अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-April
चिंतन से औचित्य के तराजू पर तोल कर अपनाना ही प्रगतिशीलता है। कोई परम्परा अथवा प्रथा केवल इसलिये अपनाये रहना कि वह प्राचीन काल से चली आ रही है अथवा किसी रीति-नीति को केवल इसलिये अपना लेना कि वह आधुनिक है, अप्रगति शीलता है। प्रगतिशीलता तो इसमें है कि हम किसी भी रीति-नीति को प्राचीनता अथवा अर्वाचीनता के आधार पर न अपनाकर उसकी उपयोगिता के आधार पर अपनायें। अनुपयोगी प्राचीन परम्परा को छोड़ने और उपयोगी आधुनिकता को अपनाने का साहस रखने वाले ही प्रगतिशील कहे जा सकते हैं।
चिंतन पर आधारित होगा तो किसी भी विवेकशील व्यक्ति पर प्रभाव न डाल सकेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-June
चिंतन, विचार एवं विवेचना को ही प्रधानता देते हैं, वे भूल करते हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र में हास्य एवं प्रसन्नता की ही प्राथमिकता है।
चिंतन क्या करना। वह अपने समय पर आयेगी, आती रहेगी। उसका विचार छोड़कर मनुष्य को जीवन की आराधना में लगा रहना चाहिये। चिन्तन का विषय जीवन है मृत्यु नहीं। मृत्यु का चिन्तन करने से जीवनी-शक्ति का ह्रास होता है जिससे मृत्यु का भय स्थायी रूप से सूक्ष्म में बस जाया करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-December
चिंतन को नवनीत की तरह पहुँचाने की साधना में निरत हैं।
चिंतन और सद्भाव का अनुदान देकर विश्वमानव की इतनी बड़ी सेवा कर सके, जो मात्र धनी व्यक्ति के लिए किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-June
चिंतन का लक्ष्य। आवश्यकतानुसार दीपक, मोमबत्ती, बिजली आदि का उपयोग प्रकाश स्थापना के लिए किया जा सकता है। पीछे यह ध्यान बिना प्रकाश उपकरणों के ही होने लगता है।
चिंतन (2) आत्मसुधार (3) आत्मनिर्माण और (4) आत्मविकास। यह चार चरण हैं— (1) आत्मचिंतन अर्थात अपने चेतन, अजर-अमर शुद्ध चेतन स्वरूप का मान। शरीर और मन में अपनी स्वतन्य एवं प्रथक सत्ता की प्रगाढ़ अनुभूति। (2) आत्मसुधार अर्थात अपने ऊपर चढ़े हुए मल-आवरण विक्षेप कषाय-कल्मषों का निरूपण, निरीक्षण और सुसंपन्न स्थिति को विपन्नता में बदल देने वाली विकृतियों की समुचित जानकारी। (3) आत्मनिर्माण अर्थात विकृतियों को निरस्त करके उनके स्थान पर सद्भावनाओं, सत्प्रवृत्तियों की उत्कृष्ट कर्तृत्व और आदर्श कर्त्तव्य स्थापित करने का सुनिश्चित संकल्प एवं साहसिक प्रयास।
चिंतन जुड़ा हुआ है। साधकों को उसी दिशा में अपने मनोयोग को नियोजित करना पड़ता है और इस प्रयास में लगाना पड़ता है कि किस प्रकार अब तक की मूढ़ताओं, भ्रांतियों और अवांछनीयताओं को चिंतन और कर्तृत्व के क्षेत्र में से बहिष्कृत करके उनकी जगह उच्चस्तरीय परिवर्तन लाया जा सकता है। वस्तुतः चार दिनों इसी उखाड़-पछाड़ में, ध्वंस निर्माण में लगना पड़ता है। सरकारी पंचवर्षीय योजनाओं के संचालक सिंचाई, सड़क, शिक्षा, बिजली, व्यवसाय आदि की बहुमुखी प्रगति के लिए सुविस्तृत योजनाएँ बनाते हैं और उनके लिए क्या किया जाना चाहिए, किस प्रकार किया जाना चाहिए, इसका ढाँचा खड़ा करते हैं। समझना चाहिए कि परिष्कृत जीवनक्रम का भावी निर्धारण करने के लिए इन चार दिनों में सुविस्तृत योजना बनाई जानी है और साधक को योजनाध्यक्ष की भूमिका निभानी है।
चिंतन करते रहने से चिंतन में नरक प्रवेश करता है और उससे क्रोध एवं विक्षोभ उत्पन्न होता है। उद्धत अहंकार को प्रत्यक्ष असुर कहा जा सकता है, जिसके कारण अपने को दूसरों से ‘बड़ा’ सिद्ध करने की 'उत' सूझती रहती है। खर्चीली साज-सज्जा के आडंबर इसी आधार पर खड़े किए जाते हैं और दूसरों को सताने-गिराने में इस पैशाचिकता के कारण प्रसन्नता होती है। इस मनःस्थिति में उलझे हुए लोगों को पग-पग पर जिन विक्षोभों का, मनोविकारों का, शोक-संतापों का सामना करना पड़ता है, उसे नारकीय यातना कह सकते हैं। ऐसे ही लोग वासनाओं, तृष्णाओं, ऐषणाओं में डूबे रहते हैं और कुकर्मों में निडर होकर लगे रहते हैं।
चिंतन का केंद्र मस्तिष्क, उससे टपकने वाला आनंद (मानवी उपलब्धियों का संतोष), उल्लास (सत्पथ गमन की प्रबल प्रेरणा) भरा सोमरस हमें उपलब्ध होता है। जीभ उसे प्राप्तकर पाचन तंत्र में भेजती है और वह अमृतरस रक्त के साथ घुलकर क्रियापद्धति के रूप में परिणत होता है। इन्हीं भावनाओं को प्रखर बनाना खेचरी मुद्रा का सारतत्त्व है।
चिंतन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है। शासन परिवर्तन जैसी राज्यक्रांति जैसी यह भाव-भूमिका है, जिसमें अनाधिकारी-अनाचारी शासनसत्ता का तख्ता उलटकर उस स्थान पर सत्य, न्याय और प्रेम संविधान वाली धर्मसत्ता का राज्याभिषेक किया जाता है। सोऽहम्-साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अंत:करण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियंत्रण नहीं रहा, उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा रहा है।
चिंतन की ही आवश्यकता पड़ती है।
चिंतन करते हुए प्रसन्नता ही अनुभव करनी चाहिए।
चिंतन के कारण उनका व्यक्तित्व इस योग्य बनता था कि जनता का सफल और समर्थ मार्ग दर्शन किया जा सके। वाचालता के व्यवसायी तथाकथित नेता या धर्मोपदेशक वह प्रयोजन किसी भी प्रकार संपन्न नहीं कर सकते। लोकरंजन की उछल-कूद करने के अतिरिक्त थोथी वाचालता और कुछ कर भी तो नहीं सकती। प्रदर्शन के ओछे स्वाँगों में नहीं, परिष्कृत व्यक्तित्व के भीतर चलने वाली सेवा-साधना ही लोक-मानस का मर्मस्पर्श करने और उसका स्तर ऊँचा उठा सकने में समर्थ हो सकती है। लोकसेवा का, जननेतृत्व का उद्देश्य इससे घटिया स्तर के लोग पूरा कर ही नहीं सकते।
चिंतन और हेय कर्तृत्व में उलझाता है। इसी से वर्त्तमान पर शोक-संताप की घटाएँ छाई रहती हैं और इसी से भविष्य अंधकारमय बनता है। यदि अपने और संसार के संबंधो का पुनर्निर्धारण किया जा सके तो उस तत्त्वबोध के आधार पर सहज ही विचार-क्षेत्र में उत्कृष्टता और क्रिया-क्षेत्र में आदर्शवादिता भर सकती है। फलस्वरूप बाह्यजीवन में स्वर्गीय वातावरण तथा अंतःजीवन में आनंद और संतोष से मुक्ति जैसा आलोक ज्योतिर्मय हो सकता है।
चिंतन में नरक प्रवेश करता है और उससे क्रोध एवं विक्षोभ उत्पन्न होता है। उद्धत अहंकार को प्रत्यक्ष असुर कहा जा सकता है, जिसके कारण अपने को दूसरों से ‘बड़ा’ सिद्ध करने की 'उत' सूझती रहती है। खर्चीली साज-सज्जा के आडंबर इसी आधार पर खड़े किए जाते हैं और दूसरों को सताने-गिराने में इस पैशाचिकता के कारण प्रसन्नता होती है। इस मनःस्थिति में उलझे हुए लोगों को पग-पग पर जिन विक्षोभों का, मनोविकारों का, शोक-संतापों का सामना करना पड़ता है, उसे नारकीय यातना कह सकते हैं। ऐसे ही लोग वासनाओं, तृष्णाओं, ऐषणाओं में डूबे रहते हैं और कुकर्मों में निडर होकर लगे रहते हैं।
चिंतन के कारण ही उत्पन्न हुई हैं। दुष्प्रवृत्तियाँ दुर्भावनाओं की बेल पर लगने वाली फलियाँ ही हैं। विश्व का सर्वनाश करने के लिए समुन्नत असंख्य विभीषिकाएँ मनुष्य के निकृष्ट चिंतन ने ही उत्पन्न की हैं। उसका निराकरण एक ही उपाय से हो सकता है कि विचारणा का स्तर ऊँचा उठाने में अग्निकांड पर जल डालने की तरह सब ओर से ध्यान हटाकर पूरी एकाग्रता के साथ जुट जाना चाहिए। अन्नदान, जलदान, धर्मशाला, मंदिर, कुआँ, तालाब, बगीचा लगाने जैसे कार्य पीछे भी हो सकते हैं।
चिंतन के साथ जुड़ा हुआ है। जहाँ क्रिया होगी वहाँ भावविस्तार भी रहेगा ही। समग्र एकाग्रता तो पूर्ण निष्क्रियता वाली स्थिति में ही संभव है। ऐसी स्थिति समाधि स्थिति की पूर्ण भूमिका में ही उत्पन्न होती है।
चिंतन कुछ ही समय में जीवन का एक प्रवाह बन जाता है और साधक का आंतरिक कायाकल्प होने से बाह्य जीवन अनासक्त कर्मयोगी जैसा उत्कृष्ट दृष्टिगोचर होने लगता है। ऐसा व्यक्ति सांसारिक दृष्टि से कृषक, पशुपालक, श्रमिक, व्यवसायी जैसे सामान्य आजीविका में निरत होने के कारण छोटा भले ही समझा जाए, पर वस्तुतः आंतरिक उत्कृष्टता के कारण वह होता अत्यंत महान ही है। अध्यात्म मूल्यांकनों की कसौटी पर कसने से उसे महामानव एवं ऋषिकाय ही ठहराया जा सकता है। राजा जनक यों सांसारिक दृष्टि से क्रियाव्यस्त व्यक्ति थे, पर अपने उदात्त दृष्टिकोण के कारण वे सदा ब्रह्मवेत्ता ही माने गए। किसी को साधारण स्तर का जीविकोपार्जन करना पड़े, इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं।
चिंतन अर्थात अपने चेतन, अजर-अमर शुद्ध चेतन स्वरूप का मान। शरीर और मन में अपनी स्वतन्य एवं प्रथक सत्ता की प्रगाढ़ अनुभूति। (2) आत्मसुधार अर्थात अपने ऊपर चढ़े हुए मल-आवरण विक्षेप कषाय-कल्मषों का निरूपण, निरीक्षण और सुसंपन्न स्थिति को विपन्नता में बदल देने वाली विकृतियों की समुचित जानकारी। (3) आत्मनिर्माण अर्थात विकृतियों को निरस्त करके उनके स्थान पर सद्भावनाओं, सत्प्रवृत्तियों की उत्कृष्ट कर्तृत्व और आदर्श कर्त्तव्य स्थापित करने का सुनिश्चित संकल्प एवं साहसिक प्रयास। (4) आत्मविकास अर्थात चिंतन और कर्तृत्व को लोक-मंगल के लिए, सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन के लिए, न परमात्म स्तर पर विकसित होने के लिए अधिकाधिक संयम, तप, त्याग, बलिदान को संतोष एवं आनंद की अनुभूति।
चिंतन आत्मिक प्रखरता को दीप्तिमान बनाने असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होता है।
चिंतन में लगाए रहती है। निद्रा और नित्यकर्म के अतिरिक्त जो शेष समय बच जाता है, उसमें भी मनन और चिंतन की प्रक्रिया में ही संलग्न रहना पड़ता है। बाहर की बातें न सोचने की मनाही इसीलिए की गई है कि आत्मचिंतन में बाधा न पड़े। चार दिन तक संन्यासी जैसी मनःस्थिति में ज्ञान और वैराग्य की भूमिका में रहने का निर्देश इसीलिए किया गया है कि अंतर्मुखी स्थिति बनाने का अवसर जो प्रायः कभी भी नहीं मिलता, वह यहाँ मिल सके।
चिंतन की एक पद्धति। मरने के बाद स्वर्ग में जाने की बातें सोचना आवश्यक है। यथार्थता यह है कि कोई भी, कभी भी अपने दृष्टिकोण में अभीष्ट परिवर्तन करके तत्काल स्वर्गलोक में प्रवेश कर सकता है और स्वर्गीय सुख-शांति का तत्काल रसास्वादन कर सकता है।
चिंतन और कर्तृत्व के अभ्यस्त व्यक्ति किसी भी राष्ट्र की बहुमूल्य संपदा सिद्ध हो सकते हैं। चरित्रवान, कर्मठ और आदर्शवादी लोग ही समाज को समुन्नत बनाते हैं। विश्वशांति में उन्हीं की भूमिका प्रमुख होती है। प्रत्यावर्तन-साधना की सफलता का सामाजिक परिणाम अत्यंत सुखद होगा। उनके हाथ में जो भी काम होगा उसे उच्चस्तरीय कर्मयोग भावना से पूरा करेंगे।
चिंतन करना पड़ता है कि यह कल्पना स्तर की बात न रहकर एक व्यावहारिक यथार्थता के प्रत्यक्ष तथ्य के रूप में दृष्टिगोचर होने लगे।
चिंतन एवं कर्तृत्व जैसी अपनी संपदाओं का एक बड़ा अंश लगना ही चाहिए। सब कुछ भौतिक जीवन ही नहीं है, समस्त विभूतियों को उसी पर निछावर नहीं कर दिया जाना चाहिए। कुछ आत्मा और परमात्मा द्वारा निर्देशित महान निर्देशों की पूर्ति के लिए भी लगाया जाना चाहिए। यह विभाजन यदि न हो सका तो इस दुर्भाग्यपूर्ण क्रियाकलाप को अपनाए रहने का परिणाम आज नहीं तो कल अनंत और पश्चाताप के रूप में ही सामने आवेगा। प्रतिबिंब के माध्यम से अपने आपको समझाया जाना चाहिए कि वह उचित-अनुचित का, लाभ-हानि का, बुद्धिमत्ता-मूर्खता का अंतर करना सीखें और समय रहे तो वह गतिविधियाँ अपनाए, जिससे शेष रही थोड़ी-सी आयु का सदुपयोग हो सके और अंधकारमय भविष्य में विभीषिका से बचा जा सके।
चिंतन में एक भारी भूल यह है कि शरीर और आत्मा को एक ही मान लिया गया है। हम अपने स्वरूप को भूल बैठे हैं और शरीर के साथ इतने रम गए हैं कि दोनों की सत्ता एक ही मानने लगे हैं। इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि शरीर के, मन के स्वार्थ अपने सुख-दुःख प्रतीत होने लगे हैं, जबकि वस्तुतः वे सर्वथा भिन्न हैं। शरीर का स्वार्थ वासना में और मन का तृष्णा की पूर्ति में हो सकता है; पर आत्मा की शांति तो जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए किए गए प्रयासों के साथ ही जुड़ी हुई है।
चिंतन और कर्तृत्व बदलने के लिए सहमत हो जाती है तो मनुष्य का कायाकल्प महामानव के,  भूसुर के रूप में हुमा तत्काल दीख पड़ने लगता है। जीवनलक्ष्य की पूर्ति इसी को कहते हैं। अपना आत्मा जिसे सबमें दीखने लगा, जिसने स्वार्थपरता और संकीर्णता की जंजीरें तोड़कर समस्त विश्व को परमात्मा का रूप माना और उसे समुन्नत बनाने के लिए आत्मसमर्पण का साहस किया, उसके लिए ईश्वरीय अनुकंपा दूर कहाँ रहती है ? वह तो स्वयं ईश्वर बन जाता है।
चिंतन और कर्तृत्व की प्रतिक्रियामात्र है। उत्थान और पतन की अंतःस्थिति का प्रतिबिंबमात्र कहना चाहिए। विक्षोभ और उल्लास का तात्त्विक विवेचन किया जाए तो उन्हें चेतना के श्वासोच्छास भर रख सकते हैं और आंतरिक स्तर में हेर-फेर संभव हो सके तो परिस्थितियों के बदलने में एक क्षण भर की भी देर नहीं लगती। इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं कि मनुष्य की अंतःनिष्ठा एवं आकांक्षा-प्रवाह में परिवर्तन हुआ तो बाह्य जीवन का सारा ढाँचा ही उलट गया। भीतरी परिवर्तन का बाह्य जीवन पर परिवर्तन- प्रभाव देखने को न मिले, ऐसा हो ही नहीं सकता।
चिंतन उसी दिशा में बहने लगा या नहीं। यदि प्रवाह की दिशा ठीक हो तो समझना चाहिए कि अभीष्ट प्रगति में आशाजनक सफलता मिल रही है।
चिंतन ने ही उत्पन्न की हैं। उसका निराकरण एक ही उपाय से हो सकता है कि विचारणा का स्तर ऊँचा उठाने में अग्निकांड पर जल डालने की तरह सब ओर से ध्यान हटाकर पूरी एकाग्रता के साथ जुट जाना चाहिए। अन्नदान, जलदान, धर्मशाला, मंदिर, कुआँ, तालाब, बगीचा लगाने जैसे कार्य पीछे भी हो सकते हैं। संपत्ति उपार्जन में थोड़ी सी ढील भी रखी जा सकती है, पर आपत्ति धर्म की तरह बौद्धिक अनाचार से लड़ने में युद्धकालीन संकट की तरह सारी शक्ति झोक दी जानी चाहिए। विचार-क्रांति की लाल-मशाल इसी प्रयोजन के लिए जल रही है।
चिंतन और कर्तृत्व बढ़ता ही नहीं। ऐसी दशा में अंतःकरण को पोषण मिल ही नहीं पाता और वह भूख-प्यास से संत्रस्त मृतप्राय: स्थिति में ही पड़ा रहता है। शरीर की, बुद्धि की, संपत्ति की, सत्ता की दृष्टि से कितने ही व्यक्ति बहुत बढ़े-चढ़े एवं सफल- श्रेयाधिकारी पाए जाते हैं। भावना की दृष्टि से, जिनमें अभीष्ट कोमलता जीवंत रह रही हो, ऐसे कोई विरले ही दीखते हैं। यंत्रवत् जीवन जीने वालों को इसकी कुछ आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।
चिंतन काया में रमी हुई अंतःचेतना को अपनी वस्तुस्थिति समझने का अवसर देता है, अस्तु उसे अपनी विचारणा में उत्कृष्ट एवं क्रियाशीलता को आदर्श बनाने के अतिरिक्त बुद्धिमत्ता भरा मार्ग और कोई सझता ही नहीं। तत्त्वबोध की प्रतिक्रिया ऋतंभरा प्रज्ञा को उपलब्ध होने के रूप में सामने आती है और व्यक्ति भ्रांतियों के भवबंधनो से मुक्त होकर समुन्नत जीवनधारा के साथ प्रवाहित होता हुआ; अंततः आनंद और ऐश्वर्य उपलब्ध करता है।
चिंतन एवं कर्त्तव्य की वस्तुस्थिति समझी-समझाई जाती है और तत्त्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक संबंधों और कर्त्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ संबंध बनाते हुए परिवार एवं समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निधारण किया जाता है। अब तक जो भेड़िया धसान जैसा अव्यवस्थिति एवं अस्त-व्यस्त जीवनक्रम चल रहा था, उसे दूरदर्शी-विवेक के आधार पर सुव्यवस्थित-सुसंचालित किया जाता है। अध्यात्म जगत की यही दो धाराएँ— पवित्र गंगा, यमुना कही जाती हैं। इन्हीं का संगम तीर्थराज प्रयाग है, जिसमें स्नान करने से परम-पुरुषार्थ का पुण्यफल प्राप्त होता है।
चिंतन के आधार पर ही संभव हो सकती है। प्रत्यावर्तन के दिनों में यही करना पड़ता है। इन दिनों में अपनी विचारपद्धति और क्रियापद्धति दोनों का ही पुनर्निर्माण व पुनर्निर्धारण करना पड़ता है, इसलिए अवांछनीय रीति-नीति को हटाने और उच्चस्तरीय क्रियाकलाप को प्रतिष्ठापित करने के लिए इन दिनों ऐसा युद्धस्तरीय पराक्रम करना पड़ता है, जिसकी तुलना समुद्र-मंथन से, महाभारत संग्राम से की जा सके। ऐसी दशा में एकाग्रता के लिए न तो निर्देश दिया गया है और न उसकी आशा ही की गई है। आगे चलकर जब एकाग्रता आवश्यक होगी तब उसकी कुंजियाँ साधकों को यथासमय मिल जाएँगी और वह कठिन प्रतीत होने वाला कार्य अत्यंत सरलतापूर्वक संपन्न हो जाएगा।
चिंतन और आदर्श कर्तृत्व की दिशा में साहस भरे कदम उठाने के लिए अदम्य उत्साह का, भाव-भरी उमंगो का उठना— यह है उल्लास। भगवान इन्हीं दो प्रेरणाओं को निरंतर पेंडुलम गति से प्रदान करते रहते हैं। मानव जीवन जैसी सृष्टि की अनुपम उपलब्धि को पाकर यदि अंत:करण आनंदित रहे और छोटे-मोटे अभावों की ओर अधिक ध्यान न देकर चारों ओर बिखरी हुई सदाशयता का अनुभव करते हुए, संतुष्ट-संतुलित रहे, तो समझना चाहिए, आनंद की उपलब्धि हो रही है। हर्षातिरेक में उछलने-कूदने या बढ़-चढ़कर शेखीखोरी की बातें करने का नाम आनंद नहीं है। उस स्थिति में दृष्टिकोण परिपक्व और परिष्कृत हो जाता है, इसलिए जिन अभावों और असफलताओं में दूसरे लोग उद्विग्न-उत्तेजित हो उठते हैं, उन्हें वह विनोद-कौतुक भर समझते हुए अपनी मन:स्थिति को संतुलित बनाए रहता है।
चिंतन वही ज्यों का त्यों है, केवल समय में ही कमी की गई है। प्रत्यावर्तन के दिनों में पंद्रह मिनट शिथिलीकरण, पंद्रह मिनट नाल जल का ध्यान करके मन को विचाररहित बनाया जाता था। वे दोनों कार्य पाँच-पाँच मिनट के कर दिए गए हैं। जिह्वा उलटकर दुनियादारी से भिन्न स्तर की अपनी रीति-नीति अपनाने का संकल्प है। उच्चस्तरीय चिंतन का केंद्र मस्तिष्क, उससे टपकने वाला आनंद (मानवी उपलब्धियों का संतोष), उल्लास (सत्पथ गमन की प्रबल प्रेरणा) भरा सोमरस हमें उपलब्ध होता है।
चिंतन के दुर्दिन चले गए। ईश्वरीय प्रकाश शरीर में सत्प्रवृत्ति और मन की सद्भावना बनकर ज्योतिर्मय हो चला। अँधेरे में भटकने वाली काली निशा का अंत हो गया। भगवान की दिव्य ज्योति ने सर्वत्र अपना आधिपत्य जमा लिया।
चिंतन और कर्तृत्व के क्षेत्र में से बहिष्कृत करके उनकी जगह उच्चस्तरीय परिवर्तन लाया जा सकता है। वस्तुतः चार दिनों इसी उखाड़-पछाड़ में, ध्वंस निर्माण में लगना पड़ता है। सरकारी पंचवर्षीय योजनाओं के संचालक सिंचाई, सड़क, शिक्षा, बिजली, व्यवसाय आदि की बहुमुखी प्रगति के लिए सुविस्तृत योजनाएँ बनाते हैं और उनके लिए क्या किया जाना चाहिए, किस प्रकार किया जाना चाहिए, इसका ढाँचा खड़ा करते हैं। समझना चाहिए कि परिष्कृत जीवनक्रम का भावी निर्धारण करने के लिए इन चार दिनों में सुविस्तृत योजना बनाई जानी है और साधक को योजनाध्यक्ष की भूमिका निभानी है। यह कार्य समाधिस्थ या एक बिंदु पर ध्यान एकाग्र करने से नही; वरन सुविस्तृत बहुमुखी गहन चिंतन से ही पूरा हो सकता है।
चिंतन और कर्तृत्व को लोक-मंगल के लिए, सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन के लिए, न परमात्म स्तर पर विकसित होने के लिए अधिकाधिक संयम, तप, त्याग, बलिदान को संतोष एवं आनंद की अनुभूति। इन चार चरणों में आत्मकल्याण का लक्ष्य प्राप्त होता है।
चिंतन से ही पूरा हो सकता है। अस्तु वही करने के लिए कहा भी जाता है।
चिंतन-प्रवाह को बहाने का अभ्यास कराया जाता है। आमतौर से मन अनेक दिशाओं में मृगतृष्णा ग्रसित होकर दौड़ता रहता है। मुख्य कार्य है, दिशा देना। चिंतन एक ही दिशा में चलाने का पूर्वार्ध पूरा होने पर ही एकाग्रता का उत्तरार्ध पूरा हो सकता है। अस्तु साधकों को आरंभ में ही यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि मन, जप, ध्यान-क्रियाएँ आरंभ करते ही एकाग्र हो जाएगा।
चिंतन का स्तर यह होना चाहिए कि सांस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ काय-कलेवर में भीतर प्रवेश कर रहे हैं। यह प्रवेश मात्र आवागमन नहीं है; वरन प्रत्येक अवयव पर सघन आधिपत्य बन रहा है। एक-एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगो के चित्र की कल्पना करनी चाहिए और अनुभव करना चाहिए, उसमें भगवान की सत्ता चिरस्थाई रूप से समाविष्ट हो गई। ह्रदय, फुफ्फुस, आमाशय, आंतें, गुर्दे, जिगर, तिल्ली आदि में भगवान का प्रवेश हो गया। रक्त के साथ प्रत्येक नस-नाड़ी और कोशिकाओं पर भगवान ने अपना शासन स्थापित किया।
चिंतन, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास के चतुर्विध महापुरुषार्थों का आश्रय लिया जाए, तो मनुष्य को लघु से महान बनने के मार्ग में फिर कोई अवरोध शेष नहीं रहा जाता। इस स्तर का प्रकाश मिल जाने पर फिर मनुष्य आत्मपरिष्कार की योजना बनाकर उसी को कार्यान्वित करने में संलग्न हो जाता है। इस दिशा में चल पड़ने वाले व्यक्ति का नर से नारायण बन जाना सुनिश्चित है। खेचरी मुद्रा हमें इसी स्तर के लाभों से लाभान्वित करती है।
चिंतन करने का, विचारणाओं को दिशा-विशेष में नियोजित किए रहने का अभ्यास कराया जाता है। एकाग्रता इस सत्र में आवश्यक नहीं मानी गई है।
चिंतन की प्रक्रिया में ही संलग्न रहना पड़ता है। बाहर की बातें न सोचने की मनाही इसीलिए की गई है कि आत्मचिंतन में बाधा न पड़े। चार दिन तक संन्यासी जैसी मनःस्थिति में ज्ञान और वैराग्य की भूमिका में रहने का निर्देश इसीलिए किया गया है कि अंतर्मुखी स्थिति बनाने का अवसर जो प्रायः कभी भी नहीं मिलता, वह यहाँ मिल सके।
चिंतन को ह्रदयंगम और आदर्श कर्तृत्व को क्रियान्वित करने के लिए आंतरिक और बाह्य अवरोधों को तोड़ता हुआ कटिबद्ध हो सके। उपासना के अनेकों विधि-विधान प्रचलित हैं, पर उनका एकमात्र उदेश्य यही है। कर्मकांडो, साधना उपक्रमों की बालपोथी के साथ भावनात्मक उत्कर्ष की उच्चस्तरीय शिक्षा-व्यवस्था की जाती है। सीढ़ियों के सहारे ऊपर चढ़ते हैं, केवल मुगदरों के सहारे पहलवान बनते हैं, पुस्तकों के सहारे विद्या प्राप्त करते हैं। ठीक इसी प्रकार साधना-विधानों के सहारे भावनात्मक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा किया जाता है।
चिंतन करने के लिए कहा जाता है। साधना और निर्दिष्टि दिशा में चलने की उन प्रेरणाओं को हृदयंगम करने की विधि क्या हो सकती है? इसी की विस्तृत योजनाएँ साधनाकाल में बनाते रहने के लिए कहा जाता है। भाव-प्रवाह को निर्दिष्ट दिशा में लगाए रहा जाए और भावी जीवन में उन प्रेरणाओं का समावेश कैसे किया जाए, इसी की योजनाएँ बनाते रहने के लिए कहा जाता है। इन साधना सत्रों में साधक को विशेष दिशाओं में चिंतन करने का, विचारणाओं को दिशा-विशेष में नियोजित किए रहने का अभ्यास कराया जाता है।
चिंतन किया जाए तो ही उसका कुछ निष्कर्ष निकल सकता है, इसलिए हर साधना-उपक्रम को माध्यम बनाकर समुद्र-मंथन जैसी मनःस्थिति रखने के लिए हर साधक को कहा जाता है। सोते-जागते उन्हें विचारों में डूबे रहने और परिवर्तन के लिए आवश्यक मार्ग ढूढ़ निकालने के लिए लगा रहा जाए तो समझना चाहिए कि अभीष्ट योग-साधना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष पूरा हो गया।
चिंतन में बाधा न पड़े। चार दिन तक संन्यासी जैसी मनःस्थिति में ज्ञान और वैराग्य की भूमिका में रहने का निर्देश इसीलिए किया गया है कि अंतर्मुखी स्थिति बनाने का अवसर जो प्रायः कभी भी नहीं मिलता, वह यहाँ मिल सके।
चिंतनपरक मस्तिष्क और क्रियापरक काय-कलेवर के बीच आदान-प्रदान की कड़ी का काम करता है। ब्रह्मसंदेशों को व्यावहारिक जीवन में ओत-प्रोत करने के लिए गतिशील बनाना खेचरी मुद्रा द्वारा सहज संभव होता है। उससे उभयपक्षीय प्रयोजन सिद्ध होते हैं। ज्ञान के रूप में विभूतियाँ उपलब्ध होती हैं और शक्ति के साथ जुड़ी हुई सिद्धियों की अवतरण प्रक्रिया संपन्न होती है। साधक में तत्त्वदर्शन की ब्रह्मचेतना भी जागृत होती है और शक्ति अवतरण से वह समर्थ सिद्धपुरुष एक महामानव भी बनता है।
चिंतन की दिशा उलटनी पड़ती है और जीवनक्रम को परिष्कृत मार्ग पर चलाने के लिए अंतःकरण को तैयार करना पड़ता है। इतनी बड़ी भूमिका प्रखर चिंतन के आधार पर ही संभव हो सकती है। प्रत्यावर्तन के दिनों में यही करना पड़ता है। इन दिनों में अपनी विचारपद्धति और क्रियापद्धति दोनों का ही पुनर्निर्माण व पुनर्निर्धारण करना पड़ता है, इसलिए अवांछनीय रीति-नीति को हटाने और उच्चस्तरीय क्रियाकलाप को प्रतिष्ठापित करने के लिए इन दिनों ऐसा युद्धस्तरीय पराक्रम करना पड़ता है, जिसकी तुलना समुद्र-मंथन से, महाभारत संग्राम से की जा सके। ऐसी दशा में एकाग्रता के लिए न तो निर्देश दिया गया है और न उसकी आशा ही की गई है।
चिंतन और कर्तृत्व अपनाते हए दिव्य जीवन की रीति-नीति अपनाई जा सके तो ही इन पूजापरक कर्मकांडों का महत्त्व है। आत्मबोध की विचारधाराओं से अंतःकरण को भरने में सहायता करना ही दर्पण उपकरण का उद्देश्य है, उसी प्रकार पूजा का उपयोग यही है कि वह जीवन निर्माण की प्रेरणाओं को उभारे और उन्हें सक्रिय बनाए। लकीर पीटने जैसी चिह्नपूजा से न तो आत्मकल्याण हो सकता है और न दर्पण का मनुहार करने से आत्मलाभ का प्रयोजन पूरा हो सकता है।
चिंतन एक ही दिशा में चलाने का पूर्वार्ध पूरा होने पर ही एकाग्रता का उत्तरार्ध पूरा हो सकता है। अस्तु साधकों को आरंभ में ही यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि मन, जप, ध्यान-क्रियाएँ आरंभ करते ही एकाग्र हो जाएगा। फिर एकाग्रता को उतना महत्त्व देने की आवश्यकता भी नहीं है, जितना कि लोग देने लगे हैं।
चिंतन (2) आत्मसुधार (3) आत्मनिर्माण (4) आत्मविकास। इन चारों ही प्रयोजनों को यह साधना-पद्धति बहुत ही सुंदर, समुचित एवं संतुलित रूप से संपन्न करती है। साधना-उपक्रम के माध्यम से उस भाव-अभ्यास की यह रूप-रेखा है, जिसके आधार पर प्राण का महाप्राण एवं आत्मा का परमात्मा के रूप में विकसित हो सकना कठिन नहीं रहता, सरल हो जाता है।
चिंतन एवं कर्तृत्व ढाला; समझना चाहिए कि इसकी जीवनकाल में ही मुक्ति हो गई। भ्रांतियों का निराकरण और उत्कृष्टता की समग्र स्वीकृति इसी का नाम जीवनमुक्ति है। इस स्थिति में पहुँचे हुए व्यक्ति ही सच्चे ईश्वर भक्त कहलाते हैं और ईश्वर, समतुल्य गौरव-गरिमा से सुसंपन्न बनते हैं।
चिंतन और भजन में भी कुछ रस आने लगता है। बच्चों की जिम्मेदारियों से प्रायः छुटकारा मिल लेता है। सादगी का रहन-सहन अपनाने में कुछ विशेष कठिनाई नहीं होती। इन सभी अनुकूलताओं की दृष्टि से ढलती आयु ही अध्यात्म साधनाओं के उपयुक्त पड़ती है। यदि यह अवधि ऐसे ही निकल जाए तो पेंसठ-सत्तर की आयु तक पहुँचते-पहुँचते शरीर का कचूमर निकल जाता है, तब जरा-जीर्ण शरीर ही एक भार बन जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-January
चिंतन शैली से की गई परिवार सेवा-गृहस्थयोग साधना बन जाती है। पिता-माता भाई-बहिन आदि का भरा-पूरा कुटुंब किसी भावनाशील व्यक्ति के लिए अपने सद्गुणों के विकास के लिए विनिर्मित प्रयोगशाला ही सिद्ध होता है। इन थोड़े से व्यक्तियों की सुव्यवस्था बनाना एक छोटे राज्य का सुशासन चलाने के समान है। नेतृत्व, सुसंचालन, सुव्यवस्था की दिशा में किसने कितनी योग्यता प्राप्त की उसकी परीक्षा पारिवारिक जीवन में बरती गई रीति-नीति से होती है। जो उसमें उत्तीर्ण होते हैं उन्हें भगवान अधिक बड़े क्षेत्र का-अधिक महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपते हैं।
चिंतन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का आदर्शवादिता का और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसंतुलित निर्धारण। इसके लिए प्रातःकाल उठते ही “हर दिन नया जनम-हर रात नई मौत” का तथ्य सामने रखकर आज की -समय परक और भाव परक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। एक ही दिन के लिए यह जनम है। आज ही रात की मृत्यु, निद्रा की गोदी में जाना है इसलिए ईश्वर प्रदत्त समय संपदा और भाव वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए-जीवन लाभ देने के लिए साहस पूर्वक तत्पर होना चाहिए। किसी भी व्यवधान को इस निर्धारण में बाधक नहीं होने देना चाहिए।
चिंतन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए। गायत्री महामंत्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही संभव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका माहात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया गया है।
चिंतन। चिंतन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का आदर्शवादिता का और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसंतुलित निर्धारण। इसके लिए प्रातःकाल उठते ही “हर दिन नया जनम-हर रात नई मौत” का तथ्य सामने रखकर आज की -समय परक और भाव परक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। एक ही दिन के लिए यह जनम है। आज ही रात की मृत्यु, निद्रा की गोदी में जाना है इसलिए ईश्वर प्रदत्त समय संपदा और भाव वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए-जीवन लाभ देने के लिए साहस पूर्वक तत्पर होना चाहिए।
चिंतन, किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनमें लगेगी उतनी ही अंतर्ज्योति प्रखर होती चली जायेगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय परिणाम होने पर जिन दिव्य संपदाओं की उपलब्धि होनी चाहिए वे सहज ही करतल गत होती चली जायेगी।
चिंतन के बन्धन में नित्य बाँधना चाहिए। रास्ते पर चलने के लिए वह तभी सहमत हो सकेगा।
चिंतन का मुख्य उद्देश्य है। कमरे में नित्य झाडू लगाते हैं, स्नान रोज करते हैं, दाँत रोज साफ किये जाते हैं, बर्तन रोज साफ करने पड़ते हैं। मन की मलीनता की आदत से विरत करने के लिए उसे स्वाध्याय और मनन-चिंतन के बन्धन में नित्य बाँधना चाहिए। रास्ते पर चलने के लिए वह तभी सहमत हो सकेगा।
चिंतन को झुठलाते समय बुद्धिवादी यह भूल जाते हैं कि जिस तर्कवाद - और प्रत्यक्षवाद को माध्यम बनाकर वे सत्य की परख करने चले है, वह आधार भी कम लचर नहीं है। उसमें आये दिन परिवर्तन होते रहते हैं। इतना ही नहीं जो कुछ देखा समझा जाता है वह भी कदाचित ही सर्वथा सत्य होता है।
चिंतन का स्वरूप शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के खाँचे में इस तरह कर देता है कि असावधानी के कारण पनपने वाली दुष्प्रवृत्तियों के पनपने की कोई गुँजाइश न रहे। ढीली-पोली जीवनचर्या पर ही विकृतियाँ सवार होती हैं यदि जागरूकता और सतर्कता बनी रहे तो दुष्ट दुर्भावों को संग लगाने का अवसर नहीं मिले। यदि वे कदाचित् आक्रमण करें भी तो सदा लड़ने और अड़ने के लिए तैयार रखता है। कभी कामुकता के विचार मन में उठें तो उसे निरस्त करने के लिए व्यभिचार से उत्पन्न होने वाले सत्परिणामों की लंबी सूची तैयार रखता है और जैसे ही उस स्तर के दुष्ट विचार उठें कि प्रतिरोधी सदाचार परायण विचार शृंखला पर गंभीरता पूर्वक ऊहापोह आरंभ कर देता है। जहाँ यह प्रक्रिया आरंभ हुई वहाँ कुविचारों के निराकरण में तनिक भी देर नहीं लगती।
चिंतन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अंतःकरण की स्वस्थता, प्रखरता, परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीन आधारों पर ही निर्भर है। गायत्री महामंत्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को कहा जा सकता है।
चिंतन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समय साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाय तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए भजन, मनन और चिंतन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है।
चिंतन। जो पड़ा है उस पर बार-बार कई दृष्टिकोणों से विचार करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उस प्रकाश को बढ़ाने का क्या उपाय है? आदर्शों को अपने व्यक्तित्व में घुलाने के प्रसंग पर ऊहापोह करना, मनन और चिंतन का मुख्य उद्देश्य है। कमरे में नित्य झाडू लगाते हैं, स्नान रोज करते हैं, दाँत रोज साफ किये जाते हैं, बर्तन रोज साफ करने पड़ते हैं। मन की मलीनता की आदत से विरत करने के लिए उसे स्वाध्याय और मनन-चिंतन के बन्धन में नित्य बाँधना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-February
चिंतन की पड़ जाए तो पग-पग पर दुःख-दुर्भाग्य के घेरे में अपने को घिरा हुआ अनुभव किया जाएगा; पर यदि सृजनात्मक एवं सुसंभावनाओं के चिंतन की दिशा मिल जाए तो हर किसी को, अपने को, हर घड़ी सुखी-संतुष्ट एवं आशा-उत्साहभरे स्वर्गीय वातावरण में रहने की अनुभूति होती रहेगी।
चिंतन, ध्यान-धारणा का फल, मन को जीवन का स्वरूप और लक्ष्य समझाने के लिए, इच्छा-आकांक्षाओं को आत्मकल्याण के लिए, कुछ सोचने-करने के लिए, उत्साहित एवं अभ्यस्त करने का प्रयोजन पूरा करती है। साधनों का अंतिम चरण आस्था को, श्रद्धा को, भावना को, आकांक्षा को देवदृष्टि के साथ जोड़ देता है।
चिंतन और कर्तृत्व बदल डालता है तो उसका नर से नारायण स्थिति में हुआ परिवर्तन देखते ही बनता है। पदासीन और पदमुक्त स्थिति के अधिकारी में जो अंतर उत्पन्न होता है, उसे देखकर सहज ही समझा जा सकता है कि व्यक्तित्व के कितने भारी परिवर्तन होते रहते हैं। राजा को रंक, यशस्वी को निंदास्पद और बलिष्ठ को लकवाग्रस्त हो जाने पर जो उलट-पुलट होती है, उसे देखकर सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि व्यक्तित्व नाम की कोई वस्तु स्थिर नहीं है। उसमें परिवर्तन होते हैं, होते रह सकते हैं।
चिंतन की एक विशेष शैली नियत— निर्धारित है, जो उसी समय बताई जाएगी। मुख्यतः शरीर और मन की स्थिरता और शांति को स्थिर रखने पर ही ध्यान दिया जाएगा। एक से दूसरे में शक्ति का हस्तांतरण होते समय ऐसी स्थिरता आवश्यक है। रक्तदान के समय, इंजेक्शन लगने के क्षणों में, ऑपरेशन की घड़ियों में रोगी को हिलने-डुलने नहीं दिया जाता, उसे निश्चल रहना पड़ता है। उथल-पुथल करने से तो सारा प्रयत्न ही गड़बड़ा जाता है।
चिंतन-मनन इन दोनों के समन्वय से तप का प्रयोजन पूरा होता है। इसलिए स्वाध्याय को भी तप का अंग माना गया है।
चिंतन एवं परमार्थपरायणता का आश्रय लेकर किसी भी उर्वर मस्तिष्क को इस योग्य बनाया जा सकता है कि वह अपने प्राण-प्रवाह से समीपवर्त्ती लोगों को सुचिंतन के लिए उत्तेजित कर सके और सद्भावनाओं से ओत-प्रोत गति के लिए बाध्य कर सके। प्राचीनकाल के ऋषि-मुनि यही कार्य करते थे। अब उसे विज्ञानवेत्ता यंत्र-उपकरण के माध्यम से, विद्युत-विकरण द्वारा कार्यांवित करने के लिए प्रयत्नशील हैं।
चिंतन में उत्कृष्टता और कर्तृत्व में आदर्शवादिता के समावेश जैसा दिखाई पड़े। इस कसौटी पर आत्मवादी को अपनी अंतरंग स्थिति की निरंतर परख करते रहना चाहिए।
चिंतन के लिए उत्तेजित कर सके और सद्भावनाओं से ओत-प्रोत गति के लिए बाध्य कर सके। प्राचीनकाल के ऋषि-मुनि यही कार्य करते थे। अब उसे विज्ञानवेत्ता यंत्र-उपकरण के माध्यम से, विद्युत-विकरण द्वारा कार्यांवित करने के लिए प्रयत्नशील हैं।
चिंतन स्तर के अनुरूप उसमें सामयिक परिवर्तन होते रहते हैं। सूक्ष्मदर्शी उसकी भिन्नताओं को रंग बदलते हुए परिवर्तनों के रूप में देख सकते हैं। शांति और सज्जनता की मनःस्थिति हलके नीले रंग में देखी जाएगी। विनोदी, कामुक, सत्तावान, वैभवशाली, विशुद्ध व्यवहार, कुशलस्तर की मनोभूमि पीले रंग की होती है। क्रोधी, अहंकारी, क्रूर, निष्ठुर, स्वार्थी, हठी और मूर्ख मनुष्य लालवर्ण के तेजोवलय से घिरे रहते हैं, हरा रंग सृजनात्मक एवं कलात्मक प्रवृत्ति का द्योतक है।
चिंतन के प्रवाह को किस दिशा में मोड़ते हैं। दैनिक खाद्य पदार्थों में भक्ष्य-अभक्ष्य का विभेद भारत में इसी दृष्टि से होता रहा है। इसके अतिरिक्त यज्ञचरु, पंचामृत, सोमरस, ब्रह्मकल्प सरीखे देवहव्य भी विनिर्मित करने की प्रक्रिया भी धार्मिक कर्मकांडों के साथ संपन्न की जाती रही है, जिसका सेवन करने से मनुष्य को प्रकृति में भरे हुए दोष-दुगुणों का निष्कासन और सद्भाव-अभिवर्द्धन का उद्देश्य पूरा हो सके। देवप्रसाद वितरण के पीछे यही प्रयोजन सन्निहित है। खाद्य पदार्थों की मूलभूत सूक्ष्म सात्विकता के साथ-साथ यदि उन में मंत्रविधान एवं आत्मबल समन्वय का अन्य उपाय जोड़ दिया जाए तो वे देवहव्य भी वांछनीय विचार परिवर्तन संपन्न कर सकते हैं।
चिंतन मुद्रा में थे। शिष्यों की जिज्ञासाओं को अधीर होते देख शाणवास किंचित मुस्कराए, मानो दबता हुआ सूर्य अब भी अपनी प्रखरता सिद्ध करना चाहता हो।
चिंतन की गहराई ही काम आती है। अतिभावुकों की बात अलग है, सामान्यतया विश्वास उपलब्ध करने के लिए प्रामाणिकता की कसौटियों पर खरा उतरना पड़ता है। इस अग्नि परीक्षा में उत्तीर्ण वही हो सकता है, जिसने आदर्शो को आग में तपाकर अपने व्यक्तित्व को प्रखर एवं परिपक्व बनाया है। इस मार्ग पर चलते हुए ‘बड़ा आदमी’ बना नहीं जाता है।
चिंतन का उभयपक्षी विवेचन करती है। संभव-असंभव, हानि-लाभ आदि के सभी पहलुओं पर विचार करके उपयोगी निर्णय करने में सहायता करती है। चित्त दीर्घकालीन अभ्यास-संपर्क के आधार पर स्वभाव, रुचि एवं अनुकूलता को स्थिरता उत्पन्न करता है। अहंकार, अपनेपन का भाव, शरीर, मन, वस्तु अथवा व्यक्तियों में आरोपित करके उन्हें रुचिर बनाता है। उसकी मात्रा घट जाने पर उपेक्षा, उदासीनता, विस्मृति उत्पन्न होती है और विकृति-विग्रह उत्पन्न होने पर घृणा-द्वेष की स्थिति बनती है।
चिंतन, मनन, स्वाध्याय और सत्संग के आधार पर सद्भावनाओं का समुचित संग्रह अपने भीतर जमा करें और उसमें से साररूप में जो सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हो, उसी को जिह्वा पर आने दें। जीभ में अमृत भी है और विष भी। विषपान करने वाले मुख के रास्ते ही उसे भीतर ले जाते हैं। दुर्भावग्रस्त संस्कारसहित वाणी को भी विष ही कहा गया है। वह प्रथम अनर्थ वक्ता का ही करती है, उसकी गरिमा का हनन करती है और दूसरों की दृष्टि में उसका सम्मान गिरा देती है; किंतु यदि अमृतवचन बोले जाए तो उसमें वक्ता को अपने आप में उल्लास का उभार दीखता है और समीपवर्त्ती लोग उसका रसास्वादन करके तृप्त होते हैं।
चिंतन, आत्मशोधन, आत्मनिर्माण और आत्मविकास के उपक्रम ही तप-साधना के, उपासना-अर्चा के मूल मर्म हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के अमर फल आत्मदेवरूप कल्पवृक्ष को सींचने-संजोने से ही प्राप्त किए जा सकते हैं। जिसने ब्रह्मविद्या के इस मर्म को समझ लिया, उसी के हाथ आत्मिक विभूतियाँ लगने की आशा की जानी चाहिए।
चिंतन करते रहने से सुखद-स्वप्न आँखों के आगे तैरते रहते हैं और कई बार वे इतने मधुर होते हैं कि सुसंपन्न लोगों की तुलना में अधिक उल्लास उमगता रहता है।
चिंतनकाल आत्मकल्याण की योजना बनाने में भी खरच होना चाहिए। कमाई का आधा अंश शरीर को, आधा आत्मा के लिए खरच किया जाए। समय और श्रम को भी इसी प्रकार विभक्त किया जाए और अंतरंग में जितनी आकांक्षाएँ लौकिक सुख के लिए उठती हैं, कम-से-कम उतनी ही आत्मकल्याण के लिए उठनी चाहिए। पारमार्थिक भावनाओं का वेग स्वार्थ-साधन से किसी भी प्रकार कम नहीं होना चाहिए। जो उतना साहस कर सके समझना चाहिए कि उसे आत्मवादी देवपक्ष में खड़ा होने का अवसर मिल गया।
चिंतन की दिशा मिल जाए तो हर किसी को, अपने को, हर घड़ी सुखी-संतुष्ट एवं आशा-उत्साहभरे स्वर्गीय वातावरण में रहने की अनुभूति होती रहेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-August
चिंतन, एक ही क्रम से, ऐसे ढंग से चला, मानो एक ने दूसरे की नकलची परीक्षार्थियों की तरह नकल टीप या चोरी की हो। वस्तुतः यह विशेष मनोयोगपूर्वक निःसृत विचारधारा का ही चमत्कार होता है, जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक दौड़ जाने से रोका नहीं जा सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-October
चिंतन में कृपणता का समावेश भर रहा है। यदि उस अभ्यस्त ढर्रे में थोड़ा सा परिवर्तन किया जा सके तो सहज ही उस दिशा में कुद कदम उठने लगेंगे जिससे युग-धर्म का निर्वाह होने लगे। नवरात्रि साधना की सफलता का अनुमान ऐस निष्कर्षो से ही निकलता है, जिससे अभ्यस्त ढर्रे में पुण्य प्रयोजनों के समावेश का रास्ता निकले।
चिंतन को ऐसा मोड़ दिया जाए संम्भव जिसके सहारे महामानवों की श्मिका सम्पन्न कर सकना सम्भव हो सके। यह प्रथम चरण है। दूसरा चरण उपलब्ध प्रतिभा का युग सृजन में शवभरा नियोजन है। जो अपनी दिशाधारा को इस शैली में ढाल सकेगे उन्हीं के लिए संभव होगा कि वे समुद्र लाँधते, पर्वत उठाने, लंका जलाने, मृत लक्ष्मण को जिलाने, राम को सीता दिलाने और विश्व वन्ध, श्क्त शिरोमणि हनुमान वन सकने का सौभग्य प्राप्त कर सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-March
चिंतन में उभारना चाहिए। और इतना साहस एकत्रित करना चाहिए कि आन्तरिक दुर्बलताओं एवं बाहरी अवरोधों से जूझते हुए उस प्रयोजन में तत्पर हुआ जा सके जो युग-निर्माण परिवार के सदस्यों के सामने विशेष रूप प्रस्तुत हुआ है। हमें इस मिशन का साधारण समर्थन कर्ता सदस्य ही नहीं बने रहना चाहिए वरन् एक कदम आगे बढ़ाकर सृजन सेना का ऐसा सैनिक बनना चाहिए जिसके पीछे अनुयायियों की एक बड़ी पंक्ति भी कदम से कदम मिला कर अग्रसर होती हुई दिखाई दें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-April
चिंतन एवं विवेचन की बात एकाएक ही है कि हमें जो सामर्थ्य प्रजनन प्रयोजन के लिए मिली है उस का उपयोग अभीष्ट उद्देश्य के लिए कर रहे हैं या नहीं। यदि इस कसौटी पर चिन्तन खरा उतरे तो समझाना चाहिए कि हमारी सोचने की क्षमता सार्थक सिद्ध हो रही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-May
चिंतन और मनन का महात्म्य इसीलिए बनाया गया है कि उससे आत्म सुधार और आत्म निर्माण के दोनों पक्ष पूरे होते है स्वाध्याय ओर सत्संग की महिमा भी इसी आधार पर इतने विस्तार से बखानी गई है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-July
चिंतन आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास के क्षेत्रों में प्रखरता उत्पन्न करने के लिए स्वाध्याय से बढ़ कर और कोई सहायक साधन कदाचित ही होगा। इसके लिए ऐसी पुस्तकों का सहारा लेना चाहिए जो उपरोक्त प्रयोजन सही रूप से पूरा कर सकने की क्षमता से पूर्ण हों। प्राचीन ग्रन्थों का कथा पुराणों का पृष्ठपेषण लकीर पीटने की तरह करते रहें तो उससे समय तो बहुत नष्ट होगा पर हाथ कुछ न लगेगा। भाषा संस्कृत हो या हिन्दी, मराठी। पुस्तक पुराने जमाने की लिखी हुई यो या अब की, इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं।
चिंतन के चार चरण ब्रह्मविद्या की उपलब्धि के आधार माने गये हैं। इन्हें साधना परायण जीवन क्षेत्र में प्रवेश करने वाले स्वयमेव भी अपने में तो साधना की आवश्यकता पूरी करते रह सकते है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-September
चिंतन और चरित्र व्यवहार का अंग बन कर उसी घटिया स्तर को बनाए रहा। सुधार का कोई प्रयत्न न हुआ। फलतः जहाँ भी संपर्क सधा वहाँ घृणा, उपेक्षा और अवमानना ही प्रतिक्रिया बन कर प्रकट हुई। दयावश किसी ने कभी कोई टुकड़ा फेंक दिया हो तो वह दूसरी बात है किन्तु ठोस और महत्वपूर्ण सहयोग करने के लिए कोई विचारशील तैयार नहीं होता क्योंकि बुद्धिमत्ता द्वारा यह सहज ही समझ लिया जाता है कि दलदल में डाली गई कोई वस्तु उसी में फँस कर रह जाती है। न वह स्वयं उबरती है और न दूसरों को उबारती है।
चिंतन और संकल्प
चिंतन और चेतन शिथिल रहता है। इसका लाभ उनके अचेतन को मिलता है और वे योगियों जैसे कितने ही अद्भुत कार्य कर सकते हैं।
चिंतन कोश “द थियेटर इन लाइफ” के अनुसार स्वयं के नैसर्गिक सौंदर्य को विकसित करने के बजाय मुखौटे बदलते रहते हैं। कभी एक कभी दूसरा। इन्हीं को छाँटते-चेहरे पर चिपकाते जिन्दगी बीत जाती है।
चिंतन और आदर्श चरित्र की गौरव गरिमा बनाये रहे हैं। पवित्रता एवं प्रखरता पर आधारित व्यक्तिवादी संकीर्ण चिन्तन सर्वथा एकाँगी है। नीति मर्यादा का पालन करने वाला आदर्शवादी व्यक्ति आत्मकल्याण की साधना के साथ-साथ समाज की भी भलाई करता है। वह समाज के लोगों से सहानुभूति रखता है और उन्हें अपने उत्कृष्ट विचारों एवं श्रेष्ठ व्यवहार से निरन्तर ऊँचा उठाने का प्रयास करता है।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार आदर्शों से ओत प्रोत हो। न केवल व्यक्ति जीवन में संयम सदाचार बरतें वरन् अन्यान्यों के प्रति भी हमारा उदात्त दृष्टिकोण रहे, तभी उसे समग्र नैतिकता कहा जा सकता है।
चिंतन, व्यवहार जैसा होना चाहिए, वैसा हो। हम ब्राह्मण बन गए। क्यों? आप नहीं थे क्या? कौम से तो हम ब्राह्मण थे, एक धनाढ्य ब्राह्मण के घर जन्म हुआ है हमारा, पर कोई भी आदमी जन्म से ब्राह्मण नहीं होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-August
चिंतन, शेष सभी पदार्थ नश्वर हैं, नष्ट होने वाले हैं। विचारणा ने ही एकमेव अमरत्व पाया है। अतः अब मनुष्य को जिन नवीन विचारणाओं से दिशा मिलने वाली है, उनसे वह समस्त संसार को, युग को बदले बिना नहीं रहेगा। वर्तमान भौतिकवादी मान्यताओं, साम्प्रदायिक मान्यताओं, दर्शनों आर्थिक तथा राजनीतिक ढाँचों-कलेवरों के प्रति उसकी आस्था हटने लगी है, संतोष जाने लगा है। सबके प्रति एक रचनात्मक विद्रोह की आवाज सर्वत्र गूँज उठी है।
चिंतन एवं दृष्टिकोण का मनःशास्त्र के आधार पर विश्लेषण किया है। उन्होंने उस आधार पर जो निष्कर्ष निकाले हैं, वे अति उपयोगी तथा हर व्यक्ति का मार्ग दर्शन करने में सक्षम हैं।
चिंतन की धारा निषेध की उल्टी तरफ बहकर विधेयात्मक मार्ग अपनाती है।
चिंतन क्षेत्र की विकृति से बचा जा सके तो मस्तिष्क की सहायक प्रणालियाँ स्वस्थ बनी रहेगी और इस प्रकार मनुष्य 150 से 200 वर्षों तक के लम्बे जीवन का सुख भोग सकेगा।
चिंतन है, जिसमें मनुष्य काम को छोटा मान कर उनमें रस नहीं लेता। सामान्य और असामान्य व्यक्तियों में मौलिक अंतर यह पाया जाता है कि सामान्य व्यक्ति जिस काम को छोटा मानकर उपेक्षा कर देते अथवा उसे करने में मनोयोग का परिचय नहीं देते महापुरुष उनमें भी पूरी तल्लीनता मनोयोग से जुटे दिखाई पड़ते हैं। वे काम के प्रतिफल पर नहीं उसके स्तर पर अपना ध्यान केन्द्रित रखते हैं। यह असाधारण मनोयोग ही अन्ततः श्रेष्ठ परिणामों का भी कारण बनता है।
चिंतन का स्वरूप भी निर्धारित करना पड़ता है। कारण कि उत्कृष्ट जीवन की ओर चलने में सर्वाधिक सहायक अथवा बाधक अपना चिन्तन एवं दृष्टिकोण ही होता है।
चिंतन एवं भावना क्षोभ से ग्रस्त मनुष्य अनेकानेक रोगों से घिरा रहता है। “इन्फलुएन्स ऑफ द माइण्ड अपॉन द बॉडी” नामक अपनी कृति में सुप्रसिद्ध चिकित्सा मनोविज्ञानी डॉ. अलबर्ट ड्यूक का मत है कि विक्षिप्तता, मूढ़ता, अंगों का निकम्मा हो जाना, पाण्डुरोग, केश-पतन, घबराहट, मूत्राशय के रोग, चर्मरोग, फोड़े-फुँसी, एक्जिमा आदि अनेक स्वास्थ्य नाशक रोग मानसिक विकारों एवं भावनात्मक उद्वेलनों के परिणाम मात्र हैं। मानसिक क्षोभ, भावनात्मक उद्वेलन, निषेधात्मक चिन्तन यह सभी सूक्ष्म शरीर की विकृतियाँ है। जिनका स्थूल शरीर पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार परिष्कृत दृष्टिकोण, स्वस्थ उदात्त चिन्तन, आदर्शवादी विचारधारा सूक्ष्म शरीर को तेजस्वी प्रखर बनाती हैं और उसका श्रेष्ठ प्रभाव स्थूल शरीर पर भी स्पष्ट देखा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-March
चिंतन में कहीं कोई कमी अवश्य है। मनीषियों का कहना है कि मनुष्य अथवा मनुष्यता की परिभाषा उसके नैतिक मूल्यमानों पर, आन्तरिक उत्कृष्टता पर आधारित होनी चाहिए, जो सही भी है।
चिंतन प्रक्रिया जनित विभिन्न सूक्ष्म संस्कार जमा होते रहते हैं और अचेतन मन का निर्माण करते हैं। यदि उनका स्तर निकृष्ट हुआ तो तदनुरूप व्यक्तित्त्व भी बनेगा और मन में भी विक्षोभ पैदा करेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-November
चिंतन एवं संकीर्ण स्वार्थपरता दृष्टिकोण में सम्मिलित होने के कारण अपनी शक्ति, अपना व्यक्तित्व, इतना घटिया एवं निकृष्ट बना डालते हैं, जिसे मानवोचित गरिमा के विपरित ही कह सकते हैं। ऐसे लोगों को नर तन धारी नर पशु की संज्ञा दे सकते हैं जिनके प्रत्येक क्रियाकलाप में पशु−प्रवृत्ति की बू आती है। उत्कृष्ट चिंतन एवं आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाना तो जैसे इन्होंने सीखा ही न हो। सामान्य जीव जन्तुओं की तरह पेट भरने और प्रजनन के कौतुक का रसास्वादन करने के लिए जीवित रहते हैं। उन्हें न मर्यादाओं के प्रति श्रद्धा होती है और न वर्जनाओं से बचने की ललक।
चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार में, प्रत्येक क्रियाकलाप में आयु,
चिंतन और व्यवहार को तपा-तपाकर ऐसे स्थायी और सुगढ़ ढाँचे में ढाल लिया था, कि जिसके वासंती बयार से शिष्यगण भौंरों की भाँति उमड़े चले आ रहे थे। दिन-दिन उनकी संख्या बढ़ती ही चली जा रही थी और मलयानिल की तरह दम्पत्ति के सुमधुर आचरण की सुगंध का प्रसार भी विस्तृत होता जा रहा था। फलतः देर रात तक उन्हें अध्ययन संबंधी कठिन परिश्रम करना पड़ता।
चिंतन की आवश्यकता मरुभूमि में बरसात के सदृश है।
चिंतन के स्तर को ऊंचा उठाए, उसे आत्म में उतारने का साहस भी प्रदान करे। वस्तुतः न तो नीत्शे का व्यक्तिवाद ही व्यावहारिक है और न ही मार्क्स का समाजवाद। उनमें से प्रथम व्यक्ति को ही सब कुछ मानता है द्वितीय समाज को। किन्तु व्यावहारिकता की कसौटी दोनों को ही असफल सिद्ध करती है।
चिंतन ही ऐसा है जो इन दोनों के मध्य सुरुचि पूर्ण से सामंजस्य का संस्थापन करता है, जहाँ वैयक्तिक उन्नति की ऊँचाइयों को आत्मा के शीर्ष स्थल पर ले जाता है वहीं यह भी उपदिष्ट करता है कि व्यक्ति और कुछ नहीं समष्टि का एक अभिन्न अंश है।
चिंतन चरित्र एवं व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश करते हैं फलस्वरूप गुण, कर्म स्वभाव की कसौटी में खरा सिद्ध हो कर आत्म सन्तोष एवं लोक सम्मान प्राप्त करते हैं।
चिंतन मनन भी करते जा रहे थे, अभी थोड़ी ही देर हुई होगी कि कुटीर के अंदर से पत्नी की वाणी उनने कानों से टकरायी “स्वामी”! भोजन तैयार है, ग्रहण कर लें।”
चिंतन से युक्त तथा पूर्वाग्रहों से मुक्त हो। औचित्य को प्रधानता देकर मानवीय आदर्शों को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए। यह एक ऐसी संजीवनी है जो शालीनता नीतिमत्ता को पुनर्जीवित कर सकती है। प्रगति व शान्ति का वातावरण सुरक्षित रख सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि इस हेतु हर क्षेत्र से प्रबल प्रयत्न किया जाय।
चिंतन एवं आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाना तो जैसे इन्होंने सीखा ही न हो। सामान्य जीव जन्तुओं की तरह पेट भरने और प्रजनन के कौतुक का रसास्वादन करने के लिए जीवित रहते हैं। उन्हें न मर्यादाओं के प्रति श्रद्धा होती है और न वर्जनाओं से बचने की ललक। अंकुश और नियंत्रण के अवरोधों से बाधित होकर ही वे अनुचित को अपनाने से रुक पाते हैं। स्वच्छता और क्षमता रहने की स्थिति में उन्हें मर्यादा पालन में कोई उत्साह नहीं रहता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-January
चिंतन चक्र चल पड़ा। अनेक गुण हैं उसमें स्वाध्यायी है, विनयशील है, कर्मठ है, सत्यवादी है। संक्षेप में एक महापुरुष के लिए जितने गुणों की अपेक्षा रहती है, प्रायः वे सभी हैं। यदि कोई दोष है तो यह कि हठी है। यों जीवन के अन्य विषयों में पारस्परिक व्यवहार में नीति परामर्श में उसका हठ कहीं भी आड़े नहीं आता।
चिंतन-मनन के अंतर्गत किया जाता है। चिन्तन का तात्पर्य है भूतकाल की भूलों को सुधारना और वर्तमान की सार्थकता पर कड़ी नजर रखना। मनन कहते हैं- भावों योजनाओं का निर्धारण और उन्हें पूरा करने के लिए योजनाबद्ध क्रिया -कलाप का निर्धारण। यह चिन्तन-मनन थोड़ा समय हर दिन निकाल कर करते रहना चाहिए, ताकि संयम साधना में कहीं चूक न होने पावे। इसे साप्ताहिक रूप में तो विशेष तत्परतापूर्वक अपनाया जाना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-February
चिंतन का मतलब आस्तिकता। आस्तिकता का मतलब कोई कर्मकाण्ड नहीं देवी-देवताओं की भीड़ के सहारे जीवन की परावलम्बिता नहीं। इसका तात्पर्य तो उस जीवन शैली से है जो न केवल स्वयं पर विश्वास करना सीखती है बल्कि यह भी शिक्षण देती है कि अपने विकास की असीम सम्भावनाओं को मत भूलो।
चिंतन करना आरंभ कर दे और उसके कल्पना चित्रों को मन में गहरी जड़ें जमाने दें, तो कोई कारण नहीं कि अगले ही दिनों वह कठिन श्रम, सत्प्रयोजनों एवं अध्यवसाय से जुड़कर वास्तविकता का रूप ग्रहण न कर ले और इक्कीसवीं सदी में प्रगति की उच्चस्तरीय संभावनायें साकार रूप में सामने खड़ी न दीखने लगें।
चिंतन में इन दिनों जो विस्मयकारी परिवर्तन परिलक्षित हो रहे हैं, आदर्शवादी कल्पनायें उठ रही हैं, उनसे यह सुनिश्चित आशा बँधी है कि आने वाला समय स्वर्णिम युग होगा।
चिंतन चेतना वही, शाश्वत है। सामूहिकता-संघशक्ति का जागरण ही वैयक्तिक व समष्टिगत दुष्प्रवृत्तियों का समाधान है।
चिंतन को सृजनात्मक जीवन का आधार बताते हैं। उन्हीं के शब्दों में विधेयात्मक चिंतन का मतलब आस्तिकता। आस्तिकता का मतलब कोई कर्मकाण्ड नहीं देवी-देवताओं की भीड़ के सहारे जीवन की परावलम्बिता नहीं। इसका तात्पर्य तो उस जीवन शैली से है जो न केवल स्वयं पर विश्वास करना सीखती है बल्कि यह भी शिक्षण देती है कि अपने विकास की असीम सम्भावनाओं को मत भूलो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-May
चिंतन चेतना के ढाँचे में ढालना आरंभ कर देता है जैसा उसका निज का होता है। प्रकारान्तर से यह भी मनोवैज्ञानिकों की उसी अवधारण को परिपुष्ट करता है, कि संकल्प के अनुसार मन, प्राण, शरीर भी प्रभावित होते हैं। संकल्प जैसा हुआ प्रभाव भी वैसा ही उत्पन्न करता है। रामकृष्ण परमहंस के बारे में कहा जाता है कि जब वह दक्षिणेश्वर में रह कर हनुमान की साधना कर रहे थे, तो उस दौरान उनके हाव-भाव और आचरण बन्दरों की भाँति ही हो गये थे। वैसे ही उछल कर पेड़ों पर चढ़ जाते जैसे कोई बन्दर।
चिंतन तंत्र को ही बुरी तरह झकझोर देती हैं। साथ ही ऐसी स्थिती बना देती हैं कि मानस सही तरीके से सोचने समझने में समर्थ न रहे और प्रवाह जिस ओर भी चल पड़े, फिर रोके न रुके।
चिंतन-चरित्र एवं व्यवहार में समाविष्ट कर लेने का नाम हैं। जो आस्तिक है वह भले ही मन्दिरों, पूजा-गृहों में न जाता हो पर यदि वह परमसत्ता का अनुशासन जीवन में उतारता है, जीवन सही ढंग से जीता है, सृष्टि को एक उद्यान मानते हुए माली की तरह उसकी सिंचाई करता है तो वह सच्चे अर्थों में आस्तिक है। नास्तिक तो वह हैं जो बाह्याडंबर कितने ही रचता हो, दिखता तो धार्मिक हो पर जीवन के किसी भी कोने से आदर्शवाद, सच्चरित्रता, उत्कृष्टता का एक अंश भी न झलकता हो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-October
चिंतन की भरमार से विषाक्त अदृश्य वातावरण और इससे फिर लोकमानस में असुरता निकृष्टता का बढ़ना-प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों ही स्तर पर, दैवी प्रकोप जीवधारियों पर बरसना यह एक ऐसा कुचक्र है जो एक बार चल पड़ने पर फिर टूटने का नाम नहीं लेता। लोक चिन्तन व प्रवाह का अदृश्य वातावरण से बड़ा गहरा व अन्योन्याश्रय संबंध है। ऐसे विग्रह व संकट न सुलझते हैं, न घटते हैं, न टलते हैं।
चिंतन का प्रवाह उलटे बिना, विनाश की विभीषिका को विकास की संभावना में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। चिन्तन की दिशाधारा को सुव्यवस्थित करने वाले दिव्य प्रवाह को युगान्तरीय चेतना कहा जा सकता है। यही युग शक्ति गायत्री है और इसी को युग परिवर्तन का उद्गम स्रोत समझा जाना चाहिए।
चिंतन का जो प्रवाह इन दिनों चल पड़ा है उसे रोकने और भाव भरी दिव्य श्रद्धा की प्रतिमा उसे मानने की, जन चेतना उत्पन्न करने की दृष्टि से भी यह स्थापना अतीव उपयोगी है। गायत्री माता का वाहन हंस माना गया है। हंस अर्थात् स्वच्छ, धवल, कलेवर, नीर क्षीर विवेक का प्रतिनिधि, मोती चुगने या लंघन करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ। वास्तव में यह परिभाषा आध्यात्मिक हंस की हैं। संकेत यह है कि परमात्मा की दिव्य शक्ति को धारण करने के लिए साधक को अपनी उत्कृष्टता हंस स्तर की विकसित करनी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-June
चिंतन के रूप में जीवन अपने खोए सौंदर्य को प्राप्त कर सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-December
चिंतन और क्रियाकलाप जिनसे भी बन पड़ेगा वे भटकाव की अस्त व्यस्तता से अपनी बरबादी को बचा लेंगे और उस बचत के सहारे उच्चकोटि की सफलताएँ प्राप्त कर सकेंगे। सफल जीवन ऐसे ही लोगों का होता है। यशस्वी वे ही बनते हैं। ध्यान योग का छोटा सा अभ्यास, छोटी सी चेष्टा अंततः कितना बड़ा सत्परिणाम उत्पन्न करती है। इसे देखते हुए उनकी उपमा बीज के माध्यम से वट वृक्ष बनने के रूप से दी जा सकती है।
चिंतन करने पर विवश कर दिया है। जो त्रासदी हुई है, उसे आँखों से देखने के बाद दिल दहल उठता है। मानवी संवेदना जिन्दा है इसलिए सहायता भी पहुँची है किन्तु जिन तक पहुँचना चाहिए था, उन तक या तो नहीं पहुँची या देर से पहुँची।
चिंतन की परिधि बनाकर संबंधित घटनाक्रमों पर गहराई से विचार करते रहा जा सकता है। किसी गीत या श्लोक के भावार्थ पर भी देर तक चिंतन को केन्द्रित रखा जा सकता है। संगीत की कोई ध्वनि इसके लिए चुनी जा सकती है। किसी मनुष्य या प्राणी की किसी विशिष्टता पर भी ध्यान केन्द्रित किया जा सकता है।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश करने की अपनी संस्कृति है जो उसे अपनाने अभ्यास में उतारने में आनाकानी करते हैं वे उस प्रसन्नता एवं यशस्विता से वंचित रह जाते हैं जो मनुष्य जन्म की जिम्मेदारी समझने वाले को मिलनी ही चाहिए।
चिंतन चरित्र व व्यवहार नितान्त असाधारण रहे हैं। उनके दृष्टिकोण में उच्च आदर्शवादिता का समावेश रहा है। यदि ऐसा न होता तो संभवतः वे महामानवों की श्रेणी में न आ पाते और इतिहास पुरुष नहीं बन पाते। इस असाधारण स्तर के विकास में उनके द्रष्ट भाव की ही प्रमुख भूमिका होती है। यदि वे द्रष्ट न होते तो काल के प्रवाह में न जाने कब, कहाँ खो जाते, कुछ पता न चलता और अंततः काल पुरुष बनकर अविस्मरणीय लोगों की पंक्ति में ला खड़ा कर देता है।
चिंतन, चरित्र, व्यवहार की उत्कृष्टता ही नहीं मस्तिष्कीय चेतना की प्रखरता भी बढ़ा सकता है। मानसिक दृष्टि से ओछे एवं पिछड़े हुए मनुष्यों को बौने मन वाला कहा तथा और भी उपहासास्पद माना जा सकता है।
चिंतन संग्रह “डिस्कवरिंग अवरसेल्वस” के अनुसार ध्यान मानव के चरम और परम विकास का सीधा, सरल व लघुत्तम मार्ग है। कर्म इस विकास की अभिव्यक्ति का माध्यम। यों किसी न किसी रूप में इनका थोड़ा बहुत संपर्क बना रहता है पर इतना काफी नहीं। अनिवार्यता इस बात की है कि शुरू से ही दोनों शक्तियाँ एकाकार हो चलें। ध्यान के प्रथम चरण में धारणा या एकाग्रता की गहरी जरूरत समझी जाती है।
चिंतन को मोड़ मरोड़कर उस दिशा में प्रवाहित करने के लिए विवश करता है ताकि उसकी गरिमा पर आँच न आने पावे। यह मानसिक संघर्ष उसे निरंतर करते रहने के लिए कहा गया है जिसमें जन्म जन्माँतरों से संचित कुसंस्कारों को उभारने और चरितार्थ होने का अवसर न मिल पावे। पिछले जन्मों में मनुष्य अन्यान्य क्षुद्र प्राणियों के शरीर में रहता और उनमें रहने वाली दुष्प्रवृत्तियों का अभ्यस्त रहा है। नशेबाजी की तरह उन पुरानी आदतों की भड़क इस जन्म में भी उठती रहती है। उन्हें दबाया दबोचा न जाय तो वे आदतें चरितार्थ होने के लिए जोर लगाती हैं और ऐसे आचरण करने के लिए घसीटती हैं, जिनके कारण उसे नर पशुओं में, नर पिशाचों में गिना जाने लगे।
चिंतन के आदर्शों का समावेश करना होगा और दृष्टिकोण में उत्कृष्टता की प्रतिष्ठापना करनी होगी। व्यवहार में सज्जनता का पुट लाना और स्वार्थ पर अंकुश लगाते हुए पुण्य परमार्थ की प्रवृत्ति जगानी होगी। इसी आधार पर व्यक्तियों को उभारना और सत्प्रयोजनों को सफल बना सकने वाली प्रतिभा को निखारना पड़ेगा। संक्षेप में यही हैं आत्मिक प्रगति॥
चिंतन को उलट कर सीधा किया जाय। दिशाशूल को, दिशा भूल को ‘एक’ न नहीं अपने अपने ढंग से, अपने-अपने क्षेत्र में अधिकाँश ने अपनाया है। इसके लिए व्यापक विचार क्राँति की आवश्यकता है। हर हाथ में यह कसौटी देनी होगी कि औचित्य-अनौचित्य का निर्णय करे तो जो दूरदर्शिता की कसौटी पर खरा उतरे उसी को अपनाये। हर मनुष्य को ऐसी टार्च चाहिए ताकि इस घोर अंधकार के दिनों में जहाँ हाथ को हाथ नहीं सूझ पा रहा, सही वस्तु को सही रूप से देखा और अपनाया जा सके।
चिंतन करने वालों के समूह का नाम है मनीषा। इस मनीषा का हम आह्वान करते हैं उनकी पूजा करते है। माँ क्या करती है? माँ समय समय पर बच्चों के लिए जरूरतों की चीजें बनाकर खिलाती है। हजम कर सके, ऐसी खुराक बनाकर देती है।
चिंतन कोष “दि यूनिटी ऑफ मेडिटेशन एण्ड एक्शन” के अनुसार ध्यान और कर्म एक गहरे असामंजस्य के दो छोर लगते हैं। प्रबल विरोधाभास की यह अंतर्वर्ती मरुभूमि मानवीय सामर्थ्य को निश्चेष्ट करती रही है। अपने अस्तित्व की शुरुआत से मानव समाज यह धारणा संजोये रहा है, जिसे ध्यान करना है उसे कर्म का त्याग करना पड़ेगा, जिसे काम करने का मोह है उसे ध्यान का लाभ नहीं मिलेगा। बात सिर्फ हिंदू धर्म-आर्य भूमि की नहीं, जहाँ कहीं जिस किसी भूखण्ड, जाति समूह में आस्तिक भावनाएँ पनपीं व्यक्तित्त्व विकास को चरम स्तर पर पहुँचाने की ललक उमगी है। इन भावों का विकास हुए बिना नहीं रहा।
चिंतन और चरित्र यदि गये गुजरे स्तर का हो तो प्रतिकूल दुःखद संकटग्रस्त एवं विनाशकारी होगा ही। उन दुष्परिणामों का कर्त्ता स्वयं तो भोगता ही है, साथ ही अपने संबद्ध परिवार को भी इस दल दल में घसीट ले जाता है। नाव की तली में छेद हो जाने पर उसमें बैठे सभी यात्री मझधार में डूबते हैं। स्वार्थी, विलासी, कुकर्मी स्वयं तो आत्म प्रताड़ना, लोक भर्त्सना, दैवी दण्ड विधान की आग में जलता ही है, साथ ही अपने परिवार को, संबंधी स्वजनों, मित्रों को भी अपने जाल जंजाल में फँसा कर अपनी तरह दुर्गति भुगतने के लिए बाधित करता है। नशेबाजी क्रिया की प्रतिक्रिया ऐसी ही होती है।
चिंतन को केन्द्रित रखा जा सकता है। संगीत की कोई ध्वनि इसके लिए चुनी जा सकती है। किसी मनुष्य या प्राणी की किसी विशिष्टता पर भी ध्यान केन्द्रित किया जा सकता है।
चिंतन आदि कार्यों में इसकी अनुभूति होती है। परन्तु ये तीनों प्रकार किसी न किसी गुण के आधीन होने के कारण विशुद्ध नहीं हैं।
चिंतन व व्यवहार भी अस्थिर होता है। सामान्यतया इस स्थिति में छोटे बच्चे रहते हैं, पर कभी कभी बड़ों में इसकी उपस्थिति रहने पर उनमें बचकानेपन के लक्षण दिखाई पड़ते हैं। मूढ़ स्थिति जड़ता अथवा पागलपन की दशा है। इसमें समूचा जीवन क्रम नष्ट प्रायः होता है। तीसरी स्थिति औसत व्यक्ति की है।
चिंतन व व्यवहार के लिए क्षमा माँगी व लौटने को कहा। संत ने विनम्रता पूर्वक मना कर उसे लौटा दिया। हम सब रहते तो सुख विलास के साधनों बीच हैं पर कभी उनके बिना भी जीने का चिंतन कर पाते हैं? तैयारी उसकी भी होनी चाहिए।
चिंतन पर भी नियंत्रण करना चाहिए। उन्हें आदर्शों के अनुरूप होना चाहिए। कुविचारों से मनोविकारों से मस्तिष्क में कूड़ा करकट जमा करते रहने के लिए मनाही है। विचारों की आदत है कि वे सुविधा, संपदा और मौज करने के लिए कल्पना करते और योजनाएँ बनाते रहते हैं। मनुष्य अपने मस्तिष्क पर अंकुश लगाता और अनैतिक चिंतन को मोड़ मरोड़कर उस दिशा में प्रवाहित करने के लिए विवश करता है ताकि उसकी गरिमा पर आँच न आने पावे।
चिंतन कर पाते हैं? तैयारी उसकी भी होनी चाहिए।
चिंतन मनन के बाद चाणक्य इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे। ‘धी’ अपने विशुद्ध रूप में ऋतम्भरा है। परन्तु अनुभूति करा पाना किसी व्यक्ति के बूते की बात नहीं। तुम कुछ काल यहाँ निवास करो और अपने को शान्त बनाकर उनकी कृपा पाने की चेष्टा करो।
चिंतन की विकृतियाँ ही चित्त पर अपना डेरा जमाये रहती हैं परिणाम स्वरूप शारीरिक एवं मानसिक बीमारियाँ मनुष्य को घेरे रहती हैं। साथ ही मानसिक विकृतियाँ चेतना क्षेत्र पर आवरण बनकर छा जाती हैं। और व्यक्ति का अपनी आत्मा से परम चेतना से एक प्रकार का संबंध विच्छेद सा हो जाता है। इसके मूल में मानसिक विकृतियाँ ही विद्यमान रहती हैं और वही रोगोत्पत्ति का निमित्त कारण बनती हैं।
चिंतन ओर प्रयास इसी हेतु नियोजित रहता है। ऐसी दशा में आत्मा के संबंध में कुछ विचार करते ही नहीं बन पड़ता। उपेक्षित की पुकार कौन सुने? जिसे उसकी आवश्यकताओं से वंचित रखा गया हो, अपेक्षित तिरस्कार किया गया हो, पोषण से वंचित रखा गया हो, दुर्बल तो होगा ही। आवश्यकता की स्थिति में उसकी वाणी भी क्षीण हो जायेगी।
चिंतन ऐसा होना चाहिए जिससे उसकी गरिमा घटने न पायें। इस क्षेत्र में उसे फूँक-फूँककर कदम रखना चाहिए। मानव जीवन के साथ अनेकानेक जिम्मेदारियां, मर्यादा, और वर्जनायें जुड़ी हैं। उसे पशु की तरह पेट प्रजनन के निमित्त कुछ भी करते रहने की छूट नहीं मिली है। वह हिंसक पशुओं की तरह किसी पर भी आक्रमण नहीं कर सकता।
चिंतन एवं कर्तव्य की स्थिति समझाई जाती है और तत्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक संबंधों और कर्त्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ संबंध बनाते हुए परिवार और समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निर्धारण किया जाता है। अब तक जो ढर्रे का अव्यवस्थित एवं अस्त−व्यस्त जीवनक्रम चल रहा था, उसे दूरदर्शी विवेक के आधार पर सुव्यवस्थित सुसंचालित किया जाता है। अध्यात्म जगत को यही दो धारायें पवित्र गंगा जमुना कही जाती हैं। इन्हीं का संगम तीर्थ राज प्रयाग है- जिसमें स्नान करके परम पुरुषार्थ का पुण्य फल प्राप्त होता है।
चिंतन कर्तव्य सभी में उद्देश्यहीनता घुस पड़ती है। जीवन प्रवाह कीट पतंगों जैसा, पशु पक्षियों जैसा बन जाता है। उसमें पेट प्रजनन की ही ललक छाई रहती है। वही कुछ बन पड़ता है, जो शरीर की निमित्त के काम आये। भूख की, कामुकता की, वासना, तृष्णा, अहंता की पूर्ति कर सके।
चिंतन करने के लिए अभ्यस्त होता चला जायेगा। तथ्यों पर जितनी गहराई और सजगता के साथ विचार किया जायेगा, उतनी एकाग्रता बढ़ेगी और मन के भागने का अनुपात घटता जायेगा। कुछ ही समय के अभ्यास में ऐसा समय आ जायेगा कि चिंतन की परिधि सिमट जाय और आरंभिक ध्यान भूमिका में सफलता मिल जाय।
चिंतन और कर्त्तव्य अपनाते हुए दिव्यजीवन की रीति-नीति अपनाई जा सके तो ही इन पूजा परक कर्मकाण्डों का महत्व है। आत्म बोध की विचार धाराओं से अंतःकरण को भरने में सहायता करना ही दर्पण उपकरण का उद्देश्य है। उसी प्रकार पूजा का उपयोग यही है कि जीवन निमार्ण की प्रेरणाओं को उभारे और उन्हें सक्रिय बनायें। लकीर पीटने जैसी चिन्ह पूजा से न तो आत्म कल्याण हो सकता है और न दर्पण की मनुहार करने से आत्म लाभ का प्रयोजन पूरा हो सकता है।
चिंतन, कीर्तन आदि सभी आध्यात्मिक उपकरण हैं। सतोगुणी, माया एवं चित्त के द्वारा ही जीव और ईश्वर का मिलन हो सकता है। यह आत्मा और परमात्मा का मिलाप कराने वाली शक्ति गायत्री ही है। ऋषियों ने इसी की उपासना की है, क्योंकि यह खुला रहस्य है कि शक्ति बिना मुक्ति नहीं। सरस्वती, लक्ष्मी, काली, माया, प्रकृति, राधा, सीता, सावित्री, पार्वती आदि के रूप में गायत्री की पूजा की जाती है।
चिंतन की विकृति- थोड़े साधन में संतोष न कर पाने का दुर्भाग्य। प्राचीन समय में न तो आज जैसी साधन सुविधा थीं और न विश्व के एक कोने से दूसरे कोने में क्षण मात्र में पहुँचने का उपाय- उपचार। फिर भी लोग आज के तथाकथित विकास युग से अधिक शाँति और संतोषपूर्वक जीवन बिताते देखे जाते थे। उनमें न तब अवाँछनीय आकाँक्षा थी, और न आज जैसी महत्वाकाँक्षा। इसी महत्वाकाँक्षा ने मनुष्य को साधन सुविधाओं की दिशा में प्रवृत्त किया और जो नहीं किया जाना चाहिए उसे भी कर गुजरने के लिए प्रोत्साहित किया।
चिंतन कर आत्म-विश्लेषण करना, उन्हें पुनः नहीं दोहराने का संकल्प एवं विज्ञजनों महामानवों के समक्ष उनका प्रकटीकरण करते हुए प्रायश्चित का संकल्प करना होता है। इससे कई लाभ होते है। मन के भीतर जो दुराव की गांठें बँधी रहती हैं, वे खुलती हैं। मनोविज्ञान शास्त्र का सुनिश्चित मत है कि मनोविकारों के, दुष्कर्मों के दुराव से मानसिक ग्रंथियाँ बनती हैं और वे अनेकों मानसिक व शारीरिक रोगों के रूप में उभरती रहती हैं। मनः चिकित्सा शास्त्री मानसिक रोगियों से उसके पिछले जीवन के घटनाचक्र को विस्तार पूर्वक बताने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
चिंतन किया जा सकता है। इससे मन की अस्त व्यस्त घुड़दौड़ रुकेगी और एक सीमित परिधि के अन्दर चिंतन करने के लिए अभ्यस्त होता चला जायेगा। तथ्यों पर जितनी गहराई और सजगता के साथ विचार किया जायेगा, उतनी एकाग्रता बढ़ेगी और मन के भागने का अनुपात घटता जायेगा। कुछ ही समय के अभ्यास में ऐसा समय आ जायेगा कि चिंतन की परिधि सिमट जाय और आरंभिक ध्यान भूमिका में सफलता मिल जाय।
चिंतन की परिधि सिमट जाय और आरंभिक ध्यान भूमिका में सफलता मिल जाय।
चिंतन करते हुए जब भौतिक अहम् विलीन हो जाय, तो समझना चाहिए कि मैं और तू से ऊपर उठा हुआ जीव परम सत्य को पा गया।
चिंतन, चरित्र, व्यवहार की निर्भरता उसकी आँतरिक चेतना के स्तर पर निर्भर है। यदि यही अनगढ़ है, तो फिर जीवन में उत्कृष्टता आए कैसे? आँतरिक चेतना को समझाते हुए अध्यात्म मनोविज्ञान ने इसे कल्पना, मन, विवेचना बुद्धि, चित्त अचेतन संस्कार और अहं मान्यता कह कर स्पष्ट किया है। यही चार क्षेत्र मिल जुल कर मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को ऊँचा उठाते या नीचा गिराते हैं। इसी को सुधारने सँवारने पर जीवन सुधर सँवर सकता है।
चिंतन करते रहने के लिए प्रशिक्षित किया जाय। इसके लिए सर्वोत्तम उपाय उपचार ध्यान साधना है, इसका स्वरूप यह है कि विचारों को केन्द्रीभूत करके किसी एक लक्ष्य पर नियोजित किया जाय। इसमें सफलता तभी मिलती है जब चेतना का मस्तिष्कीय हलचलों पर नियंत्रण सध जाय। गायत्री माता-के इष्टदेव के अथवा स्वर्णिम सविता के प्रकाश मण्डल के या अन्य किसी केन्द्र पर मन मस्तिष्क को सीमाबद्ध किये रहा जाय। इस उपक्रम में यदि सफलता मिल गयी तो समझना चाहिए कि विचार प्रवाह को स्वेच्छाचार बरतने से छोड़ने के लिए अनुशासन में रहने के लिए सहमत कर लिया गया।
चिंतन और आत्म-धिक्कार का भार हल्का हो जाता है। पापकृत्यों, दुराचारों के फलस्वरूप उत्पन्न आत्मग्लानि और आत्म प्रताड़ना से छुटकारा पा सकना प्रायश्चित के अतिरिक्त और किसी प्रकार के उपाय में संभव नहीं हो सकता। इसलिए भारतीय धर्मशास्त्रों में पाप निवारण का एक मात्र उपाय प्रायश्चित निर्धारित किया गया है।
चिंतन को देर तक सीमित किया जा सकता है। ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा, संयम, उदारता जैसे गुणों की व्याख्या, प्रयोग, पद्धति एवं प्रक्रिया के अनेक पक्ष हो सकते हैं और उन सब पर क्रमशः विचार करते हुए देर तक मन को उसी परिधि में प्रतिबंधित रहने के लिए बाध्य किया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-July
चिंतन पद्धति का न होना व उसी के कारण जीवन जीते हुए भी उस जीने की कला से अनभिज्ञ होते हुए महज काटते भर रहना। ऐसी स्थिति में यदि किसी सत्ता का अनायास हमारे जीवन में उदय हो व हमें उँगली पकड़ कर वह सही राह पर ला खड़ा कर दे तो इसे परम सौभाग्य ही मानना चाहिए। आज सारी सुविधाएँ बाजार में उपलब्ध हैं, मात्र सच्चे मार्ग दर्शकों की, मित्रों की कमी है, वरन् अकाल है। यदि सच्चा पथप्रदर्शक, एक हित सोचने वाला मित्र मिल जाय तो दुरूह कण्टकों से भरा जीवन पथ पार करने में कोई हिचक नहीं लगती। एक ऐसी ही मित्र सत्ता के रूप में हमारे बीच परम पूज्य गुरुदेव का आगमन हुआ।
चिंतन की प्रखरता। चैत्य का गुण है अंतराल की पवित्रता। आध्यात्मिक स्तर का गुण है क्षुद्रता से उबर कर महानता की ओर बढ़ चलने की अभीप्सा तथा अतिमानसिक स्तर का गुण है, प्रत्यावर्तन, महानता में, स्वराट का विराट में, संकीर्णता का विस्तीर्णता में, स्वार्थपरता का उत्सर्ग में, परिवर्तन। इन सभी स्तरों के गुणों के समुच्चय ही यथार्थ में व्यक्तित्व है। इन्हें जीवनक्रम में भली प्रकार व्यवहार में लाना ही विकसित व्यक्तित्व का लक्षण है।
चिंतन और सत्कर्म में निष्णात ये नर रत्न अपने विवेक और कौशल से लोकमानस को परिष्कृत करने में जुटेंगे। इतना कहकर उन्होंने अपनी वाणी को विराम दिया। उपस्थित विद्यार्थियों के समूह ने एक-एक करके आचार्य को प्रणाम करना शुरू किया। सबसे अन्त में एक दुबला-पतला किन्तु तेजस्वी युवक आया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-April
चिंतन-मनन से उत्पन्न करता है, इसका समाधान प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा है कि ऐसे व्यक्ति उन कारणों का पता लगाकर प्रयास करने पर स्वयमेव इस स्थिति से छुटकारा पा सकते हैं। विचारों को विचारों से काटा जाता है। उदासीनता के स्थान पर शान्ति और समस्वरता उत्पन्न करने वाले सृजनात्मक विचारों को आमंत्रित करना चाहिए तथा ऐसी रीति-नीति अपनाना चाहिए जो ध्यान बँटा सके, उत्साह बढ़ा सके। जीवन लक्ष्य सामने होने एवं सतत उसके उज्ज्वल पक्ष की ओर दृष्टिपात करते रहने से क्रियाएँ भी तद्नुरूप चल पड़ती हैं। सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य को समाज के अधिक समीप होना चाहिए अर्थात् उसे सामाजिक उत्तरदायित्वों, जिम्मेदारियों को अधिक सजगतापूर्वक वहन करना चाहिए।
चिंतन सागर में विचारों की एक लहर उठी। असंख्यों भूले-भटकों, बिछुड़ों को अपने ऊपर ढोकर मिलाने वाली राह की यह विरक्ति। राह की विरक्ति मानव से अथवा मानव की राह से। दार्शनिक मन में सहज तर्कशास्त्रीय सवाल उठा। खैर होगा सोच कर सिर झटका और चल पड़े।
चिंतन से भी छुटकारा मिलता है। एडलर के अनुसार विधेयात्मक चिन्तन से मानव मन की समस्त दुर्बलताएँ क्रमशः दूर होती जाती हैं और वह नूतन ज्ञान से जुड़ जाता है। इसी तरह के विचार मनोविज्ञानी जुँग ने भी प्रकट किये हैं। उनका कहना है कि हीन भावना के शोधन और परिष्कार के लिए विवेकशीलता को जाग्रत करना अनिवार्य है। सकारात्मक विचार एवं दृढ़ संकल्प शक्ति ही इन परिस्थितियों से मनुष्य को उबारते हैं।
चिंतन, चरित्र , व्यवहार की उत्कृष्टता, प्रखरता ही धर्म का व्यावहारिक लक्ष्य हैं। पुरातन ऋषियों ने धर्म का सृजन - आत्मानुभूति के महान लक्ष्य को प्राप्त करने एवं आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना के अनुरूप आचरण करने के लिए किया था। शास्त्र-पुराण, देवालय आदि का निर्माण इसी प्रशिक्षण के लिये हुआ। मानवी व्यक्तित्व के परिशोधन एवं सद्गुणों के अभिवर्धन के लिए यह मनोवैज्ञानिक शैली उसकी मानसिक संरचना को ध्यान में रख कर ही अपनाई गई थी। जो प्रकारान्तर से अपने प्रयोजन में विशेष रूप से सफल रही।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-September
चिंतन स्मरण के साथ ही वह दृष्टि भी विकसित होगी जिसके आधार पर प्रस्तुत जीवन का सदुपयोग हो सके। सृष्टि के अन्य जीवों की आँख से देखा जाय तो मनुष्य असीम सुविधा साधनों से सम्पन्न अवतारी सत्ता ही है। उसी अंश अवतार जैसी सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन और दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन की भूमिका में मनुष्य को भी संलग्न रहना चाहिए, पर यह इसलिए विस्मृत हो जाता है कि हम मृत्यु को भुला बैठते हैं और यह सोचते तक नहीं कि मरण निकट है। इसी कारण यह भी भुला दिया जाता है कि उपलब्ध अवसर को नष्ट किये बिना पूरी सजगता के साथ उस ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति में लगना चाहिए जिसके लिए कि यह जीवन मिला है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-April
चिंतन एवं कर्तृत्व का मुख्य आधार बन जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-January
चिंतन की सारी प्रक्रिया इसी पर घूमती है। योग साधना एवं तपश्चर्या के विभिन्न उपचार इसी क्षेत्र में विभूतियां उत्पन्न करने के लिए किये जाते हैं। ऋद्धि-सिद्धियों का चमत्कारी और विभूतियों का स्वर्ग एवं मुक्ति का- आत्म साक्षात्कार ब्रह्म साक्षात्कार का यही क्षेत्र है।
चिंतन तथ्य के अनुरूप अखंड ज्योति परिजनों का स्तर ऊँचा उठाने के लिए बौद्धिक प्रशिक्षण, युग साहित्य के माध्यम से किया जाता रहा है। दूसरा सान्निध्य वाला पक्ष किसी रूप में क्रियान्वित तो पहले से भी होता रहा है पर पिछले सात वर्ष से हरिद्वार का शान्ति कुँज आश्रम बनने के उपरान्त तो उसी को प्रमुखता दी जाने लगी है। यहाँ जीवन साधना सत्रों का कई स्वरूप में प्रयोग चलता रहा है। बड़ी संख्या में परिजन उसमें समय-समय पर सम्मिलित होते रहे हैं। इसका प्रभाव परिणाम क्या हुआ इसका संक्षेप में एक ही उत्तर है कि प्रयत्न का सत्यपरिणाम आशातीत निकला है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-October
चिंतन का स्तर उच्च स्तरीय था। उनकी कामनाएँ, रुचियाँ, महत्वाकाँक्षाएँ उच्चस्तरीय थीं। ऊँचा चाहते और ऊँचा सोचते थे। फलतः इनके क्रिया-कलापों में आदर्शों। का पुट पग-पग पर परिलक्षित होता था।
चिंतन को एक उपयोगी दिशा में नियोजित करना तथा उसके द्वारा अपनी मानसिक शक्तियों से उपयोगी परिणाम प्राप्त करना। आध्यात्मिक लक्ष्य के लिए चिन्तन की यह एकाग्रता, मन को एक ही दिशा में केन्द्रित करना आवश्यक है ही लौकिक जगत में भी तब तक सफलता नहीं मिलती जब तक कि अपनी सम्पूर्ण मनःशक्ति को पूर्णतया एक ही दिशा में नियोजित न किया जाय। अभीष्ट दिशा में अपनी सम्पूर्ण मनःशक्ति को नियोजित कर ही संसार में कोई व्यक्ति किसी क्षेत्र विशेष में चमत्कारी सफलतायें प्राप्त कर सका हैं। इसके अतिरिक्त कोई और मार्ग नहीं रहा है तथा न ही सफलता प्राप्त करने का कोई उपाय।
चिंतन का क्रम एवं मनुष्य का दृष्टिकोण प्रमुख भूमिका प्रस्तुत करते है। यहीं से वस्तुतः प्रारम्भ होता है-समस्त अध्यात्म साधनों का आद्याक्षर।
चिंतन को उच्चस्तरीय बनाना है। शारीरिक बलवृद्धि तथा मानसिक स्वास्थ्य के रूप में शेष अनुदान स्वतः मिलते चले जाते हैं। हमारा शरीर सृष्टा की अनुपम देन है। इसमें जीवकोष से लेकर जीन्स तक तथा न्यूरान्स से लेकर हारमोन्स तक सभी अनन्त क्षमताओं से संपन्न हैं। केवल इनकी संभावनाओं को पहचानना एवं उनका सदुपयोग करना मनुष्य को आना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-June
चिंतन कोशिकाओं में महत्वपूर्ण रासायनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ा देता है तथा वे कोशिकाएँ अधिक संवेदनशील बन कर बुद्धिमत्ता का क्षेत्र विस्तृत कर देती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-November
चिंतन की विकृतियाँ हैं। अरब देश में कुछ शताब्दियों पूर्व एक विख्यात चिकित्सक हुआ है हकीम इब्नसीना। उसने अपनी पुस्तक कानून में ऐसे अनेक अनुभवों का उल्लेख किया है कि अमुक प्रकार के मानसिक उभारों के कारण शरीर में अमुक प्रकार की विकृतियाँ अथवा बीमारियाँ उठ खड़ी होती हैं। चिकित्सा उपचार में इब्नसीना ने दवादारू के स्थान पर रोगी की मनःस्थिति बदलने के उपाय किये और उससे असाध्य लगने वाले रोग भी आसानी से अच्छे हो गये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-July
चिंतन करना चाहिए। घृणा और पाप के विचार त्याग कर प्रेम और स्नेह के विचार पैदा करने चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-August
चिंतन में तन्मय रहना वस्तुतः मानसिक शहादत है। यह जहाँ होगी वहाँ व्यवहार भी वैसा ही बनेगा क्रियाकलापों का निर्धारण और कार्यान्वयन वही होता है, जो अन्तःकरण में वसा हो। समर्पण एक आस्था है जिसमें लोभ मोह,और अहंकार के भव बन्धन काटने पड़ते हैं और आदर्शों के लिए चिंतन और चरित्र को पूरी तरह नियोजित रखना पड़ता है। अपने को इस ढाँचे में ढाल लेने वाले व्यक्ति अध्यात्म शब्दावली में ‘ऋषि कहलाते हैं। शहीद शब्द से यह अधिक उपयुक्त है।
चिंतन प्रधान होती हैं। मान्यतायें, विचारणायें, इच्छायें ही प्रेरणा केन्द्र होती हैं और उन्हीं के प्रवाह में सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार का स्वरूप भी तदनुरूप ही हो सकता है। लोकमानस को अवाँछनीयता, अनैतिकता एवं मूढ़ मान्यता से विरत करने वाली विचार क्राँति ही अपने समय की समस्याओं का समाधान कर सकती है।
चिंतन की धारा आदि की स्थिति को देखते हुए लगता है जिस मध्य कालीन अंधकार युग को कोसा जाता है, उसमें वह अभी भी यथावत् विद्यमान है। उसने मात्र अपना पुराना चोला उतारा और जामा नया पहना है। समाज प्रवाह के आधार पर सामान्य जन मानस ढलता है और लोक प्रवृत्तियां पनपती हैं। यदि उसमें अमानवीय तत्व ही भरे रहें तो फिर यह आशा करना व्यर्थ है कि शालीनता को लाग अपने जीवन व्यवहार में स्थान दे सकेंगे। समाज का स्तर उस क्रम से नीचे गिरता जा रहा है उसे देखते हुए लगता है आदर्शवादी सिद्धांत लिखने पढ़ने और सुनने तक ही सीमित बनकर रह जाता है।
चिंतन, दुर्भाव, अनुपयुक्त महत्वाकांक्षा, निकृष्टता में अनुभूति जैसे अनेकों ऐसे आधार खड़े हो गये हैं जिनके कारण जन-मानस में असंतुलन उद्वेग एवं आक्रोश उत्पन्न करने वाले तत्वों की ही भरमार है। अधिकांश जनमानस संतोष और शांति से वंचित हैं। प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता के लक्षण अपवाद रूप से नहीं दृष्टिगोचर होते हैं। हर व्यक्ति खिन्न चिंतन, उदास दृष्टिगोचर होता है। न उमंगे हैं न आशा।
चिंतन और प्रयास ही भली-बुरी परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी होता है। प्रकृति की प्रतिकूलता भी कभी किसी सीमा तक कारण होती है, पर मनुष्य को परिस्थितियों से जूझने का इतना अनुभव प्राप्त है कि वह उनसे सुरक्षा के उपाय किसी न किसी प्रकार खोज ही लेता है। प्रकृति संघर्ष के लंबे इतिहास में सृष्टि के आरंभ से लेकर अब तक का घटनाक्रम साक्षी है कि मनुष्य हारा नहीं। जीता भले ही न हो पर तालमेल बिठा लेने में उसे आशाजनक सफलता दिलाने में बुद्धि-कौशल ने सदा-सर्वदा अपना चमत्कार दिखाया है।
चिंतन और कर्तृत्व का आधार गायत्री ही है। उसी को मानवी-धर्म-संस्कृति का उद्गम तथा प्रथा-प्रचलन का सुनिश्चित आधार गुरुमन्त्र माना जाता रहा है। उस महान तत्वज्ञान को अपनाकर हमारे पूर्वज महामानव और नर-नारायण का जीवन जीते रहे हैं। देवता स्वर्ग में रहते हैं। उन देव मानवों की मनःस्थिति अपने इर्द-गिर्द स्वर्गीय परिस्थितियों का सहज सृजन करती है।
चिंतन तथा कर्तृत्व से भाव भरे रसास्वादन का आनन्द प्रदान करे। विवेक को बुद्धि का उत्कृष्टतम स्तर माना गया है। श्रद्धा अन्तःकरण की श्रेष्ठतम उपलब्धि है। दोनों का जहाँ जितना सम्मिश्रण होता है वहाँ उतनी ही महानता दृष्टिगोचर होती है। उसी उपलब्धि के सहारे सामान्य परिस्थितियों में जन्मे, पले व्यक्ति भी ऐतिहासिक महामानवों की भूमिका निभाते और विश्वनिर्माण में असाधारण योगदान करते हैं।
चिंतन में विधायक तत्वों को भर लेने-दृष्टिकोण को ऊँचा उठा लेने से ही काम चल जाता है। संव्याप्त विक्षोभ और असंतोष का समाधान इसी प्रकार होगा। अनुकूल के लिए किया गया पुरुषार्थ तो दूसरा चरण है।
चिंतन और चरित्र को पूरी तरह नियोजित रखना पड़ता है। अपने को इस ढाँचे में ढाल लेने वाले व्यक्ति अध्यात्म शब्दावली में ‘ऋषि कहलाते हैं। शहीद शब्द से यह अधिक उपयुक्त है। शहीद होने में मरण की आवश्यकता जुड़ी रखती है जबकि ऋषि के लिए जीवन या मरण में कोई अन्तर नहीं रहता, वह जीवित रहते हुए चतुर लोगों की दृष्ट में मृतक हे। इतिहासकार उसके मर जाने पर भी जीवितों जैसी अभ्यर्थना करते है।
चिंतन, उदास दृष्टिगोचर होता है। न उमंगे हैं न आशा। आशंकाओं और समस्याओं के भार से हर मनुष्य का मस्तिष्क तनावग्रस्त दिखता है। असुरक्षा और एकाकीपन का भार इतना लद रहा है कि जिंदगी भारी लाश की तरह ढोनी पड़ रही है। बढ़ी हुई विपन्नता में हताशों, आत्महत्याओं का दौर बढ़ रहा है।
चिंतन की ही हो छाया मनुज-विचारों में॥ दया, क्षमा, करुणा, संवेदन हों मानव-उद्गारों में। हो न कहीं नीलाम आस्था, श्रद्धा फिर बाजारों में॥ मानव में हो प्राण प्रतिष्ठा भावों के भगवान की॥5॥
चिंतन और समाज का विधान प्रचलन क्या होना चाहिए, इसकी ऐसी सुनिश्चित निर्धारण इस महामन्त्र के अंतराल में विद्यमान है जिसे सार्वभौम, सार्वजनिक, सर्वोपयोगी माना जा सके।
चिंतन की प्रखरता और मौलिक निर्णय की साहसिकता किन्हीं विरलों में ही होती है बिना दूसरों का प्रभाव ग्रहण किए उच्चस्तरीय नीति अपनाने और उस पर अन्त तक दृढ़ बने रहने का आत्मबल तो कदाचित ही किन्हीं मनस्वियों में दृष्टिगोचर होता है। प्रज्ञा के माहात्म्य की चर्चा, करते रहना सरल है, पर उसे अपनाना कठिन है कठिन इस लिए नहीं कि व्यवहार में जटिल भी असंभव है। कारण मात्र इतना भर है कि अनगढ़ प्रचलनों से आच्छादित वातावरण में अनुकरण के उदाहरण न मिलने से सामान्य व्यक्ति उस दिशा में पग बढ़ाते हुए डरता है। यह डर ही वह बाधा है जो प्रज्ञा को अपनाकर मंगलमय जीवन-यापन करने के आनन्द से मनुष्य को वंचित किये रहती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-March
चिंतन करके परमात्मा रूप हो जाना चाहिए। विवेक और वैराग्य की शिक्षा देने के कारण यह मेरा शरीर भी एक गुरु है। यद्यपि यह शरीर अनित्य है। तो भी इससे परम पुरुषार्थ का लाभ हो सकता है। मैंने इस प्रकार प्रकृति के चौबीस गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की तथा जीवन-मुक्त होने का मार्ग पाया।
चिंतन की विकृति ही है। अपराध, अन्याय और अनीति का मौनदर्शक बना रहकर वह उसमें सहभागी हो रहा है, यह बात उसे समझ में नहीं आती। इसका कारण भी चिन्तन की विकृति ही तो है। आये दिन सड़क से युवतियाँ-महिलाएं दो-चार गुँडे अपहरण कर ले जाते हैं और सैकड़ों लोग ‘तमाशा’ देखते रहते हैं। दिनदहाड़े मार-पीट, खून खराबा मचाया जाता है और हजारों की भीड़ सहमी-सिमटी सब ताकती रहती है।
चिंतन में तन्मय रहें तो उसे संसार में होने वाली उथल-पुथल अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-December
चिंतन-क्षेत्र को मथना पड़ेगा।
चिंतन को जिस अनुपात से परिष्कृत किया जा सकेगा, उसी मात्रा में समस्याओं और विपत्तियों का समाधान होता चलेगा। निश्चय ही यह बड़ा काम है। बड़े काम के लिए बड़े साधन चाहिए। इन साधनों में सर्वोपरि आवश्यकता ‘सद्भावसंपन्न मनीषा’ की है। शोधकार्य की सफलता उस उपलब्धि को समुचित मात्रा में मिल सकने पर निर्भर है।
चिंतन को दिशा दी है। सृजन ने सुविधा-साधन खड़े किए हैं। अपने आपे को सद्गुणों की संपदा से लदा हुआ कल्पवृक्ष बना लेना— यही साधना का उद्देश्य है।
चिंतन एवं भाव संस्थान के नवनिर्माण के लिए आगे आए। इस स्तर के अनुरूप रिटायर्ड व्यक्तियों की, आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी, गृहस्थभार से बचे हुए अविवाहितों की कमी नहीं। उनकी मनीषा को विशेष रूप से युगचेतना ने पुकारा है। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान ने ऐसे सभी लोगों का सहयोग आमंत्रित किया हैं जिनमें मनीषा अस्तित्व ही नहीं, वरन ग्रुप सृजन के लिए आदर्शवादी उमंगें भी उमंगती हों।
चिंतन का नवनिर्धारण आज का समुद्र-मंथन है। यदि यह प्रक्रिया ठीक तरह संपन्न हो सकी तो दुहरा लाभ होगा। अहंकारी स्वार्थ-संकीर्णता का, तृष्णा और विलासिता का व्यामोह अपने युग का हलाहल है, जिसके कारण ऋषिभूमिका निभाने में पूर्णसमर्थ होते हुए भी मनुष्य पाशविक और पैशाचिक प्रवृत्तियों में तल्लीन हो रहा है। वारुणी वह है— जिसने दूरदर्शिता और उदारता को अनावश्यक ठहराने और कुसंस्कारों में मदमस्त रहने में ही प्रसन्नता मानी है। लोक-मानस में से सर्वप्रथम इन्हीं दोनों अनुपयुक्तताओं का निष्कासन करना है।
चिंतन को किसी दिशा में आगे बढ़ाने के लिए नाम, रूप का अवलंबन अनिवार्य होता है। उपासना-उपक्रम इस निर्धारण के बिना बन ही नहीं पाता। समस्त देव प्रतिमाओं का निर्धारण इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया गया। श्रद्धा का आरोपण और संवर्द्धन इस प्रतिमा-प्रतिष्ठापन के सहारे ही सहज-सुलभ रीति से अग्रगामी बनता है। वस्तुतः समस्त देवालयों का अस्तित्व मनुष्य की श्रद्धा-समुच्चय पर ही आधारित होता है।
चिंतन की प्रक्रियाएँ मस्तिष्कीय कोशिकाओं में महत्त्वपूर्ण रासायनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ा देती हैं और वे अधिक संवेदनशील बनकर बुद्धिमत्ता का क्षेत्र विस्तृत बना देती हैं।
चिंतन और चरित्र में उच्चस्तरीय उमंगें उठने लगती हैं तथा उसी स्तर की गतिविधियाँ चल पड़ती हैं। उत्कृष्टता की उपासना ही ईश्वर की उपासना है। यही उपास्य है, लक्ष्य भी इसी को बनाना पड़ता है। इष्टदेव का निर्धारण किस रूप में किया जाए, आज इस संदर्भ में अनेकों विकल्पों के जंजाल बने खड़े हैं। प्राचीनकाल में ऐसा न था।
चिंतन’ ही गुण-धर्म है। सामर्थ्य का स्रोत वही है। लोक-चिंतन को जिस अनुपात से परिष्कृत किया जा सकेगा, उसी मात्रा में समस्याओं और विपत्तियों का समाधान होता चलेगा। निश्चय ही यह बड़ा काम है। बड़े काम के लिए बड़े साधन चाहिए।
चिंतन की उत्कृष्टता और अन्तःकरण की भावश्रद्धा के संवद्धन में लगना हैं। ब्रह्मवर्चस् का        शोधकृत्य इसी उत्पादन-परिवर्द्धन में केंद्रिभूत हो रहा है। समग्र मानवता के उत्कर्ष को ध्यान में रखते हुए इस प्रयत्नशीलता की एक स्वर से सराहना करनी पड़ेंगी।
चिंतन अपने आप में एक प्रचंड-शक्तिसंपन्न तथ्य है। उसके प्रवाह दृष्टिकोण में अंतर होने पर व्यक्तित्व का समूचा ढाँचा बदल सकता है। दिशा बदलने से परिस्थितियों में अंतर आना, सुधार होना तनिक भी कठिन नहीं है। परिस्थितियों की अनुकूलता किसी के हाथ की बात नहीं, किंतु मनःस्थिति को कोई भी मोड़ सकता है और प्रचुर प्रसन्नता तथा सफलता तक पहुँचने के लिए एक अतिसरल पगडंडी हस्तगत कर सकता हैं।
चिंतन के कारण बन पड़ने वाले आदर्श क्रियाकलाप ही मनुष्य को आत्मसंतोष, जनसम्मान, विपुल सहयोग एवं दैवी अनुग्रह की अनेकानेक संपदाएँ तथा विभूतियाँ प्रस्तुत करते हैं। प्राचीनकाल की सतयुगी परिस्थितियाँ और देवोपम मनःस्थिति की सुखद गाथा गाने वाले जानते हैं कि अतीत को गरिमा का एकमात्र आधार उस समय अपनाया गया, उत्कृष्ट दृष्टिकोण एवं आदर्श चरित्र ही था। उस समस्त वैभव को ऋतंभरा प्रज्ञा की देन कह सकते हैं। यह प्रज्ञा की देवी का अजस्र अनुदान ही था, जिसे पाकर भारतभूमि, समस्त विश्व-वसुधा को चिरकाल तक कृतकृत्य रहने का अवसर मिला।
चिंतन ही सब कुछ है। चेतना का ‘चिंतन’ ही गुण-धर्म है। सामर्थ्य का स्रोत वही है। लोक-चिंतन को जिस अनुपात से परिष्कृत किया जा सकेगा, उसी मात्रा में समस्याओं और विपत्तियों का समाधान होता चलेगा। निश्चय ही यह बड़ा काम है।
चिंतन की समर्थता और वरिष्ठता को उजागर करने वाले अध्यात्मवादी प्रतिपादनों को जनविवेक के सम्मुख नए सिरे से प्रस्तुत किया जाए। नए सिरे से इसलिए कि आधार बदल जाने से निर्धारण भी नए स्तर पर करने पड़ेंगे। बुद्धिवाद ने इन दिनों उत्साहवर्धक प्रगति की है। अब तो तथ्य- प्रमाण की साक्षी पग-पग माँगी जाने लगी है। श्रद्धा को एक प्रकार से अमान्य ही ठहरा दिया गया है।
चिंतन के दा पक्ष हैं—एक बुद्धि और दूसरा भाव। बुद्धि का क्षेत्र मस्तिष्क और भाव का हृदय माना गया है। हृदय का तात्पर्य रक्त फेंकने वाली थैली नहीं, वरन अतःचेतन का वह मर्मस्थल है जहाँ आस्थाओं और आकांक्षाओं के समन्वय से बना अंतःकरण प्रतिष्ठित है। व्यक्तित्व का उद्गम आधार नाभिक एवं ध्रुवकेंद्र यहीं है। सत्प्रवृत्तियों को अपनाने के लिए साहस प्रदान करने वाली सद्भावसंपन्न उमंगें यहीं से उठती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-February
चिंतन व कृतित्व का स्तर उतना ही ऊंचा उठता जायेगा। -मो. क. गांधी
चिंतन तथा क्रिया का आधार न बन सके वह श्रद्धा नहीं।
चिंतन की दिशाएं और स्वभाव ही अगले जन्म में संस्कार रूप में साथ रहते हैं। साधन-सामग्रियां नहीं। साधनों की उपयोगिता भी प्रवृत्ति के अनुरूप घटती-बढ़ती रहती हैं। बुद्ध के विकास में उनका राजसी ऐश्वर्य कोई सहायता नहीं कर सका। अयोध्या की साधन-सुविधाएं राम को रावण-विजय में रंचमात्र सहयोग न दे सकीं।
चिंतन-शक्ति एवं विवेक की दरिद्रता और व्यक्तित्व के उथलेपन का परिचायक मानना ही सही है। इस उथलेपन और बौनेपन के कारण ही भाग्य को बदलने के लिये चमत्कारों का आश्रय खोजने में ही समय, श्रम एवं पुरुषार्थ गंवाया जाता रहा है।
चिंतनशील, गंभीर और परिवर्तन निरत दिखाई पड़ें तो उसे सफल उपदेश समझना चाहिए। -गिलवर्ट वरनेट

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-June
चिंतन प्रवाह में निकृष्टता भर जाने से वातावरण विकृत होता है। उससे प्रभावित जनमानस में कुकल्पनाएँ दुर्भावनाएँ और अनीतिमूलक उच्छृंखलताएं ज्वार-भाटों की तरह उठती हैं। अचिन्त्य चिन्तन का परिणाम अन्तःकरण में उद्विग्नता और कुटिलताओं के रूप में प्रकट होता है। फलतः संकीर्ण स्वार्थपरता, निरंकुश उच्छृंखलता एवं आक्रामक दुष्टता अपनाने पर उतारू होता है। कुविचारों की परिणति दुर्व्यवहार से होती है।
चिंतन एवं दुष्ट आचरण में बढ़ोत्तरी देखकर निराशा आ घेरती है एवं वे अपना मनोबल खोने लगते हैं। उनका आत्म-विश्वास डगमगाने लगता है। ऐसी स्थिति में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अगस्त 1979 की अखण्ड-ज्योति में लिखा यह लेख उनके लिए एक विशिष्ट संजीवनी का कार्य करेगा। न केवल वे बाह्य व आन्तरिक आक्रमणों की ओर से जागरुक रहेंगे, अपना मन्यु जगाकर परमसत्ता के विधान पर अटल विश्वास रख और सक्रिय हो सकेंगे। इसी आशय से यह लेख यहाँ गायत्री जयंती परमपूज्य गुरुदेव की महाप्रयाण तिथि की बेला में जन-साधारण के लिए पुनः प्रकाशित किया जा रहा है।
चिंतन श्रेष्ठता की ओर बढ़े, चाहे वे विदेशी हों अथवा भारतीय। चूँकि विदेशी उदाहरण प्रचुर परिमाण में पूर्ण प्रामाणिकता के साथ मिल जाते हैं, अपने प्रतिपादनों की साक्षी में देने में कठिनाई नहीं होती। भारतीय उदाहरण मिलते कम हैं, उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध होती है एवं उनके क्रमबद्ध संकलन का अभी कोई भारत व्यापी तंत्र नहीं बन पाया हैं। अपना प्रयास यही है कि दोनों के बीच तालमेल बने। आपकी टिप्पणी से हमें बल मिला है एवं प्रयास रहेगा कि पाठकों को श्रेष्ठतम सामग्री द्वारा युग चिन्तन से अनुप्राणित कर सकें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-September
चिंतन इतना सटीक है कि उसने युवा वर्ग को विशेष रूप से प्रभावित कर मिशन का एक अंग बना दिया। प्रारम्भ में अब तक जुड़े नए परिजनों में युवक-युवतियों का प्रतिशत प्रायः 65 से 70 प्रतिशत के बीच है। उन्हें शान्तिकुँज से नियमित साहित्य मिलने लगा जिसने उन्हें जीवन जीना सिखाया। देव-स्थापना क्रम ने घर में शाँति ला दी, दुर्व्यसन मिटा दिए एवं आस्तिकता विस्तार की प्रक्रिया काफी बलवती हुई। यू0के0 में श्री वेदमाता गायत्री परिवार, तंजानिया केन्या में गायत्री परिवार युगनिर्माण अमेरिका व कनाडा में आलवर्ल्ड गायत्री परिवार न्यूजीलैण्ड, फिजी, आस्ट्रेलिया में श्री वेदमाता गायत्री परिवार के नाम से संगठन पंजीकृत व चेरिटी रजिस्ट्रेशन प्राप्त कर प्रायः तीन सौ से अधिक शाखाओं के रूप में वहाँ से शासन द्वारा मान्यता प्राप्त हैं व विधिवत् कार्य कर रहे हैं।
चिंतन समस्त विश्व को प्रभावित करता है, ऐसी दशा में हमारी क्रिया द्वारा न सही, विचारों द्वारा ही सही कुछ क्षति जरूर पहुँचाई गई अथवा सेवा-सहायता की गयी है तो उसका भला-बुरा परिणाम हमें मिलना ही चाहिए। शारीरिक पुण्य-पापों का अपना महत्व है, पर मानसिक पुण्य-पापों को भी काल्पनिक, नगण्य, निरर्थक या विनोद कहकर झुठलाया नहीं जा सकता। जब उनका प्रवाह होता है तो परिणाम क्या नहीं मिलेगा ?
चिंतन व व्यवहार के कई स्तरों पर समायी हुई विकृति के कई स्तरों पर समायी हुई विकृति का नाम है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 213-14 के अनुसार किसी भी ऐसी प्रकाशित सामग्री का अश्लील माना जाता है, जो पढ़ने, देखने या सुनने वाले के लिए कामुक, कामोत्तेजक या उसके चरित्र को भ्रष्ट करने वाली हैं यही कानून इंग्लैण्ड में 1727 में लागू हुआ है। यही कानून इंग्लैण्ड में 1727 में लागू हुआ था। न्यायाधीश कोल बोर्न के अनुसार, अश्लीलता की कसौटी यह है कि क्या अश्लील करार दी गयी सामग्री की प्रवृत्ति ऐसे लोगों को भ्रष्ट करने की है, जिनके हाथ वह सामग्री पड़ सकती है ओर जिनके दिमाग उसके अनैतिक प्रभाव का ग्रहण करने के लिए खुले हैं।
चिंतन के स्तर पर माँगा। इससे भावी संभावनाएँ काफी प्रबल हो गयी हैं।
चिंतन को इधर-उधर भटकने से रोक कर उत्कृष्ट प्रवाह के साथ जोड़ देना उसी प्रकार है जैसे अपने अन्दर के क्रिस्टल को ईश्वर में संव्याप्त तरंगों को ग्रहण करने योग्य बना लेना व आदान प्रदान का क्रम आरम्भ कर देना सद्भाव संवर्द्धन श्रद्धा-अभिवर्द्धन से श्रेष्ठ कोई साधना नहीं । सोऽहं की हंसयोग साधना नादयोग, त्राटक, ज्योति अवतरण एवं चक्र भेदन इत्यादि साधनाएँ मूलतः ध्यानपरक हैं। इनसे अखण्ड-ज्योति के मनस्वी पाठक परिचित भी हैं। समयानुसार अपनी दिनचर्या में उन्होंने इनको यथोचित स्थान भी दे रखा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-November
चिंतन करके अध्यात्म और धर्म का अति महत्वपूर्ण कलेवर खड़ा किया है। उसे जन मानस में प्रविष्टि कराने के लिए अगणित साधु ब्राह्मणों ने तिल-तिल करके अपना जीवन जलाया है। अगणित धर्मग्रंथ लिखे गये हैं और उन्हें पढ़ने, सुनने, समझने तथा हृदयंगम करने की स्थिति उत्पन्न करने के लिए अगणित मानवतावादी परम्पराओं या रीति-रिवाजों प्रक्रियाओं, पूजा-पद्धतियों एवं कर्मकाण्डों का प्रचलन किया है। लगातार उस विचारधारा से सम्पर्क बनाये रखने के लिए उन्होंने धर्म एवं अध्यात्म का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया है।
चिंतन, न मानवी क्रियाशीलता-ऐसा विशेषज्ञों का अनुमान है। प्रतिरक्षा प्रणाली से लेकर युद्ध शैली तक में इसका स्पष्ट असर दिखलायी पड़ेगा।
चिंतन में लीन थे । तभी तक्षशिला के शासक आँभी तथा अरस्तू के प्रमुख शिष्य ओनेसिक्राइट्स जो सिकन्दर के भारत आक्रमण के समय उसके साथ पधारे थे, इन मुनियों के साथ भारतीय दर्शन की गहराइयों की चर्चा करना चाहते थे । साधू जनों को नंगे बदन बैठा देखकर उसने साथ खड़े दुभाषिये से पुछवाया क्या इस प्रकार जंगल में बैठकर कष्ट क्यों सा उत्तम कोटि का वस्त्र इन्हें दे सकते हैं। दुभाषिये ने प्रश्न का उत्तर यूनानी में अनूदित करते हुये कहा इस देश में किसी भी वस्तु की कमी नहीं है त्याग से ही मुक्ति है भोग से तो संसार बँधता है।
चिंतन भी उसकी इसी सोच की एक नयी कड़ी थी। उसकी पत्नी कभी-कभी अपने पति की अजीबो-गरीब सोच से हैरान हो जाती। वे दोनों अपने गाँव के छोटे से कच्चे घर में रहते थे।
चिंतन उभरकर सामने आता है।
चिंतन किया जाये, उतना ही उसकी गरिमा और विलक्षणता स्पष्ट होती चली जाती है। बादलों की गरज से ऊँची इमारतें फट जाती हैं। आज की यांत्रिक सभ्यता जितना शोर उत्पन्न कर रही है, उसके दुष्परिणामों से मानव जाति को पूरी न हो सकने वाली क्षति उठानी पड़ेगी। इस तथ्य से समस्त संसार चिंतित है। अतिस्वन और जेट विमान आकाश में जितनी आवाज करते हैं उससे उत्पन्न होने वाली हानिकारक प्रतिक्रिया को सर्वत्र समझा जा रहा है और इन विशालकाय द्रुतगामी वायुयानों को कोलाहल रहित बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है।
चिंतन द्वारा साधना को सींचा जाता है। उसके उपरान्त उसे सस्ती प्रशंसा लूटने के लिए दिखाये जाने वाले चमत्कारों से बचाया जाता है। सिद्धियों को लोभ-मोह के उथले प्रयोजन पूरे करने में भी खर्च किया जा सकता है अपने को तथा दूसरों को आत्म-कल्याण की दिशा में प्रेरित करने के लिए भी उसका उपयोग हो सकता है। स्वल्प श्रम में अधिक भौतिक सफलताएँ पाना कर्म विज्ञान के विपरीत है। उसके लिए यदि मन्त्र शक्ति का प्रयोग किया जाएगा तो वह देर तक टिक न सकेगी और उसी खिलवाड़ में नष्ट हो जाएगी।
चिंतन की मर्यादाओं का व्यतिक्रम करके कुछ भी सोचने और कुछ भी करने लगे। इन्हें एक विशेष प्रकार की सनक कहा जा सकता है जो यदा कदा उभरती हैं और कुछ ऐसी भी होती हैं जो स्वभाव में अपने लिए स्थान बना लेती है।
चिंतन परिधि ने उसे विश्वास करा दिया कि सभी स्वार्थी है। उसके हृदय के किसी संस्कारित कोने ने एकाध बार उसे चेताया कि वह मनुष्य से राक्षस न बने। अलाउद्दीन आततायी है। देवगिरि का शत्रु है। धर्म शत्रु है।
चिंतन उनका तब रहा होगा, जब वे एक नये आत्मबल सम्पन्न साधक परिवार को खड़ा कर रहे थे, जिसे भावी गायत्री तीर्थ से अगणित योजनाओं को क्रियान्वित कर भारत के नवनिर्माण की प्रक्रिया को गतिशील करना था। परमपूज्य गुरुदेव ने पुनः 1989 व 1990 में दोहराया जब उन्होंने “ ज्योति कभी बुझेगी नहीं। उद्बोधन के साथ सभी परिजनों को उनके महाप्राण से इक्कीसवीं सदी आरंभ होने तक व उसके सौ वर्ष बाद तक सतत् ध्यान रखने की बात कही।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-July
चिंतन नहीं करेंगे तथा अपने पुरुषार्थ में साधना- पराक्रम में कोई कमी नहीं आने देंगे, ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास है।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-January
चिंतन जितना पतित और विकृत हुआ है, वैसा शायद पहले कभी नहीं हुआ। जब साधारण मनुष्य तक गंदगी पसन्द नहीं करते, तो फिर यह आशा कैसे की जा सकती है कि सर्वोपरि भगवद् चेतना गन्दे आचार-विचार वालों पर अवतरित होगी अथवा उनकी सहायता करेगी। परिष्कृति उनको सबसे प्रिय है। इतना यदि हो सका, तो उनकी समर्थ सहायता पाने के लिए कुछ विशेष करने और कहीं बाहर जाने की जरूरत न पड़ेगी। ईश्वरीय चेतना सर्वत्र समान रूप में विद्यमान है।
चिंतन का घुन लग जाए, उसकी क्षमता का अपहरण हो जाता है, एवं वह पारस्परिक विद्वेष फैलाए एवं चलती गतिविधियों में विघ्न खड़ा किए बिना चैन नहीं लेता। ऐसा मनुष्य जिस संगठन या समाज में हो, घातक-तोड़ने वाली गतिविधियों में ही निरत रह वही काम करता है जो स्रष्टा को, नियन्ता को पसन्द नहीं एवं इस प्रकार वह अपने ही विनाश के लिए अपने लिए स्वयं ही खाई खोदने का कार्य करता है। यह इन दिनों जगह-जगह इसलिए भी चलता देखा जा रहा है कि दबाव की रचनात्मक शक्तियां दिनोंदिन प्रबल होती चली जा रही है और आसुरी शक्तियों की अपने आमूल-चूल उन्मूलन का खतरा स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-August
चिंतन करो। पवित्रता वह चाभी है जिससे ध्यान रूपी द्वार खुलता है, समाधि के आगार में प्रवेश मिलता है और सर्वशक्तिमान से मिलन होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-October
चिंतन, चरित्र, व्यवहार की पवित्रता के बिना, इन्हें उच्चस्तरीय बनाये बिना यह कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता। इसलिए कुण्डलिनी जागरण की विद्या को बहुत गुप्त रखा गया है। कुण्डलिनी के दो उत्पत्ति स्थान माने गये हैं। एक सूर्य के केन्द्र में निवास करने वाली पुरुषरूपी और दूसरी स्त्री रूप में पृथ्वी केन्द्र में। पृथ्वी केन्द्र में कुण्डलिनी को प्राणधारियों की जीवन-सत्ता का केन्द्र कह सकते हैं।
चिंतन से परब्रह्म की प्राप्ति होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-April
चिंतन चल रहा है। संभव हुआ तो अगले अंक से ही यह स्तंभ आरम्भ करेंगे। इसमें महापूर्णाहुति की तैयारी के विभिन्न चरण भी होंगे।
चिंतन साँसारिक व्यवस्था को ही नहीं प्रकृति संतुलन को भी बिगाड़ता है। इस समय के प्रस्तुत घटाटोप से बचना हो तो उनके मूल कारण मानव चिन्तन और व्यवहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।
चिंतन और क्रिया-कलाप का विश्लेषण करते रहने की प्रेरणा देने के लिए ही अध्यात्म की संरचना की गयी है। एक आध्यात्मिक व्यक्ति अथवा संगठन जाति, धर्म व देश की सीमाओं से ऊपर होता है। आध्यात्मिक साम्यवाद की समस्वरता को साधकर भावी विश्व स्वयमेव ही एक सूत्र में बँधता चला जाएगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-February
चिंतन को, पर्व-वासंती आता है। बलिदानी-जीवनी से जोड़ा, किसने ? कितना ? नाता है॥
चिंतन को भी, अनुपम आकार दिये। उसके वासंती-जीवन ने, ‘वासंती-उपहार’ दिये॥1॥
चिंतन लक्ष्य की ओर चलते रहना ही धर्म बन गया है, जिसके ऊपर राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता निर्भर है। राष्ट्र की बात ही क्यों सोचें, विश्व कल्याण का मार्ग भी यही है। जनकल्याण का मार्ग भी यही है जनजागरण और लोक-मानस में उत्कृष्टता आदर्शवादिता का बीजांकुर बोया जाना वस्तुतः इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण का अभिनव प्रयोग है। हम इसी दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया को हाथ में लेकर धर्म, साहस, निश्चय और प्रबल पुरुषार्थ के साथ आगे बढ़ रहे है एवं जहाँ तक हमारा प्रभाव क्षेत्र है उसे उसी दिशा में घसीटते लिए चल रहे हैं।
चिंतन, साहस तथा आत्मविश्वास पूर्ण भावनाओं की अनिवार्यता है। पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय के मनोचिकित्सक माकिन सेलीशमेन ने एक बीमा कम्पनी में ऐसे हजारों उन आदमियों की भर्ती किया जो भावनाओं से उदार एवं समर्पित थे, लेकिन उनकी बौद्धिक दक्षता उतनी नहीं थी। यहाँ तक कि उनमें से कई तो परीक्षा में उत्तीर्ण भी नहीं हो सके थे। परंतु अपनी लगन एवं आत्मविश्वासपूर्ण भावनाओं के कारण उन्होंने कम्पनी को पहले वर्ष में 21 प्रतिशत एवं दूसरे वर्ष 5 प्रतिशत लाभाँश दिया।
चिंतन, चरित्र के उपवन में पतझर देखा। भावों के बिरवे मुरझाये देख, खिंची चिंता-रेखा॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-March
चिंतन-मनन भी किया जाये तो बहुत कुछ उस दिशा में बढ़ा जा सकता है। स्वाध्याय स्वयं ही एक तप, आसन और निर्दिष्टयासन के समान है। इसका नियम निर्वाह करने से आप ही आप अनेक नियम, संयमों का अभ्यास हो जाता है।
चिंतन की विकृति मनुष्य के चेहरे पर छाई खीझ और मस्तिष्क में भरी उद्विग्नता के अनुपात से नापी, आँकी जा सकती है।
चिंतन का थोड़ा हेर-फेर करके हम खिन्न, उद्विग्न जीवन को हँसता-हँसाता बनाने में अभीष्ट सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
चिंतन-मनन नहीं करता है और सोच लेता है कि जब मैं इतना क्रियाकाण्ड करता हूँ तो इसके बाद अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, आत्म ज्ञान अथवा परमात्मा विभूति करा देने के लिए इतना ही पर्याप्त है तो निश्चय ही भ्रम में है। आत्मा का क्षेत्र वैचारिक क्षेत्र है, सूक्ष्म भावनाओं और मनन चिंतन का क्षेत्र है।
चिंतन जीवन मूल्यों का विकास एवं विस्तार ही करता है।
चिंतन का परिष्कृत स्तर मन का भार हलका करने में बहुत सहायक सिद्ध होता है। खोज करने पर प्रतीत होगा कि दुखी मनःस्थिति का बहुत बड़ा कारण सही ढंग से सोच सकने में त्रुटि रहना ही था। उसे सुधार लेने पर अधिकाँश समस्याओं का हल मिल जाता है। फिर भी जो रह जाये उसे हर किसी को कुछ न कुछ कमी, कठिनाई रहने के सामान्य क्रम को ऐसे ही हँसते-खेलते सहन किया जा सकता है।
चिंतन बहुमुखी है और भौतिकता का ही तान बान बुनता रहता है। अंतःक्षेत्र की दिव्य विभूतियों को समझना और उन्हें प्राप्त करने का उपाय खोजना ध्यान साधना से ही संभव हो सकता है।
चिंतन की सामग्री देने से बदलती रहती हैं। महत्वाकाँक्षाओं को आवश्यक उपयोगी एवं शक्तिशाली माना गया है पर यह बात तभी सच बैठती है जब उन्हें आदर्शवादिता के साथ नियोजित किया जाये, निकृष्टता के साथ जुड़ जाने पर वह पतन और पराभव का ही पथ प्रशस्त करती हैं।
चिंतन तो और भी अधिक गहरे दलदल में फँसा देता है। उज्ज्वल भविष्य की आशा छोड़ दी जाये तो फिर चारों ओर अंधकार ही अंधकार दिखाई देगा और हलकी सी कठिनाई को पार करना भी पहाड़ उठाने जैसा भारी पड़ेगा।
चिंतन शैली के विचारों में स्पन्दन अदृश्य होने पर भी संस्कृति का प्रभावी परिचय देते हैं।
चिंतन खोजने की प्रवृत्ति हमेशा से रही है। इसके जीवंत होने का सबसे बड़ा प्रमाण है धर्म, अर्थ, काम ओर मोक्ष सभी की एक साथ स्वीकारोक्ति क्योंकि जीवन अलग-अलग हिस्सों में बैठा है। किसी को काटने-हटाने छोड़ने का मतलब है - संस्कृति का अधूरापन। इसकी पूर्णतया के जीवन्त प्रवाह को हर जगह पहुँचाने की जिम्मेदारी प्रतिभाओं की है। परन्तु भटकाव के इस दौर में याद आते हैं ए. गिलवर्ट के शब्द - “मैंने अपनी पीढ़ी की योग्यतम प्रतिभाओं को पतनावस्था में देखा है।
चिंतन का क्षेत्र है।
चिंतन पद्धतियों आदि के सोच के तौर-तरीकों का होता है। इसे जीवन के प्रति नजरिया भी कह सकते हैं। यह साहित्य के बतौर सामने आता है। मानव सभ्यता के प्राचीनतम इतिहास में ऐसे भी जीवन्त उदाहरण हैं जब इन सूक्ष्म मूल्यों का रक्षण साहित्य व पुस्तकों द्वारा संभव नहीं होता तो ऐसी दशा में उन्हें मौखिक रूप से सहेजा गया और पीढ़ी दर पीढ़ी पहुँचाया गया।
चिंतन किया जाता तो जिन्दगी का स्वरूप कुछ और होता।
चिंतन तंत्र को गम्भीरता पूर्वक सोचने और प्रयास परिश्रम की दृष्टि से भी बहुत कुछ करना होता है। इसकी सुविधा उन्हें ही मिल सकती है जिनने अपनी बड़प्पन परक आकांक्षाओं को संचित करके निर्वाह को आवश्यकताएँ पूरा करते रहना ही पर्याप्त माना है। अमीरी और गरीबी को एक साथ प्राप्त कर सकना कदाचित ही कभी किसी के लिए संभव हुआ है।
चिंतनपरक विकृतियाँ ही हमें अशान्त बनाये रखती हैं। सन्तान न होने पर कितने ही व्यक्ति दुखी रहते हैं जबकि उत्तरदायित्वों का बोझ हलका होने पर उन्हें संतान का भार वहन करने में पिसते हुए लोगों की तुलना में अधिक प्रसन्न होना चाहिए था। इसी प्रकार अनेकों अनावश्यक महत्त्वाकाँक्षाएँ दुखी बनाये रखती हैं जिनके बिना जीवन क्रम का सामान्य निर्वाह क्रम रुकता नहीं है। ऐसी अनावश्यक महत्वाकाँक्षाओं की तृष्णाओं को बोझ आसानी से हलका किया जा सकता है और सादगी के सौम्य जीवन का आनन्द लिया जा सकता है। प्रस्तुत कठिनाइयों से लड़ा जूझा जाये, उन्हें हटाने के लिए पूरा कौशल प्रयुक्त किया जाये फिर भी यदि वे न हटें तो प्रारब्ध निपट जाने की बात सोची जा सकती है।
चिंतन, आज्ञाचक्र पर अंतःत्राटक, मनोयोग कोश की विभूतियों को तीव्र गति से जाग्रत करने में समर्थ है। जप काल में स्वर्णिम सविता का ध्यान आवश्यक है। ध्यान में साधक का सविता में समर्पण, विसर्जन, विलय की गहरी अनुभूति साधनारत व्यक्ति को बोध कराती है, ‘योऽसौसूर्यो सोऽह्मस्मि।’ यानि कि वही मैं हूँ। ध्यान की इसी गम्भीरता में रुद्र, विष्णु, ब्रह्मग्रंथियाँ भी खुलती हैं।
चिंतन की इस निषेधात्मक धारा को विवेकपूर्ण पर्यवेक्षण से बहुत कुछ हलका किया जा सकता है। भविष्य में क्या होना है किसी को पता नहीं, यदि यह बात है तो विपत्ति की आशंका करने की अपेक्षा उज्ज्वल संभावनाओं की कल्पना क्यों न की जाये, साथियों के दोष ही दोष क्यों देखे जायें ? उनमें जो गुण हैं उन्हें क्यों न समझें ? उनके द्वारा जो क्षति हुई उसी पर विचार क्यों करते रहें ? जो सहयोग, सद्भाव वे देते हैं उन सुखद प्रसंगों का स्मरण क्यों न किया जाये ?
चिंतन क्षेत्र को इतना खाली नहीं छोड़ती कि वहाँ आदर्शवादी जीवन पद्धति पर विचार कर सकना और वैसा वातावरण बनाने के लिए ठोस कदम उठा सकना संभव हो सके।
चिंतन कर्म और भावना से सभी क्षेत्रों में ज्यादा से ज्यादा संवेदना बिखरे और निखरे। अपने-अपने परिवेश और समाज के अनुरूप नीति बनती है। लेकिन इन नीति नियमों का उद्देश्य यही रहा है मानव को अधिक से अधिक उदार एवं सहिष्णु बनाना। उसमें उन तत्वों को विकसित करना, जिनके द्वारा वह समाज के व्यापक दायरे में सामंजस्य बैठा सके। समाज की सौम्यता व सौजन्यता विकसित कर सके।
चिंतन के अवरोधक हैं। दूरदृष्टि के अभाव में इसमें से किसी ने परम्परा एवं प्रगति के बीच की दूरी और संबंध सूत्रों को खोजने की सही कोशिश नहीं की। इसके बिना उज्ज्वल भविष्य की संकल्पना साकार नहीं हो सकती।
चिंतन और प्रयास को दिशा देने में अंतःकरण का मार्गदर्शन होता है। अंतः कारण को कई भागो में बाँटा जाता रहा है पर उसे संक्षिप्त में अचेतन की वह परत कह सकते हैं जिसे स्वभाव एवं अभ्यास कहा जा सकता है। यह आदतें इतनी प्रबल होती हैं कि इसके सामने न बुद्धि के निर्णय ठहरते हैं और न परिस्थितियों के दबाव। इसलिए मानवी सत्ता का सबसे प्रबल पक्ष यह अचेतन या अंतःकरण ही माना जाता है।
चिंतन का शिकार है। इसके जीवन का नाव दृष्टि दोष के भँवर में फँस कर डूबने की तैयारी कर रही है। पटरी से उतरा हुआ इंजन जमीन में धँस जाता है तब उसके लिए न आगे बढ़ना संभव होता है और न पीछे हटना, कलपुर्जों की दृष्टि से बढ़ी-चढ़ी सामर्थ्यता तब निरर्थक सिद्ध होती है और वह अपने उद्धार के लिए क्रेन या जैक की सहायता चाहता है। रेलगाड़ी कीमती होती है, जैक की अपेक्षा इंजन अधिक शक्तिशाली होता है और अधिक मूल्यवान भी पर वह बड़प्पन पटरी से उतर जाने की दशा में व्यर्थ है। चिंतन की विकृति मनुष्य के चेहरे पर छाई खीझ और मस्तिष्क में भरी उद्विग्नता के अनुपात से नापी, आँकी जा सकती है।
चिंतन की पृष्ठभूमि बनाने वाली गायत्री महाविद्या एक प्रकार से अमृत है। पारस भी और कल्पवृक्ष भी। साथ ही उनने यज्ञ का तत्वदर्शन एवं विज्ञान के रूप में धर्म की सारी शिक्षाएँ समुदाय के समक्ष रख दीं। परमार्थ के लिए किये गये सत्कर्म के रूप में यज्ञ विद्या को हमारी गुरुसत्ता ने ‘जाग्रत जीवान्त पुरोहितो’ के रूप में सक्रिय कार्यकर्ताओं के माध्यम से जन जन के लिए सुलभ बना दिया। स्वयं की अनूठी एवं विलक्षण प्रयोगशाला भी यज्ञ विज्ञान पर वैज्ञानिक अनुसंधान हेतु एवं यज्ञोपैथी चिकित्सा के रूप में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान को विनिर्मित कर दिया।
चिंतन अपने आप भावनाओं के बड़प्पन में बँध जाते हैं। यदा-कदा पशुओं में भी इसकी झलक मिल जाती है। समय-समय पर समाचार पत्रों में ऐसे समाचार छपते रहते हैं, कुत्ते ने बन्दर की रक्षा की और गाय ने कुतिया के बच्चे को दूध पिलाया। कुत्ते की वफादारी और घोड़े की स्वामी भक्ति भी इसी रूप में है। परन्तु इन प्राणियों में कल्पना एवं विचारशीलता के अभाव में यह संवेदना व्यक्त नहीं हो पाती।
चिंतन से प्रवाहित विचार गंगा ही मानव वृत्तियों का कलुष धो सकने में समर्थ है। त्याग चिरअतीत से हमारे समाज व संस्कृति का मानदण्ड रहा है। इस मानदण्ड पर खरे उतरने वाले मोक्ष परायण व्यक्तियों के जीवन मूल्यों का शिक्षण संभव है। महावीर और महर्षि रमण बिना बोले ही सब कुछ सिखा देते थे जबकि वक्तृताओं की बौद्धिक रचना से प्रायः बोलने वालों की कुटिल अहंवृत्ति को ही पोषण मिलता है। यथार्थ में जिन्हें जीवन मूल्यों में गिरावट की पीड़ा है, कसक है, वे आगे आयें, तोड़ फेंके स्वार्थ और अहं की बेड़ियों को, चाहे वे लोहे की हो या सोने की और प्रामाणित कर दें अपने जीवन से कि वास्तविक जीवन मूल्य क्या है।
चिंतन उसके दुख के निवारण के लिए सक्रिय हो उठे। हमारे हाथों-पाँवों में उसकी सेवा के लिए अकुलाहट भर जाये यही संवेदना है। संवेदना जब सक्रिय होती है तो अस्तित्व की सारी शक्तियों को एक सूत्र में पिरोकर इच्छित दिशा में अग्रसर कर देती है। कर्म और चिंतन अपने आप भावनाओं के बड़प्पन में बँध जाते हैं। यदा-कदा पशुओं में भी इसकी झलक मिल जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-May
चिंतन, चरित्र, आदर्श एवं व्यवहार का ऊँचा उठाना जो इस तथ्य को जानता है, वही सच्चा अध्यात्मवादी है।
चिंतन वाला, अणु विभीषिका से सारे संसार को नष्ट करने वाला मस्तिष्क जीवित रह गया तो ? फिर इसका तो कोई अंत नहीं।
चिंतन एवं आत्म मंथन का समय हैं नवसृजन के ये जुझारू सैनिक चाहे वे गायत्री तपोभूमि , शांतिकुंज एवं ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के कार्यकर्त्ताओं के रूप में अग्रिम पंक्ति में खड़े हो। अथवा फिर अपने-अपने क्षेत्रों में नवनिर्माण के लिए जुड़ रहे कर्मठ सेनानी हों। अपने युग के इस अलौकिक महाभारत में सभी की भूमिका एक से बढ़कर एक है। कोई किसी से कम नहीं। मनुष्यता की इंच-इंच भूमि पर लड़े जा रहे इस युद्ध में यूँ तो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में सभी किसी न किसी तरह से फँसे हुए है।
चिंतन के आधार पर विनिर्मित किया गया हैं , उसे जो कोई गम्भीरतापूर्वक समझने की चेष्टा करेगा,उसे आसुरी तत्वों एवं शक्तियों की पराजय के साथ मानव जाति के सर्वांग सुन्दर एवं उज्ज्वल भविष्य कर झलक स्पष्ट दिखाई पड़ेंगीं।
चिंतन में हिंसात्मक क्रूरता के संस्कार ही लाता है। हमारे शिशु - शावकों एवं पोषण के नाम पर दूध पीने वालों के जनमानस में ये संस्कार तेजी से घुलते चले जा रहे है। इसी कारण आज तनाव, वर्ग संघर्ष संक्षोभ-विक्षोभ तेजी से बढ़ते दिखाई देते हैं। हर कोई झल्लाता अथवा ऐसे कृत्य करता देखा जाता है, जो कि मानवीय गरिमा के अनुरूप नहीं है। दूसरी ओर नर-प्रजाति का माँस व्यापार तु हनन होते रहने से ग्रामीण ऊर्जा के स्रोत बड़ी तेजी से सूखते चले जा रहे है।
चिंतन को दिग्भ्रमित करने में लगा हुआ है। विज्ञान का सर्वोत्तम उपयोग लौकिक सुखों की अभिवृद्धि नहीं, अपितु अमरत्व प्रदान करना और साँसारिक भयो से मुक्ति प्रदान करना है।
चिंतन का परिचायक है। भरपेट भोजन जिस अन्नाहार-शाकाहार पर निर्भर होना चाहिए, वह संतुलित पर्यावरण पर टिका हुआ है। गोचर क्षेत्र की सूखी घास, कृषि कार्य से उपजे वेस्ट प्रोडक्ट्स को खाकर यों पशु उपयोगी गोबर व गो-मूत्र किसानों को देते थे। उपले ही गाँवों में ऊर्जा के स्रोत थे। आज गोबर गैस तैयार करने के आधुनिक तरीके भी निकल आए है।
चिंतन प्रधान होंगे। अंतर्राष्ट्रीयता भावनात्मक एवं वैचारिक उत्कर्ष के लिए माध्यम बनेगी। श्रेष्ठ विचार एवं रेष्ठ जीवन-पद्धति कहीं की भी हो उसे अपनाना गौरव की बात समझी जाएगी। साधन’-सुविधाओं का आदान-प्रदान स्टेटस सिम्बल को ऊँचा करने के लिए नहीं, जीवन निर्वाह के साधनों को दुनिया के अन्तिम छोर में बैठे इनसान को सुखी बनाने के लिए किया जायगा।
चिंतन की पृष्ठभूमि बनाने का काम अध्यात्म करता है। आत्मा में विद्यमान परमात्मा को हम कैसे विकसित करें, परन्तु आत का मनुष्य तो पूजा-पाठ , कर्मकाण्ड, अनुष्ठान तथा हनुमानजी को प्रसाद चढ़ा देने की प्रतिमा को ही अध्यात्म क्या , सब कुछ मान बैठा है यह उसकी भूल है। वास्तव में अध्यात्म का मतलब है-आदमी के चिंतन, चरित्र, आदर्श एवं व्यवहार का ऊँचा उठाना जो इस तथ्य को जानता है, वही सच्चा अध्यात्मवादी है।
चिंतन भौतिकी अणु विज्ञान के क्षेत्र में किया था, समाप्त होने की आशा है। अन्य उनके खेमे के वैज्ञानिक चाहते हैं कि उनके प्रयोगों की शृंखला बन्द न हो एवं वे क्लोनिंग द्वारा एक नया वैज्ञानिक उनके ही जैसा है तैयार करके रख लेना चाहते हैं ताकि वह शोधकार्य को आगे बढ़ा सके। यह मात्र संभावना है , किन्तु क्या यह सही है। कहीं घातक चिंतन वाला, अणु विभीषिका से सारे संसार को नष्ट करने वाला मस्तिष्क जीवित रह गया तो ? फिर इसका तो कोई अंत नहीं।
चिंतन में बदल सकने के मूल में छिपा कारण माना जा सकता है।
चिंतन में घुसी विकृतियों व न सुधरने की स्थिति में और भी उग्र होते चले जा रहे है, इस वर्ष कुछ विशिष्ट दण्ड ही समूची धरित्री को देने में मुख्य भूमिका निभाएँ। प्रकृति को स्वाभाविक अवस्था विकृति संवत्सर में बढ़ते पापाचार के साथ-साथ स्वतः बिगड़ने लगती है। ऐसे में वर्षा कम होने एवं अकाल की परिस्थितियोँ बनने तक की सम्भावनाएँ प्रबल होने लगती है। पर्याप्त उत्पादन व अन्न संग्रह के बावजूद महंगाई बढ़ते चले जाने ऐसे दिनों में पूरे विश्व में देखा जा सकता है। बड़े-बड़े राजनेताओं में परस्पर ईर्ष्या-द्वेषगत लड़ाइयाँ, सभी विभागों की कार्य कुशलता में कमी आना, विदेशी कर्जे बढ़ते चले जाना, घोटालों की संख्या में और भी वृद्धि होते चले जाना एवं विश्व में कहीं भी कभी भी अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के बिगड़ते चले जाने के कारण विश्वयुद्ध जैसी स्थिति का ऐसे उत्पातों का खतरा अब और बढ़ गया है।
चिंतन विकृति एवं आचरण भ्रष्ट है, किंतु उन सभी के लिए लिए शुभ है जो आध्यात्मिक पुरुषार्थ में, सामूहिक साधनाएँ समूह मन के जागरण हेतु किये जा रहे पुरुषार्थों में एवं सविता-देवता बृहस्पति की उपासना में तन्मय बने रह, अपने लौकिक पुरुषार्थ में कोई कमी नहीं आने देते । यह समस्त विक्रमी संवत्सर हमें प्रेरित करने आया है कि यदि हम अशुभ से बचना चाहते हैं, तो गायत्री उपासना करने वालों की संख्या में न केवल वृद्धि करें, युगसंधि महापुरश्चरण में भागीदारी कर देवत्व को संगठित करने का भी प्रयास करें। श्रुति कहती है कि दैव-दैव कहना मात्र आलसी-प्रमादियों को शोभा देता है जो ब्रह्ममुहूर्त में जागकर औरों को भी सारे राष्ट्र को विश्व समुदाय को जाग्रत बनाए रखने का पुरुषार्थ करते हैं, इनके लिए ‘विकृति संवत्सर‘ के प्रतिफल शुभ भी बन सकते हैं।
चिंतन, शालीन आचरण एवं विनम्र व्यवहार से किया जाता था। त्याग एवं बलिदान के आभूषणों से अलंकृत नररत्न ही प्रतिष्ठा के योग्य माने जाते थे। कालान्तर में सोच व नजरिया बदला। इन मानवीय मूल्यों के स्थान पर आर्थिक सम्पन्नता का आधार खड़ा किया गया। जिसकी कमजोर नींव पर टिकी प्रतिष्ठा की मंजिल चन्द क्षणों की चकाचौंध दिखाकर धराशायी हो जाती है।
चिंतन को सद् चिंतन में बदल सकने के मूल में छिपा कारण माना जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-July
चिंतन-मनन पर आधारित ग्रंथ है।
चिंतन करना चाहिए कि जिसने सारी जिंदगी हमारे लिए खपा डाली, हमको दे डाली उसके हाथ खाली है। उसके पास कुछ नहीं हैं, सब कुछ दे दिया। अपना खजाना खाली कर दिया। क्या आपको इन अनुदानों का मूल्याँकन किया ? अगर किया जाना है तो एक ही रूप में किया जाना है कि आपको थोड़ी-सी हिम्मत करनी है।
चिंतन
चिंतन वाले थे कि वे गायत्री परिवार के उनसे जुड़े हर परिजन को एक ही जाति-ब्राह्मण कुल का मानते थे एवं इस सिद्धाँत के पोषक थे कि गायत्री परिवार के परिजनों को आपस में एक−दूसरे के बिना जन्म-जाति देखे, संस्कारों के आधार पर विवाह संबंध स्थापित करने चाहिए। हम ही ठिठक गए। हम कहाँ क्राँतिकारी हो पाए? यदि दस प्रतिशत भी उनकी मान ली होती तो आज अविवाहित कन्याओं की समस्याएँ इस तरह मुँहबाये खड़ी दिखाई नहीं देतीं।
चिंतन मिलना था, उसने अब स्वयं को मात्र मनोरंजन तक, विषय सेवन, उपभोग में ढेर सारे चैनल्स उपलब्ध हैं। कारगिल युद्ध ऐसा था, जिसका एक प्रकार से युद्ध संवाददाताओं ने सजीव प्रसारण किया हो, ऐसा कहा जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी। ईराक पर अमेरिका के आक्रमण को भी अभी चैनल्स ने सजीव दिखाया। कुछ भी गोपनीय नहीं रह गई है। इस खुले प्रजातंत्र में हर क्षण हर व्यक्ति तक वह पहुँच रहा है, जिसका संभवतः वह सुपात्र नहीं है।
चिंतन उस जिम्मेदारी की ओर है, जो मुझको सौंपी गई है, लेकिन वह परोक्ष रूप से मेरे ऊपर आ गई है, मेरे कंधों पर आ गई हैं। आज में चिंतन में डूब गई कि अभी तक तो मैं माँ ही थी। इतने दिन तक हर व्यक्ति से यही कहते थे कि आशीर्वाद लेना है तो माताजी के पास जाइए, यज्ञ भस्म ले जाइए। आशीर्वाद माँगना है तो माताजी के पास जाइए और काम करना हैं तो मेरे पास आइए, लेकिन आचार्य जी ने आज जो शब्द कहा है,मैं समझती हूँ, वह शायद पहली बार कहा हैं। उन्होंने हमेशा यही कहा हैं कि जो मैं हूँ, वही माताजी हैं और जो माताजी हैं, वही मैं हूँ।
चिंतन, जो आज कहीं दीखता नहीं। सुधारक स्तर पर वे आगे बढ़कर कार्य करते दिखाई देते हैं एवं सही मायने में युग निर्माण योजना के सूत्रधार बने दिखाई देते हैं। समय-समय पर दिए पत्रों में वे 6-3-65 को लिखते हैं-
चिंतन का पर्व है। यह साधारण नहीं, असाधारण है। इसको गुरुपूर्णिमा का पर्व कहा गया है। अर्थात् उसका दिन जिसने कि सारी जिंदगी राह दिखाई। यह आज का पर्व है।
चिंतन सहज ही होने लगता है। कितने विलक्षण व निराले रूप हैं। उनके। हर क्षेत्र में तरह-तरह का मार्गदर्शन उनका हमारे लिए उपलब्ध है। सत्तर खंडों का वाङ्मय तो उपलब्ध है ही, उनके हाथ से लिखी, उनकी हस्तलिपि में उपलब्ध चिट्ठियाँ भी कम नहीं हैं।
चिंतनीय है।निदिध्यासन ध्यान का पर्याय है। इस अवस्था में साधक गुरु द्वारा ज्ञान व साधना में लीन हो जाए। उसे संकल्पपूर्वक अपनी समस्त दुर्बलताओं को त्यागकर संयम द्वारा साधना के पथ पर आरुढ़ होना चाहिए। यही उपनिषद् की पावन व दिव्य शिक्षा है, जिसे अपनाकर हम अपने आँतरिक विकास के साथ-साथ नैतिकता तथा उच्च मानवीय मूल्यों का भी संवर्द्धन कर सकते है।
चिंतन की दिशा बदलने से ही होगा यह कार्य लेखक, कवि और प्रकाशक की त्रिमूर्ति ही करेगी। पुस्तक प्रकाशकों का संघ कसम खाए कि हम लोग जनमानस को विकृत करने वाला, अंधविश्वास, अनाचार एवं कुत्सा भड़काने वाला साहित्य नहीं छापेंगे। पुस्तक विक्रेताओं की पंचायत यह फैसला करे कि गोमाँस की तरह पतनोन्मुख साहित्य बेचकर भ्रष्ट कमाई करने की अपेक्षा भूखे सो जाना या घास बेचकर पेट भरना अच्छा समझेंगे। साहित्य सृजन, प्रकाशन और विक्रय की गंगा-यमुना सरस्वती यदि लोक-मंगल की दृष्टि अपना लें तो उस तीर्थराज में स्नान करके अपना कोढ़ी समाज कायाकल्प करने में समर्थ हो सकता है।
चिंतन में डूब गई कि अभी तक तो मैं माँ ही थी। इतने दिन तक हर व्यक्ति से यही कहते थे कि आशीर्वाद लेना है तो माताजी के पास जाइए, यज्ञ भस्म ले जाइए। आशीर्वाद माँगना है तो माताजी के पास जाइए और काम करना हैं तो मेरे पास आइए, लेकिन आचार्य जी ने आज जो शब्द कहा है,मैं समझती हूँ, वह शायद पहली बार कहा हैं। उन्होंने हमेशा यही कहा हैं कि जो मैं हूँ, वही माताजी हैं और जो माताजी हैं, वही मैं हूँ। ऊपर हम दो ही जाते है-मैं जाती हूँ और एक लड़का जाता है।
चिंतन का चरम प्रकाश एवं मुख्य स्रोत हैं। वेद का ज्ञान पक्ष उपनिषद् कहलाता है। वेद के अंतिम भाग में एवं निष्कर्ष रूप से जो उच्च आध्यात्मिक चिंतन, उत्कृष्ट शिक्षा, उदात्त विद्या तथा गूढ़ साधना विद्यमान है, वही उपनिषद् का मुख्य विषय है।
चिंतन में ऐसी डूब गई हूँ कि अभी तक उसी में हूँ कि क्या मैं यह जिम्मेदारी निभा पाऊंगी।
चिंतन के बाद कितना परिवर्तन आया, इससे सब वाकिफ है॥ विगत तैंतीस वर्ष में वह बदलाव आया है, जो विगत डेढ़ सौ वर्षों में भी नहीं आया था। वीडियो, डिजिटल टेक्नोलॉजी, उपग्रह-प्रसारण, ढेर सारे चैनल्स का प्राकट्य एवं घर-घर में उस प्रसारण का पहुँचना विज्ञान के आविष्कार ने सरल बना दिया है। जिस प्रसारण से सकारात्मक चिंतन मिलना था, उसने अब स्वयं को मात्र मनोरंजन तक, विषय सेवन, उपभोग में ढेर सारे चैनल्स उपलब्ध हैं। कारगिल युद्ध ऐसा था, जिसका एक प्रकार से युद्ध संवाददाताओं ने सजीव प्रसारण किया हो, ऐसा कहा जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी। ईराक पर अमेरिका के आक्रमण को भी अभी चैनल्स ने सजीव दिखाया।
चिंतन के अनुसार अभ्यास और वैराग्य से अनियंत्रित काम प्रवृत्ति का निरोध संभव है। उसे हठपूर्वक नष्ट कर देने की बात नन सोची जाए, वरन् ऐसे प्रयोजन में लगा दिया जाए जिसमें उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति हो।
चिंतन का पर्व है। अभी तक जितने अनुदान आपको मिले हैं और जो मिलने जा रहे हैं, आप उनका चिंतन कीजिए और उस चिंतन में डूब जाइए,सराबोर हो जाइए। आप गुरुजी में मिल जाइए और गुरुजी आप में। आप जब उनमें मिल जाएँगे तो आपको आत्मसाक्षात्कार हो जाएगा। आप जब उनको अपने में मिला लेंगे और उनमें आप मिल जाएँगे तो आपको अनुभव होगा कि गुरुजी हमारे हैं।
चिंतन करते है, जिन गुरुओं के अनुदानों से शिष्यों की झोली भर दी गई। उनको महान बना दिया गया। यह वही महापर्व है।
चिंतन में डूब जाइए,सराबोर हो जाइए। आप गुरुजी में मिल जाइए और गुरुजी आप में। आप जब उनमें मिल जाएँगे तो आपको आत्मसाक्षात्कार हो जाएगा। आप जब उनको अपने में मिला लेंगे और उनमें आप मिल जाएँगे तो आपको अनुभव होगा कि गुरुजी हमारे हैं। बेटे! मुझको यह अनुभव होता है।
चिंतन कीजिए और उस चिंतन में डूब जाइए,सराबोर हो जाइए। आप गुरुजी में मिल जाइए और गुरुजी आप में। आप जब उनमें मिल जाएँगे तो आपको आत्मसाक्षात्कार हो जाएगा। आप जब उनको अपने में मिला लेंगे और उनमें आप मिल जाएँगे तो आपको अनुभव होगा कि गुरुजी हमारे हैं। बेटे! मुझको यह अनुभव होता है।
चिंतन पठनीय है। हम सभी साधक स्तर के शिष्य हैं तो इन पंक्तियों में अपने लिए उपयोगी मार्गदर्शन पा सकते है। हमारी गुरुसत्ता सही मायने में कबीर समान थी। उनका जीवन व अपनी गुरुसत्ता का जीवन बहुत साम्य रखता है। यदि हम अपना समर्पण और अधिक सशक्त और मजबूत करना चाहते है तो कबीर साहब की एक साखी से कुछ प्रेरणा ले सकते है एवं इन वचनों को दोहरा सकते हैं-
चिंतन को सृजन का नया मार्ग मिले और बौद्धिक पराधीनता के बंधनों से जकड़ी हुई विचारणा को विवेक के उन्मुक्त आकाश में विचरण करने की संभावना बढ़ चले। फिल्म उद्योग में लगी पूँजी और प्रतिभाएँ यदि पशुता भड़काकर जेब भरने की दुरभिसंधि से बाज न आएँ तो उनकी प्रतिद्वंद्विता में नया मोरचा खड़ा किया जा सकता है। प्रगतिशील फिल्म उद्योग को जन्म दिया जाए, इसके लिए अब ठीक समय आ गया। नए कलाकार उत्पन्न किए जाएँ। सभी कुछ स्वयंसेवक स्तर पर हो।
चिंतन वाले गुरुदेव 1-2-67 को एक सज्जन को बेबाक शब्दों में लिखते है, “राजनीति आजकल बहुत महत्व एवं वर्चस्व प्राप्त कर चुकी है। उसमें समाज के निर्माण एवं विकास की एक बहुत बड़ी क्षमता सन्निहित हो गई है। इसलिए उसकी दिशा के सही-गलत होने का प्रभाव भी बहुत पड़ता है। आप लोग राजनीति को सही दिशा में अग्रसर करने के लिए जो प्रयास कर रहें है, उसमें सफलता मिले, इसकी प्रार्थना करते रहते हैं।
चिंतन करे, क्योंकि यही ब्रह्म ही एकमात्र मननीय व चिंतनीय है।निदिध्यासन ध्यान का पर्याय है। इस अवस्था में साधक गुरु द्वारा ज्ञान व साधना में लीन हो जाए। उसे संकल्पपूर्वक अपनी समस्त दुर्बलताओं को त्यागकर संयम द्वारा साधना के पथ पर आरुढ़ होना चाहिए। यही उपनिषद् की पावन व दिव्य शिक्षा है, जिसे अपनाकर हम अपने आँतरिक विकास के साथ-साथ नैतिकता तथा उच्च मानवीय मूल्यों का भी संवर्द्धन कर सकते है।
चिंतन-मनन द्वारा अपने चारों ओर एक उच्चतर वातावरण तैयार किया जाए। क्रमशः यह आदत व्यक्तित्व के भावनात्मक ढाँचे के रूपांतरण में एक महत्त्वपूर्ण कारक बन जाता है।
चिंतन आजादी के बाद का भी इस लेख शृंखला के अंतर्गत दे चुके हैं, पर स्पष्ट चिंतन वाले गुरुदेव 1-2-67 को एक सज्जन को बेबाक शब्दों में लिखते है, “राजनीति आजकल बहुत महत्व एवं वर्चस्व प्राप्त कर चुकी है। उसमें समाज के निर्माण एवं विकास की एक बहुत बड़ी क्षमता सन्निहित हो गई है। इसलिए उसकी दिशा के सही-गलत होने का प्रभाव भी बहुत पड़ता है। आप लोग राजनीति को सही दिशा में अग्रसर करने के लिए जो प्रयास कर रहें है, उसमें सफलता मिले, इसकी प्रार्थना करते रहते हैं।
चिंतन से जो मस्तिष्कीय विद्युतप्रवाह उमड़ते है। वे ही यौनलिप्सा में मनुष्य को बलात् प्रवृत्त करते है। यह विद्युत धारा घटाई भी जा सकती है। और बढ़ाकर सुनियोजित भी की जा सकती है। इसके लिए अंतः चेतना का बलिष्ठ होना अत्यंत आवश्यक है।
चिंतन, उत्कृष्ट शिक्षा, उदात्त विद्या तथा गूढ़ साधना विद्यमान है, वही उपनिषद् का मुख्य विषय है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-November
चिंतन में इन सम्बन्धों का दायरा केवल स्थूल स्तर तक सीमित व सिमट कर रह गया है। अध्ययन के आधार पर प्राप्त तथ्यों की विवेचना-व्याख्या करने पर पता चलता है कि प्राच्य ऋषियों का उद्देश्य बाह्य प्रकृति से अन्तःप्रकृति में प्रवेश कर तथा उससे परे व पार जाकर आनन्द पाना था। पश्चिमी दार्शनिकों में से अधिकाँश का लक्ष्य बाह्य प्रकृति के साथ अन्तःप्रकृति का सम्बन्ध सूत्र स्थापित कर अन्तरंग में रमणकर सुख की उपलब्धि थी। जबकि आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन में यह लक्ष्य बाह्य प्रकृति से अधिकाधिक प्राप्त कर मात्र उसका उपभोग करना रह गया है।
चिंतन से बचना चाहिए। रोगी को पथ्य में शीघ्र पचने वाले हलके तथा ठंडे आहार देना चाहिए। जौ, गेहूँ का दलिया, मूँगदाल, पुराने चावल की खिचड़ी, पतली रोटी, डबल रोटी, हरा शाक, पालक, चौलाई बथुआ, तोरई घिया की सब्जी, बकरी या गाय का दूध, दूध की लस्सी, नींबू का शर्बत, नारियल के पानी का सेवन इस रोग में हितकारी है। पथ्य परहेज युक्त संयमित जीवनचर्या स्वास्थ्य रक्षा के स्वर्णिम सूत्र है, इन्हें ध्यान में रखा जाना चाहिए।
चिंतन का माहौल बना दे, इसका उदाहरण अन्यत्र कही देखने को नहीं मिलता। यह तो इस प्राणपंच की ही महिमा है।
चिंतन की विधि ही ध्यान कहलाती है। मन को खुला छोड़ देते है तो अनगढ़ कुसंस्कारी अवचेनत मन के कारण अस्थिरता के दिखाई देती है। मनोयोग तत्परता एकाग्रता तल्लीनता जैसी उपलब्धियाँ नहीं मिल पाती। मन की निरर्थक भाग दौड़ को नियंत्रित करने एवं उसे एक ही विषय पर केंद्रित करने के लिए एकाग्रता की शक्ति हर साधन को अभीष्ट है। तब ही तो मन शक्तिशाली संकल्पहीन बन पाएगा।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्ट आदर्शवादी बनकर छलकता है। उसी के परिपोषण हेतु व्रत नियमों का निर्धारण, परिपालन किया जाता है। इसको आध्यात्मिक अग्नि क्षेत्र कहते है।
चिंतन पद्धति में परिवर्तन, पथ्यापथ्य के नियमों का परिपालन तथा आयुर्वेद योग यज्ञोपचार से कैसे मनुष्य जाति को स्वस्थ बनाया जा सकता है, यह मार्गदर्शन ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में नियमित रूप से देखा जा सकता है। दृष्टाँतों की शैली से जीवन में गुणों का विकास कैसे किया जाए यह समग्र मार्गदर्शन इस पत्रिका में मिलता है।
चिंतन पद्धति एवं जीवन शैली को व्यवस्थित करना होगा। अपने खान-पान एवं आचार-विचार में संयम एवं सात्विकता का अधिकाधिक समावेश करना होगा। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हमारे जीवन के सभी पहलुओं के बीच आदर्श संतुलन कायम हो। कोई भी एक पक्ष जरूरत से ज्यादा हावी न हो। काम-काज के साथ खेलकूद, मनोरंजन, विश्राम और नींद भी हमारे जीवन के आवश्यक पहलू हैं।
चिंतन करके प्रकृति के विकासक्रम को पूर्ण करके इससे उर्ध्व स्तरों पर आरोहण का निर्देश किया है। भारतीय संस्कृति में जीवन को मूर्त एवं अमूर्त रूप में पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र, नदी, निर्झर, उपवन, वृक्ष-वनस्पति, पशु-पक्षी आदि के साहचर्य एवं सहयोग के रूप में देखा गया है। अतः पर्यावरण का संरक्षण यहाँ का धर्म कर्त्तव्य रहा है।
चिंतन में यह लक्ष्य बाह्य प्रकृति से अधिकाधिक प्राप्त कर मात्र उसका उपभोग करना रह गया है।
चिंतन उसके समस्त एवं सम्पूर्ण नकारात्मक संस्कारों, आदतों एवं वृत्तियों को रौंदता हुआ आगे बढ़ता है। नेपोलियन के समान वह ‘नहीं’ जैसे नकारात्मक शब्द को सुनना तक पसन्द नहीं करता क्योंकि ‘नहीं’ शब्द कार्य प्रारम्भ करने से पहले ही मृत्यु तुल्य असफलता को आमंत्रण देना होता है। विजेता पुरुषार्थी एवं पराक्रमी होता है। उसके गहन में सदा एवं सदैव ‘हाँ’ मंत्र प्रतिध्वनित होता रहता है। वह कहता है ‘हाँ’ मैं यह कर सकता हूँ चाहे इस अभीष्ट एवं उत्कृष्ट उद्देश्य के लिए मेरे प्राणों की बलि ही क्यों न लग जाय ।
चिंतन को जन जन तक पहुँचाते है। ये सभी पोस्टमैन की भूमिका भी निभाते है एवं सत्परामर्श देने वाले ऋषि की भी। 66 पृष्ठों का यह प्राण प्रवाह सभी परिजनों तक पहुँचकर नूतन प्राणसंचार करता है। सभी इसकी प्रतीक्षा करते है व मिलने पर ऐसा अनुभव करते है, मानो गुरुसत्ता की पाती सीधे उनके पास पहुँच गई हो।यह जो पाठक परिजन का परिकर है, अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
चिंतन में पर्यावरण के प्रति उच्चस्तरीय भाव सन्निहित थे। पश्चिम का दार्शनिक चिंतन उर्ध्व स्तरों की चर्चा न कर मात्र मानव तथा प्रकृति के सम्बन्धों को सूक्ष्म व स्थूल स्तर पर लेता है, जबकि आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन में इन सम्बन्धों का दायरा केवल स्थूल स्तर तक सीमित व सिमट कर रह गया है। अध्ययन के आधार पर प्राप्त तथ्यों की विवेचना-व्याख्या करने पर पता चलता है कि प्राच्य ऋषियों का उद्देश्य बाह्य प्रकृति से अन्तःप्रकृति में प्रवेश कर तथा उससे परे व पार जाकर आनन्द पाना था। पश्चिमी दार्शनिकों में से अधिकाँश का लक्ष्य बाह्य प्रकृति के साथ अन्तःप्रकृति का सम्बन्ध सूत्र स्थापित कर अन्तरंग में रमणकर सुख की उपलब्धि थी। जबकि आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन में यह लक्ष्य बाह्य प्रकृति से अधिकाधिक प्राप्त कर मात्र उसका उपभोग करना रह गया है।
चिंतन और लक्ष्य में जमीन आसमान जितना अंतर रहते हुए भी असली और नकली की एक जैसी स्थिति कैसे हो सकती है? यदि गुफा में रहने से ही सिद्धियाँ मिली होती तो सभी चूहे सिद्धपुरुष हो गए होते। शीत आतप का जहाँ अधिक दबाव होता है या दृष्टि से बचने की आवश्यकता होती है वहाँ वन्य पशु प्रायः गुफाओं में रहते है या उसे अपने पंजों से खोदकर बना लेते है। नेवला, गोह साँप आदि का अधिकाँश जीवन गुफाओं में ही समय काटते हुए बीतता है।
चिंतन उर्ध्व स्तरों की चर्चा न कर मात्र मानव तथा प्रकृति के सम्बन्धों को सूक्ष्म व स्थूल स्तर पर लेता है, जबकि आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन में इन सम्बन्धों का दायरा केवल स्थूल स्तर तक सीमित व सिमट कर रह गया है। अध्ययन के आधार पर प्राप्त तथ्यों की विवेचना-व्याख्या करने पर पता चलता है कि प्राच्य ऋषियों का उद्देश्य बाह्य प्रकृति से अन्तःप्रकृति में प्रवेश कर तथा उससे परे व पार जाकर आनन्द पाना था। पश्चिमी दार्शनिकों में से अधिकाँश का लक्ष्य बाह्य प्रकृति के साथ अन्तःप्रकृति का सम्बन्ध सूत्र स्थापित कर अन्तरंग में रमणकर सुख की उपलब्धि थी। जबकि आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन में यह लक्ष्य बाह्य प्रकृति से अधिकाधिक प्राप्त कर मात्र उसका उपभोग करना रह गया है।
चिंतन व पश्चाताप करने को प्रेरित किया। कथा समाप्ति के तुरंत बाद वह पंडित जी के चरणों में गिर गया, अपने विगत पापोँ की जानकारी कराई व आगे के लिए जीवन सुधारने की दिशा पूछी। उन निर्देशों ने उसका जीवन बदल दिया। तदुपराँत वह प्रभुनारायण जीवन बिताने व जो पापों की खाई उसने खोदी थी, सेवा परमार्थ द्वारा उसे पाटने लगा।
चिंतन में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है, जितना मानव जाति का इतिहास।
चिंतन तथा जनकल्याण का कार्य करता था। संन्यास आश्रम में तो समग्र उत्तरदायित्वों एवं जिम्मेदारियों को भावी पीढ़ी को समर्पित-अर्पित कर निर्जन वन एवं गिरि-कन्दराओं में रहकर आत्मकल्याण हेतु तप करने का विधान तय किया गया था।
चिंतन प्रवाह में एक उत्कृष्ट चिंतन का माहौल बना दे, इसका उदाहरण अन्यत्र कही देखने को नहीं मिलता। यह तो इस प्राणपंच की ही महिमा है।
चिंतन प्रकृति-पर्यावरण और मानव के बीच के सूक्ष्म व संवेदनशील सम्बन्धों को पूरी तरह भुला देने के कारण ही प्रकृति का घनघोर दोहन-शोषण की स्वार्थमयी घृणित प्रक्रिया चल पड़ी है। आज हम अपनी ही प्रकृति माता का चीरहरण करने का अक्षम्य अपराध करते चले जा रहे हैं। इसलिए प्रकृति भी सिंहनी की तरह उठ खड़ी हुई है। पर्यावरण और अन्तःकरण के विघटन एवं टूटन से ही विभिन्न प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोग पनप रहे हैं। आज इस तथ्य की पुष्टि करते हुए व्यवहार विज्ञानी, मनोवैज्ञानिक एवं पर्यावरणविद् स्वीकारने लगे हैं कि व्यक्ति के अन्तःकरण की संरचना तथा मनःस्थिति निकटस्थ पर्यावरण के विघटन की स्थिति पर निर्भर करती है।
चिंतन, अंत क्षेत्र के अनुसंधान के लिए ऐसा वातावरण अधिक उपयोगी माना जाता था। तब उसमें स्थान स्थान पर अनेक योगी यती रहते थे। उनका आत्मबल ऐसा होता था कि शरीर निर्वाह के साधन भी अनायास ही मिल जाते थे और सुरक्षा संकट उत्पन्न नहीं होता था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-August
चिंतन को जागृत करना होगा।
चिंतन न कर उन्हें मन से बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी मध्य में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके, जिसकी इंद्रियाँ मन और बुद्धि जीती हुई हैं, ऐसा मोक्षपरायण मुनि (सतत परमेश्वर के स्वरूप का मनन करने वाला,) जो इच्छा, भय, क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है।
चिंतन में कर्म के अनुसार स्वर्ग-नरक की धारणा का प्रतिपादन मिलता है।
चिंतन का क्रम अपनाएँ।
चिंतन ही परिष्कृत दृष्टिकोण है। वही वास्तविक सौंदर्य है। सुन्दरता का मापदण्ड शारीरिक नहीं होता। उच्चस्तरीय विचार एवं संवेदनशील हृदय में सच्चा सौंदर्य झलकता है। विश्वास व श्रद्धा के सुमन में ही दिव्य सौंदर्य का सौरभ सुरभित होता है।
चिंतन के कर्त्तव्य सूत्र ही हैं। यह अलग बात है कि हम सब आज खुद ही अपनी धरोहर को विस्तृत कर चुके हैं। विज्ञानवेत्ता, समाजशास्त्री एवं मनोवैज्ञानिक सभी एक स्वर से संस्कार एवं संकल्प के महत्त्व को अनुभव कर रहे हैं। सबका कहना यही है कि मानवीय व्यक्तित्व एवं मानवीय समाज को नए सिरे से गढ़ना-ढालना है तो ऋषिचेतना एवं चिंतन को जागृत करना होगा।
चिंतन करने वे साधना जीवन की अनेकों समस्याओं का समाधान होता है। साधना पथ पर बिखरे हुए अनगिन कंटक अपने आप ही दूर हो जाते हैं। नये-नये साधना रहस्यों का मर्म अंतर्दृष्टि में उजागर होता है। अन्तर्यात्रा की दुरुहता-जटिलता स्वयं ही सुगम हो जाती है। यह अनुभव किसी अकेले एक का नहीं, बल्कि उन अनगिनत साधकों का है, जो दृढ़ निष्ठ होकर संकल्पित एवं समर्पित भाव से साधनारत हैं।
चिंतन हमारा जहाँ का तहाँ बना रहा तो आप विश्वास रखना, आपको हमेशा शिकायत करनी पड़ेगी कि हमारी पूजा बेकार जा रही है। हमारा भजन बेकार जा रहा है। हमारी उपासना बेकार चली गई, हमारा अनुष्ठान बेकार चला गया। यही एक भूल है, जिसकी चट्टान से टक्कर खाकर बहुत सारे जहाज डूब गए। और संन्यास डूब गए।
चिंतन विधेयात्मक चिंतन होता है। स्वयं के द्वारा जिसका चिंतन होगा उसका समग्र एवं सम्पूर्ण विकास अवश्यंभावी है। स्व का चिंतन ही परिष्कृत दृष्टिकोण है। वही वास्तविक सौंदर्य है। सुन्दरता का मापदण्ड शारीरिक नहीं होता।
चिंतन में यह कल्पना झलकती है। इसमें नरक के विषय में स्वतंत्र दृष्टिकोण नहीं होने के बावजूद इसकी परिकल्पना की गई हैं इसके अनुसार नरकलोक अंधकार से आवृत्त है और वहाँ सुख व आनंद का अभाव है। इस संसार में अविद्यारूपी नरक के उपासक नरकलोक जाते हैं। आत्मघाती पुरुषों के लिए एवं अज्ञानी को भी मृत्यु के पश्चात इस नरकवास की यातना झेलनी पड़ती है। इसके ठीक विपरीत सद्कर्म करने वाले ज्ञानी पुरुष की सद्गति स्वर्गलोक की और होती है।
चिंतन होगा उसका समग्र एवं सम्पूर्ण विकास अवश्यंभावी है। स्व का चिंतन ही परिष्कृत दृष्टिकोण है। वही वास्तविक सौंदर्य है। सुन्दरता का मापदण्ड शारीरिक नहीं होता। उच्चस्तरीय विचार एवं संवेदनशील हृदय में सच्चा सौंदर्य झलकता है।
चिंतन करना चाहिए तथा व्यवहार में उतारना चाहिए। ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, नहीं सोचना चाहिए जो सद्गुणों से परे हो, प्रभु की मर्जी के विरुद्ध हो। यही सच्ची आत्मसम्मान की भावना है जिसे अपनाकर, उताकर जीवन को प्रभुमय बनाया जा सकता है, जीवन में भगवद् चेतना को अवतरित किया जा सकता है।
चिंतन पद्धति जीवन को खिलाड़ी भाव से देखने का नजरिया देती है। इससे समता का भाव पनपता है। अतः सुख-दुःख, हार-जीत, मान-अपमान जैसे द्वन्द्वों को यह समान रूप से मधुर मुस्कान के साथ स्वागत करने योग्य बनाता है। खुरासान के राजकुमार का एक संस्मरण यहाँ प्रासंगिक है। एक बार राजकुमार लड़ाई के लिए जा रहा था।
चिंतन, दृढ़चरित्र एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार का लोकाचार प्रस्तुत किया है ताकि जन सामान्य ‘महाजनो येन गतः स पंथाः’ की उक्ति को सिद्ध कर सकें। उनके दिखाये हुए पथ का अनुसरण कर सकें और अपने आधार को, मानवीयता को उभार सकें।
चिंतन में निरत रहता है, वह स्वर्ग के अक्षय सौंदर्य एवं आनंद से आप्लावित रहता है। जिनकी मनःस्थिति हेय एवं ओछी है, उन्हें दैन्य-दारिद्र्य, दुःख-दुर्बलता, कुँठा-क्लेश, अवहेलना-अवमानना के पापसमूहों में जकड़े, घिरे रहना पड़ता हैं। नर्कवास के इस गहन काल में अनंत भौतिक संपदाएँ उन्हें मिल भी जाएँ तो उनसे सुख-शान्ति नहीं मिल पाती, उलटे उनकी दूषित प्रवृत्तियों का दारुण विस्फोट होने में बढ़ी हुई संपदा आधार बनती है और उनके व्यक्तित्व के अधिकाधिक क्षय के साथ ही वह संपदा भी क्षयीभूत होती है।
चिंतन होता है। स्वयं के द्वारा जिसका चिंतन होगा उसका समग्र एवं सम्पूर्ण विकास अवश्यंभावी है। स्व का चिंतन ही परिष्कृत दृष्टिकोण है। वही वास्तविक सौंदर्य है। सुन्दरता का मापदण्ड शारीरिक नहीं होता।
चिंतन। वैराग्य की सच्ची साधना भगवान् बुद्ध को थी, जिन्होंने सारे राजसी सुखों के बीच रहकर भी यही निष्कर्ष निकाला ‘सब्बं दुक्ख्म्’ - यह सब दुःख ही है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे- वैराग्य साधना है तो भगवान् को पुकारो। उनके शब्दों में काशी की ओर जितना बढ़ो, कलकत्ता उतना ही पीछे छूटता है। यानि कि भगवान् की ओर जितना बढ़ोगे-संसार की आसक्ति उतना ही घटेगी।
चिंतन की प्रतिमूर्ति थी। श्रमनिष्ठ एवं प्रभु कृपा पर उसका अटूट विश्वास था। उसी की प्रेरणा से बालक फुल्लर ने खच्चर चराने के पेशे को छोड़कर साबुन बेचने का कारोबार शुरू किया। उसकी ईमानदारी एवं लगन के कारण उसका यह व्यापार खूब फला-फूला और उसकी प्रमाणिकता की बदौलत लोगों से भी उसे बहुत प्रशंसा एवं सम्मान मिला। आशावाद का दामन थामे फुल्लर ने अब पीछे मुड़कर नहीं देखा।
चिंतन के ध्वंसात्मक प्रभावों को दरकिनार कर सकी। इससे उत्पन्न रचनात्मक शक्ति ही उसके लेखन के माध्यम से प्रस्फुटित हुई और उसकी महान् रचनाओं के सृजन का आधार बनीं।
चिंतन का नियोजित करने का सबसे सही उपाय है, पुस्तक लिखना। छपी या नहीं छपी, यह इतना महत्त्वपूर्ण नहीं, जितना यह कि रचनाधर्मी पुरुषार्थ हुआ कि नहीं। स्वयं परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर की अवधि में कितना असंभव कार्य किया? कुल मिलाकर छोटी-बड़ी 32 किताबें अपने 1935 से 1990 तक के पचपन वर्ष के सक्रिय जीवनकाल में लिख जाना बहुत बड़ी बात है। आज तक ऐसा कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता।
चिंतन देकर उसे स्वस्थ कर उससे कुछ श्रेष्ठ करा लेने का मार्गदर्शन इन पंक्तियों में है। उदाहरणों द्वारा गुरुवर ने समझाने का प्रयास किया है कि इच्छाशक्ति ही सर्वोपरि है। विकलाँगता भी कभी पुरुषार्थपरायणता में बाधक नहीं पड़ेगा। सही मायने में गुरु से बड़ा मित्र,मार्गदर्शक, चिकित्सक और कोई हो नहीं सकता। इस पत्र में जो तीन पृष्ठों का है, आगे पूज्यवर अपनी जीवनकथा लिखे जाने की बात पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते है, जो पढ़ने योग्य है।
चिंतन के पुनरावर्तन की जरूरत अधिक है। व्यक्तित्व विकसित हो, समाज संस्कारित हो, पर्यावरण समृद्ध हो, नारी जीवन की पवित्रता व अस्मिता सुरक्षित रहे, ये सारे संदेश श्रावणी पर्व में ध्वनित होते हैं। इस पर्व का मनाने का अर्थ है- इन्हें आत्मसात् करना। ऐसा करके ही हम ऋषि जीवन की द्वार पर सफलता पूर्वक चल सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-December
चिंतनपरक कसरत योग कहलाती है। यह योग आपको सीखना चाहिए। इस योग के सिद्धाँत मैं आपको बताऊँगा। क्रिया तो वही है? जो आपको हम यहाँ कराते हैं।
चिंतन को हमें भगवान में विलय कैसे कर देना चाहिए? ये सारी-की-सारी चिंतनपरक कसरत योग कहलाती है। यह योग आपको सीखना चाहिए। इस योग के सिद्धाँत मैं आपको बताऊँगा। क्रिया तो वही है?
