अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-July
स्वाध्याय एवं सत्संग की उत्कृष्ट पाठ्य सामग्री बड़ी आसानी से मिल सकती है। इतना अनुदान अपने आत्मीय जनों को नियमित रूप से दे सकें तो हमें यह सन्तोष ही रहेगा कि उनके भावना स्तर को परिष्कृत करने के लिए कुछ उत्तम प्रयत्न किया जा सका।
स्वाध्याय, चिन्तन तथा चारु-चरित्र से आत्मा को प्रबुद्ध कीजिए। उन पर पड़े कुसंस्कारों के आवरण को पुण्य कर्मों से जला डालिये। परोपकार एवं परमार्थ में आस्था रखिये। आस्तिकता के बल पर आत्मा की उपस्थिति पहचानिए, उसे प्रत्यक्ष होने का अवसर दीजिये। आप की बुद्ध एवं प्रबुद्ध आत्मा अपने भीतर छिपे शत-शत स्वर्गों को आपके लिए प्रत्यक्ष एवं उपलक्ष्य बना देगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-September
स्वाध्यायशील हैं और आपको पुस्तक रखने का चाव है, तो आपकी रुचि अथवा लक्ष्य का विचारक किसी समय आपसे दूर नहीं है। यदि आप उनसे आधी-रात को भी मिलना और उनके विचार जानना चाहें, तो अपने संकलन से उनकी पुस्तक निकाल लीजिये। पृष्ठ उलटिये और वे आपसे बातें करने, अपने विचार प्रकट करने लगेंगे। पुस्तकों द्वारा महापुरुषों का सत्संग स्वाध्यायशीलता के बल पर, आज सरलतापूर्वक पाया जा सकता है।
स्वाध्याय की सुविधा प्राप्त नहीं है, उन्हें सत्संग तथा प्रामाणिक व्यक्तियों के कथनों, निर्देशों तथा उपदेशों में निश्चय करके अपने चरित्र का विकास करना चाहिये। सत्य के समर्थन में अपनी मान्यताओं, परम्पराओं, धारणाओं, रूढ़ियों, आग्रहों तथा अंधविश्वासों का त्याग कर सकने का साहस भी ज्ञान ही है। सत्य को यथावत स्वीकार कर लेने और उसको अपने व्यवहार में लाने वाले व्यक्ति ज्ञानी ही कहे जायेंगे फिर चाहे वे निरक्षर ही क्यों न हों।
स्वाध्याय एवं सत्संग हर प्रकार से सहायक हो सकते हैं। जिन्हें संयोगवश स्वाध्याय की सुविधा प्राप्त नहीं है, उन्हें सत्संग तथा प्रामाणिक व्यक्तियों के कथनों, निर्देशों तथा उपदेशों में निश्चय करके अपने चरित्र का विकास करना चाहिये। सत्य के समर्थन में अपनी मान्यताओं, परम्पराओं, धारणाओं, रूढ़ियों, आग्रहों तथा अंधविश्वासों का त्याग कर सकने का साहस भी ज्ञान ही है। सत्य को यथावत स्वीकार कर लेने और उसको अपने व्यवहार में लाने वाले व्यक्ति ज्ञानी ही कहे जायेंगे फिर चाहे वे निरक्षर ही क्यों न हों।
स्वाध्याय का झंझट क्यों उठायें? साल में 4) खर्च क्यों करें? यह कसौटी सामने आते ही उस भीड़ में से अधिकाँश लोग हट गये। केवल 40 हजार सदस्य ही अखण्ड-ज्योति परिवार के रूप में रह गये।
स्वाध्यायशीलता के बल पर, आज सरलतापूर्वक पाया जा सकता है।
स्वाध्याय के लिये महत्वपूर्ण सद्ग्रन्थ पढ़ने से हृदय में निर्मलता और मन में एकाग्रता की वृद्धि होती है। विवेक उज्ज्वल और बुद्धि प्रखर होती है। मन को संयमित एवं सुशील बनाने में पुस्तकों का अध्ययन बड़ी सीमा तक सहायक होता है। निरन्तर प्रेरणाप्रद, जीवनोंपवागी पुस्तकें पढ़कर तन्मयता का गुण सहज रूप से बढ़ाया जा सकता है। सदाचार, सद्विचार तथा सद्वृत्तियाँ बढ़ाने में तो पुस्तकों का योगदान सबसे अधिक रहता है।
स्वाध्याय। लोग सत्पुरुषों की लिखी पुस्तकों का अध्ययन करें और उन्नति की ओर प्रेरित करने वाले विचारों को ग्रहण करें और उनके अनुसार अपने जीवन की रीति-नीति निर्धारित करते चलें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-April
स्वाध्याय, सेवा और संयम की साधना करने के लिए मथुरा रहना ही चाहिए, पर यदि इतना न बन पड़े तो एक वर्ष तो रहना ही चाहिए। इस एक वर्ष में वे अपने गायत्री पुरश्चरण अधिक उत्तम रीति से कर सकते हैं। साथ ही गीता, रामायण, वेद, शास्त्र, उपनिषद्, दर्शन आदि का सार-तत्व भी एक नियमित पाठ्यक्रम के रूप में बढ़ाया जायगा। गृहस्थ में प्रवेश करने से पूर्व जिस प्रकार बालकों को हिसाब, भूगोल, भाषा आदि की पढ़ाई पढ़नी पड़ती है उसी प्रकार पारलौकिक जीवन में प्रवेश करने से पूर्व—ब्रह्मविद्या की शिक्षा भी प्राप्त करनी चाहिए। यह प्रशिक्षण एक वर्ष का तो होना चाहिए।
स्वाध्याय सत्संग तथा सत्कर्मों का ग्रहण कीजिए। कुविचार उत्पन्न करने वाले वातावरण से दूर हटिये। लोभ आने पर त्याग कीजिये दान दीजिये, क्रोध होने पर करुणाजनक प्रसंग पढ़िये, कामावेग के समक्ष निर्वेद का सहारा लीजिये और मोह से बचने के लिए ईश्वर का चिन्तन करिये। निरन्तर इस प्रकार का क्रम चलाते रहने से कुछ ही समय में आपका हृदय निर्मल होने लगेगा। निर्मलता की प्रसन्नता का थोड़ा-सा आभास पाते ही फिर मन पुनः अपना परिमार्जन करने में तत्पर हो जायेगा।
स्वाध्याय, सबको आप कहना, बड़ों के चरण-स्पर्श, वेष-भूषा में सादगी, खादी पहनना, एक घंटे का पारिवारिक प्रशिक्षण आदि अनेकों अच्छाइयाँ ऐसी हो सकती हैं जो उस दिन से अभ्यास में समाविष्ट की जायँ। कोई बुराइयाँ अपने में हों तो उनमें से भी एक छोड़ी जा सकती है। इस प्रकार एक व्रत भी उस दिन लिया जाय और फिर उस पर निष्ठापूर्वक दृढ़ रहा जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-November
स्वाध्यायी बने उसके लिये प्रेरणादायक पुस्तकें संचय करें और नित्यप्रति उनका पारायण करता रहकर अपनी बुद्धि, विवेक तथा ज्ञान को विकसित करता रहे, वहाँ यह भी आवश्यक है कि स्वाध्याय की प्रेरणा दूसरे लोगों में भी भरे। किसी समाज में रहते हुए मनुष्य का स्वयं अपने लिये सुखी, साधन-सम्पन्न अथवा ज्ञानवान बनना कोई अर्थ नहीं रखता, फिर भारतीय समाज में रहते हुए—जिसमें आज अज्ञान का भयानक अन्धकार फैला हुआ है। धर्म के नाम पर न जाने कितने ढोंग जनता को पथभ्रष्ट करने में जुटे हुए हैं।
स्वाध्याय द्वारा स्वयं तो ज्ञान का प्रकाश प्राप्त ही करे साथ ही यथासाध्य अपनी परिधि में निवास करने वाले लोगों को भी प्रकाश एवं प्रेरणा दे। आज के युग का यह सबसे बड़ा पुण्य-परमार्थ है। यों भी ज्ञान पाना और उस ज्ञान से अन्यों में ज्ञान-प्राप्ति की प्रेरणा भरना पुण्य कर्म ही कहा गया है। तब आज की भ्राँत स्थिति में तो यह सर्वोपरि पुण्य कर्म बताया गया है।
स्वाध्याय का ही एक ऐसा माध्यम रह गया है जिसके द्वारा वे सत्संग से अपेक्षित लाभ पुस्तकों से प्राप्त कर सकते हैं।
स्वाध्याय। विचार बड़े ही संक्रामक, संवेदनशील तथा प्रभावशाली होते हैं। जिस प्रकार के व्यक्तियों के संसर्ग में रहा जाता है मनुष्य के विचार भी उसी प्रकार के बन जाते हैं। व्यवसायी व्यक्तियों के बीच रहने, उठने-बैठने, उनका सत्संग करने से ही विचार व्यावसायिक, दुष्ट तथा दुराचारियों की संगत करने से कुटिल और कलुषित बन जाते हैं। उसी प्रकार चरित्रवान तथा सदात्माओं का सत्संग करने से मनुष्य के विचार महान एवं सदाशयतापूर्ण बनते हैं।
स्वाध्याय रूपी सत्संग द्वारा कोई भी व्यक्ति उन विद्वानों का विचार-संग किसी समय भी, किसी स्थान पर प्राप्त कर सकता है, जो आज संसार में नहीं है अथवा जो सुदूर देशान्तर में रह रहे हैं। परिचित भाषा ही नहीं अनुवादों द्वारा अपरिचित भाषाओं के विद्वानों के विचार-संग में आया जा सकता है। पुस्तकों के माध्यम से प्रामाणिक विद्वानों का सत्संग विचार विकास के लिये अधिक उपयोगी, सरल तथा निरापद है।
स्वाध्याय की प्रेरणा दूसरे लोगों में भी भरे। किसी समाज में रहते हुए मनुष्य का स्वयं अपने लिये सुखी, साधन-सम्पन्न अथवा ज्ञानवान बनना कोई अर्थ नहीं रखता, फिर भारतीय समाज में रहते हुए—जिसमें आज अज्ञान का भयानक अन्धकार फैला हुआ है। धर्म के नाम पर न जाने कितने ढोंग जनता को पथभ्रष्ट करने में जुटे हुए हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-October
स्वाध्याय न करने से, आलस्य से और कुधान्य खाने से ब्राह्मण का पतन हो जाता है।
स्वाध्यायशील बनें, मनन-चिन्तन करें, अपने भावनात्मक स्तर को ऊँचा उठावें और उत्कृष्ट मानव निर्माण करके भारतीय समाज को देव समाज के रूप में परिणत करने के हमारे उद्देश्य को पूरा करें। पर वैसा न हो सका। अधिकाँश लोग चमत्कारवादी निकले। वे न तो आत्मनिर्माण पर विश्वास कर सके और न लोकनिर्माण में। आध्यात्मिक व्यक्तियों का जो उत्तरदायित्व होता है उसे अनुभव न कर सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-May
स्वाध्याय करेंगे। तीसरे पहर गीता रामायण की कथा चला करेंगी। यों गीता रामायण का पाठ तो कई लोग करते हैं पर धर्म शास्त्रों के निचोड़ इन महाग्रन्थों का रहस्य कोई विरले ही जानते हैं। एक वर्ष में इन दोनों महाग्रन्थों का इस प्रकार शिक्षण किया जायगा कि शिक्षार्थी भारतीय धर्म और संस्कृति के समूचे स्वरूप को इन दोनों ग्रन्थों के ही आधार पर पूरी तरह समझ लें। इस शिक्षण क्रम में विशेषताएं ही विशेषताएं भरी रहेंगी।
स्वाध्याय और साधना की अन्योन्याश्रय संगति है। ब्रह्म-विद्या का ज्ञान प्राप्त करना ही सच्चा सत्संग है। सच्चे सत्संग की आवश्यकता ऊट-पटाँग बकवास से नहीं, वरन् क्रमबद्ध शास्त्र अध्ययन से ही पूरी हो सकती है। इस एक वर्षीय वानप्रस्थ साधना में ब्रह्म-विद्या की शिक्षा को भी आधारभूत अंग बना दिया गया है।
स्वाध्याय में जिनकी अभिरुचि नहीं, चोर, जुआरी, लम्पट, व्यभिचारी तथा माता-पिता का अपमान करने वाले, सन्त-पुरुषों को कष्ट देने वाले—सब व्यक्ति जिनके ऐसे आचरण हों, निशाचर कहे जाते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-December
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन के द्वारा हमने जो पाया है, उसका सार—शहद हम अपने इस छोटे परिवार को बाँट जाना चाहते हैं। वैसा करने की हमें सुविधा मिलनी चाहिये।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-February
स्वाध्याय, विधि निषेध एवं कर्म-काण्डों का विस्तृत विधि-विधान केवल इसी प्रयोजन के लिए है कि इस अवलम्बन को अपनाकर व्यक्ति निरन्तर सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनता चला जाय। कषाय-कल्मषों का परिशोधन ही हो। स्वर्ग, मुक्ति एवं ईश्वर-साक्षात्कार का यह एक मात्र साधन हो सकता है। हमारा सारा धार्मिक कलेवर इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए है।
स्वाध्याय की व्यवस्था रहनी अवश्य चाहिये, इससे परिजनों का जीवन स्तर विकसित होता है, भावनाओं का परिष्कार होता है और सच्चा ज्ञान उदय होता है।
स्वाध्याय भी किया जा सकता है। इनमें कोई एक व्यक्ति दृष्टान्त और कहानियाँ जोड़कर प्रसंगों को सरल और रोचक करता रहे तो और भी लाभदायक। छोटे या बड़े किसी न किसी रूप में आपके परिवार में स्वाध्याय की व्यवस्था रहनी अवश्य चाहिये, इससे परिजनों का जीवन स्तर विकसित होता है, भावनाओं का परिष्कार होता है और सच्चा ज्ञान उदय होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-January
स्वाध्याय, सत्संग, भ्रमण, स्वास्थ्य-संवर्द्धन, प्रेमालाप, मैत्री आदि सद्गुणों का विकास करने से कई बुराइयाँ अपने आप छूट जाएंगी, कई दूर बनी रहेंगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-August
स्वाध्याय और प्रसार ही होना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-December
स्वाध्याय सत्संग जैसे स्थूल आधारों के सहारे व्यक्तित्व का स्तर बदल सकना सम्भव भी है, अथवा नहीं। चरित्र निमार्ण एवं भावना-स्तर के विकास में अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ ही यदि सहायक-बाधक हैं तो फिर उस क्षेत्र में हो रहे प्रयत्नों पर नये सिरे से विचार करना होगा और व्यक्तित्व की गहराई तक पहुँचने के लिए चालू प्रयत्नों से आगे बढ़कर कुछ नये आधार ढूँढ़ने होंगे।
स्वाध्याय सत्संग एवं विविध-विधि धर्म-कृत्यों का एक मात्र प्रयोजन यही है कि आत्मा पर चढ़े हुए संकीर्ण-स्वार्थपरता के वे कषाय कल्मष हट जाएँ तो वासना-तृष्णा के-लोभ-मोह के भव-बन्धनों में जकड़े रहते हैं। नरक कोई स्थान नहीं, संकीर्ण स्वार्थपरता की निकृष्ट दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया मात्र है। उदारता एवं सेवा-साधना के जल-साबुन से ही मनःक्षेत्र पर छाई हुई मलिनताएँ धोई जाती हैं। यह समस्त प्रयोजन समाज-सेवा का व्रत धारण किये बिना सम्भव नहीं हो सकते। सेवा-धर्म को अंगीकार किये बिना कोई व्यक्ति मात्र पूजा-पाठ की टण्टघण्ट अपनाये रहकर सच्चा अध्यात्मवादी नहीं बन सकता और न उसे आत्मिक प्रगति का लाभ मिल सकता है।
स्वाध्यायो यज्ञ ईरितः।
ज्ञानयज्ञः स विज्ञेयः सर्वयज्ञोत्तमोत्तमः॥
स्वाध्याय को यज्ञ कहा गया है। ज्ञान यज्ञ समस्त यज्ञों में सर्वोत्तम है।
स्वाध्याय, चिन्तन मनन, पूजा, पाठ अथवा सज्जनोचित निर्वाह में कुछ सार नहीं रह जाता।
स्वाध्याय, सत्संग को ज्ञान का आधार माना गया है। किन्तु अंतर्जगत में आत्म-चिन्तन को ज्ञान देव की-आत्मदेव की आराधना माना है। अपनी अन्तःस्थिति में उत्कृष्ट-तत्वों की स्थापना करके हम आत्मदेव की आराधना करते हैं। आत्मदेव को तत्व-दर्शन ने सर्वोच्च उपास्य माना है और उसकी आराधना का निर्देश किया है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-June
स्वाध्याय, शिक्षण एवं तप-साधना में लगे और आधा समय सेवा-धर्म में लगता रहे। पूरा या अधूरा जितना भी समय वानप्रस्थ-व्यवस्था में लगना हो, उसका विभाजन इसी प्रकार किया जाना चाहिए।
स्वाध्याय का माध्यम अपनाना चाहिए। (2) तपश्चर्या एवं योग-साधना द्वारा आत्मशक्ति का विकास करना चाहिए और (3) लोक-मंगल की सेवा-साधना द्वारा समाज का ऋण चुकाने, पुण्य संचय करने एवं ईश्वरीय स्नेह अनुदान पाने में संलग्न होना चाहिए। इन तीनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समय का विभाजन इस प्रकार होना चाहिए कि आधा समय स्वाध्याय, शिक्षण एवं तप-साधना में लगे और आधा समय सेवा-धर्म में लगता रहे। पूरा या अधूरा जितना भी समय वानप्रस्थ-व्यवस्था में लगना हो, उसका विभाजन इसी प्रकार किया जाना चाहिए।
स्वाध्याय- सत्संग, मनन-चिंतन और भजन में भी कुछ रस आने लगता है। बच्चों की जिम्मेदारियों से प्रायः छुटकारा मिल लेता है। सादगी का रहन-सहन अपनाने में कुछ विशेष कठिनाई नहीं होती। इन सभी अनुकूलताओं की दृष्टि से ढलती आयु ही अध्यात्म साधनाओं के उपयुक्त पड़ती है। यदि यह अवधि ऐसे ही निकल जाए तो पेंसठ-सत्तर की आयु तक पहुँचते-पहुँचते शरीर का कचूमर निकल जाता है, तब जरा-जीर्ण शरीर ही एक भार बन जाता है।
स्वाध्याय और सत्संग के नाम पर गले उतारते रहते हैं और उससे कुछ पाने के स्थान पर उलटा गँवाते रहते हैं।
स्वाध्याय से भी संभव है। अपना दुर्भाग्य यह है कि आज परमार्थ जीवन की कोई समग्र पाठ्य-विधि उपलब्ध नहीं। आमतौर से लोग ऐसे ही अगड़म-बगड़म बकवास, स्वाध्याय और सत्संग के नाम पर गले उतारते रहते हैं और उससे कुछ पाने के स्थान पर उलटा गँवाते रहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-January
स्वाध्याय और मनन-चिंतन के बन्धन में नित्य बाँधना चाहिए। रास्ते पर चलने के लिए वह तभी सहमत हो सकेगा।
स्वाध्याय साधना नितान्त आवश्यक है।
स्वाध्याय का विशय केवल एक होना चाहिए- आत्म निरीक्षण एवं आत्म परिशोधन का मार्गदर्शन जो पुस्तकें इस प्रयोजन को पूरा करती है, आन्तरिक समस्याओं के समाधान में योगदान करती है केवल उन्हें ही इस प्रयोजन के लिए चुनना चाहिए। कथा पुराणों का उपयोग इस प्रसंग में निरर्थक है। आज की गुत्थियों को- आज की परिस्थितियों में- आज के ढंग में किस तरह सुलझाया जा सकता है- सो उसका दूरदर्शिता पूर्ण हल प्रस्तुत करे वही उपयुक्त स्वाध्याय साहित्य है। ऐसी पुस्तकों को हमें छाँटना और चुनना पड़ेगा उन्हें नित्य नियमित रूप से गंभीरता और एकाग्रतापूर्वक पढ़ने के लिए समय नियत करना पड़ेगा अन्तः करण की भूख बुझने के लिए यह स्वाध्याय साधना नितान्त आवश्यक है।
स्वाध्याय के बाद आता है मनन- चिंतन। जो पड़ा है उस पर बार-बार कई दृष्टिकोणों से विचार करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उस प्रकाश को बढ़ाने का क्या उपाय है? आदर्शों को अपने व्यक्तित्व में घुलाने के प्रसंग पर ऊहापोह करना, मनन और चिंतन का मुख्य उद्देश्य है। कमरे में नित्य झाडू लगाते हैं, स्नान रोज करते हैं, दाँत रोज साफ किये जाते हैं, बर्तन रोज साफ करने पड़ते हैं। मन की मलीनता की आदत से विरत करने के लिए उसे स्वाध्याय और मनन-चिंतन के बन्धन में नित्य बाँधना चाहिए।
स्वाध्याय और सत्संग के सम्पर्क में आकर कुछ समय के लिए ऐसा सज्जन बन जाता है मानो सन्त हो। रामायण गीता सुनते समय आँखों में आँसू आते हैं। नरक की पीड़ायें जानकर पश्चाताप भी होता है और मृत्यु की जब याद दिलाई जाती है जब डर भी लगता है कि मौत के दिन समीप आ पहुँचे। जिंदगी बीत चली। अब बचे कूचे दिनों का तो सदुपयोग कर ले।
स्वाध्याय की नियमित व्यवस्था रखनी चाहिए। स्वाध्याय का विशय केवल एक होना चाहिए- आत्म निरीक्षण एवं आत्म परिशोधन का मार्गदर्शन जो पुस्तकें इस प्रयोजन को पूरा करती है, आन्तरिक समस्याओं के समाधान में योगदान करती है केवल उन्हें ही इस प्रयोजन के लिए चुनना चाहिए। कथा पुराणों का उपयोग इस प्रसंग में निरर्थक है। आज की गुत्थियों को- आज की परिस्थितियों में- आज के ढंग में किस तरह सुलझाया जा सकता है- सो उसका दूरदर्शिता पूर्ण हल प्रस्तुत करे वही उपयुक्त स्वाध्याय साहित्य है। ऐसी पुस्तकों को हमें छाँटना और चुनना पड़ेगा उन्हें नित्य नियमित रूप से गंभीरता और एकाग्रतापूर्वक पढ़ने के लिए समय नियत करना पड़ेगा अन्तः करण की भूख बुझने के लिए यह स्वाध्याय साधना नितान्त आवश्यक है।
स्वाध्याय साहित्य है। ऐसी पुस्तकों को हमें छाँटना और चुनना पड़ेगा उन्हें नित्य नियमित रूप से गंभीरता और एकाग्रतापूर्वक पढ़ने के लिए समय नियत करना पड़ेगा अन्तः करण की भूख बुझने के लिए यह स्वाध्याय साधना नितान्त आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-February
स्वाध्याय और सत्संग के आधार पर सद्भावनाओं का समुचित संग्रह अपने भीतर जमा करें और उसमें से साररूप में जो सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हो, उसी को जिह्वा पर आने दें। जीभ में अमृत भी है और विष भी। विषपान करने वाले मुख के रास्ते ही उसे भीतर ले जाते हैं। दुर्भावग्रस्त संस्कारसहित वाणी को भी विष ही कहा गया है। वह प्रथम अनर्थ वक्ता का ही करती है, उसकी गरिमा का हनन करती है और दूसरों की दृष्टि में उसका सम्मान गिरा देती है; किंतु यदि अमृतवचन बोले जाए तो उसमें वक्ता को अपने आप में उल्लास का उभार दीखता है और समीपवर्त्ती लोग उसका रसास्वादन करके तृप्त होते हैं।
स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः। तद्धि तपस्तद्धि तपः।
स्वाध्याय में लीन हो गई। पुत्र को माँ की यह उपेक्षा अखरी तो, पर वह अपनी अप्रसन्नता अपने अंदर ही दबाकर चुपचाप वहाँ से चला गया।
स्वाध्याय, चिंतन-मनन इन दोनों के समन्वय से तप का प्रयोजन पूरा होता है। इसलिए स्वाध्याय को भी तप का अंग माना गया है।
स्वाध्याय-सदन में प्रविष्ट होकर अध्ययन में तल्लीन हो गई। चंद्रपीड़ अंतपीड़ा से कराह उठा। माँ का रूखापन उसे अच्छा नहीं लगा तथा उसने कहा— “कुछ नहीं।” विचार-मंथन के सागर में डूब गया, चंद्रपीड़ और उसी स्थिति में उसे कब निद्रा आ गई पता भी नहीं चला।
स्वाध्यायमधीत आ हैव स नखाग्रेभ्यस्तप्यते।
स्वाध्याय-निरत है तो उसे नख-शिख तक तप संलग्न ही समझना चाहिए।
स्वाध्याय को भी तप का अंग माना गया है।
स्वाध्याय-सत्संग, मनन-चिंतन, ध्यान-धारणा का फल, मन को जीवन का स्वरूप और लक्ष्य समझाने के लिए, इच्छा-आकांक्षाओं को आत्मकल्याण के लिए, कुछ सोचने-करने के लिए, उत्साहित एवं अभ्यस्त करने का प्रयोजन पूरा करती है। साधनों का अंतिम चरण आस्था को, श्रद्धा को, भावना को, आकांक्षा को देवदृष्टि के साथ जोड़ देता है।
स्वाध्याय सत्संग जैसी धर्म-धारणाएँ विनिमित हुई हैं। उपासना, साधना, तपश्चर्या के विविध विधि-विधानों से लेकर धर्मानुष्ठानों के अगणित कर्मकांडों तक के सारे क्रिया-कृत्य इसलिए हैं कि उनके माध्यम से भौतिकतापरायण पशु-प्रवृत्तियों को आत्मवादी आस्थाओं में परिणत किया जा सके। मनीषी और तत्त्वदर्शी इस रहस्य का समय-समय पर उद्घाटन करते रहे हैं। उपनिषदों की ब्रह्मविद्या इसी मर्म चर्चा से भरी पड़ी है। देवाराधन के विधान प्रकारांतर से अपने ही श्रद्धातत्त्व के विकास की भाव विज्ञान समर्थित पद्धति है।
स्वाध्यायपूर्वक तपश्चर्या करें। लोक-मंगल का ध्यान रखें। तपस्या में निरत, स्थिर बुद्धि व्यक्ति के समस्त सत्कर्म सफल होते हैं।
स्वाध्याय ही सर्वश्रेष्ठ है। स्वाथ्याय और तप एक ही है।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-August
स्वाध्याय, सेवा संयम, साधना का क्रम निर्धारित करना चाहिए। घर से कुछ दूरी भी निवास किया जा सकता है। पत्नी को भी साथ रखा जा सकता है। पर आजीविका की दृष्टि से स्वावलम्बी ही होना चाहिए।
स्वाध्याय सत्संग द्वारा उसी जीवन दर्शन को समझने का प्रयत्न किया जाता है और उपासना साधना द्वारा उसी प्रेरणा को हृदयंगम किया जाता है। आस्तिकता और धार्मिकता का समस्त कलेवर इसी प्रयोजन के निमित्त खड़ा किया गया है। ईश्वर की प्रसन्नता और अनुकम्पा का प्रत्यक्ष संबन्ध व्यक्ति के भाव संस्थान से है। उत्कृष्टता की भाव भूमिका में ही ईश्वर की दिव्य चेतना का अवतरण संभव हो सकता है। साधना उपक्रम का एक मात्र उद्देश्य अन्तः भूमिका का परिष्कार ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-September
स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से उनका परिकर देवोपम बना रहता है। उत्कृष्ट सोचते और आदर्श को कार्यान्वित करते है। असहयोगी , विरोधी, हंस उड़ाने और मूर्ख बनाने वालों की कमी नहीं रहती। तो भी वे किसी के परामर्श सहयोग की परवाह न करते हुए एकाकी अपने मार्ग पर चलते है। दूसरे लोग जहाँ धन, वैभव अर्जित करने में जिन्दगी गुजार देते है वहाँ उनको इस कोल्हू में पिलने की इच्छा नहीं होती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-November
स्वाध्याय के लिए सामग्री और समय की व्यवस्था बनाकर हम घर के पढ़े लिखे सदस्यों के लिए बौद्धिक एवं भावनात्मक उत्कर्ष का द्वार खोल सकते हैं। पढ़े सदस्य प्रतिदिन अवकाश वाले निर्धारित समय में निर्दिष्ट पुस्तक प्रसंग पढ़कर सुनाया करे और आगे चलकर वही आदत परिवार प्रशिक्षण में अभिरुचि बनकर विकसित हो सकती है। सुनाते रहने वालों को सुयोग्य वक्ता बनने का- झेंप झिझक से पिण्ड छुड़ाने का- सुअवसर प्रदान कर सकती है।
स्वाध्याय, संतदर्शन, कथाप्रवचन एवं विविध विधि धर्मकृत्यों का प्राविधान किया गया है।
स्वाध्याय और सत्संग का महत्व इसलिए माना गया है कि पढ़े हुए आप्त वचन और सुने हुए सदुपदेशों को हृदयंगम करके मनुष्य अपनी त्रुटियों को सुधारे तथा सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करे। मूल प्रयोजन किसी वस्तु के पन्ने उलटना अथवा किसी के मुख से निकले वचनों का सुनना नहीं है। यह तो पुण्यफल प्राप्त करने का साधन है साध्य नहीं। शास्त्रों का पाठ पुण्य भी हो सकता है पर वैसा होगा तभी जब उसको-उसके उपयुक्त अंश को जीवन क्रम में उतारा जाय। यदि ऐसा कुछ नहीं हुआ केवल अक्षरों को ही पढ़ लिया गया तो वह एक उपयोगी समय क्षेप भर है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-October
स्वाध्याय मण्डली होनी चाहिए। नवरात्रि आयोजन में सम्मिलित हुए परिजनों को उसी अवसर पर इस स्वाध्याय मण्डली का सदस्य बना लिया जाना चाहिए। प्रश्न आता है कि यह साहित्य जुटाया कैसे जाए ? प्रथम चरण में यह हो सकता है कि पुरानी पत्रिकाएँ और पुस्तकें एकत्रित करके उन्हें बाँसी कागज की जिल्द लगा कर ऐसा बना लिया जाए कि वह फटने न पायें। इन्हें नये या अपरिचित लोगों को पढ़ाया जा सकता है।
स्वाध्याय सत्संग की ध्यान-धारणा की महिमा तो बहुत है पर वह है तभी जब साधक को उदार परमार्थ परायणता, लोक मंगल के सद्उद्देश्यों में निरल देखा जा सके। अन्यथा उन्हें मानसिक विलासिता कहकर उपहास करने वालों को भी निरुत्तर नहीं किया जा सकता।
स्वाध्याय मण्डली का सदस्य बना लिया जाना चाहिए। प्रश्न आता है कि यह साहित्य जुटाया कैसे जाए ? प्रथम चरण में यह हो सकता है कि पुरानी पत्रिकाएँ और पुस्तकें एकत्रित करके उन्हें बाँसी कागज की जिल्द लगा कर ऐसा बना लिया जाए कि वह फटने न पायें। इन्हें नये या अपरिचित लोगों को पढ़ाया जा सकता है। नया साहित्य मँगाने की व्यवस्था वाद में बनाई जा सकती है।
स्वाध्याय एवं सत्संग मिरित कार्यक्रम चलें। शिक्षितों में से कोई एक लेख नित्य पढ़े और अन्य सब लोग उसे सुनें। इस प्रकार पूरे एक महीने के लिए ओध घण्टा नितय सुनाये जाने योग्य सामग्री मिलती रहेगी। यह प्रक्रिया रुचिकर बने तो उसे कथा प्रसंगो के साथ जोड़कर एक घण्टे का बनाया जा सकता है। समय बढ़ने के अनुसार उसका प्रीव और सतपरिणाम बढ़ना भी निश्चित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-March
स्वाध्याय करके हम अपनी मनः स्थिति सही करें-विचारणाओं में परिष्कृत तत्त्वों का समावेश करें इतना भर उद्देश्य इस सारे ज्ञानयोग कलेवर का है। उसका सार-तत्त्व व्यवहार में आया कि नहीं इसकी परख इस कसौटी पर होती है कि सूक्ष्म दृष्टि से अपनी मानसिक हलचलों का बारीकी से अध्ययन-उनके औचित्य का वर्गीकरण-अवांछनीय प्रवाह का दमन और दिव्य चिन्तन को प्रोत्साहन कितनी गहराई के साथ किया जा रहा है।
स्वाध्याय ज्ञानयोग की साधना के अंतर्गत आता है लोग इसी के लिए कथा, प्रवचन सुनते हैं। ग्रन्थ पाठ भी उसी पुण्य प्रयोजन के लिए किये जाते हैं पर ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह सब निर्देश संकेत मात्र हैं- आधार नहीं। मस्तिष्क पर नियन्त्रण प्राप्त करने के लिए किस स्तर की चिन्तन प्रक्रिया हो इसके लिए अवतारों के, ऋषियों के-महामानवों के चरित्रों, एवं निर्देशों का श्रवण स्वाध्याय करके हम अपनी मनः स्थिति सही करें-विचारणाओं में परिष्कृत तत्त्वों का समावेश करें इतना भर उद्देश्य इस सारे ज्ञानयोग कलेवर का है। उसका सार-तत्त्व व्यवहार में आया कि नहीं इसकी परख इस कसौटी पर होती है कि सूक्ष्म दृष्टि से अपनी मानसिक हलचलों का बारीकी से अध्ययन-उनके औचित्य का वर्गीकरण-अवांछनीय प्रवाह का दमन और दिव्य चिन्तन को प्रोत्साहन कितनी गहराई के साथ किया जा रहा है।
स्वाध्याय सत्संग एवं मनन चिंतन में उभारना चाहिए। और इतना साहस एकत्रित करना चाहिए कि आन्तरिक दुर्बलताओं एवं बाहरी अवरोधों से जूझते हुए उस प्रयोजन में तत्पर हुआ जा सके जो युग-निर्माण परिवार के सदस्यों के सामने विशेष रूप प्रस्तुत हुआ है। हमें इस मिशन का साधारण समर्थन कर्ता सदस्य ही नहीं बने रहना चाहिए वरन् एक कदम आगे बढ़ाकर सृजन सेना का ऐसा सैनिक बनना चाहिए जिसके पीछे अनुयायियों की एक बड़ी पंक्ति भी कदम से कदम मिला कर अग्रसर होती हुई दिखाई दें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-April
स्वाध्याय, व्रत, होम वेदाध्ययन, इज्यया, सोमपान, यज्ञ और महायज्ञों में यह शरीर ब्राह्मण बनता है।
स्वाध्यायेन व्रतैर्होंमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः ।
स्वाध्याय सत्संग, चिन्तन मनन (2) सत्प्रवृत्तियों के सुदृढ़ता पूर्वक अपनाने का व्रत (3) अग्नि होत्र यज्ञीय जीवन, परमार्थ में संलग्नता (4) भक्ति पूर्वक ध्यान उपासना (5) विवेक की प्रधानता (6) आत्मीयता करुणा एवं ममता का विकास कहा भी हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-May
स्वाध्याय ओर सत्संग की महिमा भी इसी आधार पर इतने विस्तार से बखानी गई है।
स्वाध्याय, संयम, सेवा के चार कार्यक्रमों में अपनी दिनचर्या ढ़ालनी है। विश्राम, भोजन, व्यायाम आदि नित्य कर्मों में बँटा हुआ समय इन्हीं चार कार्यक्रमों में साधक की स्थिति देखते हुए तदनुरूप विभाजित किया जायेगा। यह निर्धारण हर व्यक्ति की स्थिति का पर्यवेक्षण कराने के उपरान्त ही किया जायेगा।
स्वाध्याय में यही पढ़ा जाता था। कि अभ्यस्त पशु-वृत्तियों को निरस्त करने के लिए अनवरत अभ्यास किया जाय साथ ही ऐसा क्रिया कलाप अपनाया जाय, जिससे आदर्शवादिता समझने समझाने तक सीमित न हरे, वरन व्यक्तित्व का अविच्छिन्न अंग बन सके। ईश्वर भक्ति से लेकर योगाभ्यास और तप-साधना के पीछे इसी एक लक्ष्य की पूर्ति का उद्देश्य सन्निहित है। चिंतन और मनन का महात्म्य इसीलिए बनाया गया है कि उससे आत्म सुधार और आत्म निर्माण के दोनों पक्ष पूरे होते है स्वाध्याय ओर सत्संग की महिमा भी इसी आधार पर इतने विस्तार से बखानी गई है।
स्वाध्याय, संयम और सेवा का चतुर्विध उपचार ही व्यक्तित्व निर्माण का, आत्मविकास का, ईश्वर प्राप्ति का सुनिश्चित आधार है, इससे कम से वास्तविक आत्मोत्कर्ष सम्भव नहीं, इस प्रक्रिया को अपनाने के उपरान्त और कुछ अधिक खोजने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-July
स्वाध्याय रुचि का अब तक का प्रयास एवं परिणाम (14) गायन एवं भाषण की वर्तमान क्षमता (15) वानप्रस्थ जीवन में प्रवेश करने के उपरान्त भी क्या कुछ समय घर-परिवार को सम्भालना पड़ेगा, यदि हो तो किसे समय तक और किस कारण? (16) अब तक के उल्लेखनीय ऐसे कार्यों का विवरण जिन्हें प्रशंसनीय अथवा निन्दनीय कहा जा सके (17) किसी राजनैतिक या धर्म-सम्प्रदाय के प्रति अपना विशेष रुझान-लगाव (18) किस भाषा पर किस स्तर का अधिकार है। (19) आपकी पत्नी का इस कदम में क्या रोल होगा? आप के परिवार वालों का इस कदम के सम्बन्ध में क्या रुख रहेगा। (20) आप किस सत्र में कितने समय शिक्षण प्राप्त करेंगे।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिंतन के चार चरण ब्रह्मविद्या की उपलब्धि के आधार माने गये हैं। इन्हें साधना परायण जीवन क्षेत्र में प्रवेश करने वाले स्वयमेव भी अपने में तो साधना की आवश्यकता पूरी करते रह सकते है।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिन्तन के माध्यम से अपनी विचारणा को उत्कृष्टतम स्तर कर उठाना ज्ञानयोग है। योगाभ्यास और तपश्चर्या को गायत्री शक्ति स्रोतों पर अवलम्बित साधना क्रम को भक्तियोग करना चाहिए। लोकमंगल में सहृदय किन्तु साहसी शूर-वीरों की तरह प्राणपण से जुट पड़ने वाली कर्मनिष्ठा को श्रेष्ठतम कर्म योग कहा जा सकता है। इस प्रकार वानप्रस्थ जीवन में तीनों प्रधान योगों में निरन्तर संलग्न रहने की विधि व्यवस्था है। आहार, निद्रा, स्नान जैसे अनिवार्य शरीर धर्म का पालन करने के उपरान्त जो समय बचता है उसे परमार्थ प्रयोजनों में लगाने वाला साधन अनवरत रूप से भगवद्भक्ति में निरत कहा जा सकता है।
स्वाध्याय का- मनन-चिन्तन का प्रयोग नित्य, नियमित रूप से करना चाहिए। जीवन को परिष्कृत और उदार बनाने की प्रेरणा भरने वाला साहित्य स्वाध्याय के लिए चुन लेना चाहिए और उसे मनोयोगपूर्वक पढ़ने के लिए कोई न कोई समय निश्चित निर्धारित कर ही लेना चाहिए। फुरसत के समय यहाँ तक कि रास्ता चलने भी पढ़ना पड़े तो भी चलेगा आत्म-चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण, आत्म-विकास की चतुर्विध आवश्यकताओं को कैसे पूरा किया जा सकता है? वर्तमान ढर्रे में क्या सुधार परिवर्तन किस क्रम में होना चाहिए इसी प्रकार की योजनाएं मनन-चिन्तन में बनाई जाती है। ज्ञानयोग की साधना के लिए उपासना के अतिरिक्त स्वाध्याय और आत्म-चिन्तन का अवसर रहना ही चाहिए।
स्वाध्याय और योग साधना तपश्चर्या के लिए भी समुचित स्थान रहे और शेष समय सेवा-कार्यों में लगा रह। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस युग की महानतम आवश्यकता और विश्व-मानव की सेवा साधना एक ही है, जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण। इसके लिए ज्ञान यज्ञ की की विचार-क्रान्ति शृंखला इन दिनों चल रही है। इस केन्द्र पर ही प्रत्येक विचारशील का ध्यान केन्द्रित होना चाहिए। इस चरण को पूरा करने के बाद ही, शिल्प, चिकित्सालय,मन्दिर, धर्मशाला, प्याऊ, सदावर्त आदि कितने ही लोकोपयोगी कार्य हो सकते हैं पर वानप्रस्थ को ही लक्ष्य सामने रखना चाहिए- विचार-क्रान्ति, बौद्धिक परिष्कार भावनात्मक नवनिर्माण।
स्वाध्याय की उद्देश्य पूर्ति नहीं होती। घर छोड़ देने भर से कोई वैरागी नहीं हो सकता। परमार्थ पथ पर चलने वालों को इतनी सी बालक्रीड़ा करके सन्तुष्ट नहीं होना पड़ता उन्हें और भी ऐसा बहुत कुछ करना पड़ता है जिससे अन्तः चेतना का स्तर महा मानव की ऊँचाई तक पहुँच सके। उपासना केवल पूजा की कोठरी तक सीमित नहीं रह सकती, उसे लोक सेवा के रूप में विकसित होना पड़ता है। यदि यह तथ्य भजन करने वालों को विदित रहा होता तो वे बेचारे निष्क्रिय दिनचर्या अपना कर ऐसे ही कुछ शब्दों की तोता रटन्त से सन्तुष्ट होकर एक कौने में बैठे मौत के दिन गिनने में न लगे रहते।
स्वाध्याय को तप कहा गया है। तप की ऊष्मा मलीनताओं के जलाती है। आत्म-चिंतन आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास के क्षेत्रों में प्रखरता उत्पन्न करने के लिए स्वाध्याय से बढ़ कर और कोई सहायक साधन कदाचित ही होगा। इसके लिए ऐसी पुस्तकों का सहारा लेना चाहिए जो उपरोक्त प्रयोजन सही रूप से पूरा कर सकने की क्षमता से पूर्ण हों। प्राचीन ग्रन्थों का कथा पुराणों का पृष्ठपेषण लकीर पीटने की तरह करते रहें तो उससे समय तो बहुत नष्ट होगा पर हाथ कुछ न लगेगा।
स्वाध्याय निरत भवेत्॥
स्वाध्याय के लिए अवकाश का कोई एक घण्टा दिनचर्या में सम्मिलित रहना चाहिए। इन्द्रियों का दमा और मनोगत लिप्साओं का शमन करते हुए संयम, सादगी और तितीक्षा भरी जीवनचर्या नियमित निर्धारित करली जाय तो उसे सामान्यतया उपयोगी तपश्चर्या कहा जा सकता है। आलय और प्रमाद को-असंयम और असंतुलन को निरस्त करके स्वभाव एवं अभ्यास को परमार्थ परायण जीवन के उपयुक्त विनिर्मित करना यही तो तपश्चर्या का मूल भूत उद्देश्य है। किसे, किस प्रकार की कितनी, तपश्चर्या किस स्थिति में कैसे करनी चाहिए। इसमें भी शारीरिक, मानसिक एवं क्रियाकलाप संबन्धी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भिन्नता रहेगी।
स्वाध्याय ही सत्संग की- तत्वदर्शी प्रशिक्षण की आवश्यकता पूरी कर सकता है। एकान्त अवकाश के समय मनन चिन्तन भी इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। जो पढ़ा समझा गया हे उस पर गंभीरता पूर्वक विचार करना-मान्य आदर्शों का जीवन में उतारने की विधि-व्यवस्था सोचना, यही है मनन चिन्तन का स्वरूप। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिंतन के चार चरण ब्रह्मविद्या की उपलब्धि के आधार माने गये हैं। इन्हें साधना परायण जीवन क्षेत्र में प्रवेश करने वाले स्वयमेव भी अपने में तो साधना की आवश्यकता पूरी करते रह सकते है।
स्वाध्याय और योगाभ्यास में सामान्यतया एक एक घण्टा लगाने के उपरान्त शेष समय उस युग के वानप्रस्थ को लोक मंगल की सेवासाधना में लगाना चाहिए। विश्वमानव का भावनात्मक स्तर ऊँचा उठाने के लिये किये गये प्रयासों को विशुद्ध रूप से पूजा आराधना में ही सम्मिलित किया जाना चाहिये। संसार में उत्कृष्टता का अभिवर्धन ऐसा कर्मयोग है जिसे साधना क्षेत्र में प्रचलित किसी भी क्रिया कलाप से हलके स्तर का नहीं गिना जा सकता। वरन् सच तो यह है कि युग धर्म के अनुरूप यही सर्वोत्तम तपश्चर्या है। जप तप से तो अकेले अपना ही कल्याण होता है किन्तु लोकमंगल में निरत ब्रह्मपरायण महामानव तो अपनी यह पुण्य साधना भी पद दलित मानवता के उत्कर्ष में समर्पित कर देते हैं।
स्वाध्याय से बढ़ कर और कोई सहायक साधन कदाचित ही होगा। इसके लिए ऐसी पुस्तकों का सहारा लेना चाहिए जो उपरोक्त प्रयोजन सही रूप से पूरा कर सकने की क्षमता से पूर्ण हों। प्राचीन ग्रन्थों का कथा पुराणों का पृष्ठपेषण लकीर पीटने की तरह करते रहें तो उससे समय तो बहुत नष्ट होगा पर हाथ कुछ न लगेगा। भाषा संस्कृत हो या हिन्दी, मराठी। पुस्तक पुराने जमाने की लिखी हुई यो या अब की, इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं।
स्वाध्याय अर्जित ज्ञान (7) समय-समय पर अपनाये गये व्यवसाय और उनकी सफलता असफलता के उल्लेख (8) परिवार का विवरण पत्नी की स्थिति-संतानों की संख्या उनकी आयु बच्चों के स्वावलम्बी परावलम्बी होने का विस्तृत विवरण (9) यदि कुछ सन्तान अभी स्वावलम्बी नहीं हो पाई है तो उनके निर्वाह का भावी प्रबन्ध किस प्रकार होगा? (10) आर्थिक स्थिति का अधिक स्पष्ट ऐसा उल्लेख जिसके आधार पर भावी अर्थव्यवस्था पर खुले दिमाग से ठीक तरह सोच-विचार किया जा सके। (11) अब तक के सेवा कार्यों का अनुभव तथा विवरण (12) जिनके ऊपर परिवार का उत्तरदायित्व जाना है उनको मनःस्थिति तथा परिस्थिति की चर्चा (13) अपनी साधना, उपासना तथा स्वाध्याय रुचि का अब तक का प्रयास एवं परिणाम (14) गायन एवं भाषण की वर्तमान क्षमता (15) वानप्रस्थ जीवन में प्रवेश करने के उपरान्त भी क्या कुछ समय घर-परिवार को सम्भालना पड़ेगा, यदि हो तो किसे समय तक और किस कारण? (16) अब तक के उल्लेखनीय ऐसे कार्यों का विवरण जिन्हें प्रशंसनीय अथवा निन्दनीय कहा जा सके (17) किसी राजनैतिक या धर्म-सम्प्रदाय के प्रति अपना विशेष रुझान-लगाव (18) किस भाषा पर किस स्तर का अधिकार है। (19) आपकी पत्नी का इस कदम में क्या रोल होगा?
स्वाध्याय को- अध्यात्म तत्व दर्शन को- लोक स्थिति के स्वरूप एवं समाधान नये सिरे से- सांगोपांग विधि अपनाना पड़ता है। उसे ज्ञानयोग की साधना कहते हैं। वानप्रस्थ मनोबल आत्मबल सम्पादन करने के लिए योगाभ्यास, तपश्चर्या तितिक्षा, मनो-निग्रह की रीति नीति य अपना कर अपनी आन्तरिक प्रखरता प्रदीप्त करता है। ब्रह्मचारी और वानप्रस्थ दोनों ही अपने-अपने स्तर का अध्ययन और स्वास्थ्य संवर्धन करते हैं। अन्तर इतना ही रहता है कि पूर्वार्ध की चेष्टाएँ होती हैं भौतिक प्रयोजनों के लिये उत्तरार्ध की मनोबल आत्मबल बढ़ाने के लिये।
स्वाध्याय का- जीवन-शोधन का और सेवा-साधना का अनिवार्य समावेश उसी प्रकार होना चाहिए जिस तरह कि पूजा में अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, जल आदि के उपकरणों को एकत्रित करना आवश्यक माना जाता है। भजन एक जीवन नीति है- कुछ क्षणों में पूरी हो जाने वाली हलचल नहीं। इस सत्य को अध्यात्मिक जगत में जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है।
स्वाध्याय और निदिध्यासन संभव हो जाता है। आत्मबोध और तत्वबोध की ज्ञान साधना से ही ऋतम्भरा प्रज्ञा प्रकट होती है और जीवात्मा का ‘भूमा’ स्थिति प्रज्ञता में प्रविष्ट होना संभव होता है। आत्मा की यह भूख बुझाने के लिए नये सिरे से विद्याध्ययन करना पड़ता है-यह ब्रह्मचारी की लौकिक शिक्षा से सर्वथा भिन्न होता है, वानप्रस्थ लेने का प्रथम सोपान है-ब्रह्मविद्या का पारायण करना, उसमें पारंगत होना- ज्ञानमृत से परिपूर्ण व्यक्ति ही ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करते हैं और लोक निर्माण जैसे महान प्रयोजन के लिए अधिकारी बनते हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं।
स्वाध्याय, तपश्चर्या और सेवासाधना की दौड़-धूप। जब शरीर अशक्त-असमर्थ हो जाय तो एक स्थान पर बैठ कर अध्यापन, प्रवचन,सत्संग जैसे सेवा साधनों को तथा ध्यान−धारणा परक उपासना की पूर्ति। वस्तुतः दोनों का लक्ष्य एक ही है-शरीर की स्थिति के अनुरूप कष्ट साध्य एवं सरलतम कार्यों का विभाजन किया गया है।
स्वाध्याय, सत्संग, उसी प्रकार आत्मचिन्तन है संलग्न होवे। यह वानप्रस्थ आश्रम की रीति-नीति है।
स्वाध्याय के लिए चुन लेना चाहिए और उसे मनोयोगपूर्वक पढ़ने के लिए कोई न कोई समय निश्चित निर्धारित कर ही लेना चाहिए। फुरसत के समय यहाँ तक कि रास्ता चलने भी पढ़ना पड़े तो भी चलेगा आत्म-चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण, आत्म-विकास की चतुर्विध आवश्यकताओं को कैसे पूरा किया जा सकता है? वर्तमान ढर्रे में क्या सुधार परिवर्तन किस क्रम में होना चाहिए इसी प्रकार की योजनाएं मनन-चिन्तन में बनाई जाती है। ज्ञानयोग की साधना के लिए उपासना के अतिरिक्त स्वाध्याय और आत्म-चिन्तन का अवसर रहना ही चाहिए।
स्वाध्याय अनिवार्य रूप से जुड़ा रहना चाहिए। साथ ही योगाभ्यासी तपश्चर्या का क्रम भी स्नान, भोजन, शयन की तरह प्रभातकालीन आवश्यक क्रिया-कलाप में सम्मिलित रहना चाहिए। आत्मिक प्रखरता बनाये रहने और बढ़ाते रहने के लिए यह दोनों प्रयोग सामान्य स्वास्थ्य रक्षा के लिये आहार और विहार की सुव्यवस्था बनाये रहने की भाँति ही आवश्यक माने जाने चाहिये, वातावरण में अनैतिक और अवाँछनीय विषाक्तता की मात्रा इतनी बढ़ गई है कि यदि उसका नित्य निवारण परिशोधन न किया जाय तो किसी भली चंगी मनोभूमि का ढलान पतनोन्मुख दिशा में चल पड़ेगा। प्रवाह की धार काटने के लिये मल्लाह अपने डाँड़े मुस्तैदी के साथ लाते रहते हैं तब कहीं नाव इस पार से चल कर उस पार तक पहुँचती है। प्रमाद बरतें तो नाव कहीं से कहीं जा पहुँचेगी।
स्वाध्याय द्वारा विचारणा में सहज ही घुस पड़ने वाली विषाक्तता का समाधान होते रहने पर ही सामान्य मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा स्थिर रखी जानी सम्भव है।
स्वाध्याय के लिए उपयुक्त माना जाना चाहिए।
स्वाध्याय और आत्म-चिन्तन का अवसर रहना ही चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-September
स्वाध्याय और भगवत्समर्पण। इन सभी अंग-उपाँगों का एक ही उद्देश्य है अन्तराल की पवित्रता। गीताकार ने इसी को अर्जित करने हेतु मानसिक द्वन्द्वों से छुटकारा पाने और सभी से आत्म भाव स्थापित करने की बात कही है। योग पद्धतियों में मौलिक सामंजस्य स्थापित करने वाले श्री अरविन्द का “सिंथेसिस ऑफ योग“ में कहना है कि योग की राह पर चलने के लिए जरूरी है अन्तःकरण को पवित्र बनाना। बिना इसके इस कठिन रास्ते पर नहीं चला जा सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-August
स्वाध्याय।
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन से ही नहीं, भोजन के साथ घुले हुए सूक्ष्म तत्वों का सन्तुलन बनाकर मनुष्य के सोचने का तरीका भी समुन्नत किया जा सकता है। इतना ही नहीं भावनाओं को दिशा भी बदली जा सकती है। अवाँछनीय दिशा में चल रही भाव विकृति को आहार शुद्धि के माध्यम से वाँछित दिशा में मोड़ा और सुधारा जा सकता है। दुष्प्रवृत्तियों में लगे हुए दुर्भावना ग्रस्त मनुष्य के अन्तःकरण को परिष्कृत किया जा सकता है और उसकी प्रवृत्ति में, मनोवृत्ति में अभीष्ट परिवर्तन किया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-March
स्वाध्याय, सत्संग से सन्मार्गगामी बनाया जाना चाहिए, वहाँ यह भी आवश्यक है कि उसके लिए आहार-विहार की ऐसी व्यवस्था बनाई जाय जिससे वह स्वयं उच्छृंखलता छोड़कर शालीनता को स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाय इस तथ्य को भारतीय तत्वदर्शियों ने बहुत पहले ही जान लिया था कि मन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष दिलाने वाली सभी शक्तियाँ भरी पड़ी हैं, उसकी सात्विक और विधेयक शक्ति का ज्ञान होने के कारण ही ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि “मेरा मन शिव संकल्प वाला हो।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-January
स्वाध्यायी है, विनयशील है, कर्मठ है, सत्यवादी है। संक्षेप में एक महापुरुष के लिए जितने गुणों की अपेक्षा रहती है, प्रायः वे सभी हैं। यदि कोई दोष है तो यह कि हठी है। यों जीवन के अन्य विषयों में पारस्परिक व्यवहार में नीति परामर्श में उसका हठ कहीं भी आड़े नहीं आता। इसके प्रकटीकरण का क्षेत्र तो एक ही है जिसे वह ‘तप’ कहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-October
स्वाध्याय, संयम और सेवा प्रक्रिया को शिक्षार्थियों के अन्तराल की गहराई तक उतारने की व्यवस्था यहाँ के नौ दिवसीय सत्रों में है। मनोबल और आत्मबल बढ़ाने वाले आहार के साथ दिव्य औषधियों का सेवन भी आवश्यकतानुसार जुड़ा रहता है। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में बहुमूल्य यंत्रों द्वारा मूर्धन्य वैज्ञानिक हर शिविरार्थियों की चिकित्सकीय जाँच पड़ताल करते हैं। इन विशेषताओं से स्पष्ट है कि पुरातन तीर्थ स्थानों में जो उच्चस्तरीय विशेषताएँ आदि से अंत तक भरी रहती थी, लगभग
स्वाध्याय, शुचिता, सेवा के एक से एक मार्मिक प्रसंग उनके जीवनक्रम में देखें जा सकते हैं। उनके अधिक विस्तार में न जाकर जब “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका का शुभारंभ हम देखते हैं तो पाते हैं कि यह छोटा सा बीजारोपण गायत्री के तत्वज्ञान के विस्तार का था। इस बीज से जो वटवृक्ष बनने वाला था, उसी की छाया में अगले दिनों गायत्री परिवार तथा युगनिर्माण योजना नामक विशाल संगठन बनना था। “एकोहं बहुस्यामि” का मूल मंत्र उनने “अखण्ड-ज्योति” के प्रकाशन से कार्य रूप में उतारना आरंभ किया व चिट्ठी की तरह निकली प्रारंभिक पत्रिका की सौ प्रतियाँ देखते-देखते हजार व लाखों में छपने लगीं। यह वस्तुतः उनकी साधना की प्रत्यक्ष सिद्धि का प्रमाण है कि आज उसी पत्रिका की पाँच लाख से अधिक प्रतियाँ आधुनिकतम मशीनों द्वारा छपती हैं व दस गुने पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-June
स्वाध्याय हर स्वजन के लिए-परिजन के लिए अपनी जगह अनिवार्य है। उसी के माध्यम से नये- सभी व्यक्ति सही अर्थों में पूज्य गुरुदेव को समझ सकेंगे।
स्वाध्यायशीलता, आत्मीय जनों पर ममत्व की वर्षा तथा धर्म एवं कर्म द्वारा मोक्ष की प्राप्ति का संकेत इस विलक्षण युक्ति से मिलता है जो उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे।
स्वाध्याय करने पर अनेकों की आस्थाएँ मजबूत होंगी। यह एक अविस्मरणीय तथ्य है कि “अखण्ड-ज्योति” एक शाश्वत-सनातन विचारधारा है जो परमपूज्य गुरुदेव की प्राण चेतना का साकार रूप है। पुस्तककार कोई जीवनी देने के पूर्व सर्व सामान्य जानकारी योग्य समझे गए संस्मरण पहले “अखण्ड-ज्योति” के विचार प्रवाह के रूप में ही दिये जायें, यही प्रेरणा शक्ति स्वरूप वंदनीया माताजी ने दी। वंदनीया माताजी जिनका जीवन पूज्यवर के जीवन से अविभाज्य है, सतत् पाण्डिचेरी की श्री माँ की तरह कहती रही हैं-”विदाउट हिम आय एक्जिस्ट नाट, विदाउट मी ही इज अनमेनीफेस्ट” (उनके बिना मेरा अस्तित्व नहीं है वह मेरे बिना उनकी कल्पना नहीं हो सकती)। उन्हीं प्रातः स्मरणीया स्नेहसलिला माँ की प्रेरणा से यह अंक श्रद्धा सुमन के रूप में पूज्य गुरुदेव के श्री चरणों में समर्पित है इस भाव के साथ कि हम कोई पुरुषार्थ नहीं कर रहे आपका काम कर आपका कर्ज चुका रहे हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-July
स्वाध्याय, तप की शक्तियाँ चाहता है। उन्होंने इसकी व्यवस्थाएँ जुटाई थी। नागरिक ऊर्ध्वमुखी जीवन-यापन करें, सतत जागरुक थे इसके लिए वह चिन्तन के तरंग वलय-भावों के उतार चढ़ाव के रूप में मुख मण्डल पर प्रकट हो रहे थे।
स्वाध्याय एवं आत्म-चिन्तन के लिए समय लगाया जाय तो वह कहीं अधिक उत्तम है। भगवान को रिझाने की अपेक्षा आत्मिक सुधार में समय लगाना कहीं अधिक श्रेयस्कर है।
स्वाध्याय और निर्माण में सत्संग असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होते हैं। आत्म निरीक्षण आत्म सुधार, आत्म निर्माण, और आत्म विकास के निमित्त परिमार्जन और परिष्कार की योजना बनाते रहना चाहिए। अपने चिन्तन में मानवी महत्ता के अनुरूप उत्कृष्ट आदर्शवादिता की अधिकाधिक मात्रा की भी धारणा करनी चाहिए। देवपक्ष के विचारों की मात्रा और प्रखरता यदि अन्तराल में विकसित होती रहे तो उस क्षेत्र में दुष्प्रवृत्तियों के पैर टिक ही नहीं पाते। परब्रह्म के राजकुमार का व्यक्तित्व जिस स्तर का होना चाहिए, उसी स्तर का उसे बनाने की उत्कंठा उठती है और यह दिव्य निर्झर जैसा प्रवाह ऐसा है कि इर्द-गिर्द के कूड़े करकट को बहा कर कहीं से कहीं फेंक देता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-April
स्वाध्याय द्वारा प्राप्त करें।
स्वाध्याय अनिवार्य शर्त के रूप में इन स्थापना के साथ जुड़े हुए तीन महत्वपूर्ण कार्यक्रम हैं। ब्रह्मकुण्ड के जल-रज के रूप में प्रतिष्ठित की साकार प्रतिमा प्रतिदिन उपासना का स्मरण करायेगी और ब्रह्मवर्चस् ब्रह्म तेजस्विता प्रदान करेगी। उपासना परिवार के प्रत्येक सदस्य, महिलाओं, बालकों तक के लिए इस देवा स्थापना का अनिवार्य कृत्य है भले ही वह स्थापित प्रतीकों के नमन वंदन जितना संक्षिप्त ही क्यों न हो। देवात्मायें अपनी ब्राह्मी शक्ति को समीप पाकर बिगड़े संसार को सम्हालने आने के अपने लक्ष्य को निरंतर स्मरण रखेंगे।
स्वाध्याय तीसरी अनिवार्यता है। जहाँ-जहाँ भी यह कार्यक्रम चल रहे होंगे, देवशक्तियाँ वातावरण बना देख स्वतः पहुँच जाएँगी। वन्य जीवों को सघन वन में देखना हो तो चुपचाप वहाँ किसी जलाशय के निकट बैठ जाना चाहिए। प्यास बुझाने वे निश्चित रूप से आते हैं, ऐसे जलाशयों की समाज में स्थान-स्थान पर निर्माण करने की आवश्यकता है, जहाँ देव शक्तियाँ अपनी युगों की प्यास बुझाने भगवत् प्रयोजन में स्वयं को निरत करने आ रही हैं।
स्वाध्याय का गहरा सामंजस्य आ जुटा था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-September
स्वाध्यायादि श्रेष्ठ कार्यों में विघ्न डालता है।
स्वाध्याय। विचार बड़े ही संक्रामक, सम्वेदनशील तथा प्रभावकारी होते हैं। जिस प्रकार के व्यक्तियों के संसर्ग में रहा जाता हैं मनुष्य के विचार भी उसी प्रकार के बन जाते हैं। व्यवसायी व्यक्तियों के बीच रहने, उठने-बैठने, उनका सत्संग करने से ही विचार व्यावसायिक, दुष्ट तथा दुराचारियों की संगत करने से कुटिल और कलुषित बन जाते है। उसी प्रकार के विचार महान एवं सदाशयतापूर्ण बनते हैं।
स्वाध्याय रूपी सत्संग के द्वारा ही ज्ञान का प्रकाश सरलता से मिल सकता है। इसलिए हर एक जागरूक नागरिक को जहाँ स्वयं स्वाध्याय में सदा प्रवृत्त रहना चाहिए। यह एक बड़ी लोकसेवा होगी। स्वयं भी ज्ञान-यज्ञ करना और दूसरों से भी उसे कराना एक बड़ा पुण्य-कर्त्तव्य है।
स्वाध्याय में सदा प्रवृत्त रहना चाहिए। यह एक बड़ी लोकसेवा होगी। स्वयं भी ज्ञान-यज्ञ करना और दूसरों से भी उसे कराना एक बड़ा पुण्य-कर्त्तव्य है।
स्वाध्याय ही सर्वोत्कृष्ट सत्संग का माध्यम सिद्ध होता है। पुस्तकें विद्वानों का बौद्धिक शरीर हैं। उनमें उनका व्यक्तित्व बोलता है। वह भी बहुत ही व्यवस्थित ढंग से।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-April
स्वाध्यायामेधीते।’ अर्थात् जितना पुण्य धन धान्य से पूर्ण इस समस्त पृथ्वी को दान देने से मिलता है उसका तीन गुना पुण्य तथा उससे भी अधिक पुण्य स्वाध्याय करने वाले को प्राप्त होता है। इस कथन पर आश्चर्य करने की कोई बात नहीं हैं। भावनाओं को प्रेरणा देने का प्रमुख आधार स्वाध्याय ही वह तथ्य माना गया है जिससे प्रेरित होकर मनुष्य के विचार और कार्य सन्मार्ग की दिशा में विकसित होते है और यही विकास क्रम अन्ततः अक्षय पुण्य फल प्राप्त होने का हेतु बनता है।
स्वाध्याय’ ही माना गया है। इसी से परमात्मा की प्राप्ति भी होती है। महर्षि व्यास का कथन है- ‘स्वाध्याय योग सभ्यत्या परमात्मा प्रमाशते’ अर्थात् स्वाध्याययुक्त साधना से ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
स्वाध्याय के लिए नित्य कुछ समय नियमित रूप से निकालना चाहिए। जिस प्रकार स्नान के लिए एक समय नियत रहता है और रोज ही उस समय नहाया जाता है उसी प्रकार नित्य स्वाध्याय के लिए भी एक समय नियत रहना चाहिए। यों पढ़ने को तो तरह-तरह की चीजें लोग पढ़ते हैं- पढ़ने का अर्थ स्वाध्याय नहीं है। स्वाध्याय वही कहा जायेगा जो हमारी जीवन समस्याओं पर, आंतरिक उलझनों पर प्रकाश डालता है और मानवता को उज्ज्वल करने वाली सद्प्रवृत्तियों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
स्वाध्याय ही वह तथ्य माना गया है जिससे प्रेरित होकर मनुष्य के विचार और कार्य सन्मार्ग की दिशा में विकसित होते है और यही विकास क्रम अन्ततः अक्षय पुण्य फल प्राप्त होने का हेतु बनता है।
स्वाध्याय में लगे रहो। शतपथ ब्राह्मण में लिखा हैं कि-”भावन्तः वा इमा पृथिवी वितेन पूर्णददल्लोकं जयति त्रिस्तावन्तं जयतिभूयाँ संवाक्षम्य य एवं विद्वान अहरहः स्वाध्यायामेधीते।’ अर्थात् जितना पुण्य धन धान्य से पूर्ण इस समस्त पृथ्वी को दान देने से मिलता है उसका तीन गुना पुण्य तथा उससे भी अधिक पुण्य स्वाध्याय करने वाले को प्राप्त होता है। इस कथन पर आश्चर्य करने की कोई बात नहीं हैं। भावनाओं को प्रेरणा देने का प्रमुख आधार स्वाध्याय ही वह तथ्य माना गया है जिससे प्रेरित होकर मनुष्य के विचार और कार्य सन्मार्ग की दिशा में विकसित होते है और यही विकास क्रम अन्ततः अक्षय पुण्य फल प्राप्त होने का हेतु बनता है।
स्वाध्याय ही प्रधान माध्यम है, इसलिए स्वाध्याय को एक आवश्यक धर्म कर्तव्य माना गया है। शास्त्र कहता है-‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ अर्थात् स्वाध्याय में प्रमाद न करों और ‘अहरहस्ऋध्यायमेध्येतव्यः’ अर्थात् दिन रात स्वाध्याय में लगे रहो। शतपथ ब्राह्मण में लिखा हैं कि-”भावन्तः वा इमा पृथिवी वितेन पूर्णददल्लोकं जयति त्रिस्तावन्तं जयतिभूयाँ संवाक्षम्य य एवं विद्वान अहरहः स्वाध्यायामेधीते।’ अर्थात् जितना पुण्य धन धान्य से पूर्ण इस समस्त पृथ्वी को दान देने से मिलता है उसका तीन गुना पुण्य तथा उससे भी अधिक पुण्य स्वाध्याय करने वाले को प्राप्त होता है। इस कथन पर आश्चर्य करने की कोई बात नहीं हैं।
स्वाध्याय ही है।
स्वाध्याय को ही है जो सुभाष को जीवन शिला पर क्रिया शीलता बनकर खुद चुका था।
स्वाध्याय को एक आवश्यक धर्म कर्तव्य माना गया है। शास्त्र कहता है-‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ अर्थात् स्वाध्याय में प्रमाद न करों और ‘अहरहस्ऋध्यायमेध्येतव्यः’ अर्थात् दिन रात स्वाध्याय में लगे रहो। शतपथ ब्राह्मण में लिखा हैं कि-”भावन्तः वा इमा पृथिवी वितेन पूर्णददल्लोकं जयति त्रिस्तावन्तं जयतिभूयाँ संवाक्षम्य य एवं विद्वान अहरहः स्वाध्यायामेधीते।’ अर्थात् जितना पुण्य धन धान्य से पूर्ण इस समस्त पृथ्वी को दान देने से मिलता है उसका तीन गुना पुण्य तथा उससे भी अधिक पुण्य स्वाध्याय करने वाले को प्राप्त होता है। इस कथन पर आश्चर्य करने की कोई बात नहीं हैं।
स्वाध्याययुक्त साधना से ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
स्वाध्याय की शक्ति को प्रमुख उपाय मानना होगा। इसी प्रकार जो सद्भावनाऐं एवं सत्प्रवृत्तियां विकसित की जानी आवश्यक हैं उनकी उपयोगिता समझने एवं ग्रहण करने के लिए उत्साह उत्पन्न करने का कार्य भी स्वाध्याय की आदत को अधिकाधिक प्रोत्साहन देने से ही संभव हो सकेगा।
स्वाध्याय नहीं है। स्वाध्याय वही कहा जायेगा जो हमारी जीवन समस्याओं पर, आंतरिक उलझनों पर प्रकाश डालता है और मानवता को उज्ज्वल करने वाली सद्प्रवृत्तियों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
स्वाध्याय द्वारा हर किसी के लिए सम्भव हो सकता है।
स्वाध्याय में प्रमाद न करों और ‘अहरहस्ऋध्यायमेध्येतव्यः’ अर्थात् दिन रात स्वाध्याय में लगे रहो। शतपथ ब्राह्मण में लिखा हैं कि-”भावन्तः वा इमा पृथिवी वितेन पूर्णददल्लोकं जयति त्रिस्तावन्तं जयतिभूयाँ संवाक्षम्य य एवं विद्वान अहरहः स्वाध्यायामेधीते।’ अर्थात् जितना पुण्य धन धान्य से पूर्ण इस समस्त पृथ्वी को दान देने से मिलता है उसका तीन गुना पुण्य तथा उससे भी अधिक पुण्य स्वाध्याय करने वाले को प्राप्त होता है। इस कथन पर आश्चर्य करने की कोई बात नहीं हैं। भावनाओं को प्रेरणा देने का प्रमुख आधार स्वाध्याय ही वह तथ्य माना गया है जिससे प्रेरित होकर मनुष्य के विचार और कार्य सन्मार्ग की दिशा में विकसित होते है और यही विकास क्रम अन्ततः अक्षय पुण्य फल प्राप्त होने का हेतु बनता है।
स्वाध्याय को वह व्यवधान कहा जा सकता है जो मन रूपी पानी को कुमार्ग की ओर बहने से रोकता है। यहीं वह पम्प है, जो मानसिक वृत्तियों को उच्च मार्ग की ओर चढ़ा कर तुच्छमानव प्राणी को महापुरुषों की- भूसुरों की श्रेणी में ले जाकर बिठा देता है अनेकों दुर्गुणों, और दुर्भावों, हानियों को स्वाध्याय के आधार पर समझा जा सकता है आत्म निरीक्षण द्वारा उन्हें ढूंढ़ा जा सकता है और प्रयत्नपूर्वक उन्हें छोड़ा जा सकता है। आत्म शोधन और आत्म निर्माण का सबसे प्रधान विधान ‘स्वाध्याय’ ही माना गया है। इसी से परमात्मा की प्राप्ति भी होती है। महर्षि व्यास का कथन है- ‘स्वाध्याय योग सभ्यत्या परमात्मा प्रमाशते’ अर्थात् स्वाध्याययुक्त साधना से ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ अर्थात् स्वाध्याय में प्रमाद न करों और ‘अहरहस्ऋध्यायमेध्येतव्यः’ अर्थात् दिन रात स्वाध्याय में लगे रहो। शतपथ ब्राह्मण में लिखा हैं कि-”भावन्तः वा इमा पृथिवी वितेन पूर्णददल्लोकं जयति त्रिस्तावन्तं जयतिभूयाँ संवाक्षम्य य एवं विद्वान अहरहः स्वाध्यायामेधीते।’ अर्थात् जितना पुण्य धन धान्य से पूर्ण इस समस्त पृथ्वी को दान देने से मिलता है उसका तीन गुना पुण्य तथा उससे भी अधिक पुण्य स्वाध्याय करने वाले को प्राप्त होता है। इस कथन पर आश्चर्य करने की कोई बात नहीं हैं। भावनाओं को प्रेरणा देने का प्रमुख आधार स्वाध्याय ही वह तथ्य माना गया है जिससे प्रेरित होकर मनुष्य के विचार और कार्य सन्मार्ग की दिशा में विकसित होते है और यही विकास क्रम अन्ततः अक्षय पुण्य फल प्राप्त होने का हेतु बनता है।
स्वाध्याय के आधार पर समझा जा सकता है आत्म निरीक्षण द्वारा उन्हें ढूंढ़ा जा सकता है और प्रयत्नपूर्वक उन्हें छोड़ा जा सकता है। आत्म शोधन और आत्म निर्माण का सबसे प्रधान विधान ‘स्वाध्याय’ ही माना गया है। इसी से परमात्मा की प्राप्ति भी होती है। महर्षि व्यास का कथन है- ‘स्वाध्याय योग सभ्यत्या परमात्मा प्रमाशते’ अर्थात् स्वाध्याययुक्त साधना से ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
स्वाध्यायशीलता और पढ़े हुये को जीवन में पचाने के अभ्यास ने गाँधी जी को महान बना दिया। रस्किन की लिखी पुस्तक “अण्ड दि लास्ट” पुस्तक तो गाँधी जी के सारे जीवन की मार्गदर्शिका रही।
स्वाध्याय की आदत को अधिकाधिक प्रोत्साहन देने से ही संभव हो सकेगा।
स्वाध्याय के लिए भी एक समय नियत रहना चाहिए। यों पढ़ने को तो तरह-तरह की चीजें लोग पढ़ते हैं- पढ़ने का अर्थ स्वाध्याय नहीं है। स्वाध्याय वही कहा जायेगा जो हमारी जीवन समस्याओं पर, आंतरिक उलझनों पर प्रकाश डालता है और मानवता को उज्ज्वल करने वाली सद्प्रवृत्तियों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
स्वाध्याय सत्संग से लेकर पुण्य परमार्थ से लेकर तप साधना के विधि-विधानों तक अनेक धर्म-कृत्य किये जाते है। भजन, कीर्तन, जप, ध्यान, पूजा-पाठ का उद्देश्य इतना ही है कि ब्राह्मी चेतना का अन्तःकरण में उदय उद्भव हो सकें, संक्षेप में इस सारी विधा को आत्म परिवर्तन या आत्म-परिष्कार कह सकते हैं। इसी के लिए धर्म कलेवर का विभिन्न उपचारों के साथ प्रयोग होता रहता है।
स्वाध्याय को भी नित्य कर्म माना है। पानी को फैलाते ही वह तेजी से नीचे की और बहने लगता है। उसी प्रकार मन का स्वभाव भी नीच कर्मों की और आकर्षित होता है। यदि उसे न रोका जाय तो वह पशु प्रवृत्तियों की और ही बढ़ेगा। पानी को ऊपर ले जाना होता है तो रस्सी, बाल्टी, पम्प, आदि का प्रयोग करना पड़ता है तब कहीं वह ऊपर को बढ़ाया जा सकता है।
स्वाध्याय को प्रमुख आधार मानना पड़ेगा और इसे जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता के रूप में जन-जन को हृदयंगम कराना पड़ेगा। जो अनेकों दुष्प्रवृत्तियां हमारे वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन में घर कर गई हैं उनकी हानियों को भली प्रकार समझने एवं त्याग ने के लिए प्रेरणा देने में स्वाध्याय की शक्ति को प्रमुख उपाय मानना होगा। इसी प्रकार जो सद्भावनाऐं एवं सत्प्रवृत्तियां विकसित की जानी आवश्यक हैं उनकी उपयोगिता समझने एवं ग्रहण करने के लिए उत्साह उत्पन्न करने का कार्य भी स्वाध्याय की आदत को अधिकाधिक प्रोत्साहन देने से ही संभव हो सकेगा।
स्वाध्याय’ और सत्संग है। चिन्तन और मनन से सत्साहित्य पड़ने से, सज्जनों के साथ रहने, उनके अभिवचन सुनने एवं कार्य-कलाप देखने से विद्या का आविर्भाव होता है।
स्वाध्याय योग सभ्यत्या परमात्मा प्रमाशते’ अर्थात् स्वाध्याययुक्त साधना से ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
स्वाध्याय की बुहारी लगाने की नित्य ही आवश्यकता होती है। इसलिए शास्त्रकारों ने भोजन, स्नान, शयन आदि की भांति ही स्वाध्याय को भी नित्य कर्म माना है। पानी को फैलाते ही वह तेजी से नीचे की और बहने लगता है। उसी प्रकार मन का स्वभाव भी नीच कर्मों की और आकर्षित होता है। यदि उसे न रोका जाय तो वह पशु प्रवृत्तियों की और ही बढ़ेगा।
स्वाध्याय वही कहा जायेगा जो हमारी जीवन समस्याओं पर, आंतरिक उलझनों पर प्रकाश डालता है और मानवता को उज्ज्वल करने वाली सद्प्रवृत्तियों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
स्वाध्याय करने वाले को प्राप्त होता है। इस कथन पर आश्चर्य करने की कोई बात नहीं हैं। भावनाओं को प्रेरणा देने का प्रमुख आधार स्वाध्याय ही वह तथ्य माना गया है जिससे प्रेरित होकर मनुष्य के विचार और कार्य सन्मार्ग की दिशा में विकसित होते है और यही विकास क्रम अन्ततः अक्षय पुण्य फल प्राप्त होने का हेतु बनता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-January
स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिंतन की सारी प्रक्रिया इसी पर घूमती है। योग साधना एवं तपश्चर्या के विभिन्न उपचार इसी क्षेत्र में विभूतियां उत्पन्न करने के लिए किये जाते हैं। ऋद्धि-सिद्धियों का चमत्कारी और विभूतियों का स्वर्ग एवं मुक्ति का- आत्म साक्षात्कार ब्रह्म साक्षात्कार का यही क्षेत्र है।
स्वाध्याय या मनोरंजन में लग जाओ तथा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए व्यायाम को अनिवार्य समझो।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-October
स्वाध्याय क्रम में उसने भारत को योगियों के देश के नाम से जाना। उसकी उत्कण्ठा इतनी बढ़ गई कि अपनी सारी जमा पूँजी समेट कर वह भारत चल दिया और हिमालय क्षेत्र में भ्रमण करता हुआ चमत्कारी योग विद्याएँ सीखता रहा।
स्वाध्यायशील और विचारशील होते हैं तथा शान्ति कुँज में अध्यापक स्तर की योगदान दे सकते हैं। ऐसे व्यक्ति सदा सर्वदा के लिए आएँ यह आवश्यक नहीं है। कम से कम एकाध महीने के लिए तो आना ही चाहिए, इससे कम में कम नहीं चलेगा, पर आने के लिए कम से कम चार महीने की तैयारी की जा सके तो उस समय का कुछ कारगर उपयोग हो सकता है। महीने पन्द्रह दिन का समय तो समझने और समझाने में ही लग जाता है। इस सत्र श्रृंखला में संगीत शिक्षकों की भी आवश्यकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-July
स्वाध्याय का लाभ लेते रह सकेंगे। पुस्तकालय ज्ञान मन्दिर के रूप में हर शक्तिपीठ का अविच्छिन्न अंग रहेगा। दर्शनार्थी घर ले जाकर पढ़ने और वापिस करने की शर्त पर बहुमूल्य युग साहित्य यहाँ से ले जाया करेंगे और इस सूत्र के सहारे जन मानस के परिष्कार का-विचार क्रांति का एक सीमा तक उद्देश्य पूरा किया करेंगे।
स्वाध्याय कर या संयम-उपासना-सेवा क पथ अपनाकर भी क्या होगा, अब तो थोड़े दिनों का खेल है, चाहे जैसे दिन काटने हैं, यह भावना पुनर्जन्म पर सच्ची आस्था रखने वाले में नहीं आ सकती। उसके लिये तो जीवन का प्रत्येक क्षण और प्रत्येक कार्य महत्वपूर्ण है। क्योंकि उसका परिणाम अवश्यम्भावी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-December
स्वाध्याय की, धनी बनने के लिए व्यवसाय की आवश्यकता पड़ती है। इसी
प्रकार आत्मिक प्रगति का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उपासनात्मक उपचार
अपनाने पड़ते है। दिव्य जीवन की चरम परिणिति ही पूर्णता है। इसी स्थिति का
स्वर्गसिद्धि एवं मुक्ति की प्राप्ति कहते है। आत्मसाक्षात्कार एवं
ईश्वरदर्शन भी वही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-May
स्वाध्याय, संयम एवं सेवा के द्वारा सर्वतोमुखी आत्म-विकास के लिए प्रोत्साहन तथा मार्गदर्शन देना। (4) दो परिव्राजकों के एक जत्थे का प्रतिदिन दो गाँवों में जाना। विचारशील लोगों से संपर्क बनाना। नवयुग के संदेशों से अवगत करना और तदनुरूप ढलने की प्रेरणा देना। (5) जन्म-दिन मनाने का उत्साह उत्पन्न करके व्यक्ति निर्माण की-संस्कार प्रचलन से परिवार निर्माण की-पर्व त्यौहारों को सामूहिक रूप से मनाकर समाज निर्माण की चेतना उत्पन्न करना।
स्वाध्याय, सत्संग, अग्निहोत्र, बलिवैश्व, जप-ध्यान, श्राद्ध-तर्पण, दान-पुण्य, योगाभ्यास, तप-साधन, ब्रह्मभोज, सन्त-सत्कार, सदावर्त, जलाशय, धर्मशाला, स्मारक आदि के अनेकानेक धर्मकृत्यों का वाह्य स्वरूप भिन्न भले ही हो पर उनका मूल प्रयोजन व्यक्ति को अधिक पवित्रता एवं अधिक उदारता अपनाने की प्रेरणा प्रदान करना ही है। इन क्रिया-कुकृत्यों की सार्थकता उतनी ही आँकी जा सकती है; जितने से कि मूल उद्देश्य के पूर्ण होने में सहायता मिलती है। आत्मा की, परमात्मा की प्रसन्नता इसी तथ्य पर निर्भर है कि अपनाये गये धर्म-कुकृत्यों के सहारे आत्म-परिष्कार का लक्ष्य पूरा कर सकना किस परिणाम में सम्भव हुआ। देवता के वरदान इसी एक कसौटी पर कसकर सत्पात्रों को दिये जाते हैं कि उनने धर्म-कुकृत्यों को अपना कर अपनी आन्तरिक उत्कृष्टता का कितना विकास किया। देव अनुग्रह की मात्रा और प्रतिक्रिया इसी आधार पर उपलब्ध होती है।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिन्तन आदि के द्वारा अपनाया जाता है। धर्मानुष्ठानों के सहारे उसे अभ्यास में उतारा जाता है। यह वैयक्तिक प्रयत्न हुए। सामूहिक एवं सुसंगठित रूप से उसे जनमानस में जगाने और जमाने के लिए जो कारगर उपाय ढूंढ़े गये हैं उनमें तीर्थ प्रक्रिया का असाधारण स्थान है उनमें चलने वाली गतिविधियों की प्रतिक्रिया बनाने के लिए अतीत के गौरव भरे इतिहास में प्रामाणिक साक्षी के रूप में पढ़ा जा सकता है।
स्वाध्याय से भी कम लाभ नहीं मिलता, इसे भली प्रकार समझ लेना चाहिए। भगवती सरस्वती की मयूर वाहिनी प्रतिमा भी पूजनीय है, पर विद्या विस्तार के रूप में जो प्रयास चल रहे है; उनमें भी माता शारदा को ही वीणा बजाते हुए देखना चाहिए। गायत्री माता की प्रतिमाएँ शक्ति पीठों में भी स्थापित होंगी पर प्रज्ञा का आलोक वितरण करने वाले साहित्य में भी उसी तथ्य की प्रत्यक्ष झाँकी होने की बात भी झुठलाई नहीं जा सकती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-February
स्वाध्याय-परायणता-कला कौशल व्यवहार-कुशलता भावनात्मक श्रेष्ठता, करुणा, निरहंकारिता, अंतर्दृष्टि, कुशाग्रबुद्धित्व, प्रखर धारणा-शक्ति-सहयोग वृत्ति, आदि सैकड़ों, हजारों मानवीय विशेषताएं है। इनमें से प्रत्येक का अपना महत्व है और उपयोगिता है। प्रत्येक से अनेक प्रकार की उपलब्धियाँ संभव हैं।
स्वाध्याय सत्संग की आरम्भिक शिक्षा का प्रयोजन बहुत हद तक पूरा हो चुका। अब परीक्षा की घड़िया हैं। जो पढ़ा या पढ़ाया गया उसकी पहुँच कितनी गहराई तक हो सकी है यह जानना परीक्षा का उद्देश्य होता है। जो उत्तीर्ण होते है उन्हीं का परिश्रम और मनोयोग सराहा जाता है। अन्यथा पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले दोनों ही अपयश के भागी बनते हैं।
स्वाध्याय करते जायेंगे, उतनी ही अधिक उपयोगिता उसकी हमें होती जायेगी व हमारे चिंतन व कृतित्व का स्तर उतना ही ऊंचा उठता जायेगा। -मो. क. गांधी
स्वाध्याय। इसके उपरांत अंबरीष अपनी समस्याओं को उनके पास लेकर सुलझाने के लिए आये नागरिकों से भेंट करते, उनके कष्ट सुनते, और कठिनाइयों को हल करने के लिए हर संभव सहयोग करते थे। इन सभी कार्यों से निवृत्त होने तक सूर्यदेव अपना रथ लिये ऊपर आकाश के एकदम बीच में पहुंच जाते थे। महाराज अंबरीष को यही समय मिलता था भोजन के लिए। कष्टसाध्य जीवन जीते हुए ईश्वर भक्ति और प्रजावत्सलता के पुण्य कार्यों में लगे रहने के कारण अंबरीष को एक प्रकार का सुख मिलता था और वे इस सुखानुभूति से अपनी कष्टसाध्य दिनचर्या की असुविधाओं को भूलकर उसके अभ्यस्त हो गये थे।
स्वाध्याय, लोक-साधना जैसे उच्चस्तरीय कार्यों में मस्तिष्क के रहने से उन चिन्ताओं का दबाव सहज ही घट जाता है जो बुढ़ापे को आवश्यकता से अधिक कष्टकारण बना देती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-September
स्वाध्याय की परम्परा को व्यापक महत्व दिया गया था। देवालयों की उपयोगिता का भी यही कारण था। भक्तिभावना सम्पन्न लोग ही वहाँ आते हैं और एक ही स्तर की गतिविधियाँ लगातार चलती रहती हैं। इसका प्रभाव वहाँ के वातावरण पर ही नहीं इमारत पर भी पड़ता है। तीर्थों का निर्माण भी इसी आधार पर किया गया था।
स्वाध्याय चिन्तन-मनन एवं शास्त्रों का सत्संग इसी निमित्त किया जाता है। यह अध्यात्म विद्या का तत्त्वदर्शन वाला पक्ष हुआ, जिसमें मान्यताओं की श्रद्धा-तर्क के आधार पर मान्यताओं से काट की जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-July
स्वाध्याय करने से विचारों में परिवर्तन तो हो जाता है। परन्तु संस्कार बड़े ही हठीले होते हैं। उनमें सहज ढंग से परिवर्तन सम्भव नहीं। लेकिन जब हम महापुरुषों के उदात्त जीवन एवं भाव भरे घटना-प्रसंगों को पढ़ते सुनते हैं, तो अपने हठीले संस्कार सहज ही गलने लगते हैं और महापुरुषों के जीवन के अनुरूप ढलने को आतुर हो जाते हैं।
स्वाध्याय, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन की सेवा-साधना जैसे अनिवार्य अनुबंधों में जो प्रमाद और उपेक्षा बरतेगा उसके विषय में पूज्य गुरुदेव का कहना है कि “उसे शाँतिकुँज की संचालक शक्ति झकझोरेगी। उसके कान उमेठेगी और बाधित करती रहेगी। हर व्यक्ति जुड़कर एवं सक्रिय रहकर ही चैन से बैठ सकेगा ।” क्या हम प्रस्तुत व्यास पूर्णिमा पर्व पर संबंधों की सघनता एवं सक्रियता का अनुपात बढ़ा सकते हैं- यह प्रश्न सभी के लिये है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यही हमारी गुरुभक्ति का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप हो सकता है।
स्वाध्याय सभी को निरन्तर नित्य विलक्षण अनुभूतियाँ कराता रहता है। कइयों को दैनन्दिन जीवन की कठिनाइयों से जूझने संबंधी मार्गदर्शन मिलता है, तो कइयों के मनोबल-प्राण चेतना को ऐसा उछाल मिलता है कि प्रतिकूलताएँ दूर हो अनुकूल वातावरण बनता चला जाता है- इस सहजता से कि अनुमान ही नहीं लग पाता। पत्रिका के नियमित पाठक बन रह- औरों को पढ़ाकर हम अपनी गुरुभक्ति रूपी कर्तव्य ही नहीं पूरा करते- हम पर चढ़ा ऋण भी उतारते हैं, जो अनुदानों की प्राप्ति के रूप में हैं व सतत् बढ़ता ही चला जाता है। इस गुरुपूर्णिमा पर यदि हम यह संकल्प ले सकें कि अधिक से अधिक व्यक्तियों को अखण्ड -ज्योति के माध्यम ये युग-चेतना से जोड़ने का प्रयास करेंगे तो यह गुरुसत्ता के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित कराने का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप होगा।
स्वाध्याय में निमग्न होकर उसकी ओर ध्यान नहीं देते थे उनकी पीठ में सिर से धक्का मारकर या गुदगुदाकर मानो कहता बड़ा पढ़ने वाला बना है। मेरे साथ तनिक उछल ले तो जानूँ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-December
स्वाध्याय ही कलियुग की एकमात्र औषधि मानकर नियमित पूज्यवर एवं मातृसत्ता का सत्संग पाने की दृष्टि से किया जाना चाहिये। यही हम सबको तारेगा। आशा है कि परिजन आराध्य की जलाई इस ज्योति को और देदीप्यमान, जाज्वल्यमान बनायेंगे। इसका प्रकाश हर कोने तक पहुँचाएँगे ।
स्वाध्याय से मिलती है। गुरुसत्ता के प्राण सँजोये प्रति माह सबके घर पहुँचने वाली यह ज्ञान सम्पदा मात्र छपे कागजों का एक पुलिन्दा भर नहीं है, अपितु प्रतिपल का मार्गदर्शन देने वाली, अनगढ़ सुगढ़ बना देने वाली एक पारसमणि की तरह है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-April
स्वाध्याय, संयम, सेवा, आत्मजाग्रति के चारों आधार इनमें सम्यक् रूप से प्रतिष्ठित हुए थे। गुरुदेव ने इन्हें जनमानस के परिष्कार के लिए प्रेरित करते हुए कहा, यही सबसे श्रेष्ठ लोकसेवा है। यदि चिन्तन परिष्कृत होगा, तो कर्म भी सात्त्विक ही होंगे। गुरुकृपा से इनमें कवित्व शक्ति जाग्रत होंगे। गुरुकृपा से इनमें कवित्व शक्ति जाग्रत हुई थी।
स्वाध्याय में जो पढ़ नहीं सकेंगे, वे दूसरों से पढ़वाकर सुन लिया करेंगे। इस प्रकार की प्रक्रिया नियमित रूप से चलती रहेगी।
स्वाध्याय चलता रहेगा। स्वाध्याय में जो पढ़ नहीं सकेंगे, वे दूसरों से पढ़वाकर सुन लिया करेंगे। इस प्रकार की प्रक्रिया नियमित रूप से चलती रहेगी।
स्वाध्याय, मनन, चिन्तन द्वारा श्रेष्ठ विचारों को जानकर, समझकर उन्हें आत्मसात कर सकते हैं। इसके लिए हर रोज अपनी दिनचर्या शुरू करने से पहले कतिपय श्रेष्ठ वैचारिक सूत्रों का मनन करना चाहिए। यह प्रक्रिया हर कार्य अथवा किसी विशेष कार्य को करने से पहले की जाय तो ओर भी अच्छा। इस क्रम में धीरे-धीरे हमारा दृष्टिकोण उनके अनुरूप ढल जाएगा और वे विचार हमें अन्दर से सहायता करते रहेंगे। प्रसिद्ध मनोचिकित्सक एमिल कू ने इसे ही ‘काँशियस आटोसजेशन’ का नाम दिया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-February
स्वाध्याय।
स्वाध्याय-मण्डल में अथवा शक्तिपीठ पर सामूहिक अखण्ड जप में भागीदारी कर युगऋषि की चेतनसत्ता का एक अंश स्वयं में समाहित करने का भावभरा संकल्प लेता है। श्रेष्ठ साधक ही इस अवधि में उभरे उल्लास की सुनियोजित कर उन्हें त्याग-बलिदान, विद्या विस्तार की ओर मोड़ दे पाते हैं। साधनात्मक स्तर पर इसीलिए यह परिपाटी बनायी गयी है, कि सामूहिक अखण्ड जप का क्रम हर स्थान पर चले, चाहे उसमें सक्रिय परिजन एक घण्टा ही भागीदारी कर सकें, अवश्य करें।
स्वाध्याय मण्डल, प्रज्ञा संस्थानों के लिए पाँच सूत्रीय कार्यक्रम निर्धारित है, जहाँ भी यज्ञ हो, वहाँ इन पाँचों को परिपुष्ट बनाया जाना चाहिए। रचनात्मक और सुधारात्मक कार्यक्रम पाँच-पाँचों को परिपुष्ट बनाया जाना चाहिए। रचनात्मक और सुधारात्मक कार्यक्रम पाँच-पाँच निर्धारित किये गये है। आज की परिस्थितियों में इन दयों को कार्यान्वित करने के लिए यज्ञ-आयोजनकर्ताओं को अपने-अपने यहाँ की स्थिति के अनुरूप जो कुछ भी सम्भव हो, उसे करने में कुछ उठा न रखना चाहिए।
स्वाध्याय ऐसा ही पत्थर है, जिसके संपर्क में निरन्तर रहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-March
स्वाध्याय को मनुष्य का पथ प्रदर्शक नेता और मित्र जैसा हितैषी बताया है। उनका कहना है कि जो व्यक्ति सत्पथ प्रदर्शक अपने सच्चे सखा स्वाध्याय का परित्याग कर देता है, उसका नाड़ी आदि इन्द्रियों पर अधिकार नहीं रहता। उसका मन चंचल, विवेक मन्द और बुद्धि कुंठित रहती है। इन सब दोषों के कारण उसे दुखों का भागी बनना पड़ता है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति वही है, जो अपने सच्चे मित्र स्वाध्याय को कभी नहीं छोड़ेगा।
स्वाध्याय द्वारा योग्यता बढ़ाने में प्रमाद मत करना। स्वाध्याय से जहाँ संचित ज्ञान सुरक्षित तो रहता है, साथ ही उसके ज्ञानकोष में नवीनता और वृद्धि भी होती रहती है। वहाँ स्वाध्याय से विरत हो जाने वाला नयी पूँजी पाना तो क्या गाँठ की विद्या भी खो देता है।
स्वाध्यायशील नहीं है।
स्वाध्याय के महत्व का ज्ञान होता है, तब हाथ मल-मलकर पछताते रहते हैं।
स्वाध्याय किया जाये एवं साधनात्मक मनोभूमि विकसित कर आहार विहार का नियमन कर कैसे स्वस्थ, सुसंस्कृत संतति को जन्म दिया जाये, इसकी पूरी व्यवस्था उस संस्कार में है। गायत्री परिवार के द्वारा सुव्यवस्थित पौरोहित्य व्यवस्था के माध्यम से यह कर्मकाण्ड अब बड़े व्यापक रूप से सम्पन्न किया जाता है। 21वीं सदी में यदि मातृसत्ता को स्वस्थ देखना चाहते हैं, उसकी संख्या में तेजी से आ रही कमी को रोकना चाहते हैं एवं उनका उनके गर्भकाल में होने वाली आनुवंशिक व्याधियों में शिशुओं को रोगी होने से बचाना चाहते हैं तो यह संस्कार ही इस प्रक्रिया के लिए सम्पन्न कराया जाना अनिवार्य माना जाना चाहिए। भविष्य की -------------रोगमुक्त, संस्कार वान श्रेष्ठ महामानवों को ही,---------------- इसके लिए यह संस्कार जरूरी है।
स्वाध्याय और उसका चिंतन-मनन भी किया जाये तो बहुत कुछ उस दिशा में बढ़ा जा सकता है। स्वाध्याय स्वयं ही एक तप, आसन और निर्दिष्टयासन के समान है। इसका नियम निर्वाह करने से आप ही आप अनेक नियम, संयमों का अभ्यास हो जाता है।
स्वाध्याय का एक साधारण और मनोवैज्ञानिक फल है। सद्ग्रन्थों में सन्निहित साधु वाणियों का निरन्तर अध्ययन और मनन करते रहने से मन पर शिव संस्कारों की स्थापना होती है, जिससे चित्त अपने आप दुष्कृत्यों की ओर से फिर जाता है। स्वाध्यायी व्यक्ति पर कुसंग का प्रभाव नहीं पड़ने पाता इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है। जिसकी स्वाध्याय में रुचि है और जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय तो स्वाध्याय में ही तो लगाता है। इसलिए उनके पास को फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा तथा दूषित वातावरण अवांछनीय तत्व ग्रहण कर लायेगा।
स्वाध्यायात् मा प्रमद।’
स्वाध्याय में मनुष्य का अंतःकरण निर्मल कर देने और उसके अंतर्पट खोलने की सहज क्षमता विमान है। आंतरिक उद्घाटन हो जाने से मनुष्य स्वयं ही आत्मा और परमात्मा के प्रति जिज्ञासु हो उठता है। उसकी चेतना ऊर्ध्वमुखी होकर उसी ओर उड़ने के लिए पर तोलने लगती है। उच्च अध्यात्मिक अनुभूतियों का प्रस्फुटन स्वाध्याय के द्वारा ही हुआ करता है। स्वाध्याय निःसंदेह एक ऐसा ही अमृत है जो मानस में प्रवेश कर मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को नष्ट करता है।
स्वाध्यायशील व्यक्ति के निकट नहीं जा पाते। इसका भी एक वैज्ञानिक हेतु ही है, कोई सुरक्षा कवच का प्रभाव नहीं है। जिसे पढ़ना और नित्य नियम से जीवन का ध्येय समझ कर पढ़ना है, वह तो हर अवस्था में अपने उस व्रत का पालन करेगा ही। अवस्था अथवा अनियमितता, वह जानता है कि उसके इस रुचिपूर्ण व्रत में बाधक होगी अस्तु वह जीवन की एक सुनिश्चित दिनचर्या बनाकर चलता है। उसका सोना, जागना, खाना-पीना टहलना-घूमना और कारोबार करने के साथ-साथ पढ़ने लिखने का कार्यक्रम एक व्यवस्थित रूप से बड़े अच्छे ढंग से चलता रहता है।
स्वाध्याय, जप के समय मंत्रार्थ चिंतन, आज्ञाचक्र पर अंतःत्राटक, मनोयोग कोश की विभूतियों को तीव्र गति से जाग्रत करने में समर्थ है। जप काल में स्वर्णिम सविता का ध्यान आवश्यक है। ध्यान में साधक का सविता में समर्पण, विसर्जन, विलय की गहरी अनुभूति साधनारत व्यक्ति को बोध कराती है, ‘योऽसौसूर्यो सोऽह्मस्मि।’ यानि कि वही मैं हूँ। ध्यान की इसी गम्भीरता में रुद्र, विष्णु, ब्रह्मग्रंथियाँ भी खुलती हैं।
स्वाध्यायी व्यक्ति पर कुसंग का प्रभाव नहीं पड़ने पाता इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है। जिसकी स्वाध्याय में रुचि है और जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय तो स्वाध्याय में ही तो लगाता है। इसलिए उनके पास को फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा तथा दूषित वातावरण अवांछनीय तत्व ग्रहण कर लायेगा।
स्वाध्यायशील के पास कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
स्वाध्याय, उनके विचारों का चिंतन-मनन नहीं करता है और सोच लेता है कि जब मैं इतना क्रियाकाण्ड करता हूँ तो इसके बाद अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, आत्म ज्ञान अथवा परमात्मा विभूति करा देने के लिए इतना ही पर्याप्त है तो निश्चय ही भ्रम में है। आत्मा का क्षेत्र वैचारिक क्षेत्र है, सूक्ष्म भावनाओं और मनन चिंतन का क्षेत्र है।
स्वाध्याय को स्थान एवं महत्व देने की कोशिश करनी चाहिए।
स्वाध्याय को कभी नहीं छोड़ेगा। इसलिए तो गुरुकुल से अध्ययन पूरा करने के बाद विद्या लेते समय गुरु, शिष्य का अंतिम उपदेश दिया करता था -
स्वाध्याय के द्वारा ही हुआ करता है। स्वाध्याय निःसंदेह एक ऐसा ही अमृत है जो मानस में प्रवेश कर मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को नष्ट करता है।
स्वाध्याय का व्रती होगा। इसके विपरीत जो वकील अविश्वास पूर्वक विश्रृंखलता प्रतिपादन करता हुआ दिखलाई दे, विश्वास कर लेना चाहिए कि वह स्वाध्यायशील नहीं है।
स्वाध्याय उनके जीवन का महत्वपूर्ण अंग है और प्रति दिन की अनिवार्य आवश्यकता बन जाता है। जिस दिन वे अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर पाते, उस दिन वे अपने तन-मन और आत्मा में एक भूख, एक रिक्तता का कष्ट अनुभव किया करते हैं। उस दिन को जीवन का एक मनहूस दिन मानते हैं और उस मनहूस दिन को अपने जीवन में कभी भी आने का अवसर नहीं देते।
स्वाध्याय का सुफल होता है जिसे वे किसी दिन भी, किसी अवस्था में नहीं छोड़ते। उनके जीवन का कदाचित ही कोई ऐसा अभागा दिन जाता हो, जिसमें मनोयोग पूर्वक घण्टे दो घण्टे स्वाध्याय न करते हों। स्वाध्याय उनके जीवन का महत्वपूर्ण अंग है और प्रति दिन की अनिवार्य आवश्यकता बन जाता है। जिस दिन वे अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर पाते, उस दिन वे अपने तन-मन और आत्मा में एक भूख, एक रिक्तता का कष्ट अनुभव किया करते हैं। उस दिन को जीवन का एक मनहूस दिन मानते हैं और उस मनहूस दिन को अपने जीवन में कभी भी आने का अवसर नहीं देते।
स्वाध्याय जीवन विकास के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है, जिसे हर व्यक्ति को पूरा करना चाहिए। अनेक लोग परिस्थितिवश अथवा प्रारम्भिक प्रमाद वश पढ़ लिख नहीं पाते और जब आगे चलकर उन्हें शिक्षा और स्वाध्याय के महत्व का ज्ञान होता है, तब हाथ मल-मलकर पछताते रहते हैं।
स्वाध्याय का परित्याग कर देता है, उसका नाड़ी आदि इन्द्रियों पर अधिकार नहीं रहता। उसका मन चंचल, विवेक मन्द और बुद्धि कुंठित रहती है। इन सब दोषों के कारण उसे दुखों का भागी बनना पड़ता है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति वही है, जो अपने सच्चे मित्र स्वाध्याय को कभी नहीं छोड़ेगा। इसलिए तो गुरुकुल से अध्ययन पूरा करने के बाद विद्या लेते समय गुरु, शिष्य का अंतिम उपदेश दिया करता था -
स्वाध्याय में ही तो लगाता है। इसलिए उनके पास को फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा तथा दूषित वातावरण अवांछनीय तत्व ग्रहण कर लायेगा।
स्वाध्याय में रुचि है और जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय तो स्वाध्याय में ही तो लगाता है। इसलिए उनके पास को फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा तथा दूषित वातावरण अवांछनीय तत्व ग्रहण कर लायेगा।
स्वाध्याय। जो वकील धारावाहिक रूप में बोल कर न्यायालय का वायुमण्डल प्रभावित कर अपने पक्ष का समर्थन जीत लेते हैं, वह निश्चय ही घंटों स्वाध्याय का व्रती होगा। इसके विपरीत जो वकील अविश्वास पूर्वक विश्रृंखलता प्रतिपादन करता हुआ दिखलाई दे, विश्वास कर लेना चाहिए कि वह स्वाध्यायशील नहीं है।
स्वाध्याय से जहाँ संचित ज्ञान सुरक्षित तो रहता है, साथ ही उसके ज्ञानकोष में नवीनता और वृद्धि भी होती रहती है। वहाँ स्वाध्याय से विरत हो जाने वाला नयी पूँजी पाना तो क्या गाँठ की विद्या भी खो देता है।
स्वाध्याय के ध्येय को अनेक तरह पूरा किया जा ही सकता है।
स्वाध्याय किसी दिन भी न करिये और देखिये कि सरस्वती की सिद्धि तो दूर पास की पढ़ी हुई विद्या भी विलुप्त हो जायेगी। सरस्वती स्वाध्याय का अनुगमन करती है, इस सत्य का सम्मान करता हुआ जो साधक उनकी उपासना किया करता है वह अवश्य उनकी कृपा का भागी बन जाता है।
स्वाध्याय स्वयं ही एक तप, आसन और निर्दिष्टयासन के समान है। इसका नियम निर्वाह करने से आप ही आप अनेक नियम, संयमों का अभ्यास हो जाता है।
स्वाध्यायशील के पास जाने का कोई प्रयोजन या साहस ही नहीं रखेगा और यदि संयोगवश ऐसे कोई व्यक्ति पास आ भी जाते हैं तो उनके पास का वातावरण अपने अनुकूल न पाकर देर तक ठहर न पायेंगे। निदान संगत जन्य आचरण दोनों का स्वाध्यायशील के पास कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
स्वाध्याय का अनुगमन करती है, इस सत्य का सम्मान करता हुआ जो साधक उनकी उपासना किया करता है वह अवश्य उनकी कृपा का भागी बन जाता है।
स्वाध्याय न करते हों। स्वाध्याय उनके जीवन का महत्वपूर्ण अंग है और प्रति दिन की अनिवार्य आवश्यकता बन जाता है। जिस दिन वे अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर पाते, उस दिन वे अपने तन-मन और आत्मा में एक भूख, एक रिक्तता का कष्ट अनुभव किया करते हैं। उस दिन को जीवन का एक मनहूस दिन मानते हैं और उस मनहूस दिन को अपने जीवन में कभी भी आने का अवसर नहीं देते।
स्वाध्याय से विरत हो जाने वाला नयी पूँजी पाना तो क्या गाँठ की विद्या भी खो देता है।
स्वाध्याय की रुचि है और उसके महत्व को हृदयंगम कर लिया गया है, तो शिक्षा अथवा अशिक्षा को कोई व्यवधान नहीं आता, स्वाध्याय के ध्येय को अनेक तरह पूरा किया जा ही सकता है।
स्वाध्याय निःसंदेह एक ऐसा ही अमृत है जो मानस में प्रवेश कर मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को नष्ट करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-May
स्वाध्यायशील बनना होगा। आप इस प्रकार कर सकेंगे तो मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आपका जीवन महान बन जायगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-July
स्वाध्याय के क्षेत्र में भी छा गए ऊँच-नीच ने हिंदू समाज को बुरी तरह खोखला किया था। कलकत्ता (कोलकाता) अधिवेशन में उपजी कटुता को शाँत करने के बाद वे राष्ट्रीय भावनाओं का प्रचार करते हुए जगह-जगह घूमे। राष्ट्रीय आँदोलन को गति देते हुए वे समाज-सुधार संबंधी कार्यक्रमों को भी गति देते रहे। व्याख्यानों में अछूतोद्धार, स्त्रियों की दशा सुधारने और सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन करने की प्रेरणा रहती। शूद्रों के शास्त्र-अधिकार का मुद्दा भी इन व्याख्यानों का विषय होता।
स्वाध्याय एवं चिंतन-मनन द्वारा अपने चारों ओर एक उच्चतर वातावरण तैयार किया जाए। क्रमशः यह आदत व्यक्तित्व के भावनात्मक ढाँचे के रूपांतरण में एक महत्त्वपूर्ण कारक बन जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-August
स्वाध्याय न करना मंत्रों का मैल है। झाड़-बुहारन करना घर का मैल है। आलस्य सौंदर्य का मैल है, प्रमाद पहरेदारों का मैल है। इन सब मैलों से भी बढ़कर अविद्या परम मैल है। भिक्षुओं इस मैल को छोड़कर निर्मल बनो।
स्वाध्याय एवं सद्चिंतन का क्रम अपनाएँ।
स्वाध्याय नहीं किया। यदि उसने धर्म श्रवण पर ध्यान किया होता तो ऐसी दुर्गति न होती।
स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान उसके जीवन के अन्तरंग अंग बन जाते हैं। उसके जीवन में ये साधनाएँ अनवरत चलती रहती हैं। ऐसे शिष्य के विचार और व्यवहार, ज्ञान और कर्म में ज्यादा अन्तर नहीं रहता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-January
स्वाध्याय आरंभ करते हैं।
स्वाध्याय के क्रम में अखण्ड ज्योति पत्रिका के किसी लेख को विचार पूर्वक पढ़ा जाय, अथवा किसी श्रेष्ठ विचारपूर्ण साहित्य को पढ़ा जाय। और उस पर कुछ पंक्तियों में समीक्षात्मक नोट लिखा जाय। इस तरह के स्वाध्याय क्रम से मौलिक सृजन चेतना जाग्रत् होती है।
स्वाध्याय- पूरे दिन कम से कम एक काम ऐसा जरूर करें, जिसमें अपना तनिक भी स्वार्थ एवं थोड़ी सी भी अहं भावना न हो। जैसे विनम्र भाव से कहीं सफाई आदि की जाय, अथवा किसी बीमार आदि की सेवा की जाय। यदि किसी दिन कोई ऐसा अवसर न मिले, तो किसी के कल्याण के लिए भगवान् से भाव भरी प्रार्थना की जाय। यह भी सेवा का ही एक रूप है।
स्वाध्याय क्रम से मौलिक सृजन चेतना जाग्रत् होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-September
स्वाध्याय जड़ जमाकर हमारे अंतस् में बैठ जाए एवं हमारे कर्मों में उतरने लग। इस अध्याय का शुभारम्भ ही अर्जुन की जिज्ञासा से हुआ है। वह भ्रमित हैं उसने चौथे अध्याय में कर्मयोग की महिमा जानी, किन्तु बीच-बीच में श्रीकृष्ण के श्रीमुख से ज्ञानयोग (कर्म संन्यास) की बातें भी ‘ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुहृवति’ (श्लोक 24) के माध्यम से जानीं। श्रीकृष्ण से अर्जुन यह जानना चाहता है कि कौन-सा साधन श्रेष्ठ है-कर्मयोग अथवा ज्ञानयोग।
स्वाध्याय द्वारा श्रेष्ठतम कर्म करते हुए अपनी जीवन यात्रा को आगे बढ़ाए। उसका इहलोक-परलोक दानों ही सध जाएंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-May
स्वाध्याय एवं तप प्रधान जीवन जीते हुए लोकशिक्षण एवं धर्मकार्यों का सम्पादन करता था। क्षत्रिय अपनी शक्ति शौर्य का सुनियोजन करते हुए देश की रक्षा एवं समाज व्यवस्था को सम्भालता था। वैश्य व्यापार एवं कृषि कार्यों के द्वारा समाज के सुविधा-साधनों की व्यवस्था जुटाता था। शुद्र अपने श्रम द्वारा तीनों वर्णों की सेवा करते हुए समाज की आवश्यकताओं को पूरी करता था। इस तरह वर्ण विभाजन पूरी तरह गुण-कर्म के आधार पर कार्य विभाजन का सिद्धान्त था, जिससे की समाज का विकास सुव्यवस्थित एवं स्थिर रूप से हो सके।
स्वाध्याय, तीर्थ, व्रत, ध्यान-धारण, समाधि आदि के अनेक उपायों में से सभी का कर सकना, एक के लिए संभव नहीं। फिर सामान्यजन यह भी निर्णय नहीं कर सकते, इनमें से किसे चुना जाए? कृपया आप ही मेरा समाधान करें कि सर्वसुलभ और सुनिश्चित मार्ग क्या है? अनेक मार्गों के भटकाव से निकालकर मुझे सरल अवलंबन का निर्देश दीजिए।”
स्वाध्याय प्रधान जीवन जीते हुए लोकसेवा में प्रवृत्त होता था। जीवन के अंतिम चरणों में मानसिक परिपक्वता के अनुरूप संन्यास आश्रम में प्रवेश करता था और पूर्णतया आत्मचिंतन और भगवद् भजन में अपना समय नियोजित करता हुआ मोक्ष का अधिकारी बनता था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-March
स्वाध्याय बहुत सहायक है। इनसे जहाँ आत्म निरीक्षण एवं समीक्षा कर प्रयोजन सिद्ध होता है वहीं मन को उच्चतर प्रेरणा एवं मार्गदर्शन भी मिलता रहता है।
स्वाध्याय को जीवन का अभिन्न अंग बनाने का आदेश दिया गया है।
स्वाध्यायशीलता का मार्गदर्शन मिलता है एवं संगठित होकर ‘सलाह लें−सम्मान दें’ वाली नीति का परामर्श प्राप्त होता है। यही कारण है कि समूह−साधना इस मिशन की नस−नस में संव्याप्त है एवं यह परिवार निरंतर बढ़ता, प्रगति ही करता चला जा रहा है। विनोबा कहते थे, कार्यकर्त्ता को ‘यश’ का दान कर देना चाहिए, निर्लिप्त भाव से बिना श्रेय लिए जीना चाहिए। आज के लिए भी यही मार्गदर्शन हम सबके लिए है।
स्वाध्याय से होने लगा। श्रेष्ठ विचारों में स्नान उनके स्वभाव को उच्चस्तरीय भाव में प्रतिष्ठित करता चला गया। जीवनोद्देश्य की जानकारी उस ध्यान से हुई, जिसमें उनने जाना कि वे कौन हैं−एक सामान्य जीव नहीं−विशिष्ट प्रयोजन के लिए जन्मे प्रज्ञा परिजन, जिन्हें उलटे को उलटकर सीधा करना हैं, विचार−क्राँति करनी है। अपने साथ औरों के चिंतन पर छाए कुहासे को भी मिटाना है। यही युग निर्माण योजना की प्रगतियात्रा है।
स्वाध्याय का एक अच्छा तरीका है विद्याविस्तार योजना का स्वयं को एक अंग बना लेना। जो भी पुस्तक या पत्रिका या ऑडियो बुक या कैसेट औरों को देना, पढ़ाना, सुनाना है, उसे पहले स्वयं पढ़ना, अच्छी तरह से उसे गुनना। जितना अधिक मनन किया जाएगा, उतना ही अपना विश्वास प्रचंड हो जाएगा एवं गुरुवर के विचारों की आग सतत सक्रिय बनाती रहेगी। मन उल्लसित, तनावमुक्त रहेगा।
स्वाध्याय को एक नियमित रुटीन बनाने की बात भी कह रहे हैं। उनका स्पष्ट मत, शुरू के भी कई पत्रों का जब हम अनुशीलन करते हैं, तो यही रहा है कि अपनी सारी समस्याओं का समाधान ‘अखण्ड ज्योति’ में ढूँढ़ने का प्रयास करें। यही नहीं, वास्तविक ज्ञान, आत्मज्ञान भी उसी से मिलता है, यह वे लिखते रहे हैं। वस्तुतः पत्र−लेखन व पाती की ही तरह से ‘अखण्ड ज्योति’ का लेखन−संपादन उनकी दैनिक साधना का एक अंग था, चाहे वे मथुरा हों या बाहर। पहले के पत्र में हम पढ़ चुके हैं कि दस हजार पत्रिकाएँ उस समय छपती थीं।
स्वाध्याय। स्व का पर्यवेक्षण−अध्ययन एवं श्रेष्ठ विचारों में सतत् स्नान। व्यक्तित्व अच्छे विचारों से स्नात रहेगा तो विचार स्वतः ही विधेयात्मक−सुगढ़ होते चले जाएँगे। स्वाध्याय का एक अच्छा तरीका है विद्याविस्तार योजना का स्वयं को एक अंग बना लेना। जो भी पुस्तक या पत्रिका या ऑडियो बुक या कैसेट औरों को देना, पढ़ाना, सुनाना है, उसे पहले स्वयं पढ़ना, अच्छी तरह से उसे गुनना।
स्वाध्यायात् मा प्रमदः’ कहकर इसमें प्रमाद को वर्जनीय माना है। क्योंकि साँसारिक माया एवं मन की प्रकृति दोनों मिलकर जीवात्मा को अपने लक्ष्य के प्रति भ्रमित ही अधिक रखती है। सद्ग्रंथों, महापुरुषों द्वारा रचित साहित्य एवं शास्त्र ग्रन्थों के अध्ययन से आत्ममूर्छना टूटती है; जीवन के अँधेरे कोनों में प्रकाश पड़ता है और अभ्युदय का मार्ग प्रकाशित होता है। अतः स्वाध्याय को जीवन का अभिन्न अंग बनाने का आदेश दिया गया है।
स्वाध्याय को जीवनोत्कर्ष का एक अनिवार्य अंग माना गया है। ‘स्वाध्यायात् मा प्रमदः’ कहकर इसमें प्रमाद को वर्जनीय माना है। क्योंकि साँसारिक माया एवं मन की प्रकृति दोनों मिलकर जीवात्मा को अपने लक्ष्य के प्रति भ्रमित ही अधिक रखती है। सद्ग्रंथों, महापुरुषों द्वारा रचित साहित्य एवं शास्त्र ग्रन्थों के अध्ययन से आत्ममूर्छना टूटती है; जीवन के अँधेरे कोनों में प्रकाश पड़ता है और अभ्युदय का मार्ग प्रकाशित होता है। अतः स्वाध्याय को जीवन का अभिन्न अंग बनाने का आदेश दिया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-June
स्वाध्याय कराना, युगशक्ति गायत्री पत्रिका से जोड़े रहने के लिए नए ग्राहक-पाठक बनाना, ब्रह्मभोज में अधिकाधिक साहित्य वितरित करना, इसी शृंखला में आता है। गायत्री तपोभूमि मथुरा की यह स्वर्ण जयंती वर्ष का समापन दिवस भी है। इस वर्ष के महानतम अभियान गायत्री मंत्र लेखन-साधना में जितने अधिक व्यक्तियों को जोड़ा जा सके, जोड़ना चाहिए। स्वयं भी चौबीस मंत्र न्यूनतम रोज लिखने का संकल्प लेना चाहिए। मंत्र लेखन से बड़ा तप कोई नहीं।
स्वाध्याय करने वाले के मन-मस्तिष्क को पढ़ लेते थे, अपने निज के गहन अध्ययन व विलक्षण स्मृति को आधार बनाकर लिखते थे। वही आज हमारे समक्ष विराट वाङ्मय के रूप में उपलब्ध है। साधनाजन्य यह उपलब्धि ऐसी है, जिस पर गहन शोध जरूरी है। संत चाहे पढ़े हों, अनपढ़ हों, वे अंतर में इस ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं, जो वर्षों तक पढ़ने वाला नहीं प्राप्त कर पाता।
स्वाध्याय करना चाहिए जो जीवन में नई दिशा दे सके। आत्म समीक्षा के लिए मनन और आत्म निर्माण के लिए चिन्तन अनिवार्य नित्य कर्म माना जाना चाहिए। सही मायने में यही प्रगतिशीलता है, आत्मोत्कर्ष है।
स्वाध्याय किया करें। पिता-माता को ऐसी पुस्तकें पढ़कर सुनाया करे जैसी कि सुभद्रा को सुनाई गई थी, जब अभिमन्यु पेट में था। पिता का यह भी काम है कि पत्नी को अच्छा साहित्य पढ़ने के लिए दे। जहाँ उसका निवास है, वहाँ गंदी तस्वीरें नहीं, एक-से एक अच्छे आदर्श महापुरुषों की तस्वीरें लगाकर रखें। जब कभी भी आँख ऊपर के लिए जाए तो अपनी धर्मपत्नी को उन श्रेष्ठ मनुष्यों का चरित्र और उनका स्वभाव देखने-समझने का ही मौका मिले।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-October
स्वाध्याय को लिया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-April
स्वाध्यायशील छात्र विद्या अध्ययन करते थे। उस समय शिक्षा का विकास विद्या स्तर तक हुआ था। ज्ञातव्य है कि शिक्षा का ही सुपरिष्कृत रूप विद्या है। विद्या का लक्ष्य सत्य का अध्ययन करना है, पर आज तो स्थिति दूसरी है। विनोबा ने एक जगह इस संबंध में उल्लेख करते हुए कहा था, “ऋषिकाल में विद्यालय विद्या के आलय अर्थात् आगार होते थे, पर आज के परिवेश में विद्यालय ऐसे हैं, जहाँ विद्या का लय अर्थात् लोप होता है।
स्वाध्यायशील छात्र। शिक्षा भी ऐसे युग्म को पाकर अपने को कृतार्थ समझती थी और अपने सारे−के−सारे रहस्य ऐसे सुपात्रों के समक्ष खोलने में अपने को कृतकृत्य मानती थी।
स्वाध्याय, मनोरंजन, प्रकृति का सान्निध्य, एकाँत का परित्याग, बात−चीत, हँसी−मजाक जैसे कितने ही उपक्रम ऐसे हो सकते हैं, जिनमें मन खो जाता है। इससे खराब मूड की अवस्था बदल जाती है और उसका स्थान आनंद, उत्साह, उमंग, सक्रियता जैसे तत्त्व ले लेते हैं। यों गम गलत करने का एक आसान और प्रचलित तरीका आज नशा−सेवन भी है, पर यह तो वैसा ही हुआ, जैसे एक छोटे फोड़े को ठीक करने में क्रम में एक बड़ा और दुःसाध्य घाव पैदा कर लेना। इससे सदा परहेज करना चाहिए। गड्ढे को छलाँगने के प्रयास में कोई कुएँ में जा गिरे तो यह उसकी मूर्खता ही कही जाएगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-November
स्वाध्याय और सत्संग की परम पुनीत प्रक्रिया को सजीव रूप देकर नैतिक, धार्मिक एवं सामाजिक क्रान्ति के पथ पर यह संस्था अग्रसर होने जा रही है। दो हजार सुसंगठित शाखाओं तथा एक लाख परिजनों द्वारा इस पथ पर ठोस कदम उठाने का संकल्प शपथ पूर्वक महायज्ञ की पूर्णाहुति के अवसर पर दुहराया जायगा। इस लक्ष की पूर्ति के लिये परिवार पुनः अपने इस पूर्व घोषित लक्ष पर सक्रिय होने की प्रतिज्ञा ग्रहण करेगा। यह प्रतिज्ञा उत्सव गायत्री परिवार के ध्वजारोहण के समय सम्पन्न होगा।
स्वाध्याय कीजिए, आत्मसुधार विषयक पुस्तकें पढ़िये। मन में स्वस्थ विचार रखिए, निरक्षर व्यक्तियों को पढ़ाइये सार्वजनिक कार्यों में अपने समय का सदुपयोग कीजिए। बागवानी या संगीत विद्या सीखिए। बस आप इन मानसिक रोगों को समूल निकाल फेंकेंगे। याद रखिए, आपके मानसिक रोगों का इलाज स्वस्थ चिन्तन और व्यस्तता ही है।
स्वाध्याय,दान आदि कार्यों के समय शिखा में ग्रन्थी लगाकर ही इन कार्यों के करने का विधान किया है—
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-May
स्वाध्याय के लिये लाभदायक एवं उपयोगी सिद्ध हो सकता है। इसलिये गायत्री ज्ञान मन्दिर में इस प्रकार के साहित्य के लिये एक कक्ष अवश्य ही निर्धारित रहना चाहिये इसके बिना ज्ञान मन्दिर का ज्ञान शब्द सार्थक न हो सकेगा। बुद्धि की देवी गायत्री के प्रत्येक उपासक के लिये स्वाध्याय भी उतना ही आवश्यक धर्मकृत्य है जितना जप ध्यान-पाठ स्नान। बिना स्वाध्याय के-बिना ज्ञान की उपासना के बुद्धि पवित्र नहीं हो सकती, मानसिक मलीनता दूर नहीं हो सकती और इस सफाई के बिना माता का सच्चा प्रकाश कोई उपासक अपने अन्तःकरण से अनुभव नहीं कर सकता। जिसे स्वाध्याय से प्रेम नहीं, उसे गायत्री उपासना से प्रेम है यह नहीं माना जा सकता।
स्वाध्याय एवं फेरी के जरूरी कार्यक्रमों को पूर्ण करना चाहिये। 10 पड़ोसियों को पूरा गायत्री ही साहित्य पढ़वाने का कार्य धर्मफेरी में सम्मिलित है। इसे पूरा करने वाले धर्म प्रचारक-ब्रह्मविद्यालय के उपाध्याय माने जायेंगे और महायज्ञ के अवसर पर इनका सार्वजनिक सम्मान किया जायेगा।
स्वाध्याय, प्रार्थना करते हैं, वही भगवान का वैभव बढ़ाने वाली बातें हैं। जिन विचारों या कार्यों से हमारा देवत्व प्रकट होता है, वे ही इस दुर्लभ मानव-देह से करने योग्य कार्य हैं। वाणी से भगवान के दिव्य गुणों, अतुल सामर्थ्यों का गुण-गान करें, हाथों से पवित्र कार्य करे, ब्रह्म-चिन्तन भजन-गायन, और अर्चन से बुद्धि को शुद्ध बनाये, यही हमारे अहंकार को दूर कर सकता है और चित्त शुद्ध कर सकता है।
स्वाध्याय की आवश्यकता अमुक देवता, अमुक अवतार के चरित्र या अमुक प्राचीन ग्रन्थ को रोज-रोज दुहराते रहने से ही काम नहीं चल सकता। मनुष्य के व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में आती रहने वाली अनेक समस्याओं तथा गुत्थियों को तर्क, विवेक एवं कारण, प्रमाण के आधार पर सुलझाने वाला साहित्य ही स्वाध्याय के लिये लाभदायक एवं उपयोगी सिद्ध हो सकता है। इसलिये गायत्री ज्ञान मन्दिर में इस प्रकार के साहित्य के लिये एक कक्ष अवश्य ही निर्धारित रहना चाहिये इसके बिना ज्ञान मन्दिर का ज्ञान शब्द सार्थक न हो सकेगा। बुद्धि की देवी गायत्री के प्रत्येक उपासक के लिये स्वाध्याय भी उतना ही आवश्यक धर्मकृत्य है जितना जप ध्यान-पाठ स्नान। बिना स्वाध्याय के-बिना ज्ञान की उपासना के बुद्धि पवित्र नहीं हो सकती, मानसिक मलीनता दूर नहीं हो सकती और इस सफाई के बिना माता का सच्चा प्रकाश कोई उपासक अपने अन्तःकरण से अनुभव नहीं कर सकता।
स्वाध्याय के-बिना ज्ञान की उपासना के बुद्धि पवित्र नहीं हो सकती, मानसिक मलीनता दूर नहीं हो सकती और इस सफाई के बिना माता का सच्चा प्रकाश कोई उपासक अपने अन्तःकरण से अनुभव नहीं कर सकता। जिसे स्वाध्याय से प्रेम नहीं, उसे गायत्री उपासना से प्रेम है यह नहीं माना जा सकता। बुद्धि की देवी गायत्री का सच्चा भोजन स्वाध्याय ही है। ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं। इसलिये गायत्री उपासना के साथ ज्ञान की उपासना भी अविच्छिन्न रूप में जुड़ी हुई है।
स्वाध्याय (ज्ञान उपासना) एवं लोक सेवा के महान कार्य को आगे बढ़ाता है। यह तीन कार्य बड़े विशाल सामूहिक सार्वजनिक देव मन्दिरों के हैं। इन्हें ही बड़े पैमाने पर अधिक विस्तृत क्षेत्र में पूरा समय लगाने वाले पुजारियों को करना होता है। चूँकि पारिवारिक गायत्री ज्ञान मन्दिर छोटे हैं इसीलिये इनके द्वारा उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति छोटे पैमाने पर की जा सकती है। गायत्री परिवार के सदस्य स्वयं ही इन मन्दिरों के संस्थापक, संचालक का पुजारी की जिम्मेदारी पूरा कर सकते हैं।
स्वाध्याय ही है। ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं। इसलिये गायत्री उपासना के साथ ज्ञान की उपासना भी अविच्छिन्न रूप में जुड़ी हुई है।
स्वाध्याय भी उतना ही आवश्यक धर्मकृत्य है जितना जप ध्यान-पाठ स्नान। बिना स्वाध्याय के-बिना ज्ञान की उपासना के बुद्धि पवित्र नहीं हो सकती, मानसिक मलीनता दूर नहीं हो सकती और इस सफाई के बिना माता का सच्चा प्रकाश कोई उपासक अपने अन्तःकरण से अनुभव नहीं कर सकता। जिसे स्वाध्याय से प्रेम नहीं, उसे गायत्री उपासना से प्रेम है यह नहीं माना जा सकता। बुद्धि की देवी गायत्री का सच्चा भोजन स्वाध्याय ही है। ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं।
स्वाध्याय को भी घर के हर सदस्य के लिये एक आवश्यक धर्म कार्य बना दिया जाय। स्वाध्याय की आवश्यकता अमुक देवता, अमुक अवतार के चरित्र या अमुक प्राचीन ग्रन्थ को रोज-रोज दुहराते रहने से ही काम नहीं चल सकता। मनुष्य के व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में आती रहने वाली अनेक समस्याओं तथा गुत्थियों को तर्क, विवेक एवं कारण, प्रमाण के आधार पर सुलझाने वाला साहित्य ही स्वाध्याय के लिये लाभदायक एवं उपयोगी सिद्ध हो सकता है। इसलिये गायत्री ज्ञान मन्दिर में इस प्रकार के साहित्य के लिये एक कक्ष अवश्य ही निर्धारित रहना चाहिये इसके बिना ज्ञान मन्दिर का ज्ञान शब्द सार्थक न हो सकेगा। बुद्धि की देवी गायत्री के प्रत्येक उपासक के लिये स्वाध्याय भी उतना ही आवश्यक धर्मकृत्य है जितना जप ध्यान-पाठ स्नान।
स्वाध्याय, सत्संग ऐसे ही दिव्य प्रयोजन हैं, जिनसे मनुष्य में संयम और व्यवस्था आती है। मन दृढ़ बनकर दिव्यत्व की ओर बढ़ता है। आध्यात्मिक नियन्त्रण में रहने का अभ्यस्त बनता है।
स्वाध्याय से प्रेम नहीं, उसे गायत्री उपासना से प्रेम है यह नहीं माना जा सकता। बुद्धि की देवी गायत्री का सच्चा भोजन स्वाध्याय ही है। ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं। इसलिये गायत्री उपासना के साथ ज्ञान की उपासना भी अविच्छिन्न रूप में जुड़ी हुई है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-February
स्वाध्याय कीजिए, आत्मा को प्रिय और आत्मा के आदेश के अनुकूल कर्म का अभ्यास करते रहिये।
स्वाध्याय में बिताइए। गुरु या कोई सन्त महात्मा के सत्संग में रह कर साधना करिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-January
स्वाध्याय की आदत न डालकर अपने मन के विकास और परिपुष्टि का पूरा-पूरा अवसर न देना एक ऐसी गलती है जिसकी उम्र भर सजा पानी पड़ती है।
स्वाध्याय की आदत डालनी चाहिए।
स्वाध्याय मनुष्य को अपनी अपेक्षा समुन्नत और परिपक्व मनुष्यों के विचार देने का अमोघ उपाय है। उत्तम ग्रन्थों से ही कम नई योजनाएं, नई कल्पनाएं और उन्नति की नई दिशाएं पाते हैं। अतः जितनी जल्दी हो दैनिक स्वाध्याय की आदत डालनी चाहिए।
स्वाध्याय की आदत डालिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-June
स्वाध्याय और सत्संग का मूल उद्देश्य यही है।
स्वाध्याय और सत्संग की वास्तविकता एवं महत्ता को विस्मरण सा कर दिया गया है। जहाँ यह होते भी हैं वहाँ एक रूढ़िमात्र पूरी कर दी जाती है। अमुक देवता या अमुक अवतार के चरित्रों की पुस्तक को रोज-रोज पढ़ते रहना और पाठ मात्र से यह मान लेना कि यह कोई बहुत बड़ा पुण्य हो गया यही आज के स्वाध्याय का रूप है। सत्संग में ईश्वर जीव, प्रकृति सृष्टि-रचना, देवता और अवतारों की लीलाओं के ऊहापोह उन्हीं विषयों में बाल की खाल निकालते रहना ही सत्संग बन गया है। व्यक्ति का जीव कैसे ऊँचा उठे, कैसे वह सद्गुणों को धारण कर समाज के लिये अधिक उपयोगी बने इसकी समस्या पर स्वाध्याय और सत्संग में कोई ध्यान नहीं दिया जाता जबकि स्वाध्याय और सत्संग का मूल उद्देश्य यही है।
स्वाध्याय तथा प्रचार आदि होता रहा तब तक रसायन विद्या का भी अस्तित्व ठोस रूप से बना रहा। जिस प्रकार से आज लोग गायत्रीमन्त्र के महत्व से अनभिज्ञ होकर इसके अनेकानेक रहस्यमय अर्थों को केवल इस मन्त्र के नाममात्र से परिचित रह गये हैं, उसी प्रकार से वे रसायन विद्या को भूलकर केवल इसके नाम से परिचित रह गये हैं।