चिंतन में रत रहने वाला, अपनी कल्पनाओं का जगत वैसा ही बनाने वाला व्यक्ति कभी मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाता। शुद्ध मन ही मोक्ष का कारण है। मन एवं मनुष्याणाँ कारणं बंधमोक्षयोः इसी संदर्भ में कहा गया है- मनुष्य का मन ही उसके बंधन और मुक्ति का कारण है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते हैं, “मन आसक्तिरहित होने से ही भगवान का (परिष्कृत आत्मसत्ता का) दर्शन होता है। शुद्ध मन से जो वाक्य निकलता है, वही भगवान की वाणी है।
चिंतन करता है अन्तकाल में भी प्रायः उसी का स्मरण होता है।’
चिंतन आदर्शवादिता के साथ जोड़ा जाता है। यह थिंकिंग है, विचारणा है। क्रियायोग का जितना भी संबंध है, वह तपश्चर्या से है। कौन-सी? जो हम शरीर के द्वारा करते हैं।
चिंतन के बिखराव को रोकता है, विचलन को रोकता है। इसको हम क्या कहते हैं? इसका नाम है- एकाग्रता। एकाग्रता किसे कहते हैं? जिसे आप बार-बार कहते हैं कि हमारे मन का निग्रह कीजिए, वस्तुतः वह योग का पहला वाला हिस्सा है।
चिंतन व दृष्टिकोण असाधारण रूप से बदल गया और समय लगभग ऐसा आ गया, जिसे सतयुग की वापसी कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी।” (पृष्ठ 25-26)
चिंतन, जो हमेशा बिखराव में व्यस्त रहता है, उसको सी उद्देश्यपूर्ण काम में व्यस्त होना चाहिए, तभी इसमें ताकत आती है और आदमी के खुद के भविष्य का निर्माण होता है। मुझे एक घटना याद आ गई। राजा द्रुपद की बेटी थी द्रौपदी, जो बहुत खूबसूरत और योग्य थी। उसके पिता ने निश्चय किया कि इस लड़की का ब्याह हम किसी ऐसे आदमी से करेंगे, जिसका भविष्य उज्ज्वल हो। कितने भविष्यवक्ता आए, पंडित आए।
चिंतन के ऊपर निर्भर हैं। हमारा चिंतन किधर चलना चाहिए? चिंतन को कहाँ लगाना चाहिए? अस्त-व्यस्त चिंतन की रोक-थाम हमें कैसे करनी चाहिए? चिंतन का परिष्कार हमको कैसे करना चाहिए?
चिंतन कहता है- परिस्थितियाँ ठीक कर दो, मन स्वतः ठीक हो जाएगा। चाहे कितनी ही भौतिक जगत की सुविधाएं हों, चाहे वातावरण कितना ही हमारे अनुकूल साधन हमें जुटकर दे दे, यदि हमारी मनःस्थिति कमजोर है तो वे हमारा कुछ भी लाभ न कर सकेंगे। उलटे हमें अपयश की ओर, वासनात्मक जीवन की ओर, बिगड़ती आदतों से परावलंबन की ओर धकेल देंगे। भोगवादी मानसिकता, अनुकूल सुविधाओं की बहुलता में क्यों इतने मनोरोग पनप रहे हैं? क्यों मन अशाँत है?
चिंतन को हमें कहाँ तक ले जाना चाहिए और अपने चिंतन को हमें भगवान में विलय कैसे कर देना चाहिए? ये सारी-की-सारी चिंतनपरक कसरत योग कहलाती है। यह योग आपको सीखना चाहिए। इस योग के सिद्धाँत मैं आपको बताऊँगा। क्रिया तो वही है?
चिंतन को परिष्कृत करने तक शायद सीमित हैं। अंतरंग को परिष्कृत करने तक सीमित हैं। योग में क्या आता है? ध्यान आता है। ध्यान की असंख्य प्रक्रियाएँ आती हैं।
चिंतन की रोक-थाम हमें कैसे करनी चाहिए? चिंतन का परिष्कार हमको कैसे करना चाहिए? चिंतन को हमें कहाँ तक ले जाना चाहिए और अपने चिंतन को हमें भगवान में विलय कैसे कर देना चाहिए? ये सारी-की-सारी चिंतनपरक कसरत योग कहलाती है। यह योग आपको सीखना चाहिए।
चिंतन किधर चलना चाहिए? चिंतन को कहाँ लगाना चाहिए? अस्त-व्यस्त चिंतन की रोक-थाम हमें कैसे करनी चाहिए? चिंतन का परिष्कार हमको कैसे करना चाहिए? चिंतन को हमें कहाँ तक ले जाना चाहिए और अपने चिंतन को हमें भगवान में विलय कैसे कर देना चाहिए?
चिंतन ढेरों व्यक्तियों का बनाना होगा।
चिंतन का परिष्कार हमको कैसे करना चाहिए? चिंतन को हमें कहाँ तक ले जाना चाहिए और अपने चिंतन को हमें भगवान में विलय कैसे कर देना चाहिए? ये सारी-की-सारी चिंतनपरक कसरत योग कहलाती है। यह योग आपको सीखना चाहिए। इस योग के सिद्धाँत मैं आपको बताऊँगा।
चिंतन को क्रिया में बदलने की शक्ति होती है। ये साक्षात् सजीव प्राणशक्ति होते हैं। बड़े कार्य में ही करेंगे, यह भवितव्यता आगामी वर्ष साकार होती दिखाई देगी।
चिंतन किसी लक्ष्य विशेष में लगाया जाए। लक्ष्य विशेष से क्या मतलब है? लक्ष्य विशेष का मतलब यह है कि बंदूक कहाँ चलाई जाएगी और कहाँ मारी जाएगी? इसका निशाना कहाँ लगेगा? कोई निशाना भी तो होना चाहिए।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार को परिशोधित करने का नाम योग है। ये सारी-की-सारी क्रियाएँ हमारी विचारणा से संबंधित हैं। आपके लिए कोई योग शब्द का इस्तेमाल करे तो आप समझना कि इसका सारे-का-सारा दबाव, सारे-का-सारा शिक्षण, सारी-की-सारी गतिविधियाँ केवल हमारे चिंतन को परिष्कृत करने तक शायद सीमित हैं। अंतरंग को परिष्कृत करने तक सीमित हैं। योग में क्या आता है?
चिंतन को कहाँ लगाना चाहिए? अस्त-व्यस्त चिंतन की रोक-थाम हमें कैसे करनी चाहिए? चिंतन का परिष्कार हमको कैसे करना चाहिए? चिंतन को हमें कहाँ तक ले जाना चाहिए और अपने चिंतन को हमें भगवान में विलय कैसे कर देना चाहिए? ये सारी-की-सारी चिंतनपरक कसरत योग कहलाती है।
चिंतन जनवरी 24 की ‘अखण्ड ज्योति’ में पढ़ें। अधिक-से-अधिक नए व्यक्ति पढ़ सकें, इसलिए अभी से इन्हें जोड़ें।
चिंतन, हमारी विचारणा-इसको परिष्कृत करना और हमारा क्रियापक्ष, इसका परिशोधन करना-इसका नाम योग है। चिंतन, चरित्र और व्यवहार को परिशोधित करने का नाम योग है। ये सारी-की-सारी क्रियाएँ हमारी विचारणा से संबंधित हैं। आपके लिए कोई योग शब्द का इस्तेमाल करे तो आप समझना कि इसका सारे-का-सारा दबाव, सारे-का-सारा शिक्षण, सारी-की-सारी गतिविधियाँ केवल हमारे चिंतन को परिष्कृत करने तक शायद सीमित हैं। अंतरंग को परिष्कृत करने तक सीमित हैं।
चिंतन का परिष्कार है योग
चिंतन किया गया है। महर्षि के अनुसार यह सम्प्रज्ञात समाधि का अगला कदम है। सम्प्रज्ञात समाधि में जहाँ चेतन मन अपनी शुद्धतम भावदशा में होता है। वहीं असम्प्रज्ञात समाधि में इसका सहज विलय हो जाता है। यानि कि असम्प्रज्ञात समाधि में सारी मानसिक क्रिया की समाप्ति होती है और मन केवल अप्रकट संस्कारों को धारण किये रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-January
चिंतन छोड़कर, संकीर्ण स्वार्थगत चिंतन ने उसे हीन कर्मों में लगा दिया और दुर्गति करा दी। उसकी रुचि के और संसार की आवश्यकता के ढेरों श्रेष्ठ कार्य प्रतीक्षा में ही रखे रह गए।
चिंतन उसके आसपास के वातावरण से तय होते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में डॉ. क्रेग वेण्टर का कहना है कि जीन मनुष्य के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं,इस तथ्य को पुष्ट करने के लिए विशिष्ट जीन का पता नहीं लग पाया है। परन्तु आशा की जा रही है कि इस प्रकार के जीन की खोज कर ली जायेगी।
चिंतन दिनचर्या के अंग बन गये हैं। परिणामतः बढ़ती असुरक्षा, हिंसा, ईर्ष्या-द्वेष, भय, चिंता,निराशा, खिन्नता जैसे मानसिक विकार मनुष्य के जीवन में कुहराम मचाए हुए हैं।
चिंतन पद्धति में आवश्यक सुधार एवं परिवर्तन कर इसे हल्का अवश्य किया जा सकता है। वैसे तनाव से पूर्ण शान्ति सम्भव भी नहीं है और न ही आवश्यक भी है। लाइले एवं अल्मा के अनुसार यह सही है कि तनाव स्वास्थ्य की तबाही कर देता है लेकिन यह आवश्यक भी है। शिशु जन्म, नव अभियान में सफलता, नये शहर में बदलाव आदि चुनौतीपूर्ण एवं रोमाँचक कार्य एवं घटनायें ऐसी हैं जो उतना ही तनाव उत्पन्न करते हैं जितना कि कोई दुर्घटना या विध्वंस की स्थिति का तनाव। इसके बिना तो जीवन नीरस ही हो जाये।
चिंतन और अपने विचार बदल सकेंगे? यदि हाँ, तो हम आपको शक्ति दिलाएँगे। ब्रह्मवर्चस् साधना में हम आपको शक्ति देने के लिए बुलाते हैं, पर आपके लिए शर्त यही है कि आप अपने वर्तमान जीवन का स्वयं ही संशोधन कर लें, क्योंकि तभी जो शक्ति आएगी, वह आप के जीवन के लिए लाभदायक हो सकती है। आपका भला कर सकती है अन्यथा यदि शक्ति आई, तो आपका पेट फट जाएगा। आप उस शक्ति को सहन नहीं कर सकेंगे।
चिंतन ने जिंदा रखा है, इसलिए हम इसे छोड़ नहीं सकते। संपादन में तिलक ऐसे लीन हुए कि समय अधिक हो गया। जब तक वे पहुँचे, बेटे को अग्नि दी जा चुकी थी। मरे हुए बेटे को वे देख तक नहीं पाए। ऐसे आदमी को कोई निष्ठुर भी कह सकता है, परंतु अपनी व्यक्तिगत वेदना सहकर भी जो लोक शिक्षण हेतु कर्म में रत रहे, वही सच्चा कर्मयोगी है।
चिंतन विगत नवंबर माह में विश्वविद्यालय में संपन्न एक सेमीनार में किया जा चुका है, जो नागपुर के वैज्ञानिकों के माध्यम से संपन्न हुई थी। एक वर्ष (2003) हमारे पास तैयारी का है।
चिंतन का जहाँ अपना महत्त्व है, वहीं श्रेष्ठ आचरण इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। जहाँ चरित्र आचरण का निर्धारण करता है, वहीं श्रेष्ठ आचरण द्वारा चरित्र का गठन होता है। चरित्र निर्माण में नैतिक आचरण की अक्षुण्णता तभी साधित हो सकती है, जब जीवन का लक्ष्य तथा इसकी परिपूर्णता का खाका स्पष्ट हो, क्योंकि तभी अपने जीवन के उच्चतम विश्वासों एवं आस्थाओं को मूल्य निष्ठ की कसौटी पर कसने का साहस एवं उत्साह उभर पाता है।
चिंतन ने उसे हीन कर्मों में लगा दिया और दुर्गति करा दी। उसकी रुचि के और संसार की आवश्यकता के ढेरों श्रेष्ठ कार्य प्रतीक्षा में ही रखे रह गए।
चिंतन व आचरण द्वारा पुष्ट होती है तथा इन्हें प्रभावित करती है। यह सतत् श्रेष्ठ व अवाँछनीय तत्त्वों के विभेद की प्रक्रिया है, जिसमें श्रेष्ठ के वरण एवं धारण करने तथा अवाँछनीय तत्त्वों को त्यागने की तत्परता बरती जाती है। अतः यह दैनन्दिन जीवन में नित्य प्रति सद्गुणों को अभ्यास द्वारा आदत में शुमार करने की प्रक्रिया है।
चिंतनक्रम हमारे भक्तों जैसा आदर्शनिष्ठ तथा व्यवस्थित रखना।
चिंतन करते हैं, चित्त पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं। प्रत्येक क्षण हम जो होते हैं, उसका निर्धारण मन के इन प्रभावों द्वारा निर्धारित होता है। प्रत्येक मनुष्य के चरित्र का निर्धारण इन प्रभावों के सार योग से होता है, यदि प्रभाव अच्छे हों तो चरित्र अच्छा होता है और यदि बुरे तो चरित्र बुरा होता है।
चिंतन एवं सद्कर्मों द्वारा चरित्र का निर्माण कर सकता है,किन्तु निर्माण के बाद इसे खो भी सकता है। अतः चरित्र को सतत् पोषण की आवश्यकता होती है, जैसे कि जीवित रहने के लिए सतत् श्वाँस की जरूरत होती है। वस्तुतः चरित्र निर्माण का मर्म अनुशासित जीवन में निहित है। संत तिरुवल्लुवर के शब्दों में - ‘अनुशासन जीवन से भी अधिक कीमती है, क्योंकि उसी से मनुष्य जीवन मूल्य प्राप्त करता है। अनुशासन के अभाव में जब हम उच्च आदर्शों एवं मूल्यों के अनुरूप जीवन को संगठित करने में विफल हो जाते हैं तो हम अन्दर से विघटित हो जाते हैं और बाहरी तौर पर समाज से समायोजन कर पाने में विफल हो जाते हैं।
चिंतन छोड़ दिया, लोलुपों का अस्त−व्यस्त क्रम अपनाया, इसलिए अपने ज्ञान का ठोस लाभ समाज को न दे सका। आदर्शनिष्ठ चिंतन छोड़कर, संकीर्ण स्वार्थगत चिंतन ने उसे हीन कर्मों में लगा दिया और दुर्गति करा दी। उसकी रुचि के और संसार की आवश्यकता के ढेरों श्रेष्ठ कार्य प्रतीक्षा में ही रखे रह गए।
चिंतन स्तर का क्या भूल हुई, तो करुणानिधि बोले, उसने सत् पुरुषों का व्यवस्थित चिंतन छोड़ दिया, लोलुपों का अस्त−व्यस्त क्रम अपनाया, इसलिए अपने ज्ञान का ठोस लाभ समाज को न दे सका। आदर्शनिष्ठ चिंतन छोड़कर, संकीर्ण स्वार्थगत चिंतन ने उसे हीन कर्मों में लगा दिया और दुर्गति करा दी। उसकी रुचि के और संसार की आवश्यकता के ढेरों श्रेष्ठ कार्य प्रतीक्षा में ही रखे रह गए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-February
चिंतन पर छाता चला जा रहा है। बाहर का वसंत आ भी जाए व अपने मन-मस्तिष्क पर छाया अंदर का कुहासा यथावत् रहे, भ्राँतियाँ वैसी की वैसी ही बनी रहें, तो क्या लाभ! इसीलिए इस वसंत पर्व पर यह संकल्प भी लेना है कि गुरुसत्ता की तरह अपने अंदर से भी वासंती उल्लास उमंग भरी सक्रियता फूट-फूटकर निकलेगी। हर परिजन स्वयं को और अधिक सक्रिय एवं स्फूर्तिवान बनाएँगे। आशावादी चिंतन लेकर कुछ नया कर दिखाने हेतु तत्पर होंगे।
चिंतन, मनन व निदिध्यासन को भी उन्होंने अपनी साधना का एक अनिवार्य व अविभाज्य अंग मान लिया है। इस अपूर्व साधना ने उनके जीवन में कई अलौकिक अनुभूतियों व उपलब्धियों के द्वार भी खोले हैं। साधना पथ के इन प्रगति द्वारों का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। योग कथा की विगत कड़ी में आगत कड़ी कुछ यूँ जुड़ती रहेगी जैसे भक्त व भगवान् की भावनाएँ जुड़ती हैं, शिष्य और गुरु के हृदय जुड़ते हैं।
चिंतन भी करें कि हम दीपक की तरह से जिएँगे, हम अपना आत्मशोधन करेंगे। जप करेंगे, नैवेद्य चढ़ाएँगे, इस तरह के जो भी कृत्य हों, इन क्रियाओं के साथ−साथ में विचारो का समन्वय हो। विचारों के समन्वय के पश्चात जब आपके विचार जमने लगें, तो आप यह कोशिश कीजिए कि इसके साथ में भाव अर्थात् उमंगे भी उमगें। हम यही करेंगे, बस यही करेंगे’ का संकल्प जाग्रत हो कि हम श्रेष्ठता से असीम श्रद्धा करेंगे। श्रेष्ठता से असीम श्रद्धा प्यारी चीज नहीं है।
चिंतन का वरदान मिला है। इस धरती पर जो शोभा-सौंदर्य भरा व्यवस्था−क्रम चल रहा है, उसमें मानवी बुद्धि-वैभव का योगदान कुछ कम नहीं है। विश्व-वसुधा की शोभा-गरिमा में भगवती सरस्वती के ही अनुग्रह ने चार चाँद लगाए है। मनुष्य को सृष्टि के अन्य प्राणियों की तुलना में जो गौरव मिला है, उसके पीछे भगवती वीणा-पाणि की अनुकंपा ही झाँक रही है।
चिंतन लेकर कुछ नया कर दिखाने हेतु तत्पर होंगे।
चिंतन में बनकर स्वर्णिम सूर्य दमकता हो,
चिंतन को, अपने लक्ष्य को, अपने आदर्श को इस लायक बनाने की कोशिश करें, जैसे कि संत के होने चाहिए। जैसे कि उपासना करने वाले के होने चाहिए। अगर आप थोड़े−बहुत कदम उठाने के लिए तैयार हैं, तो यह आपको सौभाग्य है। लोग तो तलाश करते फिरते हैं कि कोई ऐसी शक्ति हमें मिले, जो इस विषय में पारंगत हो। बेटे, हम अपनी बात तो नहीं कहते, किंतु हमारे गुरु पारंगत हैं।
चिंतन चलना चाहिए।
चिंतन करना है कि क्या हम साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण, कुरीति उन्मूलन, व्यसन मुक्ति तथा नारी जागरण अभियान रूपी सप्त आँदोलनों की दिशा में क्या कुछ गति पकड़ पाए? यदि नहीं, तो हमें किन्हीं भी दो आँदोलनों को इस वर्ष प्रमुखता देकर साधना की धुरी पर गतिशील कर देना है। 2004 के वसंत पर्व पर जब हम आत्मावलोकन करें तो अमुक दो आँदोलनों में स्वयं की गति परिपूर्ण, संतोषदायी मानें। फिर इसी तरह 2004 के पूरे वर्ष व 2005 के पूरे वर्ष में हम दो−दो आँदोलन हाथ में लेकर सप्ताँदोलनों को पूर्णता तक पहुँचा सकते हैं।
चिंतन में लीन थे। वे सोच रहे थे सृष्टि का निर्माण कैसे करूं। इसी असमंजस में पड़े हुए, ब्रह्मा को एक आकाशवाणी सुनाई दी, जो कह रही थी, तप कर, तप कर। ब्रह्माजी आकाशवाणी को ईश्वरीय आदेश मानकर तप में संलग्न हो गए। उन्होंने लंबे समय एक घोर तप किया और उसी के बल पर उन्हें सृष्टि के निर्माण की क्षमता प्राप्त हुई।
चिंतन करें कि कितनी कुछ ‘साधना’ अपनी विगत एक वर्ष में जीवन में निखर पाई। हमारी उपासना जो वैयक्तिक हुआ करती थी, क्या जीवनसाधना में बदली एवं यदि बदली तो क्या हमने व औरों ने उसकी अनुभूति की? यही जीवनसाधना जब सामूहिक स्तर पर होती है एवं विराट् ब्राह्मीसत्ता की सेवा−साधना में नियोजित होती है तो आराधना बन जाती है। संगठन इसी आधार पर सशक्त एवं परिणाम देने वाले बनते चले जाते हैं।
चिंतन हमें इसी ओर सतत ले जाता है।
चिंतन के साथ में भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। हवन में हम आपको भावना बताते हैं, जप में हम भावना बताते हैं, उपासना में हम भावना बताते हैं, देवपूजन में हम भावना बताते हैं। उसके साथ मन को जोड़ दे।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार उत्कृष्ट हो जाता है। अंतस् इतना कोमल हो जाता है कि दूसरों की पीड़ा से द्रवित हो उठता है। अहंकार का उसमें नामोनिशान नहीं होता। स्वार्थपरता से हमेशा दूर रहता है। दूसरों के हित में ही अपना हित समझता और अपना अहित करके भी दूसरों का हितसाधन करता है।
चिंतन करने की शक्ति कमजोर पड़ जाती है। यह इस बात का प्रमाण है कि ई0 क्यू0, आई0 क्यू0 को प्रभावित करती है। यह एक आध्यात्मिक उपलब्धि है, जो हर अध्यात्मपथ के सच्चे पथिकों में पाई जाती है। जिसमें यह जितनी उच्च होगी, उसे उतना ही आध्यात्मिक माना जायगा। महापुरुषों की ई0 क्यू0 काफी अधिक होती है।
चिंतन भावी मनुष्य का मार्गदर्शन करेगा। विचार क्रान्ति अभियान के तत्त्वों से नए मनुष्य के विचारों के ताने-बाने को बुनेंगे।
चिंतन, आदर्श जीवन का स्वरूप बनाएँ। अगर इतना आप बना लें, तो आपको वे सिद्धियाँ और वे चमत्कार, वे ऋद्धियाँ, जिनकी बावत ऋषियों ने बहुत सारे माहात्म्य बताए और वर्णन किए हैं और जिनके लिए आपको मैंने पहले दिन बताए थे और आज अंतिम दिन भी बताता हूँ कि वे सारी−की−सारी सिद्धियाँ और चमत्कार प्राचीनकाल के लोगों के तरीके से आज भी सुरक्षित हैं। लेकिन इसके साथ शर्त है, बिन शर्त नहीं मिलेगा।
चिंतन−मनन, अपने स्तर पर अपने यहाँ छोटा दीपयज्ञपरक आयोजन, संगठन−सशक्तीकरण की दिशा में आत्ममंथन एवं विद्याविस्तार के निमित्त हमारे सुनिश्चित संकल्प, इन चारों को पूरा करने के निमित्त मनाया जाए, तो ही हमारी गुरुसत्ता के प्रति समर्पण की सार्थकता है।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार में ऐसी शालीनता भर देती है, जिसका प्रतिफल दसों दिशाओं में अमृततुल्य अनुदान बरसाता है। आत्मा ने उसी के लिए पुकार की है कि उसे ‘सत्’ की उपलब्धि हो। असत् की ओर आँखें, मूँदकर दौड़ पड़ने की प्रवृत्ति रुके। शाँति का सरोवर सामने रहते हुए सड़न भरी दलदल में घुस पड़ने और चीखने चिल्लाने की आदत पर अंकुश लगे। इतना बन पड़े तो किसी से कुछ माँगना चाहना न पड़े।
चिंतन भी इसी प्रकार के सम्बन्धों पर आधारित है। इसका बोध जितना व्यापक होगा उतना ही सुसम्बन्धता खोजा जा सकता है।
चिंतन का एक नया आयाम प्रदान करता है। उच्च आत्मिक लब्धि से युक्त व्यक्ति की सोच सृजनात्मकता से ऐसी ओत−प्रोत होती है कि निषेधात्मक विचारधारा उसका स्पर्श तक नहीं कर पाती। दूसरे शब्दों में, इसी को आध्यात्मिक मनुष्य कहते हैं। अध्यात्म व्यक्ति को खरे सोने की तरह इतना प्रखर और अंतर को ऐसा सुँदर बना देता है, जिसका उपमा अनुपम से दी जा सके। उसका चिंतन, चरित्र और व्यवहार उत्कृष्ट हो जाता है।
चिंतन की आवश्यकता के बाद तीसरा जो चरण आता है, वह है हमारी भावनाओं का। भावना किसे कहते हैं? भावना उस उमंग को कहते हैं, जो क्रिया बिना चैन नहीं लेती, किए बिना चैन नहीं लेने देती। वे कल्पनाएं जो आपके दिमाग में आती रहती हैं कि हम जप करेंगे, संत बनेंगे, महात्मा बनेंगे, ज्ञानी बनेंगे, ब्रह्मचारी बनेंगे और नित्य प्रार्थना करते हैं, ‘हे प्रभु आनंददाता! ज्ञान हमें दीजिए। शीघ्र सारे दुर्गुण छोड़ना तो नहीं है?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-September
चिंतन घर कर गया है, तथा स्वभाव भोगवादी एवं आरामतलब बन गया है। सद्चिंतन के अभाव में मस्तिष्क क्रियाहीन एवं पंगु बनकर रह गया है। विज्ञान के इस युग में हम यंत्रमानव में बदल गए हैं। कुछ विचारक-विद्वानों को विज्ञान से ऐसी ही उम्मीद और आशा थी। उन्होंने पहले ही मानव जाति को सचेत व सतर्क कर दिया था।
चिंतन के अभाव में मस्तिष्क क्रियाहीन एवं पंगु बनकर रह गया है। विज्ञान के इस युग में हम यंत्रमानव में बदल गए हैं। कुछ विचारक-विद्वानों को विज्ञान से ऐसी ही उम्मीद और आशा थी। उन्होंने पहले ही मानव जाति को सचेत व सतर्क कर दिया था। इस संदर्भ में आल्डस हक्सले ने सन् 1932 में लिखे अपने उपन्यास ‘ब्रेव न्यू वर्ल्ड’ में एक ऐसी भविष्य कालीन दुनिया का चित्रण किया था, जिसमें मनुष्य भी वस्तुओं की भाँति कारखानों में गढ़े जाएँगे और उनकी विचार शक्ति को इच्छानुसार नियंत्रित-नियमित किया जा सकेगा।
चिंतन का रस प्राप्त नहीं हो सकता। आत्मिक निर्बलता हो तो सत्संग, प्रेम, भक्ति आदि का आत्मानंद दुर्लभ हैं इतना ही नहीं, निर्बलों को मिटा डालने के लिए प्रकृति का ‘उत्तम की रक्षा’ सिद्धांत काम करता है। कमजोर को सताने और मिटाने के लिए अनेकों तथ्य प्रकट हो जाते हैं। निर्दोष, भले और सीधे-सादे तत्व भी उसके प्रतिकूल पड़ते है। सरदी, जो बलवानोँ की बलवृद्धि करती है, रसिकों को रस देती, वह कमजोरों को निमोनिया, गठिया आदि का कारण बन जाती है।
चिंतन-मनन एवं आचार-व्यवहार की देन है। अपर्याप्त नींद या अनिद्रा के कारण व्यक्ति की कार्यक्षमता तो घटती ही है, साथ-ही-साथ इसके अनेकानेक दुष्प्रभाव भी शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर स्पष्ट परिलक्षित होने लगते हैं। इससे त्रस्त व्यक्ति नींद लाने वाली गोलियों, नशीली दवाओं आदि का सहारा लेने लगता है। रोग का मूल कारण हटाए- मिटाए बिना व्याधि मिटती नहीं, वरन् नए एवं परिवर्तित रूपों में उभरती रहती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-May
चिंतन व निदिध्यासन से उनकी चेतना में अनेकों नये आयाम खुल रहे है। उन्हें यह तथ्य भली भाँति समझ में आ रहा है कि यह योगकथा केवल बौद्धिक विचार विन्यास नहीं है। इसमें शब्दों का नियोजन नहीं बल्कि महासाधकों की अनुभूतियों का समायोजन किया गया है। इस योगकथा की प्रत्येक पंक्ति अनुभूति रस में सनी-लिपटी एवं रची-बसी है। यह आमंत्रण पत्रिका है, उनके लिए जो अन्तर्यात्रा विज्ञान को समझना चाहते हैं।
चिंतन सद्चिंतन, सदाचरण और सद्व्यवहार को उतारकर मृत्यु को माँगलिक महोत्सव के रूप में मना सकते है।
चिंतन, चरित्र और आचरण में उतारना चाहिए। क्योंकि सूत्रों में ही अगम्य शास्त्रों का मर्म छुपा हुआ रहता है। इन सूत्रों को हृदयंगम कर हमारा जीवन भी शास्त्र बने, जिससे हम स्वयं प्रकाशित हों औरों को भी आलोकित कर सकें। इसे अपनाकर अन्तर प्रसन्न-प्रफुल्लित हों तथा दूसरों को भी खुशी बाँट सकें। यही सच्ची सम्पदा है, वास्तविक पूँजी है और अक्षय समृद्धि है।
चिंतन व परमात्मा के उपकारों का स्मरण ही सच्ची प्रार्थना है। सत्य, क्षमा, संतोष, ज्ञानधारण, शुद्ध मन और मधुर वचन श्रेष्ठ प्रार्थना हैं।’
चिंतन उच्चस्तरीय हों तथा यह उच्च आदर्शों के प्रति कटिबद्ध हो। ऐसी उदात्त मनःस्थिति ही वैभवमयी स्वर्ग का परिचायक-पर्याय है। यही मनवाँछित परिस्थिति की जननी-जन्मदात्री है। अतः उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाओं को साकार करने के लिए ऐसे ही दुर्धर्ष-प्रचण्ड मनस्वी मन की आवश्यकता है।
चिंतन को अपनाया-आत्मसात् किया। जिसने जीवन पर्यन्त सत्य का साथ दिया। जीवन में उसी को उतारा तथा ईश्वर रूपी महा सत् का चिंतन-मनन एवं व्यवहार में रमाया हो, वही ऐसे आदर्श मृत्यु महोत्सव को प्राप्त कर सकता है। इस आदर्श देह-त्याग विधि को मनीषियों ने ‘सल्लेखना’ कहा है। जीवन रूपी इस प्रवाह में आये राग-द्वेष, लोभ-मोह, काम-क्रोध के प्रसंग कितने ही बने पर विवेकीजन प्राण-प्रयाण बेला में मात्र सत्य का ही चिंतन-मनन करते हैं, अपने आँखों के आगे उन्हीं उत्कृष्ट आदर्शों को उमड़ते-घुमड़ते देखते हैं।
चिंतन और भगवद् भजन में अपना समय नियोजित करता हुआ मोक्ष का अधिकारी बनता था।
चिंतन और रहन-सहन से अधिक जुड़ी हुई है। हम उसमें अपेक्षित सुधार कर उस अवाँछनीय दशा से बचे रह सकते हैं, जो हमारे जीवन के उत्तरार्द्ध को दुखी बनाती है।
चिंतन सतत युग निर्माण हेतु महाकाल की विशिष्ट भूमिका की ओर इंगित करता दिखाई देता है। इस संबंध में विस्तार से लिखते-लिखते 1988-89 में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा जो क्राँतिधर्मी साहित्य लिखा गया, तब तक की यात्रा में ‘एतद् कर्म प्रधान श्रीमन्महाकालाय नमः’ और जुड़ गया। दीपयज्ञ में उनने प्रधान देवता के रूप में महाकाल-सदाशिव भगवान शिव को ही स्थापित किया। उनका मत रहा कि आद्यशक्ति गायत्री युग परिवर्तन की अपनी प्रज्ञावतार वाली भूमिका महाकाल के माध्यम से ही निभाएँगी। इसी शृंखला में उनने पुस्तिका लिखी, ‘नवसृजन के लिए महाकाल की तैयारी।
चिंतन और इन्हीं के इर्द-गिर्द समस्त जीवन का निर्धारण यहाँ की मौलिक विशेषता रही है। इसी आधार पर वैदिक ऋषियों ने मनुष्य को अमृत पुत्र! कहकर सम्बोधित किया और सर्वप्रथम ‘आत्मान् विजाति ही’ अर्थात् आत्मा को जानो का संदेश दिया। इसने सदैव साँसारिक सुख की बजाय आध्यात्मिक सुख को प्रधानता दी है। हमारे ऋषि- मुनियों, तपस्वियों-योगियों, सिद्ध पुरुषों एवं अवतारी पुरुषों की हर युग में विशिष्ट उपस्थिति इस तथ्य की गवाही देती है।
चिंतन में डूबा रहे, हृदय का प्रत्येक स्पंदन एक तुम्हारे लिये ही स्पंदित होता रहे। ‘तत्त्वमसि’ अर्थात् मैं तुम्हारा ही अविनाशी अंश हूँ और तुम्हीं में समाकर, विसर्जित-विलय होकर पूर्णता की प्राप्ति करने के महाभाव में स्थिर रह सकूँ।
चिंतन-मनन एवं व्यवहार में रमाया हो, वही ऐसे आदर्श मृत्यु महोत्सव को प्राप्त कर सकता है। इस आदर्श देह-त्याग विधि को मनीषियों ने ‘सल्लेखना’ कहा है। जीवन रूपी इस प्रवाह में आये राग-द्वेष, लोभ-मोह, काम-क्रोध के प्रसंग कितने ही बने पर विवेकीजन प्राण-प्रयाण बेला में मात्र सत्य का ही चिंतन-मनन करते हैं, अपने आँखों के आगे उन्हीं उत्कृष्ट आदर्शों को उमड़ते-घुमड़ते देखते हैं। वे शरीर की अन्तिम विदाई में इस महानद का श्रवण करते हैं, महा सत्य का साक्षात्कार करते हैं। उनके मृत्यु काल में जैन दर्शन का ‘सल्लेखना’ शब्द घटित होता है, प्रकट होता है।
चिंतन करता हुआ अपने कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं समझता। आँग्ल भाषा में दर्शन के लिए प्रयुक्त होने वाला ‘फिलॉसफी’ शब्द यूनानी भाषा के ‘फिलो’ और ‘सोफिया’ के मिलने से बना है, जिसका अर्थ होता है, ज्ञान के प्रति प्रेम। यहाँ ज्ञान का तात्पर्य बुद्धिकृत मीमाँसा से है और तत्संबंधी रुचि ही ‘फिलॉसफी’ है। इसके विपरीत भारतीय शब्द ‘दर्शन’ का तात्पर्य ‘देखने’ से है जिसका अर्थ है, तत्त्व का साक्षात्कार करना। ज्ञान के जिस विवेचन में सत्य या तत्त्व को स्वयं न देखा जाए, उसे ‘दर्शन’ कहना युक्ति संगत प्रतीत नहीं होता।
चिंतनशैली पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन के स्तर को काफी प्रभावित करती है और यदा-कदा तो अधेड़ावस्था तक में उसमें भारी गिरावट ले आती है। जब यह गिरावट 50 प्रतिशत के करीब आ जाती है तो रजोनिवृत्ति के लक्षण मरदों में उभरने लगते हैं। फ्री एक्टिव टेस्टोस्टेरॉन में इस स्तर की गिरावट अनेक प्रकार की पुरुषोचित क्रियाओं को अवरुद्ध करती है, जिससे कितने ही तरह के रोगजन्य लक्षण प्रकट हो जाते हैं, जबकि वे रोग होते नहीं और उन्हें नियंत्रित किया जा सकना संभव हैं।
चिंतन है। परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी भूमिदान देकर यह इंटर कॉलेज बनवाया था एवं एक ही शर्त रखी थी, नाम उनकी माता का होगा। स्वयं को प्रबंधन मंडल में भी नहीं रखा, पर समय−समय पर व्यवस्था संबंधी मार्गदर्शन सतत देते रहे। कोई भी प्रबंधन कला के गुर−स्वस्थ सूत्र इस पत्र से सीख सकता है। विद्यालय का हित अपना एकमात्र स्वार्थ बने, यह कितना नीतिपूर्ण विचार है, देखा जा सकता है।
चिंतन, सदाचरण और सद्व्यवहार को उतारकर मृत्यु को माँगलिक महोत्सव के रूप में मना सकते है।
चिंतन-मनन करते हैं, अपने आँखों के आगे उन्हीं उत्कृष्ट आदर्शों को उमड़ते-घुमड़ते देखते हैं। वे शरीर की अन्तिम विदाई में इस महानद का श्रवण करते हैं, महा सत्य का साक्षात्कार करते हैं। उनके मृत्यु काल में जैन दर्शन का ‘सल्लेखना’ शब्द घटित होता है, प्रकट होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-March
चिंतन की निरन्तरता साधक के सद्गुरु में समर्पण को सुगम बनाती है। समर्पण की परमावस्था में साधक का समूचा अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। और तब आती है। विलीनता की अवस्था, इस भावदशा में शिष्य साधक का काय-कलेवर तो यथावत् बना रहता है, पर उसमें उसकी चेतना अनुपस्थित होती है। वहाँ उपस्थित होती है उसके सद्गुरु की चेतना ।
चिंतन करते हुए करें।
चिंतन में भी वही विचरता रहे, कर्म में भी वही झरता रहे। ऐसे सद्चिंतन और सद्कर्म में प्रार्थना और भजन दोनों एक ही साथ जाते हैं, समन्वित हो जाते हैं। अतः सदैव उत्कृष्ट चिंतन की अभीप्सा तथा सद्कर्म में निरत-निमग्न रहना चाहिए। यही प्रार्थना और भजन का मर्म है।
चिंतन है, भजन सद्कर्म। प्रार्थना में प्रभु के प्रति गहन आत्मीयता, तीव्र तड़पन है तो सही पर शान्त एवं निष्क्रिय। प्रार्थना का यह निष्कम्प स्वरूप भगवान महावीर, तथागत बुद्ध, लाहिड़ी महाशय, श्रीअरविन्द, रमण महर्षि आदि सन्त, अवतारी पुरुषों में परिलक्षित होता है। प्रभु के प्रति इनका प्रेम गहन शान्ति में उठा या फैला था एवं विस्तार पाया था। शान्ति निरव तो होती है परन्तु निष्क्रिय नहीं।
चिंतन करें। अपने मन को धीरे-धीरे किन्तु सम्पूर्ण संकल्प के साथ सद्गुरुदेव अथवा ईष्ट की छवि से भर दें। साथ ही भाव यह रहे कि अपनी सम्पूर्ण चेतना, प्रत्येक वृत्ति गुरुदेव में विलीन हो रही है। यहाँ तक कि समूचा अस्तित्व गुरुदेव में खो रहा है। सोचते समय मन को भटकने न दे।
चिंतन भक्तों को उनका मनवाँछित देने वाला है। महाकाल इस समस्त सृष्टि के अधिष्ठाता व नियामक हैं। वे काल के भी अधीश्वर होने के कारण महाकाल के रूप में जाने जाते हैं। उन्हीं के इंगित से युग परिवर्तित होते हैं और सृष्टि अपना क्रम बदलती है। उनकी शक्ति से ही युग प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया गतिमान होती है।
चिंतन मेरा ही (भगवान सदाशिव) चिंतन है। इससे परमपद की प्राप्ति सहज सुलभ होती है। इसलिए कल्याण कामी साधक को प्रयत्न पूर्वक गुरु आराधना करनी चाहिए॥21॥ तीनों लोकों के देव-असुर एवं नाग आदि सभी इस सत्य को बड़ी स्पष्ट रीति से बताते हैं- कि ब्रह्म विद्या गुरुमुख में ही स्थित है। गुरुभक्ति से ही इसे प्राप्त किया जा सकता है॥22॥ ‘गुरु’ शब्द में ‘गु’ अक्षर अन्धकार का वाचक है और ‘रु’ का अर्थ है प्रकाश। इस तरह गुरु ही अज्ञान का नाश करने वाले ब्रह्म है।
चिंतन में इसका स्पष्ट मार्गदर्शन मिलता है।
चिंतन से ही मिल सकती है। भगवान् महाकाल के दिव्य स्वरूप के रहस्य पर ध्यान करने से मिल सकती है। इस तरह महाशिवरात्रि में किये जाने वाले उपवास की सार्थकता तभी है जब हम शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि से किसी बाहरी और संसारी तत्त्व को न ग्रहण करते हुए प्रतिपल-प्रतिक्षण भगवान् महाकाल की महिमा का चिंतन करें।
चिंतन है, दिव्य अभीप्सा है और भजन प्रभु अर्पित किया हुआ सद्कर्म है। उच्चस्तरीय चेतना की अभीप्सा भी हो और सद्कर्म भी सधता रहे तो अनन्त की यह यात्रा तीव्रतर एवं वेगवान हो जाती है जो किया जाय सब प्रभु के लिए और जो सोचा-विचारा भी जाय तो एक उसी के लिए। चिंतन में भी वही विचरता रहे, कर्म में भी वही झरता रहे। ऐसे सद्चिंतन और सद्कर्म में प्रार्थना और भजन दोनों एक ही साथ जाते हैं, समन्वित हो जाते हैं। अतः सदैव उत्कृष्ट चिंतन की अभीप्सा तथा सद्कर्म में निरत-निमग्न रहना चाहिए।
चिंतन सम्भव नहीं। अतः मन को वश में करने की साधना ही सत्य की प्राप्ति का एकमात्र उपाय है।
चिंतन चेतना इनसे निर्झरित हुई हैं। मानव मात्र के लिए इनका संदेश एवं महत्त्व सार्वभौमिक है तथा इनके प्रतिपादन समग्र हैं। मानव जाति का यह श्रेष्ठ वाङ्मय मनुष्य के आध्यात्मिक पथ को जहाँ ज्ञान का पाथेय प्रदान करता है, वहीं उसके जीवन पथ को आलोकित करने वाला दीपस्तम्भ भी है। यह श्रेयस और प्रेयस, विद्या और अविद्या, संभूति और असंभूति, परा और अपरा विद्या का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है। इस तरह आध्यात्मिक मानसरोवर रूपी उपनिषद् से निसृत ज्ञान की सरिताएँ मानव मात्र के लौकिक अभ्युदय एवं आध्यात्मिक कल्याण के लिए प्रवाहमान होती हैं।
चिंतन तो मस्तिष्क एवं शरीर धारी मनुष्य का इच्छातंत्र करता है। इस मशीन को चलाने वाला कितना समर्थ है, इसका उस ईंधन से कोई संबंध नहीं, जो ग्रहण किया जा रहा है, भोजन या प्राणवायु के रूप में। यदि मशीन चलाने वाला खुद ही होश में न हो तो ईंधन से उत्पन्न शक्ति उस उपकरण−काया को नष्ट ही कर देगी। यदि हमारे मन−बुद्धि जाग्रत−सावधान हों तो हमारी जीवनयात्रा सुखकर हो सकती है। जीवनीशक्ति हमारे अंदर सतत काम कर रही है।
चिंतन के रंगों की इस फुहार से बच नहीं सकता।
चिंतन करें।
चिंतन करने पर सब कुछ ठीक-ठीक समझ में आ जाता है। इस तत्त्व का सत्य बोध कुछ यूँ है-सद्गुरु ही साधक है, इस वाक्य का अर्थ यह है कि सामान्य देहधारी मनुष्य जब सद्गुरु की कृपा छाँव में आता है, तब वह शिष्य बनता है। उस शिष्य में गुरु जब अपने एक अंश को प्रतिष्ठित करते हैं, तब साधक के रूप में उसका नवसृजन होता है। इस तरह अपने शिष्य के काय-कलेवर में दरअसल सद्गुरु ही साधक के रूप में अवतार लेते हैं।
चिंतन के इन रंगों में सारी इन्सानी जिन्दगी का वजूद आ सिमटा है। कई -क्या? क्यों? कैसे? और किसलिए?
चिंतन के इन रंगों की चटख और शोख छटा नजर आयेगी। इनमें उल्लास के साथ विषाद का भी पुट है। खुशी के साथ गम भी है यहाँ। हँसी के साथ रुदन भी यहाँ बिखरे हैं। चिंतन के इन रंगों में सारी इन्सानी जिन्दगी का वजूद आ सिमटा है।
चिंतन-स्मरण, हृदय से अपने गुरु की भक्ति, वाणी से उनके पावन नाम का जप और शरीर से उनके आदेशों का निष्ठापूर्वक पालन करने से समस्त दुर्लभ आध्यात्मिक विभूतियाँ, शक्तियाँ, सिद्धियाँ अनायास ही मिल जाती हैं। गुरु ही ब्रह्म है, उनके वचनों में ही ब्रह्म विद्या समायी है। इस सत्य को जो अपने जीवन में धारण करता है, आत्मसात् करता है, अनुभव करता है वही शिष्य है-वही साधक है। गुरु तत्त्व से भिन्न अन्य कुछ भी नहीं है। इसे अनुभव करने के उपाय गुरु गीता के अगले मंत्रों में वर्णित है।
चिंतन और आचरण से सिद्ध करें कि हम भगवान् नृसिंह के भक्त है प्रह्लाद के अनुगामी हैं। और हममें बरसाने में होली के रंगों की छटा बिखेरने वाले गीता गायक कृष्ण के उपदेशों पर चलने का साहस है।
चिंतन, विवेकशीलता और सृजनशीलता की अद्भुत क्षमताओं को मानता है। उसके अनुसार मानवेत्तर योनियाँ मात्र भोग योनियाँ हैं। ‘जायस्व म्रियस्व’ अर्थात् जन्म लो, भोगो और मरो, यही उनकी नियति है, किन्तु मनुष्य योनि भोग योनियाँ तो है ही, कर्म योनि भी है। अतः ‘मनुर्भव’ का आदेश देकर उसे मनुष्य बनने के लिए सचेत करता है, क्योंकि मनुष्य जन्म तो सहज है किन्तु मनुष्यता उसे कठिन एवं सचेतन प्रयत्न द्वारा अर्जित करनी होती है।
चिंतन के कुछ रंग हमारे मन पर भी पड़ सके। और हममें वह साहस पैदा हो सके, जिसके बल पर हम नयी सदी की चुनौतियों का सामना कर सकें। ध्वस्त कर सकें होलिका और हिरण्यकश्यपु के षड़यंत्रों का दुर्गम व्यूह। जिसमें आज सारी मानवता छटपटा रही है। काश्मीर से चेचन्या तक जो खून के छींटे उड़ रहे हैं उन्हें हम हास-परिहास में डूबे रहकर नहीं रोक सकते।
चिंतन का चरमोत्कर्ष है वहीं भारतीय दर्शन की अन्य विचार धाराओं का आदि स्रोत भी है। ऋतम्भरा प्रज्ञा के उच्चतम आलोक से प्रकाशित ऋषियों की चिंतन चेतना इनसे निर्झरित हुई हैं। मानव मात्र के लिए इनका संदेश एवं महत्त्व सार्वभौमिक है तथा इनके प्रतिपादन समग्र हैं। मानव जाति का यह श्रेष्ठ वाङ्मय मनुष्य के आध्यात्मिक पथ को जहाँ ज्ञान का पाथेय प्रदान करता है, वहीं उसके जीवन पथ को आलोकित करने वाला दीपस्तम्भ भी है। यह श्रेयस और प्रेयस, विद्या और अविद्या, संभूति और असंभूति, परा और अपरा विद्या का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है।
चिंतन है। इससे परमपद की प्राप्ति सहज सुलभ होती है। इसलिए कल्याण कामी साधक को प्रयत्न पूर्वक गुरु आराधना करनी चाहिए॥21॥ तीनों लोकों के देव-असुर एवं नाग आदि सभी इस सत्य को बड़ी स्पष्ट रीति से बताते हैं- कि ब्रह्म विद्या गुरुमुख में ही स्थित है। गुरुभक्ति से ही इसे प्राप्त किया जा सकता है॥22॥ ‘गुरु’ शब्द में ‘गु’ अक्षर अन्धकार का वाचक है और ‘रु’ का अर्थ है प्रकाश। इस तरह गुरु ही अज्ञान का नाश करने वाले ब्रह्म है।
चिंतन के रंगों में और मित्रों-परिचितों को भी बचने न दीजिए, उन्हें भी भिगोइए इन गाढ़े रंगों में। सदस्य परिवार के हों या पड़ोस के कोई भी छूटने न पाये। हम आप और सभी विचारशील जन मजबूती से थाम लें अपनी पिचकारियाँ और उड़ेलें चिंतन के रंग एक-दूसरे पर । हमारी, हम सबकी विचारशीलता में विमर्श पैदा हो, मतों में दुराग्रह की बजाय पारस्परिक संवाद की स्थिति बने और अन्ततः समाधान जन्म ले। तभी तो उल्लास में सार्थकता आएगी।
चिंतन के रंग भी शामिल हैं। जिनसे तन नहीं मन भीग रहा है। हमारा और शायद आपका भी। परिस्थिति एवं परिवेश को तनिक गहराई से देखेंगे तो इन रंगों का अनुमान होगा। अपने आप में उतरेंगे तो चिंतन के इन रंगों की चटख और शोख छटा नजर आयेगी।
चिंतन फुहारों से उन्होंने अनेकों अन्तःकरण रंगे थे। भक्ति व प्रेम के अगणित रंगों के साथ उन्होंने पराक्रम का गुलाल भी उड़ाया था। कंस हो या कालयवन, जरासंध हो अथवा दुर्योधन किसी के आसुरी षड़यंत्रों को उन्होंने पनपने नहीं दिया। मानवीय हितों के खिलाफ कोई भी दुरभिसंधि उन्होंने चलने नहीं दी। अपने युग के अनुरूप प्रभु ने होली को नये अर्थ दिये।
चिंतन पर छा गया है। भ्राँतियाँ ही जोर मारती दिखाई देती हैं। दूरदर्शिता, समझदारी, ज्ञान की बातें लोगों को रुचिकर नहीं जान पड़तीं।
चिंतन पर छाए कुहासे को भी मिटाना है। यही युग निर्माण योजना की प्रगतियात्रा है। गीताकार के संदेश को किस कुशलता से इस युग के संस्कृति पुरुष ने−योगेश्वर स्तर की सत्ता ने सामान्यजन तक पहुँचाया है, इसे शाँतिकुँज के प्रज्ञा अभियान को, युग निर्माण की प्रक्रिया को समीप से देखकर ही समझा जा सकता है। तब समझ में आएगा कि देव संस्कृति पुरुष ने−योगेश्वर स्तर की सत्ता ने सामान्यजन तक पहुँचाया है, इसे शाँतिकुँज के प्रज्ञा अभियान को, युग निर्माण की प्रक्रिया को समीप से देखकर ही समझा जा सकता है। तब समझ में आएगा कि देव संस्कृति विश्वविद्यालय का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
चिंतन पूर्ण गायन किया है। इस सूक्त के आठ मंत्र निद्रा को अपनी साधना बनाने वाले साधकों के लिए नित्य मननीय है। इनमें से छठवें मंत्र में ऋषि कहते हैं-‘यावयावृक्यं वृकं यवय स्तेनभूर्म्ये। अथा नः सुतरा भव’॥ 6॥ ‘हे रात्रिमयी चित्शक्ति! तुम कृपा करके वासनामयी वृकी तथा पापमय वृक को अलग करो। काम आदि तस्कर समुदाय को भी दूर हटाओ।
चिंतन और सद्कर्म में प्रार्थना और भजन दोनों एक ही साथ जाते हैं, समन्वित हो जाते हैं। अतः सदैव उत्कृष्ट चिंतन की अभीप्सा तथा सद्कर्म में निरत-निमग्न रहना चाहिए। यही प्रार्थना और भजन का मर्म है।
चिंतन की अभीप्सा तथा सद्कर्म में निरत-निमग्न रहना चाहिए। यही प्रार्थना और भजन का मर्म है।
चिंतन कर सकता है। सत्यान्वेषण के लिए मन का अनुद्विग्न होना आवश्यक है; बिना मन को वश में किये सत्य का चिंतन सम्भव नहीं। अतः मन को वश में करने की साधना ही सत्य की प्राप्ति का एकमात्र उपाय है।
चिंतन से प्राप्त होते हैं।
चिंतन। साधु बहुत लज्जित हुए।
चिंतन के रंग एक-दूसरे पर । हमारी, हम सबकी विचारशीलता में विमर्श पैदा हो, मतों में दुराग्रह की बजाय पारस्परिक संवाद की स्थिति बने और अन्ततः समाधान जन्म ले। तभी तो उल्लास में सार्थकता आएगी। सहस्राब्दियाँ, शताब्दियां बीत गयी हमें होली मनाते। कई रंग देखें हैं हम सबने।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-June
चिंतन के आधार पर लिखे गए हैं। वस्तुतः पूज्यवर पढ़ने वाले, स्वाध्याय करने वाले के मन-मस्तिष्क को पढ़ लेते थे, अपने निज के गहन अध्ययन व विलक्षण स्मृति को आधार बनाकर लिखते थे। वही आज हमारे समक्ष विराट वाङ्मय के रूप में उपलब्ध है। साधनाजन्य यह उपलब्धि ऐसी है, जिस पर गहन शोध जरूरी है। संत चाहे पढ़े हों, अनपढ़ हों, वे अंतर में इस ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं, जो वर्षों तक पढ़ने वाला नहीं प्राप्त कर पाता।
चिंतन करके यह अनुभव करना चाहिए कि मैं ही सर्वरूप ब्रह्म हूँ, मैं ही परम सुख रूप हूँ। जल में जल डालने से, दूध में दूध डालने और घी में घी मिला देने से वे एकरूप हो जाते हैं। उसी प्रकार परमात्मा के मिल जाने पर उनमें कोई अंतर नहीं रह जाता। जब इस तरह का ज्ञान द्वारा देहाभिमान नष्ट हो जाता है और बुद्धि अखंडाकार हो जाती हैं, कर्मों में कोई आसक्ति नहीं रह जाती, मोह और वासनाएं जलकर नष्ट हो जाती हैं, तभी अद्वैत ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
चिंतन आगामी अंकों में)
चिंतन को प्रखर बनाता है। भावनाओं के उफान में बहना उसे विवेकसम्मत नहीं लगता। हृदय के भाव-उद्गारों की तुलना में वह बुद्धि को अधिक महत्व देता है और चिंतन मनन द्वारा आत्मतत्त्व, परमात्मतत्त्व को जानने का प्रयास करता है।
चिंतन से युक्त, भावभरे रसास्वादन की हमें अनुभूति कराती है। पत्थर में से भगवान प्रकट कर देने वाली श्रद्धा आदर्शों के प्रति गहन निष्ठा का नाम हैं। विवेक-श्रद्धा से युक्त ही युगशक्ति गायत्री है।
चिंतन, मनन और धारण किया जाता है, ईश्वरीय सत्ता का बोध उतना ही निर्मल होता चला जाता है। उसके लिए न तो मनुष्य को कहीं अलग जाने की आवश्यकता है और न कुछ और अध्ययन की। गीता के नवें अध्याय में इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए भगवान कृष्ण ने कहा है-
चिंतन और आत्मशोधन की साधना ही आत्मा को परमात्मा का पद प्रदान करती है।
चिंतन करने से यही स्पष्ट होता है कि धर्म और नैतिकता का अभाव ही इस स्थिति का कारण है। इनके उपयुक्त समावेश से स्थिति फिर सुधर सकती है।
चिंतन से, विचारों से ओत-प्रोत रखना, यह भावभरी प्रार्थना की जा सके तो कोई कारण नहीं कि इसके सत्परिणाम हमें न मिलें।
चिंतन और स्तर उनकी गरिमा के अनुरूप रखने की सावधानी रखी जाती है। प्राणपण से उनका निर्वाह किया जाता है। अखंड दीपक की स्थापना और निरंतरता उस उपस्थिति के स्थूल प्रमाण के रूप में थी।
चिंतन नहीं कर सकते। दुर्मित हम पर हावी न हो। हे परमात्मा, हे सदगुरु, हमें श्रेष्ठ चिंतन से, विचारों से ओत-प्रोत रखना, यह भावभरी प्रार्थना की जा सके तो कोई कारण नहीं कि इसके सत्परिणाम हमें न मिलें।
चिंतन का बिखराव दूर हो, ऐसा सतत प्रयास करें, संकल्पित ही श्रेय-सफलता पाएंगे, विश्वास करें, असमंजस को त्यागें, कायर-क्लीव नहीं कहलाएं हम, भागीरथ-तप के यूँ भागीदार स्वयं बन जाएं हम।
चिंतन वाले, अभीप्सा रखने वाले अध्यात्म मार्ग के पथिक से अपेक्षा रखते हैं कि क्या वह यह पथ अपनाने का साहस करेगा? अध्यात्म को क्षुरस्य धारा पंथ (छुरे की धार पर चलने वाला मार्ग) कहा गया है। यदि कुछ मुट्ठी पर व्यक्ति भी इस मार्ग पर चलने का साहस करते हैं तो उन्हें आगे आकर भावी पीढ़ी का मार्गदर्शन करना चाहिए, स्वयं को बुधः पुर लोकनायक की श्रेणी में बिठाना चाहिए। तभी हम इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य एवं भारत को विश्व का जगद्गुरु, महानायक बनने की अपेक्षा रख सकते हैं।
चिंतन मनन द्वारा आत्मतत्त्व, परमात्मतत्त्व को जानने का प्रयास करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-October
चिंतन, तनाव, निराशा, कुंठा, अवसाद, उद्विग्नता, असफलता का भय आत्ममुग्धता दिवास्वप्न, आत्महीनता,अपराध भाव,निंदा, परदोषारोपण, ईर्ष्या द्वेष जैसे दुर्गुणों के निदान व समाधान इसी में आते है। दंभ, उग्रभाव, हिंसक स्वभाव ,लालच, अतिमहत्वाकांक्षा,अपराधी मनोवृत्ति,विखंडित व्यक्तित्व के निदान समाधान पक्ष इसी में है।
चिंतन को उच्चस्तरीय प्रयोजनों में संलग्न न होने देने में कामुकता के विचार ही अत्यधिक बाधक होते है। कल्पना शक्ति का महत्वपूर्ण भाग इन्हीं कुप्रसंगों का ताना बाना बुनने में नष्ट हो जाता है। कामुक दृष्टि रहने पर नेत्रों की दिव्य दृष्टि का बुरी तरह अपव्यय होता रहता है। ऐसा चिंतन वीर्यपात से भी अधिक हानिकारक होता है। रति कर्म से स्थूल शरीर में जैसी हानि होती है वही कामुक चिंतन से सूक्ष्मशरीर की प्राण प्रतिभा को क्षति उठानी पड़ती है, इसलिए ब्रह्मचर्य की तप साधना में न केवल वीर्यरक्षा का वरन् कामुक दृष्टि को निरस्त करने का भी अनुशासन है।
चिंतन का अनिवार्य हिस्सा बना लेना चाहिए। सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति कभी भी छोटी बात नहीं सोचता है। जब सोच ऊँची होगी, तभी उड़ान ऊँची होगी और ऊँचाइयों पर पहुँचा जा सकेगा।
चिंतन, दुर्बुद्धिजन्य क्रियाकृत्य समाप्त होने लगते है, लालसाएं कम होने लगती तथा चेष्टाएं अंतर्मुखी बन जाती है। ऐसा आत्मबोध, चेतना के उद्गम स्थान पर ही पहुंचने पर संभव है।
चिंतन से सूक्ष्मशरीर की प्राण प्रतिभा को क्षति उठानी पड़ती है, इसलिए ब्रह्मचर्य की तप साधना में न केवल वीर्यरक्षा का वरन् कामुक दृष्टि को निरस्त करने का भी अनुशासन है।
चिंतन की कला (पी.एम.ए. पॉजिटिव मेटल एटीच्यूड) भी इसी प्रथम छह माह के पाठ्यक्रम में आते है। श्रेष्ठ विचारो व आदर्शों का महत्व, आत्मविश्वास, आत्मसम्मान, आत्म मूल्यांकन, सफलता के सही मायने, व्यवहारकुशलता व घर परिवार तथा सामाजिक परिस्थितियों में उसका समायोजन इसी विधा में आता है। समय प्रबंधन (टाइम मैनेजमेंट), संतुलित एवं आकर्षक व्यक्तित्व का निर्माण, प्रभावी आत्म प्रस्तुतिकरण एवं नेतृत्व क्षमता का विकास इसी सेमेस्टर में आते हैं। क्रियात्मक प्रायोगिक रूप में प्रज्ञायोग, शिथिलीकरण प्राणाकर्षण प्राणायाम डायरी लेखन, सेल्फ विजुअलाइलेशन, योजनाबद्ध कार्यपद्धति का निर्धारण, आत्मबोध तत्वबोध, 15 मिनट का सार्थक गायत्री जप, ज्योति अवतरण की ध्यान धारणा तथा स्वाध्याय को लिया गया है।
चिंतन अभी से चलने लगे।
चिंतन एवं व्यवहार की प्रामाणिकता, गुण कर्म, स्वभाव की श्रेष्ठता, लोकसेवा के प्रति प्रतिबद्धता, ईश्वरीय कार्यों के प्रति समर्पण,निरहंकारिता जैसे स्वर्णिम सूत्र इसमें सिखाए जाएंगे। भगवान बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद, महर्षि रमण एवं आचार्य श्रीराम शर्मा जी की शिक्षण विधियाँ भी बताई जाएगी। क्रियात्मक रूप में पहले तीन सेमेस्टर की सभी कार्यविधियों को पुनः कराकर निष्णात बनाया जाएगा।
चिंतनशील रहती है। जब देश की व्यवस्था गड़बड़ाती है, तो लोकसेवियों की परम्परा इसे अपना कर्त्तव्य समझकर उसे फिर से सुधारने का प्रयास करती है। लोकसेवियों की इस परम्परा को आम आदमी के जीवन से जुड़े हुए मुद्दों का हमेशा ध्यान रहता है। कोई निहित स्वार्थ न होने के कारण लोकसेवियों की इस परम्परा में सदैव इतना नैतिक साहस होता है कि सही को सही और महान लोकमत कह सकें। गलत को गलत कह सकें।
चिंतन प्रस्तुत किया था। ऐसी लगभग सौ किताबें थी। इस पुस्तिका में उन्होंने बाबाजी लोगों की संख्या छप्पन लाख लिखी थी व लिखा था कि यही लोग विद्याविस्तार, ग्रामोत्थान, स्वावलंबन, राष्ट्रधर्म में प्रवृत्त हो जाएं तो भारत को पुनः सोने की चिड़ियां बनाया जा सकता है। एक विकल्प के रूप में उन्होंने वानप्रस्थियों परिव्राजकों का तंत्र खड़ा किया। 1970 में जो संख्या संन्यास वेशधारी लोगों की थी।
चिंतन उभरने का अभ्यास होता रहे। सरस्वती, लक्ष्मी, काली आदि अन्य देवियों की प्रतिमाओं में भी यौवन के साथ भावभरी श्रद्धा संजोए रहने की मान्यता है। इसी प्रकार देवताओं को रूपयौवन संपन्न बनाकर नारी को वह अभ्यास करने का अवसर दिया गया है कि ये नर यौवन से कामुक उत्तेजना ग्रहण न करे वरन् ईश्वरतुल्य मान्यताओं का अभ्यास करे। मीरा आदि की आराधना इसी स्तर की थी।
चिंतन व्यर्थ के कार्यों में नियोजित होता है। इस कारण ऐसे लोगों को सदैव असफलता का मुँह देखना पड़ता है जिससे इनका आत्मविश्वास डिगा हुआ होता है।
चिंतन, श्रेष्ठ भावना एवं श्रेष्ठ कर्मों के द्वारा उनका अर्चन करते रहना चाहिए।
चिंतन वीर्यपात से भी अधिक हानिकारक होता है। रति कर्म से स्थूल शरीर में जैसी हानि होती है वही कामुक चिंतन से सूक्ष्मशरीर की प्राण प्रतिभा को क्षति उठानी पड़ती है, इसलिए ब्रह्मचर्य की तप साधना में न केवल वीर्यरक्षा का वरन् कामुक दृष्टि को निरस्त करने का भी अनुशासन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-April
चिंतन द्वारा कर सकते हैं। और यह एक स्थापित मनोवैज्ञानिक सत्य है कि अवचेतन में भेजा गया विचार, स्वतः ही फलित होता है। अतः अपनी सफलता के लिए स्वयं से हम कहें- ‘मुझे स्वयं पर व इस कार्य पर पूर्ण विश्वास है जो मैं कर रहा हूँ। मैं अपना श्रेष्ठतम प्रयास कर रहा हूँ, अतः मैं सफल होकर रहूँगा। ब्रह्मांड की अनन्त शक्ति मेरे साथ है, अतः मुझे किसी भी चीज से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।
चिंतन की आत्माभिव्यक्ति के दो पहलू हैं, पक्ष हैं। रूप और विषयों को इकट्ठा रखने के ब्रह्म का विस्तार दिक् है। समय (काल) भी रूप और विषयों को ले जाते हुए आत्मशक्ति की गति विस्तार के लिए आत्म विस्तृत ब्रह्म है। अतः हमारे वैदिक ऋषियों के इन सूत्रों में आधुनिक विज्ञान के सिद्धान्तों की अपूर्णता पूर्ण होती है। वे कहते हैं कि दिक् और काल (स्पेस एण्ड टाइम) ताने-बाने की तरह आपस में गूँथे हुए हैं।
चिंतन−मननपूर्वक याद करने का प्रभाव दीर्घकालिक होता है, अतः स्मृति में रखने के लिए आवश्यक है कि याद करने वाली योग्य और अच्छी बातों को ही मन में रखा जाए और शेष को भुला दिया जाए। इससे मन पर दबाव एवं बोझ नहीं पड़ेगा और वह हलका तथा प्रसन्न रहेगा। ऐसा मन ही स्मरणशक्ति को दीर्घकाल तक बनाए रखता है।
चिंतन क्या है? यह वह चिंतन है, जिससे कि आदमी देवता बन जाते हैं। हम क्या बनाएँगे, क्या बिगाड़ेंगे, यह विचार ही मत कीजिए। अमुक को क्या नुकसान पहुँचाएँगे, यह मत सोचिए। जो खराब आदमी है, उसको हम अच्छा बनाएँगे, सज्जन बनाएँगे, यह क्यों नहीं सोचते आप?
चिंतन है, जिससे कि आदमी देवता बन जाते हैं। हम क्या बनाएँगे, क्या बिगाड़ेंगे, यह विचार ही मत कीजिए। अमुक को क्या नुकसान पहुँचाएँगे, यह मत सोचिए। जो खराब आदमी है, उसको हम अच्छा बनाएँगे, सज्जन बनाएँगे, यह क्यों नहीं सोचते आप? यह आदमी खराब है, इसको हम मार डालेंगे, इसकी हत्या कर डालेंगे, यह क्यों सोचते हैं, यह मत सोचिए।
चिंतनम्।
चिंतन करते रहें। साधना और तप के ये सभी सूत्र मिलकर साधक को उच्चस्तरीय चेतना की ओर आरोहित करते हैं।
चिंतन में ये बातें जुड़ी रहनी चाहिए कि हम किस तरीके से मिल−बाँटकर खाएँगे और दूसरों की मुसीबतों में किस तरीके से हाथ बँटाएँगे। इसीलिए आपको अपना संकीर्ण ‘स्व’—जो अभी आपने ‘कूपमंडूक’ के तरीके से सीमित कर रखा है, फिर आप उसको विशाल बना देंगे। आप सबके हो जाएँगे और सब आपके हो जाएँगे। तब आप देवता हो जाएँगे और आपको स्वर्ग में रहना आ जाएगा।
चिंतन मत करिए। पिछली जो घटनाएँ हो गई, तो ठीक है, आपने कुछ अच्छे काम कर लिए, पर बार−बार उनकी प्रशंसा करने की जरूरत क्या है? अगर किसी ने आपके साथ कोई बुराई कर ली या किसी ने दुःख भुगत लिए तो बार−बार कहने की जरूरत क्या है? भूत सो भूत, गया सो गया। आप भूत पर विचार मत कीजिए।
चिंतन व आचरण के लिए प्रेरित करता है और अपने भाग्य निर्माता आप होने का एक नया विश्वास जगाता है। इसके साथ ही युवाओं के चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व गठन की आध्यात्मिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
चिंतन के बहुत समीप है, किन्तु मानवीय चेतना की समग्र समझ के प्रति युँग भ्रमित से जान पड़ते हैं। जब वे मानवीय चेतना के विवेक संगत एवं अविवेकी, उच्चतर एवं निम्नतर तत्त्वों को अचेतन में विद्यमान मानते हैं। वे अतिचेतन को अचेतन से अलग चेतना के एक स्वतंत्र रूप में नहीं समझ पाते हैं। परिणामस्वरूप युँग का विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान एक सीमित और नियतिवादी दिशा की ओर बढ़ता प्रतीत होता है और उनके व्यक्तित्व गठन में भी अहं का स्थान केन्द्रित बना रहता है। इस संदर्भ में युँग के शोध का अन्तिम सार स्व (Self) की अवधारणा बहुत संकुचित, प्रतिबन्धित और सापेक्ष है, जिसे अन्तिम स्वीकृति नहीं दी जा सकती।
चिंतन एवं क्रिया पद्धति की दार्शनिक, वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक विवेचना युग की एक अनिवार्य आवश्यकता है। इस संदर्भ में भारतीय मनोविज्ञान को लेकर कुछ कार्य हुए हैं, जिनमें जदुनाथ सिन्हा का ‘इण्डियन साइकोलॉजी’, स्वामी अखिलानन्द का ‘मेण्टल हेल्थ एण्ड हिन्दु साइकोलॉजी’, रघुनाथ सफाया का ‘इण्डियन साइकोलॉजी’, डॉ. शान्तिप्रकाश आत्रेय का ‘योग मनोविज्ञान’ आदि कतिपय उदाहरण हैं, लेकिन आधुनिक मनोविज्ञान के समानान्तर इनकी तुलनात्मक, समीक्षात्मक एवं समन्वयात्मक विवेचना का इनमें सर्वथा अभाव ही दिखता है। मानवीय व्यक्तित्व विकास के संदर्भ में पूर्व एवं पश्चिम की मनोवैज्ञानिक धाराओं के समन्वयात्मक शोध अध्ययन की गहरी जरूरत है। देव संस्कृति विश्व विद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में इस बिन्दु पर होने वाले शोध कार्य इस दिशा में सर्वथा अभिनव प्रयास है।
चिंतन करने की बात कहकर टाल दिया।
चिंतन से उभरा। कठोपनिषद् में उल्लेख मिलता है कि स्वयं को भिन्न एवं अलग समझना ही समय रूपी भ्रम को पैदा करना है। कालद्रष्ट भगवान् शंकराचार्य के अनुसार सत्य शाश्वत एवं सनातन होने के कारण अज्ञात है परन्तु समय ज्ञात होने के कारण असत्य एवं आभास मात्र है। श्रीमद्भगवद्गीता की भी यही मान्यता है कि जो आज है, वह कल भी या और आगे भी रहेगा। अर्थात् जब सब कुछ स्थिर है तो गति पर निर्भर समय कहाँ होगा?
चिंतन, चरित्र और व्यवहार के लिए अनभिज्ञ और अनजान सा बनकर रह जाता है? क्यों यह हमारे मन में सृजनशील विचार और हृदय में भाव प्रवण-पुलकन नहीं प्रदान कर पाता? इन अनगिन और ज्वलन्त प्रश्नों का जवाब एक ही है कि हमने साधना के कलेवर को अपनाया परन्तु इसकी प्राण चेतना तपस्या को भुला दिया और प्राणहीन कलेवर में आकर्षण कितना ही क्यों न हो परन्तु प्रभाव कुछ भी नहीं होगा।
चिंतन और आचरण के सतत अभ्यास द्वारा वृत्तियों का शोधन होता है और चरित्र गठन का कार्य मनोवाँछित दिशा में आगे बढ़ता है।
चिंतन व आचरण के रूप में जिस चरित्र गठन का शुभारम्भ होता है, वही चित्तवृत्तियों के शोधन के साथ तप साधना का रूप ले लेता है। वृत्तियों के शोधन के साथ क्रमशः आत्मा में निहित शक्तियों का जागरण शुरू हो जाता है। इस क्रम में संयम, सहिष्णुता, नैतिकता व अन्य नीति-नियम, मार्ग के अनिवार्य सोपान बनते जाते हैं। अब युवाओं को अपने अनुत्तरित प्रश्नों के समाधान सहज ही मिलने लगते हैं। क्षणिक सुख का थोड़ा सा संयम आन्तरिक सशक्तता एवं आनन्द की एक गहरी अनुभूति देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-February
चिंतन या जप में लगाइये। इस समय टहलना या पढ़ना नहीं चाहिये। रविवार या छुट्टी के दिन मौन का समय चार से आठ घंटे तक बढ़ाइये। (6) अपनी उम्र, परिस्थिति, शक्ति तथा आश्रम के अनुसार ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करिये। शुरू के महीने में एक बार से अधिक ब्रह्मचर्य भंग न करने का संकल्प करिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-July
चिंतन में लगता है, वही भारतीय संस्कृति का फूल है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-July
चिंतन, चरित्र और व्यवहार को मानवी गरिमा के अनुरूप बनाना पड़ता है। सेवा-साधना को भी नित्यकर्म में सम्मिलित करना पड़ता है। सुविस्तृत सामाजिक सहयोग के बलबूते ही मनुष्य आदिमकाल की अनगढ़ परिस्थितियों को पार करते हुए वर्तमान प्रगतिशीलता के उच्च शिखर पर पहुँचा है। सृष्टि का मुकुटमणि बनने का अवसर उसके एकाकी प्रयत्नों ने ही संभव नहीं किया है। इसके लिए मानवजाति की चिर-संचित उपलब्धियों का लाभ हस्तगत करने का अवसर उसे मिलता रहा है।
चिंतन की दृष्टि से वह उतना ही निकृष्ट है। दूसरे शब्दों में कहा जाय, तो विज्ञान का यह दूसरा नियम अक्षरशः इस स्तर पर भी काम कर रहा है। तथ्य यह भी है कि मानसिक अस्थिरता ही सामाजिक विपन्नता पैदा करती है। अशाँत और अव्यवस्थित मानस सुव्यवस्था बने रहने देगा, ऐसा भी नहीं समझा जा सकता। तो क्या आज की मानसिक अराजकता विश्व-विनाश को जन्म नहीं दे देगी ?
चिंतन को देखता है और आपकी भावनाओं को देखता है। अगर आप इस क्षेत्र में सूने हैं तो आपके कर्मकाण्ड कोई बहुत ज्यादा कारगर नहीं हो सकते । आप देखते हैं न कि कितने पंडित लोग हैं जो तरह-तरह के विधि-विधान और कर्मकाण्ड जानते हैं, पर सब खाली हाथ रहते हैं। आपने देखा है न कि साधु-महात्मा तरह-तरह के जाप करते हैं, पूजा-पाठ करते हैं, स्नान, ध्यान करते हैं, तीर्थ यात्रा करते हैं, लेकिन उनकी नियत भावना और दृष्टिकोण अगर ऊँचा न हुआ, व्यक्तित्व ऊँचा न हुआ, अंतःकरण ऊँचा न हुआ , तब उनका लाल-पीले कपड़े पहन लेना , तरह-तरह के आडंबर बना लेना और तरह-तरह के क्रिया-कृत्य कर लेना बिलकुल बेकार चला जाता है और सामान्य स्तर के नागरिकों से भी गयी बीती जिंदगी जीते हैं।
चिंतन करती है, शिशु में सुसंस्कारिता के समावेश के लिए तथा उसके रक्त-माँस-मज्जा का एक-एक कण नियोजित रहता है - गर्भ में पल रही उस जीव सत्ता के लिए, जो नौ माह की अवधि पूरी कर माँ से लगाव की वेदना भरी कराह के साथ बाहर आता है व एक नये संसार से अपनी इंद्रियों के माध्यम से साक्षात्कार करता है। माँ से बढ़कर श्रेष्ठतम सत्ता ब्रह्म के बाद इस धरती पर कोई नहीं। सरस संवेदना की प्रतिमूर्ति हमेशा देती रहने वाली सतत् जीवन यज्ञ कर अपना सब कुछ अर्पित करने वाली मातृसत्ता अब तक इस धरती पर है, भगवान का अस्तित्व प्रमाणित होता रहेगा व आस्तिकता कभी भी इस धरित्री से मिटेगी नहीं।
चिंतन के पुरोहित। तुम हो सद्चिंतन प्रेरक॥
चिंतन मंथन का क्रम चल
चिंतन सौंप सकते हों , अपनी इच्छाएँ और आकाँक्षाएँ सौंप सकते हों , तो फिर देखिये कि कैसा मजा आ जाता है । आप उस जनरेटर से संबद्ध हो जाइये जिसके साथ में जुड़ने के बाद ही बल्ब जलता है । पंखे तभी चलते हैं जब उनका संबंध बिजली घर से जुड़ जाता है। अगर आप सुनेंगे नहीं , जुड़ेंगे नहीं, तब आप रखे रहिए , आपकी कीमत ढाई रुपये है । आप प्रकाश नहीं दे सकते ।
चिंतन ही किया करते हैं। वाक्पटुता व्यवहार कुशलता, दया , करुणा, प्रेम अथवा उदारता के कितने ही कृत्रिम आवरण क्यों न डाले जायें किन्तु दुर्भाव छिपाये नहीं छिप सकता । जिस प्रकार शत्रुता मुख में मिश्री मोल लेने पर भी नहीं छिप सकती उसी प्रकार दुर्भाव भी सौ आवरणों के भीतर से भी झलक जाता है। मनुष्य का मुख्य हृदय का दर्पण कहा गया है। दुर्भावना पूर्ण व्यक्ति किसी कितनी ही अनुकूलता क्यों न प्रकट करें किन्तु उसका अंतरभाव मुख के भावों से आँखों तथा मुद्राओं से प्रकट होता ही रहता है।
चिंतन प्रेरक॥
चिंतन मनन करते रहने से भोग के दुर्भाग्य पूर्ण परिणाम दिखाई दे जाते हैं। धीरे-धीरे इनसे घृणा उत्पन्न होने लगती है।
चिंतन की गहराई में जायँ तो पता चलता है कि विरोध का जन्म प्रतिकूलता से ही होता है। जब तक पुष्य प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष, शारीरिक अथवा मानसिक मौन अथवा मुखर रूप से प्रतिकूलता की अभिव्यक्ति नहीं करता तब तक विरोध उत्पन्न ही नहीं हो सकता। यह बात दूसरी है कि मनुष्य अपनी उस भूल, कभी अथवा दोष को देख समझ न पाये।
चिंतन हम पर हावी न हों। आगामी यज्ञायोजन, विगत अश्वमेधों के अनुयाज यथावत तीव्र वेग से चलते रहें तथा हर व्यक्ति एक से अनेक गुना बनता हुआ इक्कीसवीं सदी को उज्ज्वल बनाने वाले इस मिशन की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता चले, यही हमसे उनकी अपेक्षा है।
चिंतन और चरित्र , भावना और लक्ष्य सब का सब भगवान के साथ में जोड़ना पड़ेगा। जिस दिन आप यह करने को तैयार हो जायेंगे तो उस दिन आप देखियेगा क्या क्या होता है। भगवान की मर्जी तो पूरी करिये फिर देखिये आपको कुछ मिलता है या नहीं। भगवान नियत देखते हैं। अभी मैंने सुदामा का नाम लिया था।
चिंतन को बदल दीजिए, छोटे दृष्टिकोण को बदल दीजिए,। लोभ और लालच से बाज आइये और भगवान की सुन्दर दुनिया को ऊँचा बनाने के लिए शानदार बनाने के लिए, उनके राजकुमार के तरीके से उनकी संपदा को, उनकी सृष्टि को ऊँचा और अच्छा बनाने के लिए कमर कसकर खड़े हो जाइये। आप समर्पित हो जाइये, शरणागति में आइये, विलय कीजिए-विसर्जन कीजिए, फिर देखिये आप क्या पाते हैं ? बीज के तरीके से गल जाइये और पेड़ के तरीके के उगने की तैयारी कीजिए। आप त्याग नहीं करेंगे तो पा कैसे लेंगे।
चिंतन यही कहता कि अपनी बढ़ोत्तरी का लाभ अपने तक ही सीमित क्यों न रखा जाय ? दूसरों से किसी प्रकार झटक कर अपनी ही सुविधाओं को क्यों न बढ़ाया जाय? बात जिनके गले उतर जाती है, वे मात्र स्वार्थपरता को ध्यान में रखने और उसी की पूर्ति करने में लगे रहते हैं, किंतु प्रकृति व्यवस्था और अंतरात्मा इस नीति को अपनाने पर चिक्कारती भी है और बदले में उसे महानताजन्य लाभ उठाने से वंचित ही रखती है। उदारता के अभाव में कोई दयनीय और तिरस्कृत स्थिति में रहने के लिए ही विवश रह सकता है।
चिंतन से अनुभूति की ओर का प्रयाण व्यक्ति में रुका हुआ, इसलिए प्रत्यक्ष में स्वाध्याय और सत्संग की नियमित दिनचर्या दिखाई पड़ने पर भी उनकी वह परिणति समाने नहीं आती, जो आनी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-September
चिंतन का स्वरूप यह होना चाहिये कि साँस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ कायकलेवर में भीतर प्रवेश कर रहे है। यह प्रवेश मात्र वायु का अंगों में आवागमन नहीं वरन् प्रत्येक अंग अवयव पर प्राण सत्ता का आधिपत्य बन रहा है एक एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगों के चित्र की कल्पना करनी चाहिये और अनुभव करना चाहिये कि उसमें भगवान की सत्त चिरस्थायी रूप से समाविष्ट हो गई। हृदय फेफड़े पाचन तंत्र आदि में परमात्मा चेतना का प्रवेश हो गया। रक्त के साथ प्रत्येक नस नाड़ी और कोशिकाओं पर भगवान ने अपना शासन स्थापित कर लिया। पंच ज्ञानेन्द्रियों और पंच कर्मेन्द्रियों ने भगवान के अनुशासन में रहना और उनका निर्देशन पालन करना स्वीकार कर लिया।
चिंतन या साधन मिलता है उसे बचा कर अपने समुदाय के पिछड़े वर्ग को ऊँचा उठाने के लिए नियोजित करने की उदारता दिखायें। यह इसलिए भी संभव है कि वर्तमान प्रचलन में नर और नारियों का सहयोग सहकार चाहे कितना ही ऊँचे उद्देश्य के लिए क्यों न दीख पड़ता हो, उसे संदेह और अविश्वास की दृष्टि में देखा जाता है। अकारण उस पर उँगली उठती है। इसलिए नारी जागरण आन्दोलन में पुरुष के सहयोग को पूरी तरह लिया जाय पर जहाँ तक आन्दोलन चलाने और कार्य रूप में परिणत करने का सवाल है वहाँ तक यही अधिक उपयुक्त होगा कि समर्थ, समृद्ध, प्रबुद्ध और संवेदनशील नारियाँ आगे बढ़े और पिछड़ेपन को सर्व प्रथम मान्यता क्षेत्र में बहिष्कृत करने की पृष्ठभूमि तैयार करे। प्रत्यक्ष उपायों में शिक्षा संवर्धन और गरीबी उन्मूलन को महत्व दिया जाता है।
चिंतन व्यवहार के परिमार्जन की प्रारंभिक शर्त पहले पूरी होनी चाहिये, तभी अंततः अंतराल की अंतिम परिष्कृति पा सकना संभव है जिसने यह अनुबंध पूरा कर लिया उसके लिये समय संबंधी अवरोध को मिटा सकना सरला हो जाता हे -इसमें कोई दो मत नहीं।
चिंतन के इसी सिलसिले में रथ अरण्य में जा पहुँचा। अर्जुन ने देखा कि अवधूत चण्डकेतु ने प्रणाम करते श्री कृष्ण को भुजाओं में भर लिया था और अपने नेत्र प्रवाह से उनकी घुँघराली अलकें सींचते जा रहे थे “आज मेरा शरीर सार्थक हुआ। धन्य हो गये मेरे नेत्र।”
चिंतन और आकर्षण निर्धारणों में भी यह परिवर्तन लहराते देखें जाते है। बच्चे और बूढ़े के बीच जो अन्तर पाये जाते हैं। जमाते हुए कहीं से कही पहुँचते हैं।इन बारीकियों को जहाँ ध्यान में रखा जाना संभव होता है वहाँ तद्नुरूप सुधार सहयोग की भी व्यवस्था बन पड़ती है और जिस लक्ष्य तक पहुँचना है उसकी यात्रा बिना गड़बड़ाये सुनियोजित ढंग से चलती रहती है। संस्कार कराने की पद्धति हिन्दू धर्म में प्रायः इसी आधार पर विनिर्मित की गयी है।
चिंतन, समझदारी, दूरदर्शिता, सूझबूझ जैसी विशेषतायें कम पड़ जाती है।
चिंतन और व्यवहार में परिवर्तित न ला सके ऐसा कोई कारण नहीं। मधुमक्खियाँ फूलों के पराग से जहाँ मधु बना सकती है तो प्रबल प्रयत्न द्वारा परिस्थितियों में वाँछनीय परिवर्तन प्रस्तुत न किया जा सके ऐसी कोई बात नहीं।
चिंतन और चरित्र बदल जाय। अगर इसे हम बदल दे तो आप विश्वास रखिये कि आपका जीवन पिछले दिनों जैसा भी कुछ रहा है भविष्य में वैसा रह ही नहीं सकता। आपने इतिहास पढ़ा होगा और आपको उन भक्तों के नाम याद होंगे जो पहले सामान्य स्थिति में गये बीते थे लेकिन जब उन्होंने अपना मन स्तर और दृष्टिकोण बदल दिया तो कितना कमाल हो गया। उनकी जिंदगी कैसी शानदार हो गयी। अगर उन्होंने भीतर वाले हिस्से को अर्थात् दृष्टिकोण को बदला न होता तो बाहर वाली परिस्थितियाँ बिलकुल मामूली आदमी के तरीके की रही होती।
चिंतन।
चिंतन में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता भर देती है। ऐसे ही व्यक्ति महामानव ऋषि देवता एवं अवतार के नाम से पुकारे जाते हैं सो में भगवान का शासन आत्म सत्ता पर स्थापित करने और हम में अहंता का विसर्जन करने का भाव है। प्रकारान्तर से इसे महान परिवर्तन का आँतरिक कायाकल्प का बीजारोपण कह सकते सोऽहम् साधना का यही है भावना प्रधान व्यावहारिक स्वरूप। ईश्वर जीव को मनुष्य को ऊंचा उठाना श्रेष्ठ बनाना चाहता है मनुष्य कि अपने तथा कथित पूजा पाठ के आधार पर ईश्वर को अपने इशारे पर नचाने एवं उससे उचित अनुचित मनोकामनायें पूरी कराने की पात्रता कुपात्रता परखने की न्याय निष्ठा को छोड़ देने का आग्रह करता रहता है। दोनों की दिशायें एक दूसरे के अनुकूल कैसे बने?
चिंतन भोंड़ा और भोंथरा हो जाता है। दिनचर्या के ढर्रे वाले कार्यों से ही समझ काम देती है। सूक्ष्म चिंतन, समझदारी, दूरदर्शिता, सूझबूझ जैसी विशेषतायें कम पड़ जाती है।
चिंतन निकृष्टताएं और दुष्टताएं क्षुद्रताएं और हीनताएं सभी निरस्त से रही है सभी पलायन कर रही है यह तथ्य हर घड़ी सामने खड़ा दीखना चाहिये। अनुपयुक्तताओं के निरस्त होने के उपराँत जो हलकापन जो संतोश उल्लास स्वभावतः होता हे और निरंतर बना रहता उसकी का प्रत्यक्ष अनुभव होना चाहिये। तभी कहा जा सकता है कि सोऽहम् साधना का उत्तरार्द्ध भी एक तथ्य बन गया।
चिंतन हम इस संसार को भगवान का विराट स्वरूप और अपने कलेवर को ईश्वर के मंदिर जैसा पवित्र अनुभव कर सकते हैं। जहाँ ऐसी दृष्टि होगी वहाँ दूसरों से सद्व्यवहार करने और अपनी उत्कृष्टता बनाए रखने की ही आकाँक्षा बनी रहेगी और उसे जितना क्रियान्वित करना बन पड़ेगा उतना ही अपना और दूसरों का सच्चा हित साधन बन पड़ेगा। सुसंस्कृत दृष्टिकोण अपनाकर मनुष्य अपने देवत्व को विकसित करने और वातावरण को सुख शांति से भरापूरा बनाने में आशातीत सफलता प्राप्त कर सकता है।
चिंतन व्यवस्था को उत्कृष्टता के केन्द्र पर केन्द्रित रखे। दार्शनिक हेर-फेर होते रहे है। प्रथा-परंपराओं के परिवर्तन और नये समन्वय होते रहे है। साँस्कृतिक उथल-पुथल भी होती रही हैं। पर विचार क्षेत्र में ऐसी महाक्राँति अभी तक नहीं हुई जो मनुष्य को मानवी दृष्टिकोण के साथ घनिष्ठतापूर्वक जोड़ती औचित्य एवं विवेक को सर्वमान्य बना पाने में सफल होती।
चिंतन की दशा धारा विधेयात्मक है मानव की सबसे बड़ी शक्ति उसके संकल्प तथा पुरुषार्थ के सम्मिश्रण में निहित रहती है। स्वयं को संसार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति मानना चाहिये। सफलता स्वास्थ्य प्रसन्नता समृद्धि के बीज स्वयं में निहित हैं। आवश्यकता इनके विकसित करने की है।
चिंतन परिष्कृत हुआ एवं आत्मिक प्रगति का पथ भी प्रशस्त हुआ। पढ़े अमृतवाणी-
चिंतन की इस गहराई में उतर गया। जहाँ उसे ऐसा प्रतीत होने लगा, जैसे शुक्र ग्रह के बारे में वह न केवल बहुत कुछ जानता ही है। वरन् कितनी ही बार वहाँ की यात्रा भी कर आया है। शुक्र के राजकुमार का वह मित्र है और ऐसा अंतरिक्ष यान बनाने की विधि जान चुका है जिससे विभिन्न आकाशीय पिंडों की यात्रा सरलता ओर सुगमता पूर्वक कम खर्च में की जा सके।
चिंतन रहा होगा स्वतंत्रता की बलि वेदी पर चढ़ने वाले शहीदों का? हमें आजादी यों ही नहीं मिली उसका आधार बड़ा सशक्त व उद्देश्य बड़ा निर्मल रहा है।
चिंतन करना पड़ता हे कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक व्यावहारिक यथार्थता के प्रत्यक्ष तथ्य के रूप में प्रस्तुत दृष्टिगोचर होने लगे।
चिंतन हो रहे थे। उन्हीं दिनों कुछ एक विलक्षण घटनाएं घट गई जिससे वैज्ञानिक इस पर पुनर्विचार के मजबूर हो गये।
चिंतन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-June
चिंतन उसी को उगाता बढ़ाता और सँवारता है। फल स्वरूप उसे पारस कहने में कोई आपत्ति नहीं। इसे पाकर अंतरंग ही हर्षोल्लास में निमग्न नहीं-रहता, बहिरंग जीवन भी स्वर्ण जैसी आभा से दीप्तिमान रहता है। इतिहास का पन्ना-पन्ना इस प्रतिपादन से भरा पड़ा है कि इस तत्वज्ञान को अपनाकर कितने कलुषित और कुरूप लौह खण्ड स्वर्ण जैसे बहुमूल्य, महान, अग्रणी एवं प्रकाशवान बनने में सफल हुए हैं।
चिंतन में लगता नहीं है । सोचना चाहते हैं कुछ, मन सोचता कुछ है । निष्प्रयोजन बिना सिर,पैर की बातें मन में आती रहती हैं, किंतु मानसिक पूजा नहीं चल पाती ।
चिंतन के अनुरूप अध्यात्म की व्याख्या की आवश्यकता अनुभव नहीं की गई, फलस्वरूप मृत ढकोसले को ढोते रहने की लकीर भर पीटी जाती रही । यही कारण है कि आजकल अध्यात्म वेश-दरवेश की साज-सज्जा मात्र बन कर रह गया है । पुराने जमाने में सुविधा और साधन दोनों की कमी थी, इसीलिए ऋषि-महर्षि चित्र-विचित्र वेश-विन्यास अपना लेते थे । आज न तो किसी प्रकार का अभाव है, न असुविधा ही । ऐसी दशा में अजीबोगरीब रूप-राशि की कोई आवश्यकता रह नहीं जाती ।
चिंतन इस पंचभौतिक शरीर की दृष्टि से ही करते हैं । पर जब इस जीवन का नाटक खतम होता है और हम शरीर के स्टेज से उतार दिये जाते हैं तो कितने दुःखी हो सकते हैं इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ।
चिंतन परक व्याख्या है, जो आज समाज में तथा कथित बुद्धि जीवियों-जातिवाद को संदेह भरी राजनीति करने वाले क्षुद्रमना व्यक्तियों की जिव्हा पर विराजमान है। ब्राह्मण क्या है? कैसा होता है? कैसे हर कोई बन सकता है ? उसका दार्शनिक विवेचन इस पूर्वार्ध में पढ़ें।
चिंतन मन को मत करने दो । मन को राग और द्वेष के प्रवाह से दूर रखो । दया क्षमा, सेवा के भावों को मन में बसने दो ।’
चिंतन पर पूर्ण पाबंदी लगी हुई थी । तब इस पर धर्मतंत्र का कठोर नियंत्रण था । धार्मिक केन्द्र ही सत्य-तथ्य का, सही-गलत का निर्णय निर्धारण करते थे । जो इन्हें चुनौती देते, वे यातना-गृहों में गंभीर यंत्रणा के शिकार होते अथवा जान से ही हाथ धो बैठते । इतने पर भी लोग इन धर्मध्वजियों की परवा किये बिना अपनी स्वतंत्र विचार-चेतना समय-समय पर प्रकट करते रहे ।
चिंतन और भाव तीनों का ही विकास ठीक-ठीक हो सके इसी विज्ञान विधान गायत्री मंत्र है। इसे ऋषियों द्वारा अन्वेषित ऐसी वैज्ञानिक पद्धति के रूप में जाना जा सकता है-जिसका प्रयोग मानवीय व्यक्तित्व में अंतर्निहित समस्त शक्तियों को जगा सके और उसे पूर्णता दे सके। इस तरह ब्राह्मणत्व गायत्री एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक की चाहत दूसरे का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करती है। दूसरे का प्रयोग पहले की प्राप्ति कराता है।
चिंतन की स्थिति में यदा-कदा यही सूक्ष्म तरंगें हमारे मस्तिष्क की पकड़ में आकर अकस्मात् नये विचार दे जाती हैं । पर इसके लिए मस्तिष्कीय तरंगों की फ्रीक्वेंसी ब्रह्मांडव्यापी सूक्ष्म तरंगों से ट्यूण्ड होनी चाहिए । मूर्द्धन्य मनीषी लायल वाटसन ने इस संदर्भ में उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपनी प्रसिद्ध कृति ‘सुपरनेवर’ में कहा है कि गहन चिंतन की स्थिति और कठिन गणितीय प्रश्नों के हल के समय में भी आइन्स्टीन के मस्तिष्क से सदा ‘अल्फा तरंगें’ ही निकला करती थीं और ऐसे समय अचानक ही उनके मस्तिष्क में प्रश्नों के हल कौंध जाया करते थे । सापेक्षवाद का प्रसिद्ध सिद्धान्त भी ऐसे ही एक अवसर की देन बताया जाता है ।
चिंतन, व्यवहार ही अब वे पक्ष है, जिनमें परिवर्तन की सुधार-संशोधन की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इन्हीं संभावनाओं को साकार करने के लिए युग ऋषि द्वारा ‘विचार क्रान्ति अभियान’ के रूप में एक अभिनव आँदोलन का सूत्रपात हुआ है, जिसमें लोगों से खुली अपील की गई है कि अब पुरानी प्रथाओं और मान्यताओं से-सड़ी सोच एवं विकृत आकाँक्षाओं से चिपके रहने का समय लद गया । शरीर के आकार प्रकार में बदलाव के साथ-साथ परिधान में भी परिवर्तन करना पड़ता है । यही बात इन दिनों आध्यात्मिक अवधारणाओं के लिए लागू होती है, जिसे पूरा करने के लिए लोकमानस को हर प्रकार से तैयार रहना चाहिए। इससे कम में समाज और अध्यात्म की उन्नति किसी भी प्रकार संभव नहीं ।
चिंतन करने का जो तरीका था, जिस तरीके से उनने आचरण किये थे, वही तरीका हमारा होना चाहिए और हमारी गतिविधियाँ उसी तरीके की होनी चाहिए। जैसा कि श्रेष्ठ मनुष्यों की रही हैं और रहेंगी। यह विश्वास करने के बाद हमको अपनी क्रिया पद्धति में, दृष्टिकोण में, मान्यताओं में, इच्छा-आकाँक्षाओं में परिवर्तन करने, बदल देने के बाद
चिंतन में नहीं है, तब पश्चिम की रीते कोश से कुछ आशा कराना व्यर्थ है।
चिंतन को उपहासास्पद होने के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है ?
चिंतन और प्रयास अपना तो लेते हैं । ऐसे ही लोग बड़ी संख्या में पाये और अपने इर्द-गिर्द मक्खी, मच्छरों की तरह विद्यमान दिखाई पड़ते हैं । इन बहुसंख्यकों का अनुसरण करके भला कोई अपना क्या हित साधना कर सकता है ? उनके परामर्श भी ऐसे ही अधोगामी होते हैं । तथाकथित स्वजन संबंधी भी ऐसे ही सुझाव देते और आग्रह करते देखे जाते हैं ।
चिंतन का अभ्यास करो । मानसिक पूजा को अपना दैनिक कार्य बना लो और प्रतिकूल भावना से मन को प्रयत्न पूर्वक हटाते रहो। संसार के व्यक्ति तथा पदार्थों का चिंतन मन को मत करने दो । मन को राग और द्वेष के प्रवाह से दूर रखो । दया क्षमा, सेवा के भावों को मन में बसने दो ।
चिंतन की स्थिति और कठिन गणितीय प्रश्नों के हल के समय में भी आइन्स्टीन के मस्तिष्क से सदा ‘अल्फा तरंगें’ ही निकला करती थीं और ऐसे समय अचानक ही उनके मस्तिष्क में प्रश्नों के हल कौंध जाया करते थे । सापेक्षवाद का प्रसिद्ध सिद्धान्त भी ऐसे ही एक अवसर की देन बताया जाता है ।
चिंतन इन दोनों पैरों के बिना ब्राह्मणत्व की राह पर कैसे चला जा सकेगा। इस अर्जन की अवस्था में होता है रजस का जागरण। कामनाओं-इच्छाओं का उदय, अतृप्ति की जलन का अहसास इसी अवस्था की देन है। अर्जन का सदुपयोग अपने लिए नहीं औरों के लिए हो। इस भावना का उभार धीरे-धीरे व्यक्तित्व को उस धरातल पर लाकर खड़ा कर देता है जहाँ वह अनेकों को संरक्षण देने लगता है।
चिंतन और कर्म दोनों से विरति एक मात्र लक्षण है इनका। इसे तोड़ने आगे बढ़ने का उपाय सिर्फ एक है-कठोर श्रम। श्रम का कुठार ही इस तमस की कारा को तोड़ने में सक्षम है। इस ओर प्रयत्न करने का मतलब है ब्राह्मणत्व की ओर उन्मुख होना।श्रम होगा तो अर्जन होगा।
चिंतन के नीर-क्षीर विवेक की प्रतिभा किन्हीं विरलों में ही पाई जाती है । अधिकतर लोग उसी दिशा में चल पड़ते हैं जिस पर कि समीपवर्ती लोगों को चलते देखते हैं ।
चिंतन करेगा । तुम्हारे रस लिए बिना वह भटकता है तो भटका करे। आनंद को पृथक् करो और मनोमय कोश शुद्ध हुआ धरा है ।
चिंतन व कुछ गहन मनन करें-अमृतवाणी का।
चिंतन की ही परिणति है ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-August
चिंतन ही प्रमुख थे, अस्तु क्रिया बोध नाम रखा गया। उपासना के क्षणों में ईश्वर का गुणानुवाद तो अभीष्ट था ही, इसके अतिरिक्त दिनचर्या के अन्य कामों में भी दिव्य सत्ता का सतत् स्मरण और समीपता का अनुभव किया जाता । इस प्रकार हर कार्य में ब्रह्मसत्ता के बराबर मनन के कारण ही यह मार्ग ब्रह्मचर्य कहलाया।
चिंतन-मनन करना-इसे उपासना को सफलता का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है।
चिंतन के योग्य बनाते हैं, तब कहीं उन भाव तरंगों की प्राप्ति और अनुभूति हो पाती है, जो अपने अंदर और बाहर सब तरफ तिल में तेल जल में विद्युत और शब्द में अर्थ की भाँति छिपे पड़े हैं। प्रेम भावनाओं के उद्रेक से अंतःकरण में अतिरिक्त कुछ और दिखाई ही नहीं देता इसलिए प्रेम जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है। उसके लिए कठिन साधनाओं की आवश्यकता नहीं । आत्मारस है उसकी अनुभूति कराने की शक्ति केवल प्रेम को है। इस तथ्य को और अधिक स्पष्ट जानने के लिए हमें जीवन के उन क्षणों का स्मरण करना होगा जब हम किसी के प्रेम में भाव विभोर रहे हों।
चिंतन और कर्तृत्व से उत्पन्न होने वाला अंतर्द्वंद्व दुहरा व्यक्तित्व रच देता है और उससे निरंतर उठने वाली आँतरिक कलह सारी मनोभूमि को क्षत-विक्षत करके रख देती है। संचालक के आहत-घायल, उद्विग्न होने पर उसके आधीन काम करने वाले तंत्र की दुर्दशा होना स्वाभाविक है। शरीर के अनाचार और मस्तिष्क के मनोविकार ही वे कारण है जिनके कारण आत्मसत्ता का संचालित तंत्र अनेकानेक प्रकार के आत्म दंडों की व्यवस्था अपने आप कर देता है।
चिंतन और कर्तृत्व में अपना समय नियोजित करे यही महामानवों की भांति उच्च जीवनक्रम है। गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार की उत्कृष्टता तप एवं त्यागमय जीवन जीने से उपलब्ध होती है। विभिन्न धर्म-मतावलंबियों में झगड़ा उनकी क्षुद्र कामनाओं-महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति में विघ्न पड़ने से ही होता है। परंतु जिस व्यक्ति ने विवेक के द्वारा अपनी आकाँक्षाओं, वासनाओं पर नियंत्रण पा लिया हो उसका किसी से झगड़ा या संघर्ष नहीं होता। ऐसा विवेकशील मनुष्य सत्य-असत्य भले-बुरे कार्यों का निर्णय सुगमतापूर्वक करने में सक्षम होता है।
चिंतन करते रहना ही अभीष्ट है।
चिंतन कितना ही अश्लील और कामोत्तेजक क्यों न हो । प्राचीन समय में ऐसी बात नहीं थी। तब विचारणा को प्रमुख और बिंदु क्षरण को गौण माना जाता था। विचारणा यदि ठीक-ठीक सध गई, तो फिर काम-क्रीड़ा पर नियंत्रण कोई बहुत कठिन नहीं कहा जा सकता। और यदि इन दोनों पर विजय प्राप्त कर ली गई, तो लक्ष्य तक पहुँचना सरल हो जाता है।
चिंतन ने लंबे समय से अनेकानेक बंधनों से जकड़ा और वंचित रखा है।
चिंतन, चरित्र, व्यवहार की उत्कृष्टता तप एवं त्यागमय जीवन जीने से उपलब्ध होती है। विभिन्न धर्म-मतावलंबियों में झगड़ा उनकी क्षुद्र कामनाओं-महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति में विघ्न पड़ने से ही होता है। परंतु जिस व्यक्ति ने विवेक के द्वारा अपनी आकाँक्षाओं, वासनाओं पर नियंत्रण पा लिया हो उसका किसी से झगड़ा या संघर्ष नहीं होता। ऐसा विवेकशील मनुष्य सत्य-असत्य भले-बुरे कार्यों का निर्णय सुगमतापूर्वक करने में सक्षम होता है। विवेकपूर्ण सत्यमार्ग का अनुसरण करके ही महापुरुषों ने महानता को अर्जित किया है।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार में निकृष्टता भर जाने के कारण जो कुछ चल रहा है वह ऐसा है जिसे निर्धनों, अशिक्षितों और पिछड़े स्तर के समझे जाने वालों की तुलना में भी अधिक हेय समझा जा सकता है। इसे प्रगति कहा भले ही जाता हो पर वस्तुतः है अवगति ही, जिसे मानवी दुर्बुद्धि ने आमंत्रित किया है, दुर्मतिजन्य इस दुर्गति का एक ही समाधान है-विचारक्राँति।
चिंतन क्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों की ओर ध्यान नहीं दिया गया। वहाँ जमी हुई वितृष्णाओं और विपन्नताओं का समाधान न किया गया तो आहार-विहार का संतुलन बनाये रखने पर भी रुग्णता से पीछा छूट नहीं सकेगा। चिकित्सा उपचार से भी मन बहलाने के अतिरिक्त और कुछ प्रयोजन सिद्ध हो नहीं सकेगा। अब क्रमशः औषधि उपचार का महत्व घटता जा रहा है और मानसोपचार को प्रमुखता दी जा रही है। मानसिक बीमारियों की पिछले दिनों अलग से गणना होती रही है और उनका क्षेत्र अलग रहा है ।
चिंतन विचित्र और विलक्षण होता है । कितने ही दुष्टता की भाषा में सोचते हैं। और हर किसी पर दोषारोपण करते हुए शत्रुता की परिधि में लपेटते हैं। कितने ही आशंकाओं, संदेहों, आक्षेपों के इतने अभ्यस्त होते हैं कि इतने अभ्यस्त होते हैं कि उन्हें अपनी पत्नी, बेटी, बहिन तक के चरित्र पर अकारण संदेह बना रहता है। संबंधियों और पड़ोसियों को अपने विरुद्ध कुचक्र रचते हुए देखते हैं।
चिंतन में अवरोध बताते हुए उसे त्यागने में ही परम कल्याण बताया है। उनका कहना है कि व्यक्ति अपनी इच्छा-आकाँक्षाओं-वासनाओं एवं लालसाओं को संयत रखे और उत्कृष्ट चिंतन और कर्तृत्व में अपना समय नियोजित करे यही महामानवों की भांति उच्च जीवनक्रम है। गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार की उत्कृष्टता तप एवं त्यागमय जीवन जीने से उपलब्ध होती है। विभिन्न धर्म-मतावलंबियों में झगड़ा उनकी क्षुद्र कामनाओं-महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति में विघ्न पड़ने से ही होता है। परंतु जिस व्यक्ति ने विवेक के द्वारा अपनी आकाँक्षाओं, वासनाओं पर नियंत्रण पा लिया हो उसका किसी से झगड़ा या संघर्ष नहीं होता।
चिंतन और कर्तृत्व को ऐसा बनाये रहता था कि सुव्यवस्था बनी रहने पर किसी को किसी प्रकार की प्रतिकूलताओं का सामना न करना पड़े ।
चिंतन और उसकी प्रतीक्षा कर रहा है।” “पता नहीं क्या हुआ आप चाहें तो इसे ज्वर की विक्षिप्तता कह सकते हैं, आपको मैं रोकता नहीं।” “तू रामसिंह के भरोसे यहाँ आया था। धिक्कार है तुझे नीलकंठ।”
चिंतन, श्रेष्ठ व उत्कृष्ट विचारणा एवं सत्कर्मों के लिए मिला है। साँसारिक भोग सुखों को आध्यात्मिक चिंतन में अवरोध बताते हुए उसे त्यागने में ही परम कल्याण बताया है। उनका कहना है कि व्यक्ति अपनी इच्छा-आकाँक्षाओं-वासनाओं एवं लालसाओं को संयत रखे और उत्कृष्ट चिंतन और कर्तृत्व में अपना समय नियोजित करे यही महामानवों की भांति उच्च जीवनक्रम है। गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार की उत्कृष्टता तप एवं त्यागमय जीवन जीने से उपलब्ध होती है। विभिन्न धर्म-मतावलंबियों में झगड़ा उनकी क्षुद्र कामनाओं-महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति में विघ्न पड़ने से ही होता है।
चिंतन करना ही सर्वथा विवेक सम्मत है। उनका सिद्धाँत था-’पाप से घृणा करो पर पापी से नहीं।’ मनुष्य अपने लिए सुखों की अवहेलना कर सकता है, पर दूसरों को दुःखी नहीं बनना ही उसके लिए वास्तविक धर्म या कर्तव्य परायणता है। संसार के सभी श्रेष्ठ पुरुषों ने कर्तव्यपरायण होकर ही उच्चता को प्राप्त किया। उपयुक्त एवं सार्वजनीन हितकारी बातों को अंगीकार करना ही विवेक सम्मत है।
चिंतन के अभाव में शारीरिक नियमन आधे-अधूरे स्तर का बना रहता है। शायद इसी कारण से प्राचीन आचार्यों ने इस बात की आवश्यकता अनुभव की थी कि मन को सदा उदात्त भूमिका में बनाये रखा जाय। इससे इंद्रिय संयम स्वतः निभता चलेगा। निश्चित ही तब वे इस मनोविज्ञान से पूर्ण-रूपेण परिचित रहे होंगे कि म नहीं कामुकता की जड़ है। उसे यदि किसी श्रेष्ठ चिंतन में लगा दिया गया, तो फिर ‘काम ‘ का ‘उल्लास’ में उदात्तीकरण संभव है।
चिंतन तंत्र को ही नियोजित नहीं करता है, वरन् शरीर-वाहन को भी इसी प्रयोजन के लिए नियोजित करता है। अंतः करण का आदेश मन मानता है और मन के इशारे पर चलने वाला शरीर स्वामी भक्त सेवक की भूमिका निभाने लगता है। इसमें उसे भला-बुरा सोचने या किसी प्रकार ननुनच करने की भी इच्छा नहीं होती। संक्षेप में अंतराल को ही मनः संस्थान और कायकलेवर का सूत्राधार कह सकते हैं। जो किया और सोचा जाता है उस समूचे क्रिया तंत्र का अधिष्ठाता अंतःकरण को ही कहा-माना जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।
चिंतन में लगा दिया गया, तो फिर ‘काम ‘ का ‘उल्लास’ में उदात्तीकरण संभव है। वर्तमान में सर्वत्र इसके विपरीत आचरण हो रहा है, अतः ‘काम’ को परिष्कृत कर पाने में न तो सफलता मिल पाती है, न कोई वास्तविक ब्रह्मचारी बन पाता है।देखा गया हे कि क्षरण को रोक लेना ही संप्रति ब्रह्मचर्य की कसौटी बनी हुई है, भले ही चिंतन कितना ही अश्लील और कामोत्तेजक क्यों न हो । प्राचीन समय में ऐसी बात नहीं थी। तब विचारणा को प्रमुख और बिंदु क्षरण को गौण माना जाता था।
चिंतन के प्रकाश से उनकी आँखें चौंधिया जाती हैं और औचित्य को समझने स्वीकारने जैसा साहस उनके जुटाये जुट ही नहीं पाता। इस वर्ग के लोगों को मानसिक दृष्टि से अविकसित नर पशुओं की श्रेणी में ही रखा जा सकता है।
चिंतन, प्रचलन और वातावरण छाया रहेगा जिनका कि प्रतिनिधित्व नारी करती है। इसलिए नवयुग के समाज संरचना में काम आने वाले महत्वपूर्ण तथ्य नारी के द्वारा ही आगे बढ़कर रोपे और सींचे जायेंगे। समूची मनुष्य जाति का अस्तित्व और वर्चस्व मातृशक्ति की अनुकंपा से ही विकसित हुआ और अक्षुण्ण रहा है। इसी तथ्य को अगले दिनों नारी और भी अधिक कुशलता के साथ व्यापक रूप में कर सकने के लिए अवसर प्राप्त करेगी, तो कोई कारण नहीं कि अपने इसी खिन्न उद्विग्न और विपन्न समुदाय को पुरातन काल की सतयुगी व्यवस्था के अंतर्गत जा पहुँचने का सुयोग उपलब्ध न हो।
चिंतन की प्रेरणा देती है इसीलिए प्रेम जीवन की सबसे बड़ी मार्गदर्शक सत्ता है। वह आदमी को भौतिक सुख की अपेक्षा आध्यात्मिक तथ्यों में जीवन और प्राण का संदेश देती है इसलिए यह सबसे सबल शिक्षण है। हम किसी को कितना प्यार करते हैं उतना ही उसमें प्रेरणाएँ और प्रकाश भरने के अधिकार हैं। कहते हैं प्यार से समझाई हुई बातें जीवन भर नहीं भूलती जब कि भयवश सीखी हुई, दबाव में आकर सुनी हुई सारपूर्ण बातें भी लोग अधूरे मन से सुनते और कुछ ही दिन में भूल जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-May
चिंतन वृत की हैं।
चिंतन-चरित्र में चमक पैदा करने की स्वर्णिम स्थिति है। अगर उसे यों ही तृष्णा और निराशा से भरे क्षणों में व्यतीत किया जाता है तब तो यह निश्चित रूप से रोग और शोक का युग्म ही बन जाता है। मानसिकता पथभ्रष्ट हो जाती है। विशेष रूप से इस अवस्था में वाइटल एनर्जी का भारी मात्रा में क्षरण होता है।
चिंतन को किन्हीं महत्वपूर्ण प्रयोजनों में लगने से रोके रहता है। वैज्ञानिक, विद्वान, मनीषी, बुद्धिजीवी, कलाकार, साहित्यकार, अपने मन को साधने की कुशलता में निष्णात् होते हैं वे मस्तिष्क में बंदर जैसी उछल - कूद नहीं मचने देते। जिस कार्य को उपयोगी एवं आवश्यक मानते हैं उसी में एकात्म भाव से तन्मयता, स्थापित करते हैं, उथले मन से, सरसरी नजर से जिन भी विकारों को आते देखते हैं, तुरन्त उन पर नियंत्रण स्थापित कर लेते हैं।
चिंतन सही रखने के लिए आहार सही होना जरूरी हैं, वहीं श्रेष्ठ विचारों को आमंत्रित करने की कला भी उसे सीखनी होगी तभी ध्यान सफल होगा। जीवन जीने की कला के नाम से उनने जिस योग साधना को जनम दिया। वह अपने आप में विलक्षण किंतु सरल हैं। उनने कहा कि नित्यप्रति के अपने आहार पर ध्यान दो कि तुम क्या खा रहे हो पर कड़ा तप करने की कोई जरूरत किसी को भी नहीं है। हम शाकाहारी बनें, सात्विक आहार लें एवं अन्नों वै मनः के तथ्य को ध्यान में रखें कि जैसा हम खाते हैं, वैसा ही हमारा चिंतन बन जाता है।
चिंतन और दृष्टिकोण बदल दिया जाय, परिष्कृत कर दिया जाय। यहीं हैं हमारे प्रयास जिसके लिए हम अपनी समस्त शक्ति के साथ लगे हुए है।
चिंतन ही इस महाव्याधि का मूल है। सेवा निवृत्ति के पश्चात् अधिकाँश लोगों को इस मनोव्यथा का शिकार बनते देखा जाता है। कार्य के अभाव में शरीर में जंग लगने लगती है। उत्साह विहीन मन में नीरसता छा जाती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति जीर्ण, शीर्ण, निष्क्रिय एवं वृद्ध दिखाई देने लगता है।
चिंतन धारा को गहराई तक स्थापित करना। देखा जाता है कि मनुष्य कटी पतंग की तरह हवा के झोंकों के साथ दिशा बदलता रहता है। शरीरगत वासनाएं और मनोगत तृष्णाएँ ही हर घड़ी सवार रहती हैं। उन्हीं की पूर्ति के लिए निरंतर ताना बाना बुनने में लगा रहता है। उन्हीं के लिए खटता पिसता रहता है कुछ सफलताएं विशेषताएँ उपलब्ध हुई तो अहमन्यता का भूत सवार होता है।
चिंतन और प्रयासों को उद्धत स्तर का बनाकर दूसरों को भर्त्सना करने का अवसर दे और अपने आप को असाधारण बनने के प्रपंच में फँसाकर हेय स्थिति में गिरा दे। फिर वह दुर्व्यसन खर्चीला भी तो बहुत पड़ता है। निरंतर जाल-जंजाल बुनते रहने के लिए उकसाता भी तो है।
चिंतन तो युवा अवस्था की उमंगों के लिए भी घातक की होता है। व्यक्ति को आवश्यकता से अधिक अहंकारी बना देता है। अधिकार में बहुत सुख है पर कर्तव्य की महानता और उससे मिलने वाली शाँति की बराबरी कभी नहीं कर सकता। जैसे-जैसे अधिकार क्षेत्र की सीमा का ह्रास होने लगे उसी क्रम से कर्तव्य का क्षेत्र का फैलाते चलने पर इस तरह की दिक्कतें स्वयमेव दूर हो जाती हैं। उपासना, साधना, स्वाध्याय के सतत् अभ्यास और उसके अनुसार कार्यक्षेत्र में उतरने पर सफल और स्निग्ध जीवन की सुवास मिलने लगती हैं।
चिंतन, दुष्ट-आचरण का प्रतिफल अनेकानेक कष्टों तिरस्कारों, अभिशापों के रूप में सिर पर चढ़ता है। वासना पूर्ति के लिए अनेकों अपव्ययी, दुर्व्यसनी, अनाचारी अपने-अपने कीर्तिमान स्थापित करने के लिए लालायित रहते हैं। उन्हें अधोगामी दुष्प्रवृत्ति को ही क्यों अपनाना चाहिए जिनमें मात्र विक्षोभ उत्पन्न करने और अनाचारी बनने के अतिरिक्त और कुछ सार है। ही नहीं। तृष्णा की पूर्ति के लिए व्याकुल तो रहा जा सकता है, पर उसकी पूर्ति किसी भी प्रकार संभव नहीं।
चिंतन आहार तथा संस्कार बालक को प्रभावित करते हैं तथा जन्म लेने के बाद तक भी उन पर उनकी छाप रहती है किंतु बहिरंग जगत में आते ही कच्ची मनोभूमि पर वातावरण का दृश्यजगत का, आसपास के परिवेश-संगति का जो प्रभाव पड़ता है, उसका अपने आप में बड़ा महत्व है। यदि हम सही वातावरण शिशुओं, विकसित हो रहे बच्चों, को दे पाएँ, सुसंस्कारों का आरोपण कर पाएँ , तो जो संतति जन्म लेगी, निश्चित ही संस्कारवान-श्रेष्ठ चिंतन वाली होगी- देवमानवों के रूप में विकसित होने वाली। यदि वातावरण श्रेष्ठ आत्माओं को भी हेय स्तर का मिला तो संभव है उनकी प्रगति में अवरोध आ जाय, वे नरपशु की नहीं किन्हीं और रूपों में जीवन जीती हुई इस मानुष तन का दुरुपयोग करती देखी जायँ।
चिंतन और कार्यशैली थी जिसे चलते 60 वर्ष की आय में भी बच्चों जैसी निश्चिंतता और युवकों जैसी क्रियाशीलता में रत्तीभर भी गिरावट नहीं आई। मृत्यु पर्यंत शासन को अपनी सूझबूझ द्वारा परामर्श देते रहे।
चिंतन का अभ्यास तो उपयुक्त परिस्थितियों को भी कुसंस्कारी, दैन्य, दारिद्रय से भर देता है। इसलिए यदि प्रमुखता देने योग्य परमार्थ को अपनाना हो तो उसके लिए विचार परिष्कार का पर्यंत प्राण-पण से करना चाहिए। सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त सुरम्य वातावरण उत्पन्न होने की आशा इसी आधार पर की जा सकती है कि विचारणा, भावना, आस्था, रुझान और क्रियाकलापों में शालीनता की पक्षधर सुसंस्कारिता का अधिकाधिक समावेश किया जाय। यदि औचित्य का मार्ग अपनाया जा से उसके लिए प्रेरणा-प्रद वातावरण मिल सके तो समझना चाहिए कि व्यक्ति और समाज के लिए सर्वतोमुखी कल्याणकारी परिस्थिति उत्पन्न करने का सुयोग बन गया। अनेकों समस्याओं से अलग अलग उपायोँ से जूझने के स्थान पर मूल कारण के समाधान का उपाय भी समस्त समस्याओं का एक ही हल सिद्ध हो सकता है।
चिंतन अथवा दुराचार। सुविधाओं का सिरमौर न हो।
चिंतन आ।र मनन का अध्यवसाय भी दिशा निर्धारण कर सकता है। पर उपयुक्त वातावरण में अभीष्ट ऊर्जा उपलब्ध करने का महत्व भी कम नहीं है। इसलिए समय के अनुरूप अपनी गतिविधियों को उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने के लिए इन सत्रों में सम्मिलित होने के लिए कहा गया है। व्रतधारी को अपनी परिस्थिति के अनुरूप भावी कार्यक्रम बनाने में अधिक सुविधा रह सकती है।
चिंतन वाली होगी- देवमानवों के रूप में विकसित होने वाली। यदि वातावरण श्रेष्ठ आत्माओं को भी हेय स्तर का मिला तो संभव है उनकी प्रगति में अवरोध आ जाय, वे नरपशु की नहीं किन्हीं और रूपों में जीवन जीती हुई इस मानुष तन का दुरुपयोग करती देखी जायँ।
चिंतन और लेखन-संकलन में ही लग रहते। अपनी संस्कृति को जीवित करने को उनकी अदम्य भावना ने स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं देने दिया। आयु जैसे-जैसे ढलती गयी वैसे-वैसे उनका शरीर ही निर्बल नहीं होता गया वरन् पीठ में कूबड़ भी निकल आया।
चिंतन करने वाला व्यक्ति ही समाज का नेतृत्व कर सकता है आज सबकी दृष्टि इन्हीं पर है।
चिंतन का सत्त अभ्यास करने की प्रक्रिया सीखना। नवरात्रि साधना के साथ आहार संयम का सरल सुगम रूप पूज्यवर ने दो चीजों का प्रयोग- एक खाने की एक लगाने की या मात्र तरल प्रवाही द्रव्योँ का प्रयोग, यह बताया। नवरात्रि की अनुष्ठान साधना तो ढेरों व्यक्ति करते हैं तो कितने सही अर्थों में मन लगा पाते हैं। यदि वे जल उपवास जैसी या निर्जला जैसी कड़ी तथा फलाहार की अति वाली दो विपरीत धुरियों के बीच एक सामान्य कड़ी के ही प्रयोग चालू करें तो बहुत सफल साधना उनकी होती रह सकती है, यह पूज्यवर ने समय समय पर बताया।
चिंतन - चेतना जिस स्तर की होती है, वह उसी ओर आकर्षित होती है। उत्कृष्ट स्तर की चेतना सदा सजातीय की ओर खिंचती चली आती है, जबकि निकृष्ट स्तर की प्राण चेतना अनुदात्त स्तर की ओर प्रवाहित होती है।
चिंतन में निकृष्टता की पक्षधर दुष्प्रवृत्तियों की भरमार। उसी कारण दुष्कर्म पड़ते हैं और क्रिया की प्रतिक्रिया का परिपाक अनेकानेक विपत्तियोँ के रूप में प्रस्तुत होता दीख पड़ता हैं।
चिंतन बन जाता है। आँवलखेड़ा से आगरा, मथुरा से हिमालय-उत्तरकाशी-सप्तसरोवर व फिर हरिद्वार के शाँतिकुँज में उनके प्रयोग सतत् चलते उनने ‘अस्वाद व्रत जन जन से कराके सबको सिखाया। नमक-शक्कर व मसाला आदि का परित्याग मात्र एक ही दिन व्यक्ति करके देखे तो पाएगा कि इससे उसके स्वादेन्द्रियों की कड़ी परीक्षा हो रही है। जीभ यदि स्वाद के बिना कुछ घंटों रहना भी सीख ले तो दो संयम रसना का व जननेन्द्रियों का स्वयं सधने लगने की प्रक्रिया गतिशील हो जाती है, यह अनेकों ने अपने जीवन में परीक्षा कर सफल होता पाया।
चिंतन साधना से समष्टि मन का निर्माण कर सके ताकि समूह चेतना के जागरण से व्यक्ति-परिवार ही नहीं समाज की अभिनव संरचना का भी सरंजाम जुट सके। इतने विराट स्तर पर मानव मात्र के कल्याण की बात युगऋषि स्तर की सत्ता ही सोच सकती है।
चिंतन और कृत्यों में कुछ उच्चस्तरीय तत्वों का श्रेष्ठता का समावेश किये रहने की यह प्रक्रिया है। उस दिशा में धकेलने के लिए कृत्य है। उस आधार पर उत्पन्न हुई गतिशीलता को क्रियान्वित होते रहने के लिए उपलब्ध उत्तेजना को गतिशील बनाये रहना बन पड़े तो ही समझना चाहिए कि प्रज्ञायोग का मूलभूत उद्देश्य समझा गया और उससे समुचित लाभ उठाने का मार्ग समझ लिया गया। यदि ऐसा निर्धारण न हो तो इसे भी अन्यान्य चिन्ह पूजाओं में से एक ही कहा जायेगा।
चिंतन - चेतना जैसी होती है, उसी रूप में वह इस चेतना के समुद्र में संचारित हो जाती है ; हपर इसे ग्रहण करना पूर्णतः ग्रहीता पर इसे ग्रहण पर निर्भर करता है। यहाँ भी ग्रहण-अवधारण नियमानुसार होता है। जिस प्रकार समानधर्मी व्यक्ति और विचार परस्पर मिलते और घनीभूत होते हैं, वही बात चेतना के संबंध में भी कहीं जाती है चिंतन - चेतना जिस स्तर की होती है, वह उसी ओर आकर्षित होती है। उत्कृष्ट स्तर की चेतना सदा सजातीय की ओर खिंचती चली आती है, जबकि निकृष्ट स्तर की प्राण चेतना अनुदात्त स्तर की ओर प्रवाहित होती है।
चिंतन द्वारा व्यक्तित्व को विचारों का स्नान कराना तथा अपनी अनगढ़ता को सुगढ़ता में बदलने की यह प्रक्रिया अब सारे विश्व में लोकप्रिय हो गयी है। रंगों का ध्यान, रागों का सुनते हुए ध्यान, दृश्य मूर्ति पर साकारो पासना में ध्यान यह प्रक्रियाएँ ऐसी हैं, जिन्हें जनसामान्य बिना इस विशिष्ट मार्गदर्शन के कर नहीं सकता था। आज सभी व्यक्ति सारे विश्व में इन साधनाओं को कर रहे हैं एवं लाभान्वित हो रहे हैं।
चिंतन और दुष्ट आचरण की उसके बदले खरीदते और गये-गुजरे व्यक्तित्व के कारण तरह-तरह के त्रास ही सहते और देते रहते हैं। कृपणों की निष्ठुर संपदा अपने लिए, साथियों और वंशजों के लिए अनेकानेक विपत्तियों का कारण ही बनती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-March
चिंतन अपनाना चाहिये। किसी आग्रह पर अड़ कर नहीं बैठना चाहिये। हठ जड़ता का चिन्ह है। उस में तो यथार्थता को नकारने की अदूरदर्शिता काम करती रहती हैं। प्रथा परंपराओं में अनादि काल से परिवर्तन होता रहा है।
चिंतन के स्तर पर किये पुरुषार्थी से ही स्थाई सुख-शांति मिल सकती है, स्थूल पदार्थों के द्वारा नहीं।
चिंतन हैं स्वार्थ ही तो है यह।” अघोरनाथ आज यह सोचने लगे है। क्षीण कार्य अपरिग्रहशील, तपोनिरत अघोरनाथ ने अब तक ऐसा कुछ नहीं किया है, जिससे यह कहा जा सके कि गुरुदेव के दीक्षा कालीन उपदेशों को वे भूल गए हो। उनकी कठोर तपस्या घोर वन में एकांत साधना एवं लोक निरपेक्षता की देखते ही सबके मस्तक उनके सामने झुक जाते हैं। सच्चे योग साधक के सम्मुख सिद्धियाँ आती है।
चिंतन स्वभाव एवं क्रियाकलाप उन लोगों की देन है जिनने लोकमानस को प्रभावित करने को शक्ति को उभारा ओर अपने मन चाहे प्रयत्नों से लोक प्रचलन को अनुपयुक्त मार्ग पर धकेला। इसमें साहित्यकारों, अभिनेताओं, प्रचारकों, नेताओं का विशेष रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। टेलीविजन शिक्षित- अशिक्षित सभी को अपने प्रभाव से प्रभावित करते हैं। शासन या समाज द्वारा जिन लोगों का जिन कृत्यों का समर्थ किया जाता है प्रोत्साहन मिलता है उसी प्रकार का लाभ प्राप्त करने के लिए असंख्यों का मन मचलता है समारोहों जुलूस प्रदर्शनों के माध्यम से उत्पन्न किये जाने वाला वातावरण भी उन लोगों तक को अपने प्रवाह में घसीट ले जाता है जिनका प्रत्यक्षतः इससे कुछ लेना देना नहीं है। वातावरण के प्रभाव से बच निकलना या उससे विपरीत दिशा में स्वतंत्र चिंतन के आधार पर चल सकता किन्हीं बिरलों के लिए ही संभव होता है।
चिंतन के आधार पर चल सकता किन्हीं बिरलों के लिए ही संभव होता है। व्यक्ति निर्माण से लेकर समाज निर्माण तक के लिए देश को ऊँचा उठाने एवं आगे बढ़ाने के लिए जहाँ व्यक्तिगत जीवन को आदर्शवादिता के सहारे प्रखर प्रतिभावान् बनाने की आवश्यकता है। वही यह भी उचित है कि ऐसा वातावरण बनाने का प्रयत्न किया जाय जिसमें शालीनता को पनपने का अवसर मिल सके। जिसमें जल विरोध के कारण अवाँछनीयताओं को बेमौत मरना पड़े। जितना आवश्यक अपना उज्ज्वल उदाहरण प्रस्तुत करना है, अनौचित्य भर वातावरण को उलटने ओर शालीनता का पक्षधर माहौल बनाने के लिए सुविस्तृत क्षेत्र में सुनियोजित ढंग से व्यापक प्रयास किये जायेँ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-April
चिंतन, चरित्र और स्वाभिमान को नीचे न गिरने देना। इन्हीं आदर्शों को पंचशील कहा गया हैं। जो विभिन्न अवसरों पर विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न प्रकार से प्रयुक्त होते हैं। पंचशील ही पंच देव है। उपासना में इन्हीं पाँचों को मूर्धन्य माना गया है।
चिंतन में जो अवाँछनीय तत्व घुलते चले जाते हैं, उनको हम हिम्मत के साथ रोकें और जिन चीजों की आवश्यकता है, जो चिंतन हमारे भीतर आना चाहिए उस चिंतन को भुला करके- निमंत्रित करके अपने भीतर स्थिर करें, तो हमारा मस्तिष्क वह हो सकता है जिसे हम ज्ञान का भंडार कह सकते हैं। विद्या की दृष्टि से, ज्ञान की दृष्टि से, सुलझाव की दृष्टि से एक से एक बहुमूल्य चीजें इसके भीतर से निकलती हुई चली आ सकती है। ज्ञान की गंगा हमारे मस्तिष्क में से वैसी ही बह सकती है जैसे कि शंकर जी के मस्तिष्क में से प्रवाहित होती थी। हमारे मस्तिष्क में संतुलन का चन्द्रमा उसी तरीके से टंगा रह सकता है जैसे कि शंकर भगवान के मस्तिष्क पर टंगा हुआ था और हमारा तीसरा नेत्र-विवेक का नेत्र, दूरदर्शिता का नेत्र उसी तरीके से खुल सकता है जैसे कि शंकर भगवान के मस्तिष्क पर खुला हुआ था। मित्रों, यह ज्ञानयोग की साधना है।
चिंतन के अभाव में इर्द-गिर्द के व्यक्ति और वातावरण पर ही सारे दोष थोपने का प्रवाह चलता है। अपनी गलतियाँ समझने और सुधारने का मानस ही नहीं रहता है। फलतः अपने को खिन्नता का और दूसरों को निराशा का सामना करना पड़ता है। रुग्णता के कष्ट में इस अतिरिक्त भार से त्रास और भी अधिक बढ़ता है, साथियों को हैरानी बढ़ जाती है सो अलग।पीड़ित स्थिति में कुछ महत्वपूर्ण कार्य एवं उपार्जन तो बन नहीं पड़ता।
चिंतन में हुए व्यापक परिवर्तनों में किए बिना नहीं रहतीं। ऐसे परिवर्तन जिन्हें देखकर हम शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ गुरुसत्ता के इस विलक्षण तपःपूत सृजन पर अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते। तीर्थ सेवन का लाभ उठाकर जीवन को धन्य बनाने का अवसर ऐसे जाग्रत वातावरण में रहने वालों को सहज ही मिल जाता है। इसमें किसी को संशय नहीं रखना चाहिए। नवरात्रि की साधना ऐसे वातावरण में तो निश्चित ही विशिष्ट लाभ प्रदान करती है।
चिंतन की उत्कृष्टता के कारण स्वयं हर घड़ी सदा संतुष्ट, उल्लसित एवं प्रफुल्लित बना रहता है। अवाँछनीय मानसिक भ्रम से छुटकारा पाने के कारण उसकी सूझबूझ दूरदर्शी और तत्वदर्शी बन जाती है। उसका लाभ न केवल संपर्क क्षेत्र को वरन् समस्त संसार को मिलता है।
चिंतन रूप ज्ञान यज्ञ के रूप में प्रतिदिन सम्पन्न किए जाते हैं। पूर्वकाल में विश्वामित्र, अगस्त्य के प्रयासों की भाँति इस अतुलनीय प्रयास द्वारा उद्भूत शक्ति को हम कितना ग्रहण कर पाते हैं यह स्वयं की क्षमता पर निर्भर है।
चिंतन किया जाये, तो उत्साहवर्धक और आशाजनक सफलताएं प्राप्त की जा सकती हैं।
चिंतन को अनगढ़, अनैतिक, असंभव कुकल्पनाओं से रोककर सुनियोजित विधि व्यवस्था का ताना-बाना बुनने में जुटाए रखना। एकाग्रता, मनोयोग, तन्मयता इसी को कहते हैं। बंदर जैसी चंचल चित्तवृत्ति का नियंत्रण ही मनोनिग्रह है। योग साधना में विविध उपायों के सहारे इसी का अभ्यास करना पड़ता है। वैज्ञानिक, कलाकार, दार्शनिक एवं प्रगतिशील व्यक्ति इसी दक्षता में प्रवीणता प्राप्त करते और अपने लक्ष्य तक पहुँचने में सफल होकर रहते हैं।
चिंतन अनावश्यक बातों में कभी भी नहीं जाता। जब कभी जाएगा क्रमबद्ध बातों में ही जाएगा, दिशाबद्ध बातों में जाएगा, आदर्श बातों में जाएगा और जो संभव है उनमें जाएगा। हमारा मस्तिष्क इतना ताना बाना बुनता है कि वह एक वास्तविकता और व्यावहारिकता पर टिका रहता है। जो अवास्तविक है, अव्यावहारिक है और जो अनावश्यक है- ऐसे सारे के सारे विचारों को हम बाहर से ही मना कर देते हैं कि- “नो एडमीशन” यहाँ नहीं आ सकते, बाहर जाइये। आपको दाखिला हमारे मस्तिष्क में नहीं मिल सकता।
चिंतन उस ढर्रे में ढला हुआ होता है, जिसकी प्रतिक्रिया ही हमें अर्धविक्षिप्त स्तर का बनाये रखती है। कितने प्रकार की सनकें, कितने वहम, कितने भ्रम मस्तिष्क में लदे होते हैं यदि उन्हें ठीक तरह से समझा जाय तो प्रतीत होगा कि विवेकहीन व्यक्ति की तुलना में चालू आदमी निस्संदेह अधपगला होता है। लोक-प्रभाव का संशोधन करने वाली अवतारी आत्माएं उतरती हैं। उनके चले जाने के बाद फिर विकृतियाँ भरने लगती हैं और सामाजिक प्रचलनों में गंदे नाले जैसी गंदगी भरती चली जाती है। जन मान्यताएं-लोगों के प्रचलित ढर्रे ही अपने को सुहावने लगते हैं।
चिंतन हमारे भीतर आना चाहिए उस चिंतन को भुला करके- निमंत्रित करके अपने भीतर स्थिर करें, तो हमारा मस्तिष्क वह हो सकता है जिसे हम ज्ञान का भंडार कह सकते हैं। विद्या की दृष्टि से, ज्ञान की दृष्टि से, सुलझाव की दृष्टि से एक से एक बहुमूल्य चीजें इसके भीतर से निकलती हुई चली आ सकती है। ज्ञान की गंगा हमारे मस्तिष्क में से वैसी ही बह सकती है जैसे कि शंकर जी के मस्तिष्क में से प्रवाहित होती थी। हमारे मस्तिष्क में संतुलन का चन्द्रमा उसी तरीके से टंगा रह सकता है जैसे कि शंकर भगवान के मस्तिष्क पर टंगा हुआ था और हमारा तीसरा नेत्र-विवेक का नेत्र, दूरदर्शिता का नेत्र उसी तरीके से खुल सकता है जैसे कि शंकर भगवान के मस्तिष्क पर खुला हुआ था। मित्रों, यह ज्ञानयोग की साधना है।
चिंतन में लगाया जाये तो न केवल असाधारण रूप से ज्ञानवृद्धि हो सकती है, वरन् वर्तमान स्थिति से ऊँचे उठकर आगे बढ़ने एवं प्रगति करने का भी पथ प्रशस्त होता है।
चिंतन की उत्कृष्टता को अध्यात्म की भाषा में योग कहा गया है। इसके लिए ध्यान-धारणा, स्वाध्याय-सत्संग, चिंतन-मनन जैसे उपाय अपनाने पड़ते हैं। जीवन का दूसरा पक्ष है चरित्र। इसे क्रिया कृत्य या कर्मकाँड भी कहते हैं। दुष्प्रवृत्ति का निरोध और सत्प्रवृत्तियों का अभ्यास ही वह अन्तःक्षेत्र का साहस भरा पराक्रम है, जिसे तप कहा जाता है।
चिंतन सर्वसाधारण की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत न कर सकें।
चिंतन गड़बड़ाने लगता है। फलतः रोगी व्यक्ति किसी प्रकार शाँत बने रहने की स्थिति में नहीं रहता। दूसरों के सत्परामर्श न उसे सुहाते हैं और न अपना मानसिक स्तर इस योग्य रहता है कि किसी को कोई उपयुक्त एवं व्यावहारिक परामर्श दे सके। यह दुहरी हानि है। शरीरगत अशक्तता, रुग्णता, पीड़ा, बेचैनी तो स्वयं ही सहन करनी पड़ती है।
चिंतन के कारण मनुष्य न सोचने योग्य सोचता है और बाल बुद्धि की योजनाएं बनाकर उनमें बहूमूल्य विचार शक्ति को नष्ट करता रहता है। चिंता, निराशा, खीज, आवेश, उत्तेजना, निष्ठुरता, घबराहट, कायरता, कृपणता, ईर्ष्या व द्वेष, आत्महीनता व उद्दंडता जैसे अनेकों मानसिक रोग मस्तिष्क को घेरे रहते हैं और सौ रोगों से ग्रसित शरीर की जो दुर्गति होती है वैसा ही मनोविकार विचार संस्थान को, सूक्ष्म शरीर को बनाए रहते हैं। यह मनोगत कुसंस्कारों की, चिंतन विकृतियों की पराधीनता है जिसके कारण हर दृष्टि से अद्भुत विचारणा सर्वनाश के गर्त में गिरती और नष्ट होती रहती है।
चिंतन को उलट दिया जाय। आज हम सब भ्रांतियों के युग में रह रहे हैं। भटकाव की दिशा में चल रहे हैं। पारिवारिक सुख सुविधा के लिये गये प्रयास कुछ ही समय में अनेक गुनी हानि लेकर सामने आ उपस्थित होते हैं। फुर्ती, उत्तेजना के लिए पिया गया नशा कुछ समय तो अपना चमत्कार दिखाता है पर थोड़े दिनों में पीने वाले के शरीर को पोला और मन को ढीला बनाकर रख देता है।
चिंतन की धाराओं को सीमाबद्ध-दिशाबद्ध करके रखा है। हमारा चिंतन अनावश्यक बातों में कभी भी नहीं जाता। जब कभी जाएगा क्रमबद्ध बातों में ही जाएगा, दिशाबद्ध बातों में जाएगा, आदर्श बातों में जाएगा और जो संभव है उनमें जाएगा। हमारा मस्तिष्क इतना ताना बाना बुनता है कि वह एक वास्तविकता और व्यावहारिकता पर टिका रहता है। जो अवास्तविक है, अव्यावहारिक है और जो अनावश्यक है- ऐसे सारे के सारे विचारों को हम बाहर से ही मना कर देते हैं कि- “नो एडमीशन” यहाँ नहीं आ सकते, बाहर जाइये।
चिंतन एवं अवाँछनीय संवेदनाओं का कष्ट देने में समर्थ न हो सकें। समस्त विपन्नताओं की जड़ यह पराधीनता ही है। जीवन का आनन्द उठाने से इसी विवशता के कारण वंचित रहना पड़ता है। यही बंधन मनुष्य को उच्चस्तर तक पहुँचकर देवोपम आनंद, उल्लास उपलब्ध करने के मार्ग में एकमात्र व्यवधान बने रहते हैं। इस स्थिति को बदल सकना यही मनुष्य का परम पुरुषार्थ है-इसी को ‘मुक्ति कहा गया है’।
चिंतन की प्रगाढ़ता शीघ्र अनुभूतियों के क्षेत्र में प्रवेश दिलाती है। और ये भावानुभूतियाँ अपना प्रतिफल-स्वास्थ्य-व्यवहार और चिंतन में हुए व्यापक परिवर्तनों में किए बिना नहीं रहतीं। ऐसे परिवर्तन जिन्हें देखकर हम शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ गुरुसत्ता के इस विलक्षण तपःपूत सृजन पर अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते। तीर्थ सेवन का लाभ उठाकर जीवन को धन्य बनाने का अवसर ऐसे जाग्रत वातावरण में रहने वालों को सहज ही मिल जाता है। इसमें किसी को संशय नहीं रखना चाहिए।
चिंतन और चरित्र को उच्चस्तरीय बनाये रहने वाला सारा तत्वदर्शन विद्यमान है। इस महाशक्ति की साधना में योगाभ्यास और तपश्चर्या के वे समस्त आधार, संकेत और विधान मौजूद हैं जिनके सहारे साधक को ऋद्धि-सिद्धियों का समुचित लाभ मिल सकता है। आत्मिक प्रगति की दोनों उच्च भूमिकाएं-स्वर्ग और मुक्ति पाने के लिए तत्वज्ञान का अवलम्बन अनुपम है।
चिंतन विकृतियों की पराधीनता है जिसके कारण हर दृष्टि से अद्भुत विचारणा सर्वनाश के गर्त में गिरती और नष्ट होती रहती है।
चिंतन को भुला करके- निमंत्रित करके अपने भीतर स्थिर करें, तो हमारा मस्तिष्क वह हो सकता है जिसे हम ज्ञान का भंडार कह सकते हैं। विद्या की दृष्टि से, ज्ञान की दृष्टि से, सुलझाव की दृष्टि से एक से एक बहुमूल्य चीजें इसके भीतर से निकलती हुई चली आ सकती है। ज्ञान की गंगा हमारे मस्तिष्क में से वैसी ही बह सकती है जैसे कि शंकर जी के मस्तिष्क में से प्रवाहित होती थी। हमारे मस्तिष्क में संतुलन का चन्द्रमा उसी तरीके से टंगा रह सकता है जैसे कि शंकर भगवान के मस्तिष्क पर टंगा हुआ था और हमारा तीसरा नेत्र-विवेक का नेत्र, दूरदर्शिता का नेत्र उसी तरीके से खुल सकता है जैसे कि शंकर भगवान के मस्तिष्क पर खुला हुआ था। मित्रों, यह ज्ञानयोग की साधना है।
चिंतन-मनन जैसे उपाय अपनाने पड़ते हैं। जीवन का दूसरा पक्ष है चरित्र। इसे क्रिया कृत्य या कर्मकाँड भी कहते हैं। दुष्प्रवृत्ति का निरोध और सत्प्रवृत्तियों का अभ्यास ही वह अन्तःक्षेत्र का साहस भरा पराक्रम है, जिसे तप कहा जाता है। तप अर्थात् संयम अनुशासन।
चिंतन के कारण मनःसंस्थान का संतुलन बिगड़ जाना है। लोग काम करना तो चाहते हैं, पर यह नहीं जानते कि उसे कैसे किया जाना चाहिए ? शरीर और मन का तनाव कोई आकस्मिक या अप्रत्याशित घटना नहीं है। न तो वह बादलों की तरह बरसता है और न ही बिजली की तरह गिरता है। वस्तुतः वह आग्रह पूर्वक बुलाने पर स्वाभिमानी अतिथि की तरह आता है।
चिंतन और दुष्ट आचरण वाले असुर तत्व अपने सिंहासन के पदच्युत होते समय यदि कुछ असाधारण उपद्रव खड़े करें तो इसे आश्चर्यजनक नहीं माना जाना चाहिए।
चिंतन व कर्म को अपने ढर्रे पर चलाती है-अपनी लाठी से हाँकती है। शरीर को यह पराधीनता, वासना के बंधन में बाँधकर बेतरह घसीटती है, उसका स्वास्थ्य चौपट करती है, दीर्घजीवन से वंचित करती है और सत्कर्म निरत रहकर समृद्धियाँ, सफलताएं प्राप्त करने के स्थान पर ऐसा कुछ करते रहने में लगाती हैं जिनके कारण रुग्णता, निंदा, असफलता, दरिद्रता, कुरूपता जैसी विपन्नताएं ही आये दिन सामने खड़ी रहती हैं। विवेक कई बार सोचता है कि अपनी गतिविधियों में अमुक प्रकार का परिवर्तन करना चाहिए। किन्तु औचित्य को समझते हुए भी वैसा कुछ बन नहीं पड़ता। आदतें इतनी जबरदस्त सिद्ध होती हैं कि उपयोगी सुधार के मनसूबे एक कोने में रखे रह जाते हैं और आदतें अपनी बेढंगी राह पर शरीर को घसीटती चली जाती हैं और वे काम कराती हैं जिनके लिए पीछे पश्चाताप ही करना शेष रह जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-November
चिंतन किये बिना मन को निरंतर परमार्थ में निरत रखा हो तो मेरा पुण्य बाण के साथ जुड़े। इस बार भी सुधन्वा का बाण ही विजयी हुआ। उसने अर्जुन का बाण काट दिया।
चिंतन को उलटने आस्थाओं आकाँक्षाओं एवं अभ्यासोँ का कायाकल्प करने की प्रथम प्रक्रिया प्रचार परक है। धर्मतंत्र से लोक शिक्षण की क्रिया प्रक्रिया जन संपर्क साधने और जन-जन तक नवयुग का संदेश पहुँचाने की है। आलोक वितरण जन जागरण के लिये घर घर अलख जगाने के लिये इन दिनों जाग्रत आत्माएँ संलग्न है। लेखनी वाणी और संगठन उद्बोधन की प्रक्रिया अनेकों रचनात्मक क्रियाकलापों द्वारा अग्रगामी बनाई जा रही है। धर्मानुष्ठानों में श्रद्धा-संपन्न लोगों को लगाया गया है और साधना द्वारा आत्मबल बढ़ाने के लिये कहा गया है।
चिंतन की दिशा धारा विनिर्मित करने में अत्यधिक योगदान रहता है। साहित्य सृजन करते हैं। उस रुझान से प्रेरित होकर लोग अपनी गतिविधियाँ चलाते हैं। इससे वे परिस्थितियाँ और प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न होती हैं, जिनसे भला या बुरा समय सामने आ खड़ा होता है। यों देखने में साहित्यकार किन्हीं परिस्थितियों के लिये जिम्मेदार प्रतीत नहीं होता पर वास्तविकता यह है कि सच्चे अर्थों में वही उसके लिये उत्तरदायी है।
चिंतन के निकृष्टता की दिन में गिरने का ही पथ प्रशस्त होता है
चिंतन अध्ययन करने पर ही पड़ता है पर चित्र तो देखने मात्र से प्रभावित करते हैं। अपने घर में समझ बूझ के साथ चित्र लगायें, ऐसी प्रेरणा सबको मिले इसी में समय को समझदारी है।
चिंतन से विरत नहीं हुए अभी भी जिनकी कथनी करनी में अंतर नहीं हैं उन्हें बुलाकर समझाया जावेगा जन जीवन से खिलवाड़ करते बहुत समय हो गया अब आदर्शों सिद्धांतों के लिए भी कुछ स्थान मिलना चाहिए। 3. पहली बार अपने प्रवासी भारतीयों को एकजुट करके उन्हें पश्चिमी देशों तक भारतीय संस्कृति दृष्टि से जर्जर इस देश के उपकार में पुनर्निर्माण में योगदान के लिए सहमत किया जावेगा। 4. पहली बार मीडिया को मोड़कर देश की खाली कोने तक पहुँचाने को अभ्यर्थना की जायेगी। वंदनीया माताजी को श्रद्धाँजलि स्वरूप सेवा के लिए प्रतिभा संपन्न सवालाख हीरकों (पूर्ण समयदानी युगशिल्पियों) की माला भेंट की जायेंगी। यह तो उद्देश्य है उसके लिए की जाने वाली तैयारियाँ व्यवस्थाएँ इतनी दर्शनीय होगी जिन्हें लोग लंबे समय तक भूल नहीं पायेंगे।
चिंतन स्तर रुझान एवं क्रियाकलाप आमूलचूल परिवर्तन प्रस्तुत करना केवल निर्याता के लिए ही संभव है। उसी ने यह निश्चय और संकल्प किया भी है कि इसे बदला जाय बिना मानवजाति का सहयोग प्राप्त किये भी वह अपना प्रयोजन पुरा कर सकने में पूरी तरह समर्थ है। उसके अभी तक हुए अवतारों और धर्म संस्थापन की प्रक्रिया पूरी होती रहीं है। उनका “यदा यदा हि धर्मस्य” वाला आश्वासन समयानुसार सदा ही पूरा होता रहा है फिर इस बार वैसी ही परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाने पर सुधार परिवर्तन का दैवी निर्धारण पूरा न हो, ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता।
चिंतन वाले सहज विश्वासी ही प्रपंच में फँसते और उथली भावुकता के प्रवाह में धोखा खाते हैं। अस्वाभाविकता अतिवादी होती है। उसमें बिना जाँच पड़ताल किये किसी पर विश्वास कर बैठने की दुर्बलता रहती है। इसी कमजोरी को देखकर चाटुकार अपना जाल बिछाते और चिड़ियां फँसाते रहते हैं। किंतु जो कार्य कारण की संगति बिठा सकते हैं, अहैतुकी अतिशय मात्रा में बरसती मिठास का कारण समझ कर समय रहते जागरुक हो उठते हैं, उन्हें ठगे जाने की शिकायत आमतौर से नहीं करनी पड़ती।
चिंतन और व्यवहार में से पूरी तरह छोड़ना चाहिए। इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि वार्तालाप में सद्भाव और सदाशयता का सहज समावेश रहने लगेगा। जो कहा जाय उससे सुनने वाले का वास्तविक हित साधन दृष्टिगोचर होगा। इसका प्रभाव सुनने वाले पर पड़े बिना न रहेगा। वाणी निरर्थक तभी होती है जब कहने वाले की दुरभिसंधि कुटिलता के रूप में उसके पीछे काम करती है।
चिंतन में लीग बुद्ध के चित्र को हम एकाग्रतापूर्वक देखें तो हमारे चित्त में गंभीर शाँति की प्रेरणा उठने लगती है। किसी वीर योद्धा का चित्र देखने पर वैसे ही साहस और वैसे ही शौर्य के भाव उदित होने लगते हैं। गाँधी की प्रतिमा देखे तो उनके चेहरे से छलकने वाली करुणा दया और अहिंसा के भाव हमारे अंतःकरण में रिस रिस कर आने लगते हैं किसी लोकसेवी परमार्थपरायण शहीद की चित्राकृति देखकर देश और समाज के लिए हममें भी मिटने का भाव उदित होने लगता है। किसी देवी देव या अवतारी पुरुष की छवि देखकर किसी मंदिर मस्जिद या गिरजाघर में जाने पर ईश्वर तथा उसके दिव्य गुणों का अनायास ही स्मरण आने लगता है। कहने का अर्थ यह है कि देखे गये चित्रों का भाव और उनकी भाषा हमारी चेतना को अनायास ही आँदोलित कर उठती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-December
चिंतन सहायता करता है कि क्या ऐसा भी इन विकट परिस्थितियों में बन पड़ना संभव हो सकता है। फिर भी संयोजक सत्ता का कथन हैं कि जो आज असंभव लगता है वह कल संभव होकर रहेगा।
चिंतन बदलिए, अपना चरित्र बदलिए, अपने जीवन का ढाँचा और ढर्रा बदलिये फिर देखिये आपकी बदली हुई परिस्थितियों में जो देवता नाखुश थे-मुँह मोड़े हुए थे, किस तरह आप के गुलाम हो जाते हैं कैसी आपकी सहायता करते हैं? कैसे आपको छाती से लगाते हैं? कैसे आपको निहाल करते हैं? यही अनुभव हमारे जीवन का भी है और इससे आपको भी लाभ उठाना चाहिए। आप अपने आपको खाली कीजिए और निहाल होकर जाइये।
चिंतन, चरित्र, और व्यवहार में उच्चस्तरीय उत्कृष्टता का समावेश कर सकने में समर्थ हैं। उसमें समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी के चारों तत्व इस प्रकार समाविष्ट हैं कि उन्हें अपनाने वाला सच्चे अर्थों में महामानव, देवपुरुष बन सकता है। तत्वज्ञान और प्रथा प्रचलन का समग्र स्वरूप आदर्शों से भरा पड़ा है। इसमें वह सब कुछ है जिससे व्यक्ति समर्थ समुन्नत, सुविकसित, सुसंस्कृत बन सकता है। पुरातन इतिहास साक्षी है कि इस भूमि को स्वर्गादपि गरीयसी और वहाँ के निवासियों को संसार भर ने देव मानवों की संज्ञा दी थी।
चिंतन के अतिरिक्त सृजनात्मक श्रमशीलता भी इसलिये जरूरी है कि वह कभी ठाली मन में गलत निषेधात्मक विचार नहीं आने देती।
चिंतन आश्रय पाता है उसे उस स्थिति तक पहुँचने में देर नहीं लगती जिसमें दुर्व्यसनों का, दुष्प्रवृत्तियों का घेरा घिरता चला जाय और फिर उसे शिकंजे से छुटकारा पा सकना कठिन हो जाय।
चिंतन में इस तथ्य का समर्थन आरी कर दिया है कि समर्थों ने अपनी कुटिलता से समवितरण और सहविभाजन का सुयोग नहीं बनने दिया है। यदि उन्हें भी अवसर मिला होता, सभी के लिए समान परिस्थितियाँ रही होती तो उन्हें वह पिछड़ापन न भोगना पड़ता जो उन्हें इन दिनों भोगना पड़ रहा है।
चिंतन और चरित्र की आत्म रक्षा के लिए हर किसी को निरंतर लड़ना पड़ता है। अर्जुन को शिथिल पड़ते देखकर कृष्ण ने उसे युद्ध रत होने के लिए प्रोत्साहित किया। उस प्रोत्साहन का तत्व दर्शन ही गीता ज्ञान है। यह जीवन में विजय श्री वरण करने का पहला चरण है। इस प्रत्याहार, परिष्कार में संघर्षरत होने का साहस दिखाए बिना कोई उस स्थिति तक नहीं पहुँच सकता जिसमें अंतरात्मा को परमात्मा में पहुँचाने का लक्ष्य प्रतीत होता है।
चिंतन बदलने के अतिरिक्त अपने सभी स्वजन संबंधियों की, परिचित-अपरिचितों की सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करते रहना चाहिए। ढूँढ़ने पर हर किसी में कुछ गुण मिलते हैं, अच्छाइयों से रहित इस धरती पर कोई व्यक्ति पैदा नहीं हुआ। जिसमें जो सद्गुण दीख पड़ें उनकी चर्चा उस व्यक्ति के सामने की जाय कि वह इन गुणों को बढ़ाते हुए एक दिन बहुत उन्नतिशील बन सकता है, तो निश्चय ही इस प्रशंसा का प्रभाव उस पर पड़े बिना न रहेगा। प्रशंसक बनकर हम हर व्यक्ति के मित्र बन सकते हैं। उसे समझाने और सुधारने में भी सफल हो सकते हैं।
चिंतन की बढ़ती मात्रा के कारण इस ग्लैंड पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, फलतः धीरे-धीरे वह सिकुड़ने लगती है और अंत में अपने वास्तविक आकार का 1/10 वाँ हिस्सा ही रह जाती है। आकार घटने के साथ-साथ उसकी सक्रियता भी कम होने लगती है, जिससे संपूर्ण प्रतिरक्षा प्रणाली प्रभावित होती और कमजोर पड़ जाती है। कमजोर अवयव “बायोलॉजिकल एज” को बढ़ा देते हैं, जब कि यथार्थ में “क्रोनोलाजिकल एज” उतनी होती नहीं। दूसरे शब्दों कहे तो, यही बुढ़ापा है।
चिंतन होता है, वह सब विशुद्धतः उन्हीं-उन्हीं स्तरों से संबंधित होते हों, ऐसा नहीं कहा जा सकता। उनका न्यूनाधिक लगाव भाव-संस्थान की संस्कार-चेतना से भी होता है। इसलिए मानवी चेष्टाओं को शुद्ध करने की जहाँ बात आती है, वहाँ उसके चित्तगत संस्कारों को भी ध्यान में रखना होगा? कारण कि मनुष्य 84 लाख योनियों की लंबी यात्रा के उपराँत यह शरीर धारण करता है, इसलिए चित्त में उनके भी सूक्ष्म संस्कार विद्यमान रहते हैं। इस आधार पर व्यक्तित्व भेद की व्याख्या भी अत्यंत सरल हो जाती है और यह बताया जा सकना शक्य हो जाता है कि यदि किसी में क्रोध, किसी में घृणा, किसी में प्रेम तत्व प्रबल है, तो ऐसा क्यों है?