स्वाध्याय या आत्मवादियों, योगियों एवं विद्वानों के सत्संग द्वारा योग विद्या को भली प्रकार समझें। आजकल तो केवल आसन और प्राणायाम मात्र ही करना योग हो गया है। ये तो शरीर के स्वास्थ्य के लिए गौण योगिक साधन हैं, प्रधान तो मनोयोग और आत्मयोग हैं। योगशास्त्र के अध्ययन में पर्याप्त उत्साह, सद्गुरु की भक्ति और दीर्घकालीन अभ्यास-ये आवश्यकताएं योग साधना के लिए जरूरी हैं।
स्वाध्याय और सत्संग में कोई ध्यान नहीं दिया जाता जबकि स्वाध्याय और सत्संग का मूल उद्देश्य यही है।
स्वाध्याय का रूप है। सत्संग में ईश्वर जीव, प्रकृति सृष्टि-रचना, देवता और अवतारों की लीलाओं के ऊहापोह उन्हीं विषयों में बाल की खाल निकालते रहना ही सत्संग बन गया है। व्यक्ति का जीव कैसे ऊँचा उठे, कैसे वह सद्गुणों को धारण कर समाज के लिये अधिक उपयोगी बने इसकी समस्या पर स्वाध्याय और सत्संग में कोई ध्यान नहीं दिया जाता जबकि स्वाध्याय और सत्संग का मूल उद्देश्य यही है।
स्वाध्याय और स्वतन्त्र।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-March
स्वाध्याय, स्वधर्म-पालन, सरलता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, अनिंदा, दया, अलोभ, नम्रता, लज्जा, अचंचलता, गंभीरता, तेज, क्षमा, धैर्य, शौच, अद्रोह, मान की इच्छा न होना। इन विभूतियों से पूर्ण व्यक्ति को मानव कहते हैं। वह सतोगुण प्रधान होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-September
स्वाध्याय, पाठ, अमुक ग्रन्थों का पाठ करने की प्रक्रियाओं के पीछे भी यही लक्ष है।
स्वाध्याय एवं धर्म प्रचार नहीं करता उस दिन वह अपने कर्तव्य से पतित होकर प्रायश्चित्त का भागी बनता है। धर्म-ग्रन्थों का दान हिन्दू धर्म में सबसे बड़े दान की अपेक्षा हजार गुना अधिक माना गया है। इसका कारण धर्म भावनाओं की अभिवृद्धि के साधनों को महत्व देना ही है।
स्वाध्याय का-यह उपरोक्त व्यापक कार्यक्रम बड़ा ही उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
स्वाध्याय’ से सन्मार्ग की जानकारी होती है। सत्संग से स्वभाव और संस्कार बनते हैं। कथा सुनने से सद्भावनाएँ जागृत होती हैं। ‘तीर्थ यात्रा से भावाँकुर पुष्ट होते हैं। ‘कीर्तन’ से तन्मयता का अभ्यास होता है।
स्वाध्याय और सत्संग का—ब्रह्मभोज का-महत्व समझते हैं और इतने आवश्यक एवं महान कार्य के लिए दो पैसा या एक मुट्ठी अन्न प्रतिदिन का दान कर सकते हैं। दस व्यक्तियों के यहाँ जाकर उनसे महीने में दो बार एक-एक घण्टा धर्म-चर्चा करने के लिए बीस घण्टा खर्च कर सकते हैं।[1] प्रतिदिन पौन घण्टे के औसत के हिसाब से समय दान,[2]उन व्यक्तियों के घरों पर जाने का कष्ट सहने का श्रमदान [3]दो पैसा या एक मुट्ठी अन्न का धनदान, यह तीनों ही प्रकार के दान करते रहने से व्रतधारी सच्ची धर्म सेवा करते हुए अपना जीवन सफल बना सकता है। गायत्री उपासना के जप,ध्यान के साथ-साथ यह ब्रह्मभोज भी जिन साधकों के जीवन में चलता है वस्तुतः वो ही सच्चे साधक हैं, उन्हीं की साधना धन्य है, वो ही लोक-परलोक में सच्ची सुख-शान्ति की स्थापना करेंगे।
स्वाध्याय और सत्संग की सुविधा प्राप्त करने के पश्चात् वे स्वयं भी धर्म प्रचारक व्रतधारी उपाध्याय बन सकते हैं।
स्वाध्याय और सत्संग, लेखनी और वाणी ही हमारे प्रधान हथियार हो सकते हैं। असुरता को मार भगाने के लिए लेखनी का-स्वाध्याय का-यह उपरोक्त व्यापक कार्यक्रम बड़ा ही उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-October
स्वाध्याय और सत्संग यह दो कार्य विचार निर्माण के लिए आवश्यक हैं। युग निर्माण के लिए जनता को स्वाध्याय का सामान बड़े परिमाण में उपलब्ध करना पड़ेगा। यह कार्य हम लोग ज्ञान-मन्दिरों के माध्यम से बड़ी सरलता पूर्वक कर सकते हैं। देश में यदि एक लाख ज्ञान-मन्दिर स्थापित हो जायें तो उनके प्रकाश से सारी भारत भूमि आलोकित हो सकती है। अपनी अर्थ व्यवस्था के अनुसार वितरण के परिपत्र भी प्रसाद रूप में यह ज्ञान-मन्दिर हर महीने अपने क्षेत्र में बाँट सकते हैं।
स्वाध्याय के अतिरिक्त ब्रह्मदान और धर्मफेरी के कर्तव्य को भी पालन करने वाले वरिष्ठ सक्रिय धर्म सेवकों की अब एक विशेष श्रेणी बनाई जा रही है जो “उपाध्याय” के नाम से पुकारी जायगी। प्राचीन काल में धर्म शिक्षक लोग ही उपाध्याय कहलाते थे। “उपाध्याय” गोत्र इसी श्रेणी के लोगों का प्रतीक है। पर अब तो इस गोत्र वाले भी नाम मात्र के ही उपाध्याय हैं। धर्म प्रचार का कर्तव्य छोड़ बैठे।
स्वाध्याय के बाद सत्संग की प्रक्रिया भी चालू रखनी है। गायत्री परिवारों की शाखाएँ यथा सम्भव साप्ताहिक पाक्षिक या मासिक सत्संग चला रही हैं। अब इस ओर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। परस्पर मिल जुलकर वाणी द्वारा जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार विनिमय करे, यह समाज के उत्थान के लिए एक आवश्यक कार्य है। पर्व और त्यौहारों पर जन समूह को इकट्ठा करके उन्हें उन पर्व त्यौहारों में छिपे हुए संदेशों को समझाना एक अच्छा सत्संग हो सकता है।
स्वाध्याय की देश व्यापी वह व्यवस्था यह ज्ञान-मन्दिर आसानी से कर सकते हैं जिसकी युग निर्माण के लिए आज नितान्त आवश्यकता है।
स्वाध्याय और सत्संग के कार्यक्रमों के लिए यथाशक्ति कुछ न कुछ करते रहने का व्रत लिया जाय।
स्वाध्याय का चस्का लगाया जा रहा है। वे उपासना और स्वाध्याय के आवश्यक धर्म कर्तव्यों को न छोड़ने पायें इसके लिये विशिष्ट सदस्य बार-बार प्रेरणा देते रहते हैं। दूसरी श्रेणी में वरिष्ठ सक्रिय सदस्य हैं। उनको अपनी नियमित (1) उपासना तथा (2) स्वाध्याय करने के अतिरिक्त जन-सेवा के दो कार्य भी करने होते हैं 1-ब्रह्मदान 2-धर्मफेरी। उनके मस्तिष्क में यह विचार गहराई तक जमाये जाते हैं कि प्रत्येक सच्चे धर्म सेवक का यह एक आवश्यक कर्तव्य है कि भले ही स्वयं एक रोटी खा भूखा सो जावे पर एक मुट्ठी अन्न या एक दो पैसा रोज संसार में सद्ज्ञान फैलाने के लिये—ज्ञान यज्ञ के लिये—दान अवश्य करे।
स्वाध्याय के साथ-साथ सत्संगों की शृंखला को भी पूरी तत्परतापूर्वक चलाया जाय।
स्वाध्याय और सत्संग द्वारा हम जन जागृति की चण्डी का आह्वान करेंगे तो युग-निर्माण का स्वप्न आज नहीं तो कल पूरा होकर रहेगा।
स्वाध्याय करने के अतिरिक्त जन-सेवा के दो कार्य भी करने होते हैं 1-ब्रह्मदान 2-धर्मफेरी। उनके मस्तिष्क में यह विचार गहराई तक जमाये जाते हैं कि प्रत्येक सच्चे धर्म सेवक का यह एक आवश्यक कर्तव्य है कि भले ही स्वयं एक रोटी खा भूखा सो जावे पर एक मुट्ठी अन्न या एक दो पैसा रोज संसार में सद्ज्ञान फैलाने के लिये—ज्ञान यज्ञ के लिये—दान अवश्य करे। दूसरी बात जो इन वरिष्ठ श्रेणी की अन्तरात्मा में जमाई जाती है वह यह है कि जिस प्रकार नित्य कुछ न कुछ दान ब्रह्मदान के लिये करना आवश्यक है उसी प्रकार थोड़ा बहुत समय भी धर्म प्रचार में लगाया जाना चाहिये। घर बैठे बड़े-बड़े मनसूबे बाँधते रहने से, योजनाएं बनाते रहने से कुछ काम चलने वाला नहीं है। धर्म प्रचार के लिए परिश्रम की, प्रदक्षिणा की, धर्मफेरी की सच्ची तीर्थ यात्रा आवश्यक है।
स्वाध्याय का सामान बड़े परिमाण में उपलब्ध करना पड़ेगा। यह कार्य हम लोग ज्ञान-मन्दिरों के माध्यम से बड़ी सरलता पूर्वक कर सकते हैं। देश में यदि एक लाख ज्ञान-मन्दिर स्थापित हो जायें तो उनके प्रकाश से सारी भारत भूमि आलोकित हो सकती है। अपनी अर्थ व्यवस्था के अनुसार वितरण के परिपत्र भी प्रसाद रूप में यह ज्ञान-मन्दिर हर महीने अपने क्षेत्र में बाँट सकते हैं। विचारोत्तेजक परिपत्र भी बिना मूल्य बाँटने के लिए यह ज्ञान-मन्दिर अपने यहाँ यथा शक्ति मँगाया करेंगे और हजार, दो हजार व्यक्तियों तक उन्हें भी वे पहुँचाया करेंगे।
स्वाध्याय से ही कृतकृत्य हो जाता है, दूसरे कर्म वह करे या न करे। दया की प्रधानता होने के कारण वह सब जीवों का मित्र कहा जाता है।”
स्वाध्याय के आवश्यक धर्म कर्तव्यों को न छोड़ने पायें इसके लिये विशिष्ट सदस्य बार-बार प्रेरणा देते रहते हैं। दूसरी श्रेणी में वरिष्ठ सक्रिय सदस्य हैं। उनको अपनी नियमित (1) उपासना तथा (2) स्वाध्याय करने के अतिरिक्त जन-सेवा के दो कार्य भी करने होते हैं 1-ब्रह्मदान 2-धर्मफेरी। उनके मस्तिष्क में यह विचार गहराई तक जमाये जाते हैं कि प्रत्येक सच्चे धर्म सेवक का यह एक आवश्यक कर्तव्य है कि भले ही स्वयं एक रोटी खा भूखा सो जावे पर एक मुट्ठी अन्न या एक दो पैसा रोज संसार में सद्ज्ञान फैलाने के लिये—ज्ञान यज्ञ के लिये—दान अवश्य करे। दूसरी बात जो इन वरिष्ठ श्रेणी की अन्तरात्मा में जमाई जाती है वह यह है कि जिस प्रकार नित्य कुछ न कुछ दान ब्रह्मदान के लिये करना आवश्यक है उसी प्रकार थोड़ा बहुत समय भी धर्म प्रचार में लगाया जाना चाहिये।
स्वाध्याय का अभ्यास भी उनका प्रधान धर्म है, इसी से उनके सब कर्मों की पूर्ति हो जाती है। यदि अपने धर्म में स्थित, शान्त और ज्ञान-विज्ञान से तृप्त ब्राह्मण को किसी प्रकार के असत् कर्म का आश्रय लिये बिना ही धन प्राप्त हो जाय तो उसे दान या यज्ञ में लगा देना चाहिये। ब्राह्मण केवल स्वाध्याय से ही कृतकृत्य हो जाता है, दूसरे कर्म वह करे या न करे। दया की प्रधानता होने के कारण वह सब जीवों का मित्र कहा जाता है।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-April
स्वाध्याय की व्यवस्था अनिवार्य हैं। गायत्री सद्बुद्धि की देवी हैं। सद्बुद्धि का प्रधान मार्ग स्वाध्याय है। जप, ध्यान, पूजा, वन्दन के अतिरिक्त हर धर्म प्रेमी को नियमित रूप से स्वाध्याय भी करना चाहिये। बुद्धि की देवी केवल रोली, अक्षत, धूप, दीप से प्रसन्न नहीं हो सकती, उसे प्रसन्न करने के लिए स्वाध्याय आवश्यक है।
स्वाध्याय भी करना चाहिये। बुद्धि की देवी केवल रोली, अक्षत, धूप, दीप से प्रसन्न नहीं हो सकती, उसे प्रसन्न करने के लिए स्वाध्याय आवश्यक है। इसलिये प्रत्येक उपासना गृह के साथ सत्साहित्य की एक अलमारी या सन्दूक भी अवश्य रखनी चाहिए। स्वाध्याय के लिये विचारोत्तेजक एवं जीवन की, समाज की गुत्थियों पर प्रकाश डालने वाला साहित्य होना चाहिये। बुद्धि विकास के लिये यह व्यवस्था आवश्यक है।
स्वाध्याय के लिये विचारोत्तेजक एवं जीवन की, समाज की गुत्थियों पर प्रकाश डालने वाला साहित्य होना चाहिये। बुद्धि विकास के लिये यह व्यवस्था आवश्यक है। अमुक महापुरुष, अवतार या देवता के चरित्रों को रोज-रोज पढ़ते रहना ही आजकल स्वाध्याय माना जाता है, पर वस्तुतः सच्चा स्वाध्याय वही माना जायगा जो हमारी व्यक्तिगत एवं सामूहिक गुत्थियों के सुलझाने में सहायक हो सके। इस कसौटी पर खरी उतरने वाली चुनी हुई पुस्तकें ही इन ज्ञान मन्दिरों में रहें, जिनसे बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री, पुरुष सभी उन्नति एवं कठिनाई निवारण में व्यावहारिक सफलता प्राप्त कर सकें।
स्वाध्याय है। जप, ध्यान, पूजा, वन्दन के अतिरिक्त हर धर्म प्रेमी को नियमित रूप से स्वाध्याय भी करना चाहिये। बुद्धि की देवी केवल रोली, अक्षत, धूप, दीप से प्रसन्न नहीं हो सकती, उसे प्रसन्न करने के लिए स्वाध्याय आवश्यक है। इसलिये प्रत्येक उपासना गृह के साथ सत्साहित्य की एक अलमारी या सन्दूक भी अवश्य रखनी चाहिए। स्वाध्याय के लिये विचारोत्तेजक एवं जीवन की, समाज की गुत्थियों पर प्रकाश डालने वाला साहित्य होना चाहिये।
स्वाध्याय आवश्यक है। इसलिये प्रत्येक उपासना गृह के साथ सत्साहित्य की एक अलमारी या सन्दूक भी अवश्य रखनी चाहिए। स्वाध्याय के लिये विचारोत्तेजक एवं जीवन की, समाज की गुत्थियों पर प्रकाश डालने वाला साहित्य होना चाहिये। बुद्धि विकास के लिये यह व्यवस्था आवश्यक है। अमुक महापुरुष, अवतार या देवता के चरित्रों को रोज-रोज पढ़ते रहना ही आजकल स्वाध्याय माना जाता है, पर वस्तुतः सच्चा स्वाध्याय वही माना जायगा जो हमारी व्यक्तिगत एवं सामूहिक गुत्थियों के सुलझाने में सहायक हो सके।
स्वाध्याय आरम्भ कर दिया। इस प्रकार 5 दिन बीत गये, छठे दिन रविवार था, अतः मैंने उपवास रखकर हवन किया। रात को एक व्यक्ति ने मुझे एक पत्र दिया जिसमें लिखा था- “तुम्हारी नौकरी एटा में लग गई है, तुम सोमवार को आ जाओ।” बात सच निकली और मुझे नौकरी मिल गई। उसी दिन से मैं और मेरी पत्नी नियमित रूप से गायत्री की पूजा करते हैं, क्योंकि वे अपने पुत्र-पुत्रियों की करुणा पुकार अवश्य सुनती हैं।
स्वाध्याय माना जाता है, पर वस्तुतः सच्चा स्वाध्याय वही माना जायगा जो हमारी व्यक्तिगत एवं सामूहिक गुत्थियों के सुलझाने में सहायक हो सके। इस कसौटी पर खरी उतरने वाली चुनी हुई पुस्तकें ही इन ज्ञान मन्दिरों में रहें, जिनसे बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री, पुरुष सभी उन्नति एवं कठिनाई निवारण में व्यावहारिक सफलता प्राप्त कर सकें।
स्वाध्याय वही माना जायगा जो हमारी व्यक्तिगत एवं सामूहिक गुत्थियों के सुलझाने में सहायक हो सके। इस कसौटी पर खरी उतरने वाली चुनी हुई पुस्तकें ही इन ज्ञान मन्दिरों में रहें, जिनसे बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री, पुरुष सभी उन्नति एवं कठिनाई निवारण में व्यावहारिक सफलता प्राप्त कर सकें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-July
स्वाध्याय और सत्संग। स्वाध्याय से सत्प्रेरणा मिलती है और सत्संग से सद्भावना पुष्ट होती है। जब ये आचरण में उतरते हैं, तो परिवर्तन सामने आता है एक ऐसा परिवर्तन, जो यदि सतत् प्रवाहमान रहे, तो मानव को महामानव और समाज को स्वर्ग बना देता है।
स्वाध्याय और सत्संग की अच्छी बातें अप्रभावी सिर्फ इसलिए सिद्ध होती हैं कि वे अंतराल की गहराई में उतर कर उस विन्द को छू पाती, जो बदलाव उत्पन्न करती है। यदि इस संदर्भ में अध्येता और श्रोता गम्भीर बने रहें और पढ़े अथवा सुने हुए प्रसंग के प्रति इतनी संवेदन शीलता उत्पन्न कर सकें कि वे अन्दर चल कर सीधे मर्म में आघात करें, तो रूपाँतरण तत्क्षण घटित होना आरम्भ हो जायेगा, पर इन दिनों ऐसा यदा-कदा ही होता देखा जाता है अतः परिवर्तन भी कभी-कभी दृश्यमान होता है।
स्वाध्याय आवश्यक बना रहता है। इसके लिए पाठशालाओं की तरह ही सद्ज्ञान संवर्धक पुस्तकालयों की भी स्थापना होनी चाहिए। इस संदर्भ में जनसाधारण की अपेक्षा को देखते हुए ऐसा प्रबंध करना चाहिए कि हर शिक्षित को घर बैठे सत्साहित्य पढ़ने की निःशुल्क मिलता रहे और वे अपने से संबंधित निरक्षरों को भी पढ़ कर सुनाया करें। साक्षरता के उपराँत सद्ज्ञान संवर्धन का यही प्रमुख कार्य हो। यों स्वाध्याय, सत्संग के माध्यमों से भी व्यक्तित्व विकास का मार्ग प्रशस्त होता है, किन्तु सद्ज्ञान के बिना पूर्णता तक पहुँच सकना कठिन है।
स्वाध्याय और सत्संग की नियमित दिनचर्या दिखाई पड़ने पर भी उनकी वह परिणति समाने नहीं आती, जो आनी चाहिए।
स्वाध्याय और सान्निध्य परिवर्तन की अनुकूलता तो उपलब्ध कराते हैं, पर इतना ही पर्याप्त नहीं है।
स्वाध्याय से सत्प्रेरणा मिलती है और सत्संग से सद्भावना पुष्ट होती है। जब ये आचरण में उतरते हैं, तो परिवर्तन सामने आता है एक ऐसा परिवर्तन, जो यदि सतत् प्रवाहमान रहे, तो मानव को महामानव और समाज को स्वर्ग बना देता है।
स्वाध्याय, सत्संग के माध्यमों से भी व्यक्तित्व विकास का मार्ग प्रशस्त होता है, किन्तु सद्ज्ञान के बिना पूर्णता तक पहुँच सकना कठिन है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-September
स्वाध्याय और सत्संग की सामग्री संपर्क क्षेत्र में उपलब्ध कराते रहने के लिए कुछ राशि भी खर्च करते रहनी पड़ती है। यह न्यूनतम बीस पैसा नित्य की तो होनी ही चाहिए, ज्यादा निकाला जा से तो उससे कार्य विस्तार में और भी अधिक सुविधा होगी। इस संदर्भ में अपने इष्ट-मित्रों का भी सहयोग लिया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-May
स्वाध्याय, संयम और सेवा दैनिक जीवन में न्यूनतम मात्रा में भले ही हों, पर सम्मिलित अवश्य और अनिवार्य रूप से रहने चाहिए।
स्वाध्याय एवं ध्यान योग लययोग-नादयोग के रूप में योग त्रयी का दिनचर्या में समावेश अपने आप में एक साधना शैली बन गयी जिसे अब लाखों व्यक्ति जीवन में उतारते देखे जाते हैं।
स्वाध्याय को आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यधिक आवश्यक माना गया है। स्वाध्याय के बारे में ब्राह्मण ग्रंथों में कहा गया हैं जिस दिन विचारशील आदमी स्वाध्याय नहीं करता उस दिन उसकी संज्ञा चाँडाल जैसी हो जाती है। स्वाध्याय का महत्व भजन से किसी भी प्रकार से कम नहीं है। भजन का उद्देश्य भी यही है कि हमारे विचारों का परिष्कार हो और हम श्रेष्ठ व्यक्तित्व की ओर आगे-आगे बढ़ें। स्वाध्याय हमारे लिए आवश्यक है।
स्वाध्याय का साधना और भजन के बराबर ही मूल्य और महत्व समझा जाना चाहिए। तीसरी बात जो आत्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है, उसका नाम है संयम। संयम का अर्थ है- रोकथाम। अगर हम रोकथाम करें तो जो हमारी शक्तियों का घोर अपव्यय होता रहता है, उसको बचा सकते है। हम अपनी अधिकाँश शारीरिक और मानसिक शक्तियों को अपव्यय में नष्ट कर देते है, कुमार्ग पर नष्ट कर देते है।
स्वाध्याय को किस बुरी तरीके से खोखला करती है, यह सभी जानते है। इंद्रिय निग्रह का महत्व बताने की जरूरत नहीं है। शारीरिक दृष्टि से जिनको समर्थ बनाना हो, निरोग और दीर्घ- जीवी बनना हो उनको इंद्रियां निग्रह का महत्व समझना और अपने आपको संयम का अभ्यासी बनाना चाहिए। दूसरा संयम मनोनिग्रह है। मन में कितने सारे विचार उठते है, लेकिन वे असंगत, असंयमित, बुराइयों एवं मनोविकारों से भरे होते है इससे हमारा मस्तिष्क विकृत होता और बुरी आदतें पड़ती है।
स्वाध्याय, संयम और सेवा। ये चारों ऐसे हैं जिनमें से एक को भी आत्मोत्कर्ष के लिए छोड़ा नहीं जा सकता। इनमें से एक भी ऐसा नहीं है जिसके बिना हमारे जीवन का उत्थान हो सके। चारों में आपस में अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं, जिस तरीके से कई तरह की चौकड़ियाँ आपस में जुड़ी हुई हैं-मसलन बीज एक, जमीन-दो, खाद-तीन, पानी-चार। चारों जब तक नहीं मिलेंगे कृषि नहीं हो सकती।
स्वाध्याय, सत्संग, वातावरण एवं सहयोग तलाशना पड़ता है। इस घेरा बंदी से ही किसी उच्चस्तरीय दिशा धारा को दृढ़ता पूर्वक अपनाने का मन बनाता है। संकल्प उभरता है। मार्ग बनता है और उस पर दृढ़ता पूर्वक चल पड़ना संभव होता है। अन्यथा मन की चंचलता ही प्रधान बन कर रह जाती है।
स्वाध्याय।
स्वाध्याय नहीं करता उस दिन उसकी संज्ञा चाँडाल जैसी हो जाती है। स्वाध्याय का महत्व भजन से किसी भी प्रकार से कम नहीं है। भजन का उद्देश्य भी यही है कि हमारे विचारों का परिष्कार हो और हम श्रेष्ठ व्यक्तित्व की ओर आगे-आगे बढ़ें। स्वाध्याय हमारे लिए आवश्यक है। स्वाध्याय से हम महापुरुषों को अपना मित्र बना सकते हैं और जब भी जरूरत पड़ती है तब उनसे खुले मन से खुले दिल से बातचीत कर सकते है।
स्वाध्याय से पूरी होती है। इसलिए स्वाध्याय का साधना और भजन के बराबर ही मूल्य और महत्व समझा जाना चाहिए। तीसरी बात जो आत्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है, उसका नाम है संयम। संयम का अर्थ है- रोकथाम। अगर हम रोकथाम करें तो जो हमारी शक्तियों का घोर अपव्यय होता रहता है, उसको बचा सकते है।
स्वाध्याय के बारे में ब्राह्मण ग्रंथों में कहा गया हैं जिस दिन विचारशील आदमी स्वाध्याय नहीं करता उस दिन उसकी संज्ञा चाँडाल जैसी हो जाती है। स्वाध्याय का महत्व भजन से किसी भी प्रकार से कम नहीं है। भजन का उद्देश्य भी यही है कि हमारे विचारों का परिष्कार हो और हम श्रेष्ठ व्यक्तित्व की ओर आगे-आगे बढ़ें। स्वाध्याय हमारे लिए आवश्यक है। स्वाध्याय से हम महापुरुषों को अपना मित्र बना सकते हैं और जब भी जरूरत पड़ती है तब उनसे खुले मन से खुले दिल से बातचीत कर सकते है।
स्वाध्याय का महत्व भजन से किसी भी प्रकार से कम नहीं है। भजन का उद्देश्य भी यही है कि हमारे विचारों का परिष्कार हो और हम श्रेष्ठ व्यक्तित्व की ओर आगे-आगे बढ़ें। स्वाध्याय हमारे लिए आवश्यक है। स्वाध्याय से हम महापुरुषों को अपना मित्र बना सकते हैं और जब भी जरूरत पड़ती है तब उनसे खुले मन से खुले दिल से बातचीत कर सकते है। जिस तरीके से शरीर को स्वच्छ रखने के लिए स्नान करना आवश्यक है।
स्वाध्याय तथा आराधना में सारे समाज का अपने को एक अंग मानते हुए समाज सेवा के निमित्त समय व अंशदान नियमित रूप से देते रहने का विधान जो उनने बनाया, वह प्रज्ञापरिजनों के लिए योगत्रयी बनाया। यह त्रिवेणी जिसमें करोड़ों व्यक्ति स्नान कर अपने आप को महाकाल की धारा के साथ जोड़ चुके हैं, आज अपने सरल-सुगम रूप में योग साधना में प्रवेश का, मानव मात्र को कुँडलिनी के जागरण का एक द्वारा हो नहीं खोलती है वरन् जन जन की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है। यही वह विशेषता है जिससे गायत्री परिवार अपने अधिष्ठाता के मार्गदर्शन में साधना प्रणाली को जन-जन तक पहुँचा सका है। दीपयज्ञों, संस्कारों के द्वारा अब हर व्यक्ति अध्यात्म को उल्लासमय महोत्सव बनाकर अपने जीवन से झरता देख सकता है। युगसाधना का कायाकल्प कर प्रत्येक के लिए मुक्ति का पथ प्रशस्त करने वाले उस युगऋषि को महाकाल की सत्ता को बारंबार प्रणाम है।
स्वाध्याय के सतत् अभ्यास और उसके अनुसार कार्यक्षेत्र में उतरने पर सफल और स्निग्ध जीवन की सुवास मिलने लगती हैं।
स्वाध्याय जैसे प्रयोजनों में तत्परता और तन्मयता के साथ लंबे समय तक लगे रहते थे। न किसी को व्यस्तता थी और न अभावग्रस्तता, चिंता, आशंका की कठिनाई। वह समय अनेकानेक साधनाएँ देर तक करते रहने के लिए उपयुक्त रहा होगा। पर अब तो परिस्थितियाँ भिन्न हैं। आत्मपरिष्कार के आधार भी आवश्यक हो गये हैं जो पहले हस्तगत रहते थे।
स्वाध्याय से हमको प्रेरणा मिलती है-दिशायें मिलती है, मार्गदर्शन मिलता है, श्रेष्ठ पुरुष हमारे सान्निध्य में आते है, और हमको अपने मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करते है, मार्गदर्शन करते है। ये सारी की सारी आवश्यकतायें स्वाध्याय से पूरी होती है। इसलिए स्वाध्याय का साधना और भजन के बराबर ही मूल्य और महत्व समझा जाना चाहिए। तीसरी बात जो आत्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है, उसका नाम है संयम। संयम का अर्थ है- रोकथाम।
स्वाध्याय से हम महापुरुषों को अपना मित्र बना सकते हैं और जब भी जरूरत पड़ती है तब उनसे खुले मन से खुले दिल से बातचीत कर सकते है। जिस तरीके से शरीर को स्वच्छ रखने के लिए स्नान करना आवश्यक है। कपड़े धोना आवश्यक है, उसी प्रकार से स्वाध्याय के द्वारा , श्रेष्ठ विचारों के द्वारा अपने मन के ऊपर जमने वाले कषाय - कल्मषों को मलिनता को धोना आवश्यक है। स्वाध्याय से हमको प्रेरणा मिलती है-दिशायें मिलती है, मार्गदर्शन मिलता है, श्रेष्ठ पुरुष हमारे सान्निध्य में आते है, और हमको अपने मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करते है, मार्गदर्शन करते है। ये सारी की सारी आवश्यकतायें स्वाध्याय से पूरी होती है।
स्वाध्याय के द्वारा , श्रेष्ठ विचारों के द्वारा अपने मन के ऊपर जमने वाले कषाय - कल्मषों को मलिनता को धोना आवश्यक है। स्वाध्याय से हमको प्रेरणा मिलती है-दिशायें मिलती है, मार्गदर्शन मिलता है, श्रेष्ठ पुरुष हमारे सान्निध्य में आते है, और हमको अपने मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करते है, मार्गदर्शन करते है। ये सारी की सारी आवश्यकतायें स्वाध्याय से पूरी होती है। इसलिए स्वाध्याय का साधना और भजन के बराबर ही मूल्य और महत्व समझा जाना चाहिए। तीसरी बात जो आत्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है, उसका नाम है संयम।
स्वाध्याय अति आवश्यक है। दृष्टिकोण और विचार प्रायः वहीं जमे रहते हैं हमारे मस्तिष्क में जो कि बहुत दिनों से पारिवारिक और अपने मित्रों के सान्निध्य में हमने सीखे और जाने। अब हमको श्रेष्ठ विचार अपने भीतर धारण करने के लिए श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग करना चाहिए। चारों ओर हम जिस वातावरण से घिरे हुए हैं, वह हमको नीचे की ओर गिराता है। पानी का स्वभाव नीचे गिरने की तरफ होता है।
स्वाध्याय। मन की मलिनता को धोने के लिए स्वाध्याय अति आवश्यक है। दृष्टिकोण और विचार प्रायः वहीं जमे रहते हैं हमारे मस्तिष्क में जो कि बहुत दिनों से पारिवारिक और अपने मित्रों के सान्निध्य में हमने सीखे और जाने। अब हमको श्रेष्ठ विचार अपने भीतर धारण करने के लिए श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग करना चाहिए। चारों ओर हम जिस वातावरण से घिरे हुए हैं, वह हमको नीचे की ओर गिराता है।
स्वाध्याय हमारे लिए आवश्यक है। स्वाध्याय से हम महापुरुषों को अपना मित्र बना सकते हैं और जब भी जरूरत पड़ती है तब उनसे खुले मन से खुले दिल से बातचीत कर सकते है। जिस तरीके से शरीर को स्वच्छ रखने के लिए स्नान करना आवश्यक है। कपड़े धोना आवश्यक है, उसी प्रकार से स्वाध्याय के द्वारा , श्रेष्ठ विचारों के द्वारा अपने मन के ऊपर जमने वाले कषाय - कल्मषों को मलिनता को धोना आवश्यक है। स्वाध्याय से हमको प्रेरणा मिलती है-दिशायें मिलती है, मार्गदर्शन मिलता है, श्रेष्ठ पुरुष हमारे सान्निध्य में आते है, और हमको अपने मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करते है, मार्गदर्शन करते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-March
स्वाध्याय मंडल कहा है उनमें से हर एक आदमी जो हमारा प्रज्ञा पुरुष है जो हमसे घनिष्ठ है, हम चाहते हैं कि वह सौ नये गाँवों में हमको बिठा दे। हजारों गाँवों में हमको बिठा दे। हजारों गाँव ऐसे हैं हिन्दुस्तान के जो अभी हमने देखे नहीं। शहरों में हम गये है, कस्बों में गये है, पर गाँवों में तो गये नहीं। इस बार गाँवों में जाने का हमारा मन है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-April
स्वाध्याय-सत्संग, चिंतन-मनन जैसे उपाय अपनाने पड़ते हैं। जीवन का दूसरा पक्ष है चरित्र। इसे क्रिया कृत्य या कर्मकाँड भी कहते हैं। दुष्प्रवृत्ति का निरोध और सत्प्रवृत्तियों का अभ्यास ही वह अन्तःक्षेत्र का साहस भरा पराक्रम है, जिसे तप कहा जाता है। तप अर्थात् संयम अनुशासन।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-November
स्वाध्याय करने के लिए मजबूर किया है हमारे विचारो को आप पढ़िये और हमारी आग की चिनगारी को जो प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत युग साहित्य के रूप में लिखना शुरू किया है उसे लोगों में फैला दीजिए जीवन की वास्तविकता के सिद्धाँत को समझिये ख्वाबी दुनिया में से निकलिए और आदान प्रदान की दुनिया में आइये। आपके नजदीक जितने भी आदमी है उनमें आप हमारे विचार फैला दीजिए। यह काम आप अपने काम करते हुए भी कर सकते हैं आप युग साहित्य लेकर अपने सर्किल में पढ़ाना अपने पड़ोसियों को पढ़ाना शुरू कर दीजिए। उनको हमारे विचार दीजिए हमको आगे बढ़ने दीजिए संपर्क बनाने दीजिए और हमारी सहायता कर दीजिए ताकि हम उन विचारशीलों के पास शिक्षितों के पास जाने में समर्थ हो सके। इससे कम में हमारा काम चलने वाला नहीं है और न ही हमें संतोष होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-December
स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन आदि का आश्रय लेना पड़ता है। अच्छे वातावरण और संपर्क के साथ जुड़ना हो तो दुष्प्रवृत्तियां खर पतवार की तरह हर खेत में उगी रहती हैं थ्ब्न्ज्ञ प्ज्ञन्भ् क् भी हरियाली है। जलकुँभी की तरह उन्हें कभी भी जलाशय में छा जाने में देर नहीं लगती। व्यक्तियों का समुदाय अवाँछनीय प्रवृत्तियों से भरा पड़ा है। कुकृत्यों का सर्वत्र प्रचलन है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-October
स्वाध्याय यदि विचारपूर्वक अपनी स्थिति के साथ तालमेल बिठाते हुए किया जाय तो उसका परिणाम विवेकशीलों की जागृति में सहायक सिद्ध हो सकता है। यही है वह परिष्कृत विचारशैली जिसे मेधा कहते हैं। इसके प्रकाश में अपना मार्ग खोजने में सहायता मिल सकती है।
स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन का आश्रय लेकर आमतौर से लोग सुधरते और आगे बढ़ते हैं। इसलिए सर्वमान्य, सर्वसुलभ विधि व्यवस्था यही है। इतने पर भी यह नहीं समझना चाहिए कि बात समाप्त हो गई। अभी उन रहस्यों को समझना शेष है, जो अंतराल की किन्हीं गहरी पर्तों में छिपे बैठे रहते हैं और जब ज्वालामुखी की तरह फूटते हैं तो स्वाध्याय, सत्संग जैसे अवलंबनों से जो हाथ लगा था, उसे लावे की तरह उछालकर दूर फेंक देते हैं यही समझ में आ जाय तो भटकाव की विडंबना से मानव बच जाय। जीवन साधना यही है कि सतत् अपने को श्रेष्ठ विचारों में लीन रखा जाय, पतनोन्मुखी विचार प्रवाह से स्वयं को बहने से रोका जाय तथा विभिन्न व्यावहारिक अध्यात्म के उपचारों से आत्मोत्थान के प्रयास किये जाते रहें।
स्वाध्याय मंडलों-शक्ति पीठों की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप विभिन्न भागों में बाँट कर 15/11/94 से 28/2/95 तक 5-5 दिन के सत्र शाँतिकुँज में संपन्न होंगे। उन दिनों आश्वमेधिक व्यवस्थाओं में व्यस्तता के कारण उन्हें फिलहाल स्थगित किया जा रहा है। आगामी तिथियों की सूचना हम इस पत्रिका व विशेषाँक के माध्यम से देंगे।
स्वाध्याय, सत्संग एवं चिंतन मनन का अभाव भी माना जाता है। यह सही भी है। सर्वविदित प्रतिपादनों में इनका भी कम महत्व नहीं है। हम जो पढ़ते, सुनते, देखते हैं उसी आधार पर मानसिक स्तर का निर्माण होता है। चूँकि शिक्षितों द्वारा सुने गये तत्वदर्शन से लेकर कथा प्रसंगों तक सब कुछ ऐसा होता है, जो विवेक जगाता नहीं वरन् उसे और भी अधिक कुँठित करता है, अंधविश्वासों, मूढ़ मान्यताओं भाग्यवादी परावलंबन शैली का समर्थन करता है अतः चिंतन भी वैसा ही बनता चला जाता है।
स्वाध्याय मंडलों के निर्माण व संगठन को सुव्यवस्थित बनाने का निर्देश किया। देखते-देखते भव्य निर्माण होते चले गए व दो वर्ष तक पूज्यवर स्वयं प्रवास पर गए एवं अनेकों शक्तिपीठों में प्राण प्रतिष्ठा अपने हाथों संपन्न की।
स्वाध्याय, सत्संग बाहरी माध्यमों उपकरणों, व्यक्तियों द्वारा उपलब्ध किए जाते हैं। साथ ही दो अवलंबन ऐसे भी हैं जिन्हें भीतरी क्षेत्र में ही खोजा और सींचा जाता है वे हैं चिंतन और मनन। अपने दोष, गुणों को सूक्ष्म दृष्टि में देखना-परखना अपनी मान्यताओं, आकाँक्षाओं, अभिरुचियों को आदर्शवाद की कसौटी पर कसना यही है चिंतन। इसे रोग का निदान कह सकते हैं। निदान के उपराँत ही चिकित्सा बन पड़ती है।
स्वाध्याय वह है जो अपनी निम्न की तथा संबंधित परिवार की समस्याओँ के हर पहलू पर प्रकाश डाले और पाठक को, श्रोता को सही निर्णय तक पहुँचने में सहायता करे। ऐसी पुस्तकें सर्वथा उपलब्ध न हों ऐसी बात तो नहीं है पर उनकी कमी अवश्य है। उन्हें जहाँ-तहाँ से ढूंढ़कर उपलब्ध भी करना पड़ता है। ऐसा नियमित स्वाध्याय यदि विचारपूर्वक अपनी स्थिति के साथ तालमेल बिठाते हुए किया जाय तो उसका परिणाम विवेकशीलों की जागृति में सहायक सिद्ध हो सकता है। यही है वह परिष्कृत विचारशैली जिसे मेधा कहते हैं।
स्वाध्याय, सत्संग जैसे अवलंबनों से जो हाथ लगा था, उसे लावे की तरह उछालकर दूर फेंक देते हैं यही समझ में आ जाय तो भटकाव की विडंबना से मानव बच जाय। जीवन साधना यही है कि सतत् अपने को श्रेष्ठ विचारों में लीन रखा जाय, पतनोन्मुखी विचार प्रवाह से स्वयं को बहने से रोका जाय तथा विभिन्न व्यावहारिक अध्यात्म के उपचारों से आत्मोत्थान के प्रयास किये जाते रहें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-January
स्वाध्याया मा प्रमदितव्यम्। चारों पाँडवों ने तो वे सारे के सारे पाठ याद कर लिये, लेकिन सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर वह पाठ याद न कर सके। उन्होंने कहा-गुरुदेव! पाठ थोड़ा जटिल है। ‘सत्यंवद’ कहिए तो मैं सुना देता हूँ, लेकिन अध्यात्म में कोई ज्ञान ऐसा नहीं है जो केवल जबान की नोक से कहा जाय और जो परिणाम उसके बताये गये हैं उन्हें पूरा करने में समर्थ हो सके। जीभ का नहीं यह अध्यात्म का विषय है।
स्वाध्याया मा प्रमदितव्यम्।” यह ऋचाएँ अक्षर ज्ञान से भी पहले याद करायी जाती हैं जिससे आदमी को मालूम पड़ जाये कि विद्या का उद्देश्य क्या है? ज्ञान का उद्देश्य क्या है? उद्देश्य पहले बताया जाता है और उसका प्रयोग पीछे पढ़ाया जाता है। क, ख, ग पीछे पढ़ाया जाता है, पहले यह बताया जाता है कि यह किस काम के लिए है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-September
स्वाध्याय का, शंका समाधान का, प्रवचन का, विचार विमर्श का, प्रचार का, क्रम जो जिस प्रकार चला सके उसे उसी प्रकार चलाना चाहिये शरीर से, बुद्धि से, पैसे से पूर्ण रूपेण यह प्रयत्न करना चाहिए, कि निकटस्थ लोगों का मानसिक विकास बढ़े, आत्मिक प्रकाश फैले, जिससे सन्मार्ग की ओर सब की प्रवृत्ति हो। सतयुगी विचारों की स्थिरता से ही सतयुगी कार्यों की वृत्ति होती है, आज वैदिक उलट-पलट की आवश्यकता है, सद्भाव और सद् विचारों के प्रचार की आवश्यकता है, जिससे आगामी श्रेष्ठ समय को शीघ्र और सुन्दरता पूर्वक निकट लाया जा सके। अखण्ड ज्योति ईश्वर के इसी आदेश को पालन करने में प्राण-प्रण से लगी हुई है। पाठकों को भी कंधे से कन्धा मिलाकर, उसी मार्ग पर चलकर, प्रभु की इच्छा पूर्ण होने में सहायक बनकर, अपना जीवन सफल बनाना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-April
स्वाध्याय सत्संग के बिना बढ़ता है को दूर करके भगवान की कृपा को प्राप्त करो। यही एक सरल मार्ग है।
स्वाध्याय द्वारा निष्कपट, सरल स्वभाव से अपने अन्तःकरण को पवित्र बनाओ अनेक जन्मों की परम्परा से जो बुरी वासनायें दृढ़ हो गई हैं उनको दूर करो, स्वार्थ को छोड़कर सच्ची प्रभु भक्ति साधारणतया, प्राणी मात्र की सेवा और विशेषतया मनुष्य मात्र की सेवा करो। इस प्रकार जो मल बुरे खोटे कर्मों के करने से बढ़ता है, विक्षेप जो पुरुषार्थ न करके केवल इच्छा करते रहने से मन को चंचल बनाता है और आवरण जो स्वाध्याय सत्संग के बिना बढ़ता है को दूर करके भगवान की कृपा को प्राप्त करो। यही एक सरल मार्ग है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-October
स्वाध्याय, संतोष और तप को भी अपना एक मात्र लक्ष्य रखना है, इसी लक्ष्य के सहारे हम अपने अन्तिम लक्ष्य और ईश्वर के आत्मस्वरूप गुणों को प्राप्त करने की क्षमता उत्पन्न कर सकेंगे।
स्वाध्याय बढ़ेगा, हमारी आत्मा संतोष व्रतधारी बनेगी और जब संतोष का पूर्ण रूपेण समावेश हो चुकेगा तो हमारा तप पवित्र मानव का स्वरूप लोकोपकारी वृत्तियों को जीवन देकर हमें हमारे एक मात्र लक्ष्य की पूर्ति में सहायक होगा। बस यही रूप मानव जाति का विश्व शान्तिदायक पवित्र जीवन है।
स्वाध्याय, परमार्थ, परोपकार जैसे अमूल्य तथ्यों की अवहेलना करें और पागल की तरह पैसे की रट लगाते रहें। अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखिए, निर्वाह और उन्नति के मार्ग पर चलते हुए जितने के बिना काम नहीं चल सकता उतना ही संचय कीजिए। जिन्दगी भर के लिए आज ही जमा कर लेने की योजना मत बनाइए। ईश्वर के राज्य में ऐसी समुचित व्यवस्था है कि आपको यथा समय सब कुछ मिलता रहेगा। प्रभु पर विश्वास कीजिए और सीमित मात्रा में संग्रह कीजिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-March
स्वाध्याय बहुत करता है, परन्तु उस पर आचरण नहीं करता तो वह एक ऐसे ग्वाले की तरह है जिसका काम केवल दूसरे की गौएं गिनना है (उसके दूध में उसका कोई भाग नहीं)।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-November
स्वाध्याय, तप, संयम, सत्संग आदि के द्वारा आत्मोन्नति करने से ऋषि ऋण चुकाया जाता है। ऋषियों ने जीवन भर तपश्चर्या करके लोक कल्याण के लिए जो आत्मोन्नति का पथ निर्धारित किया है उसको अपनाकर हमें ऋषियों का उद्देश्य सफल बनाना चाहिए। ऋषि तत्व का विस्तार करना चाहिए। अपने और दूसरों के अन्दर अधिकाधिक मात्रा में ऋषित्व की अभिवृद्धि करनी चाहिए। यह ऋषि ऋण से उऋण होने का मार्ग है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-May
स्वाध्याय सत्संग, प्रवचन आदि का आनन्द अपने ढंग का अनूठा है। सच्चे मित्रों की मैत्री, दंपत्ति का हार्दिक एकीकरण, परिजनों की सद्भावनाएं भूतल के स्वर्ग सुख हैं। हृदय की पवित्रता, निष्कपटता, सेवाभाव, धर्म, साहस, सद्-विवेक, प्रसन्नता, सत्यनिष्ठा, त्याग, तप, मधुर भाषण, उदारता, सद्भावना आदि दैवी सम्पतियों के कारण जो आत्म शान्ति, प्रतिष्ठा, कीर्ति एवं श्रद्धा प्राप्ति होती है उसका सुख अपने ढंग का अनोखा है। समान श्रेणी के मित्रों के सहचर्या में कार्य करते हुये समय बिताते हुए जो आनन्द मिलता है उसकी मिठास भी बड़ी ही स्वादिष्ट होती है। किसी का उपकार करने के पश्चात, प्रलोभन और भयों पर विजय प्राप्त करके अपने कठोर कर्त्तव्य पालन करने के पश्चात, जो आनन्द आता है जो सन्तोष होता है उसका महत्व वे ही लोग समझ सकते हैं जिन्हें उस दिव्य रस का आस्वादन करने का अवसर तथा अनुभव प्राप्त हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-December
स्वाध्याय के लिए पुस्तकें, सत्संग के लिए जाने को मार्गव्यय, देवता पर चढ़ाने के लिए भोग, गुरु को देने के लिए दक्षिणा यह सब भी तो अर्थ साध्य ही हैं। कथा, कीर्तन, व्रत तीर्थ, दान, यज्ञ अनुष्ठान, ब्रह्मभोज, सभी के लिए तो धन चाहिए। उचित अवसर पर जब उत्तम कार्य करने के लिये पास में पैसा नहीं होता तो परमार्थ की वृत्तियाँ संकुचित होकर मुरझा जाती है। परमार्थ के पथ पर पैर बढ़ाने योग्य साहस स्थिर नहीं रह पाता। इन सब बातों पर विचार करते हुए नीतिकार ने मनुष्य को सलाह दी है कि वह विकास की प्रवृत्ति आरम्भ करते हुए धन उपार्जन की दिशा से आँखें न मूँद ले।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-December
स्वाध्याय, सत्संग में गुरुजनों का अनुग्रह चाहिए अदृश्य लोक की देव शक्तियाँ भी उस उत्थान में अपना भावभरा सहयोग प्रस्तुत करती हैं। ब्रह्म चेतना की अनुकूलता एवं अनुकम्पा आवश्यक होती है। वह ऊपर से बरसती है या भीतर से उछलती है यह प्रश्न उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि यह निर्धारण कि ऊँचा उठने के लिए कोई न कोई सहारा चाहिए भले ही वह नीचे से उचक्का कर दिया गया हो या ऊपर से खींचकर। साधना से सिद्धि प्राप्त करने में जो जिन विभूतियों का सहयोग मिलता है वे निश्चय ही सामान्य स्तर की होती हैं।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन-चिन्तन के माध्यम से चिन्तन प्रक्रिया एवं भाव संवेदना के क्षेत्र में निकृष्टता के निराकरण एवं उत्कृष्टता के संस्थापन, अभिवर्धन की प्रक्रिया सहज गति से चलती रहती है। इस आधार पर बनायी गयी स्वनिर्मित चेतना को प्रभावित करने वाला विचार वातावरण उत्कृष्टता संवर्धन में ऐसा चमत्कार दिखता है मानो वह किसी अन्य लोक से, समर्थ देवता या सिद्ध पुरुष द्वारा वरदान की तरह दिया गया है।
स्वाध्याय (2) सत्संग (3) चिन्तन (4) मनन। यह चारों ही उद्देश्यपूर्ण एवं सुनियोजित होने चाहिए। अपने चिन्तन ने जिस स्तर की निकृष्टताएँ दृष्टिगोचर हों उसके लिए उसी स्तर का प्रतिपक्ष ढूँढ़ा जाना चाहिए और अनौचित्य की टक्कर में औचित्य का पक्ष मजबूत बनाकर खड़ा कर देना चाहिए। लोहे को लोहे से काटा जाता है। काँटे से काँटा निकलता है।
स्वाध्याय सत्संग में हजारों बार पढ़ा सुना गया होता है फिर ‘न जानने’ जैसी क्या बात रह गई जिसके लिए ‘आत्म-बोध’ की बात को इस तरह सिर पर उठाया जाय और उसमें सफल होने पर सामान्य से असामान्य बन जाने का माहात्म्य सुनाया जाता रहे?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-November
स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन मनन जैसे कई व्रत नियम हैं। भविष्य निर्धारण के लिये परामर्श- पिछली भूलों में खोदी गई खाई को पाटने वाली क्षति पूर्ति- का भी इसी साधना क्रम में अविच्छिन्न समावेश है। इन अभ्यासों को योग साधना की संज्ञा दी गई है और मन क्षेत्र के परिष्कार, परिवर्तन, उन्नयन का लाभ दे सकने वाली व्यवस्था की गई है।
स्वाध्याय सत्संग का सुयोग आदि ऐसी विदित अविदित विशेषतायें हैं जिन्हें देखते हुए चान्द्रायण जैसी तपश्चर्या के लिए इससे उत्तम स्थान अन्यत्र खोजा जा सकना कठिन है। उपयुक्त वातावरण में ही उच्चस्तरीय साधनायें सफल होती हैं। इस रहस्य को जितनी जल्दी समझा जा सके उत्तम है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-April
स्वाध्याय मण्डली गठित कर सकने में जो सफल हो गये, समझना चाहिए उनने पहला मोर्चा फतह कर लिया। इस मंडली को भावात्मक नव-निर्माण की आत्म-कल्याण एवं लोक-कल्याण की गति विधियाँ अपनाने का अवसर मिलेगा। साथ ही वे अपने संपर्क क्षेत्र में युग आलोक को सुविस्तृत करने में भी योगदान देने लगेंगे।
स्वाध्याय, सत्संग आदि साधनों का आश्रय लिया जाता है ताकि चेतना को दिशा एवं प्रेरणा दी जा सके और उसे अपनी जीव ससीमता को ब्रह्म असीमता में घुला देने के लिए आवश्यक प्रकाश एवं प्रशिक्षण मिल सके।
स्वाध्याय मण्डली चलाई जा सकती है। नव प्रकाशित ‘प्रज्ञा अभियान’ मासिक ‘युग-निर्माण योजना’ मथुरा के तत्वावधान में इसी वर्ष से प्रकाशित होना आरम्भ हुआ है। उसका वार्षिक मूल्य लागत से भी कहीं कम छः रुपया मात्र रखा गया है। दस पैसा नित्य ज्ञानघट में जमा करने युग निर्माण सदस्यता शर्त जो अपनाये हुए हैं, वे इस राशि को एक वर्ष का पेशगी 36 रुपये भेज कर छः प्रतियाँ मंगाने और उन्हें अपने संपर्क क्षेत्र में 14 को पढ़ाते रहने का क्रम अत्यन्त सरलतापूर्वक कर सकते हैं। यह स्वाध्याय मण्डली गठित कर सकने में जो सफल हो गये, समझना चाहिए उनने पहला मोर्चा फतह कर लिया।
स्वाध्याय मंडली का गठन न हो सके। यह कथन समय से पहले की बात होगी कि जब यह ढर्रा चल पड़ेगा तो उसी प्रज्ञा परिवार में से ऐसे व्यक्तित्व उभरेंगे जिनके कर्तृत्व पर पर सर्वत्र गर्व गौरव व्यक्त किया जाता दृष्टिगोचर हो सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-February
स्वाध्याय में लगे रहो का निर्देश दिया।
स्वाध्याय। इसीलिए शास्त्रकारों ने ‘स्वाध्याय या प्रमदतिव्यय’ तथा ‘अहरह स्वाध्याय में ध्येतव्य’ अर्थात् स्वाध्याय में प्रमाद न करो और दिन रात स्वाध्याय में लगे रहो का निर्देश दिया।
स्वाध्याय या प्रमदतिव्यय’ तथा ‘अहरह स्वाध्याय में ध्येतव्य’ अर्थात् स्वाध्याय में प्रमाद न करो और दिन रात स्वाध्याय में लगे रहो का निर्देश दिया।
स्वाध्याय में ध्येतव्य’ अर्थात् स्वाध्याय में प्रमाद न करो और दिन रात स्वाध्याय में लगे रहो का निर्देश दिया।
स्वाध्याय से तात्पर्य विचारपूर्ण साहित्य के नित्य अध्ययन से है। हमें ऐसा साहित्य निरन्तर पढ़ते रहना चाहिए जिससे अपनी विचार और विवेक शक्ति जागृत हो। जिन लोगों को पढ़ने की बिल्कुल भी आदत नहीं है उन्हें भी पुस्तकों का महत्व समझकर उनके अध्ययन, मनन, चिन्तन का क्रम आरम्भ करना चाहिए।
स्वाध्याय में प्रमाद न करो और दिन रात स्वाध्याय में लगे रहो का निर्देश दिया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-March
स्वाध्याय, संयम, सेवा के प्रतिफल ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के के रूप में परिणित होते हैं। यह योगाभ्यास एवं तप साधन का ही एक छोटा रूप है जिसे हर शिक्षार्थी के लिए एक प्रकार से अनिवार्य ही कर दिया गया है।
स्वाध्याय साधन पहुँचाया जाता रहेगा।
स्वाध्याय के लिए उसे बिना मूल्य घर बैठे-नित्य रूप से पहुँचाने की योजना बनी है। इसे ‘प्रज्ञा पुत्रों’ द्वारा तत्काल चालू किया जा रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-June
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन और मनन यह चार अवलम्बन ब्रह्म विद्या को हृदयंगम कराते हैं। उपनिषदों का यही विषय है।
स्वाध्याय के फलस्वरूप कुछ ही समय में दृष्टिगोचर होने लगेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-July
स्वाध्याय सत्संग एवं उच्चस्तरीय परामर्श के सहारे वर्तमान को समुन्नत बनाना संभव हो सके।
स्वाध्याय, संयम और सेवा की चतुर्विध तीर्थ सेवन के रूप में उपलब्ध की जानी है। उसकी विस्तृत चर्चा तो अगले अंक में पढ़ी जा सकेगी। पर संक्षेप में इतना जाना जा सकता है कि एक महीने का सत्र तीर्थ सेवन सत्र होगा एवं पांच दिन का सत्र तीर्थ यात्रा सत्र, यह बात स्मरण रखने योग्य है कि जो भी आवें, लिखित स्वीकृति के बिना न आवें। न ही अपना कोई परिजन ऐसा पत्र लेकर बिना पूर्व अनुमति के किसी को भेजें।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, मंथन की आवश्यकता पड़ती है। प्रेरणा के लिए जप, तप, भजन, पूजन, दान, पुण्य आदि अनेकों कर्मकांडों का आश्रय लेना पड़ता है। इन्हीं दोनों प्रयोजनों के लिए अध्यात्म का एक चिन्तनपरक और धर्म का क्रियापरक विशालकाय ढाँचा खड़ा किया गया है। ऋषियों के इसी अनुदान ने नर-पशु को नर-नारायण स्तर तक विकसित कर सकने वाले अध्यात्म विज्ञान की संरचना की है। यह इतना महत्वपूर्ण है कि उसे सुविधा सम्वर्धन वाले पदार्थ विज्ञान की तुलना में कुछ अधिक ही वजनदार कहा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-August
स्वाध्याय, सत्संग जैसी परिचर्या चलती है वरन् मेजर आपरेशनों जैसी, प्लास्टिक सर्जरी जैसी सुविधा भी रहती है। अन्तराल को, अचेतन मन के रहस्यमय क्षेत्रों को सुधारने संभालने का कार्य तीर्थों में होता रहा है। उसकी कुछ-कुछ तुलना वैज्ञानिक उपचारों से किये जाने वाले ‘ब्रेन वाशिंग’ से की जा सकती है। अतीन्द्रिय क्षमताओं को उभारने वाले, व्यक्तित्व को सामान्य से असामान्य बनाने वाले उपचार एवं अभ्यास केंद्रों के रूप में ही महा-मनीषियों ने तीर्थों की स्थापना की थी। अपने समय में वह पूर्ण या सफल भी रही।
स्वाध्याय, संयम, सेवा की चतुर्विधि तपश्चर्या के लिए दो प्रकार के कार्यक्रम रखे गये हैं। एक-एक महीने के दस-दस दिन के। इन दोनों का समय सदा एक जैसा ही निर्धारित रहेगा। एक महीने वाले पहली तारीख से तीस तक और दस दिन वाले 1 से 10 तक, 11 से 20 तक और 21 से 30 तक। यह समय भविष्य के लिए नियमित रूप से चलेगा।
स्वाध्याय, सत्संग की शिक्षा पद्धति वरन् योग तप की समन्वित साधना पद्धति भी जुड़ी हुई है। साधना का महत्व शिक्षण की तुलना में कहीं अधिक है। शिक्षण मात्र मस्तिष्क भर को प्रभावित करता है। उसे इतना सोचने भर का अवसर प्रदत्त करता है कि किस तर्क के आधार पर क्या सोचना उचित हो सकता है। इससे पूर्व मान्यताओं में अन्तर आने जितना प्रयोजन सध सकता है, किन्तु इतने भर से उन रुझानों, अभ्यासों एवं आदतों पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता जो अनुपयुक्त होते हुए भी स्वभाव का अंग बनकर रह रही हैं और तर्क की दृष्टि से मात खाते हुए भी टस से मस होने का नाम नहीं लेतीं।
स्वाध्याय और सत्संग से कई अच्छे निष्कर्ष निकलते हैं। सन्मार्ग पर चल पड़ने का सत्परिणाम भी समझ में आता है। कुछ करने की उमंग भी उठती है किंतु व्यवहार में कुछ वैसा बन नहीं पड़ता। पथ कठिन जान पड़ता है। सुविधा के सामान्य ढर्रे से विपरीत यह आदर्शवादी मार्ग रुचिकर लगते हुए भी अपनाते नहीं बन पड़ता।
स्वाध्याय और मन चिन्तन की अंतर्मुखी ज्ञान साधना से काम चलायेंगे। जिज्ञासाएं न्यूनतम उभारेंगे, श्रद्धा की स्थापना में विशेष प्रकार का पराक्रम अपनायेंगे। समय-समय पर तीर्थ के सूत्र संचालक युग-ऋषि से विचार विनिमय का वही सामयिक समाधान का अवसर प्राप्त होता रहेगा। पर मानकर यहीं चलना चाहिए कि यहाँ सीखने सुनने के लिए नहीं धारणाओं को परिष्कृत परिपक्व करने के लिए जाया रहा है। इसमें सुनने-पूछने की कम और अन्तरंग को उभारने उछालने की आवश्यकता अधिक पड़ती है।
स्वाध्याय, सत्संग जैसे प्रयोजन महत्वपूर्ण होते हुए भी बुद्धि संस्थान तक ही अपनी उछल-कूद करने के उपरान्त शान्त हो जाते हैं। यदि ऐसा न होता तो आये दिन कथा-सत्संगों के वक्ता श्रोता अवश्य ही अपने व्यक्तित्वों को प्रखर बनाने में समर्थ हो गये होते, जब कि उन क्षेत्रों का प्रभाव, परिणाम दिखने पर एक प्रकार से निराशा ही हाथ लगती है।
स्वाध्याय, सत्संग की दृष्टि से वर्तमान समय में मूर्धन्य माना जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। कर्मकाण्ड की दृष्टि से शास्त्रीय विधि-व्यवस्था की समग्र जानकारी और विधि व्यवस्था का यहाँ समुचित प्रबन्ध है। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ी बात है गुरुदेव माताजी की उपस्थिति में उनके हाथों किये गये यह संस्कार कितने फलप्रद हो सकते हैं, इसका अनुमान लगाने में किसी को संदेह करने की गुंजाइश नहीं है। ऐसे संस्कार करने में बालकों को परिवार के बड़े-बूढ़ों के हाथ में थमाया, गोद में बिठाया जाता है। अपने विशाल परिवार के कुलपिता एवं कुलमाता की उपस्थिति में जिन्हें अपने बालकों के संस्कार कराने का अवसर मिलेगा, वे बड़भागी ही माने जायेंगे।
स्वाध्याय, संयम, सेवा की चतुर्विधि प्रक्रिया उसकी मनःस्थिति एवं परिस्थिति जान लेने के उपरान्त पृथक-पृथक स्तर की बनाई और बताई जायेगी। रोगियों की स्थिति देखकर पृथक-पृथक प्रकार के उपचार किये जाते हैं। इसी प्रकार इन साधना उपचारों के सम्बन्ध में भी समझा जाना चाहिए। सभी साधकों को एक जैसी साधना बता देना अवैज्ञानिक एवं अनुपयुक्त होता है। दूसरे लोग ऐसी भूल करें या करायें पर गम्भीर पर्यवेक्षण करने वाले “सब धान बाईस पसेरी” नहीं कर सकते।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-May
स्वाध्याय के द्वारा यह सहज ही पता चल जाता है कि निरर्थक एवं महत्वहीन बातों को अधिक तूल दे दिया गया और अकारण ही तनाव को आमन्त्रित कर लिया गया। वस्तुतः वह झाड़ी के भूत की कल्पना मात्र थी। अपने को तनावग्रस्त न होने देने के लिये दृढ़ निश्चय, लगन एवं सतत् निष्ठापूर्वक सद्कार्यो में नियोजित किये रहना ही सर्वोत्तम उपाय है। सदा सहनशीलता से काम लिया जाय, भविष्य के भय से भयभीत न हुआ जाय, वास्तविकता को दृष्टिगत रखा जाय, काल्पनिक बाधा या आशंका को स्थान न दिया जाय। वर्तमान में सामने आये काम को पूरी तत्परता से सम्पन्न किया जाय।
स्वाध्याय क्रम से उन्होंने इतना लाभ उठाया कि आगे चलकर वे विश्व ख्याति स्तर के ज्योतिर्विद्, खगोलवेत्ता और विविध विषयों के विद्वान बन गये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-September
स्वाध्याय की और कला-कौशल की प्रवीणता के लिए अभ्यास, अनुभव का आश्रय लिया जाता है। यह उपयुक्त भी है और प्रचलित भी। इतने पर भी इस मार्ग में एक भारी असमंजस यह बना रहता है कि बहुतों की मूल प्रकृति ही कुछ विचित्र होती है और उन पर इस उत्कर्ष प्रयत्नों का कोई कारगर परिणाम प्रस्तुत नहीं होता। मन्दबुद्धि, चंचल, उद्धत, अनगढ़ प्रकृति के ऐसे कितने ही व्यक्ति पाये जाते हैं जिन पर उपयुक्त शिक्षण का प्रभाव भी नगण्य जितना ही होता है। यही बात शारीरिक विकास के संदर्भ में भी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-August
स्वाध्याय-शील के ज्ञान अनुभवों की तरह समुद्र का खारापन प्रतिवर्ष कुछ न कुछ अधिक हो जाता है। सूर्य की किरणें समुद्र में बड़वाग्नि पैदा करती है और उसका जल सदैव भाप बनकर उड़ता रहता है। इस विराट् हलचल में भी समुद्री नमक वाष्पीकृत नहीं हो पाता इस तरह खारेपन को कोई नुकसान नहीं पहुँचता। अब एक गैलन जल में नमक का औसत और कुल समुद्र में जल का औसत लेकर कुल नमक का परिमाण निकाला गया। अब प्रतिवर्ष नदियाँ समुद्र को कितना नमक देती हैं यह हिसाब लगाकर उसका कुल प्राप्त नमक की राशि में भाग दिया गया उससे पृथ्वी की आयु 12 करोड़ वर्ष निकली जो पहले नियम से भी कम थी इसीलिये वह भी अमान्य हो गया।
स्वाध्याय करें और अपने घर-परिवार के हर सदस्य को उसे पढ़ाने-सुनाने के लिये आधे घण्टे का नियमित क्रम बनायें। इसके अतिरिक्त संपर्क क्षेत्र में भी, जिनमें कुछ विचारकर्ता दिखें, उन्हें यह सब साहित्य पढ़ाता-सुनाता रहे। हर सदस्य का संपर्क क्षेत्र न्यूनतम दस व्यक्तियों का होना चाहिये और प्रेरणा देने के लिये ही यह एक घण्टे का समय लगाया जाना चाहिये। रोज एक घण्टा निकालना हो सप्ताह में सात दिन या जैसे भी क्रम बनें, बनाया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-June
स्वाध्याय मण्डलों तक- युवकों की व्यायामशालाओं से लेकर महिलाओं के ग्रह-उद्योगों शिक्षण तक- अनेक धाराओं में यह प्रक्रिया बन सकती है और उसका संचालन, कार्यकर्त्ताओं का प्रशिक्षण एक केन्द्रीय सूत्र के अंतर्गत हो सकता है। धर्मतन्त्र के माध्यम से जन-जागृति पैदा करने वाले कार्यकर्त्ताओं का भी प्रशिक्षण केन्द्र बन सकता है। ऐसी रचना निस्सन्देह जन-जीवन का कायाकल्प प्रस्तुत कर सकती है।
स्वाध्याय मंडल, क्लब आदि के गठन की एक सुव्यवस्थित योजना हमारे दिमाग में है। इन दिनों उसकी झाँकी भर करा रहे हैं, समाज भर बता रहे हैं। क्योंकि इस विदाई वर्ष और कुछ करने के लिये नहीं कहेंगे अन्यथा लोगों का ध्यान बटेगा और संगठन की जड़ मजबूत बनाने की बात से उचटकर ‘जड़ सींचना भूले और पत्ते सींचे’ वाली कहावत चरितार्थ करने लगेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-March
स्वाध्याय किया था। भिक्षुओं के लिये निर्धारित आचार संहिता- शास्ता के भी वे अच्छे ज्ञाता थे। उन्हें मालूम था कि भिक्षु को अपने पास तीन चीवर से अधिक रखने का अधिकार नहीं है। उन्हें ऐसा लगा कि अपरिग्रह का उपदेश करने वाले आनन्द ने स्वयं ही शास्ता-मर्यादा तोड़ दी है, सो उनकी नाराजी और भी बढ़ गई। अगले दिन वे स्वयं ही बौद्ध स्थविर आ उपस्थित हुए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-April
स्वाध्याय, सदाचार, सद्-व्यवहार का आचरण करते हुए भी कभी-कभी क्रोध का व्यवहार कर जाते थे। धैर्य स्थिर रख सकना उनके लिए कठिन हो जाता था और घर में जब कभी ऐसी स्थिति आती, धर्मपत्नी को डाँटने लगते- ‘देख यदि तूने अमुक कार्य नहीं किया तो सन्त पुनीत के आश्रम में चला जाऊँगा और संन्यासी हो जाऊँगा।” सहिष्णुता का उनमें निताँत अभाव था।
स्वाध्याय करना चाहिये। इससे आत्म-निर्माण होगा। घर के हर वयस्क सदस्य को यह साहित्य पढ़ाने या सुनने का क्रम चलाया जाय। इसके लिये रात्रि को एक परिवार-गोष्ठी चलाई जाय जिसमें घर के लोगों को इकट्ठा करके एक व्यक्ति उन्हें सुनाया करे। पढ़े सदस्य स्वयं पढ़ा करें।
स्वाध्याय के लिये कुछ नियमित समय नित्य निकालें और एक घण्टा समय जो ज्ञान-यज्ञ के लिए देना है, उसे इस प्रेरक साहित्य के अपने परिवार के सदस्यों और परिचित लोगों को पढ़ाने या सुनाने के लिए लगाने का नियम बनावें।
स्वाध्याय, योगासन, प्राणायाम, प्रत्याहार आदि का सहारा लिया और आत्मा को आत्मा के प्रकाश में देखा अनुभव किया और अपना जीवन धन्य बना दिया।
स्वाध्याय में प्रमाद न करें। (107) बोलिए तो पर इस तरह। (108) बच्चों को बिगड़ने न दें। (109) बच्चों का भावनात्मक विकास। (110) बच्चों का प्रशिक्षण घर की पाठशाला में।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-November
स्वाध्याय और दीर्घकालीन मनन चिन्तन के बाद आत्मतत्व की स्पष्ट अनुभूति नहीं कर ली, इस विषय में दुविधा पूर्ण स्थिति में रहता आया है। आत्मा का कोई अस्तित्व है भी अथवा नहीं। यह एक ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसे सुलझा न पाने वाले जीवन भर उलटी और अंधकार पूर्ण दिशाओं में भटकते रहते हैं पर जो इस स्थिति के बारे में निश्चिन्त होकर आत्मानुभूति कर लेते हैं, वे अपना जीवन धन्य मानते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-September
स्वाध्याय के लिए, परिवार के साँस्कृतिक निर्माण के लिए और पड़ौसी परिचितों में भावनात्मक निर्माण करने के लिए कुछ समय नियमित रूप से लगाना चाहिए। इतनी आरम्भिक क्रिया नियमित रूप से चल पड़े, तो समझना चाहिए कि आगे और भी महत्वपूर्ण कदम उठा सकने का साहस उत्पन्न होगा। उस साहस के बल पर जो जनशक्ति उदित होगी उसके द्वारा नये समाज का नया निर्माण तनिक भी कठिन न रह जायेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-February
स्वाध्याय। स्वाध्याय का अर्थ कुछ भी पढ़ना नहीं। जो विषय आप नहीं जानते उसका अध्ययन कीजिए। किसी ऐसे विषय का अध्ययन कीजिए, जिससे आपको अपनी खोपड़ी खुजानी पड़े।
स्वाध्याय और प्रातः तथा सायंकालीन संध्या-वंदन का नियम अनिवार्य बना दिया था। जो लोग प्रमादवश इस अनिवार्य नियम का पालन नहीं करते थे, उन्हें या तो समाज-बाहर माना जाता था अथवा पतित तथा पापी।
स्वाध्याय का अर्थ कुछ भी पढ़ना नहीं। जो विषय आप नहीं जानते उसका अध्ययन कीजिए। किसी ऐसे विषय का अध्ययन कीजिए, जिससे आपको अपनी खोपड़ी खुजानी पड़े।
स्वाध्याय, मनन, चिन्तन आदि के द्वारा मस्तिष्क में यह संकल्प सुदृढ़ कर लेता है कि साँसारिक आवश्यकतायें यथा इन्द्रियसुख, पद-यश, वित्त, पुत्र यह सब चेतना के ऊपर चढ़ी झिल्ली की खुजलाहट, क्रियाशीलता अथवा माँग उसकी निज की नहीं, तब उसका दृष्टिकोण ही बदल जाता है। आसक्ति नष्ट होकर वह शुद्ध चैतन्य की प्राप्ति का प्रयत्न करने लगता है। तब वह बार-बार अनेक तरह के शरीर धारण करने की चिंता से भी मुक्त हो जाता है।
स्वाध्याय का लाभ अपने समाज को भी देते रहेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-May
स्वाध्याय, सत्संग संस्कार, सामाजिक सभ्यता और शिष्टाचार की वह सब बातें आती है जो अपनी प्रसन्नता के लिये हम औरों से चाहते हैं।
स्वाध्याय शिक्षण और आश्रम व्यवस्था में व्यस्त हो गये पर श्यावाश्व अपने योगाभ्यास में अभी भी संलग्न थे। एक समय का आहार-मिताहार, यम, नियम, ध्यान-धारणा का अभ्यास करते-करते श्यावाश्व ने अपने जीवन की रही-सही महत्वाकाँक्षाओं का भी हवन कर दिया। साधना-साधना-साधना-शरीर को तपाने से लेकर मन को ईश्वरीय सत्ता में घुलाने के लिये वे अविराम तप करने लगे।
स्वाध्याय, दान, उपासना, आदि का नाश करने लगे।”
स्वाध्याय करने और घर परिवार के लोगों की युग-निर्माण साहित्य में विचारधारा से लगातार सम्बद्ध करते रहने के अतिरिक्त बाहर के ऐसे दस व्यक्तियों से अपना संपर्क बन जाना चाहिए जो इस विचार धारा में पूरा-पूरा रस लेने लगें और अपनी ही तरह नव-निर्माण के लिए कुछ करने के लिये उत्सुकता प्रकट करने लगें।
स्वाध्याय का क्रम व्यक्ति निर्माण के लिए एक अमोघ साधन सिद्ध हो सकता है। छुट-पुट एवं अस्त-व्यस्त क्रम से कभी बहुत, कभी कुछ नहीं वाली बात चलाते रहने से कोई आशाजनक परिणाम नहीं निकलता पर यदि निरन्तर नियमित और क्रमबद्ध रूप से उसी प्रक्रिया को चलाया जाय तो थोड़ा सा प्रयत्न भी कहने लायक सफलता उत्पन्न कर सकता है। इसलिए जो नियमित रूप से दोनों साधनायें चलाते हैं उन्हें अधिक गहरी निष्ठा का समावेश करने और घरेलू ज्ञान मन्दिर और चल पुस्तकालयों की स्थापना के लिये व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रयत्नों को इस वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्य माना जाना चाहिए। एक घंटा समय और दस पैसा रोज देने वाली प्रक्रिया अपने परिवार की सदस्यता की एक अनिवार्य शर्त बना दी गई है। जिनके द्वारा युग-निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्य में भूमिका सम्पादन करने की आशा की जाय उनका कर्तव्य न्यूनतम इतना तो होना ही चाहिए, जो भावी कार्यक्रम की रूप-रेखा नियोजित करेंगे।
स्वाध्याय, संयम और भक्ति करते हुए ब्रह्मा-विभूति करते हैं।
स्वाध्याय, सत्संग, परलोक, कर्मफल आत्मा-परमात्मा सम्बन्धी सारी आस्थाओं का अन्त हो चुका था तब।”
स्वाध्याय को सम्मिलित करने के लिये कहा गया है। अपने परिवार के सभी लोग यदि इस प्रक्रिया को दृढ़ता पूर्वक अपना लें तो उनके आत्म-बल में महत्वपूर्ण अभिवृद्धि होगी और उस निष्ठा का दूसरों पर भी प्रभाव पड़ेगा। ज्ञान यज्ञ वर्ष में इस साधनात्मक अनुक्रम को नियमितता पूर्वक चलाया जाने लगे तो यह बहुत बड़ी बात होगी और अपने परिजनों का व्यक्तित्व बहुत निखरेगा। जो उच्च स्तर की साधनायें करना चाहेंगे उनके लिये साधना-विधान की एक व्यवस्थित संहिता भी हम तैयार कर रहे हैं ताकि हमारे यहाँ न होने पर भी उसका लाभ साहसी साधकों को मिलता रहे और साधना सुचारु रूप से चलती रहे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-July
स्वाध्याय द्वारा अपने राजनैतिक ज्ञान को अनुदैनिक बनाये रहते हैं। सम्पूर्ण संसार की राजनीतिक गति-विधियों तथा उसके अनुबन्धित विषयों का आधुनिकतम ज्ञान उपलब्ध किये रहते हैं। इससे उनको एक प्रकार से सारा संसार ‘करतलगत आमलक समान’- हो जाता है। वे अपने कक्ष में बैठे हुये संसार की सारी गतिविधियाँ, अपने ज्ञान बल पर चलचित्र की भाँति देखा करते हैं। ज्ञान द्वारा प्राप्त यह दिव्य दृष्टि एवं यह आश्चर्यजनक उपलब्धि कितना आनन्द दे सकती है इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
स्वाध्याय, ज्ञानार्जन, आदि के द्वारा नष्ट किया जा सकता है। सादगी का वातावरण पैदा किया जाये तो उससे फैशन के नाम पर होने वाला अपव्यय भी रुके और बालकों की उच्छृंखलता तथा गुण्डागर्दी भी रुक सके। सदाचार, साहस और ईमानदारी को सम्मानित नहीं किया जाये तो दुराचार, संकीर्णता और बेईमानी बढ़ती है। सज्जन व्यक्तियों का सम्मान बढ़ाकर ऐसी बुराइयों को सहज ही दूर किया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-August
स्वाध्याय, सत्संग और चिंतन, मनन किया जाय। साथ ही अपने संपर्क क्षेत्र में सुधार कार्य जारी रखा जाय। सत्प्रवृत्ति संवर्धन का सेवा कार्य किसी न किसी रूप में कार्यान्वित ही करते रहा जाय। इतना करने पर ही मन को स्वच्छ, निर्मल व स्वयँ को प्रगति के पथ पर अग्रगामी बनाये रखा जा सकता है।
स्वाध्याय। फकीरों की भाषा में कहें तो ऐसे कहेंगे “पढ़िबे की फल गुनब है” गुनबे का फल ज्ञान, ज्ञान का फल हरि नाम है, कहिश्रुति संत पुरान। अर्थात् पढ़ने का मर्म मनन चिंतन ज्ञानार्जन में है व ज्ञान की सार्थकता भगवद् भक्ति में है। जहाँ ये सभी मिल जायें व लेखनी इसकी सधी हुई दिशा में चले वहाँ जिस उच्चस्तरीय साहित्य का सृजन होगा, उसे पढ़कर कौन ऐसा होगा, जो प्रभावित न हों?
स्वाध्याय कर पाने पर कुछ अभाव सा महसूस करते हैं तो यह चिन्ह पूज्यवर के उस आशावादी दर्शन का द्योतक है। जिसमें वे कहते थे मूलतः मनुष्य आदर्शवादी हैं व उसे अंत में वही बना रहेगा। विचार की स्पष्टता, शैली में रोजमर्रा के प्रयोग किये जाने वाले शब्दों से लेकर शुद्ध संस्कृत के शब्द कई नयी संधियों के साथ नये शब्दों की संरचना, भावना का अविरल प्रवाह एक सुनियोजित उद्देश्य की और को मोड़ता प्रतिपादन यह पूज्यवर की जादू भरी लेखनी की विशेषता है। एक बार का प्रसंग है कि ब्रह्मवर्चस के कार्य कर रहे एक सज्जन अनगिनत तर्कों व प्रमाणों के साथ नास्तिक वाद का खण्डन करने वाला एक लेख पूज्यवर के पास लाए। उनकी दृष्टि ये यह उनका सर्वश्रेष्ठ लेख था।
स्वाध्याय में अपना जीवन क्यों खपा देते?
स्वाध्याय आदि के अतिरिक्त परमार्थ प्रयोजनों के लिए भी समय का एक अंश सुरक्षित रखने एवं नियोजित करने की आवश्यकता पड़ती है। इसका सुसंतुलन विवेकपूर्ण बिठाया जाय। समय को सर्वोपरि जीवन संपदा समझते हुए उसका एक क्षण भी बरबाद न होने दिया जाये।
स्वाध्याय प्रयोजन के अतिरिक्त लोक शिक्षण की जो विधाएँ जहाँ उपलब्ध हैं वहाँ उनका प्रयोग करना चाहिए। लोगों को एकत्रित करने के लिए ऐसे आयोजन किये जा सकते हैं, जो चलती फिरती व्यक्तित्व विकास की आवश्यकता पूरी करती रह सकें। कुछ आयोजन परम्परागत रूप से भी संपन्न होते रहते हैं, जिनमें समुदाय अपनी मान्यताओं के अनुरूप स्वतः ही एकजुट हो स्थान विशेष पर अनायास ही पूर्व प्रचलन के अनुसार एकत्र होता रहता है। ऐसे अवसरों पर चूका नहीं जाना चाहिए ख्वरप् व्यक्तित्व विकास की अति महत्वपूर्ण आवश्यकता को पूरा कर सकने वाले लोक शिक्षण को चलाने के लिए नये सिरे से नया प्रयत्न करना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-December
स्वाध्याय में लगाइए। जीवन को ऊँचा उठाने वाली, गुत्थियों को समझने और सुलझाने वाली पुस्तकें एक शानदार मित्र और परामर्श दाता की तरह हैं, जो अपने चिंतन को परिष्कृत करने में जितनी सहयोगी बनती है, उसकी तुलना में उन पर किये जाने वाला खर्च बहुत ही कम होता है। उपयोगी पुस्तकों के अध्ययन को आजीविका उपार्जन के समान ही महत्व देना चाहिए। उपयोगी से तात्पर्य यह है कि मात्र मनोरंजन करने वाली और कुत्साएँ भड़काने वाले साहित्य से। विषैले पदार्थों की तरह उनसे बचा ही जाना चाहिए, उन्हें पढ़ने की अपेक्षा न पढ़ना ही अच्छा।
स्वाध्याय को ताक पर रख दिया। अंधी भेड़ों की तरह जिस किसी तरह आड़ा तिरछा चलने में विश्वास करने लगे। ऐसी स्थिति में अवगति स्वाभाविक है। यदि किसी ने ठीक पगडंडी का चुनाव कर उस पर चलना शुरू कर दिया है तो उसे मंजिल जरूर मिलेगी। हो सकता है इसमें थोड़ी देर सबेर हो जाय, पर जिसकी कोई पगडंडी नहीं, बस यूँ ही घने जंगल में भटक रहा है, उसके पल्ले थकान के अलावा कुछ नहीं हाथ लगेगा, भले ही उसने कितनी ही भाग-दौड़ क्यों न की हो ?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-April
स्वाध्याय के संबंध में कम लोग ही यह अनुभव करते हैं कि उसकी महत्ता भी सत्य और धर्म के परिपालन से किसी भी प्रकार कम नहीं है। उसकी उपेक्षा करने पर इतनी बड़ी हानि होती है जितनी कि सत्य और धर्म के संबंध में उदासीन रहने पर।
स्वाध्याय करने से उस विस्मृति को स्मृति के रूप में परिणत किया जा सकता है। जो आम तौर से उपेक्षित बनी रहती है। शरीर प्रत्यक्ष है। वही हमारे विभिन्न प्रयोजनों की पूर्ति करता है। इन्द्रिय संवेदनाओं के आधार पर रसास्वादन भी वही करता है।
स्वाध्याय को आत्मिक आहार माना गया है। उसकी भी पेट भरने के लिए भोजन के प्रबन्ध करने की तरह ही आवश्यकता है। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा इन चारों को आध्यात्मिक जीवन का अविच्छिन्न अंग माना गया है। इनमें अधिक सरल और अधिक आवश्यक है-स्वाध्याय इसे बीजारोपण की संज्ञा दी गई है। जीवन को महामानव स्तर का कल्पवृक्ष बनाने में सफलता इसी आधार पर बनती है।
स्वाध्याय-सत्संग, चिन्तन-मनन ही नहीं उपयुक्त मार्गदर्शन और प्रत्यक्ष उदाहरण भी सामने होने चाहिए। इन्हें जुटा सकने वाले ही उत्कर्ष अभ्युदय की दिशा में बढ़ पाते हैं। चिरस्थाई, व्यापक और सर्वतोमुखी प्रगति के लिए इस सुयोग की व्यवस्था होनी ही चाहिए। इस प्रयास-अभ्यास को जीवन साधना के नाम से जाना जाता है। इसी समग्र मार्ग को अपना सकने पर व्यक्तित्व निखरता और प्रगति का पथ प्रशस्त होता है।
स्वाध्याय द्वारा ही संपन्न होता है। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय है ही नहीं। मनुष्य की स्मृति क्षणिक है वह घटना क्रम बदलते ही विस्मृति में बदल जाती है। ऐसा आत्म क्षेत्र में न होने पाए इसलिए स्वाध्याय से हर दिन उसे सींचना और हरा भरा रखना पड़ता है।
स्वाध्याय में गिना जाता है। पर अब वह स्थिति नहीं रही जिसमें जीवन का सीमित और छोटा स्वरूप था और उसकी समस्याओं का समाधान श्रद्धालु जन शास्त्र वचनों के आधार पर पूरा कर लिया करते है। अब चिन्तन का क्षेत्र पहले की अपेक्षा कहीं बड़ा हो गया है। विश्व के अनेकानेक दर्शनों के आपस में गूंथने और आदान-प्रदान करने का अवसर मिला है। तर्क, तथ्य, प्रमाण और उदाहरण हर संदर्भ में माँगे जा रहे हैं।
स्वाध्याय। इसके उपरान्त वे राज्य की समस्याओं को सुलझाने के लिए मंत्री-परिषद के सदस्यों से परामर्श करते। अपनी समस्याओं को उनके पास सुलझाने के लिए आए नागरिकों से भेंट करते, उसके कष्ट सुनते और कठिनाइयों को हल करने के लिए हर संभव सहयोग करते थे। इन सभी कार्यों के निवृत्त होने तक सूर्यदेव अपना रथ लिए ऊपर आकाश के एकदम बीच में पहुँच। उनको यही समय मिलता था भोजन के लिए।
स्वाध्याय अपने संबंध में निरीक्षण-परीक्षण करते रहने और सुधार परिष्कार की योजनायें बनाते रहने को भी कहते हैं। वह तप निजी चिन्तन-मनन से भी बन पड़ता है। वैसे मोटे तौर से जीवन समस्याओं के आदर्शवादी समाधान का पक्षधर अध्ययन विचार-विनिमय भी इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। सद्ग्रन्थों का पठन और मुनि मनीषियों के सत्संग से भी वह प्रयोजन पूरा होता है। इन में से जो भी जिससे जिस प्रकार बन पड़े, उसके लिए समय निकालना चाहिए।
स्वाध्याय का वास्तविक प्रयोजन पूरा हो सके।
स्वाध्याय-यह चार साधनाएँ प्रमुख मानी गई हैं। उपवास जिस स्तर का सध सके, उतना सधना चाहिए। अच्छा तो यह है कि पूरे दिन जल पीकर रहा जाय। आवश्यकतानुसार उसमें नीबू शहद जैसा कुछ मिला लिया जाय। इतना न बन पड़ने पर दूध छाछ, रस, रसा आदि प्रवाह पदार्थ लेकर काम लिया जा सकता है।
स्वाध्याय की एकाकी आवश्यकता मनन और चिन्तन से पूरी हो सकती है। सुविधानुसार एकान्त में बैठकर एकाग्र चित्त से आत्मस्थिति की समीक्षा की जा सकती है। आदर्शवाद की निर्धारणाओं में अपना जीवन क्रम कितना पीछे है, इन त्रुटियों को निष्पक्ष भाव से पैनी दृष्टि से स्वयं खोज निकालना मनन है। इस आत्म समीक्षा के लिए हर कोई दिन भर में कोई न कोई समय निकाल ही सकता है। उस कमियों को खोज ही समता है जो उसे उत्कृष्टता की दृष्टि से पिछड़ा हुआ बनाए हुए हैं।
स्वाध्याय को भी कम महत्व का नहीं माना जाता था। उसके लिए प्रत्येक विचारशील अपनी तत्परता बनाए रहता था।
स्वाध्याय का शब्दार्थ है अपने आप का अध्ययन। यह कार्य शिक्षितों के लिए शास्त्रों के नियमित अध्ययन द्वारा संपन्न होता है। शास्त्र उन ग्रंथों को कहते हैं जो आत्मसत्ता और उसकी महत्ता का बोध कराएँ। कर्तव्य-पथ की जानकारी एवं प्रेरणा प्रदान करें। शास्त्रों के नाम पर आजकल उन कथा पुराणों को भी सम्मिलित कर लिया गया है जिनमें किसी काल की घटनाओं का विवरण है, अथवा मिथकों का समुच्चय भरा पड़ा है।
स्वाध्याय को भी प्रमुखता दी गई है।
स्वाध्यायान्मा प्रमदः अर्थात्- सत्य बोलें धर्माचरण करें और स्वाध्याय में प्रसाद न करें। इस निर्धारण के अनुसार सत्य और धर्म के ही समकक्ष स्वाध्याय को भी प्रमुखता दी गई है।
स्वाध्याय। स्वाध्याय अपने संबंध में निरीक्षण-परीक्षण करते रहने और सुधार परिष्कार की योजनायें बनाते रहने को भी कहते हैं। वह तप निजी चिन्तन-मनन से भी बन पड़ता है। वैसे मोटे तौर से जीवन समस्याओं के आदर्शवादी समाधान का पक्षधर अध्ययन विचार-विनिमय भी इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। सद्ग्रन्थों का पठन और मुनि मनीषियों के सत्संग से भी वह प्रयोजन पूरा होता है।
स्वाध्याय को भी योगाभ्यास का एक महत्वपूर्ण अंग मानते हुए उसे दिनचर्या का एक अंग माना जाय। कम से कम इतना तो अनिवार्य ही होना चाहिए कि सप्ताह में एक दिन इस प्रयोजन के लिए सुनिश्चित रखा जाय। उसमें जितना अधिक समय मनोयोगपूर्वक लगे उसे लगाने के लिए अधिकाधिक समय निकालना चाहिए।
स्वाध्याय, संयम इसलिए नियमित किया गया है।
स्वाध्याय से हर दिन उसे सींचना और हरा भरा रखना पड़ता है।
स्वाध्याय के सहारे आत्मचेतना की स्वतंत्र महत्ता और उसके लिए प्रगति क्रम की समग्र जानकारी प्रतिदिन स्मृति पटल पर अंकित की जाती रहे। शरीर तो अपनी आवश्यकताएँ पूरी कराता रहता है। पर आत्मा के लिए कोई ऐसा क्रियात्मक व्यवहार सामने नहीं रहता जिसके आधार पर आत्म विस्मृति को सजग स्मृति में बदला जा सके। यह कार्य स्वाध्याय द्वारा ही संपन्न होता है। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय है ही नहीं।
स्वाध्याय इसे बीजारोपण की संज्ञा दी गई है। जीवन को महामानव स्तर का कल्पवृक्ष बनाने में सफलता इसी आधार पर बनती है। इसलिए प्रयत्न तो यह चाहिए कि स्वाध्याय को भी योगाभ्यास का एक महत्वपूर्ण अंग मानते हुए उसे दिनचर्या का एक अंग माना जाय। कम से कम इतना तो अनिवार्य ही होना चाहिए कि सप्ताह में एक दिन इस प्रयोजन के लिए सुनिश्चित रखा जाय। उसमें जितना अधिक समय मनोयोगपूर्वक लगे उसे लगाने के लिए अधिकाधिक समय निकालना चाहिए।
स्वाध्याय प्रयोजनों के लिए चयन करना समीचीन होगा।
स्वाध्याय की प्रक्रिया है (॥) साप्ताहिक सत्संग-जिसमें सप्ताह में कम से कम एक दिन प्रस्तुत विचारधारा के समर्थक मिल बैठ लिया करें। सहगान कीर्तन, अभिनव संदेशों का प्रवचन तथा दीपयज्ञों का संक्षिप्त आयोजन कर लिया करें।
स्वाध्याय में प्रसाद न करें। इस निर्धारण के अनुसार सत्य और धर्म के ही समकक्ष स्वाध्याय को भी प्रमुखता दी गई है।
स्वाध्याय, संयम और सेवा इन चारों को आध्यात्मिक जीवन का अविच्छिन्न अंग माना गया है। इनमें अधिक सरल और अधिक आवश्यक है-स्वाध्याय इसे बीजारोपण की संज्ञा दी गई है। जीवन को महामानव स्तर का कल्पवृक्ष बनाने में सफलता इसी आधार पर बनती है। इसलिए प्रयत्न तो यह चाहिए कि स्वाध्याय को भी योगाभ्यास का एक महत्वपूर्ण अंग मानते हुए उसे दिनचर्या का एक अंग माना जाय। कम से कम इतना तो अनिवार्य ही होना चाहिए कि सप्ताह में एक दिन इस प्रयोजन के लिए सुनिश्चित रखा जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-November
स्वाध्याय बड़ी अभिरुचि के साथ किया और तद्नुरूप ईश्वर उपासना, साधना, और आराधना का उपक्रम भी बिठाती चली गयी। फलतः आरोग्य लाभ भी हस्तगत हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-May
स्वाध्याय, चिन्तन मनन यह साधना की प्रारंभिक आवश्यकताएँ हैं, शिखिध्वज! आज तुम्हारी मंत्र दीक्षा संपन्न हुई। पूजन की सामग्री उपयुक्त पात्र, कुश आसन यह अपने पास रखने होंगे। पंचोपचार पूजन सहित मंत्र जप करते हुए शुभ ज्योति स्वरूप निराकार गायत्री का ध्यान करना। जब तुम इस प्रारंभिक साधना को सफलतापूर्वक पूरा कर लोगे, तो आगे उच्चस्तरीय साधना के लिए तुम्हें अग्नि दीक्षा भी देंगे।’ यह कहते हुए महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए।
स्वाध्याय और सत्संग आदि जुटाने की आवश्यकता थी, विद्या से होता है, उसके लिए हमारा प्रयास कितना है? हाड़-माँस की पत्नी के लिए बहुमूल्य उपहार मिल यह ठीक है, पर यह बुद्धिरूपी अर्धांगिनी को दीन-दुखी, भूखी-प्यासी निर्वस्त्र-रुग्ण चिंतित रहने और जहाँ-तहाँ भटकने दिया जाय, यह भी तो शोभनीय नहीं। प्यार से उसे बेचारी को वंचित क्यों रखा जाय?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-July
स्वाध्याय-सत्संग की व्यवस्था बनाये रखते थे इसके लिए पर्व-त्यौहारों पर व्रत संस्कारों के माध्यम से सामूहिक प्रशिक्षण अधिक उपयोगी और प्रभावी समझा जाता था। अस्तु वे ऐसे ही अवलंबनों के सहारे अपने परिकर के यजमानों को उच्चस्तरीय प्रेरणाओं से अनुप्राणित किया करते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-January
स्वाध्याय,संयम,सेवा के उपाय-उपचारों द्वारा सद्विचारों का आरोपण सहज संभव हो जाता है। प्रखर, प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का निर्माण एवं उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण इसी आधार पर संभव हो सकेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-June
स्वाध्याय आवश्यक होता है। साधना की उच्चतम स्थिति में समाधि की अवस्था में जहाँ परमतत्व में एकात्म होता है, उस समय इन ग्रंथों से प्रत्यक्ष प्रयोजन नहीं रहता। यद्यपि चेतना के उत्कर्ष का आधार उनके स्वाध्याय से ही विनिर्मित होता है। साधना की प्रक्रिया के निर्देशक ग्रंथों का एवं मार्गदर्शक सद्गुरु की आवश्यकता तो पग-पग पर पड़ती है। किंतु सविता संपर्क की प्रत्यानुभूति के क्षणों में आत्मसत्ता ही वेद और गुरु बन जाती है।
स्वाध्याय से ही विनिर्मित होता है। साधना की प्रक्रिया के निर्देशक ग्रंथों का एवं मार्गदर्शक सद्गुरु की आवश्यकता तो पग-पग पर पड़ती है। किंतु सविता संपर्क की प्रत्यानुभूति के क्षणों में आत्मसत्ता ही वेद और गुरु बन जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-March
स्वाध्याय, कथा-कहानी जैसी प्रतिष्ठापनायें अवकाश वाले क्षणों में चलती रहें तो हर किसी का मन उस वातावरण में उल्लास का अनुभव करता है। जहाँ तक महत्वपूर्ण प्रश्न नवीन आकर्षणों के आरंभ करने का है, इसके लिए अधिक आकर्षक विनोद खेल-कूद का है। जहाँ उछल-कूद की गुंजाइश हो, वहाँ कई प्रयोग घर में ही किये जा सकते हैं संगीत, सहगान कीर्तन, कथा चर्चा जैसे प्रयोग भी ऐसे है जो घर में ही मनोरंजन के साथ उपलब्ध कराते हैं। यह सभी साधन ऐसे हैं। मनोविनोद का उद्देश्य व्यक्ति की वासना की पूर्ति करना न रहे, वरन् उसकी भावनाओं को परिष्कृत करने, आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाने का प्रयोजन भी उसके साथ जुड़ा होना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-February
स्वाध्याय एवं मनन चिन्तन के एकाकी प्रयत्न से भी सम्भव हो सकता है।
स्वाध्याय करते छात्र ऐसे भले लग रहे थे-जैसे नक्षत्रों से फूटती दिव्य किरणों ने मूर्त स्वरूप धारण कर लिया हो और तब महर्षि कणाद ने स्नान कर साधना कक्ष में प्रवेश किया। किन्तु आज उनका शरीर इतना थक चुका था कि साधना प्रकोष्ठ की तीन सीढ़ियाँ उनसे चढ़ी न जा सकी। अन्तिम पैर बढ़ाते ही वह लड़खड़ा गए। उनकी कृश देह माँ गायत्री की प्रतिमा के सम्मुख जा गिरी। ऋषि अचेत हो गए।
स्वाध्याय और सत्संग का मनन चिन्तन का ऐसा क्रम बनाया जाय, जिससे कि उस दिशा में चलने के सत्परिणामों के सम्बन्ध में तर्क, तथ्य, प्रमाण एवं उदाहरणों के आधार पर अपनी इष्ट निष्ठा और गुरुभक्ति को प्रगाढ़ किया जाय। यह प्रगाढ़ता ही साधक में-तन्मयता को जन्म देती है। शनैः शनैः इ तन्मयता का ही रूपांतरण ध्यान में होता है। फिर ध्यान की प्रगाढ़ गम्भीरता को सविकल्प समाधि-आत्म-बोध के क्षणों में बदलते भला कितनी देर है?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-March
स्वाध्याय न करने से , आलस्य से और कुधान्य खाने से ब्राह्मण का पतन हो जाता है।
स्वाध्याय सत्संग का चिन्तन, मनन का विधान है। अध्यात्म दर्शन की यही पृष्ठभूमि है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-August
स्वाध्याय, उपासना लोक सेवा के सभी पक्षों का समावेश रखा जाय। उपार्जन में ही पूरा समय न खपा दिया जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-October
स्वाध्यायी बनना चाहिए। हमें अपने विचार दृढ़ बनाना चाहिए, “मैं मन, वचन तथा कर्म से पवित्र हूँ। दूसरों के सुख-दुःख मेरे ही सुख दुःख है, संसार की सभी दिशाओं से मुझे प्यार ही मिल रहा है।” ऐसे विचार जब मन में दृढ़ होंगे तब हमें संसार में कोई दूसरा दिखाई ही नहीं पड़ेगा और “आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की भावना ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की और ले जाने में समर्थ होगी। यही है ‘जीवन का अर्थ’ जिसके लिए महात्मा टॉलस्टाय का हृदय विक्षुब्ध हुआ था और उन्होंने साहित्य से विरत होकर ईश्वर’-चिन्तन में ही आत्म-कल्याण करने की प्रेरणा प्राप्त की थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-February
स्वाध्याय एवं चिन्तन-मनन आवश्यक है। उसे नित्य कर्म में सम्मिलित रखा जाय। मस्तिष्क में ऐसी कल्पना फिल्में घूमती रहनी चाहिए जिनमें उत्कृष्ट चरित्रों के घटनाक्रम एवं संस्मरण भरे पड़े हों। जीवन समस्याओं के सुलझे हुए समाधान प्रस्तुत करने वाली पुस्तकें हमारी सच्ची मित्र हो सकती है। इस स्वाध्याय के लिए सत्साहित्य को उपलब्ध करने के साधन जुटाये जाएँ।
स्वाध्याय की आवश्यकता पड़ती है। जो जीवन-क्रम में उत्कृष्टता के समावेश का क्रान्तिकारी आधार खड़ा कर सकें। दुर्भाग्य से अध्यात्म और धर्म-क्षेत्र में भी शास्त्रों के नाम पर ऐसा जाल-जंजाल भी उपलब्ध होता है जो स्पष्ट दिशा निर्देश करने की अपेक्षा उलटे भ्रान्तियों में उलझा देता है। इसी प्रकार सत्संग के नाम पर होती रहने वाली बकवास को प्रगतिशीलता के स्थान पर प्रतिगामिता के पत्थर गले से बँध जाते हैं। इतने पर भी यदि जाँच-परख की कसौटी हाथ में हो तो साहित्य अथवा व्यक्तियों के माध्यम से ऐसा परामर्श मार्ग’दर्शन मिल सकता है जो जीवन समस्याओं को सुलझाने और उत्कृष्टता की दिशा में सही रीति से बढ़ चलने का उपयुक्त मार्ग-दर्शन कर सके।
स्वाध्याय के लिए सत्साहित्य को उपलब्ध करने के साधन जुटाये जाएँ। आवश्यक खर्चों में यह भी एक गिना जाय और आत्मा की भूख बुझाने का महत्त्व समझते हुए उसके लिए भी समय एवं धन का समुचित समावेश किया जाय। जब भी अवकाश मिले, मस्तिष्क में आदर्शवादी विचारणाओं एवं प्रेरणाओं का ताना-बाना बुनने का कार्य चल पड़े।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-September
स्वाध्याय (6) शक्ति संचय का स्त्रोत संयम (7) सेवा साधना और उसके सिद्धान्त (8) सेवा, धर्म और उसका स्वरूप (9) धर्म तन्त्र की शक्ति और सामर्थ्य (10) युग परिवर्तन की पृष्ठ भूमि और रूपरेखा ।
स्वाध्याय, संयम और सेवा चार अंग हैं। यह सभी एक दूसरे के पूरक हैं। इनमें से एक की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। भवन निर्माण में ईंट चूना लकड़ी लोहा चारों ही चाहिये। जीवन निर्वाह में भोजन, शयन, मल, विसर्जन और उपार्जन में से एक भी छोड़ने से कठिनाई उत्पन्न होगी।
स्वाध्याय, संयम और सेवा के चारों चरणों को किसी न किसी प्रकार न्यूनाधिक मात्रा में समाविष्ट किये ही रहे। थोड़ा शुभारम्भ ही भविष्य में सुविस्तृत हो सकता है। बीजारोपण इन चारों का ही किया जाय। कौन, कितना, किस, प्रकार, क्या कर सकता है? यह व्यक्तिगत सुविधा, और श्रद्धा का प्रश्न है।
स्वाध्याय, सत्संग और मनन चिन्तन की चतुर्विधि साधन सामग्री से अपने मनःक्षेत्र को घेरे रहने वाला उपयोगी वातावरण बनता है। इसके अतिरिक्त आत्म बलवर्धक व्यायामों में सर्वसुलभ एवं सर्वश्रेष्ठ उपाय है-ध्यान ध्यान मग्न होकर हम अपना इष्ट आराध्य स्वयं विनिर्मित करते हैं और उसके साथ श्रद्धासिक्त घनिष्ठता स्थापित करके तादात्म्य की दिशा में बढ़ते चले जाते हैं। ध्यान लोक वस्तुतः स्वनिर्मित ऐसा स्वर्गीय नन्दन वन है, जिसका सृजन, संवर्द्धन, परिपोषण हम स्वयं ही करते हैं। इसे परिपक्व बनाते हैं। पत्र, पल्लवों से सजाते हैं और फल फूलों से लदा हुए परम मंगलमय उद्यान के रूप में विकसित कर लेते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-December
स्वाध्याय, संयम और सेवा की चार सूत्री आत्मोत्कर्ष साधना में प्रायः सभी परिजन संकल्पपूर्वक निरत हो गये हैं। मात्रा में न्यूनाधिकता भले ही रही हो, पर वे संकल्प और निष्ठा के साथ अपनाया सर्वत्र गया है। झोला पुस्तकालय में नया उत्साह आया है और जहाँ भी शाखा संगठन जीवित है वहाँ चल पुस्तकालय आरम्भ हो गये या होने जा रहे हैं। इस प्रयोजन के लिए प्रायः सभी समर्थ शाखाओं ने एक एक स्थायी कार्यकर्ता की नियुक्ति कर ली है और क्रियाकलाप इस तरह चलाया है जिससे भविष्य में कभी भी शिथिलता आने की आशंका न रहे। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण-नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति की- लक्ष्य पूरा करने के लिए जिस भावना और कर्मनिष्ठा की आवश्यकता है वह अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों में इन दिनों पहले की अपेक्षा अनेक गुनी अधिक दृष्टिगोचर हो रही है।
स्वाध्याय, संयम, सेवा के चारों चरणों में से किसी को भी छोड़ा जा सके और एक भी ऐसा नहीं है जिस अकेले के बल पर आत्मोत्कर्ष का उद्देश्य पूरा हो सके। इस सन्दर्भ में अखण्ड-ज्योति के पृष्ठो पर चिरकाल से विभिन्न रूपों में कहा जाता रहा है।
स्वाध्याय या प्रवचन परामर्श या अनुभव मनन से मिलने वाली जानकारी से आत्मज्ञान भिन्न है। उसमें अपने स्तर, स्वरूप, उद्देश्य और कर्तव्य की उच्चस्तरीय अनुभूति होती है और यह सघन विश्वास बन कर जीव चेतना का अंग बन जाती है। यह आन्तरिक काया-कल्प है। साधारणतया मनुष्य शरीर अध्याय में ही नख-शिख् पर्यन्त डूबा रहता है और इन्द्रिय लिप्सा, सम्पत्ति लालसा और बड़प्पन की अहमन्यता जैसे भौतिक उत्साह ही उस पर छाये रहते हैं। इन्हीं की पूर्ति में जीवन गुजरता है।
स्वाध्याय, संयम और सेवा के चतुर्विध प्रयोजनों में संलग्न करने के लिए भरपूर प्रयत्न करेंगे और आशा रखेंगे कि इन सिद्धान्तों को-गतिविधियों को अपनाने के लिए जिससे जितना बन पड़ेगा वह उसके लिए प्रयत्न करेगा। जो अब तक इस दिशा में प्रयास नहीं कर सके हैं वे शुभारम्भ करेंगे और जो कुछ करते रहे है वे इसमें अभिवृद्धि का साहस जुटाएँगे। सर्वथा विरत अपने परिवार का एक भी व्यक्ति न रहने पावे। इस वर्ष का यही बसंती लक्ष्य हम लोगों के सामने रहना चाहिए और बसन्त पर्व के दिन इसी के संकल्प सामूहिक रूप से किये जाने चाहिए। इस वर्ष बसन्त पर्व 12 फरवरी रविवार का है।
स्वाध्याय, संयम और सेवा के चारों चरणों को समान महत्व मिलना चाहिए। इन चारों के लिए जिससे जितना बन पड़े उसे उतना प्रयत्न अवश्य ही करना चाहिए। हममें से एक भी ऐसा न रहे जो आत्मिक प्रगति को कम महत्व दे और उसके लिए इन ठोस आधारों की अपेक्षा करता रहे। स्मरण रखने योग्य बात यह है कि मात्र मन्त्र जपने भर से आत्मिक प्रगति का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए आत्मशोधन और आत्म-परिष्कार के लिए तत्पर होना होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-May
स्वाध्याय, सत्संग एवं मनन-चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। इसके अतिरिक्त एक और भी कारगर उपाय है- मनोमय कोश की योग साधना। काम-काजी मस्तिष्क समेत मन-क्षेत्रीय की स्तरीय परतें मनोमय कोश की परिधि में आती है। जिस प्रकार वन्य पशुओं को साधकर पालतू बनाया जाता है। उनसे अनेक प्रकार के लाभ लिये जाते हैं, उसी प्रकार मन के महादैत्य की यदि साधना द्वारा सधा लिया जाय तो ऐसे लाभ मिल सकते हैं जिन्हें देवोपम उपलब्धियाँ प्राप्त करना कहने में अत्युक्ति नहीं मानी जा सकती।
स्वाध्याय ये सभी अतीर्थ हो जाते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-June
स्वाध्याय, मनन से लेकर ध्यान धारणा तक के अवलम्बन अपनी मनःस्थिति के अनुरूप अपनाने पड़ते हैं। विचारणा, भावना एवं आस्था की प्रगाढ़ प्रतिष्ठापना इसी आधार पर सम्भव होती है। तपश्चर्या के औजारों से जमे हुए कुसंस्कारों को उखाड़ना पड़ता है। तप की अग्नि में तपा कर आत्मसत्ता में आर्द्रता उत्पन्न करना और उसे देवत्व के साँचे में ढालना सम्भव होता है। योग को सृजनात्मक और तप को शोधनात्मक ध्वंसात्मक प्रक्रिया कह सकते हैं।
स्वाध्याय, आदि के क्रिया कलापों का समुचित समन्वय करते हुए इस प्रकार निर्धारण करना चाहिए जिसमें आलस्य प्रमाद के लिए कोई गुँजाइश न रहे। विश्राम के लिए रात्रि का समय ही पर्याप्त है। जल्दी सोने और जल्दी उठने की आदत डाली जानी चाहिए। समय का एक क्षण भी बर्बाद न जाने पावे और उसका उपयोग निरर्थक कामों में नहीं वरन् जीवन को सार्थक बनाने वाले निर्वाह की उचित आवश्यकता पूरी करने वाले कार्यों की ही प्रमुखता रहे। मनोरंजन के लिए-थकान दूर करने के लिए-बीच-बीच में थोड़ा-थोड़ा उचित अवकाश देने के लिए गुँजाइश रखी जा सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-January
स्वाध्याय और सत्संग की सहायता से ही यह सम्भव हो सकता है। अपने समीपवर्ती लोग प्रायः स्वार्थपरता और निकृष्टता की दिशा में ही प्रेरणा देते ही दीख पड़ने, ग्रहण करने का प्रयत्न करें। उनके जीवन चरित्र पढ़ें ओर आदर्शवादी प्रेरणाप्रद प्रसंगों एवं व्यक्तियों को अपने सामने रखें। उस स्तर के लोग प्रायः सत्संग के लिए के लिए सदा उपलब्ध नहीं रहते। यदि होते भी हैं तो उनके प्रवचन और कर्म में अन्तर रहने से समुचित प्रभाव नहीं पड़ता।
स्वाध्याय सत्संग, मनन-चिन्तन द्वारा मनः स्थिति में कुविचार फैल ही नहीं सकते। ब्रह्मचर्य व्रतधारी महापुरुषों, हनुमान्, भीष्म, शंकराचार्य, समर्थ गुरु रामदास, विवेकानन्द आदि के उज्ज्वल चरित्रों का स्मरण-चिन्तन-मनोभूमि के पवित्र संस्कारों को सुदृढ़ बनाता है। स्वादेन्द्रिय और कामेन्द्रिय की स्थूल एवं सूक्ष्म लिप्साओं पर नियन्त्रण ही इन्द्रियनिग्रह की दिशा व विधि है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-July
स्वाध्याय को भी अध्यात्म परिष्कार का दैनिक अनिवार्य धर्म कृत्य माना जाना चाहिए।
स्वाध्यायशील व्यक्ति भी अपनी पुस्तकें पढ़ने दे सकते हैं। सरसरी नजर से पढ़ने और पुस्तकें एक ओर पटकते जाने से बहुपठित होने का दावा तो किया जा सकता है, पर वह लाभ नहीं मिल सकता जो स्वाध्यायशीलों को मिला करता है। आवश्यक है कि प्रेरक प्रसंगों और संदर्भों की नोट बुक बनाकर रखी जाय और जो हृदयग्राही लगा हो उसे उसमें नोट करते चला जाय। यह सकल निश्चय ही समुद्र मन्थन के फलस्वरूप निकले हुए रत्नों की तरह बहुमूल्य होगा। इस संग्रह को अवकाश के समय बहुत ध्यानपूर्वक पढ़ा जाय और यह सोचा जाय कि इन प्रसंगों के अनुरूप कदम बढ़ा सकना किस प्रकार सम्भव हो सकता है।
स्वाध्याय स्थूल है। वह पुस्तकों के रूप में सम्पन्न होता है। सत्संग भी स्वाध्याय की श्रेणी में ही आता है। इन दोनों के लिए साहित्य एवं व्यक्ति विशेष की आवश्यकता पड़ती है। सुविधा का समय भी चाहिए और शिक्षा इतनी होनी चाहिए कि इन दोनों का लाभ उठाया जा सकना सम्भव हो सके।
स्वाध्याय के नाम से जाना जाता है। मृतक अथवा जीवित निकटस्थ अथवा दूरस्थ मनीषियों के साथ चाहे जिस विषय पर खुले मन से विचार विनिमय करते रह सकना इसी उपाय से सम्भव हो सकता है। इसलिए शास्त्रकारों ने स्वाध्याय का महत्व भजन से कम नहीं वरन् बढ़कर बताया है। स्वाध्यायान्मा प्रमदतव्य श्रुति वचन में सदुद्देश्य रीति नीति अपनाने वालों के प्रति कठोर अनुशासन निर्दिष्ट किया है कि किसी भी कठिनाई में स्वाध्याय से प्रमाद मत करो। जिस प्रकार नित्य स्नान, मंजन, कपड़े धोना, बुहारी लगाना, बर्तन साफ करना नित्य कर्म में सम्मिलित रहते हे, उसी प्रकार स्वाध्याय को भी अध्यात्म परिष्कार का दैनिक अनिवार्य धर्म कृत्य माना जाना चाहिए।
स्वाध्याय का महत्व भजन से कम नहीं वरन् बढ़कर बताया है। स्वाध्यायान्मा प्रमदतव्य श्रुति वचन में सदुद्देश्य रीति नीति अपनाने वालों के प्रति कठोर अनुशासन निर्दिष्ट किया है कि किसी भी कठिनाई में स्वाध्याय से प्रमाद मत करो। जिस प्रकार नित्य स्नान, मंजन, कपड़े धोना, बुहारी लगाना, बर्तन साफ करना नित्य कर्म में सम्मिलित रहते हे, उसी प्रकार स्वाध्याय को भी अध्यात्म परिष्कार का दैनिक अनिवार्य धर्म कृत्य माना जाना चाहिए।
स्वाध्याय के माध्यम से तो यह सुविधा हर घड़ी उपलब्ध हो सकती है। जिस भी महामानव से कुछ पूछताछ करनी हो उसके साहित्य में से अपने काम के प्रसंग ढूँढ़ने और पढ़ने का कार्य कठिन नहीं सरल है। यह अपनी सुविधा के समय कभी भी किया जा सकता है।
स्वाध्याय की श्रेणी में ही आता है। इन दोनों के लिए साहित्य एवं व्यक्ति विशेष की आवश्यकता पड़ती है। सुविधा का समय भी चाहिए और शिक्षा इतनी होनी चाहिए कि इन दोनों का लाभ उठाया जा सकना सम्भव हो सके। मनन और चिन्तन इन दोनों से सूक्ष्म है। इनके सहारे आत्म समीक्षा और आत्म निर्माण के दोनों महा प्रयोजन सिद्ध हो सकते हैं।
स्वाध्याय का लाभ तो मिलेगा नहीं समय की बर्बादी भर होगी। इतने से ही कोई आत्म प्रवंचना करके सन्तुष्ट हो ले तो बात दूसरी है।
स्वाध्याय को आहार के समतुल्य ही महत्त्वपूर्ण समझा जाना चाहिए।
स्वाध्याय का एक तरह पाठन और दूसरा श्रवण है। कथा, प्रवचन, सत्संग का प्रवचन इसी प्रयोजन के लिए हुआ है। अशिक्षा की कठिनाई एवं स्वयं निष्कर्ष निकालने में असमर्थता की कठिनाई का हल इन उपायों से सरलतापूर्वक निकल आता है। इसलिए कथा, प्रवचनों का पुण्य एवं माहात्म्य पूरे उत्साह के साथ बताया गया है। अभी धर्म क्षेत्र में कथा पुराणों का पठन, श्रवण श्रद्धापूर्वक पुण्य फलदायक माना जाता है और उस प्रकार के प्रयोजनों में बहुत समय तथा धन लगाया जाता है स्वाध्याय दृश्य प्रक्रिया है।
स्वाध्याय के नाम पर कथा पुराणों के पन्ने उलटते रहने वालों की भी कमी नहीं। ऐसे विवेकवान कम है जो यह समझकर स्वाध्याय करते हैं कि आज की अपनी आन्तरिक विकृतियों और समस्याओं का समाधान करने के लिए युग के अनुरूप आदर्शवादी विचार प्रक्रिया क्या हो सकती है? हर युग का अपनी स्थिति होती है। अब से हजारों वर्ष पूर्व जो परिस्थितियाँ थी उसके अनुरूप कथा, पुराण बने है। अब न तो वे परिस्थितियाँ है और न उन समाधानों से कोई काम चलता है।
स्वाध्यायान्मा प्रमदतव्य श्रुति वचन में सदुद्देश्य रीति नीति अपनाने वालों के प्रति कठोर अनुशासन निर्दिष्ट किया है कि किसी भी कठिनाई में स्वाध्याय से प्रमाद मत करो। जिस प्रकार नित्य स्नान, मंजन, कपड़े धोना, बुहारी लगाना, बर्तन साफ करना नित्य कर्म में सम्मिलित रहते हे, उसी प्रकार स्वाध्याय को भी अध्यात्म परिष्कार का दैनिक अनिवार्य धर्म कृत्य माना जाना चाहिए।
स्वाध्याय से प्रमाद मत करो। जिस प्रकार नित्य स्नान, मंजन, कपड़े धोना, बुहारी लगाना, बर्तन साफ करना नित्य कर्म में सम्मिलित रहते हे, उसी प्रकार स्वाध्याय को भी अध्यात्म परिष्कार का दैनिक अनिवार्य धर्म कृत्य माना जाना चाहिए।
स्वाध्याय के लिए सामयिक समाधान प्रस्तुत करने वाले साहित्य को बुनने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। घिसी पिटी लकीर पीटते रहने और अमुक पुस्तक को बार बार घोंटते पीसते रहने से स्वाध्याय का लाभ तो मिलेगा नहीं समय की बर्बादी भर होगी। इतने से ही कोई आत्म प्रवंचना करके सन्तुष्ट हो ले तो बात दूसरी है।
स्वाध्यायशीलों को मिला करता है। आवश्यक है कि प्रेरक प्रसंगों और संदर्भों की नोट बुक बनाकर रखी जाय और जो हृदयग्राही लगा हो उसे उसमें नोट करते चला जाय। यह सकल निश्चय ही समुद्र मन्थन के फलस्वरूप निकले हुए रत्नों की तरह बहुमूल्य होगा। इस संग्रह को अवकाश के समय बहुत ध्यानपूर्वक पढ़ा जाय और यह सोचा जाय कि इन प्रसंगों के अनुरूप कदम बढ़ा सकना किस प्रकार सम्भव हो सकता है। सद्विचारों को व्यवहार में उतारने में क्या कठिनाई पड़ेगी और उसका किस तरह किस सीमा तक निराकरण सम्भव हो सकता है।
स्वाध्याय का है। महामानवों , तत्त्वदर्शियों के साथ संपर्क मिलाना और उनके अन्तःकरण के साथ चाहे जिस समय चाहे जितनी देर तक लिपटे रहना इसी सरल उपाय से सम्भव हो सकता है, जिसे स्वाध्याय के नाम से जाना जाता है। मृतक अथवा जीवित निकटस्थ अथवा दूरस्थ मनीषियों के साथ चाहे जिस विषय पर खुले मन से विचार विनिमय करते रह सकना इसी उपाय से सम्भव हो सकता है। इसलिए शास्त्रकारों ने स्वाध्याय का महत्व भजन से कम नहीं वरन् बढ़कर बताया है। स्वाध्यायान्मा प्रमदतव्य श्रुति वचन में सदुद्देश्य रीति नीति अपनाने वालों के प्रति कठोर अनुशासन निर्दिष्ट किया है कि किसी भी कठिनाई में स्वाध्याय से प्रमाद मत करो।
स्वाध्याय करते हैं कि आज की अपनी आन्तरिक विकृतियों और समस्याओं का समाधान करने के लिए युग के अनुरूप आदर्शवादी विचार प्रक्रिया क्या हो सकती है? हर युग का अपनी स्थिति होती है। अब से हजारों वर्ष पूर्व जो परिस्थितियाँ थी उसके अनुरूप कथा, पुराण बने है। अब न तो वे परिस्थितियाँ है और न उन समाधानों से कोई काम चलता है। ऐसी दशा में स्वाध्याय के लिए सामयिक समाधान प्रस्तुत करने वाले साहित्य को बुनने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं।
स्वाध्याय दृश्य प्रक्रिया है। उसमें नेत्रों के सहारे पुस्तक पढ़ी जाती है। कथा श्रव्य है। उसमें सद्विचारों को कान के सहारे मस्तिष्क तक पहुँचाया जाता है। दोनों का प्रतिफल एक ही है-मानसिक चेतना को उत्कृष्ट वातावरण प्रदान करना विकृतियों और दृष्प्रवृत्तियों का परिमार्जन करना।
स्वाध्याय और चिन्तन के सहारे यह निर्माण खड़ा किया जा सकता है। अपनी रुचि के भविष्य का मार्गदर्शन कर सकने वाले जीवन चरित्रों का संग्रह करना चाहिए। उन्हें ध्यान पूर्वक पढ़ना चाहिए और उनमें जो प्रेरक प्रसंग हो अपनी वर्तमान परिस्थितियाँ कार्यान्वित हो सकते योग्य हो, उन्हें अलग से नोट कर लेना चाहिए। जब भी अवकाश मिले उन प्रसंगों के कल्पना चित्र मस्तिष्क में एक सुनियोजित फिल्म का तरह प्रस्तुत करने चाहिए। श्रेष्ठ मार्ग पर चलते हुए समुन्नत स्थिति तक पहुँचे हुए महामानवों की जीवनियाँ, गतिविधियाँ, नीतियाँ आदि अपने कल्पना लोक में दृढ़तापूर्वक जड़े जमा सके और अनायास ही स्मरण आती रहे तो समझना चाहिए कि बाहरी दुनिया के पतनोन्मुख प्रभात को निरस्त कर सकने वाला स्वनिर्मित वातावरण बनकर तैयार हो गया।
स्वाध्याय से मार्ग दर्शन मिलता है। घटनाएँ सामने आती है और परामर्श मिलते हैं। पर बात इतने भर से ही नहीं बन जाती। सोचना यह भी होगा कि प्रगति पथ पर चलना आज को स्थिति में कितना और किस प्रकार सुलभ हो सकता है योजना तो हर काम की बनानी पड़ती है। उसके बिना तो छुट पुट दैनिक कार्य भी नहीं हो पाते ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-April
स्वाध्याय सत्संग, चिन्तन, मनन और साधना समाधि तक के अगणित प्रगति प्रयास इसी आधार पर होते हैं। व्यक्तित्व और वर्चस्व की-प्रखरता की समस्त सम्भावनायें इसी क्षेत्र के साथ जुड़ी हुई है। परा प्रकृति की साधना एवं गायत्री उपासना के सहारे ही अन्तःचेतना का विकास होता है।
स्वाध्याय उनके लिये तो औषधि बना ही, सैकड़ों को नया जीवन देने वाला है। प्रेम, मैत्री, दया, करुणा, और परोपकारी विचारों को धारण कर कोई भी इसका प्रत्यक्ष लाभ ले सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-December
स्वाध्याय आदि के द्वारा ज्ञान वृद्धि और श्रम एवं क्रमिक विकास की वह उपयुक्त साधन दिखाई देते हैं, जिनके अभ्यास से उन्हें दूर किया था सकता हैं और आनन्द प्राप्ति की अपनी क्षमताओं का विकास किया जा सकता हैं।
स्वाध्याय और सत्संग से सीखा और ज्ञान तो बहुत प्राप्त किया था पर वह ऐसा ही था, जैसे कोई रोटी के सम्बन्ध में ज्ञान तो बहुत रखे पर उसे खाये बिना ही शक्ति प्राप्त करने की बात सोवे। इक्ष्वाकु उस ज्ञान को विचार और व्यावहारिक जीवन में स्थान नहीं दे पावे थे, इसलिये उससे अब तक उन्हें कोई लाभ न मिला था। पर जब उस प्राप्त ज्ञान का विचार और आचरण में अभ्यास करना प्रारम्भ किया तो उनकी मानसिक प्रसन्नता भी बढ़ी और शक्तियों का विकास भी। आचरण की कसौटी पर इक्ष्वाकु का जीवन धीरे-धीरे निखरने लगा। इस तरह एक वर्ष और बीत गया पर मुक्ति का आनन्द इक्ष्वाकु तब भी न से सके।
स्वाध्याय से उनको विश्व-प्रपंच और विश्व के अनेक सूक्ष्म रहस्यों का पता चला। कई बार ऐसे विलक्षण प्रश्न के अनेक सूक्ष्म रहस्यों का पता चला। कई बार ऐसे विलक्षण प्रश्न उठते जिनका समाधान स्वाध्याय से नहीं हो पाता था, फलस्वरूप इक्ष्वाकु ने धर्म समाये आयोजित करनी प्रारम्भ की। उन सभाओं में विद्वान-पुरुषों को आमन्त्रित किया जाता। राजा स्वयं श्रद्धा-भाव से उनकी सेवा करते और उनके सत्संग का लाभ प्राप्त करते, उससे उनके मन की पवित्रता बढ़ अवश्य पर भीतर ही भीतर से क्षुब्ध भी कम न थे, क्योंकि उससे उनको मुक्ति का मार्ग न मिला।
स्वाध्याय में जुट गये। स्वाध्याय से उनको विश्व-प्रपंच और विश्व के अनेक सूक्ष्म रहस्यों का पता चला। कई बार ऐसे विलक्षण प्रश्न के अनेक सूक्ष्म रहस्यों का पता चला। कई बार ऐसे विलक्षण प्रश्न उठते जिनका समाधान स्वाध्याय से नहीं हो पाता था, फलस्वरूप इक्ष्वाकु ने धर्म समाये आयोजित करनी प्रारम्भ की। उन सभाओं में विद्वान-पुरुषों को आमन्त्रित किया जाता।
स्वाध्याय से नहीं हो पाता था, फलस्वरूप इक्ष्वाकु ने धर्म समाये आयोजित करनी प्रारम्भ की। उन सभाओं में विद्वान-पुरुषों को आमन्त्रित किया जाता। राजा स्वयं श्रद्धा-भाव से उनकी सेवा करते और उनके सत्संग का लाभ प्राप्त करते, उससे उनके मन की पवित्रता बढ़ अवश्य पर भीतर ही भीतर से क्षुब्ध भी कम न थे, क्योंकि उससे उनको मुक्ति का मार्ग न मिला। इस तरह एक वर्ष पूरा हो गया।
स्वाध्याय-सत्संग।” और यह कहकर के अन्तर्धान हो गये। इक्ष्वाकु घर लौटे और शास्त्रों, उपनिषदों से लेकर महापुरुषों के उपसानों का संकलन किया और उनके स्वाध्याय में जुट गये। स्वाध्याय से उनको विश्व-प्रपंच और विश्व के अनेक सूक्ष्म रहस्यों का पता चला। कई बार ऐसे विलक्षण प्रश्न के अनेक सूक्ष्म रहस्यों का पता चला।
स्वाध्याय बोल रहा था। कात्यायनी ऐसी भाव-विभोर थी, जैसे कीट भृंग की मधुर गुञ्जार से विमोहित होकर अपना अस्तित्व भूल जाता हैं। वेणुनाद सुनकर सर्प लहराने लगता है। आत्मा का रस प्रवाह है ही ऐसा, जहाँ बहता हैं, वहाँ अमृत पेय का सा रसास्वादन कराता हैं। कात्यायती आत्म-विस्मृत बैठी शोण की वाणी का रस से रही थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-September
स्वाध्याय, संयम एवं सेवा में लगाना चाहिये। यहीं पूर्णता के लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी है। ब्रह्मचारी अवधि में लौकिक जीवन की प्रगति एवं स्थिरता के लिए तैयारी की गई थी। वानप्रस्थ में आध्यात्मिक जीवन की-परमात्मा-विश्व-मानव की सेवा-साधना करने के लिए अग्रसर होते हैं। यह अति महत्त्वपूर्ण समय है।
स्वाध्याय करते छात्र ऐसे भले लग रहे थे जैसे नक्षत्रों से फूटती दिव्य किरणों ने मूर्त स्वरूप धारण कर लिया हो और तब महर्षि कणाद ने स्नान कर साधना-कक्ष में प्रवेश किया। किन्तु आज उनका शरीर इतना थक चुका था कि साधना-प्रकोष्ठ के तीन सोपान भी उनसे चढ़े न जा सके। अन्तिम पैर बढ़ाते ही वह लड़खड़ा गये। उनका कृश-मात भगवती गायत्री की प्रतिमा के सम्मुख जा गिरा। ऋषि अचेत हो गये स्त्र धौम्य।
स्वाध्याय, उपासना और आत्म-शोधन की तपश्चर्या के लिए समय निकालना चाहिये और लोक-मंगल की साधना में नियमित रूप से कम-से-कम चार घण्टा समय देना चाहिए प्रातः और सायंकाल का समय व्यक्तिगत साधना के लिए और दिन का बचा समय लोक-मंगल की सेवा प्रक्रिया में लगाने के लिए नियुक्त रहना चाहिये। कहना न होगा कि समय की आवश्यकता को देखते हुए, आज की सबसे बड़ी लोक सेवा विचार परिवर्तन की दृष्टि से किये गये, प्रयत्नों पर ही निर्भर है। आर्थिक, शारीरिक या बौद्धिक सुविधाएँ बढ़ाने वाले कार्य भी यों सेवा क्षेत्र में आते हैं पर उनका भी
स्वाध्याय भी वे इसलिये करते थे कि इन माध्यमों से विनिर्मित उनका प्रखर व्यक्तित्व लोक-मंगल के लिए अधिक उपयोगी एवं समर्थ सिद्ध हो सके। भिक्षा इसलिये माँगते थे कि आजीविका उपार्जन में उनका बहुमूल्य समय नष्ट न होकर वह समाज के काम आये। ऐसे लोक -सेवी कम संख्या में होते थे, उनके पुनीत कर्तृत्व को देखकर लोग भिक्षा देते हुए भी अपने को धन्य मानते थे। उन दिनों उन हजारों-लाखों लोक-सेवी साधु ब्राह्मणों के सत्प्रयत्नों से अपना समाज हर दृष्टि से सुविकसित और समुन्नत बनता था। तब साधु ब्राह्मणों की संख्या वृद्धि राष्ट्रीय सौभाग्य की वृद्धि गिनी जाती थी।
स्वाध्याय में लगाते थे और शेष सारा समय लोक-मंगल में लगाते थे। निज की न उनकी कोई सम्पत्ति होती थी, न आकांक्षा भजन और स्वाध्याय भी वे इसलिये करते थे कि इन माध्यमों से विनिर्मित उनका प्रखर व्यक्तित्व लोक-मंगल के लिए अधिक उपयोगी एवं समर्थ सिद्ध हो सके। भिक्षा इसलिये माँगते थे कि आजीविका उपार्जन में उनका बहुमूल्य समय नष्ट न होकर वह समाज के काम आये। ऐसे लोक -सेवी कम संख्या में होते थे, उनके पुनीत कर्तृत्व को देखकर लोग भिक्षा देते हुए भी अपने को धन्य मानते थे। उन दिनों उन हजारों-लाखों लोक-सेवी साधु ब्राह्मणों के सत्प्रयत्नों से अपना समाज हर दृष्टि से सुविकसित और समुन्नत बनता था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-January
स्वाध्याय अथवा सत्संग में लग जाइये और यदि अहंकार के चिन्ह दिखाई देते हो, तो बच्चों तक से आदर और विनम्रतापूर्वक व्यवहार करना प्रारम्भ कर दीजिये।
स्वाध्याय बुद्धि को ही दिया जा सकता है।
स्वाध्याय की महिमा अतुल है अनन्त है, जिसने पढ़ने का महत्व जान लिया, उसने सौभाग्य का द्वार पा लिया। जिसने विचार की आवश्यकता अनुभव कर ली, उसने विकास का आधा पथ पार कर लिया, यह जानना चाहिये। “स्वाध्याय से बढ़कर आनन्द कुछ नहीं (गाँधी जी) और ‘मुझे नरक में भेज दो वहाँ भी स्वर्ग बना दूँगा, यदि मेरे पास पुस्तकें हों” (लोकमान्य तिलक)- इन दोनों मूर्धन्य महापुरुषों ने ज्ञान की महत्ता उपरोक्त शब्दों में गा दी।
स्वाध्याय की आकांक्षा को तृप्त करने के लिये सड़कों में जलने वाली बत्तियों के नीचे पढ़ना पड़ता था। किताबें खरीदने के लिये पैसे नहीं होते थे, इसलिये वह भी पुस्तकालय की शरण लेता था। इस तरह उसने ज्ञान वृद्धि की साधना सतत जारी रखी और एक दिन उसकी बौद्धिक प्रतिभा इस योग्य हुई कि ब्रिटिश सरकार ने उसे मद्रास हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया। वह बालक- सर टी. एस. मुत्तुस्वामी अय्यर पहले भारतीय थे, जिनको इस तरह का कोई महत्त्वपूर्ण पद प्रदान किया गया।
स्वाध्याय वृत्ति से वहाँ के जीवन में क्या कोई क्राँति हुई है? इस प्रश्न पर विचार करें तो मालूम होगा कि जापान ने इतनी अधिक उन्नति कर ली है कि वह एशिया के विकसित देशों में अपना प्रथम स्थान रखता है।
स्वाध्याय से बढ़कर आनन्द कुछ नहीं (गाँधी जी) और ‘मुझे नरक में भेज दो वहाँ भी स्वर्ग बना दूँगा, यदि मेरे पास पुस्तकें हों” (लोकमान्य तिलक)- इन दोनों मूर्धन्य महापुरुषों ने ज्ञान की महत्ता उपरोक्त शब्दों में गा दी।
स्वाध्याय वृत्ति का ही प्रतिफल है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-May
स्वाध्याय और मार्ग दर्शन के जितने अच्छे साधन यहाँ है, उतने अच्छे साधन बन में कहाँ मिल सकते हैं?
स्वाध्याय, सत्संग आदि का और अन्तःकरण क्षेत्र में भाव तन्मयता, दृष्टि परिष्कार, समक्ष, समाधि तय, वैराग्य आदि निष्ठाओं का अपना महत्व है। इन प्रकरण को भी वाधि विषानपूर्वक अनुभव मार्ग-दर्शन में अग्रसर किया जाना चाहिये। आस्मिक प्रगति के लिये इनकी भी आवश्यकता है और उनके लिये समुचित प्रयत्न परिश्रम होना चाहिये, किन्तु यह नहीं मान बैठना चाहिये किम उपासना पद्धतियों का डडडड ही आत्मा कल्याण एवं देव अनुग्रह प्राप्त कर लेने के लिये पर्याप्त है। तथ्य यह है कि उपासना के साथ साधना जुड़ी हुई होनी चाहिये। उपासना शरीर है और साधना प्राप्त।
स्वाध्याय से अरुचि जैसी बाधाओं ने ज्यादा पीछा नहीं किया। स्वल्प काल की साधना और तपस्या से ही उन्हें आत्मानुभूति हुई। उनका मुख मण्डल सौंदर्य और आत्मानन्द से खिल उठा। अब उन्हें संसार के अणु-अणु में आनन्द प्राप्त करती हुई, अपनी ही आत्मा दिखाई देने लगी। सब दुःख द्वन्द्व छूट गये।
स्वाध्याय और विवेक से मन तथा प्रेम और सेवा से अन्तःकरण का विकास होता है। जीवन साधन के यह छः आधार ही व्यक्तित्व के उत्कर्ष में सहायक होते है। जिस प्रकार काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर यह छः शुभ माने गये हैं, उसी प्रकार अन्तरंग में अवस्थित यह छः मित्र भी ऐसे है कि यदि मनुष्य इनका समर्थन प्राप्त कर सके तो अपनी समस्त तुच्छताओं पर विजय प्राप्त कर जीवन लक्ष्य की प्राप्ति में निश्चित रूप से सफलता प्राप्त कर सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-March
स्वाध्याय-हीनता के दोष के कारण अपना-अपना स्थान छोड़कर छोटी-मोटी नौकरी में चले गये है। ऐसे विशाल एवं सम्मानित क्षेत्र को अपने अवांछनीय दोष के कारण भाग खड़ा होना मनुष्य के लिए बड़ी लज्जाप्रद असफलता है।
स्वाध्याय जीवन विकास के लिये एक अनिवार्य आवश्यकता है, जिसे हर व्यक्ति को पूरी करना चाहिये। अनेक लोग परिस्थितिवश अथवा प्रारम्भिक प्रमादवश पढ़-लिख नहीं पाते और जब आगे चल कर उन्हें शिक्षा और स्वाध्याय के महत्व का ज्ञान होता है, तब हाथ मल-मल कर पछताते रहते है।
स्वाध्याय को कभी नहीं छोड़ता। इसीलिये तो गुरुकुल से अध्ययन पूरा करने के बाद विद्या लेते समय गुरु, शिष्य को यही अन्तिम उपदेश दिया करता था--
स्वाध्याय निःसन्देह एक ऐसा अमृत है, जो मानस में प्रवेश कर मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को नष्ट कर देता है।
स्वाध्याय करता और ज्ञान को व्यापक बनाता और माँजता रहता है। प्रमाद एवं परिश्रम का जो परिणाम होना है, वह दोनों के सामने उसी रूप में आता है। निदान वकील पीछे पड़ जाता है और नया आगे निकल जाता है।
स्वाध्याय में तो लगाता है। इसलिये उसके पास कोई फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा और दूषित वातावरण से अवांछनीय तत्त्व ग्रहण कर लायेगा।
स्वाध्याय में प्रमाद करने लगते हैं कि हम तो इस क्षेत्र में महारथी हैं, इस विषय के सर्वज्ञ है, कोई दूसरा हमारे सामने खड़े होने का साहस ही नहीं कर सकता। किन्तु नया आया हुआ वकील नियमपूर्वक अपने विषय का अनुदैनिक स्वाध्याय करता और ज्ञान को व्यापक बनाता और माँजता रहता है। प्रमाद एवं परिश्रम का जो परिणाम होना है, वह दोनों के सामने उसी रूप में आता है। निदान वकील पीछे पड़ जाता है और नया आगे निकल जाता है।
स्वाध्याय। जो वकील धारावाहिक रूप में बोल कर न्यायालय का वायु-मण्डल प्रभावित कर अपने पक्ष का समर्थन जीत लेता है -वह निश्चय ही बिलाना। घंटों स्वाध्याय का व्रती होगा। इसके विपरीत जो वकील अविश्वासपूर्ण विश्रृंखल प्रतिपादन करता हुआ दिखलाई दे, विश्वास कर लेना चाहिए कि वह स्वाध्याय शील नहीं है।
स्वाध्याय में रुचि है ओर जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है, वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय स्वाध्याय में तो लगाता है। इसलिये उसके पास कोई फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा और दूषित वातावरण से अवांछनीय तत्त्व ग्रहण कर लायेगा।
स्वाध्याय स्वयं ही एक तप, आसन और निदिप्यास के समान है। इसका नियम निर्वाह से आप ही आप अनेक नियम, संयमों का अभ्यास हो जाता है।
स्वाध्याय का अनुगमन करती है, इस सत्य का सम्मान करता हुआ जो साधक उसकी उपासना किया करता है, वह अवश्य उसकी कृपा का भागी बन जाता है।
स्वाध्याय न करते हों। स्वाध्याय उनके जीवन का एक अंग और प्रतिदिन की अनिवार्य आवश्यकता बन जाता है। जिस दिन वे अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर पाते, उस दिन वे अपने तन-मन और आत्मा में एक भूख, एक रिक्तता का कष्ट अनुभव किया करते हैं। उस दिन का वे जीवन का एक मनहूस दिन मानते और उस मनहूस दिन को कभी भी अपने जीवन में आने का अवसर नहीं देते।
स्वाध्याय से विरत हो जाने वाला नई पूँजी पाना तो क्या गाँठ की विद्या भी खो देता है।
स्वाध्याय का सुफल होता है, जिसे वे किसी दिन भी, जिसे वे किसी दिन भी, किसी अवस्था में नहीं छोड़ते। उनके जीवन का कदाचित ही कोई ऐसा अभागा दिन जाता हो, जिसमें वे मनोयोगपूर्वक घण्टे दो घण्टे स्वाध्याय न करते हों। स्वाध्याय उनके जीवन का एक अंग और प्रतिदिन की अनिवार्य आवश्यकता बन जाता है। जिस दिन वे अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर पाते, उस दिन वे अपने तन-मन और आत्मा में एक भूख, एक रिक्तता का कष्ट अनुभव किया करते हैं। उस दिन का वे जीवन का एक मनहूस दिन मानते और उस मनहूस दिन को कभी भी अपने जीवन में आने का अवसर नहीं देते।
स्वाध्याय, श्रम आदि अन्य सद् प्रवृत्तियों को स्थिर रूप से प्राप्त करने का अवसर मिला है। आत्म-विश्लेषण चिन्तन, मनन और अन्तःमन्थन के आधार पर यह सुनिश्चित रूप से कह सकते हैं कि हमें यदि अन्तरंग विभूतियाँ प्राप्त हुई हैं और उनके आधार पर बाह्य जगत में कुछ हलचलें उत्पन्न करने का अवसर मिला है तो इसका एक मात्र कारण हमारे अन्तःकरण में आदि से अन्त तक लबालब भरा हुआ प्यार ही है। ईश्वर को माध्यम बनाकर उसकी कृषि की गई और जब वह उगा और फला तो उसका प्रकाश निकटवर्तियों से लेकर दूरवर्तियों तक व्यापक क्षेत्र में फैला। दूसरों ने उससे लाभ उठाया और हम स्वयं स्वर्गीय उल्लास की अनुभूति हर घड़ी करते रहे। उसी आवेश में लोक-सेवा और आत्मबल संवर्धन के वे कार्य बन पड़े जो वस्तुतः तुच्छ हैं पर दूसरे उन्हें बहुत बढ़ा-चढ़ा देखते हैं।
स्वाध्यायी व्यक्ति पर कुसंग का भी प्रभाव नहीं पड़ने पाता, इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है। जिसकी स्वाध्याय में रुचि है ओर जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है, वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय स्वाध्याय में तो लगाता है। इसलिये उसके पास कोई फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा और दूषित वातावरण से अवांछनीय तत्त्व ग्रहण कर लायेगा।
स्वाध्यायशील के पास कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
स्वाध्याय द्वारा योग्यता बढ़ाने में प्रमाद मत करना।
स्वाध्याय, उनके विचारों का चिन्तन-मनन नहीं करता। सोच लेता है जब मैं इतना क्रिया-काण्ड करता हूँ तो इसके बाद अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। आत्म-ज्ञान अथवा परमात्म अनुभूति करा देने के लिए इतना ही पर्याप्त है तो निश्चय ही वह भ्रम में है। आत्मा का क्षेत्र वैचारिक क्षेत्र है, सूक्ष्म भावनाओं एवं मनन-चिन्तन का क्षेत्र हैं।
स्वाध्याय से जहाँ संचित ज्ञान सुरक्षित तो रहता ही है, साथ ही उस न कोष में नवीनता और वृद्धि भी होती रहती है। वहाँ स्वाध्याय से विरत हो जाने वाला नई पूँजी पाना तो क्या गाँठ की विद्या भी खो देता है।
स्वाध्यायात् मा प्रमद।”
स्वाध्याय किसी दिन भी न करिये और देखिये कि सरस्वती सिद्धि तो दूर पास की पढ़ी हुई विद्या भी विलुप्त हो जायेगी। सरस्वती स्वाध्याय का अनुगमन करती है, इस सत्य का सम्मान करता हुआ जो साधक उसकी उपासना किया करता है, वह अवश्य उसकी कृपा का भागी बन जाता है।
स्वाध्याय शील नहीं है।
स्वाध्यायशील व्यक्ति के निकट नहीं जाने पातीं। इसका भी एक वैज्ञानिक हेतु ही है कोई सुरक्षा कवच का प्रभाव नहीं हैं। जिसे पढ़ना है और नित्य नियम से जीवन का ध्येय समझ का पढ़ना है, वह तो हर अवस्था में अपने उस व्रत का पालन करेगा ही। अव्यवस्था अथवा अनियमितता, वह जानता है उसके इस रुचिपूर्ण व्रत में बाधक होगी, वह जानता है उसके इस रुचिपूर्ण व्रत में बाधक होगी, अस्तु वह जीवन की एक सुनिश्चित दिनचर्या बनाकर चलता है। उसका सोना, जागना, खाना-पीना टहलना-घूमना और कार्य करने के साथ-साथ पढ़ने-लिखने का कार्यक्रम एक व्यवस्थित रूप में बड़े अच्छे ढंग से चला करता है।
स्वाध्याय और उसका चिन्तन मनन भी किया जाये तो बहुत कुछ उस दिशा में बढ़ा जा सकता है। स्वाध्याय स्वयं ही एक तप, आसन और निदिप्यास के समान है। इसका नियम निर्वाह से आप ही आप अनेक नियम, संयमों का अभ्यास हो जाता है।
स्वाध्याय से मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल कर देने और उसके अंतर्पट खोलने की सहज क्षमता विद्यमान् है। आन्तरिक उद्घाटन हो जाने से मनुष्य स्वयं ही आत्मा अथवा परमात्मा के प्रति जिज्ञासु हो उठता है। उसकी चेतना ऊर्ध्वमुखी होकर उसी ओर को उड़ने के लिए पर तोलने लगती है। उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियों का प्रस्फुटन स्वाध्याय के द्वारा ही हुआ करता है। स्वाध्याय निःसन्देह एक ऐसा अमृत है, जो मानस में प्रवेश कर मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को नष्ट कर देता है।
स्वाध्याय को मनुष्य का पथ प्रदर्शक नेता और मित्र जैसा हितैषी बताया है। उनका कहना है कि जो व्यक्ति सत्पथ-प्रदर्शक बताया है, उसका नाड़ी आदि इन्द्रियों पर अधिकार नहीं रहता। उसका मन चंचल विवेकानंद और बुद्धि कुण्ठित रहती है। इन ड़ड़ड़ड़ के कारण उसे दुःखों का भागी बनना पड़ता है। इसलिये बुद्धिमान् व्यक्ति वही है, जो अपने सच्चे मित्र स्वाध्याय को कभी नहीं छोड़ता।
स्वाध्याय, जमी प्रेक्टिस, प्रमाणित प्रतिभा और लम्बे अनुभव के अभिमान में आकर यह सोच कर दैनिक स्वाध्याय में प्रमाद करने लगते हैं कि हम तो इस क्षेत्र में महारथी हैं, इस विषय के सर्वज्ञ है, कोई दूसरा हमारे सामने खड़े होने का साहस ही नहीं कर सकता। किन्तु नया आया हुआ वकील नियमपूर्वक अपने विषय का अनुदैनिक स्वाध्याय करता और ज्ञान को व्यापक बनाता और माँजता रहता है। प्रमाद एवं परिश्रम का जो परिणाम होना है, वह दोनों के सामने उसी रूप में आता है। निदान वकील पीछे पड़ जाता है और नया आगे निकल जाता है।
स्वाध्याय, सत्संग, श्रम, ईश्वर -चिन्तन तथा दृढ़ संकल्प आदि के साधन अभ्यास करते रहने से कठिन कहा जाने वाला ब्रह्मचर्य का व्रत सरल तथा सुखदायक बन जाता है। जीवन की सफलता तथा स्वास्थ्य के लिए ब्रह्मचारी होकर रहना ही श्रेयस्कर तथा कल्याणकारी है।
स्वाध्याय का एक साधारण और मनोवैज्ञानिक फल है। सद्ग्रन्थों में सन्निहित साधु वाणियों का निरन्तर अध्ययन एवं मनन करते रहने से मन पर शिव संस्कारों की स्थापना होती हैं, जिससे चित्त अपने आप दुष्कृत्यों की ओर से फिर जाता है। स्वाध्यायी व्यक्ति पर कुसंग का भी प्रभाव नहीं पड़ने पाता, इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है। जिसकी स्वाध्याय में रुचि है ओर जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है, वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय स्वाध्याय में तो लगाता है। इसलिये उसके पास कोई फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा और दूषित वातावरण से अवांछनीय तत्त्व ग्रहण कर लायेगा।
स्वाध्याय के ध्येय को अनेक तरह पूरा किया जा ही सकता है।
स्वाध्याय में रुचि है और उसके महत्व का हृदयंगम कर लिया गया है तो शिक्षा अथवा अशिक्षा का कोई व्यवधान नहीं आता, स्वाध्याय के ध्येय को अनेक तरह पूरा किया जा ही सकता है।
स्वाध्याय उनके जीवन का एक अंग और प्रतिदिन की अनिवार्य आवश्यकता बन जाता है। जिस दिन वे अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर पाते, उस दिन वे अपने तन-मन और आत्मा में एक भूख, एक रिक्तता का कष्ट अनुभव किया करते हैं। उस दिन का वे जीवन का एक मनहूस दिन मानते और उस मनहूस दिन को कभी भी अपने जीवन में आने का अवसर नहीं देते।
स्वाध्यायशील के पास जाने का कोई प्रयोजन अथवा साहस ही न रखेगा और यदि संयोगवश ऐसे कोई व्यक्ति आ भी जाते हैं तो उसके पास का वातावरण अपने अनुकूल न पाकर, देर तक ठहर ही न पायेंगे। निदान संगत-असभ्य आचरण दोषों का स्वाध्यायशील के पास कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
स्वाध्याय का व्रती होगा। इसके विपरीत जो वकील अविश्वासपूर्ण विश्रृंखल प्रतिपादन करता हुआ दिखलाई दे, विश्वास कर लेना चाहिए कि वह स्वाध्याय शील नहीं है।
स्वाध्याय हीन वकील अथवा प्रोफेसर अपने काम में सफल नहीं हो पाते और प्रगति की दौड़ में पीछे पड़े हुये घिसटते रहते हैं। उनको अपने पेशे में कोई अभिरुचि नहीं रहती और शीघ्र ही वे उसे छोड़कर भाग जाने की सोचने लगते है।
स्वाध्याय के महत्व का ज्ञान होता है, तब हाथ मल-मल कर पछताते रहते है।
स्वाध्याय के द्वारा ही हुआ करता है। स्वाध्याय निःसन्देह एक ऐसा अमृत है, जो मानस में प्रवेश कर मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को नष्ट कर देता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-April
स्वाध्याय शील धार्मिक और ईश्वर परायण महात्मा थे, उनकी धर्मपत्नी भी सुशील स्त्री थी। समय पाकर उनके उन्हीं गुणों वाले दो पुत्र जन्मे बड़े का नाम पुण्रु और छोटे का नाम पावन रखा गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-August
स्वाध्याय, संयम एवं सेवा में लगाना चाहिये। यहीं पूर्णता के लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी है। ब्रह्मचारी अवधि में लौकिक जीवन की प्रगति एवं स्थिरता के लिए तैयारी की गई थी। वानप्रस्थ में आध्यात्मिक जीवन की-परमात्मा-विश्व-मानव की सेवा-साधना करने के लिए अग्रसर होते हैं। यह अति महत्त्वपूर्ण समय है।
स्वाध्याय करते छात्र ऐसे भले लग रहे थे जैसे नक्षत्रों से फूटती दिव्य किरणों ने मूर्त स्वरूप धारण कर लिया हो और तब महर्षि कणाद ने स्नान कर साधना-कक्ष में प्रवेश किया। किन्तु आज उनका शरीर इतना थक चुका था कि साधना-प्रकोष्ठ के तीन सोपान भी उनसे चढ़े न जा सके। अन्तिम पैर बढ़ाते ही वह लड़खड़ा गये। उनका कृश-मात भगवती गायत्री की प्रतिमा के सम्मुख जा गिरा। ऋषि अचेत हो गये स्त्र धौम्य।
स्वाध्याय, उपासना और आत्म-शोधन की तपश्चर्या के लिए समय निकालना चाहिये और लोक-मंगल की साधना में नियमित रूप से कम-से-कम चार घण्टा समय देना चाहिए प्रातः और सायंकाल का समय व्यक्तिगत साधना के लिए और दिन का बचा समय लोक-मंगल की सेवा प्रक्रिया में लगाने के लिए नियुक्त रहना चाहिये। कहना न होगा कि समय की आवश्यकता को देखते हुए, आज की सबसे बड़ी लोक सेवा विचार परिवर्तन की दृष्टि से किये गये, प्रयत्नों पर ही निर्भर है। आर्थिक, शारीरिक या बौद्धिक सुविधाएँ बढ़ाने वाले कार्य भी यों सेवा क्षेत्र में आते हैं पर उनका भी
स्वाध्याय भी वे इसलिये करते थे कि इन माध्यमों से विनिर्मित उनका प्रखर व्यक्तित्व लोक-मंगल के लिए अधिक उपयोगी एवं समर्थ सिद्ध हो सके। भिक्षा इसलिये माँगते थे कि आजीविका उपार्जन में उनका बहुमूल्य समय नष्ट न होकर वह समाज के काम आये। ऐसे लोक -सेवी कम संख्या में होते थे, उनके पुनीत कर्तृत्व को देखकर लोग भिक्षा देते हुए भी अपने को धन्य मानते थे। उन दिनों उन हजारों-लाखों लोक-सेवी साधु ब्राह्मणों के सत्प्रयत्नों से अपना समाज हर दृष्टि से सुविकसित और समुन्नत बनता था। तब साधु ब्राह्मणों की संख्या वृद्धि राष्ट्रीय सौभाग्य की वृद्धि गिनी जाती थी।
स्वाध्याय में लगाते थे और शेष सारा समय लोक-मंगल में लगाते थे। निज की न उनकी कोई सम्पत्ति होती थी, न आकांक्षा भजन और स्वाध्याय भी वे इसलिये करते थे कि इन माध्यमों से विनिर्मित उनका प्रखर व्यक्तित्व लोक-मंगल के लिए अधिक उपयोगी एवं समर्थ सिद्ध हो सके। भिक्षा इसलिये माँगते थे कि आजीविका उपार्जन में उनका बहुमूल्य समय नष्ट न होकर वह समाज के काम आये। ऐसे लोक -सेवी कम संख्या में होते थे, उनके पुनीत कर्तृत्व को देखकर लोग भिक्षा देते हुए भी अपने को धन्य मानते थे। उन दिनों उन हजारों-लाखों लोक-सेवी साधु ब्राह्मणों के सत्प्रयत्नों से अपना समाज हर दृष्टि से सुविकसित और समुन्नत बनता था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-July
स्वाध्याय और अनुशीलन किया था जिनके पिता इतने प्रकाण्ड विद्वान् थे कि सारा संसार उन्हें मस्तक टेकता था वही शुक निरहंकार भाव से सभा मण्डप में गये और महाराज का गुरुभाव से प्रणाम कर एक ओर आसन पर बैठ गये। महापण्डित के इस विनम्र आचरण पर सम्पूर्ण सभा गद्-गद् हो गई।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-October
स्वाध्याय, स्वास्थ्य, सहयोग आदि के द्वारा कम शिक्षित और दलित लोगों को भी आगे बढ़ाते है, इसका सामूहिक फल प्रत्येक मनुष्य के लिए लाभदायक ही होता है। इसका एक दूसरा पहलू भी है और वह यह कि कमजोर मनुष्य अविकसित मनुष्य बाह्य परिस्थितियों से सीखकर भी अपनी क्षमताएँ और योग्यताएँ इसी प्रकार बढ़ा सकता है।
स्वाध्याय एवं सत्संग के साधन भी जुटाये जाने चाहिये। अनुभवों के एकत्रीकरण के लिए योजनाबद्ध यात्राएँ उपयोगी होती है। मनोरंजन के लिये कुछ खर्च करना चाहिए। निर्वाह के अतिरिक्त उपरोक्त खर्च भी आवश्यक मद में ही जोड़े जा सकते है। इनके लिये कुछ पैसा तभी बचाया जा सकता है जब फिजूल खर्ची की सारी मदे कड़ाई के साथ काट दी जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-November
स्वाध्याय, चिन्तन और मनन यह साधना की प्रारम्भिक आवश्यकतायें है, शिखिध्वज! आज तुम्हारी मन्त्र-दीक्षा सम्पन्न हुई। पूजन की सामग्री, उपयुक्त पात्र, कुश-आसन यह अपने पास रखने होंगे। पंचोपचार पूजन सहित मंत्र जप करना चाहिये और शुभ्र ज्योति स्वरूप निराकार भगवती गायत्री का ध्यान करना चाहिये। जब तुम इस प्रारम्भिक साधना को सफलतापूर्वक पूरा कर लोगे तो आगे उच्चस्तरीय साधना के लिये, तुम्हें अग्नि-दीक्षा भी देंगे।” यह कहकर महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए।
स्वाध्याय के महत्व पर प्रकाश डाला जाता है, जिसके कारण आज वहाँ के पुस्तकालय लोगों के सामाजिक अंग बन चुके है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-November
स्वाध्याय कर सकने योग्य विचारोत्तेजक स्वाध्याय सामग्री (3) आयोजनों और सम्मेलनों द्वारा जनमानस को उद्वेलित करने वाला लोक शिक्षण (4) रचनात्मक और संघर्षात्मक आन्दोलन का सुव्यवस्थित अभियान। यह सारी प्रक्रिया पिछले दिनों गायत्री तपोभूमि मथुरा में स्थापित युग−निर्माण योजना द्वारा संचालित होती रही है। भविष्य में भी सुविस्तृत क्रिया−कलाप वहीं से चलेगा। इसमें से थोड़े से विशिष्ट कार्य अब हरिद्वार में आरम्भ किये जा रहे हैं। इसे अधिक बढ़े हुए कार्य का वर्गीकरण विभाजन भी कह सकते हैं और यह भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति द्वारा व्यक्ति को उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की आवश्यकता पूरी करने वाली थोड़ी सी गतिविधियों का संचालन शान्ति कुँज के नये आश्रम से होगा।
स्वाध्याय, सत्संग, पर्यटन एवं ज्ञान संचय के अन्यान्य प्रयोजनों में संलग्न रहते हैं। सम्मान पाने, नेतृत्व करने, यशस्वी होने सम्पन्न बनने, अवरोधों को निरस्त करने—और उपभोग की सरलता चखने जैसी महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति का ताना−बाना यहीं बुना जाता है। इसके लिए मस्तिष्क को अधिक विकसित करने के जो भी विनोदात्मक, उपभोगात्मक एवं संवर्धनात्मक साधन उपलब्ध हो सकते हैं उन्हें निरन्तर जुटाया जाता रहता है।
स्वाध्याय और सत्संग है। शास्त्र और सत् संपर्क से यह प्रयोजन पूरा होता है प्रशिक्षित मनःस्थिति यह लाभ चिन्तन और मनन से भी ले सकती है। पशु को मनुष्य बनाने के लिए उस सद्ज्ञान की अनिवार्य आवश्यकता रहती है जो उसकी चिन्तन प्रक्रिया एवं कार्य−पद्धति में उच्चस्तरीय उभार उत्पन्न कर सके।
स्वाध्याय।
स्वाध्यायशील और चिन्तन के ऊहापोह में गहरी दिलचस्पी रखने वाले—लेखक के लिए अनायास ही कुछ प्रयास करते रहने वाले ही अपनी रुचि विशेषता एवं अध्ययन क्षमता के आधार पर ही लेखक बन सकते हैं। जो चाहे वही लेखक बन तो सकता है पर उसके लिए दीर्घकालीन अध्यवसाय की आवश्यकता पड़ती है। अध्यापक स्तर के वे लोग जिनकी शिक्षा ग्रेजुएट समकक्ष है अधिक आसानी से और कम समय में लेखन की क्षमता उपलब्ध कर सकने में सफल हो सकते हैं। इसलिए लोक शिक्षण सत्र में ही इस शिक्षा व्यवस्था को भी सम्मिलित कर दिया गया है जिसे जून 74 के पन्द्रह−पन्द्रह दिवसीय दो सत्रों में सम्पन्न किया गया था। इस वर्ष अधिक व्यस्त समय और अधिक श्रम करे ऐसा पाठ्य क्रम बनाया गया है जिसमें पन्द्रह दिन जितनी स्वल्प अवधि में ही लोक शिक्षण की विधि−व्यवस्था और लेखन के लिए तथ्यों को हृदयंगम किया जाना आवश्यक है उन्हें सार रूप से किन्तु गम्भीरतापूर्वक समझा दिया जायगा।
स्वाध्याय सामग्री (3) आयोजनों और सम्मेलनों द्वारा जनमानस को उद्वेलित करने वाला लोक शिक्षण (4) रचनात्मक और संघर्षात्मक आन्दोलन का सुव्यवस्थित अभियान। यह सारी प्रक्रिया पिछले दिनों गायत्री तपोभूमि मथुरा में स्थापित युग−निर्माण योजना द्वारा संचालित होती रही है। भविष्य में भी सुविस्तृत क्रिया−कलाप वहीं से चलेगा। इसमें से थोड़े से विशिष्ट कार्य अब हरिद्वार में आरम्भ किये जा रहे हैं। इसे अधिक बढ़े हुए कार्य का वर्गीकरण विभाजन भी कह सकते हैं और यह भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति द्वारा व्यक्ति को उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की आवश्यकता पूरी करने वाली थोड़ी सी गतिविधियों का संचालन शान्ति कुँज के नये आश्रम से होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-December
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन आदि द्वारा प्रशिक्षित एवं परिष्कृत किया जा सकता है पर अचेतन पर इन प्रक्रियाओं का बहुत थोड़ा प्रभाव पड़ता है। उसे निरन्तर के दीर्घकालीन अभ्यास ही प्रभावित करते हैं। इस दृष्टि से तत्व वेत्ताओं ने कितने ही प्रकार की विशिष्ट साधनाएँ विनिर्मित की हैं। इन्हें योगाभ्यास के नाम से पुकारा जाता है। जप और ध्यान इस प्रयोजन की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता पूरी करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-March
स्वाध्याय और सत्संग की महिमा इसी आधार पर गाई गर्ठ है कि उन माध्यमों से आदर्शवादी रीति−नीति अपनाने की प्रेरणा मिलती है। कुसंग से पतन वाला तथ्य भी सर्वमान्य है। अपवाद तो किसी भी क्षेत्र में पाये जा सकते हैं पर सर्वमान्य प्रक्रिया यही है कि उत्कर्ष और अपकर्ष का— स्वभाव और रुझान का बहुत बड़ा आधार सम्बद्ध जन−समूह से मिलने वाली प्रेरणा ही रहती है। इन तथ्यों पर जितनी अधिक गम्भीरता से विचार किया जाय उतनी ही अच्छी तरह यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य की प्रगति मनः स्थिति और गति विधि का निर्माण पारस्परिक सहयोग के आधार पर ही विनिर्मित होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-February
स्वाध्याय और सत्संग में मिल सकती है, जो काय-कलेवर और आत्मा की मित्रता का—उनके पारस्परिक सम्बन्धों का विवेचन विश्लेषण कर सके एवं वासना-तृष्णा की सुखलिप्सा से ऊँचे उठकर उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता अपना कर आंतरिक उल्लास की उपलब्धि का मार्ग-दर्शन कर सके। विषय-चर्चा से जिस प्रकार कानों को रस मिलता है, मनोरम दृश्य देखकर आँखें जिस प्रकार मुदित होती हैं, उसी प्रकार आत्म-चेतना को उस उद्बोधन में प्रसन्नता मिलती हैं, जिसके आधार पर अन्तःकरण को सद्भावनाओं से ओत-प्रोत बनाया जा सके। आत्म-शान्ति का द्वार तब खुलता है, जब सत्प्रवृत्तियों से भरी-पूरी गतिविधियाँ अपना कर यह अनुभव किया जाता है कि जीवन के स्वरूप और लक्ष्य के अनुरूप गतिविधियाँ अपना कर अपूर्णता से पूर्णता की ओर कदम बढ़ते चल रहे हैं। उच्च भावनाओं के अनुरूप क्रियाकलाप जब बन पड़ता है तो जीवन-क्रम का वह स्वरूप बन जाता है, जिसमें आत्मा को शान्ति और तृप्ति प्राप्त हो सके, वह भव-बन्धनों से मुक्त होकर नर से नारायण बन सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-January
स्वाध्याय, संयम और सेवा के चतुर्विध परमार्थ प्रयोजनों में निरत परमार्थ−परायण व्यक्ति कहना चाहिए। ऐसे लोग जितने अधिक किसी देश में होंगे, वह उतना ही अधिक फूलेगा फलेगा।
स्वाध्याय, सत्संग से आत्मिक−प्रगति का महान् प्रयोजन पूरा नहीं होता। विचारणा के साथ क्रिया−प्रक्रिया जुड़ी रहने पर ही संस्कार बनते हैं, आस्थाएँ सुदृढ़ होती हैं और स्तर परिपक्व बनते हैं। इसलिए उत्कृष्ट विचारणा के साथ आदर्श क्रिया−पद्धति को जोड़ने से ही श्रेय साधना की धारा गतिगामिनी होती है। वानप्रस्थ प्रयोजन में इन सभी सन्दर्भों का समावेश है, उसे अपना कर हम अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करने का, अन्तःचेतना में उच्चस्तरीय तत्वों के समावेश का उद्देश्य पूराकर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-April
स्वाध्याय सत्संग −मनन चिन्तन− योग तप आदि के समस्त साधन,उपचार,ईश्वर प्राप्ति का लक्ष्य पूरा करने के लिए ही बनाये गये हैं।
स्वाध्यायशील रहे हैं। जिन्हें पहले से भी कुछ लिखते रहने का अभ्यास रहा है। ऐसे ही लोगों को स्वल्प अवधि में निखार देकर पत्र−पत्रिकाओं में लिखने तथा युगान्तरकारी साहित्य सृजन के महत्वपूर्ण कार्य में जुटाया जा सकता है। इन सत्रों में छात्रों को सम्मिलित कर सकना सम्भव न होगा। लेखन के लिए दीर्घकालीन स्वाध्याय होना आवश्यक है।
स्वाध्याय होना आवश्यक है। मात्र स्कूली अक्षर ज्ञान से वह विचारकता उत्पन्न नहीं हो सकती जो कुशल और सफल लेखन के लिए आवश्यक है। कभी सुविधा हुई तो छात्रों और नव−युवकों को भी इस प्रकार के शिक्षण की व्यवस्था करेंगे अभी तो प्रौढ़,स्वाध्यायशील और अनुभवी ही इस दिशा में संक्षिप्त मार्ग−दर्शन देकर कार्यक्षेत्र में उतारने की बात है।
स्वाध्यायशील विचारकों के लिए पन्द्रह−पन्द्रह दिन के लेखनी सत्र (4) मधुर कण्ठ एवं संगीत में गति रखने वाले प्रचार प्रयोजन के लिए उपयुक्त स्थिति वाले व्यक्तियों के लिए तीन−तीन महीने के संगीत सत्र (5) महिला जागरण में रुचि लेने वाली—हलके डडडड उत्तरदायित्वों वाली—शिक्षित महिलाओं के लिए तीन−तीन महीने के नारी उत्थान सत्र।
स्वाध्यायशील और अनुभवी ही इस दिशा में संक्षिप्त मार्ग−दर्शन देकर कार्यक्षेत्र में उतारने की बात है।
स्वाध्याय में—महा मान करके सत्संग सान्निध्य में—तत्व दर्शन के मनन चिन्तन में सम्भव हो सकता है। टेलीफोन वार्ता की तरह भगवान से वार्तालाप करने की और टेलीविजन पर चलते−फिरते ईश्वर को देखने की निरर्थक उड़ानें उड़ना छोड़कर ही हम वास्तविकता के निकट पहुँच सकते हैं। भ्रम जंजाल गढ़ कर तो हम अपने आपको अवास्तविकता के ऐसे जाल में अधिकाधिक फँसाते चले जायेंगे जिसमें बालू से तेल निकालने जैसे निरर्थक प्रयासों की तरह निराशा ही हाथ लगेगी। सुखद कल्पना गढ़ लेना और ईश्वर के साथ क्रीड़ा कल्लोल, हास−विलास करते रहना एक बात है और वैसी यथार्थता का होना दूसरी। कलपना की उड़ानें सम्भव है किसी का भावनात्मक समाधान कर सकें पर वास्तविकता के क्षेत्र में उसके हाथ कोई बड़ी उपलब्धि मिल नहीं सकेगी यह भी सत्य है।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन, ध्यान प्रभृति, ज्ञान पक्ष तक सीमित रहने वाली प्रक्रिया अपूर्ण एवं एकांगी है। इसी प्रकार जिन्होंने चिन्तन परिष्कार को तिलाञ्जलि देकर मात्र जप, तप के, हठ योग के, काय−कष्ट तक सीमित विधि−विधान को ही सब कुछ मान लिया है वे भी एक पहिये की गाड़ी चलाने वालों की तरह असफल रहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-July
स्वाध्याय,नित्य कहानियाँ कहना—घर की तथा समाज की समस्याओं पर विचार विनियम, खेल, विनोद, मनोरंजन,शाक−वाटिका, टूटी−फूटी वस्तुओं की मरम्मत, गृह−शिल्प, पढ़ाना आदि कार्यों के लिए घर वालों के साथ स्वयं जुटाना चाहिए ताकि उनमें सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन करके सच्चा पारिवारिक उत्तरदायित्व निवाहा जा सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-February
स्वाध्याय और सत्संग पर इसलिए विशेष जोर दिया गया है कि मनुष्य अपनी बुराइयाँ और कमजोरियाँ जो साधारणतः समझ में नहीं आती, इन दोनों के आधार पर ढूंढ़े और पहचाने।
स्वाध्याय तथा चित्त को एकाग्र बनाना मुख्य है, क्योंकि उनको मनुष्य थोड़े प्रयत्न से कहीं भी प्राप्त कर सकता है। चित्त के एकाग्र होने से प्रत्येक प्रकार के जप और भजन का फल स्पष्ट देखने में आता है।
स्वाध्याय, सत्संग कथा, कीर्तन, तीर्थ यात्रा, मौन तितीक्षा, यम, नियम आदि का उद्देश्य यह है कि व्यक्ति अपने भीतर निरन्तर काम करने वाली दैवी और आसुरी प्रकृतियों में से आसुरी प्रकृति का दमन करके दैव प्रकृति का विकास करें। इसके लिए स्वाध्याय और सत्संग पर इसलिए विशेष जोर दिया गया है कि मनुष्य अपनी बुराइयाँ और कमजोरियाँ जो साधारणतः समझ में नहीं आती, इन दोनों के आधार पर ढूंढ़े और पहचाने।
स्वाध्याय और सत्संग
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-April
स्वाध्याय करते, यदि किसी पर क्रोध आ जाता, तो अपने आप को सजा देते, उसका उपवास द्वारा प्रायश्चित करते। 60 वर्ष का उनका जीवन केवल मनोबल के सहारे चलता रहा। वे जीवन भर सबल मन से कठिनाइयों से युद्ध करते रहे। कभी हार नहीं मानी! वे कहा करते थे कि जो व्यक्ति कठिनाइयों से लड़ने और जूझकर अभ्यास करता रहता है, वह नई अप्रत्याशित कठिनाई आने पर उस से कभी भयभीत नहीं होता। डट कर उनका सामना करता है और पूर्ण विजय प्राप्त करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-May
स्वाध्याय और सत्संग के लिए कभी इच्छा नहीं होती। किसी दीन दुखी की सहायता या दान पुण्य की आवश्यकता दिखाई दे तो भी कंजूसी करता है। इसके विपरीत शरीर से संबंधित लाभों में सारा समय लगाने, अधिक से अधिक धन खर्च करने में तनिक भी संकोच नहीं होता। शान शौकत बढ़ाने वाले प्रीतिभोज, विवाह-शादी आदि प्रयोजनों में लोग ढेरों पैसा फूँकते रहते हैं, इससे उन्हें तनिक भी झिझक नहीं होती, पर जब आत्मकल्याण से संबंधित कोई परमार्थिक कार्य ऐसा सामने आता है जिसमें कुछ खर्च करना पड़े तो सारी कंजूसी इकट्ठी हो जाती है और लोग अपनी गरीबी तथा आर्थिक कठिनाई का रोना-रोने लगते हैं। सिनेमा, मनोरंजन, गपशप, तफरी, आलस्य-प्रमाद आदि में ढेरों समय बर्बाद चला जाता है, पर आत्मकल्याणकारी सत्कार्यों के लिए समय की भारी कमी बताई जाती है।
स्वाध्याय द्वारा एवं उस विद्या के विशेषज्ञों के सत्संग से जाना जा सकता है। यह दोनों ही माध्यम प्रत्येक सच्चे जिज्ञासु को अनिवार्यतः अपनाने चाहिए।
स्वाध्याय और सत्संग के द्वारा अपने ज्ञान नेत्रों को खोलकर अन्धकार से प्रकाश की ओर चलने का प्रयत्न करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-January
स्वाध्याय, सत्संग और ज्ञानोपार्जन के बिना विवेक की अनुभूति नहीं होती। कर्तव्य-अकर्तव्य, सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय आदि के निर्णय करने को शक्ति व प्रेरणा जब तक जाग्रत नहीं होती तब तक मनुष्य मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता। मनुष्य के अन्य कार्य तो पशु बड़ी सुन्दरता व स्फूर्ति के साथ करते हैं। बल्कि कई बातों में तो पशु मनुष्य से बढ़ कर हैं। मनुष्य की श्रेष्ठता तो उपरोक्त गुणों के विकास में ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-October
स्वाध्याय, वातावरण अनुकरण आदि के आधार पर बनता है। यदि माता ने बालक का निर्माण केवल शरीर तक ही सीमित नहीं रखा है उसे अपने उच्च संस्कार भी प्रदान किये हैं तो यह माना जायेगा कि निर्माण में उसने अभीष्ट सहायता दी है। इसी प्रकार पत्नी ने वासना और व्यवस्था तक ही सीमित न रहकर यदि पति की अन्तरात्मा को छुआ है, उसकी प्रसुप्त मनोभूमि को सुविकसित करने में प्रसन्नता, उत्साह, आशा, स्फूर्ति, धैर्य, साहस आदि गुणों को प्रस्फुटित करने में योगदान दिया है तो इसे भी अभीष्ट सहयोग कहा जायेगा। जिस व्यक्ति को सहृदय और सुसंस्कृत माता एवं पत्नी प्राप्त हुई है उसे सब प्रकार सौभाग्यशाली ही कहा जा सकता है और इन दोनों के द्वारा उसका अंतस्तल इतना विकसित हो गया होता है कि वह जीवन की किसी भी दिशा में आशाजनक प्रगति कर सकता है और बड़ी कठिनाई के साथ हँसते-हँसते टक्कर ले सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-November
स्वाध्याय सत्संग का तथा अनुभव एकत्रित करने का अवसर दे जिससे उनका ज्ञान एवं विवेक स्वतः इतना विकसित हो जाए कि वे लाभ हानि, बुराई भलाई, उचित अनुचित, कर्तव्य अकर्तव्य का अंतर स्वतः समझ सकें और जिस मार्ग पर हम चलना चाहते हैं उस पर वे अपने विकसित विवेक के आधार पर स्वतः चल सकें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-June
स्वाध्याय और सत्संग
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-July
स्वाध्याय से इष्टदेव का साक्षात्कार होता है। ईश्वर प्रणिधान से समाधि लग जाती है। आसन सध जाने से सर्दी गर्मी आदि के द्वन्द्व दुख नहीं पहुँचाते। प्राणायाम से पाप और अज्ञान का आवरण मिटता है। प्रत्याहार से इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं।
स्वाध्याय, स्तुति प्रार्थना, उपासना आदि उपाय भी बताये गए हैं। इन साधनों के करते रहने से हमारी सात्विक वृत्तियाँ जागृत हो जाती हैं और उनके बल में असंख्य गुनी वृद्धि होती है जिससे आत्म दर्शन सुलभ हो जाता है।
स्वाध्याय एवं सत्संग से मनुष्य ऋषि ऋण से गुरु ऋण से मुक्त हो सकता हैं। सत् साहित्य के कुछ पृष्ठ नित्य पढ़ने का संकल्प लेकर गुरु चरणों में सच्ची श्रद्धाँजलि अर्पित की जा सकती है। अब समय आ गया है कि पुष्प, फल, भोजन दक्षिण आदि से ही गुरु पूजन पर्याप्त न माना जाए वरन् जन जन को अपना जीवन निर्माण करने के लिए गुरु के उपयोगी वचनों को हृदयंगम करने और उन्हें कार्य रूप में परिणित करने का प्रयत्न किया जाए। हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर यदि एक बुराई छोड़ने और एक अच्छाई ग्रहण करने की परम्परा पुनः आरंभ की जाए तो जीवन के अंत तक इस क्रम पर चलने वाला मनुष्य पूर्णता और पवित्रता का अधिकारी बनकर मानव जीवन के परम लक्ष को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार उस पूर्णिमा का पुनीत पर्व हमारे व्यक्तिगत कल्याण और सामूहिक रूप से युग निर्माण में भारी सहायक सिद्ध हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-March
स्वाध्याय, सत्संग, शिक्षण, चिन्तन आदि के बिना मनुष्य का मस्तिष्क पशु श्रेणी में ही बना रहता है। जिस प्रकार शरीर के लिए संतुलित भोजन, मन के लिए उत्तम विचार आवश्यक है उसी प्रकार जीवात्मा को स्वस्थ रखने, बलवान बनाने और विकसित करने के लिए नित्य प्रति भगवत् साधना का संतुलित भोजन आवश्यक है। जैसे भोजन के अभाव में शरीर का विकास रुक जाता है और उत्तम विचारों के न मिलने पर मन कुँठित हो जाता है उसी प्रकार भगवान की पूजा उपासना न करने से भी जीवात्मा की शुभ करने की प्रेरक शक्ति कुँठित हो जाती है और अपने पूर्ण विकास की स्थिति परमात्मा की प्राप्ति से वंचित रह जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-August
स्वाध्याय तथा दान आदि सम्पूर्ण निष्फल हो जाते हैं।
स्वाध्याय से अपने ज्ञान को परिपुष्ट करें और दूसरों को भी ज्ञान का दान दें। सेवाभाव से सबको सहयोग दें। पर आजकल हम यह देखते हैं कि लम्बी-लम्बी छुट्टियों से विद्यार्थियों का जीवन बरबाद सा होता है। वे इन दिनों में कई बुरी आदतें डाल लेते हैं। इससे घर वाले भी परेशान होते हैं और स्वयं का जीवन भी बिगड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-February
स्वाध्याय का है। ध्यान में इष्टदेव के माध्यम द्वारा उच्च से उच्च आध्यात्मिक गुणों की प्रतिमा की समीपता की जाती है। सत्य, अखण्ड जीवन के अंतर्गत भी आध्यात्मिक गुणों की सर्वोच्च कल्पना करते हुए उसकी सन्निकटता स्वीकार करते हैं। संसार में वास्तविक सत्य क्या है, इसे ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं जान सकता। पर हम अपनी बुद्धि के अनुसार आध्यात्मिक गुणों की पवित्रतम कल्पना कर सकते हैं, उसे सत्य कहते हैं।
स्वाध्याय अखण्ड जगत (सत्य)
स्वाध्याय- अखण्ड जगत् (सत्य)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-May
स्वाध्याय के समान है, तुम जितना ही उनके निकट संपर्क में आओगे उतनी ही महानताएं उनके अन्दर देखोगे। हँसी-दिल्लगी तो भाँड भी करते हैं पर क्या वे मित्र हुए? मित्र तो वह है जो हृदय के अंतःस्तल में आह्लाद का आविर्भाव करता है। हवा में किसी अंग का कपड़ा उड़ जाय तो हाथ तुरंत ही उसे ढ़कने को दौड़ता है, मित्र वह है जो कुमार्ग पर जाते हुए साथी को बचाने के लिए तत्पर रहता है। मित्र तो उसे ही कहना चाहिए जो बुराइयों की विपत्ति से बचाकर नेकी के कार्यों में प्रोत्साहित करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-June
स्वाध्याय करते रहने के कारण मेरे मन में असाधारण श्रद्धा उत्पन्न हो गई थी। यों तो मैं अनेक ग्रन्थों का स्वाध्याय और अनेक श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग करता रहा हूँ, पर अखंड ज्योति के लेखों में जो समाधानकारक आनंद आता था वह बड़ा ही संतोषजनक होता था। वह ज्ञान तृप्ति का आनन्द श्रद्धा में बदलता गया और एक दिन मन की तरंग से विवश होकर मैं अपने व्यापारिक झंझटों को यों ही अधूरा छोड़ कर हिसार से मथुरा चल पड़ा और अखंड ज्योति कार्यालय में आदरणीय सम्पादक जी की सेवा में जा उपस्थित हुआ।
स्वाध्याय और अनेक श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग करता रहा हूँ, पर अखंड ज्योति के लेखों में जो समाधानकारक आनंद आता था वह बड़ा ही संतोषजनक होता था। वह ज्ञान तृप्ति का आनन्द श्रद्धा में बदलता गया और एक दिन मन की तरंग से विवश होकर मैं अपने व्यापारिक झंझटों को यों ही अधूरा छोड़ कर हिसार से मथुरा चल पड़ा और अखंड ज्योति कार्यालय में आदरणीय सम्पादक जी की सेवा में जा उपस्थित हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-October
स्वाध्याय, साधना अन्वेषण, आविष्कार, खोज, परीक्षण, वादविवाद, यात्रा, समारोहों में सम्मिलित होना, नवीन वस्तुओं का देखना, इस श्रेणी के कार्य गुप्त विषयों की जानकारी के लिए होते हैं। समाज में रहना, मित्र बढ़ाना, संगठन में बंधना, दल बनाना, कम्पनी खोलना, साझा करना आदि कार्यों के द्वारा मनुष्य दूसरों की योग्यताओं की जानकारी प्राप्त करना एवं उनकी सामूहिक अनुभूतियों के आधार पर अपनी ज्ञान चेतना में वृद्धि होने के लाभ उठाना चाहता है। इस प्रकार रहस्यान्वेषण को अपना प्रिय विषय बनाकर हम अल्पज्ञता से सर्वज्ञता की ओर बढ़ना चाहते हैं। अपने संसार के और अदृश्य विषयों के रहस्य से परिचित होने के लिए ज्ञान की तीव्र पिपासा को जीव अपने अन्दर धारणा किये हुए है। शिक्षालय, योग साधनाएं, प्रयोगशालाएं, पुस्तकें, समाचार पत्र, रेडियो, मनुष्य की इसी महान मानसिक क्षुधा के निवारणार्थ-ज्ञानवृद्धि के निमित्त प्रयत्न कर रहे हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-August
स्वाध्याय से आत्मोन्नति की प्रक्रिया आगे बढ़ने लगी।
स्वाध्याय एवं सत्संग के द्वारा मैं अपने दैनिक ब्रह्म कर्म में यथाशक्ति प्रवृत्त हुआ।
स्वाध्याय का शौक जैसे जैसे बढ़ा, वैसे ही वैसे उत्तमोत्तम पुस्तकें मेरे पास आने लगीं। मित्रता दिन दिन बढ़ने लगी। अब मैंने पुस्तकों को अपना सच्चा मित्र बना लिया है, क्योंकि जीवन को नष्ट करने वाली विपत्ति में से उन्होंने ही मुझे छुड़ाया हैं। ऐसे सच्चे मित्रों से बिछोह करने की इच्छा नहीं होती। अब मेरे जीवन का प्रधान कार्य सद्ग्रन्थों का अध्ययन और ज्ञान सम्पादन करना हो गया हैं।
स्वाध्याय करते रहने का उपदेश दिया था। मैंने उनकी आज्ञा का पालन करने में श्रद्धा और विश्वास की पुट और लगा दी और अब तक इसी सुलभ नियम को पालन करता आ रहा हूँ। इससे मुझे अनेक हार्दिक अभिलाषाओं में सफलता मिली है और आध्यात्मिक तत्व की ओर रुचि भी स्वतः उत्पन्न हो गई है। इसी साधन की निरंतरता का प्रतिफल मैं यह पा चुका हूँ कि मुझे अपने वाँछित आध्यात्मिक गुरु की प्राप्ति भी हो गई है। मेरे अनुभव का संक्षेप में यही सार है कि आध्यात्मिक साधन चाहे छोटी सी क्यों न हो उसकी निरन्तरता ही सफलता की जननी है।
स्वाध्याय प्रेम है, परन्तु वह प्रेम भी तो साधु समागम के कारण ही उत्पन्न हुआ, अतएव मैं उसी को मुख्य मानता हुआ पाठकों का ध्यान साधु समागम एवं सद्ग्रन्थों के निरंतर स्वाध्याय की और विशेष रूप से आकर्षित करता हूँ।
स्वाध्याय जीवन-सुधार का बहूमूल्य साधन है, इसी भाग को अपना कर अन्य बन्धु भी मेरी तरह लाभ उठा सकते हैं।
स्वाध्याय को जीवन का प्रमुख कर्त्तव्य बनाकर लाभ उठाते रहें।
स्वाध्याय और सद्ग्रन्थावलोकन की ओर रुचि बढ़ी और विभिन्न स्थानों से अनेकानेक ग्रन्थों को मँगा कर अध्ययन किया। इन ग्रन्थों के स्वाध्याय से आध्यात्मिक भावों की ओर झुकाव दिन-दिन बढ़ता गया और उस अध्ययन से मेरा जीवन बहुत कुछ ऊँचा उठता गया। यद्यपि मैं किसी प्रकार की योग साधना नहीं कर सका तो भी सद्ग्रन्थों का कई बार स्वाध्याय करने से चित विशुद्धि काफी परिणाम में हुई हैं। मेरी इस उन्नति का मुख्य कारण स्वाध्याय प्रेम है, परन्तु वह प्रेम भी तो साधु समागम के कारण ही उत्पन्न हुआ, अतएव मैं उसी को मुख्य मानता हुआ पाठकों का ध्यान साधु समागम एवं सद्ग्रन्थों के निरंतर स्वाध्याय की और विशेष रूप से आकर्षित करता हूँ।
स्वाध्याय से आध्यात्मिक भावों की ओर झुकाव दिन-दिन बढ़ता गया और उस अध्ययन से मेरा जीवन बहुत कुछ ऊँचा उठता गया। यद्यपि मैं किसी प्रकार की योग साधना नहीं कर सका तो भी सद्ग्रन्थों का कई बार स्वाध्याय करने से चित विशुद्धि काफी परिणाम में हुई हैं। मेरी इस उन्नति का मुख्य कारण स्वाध्याय प्रेम है, परन्तु वह प्रेम भी तो साधु समागम के कारण ही उत्पन्न हुआ, अतएव मैं उसी को मुख्य मानता हुआ पाठकों का ध्यान साधु समागम एवं सद्ग्रन्थों के निरंतर स्वाध्याय की और विशेष रूप से आकर्षित करता हूँ।
स्वाध्याय करने से चित विशुद्धि काफी परिणाम में हुई हैं। मेरी इस उन्नति का मुख्य कारण स्वाध्याय प्रेम है, परन्तु वह प्रेम भी तो साधु समागम के कारण ही उत्पन्न हुआ, अतएव मैं उसी को मुख्य मानता हुआ पाठकों का ध्यान साधु समागम एवं सद्ग्रन्थों के निरंतर स्वाध्याय की और विशेष रूप से आकर्षित करता हूँ।
स्वाध्याय की और विशेष रूप से आकर्षित करता हूँ।
स्वाध्याय किया परन्तु मेरी समझ में नहीं आया कि धर्म का पालन एक गृहस्थ कैसे कर सकता है। धर्मग्रन्थों ने सत्य की जैसी व्याख्या की है, राजा हरिश्चन्द्र ने सत्य का जिस तरह पालन किया है, उस तरह से यदि हम किसान अपने गृहस्थ जीवन में करें तो गृहस्थी की गाड़ी एक कदम नहीं चल सकती। किसान जीवन गृहस्थी में ऐसा होता है कि दुष्ट लोग जिसे समझते हैं कि ये महाशय झूठ नहीं बोलते, हिंसा, चोरी, कूटनीति, मुकदमेबाजी इत्यादि अवगुणों से कोसों दूर रहते हैं, उनकी फसलों को पशुओं से चरा लेना, घर में चोरी कर लेना इत्यादि कर्म करने में जरा भी संकोच नहीं करते, ऐसी कई घटनायें मेरे साथ घटित हुई जिससे धर्म पर से मेरा विश्वास उठा दिया। मैंने एक पत्र अखण्ड ज्योति सम्पादक के पास लिखा और उनसे पूछा कि जिनको मैं चोर समझता हूँ, परन्तु पकड़ नहीं पाता- उनसे मैं किस तरह बच सकता हूँ, सत्य प्रेम न्याय का पालन पूर्णरूप से करते हुए अपने और अपने ऐसे और भाइयों के साथ होने वाले अत्याचारों को किस तरह बन्द कर सकता हूँ। शर्मा जी ने मुझे लिखा- ‘जिस तरह एक डॉक्टर रोगी के फोड़े में नश्तर चुभा कर, उसे रुला कर, पाप का भागी नहीं होता, उसी तरह आपको भी दुष्टों की दुष्टता दूर करने के लिये, समाज से बुराई दूर कर भलाई की स्थापना के लिये सच्चे हृदय से प्रयत्न करने में यदि असत्य, चोरी, हिंसा, कूटनीति से भी काम लेना पड़े तो यह अधर्म का कार्य नहीं कहा जा सकता।
स्वाध्याय किया जाता था। अन्ततोगत्वा सत्साहित्यावलोकन द्वारा क्रमशः परमात्मा की नवधाभक्ति की रूपरेखा को समझने लगे। इस भूमिका के साथ ही शिक्षण शास्त्र व मनोविज्ञान के अध्ययन ने मेरे अपने मन को आध्यात्मिक तत्वों की ओर आकर्षित किया। इधर जीविकोपार्जन के साथ गृहस्थी का शकट खींचने लगा। ‘दुख में सुमिरन सब करें, के अनुसार भगवान के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध होता गया और स्वाध्याय एवं सत्संग के द्वारा मैं अपने दैनिक ब्रह्म कर्म में यथाशक्ति प्रवृत्त हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-December
स्वाध्याय और सत्संग की आंशिक आवश्यकता पूरी करते हैं। अपनी तर्कबुद्धि विकसित की जानी चाहिए और सामने प्रस्तुत समस्याओं में से प्रत्येक पर पक्ष हो या विपक्ष दोनों को आधार मानकर विचार करना चाहिए। इस प्रकार अपनाया गया जीवनक्रम विचारशीलता को परिमार्जित करता है।
स्वाध्याय नहीं है, वरन इस प्रयोजन के लिए मात्र उसी साहित्य की जरूरत पड़ती है, जो जीवन की प्रस्तुत गुत्थियों का समय के अनुरूप समाधान प्रस्तुत कर सके। यह लिखा हुआ भी युग मनीषियों द्वारा ही होना चाहिए, क्योंकि वे बदलती हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक समाधान सुझाते हैं। पुरातन कथा-गाथाओं को पढ़ते-दुहराते रहना निरर्थक है, क्योंकि वे उस समय को ध्यान में रखकर लिखी गई होती हैं, जो अब से बहुत पीछे रह गया और उन दिनों का चिंतन आज के लिए किसी प्रकार उपयोगी नहीं रहा। यही बात सत्संग के संबंध में भी है। जो समय के अनुरूप है, जिनमें सामयिक समाधान है, उन्हीं को सत्संग में सम्मिलित करने योग्य विचारधारा मानना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-May
स्वाध्याय कक्ष में वे आचार्य धर्मपाल का जीवन-दर्शन पढ़ रही हैं। सागल नरेश भगवान् बुद्ध के परम निष्ठावान शिष्य थे उन्हीं की राज-कन्या क्षेमा के अन्तःकरण में तथागत के प्रति उपेक्षा का यह भाव खटकने वाला तो था ही। स्वयं नरेश उपस्थित हुये और पूछा - प्रियतमे! समस्त राज-प्रासाद तथागत की अगवानी के लिये तैयार है किन्तु आपने अभी तक अपने परिधान भी बदले नहीं। राज-कुल अतिथि की यह अवमानना अच्छी नहीं, उठो! और स्वागत हेतु शीघ्र तैयार हो जाओ।
स्वाध्याय और लेख भी इन परिस्थितियों में ठीक तरह संभव हो जाता है। यों सर्वथा एकान्त तो समाधि स्थिति में ही भले बन पड़े अन्यथा शारीरिक आवश्यकताएँ और मानसिक स्मृतियाँ भी किसी न किसी प्रकार के विक्षेप उत्पन्न करती रहतीं है, वैज्ञानिक शोध एवं आध्यात्मिक अवगाहन जैसे कार्यों में विक्षेप डालती है। सरल यही है कि प्रत्यक्ष और स्मृति जन्य लगाव अन्यत्र बिखरने न दिया जाय। इतने से भी वह काम चल जाता है जो एकान्त माँगता हैं। स्वाध्याय एवं साहित्य सृजन भी वैज्ञानिक शेष अथवा अनुसंधान स्तर के ही काम है।
स्वाध्याय का एक अंग माना है।
स्वाध्याय, संयम और सेवा की चार विधायें अपना कर आत्मोत्कर्ष का महान प्रयोजन पूरा किया जाता है। पशु कलेवर छूट गया, यह एक उत्साहवर्धक सफलता है पर बात इतने से ही बनती नहीं। मानव गरिमा को प्रकट प्रकाशित करने के लिए भाव भरे प्रयत्न होने चाहिए। समझदारी ईमानदारी, जिम्मेदारी और सदुद्देश्यों के लिए बहादुरी बरते जाने की प्रक्रिया अभ्यास में उतारनी चाहिए। यदि इतना न बन पड़ा तो समझना चाहिए कि विडम्बना ही सिर पर लद कर रह गई।
स्वाध्याय, चिन्तन, मनन, सत्परामर्श आदि उपाय काम में लाये जाते हैं। यह उपाय साधन जिन्हें उपलब्ध नहीं होते वे कूपमण्डूक बने रहते हैं। वे जीवन का भार ढोने के अतिरिक्त और कुछ कर नहीं पाते। इसीलिए जहाँ चेतना की शक्ति पर विचार किया जाता है वहाँ प्रकारान्तर से उसे विचार शक्ति का विशेष सुनियोजन किया जाना कहा जाता है। विचारशील ही महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाते, महत्वपूर्ण कार्य करते और सफल महापुरुष कहलाते हैं।
स्वाध्याय एवं साहित्य सृजन भी वैज्ञानिक शेष अथवा अनुसंधान स्तर के ही काम है। इसके लिए मन को अनिवार्य रूप से साधना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-February
स्वाध्याय संस्कारों से जुड़ क्रिया कलाप। जिस प्रकार सेनेटोरियमों में रह कर वहाँ की जलवायु की विशिष्टता के कारण अपेक्षाकृत अधिक लाभ पाते देखे जाते है। वैसा ही लाभ यहाँ मिलता है आत्मबल जो अन्य सब बलों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी वातावरण का प्रतिफल हैं। ओजस तेजस और वर्चस इसकी विशेष उपलब्धियाँ है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-June
स्वाध्याय प्राणायाम एवं ध्यान धारणा के उपचार उपक्रमों का आश्रय लेने से अनेक लाभों में जहाँ आध्यात्मिक लाभ मिलता है वहीं इसके अतिरिक्त चिन्तन तंत्र पर छाई शिथिलता-मलीनता भी दूर होती है। साथ ही विस्मृति की शिकायत नहीं पनपने पाती।
स्वाध्यायशील ही बने रहने का प्रयत्न करना चाहिए। यह प्रयास क्रिया की प्रतिक्रिया की तरह सुनिश्चित प्रतिफल देता है।
स्वाध्याय की आवश्यकता अनुमोदित करते रहे और यह बताते रहे कि ज्ञान आत्मा की भूख-प्यास की तरह है। उससे उसका विकास होता है। यह बात समझ में आने वाली है कि चेतना का विकास मात्र ज्ञान की साधना से ही सम्भव है, जो अद्भुत क्षमता के रूप में हर किसी को सहज उपलब्ध है। बालकों के आहार, वातावरण, पोषण आदि की समान सुविधायें होने पर भी बौद्धिक स्तर में असमानता प्राच्यदर्शन की मान्यताओं का ही समर्थन करती हैं। यह एक तथ्य और दर्शाती हैं कि ज्ञानार्जन, सत्साहित्य का पठन-मनन कभी व्यर्थ नहीं जाता।
स्वाध्याय- सत्संग-श्रेष्ठ समुदाय के साथ संपर्क- उच्चस्तरीय वातावरण के सहारे व्यक्तित्व निखरते हैं। इसके अतिरिक्त कला, साहित्य, संगीत अभिनय, तीर्थाटन, परिभ्रमण के सहारे भी मनुष्य किसी विशेष ढाँचे में ढलते हैं। प्रचलनों का प्रवाह भी प्रभावित करता है। मनुष्य समाज को बनाता हैं। यह उक्ति-उच्चस्तरीय लोगों पर लागू होती है; पर साधारण लोगों के संबंध में तो यही देखा जाता है कि समाज के, सामाजिक वातावरण के द्वारा व्यक्तियों को ढाला जाता है, इसलिए मूर्धन्य जन इस प्रयास में भी निरत रहते हैं कि समर्थ सज्जन ढालने वाले वातावरण बने।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-January
स्वाध्याय का क्रम चलाते रहने का संकल्प लिया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-April
स्वाध्याय सत्संग का-सघन संपर्क का, चिन्तन मनन का सहयोग रहता है। इस क्षेत्र की सशक्तता को नकारा नहीं जा सकता और व्यक्ति निर्माण के लिए, व्यक्तिगत संपर्क की उपेक्षा नहीं की जा सकती। चरित्रवान और क्रियाकुशल व्यक्ति देश की, समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यह कार्य प्रधानता व्यक्ति को सद्गुणों की सत्प्रवृत्तियों क ओर अग्रसर करने से ही हो सकता है। इसमें उत्कृष्टता का अभ्यास भी साथ में जुड़ा रहना चाहिए।
स्वाध्याय और सत्संग की व्यवस्था हुई है। परामर्श और प्रवचन की शैली का विकास हुआ है। सही सोचने के सत्परिणाम और गलत ढंग से सोचने के दुष्परिणामों का विस्तारपूर्वक विवेचन हुआ है।
स्वाध्याय, संयम और सेवा प्रक्रिया को, शिक्षार्थियों को अन्तराल की गहराई तक उतारने की व्यवस्था का सत्रों में समुचित समावेश है। मनोबल और आत्मबल बढ़ाने वाले आहार के साथ दिव्य औषधियों का सेवन भी आवश्यकतानुसार जुड़ा रहता है। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में बहुमूल्य यंत्रों द्वारा मूर्धन्य वैज्ञानिक, हर शिविरार्थियों की जाँच पड़ताल करते हैं। साधना की सफलता का अनुमान बहुत कुछ इस आधार पर भी लग जाता है।
स्वाध्याय, संयम, सेवा के चारों उपक्रमों में से जो जितना बन सके उसके लिए उतना करने का प्रयास करना चाहिए। सेवा कार्या के लिए प्रत्यक्ष अवसर सामने ने हो तो इसके बदले आर्थिक अंशदान की दैनिक प्रतिज्ञा के अतिरिक्त कुछ अधिक अनुदान बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। यह राशि सद्ज्ञान संवर्धन के-ज्ञानयज्ञ के निमित्त लगनी चाहिए। पीड़ितों की सहायता के लिए हर अवसर पर कुछ न कुछ करते रहना सामान्य क्रम में भी सम्मिलित रखना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-May
स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिन्तन से ईश्वर प्राप्ति के लिए उत्सुकता बढ़ती है। यह उत्सुकता जितनी ही प्रगाढ़ होगी उतना ही मन उसमें सरसता अनुभव करने लगेगा और उसी के इर्द−गिर्द छाया रहेगा। एकाग्रता का यह प्रथम सौपान है। भौतिक प्रयोजनों में भी मन लगाने के लिए यही करना पड़ता है। शिक्षा, शिल्प, खेल, धन, यश, शोध, अध्ययन आदि का माहात्म्य जितनी अच्छी तरह समझ लिया गया होगा।
स्वाध्याय के माध्यम से हम अर्वाचीन युग के देवत्व को भी अपने वर्तमान जीवन में बुला सकते हैं और नाटकों, फिल्मों से भी अच्छे बनने की प्रेरणा ले सकते हैं। दूसरों के अच्छे आचरण हमारे जीवन दीप बन सकते हैं और उनकी शिक्षायें भी वही प्रेरणा दे सकती हैं। बुराइयों के लिए भी ठीक यही स्थिति है बुलायें तो मन ही मन से करोड़ों मनोविकार आमन्त्रित कर लें दृढ़ता हो तो दृष्टि में पड़ने वाली कुत्सा भी अन्दर झाँकने न पाये।
स्वाध्याय में आँखें और सत्संग में कान ही मस्तिष्क तक ज्ञान का प्रवाह पहुँचाते और उसे सुसम्पन्न बनाते हैं। यों अन्य माध्यमों से भी कई तरह की उपयोगी जानकारियाँ मिलती हैं, पर प्रधानता इन्हीं दो की है।
स्वाध्याय से भी महत्वपूर्ण है।”
स्वाध्याय हमारे जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण अपेक्षायें हैं, इनके बिना विवेक जागृत ही नहीं होता। स्थूल पदार्थों को ही देखते और उन्हीं में उलझे रहते हैं, सूक्ष्म तत्वों की अनुभूति के लिए हमारी उस तरह की तैयारी भी होनी चाहिए। हमारी पहुँच मन को नियन्त्रित रखने और उसे यथार्थ लक्ष्य की ओर नियोजित रखने की स्थिरता भी चाहिये।
स्वाध्याय मानसिक भूख बुझाने के लिए दैनिक आहार की तरह ही आवश्यक समझा जाय उसके लिए नित्य कुछ समय निर्धारित रखा जाय।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिन्तन के सहारे मन की अभिरुचि बदलती है और वह उस संदर्भ में भी रुचि लेने लगता है। इस संदर्भ में थोड़ी−थोड़ी धीरे−धीरे सफलता मिले तो भी उसे उत्साहवर्धक एवं आशाजनक समझना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-August
स्वाध्याय, संयम, सेवा के अतिरिक्त जीवनोत्कर्ष का अति महत्वपूर्ण आधार साधना ही है। अस्त−व्यस्तता को, व्यवस्था में, अनुशासन में बदलने से अपने भीतर से ही ऐसा नया उभार, नया वर्चस् उत्पन्न होता है इसी को अप्रत्याशित दैवी अनुग्रह जैसा चमत्कार समझा जाने लगता है। आत्म चिन्तन द्वारा दोष दुर्गुणों को ढूँढ़ निकालना, आत्मसुधार द्वारा विकृतियों की जड़ें उखाड़ना, आत्म−निर्माण द्वारा सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बनाना, आत्मविकास द्वारा आत्मीयता का क्षेत्र सुविस्तृत करते जाना, यही हैं वे चतुर्विधि प्रयोग जिनके सहारे जीवन जाना−यही हैं वे चतुर्विधि प्रयोग जिनके सहारे जीवन साधना सम्पन्न होती है इन्हीं आधारों को अपनाने से आत्मोत्कर्ष के लिए की गई योगाभ्यासी तपश्चर्याओं में उत्साहवर्धक सफलता मिलती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-July
स्वाध्याय, संयम और सेवा के तीन अवलम्बन भी अपनाये जाने चाहिए और उनकी अनिवार्य आवश्यकता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह प्रत्येक साधक को विस्तारपूर्वक समझाया और करने को सुव्यवस्थित कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है। समग्र जीवन में उत्कृष्टता भर देने वाली रीति-नीति को ही आत्मोत्कर्ष की सफलता के लिए अनिवार्य बताकर उसका समुचित मार्ग-दर्शन किया जाता है।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन की साधना इसी प्रयोजन के लिए की जाती है। इसे ज्ञानयोग कहते हैं। अध्यात्म विवेचना के ग्रन्थ इसी निमित्त रचे गये हैं।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन के चारों तत्व गुंथे हुए हैं। शारीरिक और मानसिक संयम अनुशासन की कठोर विधि व्यवस्था का पालन करना पड़ता है। प्रवचन और परामर्श का दैनिक लाभ मिलता है। दिनचर्या, इतनी अनुशासित और व्यवस्थित रहती है कि इस ढर्रे में ढल जाने वाला भविष्य में अपने आपको सर्वतोमुखी प्रगति में सहायक ढाँचे में ही ढाल लेता है। वातावरण का प्रभाव अभिनव परिवर्तन के रूप में निरन्तर अनुभव होता रहता है।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन की गणना होती है। विज्ञान पक्ष में उपासना और साधना का समावेश है। इन्हें योग और तप भी कह सकते हैं। योग धारा में मस्तिष्कीय क्षेत्र में होने वाले प्रयोगों की गणना है। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के चिन्तन परक चारों ही उपचार योग है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-October
स्वाध्याय, संयम, सेवा उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार शरीर निर्वाह के लिए, भोजन, शयन, श्रम और मल विसर्जन। इन चारों में से एक भी ऐसा नहीं जिसके बिना काम चल सके या एक के बल पर ही आत्मिक प्रगति का लक्ष्य पूरा हो सके।
स्वाध्याय ही आवश्यक है और उसे दैनिक जीवन का एक नित्य क्रम मानकर किया ही जाना चाहिए। व्यक्ति एवं समाज के नव-निर्माण हेतु उपयोगी उत्कृष्ट साहित्य के दैनन्दिन स्वाध्याय के लिए समय अनिवार्यतः निकालना ही चाहिए।
स्वाध्याय नहीं। व्यावहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा दिखलाने वाला स्वाध्याय ही आवश्यक है और उसे दैनिक जीवन का एक नित्य क्रम मानकर किया ही जाना चाहिए। व्यक्ति एवं समाज के नव-निर्माण हेतु उपयोगी उत्कृष्ट साहित्य के दैनन्दिन स्वाध्याय के लिए समय अनिवार्यतः निकालना ही चाहिए।
स्वाध्याय ही इसका मार्ग है। रूढ़िवादी रीति से किन्हीं पुरानी, किस्से कहानी जैसी किताबों का वासी रहना, घोटना स्वाध्याय नहीं। व्यावहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा दिखलाने वाला स्वाध्याय ही आवश्यक है और उसे दैनिक जीवन का एक नित्य क्रम मानकर किया ही जाना चाहिए। व्यक्ति एवं समाज के नव-निर्माण हेतु उपयोगी उत्कृष्ट साहित्य के दैनन्दिन स्वाध्याय के लिए समय अनिवार्यतः निकालना ही चाहिए।
स्वाध्याय के लिए समय अनिवार्यतः निकालना ही चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-February
स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी कर सकता है। आज की स्थिति में सत्संग का श्रेष्ठ एवं सुगम रूप यही है। पढ़े लोग युग साहित्य पढ़ें, उसे सुनें।
स्वाध्याय को भी महत्व दिया जाय। आत्म कल्याण की समस्याओं को युग के अनुरूप समाधान प्रस्तुत करने वाला सत्साहित्य ही स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी कर सकता है। आज की स्थिति में सत्संग का श्रेष्ठ एवं सुगम रूप यही है। पढ़े लोग युग साहित्य पढ़ें, उसे सुनें।
स्वाध्याय, संयम और सेवा की चतुर्विधि आत्मोत्कर्ष साधना है आत्मनिर्माण और समाज निर्माण का उचित समन्वय है। अस्तु आत्मा के परमात्मा के हिस्से का लाभांश इसी पुण्य प्रयोजन में लगना चाहिए। इस सन्दर्भ में युग निर्माण परिवार के प्रत्येक सदस्य का न्यूनतम अंश प्रतीक चिन्ह के रूप में आरम्भ से ही सदस्यता शर्त के रूप में निर्धारित है। एक घन्टा और दस पैसा नित्य का अनुदान अपने सम्पर्क क्षेत्र में सद्ज्ञान का आलोक फैलाने के लिए निकालने के लिए कहा जाता रहा है। जिनका इतना भी आरम्भ अभी नहीं हुआ है वे उसे आरम्भ करें ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-March
स्वाध्याय ने ही उनके मस्तिष्क में इस नये दर्शन की पृष्ठ भूमि विनिर्मित की थी।
स्वाध्याय को जीव का प्राण मानने के कारण ही उन्होंने जीवन के अन्तिम क्षणों तक पढ़ने का क्रम बराबर बनाये रखा और चाहे सब कुछ छोड़ दिया हो। यही स्थिति पाश्चात्य विचारक जान स्टुअर्ट मिल की भी थी। विचार भले ही भौतिक दिशाओं में बढ़ गये हों किन्तु उनके साहित्य में उनकी बौद्धिक प्रखरता बराबर झाँकती मिलती है यह भी “लाइफ आफ टरगट” के रचयिता कंडोर−ऐट तथा झिलिप क्रुक ड्रेक प्रेडरिक आदि के मकदूनिया की देन थी।
स्वाध्याय सत्संग, सायंकाल तीन घन्टे लोक सेवा का प्रशिक्षण। यही तीनों क्रम निरन्तर चलते रहेंगे। गंगा की गोद, हिमालय की छाया एवं दिव्य चेतना का प्राण भरा अनुदान यही है। ये विशेषताएँ हैं जिनके आधार पर यहाँ का वातावरण ऐसा बन पड़ा है जिसमें उच्चस्तरीय साधनाओं के सफल होने की पूरी−पूरी सम्भावना बनती है।
स्वाध्याय से उभरती है−शा में उभरी। स्वाध्याय को जीव का प्राण मानने के कारण ही उन्होंने जीवन के अन्तिम क्षणों तक पढ़ने का क्रम बराबर बनाये रखा और चाहे सब कुछ छोड़ दिया हो। यही स्थिति पाश्चात्य विचारक जान स्टुअर्ट मिल की भी थी। विचार भले ही भौतिक दिशाओं में बढ़ गये हों किन्तु उनके साहित्य में उनकी बौद्धिक प्रखरता बराबर झाँकती मिलती है यह भी “लाइफ आफ टरगट” के रचयिता कंडोर−ऐट तथा झिलिप क्रुक ड्रेक प्रेडरिक आदि के मकदूनिया की देन थी।
स्वाध्याय सुरुचि का वरदान था। जिसने उनकी प्रसुप्त क्षमताओं को अनेक गुना सक्रिय बना दिया। विचार की सत्ता हर व्यक्ति में होती है स्वाध्याय उसे पैना कर उपयोगी बना देता है जिनकी पढ़ने में अभिरुचि नहीं होती, यह कहना चाहिये कि उनके विचारों को खाद पानी नहीं मिलता और वे फलने फूलने की अपेक्षा मुरझा कर नष्ट हो जाते हैं निराशायें, चिंतायें, उद्विग्नतायें और व्याधियाँ ऐसे ही लोगों को घेरती हैं। स्वाध्याय शील तो आपदाओं में हँसी खुशी और प्रसन्नता का जीवन जी लेते हैं।
स्वाध्याय के लिये चुना और मँगाया था। इन पुस्तकों में वीरतापूर्ण इतिहास, युद्ध विद्या ही नहीं मानवीय जीवन की समस्याओं पर लिखे गये महापुरुषों के निबन्ध और उपन्यास भी सम्मिलित थे। नैपोलियन जैसे तानाशाह का यह पुस्तक प्रेम अन्यथा नहीं था यदि उसने अपनी यह अभिरुचि विकसित न की होती तो 23 वर्ष की आयु में ही “ब्रिगेडियर जनरल” के पद तक पहुँचने की योग्यता, क्षमता और विचार बल उसे नहीं मिल सका होता। पुस्तकें ज्ञान और अनुभव का वह सार होती हैं जो दूसरे लोग कंटकाकीर्ण मार्ग पर चल कर प्राप्त करते हैं और अपने पीछे की पीढ़ी के लिये सरल सुबोध और निर्विघ्न राजपथ के रूप में छोड़ जाते हैं जिनमें चल कर कोई भी व्यक्ति सुविधा पूर्वक, सुरक्षा पूर्वक इच्छित लक्ष्य तक जा पहुँचता है।
स्वाध्याय की अभिरुचि उत्पन्न कर दी थी। “शा” के पिता अक्सर कहा करते थे बच्चे को खेलने कूदने भी दिया करो तो माँ कहती−पुस्तकों में सिनेमा, खेल कूद, यात्रा−भ्रमण, इतिहास, दर्शन आदि सभी कुछ है और वह भी है जो बच्चे की विचार शक्ति के लिये ईंधन का कार्य करेगा। उसकी विचार−ऊष्मा को निरंतर प्रज्ज्वलित रखेगा। 7 वर्ष से 8 वर्ष तक वे पहले ही बाइबिल पढ़ चुके थे जिससे उनका मन आध्यात्मिक भावनाओं में संस्कारित हो चुका था। अब उन्हें शेक्सपियर बनियन तथा−दि अरेबियन नाइट्स” आदि को पढ़ने का अवसर मिला डिकिन्स, उससे वायरिन, डिंडन जान स्टुअर्ट मिल तथा शैले साहित्य का 12 वर्ष की आयु तक पूर्ण अध्ययन कर लिया।
स्वाध्याय उसे पैना कर उपयोगी बना देता है जिनकी पढ़ने में अभिरुचि नहीं होती, यह कहना चाहिये कि उनके विचारों को खाद पानी नहीं मिलता और वे फलने फूलने की अपेक्षा मुरझा कर नष्ट हो जाते हैं निराशायें, चिंतायें, उद्विग्नतायें और व्याधियाँ ऐसे ही लोगों को घेरती हैं। स्वाध्याय शील तो आपदाओं में हँसी खुशी और प्रसन्नता का जीवन जी लेते हैं।
स्वाध्यायान्मत्प्रमदः” “विद्याध्ययन से, स्वाध्याय से कभी भी प्रमाद नहीं करना”−ऋषियों की इस शिक्षा में यही तथ्य सन्निहित है कि व्यक्ति के आत्मिक परिमार्जन की प्रक्रिया उसी से सम्पन्न होती है दीन हीन जीवन को ऊँचा उठाने की शक्ति उसी से मिलती है इतिहास साक्षी है कि संसार में जितने भी सफल और महापुरुष हुये हैं उनको आगे ले जाने वाला यान किसी न किसी पुस्तक की प्रेरणा के रूप में ही मिला है।
स्वाध्याय और महापुरुषों के सान्निध्य में न जाने वाला कोई भी व्यक्ति वंचित रह जाता है।
स्वाध्याय से कभी भी प्रमाद नहीं करना”−ऋषियों की इस शिक्षा में यही तथ्य सन्निहित है कि व्यक्ति के आत्मिक परिमार्जन की प्रक्रिया उसी से सम्पन्न होती है दीन हीन जीवन को ऊँचा उठाने की शक्ति उसी से मिलती है इतिहास साक्षी है कि संसार में जितने भी सफल और महापुरुष हुये हैं उनको आगे ले जाने वाला यान किसी न किसी पुस्तक की प्रेरणा के रूप में ही मिला है।
स्वाध्याय शील तो आपदाओं में हँसी खुशी और प्रसन्नता का जीवन जी लेते हैं।
स्वाध्याय वस्तुतः आत्मोन्नति का ऐसा ही साधन है। “स्वाध्यायान्मत्प्रमदः” “विद्याध्ययन से, स्वाध्याय से कभी भी प्रमाद नहीं करना”−ऋषियों की इस शिक्षा में यही तथ्य सन्निहित है कि व्यक्ति के आत्मिक परिमार्जन की प्रक्रिया उसी से सम्पन्न होती है दीन हीन जीवन को ऊँचा उठाने की शक्ति उसी से मिलती है इतिहास साक्षी है कि संसार में जितने भी सफल और महापुरुष हुये हैं उनको आगे ले जाने वाला यान किसी न किसी पुस्तक की प्रेरणा के रूप में ही मिला है।
स्वाध्याय से मनुष्य का विचार बल उसी तरह पोषण पाता है जिस तरह खेतों को उर्वरता बढ़ाने के लिये नहरों से लिया गया जल। यह सौभाग्य हर किसी के लिये सुलभ है, हर तरह की दिशायें मीडडडडड समुपलब्ध रहती हैं मनुष्य जिस किसी भी दिशा में आगे बढ़ना चाहे उसे उसी तरह का प्रशिक्षण और मार्ग दर्शन घर बैठे मिल सकता है।
स्वाध्याय किया और इस तरह संसार के सफल सम्राटों, राजनीतिज्ञों की सूझ−बूझ, चिंतन, निष्कर्ष, अनुभव उन्हें एक सम्पन्न खजाने के रूप में मिलते गये जिससे उनकी राजनैतिक प्रतिभा निखर उठी। विन्सेन्ट स्मिथ, मार्शल प्लेटो, मैक्समूलर, मैकडोनल तथा सुकरात में से जिस किसी को ढूँढ़ना हो अपने विचारों के रूप−में−सिद्धान्तों के रूप में सबके सब जवाहर लाल नेहरू में मिल सकते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-April
स्वाध्याय की आवश्यकता अनुमोदित करते रहे और यह बताते रहे कि ज्ञान आत्मा की भूख−प्यास की तरह है। उससे उसका विकास होता है। यह बात समझ में आने वाली है कि चेतना का विकास ज्ञान साधना से ही मिलती है। बालकों के आहार, वातावरण, पोषण आदि की समान सुविधायें होने पर भी बौद्धिक असमानता इन्हीं भारतीय मान्यताओं की समर्थक हैं।
स्वाध्याय, सत्संग, धर्मानुष्ठान आदि करने पड़ते हैं वहाँ कुसंस्कारों और दुष्प्रवृत्तियों के निराकरण के लिए आत्मशोधन की प्रताड़ना तपश्चर्या भी अपनानी होती है। प्रगति और परिष्कार के लिए सृजन और उन्मूलन की उभय पक्षीय प्रक्रिया अपनानी होती है। धर्माचरण की तरह ही अधर्म के प्रति प्रचंड आक्रोश प्रकट करने पर ही समग्र धर्म की रक्षा हो सकती है। अनीति के प्रति आक्रोश जागृत रखने को शास्त्रों में ‘मन्यु’ कहा गया है और उस प्रखरता को धर्म का अविच्छिन्न अंग माना गया है। अतिवादी, उदार पक्षी, एकांगी धार्मिकता का ही दुष्परिणाम था जो हजार वर्ष की लम्बी राजनैतिक गुलामी के रूप में अपने देश को अभिशाप की तरह भुगतना पड़ा।
स्वाध्याय साहित्य का, पारिवारिक पुस्तकालय का, संस्थापन होना चाहिए। पढ़ने और सुनाने का क्रम चलता ही रहे। घरों में श्रमशीलता, सहकारिता, सुव्यवस्था, शालीनता और मितव्ययिता की प्रवृत्तियों को पनपने के लिए इन पारिवारिक पंचशीलों को मिलजुल कर कुछ न कुछ किया जाता रहे। हमारे परिवारों को व्यक्तित्वों के निर्माण की प्रयोगशाला की भूमिका निभानी चाहिए। इसके लिए कुछ न कुछ शुभारम्भ इन्हीं दिनों चल पड़ना चाहिए और उसे नियमित रूप से जारी रखे रहना चाहिए।
स्वाध्याय की परम्परा नियमित रूप से चलती रहे, इसके लिए घरेलू ज्ञान−मन्दिरों का, स्वाध्याय साहित्य का, पारिवारिक पुस्तकालय का, संस्थापन होना चाहिए। पढ़ने और सुनाने का क्रम चलता ही रहे। घरों में श्रमशीलता, सहकारिता, सुव्यवस्था, शालीनता और मितव्ययिता की प्रवृत्तियों को पनपने के लिए इन पारिवारिक पंचशीलों को मिलजुल कर कुछ न कुछ किया जाता रहे। हमारे परिवारों को व्यक्तित्वों के निर्माण की प्रयोगशाला की भूमिका निभानी चाहिए। इसके लिए कुछ न कुछ शुभारम्भ इन्हीं दिनों चल पड़ना चाहिए और उसे नियमित रूप से जारी रखे रहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-January
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन, ध्यान, धारणा जैसी चिन्तन प्रधान साधनाओं में नियोजित किया जाता है। सबसे ऊँची स्थिति भाव सम्वेदनाओं के उभार उल्लास की है। इसी में भक्तियोग बन पड़ता है। आत्मवत् सर्व भूतेषु-वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता इसी आत्म विश्वास की स्थिति में हृदयंगम हो पाती है। सब हमारे-हम सबके की उच्च मनोभूमि बन पड़ने पर मनुष्य साधु-ब्राह्मण, परिव्राजक, लोकसेवी की तरह आचरण करता है उसका ‘अहम्’ विस्तृत होते-होते ‘त्वम्’ बन जाता है।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन द्वारा विवेक बुद्धि परिष्कृत होती है और इन्द्रियनिग्रह द्वारा मन चले मन को सत्संकल्प करने वाले उपयोगी चित्र गढ़ने वाला बनाया जाता है। यही है आत्म-साधना की पृष्ठभूमि और संक्षिप्त रूप रेखा।
स्वाध्याय करते-करते थक गईं, फिर भी उनकी मूल प्रवृत्तियों में कुछ विशेष अंतर नहीं आया। लोभ, मोह से उन्हें रत्ती भर भी विरति नहीं हुई। काम, क्रोध के आवेश घटे नहीं। धर्मोपदेशकों में धर्म धारणा और नेताओं में देश भक्ति प्रायः प्रसंग चर्चा की कलाकारिता जितनी ही दिखाई पड़ती है। दूसरों को जिन तर्कों से वे प्रभावित कर लेते हैं उससे अपने आपको प्रभावित नहीं कर पाते।
स्वाध्याय, सत्संग, अनुभव सम्पादन प्रशिक्षण आदि प्रयत्नों की तरह ही एक अति महत्वपूर्ण उपाय यह है कि आहार ऐसा लिया जाय जिसमें न केवल जल्दी पचने की वरन् सतोगुणी प्रकृति की सूक्ष्म विशेषताएँ भी विद्यमान हों। आहार का निर्धारण करते समय यदि स्वाद को प्रधानता देने के स्थान पर आहार में सन्निहित सतोगुणी विशेषता को ध्यान में रखा जाय तो निश्चय ही इससे मानसिक विकास में असाधारण सहायता मिल सकती है। कहना न होगा कि जीवन की प्रगति और सार्थकता का अवलम्बन मस्तिष्क की दिशा धारा पर निर्भर है और उसको सही रखने के लिए उपयुक्त आहार का महत्व समझने और खाद्य के चयन में सतर्कता बरतने की आवश्यकता होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-November
स्वाध्याय द्वारा ज्ञान प्राप्ति की साधना में संलग्न हो गये।
स्वाध्याय किया जाय।’
स्वाध्याय का विशिष्ट महत्व है। स्वाध्याय का अर्थ है सद्ग्रन्थों का अध्ययन-मनन। मनोरंजन मात्र के लिये पढ़ी जाने वाली पुस्तकें आस्था के आधार नहीं प्रस्तुत कर पातीं। ज्ञान की जिज्ञासा का समाधान एवं तृप्ति प्रदान करने वाली पुस्तकों को पढ़ना, उन पर सोचना, मनन करना ही जीवन प्रगति का आधार बनता है। ऐसी पुस्तकें व्यक्ति की पथ-प्रदर्शक गुरू बनती हैं और उनके भीतर निहित क्षमताओं को उभारकर उन्हें विकसित व्यक्तित्व का स्वामी बनाती हैं।
स्वाध्याय पृष्ठ-
स्वाध्याय सामग्री अखण्ड-ज्योति से उत्कृष्ट स्तर की अन्यत्र मिल सकना कठिन है। इसे चन्दन, पुष्पों द्वारा एकत्रित किया हुआ परम पौष्टिक मधु संचय कह सकते हैं।
स्वाध्याय का अर्थ है सद्ग्रन्थों का अध्ययन-मनन। मनोरंजन मात्र के लिये पढ़ी जाने वाली पुस्तकें आस्था के आधार नहीं प्रस्तुत कर पातीं। ज्ञान की जिज्ञासा का समाधान एवं तृप्ति प्रदान करने वाली पुस्तकों को पढ़ना, उन पर सोचना, मनन करना ही जीवन प्रगति का आधार बनता है। ऐसी पुस्तकें व्यक्ति की पथ-प्रदर्शक गुरू बनती हैं और उनके भीतर निहित क्षमताओं को उभारकर उन्हें विकसित व्यक्तित्व का स्वामी बनाती हैं।
स्वाध्याय में अधिक समय लगाना प्रारम्भ कर दिया। न्यूजर्सी के अपने मकान को उसने साधना केन्द्र ही बना डाला। कुछ वर्षों बाद उसने क्रम प्रारम्भ किया। उसकी पुस्तकें बाजार में तेजी से बिकने लगीं। इनमें से ‘गोल्डन लाइट ऑफ ए न्यू एरा’ तथा ‘फाल ऑफ द सेन्सेशनल कल्चर’ अधिक प्रसिद्ध हुईं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-June
स्वाध्याय, सत्संग, मनन,- चिन्तन के अभ्यास, योगसाधना के अन्तर्गत ही आते हैं। प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की पाँच साधनाएँ योगसाधना का अन्तःस्पर्शी अभ्यास है। इनसे पहले तीन को लोकव्यवहार का मर्यादापालन कहना चाहिए। उनमें सामाजिक अनुशासन है। उच्छृंखलता का नियन्त्रण इन्हीं तीन में किया जाता है; इसलिए उन्हें तप वर्ग में गिना गया है।
स्वाध्याय के प्रति अभिरुचि बढ़ी है, जिसका स्पष्ट परिणाम यह परिलक्षित हुआ कि न केवल विज्ञान के क्षेत्र में ही अपितु अन्यान्य क्षेत्रों में भी नई-नई प्रतिभाएं उभरने लगी हैं। यह राष्ट्र साहित्य के माध्यम से समर्थ व संपत्तिवान बनने की ओर निरन्तर आगे बढ़ता ही जा रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-April
स्वाध्याय मण्डल पारदी के संस्थापक इस महापुरुष ने पैंसठ वर्ष की आयु के बाद अपना आन्दोलन चलाया एवं आर्ष ग्रन्थों की सटीक, व्याख्या पर वैदिक साहित्य का नवीनीकरण आधुनिक सन्दर्भ में किया। सुकरात के सम्बन्ध में यह प्रसिद्ध है कि वे मात्र दार्शनिक ही नहीं, संगीतज्ञ भी थे। उन्होंने साठ वर्ष पार करने के उपरान्त यह अनुभव किया कि बुढ़ापे की थकान और उदासी को दूर करने के लिए संगीत अच्छा माध्यम हो सकता है। अस्तु उन्होंने गाना सीखना आरम्भ किया और बजाना भी। यह क्रम उन्होंने मरते दिनों तक जारी रखा।
स्वाध्यायशीलता का अभ्यास जारी रखा जा सके तो कोई कारण नहीं कि अपने मस्तिष्कीय भण्डार में स्मरण शक्तियों की अकूत सूचना सामग्री एकत्र रखी जा सकती है। कोई औषधि नहीं, मानसिक व्यायाम ही इसमें सहायक हो सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-October
स्वाध्याय भी एक प्रकार से श्रेष्ठ विचारों का सामीप्य पाना- महामानवों के चिन्तन से तादात्म्य स्थापित करना है। मार्ग कोई भी अपनाया जाए, माध्यम कुछ तो बनाना ही पड़ेगा ही- इसे समझना उतना ही अनिवार्य है जितना कि किसी भाषा को समझने के लिए उसकी लिपि एवं बोल-चाल के स्वरूप को सीखना- हृदयंगम करना। श्रेष्ठ चिन्तन यदि किसी भी प्रतीक को माध्यम बनाकर लक्ष्य के प्रति नियोजित कर दिया जाए तो उसकी उपलब्धियाँ निश्चित ही महत्वपूर्ण फलदायी होंगी। यही उपासना का तत्वदर्शन है जिसे अपनाकर साधना क्षेत्र के राज मार्ग पर बढ़ पाना अधिक सरल हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-September
स्वाध्याय-सत्संग द्वारा जितना प्रखर बनाया जाता है, उतना ही वह सूक्ष्मतम बनते हुए मस्तिष्क कोष्ठों में सम्पादित होता जाता व मनुष्य को प्रज्ञावान बनाता है। यही ज्ञान की पूँजी जन्म-जन्मांतरों के लिये फिक्सड डिपॉजिट का काम करती है। आगामी जन्मों लोकोत्तर जीवन, वर्तमान जीवन में सूक्ष्म स्थिति में अनेकों महत्वपूर्ण कार्यों हेतु यही ज्ञान-निधि महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अल्पायु में विशेष प्रतिभा (‘प्रोडिगी’) के जितने उदाहरण मिलते हैं, उनमें स्थूल मस्तिष्क की संरचना-विशिष्टता को नहीं, मन की सूक्ष्म परतों में निहित ज्ञान की पूर्व जन्मों में अर्जित सम्पदा को महत्ता दी जानी चाहिए। आइन्स्टीन, हाइजेन वर्ग, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सी. वी. रमन, जगदीश चन्द्र बसु प्रभृति प्रतिभाशाली व्यक्तित्व एक जन्म की अकेले को नहीं, जन्म-जन्मांतरों की ज्ञान साधना की उपज होते हैं।
स्वाध्याय में सिर क्यों खपाते हैं?”