चिंतन-चेतना को प्रभावित-परिष्कृत कर सके और ‘तंत्रिका तंत्र एवं स्नायु प्रणाली को सुसंतुलित बनाये रख सके। गायत्री महामंत्र को इसके लिए सबसे उपयुक्त पाया गया है। इस महामंत्र में एक ओर जहाँ मन-मस्तिष्क को उच्चस्तरीय विचारणाओं, सत्प्रेरणाओं से परिपूरित करने, मनोविकारों का श्वास करने की क्षमता है, वहाँ केन्द्रों, नाड़ी संस्थानों को प्रभावित-उत्तेजित करने और उन्हें जाग्रत कर क्षमतावान् बनाने की सामर्थ्य विद्यमान है। अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों ने पाया है कि जिन व्यक्तियों की हृदयगति 110 प्रति मिनट थी, वह 3 माह से एक वर्ष की जप साधना के पश्चात् 70 प्रति मिनट तक हृदयगति को कम करने में सफल हुए। चिकित्सा विज्ञानियों के अनुर ऑटोनामिकनर्वस सिस्टम एवं मन-मस्तिष्क का सीध संबंध मंत्र के साथ जुड़ जाने के कारण ही इस प्रकार के अप्रत्याशित परिवर्तन होते हैं।
चिंतन को भी प्रभावित कर दिया व उनने अपनी काँवर जमीन पर रखते हुए माता-पिता से स्वयं ही अपनी यात्रा पूरी करने को कहा। प्रज्ञा चक्षु पिता समझ गए कि इस स्थान में ही कोई ऐसी बात है कि उनका आज्ञाकारी बेटा ऐसा कह रहा है। उनने निवेदन किया कि कुछ दूरी तक उन्हें वह और पहुंचा दे, नेत्रहीन होने के कारण वे स्वयं चल नहीं पायेंगे, फिर वह चाहे अकेला उन्हें छोड़ कर चला जाए। थोड़ी ही देर में वह क्षेत्र पीछे निकलते ही श्रवण कुमार को स्वयं पर इतना पश्चाताप हुआ कि आखिर उनसे यह हुआ कैसे?
चिंतन पर आसुरी सत्ता के आक्रमण का प्रतिकार अष्टांग योग में “प्रत्याहार” नाम से जाना जाता है। यह नंदिन जीवन में अनिवार्य रूप से सबके द्वारा संपन्न की जाने वाली एक प्रक्रिया है, अन्यथा अवांछनीय तत्व चढ़ाई करके अपने स्वतत्व अधिकार का ही अपहरण करते रहेंगे। देवता सदैव शांतिप्रिय और नीतिवान माने जाते हैं। वे परमार्थ-परोपकार में ही लगे रहते हैं व उसी की प्रेरणा देते हैं। व्यक्तित्व उत्कृष्ट व देवत्वमय बनाते हैं तो भी आसुरी तत्व देवत्व को कभी चैन से नहीं बैठने देते।
चिंतन बदले, व्यक्तित्व कायाकल्प हो जाये, तभी देवता आपकी सहायता करेंगे। आप अपने भीतर को बदलने की कोशिश कीजिए। अपना चिंतन बदलिए, अपना चरित्र बदलिए, अपने जीवन का ढाँचा और ढर्रा बदलिये फिर देखिये आपकी बदली हुई परिस्थितियों में जो देवता नाखुश थे-मुँह मोड़े हुए थे, किस तरह आप के गुलाम हो जाते हैं कैसी आपकी सहायता करते हैं? कैसे आपको छाती से लगाते हैं? कैसे आपको निहाल करते हैं?
चिंतन और समाधान इसी दिशा में बढ़ना चाहिए।
चिंतन करें कि ऐसा व्यवहार हुआ, तो इसका कारण क्या हे? तो अंततः हम संस्कार जगत के उस मूल बिंदु पर पहुँचेंगे, जहाँ आकर मानवी आचरण को एक परिभाषा, सर्वांगपूर्ण व्याख्या तथा सर्वांगपूर्ण समाधान मिल जाता है। जब व्यवहार का उद्गम ज्ञात हो जाय, तो आदतों को बदल पाना सरल हो जाता है।
चिंतन का अर्थ है-पात्रता चरित्र का अर्थ है-पात्रता। पात्रता, आपको विकसित करनी ही चाहिए। देवताओं के अनुग्रह में कोई कमी नहीं है, यदि कमी है तो आपमें पात्रता की। गंगा हिमालय से जब निकल कर चली और बोली कि अब हम लोगों की प्यास बुझायेंगी, पशु-पक्षियों की प्यास बुझायेंगी, खेतों में हरियाली पैदा करेंगी, अब हिमालय में रहने और आपकी गोदी में ठहरने का हमारा जब जरा भी मन नहीं है, तब हिमालय ने बहुतेरा समझाया कि आप तो यहीं रहिए यहाँ क्या कष्ट है आपको? गंगा ने कहा नहीं, कष्ट का सवाल नहीं है, पर अब हमारी आत्मा नहीं मानती हैं हमारी आत्मा कहती हैं कि हमको अपने को श्रेष्ठ कामों में खपा देना चाहिए-बस-चल पड़ीं गंगा।
चिंतन, मनन आदि का आश्रय लेना पड़ता है। अच्छे वातावरण और संपर्क के साथ जुड़ना हो तो दुष्प्रवृत्तियां खर पतवार की तरह हर खेत में उगी रहती हैं थ्ब्न्ज्ञ प्ज्ञन्भ् क् भी हरियाली है। जलकुँभी की तरह उन्हें कभी भी जलाशय में छा जाने में देर नहीं लगती। व्यक्तियों का समुदाय अवाँछनीय प्रवृत्तियों से भरा पड़ा है। कुकृत्यों का सर्वत्र प्रचलन है।
चिंतन, चरित्र व्यवहार को उत्कृष्ट और उदार नहीं बनाया, तब आप घाटे में रहेंगे। इसके लिए ही हम आपको यह अनुष्ठान करा रहे हैं ताकि आपका चिंतन बदले, व्यक्तित्व कायाकल्प हो जाये, तभी देवता आपकी सहायता करेंगे। आप अपने भीतर को बदलने की कोशिश कीजिए। अपना चिंतन बदलिए, अपना चरित्र बदलिए, अपने जीवन का ढाँचा और ढर्रा बदलिये फिर देखिये आपकी बदली हुई परिस्थितियों में जो देवता नाखुश थे-मुँह मोड़े हुए थे, किस तरह आप के गुलाम हो जाते हैं कैसी आपकी सहायता करते हैं? कैसे आपको छाती से लगाते हैं?
चिंतन को, अपनी विचारणाओं को, आस्थाओं को, दृष्टिकोण को भी बदलना पड़ेगा। यदि यह कर सकें तो समझिये कि बाहर की सहायता भी आपको जरूर मिलकर रहेगी।
चिंतन में पवित्रता, उत्कृष्टता के उदार सिद्धांतों का समावेश करें। वैसी कल्पनायें करें। वैसी ही योजनायें और गतिविधियों को उसी स्तर की विनिर्मित होने दें। क्योंकि नया युग अब सन्निकट ही है।
चिंतन का शिकार न होना पड़े।
चिंतन, चरित्र और आपका व्यक्तित्व ऐसा होना चाहिए जिससे कि देवता हमेशा आपकी सहायता करते हुए चले जायँ। इससे कम में बात बनेगी नहीं। इसके लिए आपको त्याग करना ही चाहिए। आपको अपनी बुराइयाँ छोड़नी ही चाहिए, और आपको अपने दृष्टिकोण में महानता साबित करनी ही चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-October
चिंतन भी वैसा ही बनता चला जाता है। मनोरंजक समझे जाने वाले साहित्य में तो कामुकता भड़काने एवं छद्म रचने आक्रमण करने के लिए उभारने वाले ही प्रसंग भरे पड़े होते हैं। धर्मसंचों से भी ऐसे ही कथानक सुनने को मिलते हैं जो श्रद्धासिक्त भावुकता को कहीं से कहीं घसीट ले जाते हैं। वास्तविक स्वाध्याय वह है जो अपनी निम्न की तथा संबंधित परिवार की समस्याओँ के हर पहलू पर प्रकाश डाले और पाठक को, श्रोता को सही निर्णय तक पहुँचने में सहायता करे। ऐसी पुस्तकें सर्वथा उपलब्ध न हों ऐसी बात तो नहीं है पर उनकी कमी अवश्य है।
चिंतन सतत् हमें आस्तिक बनाता है व अपने कर्मों पर निरंतर एक कड़ी दृष्टि रखने की प्रेरणा देता है।
चिंतन संबंधी अक्षमता जैसे दोष भी इस अवस्था में प्रकट हो सकते हैं। यह तो वे असमानताएं हुईं, जो व्यक्त होती और दिखाई पड़ती है। इसके अतिरिक्त ऐसे कितने ही दोष हैं जो अप्रकट स्तर के बने रहते हैं। इनमें आँतरिक क्रियाएँ और रक्त रसायनों की न्यूनाधिकता शामिल हैं। विशेषज्ञों के मतानुसार व्यथित मनोभूमि में एड्रीनल कार्ट्रेक्स से कोर्टिसोल नामक एक विशेष रसायन स्रावित होने लगता है, जिससे शरीर की चयापचय क्रिया असाधारण रूप से प्रभावित होती है।
चिंतन-चेतना की इन दिनों हो रही है। यों कहने को तो बुद्धिमत्ता बढ़ी है। शिक्षा में इजाफा हुआ है। चतुरता, कुशलता की बढ़कर ढींग हाँकी जाती है। इसके सबूत में प्रत्यक्षवादी भौतिक विज्ञान की उपलब्धियों को प्रस्तुत किया जाता है।
चिंतन, चरित्र, व्यवहार के विकास एवं परिष्कार के द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं। वेदाँत के विज्ञान सम्मत इस तथ्य को मानने से ही ईश्वर दर्शन की-आत्मोत्कर्ष की अगली जानकारियाँ संभव होंगी। इसके अतिरिक्त ईश्वरीय सत्ता को जानने व मानने का कोई और उपाय भी तो नहीं है।
चिंतन में बाधा दी कुल पुरोहित ने “लेकिन आपकी छत्र छाया में सिंहासन पर उन्हें बैठाना मात्र ही तो है? आप! आप सिंहासन त्याग..............।” पूरी बात आशंका के कारण मुख से नहीं निकल सकी।
चिंतन-मनन करना है। इस बीच में आपको जप और अनुष्ठान करना है, योगाभ्यास करना है, और अपने आपका परिशोधन करना है। तो क्या हम अकेले कर लेंगे? नहीं आप अकेले कहाँ हैं। पीठ पीछे हम जो हैं।
चिंतन, मनन का आश्रय लेकर आमतौर से लोग सुधरते और आगे बढ़ते हैं। इसलिए सर्वमान्य, सर्वसुलभ विधि व्यवस्था यही है। इतने पर भी यह नहीं समझना चाहिए कि बात समाप्त हो गई। अभी उन रहस्यों को समझना शेष है, जो अंतराल की किन्हीं गहरी पर्तों में छिपे बैठे रहते हैं और जब ज्वालामुखी की तरह फूटते हैं तो स्वाध्याय, सत्संग जैसे अवलंबनों से जो हाथ लगा था, उसे लावे की तरह उछालकर दूर फेंक देते हैं यही समझ में आ जाय तो भटकाव की विडंबना से मानव बच जाय। जीवन साधना यही है कि सतत् अपने को श्रेष्ठ विचारों में लीन रखा जाय, पतनोन्मुखी विचार प्रवाह से स्वयं को बहने से रोका जाय तथा विभिन्न व्यावहारिक अध्यात्म के उपचारों से आत्मोत्थान के प्रयास किये जाते रहें।
चिंतन, जीवन, व्यवहार, दृष्टिकोण में परिवर्तन और मानवीय संवेदना की रक्षा के लिए और अधिक तत्पर होकर कार्य करेंगे। हम तब तक रुकें नहीं, जब तक धरती पर स्वर्ग और मनुष्य में देवत्व का अभ्युदय स्पष्ट दृष्टिगोचर न होने लगे।
चिंतन मनन का अभाव भी माना जाता है। यह सही भी है। सर्वविदित प्रतिपादनों में इनका भी कम महत्व नहीं है। हम जो पढ़ते, सुनते, देखते हैं उसी आधार पर मानसिक स्तर का निर्माण होता है। चूँकि शिक्षितों द्वारा सुने गये तत्वदर्शन से लेकर कथा प्रसंगों तक सब कुछ ऐसा होता है, जो विवेक जगाता नहीं वरन् उसे और भी अधिक कुँठित करता है, अंधविश्वासों, मूढ़ मान्यताओं भाग्यवादी परावलंबन शैली का समर्थन करता है अतः चिंतन भी वैसा ही बनता चला जाता है।
चिंतन और अनाचार ही अपने पल्ले बँधता है। इस चक्रव्यूह से निकलने का एक ही मार्ग है कि महामानवों की जीवनचर्या कर्मपद्धति एवं विचारणा को पढ़ा सुना जाय। प्रत्यक्ष मिलन न हो सकने पर भी दिव्य मानवों का यश शरीर दिवंगत होते हुए भी मार्ग दर्शन के लिए सदा सर्वदा उपस्थित रह सकता है। जिन्हें सत्संग का लाभ लेकर अपनी कल्याणकारी मेधा जगानी हो उन्हें इसी उपाय उपचार का अवलंबन करना चाहिए।
चिंतन में भूतकाल से लेकर वर्तमान तक का निरीक्षण-परीक्षण करते हुए खोटों को समझना पड़ता है। मनन इससे अगली आवश्यकता पूरी करना है। यह सुधारवादी योजना बनाकर देता है साथ ही उसे अपनाकर एकाकी चल पड़ने का साहस प्रदान करता है। ऐसे निश्चय यदि कल्पना लोक में ही मँडराते रहे तो बात दूसरी है अन्यथा यदि उन्हें कार्य रूप में विकसित होने का अवसर मिले तो उसका प्रभाव परिणाम किसी को भी सामान्य से असामान्य बना सकता है।
चिंतन से उस तात्पर्य तक पहुँचने में सक्षम है, चिंतन ही करना चाहिए।
चिंतन। इसे रोग का निदान कह सकते हैं। निदान के उपराँत ही चिकित्सा बन पड़ती है। आत्म परिष्कार के समस्त पक्षों पर समग्र दृष्टि में विचार करना और साथ ही उनसे पीछा छुड़ाने के लिए सुनिश्चित संकल्प करना, तथा साहसिक दृढ़ निश्चय करना ही ‘मनन’ है। इस निमित्त एक सुनियोजित कार्यक्रम बनाना होता है।
चिंतन, चरित्र, स्वभाव, रुचि और आकाँक्षाओं को बदल दें। अगर आपने यह अनुमान लगा लिया हो कि केवल क्रिया करने से जादूगरी के तरीके से आपको कहीं आसमान से कोई सिद्धियाँ आ टपकेंगी, तो आप इस ख्याल को निकाल दीजिए। करना आपको ही पड़ेगा। आपके किये बिना कोई रास्ता नहीं है। आप अगर चुपचाप बैठकर के गुरुजी के आशीर्वाद, सीधे गायत्री माता के आशीर्वाद से या किसी मंत्र के चमत्कार से बदलना चाहते हों और अपनी परिस्थितियों को सुधारना चाहते हों और स्वयं कष्ट उठाने से इनकार करते हों तो ख्याल रखिये आपको सफलता मिलने वाली नहीं है।
चिंतन करते रहें तो निश्चित ही सफलता, सुख शाँति व आत्मिक प्रगति की लक्ष्य सिद्धि होकर रहेगी।
चिंतन और मनन। अपने दोष, गुणों को सूक्ष्म दृष्टि में देखना-परखना अपनी मान्यताओं, आकाँक्षाओं, अभिरुचियों को आदर्शवाद की कसौटी पर कसना यही है चिंतन। इसे रोग का निदान कह सकते हैं। निदान के उपराँत ही चिकित्सा बन पड़ती है। आत्म परिष्कार के समस्त पक्षों पर समग्र दृष्टि में विचार करना और साथ ही उनसे पीछा छुड़ाने के लिए सुनिश्चित संकल्प करना, तथा साहसिक दृढ़ निश्चय करना ही ‘मनन’ है।
चिंतन क्षेत्र में मन-मस्तिष्क अंतःकरण में आत्मसात कर लेने पर ईर्ष्या क्षण भर भी ठहर नहीं सकती।
चिंतन प्रवाह में उस दिन की सारी घटनाएँ चल-चित्र की तरह घूम गयीं।
चिंतन ही करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-January
चिंतन। इस संघातिक व्याधि का ब्योरा प्रस्तुत करते हुए उनका कथन है-”समस्त विकृतियों, कुँठाओं, शोक, संताप, द्वंद्व, संघर्षों, अभाव-अपराधों, रोग, क्षोभों का एक मात्र कारण हमारे चिंतन क्रम का कलुषित हो जाना है। दुष्ट चिंतन समस्त विग्रहों का मूल है। सारी विपत्तियाँ दुर्बुद्धि ही उत्पन्न करती है। अवांछनीय विचारणा है जो नरक की परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है।
चिंतन समस्त विग्रहों का मूल है। सारी विपत्तियाँ दुर्बुद्धि ही उत्पन्न करती है। अवांछनीय विचारणा है जो नरक की परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है। समस्त सुविधाएँ होने पर भी यदि विचार पद्धति सही नहीं तो व्यक्ति केवल दुःख पाता रहेगा और संबंधित लोगों को दुःख देता रहेगा। हमारी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय विपन्नताओं का कारण कुछ और नहीं केवल लोकमानस की अशुद्ध दिशा ही है।
चिंतन करते समय भावी संभावनाओं की आशा करना शेखचिल्ली की तरह ही निरर्थक सिद्ध होता है। ‘मैं जीवित बना रहूँ’ वाली जीवेषणा ही हर प्राणी के अस्तित्व को यथावत् बनाये हुए है। मृत्यु से भयभीत होने को यही एक मात्र कारण है। मरघट का गाँव से बाहर होना यही सिद्ध करता है कि व्यक्ति को मृत्यु पसंद नहीं। जबकि यह एक ध्रुव सत्य है जिसे टाला नहीं जा सकता।
चिंतन क्रम का कलुषित हो जाना है। दुष्ट चिंतन समस्त विग्रहों का मूल है। सारी विपत्तियाँ दुर्बुद्धि ही उत्पन्न करती है। अवांछनीय विचारणा है जो नरक की परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है। समस्त सुविधाएँ होने पर भी यदि विचार पद्धति सही नहीं तो व्यक्ति केवल दुःख पाता रहेगा और संबंधित लोगों को दुःख देता रहेगा।
चिंतन-चरित्र को दात्त बनाकर अचेतन मन का परिष्कार किया जा सके तो संभावित भविष्य की झलक- झाँकी प्राप्त कर सकना ही किसी के लिए संभव है।
चिंतन और आचरण में स्फुट झलकने लगेगा। सन् 2040 के आस-पास तक परिवर्तन समग्र और पूर्ण हो जायेगा। इसके उपराँत विश्व एक ऐसे शाँत और सुस्थिर युग में प्रवेश करेगा, जिसे दिव्यता की दृष्टि से अध्यात्म युग और प्रखरता की दृष्टि से स्वर्णयुग कहा जा सके। इसकी अवधि उनने हजार वर्ष से भी अधिक बतायी है। इसके बाद स्रिप्टन में स्वर्णयुग में लोगों का चरित्र-चिंतन, भौतिक संपन्नता, आध्यात्मिक उन्नति, अर्थव्यवस्था, संचार-सुविधा आदि का वर्णन किया है।
चिंतन में प्राण भरे हैं।” एक अन्य स्थान पर उनके शब्द हैं, अपनी रचनाओं में मैंने अपना प्राण सँजोया है। उनमें कितनी आभा है, कितनी रोशनी है, कितनी मौलिकता है, और कितनी शक्ति है यह कहने की नहीं अनुभव करने की बात है। जिसने इन्हें पढ़ा तड़पकर रह गये। रोते हुए आँसुओं की स्याही से जलते हृदय से इन्हें लिखा है सो इनका प्रभाव होना चाहिए हो रहा है, और होकर रहेगा।
चिंतन, चरित्र कर्तृत्व को यदि उत्कृष्ट एवं उच्चस्तरीय बना लिया जाय तो फिर आत्मिक प्रखरता के कारण उपलब्ध होने वाली असंख्य ऋद्धि-सिद्धियों के मार्ग में और कोई बड़ा व्यवधान शेष नहीं रह जाता।
चिंतन दूसरे पल के निश्चय में बदला। रथ पर बैठकर चुने हुए सभासदों के साथ स्वयं विरुपाक्ष कुँड गए। जिज्ञासा तो संक्रामक ठहरी। सम्राट के पीछे दूरी अवंतिका और आस-पास से आये जिज्ञासु मनीषी और गृहस्थ थे। प्रायः जन हीन रहने वाला वह विरुपाक्ष शिखर आज स्वयं में नैमिषारण्य बन गया।
चिंतन को इस माध्यम से प्रभावित किया है। जातिवाद के जंजाल को तोड़ा है तथा एक ही ब्राह्मण वर्ग के औसत भारतीय निर्वाह में औरों के लिए जीवन जीने वाले समयदानियों की उत्पादन प्रक्रिया को बलशाली किया है। यदि सत्प्रवृत्ति संवर्धन व दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के कार्यक्रम राष्ट्र को एक अखण्ड व सशक्त बनाने के प्रयोग चल पड़े हैं-अभावग्रस्तता से उबारकर स्वावलंबी बनाने की दिशा में समाज गतिशील हो चला है तो उसका श्रेय जाग्रत धर्मतंत्र की शक्ति को ही जाता है। आह्वान है इस मिशन का हर उस विभूति को, जो आज की इस नैराश्यपूर्ण परिस्थितियों में आशावाद के राजमार्ग पर चलने की बाट जोह रही है। आशा ही नहीं विश्वास है , इस आमंत्रण को प्रबुद्धजन अवश्य स्वीकार करेंगे, नकारेंगे नहीं।
चिंतन और साधना आपस में इस कदर घुल-मिल गये थे कि एक के बिना दूसरे के बारे में सोच पाना भी मुश्किल है। उनके ही शब्दों में स्पष्ट किया गया तथ्य है-”लेखन हमारे लिए कभी व्यवसाय नहीं रहा। इसे मैंने अपनी उपासना की तरह अपनाया है। तप ने मेरे चिंतन में प्राण भरे हैं।” एक अन्य स्थान पर उनके शब्द हैं, अपनी रचनाओं में मैंने अपना प्राण सँजोया है।
चिंतन और दर्शन का विस्तार एक सीमित क्षेत्र में ही हुआ था। भौगोलिक कठिनाइयों ने हर क्षेत्र को अपनी परिधि में सीमाबद्ध कर रखा था। तब धर्म का स्वरूप भी छोटा ही था। तत्वदर्शन प्रायः ईश्वर जीव, प्रकृति के निरूपण तक ही अपनी दौड़ लगाता था। उतने से ही भली प्रकार काम चल जाता था।
चिंतन करने से बौद्धिक विकास के नए आयाम खुलते नजर आते हैं। तब समझ में आने लगता है कि जिन तथ्यों को हम अपने अधकचरे पन के कारण अवैज्ञानिक समझते रहे-वही वैज्ञानिकता का केन्द्र बिंदु हैं।
चिंतन, भौतिक संपन्नता, आध्यात्मिक उन्नति, अर्थव्यवस्था, संचार-सुविधा आदि का वर्णन किया है।
चिंतन में ज्ञान की प्रत्येक शाखा को गरिमा को पूर्ण स्थान देने वाले पूज्यवर वेदों की ऋचाओं, उपनिषदों की श्रुतियों के द्रष्ट की भाँति क्राँतदर्शी ऋषि थे, साथ ही शंकर, रामानुज मध्य की परंपरा में भाष्यकार भी। अपनी गहन साधना के बल पर सत्य की गंगोत्री उनका आवास बनी थी। उन्होंने सवालों, समस्याओं, उलझनों के शिकंजे में विकल बेबस मानव जीवन के दर्द को पहचाना और अपना समूचा जीवन इस व्यथा के निवारण के लिए उत्सर्ग कर दिया। उन्हीं के शब्दों में कहें तो हमारा यह जीवन भगवान की उस इच्छा के लिए समर्पित है, जिसके अनुसार वे प्रश्नचिह्नों के चक्रव्यूह में फँसी अपनी प्रिय मानवता का उद्धार करना चाहते हैं। हमारा अब तक का क्रिया-कलाप इसी धुरी के इर्द-गिर्द घूमता रहा है।
चिंतन ही अतिवादिता को निरुत्साहित कर तथ्यों को संतुलित रीति से ग्रहण करने की, समझ देता है।
चिंतन की दिशाधारा मिलती है। विधेयात्मक दृष्टिकोण इसी की परिणति है। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण के समतुल्य ही प्रार्थना भी ईश्वरीय सहायता को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम है। भौतिक-वेत्ताओं एवं चिकित्सा विज्ञानियों ने भी अब प्रार्थना को समर्थ अध्यात्मोपचार के रूप में मान्यता प्रदान की है। उनका मानना है कि प्रार्थना से न केवल उदासीनता और निराशा जन्य लाइलाज मानसिक व्याधियों वरन् असाध्य समझी जाने वाली शारीरिक बीमारियों का निदान भी प्रार्थना की शक्ति से संभव है।
चिंतन से सफलता बटोरने के लिए उत्साह उमगता है। रोगग्रस्तता और निर्बलता की दशा में शरीर की जो दुसह्य दुर्गति होती है, उससे डर कर ही लोग स्वस्थता प्राप्ति की व्यग्रता जताते हैं। यदि अक्षुण्ण स्वास्थ्य की निश्चितता रहे, तो फिर आरोग्य-संवर्धन के लिये जो किया और सोचा जाता है, उसकी किसी को आवश्यकता ही न पड़ेगी। फिर आरोग्य स्वाभाविक रहने और उसमें किसी प्रकार का संकट उत्पन्न होने का खतरा न रहने से उसका महत्व भी प्रतीत न होगा। ऐसी स्थिति में कोई उसके लिए फिर प्रयत्नशील क्यों रहेगा ?
चिंतन तप से उपजा होता तो ये विकृतियाँ नजर न आतीं जो आज समाज में विद्यमान है।
चिंतन में हम ऐसा उलट फेर करेंगे जिसे उलटे को उलट कर सीधा करना कहा जा सकें।”
चिंतन-चरित्र में आदर्शवाद का समावेश जरूरी समझा जायेगा। वर्तमान में जिसे पुस्तकों में पढ़ने-सुनने तक सीमित माना जाता है, उन दिनों लोगों के आचरणों में उतरता प्रत्यक्ष देखा जा सकेगा। जनसामान्य अधिक व्यावहारिक होंगे। ईश्वरीय सत्ता के प्रति एक बार पुनः आस्था जगेगी। आस्तिकता प्रतिष्ठिता होगी और नास्तिकता का अंत सदा-सर्वदा के लिए हो जायेगा।
चिंतन से मुख मोड़कर अपनी दिशाधारा उलटी कर देना। ऐसा क्यों होता है ? इस पर मनःशास्त्री-दार्शनिक कहते हैं कि यह मनुष्य का मनोबल, संकल्प शक्ति गिर जाने से, आशंकाओं-कुकल्पनाओं-के भय के कारण अधिकाधिक होता देखा जाता है।
चिंतन उनकी दीर्घकालीन गहन साधना का परिणाम था। चिंतन और साधना आपस में इस कदर घुल-मिल गये थे कि एक के बिना दूसरे के बारे में सोच पाना भी मुश्किल है। उनके ही शब्दों में स्पष्ट किया गया तथ्य है-”लेखन हमारे लिए कभी व्यवसाय नहीं रहा। इसे मैंने अपनी उपासना की तरह अपनाया है। तप ने मेरे चिंतन में प्राण भरे हैं।
चिंतन, निर्वाध भाषण, शाप-वरदान से दूसरों को नष्ट कर देना या जीवन दान देना, स्पर्श से पदार्थों का स्वादिष्ट और सुगंधित हो जाना, स्वल्प आहार से बहुतों को तृप्त कर देना, वाणी एवं आशीर्वचनों का सफल होना, शरीर का कायाकल्प, दीर्घजीवन या अमर होना।
चिंतन, चरित्र, व्यवहार में साधक जितनी अधिक पवित्रता एवं प्रखरता का समावेश करता जाता है, उसी क्रम से एक से बढ़कर एक उच्चस्तरीय विभूतियाँ-सिद्धियाँ हस्तगत होती चली जाती हैं। मनुष्य का मौलिक स्वरूप देवत्व प्रधान है। अतः शारीरिक, मानसिक और आत्मिक क्षेत्र की सिद्धियाँ भी अगणित प्रकार की हैं, उन्हें आठ या किसी अन्य संख्या में विभाजित नहीं किया जा सकता। आत्मबल की जिस दिशा में लगा दिया जाय, उसी में चमत्कार पैदा हो जायेगा और वह एक स्वतंत्र सिद्धि दिखाई देने लगेगी।
चिंतन प्रश्नों के चक्रव्यूह में उलझी मानवता के लिए मुक्तिकारक समाधान सिद्ध हो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-June
चिंतन का एक लक्षण उसका शान्तभाव उसकी नीरवता उसके पीछे जो प्रबल शक्ति रही है उसे बल वाचक शब्दों से नहीं कहा जा सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-October
चिंतन शुष्क निराशावादिता, दार्शनिकता या (Melancholia) उदासी, विवाद तथा चिंताकुलता जैसे मानसिक रोगों में परिणीत हो जाता है। मस्तिष्क के तन्तुओं का अत्यधिक तनाव बड़ा घातक है। इससे कभी-कभी प्रमाद तक हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-July
चिंतन तथा मनन में लगाते हैं, तब आपका बौद्धिक विकास ठीक चल रहा है। आगे आशा है।
चिंतन में लगाकर भावना को वश में कीजिए और विचार को विकसित होने का अवसर दीजिए। सर्वांगीण विकास ही सर्वोत्तम है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-November
चिंतन बार-बार करके हटाने का प्रयत्न करते हैं-कि ये विचार हट जायें-परन्तु ऐसा कदापि नहीं होता और हो भी नहीं सकता। इस प्रकार हम बुरे विचारों को नहीं हटा सकते। हमें चाहिए कि जब हममें बुरे विचार आवें-तो उन्हें हटाने का कभी प्रयत्न न करें बल्कि तुरन्त ही शुभ विचार करना आरंभ कर दें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-March
चिंतन से नवीन अंतर्मन के जगत की सृष्टि होती है।
चिंतन करो। दूसरों के साथ वाणी या मन से भी अशुभ बात न करो, या दूसरों की अशुभ की बात न सुनो। केवल भलाई, सब की भलाई, स्वास्थ्य, दीर्घायु का विचार, सब से आत्मभाव का दर्शन, उत्तमता का दर्शन ही तत्व चिंतन है। तत्व चिंतन से मनुष्य समस्त दुःख एवं क्लेशों से मुक्त हो जाता है। तत्व चिंतन एकाग्रता से होता है।
चिंतन नहीं करते। अतः सर्वव्यापी ईश्वर हमें व्याधि देते हैं।
चिंतन विश्वास रोग का नाश करती है। अपने अन्तःकरण की निर्विकारता, शुद्धता, उत्कृष्टता में श्रद्धा उत्पन्न करो और दूषित संस्कारों को बाहर फेंक दो। अपने आपको पवित्रता का केन्द्र बनाये रहो। दृढ़ता से कहो- “मलीन दुश्चिन्ताओं! तुम्हारे लिए मेरे मन मन्दिर में कोई स्थान नहीं है, तुम कैसे प्रविष्ट हो सकते हो, मैं अपनी शुद्धता एवं पवित्रता से तुम्हें क्षण भर में क्षार-क्षार कर दूँगा।”
चिंतन एवं मानसिक संतुलन के सच्चे रूप से अनभिज्ञ हैं, उसका मन एक ऐसा ड्राइवर है जिसे शरीर रूपी मशीन के सूक्ष्म पुर्जों का ठीक ज्ञान नहीं। मानसिक उपचारक रोगी को मानसिक संचालन का यथार्थ मार्ग सिखाता है।
चिंतन से रोग-मुक्ति -
चिंतन हमें बीमार बनाती है, उसकी विस्मृति एवं अपने अद्भुत सामर्थ्यों की कल्पना, चिंतन विश्वास रोग का नाश करती है। अपने अन्तःकरण की निर्विकारता, शुद्धता, उत्कृष्टता में श्रद्धा उत्पन्न करो और दूषित संस्कारों को बाहर फेंक दो। अपने आपको पवित्रता का केन्द्र बनाये रहो। दृढ़ता से कहो- “मलीन दुश्चिन्ताओं! तुम्हारे लिए मेरे मन मन्दिर में कोई स्थान नहीं है, तुम कैसे प्रविष्ट हो सकते हो, मैं अपनी शुद्धता एवं पवित्रता से तुम्हें क्षण भर में क्षार-क्षार कर दूँगा।”
चिंतन से मनुष्य समस्त दुःख एवं क्लेशों से मुक्त हो जाता है। तत्व चिंतन एकाग्रता से होता है। यों ही निर्द्वन्द्व मन लेकर माला फेरने से कुछ न होगा। जागृत अवस्था में प्रत्येक व्यवहार करते समय, मन के प्रत्येक विचार, वाणी के प्रत्येक व्यापार, शरीर की प्रत्येक क्रिया को तत्व मय कर देने का प्रतीक ही आध्यात्म चिंतन है।
चिंतन है।
चिंतन करने से आत्मशक्ति का बोध होता है तथा सब प्रकार के मानसिक रोग दूर होते हैं। जीवन का विकास भीतर से होता है। जिस क्षण तुम्हें अपने व्यक्तित्व के केन्द्र आत्मा के भीतर स्थिरता प्राप्त हो जायगी, उसी क्षण अक्षय उत्साह तथा आत्मभाव (देवभाव) की तरंगें तुममें उद्वेलित होने लगेंगी। प्रातःकाल उठते ही नित्य प्रसन्नता एवं शान्ति के विचारों में रमण करने से शुभ आध्यात्मिक संस्कार अंकित होते हैं। “शान्ति, आनन्द, तृप्ति का अनन्त स्त्रोत मेरे अन्तःकरण में बह रहा है।
चिंतन एकाग्रता से होता है। यों ही निर्द्वन्द्व मन लेकर माला फेरने से कुछ न होगा। जागृत अवस्था में प्रत्येक व्यवहार करते समय, मन के प्रत्येक विचार, वाणी के प्रत्येक व्यापार, शरीर की प्रत्येक क्रिया को तत्व मय कर देने का प्रतीक ही आध्यात्म चिंतन है।
चिंतन से ही हमारा मन पूर्ण रूप से निमग्न हो जाता है-हमारे शारीरिक, भौतिक अथवा मानसिक स्थिति में तद्रूप परिवर्तन अवश्य उत्पन्न कर देता है। (2) उस भावना को दूर करने के लिए जितना ही हम ऊपरी मन से प्रयत्न करते हैं, उतनी ही दृढ़ता से उसकी और जड़ जमती हैं।
चिंतन है। तत्व चिंतन से मनुष्य समस्त दुःख एवं क्लेशों से मुक्त हो जाता है। तत्व चिंतन एकाग्रता से होता है। यों ही निर्द्वन्द्व मन लेकर माला फेरने से कुछ न होगा। जागृत अवस्था में प्रत्येक व्यवहार करते समय, मन के प्रत्येक विचार, वाणी के प्रत्येक व्यापार, शरीर की प्रत्येक क्रिया को तत्व मय कर देने का प्रतीक ही आध्यात्म चिंतन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-May
चिंतन में मग्न रहता है, उसके अन्तर प्रवेश में उपरोक्त प्रकार की-ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध आदि की जटिल ग्रन्थियाँ उत्पन्न ही नहीं होती। भगवान श्रीकृष्ण का प्रवचन है-
चिंतन, शुभ कार्यों में व्यय करना, नीचे से ऊपर की ओर उठना, पशुत्व से देवत्व प्राप्त करना। वासनाओं की तृप्ति का अर्थ है उनका शोध आत्मविद्या द्वारा ही संभव है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-January
चिंतन द्वारा ही स्वभाव बनता है। आप जिस विषय या विचारों को मन में अधिक देर तक स्थान देते हैं, चिंतन मनन इत्यादि करते हैं अर्थात् जिन विचारों की मन में पुनरावृत्ति होगी उसी प्रकार का मनुष्य का भविष्य में स्वभाव (Nature) बनने लगेगा।
चिंतन है। जिसका जितना अधिक चिंतन रहता है, उसका उतना अधिक स्वभाव रहता है। आपके जो विचार हैं उनके दृढ़ चिंतन द्वारा ही स्वभाव बनता है। आप जिस विषय या विचारों को मन में अधिक देर तक स्थान देते हैं, चिंतन मनन इत्यादि करते हैं अर्थात् जिन विचारों की मन में पुनरावृत्ति होगी उसी प्रकार का मनुष्य का भविष्य में स्वभाव (Nature) बनने लगेगा।
चिंतन करो कि स्वभाव में इच्छित परिवर्तन हो जाएगा।
चिंतन, मनन, चित्र निर्माण करो।
चिंतन रहता है, उसका उतना अधिक स्वभाव रहता है। आपके जो विचार हैं उनके दृढ़ चिंतन द्वारा ही स्वभाव बनता है। आप जिस विषय या विचारों को मन में अधिक देर तक स्थान देते हैं, चिंतन मनन इत्यादि करते हैं अर्थात् जिन विचारों की मन में पुनरावृत्ति होगी उसी प्रकार का मनुष्य का भविष्य में स्वभाव (Nature) बनने लगेगा।
चिंतन करता है, जिसमें अपनी आत्मा को निरन्तर स्नान कराता है तदनुसार ही उसकी चित्त की वृत्ति दृढ़ होती है। इसी दृढ़ चित्तवृत्ति को हम स्वभाव कह कर पुकारते हैं।
चिंतन, प्रवृत्तियों, कल्पनाओं का ज्ञान देकर आदर्श माँ बाप बनना बताऊँगा। यदि आप अध्यापक हैं तो मुझसे आप शास्त्रीय शिक्षण पद्धति सीख सकेंगे। आप उपदेशक या वक्ता हैं तो मैं दूसरों पर प्रभाव डालने की गुप्त विधियाँ सिखाऊगा। यदि आप व्यापारी, दुकानदार या कार्यालय के मैनेजर हैं तो मैं आपको ग्राहकों, कर्मचारियों तथा नवागंतुकों को अपने हाथ में कर लेना बताऊँगा। मैं आपको मूर्खों, बदमाशों, दोषियों, पागलों की दशा सुधारना, अभागों, पापियों तथा आलसियों का उद्धार करना, छोटे जानवरों का अध्ययन करना, स्वयं अपना संस्कार करना, मानसिक उलझनों को सुलझाना तथा समग्र जन समुदाय के पृष्ठ भाग में कार्य करने वाले महान तत्वों का दिग्दर्शन कराऊँगा।
चिंतन मनन इत्यादि करते हैं अर्थात् जिन विचारों की मन में पुनरावृत्ति होगी उसी प्रकार का मनुष्य का भविष्य में स्वभाव (Nature) बनने लगेगा।
चिंतन, उनमें विश्वास, श्रद्धा उस विचार को स्वभाव का एक अंग बनाते हैं। जो विचार बार-बार मानस पटल पर लाया जाएगा, वह उतनी ही गति से स्वभाव निर्माण या स्वभाव परिवर्तन करेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-February
चिंतन की अकल्याणकारी मूर्ति, ईर्ष्या, द्वेष इत्यादि मन की विभिन्न भूमिकाओं का शरीर पर भयंकर प्रभाव पड़ता है। मनोविकार निरन्तर हमें नाच नचाया करते हैं, काम, क्रोध, इत्यादि मनुष्य के षट्रिपु हमें समूल नष्ट करने को प्रस्तुत रहते हैं। अनेक व्यक्ति सर्वत्र इनके मिथ्या प्रलोभनों में ग्रसित होकर अनेक स्नायु रोगों के शिकार बनते हैं।
चिंतनीय बात कह दे तो उसे अंतर्मन तुरन्त स्वीकार कर लेता है और वह क्रमशः बढ़ता रहता है। अनपढ़, गंवार, अशिक्षित व्यक्तियों तथा विशेष रूप से पुराने विचार वाली स्त्रियों में बहुत वहम होता है। यह दुर्बल चित्त का क्षुद्र मनोविकार है। दुर्बल इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति शंकित होते हैं और अपने वहम के कारण नरक की यातनाएँ भुगतते हैं। ऐसे व्यक्ति कुतर्कवादी, संशयी, अविश्वासी, चिन्तित, निराशावादी, अतृप्त, असंतोषी चित्त के होते हैं।
चिंतन किये ही जाना चाहिये, जिससे कि विशेष सुगमता से रोगों को दूर किया जा सकता है और रोग द्रुतगति से मिटाये जा सकते हैं।
चिंतन करना चाहिये। जहाँ तक कि रोग मिट न जाय वहाँ तक इस चिंतन को जारी रखना चाहिये। वह भावना रूपी मन्त्र स्वयं उसे रोग मुक्त कर सकता है परन्तु जहाँ तक इस भावना रूपी यन्त्र पर पूर्ण विश्वास प्रकट न हो वहाँ तक एक दूसरे प्रयोग करने में कोई हानि नहीं, परन्तु अन्य प्रयोग के साथ ही निम्न भावनाओं का चिंतन किये ही जाना चाहिये, जिससे कि विशेष सुगमता से रोगों को दूर किया जा सकता है और रोग द्रुतगति से मिटाये जा सकते हैं।
चिंतन, ईश्वर भजन।
चिंतन को जारी रखना चाहिये। वह भावना रूपी मन्त्र स्वयं उसे रोग मुक्त कर सकता है परन्तु जहाँ तक इस भावना रूपी यन्त्र पर पूर्ण विश्वास प्रकट न हो वहाँ तक एक दूसरे प्रयोग करने में कोई हानि नहीं, परन्तु अन्य प्रयोग के साथ ही निम्न भावनाओं का चिंतन किये ही जाना चाहिये, जिससे कि विशेष सुगमता से रोगों को दूर किया जा सकता है और रोग द्रुतगति से मिटाये जा सकते हैं।
चिंतन किया करते हैं, वे भिन्न-भिन्न रोगों से ग्रस्त होकर जीवन अन्त करते हैं।
चिंतन में हम निष्प्रयोजन जीवन शक्ति का अपव्यय करते हैं। निराशा, चिंता तथा ऊल जलूल बातों से विकसित होकर क्षय रोग उत्पन्न होता है, रात दिन जो व्यक्ति दुःख, शोक, रोग की कल्पनाओं से आच्छादित रहते हैं, दुःखमय स्थिति का ही चिंतन किया करते हैं, वे भिन्न-भिन्न रोगों से ग्रस्त होकर जीवन अन्त करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-December
चिंतन से हटाया जा सके तो सौभाग्य का वह सूर्योदय फिर प्रकट हो सकता है, जो चिरकाल तक अपने आकाश में आलोकवान रहा और समस्त संसार को सौभाग्यशाली वरदान देता रहा। आज तो अध्यात्म के प्रतिपादन और प्रयोग दोनों ही भ्रम-जंजाल की कीचड़ में बेतरह फंसे हुए हैं और अभिनंदनीय रहने के स्थान पर अवमानना सहन कर रहे हैं।
चिंतन, मनन और समुद्र मंथन जैसे प्रयास का प्रतिफल है। स्वेच्छाचारी कल्पनाओं और मनगढ़ंत मान्यताओं के आधार पर इन्हें गढ़ा नहीं गया है और न किसी अंध श्रद्धा से सम्मोहित होकर उन्हें सच्चाई मान बैठने जैसे भ्रम-जंजाल की इन पर छाया है। जो कहा जा रहा है जिस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के लिए अनास्थावानों को भी विवश होना पड़े। विज्ञान के अनुसंधानों को प्रयोगशाला में परीक्षित-प्रमाणित किया जाता है। इसके उपरांत ही उपलब्धियों की घोषणा की जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-November
चिंतन को चलने लगना इसी प्रगति का चिन्ह है। हर काम में बाहर से सहारा, दैवी अनुकम्पा चाहने वाला व्यक्ति जब ‘स्व’ परायण होकर अपने ‘सुपर चेतन’ को जगाने का पुरुषार्थ आरम्भ करता है तो उसका महामानव बनने का पथ-प्रशस्त होता चला जाता है। सिद्धान्त सब मिलाकर एक ही है कि व्यक्ति स्वयं को जाने- अपनी प्रसुप्त क्षमता को जगाये एवं आत्म परिष्कार की- व्यक्तित्व निर्माण की- प्रक्रिया से अपनी जीवन साधना आरम्भ करे। हर दृष्टि से फलितार्थ इसी तथ्य के रूप में निकल कर आता है कि जिसने व्यक्तित्व के विकास की- अन्तः की सामर्थ्यों को जगाने- विकसित करने की- साधना कर ली, वही ‘सिद्ध पुरुष’ बन गया।
चिंतन मनन जैसे कई व्रत नियम हैं। भविष्य निर्धारण के लिये परामर्श- पिछली भूलों में खोदी गई खाई को पाटने वाली क्षति पूर्ति- का भी इसी साधना क्रम में अविच्छिन्न समावेश है। इन अभ्यासों को योग साधना की संज्ञा दी गई है और मन क्षेत्र के परिष्कार, परिवर्तन, उन्नयन का लाभ दे सकने वाली व्यवस्था की गई है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-April
चिंतन की ओर प्रेरित करती है। अग्नि में डाली गई वस्तुएं सूक्ष्मतम घटकों में परिवर्तित होकर विस्तृत हो जाती हैं। उदारता, अपरिग्रह, स्वार्थ नहीं परमार्थ का सतत् शिक्षण देती हुई हव्य वस्तुएं वायुभूत हो जाती हैं।
चिंतन में उत्कृष्टता का समावेश करने वाली धर्म धारणा से संबंधित समझा जाना चाहिये। ऋषियों की तरह निर्धनता के रहते हुये भी उच्च चरित्र रखा जा सकता है और ऊंचे पदों पर रहने के कारण ऊंचा वेतन पाने पर भी रिश्वत से घर भरते रहने वालों की तरह धनवान अनैतिक भी हो सकते हैं।
चिंतन की ही प्रधान भूमिका है। मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री होती है। चिंतन की सामर्थ्य संसार की सर्वोपरि शक्ति समझी जा सकती है। उत्थान और पतन की समूची भूमिका विचार चेतना का प्रवाह ही सम्पन्न करता रहता है। वर्तमान संकट के मूल में दुर्बुद्धि का ही कृत्य झाँकता है।
चिंतन की सामर्थ्य संसार की सर्वोपरि शक्ति समझी जा सकती है। उत्थान और पतन की समूची भूमिका विचार चेतना का प्रवाह ही सम्पन्न करता रहता है। वर्तमान संकट के मूल में दुर्बुद्धि का ही कृत्य झाँकता है। उसे उबारने के लिए सद्विचार एवं भावना को ही अग्रिम पंक्ति में खड़ा करना होगा। उन्हीं के पराक्रम से विनाश एवं विघटन को निरस्त किया जा सकेगा।
चिंतन और आदर्श कर्तृत्व अपनाते हुए जिंदगी का अधिकांश समय बिताया है उनके अचेतन में दिव्य संस्कार जगे रहते हैं और वे उसके मरणोत्तर निद्राकाल में दिव्य स्वप्न बनकर उभरते हैं। उस सुखद स्वप्न श्रृंखला को ही स्वर्ग कहते हैं।
चिंतन एवं गतिविधियों का प्रभाव मात्र अपने ऊपर से ही पड़ता है। जबकि तथ्य और ही है। ‘‘अपने मतलब से मतलब और अपने काम से काम’’ की उक्ति व्यक्तिगत स्वार्थ की सिद्धि के लिए भले ही एक सीमा तक सही उतरे पर इस प्रवृत्ति का दूरगामी परिणाम समस्त समाज पर पड़ता है और हर दृष्टि से अहितकर ही होता है। संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिये प्रतिस्पर्धा चलती तथा अधिकांश व्यक्ति अपने सामाजिक एवं नैतिक दायित्वों की अपेक्षा करने लगते हैं। इन दूरवर्ती परिणामों से अवगत पुरातन ऋषियों ने सदा ही मान गरिमा के प्रतिकूल निकृष्ट बनाने वाले तत्वों की भर्त्सना की है।
चिंतन की जनमानस के स्तर की परिणति ही कहा जा सकता है। इस तथ्य को समझा जा सके तो किसी विचारशील को यह मानने में आपत्ति न होगी कि वातावरण की उपयुक्तता एवं परिस्थितियों की अनुकूलता उत्पन्न करने के लिए लोक-मानस में आदर्शवादी उत्कृष्टता का समुचित समावेश करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। प्रज्ञा-अभियान के अंतर्गत युग परिवर्तन के प्रयास का श्रीगणेश इसी प्रक्रिया से आरम्भ किया जा रहा है।
चिंतन है, दर्शन का स्तर ही व्यक्ति एवं समाज को पतन के गर्त में गिराता और उत्थान के उच्च शिखर पर पहुँचाता रहा है।
चिंतन को ऊर्ध्वगामी बनाने, गतिविधियों को महान प्रयोजनों में नियोजित करने की प्रेरणा दी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-March
चिंतनधारा को सामने प्रस्तुत पदार्थों से सर्वथा असम्बद्ध करके किसी ऐसे कल्पना लोक में उड़ा ले जाते हैं जिनका वास्तविकता से दूर का भी संबंध नहीं है। पुराने नशे वर्तमान स्थिति से किसी न किसी रूप में जोड़े तो भी रहते थे पर अभी नये प्रकाश में आए इन नशीले पदार्थों का प्रभाव तो ऐसा होता है कि वर्तमान के साथ मस्तिष्क का तारतम्य बिल्कुल टूट जाता है और आँखें वह देखने लगती हैं जो सामने प्रस्तुत यथार्थता से सर्वथा भिन्न होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-June
चिंतन, चरित्र एवं व्यक्तित्व में ऐसी कोई बात दृष्टिगोचर नहीं होती, जिसके आधार पर उनकी किसी भौतिक या आत्मिक प्रगति का पता चलता हो और न उनकी गतिविधियाँ यही सिद्ध करती हैं कि उस चिंतन को अपनाये रहकर वे भविष्य में अपना या अपने संबद्ध व्यक्तियों का कोई भला कर सकेंगे।
चिंतन को अपनाये रहकर वे भविष्य में अपना या अपने संबद्ध व्यक्तियों का कोई भला कर सकेंगे।
चिंतन के साथ-साथ आदर्श कर्तृत्व के भी अभ्यस्त बनेंगे। साथ ही उनमें से अधिकाँश नव-सृजन की प्रक्रिया में हाथ बंटाते दृष्टिगोचर होंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-July
चिंतन चलता तथा भविष्य अंधकारमय दिखायी पड़ता है।
चिंतन को नये आधार दिये हैं, लेखक ने अमेरिका से प्रकाशित होने वाली प्रसिद्ध पत्रिका ‘सेटर्डेरिव्यू’ में लिखा है कि ‘प्रकृति के अन्वेषण एवं मूल रहस्यों को जाने के लिए तार्किक बुद्धि ही पर्याप्त नहीं है। अन्त प्रज्ञा (इन्ट्यूशन) का महत्व बुद्धि से कहीं अधिक है। अधिक सूक्ष्मतर अनुभूतियाँ बुद्धि के द्वारा नहीं, अंतःप्रज्ञा द्वारा होती हैं। वैज्ञानिक क्षेत्र की असफलताओं का कारण स्पष्ट करते हुए प्रो. काप्रा ने कहा कि “अंतःप्रज्ञा की अपेक्षा, विज्ञान की असफलता का कारण रही है।”
चिंतन मनन को न केवल मस्तिष्क ही प्रभावित करता है वरन् इससे भी अलग एक शक्ति है जो विचारणाओं को प्रेरित करती है। उस चेतन शक्ति की संपूर्ण जानकारी तो नहीं मिल पाई है लेकिन यह निश्चित है कि मृत्यु के बाद भी उस चेतना का अस्तित्व बना रहता है।’’

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-October
चिंतन करता है। नश्वर शरीर के लिए वह अपनी क्षमताएँ नष्ट नहीं करता, वरन् सत् की खोज, चित् की स्वीकारोक्ति व आनन्द की अनुभूति में अपने जीवन का सदुपयोग कर परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-May
चिंतन आमूलचूल बदल गया। चिंता एवं निराशा को मन से निकाल फेंका, उसने मन में अच्छे विचारों को जगह देने का संकल्प लिया।
चिंतन ही सद्कर्म तथा स्वस्थ शरीर को जन्म देते हैं, यह एक अनुभूत अकाट्य सत्य है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-September
चिंतन क्षमता समाप्त हो जाये, नागरिक कर्तव्यों की छोटी-छोटी बातों का उसे ध्यान न रहे, उसकी स्थिति गयी बीती हो जाती है। जीवित होते हुए भी मृतवत् वह अपनी लाश ढोता है। डिप्रेशन, न्यूरोसिस, साइकोसिस, ऐसे रोग हैं, जिनमें शारीरिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ होते हुए भी मनुष्य का अस्तित्व नहीं के बराबर होता है। एक बेचारा, जो सारा दोष परिस्थितियों को देता रहता है। किसी तरह अपनी जीवन की गाड़ी चलाता रहता है, वह दार्शनिक दृष्टि से मृत्यु की ओर अग्रसर होता माना जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-January
चिंतन और स्वतंत्र कर्तृत्व अपना कर महामानवों जैसी वरिष्ठता का मार्ग अपनाया। ऐसे ही लोग प्रकाश स्तंभ ही तरह उफनते समुद्र में भी अपना सिर उठायें- अस्तित्व बनाये रहते हैं। उधर से निकलने वाले जलयानों में डूबने से बचा सकने वाला मार्ग-दर्शन कर सकना इन्हीं के भाग्य मे बदा होता है। मानवता ऐसे ही नर-रत्नों को जन्म देकर कृत-कृत्य होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-February
चिंतन करके प्राप्त करते हैं, दोनों ही अवस्थाओं में उसकी सूक्ष्मता तक पहुँचना अनिवार्य है। शास्त्रकार ने श्वेताश्वेतरोपनिषद् में बताया है-
चिंतन और किसी भी अभ्यास द्वारा यदि मन की विचारणाओं के सामान्य धरातल से ऊपर उठाकर आकाश में घुमाया जा सके तो वह भूत और भविष्य की अनेक घटनाओं को बेतार के तार के संदेश की तरह प्राप्त कर सकता है। न्यू फ्रंटियर्स आफ माइंड’ नामक पुस्तक में उन्होंने ऐसी अनेक घटनाओं का विवरण भी दिया है, जो उक्त कथन की सत्यता प्रतिपादित करती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-August
चिंतन मनन के तथ्य को प्रसुप्त स्थिति में ही पड़ा रहने दे, आस पास की परिस्थितियों पर नजर ही न डाले और उनसे कुछ अनुभव ही संचित न करें, तो मस्तिष्कीय क्षमता का विकास अपने आप कहाँ विकसित होने वाला है।
चिंतन नियोजित किया है व इसी धुरी पर युगान्तर कारी साहित्य सृजा है। तुम उसी धुरी पर चलते रहना, बस देखते ही देखते दस वर्षों में जमाना बदल जायेगा।
चिंतन स्वभाव एवं क्रिया कलाप लगभग वैसे ही होते हैं जैसे की उस प्रदेश में रहने वालों के। बहुमत का दबाव पड़ता है तो अल्प मत अनायास ही बहुतों का अनुकरण करने लगता है। समय का प्रभाव युग का प्रवाह इसी को कहते हैं। सर्दी गर्मी का मौसम बदलने पर प्राणियों के, वनस्पतियों के, पदार्थों के रंग ढंग ही बदल जाते हैं।
चिंतन प्रधान पुस्तक से आरंभ कर जीवन जीने की कला के व्यवहारिक अध्यात्म तथा धर्मतंत्र से लोक शिक्षण व लोक जन से लोक मंगल के स्वरूप से लेकर गायत्री के तत्वज्ञान के पुण्य परमार्थ प्रधान शिक्षण द्वारा एक व्यापक समुदाय को मथा जिसकी संख्या करोड़ों में आँकी जा सकती है। वे अखण्ड ज्योति के अपनी प्राण ऊर्जा का प्रवाह बताते रहें, मात्र तीन उँगलियों व कलम से लिखी जाने वाली एक पत्रिका मात्र नहीं। इस अखण्ड ज्योति का वस्तुतः मत्स्यावतार की तरह विस्तार न हुआ व संदेश नहीं मैं स्वर्ग लोक को लाओ वाला कैपशन लेकर प्रकाशित प्रारंभिक पत्रिका जो 250 मात्र थी बढ़ते बढ़ते आज चार लाख से अधिक हिंदी व इतनी ही अन्य भाषाओं में (गुजराती, उड़िया, बंगाली, मराठी, तमिल, तेलगू) प्रकाशित हो अस्सी लाख पाठकों तक पहुँच रही है। अध्यात्म प्रधान चिंतन में यदि इतने व्यक्ति आज के कलियुग माने जाने वाले युग में भी रुचि लेते हैं न उनका स्वाध्याय कर पाने पर कुछ अभाव सा महसूस करते हैं तो यह चिन्ह पूज्यवर के उस आशावादी दर्शन का द्योतक है। जिसमें वे कहते थे मूलतः मनुष्य आदर्शवादी हैं व उसे अंत में वही बना रहेगा।
चिंतन को उछालने वाले श्रेष्ठ स्तर के साहित्य का सृजन संभव हो सका। यही प्रेरणा उनने अपने पास कार्य करने वाले - सीखने वाले साधकों को भी दी। जिनने उस दिनचर्या को अपनाया, उनका निज का व्यक्तित्व तो परिष्कृत हुआ ही, उनके माध्यम से मार्ग दर्शन का एक तंत्र विकसित होता चला गया।
चिंतन मनन किया, उसका साराँश यह निकला कि बहुत सारा विस्तार ज्ञान हैं, बहुत सारा विस्तार धर्म और अध्यात्म है लेकिन इसके सार में तीन चीजें समान हुई है (1) आस्तिकता अर्थात् ईश्वर का विश्वास (2) आध्यात्मिकता अर्थात् स्वावलंबन, आत्म बोध, और अपने आपको परिष्कृत करना अपनी जिम्मेदारियों को स्वीकार करना और (3) धार्मिकता अर्थात् कर्तव्य परायणता। कर्तव्य परायणता, स्वावलंबी और ईश्वर परायण कोई भी व्यक्ति गायत्री मंत्र का उपासक कहा जा सकता है और गायत्री मंत्र के ज्ञान पक्ष के द्वारा जो शाँति और सद्गति मिलनी चाहिए उसका अधिकारी बन सकता है। हमारे जीवन का यही निष्कर्ष है विज्ञान पक्ष में तीन धारायें और ज्ञान पक्ष में तीन धारायें, इनको जो कोई प्राप्त का सकता हो गायत्री मंत्र की कृपा से निहाल बन सकता है और ऊँची से ऊँची से स्थिति प्राप्त करके इसी लोक में स्वर्ग और मुक्ति का अधिकारी बन सकता है। ऐसा हमारा अनुभव ऐसा हमारा विचार और ऐसा हमारा विश्वास है।
चिंतन मनन, स्वाध्याय में अपना जीवन क्यों खपा देते?
चिंतन काम नहीं करता, वे ही हवा के झोंके के साथ उड़ने वाले तिनके पत्ते का उदाहरण बनते हैं। सामान्यजनों को वातावरण ही घसीट-घसीटे फिरता है और उस प्रभाव से प्रभावित होकर वे अनिच्छित भवितव्यता के चंगुल में फंसते हैं। इसलिए वातावरण की प्रबलता को स्वीकार करते हुए भी यह मानना पड़ता है कि मानवी विवेक और मनोबल सर्वोपरि है। वह वातावरण के प्रभाव को ग्रहण तो करता है पर यह भी संभव है कि वह उसे अस्वीकार कर दे और जो उचित है उसे करे। यह स्वतंत्र चिंतन ही वस्तुतः भाग्य का निर्माता है अन्यथा जिस नियति को सामान्य जनों द्वारा अपनाया जाता है वही अपने गले भी बँधती है।
चिंतन चरित्र और व्यवहार में उच्चस्तरीय परिवर्तन प्रस्तुत करती है। यह मनुष्य को देवस्तर में बदलने वाला कायाकल्प ही भगवद्भक्ति का यथार्थ रूप है।
चिंतन को दिशा देने की सरल, सुबोध और सर्वोपयोगी प्रक्रिया है। भारतीय तत्त्ववेत्ताओं का प्रतीकवाद की स्थापना में यही प्रयोजन रहा कि ब्राह्मीय चेतना में सन्निहित मानवी गरिमा को समुन्नत करने वाली सत्प्रवृत्तियों की महत्ता मनुष्य को समझायी जाय और उसके प्रति असीम श्रद्धा रखने के लिए कहा जाय। देव प्रतिमाएँ भावात्मक उत्कृष्टता की प्रतीक है। देवत्व की परिधि में जो भी गुण, धर्म, स्वभाव आते हैं। उन सभी को आकृतियाँ देकर कल्पनात्मक रहस्यवाद का परिचय दिया गया है।
चिंतन के कारण त्रास देती है। धन निर्वाह के लिए चाहिएं सो कम साधनों में चला जाता है। मुट्ठी भर अन्न से पेट भरता है। उतनी कमाई कुछ घण्टे श्रम से हो सकती है, बहुमूल्य आहार से पोषण मिलता है। यह मान्यता भ्रम पूर्ण है।
चिंतन मनन न्यूनतम पंद्रह मिनट तो करना ही चाहिए।
चिंतन और चरित्र का स्तर ऊँचा उठाना पड़ता है। उन लोगों से बचना पड़ता है जो कुमार्ग अपना चुके हैं और किसी गर्त में गिरने जा रहें हैं। उचित और अनुचित भले और बुरे में जो अपने को अभीष्ट हो पहचानना और अपनाना होगा। ’मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। ‘इस कथन का अभिप्राय यह भी है कि अच्छे की तरह बुरा भविष्य भी बनाया जा सकता है।
चिंतन के आदान प्रदान का साधन बन जाते हैं। प्रतीक पूजा की प्रतीकवाद की उपयोगिता इस आधार पर सहज ही समझी जा सकती हैं
चिंतन में यदि इतने व्यक्ति आज के कलियुग माने जाने वाले युग में भी रुचि लेते हैं न उनका स्वाध्याय कर पाने पर कुछ अभाव सा महसूस करते हैं तो यह चिन्ह पूज्यवर के उस आशावादी दर्शन का द्योतक है। जिसमें वे कहते थे मूलतः मनुष्य आदर्शवादी हैं व उसे अंत में वही बना रहेगा। विचार की स्पष्टता, शैली में रोजमर्रा के प्रयोग किये जाने वाले शब्दों से लेकर शुद्ध संस्कृत के शब्द कई नयी संधियों के साथ नये शब्दों की संरचना, भावना का अविरल प्रवाह एक सुनियोजित उद्देश्य की और को मोड़ता प्रतिपादन यह पूज्यवर की जादू भरी लेखनी की विशेषता है। एक बार का प्रसंग है कि ब्रह्मवर्चस के कार्य कर रहे एक सज्जन अनगिनत तर्कों व प्रमाणों के साथ नास्तिक वाद का खण्डन करने वाला एक लेख पूज्यवर के पास लाए। उनकी दृष्टि ये यह उनका सर्वश्रेष्ठ लेख था।
चिंतन ही वस्तुतः भाग्य का निर्माता है अन्यथा जिस नियति को सामान्य जनों द्वारा अपनाया जाता है वही अपने गले भी बँधती है।
चिंतन और चरित्र की उत्कृष्टता भी गवा बैठते हैं और फूहड़पन की रीति नीति अपनाये रहने के अभ्यस्त हो गये है। ण्सा कुछ प्रकाश पुँज समीप में उगता नहीं, जो शालीनता ओर जागरुकता के समानान्तर शिक्षा देकर प्रगति शीलता अपनाने के लिए प्रेरित कर सकें। ऐसी दशा में ऐसी पुस्तकों का सहारा ना अनिवार्य हैं जो मनुष्य को सुसंस्कृत बनाने की दिशा में आगे बढ़ा सके।
चिंतन मस्तिष्क में पनप नहीं पाया।
चिंतन ज्ञानार्जन में है व ज्ञान की सार्थकता भगवद् भक्ति में है। जहाँ ये सभी मिल जायें व लेखनी इसकी सधी हुई दिशा में चले वहाँ जिस उच्चस्तरीय साहित्य का सृजन होगा, उसे पढ़कर कौन ऐसा होगा, जो प्रभावित न हों?
चिंतन को॥ आस पास सद्गंध बखरे, अपने मन का वतास॥
चिंतन से जूझना है। यही इस युग का सबसे बड़ा संग्राम है। आज दर्शन को प्रत्यक्षवाद के विषाक्त कर दिया है। यदि यह दर्शन प्रवाह उलटा न गया तो मनुष्य को यह पशु बनाकर रहेगा। इस युग संकट से जूझना ही मनीषा का काम है वह काम अखण्ड ज्योति को ही करना है।
चिंतन शक्ति नियोजित रखी जाये। मुनि, मनीषी, ज्ञानी, वैज्ञानिक, विद्वान, महामानव, इस विचार संयम साधना को अपना कर ही उत्कृष्टता के उच्च शिखर तक पहुँचते हैं।
चिंतन और प्रयास नियोजित किये रहते हैं। इस सीमित परिधि में जीवनचर्या को सीमित नहीं रखना चाहिए। अपने को समाज का अंग मानना चाहिए और समाज के एक अविच्छिन्न घटक के रूप में अपनी सत्ता की परिकल्पना करनी चाहिए। इसे स्वार्थ को परमार्थ में भी घुलना कह सकते हैं। समष्टि में व्यष्टि का विलयन भी ईश्वर को विराट् विश्व के रूप में मूर्तिमान देखा जाये।
चिंतन की मूल धुरी बनाया है। हम आशावादी है। भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल है। 21 वीं सदी का मतलब है आदर्शवाद पर विश्वास, आशावादी साहस। औरों का यूटोपिया काल्पनिक रहा होगा, हमार नहीं हैं।
चिंतन-मनन दर्शन या निदिध्यासन की बारी आती है।
चिंतन, मनन किया जाय। साथ ही अपने संपर्क क्षेत्र में सुधार कार्य जारी रखा जाय। सत्प्रवृत्ति संवर्धन का सेवा कार्य किसी न किसी रूप में कार्यान्वित ही करते रहा जाय। इतना करने पर ही मन को स्वच्छ, निर्मल व स्वयँ को प्रगति के पथ पर अग्रगामी बनाये रखा जा सकता है।
चिंतन प्रधान नहीं, अनुभूति प्रधान है। यह अनुभूति धार्मिक आदर्शों के धारण से ही संभव है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-December
चिंतन के इस आदर्श को कतिपय पश्चिमी दार्शनिकों ने भी स्वीकारा है। जर्मन दार्शनिक इमानुएल काण्ट ने अपनी रचना “क्रिटिक देर रिनेन वरनुफ्ट” में कहा है कि समूचा दर्शन तीन सवालों के इर्द-गिर्द घूमता है। ये सवाल है ‘मैं क्या जान सकता हूँ ? मुझे क्या करना चाहिए ? मैं किसकी उम्मीद कर सकता हूँ ?
चिंतन को उलट कर सीधा किया जाय। दिशा भूल को एक ने नहीं अपने-अपने ढंग से, अपने-अपने क्षेत्र में अधिकांश ने अपनाया है। इसके लिए व्यापक विचार क्राँति की आवश्यकता है। हर हाथ में यह कसौटी देनी होगी कि वह औचित्य अनौचित्य की कसौटी पर खरा उतरे, उसी को अपनाये। हर मनुष्य को ऐसी टार्च चाहिए ताकि इस घोर अंधियारी की अमावस्या में वह सही वस्तु को सही रूप से देख और अपना सके।
चिंतन करते-करते ही व्यतीत हो जाय। विचार करना उचित है, किंतु विचारों ही में निरंतर डूबे रहना और कार्य न करना, हमें मानसिक रूप से आलसी बना डालेगा। इसी प्रकार दो विरोधी गुणों में से किसी एक को जीवन में इतना प्रश्रय न दिया जाय कि व्यक्तित्व एकमुखी और एकाँगी बन जाय। यह भी असंतुलन दर्शाता है। संतुलित अवस्था वह है, जिसमें दोनों गुणों का पूर्ण विकास हो।
चिंतन की दिशाधारा मनुष्य के उत्कर्ष या अपकर्ष में महती भूमिका निभाती है। जो शक्तियों के उद्भव को प्रगति की दिशा में आगे नहीं बढ़ने देते, वे सड़े दलदल की तरह बदबू, काई, कीचड़ बन जाते हैं। भारतीयों पर जो अघटित घटित हुआ है। उसके संबंध में भी कुछ ऐसा ही सोचा जा सकता है। चिर पुरातन के सतयुगी वातावरण का अवगाहन करने पर प्रतीत होता है कि आज की तुलना में कहीं अधिक अभावग्रस्त स्थिति रहने पर भी स्वरूप साधनों से काम चलाते हुए लोग हंसी-खुशी के साथ उत्थान-अभ्युदय की ऐसी अवस्था प्राप्त कर लेते थे जिसकी प्रक्रिया देखते हुए उन्हें देवात्मा कहा जाता था, उन दिनों के वातावरण को सतयुगी कहा जाता है।
चिंतन उनके लिए जितना घातक होता है, उतना कदाचित् और कोई विघातक सिद्ध नहीं होता।
चिंतन एवं कार्यक्रम बनाने, संगठित प्रयत्नों का ढाँचा खड़ा करने के लिए एक प्रकार से कुछ किया ही नहीं ! जो किया गया वह मात्र बड़े आदमियों के काम का था। उन्हीं की क्षमता-सुविधा बढ़ाने वाला था। सर्व-साधारण की तो आवश्यकता की उपेक्षा ही बन पड़ी। हम सब विडंबनाओं के बीच ही अधर में झूलते रहे।
चिंतन शक्ति एवं संकल्प शक्ति को शिथिल करते हुए वहाँ लगे तेजस् को अचेतन में नियोजित किया जाता है, तभी अनुपम दिव्यताएं प्रकट होना शुरू होती हैं। योग और लय का आश्रय लेकर अचेतन को कुसंस्कारों से मुक्त कराने की दिशा में जो जितनी अधिक प्रगति करता है, वह उतना ही समर्थ सिद्ध पुरुष कहा जाता है। यही योग का उद्देश्य है।
चिंतन, समय, श्रम, मनोयोग सृजन प्रयोजन में लगाना चाहिए और उस पक्ष पर अधिक ध्यान देना चाहिए, जिसमें हाथ में लिए कारोबार को सार्थक-समृद्ध अधिक सफल बनाने के लिए सहभागियों और सत्परामर्शदाताओं के साथ अधिक संपर्क रखना चाहिए। हमें किससे बदला लेना, कौन अपनी क्या क्षति पहुँचाने वाला है, इस विषय पर मोटी दृष्टि रखनी चाहिए, पर अधिक ध्यान नहीं देना चाहिए। हानि की आशंकाएं कभी-कभी ही सामने आती हैं किंतु सृजन संवर्धन के संबंध में किया गया चिंतन ऐसे द्वार खोलता है, जिससे अपना गौरव बढ़े और जो काम हाथ में लिया गया है, उसमें प्रगति होती रहे। चिंतन की धारा विधेयात्मक होनी चाहिए। निषेधात्मक पक्ष में सोचते रहने वाले ओछे व्यक्तियों के साथ संबंध बढ़ाने वाले पाते तो कुछ नहीं, हानि होने के सरंजाम जुटाते रहते हैं।
चिंतन को विकसित कर व्यवहार को उन्नत बनाता है बल्कि उसके आगे बढ़ने में भी सहायक है। मानव मन की एक विशेषता है कि वह वर्तमान में बँध कर नहीं रह सकता, स्थिति विशेष उसे संतोष नहीं देती। वह भविष्य को सोचना चाहता है, आगे बढ़ने में इसे सुख मिलता है। प्रगति की, विकास की यह लालसा उसकी प्रकृति में समाहित है। प्रसिद्ध चिंतक द्वय सतीश चन्द्र चटर्जी व धीरेन्द्र मोहन दत्त ने अपनी किताब “एन इन्ट्रोडक्षन टू इण्डियन फिलॉसफी” में इसी तथ्य को समझाते हुए कहा है कि ज्ञान का लक्ष्य सिर्फ बौद्धिक कौतूहल की तुष्टि नहीं है।
चिंतन करते-करते जीवन समस्या का रहस्य पाना चाहिए।
चिंतन हमारे व्यवहार का निर्माता है। यदि चिंतन ठीक न हो तो अच्छा-भला व्यवहार कर पाना संभव नहीं हो पाएगा। दर्शन न सिर्फ चिंतन को विकसित कर व्यवहार को उन्नत बनाता है बल्कि उसके आगे बढ़ने में भी सहायक है। मानव मन की एक विशेषता है कि वह वर्तमान में बँध कर नहीं रह सकता, स्थिति विशेष उसे संतोष नहीं देती। वह भविष्य को सोचना चाहता है, आगे बढ़ने में इसे सुख मिलता है।
चिंतन को बढ़ाना, जीवन साधना के द्वारा आत्मतत्व का जो परिचय अथवा साक्षात्कार हुआ हो, उसी को परिपक्व और दृढ़ करते जाना।” यह है जीवन के संध्याकाल की साधना।
चिंतन ऐसे द्वार खोलता है, जिससे अपना गौरव बढ़े और जो काम हाथ में लिया गया है, उसमें प्रगति होती रहे। चिंतन की धारा विधेयात्मक होनी चाहिए। निषेधात्मक पक्ष में सोचते रहने वाले ओछे व्यक्तियों के साथ संबंध बढ़ाने वाले पाते तो कुछ नहीं, हानि होने के सरंजाम जुटाते रहते हैं।
चिंतन संपदा में इन्हीं, की चर्चा है। मनुष्य और विश्व के बीच मनुष्य और प्रकृति के बीच क्या संबंध हैं ? इन्हें कैसे अच्छी तरह निभाया जाय ? जिंदगी का उद्देश्य क्या है ? इन्हीं सवालों पर अलग-अलग पहलुओं से विचार किया गया है।
चिंतन विधि है जिसके लिए आसन, प्राणायाम आदि की शारीरिक-मानसिक प्रक्रियायें अपनाई जाती हैं। ध्यान-धारणा से मस्तिष्कीय अस्तव्यस्तता और बिखराव पर नियंत्रण पाया जाता है साथ ही साथ अचेतन मन की गहन परतों में दबी पड़ी विभूतियों को उभारा जाता है। इस अभ्यास में तरह-तरह की आकर्षक प्रतिभायें सामने रखकर अथवा उन्हें भावना क्षेत्र में बिठाकर उनके साथ एकाग्रता जोड़ने का अभ्यास किया जाता है। अध्यात्म साधना की यह एकाग्रता संपादन प्रक्रिया मस्तिष्क को साधने की दिशा में एक अत्यंत छोटा सा प्रयास मात्र है। समग्र आध्यात्मिक प्रगति तभी संभव हैं जब अपनी चेतना को विश्व चेतना का घटक मानकर स्वार्थ को परमार्थ में विकसित किया जाय।
चिंतन को परिष्कृत करने में जितनी सहयोगी बनती है, उसकी तुलना में उन पर किये जाने वाला खर्च बहुत ही कम होता है। उपयोगी पुस्तकों के अध्ययन को आजीविका उपार्जन के समान ही महत्व देना चाहिए। उपयोगी से तात्पर्य यह है कि मात्र मनोरंजन करने वाली और कुत्साएँ भड़काने वाले साहित्य से। विषैले पदार्थों की तरह उनसे बचा ही जाना चाहिए, उन्हें पढ़ने की अपेक्षा न पढ़ना ही अच्छा। गंदे उपन्यास, कामुकता, भड़काने वाले साहित्य आजकल बहुत हैं।
चिंतन एवं क्रियाकलापों को भी बदलना पड़ता है। नई ढंग की, नई सुविधा देने वाली मशीनें बाजार में आ जाने से पुराने ढर्रे को अपनाये रहने वाले पिछड़ जाते हैं। इसलिए समय के साथ चलने में ही भलाई समझी जाती है। लोगों की सोच और आवश्यकताएं बदलती रहती हैं। ऐसी दशा में पुराने ढर्रे पर अड़े रहने की अपेक्षा भलाई है कि समय की माँग के अनुरूप आवश्यक परिवर्तन करते रहा जाय।
चिंतन-परक, नैतिक, आध्यात्मिक जो भी समस्यायें होती थीं, उनका समाधान करने के लिए वे लोग एकत्र होते थे जिन्हें हम धार्मिक कह सकते हैं। उनके भी आयोजन होते थे। उन आयोजनों का ही नाम था वाजपेय यज्ञ। (एक लाइन मिसिंग है)डडडडडडडडडडडडडडड किया था और उसमें चार लाख आदमी आये थे और पाँच दिन ठहरे थे। पाँच दिन में 40 लाख आदमियों को भोजन कराया 50 लाख रुपये खर्च हुए थे-40 लाख भोजन में और 10 लाख अन्यान्य व्यवस्थाओं में।
चिंतन कर अपने रास्ते को तय करना चाहिए।
चिंतन का प्रमुख विषय रहना चाहिए। हम मौत को भूले रहते हैं और बहुमूल्य जीवन संपदा को अनुपयुक्त ढंग से गँवा कर चलते समय पश्चाताप करते हैं और पापों का पोटला सिर पर बाँधकर उनका दुष्परिणाम भुगतने के लिए विवश होते हैं। यदि मृत्यु का ध्यान बना रहे तो मनुष्य नारकीय यंत्रणाएँ देने वाली दुष्प्रवृत्तियों से बचा रह सकता है। यह दो कृत्य नियमित रूप से चलें और उनमें गंभीरता रहे तो मनुष्य की जीवनचर्या ऐसी सुँदर और शानदार ढंग से चलती रह सकती है। जिसे सुँदर और शानदार बनाया जा सके।
चिंतन, मनन एवं स्वाध्याय को ताक पर रख दिया। अंधी भेड़ों की तरह जिस किसी तरह आड़ा तिरछा चलने में विश्वास करने लगे। ऐसी स्थिति में अवगति स्वाभाविक है। यदि किसी ने ठीक पगडंडी का चुनाव कर उस पर चलना शुरू कर दिया है तो उसे मंजिल जरूर मिलेगी। हो सकता है इसमें थोड़ी देर सबेर हो जाय, पर जिसकी कोई पगडंडी नहीं, बस यूँ ही घने जंगल में भटक रहा है, उसके पल्ले थकान के अलावा कुछ नहीं हाथ लगेगा, भले ही उसने कितनी ही भाग-दौड़ क्यों न की हो ?
चिंतन किया था। हिंदुत्व-हिंदू धर्म-देवसंस्कृति पर अपने विचार रखने वाले स्वामी विवेकानंद को सारे विश्व ने इस धर्म संसद के बाद ही पहचाना व जाना था उनके माध्यम से इस संस्कृति के मूल तत्वों व महानतम आदर्शों को।
चिंतन और कर्तृत्व को उत्कृष्ट बनाना ही आध्यात्मिक प्रगति है। इससे कम कुछ भी नहीं। सही दिशा में चलने पर मनुष्य में देवत्व के उदय की प्रक्रिया का प्रारंभ अनिवार्य है। योग वस्तुतः एक भाव विज्ञान है, जो जीव को ब्रह्म से चिर मिलन की भाव-भूमिका की ओर ले जाता है। लघु को महान बनाने की यह विद्या है।
चिंतन, मनन, और दोहन के फल स्वरूप जो कुछ भी सार हम पा लेते हैं, उसी को भविष्य की दुनिया के लिए एकत्र करके दे देना यह सबसे बड़ा कर्तव्य, पुरुषार्थ हो जाता है। शांति, समाधान, संतोष, प्रसन्नता और सर्वतोभद्रता यही होना चाहिए उस अवस्था का वायु मंडल। ऐसी अवस्था प्राप्त होने पर जीवन स्वामी जगदीश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव हृदय में उदय होता है और ऐसी कृतज्ञता के कारण प्रसन्नता बढ़ती है तथा पाया हुआ जीवन का सार सर्वस्व घनिष्ठ होता है। इस संसार से बिदा होने की यह कितनी सुँदर तैयारी है।
चिंतन और सचेतन क्षेत्र शिथिल रहता है। इसी का लाभ उनके अचेतन को मिलता है। कुत्तों की घ्राण शक्ति अति सूक्ष्म होती है। चमगादड़ के ज्ञानतंतु राडार क्षमता से संपन्न होते हैं। ह्वेल मछली का अचेतन मस्तिष्क भी बहुत क्रियाशील होता है और उसके शरीर में पनडुब्बियों की सभी विशेषतायें पायी जाती हैं।
चिंतन को दिशा देने वाले मनीषी थे। बाकी हर आदमी स्वयं अपना विश्लेषण कर जीवन को सही मार्ग में ले जाने के लिए खुद विचार करता है। सोच-समझ कर काम करने को श्रेष्ठता की मान्यता प्रदान की गई थी। यही कारण है यहाँ के वैभव, जिंदगी जीने की रीति-नीति, को आश्चर्य की दृष्टि से देखा जाता था। यूनानी इतिहासकारों ने भारतवासियों को “दार्शनिकों की जाति” कहकर संबोधित किया था।
चिंतन की धारा विधेयात्मक होनी चाहिए। निषेधात्मक पक्ष में सोचते रहने वाले ओछे व्यक्तियों के साथ संबंध बढ़ाने वाले पाते तो कुछ नहीं, हानि होने के सरंजाम जुटाते रहते हैं।
चिंतन में विकृति घुस पड़ने पर भी खीज और उदासीनता का दौरा पड़ता है, भविष्य में क्या होने वाला है, किसी को पता नहीं, फिर उसे अनुपयुक्त मानकर अपने आपको चिंता, निराशा, भय, आशंका के गर्त में क्यों धकेला जाय ? अगले दिनों सफलतायें मिलने, सहयोग उपलब्ध होने और उन्नति के अवसर आने की विधेयात्मक कल्पनायें करते रहने में ही क्या हर्ज है। वे फलित होती हैं तब तो ठीक अन्यथा उनकी कल्पना तो तात्कालिक आनंद प्रदान करती ही है।
चिंतन ठीक न हो तो अच्छा-भला व्यवहार कर पाना संभव नहीं हो पाएगा। दर्शन न सिर्फ चिंतन को विकसित कर व्यवहार को उन्नत बनाता है बल्कि उसके आगे बढ़ने में भी सहायक है। मानव मन की एक विशेषता है कि वह वर्तमान में बँध कर नहीं रह सकता, स्थिति विशेष उसे संतोष नहीं देती। वह भविष्य को सोचना चाहता है, आगे बढ़ने में इसे सुख मिलता है। प्रगति की, विकास की यह लालसा उसकी प्रकृति में समाहित है।
चिंतन कैसा होगा, व्यक्ति का, समाज का, राष्ट्र का और विश्व का चिंतन कैसा होगा ? यह सारी की सारी प्रेरणायें गायत्री के उस बीज मंत्र से मिलेंगी जो चिरपुरातन और चिरनवीन है। चिरपुरातन और चिरनवीन का ऐसा संयोग कदाचित ही कहीं मिलेगा। नवीनतम युग और प्राचीनतम संस्कृति दोनों का समन्वय करने के लिए हम बहुत महत्वपूर्ण प्रयत्न कर रहे हैं। आप उसमें सम्मिलित हो रहे हैं, यह अधिक खुशी की बात है।
चिंतन करना चाहिए कि आज हमारा नया जन्म हुआ है। यह एक दिन के लिए ही है। इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करना चाहिए। इसके लिए सोते समय तक की ऐसी दिनचर्या बना लेनी चाहिए कि आवश्यक विश्राम को छोड़ कर सारा दिन व्यस्तता में बीते और उसमें शरीर यात्रा के साँसारिक कार्य ही नहीं आत्मोत्कर्ष के निमित्त परमार्थ प्रयोजनों के लिए भी स्थान रहे।
चिंतन कैसा होगा ? यह सारी की सारी प्रेरणायें गायत्री के उस बीज मंत्र से मिलेंगी जो चिरपुरातन और चिरनवीन है। चिरपुरातन और चिरनवीन का ऐसा संयोग कदाचित ही कहीं मिलेगा। नवीनतम युग और प्राचीनतम संस्कृति दोनों का समन्वय करने के लिए हम बहुत महत्वपूर्ण प्रयत्न कर रहे हैं। आप उसमें सम्मिलित हो रहे हैं, यह अधिक खुशी की बात है।
चिंतन अपना अंतरंग सखा, मित्र, सुहृद सभी कुछ है। जो हमें अपने प्रकाश के व्यावहारिक जीवन की अँधेरी और भू-भुलैयों से भरी राहों में मार्गदर्शन देता है और आगे बढ़ाता है। मनुष्य होने के नाते उचित यही है। कि तत्संबंधी सारी भ्राँतियों से उबर कर इसे स्वीकारा अपनाया और समझदारी का जीवन जिया जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-April
चिंतन करने, अहंकार का चिन्तन करने, वासनाओं का चिन्तन करने, बेकार की बातों का चिन्तन करने की अपेक्षा, अपने चिन्तन करने की जो सामर्थ्य है। उस सारी की सारी सामर्थ्य को भगवान के निमित्त लगा दो। उनकी खेती में बोओ, यह तुम्हारी बुद्धि सौ गुनी होकर तुमको मिल जायेगी।
चिंतन और चरित्र को प्रभावित करता है और व्यक्तित्व के स्तर को गिराता है। इसलिए अध्यात्म मार्ग पर पदार्पण करते हुए प्रथम प्रयास यह पूरा करना होता है कि इन्द्रियों में प्रधान मानी जाने वाली जिह्वा की ललक लिप्सा को नियोजित किया जाय। इतना बन पड़ने पर अन्य इन्द्रियाँ भी कुमार्ग अपनाना छोड़ती चली जाती हैं। सप्ताह में एक दिन स्वस्थता को सुरक्षित रखने वाला प्रथम नियम है। इससे मनोनिग्रह में भी सरलता बन पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-November
चिंतन का क्रम प्रारंभ हो जाता है कि काश। हम भी दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाये होते और संभावनाओं को देखते हुए अपने क्रिया-कलापों में परिवर्तन पहले से किये होते तो महत्वपूर्ण श्रेय-सौभाग्य से वंचित भी न होते और दुःखद संभावनाओं से भी बच निकलने का रास्ता मिल गया होता।
चिंतन करके कोई भी अपनी वर्तमान परिस्थितियोँ के अनुरूप उपयुक्त मार्ग दर्शन प्राप्त कर सकता है। साथ ही उसे मौलिकता का गुण भी हस्तगत हो सकेगा।
चिंतन ही चरित्र एवं व्यवहार का उद्गम स्रोत हैं। इस क्षेत्र की प्रखरता ही अन्य दोनों को भी उत्कृष्ट एवं पवित्र बनाती है, इस महत्ता पर ध्यान न दिये जानें के कारण ही इसके स्वातंत्र्य व निर्मलता पर प्रायः ध्यान नहीं दिया जाता है।
चिंतन घूमता रहता है। शास्त्रकारों ने इसे ही पुत्रेषणा, वित्तैषणा और लोकेषणा कहकर इससे उबरने को कहा है। आत्मोत्कर्ष के मार्ग में यही प्रधान बाधाएँ हैं। जन सामान्य में व्याप्त राग, द्वेष, कलह, कटुता इन्हीं में जकड़े रहने का परिणाम है। जब तक इस संकीर्णता से मुक्ति न मिले मनुष्य जैसा देव दुर्लभ जीवन कौड़ियों के मोल बिकता है।
चिंतन चेतना के क्षेत्र में उसने मनोविज्ञान के रूप में आधिपत्य जमाया है, तो यह उसी का दायित्व बन पड़ता है कि चेतना विज्ञान के सूत्रों पर प्रयोग अनुसंधान करके उसे वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करे। ऐसे साधन जुटाये, समस्त उपाय आविष्कृत करे जिनको प्रयुक्त करने से मानवी काय संरचना तथा मनः संस्थान की प्रसुप्त क्षमताएं उभारी जा सकें तथा व्यक्ति को वर्तमान से कहीं अधिक सक्षम, समर्थ एवं असाधारण बनाया जा सके।
चिंतन के लिए व्यक्ति को महान चरित्र व नैतिक बल का स्वामी होना अनिवार्य है। क्योंकि चरित्रहीन एवं अनैतिक व्यक्ति के मन, प्रतिभा व बुद्धि सभी निर्बल व रुग्ण होते हैं। ऐसे लोगों में उन्नत विचारों का क्षेत्र बंजर प्रायः होता है। इसी कारण चारित्रिक दृढ़ता व मन की सबलता अनिवार्य है। जिस तरह वेगवती गंगा को धारण करने के लिए शिव जी सदृश सामर्थ्यवान व्यक्तित्व की आवश्यकता पड़ी।
चिंतन’युगपुरुष “संजीवनी साधना ‘तथा भारत के अश्वमेधों की वीडियो फिल्में दिखाया जाना 9 जुलाई को प्रातः से ही आरंभ हो गया था। प्रदर्शनी सभी के आकर्षण की मूल बिंदु थी। लंबी-लंबी लाइनें लगी थीं ताकि सभी क्रम से अंदर जाकर अनुशासित ढंग से अध्यात्म के विज्ञान सम्मत प्रतिपादन को देख समझ सकें प्रायः सौ परिजनों ने भोपाल’भारत’से आए श्रीदत्तात्रेय एम. जोशी के सहायक के रूप में पिछले चार-पाँच दिन से रात-दिन लग कर यह विशाल प्रदर्शनी खड़ी की थी कैप्शन्स लिखे थे एवं लगभग एक हजार चित्रों, ट्राँसपेरेसी तथा वैज्ञानिक उपकरणों-माडल्स के सहारे देवसंस्कृति का आमूलचूल एक नया ढाँचा खड़ा कर दिया था। वैज्ञानिक चार्ट्स के द्वारा सभी यह देख-समझ रहे थे कि ब्रह्मवर्चस् की शोध में किस किस क्षेत्र में साधकों को क्या-क्या लाभ मिले हैं। ब्रिटिश लोगों के लिए ये आँकड़े तो आँख खोल देने वाले थे।
चिंतन की स्वतंत्र का नाम दिया गया है।
चिंतन यथास्थान बनें रहें निष्क्रिय बनें रहें यह हो ही नहीं सकता।
चिंतन के ऊँचे वाले स्तर को जो गड़बड़ा गया है-उसको ठीक कर लीजिये क्योंकि आज आदमी बुद्धिजीवी हो गया है। उसकी बुद्धि को हर क्षेत्र में पटक-पटक कर मारना है। जिस तरह धोबी कपड़े को पीट-पीट कर धुलाई करता है, वैसे ही अकल को पीट-पीट कर ठीक करना है। यह अकल का लिबास ओढ़ करके आदमी के दिमाग और जीवन पर हावी हो रही है, इसको पटक मारनी है जिससे इसको ठिकाने लगाया जा सके।
चिंतन करने से मन पर दूषित प्रभाव पड़ता है जिसकी परिणित शारीरिक रोगों के रूप में उभरती है। इसीलिए मनःचिकित्सक चिंतन, निंदा, चुगली, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, आवेश आदि के प्रसंगोँ से बचने की सलाह देते हैं। मन के भटकाव को रोककर यदि सही दिशा दी जा सके तो स्वास्थ्य की समस्या का समाधान तो होता ही है। साथ ही अन्य अनेकों, झगड़े, झँझट और वैमनस्य से भी बचा जा सकता है।
चिंतन की दिशा धारा विधेयात्मक हो।
चिंतन और कर्तृत्व एक ही दिशा में नियोजित रहने से अत्यधिक प्रखर और गतिशील हो उठता है। यही नहीं उसके साथ पवित्रता की ऐसी भावना सन्निहित रहती है, जो ध्येय को भौतिक प्रवंचनाओं से धराशायी होने से बचाती है।
चिंतन और विचार प्रक्रिया के लिए एक प्रकार का खाद है। इससे विचार हेतु नूतन आधार विकसित होते हैं। अवएव अध्ययन तथा विद्वानों-मनीषियों के साथ विचार विमर्श अवश्यमेव करणीय है। किन्तु पढ़ी हुई, सुनी हुई सभी बातों को ध्रुव सत्य मान कर बिना सोँचे-विचारे अनुकरण करने लगना भूल ही कही जायेगी। यह अंधानुकरण ही मानसिक दासता है।
चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार का स्वरूप निर्धारित किया जाता है। उसकी दृष्टि में यदि विश्वव्यापी दैवी चेतना के संदेशोँ को ग्रहण कर लिया जाय और तद्नुरूप सन्मार्ग पर अग्रसर होने का प्रयास भी चल पड़ें तो स्वास्थ संवर्धन के साथ ही समग्र प्रगति का द्वार भी खुल सकता है। आस्था ही वह मूल तत्व है जो परमात्मा सत्ता को सत्पात्र पर अपना प्यार बखेरने के लिए विवश कर देती है। इसे इस घटना के माध्यम से भी समझा जा सकता है।
चिंतन व विचार स्वातंत्र्य की साधना के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है अंतरात्मा की वाणी सुनना। आत्मा हमें निरन्तर अपना परामर्श देती रहती है। यदि इसे सुनने का प्रयत्न किया जाय, तो वैदिक ऋषियों के सदृश अपनी समस्याओं का समाधान निज के अंतराल में प्राप्त कर सकते हैं।
चिंतन ही मनन व निदिध्यासन है। इसी को चिंतन की स्वतंत्र का नाम दिया गया है।
चिंतन, निंदा, चुगली, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, आवेश आदि के प्रसंगोँ से बचने की सलाह देते हैं। मन के भटकाव को रोककर यदि सही दिशा दी जा सके तो स्वास्थ्य की समस्या का समाधान तो होता ही है। साथ ही अन्य अनेकों, झगड़े, झँझट और वैमनस्य से भी बचा जा सकता है।
चिंतन व मौलिक विचार ही विद्या है, जिसके द्वारा मानव मन अपना समाधान प्राप्त कर सकता है। जीवन की समस्याएं सुलझा सकता है। अपना सही मार्ग निर्धारित कर सकता है। हर नए पादप के लिए अनिवार्य है। कि अपनी जड़ों पर खड़ा हो।
चिंतन की दो विशेषताएं हैं -पहली भौतिकवादी और दूसरी अध्यात्मवादी। यदि चिंतन का प्रवाह वर्तमान स्तर का भौतिकवादी ही बना रहा और पहल जीवशास्त्रियों के हाथ रही तो नये सिरे से जीव-कोषों का ढालना आरंभ करेंगे जो अंतर्ग्रही परिस्थितियों में भी अपना निर्वाह कर सकें। वर्तमान मनुष्योँ की शारीरिक और मानसिक स्थिति को विज्ञान के आधार पर ऐसे मोड़ दिये जा सकते हैं। जो भावी परिस्थितियों के साथ सुविधापूर्वक तालमेल बिठाये रह सकें। उसका शरीर ही नहीं मन भी बदला जा सके, अब इतनी शक्ति विज्ञान के हाथों आ गयी है और वह उसका उपयोग समस्त मानव जाति के साथ सत्ताधीशों की सहायता से बलपूर्वक भी कर सकता है।
चिंतन का प्रवाह इस दिशा में है कि मनुष्य शरीर मात्र है और उसके लिए जितना सुविधा साधनों का बाहुल्य होगा, वह उतना ही सुखी एवं प्रसन्न होगा, पर यह मान्यता आँशिक रूप से ही सत्य है। यह भुला नहीं देना चाहिए कि मनुष्य की वास्तविक सत्ता उसकी चेतना में सन्निहित है। वह शरीर से भिन्न भी है। यदि जीवन तत्व शरीर से पृथक हो जाये तो मात्र अकेली काया सुख साधनों के बाहुल्य होने पर भी किसी प्रकार की अनुभूति न कर सकेगी। इतना ही नहीं, वह अपनी सत्ता भी देर तक यथावत् बनाये न रह सकेगी।
चिंतन अद्वैतवादी है। ’
चिंतन और ईश्वर विश्वास को बताया है। फ्रैजर को अपने जीवन काल में धार्मिक पुस्तकें पढ़ने और देवालयों में जाकर देवाराधना करने में गहन अभिरुचि थी। बचपन से ही बौक्सर बनने की मान्यता उसके अन्तः करण में जम चुकी थी और तद्नुरूप प्रयत्न भी जुटते चले गये। इतना ही नहीं आर्की मूर जैसे प्राणवान, आत्म विश्वासी एवं प्रतिभा के धनी व्यक्ति की संगति पाकर उसका संकल्प और भी दृढ़ होता चला गया। यद्यपि फ्रैजर की आर्थिक स्थिति अनुकूल नहीं थी, फिर भी उसने अपनी मनःस्थिति को विचलित नहीं होने दिया।
चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार अवाँछनीय की दिशा में चल पड़ेगा। इन दिनों मूर्धन्य विचारशीलों को यह योजना बनाते देखा गया है कि स्कूल भले ही सरकारी रहें, पर छात्रावास इस स्तर के बनायें जायें जहाँ पढ़ाई के अतिरिक्त शेष सारा समय उपयोगी सत्प्रवृत्तियों में, प्रेरणाप्रद मनोरंजनों में लगा रहे। ऐसे छात्रावासों का संचालन यदि समर्थ और वरिष्ठ हाथों में रहे और विधि व्यवस्था में शालीनता भरा अनुशासन जुड़ा रहे तो उसका असाधारण प्रभाव छात्रों पर पड़े बिना न रहेगा। उठती आयु में अपनाई गई आदतें प्रायः जीवन भर काम देती हैं।
चिंतन निषेधात्मक होता है अथवा जो स्वार्थी और चालाक होते हैं। जो केवल अपने ही स्वार्थ सिद्ध करने की सोचते और व्यक्तिगत लालसा, कामनाओं की पूर्ति के सपने संजोते रहते हैं, अथवा जिनका मन कल्पनाओं की उड़ान भरता है। उनका कथन है कि मनुष्य की धारणाएँ प्रायः भ्रम मूलक होती हैं। अधिकाँश लोग अपना मूल्याँकन सही रूप से नहीं कर पाते और दूसरों की दृष्टि में कुछ का कुछ प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार वे स्वयं अपने को ही धोखा दे रहे होते हैं।
चिंतन धारा मनुष्य में देवत्व और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की पक्षधर है। समय ही बतायेगा कि प्रधानता भौतिकवाद की रहती है या अध्यात्मवाद की। इन दिनों दोनें पक्षों में रस्साकशी चल रही है।
चिंतन द्वारा अपनाई गयी हो।
चिंतन का प्रवाह वर्तमान स्तर का भौतिकवादी ही बना रहा और पहल जीवशास्त्रियों के हाथ रही तो नये सिरे से जीव-कोषों का ढालना आरंभ करेंगे जो अंतर्ग्रही परिस्थितियों में भी अपना निर्वाह कर सकें। वर्तमान मनुष्योँ की शारीरिक और मानसिक स्थिति को विज्ञान के आधार पर ऐसे मोड़ दिये जा सकते हैं। जो भावी परिस्थितियों के साथ सुविधापूर्वक तालमेल बिठाये रह सकें। उसका शरीर ही नहीं मन भी बदला जा सके, अब इतनी शक्ति विज्ञान के हाथों आ गयी है और वह उसका उपयोग समस्त मानव जाति के साथ सत्ताधीशों की सहायता से बलपूर्वक भी कर सकता है। अन्न, वस्त्र, निवास आदि की कमी का ध्यान रखते हुए वर्तमान स्तर के मनुष्य को हटाकर उस स्थान पर नयी जाति के नयी नस्ल के मिनी मनुष्य भी बनाये जा सकते हैं जो कम जगह घेरे और खुराक भी नष्ट न करें, पर बुद्धिमता एवं प्रतिभा की दृष्टि से बढ़े चढ़े हों।
चिंतन घोंसला बनायेगा और अंडों-बच्चों की फौज खड़ी करेगा। खाली समय और चिंतन यथास्थान बनें रहें निष्क्रिय बनें रहें यह हो ही नहीं सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-May
चिंतन में लीन हो गये। इसी बीच गुलाल साहब आ पहुँचे। बुलाकीराम को गायब देख उन्होंने जोर-जोर की दो-तीन आवाजें लगायीं, पर बुलाकीराम ध्यान में इतने तल्लीन थे कि आवाज सुन न सके। जमींदार उन्हें कामचोर समझ कर आग बबूला हो उठे। नजदीक आये, तो पता चला बुलाकीराम मेंड़ पर विश्राम कर रहे हैं और समीप आने पर पता चला वह हाथ में पानी युक्त लोटा लिए आंखें बंद किये कुछ बुदबुदा रहे हैं।
चिंतन की दृष्टि से हम अपने को परमसत्ता की इच्छा के अनुरूप ढाल सके, तो इस परिवर्तन प्रक्रिया में न हम केवल स्रष्टा के सहभागी बनेंगे, अपितु उन विभूतियों से भी सहज ही ओत-प्रोत हो सकेंगे, जिन्हें प्राप्त करने में साधना-क्षेत्र के साधकों को वर्षों नहीं, जन्मों तक इंतजार करना पड़ता है।
चिंतन देगा,जो भले ही देश की भौगोलिक सीमा को बढ़ा न सके, पर संस्कृति का विराट विस्तार इस कदर होगा कि संपूर्ण विश्व विशाल भारत-महाभारत लगने लगे।
चिंतन के उद्गाता के रूप में हम गुरुदेव को जानते हैं किन्तु उनका वास्तविक परिचय उनकी स्नेहमयी-मोहक उस मुसकान के रूप में अधिक है, जिसने लाखों व्यक्ति उनके पास रोते हुए आते थे तथा हँसते हुए वापस जाते थे। यह उनका विशाल हृदय ही था जिसके समक्ष नतमस्तक हो हर व्यक्ति अपने अंदर की व्यथा अपनी हर बात उनसे कह स्वयं को अत्यन्त हल्का महसूस करता था। इसलिए तो पूज्यवर अपनी पत्रिका में अधिकार से लिखते हैं-”लोग हमें भूल सकते हैं, पर हम अपने किसी स्नेही को भूलेंगे नहीं।”
चिंतन करते हैं कि प्राण का सारा तत्व हमारे संपूर्ण काया के अंग प्रत्यंगों द्वारा पूरी तरह सोख लिया गया। अब थोड़ी देर तक बिना साँस के रहते हैं और भावना करते हैं कि जो दोष-दुर्गुण बाहर निकाले गये हैं, वे हममें बहुत दूर चले जा रहे हैं और उन्हें फिर से दुबारा अंदर प्रविष्ट नहीं होने देना है। इस पूरी प्रक्रिया को पाँच प्राणायामों तक ही सीमित रखा जाता है।
चिंतन का विषय है कि शपथ लेने के बाद हम में से कितनों को स्मरण रहा, कितने भूल गए?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-July
चिंतन को, छोड़ सकेंगे जो भी। हो जायेंगे महाकाल के, संगी-साथी वो ही॥
चिंतन क्षमता, कल्पना शक्ति-भाव-संपदा, तर्क-सामर्थ्य खपाने वाले उस तपस्वी को साहित्य संसार कैसे भूल पाएगा? जिसने अर्ध शताब्दी से अधिक समय तक तपकर अपनी लेखनी द्वारा लक्षाधिक पृथ्वी में जीवन के तत्व सँजोये है।
चिंतन की विभीषिका से, अब मुक्ति मिलेगी। ज्ञान यज्ञ की ही मशाल, अब चारों ओर जलेगी॥
चिंतन और कर्तृत्व में बदलाव नहीं आ जाय। उनके अनुसार मनुष्य जब तक बुद्धिवाद और जड़वाद का पल्ला पकड़े रहेगा, तब तक उसे ऐसी ही विसंगतियों व विपदाओं का सामना करना पड़ेगा। उबार तो इनसे अध्यात्मवादी दृष्टिकोण ही सकता है। ज्ञातव्य है कि भारतीय संस्कृति में जड़ में भी चेतन की उपस्थिति की अवधारणा है। इस आधार पर प्राचीन समय में समस्त ग्रह-पिण्डों को देवता माना और पूजा जाता था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-January
चिंतन, चरित्र रुझान एवं आदतों को बदलने और उनके स्थान पर उच्चस्तरीय प्रवृत्तियों से अपने आपका कायाकल्प कर लेने को दूसरा जन्म होने, द्विजत्व प्राप्त करने जैसे शब्दों से उपमा दी जाती है। यही तपश्चर्या है। उपवास, ब्रह्मचर्य आदि में यही भीतरी महाभारत लड़ना पड़ता है। जो जितना निर्मल, पवित्र बन सका-चिंतन और चरित्र की मर्यादाओं के शिकंजे में कस सका, कुम्हार के आवे की तरह पक सका, समझना चाहिए कि वह घर में रहने वाला तपस्वी है। अच्छा हो तपोवन में घर बनाने की अपेक्षा घर में ही तपोवन बनाएँ और अपने सज्जनतापूर्ण सृजन कार्यक्रम से न केवल अपने को वरन् समूचे परिवार को इसी सुसंस्कारिता के-तप-साधना के ढाँचे में ढाल सकें।
चिंतन और व्यवहार को उत्कृष्ट रखने की प्रेरणा दी जाय। यही है सेवाधर्म जिसका निर्वाह कर सकना केवल संयमशीलों से ही बन पड़ता है। आत्मोत्कर्ष का मूलभूत आधार यही है।
चिंतन एवं अनौचित्यपूर्ण क्रिया–कलापों के जाल में फँस जाना कोई आश्चर्य की की बात नहीं है। अज्ञानता-अबोधतावश और असावधानी से ऐसा हो सकता है, किंतु तथाकथित सभ्यों के जब ऐसा सोचते और आचरण करते देखा जाता है जो मानवी गरिमा और सभ्यता के अनुकूल नहीं होता तब और भी अधिक आश्चर्य होता है।
चिंतन से विरत होकर अचेतन मन की गहराइयों में प्रवेश करने का प्रयत्न करता है जिसके द्वारा शरीर के अनैच्छिक तंत्र संचालित होते है। आँख और कान जैसी इन्द्रियाँ जो अभी तक बहिर्मुखी गतिविधियों का संचालन करने में व्यस्त थीं, इस प्रक्रिया द्वारा अंदर की ओर अभिमुख हो उठती हैं। इसके माध्यम से हम अपने रक्त प्रवाह की ध्वनि, माँसपेशियों का कोलाहल, स्नायु मण्डल की लय एवं अन्याय आँतरिक कायकीय प्रक्रियाओं को सूक्ष्म जगत में देख और सुन करते हैं और इच्छानुसार उन पर नियंत्रण साध सकते हैं जो अभी तक चेतन मन की पकड़ से बाहर थे।
चिंतन की रीति-नीति को अपनाकर अपने को लोकोपकारी आदर्शवादी विचारधारा के साथ जोड़ना। इस विद्या को जानने वालों के जमीन में सदैव प्रसन्नता और प्रशंसा ही दृष्टिगोचर होती है। निंदा आलोचनाओं से वह सदा अपने को दूर रखते हैं। राल्फबाल्डो इमर्सन जैसे अध्यात्मवेत्ता और आइंस्टीन जैसे वैज्ञानिक अपने उत्कृष्ट प्रमाणिक चिंतन के कारण ही दुनिया को नयी और रचनात्मक दिशाधारा दे सकने में सफल हो सके। यह सभी इस तथ्य का उद्घाटन करते है कि मानवी शक्तियों में विचार शक्ति का बहुत महत्व है।
चिंतन और दुराचरण को काटने वाले यह अस्त्र-शस्त्र निश्चित ही वह परशु होंगे जिनसे लोगों के मनों में सद्चिंतन का विकास होगा। सद्कर्म और सद्व्यवहार का विस्तार इसी तरह संभव होगा। अतएव इन महारथी योद्धाओं का सम्मान इस अश्वमेध का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्यक्रम होगा। अपने परिजन न केवल इन के योग्य बने अपितु जिनकी सेवाएँ इस स्तर की हों उनके नाम-पते भी अवश्य भिजवायें ताकि इस ज्ञान यज्ञ को सफल और सार्थक बनाया जा सके।
चिंतन में वह एक ऐसे विश्व की कल्पना करते, जिसमें कोई दीन न हो-दुःखी न हो, रोगी और अस्वस्थ न हो। उनके काव्य की एक-एक पंक्ति में प्राणिमात्र के प्रति प्रेम, दया-करुणा और आत्म-भावना भरी होती है। यही कारण था कि राज कवि गाँव के किसान-मजदूरों से लेकर सौराष्ट्र नरेश तक के परम-प्रिय हो गये थे।
चिंतन मनन करते रहने से सात्विक भावों की अभिवृद्धि होती है। मानसिक शक्ति का विकास होता और सद्गुणों की प्राप्ति होती है। अतः यह आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है कि अपने सोचने विचारने की प्रक्रिया पर नये सिरे से मंथन किया जाय और उसमें से खोज-खोजकर निकृष्ट एवं हेय स्तर के विचारों को निकाल फेंका जाय। साधना, स्वाध्याय,संयम,सेवा के उपाय-उपचारों द्वारा सद्विचारों का आरोपण सहज संभव हो जाता है। प्रखर, प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का निर्माण एवं उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण इसी आधार पर संभव हो सकेगा।
चिंतन की वह अवस्था है जिसमें ज्ञान कर्म और विचार की, चिंतन- चरित्र व्यवहार की तीनों धाराओं का सामंजस्य-समन्वय सरलतापूर्वक बैठ जाता है। केवल विचारणा मात्र ही मानवी व्यक्तित्व का प्रतीक नहीं होती वरन् समग्र व्यक्तित्व का निर्धारण आचार और विचार दोनों से मिलकर बनता है। चरित्र का निर्माण इसी से होता है। संसार में ऐसे कितने ही व्यक्ति पाये जा सकते हैं जिनके विचार बड़े ही उदात्त, महान और आदर्शपूर्ण होते हैं, किंतु उनकी क्रियाएं उनके अनुरूप नहीं होती। विचार पवित्र हो और कार्य अपावन, तो यह व्यक्तित्व की श्रेष्ठता कहाँ हुई?
चिंतन आदि की बचत हो सके, उस कटौती को विश्व के कल्याण के - लोक मंगल के कार्यों में निमित्त लगाना चाहिए। इसी को पुण्य, इसी को परमार्थ, इसी को आराधना कहते हैं। पात्रता विकसित करने का यह तीसरा व अंतिम अवलम्बन है। भगवान का निराकार स्वरूप वह है जो कण-कण में समाया हुआ है। जो नियम अनुशासन मात्र है।
चिंतन, मनन और विश्वास के साथ संस्कार रूप में प्रौढ़ किया जाय। पुराने संस्कार बदलने के लिए नए संस्कारों को रचना परमावश्यक है।
चिंतन तंत्र भी इतना उच्चस्तरीय एवं दूरदर्शी है कि उसकी तुलना सृष्टि का अन्य कोई प्राणी नहीं कर सकता।
चिंतन पर,
चिंतन और चरित्र की प्रमाणिकता भी कहा जा सकता है। सर्वप्रथम साधक को इसी के लिए प्रयत्न करना होता है। अगली उपलब्धियाँ प्राप्त करने वाला पक्ष अति सरल है। रंगाई से पहले धुलाई आवश्यक है। बोने से पहले खेत जोतना पड़ता है।
चिंतन प्रधान हैं। मनुष्य की प्रेरणाओं का केन्द्र मान्यताएँ-विचारणाएँ, इच्छाएँ होती हैं। उन्हीं के प्रवाह में समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार का स्वरूप भी तद्नुरूप ही हो सकता है। समाधान भी अश्वमेध में छुपे हुए अर्थ गाम्भीर्य को प्रकट करने पर ही सम्भव है।
चिंतन में ही निहित है। विश्व प्रसिद्ध लेखक डॉ. वेने डायर ने द स्काई इज द लिमिट नामक पुस्तक में विचारणा की इस श्रेष्ठतम स्थिति को टान्सेडिंग आँथोरीटेरियन थिंकिंग अर्थात् उत्कृष्ट प्रामाणिक चिंतन के नाम से सम्बोधित किया है और इस तरह के विचार प्रक्रिया को अपनाने वाले व्यक्ति को नो लिमिट परसन अर्थात् असीम एवं असाधारण व्यक्तित्व वाला बताया है। ऐसे व्यक्ति सामान्यजनों की अपेक्षा अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं ढूंढ़ने तथा अपने बारे में निर्णय ले सकने की क्षमता से पूर्ण होते है और साथ ही परिस्थितियों के अनुरूप मनःस्थिति को ढालने की कला में भी पारंगत होते है। उनके चिंतन की परिधि ससीम न रहकर असीम हो जाती है। स्वतंत्र एवं व्यवस्थित सूझबूझ वाले व्यक्तियों के निर्णय सही और सार्थक सिद्ध होकर रहते हैं।
चिंतन के नाम से सम्बोधित किया है और इस तरह के विचार प्रक्रिया को अपनाने वाले व्यक्ति को नो लिमिट परसन अर्थात् असीम एवं असाधारण व्यक्तित्व वाला बताया है। ऐसे व्यक्ति सामान्यजनों की अपेक्षा अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं ढूंढ़ने तथा अपने बारे में निर्णय ले सकने की क्षमता से पूर्ण होते है और साथ ही परिस्थितियों के अनुरूप मनःस्थिति को ढालने की कला में भी पारंगत होते है। उनके चिंतन की परिधि ससीम न रहकर असीम हो जाती है। स्वतंत्र एवं व्यवस्थित सूझबूझ वाले व्यक्तियों के निर्णय सही और सार्थक सिद्ध होकर रहते हैं।
चिंतन की रीति-नीति अपनाकर कष्ट कठिनाइयों से छुटकारा पाने में समर्थ होते हैं। वस्तुतः मनुष्य की संरचना समन्वयवादी एवं मानवतावादी दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर परमात्मा ने की है। इस तरह की विचारणा को मनीषियों ने कल्पवृक्ष की उपमा दी है जो व्यक्ति की हर आवश्यकता को पूरी करने की क्षमता रखती और उसे सन्मार्ग पर चलने के लिए अभिप्रेरित करती है।
चिंतन में प्रविष्ट हो गई भ्रष्टता है। इसे देवासुर संग्राम कहा जा सकता है। एक ओर देवत्व खड़ा है दूसरी ओर आसुरी प्रवृत्तियों की काल मुख सेना। प्रश्न यह है कि संस्कृति और संवेदना जीतेगी अथवा पीड़ा-पतन और पराभव का त्रिपुरासुर?
चिंतन-चेतना के परिष्कार से ही संभव है। तपश्चर्या का योग साधनाओं का अवलम्बन इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है, शिक्षा का अर्थ भौतिक जानकारी देने वाली स्कूली पढ़ाई तक सीमित हो गया है। उसके द्वारा बहुज्ञता,कुशलता एवं अधिक उपार्जन क्षमता के लाभ तो मिल सकते हैं किंतु उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों का निर्माण विचार परिष्कार से ही संभव है। चिंतन की उत्कृष्टता जहाँ होगी वहाँ जीवन में स्नेह-सौजन्य का सौमनस्य का बाहुल्य मिलेगा। इसी प्रकार संपर्क क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग-सद्भाव उमड़ रहा होगा।
चिंतन-चेतना को सदैव ऊर्ध्वगामी बनाये रखने का प्रयत्न करते है। विचार-शक्ति की महिमा से अनभिज्ञ व्यक्तियों को जिस-तिस प्रकार अस्त-व्यस्त जीवन जीने को विवश होते और अविकसित मनःस्थिति में ही दम तोड़ते देखा जाता है। विचारों का स्तर विधेयात्मक जैसा भी होगा, व्यक्तित्व भी तद्नुरूप ढलता चला जायेगा।
चिंतन- चरित्र व्यवहार की तीनों धाराओं का सामंजस्य-समन्वय सरलतापूर्वक बैठ जाता है। केवल विचारणा मात्र ही मानवी व्यक्तित्व का प्रतीक नहीं होती वरन् समग्र व्यक्तित्व का निर्धारण आचार और विचार दोनों से मिलकर बनता है। चरित्र का निर्माण इसी से होता है। संसार में ऐसे कितने ही व्यक्ति पाये जा सकते हैं जिनके विचार बड़े ही उदात्त, महान और आदर्शपूर्ण होते हैं, किंतु उनकी क्रियाएं उनके अनुरूप नहीं होती। विचार पवित्र हो और कार्य अपावन, तो यह व्यक्तित्व की श्रेष्ठता कहाँ हुई?
चिंतन और चरित्र की मर्यादाओं के शिकंजे में कस सका, कुम्हार के आवे की तरह पक सका, समझना चाहिए कि वह घर में रहने वाला तपस्वी है। अच्छा हो तपोवन में घर बनाने की अपेक्षा घर में ही तपोवन बनाएँ और अपने सज्जनतापूर्ण सृजन कार्यक्रम से न केवल अपने को वरन् समूचे परिवार को इसी सुसंस्कारिता के-तप-साधना के ढाँचे में ढाल सकें।
चिंतन की परिधि ससीम न रहकर असीम हो जाती है। स्वतंत्र एवं व्यवस्थित सूझबूझ वाले व्यक्तियों के निर्णय सही और सार्थक सिद्ध होकर रहते हैं।
चिंतन के कारण ही दुनिया को नयी और रचनात्मक दिशाधारा दे सकने में सफल हो सके। यह सभी इस तथ्य का उद्घाटन करते है कि मानवी शक्तियों में विचार शक्ति का बहुत महत्व है। एक विचारवान व्यक्ति लाखों, करोड़ों का नेतृत्व कर सकता है। इस क्षमता से सम्पन्न व्यक्ति साधनहीन होने पर भी अपनी उन्नति और प्रगति का मार्ग निकाल लेते है। विधेयात्मक दिशाधारा अपनाकर ही महापुरुष समाज और राष्ट्र का निर्माण किया करते हैं।
चिंतन न तो स्वाभाविक है और न आवश्यक। यह वस्तुतः एक प्रकार की मानसिक विकृति है, जिसका कारण निजी कुकल्पना भी हो सकती है अथवा साहित्य, चित्र, दृश्य, घटनाक्रम आदि भी ऐसे भड़काने का निमित्त कारण हो सकते हैं। अन्यथा नर और नारी परस्पर सहयोगी या मित्र की तरह स्वाभाविक शीलवान जीवन जी सकते हैं तथा पवित्रता एवं प्रसन्नता से भरा-पूरा निर्वाह कर सकते हैं। इन मनोविकारों से बचने में ही मनुष्य का हित है।
चिंतन में लीन रहे-अगली शताब्दी की दुनिया का स्वर्णिम चित्र उनके अस्तित्व में पुलकन भर रहा था। पता नहीं कितना समय इसमें बीत गया और जब उन्होंने नेत्र उठाये, सम्मुख कोई नहीं था। वहीं हिमाच्छादित पर्वतमालाएँ, वही तीव्र-वेगा अलकनंदा और वहीं पीछे सुनसान माणा गाँव और हिमालय का शाश्वत संदेश-जिनके अनुरूप स्वयं को ढालकर गोपीनाथ प्राच्य विद्या के महान साधक महामहोपाध्याय डॉ. गोपीनाथ कविराज बन गये। संदेश के स्वर शाश्वत हैं-बस ग्रहणशीलता के लिए हमारी प्रतीक्षा है।
चिंतन से संबोधित किया और बताया है कि यह मानवी चिंतन की वह अवस्था है जिसमें ज्ञान कर्म और विचार की, चिंतन- चरित्र व्यवहार की तीनों धाराओं का सामंजस्य-समन्वय सरलतापूर्वक बैठ जाता है। केवल विचारणा मात्र ही मानवी व्यक्तित्व का प्रतीक नहीं होती वरन् समग्र व्यक्तित्व का निर्धारण आचार और विचार दोनों से मिलकर बनता है। चरित्र का निर्माण इसी से होता है। संसार में ऐसे कितने ही व्यक्ति पाये जा सकते हैं जिनके विचार बड़े ही उदात्त, महान और आदर्शपूर्ण होते हैं, किंतु उनकी क्रियाएं उनके अनुरूप नहीं होती। विचार पवित्र हो और कार्य अपावन, तो यह व्यक्तित्व की श्रेष्ठता कहाँ हुई?
चिंतन की उत्कृष्टता जहाँ होगी वहाँ जीवन में स्नेह-सौजन्य का सौमनस्य का बाहुल्य मिलेगा। इसी प्रकार संपर्क क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग-सद्भाव उमड़ रहा होगा।
चिंतन के दुष्परिणामों को भलीभाँति समझने और उत्कृष्ट चिंतन की रीति-नीति अपनाकर कष्ट कठिनाइयों से छुटकारा पाने में समर्थ होते हैं। वस्तुतः मनुष्य की संरचना समन्वयवादी एवं मानवतावादी दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर परमात्मा ने की है। इस तरह की विचारणा को मनीषियों ने कल्पवृक्ष की उपमा दी है जो व्यक्ति की हर आवश्यकता को पूरी करने की क्षमता रखती और उसे सन्मार्ग पर चलने के लिए अभिप्रेरित करती है।
चिंतन का विकास होगा। सद्कर्म और सद्व्यवहार का विस्तार इसी तरह संभव होगा। अतएव इन महारथी योद्धाओं का सम्मान इस अश्वमेध का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्यक्रम होगा। अपने परिजन न केवल इन के योग्य बने अपितु जिनकी सेवाएँ इस स्तर की हों उनके नाम-पते भी अवश्य भिजवायें ताकि इस ज्ञान यज्ञ को सफल और सार्थक बनाया जा सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-June
चिंतन से मुक्त करें॥
चिंतन प्रणालियों का निर्धारण करती हैं, वे अभ्यस्त क्रम का ही विचार करने में सुविधा का अनुभव करती हैं। यही कारण है कि मनुष्य अपने प्रिय एवं परिचित विषय को ही बार-बार सुनना-देखना एवं अनुभव करना पसंद करता है और थोड़े हेर-फेर से उसी अनुभव को दुहराने को वह नयापन-नवीनता आदि कहता समझता रहता है। उस प्रचलित ढर्रे से भिन्न सोचने करने वाले को सामान्य मनुष्य न समझ पाते और न सह पाते हैं। वे उसे अप्रामाणिक , अशास्त्रीय, अवैज्ञानिक आदि कहने लगते है। बाद में कालक्रम में जब वह नया प्रतिपादन उनके लिए जाना-पहचाना हो जाता है तब वे उसे तो स्वीकार कर लेते हैं किंतु अगले नये प्रतिपादन, नये अन्वेषण के प्रति पुनः वैसी ही प्रतिक्रिया करते हैं।
चिंतन सदैव सही विवेक युक्त बना रहे। उपरोक्त सभी उद्धरण यह बताते है कि सविता देवता की स्तुति को ऋषियों ने क्यों इतना महत्वपूर्ण माना तथा दैनन्दिन जीवन में श्रेष्ठतम स्थान दिया। “सविता सर्वस्य प्रसविता” सविता सबके उत्पादक जन्मदाता हैं कहकर यह प्रतिपादित किया है। सूर्य देवता ही समस्त प्राणी जगत को जीवन व प्राण देने वाले हैं।
चिंतन-मनन द्वारा ज्ञान के उस स्रोत तक पहुँचा जा सकता है जिसे शास्त्रकारों ने आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान के नाम से वर्णन किया है।
चिंतन मनन से ही अन्तःकरण की भावनाएँ स्वतः उमड़ने लगती हैं एवं साधक के व्यक्तित्व का कायाकल्प हुए बिना नहीं रहता। गायत्री मंत्र को आधार बनाकर किया गया, सविता आराधना आत्मोत्कर्ष के चरम शिखर पर हम सबको पहुँचा सकता है।
चिंतन प्रक्रिया को ऊर्ध्वगामी मोड़ दे उसे अध्यात्मिक प्रगति की ओर प्रवृत्त भी कर सकता है। इस प्रकार सूर्य विज्ञान मात्र जड़ प्रकृति ही नहीं चैतन्य सृष्टि के साथ भी हस्तक्षेप करता है एवं दृश्य स्थूल परिवर्तनों से लेकर मानव की चेतनात्मक हलचलों को भी प्रभावित कर पापनाशक विकार शामक वृत्तियों को जनमानस में बढ़ाता है।”
चिंतन को गति दें। कदाचित हवा से दूर उड़ कर चलना संभव हो और हम सूर्य से विपरीत दिशा में उड़े तो पृथ्वी से 49000000 मील दूर एक ग्रह मिलेगा। इस ग्रह से कोई एक हजार मील ऊपर ठहर जायें तो देखेंगे कि वह भी अपनी धुरी पर घूम रहा है। अपने आपकी परिक्रमा वह 24 घंटा 37 मिनट में करता है। अर्थात् वहाँ के दिन व रातें लगभग पृथ्वी के ही समान हैं।
चिंतन तथा अनुभूति उनमें नहीं है, पर मानवीय विद्युत जिसे ‘प्राण’ कहा जाता है। जड़ अणुओं के समूह में चेतना, विचारणा और अनुभूत उत्पन्न कर देती हैं, और सजीव जीवन आरम्भ कर देती हैं। निर्जीव अनुभूति रहित जीवन तो पत्थर, चट्टानों में भी रहता है।
चिंतन वालों के लिए तो यह विधाएँ गुह्य व गोपनीय है। किंतु जो विशुद्धतः परमार्थिक भाव से अथवा आत्मशक्ति के जागरण के निमित्त प्रयोग करना चाहें, उनके लिए इसके सभी मार्ग खुले पड़े हैं, ऐसा परमहंस विशुद्धानंद जी ने जिन्हें सुगंधी बाबा के नाम से ख्याति प्राप्त थी, अपने शिष्य व उनके माध्यम से समस्त विज्ञ समुदाय को बताया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-September
चिंतन और सर्वांगपूर्ण दर्शन दिया। इसी दर्शन ने इस भूमि में इतने सार महामानव, अवतार, युगपुरुष, समाज सुधारक, ऋषि-मनीषी पैदा किये कि इसे देवभूमि कहा जाने लगा। इसकी तुलना स्वर्ग से की जाने लगी। इसे स्वर्ण की उपमा दी जाने लगी-ऐसा स्वर्ग जिसमें जीवन्त देवता रहते हों-चलते- फिरते प्रत्यक्ष देव निवास करते हों। ऐसे देव जहाँ भी रहेंगे, वहाँ स्वर्ग की अनुभूति स्वाभाविक है।
चिंतन प्रणाली कम, जीवन विधा अधिक है। यह सिद्धान्त नहीं, व्यवहार है। उनके अनुसार जिस दर्शन में जीव जीने की कला का अभाव हो, जो व्यक्ति-निर्माण की प्रक्रिया नहीं बता पाता हो एवं जहाँ अपकर्ष से उत्कर्ष की ओर जाने का कोई मार्ग न हो, वह दर्शन नहीं हो सकता। व कहते हैं कि दर्शन में इतनी सामर्थ्य होनी चाहिए कि वह मानवी जीवन को चरम लक्ष्य तक पहुँचा सके। यहाँ उनके विचार भारतीय अध्यात्म से बिलकुल मिलते-जुलते हैं।
चिंतन के राजतंत्र के जमाने में जब उनने राजे-और सामंतों की तानाशाही और निरंकुशता देखी, तो उनके अंदर का दार्शनिक जाग उठा और एक नई व्यवस्था “डेमोक्रेसी” का प्रतिपादन किया। जिन दिनों की यह बात है, उन दिनों जब सर्वप्रथम इसे प्रस्तुत किया गया, तो लोगों ने इसकी बड़ी हँसी उड़ायी, कहा-यह दर्शन नहीं, पागलपन है। भला जनता, जनता पर किस प्रकार शासन कर सकती है? किन्तु आज वही पागलपन किस तरह सारी धरती में अपना प्रभुत्व जमाये हुए है-यह सर्वविदित है। यह एक लाँसर की शक्ति है।
चिंतन की कड़ियाँ एक-एक करके बिखरने लगीं।
चिंतन के अभाव में आमतौर से अंधी दौड़ चलती रहती है। भेड़ चाल का उदाहरण घटित होते हर जगह देखा जाता है। सभी नदियों का स्वच्छंद जल अंततः खारे समुद्र में गिर कर वैसा ही अपेय बन जाता है। भले ही आरंभ में वह कैसा ही स्वच्छ, गुणकारी, शीतल और सराहनीय क्यों न रहा हो। जनसाधारण में हलचलें तो पाई जाती हैं पर वे किस निमित्त हो रही हैं अंत में कहाँ जा पहुँचेगी इसका पूर्ण निर्धारण प्रायः किसी से जी नहीं बन पाता।
चिंतन और साधन का दुरुपयोग न किया जाय तो परिणति में जमीन-आसमान जैसा अंतर होगा ही। खाई खोदने और दीवार चिनने में निरत दो व्यक्तियों की गतिविधियाँ एक दूसरे से उलटी होने के कारण उसके परिणामों में भी उसी अनुपात से अंतर आता है। आरंभ में दोनों एक जगह थे, पर एक ने खाई खोदी और गहराई बढ़ाई। दूसरे ने चिनाई जारी रखी और ऊँची दीवार उठाई समतल भूमि पर दोनों प्रयास एक स्थान पर थे, पर विपरीत क्रियाकलाप ने दोनों के मध्य दुहरा अंतर खड़ा कर दिया। यही बात मनोयोग एवं श्रम साधना के संबंध में भी है।
चिंतन करने के तरीके को सुधार लें। चिंतन करने का तरीका अगर सँभाला-सुधारा जा सके तो सामान्य परिस्थितियों में भी हँसी-खुशी की भरी हम जिंदगी काट सकते हैं। संत इमर्सन कहते थे कि हमें नरक में भेज दीजिए, हम वहीं अपने लिए स्वर्ग बना लेंगे। बात सही है। शालीनता का दृष्टिकोण रखने वाले, ऊँचे दृष्टिकोण रखने वाले, वास्तविकता को समझने वाले इस दुनिया में हर समय हँसते-हँसाते हुए पाये जा सकते हैं।
चिंतन-प्रणाली प्रस्तुत करना, जिससे समय, समाज एवं समस्त विश्व का समग्र विकास सम्भव हो सके? सुकरात के शब्दों में कहें, तो वास्तविक दर्शन यही है।
चिंतन और भ्रष्ट आचरण के कारण उन असंख्य समस्याओं का समाधान संभव होगा जो इन दिलों हर किसी को उत्तेजित, विक्षुब्ध और आतंकित किये हुए हैं।
चिंतन के समस्त सत्र, सारी सामर्थ्य खप जाती है।
चिंतन को यह स्वीकार करने में तनिक भी कठिनाई नहीं रह जाती है कि इस ब्रह्मांड में एक विवेकवान निर्धारण का अस्तित्व है और वह इस सृष्टि क्रम को आश्चर्यजनक रूप से सुन्दर और सुव्यवस्थित बनाये हुए हैं। अध्यात्म की भाषा में इसे ‘परमात्मा’ कहते हैं। विज्ञान ने इसे ब्रह्मांडीय चेतना कहा है। इसका अस्तित्व मानने की दृष्टि से अब आत्मिकी और भौतिकी समान रूप से सहमत है। मतभेद इस बात पर है कि अतिरिक्त अन्य स्वरूप क्या है?
चिंतन करना चाहिए था, जो काम करना चाहिए था, उसको तोड़-मरोड़ करके ऐसे बना दिया गया है कि शुद्ध चिंतन करने की अपेक्षा अशुद्ध चिंतन में ही सदा उलझा रहता है। ईर्ष्या, डाह, चिन्ता, निराशा, भय, आशंका आदि जिनके कोई वास्तविक कारण नहीं होते हमारे ऊपर छायी रहती है और जीवन को नरक रूप में बनायें रखती है। अगर वास्तविक कारण हों भी तो आदमी उसको स्वाभाविक एवं सामान्य समझ करके हँसी-खेल में भी टाल सकता है, लेकिन प्रायः वह राई भर की बात को पहाड़ के बराबर बनाकर के रात-दिन उद्विग्न बना रहता है। अगर मस्तिष्क को ठीक रखा जा सके तो हम इसी मस्तिष्क के द्वारा भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए न जाने कितने द्वार खोल सकते हैं। यदि यह न बन पड़े तो कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि चारों ओर जो भय, आशंकायें, निराशायें दिखायी पड़ती है, उनसे तो दूर बचे ही रह सकते हैं।
चिंतन देकर फिलॉसफर बन बैठना-यह पश्चिम की पद्धति और देन है। भारत जैसे पूर्वी देशों में तो दर्शन समाज परिवर्तन का सुनिश्चित आधार माना जाता है। गाँधीजी ने ग्रामोद्योग पर आधारित दर्शन दिया था और कहा था कि हर हाथ को काम और हर पेट को अनाज इसी के माध्यम से संभव है। आर्थिक स्वावलंबन इसी के द्वारा हस्तगत किया जा सकता है। भारत का जब कभी आर्थिक कायाकल्प होगा, इसी आधार पर संपन्न होगा।
चिंतन जो इन अनावश्यक कार्यों में खप जाता है यदि बचाया जा सका होता तो उससे सहज ही शाँति पाने और प्रसन्न रहने की स्थिति बनी रह सकती थी। घात प्रतिघातों वाला समय यदि किन्हीं उपयोगी सृजनात्मक कार्यों में लग सका होता तो उनके सत्परिणाम सहज ही सामने आते रह सकते थे।
चिंतन विकृत हो चुका है।” अहिर्निश जन-कल्याण का चिन्तन करने वाले उन करुणामय के नेत्र भर आये थे।” प्रायः सभी अल्पायु होते जा रहे हैं और उनकी मेधा शक्ति क्षीण होती जा रही हैं।”
चिंतन चेतना एवं आदर्श कर्तृत्व पर इस महान संस्कृति के हर अनुयायी , मनीषी ने सदा बल दिया है। रामायण हो या गीता, महाभारत हो या रघुवंश-सभी में सत्य, धर्म और श्रेय का ही जयगान है। गुण कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाने पर ही सबने बल दिया है। यही वह आधारभूत तथ्य है जो सामान्य मनुष्य को महामानव बनाने और नर से नारायण बनने की प्रेरणा देते हैं।
चिंतन, चरित्र, व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाने पर ही सबने बल दिया है। यही वह आधारभूत तथ्य है जो सामान्य मनुष्य को महामानव बनाने और नर से नारायण बनने की प्रेरणा देते हैं।
चिंतन करने का तरीका अगर सँभाला-सुधारा जा सके तो सामान्य परिस्थितियों में भी हँसी-खुशी की भरी हम जिंदगी काट सकते हैं। संत इमर्सन कहते थे कि हमें नरक में भेज दीजिए, हम वहीं अपने लिए स्वर्ग बना लेंगे। बात सही है। शालीनता का दृष्टिकोण रखने वाले, ऊँचे दृष्टिकोण रखने वाले, वास्तविकता को समझने वाले इस दुनिया में हर समय हँसते-हँसाते हुए पाये जा सकते हैं।
चिंतन अवसर ह न आता और उन अनेकानेक झंझटों से बचा न जा सकता था समय का बड़ा भाग इन उलझनों में उलझे रहने में ही नष्ट हो जाता है। चिंतन जो इन अनावश्यक कार्यों में खप जाता है यदि बचाया जा सका होता तो उससे सहज ही शाँति पाने और प्रसन्न रहने की स्थिति बनी रह सकती थी। घात प्रतिघातों वाला समय यदि किन्हीं उपयोगी सृजनात्मक कार्यों में लग सका होता तो उनके सत्परिणाम सहज ही सामने आते रह सकते थे।
चिंतन और चरित्र नये सिरे से अभ्यास से पूर्व ही उत्कृष्टता की दिशा में ढाला गया है और उसके लिए वरिष्ठ प्रतिभाओं को आगे बढ़कर बुद्ध के धर्म चक्र परिवर्तन जैसी भूमिका निभाने के लिए सामूहिक रूप से समुद्यत होना पड़ेगा।
चिंतन से उनकी साँसारिक मोह वासनाएँ नष्ट होकर बीज रूप परमात्मा में केन्द्रित होने लगीं।
चिंतन में ही सदा उलझा रहता है। ईर्ष्या, डाह, चिन्ता, निराशा, भय, आशंका आदि जिनके कोई वास्तविक कारण नहीं होते हमारे ऊपर छायी रहती है और जीवन को नरक रूप में बनायें रखती है। अगर वास्तविक कारण हों भी तो आदमी उसको स्वाभाविक एवं सामान्य समझ करके हँसी-खेल में भी टाल सकता है, लेकिन प्रायः वह राई भर की बात को पहाड़ के बराबर बनाकर के रात-दिन उद्विग्न बना रहता है। अगर मस्तिष्क को ठीक रखा जा सके तो हम इसी मस्तिष्क के द्वारा भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए न जाने कितने द्वार खोल सकते हैं। यदि यह न बन पड़े तो कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि चारों ओर जो भय, आशंकायें, निराशायें दिखायी पड़ती है, उनसे तो दूर बचे ही रह सकते हैं।
चिंतन एकाँगी और अदूरदर्शी है। जिसकी हम सेवा सहायता करते हैं। उसका मन सहज ही जीत लेते हैं। उसकी सहानुभूति, सद्भावना अर्जित करते हैं। जो प्रकारान्तर से प्रशंसा, श्रद्धा, सहकारिता एवं उपकार के रूप में लौटकर वापस आती है।
चिंतन के द्वारा आत्मा में उतरता है। पाठ्य पुस्तकें पढ़कर उसके संबंध में थोड़ी जानकारियाँ पायी जा सकती हैं। जो अनुभूति के अभाव में ऊपर की दूब की तरह बहुत शीघ्र मुरझा जाती है।
चिंतन करने की अपेक्षा अशुद्ध चिंतन में ही सदा उलझा रहता है। ईर्ष्या, डाह, चिन्ता, निराशा, भय, आशंका आदि जिनके कोई वास्तविक कारण नहीं होते हमारे ऊपर छायी रहती है और जीवन को नरक रूप में बनायें रखती है। अगर वास्तविक कारण हों भी तो आदमी उसको स्वाभाविक एवं सामान्य समझ करके हँसी-खेल में भी टाल सकता है, लेकिन प्रायः वह राई भर की बात को पहाड़ के बराबर बनाकर के रात-दिन उद्विग्न बना रहता है। अगर मस्तिष्क को ठीक रखा जा सके तो हम इसी मस्तिष्क के द्वारा भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए न जाने कितने द्वार खोल सकते हैं। यदि यह न बन पड़े तो कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि चारों ओर जो भय, आशंकायें, निराशायें दिखायी पड़ती है, उनसे तो दूर बचे ही रह सकते हैं।
चिंतन में और हमारे क्रियाकलापों में कहीं भूल पड़ जाती है। इस भूल का ही परिणाम है कि हमारी मनःस्थिति दुर्बल होने से-विकृत होने से हमारे बहिरंग जीवन में सारी की सारी परिस्थितियाँ विकृत होती चली जाती है ग्रसित होते चले जाते हैं। अगर हम अपने दृष्टिकोण को परिष्कृत कर सकें, अपनी गतिविधियों को सही कर सकें- अपने क्रियाकलापों में हेरफेर कर लें, तब वे सारी समस्यायें जो मनुष्य जाति को खाये जा रही है, जिनसे आदमी को हर वक्त बेचैन रहना पड़ता है हर समय कष्ट से घिरा रहना पड़ता है, जिससे पार पाने के लिए वह हर किसी के सामने पल्ला पसारता और नाक रगड़ता है कि आप हमारी सहायता कीजिए, तब किसी की भी सहायता प्राप्त न करनी पड़े। अध्यात्म की शिक्षा यही है कि अपने भीतर हम देखे, अपने आपको समझें, अपने आपको जानें। अपनी गलतियों के बारे में गौर करें और अपनी गतिविधियों के बारे में गौर करें और अपनी गतिविधियों को ठीक करने के लिए प्रयत्न करें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-March
चिंतन, चरित्र, व्यवहार में लगभग आमूल–चूल परिवर्तन करने में किस स्तर की, कितनी बड़ी सृजन सेना चाहिए। इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। आगरे का ताजमहल, मिश्र के पिरामिड चीन की दीवार जैसे भव्य निर्माणों को जिन्होंने निकट से देखा है उन्हें यह अनुमान भी लगाते बन पड़ा होगा कि कठिन परिस्थितियों में जटिल संरचनाएँ खड़ी करने में कितने संसाधनों और कितने श्रमिकों, कितने योजनाकारों का इनमें नियोजन हुआ होगा, और वे कितने दिनों के कठिन परिश्रम से विनिर्मित हो सके होंगे। युग−निर्माण ऐसी संरचनाओं की तुलना में हजारों लिए किस स्तर की कितनी बड़ी सृजन सेना चाहिए, इसका अनुमान लगाना मूर्धन्यों के लिए कुछ बहुत कठिन नहीं होना चाहिए।
चिंतन की लय को क्रिया को स्वर में भरने दें।
चिंतन का असन्तुलन एक तो शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव छोड़ता है। दूसरे उसकी योजनाओं, गतिविधियों में ऐसे तत्त्व भर देता है जो उसकी क्षमता, आवश्यकता एवं परिस्थिति को देखते हुए अटपटे और बेतुके लगते है। इससे संपर्क में आने वाले को उसका व्यक्तित्व ऐसा लगता है मानो वह विक्षिप्तता की दिशाधारा अपना रहा है और अस्वाभाविक कृत्रिम, अनगढ़ बनता जाता है। इस प्रकार की विसंगतियाँ निकटवर्ती लोगों की पकड़ में आसानी से आती है और उन्हीं को उस कारण हैरानी, परेशानी भी अधिक होती है।
चिंतन की अपनी विशिष्टता है। ऋषि–मनीषी कहे जाने वाले यहाँ के मनोवैज्ञानिकों ने मानव के व्यवहार एवं अन्तराल का भली-भांति विश्लेषण कर उसके व्यक्तित्व को परिपूर्ण बनाने-तथा जीवन को आत्म-केन्द्रित करने की एक ऐसी प्रणाली विकसित की थी-जिसे अध्यात्म मनोविज्ञान नाम दिया जाना सर्वथा युक्ति संगत है। इस मनोवैज्ञानिक प्रणाली को सुसम्बद्ध रूप से स्थापित करने का प्रमुख श्रेय महर्षि पतंजलि को है। उन्हें पूर्वार्त मनोवान के प्रतिनिधि के रूप में स्वीकारा जा सकता है। सुविख्यात मनोविशारद कार्ल रोजर्स ने इसी प्रणाली से प्रेरणा ग्रहण कर एक ‘नॉन डायरेक्टिव थेरेपी’ नामक पद्धति भी विकसित की है।
चिंतन का स्वरूप और गतिविधियों का परिवर्तन इतने बड़े रूप में आवश्यक होगा, जिसे समय का कायाकल्प हुआ कहा जा सके। युग परिवर्तन ऐसी ही प्रत्यावर्तन को कहा जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-February
चिंतन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है। शासन परिवर्तन जैसी, राज्यक्रांति जैसी यह भाव भूमिका है जिसमें अनाधिकारी-अनाचारी शासन सत्ता का तख्ता पलट कर उस स्थान पर सत्य, न्याय और प्रेम-संविधान वाली धर्मसत्ता का राज्याभिषेक किया जाता है। ‘सोऽहम्’ साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अंतःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियंत्रण नहीं रहा, उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा रहा है।
चिंतन-चेतन में विशेष परिवर्तन हुआ है।
चिंतन और बुरा आचरण करने वाला समाज न सिर्फ अपनी जैसी ओछी संतानें पैदा करता है, वरन् व्यक्ति में विद्यमान उन विभूतियों को भी अंकुरित होने से कुचल कर रख देता है, जो संभावित महानता के रूप में व्यक्ति में पहले से ही विद्यमान थीं।
चिंतन का, दृष्टिकोण का परिष्कार तथा “वर्चस्” अर्थात् प्रसुप्त अंतःशक्तियों का जागरण, तेजस् का वर्धन-प्रतिमा का जागरण। यह प्रज्ञा और पराक्रम का युग्म है जो ब्रह्मवर्चस् से स्पष्ट होता है। गायत्री व सावित्री दोनों का इस शब्द में समन्वय है। जहाँ गायत्री मेधा संवर्धन करती-प्रसुप्ति का जागरण कर जीवन्मुक्ति का, शान्ति का, मोक्ष का पथ प्रशस्त करती है वहाँ सावित्री सर्वतोमुखी समर्थता, प्रखरता, पराक्रमशीलता मन्यु उभारने वाली प्रक्रिया है। एक प्राणाग्नि का जागरण करती है तो दूसरी ब्रह्माग्नि का।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-March
चिंतन में उत्कृष्टता और कर्तृत्व में आदर्शवादिता के समन्वय के लिए तत्परतापूर्वक प्रयत्न किए जाने चाहिए। श्रद्धा और विवेक का जोड़ा ही उस यथार्थवादी सत्य का सृजन करता है, जिसमें हजार हाथी का बल होने की लोकोक्ति है। अपनी शिक्षण प्रक्रिया के अनुसार न संसार को मिथ्या या स्वप्न बताकर अकर्मण्य शुष्क वेदांती बनने की आवश्यकता अनुभव होगी और न वासना, तृष्णा, अहंता में डूबे हुए नर-पामरों के स्तर का जीवन स्वरूप स्वीकार किया जायेगा। हर व्यक्ति कर्मयोगी बनने का प्रयत्न करेगा। उसे भक्ति और शक्ति की उपयोगिता समान रूप से प्रतीत होगी।
चिंतनशीलता व सक्रियता शिथिल पड़ जाती है। शरीर से दुर्बल होने पर भी मनस्वी व्यक्ति सुदृढ़ व्यक्ति भी मनोबल के अभाव में दीन-हीन अकर्मण्य, निराश, भयभीत बना रहता है। प्राण-शक्ति ही साहस बनकर उभरती और मनोबल का आधार बनती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-August
चिंतन तथा प्रखर प्रोत्साहन से यह मूर्च्छा हट सकती है और तेजस्विता बढ़ सकती है। मन्द चेतना क्रमशः समग्र जागरुकता के रूप में विकसित हो सकती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-October
चिंतन से परब्रह्म की प्राप्ति होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-February
चिंतन करने लगा। पढ़ना-लिखना भूल चुका था। कई महीनों तक यही दशा रही। फिर उसे जैसे कुछ याद आया और वह पुनः प्रौढ़ व्यक्तित्व का स्वामी बन गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-September
चिंतन में समुद्र मंथन जैसी प्रखरता उत्पन्न की जानी चाहिए। प्रसुप्ति को जागृति में - मूर्छना को क्रान्तिकारी परिवर्तन में परिणत करने की आवश्यकता है। जीवन मंथन कर डाला जाय काया-कल्प के लिए कटिबद्ध हुआ जाय । पशु-प्रवृत्तियों से छुटकारा पाकर देवयान के पथ पर चलने का साहस जुटाया जाय तो अपने लिए भी समुद्र मंथन से उपलब्ध हुए बहुमूल्य रत्नों की तरह अति महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ करतलगत हो सकती हैं। व्यामोह की, प्रलोभनों की, उन्मादों की सनकें यदि अन्तः चेतना पर छाई ही रही ।
चिंतन और शुभ कार्यों में लगाने का निश्चय किया। प्रत्येक क्षण का उपयोग बड़ी कृपणता के साथ करता।
चिंतन में मनुष्यता को गौरवान्वित करने वाली विचारणा और क्रिया-कलापों में आदर्शवादी गतिविधियों का समावेश हो। पिछले चालीस वर्ष में इस उत्कृष्टता सम्बन्ध प्रयास में जो सफलता मिली है। उसने यह उत्साह उत्पन्न किया है कि परिवार के सदस्यों को केवल दिशा देते रहने से सन्तोष न किया जाय, वरन् प्रत्येक के व्यक्तिगत जीवन का स्पर्श एक व्यवस्थित योजना के अनुसार किया जाय। विचारों से प्रभावित होकर कोई अपनी विशेषता के कारण आदर्शवादी गतिविधियाँ अपनाने लगे, यह संयोग एवं सौभाग्य ही कहा जा सकता है। अपना श्रेय इस बात में है कि सभी परिजनों को योजनाबद्ध रूप से व्यक्तित्वों के परिष्कार की शिक्षा और प्रेरणा दी जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-January
चिंतन को द्वितीय चरण माना जाना चाहिए। दर्जी पहले कपड़ा काटता है, पीछे उसे सीता है। डाक्टर पहले नश्तर लगाता है। पीछे मरहम पट्टी करता है। यों यह दोनों ही कार्य मिले जुले हैं और तनिक से अन्तर से साथ प्रायः साथ साथ ही चलते हैं, फिर भी यदि प्रथम द्वितीय का प्रश्न हो तो मनन को पहला और चिन्तन को दूसरा चरण कहा जाएगा इस प्रक्रिया के लिए पूजा उपचार की तरह कोई विशेष शारीरिक, मानसिक स्थिति बनाने की या पूजा उपचार जैसी कोई साधन सामग्री एकत्रित करने की आवश्यकता नहीं है।
चिंतन तथा सादगी को स्थान देते हुए स्वस्थ शरीर, निर्मल, प्रशांत तथा सहनशील मन और विकसित अन्तःकरण की साधना में उत्तीर्ण होना पड़ता था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-January
चिंतन करने से प्रयोजन पूर्ण न होगा। उसके लिये तदनुकूल सक्रियता की भी आवश्यकता है। भावनाओं को कार्य रूप में परिणित न करने से वे शीघ्र ही निष्क्रिय होकर मर जाती हैं और मनुष्य का मानसिक स्तर पुनः नीचे उतर जाता है। भावनाओं के परिपोषण के लिये उन्हें कार्यरूप में परिणित ही करते रहना चाहिये साथ ही केवल मनोरथ मात्र से ही तो किसी की सेवा सहायता नहीं हो सकती। जब तक किसी रोगी को दवा लाकर न दी जायेगी और यदि आवश्यक हो तो पिलाई न जायेगी, तब तक क्या तो उसकी सेवा होगी और क्या उसे सुख अथवा संतोष मिलेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-April
चिंतन करने का ही फल है। किसी विषय अथवा प्रसन्न से सम्बन्धित भयानक विचार लेकर चिन्तन करते रहने से मस्तिष्क निर्बल और मानसिक धरातल हल्का हो जाता है। ऐसी दशा में आवेशों, आवेगों ओर उत्तेजनाओं को रोक सकना कठिन हो जाता है। यह विचार सफलतापूर्वक मनुष्य को संचालित कर अपराध अथवा पाप घटित कर डालने पर विवश कर देते है और यदि वह पाप अथवा अपराध करने को साहस परिस्थिति अथवा अवकाश नहीं पा पाता-अर्थात् उसका आवेश क्रिया द्वारा निकल पड़ने का अवसर नहीं पाता तो वह सीधा मस्तिष्क पर आघात करता है, जिससे उसमें विकार पैदा हो जाते है और मनुष्य सनकी, पागल अथवा उन्मादी बन जाता है। दोनों स्थितियों में चाहे वह अपराध अथवा पाप कर बैठे या बौद्धिक विकार से ग्रस्त हो जाये, उसका जीवन बिगड़ जाता है, जिन्दगी बरबाद हो जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-February
चिंतन और आत्म-शाँति पाते थे। आज उसकी सर्वाधिक आवश्यकता अनुभव हो रही है। विद्यालय और शिक्षण संस्थानों को तो शहर से हटा कर अन्य प्रदेशों में रखना ही चाहिये साथ ही कुछ क्षण निकालकर ऐसे स्थानों की यात्रा भी करनी चाहिये, जहाँ कुछ समय मानसिक शाँति पाई जा सके। तीर्थ यात्रा का यह महत्व अब पहले की अपेक्षा बहुत अधिक है, यदि ऐसे सुरम्य और सुरक्षित एकान्त स्थान उपलब्ध हो सकें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-October
चिंतन और दूरदर्शितापूर्ण कर्त्तव्यों के साथ जुड़ी हुई है। जिस प्रकार हम अपने काय−कलेवर को सँजोते हैं, उसी प्रकार यदि हम दिव्यसत्ता को समझने और उसको परिष्कृत विकसित बनाने में संलग्न हो सके तो उस सूक्ष्म प्रक्रिया का परिणाम ऐसा सुन्दर हो सकता है जिसका अनुभव कर जीवसत्ता का कण−कण आनन्द विभोर हो सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-December
चिंतन की प्रखरता जो सामान्यतया सचेतन मन की दक्षता प्रतीत होती है वस्तुतः अचेतन द्वारा प्रदत्त की हुई होती है। अचेतन एवं तिजोरी है जिसमें उपयोगी और अनुपयोगी सभी प्रकार के रस विष भरे होते हैं उनमें से जिन्हें आगे कर लिया गया होगा वे ही सचेतन पर अधिकार जमा लेगी और उसकी अभीष्ट दक्षता प्रखर करती चली जायेंगी। बुद्धिमान, विवेकशील, दूरदर्शी और निर्णय लेने वाले और सही ढंग से काम करने वाले व्यक्ति वस्तुतः अचेतन की गहरी पर्तों से ही अपनी इन विशेषताओं को उपलब्ध करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-March
चिंतन और प्रयास इसी के संशोधन को होना चाहिए। ग्राह्य और अग्राह्य का निर्णय करते समय प्राचीनता और नवीनता का वर्ग दुराग्रह आड़े नहीं आने देना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-May
चिंतन क अपहरण कर लेती है जिससे यथार्थता क —प्रतिक्रिया को समझना सम्भव होता है। कुकर्मी क आरम्भ में अपनी बुद्धिमत्ता पर गर्व होता है। अपने उस साहस की आप ही प्रशंसा करता है जिसे दूसरे लोग कर नहीं पाये और अधिक सुखोपभोग करने से वंचित रह गये। किन्तु उसकी यह मान्यता देर तक स्थिर नहीं रहती। कुछ ही समय में पता चलता है कि जो कमाया गया उससे हजारों गुना अधिक गँधा दिया गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-April
चिंतनात्मक असमर्थता और तुच्छता स्वीकार करनी पड़ती है। समग्र ईश्वर का प्राप्त करना तो दूर उसके विस्तार सम्बन्धी कल्पना तक कर सकना हमारे लिए शक्य नहीं।
चिंतन की अवगति एवं अस्त-व्यस्तता को यदि देखा समझा न जायें उसमें सुधार परिवर्तन न किया जाय तो बाह्य क्षेत्र में भी अभीष्ट परिवर्तन सम्भव न होगा। जैसे विचार होते है वैसा जीवन का स्वरूप बनता है। इसी बात को यों भी कह सकते हैं कि जैसा बनता है उसी स्तर के विचारों की मनः क्षेत्र में स्थापना की जानी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-February
चिंतन और मनन के लिए उत्तम अवसर होता है। अधिक खाने वाले व्यक्तियों के विचार स्थूल होते हैं। वह कोई सूक्ष्म बात नहीं सोच सकते। पेटू लोग प्रायः स्थूल बुद्धि के होते हैं इसलिए बुद्धि में तीव्रता लाने के लिए हमारे धर्म शास्त्रों में व्रतों का विधान है। व्रत के दिन जो विचार मन में आते हैं, उनकी एक अमिट छाप मस्तिष्क पर पड़ जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-April
चिंतन से अहिंसा की ओर उन्मुख होता है। व्यक्ति सत्य के लिए अहिंसक तथा शान्ति प्रिय समाज की स्थापना के लिए सत्यशील होकर अपने लक्ष्यों की दिशा में अग्रसर होता है। वस्तुतः सत्य और अहिंसा में मतभेद है। मानव जीवन दर्शन एवं समाज दर्शन की युग दृष्टि में ये परस्पर अन्योन्याश्रित हैं।
चिंतन करता हुआ शरीर को संयम नियम की फांसी पर चढ़ाये रखना “मिथ्याचरण” है। अतः ब्रह्मचारी वही है जिसने अपने मन को सुसंस्कारों से संस्कृत कर दिया। जिसने इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर अपने दुर्जेय मन को भी अधिकृत कर लिया।
चिंतन से सर्वेंद्रिय संयम ही ब्रह्मचर्य के रूप में आभासित होता है। गान्धी जी उपनिषदों के इस कथन से सहमत हैं कि भोग की इच्छा से ब्रह्मचर्य के व्रत के पालन में नहीं लगा जा सकता सर्वव्यापी प्रेम के लिये ही ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। जिस समय तक व्यक्ति केवल परिवार अथवा परिवार के सदस्यों में अनुरक्त है तब तक उसका प्रेम सर्वव्यापी नहीं हो सकता और आन्तरिक प्रेम की सर्वव्यापकता ही ब्रह्म विभूति की चर्या है। अपने प्रेम को किसी एक व्यक्ति को सौंप देना ब्रह्मचर्य व्रत को भंग कर देना है। ब्रह्मचर्य व्रत के पालन के लिये अन्तर प्रकृति और बाह्य व्यवहार में एकता का होना आवश्यक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-June
चिंतन और विवेक द्वारा आत्मा को बहुत ऊँची स्थिति में पहुँचाया। मनीषियों के जो कार्य अभ्युदय और निःश्रेयस के कारण हों, उन्हें धर्म की संज्ञा दी है। भारतवर्ष में अनेक ऋषि-मुनियों ने एकाँत जंगलों में एवं पर्वतों में जाकर कठोर तप और साधना की और उसके फलस्वरूप जो कल्याण पथ उन्हें दिखाई दिया, उसे उन्होंने जगत के समक्ष रखा। एक दीप से अनेक जले। मानव समाज अज्ञान रूपी अन्धकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर बढ़ा।
चिंतन है, जिसमें ब्रह्मविद्या आती है। उन चार बातों में पहली बात यह थी कि राजनीति की जगह लोक नीति चले। इन्डायरेक्ट डेमोक्रेसी की डायरेक्ट डेमोक्रेसी, पीपल्स डेमोक्रेसी चले। दूसरी बात यह थी कि हवा, पानी और सूरज की रोशनी के जैसे जमीन भी सबके लिए हैं, उसकी मलकियत नहीं हो सकती है। तीसरी बात यह थी कि आपको शान्ति-सेना कायम करनी होगी, मर मिटने के लिए राजी होना होगा हर हालत में मारने के लिए जाने वाले सिपाही को भी मर मिटने के लिए तैयार होना ही पड़ता है।
चिंतन कर सोचो तुम क्षणभर,
चिंतन करने की जो पुरानी बात थी, उसे मैं ब्रह्मविद्या नहीं मानता हूँ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-September
चिंतन, तप, यज्ञ आदि तक ही सीमित हैं। आत्म संयम ही परमात्मा की प्राप्ति का प्रधान हेतु है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-February
चिंतन धार पाप करते हैं॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-June
चिंतन करता है, वह अवश्य सत्यमय हो जाता है और जब किसी के अन्दर सत्य का सूर्य संपूर्णतः प्रकाशित होता है, तब वह छिपा नहीं रहता। तब उसे बोलने बतलाने या समझाने की जरूरत नहीं रहती या उसके बोल में इतना बल होता है, इतना जीवन भरा होता है कि उसका असर लोगों पर तुरन्त होता हैं। ऐसा सत्य मुझ में नहीं। हाँ, इस मार्ग में अलबत्ता मैं विचरण कर रहा हूँ। अतएव ‘रुख नहीं वह रेड प्रधान’ की तरह मेरी यह दीन दशा हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-December
चिंतन की प्राभाविकता को ग्रीक के क्लासिकल युग में देखा जा सकता है। इस काल में भी विज्ञान को तत्त्व दर्शन का एक अभिन्न अंग माना गया। तत्त्व दर्शन का संबंध वस्तुओं की प्रकृति तथा उसमें निहित सत्य के ज्ञान की खोज से होता है। इसमें देखने व विचारने की विधा समग्र होती है। विशिष्ट वस्तु की पहचान या उसके स्वरूप की जानकारी समग्रता की परिधियों में ही की जा सकती है।
चिंतन आ ही नहीं सकता।”
चिंतन-क्षेत्र में घुसी गड़बड़ियों की ओर ध्यान नहीं दिया गया, वहाँ जमी वितृष्णाओं और विपन्नताओं का समाधान न किया गया, तो आहार-विहार का संतुलन बनाए रहने पर भी रुग्णता से पीछा छूट नहीं सकेगा। अब नए शोध-प्रयासों ने कुछ दुर्घटना, जैसे आकस्मिक कारणों से उत्पन्न होने वाले रोगों को ही शारीरिक माना है और लगभग समस्त बीमारियों को मनःक्षेत्र की प्रतिक्रिया घोषित किया है। गहरी खोजों के फलस्वरूप आरोग्य जैसे मानव जीवन के अति महत्त्वपूर्ण प्रयोजन पर नए सिरे से विचार करना होगा।
चिंतन से ग्रसित लोगों को भी एक प्रकार से कबाइली ही समझा जाना चाहिए और इन्हें सभ्य बनाने का प्रयास न बन पड़ता दिखे, तो कम-से-कम इतना तो करना ही चाहिए कि उनकी उच्छृंखलता उभरकर अनर्थ न रचने पाए, इस संबंध में सतर्कता बरती जाए। अनपढ़ लोग भी अविकसित बालकों की तरह होते हैं, जो उचित-अनुचित का सही निर्णय नहीं कर पाते और अक्सर ऐसी भूलें कर बैठते हैं, जिनसे उनके स्वयं का और दूसरों का अनर्थ ही होता है। बड़ी आयु हो जाने पर भी सभ्य स्तर की विचारशीलता न अपना सकने वालों की स्थिति भी ऐसी ही समझनी चाहिए। वे जितना कुछ सृजन-उत्पादन कर पाते हैं, उसकी तुलना में उत्पन्न की गई हानियाँ कहीं अधिक होती हैं।
चिंतन और व्यवहार बदलने की किस प्रकार तैयारी करनी चाहिए, इस संदर्भ में आगे से अब अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर विशेष पाठ्य-सामग्री रहा करेगी। संसार भर की मूर्धन्य प्रतिभाएँ इस संबंध में क्या सोचती और क्या परामर्श देती हैं, इसका अति महत्त्वपूर्ण सामयिक संकलन अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर ही मिल सकेगा।
चिंतन के मूल में निहित परोक्ष प्रेरणा को समझेंगे, वे इनके इस कथन पर अविश्वास नहीं करेंगे।
चिंतन के मध्य उसे अनेकानेक कारणों में एक महत्त्वपूर्ण कारण समझ में आया— 'भाषा'। इसकी विविधता, विचित्रता मनुष्य को अपने देश में बेगाना बना देती है। इसी के कारण अनेकानेक विवाद उपजते और टकराव के अवसर आते हैं।
चिंतन का पिछड़ापन स्वीकार करने में कोई लाज नहीं आनी चाहिए एवं हर परिवर्तन को खुले दिमाग से स्वीकारना चाहिए।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार में निरंतर स्थान देता चला आया है। विगत आधी शताब्दी से वटवृक्ष की तरह उसकी गरिमा समुन्नत,सुविस्तृत ही होती चली आई है।यह कैसे संभव हुआ? इसका श्रेय उस अदृश्य ऊर्जा को ही जाता है, जो अपने लिए उपयुक्त एक केंद्र विशेष पर अवतरित होती और अपनी गरिमा के आँचल में आश्चर्यजनक रीती से लाखों को समेटती चली जा रही और करोड़ों को अपनी छत्र-छाया में शांति और प्रगति से लाभांवित होने के लिए आमंत्रित करने का दुस्साहस जैसा उपक्रम अत्यंत उत्साहपूर्वक सँजोती चली जाती है।
चिंतन भी प्रकारांतर से स्वाध्याय और सत्संग की आंशिक आवश्यकता पूरी करते हैं। अपनी तर्कबुद्धि विकसित की जानी चाहिए और सामने प्रस्तुत समस्याओं में से प्रत्येक पर पक्ष हो या विपक्ष दोनों को आधार मानकर विचार करना चाहिए। इस प्रकार अपनाया गया जीवनक्रम विचारशीलता को परिमार्जित करता है।
चिंतन एवं प्रयास, संपर्क-क्षेत्र से आगे बढ़ाकर अधिकाधिक सुविस्तृत करते जाते हैं। अग्नि के लिए समर्पित होने वाला ईंधन अग्निरूप ही हो जाता है। भक्त की समस्त भाव-संवेदनाएँ ईश्वर जैसी उदार एवं महान बनती जाती हैं। उसे सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन के अतिरिक्त और कुछ सूझता नहीं।
चिंतन का पक्षधर, किंतु व्यवहार में उलटा ही देखने को मिलता है। आज भी जनजातियों में इस पवित्र बंधन के साथ जुड़े जो अनुबंध हैं, वे तुलनात्मक दृष्टि से पिछड़ों में कहीं अधिक श्रेष्ठ स्तर के हैं व हमें प्रेरणा देते हैं।
चिंतन का अभाव रहता है। स्वतंत्र चिंतन के प्रकाश में उनकी आंखें चौंधिया जाती हैं। इस वर्ग के लोगों को मानसिक दृष्टि से अविकसित, नर-पामरों की श्रेणी में ही रखा जा सकता है।
चिंतन एवं उत्कृष्ट कर्म का सामंजस्य ही वह उपाय है, जिससे अचेतन में नूतन लिपि लिखी जा सकती है। इनमें से एक का भी अभाव होने से प्रयोजन की समग्रता नहीं घटेगी। इससे न केवल जीवनक्रम सामान्य बनेगा, बल्कि अंतस्तल में उन दिव्य शक्तियों का अविरल प्रवाह प्रवाहित होने लगेगा, जिनके कारण सामान्य मनुष्य महामानवों और प्रतिभावानों की पंक्ति में जा बैठता है।
चिंतन की उपेक्षा करके किन्हीं पूर्वाग्रहों के साथ चिपके रहने पर बल दिया जा रहा हो। प्रायः हम इसे भुला देते हैं कि हमारी प्रगति क्रमशः ही हुई है और ऐसे ही अनंतकाल तक होती रहेगी। पूर्ववर्त्ती लोगों ने जो कुछ कहा या किया था, वह अंतिम था और सुधार की तनिक भी गुंजाइश नहीं, यह मान बैठने से प्रगति-पथ अवरुद्ध हो जाता है और सत्य की ओर अग्रगामी कदम रुक जाते हैं। विज्ञान ने अपने को इस स्थिति से अलग रखा एवं पिछली जानकारी से लाभ उठाकर आगे की उपलब्धियाँ हस्तगत करने के लिए प्रयत्न-पुरुषार्थ जारी रखा। अतः वह क्रमशः अधिक सफल— समुन्नत होता चला गया।
चिंतन करना चाहिए। अशुभ का चिंतन करके उसे शुभ में परिवर्तित नहीं कर सकते। हमें उस परिस्थिति का स्वयं निर्माण करना होगा, जिसमें हम अपनी भावनाओं को सुस्थिर, संतुलित और सुचारु रूप से देखना चाहते हैं। इस तरह हम ईश्वरीय शक्ति के कार्य में आने वाले अवरोधों को समाप्त करते हैं।"
चिंतन आज के लिए किसी प्रकार उपयोगी नहीं रहा। यही बात सत्संग के संबंध में भी है। जो समय के अनुरूप है, जिनमें सामयिक समाधान है, उन्हीं को सत्संग में सम्मिलित करने योग्य विचारधारा मानना चाहिए। इन दोनों आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए युगधर्म और व्यावहारिकता का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए। इस योग्य साहित्य और व्यक्ति कठिनाई से ही मिलते हैं, फिर भी ढूँढने पर वे किसी-न-किसी प्रकार कहीं-न-कहीं से मिल ही जाते हैं।
चिंतन के प्रकाश में उनकी आंखें चौंधिया जाती हैं। इस वर्ग के लोगों को मानसिक दृष्टि से अविकसित, नर-पामरों की श्रेणी में ही रखा जा सकता है।
चिंतन इसी को कहते हैं। तादात्म्यता में ही ईश्वरदर्शन का ऐसा रसास्वादन मिलता है, जिसकी प्यास में जीव कस्तूरी के हिरन की तरह दिशा-दिशा में तलाशता-भागता फिरता है।
चिंतन करके उसे शुभ में परिवर्तित नहीं कर सकते। हमें उस परिस्थिति का स्वयं निर्माण करना होगा, जिसमें हम अपनी भावनाओं को सुस्थिर, संतुलित और सुचारु रूप से देखना चाहते हैं। इस तरह हम ईश्वरीय शक्ति के कार्य में आने वाले अवरोधों को समाप्त करते हैं।"
चिंतन और कर्तृत्व से मनःक्षेत्र में उत्पन्न होने वाला अंतर्द्वंद्व दुहरा व्यक्तित्व रच देता है और इससे निरंतर उठने वाली आंतरिक कलह सारी मनोभूमि को क्षत-विक्षत करके रख देती है। संचालन के आहत, घायल एवं परेशान होने पर उसके आधीन काम करने वाले तंत्र की दुर्दशा होना स्वाभाविक है।
चिंतन किया है तथा समय-समय पर उनके अधिवेशन भी होते रहे हैं। प्रस्तुत किए गए शोधपत्रों, इस विधा से संबंधित विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा लिखित पुस्तकों को न केवल शान्तिकुञ्ज में एकत्र किया गया है, वरन पत्र व्यवहार द्वारा उनसे संपर्क स्थापितकर यह जानने का प्रयास किया जा रहा है कि आज की परिस्थितियों व मानवी पराक्रम की भावी संभावनाओँ को देखते हुए भविष्य की, नवयुग की संरचना किस प्रकार संभव है? यह एक ऐसा विषय है, जिसे अभी तक आँकड़ों व वैज्ञानिक तथ्यों की भाषा में ही समझाया जाता रहा है, किंतु अखण्ड ज्योति के पाठक अध्यात्मपरक विवेचन, जो भविष्य विज्ञान से संबंधित हैं, आगामी माह की पत्रिका से इन पृष्ठों पर पढ़ते रह सकेंगे। जेनेटिक्स, माॅलीक्यूलर, बायोलॉजी, इलेक्ट्रोफिजियोलाॅजी, एस्ट्रोफिजिक्स, बायोमेट्रालाॅजी, काॅस्मोलाॅजी, बाॅयोकेमिस्ट्री, न्यूरोएंडोक्राइनालाॅजी, एंथ्रापोलाॅजी, आल्टरनेटिव सिस्टम आफ मेडीसिन, न्यूरोसाइकिस्ट्री आदि विधाओं के विशेषज्ञ आज के मानव को, भविष्य को, किस रूप में विनिर्मित करने की कल्पना कर रहे हैं, यह तथ्यपरक, रोचक सामग्री अखण्ड ज्योति में सार-संक्षेप में पाठकगण पा सकेंगे।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार बदलना है, उनका स्वभाव, अभ्यास जिस दिशा में बह रहा है, उसके लिए कोई और समर्थ प्रयास सामने आना चाहिए। आतंक के दबाव में हुए परिवर्तनों का प्रतिफल देखा जा चुका है। उनसे नए प्रकार के आतंक फूटे हैं और परिणाम नफे के स्थान पर घाटे का ही रहा है।
चिंतन-साधना को सुचारु रूप से किसने गतिमान किया? यह और कोई नहीं, उनकी पत्नी थी— श्रीमती जेनी मार्क्स। इन्हें उतना ही श्रेयभाजन समझा जा सकता है, जितना कि स्वयं मार्क्स, बल्कि कुछ अर्थों में उनसे भी अधिक।
चिंतन विकृत एवं हेय होता है। कितने ही दुष्टता की भाषा में सोचते हैं और हर किसी पर दोषारोपण करते हुए, उन्हें शत्रुता की परिधि में लपेटते हैं।  कितने ही आशंकाओं—आक्षेपों—संदेहों के अभ्यस्त होते हैं। कुछ शेखचिल्लियों की तरह मनसूबे बाँधते, असंभव का विचार किए बिना अपने सपनों की एक अनोखी दुनिया बसाते रहते हैं। परिस्थिति का मूल्यांकन कर सकना, दूसरों की मनःस्थिति समझ सकना उनके लिए संभव नहीं होता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-October
चिंतन और प्रयत्न स्वार्थ सिद्धि के निमित्त होता है वह आत्म विस्तार की स्थिति में अन्यान्यों के लिए भी करना पड़ता है।
चिंतन में मुसकराहट में एक दिव्य कोमलता उभरी रहती है। वाणी में आत्मीयता की इतनी मिठास रहती है जिस पर गायकों का आलाप निछावर किया जा सके। इच्छा होती है, इस सौजन्य के प्रति श्रद्धा समर्पित करने की। इसके विपरीत जिनके भीतर कुटिलता भरी रहती है वे ठगों और बहुरूपियों की तरह बाहर से भले ही सब्जबाग दिखाते रहें पर भीतर जो ठगने की शोषण और विश्वासघात करने की कुटिलता भरी रहती है वह छिपाने पर भी छिपती नहीं। आँखें मनुष्य के अन्तराल का दर्पण है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-May
चिंतन बाला व्यक्ति जहाँ जाता है, वहीं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से तिरस्कार का भाजन बनता है। उसके मिलन की किसी को प्रसन्नता नहीं होती और चल जाने से न दुःख लगता है न अघात लगता है। उसकी निज के जीवन की समस्यायें ही इतनी उलझ जाती हैं, जिन्हें सुलझाते नहीं बनता और ऐसे ही परेशानियों में डूबता-उतराता हैं। जिनसे मन मिलता है उनके सामने आपनी विपन्नता का रोना रोने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं बन पड़ता है। मानवी विचार चेतना के विपरीत प्रवाहों का ही यह परिणाम है कि आज पर्याप्त सुख सुविधा, समृद्धि, ऐश्वर्य, वैज्ञानिक साधनों से युक्त जीवन बिताकर भी वह अधिक अशान्ति, दुःख व उद्विग्नता सये परेशान हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-February
चिंतन विशेष को ऐसा कुछ सूझ पड़ा जो साधारणतया असम्भव ओर अटपटा लगता था, पर जब कल्पनाकार ने उसे आग्रह पूर्वक सम्भव माना ओर प्रयास को आगे बढ़ाने में सब कुछ झोंक दिया तो ऐसे साधन बनते चले गये जिनके आधार पर असम्भव कभी आगे चलकर सम्भव बनता चला गया। मिस्र का पिरामिड, चीन की दीवार, ताजमहल, कुतुबमीनार, पनामा नगर, स्वेज नहर, हालैंड द्वारा समुद्र में डुबा बड़ा इलाका छीनकर मनुष्यों के रहने लिए बनाया जाना, नोट करेंसी का प्रचलन, डाक व्यवस्था जैसी बातें जिन्हें सूझी, उनकी प्राथमिक स्फुरणा को अतीन्द्रिय क्षमता की देन कहा जा सकता है। सम्भवः धर्म, दर्शन, परलोक, ईश्वर, आदि के वर्तमान स्वरूप निर्धारणकर्ताओं को भी इन प्रतिपादनों के सम्बंध में अन्तः स्फुरणा ही मार्ग दर्शन करती रही हो।
चिंतन तो भविष्य की कल्पनाओं में ही निरत रहता हे। कामनाएँ आरे कुछ नहीं, भविष्य की लालसा ही है। उन्हीं के अनुरूप यह निश्चित किया जाता है कि गले दिनों के लिए जो निर्धारण किया गया है उसका ताना बाना कैसे बुना जाय? सरंजाम कैसे जुटाया जाय? इसलिए तीनों काल खण्डों में भविष्य की अवधारणा ही अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसी के आधार पर अगले कार्यक्रमों का निर्धारण किया जाता है ओर तदनुरूप प्रतिफल उभर कर समाने आता है।
चिंतन और आध्यात्मिक साधना में निमग्न हो जाता है,उस समय प्रभामंडल के रंग और अधिक चमकदार एवं प्रभावकारी हो जाते हैं। इसका सीधा संबन्ध व्यक्ति के चिन्तन और भावना क्षेत्र से हे जिसमें आये क्षणिक परिवर्तन से भी इस में अंतर आ जाता है और अपने चारों ओर के वातावरण को प्रभावित करता है।
चिंतन के अभाव में ही लोग अनेकों दुर्गुण अपनाते और पतन पराभव के गर्त में गिरते हैं। यदि सही चिन्तन कर सकने का पथ प्रशस्त हो सके तो समझना चाहिए कि सर्व समर्थ मनुष्य को अपनी समस्याएँ आप हल करने का मार्ग मिल गया। अपंगों, असमर्थों या दुर्घटना ग्रस्तों को छोड़कर कोई ऐसा नहीं है जो सही चिंतन करने का मार्ग मिल जाने पर ऊँचा उठ न सके, आगे न बढ़ सके, अपनी समस्याओं का आप हल न कर सके। इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए प्रधानतया यही नीति अपनानी चाहिए कि लोक मानस के परिष्कार के लिए, सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए अपनी योग्यता और परिस्थिति के अनुसार भरसक प्रयत्न किया जाय।
चिंतन की स्थिति में अवस्थिति जिन व्यक्तियों के विर्लियन चित्र उतारे गये तो देखा गया कि फिल्म पर गहरे लाल रंग के चकते पड़ जाते हैं। इसका सर्वाधिक प्रभाव हाथ पर ही होता है। इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य के भले बुरे अणुओं की आभा हाथों से प्रकट होती और संपर्क में आने वालों को प्रभावित करती है। धर्म ग्रन्थों में इसीलिए कहा गया है वे हाथ काट डालने योग्य हैं जो पाप कर्म में प्रवृत्त होते हैं तन की बात सर्वविदित है। स्पर्श से उनकी दिव्य प्राण ऊर्जा का लाभ अनायास ही लोगों को मिल जाता है।
चिंतन करते हैं, वही इच्छा, आकाँक्षा के रूप में शब्द शक्ति बन कर निकलता है। विज्ञान ने शब्द को शक्ति के रूप में स्वीकारा है। उसके अनुसार शक्ति का न तो नाश होता है न निर्माण, वरन् रूपांतरण होता है। वह अपने मूल रूप में भी रह सकती है अथवा दूसरे में बदल सकती है, पर उनका विनाश कभी नहीं होता। इस आधार पर वैज्ञानिक अन्तरिक्ष में अब तक के छोड़े गये विचारों को एक विशेष क्षेत्र में अवस्थित बताते हैं।
चिंतन से विरत होना पड़ेगा और ऐसी अन्तःस्फुरणा से प्रेरित होना पड़ेगा जो दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाने के लिए जन जन को बिता करे। क्रिया कलापों, प्रचलन एवं प्रयासों में ऐसे तत्वों का समावेश करे जिसके आधार पर हर क्षेत्र में औचित्य अपनाया जाना दृष्टिगोचर होने लगे। मनः स्थिति ही परिस्थितियों को जन्म देती हे। यदि नये युग का अनुरूप विचार धारा को स्वीकार करने ओर औचित्य को कार्यान्वित करने के लिए उत्साह उमड़ पड़े तो कोई कारण नहीं कि सुखद परिस्थितियों का प्रादुर्भाव संभव हो न सके।
चिंतन करने का मार्ग मिल जाने पर ऊँचा उठ न सके, आगे न बढ़ सके, अपनी समस्याओं का आप हल न कर सके। इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए प्रधानतया यही नीति अपनानी चाहिए कि लोक मानस के परिष्कार के लिए, सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए अपनी योग्यता और परिस्थिति के अनुसार भरसक प्रयत्न किया जाय।
चिंतन कह सकते है।
चिंतन किया जाय तो ज्ञान विज्ञान के सर्वथा नये ओर उच्चस्तरीय आयाम खुल सकते है। इसी तरह क्रमशः जैसे-जैसे शरीर का ताप दिनमान के साथ बढ़ता जाता है ओर 2 से 40 सेंटीग्रेड तक अधिक हो जाता है। तो उस वक्त शारीरिक ऊर्जा की क्रियाशीलता बढ़ी-चढ़ी होती है। उस समय शारीरिक श्रम का सर्वोत्तम सदुपयोग हो सकता है। सबसे अधिक मेहनत का काम उस समय किया जाय तो स्वास्थ्य एवं उपार्जन दोनों ही दृष्टि से लाभकारी सिद्ध होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-September
चिंतन को उदात्त और चरित्र को उदार बनाना पड़ा है। व्यक्तित्व के परिष्कार और उदार लोक मंगल को अपनी प्रधान आकाँक्षा मानकर चलने वाले और इसके लिये प्रबल पुरुषार्थ करने वाले ही अपनी पात्रता उस स्तर तक पहुँचा सके हैं, जिस पर अंतरिक्ष से अनायास ही दिव्य अनुदान बरसते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-August
चिंतन सर्वसाधारण की समस्याओं का सुझाव प्रस्तुत न कर सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-March
चिंतन, दुर्भावनाओं का शिकार प्रायः ऐसे ही लोग बनते देखे गये है। उनका मानना है कि आस पास के वातावरण में फैले दुर्गन्ध के सूक्ष्म परमाणु नासिका छिद्र से प्रविष्ट होने के पश्चात् मस्तिष्क के अति संवेदनशील घ्राण केन्द्र को पंगु बना देते हैं जिससे न केवल मानसिक विकृतियाँ उपजती है वरन् शरीर का रसायन तंत्र भी गड़बड़ा जाता है और नई-नई व्याधियों को जन्म देता है।
चिंतन की दिशा धारा को भी विशेष गंधें अपने ढंग से मोड़ती-मरोड़ती रहती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-January
चिंतन का स्तर होता है, उसी अनुरूप औरा का निर्माण होता है एवं सारा वातावरण इन आयंस से चार्ज हो जाता है।
चिंतन उर्ध्व स्तरों की चर्चा न कर मात्र मानव तथा प्रकृति के संबंधों को सूक्ष्म व स्थूल स्तर पर लेता है, जबकि आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन में इन संबंधों का दायरा केवल स्थूल स्तर तक ही सिमट जाता है।
चिंतन में इन संबंधों का दायरा केवल स्थूल स्तर तक ही सिमट जाता है।
चिंतन को गड़बड़ाने न देना। अवसादग्रस्त या उत्तेजित न होना। शांतचित्त रहने पर ही सही निष्कर्ष निकलना और निर्धारण करना संभव होता है। जब तक कार्य की सुसंतुलित रूपरेखा न बने, तब तक उसको इस रूप में संपन्न नहीं किया जा सकता कि करने वाले की गरिमा एवं दक्षता बढ़ी-चढ़ी समझी जा सके। अच्छी तरह किए गए काम ही सफल होते तथा अपनी विशिष्टता का परिचय देकर प्रशंसा का विषय बनते है।
चिंतन को बढ़ावा दिया है, वहाँ मनुष्य को प्रकृति से पृथक्कर एक व्यापक असंतुलन भी पैदा कर दिया है। इससे प्रदूषणजन्य शारीरिक रोगों में तो बढ़ोतरी हुई ही है, अप्रत्यक्ष रूप से मनोविकारग्रस्त रोगियों की संख्या में करोड़ों की संख्या में अभिवृद्धि हुई है। 'द स्ट्रक्चर ऑफ साइंटिफिक रेवाॅल्युशन' एवं 'सायकिएट्री एंड इट्स क्रिटीक्स' जैसे शोधग्रंथों के विद्वान लेखक एम॰ रुथने बढ़ती हुई मनोरोगों की दर के लिए पर्यावरण की गड़बड़ियों को जिम्मेदार माना है। इन अध्येताओं के साथ कैम्ब्रीज विश्वविद्यालय के मनःशास्त्री डाॅ इग्लेवी की भी यह मान्यता है कि पर्यावरण के साथ मनुष्य का प्रगाढ़ भावनात्मक संबंध है। दोनों ही एकदूसरे से सूक्ष्म रूप से जुड़े हुए हैं।
चिंतन का, आस्थाओं का प्रदूषण। आशंका, अविश्वास, अकारण चिंता, भय, उत्तेजना, असंतुलन आदि से कितने ही लोग घिरे देखे जाते है। सोचने की सही पद्धति हाथ न लगने के कारण कितने ही लोग बौखलाए फिरते रहते हैं। कईयों को निराशा, उदासी घेरे रहती है। मनोबल, संकल्पशक्ति का नितांत अभाव दिखाई पड़ता है, कई कल्पनाएँ गढ़ते और उनमें उलझकर इस प्रकार रहते हैं मानों उन पर कोई विपत्ति का पहाड़ टूटने वाला हो।
चिंतन की ओर इंगित करता है। इस लेख में उन्होंने आगे लिखा है कि यह 'बायोप्लाज्मिक बॉडी' अपने आस-पास के वातावरण के घूमते कणों को अपनी शक्ति से चार्ज कर देती है। इस प्रक्रिया को उन्होंने 'आयोनाइजेशन' कहा है। जिस स्तर के प्राण-प्रवाह होते हैं, परिष्कृत अंतःकरण होता है, चिंतन का स्तर होता है, उसी अनुरूप औरा का निर्माण होता है एवं सारा वातावरण इन आयंस से चार्ज हो जाता है।
चिंतन का विषय रहे हैं। पूर्व तथा पश्चिम दोनों ही क्षेत्रों में उस पर व्यापक शोधनात्मक चिंतन हुआ है। पूर्व विशेषतया भारत में जहाँ ये अध्येता, ऋचाओं व श्रुतियों के दृष्टा ऋषि तथा दर्शनकार मनीषी रहे हैं, वहाँ इस क्षेत्र में पश्चिम में प्लेटो, एपीक्यूरस हेगल, ब्रॅडले, बर्गसाॅ, लाइ बिलित्ज, बोंसाके स्पेंसर जैसे चिंतकों का विश्वविख्यात समूह रहा है।
चिंतन वाले लोगों में यह अत्यंत निम्न स्तर का होता है। इसे असुरता का परिचायक कह सकते हैं। इसका सघन होना धारणकर्त्ता के पतन का द्वार खोलता है। जिस पर ऐसा प्रभामंडल प्रभाव छोड़ता है, उसे अशक्त-असहाय बनाकर निर्जीव-पराधीन की स्थिति में ला पटकता है। इस आसुरी तेजोवलय का रंग कालिख लिए होता है, ऐसा दिव्यदर्शियों का मत है।
चिंतन और चरित्र भी हेयस्तर का बनता है;  इसलिए जहाँ तक हो, अभक्ष्य भोजन से बचा ही जाना चाहिए।
चिंतन का प्रतीक—  प्रतिनिधि माना जाता है। अन्य दो आधार ब्रह्मसूत्र व उपनिषद् प्रकारांतर से इसमें समाहित है। इसमें जहाँ दार्शनिक चिंतन के उदात्त भाव हैं, वहीं नीति, आचार-व्यवहार की विस्तीर्णता— विशालता भी है।
चिंतन किया है और इसे शक्ति प्राप्त करने की एक वैज्ञानिक पद्धति घोषित किया है। इसकी महत्ता पर प्रकाश डालते हुए प्रसिद्ध विचारक मनीषी डेल कार्नेगी ने कहा है— “यदि लोगों को यह ज्ञात हो जाता कि प्रार्थना से शांति और संतोष मिलता है, तो जो आत्महत्या की चेष्टा करते हैं अथवा पागल हो जाते हैं, उनमें से अधिकांश को बचाया जा सकता है।” उन्होंने चिंताओं-मनोविकारों से छुटकारा प्राप्त करने का उपाय प्रार्थना को बताया है। नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध वैज्ञानिक डाॅ॰ अलेक्सिस कैरेल ने अपनी पुस्तक  'मैन द अननोन' में लिखा है कि, "प्रार्थना द्वारा कठिन रोगों से भी छुटकारा पाया जा सकता है।" इसी तरह की मान्यता वैज्ञानिक अलबर्ट विल्क की भी है।
चिंतन करके, प्रकृति के विकासक्रम को पूर्ण करके इससे उर्ध्व स्तरों पर आरोहण का निर्देश दिया गया है। पश्चिम का दार्शनिक चिंतन उर्ध्व स्तरों की चर्चा न कर मात्र मानव तथा प्रकृति के संबंधों को सूक्ष्म व स्थूल स्तर पर लेता है, जबकि आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन में इन संबंधों का दायरा केवल स्थूल स्तर तक ही सिमट जाता है।
चिंतन-स्तर सिकुड़ जाता है। न उसे सीखने की इच्छा होती है और न ऐसी योजना बनाने की, जिसके आधार पर आज की तुलना में कल अधिक समर्थ और समुन्नत बन सकें। ऐसे लोगों को जब कभी दीनता-हीनता का आभास होता है तो किसी अन्य को व्यवधान मानकर उसी पर दोषारोपण करने लगते हैं। भाग्य, विधि-विधान, ईश्वर की इच्छा, समय का फेर, ग्रह-नक्षत्रों द्वारा उत्पन्न किए गए अवरोधों की बात सोचकर संतोष कर लेते हैं। बहुत हुआ तो शासन, समाज, वातावरण, कलियुग या किन्हीं व्यक्तियों को दोषी मानकर उनके प्रति बैरभाव जमा लिया जाता है।
चिंतन की धारा कहा जा सकता है। गंभीरता से अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि इसके अध्ययन का विषय भी मनुष्य और प्रकृति ही है। विज्ञानविदों ने अपनी शोध को मानवी काया तथा इसकी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रकृति के विभिन्न घटकों पर केंद्रित किया है।
चिंतनकर स्वयं को कृतकृत्य किया।
चिंतन क्रियाकलाप वर्त्तमान मनःस्थिति तथा भविष्य के प्रति दृष्टिकोण को जानने का प्रयास किया जाता है। चिकित्सा तंत्र के प्रति आस्था एवं वातावरण में विद्यमान विशिष्टता उनकी गहरी-से-गहरी ग्रंथि खोलने में सहायक होती है। पाॅलिग्राफ, लाई डिटेक्टर नामक यंत्र इस प्रक्रिया में सहायता करता है। इसमें त्वचा का विद्युतीय प्रतिरोध, माँसपेशियों की विद्युत तथा मस्तिष्क की अल्फा वेव्स को भी मापे जाने एवं 'बायो फीडबैक' यंत्र द्वारा परीक्षार्थियों को क्रमशः ग्रंथिमुक्त होने का शिक्षण दिए जाने की भी व्यवस्था है। साधारण स्थिति में यही उपकरण व्यक्ति की ध्यान-एकाग्रता में वृद्धि तथा मनःशक्ति संवर्द्धन द्वारा विद्युतीय त्वचा-प्रतिरोध में अंतर के रूप में परीक्षण के काम आते है।
चिंतन की अपूर्णता तथा मानव व प्रकृति के मध्य पारस्परिक संबंधों को न समझ पाने की विवशता है।
चिंतन, चरित्र, स्वभाव और व्यवहार यदि ओछेपन से ग्रसित हो तो उसे किसी प्रकार धो डालने का प्रयत्न करना चाहिए, जैसे कि कीचड़ से सन जाने पर उस गंदगी को धोने का अविलंब प्रयत्न किया जाता है। गंदगी में सने फिरना किसी के लिए भी अपमान की बात है। इसी प्रकार मानवी गरिमा से अलंकृत होने पर भी क्षुद्रताओं और निकृष्टताओं का परिचय देना न केवल दुर्भाग्यसूचक है, वरन साथ में यह अभिशाप भी जुड़ता है कि कोई महत्त्वपूर्ण, उत्साहवर्द्धक और अभिनंदनीय प्रगति कर सकने का आधार कभी हाथ ही नहीं आता। पेट भरने और परिवार के लिए मरते-खपते रहना किसी भी गरिमाशील के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। इस नीति को पशु-पक्षी और कीट-पतंग ही अपनाते रहते हैं और मौत के दिन किसी प्रकार पूरे कर लेते हैं।
चिंतन की इस विशृंखलता के साथ-साथ अवांछनीय तत्त्व ही लिपट पड़ते हैं। यदि विचारों को व्यवस्थित एवं उपयोगी कार्यों में लगाया जाएगा, तो उसके अभाव का लाभ आसुरी तत्त्व उठावेंगे और पतनोन्मुख पशु-प्रवृत्तियों का मनःक्षेत्र पर अधिकार सघन होता चला जाएगा। एकाग्रता से बिखराव सिमटता है, शक्ति उत्पन्न होती है। मस्तिष्कीय बिखराव का केंद्रीकरण मनुष्य में अद्भुत प्रतिभा एवं क्षमता का विकास करता है। उसमें अतींद्रिय सामर्थ्य विकसित हो जाती है एवं वह असंभव को  भी संभव कर दिखा पाने की स्थिति में आ जाता है।
चिंतन और अकर्मों को अपनाना पतन-पराभव के यही दो कारण हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता में अपने को जकड़े रहने वाले अपनी और दूसरों की दृष्टि में गिर जाते हैं। उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से रिश्ता तोड़ लेने पर ओछे लोग समझते हैं कि इस आधार पर नफे में रहा जा सकेगा, पर बात यह है कि ऐसों को सर्वसाधारण की उपेक्षा सहनी पड़ती है और असहयोग की शिकायत बनी रहती है। अपना चिंतन, चरित्र, स्वभाव और व्यवहार यदि ओछेपन से ग्रसित हो तो उसे किसी प्रकार धो डालने का प्रयत्न करना चाहिए, जैसे कि कीचड़ से सन जाने पर उस गंदगी को धोने का अविलंब प्रयत्न किया जाता है। गंदगी में सने फिरना किसी के लिए भी अपमान की बात है।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार, उत्कृष्ट आदर्शवादिता की हर कसौटी पर खरा उतरता चला जाता है। सच्ची और झूठी भक्ति की परीक्षा हाथों-हाथ होती चलती है। यह प्रतीत होता रहता है कि समर्थ सत्ता का अनुग्रह हाथों-हाथ प्राप्त होने की मान्यता पर उपासना खरी उतरी या नहीं।
चिंतन में यह लक्ष्य बाह्य प्रकृति से अधिकाधिक उपलब्धकर मात्र उसका उपयोग करना रह गया है।
चिंतन को मोड़कर समाज के हित-साधन की दिशा में चलने के लिए बाधित किया जाए। समाज का हित पर्यावरण की रक्षा में है एवं पर्यावरण स्वस्थ है तो व्यक्ति भी स्वस्थ रहेगा। मानव जाति को भटकने से, महाविनाश से बचाना है तो यही एकमात्र उपचार अब बचा है।
चिंतन निस्वार्थ भाव से— ईश्वर के प्रति समर्पित भाव से करें। प्रत्येक व्यक्ति अपने आदर्शों का चुनावकर निष्ठा के साथ उन्हें आत्मसात करने के लिए प्रयास -पुरुषार्थ करे। श्री रामकृष्ण ने इन सबको एक ही सूत्र में स्पष्ट किया है। 'जतो मत-ततो पथ।'
चिंतन के औरा का भी गहरा विश्लेषण किया है।
चिंतन के उदात्त भाव हैं, वहीं नीति, आचार-व्यवहार की विस्तीर्णता— विशालता भी है।
चिंतन और चरित्र की गिरावट का भी मनोविकारों की अभिवृद्धि में योग होना ही चाहिए। यही कारण है कि शारीरिक और मानसिक रोगों की व्यापकता और गहराई दोनों बढ़ती जा रहीं है। रोगों में रक्तचाप वृद्धि, पाचनतंत्र की विकृतियाँ, रक्तविकार, दमा, जननेंद्रियों की बीमारियाँ तथा मानसिक तनाव आदि का बाहुल्य है। नई दवाएँ नित्य निकलती हैं, किंतु कुछ ही दिनों में गुणहीन होने लगती है।
चिंतन के इस एकांगीपन के कारण ही संव्याप्त रिक्तता को उथले साइंटिज्म के द्वारा भरने का प्रयास कर रहा है; किंतु यह प्रयास पूर्णता के स्थान पर रिक्तता को ही बढ़ाते जा रहे हैं। इस रिक्तता में तनाव, विघटन, अनिश्चितता— जिन्हें मनोविज्ञान की भाषा में 'एन्क्जायटी कांप्लेक्स' भी कह सकते हैं, डेरा जमाए है। किसी स्थिति में ये निकलने का नाम नहीं लेते।"
चिंतन करता है तो लोकशक्ति के रूप में प्रकट होता है और वह उज्ज्वल भविष्य की संरचना जैसे लक्ष्य के साथ यदि नियोजित किया जा सके तो उसका परिणाम चमत्कारी हो सकता है— होता रहा है, इसका इतिहास साक्षी है।
चिंतन-चेतना को सदा हलका-फुलका बनाए रखने की आवश्यकता है। उसे सदा तीक्ष्ण बनाने और क्रियाशील रखने की आवश्यकता है, संयम अपनाने, सूझ-बूझ उभारने और दूरवर्त्ती परिणामों को ध्यान में रखते हुए जागरूकता बनाए रखने की आवश्यकता है। इसी मनःस्थिति को प्रतिभा कहते हैं। प्रस्तुतः आधारों के अनेक पक्षों पर विचार करने के साथ ही अपनी तथा दूसरों की गतिविधियों का निर्धारण सुव्यवस्था के आधार पर बनाए रखना प्रतिभावानों के लिए ही संभव होता है। प्रमादी तो आरंभ का कुछ कार्य करते और शेष को फिर कभी के लिए, किसी और की ओर खिसका देने के लिए अधूरा छोड़ देते है।
चिंतन हुआ है। पूर्व विशेषतया भारत में जहाँ ये अध्येता, ऋचाओं व श्रुतियों के दृष्टा ऋषि तथा दर्शनकार मनीषी रहे हैं, वहाँ इस क्षेत्र में पश्चिम में प्लेटो, एपीक्यूरस हेगल, ब्रॅडले, बर्गसाॅ, लाइ बिलित्ज, बोंसाके स्पेंसर जैसे चिंतकों का विश्वविख्यात समूह रहा है।
चिंतन से घिरे रहते हैं और ज्यों-त्यों करके जिंदगी के दिन पूरे कर लेते हैं।
चिंतन किया जाता है और शेष जीवन को अधिक उत्कृष्ट बनाने के लिए नया संकल्प लिया जाता है। विवाह दिन पर पति-पत्नी दोनों एक प्रकार से विवाह कर्त्तव्यों को पुनः दुहराते हैं और पिछले दिनों यदि कुछ व्यतिरेक होता रहा हो तो उसे आगे न होने देने का प्रायश्चितपूर्वक प्रण करते हैं। इस प्रकार वैवाहिक पारिवारिक जीवन को नए सिरे से प्रगतिशील बनाने का इस संस्कार के माध्यम से नया शुभारंभ होता है।
चिंतन के लिए प्रेरित किया व इसी ने असंभव को संभव कर दिखाया। इच्छाशक्ति से मैंने शरीर की रसायन-प्रक्रिया को बदल डाला। वस्तुतः जीवन जीने का नाम है व जीने के लिए जरूरी है—  संकल्पशक्ति, जो किसी भी अवरोध से जूझ सकती है।”
चिंतन-बिंदु पर केंद्रित कर सकने की प्रवीणता प्राप्त करना है। इस प्रयोग से जिसे जितनी सफलता मिलती जाती है, उसकी अंतःचेतना में उसी अनुपात से वेधक-प्रचंडता उत्पन्न होती जाती है। शब्दवेधी बाण की तरह लक्ष्यवेध कर सकना उसके लिए सरल हो जाता है। यदि अध्यात्म उसका लक्ष्य होगा तो उस क्षेत्र में आशाजनक प्रगति होगी और विभूतियों से— दिव्य रिद्धि-सिद्धियों से उसका व्यक्तित्व भरा-पूरा दिखाई पड़ेगा। यदि लक्ष्य भौतिक उन्नति है तो भी इस एकाग्रता का समुचित लाभ मिलेगा और अभीष्ट प्रयोजनों में आशाजनक सफलता मिलती जाएगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-July
चिंतन, संकीर्ण स्वार्थ-परता से बेतरह भरा हुआ मानस, आलसी, विलासी और अनाचारी स्वभाव। इन सबसे मिलकर वह प्रेत पिशाच स्तर का बन गया हैं। भले ही ऊपर से आवरण वह देवताओं का, संतों जैसा ही क्यों न ओढ़े फिरता हो? स्थिति ने जन समुदाय को शारीरिक दृष्टि से रोगी, अभावग्रस्त, चिन्तित, असहिष्णु एवं कातर-आतुर बनाकर रख दिया है। इस सबका समापन किस प्रकार बन पड़ेगा?
चिंतन और कौशल भी इसी का ताना बुनने में उलझे रहते हैं। इस समूचे तंत्र का उपयोग यदि युद्ध में ही हुआ, तो समझना चाहिए कि परमाणु आयुध धरती का महा विनाश करके रख देंगे। तब यहाँ जीवन नाम की कोई वस्तुतः शेष नहीं रहेगी। यदि युद्ध नहीं होता है, तो दूसरे तरह का नया संकट खड़ा होगा, कि जो उत्पादन हो चुका है उसका क्या किया जाय? जन-शक्ति, धन-शक्ति और साधन-शक्ति इस प्रयोजन में लगी हैं उसे उलट कर नये क्रम में लगाने की विकट समस्या को असम्भव से सम्भव कैसे बनाया जाय?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-April
चिंतन सात्विक होता हुआ चला जायगा। जनसंख्या बढ़ेगी तो स्थान की कमी होगी उसे रेगिस्तानों में शीत गृह बसाकर एवं समुद्र की लहरों पर तैरते हुए शहर बसाकर इस कमी को पूरा कर लिया जायगा। जिस विधि से पौधे भोजन का निर्माण करते हैं उसी विधि से मानव भी प्रयोगशाला में ढेरों भोजन बनाने लगेगा। अगली सदी में शुद्ध हवा के लिए प्रति व्यक्ति ढ़ाई वर्ग मीटर घास उपलब्ध रहेगी एवं लोगों को डाक्टरों की दुकानों पर लम्बी लाइनें लगाने से मुक्ति लिए जायेगी। यह इसलिए कि रागों के लक्षण, रोगी की स्थिति तथा निदान के परिणाम स्वयं रोगी अपने कम्प्यूटर में भर कर, न केवल अपना बल्कि ऐसे हजारों व्यक्तियों का नुस्खा तैयार करके दे देगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-November
चिंतन करते तथा न करने योग्य कदम उठाते हुए प्रायः इन्हीं दशाओं में लोगों को देखा जाता है। मनोवैज्ञानिक इसका निवारण उपचार गहरे एवं नियन्त्रित श्वसन में खोजते है। उनका कहना है कि श्वास लेना और मस्तिष्क का कार्यरत रहना एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इनमें से एक को प्रशिक्षणपूर्वक नियंत्रित .... पर दूसरे को सही दिशा में चलने के लिए अभ्यस्त किया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-December
चिंतन परक कहा जा सकता है। तथा दूसरा है प्रत्यक्ष, जिसे कर्म परक कहा जाना चाहिए। परोक्ष स्वरूप में जप, ध्यान धारणा, लय तथा तत्वज्ञान, योगाभ्यास का समावेश किया गया है तथा कर्म परक-प्रत्यक्ष अभियान में यज्ञ आन्दोलन का।
चिंतन किया जाये तब। सेण्ट जोन ने इसी अकेलेपन की व्याख्या इस प्रकार की है- “यह न समझो कि मुझे यह कहकर डरा सकोगे कि तुम अकेले हो, फ्रान्स अकेला है, पृथ्वी अकेली है, चन्द्रमा अकेला है, सूर्य अकेला है यहाँ तक कि ईश्वर भी अकेला है। मेरा अकेलापन इन सबकी तुलना में ही है क्या?”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-August
चिंतन से मानसिक शक्तियों का अपव्यय ही नहीं होता, वरन् हानिकारक गतिविधियाँ अपना लेने और पग−पग पर ठोकरें खाने का भी खतरा रहता है। जिस प्रकार बच्चों को शिष्टाचार सिखाया जाता है और बछड़ों को कृषि कार्य के लिए सधाया जाता है उसी प्रकार मन को भी सही सोचने और सही करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। यह कार्य अपना ही उच्चस्तरीय मन कर सकता है। वह मन जिसे अध्यापक उपाध्याय की योग्यता अनायास ही प्राप्त है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-July
चिंतनं व्यक्तवा सत्हितमित भाषणम्। सन्ध्ययोस्तु जपेन्नित्यं गायत्री ध्यान पूर्वकम्॥ -आपस्तंव
चिंतन का परित्याग, सत्य हित और स्वल्प भाषण दोनों समय ध्यान पूर्वक गायत्री का जप, यह नित्य नियम रखे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-February
चिंतन में अधिक समय न लगा पाऊँगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-September
चिंतन करते हैं कि उनके काम की कोई सराहना कर रहा है या नहीं।
चिंतन से सही मालूम पड़ती हैं और उस समय भी ठीक लगती है जब धर्म पक्ष के विकृत रूप को ही उसका आधारभूत सिद्धान्त मान लिया जाय। गहराई में उतरने पर धर्म और विज्ञान दोनों ही ऐसे तथ्यों पर आधारित दीखते हैं, जिन पर विश्वास करने या मिलजुल कर साथ-साथ न चल सकने की आशंका करने का कोई कारण नहीं हो।
चिंतन प्रवाह को शालीनता में जोड़ देने का संकेत है। मन को इधर-उधर न भागने देने की कला से विचारों का बिखराव रुकता है और अभीष्ट प्रयोजनों में चिन्तन को नियोजित किये रहने से कार्य की सफलता का पथ-प्रशस्त होता है। किन्तु मनोनिग्रह की प्रक्रिया का यह आरम्भ है अन्त नहीं। निकृष्टता के साथ जुड़े हुए निषेधात्मक चिन्तन के प्रवाह को उलट कर उसे उत्कृष्टता की दिशा में लगाना और उससे सृजनात्मक गतिविधियों की नई रूपरेखा बनाना यही है मनोनिग्रह का वास्तविक उद्देश्य। चिन्तन जब उच्चस्तरीय उद्देश्यों को अपनाने के लिए कटिबद्ध होता है और परिष्कृत जीवन क्रम के साथ-साथ आन्तरिक विभूतियों और बहिरंग सफलताओं का द्वार खुलता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-March
चिंतन से जो पल्ला बचाकर चलना चाहें, साधना काल में जिनका मन सांसारिक आकर्षण अथवा उत्तरदायित्वों की ओर भाग−भागकर जाये, उन्हें इस प्रक्रिया का समुचित लाभ मिलना शायद ही सम्भव हो।
चिंतन, निष्कर्ष, अनुभव उन्हें एक सम्पन्न खजाने के रूप में मिलते गये जिससे उनकी राजनैतिक प्रतिभा निखर उठी। विन्सेन्ट स्मिथ, मार्शल प्लेटो, मैक्समूलर, मैकडोनल तथा सुकरात में से जिस किसी को ढूँढ़ना हो अपने विचारों के रूप−में−सिद्धान्तों के रूप में सबके सब जवाहर लाल नेहरू में मिल सकते थे।
चिंतन भी कम है। यह शक्ति मात्र स्वाध्याय से उभरती है−शा में उभरी। स्वाध्याय को जीव का प्राण मानने के कारण ही उन्होंने जीवन के अन्तिम क्षणों तक पढ़ने का क्रम बराबर बनाये रखा और चाहे सब कुछ छोड़ दिया हो। यही स्थिति पाश्चात्य विचारक जान स्टुअर्ट मिल की भी थी। विचार भले ही भौतिक दिशाओं में बढ़ गये हों किन्तु उनके साहित्य में उनकी बौद्धिक प्रखरता बराबर झाँकती मिलती है यह भी “लाइफ आफ टरगट” के रचयिता कंडोर−ऐट तथा झिलिप क्रुक ड्रेक प्रेडरिक आदि के मकदूनिया की देन थी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-April
चिंतनशक्ति असाधारण लोगों में ही होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-April
चिंतन के रूप में होता है। अपनी उत्पत्ति काल में वह सूक्ष्म होता है पर बाहर आते-आते वह स्थूल बन जाता है। जो सूक्ष्म है वह हमारे लिये अश्रव्य है। जो स्थूल है वही सुनाई पड़ता है। ध्वनि विज्ञान ने ध्वनियों को दो रूपों में विभक्त किया है-श्रव्य और अश्रव्य।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-October
चिंतन में उन्माद लाने वाले इन चन्द्र प्रभावों की व्याख्या करना अत्यन्त जटिल है, क्योंकि पूर्णिमा काल में पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा तीनों एक ही सीधी रेखा में आ जाते हैं। अनुमानतः यह विद्युत चुम्बकीय एवं गुरुत्वाकर्षण सम्बन्ध के ही प्रमाण हैं जो काया के सूक्ष्म विद्युत प्रवाहों पर सीधा प्रभाव डालते हैं। उनमें परिवर्तन लाकर वे स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-May
चिंतन दूसरी तरह का था। वह अपनी पुण्यात्मा होने का गर्व करती और वेश्या को निरंतर गालियाँ देती रहती।
चिंतन यदि समूची आत्मसत्ता को शरीर मान बैठता है और उसी के लिए सब कुछ करने की बात सोचता है, तो इसे माया की प्रबलता ही कहा जाएगा। ऐसे ही प्रसंगों को देखते हुए ब्रह्म से माया को बलवती कहा जाता है। माया अर्थात भ्रांति। संसार की अनेकानेक भ्रांतियों में सर्वोपरि यह है कि मनुष्य अपने आपको शरीरमात्र मान बैठता है। उसका सूत्र-संचालन करने वाली आत्मा को आँख से न देख पाने की बात ही नहीं, समझ का प्रयोग करके उसकी सत्ता का अनुभव तक न करने की दूसरी कठिनाई भी है।
चिंतन की उत्कृष्टता के कारण वेश्या को पतिव्रता से ऊँचे स्वर्ग में भेजा गया।
चिंतनरूपी राक्षसों के विनाश की बात प्रमाणित की गई है। अथर्ववेद में इसे बल, आयु, समृद्धि तथा यशदायक बतलाया गया है। इसके लिए पर्णमणि को शरीर में धारण करने का भी विधान है।
चिंतन एवं व्यवहार में दैनंदिन स्वयमेव समीक्षा करते रहने से यह दुष्कर लगने वाला कार्य भी संभव हो सकता है।
चिंतन और व्यवहार का अन्योन्याश्रय संबंध है, इसलिए सुधार-परिवर्तन के लिए दोनों मोर्चों पर समान रूप से तैनाती की आवश्यकता रहती है। इस उभयपक्षीय प्रयोजन की पूर्ति का सरल उपाय यह है कि विचारों को विचारों से ही काटा जाए। लब्धप्रतिष्ठ मनोचिकित्सक ‘सर नार्मन विंसेंट पील’ के प्रयोग इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं—
चिंतन की प्रखरता को यदि श्रेष्ठ कार्यों में नियोजित किया होता, तो स्थिति कुछ और ही होती। विज्ञान व समाज का जो वर्तमान स्वरूप है, वैसा नहीं दिखाई पड़ता। यह तर्क ही तो है, जो विश्वशांति के नाम पर दो महाशक्तियों की मिसाइलें एकदूसरे के सामने कर तनाव भरी स्थिति पैदा करता है। गोरे-काले वर्ण की उत्कृष्टता-निकृष्टता का समर्थन करते हुए वही दासप्रथा को उचित ठहराने, पूँजीवादी व्यवस्था को बनाए रखने एवं बंधुआ श्रमिकों के रूप में मानव को पददलित करने की बात पर जोर देता है। तर्क का सहारा लेकर मनीषी समुदाय मातृशक्ति को दूसरे दरजे पर बने रहने के लिए सहज ही बहुमत एकत्र कर लेता है।
चिंतन को परिष्कृतकर इस ग्रह की सभ्यता का ही कायाकल्प करें। देव संस्कृति के मूल्यों की अवधारणा, अध्यात्म मान्यताओं का अवलंबन, आदर्शवाद की पक्षधर स्थापनाओं के द्वारा वह लक्ष्य प्राप्त कर सकना संभव है, जिसे धरती पर स्वर्ग कहकर पुकारा गया है। यह स्मरणीय है कि यह मनःस्थिति से ही उद्भूत होगा, साधन-सामग्री की प्रचुरता एवं वैभव द्वारा नहीं। यह समय समीप है, ऐसा दिव्यदर्शियों का अभिमत भी है।
चिंतन की आवश्यकता पड़ती है। इस स्थिति का गंभीरतापूर्वक पर्यवेक्षण करने वाले उसे न तो विरक्ति कहते हैं और न अशक्ति, वरन उसे तूफानों के आगे-आगे चलने वाला सन्नाटा कहते हैं।
चिंतनजन्य विकारों के विनाश होने की बात कही गई है। इसका प्रभाव पापनाशन, मृत्युनाशन तथा दुःस्वप्ननाशन के रूप में भी प्रतिपादित किया गया है। शौनकीय अथर्ववेद संहिता (7/65/3) के अनुसार यह कुष्ठ रोगनाशक भी है। ‘याज्ञवल्क्य’, ‘शिक्षा’ तथा ‘विष्णु’ धर्मसूत्र में इसके दंतधावन को अत्यंत उपयोगी बताया गया है। ‘ज्योति विज्ञान’ में कहीं-कहीं बुध ग्रह को सहायक बनाने हेतु भी इसको समिधा रूप में प्रयुक्त करने का विधान बताया गया है।
चिंतन है।
चिंतन जारी रखा। इस अवधि में उनकी दिनचर्या एकांतपरक रही। उनका निवास, अध्ययन और पर्यवेक्षण जिस विशाल कक्ष में था, उसमें उनके बिना बुलाए किसी का भी प्रवेश न हो सकता था। भेंट के लिए भी किसी का आग्रह करने की अनुमति नहीं थी। ऐसे इच्छुकों के विजिटिंग कार्ड एक विशेष स्थान में जमा कर दिए जाते थे।
चिंतन के माध्यम से समझना होगा। मानवी काया, जिसे इस अदृश्यलोक का यंत्र-उपकरण बताया गया है, का सूक्ष्म कलेवर इस दृष्टि से दो भागों में विभक्त माना जा सकता है। एक मस्तिष्क के ऊर्ध्व भाग में स्थित ब्रह्मरंध्र, सहस्राररूपी विद्युत-स्फुल्लिंगों के निर्झर एवं आज्ञाचक्र का समुच्चय। दूसरा निचले छोर पर स्थित प्राणाग्नि का सघन पुंज, जिसे मूलाधार, कुंडलिनी एवं प्राण-संस्थान कहा गया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-June
चिंतन, चरित्र और व्यवहार में जब शिक्षा व्यवस्था तथा प्रचलन परम्परा द्वारा आदर्शों के समावेश का भरपूर प्रयत्न रहेगा तो कोई कारण नहीं कि उन जघन्य अपराधों का अस्तित्व बना रहे जो आज सर्वत्र बेतरह छाए हुए हैं। जन-जन को आशंकित आतंकित बनाए रहते हैं।
चिंतन है। कुकर्म उन्हीं की उत्पत्ति है। दुर्गति को ही दुर्गति की जन्मदात्री माना गया है। अस्तु कुसमय में विचार संशोधन की प्रक्रिया ही हाथ में लेनी पड़ती है। वही लोक सेवा का सर्वोपरि एवं सर्वप्रथम उपाय उपचार है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-February
चिंतन पर लेखन और अभिनय की गहरी छाप है। लोग इस प्रवाह के साथ बहने के लिए सहज सहमत हो रहे हैं। आज के लोकमानस को इस वर्ग का विधाता भी कहा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-August
चिंतन- आदर्श कर्त्तव्य। प्रकारान्तर से इन्हीं सिद्धाँतों की पुष्टि विभिन्न मतों के माध्यम से की जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-July
चिंतन में और शरीर दुर्व्यसनों में निरत होगा। ठाली लोगों में क्रमशः दुर्गुण बढ़ते हैं। समय काटने के लिए वे दोस्तों की तलाश में रहते हैं और जो भी उनके चंगुल में फँस जाता है उसे अपने जैसा बना लेते हैं। नई पीढ़ी की बर्बादी में इन दिनों दोस्तबाजी का एक प्रकार से भयानक दुर्व्यसन बन चला है। आवारा लोगों की चाण्डाल चौकड़ी ही इन दिनों मित्र मण्डली कहलाती है।
चिंतन, मनन की उच्चस्तरीय दिशाधारा कहां से मिल सकती है। इसे खोज पाने का प्रयास निरंतर जारी रखा जायेगा। यह कार्य ईश्वर उपासना, जीवन साधना एवं तपश्चर्या की सहायता से भी हो सकता है। ऋषिकल्प- महामानवों का सान्निध्य, सद्भाव और अनुदान तो इस प्रयोजन के लिए सर्वोपरि रहेगा ही।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-November
चिंतन का विशेष योगदान है। इस कारण संसार में विशेषकर पाश्चात्य जगत में नैतिक पतन का जो सिलसिला चल पड़ा है उसका अन्त कहाँ जाकर होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। पर यह तो सुनिश्चित है कि मनुष्य के उल्टे चिन्तन को तथा प्रचलित मान्यता प्राप्त एकांगी किन्तु निरर्थक दर्शन को उल्टा न गया तो परिणति एक ऐसी विभीषिका के रूप में प्रस्तुत होगी जो अत्यन्त कष्टदायी हो सकती है।
चिंतन किया जाता है वह परम तेजस्वी, सर्वशक्तिमान, सर्वेश्वर सविता प्रसविता परमात्मा ही है और उस परमात्मा की सर्वतोमुखी सर्वोपरि शक्ति को ही गायत्री या सावित्री कहा गया है। गायत्री या सावित्री कोई दो अलग शक्तियाँ नहीं हैं। वस्तुतः अग्नि एक ही है पर मृत शरीर को जलाते समय उसे लोहिता कहा जाता है तो भोजन बनाते समय प्रयुक्त की जाने वाली अग्नि को रोहिता कहते हैं। यह दो नाम प्रयोग में आने वाले विभाजन के अनुरूप हैं। वस्तुतः अग्नि एक ही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-December
चिंतन भी शामिल है। अपनी समस्याओं का सही स्वरूप समझना और उन्हें विवेकपूर्ण ढंग से सुलझाना, यह भी स्वाध्याय है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-June
चिंतन-आदतों में काफी कुछ साम्य मिलता है। यह एक अणु से एक पर्यावरण से विकसित होने की परिणति है। मानव, पृथ्वी, सूर्य भी इसी तरह से एक ही अणु से विनिर्मित होने के कारण समानुभूति के आधार पर परस्पर प्रभावित होते है। यही ज्योतिर्विज्ञान का केन्द्र बिन्दु है। हर क्षण, हर पल पृथ्वी के कण-कण का सूर्य के महाकणों से एक सम्बन्ध सूत्र जुड़ा हुआ है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-November
चिंतन और क्रिया−कलाप भी तद्नुरूप ही भले बुरे होंगे। शरीरशास्त्री इसकी व्याख्या शरीर संरचना और उनकी गतिविधियों के आधार कर करते है अर्थात् अंतःस्रावी रसों में न्यूनाधिकता, गुणसूत्रों या बीजकोशों में पायी जाने वाली असामान्यताएँ वे आधार है, जो व्यक्ति के गुण, कर्म, स्वभाव को प्रभावित करते हैं- उनका ऐसा मत है। चेतना विज्ञानियों का अभिमत है कि चूँकि चेतना, काया का सर्वप्रमुख और अविनाशी तत्व है, इसलिए यह मानना ही उचित होगा कि शरीर के विकास का संचालक और नियंत्रक वही है। वह यदि अनगढ़ और अपरिष्कृत है, तो यह संभव है कि उससे नियंत्रित अंग-अवयव भी विकारग्रस्त हो। इस प्रकार स्वस्थ अवयव प्रकारांतर से यही सिद्ध करते हैं कि उनकी चेतना उतनी परिष्कृत है, जितनी अंगों के स्वस्थ विकास के लिए अभीष्ट हो।
चिंतन करे तो प्रोफेसर अमर्त्यसेन के कुछ निष्कर्ष हमें हम सब पर पूरे राष्ट्र व विश्व पर लागू होते प्रतीत होंगे। अपनी पहली प्रेसवार्ता में डॉ. सेन ने कहा है कि अर्थ-व्यवस्था के वैश्वीकरण का बुनियादी आधार मानव-संसाधन का विकास है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है शिक्षा-साक्षरता विद्या−विस्तार एवं समग्र स्वास्थ्य-संवर्द्धन। किसी को भी संदेह नहीं होना चाहिए। कि ये दो मूलभूत आधार सशक्त हो तो किसी भी समाज की श्रमशीलता संदेह के घेरे में नहीं आ सकती।
चिंतन करने से भी चित्त को ध्यानस्थ हो समाधि स्थिति में जाने में मदद मिलती है। मानसिक रूप से हमें हर पल महापुरुषों को परमपूज्य गुरुदेव को अन्य गुरुजनों को याद करते रहना चाहिए। हममें से जिनने अपनी गुरुसत्ता को देखा है उन्हें ईश्वर के पार्षद के रूप में देवलोक की विभूति मानकर सतत् उन्हीं का चिंतन करते रहना चाहिए। इससे हमारी भक्ति बढ़ेगी-संवेदना के तन्तु उभरेंगे-गुरुसत्ता के प्रकाश की किरण हमारे व्यक्तित्व में अवतरित होने लगेगी।
चिंतन की कलाबाजी का खेल खड़ा करते रहने वाला दर्शन भ्राँतियों का भण्डार बन जाएगा वह हमें अवास्तविक कल्पनाओं की उड़ान में उड़ते रहने वाला-दिवास्वप्न देखते रहने वाला मात्र बनाकर रख देगा। इसी प्रकार जड़ पदार्थों की क्षमता पर निर्भर होते-होते हम स्वयं हृदयहीन मशीनी मनुष्य मात्र बनकर जाएँगे। विज्ञान को दर्शन के साथ और दर्शन को विज्ञान के साथ अपना ताल-मेल बिठाना पड़ेगा। यद्यपि आज यह बहुत कठिन दीखता है पर कल इसकी अनिवार्यता अनुभव की जाएगी। सत्य और तथ्य का समन्वय करने से ही सर्वतोमुखी प्रगति के दोनों पहिए गतिशील हो सकेंगे।
चिंतन और नवचेतना नहीं आ सकी है किन्तु यदि अपने भारतीय राष्ट्र को शक्तिशाली बनना है, अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना है, तो उसे अपनी उन आंतरिक दुर्बलताओं को दूर करना ही होगा, जो उसकी वास्तविक प्रगति के पथ में अवरोध बनी हुई है।
चिंतनक्षेत्र की विषमता एवं तनाव के कारण पनपता है। इसका उपचार भी तद्नुरूप ही ढूँढ़ा जाना चाहिए। विशेषज्ञों ने अल्फा ई. ई. बायोफीडबैक को इसके लिए बहुत उपयुक्त पाया है। एक ओर इस उपक्रम में जहाँ मन को विधेयात्मक विचारणाओं से परिपूरित करने का अवसर मिलता है। वहीं भावना क्षेत्र का परिशोधन कर संकल्पबल को बढ़ाया जाता है।
चिंतन, चेतना से प्रभावित है। व्यक्ति का चेतनात्मक स्तर जितना उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट होगा, उसके चिंतन और क्रिया−कलाप भी तद्नुरूप ही भले बुरे होंगे। शरीरशास्त्री इसकी व्याख्या शरीर संरचना और उनकी गतिविधियों के आधार कर करते है अर्थात् अंतःस्रावी रसों में न्यूनाधिकता, गुणसूत्रों या बीजकोशों में पायी जाने वाली असामान्यताएँ वे आधार है, जो व्यक्ति के गुण, कर्म, स्वभाव को प्रभावित करते हैं- उनका ऐसा मत है। चेतना विज्ञानियों का अभिमत है कि चूँकि चेतना, काया का सर्वप्रमुख और अविनाशी तत्व है, इसलिए यह मानना ही उचित होगा कि शरीर के विकास का संचालक और नियंत्रक वही है। वह यदि अनगढ़ और अपरिष्कृत है, तो यह संभव है कि उससे नियंत्रित अंग-अवयव भी विकारग्रस्त हो।
चिंतन भी गिरावट की ओर जाता हुआ दिखायी देगा। सारे जमाने में यही भरा हुआ पड़ा है।
चिंतन और औचित्य का अवलंबन जिन्होंने अपनाया उन्हें विचारक्षेत्र का वैज्ञानिक ही कहना चाहिए। दूसरे शब्दों में उसे दार्शनिक भी कह सकते है।
चिंतनप्रणाली को विचारमंथन की अग्नि में जलाकर उसमें सद्विचारों और सत्कर्मों की निरंतर आहुतियाँ, जिससे विचार और कर्म में सत्प्रवृत्तियाँ का समावेश हो जाए। कल्कि पुराण के अनुसार भगवान कल्कि की कार्यप्रणाली ऐसी ही है।
चिंतन की गायन कला नहीं कला का आवरण है। उस माध्यम से अंतःकरण में जो उल्लास प्रस्फुरण उमगता है, वह संवेदना ही कला है। काव्य किन्हीं तुकबंदी या छन्द विन्यास को नहीं कहते।शब्दों का आवरण उठाकर विशिष्ट स्तर के भावातिरेक को सजाया भर जाता है। उन शब्दों के अंतरंग में जो कोमलता झाँकती है और चेतना में गुदगुदी पैदा करती है वही कविता है।
चिंतन और मनन काम कर रहा होगा। उनका चरित्र भी गिरावट की ओर और उनका चिंतन भी गिरावट की ओर जाता हुआ दिखायी देगा। सारे जमाने में यही भरा हुआ पड़ा है।
चिंतन करते रहना चाहिए। इससे हमारी भक्ति बढ़ेगी-संवेदना के तन्तु उभरेंगे-गुरुसत्ता के प्रकाश की किरण हमारे व्यक्तित्व में अवतरित होने लगेगी।
चिंतन परिष्कार को अध्यात्म के निष्ठा पक्ष में लिया जाएगा। संयम, नियम, व्रत, तप, साधना प्रभृति क्रिया–कलापों को ‘साधना’ माना जाएगा। दोनों एक दूसरे के पूरक है। एक के बिना दूसरा अपूर्ण रह जाएगा। ज्ञान और कर्म के समन्वय से ही उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-February
चिंतन, मृदुल व्यवहार एवं उत्तम चरित्र कभी किसी बिरले भाग्यशाली को ही दिखाई पड़ते है। वही समाज युगपरिवर्तन प्रक्रिया के द्वारा अपना स्वरूप बदलकर ऋषि-मनीषियों का आरण्यक बन जाएगा। इक्कीसवीं सदी में समाज ऐसी पाठशाला का रूप ले लेगा, जहाँ आदमी सोचना, जीना एवं व्यवहार करना सीख सके।
चिंतन-चरित्र व व्यवहार विकसित करना। अंतिमसूत्र में यही सब सारभूत दर्शन छिपा पड़ा है। बाद में परमपूज्य गुरुदेव छिपा पड़ा है। बाद में परमपूज्य गुरुदेव ने इन्हीं सूत्रों को 18 संकल्पों के रूप में संशोधित रूप में 1986 में प्रस्तुत कर संधिकाल में परिवर्तन का मूल आधार बनाते हुए इसे प्रस्तुत किया था। आज उपरोक्त सूत्र नयी शब्दावली में सब ओर पढ़े जाते है।
चिंतन जुटा हुआ था।
चिंतन अंतःवेदना एवं भविष्य की योजनाएं भजा करते थे यह क्रम उनके पूरे प्रवास में चला था किन्तु 1982 के वर्ष के अन्तिम दौरे के क्षणों में बड़े व्यथित हृदय से उन्होंने प्रचारात्मक दौरों-शक्तिपीठ उद्घाटनों की भीड़ की मनःस्थिति का अध्ययन कर लिखा था कि “अब बड़े व्यापक स्तर पर साधनों का निर्माण का समय आ गया है हमारे हृदय के टुकड़ों के समान प्रिय ये कार्यकर्ता जब अपनी साधना को भूलकर लोकसम्मान व यरु अर्जन हेतु मेरे चारों और भीड़ लगाते दीखते है तो मुझे बड़ा क्लेश होता है मैं तो चाहता था कि इन शक्तियों को माध्यम से संगठन का मूल ढांचा खड़ा हो किंतु अब जब संधिवेला की एक घड़ी भारी पड़ रही है तब मैं खिन्नता मन में लिए अपने इस दौरे सके लौटूंगा ताकि कुछ नवीन जो किया जाना चाहिए उस पर तुम सबसे विचार वितश्ज्ञ कर सकूं।” प्रज्ञावतार की सत्ता के मन की वेदना क्यों हो सकती थी आज हर कोई समझ सकता है आते ही परमपूज्य गुरुदेव ने दो सम्पादकीय लिखे-” क्या काफिला बिछड़ा ही जाएगा तथा मलाई को तैरकर ऊपर आने का आमन्त्रण। ये अखण्ड ज्योति की ‘अपनी से अपनी बात ‘ अंतर्गत पृष्ठ 53 से 60 तक के पृष्ठों पर अप्रैल 1982 में प्रकाशित हुए। ये वस्तुतः उनके शब्द नहीं उनके मन की पीड़ा थी महाकाल के स्तर की सत्त की अंतर्वेदना थी, जो उसमें भावों के साथ पिरोकर लिखी गयी थी। इसने अगणित पाठकों को रुलाया अंतर्मंथन हेतु उद्वेलित किया।
चिंतन को और भी परिमार्जित करते हुए उनने सितम्बर, 1962 की अखण्ड ज्योति में नवयुग के संविधान के रूप में -युगनिर्माण सत्संकल्प’ की घोषणा की एवं प्रत्येक की विस्तार से व्याख्या करते हुए एक विशेषाँक सबके समझ प्रस्तुत किया उनने लिखा कि अखण्ड-ज्योति परिवार उसी आधार पर सारी विचारणा, योजना, गतिविधियाँ, कार्यक्रमों को संचालित करेगा। आज राजनैतिक पार्टियाँ कर्मकारण की रहते हैं किन्तु परमपूज्य गुरुदेव ने इसे ‘घोषणा-पत्र’ निकालती है। बड़े-बड़े वादे उनमें रहते हैं किन्तु, परमपूज्य गुरुदेव ने इसे ‘घोषणा-पत्र’ कहते हुए नवयुग के आगमन तक सबके लिए इसे एक दैनिक धर्मकृत्य की तरह नित्य पढ़ने, मनन करने एवं जीवन में उतारने जैसा एक संकल्पपत्र कहा एवं तब से ही युगनिर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान, गायत्री परिवार, अखण्ड ज्योति के दर्शन की यह मूल धुरी बना रहा हैं सारी योजनाएं इसी एक केंद्रक के जो विचार क्रान्ति परिक्रमा करती रही हैं। बाह्य ओर परिक्रमा करती रही हैं बाह्य कलेवर भले ही लोगों को धर्मकृत्य, कर्मकाण्ड प्रधान देखने में लगा हो, किन्तु उसका अंतरंग एक ही सूत्र पर टिका है “हम बदलेंगे-युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा। “ उन दिनों प्रकाशित युग निर्माण सत्संकल्प पर एक दृष्टि डालकर देखें तो प्रतीत होगा कि समग्र धर्मशास्त्र-नैतिकी एवं अध्यात्म दर्शन का निचोड़ समाहित है।
चिंतन करते थे। सुभाष के एक मित्र ने श्री अरविन्द को पत्र भेजकर अपनी शंका के समाधानार्थ निवेदन किया। श्री अरविन्द का उत्तर आया तो उसने वह सुभाष को भी पढ़वाया। कुछ पंक्तियाँ ऐसी ही थीं जिनने सुभाष के जीवन में बम-विस्फोट का काम किया। ये पंक्तियाँ थीं- ‘‘हममें से प्रत्येक को दैवी विद्युत का डायनेमो बनना चाहिए, जिससे कि हम अनुभूति से ओत-प्रोत हो जाएँ।
चिंतन अपनाने से दुर्गति होती है। यह मनुष्य ने इन दो सदियों में अच्छी तरह सीख लिया हैं मनःस्थिति बदलेगी तो ही परिस्थिति बदलेगी, यह सबकी समझ में आ रहा हैं एवं इसी को विचारक्रान्ति का बीज कहा जा सकता हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-August
चिंतन का क्रम ही पूर्णतया असंतोष और सन्तोष का सृजन करता है और उसी के आधार पर लोग - प्रसन्न - अप्रसन्न पाये जाते हैं। अनेक झंझटों, शत्रुओं और संकटों के बावजूद कई व्यक्ति अपनी हँसी - खुशी यथावत बनाये रहते हैं। उलझनों को वे शतरंज अथवा टेनिस खेलने की तरह मानते हैं। हार और जीत दोनों का हलकी मुसकराहट के साथ स्वागत करते हैं और अगली पकड़ लड़ने के लिए वे अधिक उत्साह के साथ तत्परता प्रदर्शित करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-December
चिंतन और व्यवहार-प्रचलन में उस उत्कृष्टता का समावेश हो सकता है।, जो युग विभीषिका से जूझने और उज्ज्वल भविष्य की संरचना में पूर्ण तथा सफल हो सके।
चिंतन क्षेत्र पर कुविचारों का आक्रमण होता रहता है। आज योग के नाम पर बहिरंग का कर्मकाण्ड मात्र ही संपन्न हो रहा है-पूज्यवर गुरुदेव को अनुसार शरीर के तल से साधना कर पाना आज संभव नहीं है-मन के तल से आरंभ कर अंतःकरण की ओर जाना व समर्पण भाव से परमात्मचेतना में स्वयं को प्रतिष्ठित कर सकना भक्तियोग से ही संभव है। गीता में योग को साधने की अनिवार्य शर्तों के रूप में जो वर्णन आया है। उसमें बताया है-
चिंतन व्यक्ति को सहजता से ऊपर उठाकर विशिष्टता के स्तर पर ले जाता है। तंत्र-साधना भी व्यक्ति की क्षुद्रता एवं पाशविक बन्धन-शीलता पर विजय जाने का मंत्र देती है और आश्चर्य यह कि यहाँ विकृतिमय संसार में विकृतियाँ ही चिकित्सक बनती हैं। आप काम के रजोगुणी आवेश से ग्रस्त हैं, तो उसके लिए दूसरा पक्ष भी काम की उत्तेजना से प्रेरित होकर आपको शान्त कर सकेगा। रावण के क्रोधमत् रूप का उपचार राम के रौद्ररूप से ही सका। यह विकृतियों का गणित था, प्रकृति का इससे भिन्न है और ये प्रकृति व विकृति मिलकर ही सम्पूर्ण बनती हैं।
चिंतन के रूप में जो ऋचाएँ दीं, वे बुद्धि की निर्मल ज्योत्सना में हमें समग्र से एकाकार हो जाने की प्रतीतियाँ थीं। हमारे अंतर्मन में झंकृत वीणा के अनुवाद की हार्दिक अनुभूति थीं। यही ऋक् जब बैखरी वृत्ति का विषय बनी तो साम की अनवरत गति बनी। वेदत्रयी का आत्मबोध संसार को कामना वितान का व्याख्याता बनकर अथर्व रूप में चतुर्थ वेद बना। यह विस्तार विशेषतः वेदत्रयी का चौथे वेद में प्रकट होना ही तंत्र की मूल परिभाषा है।
चिंतन को कुछ अधिक सूक्ष्म ओर संवेदन को कुछ और सुकुमार बनाएँ तो लगेगा कि सारा विस्तार अपने आप में तंत्र है। वेद ने उदात्त चिंतन के रूप में जो ऋचाएँ दीं, वे बुद्धि की निर्मल ज्योत्सना में हमें समग्र से एकाकार हो जाने की प्रतीतियाँ थीं। हमारे अंतर्मन में झंकृत वीणा के अनुवाद की हार्दिक अनुभूति थीं। यही ऋक् जब बैखरी वृत्ति का विषय बनी तो साम की अनवरत गति बनी। वेदत्रयी का आत्मबोध संसार को कामना वितान का व्याख्याता बनकर अथर्व रूप में चतुर्थ वेद बना।
चिंतन के निदिध्यासन को यदि नियमित रूप से गम्भीरता पूर्वक करते रहा जाय, तो परिशोधन-परिष्कार के दोनों कदम भी स्वयमेव आगे बढ़ते रहते हैं। यह प्रक्रिया नियमित -निरन्तर चलता रहे तो पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचाने वाला उपक्रम सुनिश्चित तौर से बनता रहेगा। यहाँ एक बात और समझने की है कि मनुष्य पूर्ण उत्पन्न होने के कारण पूर्ण ही है। जन्मजात रूप से उपलब्ध विभूतियों का दुरुपयोग -अपव्यय ही एकमात्र वह कारण है, जिसके कारण कामधेनु का दूध छलनी में दुहने पर जमीन पर गिरता, कपड़े चिकने करता और खेद-पश्चाताप का निमित्त कारण बनता है।इसे रोक देने की समर्थ दूरदर्शिता ही जीवन -साधना कहलाती है।
चिंतन में परिवर्तन नैतिक क्राँति से मनुष्य के चरित्र में परिवर्तन एवं सामाजिक क्रान्ति से व्यक्ति के व्यवहार में आमूलचूल बदलाव। मनुष्य की सत्ता भी इन्हीं तीन हिस्सों में बँटी हुई है-चिंतन -चरित्र एवं व्यवहार। इन तीनों ही क्षेत्रों का साफ-सुथरी रहना समय की महती आवश्यकता है। एक में भी विकृतियों का समावेश हुआ तो सर्वनाश सुनिश्चित है। बौद्धिक क्रान्ति से चिंतन की अवांछनीयता, मनोविकारों, सनकों, अनगढ़ महत्त्वाकाँक्षाओं से जूझा जाता हैं चिंतन का ही प्रभाव चरित्र पर भी पड़ता है।
चिंतन व चरित्र में हुआ था।
चिंतन -चरित्र एवं व्यवहार। इन तीनों ही क्षेत्रों का साफ-सुथरी रहना समय की महती आवश्यकता है। एक में भी विकृतियों का समावेश हुआ तो सर्वनाश सुनिश्चित है। बौद्धिक क्रान्ति से चिंतन की अवांछनीयता, मनोविकारों, सनकों, अनगढ़ महत्त्वाकाँक्षाओं से जूझा जाता हैं चिंतन का ही प्रभाव चरित्र पर भी पड़ता है। चरित्रनिष्ठा ही नैतिकता है।
चिंतन की दिशा-धारा मोड़ देने से यह परिवर्तन सम्भव हो सकता है। वर्षा का जल यदि अनियन्त्रित फैले तो खेतों, घरों को डुबाकर हानिकारक सिद्ध होगा। पर यदि नदी- नाले के माध्यम से बाँध बनाकर संग्रह किया जाए और नहरों के माध्यम से सिंचाई के लिए खेतों तक पहुँचाया जाए तो इससे हर प्रकार लाभ-ही-लाभ है। अनियन्त्रित काम प्रवृत्ति का निरोध इसी प्रकार उचित है। उसे हठपूर्वक नष्ट कर देने की बात न सोची जाए वरन् ऐसे प्रयोजन लगा दिया जाए, जिसमें उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति हो।
चिंतन। यह पशु-पक्षियों से ऊँचा स्तर है। इस पर पहुँचे हुए जीव को मनुष्य संज्ञा में गिना जाता है। कल्पना, तर्क, विवेचना, दूरदर्शिता जैसी चिन्तनात्मक विशेषताओं के सहारे औचित्य-अनौचित्य का अन्तर करना संभव होता हैं। स्थिति के साथ तालमेल बिठाने के लिए इच्छाओं पर अंकुश रख सकना इसी आधार पर संभव होता है।
चिंतन तंत्र के माध्यम से अपनी चेतना का परिचय देता है। चेतना का गुण है, चिन्तन। चिंतन को ही सजीवता का चिह्न माना जाता है। आस्था, आकांक्षा, भावना, कल्पना, विवेचना आदि उसी के भेद-उपभेद हैं। प्राणवान को साहसी समझा जाता हैं पराक्रमी, पुरुषार्थी और जीवट का धनी।
चिंतन की अवांछनीयता, मनोविकारों, सनकों, अनगढ़ महत्त्वाकाँक्षाओं से जूझा जाता हैं चिंतन का ही प्रभाव चरित्र पर भी पड़ता है। चरित्रनिष्ठा ही नैतिकता है। मानवी गरिमा के अनुरूप दायित्वों का निर्वाह-शिष्टाचार-अनुशासन का परिपालन इन्हीं का समन्वय चरित्र का निर्माण करता है। ये मर्यादाएँ-अनुशासन बने रहें-वर्जनाओं का निर्वाह हो - इस व्रतशीलता के निर्वाह को नैतिक क्रान्ति नाम दिया गया है। ये दोनों ही क्रान्ति धर्मतंत्र के माध्यम से, युगसाधना के निर्वाह से जिसका विस्तार बड़े व्यापक क्षेत्र में है, संपन्न होती है एवं इस युग प्रत्यावर्तन की वेला में उसी तीव्रता संपन्न होने जा रही है जिस तीव्रता से अवांछनीयताओं का समावेश चिंतन व चरित्र में हुआ था।
चिंतन में दो बातें अपने आप ही समायी हुई है-परिमार्जन एवं परिष्कार। इन्हें पथ्य और औषधि के रूप में भी समझा जा सकता है। व्यक्तित्व को पवित्र-प्रखर बनाने वाली सत्प्रवृत्तियों को कैसे अपनाया जाय? वर्तमान स्थिति को देखते हुए इस संदर्भ में क्या कदम उठाए जाएँ। इसका निर्धारण ही नहीं, इसे अपनाने का तत्परतापूर्वक प्रयास भी विलम्ब चलना चाहिए।
चिंतन कर-गुणगान कर उनमें मन को लगा देना। देखा जाय तो आर्ष साहित्य में लोकमानस को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है, पुराणों के कथा-प्रसंगों ने, जिनमें या तो भक्त की कथा है या भगवान की। आदमी के मन को भगवान के स्वरूप में लीन करने की इनमें जबर्दस्त शक्ति है। श्रीमद्भागवत सर्वाधिक लोकप्रिय है। देवी भागवत एवं रामचरितमानस का भी लगभग इसी के समकक्ष स्थान है।
चिंतन को ही सजीवता का चिह्न माना जाता है। आस्था, आकांक्षा, भावना, कल्पना, विवेचना आदि उसी के भेद-उपभेद हैं। प्राणवान को साहसी समझा जाता हैं पराक्रमी, पुरुषार्थी और जीवट का धनी। महाप्राण प्रतिभावान होते हैं और अल्पप्राण कहकर दीन-दुर्बलों कायरों का तिरस्कार किया जाता है। वैभववान् होने की तरह प्राणवान होना भी किसी के समर्थ सौभाग्यवान होने का चिह्न है।
चिंतन का ही प्रभाव चरित्र पर भी पड़ता है। चरित्रनिष्ठा ही नैतिकता है। मानवी गरिमा के अनुरूप दायित्वों का निर्वाह-शिष्टाचार-अनुशासन का परिपालन इन्हीं का समन्वय चरित्र का निर्माण करता है। ये मर्यादाएँ-अनुशासन बने रहें-वर्जनाओं का निर्वाह हो - इस व्रतशीलता के निर्वाह को नैतिक क्रान्ति नाम दिया गया है। ये दोनों ही क्रान्ति धर्मतंत्र के माध्यम से, युगसाधना के निर्वाह से जिसका विस्तार बड़े व्यापक क्षेत्र में है, संपन्न होती है एवं इस युग प्रत्यावर्तन की वेला में उसी तीव्रता संपन्न होने जा रही है जिस तीव्रता से अवांछनीयताओं का समावेश चिंतन व चरित्र में हुआ था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-May
चिंतन-मनन अधिक सामीप्य व सान्निध्य प्राप्त करने का प्रयास किया जाए। भोजन के बिना शरीर का काम नहीं चलता। साँस लिए बिना रक्ताभिषरण की प्रक्रिया बिगड़ जाती है। इसी प्रकार ईश्वर की उपेक्षा करने के उपरान्त आन्तरिक स्तर भी नीरस, चिंताग्रस्त, अनिश्चित, अनैतिक, अव्यवस्थित एवं आशंकित बना रहता है। यह हानि कुछ कम हानि नहीं है।
चिंतन, व्यवहार स्थिति और परिस्थिति पर अवलम्बित है, अतः यह करने में हर्ज नहीं कि शुभ-अशुभ की नाप-तौल सबके लिए अलग-अलग है। समय, परिस्थिति और आवश्यकता के हिसाब से वह बदलती रहती है, अस्तु किसी एक स्थिति या घटना को एकदम अशुभ मान बैठना उचित नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-September
चिंतनशील एवं पहुँचे फकीर थे। ऐसे फकीर को अपने महल आया हुआ देखकर वे अपना अहोभाग्य समझ रहे थे। चुपचाप यों ही बिना कुछ बोले जाते देख उन्हें बड़ा दुःख हुआ। अकबर ने अत्यन्त विनय पूर्वक उनसे निवेदन किया।
चिंतन की दृष्टि से यदि मनुष्य उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से अपने को सुसम्पन्न कर लें तो उनके कषाय-कल्मषों की कालिमा हट सकती है और अन्तःकरण तथा व्यक्तित्व शुद्ध, स्वच्छ, पवित्र एवं निर्मल बन सकता है। ऐसा व्यक्ति मंत्र, उपासना, तपश्चर्या का समुचित लाभ उठा सकता है और देवताओं के अनुग्रह का अधिकारी बन सकता है। जब तक यह पात्रता न हो तब तक उत्कृष्ट वरदान माँगने की दूरदर्शिता ही उत्पन्न होगी और साधना के पुरुषार्थ से कुछ भौतिक लाभ भले ही मिल जाएँ, देवत्व का एक कण भी उसे प्राप्त न होगा और आसुरी भूमिका पर कोई सिद्धि मिल भी जाए, तो अन्ततः उसके लिए घातक ही सिद्ध होगी। असुरों की साधना और उसके आधार पर मिली हुई सिद्धियों से उनका अन्ततः सर्वनाश ही उत्पन्न हुआ। अध्यात्म−विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिए साधक का अन्तःकरण एवं व्यक्तित्व कितना निर्मल होगा, उतनी ही उसकी उपासना सफल होगी।
चिंतन करते हैं, तो लगता है कि ‘शिव’ रूप में जन्मी महाकाल की सत्ता यदि हमारे गुरु रूप में हम सबके। बीच आयी तो शक्ति रूप में वहीं परमवंदनीया माताजी के रूप में हम सबको मिली। उनकी बहुआयामी जीवनगाथा समयानुसार एक विशाल ग्रन्थ के रूप में अवश्य प्रकाशित होगी, किन्तु आज जब हम उनकी स्मृति मन−मस्तिष्क में लात है, तो उनका संगठन को सींचने वाला अति अल्प आयु में ‘अखण्ड ज्योति’ जैसी पत्रिका के संपादन के भार को सँभालने वाला नारी जागरण आंदोलन को गति देकर चरम ऊँचाइयों तक पहुँचा देना वाला एवं आश्वमेधिक दिग्विजय अभियान के माध्यम से सारे विश्व में गायत्री व यज्ञ का संदेश फैला देने वाला जगदंबा वाला एक विराट स्वरूप उभरकर आने लगता है। परमपूज्य गुरुदेव को चौबीस महापुरश्चरणों की साधना की मध्यावधि में उनसे आकर जुड़ी माताजी ने कितने ही कष्ट सहकर न केवल अपने आराध्य के तप को चरमलक्ष्य तक पहुँचाने में मदद की स्वयं के जीवन को भी वैसा ही ढालकर एक साधिका स्वयं को बनाया, यह गुरु के प्रति समर्पण की एक ऐसी मिसाल है। जो हम सबके लिए सदैव प्रकाशस्तंभ बनी रहेगी।
चिंतन स्नायु संस्थान को संतप्त करके मनुष्य को दुर्बल बनाता है और पूरी आयु भोगने से वंचित रखता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-April
चिंतन तथा कर्तृत्व से भावभरे रसास्वादन का आनन्द प्रदान करे। विवेक को बुद्धि का उत्कृष्टतम स्तर माना गया है। श्रद्धा अन्तःकरण की श्रेष्ठतम उपलब्धि है। दोनों का जहाँ जितना सम्मिश्रण होता है वहाँ उतनी ही महानता दृष्टिगोचर होती हैं उसी उपलब्धि के सहारे सामान्य परिस्थितियों में जन्मे पले व्यक्ति भी ऐतिहासिक महामानवों की भूमिका निभाते और विश्वनिर्माण में असाधारण योगदान करते है।
चिंतन प्रधान होती है। मान्यताएँ विचारणाएँ इच्छाएँ ही प्रेरणाकेन्द्र होती है और उन्हीं के प्रवाह में सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार का स्वरूप भी तदनुरूप हो सकता है लोकमानस को अवांछनीयता अनैतिकता एवं मूढ़मान्यता से विरत करने वाली विचारक्रान्ति ही अपने समय की समस्याओं का समाधान कर सकती है।
चिंतन की प्रखरता और मौलिक निर्णय की साहसिकता इन्हीं विरलों में ही होती है। बिना दूसरों का प्रभाव ग्रहण किए उच्चस्तरीय नीति अपनाने और उस पर अन्त तक दृढ़ बने रहने का आत्मबल तो दृष्टिगोचर होता है। प्रज्ञा के माहात्म्य की चर्चा करते रहना सरल है पर उसे अपनाना कठिन है। कठिन इसलिए नहीं कि व्यवहार में जटिल है असम्भव है। कारण मात्र इतना भर है कि अनगढ़ प्रचलनों से आच्छादित वातावरण में अनुकरण के उदाहरण न मिलने से सामान्य व्यक्ति उस दिशा में पग बढ़ाते हुए डरता है।
चिंतन को परिष्कृत करने की दिशा में कई प्रचारात्मक कार्य आसानी से सम्पन्न हो सकते हैं। युगसाहित्य का निर्माण और प्रसारण एक कार्य है और ज्ञान-गोष्ठियों के माध्यम से मनीषियों द्वारा शिक्षण दूसरा। रचनात्मक और सुधारात्मक गतिविधियों की सुगठित रूपरेखा बनाकर उनमें असंख्यों सद्भाव सम्पन्नों की श्रम-साधना नियोजन की जा सकती है। समृद्धि-संवर्द्धन के लिए जिस प्रकार सोचा जाता रहा है, जिस प्रकार उसमें साधन, श्रम तथा मनोयोग का नियोजन होता रहा है, उसी तन्मयता तथा तत्परता से यह भावनात्मक उत्कृष्टता बढ़ाने के लिए सक्रियता अपनाई जाएगी, तो कोई कारण नहीं कि प्रयत्न असफल चले जाएँ। असफलता का एक ही प्रमुख कारण है, उपयुक्त तन्मयता तथा अभिरुचि एवं प्रयत्नशीलता का अभाव।
चिंतन करके अपने सुझाव-परामर्श तो भेज ही सकते हैं।
चिंतन और समाज का विधान प्रचलन क्या होना चाहिये इसकी ऐसी सुनिश्चित निर्धारण इस महामन्त्र के अंतराल में विद्यमान है जिसे सार्वभौम सर्वजनीन सर्वोपयोगी माना जा सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-July
चिंतन इस समय बदल दें। इससे आपको लाभ ही लाभ मिलेगा। आपकी परेशानी दूर हो जायेगी, अगर आप जमाखोरी करना बंद कर दें। महाकाल ने दो कार्य बंद करने को कहा है, सो आप अपनी औलाद एवं धन की बात करना अभी बंद कर दें। हम आपको बतलाना चाहते हैं कि जॉर्ज वाशिंगटन ने अपने पुरुषार्थ के बल पर इज्जत एवं धन प्राप्त किया था।
चिंतन-चरित्र व्यवहार को परिष्कृत किये बिना, उत्कृष्टता उभारे बिना चेतना का गूढ़ रहस्य समझना और अलौकिक विभूतियाँ, सिद्धियाँ अर्जित कर सकना कठिन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-October
चिंतनपरक,चारित्रिक एवं उदार सहकारिता के अनुबंधों को तिलाञ्जलि देते हुये ऐसी संस्कृति अपना ली है जैसे बौद्धिक प्रत्यक्षवाद पर अवलम्बित मानवीसत्ता के हर पक्ष में घुस पड़ी अराजकता ही कहा जा सकता है।
चिंतन में लगाया। संयम और साधना द्वारा अपना विवेक परिपक्व किया था और अपने ज्ञान-भण्डार को अनुभव की तुला पर तौलकर प्रामाणिक बना लिया था और तब इतनी साधना करने के बाद वे समाज को ज्ञान-दान के योग्य हो पाये थे। उन्होंने उस ज्ञान के बल पर मानवता के प्रति सर्वश्रेष्ठ उपकार किया जिसके लिए वे तब भी पूजित रहे, आज भी है और आगे भी पूजनीय बने रहेंगे ज्ञानोपकार से बढ़कर संसार का कोई अन्य परोपकार है ही नहीं।
चिंतन की गहराई में उतरकर इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि अनन्त में संव्याप्त दिव्य चेतना ही ईश्वर है। मनुष्य और इस ईश्वर का मिलन स्थल मानवी अन्तःकरण ही हो सकता है। व्यक्ति की समाविष्ट दिव्यचेतना का केन्द्रस्थल उसका अन्तःकरण है। सजातीय के साथ ही सजातीय का मिलना सम्भव है। आत्मिक चेतना ही ईश्वरीय चेतना के समकक्ष है।
चिंतन अवतारी सत्ता का स्वरूप एवं हम सबके दायित्व बोध पर लिखे गये इन लेखों का एक एक वाक्य जलती हुई आग की चिनगारी के समान है बाद में वांग्मय में इन्हीं लेखों को वांग्मय कृ 29 में 1.1 से1.70 तक अनौचित्य का प्रतिकार शीर्षक से प्रकाशित कर एक स्थान पर उसी से संबंधित विषय के साथ उपलब्ध कर दिया गया है।
चिंतन और प्रचलन में इतनी अधिक विकृतियों का समावेश हो गया है। कि उन्हें औचित्य एवं विवेक से सर्वथा प्रतिकूल माना जा सकता है। अस्वस्थता उद्विग्नता आक्रामकता निष्ठुरता स्वार्थान्धता संकीर्णता उद्दण्डता का बड़ों और छोटों में अपने अपने ढंग का बाहुल्य है। लगता है मानवी मर्यादाओं और वर्जनाओं की प्रतिबद्धता से इनकार कर दिया गया है। फलतः व्यक्ति का अनेकानेक संकटों और समाज का चित्र विचित्र समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
चिंतन न उत्पन्न किया है जो प्रत्यक्षवाद की दुहाई देता और मात्र आज के लाभ को देखता है। यही है वह महाव्याधि, जिससे व्यक्ति और समाज को किसी भी कीमत पर छुड़ाया जाना चाहिए। मात्र आत्मिकी ही यह चिकित्सा उपचार कर सकती है।
चिंतनात्मक असमर्थता और तुच्छता स्वीकार करनी पड़ती है। समग्र ईश्वर को प्राप्त करना तो दूर?, सके विस्तार संबंधी कल्पना तक कर सकना हमारे लिए शक्य नहीं।
चिंतन के कारण जो अनर्थ उपजे हैं, उन्हें कोई दावानल भस्मसात् करके रख दे, यह संभव है। ऐसा समय असाधारण रूप से कष्टकारक भी हो सकता है। विपत्तियाँ और बढ़ सकती हैं। संकट और भी अधिक गहरा सकते हैं, किन्तु साथ ही यह भी निश्चित है कि उज्ज्वल भविष्य का सृजन भी इन्हीं दिनों होगा। प्रतिभाएँ इन्हीं दिनों उभरेंगी और उनके द्वारा बहुमुखी सृजन की ऐसी योजनाएँ भी बनेंगी, जो चरितार्थ होने पर ऐसा बसंती वातावरण बना दें, जिसकी इक्कीसवीं सदी के रूप में आशा, अपेक्षा चिरकाल से की जाती रही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-March
चिंतन बच जाता है। इस बचत पूँजी से वे समाज का, ईश्वर का अनुग्रह प्रचुर परिणाम में प्राप्त कर सकते हैं। आत्मगौरव और आत्मसंतोष को भी यदि महत्व मिलता हो तो श्रद्धाशक्ति व्यक्ति को हर घड़ी उसकी अनुभूति होती रहती है। श्रद्धा का अमृत उमगने लगे और अनास्था का विष घटने लगे तो फिर व्यक्तित्व की गरिमा गगनचुम्बी होती चलती है। ऐसे व्यक्तियों द्वारा जो भी काम होते हैं, वे अपनी विशिष्टता और सुँदरता का परिचय देते रह सकते हैं, निजी जीवन में वे स्वस्थ, प्रसन्न, संतुलित, आशान्वित एवं निश्चिंत पाये जाते हैं और पारिवारिक जीवन में सुव्यवस्था तथा सहयोग-सद्भाव का वातावरण बना रहता है।
चिंतन की, लोभ-मोह की कृपणता में बँधे रहना ही भवबंधन हैं। जाग्रत आत्माओं में जब ऋतम्भरा-प्रज्ञा का अवतरण होगा तो वह इस भवबंधन से मुक्त होने के लिए छटपटायेगा।
चिंतन और चरित्र में परिवर्तन होता चला जाय। समय की इस माँग को शाँतिकुँज द्वारा पूरा किया गया है एवं विगत 27 वर्षों में ऐसे नररत्न श्रेष्ठ वातावरण में ढालने का प्रयास किया गया है। कितनी सफलता मिल सकी, यह तो भविष्य ही बतायेगा, क्योंकि जैसे गंगा में वास करने वाली हर मछली को मोक्ष नहीं मिल जाता तथा तीर्थसेवन करने वाले हर व्यक्ति का दृष्टिकोण नहीं बदल जाता, ऐसे अपवाद सदैव रहे हैं व रहेंगे, किंतु जिन्होंने भी शाँतिकुँज के तपःपूत वातावरण में गुरुसत्ता की प्राणऊर्जा को ग्रहण करने का प्रयास किया है। उन्हें वह अनुदान रूप में मिला है एवं उसे उनके व्यक्तित्वरूपी कल्पवृक्ष के रूप में देखा जा सकता है। यह उसे भी मिला है, जो कुछ दिन का प्रवास यहाँ करके चला गया, उसे भी जिसने कुछ माह का समय देकर यहाँ के वातावरण से कुछ ग्रहण करने का प्रयास किया तथा उसे भी जो स्थायी सेवाएँ यहाँ देते रहकर अपना हर क्षण गुरुसत्ता के लिए जिया गया मानता रहा है।
चिंतन सापेक्ष सत्य की तलाश कर रहा होता है, एक को पुस्तकीय तथ्य कहें, तो दूसरे को चरम सत्य कहना पड़ेगा। एक माया है, तो दूसरा ब्रह्म, एक कह तुलना बर्फ से करें, तो दूसरे को अगोचर वायप् मानना पड़ेगा। यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, अतः उन्हें दो नहीं, तत्वतः, एक ही कहना चाहिये।
चिंतनतंत्र जिम्मेदार है। व्यक्ति यदि सात्विक प्रकृति का है, तो उसकी विचारणा- भावना भी सौम्य-सात्विक होती है, तो अपनी ही प्रकृति की सतोगुणी तरंग उत्सर्जित करती है। ऐसे ही व्यक्ति सूक्ष्म-संदेशों को पकड़ने में सफल होते देखे गये हैं।
चिंतन का स्थान सद्बुद्धि ले एवं चहुँओर परिवर्तन की प्रक्रिया गतिशील हो चले। शाँतिकुँज की विगत सत्ताईस वर्ष की जीवन यात्रा बताती है कि जो प्रयास इसके द्वारा विश्व भर में बन पड़े हैं, उनसे असुरता की लंका निश्चित ही जलेगी-मानव में देवत्व का उदय एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने वाला राम स्वयं फिर से नये रूप में प्रकट होगा। इस प्रकटीकरण के फलस्वरूप युगशिल्पियों की एक सृजनवाहिनी अनायास ही चारों ओर से खिंचती चली जायेगी एवं उनका पुरुषार्थ उन आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा, जिनकी इन दिनों इन्हीं घड़ियों में अविलम्ब आवश्यकता है।
चिंतन करने वाले हर सृजनधर्मी को वह वातावरण मिले जो कभी ऋषिगणों के आश्रमों-आरण्यकों में मिलता था। वातावरण की प्रभावी शक्ति को सभी असंदिग्ध रूप से स्वीकार करते हैं। प्राचीनकाल में बालकों का शिक्षण ऋषियों के गुरुकुल में होता था। और वे नवरत्न बनकर निकलते थे। वयस्कों को तीर्थवास में, अधेड़-वानप्रस्थ स्तर के व्यक्तियों को आरण्यकों में चिरकाल तक निवास करना पड़ता था, ताकि वे परिवार के अनगढ़ वातावरण से पृथक होकर कुछ समय प्रेरणाप्रद स्थिति में रह सकें।
चिंतन की मुद्रा में बैठा कुछ सोच रहा था। परेशानी उसके चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी। दो वर्ष पूर्व आज ही के उस मनहूस दिन के बारे में वह सोच रहा था, जिसने उसे यहाँ तक पहुँचा दिया। दो वर्ष का समय कल तक तो उसने भली प्रकार काट लिया, पर आज न जाने क्यों उसका मन भारी हो रहा था। रह-रह कर एक वीभत्स दृश्य उसकी आँखों के आगे उभर कर जाता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-January
चिंतन करते ही सक्रिय हो जाता है। मनुष्य के कानों के ऊपर स्थित टैम्पोरल लोब उसके भी दांये हाथ से लिखने वाले के दायें मस्तिष्क में इसकी उपस्थिति बतायी गयी है। इसे आस्था केन्द्र की उपमा देते हुए सेनडियागो स्थित कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के स्नायु वैज्ञानिकों का दल कहता है कि अमूमन यह सेण्टर सभी व्यक्तियों में मौजूद होता है, किसी में कम व किसी में अधिक विकसित। अनुसंधान दल के प्रमुख डॉ. विलयानुर रामचंद्रन भारतीय मूल के हैं एवं उनकी यह रिपोर्ट लंदन के संडे टाइम्स में दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में प्रकाशित हुई थी। इससे विश्व भर के तमाम आस्तिकों के विश्वास को बल मिला है।
चिंतन का मंथन-नवनीत इसी दिन लिखना आरम्भ किया गया एवं एक वर्ष के अन्दर इसका सृजन कर पूरे राष्ट्र को भली-भाँति मथ दिया गया।
चिंतन समाया है इसमें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-August
चिंतन भी घृणित कार्य है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-February
चिंतन एवं आदर्श पर आश्रित होते हैं तथा अधिक स्वस्थ होते हैं। एक साथ उत्पन्न होकर दिन दुगुना और रात चौगुना वृद्धि पाने वाला विश्वास लिप्सा, वासना अथवा जिज्ञासा का आधार पाता है। वह निर्बल होता है और अधिक काल जीवित नहीं रह पाता। कुछ विचारकों का विश्वास है कि प्रथम कोटि के विश्वास का क्षेत्र सज्जन हैं तथा द्वितीय कोटि के विश्वास के दुर्जन अधिकारी होते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-January
चिंतन द्वारा हममें से प्रत्येक अपनी त्रुटियाँ मालूम करे और दृढ़ता से उन्हें दूर करने का प्रयत्न करे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-September
चिंतनीय कार्य में लीन रहते हैं।
चिंतन मन में आ जाता है तो हम उसे रोक नहीं सकते। फिर जैसा हमारा चिंतन होता है घटनाएँ भी उसी प्रकार होती हैं। शक्ति की उपस्थिति की अवस्था में मनुष्य के विचार उसके काबू के बाहर हो जाते हैं।
चिंतन करने से फिर नव जीवन को प्राप्त कर लेते हैं। काल विचार की शक्ति को नष्ट करने में समर्थ नहीं। इसी प्रकार देश की सीमाएँ भी विचार को नहीं बांधती। एक ही विचार सारे जगत में फैल जाता है। विचार द्वारा मनुष्य संसार के समस्त प्राणियों के हृदयों पर अधिकार कर लेता है।
चिंतन करने से हम अपने आपको ही भूल जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप तब किसी प्रकार का कुचिंतन मन में आ जाता है तो हम उसे रोक नहीं सकते। फिर जैसा हमारा चिंतन होता है घटनाएँ भी उसी प्रकार होती हैं। शक्ति की उपस्थिति की अवस्था में मनुष्य के विचार उसके काबू के बाहर हो जाते हैं।
चिंतन करने का होता है। किसी प्रकार का शुभ निर्देश सफल होने के पूर्व यह आवश्यक है कि बीमार मनुष्य अपनी बीमारी के विषय में सोचना बन्द करे इसलिए किसी प्रकार मन को स्थिर करना आवश्यक होता है। जब मनुष्य अपनी बीमारी के विषय में भूल जाता है तो फिर उसे जैसा निर्देश दिया जाता है उसका वैसा ही फल होता है। इमील कूदे महाशय रोगी को शुभ निर्देश देने के पूर्व अचेतन अवस्था में ले जाते थे अथवा किसी न किसी प्रकार चेतना के कार्य को स्थगित करने की चेष्टा करते थे।
चिंतन की उसको इच्छा ही नहीं होती। आध्यात्मिक चिंतन ऐसी अवस्था में नीरस प्रतीत होता है। बहुत से लोगों को तो सांसारिक कामों से फुरसत ही नहीं मिलती कि वे अपने आपके विषय में सोचें। कितने ही मनुष्य अकेले नहीं रह सकते। यदि उन्हें किसी काल के लिए अकेले छोड़ दिया जाय तो वे काल कवलित बन जायें।
चिंतन को शान्त कर देने से भारी लाभ होता है। कितने रोगियों का जटिल रोग अपने विचारों को श्वांस-प्रश्वांस पर केन्द्रित करने से नष्ट हो जाता है। रोगों के विनाश में आत्मनिर्देश का भारी कार्य होता है। पर चित्त की बिगड़ी हुई अवस्था में मनुष्य का आत्म-निर्देश उसका कल्याण नहीं करता। प्रत्येक शुभ-निर्देश प्रति-निर्देश में परिणत हो जाता है।
चिंतन ऐसी अवस्था में नीरस प्रतीत होता है। बहुत से लोगों को तो सांसारिक कामों से फुरसत ही नहीं मिलती कि वे अपने आपके विषय में सोचें। कितने ही मनुष्य अकेले नहीं रह सकते। यदि उन्हें किसी काल के लिए अकेले छोड़ दिया जाय तो वे काल कवलित बन जायें। इसका प्रधान कारण उनका कुरूप आला ही है।
चिंतन होता है घटनाएँ भी उसी प्रकार होती हैं। शक्ति की उपस्थिति की अवस्था में मनुष्य के विचार उसके काबू के बाहर हो जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-May
चिंतन, स्वार्थ-त्याग, प्रेम, दया आदि भी हम में स्वाभाविक ही हैं, चाहे उनका परिणाम स्वार्थपरता से कम क्यों न हो।
चिंतन मनन करते हैं वे लोग भव बाधाओं को तर जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-October
चिंतन में तल्लीन रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-June
चिंतन में ही संलग्न रहते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-September
चिंतन करो, अतिथि-सत्कार करो। इन भव्य विचारों का तुम्हारे जीवन की प्रत्येक घटना पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। मनुष्य का जीवन घटनाओं का समूह है और ये घटनाएं हमारे विचारों के परिणाम हैं। तुम्हारे अन्दर जो विचार शक्ति है, तुम चाहो तो उसके उचित उपयोग से देवता बन सकते हो और यदि चाहो तो पशु भी बन सकते हो। चाहो तो निर्धन हो सकते हो, चाहो तो धनवान हो सकते हो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-February
चिंतन के क्षणों में इस तत्व पर मनःक्रिया केन्द्रित की है कि मानव की चित्तवृत्ति, स्वभाव आदतें, भावनाएं प्रसुप्त आकाँक्षाएं किस आधार शिला पर स्थित है? मानसिक स्थितियों, उत्कृष्ट या निकृष्ट भूमिकाओं का निर्माण कौन करता है? वासनाओं अथवा मनोविकारों को प्रदीप्त करने वाला कौन तत्त्व है? अन्तःकरण में विशुद्ध सजातीय पदार्थ अथवा विषैले विजातीय कण क्या आन्दोलन उत्पन्न करते हैं?
चिंतन कर लेते हैं, जिन हजारों में संलग्न रहते हैं, क्रमशः वैसे ही होते जाते हैं। जैसे हमारे आदर्श होते हैं, जैसे हमारे हार्दिक भाव होते हैं, ठीक उन्हीं का बिम्ब प्रतिबिम्ब हमारे भूमंडल पर द्युतिमान हो उठता है और कुछ काल पश्चात् हम वैसे ही हो जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-January
चिंतन में प्रविष्ट हो जाओ। निद्रा से पूर्व इष्ट प्राप्ति करके वृत्ति में आरुढ़ रहने का प्रयत्न करने से तद्रूप चिंता की रचना हमारे मस्तिष्क में होती है और उसके स्थायी छाया हमारे हृदय पर पड़ती है। अभ्यास द्वारा क्रमशः मन अनात्म पदार्थों से विमुख हो शिव सत्य-आनन्द स्वरूप हो जाता है। तत्पश्चात जागृत, स्वप्न-सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में इष्ट के अतिरिक्त विचार क्रिया कहाँ जा सकती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-March
चिंतन अवश्य करना चाहिए, इससे मन को शान्ति मिलती है, और आत्मा का विकास होता है। जिससे स्वास्थ्य पर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ता है।
चिंतन योग्य पदार्थों में स्थिर रखने का प्रयत्न करोगे तो यह तुम्हारा सबसे बड़ा मित्र बन जायेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-August
चिंतन में ही लगती है। आप पवित्र शब्दों का ही उच्चारण करते हैं और मनोमंदिर में सदा सर्वदा पवित्र संकल्पों को ही स्थान देते हैं।
चिंतन करके देखो तो अन्त में तुम्हें यही प्रतीत होगा कि परमानन्द की प्राप्ति ही वास्तविक सफलता है। आपने कितना ही धन संग्रह किया हो किन्तु क्या मालूम वह कब जाता रहे। हमें स्मरण रखना चाहिए कि स्थायी वस्तु हमारी आध्यात्मिक सफलता ही है, वही वाँछनीय है। किन्तु शोक! महाशोक!! कंकड़ों के बदले हम हीरों को फेंक देते हैं। क्षणिक सुख के लिए अपनी आत्मा के अटल आनन्द से वंचित रह जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-May
चिंतन करता है, उस स्थिति का भाव अवश्य उसमें प्रकट होता है अतः तुम यही सोचो कि “मैं भय तथा दब्बूपन के दूषित विचारों की कल्पना में नहीं रहता। अन्तःकरण को भूत, प्रेत, पिशाच की श्मशान भूमि नहीं बनाता। मेरे अन्तःकरण में तो निर्भयता, श्रद्धा, उत्साह और शान्ति का अखण्ड राज्य है। मैं चारों ओर से अभय हूँ, परम निःशंक हूँ। परमात्मा की गोद में पूर्ण सुरक्षित हूँ।
चिंतन, मनन तथा उस पर क्रिया” यही वास्तविक अध्ययन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-July
चिंतन अथवा कल्पना तक नहीं करते, प्रत्युत उस ओर ही अपनी समस्त शक्ति उन्मुख रखते हैं। आत्मश्रद्धा तथा विश्वासपूर्वक अधिकाधिक समय तक अभ्यास करने से भय-से मुक्ति तो मिलती ही है, साथ ही हृदय का दौर्बल्य भी दूर होता है। व्यर्थ अनिष्टकारी चिंतन ही तो हार्दिक दुर्बलता का मूल है।
चिंतन ही तो हार्दिक दुर्बलता का मूल है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-November
चिंतन, मनन द्वारा सामने उपस्थित सर्वतोमुखी समस्याओं को समझना और उनके सुलझाने का मार्ग तलाश करना।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-July
चिंतन एवं परमार्थ परायणता से तृप्ति पाता है। उचित शिक्षा एवं विद्या के द्वारा ही मनुष्य पशु प्रवृत्तियों से छुटकारा पाता और अपने अंदर निहित दिव्यता के दर्शन करता है।
चिंतन में निहित प्राणदायी विचार जड़-मूल से निरस्त कर सकते है। इसके अपनाने से अभिमान ममता -राग और द्वेष, शत्रु-मित्र का भेद बोध अपने-पराए का भेदभाव, हिंसा घृणामय एवं विषय विशेष के प्रति कामना प्रभृति सारे के सारे उसी तरह विनष्ट हो जाएँगे जिस तरह सूर्य के उदय होने से अंधकार।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-May
चिंतनशील प्रयोगशाला है जिसमें से प्रकृति अतिमानव अथवा देवता उत्पन्न करने में लगी है। किन्तु मनुष्य स्वयं सोचने, विचारने ओर निर्णय करने की क्षमता वाला प्राणी है। उसे विवेक करने की क्षमता वाला प्राणी है। उसे विवेक बुद्धि का अनुपम उपहार जो मिला है, अतः उसका उपयोग करते हुए उसे अगले विकास की प्रक्रिया के साथ सहयोग करना पड़ेगा। पंचभौतिक तत्वों से जीवन, जीवन से मन उत्पन्न हो चुके है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-November
चिंतन के कारण व्यक्ति अनैतिक आचरण अपनाता और पाप कर्म करता है। परिणाम स्वरूप अनेकानेक मनोकायिक बीमारियाँ उसे धर दबोचती है। पाप कर्मों को छिपाने से एक्जिमा, दमा, माइग्रेन, जैसे रोग फूट कर व्यक्ति की मनोदशा का परिचय स्वयमेव दे देते हैं। सोरियेसि रोग भी इसी की देन है। “साइको सोमैटिक मेडिसिन” नामक अपनी कृति में मनोचिकित्सक द्वय ई.वीस एवं ओ.एस इंग्लिस ने भी कहा है कि मानसिक एवं भावनात्मक विकृतियों का दबाव किसी भी रोग के रूप में फूट सकता है।
चिंतन एवं भावना क्षेत्र की विकृति ही रोगों का प्रमुख कारण है। तनाव, उन्माद जैसे मनोविकार एवं उच्च रक्तचाप, इरीटेबल, बाँवेल, कोलाइटिस, त्वचारोग, दमा, यहाँ तक कि कैंसर भी विकृत भावनाओं की ही देन है। सिर दर्द, आधा शीशी का रोग भावनात्मक उत्पादन माने गये हैं। मूर्धन्य चिकित्साविज्ञानी वोल्फ हैराल्ड ने अपनी कृति “स्टे्रट एण्ड डिसीज, में इसका प्रमुख कारण कामुकता, विद्वेष, अप्रसन्नता, कुढ़न आदि की हीन भावनाओं को बताया है। उनके अनुसार हृदय की बीमारियों, उच्च रक्तचाप आदि अनेकों कारण है, पर इस कोमल एवं संवेदनशील अंग पर सबसे अधिक गहरा प्रभाव भावनाओं का पड़ता है।
चिंतन में परिवर्तन लाने पर मनुष्य जीवन की दिशा धारा बदल जाती है। आरोग्य की उपलब्धि, मनोबल की प्रखरता एवं भविष्य निर्माण से जुड़ने वाली महती भूमिका में सघन विचार धारा का असाधारण योगदान होता है। महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्यों की रूपरेखा निर्धारित करती है। इस संदर्भ में हुए निश्चय के उपरान्त योजना कार्यरूप में परिणत होती है, साधन जुटते हैं और सफलता के आधार खड़े होते हैं। दैनिक घटनाओं का सुनियोजन बन पड़ना और अस्त-व्यस्तता की चट्टान से टकराकर छितरा जाना और कुछ नहीं, केवल तत्परता और तन्मयता के समन्वय की कमीवेशी रहने की ही परिणति हैं।
चिंतन एवं विकृत भावनायें ही विभिन्न रोगों की उत्पत्ति के मूल कारण है। सर्व प्रथम इसी क्षेत्र का परिष्कार सुधार किये जाने की आवश्यकता है। बाह्य औषधियाँ कुछ तात्कालिक लाभ पहुँचा सकती हैं, रोग को दबा सकती हैं परन्तु वह स्थायी समाधान प्रस्तुत नहीं कर सकतीं। मनोकायिक रोगों से छुटकारा पाने एवं भावना क्षेत्र को परिष्कृत करने के लिए उनने योगाभ्यास की ध्यान धारणा प्रक्रिया का महत्वपूर्ण बताया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-April
चिंतन से-दुग्ध हो गया है उनका अध्यात्म क्षेत्र की सिद्धियाँ कैसे मिल सकती है?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-December
चिंतन चरित्र व्यवहार भी सहज दोष मुक्त हो सकेंगे। जे.एम.आर. डिलागो ने अपनी कृति “फ्री बिहेवियर एण्ड स्टीमुलेशन” में तुलनात्मक अध्ययन करते हुए बतलाया है कि क्रूरता, बर्बरता, आक्रामक प्रवृत्ति पशुओं में थोड़े से उद्दीपन से सहज संभाव्य बन जाती है। पशु व्यवहार और मानवीय व्यवहार को विभाजन करने वाली रेखा मनुष्य की विनम्रता है। यही तथ्य अमेरिका के जे.पी. स्कॉट ने अपनी रचना एनीमल बिहेवियर में प्रमाणित करते हुए कहा है कि पशुओं में जहाँ स्गसटिक बिहेवियर सहज बन पड़ता है ही उन्नत श्रेणी के मनुष्यों में नम्रता सहज दृश्यमान होती हैं।
चिंतन, चरित्र व्यवहार तीनों को संचालित करने वाला मनुष्य का अपना अंतराल है। इसकी विकसित, विकासशील एवं विकसित स्थितियों के अनुरूप इन तीनों के स्वरूप भी दृश्यमान होते हैं।
चिंतन बन पड़ता है। तदनुसार चरित्र गठित होता है, जिसकी अभिव्यक्ति व्यवहार में बन पड़ती हैं। इस तरह चिंतन, चरित्र व्यवहार तीनों को संचालित करने वाला मनुष्य का अपना अंतराल है। इसकी विकसित, विकासशील एवं विकसित स्थितियों के अनुरूप इन तीनों के स्वरूप भी दृश्यमान होते हैं।
चिंतन में प्रविष्ट होने पर जोर देते है। उनके अनुसार इनमें वे सूत्र हैं जिनसे मानवी सत्ता के रहस्यमय स्वरूप का उद्घाटन हो सकता है।
चिंतन तथा अभ्यास जारी रखा जाये। वास्तव में यह समग्रता ही जीवन साधना की विशेषता है। साधक को कर्तव्य क्षेत्र में धार्मिकता, मान्यता क्षेत्र में आत्म परायणता और अध्यात्म क्षेत्र में दूरदर्शी विवेकशीलता उत्कृष्ट आदर्शवाद को अपनाने के लिए कहा जाता है। इन सर्वतोमुखी दिशा-धाराओं में समुचित जागरूकता बरतने पर ही यह लाभ मिलता है, जिसे आत्म परिष्कार के नाम से जाना जाता है। यह हर किसी के लिए सरल, संभव और स्वाभाविक भी है।
चिंतन को ही व्यवस्था कहते हैं, भले ही वह किसी भी प्रयोजन के लिए अपनाई गई हो।
चिंतन चरित्र और व्यवहार को परिष्कृत करती है। व्यक्तित्व को प्रखर, प्रमाणिक एवं प्रतिभावान बनाती है। इसी आधार पर वे क्षमतायें उभरती है, जो अनेकानेक सफलताओं की उद्गम स्त्रोत हैं।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार की वह रूपरेखा विनिर्मित की जाए जिसे सतर्कता पूर्वक पूरी करने पर यह माना जा सके कि आज का दिन एक बहुमूल्य जन्म, पूरी सार्थक हुआ। इस चिन्तन के सभी पक्षों पर विचार करने में जितना अधिक समय लगे, उतना कम हैं, पर इसे नित्य प्रति, नियमित रूप से करते रहने पर पन्द्रह मिनट भी पर्याप्त हो सकते हैं। एक दिन की छूटी बात को अगले दिन पूरा किया जा सकता है।
चिंतन को परिष्कृत करने के लिए काफी सोच विचार किया है। उन्होंने अपने निष्कर्ष में यही स्पष्ट किया है कि अंतराल के दोषमुक्त होते ही चिंतन चरित्र व्यवहार भी सहज दोष मुक्त हो सकेंगे। जे.एम.आर. डिलागो ने अपनी कृति “फ्री बिहेवियर एण्ड स्टीमुलेशन” में तुलनात्मक अध्ययन करते हुए बतलाया है कि क्रूरता, बर्बरता, आक्रामक प्रवृत्ति पशुओं में थोड़े से उद्दीपन से सहज संभाव्य बन जाती है। पशु व्यवहार और मानवीय व्यवहार को विभाजन करने वाली रेखा मनुष्य की विनम्रता है। यही तथ्य अमेरिका के जे.पी. स्कॉट ने अपनी रचना एनीमल बिहेवियर में प्रमाणित करते हुए कहा है कि पशुओं में जहाँ स्गसटिक बिहेवियर सहज बन पड़ता है ही उन्नत श्रेणी के मनुष्यों में नम्रता सहज दृश्यमान होती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-March
चिंतन मनन से प्रारंभ होता है। इससे आगे आत्मा समीक्षा, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म विकास के ऊर्ध्वगामी चरण उठते है। ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ आत्म चेतना से सम्बन्ध बिठाने और दोनों के बीच आदान–प्रदान का द्वारा खोलने का उपक्रम आरंभ होता है।
चिंतन किन मर्यादाओं के पालन पर निर्भर रहता है? यह सभी बातें विस्तारपूर्वक समझने और उनके पालन में जो उतार चढ़ाव आते है उनका समाधान ज्ञानयोग के अंतर्गत आता है।
चिंतन में सर्वत्र शक्ति की व्यापकता बताई गयी है। भौतिकीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा, आदि न जाने कहाँ कहाँ से ऊर्जा पाने के तरीके ढूंढ़ निकाले जा रहे है। पृथ्वी, जल, वायु अग्नि के व्यापक उपयोग, उपभोग के बाद भी शून्य ही सबका कारण है एवं ऊर्जा का भण्डार भी होगा ऐसी कल्पना भी पूर्व काल के वैज्ञानिकों को न थी पर आधुनिक वैज्ञानिक आकाश को असंख्य ऊर्जा से भरा पूरा मानने लगे हैं। उनके अनुसार इसमें असंख्य अंतरिक्ष कणों-न्यूट्रिनों की बरसात होती रहती है। आकाश में तारों का विस्फोट होता रहता है और व सुपर नोवा बनकर एक ज्योति पुँज के रूप में बिखर जाता है।
चिंतन-क्षेत्र की विभूति को उच्चस्तरीय देवी-वरदान माना गया है। भगवान किसी पर वस्तुतः प्रसन्न होते है तो उसे यही वरदान प्रदान करते है। सामान्य अनुदान तो मनुष्य जीवन है। उसकी संरचना समस्त प्राणियों को मिले काय कलेवर की तुलना में अद्भुत और अनुपम है। अन्य हेय प्राणी तो अपनी काया से जीवन निर्वाह भर कर पाते हैं, पर मनुष्य पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।
चिंतन का तात्पर्य है-वस्तुस्थिति का अध्ययन, अवगाहन। मन का तात्पर्य है-विकृतियों के परिशोधन और सत्प्रवृत्तियों संवर्धन की विचारणा, योजना और संभावनाओं का अभिनव स्थापना। विद्या का शुभारंभ आत्मिक क्षेत्र चिंतन मनन से प्रारंभ होता है। इससे आगे आत्मा समीक्षा, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म विकास के ऊर्ध्वगामी चरण उठते है। ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ आत्म चेतना से सम्बन्ध बिठाने और दोनों के बीच आदान–प्रदान का द्वारा खोलने का उपक्रम आरंभ होता है।
चिंतन को स्वीकारते हुए कहते हैं कि शून्य से जगत की उत्पत्ति हुई। मैक्सिको के डॉन जुआन इस सत्य को स्वीकारने पर बल देते है।
चिंतन किया जाए और कुछ दिन पश्चात् उसका उत्तर निद्रावस्था में संकेत रूप में मिल जाए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इसका समर्थन न्यूयार्क राकफेलर यूनिवर्सिटी के तंत्रिका विज्ञानी डॉ. जोनाथन पिन्सन ने भी किया है। वे अपनी “बेन एण्ड साइक” रचना में कहते है कि “प्रसुप्त मस्तिष्कीय क्षमता को यदि जगाया-उभारा जा सके, तो वह हमें न सिर्फ सपनों के माध्यम से अनागत की सूचना दे सकती है, वरन् पूर्ण चेतना की अवस्था में भी हम उससे उसी स्तर का कार्य ले सकते है”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-August
चिंतन की प्रक्रिया बदल जाने का स्वभाव का अंग बनी बुरी आदतों से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है। अधिकाँश मनोकायिक बीमारियाँ विकृति चिन्तन के कारण ही पैदा होती हैं। ऐसी स्थिति में तंत्रिका तंत्र एवं ग्रन्थि तंत्र संजीवनी रसायन उत्पन्न करने के स्थान पर ऐसे रसायनों का उत्पादन आरंभ कर देते हैं जो विष तुल्य प्रभाव डालते और अनेकानेक शारीरिक-मानसिक रोगों को जन्म देते हैं। व्यवहार चिकित्सा विशेषज्ञों का मत है कि मन के भावनात्मक दबाव एवं तद्जन्य तनाव ही रोगोत्पादन के कारण बनते हैं।
चिंतन के स्तर में रुकावट एवं गिरावट तथा पांचवीं समस्या जिसे वह कहते है कि उसके समाधान में ही सभी का समाधान है। वह है-वर्तमान समय के अनुरूप एक ऐसे सजि और ग्रारह दर्शन की आवश्यकता, जो मनुष्य की बुद्धि एवं चिन्तन को उलटकर उसे संहारक की जगह सृजनात्मक बना दे। मूलतः तथ्य वहीं है अध्यात्म के स्तर तक पहुँचकर वान द्वारा अपनी दिशा अधो से ऊर्ध्वगामी बनाना।
चिंतन ही रोगों की मूल जड़ बनकर व्यवहार में प्रकट होता है। “वे कहते हैं कि इसके लिए व्यक्तित्व का सर्वांगपूर्ण विश्लेषण एवं उपचार किया जाना जरूरी है।
चिंतन॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-January
चिंतन और विरोधियों का सामना कैसे किया जाय? प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में कैसे बदला जाय? आत्म सुधार और आत्म विकास का उभय-पक्षीय क्रम किस प्रकार द्रुतगति से चल पड़े? चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में शालीनता का समावेश कैसे किया जाय? शान्ति से रहने और रहने देने के लिए क्या उपाय अपनाया जाय?
चिंतन से सराबोर, अनुभवपूर्ण ऐसा साहित्य जो समय की अनेकानेक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता हो, इन दिनों दुर्लभ हो रहा है। जो है वह इतना महँगा कि गरीब देश के स्वल्प शिक्षित नागरिक आसानी से नहीं खरीद सकते। इन सभी कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए आवश्यकता यह अनुभव हुई कि सर्वसुलभ सस्ते दामों का युग साहित्य प्रकाशित किया जाय। मात्र हिन्दी में ही नहीं, देश की अन्य भाषाओं में भी, जिससे क्षेत्र विशेष के लोग ही नहीं, समूचे देश के लोग लाभान्वित हो सकें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-September
चिंतन साँसारिक व्यवस्था को ही नहीं प्रकृति संतुलन को भी बिगाड़ती हैं। इस समय के प्रस्तुत घटाटोप से बचना हो तो उनके मूल कारण मानव चिन्तन और व्यवहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।
चिंतन में ही समाप्त हो जाता है। मानसिक तनाव चिंता, अनिद्रा आदि भी प्राणशक्ति का असाधारण गति से क्षरण करते हैं। प्राणतत्व की यह न्यूवता ही अनेकानेक बीमारियों का कारण बनती हैं। इसकी कमी जीवन अवधि पूर्ण होने के पूर्व ही मनुष्य को काल का ग्रास बनने को बाध्य कर देती हैं।
चिंतन की विकृतियाँ हैं। उनका कथन है कि जटिल से जटिल रोग भी वहीं से उपजते हैं एवं चिकित्सा वहीं की की जानी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-June
चिंतन के लिए इसका संदेश क्या है ? इसकी व्यावहारिक महत्ता और आध्यात्मिक उपयोगिता क्या है ?
चिंतन में डूबे रहने वालों में यह धुँधला होता हैं। डाँ0 डेविड शीनकिन तथा टेड डान जैसे ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिकों की भी यहीं धारणा है कि आभामंडल की प्रदीप्तिता-उज्ज्वलता मनुष्य की भावना और चेतना की उत्कृष्टता पर अवलम्बित हैं। साधना, समाधि के समय साधकों का प्रदीप्त मंडल बहुत चमकीला एवं विस्तृत जाता हैं। इसका कारण वैज्ञानिकों ने भावना, विचारणा एवं अन्तःकरण की पवित्रता, उत्कृष्टता को माना हैं।
चिंतन प्रक्रिया में परिवर्तन किया तो न केवल विद्वान बने वरन् महानता के उच्च शिखर पर जा पहुँचे। यही बात महात्मा गांधी के बारे में भी है। विश्व विख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन के मस्तिष्क का भार सामान्य जनों के समतुल्य एवं संरचना भी वैसी ही थी। पर उनने अपने मानसिक क्षमता असामान्य स्तर तक बढ़ा ली थी।
चिंतन क्षमता का कोई समाधान नहीं मिलता। अब वैज्ञानिक निष्कर्ष आणविक हलचलों के ऊपर शासन करने वाली एक अज्ञात नियामक चेतन सत्ता को समझने का प्रयास गंभीरतापूर्वक कर रहे है। दार्शनिक काँट का यह कथन सचाई के बहुत निकट है कि “विश्व की रचना में प्रयुक्त हुई नियमबद्धता और बुद्धिमत्ता को देखते हुए ईश्वर की सत्ता स्वीकार की जा सकती है।”
चिंतन प्रक्रिया और संकल्प शक्ति मनःसंस्थान को प्रभावित करती है। संसार में ऐसे अगणित व्यक्ति हुए है जिनका आरंभिक जीवन साधारण ही नहीं निम्न स्तर का भी था, किन्तु जब उनने अपने आपे को उच्चस्तरीय बनाने-मस्तिष्कीय क्षमता बढ़ाने का निश्चय कर लिया तो अभ्यस्त आदतें जो परिवर्तन स्वीकारने में आना-कानी करती थी, संकल्प शक्ति के दबाव से आमूल-चूल परिवर्तित होगी। सामान्य व्यक्ति असामान्य बन गये। कालिदास, वरदराज आदि के उदाहरण ऐसे ही हैं जिनमें उनकी आरंभिक स्थिति देखते हुए अनुमान होता था कि ये सदा मूर्ख रहेंगे। विद्याध्ययन में भी इन्हें सफलता न मिलेगी।
चिंतन का उत्कृष्ट रूप वेदान्त इसी का समर्थन व प्रतिपादन करता है।
चिंतन से उनके मस्तिष्क का बायाँ भाग अधिक सक्रिय एवं प्रभावी हो गया है। बौद्धिक विकास जब अपनी चरम अवस्था में पहुँच जाता है। तो ऐसी स्थिति में भावनात्मक स्त्रोत सूखने लगते है और मस्तिष्क के ..... दोनों भागों में असंतुलन पैदा हो जाता है। इसी प्रकार भावनाएँ भी मस्तिष्क को अनेकों प्रकार से प्रभावित करती है। मनुष्य के खण्डित व्यक्तित्व का मूल कारण यही है।
चिंतन की चिर पुरातन प्रणालियों का सूक्ष्म या प्रत्यक्ष रूप से मूल्य ही बदल जाता है। इस तरह प्राचीन सिद्धान्त तभी जीवित रह पाता है, जब वह इस परिवर्तन, संशोधन के लिए अपने को पूरी तरह सौंप दे।
चिंतन अनगढ़ ही बना रहता है।
चिंतन धाराओं को अपनाते और व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास करके पूर्णता प्राप्त करते है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-April
चिंतन की ही पुष्टि करती है। इनके निष्कर्ष के अनुभूत होने की स्थिति को ही तो योग विज्ञानी समाधि का नाम देते है। समाधि स्वरूप सजीव व निर्जीव है। विज्ञान की स्थिति अभी सजीव की ओर पहुँचने को है। निष्कर्ष के अनुभव अकथनीय अवर्णनीय होते हैं इनको बता पाना मात्र संकेतों से ही संभव है।
चिंतन वैसे ही करते हैं जैसे माता-पिता छोटे शिशु का करते हैं। उपेक्षा में हानि अपनी ही है। अकेलापन सदा ही अखरता है। दूसरे स्वजन सम्बन्धी एक समय तक ही साथ रह सकते है उनका प्रेम भी बदले की ही प्रक्रिया पर निर्भर रहता है। फिर उनकी क्षमा और उदारता भी उतनी बढ़ी चढ़ी कहाँ होती है।
चिंतन में आध्यात्मिकता को वैयक्तिक और सामाजिक क्रिया–कलापों का प्रेरणा केन्द्र ऊर्जा स्रोत माना गया है। इससे समर्थता पाकर परिष्कृत और समाज में अनोखी जीवन कला को शिल्प कर सकेगी। समाजवाद को प्रजातंत्र एवं साम्यवाद के मिले-जुले रूप में समझा जा सकता है इसमें आध्यात्मिकता का समावेश होने से एक ऐसी रचना सम्भव हो सकेगी जिसमें व्यक्ति की मौलिकता नष्ट न ही-वह अपने उत्कर्ष और उन्नति के चरम तक पहुँच सके। साथ ही उसमें ऐसी कोमल भावनाएँ विकसित हो सकें कि वह अपनी उपलब्धियों को सर्व जन हिताय-सर्वजन सुखाय प्रस्तुत करे। साथ ही इस तत्त्व चिन्तन से प्रेरित हुआ समाज स्वयं को ऐसी प्रयोगशाला के रूप विकसित करें जहाँ सभी सुविकसित और सुव्यवस्थित हो रह सकें।
चिंतन की काट सम्भव हो सके युग शक्ति गायत्री के अवतरण यही मूल परिजन है इसे इस युग की जागृत आत्माओं को समागत वातावरण बनाकर पूरा करना ही पड़ेगा, चाहे इसमें उन्हें अपनी सम्पूर्ण शक्ति क्यों न झोंक देनी पड़े
चिंतन चरित्र तथा व्यवहार बुरी तरह गड़बड़ा गया है और उसकी स्थिति विक्षिप्तता ग्रस्तों की तरह हो गई है। इसी कारण ऐसे ऊटपटाँग काम होने लगे है जिनसे अपने व दूसरों के लिए विपत्ति ही चारों ओर छायी दीख पड़ती है। पगलाए व्यक्ति द्वारा की गयी तोड़ फोड़ की मरम्मत तो होना चाहिए पर साथ ही उस उन्माद की रोकथाम भी वैसी ही उद्दण्डता करते रहने की आदत अपना ली हैं।
चिंतन-समर्पण स्नेह अपनापन सिखाया।
चिंतन हेतु प्रेरित करती है। बालक सिद्धार्थ का मन भी ऐसी ही विविध समस्याओं की तरंगों से आन्दोलित हुआ था? कालक्रम के प्रवाह में बहिर्मुखी हो जाने के कारण युवराज कुछ सम्मोहित भले ही हो गये हों, पर मानस सागर की जिज्ञासा एक तरंग-प्रचंड लहरों में बदलती चली गई। इनके समाधान हेतु उनने अंतराल में प्रविष्ट हो अन्वेषण प्रक्रिया की शुरुआत की और बोधि का सारभूत फल प्राप्त किया, जिसके प्रभाव से लहराता गरजता, उफनता मनस्-लहराता गरजता, उफनता मनस्-सागर उद्वेलित स्थिति से प्रशांत स्थिति में पहुँच गया अनेकों को शांति पहुँचाने में सफल हुआ।
चिंतन के एक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ योग दर्शन के रूप में जाना जाता है।
चिंतन चेतना के उदात्तीकरण के साथ यह सामूहिक प्रयोग जप उपासना दीपयज्ञों अनुष्ठानों आदि रूप में सम्पन्न किये जाते रहेंगे एवं देखते देखते सारा वातावरण गायत्रीमय विवेक श्रद्धा से परिपूरित होता देखा जा सकेगा। गायत्री महामंत्र की प्रेरणा सभी को समान रूप से अनुष्ठान के पूर्व के आगामी सात माहों में यह भी प्रयोग किया जा रहा है कि इसके विभिन्न भाषाओं में अनुवादों का मंत्र व भावार्थ का सीमित ही सही बड़े व्यापक पैमाने पर लेखन का क्रम चल पड़े जो मंत्र जप सके वे जपे किन्तु जो लिख सके वे पाँच ही सही पर अपनी अपनी भाषा में उसी भावचेतना से अनुप्राणित हो मंत्र? के भावार्थ का भी लेखन करें। वे उर्दू गुरु अंग्रेजी तमिल तेलगू असमी बंगाली कन्नड़ मलयालम मलयाली गुजराती किसी भी भाषा में हो सकता है बच्चों से लेकर बूढ़ों तक इस अभियान में सम्मिलित हो प्रसुप्त संस्कारों को जगाने की प्रक्रिया को साकार कर सकते है यह प्रयोग सारे भारत व विश्व में एक साथ चल पड़े तो देखते देखते वातावरण के बदलने युग शक्ति के व्यापक होने की सुखद कल्पना सहज की जा सकती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-January
चिंतन में उत्कृष्टता और समाज में श्रेष्ठता न आ सके। व्यष्टि से ही समष्टि का निर्माण होता है। मिट्टी यदि अच्छी हो, और मूर्तिकार योग्य, तो उससे बनने वाली प्रतिमा की प्रशंसा हुए बिना नहीं रहती। मिट्टी यदि समाज का प्रतिनिधित्व करे और मूर्तिकार को समाज की इकाई माना जाय, तो दोनों के संयोग से जिस दुनिया की रचना होगी, वह प्रतिमा जैसी सुँदर और श्रेष्ठ होगी। हम भावना को परिष्कृत करें, विचारणा और क्रिया स्वयं परिमार्जित होती चलेंगी।
चिंतन क्षेत्र में व्यापक श्रेष्ठता के तत्वों की प्रतिष्ठापना के अभ्यास के साथ-साथ क्रिया द्वारा उसकी विस्तृत अभिव्यक्ति का गंभीर प्रयास करते रहना होगा।
चिंतन में स्वयं को नियोजित कर उन उत्तरदायित्वों को निभाने के लिए स्वयं को तत्पर किया जाय, जिनसे युग परिवर्तन का उपक्रम पूरा संपन्न हुआ माना जा सके।
चिंतन करें।” उदाहरण के लिए धन के अभाव को दूर करने के लिए यह नहीं कहना चाहिए कि हे ईश्वर! मैं अत्यंत संकट में हूँ, उसे दूर करो, वरन् मानस नेत्रों से अपने प्रभु के सर्व समर्थ, शक्तिशाली और महान ऐश्वर्यों के रूप को निहारना चाहिए और भावना करनी चाहिए कि उनके उत्तराधिकारी और ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते इन ऐश्वर्यों पर हमारा स्वाभाविक अधिकार है अतः इस अधिकार को मान्यता देते हुए भगवान स्वयं हमारे रिक्त स्थान की-अभाव की पूर्ति कर रहे हैं, हमारे भंडारों को भर रहे हैं और हम भी ऐश्वर्यशाली बन रहे हैं। इस शुभ भावना के शक्ति का प्रवाह हमारी ओर परिवर्तित होगा, यह सुनिश्चित है।
चिंतन, स्मृति के रूप में मानसिक संयम अपनाना पड़ता है। इसके उपराँत उस भूमिका में पहुँच सकना संभव है, जिसमें ब्रह्म-प्राप्ति शक्य हो सके। इतना सब संपन्न कर लेने के पश्चात् ही कोई ब्रह्मचारी कहलाने का वास्तविक अधिकारी बन सकता है, इससे कम में नहीं। इस मर्म को नहीं समझ पाने के कारण ही लोग शब्दों के जाल में उलझ कर भटक जाते और यथार्थ से वंचित रह जाते हैं।
चिंतन में हमारा मन रस लेता है, क्या हमें इन्द्रियजन्य वासनाओं से मोह है, क्या हम उस परमसत्ता के हमारे बीच होते हुए भी भयभीत हैं? यदि इस प्रश्न का उत्तर हाँ है तो हमें अपने सुधार में जुट जाना चाहिए। वस्तुतः अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिस दिन हमें अपने ऊपर के प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलने लगेगा, उस दिन से हम संसार के सबसे सुखी व्यक्ति बन जायेंगे।
चिंतन उपासना को प्रभावशाली और फलवती बनाता है। उनसे उत्पन्न हुई धनात्मक शक्ति व्यक्ति के आत्मविश्वास, आत्मगौरव और आत्मबल को बढ़ाती है। इसके साथ यदि गायत्री महामंत्र का जप एवं सविता देवता का ध्यान जुड़ जाय तो अनेकानेक आधि-व्याधियों से सहज ही मुक्ति मिल सकती है।
चिंतन की उत्कृष्टता आधारभूत मानी गई है। आधार यदि कमजोर हो तो मजबूत लगने वाली संरचना भी देखते-देखते धराशायी हो जाती है। इस दृष्टि से जीवन में क्रिया-कलाप की महत्ता और उपयोगिता तो है, पर उसकी केन्द्रीय धुरी में क्रियाशील चिंतन की उपेक्षा नहीं की जा सकती। चिंतन का अच्छा और बुरा प्रवाह ही क्रिया और व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।
चिंतन की उपेक्षा नहीं की जा सकती। चिंतन का अच्छा और बुरा प्रवाह ही क्रिया और व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।
चिंतन का अच्छा और बुरा प्रवाह ही क्रिया और व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।
चिंतन क्षेत्र में गहरी दबी होने के कारण अगोचर होती हैं। दीख पड़ने वाला कार्य तने और टहनियों जैसा है। इसके परिणाम ही वह फल-फूल हैं, जो उद्देश्यों का स्वरूप अभिव्यक्त करते हैं।
चिंतन नहीं हो सकता। वह तो समय के साथ परिवर्तन की अपेक्षा करता है। धर्म की कसौटी की उपरोक्त दो बातें स्वामी रामतीर्थ ने बतायी हैं। स्वामी जी का यहाँ धर्म से अभिप्राय मानव धर्म ही है।
चिंतन और चरित्र को ऊँचा उठाये, उसे आत्म गौरव की अनुभूति के साथ-साथ सज्जनता-शालीनता के व्यवहार में उतारने का साहस प्रदान करे। आधुनिक चिंतकों ने इसके लिए भिन्न-भिन्न उपाय सुझाए हैं। नीत्से ने इस हेतु व्यक्तिवाद का दर्शन प्रस्तुत किया, तो मार्क्स ने समाजवाद की वकालत की। एक व्यक्ति को ही पूरी तरह प्रधान मानकर चलता है, तो दूसरा सामाजिक प्रमुखता को सर्वोपरि स्वीकारता है, पर देखा जाय तो उक्त दोनों ही प्रकार के दर्शन अधूरे और अव्यावहारिक हैं। व्यावहारिकता की कसौटी दोनों को समान रूप से असफल सिद्ध करती है।
चिंतन-प्रणाली, जिसे अपना सकने पर जीवन चेतना-परमात्म चेतना की ऊँचाइयों को छूने लगती है। इसे उन्हीं के भावों में कहें तो “आत्म विकास की ओर अभिमुख गतिविधियों, क्रिया प्रणालियाँ अनेकों स्थानों पर प्रचलित हैं। अलग-अलग पथ अपने दायरे के अनुरूप इनका विशिष्ट स्वरूप घोषित करते हैं। सभी का अपना महत्व भी है, पर समग्रता की दृष्टि से विवेचन-विश्लेषण करने पर इनमें से ज्यादातर को प्रायः एकाँगी मानना पड़ता है। समूची मानव प्रकृति को रूपांतरित कर सके, जिंदगी के हर हिस्से को दिव्यता से भरा-पूरा कर सके, ऐसी प्रणाली ढूँढ़ने पर शायद ही एक-आध मिले।
चिंतन ही निमित्त कारण होता है।
चिंतन पर छायी अवसाद भरी मानसिकता, समय के साथ न चलकर चिरपुरातन बहिरंगी कर्मकाँडी स्वरूप तक सीमित रह कुछ आगे का न सोच पाने की दीर्घसूत्रता यह कह रही है कि अब पूर्णाहुति तक के शेष दस माहों का यह बहुमूल्य समय गँवाया न जाय। सक्रियता का अनुपात व स्तर बढ़ाया जाय तथा बदलते समय के अनुकूल प्रगतिशील चिंतन में स्वयं को नियोजित कर उन उत्तरदायित्वों को निभाने के लिए स्वयं को तत्पर किया जाय, जिनसे युग परिवर्तन का उपक्रम पूरा संपन्न हुआ माना जा सके।
चिंतन अलग-अलग। जिसकी जैसी भावना होती है, वह वैसा ही प्रतिरूप बाहर देखता है।
चिंतन-मनन करना होता है। विचार परिष्कार एवं भाव-साधना से ही उत्कर्ष होता है। यंत्र के बीच में बिंदु होता है, जो गतिशीलता का, प्रतीक है। शरीर और ब्रह्माण्ड का प्रत्येक परमाणु अपनी धुरी पर तीव्रतम गति से सतत् चक्कर काट रहा हैं यह सर्वव्यापक है। अतः हमें भी उन्नति के मार्ग पर संतुष्ट नहीं रहना है, वरन् हर क्षण आगे बढ़ने के लिए तत्पर और गतिशील रहना है, तभी शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा गतिशील हो सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-November
चिंतन सर संधान ज्ञान से ही तम हारा है। स्वयं भगवान हमारे गुरु, परम सौभाग्य हमारा है॥
चिंतन को करें निरस्त, मनुज का कष्ट निवारण करें॥
चिंतन से, अनुचित गति-विधियों से पीछे हटने का परामर्श दिया जाता है। वे भी इतने भले कहाँ होते हैं कि भ्रांतियों के विपरीत जो श्रेयस्कर अनुरोध किया जा रहा है, उसे सहज स्वीकार कर लें। पूर्वाग्रहों से जकड़ी मान्यताएँ और आदतें, वह कुछ भी सुनना-स्वीकारना नहीं चाहती, जो अभ्यास में गहराई तक घुसकर बैठ गया है। परामर्श कितना ही तथ्यपूर्ण क्यों न हो, पर नशेबाज के गले वह शिक्षा कहाँ उतरती है कि इस आत्मघाती कुटेव से विरत होने में ही भलाई है। वह परामर्शदाता से तर्क से जीत सकने की संभावना देखते हुए कभी-कभी हाँ-हाँ भी कर देता है।
चिंतन के एकाकी प्रयत्न से भी सम्भव हो सकता है, पर अधिक सरल और व्यवहारिक यह है कि गायत्री चर्चा के संदर्भ में चलने वाले सत्संगों में उत्साहपूर्वक नियमित रूप से सम्मिलित होते रहा जाय।
चिंतन और आचरण आड़े न आने लगा हो। भावनाओं की पवित्रता तो ऐसे प्रसंगों में अक्षुण्ण रहनी ही चाहिए, पर साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिए कि तरुण और तरुणियों की घनिष्ठता, निकटता और असाधारण सहकारिता भी साधारण जनों की आँखों में खटकती हैं। उतने भर से आशंकाओं का ऐसा बवण्डर बन पड़ता है, जो बदनामी के स्तर तक पहुँचा देता है। ऐसी दशा में न केवल संबंधित व्यक्तियों को, वरन् उस लक्ष्य को भी भारी क्षति पहुँचती है, जिसके लिए एकत्रित हुआ गया था और मिल-जुलकर काम करने में कुछ अनुचित नहीं माना गया था।
चिंतन से लोगों को छुड़ायें और कुमार्ग पर चलने से लौटाने का प्रयास करें। यह कार्य प्रत्यक्षतः झंझट भरा है। तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपने प्रतिवेदन का औचित्य तो अकाट्य सिद्ध किये किया जा सकता है। पर उस हठवादिता के लिए क्या किया जाए, जो आम आदमी पर विशेषतया अनगढ़ वर्ग पर पूरी तरह सवार रहती देखी जाती है। ऐसी दशा में उपदेष्टाओं का परामर्श भी अरण्य-रोदन बनकर रह जाता है।
चिंतन और दुष्ट आचरण अपनाने पर भौतिक समृद्धि से अपना ही गला कटता है। अपनी ही माचिस से आत्मदाह जैसा उपक्रम बनता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-July
चिंतन का अपनी श्रद्धा के अभिवर्धन का पर्व है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-December
चिंतन को सीमाबद्ध बनाता है, तो वास्तविकता के सन्दर्भ में उसकी भी स्थिति मेढ़कों जैसी हो जाती है। फिर जो सामने और प्रत्यक्ष है, उसी को सर्वोपरि सत्य मानने की भूल करने लगता है। वस्तुस्थिति का भान तो तभी हो पाता है, जब मस्तिष्क को खुला और दृष्टिकोण को व्यापक रखा जाता है। तभी यह ज्ञात हो पाता है कि सच्चाई के सम्बन्ध में अपनी जो मान्यता थी, वह कितनी एकांगी, अपूर्ण और भ्रामक थी। यह सम्भव है कि किसी परिस्थिति, वातावरण, देश व काल विशेष में कोई अवधारणा सच जैसी प्रतीत हो सकती है, पर सर्वोपरि और सनातन सत्य यही है, ऐसा नहीं कहा जा सकता।
चिंतन और चरित्र की दिशा धारा निर्धारित करती हैं। कौन कैसे जिया है तथा किसे कैसी परिस्थितियों में रहना पड़ रहा है। इसका कारण उसके अन्तः कारण का स्तर ही है। भाग्य और भविष्य वस्तुतः कहीं लिखा जाता है तो वह अन्तःकरण के मर्मस्थल में ही लिखा होता है।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार उत्कृष्टता की कसौटी पर खरा सिद्ध कर सकेंगे या नहीं? बीच में कोई पक्ष अनुत्तीर्ण होता है तो उसके लिए यह छूट रहनी चाहिए कि वापस जाने या भेजने का उपाय अपना लिया जाय। जीवनदान बड़ी बात है। यदि वह दूसरों के सम्मुख आदर्श प्रस्तुत कर सकने की स्थिति में बना रह सकता हो तो उस अनुदान का गौरव है। अन्यथा मिथ्या वचन देने और उसे वापस लौटाने में किसी का भी गौरव नहीं है।
चिंतन-चरित्र व्यवहार में उत्कृष्टता समाविष्ट करने के रूप में भाव सम्वेदना जगाने अज्ञान दूर करने के लिए ही वह पुकार उठ रही है। उपरोक्त कार्य व्यक्ति और परिवार का राष्ट्र के हितों पर उत्सर्ग के बिना पूरा नहीं हो सकेगा।
चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार के दृष्टिकोण से समाज के हर नागरिक को उत्कृष्ट बनाने के लिए प्रयास किया गया या नहीं, यही एकमात्र कसौटी है। इसी का छोटा रूप प्राचीन काल में ग्राम संघ अथवा पंचायत के रूप में जीवित था जिसमें लोगों के बीच इतनी घनिष्ठता का सम्बन्ध होता था कि सम्पूर्ण पंचायत ही परिवार कहलाता था एवं एंघ्झा पंचायत के लिए अपने पारिवारिक स्वार्थ की बलि चढ़ाने के लिए सदा तत्पर रहना जीवन की सर्वप्रथम आवश्यकता थी। अगला विशालीकरण है राष्ट्रगत आत्मा के रूप में राष्ट्र का विकास एक ऐसी प्रगति है जो आधुनिक अवस्था में मानवता के लिए अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि मनुष्य परिवार, तथा वर्ग के स्वार्थ को यह समूची जगती अब विशालतर राष्ट्रीय आत्मा में अपने आपको विलुप्त करना चाहती है जिससे कि मानव जाति में भाव स्वरूप का विकास हो सके। इससे भी अधिक ऊँची एक पूर्णता है जिसके लिए कुछ ही व्यक्तियों ने अपने को तैयार दिखलाया है-वह है सारी मानवता को अपने अन्तर्गत कर लेने के लिए आत्मा का विस्तार। इस अवस्था में ही “वसुधैव कुटुम्बकम्” की सूक्ति चरितार्थ होती है।
चिंतन नहीं स्वेच्छाचार पर प्रतिबन्ध समझा जाता है। आर्थिक समस्याएँ श्रमशीलता का अभाव, अपव्ययी प्रवृत्ति नहीं पूँजी का असमान वितरण बताया जाता है। आस्तिकता आध्यात्मिकता का तत्व दर्शन हृदयंगम कराया जा सके तो अपराधों की रोकथाम हो सकती है पर इस सत्य की अपेक्षा कर समाधान पुलिस थानों, कचहरी और अदालतों में ढूँढ़ा जाता हैं राजा सत्ता को सुधार की जादुई छड़ी मानकर उस पर आधिपत्य करने के लिए महत्त्वाकाँक्षी लोग लालायित है, पर यह कोई नहीं सोचता कि धर्मतन्त्र को परिष्कृत करके उसके सहारे आस्थाओं का संकट और प्रस्तुत समस्याओं का निवारण निराकरण किया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-September
चिंतन-बीज है और कृत्य उसका फल। विचार भी एक काम है, उसका परिणाम भी होता है। गंदे विचारों करते रहिये फिर देखिये आपका पतन कैसे होता है, दिमाग कैसे खराब होता है। हेमाद्रि संकल्प इस बात को बताता है कि हमारे जीवन में जो निषेधात्मक पक्ष है-उसको ठीक करें, धोये, लोहा ले, लड़ें, बराबर अपने आपसे। लड़ाई में कमजोरी को जाहिर शक्तियाँ हावी हो जायेंगी।
चिंतन एवं एक सुनिश्चित लक्ष्य पूज्यवर हमारे समक्ष रख गए हैं। गुरु सत्ता ने प्रज्वलित संवेदनशीलों, प्राणवान, प्रतिभावानों की लक्ष्य संख्या एक से दो करोड़ निर्धारित की है। निश्चित ही गुरुसत्ता का भविष्य-कथन मात्र पदार्थ यज्ञ नहीं, विभूति यज्ञ की ओर इंगित करता है। जिसका हवाला प्रारंभ में दिया गया था।
चिंतन, दृष्टिकोण जब विकृत हो जाता है तो हमारा शरीर, दिमाग बगावत कर देता है। हमारे कम्प्यूटर ने हमारे विरुद्ध झंडा खड़ा कर दिया कि आपको सोने नहीं देंगे, चैन से रहने नहीं देंगे। चिंताओं, निराशाओं से दिमाग हैरान हो जाता है। बेटे। हमारे जीवन में नर्क भी है और स्वर्ग भी, बन्धन भी हैं और मुक्ति भी।
चिंतन एवं द्रष्टा स्तर की शक्ति ही थी वे लिखते हैं कि “दूसरे सैनिकों ने अपनी वर्दियाँ उतार दीं और राजमुकुट पहन लिए, पर अपने लिए आजीवन उस चिंतन-लक्ष्य की ओर चलते रहना ही धर्म बन गया है, जिसके ऊपर राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता निर्भर है। हमार विश्वास है कि बौद्धिक क्राँति की त्रिवेणी बहाए बिना तीर्थराज न बनेगा और उसमें स्नान किए बिना हमारे पाप ताप न कटेंगे। जन जागरण और लोकमानस में उत्कृष्टता आदर्शवादिता का बीजांकुर बोया जाना वस्तुतः इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण का अभिनव प्रयोग हैं हम इसी दूरगामी परिणाम वाली प्रक्रिया को हाथ में लेकर धर्म, साहस, निश्चय और प्रबल पुरुषार्थ के सहारे आगे बढ़ रहे हैं।
चिंतन-लक्ष्य की ओर चलते रहना ही धर्म बन गया है, जिसके ऊपर राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता निर्भर है। हमार विश्वास है कि बौद्धिक क्राँति की त्रिवेणी बहाए बिना तीर्थराज न बनेगा और उसमें स्नान किए बिना हमारे पाप ताप न कटेंगे। जन जागरण और लोकमानस में उत्कृष्टता आदर्शवादिता का बीजांकुर बोया जाना वस्तुतः इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण का अभिनव प्रयोग हैं हम इसी दूरगामी परिणाम वाली प्रक्रिया को हाथ में लेकर धर्म, साहस, निश्चय और प्रबल पुरुषार्थ के सहारे आगे बढ़ रहे हैं।
चिंतन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। परिष्कृत अध्यात्म-तंत्र का पुनर्जीवन एवं उससे राजतंत्र की मूल धुरी जनमानस का भावनात्मक परिष्कार विचारक्रांति एवं ज्ञानयज्ञ के द्वारा किया जाने वाला पुरुषार्थ ही हम सबको संपन्न करना है। इस दिशा में जितनी जागरूकता हम जनमानस में पैदा कर सकेंगे उतना ही लोकतंत्र सशक्त व प्रभावी तक राष्ट्र प्रगति की दिशा में अग्रसर होगा। यह एक लंबा संग्राम है एवं संभवतया आगामी दो या तीन वर्श तक चलने वाला विशेषतः संक्रमण-काल की इस विशेष अवधि में यदि हम पूज्यवर की विचार-चेतना पर पक्का विश्वास शताब्दी के इस अंतिम चुनाव महोत्सव को जागरूकता समझदारी एवं देशभक्ति का पर्व मानते हुए सही प्रतिनिधि चुनने की आवश्यकता जन जन को समझाएँ तो निश्चित ही बदल-दल समझा जाने वाला यह सशक्त तंत्र भी परिष्कृत हो स्थायित्व देने की स्थित में आ सकेगा।
चिंतन अलग होता है। देवता और इंसान की शक्ल में तो फर्क नहीं होता, पर दृष्टिकोण में जमीन-आसमान का फर्क होता है। आप इस बात को लिए अगर सबूत पेश करें कि हमको देवता बनना चाहिए, तो देवताओं के अन्दर जो विशेषताएँ होती है, देवताओं को जो सम्मान मिलता है, देवताओं को जो सम्मान मिलता है, देवताओं में जो सामर्थ्य होती है-देवता अपने आप में हँसते-हँसाते रहते है। देवता अपनी सुगन्धि से वातावरण को न जाने क्या से क्या बना सकते हैं। वह दूसरा दर्जा आप पा सकते है इसी जिन्दगी में।
चिंतन का निचोड़ इन शब्दों में व्यक्त कर हमारा समाधान कर देते है। भौतिक सुधार करना राजतंत्र का क्षेत्र हैं भावनात्मक सुधार के लिए प्रजातंत्र के वातावरण में केवल धर्मतंत्र ही समर्थ हो सकता हैं धर्म और अध्यात्म को हमने मानवजाति की समग्र प्रगति के लिए नियोजित किया है। धर्ममंच अब तक प्रतिगामियों का दुर्ग समझा जाता रहा है, हमने उसे नई दिशा दी हैं अस्सी प्रतिशत देहातों में बसे एवं सत्तर फीसदी अशिक्षित देश में अपनी सुधारात्मक प्रक्रिया आँधी तूफान की तरह इसलिए सफल होती चली जा रही है कि हमने धर्म प्रथाओं एवं कलेवरों के बाह्य स्वरूप में हेर फेर किए बिना उनके मूल प्रयोजन में क्राँतिकारी परिवर्तन कर दिया हैं हम स्वस्थ राजनीति के विकसित हो सकने की संभावना वाला भवन बनाने में नींव के पत्थर मात्र बनकर रहेंगे और जो भी हमारे प्रभाव संपर्क में आएगा उसे इसी दिशा में प्रेरित आकर्षित करते रहेंगे।
चिंतन और विचारों की दृष्टि से हैवान होता है, नरपशु होता है। नरपशु किसे कहते हैं? जिनका कि शरीर तो इंसान का होता है, पर दिल-दिमाग हैवान का होता है। उसका नाम नरपशु है। नरकीटक और नरपिशाच आप ने सुने होंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-February
चिंतन न जाने किधर को बखेरते फिरते हैं, कहाँ से मारे कहाँ चलते रहते हैं, हम सोचते ही नहीं, अपने जीवन के बारे में कि हमारा जीवन हम काहे के लिए पैदा हुए थे और किस तरीके से इसका श्रेष्ठतम उपयोग हो सकता है। यदि गहराई से विचारें तो एक-एक क्षण इतना मूल्यवान है कि करोड़ों की संपत्ति एक क्षण के ऊपर फेंकी जा सकती है। यदि इजहार करें तो इतना मूल्यवान यह समय है, समय यदि निकल गया तो पछताते रह जायेंगे अभी लड़कियाँ गाना गा रहीं थीं-”साधना सिर पटकती रहे जिंदगी भर, सिद्धि ऐसी कभी भी नहीं पाएगी।”
चिंतन को दुष्प्रवृत्तियाँ आक्राँत न कर दें, इसीलिए मैं भी सन्नद्ध रहता हूँ।” प्रहरी कोई उत्तर दे इससे पूर्व ही पीछे खड़े सम्राट ने आगे बढ़कर उसे बाहों में भर लिया। उन्होंने भाव-विभोर होते हुए कहा-”तात! मुझे जिसकी तलाश थी, वह मिल गया। आज से तुम मेरे राजकवि हो राजकवि तुलसीदास।”
चिंतन में चली गई कि मैंने सब कुछ खाया एक साल में और खिलाया भी, और इन्होंने कि तरीके से एक साल निकाला यहाँ। तो बेटी। जब से उन्होंने होश संभाला होगा, उनका जिह्वा पर इतना कन्ट्रोल है, तभी उनकी सरस्वती है आज सरस्वती का जन्म भी है, कला के भी पुजारी हैं तो उनकी जबान पर सरस्वती है जो कह देते हैं, पूरी हो जाती है? आखिर कैसे हो जाती है और क्यों हो जाती है? मैं आपको सुना रही हूँ कि इसलिए हो जाती है कि अपनी जीभ को ऐसे कस रखा है जैसे जम्बू से कस लेते हैं, उतना उनको पर नियंत्रण है, तपस्या पर उनको विश्वास है, गुरु के प्रति आस्था है और श्रद्धा है, जो उनको मिला है उपहार में।
चिंतन की एक नयी दिशा सदैव मिलती रहती है। विचार कार्य और लक्ष्य का, अद्वैत सार्थकता के नए क्षितिज का, उद्घाटन का जीवन के सात्विक एवं तात्विक मूल्य का, सृजन करता है। इसकी शक्ति, साधन एवं प्रेरणा की स्रोत वंदनीय माताजी हैं। जिनके चरणों में हमारे श्रद्धा सुमन सदैव अर्पित होते रहेंगे।
चिंतन, मनन, एवं कार्य प्रणाली मेरी राय में शायद ही कोई अन्य कर रहा हो। राजनीतिज्ञों एवं देश के कर्णधारों को उनका मार्गदर्शन लेना चाहिए। मैं जीवन को कृतार्थ समझूँगा। यदि उनके मार्गदर्शन के अनुसार कुछ कर सकूँ।
चिंतन तथा कर्तृत्व से भाव भरे रसास्वादन का आनंद प्रदान करे।’ विवेक और श्रद्धा का जहाँ जितना सम्मिश्रण होता है, वहाँ उतनी ही महानता दृष्टिगोचर होती है। उसी उपलब्धि के सहारे सामान्य परिस्थितियों में जन्मे, पले व्यक्ति भी ऐतिहासिक महामानवों की भूमिका निभाते और विश्व निर्माण में ऐतिहासिक भूमिका निभाते चले जाते हैं।
चिंतन की प्राण ज्योति ले, ज्योति अखंड जलाई॥ युग प्रवाह को पलट सके, वह व्यापक क्राँति मचाई।
चिंतन मिला। उनका ममत्व मेरे जिंदगी की सबसे बड़ी निधि बनी रहेगी।
चिंतन एवं सामाजिक सेवा का अभूतपूर्व संगम यहाँ पर है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-August
चिंतन, धन एवं प्रतिभा के रूप में उपलब्ध क्षमताओं का महत्व समझें और उनके सदुपयोग से प्रगति-पथ पर अग्रसर होने की बात सोचें। इन विभूतियों का एक कण भी बर्बाद न होने दें। अपव्यय अपने ही उज्ज्वल भविष्य का विनाश है।
चिंतन कर लाखों को उद्वेलित अनुप्रमाणित कर श्रेष्ठ राह पर चलने योग्य बना दिया है, वह सब कुछ इस संग्रह में है। वाङ्मय का प्रारूप जब सबके समक्ष आएगा तब ही वास्तविक मूल्याँकन सभी कर सकेंगे किंतु अभी तो यह निश्चित ही कहा जा सकता है कि यह ‘न भूतो, न भविष्यति’ की उपमा वाला एक ऐसा संकलन है, जिससे वंचित रहने वाला हाथ ही मलता रह जाएगा।
चिंतन-नवनीत के रूप में प्रकाशित वह निधि है जो प्रत्येक के लिए मार्गदर्शिका के रूप विद्यमान है। रामचरितमानस से प्रगतिशील प्रेरणा से लेकर प्रज्ञापुराण रूपी 19 वें पुराण के अठारह खण्डों का निर्माण कर उनने वह साहित्य निधि समाज को दी जो जीवन के कायाकल्प का माध्यम बन गयी। सामाजिक जीवन में छाई कुरीतियों-मूढ़-मान्यताओं से कैसे मोर्चा लिया जाय, अंधविश्वासों को मिटाकर कैसे भव्य समाज की अभिनव संरचना हो, राष्ट्र एक व अखण्ड कैसे बने, यह मार्गदर्शन भी पत्रिका व पुस्तकों के माध्यम से युगऋषि ने सतत् किया। संस्कार परम्परा का उनने पुनर्जागरण किया व षोडश संस्कारों को लोक प्रचलित कर धर्मतन्त्र से लोक शिखर का एक सशक्त माध्यम खड़ा कर भारतीय संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने, इसे विश्व संस्कृति बनने के सारे आधार खड़े कर दिए।
चिंतन, चरित्र, स्वभाव पर आधारित व्यक्तित्व का पड़ता है। इस प्राथमिक आवश्यकता की पूर्ति प्रज्ञा अभियान के हर सदस्य-युग शिल्पी को पूरी करनी चाहिए-इस संदर्भ में मोटी में मोटी मर्यादाएँ यह हैं-
चिंतन-
चिंतन का दमन करेंगे, जीवन भर जन-सेवा में हम गुरुवार का अनुगमन करेंगे,
चिंतन- नितान्त मौलिक चिन्तन पूज्यवर ने ही पहली बार जन-जन के समक्ष प्रस्तुत किया। प्रामाणिक आँकड़ों के माध्यम से साधना विज्ञान का विज्ञान सम्मत प्रस्तुतीकरण से लेकर सर्वधर्म संभव, यज्ञ विज्ञान व यज्ञोपैथी, मनोविकारों का आध्यात्मिक उपचार, मरणोत्तर जीवन व मानवी काया से लेकर सृष्टि-ब्रह्माण्ड की विलक्षण गुत्थियों को उनने अपने साहित्य के द्वारा जनसमुदाय के समक्ष रखा। व्यक्ति परिवार और समाज निर्माण के आधारभूत सिद्धान्त क्या हों, कैसे दाम्पत्य जीवन को शुचिता पूर्ण तथा परिवार संस्था को अटूट गरिमामय बनाया जा सकता है, नारी का उत्थान कैसे सम्भव है यह युग ऋषि के चिंतन-नवनीत के रूप में प्रकाशित वह निधि है जो प्रत्येक के लिए मार्गदर्शिका के रूप विद्यमान है। रामचरितमानस से प्रगतिशील प्रेरणा से लेकर प्रज्ञापुराण रूपी 19 वें पुराण के अठारह खण्डों का निर्माण कर उनने वह साहित्य निधि समाज को दी जो जीवन के कायाकल्प का माध्यम बन गयी। सामाजिक जीवन में छाई कुरीतियों-मूढ़-मान्यताओं से कैसे मोर्चा लिया जाय, अंधविश्वासों को मिटाकर कैसे भव्य समाज की अभिनव संरचना हो, राष्ट्र एक व अखण्ड कैसे बने, यह मार्गदर्शन भी पत्रिका व पुस्तकों के माध्यम से युगऋषि ने सतत् किया।
चिंतन काफी समय से चल रहा था। पूज्यवर ने महाप्रयाण से पूर्व संकेत दिया कि युगसंधि महापुरश्चरण की पूर्णाहुति के आने तक उनका समग्र साहित्य क्रमबद्ध, विषय बद्ध, रूप में जन-जन तक पहुँचे, इसका प्रयास उनके उत्तराधिकारियों द्वारा किया जाय। इस साहित्य में यह ही नहीं जो उनने लिखा बल्कि जो उनने अगणित उद्बोधन वक्ताओं के रूप में समय समय पर अमृतवाणी के रूप में अभिव्यक्त किया, वह भी सम्मिलित किया जाना था। अंततः एक विशाल स्तर के पं. श्री राम शर्मा आचार्य वाङ्मय की योजना बनी एवं सारा साहित्य प्रारंभ से लेकर अब तक का संकलन करने की रूपरेखा बनाई गयी। इसमें वह सब भी देने का विचार किया गया जो शक्तियों आदर्शवादियों-प्रेरणाप्रद निर्देशों के रूप में वे समय-समय पर लिखते या अभिव्यक्त करते रहे।
चिंतन है मोड़ा,
चिंतन मनन में मन को लगायें। कुविचार आते ही उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनसे लड़ने के लिए खड़ी कर दें। नित्य हिसाब रखें किंतु सत्प्रयोजनों में, कृपणता भी न बरतें। संग्रही न बनें पर आमदनी से खर्च कम रखें, कुछ बचत रखें, उधार लेने की आदत न डाले। अपने प्रभाव का ऐसा उपयोग करें जिससे सम्पर्क क्षेत्र की दुष्प्रवृत्तियाँ घटे और सत्प्रवृत्तियों का बीजारोपण और परिपोषण उभरे।
चिंतन चेतना का है, हर किसी के लिए प्राणों से भी बढ़कर निधि हैं। जो भी कुछ साहित्य पूज्यवर ने अवधि लिखा है, जो भी कुछ उनने कहा है अथवा जो भी कुछ उनने चिंतन कर लाखों को उद्वेलित अनुप्रमाणित कर श्रेष्ठ राह पर चलने योग्य बना दिया है, वह सब कुछ इस संग्रह में है। वाङ्मय का प्रारूप जब सबके समक्ष आएगा तब ही वास्तविक मूल्याँकन सभी कर सकेंगे किंतु अभी तो यह निश्चित ही कहा जा सकता है कि यह ‘न भूतो, न भविष्यति’ की उपमा वाला एक ऐसा संकलन है, जिससे वंचित रहने वाला हाथ ही मलता रह जाएगा।
चिंतन, चरित्र और प्रयास में आदर्शवादिता घुली रहने पर ही उपलब्ध होती है। आत्म विजेता को विश्व विजेता की उपमा अकारण ही नहीं दी गयी है। दूसरों को उबारने-उछालने दिशा देने और कुछ से कुछ ढाल देने की क्षमता मात्र इन्हीं लोगों में होती है। सेवा
चिंतन को मनःस्थिति को परिष्कृत कर उन्हें आमूलचूल बदलने के लिए धरती पर अवतरित हुई है व ज्ञान गंगा को इस तरह लाने का भागीरथी पुरुषार्थ करने का श्रेय जाता है उस सत्ता को जिसने आँवलखेड़ा गाँव में जन्म लेकर लघु से विराट बन एक विश्वव्यापी गायत्री परिवार की स्थापना कर डाली, लाखों सद्गृहस्थ पैदा कर दिए व संस्कारों के बीजारोपण की प्रक्रिया आरम्भ करवा दी।
चिंतन और व्यवहार में पारिवारिकता के सिद्धान्तों का अधिकाधिक समावेश करे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-October
चिंतन के रूप में होता है। अपनी उत्पत्ति काल में वह सूक्ष्म होता है पर बाहर आते-आते वह स्थूल बन जाता है। जो सूक्ष्म है वह हमारे लिये अश्रव्य है। जो स्थूल है वही सुनाई पड़ता है। ध्वनि विज्ञान ने ध्वनियों को दो रूपों में विभक्त किया है-श्रव्य और अश्रव्य।
चिंतन, मनोयोग एवं श्रम कितनी अधिक ऊँची भूमिका निभा सका? कितनी बड़ी छलाँग लगा सका? यही आपकी अग्नि परीक्षा है। इसी में आपका गौरव और समर्पण की सार्थकता है। अपने साथियों की श्रद्धा व क्षमता घटने न दें।
चिंतन करके विचारों का एक प्रतिरूप दिमाग में बना लिया जाय तो काम पूरा होकर ही रहता है। ‘माई लाइफ एण्ड फिलॉसफी में इस तथ्य का जिक्र करते हुए आइन्स्टीन का कहना है कि वह इसी प्रणाली के आधार पर स्वयं को प्रतिभाशाली बना सके थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-June
चिंतन करने वाला होगा। निर्बल मन का शंकाओं, संदेहों, विक्षेपों आदि के असद् तत्त्वों से भरा रहना स्वाभाविक है। जिसके मन की दशा दयनीय होगी वह श्रेष्ठता की साधना में सफल हो सकेगा। ऐसा नहीं माना जा सकता। जिसका मन निरोग, निर्विकार और निर्मल होगा उसका मन न केवल प्रसन्न ही रहेगा बल्कि प्रेम, सहानुभूति, दया, करुणा आदि की सद्भावनाओं से भरा भी रहेगा।
चिंतन। शरीर साथ नहीं देगा तो शरीर के साथ की बात युवावस्था में भी किसी के लिये निश्चित और अटल संभावना नहीं है। कब कोष्ठ रोग आ घेरे, कब कौन दुर्घटना हो जाय, कब प्राण पखेरू उड़ जाय इसका निश्चित पता ठिकाना युवावस्था और बाल्यकाल में भी कहाँ रहता है? लेकिन उस समय आशावादी और उज्ज्वल पक्षों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखने के कारण उत्साह बना रहता है। यह भी तथ्य है कि निराशा तथा अवसाद, युवावस्था में भी आक्रमण कर दें तो उस समय उत्साही से उत्साही युवक भी निरुत्साही और वार्धक्य के शिकार हो जाते हैं।
चिंतन, उच्च विचार, शांति और सुव्यवस्था आदि ऐसे गुण आते हैं जो किसी विषम परिस्थिति में मनुष्य के सहायक होते है। जो अच्छाई-बुराई-कर्तव्य अकर्तव्य, सत्य-असत्य पथ और विपथ में निर्णय कर सकने वाली बुद्धि चंचल, अशान्त और असंतुलित होगी, जिनमें इंद्रियों और मन पर शासन करने की योग्यता न होगी, ऐसे व्यक्ति श्रेष्ठता की दिशा में आवश्यक प्रगति कर सकने की आशा नहीं कर सकते। जिनकी बुद्धि योग्यता पूर्वक निर्णय दे सकती है, ऊहापोह में समय नष्ट करने से बचाये रख सकती है, इंद्रियों तथा मानसिक वृत्तियों पर शासन रखकर उन्हें कर्तव्य पर चला और अकर्तव्य से रोक सकती है, इन्हें किसी भी स्तर की श्रेष्ठता को प्राप्त कर सकने के लिये योग्य माना जा सकता है।
चिंतन-मनन के लिये शक्ति मिल सके।
चिंतन, चरित्र उनका भी आदर्शवादी नहीं है। धर्म–कलेवर के निमित्त जो कुछ भी अर्थ नियोजन किया जाता है, वह उससे थोड़ा ही कम हो सकता है जितना कि शासन को अपना ढाँचा खड़ा रखने में जुटाना पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-March
चिंतन के प्रवाह को उलट कर सीधा करना है, मन बिखराव को रोकना है और एकाग्रता में नियोजित करना है। इसके लिए चिंतन,मनन, स्वाध्याय, संयम, सेवा जैसी सुगम विधियाँ भी बताई गई है और मनोनिग्रह, ध्यान, धारणा, त्राटक प्राणायाम जैसी यौगिक क्रियाएँ भी। मनःस्थिति और परिस्थितियों के अनुरूप किसी का भी चयन किया जा सकता है। लक्ष्य मात्र एक ही होना चाहिए विचारों की शुचिता। यदि विचार सही व विधेयात्मक हुए तो व्यक्ति का निर्माण सही होता चला जाएगा।
चिंतन-मनन से लेकर और जप-तप एवं योगाभ्यास परक ध्यान-धारणा समाधि की समस्त प्रक्रियाओं का निर्धारण इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किये गये है। इस प्रकार अपूर्णता से पूर्णता की ओर जब कदम बढ़ चलते है, तब जीवन का वह स्वरूप बन जाता है जिसमें आत्मा भवबंधनों से मुक्त होकर नर नारायण बनने की ओर प्रगति यात्रा को अग्रगामी कर पाती है।
चिंतन में लगे रहते है जो स्थूल प्रयोग में आ चुके होते है। दृष्टिकोण बदलता है तो सारी चीजें बदली नजर आती है। दृष्टिकोण बदल जायेगा तो सर्वत्र आनंद ही बिखरा दिखाई देगा। कहावत भी है नजरें तेरी बदली तो नजारे बदल गये किश्ती ने मोड़ा रुख तो किनारे बदल गये। दृष्टिकोण बदलते ही वाल्मीकि का डाकू से संत बन जाना, कामुक राम बोला से संत तुलसी बन जाना अंगुली काटने वाले अंगुलिमाल से बौद्ध भिक्षु बन जाना, आम्रपाली वेश्या से भिक्षुणी बनकर बौद्ध धर्म का प्रचार करना, बैरिस्टर गाँधी से महात्मा गाँधी बापू बन जाना इस तथ्य के प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यदि दृष्टिकोण बदलने के लिए किसी एक स्फुल्लिंग का स्पर्श किसी माध्यम से हो जाय तो व्यक्ति का कायाकल्प हो जाता है।
चिंतन करें तो वह महाप्राण अनेक विचित्रताओं से संयुक्त और जीवन दाता समझ में आयेगा। दृष्टिकोण के बदलती है और अधिक आनंद की ओर अग्रसर होने लगते है। दैनिक जीवन में ऐसी अनेकों बातें आती है जो यों सामान्य-सी लगती है किंतु वे अपने भीतर बहुत बड़ा अनोखापन छिपाये होती है।
चिंतन,मनन, स्वाध्याय, संयम, सेवा जैसी सुगम विधियाँ भी बताई गई है और मनोनिग्रह, ध्यान, धारणा, त्राटक प्राणायाम जैसी यौगिक क्रियाएँ भी। मनःस्थिति और परिस्थितियों के अनुरूप किसी का भी चयन किया जा सकता है। लक्ष्य मात्र एक ही होना चाहिए विचारों की शुचिता। यदि विचार सही व विधेयात्मक हुए तो व्यक्ति का निर्माण सही होता चला जाएगा।
चिंतन सभी में सम्मिलित है। प्रायः तन मन एवं अंतःकरण के अभ्यास ही अगणित स्थूल, सूक्ष्म क्रियायें व मानसिक चिंतन सभी में सम्मिलित है। प्रायः तन मन एवं अंतःकरण के अभ्यास ही अगणित स्थूल सूक्ष्म क्रियाओं को गति देने का कारण बनते है। मानवी अंतरात्मा के प्रतिकूल उनका स्वभाव होने पर पतन-पराभव का सिलसिला शुरू हो जाता है अस्तु उनका परिष्कार आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो जाता है।
चिंतन वाले लोग जो भी कार्य हाथ में लेंगे उसे अपने दुर्गुणों के कारण कलुषित कर देंगे और वही लाभदायक की जगह हानिकारक बन जाएगा। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हम हर क्षेत्र में देखते हैं। उच्च आदर्शों के लिए बनी हुई संस्थाएँ आज पद लिप्सा और धन लोभ के कारण संघर्ष का अखाड़ा बनी हुई हैं।
चिंतन भ्रष्ट आचरण की पिछले दिनों उलटी गंगा बहती रही है अब उसे नये सिरे से उलट कर सीधा किया जाएगा दुष्कृत्यों का दंड भुगतान और प्रायश्चित के रूप में क्षति पूर्ति करने का सिलसिला इस बीच भी चलता रहेगा।
चिंतन क्षेत्र तक ही सीमित रहे और व्यावहारिकता के धरातल पर जीवन में न उतरे तो इसे भी पूर्ण सत्य का-पूर्ण प्रेम का अपूर्ण अंश ही कहना चाहिए। इतने से भी बात बनने वाली नहीं। दर्शन प्रभावोत्पादक तब होता है जब वह प्रतिपादक के जीवन में उतर कर कर्म में परिवर्तित हो जाय। यदि इतना न हो सका जीवन सामान्य स्तर से ऊँचा न उठा तो फिर दोहरे व्यक्तित्व का कलंक सिर पर लदता एवं अपमान अपयश का भागी बनना पड़ता है। इसलिए दर्शन की पूर्णता उस अंतिम सत्य में निहित मानी गयी है जहाँ दार्शनिक मात्र चिंतक बना नहीं रहता वरन् एक आदर्शनिष्ठ पुरुष की तरह समाज के साथ व्यवहार करता है।
चिंतन सभी में सम्मिलित है। प्रायः तन मन एवं अंतःकरण के अभ्यास ही अगणित स्थूल सूक्ष्म क्रियाओं को गति देने का कारण बनते है। मानवी अंतरात्मा के प्रतिकूल उनका स्वभाव होने पर पतन-पराभव का सिलसिला शुरू हो जाता है अस्तु उनका परिष्कार आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो जाता है।
चिंतन, सत्य का अन्वेषण, करने के लिये इतना साहस भी एकत्रित करना होगा कि अपनी अभ्यस्त बुद्धि की भी उपेक्षा करके विश्वव्यापी सत्य का निरूपण कर सकने की भावना सही रूप का निरूपण कर सकने में समर्थ हो सके।
चिंतन की एक विधा का नाम है। समयानुकूल दर्शन से समाज का मार्गदर्शन होता है और यह ज्ञात होता है कि समस्त लोगों को वह उन्नति की दिशा में आगे बढ़ा ले जाने की उत्कंठा रखता है। इतने पर भी सब कुछ चिंतन क्षेत्र तक ही सीमित रहे और व्यावहारिकता के धरातल पर जीवन में न उतरे तो इसे भी पूर्ण सत्य का-पूर्ण प्रेम का अपूर्ण अंश ही कहना चाहिए। इतने से भी बात बनने वाली नहीं। दर्शन प्रभावोत्पादक तब होता है जब वह प्रतिपादक के जीवन में उतर कर कर्म में परिवर्तित हो जाय।
चिंतन और चरित्र को ढालना चाहिए। ईशोपनिषद में ठीक ही लिखा है कि यह गतिमान है अगतिमान भी दूर भी है और निकट भी सबमें समाहित है और सबसे बाहर भी धर्म के इस ब्रह्म रहस्य को समझकर ही लोग सुख शांति का अनुभव करते है और जीवन लक्ष्य की प्राप्ति भी वस्तुतः धार्मिक भाषा एक ऐसी सुनहरी चाबी है जो अज्ञेय मंदिर के स्वर्ण द्वार को खोलती और परमानंद की अनुभूति कराती है। मौलाना रूप ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक मसनवी में कहा है कि लफंगों में मत फँस मानी की तरफ जा अर्थात् भाषा की शब्दावली के भ्रम में न पड़कर व्यक्ति के मनोभावों का समझना ही विवेकशीलता का परिचायक है। चिकित्सा की अनेकानेक प्रणालियों को अपनाकर उपचार का उपक्रम बिठाने वाले चिकित्सक अपनी-अपनी पृथक् पृथक् शब्दावली अथवा भाषा का प्रयोग करके ही रोगी को परामर्श देते है। चिकित्सा पद्धतियों की विविधता होते हुए भी उपचार उपक्रम एक ही है ठीक उसी प्रकार है।
चिंतन के लिए उपयुक्त दिशा मिल सकती है। अपनी मनोभूमि के पक्षपात को भी समझना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि हम जिस परंपरा में जन्मे पले और बड़े हुए है स्वभावतः उसी के समर्थन में बुद्धि काम करेगी। इसलिए स्वतंत्र चिंतन, सत्य का अन्वेषण, करने के लिये इतना साहस भी एकत्रित करना होगा कि अपनी अभ्यस्त बुद्धि की भी उपेक्षा करके विश्वव्यापी सत्य का निरूपण कर सकने की भावना सही रूप का निरूपण कर सकने में समर्थ हो सके।
चिंतन देना। कर्मयोग की भाषा में कर्मनिष्ठा पैदा करना और समाजशास्त्र के मत में सुव्यवस्था लाना।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-May
चिंतन से क्रिया तथा व्यवहार बन पड़ते हैं। इसी तरह भोजन के मूल में समग्र व्यक्तित्व छिपा होता है उसकी प्रकृति और प्रवृत्ति छिपी होती है। इसे नियंत्रित कर लेने से व्यक्तित्व को काफी हद तक नियंत्रित कर सकना संभव है। यहाँ यह जान लेना जरूरी है कि भोजन किस तरह हमारी आदतों का संचालन करता है। इस सम्बन्ध में शरीर शास्त्रियों का कहना है कि मानवी मस्तिष्क में अनेकानेक चैत्य केन्द्र हैं।
चिंतन के उन विकृत परमाणुओं को खींचते रहने के कारण ही पैदा होती है जो नीतिमत्ता को अस्वीकारने और अनैतिकता अपनाने में अभिरुचि रखते हैं। जहाँ दुर्बुद्धि रहेगी, वहाँ दुश्चिन्तन ही पैदा होगा। खराब चिंतन सदा अपने समान गुणधर्म वाले अणुओं को आकर्षित करता है। जहाँ ऐसे विकारयुक्त चिंतन कणों की भरमार हो, वहाँ स्वभाव उदात्त बना रहे यह कठिन है ऐसे में यदि अन्न की प्रकृति सात्विक भी बनी रहीं तो परिणाम कोई बहुत उत्साहवर्धक प्राप्त होगा, इसकी आशा नहीं की जानी चाहिए।
चिंतन सदा अपने समान गुणधर्म वाले अणुओं को आकर्षित करता है। जहाँ ऐसे विकारयुक्त चिंतन कणों की भरमार हो, वहाँ स्वभाव उदात्त बना रहे यह कठिन है ऐसे में यदि अन्न की प्रकृति सात्विक भी बनी रहीं तो परिणाम कोई बहुत उत्साहवर्धक प्राप्त होगा, इसकी आशा नहीं की जानी चाहिए।
चिंतन, आनंद, स्मृति, बुद्धि, क्रोध, प्रेम, दुःख-सुख- यह सब उन उन केन्द्रों की सत्यता या निष्क्रियता पर निर्भर है। अनेक माध्यमों के अतिरिक्त इन्हें आहार से भी उद्दीपन मिलता रहता है। उपरोक्त गुणों में से किसे किस परिमाण में अपने अंदर पैदा करना है यह निर्णय करना व्यक्ति का काम है। इस आधार पर आहार निर्धारणा भी स्वयं करना पड़ता है। तत्संबंधी आहार के लेते रहने से अभीष्ट मस्तिष्कीय उद्दीप्त होने लगते हैं और धीरे-धीरे उनकी विशिष्टता व्यक्तित्व में परिलक्षित होने लगती है।
चिंतन-परमाणु, वायु-परमाणु आदि का आकर्षण यह सभी एक प्रकार के आहार हैं। व्यवहार परिवर्तन को यहाँ इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए, सिर्फ अन्न के संदर्भ नहीं।
चिंतन कणों की भरमार हो, वहाँ स्वभाव उदात्त बना रहे यह कठिन है ऐसे में यदि अन्न की प्रकृति सात्विक भी बनी रहीं तो परिणाम कोई बहुत उत्साहवर्धक प्राप्त होगा, इसकी आशा नहीं की जानी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-April
चिंतन करता है, तभी तो घनश्याम ने मोर के पंख, मोर का प्रेम दर्द चिन्ह समझ कर शीश पर धारण किया, सच जूठ क्या है पर बात जँचती भी है -
चिंतन दृढ़ता के साथ करते रहना चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-August
चिंतन में पड़ गया। इन्द्र सहित देवता ब्रह्मा के पास पहुँचे। उन्होंने कहा-”विश्वरूप सब यज्ञों में हवन किया सोम पी जाता है, हमारा भाग ही न रहा इसलिये असुर बढ़ रहे हैं और हम क्षीण हो रहे हैं। आप अब हमारा कल्याण कीजिये।”
चिंतन कम करोगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-March
चिंतन से बचना चाहिए। उसका परिणाम अपने लिए ही अहितकर होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-June
चिंतन करने से उनमें आसक्ति पैदा हो जाती है। विषयों की आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना यदि पूर्ण न हो तो क्रोध की उत्पत्ति होती है।’ इस तरह विषयों के चिन्तन मात्र से ही अनेकानेक मानसिक जटिलताएं उत्पन्न हो जाती हैं और मनुष्य अपने श्रेय पथ से विचलित हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-May
चिंतन करते है, वह वस्तु हमें अवश्य प्राप्त होती है। यदि आप इस बात का पक्का विश्वास करें कि हमें आवश्यक सुख सुविधाओं का लाभ होगा, हम समृद्धिशाली होंगे, हम प्रभावशाली होंगे और आप इस दृष्टि से अपना प्रयत्न आरम्भ करेंगे तो आप में इस प्रकार की विलक्षण उत्पादन−शक्ति का उदय होगा जो आपके मनोरथों को सफल करेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-January
चिंतन-मनन द्वारा आत्म ज्ञान का सम्पादन।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-December
चिंतन मनन द्वारा जितनी देर मन मन्दिर में इन सद्गुणों का प्रकाश बना रहे और उनमें अपनी श्रद्धा जमी रहे तो समझना चाहिये कि उतनी देर उच्च-स्तरीय ईश्वर पूजन होता रहा। प्रतिमायें ईश्वर की प्रतीक हैं पर उच्च-भावनायें तो प्रभु की प्रतिनिधि ही मानी गई हैं। इसलिये स्वाध्याय हमारी उपासनात्मकता को पूर्ण करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं।
चिंतन करो।” वस्तुतः हम अपने को शरीर मान कर जीवन की उन गतिविधियों का निर्धारण करते हैं जिनसे केवल शरीर का ही यत्किंचित् स्वार्थ सिद्ध होता है। आत्मा के हित और कल्पना के लिए हमारे जीवन क्रम में प्रायः नहीं के बराबर स्थान रहता है। यदि हम अपने को आत्मा और शरीर को उसका एक वाहन औजार मात्र समझे तो सारा दृष्टिकोण ही बदल जाय। समस्त गतिविधियाँ ही उलट जायें तब हम आत्मा के हित, लाभ और कल्याण को ध्यान में रख कर अपनी रीति-नीति निर्धारित करें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-August
चिंतन की दिशा में अग्रसर करने का अभ्यास किया जा सकता है। जितना प्रखर यह अभ्यास होगा वैसा ही वैराग्य पारलौकिक जीवन के प्रति संवेदना का भाव भी जागृत होने लगेगा। जब यह सिद्ध हो जायेगा, मन यह स्वीकार कर लेगा कि परलोक ही सत्य है, आत्मा ही अमरत्व है तो फिर मन से झंझट करने की आवश्यकता ही न रहेगी, वह आपका मित्र बन जायगा।
चिंतन के कारण इनमें वह शक्ति आविर्भूत हुई थी जो बड़े-बड़े विद्यालयों के छात्रों, शिक्षकों को भी नहीं नसीब होती। कबीर अक्षर लिखना नहीं जानते थे किन्तु वह पंडितों के भी पंडित हो गये।
चिंतन करता है उससे अधिक अमरत्व का शाश्वत सुख और सनातन स्वरूप का भी चिन्तन करे।
चिंतन आत्म-कल्याण के लिये उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी है। किन्तु लौकिक वासनायें और इच्छायें भी तो इतनी जल्दी नहीं मिटतीं। ईश्वर का भजन करने बैठिये, हाथ चलेगा, माला घूमेगी, मन्त्र जाप भी होगा किन्तु मन जिसे ईश्वर के प्रकाश की ओर गमन करना चाहिये था वह तो बार-बार अपनी प्रिय वस्तुओं, ऐच्छिक इन्द्रियों के विषय भोगों की और लपटें लेगा। कठोर संयम और तितिक्षाओं से मन को दण्डित कर इस तरह भटकने से रोकने का भी विधान है किन्तु जिस प्रकार दंड से जानवर और भी क्रुद्ध और हिंसक बनते हैं, उसी प्रकार मन भी चोट खा कर विद्रोह करता है। मन वस्तुतः हमारा शत्रु नहीं है उसे यदि पुचकार कर मित्रतापूर्वक सलाह दी जाये अर्थात् प्रेमपूर्वक यह बताया जाये कि-”भाई-यह ऐन्द्रिक सुख तुम कब तक भोग सकोगे?