स्वाध्याय या सत्संग से ऐसे विचार मन में लाए जायें जो कुविचारों की प्रतिक्रिया समझा सकें और मन को उन्हें त्यागने के लिए स्वेच्छापूर्वक सहमत कर सकें। अन्यान्यों द्वारा कुमार्ग पर चलने में जो हानियां उठाई गईं, उसकी घटना उदाहरण सामने प्रस्तुत करने पर विवेक पूर्वक भी मनुष्य अपना रास्ता बदल लेता है। जिन लोगों ने कुमार्ग के स्थान पर सन्मार्ग में शक्ति का नियोजन किया और प्रशंसा प्राप्त की, उन घटनाओं को समझने या समझाये जाने से भी मनुष्य विचार बदल देता है। इसी का नाम रेचन है।
स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से उनका परिकर देवोपम बना रहता है। उत्कृष्ट सोचते और आदर्श को कार्यान्वित करते हैं। असहयोगी, विरोधी, हंस उड़ाने और मूर्ख बनाने वालों की कमी नहीं रहती। तो भी वे किसी के परामर्श सहयोग की परवाह न करते हुए एकाकी अपने मार्ग पर चलते हैं। दूसरे लोग जहाँ धन, वैभव अर्जित करने में जिन्दगी गुजार देते हैं वहाँ उनको इस कोल्हू में पिलने की इच्छा तक नहीं होती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-March
स्वाध्याय मण्डलों एवं जागृत शाखाओं में प्राण आ सके, उन्हें वस्तुतः जन-जागृति के केन्द्र माना जा सके। अभी इन प्रज्ञापीठों में हलचल के नाम पर कुछेक अफवाहों को छोड़कर पूजा अर्चा भर होती रहती है। घर-गृहस्थी, दुकान-व्यवसाय, कार्यालय में व्यस्त बहुधन्धी व्यक्ति जो भी कुछ कर पाते हैं, उसे चिन्ह पूजा भर कह सकते हैं। उस अपेक्षा की पूर्ति नहीं हो पाती, जिस प्रयोजन से इन प्रज्ञा संस्थानों को विनिर्मित किया गया था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-February
स्वाध्याय मण्डल बने
स्वाध्याय मंडल उठा लें। इसके लिए एक छोटा स्थायी यज्ञ मण्डप एवं पूजा उपचार के सारे उपकरण दो ढाई सौ की लागत में बन जाते हैं। आयोजन पर खर्च भी नगण्य जितना आता है पर उस छोटे समारोह से प्रचार कार्य तथा उत्साह अभिवर्धन अत्यधिक होता है। जिसका जन्मदिन मनाया जाए उसके यहाँ ज्ञानघट स्थापित करने के अनुरोध रहे। उसे कोई भी मना न करेगा और बीस पैसा नित्य उससे जमा होते रहने से छह रुपया मासिक की आय होने लगती है।
स्वाध्याय सर्वथा दूसरी। मनोकामना के लिए अनास्थापूर्वक चिन्ह पूजा की तरह किया गया भजन पूजन निरर्थक भी जा सकता है। देवी-देवताओं को फुसलाने की विडम्बना असफल भी रह सकती है, पर आत्म-निर्माण के लिए- व्यक्ति के सुधार परिष्कार के लिए किया गया स्वाध्याय कभी निष्फल जा ही नहीं सकता है।
स्वाध्याय मण्डल के रूप से उपरोक्त कार्यक्रमों को अपनाने के लिए कहा गया था। प्रसन्नता की बात है ऐसी प्रतिभाएँ हजारों की संख्या में इन्हीं दिनों उभर कर आगे आ रही हैं।
स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना हुई इसमें व्यक्तिगत प्रयास से ही काम चल गया है। इसके लिए किसी बाहरी व्यक्ति के सहयोग की आवश्यकता नहीं पड़ी और न कहीं घर से बाहर जाना पड़ा। घर के शिक्षितों को प्रज्ञा साहित्य पढ़ाने, सुनाने भर से बात बन गई। घर आते-जाते रहने वाले मित्र पड़ौसी भी उससे लाभ उठाने लगे।
स्वाध्याय का विशेष उपक्रम बना लिया है। प्रज्ञा पुराण के कथा माध्यम से उनने अपने घरों में सत्संग चालू कर दिया है। घर में नित्य प्रेरणाप्रद कथा वाचन चल पड़ने से सभी बाल वृद्ध उसमें रस लेने के लिए सम्मिलित होने लगे हैं।
स्वाध्याय मण्डल के आवश्यक सभी उपकरण जुटाने के लिए 4-5 हजार की व्यवस्था अपने पास से यहाँ जहाँ-तहाँ ये देखते-देखते कर सकते हैं, पर वे समय नहीं दे सकते। कुछ ऐसे हैं जो समय दे सकते हैं, पर पैसे का प्रबन्ध नहीं कर सकते। ऐसे स्थानों पर दोनों स्तर के लोग परस्पर सहयोग करके अन्धे-पंगे के सुयोग से नहीं पार उतरते जैसा उदाहरण बना सकते हैं।
स्वाध्याय मण्डल का कार्यक्षेत्र बढ़ने एवं जन साधारण का सहयोग मिलने में भारी सुविधा होती है।
स्वाध्याय मण्डल के रूप में विकसित होने का अनुरोध सर्वत्र स्वीकारा गया है यह अतीव प्रसन्नता की बात है। परिजनों द्वारा भेजे गये विवरणों से यह प्रकट है कि अधिकाँश पाठकों का व्यक्तित्व विकसित हुआ है। वरिष्ठता और विशिष्टता का बोध होने पर हर जागृत आत्मा को अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समावेश करना होता है। अन्तःकरण उमंगों और जीवनचर्या में तद्नुरूप विकास परिवर्तन न हो, यह हो ही नहीं सकता। यदि अन्तरात्मा में प्रकाश उभरा है- ईश्वरीय अनुग्रह उतरा है तो कदम भी उस दिशा में बढ़े हैं, जिसमें परमार्थ भी स्वार्थ साधन जैसा प्रिय लगने लगता है।
स्वाध्याय मण्डल विनिर्मित करने का साहस किया है। उत्साह और प्रयास उभरा तो एक सप्ताह की दौड़-धूप अपनाने भर से वह सारी व्यवस्था बन गई जो आरम्भ में अत्यधिक कठिन प्रतीत होती थी। संकोची, आलसी, आत्महीनता ग्रस्तों की बात दूसरी है, अन्यथा प्रतिभावान मिलनसार प्रकृति का हर व्यक्ति दो चार घनिष्ठ मित्रों की मण्डली संजोये रहता है। यह लोग आपस में एक दूसरे को समर्थन करते और हाथ बँटाते रहते हैं। दोस्ती का आखिर कुछ तो दबाव पड़ता है।
स्वाध्याय के माध्यम से प्रयोजन की पूर्ति कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही होती है। प्रतिमा दर्शन से देवता को वश में करके मनोकामना पूर्ण कराने की बात सोचने की अपेक्षा यह तथ्य अधिक सही है कि प्रज्ञा को अन्तःकरण की गहराई तक पहुँचाया जाय और मनन-चिन्तन के माध्यम से उसे जीवनचर्या में सम्मिलित किया जाय। इस कसौटी पर कसने गायत्री मन्दिर खड़ा करने की तुलना में चल प्रज्ञा संस्थान विनिर्मित करने की उपयोगिता रत्ती भर भी कम सिद्ध नहीं होती। लागत कम और भावी झंझट कम होने की दृष्टि से भी यह अधिक सरल है। देवालयों में पूजा-पुजारी का, बिजली मरम्मत का जितना चालू खर्च बँधता है उसकी तुलना में ज्ञानरथ के लिए नियुक्त कार्यकर्ता कहीं सस्ता पड़ता है।
स्वाध्याय मण्डल का प्रधान एवं विशेष कार्य एक ही है- ज्ञानरथ प्रज्ञा संस्थान का ढाँचा खड़ा करना। उसके लिए एक पूरे या अधूरे समय का कार्यकर्ता नियुक्त करना। इसके लिए एक हजार की चल पुस्तकालय धकेल गाड़ी का और एक हजार के साहित्य का प्रबन्ध करना। यह दो हजार की राशि ही इस स्थापना की मूल लागत है।
स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा आयोजन सम्पन्न करता रहे तो समझना चाहिए वह सारी व्यवस्था छोटे रूप से भली प्रकार बन गई जिसके लिए पिछले दिनों प्रज्ञा पीठों की स्थापना की गई थी। अब नई प्रज्ञा पीठें, चल प्रज्ञा मन्दिर के रूप में ही होनी चाहिए। 2400 प्रज्ञापीठें बन चुकीं। अब 2400 ज्ञानरथ प्रज्ञा संस्थानों के रूप में उस निर्धारण को अधिक सरल और अधिक व्यापक बनाया जाना है।
स्वाध्याय कभी निष्फल जा ही नहीं सकता है।
स्वाध्याय मण्डल स्थापित करने के लिए उमंग भरा साहस जुटाया है उन्हें दृष्टि दौड़ाते ही अपने घनिष्ठ क्षेत्र में सहयोगी मिल गये हैं। पूरी बात ठीक तरह समझाई गई है तो उस कार्य में हाथ बँटाने वाले दो चार तो अपनों में से ही मिल गये हैं। इतने भर से काम चल गया है।
स्वाध्याय और सत्संग-मनन और चिन्तन के सहारे साधक उस स्थिति तक पहुँचने का प्रयत्न करता है जिसमें माया से भ्रान्ति से छुटकारा मिल सके। यही मुक्ति की- जीवन मुक्ति की स्थिति है।
स्वाध्याय मंडल के साथ जुड़े हुए प्रज्ञाचक्र घुमाने के उपक्रम को सहज ही पूरा करते रह सकते हैं।
स्वाध्याय मण्डल स्थापित कर लिये हैं और ‘एक से दस’ का विकास विस्तार क्रम नियमित रूप से कार्यान्वित करना आरम्भ कर दिया है।
स्वाध्याय मंडल यदि चाहे तो पाँच सात सौ की व्यवस्था करके अपने यहाँ एक प्रज्ञा आयोजन भी सम्पन्न कर सकते हैं। जन जागृति की दृष्टि से इन आयोजनों का प्रभाव अत्यन्त ही उत्साहवर्धक होता है। उससे स्वाध्याय मण्डल का कार्यक्षेत्र बढ़ने एवं जन साधारण का सहयोग मिलने में भारी सुविधा होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-August
स्वाध्याय सत्संग आदि के सहारे यह कार्य सम्पन्न होते देखे जाते हैं। किन्तु यदि मस्तिष्कीय संरचना के मूल स्रोतों तक दबाव डालना और उनका परिवर्तन परिष्कार करने वाला वैधानिक उपाय उपचार काम में लाया जाय तो जड़ सींचने का प्रयत्न पूरा हो सकता है। मानसिक क्षमता सम्पन्नता से शिक्षात्मक उपाय ही आमतौर से काम में लाये जाते हैं। इन्हें पत्रों द्वारा हमसे साँस ग्रहण करने की तरह समझा जा सकता है किन्तु बड़ा काम जड़ों को खाद पानी उपलब्ध कराना है। मनःसंस्थान भी गहन संरचना को प्रभावित करने वाली कार्य पद्धति को बहिरंग शिक्षा दीक्षा से कम नहीं अधिक मूल्यवान, महत्वपूर्ण ही माना जाना चाहिए।
स्वाध्याय, सत्संग-सान्निध्य के सहारे अनेकों व्यक्ति प्रतिभा सम्पन्न होते देखो जा सकते हैं। जहाँ ऐसा वातावरण नहीं उपलब्ध हो पाता, उल्टे कुरुचि भड़काने वाली, पतन के गर्त्त में गिराने वाली परिस्थितियों का प्राधान्य होता है, वहाँ कमजोर मनोबल वाले प्रखरता के अभाव में गिरते हैं, अविकसित नर-पामरों की श्रेणी में शामिल होते देखे जा सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-July
स्वाध्याय संबंधी हैं- (1) प्रेस, टाइप, साहित्य की ढूंढ़-खोज, अन्य भाषाओं को पढ़ना- यह स्वाध्याय वर्ग हुआ। (2) दूसरे- सत्संग वर्ग में सुगम संगीत, शास्त्रीय संगीत, संभाषण, भाषण, कथा-कीर्तन, दृश्य-श्रव्य माध्यमों से प्रचार कार्य, स्लाइड प्रोजेक्टर, वीडियो आदि के माध्यम से युग चेतना का संदेश। (3) तीसरा- आश्रम की स्थानीय व्यवस्था है जिसमें बागवानी, भोजनालय, सफाई, चौकीदारी, रात्रि का पहरा आदि आते हैं। इन कार्यों में से पांच घंटा आश्रम सेवा के निमित्त करना होता है।
स्वाध्याय क्रम एवं जन्मदिवसोत्सव, कथा पुराण के रूप में सत्संग क्रम चल पड़े। जो पूरा समय दे सकने की स्थिति में हों वे शाँति कुँज को अपना घर बनाने की सोचें एवं समाज सेवा हेतु स्वयं को खपाकर उस ऋण में मुक्त होने की योजना बनायें जो अभी तक उस पर लदा है। उनके लिये क्या कैसी योजना है इसका स्वरूप अगले लेखों में है।
स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन की उच्चस्तरीय दिशाधारा कहां से मिल सकती है। इसे खोज पाने का प्रयास निरंतर जारी रखा जायेगा। यह कार्य ईश्वर उपासना, जीवन साधना एवं तपश्चर्या की सहायता से भी हो सकता है। ऋषिकल्प- महामानवों का सान्निध्य, सद्भाव और अनुदान तो इस प्रयोजन के लिए सर्वोपरि रहेगा ही।
स्वाध्याय, संयम एवं सेवा का पग-पग पर क्रियान्वयन करना पड़ता है। आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के उभयपक्षीय क्रिया-कलाप उसमें पूरी तरह गुँथे हुए हैं। इसलिए यह खतरा है नहीं कि जो लोग गायत्री नगर में बसेंगे, वे कायिक दृष्टि से उत्कृष्टता-सम्पादन में पिछड़ जायेंगे।
स्वाध्याय वर्ग हुआ। (2) दूसरे- सत्संग वर्ग में सुगम संगीत, शास्त्रीय संगीत, संभाषण, भाषण, कथा-कीर्तन, दृश्य-श्रव्य माध्यमों से प्रचार कार्य, स्लाइड प्रोजेक्टर, वीडियो आदि के माध्यम से युग चेतना का संदेश। (3) तीसरा- आश्रम की स्थानीय व्यवस्था है जिसमें बागवानी, भोजनालय, सफाई, चौकीदारी, रात्रि का पहरा आदि आते हैं। इन कार्यों में से पांच घंटा आश्रम सेवा के निमित्त करना होता है।
स्वाध्याय द्वारा जन-मानस के परिष्कार की अहम् भूमिका निभाते हैं। एक पवित्रता का प्रतीक है तो दूसरा प्रखरता का। दोनों को ही तप साधना में निरत हो सूक्ष्मतम बनना पड़ता है ताकि अपना स्वरूप और विराट् व्यापक बनाकर स्वयं को आत्मबल सम्पन्न कर वे युग चिन्तन के प्रवाह को मरोड़-बदल सकें। मुनि जहाँ प्रत्यक्ष साधनों का प्रयोग करने की स्वतंत्रता रखते हैं, वहाँ ऋषियों के लिए यह अनिवार्य नहीं। वे अपने सूक्ष्म रूप में भी वातावरण को आन्दोलित करते- सुसंस्कारित बनाये रख सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-December
स्वाध्याय की व्यवस्था है। उसमें प्रमाद करने से मन के ऊपर विकारों की परत जम जाती है। मनोविकार उपजते हैं। मानसिक रोगों का उद्भव होता है। मन की मलीनता से शरीर तो रुग्ण होता ही है।
स्वाध्याय में मनन चिंतन भी शामिल है। अपनी समस्याओं का सही स्वरूप समझना और उन्हें विवेकपूर्ण ढंग से सुलझाना, यह भी स्वाध्याय है।
स्वाध्याय नहीं करता उस दिन उसकी तुलना चाण्डाल जैसी हो जाती है। शरीर को नित्य स्नान कराना आवश्यक है अन्यथा मैल जम जाएगा। बदबू निकलेगी, अनेकों रोग उपजेंगे। ठीक उसी प्रकार मन को स्नान कराने के लिए स्वाध्याय की व्यवस्था है। उसमें प्रमाद करने से मन के ऊपर विकारों की परत जम जाती है।
स्वाध्यायानना प्रमदः” अर्थात् स्वाध्याय में प्रमाद न करो। सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा अनेक हैं, पर उनमें तीन ही प्रमुख हैं। जो उन्हें पालन करता है, समझना चाहिए कि धर्माचरण का सार उसने हृदयंगम कर लिया।
स्वाध्याय पर प्रकाश डाला जा रहा है। उसकी तुलना सत्य और धर्म के समतुल्य ही की गई है। उपनिषद् वचन है कि जो जिस दिन स्वाध्याय नहीं करता उस दिन उसकी तुलना चाण्डाल जैसी हो जाती है। शरीर को नित्य स्नान कराना आवश्यक है अन्यथा मैल जम जाएगा। बदबू निकलेगी, अनेकों रोग उपजेंगे।
स्वाध्याय है। स्वाध्यायशील दिन-दिन ऊँचे उठते हैं। इसलिए उसे नियमित रूप से अपनाये रहने के लिए शास्त्रकारों ने निर्देश दिया है। उसमें प्रमाण नहीं ही करना चाहिए।.
स्वाध्याय है।
स्वाध्याय है। आत्म निर्माण की, व्यक्तित्व के विकास की प्रेरणा देने वाली विचार पद्धति ही स्वाध्याय है। स्वाध्यायशील दिन-दिन ऊँचे उठते हैं। इसलिए उसे नियमित रूप से अपनाये रहने के लिए शास्त्रकारों ने निर्देश दिया है। उसमें प्रमाण नहीं ही करना चाहिए।
स्वाध्यायशील दिन-दिन ऊँचे उठते हैं। इसलिए उसे नियमित रूप से अपनाये रहने के लिए शास्त्रकारों ने निर्देश दिया है। उसमें प्रमाण नहीं ही करना चाहिए।.
स्वाध्याय, तीर्थ, व्रत, ध्यान, धारणा, समाधि आदि के अनेक उपायों में से सभी को कर सकना एक के लिए सम्भव नहीं। फिर सामान्य जन यह भी निर्णय नहीं कर सकते, कि इनमें से किसे चुना जाय। कृपया आप ही मेरा समाधान करें, कि सर्वसुलभ और सुनिश्चित मार्ग क्या है? अनेक मार्गों के भटकाव से निकाल कर मुझे सरल अवलम्बन का निर्देश कीजिए।
स्वाध्याय, चिन्तन, परामर्श, पर्यटन आदि उपाय काम में लाये जाते हैं। यह उपाय साधन जिन्हें उपलब्ध नहीं होते वे कूप मण्डूक बने रहते हैं। वे जीवन का भार ढोने के अतिरिक्त और कुछ कर नहीं पाते। इसलिए जहाँ चेतना की शक्ति पर विचार किया जाता है वहाँ प्रकारांतर से उसे विचार शक्ति का विशेष उपयोग कहा जाता है। विचारशील ही महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाते, महत्वपूर्ण कार्य करते और सफल महापुरुष कहलाते हैं।
स्वाध्याय के नाम पर उलटी-सीधी पुस्तकें पढ़ लेने से काम नहीं चलता भले ही थोड़ा पढ़ा जाय पर उसे चिन्तन मनन पूर्वक पढ़ा जाय। साथ ही यह परखते चला जाय कि आदर्शों का हम अनुकरण कर रहे हैं या नहीं। यदि नहीं तो भूल को तुरन्त सुधारा जाय। यदि कर रहे हैं तो उस दिशा में और भी दृढ़ता अपनानी चाहिए। इस मनःस्थिति के साथ समाधान परक साहित्य पढ़ा जाये।
स्वाध्याय क्या है? यह समझने की बात है। स्व माने अपने आपका। अध्याय माने अध्यापन करना। अपने आपको पढ़ना अर्थात् अपने को समझना।
स्वाध्याय समझते हैं। उसकी चिन्ह पूजा कर लेने से कोई काम नहीं बनता। साहित्य पढ़ना हो तो जीवन की समस्याओं का स्वरूप और समाधान बताने वाला साहित्य पढ़ना चाहिए। इसके लिए विचारशील दूरदर्शी लोगों का लेखन ही चयन करना चाहिए। स्वाध्याय के नाम पर उलटी-सीधी पुस्तकें पढ़ लेने से काम नहीं चलता भले ही थोड़ा पढ़ा जाय पर उसे चिन्तन मनन पूर्वक पढ़ा जाय।
स्वाध्याय की उपेक्षा करना, उसमें प्रमाद बरतना मन को रोगी बनाने के समान है।
स्वाध्याय में प्रमाद न करो। सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा अनेक हैं, पर उनमें तीन ही प्रमुख हैं। जो उन्हें पालन करता है, समझना चाहिए कि धर्माचरण का सार उसने हृदयंगम कर लिया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-January
स्वाध्याय मंडल की स्थापना इतने भर से हो गयी और उस आधार पर स्वाध्याय एवं सत्संग की उभय पक्षीय प्रक्रिया बन पड़ी। इस आधार पर अपने स्वजन सम्पर्क में यह बीजारोपण हो सकता है जिसके लिए प्रज्ञा अभियान के अन्तर्गत मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का उद्घोष किया जाता रहा है।
स्वाध्याय मंडल बनालें। घर के शिक्षितों को प्रज्ञा साहित्य पढ़ाने और अशिक्षितों को सुनाने की यदि नियमित व्यवस्था चल पड़े तो समझना चाहिए कि इससे भी पारिवारिक स्वाध्याय मण्डल बन गया। घर के छोटे-बड़े सदस्यों के सहारे भी यह प्रक्रिया गतिशील हो सकती है। आखिर परिवार भी तो एक छोटा समाज या राष्ट्र ही है। उतने क्षेत्र में भी लोक मानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति संवर्धन का प्रयास बन पड़े तो समझना चाहिए कि छोटे खेत में बोया गया बीज भी अगले दिनों टोकरी भर धान्य के रूप में विकसित होगा।
स्वाध्याय मंडल चलाना आरम्भ कर दें।
स्वाध्याय मण्डलों के संस्थापक संचालकों को बुलाया गया है। उनका कार्य विवरण ही फिल्माया जायेगा। निर्माण कार्य में ऐसी तत्परता रखी गई है कि उसे हाथों हाथ दिखाया जा सके। सभी आगन्तुकों को ये फिल्म दिखायी जाएँगी।
स्वाध्याय सत्संग की तरह ही भावनात्मक नवनिर्माण का एक माध्यम आस्तिकता अभिवर्धन भी है। धार्मिकता आध्यात्मिकता की तरह आस्तिकता भी भावना, चेतना में उत्कृष्टता अभिवर्धन का एक नितान्त आवश्यक माध्यम है। अखण्ड ज्योति परिजन न केवल विचार विस्तार की आवश्यकता समझें वरन् उसके साथ-साथ घर में आस्तिकता का वातावरण बनाने के लिए प्रयत्न करें। इस आधार पर चरित्र चिन्तन और व्यवहार में देवत्व का अभिवर्धन होकर चिरस्थाई सुख-शांति के लिए इसकी भी महती आवश्यकता है। आस्तिकता का बीजारोपण एवं परिपोषण करने के लिए न्यूनतम उपासना की भी एक मर्यादा बन चले।
स्वाध्याय मण्डलों का बड़ा और विस्तृत स्वरूप भी है। उसके अन्तर्गत ज्ञानरथ के रूप में चल देवालय खड़ा करने और बिना इमारत वाले प्रज्ञा संस्थानों का संचालन करने की बात भी है। एक कार्यकर्ता की नियुक्ति से न केवल हर शिक्षित को घर बैठे बिना मूल्य नियमित रूप से स्वाध्याय की सुविधा प्रस्तुत की जा सकती है। वरन् साथ-साथ सत्संग का उपक्रम भी चलता रह सकता है। स्लाइड प्रोजेक्ट, टेप रिकार्डर जैसे उपकरणों से कोई सामान्य व्यक्ति घर-घर में गली-मुहल्लों में प्राणवान सत्संग की व्यवस्था निरन्तर बनाये रह सकता है।
स्वाध्याय के साथ-साथ सत्संग का भी अन्न जल जैसा युग्म है। सत्संग के लिए रात्रि को प्रज्ञा पुराण कथा चल पड़नी चाहिये। घर के सभी छोटे-बड़े उसे श्रद्धापूर्वक सुनें। कहने का अभ्यास करने से वक्तृत्व कला का विकास होता है। प्रेरणाप्रद कथायें सुनने की पुरातन परम्परा को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया ऐसी है जिससे भाव चेतना में उत्कृष्टता भरने का उपचार सहज ही चलता रह सकता है और उस आधार पर घर में देव परम्परा के प्रति सभी का श्रद्धा विश्वास बना रह सकता है।
स्वाध्याय मण्डल बन गया। घर के छोटे-बड़े सदस्यों के सहारे भी यह प्रक्रिया गतिशील हो सकती है। आखिर परिवार भी तो एक छोटा समाज या राष्ट्र ही है। उतने क्षेत्र में भी लोक मानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति संवर्धन का प्रयास बन पड़े तो समझना चाहिए कि छोटे खेत में बोया गया बीज भी अगले दिनों टोकरी भर धान्य के रूप में विकसित होगा।
स्वाध्याय मण्डल वे हैं जिन्होंने ज्ञान रथ बनाए, चलाए तथा स्लाइड प्रोजेक्टर दिखाने, जन्म दिन मनाने जैसे प्रज्ञाचक्र घुमाने से संबंधित कार्यक्रम पूरे उत्साह के साथ चलाए हैं। इन लोगों ने स्मारिका प्रकाशन व पूँजी जुटाने का कार्य भी बिना किसी कठिनाई के कर लिया है। गर्मी के दिनों में प्रायः सभी समर्थ मण्डल अपने यहाँ प्रज्ञायोजन सम्पन्न करने की व्यवस्था भी बना रहे हैं ताकि उस क्षेत्र में जन-जागरण का उमंग भरा वातावरण बने और जन समर्थन जन सहयोग में कमी न पड़े। नव सृजन की अन्यान्य गतिविधियों को अगले दिनों इसी उत्साह के आधार पर सम्पन्न किया जा सकेगा।
स्वाध्याय मण्डलों को यही काम सुपुर्द किया गया है।
स्वाध्याय मण्डलों का संस्थापन और संचालन ऐसा कार्य है, जिसे कोई भी भावनाशील उत्साही व्यक्ति एकाकी प्रयास से भली प्रकार चलाता रह सकता है।
स्वाध्याय की सुविधा प्रस्तुत की जा सकती है। वरन् साथ-साथ सत्संग का उपक्रम भी चलता रह सकता है। स्लाइड प्रोजेक्ट, टेप रिकार्डर जैसे उपकरणों से कोई सामान्य व्यक्ति घर-घर में गली-मुहल्लों में प्राणवान सत्संग की व्यवस्था निरन्तर बनाये रह सकता है। पूँजी जुटाने के लिए स्मारिका प्रकाशन की और नियुक्त कार्यकर्ता के निर्वाह के लिए जन्म दिवसोत्सव मनाने और उस अवसर पर ज्ञानघट स्थापित करने की रीति-नीति अपनाई गई है। यह बड़े स्वाध्याय मण्डलों की बात हुई।
स्वाध्याय मण्डलों के रूप में संगठन खड़े करने और प्रकाश वितरण में जुटाने के लिये कहा गया है। विचार क्रान्ति की प्रज्ञा अभियान की व्यापकता इससे कम में बन नहीं पड़ेगी। युग चेतना से अवगत-अनुप्राणित व्यक्ति ही इस योग्य हो सकते हैं कि युग धर्म पहचानें। युगशिल्पी बनें और युग प्रहरी के रूप में जन जागरण का माहौल बनायें। इस सन्दर्भ में सबसे पहला काम समय की पुकार सुनने और परिवर्तन की पृष्ठभूमि समझना है।
स्वाध्याय मण्डल संचालकों को ही आमंत्रित किया गया है। उनकी उपस्थिति प्रथम फिल्म निर्माण हेतु आवश्यक समझी गई है। जो यह स्थापना कर चुके या करने जा रहे हैं, वे अपने पहुँचने की सूचना अविलम्ब शांतिकुंज भिजवा दें। स्त्री बच्चों के साथ न लाएँ। भीड़ अधिक होगी और स्थान कम पड़ेगा।
स्वाध्याय मण्डलों पर बनेगी। उनके संचालक फिल्म के पात्र होंगे और बताया जाएगा कि वे किस प्रकार अपने यहाँ इस स्थापना में सफल हो सके। परिस्थितियाँ प्रतिकूल होने पर भी वे किस प्रकार अपने मुट्ठी भर साथियों की सहायता से चल प्रज्ञा संस्थान खड़ा कर सके। इस फिल्म का उद्देश्य सर्वत्र यह उत्साह उभारना है कि अन्यत्र भी इसका अनुकरण चल पड़े और 24000 समर्थ स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञासंस्थानों का संकल्प पूरा करने के लिए सभी वरिष्ठ प्रज्ञापरिजनों में उत्साह उभरे।
स्वाध्याय मण्डलों के नाम से संकल्प तो कितनों ने ही लिए लेकिन उनकी लकीर पूजा ज्यों की त्यों करने के प्रयास जिनने किए हैं, उन्हें सामान्य कहा गया है। समर्थ स्वाध्याय मण्डल वे हैं जिन्होंने ज्ञान रथ बनाए, चलाए तथा स्लाइड प्रोजेक्टर दिखाने, जन्म दिन मनाने जैसे प्रज्ञाचक्र घुमाने से संबंधित कार्यक्रम पूरे उत्साह के साथ चलाए हैं। इन लोगों ने स्मारिका प्रकाशन व पूँजी जुटाने का कार्य भी बिना किसी कठिनाई के कर लिया है। गर्मी के दिनों में प्रायः सभी समर्थ मण्डल अपने यहाँ प्रज्ञायोजन सम्पन्न करने की व्यवस्था भी बना रहे हैं ताकि उस क्षेत्र में जन-जागरण का उमंग भरा वातावरण बने और जन समर्थन जन सहयोग में कमी न पड़े। नव सृजन की अन्यान्य गतिविधियों को अगले दिनों इसी उत्साह के आधार पर सम्पन्न किया जा सकेगा।
स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञासंस्थानों का संकल्प पूरा करने के लिए सभी वरिष्ठ प्रज्ञापरिजनों में उत्साह उभरे।
स्वाध्याय मण्डलों की बात हुई। इसके लिए थोड़ी दौड़-धूप करने, सम्पर्क बनाने और साधन जुटाने की आवश्यकता पड़ेगी। प्रतिभावानों से कहा गया है कि वे अपने व्यस्त कार्यक्रमों में एक छोटी प्रक्रिया यह भी सम्मिलित करते रहें और निर्वाह क्रम में बिना किसी प्रकार का हर्ज किये इस सरल किन्तु दूरगामी सत्परिणाम प्रस्तुत करने वाली परमार्थ व्यवस्था को भी चलाते रहें। स्वाध्याय मण्डलों का संस्थापन और संचालन ऐसा कार्य है, जिसे कोई भी भावनाशील उत्साही व्यक्ति एकाकी प्रयास से भली प्रकार चलाता रह सकता है।
स्वाध्याय एवं सत्संग की उभय पक्षीय प्रक्रिया बन पड़ी। इस आधार पर अपने स्वजन सम्पर्क में यह बीजारोपण हो सकता है जिसके लिए प्रज्ञा अभियान के अन्तर्गत मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का उद्घोष किया जाता रहा है।
स्वाध्याय, सत्संग और साधन की त्रिविधि प्रक्रिया अपने घर परिवार में चल पड़े तो पड़ौसियों मित्रों, परिचितों, सम्बन्धियों तक में भी आलोक वितरण की इस प्रक्रिया को अग्रगामी बनाया जा सकता है। अपने प्रज्ञा पुस्तकालय का लाभ उन्हें भी दिया जाने लगे, इसमें थोड़े से मनोयोग भर की आवश्यकता है। घर में आते-जाते रहने वाले या दफ्तर कारखाने में नित्य ही मिलते जुलते रहने वालों को अपने पुस्तकालय के प्रज्ञा फोल्डर एवं पत्रिकाओं के अंक पढ़ने के लिये दिये जाते रहें तो समझना चाहिए कि ज्ञान यज्ञ को व्यापक बनाने की सेवा साधना का निर्वाह भी साथ-साथ चल पड़ा।
स्वाध्याय मंडल की स्थापना के लिए कहा जा रहा है। अपने परिवारों में से एक भी ऐसा न रहे जिसमें हर छोटे किन्तु दूरगामी परिणाम प्रस्तुत करने वाले प्रयास के लिए उत्साह प्रदर्शित न किया गया हो। भावनात्मक वंश वृद्धि के लिए उन सभी को कहा जा रहा है कि अपने जैसे दस और विचारशील उत्पन्न करें। प्रज्ञा परिजन अगले वर्ष तक एक करोड़ बन कर रहे। 500 करोड़ों को बदलने के लिए इससे कम से काम चल नहीं रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-June
स्वाध्याय और सत्संग। लेखनी से साहित्य सृजा जाता है और उससे स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी होती है। विभिन्न भाषाओं को प्रयोग करते हुए युग-चिन्तन का विस्तार करना सत्संग के स्वरूप को स्पष्ट करता है। इन दोनों की कार्यों के लिए अभी से ताना-बाना बुना जा रहा है। हिन्दी से जो लोग अंग्रेजी, गुजराती, तमिल, तेलगू, मलयालम, कन्नड़ आदि भाषाओं में अनुवाद कर सकें, ऐसे परिजनों को इन पंक्तियों के माध्यम से आमंत्रित किया जा रहा है।
स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी होती है। विभिन्न भाषाओं को प्रयोग करते हुए युग-चिन्तन का विस्तार करना सत्संग के स्वरूप को स्पष्ट करता है। इन दोनों की कार्यों के लिए अभी से ताना-बाना बुना जा रहा है। हिन्दी से जो लोग अंग्रेजी, गुजराती, तमिल, तेलगू, मलयालम, कन्नड़ आदि भाषाओं में अनुवाद कर सकें, ऐसे परिजनों को इन पंक्तियों के माध्यम से आमंत्रित किया जा रहा है।
स्वाध्याय-सत्संग की आरम्भिक शिक्षा का प्रयोजन बहुत हद तक पूरा हो चुका। अब परीक्षा की घड़ियाँ हैं। जो पढ़ा या पढ़ाया गया, उसकी पहुँच कितनी गहराई तक हो सकी है, यही जानना परीक्षा का उद्देश्य होता है। जो उत्तीर्ण होते हैं, उन्हीं का परिश्रम और मनोयोग सराहा जाता है, अन्यथा पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले दोनों ही अपयश के भागी बनते हैं। भावी नवसृजन का स्वरूप क्या और कैसा होगा, इन्हीं जिज्ञासाओं के समाधान के लिए अखण्ड ज्योति का नवसृजन अंक समर्पित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-November
स्वाध्याय सही होगा तो सात्विकता निश्चित रूप से आएगी।
स्वाध्याय में निरत करना एक प्रमुख उपचार है। स्वाध्याय पाठ्य पुस्तकों के पठन-मनन-रटन को नहीं कहते। जो स्वयं की ओर प्रेरित करें आत्मस्वरूप की ओर इंगित करें, वही स्वाध्याय है। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे-एक टन पढ़ने से श्रेष्ठ है एक छटाँक पढ़ना व उस पर आचरण करना।” इसमें सर्वप्रथम है-उचित पुस्तकों का चुनाव।
स्वाध्याय,सत्संग,परलोक,कर्मफल,परमात्मा से संबंध सारी आस्थाओं का अंत हो चुका था तब “
स्वाध्याय है। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे-एक टन पढ़ने से श्रेष्ठ है एक छटाँक पढ़ना व उस पर आचरण करना।” इसमें सर्वप्रथम है-उचित पुस्तकों का चुनाव। पहले उनकी किताबें पढ़ें जिनने आत्मदर्शन किया ईश्वरत्व की प्राप्ति की दिशा में कुछ प्रयास किया फिर उनकी किताबों का स्वाध्याय किया जाए, जिनने ईश्वरप्राप्त पुरुषों की संगति की है अथवा उनके गुणों का वर्णन किया है।
स्वाध्याय किया जाए, जिनने ईश्वरप्राप्त पुरुषों की संगति की है अथवा उनके गुणों का वर्णन किया है।
स्वाध्याय दान, उपासना आदि का नाश करने लगे।”
स्वाध्याय के प्रकाश में स्वयं को निहारा जाए। साधू-महापुरुषों के जीवन में कैसे विघ्न-बाधाएँ आयी कैसे उनने उनका मुकाबला किया हम भी अपने विकारों को ढूँढ़े अस्तित्व के सारे प्रश्न चिन्हों को ढूँढ़े व पता लगाएँ कि हमको कैसे अपनी जीवनपद्धति ढालनी चाहिए। स्वाध्याय के परिप्रेक्ष्य में हमें एक मॉडल अपने लिए बनाना चाहिए ताकि उसे अपने ऊपर लागू किया जा सके। स्वाध्याय सही होगा तो सात्विकता निश्चित रूप से आएगी।
स्वाध्याय, संयम और भक्ति करते हुए ब्रह्म विभूति प्राप्त करते है।
स्वाध्याय पाठ्य पुस्तकों के पठन-मनन-रटन को नहीं कहते। जो स्वयं की ओर प्रेरित करें आत्मस्वरूप की ओर इंगित करें, वही स्वाध्याय है। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे-एक टन पढ़ने से श्रेष्ठ है एक छटाँक पढ़ना व उस पर आचरण करना।” इसमें सर्वप्रथम है-उचित पुस्तकों का चुनाव। पहले उनकी किताबें पढ़ें जिनने आत्मदर्शन किया ईश्वरत्व की प्राप्ति की दिशा में कुछ प्रयास किया फिर उनकी किताबों का स्वाध्याय किया जाए, जिनने ईश्वरप्राप्त पुरुषों की संगति की है अथवा उनके गुणों का वर्णन किया है।
स्वाध्याय के परिप्रेक्ष्य में हमें एक मॉडल अपने लिए बनाना चाहिए ताकि उसे अपने ऊपर लागू किया जा सके। स्वाध्याय सही होगा तो सात्विकता निश्चित रूप से आएगी।
स्वाध्याय, सत्संग, संस्कार, सामाजिक सभ्यता और शिष्टाचार की वह सब बातें आती हैं, जो अपनी प्रसन्नता के लिए हम औरों से चाहते है।
स्वाध्याय किया जाना चाहिए। इसके बाद अगला कदम क्या हो-पढ़े हुए स्वाध्याय के प्रकाश में स्वयं को निहारा जाए। साधू-महापुरुषों के जीवन में कैसे विघ्न-बाधाएँ आयी कैसे उनने उनका मुकाबला किया हम भी अपने विकारों को ढूँढ़े अस्तित्व के सारे प्रश्न चिन्हों को ढूँढ़े व पता लगाएँ कि हमको कैसे अपनी जीवनपद्धति ढालनी चाहिए। स्वाध्याय के परिप्रेक्ष्य में हमें एक मॉडल अपने लिए बनाना चाहिए ताकि उसे अपने ऊपर लागू किया जा सके। स्वाध्याय सही होगा तो सात्विकता निश्चित रूप से आएगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-February
स्वाध्याय-सत्संग का एकमात्र प्रयोजन इस आत्मकाल को उत्पन्न करने की, मनः स्थिति बनाना ही है। अवांछनीयताओं के अभिवर्धन का शौर्य साहस प्रदर्शन करने से आत्मबल बढ़ता है। बढ़ा हुआ आत्मबल ही वह शक्ति है,
स्वाध्याय, संयम एवं सेवाकार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने दूँगा। चारों ओर मधुरता, स्वच्छता एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करूंगा। “ आत्मसुधार एवं गुणों के अवलम्बन द्वारा अध्यात्म मूल्यों को जीवन में कैसे उतारा जाए, इसका समग्र शिक्षण संकल्प के इस खण्ड से मिलता है।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन का इसके अतिरिक्त, और कोई उद्देश्य नहीं। ईश्वरप्राप्ति आत्मसाक्षात्कार, स्वर्ग-उपलब्धि ओर जीवन-मुक्ति का तात्विक स्वरूप यही हैं कि व्यक्ति अपनी समस्त क्षुद्रताओं और निकृष्टता को निरस्त करके सदुद्देश्यपूर्ण सत्प्रयोजनों में निरस्त रहने का अभ्यस्त बन जाय। परिष्कृत आत्मा का नाम ही परमात्मा हैं अपने कषाय-कल्मषों का निराकरण करना ही तप-साधना हैं ईश्वर-प्रेम का सहारा लेकर अन्तःकरण में अपार प्रेमनिष्ठ की धारणा और उसका लाभ उदार सेवा-प्रवृत्ति के रूप में प्राणिमात्र को देना, ईश्वरभक्ति हमें इसी लक्ष्य उदार सेवा-प्रवृत्ति के रूप में प्राणिमात्र को देना, ईश्वरभक्ति हमें इसी लक्ष्य की ओर ले जाती है। अध्यात्म दर्शन की सारी सफलता इस बात पर निर्भर की सारी सफलता इस बात पर निर्भर है कि व्यक्तित्व के समग्र निर्माण के लिए कितना साहस किया गया? दुर्गुणों को निरस्त करने और सद्गुणों को बढ़ाने के लिए कितना प्रयास किया गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-August
स्वाध्याय के अलावा भी सामूहिक आयोजनों की दृष्टि से प्रज्ञापुराण कथा के आयोजन बड़े उपयोगी व प्रभावी सिद्ध हुए हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-December
स्वाध्याय ही इसका मार्ग है। रूढ़िवादी रीति से किन्हीं किस्से-कहानी जैसी किताबों का पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। व्यवहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा दिखलाने वाला स्वाध्याय ही आवश्यक है और उसे दैनिक जीवन का एक नित्यकर्म मानकर किया ही जाना चाहिए।
स्वाध्याय नहीं है। व्यवहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा दिखलाने वाला स्वाध्याय ही आवश्यक है और उसे दैनिक जीवन का एक नित्यकर्म मानकर किया ही जाना चाहिए।
स्वाध्याय कर हम उस शिक्षण को हस्तामलकवत सामने पा सकते हैं।
स्वाध्याय भी उसकी पूर्ति करता है।
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन-मनन कथा-प्रवचनों का महात्म्य इसी आधार पर बताया गया है ताकि उस प्रक्रिया के सहारे मानवी चिन्तन का परिष्कार होता रहे और विकृत मनोवृत्तियों से छुटकारा मिलता रहे। इससे विवेकयुक्त दूरदर्शिता का पथ प्रशस्त होता है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतम्भरा-इसी परिष्कृत चिन्तन का नाम है।” ऋतं ज्ञानेन मुक्ति” “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमही विद्यते” जैसी उक्तियों में सद्ज्ञान को साधना का प्राण माना गया है। वेदान्त दर्शन को तो विशुद्ध रूप से ज्ञान-साधना ही कहा जा सकता है।
स्वाध्याय ही आवश्यक है और उसे दैनिक जीवन का एक नित्यकर्म मानकर किया ही जाना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-September
स्वाध्याय और सत्संग के आधार पर सद्भावनाओं का समुचित संग्रह अपने भीतर जमा करें और उसमें से साररूप में सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हो उसी को जिह्वा पर आने दें। जीभ में अमृत भी है और विष भी। विषपान करने वाले मुख के रास्ते ही उसे भीतर ले जाते हैं। दुर्भावग्रस्त, संस्कार रहित वाणी को भी विष ही कहा गया है। वह प्रथम अनर्थ वक्ता का ही करती है।
स्वाध्याय, यज्ञ, कीर्तन, मार्जन, तर्पण करते-करते असंख्य सिद्धियाँ करतलगत कर लीं। असाधारण क्षमता वाले मुनि महानन्द की ख्याति चन्द्रमा के प्रकाश की तरह विकसित होने लगीं। सैकड़ों व्यक्ति उनकी सिद्धियों का लाभ उठाने लगे। किंतु मुनि का अन्तः कारण स्थिर न था। सिद्धियों ने उनकी तृष्णा तो बढ़ा दी, पर वह शान्ति, वह स्थिरता न मिली जिसके लिए मुनि ने घर-वार और स्नेहियों, संबंधियों का साथ छोड़ा था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-April
स्वाध्याय की, धनी बनने के लिए व्यवसाय की आवश्यकता पड़ती है, इसी प्रकार आत्मिक - प्रगति का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उपासनात्मक उपचार अपनाने पड़ते है। दिव्य -जीवन की चरम परिस्थिति ही पूर्णता है। इसी स्थिति को स्वर्ग, सिद्धि एवं मुक्ति की प्राप्ति कहते है। आत्मसाक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन भी यही है। इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जो पुरुषार्थ करना पड़ता है उसे साधना विधान के रूप में अपनाना होता हैं साधना में शिक्षा और प्रेरणा का समावेश होता है फलतः उसकी प्रतिक्रिया जीवनोत्कर्ष के रूप में प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगती है।
स्वाध्याय सत्संग, मनन चिन्तन द्वारा प्राणवान आत्माएँ आकाश में ऐसे प्रचण्ड प्रवाह छोड़ती थी जिनमें जनमानस का अनायास ही बहते रहने और श्रेष्ठ चिन्तन का उसके फलस्वरूप उस उत्पादित उच्च चरित्र का लाभ मिलाता था। अन्तरिक्ष उच्चस्तरीय विचार सम्पदा से भरी रहता था, इसमें अध्यात्म क्षेत्र के मूर्धन्य मनीषी सदा प्रयत्नरत रहते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-July
स्वाध्याय को ही है, जो सुभाष की जीवनशिला पर क्रियाशीलता बनकर खुद चुका था।
स्वाध्याय की इस महत्ता को जानते हुए प्रायः लोग अच्छी पुस्तकें पढ़ते भी हैं, परन्तु जो पढ़ा गया है, उस पर चिन्तन, मनन और वार्तालाप नहीं करते। यही कारण है कि उस अध्ययन का प्रभाव जीवन में स्थायी नहीं हो पाता। यदि पुस्तकों-शास्त्रों के सारे जीवन में उतारने की प्रक्रिया लोग सीख जाएँ तो सामान्य-सी परिस्थितियों में ही हर व्यक्ति उत्कृष्टता के चरम बिन्दु तक पहुँच सकता है। अच्छी पुस्तकें, महापुरुषों की जीवन-गाथाएँ गोघृत एवं दुग्ध के समान पौष्टिक आहार हैं, जो मन-बुद्धि आचार-विचार तर्क व विवेक को परिपुष्ट करके आत्मोत्थान का उज्ज्वल पथ प्रशस्त करती हैं।
स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्।” अर्थात् स्वाध्याय में नित्य तत्पर रहना चाहिए, क्योंकि इससे सद्विवेक-सद्बुद्धि का विकास होता है और उससे समस्त समस्याओं का समाधान मिलता है। प्राकृत-उत्तराध्ययन (26-10) भी इसका समर्थन करते हुए कहता है। “सज्झाएवा निउत्तेण, सव्वदुक्ख विमोक्खणे।” अर्थात् स्वाध्याय करते रहने से समस्त दुखों से मुक्ति मिलती है।
स्वाध्याय सभी प्रकार के भावों का प्रकाश करने वाला है।
स्वाध्यायशीलता और पढ़े हुए को जीवन में रचाने-पचाने के अभ्यास ने गाँधी जी को महान बना दिया। महान मनीषी रस्किन की लिखी पुस्तक- अन टू दिस लास्ट’ के अध्ययन ने तो गाँधी जी के सारे जीवन को ही बदल दिया। यह पुस्तक जीवन भर उनकी मार्गदर्शिका रही।
स्वाध्याय में नित्य तत्पर रहना चाहिए, क्योंकि इससे सद्विवेक-सद्बुद्धि का विकास होता है और उससे समस्त समस्याओं का समाधान मिलता है। प्राकृत-उत्तराध्ययन (26-10) भी इसका समर्थन करते हुए कहता है। “सज्झाएवा निउत्तेण, सव्वदुक्ख विमोक्खणे।” अर्थात् स्वाध्याय करते रहने से समस्त दुखों से मुक्ति मिलती है। इसी ग्रंथ के अगले सूत्र (26-37) में इससे मिलने वाले सत्परिणाम का उल्लेख है।
स्वाध्याय एवं चिन्तन-मनन की महत्ता का प्रतिपादन शास्त्रों में विस्तारपूर्वक किया गया है। मनुस्मृति 3-75 में उल्लेख है-स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्।” अर्थात् स्वाध्याय में नित्य तत्पर रहना चाहिए, क्योंकि इससे सद्विवेक-सद्बुद्धि का विकास होता है और उससे समस्त समस्याओं का समाधान मिलता है। प्राकृत-उत्तराध्ययन (26-10) भी इसका समर्थन करते हुए कहता है। “सज्झाएवा निउत्तेण, सव्वदुक्ख विमोक्खणे।
स्वाध्याय करते रहने से समस्त दुखों से मुक्ति मिलती है। इसी ग्रंथ के अगले सूत्र (26-37) में इससे मिलने वाले सत्परिणाम का उल्लेख है। “सज्झायं च ताओ-कुज्जा सव्वभावविभावणं।” अर्थात् स्वाध्याय सभी प्रकार के भावों का प्रकाश करने वाला है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-October
स्वाध्याय में, महामानवों के सत्संग-सान्निध्य में, तत्त्वदर्शन के मनन-चिन्तन में सम्भव हो सकता है। टेलीफोन वार्ता की तरह भगवान से वार्तालाप करने की और टेलीविजन पर चलते-फिरते ईश्वर को देखने की निरर्थक उड़ाने उड़ना छोड़कर ही हम वास्तविकता के निकट पहुँच सकते है। भ्रम-जंजाल गढ़कर तो हम अपने आपको अवास्तविकता के ऐसे जाल में अधिकाधिक फँसाते चले जाएँगे, जिसमें बालू से तेल निकालने जैसे निरर्थक प्रयासों की तरह निराशा ही हाथ लगेगी। सुखद कल्पना गढ़ लेना और ईश्वर के साथ क्रीड़ा-कल्लोल हास-विलास करते रहना एक बात है और वैसी यथार्थता का होना दूसरी। कल्पना की उड़ाने सम्भव है किसी का भावनात्मक समाधान कर सकें, पर वास्तविकता के क्षेत्र में उसके हाथ कोई बड़ी उपलब्धि मिल नहीं सकेगी, यह भी सत्य है।
स्वाध्याय-सत्संग मनन-चिन्तन योग-तप आदि के समस्त साधन, उपचार ईश्वरप्राप्ति का लक्ष्य पूरा करने के लिए ही बनाये गये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-March
स्वाध्याय के कार्यक्रमों का आध्यात्मिक, धार्मिक और वैराग्यपूर्ण चिन्तन का स्रोत मस्तिष्क में निरन्तर प्रवाहित था कि तब लोग स्वल्प-साधनों में ही अपार सुख-शान्ति का रसास्वादन करते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-January
स्वाध्याय-मण्डलों के निर्माण की घोषणा इसी दिन की गयी, जो कि विस्तार लेती हुई सारे भारत व विश्व में फैलती चली गयी।
स्वाध्याय के लिए- यह ज्ञान की बुनियाद है।
स्वाध्याय, ज्ञानप्रचार जैसी तप-साधनाएं भी साथ में की जाएँ तो और भी उत्तम हैं।
स्वाध्याय) जिसका भोजन है। इतना विशाल परिवार जिसके पास सदा रहता है, ऐसे योगी को भला किससे भय होगा? वह तो निर्भरतापूर्वक सदा ही आत्मसाधना में रत रहता है। संसार के समस्त प्राणी उसके अपने स्वजन हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-July
स्वाध्याय, सत्संग, कथा, तीर्थ यात्रा, कीर्तन, दान पुण्य, पूजा अर्चा आदि के अपने अपने महत्व है। पर तप का महत्व सर्वोपरि है क्योंकि तप की अग्नि में पड़कर ही आत्मा के मल विक्षेप और पाप ताप जलते रहते हैं। तप के द्वारा ही आत्मा में वह प्रचण्ड बल प्राप्त होता है जिसके द्वारा साँसारिक तथा आत्मिक जीवन की समस्याएं हल होती हैं। सभी तपों की जननी गायत्री है। 84 प्रकार के योगों की साधना गायत्री से ही होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-November
स्वाध्याय (जप और सद्ग्रन्थों का अध्ययन) और ईश्वर की भक्ति- ये नियम हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-June
स्वाध्याय करना चाहिए। किन्तु आश्चर्य, महा आश्चर्य, हम ऐसे ऐसे गन्दे विषयों, कार्यों, वासनाओं के विषय में सोचने लगते हैं, ऐसे ऐसे आसुरी प्रवृत्ति वाले विकार हमारे मन में ताण्डव मचाने लगते हैं, जिस पर हम प्रायः विश्वास नहीं करते, सात्विक प्रवृत्ति के मन में ये दुर्भावनाएं कहाँ से उत्पन्न हो गई?
स्वाध्याय के लिए, चाहे आधा घण्टे के लिए ही, आपको कहा जाये तो सम्भवतः आपका उत्तर होगा “समय नहीं मिलता”।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-February
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन एवं मनोविकारों से लड़ने की तत्परता के आधार पर भी इन्द्रिय लिप्सा पर विजय प्राप्त करना सुगम हो जाता है। इन्द्रियों के चटोरेपन को कभी महत्व न दिया जाय, उनकी पूर्ति करने की सफलता को कभी पुरुषार्थ या सफलता न माना जाय। जब कभी इन्द्रियाँ प्रबल हो रही हों तो उनके समाधान के लिए उस सर्वशक्तिमान सत्ता में सच्चे हृदय से प्रार्थना करनी चाहिए और जब कभी बुद्धि को इन्द्रियाँ हरा दें तब अपने को धिक्कारते हुए उसका पश्चाताप और प्रायश्चित करना चाहिए।
स्वाध्याय करते रहना चाहिये। अविद्या अर्थात् कर्म के रहस्य को जान कर विद्या के द्वारा अमृत पद प्राप्त करना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-April
स्वाध्याय तथा गायत्री प्रणव (ॐ) का अर्थ, विचार जप पौर्णमास्य आदि हवन, पंच यज्ञ, न्याय से अपनी वर्णानुसार जीविका उपार्जन, निष्काम कर्म, परोपकार योगाभ्यास आदि उत्तम कर्मों से इस शरीर को ब्राह्मी स्थिति के योग्य बनावें।
स्वाध्याय एवं सत्संग की ओर उनकी जरा भी रुचि नहीं होती। बड़ों की अवज्ञा करना जिन्हें सुहाता है। कृतघ्नता, छल, विश्वास घात, बेईमानी लीनता, एवं दुष्टता उनकी विशेषता होती है। न स्वयं चैन से बैठते हैं और न दूसरों को बैठने देते हैं। तमोगुण के अज्ञानान्धकार में उनका अन्तःकरण सदा आच्छादित रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-January
स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥
स्वाध्यायः-वेद शास्त्रों के पठन पाठन पूर्वक भगवत् के नाम और गुण का कीर्तन।
स्वाध्याय (5) और ईश्वर भक्ति आदि साधन माने गऐ हैं। कहने को ये छोटे-छोटे शब्द हैं, किन्तु इनका पालन कठिन है। ‘कठिन’ कहने भर से दूर हट जाना कायरता है। अतः हमें यथाशक्ति इनकी साधना करनी चाहिए। आत्म चिंतन द्वारा हममें से प्रत्येक अपनी त्रुटियाँ मालूम करे और दृढ़ता से उन्हें दूर करने का प्रयत्न करे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-December
स्वाध्यायैर्न चेत्यया।
गतिं गन्तुँ द्विजाः शक्ता योगात्संप्राप्नुवन्तियाम्॥2॥
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-December
स्वाध्याय, सत्संग, ईश्वर आराधना, सरीखे सत्कर्मों में करना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-April
स्वाध्याय और संगति से प्राप्त होता है। सद्ग्रंथों का अध्ययन करते रहना तथा ज्ञानियों का सत्संग, समय और सुविधा के अनुसार प्राप्त करना मनुष्य जीवन को सुधारने के लिए अत्यावश्यक है। जिस समाज या देश में यथार्थ ज्ञानियों की जितनी ही अधिक संख्या होगी, उसकी उतनी ही अधिक आत्मोन्नति हो सकेगी और वही मनुष्य, समाज अभीष्ट लक्ष्य को प्राप्त होगा। ऐसे उपयोगी ज्ञान यज्ञ के आयोजन में प्रत्येक मनुष्य को अवश्य ही भाग लेना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-January
स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान) यह सिद्धियों के मूल स्रोत हैं। अहिंसा पालन करने से, उसके समीप पहुँचने वाले आपस का बैर भाव भूल जाते हैं, गाय, सिंह पास बैठे रहते हैं। सत्य का पालन करने से वाणी सत्य होती है जो श्राप, वरदान दिया जाय सफल होता है। आस्तेय का पालन करने से सब रत्नों की प्राप्ति होती है, लक्ष्मी की कमी नहीं रहती। परिग्रह से पूर्व जन्मों का हाल मालूम होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-November
स्वाध्याय नित्य करना चाहिए। अब यह देखना चाहिए कि स्वाध्याय क्या है? स्वाध्याय शब्द के दो अर्थ किये जाते हैं।
स्वाध्याय बुद्धि का भोजन है। आत्मोन्नति का मार्ग है। अवश्य ही प्रतिदिन मनुष्य को सच्चा स्वाध्याय करना चाहिए।
स्वाध्याय शब्द के दो अर्थ किये जाते हैं।
स्वाध्याय वह है कि स्वयं किसी समस्या पर गंभीरतापूर्वक विचार करके निष्पक्ष निर्णय करके अपने विश्वास का मजबूती से निर्माण करें। ऐसा स्वाध्याय बुद्धि का भोजन है। आत्मोन्नति का मार्ग है। अवश्य ही प्रतिदिन मनुष्य को सच्चा स्वाध्याय करना चाहिए।
स्वाध्याय के लिए शास्त्रों ने मनुष्य के लिए कितना प्रेरणापूर्ण आदेश दिया है, इसका अन्दाजा पाठक नीचे के प्रमाणों से लगा सकते हैं-
स्वाध्यायमधीत्॥3॥
स्वाध्यायमामनेत्।”
स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि क्रियायोगः।”
स्वाध्याय, दया, प्रेम, विनय, उदारता, सेवा, पवित्रता आदि से परिपूर्ण कार्य प्रणाली को अपनाता है और देवता कहलाता है। इसके विपरीत जो जीव अपने को शरीर समझता है वह इन्द्रिय सुख, मनोरंजन और शारीरिक लालसाओं का सुख भोगने की इच्छा से भौतिक संपदाएं एकत्रित करने का उद्योग करता है। उसकी अधिकाधिक शक्तियाँ शरीर को प्रसन्नता देने वाले भौतिक साधनों के जुटाने में लगी रहती हैं। ऐसी स्थिति में श्रम, संचय, भोग और तृष्णा ही उसके प्रधान कार्य रह जाते हैं। वह शारीरिक एवं साँसारिक सुखों की अखण्ड प्राप्ति चाहता है पर यह चाहना किसी की भी आज तक पूरी नहीं हुई।
स्वाध्याय से कोई ऐसा ऊँचा लाभ नहीं मिल सकता, जिसका संकेत उपरोक्त शास्त्र वचनों में किया गया है। स्वाध्याय का भावार्थ अपनी विचारकता समस्या को सूक्ष्म दृष्टि से देखना और उसे निष्पक्ष और अपनी स्वतंत्र प्रतिभा द्वारा सुलझाना है। दूसरों के पथ-प्रदर्शन से मनुष्य सत्य तक नहीं पहुँच सकता, क्योंकि परस्पर विरोधी विचार वाले शास्त्र और महापुरुष विभिन्न बातों को कहते हैं, एक दूसरे के मत का खण्डन करते हैं। ऐसी दशा में यदि मनुष्य के अन्दर विचारना न हो, उचित-अनुचित का निर्णय करने योग्य बुद्धि बल न हो तो केवल अंधश्रद्धा के कारण मनुष्य अंधकार में गिर सकता है। उचित पथ-प्रदर्शन करने की क्षमता अन्तःकरण में बैठे हुए सच्चे गुरु में ही है।
स्वाध्याय सर्वोपरि (पराकाष्ठा) है।
स्वाध्यायोऽध्येतव्यः॥1॥
स्वाध्याय का अभ्यास करें। स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
स्वाध्याय का भावार्थ अपनी विचारकता समस्या को सूक्ष्म दृष्टि से देखना और उसे निष्पक्ष और अपनी स्वतंत्र प्रतिभा द्वारा सुलझाना है। दूसरों के पथ-प्रदर्शन से मनुष्य सत्य तक नहीं पहुँच सकता, क्योंकि परस्पर विरोधी विचार वाले शास्त्र और महापुरुष विभिन्न बातों को कहते हैं, एक दूसरे के मत का खण्डन करते हैं। ऐसी दशा में यदि मनुष्य के अन्दर विचारना न हो, उचित-अनुचित का निर्णय करने योग्य बुद्धि बल न हो तो केवल अंधश्रद्धा के कारण मनुष्य अंधकार में गिर सकता है। उचित पथ-प्रदर्शन करने की क्षमता अन्तःकरण में बैठे हुए सच्चे गुरु में ही है। इस गुरु की वाणी स्पष्ट सुन सकें, उसके संकेतों को ठीक तरह समझ सकें, इसके लिए अपनी विचारकता को जागृत करने की आवश्यकता है।
स्वाध्याय के अभाव में बुद्धि की होती है। इसलिए सत्साहित्य का अध्ययन करने के लिए हमारे दैनिक जीवन में अवश्य ही कुछ समय निश्चित रहना चाहिए।
स्वाध्याय बनता है। अपनी आध्यात्मिक, शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सभी समस्याओं पर एकान्त में अपने आप विचार और चिन्तन करना और वास्तविकता का पता लगाकर उपयोगी मार्ग अवलम्बन करना यही स्वाध्याय का तात्पर्य है।
स्वाध्याय है। आहार के अभाव में देह की दुर्गति होती है। वही दुर्गति स्वाध्याय के अभाव में बुद्धि की होती है। इसलिए सत्साहित्य का अध्ययन करने के लिए हमारे दैनिक जीवन में अवश्य ही कुछ समय निश्चित रहना चाहिए।
स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
स्वाध्याय शिविर स्थापित करना। इस शिविर में साधु, संन्यासी, पुरोहित, पंडित, गुरु, पुजारी, महंत आदि धर्मजीवी व्यक्तियों को ‘नर की पूजा ही नारायण की पूजा’ है। इस आधार पर स्वाध्याय करा के उन्हें लोक सेवा के लिए प्रस्तुत किया जायगा। वे जगह-जगह फैल कर गौ रक्षा, धर्म रक्षा, पाठशाला, व्यायामशाला, पुस्तकालय, चिकित्सालय आदि सेवा संघों की स्थापना एवं संचालन करेंगे और इस प्रकार ईश्वर की सच्ची पूजा में प्रवृत्त होंगे।
स्वाध्यायाभ्यसनंचौव वाङ्मयं तप उच्यते।”
स्वाध्याय का इस ग्रन्थ से पता चलेगा। यह भाष्य 18 बड़ी जिल्दों में समाप्त होगा।
स्वाध्याय आवश्यक हैं। दोनों के मिलने में ही एक पूर्ण स्वाध्याय बनता है। अपनी आध्यात्मिक, शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सभी समस्याओं पर एकान्त में अपने आप विचार और चिन्तन करना और वास्तविकता का पता लगाकर उपयोगी मार्ग अवलम्बन करना यही स्वाध्याय का तात्पर्य है।
स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमामनेत्।”
स्वाध्याय का तात्पर्य है।
स्वाध्याय नहीं करता उसी दिन ब्राह्मण अब्राह्मण हो जाता है। इसलिए नित्य-प्रति स्वाध्याय करना चाहिए।
स्वाध्याय क्या है? स्वाध्याय शब्द के दो अर्थ किये जाते हैं।
स्वाध्याय करने में भूल मत करो।
स्वाध्यायान्मा प्रमदः “ -श्रुति
स्वाध्याय और दान।
स्वाध्याय नहीं है। ऐसे स्वाध्याय से कोई ऐसा ऊँचा लाभ नहीं मिल सकता, जिसका संकेत उपरोक्त शास्त्र वचनों में किया गया है। स्वाध्याय का भावार्थ अपनी विचारकता समस्या को सूक्ष्म दृष्टि से देखना और उसे निष्पक्ष और अपनी स्वतंत्र प्रतिभा द्वारा सुलझाना है। दूसरों के पथ-प्रदर्शन से मनुष्य सत्य तक नहीं पहुँच सकता, क्योंकि परस्पर विरोधी विचार वाले शास्त्र और महापुरुष विभिन्न बातों को कहते हैं, एक दूसरे के मत का खण्डन करते हैं। ऐसी दशा में यदि मनुष्य के अन्दर विचारना न हो, उचित-अनुचित का निर्णय करने योग्य बुद्धि बल न हो तो केवल अंधश्रद्धा के कारण मनुष्य अंधकार में गिर सकता है।
स्वाध्याय करता है।
स्वाध्याय करना वाणी का तप है।
स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान यह क्रिया योग है।
स्वाध्याय करना चाहिए।
स्वाध्याय से योग की उपासना करें और योग से स्वाध्याय का अभ्यास करें। स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
स्वाध्याय करा के उन्हें लोक सेवा के लिए प्रस्तुत किया जायगा। वे जगह-जगह फैल कर गौ रक्षा, धर्म रक्षा, पाठशाला, व्यायामशाला, पुस्तकालय, चिकित्सालय आदि सेवा संघों की स्थापना एवं संचालन करेंगे और इस प्रकार ईश्वर की सच्ची पूजा में प्रवृत्त होंगे।
स्वाध्याय का स्थान बहुत ऊँचा है। जिस प्रकार शरीर की भूख बुझाने के लिए अन्न आवश्यक है उसी प्रकार बुद्धि की भूख बुझाने के लिए स्वाध्याय है। आहार के अभाव में देह की दुर्गति होती है। वही दुर्गति स्वाध्याय के अभाव में बुद्धि की होती है। इसलिए सत्साहित्य का अध्ययन करने के लिए हमारे दैनिक जीवन में अवश्य ही कुछ समय निश्चित रहना चाहिए।
स्वाध्यायं नाधीते।
स्वाध्याय योग सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते॥”
स्वाध्यायो हवै तेषाँ पराकाष्टा॥2॥
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-July
स्वाध्याय का संकल्प लिया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-May
स्वाध्याय विचारों का परिमार्जन है इन्हें करते समय या बाद में किलो जीतने जैसा कोई कारण नहीं। जिसके आधार पर स्वर्ग मुक्ति आदी की ठेकेदारी का दावा किया जा सके ओर फूलकर कुप्पा हुआ जाये। कर्तव्यपालन माने जा सकते है। पर उनके कारण गर्वान्वित होने का कोई कारण नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-November
स्वाध्याय आदि सत्प्रवृत्तियाँ चलती रहती हैं वहाँ अपने ठाँव बना लेने वाले भी उसी ढाँचे में ढलने लगते हैं। ऐसे बिरले ही होते हैं जो समुद्र के बीच भी टापू की तरह उभरे रहते हैं और अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व को अक्षुण्ण बनाए रहते हैं। अन्यथा खारी झील में पड़ने के उपरान्त मोटी लकड़ी तक नमक बन जाती है। इस तथ्य को ध्यान में रखा जाय। अपना स्थान बदलकर, अनुपयुक्तता से हटकर उपयुक्तता के समीप निवास बदला जा सके तो सर्वोत्तम।
स्वाध्याय-उपासना का क्रम चलाते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-April
स्वाध्याय का परिपालन और दुर्जनों कुकर्मों का परित्याग उपासना है।
स्वाध्याय-सत्संग अपने परिवार या संपर्क में भी चलता रह सकता है। नारी जागरण अवश्य ऐसा है जिसके लिए थोड़ी अधिक चेष्टा करनी पड़ती है। इसके लिए अपने परिवार की महिलाओं का सुव्यवस्थित क्रम बना देने से भी कार्य आरम्भ हो सकता है। कुरीतियाँ अधिकतर नारी समुदाय के स्वभाव में ही अपना कोंतर बनाये रहती है। उनमें साहस और विवेक बढ़ाया जा सके तो उसका प्रभाव पड़ोसियों, परिचितों पर भी पड़े बिना न रहेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-December
स्वाध्यायशील मिलकर 200 हो जाते है। इस समूचे परिकर में जहाँ उत्साह उभरा है वहाँ एक सत्संग मण्डल के दस विभाग हो गये है। इस प्रकार एक से दस होते हुए और कालान्तर में वे सदस्य भी उतने ही न रहकर सौ बन जाते है। आशा की गई है कि साप्ताहिक सत्संगों के बढ़ते हुए क्रम निरन्तर अग्रगामी भी होंगे और अगले वर्षों ये एक लाख बनकर करोड़ों तक नये युग का सन्देश पहुँचाने लगेंगे।
स्वाध्यायशीलता के माध्यम से विस्तार आगे बढ़ते रहने का अवसर मिलता है।
स्वाध्याय, संयम सेवा के चार पुरुषार्थ में जीवन की प्रगति एवं सफलता बन पड़ती है इसलिये दिनचर्या में उन चारों के लिए समुचित स्थान रहे, उसकी जाँच-पड़ताल आत्म समीक्षा के समय में निरन्तर करनी चाहिये। आत्मसमीक्षा,, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की चतुर्दिक् प्रक्रिया को अग्रगामी बनाने के लिए मध्यान्तर काल की मनन साधना करनी चाहिये। इसे आत्मदर्शन ही समझा जाना चाहिये, जो थोड़ी विकसित अवस्था में ईश्वर दर्शन के रूप में फलित होता है।
स्वाध्याय जैसे सामयिक प्रयोजनों में भी इनकी आवश्यकता पड़ती है। फिर जब प्रौढ़ शिक्षा, गरीबी उन्मूलन समाज सुधार जैसे कार्यों को बड़े रूप में करने पर लिया जायेगा तो हर जगह पैसे की आवश्यकता पड़ेगी। इसकी पूर्ति करने के लिए सार्वजनिक चंदा, सरकारी अनुदान, धनीमानियों की मनुहार यह तीन उपाय ही प्रयोग में लाये जाते है। पर इस तंत्र के चिन्तन ने इसकी पूर्ति भी अपने बलबूते करने का निश्चय किया है। पचास वर्ष के अनुभव ने यह बताया है कि योजनाओं की, कार्यकर्ताओं की प्रामाणिकता यदि असंदिग्ध हो तो सहयोगी अयाचित रूप में भी मिल सकता है।
स्वाध्याय का उपक्रम भी साथ-साथ बड़ी सुगमता पूर्वक चलते रहते है। साधना-उपासना की आध्यात्मिकता जुड़ी रहने से श्रद्धा संवर्धन का पुट भी लगता रहता है। किसी को ऊब नहीं आती और सभी अगले सत्संग का दिन पहले से ही सोचते रहते है। सत्संग यों तो प्रायः किसी स्थिर सुविधाजनक स्थान पर होते रहते है। पर यदि किन्हीं सदस्यों का आग्रह हो तो उनके घरों पर भी आयोजन किये जाते है।
स्वाध्याय व्यवस्था सम्पन्न करता रहता है। शिक्षित अपने संपर्क के अशिक्षितों को युग साहित्य पढ़ कर सुनायें ऐसा क्रम भी सभी चलाते है। इस प्रकार विचारक्रान्ति अभियान को इस स्वाध्यायशीलता के माध्यम से विस्तार आगे बढ़ते रहने का अवसर मिलता है।
स्वाध्याय का व्यापक निर्वाह। अब तक इस कार्य को व्यक्तिगत रूप से झोला पुस्तकालय माध्यम से चलाया करते थे। घर-घर जाकर शिक्षितों को पढ़ाने के लिए बिना कोई फीस लिये पढ़ने के लिए देते थे। बाद में जाकर वापस ले आया करते थे। अब उस प्रक्रिया को साप्ताहिक सत्संगों के अवसर पर सामूहिक रूप से करते रहने का नया प्रावधान चल पड़ा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-March
स्वाध्याय, सत्संग से अथवा गुरुजनों से जो भी ज्ञान अर्जित करता है, उसी के अनुरूप उसके चिन्तन-मनन और सोचने समझने की एक गोलाकार परिधि सी बनती जाती है। मनःमस्तिष्क में बहते हुए यह विचार ही एक धारा का रूप ले लेते है। अतः करण में प्रवाहित होने वाली क्षुद्र भावनाओं की धारा को कषाय-कल्मषों की धारा भी कहते है। काम क्रोध मद मत्सर, मोह, राग, द्वेष, भय आदि विषय वासनाओं एषणाओं की धारा मनुष्य के सूक्ष्म और कारण जगत में सदैव प्रवाहित होती रहती है, जबकि सब महापुरुषों में उदारता, आत्मीयता, सहृदयता, करुणा, पवित्रता आदि की शुभ कल्याणकारी धाराएं प्रवाहित होती रहती है।
स्वाध्याय-सत्संग से सद्विचार तो उठते है और सद्भाव भी उभरते है पर उन्हें प्रत्यक्ष परिपोषण न मिलने से समुन्नत चिन्तन पोषण के अभाव मुरझाते सूखते ही जाता है। इस अड़चन से निपटने के लिए छोटी छोटी दिक्षाएं अपनाने और उन्हें पूरा करते रहने का सिलसिला चलाया जाना चाहिए। तितिक्षाएं प्रमुखतया आदर्शवादी साहसिकता को उभारने के लिए ही की जाती है।
स्वाध्याय सत्संग, चिन्तन, मनन को आधार माना गया है। यह वातावरण के प्रभाव से ही हस्तगत हो सकता है और पूर्व सचिव संस्कारों के आधार पर अन्तः प्रेरणा से भी जब मनुष्य सोचता है कि वह पशु पक्षियों से जीव जन्तुओं से अधिक विकसित एवं समर्थ है तो उसे अपनी वरिष्ठता का बोध होता है। इस बोध को व्यावहारिक जीवन में उतारने की उत्कंठा मचलती है। यहीं है वह प्रसव पीड़ा जिसमें होकर गुजरने पर दूसरा जन्म द्विजत्व उपलब्ध होता है। ऐसी दशा में पेट प्रजनन गौण हो जाता है और मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्टता अपनाने, आदर्शों को जीवन चर्या में घुला देने की योजना बनती है।
स्वाध्याय की, निवास विश्राम की व्यवस्था रहती थी। अभी भी ऐसे तीर्थों के कितने ही प्रतीक चिन्ह जहाँ तहाँ विद्यमान है। किन्तु हिमालय में समतल भूमि की व्यवस्था नगण्य होने के कारण वैसी बड़ी व्यवस्था का सुयोग नहीं बनता रहा है। छोटे-छोटे कुटीर और आश्रम पर संभव होते रहे है उनमें व्यक्तिगत साधनाएं इस दृष्टि से होती रही है कि अन्तराल में समाहित प्रसुप्त शक्तियों का जागरण संभव हो सके। दिव्य वातावरण मिलता रह सके और उस भूमि की उर्वरता में उनका व्यक्तित्व बीच रूप में समुन्नत होते होते समर्थन सम्पन्न हो सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-August
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन-मनन आदि उपायों के द्वारा व्यावहारिक रूप में इसे विकसित किया जाता है। बुद्धिमान, विद्वान, कुशल, पारंगत, समुन्नत बनने का अवसर इसी क्षेत्र के परिसर में बन पड़ता है।
स्वाध्याय,मनन चिन्तन ऐसे ही आधार है किसी एकान्त कोठारी या निर्जन क्षेत्र में बैठकर यह अनुभव किया जा सकता है कि संसार में संव्याप्त अवांछनीयता से अपना संबंध टूट गया। बुरे लोगों का बुरा प्रवाह एक एकाँत के कवच को बेध कर भीतर प्रवेश नहीं कर पा सकेगा। यह ढाल बाहरी अनुपयुक्त प्रभावों से बचाने के लिए एल का काम दे सकती है। शर्त एक है कि उस एकान्त में संसार के अवाँछनीय लोगों का विचार,स्वरूप, कृत्य कल्पना में न आने दिया जाय। सर्वथा कोलाहल रहित स्थान मिलने में कठिनाईयाँ दिखे तो यह प्रयोजन आँखें बंद करके, संसार चिन्तन से मन का निरोध करके भी पुरा किया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-January
स्वाध्याय की सर्वांगीण एवं सामयिक आवश्यकता पूरी करने के लिए युग साहित्य की एक हजार से ऊपर छोटी-बड़ी पुस्तकें लिखी गई और छपी है। उनका अनुवाद, प्रकाशन देश की अधिकाँश भाषाओं में हुआ है। यह प्रवाह अभी रुका नहीं है अखण्ड-ज्योति पत्रिका उद्बोधन की प्रमुख धारा है। वह पढ़ने के बाद किसी कोने में फेंक नहीं दी जाती; पर पन्ने फट-टूट जाने पर भी सम्बन्ध बनाने वालों में न बुझने वाली प्राण प्रेरणा फूँकती रहती है। यह स्वाध्याय पक्ष हुआ।
स्वाध्याय रूपी साबुन से नित्य परिशोधन किया जाना चाहिए। उससे बुहारी का भी काम लिया जाता है। स्वच्छता का सर्वत्र आदर होता है। सम्पन्नता सर्वत्र प्रभावोत्पादक होती है। सद्ज्ञान के आधार पर चिन्तन की स्वच्छता का भी ऐसा ही महत्व है।
स्वाध्याय और सत्संग का पुरातन द्विपक्षीय प्रयोजन अब अकेले स्वाध्याय को ही पूरा करना पड़ता है।
स्वाध्याय का महत्व-महात्म्य इतना अधिक माना जाता था कि उसकी तुलना पारस मणि के साथ की जाती थी। परन्तु ऐसा ही प्रभाव प्रत्यक्ष देखने को भी मिलता था।
स्वाध्याय मण्डलों के लिए यह आवश्यक है कि वे अपने क्षेत्र से अनेक शिक्षार्थी प्रशिक्षण के लिए भेजें। ताकि वे लौटने पर उस क्षेत्र में नवजीवन का आलोक वितरण कर सके। नव जागृति का पुनरुत्थान का आधार खड़ा कर सके।
स्वाध्याय-सत्संग की अनुकृति कहा जा सकता है। इतने पर भी दोनों के बीच मौलिक अन्तर यह है कि जो प्रभाव स्वाध्याय-सत्संग का होता था, वह इन दिनों वाले किन्हीं समारोहों, प्रकाशनों का दीख नहीं पड़ता। लोग इस कान से सुनते और उस कान से निकाल देते है। इधर पढ़ते जाते हैं उधर भूलते जाते है। विचार योग्य प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों होता है?
स्वाध्याय को आत्मिक क्षेत्र का भरण पोषण माना गया है। जिस प्रकार शरीर को आहार की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार बुद्धि क्षेत्र को स्वाध्याय की। कभी यह कार्य सत्संग द्वारा भी सम्भव होता था, पर अब विचारशीलों का सत्संग समयाभाव के कारण अथवा उनके दिवंगत हो जाने पर सम्भव नहीं रहता। सत्संग के नाम पर जो बकवादी ऊल–जलूल बकते रहते है। उससे तो हर किसी का समय ही खराब होता है साथ ही अनगढ़ अन्ध मान्यताएँ दिमाग में घुस पैठ करती है।
स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी करने की दृष्टि से अखंड-ज्योति का मासिक प्रकाशन अपने स्थान पर ठीक है, पर उसे स्थायी और सुरक्षित रखने का उद्देश्य पुस्तकाकार पुस्तकों से ही पूरा होता है। उन्हें पुस्तकालय के रूप से घर की बहुमूल्य सम्पदा की तरह सुसज्जित रखा जा सकता है। उन्हें सुविधानुसार स्वयं पढ़ा जा सकता है और परिवार के सदस्यों को पढ़ाया या सुनाया जा सकता है। पड़ौसियों-संबंधियों को भी समय-समय पर दिया और वापस लिया जा सकता है।
स्वाध्याय और सत्संग की आशिक आवश्यकता पूरी होती है फिर भी ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि इन दो के सहारे ही नव-निर्माण की समस्त आवश्यकताएँ पूरी हो जायेगी। यदि ऐसा होता तो रेडियो, दूरदर्शन जैसे याँत्रिक माध्यम ही लोक-शिक्षण की आवश्यकता पूरी कर लेते। लेखक ओर प्रकाशकों में से भी कितने ही ऐसे है जिनके द्वारा सदाशयतापूर्ण साहित्य ही सृजन किया जाता है। इतने पर भी वे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति इसलिए नहीं कर पाते कि उनके साथ व्यक्तिगत ऐसा संपर्क नहीं जुड़ पाता जो क्रमिक एवं प्रखर हो। दीप से दीप जलते है।
स्वाध्याय प्रयोजन के लिए व्यापक व्यवस्था की थी।
स्वाध्याय-सत्संग का होता था, वह इन दिनों वाले किन्हीं समारोहों, प्रकाशनों का दीख नहीं पड़ता। लोग इस कान से सुनते और उस कान से निकाल देते है। इधर पढ़ते जाते हैं उधर भूलते जाते है। विचार योग्य प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों होता है? प्राचीन काल में तो प्रेस भी नहीं थे, न कागज ही।
स्वाध्याय पक्ष हुआ।
स्वाध्याय के नाम पर प्रायः कथा-पुराणों का ही अवलम्बन लिया जाता है। ये इतिहास भर है और समय के पीछे के प्रतिपादन करते हैं जबकि आवश्यकता सामयिक और आदर्शवादी यथार्थवादी साहित्य की है। उसका लेखन, प्रकाशन, विक्रय नहीं के बराबर है। बुकसेलरों की दुकानें तो उस कचरे से भरी रहती है, जिनसे घटिया मनोरंजन भर होता है या फिर अंधविश्वास पनपता है।
स्वाध्याय की। कभी यह कार्य सत्संग द्वारा भी सम्भव होता था, पर अब विचारशीलों का सत्संग समयाभाव के कारण अथवा उनके दिवंगत हो जाने पर सम्भव नहीं रहता। सत्संग के नाम पर जो बकवादी ऊल–जलूल बकते रहते है। उससे तो हर किसी का समय ही खराब होता है साथ ही अनगढ़ अन्ध मान्यताएँ दिमाग में घुस पैठ करती है। भोले-भावुकों को तो चंगुल में ही जकड़ लेती है।
स्वाध्याय से ही लेना पड़ता है। स्वाध्याय के नाम पर प्रायः कथा-पुराणों का ही अवलम्बन लिया जाता है। ये इतिहास भर है और समय के पीछे के प्रतिपादन करते हैं जबकि आवश्यकता सामयिक और आदर्शवादी यथार्थवादी साहित्य की है। उसका लेखन, प्रकाशन, विक्रय नहीं के बराबर है। बुकसेलरों की दुकानें तो उस कचरे से भरी रहती है, जिनसे घटिया मनोरंजन भर होता है या फिर अंधविश्वास पनपता है।
स्वाध्याय और सत्संग की दुहरी आवश्यकता इन दिनों पुस्तकों से ही पूरी होती है। सत्संग के लिए ऐसी प्रतिमाएँ मिलती नहीं, जो युग समस्याओं को ध्यान में रखते हुए देश-काल-पात्र के अनुरूप मार्गदर्शन कर सके, समस्याओं के समाधान का उपयुक्त परामर्श दे सकें। जो है, वे बहुत व्यस्त है। दूरस्थ देशों में रहती है। कुछ तो दिवंगत भी हो चुकी।
स्वाध्याय-सत्संग ने अपना चमत्कार दिखाया होता।
स्वाध्याय (2) सत्संग (3) सत्प्रवृत्ति संवर्धन- यह उसके लक्ष्य साधन है। सत्प्रवृत्ति संवर्धन का ही दूसरा पक्ष दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन भी है। इसे गलाई-ढलाई की तरह साथ-साथ मिला कर चलना होता है। स्वाध्याय के लिए युग साहित्य का अभिनव सृजन करना पड़ा। कारण कि हर युग की अपनी समस्याएँ तथा परिस्थितियाँ भिन्न होती है।
स्वाध्याय के लिए प्रस्तुत करती रही है, उन्हीं को क्रियात्मक रूप से अभ्यास से उतारने के लिए इन जीवन सत्रों की व्यवस्था की गई है। इसे प्रस्तुतीकरण का व्यवहार पक्ष भी कह सकते है और उच्चस्तरीय सत्संग भी। इनका लाभ उठाने के लिए अखण्ड-ज्योति के परिजनों को समय रहते लाभ उठाना चाहिए। सूत्र संचालकों की प्रत्यक्ष उपस्थिति न रहने पर शिविरों की प्रशिक्षण प्रक्रिया में कुछ तो कमी आवेगी ही।
स्वाध्याय और सत्संग का उल्लेख पिछले पृष्ठों पर किया जा चुका है। स्वाध्याय की सर्वांगीण एवं सामयिक आवश्यकता पूरी करने के लिए युग साहित्य की एक हजार से ऊपर छोटी-बड़ी पुस्तकें लिखी गई और छपी है। उनका अनुवाद, प्रकाशन देश की अधिकाँश भाषाओं में हुआ है। यह प्रवाह अभी रुका नहीं है अखण्ड-ज्योति पत्रिका उद्बोधन की प्रमुख धारा है। वह पढ़ने के बाद किसी कोने में फेंक नहीं दी जाती; पर पन्ने फट-टूट जाने पर भी सम्बन्ध बनाने वालों में न बुझने वाली प्राण प्रेरणा फूँकती रहती है।
स्वाध्याय को मानस क्षेत्र का नित्य कर्म माना है और उसमें कभी प्रमाद न करने का, नियमितता बनाये रहने का, निर्देश किया है। जिस प्रकार शरीर वस्त्र, घर, बर्तन आदि पर नित्य मैल जमने से उनकी नित्य सफाई करनी पड़ती है। उसी प्रकार चिन्तन पर अवाँछनीय वातावरण और अनुपयुक्त संपर्क से पड़ने वाले दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए स्वाध्याय रूपी साबुन से नित्य परिशोधन किया जाना चाहिए। उससे बुहारी का भी काम लिया जाता है। स्वच्छता का सर्वत्र आदर होता है।
स्वाध्याय को ही पूरा करना पड़ता है।
स्वाध्याय और सत्संग की दुहरी आवश्यकताएँ पूरी कर सकने वाला माना गया है और पुस्तकों को उच्चस्तरीय सम्मान दिया गया है। उन्हें सरस्वती की अनेक आकारों में अनेक परिप्रेक्ष्यों में विनिर्मित प्रतिमाएँ कहा गया है।
स्वाध्याय के लिए युग साहित्य का अभिनव सृजन करना पड़ा। कारण कि हर युग की अपनी समस्याएँ तथा परिस्थितियाँ भिन्न होती है। आज के लिए ऐसी प्रतिपादन शैली चाहिए जिसमें तर्क, तथ्य, प्रमाणों का गहरा पुट हो। अब ‘बाबा वाक्यं प्रमाणं’ की लकीर पीटते रहने के लिए किसी को भी सहमत नहीं किया जा सकता। युग साहित्य युग के अनुरूप ही सृजा गया है और सत्संग के लिए शान्ति-कुंज से लेकर स्थापित 2400 शक्ति केन्द्रों के माध्यम से जन-जन के मन-मन तक युग चेतना का संचार किया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-September
स्वाध्याय को इस प्रयास के लिए मुख्य आधार माना जाय।
स्वाध्याय का क्रम चलाने के साथ-साथ सप्ताह में एक बार सामूहिक उपासना, सामूहिक स्वाध्याय परामर्श का क्रम चलायेंगे। इस साप्ताहिक सत्संग कहा जाय। सप्ताह में सुविधानुसार एक दिन का समय इसके लिए पूर्व- निर्धारित रहे। यह सत्संग किसी एक स्थान पर अथवा सदस्यों के घरों पर बदल-बदल कर चलाए जाते रह सकते हैं। इन सत्संगों के लिए पाँच क्रम निर्धारित हैं (1) सामूहिक उपासना- दीपयज्ञ, (2) सहगान- युग संगीत, (3) सामूहिक स्वाध्याय समीक्षा, (4) युग साहित्य विस्तार प्रक्रिया, (5) सामूहिक सूर्यार्घ्य दान।
स्वाध्याय किया था। भिक्षुओं के लिये निर्धारित आचार-संहिता- शास्ता के भी वे अच्छे ज्ञाता थे। उन्हें मालूम था कि भिक्षु को अपने पास तीन चीवर से अधिक रखने का अधिकार नहीं हैं। उन्हें ऐसा लगा कि अपरिग्रह का उपदेश करने वाले आनन्द ने स्वयं ही शास्ता-मर्यादा तोड़ दी हैं, सो उनकी नाराजी और भी बढ़ गई। अगले दिन वे स्वयं ही बौद्ध स्थविर आ उपस्थित हुए।
स्वाध्याय और सत्संग को प्रधान अस्त्र−शस्त्र मान कर इन्हीं के आधार पर युग सृजन को संभव कर पाना संभव हो सकता है।
स्वाध्याय समीक्षा, (4) युग साहित्य विस्तार प्रक्रिया, (5) सामूहिक सूर्यार्घ्य दान।
स्वाध्याय परामर्श का क्रम चलायेंगे। इस साप्ताहिक सत्संग कहा जाय। सप्ताह में सुविधानुसार एक दिन का समय इसके लिए पूर्व- निर्धारित रहे। यह सत्संग किसी एक स्थान पर अथवा सदस्यों के घरों पर बदल-बदल कर चलाए जाते रह सकते हैं। इन सत्संगों के लिए पाँच क्रम निर्धारित हैं (1) सामूहिक उपासना- दीपयज्ञ, (2) सहगान- युग संगीत, (3) सामूहिक स्वाध्याय समीक्षा, (4) युग साहित्य विस्तार प्रक्रिया, (5) सामूहिक सूर्यार्घ्य दान।
स्वाध्याय सत्संग के आधार पर पूरा किया जा सकता हैं। मंत्रों से उनका अक्षर गु¡थन ही रहस्यमय हैं यदि उन्हें प्रयोग करते समय समुचित श्रद्धा विश्वास का पुट लगाये रहा जाय तो उसका समुचित प्रतिफल मिलकर ही रहता हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-June
स्वाध्याय मंडलों की स्थापना 15000 के .... बनी हैं। स्थापना के समय जो उत्साह था वह .... शिथिल होने लगा तो जिन रचनात्मक क्रियाकलापों के निरन्तर चलने की आवश्यकता थी, उनमें आ गई। स्पष्ट है कि आग में ईंधन न डाला जायगा। .... बुझेगी। पौधे को सींचा न जायगा तो वह सूखेगा।
स्वाध्याय मण्डल गठित हुए है। जहाँ भी नारी जागरण के अभिनव संगठन खड़े हुए है। वहाँ सामूहिक दीप-यज्ञ करने की योजना बननी चाहिए। यह कार्य अति सरल है। एक दिवसीय होने के कारण उसमें व्यस्तता भी बाधक नहीं होती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-November
स्वाध्याय क्रम से उन्होंने इतना लाभ उठाया कि आगे चलकर वे विश्व ख्याति स्तर के ज्योतिर्विद्, खगोलवेत्ता और विविध विषयों के विद्वान बन गए।
स्वाध्याय और सत्संग का मनन और चिन्तन का ऐसा क्रम बनाया जाय जिससे उस दिशा में चलने के सत्परिणामों के सम्बन्ध में तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरणों के आधार गायत्री उपासना के लिए श्रम करने की सार्थकता पर श्रद्धा और विश्वास गहरा होता चला जाय।
स्वाध्याय और मनन चिंतन के एकाकी प्रयत्न से भी सम्भव हो सकता है, पर अधिक सरल और व्यवहारिक यह है कि गायत्री चर्चा के संदर्भ में चलने वाले सत्संगों में उत्साहपूर्वक नियमित रूप से सम्मिलित होते रहा जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-December
स्वाध्याय, तीर्थ, व्रत, ध्यान-धारणा समाधि आदि के अनेक उपायों में से सभी का कर सकना, एक के लिए सम्भव नहीं। फिर सामान्यजन यह भी निर्णय नहीं कर सकते, इनमें से किसे चुना जाय? कृपया आप ही मेरा समाधान करें कि सर्व सुलभ और सुनिश्चित मार्ग क्या है? अनेक मार्गों के भटकाव से निकालकर मुझे सरल अवलम्बन का निर्देश दीजिए।
स्वाध्याय, परिवार गोष्ठी एवं युगसंधि महापुरश्चरण की द्वितीय चरण में भागीदारी से सम्बन्धित हैं यह सभी के लिए अनिवार्यतः अपनाने योग्य है। इस प्रक्रिया को जितने घरों तक पहुँचा जा सके, घर मन्दिर, संस्कार मन्दिर, ज्ञान मन्दिर राष्ट्र सेवा मन्दिर स्थापना क्रम द्वारा फैलाया जा सके उतना ही पुण्य व श्रेय के अधिकारी हम बनेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-September
स्वाध्याय और सत्संग। युगावतार भगवान तथागत के चिन्तन को पियो। जिन्होंने उनके चिन्तन के अनुरूप जीना शुरू किया है, उनका सत्संग करो। रोज न सही तो साप्ताहिक ही सही। ऐसे परिव्राजकों की आज बड़ी संख्या तैयार की जा रही है, जो घूम-घूम कर जनमानस को युग की भावधारा से अनुप्राणित करें।
स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान) यह सिद्धियों के मूल स्रोत हैं। अहिंसा पालन करने से, उसके समीप पहुँचने वाले आपस का वैर-भाव भूल जाते हैं गाय सिंह पास बैठी रहती हैं। सत्य का पालन करने से वाणी सत्य होती है जो .................. वरदान दिया जाय सफल होता है। अस्तेय का पालन करने से सब रत्नों की प्राप्ति होती है, लक्ष्मी की कमी नहीं रहती, अपरिग्रह से पूर्व जन्मों का हाल मालूम होता है। तप से शरीर हलका और दूर-दृष्टि मिलती है यदि।
स्वाध्याय अति आवश्यक है। चारों ओर के वातावरण का असर हम पर पड़ता है। उसे दूर करने के लिए हम ज्ञान का, विचारणाओं का लगातार शिक्षण करें। अगर हमें श्रेष्ठ जीवन जीना है तो गंदे विचार जो बिना प्रयत्न के हमारे ऊपर हावी होते रहते हैं, उनसे लोहा लेने, अच्छा जीवन जीने के लिए श्रेष्ठ विचारों के संपर्क में रहना पड़ेगा। हमारे मन में बड़ी मलीनता आती है।
स्वाध्याय और सत्संग क्या है? श्रेष्ठ पुरुषों का सान्निध्य और सद्ज्ञान के प्रति निष्ठावान् होना। अगर दो काम आपने नहीं किये है, तो आप ग्यारह माला जपें, चाहे ग्यारह हजार माला जपें, कुछ नहीं होने वाला। विकारों को आप काटते नहीं है। जीवन को ऊँचा उठाने के लिए जिस क्रेन की जरूरत है, उससे आपका सम्पर्क ही नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-August
स्वाध्याय की आदत डालें। आत्म-निर्माण की योजना बनाने के चिंतन मनन में मन को लगायें। कुविचार आते ही उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनसे लड़ने के लिए खड़ी कर दें। नित्य हिसाब रखें किंतु सत्प्रयोजनों में, कृपणता भी न बरतें। संग्रही न बनें पर आमदनी से खर्च कम रखें, कुछ बचत रखें, उधार लेने की आदत न डाले।
स्वाध्याय किया किंतु जो एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि उनकी रही है, जिसने गायत्री परिवार रूपी विराट संगठन को भी जनम देने का मुख्य निमित्त बनने का श्रेय प्राप्त किया, वह है उनकी लेखनी की साधना। युगव्यास की तरह जीवन भर वे लिखते रहें व अपने वजन से भी अधिक भार का साहित्य, हर विषय पर युग-संजीवनी के रूप में लिख गए।
स्वाध्याय मण्डलों, शक्तिपीठों पर अमूल्य निधि की तरह रखने के लिए, उपहार आदि के लिए देने हेतु, वाचनालय में अपनी ओर से स्थापना कराने के निमित्त, दहेज व विरासत के रूप में बच्चों या रिश्तेदारों के देने योग्य श्रेष्ठतम भेंट इससे अधिक और कोई नहीं हो सकती। पितरों के प्रति श्रद्धा निमित्त श्रद्धा निमित्त श्राद्ध-तर्पण के साथ-साथ यह साहित्य विद्यालयों में, संगठनों में भेंट के रूप में या प्रतिभाशाली छात्रों को पारितोषिक रूप में दिया जा सकता है। इतने विराट परिमाण में प्रकाशित हो रहे साहित्य का पुनर्रचना
न मिशन के बढ़ते दायित्वों को देखते हुए सम्भव नहीं है, अतः यह अवसर चूका नहीं जाना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-October
स्वाध्याय के प्रति जाग उठे तो उनका व्यक्तित्व भी अपूर्ण न रहे। जो इसमें पिछड़ जाते हैं, वे पछताते हैं।
स्वाध्यायशील रहे हैं। आचार्य अत्रे उन दिनों बीमार पड़े थे। फिर भी चारपाई पर सिरहाने, बगल में उनने ढेरों पुस्तकें जमा कर रखी थीं। उस कष्टकर मनःस्थिति में पढ़कर मन का हलका करते थे। एक मित्र मिलने आये और उन्होंने पूर्ण विश्राम की बात कहते हुए पढ़ने से बचने का परामर्श दिया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-June
स्वाध्याय के चमत्कारी परिणाम तो मथुरा व हरिद्वार के वर्णन में अधिक देखने को मिलते हैं। यहाँ तो उनकी स्वतंत्रता संग्राम में सेनानी, स्वयंसेवक एक समाज सेवी के नाते जो भूमिका रही, उसका वर्णन करना ही समीचीन होगा। उन्हें साथियों में ‘श्रीराम मत्त’ नाम से जाना जाता था। 1928 से 1935 की अवधि में वे कई बार अल्पावधि के लिए जेल गए, अंग्रेजों से लाठी की मार सही, किसानों के हित के लिए लगान बन्दी के जुल्म के आँकड़े एकत्र कर काँग्रेस के बड़े नेताओं के पास भिजवाये, जिन्हें देखकर स्वयं वायसराय आश्चर्य चकित हो गये थे कि एक अकेला 18-19 वर्षीय किशोर यह काम कैसे कर सका? तथा मालवीय जी, पं. जवाहर लाल नेहरू की माता स्वरूपा रानी नेहरू, रफी, अहमद किदवई, श्री देवदास गाँधी जैसे स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूतों के साथ आसनसोल जेल में रहने का अवसर मिला।
स्वाध्याय जन्म चिन्तन को लिपिबद्ध कर अखण्ड-ज्योति रूपी पत्रिका प्रकाशित किये जाने तथा राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के सान्निध्य में जाने, स्वतंत्रता संग्राम के एक सेनानी के नाते सहयोग देने के निर्देश आँवलखेड़ा की इस बस्ती के उनके विशाल घर की छोटी-सी पूजा की कोठरी में ही मिले। यहीं पर उन्होंने बतलाया गया कि साधना स्वाध्याय व स्वतंत्रता संग्राम के एक सेनानी के रूप में मातृभूमि की सेवा के त्रिसूत्री कार्यक्रम के साथ-साथ उन्हें चार बार हिमालय यात्रा करनी पड़ेगी संभावित समय व स्थान के निर्देश भी मिले व जीवन यात्रा के आगामी कार्यक्रम का एक स्वरूप उन्हें समझा दिया गया। तब से बसंत पंचमी को ही उनके आध्यात्मिक जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है।
स्वाध्याय व स्वतंत्रता संग्राम के एक सेनानी के रूप में मातृभूमि की सेवा के त्रिसूत्री कार्यक्रम के साथ-साथ उन्हें चार बार हिमालय यात्रा करनी पड़ेगी संभावित समय व स्थान के निर्देश भी मिले व जीवन यात्रा के आगामी कार्यक्रम का एक स्वरूप उन्हें समझा दिया गया। तब से बसंत पंचमी को ही उनके आध्यात्मिक जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-March
स्वाध्याय मंडल 24 हजार प्रज्ञा एवं महिला मंडल 4 हजार प्रज्ञा संस्थान जन-जन को गायत्री महाशक्ति का संदेश दे रहें है। यह कुल मिलाकर 50 हजार स्थान भी नहीं होते है जबकि सारे देश में गाँवों की संख्या ही 7 लाख से अधिक है विराट् जनसंख्या वाले नगर तो उससे अतिरिक्त है जब तक इन गाँवों नगरों में युग शक्ति संचरित न हो तब तक राष्ट्र कुण्डलिनी के जागरण का अर्थ क्या हुआ?
स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन-मनन से लेकर और जप-तप एवं योगाभ्यास परक ध्यान-धारणा समाधि की समस्त प्रक्रियाओं का निर्धारण इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किये गये है। इस प्रकार अपूर्णता से पूर्णता की ओर जब कदम बढ़ चलते है, तब जीवन का वह स्वरूप बन जाता है जिसमें आत्मा भवबंधनों से मुक्त होकर नर नारायण बनने की ओर प्रगति यात्रा को अग्रगामी कर पाती है।
स्वाध्याय शिक्षण और आश्रम व्यवस्था में व्यस्त हो गए। पर श्यावाश्व अपने योगाभ्यास में अभी भी संलग्न थे। एक समय का आहार-मिताहार यम नियम, ध्यान -धारणा का अभ्यास करते-करते श्यावाश्व ने अपने जीवन की रही सही महत्त्वाकाँक्षाओं का भी हवन कर दिया। साधना साधना साधना शरीर को तपाने से लेकर मन को ईश्वरीय सत्ता में घुलाने के लिए वे अविराम तप करने लगे।
स्वाध्याय, संयम, सेवा जैसी सुगम विधियाँ भी बताई गई है और मनोनिग्रह, ध्यान, धारणा, त्राटक प्राणायाम जैसी यौगिक क्रियाएँ भी। मनःस्थिति और परिस्थितियों के अनुरूप किसी का भी चयन किया जा सकता है। लक्ष्य मात्र एक ही होना चाहिए विचारों की शुचिता। यदि विचार सही व विधेयात्मक हुए तो व्यक्ति का निर्माण सही होता चला जाएगा।
स्वाध्याय से मनुष्य अपने आपका सही-सही समाधान ढूँढ़ सकता है। खासकर विचारों के संघर्ष में पुस्तकें ही सहायक सिद्ध होती है।
स्वाध्यायशीलता बढ़ती है, अनुभव बढ़ता चला जाता है त्यों त्यों व्यक्ति की स्मरण शक्ति व सोचने की विधि भी परिमार्जित होती चली जाती है। कबीर एक सौ बीस वर्ष जिए व श्रीमान दामोदर सातवलेकर जी शताधिक आयु जीकर जीवन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य 75 वर्ष के बाद ही कर गए। जब ऐसा है तो क्यों कर हम अपना आयुष्य रिटायरमेण्ट के बाद पूर्णतः निरर्थक जीवन जीते हुए किसी तरह काट देते है। यदि बढ़ती आयु के साथ बढ़ती स्मृति व विवेक बुद्धि का सुनियोजन समाज निर्माण के निमित्त होने लगें तो समाज का कायाकल्प उस बहुत बड़ी संख्या में हो सकता है जिसे हमने वार्धक्य के कारण उपेक्षा के गर्त वानप्रस्थ परंपरा परिव्रज्या का नव संन्यास परंपरा का पुनर्जीवन ही दूसरा एकमेव समाधान है ताकि हर बुढाता व्यक्ति अपने
महत्त्व को पहचाने अपने अनुभव व विवेक का क्रमशः बढ़ रही स्मरण शक्ति का लाभ समाज को देने की सोचे, न कि ज्यों त्यों समय काटने को या पोतों पोतियों को खिलाने तक अपना जीवन सीमित मानकर किसी तरह जीता रहे। इस बहुत बड़ी संख्या का राष्ट्र के नवनिर्माण में सुनियोजन समय की एक सबसे बड़ी आवश्यकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-May
स्वाध्याय। बड़ा शान्त तथा आनन्दमय जीवन उसे प्रतीत हुआ। अपने साथ थोड़े से वस्त्र, दो कम्बल, एक लोटा, तथा गीता एवं भागवत् की पुस्तकें इतनी ही सामग्री लाया था। ग्राम के लोग उसे आटा, आलू, नमक तथा दूध दे देते थे। शरीर निर्वाह के लिए इतना सब पर्याप्त था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-June
स्वाध्याय करें और महात्माओं का सत्संग करें तो मन संयम में हो जायगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-December
स्वाध्याय करने में कुछ समय लगाना चाहिए और अपनी स्थिति के अनुसार सद्ग्रन्थों का संग्रह भी करते रहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-November
स्वाध्याय और धर्म कर्मों को छोड़कर अनीति एवं अभिपान का आश्रय लेंगे। चील कौओं की तरह अभक्ष होने को होगा तो ऐसी बातें होने लगेंगी।
स्वाध्यायावव षट्काम अर्नयाश्चयभि मानिनः
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-March
स्वाध्याय अर्थात् प्रभु भक्ति से योग को प्राप्त करे और योग से प्रभु भक्ति में स्थित हो। क्योंकि “प्रभु भक्ति” तथा योग अर्थात् आत्म चिन्तन इन दोनों की सहायता से ही भक्त के हृदय में अपने आत्मा तथा परमात्मा का प्रकाश होता है। तात्पर्य यह है कि आत्म साक्षात्कार के दूसरे शब्दों में अपनी आत्मिक शक्तियों के विकास के दो ही मुख्य साधन हैं “आत्म चिन्तन” तथा “प्रभु भक्ति”। इस लेख में हम-”आत्म चिन्तन “ पर प्रकाश डालेंगे। आत्म चिन्तन का अर्थ है अपने आत्म स्वरूप का चिन्तन करना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-March
स्वाध्याय और अन्तःकरण की शुद्धि के लिए उपासना भी आवश्यक है। शरीर को स्नान न कराया जाय तो दुर्गन्ध आने लगेगी और अनेक बीमारियाँ पैदा होंगी। वस्त्रों को न धोने से भी ऐसी गन्दगी और कुरूपता उत्पन्न होगी जिसके कारण दूसरे लोग घृणा करने लगेंगे और शरीर एवं मन की मलीनता बढ़ेगी। इसी प्रकार यदि मन को स्वाध्याय के साबुन और सत्संग के जल में न धोया जायगा तो गंदे वातावरण का प्रभाव निरन्तर पड़ते रहने के कारण दिन-दिन उसका स्तर नीचा ही गिरता चला जायगा। आत्म-चिन्तन और आत्म-शोधन का प्रयत्न जो नहीं करते वे आत्मिक दृष्टि से ऊँचे उठ ही नहीं सकते।
स्वाध्याय के माध्यम से सत्पुरुषों का सान्निध्य निरन्तर प्राप्त करते रहा जाय। यह कार्य श्रेष्ठ साहित्य द्वारा ही सम्भव हो सकता है। सद्ग्रन्थों में महापुरुषों के जीवन चरित्र खुले पृष्ठों की तरह सर्व साधारण के लिए उपलब्ध है। बहुत पूछ-ताछ करने पर जो बातें जानी जा सकती हैं वे उन जीवन-चरित्रों में सहज ही लिखी मिल जाती हैं। फिर जिन महापुरुषों के प्रवचन जिस विषय पर सुनने हों, जिस शंका का समाधान उनसे प्राप्त करना हो उसके लिए उनका साहित्य पढ़ लेना चाहिए।
स्वाध्याय के साबुन और सत्संग के जल में न धोया जायगा तो गंदे वातावरण का प्रभाव निरन्तर पड़ते रहने के कारण दिन-दिन उसका स्तर नीचा ही गिरता चला जायगा। आत्म-चिन्तन और आत्म-शोधन का प्रयत्न जो नहीं करते वे आत्मिक दृष्टि से ऊँचे उठ ही नहीं सकते। जिन्हें स्वाध्याय और सत्संग के लिए अवकाश नहीं उन्हें आत्मिक प्रगति में अभी अभिरुचि ही उत्पन्न नहीं हुई ऐसा निश्चित रूप से कहा जा सकता है।
स्वाध्याय और सत्संग मानवीय जीवन आकाश में सूर्य और चन्द्रमा की तरह चमकने वाले दो उज्ज्वल प्रकाश केन्द्र हैं। जहाँ इनका अस्तित्व न होगा वहाँ चिरस्थायी अन्धकार छाया रहेगा। अन्तरात्मा में विकास की अनेक सम्भावनाएं मौजूद हैं। पर वे प्रस्फुटित और पल्लवित तभी होती है जब उन्हें उपयुक्त साधन मिलें। बीज में वृक्ष बनने की संभावना निश्चित रूप से मौजूद है, पर उसको मूर्त रूप तभी मिल सकेगा जब खाद पानी की आवश्यकता की उचित रूप से पूर्ति होती रहे।
स्वाध्याय के ही आधार पर होता है।
स्वाध्याय और सत्संग के लिए अवकाश नहीं उन्हें आत्मिक प्रगति में अभी अभिरुचि ही उत्पन्न नहीं हुई ऐसा निश्चित रूप से कहा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-April
स्वाध्याय-सन्दोह-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-November
स्वाध्याय से मनुष्य अपने आपका सही-सही समाधान ढूंढ़ सकता है। खासकर विचारों के संघर्ष में अनेकों पुस्तकें ही सहायक सिद्ध होती हैं।
स्वाध्याय के लिये पीढ़ियों तक संग्रह करने के लिये सुरक्षित रखते हैं। उसमें जो कुछ छपता है वह स्थायी महत्व का होता है। आन्दोलनों में सामयिक परिस्थितियों एवं प्रेरणाओं की प्रधानता रहती है इसलिये उसे समाचार प्रधान बनाना पड़ता है। ‘अखण्ड-ज्योति’ विचार प्रधान है। उसमें कुछ दिनों “युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति” नामक स्तम्भ रखकर इस आवश्यकता की आँशिक पूर्ति की गई थी पर वह चिन्ह पूजा मात्र थी।
स्वाध्याय संयम एवं पारलौकिक जीवन का अभ्यास करना पड़ता है तब उस शक्ति का अभ्युदय होना सम्भव हो सकता है।
स्वाध्याय में रुचि नहीं होती वे खाली समय में कुसंगति, दुर्व्यसन, ताश-तमाशे और तरह-तरह की बुराइयों में ही अपना समय बिताते हैं। समाज में व्यवस्था का कारण कोई बाहरी शक्ति नहीं होती, अधिकाँश बुराइयाँ, कलह और झंझट बढ़ाने का श्रेय उन्हीं को है जो व्यर्थ में समय गँवाते रहते हैं। मनुष्य लम्बे समय निष्प्रयोजन, खाली बैठा नहीं रह सकता अतएव यदि वह भले काम नहीं करता तो बुराई करने में उसे देर न लगेगी। उसे अच्छा या बुरा, सच्चा हो चाहे काल्पनिक, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। इसलिए यदि उसे सही विषय न मिले तो वह बुराइयाँ ही ग्रहण करता है और उन्हें ही समाज में बिखेरता हुआ चला जाता है।
स्वाध्याय जीवन का आवश्यक कर्तव्य बना लेना चाहिए।
स्वाध्याय, संयम सदाचार आदि के द्वारा उसका परिष्कार होकर शुद्ध निर्मल तथा पवित्र आत्मा के दर्शन होने लगते हैं।
स्वाध्याय ही करने लग जाए। इससे टूटी फूटी वस्तुओं की सार-सम्हाल, स्वास्थ्य रक्षा और ज्ञान वृद्धि तो होगी ही। समय का मूल्याँकन केवल रुपये पैसे से ही नहीं हो सकता। जीवन में और भी अनेकों पारमार्थिक व्यवसाय हैं। उन्हें भी देखना और ज्ञान प्राप्त करना हमारा धर्म होना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-December
स्वाध्याय सन्दोह
स्वाध्याय से शान्त होता है।” “शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए व्यायाम की आवश्यकता अनिवार्य है।” इन तीनों के लिए एक और सार्थक उपाय संगीत है। इससे मानसिक तनाव दूर होता है, शान्ति मिलती है और स्वास्थ्य स्थिर रहता है। अतएव अपने जीवन को संगीतमय बनाने का प्रयत्न सभी को करना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-January
स्वाध्याय, मौन आदि शुभ कर्मों के लिए कुछ न कुछ अवसर साधारण दैनिक कार्यक्रम चलाते हुए भी निकाल ही लेना चाहिये।
स्वाध्याय रूप में सर्वत्र होने लगे उसके लिए शक्तिभर प्रयत्न करूंगा। 25 हजार संकल्प पुस्तकों के बेचने तथा वितरण कराने का कार्य अगले वर्ष में अकेला पूरा करूंगा। सत्संकल्प के प्रत्येक वाक्य की व्याख्या स्वरूप आचार्यजी एक-एक सर्वांग सुन्दर सस्ता ट्रैक्ट तैयार कर रहे हैं। इन ट्रैक्टों को युग-निर्माण की पाठ्य पुस्तक की तरह पढ़ा समझा और मनन किया जाय इसके लिये हर जगह पूर्व सूचना एवं प्रेरणा देकर लोगों में उसकी प्रतीक्षा करने की उत्सुकता पैदा करूंगा।
स्वाध्याय संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने देंगे।
स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे।
स्वाध्याय सन्दोह
स्वाध्याय और छात्रों को संस्कृत पढ़ाना यही उनके प्रमुख कार्य थे।
स्वाध्याय, सत्संग जैसे कार्यक्रमों में व्यस्त रहे। मनोभूमि पर विक्षोभजन्य प्रभाव उत्पन्न न हो तो ही व्रत का पूरा लाभ मिलता है। व्यवसायिक कार्यों में प्रायः झूठ, चोरी, कर्त्तव्य में ढील, राग-द्वेष, लोभ तृष्णा क्रोध-वासना जैसे दोषों का समावेश बना रहता है। इसलिये अच्छा यही है कि व्रत के उपयुक्त स्थान तलाश किया जाय और उन दिनों छुट्टी लेकर आध्यात्मिक जीवन का लाभ लिया जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-June
स्वाध्याय सन्दोह-
स्वाध्याय, व्यायाम आदि द्वारा आत्म-विकास करें और एक घंटा नित्य अपने परिवार को सुशिक्षित एवं विचारशील बनाने के लिए गोष्ठी का कार्यक्रम चलाया करें। घर का कोई वयस्क व्यक्ति ऐसा न बचे जो अखण्ड-ज्योति पढ़ता या सुनता न हो। घर के लोगों को और अपने को आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देते रहने की समाज-सेवा तो हर परिजन के जिम्मे आई है। इसे अधिकाँश सदस्य पूरा कर रहे हैं जिसने अभी शिथिलता बरती है उनसे जल्दी इस क्रम को आरंभ कर देने की आशा की जाती है।
स्वाध्यायशील, सदाचारी, स्वच्छता प्रिय, स्त्रियों का सम्मान करने वाले, कृतज्ञ, मधुरभाषी, दयालु, उदार, निरहंकारी, मितव्ययी और नियमित दिनचर्या वाले रहे तब तक मैं वहाँ प्रसन्नतापूर्वक निवास करती रही। पर अब जबकि उनने अपना स्वभाव बदल डाला आलस, छिद्रान्वेषण, कटु भाषण, ईर्ष्या, अस्वच्छता, व्यसन, व्यभिचार, उच्छृंखलता, अवज्ञा, गुरुजनों का तिरस्कार, अधर्म मिथ्याचार और अहंकार को अपना लिया तब उनके यहाँ ठहर सकना मेरे लिये असंभव हो गया और उनके अनुनय विनय करने पर भी मैं उन्हें छोड़कर यहाँ चली आई हूँ। अभी तुम लोगों में अच्छे गुण दिखाई पड़ रहे हैं इन्हीं से आकर्षित होकर यहाँ आई हूँ। यदि तुम लोग भी प्रमाद करने लगे तो यहाँ भी मैं न ठहर न सकूँगी। सज्जनता के सद्गुणों के अतिरिक्त मुझे और कुछ भी प्रिय नहीं।
स्वाध्याय, आत्म-चिन्तन एवं योग साधन करना चाहिए, पर इसके लिए घर छोड़कर भाग खड़े होने या सामाजिक उत्तरदायित्वों को तिलाँजलि देने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है।
स्वाध्याय होता है, जहाँ सब लोग प्रेमपूर्वक मिल जुलकर रहते हैं, अनुशासन में रहते हैं, उदारता बरतते और प्रसन्नचित रहते हैं और वहाँ से अन्यत्र जाने को मेरा मन नहीं रहता। परन्तु जहाँ जुआ, परनिंदा, देर से सोना, देर से उठना, चटोरापन, मिथ्याचार, सज्जनों का उपहास और धर्म के प्रति उपेक्षा रहती है वहाँ क्षण भर ठहरना भी मुझे कष्टकारक होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-September
स्वाध्याय अभ्यास और अध्यवसाय के आधार पर ही संभव है। विश्व साहित्य के अमर निर्माता महर्षि टॉलस्टाय ने जो कुछ लिखा वह उनकी जीवन साधना का चिन्तन और मनन का, तप और आदर्श का मूर्तिमान प्रतिफल ही कहे जा सकने योग्य है।
स्वाध्याय सन्दोह -
स्वाध्याय, और धर्म रक्षा के मार्ग में प्रीति उत्पन्न हो जाए।
स्वाध्याय की अभिरुचि उत्पन्न करने में सफल हो सकें तो यह दस व्यक्तियों का प्रयत्न सौ नये व्यक्तियों को योजना की भावनाओं से प्रभावित कर सकता है। उन्हें योजना का सहायक माना जा सकता है। आगे चलकर यह ही सदस्य बन सकते हैं और अपना संगठन दस से बढ़कर सौ का हो सकता है। जिस शाखा में सौ सदस्य हों, सो भी भावनाशील और विचारशील, तो यह निश्चित है कि वे उस नगर के लिए एक अग्रिम पंक्ति का नेतृत्व उपस्थित कर सकेंगे और जनता को अपनी विचारणा, योजना एवं कार्य-पद्धति से आशाजनक सीमा तक प्रभावित कर सकते हैं।
स्वाध्याय - साहित्य कहना चाहिए। पुस्तकों की एक - एक पंक्ति आशा, स्फूर्ति, साहस और आदर्श की प्रेरणा से ओत -प्रोत रखने का प्रयत्न किया गया है। सभी में बढ़िया 28 पौण्ड ग्लेज कागज, मोनो टाइप की सुन्दर छपाई, कार्ड - बोर्ड के तिरंगे टाइटल पेज तथा 100 पृष्ठ हैं। मूल्य प्रत्येक का एक - एक रुपया रखा गया है। पुस्तकें इतनी सुन्दर और नयनाभिराम बन पड़ी हैं कि उन्हें देखते ही बनता है और पढ़ने में तो वे जादू भरी हैं ही।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-October
स्वाध्याय का महत्वपूर्ण स्थान है।
स्वाध्याय आत्मा की खुराक है। जिस प्रकार शरीर को भोजन दिया जाता है, उसी प्रकार जीवनोत्थान के लिए प्रकाश, प्रेरणा एवं मार्ग-दर्शन देने वाला साहित्य मनोयोगपूर्वक नित्य ही पढ़ना चाहिए। यह कार्य प्राचीन कथा, पुराण दुहराते रहने से नहीं, वरन् उस साहित्य द्वारा पूरा होगा जो हमारी आज की समस्याओं पर आज की परिस्थितियों के अनुरूप सुझाव एवं प्रकाश प्रदान कर सकें। सत्संग का उद्देश्य आज की परिस्थितियों में ऐसा साहित्य ही पूरा कर सकता है। तथाकथित ‘सत्संगी’ तो हमें उल्टे भ्रम-जंजाल में फँसा कर पथ भ्रष्ट कर देते हैं।
स्वाध्याय, संयम और सेवा के मंगलमय सुकृत्य मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में सहायक होते हैं। जिन्होंने सदाचार की महत्ता को समझ लिया वे जीवन पथ पर आधे पार हो गये, ऐसा समझना चाहिए किन्तु जिन्हें अभी तक स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, कलह और कटुता से ही छुटकारा नहीं मिला, उनके भाग्य में पशुवत् यंत्रणायें ही भोगनी लिखी हैं। मनुष्य जीवन जैसा अलभ्य अवसर पाकर भी जो आगे न बढ़ सका, उसे जितना धिक्कारा जाय वह कम ही है।
स्वाध्याय का उपयुक्त साहित्य निरन्तर बढ़ता रहे और उससे अपने घर के तथा पड़ोस के लोग लाभ उठाते रहें।
स्वाध्याय योग्य सत्साहित्य खरीदने के लिए सुरक्षित रखे जाने चाहिएं। शरीर का भोजन घटा कर आत्मा की खुराक बढ़ाने का शुभारम्भ इस प्रकार के साप्ताहिक उपवास से आरम्भ करना चाहिए। आगे यही पद्धति बढ़ते हुए भौतिक शारीरिक लाभों की तुलना में आत्मिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए परिपुष्ट होती चली जाती है।
स्वाध्याय द्वारा और बिना पढ़े लिखे लोगों लोगों को उसे सुनकर करनी चाहिए। मनोमय कोश की साधना में प्रबुद्ध साहित्य के स्वाध्याय का महत्वपूर्ण स्थान है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-August
स्वाध्याय और सत्संग से ही सम्भव है। ‘अखण्ड-ज्योति’ स्वाध्याय की सामग्री विनिर्मित करती है पर उसको हृदयंगम करने एवं मूर्तरूप मिलने का उद्देश्य तो सत्संग से ही संभव होगा। युग-निर्माण शाखाओं में सत्संग को मूर्तिमान ज्ञान मन्दिरों का रूप दिया जाना है जहाँ सदस्यगण एकत्रित होकर परस्पर एक दूसरे को प्रेरणा उत्साह एवं मार्ग-दर्शन प्रदान करते रह सकें।
स्वाध्याय की सामग्री विनिर्मित करती है पर उसको हृदयंगम करने एवं मूर्तरूप मिलने का उद्देश्य तो सत्संग से ही संभव होगा। युग-निर्माण शाखाओं में सत्संग को मूर्तिमान ज्ञान मन्दिरों का रूप दिया जाना है जहाँ सदस्यगण एकत्रित होकर परस्पर एक दूसरे को प्रेरणा उत्साह एवं मार्ग-दर्शन प्रदान करते रह सकें।
स्वाध्याय और सत्संग की महान आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। इतना बड़ा कार्य वह करती है कि दूसरे अन्य प्रयोजनों की आशा उससे नहीं की जा सकती। युग-निर्माण आन्दोलन के लिए प्रचार पत्र की आवश्यकता थी। उसके लिए एक स्वतन्त्र पत्र ही अपेक्षित था। प्रसन्नता की बात है कि उस आवश्यकता की पूर्ति आरम्भ हो गई।
स्वाध्याय सन्दोह-
स्वाध्याय, सत्संग शक्ति पुरुषार्थ, आत्मिक-प्रसन्नता के आधार पर ही मनुष्य की उन्नति सम्भव है। आत्म-नियन्त्रण, संयम और सम्भाषण से न केवल अपने को वरन् अपने पास-पड़ोस और संपर्क में आने वालों को भी सुख मिलता है। मानवता का विकास भी इसी से सम्भव है कि दूसरों को भी अपने ही समान समझें और सबके साथ सद्व्यवहार करें। यह सब चरित्रवान् व्यक्ति के लक्षण हैं। जिनके द्वारा दूसरों को भी आत्म-कल्याण की प्रेरणा मिले वही चरित्र के सच्चे धनी कहे जा सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-July
स्वाध्याय को अपने नित्य-नियम मं स्थान दे रखा है न?
स्वाध्याय कोई विरले ही करते हैं। जिन्हें पढ़ने लिखने का शौक है वे घटिया चीजें पढ़ते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम आत्मोत्कर्ष के विषय में अभिरुचि जागृत करें और लोगों के पीछे पड़कर उनमें जीवन-निर्माण के—युग-निर्माण के संबंध में आवश्यक जानकारी, अभिरुचि एवं आकाँक्षा उत्पन्न की जाय। इसके लिए भावनाशील शिक्षितों के साथ संपर्क बनाने, उन्हें प्रोत्साहित करने, पुस्तकें पढ़ने देने और वापिस लेने के लिये घर-घर जाने का कार्यक्रम अपनाया जाय। यह धर्मफेरी देखने सुनने में कितनी ही छोटी प्रतीत क्यों न हो, इसका परिणाम अत्यन्त व्यापक हो सकता है।
स्वाध्याय करेंगे ही, सफर एवं व्यवस्था में आज इतनी देर का अमुक समय तो लगावेंगे ही, इस प्रकार की छोटी-छोटी प्रतिज्ञाएं नित्य लेनी चाहिए और उन्हें अत्यन्त कड़ाई के साथ उस दिन तो पालन कर ही लेना चाहिए। दूसरे दिन की स्थिति समझते हुए फिर दूसरे दिन की सुधरी दिनचर्या बनाई जाय। इसमें शारीरिक क्रियाओं का ही नहीं, मानसिक गतिविधियों का सुधार करने का भी ध्यान रखा गया हो। प्रतिदिन छोटी-छोटी सफलताएं प्राप्त करते चलने से अपना मनोबल निरन्तर बढ़ता है और फिर एक दिन साहस एवं संकल्प बल इतना प्रबल हो जाता है कि आत्म शोधन की किसी कठोर प्रतिज्ञा को कुछ दिन ही नहीं, वरन् आजीवन निबाहते रहना सरल हो जाता है।
स्वाध्याय, नित्य सत्संग, गीता का विशिष्ट अध्ययन वेद, उपनिषद् दर्शन आदि की शास्त्रीय शिक्षा आदि कार्यक्रमों द्वारा आत्म-कल्याण की ऐसी सुविधा यहाँ उपलब्ध है जो अन्यत्र नहीं मिल सकती। प्राकृतिक चिकित्सा का सांगोपांग शिक्षण, आसन प्राणायाम आदि योग-क्रियाओं का अभ्यास, यज्ञ एवं षोडश संस्कार कराने की योग्यता, भाषण कला, धार्मिक प्रवचन युग-निर्माण के शतसूत्री रचनात्मक कार्यों के संबंध में विशिष्ट ज्ञान तथा जन-जीवन में नवजागरण उत्पन्न करने की विशिष्ट क्षमता उत्पन्न करने का अनुभव यह एक वर्षीय वानप्रस्थ-तपश्चर्या की सेवात्मक पद्धति है जो उपासना कार्यक्रमों के साथ-साथ ही चलती रहेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-May
स्वाध्याय सन्दोह-
स्वाध्याय सत्संग और चिन्तन मनन में समुचित समय लगाते हुए अपनी अन्तःभूमिका को अधिकाधिक परिष्कृत करने का प्रयत्न करें। (2) ईश्वर उपासना में अधिक मन लगावें। (3) अपने स्वभाव और संस्कारों को परमार्थ वृत्ति से सम्पन्न करने के लिए लोक-सेवा के कार्यक्रमों को विशुद्ध अध्यात्मिक साधना मानते हुए जन-कल्याण की प्रवृत्तियों में पूरे उत्साह के साथ भाग ले। संयम, सदाचार, त्याग, उदारता, निर्लोभता और निरहंकारता का सतर्कतापूर्वक अभ्यास करें। यह तीनों बातें जिनके जीवन क्रम का अंश बन गई समझना चाहिए कि वानप्रस्थ धर्म अपनाते हुए उसने मानव-जीवन की सफलता का द्वार प्रशस्त कर लिया।
स्वाध्याय के अतिरिक्त इन्हें इस ज्ञान-दान में भी हाथ बंटाने का अवसर मिलेगा। सेवा धर्म अपनाये बिना किसी का भी अन्तःकरण शुद्ध नहीं हो सकता इसलिये यह धर्म सेवा भी उन्हें आत्म-कल्याण का एक श्रेष्ठ साधन मानते हुए करनी होगी।
स्वाध्याय और सत्संग की कितनी समर्थ सुविधा यहाँ उपलब्ध है। जीवन शोधन के अनुकूल जहाँ सारा वातावरण हो वहाँ अनायास ही अपने संस्कार भी वैसे ही ढलने लगते हैं। कोई वानप्रस्थ का सच्चा लाभ प्राप्त करने का इच्छुक व्यक्ति मथुरा आकर प्रस्तुत शिक्षण योजना का लाभ ले तो वही विश्वास करना चाहिए कि उसे खाली हाथ न लौटना पड़ेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-February
स्वाध्याय ब्रह्मचर्य पालन में सहायक है। स्वाध्याय से चरित्र निर्माण से भी सहायता मिलती है। इसके द्वारा दुराचारी सदाचारी और व्यभिचारी भी ब्रह्मचारी बन जाता है। अतः यदि आप समुन्नत होना चाहते हैं अपने जीवन को पवित्र, शुद्ध और निर्मल बनाना चाहते हैं तो आलस्य और प्रमाद को छोड़कर नित्य सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय का आज से ही संकल्प कीजिए और उसका दृढ़ता से पालन कीजिए।
स्वाध्याय मामनेत।
स्वाध्याय वही है, जिसके द्वारा हमारा मन बाह्य विषयों से अलिप्त रहकर आत्मा के अनुसंधानों में प्रवृत्त हो एवं हमारी मानसिक दुर्भावनाओं, दुर्बलताओं तथा दूषित मनोविकारों का दमन हो सके, और हमारा मन एक अनिर्वचनीय अलौकिक आनन्द से परिप्लावित हो उठे।
स्वाध्याय नहीं है। इस प्रकार का साहित्य पढ़ना तो वास्तव में समय का दुरुपयोग करना एवं अपनी आत्मा को कलुषित करना है। कुरुचिपूर्ण गन्दे साहित्य को छूना भी पाप समझना चाहिए।
स्वाध्याय हमारे चरित्र-निर्माण में सहायक बनकर हमें प्रभु प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है। स्वाध्याय स्वर्ग का द्वार और मुक्ति का सोपान है।
स्वाध्याय करना ही वाणी का तप है।”
स्वाध्याय और दान।”
स्वाध्याय है। अतएव प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह अच्छे ग्रन्थों, सदाचार प्रवर्त्तक पत्र-पत्रिकाओं एवं सत्प्रेरणादायी पुस्तकों का सदैव स्वाध्याय करता रहे। महाभारत के शान्तिपर्व में कहा गया है-’नित्यं स्वाध्यायशीलश्च दुर्गाख्याति तरन्तिते’- नित्य स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति दुःखों से पार हो जाता है।
स्वाध्याय के लिए निम्न कोटि का साहित्य हानिकर होगा, उसी प्रकार जैसे अखाद्य एवं दूषित पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। अतएव हमें इस सम्बन्ध में पूर्ण सतर्कता और सावधानी से काम लेना होगा। सच्चा स्वाध्याय वही है, जिसके द्वारा हमारा मन बाह्य विषयों से अलिप्त रहकर आत्मा के अनुसंधानों में प्रवृत्त हो एवं हमारी मानसिक दुर्भावनाओं, दुर्बलताओं तथा दूषित मनोविकारों का दमन हो सके, और हमारा मन एक अनिर्वचनीय अलौकिक आनन्द से परिप्लावित हो उठे।
स्वाध्याय करने (9) नित्य सोते समय दिन भर के कार्यों और विचारों का लेखा-जोखा लेकर दूसरे दिन उसमें सुधार करने की व्यवस्था बना कर सोने (10) पतिव्रत धर्म और पत्नीव्रत का परिपूर्ण निष्ठा के साथ पालन करने (11) किसी के प्रति द्वेष दुर्भाव रखकर आत्मीयता की दृष्टि रखने जैसी अनेक सत्प्रवृत्तियों का अभ्यास उसी दिन से आरम्भ कर देने की प्रतिज्ञा ली। विश्वास है कि यह प्रतिज्ञायें निभेंगी और परिजनों का जीवन इन आदर्शों के अनुरूप दिन-दिन अधिक उत्कृष्ट बनता चला जायगा।
स्वाध्याय कर अपने मन और बुद्धि को सुसंस्कृत बनाकर अपने जीवन को पवित्र बनाने का संकल्प धारण करें। सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय से हमारी आत्मा की सुषुप्त शक्तियाँ जागृत होकर हमारे जीवन को सरस समुन्नत एवं दिव्य बना देती हैं।
स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति दुःखों से पार हो जाता है।
स्वाध्याय स्वर्ग का द्वार और मुक्ति का सोपान है।
स्वाध्यायशीलश्च दुर्गाख्याति तरन्तिते’- नित्य स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति दुःखों से पार हो जाता है।
स्वाध्यायाद् योग मासीत् योगात स्वाध्याय मामनेत।
स्वाध्याय और शुभ कर्म में मनुष्य सदा तत्पर रहे।”
स्वाध्याय नहीं कहा जा सकता। मनोरंजन प्रधान उपन्यास, नाटक एवं शृंगार-रस पूर्ण पुस्तकों को पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। इस प्रकार का साहित्य पढ़ना तो वास्तव में समय का दुरुपयोग करना एवं अपनी आत्मा को कलुषित करना है। कुरुचिपूर्ण गन्दे साहित्य को छूना भी पाप समझना चाहिए।
स्वाध्याय से हमें जीवन को आदर्श बनाने की सद्प्रेरणा मिलती है। स्वाध्याय हमारे जीवन विषयक सारी समस्याओं की कुञ्जी है। स्वाध्याय हमारे चरित्र-निर्माण में सहायक बनकर हमें प्रभु प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है। स्वाध्याय स्वर्ग का द्वार और मुक्ति का सोपान है।
स्वाध्याय सन्दोह-
स्वाध्याय मानव जीवन का सच्चा सुहृद एवं आत्मा का भोजन है। स्वाध्याय से हमें जीवन को आदर्श बनाने की सद्प्रेरणा मिलती है। स्वाध्याय हमारे जीवन विषयक सारी समस्याओं की कुञ्जी है। स्वाध्याय हमारे चरित्र-निर्माण में सहायक बनकर हमें प्रभु प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है। स्वाध्याय स्वर्ग का द्वार और मुक्ति का सोपान है।
स्वाध्यायशील थे। स्वाध्याय का अर्थ सत्साहित्य एवं वेद, उपनिषद्, गीता आदि आर्ष-ग्रन्थ तथा महापुरुषों के जीवन वृत्तान्तों का अध्ययन तथा मनन करना है। कुछ भी पढ़ा जाय उसे स्वाध्याय नहीं कहा जा सकता। मनोरंजन प्रधान उपन्यास, नाटक एवं शृंगार-रस पूर्ण पुस्तकों को पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। इस प्रकार का साहित्य पढ़ना तो वास्तव में समय का दुरुपयोग करना एवं अपनी आत्मा को कलुषित करना है।
स्वाध्याय से हमारी आत्मा की सुषुप्त शक्तियाँ जागृत होकर हमारे जीवन को सरस समुन्नत एवं दिव्य बना देती हैं।
स्वाध्याय योग सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते॥
स्वाध्याय का अर्थ सत्साहित्य एवं वेद, उपनिषद्, गीता आदि आर्ष-ग्रन्थ तथा महापुरुषों के जीवन वृत्तान्तों का अध्ययन तथा मनन करना है। कुछ भी पढ़ा जाय उसे स्वाध्याय नहीं कहा जा सकता। मनोरंजन प्रधान उपन्यास, नाटक एवं शृंगार-रस पूर्ण पुस्तकों को पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। इस प्रकार का साहित्य पढ़ना तो वास्तव में समय का दुरुपयोग करना एवं अपनी आत्मा को कलुषित करना है। कुरुचिपूर्ण गन्दे साहित्य को छूना भी पाप समझना चाहिए।
स्वाध्याय करता रहे। महाभारत के शान्तिपर्व में कहा गया है-’नित्यं स्वाध्यायशीलश्च दुर्गाख्याति तरन्तिते’- नित्य स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति दुःखों से पार हो जाता है।
स्वाध्याय से चरित्र निर्माण से भी सहायता मिलती है। इसके द्वारा दुराचारी सदाचारी और व्यभिचारी भी ब्रह्मचारी बन जाता है। अतः यदि आप समुन्नत होना चाहते हैं अपने जीवन को पवित्र, शुद्ध और निर्मल बनाना चाहते हैं तो आलस्य और प्रमाद को छोड़कर नित्य सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय का आज से ही संकल्प कीजिए और उसका दृढ़ता से पालन कीजिए।
स्वाध्याय वही है, जिससे हमारी चिन्ताएँ दूर हों, हमारी शंका-कुशंकाओं का समाधान हो, मन में सद्भाव और शुभ संकल्पों का उदय हो तथा आत्मा को शाँति का अनुभव हो। हमारे शास्त्रों में स्वाध्याय का बड़ा महात्म्य बताया गया है। योग-शास्त्र में कहा गया है :-
स्वाध्याय करना अत्यन्त आवश्यक है। स्वाध्याय मानव जीवन का सच्चा सुहृद एवं आत्मा का भोजन है। स्वाध्याय से हमें जीवन को आदर्श बनाने की सद्प्रेरणा मिलती है। स्वाध्याय हमारे जीवन विषयक सारी समस्याओं की कुञ्जी है। स्वाध्याय हमारे चरित्र-निर्माण में सहायक बनकर हमें प्रभु प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है।
स्वाध्याय से योग की उपासना करे और योग से स्वाध्याय का अभ्यास करें। स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।”
स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिसन् सर्वभूतानि अन्यत्र तीर्येभ्यः सखल्वेषं वर्त्तयन् यावदायुषं ब्रह्म लोकमभि सम्पद्यते’। 8। 15। 1।
स्वाध्याये नित्य मुक्तः स्यादैवे चैवहे कर्मणा।
स्वाध्याय का आज से ही संकल्प कीजिए और उसका दृढ़ता से पालन कीजिए।
स्वाध्याय का बड़ा महात्म्य बताया गया है। योग-शास्त्र में कहा गया है :-
स्वाध्याय का अभ्यास करें। स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।”
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाड्मयं तप उच्यते। 17। 15
स्वाध्याय द्वारा स्वयं अपने को, सन्तानों को एवं अन्य जनों को धार्मिक बनाता हुआ समस्त इन्द्रियों को, आत्मा के आधीन करता हुआ, तीर्थ-स्थानों के अन्यत्र भी प्राणियों की हिंसा न करता हुआ, समस्त आयु इस प्रकार बर्तता हुआ मोक्ष-पद का अधिकारी बन जाता है तथा जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है।”
स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।”
स्वाध्याय हमारे जीवन विषयक सारी समस्याओं की कुञ्जी है। स्वाध्याय हमारे चरित्र-निर्माण में सहायक बनकर हमें प्रभु प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है। स्वाध्याय स्वर्ग का द्वार और मुक्ति का सोपान है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-July
स्वाध्याय में संलग्न रहता और अपनी ही स्त्री से प्रेम करता है, वही जितेन्द्रिय, वहीं विद्वान और वही इस भू मण्डल का देवता है। जो प्रतिदिन सन्ध्योपासना करते हैं, वे निःसन्देह ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं। केवल गायत्री मात्र जानने वाला ब्राह्मण भी यदि नियम से रहता हो तो वह श्रेष्ठ है। किन्तु जो चारों वेदों का विद्वान होने पर भी सबका अन्न खाता, सब कुछ बेचता और नियमों का पालन नहीं करता, वह उत्तम नहीं माना जाता।
स्वाध्याय करते थे। डायरी लिखते थे, बताये हुए विषयों पर नोट तैयार करते थे। जिनको जाँच करके उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण होने के नम्बर दिये जाते थे।
स्वाध्याय, दान, शौच, कोमलता और सरलता ये सद्गुण ब्राह्मण के लिये वेद से भी बढ़कर हैं। जो ब्राह्मण भूर्भुवः स्वः इन व्याहृतियों के साथ गायत्री का जप करता है, वेद के स्वाध्याय में संलग्न रहता और अपनी ही स्त्री से प्रेम करता है, वही जितेन्द्रिय, वहीं विद्वान और वही इस भू मण्डल का देवता है। जो प्रतिदिन सन्ध्योपासना करते हैं, वे निःसन्देह ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं। केवल गायत्री मात्र जानने वाला ब्राह्मण भी यदि नियम से रहता हो तो वह श्रेष्ठ है। किन्तु जो चारों वेदों का विद्वान होने पर भी सबका अन्न खाता, सब कुछ बेचता और नियमों का पालन नहीं करता, वह उत्तम नहीं माना जाता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-November
स्वाध्याय के सम्बन्ध में आजकल लोगों में एक बड़ा भ्रम पैदा हो गया है। हम उस भ्रम को दूर कर देना भी अपना कर्त्तव्य समझते हैं। मुद्रण-कला के आविष्कार से हजारों पुस्तकें प्रतिदिन छपती हैं। इन पुस्तकों में से अधिकाँश तो ऐसी होती हैं कि जिनमें पढ़ने से लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होती है। किसी भी प्रकार की पुस्तक का पढ़ना स्वाध्याय नहीं कहला सकता।
स्वाध्याय के लिए रखना महान भूल है। इनके पढ़ने से समय और धन दोनों ही नष्ट होते हैं।
स्वाध्याय महापुरुषों से मिलने का एक साधन है।
स्वाध्याय को जीवन की उन्नति के लिए आवश्यक अंग माना था। योग सूत्रों के रचयिता महामुनि पातंजलि ने तो स्वाध्याय को श्रष्टाँग योग के पाँच में से एक नियम माना है। उन्होंने लिखा है-
स्वाध्याय शब्द का अर्थ है स्व+अध्याय, अर्थात् अपना अध्ययन या अपने को जानना या आत्म-निरीक्षण करना। यह संसार जिसे हम नित्य-प्रति देखते हैं क्या है? हमारा इससे क्या सम्बन्ध है? हमारा वास्तविक स्वरूप कैसा है? हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है?
स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान ये पाँच नियम हैं, जिस प्रकार आन्तरिक और बाह्य पवित्रता, सन्तोष, तप और ईश्वर का स्मरण ज्ञान प्राप्ति में सहायक हैं उसी प्रकार स्वाध्याय भी सहायता पहुँचाता है। स्वाध्याय के बिना हम ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे इसमें सन्देह है।”
स्वाध्याय बड़ी जरूरी चीज है। सत्य तो यह है कि स्वाध्याय हमारे लिए अनिवार्य है।
स्वाध्याय हमारे लिए अनिवार्य है।
स्वाध्याय को श्रष्टाँग योग के पाँच में से एक नियम माना है। उन्होंने लिखा है-
स्वाध्याय के बिना हम ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे इसमें सन्देह है।”
स्वाध्याय कहते हैं।
स्वाध्याय कदापि नहीं कह सकते। इनको स्वाध्याय के लिए रखना महान भूल है। इनके पढ़ने से समय और धन दोनों ही नष्ट होते हैं।
स्वाध्याय नहीं कहला सकता। कुछ लोगों में पुस्तकें पढ़ने की एक लत पड़ जाती है। पुस्तकें भी पढ़े बिना उनसे रहा नहीं जाता। कैसी ही पुस्तक हो उन्हें पढ़ने को चाहिये। उससे लाभ होगा या हानि इसकी परवाह नहीं।
स्वाध्याय भी सहायता पहुँचाता है। स्वाध्याय के बिना हम ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे इसमें सन्देह है।”
स्वाध्याय की महिमा से भरे पड़े हैं। हमारे तत्ववेत्ता ऋषियों ने स्वाध्याय को जीवन की उन्नति के लिए आवश्यक अंग माना था। योग सूत्रों के रचयिता महामुनि पातंजलि ने तो स्वाध्याय को श्रष्टाँग योग के पाँच में से एक नियम माना है। उन्होंने लिखा है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-January
स्वाध्याय, उपासना, तप, यज्ञ आदि में समय और धन खर्च करने की अपेक्षा भरपूर दक्षिणा हमें दो और स्वर्ग के अधिकारी बन जाओ। ऐसे अनेक श्लोक उनने पुस्तकों में सम्मिलित कर लिए और दक्षिणावाद का झण्डा गाड़ दिया। सारे धर्म कर्म की धुरी दक्षिणा बन गई।
स्वाध्याय यज्ञ- सद्ग्रन्थों द्वारा, सत्संग द्वारा एवं चिंतन-मनन द्वारा आत्म ज्ञान का सम्पादन।
स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्येन ज्ययासुतैः। महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः॥
स्वाध्याय, व्रत, होम, वेदाध्ययन, सुप्रजनन,यज्ञ तथा महायज्ञों द्वारा यह शरीर ब्राह्म किया जाता है ।
स्वाध्याय, भक्ति आदि साधनों में ईश्वरीय प्रकाश को अपनी अन्तः भूमिका में अधिकाधिक धारणा करना भी यज्ञ है। सर्वव्यापक परमात्मा को सब में समाया हुआ देख कर गुप्त से गुप्त दुष्कर्मों से बचना चाहिए। कोतवाल को सामने खड़ा देखकर चोर जिस प्रकार ठीक उसके सामने ही चोरी करने का साहस नहीं करता, उसी प्रकार परमात्मा को सर्वव्यापक समझने वाला व्यक्ति भी कोई कुविचार एवं कुकर्म नहीं कर सकता क्योंकि जब से अपने अन्तःकरण में परमात्मा दिखाई पड़ता है, तब उसके सामने कुविचार कैसे रहें? इसी प्रकार विश्व के कण-कण में जब प्रभु दिखाई पड़ता है तो कौन सा गुप्त स्थान ऐसा हो सकता है जहाँ वह अपनी चोरी को छिपा ले? इसी प्रकार जो सर्वत्र प्रभु की विद्यमानता अनुभव करेगा।
स्वाध्याय यज्ञ, ज्ञान यज्ञ, प्राण यज्ञ, संयम यज्ञ आदि की चर्चा करते हुए यह बताया है कि आत्म कल्याण के, प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चलते हुए जो भी सत्साधन कार्य में लाये जाते हैं वे सब यज्ञ रूप ही हैं-
स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्येनज्ययासुतैः
स्वाध्याय, व्रत, होम, त्रियै विद्या के ज्ञान, धार्मिक सन्तानोत्पादन, यज्ञ तथा महायज्ञों से यह शरीर ब्राह्मण किया जाता है।
स्वाध्याय, व्रत, होम, वेद, ज्ञान, तप, यज्ञ आदि द्वारा उसे ब्राह्मण बनाया जाता है। यथा :-
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥
स्वाध्याय, व्रत, वेदज्ञान आदि का आरम्भ होता है और यज्ञ का ताश्चर्या से सम्बन्ध है। इस प्रकार गायत्री माता और यज्ञ पिता से ही ब्राह्मणत्व का जन्म होता है। माता-पिता की महिमा बढ़ाना, उनके महत्व को उज्ज्वल एवं प्रकाशवान करना सत्पुत्र का कर्त्तव्य है। पूर्व काल में ब्राह्मण लोग बड़े प्रयत्न, उत्साह, लगन एवं श्रम से स्वयं गायत्री उपासना करते थे और सभी द्विजों को इस कल्याण कारक मार्ग पर प्रवृत्त करके उन्हें सुख शान्ति के परमलक्ष्य तक पहुँचाने का पुण्य लाभ करते थे। इसी प्रकार स्वयं यज्ञ करते थे और अन्य अधिकारियों को प्रेरणा पूर्वक यज्ञ करके विश्व कल्याण के एक महान परमार्थ का आयोजन करते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-October
स्वाध्यायी बनाने के लिए हमारी शिक्षापद्धति विशेष रूप से सहयोग प्रदान करती है। शिक्षा की पद्धति ऐसी होनी चाहिए कि हमारी ईश्वर प्रदत्त शक्तियों का विकास हो सके। उन शक्तियों के विकास होने पर हम में उपर्युक्त गुण स्वभावतः आ जायेंगे। आधुनिक शिक्षा पद्धति अत्यन्त दूषित है और हमें निकम्मा बनाने वाली है। आम दिन शिक्षा के ढांचे का पुनः निर्माण होने जा रहा है।
स्वाध्याय का घनिष्ठ सम्बन्ध है। सच्चरित्र व्यक्ति ही स्वाध्यायी होता है। दुश्चरित्रों में इतनी सामर्थ्य कहाँ कि वे किसी वस्तु विशेष पर अधिक काल तक मनन और अध्ययन कर सकें। उनकी नैतिक शक्ति नष्ट रहती है अतः वे उचित अनुचित तथा तथ्य युक्त और निस्सार वस्तुओं की सम्यक् विवेचना ही नहीं कर सकते हैं। जब उनमें विवेचना करने की शक्ति ही वर्तमान नहीं हैं तो भला वे आगे क्या बढ़ सकते हैं।
स्वाध्यायी भी हैं? इसका उत्तर यही होगा कि यदि उन शिक्षितों की शारीरिक, मानसिक, नैतिक एवं व्यवसायिक आदि शक्तियों का विकास एवं प्रस्फुरण प्राप्त शिक्षा द्वारा हो चुका है तो निःसन्देह वे स्वाध्यायी होंगे। उपर्युक्त शक्तियों के विकास का आधार स्तम्भ शिक्षा विशेष की पद्धति में निहित रहता है। यदि हमारी शिक्षा पद्धति दूषित है तो स्वभावतः हमारी शक्तियों का ह्रास होगा। ऐसी बात नहीं कि कोई भी व्यक्ति उपर्युक्त शक्तियों के बिना संसार में आया हो।
स्वाध्याय का अर्थ है आत्म-शिक्षण, जिसमें हम आत्म चिन्तन, मनन और अध्ययन का भी समावेश पाते हैं। स्वयं जब हम परिश्रम के द्वारा किसी वस्तु विशेष का समाधान करते हुए उत्तरोत्तर उन्नतोन्मुख होकर किसी नवीन वस्तु की खोज के निष्कर्ष पर पहुँचते हैं तब उसको हम स्वाध्याय द्वारा उपार्जित वस्तु कहते हैं। नवीनता का समारम्भ किसी स्वाध्यायी व्यक्ति द्वारा हुआ और उसकी अविरल तारतम्यता उन्हीं के द्वारा चल रही है। उत्तरोत्तर नवीनता का आविष्कार होने का अर्थ है उन्नति के सोपान पर आरोहण। स्वाध्याय द्वारा प्राप्त ज्ञान वास्तव में ज्ञान होता है।
स्वाध्याय के द्वारा उन्हीं का तद्रूप विकास ओर परिवर्तन भी होता है। यदि उसके द्वारा हमें किसी शब्द का प्रारम्भिक परिचय मिलता है तो स्वाध्याय द्वारा हम उस शब्द विशेष के अन्तस्थल तक पहुँचते हैं। दोनों में चोली दामन का साथ है। शिक्षा का अर्थ हमें यहाँ लिखने अथवा पढ़ने तक ही सीमित नहीं समझना चाहिए। बालक को यदि माँ- ‘ताई’ और ‘अम्मा’ कहना सिखाती है तो उसे भी हम उसकी प्रारम्भिक शिक्षा ही कहेंगे।
स्वाध्यायी हो सकता है और स्वाध्याय के द्वारा पढ़ने अथवा लिखने की कला उसे स्वयं आ जाती है। तात्पर्य यह कि आदर्श शिक्षा के द्वारा हम जहाँ स्वाध्यायी हो सकते हैं वहाँ स्वाध्याय द्वारा शिक्षित भी हो सकते हैं। दोनों एक दूसरे के द्वारा साध्य है। अब यहाँ पर यह प्रश्न आप पूछ सकते हैं कि शिक्षितों की संख्या तो पर्याप्त है तो क्या उतने ही स्वाध्यायी भी हैं? इसका उत्तर यही होगा कि यदि उन शिक्षितों की शारीरिक, मानसिक, नैतिक एवं व्यवसायिक आदि शक्तियों का विकास एवं प्रस्फुरण प्राप्त शिक्षा द्वारा हो चुका है तो निःसन्देह वे स्वाध्यायी होंगे।
स्वाध्यायी व्यक्तियों में कपित्य अलौकिक गुण भी होते हैं। उनके विचारों में दृढ़ता का होना अत्यन्त आवश्यक होता है क्योंकि स्वाध्याय की साधना करते हुए न मालूम कितनी जगहों से उन्हें विचलित होना पड़ता हैं। कभी-कभी हानि भी उठानी पड़ती है। तब कहीं जाकर उन्हें सफलता मिलती है। सच है सुकार्य सदा ही कष्टसाध्य है।
स्वाध्यायी उसमें डुबकियाँ लगाते हैं और मोतियों की लड़ी निकालते चले जाते हैं- धतूरे में प्राणनाशक शक्ति वर्तमान है, पेड़ से गिर कर पत्ते सीधे जमीन पर ही विश्राम लेते हैं अवश्य पृथ्वी में आकर्ष शक्ति है। आदि आदि।
स्वाध्याय की साधना करते हुए न मालूम कितनी जगहों से उन्हें विचलित होना पड़ता हैं। कभी-कभी हानि भी उठानी पड़ती है। तब कहीं जाकर उन्हें सफलता मिलती है। सच है सुकार्य सदा ही कष्टसाध्य है। एकलव्य को गुरु जी महाराज किन्हीं शब्दों द्वारा दुत्कार देते हैं।
स्वाध्याय द्वारा विकसित हो चुकी हो। पेड़ से गिरते हुए फलों और पत्तों को आदि काल से ही लोग देखते आ रहे हैं किन्तु सर आइजक न्यूटन ही एक ऐसा व्यक्ति था कि जिसने अपनी निरीक्षण शक्ति के द्वारा इस बात को सिद्ध कर दिखाया कि पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। अस्तु, लिखने पढ़ने, चलने फिरने, देखने सुनने तथा स्थूल जगत् की व्यवहारिक बातों का ज्ञान तो प्रायः अधिकाँश शिक्षित संज्ञक लोगों में होता ही है किन्तु क्या वे पूर्ण शिक्षित होते हैं? स्वाध्यायहीन शिक्षा व्यर्थ और अनुपादेय होती है और स्वाध्यायी न होता हुआ शिक्षित अशिक्षित ही है।
स्वाध्याय द्वारा प्राप्त ज्ञान वास्तव में ज्ञान होता है। जो ज्ञान हम बलपूर्वक किसी दूसरे से प्राप्त करते हैं वह टिकाऊ कदापि नहीं होता। वह पिंजरबद्ध कीर की नाइ समय पड़ने पर हमारे मस्तिष्क से फूद्दका मारकर उड़ जाता है और पुनः आने का नाम भी नहीं लेता। संसार में जितने महापुरुष हुए हैं उनके जीवन में केवल यही विशेषता रही है कि वे अपने जीवन भर स्वाध्यायी रहे हैं। जैसे-जैसे उनमें स्वाध्याय की मात्रा बढ़ती गई है तैसे तैसे वे संसार में चमकते तथा सफल होते गए हैं।
स्वाध्याय के द्वारा पढ़ने अथवा लिखने की कला उसे स्वयं आ जाती है। तात्पर्य यह कि आदर्श शिक्षा के द्वारा हम जहाँ स्वाध्यायी हो सकते हैं वहाँ स्वाध्याय द्वारा शिक्षित भी हो सकते हैं। दोनों एक दूसरे के द्वारा साध्य है। अब यहाँ पर यह प्रश्न आप पूछ सकते हैं कि शिक्षितों की संख्या तो पर्याप्त है तो क्या उतने ही स्वाध्यायी भी हैं? इसका उत्तर यही होगा कि यदि उन शिक्षितों की शारीरिक, मानसिक, नैतिक एवं व्यवसायिक आदि शक्तियों का विकास एवं प्रस्फुरण प्राप्त शिक्षा द्वारा हो चुका है तो निःसन्देह वे स्वाध्यायी होंगे।
स्वाध्याय द्वारा होती है। जिस शिक्षा पद्धति में जितनी ही अधिक ईश्वर प्रदत्त शक्तियों को बढ़ाने की क्षमता होती है वह उतनी ही अधिक सफल कही जाती है-कारण यदि उसके द्वारा हमारी उन शक्तियों का प्रस्फुरण होता है तो स्वाध्याय के द्वारा उन्हीं का तद्रूप विकास ओर परिवर्तन भी होता है। यदि उसके द्वारा हमें किसी शब्द का प्रारम्भिक परिचय मिलता है तो स्वाध्याय द्वारा हम उस शब्द विशेष के अन्तस्थल तक पहुँचते हैं। दोनों में चोली दामन का साथ है। शिक्षा का अर्थ हमें यहाँ लिखने अथवा पढ़ने तक ही सीमित नहीं समझना चाहिए।
स्वाध्याय द्वारा उपार्जित वस्तु कहते हैं। नवीनता का समारम्भ किसी स्वाध्यायी व्यक्ति द्वारा हुआ और उसकी अविरल तारतम्यता उन्हीं के द्वारा चल रही है। उत्तरोत्तर नवीनता का आविष्कार होने का अर्थ है उन्नति के सोपान पर आरोहण। स्वाध्याय द्वारा प्राप्त ज्ञान वास्तव में ज्ञान होता है। जो ज्ञान हम बलपूर्वक किसी दूसरे से प्राप्त करते हैं वह टिकाऊ कदापि नहीं होता।
स्वाध्यायहीन शिक्षा व्यर्थ और अनुपादेय होती है और स्वाध्यायी न होता हुआ शिक्षित अशिक्षित ही है।
स्वाध्यायी न होता हुआ शिक्षित अशिक्षित ही है।
स्वाध्याय में इतनी शक्ति है कि बिना शिक्षक अथवा रास्ता दिखलाने वाले के भी सफलता पूर्वक आगे बढ़ा जा सकता है।
स्वाध्याय की मात्रा बढ़ती गई है तैसे तैसे वे संसार में चमकते तथा सफल होते गए हैं।
स्वाध्यायता और भी अधिक जागृत हो उठती है। फलतः एक दिन वही एकलव्य अर्जुन से भी बढ़ कर धनुर्धर बनकर गुरुजी के सामने आता है। अब आप अनुमान लगा सकते हैं कि स्वाध्याय में इतनी शक्ति है कि बिना शिक्षक अथवा रास्ता दिखलाने वाले के भी सफलता पूर्वक आगे बढ़ा जा सकता है।
स्वाध्यायी व्यक्ति द्वारा हुआ और उसकी अविरल तारतम्यता उन्हीं के द्वारा चल रही है। उत्तरोत्तर नवीनता का आविष्कार होने का अर्थ है उन्नति के सोपान पर आरोहण। स्वाध्याय द्वारा प्राप्त ज्ञान वास्तव में ज्ञान होता है। जो ज्ञान हम बलपूर्वक किसी दूसरे से प्राप्त करते हैं वह टिकाऊ कदापि नहीं होता। वह पिंजरबद्ध कीर की नाइ समय पड़ने पर हमारे मस्तिष्क से फूद्दका मारकर उड़ जाता है और पुनः आने का नाम भी नहीं लेता।
स्वाध्यायी होता है। दुश्चरित्रों में इतनी सामर्थ्य कहाँ कि वे किसी वस्तु विशेष पर अधिक काल तक मनन और अध्ययन कर सकें। उनकी नैतिक शक्ति नष्ट रहती है अतः वे उचित अनुचित तथा तथ्य युक्त और निस्सार वस्तुओं की सम्यक् विवेचना ही नहीं कर सकते हैं। जब उनमें विवेचना करने की शक्ति ही वर्तमान नहीं हैं तो भला वे आगे क्या बढ़ सकते हैं। सदाचार से ही शारीरिक स्वास्थ्य और औद्योगिक प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है।
स्वाध्यायी पुरुषों से युक्त देश का ही भविष्य उज्ज्वल है और वही उन्नतिशील राष्ट्रों के समकक्ष में बैठने का भी अधिकार है। हमें स्वाध्यायी बनाने के लिए हमारी शिक्षापद्धति विशेष रूप से सहयोग प्रदान करती है। शिक्षा की पद्धति ऐसी होनी चाहिए कि हमारी ईश्वर प्रदत्त शक्तियों का विकास हो सके। उन शक्तियों के विकास होने पर हम में उपर्युक्त गुण स्वभावतः आ जायेंगे। आधुनिक शिक्षा पद्धति अत्यन्त दूषित है और हमें निकम्मा बनाने वाली है।
स्वाध्यायी हो सकते हैं वहाँ स्वाध्याय द्वारा शिक्षित भी हो सकते हैं। दोनों एक दूसरे के द्वारा साध्य है। अब यहाँ पर यह प्रश्न आप पूछ सकते हैं कि शिक्षितों की संख्या तो पर्याप्त है तो क्या उतने ही स्वाध्यायी भी हैं? इसका उत्तर यही होगा कि यदि उन शिक्षितों की शारीरिक, मानसिक, नैतिक एवं व्यवसायिक आदि शक्तियों का विकास एवं प्रस्फुरण प्राप्त शिक्षा द्वारा हो चुका है तो निःसन्देह वे स्वाध्यायी होंगे। उपर्युक्त शक्तियों के विकास का आधार स्तम्भ शिक्षा विशेष की पद्धति में निहित रहता है।
स्वाध्याय की प्रेरणा देने वाली वह शिक्षा होगी।
स्वाध्याय द्वारा शिक्षित भी हो सकते हैं। दोनों एक दूसरे के द्वारा साध्य है। अब यहाँ पर यह प्रश्न आप पूछ सकते हैं कि शिक्षितों की संख्या तो पर्याप्त है तो क्या उतने ही स्वाध्यायी भी हैं? इसका उत्तर यही होगा कि यदि उन शिक्षितों की शारीरिक, मानसिक, नैतिक एवं व्यवसायिक आदि शक्तियों का विकास एवं प्रस्फुरण प्राप्त शिक्षा द्वारा हो चुका है तो निःसन्देह वे स्वाध्यायी होंगे। उपर्युक्त शक्तियों के विकास का आधार स्तम्भ शिक्षा विशेष की पद्धति में निहित रहता है।
स्वाध्यायी रहे हैं। जैसे-जैसे उनमें स्वाध्याय की मात्रा बढ़ती गई है तैसे तैसे वे संसार में चमकते तथा सफल होते गए हैं।
स्वाध्यायी होंगे। उपर्युक्त शक्तियों के विकास का आधार स्तम्भ शिक्षा विशेष की पद्धति में निहित रहता है। यदि हमारी शिक्षा पद्धति दूषित है तो स्वभावतः हमारी शक्तियों का ह्रास होगा। ऐसी बात नहीं कि कोई भी व्यक्ति उपर्युक्त शक्तियों के बिना संसार में आया हो। सभी में इन शक्तियों का समावेश रहता है।
स्वाध्यायी व्यक्तियों में एकाकीपन और लोक कल्याण की भावना अधिक रहती है। यह बात स्वाभाविक ही है कि एकाकीपन में हम अपने मस्तिष्क का सन्तुलन अधिकाधिक कर पाते हैं। कवियों और कलाकारों के जीवन चरित्र को पढ़ते समय हम उनके आरम्भिक जीवन के पन्ने को जब पलटते हैं तो पता चलता है कि एकाकी अवस्था में रहकर घंटों पहले गुनगुनाया करते थे। हाँ, एकाकीपन और प्रकृति का घनिष्ठ सम्बन्ध है। एकाकीपन को पसन्द करने वाला व्यक्ति प्रकृति प्रेमी होता है।
स्वाध्याय द्वारा हम उस शब्द विशेष के अन्तस्थल तक पहुँचते हैं। दोनों में चोली दामन का साथ है। शिक्षा का अर्थ हमें यहाँ लिखने अथवा पढ़ने तक ही सीमित नहीं समझना चाहिए। बालक को यदि माँ- ‘ताई’ और ‘अम्मा’ कहना सिखाती है तो उसे भी हम उसकी प्रारम्भिक शिक्षा ही कहेंगे। एक व्यक्ति जो कि लिखना अथवा पढ़ना नहीं जानता वह भी स्वाध्यायी हो सकता है और स्वाध्याय के द्वारा पढ़ने अथवा लिखने की कला उसे स्वयं आ जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-February
स्वाध्याय करना चाहता हूँ तो उपन्यास सामने जाकर रख देता है। गीता पढ़ने बैठता हूँ तो कहता है घर में दाल नहीं है, घी नहीं, मिर्च मसाला नहीं है, लकड़ी नहीं है, चलो, ले आओ। गीता फिर पढ़ लेना। यह तो रोज का गीत है। पेट पूजा तो प्रधान है।
स्वाध्याय, सत्संग, प्रवचन, कथा श्रवण आदि के आयोजन सर्वत्र ही होते हैं। लोग अपनी-अपनी आर्थिक स्थिति के अनुकूल कुछ न कुछ दान पुण्य भी करते हैं। मानसिक दृष्टि से घोर कृपणों को छोड़ कर निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी कुछ न कुछ अवश्य ही देते हैं। कुछ देने से त्याग करने से ही आत्मा का उत्कर्ष होता है। यज्ञ का अर्थ परमार्थ ही है।
स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोध हीनता, त्याग, शाँति, निन्दा या चुगली न करना, सब प्राणियों पर दया, लोभ रहित होना, कोमलता, ईश्वर और शास्त्र विरुद्ध कर्मों में लज्जा, अचंचलता, तेज, क्षमा, धैर्य, शौच, अभिमान शून्यता, यह सब गुण दैवी सम्पदा को प्राप्त हुए पुरुष में रहते हैं, और यह दैवी सम्पत्ति भक्त में ही रहती है। इसलिए भक्त को देव कहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-August
स्वाध्याय करते, डायरी लिखते, बताये हुए विकारों पर नोट तैयार करते जिनको जाँच करके उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण के नम्बर दिये जाते थे। प्रतिदिन के दैनिक व्यवहारों तथा कार्यों पर भी नम्बर दिये जाते थे। इसमें छात्रों को अपने आचरण को अधिक उत्तम बनाने में उत्साहपूर्ण होड़ लगी रहती। उत्तीर्ण होने वाले छात्रों को शिविर के अन्त में जो प्रमाण पत्र दिया जाने वाला था वह इतना सुन्दर और आकर्षक था इसे छोड़ने के लिए कोई भी तैयार न था, इसलिए शिविर की शिक्षा परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए प्रयत्न करने में छात्रों में प्रतिस्पर्धा सी बनी रहती थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-September
स्वाध्याय, यज्ञ, व्रत तथा ज्ञान प्रसार के कार्यों के लिये शेष जीवन को देना चाहें तो मथुरा में उनको इस परिवार में भर्ती किया जा सकता है। थोड़े समय श्रम करने से वे अपने निर्वाह खर्च तो बड़ी आसानी से वहाँ ही उपार्जित कर सकती हैं। एक दो ऐसी अशिक्षित देवियों के लिये भी गुंजाइश हो सकती है जो शारीरिक श्रम में उत्साही हों और घरेलू काम काजों में हाथ बंटा लिया करें। इच्छुक महिलाएं- इस पते पर पत्र व्यवहार कर सकती हैं। श्रीमती भगवती देवी धर्मपत्नी पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अखण्ड-ज्योति प्रेस, मथुरा।
स्वाध्याय तथा आत्म चिन्तन द्वारा ऐसा बनाना कि सुसंस्कृत समाज का अपने आपको एक महत्वपूर्ण अंग सिद्ध कर सकें। अपने आपको इस प्रकार के गुण कर्म और स्वभाव का बना सकें कि जिसे देख कर लोग यह समझ सकें कि सुसंस्कृत संस्कारित व्यक्ति किस प्रकार के होते हैं। विद्यार्थी वयोवृद्ध, रोगी, कन्याएं, महिलाएं आदि इस श्रेणी वे लोग आते हैं जिनको अधिकतर जन समाज से अलग रह कर एक सीमित क्षेत्र के काम करना होता है। महिलाएं अपनी सहेलियों में अथवा किसी विवाह उत्सव में जाने पर उत्तम विचारों का प्रसार कर सकता है, उपरोक्त चार श्रेणी पुरुषों की भाँति परमार्थ प्रेमी महिलाओं की भी हो सकती हैं।
स्वाध्याय, आत्मचिन्तन, उपासना आदि तप करने से मन तथा शरीर की विशेष शुद्धि होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-December
स्वाध्याय को एक आवश्यक धर्म कर्तव्य बना लेना चाहिये। ईश्वर की प्राथमिक पूजा, मूर्ति, चित्र आदि के ध्यान और अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, धूप, दीप आदि उपकरणों के साथ होती है। पर आगे चल कर माध्यमिक उपासना उच्च विचारधारा रूपी प्रतिमा को मन मन्दिर में उपस्थित करके ही अग्रगामी बनाई जाती है। संयम, साहस, विवेक, सेवा, दया, करुणा, मैत्री, उदारता, सौजन्य, पवित्रता आदि सद्गुण विशुद्ध रूप से ईश्वर की भावनात्मक प्रतिमा ही है। स्वाध्याय सत्संग और चिंतन मनन द्वारा जितनी देर मन मन्दिर में इन सद्गुणों का प्रकाश बना रहे और उनमें अपनी श्रद्धा जमी रहे तो समझना चाहिये कि उतनी देर उच्च-स्तरीय ईश्वर पूजन होता रहा।
स्वाध्याय की आवश्यकता पड़ती है। अन्यथा मनोभूमि मलीनता से इतनी आच्छादित हो जाती है कि उसमें सड़न और दुर्गन्ध के अतिरिक्त और कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता। ऐसा मन असुरता का ही निवास-स्थल हो सकता है।
स्वाध्याय सत्संग और चिंतन मनन द्वारा जितनी देर मन मन्दिर में इन सद्गुणों का प्रकाश बना रहे और उनमें अपनी श्रद्धा जमी रहे तो समझना चाहिये कि उतनी देर उच्च-स्तरीय ईश्वर पूजन होता रहा। प्रतिमायें ईश्वर की प्रतीक हैं पर उच्च-भावनायें तो प्रभु की प्रतिनिधि ही मानी गई हैं। इसलिये स्वाध्याय हमारी उपासनात्मकता को पूर्ण करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं।
स्वाध्यायान्या प्रवतव्य’ ही है। स्वाध्याय में प्रमाद करने की कठोरता पूर्वक मनाही की गई है। भोजन, शयन, स्नान जैसे नित्य कर्मों में ही स्वाध्याय की भी गणना है। जिस प्रकार आहार की आवश्यकता है, उसी प्रकार मन शरीर के लिये स्वाध्याय चाहिये। इसके बिना क्षुधा की निवृत्ति नहीं हो सकती।
स्वाध्याय से ही सम्भव हो सकता है।
स्वाध्याय में प्रमाद करने की कठोरता पूर्वक मनाही की गई है। भोजन, शयन, स्नान जैसे नित्य कर्मों में ही स्वाध्याय की भी गणना है। जिस प्रकार आहार की आवश्यकता है, उसी प्रकार मन शरीर के लिये स्वाध्याय चाहिये। इसके बिना क्षुधा की निवृत्ति नहीं हो सकती। जिस मनोभूमि को स्वाध्याय नहीं मिलता वह ऊसर, नीरस, दुर्बल ओर विकृत होती चली जाती है।
स्वाध्याय ज्ञान-योग का अविच्छिन्न अंग हैं।
स्वाध्याय की व्यापक सर्वांगपूर्ण व्यवस्था करके सम्पन्न किया जा सकता है। वर्तमान का काम इतिहास से चलाया जा सकता है और कुशिक्षा देने वाले वर्तमान व्यक्तित्वों के मुकाबले दूरस्थ अथवा दिवंगत महापुरुषों की विचार पद्धति सामने खड़ी की जा सकती है। स्वाध्याय इसी प्रक्रिया का नाम है। संसार में ऐसे उत्कृष्ट व्यक्तित्व हैं अथवा हो चुके हैं जिनकी ओजस्वी विचार-धारा बड़ी समर्थ और सारगर्भित है, उसे सुनने का अवसर मिलता रहे तो वर्तमान दुर्बुद्धिपूर्ण शिक्षा की काट हो सकती है। इसी प्रकार दूरस्थ अथवा दिवंगत सन्मार्ग-गामी सज्जनों के महान चरित्र आँखों के सामने प्रस्तुत होते रहें तो भी वर्तमान दुरात्माओं के भ्रष्ट अनुकरण से बचने की हिम्मत जाग सकती है।
स्वाध्याय की अभिरुचि उत्पन्न हो जाय और वह श्रेयस्कर साहित्य उपलब्ध करने के लिये उसकी तलाश के लिये स्वयं उत्सुक रहने लगे। इस मानसिक स्थिति तक अपने परिवार के सदस्यों को पहुँचा देना हर विवेकवान गृहपति का एक परम पवित्र धर्म कर्तव्य है। घर में जो पढ़े न हों उन्हें जीवन साहित्य सुनने का शौक लगाया जाय। पढ़े सदस्य यह सेवा स्वीकार करें और बिना पढ़ों को नित्य प्रेरक विचार धारा का कुछ न कुछ लाभ एवं प्रकाश उपलब्ध कराया करें। जिन घरों में यह परम्परा चलने लगे, समझना चाहिये, देवत्व की दिशा में अग्रसर होने के लिये इस परिवार ने एक महत्वपूर्ण अवलम्बन ग्रहण कर लिया।
स्वाध्याय साधन उपलब्ध करना चाहिये और यदि उनमें अध्ययन की रुचि न हो तो प्रयत्न पूर्वक उसे जागृत करना चाहिये। इस रुचि का न होना मानव जीवन के विकास में एक भारी विघ्न है। इस गतिरोध को हटाने-मिटाने के लिये हर सम्भव प्रयत्न करना चाहिये और तभी चैन लेना चाहिये जब अपने प्रिय परिवार के हर शिक्षित सदस्य में स्वाध्याय की अभिरुचि उत्पन्न हो जाय और वह श्रेयस्कर साहित्य उपलब्ध करने के लिये उसकी तलाश के लिये स्वयं उत्सुक रहने लगे। इस मानसिक स्थिति तक अपने परिवार के सदस्यों को पहुँचा देना हर विवेकवान गृहपति का एक परम पवित्र धर्म कर्तव्य है। घर में जो पढ़े न हों उन्हें जीवन साहित्य सुनने का शौक लगाया जाय।
स्वाध्याय की भी गणना है। जिस प्रकार आहार की आवश्यकता है, उसी प्रकार मन शरीर के लिये स्वाध्याय चाहिये। इसके बिना क्षुधा की निवृत्ति नहीं हो सकती। जिस मनोभूमि को स्वाध्याय नहीं मिलता वह ऊसर, नीरस, दुर्बल ओर विकृत होती चली जाती है। बर्तनों को नित्य माँजना पड़ता है, दाँत रोज साफ करने पड़ते हैं, स्नान नित्य किया जाता है, कमरे में झाड़ू रोज लगती है, इसी प्रकार मन पर वातावरण से निरन्तर पड़ने वाले बुरे प्रभाव का-मलीनता का-निराकरण करने के लिये नित्य ही स्वाध्याय की आवश्यकता पड़ती है।
स्वाध्याय का उपयुक्त माध्यम माना जा सकता है। उसी से किसी उपयुक्त मार्ग दर्शन की- समस्याओं के समाधान की- आशा की जा सकती है।
स्वाध्याय हमारी उपासनात्मकता को पूर्ण करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं।
स्वाध्याय। अस्तु हमें मानसिक परिष्कार के इस अमोघ माध्यम को अपने दैनिक जीवन में दृढ़ता-स्थिरता और श्रद्धा पूर्वक स्थान देना चाहिये। स्वाध्याय में प्रमाद न करने की शास्त्राज्ञा को एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति की तरह हमें निश्चित रूप से शिरोधार्य ही करना चाहिये।
स्वाध्याय इसी महती आवश्यकता को पूर्ण करता है। स्वाध्याय ज्ञान-योग का अविच्छिन्न अंग हैं।
स्वाध्याय इसी प्रक्रिया का नाम है। संसार में ऐसे उत्कृष्ट व्यक्तित्व हैं अथवा हो चुके हैं जिनकी ओजस्वी विचार-धारा बड़ी समर्थ और सारगर्भित है, उसे सुनने का अवसर मिलता रहे तो वर्तमान दुर्बुद्धिपूर्ण शिक्षा की काट हो सकती है। इसी प्रकार दूरस्थ अथवा दिवंगत सन्मार्ग-गामी सज्जनों के महान चरित्र आँखों के सामने प्रस्तुत होते रहें तो भी वर्तमान दुरात्माओं के भ्रष्ट अनुकरण से बचने की हिम्मत जाग सकती है। प्रत्यक्ष न सही, परोक्ष रूप से मस्तिष्कों के सम्मुख प्रेरक प्रशिक्षण एवं घटनात्मक विवरण प्रस्तुत किया जा सके तो भी पतन के प्रवाह को रोकने में बहुत सहायता मिल सकती है। स्वाध्याय इसी महती आवश्यकता को पूर्ण करता है।
स्वाध्याय। जन्मदिन वर्ष में एक बार आता है झकझोर कर चला जाता है। उसे आत्म-ज्ञान का शुभारम्भ, श्रीगणेश एवं प्रेरक पर्व कह सकते हैं, इस उपलब्धि को नित्य सींचना आवश्यक है और यह कार्य दैनिक स्वाध्याय से ही सम्भव हो सकता है।
स्वाध्याय चाहिये। इसके बिना क्षुधा की निवृत्ति नहीं हो सकती। जिस मनोभूमि को स्वाध्याय नहीं मिलता वह ऊसर, नीरस, दुर्बल ओर विकृत होती चली जाती है। बर्तनों को नित्य माँजना पड़ता है, दाँत रोज साफ करने पड़ते हैं, स्नान नित्य किया जाता है, कमरे में झाड़ू रोज लगती है, इसी प्रकार मन पर वातावरण से निरन्तर पड़ने वाले बुरे प्रभाव का-मलीनता का-निराकरण करने के लिये नित्य ही स्वाध्याय की आवश्यकता पड़ती है। अन्यथा मनोभूमि मलीनता से इतनी आच्छादित हो जाती है कि उसमें सड़न और दुर्गन्ध के अतिरिक्त और कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता।
स्वाध्याय में प्रमाद न करने की शास्त्राज्ञा को एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति की तरह हमें निश्चित रूप से शिरोधार्य ही करना चाहिये।
स्वाध्याय नहीं मिलता वह ऊसर, नीरस, दुर्बल ओर विकृत होती चली जाती है। बर्तनों को नित्य माँजना पड़ता है, दाँत रोज साफ करने पड़ते हैं, स्नान नित्य किया जाता है, कमरे में झाड़ू रोज लगती है, इसी प्रकार मन पर वातावरण से निरन्तर पड़ने वाले बुरे प्रभाव का-मलीनता का-निराकरण करने के लिये नित्य ही स्वाध्याय की आवश्यकता पड़ती है। अन्यथा मनोभूमि मलीनता से इतनी आच्छादित हो जाती है कि उसमें सड़न और दुर्गन्ध के अतिरिक्त और कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता। ऐसा मन असुरता का ही निवास-स्थल हो सकता है।
स्वाध्याय की लकीर पीटने के लिये काफी माना जाता रहा है। यह सर्वथा अपर्याप्त है। जीवन- की परिवार की- समाज की बाह्य तथा अंतरंग समस्याओं पर जो साहित्य वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ का ध्यान रख कर व्यावहारिक एवं बुद्धि संगत हल उपस्थित कर सके वहीं स्वाध्याय का उपयुक्त माध्यम माना जा सकता है। उसी से किसी उपयुक्त मार्ग दर्शन की- समस्याओं के समाधान की- आशा की जा सकती है।
स्वाध्याय को अनिवार्य आवश्यकता को समझने के लिये आग्रह किया गया है। देवत्व के अभिवर्धन का- सूक्ष्म शरीर के परिष्करण का यह एक असाधारण उपाय है। हमें नित्य ही अनिवार्य रूप से इस ‘युग निर्माण साहित्य’ का अध्ययन करना चाहिये। कुछ समय इसके लिये पूजा उपासना, आहार, स्नान आदि की तरह ही निर्धारित कर लेना चाहिये और कितने ही आवश्यक कार्यों की उपेक्षा कर इस आत्मिक आहार के लिये समय निकालना चाहिये। यह प्रेरक विचारधारा जिन अन्तःकरणों से निकलती है वह इतने समर्थ हैं कि पाठक में अपनी ज्योति एवं प्रेरणा उत्पन्न कर सकें।
स्वाध्यायोपयोगी साहित्य ढूँढ़े नहीं मिलता। बुकसेलरों और प्रकाशकों के गोदामों में केवल कूड़ा कचरा ही भरा दिखाई पड़ता है। और मानव जाति का- देश धर्म और समाज संस्कृति का दुर्भाग्य ही कहना चाहिये कि व्यक्ति तथा समाज का नव-निर्माण कर सकने की क्षमता सम्पन्न साहित्य का आज खटकने वाला अभाव दृष्टिगोचर होता है। इस अभाव की पूर्ति के लिये भी प्रयत्न आरम्भ हो गया है। युग निर्माण योजना’ के अंतर्गत ऐसा सर्व सुलभ साहित्य छोटे ट्रैक्टों के रूप में छापा जा रहा है जो जन मानस की विकृतियों का समाधान कर उसे आवश्यक प्रकाश एवं मार्गदर्शन प्रस्तुत कर सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-August
स्वाध्याय का मानव-जीवन में कितना महान महत्व है। वह तथ्य यदि अपने परिवार के हर सदस्य के मन में ठीक तरह जमाया जा सका और इस दिशा में उनकी अभिरुचि को जागृत किया जा सका तो समझना चाहिए कि परिवार के प्रति अपने नैतिक कर्तव्य की बहुत हद तक पूर्ति हो गई।
स्वाध्याय, मनन, चिन्तन, व्रत, उपवास आदि की आवश्यकता शिक्षा से भी अधिक है। प्राचीन काल के गुरुकुलों में शिक्षा संबन्धी विषय गौण माने जाते थे, आत्म-विद्या के विषय अनिवार्य होते थे। मनुष्य के दार्शनिक स्वरूप को यथार्थ, शाश्वत और पूर्णानन्द की प्राप्ति का पाथेय माना जाता था। इसलिये उस पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया जाता था जो व्यक्ति के आत्म गुणों का परिवर्द्धन करती थी। उसकी आवश्यकता आज भी उतनी ही नहीं बल्कि वर्तमान विकृत परिस्थितियों में तो उससे भी अधिक है।
स्वाध्याय, आत्म-चिन्तन, सत्संग, तीर्थाटन, व्रत, उपवास, उपासना, साधना के ग्राह्य और सुधरे हुए स्वरूप को समझने और प्रयत्नपूर्वक उन्हें अपने आत्म-विकास में नियोजित करने की बुद्धि जिन लोगों में आ जाती है उन्हें अपने आपको सौभाग्यशाली समझना चाहिये। आत्म-जिज्ञासा आत्म-कल्याण का मुख्य द्वार है। जो उसे पा लेता है वह अपनी जीवन-यात्रा की मंजिल भी आसानी से प्राप्त कर लेता है। गीता अध्याय 1 के 10वें लोक में भगवान् कृष्ण ने भी कहा है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-March
स्वाध्याय, विनोद जैसे कार्यक्रमों में बंटी हुई दिनचर्या, एक स्तर के शिक्षार्थियों का पारस्परिक स्नेह-सहयोग, शिक्षकों की अभिभावकों जैसी आत्मीयता, तपोभूमि का स्वर्गीय वातावरण, प्रतिदिन मिलने वाला अमृतोपम ज्ञान यह सब मिलाकर शिक्षार्थी के लिए यह अवधि बड़ी उल्लास, आनन्द और संतोष से भरी-पूरी बीतेगी।
स्वाध्याय 3. सेवा, इन तीनों भागों में विभक्त है।
स्वाध्याय वर्ग के अंतर्गत गीता, रामायण, वेद, उपनिषद्, दर्शन, धर्मशास्त्र आदि की नियमित शिक्षा चलेगी। चार वर्षों में अध्यात्म, धर्म एवं नीति के संबंध में प्राचीन ऋषियों की आर्य पद्धति का सार एवं निष्कर्ष भली प्रकार समझा जा सकेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-May
स्वाध्याय दैनिक-जीवन का एक अविच्छिन्न नित्य-कर्म माना जाए। व्यक्ति एवं समाज के नव-निर्माण के लिये जो प्रेरक स्वाध्याय-साहित्य विनिर्मित हो रहा है उसके लिए आहार निद्रा जैसी दैनिक आवश्यकताओं की तरह ही समय निकाला जाए तो इससे ज्ञान-योग की महती आवश्यकता पूर्ण होती चलेगी।
स्वाध्याय वस्तुतः एक प्रकार की ईश्वर उपासना ही है। यों रूढ़िवादी लकीर पीटकर कूड़े करकट जैसी किन्हीं बूढ़ी, पुरानी, किस्से कहानियों की किताबों को घोटते रहना भी आज स्वाध्याय के नाम से पुकारा जाता है पर वास्तविक स्वाध्याय वह है जिसकी एक-एक पंक्ति हमें व्यवहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने की प्रेरणा से ओत-प्रोत हो। ऐसा स्वाध्याय दैनिक-जीवन का एक अविच्छिन्न नित्य-कर्म माना जाए। व्यक्ति एवं समाज के नव-निर्माण के लिये जो प्रेरक स्वाध्याय-साहित्य विनिर्मित हो रहा है उसके लिए आहार निद्रा जैसी दैनिक आवश्यकताओं की तरह ही समय निकाला जाए तो इससे ज्ञान-योग की महती आवश्यकता पूर्ण होती चलेगी।
स्वाध्याय वह है जिसकी एक-एक पंक्ति हमें व्यवहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने की प्रेरणा से ओत-प्रोत हो। ऐसा स्वाध्याय दैनिक-जीवन का एक अविच्छिन्न नित्य-कर्म माना जाए। व्यक्ति एवं समाज के नव-निर्माण के लिये जो प्रेरक स्वाध्याय-साहित्य विनिर्मित हो रहा है उसके लिए आहार निद्रा जैसी दैनिक आवश्यकताओं की तरह ही समय निकाला जाए तो इससे ज्ञान-योग की महती आवश्यकता पूर्ण होती चलेगी।
स्वाध्याय के नाम से पुकारा जाता है पर वास्तविक स्वाध्याय वह है जिसकी एक-एक पंक्ति हमें व्यवहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने की प्रेरणा से ओत-प्रोत हो। ऐसा स्वाध्याय दैनिक-जीवन का एक अविच्छिन्न नित्य-कर्म माना जाए। व्यक्ति एवं समाज के नव-निर्माण के लिये जो प्रेरक स्वाध्याय-साहित्य विनिर्मित हो रहा है उसके लिए आहार निद्रा जैसी दैनिक आवश्यकताओं की तरह ही समय निकाला जाए तो इससे ज्ञान-योग की महती आवश्यकता पूर्ण होती चलेगी।
स्वाध्याय-साहित्य विनिर्मित हो रहा है उसके लिए आहार निद्रा जैसी दैनिक आवश्यकताओं की तरह ही समय निकाला जाए तो इससे ज्ञान-योग की महती आवश्यकता पूर्ण होती चलेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-January
स्वाध्याय में लगन उत्पन्न कर देना एक जादूगर जैसी सफलता है। प्रयत्न से लोगों को कसैली चाय, मितली उत्पन्न करने वाली तम्बाकू और कड़ुई अफीम, शराब आदि का अभ्यस्त बना दिया गया तो कोई कारण नहीं कि चतुरता भरी तरकीबें काम में लाकर भावनात्मक नव-निर्माण का साहित्य पढ़ने के लिए लोगों को तैयार न किया जा सके। कुनैन की कड़ुई गोली खाने और कान छिदाने जैसे कष्टसाध्य कार्य के लिए छोटे बच्चों को फुसलाया जा सकता है, तो कोई कारण नहीं कि समझदारी से प्रयत्न करने पर बड़ी आयु के पढ़े-लिखे लोगों को जीवन-कला की समग्र शिक्षा देने वाला कल्पवृक्ष, अमृत और स्वर्ण की तुलना में अधिक वजनदार, अधिक श्रेयस्कर साहित्य पढ़ने के लिए रजामन्द न किया जा सके। बिना हिम्मत हारे-बिना धैर्य छोड़े-जो प्रयत्न करते रहेंगे वे इस प्रयत्न में अवश्य सफल होंगे कि अपने परिवार के हर शिक्षित बाल-वृद्ध एवं नर-नारियों को अपने प्रभाव क्षेत्र के परिजनों एवं स्वजन संबंधियों को दोनों पत्रिकायें पढ़ने को सहमत किया जा सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-April
स्वाध्याय, यज्ञ, कीर्तन, मार्जन, तर्पण करते करते असंख्य सिद्धियाँ करतल गत कर लीं। असाधारण क्षमता वाले मुनि महानन्द की ख्याति चन्द्रमा के प्रकाश की तरह विकसित होने लगी सैंकड़ों व्यक्ति उनकी सिद्धियों का लाभ पाने लगे। सैंकड़ों व्यक्ति प्रतिदिन आश्रम पहुँचते और श्री चरणों में सिर रख कर महासुख अनुभव करते।
स्वाध्याय की देख-भाल किया करते थे। कथा, प्रवचन तथा पूजा-पाठ द्वारा लोगों की धर्म निष्ठा को सम एवं समुचित बनाए रहते थे।
स्वाध्याय में अपना जीवन क्यों खपा देते? आध्यात्मिक सिद्धियों के धनी क्या इस प्रकार गली-गली पैसा और प्रतिष्ठा माँगते घूमते हैं? क्या यह शंका और सन्देह का विषय नहीं है कि जो दूसरों को धन, वैभव, संपत्ति, सन्तान का वरदान देने की क्षमता रखता है वह क्यों स्वयं दरिद्री, भिखारी तथा पैसे-पैसे के लिए जान दे रहा है? क्या दूसरों को लाखों का वरदान देकर दो पैसे माँग ले जाने वाला सिद्ध हो सकता है उसकी पूजा की जानी चाहिए ? इस मान्यता में कौन -सी तुक है-यह बात समझ में नहीं आती।
स्वाध्याय कर लेना, उसका ज्ञान बढ़ाकर उपदेश कर लेने से किसी को आत्मसात् नहीं हो जाता। गीताकर का स्पष्ट निर्देश है-
स्वाध्याय और ज्ञान-संवर्द्धन भी इस कार्य में सहायक है पर केवल ज्ञान की प्राप्ति ही पर्याप्त नहीं है। बुद्धिमान् लोग ज्ञान का दुरुपयोग करते हुए भी देखे जाते हैं। ज्ञान के द्वारा यदि आत्मलाभ सम्भव रहा होता तो अनेक पाश्चात्य दार्शनिक बहुत ज्ञानवान् हुए हैं-वे सब आत्मज्ञानी रहे होते और यदि इन देशों में थोड़े भी आत्मज्ञानी रहे होते तो आज उनकी दशा ही भिन्न होती। भौतिक दृष्टि से समृद्ध बनकर भी बुराइयों का जाल फैलाकर यह देश तब न दूसरों के लिए अभिशाप बनते वरन् स्वयं भी आध्यात्मिक सुखों का रसास्वादन कर रहे होते।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-June
स्वाध्याय किया और विद्वता उपलब्ध की। रोम के तत्कालीन सम्राट आड्यान भी उसके पाँडित्य का लोहा मानते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-July
स्वाध्याय के चार अंग है। इन चारों की पूर्ति के लिए सद्ग्रन्थों का पठन, श्रवण तथा सत्पुरुषों का सत्संग भी उपयोगी है। वैसे तो स्वाध्याय बिना पढ़े मनुष्य भी, बिलकुल अकेले रहकर भी कर सकते हैं। मेरी आत्मा वस्तुतः क्या है? इस जीवन का सच्चा प्रयोजन क्या है?
स्वाध्याय का अर्थ है- स्व+अध्याय, अध्ययन। अपने आपको पढ़ना। आत्म चिन्तन, आत्म निरीक्षण, आत्मशोधन, आत्मनिर्माण यह स्वाध्याय के चार अंग है। इन चारों की पूर्ति के लिए सद्ग्रन्थों का पठन, श्रवण तथा सत्पुरुषों का सत्संग भी उपयोगी है। वैसे तो स्वाध्याय बिना पढ़े मनुष्य भी, बिलकुल अकेले रहकर भी कर सकते हैं।
स्वाध्यायी मनुष्य को आत्मा का दर्शन होकर रहता है और वह समाधि सुख का रसास्वादन करता है।
स्वाध्याय सत्संग की ओर जिनकी जरा भी रुचि नहीं होती। बड़ों की अवज्ञा करना जिन्हें सुहाता है। कृतघ्नता, छल, विश्वासघात, मलीनता, दुष्टता उनकी विशेषता होती है। न स्वयं चैन से बैठते हैं और न दूसरों को चैन से बैठने देते हैं। तमोगुण के अज्ञानान्धकार में उनका अन्तःकरण सदा अच्छादित रहता है।
स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान को क्रियायोग बताया है। (तपस्स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि क्रिया योगः) और इस क्रिया योग का फल लिखते हुए उन्होंने कहा है कि इस क्रियायोग से क्लेश तथा व्यथाएं दूर होकर समाधि प्राप्त होती है। (समाधि भावनार्थः केश तनूकरणार्थंच) इस प्रकार प्रकट है कि क्रियायोग से भी समाधि की सिद्धि हो सकती है।
स्वाध्याय बिना पढ़े मनुष्य भी, बिलकुल अकेले रहकर भी कर सकते हैं। मेरी आत्मा वस्तुतः क्या है? इस जीवन का सच्चा प्रयोजन क्या है? मेरे विचार एवं कार्य में उचित तथा अनुचित का कितना अंश है? किन दोषों को छोड़ना और किन गुणों को बढ़ाना मेरे लिए आवश्यक है?
स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि क्रिया योगः) और इस क्रिया योग का फल लिखते हुए उन्होंने कहा है कि इस क्रियायोग से क्लेश तथा व्यथाएं दूर होकर समाधि प्राप्त होती है। (समाधि भावनार्थः केश तनूकरणार्थंच) इस प्रकार प्रकट है कि क्रियायोग से भी समाधि की सिद्धि हो सकती है।
स्वाध्याय है। स्वाध्यायी मनुष्य को आत्मा का दर्शन होकर रहता है और वह समाधि सुख का रसास्वादन करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-April
स्वाध्याय, म्यान जैसे कार्यों से मानसिक क्षमता एकाग्रता बढ़ती है। केवल सत्य ही बोलना, हिंसा न करना, धन का अधिक संचय न करना, काम सेवन अयुक्त मर्यादा से अधिक न करना। अन्योपार्जित धन से, कटुभाषण से बचना, आदि आत्मिक बातों से आत्म शक्ति बलवती होती है।
स्वाध्याय, सत्संग आदि सात्विकता बढ़ाने वाले कामों में विशेष रूप में समय लगाना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-June
स्वाध्याय, आत्मचिन्तन, दान, सेवा, परमार्थ, आदि कार्यों में प्रायः मन की रुचि कठिनता से झुकती है पर दृढ़ निश्चय के साथ लगातार, प्रतिदिन, उन कार्यों की पुनरावृत्ति करने पर फिर उसी प्रकार की आदत पड़ जाती है और उसी प्रकार के आचरण करने का स्वभाव बन जाता है। दिव्यता की स्थापना का विचार ही करना संकल्प है। क्या दिव्यता स्थापित की जाय? किस प्रकार की जाय? यह योजना मिश्रित करना मन्त्र है, उस योजना के अनुसार कार्य आरम्भ कर देना यज्ञ है।
स्वाध्याय, संगति, भ्रमण आदि साधनों का आश्रय लेते हैं। भाई, बहिन, माता, पिता, स्वजन, सम्बन्धी, मित्र पड़ौसी, ग्राहक, स्वजातियों, स्वदेशीयों के साथ किस किस तरह का व्यवहार करना तथा अन्य लोगों के साथ किस किस प्रकार के व्यवहार करना, इन सब बातों को भली प्रकार समझा जाता है। त्यौहार देवता, धर्म, पुस्तक, कर्मकाण्ड, मान्यताएं, आदि के सम्बन्ध में अपनी मति स्थिर करता है। इस प्रकार विविध प्रकार की जिम्मेदारियाँ अपने ऊपर उठा लेने के पश्चात् कोई मनुष्य एक सभ्य नागरिक कहलाने का अधिकारी होता है। जो इन जिम्मेदारियों को उठाने में जितनी ही आनाकानी करता है, वह उतना ही बेवकूफ, बेशर्म वेऐतकार समझा जाता है।
स्वाध्याय के लिए, आत्म चिन्तन के लिए, साधना के लिए अक्सर लोग यह कहा करते हैं कि “क्या करें, फुरसत नहीं मिलती।” वे अपने को बहुत कार्य व्यस्त बताते हैं। जरूरी कामों से फुरसत पाये बिना भला आध्यात्मिक कामों के लिए इन्हें किस प्रकार समय मिल सकता है।
स्वाध्याय, चिन्तन, मनन तथा साधन के लिए-थोड़ा भी समय नहीं लगाया जा सकता? क्या सचमुच आत्मा ऐसी तुच्छ वस्तु है, जिसकी शरीर के मुकाबले में इतनी उपेक्षा की जाय?
स्वाध्याय सत्संग, विद्वान् महात्माओं की सेवा, न्याय पूर्वक जीवन का उपार्जन, सत्य भाषण, उच्च विचार, परहित कार्य, मृदुल स्वभाव, दया आदि शुभ गुणों और सत्कार्यों को जीवन में नित्य क्रियात्मक रूप में यथा साध्य उतारें, उसके ऐसे निरन्तर आचरण से श्री परमात्मदेव प्रसन्न होंगे और उन की कृपा द्वारा अंतःकरण शुद्ध होगा, ज्यों-2 अंतःकरण शुद्ध होगा उसमें प्रभु की भक्ति भागीरथी का उदय होगा, विषयों से स्वाभाविक घृणा उत्पन्न होगी फिर कामनाएं कहाँ? यथा-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-January
स्वाध्याय करना। विचार पूर्ण, निष्पक्ष, वैज्ञानिक आधार पर लिखे गये, पक्षपात रहित सद्ग्रन्थ इस दिशा में हमें बहुत आगे तक अग्रसर करते हैं। ऐसे ग्रन्थों का विचार और पाठ चलता है। अपने संबंध में एकान्त में अंतर्मुखी होकर अपने आप विचार करना चिन्तन कहलाता है। मन और निदिध्यासन से प्रज्ञाचक्षु खुलते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-November
स्वाध्याय करते हैं एवं सिखों के ग्रन्थ साहब से भी हम अपरिचित नहीं हैं। इनमें से किसी में भी ऐसी शिक्षाएं नहीं हैं। वरन् इसके प्रतिकूल दया, प्रेम, उदारता, रक्षा, सेवा, सहायता, क्षमा, आदि के उपदेश भरे पड़े हैं। जिन्होंने यह कृत्य किये हैं उनको किसी धर्म का अनुयायी नहीं कहा जा सकता। फिर उनकी करतूतों को हिन्दू-मुसलिम संघर्ष किस प्रकार कहा जा सकता है?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-May
स्वाध्याय है यही वह बुहारी है जिससे मन की समस्त गंदगी को बुहारा जाता है। श्री अरविन्द “लेटर्स आन योग“ में स्वाध्याय की प्रभावोत्पादकता के बारे में कहते हैं कि इससे उच्च मन का परिक्षेत्र खुलता है। जिससे चेतना के उन्नत स्तरों से विचारों का अवतरण होता है। इसे विचारों के प्रकाश मान संसार का उदय कह सकते हैं।
स्वाध्याय, सत्संग जैसे विचारमंथनों द्वारा आत्मशोधन की जो प्रक्रिया चलती है उसी को देखते हुये यह जाना जा सकता है कि साधना में कितनी प्रगति हुई। साधक को सिद्धि मिलती है, बिना आत्मशोधन का भजन निरर्थक जाता है। अपवाद रूप में किसी को कोई दैवी अनुग्रह मिल भी जाय तो उसका परिणाम अंततः भस्मासुर, रावण, कुँभकरण, मारीच, कंस, हिरण्यकश्यप, आदि की तरह घोर विपत्ति के रूप में सामने आता है। फलित तो विभीषण, हनुमान जैसे सद्भाव सम्पन्न लोगों की साधना ही होती है।
स्वाध्याय की प्रभावोत्पादकता के बारे में कहते हैं कि इससे उच्च मन का परिक्षेत्र खुलता है। जिससे चेतना के उन्नत स्तरों से विचारों का अवतरण होता है। इसे विचारों के प्रकाश मान संसार का उदय कह सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-November
स्वाध्याय एवं लोक मंगल आराधना के लिए अपने समय साधन प्रतिभा का एक अंश लगाते रहना−ऐसे नियम हैं जिन्हें रत्नों की खदान कहा जा सकता है। इन्हें अथवा सेवा−साधना के छोटे−छोटे लक्ष्य स्वीकार करने की नैष्ठिक घोषणा देव दक्षिणा के अंतर्गत आती है।
स्वाध्याय शिक्षण, कौशल आदि का विस्तार। देवी सम्पदाओं से व्यक्ति और समाज को सुसम्पन्न बनाना। समग्र यज्ञ प्रक्रिया इन दर्शन सिद्धान्तों पर ही अवलम्बित रही है। यजन प्रक्रिया तो उसका स्थूल दृश्यमान पक्ष भर है। उपरोक्त प्रयोजनों के लिए कई बार व्यक्ति विशेष द्वारा इन चार में से जिसका निश्चय किया हो, उसकी सार्वजनिक घोषणा के लिए यह आयोजन सम्पन्न किया जाता था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-August
स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन-मनन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लिया जाता है और लक्ष्यपूर्ति की दिशा में आगे बढ़ा जाता है। निश्चित ही यह साधना व्यक्ति को देवमानव ऋषि के पद पर प्रतिष्ठित करती व उसे ऋद्धि सिद्धियों का स्वामी बनाती है।
स्वाध्याय और सत्संग तप है। पर पर-दुःख कातर होकर रात दिन कर्म में तत्पर रहना सर्वत्र आत्मानुभूति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। कार्य के स्वरूप का मूल्य नहीं मूल्यवान और महत्वपूर्ण उसके पीछे विद्यमान भाव है। भावों की इसी उत्कृष्टता के कारण जनक राजा होने के पर भी तत्व-ज्ञानियों में श्रेष्ठ हैं, उपदेश देने योग्य हैं।” ऋषिगणों को समाधान मिल रहा था महर्षि कह रहे थे-”उत्कृष्ट भावनाओं के घुल जाने पर साधारण कर्म भी योग बन जाता है।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥
स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ।
स्वाध्याय से मनन और निदिध्यासन से ध्यान और समाधि से वह परम तत्व अनुभव का विषय बनता है। सत्संग और सदाचार से यह मनुष्य का शरीर इसके भीतर देखने वाला अन्तःकरण वह पवित्र अधिष्ठान बनता है जिसमें आत्मानुभूति स्थिर और अचंचल होकर निवास करती है। सत्य बड़ा गुण है, स्वाध्याय और सत्संग तप है। पर पर-दुःख कातर होकर रात दिन कर्म में तत्पर रहना सर्वत्र आत्मानुभूति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। कार्य के स्वरूप का मूल्य नहीं मूल्यवान और महत्वपूर्ण उसके पीछे विद्यमान भाव है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-March
स्वाध्याय हेतु सही विचार परक औषधि की सही मात्रा का चयन यह सब करना जरूरी है। मनः शक्ति संवर्धन किए बिना शरीर शोधन की प्रक्रिया तो बहिरंग की, कलपुर्जों की सफाई भर है। आहार शुचिता की साधना जो कल्प प्रक्रिया से जुड़ी है, इसीलिए अस्वादव्रत को प्रधानता देती आयी है क्योंकि इससे मनोबल की परीक्षा होती है-आत्मानुशासन का कड़ा अभ्यास होता है व मन के मजबूत बन पड़ने पर आगे वह पृष्ठभूमि बन जाती है, जिसके आधार पर और भी विशिष्ट प्रयोग आहार एवं औषधि के किये जा सकें। शाँतिकुँज में गायत्री तीर्थ के आरण्यक में इसी कारण अस्वाद का साप्ताहिक अभ्यास हर साधक को कराया जाता है ताकि वे इन्द्रियसंयम का अभ्यास करते चल सकें। अध्यात्म उपचार जो परम पूज्य गुरुदेव ने जन-जन के लिए सुलभ बनाये हैं, में उनने किसी प्रकार के अतिवाद से बचने व सरल-सूत्रों को हृदयंगम किये जाने पर विशेष जोर दिया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-January
स्वाध्याय सत्संग का सार इतना ही है । चिन्तन मनन से निष्कर्ष नवनीत इतना ही निकलता है । अनेकानेक साधनाओं की सिद्धि इतनी ही है कि मानवी चेतना को उस जाल जंजाल से परित्राण मिले जो लक्ष्य को विस्मृत करती और कुत्साओं के अनेकानेक प्रतिपादनों का एक मात्र उद्देश्य है कि व्यक्ति आत्मबोध की भूमिका से जाग पड़े । उस प्रसुप्ति से छुटकारा पाये जिसमें वासना, तृष्णा और अहंता का गुलाम बनकर नर वानर की तरह निरर्थक उचक मचक करते रहने की उसकी आदत पड़ जाती है । पेट और प्रजनन के लिए पशु जीते हैं ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-April
स्वाध्याय व संतों-आचार्यों का सत्संग, तीर्थ यात्रा को जीवन में स्थान देना, देवता-पितर-ऋषि और मनुष्य मात्र के प्रति स्वयं को ऋणी मानते हुए उस ऋण से उऋण होने में ही जीवन की सफलता मानना जैसी कुछ ऐसी विज्ञान सम्मत मान्यताएँ भारतीय संस्कृति की हैं जो उसे आज युगधर्म देने के नाते सर्वांगपूर्ण बनाती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-December
स्वाध्याय से श्रेष्ठ कोई और साधना नहीं है। उसमें प्रमाद किसी को भी नहीं करना चाहिए।
स्वाध्याय से चलना चाहिए। प्रमाणिक, सुयोग्य और पारंगत विद्वानों की अभी भी कमी नहीं है। उनने आवश्यक विषयों पर ऐसी पुस्तकें लिखी हैं जो अभीष्ट सत्संग की आवश्यकता पूरी करती हैं। सोचना चाहिए कि हमारी जिज्ञासाओं का विषय क्या है? उस विषय के अनुभवी विद्वान कौन हैं?
स्वाध्याय को सत्संग का माध्यम बनाया जाना ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है। यह समय व्यस्तता का है जिसमें साथ में किसी के बैठकर जिज्ञासाओं का समाधान किया जाना हर जगह हर समय उपलब्ध नहीं हो सकता है। फिर जिन्हें पूछताछ करनी है वही सर्वथा खाली कहाँ हैं। पुराने जमाने में समय की इतनी अधिक कीमत नहीं थी। गुरु भी ढेरों मिल जाते थे और शिष्य भी।
स्वाध्याय से भी वह वंचित है उसे यदि निराकार उपासना की दीक्षा दी जाय तो उसे उस उपासना से कोई लाभ न होगा, क्योंकि उसकी अन्तः चेतना का इतना विकास नहीं हुआ है कि ईश्वर के वास्तविक निराकार तत्व को समझ सके। यदि एक निर्बल बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति से यह कहा जाय कि ईश्वर सर्वव्यापक है परन्तु वह इन स्थूल नेत्रों से दृष्टिगोचर नहीं होता उसका कोई रंगरूप नहीं है तो निश्चित रूप से उसकी बुद्धि ईश्वर के अस्तित्व को ही मानने से इनकार कर देंगी।
स्वाध्याय भी बहुमुखी होना चाहिए। मनीषियों ने अपनी-अपनी स्थिति के अनुरूप चिन्तन किये हैं और समाधान ढूँढ़े हैं। आवश्यक नहीं कि आज की स्थिति में उन्हें ज्यों का त्यों अपनाया जा सके। यही बात चरित्रों के सम्बन्ध में भी है। महामानवों में से किसी का भी चरित्र ऐसा नहीं है, जिसकी आज ज्यों की त्यों नकल की जा सके।
स्वाध्याय द्वारा हम वैसा संभव बना सकते हैं। ऐसी पुस्तकें भी उपलब्ध हैं व उनको पाने के साधन भी आज सुविकसित हैं। अपना ज्ञान सम्पदा बढ़ाते चलना सतत्-महामानवों का मार्ग दर्शन पाने के लिए स्वाध्याय से श्रेष्ठ कोई और साधना नहीं है। उसमें प्रमाद किसी को भी नहीं करना चाहिए।
स्वाध्याय के सहारे कार्यान्वित करना होगा। उसी प्रकार अनेक चिन्तर और अनेक चरित्र मिल कर हमारी आज की अपेक्षा के अनुरूप हो सकते हैं। हम जैसा निज को ढालना चाहते हैं, श्रेष्ठ पुस्तकों के स्वाध्याय द्वारा हम वैसा संभव बना सकते हैं। ऐसी पुस्तकें भी उपलब्ध हैं व उनको पाने के साधन भी आज सुविकसित हैं। अपना ज्ञान सम्पदा बढ़ाते चलना सतत्-महामानवों का मार्ग दर्शन पाने के लिए स्वाध्याय से श्रेष्ठ कोई और साधना नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-May
स्वाध्याय से उभरे विवेक के आधार पर हर किसी को यह समझाया जा सकता है कि किस प्रकार हम अपने ही साधनों से अपना हित कर रहे हैं और इन्हें सही दिशा में लगाकर हम कितना लाभ और पुण्य कमा सकते हैं। विभिन्न नशों, फैशनपरस्ती, मनोरंजन के नाम पर समय और आदतें खराब करने के चलन, प्रचलित परंपराओं के नाम पर चल रही तमाम कुरीतियों को दूर करने के लिए प्राणवान अभियान विचारशीलों और कर्मठों के द्वारा हर क्षेत्र में चलाए जा सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-January
स्वाध्याय में लगाना चाहती थी, किंतु मानसिक धरातल पर वह अपरिपक्व ही थी। वयस्क होने पर भी वह विवाह के लिए तैयार न होती थी। पिता का बहुत आग्रह पर उसने एक विद्वान् वयोवृद्ध से विवाह की स्वीकृति दे दी, ताकि उसका व्रत भी निभता रहे और लोकापवाद भी वन रहे। वयोवृद्ध पति की सेवा करते और उनसे ज्ञान-अनुदान का पाते बहुत समय बीत गया।
स्वाध्याय’ ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-June
स्वाध्याय मंडलों के माध्यम से ये कार्यक्रम संपन्न होंगे। उनसे तृतीय चरण में हुए कार्य को स्थायित्व मिलेगा, साथ ही स्थान-स्थान की अनछुई प्रतिभा को नए सिरे से युगचेतना के प्रवाह में जुड़ने का अवसर भी प्राप्त होगा।
स्वाध्याय,आध्यात्मिक व्यायाम और प्रार्थना आदि कृत्य सभी कालों में चले रहे है। प्राकृतिक विपदाओं के निवारण के लिए विभिन्न आध्यात्मिक प्रयोगों का स्वरूप भी सामूहिक ही रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-July
स्वाध्याय करिए। उनके साथ सत्संग करिए।
स्वाध्याय का क्रम चलाया जाए।
स्वाध्याय मंडलों के माध्यम से ये कार्यक्रम संपन्न होंगे। उनसे तृतीय चरण में हुए कार्य को स्थायित्व मिलेगा, साथ ही स्थान-स्थान की अनछुई प्रतिभा को नए सिरे से युगचेतना के प्रवाह में जुड़ने का अवसर भी प्राप्त होगा।
स्वाध्याय का नियमित समय एक घंटे के हिसाब से रखा। पंद्रह वर्ष की उम्र से सत्तर वर्ष की उम्र तक हमने सत्तर लाख पन्ने पढ़े हैं। ये सब विचारों का संयम है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-March
स्वाध्याय द्वारा श्रेष्ठ चिंतन की प्रवृत्ति को बढ़ावा। (स) व्यसन मुक्ति अभियान में स्वयं व औरों की भागीदारी। परिवार निर्माण के तीन सूत्र है- (अ) परिवार में सुव्यवस्था श्रमशीलता मितव्ययिता शालीनता-सहकार की पंचशील वृत्तियों का पालन। (ब) पुँसवन संस्कार द्वारा माता शिशु का कल्याण-जन्मदिवस व विवाह दिवस संस्कारों का प्रचलन। (स) मला शक्ति के जागरण हेतु प्रयोग उपचार।
स्वाध्याय स्थिर होने तक ही अर्थभावना अविच्छिन्न रहनी चाहिए । उसके बाद जप आरंभ होते ही इष्ट की छवि में चित्त का लय हो जाना चाहिए । इस स्थिति में किया गया जप अनहद स्तर का होता है ।
स्वाध्याय से इष्टदेवता के साथ मिलन होता है । (1/44) सूत्र का अर्थ करते हुए टीकाकार लिखते हैं, एक अवस्था में जप के समय अर्थ की भावना ठीक नहीं रहती । मन विषयाँतर में दौड़ता रहता है । स्वाध्याय स्थिर होने तक ही अर्थभावना अविच्छिन्न रहनी चाहिए । उसके बाद जप आरंभ होते ही इष्ट की छवि में चित्त का लय हो जाना चाहिए ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-February
स्वाध्यायशील व्यक्ति ही कर्मठ लोकसेवी संगठन बन पाते हैं। सामूहिक साधना द्वारा सामूहिक मन के जागरण की प्रक्रिया सक्रिय बना एक तीव्र चिंतनप्रवाह को जन्म देना एक अवतारी स्तर की सत्ता का ही काम हैं। हमारी गुरुसत्ता का जीवनक्रम हम देखते हैं, तो बहुआयामी रूप में उनके व्यक्तित्व रूपी विराट् हिमालय का दर्शन करते हैं। इसीलिए वह प्रचंड प्राणप्रवाह वाली लेखनी बनकर कभी लाखों अखण्ड ज्योति पाठकों के मनों को मथती हैं, उन्हें कुछ कर दिखाने के लिए तत्पर करती हैं, एक रचनात्मक घटक बनने को प्रेरित करती हैं। कभी वह उनकी ओजस्वी वाणी के प्रवाह से निस्सृत हो दृश्यजीवन में प्रखर तप व गहन ममत्व से भरी प्राण फूँक देने वाली अपनी इस विधा से अनेकों के जीवन की दिशाधारा बदले देती हैं।
स्वाध्याय, शास्त्रश्रवण इनमें से कोई भी ब्राह्मणत्व का कारण नहीं हैं। आचार मात्र ही ब्राह्मणत्व का कारण नहीं हैं। जिसका सदाचार अक्षुण्ण हैं, उसने आना आत्मबोध कर लिया हैं, अज्ञान से वह दूर हैं, अतः उसे ही द्विज कहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-September
स्वाध्याय रूपी यज्ञ में जो यज्ञोपवीत आदि सूत्र, मणी, ग्रंथि आदि के सहित शिष्य द्वारा धारण कराया जाता है, वही सौत्रामणी यज्ञ है
स्वाध्यायी डॉ. राघव घर आए। माँ ने डॉ. राघव को अपने बेटे की परेशानी के बारे में बताया। पूरा वृत्ताँत जानने के बाद उन्होंने मनोहर के पिता से कहा कि आप अपने बचपन को याद कीजिए, जिन दिनों आप पाँचवीं कक्षा में पढ़ते थे और स्कूल से भाग आया करते थे, तो पिता ने तब आपको किस तरह स्वीकार किया था। तरह-तरह से समझाने पर बात पिता के गले उतरी। उन्होंने बेटे को स्वीकार किया।
स्वाध्याय, यज्ञ, कीर्तन, मार्जन, तर्पण करते-करते असंख्य सिद्धियाँ करतलगत कर ली। असाधारण क्षमता वाले मुनि महानंद की ख्याति चंद्रमा के प्रकाश की तरह विकसित होने लगी। सैकड़ों व्यक्ति उनकी सिद्धियों का लाभ पाने लगे। सैकड़ों व्यक्ति प्रतिदिन आश्रम पहुँचते और उनके चरणों में सिर रखकर महासुख अनुभव करते, किन्तु मुनि का अंतःकरण स्थिर न था। सिद्धियों ने उनकी तृष्णा तो बढ़ा दी।
स्वाध्याय के क्रम में हमें कहा जाता है कि हम उनके जीवनक्रम को पढ़ें, मनन करें, भलीभाँति हृदयंगम करें। मनुष्य-मनुष्यता सीख सके, इसके लिए अवतार वह सब करके दिखाता है जिसका समाना किसी भी मनुष्य को करना पड़ सकता है। भगवान् अगले ही श्लोक में कहते हैं कि यदि मैं कर्म न करूं, तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएंगे और मैं संकरता को (व्यक्तियों में भ्रम उत्पत्ति) जन्म देने वाला बन जाऊँगा तथा जाति के रूप में उनके नाश का कारण बनूँगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-November
स्वाध्याय की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। विज्ञापन उपर्युक्त सभी पत्रिकाएं लेती है व अपनी अधिकाँश आय उन्हीं से इस उपभोक्ता प्रधान जगत् में लेती है। अपनी नीति शुरू से ही संस्थापक, आराध्य सता के निर्देशानुसार वैसी ही चलती रही हैं, चलती रहेगी। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका मूलतः परिजनों के अंशदान से चलती है, ज्योति प्रज्वलित बनी रही है इसी में इसकी शुचिता भी है, गरिमा भी ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-August
स्वाध्याय और ईश्वर-प्राणिधान के पाँच व्रतों को नियम की संज्ञा दी गई है। योगशास्त्र को व्यवस्थित विज्ञान का रूप देते हुए महर्षि पतंजलि के इन निर्धारणों का स्वरूप आँतरिक और बाह्य दोनों हैं। आस्था क्षेत्र में जिस गहराई तक ये स्थिर होते हैं, उसमें कई गुना विस्तार बाह्यजगत में होता है।
स्वाध्याय और ईश्वर-प्राणिधान को साध लिया जाए, तो समूचा धर्म-अध्यात्म सध गया। यह मानने की जरूर नहीं है, इसे प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सका है। मनीषियों ने इन दस गुणों अथवा भावों को सार्वभौम धर्म कहा है।
स्वाध्याय का अर्थ है, भक्ति,ज्ञान वैराग्य में रुचि जगाने वाले शास्त्रों और ग्रंथों का अध्ययन। दसवें व्रत या अंतिम नियम के रूप में ईश्वर का स्मरण, चिंतन और ध्यान करना ईश्वर-प्राणिधान है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-April
स्वाध्याय हेतु दे दें, ताकि ज्ञान का आलोक जन-जन तक पहुँच सके और स्वाध्याय का क्रम चलता रहे।
स्वाध्याय का क्रम चलता रहे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-July
स्वाध्याय में प्रयत्न करना बतलाया है। ऐसा करने से अन्तःकरण की शुद्धि तथा निर्मल बुद्धि होकर मनुष्य जीवन अपने और दूसरों के लिए हितकर हो जाता है। जितनी भी इस शुभ कर्म में श्रद्धा और विश्वास हो, उतना ही अविद्या आदि क्लेशों का ह्रास होता है। फिर विद्या के प्रकाश में उपासना, प्रभु के आस पास हो जाता है।
स्वाध्याय, चिन्तन, आत्मनिर्माण, उत्तर दायित्वों की पूर्ति और लोक सेवा के साथ हमें आध्यात्मिक साधनाएं करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अनेक सुयोग्य और कई अयोग्य गुरुओं के संरक्षण में हमने अनेकों, दीर्घकालीन कष्ट साध्य साधनाएं की हैं, अनेकों तपश्चर्याओं में अपने को काफी तपाया है। इस लम्बे साधना काल में हमने जो अनुभव प्राप्त किये हैं, उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अन्य सब साधना विधियों की अपेक्षा गायत्री की साधना अपेक्षाकृत सरल है, शीघ्र सफल होने वाली और अधिक उत्तम परिणाम उत्पन्न करने वाली है। इस साधना में वैसा कोई विक्षेप नहीं आता जैसा कि अन्य साधनाओं में आता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-August
स्वाध्याय, भजन, ध्यान, इत्यादि करना चाहिए।
स्वाध्याय और छोटे छोटे व्यवहार द्वारा नित्य परिमार्जित करते रहो। यदि कहीं ज्ञान चर्चा होती हो और उसके कुछ शब्द सुनकर तुम्हें मालूम पड़े तो यह कहकर वहाँ से मत खिसक जाओ कि यह सब तो मैंने पढ़ लिया है मैं जानता हूँ। संभव है उसके अन्दर कोई नवीन बात निकल आवे जो तुम्हारे लिए उपयोगी हो, तुम्हारे जीवन में महान् परिवर्तन उपस्थित कर दे।
स्वाध्याय कीजिए। फिर देखिए कि इस ज्ञान के आधार पर आपको कैसे 2 अद्भुत साँसारिक और आत्मिक लाभ प्राप्त होते हैं इतनी सस्ती और इतनी प्रमाणिक पुस्तक अन्यत्र नहीं मिल सकतीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-March
स्वाध्याय तप के समान हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-June
स्वाध्याय, अध्ययन, आकाशवाणी, देवी देवताओं के दर्शन दिव्य प्रकाश आदि आध्यात्मिक, सतोगुणी, शुभ स्वप्नों में मन अपने आप अपने अन्दर आये हुए नये शुभ तत्वों को देखता है और उन दृश्यों से शान्ति लाभ करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-October
स्वाध्याय शील एवं सदाचार-परायण बनने का आदेश दिया है। शास्त्रों में जो बार बार धर्म पर सत्यं वद, स्वाध्यायान्मा प्रमद, आदि आदेश वाक्य मिलते हैं उनका एक मात्र कारण अन्त गति को सुधारता रहना है जिसे जीवन में शाँति रहे और मृत्यु भी शान्ति से हो।
स्वाध्यायान्मा प्रमद, आदि आदेश वाक्य मिलते हैं उनका एक मात्र कारण अन्त गति को सुधारता रहना है जिसे जीवन में शाँति रहे और मृत्यु भी शान्ति से हो।
स्वाध्याय आदि द्वारा जिन्होंने अपने आत्म ज्ञान को बढ़ाकर चरित्र में उतार लिया है वे किसी भी प्रकार से असद् संस्कारों से बद्ध नहीं रहते। तब उन्हें भय और शोक क्यों होगा? दुख और वेदनाओं की पीड़ा को क्यों सहन करना पड़ेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-May
स्वाध्याय, आत्म चिन्तन, आदि नामों से पुकारते हैं। इन उपायों से आत्मबल प्राप्त होता है, आत्मिक थकान मिटती है, प्रकाश, स्फूर्ति और ताजगी मिलती है। जैसे पूरी निद्रा लेकर, पौष्टिक आहार प्राप्त करके प्रसन्न चित्त हुआ मनुष्य जिस कार्य में जुटता है उसे उत्साह चतुरता और शीघ्रता से पूरा कर लेता है उसी प्रकार साधना के द्वारा आत्मबल प्राप्त करने पर मनुष्य की आन्तरिक स्थिति काफी मजबूत और प्रफुल्लित हो जाती है, उसके द्वारा दैनिक जीवन की गतिविधि का संचालन बड़ी ही आशापूर्ण उत्तमता के साथ होता है।
स्वाध्याय नहीं किया जाता उस दिन व्यक्ति अपने स्वाभाविक पद से च्युत हो जाता है।” कारण स्पष्ट है जिस दिन मनुष्य शौच न जायगा, मूत्र त्याग न करेगा, मुँह हाथ न धोवेगा, उस दिन उसकी वह दशा न रहेगी जो स्वभावतः साधारण मनुष्य की रहती है। जिस दिन भोजन न किया, जल न पिया जाय, सोया न जाय उस दिन क्या कोई मनुष्य अपनी स्वाभाविकता से च्युत अवश्य होगा। इसी प्रकार आत्मिक भोजन प्राप्त किये बिना, आत्मशोधन किये बिना भी अन्तःकरण स्वस्थ नहीं रह सकता उसकी स्थिति, स्थान भ्रष्ट जैसी ही हो जावेगी। शतपथ कार का यही अभिप्राय है।
स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। इस महत्व पूर्ण कार्य में हममें से किसी को प्रमाद नहीं करना चाहिए।
स्वाध्यायान्मा प्रमदतव्यं।” स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। इस महत्व पूर्ण कार्य में हममें से किसी को प्रमाद नहीं करना चाहिए।
स्वाध्याय सत्संग, चिन्तन, मनन करने के उपरान्त उत्तम विचारों के संस्कार दृढ़ होते हैं तब कहीं प्रत्यक्ष जीवन में वे लक्षण प्रकट होते हैं और वह वैसा बन जाता है। गायत्री की साधना से सतोगुण की ब्राह्मी भावनाएं अन्तः प्रदेश में अपना केन्द्र स्थापित करती हैं। उन भावनाओं के अनुरूप आन्तरिक जीवन बन जाता है और उसी प्रकार की प्रवृत्तियाँ वाह्य जीवन में भी दृष्टि गोचर होती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-January
स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान के बिना आत्मा मुरझाई हुई पड़ी है। इस प्रकार जीवन की सभी दिशाएं अस्त व्यस्त हो जाती हैं, चारों ओर भयंकर आरण्य में निशाचर विचरण करते दिखाई पड़ते हैं। हर मार्ग में कूड़ा करकट झाड़ झंखाड़ पड़े दीखते हैं। कारण स्पष्ट है-मनुष्य ने धन की दिशा में इतनी प्रवृत्ति बढ़ाई है कि केवल उसी का उसे ध्यान रहा है और शेष सब ओर से उसने चित्त हटा लिया है। जिस दिशा में प्रयत्न न हो, रुचि न हो, आकाँक्षा न हो, उस दिशा में प्रतिकूल परिस्थितियों का ही विनिर्मित होना संभव है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-December
स्वाध्याय गृहस्थ यज्ञ और अपने उस पुरुषार्थ में भी, जो अपनी सामाजिक उन्नति के लिए तुम करते हो, उसको अपने बराबर की साथिनी और सहचरी समझो। उसको न केवल गृहस्थ जीवन व सामाजिक जीवन में किन्तु जातीय जीवन में भी अपनी सदा सहचरी और विश्वस्त मन्त्रिणी समझो। तुम दोनों मनुष्य रूप पक्षी के दो पर बन जाओ जिनके द्वारा आत्मा उस निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच सके, जो हमारा भाग्य या प्रारब्ध कहा जाता है।
स्वाध्याय के अर्थ के सम्बन्ध में लोगों में अनेक मतभेद हैं। कुछ लोग पुस्तकें पढ़ने को स्वाध्याय कहते हैं, कुछ लोग खास प्रकार की पुस्तकें पढ़ने को स्वाध्याय कहते हैं। कुछ का कहना है कि आत्म निरीक्षण करते हुए अपनी डायरी भरने का नाम स्वाध्याय है। वेद के अध्ययन का नाम भी कुछ लोगों ने स्वाध्याय रख छोड़ा है। लेकिन इतने अर्थों का विवाद उस समय अपने आप हो समाप्त हो जाता है जब मनुष्य के ज्ञान में उसका लक्ष्य समा जाता है।
स्वाध्यायमामनेत्।
स्वाध्याय योगसम्पत्या परमात्मा प्रकाशते।1।28
स्वाध्याय करने वाले को प्राप्त होता है।
स्वाध्याय को श्रम की सीमा कहा गया है। श्रम में ही पृथ्वी से लेकर अन्तरिक्ष तथा स्वर्ग तक के समस्त कर्म प्रतिष्ठित हैं। बिना स्वाध्याय के साँगोपाँग रूप से कर्म नहीं हो सकते और साँगोपाँग हुए बिना सिद्धि नहीं मिल सकती। इसलिए सम्पूर्ण सिद्धियों का एक मात्र मूल मंत्र है स्वाध्याय, आत्मनिरीक्षण।
स्वाध्याय में प्रमाद न करो और अहरहः स्वाध्यायमध्येतव्यः-रात दिन स्वाध्याय में लगे रहो।
स्वाध्यायंनाधत्ते।
स्वाध्याय के इस मार्ग से कहीं भी अपने अन्दर कमी नहीं आने दी बल्कि समस्त कमियों को निकालने और पूर्ण मानव बनने के उद्देश्य से इस मार्ग को ग्रहण किया।
स्वाध्याय, आत्मनिरीक्षण।
स्वाध्यायमधीते।
स्वाध्याय द्वारा परमात्मा से योग करना सीखा जाता है और समत्व रूप योग से स्वाध्याय किया जाता है। योगपूर्वक स्वाध्याय से ही परमात्मा का साक्षात्कार हो सकता है।
स्वाध्याय ही सबसे बड़ा क्षेत्र है। योग भाष्यकार व्यास का कहना है कि :-
स्वाध्याय कहते हैं, कुछ लोग खास प्रकार की पुस्तकें पढ़ने को स्वाध्याय कहते हैं। कुछ का कहना है कि आत्म निरीक्षण करते हुए अपनी डायरी भरने का नाम स्वाध्याय है। वेद के अध्ययन का नाम भी कुछ लोगों ने स्वाध्याय रख छोड़ा है। लेकिन इतने अर्थों का विवाद उस समय अपने आप हो समाप्त हो जाता है जब मनुष्य के ज्ञान में उसका लक्ष्य समा जाता है।
स्वाध्याय न करने से शरीर में मन तथा बुद्धि में एवं प्राणों में भी जड़ता स्थान बना लेती है, मनुष्य प्रमादी हो जाता है। प्रमाद मानव का सबसे बड़ा शत्रु है यह उसे बीच में ही रोक लेता है सिद्धि तक पहुँचने ही नहीं देता। इसीलिए आर्य ऋषियों ने कहा है-
स्वाध्याय के साँगोपाँग रूप से कर्म नहीं हो सकते और साँगोपाँग हुए बिना सिद्धि नहीं मिल सकती। इसलिए सम्पूर्ण सिद्धियों का एक मात्र मूल मंत्र है स्वाध्याय, आत्मनिरीक्षण।
स्वाध्याय नहीं करते, वे खामियों को दूर नहीं कर सकते इसलिए चाहे ब्राह्मण हो-चाहे शूद्र प्रत्येक व्यक्ति अपने लक्ष्य से गिर सकता है।
स्वाध्याय किया जाता है। योगपूर्वक स्वाध्याय से ही परमात्मा का साक्षात्कार हो सकता है।
स्वाध्याय से बढ़कर अन्य कोई उपाय नहीं है। यहाँ तक इससे बढ़कर कोई पुराण भी नहीं है। शतपथ ब्राह्मण में लिखा है कि :-
स्वाध्याय में प्रमाद नहीं करना चाहिए।’
स्वाध्याय ही है। इसी कारण ज्ञान हो और प्रमाद से वह विस्मृत हो गया हो तब भी स्वाध्याय की आवश्यकता है। अग्रसर होकर जिस कार्य को किया जाता है, सम्पूर्ण शक्ति जिस कार्य में लगी रहती है, उसकी सिद्धि में किंचित भी सन्देह नहीं करना चाहिए इसीलिए इहलौकिक और पारलौकिक दोनों स्थानों की सिद्धि के लिए, आत्मकल्याण के लिए निरन्तर स्वाध्याय न करने से शरीर में मन तथा बुद्धि में एवं प्राणों में भी जड़ता स्थान बना लेती है, मनुष्य प्रमादी हो जाता है। प्रमाद मानव का सबसे बड़ा शत्रु है यह उसे बीच में ही रोक लेता है सिद्धि तक पहुँचने ही नहीं देता। इसीलिए आर्य ऋषियों ने कहा है-
स्वाध्याय तो तप है। तप के द्वारा शक्ति का संचय होता है। शक्ति के संचय से मनुष्य शक्तिवान बनता है। चमत्कार को नमस्कार करने वाले बहुत हैं, जिसके पास शक्ति नहीं है उसे कोई भी नहीं पूछता। इसलिए जो तपस्वी हैं उनसे सभी भयभीत रहते हैं और उनके भय से समाज अपने अपने कर्त्तव्य का साँगोपाँग पालन करता रहता है।
स्वाध्याय योगसम्पत्या परमात्मा प्रकाशते।1।28
स्वाध्याय से ही परमात्मा का साक्षात्कार हो सकता है।
स्वाध्याय का विश्लेषण करने वालों ने इसके दो प्रकार से समास किये हैं-
स्वाध्याय की आवश्यकता है। अग्रसर होकर जिस कार्य को किया जाता है, सम्पूर्ण शक्ति जिस कार्य में लगी रहती है, उसकी सिद्धि में किंचित भी सन्देह नहीं करना चाहिए इसीलिए इहलौकिक और पारलौकिक दोनों स्थानों की सिद्धि के लिए, आत्मकल्याण के लिए निरन्तर स्वाध्याय न करने से शरीर में मन तथा बुद्धि में एवं प्राणों में भी जड़ता स्थान बना लेती है, मनुष्य प्रमादी हो जाता है। प्रमाद मानव का सबसे बड़ा शत्रु है यह उसे बीच में ही रोक लेता है सिद्धि तक पहुँचने ही नहीं देता। इसीलिए आर्य ऋषियों ने कहा है-
स्वाध्याय को परमात्मा का साक्षात्कार करने वाला इसी लिए बतलाया है क्योंकि जो आवरण के अन्धकार में चला गया है उसे प्रकट करने के लिए अन्धकार को दूर करने की आवश्यकता है।
स्वाध्याय नहीं करता उसी दिन वह ब्राह्मणत्व से पतित हो जाता है-
स्वाध्याय है। वेद के अध्ययन का नाम भी कुछ लोगों ने स्वाध्याय रख छोड़ा है। लेकिन इतने अर्थों का विवाद उस समय अपने आप हो समाप्त हो जाता है जब मनुष्य के ज्ञान में उसका लक्ष्य समा जाता है।
स्वाध्याय है जिस दिन वह स्वाध्याय नहीं करता उसी दिन वह ब्राह्मणत्व से पतित हो जाता है-
स्वाध्याय की आवश्यकता होती है। स्वाध्याय जीवन के उद्देश्य तक पहुँचने की खामियों को भी दूर कर सकती है। जो स्वाध्याय नहीं करते, वे खामियों को दूर नहीं कर सकते इसलिए चाहे ब्राह्मण हो-चाहे शूद्र प्रत्येक व्यक्ति अपने लक्ष्य से गिर सकता है।
स्वाध्याय रख छोड़ा है। लेकिन इतने अर्थों का विवाद उस समय अपने आप हो समाप्त हो जाता है जब मनुष्य के ज्ञान में उसका लक्ष्य समा जाता है।
स्वाध्यायान्माप्रमदः-स्वाध्याय में प्रमाद न करो और अहरहः स्वाध्यायमध्येतव्यः-रात दिन स्वाध्याय में लगे रहो।
स्वाध्याय जीवन के उद्देश्य तक पहुँचने की खामियों को भी दूर कर सकती है। जो स्वाध्याय नहीं करते, वे खामियों को दूर नहीं कर सकते इसलिए चाहे ब्राह्मण हो-चाहे शूद्र प्रत्येक व्यक्ति अपने लक्ष्य से गिर सकता है।
स्वाध्यायमध्येतव्यः-रात दिन स्वाध्याय में लगे रहो।
स्वाध्याय में लगे रहो।
स्वाध्याय या अध्ययन है।
स्वाध्याय है। जितने महापुरुष हुए हैं वे सब इसी मार्ग का अनुसरण करते रहे। उन्होंने स्वाध्याय के इस मार्ग से कहीं भी अपने अन्दर कमी नहीं आने दी बल्कि समस्त कमियों को निकालने और पूर्ण मानव बनने के उद्देश्य से इस मार्ग को ग्रहण किया।
स्वाध्याय कहते हैं। कुछ का कहना है कि आत्म निरीक्षण करते हुए अपनी डायरी भरने का नाम स्वाध्याय है। वेद के अध्ययन का नाम भी कुछ लोगों ने स्वाध्याय रख छोड़ा है। लेकिन इतने अर्थों का विवाद उस समय अपने आप हो समाप्त हो जाता है जब मनुष्य के ज्ञान में उसका लक्ष्य समा जाता है।
स्वाध्याय की महिमा का गान किया है। हिन्दू शास्त्रों में लिखा है कि ‘स्वाध्याय में प्रमाद नहीं करना चाहिए।’
स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमामनेत्।
स्वाध्याय योगसम्पत्या परमात्मा प्रकाशते।1।28
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-January
स्वाध्याय की शक्ति
स्वाध्याय और सत्संग की आवश्यकता उसी प्रकार है जिस प्रकार बर्तन माँजने के लिए मिट्टी और पानी की उपयोगिता होती है। सद्विचारों का प्रसार जब कम हो जाता है और कुविचारों का विस्तार बढ़ जाता है तब स्वभावतः जन मानस में मलीनता छा जाती है और पाप तापों का, क्लेश कलह का रोग शोक का वातावरण पनपता दृष्टिगोचर होने लगता है। मनुष्य के भीतरी मन की बुराइयाँ उसके सामने विपत्ति बनकर आ खड़ी होती हैं। कुएँ की प्रतिध्वनि की तरह हमें अपनी भावनाओं के अनुरूप ही दूसरों का प्रत्युत्तर मिलता है। जैसे हम स्वयं है वैसे ही दूसरे भी दीखते हैं।
स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान—नियम इन दसों बातों पर बारीकी से ध्यान दिया जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि इनका उद्देश्य शारीरिक, मानसिक और सामाजिक सुव्यवस्था ही है। ब्रह्मचर्य, शौच और तप का कार्यक्रम शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से रखा गया है। इन्द्रियों का संयम ब्रह्मचर्य के अन्तर्गत आता है। शरीर, वस्त्र, घर एवं उपकरणों की स्वच्छता का तात्पर्य शौच है। तप का अर्थ है शारीरिक और मानसिक श्रम—आसन, प्राणायाम, व्यायाम, तितिक्षा, कष्ट-सहिष्णुता आदि।
स्वाध्याय करने के लिए तत्संबंधी पुस्तकालय, आरोग्य शास्त्र का व्यावहारिक शिक्षण, आसन, प्राणायाम, सूर्य नमस्कार, मालिश, सूर्य−किरण चिकित्सा, वाष्प स्नान जलोपचार, आदि का दैनिक कार्यक्रम रहेगा। स्वास्थ्य बिगाड़ने की भूलों के प्रायश्चित स्वरूप 40 दिन का यह कल्प उपवास एक प्रकार का चांद्रायण व्रत ही है, गायत्री उपासना भी इसमें सम्मिलित रहने से इस कार्यक्रम से शारीरिक ही नहीं आत्मिक काया−कल्प भी होने की संभावना है। नित्य यज्ञ में सम्मिलित रहने से यज्ञ चिकित्सा का भी लाभ मिलेगा। अपने बिगड़े हुए पेट को सुधारने और आगे के लिए आहार−विहार संबंधी अच्छी आदतें डाल लेने के लिए यह दो महीने का शिक्षण काल किसी भी आरोग्याकाँक्षी के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकता है। अपने तथा अपने परिजनों के लिए इस उपयोगी पद्धति को काम में लाकर एक स्वास्थ्य रक्षक की योग्यता भी प्राप्त की जा सकती है।
स्वाध्याय और मनन-चिन्तन करते रहने से मन की मलीनता हटेगी ही। ईश्वर का उपासक सर्वत्र उस अंतर्यामी को उपस्थित देखेगा तो क्यों पाप में प्रवृत्त होगा और क्यों भय, चिन्ता, शोक, निराशा आदि में डूबेगा? इसी प्रकार सामाजिक सुव्यवस्था के लिए अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह हैं। दूसरों में अपनी ही आत्मा देखकर उनसे प्रेम, सहयोग एवं उदारता का व्यवहार करना अहिंसा है। अपनी न्यायेपार्जित कमाई पर ही गुजारा करना अस्तेय है और निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकताओं से बची हुई प्रतिभा, विद्या, क्षमता, समय एवं सम्पत्ति को समाज के हित में वापिस लौटा देना, दान कर देना अपरिग्रह है।
स्वाध्याय और ईश्वर उपासना यह चार आधार मानसिक स्वच्छता के लिए हैं। छल-कपट, दंभ-पाखंड आदि कुविचारों का शमन सत्य-निष्ठा से होता है। सन्तोषी को तृष्णाऐं और वासनाऐं क्यों सतावेंगी? स्वाध्याय और मनन-चिन्तन करते रहने से मन की मलीनता हटेगी ही। ईश्वर का उपासक सर्वत्र उस अंतर्यामी को उपस्थित देखेगा तो क्यों पाप में प्रवृत्त होगा और क्यों भय, चिन्ता, शोक, निराशा आदि में डूबेगा?
स्वाध्याय से ही सम्भव है। इस क्षेत्र में यही दो माध्यम काम करते हैं। चिन्तन और मनन की आदत पड़े तो मनुष्य आत्म−निरीक्षण कर सकता है और अपनी बुराइयों के एवं दुर्बलताओं के बारे में बहुत कुछ सोच−समझ सकता है, उन्हें छोड़ और सुधार भी सकता है। ऐसी विचार−गोष्ठियाँ जिनमें अपनी मानसिक स्थिति को सुधारने का मार्ग−दर्शन होता रहे बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। ईश्वर उपासना का भी इस दृष्टि से अत्यधिक महत्व है।
स्वाध्याय और सत्संग की दुहरी आवश्यकता पूरी होती है। यह दोनों की लाभ घर बैठे पहुँचाने का धर्म कार्य किसी भी श्रेष्ठ कार्य से कम महत्वपूर्ण नहीं है। समय दान का यह छोटा सा काम कुछ ही दिन बाद अपना जादू जैसा असर उपस्थित करेगा और जिनको सेवा दी जा रही है उनके विचारों में भारी परिवर्तन आरम्भ होगा।
स्वाध्याय का समन्वय
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-June
स्वाध्याय क्यों और किसका?
स्वाध्याय और सत्संग का विषय प्राचीन काल में आत्म−विश्लेषण और आत्मनिर्माण ही हुआ करता था। गुरुजन इसी विषय की शिक्षा दिया करते थे। उच्च शिक्षा वस्तुतः यही है। कला कौशल की अर्थकारी जो विद्या स्कूल-कालेजों में पढ़ाई जाती है वह हमारी जानकारी और कार्य कुशलता को तो बढ़ा सकती है पर आदतों और दृष्टिकोण को सुधारने की उसमें कोई विशेष व्यवस्था नहीं है। इसी प्रकार कथावार्ता के आधार पर होने वाले सत्संग प्राचीनकाल के किन्हीं देवताओं या अवतारों के चरित्र सुनाने या ब्रह्म-प्रकृति—स्वर्ग-मुक्ति जैसी दार्शनिक बातों पर तो कुछ चर्चा करते हैं पर यह नहीं बताते कि हम अपने व्यक्तित्व का विकास कैसे करें?