चिंतन के द्वारा बापू ने अपने आपको सुधारा तो कस्तूरबा स्वयमेव उनकी सच्ची सहचरी बन गई। दाम्पत्य जीवन में वह आनन्द आया कि मृत्युपर्यन्त कोई मनोमालिन्य न आया। सुकरात को दार्शनिक बना देने में उनकी धर्मपत्नी की कर्कशता ही थी। ऐसे अवसर मनुष्य को जीवन-दर्शन की गहराइयों तक पहुँचा सकते हैं, साथ ही पारिवारिक प्रेम, ईमानदारी, सद्व्यवहार, स्नेह, प्रेम, आत्मीयता, प्रसन्नता, प्रफुल्लता की आवश्यकता और उपयोगिता का पाठ सिखा सकते हैं। मनुष्य जीवन की गहराइयों का ज्ञान उपलब्ध करा सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-March
चिंतन, लकीर पीटने के रूप में नहीं वरन् निर्माणात्मक उद्देश्य की पूर्ति के लिए करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-May
चिंतन की उपयुक्त घड़ी पर कोई निर्माणात्मक निर्णय लेने की सम्भावना भी है। इस उत्सव आयोजन में इकट्ठे होने वाले विचारशील लोगों में परस्पर प्रेम भाव बढ़ता है, सृजनात्मक संगठन होता है और एक प्रेरणाप्रद परिपाटी के शुभारम्भ का अवसर मिलता है। युग-निर्माण योजना जिस उद्देश्य को लेकर बनी है उसकी पूर्ति के बीजाँकुर भी इस कार्यक्रम में सन्निहित हैं। वह प्रचलन निश्चय ही व्यक्ति निर्माण और तदनुसार समाज निर्माण का बहुत कुछ प्रयोजन पूरा करेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-September
चिंतन करे। निदान उसने ऐसा किया और कुछ समय में उसके सींग गायब हो गये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-December
चिंतन का सूचक है। वह हमारी विचार शक्ति को केन्द्री भूत करता है।
चिंतन के ओजस्वी पानी में लय होकर निखार पाती हैं। मौन चिंतन का सूचक है। वह हमारी विचार शक्ति को केन्द्री भूत करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-June
चिंतन आवश्यक है। संसार का जो भी मनुष्य जिस विषय में आगे बढ़ा है, पारंगत हुआ है, उसमें उसने एकाग्रता और आस्था उत्पन्न की है। इसका एक आध्यात्मिक उपाय यह है कि ईश्वर की उस शक्ति का चिन्तन किया जाय। चिन्तन के लिये आकृति की आवश्यकता है उस आकृति की मूर्ति या चित्र के आधार पर हमारी कल्पना आसानी से ग्रहण कर सकती है। इस साधन की सुविधा के लिये मूर्तियों का आविर्भाव हुआ है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-October
चिंतनम्।
चिंतन से अनेक प्रकार की मानसिक व्याधियाँ उत्पन्न करता है जो जितना ही अधिक अपने आपको दूसरों से अलग रखने की चेष्टा करता है, उसके विचार उतने ही दूषित हो जाते हैं। मनुष्य के मन में अनेक प्रकार की भावनाएं उठती हैं। जब तक वह अपनी इन भावनाओं को अपने मित्रों के समक्ष प्रकाशित करता रहता है, तब तक वे मानसिक जटिलता और परेशानी का कारण नहीं बनती, किन्तु हम अपनी सभी भावनाओं को अपने मित्रों के समक्ष प्रकाशित नहीं कर सकते। क्योंकि वे इतनी घृणित होती हैं कि हमारा विश्वास होता है कि उन्हें जान कर भी हमारे मित्र हमसे घृणा करने लग जायेंगे। इसी तरह हम अपने अनेक दुष्कर्मों को प्रकाशित होने से रोकते रहते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-February
चिंतन से परिचालित एवं परहित कामना से कर्मरत व्यक्ति का अहंभाव क्रमशः विनष्ट होता जाता है और विराट् सत्ता से सम्बन्धित हो जाता है। विराट परमात्म सत्ता ही तब उसका मार्गदर्शन करने लगती है। साधना-उपासना का, भजन-पूजन का भी यही उद्देश्य है कि सद्गुणों में दैवी सम्पदा में अभिवृद्धि हो, सत्कर्मरत् रहा जाय और अन्ततोगत्वा शुद्र अहं का विराट सत्ता में विलीन होकर सबकुछ उसका हो जाय। जड़ चेतन में समायी परमसत्ता ही मार्गदर्शिका बन जाय। अहं विसर्जन की फलश्रुति भी यही है।
चिंतन प्रक्रिया व इसकी मूलभूत आस्थाओं तक के निर्माण के लिए वह उत्तरदायी है। इस दृष्टि से आहार निग्रह की साधना पद्धतियों में बड़ी प्रमुख भूमिका मानी जाती है।
चिंतनशील-विवेकशील होना चाहिए। परन्तु चिन्तन जीवन का मात्र सैद्धान्तिक पक्ष है उसका व्यावहारिक पक्ष है-श्रेष्ठ कार्यों के रूप में परिलक्षित होना। विचार मन्थन से जो सिद्धान्त निर्धारित हों उनको सत्यता की कसौटी के लिए व्यवहारिक क्षेत्र में उतारना होता है। उच्च आदर्शों एवं नैतिक सिद्धान्तों का व्यवहार में आना ही नैतिक जीवन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-September
चिंतन में डूब जाते किन्तु इसका भी समय उन्हें मिलना नहीं था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-May
चिंतनधारा से तात्पर्य है वह सब कुछ जो भारतीय संस्कृति के पुनर्जीवन द्वारा मानव में देवत्व तथा धरित्री पर स्वर्ग के अवतरण की व्याख्या करते हुए परम पूज्य गुरुदेव अखण्ड-ज्योति पत्रिका रूपी प्राण प्रवाह के माध्यम से जो अपनी विरासत छोड़ गए हैं, उसे घर-घर पहुँचाने का संकल्प लिया जाना। शपथ समारोह जो जून माह में संपन्न होने जा रहा है, इसी संदर्भ में आयोजित है।
चिंतन धारा से जुड़े रहे शेष काम दैवीचेतना उनसे करा लेगी। चिंतनधारा से तात्पर्य है वह सब कुछ जो भारतीय संस्कृति के पुनर्जीवन द्वारा मानव में देवत्व तथा धरित्री पर स्वर्ग के अवतरण की व्याख्या करते हुए परम पूज्य गुरुदेव अखण्ड-ज्योति पत्रिका रूपी प्राण प्रवाह के माध्यम से जो अपनी विरासत छोड़ गए हैं, उसे घर-घर पहुँचाने का संकल्प लिया जाना। शपथ समारोह जो जून माह में संपन्न होने जा रहा है, इसी संदर्भ में आयोजित है।
चिंतन करने की स्थिति में दुबारा आ गये। उन्होंने क्रिस्टिया के प्रस्थान पर खुशी जाहिर की।
चिंतन की दृष्टि से दरिद्र है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-June
चिंतन चरित्र व व्यवहार की दृष्टि से श्रेष्ठ था। शक, हूण, मिस्री, यवन आदि सब हिन्दू ही थे। कालान्तर में संस्कार विहीन होने के कारण ये जातियाँ आर्यावर्त से बाहर जाती रहीं निर्वासित होती रहीं, पुनः मातृदेश लौटती रहीं। पुरातन काल में जातिच्यूत व्यक्ति को पुनः आर्य-मानव जाति का अंग बना लेना ही शुद्धि का प्रतीक था। जाति की मिथ्या परिभाषा, वर्ण जातिभेद की गलत व्याख्याएँ तथा व्यापक पैमाने पर बहिष्कार की परम्परा ने हिन्दू संस्कृति का कालान्तर में कितना नुकसान किया व आज भी विश्व मानवता के पथ पर एक अवरोध बनकर खड़ा है, इस पर सभी मानवतावादियों का मत एक है।
चिंतन करना है। जीवन जीने की कला का शिक्षण करने का कार्य संपन्न करती है। इसे ऋषियों ने जीवन दर्शन कहा है, जिसे अपना कर व्यक्ति रोज के जीवन के संत्रासों से मुक्ति पाता हुआ मानव जन्म के सौभाग्यों को सार्थक करने वाला जीवन जी सकता है। यही मोक्ष है। मोक्ष-दायक ज्ञान का स्वरूप भारतीय दर्शन के विभिन्न संप्रदायों में भिन्न-भिन्न हो सकता है किन्तु लक्ष्य सभी का एक है-जीव को बंधनों से मुक्त करना।
चिंतन-जीवनक्रम की सलाह दी जाने की बात बड़े जोरों से की जा रही है। हिप्नोथेरेपी अब खूब प्रचलित है। पुनर्जन्म व पितर विद्या के क्षेत्र में अनेक पाश्चात्य विशारद उतरे हैं व आत्माओं का आह्वान प्लेनचिट पद्धति से करने का प्रचलन 1885 से चला आ रहा है। सर आलीवरलॉज, सरकुम्स तथा विलियम जेम्स ने इस संबंध में काफी शोध कार्य किया है। वी-वी श्रेनेक ने अपनी पुस्तक “फिनामिना आफ मेटेरियलाइजिंग “ तथा स्वामी अभेदानन्द ने “लाइफ बियॉण्ड डेथ” में मृतात्माओं के चित्र देकर प्रमाण तक प्रस्तुत किये हैं।
चिंतन को वैज्ञानिक कसौटी पर करने के लिए प्रेरित किया। इस प्रेरणा और प्रभाव ने ही भौतिक विज्ञान को ‘अनब्रोकेन होलनेस’ का अभिनव सिद्धान्त दिया।
चिंतन देते हुए कहा है कि यदि व्यक्ति को अवतार मानना हो तो मात्र धर्म क्षेत्र की विभूति नहीं सृष्टि के संतुलन में सहायक हर महान सत्ता को उसी क्षेत्र में गिनना पड़ेगा ।
चिंतन भारतीय वांग्मय में कहीं देखने को नहीं मिलता, इसीलिए इस ग्रन्थ को उपनिषदों, रूपी गायों से दुहा गया दुग्धामृत कहा गया है। मोक्ष, गीताकार के अनुसार योग के रूप में जीवन का एक सकारात्मक पक्ष है। ससीम के बंधनों से मुक्त होकर जीवात्मा जब असीम सत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है तो उसे योग या मोक्ष कहा जाता है। इसके लिए ज्ञानयोग कर्मयोग व भक्तियोग के तीन मार्ग बताए गए हैं ताकि मनुष्य इस देह के रहते ही अन्यान्य कर्मों में लिप्त होते हुए भी चरम लक्ष्य को प्राप्त करें। विचित्र बात यह है कि श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार में मनुष्य रचना ही कर्म करने के लिए हुई हैं।
चिंतन सबका सार्वभौम सनातन एक ही होना चाहिए। आज संस्कृति के नाम पर समाज व शासन द्वारा मात्र नृत्य, संगीत अभिनय, उछलकूद, चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्य व काव्यकला को ही उसका पर्याय मानकर उनकी चिन्ह पूजा होती रही है। जबकि संस्कृति का यह एक प्रतिशत से भी कम पक्ष है। संस्कृति इससे भी बड़ी विराट स्तर की वस्तु है, जिसे दैनन्दिन जीवन में, क्रियाकलापों में, हमारी आस्थाओं में स्थान मिलना चाहिए, विज्ञान व अध्यात्म हमारी संस्कृति के झण्डे तले एक साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हैं। इससे बड़ी स्थापना देव संस्कृति की क्या हो सकती है कि वह प्रगतिशील विज्ञान सम्मत धर्म को विश्वधर्म बनाकर आज साम्प्रदायिकता व धार्मिक उन्मादभरी परिस्थितियों का हल सुझाने में पूर्णतः सक्षम है।
चिंतन होगा। कहा जाता है कि जाति से बहिष्कृत, समाज से बहिष्कृत, संस्कृति से बहिष्कृत, करने की आदिकालीन परम्परा ने आज हिन्दू संस्कृति का ह्रास किया है। यदि यह सच होता तो इतने मत-मतान्तर इतने संप्रदाय, परस्पर विरोधी दर्शन, धार्मिक मान्यताएँ, रीतिरिवाज, भाषाएँ यहाँ एक साथ नहीं पनपी होतीं, बहिष्कार किया गया था हीनवृति का, विकृत तत्वों का, न कि जाति का या व्यक्तियों का। जब तक संस्कृति धर्मपरायण रही आध्यात्मिक रही, वह हर विचारधारा को अपने अंदर समाहित करती रही, देव संस्कृति में युगधर्म, वर्णधर्म, आश्रमधर्म के साथ आपधर्म का भी विधान है। अवश्य ही इन निश्चित धर्मों का ठीक पालन न करने से भी संस्कृति में विकार आया है।
चिंतन और आनंदघन तत्व को मूलतः स्वीकार करके उसी के अनेक रूपों के रूप में ईश्वर को मान्यता दी गयी है। विश्व के समस्त नाना प्रकार के रूपों में उसी एक का साक्षात्कार किया गया है। एक प्रकार से एकत्व में अनेकत्व तथा अनेकत्व में एकत्व, यह एक निराले प्रकार का दर्शन भारतीय संस्कृति का है, जो कहीं और देखने को नहीं मिलता। जब अधिकार भेद से आराध्य रूप भी विविध हो जाते हैं तो दार्शनिक चकराकर हिन्दुओं को बहुदेववादी (पालीथीस्टीक) ठहरा देते हैं व कहते हैं कि संभवतः हिन्दू सभ्यता एक ईश्वर की सत्ता से अनभिज्ञ थी। जबकि एक ही सत्य, एक ही चिन्मय सत्ता की स्वीकृति” भारतीय अध्यात्म स्थान-स्थान पर देता आया है।
चिंतन में पापपूर्ण कृत्य हैं, स्ट्रेस नामक व्याधि को पाप, अनीति जन्य माना जाने लगा है तथा संक्षोभ-विक्षोभ गन्ध शरीर रोगों में संत्रासों को व्यक्ति को मिलने वाले ग्रन्थ के रूप में जाना जाता है। कन्फेशन का प्रावधान पश्चिम में भी है तथा अब ट्रांजेक्शनल एनालिसिस व साइकोइवेल्युएशन काउन्सिलिंग द्वारा मनुष्य को जरूरी है व पूर्व के विभिन्न कर्मों की जानकारी-अनुभूति कराते हुए उसे सही चिंतन-जीवनक्रम की सलाह दी जाने की बात बड़े जोरों से की जा रही है। हिप्नोथेरेपी अब खूब प्रचलित है। पुनर्जन्म व पितर विद्या के क्षेत्र में अनेक पाश्चात्य विशारद उतरे हैं व आत्माओं का आह्वान प्लेनचिट पद्धति से करने का प्रचलन 1885 से चला आ रहा है। सर आलीवरलॉज, सरकुम्स तथा विलियम जेम्स ने इस संबंध में काफी शोध कार्य किया है।
चिंतन जो अध्यात्मवादी था, व्यक्ति की बहिर्मुखी नहीं अंतर्मुखी वृत्ति के विकास एवं आत्मसत्ता की सर्वांगपूर्ण प्रगति पर निर्भर था हिन्दू संस्कृति देवसंस्कृति का प्राण बना रहा। जब से यह चिन्तन बदला व यह माना जाने लगा कि भोगवाद ही प्रधान है, आध्यात्मिक नहीं। आधिभौतिक प्रगति ही सब कुछ है, तब से ही भारत की अंधकार-युग आरंभ हुआ मानना चाहिए। जो भारत अर्ध संस्कृत-हिंसक-आक्रान्ताओं द्वारा पराजित हुआ, वह विलासी भारत था। इतिहास के पृष्ठो का विवेचन यही बताता है।
चिंतन मनन-ज्ञानार्जन द्वारा इतने प्रबल हो जाते हैं कि दुष्कर्मों से उसे विरत कर सदैव पवित्र बनाए रखते हैं तो ऐसा व्यक्ति स्थिर चरित्र वाला कहलाता है।
चिंतन है यह जो हमें हमारी चेतना को गढ़ने वाला यह महापुरुष दे गया है । उनके जीवन के सभी पक्ष अद्भुत हैं अलौकिकताओं से भरे पूरे हैं किन्तु कुछ घटनाक्रमों के द्वारा हमें पता चलता है कि किस तरह से उनका जीवन मात्र एक लक्ष्य के लिए ही नियोजित हुआ , वह था मानवी चेतना का उत्थान व उसके लिए देव संस्कृति को माध्यम बनाकर उसके विभिन्न उपादानों द्वारा उनने चेतना को उसी तरह गढ़ा जिस तरह मूर्तिकार एक शिला को तराशकर उसे अभिनन्दनीय मूर्ति का रूप दे देता है।
चिंतन यह करें कि धर्म, अर्थ, काम मोक्ष की युगानुकूल व्याख्या क्या हो सकती है? मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य प्राप्त हो इसके लिए आज के समय के अनुकूल सही अर्थों में इन्हें कैसे समझा जाय तथा परम पूज्य गुरुदेव ने इन सभी के विषय में क्या-क्या परिभाषाएँ दी, कैसे स्वयं अपने जीवन व्यवहार में उन्हें लागू करते हुए लक्ष्य सिद्धि को प्राप्त हुए, यह चर्चा अधिक लोकोपयोगी व व्यावहारिक अध्यात्म की परिधि में होगी।
चिंतन नहीं कर पाए? आखिर यह कल्पना हमारे मन में आई कैसे?
चिंतन-लक्ष्य निर्धारण के अनुरूप ही मनुष्य अपना पुरुषार्थ चुनता है। मनुष्य का यह पुरुषार्थ पक्ष व तत्संबंधी मार्गदर्शन ही भारतीय संस्कृति का आधार स्तंभ है। पाश्चात्य भोगवाद देह को प्रमुख मानता है अतः वहाँ वह पुरुषार्थ प्रधान है व पूर्वार्त्य रहस्यवादी अध्यात्म पारलौकिक जीवन व उसके लिए की गयी प्रगति को वरीयता देता है, अतः उसके अनुवर्तियों का प्रधान पुरुषार्थ यह है। देखा जाय तो पूरी जगती पर बहुसंख्य व्यक्तियों का जीवन भर का पुरुषार्थ देहादि बंधनों से परे नहीं जा पाता। जो मुक्त होने का प्रयास करता है, वह मोक्ष को प्राप्त करता हुआ पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि करता है।
चिंतन व आचरण से क्यों पशु को भी पीछे छोड़ता नजर आता है, इसका उत्तर किसी आधुनिक चिंतक-वैज्ञानिक के पास नहीं है। इसका उत्तर तो एक ऋषि ने आज से वर्षों-अगणित सहस्राब्दियों पूर्व उपनिषदों के आलोकपूर्ण काल में मानव की अतिभोगवादी मंत्रणाओं का पूर्वाभास करते हुए दे दिया था व कहा था-तेन त्यक्तेन भुंजीथाः अर्थात् “भोज भी त्याग के साथ करो”। यह है चिरपुरातन व आज की परिस्थितियों के लिए नितान्त सही समाधान जो भारतीय संस्कृति के माध्यम से मानवमात्र को उपलब्ध होता है, जो अध्यात्मवादी भौतिकता की बात कहती है व बताती है कि “साधनों का उपभोग करो पर भावना त्याग की रखो। स्वयं भी जियो, औरों को भी जीने दो।
चिंतन था-साधुता का पालन करने पर आत्मा का जन्म उच्चतर लोकों में होता है और दुष्कृत्य आत्माएँ निम्न पशु आदि योनियों में जाती हैं।” प्लेटो कामना को ही पुनर्जन्म का निमित्त कारण मानते थे। लिबनित्य की यह मान्यता थी कि “पशुओं व मनुष्यों का उनके वर्तमान जीवन से पूर्व भी कोई अस्तित्व था तथा इस जीवन के बाद भी कोई अस्तित्व रहेगा, इसे स्वीकारना ही होगा।” हेगल के अनुसार “पूर्णता की ओर बढ़ती जीवात्माएँ यदाकदा निकृष्ट कर्मानुसार प्रेत-पिशाच जैसी योनियों में चली जाती हैं।” लेसिंग के विचार उपनिषदों से मिलते हैं।
चिंतन और आधुनिक विज्ञान का समन्वय कर रहे हैं। लेंग ने हल्की मुसकराहट के साथ कहा समन्वय की बात नहीं पूर्वी चिन्तन पूर्णतया वैज्ञानिक है। वह स्वयं योग और ध्यान का अभ्यास करते हैं। इसी तत्व चिन्तन की प्रेरणा से वह ह्यूमिनिस्टिक साइकोलॉजी की धारणा दे सके हैं।
चिंतन होते हुए भी मनुष्य भ्रान्तियों में उलझा जाता है व विभिन्न मत-मतान्तरों के हिचकोलों में इधर उधर झूलने लगता है। उदाहरण के लिए आचार्य शंकर का मायावाद। उनने कहा-ब्रह्मसत्यं जगत्मिथ्या”। यह परमात्मा सत्य है व संसार झूठ है। पर क्या-संसार से हटकर परमात्मा की परिकल्पना की जा सकती है?
चिंतन व निकृष्ट कर्म। क्षत्रिय वे जो पुरुषार्थी थे व बाहुबल से क्षेत्रों की विजय करके राज्य स्थापना हेतु बाहर जाते रहे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-November
चिंतन तरंगों को जन्म देती है।
चिंतन करने, देखने, वाद्य बजाने तथा ग्रहण करने के अर्थ में प्रयुक्त होता है।
चिंतन, सत्कर्म और सद्व्यवहार (जो समस्त मानवीय प्रगति का मूलाधार है) का नाम ही देव-संस्कृति है। अश्वमेध आयोजनों की वर्तमान घोषणा प्राचीन देव संस्कृति दिग्विजय का ही अभिनव संस्करण है। इसमें देवतत्व की विजय सुनिश्चित है। महामाया ने उसके लिए समूचा सरंजाम एकत्र कर लिया है। कलियुग में पान की अनिवार्यता को अब ने केवल भूल जाना चाहिए, अपितु जहाँ भी देवत्व है उसे इस देव संस्कृति दिग्विजय के झंडे के नीचे आकर असुरता के विनाश में संलग्न हो जाना चाहिए।
चिंतन जुड़ा हो। यदि इनकी पूर्ति के श्रेष्ठतम साधन की ढूँढ़ -खोज हो तो दिव्यदृष्टा ऋषिगणों की अनुभूतियों-प्रयोगशाला बने उनके जीवन की निष्कर्ष एक ही शब्द में मिल जायेगा-’यज्ञ’।
चिंतन और स्वाभिमान को नीचे न गिरने देना। यज्ञाग्नि की यही सद्गुण सामर्थ्य ऋग्वेद-7/1/7-7/11/1, अथर्ववेद -5/12/2, शतपथ ब्राह्मण 3/7/4/10, शांखायन ब्राह्मण 3/7 महाभारत 7/7/10 में वन्दित की गई है। इसे देवमुख कहकर वर प्रदाता माना गया है। स्वर्ग तक आत्मा को पहुँचाने वाला वाहन क्या हो सकता है? इस प्रश्न को उत्तर देते हुए शास्त्रों ने कहा है-यज्ञाग्नि।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-August
चिंतन की दुष्प्रवृत्तियाँ इस प्रतीक स्नान द्वारा मिटें, यह भावना की जाती है। दुग्ध स्नान द्वारा जीवन को दुग्ध सा धवल, उज्ज्वल, निर्मल बनाने की तथा दधि स्नान पर अपना जीवन सुनियोजित , नियंत्रित व्यवस्थित बनाने की भावना करते हैं। घृत स्नान से भाव यह है कि जीवन में स्नेह-प्यार-शालीनता का समावेश करेंगे। सर्वोषधि (हरिद्रा) स्नान का अर्थ है। अवाँछनीयताओं , सामाजिक विभूतियों से संघर्ष कुशा स्पर्श करके भाव यह मन में आरोपित किया जाता कि अनीति के प्रति ऐसे ही तीक्ष्ण बने रहेंगे।
चिंतन क्षेत्र को प्रभावित करने वाली साधना है जो अवाँछनीयता के पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कारों को छुड़ाने में आत्मसत्ता की मदद करती है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतम्भरा उस परिष्कृत मनःस्थिति का नाम है जो ज्ञान साधना से प्राप्त होती है। योग का अर्थ है जोड़ देना-आत्मा को परमात्मा से। परमात्मा यहाँ व्यक्ति नहीं शक्ति है -उत्कृष्ट आदर्शवादी आस्थाओं-आकाँक्षाओं के समुच्चय के रूप में । आत्म साक्षात्कार का अर्थ यही है कि अपनी आस्थाएँ परिष्कृत स्तर की हो जाएँ, संवेदना इतनी उच्चस्तरीय हो जाय कि सब ओर अपनी ही आपा बिखरा दिखाई देने लगे।
चिंतन-सत्कर्म-को उमगा देना। स्वयं में यदि आदर्शों के प्रति प्रेम उमड़ सका लोक हृदय में उनके प्रति श्रद्धा, निष्ठा उमगायी जा सकी तो समझो साधना बन सकी सिद्धि मिल सकी”।
चिंतनशील ज्ञानार्जन व अध्यापन में रुचि लेने वाले वर्ग को प्राचीनकाल में ब्राह्मण कहा गया था । दुर्धर्ष साहस , काम का सृजनात्मक उल्लास में प्रयोग करने वालों को ‘क्षत्रिय’ तथा अर्थ व्यवस्था व उसके सुनियोजन में रुचि लेने वालों को वैश्य बताया गया । साधारण रुचि वाले किन्तु श्रमनिष्ठ सेवाभावी व्यक्तियों को जो ऊपर के तीनों ही वर्गों में नहीं आते थे , शूद्र कहा गया। यह विभाजन विशुद्धतः कर्मों के आधार पर व्यक्ति के संस्कारों के अनुरूप किया गया व आज भी यही युगानुकूल है। जन्म से तो सभी शूद्र होते हैं, यह मनु की मान्यता है व आज के मनोवैज्ञानिक की भी किन्तु प्रयास-पुरुषार्थ, साधना-संस्कारादि द्वारा सब ब्राह्मण बन सकते हैं, यह सबकी मान्यता रही है।
चिंतन ऐसी उलट-फेर से भर जाएगा जिसे आज की तुलना में शीर्षासन की संज्ञा दी जा सके।
चिंतन तंत्र पर प्रयोग करके कही है। हमारा विश्वास है कि बावजूद इस तथ्य के कि पाश्चात्य संस्कृति अपना आधिपत्य जमाती दिख रही है, राष्ट्र का ब्राह्मणत्व जागेगा, प्रबुद्ध वर्ग अपने दायित्वों को समझेगा तथा सत्तर प्रतिशत से अधिक देहात व कस्बों में रहने वाला वर्ग धर्मतंत्र के प्रगतिशील रूप की ओर झुकेगा। सारे राष्ट्र के कण-कण में समाए देवत्व को जो प्रसुप्त पड़ा है , जगाने के लिए हम ही नहीं , अगणित ऋषिगण सक्रिय हैं। इस राष्ट्र की नियति ही यह है कि इसे अगले दिनों सारे विश्व का मार्ग दर्शन व्यक्तित्व निर्माण व परिष्कार से लेकर समाज देवता की आराधना क्षेत्रों में करना है। यह इतना ही सत्य है जितना कि सूर्य का अस्तित्व है।
चिंतन क्रम अपनाना पड़ता है। इसके लिए कोई न कोई अवलम्बन चाहिए। बिना किसी समर्थ आदर्शवादी व्यक्तित्व के साथ घनिष्ठता स्थापित किये ऊपर चढ़ पाना संभव नहीं। बेल अपने बलबूते पर नहीं पनपती रह सकती यूँ ही धरती पर फैलकर वह अनगढ़ बन जाती है किन्तु समर्थ वृक्ष का सहारा मिलते ही वह चढ़ती चली जाती है है व आकाश चूमने लगती है। ऊँचा उठना एक बड़ा काम है।
चिंतन आकाँक्षाओं एवं आस्थाओं में परिवर्तन लाना संभव है, यही शोध संस्थान का यज्ञोपैथी के माध्यम से लक्ष्य है। निश्चित ही भारतीय संस्कृति की यह महत्वपूर्ण स्थापना जो स्वयं एक विज्ञान है, प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर भी प्रतिपादित की जा सकती है, चह इस केन्द्र ने प्रमाणित कर दिखाया है।
चिंतन एक प्रयास जब आँधी की तरह चलता है, सारे वातावरण को हिलाकर रख देता है। इसका एक उदाहरण ‘युद्धोन्माद’ , “ माँब मेन्टलिटी” के रूप में देखा जा सकता है। ऐसी स्थिति में दिमाग पर मात्र लड़ने का आवेश छाया होता है। हवा में तेजी और गर्मी कुछ ऐसी होती है जिसके कारण सामान्य व्यक्ति भी सम्मोहित होकर, असामान्य पुरुषार्थ करते देखे जाते हैं।
चिंतन किया ही नहीं गया। मोटी दृष्टि से यज्ञ की भौतिकीय व रसायन विश्लेषण वाला पक्ष यहाँ आने वालों को प्रधान दिखाई देता है। शोध प्रयोगशाला में गैस, लिक्विड क्रोमोटोग्राफी से लेकर थिनलेयर क्रोमोटोग्राफी, ऊँची ऑप्टिकल क्षमता वाले स्टीरियो माइक्रोस्कोप से लेकर यज्ञ-धूम का शरीर, मन, वातावरण, जीवाणु पर प्रभाव दर्शाने वाले अनेक उपकरण हैं। किन्तु इनका उपयोग सीमित ही है। ये केवल यह बता पाते हैं कि यज्ञ का अवलम्बन लेने वाले की पूर्व में क्या स्थिति थी व बाद में क्या परिवर्तन हुए ?
चिंतन है। यदि संघबद्ध आध्यात्मिक पुरुषार्थ इस माध्यम से संपन्न हो सके तो सतयुग की वापसी संभव है, इसमें संदेह नहीं।
चिंतन-कर्म कौशल की दृष्टि से उसे क्या संबोधन दिया जाना चाहिए। समाज व्यवस्था का यह आदिकाल से चला आ रहा सुनियोजित क्रम है। चिंतनशील ज्ञानार्जन व अध्यापन में रुचि लेने वाले वर्ग को प्राचीनकाल में ब्राह्मण कहा गया था । दुर्धर्ष साहस , काम का सृजनात्मक उल्लास में प्रयोग करने वालों को ‘क्षत्रिय’ तथा अर्थ व्यवस्था व उसके सुनियोजन में रुचि लेने वालों को वैश्य बताया गया । साधारण रुचि वाले किन्तु श्रमनिष्ठ सेवाभावी व्यक्तियों को जो ऊपर के तीनों ही वर्गों में नहीं आते थे , शूद्र कहा गया।
चिंतन के विशेषाँकों की शृंखला में हम उनके इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य के द्रष्टा एक ब्राह्मण तथा तीर्थ चेतना के उन्नायक के रूप में देव संस्कृति को समर्पित एक साधक के रूप में उनके जीवन व कर्तृत्व संबंधी विभिन्न पक्षों पर विस्तार से विवेचन कर चुके हैं। युगऋषि के रूप में मानव मात्र को ऊँचा उठाने की आकाँक्षा लेकर अवतरित हुए परम पूज्य गुरुदेव के जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष है। ऋषि वह जो काल व परम्पराओं से न बँधे। ऋषि वह जो साधना पद्धति से लेकर समाज व्यवस्था में युगानुकूल नूतन निर्धारण कर डाले व एक विराट समुदाय को उनका पालन करने को विवश कर दे। ऋषि वह जो आत्मसत्ता रूपी प्रयोगशाला में गहन अनुसंधान कर मानवमात्र के लिए चेतना जगत संबंधी कुछ ऐसे सूत्र दे जिनसे तत्कालीन समाज की मनःस्थिति चमत्कारी ढंग से बदलती देखी जा सके।
चिंतन की पृष्ठभूमि बनाने वाले तत्वज्ञान को “अध्यात्म नाम” दिया है तथा आदर्श कर्तव्य में निष्ठा उत्पन्न करने की प्रक्रिया को “धर्म” कहा है। ‘गायत्री’ महाशक्ति के तत्वज्ञान एवं विज्ञान में धर्म की सारी शिक्षाएँ निहित मानी जा सकती है। आत्मसत्ता के परिष्कार की भारतीय संस्कृति के प्रणेताओं द्वारा प्रतिपादित ये दो विधाएँ उज्ज्वल भविष्य के रूप में सतयुग का मूल आधार है, ऐसी संस्कृति-पुरुष की मान्यता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-March
चिंतन करने वाले युवारक्त की जरूरत है। इसीलिए स्कूलों की, कालेजों की शिक्षण पद्धति में व्यापक क्रान्ति पैदा करने के लिए यहीं से वातावरण बनाते हैं। ये बच्चे नहीं हैं। इनमें महामानवों के बीज हैं। न जाने इनमें से कौन गाँधी है, नेहरू है, सुभाष बोस है, खुदीराम है।
चिंतन का कायाकल्प व परिस्थितियों का अनुकूलन।” व्यक्ति यदि संकल्पबद्ध पुरुषार्थ करे तो सिद्धियाँ स्वयं उस पर आकर बरसती हैं, यह उनने जीवन भर प्रतिपादित किया। सर्वसाधारण को संभवतः इस तथ्य पर विश्वास न हो अतः हमने यही उचित समझा कि एक साक्षी के रूप में, जीती जागती चित्रकला के रूप में परमपूज्य गुरुदेव के जीवन से जुड़े उन प्रामाणिक प्रसंगों को ही सबके सम्मुख रख दिया जाय ताकि वे स्वयं निर्णय लें कि यह सब क्यों व कैसे हो पाना शक्य बन पड़ा?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-January
चिंतन कर मृत्यु भी टाल सकता है व छोटे स्तर पर टली विपदा द्वारा नया जीवन जीने की प्रेरणा दे सकता है। गायत्री की सिद्धि जिन्हें सर्वोच्च स्तर की प्राप्त हो, ऐसे परमपूज्य गुरुदेव ने अगणित व्यक्तियों को मौत के मुँह से लौटाकर उन्हें सृजन कार्यों से जोड़ा। यहाँ तो मात्र दो ही उदाहरण दिए हैं किन्तु ऐसे उदाहरण ढेरों है, अगणित परिजन जिसके साक्षी हैं।
चिंतन का अभ्यास होता है। इसमें जिसे जितनी सफलता मिलेगी उसकी मानसिक प्रखरता उतनी ही तीक्ष्ण होती चली जायेगी। कहना न होगा कि इस उपलब्धि के कारण न केवल आत्मिक क्षेत्र में वरन् भौतिक क्षेत्र में विचित्र प्रकार की सफलताएँ प्राप्त होती हैं। ध्यान-धारणा के सहारे उपलब्ध होने वाली मानसिक प्रखरता जीवन के हर क्षेत्र में सहयोगी बनकर सफलताओं का द्वार खोलती है। आत्मिक प्रगति का उद्देश्य तो पूरा होता ही है।
चिंतन को कैसे परिष्कृत किया जाय तथा आत्मसत्ता को विराट सत्ता के प्रति समर्पित होने का शिक्षण कैसे दिया जाय? इतना भर करने से ऋद्धि-सिद्धियों का रहस्योद्घाटन अपने ही अंतराल से होने लगता है।
चिंतन, चरित्र, व्यवहार में परिलक्षित होने लगते हैं, घातक रोगों के रूप में परिणति निकलने लगती है, तब उस ओर ध्यान आकर्षित होता है।
चिंतन को इस प्रयोजन के लिये एकाग्र करने तथा गहराई में उतरने के लिये आकर्षक उपचार खड़े करने पड़ते हैं। देव पूजा के लिये प्रतिमाओं का आधार बनाया जाता है और उनकी अर्चना के लिये कतिपय कर्मकाण्डों के विधान बनाये जाते हैं। देव प्रतिमाओं की आकृति यौवन से उत्फुल्ल नख-शिख तक आकर्षक होती है। उन पर वस्त्र आभूषणों की सुसज्जा की जाती है, सुगन्ध लेपन, पुष्प, उपकरण, चंवर, छत्र, वाहन आयुध आदि से प्रतिमा का समीपवर्ती क्षेत्र ऐसा बनाया जाता है जिससे आँखों का समुचित आकर्षण तथा देखने के लिये सुन्दर उपकरण मिल सकें। यह विश्रृंखलित ध्यान को उस प्रतिमा पर केन्द्रित एकाग्र करने की परिचर्या कही जा सकती है।
चिंतन एवं दर्शन वस्तुतः सही अर्थों में शिथिलीकरण की ही प्रक्रिया को चिकित्सा बताता है।
चिंतन से ही सही दिशा में चलता है। तनावजन्य स्थिति में भी यह भावना कि “मैं दिनों दिन तनाव से मुक्त हो रहा हूँ एवं उन सभी परिस्थितियों को समझ कर उनसे निपटने में सक्षम हूँ जो तनाव उत्पन्न करती हैं” व्यक्ति को भावनात्मक टॉनिक प्रदान करती हैं। मनोबल व आत्मबल बढ़ाती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-April
चिंतन, चरित्र, व्यवहार को उच्चस्तरीय लेने पर ही संभव हो पाता है कि मनुष्य स्वयं के साथ समाज की भी समस्यायें सुलझा सकें। उनका मार्गदर्शन कर नूतन दिशा प्रदान कर सकें। जो इस समूची प्रक्रिया का भलीभाँति निर्वाह कर सके, वही वस्तुतः अपने को मनीषियों की कतार में खड़ा कर सकता है।
चिंतन के लिए समय ही नहीं निकल पाता जिसे आत्मज्ञान कहते हैं।
चिंतन से आपको निकालकर एक नई दृष्टि देना चाहते हैं । यही मानसिक ब्रह्मचर्य है। आपको इसका, मर्यादा का पालन करना चाहिए, यह हमने आपको सिखाया।
चिंतन धारा को एक नया मोड़ प्रदान किया । जीवन जीने की एक नयी शैली विकसित हुई। अमेरिका में दास प्रथा को समाप्त करने का श्रेय हैरियट स्टो के चिन्तन तथा अब्राहम लिंकन के प्रयासों को है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-December
चिंतन को उदात्त और चरित्र को उदार बनाना पड़ा है। व्यक्तित्व के परिष्कार और उदार लोकमंगल को अपनी प्रधान आकाँक्षा मानकर चलने वाले और इसके लिये प्रबल पुरुषार्थ करने वाले ही अपनी पात्रता उस स्तर तक पहुँचा सके हैं, जिस पर अंतरिक्ष से अनायास ही दिव्य अनुदान बरसते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-May
चिंतन और भावनाएं उमड़ती रहती हैं।
चिंतन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दंभी कहा जाता है।”
चिंतन परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है। परमपूज्य गुरुदेव नियत लेखनी के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत हैं परमपूज्य गुरुदेव नियत कर्म की परिभाषा ऐसी जीवनचर्या के रूप में करते हैं।
चिंतन करने वाले, द्वेष भरे विचार मन में पालने वाले मिथ्याचारी, दंभी कहे जाते हैं। कर्म मात्र बहिरंग से नहीं, अंतरंग से भी व निष्पाप मन के द्वारा होना चाहिए। श्रीकृष्ण भगवान यहाँ ऐसे लोगों की चर्चा कर रहे हैं, जो समाज की कुछ सेवा नहीं करते, समाज पर भाररूप हैं, मन से विषयों को चिंतन करते रहते हैं, कामना के प्रति आसक्ति भाव अंदर से छोड़ नहीं पाते । ऐसे व्यक्तियों से भिन्न हमें एक आदर्श जीवन बिताने वाला बुद्धिमान, प्रज्ञावान् व्यक्ति बनना है। वे सातवें श्लोक में कहते हैं -
चिंतन का प्रसार-विस्तार ही अबका युगधर्म है। पत्र की भाषा से इसकी स्पष्ट झलक मिलती है। एक पत्र और यहाँ उद्धृत कर रहे हैं। यह पत्र 10-9-64 को टीकमगढ़ के श्री बैजनाथ शौनकिया जी को लिखा गया था श्री बैजनाथ जी अखण्ड ज्योति के 108 सदस्य बनाने के लिए संकल्प किया था। इस संबंध में ‘युग निर्माण योजना’ में विवरण छपता था ताकि औरों को भी प्रेरणा मिले।
चिंतन और धारणा की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। साधनात्मक पुरुषार्थ थोड़ा सा ही क्यों न हो, हजार बड़ी-बड़ी बातों से ज्यादा उत्तम है। बातों से भावनाएँ जाग सकती हैं, किंतु उस सिद्धाँत की अनुभूति के लिए यदि आवश्यक पुरुषार्थ न किया गया, तो समझो समय तथा भावना बेकार नष्ट हुई। आदर्शोन्मुखी आध्यात्मिक कर्म में ही तो जीवन का सच्चा सदुपयोग है।
चिंतन और प्रयास सृजनात्मक प्रयोजनों में ही निरत रहना चाहिए। जीवन की गरिमा इस कसौटी पर आँकी जाती हैं कि उसमें किस स्तर का कितना सृजनात्मक कार्य सफल हुआ। क्रिया-कौशल की जो भी प्रतिभा-प्रखरता है, उसकी प्रशंसा इस बात में है कि उसके द्वारा सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन में सहायता मिल या नहीं।-परमपूज्य गुरुदेव
चिंतन श्रेष्ठता के स्थान पर निकृष्टता के सरल प्रवाह में बहने को उतारू हो, एक आध्यात्मिक पत्रिका का निकलना, सतत् संख्या बढ़ते चले जाना एवं न मिलने पर जन-जन को उसका अभाव खलने लगना, इस तथ्य का परिचायक है कि किसी शक्तिपुँज ने अपनी प्राणचेतना उड़ेलकर हृदय में उमड़ी संवेदना की स्याही के सागर में लेखनी डुबोकर उसे लिखा है एवं बिना किसी लाभ की कामना के उसे प्रकाशित किया गया है।
चिंतन करते रहते हैं, कामना के प्रति आसक्ति भाव अंदर से छोड़ नहीं पाते । ऐसे व्यक्तियों से भिन्न हमें एक आदर्श जीवन बिताने वाला बुद्धिमान, प्रज्ञावान् व्यक्ति बनना है। वे सातवें श्लोक में कहते हैं -
चिंतन श्रेष्ठ है, तो आदर्श कर्म श्रेष्ठतम । आध्यात्मिक सत्य की अनुभूति- तत्वचिंतन और धारणा की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। साधनात्मक पुरुषार्थ थोड़ा सा ही क्यों न हो, हजार बड़ी-बड़ी बातों से ज्यादा उत्तम है। बातों से भावनाएँ जाग सकती हैं, किंतु उस सिद्धाँत की अनुभूति के लिए यदि आवश्यक पुरुषार्थ न किया गया, तो समझो समय तथा भावना बेकार नष्ट हुई। आदर्शोन्मुखी आध्यात्मिक कर्म में ही तो जीवन का सच्चा सदुपयोग है।
चिंतन का आकलन करना हो तो उसे बड़ी आसानी से उनके उनके पत्रों द्वारा किया जा सकता है, जिसमें अनौपचारिक रूप में उनकी परामर्श भरी सद्भावना झलकती दिखाई देती है। स्वामी विवेकानंद के साहित्य में जितना जन-जन को रस आता है, उससे अधिक प्रेरणा उनके द्वारा लिखे पत्रों से मिलती है। ‘सलक्टेड लेटर्स ऑफ स्वामी विवेकानंद’ पुस्तक के पन्ने पलटकर देखा जा सकता है कि कितनी विविधता भरा शिक्षण उस देखा जा सकता है कि कितनी विविधता भरा शिक्षण उस महामनीषी ने तत्कालीन स्थितियों को दृष्टिगत रख दिया । इसी प्रकार बापू के पत्रों के वाङ्मय पर दृष्टि डालकर जाना जा सकता है कि उनके विभिन्न विषयों पर विचार क्या थे।
चिंतन के रूप में हम सबके लिए है। आज भी यह तथ्य अपनी जगह है कि हमें कष्टों को तप बनाकर जीवन जीने का अभ्यास डालना चाहिए। आत्मिक प्रगति तो सतत् अभ्यास से होती रहेगी, किंतु थोड़े-बहुत छोटे-मोटे लौकिक अवरोधों से हममें से किसी को भी विचलित नहीं होना चाहिए। साधना-विज्ञान का इतना सरल-सुगम व व्यावहारिक मार्गदर्शन इससे श्रेष्ठ और क्या हो सकता है।
चिंतन के विस्तार के लिए निभाई थीं। क्राँतिधर्मी साहित्य अभी हिंदी, गुजराती, उड़िया, बंगाली, मराठी में उपलब्ध है। तेलगू में प्रकाशित हुई युगशक्ति गायत्री के साथ-साथ यह उस भाषा में तथा दक्षिण की शेष तीन तमिल-मलयालम-कन्नड़ भाषाओं में भी इस वर्ष के अंत तक उपलब्ध होने जा रहा है। इस वर्ष के अंत में होने जा रहे सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ के साथ ही अंगरेजी में संभावित अखण्ड ज्योति के उच्चस्तरीय अनुवाद के प्रकाशन के साथ ही विश्वभर की न्यूनतम पाँच जर्मन, फ्रेंच, स्पेनिश, जापानी व चीनी भाषा में भी इन बीस+पाँच पुस्तकों के अनुवाद प्रकाशित हों, यह प्रयास किया जा रहा है। प्रतिभाओं को इस निमित्त अपना पुरुषार्थ जुटाना होगा।
चिंतन न केवल हमारी प्राणशक्ति का ह्रास करता है, हमारी कार्य-कुशलता को भी प्रभावित करता है। आँतरिक विषय चिंतन के कारण वह धीरे-धीरे असफलता की आरे बढ़ने लगता है, चाहे वह कितना ही कर्म करता दिखाई पड़े, कितने ही आकर्षक व्यक्तित्व वाला, ऊँचे पद वाला क्यों न हो।
चिंतन में उत्कृष्टता एवं व्यवहार में उदात्त भाव भरती है। एक ओर जहाँ इससे भौतिक पक्ष समृद्ध होता है, वहीं दूसरी ओर यह आत्मिक उत्थान की ओर अग्रसर होने का भी उचित एवं श्रेष्ठ माध्यम है। शिक्षा ‘शिक्ष’ धातु से आगे ‘गुरोश्च हलः’ सूत्र से ‘अ’ प्रत्यय होकर स्त्रीलिंग में ‘शिक्षा’ शब्द का प्रयोग होता है। इसका तात्पर्य है-जिसके द्वारा विद्या ग्रहण की जाए, उसे शिक्षा कहते हैं। ‘सा विद्यया विमुक्तेये’ कहकर विद्या की महत्ता प्रतिपादित की जाती है।
चिंतन एवं व्यवहार में कैसे परिवर्तन ला सकती है। सत्य यही है कि आज का शैक्षिक परिदृश्य एकदम दिग्भ्रमित है।
चिंतन के कारण वह धीरे-धीरे असफलता की आरे बढ़ने लगता है, चाहे वह कितना ही कर्म करता दिखाई पड़े, कितने ही आकर्षक व्यक्तित्व वाला, ऊँचे पद वाला क्यों न हो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-January
चिंतन करने वाले व्यक्तियों की आँखों में चमक दिखाई देती है। चार्ल्स डार्विन न अपनी विख्यात ग्रंथ ‘एक्सप्रेशन ऑफ इमोशन’ में उल्लेख किया है कि संसार में केवल हिंदू जाति के व्यक्तियों में ये समस्त विशिष्टताएँ परिलक्षित होती है, हालांकि इसकी झलक मलायास , न्यूजीलैंड तथा बोर्निया के डूयाक्सके निवासियों में भी दिखाई देती है।
चिंतन प्रसारित कर राष्ट्र की स्वतंत्रता की आधारशिला के रूप में प्रकाशित किया जाना।
चिंतनशक्ति , ज्ञान और बुद्धि के ऊपर उठ जाने पर ही आगे के लोक से आगे की उन्नति के लिए संपर्क स्थापित हो पाता है। यदि बात ऐसी नहीं होती तो दुनिया में क्रमिक और क्रमबद्ध विकास के स्थान पर छलाँगने जैसी प्रक्रिया दिखलाई पड़ती, जो न केवल अनबूझ होती वरन् अनुपयोगी भी।
चिंतन को पूर्णतः आचरण में नहीं ला सके। इसके लिए निराश होने की बजाय मन में वज्र संकल्प करो। वर्ष 2000 तुम्हारे जीवन की नई राहें खोल रहा है। उन पर वीरतापूर्वक आगे बढ़ो। जिसने अपने जीवनलक्ष्य की प्राप्ति का दृढ़ संकल्प कर लिया है, उसके मार्ग में कौन बाधा डाल सकता है।
चिंतन का गौरवगान हुआ है। अथर्वण ऋषि अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में धरा की महानता उदारता , सर्वव्यापकता आदि अनंत गुणों पर विस्मय−विमुग्ध हो कह उठे, हे माता! आपके लिए ईश्वर ने शीत वर्षा तथा वसंत ऋतुएँ बनाई हैं।दिन-रात के चक्र स्थापित किए हैं। इस कृपा के लिए हम आभारी हैं। मैं भूमि के जिस स्थान पर खनन करूं , वहाँ शीघ्र ही हरियाली छा जाए।
चिंतन चेतना से ओतप्रोत रहे हैं। साँख्य दर्शन में प्रकृति और पुरुष के समवाय का सृष्टि का कारण माना है। प्रकृति जड़ एवं स्थूल होते हुए भी अति सूक्ष्म है। अतः प्रकृति समस्त सृष्टि की उत्पत्ति का प्रमुख कारण है। चूँकि प्रकृति को यहाँ इतना सूक्ष्मातिसूक्ष्म दर्शाया है, इसलिए इसमें पर्यावरण अनायास ही जीवंत हो उठा है।
चिंतन मंथन में उलझे सेठ मूलराज को नींद नहीं आई। तर्क-वितर्क चलते रहे। उनका मन गहरी ग्लानि से भर गया। जीवनभर कुछ नहीं किया- न दूसरे का ही कुछ विशेष भला किया और न स्वयं के सार्थक हितचिंतन में तत्पर हुए। अब तो लड़के भी बड़े और समझदार हो गए है।
चिंतन देने का प्रयास करें। मात्र लाड़ दुलार न दे तो यह बात कोई पोहाँध सुनता नहीं। पर कहे कौन किससे? ज्ञान वैराग्य की कथा कहने रहने वाले ही जब श्रोता भक्तजनों से भी अधिक गए-गुजरे सिद्ध होते हों , तो ‘सत्य वचन, महाराज ‘ की विडंबना ही सिर हिलाती रहेगी।
चिंतन , चंदन महक रहा है।, उत्कृष्ट-आचरण को जन-मन ललक रहा है॥
चिंतन करने लगते हैं वरन् अनाप शनाप व्यय भी कर डालते हैं। इन सभी में हमें मनोनिग्रह की निताँत आवश्यकता है। यदि मन पर संयम रख जाए।वासनाओं को नियंत्रण में रखा जाए, पाकेट में अतिरिक्त पैसा न रखा जाए, तो आप इंद्रियों को वश में रख सकेंगे।
चिंतन में लीन ऋषि -महापुरुषों को इंद्रियभोग नहीं व्यापते। जहाँ इंद्रियों को तृप्ति मिलती है, वहाँ आदमी के समुद्र में हलचल पैदा हो जाती है। आत्मारूपी समुद्र में हलचल पैदा हो जाती है। आत्मारूपी समुद्र में यदि कोई हलचल न पैदा हो, ऐसा व्यक्ति इंद्रियभोग करता हुआ दिखाई देकर भी वैसा होता नहीं है।
चिंतन को पूर्णतः आचरण में नहीं ला सके। पिछला साल भी कुछ यूँ ही गुजरा। अब नए संकल्प की आवश्यकता है। अब तक तुम अपने चिंतन को पूर्णतः आचरण में नहीं ला सके। इसके लिए निराश होने की बजाय मन में वज्र संकल्प करो।
चिंतन में तत्पर हुए। अब तो लड़के भी बड़े और समझदार हो गए है। वे व्यापार सँभाल ही रहे है। फिर न जाने क्यों मैं इतना आसक्त हो रहा हूँ। उन्होंने आखिर निर्णय ले ही लिया कि कल ही वे किसी आध्यात्मिक गुरु की शरण प्राप्त कर अपने शेष जीवन को परमेश्वर के गुणानुवाद और लोकहित में खपा देंगे।
चिंतन के परिप्रेक्ष्य में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में निरंतर प्रकाशित हो रही है। अठारह अध्यायों के विभिन्न श्लोकों में वर्णित विषयों पर यह शृंखला अनवरत प्रकाश डालती रहेगी। विगत अंक में पाठक-परिजन ‘ स्थितप्रज्ञ ‘ की व्याख्या के परिप्रेक्ष्य में आसक्ति से निवृत्ति होकर कैसे परमात्मा का साक्षात्कार करने वाले स्थितप्रज्ञ पुरुष की उच्चतम आध्यात्मिक प्रगति होती है, यह पढ़ चुके हैं। यह विषय अत्यंत गंभीर भी है। एवं आज जब मनीषियों -महापुरुषों का चारों ओर अकाल सा दिखाई देता है-बड़ा महत्वपूर्ण एवं सामयिक भी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-June
चिंतन के रूप में ही इस युग का निष्कलंक अवतार, ऋतंभरा प्रज्ञा की स्थापना के रूप में आ रहा है।
चिंतन करता है, वही सच्चा धर्मज्ञ है। किसी भी प्राणी से द्रोह भाव विहीन जीवनवृत्ति ही श्रेष्ठ धर्म है। मैं जीवन के लिए उपयोगी वस्तुएँ दूसरों से क्रय करके बेचता हूँ। जीवन को हानि पहुँचाने वाली वस्तुओं को नहीं बेचता। छल-कपट से दूरी सभी को अपना मित्र मानता हूँ और सभी के हित-चिंतन में लगा रहता हूँ।
चिंतन में लगा रहता हूँ। मेरी यह तुला सभी के लिए समान है। किसी के साथ मेरा कोई भेदभाव नहीं है। मैं सदा ही सबके साथ समान व्यवहार करता हूँ।
चिंतन करते हुए वे उनके पास पहुंचे और निवेदन किया, हे भगवान! आपसे शिक्षा ग्रहण करने का उपयुक्त समय अब आ पहुंचा है। कृपया हमें उपदेश दीजिए।
चिंतन एवं सद्कर्म ही जीवन का राजपथ है।”
चिंतन के रुझान के अनुरूप उँगली पकड़कर दिग्दर्शन कराना, यही तो सद्गुरु का कार्य रहा है। आज गायत्री जयंती की पुण्यवेला में जब हम पूज्यवर को स्मरण करते हैं, तो उनकी ये पंक्तियाँ अंदर तक स्पर्श कर जाती हैं। लाखों सद्गृहस्थों का निर्माण कर उन्हें धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की दिशा में अग्रगामी बनाने वाली सत्ता जिस लक्ष्य को लेकर आई थी, उसकी पूर्ति हेतु काफी पूर्व आज से पचास साल पहले ही तत्पर हो गई थी।
चिंतन में लग गए।
चिंतन को और अधिक स्पष्ट करते हुए लिखा था, “लोग अपने देश को एक जड़ पदार्थ का टुकड़ा समझते हैं-खेत, वन और पहाड़ियों-नदियों के रूप में, लेकिन मैं आपने देश को अपनी माता मानता हूँ। मैं उसकी आराधना करता हूँ, माता के रूप में उसकी पूजा करता हूँ। यदि कोई राक्षस किसी पुत्र की माता की छाती पर चढ़कर उसका खून चूसने लगे, तो वह पुत्र क्या करेगा ? मैं यह जानता हूँ कि मुझ में इस गिरे हुए राष्ट्र को उबारने की ताकत है। शारीरिक शक्ति की बात नहीं, मैं कोई तलवार या बंदूक उठाकर लड़ने नहीं जा रहा, पर मैं ज्ञान की शक्ति से विजय प्राप्त करूंगा।
चिंतन से जब मनुष्य इस लक्ष्य को समझ लेता है कि प्रत्येक आत्मा निश्चय ही वहीं है, जो विश्व की आत्मा है। सभी आध्यात्मिक नाते से परस्पर आबद्ध है। प्रत्येक की दिव्यसत्ता हमारे भीतर ही संस्थित है तथा हम अपने भीतर दिव्य स्वरूप की अनुभूति कर सकते हैं, जो विश्वात्मा का शाश्वत अंश है, तब ज्ञानयोग की सार्थकता सिद्ध होती है।
चिंतन और चर्या का निर्धारण समान ही रहता है। सब मिलकर उपासनास्थली में जैसा वातावरण बनाते हैं। वह एकाँत सेवन की तुलना में कई गुना लाभकारी है। सूक्ति की तरह कहना हो तो एक घंटा की गई सामूहिक उपासना महीने भर तक किए गए एकाँत सेवन के बराबर परिणाम उत्पन्न करती है।
चिंतन का प्रकट कर पाते हैं। उनके अभ्यस्त सहायक उनका मंतव्य समझ लेते हैं और जिन वैज्ञानिकों के साथ वे काम कर रहे है, उन्हीं के समक्ष प्रस्तुत कर देते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-July
चिंतन के रूप में ही इस युग का निष्कलंक अवतार, ऋतंभरा प्रज्ञा की स्थापना के रूप में आ रहा है।
चिंतन और तप-साधना के लिए सदैव इसी का तट अभीष्ट रहा है। इसी के किनारे साँसारिक ताप से पीड़ित, मानवता को शाँति-मुक्ति देने वाले प्रमुख तीर्थों का निर्माण हुआ इसी के आँचल में देव-संस्कृति का विकास हुआ और सभ्यताएँ फली-फूली। इसके जल को अमृत की संज्ञा दी गई। सुविख्यात वैज्ञानिकों ने अपने परीक्षणों से इसकी अलौकिक विशेषता की पुष्टि की। भारतवासियों के साथ विदेशियों ने भी इसकी श्रेष्ठता को आश्चर्य विभोर होकर स्वीकारा।
चिंतन की यही विकृति उन्हें ले डूबी। उनका शत्रु कालकेतु व अन्य राजा कपट से उन्हें अपने वश में कर ब्राह्मणों का श्राप दिलाने में सफल हो गए और उन्हें अगले जन्म में रावण बनना पड़ा। उनने मंत्री व छोटे भाई ने कुँभकरण व विभीषण के रूप में जन्म लिया। लगभग सभी असुरों का इतिहास यही बताता है कि उन्हें चिंतन व चरित्र की विकृतियों ने ही गिराया है। देवगणों ने इस विभूति को खोया नहीं, अतः जब भी वे संगठित हुए, विजयी हुए।
चिंतन व चरित्र की विकृतियों ने ही गिराया है। देवगणों ने इस विभूति को खोया नहीं, अतः जब भी वे संगठित हुए, विजयी हुए।
चिंतन)।
चिंतन को और अधिक स्पष्ट करते हुए लिखा था, “लोग अपने देश को एक जड़ पदार्थ का टुकड़ा समझते हैं-खेत, वन और पहाड़ियों-नदियों के रूप में, लेकिन मैं आपने देश को अपनी माता मानता हूँ। मैं उसकी आराधना करता हूँ, माता के रूप में उसकी पूजा करता हूँ। यदि कोई राक्षस किसी पुत्र की माता की छाती पर चढ़कर उसका खून चूसने लगे, तो वह पुत्र क्या करेगा ? मैं यह जानता हूँ कि मुझ में इस गिरे हुए राष्ट्र को उबारने की ताकत है। शारीरिक शक्ति की बात नहीं, मैं कोई तलवार या बंदूक उठाकर लड़ने नहीं जा रहा, पर मैं ज्ञान की शक्ति से विजय प्राप्त करूंगा।
चिंतन इस निष्कर्ष पर पहुँचाएगा कि शक्ति प्रकट होने के लिए आतुर है। देवी को चेतना के रूप में समझें तो वह प्रश्न पूछती है, “हे प्रभु आपका सत्य क्या है ?” शिव अर्थात् मार्गदर्शक सत्ता इस प्रश्न का सीधे उत्तर नहीं देती। वे एक विधि बता देते हैं। देवी अर्थात् चेना अर्थात् साधन उस विधि से यात्रा कर लें तो उत्तर मिल जाएगा।
चिंतन व कर्म से गंगा माँ को प्रदूषित नहीं करेगा। तभी पतितपावनी गंगा मैया, इससे जुड़ी संस्कृति जीवित रह पाएगी। प्रदूषण के इस वर्तमान संकट के प्रति समय रहते हुए न चेते तो कहीं ऐसा न हो कि गंगा नदी भी एक दिन आर्यों की पावन सरस्वती नदी की तरह विलुप्त हो जाए।
चिंतन के साथ इस अंक में प्रस्तुत है।
चिंतन वाले नवयुवक के लिए यही रीति-नीति जरूरी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-March
चिंतन चलता है । महामृत्युँजय मंत्र में मृत्यु का भय निवारण करने वाले अर्थ का चिंतन किया जाता है ।
चिंतन भी आवश्यक है । साधारण स्थिति में यह स्वाभाविक रूप से भी चलता रहता है । उदाहरण के लिए, ॐ का जप करने पर निर्गुण-निराकार परमात्मा का स्मरण होता है, राम नाम जपने पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की छवि मन में आनी चाहिए, महामृत्युँजय जप में शिव के ब्रह्मस्वरूप की झाँकी का ध्यान किया जाता है और दैवीमंत्रों में भी संबंधित इष्ट की भावना उत्पन्न होती है । लेकिन यह अर्थ की भावना है, मंत्र का अर्थ नहीं है । अर्थचिंतन उस मंत्र के शाब्दिक अनुवाद और उसमें निहित प्रेरणाओं की अनुभूति का नाम है ।
चिंतन को ध्यान विधि और संकल्प से कितने ही साधकों ने अपने व्यक्तित्व का पुनर्गठन किया, उसे सुदृढ़ बनाया और विकसित किया । अर्थचिंतन एक सीमा तक साधक के स्तर को ऊपर उठाता है । उसके बाद मंत्र की ध्वनि ही काम करती है। यह सभी जानते हैं कि मंत्रों के गठन में ध्वनि और कंपन का विशेष महत्व है ।
चिंतन और व्यवहार को परिष्कृत भर कर लें । इतने से ही वे आज के इस दैवी मुहूर्त में वह सब कुछ हस्तगत कर सकते हैं, जिसके लिए जन्म-जन्माँतरों जितना समय चाहिए ।
चिंतन-चरित्र व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाने का प्रयत्न किया जा सके तो नीरोगी काया के साथ ही व्यक्तित्व परिष्कार का दुहरा लाभ उठाया जा सकता है। मन ही प्रगति या अवगति का, रुग्णता या नीरोगता का मूल है। इस तथ्य को जितना जल्दी समझा जा सके उतना ही बेहतर है।
चिंतन की दृष्टि से सज्जन और सभ्य-इन दो विशेषताओं को अपने भीतर पैदा करे आदमी, तो ये माना जाएगा कि उसने पात्रता का विकास कर लिया। पात्रता का विकास अगर कर लिया है, तो संसार में भी इज्जत और भगवान के यहाँ भी इज्जत। पात्रता का अगर आपने विकास नहीं किया, तो संसार में भी उपहास और तिरस्कार और भगवान् के यहाँ भी नाराजगी। आप कहीं भी, कुछ भी नहीं पा सकते। पात्रता की ओर ध्यान एकाग्र कीजिए।
चिंतन, मनन, धैर्य आदि इसके कारण ही बन पड़ते हैं। परिष्कृत मन जहाँ अनेक दिव्य क्षमताओं का भाँडागार है, वहीं विकृत मनःस्थिति रोग-शोक एवं आधि-व्याधि का कारण बनती है। आध्यात्मिक साधनाएँ, योग-तप आदि मन को साधने एवं परिष्कृत करने के विविध उपाय-उपचार हैं।
चिंतन-मनन के स्तर पर उनका महत्व है । वे विद्वानों की बौद्धिक और आँतरिक स्थिति को व्यक्त करते हैं । उस स्थिति में भावभरी और एकाग्र पुकार ही अंतस् के द्वार खोलती है । उस द्वार से साधक का अपना इष्ट प्रकट होता है ।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार में श्रेष्ठता की आशा भला कैसे की जा सकती है? रुग्ण मानस रुग्ण समाज को ही जन्म देगा। मन रोगी हो, तो काया भी अपना स्वास्थ्य अधिक दिनों तक स्थिर नहीं रख सकती। वैज्ञानिक क्षेत्र के नए अनुसंधानों ने कितने ही सिद्धाँतों का खंडन किया है। कितनी ही नई प्रतिस्थापनाएँ हुई हैं तथा कितने ही सिद्धान्तों में उलट-फेर करने के लिए विवश होना पड़ा है।
चिंतन सहायक है । साधना की उच्च कक्षा में पहुँचने पर अर्थविचार की आवश्यकता प्रायः नहीं रह जाती । एक स्थिति आने पर उसका निषेध भी किया जाता है । इसका कारण चित्त की एकाग्रता का ध्यान रखना नहीं है, मंत्र-विज्ञान के सूक्ष्म नियम मुख्य कारण है । जिनके चलते मंत्रजप के साथ उसके अर्थ पर ध्यान नहीं देने का निर्देश दिया जाता है ।
चिंतनप्रवाह मोड़ा गया तो सकारात्मक परिणाम सामने आए। बिना औषधि-उपचार से ही वे बहुत कुछ स्वस्थ हो गए।
चिंतन किया जाता है ।
चिंतन एक सीमा तक साधक के स्तर को ऊपर उठाता है । उसके बाद मंत्र की ध्वनि ही काम करती है। यह सभी जानते हैं कि मंत्रों के गठन में ध्वनि और कंपन का विशेष महत्व है ।
चिंतन से विषाक्त परोक्ष जगत् से उपजी हम सबकी नियति ही मानी जाएगी। पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। प्रतिभाओं का-जाग्रत जीवंतों का निताँत अकाल पड़ जाए, राष्ट्र के जागरण हेतु निस्वार्थ भाव से अपनी यथायोग्य शक्ति-समय भावभरा पुरुषार्थ व साधन देने वाले व्यक्ति चुक जाएँ, ऐसा समय न कभी आया है, न कभी आएगा। मात्र यह गूँज उन तक पहुँच नहीं पा रही है। यह पत्रिका परमवंदनीया माता जी की टीस को-परमपूज्य गुरुदेव की अंतर्वेदना से भरे इन शब्दों को दिग्दिगंत तक गुंजायमान करने हेतु ही सतत् पुरुषार्थ कर रही है।
चिंतन के सागर में ऊहापोह का ज्वारभाटा मच रहा था । भगवान् तथागत का उत्तर उनके लिए सम्यक् समाधान न बन पाया । अपितु और अधिक समस्या की गुत्थियों को उलझाने वाला लगा । प्रसेनजित ने साहस कर पुनः प्रश्न किया, “प्रभो ! उस समय तो राजर्षि को सातवें नरक में स्थान मिलता, किंतु यदि इस समय मृत्यु हो जाए तो ?”
चिंतन की मशीन से कीजिए, ताकि प्यार द्वार सही विचार करे और अपने आप को तहस-नहस न होने दें। प्यार अपनी बीबी को कीजिए, ताकि उसका व्यक्तित्व आप निखार सके। प्यार आप बच्चों से कीजिए, ताकि उनको संस्कारवान बना सके। प्यार अपने मुल्क को कीजिए, देश को कीजिए, धर्म और संस्कृति को कीजिए, ताकि उनको इस लायक बना सके कि वह सम्मानास्पद हो, उनका मजाक नहीं उड़ाया जाए। हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति के बारे में लोग तरह-तरह के लांछन न लगा सकें, ऐसा कीजिए न! भक्ति का अर्थ प्यार होता है।
चिंतन का अपना महत्व है । गायत्री मंत्र का अर्थ सर्वविदित है । परमपूज्य गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने इसके अर्थचिंतन को ध्यान विधि और संकल्प से कितने ही साधकों ने अपने व्यक्तित्व का पुनर्गठन किया, उसे सुदृढ़ बनाया और विकसित किया । अर्थचिंतन एक सीमा तक साधक के स्तर को ऊपर उठाता है । उसके बाद मंत्र की ध्वनि ही काम करती है।
चिंतन-निषेधात्मक विचारो में एक प्रकार से युद्ध हो रहा है। यही इस युग विचारक्रांति है, जो देवत्व को मानव मन में उत्कृष्ट अरइयर्रपरइरे लिर्ण्रीएररे केस्न में स्थापित कर रही है। गायत्री परिकर और उसकी युग निमार्ण योजना जिस तरह क्रियाशील है, एक परिष्कृत प्रगतिशील सर्वधर्म समभाव वाले धर्मतंत्र का स्वरूप क्रमशः स्पष्ट होता जा रहा है। गायत्री मंत्र जन जन तक पहुँचा है एवं सद्बुद्धि के विस्तार के साथ-साथ एक जाति विहीन समाज की ओर मानवजाति अग्रसर हो रही है। क्रोध-आवेश उत्तेजना-तनाव ने ही आज मनुष्य को नारकीय जीवन उत्तेजना-तनाव ने ही आज मनुष्य को नारकीय जीवन जीने को मजबूर कर दिया है।
चिंतन की एक लहर पैदा करने हेतु आगामी डेढ़ वर्ष का समय निर्धारित किया गया है। यह समग्र संकल्प हिमालयवासी गुरुसत्ता का ही है।
चिंतन वालों की दृष्टि से नया ‘मिलेनियम’ आ गया, एक सहस्राब्दी बदल गई। बड़े मौज-मजे व जश्न के साथ नए वर्ष में बहुसंख्य व्यक्तियों ने प्रवेश किया। इन सभी के इस रागरंग भरे महोत्सव से अरबों की धनराशि एक रात्रि में ही स्वाहा हो गई, वातावरण प्रदूषित हुआ, वह अलग है। हम पाश्चात्य, अंधानुकरण करने वाले भारतीयों को न जाने कब से पश्चिम का यह रोग लग गया है, जिसका ज्वार थामे नहीं थमता। भारतीय संस्कृति में शक संवत्, विक्रम संवत्सर एवं युगाशब्द को मनाने का प्रचलन है।
चिंतन की प्रवृत्ति को बढ़ावा। (स) व्यसन मुक्ति अभियान में स्वयं व औरों की भागीदारी। परिवार निर्माण के तीन सूत्र है- (अ) परिवार में सुव्यवस्था श्रमशीलता मितव्ययिता शालीनता-सहकार की पंचशील वृत्तियों का पालन। (ब) पुँसवन संस्कार द्वारा माता शिशु का कल्याण-जन्मदिवस व विवाह दिवस संस्कारों का प्रचलन। (स) मला शक्ति के जागरण हेतु प्रयोग उपचार।
चिंतन उस मंत्र के शाब्दिक अनुवाद और उसमें निहित प्रेरणाओं की अनुभूति का नाम है । गायत्री मंत्र का जप करते समय जैसे तीनों लोकों के स्रष्टा ईश्वर के तेज का ध्यान करने और सद्बुद्धि की प्रार्थना का चिंतन चलता है । महामृत्युँजय मंत्र में मृत्यु का भय निवारण करने वाले अर्थ का चिंतन किया जाता है ।
चिंतन एक सीमा तक ही आवश्यक बताया गया है । पतंजलि ने योगसूत्र में एक स्थान पर कहा है, “तज्जस्पतदर्शभावनः” (1/24) इस सूत्र की टीका करते हुए स्वामी हरिहरानंद आरण्यक ने लिखा है-साधकों को पहले सावधानी से वाच्यवाचक भाव को मंत्र में जाग्रत करना पड़ता है । शब्द का जप तथा उसके अर्थ की भावना करते-करते मन अभ्यस्त हो जाता है । अभ्यास से जब चित्त कुछ स्थिर, निश्चित तथा ईश्वरीय भाव में स्थित होने में समर्थ हो जाए तब हृदय में स्वच्छ-शुभ्र-असीम आकाश की धारणा करनी चाहिए । हृदय -आकाश में स्थित ईश्वर के साथ अपने चित्त को मिलाकर निश्चित, संकल्पशून्य और तृप्तभाव से रहने का अभ्यास करना होता है ।
चिंतन एवं बदलाव के लिए संकल्पित समुदाय के रूप में ही इस युग का चेतनावतार आ रहा है, यह हमारी गुरुसत्ता ही नहीं प्रायः सभी महापुरुषों नोस्ट्राडमस, श्री अरविंद, स्वामी विवेकानंद, गोस्वामी तुलसीदास जी एवं संत सूरदास जी की भी भविष्यवाणी है। बदलाव भरा प्रसव पीड़ा के कष्टों से युक्त युगसंधि का यही समय है। इसी परिवर्तन की प्रक्रिया का उद्घोष करने-युगसंधि महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति द्वारा जन-जन में विधेयात्मक चिंतन की एक लहर पैदा करने हेतु आगामी डेढ़ वर्ष का समय निर्धारित किया गया है। यह समग्र संकल्प हिमालयवासी गुरुसत्ता का ही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-February
चिंतन बदलने हेतु कोई क्रिया करनी पड़े तो वह करेगा एवं इस जैसे बीसवीं सदी के समापन पर दिखाई दे रहे थे। भावसंवेदना का सतयुग अध्यात्म तत्वज्ञान के परिष्कृत रूप से ही आएगा। समझदारों की नासमझी-भ्राँतियाँ अवांछनीयताएं इसी से दूर होंगी। समर्थ एवं प्रखर अध्यात्म ही उज्ज्वल भविष्य की संरचना करेगा एवं उसी तंत्र को विनिर्मित करने में ऋषियुग्म का समग्र कर्तव्य नियोजित हुआ हैं।
चिंतन ही प्रखरता बता है। यद्यपि महात्मा कबीर की चेतना मूलतः आध्यात्मिक थी, परंतु वे समाज से विमुख न थे। अपने समय की सामाजिक चुनौतियों को स्वीकारने एवं इसके दायित्वों को निभाने को उनमें अपूर्व उत्साह था। हाँ यह वे अवश्य मानते थे कि प्रश्न चाहे निजी जीवन के हों या फिर सामाजिक जीवन के, उनका एकमात्र सही सार्थक एवं सटीक हल ‘अध्यात्म’ में ही निहित हैं। उनके दर्शन को आध्यात्मिक समाजवाद का नाम देना पूरी तरह समयोचित होगा।
चिंतन से प्रभावित हुए बिना न रहे। यह महात्मा कबीर की चिंतनधारा ही थी, जिसमें निमग्न होकर शहंशाह अकबर धीरे-धीरे मुल्लाओं के प्रभाव से मुक्त हो गया। उसने हिंदुओं के प्रति सहिष्णुता की नीति अपनाई। इतना ही नहीं, उसने युद्ध बंदियों को दास और मुसलमान बनाने की प्रथा पर 1562 ई. में रोक लगाई। हिंदुओं को तीर्थयात्रा कर से मुक्त कर दिया।
चिंतन बड़ा ही स्पष्ट हैं। वे लिखते हैं-”हम लोग सुषुप्ति की स्थिति में पड़ी राष्ट्रचेतना को कुँभकर्णी निद्रा से जगाने का प्रयास करेंगे।
चिंतन तो यही कहता था कि “एक नून तै सब जग कीआ, कौन भल कौन मंदे” अर्थात् एक ही नूर से सारा संसार रचा गया हैं, फिर भला कौन अच्छा है और कौन बुरा। छुआछूत का भेद भी उन्होंने इसी स्तर पर किया हैं। वह कहते हैं।
चिंतन को आत्मसात् करने वाले यह अच्छी तरह अनुभव कर सकते हैं कि दीनं-ऐ-इबही की उपर्युक्त सभी बातें इस निराले संत के कथन को दुहराने के सिवा कुछ नहीं हैं।
चिंतन का ही चमत्कार था, जिसने अकबर के शासनकाल में नवयुग के अभ्युदय की कल्पना को साकार किया। कतिपय प्रख्यात इतिहासवेत्ता भी इस सच को स्वीकार करते हैं कि कबीर साहब के दार्शनिक चिंतन को स्वीकार करके ही अकबर ने परंपराओं की तुलना में विवेक को महत्व दिया। यही नहीं उसने धर्मान्ध व्यक्तियों के घृणाभाव को दूर करने के लिए और धार्मिक विद्वेष को समाप्त करने के लिए विभिन्न धर्मों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया और इसका नाम तवहीदेइबही (दैवी एकेश्वरवाद) रखा। यह विभिन्न धर्म के लोगों को सन्निकट बनाकर सामाजिक-धार्मिक भ्रातृ-संप्रदाय स्थापित करने का प्रयास था। इसकी रचना सुलहे कुल के सिद्धांत को आधार मानकर की गई थी।
चिंतन से प्रभावित था।
चिंतन से उस जमाने में भी नए युग की स्थापना हुई।
चिंतन शैली से वैचारिक स्तर से वहाँ की सभ्यता, रहन, सहन, आचार-व्यवहार और जीवनक्रम की भविष्यत् की संभावनाओं की बारीकियाँ जानी जा सकती हैं। वैदिक युग कभी सतयुग था तो एक ही कारण था कि उस युग की चिंतनपद्धति तथा वैचारिक स्तर उत्कृष्ट था। यदि आज वह नहीं हैं तो निश्चित ही कहीं न कहीं विचारों के स्तर में गिरावट आई हैं, यह मानना चाहिए।
चिंतन में एक सामंजस्य स्थापित कर युगपरिवर्तन की प्रक्रिया को अमली जामा पहना सकता है। इस विचारक्राँति को अपने समय की सबसे सशक्त महाक्राँति कहना चाहिए।
चिंतनधारा ही थी, जिसमें निमग्न होकर शहंशाह अकबर धीरे-धीरे मुल्लाओं के प्रभाव से मुक्त हो गया। उसने हिंदुओं के प्रति सहिष्णुता की नीति अपनाई। इतना ही नहीं, उसने युद्ध बंदियों को दास और मुसलमान बनाने की प्रथा पर 1562 ई. में रोक लगाई। हिंदुओं को तीर्थयात्रा कर से मुक्त कर दिया। वह हिंदुओं के प्रति इतना सहिष्णु हो गया था कि 1564 ई. में उसने जजिया समाप्त कर दिया।
चिंतन और कर्म का एक प्रकार हैं, जिसके साथ ऊँचा उद्देश्य अनिवार्यतः जुड़ा होता है।
चिंतन को आत्मसात कर राष्ट्रीय चेतना में नवस्फूर्ति का संचार हुआ। नवजागरण की वेला शुरू हुई। राष्ट्रीय अवसाद का दूर होना प्रारंभ हुआ। सभी ने इस सत्य को स्वीकार किया कि स्वतंत्रता पूर्व भारत में राष्ट्रीय जागरण का जो महान् कार्य हुआ उसके केंद्र में स्वामी विवेकानंद के माध्यम से व्यक्त होने वाला श्रीरामकृष्ण का दार्शनिक ज्ञान ही सक्रिय रहा हैं। अपने समय की संक्रमण वेला वे सर्वोपरि प्रतिनिधि दार्शनिक थे।
चिंतन एवं आध्यात्मिक अनुभवों को ही स्वामी विवेकानंद एवं उनके गुरुभाइयों ने अपने कर्म में मूर्त किया। स्वामी विवेकानंद के माध्यम से उनके दार्शनिक चिंतन को आत्मसात कर राष्ट्रीय चेतना में नवस्फूर्ति का संचार हुआ। नवजागरण की वेला शुरू हुई। राष्ट्रीय अवसाद का दूर होना प्रारंभ हुआ। सभी ने इस सत्य को स्वीकार किया कि स्वतंत्रता पूर्व भारत में राष्ट्रीय जागरण का जो महान् कार्य हुआ उसके केंद्र में स्वामी विवेकानंद के माध्यम से व्यक्त होने वाला श्रीरामकृष्ण का दार्शनिक ज्ञान ही सक्रिय रहा हैं।
चिंतनप्रवाह को जन्म देना एक अवतारी स्तर की सत्ता का ही काम हैं। हमारी गुरुसत्ता का जीवनक्रम हम देखते हैं, तो बहुआयामी रूप में उनके व्यक्तित्व रूपी विराट् हिमालय का दर्शन करते हैं। इसीलिए वह प्रचंड प्राणप्रवाह वाली लेखनी बनकर कभी लाखों अखण्ड ज्योति पाठकों के मनों को मथती हैं, उन्हें कुछ कर दिखाने के लिए तत्पर करती हैं, एक रचनात्मक घटक बनने को प्रेरित करती हैं। कभी वह उनकी ओजस्वी वाणी के प्रवाह से निस्सृत हो दृश्यजीवन में प्रखर तप व गहन ममत्व से भरी प्राण फूँक देने वाली अपनी इस विधा से अनेकों के जीवन की दिशाधारा बदले देती हैं। आध्यात्म मंच से समाज व राष्ट्र के अभिनव निर्माण के रचनात्मक क्रिया–कलाप जब उस साधक-संगठन के माध्यम से चलते हैं, तो गायत्री परिवार को सरकार के समानाँतर एक विराटतम आदर्श स्वयंसेवी संगठन के रूप में स्थापित कर देते हैं।
चिंतन का ढाँचा बदला हैं एवं जन-जन को सतयुगी मनःस्थिति में जीने की दिशा में अग्रगामी बनाया हैं। समाज की आधी जनशक्ति नारी शक्ति के जागरण-उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त कर दिखाया हैं। बौद्धिक क्राँति द्वारा चिंतन का, नैतिक क्राँति द्वारा चरित्र का एवं सामाजिक क्राँति द्वारा व्यवहार का परिष्कार उन्हीं का दिया सबसे व्यावहारिक जीवनदर्शन हैं। इन पुस्तकों के विचारों एवं ‘अखण्ड ज्योति’ में प्रकाशित प्रतिमाह संप्रेषित उनकी चिंतनचेतना ने लाखों-करोड़ों को झकझोर कर ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया हैं, जहां परिवर्तन सुनिश्चित दिखाई पड़ रहा हैं। ऐसा ही युगद्रष्टा अपनी ऐतिहासिक क्राँतिधर्मी रचना ‘सतयुग की वापसी’ 1989 में हमें कहता है।
चिंतन से सारी जगती प्रभावित हुई, अनेकानेक नाम विगत 3-4 माह से समाचारपत्रों में देखने को मिल रहे हैं। आइंस्टीन से लेकर कार्लमार्क्स, लेनिन से लेकर रुजवेल्ट तथा महात्मा गाँधी के नाम लिए गए। इन सबमें एक ही नाम निरवाद रूप से उभरकर आया हैं, वह हैं गाँधी जी का, जो महात्मा के रूप में प्रसिद्ध हुए। अहिंसा व सविनय अवज्ञा के माध्यम से एक आँदोलन छेड़ पहले दक्षिणी अफ्रीका एवं बाद में भारतवर्ष था। एक आध्यात्मिक संत राजनीति में सक्रिय हो एक महासाम्राज्य, जिसके राज्य में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था, के उपनिवेशों को आजाद करने और कराने में सफल रहा, निश्चित ही जिस सहस्राब्दी में पश्चात् संस्कृति का बोलबाला रहा हो, विज्ञान व उपभोगवाद ही चिंतन पर हावी रहा हो, लोग इसे पश्चिमी सभ्यता की सहस्राब्दी ही सिद्ध करने पर तुल हो, एक भारतवासी अधनंगे फकीर द्वारा शिखर पुरुषों की होड़ में शीर्ष स्थान पाना एक गर्व का विषय है।
चिंतन प्रणाली के वे पहले द्रष्टा एवं संस्थापक थे इसी के आधार पर उन्होंने नवयुग के अभ्युदय की कल्पना की थी।
चिंतन इसका साक्षी हैं।
चिंतन मनन करें और आग के गोल की भाँति तेजस्वी होकर समस्त विश्व में व्याप्त हो जाएँ। कभी नालंदा विश्वविद्यालय के शिक्षक विद्यार्थियों को तराशा करते थे। गुरु जी ने सार जीवन यही किया। प्रत्येक व्यक्ति को ऊँचा उठाने में उन्होंने अपना समस्त जीवन लगा दिया। कोई भी हमारा परिजन यह नहीं कह सकता कि गुरु जी के पास से हम खाली हाथ बैट आए हैं।
चिंतन आचार्य श्री के लेखन में सामाजिक परिवर्तन की चिनगारी के रूप में एवं छोटे से आरंभ होकर विराट् रूप में फैल क्रिया–कलापों में दिखाई देता है। उन दिनों की प्रतिकूल परिस्थितियों में एक विधवा ब्राह्मणी का पुनर्विचार, एक दूसरे धर्म में विवाहित महिला के सामाजिक बहिष्कार से संघर्ष, कर्मकाँडों को परे रख तर्कसम्मत विचारों का प्रस्तुतीकरण, छोटी कहीं जाने वाली जातियों में जाकर उनकी ममत्व भरी सेवा, स्वावलंबन हेतु रोजगार के विकल्प ग्रामोद्योग के रूप में एवं हॉटों में जाकर स्वच्छता विस्तार से लेकर भारत की आजादी का संदेश हैंडबिल से वितरित करने वाले युवा श्रीराम ‘मत्त’ के जीवनवृत्त से ही हम एक ऐसी झलक पाते हैं, जो उनके क्राँतिधर्मी लेखन का आधार बनी।
चिंतनपद्धति तथा वैचारिक स्तर उत्कृष्ट था। यदि आज वह नहीं हैं तो निश्चित ही कहीं न कहीं विचारों के स्तर में गिरावट आई हैं, यह मानना चाहिए।
चिंतन करने में जो आनंद हैं, वह और कही नहीं। हे गुरुवर! उच्चस्तरीय साधना हेतु मैं पहाड़ों जैसी शाँति चाहता हूँ। गुरु ने कहा वत्स! पहाड़ों का परमार्थ अनिश्चित हैं। तू सुदूर क्षेत्रों में जा-जहां अज्ञान का तिमिर व्याप्त है। व्यक्ति दीनहीन स्थिति में अपना जीवनयापन कर रहें हैं।
चिंतन ने सामान्य जनता के साथ समकालीन संतों-विचारकों को भी प्रभावित किया। एक प्रसंग के अनुसार संवत् 1553 या 1554 में सिख पंथ के प्रवर्तक गुरुनानक देव जी की भेंट स्नान करते समय किसी नदी के किनारे उनसे हुई। इस भेंट ने नानकदेव जी को बहुत प्रभावित किया। वह कबीर का प्रभाव ही हैं कि गुरु ग्रंथ साहिब में कबीर की अनेकों रचनाएँ आज भी पढ़ी जा सकती हैं। इसके अलावा संत रैदास, दीपा, धन्ना, एवं सेन जैसे कबीर के समसामयिक संत उनके प्रति श्रद्धा भाव रखते थे।
चिंतन को स्वीकार करके ही अकबर ने परंपराओं की तुलना में विवेक को महत्व दिया। यही नहीं उसने धर्मान्ध व्यक्तियों के घृणाभाव को दूर करने के लिए और धार्मिक विद्वेष को समाप्त करने के लिए विभिन्न धर्मों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया और इसका नाम तवहीदेइबही (दैवी एकेश्वरवाद) रखा। यह विभिन्न धर्म के लोगों को सन्निकट बनाकर सामाजिक-धार्मिक भ्रातृ-संप्रदाय स्थापित करने का प्रयास था। इसकी रचना सुलहे कुल के सिद्धांत को आधार मानकर की गई थी। इसमें सभी धर्मों की अच्छी बातों को समावेश था।
चिंतन के स्तर पर जो विकृतियों का कुहासा छाया आज दिखाई दे रहा था, उसे युगप्रवर्तक के क्राँतिकारी विचार ही मिटा सकते थे। यही कार्य उन्होंने किया व अब नई सहस्राब्दी के द्वार पर खड़ी मानवजाति के समक्ष एक ऐसा नूतन दर्शन लाकर रख दिया हैं कि सारी समस्याएँ इसी धुरी पर मिटती चली जाएँगी, नया युग शीघ्र आएगा एवं सारे विश्व का वैचारिक-साँस्कृतिक आध्यात्मिक मार्गदर्शन करेगा।
चिंतन एवं चरित्रनिष्ठ जीवन को महत्व दिया, लेकिन बाद में इसमें भी मत-मताँतर होने लगे।
चिंतन हमारी आराध्यसत्ता का रहा हैं एवं उसी ने इस निराशा के कुहासे से उबारकर सतयुगी संकल्प के साथ जोड़ा हैं। इस संकल्प की धुरी दो हैं- मनुष्य में देवत्व एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण। इसे स्वप्न नहीं, एक वास्तविकता बताते हुए युगऋषि ने विचारक्राँति की चिनगारी को दावानल बनाकर हमें नई सहस्राब्दी के द्वार पर ला खड़ा किया हैं।
चिंतन पर हावी रहा हो, लोग इसे पश्चिमी सभ्यता की सहस्राब्दी ही सिद्ध करने पर तुल हो, एक भारतवासी अधनंगे फकीर द्वारा शिखर पुरुषों की होड़ में शीर्ष स्थान पाना एक गर्व का विषय है।
चिंतन का, नैतिक क्राँति द्वारा चरित्र का एवं सामाजिक क्राँति द्वारा व्यवहार का परिष्कार उन्हीं का दिया सबसे व्यावहारिक जीवनदर्शन हैं। इन पुस्तकों के विचारों एवं ‘अखण्ड ज्योति’ में प्रकाशित प्रतिमाह संप्रेषित उनकी चिंतनचेतना ने लाखों-करोड़ों को झकझोर कर ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया हैं, जहां परिवर्तन सुनिश्चित दिखाई पड़ रहा हैं। ऐसा ही युगद्रष्टा अपनी ऐतिहासिक क्राँतिधर्मी रचना ‘सतयुग की वापसी’ 1989 में हमें कहता है। ‘‘इक्कीसवीं सदी उपेक्षित क्षेत्र को ही हरा-भरा बनाने में निष्ठावान् माली की भूमिका निभानी चाहिए। यह विश्व उद्यान इसी आधार पर हरा-भरा, फल-फूल एवं सुषमासंपन्न बन सकेगा।
चिंतनचेतना ने लाखों-करोड़ों को झकझोर कर ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया हैं, जहां परिवर्तन सुनिश्चित दिखाई पड़ रहा हैं। ऐसा ही युगद्रष्टा अपनी ऐतिहासिक क्राँतिधर्मी रचना ‘सतयुग की वापसी’ 1989 में हमें कहता है। ‘‘इक्कीसवीं सदी उपेक्षित क्षेत्र को ही हरा-भरा बनाने में निष्ठावान् माली की भूमिका निभानी चाहिए। यह विश्व उद्यान इसी आधार पर हरा-भरा, फल-फूल एवं सुषमासंपन्न बन सकेगा। आश्चर्य नहीं कि वह स्वर्गलोक वाले नंदनवन की समता कर सके।
चिंतन वाले महापुरुषों के बाल्यकाल के क्रिया–कलाप ही बात देते हैं कि वे किस मिट्टी से बनें हैं। ग्रामोत्थान से राष्ट्रनिर्माण की बातें बीसवें-तीसवें दशक में एक किशोर-श्रीराम मत्त के द्वारा पराधीन भारत में की जा रही थी। बाद में वही चिंतन आचार्य श्री के लेखन में सामाजिक परिवर्तन की चिनगारी के रूप में एवं छोटे से आरंभ होकर विराट् रूप में फैल क्रिया–कलापों में दिखाई देता है। उन दिनों की प्रतिकूल परिस्थितियों में एक विधवा ब्राह्मणी का पुनर्विचार, एक दूसरे धर्म में विवाहित महिला के सामाजिक बहिष्कार से संघर्ष, कर्मकाँडों को परे रख तर्कसम्मत विचारों का प्रस्तुतीकरण, छोटी कहीं जाने वाली जातियों में जाकर उनकी ममत्व भरी सेवा, स्वावलंबन हेतु रोजगार के विकल्प ग्रामोद्योग के रूप में एवं हॉटों में जाकर स्वच्छता विस्तार से लेकर भारत की आजादी का संदेश हैंडबिल से वितरित करने वाले युवा श्रीराम ‘मत्त’ के जीवनवृत्त से ही हम एक ऐसी झलक पाते हैं, जो उनके क्राँतिधर्मी लेखन का आधार बनी।
चिंतन का केंद्र कहा जाए, तो अत्युक्ति न होगी। वे कहते हैं कि दूध से मक्खन निकालकर घी बनाने के लिए उसे उबाला जाता है, मथा जाता है। इसी तरह युगसंधि पर्व में पूरे समाज के समुद्रमंथन जैसी प्रक्रिया की आज अनिवार्य आवश्यकता है प्रतिभा परिष्कार को युग की महती आवश्यकता बताते हुए। उन्होंने कहा है कि महाकाल को इस समय इन्हीं की सर्वाधिक जरूरत हैं। जन्म-जन्मांतरों से संचित सुसंस्कारों वाली प्रतिभाओं की खोज कर उन्हें युगचेतना से जोड़कर प्रज्ञापरिकर का सदस्य बनाया जाए, यही उस महापूर्णाहुति का लक्ष्य होगा, यह भी महाकाल के अग्रदूत ने अपनी युगसंधि महापुरश्चरण की प्रक्रिया के विस्तार के समय बताया था।
चिंतन तक ले जाना ही अवतारी प्रवाह का लक्ष्य रहा है। इस युग की दार्शनिक भ्रष्टता बड़े अजीबोगरीब स्तर की हैं। उपयोगवाद से ऊब चुके विज्ञान के शिखर पर पहुँचे समाज में चिंतन के स्तर पर जो विकृतियों का कुहासा छाया आज दिखाई दे रहा था, उसे युगप्रवर्तक के क्राँतिकारी विचार ही मिटा सकते थे। यही कार्य उन्होंने किया व अब नई सहस्राब्दी के द्वार पर खड़ी मानवजाति के समक्ष एक ऐसा नूतन दर्शन लाकर रख दिया हैं कि सारी समस्याएँ इसी धुरी पर मिटती चली जाएँगी, नया युग शीघ्र आएगा एवं सारे विश्व का वैचारिक-साँस्कृतिक आध्यात्मिक मार्गदर्शन करेगा।
चिंतनराशि को एक अखंड-सुसंबद्ध भाषा में इसके पूर्व कभी किसी ने विदेशियों, प्राचीन वैदिक सत्यद्रष्टा महर्षियों के समान श्रोताओं को ‘अमृत के पुत्रों’ कहकर संबोधित करते हुए महान् ब्रह्मर्षि के स्वर तथा भाषा में कहा- ‘अमृत के पुत्रों!’ कैसा मधुर और आशाजनक संबोधन हैं यह। बंधुओं! मैं इसी मधुर नाम से तुम लोगों को संबोधित करना चाहता हूँ। तुम अमृत के अधिकारी हो। हिंदू तुम्हें पापी कहने से इनकार करता है। तुम तो ईश्वर की संतान हो चिर आनंद के भागी हो, पवित्र और पूर्ण हो।
चिंतन में निमग्न थे। वह था 1967 में घोषित महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया, इसके लिए महामानवों की तलाश एवं देव-परिवार बसाने के लिए एक टकसाल विनिर्मित करने के लिए एक सिद्धपीठ का निर्माण।
चिंतन में यह सत्य स्वीकार करते हैं कि अपने आत्मरूप में सब जन मुक्त हैं, बस माया के भुलावे में आ गए हैं। उन्हीं के शब्दों में ‘कोणासींच नाही’ बन्धन भ्रान्तिस्तव भूलल जन।’ वह चाहते थे सभी इसी भ्राँति से उबरें। दार्शनिक विचारों से पतनोन्मुखी समाज का उन्नयन करना था। राष्ट्र की निर्बल नसों में नई शक्ति, नई चेतना, नवस्पूर्ति और नवजीवन का संचार करना था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-September
चिंतन में लगा था और अब बदली हुई विपरीत दशा में भी उसका चिंतन शरीर पर ही केंद्रित होता है। इस भाँति विपरीत अति पर जाकर मन धोखा दे देता है। इस धोखाधड़ी में वह अपनी मूलवृत्ति को बचा लेता है। सदा ही अतियों में चलते रनहे की इस मानसिक वृत्ति का कारण यही है। विपरीत अतियों में चलने की यह मन की प्रवृत्ति ही असंयम है।
चिंतन यही है कि यदि राजधानी जहाँ सारा प्रशासकीय तंत्र, प्रतिभाओं का तंत्र, राष्ट्र की सर्वोच्च साँसद विद्यमान है, से यह प्रयोग आरंभ होगा, तो सबल-सशक्त नाड़ियों से इसका विधेयात्मक प्रवाह सारे विश्व को एक नई ऊर्जा देगा। इतनी बड़ी-बड़ी रैली दिल्ली में होती रहती हैं, पर उनका परिणाम नहीं निकलता। सभी भाषणबाजी, घोषणाओं में समाप्त हो जाती हैं। अपना यह महायज्ञ कोई रैली नहीं, अखिल विश्व गायत्री परिवार के व्यक्ति-परिवार -समाज निर्माण की दिशा में किए गए सफलतम प्रयोगों की जन-जन को जानकारी कराने हेतु प्रतिभाओं को, विभूतियों को उनके कर्तव्यों की याद दिलाने हेतु एवं नवयुग के आगमन का तुमुलनाद करने का लक्ष्य लेकर एक विराट् आध्यात्मिक प्रयोग है, जो कि महापुरश्चरण (बारह वर्षीय युगसंधि अनुष्ठान) की महापूर्णाहुति की वेला में किया जा रहा है। सभी जानते हैं कि महापूर्णाहुति पाँच चरणों में विभाजित की गई थी।
चिंतन किया था। गाँधी वाङ्मय में उनके तद्विषयक विचार बिखरे पड़े है। स्वतंत्रता आँदोलन में धर्म परिवर्तन का सीधा कोई संबंध नहीं दिखाई देता, लेकिन गाँधी जी मानते थे कि धर्म बदलने का अर्थ है, व्यक्ति की अंतरात्मा को बदलना। अंतरात्मा कोई वस्त्र या आभूषण नहीं है कि उसे बदला या पहना और उतारा जा सके। वह पिछले जन्मों के संस्कारों का समुच्चय है।
चिंतन की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रकृति स्वयं किसी भी चेतना को पूर्ववर्ती संस्कार और स्तर के अनुरूप वातावरण में भेजती है। अर्थात् एक व्यक्ति शैव मार्ग का साधक है, तो पंचानवे प्रतिशत संभावना यही है कि अगले जन्म में वह किसी शिव-भक्त परिवार में ही जन्मेगा। वहाँ पिछले जन्म में प्राप्त संस्कार और पुण्य को बढ़ाता हुआ यात्रा को आगे बढ़ाता है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने इस तथ्य को बहुत सूक्ष्म रूप में समझाया है। योगभ्रष्ट व्यक्ति की गति, स्थिति का वर्णन करते हुए वे कहते हैं कि किसी कारण इस जन्म में किए प्रयत्न सफल नहीं होते, तो भी कोई हर्ज नहीं।
चिंतन-चेता का असाधारण परिष्कार हो सकता है और हम सहज ही मनोबल सम्पन्न बन सकते हैं। कहना न होगा कि मनोबल की गरिमा शरीर-बल, शिक्षा-बल, धन-बल, कौशल-बल आदि से सभी की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है। उसे सहारे मनुष्य उन्नति के उस चरम शिखर पर पहुँच सकता है, जिसकी कल्पना कर सकना भी किसी के लिए कठिन है।
चिंतन, जिससे भविष्य की तस्वीर गढ़ी जा सकती है या इसकी चुनौतियों का सामना किया जाता है, इसी ठोस सामग्री के आधार पर संभव है।
चिंतन में समावेश से नवयुग का एक आधार खड़ा किया जाएगा। आत्म शक्ति जागेगी, तो युगशक्ति निषेचित ही अवतरित होगी। यह आयोजन सभी को यह बोध कराएगा कि सहकार की ताकत सरकार से बड़ी होती है। राष्ट्र का साँस्कृतिक जागरण विभूतियों की सृजनात्मक कार्यों में भागीदारी द्वारा संभव है। यह आशावादी उमंगें जगें, उसके लिए सात आँदोलनों को गति देने के लिए विशिष्ट कार्यक्रम इस महायज्ञ में सभी को दिए जाएँगे।
चिंतन का निवारण व जनमानस में परिष्कृत दृष्टिकोण का प्रतिष्ठापन, यही है हमारा विचारक्राँति अभियान। यही है इस युग का सर्वोपरि महत्वपूर्ण धर्मानुष्ठान ज्ञानयज्ञ। युग निर्माण योजना इन्हीं प्रयत्नों में प्राणपण से संलग्न है।”
चिंतन से भरे प्रतिभावानों के मन मिलकर एक विराट् मन बन जाते हैं। जब इस विराट् मन (कलेक्टिव माइंड) के द्वारा शब्द शक्ति का प्रयोग किया जाता है, संकल्पों के साथ जुड़कर कुछ उद्घोषणा की जाती है, तो उसका प्रभाव उस स्थान विशेष नहीं, सारी धरती पर पड़ता है, इस महायज्ञ में भी पड़ने जा रहा है। भारतवर्ष के सारे विश्व का सिरमौर बनने की भविष्य वाणियाँ उस प्रयोग के बाद निश्चित ही सफल होती दिखाई देंगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
चिंतन का परिष्कार हैं। शारीरिक बल-वृद्धि तथा मानसिक स्वास्थ्य के रूप में शेष अनुदान स्वतः मिलते चले जाते हैं। हमारा शरीर स्रष्टा की अनुपम देन है। यहाँ जीवकोष से लेकर जीन्स तक तथा न्यूरान्स से लेकर हार्मोन्स तक सभी अनंत क्षमताओं से सम्पन्न हैं। केवल इनकी संभावनाओं को पहचानना एवं उनका सदुपयोग करना मनुष्य को आना चाहिए।
चिंतन शरीर पर ही केंद्रित होता है। इस भाँति विपरीत अति पर जाकर मन धोखा दे देता है। इस धोखाधड़ी में वह अपनी मूलवृत्ति को बचा लेता है। सदा ही अतियों में चलते रनहे की इस मानसिक वृत्ति का कारण यही है। विपरीत अतियों में चलने की यह मन की प्रवृत्ति ही असंयम है।
चिंतनधारा। विकृतियाँ यही से उद्भव होती हैं। व्यक्तित्व इसी निकृष्टता के कारण स्वार्थी और संकीर्ण बनते हैं ओछे व्यक्तियों से भरा समाज विग्रहों, समस्याओं, दुर्बलताओं और अभावों को केंद्र ही बना रहेगा। आज की स्थिति में सबसे बड़ा शौर्य यह है कि हम पूरा मनोबल इकट्ठा करके प्रखर परिवर्तन प्रस्तुत करें, जिसमें विवेक की ही प्रतिष्ठापना हो और अविवेकपूर्ण दुर्भावनाओं एवं दुष्प्रवृत्तियों को पैरों तले कुचल कर रख दिया जाए।
चिंतन प्रारंभ हुआ। इसके सूत्रधार थे प्रो. बरनूफ। विश्व के प्राचीनतम साहित्य के रूप में वेदों के प्रति यूरोपियनों में रुचि जाग्रत् करना उनका विशेष लक्ष्य था। प्रो. बरनूफ ने स्पष्ट किया कि तुलनात्मक भाषाविज्ञान के द्वारा ही वेदों को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। वेदाध्ययन के क्षेत्र में इसे एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में माना गया और इसी के फलस्वरूप वेदों के अध्ययन के क्षेत्र में दो प्रकार की विचारधाराएँ पनपीं-पहली भारतीय एवं दूसरी पश्चिमी।
चिंतन और उत्कृष्ट आचरण से बनता है। वह समय विशेष का मोहताज नहीं उसे हम कभी और कहाँ भी विनिर्मित कर सकते हैं, इससे दो मत नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-November
चिंतनीय उद्भावनी शक्ति, कार्यक्षमता असीम और उत्साह अदम्य और सबसे बढ़कर थी उनकी ईश्वर के प्रति उन्मुखता। जन्म से ही थे वे ध्यानसिद्ध, आत्मज्योति में सदा निमग्न। पूजा-प्रार्थना, आत्मानुसंधान में बचपन से ही उनकी रुचि एवं अधिकार थे। इन अनन्य-असाधारण संस्कृति पुरुष के जीवन के विविध अध्याय पढ़ने पर हम लोग पाएँगे कि ये सारी बातें अतिरंजित नहीं, बल्कि सत्य की तुलना में बहुत कम हैं।
चिंतन करें, तो पाते हैं कि ऋषियों के बताए मार्ग पर न चलने के कारण ही हम वर्तमान स्थिति को प्राप्त हुए है। देवसंस्कृति का ढाँचा खड़ा करने हेतु परमपूज्य गुरुदेव ने आश्रम-व्यवस्था में आई सामयिक विकृतियों में हेरफेर कर लोकजीवन की सबसे सशक्त परंपरा ‘वानप्रस्थ’ का पुनरुज्जीवन किया। अपने समय की यह सबसे बड़ी क्राँति मानी जानी चाहिए कि सामान्य जीवन जीने वाले अगणित व्यक्ति अनायास ही तप प्रधान वानप्रस्थ जीवन की प्रेरणा पाकर इस आश्रम में प्रवृत्त हो गए। गायत्री परिवार इन्हीं साधु-ब्राह्मणों, वानप्रस्थों का समुच्चय है, यह देख-समझने के बाद इस क्राँति के मर्म को जाना जा सकता है। धर्म-तंत्र की विकृतियों को, बौद्धकाल की विडंबना भरी परिस्थितियों को पहले आद्य शंकराचार्य ने बाद में स्वामी विवेकानंद ने काफी सीमा तक ठीक किया।
चिंतन की मूल धुरी बनाया, इसी निमित्त सारे कार्यक्रम जुटाए।
चिंतन प्रस्तुत करते हुए युगऋषि ने कहा, “पारमार्थिक जीवन जीने के लिए व्रत-धारण करने वाले नर-नारी ऐसा भी कर सकते है। कि विवाह तो करें, पर संतानोत्पादन के झंझटों से बचे रहें। ऐसी स्थिति में वे सुविधापूर्वक किसी भी आयु में वानप्रस्थ में प्रवेश कर सकते है। जिन्हें संयोगवश संतान नहीं मिली, उनके सौभाग्य को हजारों मुखों से सराहा जाना चाहिए कि उन्हें देव जीवन जीने का लाभ लेने का अवसर मिला।” (पृष्ठ 24) वस्तुतः समाज-सुधारक स्तर की संस्कृति पुरुष की सत्ता ही यह सब लिख सकती थी।
चिंतन वालों की होती है। उदार चरितानाम् तू’ भावनाशील उदार हृदय व आचरण वालों के लिए तो “वसुधैव कुटुम्बकम्” सारी विश्व-वसुधा ही एक परिवार होती है। ऐसा उदाहरण आज के युग में हम सबके समक्ष परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी के माध्यम से सामने आया। जो हमारा मार्गदर्शन आज भी कर रहा है। यही तो देवसंस्कृति के सृजन सैनिकों साधु ब्राह्मणों की आचार-संहिता बनने जा रहा है।
चिंतन प्रवाह धाराक्रमपरक हो गया और विवेक के प्रकाश से विचारणीय विषय स्वयं अपने समाधान खोलने लगे।
चिंतन था उस युगऋषि का कि उन्होंने आज की सभी समस्याओं का समाधान इस परंपरा के पुनर्जागरण द्वारा बताया। उन्होंने लिखा, “सेवा-साधना के लिए इन दिनों हमें एक ही केंद्र पर केंद्रित होना है। वह है, ज्ञानपज्ञ, ज्ञानयज्ञ। विचारक्राँति, विचारक्राँति, विचारक्राँति। चूँकि अपना कार्य भावनाओं के परिष्कार से संबंध रखता है, इसलिए उसके साथ आध्यात्मिक पृष्ठभूमि अनिवार्य है।
चिंतन में ही लीन रहता।” सर्वविदित है कि डॉ. राधाकृष्णन भारतीय दर्शन और विद्या धाराओं के अधिकारी विद्वान थे। ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालय में उन्होंने भारतीय दर्शन पढ़ाया। उनकी अँगरेजी व्याख्याएँ यूरोपीय जगत् में भारतीय दर्शन की प्रामाणिक और प्रतिनिधि रचनाएँ समझी जाती है।
चिंतन-चेतना ही सक्रिय हुई है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-August
चिंतन, अपनी आस्थाओं को आमूलचूल बदलना होगा या फिर निज के अस्तित्व को बड़ी निर्ममतापूर्वक मिटते स्वयं देखना होगा। इन दिनों मिशन के गीतों में एक गीत बड़ा लोकप्रिय है, “महाकाल की चली सवारी, चलो साथ हो जाएँ, यह परिवर्तन की वेला है युगपरिवर्तन लाएँ।” इसी गीत में एक पंक्ति है, “परिवर्तन का चक्र जल रहा सभी बदल जाएँगे, जो न बदल पाएँगे, अपने आप कुचल जाएँगे” यह पंक्ति जिस बात की घोषणा कर रही है, उसका संकल्प स्रष्टा के श्रीमुख से गीता के ग्यारहवें अध्याय में प्रकट हुआ है।
चिंतन के विस्तार को समेटकर उसे किसी एक विषय पर केंद्रीभूत कर लेने पर उस विषय के एक से एक रहस्य उजागर होने लगते हैं और चिंतन को उसमें वरिष्ठता और विशिष्टता प्राप्त हो जाती है । ऐसा एकाग्रता के अभाव में शक्य नहीं है, अस्तु बुद्धिमान् बनने के लिए एकाग्रता संपादन अनिवार्य है ।
चिंतन के क्षेत्र में भी उनकी गवेषणाएँ देश को आश्वस्त करती है। ‘इंडिया टू थाउजेंड ट्वंटी ए विजन फॉर न्यू मिलेनियम’ में उन्होंने इस बात की प्रबल संभावना व्यक्त की है कि सन् 2020 में भारत अति उन्नत देश हो जाएगा।
चिंतन-चरित्र और व्यवहार के बहुमुखी पक्षों में आदर्शवादिता का प्रवेश। यह कार्य अत्यंत कठिन है। अंतराल का कायाकल्प करने एवं सर्जरी के समान है। इसमें भावनाओं, मान्यताओं, संवेदनाओं, आकाँक्षाओं के अनेकानेक पक्षों-स्तरों में जनचेतना का संचार एवं इसी हेतु इसमें कितने ही तर्कों, तथ्यों, प्रमाणों और उदाहरणों का समावेश करना होता है। इस संग्रह के लिए मनन और अध्ययन-अवगाहन के मानसरोवर में उतरे हंसों की तरह मोती बीनने पड़ते हैं।
चिंतन दूर करने के सभी उपाय किए जाते इसका सत्परिणाम देखकर उन्होंने अपनी मातृभूमि के अतिरिक्त कई अन्य देशों में यह कार्यशाला चलाई और लाखों व्यक्तियों का रोगमुक्त किया । अमेरिका में यह संस्था अभी भी कार्यरत है।
चिंतन के परिप्रेक्ष्य में ली जाए, तो अगले दिनों और बढ़ेगी । केबल टीवी , दूरसंचारी उपग्रहों से घरों में संप्रेषण, वायरलैस प्रोटोकॉल जैसे मिनीयंत्रों द्वारा कार्यालयों का हाथ में सिमट आना, ‘ ऑनलाइन’ शिक्षण प्रणाली का विकास होना एक संकेत देता है, अगले दिनों परिवर्तन बड़ी तेजी से होंगे। विज्ञान की दिशा में , बौद्धिक प्रगति की दिशा में यदि इसी गति से प्रगति होती रही तो सब कुछ जो वर्षों में होता था, अब कुछ घंटों नहीं,बल्कि कुछ ही क्षणों में होता देखा जाएगा। ऐसी परिवर्तन की वेला में जब सब कुछ तेजी से हो रहा है, सर्वाधिक प्रभावित जो एक महत्वपूर्ण विधा हुई है, वह है मानव की संवेदनशीलता-भावना शक्ति, जो बुद्धि के साथ मिलकर प्रतिभा को जन्म देती है। परिष्कृत प्रतिभाओं का अकाल इसलिए इन दिनों पड़ रहा है कि यह तथाकथित प्रगति एकाँगी हुई है एवं यही हम सबके लिए भस्मासुर की पुनरावृत्ति भी बन सकती है तथा प्रयास किया जाए तो एक रचनात्मक उपलब्धि भी।
चिंतन किया जाता था, चर्चाएं चलती थीं और विद्वज्जनों की गोष्ठियाँ होती थी, उन दिनों एक दो पंक्ति में की गई परिभाषाएँ पर्याप्त थी। लेकिन आज ये परिभाषाएँ जटिल ही हैं । व्यवहार -क्षेत्र में इनसे कोई सहायता नहीं मिलती, इसलिए पढ़-सुनकर लोग नाक भौं ही सिकोड़ते हैं। उनके प्रति श्रद्धा जागने के स्थान पर उपेक्षा के भाव ही आते हैं। आठ-दस रुपये में मिलने वाली टीकाओं से खीझकर कुछ आलोचकों ने तीखी टिप्पणियाँ की है।
चिंतन एवं दृष्टिकोण तनाव को बढ़ावा देते हैं। सुप्रसिद्ध स्नायविक तनाव विशेषज्ञ डॉ0 एडमंड जेकबसन के अनुसार ब्लडप्रेशर, हृदय रोग आदि अब मध्यम वर्ग के लोगों में भी पनप रहा है। इसका मूल कारण उन्होंने अज्ञा भय, चिंता जो अंतर्मन में व्याप्त हो जाती है, को बताया है। इसके फलस्वरूप व्यक्ति की स्वाभाविक खुशी व प्रफुल्लता छिन जाती है। इसी तरह जो लोग अधिक आराम का, विलासी जीवन जीना चाहते हैं, परिश्रम से बचना चाहते हैं, आमदनी से अधिक बढ़ चढ़कर खर्च करते हैं, वे अपने चारों ओर मकड़जाल की रह अत्यधिक चिंताओं का घेरा बुन ले हैं।
चिंतन-मनन एवं गुण, कर्म, स्वभाव पर भी छाई रहती हैं। फलस्वरूप शरीर और मन दोनों की शक्तियों अंधाधुँध अपव्यय होता रहता है और दोनों क्षेत्रों पर छाई रहने वाली उत्तेजना, आवेशग्रस्तता अंततः चित्र-विचित्र रोगों के रूप में फूटती है। महँगे टाँनों, दवाइयों से इन पर नियंत्रण पाना आसान नहीं है। इनसे छुटकारा पाने के लिए हमें मनोकायिक एवं योगपर मनो-आध्यात्मिक उपाय-उपचारों का आश्रय लेना पड़ेगा। समग्र स्वास्थ्य संवर्द्धन की दिशा में तभी आगे बढ़ा और जीवन का सच्चा आनंद उठाया जा सकता है, जब गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार में उत्कृष्टता तथा सदाशयता का समावेश किया जा सके।
चिंतन को उसमें वरिष्ठता और विशिष्टता प्राप्त हो जाती है । ऐसा एकाग्रता के अभाव में शक्य नहीं है, अस्तु बुद्धिमान् बनने के लिए एकाग्रता संपादन अनिवार्य है ।
चिंतन -मनन करने पर ज्ञात होता है कि जिस अंतराल में यह विकसित होती है, उसका मस्तिष्क एक प्रकार का चुँबकीय गुण प्राप्त कर लेता है, जिससे उसका इच्छित विषय अपने आप खिंचता रहता है। कहते हैं कि वैध को रोगी हर जगह मिल जाते हैं । एक दूसरी कहावत है कि बेगारी को स्वर्ग में भी बेगार मिलेगा। इन उक्तियों में सत्य का अंश यह है कि उसका मानसिक चुँबकत्व अपने अनुकूल स्थितियाँ आकर्षित कर लेता है । निखिल विश्व- ब्रह्माँड में अनंत ज्ञान भरा हुआ हैं ।
चिंतन एवं लोगों की सद्भावनायुक्त सम्मिलित ईश-प्रार्थना की शक्ति चमत्कारी ढंग से अपना प्रभाव दिखाती है।
चिंतन को नए आयाम दिए, वे घरेलू किस्म के व्यक्तियों का पुरुषार्थ नहीं है। वैसे आविष्कार घर परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त या उनकी उपेक्षा करने वाली प्रतिभाओं से ही संभव हो सके है।
चिंतन-मनन से खुलता है अखंड ज्योति के पन्नों पर क्रम से इस विषय में पथ के प्रदीप प्रस्तुत है।
चिंतन-मनन एवं विचारधारा के अनुरूप होती हैं। निषेधात्मक, निराशावादी, संशयात्मक चिंतन एवं दृष्टिकोण तनाव को बढ़ावा देते हैं। सुप्रसिद्ध स्नायविक तनाव विशेषज्ञ डॉ0 एडमंड जेकबसन के अनुसार ब्लडप्रेशर, हृदय रोग आदि अब मध्यम वर्ग के लोगों में भी पनप रहा है। इसका मूल कारण उन्होंने अज्ञा भय, चिंता जो अंतर्मन में व्याप्त हो जाती है, को बताया है। इसके फलस्वरूप व्यक्ति की स्वाभाविक खुशी व प्रफुल्लता छिन जाती है।
चिंतन और ध्यान करना ईश्वर-प्राणिधान है।
चिंतन प्रेरक, जातक की आत्मा) एवं आध्यात्मिक (अतिमानसिक विराट् पुरुष की ज्योति) तीनों स्वरूपों पर प्रभाव के माध्यम से त्रिपदा गायत्री की उपासना सौर-सक्रियता के समय एक दैवी संरक्षण साधक को उपलब्ध कराती है। इस महापूर्णाहुति की वेला में सभी को अपना साधनात्मक पुरुषार्थ प्रखर करना होगा। इसके अलावा कोई और चारा है भी तो नहीं।
चिंतन, चरित्र, व्यवहार में उत्कृष्टता तथा सदाशयता का समावेश किया जा सके।
चिंतन व भावना जगत् में अभूतपूर्व परिवर्तन ला देने वाले घटनाक्रम घटेंगे। इस विधेयात्मक विश्वास को जितनी दृढ़तापूर्वक जितनी जल्दी अपना लिया जाए, उतना ही मानव मात्र के कल्याण के लिए हितकारी है। विभिन्न भविष्यवाणियों की संगति जिस समय विशेष से बैठती है, वह यही है 1995 से 2005 तक के बीच का समय। प्रकृति प्रकोपों के साथ उतरने वाली दंड−प्रक्रिया जो ईश्वर का विधान है, किसी हद तक आज की स्थिति से संगति भी खाता है।
चिंतन में उत्कृष्टता का समावेश एवं चिंतन-चरित्र और व्यवहार के बहुमुखी पक्षों में आदर्शवादिता का प्रवेश। यह कार्य अत्यंत कठिन है। अंतराल का कायाकल्प करने एवं सर्जरी के समान है। इसमें भावनाओं, मान्यताओं, संवेदनाओं, आकाँक्षाओं के अनेकानेक पक्षों-स्तरों में जनचेतना का संचार एवं इसी हेतु इसमें कितने ही तर्कों, तथ्यों, प्रमाणों और उदाहरणों का समावेश करना होता है। इस संग्रह के लिए मनन और अध्ययन-अवगाहन के मानसरोवर में उतरे हंसों की तरह मोती बीनने पड़ते हैं।
चिंतन और दृष्ट आचरण ही प्रकाराँतर से दैत्य-दानव को भूमिका निभाता है। गुँबज में अपनी ही आवाज प्रतिध्वनि बनकर लौटती है। आज की सभी छोटी-बड़ी परिस्थितियाँ हमारे अपने द्वारा ही आमंत्रित हैं। क्रम उलट दिया जाए, तो प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदलने में देर नहीं लगेगी। समय-समय पर अनेक बार यही होता रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-April
चिंतन संयम भी सम्मिलित है। ब्रह्मचर्य के इस तत्वज्ञान को अपनाने वाले केवल आध्यात्मिक प्रगति की दिशा में द्रुतगति से अग्रसर होते हैं, वरन् शारीरिक और मानसिक, पारिवारिक और आर्थिक क्षेत्रों की भौतिक सुख-शांति का भी प्रत्यक्ष लाभ लेते हैं।
चिंतन और विचार की निकृष्टता से अधिक हानि पहुँचती है। इसलिए ब्रह्मचर्य में केवल नर नारी का संयोग संयम ही नहीं, चिंतन संयम भी सम्मिलित है। ब्रह्मचर्य के इस तत्वज्ञान को अपनाने वाले केवल आध्यात्मिक प्रगति की दिशा में द्रुतगति से अग्रसर होते हैं, वरन् शारीरिक और मानसिक, पारिवारिक और आर्थिक क्षेत्रों की भौतिक सुख-शांति का भी प्रत्यक्ष लाभ लेते हैं।
चिंतन से मन मस्तिष्क को बचाने का अत्यधिक महत्व है क्योंकि नर नारी के बीच मिलन तो यदा कदा ही होता है इसमें परिस्थितियाँ और मर्यादाएँ बहुधा अवरोध बनती हैं। इतने पर भी इस प्रसंग में चिंतन और विचार की निकृष्टता से अधिक हानि पहुँचती है। इसलिए ब्रह्मचर्य में केवल नर नारी का संयोग संयम ही नहीं, चिंतन संयम भी सम्मिलित है। ब्रह्मचर्य के इस तत्वज्ञान को अपनाने वाले केवल आध्यात्मिक प्रगति की दिशा में द्रुतगति से अग्रसर होते हैं, वरन् शारीरिक और मानसिक, पारिवारिक और आर्थिक क्षेत्रों की भौतिक सुख-शांति का भी प्रत्यक्ष लाभ लेते हैं।
चिंतन को परिष्कृत कर तदनुसार अपनी रीति नीति बनाकर कार्य करने को तैयार है, वह गायत्री परिवार का सदस्य है, यह निर्धारण परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा जी आचार्य ने किया। इसी धुरी पर एक विराट् संगठन खड़ा होता चला गया। जिसकी संख्या आज नौ करोड़ के लगभग आँकी जाती है। ममत्व विस्तार साधना से लेकर जीवन व्यापार संबंधी सही समय पर दिए गए मार्गदर्शन ने परिजनों को दिशा दी एवं वे गायत्री परिवार के अभिभावक संरक्षक आचार्यजी से जुड़ते चले गए। जुड़ाव भी घर के एक बुजुर्ग सदस्य जैसा।
चिंतनक्षेत्र में आरोपित करने का अभ्यास कर लेना चाहिए। जैसे जैसे आँतरिक अभ्यास परिपक्व होने लगता है, मनःसंस्थान उन्हीं संस्कारों में ढल जाता है, जैसा कि बहिरंग के व्यवहार में उन्हें झलकना चाहिए। ‘स्वे स्वे आचरेण शिक्षयेत्’ का सिद्धाँत हमारे ऋषिगण हमें पढ़ा गए हैं। उसे हमें अच्छी तरह आत्मसात् कर अपनी जीवन-शैली में ढालने का प्रयास करते रहना चाहिए।
चिंतन में लीन थे, तभी भार्गव वैदर्भी ने उन्हें श्रद्धाभाव से प्रणाम किया और एक ओर खड़ा हो गया। महर्षि ने उसे अपने पास बुलाते हुए बैठने का संकेत करते हुए कहा-आयुष्मान् ! तुम्हारी मानसिक परेशानियों का शमन हो गया अथवा नहीं ? तुम्हें और क्या जानना शेष है ? तुम्हारे मन में जो संशय-शंकाएं हों, उन्हें तुम मुझसे पूछ सकते हो।
चिंतन नवनीत के रूप में उपलब्ध है।
चिंतन में निरत रहने को ही ज्ञानयोग-साँख्ययोग या संन्यासयोग कहा जाता है। केवल भगवत् सत्ता के निमित्त समत्वभाव से, बिना किसी फल का कामना के - आसक्ति को त्यागकर जो कर्म किया जाता है वही गीता का कर्मयोग है। इसी को तदर्थकर्म, मदर्थकर्म, मर्त्कम, समत्वयोग नाम से स्थान स्थान पर भगवान् ने उच्चरित किया है।
चिंतन को आदर्शवादी उपक्रम में उभारने वाला पराक्रम-पुरुषार्थ। जो इसे हजम कर पाते हैं, वे ही विभूतिवान् और सिद्धपुरुष कहलाते हैं।
चिंतनलीन हुए और उनके अधरों पर मंदस्मित झलका। जिसकी आभा उनके समूचे मुखमंडल पर फैल गई। वह बोले- वत्स ! आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वाक्, चक्षु, कान ये सभी देवता है। इंद्रियों के द्वारा ये सभी मिलकर देवों की शक्ति को प्रकाशित करते हैं और प्राणी के शरीर को धारण करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-July
चिंतन किया वचसा कभी भी, श्यामे ! अनाथ मुझको लख जो कृपा हो, तो है यही उचित अंब! तुम्हें सदा ही ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-August
चिंतन यदि गहरी अनुभूति और श्रद्धा पूर्वक किया जाय तो आत्मा एक स्वर्गीय दिव्य भाव से ओत प्रोत हो जाता है आत्मा इस दिव्य आनन्द को विचार क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रखता वरन् क्रिया में लाकर इसका सुदृढ़ आनन्द भोगने की और कदम उठाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-April
चिंतन करने से मनुष्य विकार ग्रस्त, रोगी दीन हीन रहता है। उसमें नए नए शक शुवे उठते हैं। वह कई ऐसी कमजोरियाँ अपने व्यक्तिगत में बढ़ा लेता है, जिसका अस्तित्व बिल्कुल नहीं होता। धीरे-धीरे ये कल्पित रोग न्यूनताएँ शरीर में विचार शक्ति के दुरुपयोग स्वरूप स्वतः प्रकट हो जाती हैं। व्यक्ति बीमार हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-March
चिंतन द्वारा ज्ञान अपनी चीज बन जाता है। पाये हुए ज्ञान के आधार पर अपने को देखना, निष्पक्षता से अपने गुण दोषों का विचार करना आत्मनिरीक्षण है। आत्मनिरीक्षण के बाद जगहित के लिए ग्रन्थ रचना की जाती है। यह निर्माण तप जगत् को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा करना उपदेश है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-June
चिंतन करें। अपने प्रश्न को उनके सामने रखकर चित्त को बिल्कुल खाली कर दें। कुछ समय में अपने आप आपके अंदर एक उत्तर सूझ पड़ेगा। यह स्फुरणा गुरु की मानकर तदनुसार कार्य करना चाहिए। साधक को अपनी सफलता के लिए आचार्य का वरण करना आवश्यक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-May
चिंतन ही करती है उसी प्रकार गायत्री शक्ति द्वारा भी साधक का हित ही सम्पादन होता है। माता के प्रति बालक गलतियाँ भी करते रहते हैं, उसके सम्मान एवं पूज्य भाव में बालकों से त्रुटि भी रह जाती है और कई बार तो वे उलटा आचरण कर बैठते हैं इतने पर भी माता न तो उनके प्रति दुर्भाव मन में लाती है और न उन्हें किसी प्रकार की हानि पहुँचाती है। जब साधारण माताएं इतनी दयालुता, क्षमा और उदारता प्रदर्शित करती हैं तो आदि जननी वेद माता, सतोगुण की दिव्य सुरसरी, गायत्री से तो और भी अधिक आशा रखी जा सकती है। वह अपने बालकों की अपने प्रति श्रद्धा भावना को देखकर प्रभावित हो जाती है, बालक की भक्ति भावना को देखकर माता का हृदय उमड़ पड़ता है। उसके वात्सल्य की अमृत निर्झरिणी फूट पड़ती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-July
चिंतन, किसी भी संक्रामक रोग से कम भयंकर नहीं है। हैजा, प्लेग, फ्ल्यू, कोढ़, तपैदिक, चेचक, इन्फ्लुएँजा जैसी बीमारियाँ स्पष्ट दीखती हैं, इसलिए उनका इलाज भी हो जाता है, पर विकार दृष्टि का अदृश्य रोग ऐसा है, जो न पकड़ में आता है और न उसका किसी अस्पताल में इलाज किया जाता है। दांपत्ति जीवन पर इसका कितना बुरा प्रभाव पड़ता है, गृहस्थ की नींव इस बुराई के कारण कितनी खोखली हो जाती है और अपने बड़ों की दुष्प्रवृत्तियों का बच्चों के कोमल मन पर कैसा घातक प्रभाव पड़ता है, यह बहुत ही गंभीर प्रश्न है। मानसिक व्यभिचार की हानि, शारीरिक व्यभिचार से किसी प्रकार कम नहीं है। विचार ही तो अंत में कार्यरूप में परिणित होते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-June
चिंतन करके खिन्न बने रहते हैं। ऐसे लोगों को सदा संताप और क्रोध की आग में ही झुलसते रहना पड़ेगा। इस संसार में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं जिसमें कोई दोष-दुर्गुण नहीं और न ही कोई वस्तु ऐसी है जो सब प्रकार हमारे अनुकूल ही हो। सब व्यक्ति सदा वही आचरण करें जो हमें पसंद है ऐसा हो नहीं सकता। सदा मनचाही परिस्थितियाँ किसे मिली हैं?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-October
चिंतन करते हुए विचार करना चाहिए कि, "ईश्वर ने इस संसार के विविध आनंदों का रसास्वादन करने के लिए यह कितना सुंदर, कितना महत्त्वपूर्ण शरीर दिया है। शरीर छिन जाने पर सूक्ष्मप्राण केवल चेतना रूप रह जाते हैं। फिर संसार की विभिन्न रंग−बिरंगी अनुभूतियों का अनुभव करने की क्षमता हमें कहाँ रह पाती है? देवलोक में कुछ आनंद है, उन्हें प्राप्त करने के लिए जीव स्वर्ग जाने की आकांक्षा करता है। पर कुछ आनंद ऐसे हैं, जो स्वर्गलोक में भी नहीं हैं और जिन्हें प्राप्त करने की इच्छा से देवता भी स्वर्ग छोड़कर नरदेह में जन्म लेते और इस 'स्वर्गादपि गरीयसी'  धरती पर विचरण करने की आकांक्षा करते रहते हैं और जब भी उन्हें ऐसा अवसर मिलता है, तभी अपना सौभाग्य मानते हैं।
चिंतन करने के कुछ विचार प्रस्तुत किए गए हैं। हमें पूरे संकल्प में सन्निहित सभी विचारों पर धीरे−धीरे मनन और चिंतन करते रहना चाहिए। गत अंक में इस संबंध में और भी अधिक विस्तारपूर्वक विचार हो चुका है। चिंतन और मनन के समय ऐसे−ऐसे अगणित विचार उठ सकते हैं। उन पर एकांत में बैठकर मनन करते रहना चाहिए।
चिंतन करते रहना चाहिए। गत अंक में इस संबंध में और भी अधिक विस्तारपूर्वक विचार हो चुका है। चिंतन और मनन के समय ऐसे−ऐसे अगणित विचार उठ सकते हैं। उन पर एकांत में बैठकर मनन करते रहना चाहिए। युधिष्ठिर ने बाल्यकाल में ‘सत्यं वद’— इतना-सा गुरु का दिया हुआ पाठ याद करने में बहुत समय लगाया था।
चिंतन-मनन करते रहने में एक वर्ष का समय लग जाना कुछ अधिक नहीं है।
चिंतन को गत वर्ष जितना विस्तृत एवं क्षेत्र में बिखरा हुआ न रखकर उसे सीमाबद्ध कर रहे हैं, ताकि थोड़े विचारों पर अधिक तत्परता और तन्मयता के साथ चित्त-वृत्तियों को एकाग्र करते हुए मनोभूमि का सुदृढ़ निर्माण किया जा सके । गत मास युगनिर्माण संकल्प आरंभिक पृष्ठ पर छपा है और उसकी विस्तार से व्याख्या भी की गई है। यह संकल्प अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को दैनिक-साधना एवं उपासना की तरह मनोयोगपूर्वक नित्य ही पढ़ना और उस पर मनन रखना चाहिए।
चिंतन करते रहने से उस आदर्श के अनुकूल अपने आप को ढालने में भी कितनी सुविधा होती है। आत्मा के आंतरिक संतोष का नाम ही ईश्वरीय प्रसन्नता है, सो यह कार्य सन्मार्ग पर चलने वाले के लिए कितना सरल और सुगम है, ईश्वर की सृष्टि को सुंदर-सुविकसित बनाकर सच्ची ईश्वरभक्ति का परिचय देने वाला विवेकशील व्यक्ति जितना आनंद और उल्लास प्राप्त करता है, उतना विपुल वैभव वाले को भी नहीं मिलता। ईश्वरप्राप्ति का लक्ष्य, ईश्वर-आदेशों पर चलते हुए प्राप्त कर सकना कितना सुगम रखा गया है। वासना और तृष्णा के बंधनों को तोड़कर कर्त्तव्यपरायणता को अपना लक्ष्य रखने वाला कितना संतुष्ट रहता है। महापुरुषों का सर्वोपरि गुण, कर्त्तव्यपरायणता ही तो होती है।
चिंतन और मनन के समय ऐसे−ऐसे अगणित विचार उठ सकते हैं। उन पर एकांत में बैठकर मनन करते रहना चाहिए। युधिष्ठिर ने बाल्यकाल में ‘सत्यं वद’— इतना-सा गुरु का दिया हुआ पाठ याद करने में बहुत समय लगाया था। सत्संकल्प की विचारधारा इतनी विस्तृत है कि उस पर चिंतन-मनन करते रहने में एक वर्ष का समय लग जाना कुछ अधिक नहीं है।
चिंतन
चिंतन की साधना पाठकों ने आरंभ की थी और अखण्ड ज्योति के लेखों या किसी भी जीवन निर्माण करने वाली प्रेरणाप्रद पुस्तक को पढ़ने और उस पर मनन चिन्तन करते रहने का कार्य−क्रम अपनाया था। विचारों के परिमार्जन के लिए स्वाध्याय आवश्यक है। कुविचारों की काट सद्विचारों से ही होती है। गरम लोहे को ठंडा लोहा काटता है, काँटे-से-काँटा निकाला जाता है और विष-से-विष का शमन होता है। स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से जो सद्विचार ग्रहण किए जाते हैं, इन्हीं के द्वारा कुविचारों और कुसंस्कारों का प्रतिरोध किया जाता है।
चिंतन विस्तारपूर्वक करते हुए यह सोचना चाहिए कि ये  भावनाएँ कितनी वास्तविक, कितनी उपयोगी, कितनी सत्परिणामदायिनी, कितनी श्रेष्ठ और कितनी महान हैं। यदि सच्चे मन से उन पर विश्वास करें और उसी के आधार पर अपनी गतिविधियाँ निर्धारित करें तो जीवन कितना उत्कृष्ट, कितना दिव्य, कितना शांतिमय और कितना आदर्श बन सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-February
चिंतन द्वारा आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास का आधार ग्रहण करना होगा। अंतःकरण की पवित्रता और पुष्टि के लिए इस अवलंबन को मजबूती से पकड़े रहना आवश्यक है। इसके बिना लौकिक-प्रगति भी संभव नहीं। धर्म और नीति का आधार अध्यात्म है, उसे छोड़ देने पर चतुरता और कूटनीति ही मनुष्य के पल्ले पड़ती है। उससे तात्कालिक लाभ तो हो जाता है, पर अंत बहुत ही दुःखद होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-November
चिंतन वैसे ही करते रहते हैं, जैसे माता−पिता छोटे शिशु का करते हैं। उपेक्षा से हानि अपनी ही है। अकेलापन सदा अखरता है। दूसरे स्वजन-संबंधी एक समय तक ही साथ रह सकते हैं, उनका प्रेम भी बदले की प्रक्रिया पर निर्भर रहता है, फिर उनकी क्षमता और उदारता भी उतनी बढ़ी-चढ़ी कहाँ होती है। सबसे श्रेष्ठ और सबसे सस्ता साथी ईश्वर ही हो सकता है।
चिंतन का परिचय दिया था।
चिंतन करें और उन्हीं में तन्मय होकर अपनी मनोभूमि को भी वैसी ही गंदी बना लें, यह उचित नहीं। बुरी बातों को सोचते रहने से मन में क्रोध, क्षोभ, घृणा, द्वेष और दुःख की ही भावनाएँ बढ़ेंगी और इस बढ़ोत्तरी से न अपना आंतरिक विकास होगा, वरन उलटे बाहरी स्वभाव में निंदा, ईर्ष्या, द्वेष, कुढ़न, कटुता का समावेश हो जाने से अपने व्यक्तित्व का स्तर नीचा हो जाएगा। चिड़चिड़ापन, झुँझलाहट, अविश्वास, तिरस्कार, क्रोध, आवेश का स्वभाव उन लोगों का बन जाता है, जो दुनियाँ में बुराई ढूँढते, देखते, सुनते और मानते रहते हैं। यह लाभदायक नहीं हानिकारक प्रक्रिया है। चित्त को दुर्भावनाओं में डुबाए रहना कहाँ की बुद्धिमानी है?