स्वाध्याय, संयम और सेवा चतुर्विधि कार्य−क्रम युग निर्माण का आधार है। इसे ही अपना कर व्यक्ति का व्यक्तित्व महान बनना है मन की स्वच्छता भी इन चार साधनों पर निर्भर है इन्हें हम प्राण−प्रण से अपनायें इसी से जीवन लक्ष की सफलता संभव हो सकती है।
स्वाध्याय की दृष्टि से कौन सी पुस्तकें के कितने पृष्ठ पढ़े और उन में प्राप्त हुई महत्वपूर्ण बातों पर कितनी देर मनन-चिन्तन किया? (3) आज हमने अपने दिन भर के विचारों और कार्यों की बड़ी समीक्षा करके उनमें क्या−क्या गुण-दोष पाये और कल उन दोषों को सुधारने एवं गुणों को बढ़ाने के लिए क्या निश्चय किया? (4) आज हमने दूसरों को क्या सेवा लाभ दिया? इन चारों बातों पर यदि नित्य बारीक नजर रखी जाय, इनके महत्व को सोचते-समझते रहा जाय और दैनिक जीवन में इनके लिए स्थान दिया जाता रहे तो एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति हो सकती है। ऐसी डायरी रखना और उसे नित्य लिखना प्रत्येक आत्म कल्याण के इच्छुक के लिए आवश्यक है।
स्वाध्याय का उद्देश्य पूर्व ही स्पष्ट किया जा चुका है। गीता भागवत पढ़ना धर्म शिक्षा की दृष्टि से अलग बात है। उसके लिए जितनी इच्छा हो अलग से समय रखना चाहिए। पर जीवन निर्माण के लिए व्यावहारिक विचार देने वाला सुलझा हुआ विचारपूर्ण एवं क्रमबद्ध साहित्य पढ़ना- हम इस आत्मसुधार कार्यक्रम के लिए आवश्यक समझें। “अखण्ड−ज्योति” पत्रिका इन दिनों हम इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए चला रहे हैं, जिस प्रकार वात्सल्यमयी माता अपने बच्चों के लिए अपनी बुद्धि और सामर्थ्य के अनुरूप उत्तम से उत्तम भोजन बनाने का प्रयत्न करती है।
स्वाध्याय और सत्संग का यही प्रधान विषय रखा जाय। पढ़ने और सुनने की आदत बहुत कम लोगों को होती है जिन्हें होती है वे केवल मनोरंजन की या कल्पना लोक में बहुत ऊँची उड़ान लगाने वाली बातें पढ़ना या सुनना पसन्द करते हैं। किस्से कहानियाँ, उपन्यास, जासूसी, तिलस्म, वासनात्मक साहित्य आज बहुत पढ़ा, बेचा और छापा जाने लगा है और सिनेमा, नाटक, सरकस, खेल-कूद, प्रदर्शन, नृत्य, संगीत, कथावार्ता आदि में भी मनोरंजन की ही प्रधानता रहती है। लोग कल्पना लोक में विचरण करते रहना पसंद करते हैं। यह आदत ज्ञान−वृद्धि में जितनी सहायक होती है उससे कहीं अधिक बाधक होती है।
स्वाध्याय और सत्संग की इतनी अधिक महिमा धर्म ग्रन्थों में वर्णन की गई है कि उसकी आवश्यकता भजन से भी पहले मालूम पड़ती है। देखा भी यही गया है कि आवेश में आकर साधना और तपश्चर्या करने में लगे हुए लोग किसी छोटे से कारण से विचलित होकर अपना मार्ग बदल देते हैं पर जितने विवेक और ज्ञानपूर्वक बहुत चिन्तन और मनन के बाद इस मार्ग को अपनाया है वे जीवन भर सुनिश्चित रूप से लक्ष की ओर चलते रहते हैं। वेदान्त में ज्ञान की पूर्णता को ही मुक्ति माना गया है। ज्ञान और विवेक बिना अध्यात्म की गाड़ी एक पग भी आगे नहीं बढ़ती।
स्वाध्याय (3) नियम (4) सेवा। इन चार कामों के लिए अपनी दिनचर्या में निश्चित रूप से अपनी स्थिति के अनुरूप स्थान देना चाहिए।
स्वाध्याय और सत्संग का, चिन्तन और मनन का विषय होना चाहिए। कहते हैं कि संजीवनी बूटी का सेवन करने से मृतक व्यक्ति भी जीवित हो जाते हैं। हनुमान द्वारा पर्वत समेत यह बूटी लक्ष्मण जी की मूर्च्छा जगाने के लिए काम में लाई गई थी। वह बूटी औषधि रूप में तो मिलती नहीं है पर सूक्ष्म रूप में अभी भी मौजूद है। आत्म−निर्माण की विद्या—संजीवनी विद्या—कही जाती है इससे मूर्छित पड़ा हुआ मृतक तुल्य अन्तःकरण पुनः जागृत हो जाता है और प्रगति में बाधक अपनी आदतों को, विचार श्रृंखलाओं को सुव्यवस्थित बनाने में लगकर अपने आपका कायाकल्प ही कर लेता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-October
स्वाध्याय और मनन-चिंतन की साधना पाठकों ने आरंभ की थी और अखण्ड ज्योति के लेखों या किसी भी जीवन निर्माण करने वाली प्रेरणाप्रद पुस्तक को पढ़ने और उस पर मनन चिन्तन करते रहने का कार्य−क्रम अपनाया था। विचारों के परिमार्जन के लिए स्वाध्याय आवश्यक है। कुविचारों की काट सद्विचारों से ही होती है। गरम लोहे को ठंडा लोहा काटता है, काँटे-से-काँटा निकाला जाता है और विष-से-विष का शमन होता है। स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से जो सद्विचार ग्रहण किए जाते हैं, इन्हीं के द्वारा कुविचारों और कुसंस्कारों का प्रतिरोध किया जाता है।
स्वाध्याय और सत्संग को खाद-पानी कहना पड़ेगा। ‛श्रेय’ का पौधा इसी प्रकार फलता−फूलता है। साधनाओं में गायत्री उपासना ही सद्बुद्धि की स्थापना का उद्देश्य पूरा करती है। गायत्री को बुद्धि की, ज्ञान की, विवेक की देवी कहा गया है। इस महामंत्र में तेज और ज्ञान की शक्तियों का आह्वान किया गया है और सच्चे मन से की गई इस साधना से यह दोनों वस्तुएँ मिलती भी देखी जा सकती हैं।
स्वाध्याय को इसी दृष्टि से एक अनिवार्य साधना माना गया है और उसे भजन के समकक्ष ही पुण्य फलदायक माना गया है। पंचकोशी साधना में साधकों के लिए तो वह नितांत अनिवार्य ही है।
स्वाध्याय एवं सत्संग की बहुत महत्ता बताई है, पर उसके साथ−साथ साधना का समावेश होना भी आवश्यक है। साधना को बीज माना जाए तो स्वाध्याय और सत्संग को खाद-पानी कहना पड़ेगा। ‛श्रेय’ का पौधा इसी प्रकार फलता−फूलता है। साधनाओं में गायत्री उपासना ही सद्बुद्धि की स्थापना का उद्देश्य पूरा करती है। गायत्री को बुद्धि की, ज्ञान की, विवेक की देवी कहा गया है।
स्वाध्याय आवश्यक है। कुविचारों की काट सद्विचारों से ही होती है। गरम लोहे को ठंडा लोहा काटता है, काँटे-से-काँटा निकाला जाता है और विष-से-विष का शमन होता है। स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से जो सद्विचार ग्रहण किए जाते हैं, इन्हीं के द्वारा कुविचारों और कुसंस्कारों का प्रतिरोध किया जाता है। रोज ही घर में धूलि जमती है, उसे बुहारी से रोज ही झाड़ना पड़ता है।
स्वाध्याय और सत्संग की व्यवस्था करनी पड़ती है। चूँकि अब आज की परिस्थितियों में सुलझे हुए विचारों का ऐसा सत्संग जो जीवन को सर्वांगपूर्ण प्रगति के पथ पर अग्रसर कर सके, प्रायः दुर्लभ ही दीख पड़ता है। इसलिए इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ऐसे साहित्य के स्वाध्याय पर ही निर्भर रहना पड़ता है जो विज्ञानसम्मत ढंग से हमारी जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए जीवन जीने की कला ठीक प्रकार सिखा सके । स्वाध्याय को इसी दृष्टि से एक अनिवार्य साधना माना गया है और उसे भजन के समकक्ष ही पुण्य फलदायक माना गया है। पंचकोशी साधना में साधकों के लिए तो वह नितांत अनिवार्य ही है।
स्वाध्याय के मनन-चिंतन को गत वर्ष जितना विस्तृत एवं क्षेत्र में बिखरा हुआ न रखकर उसे सीमाबद्ध कर रहे हैं, ताकि थोड़े विचारों पर अधिक तत्परता और तन्मयता के साथ चित्त-वृत्तियों को एकाग्र करते हुए मनोभूमि का सुदृढ़ निर्माण किया जा सके । गत मास युगनिर्माण संकल्प आरंभिक पृष्ठ पर छपा है और उसकी विस्तार से व्याख्या भी की गई है। यह संकल्प अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को दैनिक-साधना एवं उपासना की तरह मनोयोगपूर्वक नित्य ही पढ़ना और उस पर मनन रखना चाहिए।
स्वाध्याय, मनन और चिंतन करते हुए विचार करना चाहिए कि, "ईश्वर ने इस संसार के विविध आनंदों का रसास्वादन करने के लिए यह कितना सुंदर, कितना महत्त्वपूर्ण शरीर दिया है। शरीर छिन जाने पर सूक्ष्मप्राण केवल चेतना रूप रह जाते हैं। फिर संसार की विभिन्न रंग−बिरंगी अनुभूतियों का अनुभव करने की क्षमता हमें कहाँ रह पाती है? देवलोक में कुछ आनंद है, उन्हें प्राप्त करने के लिए जीव स्वर्ग जाने की आकांक्षा करता है। पर कुछ आनंद ऐसे हैं, जो स्वर्गलोक में भी नहीं हैं और जिन्हें प्राप्त करने की इच्छा से देवता भी स्वर्ग छोड़कर नरदेह में जन्म लेते और इस 'स्वर्गादपि गरीयसी' धरती पर विचरण करने की आकांक्षा करते रहते हैं और जब भी उन्हें ऐसा अवसर मिलता है, तभी अपना सौभाग्य मानते हैं।
स्वाध्याय पर ही निर्भर रहना पड़ता है जो विज्ञानसम्मत ढंग से हमारी जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए जीवन जीने की कला ठीक प्रकार सिखा सके । स्वाध्याय को इसी दृष्टि से एक अनिवार्य साधना माना गया है और उसे भजन के समकक्ष ही पुण्य फलदायक माना गया है। पंचकोशी साधना में साधकों के लिए तो वह नितांत अनिवार्य ही है।
स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से जो सद्विचार ग्रहण किए जाते हैं, इन्हीं के द्वारा कुविचारों और कुसंस्कारों का प्रतिरोध किया जाता है। रोज ही घर में धूलि जमती है, उसे बुहारी से रोज ही झाड़ना पड़ता है। रोज ही दाँत मैले होते हैं। रोज ही मंजन करना पड़ता है। इसी प्रकार जनसंपर्क से रोज ही दूषित प्रवृत्तियाँ हमारे ऊपर आक्रमण करती हैं और उनका निवारण करने के लिए रोज ही स्वाध्याय और सत्संग की व्यवस्था करनी पड़ती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-December
स्वाध्याय, सत्संग, कला-कौशल, सामूहिक विकास, परमार्थ एवं सत्कर्मों के लिए हमारी शक्तियाँ लगें और हमारी कमाई का एक अंश इन कार्यों के लिए भी सुनिश्चित रहे। पर सामाजिक कुरीतियों का भार इतना अधिक हो जाता है कि उसे वहन करने में ही सारी शक्ति समाप्त हो जाती है । इस अपव्यय को रोकना होगा। हमारी अर्थ-व्यवस्था को नष्ट−भ्रष्ट करने का भारी उत्तरदायित्व इन खर्चीली कुरीतियों को है। अर्थ संतुलन जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-February
स्वाध्याय, सत्संग, मनन और चिंतन द्वारा आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास का आधार ग्रहण करना होगा। अंतःकरण की पवित्रता और पुष्टि के लिए इस अवलंबन को मजबूती से पकड़े रहना आवश्यक है। इसके बिना लौकिक-प्रगति भी संभव नहीं। धर्म और नीति का आधार अध्यात्म है, उसे छोड़ देने पर चतुरता और कूटनीति ही मनुष्य के पल्ले पड़ती है। उससे तात्कालिक लाभ तो हो जाता है, पर अंत बहुत ही दुःखद होता है।
स्वाध्याय और नैतिक शिक्षा के अभाव में पनपता है। नीचे कुछ ऐसे समाचार उपस्थित हैं जिन्हें पढ़कर यह अनुमान लगाया जा सकेगा कि गरीबी से पीड़ित नहीं, अनैतिक विचारधारा वाले व्यक्ति साधन सम्पन्न होते हुए भी अपराध करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-April
स्वाध्याय, सत्संग यह दो ज्ञानप्राप्ति के बाह्य उपाय हैं और चिंतन-मनन यह आंतरिक उपाय हैं। इन चारों चरणों से मिलकर सर्वांगपूर्ण ज्ञान साधना बनती है और उसी के आधार पर जीव अपने लक्ष्य-मार्ग की ओर गतिशील होता है।
स्वाध्याय की चिह्नपूजामात्र है। उनसे स्वाध्याय की आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो सकती।
स्वाध्याय भी एक विनोद व्यसन ही बना रहता है। जो कुछ थोड़ा−सा लाभ मिलता है, उसकी तुलना ताश खेलने के मनोविनोद से की जा सकती है।
स्वाध्याय और संयम के परिणामस्वरूप अंतःकरण का जिस प्रकार परिपाक होना है, उसमें ‘सेवा’ अनिवार्य है। हर सच्चा अध्यात्मवादी सेवाभावी अवश्य होगा। जिसे सेवा में रुचि नहीं, वह भजनानंदी हो सकता है, अध्यात्मवादी नहीं। आज एकांगी संकुचित दृष्टि वाले, भजनानंदी बहुत हैं, पर सर्वांगपूर्ण अध्यात्मवादी बनने का प्रयत्न कोई विरले ही करते हैं। यह मार्ग कष्टसाध्य है।
स्वाध्याय और सत्संग की भूख जिसे जगी नहीं तो समझना चाहिए कि इसे अभी सच्चा भजन करने का अवसर नहीं मिला। इसी प्रकार जो स्वाध्याय करने लगा हो ,उसे अपनी वासनाओं और तृष्णाओं पर संयम करने की लगन लगेगी ही। वह अपने जीवन को अस्त-व्यस्त, अव्यवस्थित, अनुपयुक्त रीति से व्यतीत नहीं कर सकता। शरीर की आवश्यकताएँ पूरी करने की तरह उसे आत्मा की आवश्यकताएँ पूर्ण करने का महत्त्व समझ पड़ेगा और वह अपना सर्वस्व लौकिक लाभों के लिए ही उत्सर्ग न कर सकेगा, वरन पारलौकिक हित-साधन के लिए अपनी शक्ति का एक अच्छा भाग लगाना आरंभ करेगा। जिसकी बुद्धि शरीर को ही सब कुछ नहीं मान बैठी है, जिसने आत्मा के अस्तित्व और उसके हित को भी समझना आरंभ कर दिया है, वह स्वार्थ-साधन में ही कैसे लगा रहेगा?
स्वाध्याय नहीं हो सकता। कठिन अभिव्यक्तियों को समझा नहीं जा सकता; इसलिए शिक्षा की भी आवश्यकता एवं उपयोगिता माननी ही पड़ेगी। ज्ञान का स्तर इससे ऊपर है। स्वाध्याय, सत्संग यह दो ज्ञानप्राप्ति के बाह्य उपाय हैं और चिंतन-मनन यह आंतरिक उपाय हैं। इन चारों चरणों से मिलकर सर्वांगपूर्ण ज्ञान साधना बनती है और उसी के आधार पर जीव अपने लक्ष्य-मार्ग की ओर गतिशील होता है।
स्वाध्याय आरंभ कर सकते हैं। अन्य धर्मग्रंथ पढ़ने हों तो उन्हें भी प्रसन्नतापूर्वक पढ़ा जाए। जिस प्रकार गायत्री उपासना के साथ−साथ अन्य मंत्र या देवता की उपासना करने की छूट है, उसी प्रकार जीवन में व्यावहारिक अध्यात्म की सामयिक प्रेरणा देने वाले अखण्ड ज्योति के पृष्ठ आधा घंटा तक पढ़ते रहने के अतिरिक्त अन्य ग्रंथ भी पढ़े जा सकते हैं, पर स्वाध्याय का जो एक व्यवस्थित कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा रहा है, वह अखण्ड ज्योति के पृष्ठों से प्राप्त करते रहना ही चाहिए।
स्वाध्याय का जो एक व्यवस्थित कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा रहा है, वह अखण्ड ज्योति के पृष्ठों से प्राप्त करते रहना ही चाहिए।
स्वाध्याय कैसे करें?
स्वाध्याय और सत्संग का उद्देश्य जीव को इस खतरे से सजग करना है। सत् शिक्षण का प्रयोजन यही है कि जीव अपने लक्ष्य को समझे, शरीर को ही सब कुछ न मान बैठे, उसी की चिंताओं में दिन-रात न डूबा रहे, कुछ उस लक्ष्य की ओर भी विचार करे, जिसके लिए कि यह बहुमूल्य मानव जीवन प्राप्त हुआ है।
स्वाध्याय, संयम और सेवा के चार भागों में अध्यात्म विभक्त है। चारों को मिलाकर ही आत्मकल्याण की कोई सर्वांगपूर्ण व्यवस्था बन सकती है। इसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि हम विश्वासपूर्वक इस आदर्श पर निष्ठा रखें कि अन्य आवश्यक कार्यों की तरह आत्मकल्याण का कार्यक्रम भी उपेक्षणीय नहीं, वरन अन्य साधारण कार्यों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है और महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए सोच-विचार करते रहना पड़ता है। यह तीनों ही साधन जब तक आत्मकल्याण योजना में न लगेंगे, तब तक उसकी पूर्ति किसी भी प्रकार संभव न होगी। हमें अपने मस्तिष्क में आत्मकल्याण की आवश्यकता और योजना को अधिकाधिक स्थान देते चलना होगा और उसके लिए समय मिलते ही गहराई से सोच-विचार करते रहना होगा।
स्वाध्याय, मन पर एक हलकी−सी सतोगुणी छाप तो छोड़ता है, पर जब तक क्रिया में वे विचार न उतरें, तब तक यह स्वाध्याय भी एक विनोद व्यसन ही बना रहता है। जो कुछ थोड़ा−सा लाभ मिलता है, उसकी तुलना ताश खेलने के मनोविनोद से की जा सकती है।
स्वाध्याय एवं सत्संग को अध्यात्म का प्रवेशद्वार माना गया है। आस्तिकता एवं उपासना में निष्ठा उत्पन्न करना स्वाध्याय एवं सत्संग का काम है। जीव की पतनोन्मुख पाशविक वृत्तियाँ उसे वासना और तृष्णा के प्रलोभनों की ओर आकर्षित करती रहती हैं। फलस्वरूप उसकी प्रवृत्तियाँ और गतिविधियाँ इंद्रियों की वासनाएँ पूरी करने में एवं मन की— संग्रह, प्रभुता, प्रशंसा, ममता आदि तृष्णाएँ पूरी करने में लगी रहती हैं। जीव की सारी शक्तियाँ, क्षमता, योग्यता, इसी दिशा में लगी रहती हैं और 84 लाख योनियों के बाद, करोड़ों वर्ष बाद प्राप्त हुआ यह सुरदुर्लभ मानव जीवन, केवल शरीर की क्षणिक प्रसन्नताएँ प्रस्तुत करते रहने में समाप्त हो जाता है।
स्वाध्याय की आवश्यकता को पूर्ण करते रहने के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ के पृष्ठों पर अत्यंत सारगर्भित पुण्य-सामग्री प्रस्तुत करते रहेंगे। अब सरसरी दृष्टि से अखण्ड ज्योति न पढ़ी जानी चाहिए, वरन प्रतिदिन आधा घंटा यह सोचकर उसे पढ़ना चाहिए कि इन पृष्ठों के लेखक को समीप बैठा मानकर उसके साथ सत्संग करते हुए अनेक धर्मग्रंथों का सार मधुर मधु के रूप में प्राप्त किया जा रहा है।
स्वाध्याय, संयम और सेवा के चारों कार्यक्रम हमारे जीवन में यदि स्थान प्राप्त करने लगें— यदि अखण्ड ज्योति परिवार के बीस हजार सदस्य अपने कार्यक्रम में इस प्रस्तुत योजना को स्थान देने लगें तो उसका परिणाम बहुत ही दूरगामी होगा और युग निर्माण का वह स्वप्न जो आज एक कल्पना जैसा दीखता है, निकट भविष्य में साकार होकर रहेगा। हम अपनी आँखों से सभ्य समाज का सुखद स्वर्गीय वातावरण देखकर शांति और संतोष प्राप्त कर सकेंगे।
स्वाध्याय के लिए कम-से-कम आधा घंटा समय निकाल लेना चाहिए। स्वाध्याय के लिए केवल वही साहित्य काम में लेना चाहिए जो जीवन की वास्तविक समस्याओं पर व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रस्तुत करता हो। हमें आज की अपेक्षा कल अधिक उत्कृष्ट कैसे बनना चाहिए, इस प्रश्न का उत्तर जिस भी पुस्तक में सरलतापूर्वक समझाया गया हो, वही स्वाध्याय में प्रयुक्त हो सकती है। प्राचीन ग्रंथों के मोह में किन्हीं कथा-पुराणों का एवं अत्यंत दुरुह आध्यात्मिक ग्रंथों पर पाठ करते रहना स्वाध्याय की चिह्नपूजामात्र है। उनसे स्वाध्याय की आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो सकती।
स्वाध्याय की आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो सकती।
स्वाध्याय और सत्संग का साधन जुटाते हैं, उसी प्रकार दूसरों के लिए यह उपकार करने की कुछ-न-कुछ योजना नित्य बनानी चाहिए। इससे बड़ा पुण्य-परमार्थ इस संसार में और कुछ नहीं हो सकता।
स्वाध्याय के लिए केवल वही साहित्य काम में लेना चाहिए जो जीवन की वास्तविक समस्याओं पर व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रस्तुत करता हो। हमें आज की अपेक्षा कल अधिक उत्कृष्ट कैसे बनना चाहिए, इस प्रश्न का उत्तर जिस भी पुस्तक में सरलतापूर्वक समझाया गया हो, वही स्वाध्याय में प्रयुक्त हो सकती है। प्राचीन ग्रंथों के मोह में किन्हीं कथा-पुराणों का एवं अत्यंत दुरुह आध्यात्मिक ग्रंथों पर पाठ करते रहना स्वाध्याय की चिह्नपूजामात्र है। उनसे स्वाध्याय की आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो सकती।
स्वाध्याय (3) संयम (4) सेवा, यह चार कार्य मिलने से एक सर्वतोमुखी सर्वांगपूर्ण अध्यात्मवाद बनता है। जिस प्रकार दोनों हाथ और दोनों पैर ठीक होने से हमारी शारीरिक क्षमता ठीक कार्य करती है, उसी प्रकार इन चारों साधनों की समस्वरता से ही कोई व्यक्ति स्वस्थ अध्यात्मवादी बन सकता है। जिस व्यक्ति के दो हाथ और दो पैर के चार अंगों में से यदि एक या दो ही अवयव काम करें, शेष अपंग या नष्ट हो जाएँ तो वह अपने जीवन को सक्षम कैसे बनाएँ रख सकेगा? जिनका अध्यात्मवाद केवल थोड़े से भजन तक सीमित रह गया है, स्वाध्याय, संयम और सेवा के लिए उनके जीवन में कोई स्थान नहीं, वे वैसे ही अपंग हैं जैसे केवल एक हाथ या केवल एक पैर वाला व्यक्ति होता है।
स्वाध्याय का उद्देश्य पूरा हो रहा है। यदि ऐसा न हो और कोई पुस्तक पढ़कर, कोई वचन सुनकर अपने कर्त्तव्य का अंत मान लिया जाए तो समझना चाहिए कि छोटे बच्चों की तरह गुड़ियों का खेल ही खेला जा रहा है। सत्यनारायण की कथा हम सुनें, उसे सुनकर सत्यरूप नारायण को अपने व्यवहार में सच्चाई से सम्मिलित करने का व्रत लें तो समझना चाहिए कि कथा सुनने का उद्देश्य पूरा हो गया; किंतु यदि लीलावती-कलावती की कथा सुनकर, पंडित जी को दक्षिणा देकर और प्रसाद ग्रहण करके कर्त्तव्य की समाप्ति मान ली गई और उतने से ही सत्यनारायण भगवान को प्रसन्न हुआ मान लिया गया तो यह एक भूल ही होगी। हम सत्यनारायण की कथा सुनने की अपनी अभिरुचि को बढ़ावें, जल्दी−जल्दी कथाएँ कहें और सुनें, पर यह भी ध्यान रखें कि कथा में प्रस्तुत सत्य की साधना को कहने−सुनने मात्र से काम चलने वाला नहीं है, उसे जीवन में उतारना ही पड़ेगा, तभी भगवान की प्रसन्नता का पुण्यफल प्राप्त हो सकना संभव होगा।
स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन के आधार पर जीवन की गुत्थियों को समझना और उन्हें सुलझाने का मार्ग खोजना संभव होता है; इसलिए मनीषियों ने इस बात पर बहुत जोर दिया है कि मनुष्य को ज्ञानवान बनना चाहिए। अत्यंत आवश्यक कार्यक्रमों में एक कार्यक्रम ज्ञान-संपादन का भी रहना चाहिए।
स्वाध्याय और सत्संग की व्यवस्था रहनी चाहिए, दूसरी ओर ऐसे अनुकरणीय आदर्श भी सामने रहने चाहिए, जिन्हें देखकर लोग प्रकाश ग्रहण करें और उनके पदचिह्नों पर चलते हुए अपना लक्ष्य एवं कार्यक्रम निर्धारित करें।
स्वाध्याय करने लगा हो ,उसे अपनी वासनाओं और तृष्णाओं पर संयम करने की लगन लगेगी ही। वह अपने जीवन को अस्त-व्यस्त, अव्यवस्थित, अनुपयुक्त रीति से व्यतीत नहीं कर सकता। शरीर की आवश्यकताएँ पूरी करने की तरह उसे आत्मा की आवश्यकताएँ पूर्ण करने का महत्त्व समझ पड़ेगा और वह अपना सर्वस्व लौकिक लाभों के लिए ही उत्सर्ग न कर सकेगा, वरन पारलौकिक हित-साधन के लिए अपनी शक्ति का एक अच्छा भाग लगाना आरंभ करेगा। जिसकी बुद्धि शरीर को ही सब कुछ नहीं मान बैठी है, जिसने आत्मा के अस्तित्व और उसके हित को भी समझना आरंभ कर दिया है, वह स्वार्थ-साधन में ही कैसे लगा रहेगा? सेवा के लिए उसके जीवन में कुछ भी स्थान न हो, ऐसा कैसे बन पड़ेगा?
स्वाध्याय में प्रयुक्त हो सकती है। प्राचीन ग्रंथों के मोह में किन्हीं कथा-पुराणों का एवं अत्यंत दुरुह आध्यात्मिक ग्रंथों पर पाठ करते रहना स्वाध्याय की चिह्नपूजामात्र है। उनसे स्वाध्याय की आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो सकती।
स्वाध्याय एवं सत्संग का काम है। जीव की पतनोन्मुख पाशविक वृत्तियाँ उसे वासना और तृष्णा के प्रलोभनों की ओर आकर्षित करती रहती हैं। फलस्वरूप उसकी प्रवृत्तियाँ और गतिविधियाँ इंद्रियों की वासनाएँ पूरी करने में एवं मन की— संग्रह, प्रभुता, प्रशंसा, ममता आदि तृष्णाएँ पूरी करने में लगी रहती हैं। जीव की सारी शक्तियाँ, क्षमता, योग्यता, इसी दिशा में लगी रहती हैं और 84 लाख योनियों के बाद, करोड़ों वर्ष बाद प्राप्त हुआ यह सुरदुर्लभ मानव जीवन, केवल शरीर की क्षणिक प्रसन्नताएँ प्रस्तुत करते रहने में समाप्त हो जाता है। इस घातक भूल के लिए जीव को फिर 84 लाख योनियों में भ्रमण करने का भारी पश्चात्ताप भरा संकट उठाना पड़ता है।
स्वाध्याय और आपका सत्संग करने का अवसर हर महीने मिलता रहेगा, वे अवश्य ही कुछ-न-कुछ प्रभाव ग्रहण करते चलेंगे और उनके जीवन में निश्चित रूप से कुछ-न-कुछ परिवर्तन होता चलेगा। आगे चलकर जब छोटे−छोटे ट्रैक्ट प्रकाशित होंगे, तब उनके माध्यम से एक विचार विद्यालय भी बन सकेगा, जिसकी चर्चा जनवरी अंक के अंतिम लेख में की गई है। यह धर्ममैत्री विकसित होते-होते एक विशाल धर्मसंगठन के रूप में भी परिणत हो सकेगी। अखण्ड ज्योति परिवार के हजारों सदस्य अपने धर्म परिवार के साथ लाखों की संख्या में होंगे और फिर उनका विस्तार चक्रवृद्धि क्रम से होने लगा, तो देश के कोने−कोने में प्रत्येक भारतीय तक यह युग निर्माण विचारधारा पहुँचेगी और लाखों-करोड़ों व्यक्ति उस ढाँचे में ढलेंगे, जिसे लक्ष्य बनाकर हम लोग सांस्कृतिक एवं नैतिक पुनरुत्थान के महान अभियान में संलग्न हो रहे हैं।
स्वाध्याय आवश्यकता की पूर्ति की पूरी जिम्मेदारी ‘अखण्ड ज्योति’ ने अपने कंधों पर ली है। जैसे मधुमक्खी दूर−दूर से पुष्पों का पराग एकत्रित करती है और उसे मधुर रस देकर गुणवान शहद के रूप में प्रस्तुत करती है, उसी प्रकार हम अपने पाठकों की दैनिक स्वाध्याय की आवश्यकता को पूर्ण करते रहने के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ के पृष्ठों पर अत्यंत सारगर्भित पुण्य-सामग्री प्रस्तुत करते रहेंगे। अब सरसरी दृष्टि से अखण्ड ज्योति न पढ़ी जानी चाहिए, वरन प्रतिदिन आधा घंटा यह सोचकर उसे पढ़ना चाहिए कि इन पृष्ठों के लेखक को समीप बैठा मानकर उसके साथ सत्संग करते हुए अनेक धर्मग्रंथों का सार मधुर मधु के रूप में प्राप्त किया जा रहा है।
स्वाध्याय, संयम और सेवा के लिए उनके जीवन में कोई स्थान नहीं, वे वैसे ही अपंग हैं जैसे केवल एक हाथ या केवल एक पैर वाला व्यक्ति होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-March
स्वाध्याय चिन्तन आदि उसके उपाय हैं। पर इतने मात्र को ही अध्यात्म का पूर्ण स्वरूप नहीं माना जा सकता यह तो उसका एक अंश मात्र है। पूर्णता तब आती है जब बाह्य वातावरण में भी वह अध्यात्म भावनाऐं साकार रूप से दिखाई देती हैं। जैसे हमारा मन अध्यात्म तत्व में डूबा रहने पर सुख प्राप्त करता है वैसे ही हमारा समाज यदि आध्यात्मिक आदर्शों को अपना कर धर्म नीति पर चले तो शान्ति की स्थापना हो सकती है। भीतर उत्पन्न होने वाली दुर्भावनाओं की बाहर फैलने वाली सडांद ही अशान्ति के रूप में प्रकट होती है।
स्वाध्याय नहीं करता उस दिन वह अपने कर्तव्य और वर्ण धर्म से पतित हो जाता है।” यही बात सत्संग के बारे में भी है। अच्छे व्यक्ति और अच्छे विचारों की तुलना पारस पत्थर से की गई है जिसे छूकर लौह सरीखे कलुषित अन्तःकरण भी स्वर्ण जैसे बहुमूल्य बन जाते हैं।
स्वाध्याय और सत्संग की आज कोई व्यवस्था नहीं दीखती। पुराणों की दन्त कथाओं को रटते रहने का नाम स्वाध्याय और परलोक की, देवताओं की या दार्शनिक बातों की कल्पना में उड़ते रहने वाले विचारों को सत्संग कहा जाता है। ऐसी परम्पराऐं जहाँ−तहाँ दीख तो पड़ती हैं पर उनमें कोई तथ्य न होने से उसका प्रभाव कुछ नहीं पड़ता। सजीव स्वाध्याय और सत्संग का यदि आयोजन बन पड़े तो उसमें मनुष्य की अन्तरात्मा को हिला डालने की शक्ति प्रत्यक्ष दिखाई देगी। यदि वेश्या का नृत्य देखकर, गन्दे गीत सुनकर, अश्लील साहित्य पढ़कर, वासनापूर्ण चित्र देखकर, कामुकता की चर्चा में सम्मिलित होकर हमारा मन तुरन्त कलुषित एवं विचलित हो उठता हो तो श्रेष्ठता के विचार एवं कार्य हमें अच्छाई की ओर मुड़ने के लिए क्यों प्रेरणा न देंगे?
स्वाध्याय की उपेक्षा करने वाले की भर्त्सना करते हुए शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है ‟जो व्यक्ति जिस दिन स्वाध्याय नहीं करता उस दिन वह अपने कर्तव्य और वर्ण धर्म से पतित हो जाता है।” यही बात सत्संग के बारे में भी है। अच्छे व्यक्ति और अच्छे विचारों की तुलना पारस पत्थर से की गई है जिसे छूकर लौह सरीखे कलुषित अन्तःकरण भी स्वर्ण जैसे बहुमूल्य बन जाते हैं।
स्वाध्याय और सत्संग की धर्म-ग्रन्थों में भूरि−भूरि प्रशंसा की गई है। उन्हें जीवन का नितान्त आवश्यक एवं अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है। स्वाध्याय की उपेक्षा करने वाले की भर्त्सना करते हुए शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है ‟जो व्यक्ति जिस दिन स्वाध्याय नहीं करता उस दिन वह अपने कर्तव्य और वर्ण धर्म से पतित हो जाता है।” यही बात सत्संग के बारे में भी है। अच्छे व्यक्ति और अच्छे विचारों की तुलना पारस पत्थर से की गई है जिसे छूकर लौह सरीखे कलुषित अन्तःकरण भी स्वर्ण जैसे बहुमूल्य बन जाते हैं।
स्वाध्याय और सत्संग भी होना चाहिए। सात्विकता में यदि कोई शक्ति न होती तो संसार में अगणित महापुरुष अपने जीवन को इतना आदर्श एवं महान बना सके और संसार की इतनी बड़ी सेवा कर सके वह कैसे संभव होता?
स्वाध्याय और परलोक की, देवताओं की या दार्शनिक बातों की कल्पना में उड़ते रहने वाले विचारों को सत्संग कहा जाता है। ऐसी परम्पराऐं जहाँ−तहाँ दीख तो पड़ती हैं पर उनमें कोई तथ्य न होने से उसका प्रभाव कुछ नहीं पड़ता। सजीव स्वाध्याय और सत्संग का यदि आयोजन बन पड़े तो उसमें मनुष्य की अन्तरात्मा को हिला डालने की शक्ति प्रत्यक्ष दिखाई देगी। यदि वेश्या का नृत्य देखकर, गन्दे गीत सुनकर, अश्लील साहित्य पढ़कर, वासनापूर्ण चित्र देखकर, कामुकता की चर्चा में सम्मिलित होकर हमारा मन तुरन्त कलुषित एवं विचलित हो उठता हो तो श्रेष्ठता के विचार एवं कार्य हमें अच्छाई की ओर मुड़ने के लिए क्यों प्रेरणा न देंगे? शर्त केवल इतनी ही है कि जिस प्रकार कामुकता की विचारधारा सजीव होती है वैसा ही सजीव हमारा स्वाध्याय और सत्संग भी होना चाहिए।
स्वाध्याय और सत्संग
स्वाध्याय और सत्संग ज्ञान यज्ञ के दो पहलू हैं, इनका आरम्भ सबसे पहले ऊपर बताई हुई पंक्तियों के अनुसार ही हमें आरम्भ कर देना चाहिए ताकि लोगों की सोई हुई जिज्ञासा एवं अभिरुचि का जागरण हो सके। यदि उस कुँभकरणी निद्रा से मानवी चेतना को जगाया जा सका तो वह जागरण अभूतपूर्व हलचल उत्पन्न करने वाला होगा यह निश्चित है।
स्वाध्याय और सत्संग का यदि आयोजन बन पड़े तो उसमें मनुष्य की अन्तरात्मा को हिला डालने की शक्ति प्रत्यक्ष दिखाई देगी। यदि वेश्या का नृत्य देखकर, गन्दे गीत सुनकर, अश्लील साहित्य पढ़कर, वासनापूर्ण चित्र देखकर, कामुकता की चर्चा में सम्मिलित होकर हमारा मन तुरन्त कलुषित एवं विचलित हो उठता हो तो श्रेष्ठता के विचार एवं कार्य हमें अच्छाई की ओर मुड़ने के लिए क्यों प्रेरणा न देंगे? शर्त केवल इतनी ही है कि जिस प्रकार कामुकता की विचारधारा सजीव होती है वैसा ही सजीव हमारा स्वाध्याय और सत्संग भी होना चाहिए। सात्विकता में यदि कोई शक्ति न होती तो संसार में अगणित महापुरुष अपने जीवन को इतना आदर्श एवं महान बना सके और संसार की इतनी बड़ी सेवा कर सके वह कैसे संभव होता?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-September
स्वाध्याय,सत्संग,मनन और चिन्तन यह चार ही उपाय हैं। मानव जीवन की महत्ता को हम समझें, इस स्वर्ण अवसर के सदुपयोग की बात सोचें, अपनी गुत्थियों में से अधिकाँश की जिम्मेदारी अपनी समझें और उन्हें सुलझाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव में आवश्यक हेर−फेर के लिए सदा कटिबद्ध रहें । इस प्रकार की विचार शैली आत्म−निर्माण की प्रेरणा देने वाले सत्साहित्य से, प्रबुद्ध मस्तिष्क के सत्पुरुषों से एवं आत्म−निरीक्षण तथा आत्म−चिन्तन करने से किसी भी व्यक्ति को सहज ही उपलब्ध हो सकती है। दृष्टिकोण बदलते ही परिस्थितियाँ भी निश्चित रूप से बदल सकती हैं।
स्वाध्याय का स्थान भजन के समान ही है। उसे साधना का एक सुनिश्चित अंग मानना चाहिये। भजन−पूजन की उपासना सरल है। घण्टा, आधा घण्टा पूजा−पाठ की विधि पूरी कर लेना कुछ कठिन नहीं है। ढर्रे पर पड़ जाने पर वह भी दैनिक जीवन का एक अंग बन जाता है और उसकी पूर्ति में कुछ कठिनाई नहीं दीखती।
स्वाध्याय के नाम पर जीवन निर्माण की ज्वलन्त समस्याओं को सुलझाने में कोई सहायता न देने वाली, किन्हीं देवी देवताओं के गुणानुवाद गाने वाली पुस्तकों का पाठ करते रहने से कोई वास्तविक प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
स्वाध्याय, संयम एवं सेवाकार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने दूँगा। चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करूँगा। परंपराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व दूँगा। अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करूँगा। मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को रखूँगा।
स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहूँगा। अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानूँगा और सबके हित में अपना हित समझूँगा। व्यक्तिगत स्वार्थ एवं सुख को सामूहिक स्वार्थ एवं सामूहिक हित से अधिक महत्त्व न दूँगा।
स्वाध्याय (3) संयम (4)सेवा, इन चारों की वही उपयोगिता है जो शरीर में हाथ पैरों की है। इनके बिना आत्म−कल्याण की दिशा में एक कदम भी आगे बढ़ सकना संभव नहीं हो सकता। ईश्वर उपासना को दैनिक जीवन में से बिलकुल हटा देना किसी भी प्रकार उपयुक्त नहीं। मन न लगने पर भी किसी न किसी प्रकार आदत में इसे सम्मिलित करने के लिए साधना का कुछ न कुछ अभ्यास नित्य ही करते रहना चाहिए। आत्म शक्ति जब कभी जिस किसी को भी प्राप्त हुई है तब उसमें आस्तिकता और उपासना का कोई न कोई अंश जरूर रहा है।
स्वाध्याय की उपयोगिता आहार से भी बढ़कर हो जाती है। जिस प्रकार भोजन त्याग कर शरीर को जीवित रख सकना कठिन है, इसी प्रकार स्वाध्याय की उपेक्षा करके, उसका परित्याग करके कोई व्यक्ति न तो अपने आत्मिक स्तर को ऊँचा उठा सकता है और न स्थिर रख सकता है । बिना पढ़े लोगों के लिए भी उचित है कि वे श्रेष्ठ साहित्य का स्वाद किया करें। दुर्भिक्ष काल में जिस प्रकार साधन सम्पन्न लोग भूखों मरते हुओं को अन्न की व्यवस्था जुटाते हुए पुण्य लाभ करते हैं उसी प्रकार स्वाध्यायशील अपने घर के तथा बाहर के अशिक्षितों को पढ़ाकर सयाना करें और उनके आत्मिक जीवन को हरा−भरा रखने में अपने पसीने से सिंचन करने के महान पुण्य प्राप्त किया करें। ज्ञान दान इस संसार का सर्वश्रेष्ठ दान है।
स्वाध्याय आदि का पुरुषार्थ करना पड़ता है उसी प्रकार अपने गुण कर्म और स्वभाव को सुव्यवस्थित बनाकर मनोभूमि को संतुलित करने में भारी प्रयत्न करना होता है। आध्यात्मिक पुरुषार्थ के रूप में उपासना और मानसिक पुरुषार्थ के रूप में भावना की गणना होती है। कुविचारों से सद्विचारों की काट होती है। घड़ी−घड़ी पर निराशा के, उत्तेजना के, आवेश के, वासना के, ईर्ष्या द्वेष के, लोभ−मोह के, आलस्य और प्रमाद के विचार मन में उठते रहते हैं। इनसे लड़ने के लिए इनके प्रतिपक्षी विचारों की एक सुव्यवस्थित शृंखला पहले से ही बना रखनी चाहिए।
स्वाध्याय की है। मनुष्य के पास सर्वोत्तम विशेषता उसकी विचार बुद्धि की ही है और इन विचारों का सही एवं सुसंस्कृत बनना स्वाध्याय पर निर्भर है। श्रेष्ठ पुरुषों की कमी, उनके पास समय का अभाव और अपने लिए भी समुचित फुरसत की कमी रहने के कारण अब उपयुक्त सत्संग की व्यवस्था बन सकना कठिन है, ऐसी दशा में जीवन निर्माण के श्रेष्ठ साहित्य का स्वाध्याय ही सत्संग की आवश्यकता को भी पूरी करता है। विचारों का निर्माण ही जीवन निर्माण है, इसलिए स्वाध्याय की उपयोगिता आहार से भी बढ़कर हो जाती है। जिस प्रकार भोजन त्याग कर शरीर को जीवित रख सकना कठिन है, इसी प्रकार स्वाध्याय की उपेक्षा करके, उसका परित्याग करके कोई व्यक्ति न तो अपने आत्मिक स्तर को ऊँचा उठा सकता है और न स्थिर रख सकता है ।
स्वाध्याय और आत्मोन्नति के लिए परमार्थ के लिए छोड़े गये छह घंटों में से आधा समय अर्थात् तीन घंटे खर्च किये जा सकते हैं। शेष तीन घंटे परिवार और समाज की सेवा में लगाने चाहिएं। जिन्हें अपना परिवार सभ्य और सुविकसित देखना हो तो उन्हें कम से कम एक घंटा अपनी परिवार गोष्ठी के लिए बिलकुल निश्चित रूप से नियत रखना चाहिए। जब सब लोग फुरसत में होते हैं तब परिवार की दैनिक समस्याओं पर विचार विनिमय करने के लिए एक नियत समय पर ज्ञान गोष्ठी का कार्यक्रम रखा जाया करे। आज के दिन किसके मन में क्या भले−बुरे भाव उठे और क्या प्रिय−अप्रिय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा इसकी चर्चा इस गोष्ठी में की जाती रहनी चाहिए और उलझनों को सुलझाने वाले सुझाव भी साथ−साथ ही प्रस्तुत किये जाते रहने चाहिए।
स्वाध्याय पर निर्भर है। श्रेष्ठ पुरुषों की कमी, उनके पास समय का अभाव और अपने लिए भी समुचित फुरसत की कमी रहने के कारण अब उपयुक्त सत्संग की व्यवस्था बन सकना कठिन है, ऐसी दशा में जीवन निर्माण के श्रेष्ठ साहित्य का स्वाध्याय ही सत्संग की आवश्यकता को भी पूरी करता है। विचारों का निर्माण ही जीवन निर्माण है, इसलिए स्वाध्याय की उपयोगिता आहार से भी बढ़कर हो जाती है। जिस प्रकार भोजन त्याग कर शरीर को जीवित रख सकना कठिन है, इसी प्रकार स्वाध्याय की उपेक्षा करके, उसका परित्याग करके कोई व्यक्ति न तो अपने आत्मिक स्तर को ऊँचा उठा सकता है और न स्थिर रख सकता है । बिना पढ़े लोगों के लिए भी उचित है कि वे श्रेष्ठ साहित्य का स्वाद किया करें।
स्वाध्याय और सत्संग है। रोटी और पानी जिस प्रकार शरीर की सुरक्षा और परिपुष्टि के लिए आवश्यक हैं उसी प्रकार आत्मिक स्थिरता और प्रगति के लिए सद्विचारों की प्रचुर मात्रा हमें उपलब्ध होनी ही चाहिए। इस आवश्यकता की पूर्ति स्वाध्याय और सत्संग से, मनन और चिन्तन से पूरी होती है। युगनिर्माण के लिए, आत्म−निर्माण के लिए यह प्रधान साधन है। संकल्प की, मन की शुद्धि के लिए इसे ही रामबाण दवा माना गया है।
स्वाध्याय की वैसी ही आवश्यकता है जैसे शरीर को भोजन देने की। आत्म−निर्माण करने वाली जीवन की समस्याओं को सही ढंग से सुलझाने वाली उत्कृष्ट विचारधारा की पुस्तकें पूरे ध्यान, मनन और चिन्तन के साथ पढ़ते रहना ही स्वाध्याय है। यदि सुलझे हुए विचारों के जीवन विद्या के ज्ञाता कोई सम्भ्रान्त सज्जन उपलब्ध हो सकते हों तो उनका सत्संग भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है। यों धर्म और अध्यात्म के नाम पर आलस, कर्तव्य त्याग, निराशा, भाग्यवाद परावलम्बन आदि भ्रान्तियों को बढ़ाने वाले प्रवचनकर्ता गली कूँचों में मक्खी, मच्छरों की तरह सत्संग की दुकानें लगाये बैठे हैं, उनमें जाने की अपेक्षा न जाना अधिक उत्तम है। इसी प्रकार स्वाध्याय के नाम पर जीवन निर्माण की ज्वलन्त समस्याओं को सुलझाने में कोई सहायता न देने वाली, किन्हीं देवी देवताओं के गुणानुवाद गाने वाली पुस्तकों का पाठ करते रहने से कोई वास्तविक प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
स्वाध्याय और सत्संग से, मनन और चिन्तन से पूरी होती है। युगनिर्माण के लिए, आत्म−निर्माण के लिए यह प्रधान साधन है। संकल्प की, मन की शुद्धि के लिए इसे ही रामबाण दवा माना गया है।
स्वाध्याय है। यदि सुलझे हुए विचारों के जीवन विद्या के ज्ञाता कोई सम्भ्रान्त सज्जन उपलब्ध हो सकते हों तो उनका सत्संग भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है। यों धर्म और अध्यात्म के नाम पर आलस, कर्तव्य त्याग, निराशा, भाग्यवाद परावलम्बन आदि भ्रान्तियों को बढ़ाने वाले प्रवचनकर्ता गली कूँचों में मक्खी, मच्छरों की तरह सत्संग की दुकानें लगाये बैठे हैं, उनमें जाने की अपेक्षा न जाना अधिक उत्तम है। इसी प्रकार स्वाध्याय के नाम पर जीवन निर्माण की ज्वलन्त समस्याओं को सुलझाने में कोई सहायता न देने वाली, किन्हीं देवी देवताओं के गुणानुवाद गाने वाली पुस्तकों का पाठ करते रहने से कोई वास्तविक प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
स्वाध्यायशील अपने घर के तथा बाहर के अशिक्षितों को पढ़ाकर सयाना करें और उनके आत्मिक जीवन को हरा−भरा रखने में अपने पसीने से सिंचन करने के महान पुण्य प्राप्त किया करें। ज्ञान दान इस संसार का सर्वश्रेष्ठ दान है। इसकी तुलना और किसी बड़े से बड़े पुण्य के साथ भी नहीं हो सकती ।
स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहूँगा।
स्वाध्याय एक आवश्यक नित्यकर्म
स्वाध्याय के भण्डार से ही उपलब्ध हो सकते हैं। जीवन निर्माण के लिए प्रेरणाप्रद विचारों को अपनाते रहने से जिसे ज्ञान उत्पन्न न हो सका, उसका साधना पथ पर चल सकना असंभव जैसा ही है। इसलिए हम में से प्रत्येक को साधना का एक नियत क्रम स्थिर कर ही लेना चाहिए।
स्वाध्याय नहीं मानना चाहिए क्योंकि उसके द्वारा वर्तमान काल की परिस्थितियों और समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कोई क्रमबद्ध सुझाव प्रस्तुत नहीं किये जाते हैं।
स्वाध्याय संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने दूँगा। चारों और मधुरता, स्वच्छता एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करूँगा।”
स्वाध्याय की उपेक्षा करके, उसका परित्याग करके कोई व्यक्ति न तो अपने आत्मिक स्तर को ऊँचा उठा सकता है और न स्थिर रख सकता है । बिना पढ़े लोगों के लिए भी उचित है कि वे श्रेष्ठ साहित्य का स्वाद किया करें। दुर्भिक्ष काल में जिस प्रकार साधन सम्पन्न लोग भूखों मरते हुओं को अन्न की व्यवस्था जुटाते हुए पुण्य लाभ करते हैं उसी प्रकार स्वाध्यायशील अपने घर के तथा बाहर के अशिक्षितों को पढ़ाकर सयाना करें और उनके आत्मिक जीवन को हरा−भरा रखने में अपने पसीने से सिंचन करने के महान पुण्य प्राप्त किया करें। ज्ञान दान इस संसार का सर्वश्रेष्ठ दान है। इसकी तुलना और किसी बड़े से बड़े पुण्य के साथ भी नहीं हो सकती ।
स्वाध्याय ही सत्संग की आवश्यकता को भी पूरी करता है। विचारों का निर्माण ही जीवन निर्माण है, इसलिए स्वाध्याय की उपयोगिता आहार से भी बढ़कर हो जाती है। जिस प्रकार भोजन त्याग कर शरीर को जीवित रख सकना कठिन है, इसी प्रकार स्वाध्याय की उपेक्षा करके, उसका परित्याग करके कोई व्यक्ति न तो अपने आत्मिक स्तर को ऊँचा उठा सकता है और न स्थिर रख सकता है । बिना पढ़े लोगों के लिए भी उचित है कि वे श्रेष्ठ साहित्य का स्वाद किया करें। दुर्भिक्ष काल में जिस प्रकार साधन सम्पन्न लोग भूखों मरते हुओं को अन्न की व्यवस्था जुटाते हुए पुण्य लाभ करते हैं उसी प्रकार स्वाध्यायशील अपने घर के तथा बाहर के अशिक्षितों को पढ़ाकर सयाना करें और उनके आत्मिक जीवन को हरा−भरा रखने में अपने पसीने से सिंचन करने के महान पुण्य प्राप्त किया करें।
स्वाध्याय के लिए निश्चित रूप से रखा जाना चाहिए। यह कार्य भजन से किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं है। आत्म−निर्माण की समस्याओं को, जीवन की विभिन्न गुत्थियों को सुलझाने में सहायता करने वाला साहित्य ही स्वास्थ्य की आवश्यकता पूरी करता है। कथा पुराणों की धर्म गाथाऐं सुनना पढ़ना उचित है पर उसे स्वाध्याय नहीं मानना चाहिए क्योंकि उसके द्वारा वर्तमान काल की परिस्थितियों और समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कोई क्रमबद्ध सुझाव प्रस्तुत नहीं किये जाते हैं।
स्वाध्याय की उपयोगिता पिछले लेख में बताई जा चुकी है। मैले कपड़े को साफ करने के लिए जो उपयोगिता साबुन की है वही मन पर चढ़े हुए मैल को शुद्ध करने के लिए स्वाध्याय की है। मनुष्य के पास सर्वोत्तम विशेषता उसकी विचार बुद्धि की ही है और इन विचारों का सही एवं सुसंस्कृत बनना स्वाध्याय पर निर्भर है। श्रेष्ठ पुरुषों की कमी, उनके पास समय का अभाव और अपने लिए भी समुचित फुरसत की कमी रहने के कारण अब उपयुक्त सत्संग की व्यवस्था बन सकना कठिन है, ऐसी दशा में जीवन निर्माण के श्रेष्ठ साहित्य का स्वाध्याय ही सत्संग की आवश्यकता को भी पूरी करता है। विचारों का निर्माण ही जीवन निर्माण है, इसलिए स्वाध्याय की उपयोगिता आहार से भी बढ़कर हो जाती है।
स्वाध्याय की महत्ता
स्वाध्याय और सत्संग में जितना अधिक समय लगाया जाता है उतनी ही कुविचारों से सुरक्षा बन पड़ती है। जीवन को सब प्रकार दुख दारिद्र से भर देने वाले कुकर्मों को अपनाने से ही मनुष्य का पतन होता है और यह कुकर्म, कुविचारों के प्रतिफल मात्र ही हैं। शान्ति और प्रगति के लिए हमें सद्विचारों की ही शरण में जाना पड़ता है, इसी प्रक्रिया का नाम स्वाध्याय और सत्संग है। रोटी और पानी जिस प्रकार शरीर की सुरक्षा और परिपुष्टि के लिए आवश्यक हैं उसी प्रकार आत्मिक स्थिरता और प्रगति के लिए सद्विचारों की प्रचुर मात्रा हमें उपलब्ध होनी ही चाहिए। इस आवश्यकता की पूर्ति स्वाध्याय और सत्संग से, मनन और चिन्तन से पूरी होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-May
स्वाध्याय-सत्संग न त्यागूँ, कभी नहीं कुविचार करुँगा॥2॥
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-September
स्वाध्याय ज्ञान यज्ञाश्चयतयः संशित ब्रताः॥
स्वाध्याय एवं ज्ञान यज्ञ भी समर्पण के द्वारा यज्ञ के महत्व को सूचित करता है। किसी भी कार्य की सफलता बिना तप के नहीं होती। कार्य सिद्धि के लिए अपने आपको समर्पित करना यह तपो यज्ञ है। आत्मा और परमात्मा के साथ मेल करने के लिये अनात्म भाव का निराकरण योग−यज्ञ है। इसमें भी आत्मा अपने आपको परमात्मा के लिये समर्पण करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-May
स्वाध्याय कितना होता है? निष्काम सेवा में कितना समय देते हैं? गीता के कितने श्लोक पढ़ते तथा उन पर कैसा आचरण करते है? जब ध्यान हवन इत्यादि की ओर कैसी प्रगति है? भोग विलास में कितना संयम हो चुका है?
स्वाध्याय में ही अपना जीवन लगाते रहे हैं। उन्होंने घोषणा की कि गायत्री ज्ञान प्रसार में अपना जीवन लगाने को संकल्प करते हैं और अगले वर्ष इसी चैत्र में होने वाले नरमेध यज्ञ में अपना जीवन विधिवत् होने देंगे। सिद्ध श्री स्वामी सन्तोषानन्द जी महाराज यहाँ की वस्तुस्थिति को देखकर इतने प्रभावित हुए हैं कि उन्होंने अपने अन्यत्र के कार्यक्रमों को स्थगित करके यहीं निवास करने का निश्चय किया है। पं. भरतराम अवस्थी भी ऐसा ही निर्णय करने की बात सोच रहे हैं। पं. तारकेश्वर जी का झा तो गतवर्ष से ही अपना सब कुछ होम कर तपोभूमि में अनन्य सेवा कर रहे हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-February
स्वाध्याय रस पान पुनि, सत संगति ही सार ॥1॥
ब्रह्मचर्य आश्रम सुखद, श्रम सहि करो सप्रीति।
बढ़े बाल और बालिका, यही सनातन रीति ॥2॥
विद्या धन आधार है, विद्या बल आधार।
यह मत जो धारण करे, वह सब गुण आधार ॥3॥
कर्त्तव्याकर्त्तव्य गुनि, गहै प्रशस्त विचार।
रहें सदा सुविवेक रत, साँचो शिक्षा सार ॥4॥
पड़ी न आई काम पै, चित्रग्रीव की उक्ति।
अपनी अपनी क्यों करौ, सबतें सबकी युक्ति ॥5॥
निर्बल, निरुघर, निर्घनी, नास्तिक, निपट, निरास।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-April
स्वाध्याय अतीव आवश्यक है। घर में उत्तम ग्रंथों का संकलन रखने से घर का वातावरण शुद्ध होता है। शुभ विचार की लहरें सर्वत्र व्याप्त हो जाती हैं। सद्विचार से रमण करने में बुद्धि विकास का क्रम उचित दिशा में होता है। सद्विचार मन में शिव भावना, सत्य भावना, और दिव्य भावना जाग्रत रखता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-December
स्वाध्याय’ नित्ययुक्तः स्याद् दैवेचैवेच कर्मणि युक्तो हि विभर्तीद चराचरम् (3।75) मनु जी के इन शब्दों से सारे संसार का पालन कर रहा होता है-यह कथन केवल अर्थवाद नहीं, किन्तु युक्तियुक्त भी सिद्ध है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-March
स्वाध्याय और दूसरों के पढ़े हुए विचारों पर स्वयं स्वतन्त्र चिन्तन से मस्तिष्क की शक्तियाँ बढ़ती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-October
स्वाध्याय की वस्तु सिर पर रखीं और नदी में उतर पड़े। नदी का लगभग अधिकाँश भाग पार कर चुके कि सहसा ही भयंकर वेग से नदी में बाढ़ आयी। हम दोनों माता का स्मरण करते हुए किसी भाँति किनारे पर आ गये। उलट कर देखा तो चार पुरुष उस भयंकर प्रवाह में बहते हुए जा रहे थे, जिसे अपना प्राण देकर भी बचाने का उपाय नहीं था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-January
स्वाध्याय’ से सन्मार्ग की जानकारी होती है। सत्संग से स्वभाव और संस्कार बनते हैं। कथा सुनने से सद्भावनाएं जागृत होती हैं। ‘तीर्थ यात्रा’ से भावाँकुर पुष्ट होते हैं। ‘कीर्तन’ से तन्मयता का अभ्यास होता है।
स्वाध्याय नित्य करके अपने गायत्री सम्बन्धी ज्ञान को बढ़ाना, (6) ब्रह्म संदीप− दूसरों को गायत्री साहित्य पढ़ने की तथा उपासना करने की प्रेरणा एवं शिक्षा देना। अपनी पुस्तकें दूसरों को पढ़ने को देकर उनका ज्ञान बढ़ाना एवं नये गायत्री उपासक उत्पन्न करना। इन छः नियमों को एक वर्ष नियम पूर्वक पालन किया जाय तो उसका परिणाम बहुत ही कल्याणकारक होता है। वर्ष के अन्त में यथा− शक्ति हवन एवं दान पुण्य करना चाहिये।
स्वाध्याय−गायत्री साहित्य का थोड़ा बहुत स्वाध्याय नित्य करके अपने गायत्री सम्बन्धी ज्ञान को बढ़ाना, (6) ब्रह्म संदीप− दूसरों को गायत्री साहित्य पढ़ने की तथा उपासना करने की प्रेरणा एवं शिक्षा देना। अपनी पुस्तकें दूसरों को पढ़ने को देकर उनका ज्ञान बढ़ाना एवं नये गायत्री उपासक उत्पन्न करना। इन छः नियमों को एक वर्ष नियम पूर्वक पालन किया जाय तो उसका परिणाम बहुत ही कल्याणकारक होता है। वर्ष के अन्त में यथा− शक्ति हवन एवं दान पुण्य करना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-November
स्वाध्याय करने एवं साहित्य निर्माण करने के लिए-सुयोग्य व्यक्तियों की हमें भारी आवश्यकता है। जो व्यक्ति लोक सेवा की साधना करते हुए जीवन लक्ष की प्राप्ति में-ईश्वर और मुक्ति के निश्चित रूप से प्राप्त होने में विश्वास रखते हों वे अपना और दूसरों का सच्चा हित साधन करने के लिए इस संगठित महान कार्यक्रम में अपने आपको सौंप दें। जिनकी भावनाएं ऊँची तथा योग्यताएं कम है उनकी योग्यताएं बढ़ाने के लिए यहाँ पर प्रयत्न हो सकता है। नर और नारी दोनों ही समान रूप से इस कार्य के लिए उपयोगी हैं। जो लोग पूरा समय नहीं दे सकते वे अपना बचा हुआ समय, अपने निकटवर्ती क्षेत्र देकर भी बहुत कुछ कर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-March
स्वाध्याय, और साधना में प्रवृत्त रहे हैं। जहाँ ऐसे ब्रह्मर्षि जलवायु की उत्तमता के कारण, एवं ऐतिहासिक महत्व के कारण, अधिक संख्या में रहते हैं वह स्थान तीर्थ कहे जाते हैं। तीर्थ यात्रा में वायु परिवर्तन होता है, ऐतिहासिक स्मृतियों का अनुभव होता है और उन ब्रह्मर्षियों से सत्संग करने का सौभाग्य प्राप्त होता है जिनमें दूसरों पर अच्छा असर डालने की योग्यता का बाहुल्य होता है। तीर्थ यात्रा में पुण्य फल प्राप्त होता है इसका तात्पर्य यही है कि श्रेष्ठ व्यक्तियों की संगति का उत्तम प्रभाव पड़ता है और उस प्रभाव के कारण अपने अन्दर जो सद्गुण उत्पन्न होते हैं उनके फलस्वरूप सुखदायक आनन्दमयी परिस्थितियाँ होती हैं।
स्वाध्याय के लिए कुछ समय नित्य निकालें, श्रेष्ठ पुरुषों की उत्तम रचनायें जो ऊँचा उठाने वाली हों, नित्य पढ़ें। स्वाध्याय करना घर बैठे सत्संग करना है। इसके अतिरिक्त उत्तम विचारवान, श्रेष्ठ पुरुषों के पास बैठने, उनसे प्रश्न पूछने, उनके आदर्शों और स्वभावों का अनुकरण करने का प्रयत्न करते रहना चाहिए। लोहे को सोना बना देने की शक्ति पारस पत्थर में होती है। और पशु को मनुष्य बना देने की क्षमता सत्संग में पाई जाती है।
स्वाध्याय करना घर बैठे सत्संग करना है। इसके अतिरिक्त उत्तम विचारवान, श्रेष्ठ पुरुषों के पास बैठने, उनसे प्रश्न पूछने, उनके आदर्शों और स्वभावों का अनुकरण करने का प्रयत्न करते रहना चाहिए। लोहे को सोना बना देने की शक्ति पारस पत्थर में होती है। और पशु को मनुष्य बना देने की क्षमता सत्संग में पाई जाती है। पारस पत्थर अप्राप्य है पर सत्संग की इच्छा करें तो उसे अपने समीप ही प्राप्त कर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-May
स्वाध्याय और सत्संग उसके नित्य कर्म होंगे। स्वाध्याय का तात्पर्य-(1) सद्ग्रन्थों का पढ़ना, (2) मनन करना, (3) आत्मचिन्तन करना हैं। और सत्संग का अर्थ-(1) श्रेष्ठ पुरुषों के विचारों को ग्रहण करना, (2) अच्छे विचार दूसरों को देना (3) सेवा या श्रेष्ठ कर्मों में सहयोग करना हैं।
स्वाध्याय सत्संग को-यज्ञ। और अज्ञान विरोधी युद्ध को तप समझना चाहिए और इस योग, यज्ञ, तप को-सत्य, प्रेम, न्याय को अपनी सुविधा और परिस्थिति के अनुसार कार्यक्रम बनाकर नित्य कार्य रूप में परिणित करना चाहिए।
स्वाध्याय और सत्संग द्वारा अपने तथा दूसरों के ज्ञान को बढ़ाना मंदिरों का उद्देश्य होगा। इनको मन द्वारा अन्तःकरण में धारण करने और शरीर द्वारा कार्य रूप में परिणत करने का प्रयत्न किया जायगा।
स्वाध्याय सत्संग की सुविधा हो। इस कमरे में आदर्श वाक्य लिखने चाहिये, महापुरुषों के चित्र टाँगने चाहिये और साफ सुथरा रखना चाहिये जिससे वहाँ आने वालों के मन पर अच्छी छाप पड़े। यहाँ एक पुस्तकालय होना चाहिये। अच्छी अच्छी चुनी हुई, ज्ञानवर्धक पुस्तकें ही यहाँ रहें। दैनिक एवं साप्ताहिक अखबारों की व्यवस्था रहनी चाहिये।
स्वाध्याय का तात्पर्य-(1) सद्ग्रन्थों का पढ़ना, (2) मनन करना, (3) आत्मचिन्तन करना हैं। और सत्संग का अर्थ-(1) श्रेष्ठ पुरुषों के विचारों को ग्रहण करना, (2) अच्छे विचार दूसरों को देना (3) सेवा या श्रेष्ठ कर्मों में सहयोग करना हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-July
स्वाध्याय द्वारा ज्ञान वृद्धि का महान् कार्य सदा चलता ही रहता है।
स्वाध्याय के लिए-सत्साहित्य पढ़ने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करे, चस्का लगाये, दिलचस्पी पैदा करे। इसके बाद हर आदमी को अपने लिए अच्छी पुस्तकें खुद खरीदनी चाहिए, निजी लाइब्रेरी बनानी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-December
स्वाध्याय करना चाहिए। संध्या समय भगवत् स्मरण, संध्यावन्दन करना चाहिए। रात को जल्दी सोने का प्रयत्न करना उचित है जिस से प्रातः काल जल्दी उठने में सुविधा रहे। सोते समय गायत्री माता का ध्यान करना चाहिए और जब तक नींद न आवे मन ही मन बिना होठ हिलाये मन्त्र का जप करते रहना चाहिये। दोनों एकादशियों को और अमावस्या पूर्णमासी को केवल थोड़े फलाहार के साथ उपवास करना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-September
स्वाध्याय और सत्संग का अखण्ड कार्यक्रम सदा चलता रहता है। कर्मयोग गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने के लिए भारत के कोने कोने से शिक्षार्थी लोग सदा आते रहते हैं परन्तु इस श्रावण मास में नाग पंचमी से लेकर श्रावणी तक 11 दिन के सत्संग का एक विशेष आयोजन हुआ था। मथुरा वृन्दावन में श्रावण के झूलों का उत्सव प्रसिद्ध है। उसे देखने के लिए लाखों यात्री हर वर्ष पहुँचते हैं, ऐसे नयनाभिराम उत्सव के साथ साथ अखंड ज्योति का कर्मयोग सत्संग भी हो रहा था। इस अवसर से लाभ उठाने का लोभ संवरण न हो सका फलस्वरूप अनेक कठिनाईयों के होते हुए भी मैं और पं. विश्वेश्वर दयालु जी मथुरा के लिए चल पड़े।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-October
स्वाध्याय करना अपने को पशुता से देवत्व की ओर ले जाना का स्पष्ट चिन्ह है।
स्वाध्याय करना, तथा प्रसन्न चित्त रहना चाहिए। अनुष्ठान पूरा होने पर सत्पात्रों को अन्न धन का दान देना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-November
स्वाध्याय तथा रूप लावण्य दास बनकर रहते हैं। कम से कम आधा घण्टा अवश्य ही प्रातः सूर्य किरण का सेवन करो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-December
स्वाध्याय करना चाहिये। कामोत्तेजक या अश्लील पुस्तकों, चित्रों को पास भी नहीं आने देना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-April
स्वाध्याय करना चाहिये। कामोत्तेजक या अश्लील पुस्तकों, चित्रों को पास भी नहीं आने देना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-January
स्वाध्याय मनन जैसे उपचार बीजारोपण की तरह हैं जो खाद पानी, निराई, गुड़ाई, रखवाली आदि की चिरकाल तक अपेक्षा करते हैं और समयानुसार कल्प-वृक्ष बनकर मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाते हैं। आन्तरिक दृष्टि से आनन्द विभोर और बहिरंग दृष्टि से श्रद्धा का पात्र बना हुआ भूदेव यह अनुभव करता है कि आत्म-विज्ञान ही जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ है।
स्वाध्याय तथा मित्रों में परामर्श हो सकता है। परिवार-व्यवस्था में मनोरंजन का पुट रह सकता है। निद्रा, नित्यकर्म, आजीविका उपार्जन, स्वाध्याय, उपासना, परिवार-व्यवस्था, लोक-मंगल आदि कार्यों में, कौन, कब, किस प्रकार, कितना समय देगा, यह हर व्यक्ति की अपनी परिस्थिति पर निर्भर है, पर समन्वय इन सब बातों का रहना चाहिए। दृष्टिकोण यह रहना चाहिए कि आलस्य-प्रमाद में एक क्षण भी नष्ट न हो और सारी गतिविधियाँ इस प्रकार चलती रहें, जिनमें आत्मकल्याण, परिवार निर्माण एवं लोक-मंगल के तीनों तथ्यों का समुचित समावेश बना रहे। इन सारे क्रियाकलापों में आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाया जाए।
स्वाध्याय, मनन आदि की सहायता से संग्रह किया जाय। उन पर बार−बार गहराई से विचार किया जाय। कामुकता तथा शालीनता के दोनों पक्षों को अपनी−अपनी बात के समर्थन का अवसर देकर यदि विवेक द्वारा निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह फैसला करने का अवसर दिया जाय तो पुराने अवाँछनीय चिन्तन अभ्यास को आसानी से काटा जा सकता है। शारीरिक दुष्प्रवृत्तियों के संबंध में भी यही बात है। नशा, व्यसन, आलस्य जैसे दुर्गुणों से निपटना, कठोर संकल्प एवं दृढ़ निश्चय से ही सम्भव हो सकता है।
स्वाध्याय, सत्संग, कथा, प्रवचन, पाठ, मनन, चिन्तन जैसी प्रक्रियाओं का सहारा इसी प्रयोजन के लिए लिया जाता है।
स्वाध्याय, उपासना, परिवार-व्यवस्था, लोक-मंगल आदि कार्यों में, कौन, कब, किस प्रकार, कितना समय देगा, यह हर व्यक्ति की अपनी परिस्थिति पर निर्भर है, पर समन्वय इन सब बातों का रहना चाहिए। दृष्टिकोण यह रहना चाहिए कि आलस्य-प्रमाद में एक क्षण भी नष्ट न हो और सारी गतिविधियाँ इस प्रकार चलती रहें, जिनमें आत्मकल्याण, परिवार निर्माण एवं लोक-मंगल के तीनों तथ्यों का समुचित समावेश बना रहे। इन सारे क्रियाकलापों में आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाया जाए। दुष्प्रवृत्तियों को— दुर्भावनाओं को स्थान न मिलने दिया जाए। जहाँ भी जब भी गड़बड़ दिखाई पड़े, तब वहीं उसकी रोक-थाम की जाए और गिरते कदमों को संभाल लिया जाए।
स्वाध्याय और सत्संग द्वारा श्रेष्ठ विचारकों से सम्पर्क साधा जाता है और चिन्तन मनन द्वारा आन्तरिक उत्कृष्टता को उभार कर उच्चस्तरीय निष्ठाओं पर आरूढ़ हुआ जाता है। दर्शन शास्त्र इसी काट छांट के लिए बना है। तत्वदर्शन के अन्तर्गत यों अन्य कई विषय भी आते हैं, पर उसका मूल प्रयोजन विचारणा का स्तर परिष्कृत करना ही माना गया है।
स्वाध्याय, सत्संग आदि साधनों का आश्रय लिया जाता है ताकि चेतना को दिशा एवं प्रेरणा दी जा सके और उसे अपनी जीव ससीमता को ब्रह्म असीमता में घुला देने के लिए आवश्यक प्रकाश एवं प्रशिक्षण मिल सके।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन का आश्रय लेकर मनोभूमि ऐसी प्रौढ़, परिपक्व बनाई जा सकती है जिसमें कुविचारों को पैर जमाने के लिए तनिक भी गुंजाइश न रहे।
स्वाध्याय संपर्क, परिभ्रमण, विचार विनिमय, अभ्यास आदि के अन्य उपाय भी ऐसे हैं जिनके सहारे ज्ञानवृद्धि का पथ प्रशस्त होता है। शरीर कौशल की तरह बुद्धि वैभव की भी अपनी उपलब्धियाँ हैं। अभिनव शोध कार्यों में—अन्वेषण पर्यवेक्षणों में—आवरणों के परत भेदकर वस्तुस्थिति समझने में सूक्ष्म बुद्धि ही काम करती है। यह उस अक्ल-मंदी से ऊपर की चीज है जो दैनिक कार्य−व्यवसायों में कई तरह की सफलताएँ प्रस्तुत करती है। यह किस प्रकार पाई या बढ़ाई जा सकती है इसका कोई बहिरंग आधार अभी बन नहीं पाया है।
स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन का- कथा प्रवचनों का- माहात्म्य इसी आधार पर बताया गया है कि उस प्रक्रिया के सहारे मानवी चिन्तन का परिष्कार होता रहे। अवांछनीय पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कार छुड़ाने में, यह ज्ञान साधना साबुन का काम करती है। विकृत मनोवृत्तियों से छुटकारा मिलता है और विवेक युक्त दूर दर्शिता का पथ-प्रशस्त होता है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतंभरा इसी परिष्कृत चिन्तन का नाम है। ‘ज्ञानामुक्ति’, ‘नहिं ज्ञानेन सदृश पवित्र मिह विद्यते’ जैसी उक्तियों में सद्ज्ञान को अध्यात्म का प्राण माना गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-May
स्वाध्याय और उपासना को भी नित्य कर्म में सम्मिलित रखा जाता है। ठीक इसी प्रकार अंश दान हमारा नित्य कर्म होना चाहिए। स्थूल संपत्ति के रूप में धन और सूक्ष्म संपत्ति के रूप में श्रम सद्भाव संवर्धन के लिए नित्य ही नियोजित किया जाना चाहिए। यही है अंश दान, जिसके आधार पर दृष्टिकोण की उदारता और अन्तःकरण में विकसित आत्म भाव का प्रमाण मिलता है।
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन जैसे माध्यम अपनाकर उसकी क्षमता को निरन्तर प्रखर बनाया जायगा। यह पोषण मिलते रहने पर मस्तिष्क की भूख बुझती रहेगी और उसे अधिक विकसित परिष्कृत होने का अवसर मिलता रहेगा। यदि इस ओर ध्यान न दिया जाय, प्रमादग्रस्त रहा जाय, मूढ़ मान्यताओं में जकड़े रखा जाय तो समझना चाहिए कि विलक्षण मनः शक्ति देने के साथ-साथ सन्निहित ईश्वरीय प्रयोजन को नष्ट कर दिया गया।
स्वाध्याय, सत्संग, एवं धर्मकृत्यों का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया है। धर्म कलेवर का प्राण तत्व ढूंढ़ना हो तो कर्त्तव्य-पालन ही मिलेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-November
स्वाध्याय, सत्संग एवं मनः चिन्तन के आधार पर हृदयंगम किया जाता रहे तो आत्मबोध की स्थिति उत्पन्न हो सकती है और ज्ञान वैराग्य का प्रकाश अन्तरात्मा में परिलक्षित हो सकता है। वेदान्त साधनाओं की अहं-ब्रह्मादिकपरक-सोऽहम् शिवोऽहम् की उद्बोधक वृत्ति ज्ञानयोग का प्रयोजन पूरा कर सकती है। उसे आत्मबोध की स्थिति जागृत करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
स्वाध्याय, संयम और सेवा की ओर भी ध्यान दिया गया है या नहीं। शिष्य होने का दावा करते और जिह्वाग्र भाग से गुरुदेव कहते तो कितने ही सुने जाते हैं, पर अपने परिवार में प्रवेश करने की पहली और अनिवार्य शर्त न्यूनतम एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य ज्ञान-यज्ञ के लिए निकालते रहने को कितने लोग पालन करते हैं, यह जाँचने पर भारी निराशा होती है। लगता है कर्मनिष्ठा का युग लद गया और वाचालता ने उसका स्थान हथिया लिया है। परिजनों ने यदि स्वार्थ परमार्थ का समन्वय किया होता तो निश्चय ही वे व्यक्तिगत लोभ, मोह के लिए जितनी भाग दौड़ करते और चिन्तित रहते हैं उतना ही उत्साह लोक-निर्माण के क्रिया-कलापों में भी प्रस्तुत करते। ढेरों समय आवारागर्दी और आलस्य में गुजर जाता है, उतना यदि नव-निर्माण प्रयोजनों में लग सका होता तो जीवन का स्वरूप ही दूसरा होता।
स्वाध्याय, सत्संग, कथा-कीर्तन, भजन-पूजन आदि की लकीर तो पिटती रहती है, पर यह सब आखिर हो किस लिए रहा है उसका ध्यान ही नहीं आता। पूजा-परक, धार्मिक कर्मकाण्डों की चमत्कारी फलश्रुतियों ने बुद्धि पर ऐसा आच्छादन लपेट दिया होता है। कि इस घिसे को घिसते रहने से ही आत्मिक और भौतिक क्षेत्र में सस्ती ऋद्धि-सिद्धियों की अपेक्षा की जाने लगती है। स्पष्ट है कि उस मृग-मरीचिका में किसी के पल्ले कुछ नहीं पड़ता। मात्र कर्मकाण्डों से आत्मोत्कर्ष का एक भी आधार खड़ा नहीं होता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-February
स्वाध्याय, (3) संयम और (4) सेवा। इन चारों को चारपाई के चार पाये की तरह कमरे के चार कोनों की तरह, चार दिशाओं की तरह परस्पर अविच्छिन्न माना जाना चाहिए। उपासना और स्वाध्याय की चर्चा ऊपर हो चुकी। संयम का अर्थ सादगी, मितव्ययिता होता है जिसे व्यक्तित्व के उत्कर्ष का योगाभ्यास कहा गया है। चौथा चरण सेवा साधना है।
स्वाध्याय को मिला कर दो घण्टे का भाव परिष्कार साधना बनती है। दो घण्टे इस चिन्तन को कर्मरूप में परिणत करने के लिए लगने चाहिएं। लोक−मंगल के परमार्थ प्रयोजनों में यह समय लगना चाहिए। व्यक्तिगत जीवन ही सब कुछ नहीं है−अपने लिए जिन्दा रहते वासना, तृष्णा की और मरने के बाद स्वर्ग मुक्ति की बात सोचते रहना स्वार्थ साधन ही कहा जायगा। मनुष्य जीवन ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए−इस संसार को अधिक सुन्दर, सुव्यवस्थित, सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए मिला है।
स्वाध्याय को। आत्मिक प्रगति के चार सूत्र प्रख्यात हैं (1) साधना (2) स्वाध्याय, (3) संयम और (4) सेवा। इन चारों को चारपाई के चार पाये की तरह कमरे के चार कोनों की तरह, चार दिशाओं की तरह परस्पर अविच्छिन्न माना जाना चाहिए। उपासना और स्वाध्याय की चर्चा ऊपर हो चुकी। संयम का अर्थ सादगी, मितव्ययिता होता है जिसे व्यक्तित्व के उत्कर्ष का योगाभ्यास कहा गया है।
स्वाध्याय है। इसी के साथ चिन्तन−मनन की यह विचारणा भी जुड़ी हुई है कि उन आदर्शों को अपने जीवन−क्रम में समाविष्ट करने की रूपरेखा किस प्रकार बन सकती है। सत्साहित्य पढ़ने का भी लाभ है। उनसे प्रकाश और दिशा मिलती है। पर सारा प्रयोजन इतने से ही पूरा नहीं हो जाता।
स्वाध्याय को सर्वांगपूर्ण बनाता है। अन्य पठन मात्र से तो उपयोगी समयक्षेप ही बना पड़ा रहा जा सकेगा। एक घण्टा सत्साहित्य पढ़ने के लिए नियत रखा जाय। चिन्तन, मनन इसी के साथ−साथ भी चल सकता है और ऐसा भी हो सकता है कि पढ़ते समय प्रेरक तथ्यों को नोट करते रहा जाय और पीछे अवकाश के साथ यह मंथन किया जाय कि अपने लिए उस परामर्श में से कितना और किस प्रकार अपनाये जाने योग्य हो सकता है। जो सम्भव हो उसकी रूपरेखा बनाने के लिए कल्पना शक्ति दौड़ाई जानी चाहिए और आज की अपेक्षा कल अधिक आदर्शवादिता अपनाये जाने का ताना-बाना बुनना चाहिए।
स्वाध्याय की चर्चा ऊपर हो चुकी। संयम का अर्थ सादगी, मितव्ययिता होता है जिसे व्यक्तित्व के उत्कर्ष का योगाभ्यास कहा गया है। चौथा चरण सेवा साधना है। इसे अपनाये बिना सद्भावनाओं को सत्प्रवृत्तियों का रूप धारण करने का अवसर ही नहीं मिल पायेगा और परमार्थ चिन्तन के अंकुर खाद पानी के अभाव में मुरझाते सूखते चले जाएंगे। सेवा साधना से बच कर मात्र भजन, पूजन में निरत रहने वाले तथाकथित साधक इसी कारण छूंछ रहते हैं कि वे उदारता को चरितार्थ करने वाला सत्साहस जुटा नहीं पाते और व्यक्तिगत उपलब्धियों की संकीर्णता में ही घिर कर रह जाते हैं।
स्वाध्याय का समय भी इसी में से काटना पड़े तो भी दो−तीन घंटे लोक−मंगल के कार्यों के लिए बच रहते हैं। अपने युग का सबसे भयंकर संकट विकृत चिन्तन के कारण ही उत्पन्न हुआ है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता सामाजिक, नैतिक और बौद्धिक क्रान्ति की है। इसके लिए अपना ज्ञान−यज्ञ अभियान युग−निर्माण आन्दोलन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। लोक सेवा के लिए इससे बढ़कर इन दिनों और कोई कदम नहीं हो सकता।
स्वाध्याय में एक घण्टा लगना भी इतना ही महत्वपूर्ण है। महामानवों से सत्संग करके जीवन शोधन की प्रेरणा प्राप्त करना स्वाध्याय का उद्देश्य है। इसके लिए किन्हीं कथा−पुराणों या धर्मशास्त्रों की घुटाई करते रहना निरर्थक है। आज की समस्याओं का आज की परिस्थितियों में आज के दृष्टिकोण से जो सही समाधान प्रस्तुत कर सके ऐसे साहित्य का गम्भीरतापूर्वक पढ़ना स्वाध्याय है। इसी के साथ चिन्तन−मनन की यह विचारणा भी जुड़ी हुई है कि उन आदर्शों को अपने जीवन−क्रम में समाविष्ट करने की रूपरेखा किस प्रकार बन सकती है।
स्वाध्याय का उद्देश्य है। इसके लिए किन्हीं कथा−पुराणों या धर्मशास्त्रों की घुटाई करते रहना निरर्थक है। आज की समस्याओं का आज की परिस्थितियों में आज के दृष्टिकोण से जो सही समाधान प्रस्तुत कर सके ऐसे साहित्य का गम्भीरतापूर्वक पढ़ना स्वाध्याय है। इसी के साथ चिन्तन−मनन की यह विचारणा भी जुड़ी हुई है कि उन आदर्शों को अपने जीवन−क्रम में समाविष्ट करने की रूपरेखा किस प्रकार बन सकती है। सत्साहित्य पढ़ने का भी लाभ है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-October
स्वाध्याय, संयम और सेवा के लिए साथ मिली रहने वाली साधना ही सार्थक होती है। यही हमें भी आजीवन करते रहना पड़ा है और यही समन्वय उन सबको भी रखना पड़ेगा जो हमारे कन्धे से कन्धा और कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए उत्सुक हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-December
स्वाध्याय, सत्संग मनन, चिन्तन जैसे माध्यम अपनाये जाते हैं। कथा, प्रवचनों का सिलसिला इसी सन्दर्भ में चलता है। धर्म-शास्त्रों का- तत्व दर्शन का विशालकाय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है।
स्वाध्याय, सद्ज्ञान द्वारा ही सम्भव होता है। इसके लिए स्वाध्याय, सत्संग मनन, चिन्तन जैसे माध्यम अपनाये जाते हैं। कथा, प्रवचनों का सिलसिला इसी सन्दर्भ में चलता है। धर्म-शास्त्रों का- तत्व दर्शन का विशालकाय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है।
स्वाध्याय-सत्संग मनःचिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। आत्म-चिन्तन और आत्म मन्थन पर विचार शक्ति को केन्द्रित करना होता है। भगवान बुद्ध और आत्मज्ञानियों को अपनी साधना का केन्द्र बिन्दु इसी को मान कर चलना पड़ा था। अध्यात्म की भाषा में इसे योग कहते हैं। योग का अर्थ है जोड़ना।
स्वाध्याय, संयम और सेवा इन चार आध्यात्मिक प्रगति के चार-उपचारों को अधिक प्रखर बनाने में जो उपेक्षा बरती जाती रही है उसका अब अन्त होना चाहिए। दैनिक जीवन में इन तथ्यों के लिए भाव भरा एवं सुनिश्चित स्थान रहना चाहिए। कौन, क्या, कैसे करे, यह तो व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर है, अस्तु स्वयं निर्धारण करने और स्वयं कार्यक्रम बनाने की बात है। दूसरे परामर्श भर दे सकते हैं, पर करना तो स्वयं ही पड़ता है। अपनी मनः स्थिति और परिस्थिति के साथ उत्कृष्टता का ताल-मेल बिठाना अपना ही काम है।
स्वाध्याय और सत्संग के प्रभा में कितनी विशेषता होती है। इसका अनुभव इन सत्रों में सम्मिलित होने वाले सहज ही अनुभव कर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-September
स्वाध्याय और सत्संग से इसी प्रयोजन की पूर्ति होती हैं। लेखनी और वाणी द्वारा-दृश्य और श्रव्य माध्यम द्वारा जानकारियों का विस्तार और बुद्धिबल का विकास होता है। तथ्यों की जानकारी मिलने से दिशा निर्धारण में सहायता मिलती है अस्तु प्रकाश प्रयोजन के लिए विभिन्न स्तर की शिक्षा प्रक्रिया चलती है अपने स्तर की शिक्षा देने में शान्तिकुँज ने पिछले सत्रों में इसी आवश्यकता की पूर्ति की है।
स्वाध्याय परायण जैसे अनेकों आत्मशक्ति सम्वर्धक प्रयोग यहाँ चलते रहते हैं। इसका प्रभाव इस भूमि को सच्चे अर्थों में युग तीर्थ बना सकने में समर्थ हो गया है। हिमालय की दिव्य सत्ताओं का यहाँ संरक्षण है। इसके सूत्र संचालक तत्व इसे अधिकाधिक महत्वपूर्ण बनाने के लिए प्राण-प्रण से प्रयत्नशील हैं। ऐसे तपोवन में कुछ समय का निवास अपने आप में एक ऐसा सौभाग्य है जिसका सत्परिणाम कोई भी और कभी भी देख सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-April
स्वाध्याय किया। फिर लिख डाली आनन फानन में एक पुस्तक- कर्सिका का इतिहास और उसे ऐल्बे रेनाल के पास भेज दिया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-March
स्वाध्याय, सत्संग और विवेक आदि। किन्तु तुमने उसे दिया क्या? कुतर्क, असमञ्जस, स्थगन, अकर्मण्यता, अविद्या, कुसंग और अज्ञान आदि। आत्मा की माँग थी—परिमार्जन, परिष्कार, संस्कार, शोधन, साधन, धर्म, धीरता, कर्म, परोपकार व सदाचार आदि। किन्तु तुमने उसे इसके विपरीत दिया—अन्धकार, अज्ञान, कलुष, अवज्ञा, उपेक्षा, अवहेलना और तिरस्कार आदि! फलतः यह सब तुम से विमुख होकर बुझे दीपक की भाँति तुम्हारे पास रह गये।
स्वाध्याय करो, पुस्तकालयों और सत्सभाओं में सम्मिलित होओ! सबसे अधिक सेवा कार्यों में सम्मिलित होओ! ठीक समय पर पुनः सन्तुलित भोजन करो। थोड़ा संचरण करो। दूसरे दिन के कार्य पर विचार करो, और ठीक समय पर परमात्मा का स्मरण करते हुये निश्चिंत निद्रा में से जाओ!
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-June
स्वाध्याय में उनकी रुचि होती है। उन्हें दंभ पाखंड नहीं आता। वे भूलकर भी कुमार्ग में पाँव नहीं देते।
स्वाध्याय में जो केवल पढ़ जाने की क्रिया पूरी करता है उससे किसी तरह का मानसिक या चारित्रिक विकास नहीं होता। कोई विद्यार्थी यह कहे कि उसने दो-दो बार सारी पुस्तक पढ़ी है फिर किस तरह उसे फेल कर दिया गया, तो यही समझना चाहिए कि उसने पढ़ा है, मनन नहीं किया। शब्द दुहराते चले जायें और आशय कुछ न निकालें तो उस अध्ययन का लाभ ही क्या होगा? जो कुछ पढ़ें, उसे भली प्रकार मनन करें तो वह बात परिपक्व होकर ज्ञान का रूप धारण करती है। विचारों को तदनुरूप कर्मों में प्रसारित करें “स्वाध्याय” शब्द तब कहीं सार्थक होता है।
स्वाध्याय, ठीक संगठन आदि का अखण्ड यज्ञ देवालयों में चलता रहे। पर व्यवहार में यह सब कुछ नहीं होता। लोग आते हैं, चन्दन, अक्षत पुष्प, पाई पैसा की सस्ती भेंट चढ़ाकर अपनी अन्ध श्रद्धा व्यक्त करके चले जाते हैं। उनके लौकिक जीवन में किसी प्रकार का प्रकाश उत्पन्न नहीं होता। वही आसक्ति , वही वासना, क्रोध, मोह, सब कुछ वहीं।
स्वाध्याय” शब्द तब कहीं सार्थक होता है। अक्षरों को शब्द रूप दे देना ही काफी नहीं है। उनका अर्थ भी समझें तो आपका सीखना सही माना जायेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-February
स्वाध्याय, सत्संग, मौलिक चिन्तन, जीवन और जगत का अनुभव, निर्भयता पूर्वक सीखने और सिखाने की लगन, उत्साह, ईश्वर भक्ति , परमात्मा की पूजा उपासना आदि ऐसे आधार हैं, जिनके द्वारा हम अपनी बुद्धि का विकास कर सकते हैं। बौद्धिक विकास के क्षेत्र में न तो किन्हीं प्राचीन ग्रन्थों के पाठ करने से काम चलेगा, न पूर्वजों की गुण गाने से। इसी तरह वर्तमान युग के उच्छृंखल लहरों में बह जाने से भी कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। बौद्धिक विकास के लिए आधुनिक युग के अनुरूप नई प्रयोगशालाएं बनानी पड़ेंगी, जहाँ प्राचीन और अर्वाचीन समन्वय के नवीन प्रयोग करने होंगे, नई सूझ-बूझ का परिचय देना होगा, नई राह निकालनी पड़ेगी।
स्वाध्याय से अन्तःकरण की तुष्टि करनी चाहिए। जिन्हें प्राकृतिक जीवन प्यारा लगता हो, वे ऐसा भी कर सकते हैं कि कुछ दिन तक कहीं तीर्थ यात्रा आदि में समय बितावें। अपनी रुचि के अनुसार अपनी शान्ति प्राप्त करने के प्रयत्न करें, तो कई साधन ऐसे बन जायेंगे, जिससे चिन्ता-जनक परिस्थिति में भी अपना मानसिक सन्तुलन बनाये रख सकें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-April
स्वाध्याय के सम्मिश्रण से उनको आत्म-ज्ञान की अनुभूति हो जाती थी। विद्यार्थी केवल गुण-पुँज या ज्ञान पुँज ही नहीं शक्ति-पुँज होकर भी निकलते थे। फलस्वरूप उन्हें भौतिक सुखों की कोई आकाँक्षा न होती थी तब वे अधिकार नहीं कर्तव्य माँगते थे। सेवा को वे व्रत समझते थे। साहस और कर्मठता उनमें कूट-कूट कर भरी होती थी।
स्वाध्याय की चमक यह व्यक्त करती है कि विद्यार्थी का भविष्य उज्ज्वल है उसी प्रकार कर्म की उत्कट भावना यह बताती है इस मनुष्य का हृदय उत्कृष्ट और विशाल है। इन गुणों के कारण ही उसका व्यक्तित्व निखरता, समुन्नत होता, और श्रेय प्राप्त करता है।
स्वाध्याय की बड़ी आवश्यकता होती है। पवित्र मन में अनेक गुणों का विकास स्वतः होने लगता है। लौकिक वस्तुओं को लेकर अभिमान, मोह, ममता, लोभ, क्रोध आदि द्वेष दुर्विकारों का त्याग ही अन्तर्जीवन की शुद्धि है। इसी प्रकार अपने अन्तःकरण में श्रद्धा, भक्ति, विवेक, सन्तोष, क्षमा, उदारता, विनम्रता, सहिष्णुता, एवं अविचल प्रसन्नता का धारण करना ही सुन्दर शृंगार है। केवल बाह्य शरीर के शृंगार पर ध्यान देना, मनुष्य के स्थूल दृष्टिकोण का परिचारक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-December
स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन आदि के माध्यम से ऊर्ध्वगामी होना ही चाहिये। मन सुधर जाय तो जीवन सुधर जाय। मन बदल जाय तो जीवन की दिशा बदल जाय। शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा है कि बन्धन और मोक्ष का कारण भी मन ही है।
स्वाध्याय, साधना आदि सम्पूर्ण क्रियाओं का स्वामी मन है। मन की प्रचंड हुँकार से देवासन हिल जाते हैं, राष्ट्र बदल जाते हैं, व्यक्ति का कायाकल्प हो जाता है। जागृत मन मनुष्य को परमात्मा की शक्ति वाला बना देता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-August
स्वाध्याय या सत्संग में लगाते तो विचार और सन्मार्ग की प्रेरणा मिलती। कुछ न करते केवल नियमित दिनचर्या में ही लगे रहते तो इस क्रियाशीलता के कारण अपना स्वास्थ्य तो भला-चंगा रहता। निष्क्रियता रोग से कम नहीं, उससे अनेक बुराइयाँ उत्पन्न होती हैं, खाली दिमाग शैतानी ही कर सकते हैं। इस तरह समय के अपव्यय से मनुष्य की शक्ति और सामर्थ्य ही घटती है। कहना न होगा कि नष्ट किया हुआ समय मनुष्य को भी नष्ट कर डालता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-January
स्वाध्याय का अनुसरण किया है उनकी आत्मा अवश्यमेव परिष्कृत हुई है, उनकी महानता जागृत हुये बिना नहीं रही।
स्वाध्याय, संयम और सेवा के साधन चतुष्टय से परिपूर्ण होती है। हम आदर्शों की उपासना करें, विचारों में निर्मलता और जीवन में आत्मसंयम का अभ्यास करें, दूसरों की सेवा को ही परमात्मा की सच्ची सेवा मानें तो ही महानता का गौरव प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते है। अतः हमें साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में कभी भी आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये।
स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में कभी भी आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये।
स्वाध्याय और सत्संग” को अधिक फलदायक और सुविधाजनक मानते हैं। स्वाध्याय भी एक प्रकार से विचारों का सत्संग है, किन्तु महापुरुषों की समीपता का मनुष्य के अन्तःकरण पर तीव्र प्रभाव पड़ता है। सन्तजनों की समीपता शीघ्र फलदायक होती है क्योंकि यह लाभ उनकी वाणी, विचार और व्यवहार से निरन्तर मिलता रहता है अतएव प्रगति भी उतनी ही द्रुतगामिनी होती है। आत्म-संस्कार के लिए सत्संग से बढ़कर कोई दूसरा साधन नहीं। बड़े-बड़े दुष्ट दुराचारी व्यक्ति तक सत्संग के प्रभाव के सुधरकर महान आत्मा बने हैं।
स्वाध्याय केवल पुस्तकें पढ़ने को ही नहीं कहते। उसका वास्तविक उद्देश्य आत्म-निरीक्षण के लिए प्रेरणा प्राप्त करना है। शास्त्र कहता है।
स्वाध्याय ही हो सकता है। आत्मबल बढ़ाने वाला, चरित्र को उज्ज्वल करने वाला, गुणकर्म, स्वभाव में प्रौढ़ता उत्पन्न करने वाला साहित्य उपलब्ध करके नियमित रूप से उसे पढ़ते रहने से भी घर बैठे सत्पुरुषों के साथ सत्संग का लाभ लेने की सुविधा मिल सकती है।
स्वाध्याय भी एक प्रकार से विचारों का सत्संग है, किन्तु महापुरुषों की समीपता का मनुष्य के अन्तःकरण पर तीव्र प्रभाव पड़ता है। सन्तजनों की समीपता शीघ्र फलदायक होती है क्योंकि यह लाभ उनकी वाणी, विचार और व्यवहार से निरन्तर मिलता रहता है अतएव प्रगति भी उतनी ही द्रुतगामिनी होती है। आत्म-संस्कार के लिए सत्संग से बढ़कर कोई दूसरा साधन नहीं। बड़े-बड़े दुष्ट दुराचारी व्यक्ति तक सत्संग के प्रभाव के सुधरकर महान आत्मा बने हैं।
स्वाध्याय है। पूर्ण मानव बनने के सद् उद्देश्य से जिनने भी स्वाध्याय का अनुसरण किया है उनकी आत्मा अवश्यमेव परिष्कृत हुई है, उनकी महानता जागृत हुये बिना नहीं रही।
स्वाध्याय से ही पूरी करनी पड़ती है। जहाँ जीवन को प्रेरणाप्रद मार्गदर्शन कर सकने की दृष्टि से उपयुक्त सत्संग मिल सके, वहाँ जाने और लाभ उठाने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए। पर जहाँ व्यर्थ की विडम्बनाओं में समय बर्बाद किया जाता हो, वहाँ जाने में कुछ लाभ नहीं। आज की स्थिति में सरल सत्संग स्वाध्याय ही हो सकता है। आत्मबल बढ़ाने वाला, चरित्र को उज्ज्वल करने वाला, गुणकर्म, स्वभाव में प्रौढ़ता उत्पन्न करने वाला साहित्य उपलब्ध करके नियमित रूप से उसे पढ़ते रहने से भी घर बैठे सत्पुरुषों के साथ सत्संग का लाभ लेने की सुविधा मिल सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-September
स्वाध्याय सन्दोह-
स्वाध्याय और अपनी साधना तक ही सीमित रहने से काम न चलेगा, उन्हें नव-निर्माण का उत्तरदायित्व भी वहन करना होगा। उन्हें एक संगठनकर्ता, धर्मोपदेशक एवं युग-निर्माता के रूप में परिणत होना चाहिए। अपने व्यक्तिगत कार्य करते हुए इन प्रयोजनों के लिये भी उन्हें समय निकालना ही चाहिये। सेवा के बिना मानव जीवन की सार्थकता नहीं। ईश्वर की भक्ति का सच्चा स्वरूप मानव प्राणी का आन्तरिक स्तर उठाने के लिए किया गया प्रयत्न ही हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-May
स्वाध्याय करे, विविध कष्ट सहे, किन्तु यदि वह गुणानुरागी नहीं बनता, तो उसकी सारी तपश्चर्या व्यर्थ है। दूसरों के सद्गुण देख कर प्रसन्न होना, आत्म-कल्याण की दृष्टि से ऐसा ही है जैसा कोई पनघट से भी प्यासा लौट जाय। मनुष्य के सारे मोक्ष प्राप्ति के साधन बेकार ही सिद्ध होंगे यदि उसने सद्गुणों का अपने जीवन में विकास नहीं किया। जैन धर्म की प्रसिद्ध पुस्तक “गुणानुराग कुलक” में लिखा है-’जिस पुरुष के हृदय में उत्तम गुणों से प्रेम रहता है, उसे परमात्मा की प्राप्ति दुर्लभ नहीं है, अपितु सुलभ है। गुणानुरागी पुरुष धन्य हैं, उसे कृतपुण्य समझना चाहिए।
स्वाध्याय करना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-July
स्वाध्याय करते रहना चाहिये। इससे भी मन बुरे विचारों से बचा रहता है और सद्भावनायें उत्पन्न होती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-December
स्वाध्याय और सत्संग को परस्पर पूरक-अन्योन्याश्रित माना जाता रहा है अस्तु दोनों कदम साथ-साथ उठते चलने में मंजिल तक पहुँचने की बात बनती है। दो पहियों के बिना किसी गाड़ी का चल सकना सम्भव नहीं होता।
स्वाध्याय के सहारे चिन्तन मनन का विषय बनाने की ललक भी पीछे छोड़ना है। स्वाध्याय और सत्संग को परस्पर पूरक-अन्योन्याश्रित माना जाता रहा है अस्तु दोनों कदम साथ-साथ उठते चलने में मंजिल तक पहुँचने की बात बनती है। दो पहियों के बिना किसी गाड़ी का चल सकना सम्भव नहीं होता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-February
स्वाध्याय मण्डल असल में बिना निजी इमारत छोटे दायरे में काम करने वाले - एक व्यक्ति के प्रयास से चल पड़ने वाले प्रज्ञा संस्थान ही हैं। दोनों के कार्यक्रम और उत्तरदायित्व समान हैं। दोनों का कार्य अपने-अपने क्षेत्रों में स्वाध्याय प्रक्रिया द्वारा युगान्तरीय चेतना का आलोक वितरण से आरम्भ होता है और दोनों को ही थेड़ा समर्थन-सहयोग उपलब्ध होने लगने पर पंच सूत्री कार्यक्रम हाथ में लेना पड़ता है। एक दशा में अन्तर केवल छोटे या बड़े का रह जाता है। गतिविधियाँ सर्वथा एक जैसी हैं।
स्वाध्याय प्रक्रिया द्वारा युगान्तरीय चेतना का आलोक वितरण से आरम्भ होता है और दोनों को ही थेड़ा समर्थन-सहयोग उपलब्ध होने लगने पर पंच सूत्री कार्यक्रम हाथ में लेना पड़ता है। एक दशा में अन्तर केवल छोटे या बड़े का रह जाता है। गतिविधियाँ सर्वथा एक जैसी हैं। फिर भी यह निश्चित है कि प्रज्ञा संस्थानों के लिए नियुक्त कार्यकर्ताओं को जिस प्रकार ट्रेनिंग की आवश्यकता होती है उसी प्रकार स्वाध्याय मण्डलों के रूप में छोटे प्रज्ञा संस्थानों की बारी है। यह भी हो सकता है कि प्रज्ञा पीठों की तरह वह भी सौ गुना अधिक बढ़ चले और 24 हजार के स्थान पर 24 लाख की संख्या में प्रज्ञा संस्थान-स्वाध्याय मण्डल-विनिर्मित हो चुकें।
स्वाध्याय मण्डलों के रूप में छोटे प्रज्ञा संस्थानों की बारी है। यह भी हो सकता है कि प्रज्ञा पीठों की तरह वह भी सौ गुना अधिक बढ़ चले और 24 हजार के स्थान पर 24 लाख की संख्या में प्रज्ञा संस्थान-स्वाध्याय मण्डल-विनिर्मित हो चुकें। युग सन्धि का प्रज्ञा अभियान एक अद्वितीय एवं अभूत पूर्व तूफान है उसका प्रखरता और व्यापकता अपनी शक्ति और सफलता का जितना प्रभाव परिचय देने लगे उतना ही कम हैं।
स्वाध्याय मंडलों के मचालकों को भी उसी प्रक्रिया का अनुभव अभ्यास कराने का।
स्वाध्याय मण्डलों के संस्था पकों की भी होनी है। इतने बड़े काम की शिक्षा एक महीने से कम में किसी प्रकार भी सम्पन्न नहीं हो सकती। उसके साथ जो पाठ्यक्रम जुड़े हैं वे कल्प साधना सत्र की तुलना में कही अधिक कठिन और जटिल है। ऐसी दशा में एक महीने से कम में उनकी शिक्षा भी पुरी नहीं हो सकती। वह नई व्यवस्था कैसे हो?