चिंतन सदा न करते रहा जाए। अनुरक्ति से मतलब यह है कि यहाँ जो कुछ श्रेष्ठ है, शुभ है, उससे अधिक संपर्क बढ़ाया जाए, उसकी समीपता प्राप्त की जाए और उसी के संबंध में मस्तिष्क को अधिक सोच-विचार करने दिया जाए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-April
चिंतन-मनन यह आंतरिक उपाय हैं। इन चारों चरणों से मिलकर सर्वांगपूर्ण ज्ञान साधना बनती है और उसी के आधार पर जीव अपने लक्ष्य-मार्ग की ओर गतिशील होता है।
चिंतन करना चाहिए। अपनी व्यक्तिगत शक्ति स्वल्प है, जो सफलताएँ मिली हैं, उसमें अपना श्रेय न मानकर ईश्वर की ही अनुकंपा माननी चाहिए और अहंकार को तनिक भी न पनपने देना चाहिए। सफलताओं का श्रेय अपने ऊपर लेने वाले मनुष्य वास्तव में नास्तिक होते हैं। अहंकार नास्तिकता का प्रधान चिह्न है। प्रार्थना द्वारा हम इस अहंकार को ही गलाते हैं।
चिंतन, मनन के आधार पर जीवन की गुत्थियों को समझना और उन्हें सुलझाने का मार्ग खोजना संभव होता है; इसलिए मनीषियों ने इस बात पर बहुत जोर दिया है कि मनुष्य को ज्ञानवान बनना चाहिए। अत्यंत आवश्यक कार्यक्रमों में एक कार्यक्रम ज्ञान-संपादन का भी रहना चाहिए।
चिंतन और मनन करना होगा और यदि आध्यात्मिकता पर, उपासना पर वस्तुतः हम विश्वास करते हैं तो नियत समय पर पूजा−पाठ निपटने तक सीमित न रहकर ईश्वर को अपना जीवनसंगी बनाना पड़ेगा, हर घड़ी उसकी उपस्थिति अपने साथ अनुभव करने और अपने सद्विचारों एवं सत्कर्मों से उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करना होगा।
चिंतन के लिए मिल सकता है। वासनाओं की,तृष्णाओं की महत्वकांक्षाएँ ही मनुष्य का सारा समय, सारा मस्तिष्क, सारा ओज जोंकों की तरह चूसती रहती हैं। यदि इन नागिनों से छुटकारा पाया जा सके तो फिर आदमी के पास आत्मकल्याण के लिए कुछ सोचने और कुछ करने को इतनी बड़ी मात्रा में समय बच सकता है कि वह अपना लक्ष्य पूर्ण कर ले। 84 लाख योनियों में लाखों वर्षों तक भ्रमण कराने वाली पीड़ाओं से छूट जाए और इस सुरदुर्लभ मानव शरीर का सदुपयोग करके भावी पीढ़ी के लिए प्रकाश दीप की तरह युगयुगांतरों तक यशस्वी बने रहने के लिए अमरता प्राप्त कर ले।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-September
चिंतन से उसका आध्यात्मिक बल नष्ट हो जाता है और वह दुःख में डूब जाता है।
चिंतन में ही अपना समय व्यतीत करता है। इस तरह के कुचिंतन से उसका आध्यात्मिक बल नष्ट हो जाता है और वह दुःख में डूब जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-June
चिंतन करने से काम भावना और भी प्रबल हो जाती है। इस रागात्मक मनोवृत्ति के विनाश के लिये रूप के दुर्गुणों पर विचार करना आवश्यक है। शरीर की गंदगी पर विचार करने से उसके प्रति अनुराग चला जाता है। मुर्दे की कल्पना करके उस पर चिन्तन करने से शरीर के प्रति अनुराग नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार धन, मान आदि के दुर्गुणों पर नित्य विचार करने से इनके प्रति अनुराग नष्ट हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-February
चिंतनीय है। आप बाहर से प्रेरणा की आशा क्यों करते हैं? स्मरण रखिये किसी दूसरे को आप में दिलचस्पी नहीं है। स्वयं आपको अन्दर से प्रेरणा लेनी होगी। आपका आत्म विश्वास स्वयं आपकी ही विकसित चीज है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-April
चिंतनशील व्यक्ति यों के मन में बार−बार आता है। यदि भारतीय संस्कृति सर्वोच्च है, तो वह अपना संरक्षण अपने आप क्यों नहीं कर सकती? हम दूसरे राष्ट्रों के अधीन क्यों बने हैं? एक अँग्रेज लेखक का कथन है कि जब संस्कृतियों में संघर्ष होता है, तो

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-December
चिंतन से भी। इससे यह सिद्ध होता है कि विश्व की शाँति या अशान्ति मंत्र से पैदा की जा सकती हैं जहाँ वैदिक मंत्र कैसे विफल या दुर्बल हो जाता है? तस्मात् मंत्र तथा मंत्रात्मा यज्ञ पर विश्वशाँति निर्भर हो सकती है न? यज्ञ शाँतिकारक तथा पुष्टिकारक होता है, सो सब कर्मकाण्डी जानते हैं।
चिंतन और मन्थन के बाद ही निर्धारित हुआ कि यदि यज्ञादि करणीय कर्मों की उपेक्षा की जायेगी तो यज्ञपुरुष विष्णु भगवान् के विधान की अपार हानि होगी और संसार में महाअनिष्ट, अन्धता, जड़ता तथा तमसाच्छन्न अव्यवस्था फैल जायेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-October
चिंतन करते रहो। कुछ समय में अवश्य ही गुण दृष्टि उत्पन्न हो जायेगी:−

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-June
चिंतन करो । तुम्हें ज्ञात होगा कि वृक्षों की शाखाओं पर इधर से उधर कूदने वाले चंचल बन्दर की तरह तुम्हारा मन कभी इधर कभी उधर निरंतर भाग दौड़ में संलग्न है। कुछ न कुछ उधेड़बुन कर ही रहा है। तुम इसे किसी विशिष्ट कार्य में एकाग्र करना चाहते हो यह किंचित काल पश्चात भाग खड़ा होता है। तुम बारबार खींचकर इसे एक विषय पर लगाते हो पर यह भाग भाग जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-December
चिंतन से हानि होती है। निरंतर उसी में बल का क्षय करते रहते हैं। प्रतिक्रिया स्वरूप (reaction) परिणाम घातक होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-January
चिंतन एवं धन का तनिक-सा अंश भी अवांछनीय प्रयोजन में नष्ट न होने दिया जाए। इन चारों ही संपदाओं का एक-एक कण सदुपयोग में लगता रहे। इस तथ्य पर तीखी दृष्टि रखी जाए। भूलों को तत्काल सुधारते रहा जाए, तो उस दिन के, उस जीवन को संतोषजनक रीति से जिया जा सकता है।
चिंतन, आत्मनिरीक्षण, पश्चात्ताप और कल के लिए सतर्कता—वैरागी एवं संन्यासी जैसी मालिकी त्यागने की हलकी-फुलकी मनःस्थिति लेकर शयन किया जाए। दिन भर हर घड़ी चुस्ती-फुरती, मुस्तैदी और दिलचस्पी के साथ प्रस्तुत कार्यों को निपटाया जाए। भीतर दुर्भावनाओं और बाहरी दुष्प्रवृत्तियों के उभरने का अवसर आते ही उनसे जूझ पड़ा जाए और निरस्त करके ही दम लिया जाए। यह है वह जीवन-साधना, जिसमें चौबीसों घंटे निमग्न रहकर और इसी जीवन में स्वर्ग जैसे उल्लास आनंद और मुक्ति जैसे आनंद का हर घड़ी अनुभव करते रहा जा सकता है।
चिंतन, मनन का- कथा प्रवचनों का- माहात्म्य इसी आधार पर बताया गया है कि उस प्रक्रिया के सहारे मानवी चिन्तन का परिष्कार होता रहे। अवांछनीय पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कार छुड़ाने में, यह ज्ञान साधना साबुन का काम करती है। विकृत मनोवृत्तियों से छुटकारा मिलता है और विवेक युक्त दूर दर्शिता का पथ-प्रशस्त होता है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतंभरा इसी परिष्कृत चिन्तन का नाम है। ‘ज्ञानामुक्ति’, ‘नहिं ज्ञानेन सदृश पवित्र मिह विद्यते’ जैसी उक्तियों में सद्ज्ञान को अध्यात्म का प्राण माना गया है।
चिंतन वस्तुस्थिति बनकर मस्तिष्क को पूरी तरह आच्छादित कर ले।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-May
चिंतन एवं आदर्श कर्त्तव्य-सद्भाव एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन होता है। विचार क्रान्ति, ज्ञान, यज्ञ, भावनात्मक परिष्कार आदि नामों से इसी तत्वज्ञान की व्याख्या की जाती रही है- गायत्री और यज्ञ इसी आदर्श के प्रतीक प्रतिनिधि हैं। दृष्टिकोण से भरी हुई विकृतियाँ ही अगणित समस्याएं और विपत्तियां उत्पन्न करती हैं। परिष्कृत विवेकशीलता अपनाने पर समस्त संकटों का समाधान निकल सकता है अस्तु हमें पत्ते सींचने की अपेक्षा जड़ सींचने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए हमें सद्भाव संवर्धन एवं सत्प्रवृत्तियों के विकास को सर्वोपरि महत्व देना चाहिए। हमारा अंश दान इधर उधर बिखरने की अपेक्षा इसी मूल सिंचन पर केन्द्रित रहे तो ही अधिक श्रेयस्कर है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-November
चिंतन की बात कहेंगे और कुमार्ग से पीछे हटाने का प्रयत्न करेंगे। पर हुआ ठीक उलटा। मदान्ध द्रुपद उनके उपदेश सुनने तक के लिए तैयार नहीं हुए और अपमानित करके उन्हें सभा भवन में से निकलवा दिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-February
चिंतन में निरत रहकर समुचित सामर्थ्य प्राप्त करते रहे हैं। ठीक तरह बन पड़े तो इतना समय किसी भी दृष्टि से कम नहीं है। स्वर्ण−जयन्ती साधना वर्ष के उपलक्ष में चल रही 45 मिनट की प्रातःकालीन उपासना और प्रातः सायं का आत्मबोध, तत्वबोध, चिन्तन क्रम मिलाकर प्रायः एक घण्टा ही हो जाता है। इतनी उपासना, श्रद्धा एवं तत्परता मनोयोगपूर्वक निभती चली जाय तो समझना चाहिए कि आत्मिक प्रगति का सुनिश्चित आधार बन गया। आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में विशेष तप साधना का उपक्रम बन जाया करे तो उसका प्रभाव भी छह−छह महीने बने रहने का महत्वपूर्ण आधार बन जायगा।
चिंतन के अभाव में अवाँछनीय मान्यताएँ हर क्षेत्र में घुस पड़ी हैं और उन्होंने ऐसी अगणित विपत्तियाँ तथा समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं जो न टाले टलती हैं न सुलझाये सुलझती हैं। चिन्तन की भ्रष्टता ने मनुष्य को अन्धा, अविवेकी, बहरा, अहंकारी, गूँगा कुण्ठाग्रस्त, मृतक, पराश्रित, दूसरों के लिए भार भूत बनाकर रख दिया है।
चिंतन के रूप में विश्वव्यापी चेतना ही काम कर रही है तो भी स्पष्ट है कि जीव की आस्थाएँ एवं आकाँक्षाएँ दिव्य सत्ता के अनुरूप नहीं है। उनमें निकृष्टता का आसुरी अंश ही भरा पड़ा है, मनुष्यता की सार्थकता तभी है जब उसका स्वरूप एवं स्तर भी उसी के अनुरूप ऊंचा उठ सके। निम्न योनियों के जीवनधारी पेट और प्रजनन के लिए जीते हैं। स्वार्थ सिद्धि ही उनकी नीति होती है। शरीरगत लाभ ही उनके प्रेरणा स्त्रोत होते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-October
चिंतन सहित एकाग्रता की साधना। एक ही चेतना की चार गतिविधियों को मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को अन्तःकरण चतुष्टय की संज्ञा दी गई है। चार स्वरूप और व्याख्याएँ होते हुए भी वस्तुतः यह एक ही सत्ता की विवेचनाएँ हैं। ठीक इसी प्रकार एकाग्रता की उपयोगी विद्या में दक्षता प्राप्त करने के लिए योगसाधना के अन्तर्गत राजयोग, हठयोग, भक्ति योग और लययोग की चारों दिशाएँ, चारों विद्याएँ अपनी-अपनी सड़क पर चलते हुए अन्ततः जिस केन्द्रबिन्दु पर जा मिलती हैं, उसे एकाग्रता कहा जा सकता है। किसी गोले पर भिन्न दिशाओं में खींची गई रेखाएँ भी किसी जगह एकत्रित होकर ही रहती हैं, इसी प्रकार साधनाओं के विभिन्न स्वरूप और विधान भी एकाग्रता का प्रयोजन पूरा करते हैं।
चिंतन का ही परिणाम है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक स्वयट अपने प्रत्येक जन्म-दिन में काले और भद्दे कपड़े पहनकर शोक मनाया करते थे। वह कहते थे-‘‘अच्छा होता यह जीवन मुझे न मिलता, मैं दुनिया में न आता” इसके ठीक विपरीत अन्धे कवि मिल्टन कहा करते थे। “भगवान का शुक्रिया है जिसने मुझे जीने का अमूल्य वरदान दिया।” नेपोलियन बोनापार्ट ने अपने अन्तिम दिनों में कहा था-‘‘अफसोस है मैंने जीवन का एक भी सप्ताह सुख-शान्तिपूर्वक नहीं बिताया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-March
चिंतन द्वारा साधना को सींचा जाता है। उसके उपरान्त उसे सस्ती प्रशंसा लूटने के लिए दिखाये जाने वाले चमत्कारों से बचाया जाता है। सिद्धियों को लोभ, मोह के उथले प्रयोजन पूरे करने में भी खर्च किया जा सकता है और अपने को तथा दूसरों को आत्म-कल्याण की दिशा में प्रेरित करने के लिए भी उसका उपयोग हो सकता है। स्वल्प श्रम में अधिक भौतिक सफलतायें पाना कर्म विज्ञान के विपरीत है। उसके लिए यदि मन्त्र शक्ति का प्रयोग किया जायगा तो यह देर तक टिक न सकेगी और उसी खिलवाड़ में नष्ट हो जायगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-December
चिंतन से उपजी विचार-क्रान्ति होगी, जो मत मतान्तरों, सम्प्रदायों, भाषाओं और सभ्यताओं के भेदभाव की जड़े खोद डालेगी और सम्पूर्ण विश्व में आध्यात्मिक समभाव तथा भ्रातृभाव की प्रतिष्ठा करेगी। ईश्वरीय सत्ता की सभी को अनुभूति होगी। नीति-सदाचार में निरत लोग ही समाज के निर्देशक, नियामक और शासक होंगे। विवाह-शादियों के मामले में लोग उदार-दृष्टिकोण अपनाएंगे। भौतिक मान्यताओं वाले व्यक्ति भी आध्यात्मिक मानदंडों की श्रेष्ठता मानने लगेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-April
चिंतन और आत्म निर्माण इन पाँच बातों को अपने जीवन में उतार लें तो कोई शक्ति हमें भाग्य बदलने की तो बात ही क्या, संसार बदलने से नहीं रोक सकती है। परावलंबी, पराधीन को न तो कभी इस लोक में सुख मिलता है और न परलोक में।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-June
चिंतन करना तथा वाणी और शरीर से लोक-हित तथा परोपकार के कार्य यथाशक्ति करना, किसी का अहित या किसी को पीड़ा न पहुँचाना यही परोपकार का सदुपयोग है। यह भावना साँसारिक न होनी चाहिये। विश्व कल्याण की सजीवता ही परोपकार का प्राण है। कवि के शब्दों में परमात्मा का सान्निध्य सुख भी उसे ही मिलता है।
चिंतन कर सकेंगे। जीवन यापन के स्थूल साधनों तक ही सीमित रहे तो चित्तवृत्तियां भी उन्हीं का ज्ञान और अनुभव प्राप्त करने में जुटी रहेंगी और आपका विकास एकाँगी रह जायगा। आध्यात्मिक जीवन का प्रकाश आपके जीवन में न आया तो आप भौतिक सुखों के झमेले में ही भटकते, ठोकरें खाते फिरते रहेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-February
चिंतन में मन को एकाग्र कर दिया जाय। मन चाहे या न चाहे, वह कितना ही भागे, उसे उस लक्ष्य और कार्यक्रम पर ही पकड़कर बार-बार लगाइये। इसके सिवा जो भी विरोधी विचार, भावनायें मन में उठे, उनकी ओर ध्यान न दें, उनसे विरक्त रहें। थोड़े समय में मन की चंचल दूर होकर मन एकाग्र हो जायगा। आप ऐसे एकाग्र मन की शक्ति का जिस दिशा में भी उपयोग करेंगे, उधर ही यह आश्चर्य उत्पन्न कर दिखायेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-April
चिंतन की प्रवृत्ति जागती थी। साधना और स्वाध्याय के सम्मिश्रण से उनको आत्म-ज्ञान की अनुभूति हो जाती थी। विद्यार्थी केवल गुण-पुँज या ज्ञान पुँज ही नहीं शक्ति-पुँज होकर भी निकलते थे। फलस्वरूप उन्हें भौतिक सुखों की कोई आकाँक्षा न होती थी तब वे अधिकार नहीं कर्तव्य माँगते थे। सेवा को वे व्रत समझते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-February
चिंतन में अपनी जड़ें गहरी जमाता गया, उसी क्रम में मान्यताओं एवं प्रतिपादनों में उलट-फेर होता गया। समय-समय पर मनोविज्ञान की परिभाषाएँ भी बदलती गयीं। पर एक बात समान रूप से उन परिभाषाओं में दिखायी पड़ती है कि सबने मन का तत्व चेतना को माना है।
चिंतनपरक दिशा धाराएँ हैं। मीमाँसा, सूत्र-ग्रन्थ, ब्राह्मण एवं आरण्यकों में ‘यज्ञ’ शब्द यजन कृत्य के साथ सम्बद्ध है। जीवन यज्ञ का तात्पर्य है। चिन्तन और चरित्र को पवित्र एवं प्रखर बनाना। अग्निहोत्रों का तात्पर्य ऐसी ऊर्जा उत्पन्न करना है जो न केवल शरीर को ओजस्, मन को तेजस् आत्मा को वर्चस् दे सके वरन् इस प्रकृति ब्रह्माण्ड में भी अनुकूलताओं का अनुपात बढ़ा सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-September
चिंतन, चरित्र, व्यवहार में भी परिवर्तन आ रहे हैं। आदतों और अभ्यासों में जो हरे-फेर हो रहा है, उसमें भी इतनी तेजी आई है कि सहस्रों वर्षों में हो सकने वाले कार्य को कुछ ही महीनों में होते देखा जा सकता है। रीति-रिवाजों प्रथा परम्पराओं में आश्चर्यजनक क्रान्तिकारी परिवर्तन देखा जा सकता है।
चिंतन करते हुए मुझे यही लगता कि विश्व के और मेरे अस्तित्व में आत्मीयता है- एकरसता है। भूर्भुवः स्वः- इस भूलोक के साथ अन्तरिक्ष के साथ मेरा अखण्ड योग है। इस विश्व ब्रह्माण्ड का आदि अन्त जो ईश्वर है, उसने ही हमारे मन में चेतना को जागृत किया है। गायत्री मन्त्र के ध्यान द्वारा हम जिसे उपलब्ध करने का प्रयास करते हैं वह विश्वास से हम हमारी आत्मा से चैतन्य के सम्बन्ध में अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-August
चिंतन की भरमार से विषाक्त अदृश्य वातावरण और इससे फिर लोक-मानस में असुरता-निकृष्टता का बढ़ता। यह एक ऐसा कुचक्र है जो एक बार चल पड़ने पर फिर टूटने का नाम नहीं लेता। लोक चिन्तन व प्रवाह का अदृश्य वातावरण से अन्योन्याश्रय संबंध है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-January
चिंतन, मनन से क्रमशः उत्पन्न और परिपक्व होती है। जो भावावेश में एक ही क्षण दुर्जन से सज्जन बन जाते हैं उन्हें फिर फिसल कर दूसरे ही दिन अपनी पुरानी जगह पहुँचने में देर नहीं लगती। इसलिए नई दुनियाँ बसाने के लिए आज जो क्रम शुरू किया जाता है वह यह है कि उत्कृष्टता की विचारणा का वैज्ञानिक और बुद्धिसंगत, तर्क और प्रयासों से परिपुष्ट स्वरूप जन साधारण की मनोभूमि तक पहुँचाने के लिए अथक प्रयत्न किया जाय।
चिंतन, सद्ज्ञान साधना, जन्मधारण की प्रेरणा का स्मरण, अविवेक से संघर्ष और उपासना में भावना का समावेश, यह जीवन साधना की पद्धति हममें से हर एक के जीवन क्रम का अंग बने इसके लिए हर सदस्य से व्यक्तिगत रूप से भली-भाँति विचार विनमय किया जाय और इस आत्मोत्कर्ष के पुनीत कार्य का उसकी रुचि को अभिवर्धन किया जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-November
चिंतन, उत्तेजना से जिस तरह अंगों में भद्दापन, बेडौल और खराब मुखाकृति बनती है, उसी तरह शुभ-संकल्प और प्रसन्नतापूर्ण विचारों से बच्चा स्वस्थ, सुँदर और चरित्रवान् बनता है। इसीलिये कहा जाता है- गर्भावस्था में माँ को सत्य भाषण, उत्साह, प्रेम, दया, सुशीलता, सौजन्यता, धर्माचरण और ईश-भक्ति का अनुगमन करना चाहिये। यह बच्चे होनहार और प्रतापी होते हैं, जबकि क्रोध, ईर्ष्या, भय, उद्विग्नता आदि अधम वृत्तियों के बच्चे भी अधम, उत्पाती और स्वेच्छाचारी होते हैं। गलत खान-पान भी उसमें सम्मिलित हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-December
चिंतनों में दौड़ जाता है, तो उसे आत्म-चिन्तन के लिए- ब्रह्मशक्ति संचय के लिए अवसर ही नहीं मिलता। इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव- मूलाधार में भरी प्रचण्ड क्षमता को कार्य शक्ति में लगा दिया जाय, तो मनुष्य पर्वत उठाने एवं समुद्र मथने जैसे कार्यों को कर सकता है। क्रिया शक्ति मानव प्राणी में असीम है। किन्तु उसका क्षय कामुकता के विष-विकारों में होता रहता है। यदि इस प्रवाह को गलत दिशा में रोककर सही दिशा में लगाया जा सके, मनुष्य की कार्य-क्षमता साधारण न रहकर दैत्यों अथवा देवताओं जैसी हो सकती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-July
चिंतन द्वारा उन्हें जगाते और उपयोग में लाते हैं वे आगे बढ़ जाते हैं, और जो अपने प्रति हीन भावना के शिकार बने रहते हैं, वे यथास्थान जीवन का बोझ ढोते रहते हैं। संसार में जितने भी वैज्ञानिक, तत्ववेत्ता, विचारक, विद्वान, विजयी, दर्शन-शास्त्री, कलाकार और राजनेता अथवा जन-नेता हुए हैं, उन्होंने अपनी शक्तियों में विश्वास किया, अपने अस्तित्व को पहचाना उसे विकसित किया और उसके आधार पर संसार में बड़े-बड़े काम कर दिखलाये। उन्होंने स्वयं अपना उचित मूल्याँकन किया और संसार से वही मूल्य प्राप्त कर लिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-September
चिंतन पर भी अंकुश लगाना पड़ता है। विपरीत लिंग के प्रति सतत् पवित्र भाव का आरोपण किया जाता है व ऐसे साहित्य, संग व वातावरण से दूर ही रहा जाता है, जिनसे कि निम्नवृत्तियाँ भड़क न उठे।
चिंतनशील व्यक्ति में पनपता है। इसके अंतर्गत रक्त में एसिटाइकोलिन की मात्रा बढ़ी-चढ़ी रहती है। इसके उपचार में आसन (शल्भासन, भुजंगासन, सर्वांगासन, हलासन, पद्मासन आदि) तथा प्राणायाम (उज्जयी, अनुलोम विलोम) को विशेष लाभदायक पाया गया है। इसके अंतर्गत प्रारम्भिक योगाभ्यास 6 मास में ही अद्भुत परिणाम देखे गये हैं।
चिंतन और आदर्श कर्तृत्व की प्रेरणा देने वाले उपनिषद् प्रतिपादित उस योग-दर्शन में है जिसे प्राचीन काल में ब्रह्मविद्या कहा जाता था। इसके आधार पर व्यक्ति अपनी सत्ता का समष्टि में समर्पण करता था। आत्मा को परमात्मा के स्तर तक पहुँचाना, नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम, अणु को विभु, लघु को महान् बनाना जिसका लक्ष्य था। चिन्तन की अंतरंग उमंगें ही बहिरंग जीवन का पर आच्छादित होती हैं। उन्हीं से परिस्थितियाँ बनती हैं, घटनाएँ घटती हैं और दिशाएँ मुड़ती हैं।
चिंतनधारा को नई दिशा दे, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। चिन्तन की इसी नवीन गरिमा से अनुप्राणित होकर आधुनिक युग में योग के प्रचार की आवश्यकता है।
चिंतन मुक्ति के साथ व्यक्तित्व संघटन में ध्यान के प्रभावों को मानते हैं। डॉ. थयोफोर ने मनोरोगों के उपचार एवं मानसिक संतुलन में ध्यान की प्रभावी भूमिका को पाया। नीदरलैण्ड के वैज्ञानिक विलियम पी. वानडेनवर्ग तथा वर्टमुल्डा ने गहरा अध्ययन के बाद पाया कि ध्यान दृष्टिकोण परिवर्तन का अचूक नुस्खा है। वैज्ञानिक अध्ययनों ने यह भी सिद्ध किया है कि ध्यान के क्षणों में मस्तिष्क से अल्फा तरंगों का प्रस्फुटन होता है, जो कि गहन शान्ति की द्योतक होती है। अर्थात् ध्यान मानसिक स्थिरता एवं शान्ति का निरापद उपाय है।
चिंतन के इस मोड़ ने संसार का ध्यान योग-विज्ञान की ओर आकर्षित किया है। इन दिनों विश्व भर में योग-विज्ञान के प्रति भारी उत्साह है और उस दिशा में उत्सुकतापूर्वक खोज और प्रयोग के लिए प्रयास चल रहे हैं। चूँकि भारत योग के उद्गम, उत्थान एवं परीक्षण प्रयोग का क्षेत्र रहा है इसलिए भारत की ओर सहज ही सबका ध्यान चला जाता है।
चिंतन करने पर, भूतकाल के ऋषि-युग की सुख-शान्ति का उज्ज्वल इतिहास उन्हें समाधान के लिए अपनी ओर आकर्षित, आमंत्रित करता है।
चिंतन के स्वरूप को ऊँचा उठाना है। अपनी सत्ता और दिशा को परिष्कृत करना है। पदार्थों और व्यक्तियों के प्रति दृष्टिकोण का परिमार्जन करना है। वस्तुतः योग एक दर्शन है। सर्वत्र आत्म-सत्ता की अनुभूति से विश्व मानव की, विश्व परिवार की भावना विकसित होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-July
चिंतन काम कर रहा है। साधना, शिक्षा, स्वावलंबन तथा स्वास्थ्य जैसी विधाओं पर कोई ठोस कार्य हो, इनके शिक्षण-प्रशिक्षण का तंत्र बने व यहाँ से प्रशिक्षित लोकसेवी विश्वभर में फैल जाएँ, तो पुनः इस देश को विश्व का अग्रणी बनने में देर नहीं लगेगी।
चिंतन की उत्कृष्टता एवं आत्मिक परिष्कार से संबंधित रहा है। मनुष्य की प्रगति यात्रा इन्हीं दो चरणों से होकर आगे बढ़ी है। पश्चिम में यह प्रमुखतया मानवीय अस्तित्व के शारीरिक, मानसिक एवं नैतिक आयामों को छूती हुई भौतिकता प्रधान रही, जिसके कारण उसके विकास की अवधारणा को एकाँगी एवं अधूरा ही कहा जा सकता है, जबकि भारत में इसने उपयुक्त आयामों के साथ आत्मिक विकास के भी चरमोत्कर्ष को पाया। इसी तथ्य में इसकी मौलिक समग्रता निहित है। वैदिक युग का स्वर्णिम अतीत इसका गौरवमयी अध्याय रहा है।
चिंतन की गहराई है।
चिंतन में स्वप्न पर व्यापक प्रकाश डाला गया है। संहिता ग्रंथों का यह एक प्रमुख विषय रहा है। प्राचीन दार्शनिकों का यह मानना था कि आत्मा चौरासी लाख योनियों में जन्म लेने और भ्रमण करने के बाद मनुष्य योनि प्राप्त करती है। स्वप्न के माध्यम से वह विभिन्न योनियों में अर्जित अनुभवों का पुनः स्मरण करती है। इन्हीं के साथ ही स्वप्नों को भविष्य के संकेतों के साथ भी जोड़ा गया है।
चिंतन में मिलता है। इसके सूत्रों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि विकास का यथार्थ तात्पर्य दिव्यता, आत्मज्योति व अतिमानस में प्रतिष्ठित होना है। श्री अरविंद ने ‘द सिंथेसिस ऑफ योग’ में इसका समुचित विश्लेषण प्रस्तुत किया है। उन्होंने मनुष्य को वर्तमान मनःस्थिति से ऊपर उठने को प्रेरित करते हुए आगामी आधारों की भी चर्चा की है। इन स्तरों को उन्होंने उच्च मन, प्रकाशित मन, अधिमानस तथा अतिमानस कहा है।
चिंतन की दृष्टि से चोर, लुटेरा, व्यभिचारी ही क्यों न हो? इसके विपरीत आध्यात्मिक अथवा भारतीय अवधारणा में विकास की कसौटी है, व्हाट यू आर? (खद्धड्डह्ल ब्शह्व ड्डह्द्ग) अर्थात् आप क्या हैं? यदि व्यक्ति फटेहाल ही क्यों न हो, यदि वह संयम, त्याग, करुणा भाव से संपन्न है, तो उसे विकसित माना जाएगा। युगनायक स्वामी विवेकानंद भारत के इसी महान् चरित्र का उद्घोष करते हुए कहते हैं कि वैदिक संस्कृति ने अपने साँस्कृतिक विस्तार के लिए कभी खून की नदियाँ नहीं बहाईं।
चिंतन
चिंतन को बढ़ावा दिया है।
चिंतन विकसित करना, साँस्कृतिक प्रदूषण से भरे इस समाज में श्रेष्ठता के विस्तार की साधना संपन्न करना।
चिंतन की कसौटी पर नहीं, अपितु सिर्फ फुरसती विलास के लिए किया जाने लगा है। आज हम संचार माध्यमों द्वारा ढाकर लाए जाने वाले साँस्कृतिक कचरे के कूड़ेदान बन जाने के लिए अभिशप्त हैं।
चिंतन धारा प्रवाहित होती है, वह सर्वथा आध्यात्मिक होते हुए भी जीवन के व्यावहारिक पक्षों से अछूती नहीं है। क्योंकि यह तपःपूत एवं सूक्ष्मदर्शी ऋषियों द्वारा मानव के समग्र विकास के लिए प्रकट की गई थी। यह ‘ऋत’ एवं ‘सत्य’ के ठोस आध्यात्मिक आधार पर प्रतिष्ठित थी। ‘ऋत’ जहाँ प्राकृतिक जगत् के अंदर कार्य करने वाले अटल व्यापक नियम हैं, वहीं ‘सत्य’ आध्यात्मिक जगत् के अंदर काम करने वाले नियम हैं। स्पष्ट रूप में वैदिक आदर्श ऋत और सत्य को एक ही मौलिक तथ्य के दो रूप मानता है।
चिंतन नहीं करना चाहिए। भूलें करना मन का स्वभाव है। अतः इसका कोई ज्यादा महत्त्व नहीं है और न ही इससे व्यथित व परेशान होना चाहिए। एकमात्र उच्चतर चेतना ही इन सबको सुधार सकती है। सदैव अपने विशिष्ट प्रयासों एवं पुरुषार्थ पर ही विश्वास रखना चाहिए।
चिंतनधारा, मानववाद (॥रु्नहृढ्ढस्रु) के रूप में प्रस्फुटित हुई, जो 14वीं एवं 15वीं शताब्दी में ग्रीक एवं रोमन संस्कृति व दर्शन की पुनर्जाग्रति के रूप में हुई। इसका मूल विचार सार्वभौमिक एक्य का प्रचार करने वाला नैतिक तत्त्व था। ई.पू. पूर्वी सदी में एफ्क्यूरस ने इसी दर्शन को विकसित किया था और एक नैतिक मानववादी आधार दिया था। 9वीं सदी के मध्य में काँट ने इसी के अंतर्गत ईश्वर के ध्यान के स्थान पर मनुष्य की पूजा का विधान किया। इंग्लैंड में जॉन स्टुअर्ट मिल ने उपयोगितावाद से मानववाद को पोषित किया।
चिंतन की प्रवृत्ति जागती थी। साधना-स्वाध्याय के सम्मिश्रण से उनको आत्मज्ञान की अनुभूति हो जाती थी। विद्यार्थी केवल गुण-पुँज या ज्ञान-पुँज ही नहीं, शक्ति-पुँज होकर भी निकलते थे। फलस्वरूप उन्हें भौतिक सुखों की कोई आकाँक्षा नहीं होती थी। जब वे अधिकार नहीं कर्त्तव्य माँगते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-August
चिंतन व जीवन में भारतीय साहित्य के प्रभाव को स्वीकारा है। उन्होंने अभिज्ञान शाकुँतलम् के बारे में उल्लेख किया है कि यह मेरे जीवन में एक युग का प्रतीक है। एलेक्स एराँन्सन के अनुसार ऐसे प्रतिभावान विद्वान् को जब तक प्राच्य विद्या दृढ़ आधार के रूप में प्राप्त न होती, तब तक वह उसका सहारा लेकर अपनी कल्पना को अपनी कृतियों में कैसे साकार करता।
चिंतन में भारतीय प्रभाव को स्वीकारा। काँट द्वारा प्रतिपादित दिक् और काल के मध्य प्राकृतिक जगत् और उससे परे अगम्यमूल वस्तु के भेद बहुत कुछ मायावाद के समान है। श्वेर बातस्की ने स्पष्ट किया है कि काँट द्वारा निरूपित शुद्धि-बुद्धि सिद्धांत का प्रतिरूप भारतीय दर्शन में है। इसके अतिरिक्त हरमन जैकोवी के मतानुसार काँट के ‘एस्थेटिक्स’ को भारतीय लेखक काव्य शास्त्र में बहुत पहले व्यक्त कर चुके हैं। इसी प्रकार काँट के उत्तराधिकारी जोहान गाँट लीव फिक्टे (1963-1924) ने अपनी ‘हिण्ट्स फॉर ब्लेसेड लाइफ’ ग्रंथ में अद्वैतवाद से मिलते-जुलते अनुच्छेद सम्मिलित किए हैं।
चिंतन की प्रतिध्वनियाँ ऐसे देशों में भी सुनी गयीं, जिनका भारत से केवल औपचारिक संबंध था। रुमानिया के महाकवि मिहाई एसिनेस्क्यू (1950-1997) की कविताओं में वैदिक दर्शन की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी कविताओं के कितने ही अंश तो संस्कृत मूल के रूमानी रूपांतर जान पड़ते हैं। उन्होंने अपने साहित्य में भारतीय प्रतीकों को भी अपनाया है। यह भारत के प्राचीन साहित्य से उनके गहरे ज्ञान का द्योतक है।
चिंतन का सही इतिहास भारतीय चिंतन के बिना नहीं लिखा जा सकता । उनके भाई आगस्ट विल्हेण वान श्लेगेल ने भगवद्गीता का मूल पाठ लैटिन अनुवाद सहित संपादित किया।
चिंतन ही उसका परिणाम है। यह जैसा सोचता है और प्रयत्न करता है वैसा ही उसका फल मिलता है।
चिंतन का प्रवाह चलता रहता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है, योगी है और सबके सब कर्म उसके संपन्न हो गए हैं। कभी एक चर्चा में उन्होंने अपने शिष्य से कहा था, ‘जानते हो भगवान् कृष्ण कैसे थे? समस्त गीता मूर्तिमान (पर्सोनीफ इड) है। जब अर्जुन का मन अज्ञान और कायरता से भर गया था, तब उन्होंने गीता सुनाई। उस समय उनका मुख्य भाव कर्म का मर्म उनके शरीर के कण-कण से फट कर निकल रहा था।
चिंतन से असत्य पदार्थ भी सत्य प्रतीत होने लगता है एवं विष भी अमृत बन जाता है। शत्रु एवं मित्र बन जाता है एवं शत्रु-बुद्धि से मित्र शत्रु हो जाता है। दुःख -सुख और खट्टा-मीठा सभी मन की कल्पनाएँ हैं। जैसा हमारा विचार होता है वैसा ही हमारा जगत्।
चिंतन एवं व्यवहार में उत्तरोत्तर उत्कृष्टता का समावेश। चैत्य पुरुष का यह प्रभाव सत्य, शुभ, सुँदर, परिष्कृत और श्रेष्ठ होता है। इस स्थिति में अवस्थित साधक अपने विचारों, भावनाओं, आचरण एवं चरित्र में गठित करने के लिए मन एवं प्राण पर एक दबाव अनुभव करता है।
चिंतन में लगाए रहना चाहिए। मन को साध लेने पर वह वरदान बन जाता है। मन एक देहरी पर खड़ा नीचे दृश्य जगत् की ओर झाँक सकता है और ऊपर चेतना के उच्चस्तरीय आयामों में भी गति कर सकता है। अच्छा यही है कि सतत साधना से हम इसे उच्चस्तरीय आयामों की ओर प्रेरित करें।
चिंतन में रस लेने वाले विद्वानों में प्रतिभाशाली, भाषाशास्त्री एवं प्रशिया शिक्षामंत्री वान हलवोल्ट भी थे। उन्होंने परमात्मा को जीवन प्रदान करने के लिए धन्यवाद किया कि वह भारतीय दर्शन का अध्ययन कर सके।
चिंतन करने वाले अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं। ऐसे कई पत्र पूज्यवर के लिखे हमारे पास हैं, जिनमें उनने उदारतापूर्वक अनुदान बाँट है। कई ऐसे हैं जिनमें समझाया है, तर्क की कसौटी पर विवेक का प्रयोग करने को कहा है। किसी को लड़के की चाह थी, किसी को चुनाव में जीतने की तथा किसी को पैसा कमाने की। अनुत्तरित कोई न रहा।
चिंतन से मन निर्मल होने लगता है। इसके लिए मन को सदा स्वाध्याय एवं सद्चिंतन में लगाए रहना चाहिए। मन को साध लेने पर वह वरदान बन जाता है। मन एक देहरी पर खड़ा नीचे दृश्य जगत् की ओर झाँक सकता है और ऊपर चेतना के उच्चस्तरीय आयामों में भी गति कर सकता है। अच्छा यही है कि सतत साधना से हम इसे उच्चस्तरीय आयामों की ओर प्रेरित करें।
चिंतन के प्रभाव स्पष्ट दिखाई देते हैं। वे इस तयि को साफ तौर पर सत्यापित करते हैं कि भारत के अजस्र अनुदानों से ही समूचा विश्व आलोकित-प्रकाशित हुआ है।
चिंतन से प्राप्त हुई। वैज्ञानिक आर.डी.लैंग के अनुसार पूर्वी चिंतन पूर्णतया वैज्ञानिक है। इसके अलावा स्टेनग्राफ के ‘रील्स ऑफ ह्यूमन कान्शसनेस’ एवं कार्ल गुस्ताव जुँग के प्रयोगों एवं राबर्टो असगोली की’ साइको सिंथेसिस’ में भारतीय चिंतन के प्रभाव स्पष्ट दिखाई देते हैं। वे इस तयि को साफ तौर पर सत्यापित करते हैं कि भारत के अजस्र अनुदानों से ही समूचा विश्व आलोकित-प्रकाशित हुआ है।
चिंतन के बिना नहीं लिखा जा सकता । उनके भाई आगस्ट विल्हेण वान श्लेगेल ने भगवद्गीता का मूल पाठ लैटिन अनुवाद सहित संपादित किया।
चिंतन ने उन्नीसवीं शताब्दी में इंग्लैंड और जर्मनी को ही नहीं, सुदूर अमेरिका को भी प्रभावित किया था। रैल्फ वाल्डो एमर्सन (1903-1992) द्वारा प्रवर्तित शाँति आँदोलन इसका एक साफ प्रमाण है। भारतीय दर्शन के पुनर्जन्म सिद्धांत से विशेष आकर्षित हुए दूसरे अमेरिकन जिनका ध्यान भारत की ओर गया, हेनरी डविड थोरो (1918-1962) थे। वे भारतीयता के रंग में इतने रँग गए थे कि उन्होंने सनातन हिंदू जीवनचर्या भी अपना ली थी। वे कहते हैं, भारतीय दर्शन से मेरा इतना प्रेम है, तो मेरे लिए चावल का आहार ही उपयुक्त है।
चिंतन संपदा के वेदांत दर्शन ने क्वाँटम भौतिकी के वैज्ञानिक वारनर हाइज़ेनबर्ग की सोच में व्यापक उलटफेर कर दी। उनके अनिश्चितता के सिद्धांत में वेदाँत तत्व की ही व्याख्या है कि पदार्थ का स्वरूप प्रतिक्षण अनिश्चित है। उन्होंने अपने ग्रंथ ‘फिजिक्स एंड फिलॉसफी’ में यहाँ के चिंतन से स्वयं को प्रभावित होने का मार्मिक वर्णन किया है। नील्स बोर और इरविन श्रोडिंगर के स्वरों में भी यही गूँज सुनाई देती है। श्रोडिंगर के वेव्स मेकेनिक्स में वेदाँत वर्णित प्रकृति के अनिश्चित स्वरूप का संकेत मिलता है।
चिंतन,विशिष्ट साधना एवं पूज्यवर के साहित्य तथा कैसेट्स द्वारा उनके अमृत वचनों का सान्निध्य मिले, ऐसी कुछ व्यवस्था बने। विशिष्ट कक्ष बन चुके हैं, पर सामान्य आने-जाने वाले ही इतने हैं कि अभी अक्टूबर तक इनकी संख्या कम होने का प्रश्न नहीं उठता । इसीलिए यह क्रम इन कक्षों में 82 साधकों से व यदि कक्ष को दो में विभाजित करना संभव हो सका, तो 244 साधकों से शुरुआत संभवतः हो सकेगी।
चिंतन के प्रभाव के बारे में मैक्डेनल ने लिखा है कि नवजागरण के बाद विश्व के साँस्कृतिक मंच पर यदि कोई सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जा सकती है, तो वह है 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुई संस्कृत साहित्य की जानकारी। भारतीय दर्शन और साहित्य का यूरोप में सबसे अच्छा स्वागत जर्मनी में हुआ। यहाँ के विद्वान् जोहान गोट फ्रीड हर्डर ने 1996 में प्रकाशित अपनी मुख्य कृति आइडियाज ऑन ए फिलॉसफी ऑफ द हिस्ट्री ऑफ मेनकाइंड में भारतीयों का एक आदर्श चित्र प्रस्तुत किया। हर्डर के मित्र और प्रख्यात कवि जोहान वुल्फ गाँग वाल गेटे ने अपने चिंतन व जीवन में भारतीय साहित्य के प्रभाव को स्वीकारा है। उन्होंने अभिज्ञान शाकुँतलम् के बारे में उल्लेख किया है कि यह मेरे जीवन में एक युग का प्रतीक है।
चिंतन से स्वयं को प्रभावित होने का मार्मिक वर्णन किया है। नील्स बोर और इरविन श्रोडिंगर के स्वरों में भी यही गूँज सुनाई देती है। श्रोडिंगर के वेव्स मेकेनिक्स में वेदाँत वर्णित प्रकृति के अनिश्चित स्वरूप का संकेत मिलता है।
चिंतन किया जाता है, वह वस्तु उसी प्रकार से अनुभव में आने लगती है। सतत चिंतन से असत्य पदार्थ भी सत्य प्रतीत होने लगता है एवं विष भी अमृत बन जाता है। शत्रु एवं मित्र बन जाता है एवं शत्रु-बुद्धि से मित्र शत्रु हो जाता है। दुःख -सुख और खट्टा-मीठा सभी मन की कल्पनाएँ हैं। जैसा हमारा विचार होता है वैसा ही हमारा जगत्।
चिंतन कर सकेंगे, तो आपकी जीवात्मा ही आपको इतना ऊँचा उठा देगी कि आप देखते रह जाएँगे। उस समय आप हमारे प्राणप्रिय बन जाएँगे तथा मिशन के लिए बड़े ही उपयोगी हो जाएँगे। इसी बात को हम हमेशा आपको समझाते रहते हैं। इसके लिए आपको सदा प्रयास करते रहना चाहिए तथा हमारे प्राणप्रिय बनकर रहना चाहिए। हम चाहते हैं कि हम और आप इस काम को एक साथ पूरा करें तथा नये युग को ला सकें।
चिंतन की व रात्रि सोते समय 15 मिनट तत्व-बोध-मनन की साधना भी सम्मिलित थी। इस साधना में प्रत्येक साधक द्वारा प्रतिदिन 600 गायत्री मंत्र जपने का प्रावधान रखा गया था। उपासना क्रम को छह भागों में विभाजित किया गया था, आत्मशोधन के लिए षट्कर्म, प्रतीक पूजा उपचार, सोऽहम्, प्राणयोग, गायत्री जप और ध्यान, खेचरी मुद्रा तथा सूर्यार्घ्य दान। प्रत्येक का महत्व विस्तार से सात पृष्ठ के संपादकीय द्वारा समझाया गया था। एक लाख साधकों द्वारा पूज्यवर ने प्रतिदिन छह करोड़ प्रतिदिन की साधना संपन्न कराई।
चिंतन-शक्ति भी जुड़ सकी होती, तो किए गए कार्य का स्वरूप कितना उत्कृष्ट एवं लाभकारी होता। परंतु ऐसा न हो पाने के कारण ही अजीबो-गरीब सनकें सामने आती रहती हैं।
चिंतन और मेरी सामर्थ्य तथा तुम्हारा व्यक्तित्व भी ऋषिकृपा से ही इस रूप में ढला है।’
चिंतन से प्रभावित होने वालों में थे। अपनी कुछ कविताओं में उन्होंने हिंदू रहस्यवाद में प्रत्यक्ष रुचि अभिव्यक्त की है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण उनकी ‘पैसेज टू इंडिया’ कविता है। जिसमें उन्होंने यह भाव व्यक्त किया है कि मनुष्य की आत्मा और विश्वात्मा एक ही है।
चिंतन एवं व्यवहार के सात्विक बदलाव से कर सकता है। यह बदलाव ही क्रमिक रूप से शनैः-शनैः अतिमानसिक रूपांतरण को सिद्ध करने वाला होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।
चिंतन पूर्णतया वैज्ञानिक है। इसके अलावा स्टेनग्राफ के ‘रील्स ऑफ ह्यूमन कान्शसनेस’ एवं कार्ल गुस्ताव जुँग के प्रयोगों एवं राबर्टो असगोली की’ साइको सिंथेसिस’ में भारतीय चिंतन के प्रभाव स्पष्ट दिखाई देते हैं। वे इस तयि को साफ तौर पर सत्यापित करते हैं कि भारत के अजस्र अनुदानों से ही समूचा विश्व आलोकित-प्रकाशित हुआ है।
चिंतन कर स्वयं को उद्विग्न बना लेते हैं। सकाम चिंतन करने वाले अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं। ऐसे कई पत्र पूज्यवर के लिखे हमारे पास हैं, जिनमें उनने उदारतापूर्वक अनुदान बाँट है। कई ऐसे हैं जिनमें समझाया है, तर्क की कसौटी पर विवेक का प्रयोग करने को कहा है। किसी को लड़के की चाह थी, किसी को चुनाव में जीतने की तथा किसी को पैसा कमाने की।
चिंतन पर ही संसार के सभी पदार्थों का स्वरूप निर्भर करता है। जिस वस्तु का जिस भाव से चिंतन किया जाता है, वह वस्तु उसी प्रकार से अनुभव में आने लगती है। सतत चिंतन से असत्य पदार्थ भी सत्य प्रतीत होने लगता है एवं विष भी अमृत बन जाता है। शत्रु एवं मित्र बन जाता है एवं शत्रु-बुद्धि से मित्र शत्रु हो जाता है। दुःख -सुख और खट्टा-मीठा सभी मन की कल्पनाएँ हैं।
चिंतन और दर्शन अवश्य ही यूरोपीय ज्ञान और दर्शन में गंभीर परिवर्तन ले आएगा। यही नहीं उन्होंने भारतीयों को यूरोपियनों की अपेक्षा अधिक गंभीर विचारक माना, क्योंकि वे जगत् को आँतरिक एवं सहजानुभूत कहकर उसकी व्याख्या करते हैं और यूरोपीय विचारकों की तरह उसको बाह्य एवं बुद्धिगम्य नहीं मानते। एक अन्य जर्मन दार्शनिक कार्ल क्रिश्चियन फ्रेडरिक ब्रासे (1971-1930) भी भारतीय दर्शन काफी अधिक प्रभावित थे। पाल डायसन (1943-1999) तो यूरोपीय दर्शन एवं भारतीय विद्या के महान् ज्ञाता थे। वे वेदाँत दर्शन के प्रति अत्यधिक आकृष्ट थे।
चिंतन का जो केंद्रीय संस्थान मस्तिष्क के रूप में खोपड़ी के अंदर विराजमान है, वह हमेशा शीतल बना रहे, उसके विचार और भाव इतने श्रेष्ठ हों कि अपनी तरह औरों को भी वह शीतलता, शाँति और प्रसन्नता प्रदान करता रहे।
चिंतन करके मन भी महान् होने लगता है और इससे तादात्म्य स्थापित कर लेता है। यही इसकी सार्थकता एवं सफलता है। इस तरह दर्शन में शिक्षा के लिए एक नवीन शाखा व विषय का उदय होता है।
चिंतन शक्ति का ह्रास है, ज्ञान की भूमि में अज्ञान का विस्तार है। इस अनेकमुखी अज्ञान को दूर करने की जातीय प्रेरणा से उस काल की पत्रकारिता अनुप्राणित थी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-November
चिंतन के अभाव में एक परिवार का दुःखद अंत हो गया।
चिंतन हेतु रखा गया है। इस समग्र दिनचर्या से साढ़े चार दिन में साधक काफी कुछ शक्ति का उपार्जन कर सकेंगे, अपनी जीवन की दिशाधारा का निर्धारण कर सकेंगे। प्रत्येक सत्र में 20 व्यक्तियों को ही स्थान दिया गया है, साथ ही इनका पंजीयन कड़ी जाँच-पड़ताल के बाद किया जा रहा है। इसलिए जिस किसी को भी आना हो, पत्राचार करके सुनिश्चित अनुमति मिल जाने के बाद ही आना चाहिए।
चिंतन कर उसकी गहराई पर जोर देना। भावविह्वल होकर जप करने की प्रधानता।
चिंतन इतना एकाँगी हो जाता है कि कई बार वे ऐसे निर्णय ले लेते हैं जो भयावह होते हैं।
चिंतन के ऊर्ध्वगामी होने के सत्परिणाम निश्चित ही जीवन-व्यापार के विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई देने लगते हैं। सफलताएं हस्तगत होने लगती हैं। आत्मविश्वास बढ़ जाता है तथा चौबीसों घंटे स्फूर्ति बनी रहती है। लगता है सतत मार्गदर्शन देने वाला कोई सच्चा घनिष्ठ मित्र मिल गया। ‘जीवन जीने की कला’ का शिक्षण देने वाली यह पत्रिका लाखों लोगों द्वारा पढ़ी जाती है एवं सभी वर्ग-समुदाय के व्यक्तियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
चिंतन-मनन।
चिंतन को जो पोषण और प्रखरता जनसंपर्क से मिलनी चाहिए, वह बंद हो जाती है। ऐसी स्थिति में प्रतिगामी सोच आदमी को वह सब करने के लिए प्रेरित करती हैं, जो लोमहर्षक घटनाक्रम के रूप में ऊपर घटित हुआ।
चिंतन-मनन करना और जो कुछ निम्न एवं हेय है उसको त्यागते हुए, श्रेष्ठ एवं उदात्त का वरण एवं विकास करना है। इस तरह जब भिक्षु अपने बुरे विचारों पर विजयी हो जाएगा, वह एक दिन अपने मन का स्वामी बनेगा और सदैव के लिए बुराई एवं दुःख से मुक्त हो जाएगा।’
चिंतन में तल्लीन होकर ध्यान रंगों का इष्ट का ध्यान इस संबंध में जो विज्ञानसम्मत प्रस्तुति पूज्यवर ने दी, वह बिरले ही कहीं एक स्थान पर देखने को मिलती है। ध्यानयोग, लययोग एवं नादयोग की योगत्रयी को उन्होंने शाँतिकुँज आश्रम ही नहीं, सभी केन्द्रों व शक्तिपीठों का एक अनिवार्य रुटीन बना दिया। प्रज्ञायोग तो उनकी मानव मात्र के लिए एक बहुमूल्य देन है।
चिंतन जब गूलर के भुनगे की तरह बंद परिपथ में घूमने लगे, तो परिणाम भयंकर होता है। हुआ भी यही। एक दिन उसके घर से धुएं का गुबार उठता दिखलाई पड़ा। गाँव वालों ने पूछताछ की तो बताया कि बहुत सारे पुराने पन्ने इकट्ठे हो गए थे, उन्हीं को अग्नि की भेंट कर रहा हूँ, जबकि सचाई इससे भिन्न थी। उन लोगों ने सर्वप्रथम आँगन में एक बड़ा गड्ढा खोदकर घर के सारे बरतन उसमें डाल दिए।
चिंतन बदल गया, जीवन की दिशाधारा दूसरी दिशा में मुड़ गई एवं उसका आमूल-चूल कायाकल्प हो गया। चिंतन के ऊर्ध्वगामी होने के सत्परिणाम निश्चित ही जीवन-व्यापार के विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई देने लगते हैं। सफलताएं हस्तगत होने लगती हैं। आत्मविश्वास बढ़ जाता है तथा चौबीसों घंटे स्फूर्ति बनी रहती है। लगता है सतत मार्गदर्शन देने वाला कोई सच्चा घनिष्ठ मित्र मिल गया।
चिंतन गहराई तक पैठ गया। माँ के विचारों पर सहमति व्यक्त करते हुए कोई योजना बनाने में निमग्न हो गए।
चिंतन, मनन अतीव उपयोगी एवं सहयोगी हैं। इसी के प्रकाश में इच्छा शक्ति के जागरण एवं विकास की प्रक्रिया गति पकड़ती है, जिसमें तीन चीजें अभिन्न रूप से जुड़ी होती हैं- 1. सत् और असत्, उचित और अनुचित के बीच सतत विवेक, 2. जो सही है, उसको करने में संलग्नता और 3. जो अवाँछनीय व अनुचित है, उसके प्रतिकार में जागरुकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-January
चिंतन क्षमता के अनुरूप वैज्ञानिकों, राजनीतिज्ञों एवं धर्मशास्त्रियों ने इन विषयों की परिभाषा को एक सीमा विशेष में बाँध दिया है, जबकि वास्तव में इनकी कोई विभाजन रेखा नहीं है। धर्म के संबंध में तो कहना ही होगा कि उसका समग्र स्वरूप सत्य की खोज को दृष्टिगत रखकर ही गढ़ा गया है। प्रथा-परंपराएँ तो समय के अनुरूप बदलते रहने वाली नियम-व्यवस्थाएँ भर हैं। इन्हें धर्म की संज्ञा नहीं दी जानी चाहिए। धर्म का मूल सिद्धाँत तो सभी मत-संप्रदायों में एक ही है, “सत्कर्मों द्वारा ईश्वर को प्रसन्न करना तथा उसके अस्तित्व को मानना।
चिंतन इस विषय में है। वे 21-2-54 को श्री रामदास (कानपुर) को लिखते हैं।
चिंतन से जोड़कर हमारी आध्यात्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है। यदि इन पत्रों से कुछ प्रतिशत परिजन भी सच्चा मार्गदर्शन पा सकें, तो यह परिश्रम हम सफल मानेंगे।
चिंतन के परिप्रेक्ष्य में बड़ा ही महत्त्वपूर्ण जन-जन के लिए उपयोगी चिंतन प्रस्तुत किया जा चुका है। इन सभी लेखों का एक संकलित रूप ‘युगगीता’ ग्रंथ के प्रथम भाग के रूप में पाठकगणों के समक्ष शीघ्र ही आ रहा है। चौथे अध्याय का शीर्षक है- ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
चिंतन-पद्धति को प्रभावी रूप से विकसित किया है, युवाओं का एक वर्ग वह भी है, जो आधुनिकता के नाम पर पश्चिम की संस्कृति का शिकार बना है। इस संस्कृति ने भारतीय समाज में पैसे के महत्त्व को बढ़ाकर आदमी का महत्त्व घटा दिया है। यौन उच्छृंखलता, अपराध एवं ग्लैमर की मृग-मरीचिका में डूबा यह युवा वर्ग बुनियादी समस्याओं तक से अनभिज्ञ है। भोग-विलास की इस संस्कृति ने युवाओं को परिवार, समाज एवं राष्ट्र के प्रति गैर जिम्मेदार बना दिया है।
चिंतन, कला, वीरता के उत्कर्ष द्वारा। मनुष्य को वर्तमान सीमाओं को पार करने के लिए जिस भी वस्तु से सहायता मिले, उसके माध्यम से वह वहाँ पहुँच सकता है। इस संदर्भ में श्री अरविंद ने कला को विशेष महत्त्व प्रदान किया है। उन्होंने कला को आध्यात्मिक प्रगति के प्रमुख साधनों में से एक माना है। यह धरती ही वह आधार है, जहाँ उस शिखर तक पहुँचा जा सकता है।
चिंतन और व्यवहार को गहरे प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे वातावरण में रुकना उचित नहीं, यह सोचकर पहले तो वे वहाँ से तुरंत प्रस्थान करने का मन बनाने लगे। पीछे उनने इसकी सत्यता परखनी चाही और वहाँ के निषेधात्मक आभा की तीक्ष्णता का अनुमान लगाने के लिए रुक गए। उन्हें ऐसी क्षमता प्राप्त थी कि वे शीघ्र ही एकाग्रचित होकर अतींद्रिय स्थिति में पहुँच जाते थे। उनने मस्तिष्क को पूरी तरह विचार शून्य किया और सामने की ओर देखने लगे।
चिंतन-मनन करते हैं।
चिंतन-मनन में उतरे। कोई भक्त अपने इष्ट-आराध्य को जिस आतुरता से पुकारता है, इसे ही व्यग्र भाव से उन्होंने ‘पत्नी’ की साधना की। माता-पिता-गुरु और संत की आराधना-उपासना कर हजारों साधक मुक्ति के लक्ष्य तक पहुँचे होंगे। स्वामी निगमानंद ने पत्नी की आराधना की और सिद्ध स्तर पर पहुँचे। पश्चिम बंगाल के नदिया क्षेत्र में हुए इस संन्यासी को लोगों ने नहीं स्वीकारा, लेकिन स्वामी निगमानंद ने इसकी कभी चिंता नहीं की।
चिंतन प्रस्तुत किया जा चुका है। इन सभी लेखों का एक संकलित रूप ‘युगगीता’ ग्रंथ के प्रथम भाग के रूप में पाठकगणों के समक्ष शीघ्र ही आ रहा है। चौथे अध्याय का शीर्षक है- ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-February
चिंतन के परिप्रेक्ष्य में पढ़ने योग्य हैं। जुलाई 1979 को अपने लेख में वे लिखते हैं, “विशेष युगों में कुछ विशेष आँदोलन होते हैं, जब ईश्वरीय शक्ति अपने आपको प्रकट करती है और अपनी चरम शक्ति से मानवजाति के सारे आकलनों को तहस−नहस कर देती है। सावधान राजनेता और योजनाएँ रचने वाले कूटनीतिज्ञों की बुद्धिमानी का मजाक बना देती है। वैज्ञानिक विश्लेषण करने वालों के पूर्वानुमानों को वह झूठा बना देती है और जितनी प्रचंडता और तीव्र गति से वह आगे बढ़ती है, उससे उसका मानवातीत−अलौकिक शक्ति होना स्पष्ट रूप से प्रकट होता
चिंतन अगस्त 1969 विशेषाँक के पृष्ठ 17 से उद्धृत हैं। “हम सुषुप्ति की स्थिति में पड़ी हुई राष्ट्र चेतना को कुँभकरणी निद्रा से जगाने का प्रयास करेंगे। विश्वास है कि अगले दिनों राष्ट्र जगेगा और अँगड़ाई लेता हुआ उठ खड़ा होगा। जिस दिन यह महादैत्य जगेगा, उस दिन दसों दिशाएँ काँप उठेंगी। उसके पास अध्यात्म, तत्त्वज्ञान, शौर्य, साहस, विज्ञान एवं संपन्नता की इतनी अधिक परंपरागत पूँजी विद्यमान है, जिसके बल पर विश्व की अद्भुत−अनुपम शक्ति बनकर रहेगा।
चिंतन जिस गहराई के गड्ढे में धँसता हुआ चला जा रहा है, ये ठीक वही परंपराएँ हैं, जो कि रावण के जमाने में आई थीं। इसमें वह मनुष्यों को मारक हड्डियों के ढेर लगा देता था। आज हड्डियों के ढेर तो नहीं लगाए जाते, पर हम हड्डियों के ढेर को चलते−फिरते आदमियों का रूप में देख सकते हैं। हड्डियाँ जो जिंदा तो हैं, पर जिनको चूस लिया गया है। मैं समझता हूँ कि प्राचीनकाल में ज्यादा भले आदमी थे और शरीफ आदमी थे।
चिंतन−प्रवाह में निरंतर गोते लगाते रहने का अभ्यास करें, यह अपेक्षा स्वाध्यायक्रम में हम से की जा रही हैं।
चिंतन देखें। अखण्ड ज्योति का अगस्त 1979 का अंक प्रज्ञावतार विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ था। उसमें पूज्यवर लिखते हैं, “यदा−कदा ऐसी परिस्थितियाँ हर युग में आती हैं, जब संत, सुधारक और शहीद अपने पराक्रम को भारी देखते हैं और विपन्नता से लड़ते−लड़ते भी सत्य परिणाम की संभावना को धूमिल देखते हैं। ऐसे अवसरों पर अवतार का पराक्रम उभरता है और पासा पलटने जैसी असंभाव्य को संभव बनाने वाली परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है। सदा से विषम वेलाओं में ऐसा ही चलता रहा है।
चिंतन को देखे। लोकसेवी व सत्साहस संघर्ष करने के लिए आगे आने वाले के लिए तो यह एक अनिवार्य प्रक्रिया हैं।
चिंतन जैसा और जितना घटिया होगा, मुसीबतें उसी हिसाब से आएँगी। आज भगवान की दी हुई मुसीबतें हमारे पास आती हुई चली जा रही हैं। बीमारियों हमारे पास बराबर बढ़ रही हैं। डॉक्टर बढ़ रहे हैं, अस्पताल बढ़ रहे हैं, लेकिन बीमारियों का दौर अभी और बढ़ेगा। डॉक्टर कितने बढ़ गए हैं, भगवान् करे डॉक्टर दोगुने−चौगुने हो जाएँ।
चिंतन एवं निष्काम सेवापरायण मनुष्य स्वर्ग एवं उच्चतर लोकों को प्राप्त करता है, भगवत्प्राप्ति की लक्ष्य−सिद्धि तक पहुँचता है। अतः हर मनुष्य को इस दुर्लभ मानव शरीर से सतत श्रेष्ठ कर्म में लगे रहना चाहिए।
चिंतन करें, अपनी आराध्यसत्ता के सत्ता के विषय में।
चिंतन से ओत−प्रोत तथा सतयुगी उल्लास भरे आनंद में सराबोर रहे, ऐसी अपेक्षा हमारी गुरुसत्ता की प्रत्येक परिजन से इस वर्ष विशेष में है। हम मात्र उत्साह में औपचारिकता न बरतकर रह जाएँ, गहरे उतरें व गुरुसत्ता के चिंतन−प्रवाह में निरंतर गोते लगाते रहने का अभ्यास करें, यह अपेक्षा स्वाध्यायक्रम में हम से की जा रही हैं।
चिंतन, विधि, मान्यता, परंपरा तथा नैतिकता जैसे प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष मूल्यों का सम्मान करना आना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-May
चिंतन और मनन की एकाँत साधना के लिए अगर आप प्रातःकाल का समय निकाल पाएँ, तो बहुत अच्छा। कदाचित् प्रातःकाल का समय निकालना आपके लिए संभव न हो तो आप ऐसा करें कि और कोई समय एक साथ मनोयोगपूर्वक काम करने हेतु आप निकाल ले। जब कभी आप यह देख पाएँ कि एक आधा घंटा या पंद्रह मिनट का समय ऐसा निकलता है, जिसमें आप शांतचित्त है। इसमें मन के लिए शांतचित्त होना जरूरी है। भागदौड़ में, रास्ता चलते, चलते-फिरते कहीं भी जप कर लेंगे, नहीं, ऐसा मत कीजिए।
चिंतन से आरंभ होती है। महायोग का जो साध्य है वही साधना है। यद्यपि यह योग कठिन एवं दुर्गम है, परंतु भगवत्कृपा से यह भी सहज, सरल एवं सुगम हो जाता है। महर्षि रमण के अनुसार ‘हृदय गुह्य’ में केवल मात्र ब्रह्मा ही है। यह साक्षात आत्मस्वरूप में प्रकाशित होता है।
चिंतन नवनिर्मित भागों द्वारा संसार की जातिय की धमनियों में होकर प्रवाहित होते रहे हैं। राजनीतिक श्रेष्ठता या सामरिक शक्ति प्रदान करना किसी काल में इन राष्ट्र का जीवनोद्देश्य न कभी रहा है और न कभी रहेगा इसका दूसरा ही जीवनोद्देश्य रहा है। वह यह कि अपना समग्र शक्ति को मानो किसी डाइनेमो में संगृहीत, संरक्षित और नियोजित किया गया हो, और यह संचित शक्ति सारा पृथ्वी के जन जीवन में जीवन जलप्लावन करती रही है।
चिंतन चरित्र एवं व्यवहार में उत्कृष्टता का योग ही सच्चा योग माना जा सकता है। अतः योग मार्ग पर अग्रसर साधक को सदैव उस परमात्मा का अभीप्सा करते रहना चाहिए। यही सभी योगों का सार है।
चिंतन एवं मनोबल एक प्रकार से कल्पवृक्ष ही है। उसका सदुपयोग करने वाला जीवनलक्ष्य की प्राप्ति का अभीष्ट उद्देश्य पूर्ण कर सकता है।
चिंतन की शैली में जैसी शालीनता का समावेश होना चाहिए था, वैसा रखा क्या? नहीं। न हमने शरीर के प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया, न अपने मस्तिष्क के प्रति कर्त्तव्य का पालन किया, न अपने कुटुँबियों के प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया। कर्तव्यों की दृष्टि से हम बराबर पिछड़ते हुए चले गए। अतः जहाँ-जहाँ पिछड़ते हुए चले गए, उन सबके विषय में एक बार फिर विचार कीजिए।
चिंतन और मनन के लिए किसी कर्मकाँड की जरूरत नहीं है, किसी पूजा-विधान की जरूरत नहीं है और किसी समय निर्धारण की जरूरत नहीं है। अच्छा तो यह हो कि इन सब कामों के लिए आप सबेरे का समय ही रखें। अध्यात्म साधना के लिए सबसे अच्छा प्रातःकाल का ही है। दूसरे कामों के लिए भी प्रातःकाल का ही हैं, यानी कि चौबीस घंटों में जो सबसे अच्छा समय हैं, वह प्रातःकाल का ही हैं। प्रातःकाल के समय को आप जिस भी काम में लगा देंगे, उसी काम में आपको बड़ी प्रसन्नता मिलेगी और सफलता भी मिलेगी।
चिंतन के निर्माण करने का एक शानदार तरीका है। आप इसको किस तरीके से कार्यान्वित कर सकते हैं, इसके बारे में एकाँत में चिंतन और मनन करने जब बैठें, तब यह विचार किया कीजिए। यह तीसरी वाली बात निर्माण वाली धारा है।
चिंतन की दो ही धाराएँ हैं, गलतियों को याद करना और गलतियों को सुधारने के लिए हिम्मत इकट्ठी कर लेना और तदनुरूप कार्यपद्धति बना लेना। इस तरह एकाँत का आधा काम समाप्त। इस एकाँत सेवन के चिंतन को याद कीजिए। इसके बाद दूसरा वाला कदम उठाइए। यह दूसरा कदम हरदम आपको एकाँत में बैठकर उठाना पड़ेगा।
चिंतन में भी मुखरित होता है। इसमें भी जगह-जगह पर पर्यावरण के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। वन-अरण्यों की गोद में ही वस्तुतः इस काल की संस्कृति पुष्पित-पल्लवित हुई थी, जिस कारण यह ‘अरण्य संस्कृति’ के नाम से भी प्रख्यात हुई।
चिंतन में वन के महत्व एवं जीव संरक्षण पर सूक्ष्म विचार पाते हैं, जिसको चंद्रगुप्त ने व्यावहारिक रूप दिया था। अशोक के काल में हम इसका चरमोत्कर्ष पाते हैं। इसी परंपरा को गुप्तकाल में हर्षवर्धन ने आगे बढ़ाया है। इस काल में कालीदास से लेकर, माघ, बाण, बुद्धघोष, भवभूति, भारवि आदि कवियों द्वारा वन-उपवन एवं जीव-जंतुओं सहित मनुष्य के पर्यावरण के साथ सामंजस्यपूर्ण संबंधों का उल्लेख मिलता है।
चिंतन के लिए जब आप बैठें तो आप यह विचार किया करें कि हम पिछले दिनों क्या भूल करते रहे हैं। हम रास्ता भटक तो नहीं गए, भूल तो नहीं गए। इसके लिए ही जन्म मिला था क्या? पेट के लिए जितनी जरूरत थी, उससे ज्यादा कमाते रहे क्या? कुटुँब की जितनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी थीं, उसके स्थान पर अनावश्यक संख्या में लोग बढ़ाते रहे क्या और जिन लोगों को जिस चीज की जरूरत नहीं थी, उनको प्रसन्न रखने के लिए उपहार रूप में लादते रहे क्या?
चिंतन अर्थात् अपनी समीक्षा
चिंतन और मनन को अस्त-व्यस्त बनाकर रखें। यह भी कोई ढंग हैं? यह क्या हैं? यह भी गलतियाँ है। व्यक्तिगत जीवन में आपके गुण, कर्म, स्वभाव संबंधी गलतियाँ क्या हुई और क्राइम-अपराध, जुर्म करने के संबंध में क्या भूलें हुईं?
चिंतन एवं कर्तृत्व में नियोजित कर लेते हैं।
चिंतन और मनन का भी स्थान रहना चाहिए और न केवल स्थान रहना चाहिए, बल्कि उसे मजबूती से पकड़े रहना चाहिए। छोड़ना किसी भी कीमत पर न हो, अगर आपका ऐसा संकल्प हो तो आप अध्यात्म जीवन में तेजी से आगे बढ़ेंगे और वह लाभ प्राप्त करेंगे जो अध्यात्मवाद की शक्ल में प्राप्त होते रहें हैं।
चिंतन आप जरूर किया कीजिए।
चिंतन’ और दूसरे का नाम है, ‘मनन’। चिंतन और मनन के लिए किसी कर्मकाँड की जरूरत नहीं है, किसी पूजा-विधान की जरूरत नहीं है और किसी समय निर्धारण की जरूरत नहीं है। अच्छा तो यह हो कि इन सब कामों के लिए आप सबेरे का समय ही रखें। अध्यात्म साधना के लिए सबसे अच्छा प्रातःकाल का ही है। दूसरे कामों के लिए भी प्रातःकाल का ही हैं, यानी कि चौबीस घंटों में जो सबसे अच्छा समय हैं, वह प्रातःकाल का ही हैं।
चिंतन-मनन की चौथी वाली कड़ी कह सकते हैं। उसका नाम है, ‘आत्मविकास’ आत्मविकास का क्या मतलब है? आत्मविकास का यह मतलब है कि अपने आपका, अपने ‘अहं’ के दायरे को बढ़ा देना। लोगों का दायरा कूप-मंडूक के तरीके से बहुत छोटा है। वे अपने शरीर को ही अपना मानते हैं।
चिंतन और गतिविधि का गतिचक्र अपनी धुरी पर परिभ्रमण करता है। समय, सार नए तर्क, तथ्य, प्रकार, उदाहरण के कारण ताप बढ़ते घटते रहते हैं। मन क्षेत्र को जीवन का उद्गम उद्भव समझा जाना मनुष्य जैसा भी कुछ है, जैसा भी कुछ होने वाला है सब कुछ उसकी विचार संपदा का प्रतिफल है। चिंतन को यदि जीवनचर्या में सर्वोपरि स्थान मिले, उसे न तो अनुचित कहा जाना चाहिए और न अत्युक्ति। भगवान के बाद आदमी की इच्छा आवश्यकता मनःक्षेत्र जायेगी है।
चिंतनपरक-आत्मसमीक्षा एक, आत्मसुधार दो और मननपरक आत्मनिर्माण एक और आत्मविकास दो। दो मनन की धाराएँ और दो चिंतन की धाराएं चारों को मिला दीजिए। यह चारों वेदों का सार है। यह चारों दिशाओं से भगवान् के बरसने वाले अनुदानों को प्राप्त करने का सही तरीका है। आपकी उपासना में चिंतन और मनन का भी स्थान रहना चाहिए और न केवल स्थान रहना चाहिए, बल्कि उसे मजबूती से पकड़े रहना चाहिए।
चिंतन को यदि जीवनचर्या में सर्वोपरि स्थान मिले, उसे न तो अनुचित कहा जाना चाहिए और न अत्युक्ति। भगवान के बाद आदमी की इच्छा आवश्यकता मनःक्षेत्र जायेगी है। वही से उपलब्धियों का उपाय खोजा जाता है।
चिंतन उसे कहते हैं जिसमें भूतकाल के लिए विचार किया जाता है कि हमारा भूतकाल किस तरीके से व्यतीत हुआ। इसके बारे में आप समीक्षा कीजिए। आप अपने समीक्षा तो नहीं कर पाते, लेकिन दूसरों की समीक्षा कर अच्छी तरह जानते हैं। आप पड़ोसी की समीक्षा कर सकता है, अपनी बीबी के दोष निकाल सकते हैं, भाग्य ने गलती बता सकते हैं। कोई भी ऐसा नहीं है जिसकी आप गलती न बताते हों, लेकिन अपनी गलती?
चिंतन के दो हिस्से हैं, उसी तरह मनन के दो हिस्से हैं। इनमें से एक का नाम हैं, ‘आत्मनिर्माण और दूसरे का नाम है आत्मविकास आत्मनिर्माण क्या है? आत्मनिर्माण उसे कहते हैं कि जो चीज आपके पास नहीं है या जो उच्चस्तरीय गुण, कर्म, स्वभाव आपके व्यक्तित्व में शामिल नहीं है, वह शामिल कीजिए। मसलन आप पढ़े-लिखे नहीं हैं, विद्या नहीं है आपके पास, तो आप कोशिश कीजिए कि आपको विद्या पढ़नी है। हम ईमानदारी से रहते हैं, बीड़ी भी नहीं पीते?
चिंतन की धाराएं चारों को मिला दीजिए। यह चारों वेदों का सार है। यह चारों दिशाओं से भगवान् के बरसने वाले अनुदानों को प्राप्त करने का सही तरीका है। आपकी उपासना में चिंतन और मनन का भी स्थान रहना चाहिए और न केवल स्थान रहना चाहिए, बल्कि उसे मजबूती से पकड़े रहना चाहिए। छोड़ना किसी भी कीमत पर न हो, अगर आपका ऐसा संकल्प हो तो आप अध्यात्म जीवन में तेजी से आगे बढ़ेंगे और वह लाभ प्राप्त करेंगे जो अध्यात्मवाद की शक्ल में प्राप्त होते रहें हैं।
चिंतन में मग्न उसकी आत्मा के स्वर फूटे “वास्तविक बहादुरी तो सृजन में हैं, ध्वंस में नहीं, क्योंकि सृजन में ईश्वर स्वयं अभिव्यक्त होता है।”
चिंतन-मनन के लिए आप कहीं थोड़ी देर के लिए शांतचित्त से बैठ जाएं और यह समझें कि हम अकेले हैं, कोई हमारा साथी और सहकारी नहीं है। साथी अपनी जगह पर, सहकारी अपने स्थान पर, कुटुँबी अपने स्थान पर, पैसा अपने स्थान पर, व्यापार अपने स्थान पर, खेती बाड़ी अपने स्थान पर इन सबको अपने-अपने स्थान पर रहने दीजिये। आप तो सिर्फ यह अनुभव कीजिए कि हम एकाकी हैं और एकाँत में बैठे हुए हैं। फिर क्या करें? फिर आप दो तरह के विचार करना शुरू कीजिए।
चिंतन। चिंतन की दो ही धाराएँ हैं, गलतियों को याद करना और गलतियों को सुधारने के लिए हिम्मत इकट्ठी कर लेना और तदनुरूप कार्यपद्धति बना लेना। इस तरह एकाँत का आधा काम समाप्त। इस एकाँत सेवन के चिंतन को याद कीजिए। इसके बाद दूसरा वाला कदम उठाइए।
चिंतन की शैली को बदलने के लिए जो कुछ कर सकते हैं, वह सब कुछ कीजिए, लेकिन परिवार के लिए भी कीजिए। परिवार के पंचशीलों में ‘श्रमशीलता’ का नाम आता है, सुव्यवस्था का नाम आता है, मितव्ययिता का नाम आता है, सहकारिता, शालीनता का नाम आता है। यह सब बाते उसमें आती है। आप इन सब बातों का स्वयं निर्धारण कीजिए और घरवालों को धारण करवाइए। यह व्यक्तित्व के निर्माण, चरित्र के निर्माण, चिंतन के निर्माण करने का एक शानदार तरीका है।
चिंतन-मनन के लिए ऐसा संभव नहीं है। इसके लिए ऐसा स्थान होना चाहिए जहाँ बाहरी विक्षेप उत्पन्न न होता हो और आपका मन शांत और एकाग्र हो जाता हो। इसके लिए कोई मुनासिब एकाँत का स्थान मिल जाए, तो और भी अच्छा, लेकिन अगर न मिले, तो आप आँखें बंद करके भी ऐसी जगह बैठ सकते हैं, जहाँ कोलाहल न हो। आँखें बंद कर लेंगे, तब भी गुफा निवास की स्थिति बन जाती है। गुफा में चले जाना और शांत-एकाँत में चले जाना एक की बात है।
चिंतन और मनन करने जब बैठें, तब यह विचार किया कीजिए। यह तीसरी वाली बात निर्माण वाली धारा है।
चिंतन मनन की प्रेरणा इसलिए दी जाती है कि वे इसकी सहायता से अपने अंतर्जगत में प्रवेश करें। बिना किसी के बताए सिखाए लाखों लोग आज भी गीता के एक-एक अध्याय का नियमित पाठ करते हैं।
चिंतन’। चिंतन आप जरूर किया कीजिए।
चिंतन और मनन में विचार करने की गुंजाइश हैं, मन को भागने की पूरी छूट है। ध्यान में तो एक केंद्र ही करना पड़ता है, पर इसमें एक केंद्र में नहीं कर पड़ता। इसके लिए विचार करने के लिए काफी लंबी-चौड़ी गुंजाइश है।
चिंतन को याद कीजिए। इसके बाद दूसरा वाला कदम उठाइए। यह दूसरा कदम हरदम आपको एकाँत में बैठकर उठाना पड़ेगा। इसका नाम है ‘मनन’। मनन क्या है?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-March
चिंतनधारा को अपनाया जाता है, उसमें साधक कुछ इस तरह सोचता है, जिस प्राणवायु के बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रहा जा सकता, वह हमने स्वयं नहीं बनाई। संसार में अपने आस-पास और शरीर के भीतर भी वायु तथा आकाश का जैसा विस्तार है। वह बना सकना तो दूर, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। शरीर के भीतर और बाहर वायु के दबाव, गुरुत्वाकर्षण, गति देने वाली जैविक प्रक्रियाएँ, पोषण देने वाले उपादानों में से अपना बनाया कुछ भी तो नहीं है। यह विराट् अस्तित्व के ही अनुग्रह का फल है।
चिंतन को अपनाने के बाद दैन्य-दुर्बलता टिकी नहीं रह सकती। विनम्रता के साथ एक सात्विक संतुलन बना रहने लगता है।
चिंतन है। भगवान् जब भी आता है, हर युग में निरंतर होती रहने वाली परिवर्तन की प्रक्रिया को साकार करने के लिए आता है। चूँकि पश्चिम में सभ्यता का विकास, सोचने का विकास उस सीमा तक नहीं हुआ, जहाँ तक हमारे औपनिषदकालीन ऋषियों ने सोचा, इसीलिए उनने कह दिया कि क्राइस्ट इज द लिमिट’ यही अंतिम हैं। इसीलिए उनकी लेखनी एंटी क्राइस्ट की बात कहती है, जबकि हम नवयुग के आगमन की बात करते हैं।”
चिंतन अनाचार ही नहीं, दुराचार और अत्याचार करने तक पर उतारू हो जाता है, फलतः अंतराल में अंतर्द्वंद्व उठ खड़े होते हैं, दुहरा व्यक्तित्व उभरता है। इस असंतुलन के कारण अविवेकी व्यक्ति की मनःस्थिति सनकी एवं उद्धत, अभिमानी जैसी हो जाती है। उस आवेश से सारा शरीर तन जाता है। यह तनाव जिस भी अंग-अवयव को कमजोर पता है, उसी के ऊपर अपना अधिकार जमा लेता है। उत्तेजित तनावों की भाँति हीनता, दीनता, भीरुता, आशंका आदि का भी ऐसा प्रभाव होता है, जिसे ‘अवसाद’ कह सकते हैं।
चिंतन की सीमा है,
चिंतन या आचरण मनःक्षेत्र को मथ डालते हैं। आत्मिक प्रेरणा उनसे दूर रहने की प्रेरणा देती है, किंतु उद्धत चिंतन अनाचार ही नहीं, दुराचार और अत्याचार करने तक पर उतारू हो जाता है, फलतः अंतराल में अंतर्द्वंद्व उठ खड़े होते हैं, दुहरा व्यक्तित्व उभरता है। इस असंतुलन के कारण अविवेकी व्यक्ति की मनःस्थिति सनकी एवं उद्धत, अभिमानी जैसी हो जाती है। उस आवेश से सारा शरीर तन जाता है। यह तनाव जिस भी अंग-अवयव को कमजोर पता है, उसी के ऊपर अपना अधिकार जमा लेता है।
चिंतन, जीवन शैली को संतुलित बनाएँ।
चिंतन का परिचायक बनता जा रहा है। होली जलाई जाती है, तो उसके साथ सारा कूड़ा-करकट, ईर्ष्या-द्वेष, घृणा-कामुकता के भाव आदि भी जला दिए जाते हैं। परंतु इससे उल्टा ही हो रहा है। कई बार इसी पर्व पर दंगे उठ खड़े होते हैं। समाज में पारस्परिक सामंजस्य-समरसता स्थापित करने हेतु स्थापित यह पर्व ऐसी छिछालेदारी का पात्र बनेगा, यह कभी सोचा भी नहीं गया था।
चिंतन मनन के बाद जो निर्धारण हो, उस पर अमल भी किया जाए। यह निर्धारण किसी और के साथ मिलकर नहीं, स्वयं ही करना चाहिए। तुलना और समीक्षा का यह अभ्यास संतोष की सिद्धि तक पहुँचाएगा।
चिंतनप्रधान होती हैं। मान्यताएँ, विचारणाएँ, इच्छाएँ ही प्रेरणा-केंद्र होती हैं और उन्हीं के प्रवाह में सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार का स्वरूप भी तदनुरूप ही हो सकता है। लोकमानस को अवाँछनीयता, अनैतिकता एवं मूढ़ मान्यताओं से विरत करने वाली विचारक्राँति ही अपने समय की समस्याओं का समाधान कर सकती है।” (पृष्ठ 23) इस व्याख्या से समझा जा सकता है कि अवतार स्वरूप परिस्थितियों के अनुरूप भिन्न-भिन्न होते हैं व उन्हें समझने के लिए दूरदर्शी विवेकशीलता-प्रज्ञा का जागरण अनिवार्य है।
चिंतन की उत्कृष्टता सफलता का एक अंग है। सही सोच क्षमताओं का भरपूर उपयोग करने में सहायक होती है। सच्चा विश्वास इसी सोच से कई गुना बढ़कर है। सच्चा विश्वास आत्मविश्वासी होने का दृष्टिकोण है। यह व्यापक तैयारियों से ही उपलब्ध होता है।
चिंतन करता है। ऐसी स्थिति में भावनाएँ, विचारणाएँ सात्विक ढंग से निस्सृत होती हैं और उनका आरोपण जिस किसी पर भी होगा, उसी में अपनत्व भरी तरंगों का प्रवाह प्रस्फुटित होने लगेगा। ऐसी दशा में स्वयं को प्रसन्नता होती है, स्नायुमंडल को विश्राम मिलता है और विरोधी आकाँक्षाएँ-भावनाएँ मिटती हैं। मन एवं उसकी शक्तियों का बिखराव भी रुकता है। यही शक्तियाँ मूल स्रोत पर पहुँचकर घनीभूत होती और तन-मन को स्वस्थ बनाती हैं।
चिंतन द्वारा पाठक-परिजनों को अवतार की प्रत्यक्ष प्रेरणा से अनुप्राणित करना चाहेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-April
चिंतन चल रहे थे, उन्हीं दिनों कुछ विलक्षण घटनाएं घट गई, जिससे वैज्ञानिक इस पर पुनर्विचार के लिए मजबूर हो गए।
चिंतन करेंगे, तो थोड़ा कठिन पड़ेगा। इसलिए हर दिन सोते समय में, मौत की गोद में, नींद की गोद में जाते समय यह विचार लेकर जाया करें कि अब हम इस संसार से चले और भगवान् के यहाँ गए। ऐसी स्थिति में फिर आपको क्या करना चाहिए? लगाव को कम करना चाहिए। लोगों से, वस्तुओं से आपका लगाव जितना ज्यादा होगा, आप उतना ही ज्यादा कष्ट पाएंगे।
चिंतन प्रवाह जिस दशा में बहने लगता है, तदनुरूप ही उसकी नियति बन जाती है। इसी को कहते हैं, भविष्य निर्धारण।
चिंतन क्षेत्र का अधिकाँश हिस्सा भविष्य की कल्पनाओं में ही सदैव निरत रहता है। इसे यों कहना ठीक रहेगा कि भावी निर्धारणों का स्वरूप ही चिंतन क्षेत्र की सबसे बहुमूल्य संपदा है। प्रत्यक्षतः भविष्य दिखाई न पड़ने पर भी शक्ति उन काल्पनिक निर्धारणों में सर्वाधिक खरच होती है, पर सत्य है कि जो जैसा सोचता है, वह वैसा ही बन जाता है। समूहगत चिंतन प्रवाह जिस दशा में बहने लगता है, तदनुरूप ही उसकी नियति बन जाती है। इसी को कहते हैं, भविष्य निर्धारण।
चिंतन है। वे पूर्णतः ईश्वरनिष्ठ-आत्मसत्ता में तन्मय महापुरुष है।
चिंतन तंत्र सक्रिय हो उठा, पर यह सोचकर कि शायद आज की विशिष्ट मनोदशा के कारण ही वह पूर्व में देखे गए दृश्यों को भूल रहा हो, उस पर विशेष ध्यान न दिया। वहाँ एक तालाब था, जिसमें अनेक बतखें और हंस जलक्रीडा कर रहे थे। थोड़ी देर रुककर वह उनकी अठखेलियों को निहारता रहा, फिर आगे बढ़ गया। झोंपड़ियों के बाहर अनेक लोग धूप सेंक रहे थे और परस्पर वार्तालाप में संलग्न थे। उसने उनमें से एक दो से बात करने की कोशिश की, पर सुलह न हो सका।
चिंतन के आधार पर ही अपना समय गुजारते हैं। वर्तमान और भविष्य के लिए उपर्युक्त साधन उनके पास उस स्थिति में नहीं होते, अस्तु भूतकालीन स्मृतियों का दबाव ही उन पर छाया रहता है। संभवतः मृतात्माओं का नामकरण ‘भूत’ इसी आधार पर किया गया हो। पुनर्जन्म में कइयों को कितनी ही घटनाएँ पिछले जीवन की याद रहती हैं और ऐसे कथन बहुत बार आश्चर्यजनक रीति से सत्य पाए जाते हैं। इतना तो हर किसी के साथ होता है कि भूतकाल के अनुभव एवं संस्कार जन्म-जन्माँतरों तक चले जाते हैं।
चिंतन और मनन कीजिए “नया जन्म नई मौत” “और हर दिन को नया जन्म और हर रात को नई मौत।” इस मौत और जिंदगी के झूले में आप झूलते हुए अपने फर्ज, कर्तव्य और बुद्धिमत्ता के बारे में विचार करेंगे, तो ऐसी हजारों बाते मालूम पड़ेंगी, जिसके आधार पर आपका जन्म सार्थक हो सके आप अध्यात्मवाद के सच्चे अनुयायी और उत्तराधिकारी बन सकें। आज आप से यही कहना था। ॥ॐ शांति॥
चिंतन क्षेत्र के निर्धारणों के रूप में विद्यमान रहते हैं। ब्रह्माँड का हर घटक इन घटनाक्रमों से जुड़ा होता है, चाहे वह जड़ हो अथवा चेतन।
चिंतन करते हैं, तो यही बोध होता है कि कितने भाग्यशाली हैं हम, जिन्हें ऐसे गुरु मिले। उनके ही हाथों से लिखा 7 सितंबर 1967 का एक पत्र यहाँ उद्धृत कर रहे हैं-
चिंतन धारा में यही सत्य विविध रूपों में वर्णित हुआ है। यह तथ्य स्पष्ट है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम एवं आद्यशक्ति सीता आदर्शों की स्थापना के लिए तो अवतरित हुए ही थे, परंतु साथ ही सनातन ब्रह्मा एवं शक्ति भी राम एवं सीता के रूप में लीला करने इस भूतल पर आए थे।
चिंतन तंत्र पर छाई हुई शिथिलता को दूर किया जाए। इसके लिए ध्यान-धारणा के सभी उपचार न्यूनाधिक मात्रा में लाभदायक ही सिद्ध होते हैं। उपासना में ध्यान-धारणा पर जोर देने के अनेक शारीरिक-अध्यात्मिक लाभों के अतिरिक्त एक अतिरिक्त लाभ यह भी हैं कि उसे करते रहने पर विस्मृति की शिकायत पनपने नहीं पाती।
चिंतन और क्रिया को जोड़ देते हैं, तो दोनों से एक समग्र स्वरूप बन जाता है। आप शरीर से काम करते रहें, मगर कोई उद्देश्य न हो अथवा अगर आप उद्देश्य ऊँचे रखें, लेकिन उसे क्रियान्वित करने का कोई मौका न हो, तो दोनों ही बातें बेकार हो जाएँगी। इसलिए मित्रो! सबेरे उठते ही जहाँ अपने जीवन को सराहें या मनुष्य जीवन पर गौरव का अनुभव करें, वहाँ एक बात और साथ-साथ में चालू कर दें, सुबह प्रातःकाल से लेकर सायंकाल तक का एक ऐसा टाइमटेबिल बनाएँ जिसको कि सिद्धाँतवादी कहा जा सके, आदर्शवादी कहा जा सके। इसमें भगवान् की हिस्सेदारी रखिए। शरीर के लिए भी गुजारे का समय निकालिए, भगवान् के लिए भी गुजारे समय निकालिए।
चिंतन और शालीन व्यवहार के मूलभूत अनुबंध को जिसने पूरा कर लिया, उसके लिए समय के अवरोध को पार कर सकना कठिन नहीं, ऐसा तत्ववेत्ताओं का सुनिश्चित मत है।
चिंतन को जोड़ दीजिए। चिंतन और क्रिया को जोड़ देते हैं, तो दोनों से एक समग्र स्वरूप बन जाता है। आप शरीर से काम करते रहें, मगर कोई उद्देश्य न हो अथवा अगर आप उद्देश्य ऊँचे रखें, लेकिन उसे क्रियान्वित करने का कोई मौका न हो, तो दोनों ही बातें बेकार हो जाएँगी। इसलिए मित्रो! सबेरे उठते ही जहाँ अपने जीवन को सराहें या मनुष्य जीवन पर गौरव का अनुभव करें, वहाँ एक बात और साथ-साथ में चालू कर दें, सुबह प्रातःकाल से लेकर सायंकाल तक का एक ऐसा टाइमटेबिल बनाएँ जिसको कि सिद्धाँतवादी कहा जा सके, आदर्शवादी कहा जा सके। इसमें भगवान् की हिस्सेदारी रखिए।
चिंतन क्षेत्र की सबसे बहुमूल्य संपदा है। प्रत्यक्षतः भविष्य दिखाई न पड़ने पर भी शक्ति उन काल्पनिक निर्धारणों में सर्वाधिक खरच होती है, पर सत्य है कि जो जैसा सोचता है, वह वैसा ही बन जाता है। समूहगत चिंतन प्रवाह जिस दशा में बहने लगता है, तदनुरूप ही उसकी नियति बन जाती है। इसी को कहते हैं, भविष्य निर्धारण।
चिंतन करते रहें
चिंतन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अंतःकरण के भावों की भलीभाँति पवित्रता को धन सम्बन्धी तप कहते हैं।” (गीता 17/14-16)
चिंतन काया तक सिमटा, अश्लीलता की परिधि लाँघता दिखाई दे रहा है, वही समाज के पतन का, दैवी आपदाओं का, बढ़ते संक्षोभों का मूल कारण है। यदि हमारी दृष्टि ऋषिप्रवर कुतुक जैसी हो जाए, तो हम बहुत सारी समस्याओं का समाधान पा सकते हैं। बहुचित्तीय राग-आसक्तिप्रधान वृत्ति से निरपेक्ष होते ही सही व्यक्तित्व उभरकर आ जाता है। भगवान् को ‘तत्त्वरूप’ से जान पाना बिना वीतराग स्थिति में जाए संभव नहीं है। यह भी कहा जा सकता है कि भगवान् को जान लेने के बाद ‘वीतराग‘ स्थिति एक सिद्धि के रूप में हस्तगत हो जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-June
चिंतन सामने रखते हैं कि कोई भी अपवाद नहीं है मनःस्थिति किसी की भी कभी भी गड़बड़ा सकती है। आशावाद ही जीवन है। अंधकार कितना भी घना क्यों न हो, सूर्य कदापि आशा नहीं छोड़ता कि दिनमान नहीं होगा। वह तो भवितव्यता है। ऐसी बदलियाँ आए दिन हम सबके जीवन सूर्य पर भी आती रहती है।
चिंतन को पढ़-पढ़कर अपनी मुक्ति का पथ भी प्रशस्त कर लिया जाए। इससे बड़ी प्रार्थना और हो भी क्या सकती है कि हम चाहेंगे कि ऐसा हो एवं आप गृह निवासी साधु के रूप में, एक सद्गृहस्थ होते हुए भी निर्लिप्त कर्म करने वाले साधक के रूप में प्रतिष्ठित हों।
चिंतन को तोड़ता है कि वह संसार का केंद्र है। आसपास के जगत् में जो कुछ भी होता है, उसके अनुरूप और अनुकूल ही होना चाहिए। तीनों लोक विराट् ब्रह्मांड, अस्तित्व का तेजस्वी प्रचंड और महासूर्य जैसा स्वरूप, उस स्वरूप में अपनी अकिंचन स्थिति और महाऊर्जा की एक सूक्ष्म किरण से चलती हुई अपनी सत्ता। इन अनुभूतियों से गुजरने के बाद किस साधक को यह भ्रम रह जाएगा कि वह महान है और यह समूचा वैभव उसी के लिए पसरा हुआ है।
चिंतन किया जाए, तो इसकी प्रेरणा साधक की दिशाधारा ही बदल देती हैं। शास्त्रों और तत्वदर्शियों ने भी अपने ढंग से यही बात कही है। उनका सार मनुष्य को महत्व नहीं देता। वह दूसरे प्राणियों की तरह ही है। सृष्टि परिवार की करोड़ों अरबों प्रजातियों में से एक है।
चिंतन उपयोगी एवं व्यावहारिक सिद्ध हुआ। छठी पंचवर्षीय योजना में प्रौढ़ शिक्षा को व्यापक आधार एवं सुव्यवस्थित रूप दिया गया था। इस महत्वाकाँक्षी कार्यक्रम के अंतर्गत क्भ् से ख्भ् आयु वर्ग के लगभग दस करोड़ व्यक्तियों को पाँच वर्ष की अवधि में शिक्षा की सुविधाएं सुलभ कराने का प्रस्ताव था। यह कार्यक्रम क् अप्रैल क्−स्त्र− से प्रारंभ हुआ। सातवीं पंचवर्षीय योजना में भी प्रौढ़ शिक्षा के माध्यम से इसी वर्ग विशेष के जीवन स्तर को विकसित करने का लक्ष्य रखा गया था।
चिंतन को वर्तमान त्रासदी भरे समय में भी विधेयात्मक बनाए रख सकें, मनोबल गिरने न दें और पतन की दुरभिसंधि का शिकार न हो जाएं। पिछले दिनों इतना कुछ कहा गया, लिखा गया, कभी-कभी पाठकों-परिजनों को लगता है कि अब तो इक्कीसवीं सदी आ गई। अब तो कष्टों का समापन होना चाहिए। सतयुग के चिह्न स्थान-स्थान पर दिखाई देने चाहिए। किंतु दैवी आपदा ही नहीं, दुर्बुद्धि का भस्मासुर अभी चारों ओर महाविनाश मचाता दीख रहा है।
चिंतन इस तरह का नहीं है? ईमानदारी से पूछें तो लगभग सभी लोग अपने आपको केंद्र में रखकर देखते हैं। गायत्री मंत्र का जप आत्मिक जगत् में जो भी विलक्षण प्रभाव उत्पन्न करता है, उसका पहला संस्कार व्यक्ति की इन अनास्था या विकृत चिंतन को तोड़ता है कि वह संसार का केंद्र है। आसपास के जगत् में जो कुछ भी होता है, उसके अनुरूप और अनुकूल ही होना चाहिए। तीनों लोक विराट् ब्रह्मांड, अस्तित्व का तेजस्वी प्रचंड और महासूर्य जैसा स्वरूप, उस स्वरूप में अपनी अकिंचन स्थिति और महाऊर्जा की एक सूक्ष्म किरण से चलती हुई अपनी सत्ता।
चिंतन, उदात्त भावना एवं आदर्श चरित्र के रूप में परिलक्षित करना होगा। जितने अंश में यह अध्यात्म व्यक्तित्व के अंदर घटित होता जाएगा, उतना ही उसमें देवत्व बढ़ता जाएगा। ऐसे ब्रह्मवर्चस संपन्न महामानवों का बाहुल्य ही भोगवादी दर्शन से उपजी भ्राँतियों का सर्वसमर्थ निराकरण करेगा और तभी समाज में वे परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी, जिन्हें स्वर्गोपम कहा जा सकेगा।
चिंतन और व्यवहार आपस में अन्योन्याश्रित है। विचार उत्कृष्ट होंगे तो शंका-संदेहों का मायाजाल अपने आप ही तिरोहित हो जाएगा। ‘ए ट्रीटीज ऑफ ह्यूमन नेचर’ में डेवीड ह्यूम ने मन के बारे में कुछ इस तरह से अभिव्यक्ति दी है। विचाररुपी मन मानसिक साम्राज्य का चक्रवर्ती सम्राट् है। इसी मन द्वारा ही शरीर परिचालित होता है।
चिंतन में लगा रहता हैं बुद्धि भी जड़ पदार्थों में सन्मय न रहकर परमात्मज्ञान में अधिक-से अधिक सूक्ष्मदर्शी होकर दिव्य भाव में बदल जाती हैं । जब अपने कर्मों के औचित्य एवं अनौचित्य को परम प्रेरक शक्ति के हाथों सौंप देते हैं, तो एक प्रकार की निश्चिंतता मन में आ जाती है। मन का बोझ हलका हो जाता हैं। जिसकी जीवन पतवार परमात्मा के हाथ में हो उसे किसका भय?
चिंतन द्वारा हो रहा है। पूँजीवादी नया समाज कैसा भी हो, लेकिन यह नहीं होगा।
चिंतन ऐसा हो जो ऊपर बताया गया। ब्राह्मण वह जो ब्रह्म में विचरण करे, जो कर्मों के बंधन से ऊपर चले।
चिंतन और दुष्ट आचरण के कारण जो अनर्थ उपजे हैं, उन्हें कोई दावानल भस्मसात् करके रख दें, यह संभव है। ऐसा समय असाधारण रूप से कष्टकारी भी हो सकता है। विपत्तियाँ और बढ़ सकती हैं। संकट और भी अधिक गहरा सकते हैं, किंतु साथ ही यह भी निश्चित है कि उज्ज्वल भविष्य का सृजन भी इन्हीं दिनों होगा। प्रतिभाएँ इन्हीं दिनों उभरेंगी और उनके द्वारा बहुमुखी सृजन की ऐसी योजनाएं भी बनेंगी, जो चरितार्थ होने पर ऐसा वासंती वातावरण बना दें, जिसकी इक्कीसवीं सदी के रूप में आशा-अपेक्षा चिरकाल से की जाती रही हैं।
चिंतन से जुड़ते चले गए। जीवन जीने की कला की विधा के रूप में अध्यात्म का प्रतिपादन कर जीवन साधना को एक अनिवार्यता बताने वाले आचार्य श्री ने जन-जन के हृदय स्थल को स्पर्श ही नहीं किया वरन् अपने विचारों से गजब का एक क्राँतिकारी आँदोलन खड़ा कर दिया। यह अपने समय का विचार क्राँति अभियान बना, जो साधना की पृष्ठभूमि पर टिका था।
चिंतन का परित्याग करके बार-बार परमात्मा के चिंतन में लगा रहता हैं बुद्धि भी जड़ पदार्थों में सन्मय न रहकर परमात्मज्ञान में अधिक-से अधिक सूक्ष्मदर्शी होकर दिव्य भाव में बदल जाती हैं । जब अपने कर्मों के औचित्य एवं अनौचित्य को परम प्रेरक शक्ति के हाथों सौंप देते हैं, तो एक प्रकार की निश्चिंतता मन में आ जाती है। मन का बोझ हलका हो जाता हैं। जिसकी जीवन पतवार परमात्मा के हाथ में हो उसे किसका भय?
चिंतन बिंदु पर केंद्रित करने की प्रवीणता प्राप्त करना है यूँ तो सामान्य विश्रामावस्था में ही अधिकाँश व्यक्तियों के मस्तिष्क से अल्फा तरंगें निकलती हैं। वे अल्फा तरंगें शरीर व मन की स्थिर व शाँत अवस्था की द्योतक है। ध्यान साधना से इन अल्फा तरंगों में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि देखी गई है। शोधकर्ता ब्राउन, स्टीवार्ट एवं ब्लोगेट ने ईईजी पर ग्यारह ध्यान करने वाले व ग्यारह ध्यान न करने वाले व्यक्तियों पर अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि ग्यारह में से क् साधकों की ध्यानावस्था में अधिकाँश समय अल्फा तरंगें निकल रही थी।
चिंतन और हृदय में परिष्कृत भाव तरंगों को उमगाने वाली सिद्ध होगी और जीवनक्रम भी श्रेय पथ पर सदैव ही निरंतर निर्बाध गति से अग्रसर होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-December
चिंतन चरित्र में आमूल-चूल परिवर्तन आया है। उसके अनुसार यह अनुभव एक तरह से आत्मशोधन प्रक्रिया थी, जिसने पिछले पापों को धो डाला।
चिंतन मिले, जीवन जीने का दिशाधारा का सच्चा मार्गदर्शन मिले। जानकारी देने वाला ज्ञान तो शिक्षा के रूप में, विज्ञान के रूप में, अन्य पत्र-पत्रिकाओं के रूप में ढेर सारा फैला पड़ा है, इंटरनेट से लेकर लाइब्रेरी में पाया जा सकता है, पर आत्मसत्ता को महानता की दिशा में अग्रसर करने वाले ज्ञान विस्तार का कहीं कोई तंत्र नहीं नजर आता। इस ज्ञान की विशेषता यह है कि यह तर्क, तथ्य, प्रमाणों की कसौटी पर प्रस्तुत किया गया है। आज के युग की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने वाले ‘वैज्ञानिक अध्यात्मवाद’ का पोषक-समर्थक-प्रस्तोता है।
चिंतन द्वारा तमाम मनोविकारों एवं मनोरोगों से बचाव करना चाहिए। यही स्थायी एवं समग्र समाधान है।
चिंतन का कक्ष। परोसा जाए श्रेष्ठ चिंतन, अरे! जनमानस के भी समक्ष श्रेष्ठ चिंतन चरित्र दोनों, स्वर्ग का सर्जन निश्चित है॥
चिंतन, अरे! जनमानस के भी समक्ष श्रेष्ठ चिंतन चरित्र दोनों, स्वर्ग का सर्जन निश्चित है॥
चिंतन, और व्यवहार में वह श्रेष्ठता क्यों नहीं आ पाती, जिसके लिए कहा जाता है कि वह ईश्वर का अंशधर है? उसमें ईश्वरीय चेतना विद्यमान है, यह सत्य है, तो उसकी झलक-झाँकी मिलनी चाहिए, वैसी पवित्रता भी दीखनी चाहिए, लेकिन यथार्थ में यह सब दृष्टिगोचर होते नहीं, क्यों? यह प्रश्न सभ्यता और समाज के विकासकाल से दार्शनिकों के मन में उभरते और उन्हें आँदोलित करते रहे हैं।
चिंतन को बढ़ाता है। विस्थापन व आरोपण किसी बाह्य परिस्थिति के प्रति एक अतर्किक तथा असंगत भय का रूप धारण करता है और व्यवस्थित रूप से इस परिस्थिति से दूर भागने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। सामान्यतः किसी विशेष वस्तु या घटना से डरना उस वर्ग से संबंधित सभी वस्तुओं के प्रति भय पैदा करता है।
चिंतन का केन्द्रीय संस्थापन पूर्णतः निर्विचार दशा में आ जाता है, जो काफी आनंददायक होता है।
चिंतन का है, सारे समाज को अपनी संतान मानकर उसकी सेवा करने का है। कितना सही व सशक्त मार्गदर्शन है। यही अपनत्व, सगे-संबंधी वाली आत्मीयता, खरी बातें हमारी गुरुसत्ता की विशेषता को स्थापित करती हैं।
चिंतन ही है। इसके द्वारा फोबिया से पूर्णतः मुक्ति पाई जा सकती है, क्योँकि फोबिया के मूल में वैचारिक विकृति ही सन्निहित होती है।
चिंतन एवं योगाभ्यास द्वारा जैसे एक नया इन्सान जन्म ले रहा था। पहली बार उसे यह प्रतीत हो रहा था कि, बाह्य जगत् का परिवर्तन, आँतरिक जगत् के विकास के अनुरूप ही होता है।
चिंतन सामर्थ्य में पैनापन आता है और सीखने समझने की क्षमता प्रखर होती है। इसके अतिरिक्त मस्तिष्क संबंधी रोगों का निदान होता है। अनिद्रा के रोगियों को इससे विशेष लाभ होता देखा गया है। जो व्यक्ति चिड़चिड़े स्वभाव के और क्रोधी हैं, वे इसके नियमित अभ्यास से अपनी प्रकृति परिवर्तित कर सकते हैं।
चिंतन करते रहने से ब्रह्मदर्शन होता है, यह सत्य है। स्वामी अपूर्वानंद जी (रामकृष्ण शिवाश्रम) लिखते हैं, ‘परमहंसदेव भी श्रीकृष्ण की साधना करते समय छह मास तक सर्वत्र कृष्ण का दर्शन करते थे। काली मंदिर में पूजा करते समय सब कुछ चैतन्यमय देखते थे, चिन्मय अर्घा, चिन्मय मंदिर, चिन्मयी देवी।’
चिंतन ही इसका एकमात्र निदान हो सकता है।
चिंतन वे पत्र द्वारा देते थे। ये पत्र भी एक अनाम अपने आत्मीय साधक को 29/5/52 को लिखा गया, ऐसी ही कुछ कहानी कहता है।
चिंतन चरित्र दोनों, स्वर्ग का सर्जन निश्चित है॥
चिंतन एवं सद्भाव। इसके अलावा शेष समस्त उपचार विधियाँ पेड़ की जड़ के स्थान पर पत्तों को सींचने एवं सद्चिंतन द्वारा तमाम मनोविकारों एवं मनोरोगों से बचाव करना चाहिए। यही स्थायी एवं समग्र समाधान है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-October
चिंतन करता है, वह वैसा ही बनता चला जाता है, इसके व्यक्तित्व का निर्धारण उसकी स्वयं के प्रति दृष्टि के अनुसार तथा विधेयात्मक−निषेधात्मक चिंतन के अनुसार होता है। इसी अध्याय में भगवान् योगी का आहार भी वर्णित करते हैं
चिंतन में नियोजन हो, मन का निग्रह होता रहे तथा अंतः करण के भाव पवित्र बने रहें (श्लोक 16)। भगवान् अंतिम श्लोक (28) में कहते हैं कि बिना श्रद्धा के किया गया कोई भी कार्य असत् है, न वह इस लोक में लाभदायक है, न मरने के बाद ही।
चिंतन−मनन हेतु लगाना होगा। पढ़ने के लिए पूरी साधनावधि तक समाचार पत्र, अन्य कोई साहित्य उपलब्ध नहीं होगा। भोजन, गंगाजल एवं प्रज्ञापेय साधना कक्षा में ही दोनों समय पहुँचा दिए जाएँगे। भोजन में हविष्यान्न की एक रोटी, औषधियों की चटनी एवं साधक की इच्छानुसार चावल या दलिया की सब्जी मिश्रित खिचड़ी दी जाएगी। अन्य कोई पदार्थ सेवन नहीं कर सकेंगे।
चिंतन हेतु होंगे। साधक अपनी विशिष्ट अनुभूतियों को लिख सकेंगे। बाद में इस आधार पर परामर्श एवं जिज्ञासा−समाधान भी पत्र द्वारा प्राप्त कर सकेंगे। समापन पर वे युगधर्म के परिपालन के क्रम में अपने अंदर उभरे संकल्प भी लिखकर देंगे। इनका भी विधिवत संकल्प कराया जाएगा।
चिंतन के सान्निध्य में ‘नामक ग्रंथ का विमोचन गायत्री तपोभूमि मथुरा के व्यवस्थापक पं. श्री लीलापत शर्मा जी के द्वारा किया गया। चार सौ पृष्ठ की यह ग्रंथ 1940 से 1966 तक की ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका से लिए गए पूज्यवर के विचारों का संकलन है। दो सौ रुपये मूल्य की यह पुस्तक मँगाई जा सकती है एवं घर में स्थापित की जा सकती है।
चिंतन में लगेंगे। औसत दो घंटे स्वाध्याय−मनन−चिंतन हेतु होंगे। साधक अपनी विशिष्ट अनुभूतियों को लिख सकेंगे। बाद में इस आधार पर परामर्श एवं जिज्ञासा−समाधान भी पत्र द्वारा प्राप्त कर सकेंगे। समापन पर वे युगधर्म के परिपालन के क्रम में अपने अंदर उभरे संकल्प भी लिखकर देंगे।
चिंतन, 12.45 से अनुलोम−विलोम प्राणायाम, 13 से 13.30 जपयोग तथा 13.30 से 14.00 बिंदु योग अंतः त्राटक (दीपक की ज्योति) हेतु निर्धारित है।
चिंतन करें। आज हम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की रेलम−पेल में जी रहे हैं। हर किसी के मन में आज के उस उपभोक्तावादी जीवन में अधिक और अधिक पाने की कामना है। सारी अंधी नकल पश्चिम की हो रही है एवं हमारे घर में बैठा एक ‘बुद्धबाक्स’ हमें ललचाता रहता है। यहाँ पूज्यवर अपने अभिन्न मित्र, शिष्य, प्रिय सखा को बता रहे हैं कि तपस्या हेतु, योग−साधना हेतु किया जा रहा पुरुषार्थ उसी लगन से भरा होना चाहिए, जैसा कि मनुष्य धन जोड़ने या करोड़पति बनने के लिए करता है।
चिंतन में व्यक्ति की मूलभूत स्वतंत्रता एवं दायित्व के सिद्धान्त के निकट है। सार्त्र के अनुसार हम स्वतंत्र होने के लिए दण्डित हैं और हम क्या हैं का निर्णय हमसे बाध्य नहीं है। सार्त्र ने एजिस्टेनियलिज्म एण्ड ह्यमनिज्म में कहा है कि कम से कम एक ऐसा प्राणी है जिसका अस्तित्व उसके सत्त्व का पूर्ववर्ती है। वह प्राणी है मनुष्य। व्यक्तिगत जीवन से सामूहिक जीवन की ओर बढ़ते हुए ओर्तेगा कहते हैं- यही बात सामूहिक जीवन पर भी लागू होती है।
चिंतन आदि भी तो कर्म हैं, कर्म नहीं बल्कि विशिष्ट कर्म हैं।
चिंतन का परिणाम ही है, जो उसे चरम लक्ष्य से दूर ले जाता है। ध्यान उस दूरी को घटाने और चिंताओं एवं उलझनों से ग्रसित मन को शाँति का शीतल अनुभव कराने का एक माध्यम है।
चिंतन में यही योग काम करता है। जीवन में इसका समावेश होना चाहिए । वे योग अलग है, जिनमें किसी तरह के अभ्यास किए जाते हैं। वह योगाभ्यास कहलाते हैं, जैसे—प्राणायाम वगैरह। उस योगाभ्यास की बात मैं आपसे नहीं कह रहा हूँ।
चिंतन और व्यवहार सब कुछ भारतीय संस्कृति के रंग में रँगे हुए होते थे। वे स्वयं ही अपनी संस्कृति के संरक्षक थे, परंतु आज उपभोक्तावादी पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध से भ्रमित युवा वर्ग को भारतीय संस्कृति के अनुगमन में पिछड़ेपन का अहसास होने लगा है। आज अँगरेजी भाषा और अँगरेजी संस्कृति के रंग में रँगने को ही आधुनिकता का पर्याय समझा जाने लगा है।
चिंतन में लगे रहते हैं उनकी अपनी समस्या का समाधान स्वतः ही हो जाता है। लोककल्याण में ही आत्मकल्याण की पहेली का हल छुपा हुआ है।”
चिंतन कर अपने आत्मविकास के लिए अपना पथ प्रशस्त करता चले, ऐसा व्यक्ति ही सही अर्थों में योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार योगी है। भगवान् 13, 14 श्लोक में ध्यानयोग की क्रियापद्धति पुनः अर्जुन को सिखाते हैं। वे कहते हैं कि “योगी को काया, सिर और गले को समान एवं अचल रखते हुए, स्थिर शरीर रखकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखकर, ब्रह्मचर्य में स्थित होकर, बिना किसी भय के, शाँत अंतःकरण के साथ परमात्मा में मन लगाना चाहिए। ऐसे योगी को परमानंद की पराकाष्ठारूपी चिरस्थाई शाँति मिलती है।”
चिंतन हेतु रखा गया है तथा 20.15 से 20.50 तत्त्वबोध साधना (निर्देशों द्वारा) संपन्न होकर साधकों को योगनिद्रा एवं विश्राम में चले जाना है।
चिंतन न करते हुए उन्हें बाहर ही रख (मन में न आने देकर) नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके, जिसकी इंद्रियाँ, मन व बुद्धि जीत ली गई हैं, ऐसा मोक्ष की इच्छा रखने वाला योगी इच्छा, भय और क्रोध से रहित होकर परमात्मा को प्राप्त कर लेता है अर्थात् मुक्त हो जाता है (श्लोक 27, 28 अध्याय 5)। यह एक प्रकार से ध्यान की विधि भी है, अंतः त्राटक की क्रियापद्धति भी तथा अंतर्गुहा में प्रवेश करने का मार्गदर्शन भी। इससे सुँदर योग का शिक्षण और क्या हो सकता है।
चिंतन के अनुसार होता है। इसी अध्याय में भगवान् योगी का आहार भी वर्णित करते हैं
चिंतन का क्रम है।
चिंतन होने लगता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-April
चिंतन के द्वारा अपने लिए उस वस्तु का निर्माण कर सकते हैं। यह नियम है कि हमारे प्रत्येक विचार मन में उत्पन्न होने पर बाहर भी वैसा ही रूप धारण करते हैं। इसलिए हम प्रार्थना के समय यदि वस्तु के अभाव का अपनी दीनता का विचार करते रहेंगे तो इसका परिणाम आशाजनक नहीं हो सकता। इसके विपरीत प्रार्थना के समय हमको इस प्रकार के भाव रखने चाहिए। “हमें तो सब कुछ प्राप्त है, हमारा सब कुछ सुँदर है नाथ!” तुम्हारी कृपा से मैं बराबर सफल होता जा रहा हूँ।
चिंतन के लिए थोड़े से क्षणों में तो उपयुक्त हो सकती है पर जीवन के सर्वांगीण विकास में यह अकेलेपन की भावना बड़ी घातक है। यह स्वार्थपरता का ही एक रूप है। पिछले 2-3 हजार वर्षों में यह प्रवृत्ति पनपी और फूट एवं स्वार्थपरता ने बढ़कर राष्ट्र का सत्यानाश कर दिया। ऋषि महर्षियों की घर-घर जाकर धर्म का अलख जगाने परम पुनीत परम्परा का लोप होकर साधु ब्राह्मणों में अकेले अपना भजन करने, दुनिया को स्वप्न व मिथ्या बताकर स्वयं को गुलछर्रे उड़ाने और लोक सेवा के कार्यों से दूर भागने की दुष्ट मनोवृत्ति पनपी फलस्वरूप देश का नैतिक स्तर गिर गया। जनता की धर्म भावनाएँ नष्ट हो गई।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-February
चिंतन एवं सत्संग से इन दिव्य गुणों की अभिवृद्धि होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-March
चिंतन से हुई है सही, लेकिन चिंतन कर्म में से मुक्ति की अपेक्षा नहीं रखता, बल्कि कर्म में से ही चिंतन उत्पन्न होता है। जो चिंतन कर्म में से मुक्ति की अपेक्षा रखता है वह मनुष्य को सही रास्ते पर नहीं, बल्कि अनुचित रास्ते पर ले जाता है। विकास के बदले विनाश की तरफ ले जाता है। फुरसत के समय का चिंतन भी निकम्मा होता है। जिस चिंतन का आधार प्रत्यक्ष कर्मयोग पर, अनुभव पर नहीं होता है, वह चिंतन हवा में रह जाता है।
चिंतन की प्रेरणा कहाँ से आवे? सभी ओर घोर स्वार्थपरता में डूबे हुए-भौतिक समस्याओं में उलझे हुए-मनुष्य दीखते हैं तो कोई व्यक्ति एकाकी-अपने लिए अलग रास्ता बनाने की इच्छा भी नहीं करता। सब उसी ढांचे में ढलते चले जाते हैं। देखा-देखी से उत्साह प्राप्त करने अनुकरण करने में प्रसन्न होने की मानसिक कमजोरी के कारण लोग उसी दिशा में बहते चले जाते हैं जिसमें अन्य सब लोग बहते हैं। इस प्रक्रिया के कारण आज जन मानस का प्रवाह एक बुरे मार्ग पर चल रहा है।
चिंतन कर्म में से मुक्ति की अपेक्षा नहीं रखता, बल्कि कर्म में से ही चिंतन उत्पन्न होता है। जो चिंतन कर्म में से मुक्ति की अपेक्षा रखता है वह मनुष्य को सही रास्ते पर नहीं, बल्कि अनुचित रास्ते पर ले जाता है। विकास के बदले विनाश की तरफ ले जाता है। फुरसत के समय का चिंतन भी निकम्मा होता है। जिस चिंतन का आधार प्रत्यक्ष कर्मयोग पर, अनुभव पर नहीं होता है, वह चिंतन हवा में रह जाता है।
चिंतन हवा में रह जाता है। मनुष्य के शरीर की रचना भी ऐसी है कि उसका मस्तक आकाश में होते हुए भी पाँव जमीन से लगे हुए हैं। मानवमूर्ति, मनुष्य के जीवन की कैसी व्यवस्था होनी चाहिए, इसका सृजन करती है। इसलिए ज्ञान, कर्म और आनंद, जिसको अब मैं भक्ति कहूँगा, तीनों का एक साथ अनुभव करना चाहिए। वैदिक ऋषि बोल रहा है “तवेत् इन्द्र अहं आशसा हस्ते दातुरं च ना दधे” -हे परमेश्वर, तेरी प्राप्ति के लिए हाथ में हँसिया लेकर मैं खेत में काम करता हूँ।
चिंतन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण की पवित्रता ही सच्चा तप है।”
चिंतन भी निकम्मा होता है। जिस चिंतन का आधार प्रत्यक्ष कर्मयोग पर, अनुभव पर नहीं होता है, वह चिंतन हवा में रह जाता है। मनुष्य के शरीर की रचना भी ऐसी है कि उसका मस्तक आकाश में होते हुए भी पाँव जमीन से लगे हुए हैं। मानवमूर्ति, मनुष्य के जीवन की कैसी व्यवस्था होनी चाहिए, इसका सृजन करती है। इसलिए ज्ञान, कर्म और आनंद, जिसको अब मैं भक्ति कहूँगा, तीनों का एक साथ अनुभव करना चाहिए।
चिंतन का आधार प्रत्यक्ष कर्मयोग पर, अनुभव पर नहीं होता है, वह चिंतन हवा में रह जाता है। मनुष्य के शरीर की रचना भी ऐसी है कि उसका मस्तक आकाश में होते हुए भी पाँव जमीन से लगे हुए हैं। मानवमूर्ति, मनुष्य के जीवन की कैसी व्यवस्था होनी चाहिए, इसका सृजन करती है। इसलिए ज्ञान, कर्म और आनंद, जिसको अब मैं भक्ति कहूँगा, तीनों का एक साथ अनुभव करना चाहिए। वैदिक ऋषि बोल रहा है “तवेत् इन्द्र अहं आशसा हस्ते दातुरं च ना दधे” -हे परमेश्वर, तेरी प्राप्ति के लिए हाथ में हँसिया लेकर मैं खेत में काम करता हूँ।
चिंतन कर्म में से मुक्ति की अपेक्षा रखता है वह मनुष्य को सही रास्ते पर नहीं, बल्कि अनुचित रास्ते पर ले जाता है। विकास के बदले विनाश की तरफ ले जाता है। फुरसत के समय का चिंतन भी निकम्मा होता है। जिस चिंतन का आधार प्रत्यक्ष कर्मयोग पर, अनुभव पर नहीं होता है, वह चिंतन हवा में रह जाता है। मनुष्य के शरीर की रचना भी ऐसी है कि उसका मस्तक आकाश में होते हुए भी पाँव जमीन से लगे हुए हैं।
चिंतन, मधु-मादक द्रव्यों का सेवन। चपल इंद्रियों की उपासना को ही जाना जीवन साधन॥
चिंतन उत्पन्न होता है। जो चिंतन कर्म में से मुक्ति की अपेक्षा रखता है वह मनुष्य को सही रास्ते पर नहीं, बल्कि अनुचित रास्ते पर ले जाता है। विकास के बदले विनाश की तरफ ले जाता है। फुरसत के समय का चिंतन भी निकम्मा होता है। जिस चिंतन का आधार प्रत्यक्ष कर्मयोग पर, अनुभव पर नहीं होता है, वह चिंतन हवा में रह जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-August
चिंतन करते-करते वे अंत में इस फल पर पहुँचे कि वास्तव में नारी का कथन सत्य है। आसक्ति से बढ़कर संसार में कोई दूसरा दुःख नहीं है। इंद्रियों के विषयों में फँसे रहने से मनुष्य दुःखी रहता है।
चिंतन करते रहे। चिंतन करते-करते वे अंत में इस फल पर पहुँचे कि वास्तव में नारी का कथन सत्य है। आसक्ति से बढ़कर संसार में कोई दूसरा दुःख नहीं है। इंद्रियों के विषयों में फँसे रहने से मनुष्य दुःखी रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-July
चिंतन से उसमें आसक्ति हो जाती है, उस आसक्ति से उसकी प्राप्ति की इच्छा होती है; और तमोगुण के इच्छित फल मिलने से सर्वनाश हो जाता है। अतः चौबीसों घंटों अपने आपको नियमों में बाँधना चाहिए।
चिंतन, व्यर्थ के कार्य और इन्द्रियों के प्रलोभनों से बचकर आहार-विहार में संयम लाने से मनुष्य का शरीर श्रमी, बुद्धि विवेकवती और मन शक्तिशाली बनता है। जितेन्द्रियता व्यक्ति के निर्माण में सर्वाधिक महत्व रखती है।
चिंतन में फँसता है, तो हमको उस पर कठोर नियंत्रण करना चाहिए ; जब क्षुद्र अनुराग, मोह, शंका आदि मनोविकारों के बंधन में बंधता है, तब उसका निग्रह करना चाहिए, जब दूसरों की खराबियों की थोथी आलोचना में फँसता है, तब उसे संयम पूर्वक रोकना चाहिए।
चिंतन, सर्वत्र ही आत्मसंयम का प्रयोग करें। हमारा मन जब फालतू, व्यर्थ के अनीतिकर चिंतन में फँसता है, तो हमको उस पर कठोर नियंत्रण करना चाहिए ; जब क्षुद्र अनुराग, मोह, शंका आदि मनोविकारों के बंधन में बंधता है, तब उसका निग्रह करना चाहिए, जब दूसरों की खराबियों की थोथी आलोचना में फँसता है, तब उसे संयम पूर्वक रोकना चाहिए।
चिंतन किया करते हैं, वे दीन, दुखी और दरिद्रावस्था को प्राप्त होकर बड़ी बुरी दशा में अपने जीवन का अन्त करते हैं।
चिंतन है। इन्द्रियों की और भी उत्तेजित करने और विकारों को बढ़ाने का साधन है।
चिंतन, दोष दर्शन, इन्द्रिय-पूर्ति और निद्रा में ही समाप्त कर दे। पर ऐसा नहीं होता। ईश्वर ने हमें एक ऐसी शक्ति दी है, जिसे विवेक कहते हैं। यह विवेक हमें मर्यादा, नियम-बंधन और नाप तोल कर चलना सिखाता है। विवेक होने पर हम स्वयं अपने मन के द्रष्टा बन जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-November
चिंतन कर इसे विकसित करें। तमोगुण हमारे अन्तःकरण में मलीनता उत्पन्न करता है जिससे अशुभ विचार आते हैं। अतः अपने शुद्ध, सत्त, चित्त, आनन्द रूप का ही ध्यान करना चाहिए। चित्त में शान्त, पवित्र और उक्त विचारों को ही दृढ़ता से जमाइये। अपनी महत्ता, अपनी शक्ति, अपने दैवी गुणों का चिन्तन करने से मस्तिष्क बलशाली बनता है और हृदय से प्रफुल्लता का झरना प्रवाहित होने लगता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-October
चिंतन चरण वहां जा पहुंचे, जहां न कोई साथी। साथी बनी राह में छायी, केवल गहन निशा थी॥ धर्म-साधना अर्पित जीवन, साधक, सृजक विधाता। तप के धनी, ज्ञान के सागर, चिंतन के उद्गाता॥
चिंतन मनन को न केवल मस्तिष्क ही प्रभावित करता है। वरन् इससे भी अलग एक शक्ति है जो विचारणाओं को प्रेरित करती है। उस चेतन शक्ति की सम्पूर्ण जानकारी तो नहीं मिल पायी है यह लेकिन यह निश्चित है कि मृत्यु के बाद भी उस चेतना का अस्तित्व बना रहता है।
चिंतन के उद्गाता। युग द्रष्टा, युग स्रष्टा, प्रेरक जीवन-ज्योति-प्रदाता॥
चिंतन जाग रहा जन-जन में जीवन-ज्योति जगाता। तप के धनी, ज्ञान के सागर, चिंतन के उद्गाता॥
चिंतन के उद्गाता॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-January
चिंतन, चरित्र और व्यवहार की ऐसी व्यवस्था के अंतर्गत लाया जा सकता है जो सार्वभौम हो। ‘‘वह मत कीजिए जो आपको अपने लिए अच्छा न लगे। जो बरताव आप अपने साथ किया जाना ना पसन्द करते हैं वह दूसरों के साथ न करें।’’ धर्म के लिए इतनी सार्वभौम परिभाषा जन-जन को स्वीकृत हो सके तो समझना चाहिए कि ईश्वर और धर्म का प्रारम्भिक एवं निर्विवाद रूप बन गया। प्रथा प्रचलनों की परम्परा इसके बाद कभी पीछे के लिए सुरक्षित रखी जा सकती है।
चिंतन को स्वाध्यायशील बनाना होता है ताकि उतना समय शरीराभ्यास की विडम्बनाओं में से कटे। सर्दी-गर्मी सहन करने के अभ्यास डालने पड़ते हैं ताकि त्वचा को सहनशीलता की आदत पड़े। अभाव-ग्रस्तता गरीबी का चिन्ह माना जाता है, पर जब उसे व्रतशीलता में सम्मिलित किया जाता है। तो वर्ग गौरव का निमित्तिकरण बन जाता है। सादा जीवन उच्च विचार की नीति अपनाने में आदर्शवादिता चरितार्थ होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-March
चिंतन गड़बड़ाता है तो प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाता है और वायुमंडल, वनस्पति जगत, छोटे-बड़े जीवधारी, उलटी दिशा में चलने लगते हैं और उस प्रवाह का असर मनुष्य की प्रकृति पर पड़ता है।
चिंतन और चरित्र बनकर प्रकट होने लगे। साथ ही अपनी मान्यता पर अटूट आस्था भी रहे तो समझना चाहिए कि गीता की प्रेरणाऐं जीवन में सम्मिलित हो गईं और ब्रह्म-विद्या के क्षेत्र में गहरा प्रवेश हो गया।
चिंतन भर देना है। जैसे परिवर्तन इस शताब्दी में पूर्व में देखने को मिले हैं, उन्हें दृष्टिगत रख उत्साहपूर्वक यह कहा जा सकता है कि यह असम्भव नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-August
चिंतन और चरित्र की दृष्टि से उनकी स्थिति नर पशु, नर पामर या नर पिशाच जैसी होती है। इन दुष्प्रवृत्तियों के क्षेत्र में कौन अग्रणी रहा इसी की प्रतिस्पर्धा उनमें चलती रहती है। इसी हेय स्तर की सफलताओं को अपनी चतुरता, कुशलता एवं सफलता के नाम से दिखाते बखानते रहते हैं। औसत आदमी की अहन्ता इसी रूप में प्रकट होती है। दुष्ट दुराचारी अपने अनीति कृत्यों को गौरव गरिमा में सम्मिलित करते हैं और छल प्रपंच की अनीति और आक्रमण की घटनाओं को अपनी विशिष्टता के रूप में देखते और दिखाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-November
चिंतन, आदर्श चरित्र और शालीन व्यवहार का पाठ पढ़ाया−अभ्यास कराया जा सके तो समझना चाहिए कि ऐसा सौभाग्य उदय हुआ जैसा पारसमणि हस्तगत होने पर हो सका है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-February
चिंतन पद्धति एवं आहार−विहार में सुधार परिवर्तन कर लेने से बहुत बड़ा प्रयोजन सिद्ध हो जाता है। भोजन भी सौम्य सात्विक वस्तुएँ भूख के साथ तालमेल बिठाते हुए खाया जाय। स्वच्छता और नियमितता को सतर्कता पूर्वक अपनाया जाय। और हँसते−हँसाते, हलका−फुलका जीवन जीने का अभ्यास किया जाय, तो तनावजन्य व्यथाओं से निश्चयपूर्वक छुटकारा पाया जा सकता है।
चिंतन से मनुष्य मुसीबतों के बीच भी प्रसन्नता के आधार ढूँढ़ सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-August
चिंतन है और उत्थान पथ पर अग्रसर करने वाली सत् शिक्षा के महत्व एवं महात्म्य पर विस्तार पूर्वक सोचना एवं उसी ढाँचे में अपने को ढालने की योजना बनाना मनन है। चिंतन और मनन करते रहने वाला व्यक्ति अपनी बौद्धिक, चरित्र एवं लौकिक दुर्बलताओं को आत्म निरीक्षण एवं आत्म आलोचना के आधार पर भली प्रकार जान सकता है और जिस प्रकार रोग का निदान होने पर चिकित्सा सरल हो जाती है उसी प्रकार अपनी त्रुटियों को जानने वाला उन्हें सुधारने का उपाय भी ढूँढ़
चिंतन करता हूँ तो अनायास ही मेरा मन व्याकुल हो उठता है। मैं भगवान से एक ही प्रार्थना करता रहा-प्रभो मुझे एक मित्र दो, पर उनने मेरी विनति सुनी नहीं। इसमें मेरा ही दोष है यह मैं नहीं मानता। जिस व्यक्ति में मुझे मानवता की जरा भी छाया दिखाई दी, उससे लिपटने की मैंने कोशिश की, कभी उसे अपने से दूर हटाना नहीं चाहा। पर जब कि मेरा अन्त समय निकट आ पहुँचा है मैं कहना चाहता हूँ कि किसी को मैं अपना नहीं बना सका।
चिंतन और मनन यह चार उपाय अपनी अन्तःभूमि के निरीक्षण, परीक्षण करने, त्रुटियों एवं दोषों को समझने तथा कुविचारों को त्याग कर सत्प्रवृत्तियों अपनाने के है। यह चार उपाय भी साधना के ही अंग हैं। जीवन समस्याओं को सुलझाने में सहायक सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना हर विचारशील धर्मप्रेमी व्यक्ति का एक दैनिक नित्यकर्म होना चाहिए। आज किन्हीं पौराणिक कथा ग्रन्थों या आज हजारों लाखों वर्ष पूर्व की स्थिति के अनुरूप मार्ग दर्शन करने वाले संस्कृत ग्रन्थों का बार-बार पढ़ना ही स्वाध्याय माना जाता है। यह मान्यता अस्वाभाविक है।
चिंतन करते हैं। नाद योग भी इसी के अंतर्गत आता है। सूक्ष्म जगत में जो नाना प्रकार की ध्वनियाँ होती रहती हैं उन्हें एकाग्रता पूर्वक सुनना और उनके आधार पर अदृश्य क्षेत्र में हो रही हलचलों का पता लगाना नाद योग का काम है। यह साधना भी ध्यान की एकाग्रता से ही संभव है। देव दर्शन, ईश्वर प्रणिधान, आत्म साक्षात्कार, समाधि आदि की उच्च आध्यात्मिक सफलताएँ भी ध्यान योग के विधि विधानों से ही सम्बन्धित हैं।
चिंतन और मनन करते रहने वाला व्यक्ति अपनी बौद्धिक, चरित्र एवं लौकिक दुर्बलताओं को आत्म निरीक्षण एवं आत्म आलोचना के आधार पर भली प्रकार जान सकता है और जिस प्रकार रोग का निदान होने पर चिकित्सा सरल हो जाती है उसी प्रकार अपनी त्रुटियों को जानने वाला उन्हें सुधारने का उपाय भी ढूँढ़

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-October
चिंतन और मनन, इन चार आधारों पर मानसिक दुर्बलता को हटाना और आत्मबल बढ़ाना निर्भर रहता हैं। इसके बिना न मन की जड़ता जाती हैं और न संकीर्णता, गंदगी मूढ़ता, विषयासक्ति आदि से छुटकारा मिलता है। शास्त्रों में सत्संग की बड़ी महिमा गाई गई हैं। उसकी तुलना पारस मणि से हुई है। स्वाध्याय को एक अनिवार्य दैनिक धर्म, कर्तव्य माना गया है और लिखा है कि जिस दिन स्वाध्याय नहीं किया जाता उस दिन मनुष्य चाण्डाल तुल्य अपवित्र हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-December
चिंतन-चरित्र, व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर एक ही तथ्य का द्योतक है कि अब आशा कही से शेष है तो वही से जहाँ से भावनात्मक परिष्कार के साँस्कृतिक नवोन्मेष के बीजाँकुर प्रस्फुटित हो सकने की सम्भावना साकार हो सकती हैं एवं वह हैं प्रगतिशील संवेदना मूलक धर्मतंत्र। तनद
चिंतन सुधारने लिए एक नाटक रचा। चारपाई पर रोनी सूरत बनाकर पड़ गई । घर का कोई काम न किया। दुकान पर से सेठजी आये, वे भी चिन्तित हुए और कारण पूछा। पत्नी ने कहा- “ आज एक पहुंचे हुए ज्योतिषी आये थे हाथ देखकर बता गये है कि तू साठ वर्ष तक जियेगी और आठ बच्चे होंगे।
चिंतन स्तर में उतर गयी, वह मस्तिष्क को स्थायी निधि बन जाती है। उसे कभी भी जगाया और उभरा जा सकता है। सम्मोहन की कला में पारंगत व्यक्ति इसी स्तर की अपना आधार बनाकर कौशल का प्रदर्शन करते हैं व्यक्ति को सम्मोहन की स्थिति में लाकर वे चाहे तो उसकी अंतर्चेतना में विद्यमान विकृतियों से उसे छुटकारा दिला सकते हैं इसके विपरीत वह उसे अपार क्षति भी पहुँचा सकते हैं। निद्रित व्यक्ति की जानकारी से परे वह उसमें ऐसे दुर्गुण डाल सकते हैं।
चिंतन में निरत थे-परमात्मा की यह सृष्टि कितनी सुन्दर है, इसमें सर्वेश्वर की संव्याप्त चेतना कितनी आनन्दप्रद है। महर्षि भावों में डूबे हुए देख रहे थे कि पक्षी दिनभर के श्रम से थककर आये अपने घोसलों में विश्राम के पूर्व चहक रहे थे। लगता था कि वे अपने बच्चों रहे थे। लगता था कि वे अपने बच्चों के साथ बैठकर साध्य गीत गा रहे हों।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-May
चिंतन, ईर्ष्या-द्वेष भाव रखते हुए अथवा नरपशु, नर-पिशाच का जीवन जीते हुए नारकीय मनःस्थिति में भी रह सकता है। इस धरती को स्वर्ग जैसा सुन्दर ऐश्वर्ययुक्त बनाये रखना ही ईश्वर को मनुष्य से अभीष्ट है। इसीलिए उसे पूरी छूट दी गई है कि वह अपने मानव शरीर वाली इस योनि में जितना भी कुछ श्रेष्ठतम संभव हो सकता है वह दी हुई अवधि में कर दिखाये। इसी को कहते हैं।- “अपने भाग्य का स्वयं निर्माण करना ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-February
चिंतन और दिशाधारा को बदल देता है, वही देवता हो सकता है।
चिंतन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समग्र साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल, वायु के तीनों अंग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाये तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए भजन, मनन, और चिंतन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है।
चिंतन बदलने के लिए लकड़ी की, पैसे की जरूरत नहीं है। जरूरत है रूहानी बल की -आत्मबल की जिससे विचारों को बदलना है। विचारों को कोई और दूसरी चीज नहीं बदल सकती। पैसा विचारों को नहीं बदल सकता। दुनिया की कोई भी चीज विचारों को नहीं बदल सकती।
चिंतन। पाये मानवता का मधुवन॥
चिंतन है - खाना -कपड़ा नहीं। आदमी का चिंतन बदलने के लिए लकड़ी की, पैसे की जरूरत नहीं है। जरूरत है रूहानी बल की -आत्मबल की जिससे विचारों को बदलना है। विचारों को कोई और दूसरी चीज नहीं बदल सकती। पैसा विचारों को नहीं बदल सकता।
चिंतन किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनको लगेगी उतनी ही अंतर्ज्योति प्रखर होती चली जायेगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय परिणाम होने पर जिन दिव्य सम्पदाओं की करतलगत होती चली जायेगी।
चिंतन और चरित्र उत्कृष्टता, आदर्शवादिता का समावेश करना । आत्मशोधन और आत्म परिष्कार की उस उभयपक्षीय प्रक्रिया को गलाई, ढलाई, धुलाई रंगाई भी करते हैं । इन्हीं को पवित्रता, प्रखरता का युग्म भी कहते हैं। सज्जनता औ साहसिकता का समन्वय ही आत्मिक प्रगति का सच्चा स्वरूप है। हर कोई को यह देखते रहना चाहिए कि उसकी आँतरिक समस्वरता बढ़ रही है या नहीं।
चिंतन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अंतःकरण की स्वस्थता, प्रखरता, परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीनों आहारों पर निर्भर है। गायत्री महामंत्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को ही कहा जाता है।
चिंतन मनन के इन दो साधनों को तपश्चर्या अनुसंधान की पृष्ठ भूमि माना जा सकता है। प्रायश्चित के विभिन्न पक्ष भी इस पूर्वार्ध में सन्निहित है। उत्तरार्द्ध और भी अधिक महत्वपूर्ण है जिसमें प्रगति की दिशा में कदम बढ़ाये जाते हैं। आत्म परिष्कार के बाद यदि मन व अंतर्जगत के क्रमबद्ध दिशा नहीं मिलेगी तो उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी। औषधि सेवन को इसलिए महत्व दिया गया है एवं निर्धारण इस प्रकार किया गया है कि शरीर की सूक्ष्म आध्यात्मिक संरचना इससे प्रभावित, उत्तेजित हो और प्रसुप्त जागरण में भाव योग की उच्चस्तरीय स्थितियों में पहुँचने का साधक को अवसर मिल सके ।
चिंतन मिटे तो ही आगे की व्यवस्था बन सकती है। बुढ़ापे ने काया जीर्ण कर दी तो ब्राह्मण और किसी लायक न रहा । सूखी लकड़ियाँ पास के जंगल से बीनकर गाँव में बेंच आता और किसी प्रकार निर्वाह चलाता। एक दिन लकड़ी भी थोड़ी मिली और दुर्भाग्य से बाघ भी झाड़ी से निकलकर सामने आ खड़ा हुआ। ब्राह्मण प्राण जाने के भय से थर थर काँपने लगा।
चिंतन की दिशा अलग बदल जायेगी । फिर मैं समझ लूँगा कि अब आप कल्याण की दिशा में चल पड़े और आपके पास बहुत सारी चीज आ गयी । क्या क्या चीज बदल जाये ?बस एक ही चीज बदल जाये वह यह कि महत्वाकाँक्षाओं का प्वाइंट बदल जाय तब।
चिंतन का स्वरूप बदल दिया आकाँक्षाओं को बदल दिया। जो व्यक्ति अपनी प्रियता को, चिंतन और दिशाधारा को बदल देता है, वही देवता हो सकता है।
चिंतन शैली से की गई परिवार सेवा गृहस्थ योग साधना बन जायेगी। पिता-माता, भाई-बहन आदि का भरा पूरा कुटुम्ब किसी भावना शील व्यक्ति के लिए अपने सद्गुणों के विकास के लिए विनिर्मित प्रयोगशाला ही सिद्ध होता है। इन थोड़े से व्यक्तियों की सुव्यवस्था बन जाना एक छोटे से राज्य का आगे स्पष्ट छपा नहीं था ।
चिंतन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का आदर्शवादिता और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसंतुलित निर्धारण। इसके लिए प्रात’काल उठते ही “ हर दिन नया जन्म और हर रात नयी मौत” का तथ्य सामने रखकर आज ही समय परक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए।एक ही दिन के लिए यह जन्म है। आज ही रात की मृत्यु निद्रा की गोद में जाता है।इसी लिए ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदा और भाव वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए-जीवन लाभ लेने के लिए साहस पूर्वक तत्पर होना चाहिए ।
चिंतन, खिन्न, असन्तुष्ट कभी भी न रहें। हँसती -हँसाती, हलकी-फुलकी जिन्दगी ही किसी अध्यात्मवादी होने की निशानी हो सकती है।
चिंतन उनकी लेखनी में आगे भी प्रकट होता रहा एवं जून तब जब तक उनके हाथों लिखी” अपनों से अपनी बात “ परिजनों तक पहुँचती रही, वह अपनी भावी भूमिका, स्थूल शरीर के बन्धनों से मुक्त होकर सूक्ष्म रूप में शाँतिकुँज में ही विराट रूप में विराजे रहने की बात लिखते रहे।
चिंतन में लीन थे। उनके मन में देश, समाज, संस्कृति के उत्थान और कल्याण के लिए विचारो की लहरे उठ रही थी। उनका प्रवाह नीचे वेगवती यमुना के प्रवाह से तेज था।
चिंतन के लिए भावभरी विराट सामग्री प्रदान करता है। जीवों की भाँति मनुष्यों में भी यह गुण पाया जाता है। किन्तु सांसारिकता के भार इस तरह के आवाहन प्रदान करने वाले गुणों को भी नष्ट कर देते हैं। तब उनकी पाशविकता उभर कर सामने आ जाती है। अच्छे और नये के स्वागत की दृष्टि से भारतीय मनीषा को अनासक्त कर्म योग का दर्शन दिया है।
चिंतन चरित्र की भावना है । वह भावना न हो तो प्रतिमायें खिलौना भर रह जाती है । सदाशयता के प्रति प्रगाढ़ आस्था बनाने में जिसका अन्तराल जितना सफल हुआ वह उसी स्तर का भगवान भक्त हैं । भक्त का गुण कर्म, स्वभाव ईश्वर के सहचर पार्षदों जैसा होना चाहिए जिस ईश्वर भक्ति के प्रतिफलों का वर्णन स्वर्ग मुक्ति ऋद्धि सिद्धि आदि के रूप में किया गया है उसमें एकत्व अद्वैत, विलय विसर्जन की शर्त है साधक भगवान को आत्मसात करता है और उसके निर्धारण, अनुशासन को अपनाने को ही गर्व -गौरव और हर्ष, संतोष अनुभव करता है
चिंतन, चरित्र और व्यवहार में आदर्शवादिता का अधिकाधिक समावेश करते रहे। व्यक्तित्व के हर पक्ष को मानवी गरिमा के अनुरूप बनाये किन्तु अवाँछनीयता से लड़ने के लिए हर समय लड़ाकू, शूरवीर का बाना पहने रहे। जो उपलब्ध है उसका सदुपयोग करे। जो नहीं है उसके लिए प्रयत्न करे, किन्तु चिंतन, खिन्न, असन्तुष्ट कभी भी न रहें। हँसती -हँसाती, हलकी-फुलकी जिन्दगी ही किसी अध्यात्मवादी होने की निशानी हो सकती है।
चिंतन करेंगे, उतना ही गुरु सत्ता के मर्म को समझ पायेंगे। नीचे के पैराग्राफ में मार्मिक हृदय स्थल को स्पर्श करने वाले अंश इसी लेख में दिये जा रहे है।
चिंतन, चरित्र में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश। आराधना अर्थात् लोकमंगल की सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में उदार सहयोग, श्रम दान, अंशदान । यह तीनों ही साथ -साथ चलने चाहिए। इनमें से एक भी ऐसा नहीं जो अपने आप में पूर्ण हो। इसमें से एक भी ऐसा नहीं जिसे छोड़कर प्रगति पथ पर आगे बढ़ना संभव हो सके ।
चिंतन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए। गायत्री महामंत्र के उपासनात्मक कर्म काण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही संभव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका महात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया जाता रहा है।
चिंतन के सतोगुण प्रधान तथा चरित्र को निर्मल बनाती है। कल्प चिकित्सा विज्ञान में तुलसी पत्रदल चूर्ण को गंगा जल में संकरित किया जाता है और कल्क रूप में उसे नियमित रूप से 30 से 60 ग्राम की मात्रा का सेवन करने का विधान बनाया गया है।
चिंतन में लीन हो गये रघु ने सोचा गुरु कम मिलने के कारण उदास है।उसने कहा अभी मेरे पास बहुत संपत्ति है। इसे मैं आपको इच्छानुसार दे सकता हूँ। गुरु बोले मुझे संपत्ति की नहीं बन्दों की जरूरत है। जो पूर्णतया समर्पित होकर समाज के उत्थान में जुट सके ।
चिंतन, आहार नियमन तथा दिव्य औषधि के साथ की गयी तप योग साधनाएँ किस प्रकार व्यक्ति का स्वरूप बदल देती है, उसे नया जीवन देती है, इसे देखकर कोई भी आश्चर्य चकित हो सकता है। कोई कारण नहीं है कि च्यवन, ययाति की तरह आज भी व्यक्ति समुदाय का कायाकल्प नहीं किया जा सका। यह पूर्णतः वैज्ञानिक परीक्षित एक अध्यात्म उपचार प्रक्रिया है, इसे साधक साधना विधि में अनुभव कर सकता है।
चिंतन हो, जन हिताय ही जग जीवन हो। शोषण- उत्पीड़न, अभाव अज्ञान न दें फिर कही दिखाई॥
चिंतन। चिंतन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का आदर्शवादिता और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसंतुलित निर्धारण। इसके लिए प्रात’काल उठते ही “ हर दिन नया जन्म और हर रात नयी मौत” का तथ्य सामने रखकर आज ही समय परक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए।एक ही दिन के लिए यह जन्म है। आज ही रात की मृत्यु निद्रा की गोद में जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-April
चिंतन चेतना की कितनी महान भूमिका थी, यह सभी जानते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-October
चिंतन एवं निकृष्ट कर्तृत्व वातावरण को इसी प्रकार दूषित कर रहे हैं, जिस प्रकार परमाणविक परीक्षण।
चिंतन की भ्रष्टता एवं कर्तृत्व की निकृष्टता का परिष्कार भी इसी प्रकार संभव है। इस बात से कोई भी विचारशील इनकार नहीं कर सकता कि भ्रष्ट चिंतन एवं निकृष्ट कर्तृत्व वातावरण को इसी प्रकार दूषित कर रहे हैं, जिस प्रकार परमाणविक परीक्षण।
चिंतन तथा क्रिया का आधार न बन सके वह श्रद्धा नहीं। रामचरितमानस में गरुड़ ने काकभुशुण्डि से आत्मसाधना की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए कहा है कि- “सात्विक श्रद्धा धेनु सुहाई।” सात्विक श्रद्धा ही सुन्दर गाय है। यह गाय “जप, तप, व्रत, यम, नियम, अपारा” यानि, यम, नियम, जप , तप आदि चारा ही खाती है। यह चारा हरा हो, उसमें जीवन हो प्राण हो।
चिंतन ही नहीं कर्म भी किसी ऐसी दशा में बहने, बढ़ने लगता है जिसकी इसके पूर्व वैसी आशा या तैयारी जैसी कोई बात नहीं थी। ऐसे अप्रत्याशित अवसर तो यदा-कदा ही आते हैं पर नवरात्रि के दिनों अनायास ही अंतराल में ऐसी हलचलें उठती हैं जिनका अनुसरण करने पर आत्मिक प्रगति की व्यवस्था बनने में ही नहीं, सफलता मिलने में भी ऐसा कुछ बन पड़ता है मानो अदृश्य से अप्रत्याशित अनुदान बरसा हो।
चिंतन और श्रम पूरी तरह उसी दिशा में लगा रहेगा। फिर साधक के लिए उच्चस्तरीय अध्यात्म प्रयोजन मात्र एक कल्पना की वस्तु बनकर रह जाएगा। फलतः वे सारे कार्य अपूर्ण ही पड़े रहेंगे, जिनके लिए यह बहुमूल्य जीवन का अनुपम उपहार मिला है। दूरदर्शिता इसी में है कि संग्रह उतना ही किया जाये जिससे सामान्य निर्वाह की गाड़ी चलती रहे और साधक को अभीष्ट प्रयोजन में कोई विघ्न-बाधा न पड़ने पावे।
चिंतन, मनन से मस्तिष्क में विचारों का समुद्र लहराने लगा।
चिंतन करते-करते तद्रूप हो जाता है, उसी प्रकार साधक को भी केवल परमात्मा का ही चिंतन करके परमात्मा रूप हो जाना चाहिए। विसके और वैराग्य की शिक्षा देने के कारण यह मेरा शरीर भी एक गुरु है। यद्यपि यह शरीर अनित्य है, तो भी इससे परम पुरुषार्थ का लाभ हो सकता है। मैंने इस प्रकार प्रकृति के चौबीस गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की तथा जीवनमुक्त होने का मार्ग पाया।
चिंतन करके परमात्मा रूप हो जाना चाहिए। विसके और वैराग्य की शिक्षा देने के कारण यह मेरा शरीर भी एक गुरु है। यद्यपि यह शरीर अनित्य है, तो भी इससे परम पुरुषार्थ का लाभ हो सकता है। मैंने इस प्रकार प्रकृति के चौबीस गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की तथा जीवनमुक्त होने का मार्ग पाया।
चिंतन उसे अपने चैतन्य के अनन्त प्रवाह से निश्चय ही आप्लुप्त कर देता है। उसे उस सर्वव्यापी को कोई हृदय की वाणी से सम्बोधित करे और उत्तर न मिले, यह तो कभी हुआ नहीं, हो सकता भी नहीं। जगदीश का अन्तर्यामी आज उसके लिए जाग गया है। वैसे तो वह नित्य जागरुक हैं। लेकिन आज वह जगदीश को उत्तर देने लगा है।
चिंतन में तन्मय रहे तो उसे संसार में होने वाली उथल-पुथल अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकती। तन्मयता ही वह कारण है जो मनुष्य के अन्दर सोयी पड़ी सुषुप्त शक्ति के समुचित विकास में सहयोग करती है। तन्मयता को आधार मानकर ही ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, साहित्य, कला आदि अनेक क्षेत्रों में नवीन खोज, आविष्कार एवं शोध हुआ और समाज को लाभ मिला। अतः साधक को तन्मयतापूर्वक अपने कार्य को अंजाम देना चाहिए।
चिंतन तथा दुष्ट कर्तृत्व वातावरण में ऐसे प्रदूषण भरने लगा, जो वायुमण्डल में बढ़ती जाने वाली विषाक्तता से भी अधिक भयंकर है।
चिंतन की दिशा क्या होगी, यह निर्भर करता है अंतः में उठने वाली भाव-संवेदनाओं के स्वरूप पर। अंतःकरण को ही कारण शरीर कहा जाता है। मनुष्य के प्रत्येक कार्य का आधारभूत कारण उसके अंतःकरण में उठी उमंगे, आकाँक्षाएं, प्रेरणाएँ ही होती हैं। अंतःकरण की प्रेरणा ही जीवन-दिशा का निर्धारण करती है। इस अंतःकरण में घनीभूत भाव संवेदना का नाम ही श्रद्धा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-August
चिंतन, मनन, स्वाध्याय का क्रम अपनाना तथा छोटे-छोटे दीपों द्वारा जन-जन को युगपरिवर्तन की विचारधारा से अनुप्राणित करना यह त्रिविध उद्देश्य इन कार्यकर्ता गोष्ठियों का था, जो तीन दिन टुकड़ों-टुकड़ों में पूरा होता चला गया। संध्याकाल में वन्दनीया माताजी के उद्बोधन के पूर्व गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक पण्डित लीलापत शर्मा का प्रेरक उद्बोधन हुआ। उन्होंने पू. गुरुदेव के विद्या-विस्तार कार्यक्रम के प्रसार हेतु उनके लिखे साहित्य को उन सभी मिशन का आलोक नहीं पहुँच पाया है। इसके पश्चात् वन्दनीया माताजी का सारगर्भित प्रवचन हुआ। जिसमें उन्होंने उपासना, साधना, आराधना के मर्म को पूज्यवर के जीवन के परिप्रेक्ष्य में समझाया।
चिंतन शाँतिकुँज से ही क्रियान्वित होना था । पं.पू. गुरुदेव ने अपनी वेदना व्यक्त करते हुए मार्च 69..की अखण्ड ज्योति में लेखनी से अभिव्यक्ति दी है कि आज धर्म, नीति, सदाचरण आदि की शिक्षा देने वाले ग्रंथ एवं प्रवक्ता तो मौजूद है, पर उस विज्ञान की उपलब्धियाँ हाथ से चली गई, जो इसी शरीर में विद्यमान अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय शक्ति कोषों की क्षमता का उपयोग करके व्यक्ति की, समाज की कठिनाइयों को हल कर सके । पातंजलि योग दर्शन, मंत्र महार्णव, कुलार्णव तंत्र आदि शक्ति विज्ञान के ग्रंथ तो कई है लेकिन उसमें वर्णित सिद्धियों को जो प्रत्यक्ष कर दिखा सके ऐसी मिश्रित साधना नहीं के बराबर दिखायी देती है । यदि इन लुप्त विद्याओं को खोज निकाला जाय तो भौतिक विज्ञान को परास्त कर पुनः अध्यात्म विज्ञान की महत्ता प्रतिस्थापित की जा सकेगी और लोकमानस के प्रवाह को उस स्थिति की ओर मोड़ा जा सकेगा जिसकी हम अपेक्षा करते हैं । ब्रह्मवर्चस की स्थापना का मूलभूत आधार प. पूज्य गुरुदेव के मानस में आठ वर्ष पूर्व ही बन चुका था ।
चिंतन आत्म -सुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्म-विकास की दृष्टि से बनाया गया कार्यक्रम सुचारु रूप से चल सकें । उपासना को केवल लकीर पीटने की तरह मात्र कर्मकाण्ड स्तर तक पूरा नहीं किया जाता, वरन् उसके साथ जिस भावोत्कर्ष का सम्बन्ध है उसे अधिकाधिक प्रखर बनाने पर जोर दिया जाता । यही कारण है कि इन दिनों साधकों की मनःस्थिति उच्चस्तरीय भावभूमिका में अवस्थित रहती और वे किसी शान्ति लोक में निवास करने का अद्भुत आनन्द जीवन में पहली बार मिला अनुभव करते ।
चिंतन’ के नाम से युग-साहित्य केन्द्र स्थापित किया है । केन्द्र के परिजनों ने जितना साक्षरता समिति से संपर्क किया व उन्हें वांग्मय के उपयोगी खण्ड दिखाए । जिला साक्षरता समिति के पास उपयोगी साहित्य खरीदने के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध रहता है । उन्होंने पूज्यवर के वांग्मय से प्रभावित होकर चिकित्सा उपचार के विविध आयाम ग्रन्थ की 1100 प्रतियों का एक मुश्त आर्डर दिया । इसके लिए रायपुर के परिजन साधुवाद के पात्र है ।
चिंतन, मनन एवं कार्य प्रणाली मेरी राय में सिर्फ यहीं से परिचालित हो रही है। राजनीतिज्ञों एवं देश के कर्णधारों को यहाँ से मार्गदर्शन लेना चाहिए। में मानव सेवा में अपना योगदान देने का संकल्प लेता हूँ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-March
चिंतन की अपेक्षा मानव कल्याण की संभावनाओं को खोजने पर बल देते थे और कहते थे कि दुख और पीड़ा-पतन से भरे इस संसार में बुद्धि की तरह उतर उन्हें दूर करने के लिए संघर्ष करो। ऐसा पुरुषार्थ अन्तः क्षेत्र की प्रचंड तप साधना से ही संभव हो सकता है। इसके बल पर दिव्य चेतना प्रकट हुआ करती है जो बुद्धि से परे की स्थिति है। यही प्रज्ञा है।
चिंतन और व्यवहार कब किस प्रकार बन पड़ता है और उन आदतों को कैसे सुधारा जाना चाहिए। इस ऊहापोह में आत्म-समीक्षा और आत्म-सुधार की प्रक्रिया बन पड़ती है। देव मानवों की पंक्ति में बैठने के लिए उनकी किन क्षमताओं को विकसित एवं आदतों को परिष्कृत किया जाना है उसका ताना-बाना बुनना आत्म निर्माण है। अन्ततः यह सोचा ही जाना चाहिए। संकीर्ण सीमा बन्धन तोड़े ही जाने चाहिए।
चिंतन की विविध धाराओं को समन्वित करने के लिए प्रयत्नशील रहे। वे समस्त संसार को अपने भारतीय ज्ञान परिधि में लेना चाहते थे। उनका कहना था कि हम किसी को अस्वीकार नहीं करते चाहे वह ईश्वरवादी हो या नास्तिक। हमारे धर्म में दीक्षित होने के लिए एक ही शर्त है- और वह है चारित्रिक गठन। वे तत्व चिंतन की अपेक्षा मानव कल्याण की संभावनाओं को खोजने पर बल देते थे और कहते थे कि दुख और पीड़ा-पतन से भरे इस संसार में बुद्धि की तरह उतर उन्हें दूर करने के लिए संघर्ष करो।
चिंतन-चेतना में विवेकशीलता का अधिकाधिक समावेश हो सकता है दुर्भाग्य यहाँ भी जड़ जमा बैठा है कि उसमें दुराग्रहों की भरमार ने विवेकशील चिन्तन के द्वारा अवरुद्ध कर दिये है। विज्ञान की कुछ प्रगति अवश्य इसलिए हुई है कि उसने नये ज्ञान के प्रकाश के लिए अपने द्वारा खुले रखे हैं और अपनी भूलों को समझने तथा सुधारने के लिए निरन्तर प्रयत्न जारी रखा है। इस भिन्नता के कारण ही विज्ञान आगे निकल गया और धर्म पिछड़ गया दीखता है यदि शोध और सुधार का द्वार धर्म ने भी खुला रखने का शुभारंभ किया तो निःसंदेह धर्म को भी वैसी ही मान्यता मिलती जैसी की आज विज्ञान को मिली है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-July
चिंतन की इसी असीम उपादेयता का पता चला तो उन्होंने अपना जीवनक्रम ही बदल डाला। मन की जड़ता और विषय विचारों का जुआ उनने उतार फेंका, हृदय को श्रद्धा, आस्था से भरा, सदैव प्रसन्न-प्रफुल्ल रहने की आदत बना ली। 20 वर्षों के अपने इस जीवन को स्वार्गीय सुख से ओत-प्रोत बनाते हुए डॉ0 बैनेट से अपनी 50 वर्षीय फोटो तथा 60 वर्षीय फोटो भी इस पुस्तक में छापी है। पहली में उनका चेहरा झुर्रियों से, चिपके गाल, धंसी आँखों के कारण मनहूस दिखायी देता है। जबकि 70 वर्ष की आयु में वे स्वस्थ, सशक्त दिखायी देते हैं, झुर्रियाँ न जाने कहाँ चली गयीं, चेहरे में उद्दीप्ति हैं और युवकों जैसी सक्रियता।
चिंतन में लगाइये , पूजा में लगाइये , मनन में लगाइये, पूजा में लगाइये , उपासना में लगाइये, और अच्छे लोगों के संपर्क में लगाइये, अच्छी बातों के सोचने में लगाइये , गंगा के किनारे जा करके रहिये। पूरा का पूरा समय आपका ऐसा हो जिसमें कहीं अवाँछनीयता के लिये जगह न हो। आपका चिन्तन ऐसा हो, जिसमें अवाँछनीयता के लिये कोई गुँजाइश न हो। बस, यह एक तीर्थ हमने बनाया है। मान्धाता की सहायता से जगतगुरु शंकराचार्य ने चार धाम बनाये थे, चार तीर्थ बनाये थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-June
चिंतन के साथ जुड़कर ही वे पूर्णता। चिन्तन के साथ जुड़कर ही वे पूर्णता प्राप्त करती हैं। और सार्थकता सिद्ध करती है।
चिंतन तंत्र को ही नियोजित नहीं करता है, वरन् शरीर वाहन को भी इसी प्रयोजन के लिए नियोजित करता । अंतःकरण का आदेश मन मानता है और मन के इशारे पर चलने वाला शरीर स्वामिभक्त सेवक की भूमिका निभाने लगता है। इसमें उसे भला-बुरा सोचने या किसी प्रकार का ननुत्व करने की भी इच्छा नहीं होती। संक्षेप में अंतराल को ही मनः संस्थान और काय-कलेवर का सूत्रधार कह सकते हैं। जो किया और सोचा जाता है उस सुचे क्रिया तंत्र का अधिष्ठाता अंतःकरण को ही कहा जाना जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी मनोविज्ञान की भाषा में अंतःकरण को ही ‘सुपरचेतन’ कहा गया है।
चिंतन ‘ की शैली है। श्रेष्ठ चिन्तन कभी निषेधात्मक नहीं होता वह कभी निराश नहीं करता, क्योंकि वह कर्म और भविष्य में विश्वास करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-January
चिंतन का सद्भावों का, मानव मन में खुमार छाया ॥
चिंतन। दूसरे आदमी जैसा विचार करते हैं वैसा मैं नहीं करता॥। दूसरे आदमी की जैसी आकाँक्षाएँ है वैसी मेरी नहीं है। वे जिस दृष्टिकोण के आधार पर फैसले करते हैं, मैं उस आधार पर फैसला नहीं करता। यह क्या हुआ पारस को छू जाना हुआ फ यह मेरा सौभाग्य है कि मैं पारस को छू गया।
चिंतनों और दुरितों का बाहुल्य देखा गया है। इतना ही नहीं उन उन स्थानों पर सक्रियता इतनी प्रबल होती हैं कि प्रत्यक्ष आचरण भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसी निष्क्रिय और निश्चेत जमीन भी होती है जो आदमी पर किसी प्रकार का कोई प्रभाव छोड़ देने में असमर्थ होती है। विज्ञानियों के अनुसार ये वे स्थान हैं, जहाँ पर विशिष्ट स्तर की ऊर्जा का जमाव नहीं होता। अतएव सामान्य रूप से मानवी चेतना पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
चिंतन न करने के कारण हमारी बुद्धि जड़तावादी हो गयी है। पृथ्वी हमें इसलिए जड़ दिखाई पड़ती है, क्योंकि हमने अपनी भावात्मक चेतना के द्वारा उसे देखने का प्रयत्न नहीं किया। अब आप यह मानिये कि आप बहुत छोटे बच्चे हैं। आपके हाथ में एक हथौड़ा हैं, दूसरे में पृथ्वी छोटे से गेंद के समान है। हथौड़े से पृथ्वी को पीस डालिये।
चिंतन की दिशा धारा को दूसरी दिशा में मोड़ देना चाहिए। उस दिन से उनकी जो इच्छा, वह हमारी इच्छा। उस दिन से हमारा सौभाग्य उदय हो गया। मैं तब से क्रमशः मजबूत होता चला गया।
चिंतन देने का प्रयास करें, मात्र लाड़ दुलार न दे तो कोई मुहान्ध सुनता नहीं। पर कहे कौन किससे ? ज्ञान वैराग्य में कथा कहते रहने वाले ही जब श्रोता भक्त जनों से भी अधिक गये गुजरे सिद्ध होते हो तो सत्य वचन महाराज की विडम्बना ही सिर हिलाती रहेगी।
चिंतन सविता के अमृत का रसानुभूति कराने वाला सिद्ध होगा, इसे सुनिश्चित मानना चाहिए। इस अवसर पर सभी माननीय पुरुषों का श्रद्धार्चन भी किया जाय जिन्होंने इस पुण्य परम्परा को जागृत और जीवंत रखा। इस पुण्य पर्व को यदि यथा रीति मनाया जाय, तो हम सब भी उसी अमृत की उपलब्धि कर सकेंगे जिसे महर्षि प्रवाहण ने प्राप्त किया था।
चिंतन करने से मन उसी परिधि में घूमता रहता है। उसी क्षेत्र में क्रीडा कलोल करता है। अतएव मन को रोकने, वश में आवश्यकता करने की एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक साधना भी इस साधन के माध्यम से पूरी हो सकती है।
चिंतन के, दुर्भावों के, पतझर में परिवर्तन आया। सद् चिंतन का सद्भावों का, मानव मन में खुमार छाया ॥
चिंतन एवं स्वस्थ जीवन का मार्ग अपनाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-January
चिंतन, मनन एवं सेवाभाव के बीज पारिवारिक सदस्यों में बोने चाहिए। पिता ही प्रथम शिक्षक और पथ प्रदर्शक है। ऊँचा उत्साही, मिलनसार, भावुक, परोपकारी, अधिक परिश्रमी, अटल विश्वासी, व्यवहार कुशल, सच समालोचक, विनोदपूर्ण होना चाहिए। जिस संलग्नता से वह पवित्र जीवन व्यतीत करेगा। उसी परोपकारिकता, पितृभक्ति और मृदुता से उसका परिवार उसके पद चिन्हों पर चलेगा।
चिंतन के क्षेत्र में जहाँ तक पहुँचा हूँ, उन्हीं के पद चिन्हों पर चल कर हो सका है। उनकी आदतें और विश्वास हमारे प्रत्येक परिवार के सदस्य में प्रविष्ट हो गये हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-August
चिंतन करने की योग्यता होने पर भी हम उसे दार्शनिक न कहेंगे क्योंकि पक्षपातपूर्ण होने के कारण वह वस्तु सत् के दर्शन न कर सकेगा। अतएव निष्पक्ष होना दार्शनिक का दूसरा गुण है। दार्शनिक के इस दूसरे गुण पक्षपातहीनता का दूसरा भाव यह है कि दार्शनिक में मानसिक स्वतन्त्रता होनी चाहिए अर्थात् वह किसी का पिछलग्गू न हो और उसमें किसी भी मत अथवा आचार्य के विचारों पर आलोचनात्मक दृष्टि से विचार करने की क्षमता हो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-May
चिंतन कर हम अपनी समस्याओं को हल नहीं कर पाते। उलटे कठिनाइयों से संघर्ष करने वाली गुप्त इच्छा शक्ति का ह्रास करते हैं। आने वाली कठिनाइयों के विषय में चिंता कर रही सभी शक्तियों को भी क्षय करने की अपेक्षा यह युक्ति संगत है कि उन पर स्थिर बुद्धि से शान्तचित्त हो उन को दूर करने की तदबीरों पर विचार किया जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-March
चिंतन, आत्मोन्नति, एवं आत्म-गौरव की सबसे अधिक चिन्ता करनी चाहिए।
चिंतन करता रहे तो निश्चय ही विद्वानों की संगति का उतना प्रभाव न होगा जितना उन मानसिक काम विकारों का होगा। मन में जो भाव दृश्य, एवं आदर्श हर घड़ी भरे रहते हैं, जिधर आन्तरिक इच्छा अभिलाषा और अभिरुचि झुकी रहती है, उधर ही मस्तिष्क की समस्त शक्तियाँ झुक जाती हैं फलस्वरूप उसका जीवन तेजी से उसी रास्ते पर चलने लगता है। मानसिक चिन्तन के आधार पर मनुष्य के गुण, धर्म, स्वभाव बनते हैं, तद्नुसार वह अपने अनुकूल वातावरण में पहुँच जाता है, वैसी ही परिस्थितियाँ उसके सामने आ खड़ी होती हैं। जो प्रभाव बाह्य संगति से बहुत समय में पड़ता है वह मानसिक संगति से स्वल्प काल में ही परिस्थिति होने लगता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-January
चिंतन कितन ही व्यक्ति करते और उद्धिग्न रहते है। जबकि वैसा व्यवहार या घटनाक्रम कदाचित कम ही सामन आता है।
चिंतन का चल पड़ना। आशंकाएँ प्रायः इसी स्तर की होती है। दूसरे व्यक्तियों का व्यवहार, परिस्थितियों का प्रवाह निकट भविष्य में हमारे प्रतिकुल चलेगा और उससे भंयकर विपत्ति आयेगी ऐसा चिंतन कितन ही व्यक्ति करते और उद्धिग्न रहते है। जबकि वैसा व्यवहार या घटनाक्रम कदाचित कम ही सामन आता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-October
चिंतन को ऐसा मोड़ दिया जाए संम्भव जिसके सहारे महामानवों की श्मिका सम्पन्न कर सकना सम्भव हो सके। यह प्रथम चरण है। दूसरा चरण उपलब्ध प्रतिभा का युग सृजन में शवभरा नियोजन है। जो अपनी दिशाधारा को इस शैली में ढाल सकेगे उन्ही के लिए संभव होगा कि वे समुद्र लाँधते, पर्वत उठाने, लंका जलाने, मृत लक्ष्मण को जिलाने, राम को सीता दिलाने और विश्व वन्ध, श्क्त शिरोमणि हनुमान वन सकने का सौभग्य प्राप्त कर सके।
चिंतन में कृपणता का समावेश भर रहा है। यदि उस अभ्यस्त ढर्रे में थोड़ा सा परिवर्तन किया जा सके तो सहज ही उस दिशा में कुद कदम उठने लगेंगे जिससे युग-धर्म का निर्वाह होने लगे। नवरात्रि साधना की सफलता का अनुमान ऐस निष्कर्षो से ही निकलता है, जिससे अभ्यस्त ढर्रे में पुण्य प्रयोजनों के समावेश का रास्ता निकले।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-February
चिंतन में उत्कृष्टता और कर्त्तव्य की आदर्शवादिता भर ली जाय तो उतने भर से काम चल जायगा तथा जीवन कला का रहस्यमय विज्ञान सहज ही करतलगत हो जायगा । तदनुसार शरीर, मन साधन और परिवार का सुसंचालन कर सकने में निपुणता प्राप्त हो जायगी । तब सुखयुक्त परिस्थिति और शान्तिपूर्ण मनःस्थिति का रसास्वादन पग-पग पर उपलब्ध होने लगेगा।
चिंतन का स्तर उच्च स्तरीय था । उनकी कामनाएँ, रुचियाँ और महत्वाकाँक्षाएँ उच्चस्तरीय थीं । उस समय के लोग ऊँचा सोचते और ऊँचा चाहते थे । फलतः उनके क्रियाकलापों में भी पग-पग पर आदर्शो का पुट परिलक्षित होता था । ऐसे व्यक्तियों के स्वभाव में शालीनता, चरित्र में सज्जनता और व्यवहार में उदारता का धुला रहना स्वाभाविक है ।
चिंतन व्यक्ति को मर्यादाओं में रहने और दूसरों के प्रति आत्मवत् व्यवहार करने के लिए भी आँतरिक रुप से विवश करता है । इस तरह के विचार दूसरों की स्थिति में अपने को रख कर उदात्त दृष्टिकोण अपनाने की प्रबल प्रेरणा देते हैं ।
चिंतन के लिए कितने ही उत्कृष्ट आधार खड़े करती है । आज कोई व्यक्ति हिन्दू, भारतीय और पुरुष है तो अगले जन्म में वह ईसाई, यूरोपियन और स्त्री भी हो सकता है । ऐसी दशा में सहज ही यह प्रेरणा उठती है कि र्व्यथ ही क्यों साम्प्रदायिक कलह के बीज बोये जाँय और ऐसी परम्पराएँ बनाई जाँय जिनसे अगले जन्म में अपने लिए ही विपत्ति खड़ी हो जाय । आज जो सत्ता की कुर्सी पर बैठा है या कुलीन है, पुनर्जन्म की मान्यता उसे सोचने के लिए प्रेरित करती है कि अगले जन्म में वह साधारण प्रजाजन भी हो सकता है और उस स्थिति में उच्च स्थिति वालों को स्वेच्छाचार कितना कष्टकारक होगा । यह विचार अथवा चिंतन व्यक्ति को मर्यादाओं में रहने और दूसरों के प्रति आत्मवत् व्यवहार करने के लिए भी आँतरिक रुप से विवश करता है ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-December
चिंतन की परम्परागत शैली को मोड़ देने के लिए सदा सराहा जाता रहेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-May
चिंतन इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि कन्याओं की जो शिक्षा इन दिनों छोटे रूप में आरम्भ की गई थी उसी को बड़ा बना दिया जाय और इससे एक बड़े अभाव की पूर्ति हो सकेगी। गायत्री तपोभूमि में यों पुरुषों के साथ महिलाएं भी आती थीं पर उनके प्रशिक्षण एवं स्थायी निवास के लिए प्रबन्ध नहीं था। इससे महिला जागृति में भारी अड़चन थी। इस कमी को गुरुदेव अनुभव करते थे पर वे परिवार के साथ बिना—नारी और नर के अधिक संपर्क में दूसरी बुराइयाँ उठ खड़ी होने की आशंका करते थे और कहते थे विकृत सेवा से उसे न करना अच्छा। वे सोचते थे नारी को भी प्रशिक्षित तो किया जाना चाहिए उसे परिवार और समाज में देवत्व उत्पन्न करने का ज्ञान तो कराया जाना चाहिए पर वह प्रशिक्षण पृथक से होना चाहिए।
चिंतन जब सक्रिय रूप धारण करेगा- सृजन मेघ बनकर बरसेगा तो आज की तपन कल जल थल को एक करने वाले सुषमा-शीतलता और हरीतिमा का दृश्य ही चारों को बिखरा दिखाई देगा। इस परिवर्तन के लिए अब अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।
चिंतन की प्रक्रिया को प्रगति पथ पर बढ़ चलने की योजना व्यवस्था भी कह सकते हैं। इसे प्रातः काल चारपाई पर पड़े या एकान्त में बैठे, लेटे तो नित्यकर्म के रूप में करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जब भी एकान्त हो-मन खाली हो तब उसी दिशा में उधेड़-बुन आरम्भ कर देनी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-November
चिंतन के आधार पर परिष्कृत करना, स्वाध्याय, सत्संग से सन्मार्गगामी बनाया जाना चाहिए वहाँ यह भी आवश्यक है कि उसके लिए आहार विहार की ऐसी व्यवस्था बनाई जाय जिससे वह स्वयं उच्छृंखलता छोड़कर शालीनता को स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-June
चिंतन एवं निर्देश के बारे में हर परिजन की प्रतिक्रिया जानने की आवश्यकता अनुभव की गई थी, सो गत अंक में अनुरोध किया गया था कि प्रस्तुत विचारधारा से कौन-कितना सहमत और किस अंश से असहमत है? उसमें सुधार के लिए किसका क्या परामर्श है? कौन उस परामर्श को कार्यान्वित करने के लिए क्या सोच रहा है, क्या कर रहा है और क्या करने जा रहा है? यह जानने की उत्सुकता हम लोगों को होनी नितांत स्वाभाविक है। स्वजनों की गतिविधियाँ अपनी निज की प्रतीत होती हैं और उनकी सहज ही गहरी रुचि जुड़ी रहती है।
चिंतन अपनाएँ, जिसे धारणा, ध्यान, प्रत्याहार और समाधि की संज्ञा दी जा सके। यह चिंतन वही हो सकता है , जो व्यक्ति निर्माण-प्रक्रिया के अंतर्गत गुरुदेव आए दिन समझाते रहे हैं। वे चाहते हैं कि उनके हर साथी को इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति का पग-पग पर भरपूर आनंद मिले। इसके लिए कोई मंत्रानुष्ठान पर्याप्त नहीं हो सकता। इसके लिए लोक-मंगल की वह साधना अपने कर्तृत्व में सम्मिलित करनी पड़ती है, जिसे उन्होंने शतसूत्री युगनिर्माण योजना के नाम पर अनेकों बार अनेकों ढंग से कहा है।
चिंतनशील और दूरदर्शितापूर्ण होता चला जाएगा। आहार में से उष्णतावर्द्धक तत्त्वों को हटाना चाहिए। गरम-गरम चाय, काफी, सिगरेट, नशे, मिर्च-मसाले, स्वाद में भले ही अच्छे लगते हैं,पर उनकी प्रतिक्रिया शरीर पर ही नहीं, मन पर भी बुरी होती है। तामसिक भोजन इसलिए हानिकारक बताया गया है कि वह ऊष्मा की अनावश्यक मात्रा बढ़ाकर अवांछनीय उत्तेजना पैदा करता है। गरमी हर चीज को सुखाती है।
चिंतन को देखकर ही किया जा सकता है। इसी को सच्चा हस्तरेखा विज्ञान और सच्ची जन्मकुंडली निरीक्षण कह सकते हैं। प्रतिक्रिया पूछने का यही प्रयोजन था। अधिकांश परिजनों की प्रतिक्रिया पत्ररूप में प्राप्त हो गई है। जिनकी अभी नहीं आई है, उन सबकी भी गायत्री जयंती से पूर्व आ जाएगी, ऐसा विश्वास है।
चिंतन छोड़ बैठना। इसी मनः स्थिति का नाम बंधन है। यद्यपि यह सब रचित है, पर कितने निविड़ और कितने कठिन हैं कि इनके रहते जीवन के लक्ष्य की दिशा में— आत्मकल्याण के पथ पर एक कदम चलना संभव नहीं होता।
चिंतन और प्रयत्न शरीर की सुविधा के लिए ही नियोजित होना चाहिए तो फिर उन भावों का अस्तित्व कहाँ से आ गया? जिनका शारीरिक लाभ से कोई संबंध तो नहीं है, वरन और उलटी हानि होती है। तब मस्तिष्क शारीरिक लाभ को, अपनी मर्यादा को छोड़कर हानि की संभावनाओं का समर्थन क्यों करता है? इस प्रश्न का उत्तर दे सकना भौतिक मनःशास्त्र के लिए अभी भी संभव नहीं हो सका है।
चिंतन करेगा, उसके विचार उतने ही स्पष्ट एवं उन्नत होंगे। तन्मयता दक्षता का मूलमंत्र है।
चिंतन वही हो सकता है , जो व्यक्ति निर्माण-प्रक्रिया के अंतर्गत गुरुदेव आए दिन समझाते रहे हैं। वे चाहते हैं कि उनके हर साथी को इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति का पग-पग पर भरपूर आनंद मिले। इसके लिए कोई मंत्रानुष्ठान पर्याप्त नहीं हो सकता। इसके लिए लोक-मंगल की वह साधना अपने कर्तृत्व में सम्मिलित करनी पड़ती है, जिसे उन्होंने शतसूत्री युगनिर्माण योजना के नाम पर अनेकों बार अनेकों ढंग से कहा है। उस पुराने कथनोपकथन को साररूप में दुहरा देने और उसे चिरंतन अथवा नवीनतम संदेश के रूप में परिजनों तक पहुँचा देने के लिए उन्होंने आदेश दिया था, सो उसी का पालन करते हुए मई अंक की लेखमाला उस संदर्भ में लिख दी गई।
चिंतन में लगाएँ? अपनी योग्यता का लाभ स्वयं ही क्यों न उठाएँ? यह सोचना अदूरदर्शितापूर्ण है, क्योंकि इससे उस परंपरा का व्यतिरेक होता है जिसको अपनाकर मनुष्य जाति को इतना आगे बढ़ सकने का अवसर मिला है। हम सब स्वार्थरत रहें और दूसरे लोग हमारे प्रति सहयोग-सद्भाव रखें, यह कैसे होगा? क्रिया की प्रतिक्रिया नितांत स्वाभाविक है।
चिंतन और शारीरिक कर्तृत्व में ईश्वरीय महत्ता को ओत-प्रोत करने की आवश्यकता अनुभव होती रहे, साथ ही इस बात का भी भान रहे कि ईश्वर और जीव यदि मिल-जुलकर, एक होकर रहें तो उससे हर्ष और आनंद का विस्तार होगा। ईश्वर संतुष्ट होगा कि उसने मनुष्य के निर्माण पर जो श्रम किया था, वह निरर्थक नहीं गया। जीव आनंद अनुभव करेगा कि उसने सर्वशक्तिमान सत्ता के संकेतों पर चलना स्वीकार करके उसका स्नेह-सद्भाव और अनुग्रह प्राप्त कर लिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-August
चिंतन और क्रियाकलापों को परिष्कृत विकसित किया जाना चाहिये। विकसित मनोभूमि ही उस अनुदान को सार्थक बना सकेगी।
चिंतन की दृष्टि से यदि मनुष्य उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से अपने को सुसम्पन्न कर लें तो उनके कषाय-कल्मषों की कालिमा हट सकती है और अंतःकरण तथा व्यक्तित्व शुद्ध, स्वच्छ, पवित्र एवं निर्मल बन सकता है। ऐसा व्यक्ति मंत्र, उपासना, तपश्चर्या का समुचित लाभ उठा सकता है और देवताओं के अनुग्रह का अधिकारी बन सकता है। जब तक यह पात्रता न हो तब तक उत्कृष्ट वरदान माँगने की दूरदर्शिता ही उत्पन्न न होगी और साधना के पुरुषार्थ से कुछ भौतिक लाभ भले ही मिल जायं, देवत्व का एक कण भी उसे प्राप्त न होगा। और आसुरी भूमिका पर कोई सिद्धि मिल भी जाय तो अन्ततः उसके लिये घातक ही सिद्ध होगी। असुरों की साधना और उसके आधार पर मिली हुई सिद्धियों से उनका अन्ततः सर्वनाश ही उत्पन्न हुआ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-September
चिंतन और मनन द्वारा व्यक्ति अपने आप भी अपने मानसिक स्तर को बढ़ाता है। इन दिनों मस्तिष्कीय विज्ञानवेत्ताओं का शोधकार्य यह चल रहा है कि परंपरागत मंथर उपायों के अतिरिक्त कुछ ऐसे उपाय प्राप्त किए जाएँ; जिनमें मस्तिष्कीय स्थिति में अभीष्ट परिवर्तन तुर्त-फुर्त किया जा सके आज इस स्तर की गतिविधियाँ जो अपनाने हुए हैं, वह कल दूसरी तरह की स्वेच्छापूर्वक अपना लें। आज के डाकू को कल संत बनाया जा सके।
चिंतन, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण विकास की बात तब सूझेगी ही नहीं और सूझेगी भी तो अत्यंत फूहड़ ढंग से। आत्मवाद का अर्थ पूजा-पाठ को सीमित कर देना, उसमें जीवन के समग्र परिष्कार की आवश्यकता को अविच्छिन्न न मानना एक प्रकार से परले सिरे की भ्रांति है।
चिंतनशैली और साहसिकता पर निर्भर रहती है। आशंकाग्रसित, घबराने वाले, चिंतातुर व्यक्ति छोटी कठिनाई को बड़ा करके देखते हैं और तिल का ताड़ बनाते हैं। उसी प्रकार कितने ही अशुभ चिंतक लोग बैठे-ठाले भविष्य के अंधकारमय कल्पना-चित्र बनाते रहते हैं और अपने गढ़े हुए उस “हौआ” को देख-देखकर काँपते रहते हैं। कई व्यक्ति द्वेष, दुर्भाव के आदी होते हैं और छिद्रांवेषी प्रवृत्ति के कारण हर व्यक्ति में कुटिलता हर परिस्थिति में अवांछनीयता ढूँढ़ते रहते हैं और अपने मानसिक क्षोभ को बढ़ाते रहते हैं। इस प्रकार के कितने ही मनोविकार अंतःकरण में भर जाते हैं।
चिंतन और सान्निध्य में अतिशय रुचि लेता है, तो उसकी चेतना नारी वर्ग में परिणत होने लगेगी और वह उस प्रवृत्ति को तीव्रता के अनुरूप देर में या जल्दी लिंग-परिवर्तन कर लेगा। इसमें एकाध जन्म की देरी भी हो सकती है। लिंग-परिवर्तन की ऐसी घटनाओं में; जिनमें नारी नर के रूप में या नर नारी के रूप में परिणत किए गए, उनमें शारीरिक या मानसिक कारण नहीं होते; वरन अंतःचेतना का गहन स्तर—  "कारणशरीर ही इस प्रकार की पृष्ठभूमि विनिर्मित करता है। नपुंसक वर्ग भी ऐसी ही स्थिति है। इसे परिवर्तन का मध्य स्थल कह सकते हैं।
चिंतन जितनी गहराई के साथ किया जाएगा उतना ही यथार्थवादी दृष्टिकोण परिष्कृत होगा और आत्मशोधन की दिशा में योजनाबद्ध रूप से बढ़ चलना संभव हो जाएगा। बैल को, घोड़े को, जिस तरह ठीक तरह काम करने का अभ्यास कराया जाता है और सख्त-सुस्त व्यवहार किया जाता है, उसी तरह मन से भी बरतना पड़ता है। साधना, तपस्या, तितीक्षा इसी का नाम है। अपनी आकांक्षाओं अभिरुचियों और आदतों को परिष्कृत करने के प्रयास ही आत्मसुधार या आत्मनिर्माण कहलाते हैं, साधना-समर में विजय प्राप्त वीरवर्ती ही आत्मोत्कर्ष की मंजिल पूरी करते हैं।
चिंतन करने से इसी की प्रेरणा हमें प्राप्त होती है।
चिंतन और कर्तृत्त्व की दिशा का निर्धारण करें।"
चिंतन पर वही प्रेषित तरंगें छा जाएँगी और उसे जैसा सोचने के लिए निर्देश दिया गया था, वैसा ही सोचने के लिए विवश करेंगी। मनुष्य की स्वतंत्र चिंतन क्षमता समाप्त हो जाएगी और वह बौद्धिक पराधीनता से पूरी तरह ग्रस्त होकर वही सोचेगा, जो उसे सोचने के लिए बाध्य किया गया है।
चिंतन में उत्कृष्टता का और कर्त्तृत्व में आदर्शवादिता का परिपूर्ण समावेश रहे। अपनी कोई भाव तरंग उच्च गौरव से गिरी पिछड़ी न रहे, अपनी कोई हलचल ऐसी न हो जो ईश्वर के पुत्र की गरिमा के माथे पर कलंक-कालिमा लगाए। उचित-अनुचित का, श्रेय और प्रेय का निरंतर अंतर करते रहने वाली, सन्मार्ग पर अग्रसर करने वाली ऋतंभरा प्रज्ञा को जिन्होंने सर्वोपरि प्रतिष्ठा प्रदान की है वस्तुतः वे ही आत्मज्ञानी हैं। आत्मोत्कर्ष उन्हीं का हो सकता है जिन्होंने अपने सोचने और करने की समस्त हलचलों में उच्चस्तरीय तत्त्व दर्शन का समावेश कर सकने में सफलता प्राप्त की है। इस महान प्रयास में पूजा, उपासना भी एक अंग है।
चिंतन में निरत रहती है, तो उसका अंतःकरण उसी ढाँचे में ढलता और तादात्म्य होता चला जाएगा। कालांतर में वह आकांक्षा उसे स्वयं नर के रूप में परिणत कर सकती है। इस प्रकार कोई नर यदि नारी के चिंतन और सान्निध्य में अतिशय रुचि लेता है, तो उसकी चेतना नारी वर्ग में परिणत होने लगेगी और वह उस प्रवृत्ति को तीव्रता के अनुरूप देर में या जल्दी लिंग-परिवर्तन कर लेगा। इसमें एकाध जन्म की देरी भी हो सकती है। लिंग-परिवर्तन की ऐसी घटनाओं में; जिनमें नारी नर के रूप में या नर नारी के रूप में परिणत किए गए, उनमें शारीरिक या मानसिक कारण नहीं होते; वरन अंतःचेतना का गहन स्तर—  "कारणशरीर ही इस प्रकार की पृष्ठभूमि विनिर्मित करता है।
चिंतन को नई दिशा दी है— भीतर के आधार पर बाहर का ढाँचा। इस वैज्ञानिक नए दृष्टिकोण को अपनाकर हम अध्यात्म के सनातन सिद्धांत को ही स्वीकार करते हैं। अध्यात्म ने सदा यही कहा है, जैसा अंतरंग होगा वैसा बहिरंग विनिर्मित होगा। विज्ञान और अध्यात्म का एकीकरण ही समग्र सत्य को जनसाधारण के सामने प्रस्तुत करेगा और उसी से ज्ञान की परिधि विस्तृत होगी।
चिंतन एवं कर्त्तृत्व से प्रखर, परिष्कृति का समावेश। जीवन लक्ष्य इसी का दूसरा नाम है। स्वर्गमुक्ति इसी के प्रतिफल हैं। आत्मसाक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन इस मनः स्थिति का नाम है। यदि अंतरंग और बहिरंग व्यक्ति को उत्कृष्टता की रीति के साथ जोड़ा न जा सके तो समझना चाहिए कि भजन-पूजन के सारे क्रियाकलाप बालक्रीड़ा जैसे निरर्थक और उपहासास्पद ही सिद्ध होंगे।
चिंतन के आधार पर अपना मार्ग-निर्धारण स्वयं करता है और स्वयं ही अपने साहस के बलबूते उस दिशा में चल पड़ने का साहस बटोरता है। वह जानता है कि मार्गदर्शन तो जीवित या दिवंगत महामानवों से ही ग्रहण किया जाना चाहिए। नर-पशु तो कितनी ही बड़ी संख्या में क्यों न हों, भले ही वे अपने स्वजन, संबंधियों में ही भरे पड़ें हों, दया के पात्र हैं उन्हें तो प्रकाश दिया जाना चाहिए, भटकने से बचाकर रास्ते पर लाया जाना चाहिए। संपर्क निकटता के कारण उन्हें यह अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए कि उच्च आदर्शों से गिराकर निरुद्देश्य जीने वाले नर-कीटकों के रास्ते पर चलने के लिए बाध्य विवश करें।
चिंतन और कर्त्तव्य की महत्ता आहार-विहार से भी बढ़कर है। यदि उनकी उपेक्षा की गई तो हाथ कुछ भी लगने वाला नहीं है। आज यही हो रहा है। धर्म और अध्यात्म क्षेत्र में मंत्र जाप, स्तोत्र, पाठ, तीर्थ-दर्शन, स्नान-ध्यान, कथा-कीर्तन, आसन-प्राणायाम जैसे कर्मकांडों का महत्त्व आकाश-पाताल जितना बताया जा रहा है और कहा जा रहा है कि इतने भर से ही समस्त आत्मिक और भौतिक मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाएँगी। इस मूर्खतापूर्ण शिक्षा का परिणाम यह हुआ कि लोग आत्मनिर्माण की महान प्रक्रिया को तिलांजलि देकर सस्ते कर्मकांडों से आत्मलाभ प्राप्त करने की आशा करने लगे।
चिंतन क्षमता समाप्त हो जाएगी और वह बौद्धिक पराधीनता से पूरी तरह ग्रस्त होकर वही सोचेगा, जो उसे सोचने के लिए बाध्य किया गया है।
चिंतन करना चाहिए और उन्हें डायरी में नोट कर लेना चाहिए। इसी प्रकार व्यक्तित्व में घुसी हुई दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों को त्याग देने पर जो अपना परिष्कृत स्वरूप निखरेगा उसकी देव प्रतिमा ज्ञानचक्षुओं के सम्मुख प्रस्तुत करनी चाहिए। दिव्य जीवन कितनी सिद्धियों और विभूतियों से संपन्न होता है, उसका सुंदरतम चित्र गढ़ना चाहिए और उसमें अपने को घुलाकर यह सोचना चाहिए कि जब हम उस दिव्य स्थिति में होंगे तो अपने लिए कितनी शांति अर्जित करेंगे और अपने संपर्क को किस दिव्य आलोक से प्रकाशित करेंगे। इस प्रकार का चिंतन, आंतरिक महाभारत की सफलता का पथ-प्रशस्त करता है। अवांछनीयता के दुष्परिणामों पर सत्प्रवृत्तियों के सत्परिणामों पर जिनका तर्कपूर्ण, तथ्यपूर्ण उदाहरण सहित, भावसिक्त चिंतन जितनी गहराई के साथ किया जाएगा उतना ही यथार्थवादी दृष्टिकोण परिष्कृत होगा और आत्मशोधन की दिशा में योजनाबद्ध रूप से बढ़ चलना संभव हो जाएगा।
चिंतन की विशेषता को नियंत्रित करने के उपाय यदि सचमुच हाथ लग जाएँ, तब फिर यह संभव हो सकेगा कि उस विज्ञान का ज्ञाता अपनी इच्छित दिशा में गतिशील होने की प्रेरणा अगणित मनुष्यों को दे सके। इस उपलब्धि में जहाँ सुधार की संभावनाएँ हैं, वहाँ यह खतरा भी है कि कोई अधिनायक समस्त प्रजा पर अपनी इच्छित विचारधारा थोपकर उसे सदा के लिए वशवर्ती बना ले।
चिंतन, आंतरिक महाभारत की सफलता का पथ-प्रशस्त करता है। अवांछनीयता के दुष्परिणामों पर सत्प्रवृत्तियों के सत्परिणामों पर जिनका तर्कपूर्ण, तथ्यपूर्ण उदाहरण सहित, भावसिक्त चिंतन जितनी गहराई के साथ किया जाएगा उतना ही यथार्थवादी दृष्टिकोण परिष्कृत होगा और आत्मशोधन की दिशा में योजनाबद्ध रूप से बढ़ चलना संभव हो जाएगा। बैल को, घोड़े को, जिस तरह ठीक तरह काम करने का अभ्यास कराया जाता है और सख्त-सुस्त व्यवहार किया जाता है, उसी तरह मन से भी बरतना पड़ता है। साधना, तपस्या, तितीक्षा इसी का नाम है। अपनी आकांक्षाओं अभिरुचियों और आदतों को परिष्कृत करने के प्रयास ही आत्मसुधार या आत्मनिर्माण कहलाते हैं, साधना-समर में विजय प्राप्त वीरवर्ती ही आत्मोत्कर्ष की मंजिल पूरी करते हैं।
चिंतन यदि अंतःकरण में स्थान प्राप्त कर सके तो समझना चाहिए ज्ञान चेतना सार्थक हो गई। यदि कर्त्तृत्व में दिव्य क्रियाकलाप का समावेश हो सके तो समझना चाहिए सुरदुर्लभ मानव-काया का ईश्वरीय अनुदान सार्थक हो गया। असत् से सत् की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर, यदि हम चल सके तो ही जीवन की महान उपलब्धि को धन्य माना जा सकेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-April
चिंतन, मन्थन और निर्धारण को ब्रह्मविद्या का सार तत्व समझना चाहिये। इसी से आध्यात्मिक काया−कल्प रूपी सिद्धि अनुदान की प्राप्ति होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-February
चिंतन को ‘तत्वबोध’ कहा गया है। यह दोनों देखने, कहने, सुनने एवं करने में अत्यंत साधारण जैसे लगते हैं; किंतु यदि चिन्ह पूजा की तरह उनकी लकीर न पीटी जाए और गंभीरतापूर्वक उन विचारणाओं की परिणति एवं फलश्रुति पर विचार किया जाए तो प्रतीत होगा कि इस बीज का विकास विस्तार विशालकाय वटवृक्ष के रूप में होता है। चिनगारी तनिक-सी होती है; किंतु उसे ईंधन की सुविधा मिल सकें तो उसे प्रचंड दावानल बनते और योजनों लंबे वनप्रदेश उदरस्थ करते देर नहीं लगती। आँख से न दीख पड़ने वाला, बाल की नाक से भी कम विस्तार वाला शुक्राणु जब नौ महीने जितने स्वल्पकाल में एक अच्छा खाना शिशु बनकर प्रकट होता है तो कोई कारण नहीं कि उपरोक्त विचारद्वय समुचित परिपोषण पाने पर जीवन को देवत्व से लपेट लेने वाले वरदान— सौभाग्य के रूप में प्रकट-विकसित न हो सकें।
चिंतन और चरित्र की दृष्टि से कौन, किस स्तर पर रह रहा है। वस्तुतः व्यक्तित्व की पवित्रता एवं प्रखरता के आधार पर बनने वाली प्रतिभा ही वह संपदा है, जिसके सहारे उच्चस्तरीय प्रगति के पथ पर दूर तक जा पहुँचने का अवसर किसी को मिलता है। आंतरिक प्रफुल्लता, लोक, श्रद्धा एवं दैवी अनुकंपा को सफल जीवन की महान उपलब्धियाँ माना गया है। इन्हें अर्जित करने में परिष्कृत व्यक्तित्व ही सफल होते हैं। वैभव बटोरने में तो दुष्ट— दुराचारी भी सफल हो जाते हैं, किंतु इस विष-संचय से उन्हें भीतरी और बाहरी जलन भी झुलसाती-उबालती रहती है।
चिंतन-मनन के चार प्रयोजनों में निरत रहना पड़ता है। नित्यकर्म उपासना के अतिरिक्त जो भी समय खाली मिले उसमें इन्हीं चार प्रयोजन में मन को लगाए रहना पड़ता हैं। इन चारों का लक्ष्य एक ही हैं— आत्मपरिष्कार। उज्ज्वल भविष्य का योजनाबद्ध निर्धारण। इसके लिए आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास के चार प्रसंगों पर गंभीरतापूर्वक समुद्र-मंथन जैसा आत्मचिंतन करते रहना होता है।
चिंतन−मनन का उपक्रम जारी रखा जा सकता है। चिंतन का विषय है—आत्मशोधन, मनन का उद्देश्य है— आत्मपरिष्कार। दोनों को एकदूसरे का पूरक कहना चाहिए। मलत्याग करने के उपरांत की पेट खाली होता है, तभी भूख लगती है और भोजन गले उतरता है। धुलाई के उपरांत रंगाई होती है।
चिंतन-मनन , श्रवण−स्वाध्याय ज्ञानयोग की साधना के अंतर्गत आता है। कथा, सत्संग, प्रवचन इसी उद्देश्य से सुने भी जाते हैं; पर ये तो मात्र निर्देश हैं, दिशा में चलने के संकेत भर हैं, जीवन की दिशा निर्धारित करने के आधार नहीं। मस्तिष्क को वांछित प्रवाह में चलने देने के लिए अवतारों के, ऋषियों के–महामानवों के विचारों व चरित्र का अवलोकन–श्रवण–स्वाध्याय के माध्यम से करके हम अपनी मनःस्थिति को उत्कृष्टतापरायण बना सकते हैं। विचार संस्थान हमेशा परिष्कृत−पवित्र−विधेयात्मक चिंतन से युक्त हो, यही लक्ष्य रहे। अपनी मानसिक हलचलों का सूक्ष्मदृष्टि से अध्ययनकर यह सतत देखा जा सकता है कि अवांछनीय प्रवाह का दमन व दिव्य चिंतन का अनुसरण कितना हो पा रहा है।
चिंतन करते हुए भी वह सांसारिक पदार्थों एवं व्यक्तियों के प्रति निरासक्त होता है।
चिंतन व्यापक दूरदर्शी बनाने के लिए जिन आधारों की सहायता ली जाती है वे ज्ञानयोग की साधना के अंतर्गत आते हैं। स्वाध्याय, योग, सत्संग, चिंतन−मनन, इसी के अंग हैं।
चिंतन उखड़ा−उखड़ा ही रहेगा। प्रगति-पथ पर आगे बढ़ने के लिए इसी कारण दोनों का समन्वय आवश्यक है।
चिंतन में वे सभी गुण नजर आने लगते हैं। जिनकी अभ्यर्थना ईश-स्तवन में की जाती हैं। ऐसे व्यक्ति अपने अंतरंग को प्रसुप्त— को जगाकर देवशक्तियों का अपने अंदर आह्वान कर सकने में समर्थ हो जाते हैं। किसी-किसी में यह क्षमता जन्मजात पाई जाती है। किन्हीं-किन्हीं बालकों की स्मृति-सूझबूझ ऐसी होती है, जिसे विलक्षण कहा जा सकता हैं।
चिंतन। यही तीन आधार चांद्रायण के भी हैं। रोगी अपने रोग का स्वरूप ही नहीं इतिहास भी चिकित्सक को बताता है, उसी निदान के आधार पर उपचार की व्यवस्था बनाती है। चांद्रायण में मार्गदर्शक को अपने संचित पापकर्मों का विस्तृत वर्णन–स्वभावगत दोष-दुर्गुणों का परिचय एवं भौतिक-आत्मिक अवरोधों का विवरण प्रस्तुत करना पड़ता है। इन दोनों पक्षों पर गंभीर विचार करने के उपरांत ही हर व्यक्ति के लिए कुछ विशेष परामर्श दिए जाते हैं, उपाय-उपचार बताए जाते हैं।
चिंतन एक प्रकार से विस्मृत ही कर देना चाहिए और मात्र अध्यात्म लोक की आवश्यकताओं तथा अंतःक्षेत्र की समस्याओं को हल करने में ही चित्त को पूरी तरह केंद्रित रखना चाहिए। भौतिक जीवन की समस्याएँ इतनी विकट होती हैं कि उन्हें सुलझाने वाले साधन जुटाने में प्रायः समूची जीवन अवधि खप जाती है। फिर आत्मिक जीवन तो और भी अधिक व्यापक एवं महत्त्वपूर्ण है। उसकी गुत्थियाँ सुलझाने और प्रगति के सरंजाम जुटाने के नए सिरे से, नए दृष्टिकोण तथा नया साहस जुटाना होता है। इतने बड़े काम के लिए निर्धारित साधनाकाल स्वल्प ही है।
चिंतन जिसे रात्रि को सोते समय तब तक करते ही रहना चाहिए, जब तक कि निद्रा स्वयं आकर अपने आँचल से ढक न ले।
चिंतन एवं कर्त्तव्य के उलटकर उसे कुमार्गगामिता के पथ से रोककर सद्भावना व सत्प्रवृत्तियों में परिणत करना। इसी तथ्य की ओर योग-साधना के उत्सुकों का ध्यान आकर्षित किया जाना चाहिए। यह ध्यान-साधना क्रियाओं में सद्कर्म, चिंतन में सद्ज्ञान व अंतः में सद्भाव के रूप में परिलक्षित होने लगती है। यही वह चरम उपलब्धि है, जिस पर मानव का उत्थान एवं समाज का उत्कर्ष निर्भर है। जितनी जल्दी इन तथ्यों को हृदयंगम कर लिया जाए, श्रेयस्कर है।
चिंतन की अस्त-व्यस्त उड़ानें भरने से रोकना। सौंपे हुए काम में ही मनोयोग नियोजित रखना। चांद्रायण में यह चारों ही संयम साधनाएँ तपश्चर्या के रूप में निर्धारित करनी होती हैं। तपस्वी सच्चे अर्थों में सामर्थ्यवान बनता है। उसकी ऊर्जा से प्रखरता, परिपक्वता बढ़ती हैं।
चिंतन का पारस्परिक संबध बताता है।
चिंतन का विषय अनुशासन है। इसी को ‘संयम’ कहा जाता है। इंद्रिय संयम, अर्थ, समय, विचार संयम के अंतर्गत विभिन्न पक्षों की चर्चा होती रही है। साधक को अपने वर्तमान स्वभाव-अभ्यास में इन प्रसंगों में कहाँ क्या त्रुटि रहती है, इसकी निष्पक्ष निरीक्षक एवं कठोर परीक्षक की तरह जाँच−पड़ताल करना चाहिए। आत्मपक्षपात मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्गुण है।
चिंतन बिंदु पर केंद्रित कर सकने की प्रवीणता प्राप्त कर लेना। जिसे इस प्रयोग में सफलता मिलने लगती हैं, वह उसी अनुपात में अंतःचेतना को बेधक प्रचंडता से अभिपूरित करता चला जाता है। शब्दबेधी बाण की तरह लक्ष्यबेध कर सकना उसके लिए सरल हो जाता है।
चिंतन और चरित्र से निकृष्टता हटाने की उपेक्षा करके सीधे ईश्वर तक जा पहुँचने— साक्षात्कार करने या योग सिद्धियों की बात करते हैं, उन्हें हवा में तैरने वाले— कल्पना-लोक के पखेरू ही कहा जा सकता है। ऐसे शेखचिल्ली अध्यात्म-क्षेत्र में भी कम नहीं हैं, जो जिस−तिस क्रिया−प्रक्रिया को ही सब कुछ मान बैठते हैं और बिना चिंतन सुधारे श्रम−प्रयास के आधार पर ही साधना की सफलता का स्वप्न देखते हैं।
चिंतनशैली का— जिस प्रथा-प्रचलन का, अभ्यस्त हो गया है, उसी से तालमेल बिठा सकने वाला तत्त्व दर्शन इन दिनों सृजा जाना चाहिए। यह सृजन ऐसा होना चाहिए, जो चिंतन की उत्कृष्टता और चरित्र की आदर्शवादिता को तर्क, तथ्य, प्रमाण, प्रयोग, उदाहरण आदि की हर कसौटी पर, हर किसी के लिए, हर क्षेत्र में उपयोगी सिद्ध कर सके।
चिंतन और कर्त्तव्य एक तरह का होता है और दुर्जनों का दूसरी तरह का। इन दोनों ही प्रकार की प्रवृत्तियों में शरीर और मन सर्वथा निर्दोष होते हैं। दोषी अन्तःकरण होता है, जिसमें जमे संस्कार भली−बुरी प्रेरणाएँ उभारने का कारण बनते हैं।
चिंतन की उपेक्षा करे तो समझना चाहिए कि शरीरश्रम जितना लाभ मिल सकता है, उतना ही मिलेगा। मनोयोग के अभाव में उस उच्चस्तरीय प्रतिफल की आशा न की जा सकेगी जो शास्त्रकारों ने–अनुभवी सिद्धपुरुषों ने बताई है।
चिंतन को हेय स्थिति से उलटकर सद्भावना व सत्प्रवृत्तियों में रत होना पड़ता है। समस्त अध्यात्मयोग-साधनाओं का लक्ष्य यही है। यही वह लक्ष्य है, जिसकी प्राप्ति के लिए योग-साधक तत्पर हो स्वयं आगे बढ़ता है व अन्यों को आगे बढ़ाता है।
चिंतन को, उच्चस्तरीय बनाने में सफल होते हैं। इस दिशा में की गई प्रगति ही वास्तविक प्रगति है। उसके सहारे महानता एवं संपन्नता के दोनों ही क्षेत्रों में आशातीत प्रगति हो सकती है।
चिंतन एवं अनुसंधान से जो निष्कर्ष निकाले थे, वे बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं तथा आत्मानुसंधान में प्रवृत्त होने के इच्छुक जिज्ञासुओं का मार्गदर्शन करने में सक्षम है।
चिंतन है और आगे बढ़ना— मनन। चिंतन को आत्मसमीक्षा और आत्मसुधार कह सकते हैं। उसे वस्तुतः तपश्चर्या की, संयम-अनुशासन अपनाने की पृष्ठभूमि कहना चाहिए। मनन को आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास की पृष्ठभूमि कहना चाहिए। क्षुद्रता को, महानता के साथ जोड़ देना ही योग है।
चिंतन का विषय है—आत्मशोधन, मनन का उद्देश्य है— आत्मपरिष्कार। दोनों को एकदूसरे का पूरक कहना चाहिए। मलत्याग करने के उपरांत की पेट खाली होता है, तभी भूख लगती है और भोजन गले उतरता है। धुलाई के उपरांत रंगाई होती है। नींव खोदने पर ही दीवार चुनी जाती है।
चिंतन−मनन के लिए सतत मंथन के अतिरिक्त एक घंटा नित्य अलग से निकाल लिया जाए, जिसमें मात्र आत्मसमीक्षा, सुधार, निर्माण व विकास की प्रक्रिया में ही निरत रहा जाए। इसके अतिरिक्त भी कभी भी खाली रहने या काम करते रहने की स्थिति में यह चिंतन−मनन का उपक्रम जारी रखा जा सकता है। चिंतन का विषय है—आत्मशोधन, मनन का उद्देश्य है— आत्मपरिष्कार। दोनों को एकदूसरे का पूरक कहना चाहिए। मलत्याग करने के उपरांत की पेट खाली होता है, तभी भूख लगती है और भोजन गले उतरता है।
चिंतन सुधारे श्रम−प्रयास के आधार पर ही साधना की सफलता का स्वप्न देखते हैं।
चिंतन करते रहने पर ही शरीरकल्प संभव हो पाता है। यदि वैसा न बन पड़े तो कुटी-प्रवेश की स्थिति में प्रयोग की असफलता, व्यर्थता का संदेह छाया रहे, जी घबराने लगे एवं उद्विग्नता छाई रहे। ठीक इसी प्रकार साधना−अनुष्ठान की अवधि में साधक यदि मात्र आहार संयम एवं मुँह से जीभ हिलाकर जप की बेगार भुगते और आत्मचिंतन की उपेक्षा करे तो समझना चाहिए कि शरीरश्रम जितना लाभ मिल सकता है, उतना ही मिलेगा। मनोयोग के अभाव में उस उच्चस्तरीय प्रतिफल की आशा न की जा सकेगी जो शास्त्रकारों ने–अनुभवी सिद्धपुरुषों ने बताई है।
चिंतन के आधार क्या हों? अभ्यास किस क्रम से और किस प्रकार आरंभ किया जाए? इसका निश्चय−निर्धारण हर कोई नहीं कर सकता। मरीज स्वयं दवा का निर्धारण करने लगे तो उसे कितने ही संकटों का सामना करना पड़ सकता है। कुशल चिकित्सक का परामर्श उसके लिए आवश्यक है।
चिंतन रोककर एक जगह केंद्रित किया जाए तो उसके सत्परिणाम मिलेंगे ही। मस्तिष्क की घुड़दौड़ जब रुक जाती है— विचार-प्रवाह सुनियोजित हो जाता है तो, भौतिक क्षेत्र में अपार सफलताएँ मिलती हैं, यह सत्य है। मात्र यहाँ तक ही एकाग्रता या ‘मेडीटेशन की भूमिका है। यह मस्तिष्कीय व्यायाम मात्र हुआ; पर यह योग-साधन नहीं है। इसे यदि इतनी हलकी परिधि में सीमाबद्ध कर देंगे तो अर्थ का अनर्थ हो जाएगा।
चिंतन उत्कृष्ट होता है– तत्त्वदृष्टि विकसित होती है। भक्तियोग से अंतःकरण सुविकसित होता, पवित्र बनता और इस योग्य होता है कि परमात्मसत्ता का वहाँ अवतरण हो सके। जीवात्मा की सामर्थ्य सीमित है, परमात्मा से मिलने पर ही उसमें परिपूर्णता आती है। यह सम्मिलन समर्पण के आधार पर ही संपन्न होता है। कर्म और ज्ञानयोग की साधना में कर्त्तापन का बोध बना रहता है, जिसके कारण आत्मसत्ता और परमात्मासत्ता के बीच एकत्व स्थापित नहीं हो पाता।
चिंतन करके मन को उनमें न रमने देना वैराग्य है। यह विचारपरक है। इंद्रियों का सहज रुझान विषयों की ओर होता है। विषयासक्ति से उन्हें निकालकर आत्मलक्ष्य प्राप्ति में सहयोग करने वाली— जीवनोद्देश्य को सार्थक करने वाली, गतिविधियों में प्रवृत्त करने को अभ्यास कहते हैं।
चिंतन की उत्कृष्टता और चरित्र की आदर्शवादिता को तर्क, तथ्य, प्रमाण, प्रयोग, उदाहरण आदि की हर कसौटी पर, हर किसी के लिए, हर क्षेत्र में उपयोगी सिद्ध कर सके।
चिंतन व दिशा-निर्धारण का इसमें समावेश हो जाता है तो अगणित विभूतियों के रूप में इसके परिणाम सामने आते हैं।
चिंतन-चेतना को इस संदर्भ में उपेक्षा नहीं बरतनी चाहिए; वरन् जो अवश्यंभावी है इसके लिए समय रहते जागरूकता बरतने एवं तत्परता अपनाने में ही दूरदर्शिता है।
चिंतन एवं प्रयास के लिए तनिक भी कटौती नहीं करनी चाहिए। समय तथा मनोयोग को निर्धारित प्रयोजन में ही जुटाए रहना चाहिए, उसे अन्य किसी कार्य में रत्ती भर भी अस्त-व्यस्त नहीं करना चाहिए।
चिंतन का अनुसरण कितना हो पा रहा है।
चिंतन में सद्ज्ञान व अंतः में सद्भाव के रूप में परिलक्षित होने लगती है। यही वह चरम उपलब्धि है, जिस पर मानव का उत्थान एवं समाज का उत्कर्ष निर्भर है। जितनी जल्दी इन तथ्यों को हृदयंगम कर लिया जाए, श्रेयस्कर है। बाल−क्रियाओं में समय भी नष्ट किया और पाया कुछ नहीं, यह पश्चात्ताप मन में बना रहे, इससे उचित तो यही है कि योग-साधना, अध्यात्म उपचारों के मर्म, स्वरूप एवं लक्ष्य पहले अच्छी तरह समझ लिया जाए। उतना होने पर आगे बढ़ चलना, बिना किसी कठिनाई के ही संभव है।
चिंतन ही नहीं किया गया, उसे इन दिनों सोचना चाहिए। जिस क्षेत्र में कभी बुहारी तक नहीं लगी, कभी दृष्टि ही नहीं गई, उसे इन दिनों साफ−सुथरा बनाने से लेकर सुंदर–सुसज्जित बनाने के लिए तत्परता एवं तन्मयता के साथ जुटे रहना चाहिए।
चिंतन को आत्मसमीक्षा और आत्मसुधार कह सकते हैं। उसे वस्तुतः तपश्चर्या की, संयम-अनुशासन अपनाने की पृष्ठभूमि कहना चाहिए। मनन को आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास की पृष्ठभूमि कहना चाहिए। क्षुद्रता को, महानता के साथ जोड़ देना ही योग है। इस उद्देश्य के लिए कामना को भावना में, तुच्छ को महान में, सीमित को असीम में परिवर्तित करना होता है।
चिंतन और चरित्र को परिष्कृत स्तर का— ताल-मेल बिठा सकने में सक्षम बनाता है। इसके अभाव में उसे अनगढ़, पिछड़े, असभ्य लोगों की तरह वनमानुष जैसा जीवन जीना पड़ेगा। साधन होते हुए भी सही उपयोग न बन पड़ने के कारण उलटे संकट में फँसना पड़ेगा।
चिंतन को भी कायिक परिवर्तन की परिधि में ही घुमाना पड़ता है। उस नियत क्षेत्र में चिंतन करते रहने पर ही शरीरकल्प संभव हो पाता है। यदि वैसा न बन पड़े तो कुटी-प्रवेश की स्थिति में प्रयोग की असफलता, व्यर्थता का संदेह छाया रहे, जी घबराने लगे एवं उद्विग्नता छाई रहे। ठीक इसी प्रकार साधना−अनुष्ठान की अवधि में साधक यदि मात्र आहार संयम एवं मुँह से जीभ हिलाकर जप की बेगार भुगते और आत्मचिंतन की उपेक्षा करे तो समझना चाहिए कि शरीरश्रम जितना लाभ मिल सकता है, उतना ही मिलेगा। मनोयोग के अभाव में उस उच्चस्तरीय प्रतिफल की आशा न की जा सकेगी जो शास्त्रकारों ने–अनुभवी सिद्धपुरुषों ने बताई है।
चिंतन में, व्यवहार में तथा फिर साधना के क्रिया-क्षेत्र में परिलक्षित हो। व्यक्तिगत संपन्नता साधना की परिणति सुपात्र हैं। व्यक्तित्व का सारा आधार ही दृष्टिकोण है। अंतरंग जैसा भी कुछ है, इसी आधार पर बनता है कि अपने आंतरिक विकास के लिए क्या सोचा गया और उसकी रूपरेखा किस प्रकार बनाई गई।
चिंतन का आधार बनाया जाता है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने, अपना चिंतन व्यापक दूरदर्शी बनाने के लिए जिन आधारों की सहायता ली जाती है वे ज्ञानयोग की साधना के अंतर्गत आते हैं। स्वाध्याय, योग, सत्संग, चिंतन−मनन, इसी के अंग हैं।
चिंतन का समावेश हुए बिना योग कहाँ हुआ? चूँकि चरित्र निर्माण, भावनात्मक उत्थान एवं जीवन लक्ष्य का उच्चस्तरीय निर्धारण कठिन एवं सबके लिए सुलभ नहीं है, इसलिए मात्र भीड़ एकत्र करने के लिए योग के नाम पर बाजीगरी उपयुक्त नहीं।
चिंतन पेट−प्रजनन में लगा रहता है। वासना, तृष्णा, और अहंता के भवबंधनों में जकड़ा हुआ इन्हीं ललक-लिप्साओं की पूर्ति में कोल्हू का बैल बना रहता है। इस स्थिति को उलटकर अंतःकरण की भावनाएँ और मनःसंस्थान की विचारणाओं को उत्कृष्ट आध्यात्मिकता के साथ जोड़ देने के सुयोग को योग कहते हैं। साधारणतया स्वभाव— संस्कार इसे करने नहीं देते। ऊँचा चढ़ने की इच्छा को पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति रोकती है और बलपूर्वक नीचे घसीटती है।
चिंतन एवं दुष्ट आचरण ही होता है। पापकर्म के बीज सर्वप्रथम दुष्प्रवृत्ति बनकर अंकुर की तरह पौधे उगते हैं। इसके बाद वे पेड़-पौधे बनकर फलने-फूलने लगते हैं। जब तक वे फलने योग्य नहीं होते तब तक उनका स्वरूप पतन-पराभव के रूप में दृष्टिगोचर होने वाले दुराचरण जैसा होता है। पीछे जब वे यदि पुष्ट-परिपक्व हो जाते हैं तो आधि-व्याधि, विपत्ति, हानि, भर्त्सना के रूप में कष्ट देने लगते हैं।
चिंतन करते रहना होता है। ताकि ईश्वरप्रदत्त अलभ्य उपहार मनुष्य जन्म का सही उपयोग संभव हो सके। इसके लिए शरीर निर्वाह एवं परिवार पोषण की तरह ही परमार्थ प्रयोजनों को महत्त्व देना होता हैं। आत्मकल्याण और लोक मंगल की समन्वित जीवनचर्या का निर्धारण एवं अभ्यास ही आराधना है।
चिंतन व कार्य तो बदले ही नहीं। वैसे के वैसे ही घटिया रहे। एकाग्रता मन के विधि−व्यवस्थापूर्वक सोचने की, बिखरी शक्तियों को एक ओर केंद्रित सुनियोजित करने की विधा मात्र है। यह तो एक कला है। घड़ी साज जब अपने ग्राहक की घड़ी का सूक्ष्मपुर्जा अपनी जगह लगाता है व त्रुटि को ठीक करता है तो वह एकाग्रता के माध्यम से ही यह सब कर पाता है।
चिंतन व आहार, कर्त्तव्य व व्यवहार में पूरी छूट है।
चिंतन की प्रखरता न रखने वालों के बहक जाने और अनास्था अपना लेने का पूरा−पूरा खतरा है। अनैतिकता, विलासिता और उच्छृंखलता के समर्थन में और भी कितने ही प्रवाह चल रहे हैं, जो चतुरता और संपन्नता की अभिवृद्धि से भी कहीं अधिक तेजी के साथ भ्रष्ट चिंतन एवं दुष्ट आचरण को उत्तेजना दे रहे हैं। इन परिस्थितियों में आस्था-संकट दिनों- दिन घनीभूत होता चला जा रहा है। यह लक्षण महाविनाश के हैं। उस मार्ग पर चलते हुए यादवी गृहयुद्ध में हम सभी किसी न किसी प्रकार अपना आत्मघात कर बैठेंगे।
चिंतन से युक्त हो, यही लक्ष्य रहे। अपनी मानसिक हलचलों का सूक्ष्मदृष्टि से अध्ययनकर यह सतत देखा जा सकता है कि अवांछनीय प्रवाह का दमन व दिव्य चिंतन का अनुसरण कितना हो पा रहा है।
चिंतन एवं दुष्ट आचरण को उत्तेजना दे रहे हैं। इन परिस्थितियों में आस्था-संकट दिनों- दिन घनीभूत होता चला जा रहा है। यह लक्षण महाविनाश के हैं। उस मार्ग पर चलते हुए यादवी गृहयुद्ध में हम सभी किसी न किसी प्रकार अपना आत्मघात कर बैठेंगे।
चिंतन से जुड़ी हुई एक महत्त्वपूर्ण साधना है।
चिंतन की जो सामर्थ्य काम करती दिखती है, उसे अग्नि का एक नाम ‘आतप’ है। अध्यात्म-क्षेत्र में उसके उत्पन्न करने की पद्धति का नाम ‘तप’ है।
चिंतनसहित एकाग्रता की साधना। राजयोग, हठयोग, भक्तियोग, लययोग की समस्त दिशा धाराएँ जिस एक स्थान पर आकर केंद्रित होती हैं, उसे एकाग्रता कहा जा सकता है। एकाग्रता में वृद्धि के अनुपात में ही साधक अपनी प्रगति और सफलता का अनुमान लगाते हैं। इसीलिए उपनिषद्कार ने नारद−सनत्कुमार जिज्ञासा-समाधान के माध्यम से कहा है— "संकल्पो वाव मनसी भूयान। चित्तं वाव संकल्पाद्भूयो।
चिंतन को अस्त−व्यस्त उड़ान−भटकावों से रोककर एक लक्ष्य निर्धारितकर उस पर विचार तरंगों को केंद्रीभूत करना, यही प्रक्रिया ध्यान में भी अपनी जाती है, जो ज्ञानयोग का ही एक अंग है।
चिंतनक्षेत्र में उतारना होता है, इष्ट का निर्धारण किस प्रकार किया जाता है, इस पर ऋषि−मनीषियों ने विशद अनुसंधान किया है एवं आप्त वचनों के रूप में अपने निष्कर्ष जनमानस के सम्मुख रखे हैं।
चिंतन–महत्त्वाकांक्षाओं को भौतिक से आत्मिक में बदल देना, संकीर्ण स्वार्थपरता के भवबंधनों— लोभ, मोह, अहंकार से मुक्त होकर आत्मविस्तार करना यह योग का वह पक्ष है, जिसके बिना ऊपर वर्णित तीनों साधन मात्र स्थूलक्रियाएँ भर हैं। आदर्शवादी भावचेतना को ही ‘उपास्य ब्रह्म’ कहते हैं। अपनी ‘लघु−स्व’ चेतना को ऊँचा उठाकर उसे परम सत्ता के साथ जोड़ देना अथवा उसका अपने अंदर अवतरण होने की अनुभूति करना, दोनों एक ही हैं। लक्ष्य एक ही है, दृष्टिकोण का परिष्कार— पाशविक स्तर, हेय चिंतन एवं कर्त्तव्य के उलटकर उसे कुमार्गगामिता के पथ से रोककर सद्भावना व सत्प्रवृत्तियों में परिणत करना। इसी तथ्य की ओर योग-साधना के उत्सुकों का ध्यान आकर्षित किया जाना चाहिए।
चिंतन में सदा निरत रखने से वैराग्य का भाव जागृत होता है।
चिंतन−मनन, इसी के अंग हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-December
चिंतन्य है। विस्तार की कल्पना एवं आराधना कठिन है। किन्तु अणु के भीतर विद्यमान उस महती शक्ति सत्ता का सरल साक्षात्कार हो सकता है। बूँद में सरोवर की समस्त विशेषताएँ विद्यमान हैं। चिनगारी में विश्व अग्नि तत्व की समस्त सम्भावनाएँ सन्निहित हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-July
चिंतन प्रवाह अपने में प्रायः एक ही दिशा में होता है। मनस्वी और स्वतन्त्र चिन्तक के प्रवाह की धारा एक ही दिशा में बहती है। युद्ध और शांति के दिनों में इस तथ्य को बड़ी आसानी से साकार हुआ देखा जा सकता है। अपने समय में पूर्वजों के कथन को प्रमाणिक मान लेने की श्रद्धा अब उखड़ रही है तथा तर्क और प्रमाणों पर आधानीति एवं दर्शन शास्त्र के प्रख्यात विद्वान् डयूरेन्ट डे्रक अपने ग्रन्थ “सामान्य व्यक्ति के लिए ईश्वर जगत का निर्माता पोषण तथा संहारक बनकर सद्मार्ग अपनाने एवं सदाचरण की प्रेरणा देता है। असामान्य व्यक्ति उस सत्ता को श्रेष्ठ सिद्धान्तों एवं आदर्शों के पुँज के रूप के रूप में देखता है और उसी के अनुरूप ढलने का बाध्य करता है।
चिंतन था, जो उस समय साकार न हो सका। पर गॉल्टन ने इस तथ्य की ‘प्राकृतिक चयन’ (नेचुरल सलेक्शन) की तकनीक के बजाय समाज को बुद्धिमानी प्राणी देने के लिए ‘सोशल सलेक्शन’ की विधि अपनाई जानी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-January
चिंतन करते रहने और प्रज्ञा का अवलम्बन लेने से योग का कंटकाकीर्ण मार्ग सरल बन जाता है। इस मार्ग में मन का विक्षोभ एवं चिन्तन का भटकाव ही अधिक बाधक होता है। प्रज्ञा को वरण कर लेने से वह विवेक बुद्धि विकसित होती है जिसके कारण भटकाव रुकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-October
चिंतन, पतनोन्मुख प्रवृत्तियों से विरत होकर पवित्रता और प्रखरता अपनाएँ, संयमी और उदारचेता बनें। चरित्रनिष्ठा और समाजनिष्ठा के सभी महत्त्वपूर्ण तथ्य उसमें कूट-कूटकर भरे हैं। चिथड़ों में लिपटा हुआ हीरा भी ग्राह्य है। प्रस्तुत विकृतियों के ढकोसले को उखाड़कर यदि अंतराल तक पहुँचने और वस्तुस्थिति का पता लगाने का प्रयत्न किया जाए तो पता चलेगा कि धर्म मानवी उत्कृष्टता का जीवन-प्राण है।
चिंतन के साथ उत्कृष्टता का जुड़ा रहना ही साधनों को सार्थक बना सकता है। चिंतन ऊँचा हो तो ऋषियों की तरह स्वल्प साधनों में भी बादशाहों से बढ़कर सुखी, समुन्नत एवं शानदार जीवन जिया जा सकता है। इसके विपरीत यदि आंतरिक निकृष्टता का बोलबाला हो, तो समझना चाहिए वैभव का वैसा ही दुष्परिणाम होगा जैसा कि रावण, कंस, हिरण्यकश्यपु, जरासिंधु, वृत्तासुर आदि को अपने समुदाय समेत भुगतना पड़ा था। महत्ता संपदा को, समर्थता को तो मिलनी चाहिए; पर यह नहीं भुला दिया जाना चाहिए कि दूरदर्शी, विवेकशीलता, मेधा, प्रज्ञा के अनुभव से वह सारी विभूतियाँ बंदर के हाथ पड़ने वाली तलवार का काम करेंगी और उस पुरुषार्थ, सौभाग्य का परिणाम हितकर न बनकर, विनाशकारी ही सिद्ध होगा। तथ्य को समझा जा सके तो चिंतन की उत्कृष्टता ही सर्वोपरि ठहरती है, उसे विकसित करने के एकमात्र अवलंबन— धर्मतंत्र को इस विश्व-व्यवस्था में सर्वोपरि स्थान सम्मान मिलता है।
चिंतन के भटकाव को रास्ते पर लाने का उत्तरदायित्व कौन संभाले? कौन आगे बढ़े और कौन उसका सहयोगी रहकर व्यापक प्रयोजन को पूरा करे?