स्वाध्याय मण्डल-विनिर्मित हो चुकें। युग सन्धि का प्रज्ञा अभियान एक अद्वितीय एवं अभूत पूर्व तूफान है उसका प्रखरता और व्यापकता अपनी शक्ति और सफलता का जितना प्रभाव परिचय देने लगे उतना ही कम हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-March
स्वाध्याय सत्संग से लेकर पूजा-अर्चा तक के विभिन्न उपचारों का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को वस्तुतः ऊँचाई की ओर उछाल देना है। कामना से भावना के- क्षुद्रता से महानता के- बन्धन से मोक्ष के- नरक से स्वर्ग के- क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए एक ही राजमार्ग है कि मनुष्य स्वार्थ को परमार्थ में बदले। महानता इसी को कहते हैं। इसी में मानव जीवन की समग्र गरिमा केंद्रीभूत है। इस स्तर को अपनाने वाला ही यह गर्व गौरव अनुभव कर सकता है कि उसे मनुष्य जन्म का जो अनुपम अनुदान सृष्टा ने बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाते हुए प्रदान किया था, उसे सार्थक कर दिखाया।
स्वाध्याय सत्संग का वार्ता उपक्रम जिसमें कथन और पठन की प्रधानता रहती है। अध्यापक कक्षाएँ पढ़ाते हैं, विद्यार्थी इस ज्ञान को पुस्तकों के सहारे अधिक अच्छी तरह मस्तिष्क में जमाते उतारते हैं। इस समूची प्रक्रिया का प्रभाव मात्र उस बाह्य मस्तिष्क पर ही होता देखा जाता है जिसे व्यवहार में काम आने वाला सचेतन कहते हैं। इसी आधार पर कुशलता भी अर्जित की जाती है। स्कूलों- कॉलेजों- शिल्पगृहों में इसी की धूम रहती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-September
स्वाध्याय, शिक्षण, कौशल, आदि का विस्तार। दैवी सम्पदाओं से व्यक्ति और समाज को सुसम्पन्न बनाना। समग्र यज्ञ प्रक्रिया इन दर्शन सिद्धान्तों पर ही अवलंबित रही है। यजन प्रक्रिया तो उसका स्थूल दृश्यमान पक्ष भर है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-April
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन जैसे माध्यम अपनाए जाते हैं। कथा-प्रवचनों का सिलसिला इसी संदर्भ में चलता है। धर्मशास्त्रों का-तत्वदर्शन का विशालकाय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है।
स्वाध्याय की महत्ता भी इसीलिए मानी गयी है। गर्भाधान की अवधि में माता को श्रेष्ठता का ही वातावरण मिले, उसके लिये आवश्यक है कि अमर्यादित प्रजनन तो रुके ही; साथ ही ऐसा वातावरण भी बने जिससे कामुकता को प्रश्रय न मिलकर सत्प्रवृत्ति संवर्धन श्रेष्ठता का महत्व मिले। दायित्व न केवल व्यक्ति एवं परिवार का है वरन् सारे समाज का है। यह मात्र आस्तिकता एवं आध्यात्मिकता का वातावरण बनने पर ही सम्भव है। सत्साहित्य का प्रचार, विस्तार एवं लोकरंजन के श्रेष्ठ माध्यम भी कामुकता विरोधी वातावरण बना सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-July
स्वाध्याय, सत्संग सत्परामर्श का- उद्देश्य सदा उसका एक ही रहेगा- अन्तराल का परिशोधन परिष्कार। रुग्ण मानवता को यही चिकित्सा पद्धति अब चाहिए भी।
स्वाध्याय सत्संग, मनन, चिन्तन एवं विचार विमर्श ही यजन माना जाता है। दिनचर्या उसी आधार पर बनती है। यह सामूहिक होते हैं और अधिक समय तक चलते हैं।
स्वाध्याय मण्डल प्रायः ऐसे स्थान पर बने हैं, उनके संचालक लोग ऐसे हैं उनकी भावना और कर्मठता बढ़ी-चढ़ी होने पर भी आयोजन सम्मेलन करने की रूपरेखा ध्यान में नहीं है। ऐसी दशा में अनुभवहीनता के कारण वह छोटा प्रबन्ध भी उनके लिये सरदर्द बनेगा। इस असमंजस को दूर करने का एक ही उपाय है कि अनुभवी प्रज्ञा पुत्र अपने-अपने कार्य क्षेत्र बांटे और वहाँ मितव्ययिता पूर्वक अधिकाधिक सफलता के साथ निर्धारित आयोजनों को सम्पन्न करायें।
स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थानों को प्रखर परिपुष्ट बनाने के लिये सभी प्रज्ञा पुंजों को पूरा-पूरा ध्यान देना है। इस वर्ष के दस हजार आयोजन भी उन्हीं से सम्पन्न करने तथा दूसरों से कराने हैं।
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन के चार आधार अपनाने पड़ते हैं। एकाग्रता (मेडीटेशन) ध्यान योग के अंतर्गत ये प्रयोजन भी जुड़े रहते हैं। अन्यथा मन को एक कल्पना भर देकर रोके रहने से योगाभ्यास का वह उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा जिसके आधार पर आत्मसत्ता को आत्मिकी की प्रयोगशाला के रूप में परिणति करने की व्यवस्था बनती थी।
स्वाध्याय और सत्संग भी ध्यानयोग के ही अंग माने गये हैं। उत्कृष्टता की गरिमा पर श्रद्धा केन्द्रित करने को ‘चिन्तन’ और उसे आज की स्थिति में क्रियान्वित करने की आकाँक्षा को उभारना, योजना बनाना ‘मनन’ कहलाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-January
स्वाध्याय मंडल चलाने का यह लाभ प्रत्यक्ष है। इसके उपरान्त सत्प्रवृत्ति संवर्धन का कार्य इतना महान है जिसे उच्चस्तरीय कहे जाने वाले पुण्य परमार्थों से किसी से भी कम महत्व का नहीं समझा जा सकता है।
स्वाध्याय करे और साथ ही अपने पड़ोस परिवार के पाँच-पाँच अन्य शिक्षितों को यही चस्का लगाये। उन्हें हर दिन, नियमित रूप से बिना मूल्य साहित्य देने और वापस लेने का सिलसिला चलाने लगें तो देखते-देखते तीस सदस्यों का एक सुदृढ़ प्रज्ञा परिवार गठित हो जायेगा।
स्वाध्याय मण्डली का यह शुभारंभ है। तीस की मंडली में जब स्लाइड प्रोजक्टरों के माध्यम से घर-घर प्रकाश चित्र प्रदर्शन और टेप रिकार्डरों के माध्यम से जन-जन का उद्बोधन क्रम चल पड़ता है। तो उस आधार पर युगान्तरीय चेतना को गगन चुम्बी बनने का अवसर मिलता है। सदस्यों के जन्म दिवसोत्सव उनके घरों पर मानते हैं तो एक अच्छी-खासी ज्ञान गोष्ठी सम्पन्न होती है और उस आधार पर आलोक वितरण करने में समर्थ वातावरण बनाता है। यही सदस्य मिलजुल कर खड़िया, गेरू से दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखने, घरों में उन्हें टाँगने के लिए निकलते हैं तो उस क्षेत्र में प्रगतिशीलता की उमंगें उफनती दृष्टिगोचर होती हैं।
स्वाध्याय मंडल प्रायः 10 गुने अधिक होंगे। वार्षिक आयोजन उनके भी होने चाहिए। इसके लिए जीपों के स्थान पर टैम्पो खरीदे जा रहे हैं और पाँच प्रचारकों के स्थान पर तीन गायक वक्ताओं के मंडल गठित किये जा रहे हैं। एक छोटी चित्र प्रदर्शनी भी तैयार की गयी है जो टैम्पो में भेजी जा सकेगी। जहाँ स्वाध्याय मंडल बन चुके हैं या बनने जा रहे हैं उनके सूत्र संचालकों से कहा गया है कि अपनी स्थापना का उद्घाटन आयोजन इसी वर्ष रखें और भविष्य में उन्हें वार्षिकोत्सवों के रूप में सम्पन्न करते रहें।
स्वाध्याय एवं ईश्वर प्राणिधान को ‘नियम’ कहते हैं। इन यम-नियमों के पालन से शरीर यन्त्र शुद्ध बनता है, मन पवित्र बनता है, प्राण ऊर्जा के स्वरूप का बोध होता है और लक्ष्य के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है। इसके साथ आसन सिद्धि का अभ्यास आवश्यक है, जिससे पर्याप्त समय तक एक ही मुद्रा में स्थिर रहकर साधना-अभ्यास किया जा सके।
स्वाध्याय मंडल योजना को गम्भीरतापूर्वक समझाने का प्रयत्न किया होगा। जिनने उस प्रयोग को हाथ में लिया, अग्रगामी बनाया ओर उसके लिए अनवरत प्रयत्न किया होगा उन्हें अनुभव हुआ होगा कि रीछ बानरों के स्वल्प प्रयास ने किस प्रकार सेतुबन्ध बंध और असुर दमन हुआ होगा।
स्वाध्याय मंडली के अंतर्गत न केवल संघबद्ध होना है वरन् उन्हें सुयोजित ढंग से चलाने-बढ़ाने के लिए भी सामर्थ्य भर प्रयत्न करना है।
स्वाध्याय मण्डल गठित करें या फिर किसी अन्य के गठन प्रयास में सम्मिलित होकर रहें। एकाकी पाठक बने रहने भर से काम नहीं चलेगा। सृजन पर्व पर हममें से प्रत्येक का संगठन और सृजन प्रयास में भावभरा योगदान भी होना चाहिए। भले ही वह गिलहरी के श्रमदान एवं शबरी के अंशदान जितना स्वरूप ही क्यों न हो। इस संदर्भ में एक सुनिश्चित सामयिक एवं सरलतम प्रयास यही हो सकता है जिसके लिए प्रत्येक जागृत आत्मा से इन पंक्तियों में न केवल अनुरोध वरन् आग्रह भी किया जा रहा है।
स्वाध्याय मंडल उद्घाटनों के संदर्भ में शांति कुँज हरिद्वार से इन दिनों देश के कोन कोने में प्रचारक जीप टोलियां भेजी जा रही हैं। माँगे अधिक होने एवं प्रस्तुत जीपें कम पड़ने से और भी अधिक संख्या में जीप गाड़ियों की व्यवस्था की जा रही है।
स्वाध्याय मंडलों की स्थापना- उनके उद्घाटन आयोजनों की व्यवस्था करने के लिए प्राणवान परिजनों को प्रेरणा दी जा रही है वहाँ एक अनुरोध उनसे यह भी किया जा रहा है कि प्रचारक स्तर के प्राणवानों की आवश्यकता पूरी करने जैसी सामयिक आवश्यकता पर भी अविलम्ब ध्यान दें।
स्वाध्याय मण्डल का सृजेता, संस्थापक एवं संचालक बनना है। इस पुण्य संकल्प की सम्भावनाएं अद्भुत एवं अनुपम है। बसन्त पर्व सूत्र संचालक का आध्यात्मिक जन्म दिवस है। इस वर्ष बसन्त पंचमी का पर्व 19 जनवरी बुधवार को पड़ता है इस वर्ष के लिये उनका यह विशेष सन्देश अपने हर प्राणवान परिजन के नाम व्यक्तिगत रूप से इन पंक्तियों द्वारा भेजा जा रहा है। लोक मानस के परिष्कार का इस अभियान के अनेकानेक महत्वपूर्ण कदम संकल्प लेकर चलने वाले इसी उल्लास भरे पर्व की बेला में उठे हैं।
स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना करने छोटे-छोटे प्रज्ञा परिवार चलाने जितना उत्तरदायित्व तो ओढ़े हैं। इस सरलतम सृजन प्रक्रिया में हर स्तर का व्यक्ति सहगामी बन सकता है। उसमें जोखिम तनिक भी नहीं। लाभ इतना जिसका सत्परिणाम हाथों हाथ देखा जा सकता है।
स्वाध्याय मंडल बन चुके हैं या बनने जा रहे हैं उनके सूत्र संचालकों से कहा गया है कि अपनी स्थापना का उद्घाटन आयोजन इसी वर्ष रखें और भविष्य में उन्हें वार्षिकोत्सवों के रूप में सम्पन्न करते रहें।
स्वाध्याय मण्डली के संचालन में मौजूद हैं। इस प्रक्रिया को कोई छोटा न समझे। उसका नन्हा-सा कलेवर देखकर उपहास न करे। जो वट बीज के आकार और फलित होने पर उसके विशाल आकार वाली बात जानते हैं कि मात्र दुष्टता ही छूत की बीमारी बन कर फैलती नहीं है। किसान द्वारा फैलाये गये एक टोकरी दाने उसके कोठी-कुठीले भी भरते हैं।
स्वाध्याय मंडली के रूप में विनिर्मित किये जा रहे हैं। इन छोटे घटकों को ही अब सजीव प्रज्ञा परिवार कहा जायगा। उनके कार्यालय प्रज्ञा संस्थान कहे जा सकेंगे। इनकी संख्या इस वर्ष 24000 होती है। यह दूसरा कदम है।
स्वाध्याय मंडल संस्थापन को समझा जायगा।
स्वाध्याय मण्डल का सृजेता संस्थापक एवं संचालक होना चाहिए। यह देखने में अति सरल और परखने में नगण्य सा काम है किन्तु इसकी दूरगामी सम्भावना और परिणति पर विचार करते ही यह तथ्य उजागर हुए बिना नहीं रहता कि यह असाधारण, अद्भुत, एवं अनुपम प्रयास है। जिस विचार क्रान्ति को युग धर्म माना गया है और जिस आधार पर लोकमानस के परिष्कार का स्वप्न देखा गया है उसकी समग्र सम्भावना एवं बीजारोपण में सुनिश्चित रूप से सन्निहित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-August
स्वाध्याय मण्डल भी अफसरों की तरह किसी के यहाँ अपना कार्यालय रखे रहे तो हर्ज नहीं। न कुछ से कुछ अच्छा की नीति भी बुरी नहीं।
स्वाध्याय मण्डल के रूप में प्रज्ञा संस्थान खड़ा करने का पुरुषार्थ भी प्रकट होना चाहिए।
स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थान, अभी-अभी अंकुरित हुए हैं। उनमें खाद पानी लगाने की ठीक इन्हीं दिनों आवश्यकता पड़ रही है। उन्हें प्रेरणा प्रदान करने, उत्साह भरने और जन सहयोग दिलाने के लिए आवश्यक घोषित किया गया है कि सभी की वार्षिकोत्सव प्रज्ञा आयोजनों के रूप में सम्पन्न हों। ऐसे आयोजन इस वर्ष में-अक्टूबर से जून तक प्रायः दस हजार की संख्या में सम्पन्न किये जाने हैं। इनके लिए प्रचारकों की मण्डलियाँ प्रशिक्षित की जाती हैं।
स्वाध्याय मण्डल के प्रज्ञा संस्थान भी जहाँ तहाँ रहते रहें तो हर्ज नहीं। बड़े अफसरों तक के ट्रान्सफर होते और क्वार्टर बंगले बदलते रहते हैं। वे इनके निजी कहाँ होते हैं? ऐसी दशा में यदि स्वाध्याय मण्डल भी अफसरों की तरह किसी के यहाँ अपना कार्यालय रखे रहे तो हर्ज नहीं। न कुछ से कुछ अच्छा की नीति भी बुरी नहीं।
स्वाध्याय मंडल के रूप में स्थापित किया जाय। यह बिना इमारत के प्रज्ञा संस्थान छोटे रूप में उसी उद्देश्य की पूर्ति करते हैं, जिसका कि गायत्री शक्ति पीठें- प्रज्ञा पीठें- बड़े रूप में सम्पन्न कर रही हैं। प्रज्ञा युग के अवतरण में इन केन्द्र संस्थानों की महती भूमिका सुनिश्चित है।
स्वाध्याय मण्डल की स्थापना के रूप में एक स्मारक खड़ा कर देना चाहिए। बड़े कार्यों में बड़ी घटनाओं के स्मारक बनाने के पुरातन परम्परा अभी भी उतनी ही उपयुक्त एवं आवश्यक बनी हुई है। देवालयों की स्थापना इसी निमित्त हुई है। भगवान राम, भगवान कृष्ण, हनुमान जैसे महानों की स्मृतियों में उनके व्यक्तित्व एवं चरित्र के प्रति जन-साधारण की श्रद्धा जगाने प्रवृत्ति उभारने का निमित्त कारण ही सन्निहित रहा है। तीर्थों की स्थापना ऐसी ही ऐतिहासिक प्रेरणास्पद घटनाओं के जनमानस पर छाये रहने के निमित्त होती थी।
स्वाध्याय और सत्संग, लेखनी और वाणी के सहारे यदि प्रज्ञा पुरश्चरण की पृष्ठभूमि एवं कार्यपद्धति जन-जन को समझाने का कोई व्रत धारण करे तो कोई कारण नहीं कि कोई प्रतिभावान लगनशील व्यक्ति 100 भागीदार न बना सके। हजारी किसान के पास न साहित्य था न सुवचन का अभ्यास, तो भी उसने हजार आम्र उद्यान लगाने का संकल्प पूरा किया था। एक उद्यान में बीस पेड़ माने जाय तो बीस हजार पेड़ लगाने लगवाने का श्रेय उसे मिला था। एक अनपढ़ साधन रहित व्यक्ति मात्र लगन और जीवट के सहारे इतना कर सकता है तो कोई कारण नहीं कि प्रज्ञा परिवार की जागृत आत्माएँ अपनी संकल्प शक्ति को उभारें और चमत्कारी परिणति उत्पन्न न कर सकें। प्रश्न न समय का है, न योग्यता का न परिस्थितियों का।
स्वाध्याय संस्थानों के रूप में। अन्तर स्वरूप विस्तार का है। उद्देश्य और उत्तरदायित्व का वहन दोनों ही समान रूप से कर रहे होंगे।
स्वाध्याय मण्डल-प्रज्ञा संस्थान के साथ संयुक्त रहकर दो घण्टे नित्य उस प्रयोजन के लिए लगाने लगे तो निश्चय ही उस क्षेत्र में नव-जागरण का माहौल बनेगा और उत्साहवर्धक परिवर्धन अभिवर्धन का प्रवाह देखते-देखते चल पड़ेगा। समय की अनुकूलता में स्वल्प प्रयत्न भी सफल होते देखे गये हैं। हवा का रुख अनुकूल हो तो हर किसी की चाल में अनायास ही अभिवृद्धि होती है।
स्वाध्याय मण्डल की स्थापना को हर प्रज्ञा पुरश्चरण केन्द्र के साथ जोड़ा जाना चाहिए। अनेक बार कहा जा चुका है कि यह बिना निजी इमारत के प्रज्ञा संस्थान है। स्थान की तो हर कार्य के लिए आवश्यकता होती है, पर यह आवश्यक नहीं कि वह अपना निजी ही हो। किराये के, माँगे के, साझे के स्थानों में भी तो लोग गुजारा करते हैं। सब लोगों के पास अपने निजी मकान कहाँ होते हैं।
स्वाध्याय मण्डल गतिशील है। वहाँ उनकी पूर्व निर्धारित गतिविधियों में एक नितान्त आवश्यक प्रक्रिया प्रज्ञा पुरश्चरण की उस क्षेत्र में व्यापक बनाने की भी चाहिए। इसी प्रकार जहाँ भी प्रज्ञा पुरश्चरण की प्रक्रिया कार्यान्वित हो वहाँ प्रज्ञा पीठ न सही स्वाध्याय मण्डल के रूप में प्रज्ञा संस्थान खड़ा करने का पुरुषार्थ भी प्रकट होना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-June
स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थान’। उन्हें बिना इमारत के छोटा प्रज्ञापीठ समझा जाना चाहिए। उनके जिम्मे भी वही कार्यक्रम सौंपे गये हैं जो बड़े प्रज्ञा पीठों को बड़े रूप में वहन करने पड़ रहे हैं। स्वाध्याय से शुभारम्भ होने के कारण उसकी प्रधानता रखी गई है। पर जड़ जमते ही पेड़ों से नई पत्तियाँ निकल पड़ेंगी।
स्वाध्याय से शुभारम्भ होने के कारण उसकी प्रधानता रखी गई है। पर जड़ जमते ही पेड़ों से नई पत्तियाँ निकल पड़ेंगी। पंचसूत्री कार्यक्रम इन दिनों प्रायः सभी प्रज्ञा संस्थानों को चलाना पड़ रहा है। (1) शिक्षितों को नित्य नियमित रूप से प्रज्ञा साहित्य पढ़ाना वापिस लेना (2) जन्म दिवसोत्सव के माध्यम से परिवार निर्माण की ज्ञान गोष्ठियाँ चलाना (3) स्लाइड प्रोजेक्टर एवं टेप रिकार्डर के माध्यम से हर गली मुहल्ले में सत्संग की व्यवस्था (4) दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन एवं घर कमरों में उन्हें कलण्डरों की तरह लटकाना (5) पर्व त्यौहारों के अवसर पर विशेष प्रज्ञा आयोजन, उस अवसर पर बुराइयाँ छुड़वाने, अच्छाइयाँ अपनाने के लिए संकल्प। यह कार्य ऐसे हैं जिसके सहारे जन जागरण के लिए जन संपर्क का एक सुनिश्चित कार्यक्रम चलता है।
स्वाध्याय मण्डल का यह जन संपर्क कार्यक्रम हुआ। संचालक लोग अपना समय देकर इसे चलायें। इस संदर्भ में नया प्रज्ञा साहित्य मँगाते रहने की दूसरी आवश्यकता सामने आती है। इस निमित्त एक रुपया हर दिन का बजट रखा गया है। एक रुपया प्रतिदिन अर्थात् तीस रुपया मासिक।
स्वाध्याय मण्डलों के साथ प्रज्ञा संस्थान नाम को भी जोड़ा गया है। इनका पूरा नाम है ‘स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थान’। उन्हें बिना इमारत के छोटा प्रज्ञापीठ समझा जाना चाहिए। उनके जिम्मे भी वही कार्यक्रम सौंपे गये हैं जो बड़े प्रज्ञा पीठों को बड़े रूप में वहन करने पड़ रहे हैं। स्वाध्याय से शुभारम्भ होने के कारण उसकी प्रधानता रखी गई है।
स्वाध्याय मण्डल यदि उपरोक्त पंचसूत्री संपर्क योजना का प्रथम चरण पूरा कर लेते हैं तो उनमें इतनी सामर्थ्य उभरेगी कि सृजन और सुधार के लिए जो अगले चरण निर्धारित हैं, उन्हें भली प्रकार सम्पन्न कर सकें।
स्वाध्याय मण्डल स्थापित करें और उसे उमंग भरे वातावरण में सजीव सक्रिय रखें।
स्वाध्याय परिवार के जितने सदस्य आरम्भ में बने, उन्हें एक-एक करके नित्य एक पुस्तिका पढ़ाने का क्रम नियमित रूप से चलाया जा सकता है। आगे से सामान्य क्रम चलेगा। बारह रुपये के फोल्डर और अठारह रुपये की पुस्तकें। युग निर्माण योजना मथुरा के पते पर पत्र भेजकर पुस्तक की सूची मँगाई जा सकती है। जुलाई से दिसम्बर तक के छः महीनों के लिए उसमें से यह चुना जा सकता है कि किस महीने किन पुस्तकों का पार्सल पहुँचे।
स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थान का गठन करे। उसे सुसंचालित रखे और सफल बनाये। इस सुलभ व सरल किन्तु परिणति की दृष्टि से उच्चस्तरीय प्रक्रिया को संपन्न करने में किसी को भी पीछे नहीं रहना चाहिए।
स्वाध्याय मण्डली की स्थापना पर पूरा जोर दिया गया ओर प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को कहा गया है। कि वे अपनी स्वतन्त्र सृजन शक्ति का परिचय देने के लिए निजी प्रयत्न पुरुषार्थ के सहारे एक स्वाध्याय मण्डल स्थापित करें और उसे उमंग भरे वातावरण में सजीव सक्रिय रखें।
स्वाध्याय मण्डल स्थापना में एक व्यक्ति संस्थापक होता है। वह अपने चार साथी और तलाश करके पाँच की एक कार्यकारी समिति बना लेता है। यह पाँच सदस्य अपना एक कार्यक्षेत्र बनाते हैं, जिसके न्यूनतम पाँच सदस्य हों। पाँच संचालक पच्चास सहयोगी- इस प्रकार वह तीस की मण्डली बन जाती है। संचालक स्वयं नित्य प्रज्ञा साहित्य पढ़ते और अपने पाँच सहयोगियों से नियमित रूप से पढ़ाते रहते हैं इस प्रकार एक मण्डल के अंतर्गत प्रायः तीस सदस्य ऐसे होते हैं जो नियमित रूप से युग साहित्य के पढ़ने का क्रम चलाते हैं।
स्वाध्याय मण्डलों का संस्थापन संचालन। अपने समय का यह सर्व सुलभ कार्य ऐसा है जिसमें युग समस्याओं का समाधान भली प्रकार खोजा और पाया जा सकता है।
स्वाध्याय मण्डल जैसे-जैसे जन समर्थन प्राप्त करते चलने में सफल होंगे वैसे-वैसे उन्हें लोक-मानस के परिष्कार तक सीमित न रहकर सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के उभयपक्षीय कार्यक्रम हाथ में लेने एवं सफल कर दिखाने होंगे। 500 करोड़ मनुष्यों के भाग्य का निर्धारण इन्हीं दिनों होना है। उसके लिए सृष्टा की परिवर्तन व्यवस्था में सभी प्रज्ञा परिजनों को अपनी भूमिका निभानी है। इसके लिए एक सुनियोजित मंच चाहिए जिसके माध्यम से क्रमिक गति से आगे बढ़ते हुए विश्व का अभिनव निर्माण के लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव हो सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-October
स्वाध्याय, सत्संग अथवा सेवा-कार्यों द्वारा सहज ही में किया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-January
स्वाध्याय, सेवा और संयम की चतुर्विधि तपश्चर्या चातुर्मास से जो कर सकें उन्हें सौभाग्यवान कहा जाना चाहिये। ऐसे सौभाग्यवानों का प्रशिक्षण करने का अवसर हमें तीन वर्ष मिलेगा यह हमारा भी एक सौभाग्य ही होगा।
स्वाध्यायशील बनना है। बहुत ध्यानपूर्वक दोनों पत्रिकाओं और ट्रैक्टों को पढ़ना है ताकि अपना अन्तरंग और बहिरंग जीवन सुदृढ़ आधार पर विनिर्मित करने की प्रेरणा मिल सके। इसके साथ ही परिवार के हर शिक्षित अशिक्षित सदस्य को इस विचारणा के संपर्क में लाने का पूरा-पूरा प्रयत्न करना है। जो शिक्षित हैं उन्हें अनुरोध और आग्रहपूर्वक इस विचार पद्धति को पढ़ने समझने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और जो पढ़े नहीं हैं उन्हें सुनाने के लिये परिवार गोष्ठी का आयोजन किया जाना चाहिये। निबन्ध व ट्रैक्ट, जीवन चरित्र, कथा साहित्य सभी में रोचकता है।
स्वाध्यायशील व्यक्ति ऐसा उत्पन्न किया जाना चाहिए जो परमार्थ बुद्धि से महान कार्य में अपना पूरा समय लगाने लगे। प्रातःकाल से लेकर मध्याह्न अथवा तीसरे पहर तक उन्हें अपना झोला-पुस्तकालय लेकर अपने क्षेत्र के शिक्षित व्यक्तियों के पास जाना चाहिए और नवनिर्माण साहित्य का महत्व समझाकर उनमें पढ़ने की उत्सुकता उत्पन्न करनी चाहिए। तब जिस व्यक्ति की जैसी मनोभूमि हो, उसके अनुरूप उसे वह पुस्तक पढ़ने देनी चाहिए। मनुष्य की रुचि, प्रवृत्ति और आवश्यकता के अनुरूप साहित्य देने का मनोविज्ञान जिसकी समझ में आ गया वह घर-घर में उत्सुक रहने वाले पाठक उत्पन्न कर लेगा। जो यह न समझ सका, रुचि से विपरीत साहित्य बाँटने लगा वह असफल रहेगा।
स्वाध्याय के लिए समय नियत रखने की आवश्यकता अनुभव कराना।
स्वाध्याय संवर्धन। आज व्यक्ति और समाज को बुरी तरह अज्ञान ने-विपरीत धारणाओं ने जकड़ रखा है। इस अन्धकार का निराकरण और विवेक-सम्मत विचारणा प्रदान करने वाले प्रकाश की आज महती आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति किये बिना दुःखद परिस्थितियों से- शोक सन्तापों से छुटकारा न मिल सकेगा। इसलिये हमें ऐसी प्रखर विचारणा एवं प्रेरणा उपलब्ध करनी चाहिए जो मनोभूमि को झकझोर कर रखदे और उल्टे मार्ग पर चलने से रोक कर सन्मार्ग पर चलने का साहस प्रदान करे।
स्वाध्याय-सम्वर्धन। नियत जन्म तिथि पर एक छोटा उत्सव आयोजन हर साधक करे और उस दिन अपने जीवन का स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग के बारे में बारंबार गम्भीर विचार किया जाय।
स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन से क्रमशः उत्पन्न और परिपक्व होती है। जो भावावेश में एक ही क्षण दुर्जन से सज्जन बन जाते हैं उन्हें फिर फिसल कर दूसरे ही दिन अपनी पुरानी जगह पहुँचने में देर नहीं लगती। इसलिए नई दुनियाँ बसाने के लिए आज जो क्रम शुरू किया जाता है वह यह है कि उत्कृष्टता की विचारणा का वैज्ञानिक और बुद्धिसंगत, तर्क और प्रयासों से परिपुष्ट स्वरूप जन साधारण की मनोभूमि तक पहुँचाने के लिए अथक प्रयत्न किया जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-February
स्वाध्याय अथवा सत्संग जिसकी भी आवश्यकता हो उसे पूरा करने में प्रमाद अथवा आलस्य नहीं करना चाहिये।
स्वाध्याय नितान्त आवश्यक है। एक घण्टा समय और दस पैसा रोज इस ज्ञान यज्ञ के लिए जिनने अभी खर्च करने का क्रम नहीं बनाया है, उन्हें अब बना लेना चाहिए। इसमें न तो कंजूसी करनी चाहिए और न उपेक्षा बरतनी चाहिए। पेड़ के सहारे बेल ऊँची चढ़ती है। स्वाध्याय और सत्संग के सहारे आत्मिक स्तर उठता है।
स्वाध्याय और सत्संग घर बैठे उपलब्ध करने की जो प्रक्रिया युग-निर्माण के अंतर्गत चल रही है, उस लाभ से किसी को भी वंचित नहीं रहना चाहिए। जेवर, जायदाद और नोट नहीं, परिवार की सच्ची सम्पत्ति जीवन निर्माण का प्रेरणाप्रद साहित्य है। अपने घर में एक ज्ञान मन्दिर- घरेलू नव निर्माण पुस्तकालय- रखना चाहिए, जिससे स्वयं को, अपने परिवार को, पड़ौसी और मित्रों को प्रेरणाप्रद प्रकाश मिलता रहे। यह ज्ञान यज्ञ हर घर में चलते रहना चाहिए। अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाएं तथा सस्ते ट्रैक्टों में कुछ पैसा खर्च करके इसी 40 दिन की अवधि में हमें अपना ज्ञान मन्दिर आरम्भ कर लेना चाहिए और दस पैसा प्रतिदिन इस ज्ञान-यज्ञ के लिए निकाल कर आगे भी इस भण्डार को बढ़ाने का क्रम जारी रखना चाहिए।
स्वाध्याय और सत्संग के सहारे आत्मिक स्तर उठता है। उपयुक्त स्वाध्याय और सत्संग घर बैठे उपलब्ध करने की जो प्रक्रिया युग-निर्माण के अंतर्गत चल रही है, उस लाभ से किसी को भी वंचित नहीं रहना चाहिए। जेवर, जायदाद और नोट नहीं, परिवार की सच्ची सम्पत्ति जीवन निर्माण का प्रेरणाप्रद साहित्य है। अपने घर में एक ज्ञान मन्दिर- घरेलू नव निर्माण पुस्तकालय- रखना चाहिए, जिससे स्वयं को, अपने परिवार को, पड़ौसी और मित्रों को प्रेरणाप्रद प्रकाश मिलता रहे। यह ज्ञान यज्ञ हर घर में चलते रहना चाहिए।
स्वाध्याय और स्वाध्याय के लिए पुस्तकों की जो आवश्यकता है वह किसी भी योग्य पुस्तकालय से पूरी हो सकती है। पुस्तकें माँगकर भी काम चलाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त वह स्वाध्याय सत्संग के माध्यम से भी किया जा सकता है। इसमें तो किसी प्रकार के व्यय की आवश्यकता है ही नहीं।
स्वाध्याय आत्मा का भोजन है। अपना पेट काट कर भी, आवश्यक कार्यों में कमी करके भी जीवन साहित्य को पढ़ने के लिए समय निकालना चाहिए। मानसिक शुद्धि के लिए, आत्मा की क्षुधा बुझाने के लिए ऐसा स्वाध्याय नितान्त आवश्यक है। एक घण्टा समय और दस पैसा रोज इस ज्ञान यज्ञ के लिए जिनने अभी खर्च करने का क्रम नहीं बनाया है, उन्हें अब बना लेना चाहिए। इसमें न तो कंजूसी करनी चाहिए और न उपेक्षा बरतनी चाहिए।
स्वाध्याय के लिए पुस्तकों की जो आवश्यकता है वह किसी भी योग्य पुस्तकालय से पूरी हो सकती है। पुस्तकें माँगकर भी काम चलाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त वह स्वाध्याय सत्संग के माध्यम से भी किया जा सकता है। इसमें तो किसी प्रकार के व्यय की आवश्यकता है ही नहीं।
स्वाध्याय सत्संग के माध्यम से भी किया जा सकता है। इसमें तो किसी प्रकार के व्यय की आवश्यकता है ही नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-November
स्वाध्याय और महात्माओं का सत्संग वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने में सहायक तो हो सकता है, किन्तु इसका उपार्जन तो मनुष्य को स्वयं ही आत्म-चिन्तन एवं मनन द्वारा ही करना पड़ता है। पुस्तक पढ़ लेने अथवा किसी महात्मा का कथन सुन लेने भर से वास्तविक ज्ञान की उपलब्धि नहीं हो सकती। वास्तविक ज्ञात तो आत्मानुभूति के द्वारा ही सम्भव हो सकता है।
स्वाध्याय करना पड़े, सत्संग अथवा चिन्तन मनन करना पड़े, आराधना, उपासना अथवा पूजा-पाठ करना पड़े। वास्तविक ज्ञान के बिना न तो जीवन में सच्ची शान्ति मिलती है और न उसको परकल्याण प्राप्त होता है।
स्वाध्याय, 3 व्यायाम) की सार्थकता संगीत से सम्पन्न होती हैं, इसलिये संगीत साधना को हम सभी मानसिक तनावों के निराकरण की अचूक औषधि भी कहते हैं। संगीत के अभ्यास और श्रवणकाल दोनों में मन को विश्रान्ति ही नहीं, आत्म-प्रसाद भी प्राप्त होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-March
स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने देंगे।
स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-December
स्वाध्याय में प्रमाद न करें। (107) बोलिये तो पर इस तरह। (108) बच्चों का भावनात्मक विकास। (110) बच्चों का प्रशिक्षण घर की पाठशाला में। (111) चरित्र का निर्माण सबसे बड़ा निर्माण।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-April
स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे।
स्वाध्याय तथा सत्संग ही एक मात्र उपाय है। इस जमाने में सत्संग के नाम पर भ्रम-जंजाल में भटका देने वाले साधु बाबाओं और कथा-वाचकों की ऐसी माया फैली पड़ी है जो सीधे रास्ते पर चलने वाले को उल्टा भटका दे। अब सत्संग भी लगभग असंभव है क्योंकि विचारशील व्यस्त रहते हैं और जिनके पास समय है, वे उल्टे भ्रम में डालते हैं। सामाजिक विचारशील और चरित्रवान लोगों का सत्संग उनके साहित्य से ही मिल सकता है। युग-निर्माण योजना द्वारा प्रस्तुत सत्-साहित्य ही हमारी स्वाध्याय की आवश्यकता को पूरा कर सकता है।
स्वाध्याय की आवश्यकता को पूरा कर सकता है।
स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने देंगे।
स्वाध्याय नित्य करना चाहिये। जीवन-निर्माण के लिए उपयुक्त सत्साहित्य नित्य पढ़ना चाहिये। मस्तिष्क पर सारे संसार में फैले हुए अनुपयुक्त वातावरण की छाप अनायास ही पड़ती रहती है। इस मलीनता को रोज स्वच्छ करने के लिए स्वाध्याय तथा सत्संग ही एक मात्र उपाय है। इस जमाने में सत्संग के नाम पर भ्रम-जंजाल में भटका देने वाले साधु बाबाओं और कथा-वाचकों की ऐसी माया फैली पड़ी है जो सीधे रास्ते पर चलने वाले को उल्टा भटका दे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-June
स्वाध्याय में प्रमाद न करें। (107) बोलिये तो पर इस तरह। (108) बच्चों का भावनात्मक विकास। (110) बच्चों का प्रशिक्षण घर की पाठशाला में। (111) चरित्र का निर्माण सबसे बड़ा निर्माण।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-July
स्वाध्याय के लिए धार्मिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक, साहित्य जो किन्हीं प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा ही प्रणयन किया गया हो उचित होता है। निरर्थक, निस्सार और अनुपयोगी साहित्य पढ़ने वाला एक बार किन्हीं विषयों का विद्वान भले हो जाये किन्तु ज्ञानी नहीं हो सकता। बहुत कुछ जानते हुए भी उसकी जीवन-गति एक सीमित परिधि में ही चक्कर लगाती रहेगी।
स्वाध्याय के लिए निर्वाचित विषय ऊंचा आदर्श और पुनीत होना आवश्यक है। ओछे और निम्नकोटि का साहित्य स्वाध्यायी को भी अपने समान ही बना लेता है। स्वाध्याय के लिए धार्मिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक, साहित्य जो किन्हीं प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा ही प्रणयन किया गया हो उचित होता है। निरर्थक, निस्सार और अनुपयोगी साहित्य पढ़ने वाला एक बार किन्हीं विषयों का विद्वान भले हो जाये किन्तु ज्ञानी नहीं हो सकता। बहुत कुछ जानते हुए भी उसकी जीवन-गति एक सीमित परिधि में ही चक्कर लगाती रहेगी।
स्वाध्याय एक पुरुषार्थ है। उसे करते समय चित्त की सारी वृत्तियाँ एकाग्र कर विषय पर ही केन्द्रित करनी पड़ती है। एक-एक अक्षर, एक-एक वाक्य और एक-एक प्रकरण ध्यान से ग्रहण करते हुए पढ़ना पड़ता है। इसके अतिरिक्त जब जितना भी पढ़ा होता है उस पर तब तक चिन्तन और मनन करना पड़ता है, जब तक वह पूरी तरह बुद्धिसात् न हो जाय। इस प्रकार बुद्धिसात् हुआ विषय जब आचरण में उतर आता है, तभी वह सच्चा ज्ञान बनता है।
स्वाध्यायी को भी अपने समान ही बना लेता है। स्वाध्याय के लिए धार्मिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक, साहित्य जो किन्हीं प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा ही प्रणयन किया गया हो उचित होता है। निरर्थक, निस्सार और अनुपयोगी साहित्य पढ़ने वाला एक बार किन्हीं विषयों का विद्वान भले हो जाये किन्तु ज्ञानी नहीं हो सकता। बहुत कुछ जानते हुए भी उसकी जीवन-गति एक सीमित परिधि में ही चक्कर लगाती रहेगी।
स्वाध्याय की सुविधा है, उनको कहीं किसी के पास जाने की आवश्यकता नहीं है। वे अपने घर पर ही पुस्तकों और अपनी शिक्षा की सहायता से ज्ञान प्राप्त करने का पुरुषार्थ कर सकते हैं। किन्तु स्वाध्याय और पठन में एक बड़ा अन्तर होता है। पठन तो केवल उस पढ़ने को कहते हैं, जो सरसरी दृष्टि से मनोरंजन के लिये कोई पुस्तक पढ़ी जाती है। स्वाध्याय एक पुरुषार्थ है।
स्वाध्याय और पठन में एक बड़ा अन्तर होता है। पठन तो केवल उस पढ़ने को कहते हैं, जो सरसरी दृष्टि से मनोरंजन के लिये कोई पुस्तक पढ़ी जाती है। स्वाध्याय एक पुरुषार्थ है। उसे करते समय चित्त की सारी वृत्तियाँ एकाग्र कर विषय पर ही केन्द्रित करनी पड़ती है। एक-एक अक्षर, एक-एक वाक्य और एक-एक प्रकरण ध्यान से ग्रहण करते हुए पढ़ना पड़ता है।
स्वाध्याय, चिन्तन-मनन और अनुभव के आधार पर व्यक्ति को सद्ज्ञान प्राप्त करने का निरन्तर प्रयास करते ही रहना चाहिये।
स्वाध्याय, चिन्तन, मनन और अनुभव। जिज्ञासा लेकर ज्ञानी पुरुषों के पास जाया जाय और उनसे सत्संग प्रदान करने की प्रार्थना की जाय। वे जो कुछ कहें अथवा बतलायें वह ध्यान से सुना जाये और विश्वासपूर्वक उसे न केवल हृदयंगम किया जाये बल्कि उस पर यथोचित आचरण भी किया जाये। उन व्यक्तियों के लिए जिन्हें शिक्षा का अवसर नहीं मिला है, सत्संग ही एक उपाय है। जिससे ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है।
स्वाध्यायवान ही जान सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-August
स्वाध्याय तो वह कि जो कुछ थोड़ा-बहुत पढ़ा जाये उसको अपने अन्दर ठीक तरह से मनन और आत्मसात् किया जाये। और सत्संग वह कि योग्य व्यक्तियों की पुस्तकों को ही उनका स्वरूप और उसके विषय को ही उनका प्रवचन मान लिया जाये। निःसन्देह ऐसी निष्ठा एवं आस्था रखने वालों को पुस्तक का सान्निध्य भी विद्वान के संपर्क की तरह ही फलीभूत होता है। पुस्तकों के माध्यम से वर्तमान एवं दूरस्थ व्यक्तियों का ही नहीं सुदूर भूतकाल में चले गये, विद्वानों, चिन्तकों, मनीषियों तथा महात्माओं का सत्संग प्राप्त किया जा सकता है।
स्वाध्याय कक्षों में, बड़े बुकसेलरों के यहाँ ढूंढ़ी जा सकती है। जहाँ पढ़ने को मिल सकती हों वहाँ उस तरह और जहाँ खरीदनी पड़े वहाँ खरीदा जा सकता है। इन पुस्तकों में से अनेक काम के साराँश नोट किये जायें।
स्वाध्याय ही है। पुस्तकालयों से माँग कर अथवा खरीद कर जिस प्रकार हो सके खोज-खोज कर सत्साहित्य का स्वाध्याय, चिन्तन और मनन करते रहना ही चाहिये और सत्साहित्य वही हो सकता है, जो हमें ज्ञान का ऐसा प्रकाश प्रदान करे, जिसमें हम अपने को अपनी आत्मा को और अपनी शक्तियों को ठीक से पहचान सकें।
स्वाध्याय को ही स्वाध्याय एवं सत्संग दोनों मान लिया जाये। स्वाध्याय तो वह कि जो कुछ थोड़ा-बहुत पढ़ा जाये उसको अपने अन्दर ठीक तरह से मनन और आत्मसात् किया जाये। और सत्संग वह कि योग्य व्यक्तियों की पुस्तकों को ही उनका स्वरूप और उसके विषय को ही उनका प्रवचन मान लिया जाये। निःसन्देह ऐसी निष्ठा एवं आस्था रखने वालों को पुस्तक का सान्निध्य भी विद्वान के संपर्क की तरह ही फलीभूत होता है। पुस्तकों के माध्यम से वर्तमान एवं दूरस्थ व्यक्तियों का ही नहीं सुदूर भूतकाल में चले गये, विद्वानों, चिन्तकों, मनीषियों तथा महात्माओं का सत्संग प्राप्त किया जा सकता है।
स्वाध्यायशील भी। इस बात को वेद में यों व्यक्त किया है-
स्वाध्याय से बढ़ कर कोई उपाय नहीं है।
स्वाध्याय और सत्संग मानवीय जीवनाकाश में सूर्य और चन्द्रमा के समान चमकने वाले दो प्रकाश-केन्द्र हैं। जिस जीवन में इनका उदय हो जाता है, वहाँ अविद्या का अन्धकार रह ही नहीं सकता। इसके विपरीत जिस जीवन में इनको उदय करने का प्रयत्न न किया जायेगा, वहाँ अज्ञान के अन्धकार के सिवाय और किसी माँगलिक स्थिति की आशा ही नहीं की जा सकती।
स्वाध्याय ही सर्वोत्तम साधन है।
स्वाध्याय और सत्संग के सिवाय और क्या हो सकता है? स्वाध्याय और सत्संग मानवीय जीवनाकाश में सूर्य और चन्द्रमा के समान चमकने वाले दो प्रकाश-केन्द्र हैं। जिस जीवन में इनका उदय हो जाता है, वहाँ अविद्या का अन्धकार रह ही नहीं सकता। इसके विपरीत जिस जीवन में इनको उदय करने का प्रयत्न न किया जायेगा, वहाँ अज्ञान के अन्धकार के सिवाय और किसी माँगलिक स्थिति की आशा ही नहीं की जा सकती।
स्वाध्याय, चिन्तन और मनन करते रहना ही चाहिये और सत्साहित्य वही हो सकता है, जो हमें ज्ञान का ऐसा प्रकाश प्रदान करे, जिसमें हम अपने को अपनी आत्मा को और अपनी शक्तियों को ठीक से पहचान सकें।
स्वाध्याय एवं सत्संग दोनों मान लिया जाये। स्वाध्याय तो वह कि जो कुछ थोड़ा-बहुत पढ़ा जाये उसको अपने अन्दर ठीक तरह से मनन और आत्मसात् किया जाये। और सत्संग वह कि योग्य व्यक्तियों की पुस्तकों को ही उनका स्वरूप और उसके विषय को ही उनका प्रवचन मान लिया जाये। निःसन्देह ऐसी निष्ठा एवं आस्था रखने वालों को पुस्तक का सान्निध्य भी विद्वान के संपर्क की तरह ही फलीभूत होता है। पुस्तकों के माध्यम से वर्तमान एवं दूरस्थ व्यक्तियों का ही नहीं सुदूर भूतकाल में चले गये, विद्वानों, चिन्तकों, मनीषियों तथा महात्माओं का सत्संग प्राप्त किया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-September
स्वाध्याय, सत्संग, मनन और चिन्तन की चतुर्विधि साधन सामग्री से सभी परिचित हैं। इससे अपने मनःक्षेत्र को घेरे रहने वाला उपयोगी वातावरण बनता है। लेकिन इन सबसे कहीं अधिक सर्वसुलभ और सर्वश्रेष्ठ उपाय है- ध्यान। मनोमयकोश के परिष्कार की यह सर्वोत्तम साधना विधि है। ध्यानमग्न होकर हम अपने ईष्ट के साथ श्रद्धासिक्त घनिष्ठता स्थापित करके तादात्म्य की दिशा में बढ़ते चले जाते हैं।
स्वाध्याय करना चाहिए, जो निवृत्ति मार्ग का प्रतिपादन करते हैं अर्थात् ब्रह्म (ईश्वर) की एकता का प्रतिपादन करते हैं। (उत्तेजक, हिंसक नहीं) मात्र पवित्र जल का ही सेवन किया जाना चाहिए। (शराब या अपवित्र जल आदि का नहीं) आध्यात्मिक लोगों का ही संग करना चाहिए (प्रपंची या दुष्ट लोगों का नहीं)। एकाँत स्थान को प्राथमिकता देनी चाहिए (भीड़ या जुआ घर नहीं)। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त का या कोई ऐसा समय ध्यान के लिए चुनना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-July
स्वाध्याय के सम्मिश्रण से उनको आत्मज्ञान की अनुभूति हो जाती थी। विद्यार्थी केवल गुण-पुँज या ज्ञान-पुँज ही नहीं, शक्ति-पुँज होकर भी निकलते थे। फलस्वरूप उन्हें भौतिक सुखों की कोई आकाँक्षा नहीं होती थी। जब वे अधिकार नहीं कर्त्तव्य माँगते थे। सेवा को वे व्रत समझते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-August
स्वाध्यायजनित समझ और ध्यानजनित अनुभव में अर्थात् ज्ञानाग्नि में दग्ध हो गई हैं, जलकर भस्म हो गई हैं (ज्ञानग्निदग्ध कर्माणं) जो जिस कार्य को हाथ में ले, उसे दिव्यता प्रदान करे, वही सही अर्थों में ज्ञानी है, पंडित है। परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर यही किया। उन्होंने कहा, ‘यह कार्य महाकाल का है। युग के नवनिर्माण की योजना परमसत्ता की है। हमारा संकल्प इनके साथ मिला हुआ है।
स्वाध्याय एवं सद्चिंतन में लगाए रहना चाहिए। मन को साध लेने पर वह वरदान बन जाता है। मन एक देहरी पर खड़ा नीचे दृश्य जगत् की ओर झाँक सकता है और ऊपर चेतना के उच्चस्तरीय आयामों में भी गति कर सकता है। अच्छा यही है कि सतत साधना से हम इसे उच्चस्तरीय आयामों की ओर प्रेरित करें।
स्वाध्याय के साथ हाथ में लेने को कहा गया है, ताकि कार्यकर्ताओं का समग्र विकास हो सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-November
स्वाध्याय के क्रम में मात्र निर्धारित पुस्तकों का ही पठन-पाठन, चिंतन-मनन।
स्वाध्याय एवं चिंतन, मनन अतीव उपयोगी एवं सहयोगी हैं। इसी के प्रकाश में इच्छा शक्ति के जागरण एवं विकास की प्रक्रिया गति पकड़ती है, जिसमें तीन चीजें अभिन्न रूप से जुड़ी होती हैं- 1. सत् और असत्, उचित और अनुचित के बीच सतत विवेक, 2. जो सही है, उसको करने में संलग्नता और 3. जो अवाँछनीय व अनुचित है, उसके प्रतिकार में जागरुकता।
स्वाध्याय कर सकेंगे। समाचार पत्रों की दुनिया से पाँच दिन कटकर रहना होगा। 4. भोजन साधक की स्थिति के अनुसार यहीं से निर्धारित कर दिया जाएगा। अन्य किसी पदार्थ का सेवन नहीं कर सकेंगे। 5. अपने साथ किसी भी ऐसे व्यक्ति को लेकर नहीं आएंगे, जिन्हें अलग न ठहराया जा सके या उसकी देखभाल की चिंता करनी पड़े।
स्वाध्याय, मनन-चिंतन हेतु रखा गया है। इस समग्र दिनचर्या से साढ़े चार दिन में साधक काफी कुछ शक्ति का उपार्जन कर सकेंगे, अपनी जीवन की दिशाधारा का निर्धारण कर सकेंगे। प्रत्येक सत्र में 20 व्यक्तियों को ही स्थान दिया गया है, साथ ही इनका पंजीयन कड़ी जाँच-पड़ताल के बाद किया जा रहा है। इसलिए जिस किसी को भी आना हो, पत्राचार करके सुनिश्चित अनुमति मिल जाने के बाद ही आना चाहिए।
स्वाध्याय का अवकाश तथा 6.015 सायं से 7 रात्रि तक का समय भोजन के लिए सुरक्षित रखा गया है। रात्रि 7.30 से 8.15 स्वाध्याय, मनन-चिंतन हेतु रखा गया है। इस समग्र दिनचर्या से साढ़े चार दिन में साधक काफी कुछ शक्ति का उपार्जन कर सकेंगे, अपनी जीवन की दिशाधारा का निर्धारण कर सकेंगे। प्रत्येक सत्र में 20 व्यक्तियों को ही स्थान दिया गया है, साथ ही इनका पंजीयन कड़ी जाँच-पड़ताल के बाद किया जा रहा है। इसलिए जिस किसी को भी आना हो, पत्राचार करके सुनिश्चित अनुमति मिल जाने के बाद ही आना चाहिए।
स्वाध्यायजनित समझ-बूझ के माध्यम से हर क्षण प्रभु में ही लीन होकर कार्य करता है। वह जो भी कार्य करता है, चूँकि उसकी उसके फल के प्रति आसक्ति नहीं है, वह करता हुआ भी उसे न करने वाला बन जाता है।
स्वाध्याय ओर सेवा यही जीवन के मूल मंत्र हैं। इन्द्रिय समेत मन को बुद्धि और आत्मा के नियंत्रण में रखकर ही गृहस्थ जीवन में सुख पाया जा सकता है। महर्षि के इस प्रबोध के बावजूद शौर्यायणी गार्ग्य अभी तक अशान्त थे। उसने ऋषिप्रवर के सम्मुख अपनी जिज्ञासा प्रकट की-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-February
स्वाध्याय भी बहुत लाभदायक होता हैं। भगवत् प्राप्त महापुरुषों के अनुभवयुक्त वचनों में बड़ा प्रभाव होता है और आत्मा को प्रकाशित करने की सामर्थ्य रखता है।
स्वाध्याय भी बहुत लाभदायक होता है। भगवत् प्राप्त महापुरुषों के अनुभवयुक्त वचनों में बड़ा प्रभाव होता है और आत्मा को प्रकाशित करने की सामर्थ्य रखता है ।
स्वाध्यायक्रम में हम से की जा रही हैं।
स्वाध्याय मंडलों एवं महिला मंडलों का उनसे संपर्क अब प्रशिक्षण स्तर पर जुड़ जाना चाहिए। यही सोचकर उस वर्ष माँग के अनुपात में कितने दल हम निकाल सकते हैं, यह देखकर मार्च 2002 से प्रति तीन माह न्यूनतम दो−दो सब दो सौ शक्तिपीठों पर आरंभ करने का मन है। प्रत्येक पीठ पर यह प्रति तीन माह के अंतर से पाँच दिन के लिए चलेंगे। 1 से 5 साधनाप्रधान चल सकता है एवं 21 से 25 आँदोलनप्रधान। यह तो मात्र नमूने के लिए लिखा गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-May
स्वाध्याय की तुलना दर्शनेंद्रिय से की है, जो व्यवहार जगत् में देखती और अच्छा-बुरा समझकर देहपुरी के स्वामी को तदनुसार चलने का निर्देश देती है। देखने समझने की इस क्षमता को सक्रिय समर्थ बनाए रहने के उपाय का नाम है ‘स्वाध्याय’।
स्वाध्याय’।
स्वाध्याय का मोटा अर्थ सत्शास्त्रों का अध्ययन है शाब्दिक अर्थ अपने आपका अध्ययन भी है। अपने आप के बारे में कोई पहचान या समझ अनायास ही नहीं आ जाती। वह मार्गदर्शक सत्ता से प्राप्त हुई हो, पिछले जनम के संस्कारों से उदित हुई हो या ईश्वर के अनुग्रह से जाग्रत हुई हो, तभी प्राप्त होती है। यह स्थिति ऊँची अवस्था में पहुँचे और किन्हीं कारणों से भटक गए साधकों को ही सुलभ होती है। भटकते रहने पर किसी घड़ी में कोई शुभ संस्कार जाग्रत होता है, तो अचानक ‘संबोधि’ का उदय होता है।
स्वाध्याय का अर्थ उससे अलग है और वह सिर्फ आत्मचेतना के विकास में सहायक होने की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। इतना नहीं होगा कि परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लिखा गया सृष्टि या स्वयं सिद्ध और उत्कृष्ट श्रेणी की निधि है। साधना उपासना का प्रभाव हो रहा है या नहीं, इस सही दिशा में बढ़ रहे हैं या नहीं अथवा यथास्थिति ही बनी हुई है? यह जानने का उपाय समीक्षा के सिवा कोई नहीं हो सकता। साधना के क्षेत्र में जो भी पुरुषार्थ किया जाता है, उसका उद्देश्य अपने आपको ऊपर उठाना है।
स्वाध्याय’ की अगली कड़ी है। आत्मविकास को दिशा देने और जीवन की गुत्थियाँ सुलझाने वाला साहित्य पढ़ने के लिए कम से कम आधा घंटा तो लगाना ही चाहिए। किस साहित्य को सत समझें और किसे असत्? इस प्रश्न का उत्तर कठिन है। जिसे पढ़ने से मन में आशा, उत्साह, स्फूर्ति, ऊर्जा और गुत्थियों को सुलझाने वाली दृष्टि का उदय हो, वह सत्साहित्य है।
स्वाध्याय के निज जीवन का अंग बनाएँ।
क्षमताओं का संचय करके जन-मंगल के लिए लगाएँ।
स्वाध्याय बताया। मनीषियों ने स्वाध्याय की तुलना दर्शनेंद्रिय से की है, जो व्यवहार जगत् में देखती और अच्छा-बुरा समझकर देहपुरी के स्वामी को तदनुसार चलने का निर्देश देती है। देखने समझने की इस क्षमता को सक्रिय समर्थ बनाए रहने के उपाय का नाम है ‘स्वाध्याय’।
स्वाध्याय करना।
स्वाध्याय और सत्संग की बात भी कर ली। इसके अतिरिक्त पूजापरक-उपासनापरक दो और भी आध्यात्मिक प्रयोग हैं, जो आपको करने ही चाहिए। इनमें से एक का नाम है, ‘चिंतन’ और दूसरे का नाम है, ‘मनन’। चिंतन और मनन के लिए किसी कर्मकाँड की जरूरत नहीं है, किसी पूजा-विधान की जरूरत नहीं है और किसी समय निर्धारण की जरूरत नहीं है। अच्छा तो यह हो कि इन सब कामों के लिए आप सबेरे का समय ही रखें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-March
स्वाध्याय भी कर डाला, परंतु फिर भी अपने अंदर अपूर्णता ही पाता हूँ। न तो मेरी कोई प्रशंसा करता है, न मुझे कोई स्नेह ही देता है।” मुनीश्वर बोले, ‘तात! तुमने कर्म व ज्ञान की दो धाराओं की तो उपासना कर ली, पर भावपक्ष को तो भूल ही गए। तुम स्नेह बाँटो, बदले में दस गुना पाओगे। सब जीवधारियों में अपनी ही आत्मा समाई मानकर स्वयं को भक्तिप्रवाह में सराबोर कर डालो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-April
स्वाध्याय में दत्तचित्त नहीं हो पाते। पिता को चिंतित देखकर वह तरह-तरह की बातें करके उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करती और जब इसमें वह असफल हो जाती, तो उनके पास जाकर वह धैर्य बँधाने लगती, पिता श्री क्यों चिंता करते हैं? यह रोग तो अपने आप ही निर्मूल हो जाएगा। औषधियाँ भी चल ही रही है। यदि निर्मल नहीं भी हो तो चिंता करने से क्या लाभ?
स्वाध्याय का दैनिक जीवन में स्थान रखिए। आप सेवा का दैनिक जीवन में स्थान रखिए, आप उपासना का दैनिक जीवन में स्थान रखिए। इन सब बातों का समन्वित जीवन का अभ्यास कर लें, तो कल प्रातःकाल वाला संध्यावंदन पूरा हो हो जाएगा।
स्वाध्याय परिवार सहित सिख-मुसलिम सभी संगठन अपने दल-बल के साथ चौबीस घंटों में पहुँचकर सक्रिय हो गए, तुरंत ही जीवितों को निकालने, उन्हें फर्स्ट एड देने, आर्थोपेडिक स्तर पर कुशलतम सहायता देने का क्रम आरंभ हो गया। सुदूर गाँवों में यह विशेषज्ञ स्तर की मदद देरी से पहुँची, पर स्वैच्छिक संगठनों ने अपनी ओर से कोई कसर न रखी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-December
स्वाध्याय और सत्संग करके अपने मन को माँजते रहे हैं- इसीलिए यह बात आपको समझ में आ सकी।’
स्वाध्याय, आत्मचिंतन एवं योगाभ्यास द्वारा जैसे एक नया इन्सान जन्म ले रहा था। पहली बार उसे यह प्रतीत हो रहा था कि, बाह्य जगत् का परिवर्तन, आँतरिक जगत् के विकास के अनुरूप ही होता है।
स्वाध्याय का सहारा लिया जाना चाहिए। कारण शरीर की साधना तो अपनी गुरु सत्ता को भाव भरा समर्पण करने से ही पूर्ण होती है समर्पण की गहनता हमें श्रद्धेय गुरुवर की तपचेतना एवं उनके द्वारा सम्पन्न किए जा रहे युग प्रत्यावर्तन का परिचय अपने आप ही दे देगी।
स्वाध्याय, तीर्थ, व्रत, ध्यान, धारणा, समाधि आदि अनेक उपायों में से सभी को कर सकना हर एक के लिए संभव नहीं। फिर सामान्य जन यह भी निर्णय नहीं कर सकते कि इनमें से किसे चुना जाए। कृपया आप ही मेरा समाधान करें कि सर्वसुलभ और सुनिश्चित मार्ग क्या है? अनेक मार्गों के भटकाव से निकालकर मुझे सरल अवलंबन का निर्देश कीजिए।’
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-October
स्वाध्याय−मनन−चिंतन हेतु होंगे। साधक अपनी विशिष्ट अनुभूतियों को लिख सकेंगे। बाद में इस आधार पर परामर्श एवं जिज्ञासा−समाधान भी पत्र द्वारा प्राप्त कर सकेंगे। समापन पर वे युगधर्म के परिपालन के क्रम में अपने अंदर उभरे संकल्प भी लिखकर देंगे। इनका भी विधिवत संकल्प कराया जाएगा।
स्वाध्याय का क्रम रहेगा। अपना कक्ष साफ करेंगे, संगीत चलता रहेगा। 17 से 17.15 नाड़ी शोधन प्राणायाम 17.15 से 17.30 अमृतवाणी एवं 17.30 से 18 खेचरी मुद्रा का क्रम चलेगा।
स्वाध्याय कहते हैं। इसकी पूर्णता से इष्ट देवता की उपलब्धि और साक्षात्कार होता है, ऐसा भगवान पतंजलि का कथन है, ‘स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः।’ (2/44)।
स्वाध्याय हेतु निर्धारित पुस्तकें ही दी जाएँगी। शेष समय अंतः चेतना की गहराइयों में उतरने एवं अंतर्मुखी गहन चिंतन−मनन हेतु लगाना होगा। पढ़ने के लिए पूरी साधनावधि तक समाचार पत्र, अन्य कोई साहित्य उपलब्ध नहीं होगा। भोजन, गंगाजल एवं प्रज्ञापेय साधना कक्षा में ही दोनों समय पहुँचा दिए जाएँगे। भोजन में हविष्यान्न की एक रोटी, औषधियों की चटनी एवं साधक की इच्छानुसार चावल या दलिया की सब्जी मिश्रित खिचड़ी दी जाएगी।
स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान−ये पाँच नियम हुए।
स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः।’ (2/44)।
स्वाध्याय, मनन−चिंतन हेतु रखा गया है तथा 20.15 से 20.50 तत्त्वबोध साधना (निर्देशों द्वारा) संपन्न होकर साधकों को योगनिद्रा एवं विश्राम में चले जाना है।
स्वाध्याय, मनन−चिंतन, 12.45 से अनुलोम−विलोम प्राणायाम, 13 से 13.30 जपयोग तथा 13.30 से 14.00 बिंदु योग अंतः त्राटक (दीपक की ज्योति) हेतु निर्धारित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-April
स्वाध्याय, सत्संग कार्यों में सदस्यगण बड़े चाव से भाग लेते हैं। -राम प्रसाद मिश्र
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-January
स्वाध्याय के बिना किसी भी व्यक्ति का विकास होना असम्भव है, परन्तु दूसरों के अध्ययन का लाभ उठाना तो उससे भी अधिक उपयोगी तथा आवश्यक है। अपने पास-पड़ोस की साहित्य एवं साँस्कृतिक संस्थाओं और गोष्ठियों की सदस्यता स्वीकार कीजिए और वहाँ नियम बनवाइये कि बारी-बारी से प्रत्येक सदस्य अपनी मौलिक कृति या पढ़ी हुई नवीन पुस्तक का साराँश लाकर पढ़ें। पुस्तकों के साराँशों में मूल पुस्तक के उत्तम-उत्तम अंश भी कहीं-कहीं उद्धृत किए जाने चाहिए। इस प्रकार का सामुदायिक अध्ययन आप के लिए बड़ा उपयोगी सिद्ध होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-February
स्वाध्याय, श्रवण, कथन एवं मनन करना।
स्वाध्याय कर सकते हैं। प्राइवेट परीक्षाओं में बैठ सकते हैं। निरर्थक कार्यों-जैसे व्यर्थ की गपशप, मित्रों के साथ इधर-उधर घूमना-फिरना, सिनेमा, अधिक सोना, देर से जागना, हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहना- से बच सकते हैं।
स्वाध्याय, भजन, कीर्तन, पूजन, सद्ग्रन्थावलोकन इत्यादि के लिए समय ही नहीं बचता।’
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-March
स्वाध्याय- मानव जीवन की अनेक समस्याओं को सुलझाने वाले उच्चकोटि के मनीषियों के लिखे हुए ग्रन्थों का अध्ययन।
स्वाध्याय से मनुष्य सत्-कार्यों में प्रवृत्त होता है और जघन्य कार्यों से मुँह मोड़ता है। गोस्वामी जी की रामायण में राम का आदर्श जीवन पढ़कर न जाने कितनों ने कुमार्ग से अपना पैर हटा लिया। महाराणा प्रताप और महाराज शिवाजी की जीवनियों ने लाखों व्यक्तियों को देश सेवा का पाठ पढ़ाया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-July
स्वाध्याय करते रहते फिर 3 से 6 बजे तक सम्मेलन की कार्यवाही आरम्भ हो जाती। आचार्य जी का प्रवचन नित्य ही होता, इसके पश्चात अन्य परिजन अपने अपने विचार प्रकट करते। 6 बजे ये सम्मेलन समाप्त होने के पश्चात शौच, स्नान, आरती, कीर्तन, भोजन का कार्यक्रम चलता। रात को परिजन परस्पर विचार विनिमय करते रहते और दस बजे चटाइयों पर सो जाते, रात्रि में मेजिक लालटेन तथा सिनेमा के चित्र भी दिखाये गये। मथुरा, वृंदावन की सामूहिक तीर्थ यात्रा भी हुई।
स्वाध्याय (2) प्रतिदिन धर्म सेवा के लिए कुछ समय लगाना तथा (3) रविवार को उपवास करके बचाया हुआ अन्न सद्ज्ञान प्रसार के लिए लगाना, यह तीन जिम्मेदारियाँ भी कंधे पर उठाना आवश्यक है। उपस्थित लोगों में से अधिकाँश ने अपने व्रतधारी प्रतिज्ञा पत्र सम्मेलन में ही भर दिये और अपनी शाखाओं में से और भी ऐसे ही सजीव सदस्य ढूँढ़ने का निश्चय किया।
स्वाध्याय-यज्ञ (अर्थात् विद्या और ज्ञान प्रदायक शास्त्रों का पठन-पाठन)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-November
स्वाध्याय, तप, व्रत, साधु-सेवा ये सभी मन को शुद्ध करने के साधन हैं। निश्चय ही ऐसे शुद्ध हुए मन में पूर्ण आनन्द रहेगा। मन्त्र भी मन को शुद्ध करता है, पर तोते की तरह मंत्र को केवल रटने से बहुत कम फल होता है। मन्त्र को भाव के साथ कहने से उसका आश्चर्यजनक फल होता है। तब तक मंत्र में अपने ही मन की पूर्ण इच्छा-शक्ति नहीं भरी जायेगी तब तक उसका बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं हो सकता।
स्वाध्याय द्वारा अपना गायत्री-ज्ञान बढ़ाने के साथ ही नियमित रूप से धर्म-प्रचार के लिये, धर्म-फेरी के लिए कुछ न कुछ समय भी लगाते रहेंगे। इस युग में ऐसे कार्यों की सफलता “भगवान” पर ही निर्भर रहती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-October
स्वाध्याय के साधन जुटाने पर बल देते हुए कहते हैं कि ‘‘जब सद्विचारों के फलस्वरूप उनमें रस आने लगता है जो आचरण में आने पर चरित्र का निर्माण करते हैं। उनका कहना है कि मनुष्य के आचरण और चरित्र के विकास के लिए उसका उत्कृष्ट एवं भले विचारों के संपर्क में रहना आवश्यक है। व्यक्ति के भले बुरे कार्यों का हेतु उसके श्रेष्ठ-निकृष्ट विचार ही होते हैं। सद्विचारों से व्यक्ति की पाशविक वासनाएँ विवेकपूर्ण भावनाओं इच्छाओं में बदलती चली जाती हैं और व्यक्ति देवोपम बन जाता है।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-January
स्वाध्याय सत्संग का समावेश रहता है। हिमालय का तट गंगा का किनारा, सप्त ऋषियों की भूमि, गंगाजल पान अपनी स्थिति विशेष के लिए सर्वतोमुखी प्रगति के लिए परामर्श, प्राण शक्ति से भरा-पूरा वातावरण, इतनी सारी सुविधायें अन्यत्र कदाचित् ही मिल सकें। जो काय चिकित्सा करते हैं उन्हें मानसोपचार का ज्ञान नहीं। जो मन का शोधन जानते हैं उनमें चेतना के अन्तःकरण केन्द्र को समझाने या सुधारने की क्षमता नहीं है। यह त्रिविधि संयोग गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम की तरह मात्र शान्तिकुँज में ही उपलब्ध है।
स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थानों की स्थापना 24 लाख परिजनों के परिवार का गठन ऐसा काम है जिसकी दूसरी उपमा भारत में हिन्दू धर्म में दूसरी नहीं है। दस पैसा और एक घण्टा श्रम के सदस्यता शुल्क पर प्रज्ञा अभियान के अनेकानेक रचनात्मक और सुधारात्मक कार्य किसी ने कभी चलाये हों यह भी एक चकित करने वाली बात है।
स्वाध्यायशील बनाना होता है ताकि उतना समय शरीराभ्यास की विडम्बनाओं में से कटे। सर्दी-गर्मी सहन करने के अभ्यास डालने पड़ते हैं ताकि त्वचा को सहनशीलता की आदत पड़े। अभाव-ग्रस्तता गरीबी का चिन्ह माना जाता है, पर जब उसे व्रतशीलता में सम्मिलित किया जाता है। तो वर्ग गौरव का निमित्तिकरण बन जाता है। सादा जीवन उच्च विचार की नीति अपनाने में आदर्शवादिता चरितार्थ होती है।
स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थानों की आलोक वितरण प्रक्रिया बड़े शानदार ढंग से चलने लगी है। देश की हर संस्था के पास सुयोग्य प्रचारकों की कमी है। वे इधर-उधर से माँग-जाँचकर अपना काम चलाते हैं। किन्तु प्रज्ञा परिवार के पास इस प्रयोजन की पूर्ति करने वाले युग शिल्पी इतनी संख्या में हैं कि न केवल अपनी आवश्यकता पूरी करते हैं वरन् अपने संगठन से बाहर के लोगों की माँग को भी पूरा करते रहते हैं। उनकी क्षमता और कुशलता सर्वत्र सराही गई है।
स्वाध्याय से ज्ञान का संकल्प नेत्र माध्यम से भी संभव है। पर प्रथम आधार वाणी ही है। उसके द्वारा लिपि भाषा, शब्द व्याकरण आदि का प्रथम ज्ञान वाणी से ही करना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-April
स्वाध्याय की प्रगति में इनमें से कोई बाधक नहीं बने। जबकि इस बीच हमें दो बार हिमालय भी जाना पड़ा। अपितु सभी साथ-साथ सहज ही ऐसे सम्पन्न होते चले गये कि हमें स्वयं इनके क्रियान्वयन पर अब आश्चर्य होता है। इसका श्रेय उस दैवी मार्गदर्शक सत्ता को जाता है जिसने हमारे जीवन की बागडोर प्रारम्भ से ही अपने हाथों में ले ली थी एवं सतत् संरक्षण का आश्वासन दिया था।
स्वाध्याय मण्डल विनिर्मित हुए। जिन स्थायी कार्य कर्ताओं ने हमारे मथुरा से आने के बाद प्रेस प्रकाशन, संगठन-प्रचार का दायित्व अपने कन्धों पर लिया, वे इसी महायज्ञ से उभर कर आये थे। सम्प्रति शाँतिकुँज में स्थायी रूप से कार्यरत बहुसंख्य स्वयं सेवकों की पृष्ठ भूमि में इस महायज्ञ अथवा इसके बाद देश भर में हुए आयोजनों की प्रमुख भूमिका रही है।
स्वाध्याय का, अध्ययन का व्यसन रहा। उसके लिए रास्ता चलते हुए पढ़ने की आदत रही। उससे एक साथ दो काम सधते रहे। पैर चलते रहे और आंखें पुस्तकों देखते हुए पढ़ती रहीं। हाथों को पुस्तक थामें रहने और पन्ने उलटते रहने का काम करना पड़ा।
स्वाध्याय का और विशाल धर्म संगठन द्वारा सत्संग का- यह दो कार्य मथुरा रहकर करना पड़ेगा। पुरश्चरण की पूर्णाहुति भी वहीं होगी। प्रेस प्रकाशन भी वहीं से चलेगा। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की प्रक्रिया सुनियोजित ढंग से वहीं से चलेगी। वह प्रयास एक ऐतिहासिक आन्दोलन होगा जैसा कि अब तक कहीं भी नहीं हुआ।
स्वाध्याय, सत्संग और मनन-चिन्तन से यह तथ्य भली प्रकार हृदयंगम हो गया था कि दसों इन्द्रिय प्रत्यक्ष और ग्यारहवीं अदृश्य मन इन सबका निग्रह कर लेने पर बिखराव से छुटकारा मिल जाता है और आत्म संयम का पराक्रम बन पड़ने पर मनुष्य की दुर्बलताएँ समाप्त हो जाती हैं और विभूतियाँ जग पड़ती हैं। सशरीर सिद्ध पुरुष होने का यही राजमार्ग है। इन्द्रिय निग्रह, अर्थ निग्रह, समय निग्रह और विचार निग्रह यह चार संयम हैं। इन्हें साधने वाले महामानव बन जाते हैं और काम क्रोध, लोभ, मोह इन चारों में मन को उबार लेने पर लौकिक सिद्धियाँ हस्तगत हो जाती हैं।
स्वाध्याय मण्डलों द्वारा सम्पन्न किए जाने के संकेत मार्गदर्शक द्वारा हिमालय प्रवास में ही दे दिये गए थे।
स्वाध्याय मण्डलों द्वारा सारे देश में चेतना केन्द्रों का जाल बिछाया गया है। ये सभी चार धामों की परम्परा में अपने-अपने क्षेत्रों में युग चेतना का आलोक वितरण कर रहे हैं।
स्वाध्याय भी करना था, जो एकाग्रता सम्पादन की साधना थी। साथ ही जन-संपर्क का कार्य भी करना था ताकि भावी कार्य क्षेत्र को दृष्टिगत रखते हुए हमारी संगठन क्षमता विकसित हो। तीसरा महत्वपूर्ण दायित्व था स्वतन्त्रता संग्राम में एक स्वयंसेवी सैनिक की भूमिका निभाना। देखा जाय तो सभी दायित्व शैली एवं स्वरूप की दृष्टि से परस्पर विरोधी थे। किन्तु साधना एवं स्वाध्याय की प्रगति में इनमें से कोई बाधक नहीं बने।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-September
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन, कथा-कीर्तन आदि के सहारे जीवनचर्या में सतोगुण बढ़ाने का मार्ग-दर्शन मिलता है। पर उसका कहना सुनना ही पर्याप्त नहीं। उस राह पर चलना भी तो चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि हमारे चिन्तन और चरित्र का प्रवाह निरन्तर उत्कृष्टता के मार्ग पर चले। आचरण में अधिकाधिक आदर्शवादिता और पुण्य परमार्थ की गतिविधियों का समावेश बढ़े।
स्वाध्याय शिक्षितों तक ही सीमित है। यदि उसका लाभ अशिक्षितों को भी देना हो तो उसका सत्संग रूप में परिणत करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। सत्संग के निमित्त व्यक्तिगत परामर्श देने की अपेक्षा यह कहीं अधिक उत्तम है कि प्राचीन कथा-पुराणों, इतिहासों के संदर्भ देकर उन विचारों की पुष्टि की जाय तो रूखे प्रतिपादनों द्वारा प्रस्तुत किये जाते हैं। दृष्टान्त उदाहरण अधिक प्रभावशाली होते हैं और स्मरण बहुत समय तक बने रहते हैं इसमें सन्देह नहीं।
स्वाध्याय और सत्संग से भी बढ़कर भोजन का नम्बर है। अभक्ष्य खाने के उपरान्त पेट और मस्तिष्क के रोगों पर उसकी प्रतिक्रिया होती है। उदाहरणार्थ- नशा पीकर देखा जाय। पेट की स्थिति असामान्य हो जायेगी। कम खाने को जी करेगा या ज्यादा खाने को।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-August
स्वाध्याय और सत्संग का सुयोग बनाते रहना जिससे भगवद् भक्ति में श्रद्धा विश्वास बढ़े। जमे हुए संचित कुसंस्कारों के उन्मूलन का क्रम चलता रहे। उनके आधार पर ही लोभ मोह का दुष्परिणाम विदित होते हैं। उच्चस्तरीय चिन्तन मनन से ही मन की भ्रष्टता का निराकरण होता है।
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन और मनन से काम लेना पड़ता है। कर्म के लिए उद्देश्यपूर्ण प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। भक्ति के लिए कोई उच्चस्तरीय आधार भगवान का गढ़ना पड़ता है। यों प्यार तो स्त्री बच्चों से भी होता है पर उसके पीछे स्वार्थ और आदान-प्रदान के तत्व काम करते हैं। इस अभ्यास को आगे बढ़ाने के लिए आदर्श के समुच्चय इष्टदेव की प्रतिमा गढ़ते हैं और एकान्त एकाग्रता के समय अंतर्मुखी होकर उसके साथ अपने को घुला देने की भावना करते हैं।
स्वाध्याय सामग्री विनिर्मित करते हैं और सामयिक समस्याओं के समाधान के सत्संग का ऐसा भाण्डागार विनिर्मित करते हैं जिसमें से अमृत जल भर कर विज्ञजन लोकमानस को परिष्कृत करने में जुट पड़ते हैं। इस आधार पर वे स्वयं दौड़ धूप करने की अपेक्षा दिशा निर्धारण एवं योजना निर्माण की दृष्टि से लोक सेवा की तुलना में कहीं अधिक काम कर गुजरते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-November
स्वाध्याय, सत्संग जैसे अनावश्यक कार्यों में अपने समय को इस प्रकार बाँध लेना चाहिए कि उसमें आलस्य प्रमाद के प्रवेश की कहीं कोई गुंजाइश न रह पाये। मनमर्जी की दिनचर्या चलने देने में प्रकारान्तर से आवारागर्दी अपनाना है। ऐसी उच्छृंखलता लगती तो अच्छी है पर समय सम्पदा का ऐसा अनावश्यक अतिक्रमण होता है जिसमें कोई महत्वपूर्ण कार्य हाथ में लेकर पूरा करने की बात बन ही नहीं पड़ती। भौतिक या आत्मिक स्तर के जो भी कार्य किये जाते हैं सभी आधे−अधूरे, लँगड़े−काने−कुबड़े रह जाते हैं। उनके कारण असन्तोष उपजता है, अपयश मिलता है और कौशल का स्तर गिरता चला जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-December
स्वाध्याय एवं सत्संग में पढ़ा गया है। उनको व्यवहार में भी उतारा जा सके। अध्यात्म सिद्धांतों का क्रियान्वयन लोक मंगल प्रयासों में संलग्न होने पर ही होता है। इसलिए साधु, ब्राह्मण सदा व्यक्ति और समाज के कल्याण में निरत रहने के कार्यक्रम बनाते और उनमें जीवन खपाते रहे हैं। सर्वसाधारण के लिए यही मध्यवर्ती मार्ग उपयोगी है।
स्वाध्याय का−सत्संग का−मनन चिन्तन का भाव है। मातृ शक्ति की यही प्रतिभा है। मानवी गरिमा की वह अधिष्ठात्री है, इसलिए उसकी एक दिशा धारा, एक प्रतिपादन के रूप में एक मुख है।
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन के अभ्यासों में भी मन रुकता है और एकाग्रता की स्थिति बढ़ती जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-July
स्वाध्याय सत्संग से उपयुक्त मार्ग−दर्शन होता है। जिस कल्प वृक्ष पर गौरव और वर्चस्व के फूल खिलते और फल लगते हैं वह आत्मशोधन के खाद और परमार्थ परायण का पानी पाकर ही ऊँचा उठता और किसी को छाया में बिठा कर अभीष्ट अनुदानों से निहाल करता है।
स्वाध्याय तथा सुना हुआ सत्संग निरर्थक चला जाता है। वातावरण की श्रेष्ठता कई कारणों पर अवलम्बित है। उनमें से एक तो अनिवार्य ही है और यह है पेड़−पौधों की सघनता और निकटता। वानप्रस्थ का शब्दार्थ है—वनप्रदेश में निवास व्यवस्था। ऊँचे विचार ऐसे ही क्षेत्रों में पनपते और फूलते−फलते हैं।
स्वाध्याय, संयम, सेवा में निरत रहने का अनुशासन है, वहाँ एक अनुबन्ध यह भी है कि वन क्षेत्र में रहा जाय। आरण्यक ही उस उच्चस्तरीय जीवनचर्या के लिए उपयुक्त स्थान हो सकते हैं। घिचपिच बसे, कोलाहल भरे नगरों और गन्दे गली−कूचों में ऐसा वातावरण होता है जिसमें आध्यात्मिकता पनपती नहीं। उस घुटन भरी विषाक्तता में उच्चस्तरीय भावनाएँ पनपने नहीं पाती और किया हुआ स्वाध्याय तथा सुना हुआ सत्संग निरर्थक चला जाता है। वातावरण की श्रेष्ठता कई कारणों पर अवलम्बित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-May
स्वाध्याय आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है। एक से दस का विस्तार होने लगे तो वर्तमान दस लाख परिजन इसी हीरक जयन्ती वर्ष में एक करोड़ में युग चेतना फूँकने का लक्ष्य पूरा कर सकते हैं।
स्वाध्याय और सत्संग की महत्ता इसीलिए बताई गई है कि उस आधार पर व्यक्ति के मस्तिष्क में कल्पना चित्र बनने लगते हैं और प्रवृत्तियों का प्रवाह उसी दिशाधारा में बहने लगता है। ध्यान एक प्रकार का स्वनिर्मित सत्संग है। जिस प्रकृति के लोगों के साथ रहते हुए मनोभूमि बनती है। उसी प्रकार जिस स्तर का इष्ट निर्धारित किया जाय और उसके साथ अपनी अभिरुचि एवं सम्भावना का तानाबाना बुना जाय तो प्रायः उसी स्तर का चिन्तन और चरित्र बनने लगता है। इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए पूजा उपासना में ध्यान को अत्यधिक महत्व दिया गया है।
स्वाध्याय सत्संग एवं चिन्तन मनन द्वारा सम्भव होती है। लोग कर्मकाण्ड मात्र से अध्यात्म लक्ष्य की प्राप्ति करना चाहते हैं। यह एकाँगी प्रयास सफल नहीं होता। उपासना क्रिया-कृत्यों का रहस्य ज्ञानपूर्वक समझना चाहिए और उन्हें करते समय तद्विषयक भावनाओं को प्रदीप्त करना चाहिए। अन्यथा कर्मण्ड का मात्र शरीर श्रम एवं वस्तुओं की उलट पुलट मात्र बन रह जायेगा और उनका वह प्रतिफल न मिलेगा जो शास्त्रकारों द्वारा बताया गया है।
स्वाध्याय (2) सत्संग। इन्हीं दो के सहारे सद्ज्ञान का विस्तार हो सकता है और युग तमिस्रा से छुटकारा मिल सकता है।
स्वाध्याय और समस्त गद्य-पद्य रूप में होने वाली प्रक्रियाऐं सम्मिलित होती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-February
स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन मनन से भी यह शालीनता का मार्ग किसी को भी सहज सुलभ हो सकता है। उच्चस्तरीय व्यक्तियों के क्रिया कलाप में सम्मिलित रहने से भी उस प्रकार की उत्कृष्टता, आदर्शवादिता हस्तगत हो सकती है। ऐसे लोग जब चमत्कार तो नहीं दिखाते और न वरदान आशीर्वाद देते हैं पर ऐसे योगियों की तुलना में अपना और अन्यान्यों का−समाज और समय का जो हित साधन करते हैं, वह किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं होता।
स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थानों में उत्साहपूर्वक मनाया गया। सभी संचालकों ने एक ही प्रतिज्ञा की कि गुरुदेव का प्रत्यक्ष संपर्क न होने पर भी हम सदा उन्हें अपने निकट अनुभव करेंगे और मिशन का अपने−अपने क्षेत्र में आलोक वितरण में तनिक भी शिथिलता न आने देंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-August
स्वाध्याय सत्संग, चिन्तन, मनन यह चार कार्य भावात्मक साधना के अंतर्गत आते हैं। इनसे विचारों की, दृष्टिकोण की भावना की शुद्धि होती है। क्रियात्मक साधना से संस्कारों का संशोधन एवं पोषण होता है। जो अशुभ संस्कार मनोभूमि में गहराई से जमे हैं उन्हें उखाड़ने का कार्य क्रियात्मक साधना द्वारा ही संभव होता है। शुभ संस्कारों का बीजारोपण तथा उनका परिपोषण भी क्रियात्मक साधना द्वारा ही संभव होता है।
स्वाध्याय करना हर विचारशील धर्मप्रेमी व्यक्ति का एक दैनिक नित्यकर्म होना चाहिए। आज किन्हीं पौराणिक कथा ग्रन्थों या आज हजारों लाखों वर्ष पूर्व की स्थिति के अनुरूप मार्ग दर्शन करने वाले संस्कृत ग्रन्थों का बार-बार पढ़ना ही स्वाध्याय माना जाता है। यह मान्यता अस्वाभाविक है। आज हमें ऐसी पुस्तकों के स्वाध्याय की आवश्यकता है जो वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप जीवन के सर्वांगीण विकास में सहायक हो सकें। प्रत्येक युग में सामयिक ऋषि उत्पन्न होते हैं ओर वे देश काल पात्र के अनुरूप जन शिक्षण करते हैं।
स्वाध्याय से किस मनन से किस चिन्तन से किस साधन अभ्यास से किया जाए, इसकी विवेचना यहाँ नहीं हो सकती। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को मनोभूमि में दूसरों की अपेक्षा कुछ भिन्नता होती है और उस भिन्नता को ध्यान में रखकर ही व्यक्ति की अन्तःभूमिका को शुद्ध करने का मार्ग दर्शन संभव हो सकता है। इसी प्रकार किस व्यक्ति में कौन-सी सत्प्रवृत्तियाँ विकासोन्मुख हैं और उनका अभिवर्धन करने के लिए किस प्रकार का स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन, ध्यान, संकल्प एवं अभ्यास आवश्यक है इनका विवेचन भी लेख रूप में नहीं हो सकता क्योंकि व्यक्ति की मनोभूमि का स्तर पहचान कर ही उनका भी निर्णय हो सकना संभव है।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन, ध्यान, संकल्प एवं अभ्यास आवश्यक है इनका विवेचन भी लेख रूप में नहीं हो सकता क्योंकि व्यक्ति की मनोभूमि का स्तर पहचान कर ही उनका भी निर्णय हो सकना संभव है।
स्वाध्याय सत्संग ही है। अपने आप अपनी स्थिति पर, अपना त्रुटियों और दुर्बलताओं पर विचार करके, बुराइयों को छोड़ने और अच्छाइयों को बढ़ाने के लिए अकेले में सोच विचार करना चिंतन है और उत्थान पथ पर अग्रसर करने वाली सत् शिक्षा के महत्व एवं महात्म्य पर विस्तार पूर्वक सोचना एवं उसी ढाँचे में अपने को ढालने की योजना बनाना मनन है। चिंतन और मनन करते रहने वाला व्यक्ति अपनी बौद्धिक, चरित्र एवं लौकिक दुर्बलताओं को आत्म निरीक्षण एवं आत्म आलोचना के आधार पर भली प्रकार जान सकता है और जिस प्रकार रोग का निदान होने पर चिकित्सा सरल हो जाती है उसी प्रकार अपनी त्रुटियों को जानने वाला उन्हें सुधारने का उपाय भी ढूँढ़
स्वाध्याय माना जाता है। यह मान्यता अस्वाभाविक है। आज हमें ऐसी पुस्तकों के स्वाध्याय की आवश्यकता है जो वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप जीवन के सर्वांगीण विकास में सहायक हो सकें। प्रत्येक युग में सामयिक ऋषि उत्पन्न होते हैं ओर वे देश काल पात्र के अनुरूप जन शिक्षण करते हैं। आज के युग में गाँधी, विनोबा, दयानंद, विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, तुकाराम, कबीर आदि संतों का साहित्य जीवन निर्माण की दिशा में बहुत सहायक हो सकता है।
स्वाध्याय की आवश्यकता है जो वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप जीवन के सर्वांगीण विकास में सहायक हो सकें। प्रत्येक युग में सामयिक ऋषि उत्पन्न होते हैं ओर वे देश काल पात्र के अनुरूप जन शिक्षण करते हैं। आज के युग में गाँधी, विनोबा, दयानंद, विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, तुकाराम, कबीर आदि संतों का साहित्य जीवन निर्माण की दिशा में बहुत सहायक हो सकता है। आत्म सुधार, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास का जो विवेचनात्मक सत्साहित्य मिल सके हमें नित्य नियमित रूप से पढ़ते रहना चाहिए। स्वाध्याय की दैनिक आदत इतनी आवश्यक है कि उसकी उपेक्षा करने से आत्मिक प्रगति के मार्ग में प्रायः अवरोध ही पैदा हो जाता है।
स्वाध्याय की दैनिक आदत इतनी आवश्यक है कि उसकी उपेक्षा करने से आत्मिक प्रगति के मार्ग में प्रायः अवरोध ही पैदा हो जाता है।
स्वाध्याय और सत्संग, चिंतन और मनन यह चार उपाय अपनी अन्तःभूमि के निरीक्षण, परीक्षण करने, त्रुटियों एवं दोषों को समझने तथा कुविचारों को त्याग कर सत्प्रवृत्तियों अपनाने के है। यह चार उपाय भी साधना के ही अंग हैं। जीवन समस्याओं को सुलझाने में सहायक सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना हर विचारशील धर्मप्रेमी व्यक्ति का एक दैनिक नित्यकर्म होना चाहिए। आज किन्हीं पौराणिक कथा ग्रन्थों या आज हजारों लाखों वर्ष पूर्व की स्थिति के अनुरूप मार्ग दर्शन करने वाले संस्कृत ग्रन्थों का बार-बार पढ़ना ही स्वाध्याय माना जाता है। यह मान्यता अस्वाभाविक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-June
स्वाध्याय और सत्संग का उद्देश्य भी इन्हीं प्रवृत्तियों को विकसित करना है। चरित्र निर्माण और नैतिकता भी इसी प्रक्रिया का नाम है। पुण्य, परमार्थ भी इसी को कहते है और स्वर्ग तथा मुक्ति इसके फल माने गये है। ईश्वर उपासना के महात्म्य से यह आत्म-निर्माण का कार्य अधिक सरलता से पूर्ण होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-October
स्वाध्याय का व्रत लेना चाहिये। अभी अखंड-ज्योति का एक लेख प्रतिदिन उपयुक्त विधि से पढ़ना आरंभ करें। महीने भर में नया अंक आने तक उन लेखों को दो या तीन बार दुहा सकते हैं। उन्हें मनोयोग पूर्वक पढ़ा जाय तो प्रत्येक बार उनमें कुछ नई बात मिलेगी और पहली बार की अपेक्षा दूसरी बार और भी अधिक रस आयेगा । अन्य सत्साहित्य भी इसके लिए चुना जा सकता हैं पर उसका विषय आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास ही होना चाहिए।
स्वाध्याय के लिए ऐसा साहित्य चुना जाना चाहिए जो हमारी आध्यात्मिक प्रगति के लिए बुद्धिसंगत एवं व्यवहारिक सुझाव उपस्थिति करता हो। ऐसा साहित्य चाहे आधुनिक लेखकों का लिखा हुआ हो चाहे प्राचीन लेखकों का। पुस्तक कब लिखी गई थी? इस प्रश्न का उसकी उपयोगिता से कोई संबंध नहीं हैं। प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में भी बहुत-सा अनुपयुक्त और अवांछनीय साहित्य में भी बहुत-सा अनुपयुक्त और अवांछनीय तत्त्व मौजूद हैं और आधुनिक हिन्दी साहित्य में भी अत्यन्त उच्चकोटि का वांग्मय उपलब्ध हैं।
स्वाध्याय नहीं किया जाता उस दिन मनुष्य चाण्डाल तुल्य अपवित्र हो जाता है। चिन्तन और मनन को तो एक प्रकार से योग साधना में ही सम्मिलित कर लिया गया हैं। कहा गया है कि-मनन और चिन्तन के बिना न आत्म साक्षात्कार होता हैं और न ईश्वर ही मिलता हैं। ठीक भी हैं, उसकी मनोभूमि उड़ता से जकड़ी हुई हैं उसमें आत्मा और परमात्मा का चैतन्य-तत्त्व प्रवेश भी कैसे करेगा? आत्म कल्याण के लिए भजन, ध्यान, जप, तप, कथा-कीर्तन व्रत, दान, तीर्थ, पूजा, पाठ आदि की आवश्यकता मानी जाती हैं।
स्वाध्याय और सत्संग का लाभ दूसरों को दे सकते हैं।
स्वाध्याय आसानी से कर सकते हैं। अच्छा साहित्य वे पुस्तकालयों से लेकर था खरीद कर अपनी इस आध्यात्मिक आवश्यकता को पूरा कर सकते हैं। पर अशिक्षित लोगों के लिए, स्त्री बच्चों के लिए वह कठिन हैं और उनके लिए भी कठिन हैं जिनका मन पढ़ने में लगता ही नहीं। ऐसे लोगों के लिये सत्संग ही एक मात्र उपाय रह जाता हैं। पर भारी कठिनाई यह है कि आज सर्वत्र नकली अध्यात्म का बोल वाला है।
स्वाध्याय में से जो बात हृदयंगम की गई हो उसे अपने जीवन में कैसे ढाला जाय इसकी योजना बनाना चिन्तन हैं। सद्गुणों, सद्विचारों, सत्कर्मों के बारे में मढ़ लेना या उनकी उपयोगिता स्वीकार कर लेना ही पर्याप्त न होगा वरन् यह भी विचार करना पड़ेगा कि इन उपयोगिता बातों को हमारे जीवन में व्यवहारिक रूप से स्थान कैसे मिले? यह ठीक है कि आज ही सारे कुविचार और कुसंस्कार नहीं छूट सकते और सारी उत्तम योजनाएँ आज ही पूरी तरह जीवन में उतार लेना संभव नहीं हो सकता, पर आखिर उस संबन्ध में सोचना विचारना तो आवश्यक ही हैं इससे मनोभूमि तो तैयार होगी, रुचि तो बढ़ेगी, दृष्टिकोण तो बनेगा। फिर धीरे-धीरे उस दिशा में कदम भी बढ़ने लगेंगे। आज न सही तो कल, मनुष्य के सपने साकार होते ही हैं।
स्वाध्याय ही सरल और सम्भव हैं। उसी के द्वारा दूरस्थ, स्वर्गवासी या दुर्लभ महा पुरुषों का सत्संग किसी भी स्थान पर कितनी ही देर तक और अपनी सुविधा के किसी भी समय प्राप्त किया जा सकता हैं। उच्च कोटि के विचारों की पूँजी अधिकाधिक मात्रा में जमा जिये बिना हम न ता अन्तःकरण को शुद्ध कर सकते हैं और न उच्च-मार्ग पर अग्रसर होने के लिए आवश्यक प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए इसे साधना का एक अनिवार्य अंग मानकर स्वाध्याय को अपने है
स्वाध्याय के लिए उसे निस्संकोच चुना जा सकता हैं। सरसरी नजर से बहुत तेजी से के साथ एक सपाटे में बहुत कुछ पढ़ डालना वर्र्र्र्यर्थ हैं। किस्से कहानियों की किताबें इस दृष्टि में पढ़ी जा सकती हैं कथानक का घटनाक्रम जल्दी ही जान लेने की उत्सुकता में लोग बड़ी तेजी से कहानियाँ तथा उपन्यास पढ़ते हैं। वहाँ यह बात भले ही ठीक हो पर आत्म-निर्माण के लिए स्वाध्याय करना हो तो इस प्रकार कभी नहीं करना चाहिए। उससे हाथ कुछ नहीं पड़ता, लाभ कुछ नहीं होता।
स्वाध्याय से-पढ़ने से-आसानी से प्राप्त हो सकती हैं। पढ़कर या सुनकर, नेत्र मार्ग से या कान मार्ग से जैसे भी बन पड़े सद्विचारों को अपनी मनोभूमि में प्रवेश करते रहने का नियमित कार्य-क्रम बनाना ही चाहिए। आत्मोन्नति के मार्ग में यह आत्मशिक्षण का-मानसिक परिष्कार का स्वाध्याय साधन नितान्त आवश्यक हैं। मनोमय कोश का प्रधान आधार यही हैं। गुरु की शरण में इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए जाने का विधान शास्त्रकारों ने किया हैं।
स्वाध्याय भी भजन का ही एक अंग हैं। शरीर के केवल एक ही अंग को पुष्ट करने से काम नहीं चलता वरन् सभी अंगों का ध्यान रखना पड़ता हैं । साधना भी एकांगी नहीं सर्वांगीण हैं। शरीर का कोई एक ही अंग पुष्ट हो और बाकी सब दुर्बल हो तो इससे अच्छे स्वास्थ्य काक प्रयोजन सिद्ध न होगा। कोई मनुष्य केवल घी ही खाये और अन्न, शाक आदि को त्याग दे तो घी पौष्टिक और प्रशंसनीय होते हुए भी स्वास्थ्य को स्थिर न रख सकेगा।
स्वाध्याय और उद्देश्य हमारी मानसिक स्थिति का सुधार, निर्माण और विकास करना है। इसके लिए ऐसा साहित्य चाहिए जो उपर्युक्त आवश्यकता को भली प्रकार पूर्ण कर सके। इसके लिए ऐसे साहित्य का चुनाव करना नितान्त आवश्यक हैं जिसमें हमारी आत्मिक समस्याओं का आज की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सही सुलझाव प्रस्तुत किया गया हो। स्वाध्याय सत्संग के नाम पर कोई भी प्राचीन काल में लिखी हुई मोटी किताब तोता रटंत की तरह रोज रोज पाठ करते रहने से कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। कई लोग स्वाध्याय का अर्थ यही समझने हैं कि संस्कृत भाषा की या किसी संत महात्मा की लिखी हुई प्राचीन पुस्तक पढ़ लेने मात्र से पाठ या स्वाध्याय का पुण्य मिल जाएगा ।
स्वाध्याय और सत्संग ही दो मार्ग हैं। इनमें से आज की परिस्थितियों में हमारे लिए स्वाध्याय ही सरल और सम्भव हैं। उसी के द्वारा दूरस्थ, स्वर्गवासी या दुर्लभ महा पुरुषों का सत्संग किसी भी स्थान पर कितनी ही देर तक और अपनी सुविधा के किसी भी समय प्राप्त किया जा सकता हैं। उच्च कोटि के विचारों की पूँजी अधिकाधिक मात्रा में जमा जिये बिना हम न ता अन्तःकरण को शुद्ध कर सकते हैं और न उच्च-मार्ग पर अग्रसर होने के लिए आवश्यक प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए इसे साधना का एक अनिवार्य अंग मानकर स्वाध्याय को अपने है
स्वाध्याय ही हमारी साधना का दूसरा कार्यक्रम हैं।
स्वाध्याय का लाभ नहीं उठा पाते एक अत्यन्त ही उच्चकोटि का पुण्य हैं। इस ज्ञानयज्ञ की बराबर शुभ कार्य इस संसार में और कुछ हो नहीं सकता।
स्वाध्याय मंडल बनाकर थोड़े ही प्रयत्न में नन्हा-सा किन्तु बहुत ही महत्त्वपूर्ण ज्ञानयज्ञ चलाया जा सकता हैं।
स्वाध्याय के उद्देश्य को पूरा करने जा रही हैं भविष्य में उसकी एक-एक पंक्ति इसी उद्देश्य को ध्यान रखते हुए लिखी जाया करेंगी। अब तक उसमें यदा-कदा अन्य प्रकार के लेख भी छपा करते थे पर अब आत्मोन्नति की दिशा में जनसाधारण का मार्गदर्शन करना ही एकमात्र लक्ष होगा। आत्म-सुधार आत्म-निर्माण आत्म-विकास से सम्बन्धित तथ्यों को ही पत्रिका के पृष्ठों पर स्थान दिया जाया करेगा। स्वाध्याय के लिए उसे निस्संकोच चुना जा सकता हैं। सरसरी नजर से बहुत तेजी से के साथ एक सपाटे में बहुत कुछ पढ़ डालना वर्र्र्र्यर्थ हैं।
स्वाध्याय आवश्यक हैं। वर्तन अपने आप ही धूलि, हवा और ऋतु के प्रभाव से मैले होते रहते हैं, उन्हें रोज ही माँजना पड़ता हैं। कमरे में रोज ही धूलि जम जाती हैं से रोज ही बुहारना पड़ता हैं। दाँत रोज मैले होते हैं सो रोज ही मंजन की जरूरत होती हैं। त्वचा से पसीना निकलकर रोज ही शरीर तथा कपड़ों में मलीनता उत्पन्न करता हैं सो रोज ही उन्हें धोया जाता हैं।
स्वाध्याय का अर्थ यही समझने हैं कि संस्कृत भाषा की या किसी संत महात्मा की लिखी हुई प्राचीन पुस्तक पढ़ लेने मात्र से पाठ या स्वाध्याय का पुण्य मिल जाएगा । यह मान्यता भ्रम मात्र है। तोता रटंत जैसे पाठ मात्र से स्वाध्याय का उद्देश्य किसी भी प्रकार पूर्ण नहीं होता। इसके लिए वही चुनी हुई पुस्तकें चाहिए जो हमारी जीवन की विविध समस्याओं को आध्यात्मिक दृष्टि से सुलझाने में व्यवहारिक मार्ग दर्शन करें और हमारी सर्वांगीण प्रगति को उचित प्रेरणा देकर अग्रगामी बनावें। आत्मिक-विकास के लिए आत्म-शिक्षण आवश्यक हैं।
स्वाध्याय का पुण्य मिल जाएगा । यह मान्यता भ्रम मात्र है। तोता रटंत जैसे पाठ मात्र से स्वाध्याय का उद्देश्य किसी भी प्रकार पूर्ण नहीं होता। इसके लिए वही चुनी हुई पुस्तकें चाहिए जो हमारी जीवन की विविध समस्याओं को आध्यात्मिक दृष्टि से सुलझाने में व्यवहारिक मार्ग दर्शन करें और हमारी सर्वांगीण प्रगति को उचित प्रेरणा देकर अग्रगामी बनावें। आत्मिक-विकास के लिए आत्म-शिक्षण आवश्यक हैं।
स्वाध्याय की साधना का अंग
स्वाध्याय की जुगाली मनन हैं । जो पढ़ा गया हो उस पर बारबार विचार करना चाहिए। अनेक दृष्टिकोणों से उस बात को सोचना चाहिए और तर्क-वितर्क के बाद यदि वह बात उचित प्रतीत हो तो सच्चे मन से उसे हृदयंगम कर लेना चाहिए। चिन्तन इससे आगे का कदम हैं। प्रस्तुत स्वाध्याय में से जो बात हृदयंगम की गई हो उसे अपने जीवन में कैसे ढाला जाय इसकी योजना बनाना चिन्तन हैं।
स्वाध्याय द्वारा रोज ही न माँजा धोया गया तो वह दिन दिन अधिक गन्दा और मलीन होता जाएगा । और अन्त में वह इतना दूषित हो जाएगा कि थोड़ा सा पूजा भजन भी वहाँ कुछ शुद्ध वातावरण पैदा न कर सकेगा। इसलिए स्वाध्याय की उपेक्षा कदापि न की जानी चाहिए। दैनिक नित्य कर्म में उसके लिए अनिवार्य रूप से स्थान रखना चाहिए।
स्वाध्याय की उपेक्षा कदापि न की जानी चाहिए। दैनिक नित्य कर्म में उसके लिए अनिवार्य रूप से स्थान रखना चाहिए।
स्वाध्याय उसी का करना चाहिए।
स्वाध्याय और सत्संग दो ही उपाय हैं। इसके लिए स्वाध्याय और सत्संग दो ही उपाय हैं। इसके लिए एक घण्टा या आधा घण्टा समय नियत कर लिया जाना चाहिए । जीवन को समुन्नत बनाने की प्रेरणा देने एवं उनका उपाय बताने वाला साहित्य ही स्वाध्याय क लिए चुना जाय। धीरे-धीरे समझ-समझ कर उसे पढ़े और उस पर मनन एवं चिन्तन करें तो ही स्वाध्याय की प्रेरणा अन्तःकरण में गहराई तक उतर सकेगी।
स्वाध्याय और सत्संग के लिए किसी न किसी रूप में नियमित अवसर होना ही चाहिए।
स्वाध्याय का उद्देश्य किसी भी प्रकार पूर्ण नहीं होता। इसके लिए वही चुनी हुई पुस्तकें चाहिए जो हमारी जीवन की विविध समस्याओं को आध्यात्मिक दृष्टि से सुलझाने में व्यवहारिक मार्ग दर्शन करें और हमारी सर्वांगीण प्रगति को उचित प्रेरणा देकर अग्रगामी बनावें। आत्मिक-विकास के लिए आत्म-शिक्षण आवश्यक हैं। इसके लिये स्वाध्याय और सत्संग ही दो मार्ग हैं। इनमें से आज की परिस्थितियों में हमारे लिए स्वाध्याय ही सरल और सम्भव हैं।
स्वाध्याय के लिए चुनना उपयुक्त न होगा। प्रेरणा प्राप्त करने के लिए ही स्वाध्याय किया जाता हैं। जो पढ़ा जाय वह ऐसा हो जो हमारे हृदय और मस्तिष्क का मंथन कर सके, पतन के पथ पर बढ़ते हुए पैरों को बलपूर्वक रोक कर उत्थान की ओर हमारा मुँह मरोड़ कर मोड़ सके। ऐसा प्राणवान सजीव साहित्य पढ़ने से किसी को आत्मोन्नति का लक्ष प्राप्त करने में सहायता मिल सकती हैं।
स्वाध्याय करना हो तो इस प्रकार कभी नहीं करना चाहिए। उससे हाथ कुछ नहीं पड़ता, लाभ कुछ नहीं होता। केवल इतना मात्र सन्तोष हो जाता हैं कि इतने पृष्ठ हमने पढ़ लिए। पर यदि थोड़ी देर बाद ही उनसे पूछा जाय कि आपने क्या पढ़ा तो शायद उन्हें कुछ भी याद न मिलेगा । ऐसे पढ़ने से क्या लाभ?
स्वाध्याय और सत्संग दो ही उपाय हैं। इसके लिए एक घण्टा या आधा घण्टा समय नियत कर लिया जाना चाहिए । जीवन को समुन्नत बनाने की प्रेरणा देने एवं उनका उपाय बताने वाला साहित्य ही स्वाध्याय क लिए चुना जाय। धीरे-धीरे समझ-समझ कर उसे पढ़े और उस पर मनन एवं चिन्तन करें तो ही स्वाध्याय की प्रेरणा अन्तःकरण में गहराई तक उतर सकेगी। इस प्रयोजन के लिए अभी अखण्ड-ज्योति से भी काम चल सकता है।
स्वाध्याय साधन नितान्त आवश्यक हैं। मनोमय कोश का प्रधान आधार यही हैं। गुरु की शरण में इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए जाने का विधान शास्त्रकारों ने किया हैं। भौतिक विचारों ने हमारे मस्तिष्क में बुरी तरह अंगा जमाया हुआ होता हैं। सारी विचार धारा प्रायः उन्हीं के कब्जे में रहती हैं।
स्वाध्याय का व्रत
स्वाध्याय को अपने है
स्वाध्याय और सत्संग पर-मनन और चिन्तन पर निर्भर रहता हैं।
स्वाध्याय भी साधना का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं प्रधान अंग हैं । उसके लिए भी नियत समय पर स्वस्थ चित्त होकर शान्तिमय स्थान पर बैठना चाहिए और धीरे-धीरे समझ-समझकर एक-एक पेराग्राफ पढ़ना चाहिये । हो सके तो उस पेराग्राफ को एकबार और दुहरा लिया जाय तब फिर दूसरा पेराग्राफ पढ़ना आरंभ किया जाय। लाल पेन्सिल पास में रखी जाय। जो विचार महत्त्वपूर्ण जचें उन पर निशान लगा लेने चाहिए।
स्वाध्याय और सत्संग दो प्रमुख आधार हैं। उपरोक्त योजना के अनुसार हम अपने लिए इस आवश्यकता की पूर्ति करें और दूसरों के लिए उच्च कोटि की सेवा के रूप में भी इसे अपनाये। इसमें स्वार्थ और परमार्थ दोनों का महत्त्वपूर्ण समन्वय हैं। अन्नदान से ब्रह्मदान का पुण्य सौ गुना अधिक माना गया हैं। किसी को धन देकर उसकी उतनी भलाई नहीं की जा सकती जितनी उसे सन्मार्ग पर चला देने से होती है।
स्वाध्याय और सत्संग से, मनन और चिन्तन से आत्म-निरीक्षण की प्रवृत्ति पैदा होती हैं। मन का स्तर हीनता से उठकर उच्चता की ओर अग्रसर होता हैं। मनोमय कोश का आवरण सद्विचारों से ही खुलता हैं। जिसके मस्तिष्क में प्रगतिशील और प्रकाशवान् विचारों का नया जल नहीं पहुँचता, उसका अन्तः प्रदेश सड़े, गले, गन्दे नाले की तरह अवरुद्ध पड़ा हुआ दिन-दिन अधिक दुर्गन्धित बनता जाता हैं। मन की शक्ति विचारों पर ही अवलम्बित हैं।
स्वाध्याय और सत्संग
स्वाध्याय के लिये हजारों आध्यात्मिक पुस्तकों एवं सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं का सर्वांगपूर्ण पुस्तकालय, अस्वस्थ होने पर आश्रम के चिकित्सालय में औषधि की व्यवस्था, पुष्प पल्लवों से हरा-भरा नयनाभिराम प्रांगण, परमार्थ प्रेमी सत्पुरुषों का सान्निध्य आदि सभी बातें ऐसी है जिनसे अस्थिर मन भी स्थिरता एवं शान्ति लाभकर सकता है। अपने हाथ से भोजन बनाने के सभी साधन यहाँ मौजूद है। 10-15 रुपये मासिक में यहाँ की सस्ती परिस्थितियों में किफायत से चलने वाले अपनी गुजर कर सकते हैं।
स्वाध्याय और सत्संग प्रत्येक श्रेयार्थी के लिए अनिवार्य माना गया हैं, सत्संग की समस्या आज कल बड़ी विकट हैं ।धर्म और अध्यात्म का वास्तविक स्वरूप आज लगभग लुप्त हो चुका हैं। पुरुषार्थहीन, कर्तव्यघाती, भाग्यवादी, आलसी बनाने वाली शिक्षा ही आज धर्म और अध्यात्म के नाम पर जहाँ तहाँ दी जाती हैं । ऐसे ही सत्संगों की दुकानें जहाँ-तहाँ लगी दीखती हैं, जहाँ किसी न किसी बहाने लोगों की जेबें तो खाली करा ली जाती है पर बदले में ऐसे रद्दी विचार गले मढ़ दिये जाते है जिन्हें अपनाने से उलझने सुलझने की अपेक्षा और अधिक बढ़ जाती हैं। उत्थान के स्थान पर पतन पल्ले पड़ता हैं।
स्वाध्याय किया जाता हैं। जो पढ़ा जाय वह ऐसा हो जो हमारे हृदय और मस्तिष्क का मंथन कर सके, पतन के पथ पर बढ़ते हुए पैरों को बलपूर्वक रोक कर उत्थान की ओर हमारा मुँह मरोड़ कर मोड़ सके। ऐसा प्राणवान सजीव साहित्य पढ़ने से किसी को आत्मोन्नति का लक्ष प्राप्त करने में सहायता मिल सकती हैं।
स्वाध्याय सत्संग का खाद पानी न मिले तो वह भजन का बीज भी फलने-फलने की स्थिति तक न पहुँच सकेगा। इसलिए हमारे दैनिक जीवन में स्वाध्याय और सत्संग के लिए किसी न किसी रूप में नियमित अवसर होना ही चाहिए।
स्वाध्याय को एक अनिवार्य दैनिक धर्म, कर्तव्य माना गया है और लिखा है कि जिस दिन स्वाध्याय नहीं किया जाता उस दिन मनुष्य चाण्डाल तुल्य अपवित्र हो जाता है। चिन्तन और मनन को तो एक प्रकार से योग साधना में ही सम्मिलित कर लिया गया हैं। कहा गया है कि-मनन और चिन्तन के बिना न आत्म साक्षात्कार होता हैं और न ईश्वर ही मिलता हैं। ठीक भी हैं, उसकी मनोभूमि उड़ता से जकड़ी हुई हैं उसमें आत्मा और परमात्मा का चैतन्य-तत्त्व प्रवेश भी कैसे करेगा? आत्म कल्याण के लिए भजन, ध्यान, जप, तप, कथा-कीर्तन व्रत, दान, तीर्थ, पूजा, पाठ आदि की आवश्यकता मानी जाती हैं।
स्वाध्याय भी हमारा नित्य कर्म होना चाहिए। अपने चारों ओर फैले हुए विषाक्त वातावरण का दूषित प्रभाव रोज ही हमारे मन पर पड़ता है। उसकी सफाई करने के लिए नित्य ही स्वाध्याय आवश्यक हैं। वर्तन अपने आप ही धूलि, हवा और ऋतु के प्रभाव से मैले होते रहते हैं, उन्हें रोज ही माँजना पड़ता हैं। कमरे में रोज ही धूलि जम जाती हैं से रोज ही बुहारना पड़ता हैं।
स्वाध्याय का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। देवताओं और अवतारों की लीलाओं के ग्रन्थ पढ़ने से यदि हमारी आज की समस्याओं को सुलझाने और अन्तःकरण को ऊर्ध्वगामी बनाने में कोई विशेष सहायता नहीं मिलती हो तो उसे स्वाध्याय के लिए चुनना उपयुक्त न होगा। प्रेरणा प्राप्त करने के लिए ही स्वाध्याय किया जाता हैं। जो पढ़ा जाय वह ऐसा हो जो हमारे हृदय और मस्तिष्क का मंथन कर सके, पतन के पथ पर बढ़ते हुए पैरों को बलपूर्वक रोक कर उत्थान की ओर हमारा मुँह मरोड़ कर मोड़ सके। ऐसा प्राणवान सजीव साहित्य पढ़ने से किसी को आत्मोन्नति का लक्ष प्राप्त करने में सहायता मिल सकती हैं।
स्वाध्याय के उपयुक्त ही पाठ्य सामग्री प्रस्तुत किया करेगी।
स्वाध्याय में रुचि उत्पन्न हो जाय। ऐसी रुचि उत्पन्न करना आज के समय को देखते हुए कुछ कठिन है। पर प्रयत्न करने से वह भी असंभव न रहेगा। लोगों के घरों पर अपनी पुस्तकें पढ़ने देने तथा फिर वापिस लेने जाने का कार्य कुछ अटपटा सा, तौहीन जैसा लगने वाला तो है पर इसमें अत्याधिक उच्चकोटि की आध्यात्मिक सेवा सन्निहित है। ब्रह्मदान का पुण्य और सत्परिणाम असाधारण है।
स्वाध्याय से आत्म-निरीक्षण की प्रवृत्ति जागृत होती है। सद्ग्रन्थों में उपस्थित आदर्श से जब मनुष्य अपनी तुलना करता है तभी वह समझ पाता है कि मानवता के मापदण्ड से अभी वह कितना पीछे हैं। उसके अन्दर कितनी मात्रा में क्या-क्या दोष-दुर्गुण भरे पड़े हैं। उन्नतिशील बनने के लिए जिन आवश्यक गुणों की कमी जब अपने में दिखाई पड़ने लगती हैं तभी वह उसकी पूर्ति की बात सोचता हैं। यही उन्नतिशील होने की प्रक्रिया है।
स्वाध्याय के लिए दिन में कोई भी सुविधा का समय नियत किया जा सकता है। अपना पुस्तकालय, ज्ञान मन्दिर चलाने के लिए तथा उसके सदस्यों के गले पड़ कर सत्साहित्य पढ़ाने के लिए नित्य कुछ समय देना चाहिए। यह ज्ञान-सेवा छोटी दीखते हुए भी अत्यन्त उच्चकोटि की है। सत्संग की व्यवस्था अपनी ओर से करने का कोई प्रबन्ध बन सके तो उत्तम है अन्यथा घर में कथा-कहानियाँ कहने या कोई पुस्तकें पढ़कर दूसरों को सुनाने का कोई क्रम बन सकता है। आरंभिक झिझक को जीत लिया गया तो यह कार्यक्रम अपने लिए बड़ा मनोरंजक तथा आनन्ददायक प्रतीत होने लगेगा।
स्वाध्याय क लिए चुना जाय। धीरे-धीरे समझ-समझ कर उसे पढ़े और उस पर मनन एवं चिन्तन करें तो ही स्वाध्याय की प्रेरणा अन्तःकरण में गहराई तक उतर सकेगी। इस प्रयोजन के लिए अभी अखण्ड-ज्योति से भी काम चल सकता है। उसका एक-एक लेख नित्य इसी दृष्टि से पढ़ा जाय। महीने में दो तीन बार भी उन लेखों को दुहराया जा सकता है।
स्वाध्याय सत्संग के नाम पर कोई भी प्राचीन काल में लिखी हुई मोटी किताब तोता रटंत की तरह रोज रोज पाठ करते रहने से कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। कई लोग स्वाध्याय का अर्थ यही समझने हैं कि संस्कृत भाषा की या किसी संत महात्मा की लिखी हुई प्राचीन पुस्तक पढ़ लेने मात्र से पाठ या स्वाध्याय का पुण्य मिल जाएगा । यह मान्यता भ्रम मात्र है। तोता रटंत जैसे पाठ मात्र से स्वाध्याय का उद्देश्य किसी भी प्रकार पूर्ण नहीं होता। इसके लिए वही चुनी हुई पुस्तकें चाहिए जो हमारी जीवन की विविध समस्याओं को आध्यात्मिक दृष्टि से सुलझाने में व्यवहारिक मार्ग दर्शन करें और हमारी सर्वांगीण प्रगति को उचित प्रेरणा देकर अग्रगामी बनावें।
स्वाध्याय के उद्देश्य को पूरा कर सकेगा। यह स्वाध्याय ही हमारी साधना का दूसरा कार्यक्रम हैं।
स्वाध्याय के लिए कोई समय नियत रहना चाहिए। केवल माला जप का ही नाम भजन नहीं, स्वाध्याय भी भजन का ही एक अंग हैं। शरीर के केवल एक ही अंग को पुष्ट करने से काम नहीं चलता वरन् सभी अंगों का ध्यान रखना पड़ता हैं । साधना भी एकांगी नहीं सर्वांगीण हैं। शरीर का कोई एक ही अंग पुष्ट हो और बाकी सब दुर्बल हो तो इससे अच्छे स्वास्थ्य काक प्रयोजन सिद्ध न होगा।
स्वाध्याय के लिए कुछ साहित्य इकट्ठा करना ही पड़ेगा। उसे ही व्यवस्थित एवं सुसज्जित पुस्तकालय का रूप देकर घर की एक आलमारी में रखा जा सकता है और कम से कम पाँच व्यक्ति ऐसे आसानी से तलाश किया जा सकते हैं जो उस पुस्तकालय के निःशुल्क सदस्य हों। आप प्रयत्न पूर्वक उन्हें पढ़ने की प्रेरणा दें। कभी-कभी उनके घर जाकर अपनी पुस्तकें पढ़ने के लिए देने और यदि वे वापिस न लायें तो ने के लिए भी उनके घर पर जाया करें। साथ ही उस पुस्तक को आधार मानकर कुछ ज्ञान चर्चा भी छेड़ दिया करें।
स्वाध्याय की प्रेरणा अन्तःकरण में गहराई तक उतर सकेगी। इस प्रयोजन के लिए अभी अखण्ड-ज्योति से भी काम चल सकता है। उसका एक-एक लेख नित्य इसी दृष्टि से पढ़ा जाय। महीने में दो तीन बार भी उन लेखों को दुहराया जा सकता है। अब अखण्ड-ज्योति दैनिक स्वाध्याय के उपयुक्त ही पाठ्य सामग्री प्रस्तुत किया करेगी।
स्वाध्याय को ही सत्संग भी मान लेना चाहिए और उसी को सुव्यवस्थित बनाना चाहिए।
स्वाध्याय और सत्संग, चिंतन और मनन, इन चार आधारों पर मानसिक दुर्बलता को हटाना और आत्मबल बढ़ाना निर्भर रहता हैं। इसके बिना न मन की जड़ता जाती हैं और न संकीर्णता, गंदगी मूढ़ता, विषयासक्ति आदि से छुटकारा मिलता है। शास्त्रों में सत्संग की बड़ी महिमा गाई गई हैं। उसकी तुलना पारस मणि से हुई है। स्वाध्याय को एक अनिवार्य दैनिक धर्म, कर्तव्य माना गया है और लिखा है कि जिस दिन स्वाध्याय नहीं किया जाता उस दिन मनुष्य चाण्डाल तुल्य अपवित्र हो जाता है।
स्वाध्याय और सत्संग 23-आत्म कल्याण का मार्ग 24-समाज के प्रति कर्तव्य 25-शिष्टाचार और सहयोग 26-साँस्कृतिक पुनरुत्थान
स्वाध्याय और सत्संग। शिक्षा और कुछ आर्थिक दृष्टि से जिन्हें थोड़ी अनुकूलता प्राप्त हैं वे स्वाध्याय आसानी से कर सकते हैं। अच्छा साहित्य वे पुस्तकालयों से लेकर था खरीद कर अपनी इस आध्यात्मिक आवश्यकता को पूरा कर सकते हैं। पर अशिक्षित लोगों के लिए, स्त्री बच्चों के लिए वह कठिन हैं और उनके लिए भी कठिन हैं जिनका मन पढ़ने में लगता ही नहीं। ऐसे लोगों के लिये सत्संग ही एक मात्र उपाय रह जाता हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-November
स्वाध्याय ही एक प्रमुख माध्यम रह जाता है।
स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी होती है। जो हमारे विचारों को उच्चस्तरीय भूमिका में विकसित करे, दुष्प्रवृत्तियों से दुर्भाव और दुष्कर्मों से बचाते उसे ही स्वाध्याय साहित्य कह सकते है। हमारे नित्य के जीवन में स्वाध्याय के लिए समुचित स्थान होना चाहिए। सद्विचारों का आहार मानसिक भूख को बुझाने के लिए प्रस्तुत करना हमारी एक प्रमुख आवश्यकता है। इसकी ओर से मुँह मोड़कर उपेक्षा वृत्ति अपना कर कोई भी आत्म-विकास नहीं कर सकता है चाहे वह कितना ही भजन रोज करना हो।
स्वाध्याय और सत्संग का यही उद्देश्य है। प्राचीनकाल में प्रेस का माध्यम न होने से पुस्तकें दुर्लभ थी। सज्जनों का बाहुल्य सर्वत्र होने से सत्संग सुलभ था। इसलिए उस जमाने में सत्संग की ओर अधिक ध्यान दिया जाता था। आज स्थिति उलटी है।
स्वाध्याय के नाम पर प्राचीन ग्रन्थ कथा पुराण स्तोत्र आदि का पाठ करने से काम नहीं चल सकता। जीवन की अत्यन्त समस्याओं को आज की परिस्थितियों में हल करने का मार्ग-दर्शन करने वाले साहित्य से ही स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी होती है। जो हमारे विचारों को उच्चस्तरीय भूमिका में विकसित करे, दुष्प्रवृत्तियों से दुर्भाव और दुष्कर्मों से बचाते उसे ही स्वाध्याय साहित्य कह सकते है। हमारे नित्य के जीवन में स्वाध्याय के लिए समुचित स्थान होना चाहिए। सद्विचारों का आहार मानसिक भूख को बुझाने के लिए प्रस्तुत करना हमारी एक प्रमुख आवश्यकता है।
स्वाध्याय साहित्य कह सकते है। हमारे नित्य के जीवन में स्वाध्याय के लिए समुचित स्थान होना चाहिए। सद्विचारों का आहार मानसिक भूख को बुझाने के लिए प्रस्तुत करना हमारी एक प्रमुख आवश्यकता है। इसकी ओर से मुँह मोड़कर उपेक्षा वृत्ति अपना कर कोई भी आत्म-विकास नहीं कर सकता है चाहे वह कितना ही भजन रोज करना हो।
स्वाध्याय के लिए समुचित स्थान होना चाहिए। सद्विचारों का आहार मानसिक भूख को बुझाने के लिए प्रस्तुत करना हमारी एक प्रमुख आवश्यकता है। इसकी ओर से मुँह मोड़कर उपेक्षा वृत्ति अपना कर कोई भी आत्म-विकास नहीं कर सकता है चाहे वह कितना ही भजन रोज करना हो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-April
स्वाध्याय आदि से अपने ज्ञान को विशुद्ध एवं शक्ति को सचेष्ट रखना पड़ता है दूसरी ओर सम्पूर्ण भाव से अपने आपको ईश्वर की इच्छा पर उसी के लिए से निवेदित करना पड़ता है। जब साँसारिक तुच्छ लाभों के लिए कुछ न कुछ उत्सर्ग करना पड़ता है तो उस समग्र-अखण्ड, विश्वात्मा, ब्रह्म के साक्षात्कार के लिए अपने आपको सम्पूर्ण रूपेण निवेदन करना ही पड़ेगा पतंगा अपने आपको सम्पूर्ण भाव से दीपक को अर्पण कर देता है और तभी वह लौ में मिल जाता है? अपने प्रियतम के मिलन के लिए उसे समग्र भाव से अपने आपको अर्पण करना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-December
स्वाध्याय, चिन्तन, मनन, तत्त्व दर्शन और आत्म ज्ञान द्वारा अपने अंतः करण का पूर्ण समाधान कर चुका हो। अपने संशय, भ्रम, मोह, अज्ञान का पूर्णतया निवारण कर चुका हो तथा अन्य व्यक्तियों की आन्तरिक एवं साँसारिक जीवन की समस्या को धार्मिक एवं व्यवहारिक समन्वय के आधार पर हल करने की क्षमता जिसने प्राप्त कर ली हो तो ऐसा ही व्यक्ति संसार के मार्ग दर्शन के लिए धर्मोपदेश के लिए अधिकारी कहा जा सकता है, उसे ही परिव्राजक बनना चाहिये, उसे ही संन्यास लेना चाहिए।
स्वाध्याय। सद्ग्रन्थों के माध्यम से सत्पुरुषों की, मनीषियों और ऋषियों की आत्मा हर घड़ी सत्संग करने को प्रस्तुत रहती है। जो महापुरुष स्वर्गवासी हो चुके है, दूरस्थ है, या जिनके पास समय का अभाव रहता है उससे प्रत्यक्ष सत्संग नहीं हो सकता पर ग्रन्थों द्वारा उनका सत्संग कितनी ही देर तक किसी भी समय किया जा सकता है। सभी सद्ग्रन्थ, जिनमें जीवन की समस्याएँ को सतोगुणी दृष्टिकोण के साथ सुलझाया गया है, शास्त्र है। शास्त्र किसी भी भाषा या लिपि में हो सकते है।
स्वाध्याय की दृष्टि से मनन और चिन्तन के साथ पढ़ा करें तो उनकी आत्मा से हमारी आत्मा का स्पर्श होने लगे। इसका और भी विस्तार इस प्रकार हो सकता है कि अखंड-ज्योति के पाठक पत्रिका में प्रस्तुत विचारों को, कथाओं, प्रसंगों, दृष्टान्तों उदाहरणों को अपने घर तथा बाहर के लोगों को स्वयं सुनाया करें, अपनी पत्रिका कई-कई व्यक्तियों को पढ़ने देने स्वयं जाया करें, उनसे प्रस्तुत लेखों के संबन्ध में चर्चा किया करें। छपे हुए कागज के टुकड़े युग निर्माण नहीं कर सकते। अखंड-ज्योति में हम कुछ भी क्यों न लिखते रहें उसका प्रभाव और विस्तार तब तक नहीं हो सकता जब तक कि आप स्वजनों का त्यक्त्वा मिलकर ही गायन और वाद का जोड़ा बन सकता है। बिना बाजे के गाना और बिना गाने का बाजा अपूर्ण रह जाता है, इसी प्रकार हमारे विचारों का समुचित प्रभाव तभी हो सकता है जब उनके प्रसार में आपका व्यक्तिगत उत्साह, उल्लास एवं श्रम सम्मिलित हो।
स्वाध्याय (3)प्राणाकर्षण प्राणायाम (4) सोकर उठते ही अपने उपकारियों का मानसिक अभिवन्दन, पृथ्वी पर पैर धरते ही धरती माता को प्रणाम, माता, पिता, पति, गुरुजनों के चरणस्पर्श, उनके अभाव में चरणों की प्रतिमूर्ति को नमन एवं रात को सोते समय दिन भर के उपकारियों का स्मरण (5) जप के साथ अपने को एक वर्ष के बालक के रूप में मानते हुए माता की गोदी में खेलने एवं उसका स्तन पान का ध्यान यह सब कार्य न तो अधिक समय साध्य है ओर न श्रमसाध्य। थोड़ी सी इच्छा, श्रद्धा और निष्ठा हो तो इनके लिए अवकाश भी हर किसी से सकते है। गायत्री, उपासना जिनकी अब तक बिलकुल नहीं चलती, वे इस आधार पर थोड़ी-सी से ही आरम्भ कर सकते है। जिनकी चलती है वे ध्यान के द्वारा उसे और परि-पुष्ट कर सकते है।
स्वाध्याय के निमित्त पढ़ने का मनीषियों ने आदेश किया है।
स्वाध्याय और सत्संग को आत्मकल्याण का सर्वोपरि मार्ग बताया है। ज्ञान की महत्ता के सम्बन्ध में शास्त्र का अभिमत देखिये-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-September
स्वाध्याय और सत्संग भी उसके प्रधान अंग है। अखंड ज्योति को स्मृति रूप से पढ़ना इस अंग की एक अनिवार्य आवश्यकता है। जिन लोगों की आचार्यजी के प्रति व उनके मिशन के प्रति कुछ भी आस्था है उन्हें ड़ड़ड़़ड़ उस आस्था का परिचय अखंड ज्योति नियमित रूप से पढ़ते रहकर देना चाहिए।
स्वाध्याय की अनिवार्यता पर धर्म शास्त्रों में अत्यधिक जोर दिया गया है क्योंकि आन्तरिक स्थिति की स्वस्थता के लिए यह दोनों ही बातें आवश्यक है। आन्तरिक स्वास्थ्य के बिना बाह्य जीवन नितान्त असफल एवं संतापयुक्त ही रहता है चाहे उसमें भौतिक सम्पदाएँ कितनी ही अधिक क्यों न हो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-February
स्वाध्याय और चिन्तन के लिए, तप और ध्यान के लिये क्यों सूनापन ढूँढा़ जाता? दूरदर्शी महापुरूषों का मूल्यवान समय क्यों उस असुखकर श्रकेज्ञेपन में व्यतीत होता?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-December
स्वाध्याय परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीय माताजी से साक्षात्कार करने के समान है यह हर किसी के लिए हर पल सहज ही उपलब्ध हैं इस पत्रिका को स्वयं पढ़ना व औरों को प्रेरित करना ऋषियुग्म की सत्ता के मानस पुत्रों में वृद्धि में वृद्धि करने के समान हैं इस संधिवेला में सभी का यह कर्त्तव्य होना चाहिए कि इन मानस पुत्रों में और वृद्धि हो एक पाठक न्यूनतम पाँच नये जपजसम मज पाठक तैयार करे पच्चीस सहयोगी पाठक तैयार करे।
स्वाध्यायी होते हुए भी संग्राही नहीं है। ये पुस्तकें भी किसी दर्शनार्थी की ही हैं। वह सबेरे इन्हें यहां लेकर आया था। पुस्तकें यही छोड़कर दोपहरी में पास के गांव में चला गया है। भोजन की कोई व्यवस्था यहाँ से ही आ जाता है।
स्वाध्याय से एकत्रित ज्ञान को दूसरे को सिखाने से हमारी बुद्धि का विकास होता है वस्तुतः दूसरों के माध्यम से ही जो कुछ सीखा हुआ है वह परिष्कृत होता है ।
स्वाध्याय करता है,
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-May
स्वाध्याय व मनन परिजन नित्य किया करें। चाहें तो उसका एक ही पद चुन लें। उसके संदर्भ में गम्भीरतापूर्वक विचार किया करें कि इस पद में लक्ष्य क्या है और हम कैसा जीवन जी रहे हैं, यह हमारे ही विकास का प्रश्न है। अतः अपनी जीवन शैली में कौन सा परिवर्तन किस प्रकार से करना हमारे लिए सम्भव है। यह मनन प्रतिदिन हम करें।
स्वाध्याय’ है।
स्वाध्याय, मनन, चिन्तन ये तीन शब्द ही तीन फलकों वाला अंकुश है जिसे युग निर्माण योजना-गायत्री परिवार अश्वमेध महायज्ञों के प्रथम अनुयाज कार्यक्रम के रूप में अपनाने और जन-जन में प्रचार-प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहे है। शब्द कोष में इनके जो भी अर्थ दिए गए हों, पर पूज्य गुरुदेव ने अपने प्रवचनों लेखों तथा पंचकोशी साधना विवरण में जिन विशिष्ट अर्थों में इनका प्रयोग किया है वही हमारे लिए ग्रहण करने योग्य है। उनके बताये अर्थ ही हमें जानना चाहिए, उन अर्थों में ही इन तीन शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
स्वाध्याय - मनन की जोड़ी हीनताओं को हटाने, न्यूनताओं को पूरा करने तथा श्रेष्ठताओं को बढ़ाने में सक्रिय योगदान दे सकती है। हमारी नियमितता और निष्ठा उसके साथ जुड़ी हो तो वह अत्यन्त सन्तोषप्रद प्रगति की अनुभूति अनिश्चय ही करा सकती है।
स्वाध्याय करते हैं।
स्वाध्याय’ है। वह न तो समय काटने के लिए किया जाता है, न ही मात्र बौद्धिक ज्ञान बढ़ाने के लिए ।स्वाध्याय के लिए भी पढ़ा जाता है किन्तु ध्यानपूर्वक। इसलिए सरसरी दृष्टि से देखने पर तो यह अध्ययन करने जैसा लगता है। पर इसकी पैठ बाहरी कमरे पर, बुद्धि पर समाप्त नहीं हो जाती।
स्वाध्याय हमें अपनी पकड़ में समेट लेता है।
स्वाध्याय के समान मनन भी उत्तम वैद्य है। वह न तो हीनता की भावना जगाता है न ही निकृष्टता की। शारीरिक असंयम से दूषित पर्यावरण में रहने से शरीर का रोगी हो जाना स्वाभाविक है। मानसिक असंयम से, चारों ओर संव्याप्त दूषित वातावरण से मन का मैला हो जाना, बुद्धि का भ्रष्ट हो जाना भी स्वाभाविक है। मनन गहरे उतर कर मानस में उन मनोवृत्तियों, दृष्टिकोणों तथा आदतों की खोज करता है जहाँ यह दोष उपजते और पोषण पाते हैं और वैसे ही कर्मों के रूप में दैनिक जीवन में दिखाई देते हैं।
स्वाध्याय के लिए भी पढ़ा जाता है किन्तु ध्यानपूर्वक। इसलिए सरसरी दृष्टि से देखने पर तो यह अध्ययन करने जैसा लगता है। पर इसकी पैठ बाहरी कमरे पर, बुद्धि पर समाप्त नहीं हो जाती। बुद्धि के बहुत आगे तक, बहुत ‘भीतर’ तक स्वाध्याय की पहुँच है। राम-भरत मिलन की कथा के पाठ्यकर्ताओं में निश्चय ही कुछ व्यक्ति ऐसे होंगे जो इस कथा को विवेक के संग अन्तस् में भी ले जाते हैं कथा में से झर रही राम और भरत की मानसिकता एवं भावात्मकता के सामने वे अपनी मानसिकता एवं भावात्मकता को खड़ा करते और तुलना करते हैं।
स्वाध्याय के लिए इसे प्रायः चुन लिया जाता है। पर जिसे जो माध्यम सरल व उपयुक्त समझ पड़े वह वही अपना ले। महत्व माध्यम का नहीं है। महत्व उस उमंग, महत्वाकाँक्षा का है जो अपने व्यक्तित्व को निखारने के लिए उमड़ती रहती है। महत्व उस ग्लानि का पतन के प्रति उस असन्तोष का है, उस प्रत्येक प्रेरणा का है जो ऊपर, और ऊपर उठने के लिए अन्तःकरण को कचोटती रहती है।
स्वाध्याय अपनी ही नजरों में अपने को गिरा लेने की प्रक्रिया है। उत्तम वैद्य रोगी की नाड़ी देखता है, रोगों को खोजता है, रोगी भी अपने दोष स्वीकार करता है। परन्तु इस पूरी प्रक्रिया में वैद्य रोगी को हीन दृष्टि से नहीं देखने लगता, उस निकृष्ट व्यक्ति नहीं मानने लगता। वह रोगी को उसके रोग बताया है और धैर्य भी बाँधता है। उत्तम वैद्य के समान स्वाध्याय भी भीतर व बाहर के स्वभाव एवं आचरण दोषों को खोजता है।
स्वाध्याय है।
स्वाध्याय श्रेष्ठताओं की ओर भी संकेत करता है, पीठ भी थपथपाता है, बढ़ - चलने का उत्साह भी बढ़ाता है। स्वाध्याय मानसिक दृढ़ता, भाव शक्ति व आत्मबल को विकसित करने का प्राणवान प्रेरणा स्रोत है। अपने उजलेपन को जानना और उसे परमात्मा का अनुग्रह मानना उतना ही आवश्यक है जितना कि अपने मैलेपन की जानकारी। इस प्रकार ‘कृतज्ञता’ जैसी दैवी सम्पदा को स्वाध्याय सहज की उपलब्ध करा देता है।
स्वाध्याय करना अधिक सरल है। सत्साहित्य सरलता से उपलब्ध भी हो जाता है। इसलिए स्वाध्याय के लिए इसे प्रायः चुन लिया जाता है। पर जिसे जो माध्यम सरल व उपयुक्त समझ पड़े वह वही अपना ले। महत्व माध्यम का नहीं है।
स्वाध्याय भी भीतर व बाहर के स्वभाव एवं आचरण दोषों को खोजता है। मानव जीवन का लक्ष्य क्या है और अभी कहाँ भटक गए हैं, कहाँ अटक गए हैं, इसका अनुसन्धान स्वाध्याय करता है। अपने दोषों को दुर्बलताओं को जानना और जानकारी स्वीकार कर लेना स्वयं ही प्रमाण है कि दोषों से मुक्त होने की राह भटके व्यक्ति में आकाँक्षा है। यह हीनता का नहीं वीरता का लक्षण है। दोष को जानकारी उसे सहज भाव से स्वीकार करते ही स्वच्छ जीवन जीने का भाव जागता है।
स्वाध्याय मानसिक दृढ़ता, भाव शक्ति व आत्मबल को विकसित करने का प्राणवान प्रेरणा स्रोत है। अपने उजलेपन को जानना और उसे परमात्मा का अनुग्रह मानना उतना ही आवश्यक है जितना कि अपने मैलेपन की जानकारी। इस प्रकार ‘कृतज्ञता’ जैसी दैवी सम्पदा को स्वाध्याय सहज की उपलब्ध करा देता है।
स्वाध्याय की इस लम्बी व गहरी पैठ के कारण उसके उद्देश्य व परिधि, पद्धति व व्यूह रचना पढ़ने - अध्ययन करने की अपेक्षा नहीं अधिक व्यापक, विशिष्ट व उच्चस्तरीय है - स्वाध्याय हमें अपनी पकड़ में समेट लेता है।
स्वाध्याय का दूसरा पक्ष भी उतना भी सशक्त एवं प्रेरक है। मानवी अन्तःकरण में दोष ही दोष नहीं होते, गुण भी होते हैं। स्वाध्याय श्रेष्ठताओं की ओर भी संकेत करता है, पीठ भी थपथपाता है, बढ़ - चलने का उत्साह भी बढ़ाता है। स्वाध्याय मानसिक दृढ़ता, भाव शक्ति व आत्मबल को विकसित करने का प्राणवान प्रेरणा स्रोत है। अपने उजलेपन को जानना और उसे परमात्मा का अनुग्रह मानना उतना ही आवश्यक है जितना कि अपने मैलेपन की जानकारी।
स्वाध्याय है। कुविचारों के विष की काट भी इस अमृत रस से ही हो सकती है। अतः मनोमय कोश की शुद्धि का सबसे प्रधान एवं सबसे महत्वपूर्ण साधन यह है कि मस्तिष्क में अधिक से अधिक समय तक श्रेष्ठ विचारधारा प्रवाहित होती रहे। शुद्धता, शान्ति व प्रगति के इच्छुक व्यक्ति इसी लिए नित्य-नियमित स्वाध्याय करते हैं।
स्वाध्याय हमें अपना निरीक्षण स्वयं करने के लिए बाध्य कर देता है। इसलिए स्वाध्याय मात्र पुस्तक का अध्ययन नहीं है।
स्वाध्याय के लिए मात्र पढ़ना-अध्ययन करना, सत्साहित्य को माध्यम बनाना अनिवार्य है, तो उसे हटा दें। यदि ऐसा होता तो अनपढ़ कबीर अंतर्मन की स्थितियों को गहन सूक्तियों में कैसे बता पाते ? अन्धे सूरदास कन्हैया के प्रति अपनी आन्तरिक प्रीति को मन मोह लेने वाले पदों में कैसे गा पाते ? आत्म साक्षात्कार जैसे अत्यन्त क्लिष्ट विषय को रामकृष्ण सीधे-सादे उदाहरणों से कैसे स्पष्ट कर पाते ? तुलसीकृत ‘रामचरित मानस’ अपने अन्दर सृष्टि विज्ञान, वेदान्त, उपनिषद् ज्ञान जैसे गूढ़ विषय को इतने सरल ढंग से कैसे समझा पाते?