चिंतन को भी एक सीमा तक प्रभावित करती हैं, फिर भी उनका वह मूल विषय है नहीं। जहाँ तक नैतिक प्रश्नों का, व्यक्तित्व का, परिष्कृत करने वाले संदर्भों का, परंपराओं के प्रवाह का संबंध है, वे किसी नीतिनिष्ठ तंत्र से प्रसारित होने पर ही प्रभावी बनती हैं। अन्यथा चिह्नपूजा जैसी विडंबना बनकर रह जाती है। शासनतंत्र और अर्थतंत्र दोनों ही लगा-लपटों से भरे, कुचक्रों से सने रहते हैं। उनकी कूटनीति प्रमुखता को सभी जानते हैं, इसलिए इस मंच से किए गए प्रचार को सही होने पर भी संदेह की दृष्टि से देखते हैं और किसी प्रयोजन विशेष के छिपे होने की गंध सूँघते हैं।
चिंतन ऊँचा हो तो ऋषियों की तरह स्वल्प साधनों में भी बादशाहों से बढ़कर सुखी, समुन्नत एवं शानदार जीवन जिया जा सकता है। इसके विपरीत यदि आंतरिक निकृष्टता का बोलबाला हो, तो समझना चाहिए वैभव का वैसा ही दुष्परिणाम होगा जैसा कि रावण, कंस, हिरण्यकश्यपु, जरासिंधु, वृत्तासुर आदि को अपने समुदाय समेत भुगतना पड़ा था। महत्ता संपदा को, समर्थता को तो मिलनी चाहिए; पर यह नहीं भुला दिया जाना चाहिए कि दूरदर्शी, विवेकशीलता, मेधा, प्रज्ञा के अनुभव से वह सारी विभूतियाँ बंदर के हाथ पड़ने वाली तलवार का काम करेंगी और उस पुरुषार्थ, सौभाग्य का परिणाम हितकर न बनकर, विनाशकारी ही सिद्ध होगा। तथ्य को समझा जा सके तो चिंतन की उत्कृष्टता ही सर्वोपरि ठहरती है, उसे विकसित करने के एकमात्र अवलंबन— धर्मतंत्र को इस विश्व-व्यवस्था में सर्वोपरि स्थान सम्मान मिलता है।
चिंतन और कर्त्तृत्व की दिशाधारा निर्धारित करते और पृष्ठभूमि बनाते हैं। जब विज्ञान ने मत्स्यावतार की तरह अपनी परिधि को इतना विशाल— व्यापक बना लिया है तो धर्म को सभी सांप्रदायिक प्रथा-पूजा की सीमाओं में जकड़कर रखे रहना संभव नहीं है। युग धर्म, विश्व धर्म, चेतना धर्म आदि शब्दों में ही धर्म की वर्तमान दायरे की व्याख्या-विवेचना करना और उसके भावी स्वरूप-निर्धारण के संदर्भ में विचार कर सकना संभव हो सकता है। इसमें संप्रदायों को अपने-अपने ढंग से सोचना और अपनी रुचि को कार्यांवित करने का नागरिक अधिकार है। उसे मनुष्य के मौलिक अधिकारी के कारण अपने ढंग से अपनी गतिविधियाँ चलाते रहने की छूट है, पर उस क्षेत्र के इस दावे को मान्यता नहीं मिल सकती कि वे जो सोचते हैं वही सत्य, तथ्य या उचित है।
चिंतन को प्रभावित करने वाले हर क्षेत्र को इच्छित प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किया। अपने देश में वैसा तो नहीं हो सकता और न वैसी आवश्यकता ही है। नीति और धर्म का पक्ष इतना सशक्त है कि यदि उसे बुद्धिवादीशैली में प्रस्तुत करने के लिए युगमनीषा कमर कस ले तो बिना शासन की सहायता के भी जन स्तर पर वैसा हो सकता है और जन-जन को युगचिंतन के हर पक्ष का समर्थन करने वाला साहित्य मिल सकता है। जो सत्य है, जो श्रेष्ठ है, जो श्रेय है, उसे उसी रूप में प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर भी खरा सिद्ध किया जा सकता है। इस प्रकार के लेखन-प्रतिपादन में मात्र मनीषा को संकल्पपूर्वक कटिबद्ध भर होना है।
चिंतन, आदर्श, कर्त्तृत्व के नाम से जाना जाता है।
चिंतन को परिष्कृत किया जाए। इसके लिए लोक-मानस में उत्कृष्ट आदर्शवादिता को प्रतिष्ठित करने वाली विचार-क्रांति को प्रखर किया जाए। इसके लिए नवजागरण का अलख घर-घर जगाया जाए। जन-जन के मन तक नवचेतना का आलोक पहुँचाया जाए। मान्यताओं और परंपराओं का नए सिरे से दूरदर्शी विवेकशीलता के सहारे नया निर्माण-निर्धारण किया जाए।
चिंतन को सहमत किया जा सके और इस कसौटी पर अपनी मान्यताओं, आदतों और गतिविधियों की जाँच-पड़ताल करने का उत्साह जग पड़े तो समझना चाहिए कि विचार क्रांति आरंभ हुई। विघातक अवांछनीयता से पीछा छूटा और सुखद संभावना से भरा-पूरा प्रभाव उगा।
चिंतन-क्षेत्र में घुसी हैं। दृष्टिकोण गड़बड़ाया है। आस्था-क्षेत्र में दुर्भिक्ष पड़ा है। रुझान में निकृष्टता को प्रश्रय मिला है। फलतः संकीर्ण स्वार्थपरता, वासना-तृष्णा की तूती बोलने लगी है।
चिंतन की शालीनता को सहकारिता के प्रति निष्ठावान बनाना है। पूजा, उपासना, शास्त्र, कथा-सत्संग, दान-पुण्य-तीर्थ, भजन आदि क्रिया-कृत्यों के पीछे मूलभूत उद्देश्य एक ही है कि मानवी चिंतन, पतनोन्मुख प्रवृत्तियों से विरत होकर पवित्रता और प्रखरता अपनाएँ, संयमी और उदारचेता बनें। चरित्रनिष्ठा और समाजनिष्ठा के सभी महत्त्वपूर्ण तथ्य उसमें कूट-कूटकर भरे हैं। चिथड़ों में लिपटा हुआ हीरा भी ग्राह्य है। प्रस्तुत विकृतियों के ढकोसले को उखाड़कर यदि अंतराल तक पहुँचने और वस्तुस्थिति का पता लगाने का प्रयत्न किया जाए तो पता चलेगा कि धर्म मानवी उत्कृष्टता का जीवन-प्राण है।
चिंतन-चरित्र को, प्रखर-परिष्कृत करने की आवश्यकता पड़ी है, तब मनीषा को ही आगे आना पड़ा है। अपने समय भी अवरोधों में थी, इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। शासन अपना काम करे; पर यह उचित नहीं कि मनीषा का उत्तरदायित्व भी उसी पर लद पड़े। इस दिशा में शासन रेडियो, टेलीविजन प्रकाश आदि के द्वारा जो कर लेता है, उतने को भी न कुछ-से-कुछ कह कर संतोष किया जा सकता है। साहित्य और कला की विकृतियों पर अंकुश लगाने का कुछ कारगर कदम भर उठने लगे तो फिल्म एवं प्रकाशन-उद्योग की विकृतियाँ फैलने से रोकने का आग्रह भी प्रस्तुत किया जा सकता है।
चिंतन की उत्कृष्टता ही सर्वोपरि ठहरती है, उसे विकसित करने के एकमात्र अवलंबन— धर्मतंत्र को इस विश्व-व्यवस्था में सर्वोपरि स्थान सम्मान मिलता है।
चिंतन, सब कुछ या कुछ नहीं का रहा है। बैर और प्रीति के बीच का मध्यवर्ती मार्ग तालमेल बनाए रहना भी हो सकता है, उस दिशा में गंभीरतापूर्वक सोचा ही नहीं जाता। संघर्ष और सहयोग का समन्वय हो सकता है। एक आँख दुलार की, दूसरी सुधार की बनी रहे तो विकृतियों का उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन साथ-साथ चल सकता है। कुशल माली यही करते हैं, निराई और सिंचाई का परस्पर विरोधी सिलसिला साथ-साथ चलाते रहते हैं और इसे विसंगति नहीं, पूरक प्रक्रिया मानते हैं।
चिंतन। जो उपलब्ध है, उसका संतोष, आनंद लेने की अपेक्षा जो नहीं है, उसी की सूची बनाए फिरना, अधिक संपन्नों के साथ तुलना करके दरिद्र अनुभव करना। तुलना ही करनी हो तो पिछड़ों के साथ करके अपने सौभाग्य को सराहा क्यों न जाए? चारों ओर जो उत्साहवर्द्धक भरा पड़ा है जिसे देखने, सोचने, स्मरण करने से कृतज्ञता, प्रसन्नता की अनुभूति होती है, उसी पर ध्यान केंद्रित क्यों न किया जाए? मनोकामनाओं के पर्वत सिर पर लादने की अपेक्षा निर्वाह में संतोष करने की आदत क्यों न डाली जाए?
चिंतन और चरित्र का समन्वय अपने जीवनक्रम में किया है, उनकी सेवा-साधना सदा फलती-फूलती रही है। चरित्रवान उपदेष्टा ही जनमानस पर शासन करते, उसे सुधारते और मोड़ते-मरोड़ते देखे गए हैं। सेवा की जिनने सस्ती वाहवाही लूटने और दूसरों की आँखों में चकाचौंध करने को ही अपनाया है, निराशा उन्हीं के हाथ लगती है। जो दूसरों से कहे जाने वाले प्रसंगों को निजी जीवनचर्या की प्रयोगशाला में परखकर खरी सिद्ध करते हैं, उनके निर्धारण कभी असफल नहीं हुए। पवित्रता, प्रखरता, शालीनता और उदारता के कदम सदा से लक्ष्य तक पहुँचकर ही रुके हैं।
चिंतन-चेतना ही है। यदि वह गड़बड़ाने लगे तो भली-चंगी काया को रुग्ण, अक्षम, कुरूप बनने और अकालमृत्यु का ग्रास बनने में देर न लगे। हर दृष्टि से चेतना की ही गरिमा-वरिष्ठता सिद्ध होती है। इसी दशा में जो विज्ञान दर्शन निर्धारण-प्रवाह उसे सुनियोजित दिशाधारा प्रदान करता है, उस धर्मतत्त्व की महिमा उपयोगिता इतनी ऊँची ठहरती है कि उसे एक शब्द में मनुष्य का भाग्यविधाता कहने में कोई अत्युक्ति नहीं है। यदि उसका अस्तित्व उभरकर आगे न आया होता तो शारीरिक संगठन एवं मानसिक संरचना की दृष्टि से अनेक प्राणियों की तुलना में ओछा पड़ने वाला आदमी इतना ऊँचा न उठ सका होता, जितना कि इन दिनों जा पहुँचा है।
चिंतन का यह मर्मबिंदु ही ऐसा है, जिसको गर्त्त में गिरने या आकाश में उछलने की दिशाओं में से किसी एक का वरण किया जा सकता है।
चिंतन मुड़े तो हजार उपाय, हजार मार्ग ऐसे सामने अनायास ही प्रस्तुत होने लगेंगे, जिनके सहारे नवसृजन अभियान को आगे बढ़ाया जा सके। स्वयं करने के साथ-साथ दूसरों से कराने की बात का भी उतना ही महत्त्व है। जामवंत स्वयं समुद्र लाँघने की स्थिति में नहीं थे; पर उनने हनुमान को प्रोत्साहन देकर वह कार्य करा लिया। परिणामतः यह प्रयास जामवंत के स्वयं समुद्र लाँघने के समतुल्य ही श्रेयस्कर सिद्ध हुआ।
चिंतन और आदर्शरहित चरित्र ही ऐसे घृणित वातावरण का सृजन करता है, जिसे पुरातन भाषा में नरक कहा जाता था। नरक की परिणति पीड़ा और पतन में ही होती है। जहाँ वरिष्ठ और कनिष्ठ सभी मानवी गरिमा को तिलांजलि देकर भूत-प्रेतों जैसे उद्धत आचरण में निरत हों। वहाँ शांति कहाँ, प्रगति कहाँ, स्नेह कहाँ? सौजन्य कहाँ, न्याय कहाँ, औचित्य कहाँ?
चिंतन-चरित्र का होना है। इसके लिए उत्कृष्टता का पक्षधर जीवन दर्शन पुनर्जीवित करना होगा। उसे जन-जन के व्यवहार में उतारने— प्रचलन में सुनिश्चित स्थान बनाने वाले प्रचंड प्रयत्न करने होंगे। यह कार्य विशुद्धरूप में ‘धर्म’ का है। अध्यात्म दर्शन की आदर्श निर्वाह की दिशाधारा फिर से इस प्रकार ढालनी होगी, जिसमें मानवी गरिमा अक्षुण्ण रह सकें और विश्वशांति का सुनिश्चित वातावरण बना रहे।
चिंतन और उच्च चरित्र के निर्माण में कारगर साहसिकता मिल सके। इसके लिए उसे अपने स्वरूप, कार्यक्रम एवं निर्धारण में अपेक्षाकृत अधिक बड़े और तेज कदम उठाने चाहिए। अपने भारतीय शासन से ऐसी अपेक्षा की जाती है कि वे गाँधी जी की परंपरा को जीवंत एवं अग्रगामी बनाने के लिए उससे भी अधिक प्रयत्न करे, जैसे कि किए जा रहे हैं।
चिंतन और चरित्र पर पड़ता है। प्रचलित प्रवाह को सिनेमा संस्कृति के देन कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। उसने अपना प्रभाव प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जन-जन के मन पर छोड़ा है, उसकी तुलना और किसी माध्यम से नहीं की जा सकती। इस महाशक्ति को पतन-पराभव से रोकने में यों उनके निर्माता और सरकारी सेंसर भी सक्षम हो सकता है, फिर भी यह आवश्यकता तो बनी ही रहेगी कि दिशा परिवर्तन की, अभिनव निर्माण की जिम्मेदारी कोई दूसरा उठाए। अंधों को रास्ता दिखाने में कोई आँख वाला भी चाहिए।
चिंतन को प्रभावित करने वाले चार प्रयोजनों की चर्चा पिछले पृष्ठों पर हो चुकी है। इस संदर्भ में वाणी-लेखनी का प्रयोग किस प्रकार होना चाहिए, इसके कुछ सुझाव-प्रयासों का उल्लेख भी हुआ है। अब तीसरे ‘दृश्य’ और चौथे ‘कृत्य’ प्रयोजन पर प्रकाश पड़ने की आवश्यकता है। वाणी-लेखनी का किस पर कितना प्रभाव पड़ा, इसमें वक्ता एवं लेखक की भूमिका ही सब कुछ नहीं है। उसमें श्रोता एवं पाठक की मनोभूमि का, कोमलता, कठोरता को भी अपना रोल अदा करती है।
चिंतन को प्रभावित न किया होता तो प्रजातंत्र की अभूतपूर्व कल्पना इतनी तूफानी गति से संसार के अधिकांश भाग को अपनी लपेट में न ले पाती। अपने समय में मेजिनी के प्रतिपादन पीड़ित पक्ष को तनकर खड़ा होने का साहस प्रदान करते रहे हैं। बुद्ध ने विचार-क्रांति की मशाल का भी तो समर्थ सहयोगियों की कमी रही होती, वह नेतृत्त्व न मिलता, तो अन्य माध्यमों से समय को उलट देने वाले उस बुद्धिवादी का कोई आधार ही खड़ा न होता। प्रश्न श्रेय-सहयोग का नहीं, वह किसी को भी मिल सकता है, किसी का भी हो सकता है; पर उन चिनगारियों को भुलाया नहीं जा सकता जो चमकी-भड़की और अपनी लपेट में वन-प्रदेशों को ईधन बनाकर दावानल की तरह गगनचुंबी बनती चली गई ।
चिंतन-मनन के रूप में विकसित किया जाए और फिर किसी भाव-भरे निष्कर्ष-निर्धारण पर स्वेच्छापूर्वक पहुँचा जा सके, साधना के माध्यम से ऐसी संकल्पशक्ति उभरती है कि वह उत्कृष्टता का न केवल पक्ष-समर्थन करे; वरन उसे आत्मसात करने, जीवन व्यवहार में उतारने के लिए आवश्यक श्रद्धासिक्त साहसिकता भी उभार सके। सूत-सौनिक की कथा-पुराणशैली की तरह साधना के साथ योग वाशिष्ठ को हृदयंगम कराने वाले तीर्थसेवन को भी समान महत्त्व मिलता था। इन दिनों भी पुरातन सतयुग की वापसी के लिए उन चिर परीक्षित प्रयोगों की आज की आवश्यकता एवं प्रक्रिया के साथ नए सिरे से पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। यही प्रयोजन प्रकारांतर से घरेलू संस्कार-प्रक्रिया एवं गाँव-मुहल्ले की पर्व परिपाटी के साथ भी भली प्रकार निभाना है। जन्म-दिवसोत्सव, विवाह-दिवसोत्सव, विद्यारंभ, उपनयन, वानप्रस्थ आदि वैयक्तिक संस्कारों के कर्मकांड-पद्धति में वे तत्त्व विद्यमान हैं जो उस छोटे आयोजन को पारिवारिक ज्ञान-गोष्ठी में परिणत कर सके और वातावरण के धार्मिक होने के कारण उपस्थित लोगों को आदर्शवादिता के पक्ष में सहमत कर सके।
चिंतन और श्रम को नियोजित नहीं रखे रहता; वरन अपने को समाज का एक अविच्छिन्न घटक मानकर उसके उत्थान-पतन की भी चिंता करता है। दुःख बँटाने, सुख बाँटने में संतोष अनुभव करता है। युगमनीषा, जिसे नवसृजन का भार उठाना है, ऐसे ही भावनाशील आदर्शवादी लोगों के समुदाय को कहा जाएगा। एक शब्द में इन्हें ‘जागृत आत्मा’ नाम दिया जाता है। दूसरे तो ‘पीत्वामोह मयही मदिरा उन्मुक्त भूत्वा जगत्’ की श्रेणी में आते हैं।
चिंतन ही नहीं, कृत्य भी है। ताने-बाने के दोनों धागे मिलकर इस कपड़े को बुनते हैं। आवश्यक है कि जहाँ दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाने का समग्र लोक-शिक्षण दिया जाए, वहाँ यह भी न भुला दिया जाए कि उस स्तर के कुछ-न-कुछ क्रिया-कृत्य भी साथ में जुड़े रहने चाहिए। बीजारोपण को अंकुरित-पल्लवित करने के लिए इसी खाद-पानी की आवश्यकता पड़ती है।
चिंतन और चरित्र की दृष्टि से भी ऐसा होना चाहिए, जिससे उन्हें जनसाधारण का विश्वास, समर्थन और सहयोग मिल सके। उनकी नियुक्ति मात्र शिक्षा पर आधारित नहीं; वरन पिछले अनुभवों और प्रयत्नों को भी वरिष्ठता माना जाए। छोटी आयु के लड़के उच्च पदों पर आसीन न किए जाए। इसके लिए कार्यपद्धति इतनी सरल बनाई जाए कि बिना पेचींदगियों में उलझे पारस्परिक सहयोग पर निर्भर बिना समय गँवाए और खीज़ उत्पन्न किए, सरलतापूर्वक संपन्न होते रहें। कार्यपद्धति में प्रस्तुत पेचींदगियों को सरल किया जाना चाहिए, ताकि वे लंबी अवधि न गँवाकर काम को जल्दी निपटा दिया करे।
चिंतन इस केंद्र पर केंद्रीभूत रहना चाहिए कि किस प्रकार लोक-मानस में घुसी हुई भ्रांतियों, विकृतियों एवं दुष्प्रवृत्तियों को उन्मूलन किया जाए। उनके स्थान पर किस प्रकार दूरदर्शी विवेकशीलता को, शालीन सुसंस्कारिता को प्रतिष्ठित किया जाए? इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि अर्थशास्त्रियों, वैज्ञानिक, समाजसेवियों, अपराध-नियामकों, चिकित्सकों, शासकों का तीन-चौथाई भार हलका हो सकता है।
चिंतन और दुष्ट आचरण में संलग्न पाया जाता है। यदि समूचे जनसमुदाय को समेटने की बात हो तो फिर लोगों का जैसा स्तर है वैसा ही संगठन भी बनेगा। उसके माध्यम से बन पड़ने वाले कार्यों से भी उत्कृष्टता की पक्षधर विधि-व्यवस्था बन पड़ने की आशा नहीं की जा सकती। सृजनात्मक उच्चस्तरीय कार्य तो सदा से वरिष्ठ लोग ही हाथ में लेते और संपन्न बनाते रहे हैं। उसी की पुनरावृत्ति इसी विषम बेला में भी होनी है।
चिंतन एवं दुष्ट आचरण का बोलबाला रहता है।
चिंतन को दिशा मिलती है। भाव-संवेदनाओं और आस्था-मान्यताओं को किसी बिंदु पर एकत्रित करना उसी का काम है। उत्कृष्टतावादी दर्शन को अध्यात्म कहते हैं। धर्मतत्त्व का बौद्धिक पक्ष यही है।
चिंतन को प्रभावित करके, दृष्टिकोण एवं स्वभाव बनाने की भूमिका संपन्न करते हैं।
चिंतन को अपनाने में भी साहस भरा उत्साह प्रकट कर सके।
चिंतन का वह प्रवाह-प्रचलन, जिसने व्यक्ति और समाज को अनौचित्य का पक्षधर बनाकर वहाँ ला पटका जहाँ सर्वनाशी संकट का सामना करना पड़ रहा है।
चिंतन को प्रभावित करने वाली प्रचार क्षमता भी चली गई है। फिर भी उसका प्रमुख विषय प्रज्ञाजनों के निर्वाहक्रम में संतुलन बिठाए रहना ही है। रेडियो, टेलीविजन, सरकारी प्रेस, प्रकाशन, समाज कल्याण, जनसंपर्क, स्कूली पाठ्यक्रम आदि विभागों के माध्यम से यों सरकारें लोक-चिंतन को भी एक सीमा तक प्रभावित करती हैं, फिर भी उनका वह मूल विषय है नहीं। जहाँ तक नैतिक प्रश्नों का, व्यक्तित्व का, परिष्कृत करने वाले संदर्भों का, परंपराओं के प्रवाह का संबंध है, वे किसी नीतिनिष्ठ तंत्र से प्रसारित होने पर ही प्रभावी बनती हैं। अन्यथा चिह्नपूजा जैसी विडंबना बनकर रह जाती है।
चिंतन और दर्शन का विस्तार एक सीमित क्षेत्र में ही हुआ था। संसार के सुदूर क्षेत्र संचार एवं परिवहन माध्यमों के अनुरूप इतने निकट नहीं आए थे। भौगोलिक कठिनाइयों ने हर क्षेत्र को अपनी परिधि में सीमाबद्ध कर रखा था। तब धर्म का स्वरूप भी छोटा ही था। शास्त्रों का वाचन-पाठन, साधना, उपचार, जप-तप, पूजा-अर्चा, कर्मकांड, तीर्थ, व्रत आदि का जितना विस्तार था, उतने में ही काम चल जाता था।
चिंतन से विरत होने और उत्कृष्टता की सदाशयता अपनाने का साहस करना होगा। यही तत्त्व दर्शन का पुरातन निर्धारण रहा है, इसी को अध्यात्म विज्ञान के आधार पर वर्त्तमान प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर भी सर्वथा खरा उतरते देखा जा सकता है।
चिंतन और आचरण अपनाने की प्रेरणा देता है। उसकी काट कर सकने के लिए कैंची, उस्तरे से नहीं, कुल्हाड़े-फरसे से काम चलेगा। सत्परामर्श के लिए प्रामाणिक व्यक्तियों को श्रद्धासिक्त वातावरण में तर्क और प्रमाण, उदाहरण प्रस्तुत करते हुए ऐसा परामर्श देना होगा, जिसमें अपनाई गई अवांछनीयता के दूरगामी दुष्परिणाम गिनाए जा सकें, साथ ही शालीनता की रीति-नीति आरंभ से अनाकर्षक लगाने पर भी व्यक्ति और समाज को सुसंपन्न बनाने वाले आधार किस प्रकार खड़े करती है, उसका हर पहलू ऐसी शैली में समझाया जाना चाहिए जो अंतराल की गहराई तक उतर सके, हृदयंगम हो सके और नए सिरे से सोचने के लिए विवश कर सके।
चिंतन को, दृष्टिकोण को, प्रभावित करने के लिए जिन आदर्शवादी प्रतिपादनों की आवश्यकता है, उन्हें चार माध्यमों से प्रस्तुत किए जाने की परंपरा है। यदि उनका निर्वाह ठीक तरह बन पड़े तो फिर हृदयंगम करने में भी बहुत हद तक सफलता मिल सकती है। यह चार आधार इस प्रकार हैं— (1) प्रवचन-परामर्श (2) साहित्य अध्ययन (3) दृश्य घटनाक्रम (4) अनुरूप कृत्यों में सम्मिलित होने, हाथ बँटाने का उपक्रम। यह चारों अपने-अपने स्थान पर अपने-अपने स्तर की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और व्यक्ति को किसी भी दिशा में मोड़ने-मरोड़ने में बहुत हद तक सफल होकर रहते हैं।
चिंतन के पीछे मिथ्या और डर मात्र है। महामानवों में से प्रत्येक की जीवनचर्या पर गंभीरतापूर्वक दृष्टिपात करने से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि ढर्रा बदलते समय की थोड़ी-सी असुविधा के अतिरिक्त उनमें से किसी को भी घाटे में नहीं रहना पड़ा। बुद्ध ने क्या खोया? गाँधी को कितना घाटा पड़ा? शंकराचार्य, चाणक्य आदि अन्यान्यों की तरह गोरख धंधे में उलझे रहने को बुद्धिमानी और आदर्शवादी साहस अपनाने की मूर्खता माने बैठे रहते तो उनकी गणना पेट-प्रजनन के कोल्हू में पिसने वाले नर पामरों से अधिक न रही होती।
चिंतन के अभ्यस्त ढर्रे में विवेकयुक्त परिवर्तन किया जा सके तो तनाव, खीज़, चिंता, आशंका, आवेश जैसे कितने ही मनोविकारों द्वारा निरंतर झुलसते रहना समाप्त हो सकता है।
चिंतन, कुकृत्य-कर्त्तृत्व में निमग्न देखा जा सकता है। पेट और प्रजनन से आगे की बात किसी को सूझती ही नहीं। संकीर्ण स्वार्थपरता की खुमारी ऐसी चढ़ी है कि लोभ और मोह की खाई पाटने के अतिरिक्त और कोई लक्ष्य सामने रह ही नहीं गया है। बड़प्पन की एक ही परिभाषा है— दूसरों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करके अपनी विशेषता सिद्ध करना और अहंता की, दर्प की आत्मप्रवंचना से मन बहलाना। नीति और अनीति का विचार छोड़कर, जिस प्रकार भी, जितना भी संग्रह संभव हो, करते रहना।
चिंतन से संबंधित। यदि ऐसा न होता तो वस्तुओं के वर्त्तमान बाहुल्य एवं स्तर में देखते हुए उसे अभूतपूर्व माना जाता और इतने से ही सर्वत्र सुख-शांति का, प्रगति एवं प्रसन्नता का वातावरण बन गया होता। विकृतियाँ चिंतन-क्षेत्र में घुसी हैं। दृष्टिकोण गड़बड़ाया है। आस्था-क्षेत्र में दुर्भिक्ष पड़ा है।
चिंतन तथा चरित्र को एक कदम भी कुमार्ग पर न चलने देगा। मानसिक संतुलन सौमनस्य यदि बन पड़े तो उस क्षेत्र में विवेकशील दूरदर्शिता का ही साम्राज्य होगा और फिर मान्यताओं, आकांक्षाओं, विचारणाओं का प्रवाह उस दिशा में बह चलेगा, जिसमें कृत्यों की पवित्रता-प्रखरता के अतिरिक्त और कुछ बन पड़ने की संभावना ही नहीं है। पुण्य-पथ इसी को कहते हैं। पापों से आत्यंतिक निवृत्ति इसी अवलंबन के सहारे मिलती है। नरक से निवृत्ति और स्वर्ग सोपान में प्रवृत्ति की पृष्ठभूमि यही है।
चिंतन, मनन, पूजन, भजन तक सीमित न रहकर कुछ ऐसा करने के लिए भी कहा जाना चाहिए, जिसमें उसे श्रम करना और सहयोग देना पड़ता हो। यही प्रज्ञा अभियान में सम्मिलित होने का व्रत-धारण है। प्रज्ञापरिजनों को इस देव परिवार का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम एक घंटा समय और दस पैसा नित्य की अपने क्षेत्र में रचनात्मक प्रवृत्तियों को गतिशील बनाने के लिए नियमित रूप से देना होता है। इससे कम में किसी को प्रज्ञापरिजन कहलाने का अधिकार नहीं मिलता। यह समय अपने समीपवर्त्ती क्षेत्र में मिशन की बीससूत्री योजना में लगाना पड़ता है।
चिंतन के हर पक्ष का समर्थन करने वाला साहित्य मिल सकता है। जो सत्य है, जो श्रेष्ठ है, जो श्रेय है, उसे उसी रूप में प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर भी खरा सिद्ध किया जा सकता है। इस प्रकार के लेखन-प्रतिपादन में मात्र मनीषा को संकल्पपूर्वक कटिबद्ध भर होना है। प्रकाशन और विस्तार का काम भी मनस्वी लोग संभालेंगे ही। थोड़े दिनों की अड़चन के बाद, वस्तुस्थिति को समझने के बाद ऐसा साहित्य प्रकाशन और विक्रय की अपनी व्यवस्था आप बना लेगा।
चिंतन-प्रवाह को पतन-पराभव से मोड़कर उसे उत्कृष्टता के साथ नियोजित कर दिया जाए, इतने भर से वह अभावग्रस्त परिस्थितियों में रहते हुए भी महानता के उच्चशिखर पर पहुँच सकता है और विपन्न परिस्थितियों में रहते हुए भी असंख्यों के लिए प्रेरणाप्रद एवं अनुकरणीय जीवन जी सकता है।
चिंतन और आदर्श चरित्र की गौरव गरिमा बनाए रहे, पवित्रता एवं प्रखरता पर आधारित व्यक्तित्व समर्थ रखे तथा ऐसी योजना बनाकर चले, जिसका अनुकरण करने वाले निरंतर ऊँचे उठते, आगे बढ़ते रहे। संक्षेप में यही है, मनुष्य की नीति-मर्यादा का सार-संक्षेप। इसका जो जितना परिपालन करता है, वह उतना ही नीतिवान है। इस निर्धारण को जो जितना तोड़ता है। जो लोभ, मोह और अहंकार के लिए ही मरता-खपता है, जिसे वासना-तृष्णा के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं, जिसे संकीर्ण स्वार्थपरता में आगे की बात सोचने की फुरसत ही नहीं, जिसके मन में लोक-मंगल के उत्तरदायित्व निभाने के लिए उल्लास उठता ही नहीं उसे अनैतिक कहना चाहिए।
चिंतन से पूरी तरह उतारने के उपरांत ही दूसरों को यह विश्वास दिलाया जा सकता है कि प्रतिपादन शक्य एवं व्यावहारिक भी है या नहीं। क्या कहा जा रहा है, इस पर मनोरंजन स्तर का ही ध्यान जाता है। प्रभाव तब पड़ता है, जब कौन कहता है वाली बात का समाधान मिल सके। भौतिक-क्षेत्र में प्रतिभा, संपन्नता, सुंदरता चतुरता, समर्थता एवं कला-कौशल का बखान करने से भी प्रभावोत्पादन बन पड़ता है, पर आस्थाओं को उछालने की सामर्थ्य उन्हीं व्यक्तित्वों में उत्पन्न होती है जो केवल आदर्शवादी प्रतिपादन करते हैं; वरन अपने उज्ज्वल चरित्र, सेवा-साधना तथा त्याग-बलिदान की दृष्टि से ही अपनी वरिष्ठता सिद्ध करते हैं। युगमनीषा के नाम से इसी वर्ग का उल्लेख किया जा रहा है।
चिंतन में उत्कृष्टता का समावेश पेट भरने से कम महत्त्व का नहीं है। शरीर को जीवित रहना चाहिए, यह ठीक है; पर यह भी गलत नहीं है कि आत्मा को तो न मरने-सड़ने देना चाहिए और न व्यक्तित्व का पतित—  पिछड़ा, गया-गुजरा रहना ही सहन होना चाहिए। प्रयत्न होना चाहिए कि दोनों को ही स्वस्थ-समर्थ रहने का अवसर मिले।
चिंतन के माध्यम से हृदयंगम करने वाले तदनुकूल वातावरण और तप-साधना का समन्वय भी साथ-साथ चलना चाहिए। यह प्रयोग शान्तिकुञ्ज की गायत्री तीर्थ के रूप में विकसित करके कल्प-साधना सत्रों के रूप में वह प्रयोग चल रहा है, जिसमें सम्मिलित होने वाला जीवन-दर्शन बदल सके। भविष्य के लिए आदर्शवादी निर्धारण साथ लेकर वापस लौट सके। प्राचीनकाल में मात्र तीर्थयात्रा ही नहीं होती थी, उस प्रयास का तीर्थसेवन प्रमुख अंग था, जिसका अर्थ था तेजस्वी वातावरण में, मनस्वी-ऋषियों के संरक्षण में, साधना के साथ-साथ उत्कृष्टता को आत्मसात करना। इन दिनों तो पर्यटकों की भगदड़ ही तीर्थयात्रा के ध्वंसावशेषों का परिचय देती है।
चिंतन-प्रक्रिया एक आदत भर है, जिसका अनुकूलता या प्रतिकूलता से कोई गहरा संबंध नहीं है। मस्तिष्क सभी को उपलब्ध है। भाव-संवेदना से भरा-पूरा अंतःकरण किसके पास नहीं है। उस क्षीर सागर, कैलाश जैसे पुण्य क्षेत्र में भ्रष्टता और दुष्टता से सने कषाय-कल्मष भर लेने का ही परिणाम है कि ऋषिकल्प संभावनाओं वाली देवात्मा चेतना, निकृष्ट नारकीयता में आबद्ध होकर रह जाती है। इसे उलटना हर विवेकशील के लिए संभव है।
चिंतन को प्रभावित करने वाले मंत्रों में साहित्य, संगीत, कला की क्षमता सर्वविदित है। दर्शन से व्यक्ति और समाज के चिंतन को दिशा मिलती है। भाव-संवेदनाओं और आस्था-मान्यताओं को किसी बिंदु पर एकत्रित करना उसी का काम है। उत्कृष्टतावादी दर्शन को अध्यात्म कहते हैं। धर्मतत्त्व का बौद्धिक पक्ष यही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-March
चिंतन−मनन− स्वाध्याय द्वारा साफ कर लिया तो सदा वह वैसा ही बना रहेगा, ऐसी आशा निरर्थक है। अभी आकाश साफ है। उस पर कब आँधी, कुहासा धूलि−बादल छा जायेंगे प्रकृति कब कुपिता हो जाएगी कहा नहीं जा सकता। अन्तरात्मा पर निरन्तर छाते रहने वाले इन मलिन आवरणों की सफाई के लिये उपासना की नित्य निरन्तर आवश्यकता पड़ती है ईश्वरीय गुणों का समावेश अपने चिन्तन व्यवहार में इससे कम में हो ही नहीं सकता। आग के समीप बैठे बिना गर्मी आये कैसे?
चिंतन और क्रिया के दो भागों में विभक्त किया है। चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश करने वाले प्रतिपादन को ब्रह्मविद्या कहते हैं। इसमें ईश्वरीय निर्देशों एवं ऋषि अनुभवों को इस प्रकार गूँथा गया है कि मानवी अन्तःकरण उसे स्वीकार कर ले। शास्त्र वचनों का स्वाध्याय, चिन्तन, मनन एवं शास्त्रज्ञों का सत्संग इसी निमित्त किया जाता है। यह अध्यात्म विद्या का तत्वदर्शन वाला पक्ष हुआ जिसमें मान्यताओं की श्रद्धा−तर्क के आधार पर मान्यताओं से काट की जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-May
चिंतन−मनन के सहारे भविष्य निर्धारण का निश्चय जिसमें जुड़ा हुआ हो उसी को तीर्थसेवन कहा गया है। शास्त्रों में उसी के पुण्यफल की चर्चा है। प्रतिमा−दर्शन, जल, स्नान, और लुटेरों जैसी भगदड़ से तो तीर्थ पुण्य तो दूर, पर्यटन का मनोरंजन भी पूरा नहीं होता। प्रस्तुत परिजन−सत्र की अवधि तो कम है पर उनमें उन तथ्यों का समुचित समावेश किया गया है जिन्हें यदि ठीक तरह समझा जा सके तो अन्तराल में ऐसा बीजारोपण हो सकता है जिसे कल्पवृक्ष की उपमा दी जा सके। प्राचीन काल के तीर्थों में गुरुकुल, तीर्थ−परायण और आरण्यक–यह तीन उपक्रम चलते थे।
चिंतन−मनन।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-November
चिंतन को सुधारा जा सकता है। यह व्यवहार में आने वाली ऊपरी परत है। इससे मन− मस्तिष्क की विचारणाएँ भटकाव से उबर कर सही दिशा में चलने के लिए प्रशिक्षित की जाती हैं। इतने पर भी अन्तराल का आस्थापरक क्षेत्र तो बच ही जाता है। उसके लिए उन उपचारों का प्रयोग करना पड़ता है, जो चेतना के मर्मस्थल तक पहुँच सके, वहाँ निवान करने वाली श्रद्धा प्रज्ञा और निष्ठा को संचित कुसंस्कारों से मुक्त कर सके।
चिंतनपरक उत्तरार्ध दो चरणों में आत्म बोध एवं तत्व बोध की साधना के रूप में सम्पन्न होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-January
चिंतन और कारणशरीर के सद्भाव उच्चकोटि के रहें। इन सबकी संयुक्त उत्कृष्टता ही पश्यंती वाणी का निर्माण करती है। वह इतनी प्रचंड हो सकती है कि अनाचार से लोहा ले सके और सत्प्रवृत्तियाँ दूरगामी क्षेत्र में सफल बनाने की भूमिका निभा सकें।
चिंतन और मनन के सहारे आत्मसुधार और आत्मविकास का प्रयोजन कर सके, उनके लिए वस्तुपरक एवं क्रियापरक कर्मकांडों का आश्रय लेना ही उपयुक्त पड़ता है। अपने दोष-दुर्गुणों को ढूँढ़ निकालना और उन्हें सुधारने तक आत्मशोधन तक की साधना में निरत रहना होता है। विचारों से विचारों को काटने की प्रणाली अपनानी पड़ती है; पर इस सबके लिए बलिष्ठ मनोबल चाहिए। उसमें कमी पड़ती हो तो वस्तुओं से, वातावरण से, सहयोग से एवं क्रियाओं में सुधार कार्य को अग्रगामी बनाना पड़ता है। धार्मिक कर्मकांडों की संरचना इसी निमित्त हुई है कि उन हलचलों को प्रत्यक्ष देखते हुए आधार-अवलंबन अपनाकर साधक अपनी श्रद्धा को परिपक्व कर सके।
चिंतन और चरित्र की ऊँचाई का अनुमान लगाते हैं।
चिंतन करें॥
चिंतन से टकराती और अपने समर्थन का प्रभाव जमाती हैं।
चिंतन करें, उसकी उपयोगिता स्वीकारें और रुझान उसी पक्ष में रखें अगला जन्म आने पर वह अधूरी स्थिति पूर्ण हो जाएगी और इच्छित कलेवर मिल जाएगा।
चिंतनात्मक क्षमता आधारहीन होने पर अपने पराक्रम का, अस्तित्व का परिचय नहीं दे सकती। इस तर्क के अनुसार सावित्री की भी समान महत्ता स्वीकार करनी पड़ती है।
चिंतन में आ जाते हैं।
चिंतन किया करें और अपने को उसी ढाँचे में ढालने का प्रयत्न किया करें? आत्मसुधार का, आत्मनिरीक्षण का क्रम चल पड़ने पर व्यक्तित्व निखरने और सुधरने लगता है। गुण, कर्म, स्वभाव में शालीनता की अभिवृद्धि करते चलने वाला व्यक्ति आमतौर से मनस्वी होता है, संतुष्ट रहता और सम्मान पाता है।
चिंतन और मनन के रूप गहराई तक, अधिक गहराई तक हृदयंगम करना चाहिए।
चिंतन व स्वभाव ही होता है।
चिंतन-क्षेत्र में भी कामुकता के रूप में समय-कुसमय छाई रहती और कल्पना-चित्र बनाती रहती है। मनुष्य इसी से बंधन में बँधता है। विवाह करता है। उसके साथ ही संतानोत्पादन का सिलसिला चल पड़ता है। स्त्री-बच्चों की जिम्मेदारी साधारण नहीं होती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-March
चिंतन प्रक्रिया और संकल्प शक्ति मनःसंस्थान को प्रभावित करती है। उसकी संरचना का कितना ही महत्व क्यों न हो- वातावरण से, प्रकृति प्रवाहों से वह कितना ही प्रभावित क्यों न रहता हो, पर इस सबमें इतनी शक्ति नहीं है कि वह निश्चय पूर्ण संकल्पों के दबाव से अस्वीकार कर सके। शरीर के अन्यान्य अवयवों को हम इच्छानुसार मोड़ने मरोड़ने में एक सीमा तक ही सफल हो सकते हैं पर मस्तिष्क के सम्बन्ध में बात दूसरी है। उसे सुधारा, बदला ही नहीं उलटा तक जा सकता है। इस दृष्टि से वह जितना सशक्त और महत्वपूर्ण है, उतना ही कोमल भी है।
चिंतन की दृष्टि से भी वह इन्हीं कारणों से प्रभावित रहता है। यह तथ्य बताते हैं कि सौंदर्य और कुरूपता की तरह मस्तिष्कीय विलक्षणतायें भी प्राकृतिक कारणों एवं जन्मजात संस्कारों से प्रभावित होती हैं। इतने पर भी वातावरण एवं संकल्प का अपना महत्व है। वह इन सब प्राकृतिक कारणों को बदल सकने में समर्थ हैं। कालिदास, वरदराज आदि के उदाहरण ऐसे हैं जिनमें उनकी आरंभिक स्थिति देखते हुए अनुमान होता था कि ये सदा मूर्ख रहेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-November
चिंतन के ही परिणाम हैं। इसके अनुसार ही ग्रह, नक्षत्रों का प्रभाव पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-July
चिंतन। अग्नि में हाथ डालने की संभावना मालूम पड़ने पर माँ बच्चे पर बरस पड़ती है। इतना ही नहीं दो-चार चपत भी लगा देती है। विद्यार्थी के पढ़ने में लापरवाही करने पर अध्यापक डाँट-डपट देते हैं। इसमें परहित-साधन के लिए विचारपूर्वक क्रोध किया गया है।
चिंतन या कृत्य अनेकों पर हावी होता है और वैसा ही करने की न केवल प्रेरणा देता है; वरन एक प्रकार से परंपरा बना देता है। इसलिए मनस्वीजनों के बीच विचार-मंथन होते रहना चाहिए, ताकि जनमानस को एक दिशा में बहने न लगकर उचित-अनुचित का विचार करने और अपना मार्ग स्वयं निर्धारित करने का अवसर मिले।
चिंतन के कारण ही मनुष्य इसे नहीं समझ पाता। सुख-दुःख, लाभ-हानि, ज्ञान-अज्ञान आदि का बोध मनुष्य को मन के द्वारा ही होता है। प्रत्येक मनुष्य के पास शरीर, ज्ञानेंद्रियाँ, मन और आत्मा होते हैं। इनको समझने से ही जीवन का उद्देश्य समझ में आता है। वेदांत के अनुसार यह उद्देश्य ईश्वर की खोज नहीं है, वरन अज्ञानताजन्य कष्टों एवं कमियों से मुक्त होकर सुख, शांति और बुद्धि प्राप्त करना है।
चिंतन और स्वभाव पर असर पड़ता है, इसलिए शिक्षा तथा परंपरा के क्षेत्र में कुछ ऐसा समावेश होना चाहिए, जिसके प्रभाव से आज का मनुष्य कल अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान, साहसी और सद्गुणी हो सके।
चिंतन और चरित्र इन दोनों के बीच रस्साकशी निरंतर बनी रहती है।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार बदलने से ही सम्भव होता है।
चिंतन और मृदुल व्यवहार को स्वभाव का अंग बना लेना मध्यवृत्ति का योगाभ्यास है। इसी को कहते है— असंस्कृत से सुसंस्कृत बनना। शरीर से सत्कर्म और मन से सद्भाव क्रियांवित होते रहें तो समझना चाहिए कि आत्मोत्कर्ष का उपक्रम अपनी गति से ठीक तरह से चल रहा है।
चिंतन से वह समझता है कि मन और इंद्रियों को वश में करके अंतःदर्शन किया जा सकता है। ज्ञानयोग मन को वश में करके अंतःज्ञान प्राप्त करने के लिए कहता है। इसके लिए वेदांत दर्शन के निर्देशों के अनुसार चलना होता है, जो सर्वोच्च ज्ञान एवं सत्य के रहस्य को बतलाता है। सत्य वह है, जो नहीं बदलता, न नष्ट होता, न मरता और न क्षय होता है। वह आत्मनिर्भर रहता है और किसी अन्य पर आश्रित नहीं रहता।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाया। यह प्रथम सोपान पूरा होते ही प्रामाणिकता सिद्ध होती है। लोकश्रद्धा उमड़ती है। सब ओर से सहयोग का माहौल बनता है और उस आधार पर अप्रत्याशित दैवी सहायता भी मिलने लगती है। इस तथ्य की साक्षी में हम किसी भी महापुरुष का जीवनक्रम उलट-पुलटकर देखते हैं।
चिंतन-प्रक्रिया को स्वस्थ रखना आवश्यक है। मन ससीम है और वह स्थान, समय एवं कारण की परिधि के बाहर नहीं जा सकता। परंतु अंतरात्मा स्वतंत्र है। वह सर्वत्र देखता है।
चिंतन, आदर्श चिंतन और मृदुल व्यवहार को स्वभाव का अंग बना लेना मध्यवृत्ति का योगाभ्यास है। इसी को कहते है— असंस्कृत से सुसंस्कृत बनना। शरीर से सत्कर्म और मन से सद्भाव क्रियांवित होते रहें तो समझना चाहिए कि आत्मोत्कर्ष का उपक्रम अपनी गति से ठीक तरह से चल रहा है।
चिंतन एवं कार्यक्रमों से परिचित कराया करें, प्रशिक्षित करें। इस प्रकार अगले कुछ ही समय में वर्तमान प्रज्ञा-प्रशिक्षण लाखों नए सृजनशिल्पी तैयार कर देगा।
चिंतन में विघ्न उपस्थित करने वाली परिस्थितियाँ न हों। इस प्रयोजन के लिए ऐसे कमरे का चुनाव किया जाए जहाँ से आकाश दिखता हो। खुली वायु और सूर्य की ऊर्जा का आवागमन हो। कभी गुफाएँ इस कार्य के लिए आवश्यक मानी जाती थीं, पर अब उस कार्य के लिए उपयुक्त कमरे झोंपड़े भी काम दे सकते हैं। ऋषियों में से अधिकाँश झोंपड़े बनाकर रहते थे जिनमें वायु और धूप का आवागमन रहता था।
चिंतन में प्रज्ञा का समावेश, परमार्थ का अवलंबन। लोकमानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन। व्यक्तिगत अंतरंग जीवन में यदि स्वरूप और लक्ष्य को समझते हुए अपनी प्रखरता को जगा लिया जाए और उसे इस योग्य बना लिया जाए कि संपर्क में आने वाला तद्रूप पाठ ग्रहण करते चला जाए, तो यह आज का सबसे बड़ा परमार्थ होगा। परमार्थ वस्तुओं को देकर सामयिक आवश्यकता की पूर्ति के रूप में भी हो सकता है; पर वास्तविक परमार्थ उस प्रकाश को कहते हैं, जो आत्मस्वरूप और उद्देश्य को जगने-जगाने में समर्थ हो सके।
चिंतन करता और किसी निष्कर्ष पर स्वेच्छा-विवेक के सहारे पहुँचता रहता है; पर जब जन आवेश के चक्रवात में फँसता है तो उन्मादी जैसी स्थिति अपना लेता है। मंडलियाँ एक वातावरण बनाती हैं। समुदायों के मिले-जुले कृत्य भी ऐसे षड्यंत्र रचते हैं कि उनके परिणाम सूझ ही नहीं पड़ते। प्रतिभावानों का उन्माद दुर्बल मन वालों को इस स्थिति में पहुँचा देता है कि नदी के प्रवाह में बहते हुए पत्ते की तरह दिशा पकड़ लेते हैं और भूल जाते हैं कि इस प्रवाह में बहते-बहते वे कहाँ जा पहुँचेंगे?
चिंतन, चरित्र और व्यवहार को उत्कृष्टता तथा शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक प्रगतिशीलता के सिद्धांत और व्यवहार सिखाएँ-समझाएँ जाएँगे। इतना ही नहीं, सुगम संगीत, भाषण, संभाषण, धर्मकृत्यों के माध्यम से लोक-शिक्षण के विभिन्न पहलुओं के अध्यापनक्रम भी चलते रहेंगे। मूल उद्देश्य यह है कि आत्मनिर्माण और समाज-निर्माण के दोनों पक्षों से जनमानस को अवगत और अभ्यस्त किया जाए। शान्तिकुञ्ज में सीमित स्थान है। उसी तक सभी का प्रशिक्षण सीमित कर दिया जाए तो अभीष्ट प्रगति में वर्षों लगेंगे, इसलिए उचित यही समझा गया कि शान्तिकुञ्ज के प्रशिक्षित शिक्षार्थी अपने-अपने स्थानों में सुविधा के समय कुछ घंटे की नित्य नवसृजन कक्षाएँ चलाया करें और नए-नए व्यक्तियों को मिशन के चिंतन एवं कार्यक्रमों से परिचित कराया करें, प्रशिक्षित करें।
चिंतन, दुष्टता से लोहा लेने की प्रेरणाएँ ही मुख्य होती हैं।
चिंतन करने की शैली को बदलना चाहिए। अपने से छोटे और पिछड़े हुए लोग यदि दृष्टि में रहें तो जो मिला है, वह भी सुखद और पर्याप्त प्रतीत होता रहेगा और अपने को भी सुखी अनुभव करने की मनःस्थिति सदा ही बनी रहेगी। समुन्नत लोगों को अपना गुरु मानें, उनने जिन सद्गुणों को अपनाकर प्रगति की है, उन्हें अपनाने, बढ़ाने का प्रयास करें। इस क्षेत्र में तुलना करते हुए जो बढ़ाना आवश्यक है, उसे बढ़ाएँ तो बड़ों के साथ की जाने वाली तुलना भी श्रेयस्कर हो सकती है। दुःखों से स्थाई निवृत्ति और सुखों की सुस्थिर उपलब्धि का यही मार्ग है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-May
चिंतन, व्यवहार पर पड़ने वाले प्रभाव स्पष्ट देखे जा सकते हैं। योगवशिष्ठ में मन को संकल्पात्मक शक्ति बताया गया है। कहा गया है कि मन बुद्धि के निश्चयों से प्रेरित होता है और बुद्धि अहंकार से नियंत्रित की जाती है। यही नहीं संकल्प व मन को अभिन्न बताया गया है-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-March
चिंतन आम बात होती जा रही है। इसका प्रतिफल व्यभिचार, बलात्कार इत्यादि के रूप में इस कदर देखने सुनने में आ रहे हैं कि उनके भयावह परिणामों की संभावना से परिवार संस्था की पवित्रता का समापन होता दीख पड़ता है। इसका प्रतिफल वासनात्मक अतिवाद के कारण शरीरों को निःस्वत्व होते देखा जा सकता है और पाया जा सकता है कि अभिभावकों और वंशजों के बीच दुःखदायी उपेक्षा पल रही है। यौन रोग पनप रहे हैं और उसके साथ ही बौद्धिक एवं नैतिक स्तर बेतरह गिर रहे हैं।
चिंतन और जीवन। उसने अपने समय के समाज को पूरी तरह झकझोरा।
चिंतन में निरत रहना। साधना की अधिकांश अवधि ध्यान में बीतती है। इस बीच वातावरण को इतना शांत रखा जाता है कि साधकों के ध्यान में किसी प्रकार का विघ्न न पड़े। ध्यान में ज्योति के ध्यान की प्रधानता रहती है। साधक द्वारा धारणा की जाती है कि यह सर्वव्यापी प्रकाश ऊर्जा सचेतन रूप से समस्त ब्रह्मांड में संव्याप्त है और वही साधक के ध्यान आकर्षण से विशेष मात्रा में आकर्षित होकर काय कलेवर के प्रत्येक कण में संव्याप्त हो रही है।
चिंतन की चपेट में वही मुड़ते हैं जिनकी स्थिति गर्भाधान के उपयुक्त हो गई है। इसके बिना स्वाभाविक रूप से कामुक आवेश उत्पन्न ही नहीं होता और न यौनाचार का अवसर खोजा जाता है।
चिंतन उभरने लगता है। इसलिए शीलवान कुलों की वयस्क नारियों को सभ्यता के अन्यान्य प्रसंगों के साथ यह भी सिखाया जाता है कि वे पेट को ढक कर रखा करें। प्रदर्शन करने पर शिष्ट मर्यादा की उपेक्षा समझी जाती है और इस गलतफहमी से अनाचार परक कई प्रकार के झंझट खड़े होते हैं।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार में ऐसी शालीनता भर देती है, जिसका प्रतिफल दसों दिशाओं में अमृततुल्य अनुदान बरसाता है। आत्मा ने उसी के लिए पुकार की है कि उसे 'सत्' की उपलब्धि हो। असत् की ओर आँखें मूँदकर दौड़ने की प्रवृत्ति रुके। शांति का सरोवर सामने रहते हुए भी सड़न भरे दलदल में घुस पड़ने और चीखने-चिल्लाने की आदत पर अंकुश लगे। इतना बन पड़े तो किसी से कुछ माँगना-चाहना न पड़े।
चिंतन, एवं कौशल बच जाता है, उन्हें उन कार्यों में लगाया जा सकता है, जिनसे जीवन की सफलता का आधार बन सके।
चिंतन का एक-एक कण वह  अपने मिशन के लिए विसर्जित करता रहा। मरा तब उसके हाथ में  लेखनी और सिरहाने पुस्तकों का बड़ा सा ढेर था। यही थी उसकी संपदा, जिसे मरते समय मित्रों के लिए सौगात रूप में छोड़ा।
चिंतन प्रवाह में परिवर्तन से आभामण्डल भी परिवर्तित होता पाया गया। यू.सी.एल. की थेल्मा माँस. ने योगों, अतीन्द्रिय क्षमता संपन्न व्यक्तियों की उँगलियों से विशिष्ट “कोरोना” निकलते देखा व अंकित किया है। अपनी पुस्तक “सायकिक डिस्कवरीज बिहाइण्ड आयरन करटेन’ (1970) में लिनथ्रोडर एवं शीला आँस्ट्रेण्डर ने सोवियत परामनोचिकित्सक व तथाकथित सायकिक हीलर कर्नल एलेक्सी क्रिवोरोटोव के बारे में लिखा है कि “जब वे अपना हाथ रोगी व्यक्ति के पेट पर घुमा रहे थे एवं उन्होंने अपना ध्यान एकाग्र किया, तब उनके हाथ से तीव्र चमक वाली प्रकाश किरणें, जैसे कि “लेसर बीम” निकलती हैं, उत्सर्जित हुईं व अंग विशेष पर फोकस हो गयीं”। इस प्रक्रिया को लेखक द्वय ने चित्राँकित भी किया है। इसी प्रकार चैकोस्लोवाकिया में डिजाइन किये गए अपने इत्वीपमेण्ट द्वारा नेवार्क कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग न्यूजर्सी के डॉ. इ. डगलस. डीन ने ईथेल. ई. डी. लोच नामक एक सायकिक हीलर के हाथों से भी किरणों का मापन किया।
चिंतन इसी प्रकार का होता है, पर यहाँ संकेत इस बात का है कि अनिवार्य निर्वाह को सामान्य नागरिक स्तर पर अपनाया जाए। लोभ, मोह अहंकार से अपने को बचाया जाए। त्रिविध एषणाओं से विचारणा, आकांक्षा को मुक्त कराया जाए। तप का अर्थ— धूप या अग्नि के सामने गरम होना नहीं, वरन् अपने कषाय-कल्मषों का दमन करना है। इसे इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम, विचार संयम भी कह सकते हैं।
चिंतन भी करना चाहिए कि सहस्रार के इस अधोभाग को उत्तेजना मिलने से समूचे मस्तिष्क क्षेत्र को राहत मिल रही है। समर्थता, सक्रियता का दौर बन रहा है।
चिंतन स्वच्छंद यौनाचार के दुष्परिणाम अभी भी बुरी तरह मनुष्य को तोड़ निचोड़ रहे हैं और भी अधिक बढ़ोत्तरी होने पर जो बीतने वाला है उसकी चिंता मात्र से सीना दहलता है।
चिंतन करता हुआ भ्रमण करने निकला। जीवन उसे व्यर्थ लगने लगा था। देर रात तक बैठा सोचता रहा, क्या करें? एक साधु वहाँ से गुजरे। उनकी दिव्य दृष्टि ने हीरे की परख कर ली व छिपे हुए दोष की भी।
चिंतन को झुठलाना पड़ेगा।
चिंतन विशुद्ध व्यभिचार है और गाँधी जी की तरह धर्म पत्नी के प्रति उच्च भावनाएँ रखे रहना भी ब्रह्मचर्य है। यह भावनात्मक संयम है। इंद्रिय संयम के साथ-साथ इसमें भाव संयम भी जुड़ा रहना चाहिए।
चिंतन चल रहा है, उसके विपरीत भी कोई तर्क या तथ्य हो सकता है,यह सूझता नहीं। विकल्प ढूँढ़ने और नई राह खोजने की भी गुंजाइश नहीं रहती। ऐसी दशा में बेलगाम घोड़े की तरह विपत्ति में जा फँसने की दिशा में भी सरपट दौड़ा जा सकता है। किसी भी खाई खड्ड में गिरा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-August
चिंतन में ऐसी प्रगाढ़ निष्ठा भरी थी कि गाँधी के नाम से लहर आती थी और उत्तर-दक्षिण में एक विकट तूफान-सा उठ पड़ता था। वह शक्ति गाँधी की नहीं थी, जनता की भी नहीं थी; संपूर्ण क्रांति का बीज वह “राम-नाम” था जो हर वक्त गाँधी की जबान पर रहता था, उसके हृदय में गूँजता रहता था।
चिंतन की भी आवश्यकता पड़ती है। इन्हें व्यक्ति स्वयं भी जुटा सकता है। आवश्यक नहीं कि इस संदर्भ में दूसरों की सहायता अनिवार्य ही हो। सद्ज्ञान-स्रोतों की कमी नहीं, उनके साथ संबंध जोड़ने के लिए उत्सुक व्यक्ति गई गुजरी स्थितियों में भी अवसर प्राप्त कर लेते हैं, जिनके सहारे वह विज्ञजनों की पंक्ति में बैठ सकें। सभ्य और सुसंस्कृत रहना सीखें।
चिंतन से होती है। उस कारण मानस तंत्र जो उपयोगी योजनाएँ बनाने और उन्हें कार्यांवित करने में लग जाता था, ऐसे जंजाल में फँस जाता है, पर उपलब्धि कुछ भी हाथ लगती नहीं है। लगता भर ऐसा है कि किसी दूसरे के सहवास से आनंद उठाया जा रहा है, पर वस्तुतः होता यह है कि अपने जीवनरस को, इंद्रिय-सामर्थ्य को चिंतन की सरसता को जलाकर फुलझड़ी जलाने जैसा कौतूहल देखा जाता है। उससे जीवनीशक्ति कम पड़ती जाती है और मौत दिन-दिन निकट दीखती है। कामुकता अकालमृत्यु को आग्रहपूर्वक निमंत्रण देना है।
चिंतन की सरसता को जलाकर फुलझड़ी जलाने जैसा कौतूहल देखा जाता है। उससे जीवनीशक्ति कम पड़ती जाती है और मौत दिन-दिन निकट दीखती है। कामुकता अकालमृत्यु को आग्रहपूर्वक निमंत्रण देना है। इसलिए जीवनफल में जो ‘काम’ शब्द का प्रयोग हुआ है। पर अभिप्राय वस्तुतः कामुकता से नहीं।
चिंतन तो शारीरिक स्खलन से भी महँगा पड़ता है। वीर्यपात से अधिक हानि कामुक चिंतन से होती है। उस कारण मानस तंत्र जो उपयोगी योजनाएँ बनाने और उन्हें कार्यांवित करने में लग जाता था, ऐसे जंजाल में फँस जाता है, पर उपलब्धि कुछ भी हाथ लगती नहीं है। लगता भर ऐसा है कि किसी दूसरे के सहवास से आनंद उठाया जा रहा है, पर वस्तुतः होता यह है कि अपने जीवनरस को, इंद्रिय-सामर्थ्य को चिंतन की सरसता को जलाकर फुलझड़ी जलाने जैसा कौतूहल देखा जाता है। उससे जीवनीशक्ति कम पड़ती जाती है और मौत दिन-दिन निकट दीखती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-April
चिंतन के रहते उच्चस्तरीय लक्ष्य ही निर्धारित होते हैं। निकृष्टता न तो उन्हें रुचती है और न उनके पास फटकती है। वे जो कुछ भी सोचते हैं, वह खरा होता है। सोने को खरा-खोटा परखने के लिए उसे कसौटी पर कसा और आग पर तपाया जाता है। इसी प्रकार अध्यात्म प्रकृति के व्यक्ति आत्मकल्याण और लोक-मंगल के दो आधारों के साथ जुड़ा हुआ निर्धारण निश्चय करते हैं।
चिंतन एवं जीवन में उतारने की प्रेरणा दी। सम्मेलन में सांसद गपेश्वर कौमी एकता के अध्यक्ष जलाल अहमद सिडकी रजीउद्दीन खान, डॉ. एस.एम. हुसैन, उाँ. मतलूब हुसैन, केदार दास मेहता, सरदार बलवंत सिंह सिराजुद्दीन तथा मौलवी अजीत भी उपस्थित थे। सभी ने देश की एकता और अखंडता के लिए एक जुट होने की शपथ ली। उपायुक्त जिला मजिस्ट्रेट आदि सभी उच्च अधिकारी इसमें प्रतिदिन उपस्थित रहे।
चिंतन का स्तर भी अधोगामी होगा। खींच-निराशा से उद्विग्न रहेगा और पुरुषार्थ की दिशा धारा छल प्रपंच, पाखंड, अनाचार जैसी दुष्प्रवृत्तियों में निरत रहने की रहेगी। नीति-मर्यादाओं को वह तोड़ चुका होगा और वर्जनाओं का ध्यान न करते हुए ऐसे कुकृत्यों में संलग्न रहेगा जिनके दुष्परिणाम उसे हाथों-हाथ भोगने पड़े। यह विपन्नता दूरदर्शिता का अभाव हो जाने के कारण होगी, मनुष्य बाहर से बौना, मानसिक दृष्टि से छोटा और व्यवहार में खिलौनामात्र बनकर रह जाएगा आदि-आदि।
चिंतन तंत्र न विकृत हो।
चिंतन स्थूल धरातल पर चला एवं ऐसे ही निष्कर्ष उन्होंने निकाले भी हैं। बायोटेक्नोलॉजी आज की एक विकसित वैज्ञानिक विधि है, जिसमें नित नए अनुसंधान हो रहे हैं। पादप-वनस्पति एवं जीव−जंतु वर्ग से आरंंभ हुआ यह शोधक्रम अब मानव को भी एक स्थूल संसाधन मानते हुए उसे बदलने की— आने वाली पीढ़ी को बलिष्ठ बनाने की दिशा में अग्रसर हो रहा है। दूसरी ओर अध्यात्म के सौम्य प्रतिपादनों के पक्षधर मनीषीगण हैं, जो वंशानुक्रम विज्ञान का पूरा सम्मान करते हुए भावी पीढ़ी में संस्कारों के समावेश द्वारा पीढ़ी परिवर्तन की चर्चा करते हैं। वे मानवी नस्ल के साथ पशुओं की तरह प्रयोग किए जाने का समर्थन नहीं करते, अपितु विचार-संस्कार-स्वभाव को बदले जाने की आवश्यकता पर बल देते हैं।
चिंतन को परिष्कृत करने की दृष्टि से हम श्रेष्ठता को साथ लिए रहें और उसी का ध्यान किया करें।
चिंतन और उसकी निर्धारणा-प्रेरणा को हृदयंगम करने की प्रक्रिया का नाम उपासना है। इस आद्यशक्ति—  महाशक्ति की उपासना, साधना एवं आराधना करने से हमारे स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीर का परिमार्जन हो सकता है। दर्शन का काम, चिंतन को दिशा देना है और साधन का स्वरूप अभीष्ट शक्तियों को अपने में उभारने की वैज्ञानिक कार्यपद्धति को अपनाना है। हम गायत्री का तत्त्व दर्शन भी समझें और उसके साधना-विधानों को अपनाने का भी प्रयत्न करें। इस आधार पर मस्तिष्क और अंतःकरण दोनों ही महानता के ढाँचे में ढल सकते हैं और उनके स्तर के अनुरूप ही हमारे प्रत्यक्ष व्यवहार एवं क्रियाकलाप का पहिया लुढ़क सकता है।
चिंतन जितना सघन होगा उतना ही उसका प्रभाव पड़ेगा। उसी अनुपात से ध्यान एवं विभूतियाँ अपने भीतर प्रवेश करती चली जाएँगी और गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि में अपने उत्कर्ष का क्रम उभरता चलेगा।
चिंतन-व्यवहार, उत्कृष्ट आदर्शवादिता से समन्वित है, उसे अंतरंग से उभरते उल्लास की अनुभूति होती है। इसके साथ ही यदि पुण्य-परमार्थ का क्रियाकलाप में समावेश है; दूसरों की भलाई के लिए अपने से कुछ करते-धरते बन पड़े, तो वह बीजारोपण वर्षा ऋतु में सहज अंकुरित होने वाली हरीतिमा की तरह अपनी शोभा-सुषमा से समूचा वातावरण भर देता है। क्रिया की प्रतिक्रिया चल पड़ती है। सेवा-साधना का बीजारोपण कुछ ही समय में सुरम्य उद्यान की तरह विकसित हुआ दिख पड़ता है।
चिंतन हेतु प्रेरित-प्रशिक्षित किया जा सकता है। इस तरह चिरपुरातन संस्कारों को मिटाकर चिंतन को नए अभ्यास में ढलने का मौका भी दिया जा सकता है। यह सारी प्रक्रिया मस्तिष्क के स्मृतिकोशों में हो रहे स्ट्रक्चरल एवं फंक्शनल परिवर्तनों की ही प्रतिक्रिया रूप में संपन्न होती मानी गई है।
चिंतन पर अनाचार ही छाया रहता है। इस कारण उनसे मानवी गरिमा के अनुरूप कुछ किए जाने की आशा नहीं की जा सकती।
चिंतन से मस्तिष्क तदनुरूप रंगरेलियों में उलझ जाता है और शरीर में स्वप्नदोष जैसी उत्तेजना अपना काम करने लगती है। अच्छा यही है साधना की दृष्टि से अथवा चिंतन को परिष्कृत करने की दृष्टि से हम श्रेष्ठता को साथ लिए रहें और उसी का ध्यान किया करें।
चिंतन एवं मनन द्वारा प्राप्त होती है, जिसके लिये आत्मनिरीक्षण करना होता है। ब्रह्मविघा का अवलंबन लेना पड़ता है। सत्यासत्य के बीच अंतर करने एवं सत्यावलम्बन के लिए प्रेरित करने वाली बुद्धि का नाम ही विद्या है।
चिंतन को दिशा देना है और साधन का स्वरूप अभीष्ट शक्तियों को अपने में उभारने की वैज्ञानिक कार्यपद्धति को अपनाना है। हम गायत्री का तत्त्व दर्शन भी समझें और उसके साधना-विधानों को अपनाने का भी प्रयत्न करें। इस आधार पर मस्तिष्क और अंतःकरण दोनों ही महानता के ढाँचे में ढल सकते हैं और उनके स्तर के अनुरूप ही हमारे प्रत्यक्ष व्यवहार एवं क्रियाकलाप का पहिया लुढ़क सकता है।
चिंतन और उस प्रयोजन के लिए होने वाले अन्य कृत्य भी कामुकता की व्याख्या परिधि में आते हैं। किंतु वास्तविकता यह है कि यह समस्त परिकर सुविस्तृत काम-क्षेत्र का बहुत ही छोटा और हेय स्वरूप है। वस्तुतः काम शब्द की परिभाषा क्रीड़ा, विनोद एवं उल्लास ही हो सकती है। उसे अंतरंग का उभार या उमंग भी कहा जा सकता है। यह प्रयोजन जिन भी उपाय-उपचारों से संभव होता हो, उन्हें काम की परिधि में सम्मिलित किया जा सकता है।
चिंतन को नए अभ्यास में ढलने का मौका भी दिया जा सकता है। यह सारी प्रक्रिया मस्तिष्क के स्मृतिकोशों में हो रहे स्ट्रक्चरल एवं फंक्शनल परिवर्तनों की ही प्रतिक्रिया रूप में संपन्न होती मानी गई है।
चिंतन, चरित्र और भावनाएँ यह तीनों व्यक्ति की भीतरी शक्तियाँ हैं। इनके बल पर व्यक्ति और समाज ऊँचे उठते हैं। यदि इनमें खोखलापन आ जाए तो भौतिक सामर्थ्यों की प्रचुरता होते हुए भी सब कुछ गुड़-गोबर हो जाएगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-February
चिंतन-सदाचरण की ही वरन्।
चिंतनों की ओर धकेलता रहा है। उस प्रभाव से अगणित प्रभावित हुये हैं और बड़ा सा लोक मानस उसी ढाँचे में ढला है। अब जब सांचा बदलेगा तो उसमें ढलने वाले पुर्जे दूसरे रंग ढंग के होंगे। सत्साहित्य कितना प्रेरक होता है। इसके साक्षी ईसाइयों, कम्युनिस्टोँ और क्राँतियाँ प्रस्तुत करते रहने वालों से पूछकर कारगर निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार। शरीर और मन को मिला कर यही प्रयोजन पूरे करने पड़ते हैं। इन क्षेत्रों को साफ सुथरा रहना चाहिए। इनमें से एक में भी विकृतियों का समावेश नहीं होने देना चाहिए। जहाँ भी गड़बड़ी दीख पड़े वहाँ बुहारी लगानी चाहिए और जो कचरा दीख पड़े उसे कूड़े के ढेरों में पटकना चाहिए।
चिंतन ने, दुराचरण ने, अंतिम दाँव लगाया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-November
चिंतन के जाल में फँस जाता है। वैसी ही आदत बन जाती है। कल्पना लोक में उड़ते रहने की स्थिति नशेबाजी जैसी हो जाती है, जिन्हें वास्तविकता एवं हानि-लाभ का निष्कर्ष निकाल सकने तक की क्षमता से वंचित रह जाना पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-December
चिंतन की दिशाधारा को प्रोत्साहन दिया है। प्रो0 सोरोकिन ने हारवर्ड अस्पताल के चिकित्सकों द्वारा सहानुभूतिपूर्वक सद्व्यवहार से रोगियों में संतोषजनक आशावादिता बढ़ाने में सफलता प्राप्त की है। उनका कहना है कि कोई भी टॉनिक मूल रूप से उतना प्रभावकारी नहीं सिद्ध हो सकता जितना अच्छा किसी चिकित्सक द्वारा रोगी को प्रेरक विचारों के टॉनिक से एवं उसे समझाने और प्रोत्साहित किए जाने से मिलता है। महामारी जैसे प्रकृति-प्रकोपों में बचे हुए लोगों को चाहे “भाग्यवान” कह लें, किंतु प्रकारांतर से वे “समर्थ विचारवान” व्यक्ति ही होते हैं, जो सर्वसमर्थ उस जीवनधारा से सतत् शक्ति संचित करते रहते है।
चिंतन का सार निहित है, इसीलिए इसे ज्ञान का अंत अर्थात् चरमोत्कर्ष भी कहा जाता है। इससे यह स्पष्ट किया जाता है कि संसार सापेक्ष है, जबकि परम सत्य पूर्णब्रह्म निरपेक्ष। जीवन क्या है? इसका लक्ष्य या उद्देश्य क्या है? आदि बातों से विमुख होकर यहाँ तक कि अपने यथार्थ स्वरूप को न जानते हुए भी हम सापेक्षता के इस मायाजाल की भूल भुलैयों में जा फंसे हैं, इसका कारण क्या है और निवारण करने के उपाय क्या हैं?
चिंतन के प्रेरणाप्रद सिद्धांत इस सम्मोहन-निद्रा को एक झटके में तोड़कर चेतना-जगत में प्रविष्ट होने का सन्देश सुनाते हैं।
चिंतन करने पर यह मान्यता भी पूरी तरह से ध्वस्त हो जाती है।
चिंतन से अपने को न रोक पाने वाले व्यक्ति अपनी समूची गतिविधियों को ही अनुपयुक्तता के दल-दल में फँसा लेते हैं। लोभ, मोह और अहंकार को समस्त कुकृत्यों का जन्मदाता माना गया हैं। जहाँ मन पर यह तीनों विकृतियाँ छाई रहेंगी, वहाँ कोल्हू के बैल जैसी व्यस्तता भी छाई रहेगी और सत्प्रयोजनों के लिए कुछ करते धरते न बन पड़ेगा। सदाशयता को चरितार्थ करने में इन तीनों को ही प्रमुख व्यवधान माना जाना चाहिए।
चिंतन अनैतिक भी हैं। उसमें नारीमात्र को रमणी, कामिनी, भोग्या, वैश्या के रूप में देखने सोचने की दुर्बुद्धि जड़ पकड़ती हैं और ऐसे ही लोग योग्य, अयोग्य का विचार किए बिना व्यभिचार, बलात्कार, असीमित यौनाचार, हस्तमैथुन जैसे आत्मघाती प्रयासों पर उतारू हो जाते हैं। पलंग का एक पाया टूटा तो बाकी तीन भी सुस्थिर नहीं रह सकते। कामुकता के प्रसंग में जो स्वच्छंद होते हैं, वे नैतिकता के सामाजिकता के अन्यान्य, उपयोगी पक्षों को भी छिन्न-विच्छिन्न करते चले जाते हैं और पतन के गहरे गर्त में गिरते हैं।
चिंतन और आदर्श गतिविधियों का अभ्यस्त कर लेना। इन सफलता के श्रेयाधिकारियों की जन-जन का सहज सम्मान मिलना ही चाहिए।
चिंतन, चरित्र, व्यवहार में भारी उलट-फेर हो गया एवं प्रगति अधूरी रह गई।
चिंतन उसके मन में चल रहा था।
चिंतन में अश्लीलता चढ़ी रहे तो समझना चाहिए कि उपयोगी प्रसंगों पर गंभीरतापूर्वक सोच सकने की मेधाशक्ति का ही अपहरण हो गया।
चिंतन करने से सारा का सारा आधार डगमगाने लगता है। सही माने में तो वजन का कोई अपना अस्तित्व है ही नहीं। पृथ्वी की आकर्षणशक्ति का जितना प्रभाव जिस चीज पर पड़ रहा है, उसे रोकने के लिए जितनी शक्ति लगानी पड़ती है, उसी को उसका वजन मान लिया जाता है। यह आकर्षणशक्ति भिन्न-भिन्न हैं। पृथ्वी और चंद्रमा के बीच एक जगह ऐसी भी आती है, जहाँ कोई आकर्षणशक्ति है ही नहीं तो वहाँ वजन कुछ भी नहीं रहता।
चिंतन पर सवार होकर अभ्यास का रूप ले ले और उन्हें निरस्त करने वाले देवपक्ष मूर्छित-तंद्रित रहकर अपनी प्रतिरोधी क्षमता गँवा बैठे।
चिंतन-प्रवाह को विधेयात्मक मोड़ दिया जा सकता है, उसे परिमार्जित-परिष्कृत किया जा सकता है और व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बनाया जा सकता है। योग-साधनाओं द्वारा योगीजन इसी प्रक्रिया को संपन्न करते हैं। विभिन्न प्रकार के योगाभ्यासों द्वारा शरीर विद्युत को नियंत्रित-सुनियोजितकर वे न सिर्फ शरीर-मन से स्वस्थ बने रहते हैं, वरन अपनी मलीनता को हटाकर प्रखरता उभारने में भी सफल होते हैं। यह प्रखरता वस्तुतः काय-ऊर्जा के सुनियोजन से ही सफल— संभव बन पाती है। श्रेष्ठ, प्रखर-व्यक्तित्वसंपन्न व्यक्ति संभवतः अगले दिनों इसी आधार पर बनाए जाएँगे।
चिंतन करते रहने की विधा को त्राटक साधना कहा गया है। इससे धर्मचक्षुओं में आत्मतेज का आविर्भाव होता है और दृष्टिकोण के परिमार्जन का क्रम चल पड़ता है।
चिंतन में उन्माद भरने वाले इन चंद्रप्रभावों की व्याख्या करना अत्यंत जटिल है, क्योंकि पूर्णिमाकाल में पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा तीनों एक सीध में आ जाते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी और चंद्रमा के बीच विद्युत चुंबकीय एवं गुरुत्वाकर्षण संबंध के ही यह परिणाम हैं, वस्तुतः लंबे समय से चिकित्सा जगत में इस संबंध में अनुसंधान चल रहा है कि चंद्रकला के साथ शारीरिक एवं मानसिकता रुग्णता का क्या संबंध हो सकता है। अब यह बात क्रमशः समझ में आने लगी है।
चिंतनीय बात है। क्या हम अपने जीवन में उन्हीं बातों को मानते— स्थान देते हैं, जिनका अस्तित्व विज्ञान द्वारा प्रमाणित हो? इस प्रश्न का एकमेव जवाब है— नहीं। जीवन से ऐसे कितने ही तथ्य एवं मूल्य जुड़े हैं, जिनके स्वरूप के संबंध में पुष्टि हेतु विज्ञान मौन है। उदाहरण के लिए नीतिशास्त्र को ही लें।
चिंतन की इस धारा में स्पष्ट किया गया है कि एक ऐसा परम तत्त्व विश्वचेतना जो सबकी नियामक, ‘एकमेवाद्वितीयं’ सर्वत्र परिव्याप्त है। सृष्टि के कण-कण, विश्व-ब्रह्मांड के प्रत्येक घटक में समाई हुए है। संपूर्ण विश्व उसी की अभिव्यक्ति है। इसी सत्ता को वेदांत पूर्ण ब्रह्म कहकर संबोधित करता है, पर नाम के प्रति उसका कोई संकीर्ण भाव नहीं। क्योंकि परम सत्ता नाम और रूप से परे है।
चिंतन का सार निहित है। इसमें आस्तिकता का समर्थन व प्रतिपादन है। तत्त्वचिंतन की इस धारा में स्पष्ट किया गया है कि एक ऐसा परम तत्त्व विश्वचेतना जो सबकी नियामक, ‘एकमेवाद्वितीयं’ सर्वत्र परिव्याप्त है। सृष्टि के कण-कण, विश्व-ब्रह्मांड के प्रत्येक घटक में समाई हुए है। संपूर्ण विश्व उसी की अभिव्यक्ति है।
चिंतन का प्रतीक मानना चाहिए। ईश्वर प्रार्थना, भजन, कीर्तन, प्रवचन, मंत्र-जप आदि जीभ से ही होते हैं। यदि जिव्हा का परिशोधन हो चुका है तो उपरोक्त सभी कार्य ठीक प्रकार बन पड़ेंगे और अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करेंगे। यदि जिव्हा कुधान्य खाने और कुसंस्कारिता के दुर्गुणों की अभ्यस्त, है तो फिर समझना चाहिए कि साधना-प्रयोजन के लिए जिव्हा माध्यम से जो कुछ किया गया है, वह सभी निरर्थक चला जाएगा।
चिंतन-क्षेत्र में घुमड़ती रहने और मस्तिष्क भर को कुछ काम देने वाली एक विशेषता भर समझा जाता था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-October
चिंतन से छुड़ा देने की प्रार्थना करने लगा।
चिंतन बह रहा है। आदर्शवादी क्रियाकलापों में उसकी प्रतिक्रिया जनजीवन में परिलक्षित हो रही हो तो समझना चाहिए कि धर्मतंत्र की विधा और प्रक्रिया अपने सही रूप में बनी हुई है। इस कसौटी पर धर्म क्षेत्र का काया कल्प किये जाने जैसी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-January
चिंतन की। कुण्डलिनी है महाशक्ति, इस जीवन की॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-September
चिंतन मनन के बाद आती है। इसके लिए पक्ष-विपक्ष के तर्क तथा प्रमाण उदाहरण ढूंढ़े जाते हैं और उनका तुलनात्मक विवेचन करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है कि कौन-सा पक्ष अधिक वचनदार है। न्यायाधीशों को यही करना पड़ता है। वे वादी और प्रतिवादी के कथनों और प्रस्तुत किये गये प्रमाणों की वास्तविकता, अवास्तविकता का विचार करते हैं और जिस ओर से प्रतिपादन अधिक वचनदार प्रतीत होता है उसी पक्ष में फैसला देते हैं। सामान्य जीवन में भी ऐसी स्थिति बार-बार आती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-July
चिंतन ने ही इनका सूत्रपात किया है और उन्हें क्रियारत होने की स्थिति तक पहुँचाया है।
चिंतन करने का अवसर प्रदान करता है।
चिंतन में, चरित्र में, व्यवहार में, आदर्शवादी-उत्कृष्टता का समावेश। जिसके जीवनक्रम में जितनी शालीनता भर चले, समझना चाहिए कि उससे उतनी ही सार्थक भक्तिभावना सध रही है।
चिंतन श्रेष्ठ, चरित्र न अपनाया हो जिसने।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार; इसे उत्कृष्ट बनाने में ही समय, श्रम एवं मनोयोग का नियोजन करना पड़ता है। वह न बन पड़े तो समझना चाहिए कि पथ्य बिगाड़ते रहने पर उपचार कारगर नहीं होता। साधक का व्यक्तित्व गया गुजरा हो तो उसकी समुचित साधना का भी उपयुक्त लाभ न मिल सकेगा।"
चिंतन-मनन का आश्रय तो लेना पड़ता है, साथ ही एक कदम बढ़कर प्राणतत्त्व की अतिरिक्त मात्रा का भी संचय करना पड़ता है। सामान्यतया हर किसी को प्राणतत्त्व की एक समिति मात्रा ही उपलब्ध होती है। उस विभूति को अधिक मात्रा में हस्तगत करने के लिए प्राणाकर्षण की विशेष साधना करनी पड़ती है। प्राणाकर्षण का अर्थ है— ब्रह्मांडव्यापी महाप्राण में से खींचकर अपनी पात्रता को फुला-फैलाकर उसमें अभीष्ट वैभव को संचित-संकलित करना। इसी क्रिया विज्ञान को प्राणायाम भी कहते हैं।
चिंतन-क्षेत्र की परिधि बढ़ानी पड़ती है। शिक्षा का आश्रय लिया जाता है, अनुभव एकत्रित करते हैं, साथ ही मनन-चिंतन का उपक्रम अपनाने मंथन करते हुए दूरदर्शी विवेकशीलता की परिधि तक पहुँचा जाता है। प्रज्ञा का, मेधा का भूमा का उदय कारणशरीर में होता है, पर उसके पूर्व मानसिक संतुलन की, परिष्कृत दृष्टिकोण की पृष्ठभूमि बनती है।
चिंतन का उपक्रम अपनाने मंथन करते हुए दूरदर्शी विवेकशीलता की परिधि तक पहुँचा जाता है। प्रज्ञा का, मेधा का भूमा का उदय कारणशरीर में होता है, पर उसके पूर्व मानसिक संतुलन की, परिष्कृत दृष्टिकोण की पृष्ठभूमि बनती है।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार में घुसी हुई त्रुटियों का निराकरण करते हैं और उस स्थान पर शालीन-सुसंस्कारिता का समावेश करते हैं। इतना कर पाने के लिए ईश्वर से शक्ति-सामर्थ्य प्रदान करने की याचना करते हैं। पूजा-प्रक्रिया, उपासना, साधना का मूलभूत प्रयोजन यही है। कांटों में भटकने और सस्ते दाम में बहुमूल्य उपलब्धियां झटकने की फिराक में रहने वालों को ही असफलताजन्य निराशा का सामना करना पड़ता है।
चिंतन तंत्र को इतना सुसंस्कृत बनाया जाए कि प्रस्तुत समस्याओं का हल और आवश्यकताओं का सरंजाम जुटाने में उन्मुक्त दृष्टिकोण अपनाया जा सकना संभव हो सके। सूक्ष्मशरीर के मनन संस्थान को समुन्नत इसी प्रकार रखा जा सकता है।
चिंतन से परे विशालता और कहाँ मैं नगण्य-सा तुच्छ राजकण।
चिंतन। इस प्रवृत्ति से छोटी-छोटी बात को बढ़ा-चढ़ाकर 'तिल का ताड़' बना लिया जाता है। संभावनाओं में आशंका, निराशा, अविश्वास, हानि, चिंता वाला पक्ष ही मस्तिष्क में घूमता रहता है। शत्रुओं के आक्रमण का, अशुभ अनिष्ट दैवी दुर्विपाक का भय बना रहता है। अपनों द्वारा विश्वासघात किए जाने की कुशंका रहती है।
चिंतन-क्षेत्र में आदर्शवादिता एवं विवेकशीलता को उछाला-उभारा जा सकता है। प्राण का मन पर नियंत्रण है। चित्तवृत्तियों के निरोध की, मनोनिग्रह की, एकाग्रता संपादन की, अध्यात्म उत्कर्ष के निमित्त पग-पग पर पल-पल में आवश्यकता पड़ती है। मनस्वी बनने के लिए प्राणतत्त्व की अधिक मात्रा संकलित करनी पड़ती है। इसके बिना ओछी चतुरता ही हाथ रह जाती है और वह कुशलता भरे छद्म-प्रपंच ही रचती रहती है।
चिंतन और परमात्मा के उपकारों को स्मरण रखना ही मनुष्य की सच्ची प्रार्थना है। महात्मा गाँधी कहा करते थे ”मैं कोई काम बिना प्रार्थना के नहीं करता। मेरी आत्मा के लिए प्रार्थना उतनी ही अनिवार्य है, जितना शरीर के लिए भोजन।”
चिंतन-तंत्र के माध्यम से अपनी चेतना का परिचय देता है। चेतना का गुण है— चिंतर। चिंतर को ही सजीवता का चिह्न माना जाता है। आस्था, आकांक्षा, भावना कल्पना, विवेचना आदि उसी के भेद उपभेद है। प्राणवान को साहसी समझा जाता है।
चिंतन से घिरे रहते हैं। कुछ कर तो नहीं पाते पर मन को उद्विग्न रखकर अपने शारीरिक, मानसिक क्षेत्र को असीम हानि पहुँचाते हैं। इसके अतिरिक्त मस्तिष्कीय वह कोमलता भी नष्ट कर देती है, जो प्रगति के पथ पर बढ़ चलने का मार्ग सुझाती है। ऐसे व्यक्ति एक प्रकार के मानसिक रोगी हो जाते हैं। उन्हें बौड़म या सनकी समझा जाने लगता है।
चिंतन के माध्यम से ही संभव हुई है। विज्ञान का प्रयोग मशीनों के माध्यम से होता है, पर उन मशीनों का आविष्कार-आविर्भाव मनुष्य के बुद्धिबल से ही हुआ है। आकाश, गमन, उपग्रह, कम्प्यूटर, अणुशक्ति आदि अनेकों एक से एक विचित्र विज्ञान की शाखाएँ कार्यरत दिखाई पड़ती है, पर यह सब आकाश से नहीं टपका है। मनुष्य के चिंतन ने ही इनका सूत्रपात किया है और उन्हें क्रियारत होने की स्थिति तक पहुँचाया है।
चिंतन सहज ही निरस्त होता रह सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-January
चिंतन में रहना अच्छा है किन्तु मार्ग तो वह है, जिसके द्वारा आप स्वयं अपने विषय में हित चिंतन करते हैं।
चिंतन, अध्ययन, मनन आदि से जो गुप्त मन निर्मित होता था, वह पवित्रतम भावनाओं का प्रतीक होता था। घर का वातावरण भी उच्च नैतिकता से परिपूर्ण होता था, जिससे एक पीढ़ी के पश्चात् दूसरी पीढ़ी उन्हीं संस्कारों को निरन्तर विकसित करती चली आती थी।
चिंतन करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-November
चिंतन करता है। देखा गया है कि जिस व्यक्ति के बारे में मनुष्य ऐसा सोचता है वह उद्विग्नमन हो गया है। या तो उसे जाग्रत अवस्था में ही उसका स्मरण आने लगता अथवा वह उसके विषय में स्वप्न देखने लगता है। इस प्रकार के कितने ही स्वप्न सत्य होते पाये गये हैं। लेखक के एक छात्र ने एक बार अपने पिता की मृत्यु का स्वप्न देखा और दूसरे दिन उसकी मृत्यु का तार आया।
चिंतन मुक्ति का सर्वोपरि साधन है। भीतर बाहर सर्वत्र ईश्वरत्व का दर्शन करना को मुक्ति का साधन हो सकता है। हम ईश्वरत्व की आराधना करें। ईश्वरत्व का व्यवहार करें। जो कार्य ईश्वरत्व जैसे तत्व के विरुद्ध हो सकते हैं, हम उनसे बचकर ही ईश्वर के प्रिय पुत्र होने के अधिकारी हो सकते हैं।
चिंतन में न सत्य, भ्रम ही होता है,,

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-August
चिंतन, सोचना, विचार करना जिससे कि वह मन में बैठ सके और भूला न जा सके। पढ़ी बात पर जितना ही चिंतन किया जायगा, वह उतनी ही स्मृति में अच्छी तरह बस जायगी।
चिंतन कर सके। पुनः पुनः स्मृति में संगृहीत ज्ञान की आवृत्ति करने से ज्ञान दृढ़ होता है और संस्कार परिपुष्ट होते हैं।
चिंतन मनन द्वारा मालूम करनी चाहिए। प्रति सप्ताह सात दिनों के कार्यों पर विचार करना चाहिये। जाँच का कार्य महत्वपूर्ण है। इससे नीर क्षीर हो जाता है। हम जिस ज्ञान को अपना समझते हैं, वह प्रायः अधूरा धुँधला, अपूर्ण निकलता है।
चिंतन किया जायगा, वह उतनी ही स्मृति में अच्छी तरह बस जायगी।
चिंतन और ध्यान एक रस नहीं चल पाता है, वह आत्म चेष्टा में हिम्मत हार बैठता है, वह मन के धक्के का सहन नहीं कर सकता, विघ्न आने पर उनका मुकाबला नहीं कर सकता, बलहीन में साहस और उत्साह की कमी रहती है, उसका इरादा अथवा संकल्प मजबूती लिए नहीं होता, करता है फिर छोड़ देता है, ऐसों को अमरधाम में पहुँचना एवं मन पर अधिकार करके आत्मसाक्षात्कार करना बड़ा ही कठिन हो जाता है। वह सफल हो सकेगा या नहीं इसमें सन्देह ही रहता है। इसलिए ठीक रास्ता जिज्ञासु के लिए यह है कि—वीर्य रक्षा करके और रोगों से बचा करके शरीर को बलवान बनाओ फिर आत्म साधनों में लग पड़ो और उस अवस्था में अपने को पहुँचाओ जहाँ आगे पीछे, ऊपर नीचे, दाएँ-बाएँ एक शुद्ध चैतन्य पुरुष की सत्ता भरी हुई दृष्टि-गोचर हो, प्रत्येक वस्तु उसके रंग में रंगी हुई दिखाई दे, प्रत्येक पदार्थ में उसके रूप की झलक झलकती हुई नजर आवे, प्रकृति के प्रत्येक कण तुम्हारे लिए दर्पण बन जाये जिसमें प्यारे का मुखड़ा चमकता हुआ जान पड़े। तुममें तुमसे बाहर, औरों में औरों से बाहर वही एक तत्व भरा हुआ अनुभव हो, वह सबमें और सब उसमें प्रत्यक्ष मालूम देने लगें, इसका नाम ही ‘ब्रह्मचर्यावस्था’ है और यहाँ तक पहुँचा हुआ ही ‘ब्रह्मचारी’ है। वीर्य रक्षा, विचार संयम और इच्छा शक्ति को बलवान बनाने से और निरन्तर अपना उद्योग जारी रखने से आगे चल कर कुछ काल में साधकों पर यह अवस्था आ जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-October
चिंतन के लिए मन को ढीला छोड़ देना ही मूर्खता है। आइए, फालतू बैठने के स्थान पर किसी कार्य में व्यस्त हो जायं- अपना कमरा ही साफ कर लें, रुमाल ही धो डालें, बाहर से सब्जी ले आयें या अपने जूते पर पालिश ही कर लें। कार्य चाहिए। जहाँ आप किसी कार्य में लिप्त हुए कि चिन्ता भागी। यह सबसे सस्ती दवाई है जिससे चिन्ता की पुरानी शत्रुता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-April
चिंतन की भावना गुप्त मन में स्थायी हो जायेगी। अज्ञानता जन मोह दूर हो जायगा, आत्म-भाव का उदय होगा। तुम्हारी अशाँति छोटे मोटे झगड़े, व्यर्थ ही दुरभि-सन्धि, शुद्ध वस्तुओं के प्रति मोह, शरीर, रुपया, मान, ईर्ष्या, वासना-दृष्टि सम्बन्धी चिंताएँ, समस्त उद्वेग, मानसिक परतन्त्रता दूर हो जायगी। अतः संसार की चमक-दमक में आप अपना आत्म तत्व न खो दें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-March
चिंतन करना पड़ेगा; प्रत्येक बोध में उसी का अनुभव करना होगा। क्या तुम जानते हो कि इन्द्रियों के द्वारा यह मन जो असंख्य खेल खेलता है; वह क्या अपनी शक्ति से खेलता है जितने भी बोध के विषय हैं उनमें से एक भी ऐसा नहीं है जिसका विकास उस माँ के पदनिक्षेप के बिना हो सकता हो। क्या तुमने कभी इस बात पर विचार किया है? मन जो इन्द्रियों के द्वारा दौड़ता फिरता है, इसके प्रत्येक वेग से जो कल्पना या चिन्ता रहती है वह उस माँ के चरण-कमलों से प्रस्फुटित रहती है। इसके सिवाय अंट-संट और जो कुछ होता है सो सब तो भूत की बेगार के ढोने के समान है।
चिंतन करते रहा जाय और शरीर से ब्रह्मचर्य रखा जाय तो उसका कोई विशेष लाभ न होगा क्योंकि मन में उत्पन्न होने वाली वासना से मानसिक व्यभिचार होता रहेगा और आत्मिक बल संचय न हो सकेगा। उसके विपरित यदि कोई व्यक्ति साधारण गृहस्थ धर्म का पालन करता है और मन से निर्विकार रहता है तो उसका थोड़ा सा शारीरिक स्खलन उतना हानिकारक नहीं होता, जितना कि अविवाहित का मानसिक उद्वेग। यों शारीरिक और मानसिक दोनों ही प्रकार का संयम रखा जाय तो सर्वोत्तम है।
चिंतन करते हो? यह न तो उसका असली स्मरण है और न साधना ही है। उसका निरंतर चिंतन करना पड़ेगा; प्रत्येक बोध में उसी का अनुभव करना होगा। क्या तुम जानते हो कि इन्द्रियों के द्वारा यह मन जो असंख्य खेल खेलता है; वह क्या अपनी शक्ति से खेलता है जितने भी बोध के विषय हैं उनमें से एक भी ऐसा नहीं है जिसका विकास उस माँ के पदनिक्षेप के बिना हो सकता हो। क्या तुमने कभी इस बात पर विचार किया है?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-September
चिंतन के विरुद्ध तो निरन्तर संघर्ष ही जारी रखना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-September
चिंतन में, ध्येय की प्राप्ति में बाधा डालती है। अतः प्राणायाम द्वारा इस विक्षेप को दूर करना चाहिए।
चिंतन (8) सत्प्रयोजन के लिए कष्ट सहना (9) सादगी (10) अहिंसा (11) सत्य (12) अक्रोध (13) अभिमान का त्याग (14) अनुद्वेग (15) निन्दा चुगली आदि से दूर रहना (16)दयालु (17)निर्लोभता (18) सहृदयता (19)दुष्कर्मों के करने में लज्जा (20) छिछोरपन से बचना (21)तेजस्विता (22) क्षमा (23) धैर्य (24) सफाई (25) शत्रुता का भाव न रखना (26) अपने को दूसरे से श्रेष्ठ न समझना, यह आत्मिक गुण है। जिनकी आत्म बलवान है, उनमें इन गुणों का अधिकाधिक विकास देखा जायेगा। यह विकास जितना ही अधिक होगा उतनी ही आत्म संतोष की मात्रा में अधिक वृद्धि होगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-June
चिंतन को अपनाएं जिससे मानसिक कुढ़न और असंतोष से छुटकारा मिले और सर्वत्र सब परिस्थिति में, आनन्द ही आनन्द उपलब्ध हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि अधिक अच्छी परिस्थिति प्राप्त करने का प्रयत्न ही न किया जाय। वैसा प्रयत्न तो अवश्य जारी रखना चाहिए क्योंकि आत्म उन्नति करना, आगे बढ़ना, शक्ति संचय करना यह तो मनुष्य का कर्तव्य धर्म है जो उसे नहीं करता वह धर्मघात का अपराधी बनता है। उन्नति के लिए हंसी, खुशी, संतोष, उत्साह एवं कठोर परिश्रम के साथ प्रयत्न करना एक बात है और अपनी स्थिति से असंतुष्ट, दुखी, निराश रह कर सौभाग्य के लिए तरसते रहना दूसरी बात। निश्चित रूप से इनमें से पहली बात ही श्रेयष्कर है।
चिंतन को त्यागकर शुभ चिंतन को अपनाएं जिससे मानसिक कुढ़न और असंतोष से छुटकारा मिले और सर्वत्र सब परिस्थिति में, आनन्द ही आनन्द उपलब्ध हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि अधिक अच्छी परिस्थिति प्राप्त करने का प्रयत्न ही न किया जाय। वैसा प्रयत्न तो अवश्य जारी रखना चाहिए क्योंकि आत्म उन्नति करना, आगे बढ़ना, शक्ति संचय करना यह तो मनुष्य का कर्तव्य धर्म है जो उसे नहीं करता वह धर्मघात का अपराधी बनता है। उन्नति के लिए हंसी, खुशी, संतोष, उत्साह एवं कठोर परिश्रम के साथ प्रयत्न करना एक बात है और अपनी स्थिति से असंतुष्ट, दुखी, निराश रह कर सौभाग्य के लिए तरसते रहना दूसरी बात। निश्चित रूप से इनमें से पहली बात ही श्रेयष्कर है।
चिंतन करें। अशुभ चिंतन को त्यागकर शुभ चिंतन को अपनाएं जिससे मानसिक कुढ़न और असंतोष से छुटकारा मिले और सर्वत्र सब परिस्थिति में, आनन्द ही आनन्द उपलब्ध हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि अधिक अच्छी परिस्थिति प्राप्त करने का प्रयत्न ही न किया जाय। वैसा प्रयत्न तो अवश्य जारी रखना चाहिए क्योंकि आत्म उन्नति करना, आगे बढ़ना, शक्ति संचय करना यह तो मनुष्य का कर्तव्य धर्म है जो उसे नहीं करता वह धर्मघात का अपराधी बनता है। उन्नति के लिए हंसी, खुशी, संतोष, उत्साह एवं कठोर परिश्रम के साथ प्रयत्न करना एक बात है और अपनी स्थिति से असंतुष्ट, दुखी, निराश रह कर सौभाग्य के लिए तरसते रहना दूसरी बात।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-November
चिंतन छोड़ो जब कभी विश्व की विशालता पर विचार करने बैठो तो अपने मन, शरीर, आत्मा की महान शक्तियों पर चित्त एकाग्र करो। शक्ति के इस केन्द्र पर मन स्थिर रखने से कोई दुर्बलता तुम्हारे अन्तःकरण में प्रवेश नहीं कर सकती। जब तुम शक्ति के विशाल बिंदू पर समस्त शक्तियाँ केन्द्रित करोगे तो तुम्हें प्रतीत होगा कि पाषाण में, धातु में, वनस्पति में, प्रकृति में, पशु में और जिस किसी वस्तु में भी विशालता है, उस सब से तुम्हारी विशालता कहीं अधिक है। इन सब की विशालता की एक सीमा निश्चित है, किन्तु तुम्हारी शक्तियों की सीमा अपार है।
चिंतन में निष्प्रयोजन अपनी शक्तियों का अपव्यय नहीं करते। संसार में तुम उस महान पद पर आसीन होगे जिस पर संसार के अन्य प्रतापी पुरुष होते आये हैं। अभी तुम इस स्थिति में पड़े हो तो क्या, शीघ्र ही उच्चतम विकास के दिव्य प्रदेश में तुम प्रविष्ट होने वाले हो। तुम सर्वेश्वर के पवित्र अंश हो और तुम्हें प्रकृति ने अपनी इष्ट-सिद्धि के लिए पर्याप्त साधन और सामर्थ्य प्रदान किए हैं। तुम एक बार प्रयत्न तो करो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-July
चिंतन ने आपको विचारशील न बनाया, तो दूसरे को आप पर कैसे विश्वास हो सकता है? वह आपका हृदय नहीं, मुख देखता है, उसकी प्रत्येक मुस्कान, लकीरें, भाव-भंगिमा, नेत्र संचालन, भ्रू-भंगिमा पढ़ता है। आपको अपने नाना भावों को एक सफल अभिनेता की भाँति चेहरे पर प्रकाशित करने की कला सीखनी चाहिए। करुणा, क्रोध, प्रेम, शान्ति, उल्लास, रौद्र, वीभत्स, इन सभी भावों के प्रकाशन की आवश्यकता सम्भाषण में पड़ सकती है। चुने हुए स्थानों पर विशेषतः भावावेश में अंग संचालन करना बातचीत को प्रभावशाली बनाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-February
चिंतन और मनन करता है और वैसा ही चिन्तन और मनन करते हुए मन भी उसी साँचे में ढल जाता है। परिणाम यह होता है कि चिन्तन की स्वतन्त्र दिशा का लोप हो जाता है। यहाँ तक कि चिन्तन की स्वतन्त्रता भी नष्ट हो जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-January
चिंतन की अपेक्षा करेंगे। एक स्पेनिश कहावत है कि-वह व्यक्ति जो एक नाली की मरम्मत नहीं कराता, उसे पूरे मकान की मरम्मत करानी पड़ती है।
चिंतन, उच्च विषयों के ध्यान तथा दूसरों की सहायता में व्यतीत होता है।
चिंतन प्रधान होता है। बड़े-2 दार्शनिक, विचारक, आविष्कारक और कलाकार निर्धन होते हुए भी जीवन रक्षक पदार्थों का उचित उपयोग कर जीवन को पूर्ण बना सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-May
चिंतन, इत्यादि कैसे आ सकते है? जिसका शरीर और मन वश में नहीं वह नीति के अनुसार सत्-असत् का विवेक किस प्रकार कर सकता है? जिसे क्रोध आता है वह दूसरे के मान अपमान का विचार क्या करेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-June
चिंतन की शुष्क भूमि नहीं, प्रत्युत,लोक-साधना की सरस भूमि है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-April
चिंतन में तन्मय रहना—ये सब हमारी संस्कृति के अभिन्न अंश हैं। हिन्दू संस्कृति में वृक्ष-पूजन तथा वृक्षारोपण का बड़ा महत्व है। वृक्ष पर, और पशु घास वृक्ष आदि पर आधारित हैं। अतः हमारी संस्कृति में वृक्षों की देख−रेख, जलदार आदि का महत्व है। तुलसी, अशोक, शमी, पीपल, नीम, गूलर, आँवला आदि उपयोगी वृक्ष बड़ी श्रद्धा से पूजे जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-March
चिंतन और मननशील व्यक्ति अपने थोड़े से अध्ययन के सहाप्य से भी समाज और राष्ट्र में अपना एक विशिष्ट व्यक्तित्व निर्मित कर लेते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-November
चिंतन करने लगे।
चिंतन करते हुए कदलीवन में बैठे हैं। उनकी कान्ति उदयकाल के कोटि कोटि सूर्यों के समान है।’

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-July
चिंतनधारा में साँसारिक लोग जिन्हें दुःख या सुख समझते हैं, वह मिथ्या-कल्पनाजन्य प्रतीत हुआ और उससे आगे बढ़कर ऐसे-ऐसे मार्ग, खोज निकाले, जिनके द्वारा इन दोनों से अतीत अवस्था का अनुभव किया जा सके। साधारणतया मनुष्य दुःख एवं सुख का कारण बाहरी वस्तुओं के संयोग एवं वियोग मानता है और इसी गलत धारणा के अनुकूल वस्तुओं व परिस्थितियों को उत्पन्न करने व जुटाने में व प्रतिकूल वस्तुओं को दूर करने में ही लगा रहता है। पर विचारकों ने वह देखा कि वस्तु की प्राप्ति से एक को सुख होता है और दूसरे को दुख। इतना ही नहीं, परिस्थिति की भिन्नता हो तो एक ही वस्तु व बात एक समय में सुख कर प्रतीत होती है और अन्य समय में वही दुखकर अनुभूत होती है। इससे वस्तुओं का संयोग-वियोग ही सुख, दुख का प्रधान कारण नहीं कहा जा सकता और इसी के अनुसन्धान में बाहरी दुःखों एवं सुखों में समभाव रखने का महत्त्व दिया गया।
चिंतन की उपज है, मानवता को एक करने की अधिक से अधिक क्षमता उसमें है पर उसके प्रकाश में जब हम समाज का दलित-गलित रूप देखते हैं तो ऐसा लगता है कि कभी इस राष्ट्र के लोक-जीवन में सामूहिक चेतना जग ही नहीं सकती, उसका विगत एक हजार वर्ष का इतिहास पराजय और आपसी घृणा का इतिहास है। वह ऐसी अचल जातों का ढेर है जिनमें न जीवन है और न ही गति। आशा-निराशावाद, हिंसा-अहिंसा और प्रवृत्ति-निवृत्ति की विचारधाराओं से इस साँस्कृतिक पतन का उतना सम्बन्ध नहीं जितना कि सदोष वर्णमूलक समाज व्यवस्था से। इसमें वह विष है जो साझेदारी के भाव को मार देता है और सामूहिक चेतना को कुण्ठित कर देता है। ऊँच-नीच की भावना से एक दूसरे के प्रति घृणा होने लगती है और फिर जातियों में द्वेष की परम्परा चल पड़ती है, जड़-समाज व्यवस्था में ऐहिक दुःख और विषमता से खीज कर, काल्पनिक सुख की खोज में परलोकवाद और मुक्ति की ओर झुकाव स्वाभाविक हो उठता है, मध्ययुग में हमने चारों ओर से अपने को समेट लिया और कछुआ धर्म ही जीवन का आधार बना लिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-January
चिंतन पद्धति कुछ समय के लिए आवेश रूप में नहीं वरन् स्थायी रूप में बदली जा सकेगी। जिस प्रकार प्लास्टिक सर्जरी से अंगों की काट-छांट करके कुरूपता को सुन्दरता में बदल दिया जाता है उसी प्रकार मस्तिष्क की विचारणा एवं सम्वेदना का आधार भी बदल दिया जाय जिससे वह सदा के लिए अपने मस्तिष्क चिकित्सक का आज्ञानुवर्ती बनने के लिए प्रसन्नतापूर्वक सहमत हो जाय।
चिंतन से छुटकारा मिल जाय और सृष्टि के अनवरत जन्म बुद्धि विनाश के अनिवार्य क्रम को समझ लिया तो मनुष्य शान्त सन्तुलित स्थिर सन्तुष्ट एवं सुखी रह सकता है। ऐसी देवोपम मनोभूमि पल पल में पग पग में स्वर्गीय जीवन की सुखद संवेदनाएं सम्मुख प्रस्तुत किये रह सकती है। चिन्तन में बैठे अज्ञानी बालक के ज्वार से प्रसन्न और भाटा से अप्रसन्न होने की तरह हमें उद्विग्न बनाये रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-June
चिंतन की विकृति का नाम ही दुख है इस कथन में कोई अत्युक्ति नहीं हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-December
चिंतन का एक भारी दोष, एक पक्षीय विचार करना है। हमें चाहिए कि हर कार्य के गुण-दोषों का उभय पक्षीय विचार करें और उसकी उपयोगिता-अनुपयोगिता पर समग्र विचार करने के उपरान्त किसी निर्णय पर पहुँचे।
चिंतन और चेतना के स्तर पर ही समुन्नत और पतित होती है सम्पन्न और दरिद्र बनती है उन्हें यह स्मरण भर दिलाना पर्याप्त होगा कि शरीर की तरह आत्मिक चेतना की भी कुछ भूख होती है और उसका साधन जुटाना पेट भरने की सामग्री जुटाने से कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही आवश्यकता है। घरेलू पुस्तकालय की स्थापना इसी अभाव की पूर्ति करती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-March
चिंतन-आस्था को प्रभावित करने वाला विचार प्रवाह-फिलॉसफी। उसका दूसरा प्रचलित अर्थ है- देखना। लोगों ने इस सस्ती प्रक्रिया को तत्व दर्शन के महात्म्य के साथ जोड़कर सारा गुड़ गोबर कर दिया। देखने को बहुत कुछ माना जाना लगा। लोग तीर्थ स्थानों को, मन्दिर प्रतिमाओं को, सन्त ज्ञानियों को देखने के लिए घर दौड़े और आँखों से देखे गये दृश्य को ही पर्याप्त समझकर यह मानने लगे कि हमें दर्शन का शास्त्र वर्णित सत्परिणाम प्राप्त हो जायगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-September
चिंतन बन पड़ता पर लगता है पतंग की तरह मन का उड़ाने वाला भी कोई और है, उसकी आकाँक्षा बदलते ही मस्तिष्क की सारी चिन्तन प्रक्रिया उलट जाती है। मन एक पराधीन उपकरण है-वह किसी दिशा में स्वेच्छा पूर्वक दौड़ नहीं सकता। उसके दौड़ने वाली सत्ता जिस स्थिति में रह रही होगी, चिन्तन की धारा उसी दिशा में बहेगी। मन को दिशा देने वाली मूल सत्ता का नाम ‘आत्मा’ है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-November
चिंतन के निषेधात्मक पक्ष में ही उलझे रहे। अपने आप को स्वस्थ, सुसम्पन्न, विद्वान आदि बनने की बात सोचते रहने, स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धी आदि की व्यक्तिगत लालसाओं में संलग्न व्यक्ति उस सहज आनन्द से वंचित रह जाते हैं जो सामाजिक जीवन बिताने वाले एवं सामूहिक चिन्तन करने वाले लोगों को मिलता है दूसरों के सुख-दुख में भागीदार होना, उनकी कठिनाइयों को समझना एवं सहायता करना ऐसा गुण है जिसके कारण व्यक्ति लोक प्रिय बनता है। स्नेह, सम्मान एवं श्रद्धा सौजन्य अर्जित करने वाला व्यक्ति वैभव सम्पादित करने में संलग्न, संकीर्ण, स्वार्थपरायण व्यक्तियों की तुलना में कहीं अधिक प्रसन्न रहता है। उसका मनोबल अनायास ही बढ़ता जाता हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-August
चिंतन बन पड़ता; पर लगता है पतंग ही तरह मन का उड़ाने वाला भी कोई और है, उसकी आकाँक्षा बदलते ही मस्तिष्क की सारी चिन्तन प्रक्रिया उलट जाती है। मन एक पराधीन उपकरण है- वह किसी दिशा में स्वेच्छा पूर्वक दौड़ नहीं सकता। उसके दौड़ने वाली सत्ता जिस स्थिति में रह रही होगी, चिन्तन की धारा उसी दिशा में बहेगी। मन को दिशा देने वाली मूल सत्ता का नाम ‘आत्मा’ है।
चिंतन प्रक्रिया को ठप्प कर देना, एक ही ध्यान में निमग्न रहना, नहीं वरन् यह है कि विचारों का प्रवाह नियत निर्धारित प्रयोजन से ही रुचि पूर्वक लगा रहे। यह कुशलता जिनकी करतल गत हो जाती है वे जो भी लक्ष्य निश्चित करते हैं उसमें प्रायः अभीष्ट सफलता ही प्राप्त करके होते हैं। बिखराव की दशा में चिन्तन की गहराई में उतरने का अवसर नहीं मिलता अस्तु किसी विषय में प्रवीणता और पारंगतता भी हाथ नहीं लगती। संसार में विशेषज्ञों का स्वागत होता है, यहाँ हर क्षेत्र में ‘ए-वन’ की माँग है और यह उपलब्धि कुशाग्र बुद्धि पर नहीं सघन मनोयोग के साथ सम्बद्ध है। यह मनोयोग का वरदान प्राप्त करने के लिए जो प्रयास व्यायाम करने पड़ते हैं उन्हें ही मनोमय कोश की साधना करते हैं।
चिंतन की दिशा और अवांछनीय परिस्थितियों को बदलने में संलग्न होना, जैसे उपाय अपना कर इस घातक मनोविकार से पीछा छुड़ाया जा सकता है जो देखने में छोटा दीखता है किन्तु जीवन की सरसता और सफलता को नष्ट भ्रष्ट करके रख देता है।
चिंतन क्षेत्र का कोलाहल मनुष्य को एक प्रकार से विक्षिप्त ही बनाकर रख देता है। ऐसा जीवन जीकर भला क्या कोई सुखी रह सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-July
चिंतन से बाहर की बात सोचना उनके लिये कठिन है क्योंकि कभी सामाजिकता की-सामाजिक कर्तव्यों की आवश्यकता उपयोगिता के बारे में उन्हें कभी जताया समझाया ही नहीं गया। जब वे घर के लोगों को रोकती हैं तो स्वयं तो उस दिशा में कुछ करेंगी ही क्या? यही कारण है कि जिनके पास अवकाश की बहुलता है वे नारी उत्कर्ष के कार्यों में कोई भाग नहीं लेतीं। उस दिशा में उनका तनिक भी उत्साह नहीं होता। निरर्थक कामों में किसी प्रकार समय तो काटेंगी, पर अपने वर्ग को दयनीय दुर्दशा से उबारने के लिये थोड़ा भी प्रयास न करेंगी।
चिंतन धीमा और हल्का होगा साथ ही उत्साह एवं स्फूर्ति में भी न्यूनता आवेगी तद्नुसार क्रिया का परिमाण स्वल्प रहेगा और मनुष्य आलसी एवं मन्द कमी बनती दिखाई देगी। सामान्य बुद्धि से ऐसी स्थिति अनुत्पादन होने के कारण अवांछनीय है। उससे प्रत्यक्ष प्रगति में बाधा पहुँचती है। आलसी और प्रमादी प्रायः होते भी इसी स्तर के हैं। यदि ऐसी स्थिति आदत बन जाय और शिथिलता, निरुद्देश्यता, निष्क्रियता की पर्यायवाची बन जाय तो निस्सन्देह वह हानिकारक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-April
चिंतन की दिशा सहयोग पूर्वक शान्ति एवं प्रगति के लिए प्रयुक्त हो सकने वाले आधारों को ढूँढ़ने के लिए प्रयुक्त होगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-June
चिंतन के लिए बहुत ही अनुकूल है। प्रत्येक आध्यात्मिक जिज्ञासु को सूर्योदय से दो घंटे पूर्व उठना आवश्यक है। महान पुरुषों के जीवन चरित्रों को देखा जाय तो ज्ञात होगा कि उनकी दिनचर्या सूर्योदय के दो तीन घंटे पूर्व से आरम्भ होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-April
चिंतन से ज्ञान हुआ, ज्ञान से अनासक्ति बढ़ी और उपासना, भजन से लोक-सेवा बढ़ी। मगर वैराग का पता नहीं लगा कि, मुझे वैराग कब से हुआ?
चिंतन करने लगा।
चिंतन बहुत किया, चिंतन से ज्ञान हुआ, ज्ञान से अनासक्ति बढ़ी और उपासना, भजन से लोक-सेवा बढ़ी। मगर वैराग का पता नहीं लगा कि, मुझे वैराग कब से हुआ?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-March
चिंतन किया करता है यह वह तर्क है जिनके द्वारा हमें यह मानने के लिये विवश होना पड़ता है चेतना से अधिक समर्थ और शक्तिशाली है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-April
चिंतन आदि से विकृत कर लिया जाये तो समझना चाहिए कि उत्कर्ष की संभावनाएं समाप्त हो गई और भविष्य को अन्धकार मय बना लिया गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-October
चिंतन करता है। नश्वर शरीर के लिए वह अपनी क्षमताएँ नष्ट नहीं करता, वरन् सत् की खोज, चित की स्वीकारोक्ति व आनन्द की अनुभूति में अपने जीवन का सदुपयोग कर परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-September
चिंतन क्षमता समाप्त हो जाये, नागरिक कर्तव्यों की छोटी छोटी बातों का उसे ध्यान न रहे, उसकी स्थिति गयी बीती हो जाती है जीवित होते हुए भी मृतवत वह अपनी लाश ढोता है। डिप्रेशन, न्यूरोसिस, साइकोसिस, ऐसे रोग है, जिनमें शारीरिक दृष्टि से पर्ण स्वस्थ होते हुए भी मनुष्य का अस्तित्व नहीं के बराबर होता है। एक बेचारा, जो सारा दोष परिस्थितियों को देता रहता है। किसी तरह अपनी जीवन की गाड़ी चलाता रहता है, वह दार्शनिक दृष्टि से मृत्यु की ओर अग्रसर होता माना जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-November
चिंतन ही कहा जाएगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-June
चिंतन योचित नहीं है। अपने परिवार को हमने बड़े आदमियों के समूह बनाने की बात कभी नहीं सोची। उसे महापुरुषों का देव समाज देखने की ही अभिलाषा सदा से रही वस्तुतः महा मानव बनना ही व्यक्तिगत जीवन का संकल्प और समाज का सौभाग्य माना जा सकता है। मनुष्य जीवन की सार्थकता महा मानव बनने में है। इसके अतिरिक्त आज की परिस्थितियां महा मानवों की इतनी आवश्यकता अनुभव करती है कि उन्हीं के लिये सर्वत्र त्राहि-त्राहि मची हुई है।
चिंतन−मनन किया जाना चाहिए और यदि वे उचित जंचे तो तद्नुकूल अपनी मनोभूमि एवं क्रिया-पद्धति में ढालने के लिए विचार किया जाना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-June
चिंतन, मनन और अनुभव पर मुझे गर्व था, वह मिथ्या हुआ। मेरे ये ग्रन्थ, जिन्हें मैं प्राणों से भी अधिक प्रिय समझता था, अब इन्हें आग में झोंक देना होगा, क्योंकि अन्य कोई मार्ग नहीं है। बस, आप एक बार अपने श्रीमुख से कह दे। "
चिंतन के परिप्रेक्ष्य में हम सभी इस प्रथम अध्याय को समझने का प्रयास करें, तो हमें पग-पग पर परोक्ष मार्गदर्शन की अनुभूति होगी। यह अध्याय अपने आप को अभूतपूर्व है। इसमें कहीं भी भगवान श्रीकृष्ण के नाम से उल्लेख नहीं आया है, जिसे हम पूरी गीत में " श्री भगवान उवाच" नाम से होता देखते हैं। मात्र एक छोटा सन्दर्भ अर्जुन द्वारा युद्धभूमि के मध्यक्षेत्र में रथ खड़ा किए जाने के पश्चात श्रीकृष्ण के हवाले से संजय ने कहा है - "उवाध पार्थ पश्येतान्स्म्वेतान्कूरुनिती।" (२५वें श्लोक का उतरार्द्ध) अर्थात् हे पार्थ।
चिंतन को गतिशील करेगी।
चिंतन उभरा, मैंने अपने जीवन में अब तक भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को नहीं उतारा। यदि उतारा होता तो विरक्तभाव में रमण करने वाला क्या मैं पुनः इस संसार में लौटने का प्रयत्न करता?
चिंतन, मनोयोग एवं श्रम कितने अधिक ऊँची भूमिका निभा सका? कितनी बड़ी छलांग लगा सका? यही आपकी अग्निपरीक्षा है। इसी में आपका गौरव और समर्पण की सार्थकता है। अपने साथियों को श्रद्धा व क्षमता घटने न दे, उसे दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ाते रहें।
चिंतन बराबर करते रहे हैं। समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का ख्याल करते रहे हैं। जनता के साथ हम बराबर रहे हैं। हमने अब अपने जीवन में एक नया मोड़ दिया है। नया मोड़ क्या है?
चिंतन को विकसित करने की दृष्टि हमें प्रदान करता है- हमें जीवन-संग्राम में नीति के पद पर चलने हेतु समग्र शिक्षण देता है।
चिंतन करते हुए जब मन ध्येय में ही निश्चल एवं विलीन हो जाता है, तो उसे तत्वचिंतक परमध्यान की संज्ञा देते है।
चिंतन, ईर्ष्या, द्वेष,क्रोध, भय, कम-वासना, आलस्य, अवसाद, निराशा जैसी तमाम तामसिक प्रवृत्तियां प्रकट होकर समाप्त होने लगाती हैं, इसलिए विकास की यह अवस्था एक प्रकार से शोधनकाल कहलाती है, जिसमें साधक अपरिष्कृत चेतना शुद्ध और परिष्कृत बनती है। जब इस स्तर से होकर कुण्डलिनी शक्ति आगे बढ़ती है, तो योगाभ्यासी को भयंकर मानसिक त्रास और अशांति झेलनी पड़ती है। इस स्थिति से उबार पाना सामान्य मनःस्थिति वालों के वश की बात नहीं। वही साधक इस अवस्था को सफलतापूर्वक पर कर पाते हैं, जो संकल्प शक्ति धनी हैं अथवा जिनमें समर्थ गुरु की कृपा प्राप्त है या जो लक्ष्य के प्रति सजग, समर्पित एवं निष्ठावान हैं।
चिंतन में हो, वेश में होना अनिवार्य नहीं। साधना से सिद्धि को उन्होंने परिष्कृत जीवन रूपी प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष के रूप में प्रतिपादित किया, प्रमाणित भी किया- स्वयं वैसा जीवन जीकर। हम ढेरों साधकों की जीवनी देखते है- परन्तु लोक उनसे क्या शिक्षण ले? क्या सभी हिमालय चले जाये, कुण्डलिनी जगाने के सम्मोहन भरे जाल में उलझकर जीवन संपदा गंवा बैठे- या मरघट में बैठकर तांत्रिक साधना करे? नहीं, उन्होंने लोकमानस के बीच रहकर उनके जैसा जीवन जीकर बताया है की अध्यात्म सौ फीसदी व्यावहारिक है, सत्य है एवं इसे उन्होंने अपनी जीवन रूपी प्रयोगशाला में स्वयं अपनाकर देखा व खरा पाया है।
चिंतन कितना विज्ञानसम्मत रहा है। जठराग्नि में प्रतिक्रियास्वरूप आमाशय में वायु रूपी पदार्थ उत्पन्न होते हैं। यदि इसे खचाखच भर दिया जाए, तो इन वायुरूपी पदार्थों का न केवल पेट पर अपितु हृदय पर भी दबाव पड़ता है। 'इन्जाइना' रूपी हृदय रोग इसी कारण आज अधिकाधिक लोगों में होते देखा जाता है। दूसरे जथर खाली न रहने से पाचक रस व भोजन का ठीक मिश्रण भी नहीं होता व पाचन सम्बन्धी कई रोग जन्म लेते है।
चिंतन-मनन कर सकूँ। भिक्षुक की आँखों में प्रसन्नता की चमक आ गयी। उन्हें अनुभव हो रहा था की तीर लक्ष्य तक पहुँच चुका है।
चिंतन प्रधान विषय होगा।
चिंतन करने को ध्यान कहते हैं ब्राह्मी भाव में निमग्न हो जाना भी ध्यान है। ध्येय में अवस्थित चित्त की एकाग्रता को ही ध्यान कहा जाता है
चिंतन को इसे पढ़ने पर केन्द्रित कर दिया। कुछ ही समय में वे अपने लिए दीपक बन गए। उनका चिंतन उभरा, मैंने अपने जीवन में अब तक भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को नहीं उतारा। यदि उतारा होता तो विरक्तभाव में रमण करने वाला क्या मैं पुनः इस संसार में लौटने का प्रयत्न करता?
चिंतन का साधक में अभाव है, तो स्वाधिष्ठान चक्र उसके लिए एक अभेद्य कवच की तरह है, जिसे हजार जन्मों में भी वह कदाचित पार कर सके।
चिंतन अथवा इन्द्रियों की अंतः वृत्ति प्रवाह के रूप में किया जाता है। पतंजलि महाभाष्य की उक्ति के अनुसार, ध्यान को एकाग्रता से जोड़ा जाता है। श्री अरविन्द के अनुसार ध्यान उस स्थित को कहते है, जब अंतर्मन वस्तुओं को उनका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिए देखता है। एकाग्रता का तात्पर्य है - एक स्थान या एक वास्तु पर और सहेज एक अवस्था में चेतना को केन्द्रित करना। योग में एकाग्रता उसे कहते हैं, जब चेतना किसी विशेष स्थित जैसे शांति में अथवा क्रिया में या अभिप्षा, संकल्प आदि में तल्लीन होती है।
चिंतन -मनन में। यदा -कदा कोई मृग शावक मुनि से सटकर बैठ जाता, शायद वह इसी बहाने हद्पुर्वक मुनि का लाड़ -दुलार पा लेना चाहता थे पर अंततः विफल प्रयासी हो, उसे पुलिनों की ओर चले जाना पड़ता। मुनि स्नानार्थ नदी की ओर बढ़ते . तो आश्रम का कोई - न-कोई शुक समूह उनके साथ ही मंडराता चलता, उन्हें भला एक निस्पृह मुनि से क्या भय हो सकता था। उस दिन ब्रह्ममुहूर्त "ओम् विशवनी देव सबितुर दुरितानि ... " का धीर -गंभीर स्वर आश्रम में एक विचित्र वातावरण की सृष्टि कर रहा था। मुनि अभी नेत्र निमीलित किये ध्यानावस्थित थे।
चिंतन में व्यस्त रखकर इस अवस्था से पर किया जा सकता है।
चिंतन में लीं भिक्षुक का न मालूम कितना समय व्यतीत हो गया। उन्हें दिन-रत का भान नहीं रहा। जब कई महीने बीत गए और भिक्षुक लौटकर नहीं आए, तो राजा उनकी कुटिया में पहुँचा। भिक्षुक को आत्मलीन देखकर निवेदन किया- भंते! पधारे, सत्ता सँभालकर अनुग्रहीत करें।
चिंतन यदि पवित्र है और भावनाएँ शुद्ध, तो इसका यह अर्थ है की व्यक्ति की समस्त निम्न प्रवृत्तियां उच्चस्तरीय तरंगों में रूपांतरित हो चुकी है। इसका तात्पर्य इतना ही हुआ की मस्तिष्क के वे केंद्र अब परिष्कृत चेतनासंपन्न बन गए।
चिंतन में डूबा रहता अथवा दारुण दुःख से आकुल-व्याकुल हो रहा होता है, जो मन मस्तिष्क पर बोझ की तरह लद जाते है। इनका शरीर-मन पर द्विविध प्रभाव पड़ता है। काया में सुस्ती, आलस्य लगती है और मन अवसादग्रस्त, अस्त−व्यस्त, उत्साहहीन तथा भारभूत-सा प्रतीत होने लगता है। इस दौरान जब व्यक्ति दहाड़ मर कर रोता है, तो अश्रुधारा के साथ वो तत्व बाहर निकल जाते है, जो मन को अन्यमनस्क और शरीर को अस्वस्थ जैसी स्थिति में निरंतर बनाये रहते है। इससे शरीर-मन हल्का हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-January
चिंतन में लगा दी जाय तो शान्ति के उस स्रोत तक पहुँच हो सकती है, जो हमारी अशान्तियों को हटाकर सुखद, शीतल और स्निग्ध शान्ति का आश्वासन देती है। इस प्रकार के विश्वास के उपरान्त नवीन चैतन्यता, स्फूर्ति और जीवनीशक्ति प्राप्त होती है, जो कार्यक्षमता, सूक्ष्मदर्शिता और प्रतिभा को कई गुना बढ़ा देती है।
चिंतन पद्धति एवं आहार-विहार में सुधार-परिवर्तन कर लेने से बहुत बड़ा प्रयोजन सिद्ध हो जाता है। भोजन भी सौम्य-सात्विक वस्तुएँ भूख के साथ तालमेल बिठाते हुए खाया जाय। स्वच्छता और नियमितता को सतर्कतापूर्वक अपनाया जाए और हँसते-हँसाते, हल्का-फुल्का जीवन जीने का अभ्यास किया जाय, तो तनावजन्य व्यथाओं से निश्चयपूर्वक छुटकारा पाया जा सकता हैं
चिंतन का प्रतीक मानना चाहिए। ईश्वर-प्रार्थना भजन-कीर्तन प्रवचन, मंत्रजप आदि जीभ से ही होते है। यदि जीभ का परिशोधन हो चुका है, तो उपर्युक्त सभी कार्य ठीक प्रकार बने पड़ेंगे और अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करेंगे। यदि जिह्वा कुधान्य खाने और कुसंस्कारिता के दुर्गुणों की अभ्यस्त है, तो फिर समझना चाहिए कि साधना-प्रयोजन के लिए जिह्वा के माध्यम से जो कुछ किया गया है, वह सभी निरर्थक चला जाएगा।
चिंतन-चेतना एवं भाव-संवेदना की त्रिधा भूमिका निभाने वाला यंत्र कहना अधिक समीचीन होगा।
चिंतन में लगाये रहती है, जिसे तात्त्विक दृष्टि से पूर्णतया निरर्थक कहा जा सके। किसी ने कुछ देर के लिए हमें साधन-सम्पन्न, अमीर, बड़ा आदमी जान या मान भी लिया तो अपना प्रयोजन सधा और क्या उसे लाभ हुआ?
चिंतन की अवांछनीयता को समझा जाय और अपनी अब तक की ढर्रे पर लुढ़कती हुई मान्यताओं के औचित्य को अस्वीकार किया जाय। काया-कल्प में पुराना शरीर छोड़ना पड़ता है और नया ग्रहण करना पड़ता है। विवाह होने पर वधू पितृ-गृह छोड़ती है, साथ ही अब तक का स्वभाव-अभ्यास उस नव- विवाहिता को पति के घर में जाकर नये स्वजनों से घनिष्ठता बढ़ानी पड़ती है और ससुराल की विधि-व्यवस्था में अपने को ढालना होता है। ठीक ऐसा ही परिवर्तन आन्तरिक काया-कल्प के अवसर पर करना पड़ता है। आत्मबोध एक प्रकार को वरण करना है।
चिंतन खराब है, तो वह किसी तरह उपयोगी नहीं। हमारे पास सम्पत्ति है, परन्तु कुछ उलटा हो जाये, अकाल पड़ जाये, आग लग जाये, तूफान आ जायें तो हमारी सारी सम्पत्ति स्वाहा हो सकती है। जिसके प्रति हमारा अहंकार है, लोभ है, मोह है, वह बेकार हो जाएगा।
चिंतन करना पड़ेगा और आश्रित, असमर्थ परिजनों की उचित व्यवस्था के अतिरिक्त जो कुछ उसके पास बच जाता है, उसे लोक-मंगल के लिए नियोजित करने का ही निर्णय करना पड़ता है। आत्म-बोध के साथ यदि इस स्तर का दुस्साहस जुड़ा हुआ न होता उसे बकवादी का बाल-विनोद ही कहा जाएगा। असंख्यों व्यक्ति, स्वाध्याय -सत्संग के नाम पर धर्म और अध्यात्म की लम्बी-चौड़ी बकवास करते और सुनते रहते है, जो चिन्तन-जीवन को प्रभावित न कर सके उसे मनोविनोद के अतिरिक्त और क्या कहा-समझा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-September
चिंतन एवं द्रष्टा स्तर की शक्ति ही थी वे लिखते हैं कि “दूसरे सैनिकों ने अपनी वर्दियाँ उतार दीं और राजमुकुट पहन लिए, पर अपने लिए आजीवन उस चिंतन-लक्ष्य की ओर चलते रहना ही धर्म बन गया है, जिसके ऊपर राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता निर्भर है। हमार विश्वास है कि बौद्धिक क्राँति की त्रिवेणी बहाए बिना तीर्थराज न बनेगा और उसमें स्नान किए बिना हमारे पाप ताप न कटेंगे। जन जागरण और लोकमानस में उत्कृष्टता आदर्शवादिता का बीजांकुर बोया जाना वस्तुतः इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण का अभिनव प्रयोग हैं हम इसी दूरगामी परिणाम वाली प्रक्रिया को हाथ में लेकर धर्म, साहस, निश्चय और प्रबल पुरुषार्थ के सहारे आगे बढ़ रहे हैं।
चिंतन में भी अस्तित्ववादी संकट और बौद्धिकता दोनों का समावेश हुआ है। इसका संबंध मानव की पूर्णता से उसके अंतिम लक्ष्य से है। यहाँ मानवीय जीवन की सर्वतोमुखी प्रगति आत्मोत्कर्ष मन शाँति एवं भौतिक समृद्धि के लिये विचार किया गया है। मानव के भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन के लिये भारतीय विचार पद्धति पथप्रदर्शक है। वेदांत दर्शन एवं उपनिषदों में यथार्थ सार्थक एवं समग्र ज्ञान तथा उसके प्रति बौद्धिक आचरण पर प्रकाश डाला गया है।
चिंतन-लक्ष्य की ओर चलते रहना ही धर्म बन गया है, जिसके ऊपर राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता निर्भर है। हमार विश्वास है कि बौद्धिक क्राँति की त्रिवेणी बहाए बिना तीर्थराज न बनेगा और उसमें स्नान किए बिना हमारे पाप ताप न कटेंगे। जन जागरण और लोकमानस में उत्कृष्टता आदर्शवादिता का बीजांकुर बोया जाना वस्तुतः इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण का अभिनव प्रयोग हैं हम इसी दूरगामी परिणाम वाली प्रक्रिया को हाथ में लेकर धर्म, साहस, निश्चय और प्रबल पुरुषार्थ के सहारे आगे बढ़ रहे हैं।
चिंतन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। परिष्कृत अध्यात्मतंत्र का पुनर्जीवन एवं उससे राजतंत्र की मूल धुरी जनमानस का भावनात्मक परिष्कार विचारक्रांति एवं ज्ञानयज्ञ के द्वारा किया जाने वाला पुरुषार्थ ही हम सबको संपन्न करना है। इस दिशा में जितनी जागरूकता हम जनमानस में पैदा कर सकेंगे उतना ही लोकतंत्र सशक्त व प्रभावी ताकत राष्ट्र प्रगति की दिशा में अग्रसर होगा। यह एक लंबा संग्राम है एवं संभवतः आगामी दो या तीन वर्ष तक चलने वाला विशेषतः संक्रमण-काल की इस विशेष अवधि में यदि हम पूज्यवर की विचार−चेतना पर पक्का विश्वास राष्ट्र शताब्दी के इस अंतिम चुनाव महोत्सव को जागरूकता समझदारी एवं देशभक्ति का पर्व मानते हुए सही प्रतिनिधि चुनने की आवश्यकता जन जन को समझाएँ तो निश्चित ही बदल दल समझा जाने वाला यह सशक्त तंत्र भी परिष्कृत हो स्थायित्व देने की स्थित में आ सकेगा।
चिंतन पद्धति ने यह साफतौर पर बताया कि विकास की समग्रता तभी है जब हम स्वयं की आँतरिक एवं बाह्य आध्यात्मिक एवं भौतिक दोनों अर्थों एवं स्तरों पर विकसित करे। इसके लिये जितनी आवश्यकता आध्यात्मिक विचारों एवं प्रक्रियाओं की है उतनी ही वैज्ञानिक सूत्रों एवं प्रयोगों की। मानवीय जीवन एवं समग्र एवं सार्थक विकास का अर्थ है जीवन में विचारों की त्रिविध आयामों का समावेश। विचारों के त्रिविध आयाम के रूप धर्म दर्शन एवं विज्ञान का समन्वित उद्देश्य ही मानव की पूर्णता को साकार करना है। वैज्ञानिक आध्यात्मवाद की अवधारणा इस अभूतपूर्व समन्वय की ही सार्थक परिभाषा है।
चिंतन का निचोड़ इन शब्दों में व्यक्त कर हमारा समाधान कर देते है। भौतिक सुधार करना राजतंत्र का क्षेत्र हैं भावनात्मक सुधार के लिए प्रजातंत्र के वातावरण में केवल धर्मतंत्र ही समर्थ हो सकता हैं धर्म और अध्यात्म को हमने मानवजाति की समग्र प्रगति के लिए नियोजित किया है। धर्ममंच अब तक प्रतिगामियों का दुर्ग समझा जाता रहा है, हमने उसे नई दिशा दी हैं अस्सी प्रतिशत देहातों में बसे एवं सत्तर फीसदी अशिक्षित देश में अपनी सुधारात्मक प्रक्रिया आँधी तूफान की तरह इसलिए सफल होती चली जा रही है कि हमने धर्मप्रथाओं एवं कलेवरों के बाह्य स्वरूप में हेर फेर किए बिना उनके मूल प्रयोजन में क्राँतिकारी परिवर्तन कर दिया हैं हम स्वस्थ राजनीति के विकसित हो सकने की संभावना वाला भवन बनाने में नींव के पत्थर मात्र बनकर रहेंगे और जो भी हमारे प्रभाव संपर्क में आएगा उसे इसी दिशा में प्रेरित आकर्षित करते रहेंगे।
चिंतन और आत्मबोध के क्षण होते हैं, उन क्षणों को जीआ जा सके तो चित्त में ध्यान और समाधि के फूल खिल उठते हैं। ‘विज्ञान भैरव’ तंत्र में इस तरह के कई अवसरों का उल्लेख है, जिसमें व्यक्ति अपनी आत्मचेतना के केंद्र में स्थिर होता है। संकट का सदुपयोग किया जाए तो बोध का एक सामान्य-सा भाव भी साधक की दिशाधारा मोड़ देता है।
चिंतन एवं एक सुनिश्चित लक्ष्य पूज्यवर हमारे समक्ष रख गए हैं। गुरु सत्ता ने प्रज्वलित संकल्पशीलों, प्राणवान, प्रतिभावानों की लक्ष्य संख्या एक से दो करोड़ निर्धारित की है। निश्चित ही गुरुसत्ता का भविष्यकथन मात्र पदार्थ यज्ञ नहीं, विभूति यज्ञ की ओर इंगित करता है। जिसका हवाला प्रारंभ में दिया गया था।
चिंतन और विचार अपने बारे में पूरी तरह से चैतन्य होता है तो वह अध्यात्म बन जाता है।
चिंतनशैली में प्रोटोगोरस ने जब अपना मंतव्य प्रकट करते हुए कहा कि सत्य तभी सार्थक है- जब वह इंद्रियों द्वारा ग्रहणशील हो। तब प्लेटो ने इसकी कटु आलोचना की थी। उन्होंने कहा कि सत्य के उच्चतर पहल इंद्रियातीत भी हो सकते हैं। आधुनिक यूरोपीय दर्शन में ह्यूम का मानना है कि ईश्वर, आत्मा आदि के संबंध में कोई वास्तविक या सार्थक दावा नहीं हो सकता। परंतु काँट ने किस्मत को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-March
चिंतन किया जाए, तब इनका तात्पर्य समझ में आएगा कि यह वास्तव में बाहर का खेल नहीं, भीतर का व्यापार है। इंद्र जैसे देवता और अप्सराओं को इतनी फुर्सत कहाँ कि वे लोगों को डिगाने की, गिराने की व्यवस्था करते रहें। श्रेष्ठ सत्ताएँ तो सदा आगे बढ़ाने और ऊँचा उठाने में सहयोग ही करती हैं। वे किसी को क्यों गिराने लगें? इतने पर भी यदि किन्हीं के समक्ष मेनका, रम्भा, उर्वशी जैसी स्वर्ग-सुन्दरियाँ उपस्थित होती हैं, तो यह यथार्थ में उनके मनोराज्य का बीजांकुर हैं।
चिंतन एक श्रेष्ठतम चिकित्सा-उपचार हो सकता है।
चिंतन, वातावरण और आदत में परिवर्तन-परिष्कार की आवश्यकता है। इतना यदि हो सका, तो विज्ञान द्वारा मनुष्य की एक सुविकसित प्रजाति के निर्माण का एक पहलू पूरा हो जाता है, कारण कि विज्ञान की अवधारण का ‘सुपरमैन’ हर दृष्टि से स्वस्थ, सुंदर और सुगठित होना चाहिए, जबकि अध्यात्म तत्त्वज्ञान में इसके लिए अंतरंग पक्ष को महत्त्वपूर्ण माना गया है।
चिंतन की आँधियों से विश्वयुद्ध व अराजकता का दौर-सभी कुछ संभव है।
चिंतन इसका कारण है। जब तक अपनी इन आदतों में व्यक्ति सुधार-संशोधन नहीं कर लेता, तब तक मूल समस्या ज्यों-की-त्यों बनी रहेगी। चिकित्साविज्ञानी बताते हैं कि गर्भकाल में आहार-विहार यदि शुद्ध-पवित्र नहीं हुआ, तो गर्भस्थ शिशु पर इसका प्रतिकूल असर पड़ता और बाद में अपंगता के रूप में सामने आता है। अनेक अवसरों पर ऐसा पाया गया है कि भ्रूण को पोषण देने अथवा प्रसव के स्वास्थ्य-संवर्द्धन हेतु जब आवश्यकता से अधिक दवाओं का सेवन किया जाता है, तो उसका दुष्परिणाम गर्भ में पल रहे बालक पर कायिक विकृति के रूप में प्रकट होता है। ऐसे ही उस दौरान यदि रहन-सहन में सावधानी बरती नहीं गई, तो उसका भी नतीजा वाँछनीय नहीं होता।
चिंतन, व्यवहार के रूप में होती है। यदि वह श्रेष्ठ और समुन्नत स्तर की हुई, तो मानव के महामानव बनते देर न लगेगी। जप, तप, व्रत, अनुष्ठान का विधान और विज्ञान इसी निमित्त विनिर्मित है, जो कषाय-कल्मषों को गला-जलाकर समाप्त करता और चेतना एवं साथ-साथ मनुष्य को अधिक प्रखर एवं पवित्र बनाता है। यह शुचिता और श्रेष्ठता ही महान बनने की प्रथम तथा अंतिम शर्त है। चूँकि उक्त राजमार्ग सभी के लिए समान रूप से खुला हुआ एवं अधिक व्यावहारिक तथा अपेक्षाकृत सुगम है, अतएव वर्तमान समय के लिए महामानव गढ़ने-ढालने का यही एकमात्र विकल्प हो सकता है- ऐसा मनीषियों का कथन है।
चिंतन को जन्म दे पाते हैं। तन्मय स्थिति में होना अर्थात् शरीर से परे होने का भाव पैदा कर स्वयं को विचार समुद्र में डुबा देना। लोकमान्य तिलक के जीवन की एक प्रसिद्ध घटना है कि जब उनके अँगूठे में एक फोड़े को चीरा लगाया जाना था, तो डॉक्टरों ने आपरेशन की गंभीरता बताकर दवा सुंघाकर बेहोश करने का प्रस्ताव रखा। उनने कहा कि “मैं अपने को गीता के प्रगाढ़ अध्ययन में लगा दूँ। आप बेखटके आपरेशन कर लें।
चिंतन प्रवाह का निरोध एवं तदुपरान्त ऊर्ध्वीकरण। इसके लिए निराकरण ध्यान भी किया जा सकता है व साकार भी। कई व्यक्ति इसी ऊहापोह में रहते हैं कि कौन-सा ध्यान श्रेष्ठ है-निराकार या साकार। ध्यान उपासना के साथ जब भी जोड़ा जाता है, वह आत्मिक प्रगति के साथ भौतिक प्रगति का भी लक्ष्य पूरा करता है। ईश्वरप्राप्ति-जीवनलक्ष्य की प्राप्ति जैसे महानतम उद्देश्यों के कारण उपासना व ध्यान परस्पर जोड़कर किये जाते हैं व तुरंत लाभ भी देते हैं।
चिंतन आवश्यक है।”
चिंतन किया जा सकता है।
चिंतन- परिधि चूँकि स्थूलशरीर तक सीमित है, इसलिए वे इसी में सुधार-संशोधन कर मनुष्य को श्रेष्ठ और संस्कारवान बनाने की बात सोचते हैं। विज्ञान की अवधारणा में मनुष्य के संस्कार कोष उसके ‘जीन’ हैं। इसी के गर्भ में इसकी समस्त अच्छाइयाँ और बुराइयाँ छुपी हुई होती है। यदि वह अपराधी, हत्यारा, चोर-डकैत क्रूर-कठोर है, तो इसके लिए इसका जीन जिम्मेदार है और यदि वह संत हृदय जैसा सरल, शिष्ट और सदाचारी है, तो इसके पीछे भी उसी ‘जीन’ की भूमिका है। चाहे वंशानुगत रोग हो या त्वचा की स्निग्धता, बालों का रंग हो या स्वभाव का चंचलता- सभी के लिए वह समान रूप से उत्तरदायी है-यहाँ शरीर-शास्त्रियों का कहना है कि यदि ऐसा है, तो उक्त विकृति (जन) को निकालकर अथवा नवीन श्रेष्ठ जीन प्रत्यारोपित कर व्यक्ति के स्वभाव और संस्कार को उदात्त बनाया जा सकता है।
चिंतन का अभ्यास करने की बात पर बार-बार जोर दिया जाता रहा है। तन्मयता की फलश्रुतियाँ अपार हैं। वैज्ञानिकगण अपने विषय में तन्मय हो जाते हैं और विचार समुद्र में गहरे गोते लगाकर नई-नई खोजों के रत्न ढूँढ़ लाते हैं। साहित्यकार-चिंतक-मनीषी तन्मयता के आधार पर ही राष्ट्रोत्थान के, समाज के नवनिर्माण के चिंतन को जन्म दे पाते हैं। तन्मय स्थिति में होना अर्थात् शरीर से परे होने का भाव पैदा कर स्वयं को विचार समुद्र में डुबा देना।
चिंतन की समर्थता जब शरीर की स्वस्थता-अस्वस्थता को प्रभावित कर सकती है, तो उदरदरी में विकास की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरने वाले कोमल माँस पिण्ड पर उसका कितना घातक असर होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। इसलिए इस संदर्भ में गर्भपात की नहीं, चिंतन, वातावरण और आदत में परिवर्तन-परिष्कार की आवश्यकता है। इतना यदि हो सका, तो विज्ञान द्वारा मनुष्य की एक सुविकसित प्रजाति के निर्माण का एक पहलू पूरा हो जाता है, कारण कि विज्ञान की अवधारण का ‘सुपरमैन’ हर दृष्टि से स्वस्थ, सुंदर और सुगठित होना चाहिए, जबकि अध्यात्म तत्त्वज्ञान में इसके लिए अंतरंग पक्ष को महत्त्वपूर्ण माना गया है।
चिंतन करते हैं। स्कूल-कालेजों में पढ़ाया जाने वाला विकासवाद शारीरिक विकासयात्रा की व्याख्या-विवेचना भर करता और यह बताता है कि उसका वर्तमान स्वरूप इस स्तर तक किस प्रकार विकसित हुआ। आदमी के संबंध में उसकी मान्यता है कि उसका वर्तमान शरीर चिंपांजी अथवा गोरिल्ला प्रभृति प्राणियों से विकसित हुआ है। इसका प्रमाण वह क्रोमैग्नन, नीण्डरथल आस्ट्रेलो-पिथैकस एपमैन जैसी कितनी ही आदिमानव प्रजातियों की श्रृंखलाबद्ध कड़ियों द्वारा जोड़-तोड़कर देता है और कहता है कि वर्तमान मनुष्य का इसी प्रकार क्रमिक विकास हुआ। जहाँ कोई कड़ी नहीं मिलती, उसकी व्याख्या के लिए नवीन सिद्धांत गढ़ देता है।
चिंतन में क्राँतिकारी परिवर्तन कर उसे उत्कृष्टता की दिशाधारा में सोचने हेतु विवश करने वाली वह संजीवनी साधना ही रही है, जिसे आप चाहें तो गायत्री महाशक्ति कह सकते हैं अथवा विचारक्रांति अभियान अथवा यज्ञों के माध्यम से मानवमात्र का नवनिर्माण करने वाली युगांतरीय चेतना।
चिंतन में उसका प्रवेश चेतना जगत का, इस युग का अणु विस्फोट है। आत्मशक्ति के संवर्द्धन से युगशक्ति के उद्भव की यह विस्फोटक प्रक्रिया क्या रंग लाएगी, इसे हम आने वाले कुछ समय में देखेंगे। हम जहाँ भी हैं, जिस भी स्तर के साधक है, यदि इस विशिष्ट वेला में कुछ विशिष्ट कर दिखाने हेतु तत्पर हो जाएँ तो अपने सौभाग्य को कुछ वर्षों बाद हम ही सराहेंगे। अपनी समझदारी को जो समय पर अपना ली गयी, बार-बार धन्यवाद देंगे।
चिंतन करेगा, आचरण और कृत्य भी वैसे ही होंगे; लेकिन औसत आदमी की तरह यदि वह भी भौतिकवादी हुआ, तो बाहरी आकर्षणों में ही संपूर्ण जीवन फँसा रहेगा। एक ज्ञानी और सामान्यजन में यही अंतर है। ज्ञानी यहीं पर पत्थरों में छिपे परमात्मा को देख लेता है, जबकि संसारी सर्वव्यापी परमात्मा में केवल पत्थर को- मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर और गुरुद्वारे को देख पाता है। सब कुछ देखने के तरीके पर निर्भर है। बाहर वही सब दिखलाई पड़ता है, जो मन के अंदर है।
चिंतन के परिचायक स्वरूप में बदल गया है, यह एक विडंबना ही है। समाज में पारस्परिक सामंजस्य, समरसता-एकत्व स्थापित करने के लिए जिस पर्व का प्रावधान ऋषिगणों ने किया था, उसकी यह छीछालेदारी होगी-यह कभी सोचा भी न था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-February
चिंतन में पवित्रता का समावेश किए जाने के लिए साधनात्मक प्रयास इंद्रिय, समय, अर्थ व विचार चारों स्तर पर संयम किए जाने के माध्यम से संपादित होने चाहिए। आध्यात्मिक चिंतन ही स्वच्छ मन का जन्मदाता माना जाना चाहिए। अपने-अपने इष्ट के प्रति समर्पण भाव जब राष्ट्र देवता के प्रति समर्पण में रूपान्तरित होता है, तो ऐसा मन समष्टि के साथ मिलकर एक विराट-समूह मन का निर्माण करता है जिसमें परिवर्तन हेतु अनिवार्य क्राँतिकारी शक्ति होती है।
चिंतन ही स्वच्छ मन का जन्मदाता माना जाना चाहिए। अपने-अपने इष्ट के प्रति समर्पण भाव जब राष्ट्र देवता के प्रति समर्पण में रूपान्तरित होता है, तो ऐसा मन समष्टि के साथ मिलकर एक विराट-समूह मन का निर्माण करता है जिसमें परिवर्तन हेतु अनिवार्य क्राँतिकारी शक्ति होती है।
चिंतन का प्रवाह भी बदलता देखा जाता है- सभी की मिल- मिल−जुलकर की गयी साधना एक विराट समूहमन का निर्माणाधीन ब्रह्माण्ड में एक नहीं लाखों मिसाइलों का काम करती है। अपने राष्ट्र ने गायत्री मंत्र की उपेक्षा करके अपना वर्चस्व खोया था एवं अब युगऋषि-अवतारी सत्ता के परम पुरुषार्थ से यह श्रेय भारत को ही मिलने जा रहा है कि सारे भारत ही नहीं, विश्वभर में इस मंत्र को चप्पे चप्पे में गूँजता-निनादित होता सुना जाएगा एवं इसी के आधार पर भारत पुनः जगद्गुरु के रूप में स्थापित होने की प्रक्रिया संपन्न करेगा। भारत चक्रवर्ती था- सारे विश्व का मार्गदर्शन करता था, अब चप्पे-चप्पे में साधना शक्ति के गायत्री मंत्र की प्रेरणाओं के समावेश से यह पुनः सारे विश्व का नेतृत्व करेगा, भारतभूमि, देवभूमि-तपोभूमि एक विराट तीर्थ बनेगी, इसमें रंचमात्र भी सन्देह न कर, निज को साधनात्मक पुरुषार्थ में नियोजित कर ही देना चाहिए।
चिंतन-पद्धति आरोग्य, प्राणशक्ति, चरित्र, इच्छाशक्ति।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-May
चिंतन एवं श्रीमद्भागवतगीता का मर्म इन दो विषयों को गुंथकर व्याख्यापरक शैली में प्रतिमाह इसे प्रस्तुत करेंगे। यह क्रम अठारह अध्याय की टीका समाप्त होने तक चलता रहेगा। इससे आज के युगसंधि काल में युगगीता का हम सबके लिए क्या मार्गदर्शन है, कैसे विभिन्न उदाहरणों के द्वारा गीता कि गूढ़ विवेचनाओं को आत्मसात् का जीवन में उतारा जा सकता है, इस पर व्यवहारिक आध्यात्म की भाषा में सन्देश पाठकों को प्राप्त होगा। प्रथम कड़ी में हम गीता माहात्म्य प्रसंग ले रहे है।
चिंतन करने का उल्लेख है।
चिंतन और व्यवहार ओछे स्तर के व्यक्तियों जैसा हेय और हीन होता है।मानसिक और भावात्मक समस्याओं से वह पग-पग पर दो-चार होता रहता है, किन्तु जैसे ही इन भूमिकाओं से ऊँचा उठकर साधक मणिपूरित की वास्तविक मानवी भूमिका में अधिष्ठित होता है, समाज और संसार की परिभाषा परिवर्तित हो जाती है जो मन खीझ और कुढ़न से पहले परेशान रहता था, वही अब उत्फुल्लता के आनंद से ओत-प्रोत रहने लगता है।
चिंतन ही होता है। जीवन में सार्थक कार्य के अभाव में या खाली व निठल्ला व्यक्ति इससे अधिक ग्रसित पाया जाता है। ऐसा व्यक्ति जीवन को भार की तरह ढोता फिरता है और अपनी ही कुंठाओं के कारण उसे स्थाई थकान की शिकायत बनी रहती है। ऐसी थकान को अनिद्रा या नींद की कमी पूरी करने के लिए नींद की गोली खाने से तात्कालिक राहत तो मिलती है, किन्तु थकावट यथावत बनी रहती है। नींद न आने से उतना नुकसान नहीं होता, जितना नींद की गोलियाँ खाने से होता है।
चिंतन में लीन थे। वे सोच रहे थे सृष्टि का निर्माण कैसे करूं? इसी असमंजस में पड़े हुए, ब्रह्मा को एक आकाशवाणी सुनाई दी, जो कह रही थी- तप कर! तप कर!! ब्रह्माजी आकाशवाणी को ईश्वरीय आदेश मानकर तप में संलग्न हो गए। उन्होंने लम्बे समय तक घोर तप किया और उसी के बल पर उन्हें सृष्टि के निर्माण की क्षमता प्राप्त हुई। पुरुषार्थ और साहस करके ही ब्रह्माजी ने कुछ पाया था।
चिंतन के अनुरूप व्याख्या-विवेचना कर लेता और उसके प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाता है। इसके विपरीत जब कुण्डलिनी शक्ति और स्वाधिष्ठान जैसे पशु-स्तरीय भूमिकाओं में अधिष्ठान करती है, तो व्यक्ति औसत स्तर के लोगों जैसी सांसारिक उलझनों में उलझा रहता है। उसका चिंतन और व्यवहार ओछे स्तर के व्यक्तियों जैसा हेय और हीन होता है।मानसिक और भावात्मक समस्याओं से वह पग-पग पर दो-चार होता रहता है, किन्तु जैसे ही इन भूमिकाओं से ऊँचा उठकर साधक मणिपूरित की वास्तविक मानवी भूमिका में अधिष्ठित होता है, समाज और संसार की परिभाषा परिवर्तित हो जाती है जो मन खीझ और कुढ़न से पहले परेशान रहता था, वही अब उत्फुल्लता के आनंद से ओत-प्रोत रहने लगता है।
चिंतन और साधनों का अधिकांश भाग उस बीजारोपण में लगाना पड़ा है, जो अगले दिनों सतयुग की फसल के रूप में फलता-फूलता दिखाई पड़ेगा। अगली शताब्दी में ऐसा परिवर्तन कर दिखायेगा जिससे ना भूत ना भविष्यति की संज्ञा सके। पिछले सतयुग में आध्यात्म की ही वरिष्ठता थी। विज्ञान का उन दिनों इस स्तर तक उभर और प्रचलन नहीं हुआ था। पर अब तो बुद्धिवाद, विज्ञान की प्रमुखता है, कमी केवल एक ही है- इसके साथ अध्यात्म का समावेश नहीं हो सकता।
चिंतन में आमूलचूल परिवर्तन, यही अवतारी चेतना के प्रकट होने का प्रबलतम संकेत है। जिन-जिन के अन्दर यह रुझान तेजी से बढ़ता दिखाई देगा -उनके अन्दर अवतारी चेतना प्रवेश उतनी ही तेजी से होगा। विचार परिवर्तन एवं इसमें निमित्त अपना सब कुछ सर्वस्व लगा देना ही इस समय का युगधर्म है।
चिंतन किया है अथवा जीवनशैली बदली है, उसे लोकभर्त्सना के साथ आत्मा की धिक्कार भी सुननी पड़ी है। ( प्रतिभाओं को प्रशिक्षण हेतु भावभरा आमन्त्रण )
चिंतन को निरस्त करने हेतु एक व्यापक ज्ञानयज्ञ उन्होंने रचा। सबसे बड़ी बात गायत्री व यज्ञ को एक सीमित दायरे से निकलकर उसे जनसुलभ बना दिया। यह अवतारी स्तर की जगद्गुरु स्तर की चेतना ही कर सकती है। पूज्यवर कहते है -हर अवतार ने अपने समय की विकृतियों के समाधान का नेतृत्व अवश्य किया, पर उनके पीछे वस्तुतः अपार जनशक्ति थी। जनशक्ति ही वह चंडी है जो असुरता का समग्र वध करने में समर्थ है।
चिंतन को जीवन का अभिन्न अंग बनायें। इस तरह स्वयं ही स्फूर्ति एवं आनंद के साथ जीवन प्रगतिशील एवं विकसित रहेगा।
चिंतन आर्षवचनों के परिप्रेक्ष्य में पढ़ते है तो ज्ञात होता है कि कितनी दूरदर्शिता से दिव्यद्रष्टा होने के नाते वे यह सब डेलीरूटीन (दिनचर्या) को व्यवस्थित बनाने के लिए लिख गये है।
चिंतन करने वाला व्यक्ति स्वामी श्रद्धानन्द बन गया। आदर्शवादिता की ओर अग्रसर कर देने वाला विवेक बड़ा महान है। विवेक मनुष्य को कहाँ-से-कहाँ उछालकर ले जाता है। सिद्धियाँ मनुष्य के भीतर पड़ी है। अगर विवेक के आधार पर हम चले, तो सब कुछ प्राप्त कर सकते है।
चिंतन, अव्यवस्थित कार्यपद्धति व भावनात्मक जटिलताएं उसकी जीवनीशक्ति को निचोड़कर थकान के सघन तमस में धकेल रही है।
चिंतन।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-July
चिंतन धन एवं प्रभाव का समय के अनुपयोग दुरुपयोग एवं अव्यवस्था ढूँढ़े और उसे साहसपूर्वक सुधारें अभ्यस्त ढर्रे की समीक्षा करें और उसमें अधिकाधिक प्रगतिशीलता का समावेश करने के लिए प्रयत्नशील रहें।
चिंतन
चिंतन करने से भीतर से एक स्फुरणा उत्पन्न होती है। यदि वह स्फुरणा कायम रखी जा सके तो मनुष्य जागरूक बन सकता है।
चिंतन।
चिंतन मस्तिष्क में हावी हो जाता और चिंतन तंत्र को इस कदर अपनी पकड़ में ले लेता है कि व्यक्ति एकदम असहाय अनुभव करने लगता। ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, प्रतिशोध का वेग रोके नहीं रुकता, जिससे साधक बुरी तरह चिड़चिड़ा और अस्थिर हो जाता है। उसके चिड़चिड़ेपन का हाल यह होता है कि एक छोटे से सवाल का जवाब भी वह सरलता और शालीनतापूर्वक नहीं दे पाता, जबकि अस्थिरता इतनी विकट होती है कि यदि अभी वह शाँत एकांत बैठा है तो अगले ही पल किसी से झगड़ा करता दिखाई देगा। एक दिन तो वह सबेरे आठ बजे तक सोता रहेगा, किंतु दूसरे
चिंतन और व्यवहार में पारिवारिकता के सिद्धान्तों का अधिकाधिक समावेश करें।
चिंतन मनन में मन को लगाए। कुविचार आते ही उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनसे लड़ने के लिए खड़ी कर दें। नित्य हिसाब रखें किन्तु सत्प्रयोजनों में कृपणता भी न बरतें। संग्रही न बनें पर आमदनी से खर्च कम रखें कुछ बचत करें, उधार लेने की आदत न डालें। अपने प्रभाव का ऐसा उपयोग करें, जिससे संपर्क क्षेत्र की दुष्प्रवृत्तियाँ घटे और सत्प्रवृत्तियों का बीजारोपण और परिपोषण उभारे।
चिंतन कर जीवन जीवन संग्राम में प्रवेश किया जाय तो कही किसी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं होगी धैर्य रखने वाले संकल्प के धनी एवं शौर्यभाव से भरे लोकनायकों की हमें अगले दिनों अधिकाधिक आवश्यकता होगी। ऐसे ही व्यक्ति सच्चा शिष्यत्व जाग्रत कर लोकशिक्षण से लेकर नवनिर्माण कर सकते है। यह सब लक्षण अर्जुन में दिखाई देते हैं। हमारे लिये एक आदर्श नायक के रूप में अर्जुन उभर कर आता है। इसी क्रम में को अब आगे बढ़ाते है,
चिंतन तंत्र को इस कदर अपनी पकड़ में ले लेता है कि व्यक्ति एकदम असहाय अनुभव करने लगता। ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, प्रतिशोध का वेग रोके नहीं रुकता, जिससे साधक बुरी तरह चिड़चिड़ा और अस्थिर हो जाता है। उसके चिड़चिड़ेपन का हाल यह होता है कि एक छोटे से सवाल का जवाब भी वह सरलता और शालीनतापूर्वक नहीं दे पाता, जबकि अस्थिरता इतनी विकट होती है कि यदि अभी वह शाँत एकांत बैठा है तो अगले ही पल किसी से झगड़ा करता दिखाई देगा। एक दिन तो वह सबेरे आठ बजे तक सोता रहेगा, किंतु दूसरे
चिंतन में निमग्न इसी विषय पर सोच रहे थे हर पल उनके चेहरे के भाव बदल जाते, जिससे ऐसा प्रतीत होता कि ऋषि भी प्रस्तुत संकट के प्रति उतने ही चिंतित है जितना कि जन-सामान्य कभी कभी उनके मन में विचार उठते -तू क्यों वृथा परेशानी मोल ले रहा है? किंतु दूसरे ही पल इसके विपरीत विचारधारा हुँकारती सुनाई पड़ती -तो तू क्या मूकदर्शक बना रहेगा? तेरी अंतरात्मा तुझे धिक्कारती क्यों नहीं? समाज के सामने इतनी गंभीर समस्या आ उपस्थित हुई है और तू अपनी ध्यान -साधना के पीछे -अपने स्वार्थ एवं अपनी उन्नति के पीछे भाग रहा है। अपनी निज की उन्नति के पीछे।
चिंतन चरित्र, स्वभाव पर आधारित व्यक्तित्व का पड़ता है इस प्राथमिक आवश्यकता की पूर्ति प्रज्ञा अभियान के हर सदस्य-युगशिल्पी को पूरी करनी चाहिए-इस संदर्भ में मोटी मर्यादाएँ यह है-
चिंतन का पर्व है। इस शताब्दी की अंतिम गुरुपूर्णिमा, व्यास-पूर्णिमा पर हम सभी शपथ लें कि अपनी गुरुसत्ता की जन्म शताब्दी (2010-11) तक बिना कोई विकार मन में लाए बिना किसी विराम के अपनी श्रद्धा शाँतिकुँज के प्रति-आराध्य सत्ता के प्रति तनिक भी कम न होने देंगे। न किसी की होने देंगे, उज्ज्वल भविष्य लाने को उतारू महाकाल की सत्ता हमारी गुरुदक्षिणा के बदले हमें क्या कुछ नहीं देती रही है व क्योंकर नहीं देगी, यह विश्वास तो सभी को होना ही चाहिए।
चिंतन को विवश कर दें, मानना चाहिए कि यहाँ हमारे कषाय-कल्मषों के शोधन की घड़ी है। हम जब कभी भी परमपूज्य गुरुदेव, परम वंदनीय माता जी के निर्देशों का स्मरण करते है तो उनके अपनत्व ममत्व को याद कर कभी हमारा मन रोने को कहता है क्या। यदि हाँ तो यह एक शुभ चिन्ह है। यदि वही स्मरण कर हम अपना सतत् परिशोधन करते रहे तो गीता का यह उपदंश सार्थक हो सकता है। शिष्यत्व के जागरण के लिए इस स्थिति में जाना बड़ा अनिवार्य है।
चिंतन करें कि एक अच्छे शिष्य के नाते हमारे अपने समर्पण में कही कोई कमी तो नहीं। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं परम वंदनीया माता भगवती देवी जी ने बीज बोने एवं खाद-पानी जुटाने की व्यवस्था की। जिनकी अन्तर्भूमि में थोड़ी भी उर्वरता-सुसंस्कारिता थी, उन्हें अवसर मिला उनके अगाध स्नेह व साधना अनुदान पाने का। यह पर्व उन सभी शिष्यों के लिए आत्मचिंतन का पर्व है। इस शताब्दी की अंतिम गुरुपूर्णिमा, व्यास-पूर्णिमा पर हम सभी शपथ लें कि अपनी गुरुसत्ता की जन्म शताब्दी (2010-11) तक बिना कोई विकार मन में लाए बिना किसी विराम के अपनी श्रद्धा शाँतिकुँज के प्रति-आराध्य सत्ता के प्रति तनिक भी कम न होने देंगे।
चिंतन की बात कही गयी थी। इस प्रारंभिक समीक्षा के बाद हम अर्जुन की मनःस्थिति देखने का प्रयास करते है। अर्जुन व दुर्योधन दोनों की तुलना करने का प्रयास करें तो हमें जानकारी मिलती है कि प्रारंभ में जहाँ दुर्योधन ने भीष्म पितामह एवं गुरु द्रोणाचार्य को वर्ण बताने के साथ व्यंग्य भी कसा है, यह भी परोक्ष रूप से कहने का प्रयास किया है कि वे कही ममत्ववश अपने शौर्य को भुला तो नहीं बैठे। उसकी इसी वृत्ति के कारण उसका शिष्यत्व ही नहीं, मनुष्यत्व भी जाग्रत नहीं हो पा रहा। पाँडवों में युधिष्ठिर है किंतु वे धर्मराज है।
चिंतन के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का प्रयास किया रहा है। मई 19 के अंक से प्रारंभ हुई यह श्रृंखला समग्र गीता पर व्यवहारिक समीक्षा करती हुई क्रमशः चली रहेगी। विगत अंक में विषाद योग जो प्रथम अध्याय की धुरी है के पूर्वार्द्ध पक्ष पर चर्च की थी। कहा गया था कि कैसे गीता के श्लोकों के द्वारा वेदव्यास हमें बताते है कि हमें हर परिस्थिति पर सम्यक् विचार करना चाहिए पराक्रम-वीरता बलिष्ठता अपनी जगह है, परन्तु विवेक सम्मत चिंतन कर जीवन जीवन संग्राम में प्रवेश किया जाय तो कही किसी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं होगी धैर्य रखने वाले संकल्प के धनी एवं शौर्यभाव से भरे लोकनायकों की हमें अगले दिनों अधिकाधिक आवश्यकता होगी। ऐसे ही व्यक्ति सच्चा शिष्यत्व जाग्रत कर लोकशिक्षण से लेकर नवनिर्माण कर सकते है।
चिंतन धन एवं प्रतिभा के रूप में उपलब्ध क्षमताओं का महत्व समझें और उनके सदुपयोग से प्रगति पथ पर अग्रसर होने की बात सोचें इन विभूतियों का एक कण भी बर्बाद न होने दें। अपव्यय अपने ही उज्ज्वल भविष्य का विनाश है।
चिंतन की हानियाँ समझें। दिनचर्या बनाए और कठोरता पूर्वक पालन करें न श्रम से जी चुराएं न समय को प्रमाद में गँवाए। स्वाध्याय की आदत डालें आत्म-निर्माण की योजना बनाने के चिंतन मनन में मन को लगाए। कुविचार आते ही उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनसे लड़ने के लिए खड़ी कर दें। नित्य हिसाब रखें किन्तु सत्प्रयोजनों में कृपणता भी न बरतें।
चिंतन इस पर्व के विषय में करते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि हमारी साँस्कृतिक विरासत के रूप में परमसत्ता के अनुदान के रूप में अपनी श्रद्धा आस्था को परिमार्जित कर आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ाने वाला त्योहार है यह। ‘गुरु बिन ज्ञान नहीं रे - नहीं रे’ गीत के माध्यम से जब यह पंक्ति कही जाती है - गुरु बिन जीवन ऐसा होता, जैसे प्राण नहीं रे, नहीं रे’ तो आभास होता है कि गुरु का सान्निध्य पाना - उनके आर्षवचन, सूक्ष्म संरक्षण को पाना कितना विलक्षण सौभाग्य है। आदिकाल से ही भारतवर्ष में यह परंपरा चली आयी है कि गुरु अपने ज्ञान द्वारा उचित पात्र समझे गए शिष्य पर पड़े अज्ञान-अविद्या के पर्दे को हटाएँ व उसका उँगली पकड़कर मार्गदर्शन करें। अज्ञान के अंधकार से ज्ञान का अंजन उसकी आँखों में लगाकर शिष्यों को जीवनमुक्त करें, यह दायित्व गुरु को ही सौंपा गया। जीवनविद्या के लुप्त होते चले जाने की आज की स्थिति में इस गुरु-शिष्य परंपरा के पुनः प्रतिष्ठित किए जाने की कितनी आवश्यकता है, इसे कोई भी समझ सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-November
चिंतन-मनन करो, उसी को अपने सपने में पा लो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, स्नायुतंत्र व समूचे अंग-प्रत्यंगों को इसी आदर्श के विचार से ओत−प्रोत कर दो और अन्य विचारों को एक तरफ हटा दो। फिर देखो सफलता कैसे तुम्हारे कदम चूमती है। यदि तुम अपना जीवन सफल बनाना चाहते हो व समूची मानवजाति के लिए वरदान बनना चाहते हो तो तुम्हें गहराई में जाना होगा। दृढ़ निश्चयी व्यक्ति को उसका लक्ष्य रूपी ध्रुवतारा बड़ी-से-बड़ी बाधाओं को पार करने की शक्ति देता है।
चिंतन करने लगते हैं। जीवन की सारी सरसता इस एक ही कठिनाई से समाप्त होती प्रतीत होने लगती है और कई बार इस स्थिति में ऐसे आत्मघाती कदम उठा लिए जाते हैं, जो हर दृष्टि से हेय और हीन कहलाने योग्य हैं। परिस्थितियों की यह दासता दुर्बल मनःस्थिति के कारण पैदा होती है एवं कमजोर मनःस्थिति मन के निम्नतलों में अवस्थान की परिणति है।
चिंतन है। बस, इन्हीं बाल-बच्चों जैसे खिलौनों से खेलते रहते हैं। भगवान् की पूजा के लिए इन खेल-खिलौनों के अतिरिक्त हम और हिम्मत नहीं कर सकते।
चिंतन से लोगों को छुड़ाएँ और कुमार्ग पर चलने से लौटाने का प्रयास करें। यह कार्य प्रत्यक्षतः झंझट भरा है। तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण प्रस्तुत हुए अपने प्रतिवेदन का औचित्य तो अकाट्य सिद्ध किया जा सकता है, पर उस हठवादिता के लिए क्या किया जाए, जो आम आदमी पर विशेषतया अनगढ़ वर्ग पर पूरी तरह सवार देखी जाती है। ऐसी दशा में उपदेष्टाओं का परामर्श भी अरण्यरोदन बनकर रह जाता है। बहुतों को बहुत बातें समझाते रहने पर भी लोग आदर्शों की ओर मुड़ने को तैयार नहीं हैं, लाभ की हानि और हानि को लाभ समझने की दृष्टि जो उनकी परिपक्व हो गई है।
चिंतन के अभ्यास से संचित संस्कारों पर निर्भर हैं। कई व्यक्ति बड़ी घटना को भी छोटी मानते हैं और किन्हीं की कल्पना में छोटी घटना भी पहाड़ तुल्य भारी होती है। इस हलकेपन और भारीपन का अचेतन-सुपरचेतन क्षेत्र में आघात लगता है। कभी-कभी तो वह सहज होता है और समय के साथ-साथ अनुभूतियाँ धीमी पड़ती जाती हैं; किंतु कभी-कभी वे इतनी असह्य होती हैं कि चिंतनतंत्र को ही बुरी तरह झकझोर देती हैं, साथ ही ऐसी स्थिति बना देती हैं कि मानस सही तरीके से सोचने-समझने में समर्थ न रहे और प्रवाह जिस ओर भी चल पड़े, फिर रोके न रुके।
चिंतन की धारा को गायत्री महाशक्ति के प्रवाह के साथ जोड़कर चलने वाली इन यात्राओं से सारा देश एक अनूठे रंग में रँगकर इक्कीसवीं सदी के लिए स्वयं को तैयार कर सकेगा। कितनी विभूतियाँ इसमें नियोजित होंगी, इसकी कल्पना ही मात्र की जा सकती हैं इन सभी रथयात्राओं का समापन शाँतिकुँज हरिद्वार में होगा। मार्ग में पड़ने वाली सभी शक्तिपीठों, तीर्थनगरियों, गुरुग्राम आंवलखेड़ा तथा गायत्री तपोभूमि मथुरा से होती हुई पाँचों रथयात्राएँ लगभग अक्टूबर के द्वितीय सप्ताह से हरिद्वार क्रमशः आती रहेंगी व इन सबके समापन पर एक माह तक चलने वालों विराट् महायज्ञों द्वारा चार खंडों में भारत के विभिन्न प्राँतों व विश्वभर के देशों से आए परिजनों द्वारा आहुतियाँ दी जाएँगी। इस प्रकार यह चौथा चरण द्रव्ययज्ञ व विभूतियज्ञ के समन्वय के साथ एक विराट् ज्ञानयज्ञ के माध्यम से संपन्न होगा।
चिंतन उभारे। पति महाराज ऋतध्वज की इच्छा के कारण चौथे पुत्र अलर्क को राजा बनाया। वैसा ही चिंतन विकसित कर गर्भावस्था से ही संस्कार दिए।
चिंतन में उन्हें रुचि है, लेकिन मित्रों के हास-परिहास से अब उन्हें विरक्ति हो गई है। वे एक स्थान पर कितनी ही देर तक प्रस्तरवत् बैठे रहते हैं अथवा फिर उदासीन एवं गंभीर मुद्रा में टहलने लगते हैं।”
चिंतन से, अनुचित गतिविधियों से पीछे हटने का परामर्श दिया जाता है। वे इतने भले कहाँ होते हैं कि भ्राँतियों के विपरीत जो श्रेयस्कर अनुरोध किया जा रहा है, उसे सहज स्वीकार कर लें। पूर्वाग्रहों से जकड़ी मान्यताएँ और आदतें, जो अभ्यास में गहराई तक घुसकर बैठ गई हैं। परामर्श कितना ही तथ्यपूर्ण क्यों न हो, पर नशेबाज के गले वह शिक्षा कहाँ उतरती है कि इस आत्मघाती कुटेव से विरत होने में ही भलाई हैं। वह परामर्शदाता से तर्क से न जीत सकने की संभावना देखते हुए कभी-कभी हाँ-हाँ भी कर देता है, पर वह आश्वासन बहकावा भर होता है।
चिंतन करना चाहिए। रात्रि के 10 बजे से प्रातः- साढ़े तीन-चार तक का समय महानिशा बताया गया है। इस समय सोने वाला व्यक्ति सुख भरी रोगनाशक नींद लेता है। यह एक अकाट्य सत्य है। ऐसे व्यक्ति की कायाग्नि प्रदीप्त होती है और ग्रहण कर उसे पचा लेता है, वह आहार उसके शरीर के लिए परम पुष्टिकर बन जाता है।
चिंतन विधेयात्मक रहे और आवेशों से परहेज रखे, तो सीधी-सादी सरल, संतोषी और सही जिंदगी आसानी से गुजर सकती है। ऐसी दशा में विक्षोभरहित मस्तिष्क सही काम को सही ढंग से करते हुए क्रमिक रूप से प्रगति करता रहेगा। तीसरा आधार है-प्रशिक्षण। अभ्यास के आधार है- प्रशिक्षण। अभ्यास के आधार पर शरीर के किसी भी अवयव को परिपुष्ट किया जा सकता है।
चिंतन करना ही होगा। दीवाली के दिनों की तरह सवेरा होने और उज्ज्वल भविष्य का सूर्य उदित होने तक अपने लिए ही नहीं दूसरों के लिए भी जना होगा। यह केवल दीये और दिवाली की बात नहीं, भारतमाता के दिलवाली बात भी यही है।
चिंतनधारा में निमग्न थे, उसकी व्यापकता सीमाहीन थी।
चिंतनतंत्र को ही बुरी तरह झकझोर देती हैं, साथ ही ऐसी स्थिति बना देती हैं कि मानस सही तरीके से सोचने-समझने में समर्थ न रहे और प्रवाह जिस ओर भी चल पड़े, फिर रोके न रुके।
चिंतन-मनन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि निश्चित उद्देश्य वाले व्यक्ति कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं और कोई भी शक्ति इच्छाशक्ति को नहीं रोक सकती। जो अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने समूचे अस्तित्व को दाँव पर लगाने को तैयार हैं, उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं।
चिंतन और दृष्टिकोण दार्शनिकों की भाँति तटस्थ और निर्लिप्त होता है। वे अपने आचरण और व्यवहार से दूसरों को तो प्रभावित करते हैं, पर साँसारिक घटनाओं से वे स्वयं जल में कमलवत् सर्वथा अप्रभावित रहते हैं। यही वास्तविक आध्यात्मिक दृष्टि है। इसका निचोड़ समाज और संसार के दुखों को हलका करना और चरमलक्ष्य की ओर निरंतर अग्रसर होना है।
चिंतनप्रक्रिया चलने लगती है और बुद्धि अतीत में चली जाती है। कारण जानने के लिए स्मृतियों में जाना ही पड़ेगा। अतीत में चले जाने के बाद सचेत रहने वाली दृष्टि धुँधला जाती है। भगवान् बुद्ध इसीलिए अपने उपदेशों में बारबार सावधान करते हैं कि सिर्फ जागे रहना है। कोई प्रतिक्रिया नहीं करनी है।
चिंतन और मेधा का विकास संभव ही नहीं हो पाएगा। दूसरे शब्दों में यह कि प्रतिभाएँ सूचनातंत्र का नियमन करने वाली शक्तियों के अनुशासन में रहेंगी, उन्हीं के लिए काम करेंगी और अपने संस्कार या विवेक के अनुसार कुछ भी निश्चित नहीं कर सकेंगी। मनुष्यजाति के पूरी तरह गुलाम हो जाने की जॉर्ज ऑरवेल की भविष्यवाणी इस अर्थ में सही होने जा रही है। क्या अध्यात्म तंत्र इस सूचना प्रौद्योगिकी की क्राँति को रचनात्मक मोड़ देकर युगपरिवर्तन की प्रक्रिया को प्रशस्त कर सकता है? यह प्रश्नचिह्न संक्राँति वेला में हम सबके समक्ष है।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार को ऐसा बनाना पड़ता है, जिसके कण-कण में मनोहारी सुगंध उभरती रहती है। ऐसे वरिष्ठ व्यक्तित्व वैचारिक प्रतिकूलता और परिस्थितियों की विकटता से भी निपटने में सफल हो जाते हैं।
चिंतन को नष्ट कर डालता है। अमेरिकी राजनेता, वैज्ञानिक और साहित्यकार डॉ. बेंजामिन फ्रेंकलिन ने एक बार अपना आवास इसलिए बदल दिया था कि उनके घर के पारस बाजार के कोलाहल से उनके चिंतन में विघ्न पड़ता था। डॉ. नीलस्केगी तथा डॉ. फ्राँसब्रोक ने काफी पहले ही बहरेपन पर शोधग्रंथ लिखकर स्पष्ट कर दिया था कि ध्वनिप्रदूषण अगणित रोगों-तकलीफों का मुख्य कारण है।
चिंतन लिए नवीनतम सामग्री भी होगी। पहली शुरुआत हम जनवरी 2000 के सहस्राब्दी विशेषाँक ‘महापूर्णाहुति विशेषाँक’ से कर रहे हैं। इसकी सामग्री अति रोचक व पूरी सहस्राब्दी के सफरनामे से लेकर भविष्य की संभावना से भरी होगी। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर नवीनतम खोजों के निष्कर्ष-भारतीय संस्कृति के विश्व-विद्यालय की समग्र पाठ्यसामग्री लिए, इक्कीसवीं सदी के समाज का संविधान का स्वरूप तथा साधनापद्धति में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा प्रणीत नए सूत्रों के समावेश से भरे लेखन का समुच्चय होगा अखण्ड ज्योति 2000 व उसके बाद के अंकों का प्रारूप।
चिंतनधारा।
चिंतन और आचरण आड़े न आने लगा हो। भावनाओं की पवित्रता तो ऐसे प्रसंगों में अक्षुण्ण नहीं भूलना चाहिए कि तरुण और तरुणियों की घनिष्ठता, निकटता और असाधारण सहकारिता भी साधारणजनों की आँखों में खटकती हैं। उतने भर से आशंकाओं का ऐसा बवंडर बन पड़ता है कि जो बदनामी के स्तर तक पहुँचा देता है। ऐसी दशा में न केवल संबंधित व्यक्तियों को, वरन् उस लक्ष्य को भी भारी क्षति पहुँचती है, जिसके लिए एकत्र हुआ गया था और मिल−जुलकर काम करने में कुछ अनुचित नहीं माना गया था।
चिंतन में विघ्न पड़ता था। डॉ. नीलस्केगी तथा डॉ. फ्राँसब्रोक ने काफी पहले ही बहरेपन पर शोधग्रंथ लिखकर स्पष्ट कर दिया था कि ध्वनिप्रदूषण अगणित रोगों-तकलीफों का मुख्य कारण है।
चिंतन विकसित कर गर्भावस्था से ही संस्कार दिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-October
चिंतन और चरित्र से मनुष्य की सम्पूर्ण गरिमा को चरितार्थ कर्ट है, मनुष्य किस स्तर तक विकसित हो सके, इस प्रश्न का उत्तर रामचरित में मिलता है। जिन्हें मानव धर्म की पूरी पराकाष्ठा में देखना हो वे मर्यादा पुरुषोत्तम का अवगाहन करे।
चिंतन-दूरदर्शी रीति-नीति एवं एक समग्र समाज, राष्ट्र व युग के नवनिर्माण के संकल्प को लेकर खड़ा हुआ यह विराट् संगठन विगत नौ वर्षों में विराट् से विराटतम बनता चला गया है।
चिंतन उस मस्तिष्क में ही उभरेगा, जो सेवाकार्य को कर्त्तव्य नहीं किसी पर किया गया अहसान मानता है। सेवा भाव से संतोष बढ़ता है और अहसान के भाव से अहंकार पनपता है। उसके बढ़ने पर पतन निश्चित है। अस्तु, सेवाभावी का दृष्टिकोण सेवा के प्रति शुद्ध रहना ही चाहिए। वह सेवाकार्य को कर्त्तव्यपूर्ति का, सामाजिक ऋण से मुक्त होने का, भगवान का प्रेम पाने का एक अलभ्य अवसर मानता है।
चिंतन और उपयुक्त कार्य वाले ऐसे ही व्यक्ति वास्तविक सनकी है। समय-समय पर इस तरह के प्रसंग प्रकाश में आते रहते हैं।
चिंतन कि प्रक्रिया अपने आप चलने लगती है। जप के विभिन्न रूपों में वाचिक जप और मानसिक प्रमुख है। वाचिक जप में मंत्र का उच्चारण किया जाता है। वह उच्चारण होंठ, जीभ, तालू, कंठ आदि के स्पर्श और वायु के संघात से उत्पन्न होता हुआ वैखरी वाणी से भी व्यक्त होता है। उपांशु जप में होंठ हिलते है, कंठ से भी उच्चारण होता सुने नहीं देती।
चिंतन को एक आधार मिल गया था। अब वह बराबर उसी दिशा में सोचती रहती। एक दिन अचानक उसके मन में विचार आया की यदि प्रेतात्माओं के लिए उनके सुविधा जनक महल बना दिया जाए, तो शायद वह उनके कोप से बच सकती है बस फिर क्या था। उसने अपने विचार को क्रियान्वित कर डाला। दूसरे दिन कैलीफोर्निया पहुंची और कूपर टिनो में निकट १८ कमरों का एक मकान खरीद लिया।
चिंतन-मानसिक एवं मनोशारीरिक व्याधियों-तनाव, मानसिक विकलाँगताओं एवं शारीरिक अपंगता से मुक्त हो।
चिंतन उभरने का अर्थ है- ‘लोकसेवी का दृष्टिकोण खो जाना।’ ऐसा चिंतन उस मस्तिष्क में ही उभरेगा, जो सेवाकार्य को कर्त्तव्य नहीं किसी पर किया गया अहसान मानता है। सेवा भाव से संतोष बढ़ता है और अहसान के भाव से अहंकार पनपता है। उसके बढ़ने पर पतन निश्चित है। अस्तु, सेवाभावी का दृष्टिकोण सेवा के प्रति शुद्ध रहना ही चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-April
चिंतन का अवलम्बन और मर्यादाओं का परिपालन करने पर खरा सिद्ध होगा। इस भावी की विचारणीय बातें हैं-
चिंतन में आमूल-चूल परिवर्तन का अवसर आ गया तथा अगली भूमिका में प्रवेश करने का समय भी। इस दशा में अपनी चिंतन-प्रक्रिया पर गहरी नजर रखने की आवश्यकता है। जब ऐसा अनिवार्य रूप से महसूस होने लगे, तो यह समझ लेना चाहिए कि अनाहत-स्तर की चेतना को वह प्राप्त कर चुका है।
चिंतन कर्म में ईश्वरीय सत्ता के प्रति समर्पण भाव होगा। भगवान महाकाल को प्रिय यह है कि हमारा दुष्चिंतन मिटे-दुर्मतिजन्य दुर्गति से हम बचें। जो उन्हें प्रिय हो वही हम करें भी। अचिंत्य चिंतन कदापि न करें।
चिंतन, मनन, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग जैसे कार्यक्रमों में व्यस्त रहे। मनोभूमि पर विक्षोभजनक प्रभाव उत्पन्न न हो, तो ही व्रत का पूरा लाभ मिलता है। व्यावसायिक कार्यों में प्रायः झूठ, चोरी, कर्तव्य में ढील, राग-द्वेष, लोभ, तृष्णा, क्रोध, वासना जैसे दोषों का समावेश बना रहता है। इसलिए अच्छा यही है कि चाँद्रायण के उपयुक्त स्थान तलाश किया जाय और उन दिनों छुट्टी लेकर आध्यात्मिक जीवन का लाभ लिया जाय। इस संबंध में परिजनों के लिए गायत्री तीर्थ, शांतिकुंज सर्वाधिक उपयुक्त पड़ेगा।
चिंतनशील हैं, उन्हें मूर्ख होना सुहाता नहीं। यह मूढ़ता तो निकम्मों के लिए ही ठीक है।”
चिंतन व आत्मबोध की साधना के साथ हमें जन्म देने वाली पृथ्वी माँ को नमस्कार करना चाहिए
चिंतन करना चाहिए।
चिंतनप्रणाली और कार्यशैली पूरी तरह परिवर्तित हो जाती है। साधक के लिए यह चेतना के एक नये तल में अवस्थान है।
चिंतन करना तथा शरीर के रोग और उनके कारणों का विचार करना एवं वेद के रहस्यों का भी विचार-चिंतन करना चाहिए।
चिंतन पटल पर आते हैं।
चिंतन की विकृति, महत्वाकाँक्षा, आसुरी सत्ताओं द्वारा फैलाया गया दुष्प्रचार अब हमें लक्ष्य-प्राप्ति से रोक नहीं सकता, यह विश्वास इस साधनावर्ष में प्रतिफल-प्रतिक्षण दृढ़ करते रहा जाना चाहिए। बड़े-बड़े आयोजनों की होड़ समाप्त होने के बाद अब साधना की धुरी पर संगठन को सशक्त बनाने, अपने आपको प्रतिकूल समय के लिए सभी मोर्चों पर तैयार करने के लिए ही यह एक वर्ष की पूरी साधना का क्रम निर्धारित किया गया है। राष्ट्र ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में, चप्पे-चप्पे में आस्तिकता के संस्कारों की नर्सरी उगानी-बढ़ानी व संभावित आक्रमणों से उसकी रक्षा करनी है। गायत्री, यज्ञ एवं संस्कारों की त्रिवेणी में
चिंतन कदापि न करें।
चिंतन मिटे-दुर्मतिजन्य दुर्गति से हम बचें। जो उन्हें प्रिय हो वही हम करें भी। अचिंत्य चिंतन कदापि न करें।
चिंतन और कार्यों में लगे रहते है।
चिंतन की धारा बदलें विचार-विज्ञान का समझें।
चिंतन-प्रक्रिया पर गहरी नजर रखने की आवश्यकता है। जब ऐसा अनिवार्य रूप से महसूस होने लगे, तो यह समझ लेना चाहिए कि अनाहत-स्तर की चेतना को वह प्राप्त कर चुका है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-August
चिंतन के प्रति होना चाहिए। वार्व ने इसी का उदाहरण प्रस्तुत किया।
चिंतन करने वाले व्यक्ति साथ रहते हों, जिस स्थान को किसी महामानव ने अपनी पदरज से पवित्र किया हो-वह स्वतः एक देवालय बन जाता है उस पर कोई विधि नियम लागू नहीं होता। अतः इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए नवीन निर्माण के पूर्व इस लेखमाला में वर्णित विवरण को लागू किया जाए, तो कोई असमंजस किसी भी प्रकार का पाठकों -परिजनों को न होगा। यह टिप्पणी मात्र उन सभी जिज्ञासाओं का समाधान करने के लिए उद्धत की गई है, जो सहज ही किसी के मन में उठ सकती है।
चिंतनीय एवं भयावह बनी हुई हैं।
चिंतन-चरित्र व्यक्तित्व एवं भविष्य हेय स्तर का बनाकर उतना पतित बनना पड़ता है, जितना कि सेवा सर्वथा दूर रहने वाले सामान्य श्रमिक भी नहीं गिरते। लोकसेवियों में से अधिकाँश को अपने व्यक्तित्व और सेवा क्षेत्र में ऐसे विग्रह उत्पन्न करते देखा जाता है, जिसे दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ही कहा जा सकता है और सोचना पड़ता है कि यदि यश हजम कर सकने में असमर्थ लोग, लोकसेवा के क्षेत्र में न आया करें तो वे अपनी ओर समाज की अधिक सेवा कर सकते है।
चिंतन करेंगे तो आपको हमारा संदेश मार्गदर्शन एवं सहयोग मिलेगा। इसके अलावा हम आपसे और क्या चाहेंगे। आप हमारे बच्चे है, हम जो कर रहे है। वह आप करें यही हमारी इच्छा है। हम जिस परंपरा चले है, आपको भी उसी पर चलना चाहिए।
चिंतन यदि अर्जुन पर युगधर्म की परिप्रेक्ष्य में लागू करें तो लगता है कि इस समय इसकी स्थिति यही है किन्तु यही स्थिति उसे क्रमशः समर्पण की स्थिति में ले जाती है। गीता के इस अध्याय के सातवें श्लोक में ही वह कह बैठता है-
चिंतन उभरकर आएगा जो समूह चिंतन का रूप लेगा एवं विश्व सरकार, एक ही विश्व- व्यवस्था, एक ही आचार- संहिता, विभिन्नताओं के बावजूद एक ही संस्कृति के विकास के रूप में दिखाई देगा। कितने महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े है हम। सहज ही हमें अपने सौभाग्य का अहसास नहीं होता, किन्तु यह समय निश्चित ही विश्व इतिहास में एक युगांतरकारी अवधि वाला सिद्ध होगा, इतिहास अगले दिनों यह बताएगा।
चिंतन के केन्द्र में- नाभिक से संकल्प जाग्रत हुआ- वही कर्मबेल के रूप में बढ़ा-विकसित हुआ। यही विष्णु की नाभि से कमलनाल निकलने का आलंकारिक प्रसंग है। कमलबेल से वैभव एवं घटनाक्रमों को पंखुड़ियाँ फूट पड़ती है। कमल की व्याख्या इसी रूप में की जा सकती है। इसी कमल के पराग का भ्रमण है- प्रजापति, जिसकी प्रजा के रूप में सृष्टि का विस्तार होता चला गया।
चिंतन किया जाए तो यह समय 1999 के प्रथम तिमाही वाले भाग से ही प्रारम्भ हो चुका हैं एवं संभवतः जुलाई 2000 तक रहेगा, जिसमें पूरे विश्व में कही भी, कभी भी कोई शांति से नहीं बैठ सकेगा।
चिंतन को झकझोरती बातें हैं-
चिंतन का रूप लेगा एवं विश्व सरकार एक ही विश्व व्यवस्था, एक ही आचार- संहिता, विभिन्नताओं के बावजूद एक की संस्कृति के विकास के रूप में दिखाई देगा। कितने महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े है हम। सहज ही हमें अपने सौभाग्य का अहसास नहीं होता, किन्तु यह समय निश्चित ही विश्व इतिहास में एक युगांतरकारी अवधि वाला सिद्ध होगा, इतिहास अगले दिनों यह बताएगा।
चिंतन का मूल आधार है। सन् 1988 में जब बारह वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण आरम्भ हुआ था तब किस ने कल्पना की थी कि क्रमशः चौबीस करोड़ प्रतिवर्ष से बढ़कर चौबीस सौ ही नहीं चौबीस हजार करोड़ प्रतिवर्ष से बढ़कर चौबीस सौ नहीं, चौबीस हजार करोड़ गायत्री जाप प्रतिवर्ष होने लगेगा। किन्तु क्रमशः इस महापुरश्चरण में भाग लेने वालों की संख्या बढ़ती चली गयी है। एवं अब इस अवधि का अंत आते-आते बढ़ते हुए इस चरम शिखर पर पहुँच गई है कि अब हम आगामी वर्ष एक करोड़ प्राणवान परिजनों के माध्यम में विराट महापूर्णाहुति आयोजित करने जा रहे हैं। महापूर्णाहुति के लिए इससे श्रेष्ठ समय और क्या हो सकता है।
चिंतन का रूप लेगा एवं विश्व सरकार, एक ही विश्व- व्यवस्था, एक ही आचार- संहिता, विभिन्नताओं के बावजूद एक ही संस्कृति के विकास के रूप में दिखाई देगा। कितने महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े है हम। सहज ही हमें अपने सौभाग्य का अहसास नहीं होता, किन्तु यह समय निश्चित ही विश्व इतिहास में एक युगांतरकारी अवधि वाला सिद्ध होगा, इतिहास अगले दिनों यह बताएगा।
चिंतन व कर्तव्य पर लिखे जा चुके, किन्तु जिसका व्यक्तित्व हिमालय समान विराट हो, उसे कैसे शब्दों में बाँधा जा सकता है। वे एक विराट परिवार के मुखिया भी थे, संत भी थे, एक संगठन एक व्यवस्थापक, एक दार्शनिक, एक द्रष्टा एवं एक महान लेखक-साहित्यकार भी। अखण्ड ज्योति पत्रिका जीता-जागता वह दर्पण है, जिसके माध्यम से परमपूज्य गुरुदेव की प्राणचेतना को स्पंदन लेते देखा जा सकता है। उनके व्यक्तित्व के और भी कई रूप हैं, परंतु इस मिशन का जन्म जिस आधार पर हुआ- जिसके बलबूते पाला-पोसा जाकर वह बढ़ता चला गया और आज के 6 से लेकर 9 करोड़ परिजनों वाले विराट रूप तक पहुँच गया है, उसका आधार हैं उनकी संवेदना से भरी जीवन लेखनी। उसी से न केवल उन्होंने लेख लिखें वे पतियाँ भी लिखी जो लाखों व्यक्तियों के जीवन परिवर्तन का आधार बन गई, उन्हें संगठन से जोड़ कर उनसे कुछ ऐसा कराती चली गई कि संगठन का ढाँचा बनता चला गया।
चिंतन, व्यवहार में पवित्रता और शुचिता के बिना उपलब्ध नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त वह रंग-बिरंगी सुखद प्रतीतियों तक ही सीमित नहीं, अतींद्रिय सामर्थ्य की महत्वपूर्ण आधार भी है। नशे की अर्धमूर्छा-अर्द्ध-तंद्रा स्थिति में जो कुछ भी अनुभव होते हैं, उसे इंद्रियातीत नहीं, इंद्रियजन्य कहना चाहिए। वह मन-मस्तिष्क का क्रिया व्यापार है, उसका कोई अतींद्रिय आधार नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-December
चिंतन की ओर झुकता है। यह क्रिया बहुत ही सूक्ष्म होती है और थोड़े समय के लिए आती है। इसलिए हम अच्छी तरह पहचान भी नहीं पाते। यदि इस समय परमार्थ चिंतन और ईश्वराधना का अभ्यास किया जाए तो निस्संदेह उसमें बहुत उन्नति हो सकती है; किंतु साँसारिक कार्यों के लिए यह स्थिति उपयुक्त नहीं, अतएव सुषुम्ना स्वर में आरंभ होने वाले कार्यों का परिणाम अच्छा नहीं होता। वे अक्सर अधूरे या असफल रह जाते हैं।
चिंतन पद्धति कहना अनुपयुक्त न होगा।
चिंतन-अनुसंधान रहा तो यह कहने की जरूरत नहीं कि इस चिंतन में प्राण और मन दोनों एक हो जाएँगे। प्राण और मन का एकत्व ही तो सुषुम्ना का संचार है और यही पहले ध्यान की एवं पीछे समाधि की अवस्था है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि जप में तीन बातें रहें, मंत्र का उच्चारण गंभीरतापूर्वक नियमित गति से, मंत्र की मधुरता का आस्वादन हो और मंत्र के अर्थ का चिंतन हो तो किसी भी हठयोग या लययोग की आवश्यकता नहीं है। केवल जप से ही पूर्णता प्राप्त हो जाती है। एक बात और, मंत्रार्थ चिंतन का यह तात्पर्य नहीं है कि उसके शब्दों का अलग-अलग अर्थ जान लिया जाए।
चिंतन हो तो किसी भी हठयोग या लययोग की आवश्यकता नहीं है। केवल जप से ही पूर्णता प्राप्त हो जाती है। एक बात और, मंत्रार्थ चिंतन का यह तात्पर्य नहीं है कि उसके शब्दों का अलग-अलग अर्थ जान लिया जाए। मंत्र का एकमात्र अर्थ है, इष्ट देवता। उनका जो स्वरूप अपने चित्त में हो, उसका चिंतन ही मंत्रार्थ चिंतन है।
चिंतन और सन्मार्गगामी के रूप में तत्काल सामने आता है; दुर्बुद्धिग्रस्तों की बात और है, जहाँ चिंतन की शक्ति का न तो कोई मूल्य है, न महत्त्व। इसलिए वे हमेशा दुरभिसंधियाँ रचने में निरत रहते और वातावरण को विषाक्त करते हैं यही कारण है कि आज हर ओर आपाधापी और अराजकता जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। आक्रमण-प्रत्याक्रमण और घात-प्रतिघात की प्रवृत्ति ने चिंतन को जहाँ हेय बनाया है, वहीं आचरण में दुष्टता और और आक्रामकता बढ़ी है। आज सभी इस बात से चिंतित हैं कि मनुष्य-मनुष्य के बीच बढ़ती कटुता को कैसे रोका जाए एवं विचारतंत्र में घुस पड़ी अवांछनीयता को घटाया-मिटाया कैसे जाए? पारस्परिक स्नेह-सद्भाव बढ़ाने एवं जीवन को सुखी-समुन्नत बनाने का उपाय क्या हो?
चिंतन और प्रयासों को उत्कृष्टता से जोड़कर अपनी परिस्थितियाँ हों व बिना श्रम-प्रयास के सब अनुकूल होता चला जाए।
चिंतन, मनन व अपनी साप्ताहिक-दैनिक योजना बनाना मन के अच्छे व्यायाम हैं।
चिंतन ही प्रखर वातावरण का निर्माण करता है।
चिंतन, आशावादी दृष्टिकोण व उदात्त भावों द्वारा सुधार कर हम स्थायी स्वास्थ्य लाभ एवं आरोग्य पा सकते हैं।
चिंतन से बचे रहना भी ऐसे कारक है, जो स्वास्थ्य संवर्द्धन और दीर्घजीवन को सुनिश्चित करते हैं। नाभि तक गहरी साँस लेने से एक प्रकार का कुँभक होता और श्वास संख्या घट जाती है। मेरुदंड के भीतर एक जीवन तत्व प्रवाहित होता है, जो सुषुम्ना को बलवान बनाता और मस्तिष्क को परिपुष्ट रखता है। कमर झुकाकर बैठने से इस प्रवाह में गतिरोध पैदा होता है। अचिंत्य चिंतन से साँस की गति तीव्र हो जाती है जो उम्र घटने का प्रधान कारण है।
चिंतन भी उसी स्तर का होना चाहिए अन्यथा प्रतीक और प्रतिष्ठान का आश्रय लेना परम आवश्यक है।
चिंतनशील भावुक और सक्रिय। तीनों के लिए क्रमशः ज्ञान, भक्ति और कर्म है। ये विभाजन स्थूल हैं। एकान्तिक रूप से कोई भी व्यक्ति इनमें से किसी एक प्रकार का नहीं होता। अतः ये ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों मिल जाते है।
चिंतन, उपासना, योगाभ्यास, शोध, अनुसंधान, विज्ञान आदि ऐसे कार्य हैं, जिनमें अधिक गंभीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की जरूरत है। इसलिए इनका आरंभ भी ऐसे ही समय में होना चाहिए, जब शरीर के सूक्ष्म कोष चंद्रमा की शीतलता को ग्रहण कर रहें हों।
चिंतन, श्रेष्ठ सान्निध्य और उत्कृष्ट अध्ययन में स्वयं को बराबर संलग्न रखना ही उपयुक्त उपाय बताया गया है, ताकि मस्तिष्क से निकलने वाली विचार तरंगें विचार मंडल के समानधर्मी तरंगों को अपनी ओर आकर्षित कर स्वयं को अधिकाधिक समर्थ-सशक्त बना सके।
चिंतनशीलता हर व्यक्ति में है, लेकिन वही जब किसी मनीषी की मेधा से निस्सृत होती है, तो श्रेष्ठ ग्रंथों का आकार लेती है और आसपास के वातावरण को इतना ओजस्वी तथा ऊर्जायुक्त बना देती है कि सात्विक मस्तिष्कों में इसका परिणाम श्रेष्ठ चिंतन और सन्मार्गगामी के रूप में तत्काल सामने आता है; दुर्बुद्धिग्रस्तों की बात और है, जहाँ चिंतन की शक्ति का न तो कोई मूल्य है, न महत्त्व। इसलिए वे हमेशा दुरभिसंधियाँ रचने में निरत रहते और वातावरण को विषाक्त करते हैं यही कारण है कि आज हर ओर आपाधापी और अराजकता जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। आक्रमण-प्रत्याक्रमण और घात-प्रतिघात की प्रवृत्ति ने चिंतन को जहाँ हेय बनाया है, वहीं आचरण में दुष्टता और और आक्रामकता बढ़ी है। आज सभी इस बात से चिंतित हैं कि मनुष्य-मनुष्य के बीच बढ़ती कटुता को कैसे रोका जाए एवं विचारतंत्र में घुस पड़ी अवांछनीयता को घटाया-मिटाया कैसे जाए? पारस्परिक स्नेह-सद्भाव बढ़ाने एवं जीवन को सुखी-समुन्नत बनाने का उपाय क्या हो?
चिंतन की शक्ति का न तो कोई मूल्य है, न महत्त्व। इसलिए वे हमेशा दुरभिसंधियाँ रचने में निरत रहते और वातावरण को विषाक्त करते हैं यही कारण है कि आज हर ओर आपाधापी और अराजकता जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। आक्रमण-प्रत्याक्रमण और घात-प्रतिघात की प्रवृत्ति ने चिंतन को जहाँ हेय बनाया है, वहीं आचरण में दुष्टता और और आक्रामकता बढ़ी है। आज सभी इस बात से चिंतित हैं कि मनुष्य-मनुष्य के बीच बढ़ती कटुता को कैसे रोका जाए एवं विचारतंत्र में घुस पड़ी अवांछनीयता को घटाया-मिटाया कैसे जाए? पारस्परिक स्नेह-सद्भाव बढ़ाने एवं जीवन को सुखी-समुन्नत बनाने का उपाय क्या हो?
चिंतन का तात्पर्य है- इष्ट देवता का जो स्वरूप अपने चित्त में हो, ईश्वर का सद्गुणों के रूप में चिंतन। पढ़े, इस कथानक में गायत्री पज के मर्म के विषय में।
चिंतन का ही परिणाम है। ज्यों-ज्यों यह बुद्धि को प्राप्त होती है, त्यों ही यह अपने प्रवाह के वेग में रागयुक्त पदार्थ की प्राप्ति हेतु भावना को उत्पन्न कर देती है। यह बात श्लोक के उत्तरार्द्ध में स्पष्ट है-
चिंतन उससे दूने वेग से पतनोन्मुख होता जा रहा है। उत्कृष्टता का पक्षधर वातावरण विनिर्मित होता कहीं दीख नहीं पड़ता। ऐसे में समाज के पुरोधाओं का चिंतित होना स्वाभाविक है।
चिंतन-मनन से नई-नई भावनाएँ उठती अनुभव करते हैं। इसके बावजूद यह सही है कि गीता वैराग्य अथवा वीतराग भाव को जन्म देती है। संसार के प्रति उपराम करती है। अभिभावक अपने बच्चों को गीता पढ़ने से इसीलिए रोकते हैं।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार को ढालने की प्रेरणा मिलती है। भारतीय परंपरा के अनुरूप सभी पर्व-त्योहार एवं षोडश संस्कार किसी-न-किसी रूप में यज्ञकृत्य के साथ जुड़े हुए हैं। विवाह अग्नि की साक्षी में होते हैं। अंत्येष्टि में शरीर चिता रूपी यज्ञ में होमा जाता है। नवान्न पककर जब आता है, तब उसे सर्वप्रथम यज्ञ भगवान् को अर्पित किया जाता है।
चिंतन और ईश्वराधना का अभ्यास किया जाए तो निस्संदेह उसमें बहुत उन्नति हो सकती है; किंतु साँसारिक कार्यों के लिए यह स्थिति उपयुक्त नहीं, अतएव सुषुम्ना स्वर में आरंभ होने वाले कार्यों का परिणाम अच्छा नहीं होता। वे अक्सर अधूरे या असफल रह जाते हैं। सुषुम्ना की दशा में मानसिक विकार दब जाते हैं और गहरे आत्मिक भाव का थोड़ा -बहुत उदय होता है, अस्तु इस समय में दिए हुए शाप-वरदान अधिकाँश फलीभूत होते हैं, कारण कि उन भावनाओं के साथ आत्मतत्त्व का बहुत कुछ सम्मिश्रण होता है।
चिंतन चेतना को उलटकर सीधा करना। इस ऊर्जाकेन्द्र को गुरुसत्ता ने अंतस् की पिटारी में न बंद कर जन-जन के अखण्ड ज्योति पत्रिका के रूप में बारह वर्ष के अन्दर 1937-38 में प्रस्तुत कर दिया गया। इस पत्रिका का भी तिरसठवाँ वर्ष आगामी माह से आरंभ होने जा रहा है। भली-भाँति समझा जा सकता है कि युगधर्म की महती आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ही अखण्ड ज्योति एक प्रतीक बनी, अनवरत जली एवं उसने समय की चुनौती को स्वीकार कर युगपरिवर्तन की आँधी को जन्म दिया।
चिंतन करने वाले पुरुष की इन विषयों में आसक्ति हो जाती है। “ ध्यायतो विषयान् पुँसः सड्डस्तेषूपजायते” (2/62 का पूर्वार्द्ध)। विचार विज्ञान के मर्मज्ञ हैं श्रीकृष्ण। इसीलिए वे एक मनोवैज्ञानिक तथ्य सामने रखते हैं कि विचारों का यह स्वभाव है कि वे अपने उद्गम स्थल की और बारंबार जाते हैं। मन से सजातीय विचारों का मानो निर्झर फूट पड़ता है।
चिंतन का यह तात्पर्य नहीं है कि उसके शब्दों का अलग-अलग अर्थ जान लिया जाए। मंत्र का एकमात्र अर्थ है, इष्ट देवता। उनका जो स्वरूप अपने चित्त में हो, उसका चिंतन ही मंत्रार्थ चिंतन है।”
चिंतन में संलग्न रहे- गायत्री पुरश्चरण एवं यज्ञ का कार्यक्रम विधिवत् बनाए रहे।
चिंतन पद्धति हैं, जो ‘अणु में विभु’ और गागर में सागर’ समेटे हुए हैं। उनके पद और साक्षियाँ थोड़े में बहुत कुछ कहने की क्षमता रखती हैं, इसलिए वे विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण हैं।
चिंतन के साथ तप किया हो।
चिंतन चले, तो फिर किसी दृढ़योग या लययोग की आवश्यकता नहीं है। केवल जप से ही पूर्णता प्राप्त हो जाती है। मंत्रार्थ के चिंतन का तात्पर्य है- इष्ट देवता का जो स्वरूप अपने चित्त में हो, ईश्वर का सद्गुणों के रूप में चिंतन। पढ़े, इस कथानक में गायत्री पज के मर्म के विषय में।
चिंतन मनन, पूजन के लिए एकांत की आवश्यकता है; किंतु उत्साह भरने और युद्ध में प्रवृत्त होने के लिए उत्तेजक वातावरण की जरूरत पड़ती है। ऐसी उचित स्थितियों में किए हुए कार्य अवश्य फलीभूत होते हैं। इसी आधार पर स्वरयोगियों ने निर्देश किया है कि विवेकपूर्ण और स्थायी कार्य चंद्र स्वर में किए जाने चाहिए। अध्ययन, मनन, चिंतन, उपासना, योगाभ्यास, शोध, अनुसंधान, विज्ञान आदि ऐसे कार्य हैं, जिनमें अधिक गंभीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की जरूरत है। इसलिए इनका आरंभ भी ऐसे ही समय में होना चाहिए, जब शरीर के सूक्ष्म कोष चंद्रमा की शीतलता को ग्रहण कर रहें हों।
चिंतन में प्राण और मन दोनों एक हो जाएँगे। प्राण और मन का एकत्व ही तो सुषुम्ना का संचार है और यही पहले ध्यान की एवं पीछे समाधि की अवस्था है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि जप में तीन बातें रहें, मंत्र का उच्चारण गंभीरतापूर्वक नियमित गति से, मंत्र की मधुरता का आस्वादन हो और मंत्र के अर्थ का चिंतन हो तो किसी भी हठयोग या लययोग की आवश्यकता नहीं है। केवल जप से ही पूर्णता प्राप्त हो जाती है। एक बात और, मंत्रार्थ चिंतन का यह तात्पर्य नहीं है कि उसके शब्दों का अलग-अलग अर्थ जान लिया जाए।
चिंतन व विकृत जीवनशैली द्वारा दूषित एवं आक्रान्त इस स्थिति को विधेयात्मक चिंतन, आशावादी दृष्टिकोण व उदात्त भावों द्वारा सुधार कर हम स्थायी स्वास्थ्य लाभ एवं आरोग्य पा सकते हैं।
चिंतन। पढ़े, इस कथानक में गायत्री पज के मर्म के विषय में।
चिंतन की ही बात सोची जाने लगी हैं। उसकी पूर्ति के लिए उचित-अनुचित हर तरह के तरीके अपनाए जाते हैं। इस मनोवृत्ति को उन्होंने ‘हैंडसम डेविल’ का नाम दिया है। इस निषेधात्मक विचार प्रक्रिया को अपनाने के कारण न केवल भोगवादियों को संत्रस्त रहना पड़ रहा है, वरन् परोक्ष रूप से उसका प्रभाव समूची मानवजाति पर पड़ रहा है। दार्शनिकों ने इस प्रवृत्ति को ‘हैडोनिज्म’ कहा है, जिसके कारण मनुष्य मादक पदार्थों के सेवन से लेकर परपीड़न, कामुकता, अपराधों, मनोरोगों और आत्महत्या तक की और अग्रसर होता जाता है।
चिंतन आत्मावलोकन-अपने बारे में आपको ही स्मृति दिलाना बहुत जरूरी है।
चिंतन की ऊर्जा तरंगें अपेक्षाकृत अधिक सबल और सशक्त होती हैं। आज इनका पोषण, अभिवर्द्धन एवं उत्सर्जन ही समग्र प्रगति, सुखद वातावरण एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए अभीष्ट है।
चिंतन है।”
चिंतन से साँस की गति तीव्र हो जाती है जो उम्र घटने का प्रधान कारण है।
चिंतन की सूक्ष्म शक्ति कहते हैं।
चिंतन के परिप्रेक्ष्य में युग नेतृत्व हेतु एक मार्गदर्शन है।
चिंतन को जहाँ हेय बनाया है, वहीं आचरण में दुष्टता और और आक्रामकता बढ़ी है। आज सभी इस बात से चिंतित हैं कि मनुष्य-मनुष्य के बीच बढ़ती कटुता को कैसे रोका जाए एवं विचारतंत्र में घुस पड़ी अवांछनीयता को घटाया-मिटाया कैसे जाए? पारस्परिक स्नेह-सद्भाव बढ़ाने एवं जीवन को सुखी-समुन्नत बनाने का उपाय क्या हो? यह आज के ऐसे ज्वलंत प्रश्न हैं जिन पर मनीषीगण समय-समय पर विचार करते रहे हैं।
चिंतन में न लिप्त हो उस दृश्य के वास्तविक सौंदर्य की ओर जाएगा, जो परमात्मा का स्वरूप है। तब शारीरिक के साथ मानसिक संयम भी साधता चला जाएगा। भगवान् कहते हैं कि स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्म चेतना का साक्षात्कार कर पूर्णतः निकल जाती है- वह उससे निवृत्ति पा लेता है।
चिंतन एक ही धुरी पर चलना है- राष्ट्र के नवोन्मेष के लिए भारतीय संस्कृति को विश्व संस्कृति बनाने के लिए उच्चस्तरीय प्रतिभाओं को उत्पादन-नियोजन कैसे हो। जन साधारण से लेकर चिंतक स्तर के-युग नेतृत्व देने वाले कार्यकर्ताओं का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन भी अब पत्रिका के पृष्ठों द्वारा ही होगा।
चिंतन किया, उनमें टी. सेल की वृद्धि दीर्घकाल तक देखी गई। इसके विपरीत नाजी-जर्मनी की अत्याचार एवं क्रूरता भरी फिल्मों का प्रभाव सर्वथा प्रतिकूल देखा गया।
चिंतन ही मंत्रार्थ चिंतन है।”
चिंतन जन-जन तक पहुँच सके। जिन परिजनों के अनुवाद को-एम्बेसी-कल्चरल सेंटर आदि स्तर पर संपर्क हों, वे ‘महापूर्णाहुति प्रकोष्ठ ‘ शान्तिकुञ्ज हरिद्वार से तुरंत संपर्क करें।
चिंतनीय चिंतन से बचे रहना भी ऐसे कारक है, जो स्वास्थ्य संवर्द्धन और दीर्घजीवन को सुनिश्चित करते हैं। नाभि तक गहरी साँस लेने से एक प्रकार का कुँभक होता और श्वास संख्या घट जाती है। मेरुदंड के भीतर एक जीवन तत्व प्रवाहित होता है, जो सुषुम्ना को बलवान बनाता और मस्तिष्क को परिपुष्ट रखता है। कमर झुकाकर बैठने से इस प्रवाह में गतिरोध पैदा होता है। अचिंत्य चिंतन से साँस की गति तीव्र हो जाती है जो उम्र घटने का प्रधान कारण है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-January
चिंतन इत्यादि विकारों का बड़ा हाथ है। ये शत्रु दीखते नहीं, किन्तु अन्दर ही अन्दर शरीर को जर्जर कर देते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-October
चिंतन, मनन इत्यादि पर केन्द्रित नहीं होता, सब कुछ झंझट सा प्रतीत होता है। सब कुछ नियंत्रण तोड़ डालने को मन करता है। असंयम की ओर प्रवृत्ति होती है, मादक दृव्य हमें अपनी ओर खींचते हैं। साधक के लिए यह परीक्षा की घड़ी होती है। यहाँ उसके धैर्य और संयम की परीक्षा होती है।
चिंतन में उसे शान्ति मिलती है, बस प्रतिभा यही है। प्रतिभा केवल एक होती है, पसन्द अनेक होती हैं। गायिका के जमघट में बैठकर और संगीत का आनन्द लाभ करके जब यह इच्छा होती है कि कितना अच्छा हो यदि मुझे भी गाना आ जाये और उस समय यह भी सोच ले कि हम भी गीत का अभ्यास करेंगे मगर उस गोष्ठी से दूर हट कर वही इच्छा लुप्त हो जाती है और यदि महीनों उस संगति में न जाये तो उस ओर ध्यान भी नहीं जाता, वही स्थिति पसन्द का बोध कराती है। पसंद क्षणिक है, वह मन को केवल अस्थायी शान्ति देती है। मनुष्य परिवर्तन चाहता है ‘पसंद’ केवल इसमें सहायता देती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-July
चिंतन एवं न्याय की प्रवृत्ति बहिर्गत होती जाती है। मादकता, अपव्ययता, अकर्मण्यता तथा निर्दयता का साम्राज्य छा जाना है। इसके विपरीत भोजन को फल-घी-दूध-दाल-साग तरकारियों से युक्त सात्विकी बनाया जाय तो मस्तिष्क के विकास में बड़ी सहायता मिलती है। नवीन कल्पना शक्तियों के स्त्रोत खुलते हैं, विवेक बुद्धि जागृत होती है। हमारे पूर्वज गौतम, कपिल, वशिष्ठ, कणादि, विश्वामित्र आदि ऋषियों ने निरामिष भोजन द्वारा ही अपने मस्तिष्क में अनन्त ज्ञान राशि को संचित कर रखा था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-August
चिंतन प्रधान जीवन से ही मनुष्य को स्थायी आनन्द की उपलब्धि होती है।
चिंतन, आनन्द के क्रियाशील सामंजस्य में निहित है। अतः इन सभी का उचित उपयोग जीवन में होना चाहिए।
चिंतन प्रधान जीवन उत्तम जीवन है। बाह्य सामाजिक जीवन मनुष्य के लिए उपयुक्त नहीं है। यह अत्यंत विस्तृत है, नीरस और स्वार्थमय है। आन्तरिक जीवन की महानता ही जीवन को जीने योग्य बनाती है। आदर्शों का आन्तरिक जीवन, कोमल भावनाओं, भावी उन्नति के सुखद स्वप्न, आत्म जिज्ञासा की तृप्ति-मनुष्य की वास्तविक सम्पत्ति है।
चिंतन, संयम, आत्म-निमंत्रण इत्यादि मनुष्य को सीमित बना कर जीवन का आनन्द ही नष्ट कर डालते हैं। हमें बड़े शान से, जीवन के सभी बाह्य और ऐन्द्रिय सुखों का उपभोग करते हुए दूसरों की सहायता तथा उनके सुख में सुखी होते हुए व्यतीत करना चाहिए। मानव जीवन अधिक गंभीर चीज नहीं है।
चिंतन में लगा दिया जाय तो आध्यात्मिक आनन्द का एक निर्झर झरने लगता है। जिसके रसास्वादन की अनुभूति भुक्त भोगी ही जानते हैं। अरुणाचल के तपस्वी महर्षि रमण विगत 50 वर्षों से मौन की साधना कर रहे हैं। उनकी सिद्धावस्था संदेह से परे है। इस अकेली मौन साधना से वे सब सिद्धियाँ मिल सकती हैं जो अन्य योग साधनों से मिल सकती हैं।
चिंतन तथा आत्म-संकेत करें। ऐसा करने से सोने के बाद भी शाँत नींद आती है।
चिंतन, मनन और आत्म ज्ञान में लिप्त रहना चाहिए। ऐसा व्यक्ति सामाजिक झुण्डों से दूर, भौतिक वस्तुओं से विरक्त अपने आप को संयमित करने में ही अधिक समय देता है। सोचता है-अपना बाहरी जीवन सरल बनाने का प्रयत्न करना चाहिए, और भौतिक एवं सामाजिक आवश्यकताओं को घटाने का प्रयत्न करना चाहिए। शरीर के कार्य आत्मा के विकास, परिष्कार और प्रतीति के लिए होने चाहिए। बाह्य जीवन अर्थात् बाहरी आडम्बरों तथा झंझटों में लिप्त जीवन से कुछ अधिक नहीं हो सकता।
चिंतन के लिए भी निकालना चाहिए। जीवन का अधिकतम लाभ कार्य, चिंतन, आनन्द के क्रियाशील सामंजस्य में निहित है। अतः इन सभी का उचित उपयोग जीवन में होना चाहिए।
चिंतन द्वारा भी नहीं प्राप्त किया जा सकता। ये तो भली प्रकार का जीवन व्यतीत करते रहने से स्वयं आते हैं। हमारा जीवन धीमी गति से उन गुणों को प्रकट कर रहा है। जो आत्मा में विद्यमान है। जब हमारा शरीर आवश्यकताओं और फरमाइशों को बंद कर दे और शाँत होकर सद्ज्ञान ग्रहण करने के लिए प्रस्तुत हो जाय तो वह उच्चतम दैवी नियमों के द्वारा परिचालित होने के लिए तैयार हो जाता है।
चिंतन एवं कार्य सभी आवश्यक तत्व हैं। जब इन में से कुछ भी कम या अधिक हो जाता है तो हम कुछ न कुछ महत्वपूर्ण चीज खो देते हैं। अतः हमें परिस्थिति के अनुसार मुड़ना या लपक (Flexibility) जाना सीखना चाहिए। अपने अंदर विभिन्नता स्वीकार करनी चाहिए, और साथ ही साथ आनन्द और कार्य में कुछ समय पृथक चिंतन के लिए भी निकालना चाहिए। जीवन का अधिकतम लाभ कार्य, चिंतन, आनन्द के क्रियाशील सामंजस्य में निहित है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-January
चिंतन, चरित्र ऊँचा उठता चला जाएगा, आपके अंदर सिद्धियाँ आती चली जाएंगी। यह अध्यात्म सुभाष चंद्र बोस के अंदर आया था, नेहरू, पटेल के अंदर आया था। यह उन लोगों के अंदर आया था, जिनका चिंतन और चरित्र महान् बना।
चिंतन एवं चरित्र से संबंध रखता है। आपको यह मालूम होना चाहिए कि जैसे-जैसे आपका चिंतन, चरित्र ऊँचा उठता चला जाएगा, आपके अंदर सिद्धियाँ आती चली जाएंगी। यह अध्यात्म सुभाष चंद्र बोस के अंदर आया था, नेहरू, पटेल के अंदर आया था। यह उन लोगों के अंदर आया था, जिनका चिंतन और चरित्र महान् बना।
चिंतन न करना ही सब क्रियाओं का हवन करना है।”
चिंतन वाले अध्यात्मविद् एवं वैज्ञानिक होगे।
चिंतन ही आज की विषम समस्याओं से विश्वमानवता को उबार सकता है। गायत्री परिवार के सप्तसूत्री आँदोलनों की मूल धुरी यही अध्यात्म है, जीवनसाधना है।
चिंतन और चरित्र महान् बना।
चिंतन से तप में निरत होते हैं, वे निश्चित ही दैवी अनुदानों के अधिकारी होते हैं।”
चिंतन हेतु प्रेरित कर एक युगसाहित्य का पुस्तकालय चला सकता है। क्रमशः यह प्रक्रिया हर कक्षा में दुहराई जा सकती है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना के मूल में ही इन छात्रों की परिकल्पना की गई है, जो आगे चलकर लीग से हटकर पढ़ाई जा रही विद्या-विस्तार की नीति में भागीदारी करेंगे।
चिंतन सदैव विधेयात्मक, उत्कृष्टतावादी होने चाहिए। लोकहितार्थाय जीवन जीने के लिए जो महत्वपूर्ण आवश्यकता है, अंतः की पवित्रता, उसे अर्जित करना एवं अनंत के प्रति इतना नजदीकपन विकसित कर लेना कि दोनों में कोई अंतर न रहे। एक पाश्चात्य लेखक ने ‘इनट्यूनिंग विथ इन्फीनीरी’ पुस्तक में लिखा है कि अनंत के साथ एकाकार होने का हिंदुओं का जो श्रेष्ठतम तरीका है यज्ञ, उसके समकक्ष किसी भी धर्म-संप्रदाय में कोई भी विधि-विधान देखने में नहीं आता। विद्वान् लेखक जो स्वयं क्रिश्चियन धर्म को जीवन में उतारता था, नित्य यज्ञ करता था एवं सभी को इनका महत्त्व समझाता था। यज्ञ जब "इदं न मम्" भाव से किए जाते हैं।
चिंतन था। जो गुरु द्वारा शिष्य को दिया गया। यों यज्ञ सदैव हितकारी होते हैं, किए जाने चाहिए, पर यह तो न ज्ञान-विज्ञान पर आधारित है, न किसी प्रकार की तर्क की कसौटी पर । ऐसे में यज्ञ के नाम पर फैलाने वाला पंडावाद तोड़े कौन ? परमपूज्य ने यही कार्य जीवनभर कर यज्ञ की सही अर्थों में पुनः प्रतिष्ठा की ।
चिंतन-चेतना ढेरों रूढ़िवादिताओं से भरी मान्यताओं को ध्वस्त करती चली गई।
चिंतन, जिसमें आज से प्रायः 46 वर्ष पूर्व वे लिखते हैं कि ब्राह्मणों को भोजन कराने की अपेक्षा उत्तम होगा कि वे श्रेष्ठ विचारों का प्रचार-प्रसार करने वाला ज्ञानयज्ञ कर लें। यही क्राँतिकारी चिंतन-चेतना ढेरों रूढ़िवादिताओं से भरी मान्यताओं को ध्वस्त करती चली गई।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-April
चिंतन को बहिर्मुखी बना दिया हैं भोग ही सब कुछ बनकर रह गया है, इसीलिए चारों और आसुरी चिंतन दिखाई देता है। यदि कलियुग की स्थिति सुधरती है, सतयुगी समाज वापस लाना है, पापियों की संख्या में कमी करनी है तो एक ही रास्ता है ज्ञान की आराधना का। वह ज्ञान जो पाप समुद्र से भलीभाँति सभी को तार देता है।
चिंतन दिखाई देता है। यदि कलियुग की स्थिति सुधरती है, सतयुगी समाज वापस लाना है, पापियों की संख्या में कमी करनी है तो एक ही रास्ता है ज्ञान की आराधना का। वह ज्ञान जो पाप समुद्र से भलीभाँति सभी को तार देता है।
चिंतन इससे भी आगे परिष्कृत मार्ग अपनाता है एवं हर श्वास में योग, हर श्वास में जीवन साधना जीने का मंत्र सिखाता है। जब जीवन साधना निखरने लगती है, तो पापकर्म स्वतः नहीं बन पड़ते। रोजमर्रा के कषाय-कल्मषों एवं पापकर्मों के बीजों को भूनकर राख कर देने के लिए उनका स्वरूप बदलने के लिए इसीलिए परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री की ज्ञानगंगा बहाई। कभी जो प्रतिबंधों से घिरी थी, उस साधना को जन-जन के लिए उपलब्ध करा दिया। गायत्री मंत्र का भर्गतश्रव पापनाशक सविता देव का तेज धारण करने की प्रेरणा देता है।
चिंतन क्षमता, कल्पनाशक्ति, भाव संपदा खपाने वाले तपस्वी युगद्रष्टा आचार्य श्री को पत्रकारिता के क्षेत्र में भी एक पथप्रदर्शक के रूप में याद रखा जाना चाहिए। उन्होंने दार्शनिक, साहित्यकार एवं मार्गदर्शक तीनों की भूमिका निभाई। जीवनभर वे अपनी लेखनी से, पुस्तकों-पत्रिकाओं, पत्रों व प्रत्यक्ष चर्चा से औरों को भी प्रोत्साहित करते रहे, ताकि सकारात्मक लेखन चलता रहे, जिस किसी के भी अंदर पात्रता हो, वह युगसाहित्य के निर्माण में भागीदारी करे। कार्य बड़ा था, वे स्वयं भी सामर्थ्य रखते थे एवं अस्सी वर्ष की आयु पूरी होने तक उन्होंने जो लिखा, वह अपने आप में एक कीर्तिमान है। फिर भी वैज्ञानिक अध्यात्मवाद हो, चाहें काव्यलेखन, विभिन्न स्तर की साहित्यिक प्रतिभाओं को सतत प्रेरित कर उनका पथ प्रदर्शन जीवन भर किया।
चिंतन मंथन
चिंतन दुर्भावग्रसित जनमानस का उद्धार करें॥
चिंतन वे सतत देते रहते थे। एक ऐसा ही पत्र हमारे मिशन की सुपरिचित कवयित्री श्रीमती मायावर्मा को लिखा हम यहाँ दे रहे है। गुरुसत्ता ने अपनी शिष्या की अंतर्वेदना को समझा व उन्हें काव्य लिखने को प्रेरित किया। वे जीवनपर्यंत लिखती रहीं। 22-12-67 को लिखे एक पत्र में पूज्यवर लिखते हैं-
चिंतन को सही कर देना, आदमी के दृष्टिकोण को परिष्कृत कर देना। अगर कोई आदमी यह कर सके तो तब? तब मैं कहूँगा कि जीवन में वास्तविक अध्यात्म आ गया। वास्तविक अध्यात्म को प्राप्त करने के बाद में आप वो चीजें पाएंगे जो आपको मिलनी चाहिए। माँगने पर भी मिलेंगी, बिना माँगे भी मिलेंगी।
चिंतन भी पिछली कड़ी में दिया गया था। यह ज्ञान प्राप्त कैसे किया जाए, उसके लिए भगवान अर्जुन को राय देते है, वह इसके लिए उन तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाए जिनने इस सत्य को प्रत्यक्ष देखा है (ज्ञानिनः तत्वदर्शिनः)। वे कहते हैं कि बिना किसी छल के भाव से सरलतापूर्वक जिज्ञासा व्यक्ति करने से वह ब्रह्मज्ञान हर किसी को ज्ञानी महात्माओं से, उनकी सेवा करने से प्राप्त हो सकता है। शिष्य पात्रता विकसित करने के लिए अपना सब कुछ यदि गुरु को अर्पित कर दे, तो वह उनसे ब्रह्मज्ञान पा सकता है। इसी ज्ञान के बारे में चर्चा और विस्तार से इस अंक में-
चिंतन ने विज्ञान के वरदान को अभिशाप में बदलने की मूर्खता छोड़ दी। यह उसके सुखद भविष्य का शुभ लक्षण होगा और मानवी उत्कर्ष का ब्रह्ममुहूर्त भी।
चिंतन गड़बड़ाए?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-July
चिंतन करना चाहिए कि क्या हम इस परिभाषा पर खरे उतरते हैं। हम अपने विश्वासों को व्यवहार में लाने का साहस दिखाने की स्थिति में हैं कि नहीं? हम अपनी निम्नगामी प्रवृत्तियों और विषय−वासनाओं से लड़ने के लिए गतिशील हैं कि नहीं। यदि हैं तो, हम सभी को संबोधन है परमसत्ता का, भगवान श्रीकृष्ण का कि उठो भारत, भारतवासी, देवपुत्रों, अमृतपुत्रों, अपनी गरिमा को पहचानो एवं स्वयं को योग में प्रतिष्ठित करो। बस यहीं एक विलक्षण बिंदु पर इस अध्याय का समापन हो जाता है।
चिंतन कर चुके हैं, उनके लिए महर्षि तीसरा सूत्र प्रकट करते हैं। यह तीसरा सूत्र है- ‘तदा द्रष्टः स्वरुपेऽवस्थानम्।’ इस सूत्र का शब्दार्थ कुछ यूँ होगा- तदा=तब (वृत्तियों का निरोध होने पर); द्रष्टः= द्रष्ट की; स्वरुपे=स्वरूप में; अवस्थानम्= अवस्थिति (होती है)।
चिंतन आपके ऊपर हावी है, इसको आप ठीक करना शुरू कर लें, फिर मैं आपको यकीन दिलाता हूँ, विश्वास दिलाता हूँ कि आपको तीनों तरह की सहायता मिलेगी। देने के लिए तीनों खड़े हुए हैं, पहला− आपका अंतःकरण, सिद्धियाँ देने के लिए खड़ा है। हमारे भीतर दिव्य शक्तियाँ हैं, दिव्य क्षमताएँ भरी पड़ी हैं और हम आपको उठा सकते हैं। आपके भीतर का वर्चस्व, आपके भीतर का वैभव उठे, तो वह आपको निहाल कर देगा। दूसरा− समाज के लिए आपकी आरती उतारने के लिए खड़े हैं।
चिंतन है, अंतर्मुखी जीवन है। स्वार्थ से घिरा हुआ चिंतन आपके ऊपर हावी है, इसको आप ठीक करना शुरू कर लें, फिर मैं आपको यकीन दिलाता हूँ, विश्वास दिलाता हूँ कि आपको तीनों तरह की सहायता मिलेगी। देने के लिए तीनों खड़े हुए हैं, पहला− आपका अंतःकरण, सिद्धियाँ देने के लिए खड़ा है। हमारे भीतर दिव्य शक्तियाँ हैं, दिव्य क्षमताएँ भरी पड़ी हैं और हम आपको उठा सकते हैं। आपके भीतर का वर्चस्व, आपके भीतर का वैभव उठे, तो वह आपको निहाल कर देगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-May
चिंतन और क्रियाओं को, जो प्रमाद को हटा, मनुज में नूतन प्राण जगाएगा, युग उसके गुण गाएगा।
चिंतन में धनोपार्जन की छूट तो है; पर धन-संग्रह पर रोक लगाई गई है। यदि यह बात सही है कि वर्तमान मानसिक अस्वस्थता की जड़ में संपदा की प्रधान भूमिका है, तो अर्थवेत्ताओं, नृतत्त्वविज्ञानियों और समाजशास्त्रियों को मिल-जुलकर कोई ऐसा हल वर्तमान संदर्भ में ढूँढ़ना चाहिए, जिससे समाज भी संपन्न बना रहे और मनुष्य भी मानसिक दृष्टि से विपन्न नहीं कहलाए।
चिंतन था। आजादी के बाद का वह दौर आधुनिकता की बयार लिए आया था। यह एक प्रतिद्वंद्विता से भरी उपभोक्तावादी होड़ तो 1990 के बाद आँधी के रूप में बढ़ी, पर उस समय भी धीरे-धीरे आधुनिकता जीवन शैली पर अतिक्रमण करने लगी थी।
चिंतन तंत्र का सही उपयोग कर सकने की क्षमता भी सर्वसाधारण में उत्पन्न की जाए। इसके लिए मानसिक प्रशिक्षण की एक समर्थ प्रणाली खड़ी की जानी चाहिए। इसके बिना आत्महत्या जैसे व्यापक संकट उत्पन्न करने वाले मनोरोगों का भड़काया हुआ दावानल रोका न जा सकेगा।
चिंतन का परिचय देता है, पर वे बड़ा स्पष्ट कर देते हैं कि वह ‘कामज’ नहीं होना चाहिए, वासनाजन्य नहीं होना चाहिए। जब तक गुणों के आधार पर परस्पर एकरूपता स्थापित न हो, तब तक प्रेम विवाह असफल होते रहेंगे। विगत 43 वर्षों में दुनिया कहाँ-से-कहाँ पहुँच गई, आधुनिकीकरण के दौर में हम रह रहे हैं, पर तथ्य अपने स्थान पर हैं कि परिवार संस्था का कल्याण तभी है, जब गाड़ी के दोनों पहिये गुणों-कर्म-स्वभाव के परिष्कार पर, एक धुरी पर चलने को तैयार हों। आज भी यह शिक्षा उतनी ही उपयोगी है। शिक्षा व विद्या के सार्थक समन्वय पर, नैतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा पर हम आज विचार कर रहे हैं, पर आज की मैकाले प्रधान शिक्षा 1949 में ही प्रबुद्धजनों के लिए निरुपयोगी सिद्ध होने लगी थी।
चिंतन गड़बड़ाए किस तरह मोरचा लेना है, यह विद्या अर्जन से ही संभव हो पाता है। विद्या शब्द को ज्ञान भी कह दिया जाए, तो कोई अत्युक्ति न होगी। हमारे शास्त्र कहते हैं, बिन गुरु ज्ञान नहीं, अर्थात् गुरु के माध्यम से ही विद्या, जीवन कला शिक्षण मिलता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-December
चिंतन की इन कड़ियों को उनके शब्दों ने एक आँतरिक झंकार के साथ बिखरा दिया। वह बोल रहे थे, बेटा, वातावरण का महत्व असाधारण और अद्भुत है, परंतु इसे ग्रहण करने के लिए इसे धारण करने के लिए भी योग्यता चाहिए। अब देखो, साधना के लिए सबसे अच्छा वातावरण हिमालय का माना जाता है, पर हिमालय जाने वाले, वहाँ रहने वाले सभी उसका लाभ कहाँ उठा पाते हैं? मैं जब हिमालय गया तो वहाँ देखा, दो साधु वेशधारी थोड़ी सी जमीन के लिए झगड़ा कर रहे हैं। यहाँ तक कि नौबत सिर फुटब्बल की आ गई।
चिंतन करे कि बाकी बातों को, सबको भूल जाए, केवल ध्यान की बात रह जाए। जब हम लेख लिखते है, तब इतने एकाग्र हो जाते है कि हमें पता ही नहीं चलता कि कौन बैठा हुआ है और कौन चला गया। कौन आ गया और कौन क्या कर गया, कुछ पता ही नहीं चलता। बस हम अपने काम में लगे रहते हैं। उस समय हमारे मन की दिशा एक होती है और इतने तरह के विचार आते है, इतने रिफरेंस आते हैं कि अमुक विद्वान ने ये कहा, उसने ये कहा।
चिंतन के गहरे अभ्यास की है। पिछली कड़ी में सभी साधकों को मन की पाँचों वृत्तियों का सामान्य परिचय दिया गया था। यह बताया गया था कि ये पंचवृत्तियां मन की पाँच शक्तियाँ और विभूतियाँ हैं। इनके सम्यक् प्रयोग से योग साधक बहुत कुछ आश्चर्यजनक उपलब्धि हस्तगत करने में सक्षम हो सकते हैं।
चिंतन का नवनीत है। इसे पढ़ना पढ़ाना एक प्रकार का पावन पुण्य माना जाना चाहिए।
चिंतन
चिंतन मनन में डूब गए?
चिंतन, परामर्श होता रहा। निष्कर्ष जो निकलकर आए हैं, वे समुद्र मंथन के चौदह रत्नों की तरह हैं एवं इतने मूल्यवान हैं कि इस राष्ट्र एवं जगती की काया पलट करके रख देंगे, ऐसा लगता है।
चिंतन व तदनुसार ही संकल्प शपथ के साथ गायत्री तपोभूमि मथुरा के स्वर्ण जयंती वर्ष का पहला प्रकल्प संपन्न हो गया। सभी पाठक परिजन जानते हैं कि यह गायत्री तपोभूमि, मथुरा की स्थापना का स्वर्ण जयंती वर्ष है, जो जून 2002 से जून 2003 की अवधि में मनाया जा रहा है। शपथ समारोह इसी का एक अंग था, जिसे प्रायः चालीस हजार प्राणवान साधकों ने 20, 21, 22 अक्टूबर की तारीखों में शरद चंद्र की पावन रश्मियों एवं जलते दीपों की उर्मियाँ की साक्षी में अपने संकल्पों द्वारा सुशोभित किया। पूरे वर्ष यह स्वर्ण जयंती संकल्प समारोह चलता रहेगा एवं वह चलेगा- ली गई शपथ को अमल करने के रूप में, अपनी गुरुसत्ता के एक सच्चे सुपात्र बनने के रूप में।
चिंतन के रूप में आता है, शक्ल के रूप में नहीं आता। महाराज जी, हमने रात को हनुमान जी को देखा। तो देखा होगा, अच्छी बात है। बेटे, भगवान करे तुझे रोजाना दिखाई पड़े। महाराज जी, हमें तो कल लक्ष्मी जी दिखाई पड़ी।
चिंतन सूत्र कहता हैं, ‘चेतना प्रत्यक्ष’। यानि कि हमारी चेतना बिना किसी इंद्रिय माध्यम के सब कुछ साफ-साफ आमने-सामने देखे। गहरे ध्यान अथवा समाधि की भावदशा में ही साधक को यह स्थिति प्राप्त होती है। देखने के लिए जानने के लिए, किसी माध्यम की जरूरत नहीं रह जाती। किसी इंद्रिय की तो बिल्कुल भी नहीं।
चिंतन में श्रेष्ठता रहती है, वहाँ सभी विभूतियाँ बनी रहती हैं।
चिंतन करते थे, तो उछलकर बेहोश हो जाते थे और कीर्तन करते थे। वे एकाग्रचित्त हो जाते थे। अरे, कैसे एकाग्र हो जाएँगे? एक विषय पर, एक धारा पर आदमी का दिमाग लगा रहे, तो वह एकाग्र हो जाता है, लेकिन एक तरह के विचारों पर बहुत देर तक आदमी का मन स्थिर नहीं रह सकता, इसलिए हम सबेरे भी आपको ध्यान कराते हैं, छोटे-छोटे पीसों में कराते हैं। अलग-अलग तरह के वैराइटीज में कराते हैं, ताकि आपको एक विचार के ऊपर, एक क्रियापद्धति पर ध्यान को लगाने का, सीखने का मौका मिले।
चिंतन गीता का अमृत है। जिसने इसे समझ लिया, उसने मानो ब्रह्म को पा लिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-August
चिंतन गड़बड़ाता हो, तो उस चिंतन को तुम साफ करना। आगे आने वाले समय में कितना काम करना है। मैं देख चुकी हूँ तुम्हारे साहस को। उस समय हमारे कुछ बच्चे बाहर गए थे। मुझे भीतर से वेदन हुई कि इन बच्चों को ऐसा लगा होगा कि हमने गुरुजी के अंतिम दर्शन भी नहीं किए।
चिंतन एकदम भौतिक था। वे न तो गायत्री मंत्र का जप करते थे, न जीवन में कभी किसी अन्य मंत्र की उपासना की थी। दोनों का एज-ग्रुप 25-35 वर्ष के बीच रखा गया। दोनों ग्रुपों के सभी लोगों की स्वास्थ्य-परीक्षा कर यह सुनिश्चित कर लिया गया कि वे पूर्णतः स्वस्थ है। उनमें से किसी को भी न रक्तचाप संबंधी रोग था, न हृदय संबंधी।
चिंतन प्रखर होने पर स्वयं को ऊँचा उठा हुआ पाता है। आत्मिक प्रगति के विभिन्न सोपानों को पार करता हुआ अपने लक्ष्य तक जा पहुँचाता है।
चिंतन वालों की कामधेनु है। इसके अतिरिक्त अथर्ववेद में कहा गया है, ‘ऊँ स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्ताँ पावमानी द्विजानाम्। आयुः प्राणं प्रजाँ पशुँ कीर्ति द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्। मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्।’ गायत्री मंत्र की फलश्रुति विषयक यह श्लोक भी उनका ध्यान खींच रहा था।
चिंतन में होता है, वही चरित्र में भी होता है और जो चरित्र में होता है, वही व्यवहार में भी होता है। यह व्यवहार में होता है, तो स्वतः ही उसी प्रकार का वातावरण बना लिया जाता है। वह बाद में अपने आप बनता हुआ चला जाता है।
चिंतन में लगा दिया। अरे, दूसरा तो सड़ ही रहा है, हम और उसके साथ सड़ जाएँ। क्यों? हमें मिशन चलाना है, तो हम में प्रखरता होनी चाहिए, नम्रता भी होनी चाहिए, साथ ही अपने अंदर साहस और बल भी होना चाहिए।
चिंतन और चरित्र दोनों ही उच्चस्तरीय होने चाहिए। जो चिंतन में होता है, वही चरित्र में भी होता है और जो चरित्र में होता है, वही व्यवहार में भी होता है। यह व्यवहार में होता है, तो स्वतः ही उसी प्रकार का वातावरण बना लिया जाता है। वह बाद में अपने आप बनता हुआ चला जाता है।
चिंतन का अभाव एवं उत्कृष्टता के प्रति अनास्था अंततः उद्दण्डता को जन्म देते हैं। विकृत चिंतन से सद्विचारों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सिद्धाँतों के प्रति, अपनी दिव्यता के प्रति अनास्था मनुष्य को एकाकी, स्वार्थी एवं अहंकारी बनाती है।
चिंतन न बिगड़े। क्या पूछना है? आपस में राजी-खुशी पूछो। एक-दूसरे के दुःख-दर्द में काम न आएँगे, तो और कौन आएगा। मैं तो यहाँ बैठी रहती हूँ, मुझसे कोई कहने आएगा, तभी तो मुझे मालूम पड़ेगा।
चिंतन से सद्विचारों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सिद्धाँतों के प्रति, अपनी दिव्यता के प्रति अनास्था मनुष्य को एकाकी, स्वार्थी एवं अहंकारी बनाती है।
चिंतन को इस तरीके से ढाला कि एक स्वयं सेवक की मनोवृत्ति उनके अंदर हमेशा से विद्यमान रही। जहाँ कहीं भी उन्होंने कार्य किया, लोग उन्हें सराहते रहे। सैनिक प्रेम में जब काम करते थे, तो जो उनसे बड़े थे, वे सबसे यही कहते थे कि कहिए साहब, मैं बाजार जा रहा हूँ, कोई आपका काम है क्या? उनने कहा, हमारी बीबी के बच्चा होने वाला है। अच्छा दायी का प्रबंध करता हूँ और कोई बात?
चिंतन का परिणाम है। वैसे ही यह काया आत्मा की छाया है, उसका ही प्रतिबिंब है। ईश्वर ने इसकी सृष्टि अपना ज्ञान कराने, अपना अस्तित्व दर्शाने हेतु किया है, इसलिए मूल, ईश्वर की अंशधर आत्मा ही हुई। देह तो माया-मिथ्या के समान है, इसकी प्रतीति होते ही व्यक्ति को वैभव-विलास, यश-कीर्ति की निरर्थकता स्पष्ट भासने लगती है। वह सोचता है, जो चिरस्थायी नहीं, उसके प्रति मोह कैसा।
चिंतन को तुम साफ करना। आगे आने वाले समय में कितना काम करना है। मैं देख चुकी हूँ तुम्हारे साहस को। उस समय हमारे कुछ बच्चे बाहर गए थे। मुझे भीतर से वेदन हुई कि इन बच्चों को ऐसा लगा होगा कि हमने गुरुजी के अंतिम दर्शन भी नहीं किए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-October
चिंतन चले एवं कर्म भी उसी दिशा में नियोजित हों। युगधर्म की बात आती है, तो गोरखनाथ जी का एक दृष्टाँत बताने का मन करता है।
चिंतन और चरित्र की उत्कृष्ट धरोहरों से विमुख उद्दंड, आवारा और सब तरह से हेय कर्मों में लिप्त संतानें यहाँ के समुदाय में जन्में−पनपें, तो कोई आश्चर्य नहीं समझा जाना चाहिए।
चिंतन कर रहे थे कि कैसे इनका स्तर ऊँचा हो, कैसे अधिकाधिक व्यक्ति गुणात्मक दृष्टि से अच्छे इसमें भागीदारी करें। वे कहते हैं कि यह सत्र दूरगामी परिणामों को जन्म देंगे। इनसे साधक स्तर के लोकसेवी कार्यकर्त्ता निकलेंगे। अगर अन्यमनस्कता के साथ वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं ने इस शिक्षण को लिया तो वह परिणाम नहीं मिलेंगे
चिंतन एवं तपस्या प्रधान जीवन जीती थीं। उपनिषद् काल की मैत्रेयी एवं गार्गी इन स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। मैत्रेयी युग के महानतम तत्त्ववेत्ता याज्ञवल्क्य ऋषि की धर्मपत्नी थी। वृहदारण्यक उपनिषद् (2/4) में याज्ञवल्क्य एवं मैत्रेयी का संवाद आता है, जिससे मैत्रेयी के मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास की उच्चावस्था का ज्ञान होता है। गार्गी के भरी सभा में याज्ञवल्क्य ऋषि को शास्त्रार्थ करने का वर्णन भी उपनिषदों में मिलता है।
चिंतन−मनन हेतु प्रस्तुत कर दी गई हैं। अब इनकी समीक्षा व क्यों व किन परिस्थितियों में यह सब लिखा गया, इसके आगे का उनका मार्गदर्शन क्या रहा, यह अगले अंक में पढ़ सकेंगे। अभी इतना ही।
चिंतन व्यक्ति को द्वंद्वों में उलझाकर बंधनों में जकड़ लेता है। इन द्वंद्वों से मनोविकार एवं फिर प्रज्ञापराध पनपता है। व्यक्ति बाहर स्वस्थ, किंतु वस्तुतः रोगी बन जाता है। परमपूज्य गुरुदेव ने उसे वास्तविक रोगी एवं आस्था−संकट से ग्रस्त बताया है। यह भी उन्होंने कहा कि आज बहुसंख्य व्यक्ति इसी विडंबना में उलझे हैं, अधिक पाने की आकाँक्षा, राग की अधिकता, कामनाओं का महत्वाकाँक्षाओं में बदलना एवं बाधक तत्वों को हटाने के लिए द्वेष का जन्म लेना, फिर इन द्वंद्वों में उलझकर एक मायावी मृगतृष्णा में फँसकर जीवन गंवाते चलना यह नर समुदाय की एक नियति−सी बन गई है।
चिंतन तथा भक्ति का तात्पर्य है संवेदना, भावना। ये दो धाराएँ हैं। ये पक्षी के दो पंख, नाव के दो पतवार तथा नदी के दो तट हैं। जीवन की चैतन्य चेतनता इसी के बीच बहती-प्रवाहित होती है। इन दोनों के समुचित विकास से ही जीवन में परमात्मा का दिव्य प्रकाश प्रकाशित होता है।
चिंतन कर रहे हैं।
चिंतन ही धर्म−धारणा है। अभ्यास बस इसी का, नवरात्रि−साधना है।
चिंतन वाली भारतीय नारी
चिंतन, सोचने का तरीका सही हो, अहर्निश यही हमारा पुरुषार्थ चले, चिंतन चले एवं कर्म भी उसी दिशा में नियोजित हों। युगधर्म की बात आती है, तो गोरखनाथ जी का एक दृष्टाँत बताने का मन करता है।
चिंतन प्राचीन भारत में कभी स्थान नहीं पर सका था। पारिवारिक उत्तरदायित्व से लेकर शिक्षा, संस्कृति, समाज तथा शासन कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं रहा जिसमें भारतीय नारी का योगदान पुरुषों से कम रहा हो। वाचस्पति ने व्याकरण शास्त्र लिखा। उसकी प्रमुख श्रेयाधिकारी उनकी पत्नी भामती थी। याज्ञवल्क्य जैसे प्रकाँड पंडित को विदुषी गार्गी के पाँडित्य का लोहा मानना पड़ा था।
चिंतन करके पूज्यवर ने इन सत्रों का प्रावधान बनाया था, लगभग उसी स्तर पर 1980−81 में आरंभ किए गए चाँद्रायण साधना सत्रों के विषय में भी सोचा था। परमपूज्य गुरुदेव इसी विषय पर अपने गुजरात प्रवास में महुआ से 5-11-81 को एक पत्र में परमवंदनीया माताजी को लिखते हैं−
चिंतन करने को विवश करता है। आज भी हम साधना की धुरी पर ही संगठन के सशक्त होने की बात कह रहे हैं। ऐसी स्थिति में आगे के पत्र भी हमारा इसी इसी प्रकार मार्गदर्शन करते दिखाई देते हैं। ये बताते हैं कि सूक्ष्म से जानने की सामर्थ्य होते हुए भी हमारी गुरुसत्ता प्रत्यक्ष में मात्र शिक्षण हेतु किस तरह अपनी भावनाएँ प्रेषित करती थी। अमरेली से लिखे 6-11-81 के (पिछले पत्र के मात्र एक दिन बाद) पत्र में वे लिखते हैं−

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-March
चिंतन की दिशा बदलना ही युगपरिवर्तन है। यदि चिंतन की धारा उत्कृष्टता की ओर मुड़ जाए, तो व्यक्ति संत, सज्जन, महान, विचारवान, विद्वान एवं परमार्थपरायण बनकर देवत्व की भूमिका संपादन कर सकता है। हमारा ज्ञानयज्ञ इसी प्रयोजन के लिए है।” (पृष्ठ 65)
चिंतन करने वाले युवा रक्त की जरूरत है। इसीलिए स्कूलों-कॉलेजों की शिक्षण पद्धति में व्यापक क्राँति पैदा करने के लिए यहीं से वातावरण बनाते है।” (गुरुवार की धरोहर-भाग 2, पृष्ठ 80)
चिंतन के कारण कलंकित हो रही है।
चिंतन। एक पत्र जो सप्तर्षि आश्रम हरिद्वार से 31/5/61 को लिखा गया, इसी प्रवास की साक्षी देता हैं वे बशेशरनाथ जी (दिल्ली) को लिखते हैं-
चिंतन जीवनदर्शन की यथार्थता के साथ जुड़ सके तो ही काम चलेगा। थोड़ी दूरदर्शिता और थोड़ी साहसिकता अपनाने पर उन तथाकथित परिस्थितियों का स्वरूप ही बदल जाता है, जो लक्ष्यपथ पर चल सकने की असमर्थता-विवशता बनकर सामने आती रहती है। मकड़ी अपना जाला आप बुनती है और उसमें फँसकर छटपटाती और जिस-तिस को दोष देती है, किंतु जब अपना चिंतन उलटती है तो अपने बुने जाले के धागे को समेटती-निगलती चली जाती है। निविड़ दीखने वाले बंधन देखते-देखते साँझ के रंगीन बादलों की तरह अदृश्य होने लगते हैं।
चिंतन और दर्शन की सर्वोपरि विशेषता कहनी चाहिए कि उसमें कोई भी सार्वजनिक व्यवस्था सदैव जनहित के प्रति समर्पित रही है। भारतीय गुप्तचर प्रणाली इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जबकि दूसरे देशों और संस्कृतियों के समक्ष प्रणालियों में ऐसी सोच और भावना का स्पष्ट अभाव झलकता है। पिछले 13 दिसंबर को संसद भवन पर ओर इससे पूर्व जम्मू-कश्मीर विधान सभा में हुए आत्मघाती हमले को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह विदेशी गुप्तचर तंत्र की विध्वंसकारी सोच को ही परिलक्षित करता है। इन दिनों विश्वभर में कई ऐसी गुप्तचर व्यवस्थाएं है, जो अपने जन्मकाल से ही विनाश और जनहानि में संलग्न रही है।
चिंतन भर का है। न किसी के लिए पेट भारी पड़ता है और न परिवार। बोझिल तो वह मूर्खता है, जो लिप्सा-तृष्णा के रूप में जोंक की तरह शिराओं में दाँत गड़ाए खून चूसती रहती है।
चिंतन शैलियों और दृष्टिकोणों को दर्शाता और बताता है कि व्यक्ति की निजी सोच ही किसी वस्तु, व्यक्ति या विधा के भली-बुरी होने के पीछे जिम्मेदारी है। गुप्तचर्या आज इसी दुश्चिंतन के कारण कलंकित हो रही है।
चिंतन, व्यवहार और कर्तव्य पर अवलंबित है। असुरता जहाँ कहीं भी रहेगी, वहाँ अस्थिरता और अशाँति ही पैदा करेगी और सदाशयता का गला घोटती रहेगी। इसके विपरीत देवत्व बुराई में भी अच्छाई का संधान कर लेता है। द्रोणाचार्य ने दुर्योधन की परीक्षा के निमित्त जब उसे किसी अच्छे इंसान को ढूंढ़ लाने को कहा, तो लाख कोशिश करने के बावजूद भी उसे कोई अच्छा आदमी न मिला, सब उसे बुरे ही दीखते रहे। फिर युधिष्ठिर से किसी बुरे मनुष्य को तलाश लाने को कहा।
चिंतन करने वाले दूरदर्शी इस आपत्तिकाल में कहीं-न-कहीं होंगे। वे आएँगे और गुरुकुल विद्यापीठ को एक आदर्श विद्यालय, इंटर कॉलेज, महाविद्यालय एवं हमारे अभी के महाविद्यालय को विश्वविद्यालय बनाने हेतु खप जाएँगे। सारे भारत के चार हजार शक्तिपीठों, प्रज्ञासंस्थानों में से हमने लगभग पाँच सौ चिह्नित कर लिए हैं, जिन्हें महाविद्यालय के रूप में विकसित किया जाएगा व इस विश्वविद्यालय से संबद्ध किया जाएगा। संस्कार देने वाली अनौपचारिक, किंतु सर्वांगपूर्ण शोधप्रधान, पर स्वावलंबी बना देने वाली, मात्र डिग्रीधारी नहीं, शिक्षण प्रक्रिया भी यहाँ से एक वर्ष में आरंभ हो जाएगी। ब्राह्मणोचित जीवन जीने वालों को एक ही सलाह दी जा रही है कि बेटों को बैरिस्टर बनाने और लड़की को कुबेर के घर भेजने का नशा हलका कर लें और औसत नागरिक की तरह निर्वाह कर अपना जीवन धन्य बनाने, अपनी संतानों को भी यहीं इसी विश्वविद्यालय का स्नातक बनाने में गौरव का अनुभव करें।
चिंतन उलटती है तो अपने बुने जाले के धागे को समेटती-निगलती चली जाती है। निविड़ दीखने वाले बंधन देखते-देखते साँझ के रंगीन बादलों की तरह अदृश्य होने लगते हैं।
चिंतन को, नुकीला शर करें॥
चिंतन की धारा उत्कृष्टता की ओर मुड़ जाए, तो व्यक्ति संत, सज्जन, महान, विचारवान, विद्वान एवं परमार्थपरायण बनकर देवत्व की भूमिका संपादन कर सकता है। हमारा ज्ञानयज्ञ इसी प्रयोजन के लिए है।” (पृष्ठ 65)

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-November
चिंतन का मेल हो
चिंतन से अनुभूति की ओर का प्रयाण मनुष्य में रुका हुआ है, इसलिए प्रत्यक्ष में स्वाध्याय और सत्संग की नियमित दिनचर्या दिखलाई पड़ने पर भी उनकी वह परिणति सामने नहीं आती, जो आनी चाहिए।
चिंतन के साथ-साथ क्रिया को मिला देंगे, तो मन और क्रिया का समावेश हो जाएगा। यह दो चीजें शामिल हो जाएंगी- विचारणा और क्रिया तो चमत्कार हो जाएगा। विचारणा और क्रिया को मिला देने से हमारा शरीर और मन जिस तरीके से दोनों एक बन जाते है, वैसे ही आपकी साधना जीवंत हो जाएगी। प्रत्येक क्रिया के साथ हम पाँच उपासनाएँ बताते है। पाँच उपासनाओं का मोटा-मोटा स्वरूप हमने पत्रिकाओं में भी छापा दिया था और पिछले साल भी हमने स्वर्ण जयंती साधना भी सिखाई थी।
चिंतन होता है, वे सब केवल उन्हीं उन्हीं स्तरों की परिणतियाँ है, सो बात नहीं। उनका न्यूनाधिक लगाव भाव संस्थान की संस्कार-चेतना से भी होता है, इसलिए मानवीय चेष्टाओं को शुद्ध करने की जहाँ बात आती है वहाँ उसके चित्तगत संस्कारों को भी ध्यान में रखना होगा, क्योंकि मनुष्य 74 लाख योनियों की लंबी यात्रा के उपराँत यह शरीर धारण करता है, इसलिए चित्त में उनके भी सूक्ष्म संस्कार मानवीय अंतराल में जमे रहते है, वैसी ही उनमें प्रवृत्तियों दिखाई पड़ती है। इस आधार पर व्यक्तित्व भेद की व्याख्या भी अत्यंत सरल हो जाती है और यह बताया जा सकना शक्य हो जाता है कि यदि किसी में क्रोध किसी में घृणा, किसी में प्रेम तत्व प्रबल है, तो ऐसा क्यों है? मनोविज्ञान की इस संबंध में जो व्याख्याएँ है, वह अत्याधिक दुरूह है और अधूरी भी, कारण कि व्यवहार की व्याख्या वहाँ परिस्थिति के आधार पर की जाती है।
चिंतन और आचरण में आश्चर्यजनक साम्य था। जिस प्रकार उनका चिंतन श्रेष्ठ था, उसी के अनुरूप उनके व्यवहार में सात्विकता और उदात्तता थी। वे शुष्क ज्ञान को निरर्थक बताते और कहते थे कि ज्ञान की गरिमा सद् आचरण में है। जो इसका परिपालन करते और प्रकृति के अनुसार जीवनयापन करते है, उनके प्रतिभाओं की कमी नहीं रहती। वे विकसित होती चली जाती है।
चिंतन श्रेष्ठ था, उसी के अनुरूप उनके व्यवहार में सात्विकता और उदात्तता थी। वे शुष्क ज्ञान को निरर्थक बताते और कहते थे कि ज्ञान की गरिमा सद् आचरण में है। जो इसका परिपालन करते और प्रकृति के अनुसार जीवनयापन करते है, उनके प्रतिभाओं की कमी नहीं रहती। वे विकसित होती चली जाती है।
चिंतन करे कि ऐसा व्यवहार हुआ, तो इसका कारण क्या है? तो अंततः हम संस्कार चेतना के उस मूल बिंदु पर पहुंचेंगे जहाँ आकार मानवी आचरण को एक परिभाषा, सर्वांगपूर्ण व्याख्या तथा सर्वांगीण समाधान मिल जाता है। जब व्यवहार का उद्गम ज्ञात हो जाए, तो आदतों को मोड़ना मरोड़ना सरल हो जाता है।
चिंतन को और अपने विचार करने की श्रेणी को उसी पर स्थापित कीजिए, केंद्रित कीजिए। हमने आपसे कहा- प्रातःकाल का स्वर्णिम सूर्योदय। आप विचार कीजिए कि प्रातःकाल का लाल रँगा सूरज, सबेरे निकलता हुआ बड़ा वाला सूरज, पूरब से निकला, थोड़ा निकला, अभी थोड़ा और बढ़ा, अभी और बढ़ा और पूरा सूरज निकल आया। क्या मतलब है? बेटे, हमने आपसे कहा कि अपने मन को हमारी कही हुई बात पर लगा दें, फिर आपका मन उस काम पर लग जाएगा, तो भागने का सवाल ही नहीं है।
चिंतन और परोपकार की वृत्ति- इसे आदर्श जीवनपद्धति कहते है। इसको अपना लेने से भी आवश्यकता की काफी हद तक पूर्ति हो जाती है और वह लाभ प्राप्त हो जाता है, जो प्रकृति के मध्य रहकर प्राप्त किया जा सकता था। खोजने से ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाते है, जो इस बात की पुष्टि करते है कि सरल, सहज और सात्विक जीवन जीने से कौशल और निपुणता बढ़ती है एवं अनेक बार व्यक्ति को अद्भुत बना देती है।
चिंतन उभरता है कि यह प्रयोग जो समूह मन के जागरण की प्रक्रिया है, अब और विस्तार ले। इसी मार्गदर्शन के अनुसार ‘ब्रह्मवर्चस की पंचाग्नि विद्या’ पुस्तक में वह ध्यान दिया गया, जिससे ढेरों साधकों ने अपनी आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त किया एवं आज वही संयुक्त ध्यान परमपूज्य गुरुदेव के स्वर में नित्य प्रातः 4-30 से 5 तक शाँतिकुँज में संपन्न कराया जाता है।
चिंतन दिया है। चिंतन के साथ-साथ क्रिया को मिला देंगे, तो मन और क्रिया का समावेश हो जाएगा। यह दो चीजें शामिल हो जाएंगी- विचारणा और क्रिया तो चमत्कार हो जाएगा। विचारणा और क्रिया को मिला देने से हमारा शरीर और मन जिस तरीके से दोनों एक बन जाते है, वैसे ही आपकी साधना जीवंत हो जाएगी। प्रत्येक क्रिया के साथ हम पाँच उपासनाएँ बताते है।
चिंतन कर उसकी देखभाल करने वालों का एक तंत्र खड़ा किया जाता है। गायत्री परिवार ऐसा ही एक वटवृक्ष है, जो परमपूज्य गुरुदेव के तप एवं वंदनीया माताजी के सजल स्नेह भरे सिंचन से खड़ा हो आज करोड़ों के लिए मार्गदर्शन बना हुआ है।
चिंतन पवित्र होना चाहिए। हमारे साधन पवित्र होने चाहिए और हमारे जीवन की गतिविधियाँ पवित्र होनी चाहिए। अगर हम पवित्रता का पहला उद्देश्य पूरा कर लेते है, तो समझना चाहिए कि पाँच मुख वाली गायत्री की हमारी उपासना सफल हुई।
चिंतन दिया हुआ है। ऋषियों ने जितने भी कर्मकाँड बनाए है। उनके साथ में चिंतन दिया है। चिंतन के साथ-साथ क्रिया को मिला देंगे, तो मन और क्रिया का समावेश हो जाएगा। यह दो चीजें शामिल हो जाएंगी- विचारणा और क्रिया तो चमत्कार हो जाएगा।
चिंतन कहाँ लग रहा है यह आप देखें। आप कही लग रहे हो, जीभ कही लग रही हो, वस्तुएँ कही भी रखी हों, माला कहीं भी चल रही हो, पर बेटे, आप यह बताइए कि आपका चिंतन कहाँ लग रहा है? गुरुजी! चिंतन तो भागता रहता है। तो बेटे, भजन कहाँ हो रहा है? चिंतन को लगाने का उद्देश्य यह है कि जिस काम के लिए जो क्रियाएँ कराई जा रही हैं आप उस इशारे पर आ जाइए कि उस इशारे के साथ में आपको क्या चिंतन करना चाहिए?
चिंतन तो भागता रहता है। तो बेटे, भजन कहाँ हो रहा है? चिंतन को लगाने का उद्देश्य यह है कि जिस काम के लिए जो क्रियाएँ कराई जा रही हैं आप उस इशारे पर आ जाइए कि उस इशारे के साथ में आपको क्या चिंतन करना चाहिए?
चिंतन को कहाँ लगाएँ? सीधी-सी बात है- चिंतन कहाँ लग रहा है यह आप देखें। आप कही लग रहे हो, जीभ कही लग रही हो, वस्तुएँ कही भी रखी हों, माला कहीं भी चल रही हो, पर बेटे, आप यह बताइए कि आपका चिंतन कहाँ लग रहा है? गुरुजी! चिंतन तो भागता रहता है। तो बेटे, भजन कहाँ हो रहा है?
चिंतन कहाँ लग रहा है? गुरुजी! चिंतन तो भागता रहता है। तो बेटे, भजन कहाँ हो रहा है? चिंतन को लगाने का उद्देश्य यह है कि जिस काम के लिए जो क्रियाएँ कराई जा रही हैं आप उस इशारे पर आ जाइए कि उस इशारे के साथ में आपको क्या चिंतन करना चाहिए?
चिंतन और विचारों की धारा वही बहती रहे, तो मैं समझूँगा कि आपने विचारों का और क्रिया का समन्वय कर दिया। (क्रमशः)
चिंतन को लगाने का उद्देश्य यह है कि जिस काम के लिए जो क्रियाएँ कराई जा रही हैं आप उस इशारे पर आ जाइए कि उस इशारे के साथ में आपको क्या चिंतन करना चाहिए?
चिंतन। चेतना चिंतन से ताल्लुक रखती है। चेतना का स्रोत है- चिंतन। चिंतन को कहाँ लगाएँ? सीधी-सी बात है- चिंतन कहाँ लग रहा है यह आप देखें।
चिंतन। चिंतन को कहाँ लगाएँ? सीधी-सी बात है- चिंतन कहाँ लग रहा है यह आप देखें। आप कही लग रहे हो, जीभ कही लग रही हो, वस्तुएँ कही भी रखी हों, माला कहीं भी चल रही हो, पर बेटे, आप यह बताइए कि आपका चिंतन कहाँ लग रहा है? गुरुजी! चिंतन तो भागता रहता है।
चिंतन भटका है, बौराया है, प्रगति देखकर औरों की हर व्यक्ति बहुत ललचाया है, निज अभाव का नहीं, दूसरों के सुख का दुःख ज्यादा है, व्यक्ति पड़ोसी की ही दुर्गति करने पर आमादा है।
चिंतन को स्थान मिला तथा उसके कर्मकाण्डीय पक्ष को स्थगित किया गया। उपनिषदों में भी ज्ञानपक्ष की ही महत्ता प्रतिपादित की गई।
चिंतन से ताल्लुक रखती है। चेतना का स्रोत है- चिंतन। चिंतन को कहाँ लगाएँ? सीधी-सी बात है- चिंतन कहाँ लग रहा है यह आप देखें। आप कही लग रहे हो, जीभ कही लग रही हो, वस्तुएँ कही भी रखी हों, माला कहीं भी चल रही हो, पर बेटे, आप यह बताइए कि आपका चिंतन कहाँ लग रहा है?
चिंतन में इतनी प्रखरता और विद्वत्ता मानो साक्षात सरस्वती ही रूप बदलकर आ उपस्थित हुई हो। उनकी दिनचर्या बहुत ही नियमित थी। वे प्रातः तीन बजे उठ जाते और दैनिक क्रिया से निवृत्त होकर प्रायः एक घंटे तक उपासना और ध्यान करते। उसके उपराँत भ्रमण के लिए निकल जाते। प्रतिदिन तीन मील की पैदल यात्रा करने के बाद यज्ञ करते, तत्पश्चात् उनका अध्यापन कार्य आरंभ होता, जिसमें वे करीब एक घंटा लगाते।
चिंतन करना चाहिए?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-September
चिंतन और चर्चा के बीच वे दोनों जब भी इकट्ठे बैठते, भविष्य की नयी सम्भावनाओं पर चर्चा होती। उनके आराध्य उन्हें नयी भूमिका के लिए तैयार करते।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-July
चिंतन और अनाचरण से मुक्ति पाना। इसी को तत्वदर्शियों ने लोभ और मोह की हथकड़ी, बेडिय़ों से छुटकारा पाना कहा है। उनने बड़प्पन प्रदर्शन की अहंता को भी तीसरी बाधा बताया है। इन तीन से निपट लेने पर, उन भव–बन्धनों से, कषाय कल्मषों से छुटकारा मिल जाता है, जो पतन, पराभव के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं।
चिंतन चेतना के रूप में प्रचुर परिमाण में साहित्य लिख कर छोड़ गये हैं। धर्म-तंत्र से लोक मानस का परिष्कार, अध्यात्म का विज्ञानसम्मत प्रतिपादन, व्यक्ति, परिवार व समाज का नवनिर्माण करने वाला मार्गदर्शन तथा न्याय की स्थापना हेतु तैयारी संबंधों जो संजीवनी उनकी लेखनी से प्रकट हुई थी, डडडड रुक नहीं है। वह आगे भी उनकी शक्ति से अनुप्राणित हो सतत् चलती रहेगी तथा असंख्यों व्यक्तियों का मार्गदर्शन करती रहेगी। आने वाले दस वर्षों के लिए तो साहित्य वे लिखकर रख ही गये हैं। इस संबंध में किसी को अवसाद नहीं करना चाहिए कि उनकी लेखनी का प्रकाश अब उन तक नहीं पहुँचेगा।
चिंतन करते रहने के कारण जब वह कैद से छूटे तो सच्चे आस्तिक एवं कैथोलिक मत के अनुयायी बन कर निकले। उनके जीवन में कायाकल्प स्तर का परिवर्तन हो गया था। जैक को न केवल दूसरों के भविष्य में झाँकने की अतीन्द्रिय सामर्थ्य प्राप्त थे वरन् अपने बारे में भी उनने स्पष्ट कर दिया था कि उन्हें कई बार जेल की यात्रा करनी पड़ेगी और अंत में मृत्यु दंड दे दिया जायेगा। सभी घटनाएँ समयानुसार घटित होकर रहीं।
चिंतन चरित्र और व्यवहार में समाविष्ट उत्कृष्टता। यही वह है जिसे पवित्रता, प्रामाणिकता, और वरिष्ठता कहा जाता है और उन्हें कुछ भी दायित्व सौंपने पर ठीक तरह सम्पन्न किया जाने का विश्वास किया जाता है। यही है प्रामाणिकता जिसके आधार पर किसी को भी जनसाधारण की आँखों में श्रद्धास्पद बनने का अवसर मिलता है। ईश्वर तक उन्हें अपने प्रतिनिधि-पार्षद का गौरव प्रदान करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-September
चिंतन-प्रतिपादन क्रियान्वयन में दर्शन की सार्थकता है।” व्याख्या की समाप्ति पर प्राध्यापकों समेत प्राचार्य महोदय के हाथ जुड़े थे। प्राचार्य महोदय भावपूर्ण स्वर में बोले-”मैं आपको समझ नहीं सका था। डॉ. राधाकृष्णन को सुनने के बाद मुझे सभी फीके लगते थे। पर आज आपको सुनकर लगा कोई उसे भी एक कदम आगे है, जो न केवल दर्शन की सार्थकता समझा सकता है बल्कि स्वयं के जीवन में दर्शन को सार्थक कर रहा है।
चिंतन चेतना इसका प्रमाण है। यही तो है निष्कलंक प्रज्ञावतार जिसे दशमावतार कहा गया है।
चिंतन, श्रम एवं मनोयोग लगाने में कोई कसर न छोड़ेंगे।
चिंतन न जाने कौन सी अदृश्य शक्ति इस तेजी से बदल रही है कि परमार्थ के लिए सत्प्रयोजनों के लिए देवमानवों में सहज ही उमंगें उठने लगी है। यदि यह परिवर्तन एक छोटे स्तर पर भी कहीं क्रियारूप लेता दिखाई देता हो तो भविष्य में महाकाल एवं अदृश्य जगत में विद्यमान समर्थ सत्ताओं से और व्यापक स्तर पर सक्रिय होने की आशा की जा सकती है।
चिंतन, स्वास्थ्य व सत्संग से रोक कर सही दिशा दिखाती हैं व सदैव आत्मनिर्माण, आत्मविकास की प्रेरणा देती रहती है। सद्विचारों के लिए श्रेष्ठ साहित्य ही वरेण्य होना चाहिए व सतत् स्वाध्यायरत रह, श्रेष्ठ व्यक्तियों के समूह में रह कर व्यक्तियों को सही चिन्तन की शैली का अभ्यास करना चाहिए, यह सत्संकल्प का प्रथम पाठ है एवं सही कहा जाय तो यही मर्म है। यदि इतनी व्यवस्था भी कोई जीवन में कर ले तो वह बदल जाए, साथ ही अनेकों को बदल दे।
चिंतन उनके मन में सतत् चल रहा था। वंदनीया माताजी को उनने कार्य क्षेत्र से भी जो पत्र लिखे, उनमें यही बातें थी कि संगठन में से मणि मुक्तक तलाशने हेतु अभी एक पुरुषार्थ और बाकी है ताकि “जीवट का अंश कहीं भी आधिक परिमाण में विद्यमान हो तो वह गरम होने पर मलाई की तरह उछल कर ऊपर आ जाय व दूध पर तैरने लगे”।
चिंतन व समाज का विधान, प्रचलन क्या हो, इसका सुनिश्चित निर्धारण इस महामंत्र के विराट विस्तार द्वारा सम्पन्न हुआ है। देवसंस्कृति की जन्मदात्री, देवमाता, वेदमाता अब उनके महाप्रयाण के बाद विश्वमाता का रूप धारण करने जा रही है, इसे अगले दिनों ही देखा जा सकेगा। सुसंस्कृत समुन्नत विश्व का निर्माण इसी चिन्तन धारा की पृष्ठभूमि पर होने जा रहा है।
चिंतन की धारा से, ऋषियों का प्रादुर्भाव हुआ। मैंने जब ऋचा उचारी तो, सुर संस्कृति का फैलाव हुआ॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-April
चिंतन मनन के पश्चात् वे इसी निष्कर्ष पर पहुँच पाये है कि व्यक्ति की कषाय-कल्मषों से मुक्ति अपने भीतर की प्रसुप्त चेतना को जगाने के उपरान्त ही संभव है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-November
चिंतन की स्वच्छता जहाँ शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रखती है, वहीं उसकी विकृति अनेकानेक बीमारियों का कारण बनती है। इस तथ्य की पुष्टि मनोविज्ञानियों एवं मनःचिकित्सकों ने अब गहन अध्ययन एवं अनुसंधान के आधार पर की है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-December
चिंतन, पूज्य गुरुदेव के महत्वपूर्ण उद्बोधन आदि विषयों पर भी कैसेट उपलब्ध हैं। यह कैसेट शाँतिकुँज से अविलम्ब मँगा लेने चाहिए ताकि नवयुग के स्वागत का आकर्षक क्रम तत्काल प्रारंभ किया जा सके।
चिंतन व जीवन है।
चिंतन की उत्कृष्ट बनाने की महत्वपूर्ण मुहिम संभालनी होगी।
चिंतन कथन और कर्तव्य की प्रामाणिकता है। विज्ञान मात्र प्रकृति से सम्बन्धित सूक्ष्म जगत का रहस्योद्घाटन करने और उससे लाभान्वित होने तक सीमित न होकर जीवन से, प्राणि शरीरों से भी सम्बन्धित है। चेतना उसी से लिपटी एवं सघनतापूर्वक गुँथी हुई सक्रिय है। उसकी शक्ति अदृश्य होते हुए भी इतनी प्रचण्ड है कि अनगढ़ पदार्थ जगत को सुनियोजित कर स्वर्गोपम सुखद परिस्थितियाँ पैदा कर दे। इसे ही अध्यात्म कहते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-May
चिंतन के द्वारा हम माया बन्धनों और सांसारिक अज्ञान को काट लेते हैं और विषय वासनाओं से छूट जाते हैं तो हम मुक्त हो जाते हैं। किन्तु ऐसी मुक्ति तब तक नहीं मिल सकतीं जब तक कि सृष्टि के शेष प्राणी बन्धन में पड़े हैं।
चिंतन की उत्कृष्टता एवं संकल्प की प्रबलता जितनी अधिक सुदृढ़ होगी उतना ही अधिक स्पष्ट उनका रूप उभर कर आयेगा। यदि संकल्प विश्रृंखलित या कमजोर हुए विचारों में अस्त–व्यस्तता हुई तो उसके प्रकंपन भी कमजोर होंगे और स्पष्ट आकार न ग्रहण कर सकेंगे।
चिंतन क्रम के अनुरूप अपनी गतिविधियों का निर्धारण कर लेने पर आधी से अधिक बीमारियों विपन्नताओं का समाधान को जीवन में ताक-झाँक करने का अवसर तक नहीं मिलता। तनाव से बचने के यह सहज उपचार है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-June
चिंतन व चरित्र पर अवलम्बित है। सेवा और परमार्थ ही मनुष्य का वह आकर्षण बनाये रहता है जो जन्म जन्मांतरों तक आभा रहित नहीं होता। आदर्शवादी व्यक्तित्व और सेवा संलग्न कर्तव्य ही वह निधि है, जिसके क्षरण होने की कभी कोई आशंका ही नहीं की जानी चाहिए।
चिंतन चरित्र एवं व्यवहार की उत्कृष्टता अपने चरम उत्कर्ष पर थी जिनके संपर्क सान्निध्य के लिए सभी लालायित रहते थे। जर्मन दार्शनिक मैक्समूलर का इस संबंध में कहना है कि भारतीय स्वभाव से ही दार्शनिक हैं। उनकी दार्शनिक जाति प्रसिद्ध है जिन्होंने सभी क्षेत्रों में आशाजनक उन्नति की थी। सभ्यता को पराकाष्ठा तक पहुँचाने वाले आर्यों ने दार्शनिक ज्ञान को भी ऊँचाई तक पहुँचाया था। प्रो. वेवर के अनुसार “आर्यों की चिन्तन शक्ति इतनी ओजपूर्ण थी कि वह दार्शनिक ज्ञान के क्षेत्र में सब से आगे थे।
चिंतन को अपनाना ही अभीष्ट है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-February
चिंतन के माध्यम से आत्मसत्ता को व्यवहारव्यापी बनाने का क्रम शुरू किया।"
चिंतन करके इन गुणों पर आस्था जमाए और व्यवहार के माध्यम से इनको सक्रिय करे तो धीरे-धीरे ये अपने जीवन का अविभाज्य अंग हो जाएँगे। सद्गुणों की जितनी अधिक सघनता होती है, सद्विचारों के द्वारा मन जितना अधिक प्रकाशित होता है, सपने उतनी ही अधिक गहराई की कहानी सुनाते हैं। 'मेमोरीज, ड्रीम्स, रिफलेक्शन्स' के लेखक मानव मन के आचार्य कार्लजुंग ने इसे स्वीकारते हुए अपने निजी अनुभव से प्रामाणिक ठहराया है। उनका इसी किताब में कहना है कि, "सन् 1944 में एक दिन मैंने सपना देखा कि एक पहाड़ी सड़क में टहल रहा हूँ। पास में मंदिर है।
चिंतन की चमक से है। साफ-सुथरा चिंतन, सुधरी सोच, उन्नत कल्पनाएँ हर किसी को कहीं भी प्रमुदित बनाए रख सकती है। अंतिम सिद्धि वहाँ है, जिसे प्राप्त होने पर मनुष्य सिद्ध बनता है। इसका नाम है— अध्यात्मिक दुखहान। ऐसी स्थिति में जागृत भाव-चेतना समूचे व्यक्ति को अपने प्लावन से ओत-प्रोत कर देती है।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार बदला और साथ ही उच्चस्तरीय परिवर्तन भी सुनिश्चित हो गया।
चिंतन, चरित्र, व्यवहार में पूरी तरह भगवान ओत-प्रोत रहा और उन्हें अपने सान्निध्य का, उपयोगी आदान-प्रदान का प्रत्यक्ष आभास कराता रहा। ऋषियों, तपस्वियों, मनीषियों, महामानवों, लोकसेवियों, उदात्त, संयमशीलता के साधकों को ही सच्चे अर्थों में भक्त माना जा सकता है और उन्हें इस अवलंबन के सहारे पूरी तरह कृत-कृत्य हुए देखा जा सकता है।
चिंतन, दृष्टिकोण, उत्साह, साहस जैसी अदृश्य प्रवृत्तियों के संबंध में हर किसी के लिए यह अनुमान लगाना कठिन होता है कि पर्दे के पीछे काम करने वाली मदारी की उँगलियाँ ही समूचे प्रह्सन की निमित्तमात्र है। तमाशे का सूत्रधार तो मानसिकता का बाजीगर ही होता है। समस्याओं का वास्तविक हल उसी के हाथ है। बंदी-कठपुतलियों के साथ माथा-पच्ची करना कुछ अर्थ नहीं रखता, फिर भी बच्चे को चाभी के खिलौनों की हलचलें ही प्रभावित करती हैं। उन्हें यह कहाँ पता होता है कि खोखले के भीतर जमे हुए पुर्जे ही यह चित्र-विचित्र हलचल करते हैं।
चिंतन-चेतना के बहते रहने पर हम अपना मूल्यांकन, उपलब्धियों के आधार पर करने लगे हैं। इस हालत में न तो चेतनसत्ता के प्रति चिंतन-मनन का समय मिलता है और न आदर्शों के प्रति अभिरुचि जाग्रत होती है।
चिंतन के बीजों से अंकुरित होता, चरित्र के पौधे के रूप में विकसित हो, व्यवहार विटप के रूप में अपना विस्तार करता है। स्वाभाविक है, यह विस्तार बीज के अनुरूप हो। बबूल का बीज तो बड़ा होकर खुद की तथा दूसरों की राह पर काँटे ही बिखेरेगा। उससे यह उम्मीद कैसे की जाए की आम के स्वादिष्ट फल खाने को मिलेंगे। आम के लिए तो भूमि को कुरेदकर बबूल के बीज को निकालने, आम के बीज को गाड़ने जैसी प्रक्रियाओं में संलग्न होना होगा।
चिंतन उसे प्राप्त करने और उपलब्धि की सुरक्षा करने में खप जाता है। उस की अभिवृद्धि एवं उपभोग में ही हम उलझे रहते हैं। एक ही दिशा में चिंतन-चेतना के बहते रहने पर हम अपना मूल्यांकन, उपलब्धियों के आधार पर करने लगे हैं। इस हालत में न तो चेतनसत्ता के प्रति चिंतन-मनन का समय मिलता है और न आदर्शों के प्रति अभिरुचि जाग्रत होती है।
चिंतन की स्वतः प्रक्रिया को न दबाया जाए। उचित-अनुचित का निर्णय ले सकने वाली प्रतिभा का विकास तभी होता है।
चिंतन-मनन का समय मिलता है और न आदर्शों के प्रति अभिरुचि जाग्रत होती है।
चिंतन-पद्धति को बदलने तथा पाश्चात्य वैज्ञानिक विचारधारा में, प्राच्य दार्शनिक चिंतन में, वैज्ञानिक विचारधारा को समाविष्ट किए जाने की आवश्यकता पड़ेगी और तब विज्ञान और दर्शन दोनों महाशक्तियों का समन्वय जीवन की पूर्णता की उपलब्धि सरलतापूर्वक करा सकेगा। भविष्य के इक्कीसवीं सदी के विज्ञान का यही स्वरूप होगा।
चिंतन और आचरण में निरत हो गए। प्रतिफल जो होना था, वही हुआ। देवता स्वर्गीय वातावरण का आनंद लेते रहे और दैत्यों ने अपना ही नहीं, अपनी पकड़ में आने वालों, संपर्क-साधने वालों का अहित-ही-अहित किया। स्वयं भर्त्सना के भाजन बनते और दुर्गति के गर्त में गिरते रहे। इतना ही नहीं, जो भी संपर्क में आया, उसे पतन के गर्त में गिराया।
चिंतन, चरित्र व व्यवहार को सुधारा जा सके। चौथी का नाम है— सुहृत प्राप्ति अथवा 'सत्संग'; ऐसे लोगों का संग, जो हमें समय की पहचान कराएँ, हमारे मनोबल को मजबूत बनाएँ, जिससे जीवन-साधना अविराम चलती रहे। पाँचवीं सिद्धि है— 'दान' अर्थात अपने समय का कुछ भाग स्वयं के अनुभवों को दूसरों को बताने व उन्हें सन्मार्ग की ओर मोड़ने में लगाना। अपने प्रयत्नों से स्वाध्याय और सत्संग की प्रक्रिया को वह तेजी देना, जिससे दूर अनेकों व्यक्ति जीवन-साधना को अपना सकें; स्वयं के व्यक्तित्व को परिपक्व बना सकें।
चिंतन को जीवनचर्या के साथ जोड़ने के लिए नौ सूत्र ऐसे सुझाए हैं, जिनके समाविष्ट होने पर भ्रांतियाँ मिटती और प्रसुप्त प्रतिभा निखरती हैं। ये नौ सूत्र इस प्रकार है—
चिंतन में, वैज्ञानिक विचारधारा को समाविष्ट किए जाने की आवश्यकता पड़ेगी और तब विज्ञान और दर्शन दोनों महाशक्तियों का समन्वय जीवन की पूर्णता की उपलब्धि सरलतापूर्वक करा सकेगा। भविष्य के इक्कीसवीं सदी के विज्ञान का यही स्वरूप होगा।
चिंतन के बीजों को नष्ट करने, सत्चिंतन को उगाने जैसी प्रक्रिया चल पड़े तो समूचा जीवन बदलता नजर आने लगेगा। स्वप्न की छान-बीन, इस प्रक्रिया में बहुत अधिक सीमा तक सहायक सिद्ध हो सकती है, यदि इनकी बारीकियों को समझा जा सके। आज के मनोवैज्ञानिक ने भी इस बात को स्वीकार किया है। उनके अनुसार नींद में दिखाई देने वाले सपनों के माध्यम से तीन चीजें उजागर होती हैं, वर्तमान चिंतन, गहरे पड़े भले-बुरे संस्कार और मनोभूमि की उर्वर या बंजर स्थिति। यही तीन भिन्न-भिन्न रूपों, झाँकियों के माध्यम से स्वप्नों के झरोखे से प्रकट होते अपनी झलक दिखाते रहते हैं।
चिंतन-चेतना में, क्रियाकलापों में विकृतियों की भरमार का कार्य तो उसने पूरे कर लिए, परंतु प्रतिफल जब अकालमृत्यु के रूप में सामने आया तो, किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो अदृश्य सत्ता की ओर ताकने लगा है। उनके अनुसार प्रस्तुत समय की विषम परिस्थितियों को अनुकूल बनाने में मात्र परमात्म सत्ता ही सहायक सिद्ध हो सकती है। मनुष्य की शक्ति, क्षमता और प्रतिभा एक सीमित दायरे में थोड़ा-बहुत अपना चमत्कार प्रस्तुत कर सकती है, किंतु विस्तृत भूमंडल की परिस्थितियों का नियंत्रण करना तो दूर, उनकी सूक्ष्मता को समझना भी मुश्किल है। फिर समूचे ब्रह्मांड की स्थिति को समझना तो उसकी शक्ति से सर्वथा परे है।
चिंतन करने से गुण के प्रति आस्था जगेगी, दोषों से विरक्ति होगी। इतना ही नहीं, पूर्ण मनोयोग से उसे क्रिया-व्यवहार में उतारें। चेतना की गहरी परतों में दुर्गुणों की खरपतवार उखाड़ने, सत्प्रवृत्तियों की फसल रोपने का यही तरीका है।
चिंतन चेतना को पतनोन्मुख एवं विध्वंसक गतिविधियों से विमुखकर विधेयात्मक एवं रचनात्मक दिशा में मोड़-मरोड़कर रख दे और नवसृजन की सुखद प्रक्रिया चल पड़े तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं मानना चाहिए।
चिंतन-मनन करने, तदनुरूप प्रयासरत बने रहने से प्रसुप्त मानसिक क्षमताओं का विकास होता और जीवन सब प्रकार से सफल सिद्ध होता है।
चिंतन, चरित्र, व्यवहार की श्रेष्ठता उसकी कसौटियाँ हैं। इस परीक्षण पर खरा उतरने पर चेतनसत्ता जो तथ्य उसके समक्ष उजागर करती है, वह आधुनिक वैज्ञानिक शक्ति से कई गुने अधिक सुस्पष्ट, सशक्त एवं उपयोगी होते हैं। उनके अनुसार विज्ञान के बढ़ते चरण को सुविधा-संवर्द्धन तक ही सीमित न रहने देकर यदि उसी प्रक्रिया को अगले कदम के रूप में जीवन तथ्यों के उद्घाटन की ओर मोड़ा जा सके तो जो बुद्धि, भौतिक शक्ति के अन्वेषण में लगी हुई है, वही परम सत्य का उद्घाटन करने में भी समर्थ हो सकती है। तब बहुसंख्यक उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों के उदाहरण सामने होने पर सामान्यजनों का मन भी उस ओर आकर्षित होगा। रुझान बढ़ने पर प्रगति की दिशाधारा तदनुरूप बन पड़ेगी।
चिंतन-चरित्र, कार्य-संचालन के तौर-तरीकों की बारीकियाँ परखी जा सकती है। उदाहरण के लिए दो परीक्षार्थियों के स्वप्न को लें। एक देखता है कि मैं पहाड़ की चोटी पर खड़ा हूँ और दूसरा कि मैं लड़ाई लड़ रहा हूँ। इसका मतलब है कि पहला आत्मविश्वासी है। दूसरे के मन में अपने प्रति विश्वास की कमी है और वह परीक्षा का लड़ाई जैसा दृष्टिकोण रखता है।
चिंतन, गहरे पड़े भले-बुरे संस्कार और मनोभूमि की उर्वर या बंजर स्थिति। यही तीन भिन्न-भिन्न रूपों, झाँकियों के माध्यम से स्वप्नों के झरोखे से प्रकट होते अपनी झलक दिखाते रहते हैं।
चिंतन को उगाने जैसी प्रक्रिया चल पड़े तो समूचा जीवन बदलता नजर आने लगेगा। स्वप्न की छान-बीन, इस प्रक्रिया में बहुत अधिक सीमा तक सहायक सिद्ध हो सकती है, यदि इनकी बारीकियों को समझा जा सके। आज के मनोवैज्ञानिक ने भी इस बात को स्वीकार किया है। उनके अनुसार नींद में दिखाई देने वाले सपनों के माध्यम से तीन चीजें उजागर होती हैं, वर्तमान चिंतन, गहरे पड़े भले-बुरे संस्कार और मनोभूमि की उर्वर या बंजर स्थिति। यही तीन भिन्न-भिन्न रूपों, झाँकियों के माध्यम से स्वप्नों के झरोखे से प्रकट होते अपनी झलक दिखाते रहते हैं।
चिंतन, चरित्र, व्यवहार में उभारना पड़ेगा। ये यों ही नहीं उभरेंगे। कष्ट सहना होगा। तितिक्षा सहनी होगी, इसी का दूसरा नाम तप है। जब स्वयं सारे सद्गुण अच्छी तरह खूबसूरत ढंग से उभर आए तो दूसरे के पास जाओ।
चिंतन, क्रियाकलाप-प्रवाह वैसा ही कुछ बनाकर खड़ा कर देता है, जैसा कि सोचा या कहा गया था। हमें मुरझाए पत्ते सींचने की योजना नहीं बनानी चाहिए; वरन जड़ तक खाद-पानी पहुँचाने का प्रयत्न करना चाहिए।
चिंतन, सुधरी सोच, उन्नत कल्पनाएँ हर किसी को कहीं भी प्रमुदित बनाए रख सकती है। अंतिम सिद्धि वहाँ है, जिसे प्राप्त होने पर मनुष्य सिद्ध बनता है। इसका नाम है— अध्यात्मिक दुखहान। ऐसी स्थिति में जागृत भाव-चेतना समूचे व्यक्ति को अपने प्लावन से ओत-प्रोत कर देती है। व्यक्ति संवेदनशील, सक्रिय और प्रामाणिक बन जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-August
चिंतन-प्रतिपादन क्रियान्वयन में दर्शन की सार्थकता है।” व्याख्या की समाप्ति पर प्राध्यापकों समेत प्राचार्य महोदय के हाथ जुड़े थे। प्राचार्य महोदय भावपूर्ण स्वर में बोले-”मैं आपको समझ नहीं सका था। डॉ. राधाकृष्णन को सुनने के बाद मुझे सभी फीके लगते थे। पर आज आपको सुनकर लगा कोई उसे भी एक कदम आगे है, जो न केवल दर्शन की सार्थकता समझा सकता है बल्कि स्वयं के जीवन में दर्शन को सार्थक कर रहा है।
चिंतन चेतना इसका प्रमाण है। यही तो है निष्कलंक प्रज्ञावतार जिसे दशमावतार कहा गया है।
चिंतन, श्रम एवं मनोयोग लगाने में कोई कसर न छोड़ेंगे।
चिंतन न जाने कौन सी अदृश्य शक्ति इस तेजी से बदल रही है कि परमार्थ के लिए सत्प्रयोजनों के लिए देवमानवों में सहज ही उमंगें उठने लगी है। यदि यह परिवर्तन एक छोटे स्तर पर भी कहीं क्रियारूप लेता दिखाई देता हो तो भविष्य में महाकाल एवं अदृश्य जगत में विद्यमान समर्थ सत्ताओं से और व्यापक स्तर पर सक्रिय होने की आशा की जा सकती है।
चिंतन, स्वास्थ्य व सत्संग से रोक कर सही दिशा दिखाती हैं व सदैव आत्मनिर्माण, आत्मविकास की प्रेरणा देती रहती है। सद्विचारों के लिए श्रेष्ठ साहित्य ही वरेण्य होना चाहिए व सतत् स्वाध्यायरत रह, श्रेष्ठ व्यक्तियों के समूह में रह कर व्यक्तियों को सही चिन्तन की शैली का अभ्यास करना चाहिए, यह सत्संकल्प का प्रथम पाठ है एवं सही कहा जाय तो यही मर्म है। यदि इतनी व्यवस्था भी कोई जीवन में कर ले तो वह बदल जाए, साथ ही अनेकों को बदल दे।
चिंतन की धारा से, ऋषियों का प्रादुर्भाव हुआ।मैंने जब ऋचा उचारी तो, सुर संस्कृति का फैलाव हुआ॥
चिंतन व समाज का विधान, प्रचलन क्या हो, इसका सुनिश्चित निर्धारण इस महामंत्र के विराट विस्तार द्वारा सम्पन्न हुआ है। देवसंस्कृति की जन्मदात्री, देवमाता, वेदमाता अब उनके महाप्रयाण के बाद विश्वमाता का रूप धारण करने जा रही है, इसे अगले दिनों ही देखा जा सकेगा। सुसंस्कृत समुन्नत विश्व का निर्माण इसी चिन्तन धारा की पृष्ठभूमि पर होने जा रहा है।
चिंतन उनके मन में सतत् चल रहा था। वंदनीया माताजी को उनने कार्य क्षेत्र से भी जो पत्र लिखे, उनमें यही बातें थी कि संगठन में से मणि मुक्तक तलाशने हेतु अभी एक पुरुषार्थ और बाकी है ताकि “जीवट का अंश कहीं भी आधिक परिमाण में विद्यमान हो तो वह गरम होने पर मलाई की तरह उछल कर ऊपर आ जाय व दूध पर तैरने लगे”।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-March
चिंतन में भगवत आस्था की ऐसी प्रगाढ़ निष्ठा भरी थी कि गाँधी के नाम से लहर आती थी और सारे देश में एक विकट तूफान-सा उठ पड़ता था। वह शक्ति गाँधी की नहीं थी, जनता की भी नहीं। संपूर्ण क्रांति की वह शक्ति परमसत्ता की थी, जो गाँधी जी के हृदय में हिलोरें मार रही थी।
चिंतन का विकास न होने के कारण वे मात्र उसका अनुकरण भर कर पाते हैं, जो सामने दृष्टिगोचर होती हैं। उचित-अनुचित का भेद और मर्यादा-वर्जना का अंतर भी वे नहीं कर पाते, इसलिए उनके सामने प्रचलन ही प्रमुख होता है। विवेक की अविकसित स्थिति में उन्हें चतुर लोग आसानी से बहकाने, फुसलाने और दबाने-दबोचने में भी सफल होते रहते हैं। वे अपने को नियति के बंधनों से जकड़े हुए ही मानते हैं। यथास्थिति बनाए रहने में ही उन्हें संतोष करना पड़ता है।
चिंतन व प्रखर कर्म का मिलन” कुछ भी कहें। समर्थ ने शिवाजी की योजना व कार्यपद्धति सुनकर अपना मत प्रकट किया “आज के युग में आवश्यकता सुव्यवस्थित व संगठित प्रयासों की है। तू इसी में जुट पड़। पर ध्यान रख भेड़ों की भीड़ का नाम संगठन नहीं है। ऐसी भीड़ तो प्रायः जुटती है, पर दोष दुष्प्रवृत्तियों का एक ही हमला उसे तितर-बितर कर देता है।
चिंतन और भ्रष्ट आचरण अपनाए बिना काम नहीं चलता।
चिंतन चरित्र व व्यवहार में उतारना शुरू किया। बढ़ते क्रम के अनुसार कार्य की प्रभावोत्पादकता भी बढ़ी। उनके हृदय में जलती स्वाभिमान की आग भड़कती जा रही थी। अनीति-अत्याचार कीट-पतंगों की तरह भुनते जा रहे थे। 41 दुर्गों पर त्याग और सेवा का प्रतीक फहरा चुका था।
चिंतनशील प्राणी है, जो चाहे तो अपने मानसिक स्तर को इतना विकसित कर सकता है, जिसके माध्यम से ब्राह्मीचेतना से, परोक्ष जगत से संपर्क स्थापित कर भावी परिवर्तनों को पूर्व से ही वह जान ले। यह एक जाना माना तथ्य है कि हर परिवर्तन की रूपरेखा पहले सूक्ष्मजगत में बनती है, फिर वह अपने प्रत्यक्षरूप में आँखों से देखी जा सकने वाली स्थिति में घटित होती है।
चिंतन क्षेत्र है; जिसमें समाज की तात्कालिक समस्याओं के समाधान सूझते हैं। जो इस मनीषा से संपन्न है, वह मनीषी। इस परंपरा में ज्ञानदेव, एकनाथ और तुकाराम आते हैं”।
चिंतन-क्षेत्र की विषमता व तनाव के कारण पनपती है। इसका उपचार भी तदनुरूप ही ढूँढ़ा जाना चाहिए। विशेषज्ञों ने ई.के.जी. बायोफीडबैक को इसके लिए बहुत उपयुक्त पाया है। एक और इस उपक्रम में जहाँ मन को विधेयात्मक विचारणाओं से परिपूरित करने का अवसर मिलता है, वहीं भावना-क्षेत्र का परिशोधन कर संकल्पबल को बढ़ाया जाता है। हृदय की गतिविधियों एवं ब्लडप्रेशर को नियंत्रित करने में यह युक्ति बहुत कारगर सिद्ध हुई है।
चिंतन ही एक मात्र कारण है। यदि वह भविष्य में भी इसी प्रकार बना रहा, तो उपरोक्त समस्याओं में से किसी का भी महाविनाश से पूर्व समाधान होने की संभावना नहीं है।
चिंतन चेतना का जीता-जागता स्वरूप माने, जो सतयुग की आधारशिला रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रही है। पत्रिकाओं का पठन-पाठन ही परोक्षरूप से उनके द्वारा दी गई ज्ञानदीक्षा है।
चिंतन का है। इसी के कारण उसके चरित्र और व्यवहार में भ्रष्टता घुस पड़ती है और तरह-तरह के आक्षेप उलाहना लगने शुरू होते हैं। दुष्ट चिंतन ही भ्रष्ट आचरण का निमित्त बनता है और इसी के कारण अनेकों अवांछनीयताएँ उसके सिर पर लद लेती हैं। कहना न होगा कि कर्मफल भोगे बिना किसी को छुटकारा नहीं। भले ही वह भटकाव के कारण ही क्यों न बन पड़ा हो।
चिंतन ही भ्रष्ट आचरण का निमित्त बनता है और इसी के कारण अनेकों अवांछनीयताएँ उसके सिर पर लद लेती हैं। कहना न होगा कि कर्मफल भोगे बिना किसी को छुटकारा नहीं। भले ही वह भटकाव के कारण ही क्यों न बन पड़ा हो। चारे के लोभ में चिड़ियाँ और मछलियाँ बहेलियों के हाथ पड़ती और अपनी जान गँवाती देखी गई हैं। जो बोया है वही तो काटना पड़ेगा।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार को प्रभावित करने के उपरांत ऐसी उलझनें विनिर्मित करती हैं, जिनका भौतिक आधार पर कोई निश्चित समाधान ही संभव नहीं। संभव इतना है कि उस मनःस्थिति के साथ अवांछनीय रूप से जुड़ी हुई प्रक्रिया को समझा और समझाया जाए, जो कि विचार क्षमता को दैत्य के चंगुल से छुड़ाकर देवता के हवाले करे। दृष्टिकोण और क्रियाकलाप में मानवीय गरिमा के अनुरूप सात्विकता-सदाशयता का समावेश करे। इतने भर से एक ही चाबी उन जैसे मजबूत तालों को खोल देगी और “खुल जा सिमसिम” के अली बाबा के इशारे से एक नया माहौल विनिर्मित करेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-January
चिंतन-क्षेत्र में उपजे ये कारण अंदर ही अंदर नासूर की तरह पनपते और मनोंरोगों के रूप में फट पड़ते हैं। किसी भी तरह इन अवांछित कारणों को बीजरूप में ही समाप्त किया जा सके, तो इन विकृतियों की गुंजाइश न रहेगी। पर किया तो तब जाए, जब ये बीज दिखाई पड़ें। इन्हें देखने की सामर्थ्य ऋषि की अंतर्दृष्टि में होती है, जो इन अवांछित कुप्रवृत्तियों, दुश्चिंतन को बीजरूप में देखते-परखते और स्पष्ट करते हैं। साथ ही सत्प्रवृत्तियों, सद्गुणों के बीजों के अंकुरण लायक भूमि तैयारकर सत्चिंतन का खाद-पानी जुटाते रहते हैं।
चिंतनशैली के बदलने पर जनसामान्य की विचारणा भी नवनिर्मित वातावरण के अनुरूप ढलती चली जाएगी।
चिंतन की ही बात सोची जाने लगी है। उसकी पूर्ति के लिए उचित-अनुचित सभी तरह के तरीके अपनाए जाते हैं। इस मनोवृत्ति को उनने ‘हैंडसम डैविल’ के नाम से सबोधित किया है। इस निषेधात्मक विचार-प्रक्रिया को अपनाने के कारण न केवल भोगवादियों को संत्रस्त रहना पड़ रहा है वरन, परोक्ष रूप से उसका प्रभाव समूची मानव जाति पर पड़ रहा है। दार्शनिकों ने इस मनोवृत्ति को ‘हैडोनिज्म’ कहा है, जिसके कारण मनुष्य मादक पदार्थों के सेवन से लेकर परपीड़न, कामुकता, अपराधों, मनोरोगों, और आत्महत्या की ओर अग्रसर होता जाता है।
चिंतन की ऊर्जा-तरंगें अपेक्षाकृत अधिक सशक्त और प्रबल होती हैं। आज इनका पोषण, अभिवर्द्धन एवं उत्सर्जन ही समग्र प्रगति, सुखद वातावरण एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए अभीष्ट है।
चिंतन और अंतराल का समुद्र-मंथन ही प्रधान कार्यक्रम है। तदनुसार ही नियमोपनियम भी बनाए गए है। संभवतः यहाँ पाँच दिन शान्तिकुञ्ज की परिधि में रहकर उसी प्रकार काटने होंगे, जिस प्रकार कि गर्भस्थ भ्रूण माँ के पेट में ही निर्वाह करता है और जिस प्रकार भी भरण-पोषण अनुशासन निर्धारित रहता है, उसी के परिपालन में एकाग्र रहता है। अन्वेषण हेतु वैज्ञानिकों को अपनी प्रयोगशाला में, योगियों को ध्यान-साधना हेतु अपनी कुटी में, कायाकल्प-प्रक्रिया संपन्न करने वालों को एक छोटी कुटिया में रहना पड़ता है। लगभग वैसी ही स्थिति साधकों की रहेगी।
चिंतन को बीजरूप में देखते-परखते और स्पष्ट करते हैं। साथ ही सत्प्रवृत्तियों, सद्गुणों के बीजों के अंकुरण लायक भूमि तैयारकर सत्चिंतन का खाद-पानी जुटाते रहते हैं।
चिंतन को धुआँधार विकृतियाें से भरती क्यों चली आ रही है ? निकट भविष्य के संबंध में मूर्धन्य विचारक यह भविष्यवाणी क्यों कर रहे हैं  कि स्थिति यही रही, रेल इसी पटरी पर चलती रही, तो विपन्नता बढ़ते-बढ़ते महाप्रलय जैसी स्थिति में पहुँच जा सकता है? वे कहते हैं, कि हवा और पानी में विषाक्तता इस तेजी से बढ़ रही है कि उसे धीमी गति से सर्वभक्षी आत्महत्या का नाम दिया जा सकता है। बढ़ता हुआ तापमान यदि ध्रुवों की बर्फ पिघला दे और समुद्र में भयानक बाढ़ ला दे, तो उससे थल निवासियों के लिए डूब मरने का संकट उत्पन्न कर सकता है। वनों का कटान , रेगिस्तान का द्रुतगामी विस्तार, भूमि की उर्वरता का ह्रास, खनिजों के बेतरह दोहन से उत्पन्न हुआ धरित्री असंतुलन, मौसमों में आश्चर्यजनक परिवर्तन, तेजाबी मेघवर्षण, अणु-विकिरण, बढ़ती हुई जनसंख्या के अनुरूप जीवन-साधन न बढ़ पाने का संकट; जैसे अनेकानेक प्रश्न ऐसे हैं, जिनमें किसी पर भी विचार किया जाए तो प्रतीत होता है कि तथाकथित प्रगति ही उन समस्त विग्रहों के लिए पूरी तरह उत्तरदाई है।
चिंतन कर रहे होते हैं, पर अनायास इस क्रम में ऐसे विचार कौंध जाते हैं, जिसकी आशा भी नहीं की गई होती है। कुछेक अवसरों पर ऐसे विचार क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए जिम्मेदार होते हैं। 17वीं सदी के फ्रांसीसी दार्शनिक रेने डेस्कार्टिस के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने जो प्रतिपादन आधुनिक युग के वैज्ञानिक तरीकों, सिद्धांतों एवं उनसे संबंधित दर्शन के बारे में किया, उन सबके मूल में परोक्ष जगत की अदृश्य प्रेरणा की ही प्रमुख भूमिका थी। इस क्रांतिकारी प्रतिपादन के कारण ही उन्हें वैज्ञानिक युग का ‘जनक’ माना गया है।
चिंतन को विकसित किया था। पति के द्वारा तैयार की गई इन पांडुलिपियों को एक सरसरी निगाह से देखा तो अवाक रह गई। लज्जा और क्रोध से उनका चेहरा आरक्त हो गया। साहित्य के नाम पर यह प्रवंचना उन्हें असह्य लगी।
चिंतन-चेतना की उत्कृष्टता- निकृष्टता ही वह प्रमुख आधार है, जो मनुष्य समुदाय के उत्थान-पतन का, प्रगति-दुर्गति का निमित्तकारण बनती है। एक व्यक्ति के चिंतन की पद्धति दूसरे को भी समान रूप से प्रभावित करती है।” यह कथन है विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक एवं मनोविज्ञानी विलियम जेम्स का।
चिंतन एकांत की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार मनोवैज्ञानिक संशोधनों के लिए भी एकांत सेवन करना पड़ता है। ऐसे एकांतसेवी जो ब्रह्मर्षि होते हैं, वे संसार को जीवन के तत्त्वज्ञान का चिंतनात्मक सार देते हैं, जिसमें जीवन की समस्याओं का समाधान समाहित होता।
चिंतन और पुरुषार्थ का अपना महत्त्व है। उसकी शानदार प्रतिकृतियों को नकारा नहीं जा सकता। इस पर अदृश्य वातावरण द्वारा प्रभावित होने वाले अचेतन मन की अतिरिक्त क्षमता के दिशा बदल लेने पर जो आश्चर्यजनक परिवर्तन होते देखे गए हैं, उन्हें किसी अदृश्य सूत्रसंचालक का निर्धारण या प्रेरणा-संचार करने वाला प्रभातपर्व जैसा उदीयमान प्रकाश ही कह सकते हैं। उसमें मानवी कर्तृत्व का कहाँ कुछ योगदान होता है। वह विशुद्ध नियति-निर्धारण है, जो अपने समय पर अपने ढंग से प्रकट या फलित होता रहता है।
चिंतन, चरित्र और व्यवहार में गिरावट के दृश्य ही परिलक्षित हो रहे हैं। उत्कृष्टता का पक्षधर वातावरण विनिर्मित होता कहीं दीख नहीं पड़ता।
चिंतन क्षेत्र में अवांछनीयता का घुस पड़ना। यदि इस एक ही तथ्य पर पहुँचा जा सके और विचार-परिष्कार को समस्त समस्याओं का एक हल माना जा सके, तो बात इतने भर से बन जाती है। इस एक ही चाबी से उलझनों के अगणित ताले सरलतापूर्वक खुल सकते हैं।
चिंतन और दुष्ट आचरण वाले स्वभाव-अभ्यास को और अधिक गहन करते रहने से स्पष्ट इनकार कर दे। भूल समझ में आने पर उलटे पैरों लौट पड़ने में भी कोई बुराई नहीं है। गिनती गिनना भूल जाने पर, दुबारा नए सिरे से गिनना आरंभ करने में किसी समझदार को संकोच नहीं करना चाहिए। जीवन सच्चे अर्थों में धरती पर रहने वाला देवता है। नर-कीटक, नर-पशु, नर-पिशाच जैसी स्थिति तो उसने अपनी मनमर्जी से स्वीकार की है।
चिंतनात्मक सार देते हैं, जिसमें जीवन की समस्याओं का समाधान समाहित होता।
चिंतन की पद्धति दूसरे को भी समान रूप से प्रभावित करती है।” यह कथन है विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक एवं मनोविज्ञानी विलियम जेम्स का।
चिंतन करते तथा  कर्तृत्त्व का निर्धारण करते हैं। ये जब जिस काल या युग में सक्रिय होते हैंं, उसकी काया पलटकर दिखाते हैं।
चिंतन चेतना का उर्वर-क्षेत्र है— मनुष्य का अपना अंतराल है। चरित्र व व्यवहार की कठपुतलियों की डोर घुमाना, उन्हें नचाना, यहीं से संभव बन पड़ता है। बाहर के जीवनक्रम में घटने वाली वांछित-अवांछित गतिविधियाँ— कार्य के रूप में सामने आती हैं। कारणों की परिपक्वता के बाद कार्य को रोक पाना असंभव प्रायः होता है। किसी भी तरह जबरदस्ती कर यदि रोक भी दिया जाए तो चिंतन-क्षेत्र में उपजे ये कारण अंदर ही अंदर नासूर की तरह पनपते और मनोंरोगों के रूप में फट पड़ते हैं।
चिंतन-चेतना वाली बुद्धिमत्ता। इन दोनों को तिरस्कृत—  उपेक्षित पड़ा रहने दिया जाए, तो कचरा भर बनकर रह जाती हैं और कूड़े के ढेर में बुहार फेंकी जाती हैं, पर यदि उनका अभिवर्द्धन और सुनियोजन बन पड़े, तो इतने भर से उत्पन्न हुए चमत्कारों को ऋद्धि-सिद्धि जैसे नामों से जाना जा सकता है। लोगों के असंख्यों एक-से-एक बढ़कर प्रगति-प्रयोजन साक्षीरूप में प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
चिंतन की शक्ति । राजर्षि का लक्षण— उसकी निरहंकार सेवा भावना है। वैसे ही देवर्षि का लक्षण है— सबके लिए प्रेम भरा दिल। वह नारद की तरह देव-दानव-मानव सभी से मिलता है। उन्हें प्रेरित करता है।
चिंतनक्षमता गँव— गुमा दे। तृष्णा तो समुद्र की चौड़ाई और गहराई से भी बढ़कर है। उसे तो भस्मासुर, वृत्तासुर, महिषासुर जैसे महादैत्य भी पूरी न कर सके। फिर बेचारे मनुष्य की तो बिसात ही क्या है?, जो संतोष की अभिव्यक्ति के लिए कहीं कोई आश्रय प्राप्त कर सके ?
चिंतनकोश “दानिम नामे दुशात्वे” के पृष्ठ सूचित करते हैं कि जीवन के बहाव में विकास की गति यदि सही दिशा में है, तो कुछ विलक्षण क्षणों का आना अनिवार्य है। ऐसे क्षणों में अनुभव होने लगता है कि व्यक्तिगत अस्तित्व, हित, आवश्यकताएँ, लक्ष्य सभी कुछ समाज से किसी न किसी रूप में अभिन्न और अविच्छिन्न है। ऐसी दशा में व्यक्तिगत 'लघु अहं', जिसमें उसकी नियति तथा जीवन की परिस्थितियों की अनन्य प्रकृति परावर्तित होती है एवं “वृहत अहं”, जो समूचे जनगण का— सारी मानव जाति का समष्टि रूप है, में समा जाता है।
चिंतनशैली को आधार बनाकर ही। विराट विश्व की आराधना जो कर सकें, ऐसे संन्यासी-वानप्रस्थ-परिव्राजक समयदानी-लोकसेवी समाज के हर अंचल से निकलें एवं प्रतिगामिता से मोर्चा लें, धर्म—अध्यात्म को प्रगतिशील बना उसे नए प्राण दें।
चिंतनशक्ति के अभाव में समाज पंगु हो जाएगा। प्रगति रुक जाएगी। भौतिक वैज्ञानिक शोधकार्य के लिए जिस प्रकार चिंतन एकांत की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार मनोवैज्ञानिक संशोधनों के लिए भी एकांत सेवन करना पड़ता है। ऐसे एकांतसेवी जो ब्रह्मर्षि होते हैं, वे संसार को जीवन के तत्त्वज्ञान का चिंतनात्मक सार देते हैं, जिसमें जीवन की समस्याओं का समाधान समाहित होता।
चिंतन में आई गिरावट को दूर नहीं किया गया, तो हमारे आस-पास भूख और पीड़ा से कराहते बच्चों की चीत्कार, उन्मादी होते जा रहे मनुष्य पर हावी शैतान के ठहाके क्या हमें चैन की जिंदगी जीने देंगे ?”— नवयुवक का तर्क था। अपनी जगह पर सही भी था। पिता तर्कों का उत्तर नहीं दे पा रहे थे, किंतु उनसे यह भी नहीं हो पा रहा था कि अपने होनहार बेटे को दुनिया से विमुख होते देख सकें। वकालत पास किया हुआ वह नवयुवक हालैंड चला गया।
चिंतन और दृढ़ हुआ। अब वह लेखनी के माध्यम से समाज में जागृति लाने के प्रयत्न में जुट गया। उद्देश्य के प्रति स्वयं की प्रगाढ़ता इतनी थी कि लाख प्रयत्नों के बाद भी पिता उसे तोड़ न सके। पिता ने उससे कहा कि, “यदि तुमने अपनी खब्त न छोड़ी, तो मैं तुम्हें अपनी जायदाद में एक कौड़ी भी नहीं दूँगा और हमेशा के लिए त्याग दूँगा।”
चिंतन और कर्म दोनों एकदूसरे के पूरक हैं। एक उत्कृष्ट होगा— दूसरा प्रखर बनेगा”। “आपको कहाँ से लिखने की प्रेरणा मिली?''— "प्रेरणा ?” इतना कहकर मानो वह अतीत के गहरे सागर में डूब गए।
चिंतन करने और प्रकाश देने के लिए स्थिर भी तो बैठना चाहिए।"
चिंतन के आधार पर समाजसेवी, लोकसेवा में निरत रहते हैं। इन्हें ही राजर्षि कहा जाता है। ऐसे सेवा करने वाले समाज में न रहें तो समाज सूखकर कुम्हला जाएगा। ऐसे लोकसेवी विचारशील समाज में आवाज बुलंद करते हैं। आंदोलन की जरूरत हो तो आंदोलन खड़ा करते, संगठन की जरूरत हो तो वह भी बनाते हैं।
चिंतन का खाद-पानी जुटाते रहते हैं।
चिंतन व कर्मपीड़ित मानवता की मरहम-पट्टी करते रहे।"
चिंतन है। इसकी अपनी शक्ति होती है। जो चेतना की गहराई में जाकर विश्व की सूक्ष्मता में प्रवेशकर जीवन के सिद्धांतों की शोध करती है। इस चिंतनशक्ति के अभाव में समाज पंगु हो जाएगा। प्रगति रुक जाएगी।
चिंतन हेतु विवश करने में समर्थ हुई, अगले दिनों सारे बुद्धिजगत से मोर्चा लेगी।