स्वाध्याय’ है। यह सही नहीं है। इस भ्रम को दूर कर लेना चाहिए। पढ़ना, अध्ययन करना, स्वाध्याय करना तीन बिल्कुल ही भिन्न-भिन्न क्रियाएँ हैं। उनके उद्देश्यों में, क्रिया पद्धतियों में तथा परिणामों में कोई एकरूपता या समानता नहीं है।
स्वाध्याय जैसी अति महत्वपूर्ण क्रिया के पश्चात् सम्पन्न किये जाने वाले मनन में विचार क्रमबद्ध व प्रगतिशील होते हैं, निर्धारित दिशा मेँ दूर तक और गहराई तक जाते हैं और किसी निष्कर्ष अथवा निर्णय अथवा प्रेरणा पर निश्चय ही पहुँचते हैं।
स्वाध्याय के संदर्भ में मनन का अर्थ है “अपने विगत जीवन तथा वर्तमान जीवन का गम्भीरतापूर्वक अवलोकन करना और अपने व्यक्तित्व के स्तर को ऊपर उठाने की प्रेरणा देना।” अतः मनन उद्देश्यपूर्ण विचार करने की शैली हैं । मनन स्थूल हानि-लाभों को महत्व नहीं देता।
स्वाध्याय-वैद्य के सम्मुख नित्य अपने मानस को प्रस्तुत करते रहना चाहिए।
स्वाध्याय मात्र पुस्तक का अध्ययन नहीं है।
स्वाध्याय करना तीन बिल्कुल ही भिन्न-भिन्न क्रियाएँ हैं। उनके उद्देश्यों में, क्रिया पद्धतियों में तथा परिणामों में कोई एकरूपता या समानता नहीं है।
स्वाध्याय सहज की उपलब्ध करा देता है।
स्वाध्याय है। खोजी प्रकाश को भीतर की ओर मोड़ना स्वाध्याय है।
स्वाध्याय-वैद्य अपनी ही नजरों में अपने को कभी नहीं गिराता, कभी निराश नहीं करता। वह सदैव आश्वासन देता है, विश्वास जगाता है कि सुबह का भूला शाम को घर वापिस आ जाय तो भटका हुआ नहीं कहलाता है। वह तो अंतःकरण के दोषों से जूझने का संकल्प उठाता है। अतः नैतिक आध्यात्मिक प्रगति के इच्छुक साधक को बिना हिचके स्वाध्याय-वैद्य के सम्मुख नित्य अपने मानस को प्रस्तुत करते रहना चाहिए।
स्वाध्याय दोषों की ही नहीं, श्रेष्ठताओं की भी जानकारी देता है। तो उत्साहित हुआ मनन इन श्रेष्ठताओं के मूल को भी इन्हीं मनःक्षेत्र तथा भाव-क्षेत्र में खोजता है। जैसे बाह्य जगत में आदि कोई व्यक्ति मानव सेवा का कार्य कर रहा है तो इसका कारण उसके मन की परहित वृत्ति है। यह श्रेष्ठ-वृत्ति यदि उसके मन में गहरे समा गई है, यदि उसे बार-बार उसके मन को परहित चिन्तन की ओर खींच ले जाती है, तो इसका कारण यह है कि वह परमार्थ वृत्ति भाव क्षेत्र हृदय में स्थित ‘उदारता’ से निरन्तर पोषण पा रही है। मनन इस परिहित वृत्ति और उदारता की भावना का अवलोकन और मूल्याँकन करता है, उन पर यदि स्वार्थ अथवा यश की कामना की धूल जमने लगी हो तो सचेत करता है निखार आ रहा हो तो प्रसन्नता और सन्तोष व्यक्त करता है मनन व्यक्ति की अपनी क्षमता के अनुसार इन श्रेष्ठताओं की ओर बढ़ाने की सम्भावना ढूंढ़ता है।
स्वाध्याय करता है। अपने दोषों को दुर्बलताओं को जानना और जानकारी स्वीकार कर लेना स्वयं ही प्रमाण है कि दोषों से मुक्त होने की राह भटके व्यक्ति में आकाँक्षा है। यह हीनता का नहीं वीरता का लक्षण है। दोष को जानकारी उसे सहज भाव से स्वीकार करते ही स्वच्छ जीवन जीने का भाव जागता है। स्वाध्याय-वैद्य अपनी ही नजरों में अपने को कभी नहीं गिराता, कभी निराश नहीं करता।
स्वाध्याय की पहुँच है। राम-भरत मिलन की कथा के पाठ्यकर्ताओं में निश्चय ही कुछ व्यक्ति ऐसे होंगे जो इस कथा को विवेक के संग अन्तस् में भी ले जाते हैं कथा में से झर रही राम और भरत की मानसिकता एवं भावात्मकता के सामने वे अपनी मानसिकता एवं भावात्मकता को खड़ा करते और तुलना करते हैं। अपने पिता व भाई के प्रति स्वयं उनकी कैसी मनोवृत्ति, कैसी भावना, कैसा व्यवहार है ? इसे परखते हैं। राम-भरत की निर्लोभ वृत्ति वे प्रेम भाव तथा राम-दशरथ के कर्तव्य भाव के दर्पण में अपनी सूरत देखने का वे साहस करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-February
स्वाध्यायशील के मन में पैदा कर दी। यों तो वेद के सभी मंत्र अनुभूति जन्य ज्ञान के उद्घोषक होने के कारण लौकिक एवं अध्यात्मिक रहस्यों से लबालब भरे है किंतु सामवेद के परिष्कृत ज्ञान और उत्कृष्टतम भावना के संयोग से ईश्वरत्व की सहज अनुभूति जीवन काल में ही हो जाती है।
स्वाध्याय मनन के साथ इसका समापन करे। यदि यह क्रम नियमित चल गया तो 15 लाख नये व्यक्ति अन्यान्य सम्प्रदायों के या अल्पशिक्षित वर्ग के इस मिशन के साथ जुड़ेंगे ।
स्वाध्याय, सत्संग, कुटि प्रवेश, एकाँत और अंतर्मुखी साधना जैसे दैनिक कृत्यों की पूर्ति तो शास्त्र परम्परा के अनुसार करते ही है। पर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह अवधि अंतर्जगत की गुत्थियों को सुलझाने के लिए किये जाने वाले संयम के लिए होता है। इस क्रिया रहित प्रक्रिया को आध्यात्मिक कल्प के मेरुदण्ड आधार केन्द्र कहा जा सकता है। चिंतन मनन के इन दो साधनों को तपश्चर्या अनुसंधान की पृष्ठ भूमि माना जा सकता है। प्रायश्चित के विभिन्न पक्ष भी इस पूर्वार्ध में सन्निहित है।
स्वाध्याय, साधना एवं तपश्चर्या वाले तीनों अंशों का समन्वित साधन चलेंगे।ऐसी तपश्चर्या कराना चाहते हैं। तपश्चर्या में सबसे पहले यह काम करना पड़ता है -महाभारत की लड़ाई लड़नी पड़ती है। अर्जुन को श्रीकृष्ण बार बार यही कहते थे कि “ततो युद्धाय युज्यस्व “ किंतु अर्जुन बार बार बहाने बनाता रहा और कहता रहा कि मैं नहीं लड़ूँगा। पीछे भगवान के बार बार समझाने पर उसने कहा-” करिष्ये वचनं तव” अर्थात् आपकी आज्ञा मानूँगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-November
स्वाध्याय के लिए सत्साहित्यों का वितरण किया जाता है। बीच-बीच में यज्ञ, दीपयज्ञ, कीर्तन, आरती जैसे कार्यक्रम भी कराये जाते हैं। उनके प्रति स्नेह और प्रेम प्रदर्शित करने के लिए रक्षा-बन्धन जैसे त्यौहारों में उनकी कलाइयों में राखी बाँधी जाती है। इसके अतिरिक्त समय-समय पर उनसे मिलने और उन्हें श्रेष्ठ चिन्तन देकर रचनात्मक कार्यों के प्रति रुचि जगाने का भी उपक्रम होता रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-April
स्वाध्याय-मनन-चिन्तन प्रक्रिया। समय की कसौटी पर यह त्रिपदा प्रक्रिया सदा ही खरी उतरी है। यह सम्पूर्ण मन्थन भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इस निर्णयात्मक वैचारिक युद्ध को लड़ने व विजयी होने के लिए स्वाध्याय-मनन-चिन्तन आज की सर्वोपरि आवश्यकता है।
स्वाध्याय-मनन-चिन्तन सर्वप्रथम क्रियापरक कार्यक्रम है। प्राणवान परिजनों से शुभाकाँक्षियों से तथा आत्मोन्नति के इच्छुक पाठकों से अपेक्षा और आग्रह भी कि वे इस स्वाध्याय त्रिवेणी को गहराई से जानें-समझे और मानव में प्रसुप्त पड़ी वैचारिक व भावात्मक चेतना को जाग्रत करने का नैष्ठिक प्रयास करें। इसका क्रियापक्ष, अगले अंक के चार लेखों में परिजन पढ़ सकेंगे। विश्वास रखें इक्कीसवीं सदी का उज्ज्वल भविष्य दिवा स्वप्न नहीं है, महाकाल द्वारा निर्धारित भवितव्यता है। इसे चरितार्थ करने के लिए अब आवश्यकता विश्वास और उमंग भरे मन वालों का है।
स्वाध्याय -मनन-चिन्तन (2) विश्व कल्याण के लिए समर्पित गायत्री मन्त्र जप अथवा भगवन्नाम जप, अथवा अपने-अपने धर्म सम्प्रदाय का मंत्र जप। (3) गायत्री मन्त्र अथवा भगवन्नाम लेखन। (4) ज्ञान-यज्ञ, दीप यज्ञ आदि द्वारा आस्था जागरण, मिशन का विस्तार। (5) तुलसी का व्यापक रोपण-रक्षण-सिंचन। (6) पंच महावृक्षों तथा जैनोसिया अशोक का व्यापक रोपण रक्षण-सिंचन।
स्वाध्याय मण्डल, विचार गोष्ठियाँ, धार्मिक कर्मकाण्डों के भावात्मक आधारों का निरूपण तथा ऐसी अन्य प्रक्रियाएं इस अभियान के प्रमुख उपकरण माध्यम रहे हैं। शक्तिपीठों, प्रजा मण्डलों, महिला मण्डलों द्वारा जो व्यापक रूप से व्यवहार में लाए जा रहे हैं, अत्यन्त प्रभावी भी सिद्ध हुए हैं। अब इन्हें अधिकतम प्रखर व पैना बनाना आवश्यक है, युद्ध की दृष्टि से अनिवार्य भी। इस आवश्यकता की पूर्ति की सर्वाधिक प्रभावी विधि है-स्वाध्याय-मनन-चिन्तन प्रक्रिया। समय की कसौटी पर यह त्रिपदा प्रक्रिया सदा ही खरी उतरी है।
स्वाध्याय त्रिवेणी को गहराई से जानें-समझे और मानव में प्रसुप्त पड़ी वैचारिक व भावात्मक चेतना को जाग्रत करने का नैष्ठिक प्रयास करें। इसका क्रियापक्ष, अगले अंक के चार लेखों में परिजन पढ़ सकेंगे। विश्वास रखें इक्कीसवीं सदी का उज्ज्वल भविष्य दिवा स्वप्न नहीं है, महाकाल द्वारा निर्धारित भवितव्यता है। इसे चरितार्थ करने के लिए अब आवश्यकता विश्वास और उमंग भरे मन वालों का है।
स्वाध्याय-मनन-चिन्तन आज की सर्वोपरि आवश्यकता है।
स्वाध्याय की सभी सुविधा उपलब्ध हो। मन्दिर के परिसर में उपयोगी जड़ी-बूटियों का एक छोटा उद्यान लगाया जाय। जिसमें रोज-मर्रा में काम आने वाली औषधियों के पौधे लगे हों। ग्रामीण अंचलों में अभी भी जड़ी-बूटियों के इतने अच्छे जानकार मिल जाते हैं, जितना ज्ञान कभी-कभी प्रशिक्षित आयुर्वेदाचार्य को भी नहीं होता। परन्तु उनमें इस ज्ञान को गोपनीय रखने की घातक प्रवृत्ति होती है।
स्वाध्याय-मनन-चिन्तन की सर्वोत्कृष्टता
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-October
स्वाध्याय नहीं कर पाते, उनके लिए -आडियो बुक’ लगभग एक हजार की संख्या में आगामी एक वर्ष में तैयार करने का निर्णय लिया गया है। विदेश में अब इनका प्रचलन अत्याधिक है। ज्ञानेन्द्रियों में आँखें देखें या कान सुनें, कोई फर्क नहीं पड़ता । मस्तिष्क की ग्रहणशीलता पर निर्भर करता है कि स्वाध्याय सार्थक हो पा रहा है या नहीं। पूज्यवर के साहित्य के महत्वपूर्ण अंश अब ‘ऑडियो बुक्स’ के रूप में भी शाँतिकुँज की रजत जयंती के उपलक्ष्य में प्रतिमाह निकलते रहेंगे एवं दीपावली उनके प्रथम किश्त निकल जाय, यह विदेश प्रवास से लौटकर सुनिश्चित कर लिया गया है, इसी तरह वीडियो के माध्यम से नन्हें-मुन्हें बच्चों के लिए एनीमेशन फिल्मस से लेकर बड़ों के लिए एक्शन साँग्स, एकाँकी नाटिकाएँ एवं पूज्यवर एवं मातृसत्ता का संदेश और भी प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करने की योजना बनी है।
स्वाध्याय, चिंतन, मनन से मस्तिष्क में विचारों का समुद्र लहराने लगा।
स्वाध्याय सार्थक हो पा रहा है या नहीं। पूज्यवर के साहित्य के महत्वपूर्ण अंश अब ‘ऑडियो बुक्स’ के रूप में भी शाँतिकुँज की रजत जयंती के उपलक्ष्य में प्रतिमाह निकलते रहेंगे एवं दीपावली उनके प्रथम किश्त निकल जाय, यह विदेश प्रवास से लौटकर सुनिश्चित कर लिया गया है, इसी तरह वीडियो के माध्यम से नन्हें-मुन्हें बच्चों के लिए एनीमेशन फिल्मस से लेकर बड़ों के लिए एक्शन साँग्स, एकाँकी नाटिकाएँ एवं पूज्यवर एवं मातृसत्ता का संदेश और भी प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करने की योजना बनी है।
स्वाध्याय कर रही थी। घनी, काली केशराशि उसकी पीठ पर लहरा रही थी। वायु के मन्द झोंके उससे अठखेलियाँ कर रहे थे। शान्त-स्निग्ध मुख की आकृति पर एक अलौकिक आभा बिखरी थी। उसके विस्तीर्ण नयन गीतामृत का रसपान कर रहे थे।
स्वाध्याय शीलता और पढ़े हुए को जीवन में पचाने के अभ्यास ने गाँधीजी को महान बना दिया। रस्किन की लिखी पुस्तक ‘एण्ड दि लास्ट’ पुस्तक तो गाँधीजी के सारे जीवन की मार्गदर्शिका रही।
स्वाध्याय की ही है, जो सुभाष की जीवनशिला पर क्रियाशीलता बनाकर खुद चुका था।
स्वाध्याय से, ज्ञानार्जन से ही संभव है। उत्तराखण्ड के एक प्राचीन नगर में सुबोध नामक राजा राज्य करते थे। महाराज का नियम था-राजकीय कार्य प्रारम्भ होने से पूर्व वे आये हुए याचकों को दान दिया करते थे। इस नियम में उन्होंने कभी भूल नहीं की। एक दिन जब सब लोग दान पा चुके , तो एक विचित्र स्थिति आ खड़ी हुई।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-August
स्वाध्याय, मनन, चिन्तन (9) 1.30 से 2.30 प्रवचन (10) 2.30 से 3 जलपान (11) 3 से 5 साधना का तृतीय सोपान (12) 5 से 5.30 शौच आदि (13 ) 5.30 से 6 में भोजन (14 ) 6 से 7 टहलना (15) 7 से 8 भाव संगीत (15) 8 से 4 तक शयन ।
स्वाध्याय, चिन्तन, मनन के लिए था ।
स्वाध्याय का क्रम अपनाना तथा छोटे-छोटे दीपों द्वारा जन-जन को युगपरिवर्तन की विचारधारा से अनुप्राणित करना यह त्रिविध उद्देश्य इन कार्यकर्ता गोष्ठियों का था, जो तीन दिन टुकड़ों-टुकड़ों में पूरा होता चला गया। संध्याकाल में वन्दनीया माताजी के उद्बोधन के पूर्व गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक पण्डित लीलापत शर्मा का प्रेरक उद्बोधन हुआ। उन्होंने पू. गुरुदेव के विद्या-विस्तार कार्यक्रम के प्रसार हेतु उनके लिखे साहित्य को उन सभी मिशन का आलोक नहीं पहुँच पाया है। इसके पश्चात् वन्दनीया माताजी का सारगर्भित प्रवचन हुआ। जिसमें उन्होंने उपासना, साधना, आराधना के मर्म को पूज्यवर के जीवन के परिप्रेक्ष्य में समझाया।
स्वाध्याय और योग साधन तपश्चर्या के लिए भी समुचित स्थान रहे और शेष समय सेवाकार्यों में लगा रहे। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस युग की महानतम आवश्यकता और विश्व मानव की सेवा-साधना एक ही है जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण। इसके लिए ज्ञान यज्ञ की विचार क्रान्ति शृंखला इन दिनों चल रही है। इस केन्द्र पर ही प्रत्येक विचारशील का ध्यान केन्द्रित होना चाहिए। इस चरण को पूरा करने के बाद ही रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्य हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-March
स्वाध्याय संयम के आधार पर जो श्रेष्ठता अर्जित की जाय उसे प्रज्ञायुग के अवतरण में लगाने के लिये भगीरथ जैसा साहस उभरना चाहिये। अपने समय में प्रज्ञायोग ही सबसे बड़ा योग जप एवं तप, साधना माना जायेगा।
स्वाध्याय, संयम और सेवा की आवश्यकता अनुभव की जानी चाहिए और उसकी व्यवस्था भी आहार, वस्त्र, विश्राम की तरह ही बननी चाहिये। अब ऐसा सत्संग सम्भव नहीं इसलिये अब वह कार्य प्रेस की वर्तमान सुविधा और श्रेष्ठजनों की दुर्लभता में सत्साहित्य से ही चलाना होता है, संयम को तपश्चर्या कहते हैं। आत्म-अनुशासन भी वही है। इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम, विचार संयम, के चार अनुशासन अपने ऊपर स्थापित किये जायँ तो अपव्यय और अस्तव्यस्तता में नष्ट होने वाली शक्तियां बचायी जा सकती हैं। इन चार छेदों के बन्द कर देने पर ईश्वर प्रदत्त विभूतियों की असाधारण बचत हो सकती है और उस बचत को सत्प्रयोजनों में नियोजित करने वाला कोई भी व्यक्ति, किसी भी दिशा में आश्चर्यजनक प्रगति करने में समर्थ हो सकता है।
स्वाध्याय मण्डल, प्रज्ञा संस्थान छोटे व बड़े रूप में मनायें। सामूहिकता में बड़ी शक्ति होती है। एक साथ संकल्पित साधक जब इस अनुष्ठान प्रक्रिया में जुड़ेंगे तो निश्चित ही सूक्ष्मजगत के संशोधन एवं जीवन-मरण के संघर्ष के लिए जूझ रही असुरता से मोर्चा लेने में मदद मिलेगी। युग देवता ने इस पुनर्गठन वर्ष विशिष्ट संस्कार सम्पन्न दैवी अंशधारी आत्माओं से साधना द्वारा आत्मबल उपार्जन हेतु न्यूनतम पाँच चौबीस चौबीस हजार के अथवा दो या तीन सवा लक्ष के गायत्री अनुष्ठान करने की प्रेरणा दी है। उसका शुभारम्भ यदि अभी तक न हुआ हो तो इस नवरात्रि से आरम्भ कर दिया जाना चाहिए।
स्वाध्याय-संयम-सेवा, यही है आत्मोत्कर्ष के चार चरण। इनमें एक भी ऐसा नहीं है, जिसे छोड़ा जा सके और एक भी ऐसा नहीं है जिस अकेले के बल पर आत्मकल्याण का लक्ष्य पूरा किया जा सके। अस्तु मनन और चिन्तन द्वारा इन्हें किस प्रकार कितनी मात्रा में अपनी दिनचर्या में सम्मिलित रखा गया, इस पर अति गम्भीरतापूर्वक विचार करते रहना चाहिए। यदि इससे भावी जीवन की कोई परिष्कृत रूपरेखा बन सकी और उसे व्यवहार में उतारने का साहस जग सका तो समझना चाहिए कि उतने ही परिमाण में गायत्री माता का प्रसाद तत्काल मिल गया। यह सुनिश्चित मानना चाहिए कि श्रेष्ठता भरी गतिविधियाँ अपनाते हुए ही भगवान की शरण में पहुँच सकना और उनका अनुग्रह प्राप्त करना सम्भव हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-July
स्वाध्याय सत्संग में हजारों बार पढ़ा-सुना गया होता है फिर ‘न जानने’ जैसी क्या बात रह गई जिसके लिए ‘आत्म-बोध’ की बात को इस तरह सिर पर उठाया जाय और उसमें सफल होने पर सामान्य से असामान्य बन जाने का माहात्म्य सुनाया जाता रहे ?
स्वाध्याय, सत्संग-सान्निध्य के सहारे अनेकों व्यक्ति प्रतिभासंपन्न होते देखे जा सकते हैं। जहाँ ऐसा वातावरण नहीं उपलब्ध हो पाता, उलटे कुरुचि भड़काने वाली, परिस्थितियों का प्राधान्य होता है, वहाँ कमजोर मनोबल प्रखरता के अभाव में गिरते हैं। अविकसित नर-पामरों की श्रेणी में शामिल होते देखे जा सकते हैं
स्वाध्याय ने संयम वृत्ति व नियमितता के कच्चेपन को भी स्पष्ट किया। मैंने अपनी यह दुर्बलता स्वीकार कर ली। इन्हें परिपक्व स्थिति में लाने के लिए मैंने मनन प्रारम्भ किया। मन को टटोला तो समझ में आया कि सुस्वादु भोजनों और आकर्षक किन्तु हेय मनोरंजनों का लोभ संयम वृत्ति को ढीला कर देता है, फलस्वरूप नियमितता का संकल्प भी टूट जाता है । अतः इस लोभ का शमन करना व संयम वृत्ति को स्थिर बनाना होगा।
स्वाध्याय -मनन-चिन्तन करना चाहिए। पहले षट्कर्म सम्पन्न करने के बाद संक्षिप्त स्वाध्याय आदि प्रक्रिया में दस मिनट समय लगाना उपयुक्त होगा। उसके बाद जप करने से विचारों की दिशा श्रेष्ठता की ओर मुड़ जाएगी तो जप-ध्यान आदि भी क्रमशः उच्च स्तर के होते जायेंगे।
स्वाध्याय
स्वाध्याय-मनन-चिन्तन करने से ही श्रेष्ठ जीवन जीने की आकाँक्षा जागती है। आस्था और मान्यता में सुधार होता है, तो उस दिशा में में प्रयास भी होने लगते हैं। अतः इन तीन प्रक्रियाओं को एक बार फिर समझ लेना चाहिए।
स्वाध्याय-त्रिवेणी- भजन-उपासना के समकक्ष पुण्य फलदायक साधना मानी जाती है। यह विचारों के सामान्यतः निम्न प्रवाह को उत्कृष्टता की ओर मोड़ देती है। इस स्थिति में जप ध्यान भी श्रेष्ठ स्तर के बन पड़ते हैं। अतः आश्वमेधिक अनुयाज में इसे जप से पहले सम्पन्न करने की अनुशंसा की गई है। प्रतिदिन आधा से एक घण्टा इन श्रेष्ठ प्रक्रियाओं में लगाना चाहिए, किन्तु ज पके पूर्व दस मिनट का समय ही पर्याप्त है।
स्वाध्याय- मनन- चिन्तन प्रक्रिया का एक उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है। मूल बिन्दुओं को ध्यान में रखकर अपनी रुचि तथा पूर्व अभ्यास के अनुसार इसमें साधारण हेर-फेर किया जा सकता है।
स्वाध्याय आता है- यह ज्ञान एक्ष है और कर्म पक्ष ! उसे कहते हैं जिसमें सेवा का समावेश होता है, परोपकार का समावेश होता है, पुण्यकर्मों का समावेश होता है। इन दोनों बातों को अगर आप मिला देंगे, तो आपकी प्रक्रिया पूर्ण हो जायेगी। बिजली के दो तार मिल जाने से करेंट चालू हो जाता है। आप ज्ञान और कर्म का समावेश अगर कर पायें, तो आपकी पूर्ण उपासना हो जायेगी। आप उस अध्यात्म के चमत्कार को देख पायेंगे जिसकी चर्चा शास्त्रों में की गई है।
स्वाध्याय-त्रिवेणी सम्पन्न की जा सकती है।
स्वाध्याय आदि प्रक्रिया में दस मिनट समय लगाना उपयुक्त होगा। उसके बाद जप करने से विचारों की दिशा श्रेष्ठता की ओर मुड़ जाएगी तो जप-ध्यान आदि भी क्रमशः उच्च स्तर के होते जायेंगे।
स्वाध्यायरत रहकर उनने अखण्ड ज्योति नामक पत्रिका का पहला अंक 1938 की बसंत पंचमी पर प्रकाशित किया। प्रयास पहला था, जानकारियाँ कम थी अतः पुनः सारी तैयारी के साथ विधिवत् 1940 की जनवरी से उनने परिजनों के नाम पाती के साथ अपने हाथ से बने काज पर, पैर से चलने वाली मशीन से छापकर ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का शुभारंभ किया जो पहले तो दो सौ पच्चीस पत्रिका के रूप में निकली, किन्तु क्रमशः उनके अध्यवसाय घर-घर पहुँचाने, मित्रों तक पहुँचाने वाले उनके हृदयस्पर्शी पत्रों द्वारा बढ़ती-बढ़ती नवयुग के मत्स्यावतार की तरह आज दस लाख से भी अधिक संख्या में विभिन्न भाषाओं में छपती व एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाती है।
स्वाध्याय, ध्यान मौन, तप और आत्म साधना में चार महीने हवा के झोंके की तरह झट-पट व्यतीत हो गए। डकैत - डकैती का माल लेकर इन ऋषियों - मुनियों के निवास स्थान के आगे से होकर गुजरते जरूर थे, परन्तु तप का प्रकाश उनके हृदयों को स्पर्श करता, उससे पहले ही वे वायु वेग सरपट आगे निकल जाते हैं।
स्वाध्याय में लगाइये, आत्मचिंतन में लगाइये , पूजा में लगाइये , मनन में लगाइये, पूजा में लगाइये , उपासना में लगाइये, और अच्छे लोगों के संपर्क में लगाइये, अच्छी बातों के सोचने में लगाइये , गंगा के किनारे जा करके रहिये। पूरा का पूरा समय आपका ऐसा हो जिसमें कहीं अवाँछनीयता के लिये जगह न हो। आपका चिन्तन ऐसा हो, जिसमें अवाँछनीयता के लिये कोई गुँजाइश न हो। बस, यह एक तीर्थ हमने बनाया है। मान्धाता की सहायता से जगतगुरु शंकराचार्य ने चार धाम बनाये थे, चार तीर्थ बनाये थे।
स्वाध्याय-मनन-चिन्तन” के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक प्रतिपादन को प्रस्तुत किया जा रहा है। मनोविज्ञान कहता है कि मन को नये ढाँचे में ढालने के लिए अभ्यस्त स्थिति से उबार कर नये सिरे से प्रशिक्षित करना पड़ता है। इसी तकनीक को विस्तृत विवेचन द्वारा विगत चार माह से समझाया जा रहा है। एक बार आत्मसात् कर लेने पर यह कितना सरल व चित्त को सुसंस्कारिता से ओत-प्रोत कर लेने वाला बन सकेगा, यह पाठक स्वयं देखेंगे।
स्वाध्याय अधिक सरल व सुलभ है। यह सदैव ध्यान देने योग्य बात है कि स्वाध्याय-त्रिवेणी के लिए उपयुक्त सत्साहित्य वही है। जो विज्ञानसम्मत ढंग से हमारी जिज्ञासाओं का समाधान कर सके तथा जीवन जीने की कला सिखा सके। ऐसे सत्साहित्य के माध्यम से स्वाध्याय-मनन-चिन्तन करने से ही श्रेष्ठ जीवन जीने की आकाँक्षा जागती है। आस्था और मान्यता में सुधार होता है, तो उस दिशा में में प्रयास भी होने लगते हैं।
स्वाध्याय-त्रिवेणी के लिए उपयुक्त सत्साहित्य वही है। जो विज्ञानसम्मत ढंग से हमारी जिज्ञासाओं का समाधान कर सके तथा जीवन जीने की कला सिखा सके। ऐसे सत्साहित्य के माध्यम से स्वाध्याय-मनन-चिन्तन करने से ही श्रेष्ठ जीवन जीने की आकाँक्षा जागती है। आस्था और मान्यता में सुधार होता है, तो उस दिशा में में प्रयास भी होने लगते हैं। अतः इन तीन प्रक्रियाओं को एक बार फिर समझ लेना चाहिए।
स्वाध्याय-मनन-चिन्तन इन कार्यों को भली प्रकार कर सकते हैं, इस दृष्टि से व अब हमारी जीवनचर्या का अनिवार्य अंश बन जाने चाहिए।
स्वाध्याय के अनेक प्रकारों की चर्चा पहले की जा चुकी है। इनमें से सत्साहित्य द्वारा स्वाध्याय अधिक सरल व सुलभ है। यह सदैव ध्यान देने योग्य बात है कि स्वाध्याय-त्रिवेणी के लिए उपयुक्त सत्साहित्य वही है। जो विज्ञानसम्मत ढंग से हमारी जिज्ञासाओं का समाधान कर सके तथा जीवन जीने की कला सिखा सके। ऐसे सत्साहित्य के माध्यम से स्वाध्याय-मनन-चिन्तन करने से ही श्रेष्ठ जीवन जीने की आकाँक्षा जागती है।
स्वाध्याय-मनन-चिन्तन तीनों को एक साथ सम्पन्न किया जाना चाहिए। अपनी महत्ता के कारण स्वाध्याय-त्रिवेणी- भजन-उपासना के समकक्ष पुण्य फलदायक साधना मानी जाती है। यह विचारों के सामान्यतः निम्न प्रवाह को उत्कृष्टता की ओर मोड़ देती है। इस स्थिति में जप ध्यान भी श्रेष्ठ स्तर के बन पड़ते हैं। अतः आश्वमेधिक अनुयाज में इसे जप से पहले सम्पन्न करने की अनुशंसा की गई है।
स्वाध्याय के लिये, इस आदर्श स्थिति की तुलना में मैंने अपने बीते तथा वर्तमान जीवन व्यवहारों का निष्पक्ष अवलोकन किया। “मेरी जीवनचर्या में संयम की वृति एवं कार्यों में नियमितता है या नहीं ?” निष्कर्ष सामने आया है तो किन्तु कभी-कभी वे टूट भी जाते हैं। कभी ऐसा विचार उठा भी नहीं कि इन्हें टूटने नहीं देना चाहिए। फिर भी यह ईश्वरीय सत्ता की अनुकम्पा तथा गुरुसत्ता की प्रेरणा ही है कि भले ही वे थोड़ी मात्रा में हों, पर आज के इस उच्छृंखल वातावरण में भी यह श्रेष्ठ गुण मुझसे जुड़े हुए हैं।
स्वाध्यायमण्डल के रूप में पूरे देश व विश्व में फैलते चले गए। 76 देशों में गायत्री परिवार की शाखाएँ फैल गयीं, 4600 से अधिक भारत में निज के भवन वाले संस्थान विनिर्मित हो गए, वातावरण गायत्रीमय होता चला गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-June
स्वाध्याय, मनन-चिन्तन को मन्त्र जप के समान महत्व देते हुए आश्वमेधिक अनुयाज में इसीलिए प्रथम स्थान दिया गया है।
स्वाध्याय अथवा मनन महत्वपूर्ण क्रियाएँ होते हुए भी फलहीन बनी रहती हैं और इच्छित परिणाम प्रस्तुत नहीं कर पाती। चिंतन के साथ जुड़कर ही वे पूर्णता। चिन्तन के साथ जुड़कर ही वे पूर्णता प्राप्त करती हैं। और सार्थकता सिद्ध करती है।
स्वाध्याय)। दूसरा, इन गल्तियों और कमियों को दूर करने के लिये अब क्या करना चाहिए? शरीर बल में कमी हो तो कौन से व्यायाम बढ़ाए जायँ? कौशल में कमी हो तो कौन से दाँव-पेंच सीखें और क्या करें जिससे कि भविष्य में जब भी दंगल का अवसर आए तव विजय श्री मिले (चिन्तन)। सम्भव है कि इतनी तैयारियों के बाद भी अगला दंगल फिर हार जाये।
स्वाध्याय-मनन-चिन्तन की तीन पदों वाली विचार शैली में ‘चिन्तन’ अन्तिम पद है। एक पैर अथवा दो पैरों वाली तिपाई खड़ी नहीं होती। तीन पैरों वाली स्थिर खड़ी नहीं होती। तीन पैरों वाली स्थिर खड़ी तिपाई ही उपयोग में लाई जा सकती है। उपयोग में लाई जा सकती है।
स्वाध्याय के द्वारा अपने दोष गुण जान लिये, स्वीकार अपने दोष गुण जान लिये, स्वीकार भी कर लिये। मनन द्वारा इन दोष-गुणों को विस्तार से ढूँढ़ भी लिया गया। जहाँ से वे पोषण पाते हैं, उन मनोवृत्तियों, संस्कारों को भी देख लिया गया। किन्तु इतना जान लिये व खोज गया। किन्तु इतना जान लेने व खोजे लेने से तो दोष घटेंगे-मिटेंगे नहीं ।
स्वाध्याय व मनन के निष्कर्षों के अनुरूप सरल, साध्य अभ्यासों की बना करता है। इतना ही नहीं वह कार्य-योजना का विस्तार भी उतना ही करता है, जितना अपनी वर्तमान क्षमता व इच्छाशक्ति के द्वारा संपन्न होना सम्भव हैं इस कारण चिन्तन व्यावहारिक एवं उपयोगी होती है। कुल मिलाकर चिन्तन प्रक्रिया का उद्देश्य बहुत सीधा और स्पष्ट है “आज हमारी जैसी भी मनः स्थिति व परिस्थिति है, जैसी भी क्षमता व इच्छाशक्ति है, हमें तो उतने से ही अपने दोषों को हटाने और गुणों को बढ़ाने का प्रयास करना है। अतः हम निश्चित करें कि हम अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कौन-कौन से उपायों-अभ्यासों का सतत् प्रयोग कर पायेंगे, जिससे कि वर्तमान स्थिति से बेहतर मानसिक व आत्मिक प्रगति की ओर बढ़ सकें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-January
स्वाध्याय मण्डलों में सम्पन्न हो सकती है।
स्वाध्याय, और धर्म रक्षा के मार्ग में प्रीति उत्पन्न हो जाय। जन कल्याण के लिए परशुराम जी ज्ञान और विग्रह दोनों को ही आवश्यक मानते थे। नम्रता और ज्ञान से सज्जनों को और प्रतिरोध तथा दण्ड से दुष्टों को जीता जा सकता है, ऐसी उनकी निश्चित मान्यता थी। इसीलिए वे अभय पक्षीय संतुलित नीति लेकर चलने से ही धर्म रक्षा की संभावना स्वीकार करते थे। उनकी मान्यता उनके शब्दों में ही इस प्रकार है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-January
स्वाध्याय इत्यादि साथ-साथ करने में सबमें भ्रातृभाव का संचार होता है। (2) समता का प्रचार त्यौहारों में हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति सामूहिक रूप से उन्हें सफल बनाने का उद्योग करता है। (3) पुराने साँसारिक एवं आध्यात्मिक गौरव की स्मृति पुनः हरी हो जाती है। यदि हम गहराई से विचार करें, तो हमें प्रतीत होगा कि प्रत्येक त्यौहार का कुछ गुप्त आध्यात्यि अर्थ है।
स्वाध्याय, चिंतन, मनन एवं सेवाभाव के बीज पारिवारिक सदस्यों में बोने चाहिए। पिता ही प्रथम शिक्षक और पथ प्रदर्शक है। ऊँचा उत्साही, मिलनसार, भावुक, परोपकारी, अधिक परिश्रमी, अटल विश्वासी, व्यवहार कुशल, सच समालोचक, विनोदपूर्ण होना चाहिए। जिस संलग्नता से वह पवित्र जीवन व्यतीत करेगा। उसी परोपकारिकता, पितृभक्ति और मृदुता से उसका परिवार उसके पद चिन्हों पर चलेगा।
स्वाध्याय द्वारा ही हमारा विकास सम्भव है। स्कूल कालेज में भी केवल स्वाध्याय करने के उचित साधन उपस्थित फिर जाते हैं। स्वाध्याय अर्थात् स्वयं अपने परिवार और उद्योग से शिक्षित होकर संसार में महात्मा, भक्त, ज्ञानी, तपस्वी, त्यागी, गुणी, विद्वान्, महापुरुष, नेता, देवदूत, पैगम्बर तथा अवतार हुए हैं। ज्ञान ने ही मनुष्य को तुच्छ पशु से ऊँचा उठाकर एक सुदृढ़ असीम शक्तिपुँज नानादैवी सम्पदाओं तथा कृत्रिम साधना से सम्पन्न अधीश्वर बनाया है। जीवन का सुख इस विद्याबल पर ही बहुत हदतक निर्भर है।
स्वाध्याय करने के उचित साधन उपस्थित फिर जाते हैं। स्वाध्याय अर्थात् स्वयं अपने परिवार और उद्योग से शिक्षित होकर संसार में महात्मा, भक्त, ज्ञानी, तपस्वी, त्यागी, गुणी, विद्वान्, महापुरुष, नेता, देवदूत, पैगम्बर तथा अवतार हुए हैं। ज्ञान ने ही मनुष्य को तुच्छ पशु से ऊँचा उठाकर एक सुदृढ़ असीम शक्तिपुँज नानादैवी सम्पदाओं तथा कृत्रिम साधना से सम्पन्न अधीश्वर बनाया है। जीवन का सुख इस विद्याबल पर ही बहुत हदतक निर्भर है। ज्ञान प्राप्ति के कुछ उपाय ये है -
स्वाध्याय से ज्ञान बढ़ता है। जो व्यक्ति पुस्तकें पढ़ता है, वह उच्चतम ज्ञान के साथ अटूट सम्बन्ध स्थापित करता है। सुशिक्षा, विद्या, विचारशीलता, समझदारी, सुविस्तृत जानकारी अध्ययन, चिन्तन, ममन, सत्संग तथा दूसरों के अनुभव द्वारा हम में से प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको सुसंस्कृत बना सकता है। मनुष्य स्वयं अनेक शक्तियों को लेकर भूतल पर अवतरित हुआ है। जन्म से प्रायः हम सब समान ही हैं।
स्वाध्याय अर्थात् स्वयं अपने परिवार और उद्योग से शिक्षित होकर संसार में महात्मा, भक्त, ज्ञानी, तपस्वी, त्यागी, गुणी, विद्वान्, महापुरुष, नेता, देवदूत, पैगम्बर तथा अवतार हुए हैं। ज्ञान ने ही मनुष्य को तुच्छ पशु से ऊँचा उठाकर एक सुदृढ़ असीम शक्तिपुँज नानादैवी सम्पदाओं तथा कृत्रिम साधना से सम्पन्न अधीश्वर बनाया है। जीवन का सुख इस विद्याबल पर ही बहुत हदतक निर्भर है। ज्ञान प्राप्ति के कुछ उपाय ये है -
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-August
स्वाध्याय और तप में जीवन लाभ है, भौतिकवादी के लिए जप-तप में समय लगाना एक प्रकार की बेवकूफी है। आज जो घोड़ा अपना होने के कारण परम प्रिय लगता है, कल उसके बिक जाने पर ममत्व न रहने के कारण उससे कोई संबंध नहीं। गरीबों के मस्त रहते और अमीरों को चिन्ता में कुढ़ते देखा जाता है। सतयुग आदि पूर्व युग में भी दुष्ट लोग तथा कष्टकारक कारण मौजूद थे और इस युग में भी सज्जन तथा आनन्द के हेतु मौजूद हैं। स्वर्ग में भी देवता लोग, मनुष्यों की भाँति ही मानसिक उद्वेगों से दुखी रहते हैं, वहाँ भी भोग वस्तुएं उन्हें पूर्ण सन्तोष नहीं दे पातीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-July
स्वाध्याय और साधना में रुचि बढ़ी। समय के कुचक्र से हम दोनों बिछुड़ गये उनकी बदली दूसरी जगह हो गई मेरी बदली दूसरी जगह।
स्वाध्याय भी साधना का अंग है। जैसे जप और ध्यान करना आवश्यक है वैसे ही गायत्री साहित्य का नित्य स्वाध्याय करना भी प्रत्येक गायत्री साधक का नित्य कर्म होना चाहिए। इस आवश्यक कर्तव्य की उपेक्षा करके जो लोग केवल जप ही किया करते हैं उनकी अधूरी साधना एकाँगी होने से निर्बल रहती है।
स्वाध्याय करना भी प्रत्येक गायत्री साधक का नित्य कर्म होना चाहिए। इस आवश्यक कर्तव्य की उपेक्षा करके जो लोग केवल जप ही किया करते हैं उनकी अधूरी साधना एकाँगी होने से निर्बल रहती है।
स्वाध्याय और सत्संग के अलभ्य अवसर प्राप्त होते रहे। सत्पुरुषों की ऐसी अहैतु की कृपा उपलब्ध हुई कि मेरी आत्मिक यात्रा आगे ही बढ़ती चली।
स्वाध्याय और सत्पुरुषों के सत्संग से यह प्रवृत्ति और भी बढ़ी। मैं आत्मकल्याण का मार्ग प्यासे चातक की तरह ढूँढ़ने लगा। अनेक सूत्रों से मुझे एक ही उपाय दृष्टिगोचर हुआ -गायत्री उपासना। अखण्ड ज्योति के प्रकाश में मुझे वह मार्ग भी दिखाई दिया जिस पर चलकर पिता से उस दस गुनी ममता रखने वाली माता की आनन्दमयी गोद प्राप्त हो सकती है।
स्वाध्याय करने से ही ब्रह्म विद्या के रहस्यों को समझा जा सकता है।
स्वाध्याय करना और दूसरों को परमार्थ पथ पर लगाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना यह दोनों ही कार्य पूरे हो सके इसके लिए अपने साधक बन्धुओं के सामने मैं एक कार्यक्रम उपस्थित करता हूँ, वह यह कि हममें से हर एक के घर में छोटा ‘गायत्री पुस्तकालय’ हो। अखण्ड ज्योति ने अब तक 12 पुस्तकें छापी हैं। इन सभी को लेकर एक छोटा पुस्तकालय बना लिया जाय। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका पुस्तकालय में आती रहे और भी पुस्तकें गायत्री सम्बन्धी कहीं से मिले या भविष्य में अखण्ड ज्योति से छपे तो उन्हें भी समय-समय पर इस पुस्तकालय में बढ़ाते रहा जाय।
स्वाध्याय में इनका थोड़ा बहुत पाठ किया जाय। मैंने देखा कि मनोयोगपूर्वक जितनी बार इस साहित्य को पढ़ा जाय उतने ही महत्वपूर्ण गुप्त रहस्य प्रकट होते चलते हैं। गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण आदि के प्रकरण ऐसे हैं कि जिनमें से एक का मंथन करने के लिए एक-एक जीवन का समय भी कम है, एक बार पुस्तक के पन्ने पलट लेने से नहीं वरन् निरन्तर उनको मनोयोगपूर्वक स्वाध्याय करने से ही ब्रह्म विद्या के रहस्यों को समझा जा सकता है।
स्वाध्याय द्वारा मन में स्थिर ज्ञान और सुदृढ़ संस्कार जमाना ऐसा है जैसा निरन्तर बहने वाला निर्झर प्रवाह।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-June
स्वाध्याय, कीर्तन, हवन, प्रवचन आदि का आयोजन करना चाहिए।
स्वाध्याय, योग आदि द्वारा ब्रह्म को करते थे वैसे ही कितनी ही स्त्रियाँ ब्रह्मचारिणी रहकर आत्मा निर्माण एवं परमार्थ का संपादन करती थी।
स्वाध्याय प्रवचनेन च’ भगवद्गीता में भी यज्ञों का वर्णन बहुत मिलता है। परम कृपालु भगवान् कृष्णचन्द्र आनन्दकन्द ने तृतीय अध्याय में अर्जुन को कर्म योग का मार्ग बतलाते हुए यज्ञों की सृष्टि और आवश्यकता भली भाँति बतला दी है, भगवान् ने अर्जुन से कहाः-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-December
स्वाध्यायशील सज्जनों के पते हमें लिखने चाहिए जिन तक आप की पहुँच न हो पाती हो, उनको यहाँ से गायत्री उपासना के लिए प्रेरणा दी जायगी।
स्वाध्याय बार बार करना जिससे इस विद्या के अनेकों गुप्त रहस्यों की भली प्रकार जानकारी हो जाए तथा (2) दूसरे धार्मिक प्रवृत्ति के सत्पुरुषों को अपना साहित्य देना, जिससे उनकी अभिरुचि भी इस परम कल्याणकारी मार्ग में हो। यह दोनों कार्य ब्रह्म संदीप कहलाते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-November
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः शंसितव्रताः’॥
स्वाध्याय, देव पूजा, गायत्री जप, हवन आदि धार्मिक कृत्यों का नित्य नियम रखना चाहिए। भूमि शयन, एवं ब्रह्मचर्य का विधान आवश्यक है, कहीं-कहीं मुँडन करने का भी आदेश है।
स्वाध्याय गायत्री जप आदि में लगनी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-October
स्वाध्याय, सत्संग, सेवा, दान, और प्रभु शरणागति की ओर अग्रसर होता है।
स्वाध्याय के लिए लोगों को फुरसत नहीं, व्यायाम के लिए अवकाश नहीं, भजन के लिए समय नहीं मिलता, लोक सेवा के लिए छुटकारा नहीं, चित्त को प्रफुल्लित करने वाले संगीत, देशाटन, तैरना, सत्संग आदि के लिए टाइम नहीं। कारण एक ही है कि जिस कार्य को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मान लिया गया है उसकी तुलना में ये सब बातें इतनी तुच्छ इतनी गौण समझी गई हैं कि उनकी ओर ध्यान करने की आवश्यकता नहीं समझी जाती। फुरसत उसी काम के लिए नहीं मिलती जो अनावश्यक और महत्वहीन समझा जाता है। जिस काम को हम आवश्यक समझते हैं उसे अन्य कामों की उपेक्षा करके भी सबसे पहले करने हैं। धन का आकर्षण जब अति प्रबल होता है तो जीवन को सुखी और समुन्नत बनाने वाले विचार गुण और कार्य करने के लिए जरा भी अवकाश नहीं मिल सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-March
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन द्वारा प्राणवान आत्माएँ आकाश में ऐसे प्रचण्ड प्रवाह छोडती थी जिसमें जन मानस को अनायास ही बहते रहने और श्रेष्ठ चिन्तन का उसके फलस्वरुप उस उत्पादित उच्च चरित्र का लाभ मिलता था। अन्तरिक्ष उच्चस्तरीय विचार सम्पदा से भरा रहता था। इसमें अध्यात्म क्षेत्र के मूर्धन्य मनीषी सदा प्रयत्नरत रहते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-January
स्वाध्याय अनुशीलन द्वारा ज्ञान साधना करने में जुट गए।
स्वाध्याय की अनिवार्यता। जन्म दिन संस्कारो का प्रचलन। शाखा संगठनों के माध्यम से सृजनात्मक प्रवृत्तियों के सामूहिक प्रयास। ज्ञान यज्ञ के लिए सुनिश्चित अंशदान।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-October
स्वाध्याय मण्डली होनी चाहिए। नवरात्रि आयोजन में सम्मिलित हुए परिजनों को उसी अवसर पर इस स्वाध्याय मण्डली का सदस्य बना लिया जाना चाहिए। प्रश्न आता है कि यह साहित्य जुटाया कैसे जाए ? प्रथम चरण में यह हो सकता है कि पुरानी पत्रिकाएँ और पुस्तकें एकत्रित करके उन्हें बाँसी कागज की जिल्द लगा कर ऐसा बना लिया जाए कि वह फटने न पायें। इन्हें नये या अपरिचित लोगों को पढ़ाया जा सकता है।
स्वाध्याय सत्संग की ध्यान-धारणा की महिमा तो बहुत है पर वह है तभी जब साधक को उदार परमार्थ परायणता, लोक मंगल के सद्उद्देश्यों में निरल देखा जा सके। अन्यथा उन्हें मानसिक विलासिता कहकर उपहास करने वालों को भी निरुत्तर नहीं किया जा सकता।
स्वाध्याय मण्डली का सदस्य बना लिया जाना चाहिए। प्रश्न आता है कि यह साहित्य जुटाया कैसे जाए ? प्रथम चरण में यह हो सकता है कि पुरानी पत्रिकाएँ और पुस्तकें एकत्रित करके उन्हें बाँसी कागज की जिल्द लगा कर ऐसा बना लिया जाए कि वह फटने न पायें। इन्हें नये या अपरिचित लोगों को पढ़ाया जा सकता है। नया साहित्य मँगाने की व्यवस्था वाद में बनाई जा सकती है।
स्वाध्याय एवं सत्संग मिरित कार्यक्रम चलें। शिक्षितों में से कोई एक लेख नित्य पढ़े और अन्य सब लोग उसे सुनें। इस प्रकार पूरे एक महीने के लिए ओध घण्टा नितय सुनाये जाने योग्य सामग्री मिलती रहेगी। यह प्रक्रिया रुचिकर बने तो उसे कथा प्रसंगो के साथ जोड़कर एक घण्टे का बनाया जा सकता है। समय बढ़ने के अनुसार उसका प्रीव और सतपरिणाम बढ़ना भी निश्चित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-November
स्वाध्याय की आवश्यकता को अन्न, जल की तरह पूरी कर सकती हैं। अखण्ड-ज्योति का विषय चिन्तन को और युग निर्माण का कर्म को दिशा देना है। यह ज्ञान कर्म का समन्वय-कृष्ण, अजफ्रन का - राम हनुमान का समन्वय जैसा युग्म समझा जा सकता है। इन पत्रिकाओं को दो बार पढ़ा जाय। एक बार सिद्धान्त समझने की दृष्टि से और दूसरी बार यह सोचने के लिए कि क्या इन प्रतिपादनों में से कुछको अपने जीवन क्रम में समिमलित किया जा सकता है।
स्वाध्याय (3) संयम (4) सेवा इन चार उपचारों को आत्मोर्त्कष के आधार भूत अवलम्बन माना गया है। इन्हें किसी न किसी रुप में अपनी जीवनचर्या में स्थान देने और परिवार को भी विस्तृत शरीर मान कर उसमें भी वे हलचलें उत्पन्न की जानी चाहिए, यह हर स्थिति के व्यक्ति के लिए नितान्त सरल है।
स्वाध्याय की परम्परा को प्रखर बना सकता है।
स्वाध्याय’ ही एकमात्र अवलम्बन है। उगे आत्मा की भूख बुझाने के लिए अन्न की तरह ही अनिवार्य माना जाय और इसके लिए न्यूनतम आधा घण्टा समय निकाला जाय। भले ही वह काम-काज के बीच थोड़ी सुविधा मिलने के समय ही क्यों न किया जाय।
स्वाध्याय के लिए - परिवार निर्माण में धरेलू पुस्तकालय के लिए और लोगमंगल में नव-सृजन के लिए दस-दस पैसा जैसी राशियाँ लगाई जाय और जहाँ समूची जीवनचर्या के साथ भारी खर्च बहन करने पड़ते हैं वहाँ इन तीनों क्षेत्रों के लिए दस-दस पैसे अर्थात् कुल मिलाकर तीस पैसा और बढ़ा दिये जायं। यह वृद्धि कठिन पड़ती हो तो किन्हीं मदों में कटौती करके उसे पूरा किया जाय। पर आत्मिक प्रगति के लिए इतनी उदार साहसिकता तो अपनाई ही जानी चाहिए। धर्मघटों वाली राशि को घर की उदार महिलाओं के जिम्मे छोड़ा जा सकता है ओर उसे अभियान के उद्गम केन्द्र शाँति-कुँज में सर्वश्रेष्ठ उपयोग के लिए भिजवाया जा सकता है।
स्वाध्याय सत्संग-प्रत्यक्ष और चिन्तन मनन-परोक्ष है। आत्मिक प्रगति के लिए इन प्रयोजनों को भजन ध्यान से कम महत्वपूर्ण एवं कम आवश्यक न माना जाय।
स्वाध्याय -
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-February
स्वाध्याय एवं अनुसंधान का विशाल कार्यक्षेत्र पड़ा है । सुशिक्षितों एवं अध्ययनशीलों के लिये वह कार्य रुचिकर रहेगा । (2) गायत्री-नगर में कई स्तर के सत्र निरन्तर चलेंगे, जिनमें नवयुग के अनुरुप जीवन ढालने और कार्यक्रम अपनाने का प्रशिक्षण अनवरत चलता रहेगा । प्रशिक्षण क्षमता वाले इस विभाग में योगदान दे सकेंगे । (3) गायत्री शक्ति पीठें देश भर में बड़ी संख्या में बन रही हैं, जो एक आश्रम को चलाने एवं कार्यक्षेत्र को जगाने की प्रतिभा से सम्पन्न हैं, वे वहाँ थोड़े-थोड़े समय के लिए भेजे जाते रहेंगे ।
स्वाध्याय और व्यक्तित्व को सुसंयत बनाने वाली संयम-साधना का उपक्रम ऐसा सुनियोजित रहेगा, जिसमें अव्यवस्था की असुरता को जीवन क्रम में प्रवेश पाने के लिये गुँजायश ही न रहे । अपने हाथ भोजन बनाने की सुविधा भी है और सामूहिक भोजनालय की व्यवस्था भी । दैनिक जीवन की अन्य आवश्यकतायें पूरी करने वाले सभी साधन गायत्री नगर में मौजूद हैं ।
स्वाध्याय सत्संग द्वारा उसी जीवन दर्शन को समझने का प्रयत्न किया जाता है और उपासना साधना द्वारा उसी प्रेरणा को हृदयंगम किया जाता है । आस्तिकता और धार्मिकता का समस्त कलेवर इसी प्रयोजन के निर्मित्त खड़ा किया गया है । ईश्वर की प्रसन्नता और अनुकम्पा का प्रत्यक्ष सम्बन्ध व्यक्ति के भाव संस्थान से है । उत्कृष्टता की भाव भूमिका में ही ईश्वर की दिव्य चेतना का अवतरण सम्भव हो सकता है । साधना उपक्रम का एकमात्र उद्देश्य अन्तः भूमिका का परिष्कार ही है ।
स्वाध्याय (3) संयम (4) सेवा इन चार तथ्यों का समन्वय ही सच्चे अर्थो में जीवनोद्देश्य की पूर्ति कर सकता है । प्रस्तुत देव-नगर में बसने वालों को शारीरिक नित्यकर्मो के अतिरिक्त इन्हीं चार कार्यक्रमों में निरत रहना पड़ेगा । व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक स्थिति के अनुरुप उनके कार्यक्रम बना दिये जायेंगे ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-August
स्वाध्याय के सम्मिश्रण से उनको आत्मज्ञान की अनुभूति हो जाती थी। विद्यार्थी केवल गुणवान या ज्ञानवान होकर ही नहीं निकलत थे वरन् वे शक्ति पुत्र बनकर भी गुरु फल से साँसारिक जीवन में प्रवेश करते थे। फलस्वरुप उन्हे भौतिक सुखों की न तो इतनी स्पर्धा रहती थी और न ही वे अधिकार प्राप्त करने के लिए लालायित रहते थे। तब के स्नातक गुरुकुल से स्नातक होकर विदा के समय प्रतिज्ञा करते थे “मैं पृथ्वी पुत्र हूँ। भूमि मेरी माता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-April
स्वाध्याय और सन्त सज्जनों का सत्संग असाधारण पुण्य फलदायक माना गया है। ऐसा क्यों ? इस प्रश्न का उत्तर एक ही है कि पठन और श्रवण के माध्यम से उपब्ध प्रेरणा जब सत्प्रवृतियों में परिणित होती है तो उसमें व्यक्तित्व का स्तर बदल जाता है। मनःस्थिति बदलने पर परिस्थितियाँ बदलती है। अन्तरंग सुधारने से बहिरंग में सुखद परिवर्तन होते है।
स्वाध्याय को कोई पुण्य है और न सत्संग का कोई लाभ।
स्वाध्याय की दृष्टि से उपयासेगी पाठ्यसामग्री प्रस्तुत करने में यथासम्भव कहीं कोई चूक नहीं रहने दी है। यह आहार लोगों ने अपनाया भी है और सराहा भी। यही कारण है कि उसके पाठकों की संख्या इतनी है, जिसे हिन्दी धार्मिक पत्रिकाओं में अद्वितीय ही कह सकते है। यह उसकी लोकप्रियता का चिन्ह है।
स्वाध्याय से ही पूरा करना पड़ता है।
स्वाध्याय और सत्संग का उद्देश्य है। यदि इन दोनों प्रयासों से सन्मार्ग पर चल पड़ने का साहस मिल सके तो समझना चाहिए कि उनका जो माहात्म्य बखाना गया है, उसमें कोई अत्युक्ति नहीं। किन्तु यह स्वाध्याय पढने तथा सत्संग सुनने तक सीमित रहे और उनका प्रभाव जीवन व्यवहार में समन्वित न हो सके तो समझना चाहिए, पढने और सुनने की व्यसन भर की पूर्ति हुई। समय क्षेप का अपेक्षाकृत कुछ उपयोगी बहाना मिल गया। ऐसी दशा में न स्वाध्याय को कोई पुण्य है और न सत्संग का कोई लाभ।
स्वाध्याय संयम और सेवा के चारों तत्व समन्वित रखने होंगे। आत्मोर्त्कष की सच्ची साधना इसी प्रकार सम्भव होती है। मात्र भजन का एकाँगी उपक्रम चेतना को परिष्कृत एवं समु़त्रत करने का, उद्देश्य पूरा नहीं कर सकता। मार्गदर्शन, प्रचलन और वातावरण की अनुकुलता में ही उच्चस्तरीय साधना क्रम चल सकता है। अटपटी परिस्थितियों में न मन लगता है और न ही सुनिश्चित क्रम चलता है।
स्वाध्याय, 3. संयम और 4. सेवा। इन चारों को एक चार पाई के चार पाये एक कमरे के चार कौने एक धरातल की चार दिशाएँ एक धर्म के चार आश्रम, एक संस्कृति के चार वर्ण कहना चाहिए, इन्हीं चार पुरुषार्थों के परिणाम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के रुप में फलित होते है। इन्हीं चारों को मन, बुद्धि, चित्त अहंकार के अन्तःकरण चतुष्टय में बोया उगाया जाता है।
स्वाध्याय, संयन, सेवा के चारों विद्यान अपनी दिनचर्या में सम्मिलित करते हैं। यही रीति-नीति उन्हें अपनानी होगी जो गायत्री नगर में निवास करते हुऐ उसका वातावरण बनाने तथा उससे स्वयं लाभन्वित होने के महत्व को समझे होगें।
स्वाध्याय तभी सराहा जायेगा जब वह व्यक्तित्व में चमके और आचरण में उतरे। अखण्ड-ज्योति के प्रतिपादन, और पाठकों के अध्यवसाय अध्ययन की सार्थकता इसी कसौटी पर आँकी जायेगी कि परिजनों के जीवन क्रम में उसका क्या प्रभाव पडा ? क्या परिवर्तन हुआ ? यदि ऐसा छ भी न हुआ हो तो समझना चाहिए कि मनोरंजन बेचने खरीदने वालों में एक संख्या अखण्ड-ज्योति के प्रकाशन को भी सम्मिलित हो गई। यदि ऐसा हुआ हो तो समझना चाहिए कि एक महान प्रयास चट्टान से टकराने वाली नाव की तरह दुर्घटना ग्रसित हो गया।
स्वाध्याय। स्वाध्याय के चार चरण है। 1. अपने सम्मुख समस्याओं के समाधान के लिए उपयुक्त साहित्य का गम्भीरता पूर्वक अध्ययन। 2. ऋषियों से विचार विनिमय, परामर्श, मार्गदर्शन। इसी को प्रवचन सत्संग कहते है।
स्वाध्याय, संयम ये तीन प्रयोजन आते है। परमार्थ में एक ही निर्धारण है, सेवा। एक होते हुए भी वह इतना महत्वपूर्ण है कि अन्य तीनों की आवश्यकता पूरी कर सके। संसार में कितने ही ऐसे महा मानव हुए है जिन्होने आत्म निर्माण की उच्चस्तरीय उपलब्धियाँ सेवा साधना में संलग्न रह कर ही उपार्जित करली। गायत्राी नगर में इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखा जाता है कि कोई ऐसा न रहे जो अपने ही निजी गोरख धन्धो में उलझा दिन काटता रहे और परमार्थ प्रयोजनों में अरुचि दिखाये।
स्वाध्याय, समय और सेवा की चतुविधि आत्मोर्त्कष प्रक्रिया हर श्रेयार्थी के लिए अनिवार्य रुप से आवश्यक हैं। मात्र भजन अधूरा है। किसान को भूमि, बीज, सिचाई और रखवाली की चारों व्यवस्थाओं पर समान रुप से ध्यान देना और प्रबन्ध करना पड़ता है। इसी प्रकार श्रवार्थी साधना, स्वाध्याय, संयन, सेवा के चारों विद्यान अपनी दिनचर्या में सम्मिलित करते हैं। यही रीति-नीति उन्हें अपनानी होगी जो गायत्री नगर में निवास करते हुऐ उसका वातावरण बनाने तथा उससे स्वयं लाभन्वित होने के महत्व को समझे होगें।
स्वाध्याय के चार चरण है। 1. अपने सम्मुख समस्याओं के समाधान के लिए उपयुक्त साहित्य का गम्भीरता पूर्वक अध्ययन। 2. ऋषियों से विचार विनिमय, परामर्श, मार्गदर्शन। इसी को प्रवचन सत्संग कहते है। 3. मनन-भूतकाल से लेकर अध्यावधि चलते आ रहे जीवन क्रम कर पर्यवेक्षण।
स्वाध्याय पढने तथा सत्संग सुनने तक सीमित रहे और उनका प्रभाव जीवन व्यवहार में समन्वित न हो सके तो समझना चाहिए, पढने और सुनने की व्यसन भर की पूर्ति हुई। समय क्षेप का अपेक्षाकृत कुछ उपयोगी बहाना मिल गया। ऐसी दशा में न स्वाध्याय को कोई पुण्य है और न सत्संग का कोई लाभ।
स्वाध्याय, सयम के अतिरिक्त चौथा चरण सेवा है। यह चारों ही ऐसे है जिन्हें एक साथ लेकर चलना पड़ता है। इसमें से एक भी ऐसा नहीं जिस अकेले के सहारे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो सके। इनमें से एक भी ऐसा नहीं है जिसे छोड़ने पर आत्मिक प्रगति का रथ एक इंच भी आगे बढ सके। यह चारों ही अपरिहार्य है।
स्वाध्याय और सत्संग का महत्व एकपक्षीय है। बात आचरण से बनती है और उसके लिए अनिवार्य रुप से वातावरण चाहिए। उद्यान लगाने वालक सिंचाई, रखवाली, माली आदि की समस्त व्यवस्थाए बनाते है अन्यथा आपने आप तो जंगलों में झाड़-झंखाड़ ही उगते बढ़ते है। अनगढ़ता सर्वत्र है। सुसंस्कारिता के लिए तो नियोजन और अनुशासन को निरन्तर आपनाये रहना पड़ता है।
स्वाध्याय सार्थक होता है।
स्वाध्याय में रस आते है। जिनके स्वभाव में कटुता नहीं, जो निन्दा करने के स्थान पर सुझाव या सुधार के आधार प्रस्तुत कर सकतें हैं, ऐसीरचनात्मक प्रवृति ही यहाँ उपयोगी सिद्ध हो सकती है। जिन्हे छिद्रन्वेषण आक्षेप निन्दा भर्त्सना में ही रस आता है, ऐसे निषधात्मक प्रकुति के व्यक्ति यहाँ खप नहीं सकेंगे। अपना लक्ष्य सृजन है- विग्रह एवं विगठन नहीं। निषेधात्मक प्रवृति को तोड़ना भष्ट आता है बनाना नहीं, ऐसे यदि सुणर सकेंगे तो ही उनके पैर यहाँ जम सकेगें।
स्वाध्याय का ही अवसर न मिले-वरद् उस वातावरण में रहने को भी सुविधा हो जो व्यक्तित्व को आदर्शवादी-अध्यात्मवादी ढाँचे में ढालने के लिए अनिवार्य रुप से आवश्यक है। समय को माँग-नव सृजन के लिए अपने आदर्श उपस्थित करने वाले और जन समुदाय को नेतृत्व कर सकने योग्य प्रतिभाओं का उत्पादन प्रचुर परिमाण में करने की है। उसकी पूर्ति के लिए गायत्री नगर का ढाँचा खडा किया गया है, इसमें गुरुकुल, आरण्यक और तीर्थ कल्प की तीनों ही दिव्यधारीओं का समन्वय किया गया है। इस त्रिवेणी में अवगाहन करने के लिए जागरुक प्राणवानों को अखण्ड-ज्योति के प्रखर परिजनों को- आग्रहपूर्वक आमन्त्रण किया गया है।
स्वाध्याय के लिए श्रेयतम पाठ्यसामग्री परिजनों को उपलब्ध कराने में कुछ कसर बाकी न रहने दी जाये। कमल पुष्पों का मधु सर्वोत्तम माना जाता है। प्रयत्न यही हुआ है कि घटिया फूलों का नहीं प्रफुल्लित पारजातों का ही पराग ढूँढा जाये और उससे परिजनों की परिपोषण के सभी उपयोगी तत्वों से भर पूर खाद्य आवश्यकता पूरी कराई जाये। मधु मक्खी के श्रम को सराहा जाता है। अखण्ड-ज्योति के अध्यवसाय और प्रस्तुतीकरण का यदि मूल्याँकन हो सके तो यही कहा जायेगा कि मानवी तत्परता के अर्न्तगत जो सम्भव था उसमें कुछ उठा नहीं रखा गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-March
स्वाध्याय, सत्संग तक ही धर्म मञ्च की कार्य पद्धति सीमित है। विज्ञान पक्ष जिसके अनुसार सूक्ष्म शक्तियों का उत्पादन तथा प्रयोग सम्भव होता है वह एक प्रकार से लुप्तप्राय ही है। विज्ञान के बिना ज्ञान एकाँगी है। शक्ति के बिना धर्म की रक्षा कहाँ होती है? प्राचीन काल में अध्यात्म की गरिमा के सम्मुख समस्त विश्व नतमस्तक था।
स्वाध्याय, सत्संग, दान, पुण्य आदि का जो जितना कुछ भी धर्म कलेवर खड़ा है; इस सबके पीछे एक ही उद्देश्य है मनुष्य व्यक्तिवादी पशु प्रवृत्तियों से छुटकारा पाये और समाजनिष्ठा के परमार्थ मार्ग को अपनाकर उदार एवं लोकसेवी प्रक्रिया अपनाये। इस मूल प्रयोजन की ओर मनुष्य को अग्रगामी बनाने के लिए अनेक कथा पुराण बनाये गये-धर्म शास्त्र रचे गये, साधन विधान बनाये गये-स्वर्ग-नरक के भय प्रलोभन प्रस्तुत किये गये। अदृश्य जगत के, लोक-लोकान्तरों के, देव-दानवों के प्रतिपादन किये गये। मत-मतान्तरों के बीच इन प्रतिपादनों में भारी अन्तर पाया जाता है पर मूल प्रयोजन सबका एक है-मनुष्य की पशु प्रवृत्ति को व्यक्तिवादी स्वार्थपरता को समाजनिष्ठ परमार्थ को धर्म धारणा में विकसित करना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-December
स्वाध्याय।
स्वाध्याय में प्रमाद न करें। 31. झूठी आलोचनाओं से परेशान न रहें। 32. उतावली न करें- उद्विग्न न हों। 33. दूसरों के दोष दुर्गुण ही न देखा करें। 34. मत असन्तुष्ट रहिये, मत खिन्न हूजिये।
स्वाध्याय करके यह दिखा दिया कि थोड़े समय में एक चपरासी भी मैनेजिंग डाइरेक्टर की योग्यता को प्राप्त कर सकता है। प्रगति के क्षेत्र में वह यहीं तक नहीं रुका रहा वरन् अपने परिश्रम, लगन और निरन्तर स्वाध्याय से करोड़पति बना, जिसका नाम एंड्रयू कार्नेगी था।
स्वाध्याय से करोड़पति बना, जिसका नाम एंड्रयू कार्नेगी था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-May
स्वाध्याय, सत्संग चिन्तन, मनन आदि से शुद्ध कर दिया जाय तो समाधान होने के बाद भी वह सदा उसी स्थिति में बना रहेगा ऐसी आशा नहीं की जानी चाहिए।
स्वाध्याय के नाम पर यह प्रतिपादन आये दिन आँखों और कानों के पर्दों पर टकराते हैं पर वह सब एक ऐसी विडम्बना बन कर रह जाता है जो मानों कहने सुनने और पढ़ने लिखने के लिए खड़ी की गई है। यदि ऐसा न होता ‘आत्मा’ को सचमुच ही महत्वपूर्ण माना गया होता, कम से कम शरीर मन जितने स्तर का समझा गया होता तो उसके लिये उतना श्रम एवं चिन्तन तो नियोजित किया ही गया होता जितना कायिक मानसिक उपलब्धियों के लिए किया जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-November
स्वाध्याय, सत्संग से सन्मार्गगामी बनाया जाना चाहिए वहाँ यह भी आवश्यक है कि उसके लिए आहार विहार की ऐसी व्यवस्था बनाई जाय जिससे वह स्वयं उच्छृंखलता छोड़कर शालीनता को स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-July
स्वाध्याय, सत्संग और मनन चिन्तन से वह कुछ समय को हट जाती है पर अवसर पाते ही वह फिर जमा हो जाती है। एक बार के ज्ञानोदय को पर्याप्त नहीं मान लेना चाहिए।
स्वाध्याय, सत्संग—मनन और चिन्तन। इन्हें अपनाया जा सके तो जीवन का स्वरूप बदलेगा और अवसाद उत्कर्ष में परिणत होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-January
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन और साधना समाधि तक के अगणित प्रयोग किये जाते रहते हैं। इस व्यावहारिक क्षेत्र को गायत्री उपासना-परा प्रकृति की साधना ही कहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-April
स्वाध्याय सत्संग के नाम पर धर्म और अध्यात्म की लम्बी-चौड़ी बकवास करते और सुनते रहते हैं। जो चिन्तन-जीवन को प्रभावित न कर सके उसे मनोविनोद के अतिरिक्त और क्या कहा समझा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-February
स्वाध्याय कक्ष में वे आचार्य धर्मपाल का जीवन-दर्शन पढ़ रही हैं। सागल नरेश भगवान् बुद्ध के परम निष्ठावान शिष्य थे उन्हीं की राज-कन्या क्षेमा के अन्तःकरण में तथागत के प्रति उपेक्षा का यह भाव खटकने वाला तो था ही। स्वयं नरेश उपस्थित हुए और पूछा-प्रियतमे समस्त राज-प्रासाद तथागत की अगवानी के लिये तैयार हैं किन्तु आपने अभी तक अपने परिधान भी बदले नहीं। राज-कुल अतिथि की यह अवमानना अच्छी नहीं- उठो और स्वागत हेतु शीघ्र तैयार हो जाओ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-June
स्वाध्याय और सत्संग आदि जुटाने की आवश्यकता थी, वह विद्या की व्यवस्था कहाँ की? बुद्धि का पोषण जिस विद्या से होता है, उसके लिए हमारा प्रयास कितना है? शरीर की पत्नी के लिए बहुमूल्य उपहार मिले, यह ठीक है और बुद्धिरूपी अर्द्धांगिनी को दीन-दुखी, भूखी-प्यासी, निर्वस्त्र, रुग्ण, चिंतित रहने और जहाँ-तहाँ भटकने दिया जाए, यह भी तो शोभनीय नहीं। प्यार से उस बेचारी को वंचित क्यों रखा जाए?
स्वाध्याय,
सत्संग, कथा-कीर्तन, पूजा-पाठ की प्रक्रिया को भी चलाते रहते हैं। आस्तिकता
का दर्शन और उपासना का कर्मकांड बनाया ही इस प्रयोजन के लिए गया है कि
मनुष्य विस्मृति के गर्त में न गिर पड़े। आत्मज्ञान को ‘प्रकाश’ के नाम से
संबोधन इसलिए किया जाता है कि उसके सहारे सही दिशा विदित होती रहे।
दिग्भ्रम की भूल-भुलैयों में भटकने से बचा जा सके।
यह प्रकाश मिलता रहता है और दिशा सूझती रहती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-August
स्वाध्याय सत्संग की उच्च भूमिका भी कहते हैं।
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन से ही नहीं-आहार के साथ घुले हुए सूक्ष्म तत्वों का सन्तुलन बनाकर मनुष्य के सोचने का तरीका भी समुन्नत किया जा सकता है। इतना ही नहीं भावनाओं की दिशा भी बदल सकती है। अवाँछनीय दिशा में चल रही भाव विकृति को आहार शुद्धि के आधार पर मोड़ा और सुधारा जा सकता है। दुष्प्रवृत्तियों में लगे हुये दुर्भावना युक्त मनुष्य के अन्तःकरण को छुपाया जा सकता है और उनकी प्रवृत्ति-मनोवृत्ति में अभीष्ट परिवर्तन किया जा सकता है।
स्वाध्याय सत्संग की खुराक लेनी उसने बन्द कर दी है। आत्मा के पास बैठकर कभी विचार नहीं करता कि घर का बनाव-बिगाड़ किसमें है। कुमार्गगामी होकर रूठे बच्चे की तरह सफलता साधन सद्गुणों को तोड़ता फोड़ता रहता है और स्वयं निन्दा, तिरस्कार, अभाव, दारिद्रय, शोक संताप का भागी बनकर कष्ट पाता है। रूठा हुआ नौकर या तो काम करता ही नहीं, करता है तो ऐसे ढंग से कि मालिक को उलटा नुकसान पड़े। मन ने आत्मोन्नति के सारे प्रयास अवरुद्ध कर रखे हैं, कुछ करता है तो ऐसा विलक्षण जिससे इस लोक और परलोक में भविष्य अन्धकारमय ही बनता चला जाय।
स्वाध्याय का निर्धारित समय पूर्ण हो गया और अपने आसान से उठ बैठे।
स्वाध्याय का क्रम टूट जाता, मन उचट जाता, विचार शृंखला टूट जाती, उसे नये सिरे से जोड़ते और फिर पढ़ना शुरू करते। प्रयत्न करने पर भी मन में स्थिरता नहीं आ रही थी। स्वाध्याय का निर्धारित समय पूर्ण हो गया और अपने आसान से उठ बैठे।
स्वाध्याय में रत थे। पर बीच-बीच में स्वाध्याय का क्रम टूट जाता, मन उचट जाता, विचार शृंखला टूट जाती, उसे नये सिरे से जोड़ते और फिर पढ़ना शुरू करते। प्रयत्न करने पर भी मन में स्थिरता नहीं आ रही थी। स्वाध्याय का निर्धारित समय पूर्ण हो गया और अपने आसान से उठ बैठे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-September
स्वाध्याय और सत्संग की आवश्यकता इसी प्रयोजन के लिए अनुभव की जाती है। चिंतन और मनन द्वारा व्यक्ति अपने आप भी अपने मानसिक स्तर को बढ़ाता है। इन दिनों मस्तिष्कीय विज्ञानवेत्ताओं का शोधकार्य यह चल रहा है कि परंपरागत मंथर उपायों के अतिरिक्त कुछ ऐसे उपाय प्राप्त किए जाएँ; जिनमें मस्तिष्कीय स्थिति में अभीष्ट परिवर्तन तुर्त-फुर्त किया जा सके आज इस स्तर की गतिविधियाँ जो अपनाने हुए हैं, वह कल दूसरी तरह की स्वेच्छापूर्वक अपना लें। आज के डाकू को कल संत बनाया जा सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-April
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन−मनन के चारों प्रयोग उपचार इसी एक आवश्यकता की पूर्ति में नियोजित किये जाते हैं।
स्वाध्याय,संयम, और सेवा के चारों उपक्रम किस प्रकार पूरे करने चाहिए। यह निर्धारण अब हर साधकों की विशेष स्थिति का पर्यवेक्षण करके पृथक पृथक ही किया जाया करेगा और उस उपक्रम का क्या प्रभाव हुआ इसकी जाँच पड़ताल ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की अनुसंधानशाला में निष्णात नृतत्व वेत्ताओं द्वारा नियमित की जाती रहेगी। जिन पापों का स्मरण हो उनके प्रायश्चित्त के सम्बन्ध में भी इन्हीं दिनों परामर्श दिया और सम्भव हो तो उसे कराया भी जायगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-February
स्वाध्याय ज्ञानयोग की साधना के अंतर्गत आता है। कथा, सत्संग, प्रवचन इसी उद्देश्य से सुने भी जाते हैं; पर ये तो मात्र निर्देश हैं, दिशा में चलने के संकेत भर हैं, जीवन की दिशा निर्धारित करने के आधार नहीं। मस्तिष्क को वांछित प्रवाह में चलने देने के लिए अवतारों के, ऋषियों के–महामानवों के विचारों व चरित्र का अवलोकन–श्रवण–स्वाध्याय के माध्यम से करके हम अपनी मनःस्थिति को उत्कृष्टतापरायण बना सकते हैं। विचार संस्थान हमेशा परिष्कृत−पवित्र−विधेयात्मक चिंतन से युक्त हो, यही लक्ष्य रहे। अपनी मानसिक हलचलों का सूक्ष्मदृष्टि से अध्ययनकर यह सतत देखा जा सकता है कि अवांछनीय प्रवाह का दमन व दिव्य चिंतन का अनुसरण कितना हो पा रहा है।
स्वाध्याय के माध्यम से करके हम अपनी मनःस्थिति को उत्कृष्टतापरायण बना सकते हैं। विचार संस्थान हमेशा परिष्कृत−पवित्र−विधेयात्मक चिंतन से युक्त हो, यही लक्ष्य रहे। अपनी मानसिक हलचलों का सूक्ष्मदृष्टि से अध्ययनकर यह सतत देखा जा सकता है कि अवांछनीय प्रवाह का दमन व दिव्य चिंतन का अनुसरण कितना हो पा रहा है।
स्वाध्याय-सत्संग और चिंतन-मनन के चार प्रयोजनों में निरत रहना पड़ता है। नित्यकर्म उपासना के अतिरिक्त जो भी समय खाली मिले उसमें इन्हीं चार प्रयोजन में मन को लगाए रहना पड़ता हैं। इन चारों का लक्ष्य एक ही हैं— आत्मपरिष्कार। उज्ज्वल भविष्य का योजनाबद्ध निर्धारण। इसके लिए आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास के चार प्रसंगों पर गंभीरतापूर्वक समुद्र-मंथन जैसा आत्मचिंतन करते रहना होता है।
स्वाध्याय है। अपने चित्त को श्रद्धापूर्वक परमात्मा के दिव्य–स्वरूप में नियोजित करना ईश्वर प्राणिधान कहलाता है।
स्वाध्याय, योग, सत्संग, चिंतन−मनन, इसी के अंग हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-June
स्वाध्यायशील व्यक्ति ही सम्मिलित होंगे। वे अपने प्रिय विषय, रुझान एवं अवसर का उल्लेख करते हुए कोई कुछ न कुछ विषय ब्रह्मवर्चस् शोध में सहयोग देने के लिए केन्द्र के परामर्श द्वारा निर्धारित कर लेंगे। स्थानीय पुस्तकालयों से निश्चित विषय की पुस्तकें लेकर उन्हें अवकाश के समय पढ़ते रहेंगे और निर्धारित प्रसंगों के जो भी संदर्भ उपलब्ध होंगे, उन्हें शान्ति−कुञ्ज भेजते रहेंगे। अपने अतिरिक्त संपर्क क्षेत्र के समान रुचि वाले अन्यों को भी ऐसा ही कुछ सहयोग करने के लिए प्रोत्साहित करते रहेंगे। ब्रह्म डडडडडड अगले दिनों अत्यन्त व्यापक होगी।
स्वाध्याय के प्रति प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को अपने परिवार में रुचि जगानी चाहिए। जो पढ़ नहीं सकते उन्हें प्रज्ञा साहित्य सुनाने की व्यवस्था बनानी चाहिए। कथा श्रवण वाचन का शास्त्रों में बहुत पुण्यफल बताया। गया है। इस धर्म कृत्य का हमें अपने−अपने घरों में मनोयोगपूर्वक पढ़ने और उसका सार तत्व हृदयंगम करने व्यवहार में उतारने का प्रयत्न करने की घर में नित्य धर्म कथा होने की तरह ही पुण्य प्रचलन मानना चाहिए।
स्वाध्यायशील नगण्य-सी संख्या में हैं। आर्थिक दरिद्रता में भी अधिक कष्टकर स्थिति है। शिक्षित भी पिछड़े रह सकते हैं किन्तु प्रगतिशील बनने के लिए शिक्षा की अनिवार्य आवश्यकता रहेगी। मस्तिष्कीय विकास के बिना न तो दूरदर्शिता बन पड़ती है और न विचारणा भावना को ही सुनिश्चित दिशाधारा मिलती है। इस तथ्य को समझा जाना चाहिए और शिक्षा संवर्धन के लिए व्यक्तिगत एवं पारिवारिक दिनचर्या में समुचित स्थान रखने के लिए कोई न कोई मार्ग खोज निकालना चाहिए।
स्वाध्याय का है। स्वाध्याय कथा पुराणों का नहीं, वरन् युग मनीषियों के उस प्रतिदिन का जो व्यक्ति और समाज के सामने प्रस्तुत सामयिक समस्याओं को आदर्शवादी समाधान प्रस्तुत करते हैं। ऐसा साहित्य छपता तो कम है, पर ढूंढ़ने पर जहाँ−तहाँ से उसे चुना बीना जा सकता है। स्वाध्याय के प्रति प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को अपने परिवार में रुचि जगानी चाहिए। जो पढ़ नहीं सकते उन्हें प्रज्ञा साहित्य सुनाने की व्यवस्था बनानी चाहिए।
स्वाध्याय क्रम अधिक उपयोगी मानकर विद्यार्जन की तरह दिनचर्या में सम्मिलित रखा जा सकता है।
स्वाध्याय−सत्संग आदि कर प्रखर बनाने की भूमिका निभानी है।
स्वाध्यायशील रहे और परिवार के लिए जिस प्रकार निर्वाह साधन जुटाये जाते हैं उसी प्रकार अध्ययन अध्यापन में भी समय एवं धन का एक अंश लगता रहे इसकी गुंजाइश निकालें।
स्वाध्याय सत्संग जैसे प्राणवान माध्यम खड़े करने होंगे और व्यक्तिगत रूप से जन−जन को दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाने के लिए मनन चिन्तन की आदत डालनी होगी।
स्वाध्याय प्रेमी और सत्संगों में सम्मिलित रहने वाले भी जब व्यवहार में पूर्ववत् गये−गुजरे बने रहते हैं तो प्रतीत होता है कि जानकारियों की आवश्यकता तो है पर पर्याप्त नहीं। भोजन की उपयोगिता तो है, पर पाचन शक्ति के अभाव में उसकी उपलब्धि भारभूत ही बनी रहेगी। प्रज्ञा परिजन चिरकाल से अखण्ड−ज्योति के पाठक हैं। उन्हें ज्ञान विज्ञान के समुद्र मंथन से निकाला हुआ नवनीत घर बैठे मिलता रहता है। मधु संचय में किसे कितना श्रम करना पड़ा इसे समझने की उसे क्या आवश्यकता जिसे कटोरी भर शहद थाली में नित्य नियमित रूप से परोसा हुआ मिलता है।
स्वाध्याय में रुचि जगा देने भर से बात बन जाती है। किसी विषय का साहित्य लगातार पढ़ते रहने पर अभीष्ट ज्ञान को बिना किसी दूसरे की सहायता के प्रचुर परिमाण में एकत्रित किया जा सकता है। स्कूली परीक्षाओं में भी कितने ही छात्र बिना स्कूलों में भर्ती हुए भी घर पर बिना किसी सहायता के पढ़ते है। कुँजियों के सहारे काम चलाते और अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होते रहते हैं। अपने घर में भी ऐसी ही अभिरुचि जगानी चाहिए।
स्वाध्याय (3)संयम (4)सेवा के चार चरण निर्धारित है। साधना के बाद दूसरा नम्बर स्वाध्याय का है। स्वाध्याय कथा पुराणों का नहीं, वरन् युग मनीषियों के उस प्रतिदिन का जो व्यक्ति और समाज के सामने प्रस्तुत सामयिक समस्याओं को आदर्शवादी समाधान प्रस्तुत करते हैं। ऐसा साहित्य छपता तो कम है, पर ढूंढ़ने पर जहाँ−तहाँ से उसे चुना बीना जा सकता है। स्वाध्याय के प्रति प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को अपने परिवार में रुचि जगानी चाहिए।
स्वाध्याय कथा पुराणों का नहीं, वरन् युग मनीषियों के उस प्रतिदिन का जो व्यक्ति और समाज के सामने प्रस्तुत सामयिक समस्याओं को आदर्शवादी समाधान प्रस्तुत करते हैं। ऐसा साहित्य छपता तो कम है, पर ढूंढ़ने पर जहाँ−तहाँ से उसे चुना बीना जा सकता है। स्वाध्याय के प्रति प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को अपने परिवार में रुचि जगानी चाहिए। जो पढ़ नहीं सकते उन्हें प्रज्ञा साहित्य सुनाने की व्यवस्था बनानी चाहिए। कथा श्रवण वाचन का शास्त्रों में बहुत पुण्यफल बताया।
स्वाध्याय सत्संग का कोई न कोई नियमित कार्यक्रम बनाया, निभाया और चलाया जाना चाहिए।
स्वाध्याय सत्संग दो प्रयोग बताये गये हैं। इन दिनों यह दोनों ही प्रयोजन सत्साहित्य से पूरे हो सकते हैं। सत्संग की सान्निध्य परक प्रक्रिया तो अब दुर्लभ होती जा रही है। उपयुक्त व्यक्ति यों की उपस्थिति की उपस्थिति हर घड़ी कहाँ सम्भव हो सकती हैं? उनका साहित्य ही अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-December
स्वाध्याय सत्संग की योजना बनाते और जन−मानस के परिष्कार को ध्यान में रखते हुए लोक−शिक्षण में लगे रहते थे। ऋषि उन्हें कहा जाता था जो काय सत्ता को चेतना क्षेत्र की एक सर्व सम्पन्न प्रयोगशाला मानते थे और उसमें मूर्धन्य वैज्ञानिकों की तरह शोध अनुसन्धान—प्रयोग परीक्षण में लगे रहते थे। वे व्यक्तित्व की प्रसुप्त क्षमताओं को जगाने के क्षेत्र में गहरी डुबकी लगाते और बहुमूल्य मणि मुक्तक बीन कर लाते थे। जबकि मुनियों का प्रयास दूरदर्शी विवेकशीलता—सभ्य सुसंस्कारिता को लोक प्रचलन में समाविष्ट किये रहने के प्रयत्नों में निरत रहना होता था। लेखनी और वाणी की शक्ति वे इसी निमित्त करते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-July
स्वाध्याय, चिन्तन, मनन के चार आधार अपनाने पड़ते हैं। एकाग्रता, मेडीटेशन, ध्यान योग के अंतर्गत यह प्रयोजन भी जुड़े रहते हैं अन्यथा मन को एक कल्पना तक देर तक रोके रहने से योगाभ्यास का वह उद्देश्य पूरा न हो सकेगा जिसके आधार पर आत्म−सत्ता की आत्मिकी को प्रयोगशाला के रूप में परिणित करने की सम्भावनाओं को साकार किया जाना है।
स्वाध्याय और सत्संग को ध्यान योग का ही अंग माना गया है। उत्कृष्टता की गरिमा पर श्रद्धा केन्द्रित करने को ‘चिन्तन’ और उसे आज की स्थिति में क्रियान्वित करने को आकाँक्षा उभारना—योजना बनाना—मनन कहलाता है। योगाभ्यास की ध्यान योजना के अंतर्गत आत्म−समीक्षा, आत्म−परिष्कार, आत्म−निर्माण, आत्म−विकास की सुविस्तृत रूपरेखा खड़ी करना तथा उसे सफल बनाने के लिए कटिबद्ध होना प्रमुख कार्य है। इसी के निमित्त साधना, स्वाध्याय, चिन्तन, मनन के चार आधार अपनाने पड़ते हैं। एकाग्रता, मेडीटेशन, ध्यान योग के अंतर्गत यह प्रयोजन भी जुड़े रहते हैं अन्यथा मन को एक कल्पना तक देर तक रोके रहने से योगाभ्यास का वह उद्देश्य पूरा न हो सकेगा जिसके आधार पर आत्म−सत्ता की आत्मिकी को प्रयोगशाला के रूप में परिणित करने की सम्भावनाओं को साकार किया जाना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-January
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मन के चार व्यावहारिक और जप,ध्यान,प्राणायाम, मुद्रा बन्ध, नाद, लय आदि कितनी ही प्रक्रियाएँ बताई, अपनायी जाती हैं। तप में अस्वाद, उपवास, ब्रह्मचर्य, शरीर सेवा में आत्म−निर्भर, भूमि शयन, ऋतु प्रभावों का सहन, मौन आदि ऐसे क्रिया−कृत्य आते हैं जिनमें शरीर को यह अनुभव करना पड़े कि उसे उच्चस्तरीय प्रगति का अभ्यास करना पड़ रहा है। आदतों का–आकाँक्षाओं का प्रतिरोध करने में स्वभावतः अनख लगता और कष्ट होता है। इसके अतिरिक्त आदर्शवादिता अपनाते ही अवाँछनीयता व्यंग्य, उपहास, असहयोग, विरोध करने पर उतरती है और चिढ़कर हानि भी पहुँचती हैं। महानता के मार्ग पर चलने वालों को कदम बढ़ाने से पूर्व इस सम्भावना को ध्यान में रखना चाहिए और उसकी पूर्व जानकारी एवं तैयारी रहने के रूप में विभिन्न प्रकार की तितिक्षाएं करते रहने की विधि व्यवस्था अपनानी चाहिए।
स्वाध्याय, सत्संग, कथा, कीर्तन एवं धर्मानुष्ठानों की तरह आहार में सात्विकता एवं सदाशयता का समावेश भी आत्मिक प्रगति के अनिवार्य आधारों में सम्मिलित रखा गया है।
स्वाध्याय, सत्संग की प्रचलित प्रक्रिया ने ही लोक−मानस का काया−कल्प कर दिया होता। लेखनी वाणी से ही अवाँछनीयता का प्रवाह कब का उलट दिया गया होता। किन्तु यथार्थता दूसरी ही है। गुण−कर्म−स्वभाव की–मान्यता और आदत के रूप में अन्तरंग की जैसी भी संरचना बन गई होती है उसे रास्ता बदलने के लिए तत्पर कर लेना टेढ़ी खीर है। सदाशयता का ढोल बजाने वाले दुष्ट प्रयोजनों में निरत देखे गये हैं।
स्वाध्याय को दिनचर्या का आवश्यक अंग बनाना। दैनिक उपासना में व्रतशील रहना। आहार में सात्विकता रखना, सादगी अपनाना। अस्वच्छता और अव्यवस्था को बदलने में तनिक भी ढील न होने देना। मिल बाँट कर खाना।
स्वाध्याय, सत्संग, विशिष्ट साधना उपक्रम, दिनचर्या अनुशासन आदि की निर्धारित विधि−व्यवस्था का परिपालन करते हुए साधकों को अपना चिन्तन इस केन्द्र बिन्दु पर नियोजित करना चाहिए कि अन्तःक्षेत्र को परिष्कृत करने के लिए क्या सोचना चाहिए क्या बदलना चाहिए और क्या कर गुजरने के लिए साहस जुटाना चाहिए। इस निर्धारण में निश्चय ही उपवास−अनुष्ठान एवं तप−साधना के कारण बढ़ी हुई सात्विकता–सही निर्णय तक पहुँचाने में बहुत कुछ सहायक सिद्ध हो सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-August
स्वाध्याय और सत्संग के दो कारगर उपाय लोकमानस को परिष्कृत करने की दृष्टि से अवश्य माने जाएँ और उनके लिए किसी न किसी प्रकार कुछ न कुछ प्रयत्न किया ही जाय। यह प्रयत्न वैयक्तिक या सामूहिक रूप से किस प्रकार अग्रगामी बन सकेंगे इसकी अपनी तैयारी क्या चली?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-October
स्वाध्याय और सत्संग को सर्वसुलभ बनाने वाले उपरोक्त तीनों उपकरणों को अपने एकाकी बलबूते अपने संपर्क-क्षेत्र में चलाते और उत्साहवर्द्धक आलोक वितरण करते रह सकें। बात एक कदम और आगे बढ़े तो शिक्षा प्रचार, हरीतिमा-संवर्द्धन, स्वच्छता अभियान जैसे कितने ही सेवाकार्यों में कुछेक घनिष्ठ साथियों को लेकर जुटा जा सकता है। स्वयं संकल्प पूर्व आगे बढ़ने पर सहयोगी अनुयायियों की कभी कमी नहीं पड़ती। इंजन दौड़ेगा तो डिब्बे भी पीछे-पीछे घिसटते चलेंगे ही। प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत असंख्यों प्रचारात्मक, सुधारात्मक और रचनात्मक कार्यक्रम हैं, जिनमें से योग्यता और सुविधा के अनुरूप स्थानीय परिस्थितियों, आवश्यकताओं के अनुसार कुछ भी चुना जा सकता है।
स्वाध्याय और सत्संग से भी अधिक पड़ता है। उसे बालबुद्धि और कठोर मनोभूमि के लोग भी अपेक्षाकृत अधिक सरलता से हृदयंगम कर सकते हैं।
स्वाध्याय-प्रक्रिया व्यापक रूप से चल रही है। इस योजना के अंतर्गत 360 दिन के लिए 360 पुस्तिकाएँ हर वर्ष छपने और ज्ञानरथ में सँजोकर घर-घर उन्हें पहुँचाने का प्रावधान है। इसी की सहयोगी दूसरी योजना है, हर मुहल्ले स्लाइड प्रोजेक्टर के माध्यम से मुहल्लों में मनोरंजन जन-चित्र, प्रकाश-चित्र-प्रदर्शन कार्यक्रम रखना। चित्रों की व्याख्या करते हुए युगांतरीय चेतना जन-जन के गले उतारना यह सत्संग प्रचलन हुआ। स्वाध्याय और सत्संग की यह समन्वित प्रक्रिया हर दिनों हजारों लाखों को अभिनव प्रेरणा देती और दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाकर नए ढाँचे में ढलने के लिए गरम करती हैं।
स्वाध्याय का ही होना चाहिए। ऐसे पूरे या अधूरे समय के फीस, बिना फीस के विद्या या जगह-जगह पर चलने चाहिए, जिनमें आजीविका उपार्जन, स्वास्थ्य-संरक्षण एवं व्यवहार-कौशल की शिक्षा का समावेश है। प्रगतिशील देशों में सरकारी शिक्षा की परिधि सीमित और निजी प्रयासों से चलने वाली शिक्षण संस्थाएँ अपेक्षाकृत कहीं अधिक हैं। इससे वहाँ के नागरिकों को अपनी मर्जी के बिना अपनी अनुकूलता के समय में पढ़ने की सुविधा उपलब्ध होती रहती है। हमें सरकारी शिक्षा का स्वागत और सहयोग करते हुए भी उन प्रसंगों के पाठ्यक्रम बनाने और विद्यालय चलाने चाहिए जो योग्यता-संवर्द्धन के साथ-साथ प्रतिभा निखरने, व्यक्तित्व उभारने और प्रगतिशील सुखी, समुन्नत जीवनक्रम बनाने में कारगर सहायता दे सके।
स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन, पूजन, भजन तक सीमित न रहकर कुछ ऐसा करने के लिए भी कहा जाना चाहिए, जिसमें उसे श्रम करना और सहयोग देना पड़ता हो। यही प्रज्ञा अभियान में सम्मिलित होने का व्रत-धारण है। प्रज्ञापरिजनों को इस देव परिवार का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम एक घंटा समय और दस पैसा नित्य की अपने क्षेत्र में रचनात्मक प्रवृत्तियों को गतिशील बनाने के लिए नियमित रूप से देना होता है। इससे कम में किसी को प्रज्ञापरिजन कहलाने का अधिकार नहीं मिलता। यह समय अपने समीपवर्त्ती क्षेत्र में मिशन की बीससूत्री योजना में लगाना पड़ता है।
स्वाध्याय-सत्संग को चिंतन-मनन के रूप में विकसित किया जाए और फिर किसी
भाव-भरे निष्कर्ष-निर्धारण पर स्वेच्छापूर्वक पहुँचा जा सके, साधना के
माध्यम से ऐसी संकल्पशक्ति उभरती है कि वह उत्कृष्टता का न केवल पक्ष-समर्थन करे; वरन उसे आत्मसात करने, जीवन व्यवहार में उतारने के लिए आवश्यक
श्रद्धासिक्त साहसिकता भी उभार सके। सूत-सौनिक की कथा-पुराणशैली की तरह
साधना के साथ योग वाशिष्ठ को हृदयंगम कराने वाले तीर्थसेवन को भी समान
महत्त्व मिलता था। इन दिनों भी पुरातन सतयुग की वापसी के लिए उन चिर परीक्षित
प्रयोगों की आज की आवश्यकता एवं प्रक्रिया के साथ नए सिरे से पुनर्जीवित
करने की आवश्यकता है। यही प्रयोजन प्रकारांतर से घरेलू संस्कार-प्रक्रिया
एवं गाँव-मुहल्ले की पर्व परिपाटी के साथ भी भली प्रकार निभाना है।
जन्म-दिवसोत्सव, विवाह-दिवसोत्सव, विद्यारंभ, उपनयन, वानप्रस्थ आदि वैयक्तिक
संस्कारों के कर्मकांड-पद्धति में वे तत्त्व विद्यमान हैं जो उस छोटे आयोजन
को पारिवारिक ज्ञान-गोष्ठी में परिणत कर सके और वातावरण के धार्मिक होने के
कारण उपस्थित लोगों को आदर्शवादिता के पक्ष में सहमत कर सके।
स्वाध्याय और सत्संग की यह समन्वित प्रक्रिया हर दिनों हजारों लाखों को अभिनव प्रेरणा देती और दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाकर नए ढाँचे में ढलने के लिए गरम करती हैं। तीर्थयात्रा, धर्म प्रचार की पदयात्रा पर निकलने वाली टोलियाँ साइकिलों पर सामान लादकर चलती और ढपली, तिकोन के सहारे युग गायनों को सुनाती, घर-घर अलख जगाती आगे बढ़ती हैं। प्रचार तंत्र का यह छोटा; किंतु अत्यंत प्रभावी उपक्रम देखने ही योग्य है। उसकी परिणति प्रतिक्रिया को जिनने निकट से, भीतर घुसकर देखा है, वे यही कहते पाए गए हैं कि साधनहीन तंत्र द्वारा जीवन के बलबूते इतना दुस्साहस कर बैठना और शकट को इतना आगे घसीट ले जाना अद्भुत है। इसे ग्वालबालों की सहायता से गोवर्धन उठाने जैसा, अपने समय का चमत्कार कहा जा सकता है।
स्वाध्याय-साहित्य, प्रज्ञा-संस्थानों का दैनिक खर्च सरलतापूर्वक चल जाता है। यह ही बूँद-बूँद से घड़ा भरने की कहावत का प्रत्यक्ष प्रमाण— उदाहरण है। उसे व्यापक क्षेत्र में बड़े रूप में चरितार्थ किया जा सके तो नवसृजन के लिए श्रम साधन जुटाने में कहीं भी अवरोध-असमंजस न दिख पड़े। सरकारी सहायता माँगने एवं धनिकों के सम्मुख नाक रगड़ने की फिर कहीं, किसी को आवश्यकता न पड़ेगी। भावनाशील परमार्थपरायणों के मुट्ठी-मुट्ठी समयदान-अंशदान में नवसृजन की वे योजनाएँ सहज संपन्न हो सकती हैं, जो आज साधनों के अभाव में अवरुद्ध बनी पड़ी हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-March
स्वाध्याय द्वारा साफ कर लिया तो सदा वह वैसा ही बना रहेगा, ऐसी आशा निरर्थक है। अभी आकाश साफ है। उस पर कब आँधी, कुहासा धूलि−बादल छा जायेंगे प्रकृति कब कुपिता हो जाएगी कहा नहीं जा सकता। अन्तरात्मा पर निरन्तर छाते रहने वाले इन मलिन आवरणों की सफाई के लिये उपासना की नित्य निरन्तर आवश्यकता पड़ती है ईश्वरीय गुणों का समावेश अपने चिन्तन व्यवहार में इससे कम में हो ही नहीं सकता। आग के समीप बैठे बिना गर्मी आये कैसे?
स्वाध्याय द्वारा ज्ञानवृद्धि कर वे सम्मान, नेतृत्व पाते हैं, यशस्वी बनते हैं। उनकी महत्वाकांक्षाएं इसी उद्देश्य की पूर्ति तक सीमित रहती हैं। इसी कारण मस्तिष्क विकास के जितने भी विनोदात्मक सम्वर्धनात्मक, उपभोगात्मक तरीके उपलब्ध हो सकते हैं उसे वे जुटाते रहते हैं। जीवन का अधिकाँश समय उनका इसी पुरुषार्थ में निकल जाता है। यह सामान्य से ऊँचे स्तर वाली प्रक्रति की स्थिति हुई।
स्वाध्याय-सत्संग को स्थूल और चिन्तन-मनन को सूक्ष्म ज्ञानयोग तथा व्रतोपवास के अनुशासन को कर्मयोग कहा जाता है। इस समन्वय में तीनों शरीरों को परिष्कृत करने वाली तीन प्रकार की विधि-व्यवस्था के अंतर्गत समूचे
स्वाध्याय, चिन्तन, मनन एवं शास्त्रज्ञों का सत्संग इसी निमित्त किया जाता है। यह अध्यात्म विद्या का तत्वदर्शन वाला पक्ष हुआ जिसमें मान्यताओं की श्रद्धा−तर्क के आधार पर मान्यताओं से काट की जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-May
स्वाध्याय के अतिरिक्त और कुछ न पढ़ना। निर्धारित समय के अतिरिक्त और किसी से न मिलना। जैसे इस अवधि के निर्धारण ऐसे हैं जिसमें बाल कोठरी जैसी असुविधा न होते हुए भी आत्मावलंबी, आत्मकेन्द्रित रहने की बहुत कुछ सुविधा है। अनावश्यक पत्र व्यवहार एवं मिलने−जुलने पर भी अंकुश है। यह इसलिए कि आत्म निर्भरता में व्यतिरेक उत्पन्न न हो और मननचिन्तन की निर्धारित दिशाधारा में विक्षेप न पड़े।
स्वाध्याय, ज्ञानयज्ञ आदि।
स्वाध्याय, सत्संग से गुत्थियों को सुलझाने और चिंतन−मनन के सहारे भविष्य निर्धारण का निश्चय जिसमें जुड़ा हुआ हो उसी को तीर्थसेवन कहा गया है। शास्त्रों में उसी के पुण्यफल की चर्चा है। प्रतिमा−दर्शन, जल, स्नान, और लुटेरों जैसी भगदड़ से तो तीर्थ पुण्य तो दूर, पर्यटन का मनोरंजन भी पूरा नहीं होता। प्रस्तुत परिजन−सत्र की अवधि तो कम है पर उनमें उन तथ्यों का समुचित समावेश किया गया है जिन्हें यदि ठीक तरह समझा जा सके तो अन्तराल में ऐसा बीजारोपण हो सकता है जिसे कल्पवृक्ष की उपमा दी जा सके। प्राचीन काल के तीर्थों में गुरुकुल, तीर्थ−परायण और आरण्यक–यह तीन उपक्रम चलते थे।
स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन−मनन।
स्वाध्याया ज्ञान यज्ञाश्च यतयः संशित व्रताः।
−गीता 4। 28
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-November
स्वाध्याय और कथा कहानी परस्पर विचार विनिमय का नियमित कार्यक्रम चलता रहे। गृहपति स्वयं चतुर्विधि संयम पालें और घर के अन्य सदस्यों को भी इस शालीनता को निशानी संयमशीलता का अधिकाधिक अभ्यास करायें।
स्वाध्याय के लिए सहमत करें साथ ही, ऐसा प्रबन्ध करें कि पाँचों सदस्य अपने सम्बन्धित पाँच-पाँच स्वाध्यायशीलों तक प्रज्ञा साहित्य नियमित रूप में देने और वापस लेने का क्रम चलाते रहें। संक्षेप में यही है वह स्वाध्याय मण्डल योजना जिसे प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत सर्वोपरि प्रमुखता दी जा रही है। कल्प साधक अपने पाप नाश एवं पुण्य संवर्धन की दृष्टि से इस प्रयास में पूरी तत्परता के साथ संलग्न हों
स्वाध्याय मण्डली बन जाती है। स्वाध्याय मण्डल के यह पाँच सहचर और पाँच-पाँच उनके बच्चे यह तीस का एक छोटा परिवार बन जाता है। वे लोग पढ़ने का क्रम तो जारी रख ही सकते हैं। साथ ही सप्ताह में एक दिन इकट्ठे होकर सत्संग की प्रक्रिया भी चला लिया करें। इस सप्ताह जो पढ़ाया गया हो उसे जीवनक्रम में सम्मिलित करने के उपायों के सम्बन्ध में इस सत्संग में विचार विनिमय होता रहे तो पठन के बीजारोपण को आवश्यक खाद पानी मिलता रहेगा और देखते-देखते खेत लहलहाने लगेगा।
स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना और उसकी महान परिणति के रूप में संजोयी गई आशा अपूर्ण ही रह जायगी। विश्वास किया गया है कि जहाँ आदर्शवादी उत्साह उमड़ेगा वहाँ समयदान और अंशदान का यह छोटा सा अनुदान भी प्रस्तुत किया जाने लगेगा।
स्वाध्याय-सत्संग भी इसी प्रयोजन के लिए है। तीसरा क्षेत्र कारण शरीर का बचता है। इसके लिए साधना ही एकमात्र आधार है। उसे तपश्चर्या और योग के आधार पर ही गलाया ढलाया जाता है। शरीर नरम है।
स्वाध्याय मंडल के छोटे-बड़े सदस्य यदि सचमुच महाप्रज्ञा के प्रति निष्ठावान् बन सकें तो समझना चाहिए कि उनमें से प्रत्येक का कतृत्व हजारीबाग जिले को यशस्वी बनाने वाले अनगढ़ हजारी किसान की भूमिका निभाने में पीछे न रहने देगा। पिसनहारी यदि पुण्य परमार्थ के क्षेत्र में यशस्वी हो सकती है तो कोई कारण नहीं कि प्रज्ञा पाठक मात्र वाचक व्यसन को ही गले बाँधें बैठे रहे। युग निमन्त्रण पर कान न धरे ।
स्वाध्याय सामग्री जुटाने के लिए खर्च का प्रबन्ध कैसे हो। तीस व्यक्तियों के लिए न्यूनतम एक रूपया प्रत्येक के हिसाब से तीस रूपये की पाठ्य सामग्री तो खरीदनी ही पड़ेगी। इसका सरल उपाय एक ही है कि पाँचों नैष्ठिक सदस्य अपने यहाँ ज्ञानघट स्थापित करें, और उनमें बीस-बीस पैसा प्रतिदिन डालें। अब से पैंतीस वर्ष पूर्व ज्ञानघट का अनुदान दस पैसा था। अब महँगाई कई गुनी हो जाने से वह राशि बीस पैसा कर दी गई है।
स्वाध्याय की महत्ता बताने वाला स्लाइड प्रोजेक्टर प्रदर्शन प्रातः उद्घाटन समारोह। जिसमें पाँचों नैष्ठिक सदस्य और उनके पाँच-पाँच सहयोगी कुल तीस व्यक्ति तो उस धर्मकृत्य में प्रमुख रूप से सम्मिलित होंगे ही। अन्य लोगों को भी आमन्त्रित करके उस विधा से परिचित कराने की व्यवस्था रहेगी। पाँच सदस्य और पच्चीस सहयोगी क्रमबद्ध रूप से बिठाते जायेंगे। षट्कर्म, स्वस्तिवाचन, कलश पूजन, सामूहिक गायत्री पाठ, संकल्प, व्रत धारण, अभिसिंचन आदि क्रिया-कृत्यों के अतिरिक्त उस अवसर पर संगीत एवं प्रवचन की व्यवस्था भी रहेगी।
स्वाध्याय से चिंतन को सुधारा जा सकता है। यह व्यवहार में आने वाली ऊपरी परत है। इससे मन− मस्तिष्क की विचारणाएँ भटकाव से उबर कर सही दिशा में चलने के लिए प्रशिक्षित की जाती हैं। इतने पर भी अन्तराल का आस्थापरक क्षेत्र तो बच ही जाता है। उसके लिए उन उपचारों का प्रयोग करना पड़ता है, जो चेतना के मर्मस्थल तक पहुँच सके, वहाँ निवान करने वाली श्रद्धा प्रज्ञा और निष्ठा को संचित कुसंस्कारों से मुक्त कर सके।
स्वाध्याय मण्डलों को इन दिनों प्रमुखता दी जा रही हैं। कल्प साधना के साधकों को अपना चरम पुरुषार्थ इस केन्द्र बिन्दु पर नियोजित करना चाहिए। अपने प्रभाव क्षेत्र में इन्हें अधिकाधिक संख्या में बनाने-उन्हें सुनियोजित ढंग से चलाने एवं इस निमित्त जिन साधकों की आवश्यकता है उन्हें जुटाने के लिए भरपूर प्रयत्न करना चाहिए। इस उदार सेवा साधना को अपनाकर वे भूल का प्रायश्चित्त परिमार्जन तथा भविष्य निर्धारण के निमित्त आवश्यक पुण्य परमार्थ का उत्साहवर्धक अर्जन कर सकेंगे।
स्वाध्याय मंडलों की स्थापना की जा रही है। इस युगान्तरीय चेतना में अपना समय एवं धन जितना भी लग सके प्रायश्चित एव पुण्य अर्जन की उभयपक्षीय आवश्यकताओं का दृष्टि से जी खोलकर लगाया जाना चाहिए। ऐसे ही दान बीजारोपण कहे जाते हैं। मक्का के एक दाने से एक पौधा उत्पन्न होता है। एक पौधे पर पाँच भुट्टे आते हैं।
स्वाध्याय संचित पूँजी ही मनुष्य की सच्ची आध्यात्मिक सम्पदा है।
स्वाध्याय मंडल की स्थापना में रही हो रहा है। संस्थापक एक उसके घनिष्ठ साथी नैष्ठिक सदस्य पाँच। फिर उसके समर्थक पाँच-पाँच इस प्रकार बीस की एक ऐसी मंडली का निर्माण जो युग धर्म के निर्वाह में या तो कटिबद्ध हो चली या होने वाली है। यह बीस गोबर के चौथ बने रहे, एक संस्थापक ही सदा सर्वदा कट पुतलियाँ नचाता रहे, ऐसा नहीं हो सकता। आशा की जानी चाहिए कि इनमें से भी अधिकाँश लोग ऐसे निकलेंगे जो दूसरों के कन्धों पर चढ़े रहने से आगे बढ़े।
स्वाध्याय मंडल के सदस्यों प्रज्ञा परिजनों को वैसा करने का उत्साह न उमंगें ।
स्वाध्याय मण्डल संस्थापन का कार्य एक व्यक्ति एकाकी प्रयासों से भी कर सकता है। एक स्वयं चार अपने जैसे स्वभाव और रुझान के साथी ढूँढ़ लेने भर से काम चल जायेगा। यह पाँचों मण्डली के प्रारम्भिक नैष्ठिक सदस्य कहलायेंगे । स्वयं नियमित रूप से प्रज्ञा साहित्य पढ़ने के लिए एक घण्टा समय निकालेंगे साथ ही यह भी प्रयत्न करेंगे कि अपने-अपने संपर्क क्षेत्र में जहाँ भी प्रभाव हो वहाँ युग-साहित्य का चस्का लगाने का उत्तरदायित्व निभाया जाय। हर नैष्ठिक सदस्य ऐसे पाँच व्यक्ति ढूँढ़ निकालें जो स्वाध्याय के प्रति उत्साह बरतें।
स्वाध्यायशील इस प्रकार 1+ 5 = 6 की स्वाध्याय मण्डली बन जाती है। स्वाध्याय मण्डल के यह पाँच सहचर और पाँच-पाँच उनके बच्चे यह तीस का एक छोटा परिवार बन जाता है। वे लोग पढ़ने का क्रम तो जारी रख ही सकते हैं। साथ ही सप्ताह में एक दिन इकट्ठे होकर सत्संग की प्रक्रिया भी चला लिया करें। इस सप्ताह जो पढ़ाया गया हो उसे जीवनक्रम में सम्मिलित करने के उपायों के सम्बन्ध में इस सत्संग में विचार विनिमय होता रहे तो पठन के बीजारोपण को आवश्यक खाद पानी मिलता रहेगा और देखते-देखते खेत लहलहाने लगेगा।
स्वाध्यायशीलों का एक सर्किल बनाना होता है। नियमित रूप से बिना मूल्य प्राणवान साहित्य मिलते रहने से इस मंडली के जीवन-क्रम स्तर में जो उत्साहपूर्वक परिवर्तन होता है उसका आभास पाने भर से हर किसी को उनकी उपयोगिता एवं गरिमा का विश्वास होता चला जाता है।
स्वाध्याय को भजन से भी अधिक प्रमुखता दी गई है। इसलिए उसे नित्य कर्म में सम्मिलित करना चाहिए और कभी प्रमाद न करना चाहिए सद्विचारों की यह स्वाध्याय संचित पूँजी ही मनुष्य की सच्ची आध्यात्मिक सम्पदा है।
स्वाध्याय चलता है। इसमें आत्म-शोधन आत्म-परिष्कार और भविष्य निर्माण के तत्व जुड़े रहते हैं। किसे क्या पढ़ना चाहिए इसका क्रम भी आहार उपचार की तरह आरम्भ से ही निर्धारित कर दिया जाता है। सभी के पास पुस्तकें पहुँचती हैं और वापिस ली जाती हैं। यह व्यवस्था आश्रम की ओर से हैं।
स्वाध्याय मण्डल बनेंगे वहाँ उनके एक दिवसीय उद्घाटन समारोह भी होंगे। इनके लिए शान्ति कुँज से दो प्रतिनिधि भेजने की व्यवस्था बनी है। वे आयोजन की गरिमा से अधिकाधिक लोगों को अवगत कराने का प्रयत्न करेंगे। सायंकाल स्वाध्याय की महत्ता बताने वाला स्लाइड प्रोजेक्टर प्रदर्शन प्रातः उद्घाटन समारोह। जिसमें पाँचों नैष्ठिक सदस्य और उनके पाँच-पाँच सहयोगी कुल तीस व्यक्ति तो उस धर्मकृत्य में प्रमुख रूप से सम्मिलित होंगे ही।
स्वाध्यायशीलों तक प्रज्ञा साहित्य नियमित रूप में देने और वापस लेने का क्रम चलाते रहें। संक्षेप में यही है वह स्वाध्याय मण्डल योजना जिसे प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत सर्वोपरि प्रमुखता दी जा रही है। कल्प साधक अपने पाप नाश एवं पुण्य संवर्धन की दृष्टि से इस प्रयास में पूरी तत्परता के साथ संलग्न हों
स्वाध्याय मण्डल योजना जिसे प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत सर्वोपरि प्रमुखता दी जा रही है। कल्प साधक अपने पाप नाश एवं पुण्य संवर्धन की दृष्टि से इस प्रयास में पूरी तत्परता के साथ संलग्न हों
स्वाध्याय की ओर मुड़ना चाहिए। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए प्रज्ञा साहित्य को वरीयता दी जा सकती है। इसे मणि मुक्तकों की गहरी डुबकी लगाकर संचित किया गया है। इसे अमृतोपम मधु संचय कहा जाय तो तनिक भी अत्युक्ति न होगी। इस अवलम्बन से बढ़कर सस्ता, सुलभ और सर्वांगपूर्ण सत्संग कदाचित् ही कहीं अन्यत्र उपलब्ध हो सके।
स्वाध्याय मण्डल के यह पाँच सहचर और पाँच-पाँच उनके बच्चे यह तीस का एक छोटा परिवार बन जाता है। वे लोग पढ़ने का क्रम तो जारी रख ही सकते हैं। साथ ही सप्ताह में एक दिन इकट्ठे होकर सत्संग की प्रक्रिया भी चला लिया करें। इस सप्ताह जो पढ़ाया गया हो उसे जीवनक्रम में सम्मिलित करने के उपायों के सम्बन्ध में इस सत्संग में विचार विनिमय होता रहे तो पठन के बीजारोपण को आवश्यक खाद पानी मिलता रहेगा और देखते-देखते खेत लहलहाने लगेगा। इन तीसों व्यक्ति यों के जन्म दिवसोत्सव मनाने का भी शुभारम्भ करना चाहिए।
स्वाध्याय मण्डलों की रूपरेखा अत्यन्त सरल है। एक भावनाशील व्यक्ति आगे बढ़े। अपने जैसी प्रकृति के अन्य चार भी ढूँढ़े। यह पाँच नैष्ठिक सदस्यों का एक स्वाध्याय मण्डल बना। इन पाँचों को अपने-अपने संपर्क क्षेत्र के पाँच-पाँच व्यक्ति ऐसे तलाश करने होते हैं जिनका रुझान धर्म एवं विवेक की ओर हो।
स्वाध्याय मंडल के सदस्य अपने चिन्तन और चरित्र में-स्वभाव और दृष्टिकोण में ऐसा उत्साहवर्धक परिवर्तन करेंगे जिससे प्रज्ञा साहित्य की प्रखरता सिद्ध हो सके। यह पठन ऐसा है जो अन्तराल के मर्मस्थल तक पहुँचने के उपरान्त-कर्म क्षेत्र में उतरने की तड़पन उत्पन्न करता है। युग सन्धि जैसे ऐतिहासिक अवसर पर तो समय की चुनौती स्वीकार करने में जागृत आत्माओं का पौरुष उन्हें दबा-दबोच कर अग्रिम पंक्ति में खड़ा होने के लिए विवश करेगा। ऐसी उमंगें जिस भी अन्तःकरण में उठती हैं उसे सत्प्रयोजनों के लिए उदार अनुदान प्रस्तुत करने के लिए विवश करती हैं। आदर्शों से अनुप्राणित व्यक्ति मूक दर्शक बन कर नहीं बैठ सकते उन्हें पठन-पाठन से एक कदम आगे बढ़ाकर समयदान और अंशदान की श्रद्धांजलि से युग देवता की झोली भरनी पड़ती है।
स्वाध्याय मंडलों का संस्थापन और संचालन कह सकते हैं। यह हर स्थिति के व्यक्ति के लिए नितान्त सरल है। साथ ही उस बीजारोपण का अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होना भी हथेली पर सरसों जमने की तरह हाथों-हाथ देखा जा सकता है। प्रज्ञा साहित्य जिनने पढ़ा है वे जानते हैं कि उनकी बाजारू किताबों से कोई तुलना नहीं। इसे तत्व-दर्शन का, नीति शास्त्र का, सामाजिक आदर्शवादिता का सार-संक्षेप एवं मणु-संचय कह सकते हैं।
स्वाध्याय मण्डलों के माध्यम से जो तीस-तीस की मण्डलियाँ बने भी उनमें आधे चौथाई अवश्य भावनाशील निकलेंगे और कम से कम न्यूनतम अनुदान प्रस्तुत करने की उदारता तो दिखायेंगे ही। फिर सभी इतने कृपण कहाँ होते हैं जो बीस पैसे से अधिक की उदारता न दिखा सकें। पारिवारिक उत्तरदायित्व से निवृत्त, आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी, जिन पर उपार्जन की जिम्मेदारी लदी ही नहीं, ऐसे अगणित व्यक्ति हो सकते हैं जो दो घण्टे की बात क्या, सोने खाने के घण्टे छोड़कर युग धर्म के निर्वाह में अंगद, हनुमान् की तरह-भीम अर्जुन की तरह-अहर्निश जुटे रह सकें। यह चर्चा मात्र एक लाख को जागृत आत्माओं की श्रेणी में मिलाकर की जा रही है। यदि वह संख्या बीस गुनी हो सके।
स्वाध्याय मण्डल अपना कार्यारम्भ तो प्रज्ञा साहित्य पढ़ने-पढ़ाने से करेगा, पर उस छोटी परिधि तक सीमित नहीं रहेगा। ज्ञान यदि जीवन्त है तो वह कर्म के रूप में विकसित होगा ही। सड़ना तो घुन लगा बीज है। जिसमें जीवन मौजूद है उसके अंकुरित पल्लवित होने में किसी व्यवधान की आशंका नहीं है।
स्वाध्याय मण्डल की स्थापना की कल्प वृक्ष आरोपण से तुलना की गई थी। यह सही है। प्रज्ञा साहित्य का नियमित स्वाध्याय करने का जिन्हें चस्का लगेगा, अवसर मिलेगा, वे कुछ ही दिन में चिन्तन और व्यवहार की दृष्टि से तेजी से बदलते हुए शालीनता की दिशा में चलते हुए दृष्टिगोचर होंगे। मनोविनोद के लिए पढ़े गये उथले साहित्य की बात दूसरी हैं। उसकी तुलना जाज्वल्यमान प्राण प्रेरणा से भरे पूरे प्रज्ञा साहित्य के साथ नहीं हो सकती।
स्वाध्याय साधना करने से व्यक्ति विशेष को तो लाभ मिल सकता है। पर यदि उस आलोक को व्यापक बनाना हो तो संगठित रूप से उस प्रक्रिया को अग्रगामी बनाना होगा। आरम्भ में संगठन छोटा रहे हर्ज नहीं। पर यदि वह उद्देश्यपूर्ण और सज्जनों का समुदाय हो तो उस बीजारोपण के एक दिन विशाल वृक्ष बनने की सम्भावना सुनिश्चित ही रहेगी।
स्वाध्याय के लिए तो एक घण्टा आठ से नौ बजे तक का निर्धारित है। सत्संग के क्रम में प्रातः छः बजे नादयोग के साथ-साथ अपने कमरे में ही फिट किये गये स्वतन्त्र लाउडस्पीकर पर गुरुदेव का प्रवचन सुनने को मिल जाता है। इसके अतिरिक्त बारी-बारी से साधकों की वर्गीकृत टोलियाँ बारह से एक तक गुरुदेव के पास व्यक्ति गत परामर्श के लिए पहुँचती है। मार्गदर्शन का सामूहिक भाषण प्रवचन तो अब नहीं होते पर नियत समय पर आवश्यक विषयों पर परामर्श करने की अभी भी छुट है। इस अवसर पर पारस्परिक वार्तालाप और विचारों का आदान-प्रदान भी हो जाता है।
स्वाध्याय मण्डल बनाले तो इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं मानना चाहिए। हर व्यक्ति की अपनी प्रतिभा है हर व्यक्ति का अपना संपर्क क्षेत्र है। उसका उच्च उद्देश्य के लिए संकल्पपूर्वक प्रयोग बन पड़े तो अनपढ़ हजारी किसान की तरह हजार न सही पाँच बगीचे। पाँच बगीचे ही न सही पाँच पेड़ तो उगा ही सकता है। युग परिवर्तन नव निर्माण का यही तरीका सरल और व्यावहारिक है।
स्वाध्याय की, प्रज्ञा प्रेरणा की गरिमा समझने वाले पाँच एवं पच्चीस अन्यों के मिलने से बना हुआ तीस का स्वाध्याय मण्डल अपना कार्यारम्भ तो प्रज्ञा साहित्य पढ़ने-पढ़ाने से करेगा, पर उस छोटी परिधि तक सीमित नहीं रहेगा। ज्ञान यदि जीवन्त है तो वह कर्म के रूप में विकसित होगा ही। सड़ना तो घुन लगा बीज है। जिसमें जीवन मौजूद है उसके अंकुरित पल्लवित होने में किसी व्यवधान की आशंका नहीं है।
स्वाध्याय मंडल के पाँच नैष्ठिक सदस्य यदि एक वर्ष में अपने-अपने स्वतन्त्र पाँच स्वाध्याय मण्डल बनाले तो इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं मानना चाहिए। हर व्यक्ति की अपनी प्रतिभा है हर व्यक्ति का अपना संपर्क क्षेत्र है। उसका उच्च उद्देश्य के लिए संकल्पपूर्वक प्रयोग बन पड़े तो अनपढ़ हजारी किसान की तरह हजार न सही पाँच बगीचे। पाँच बगीचे ही न सही पाँच पेड़ तो उगा ही सकता है। युग परिवर्तन नव निर्माण का यही तरीका सरल और व्यावहारिक है।
स्वाध्याय से कम में और किसी प्रकार बन नहीं पड़ेगा। बात वर्तमान सूची की नहीं। उसमें यदि निष्क्रियों का बाहुल्य मान लिया जाय तो भी यह भावना की जा सकती है कि स्वाध्याय मण्डलों के माध्यम से जो तीस-तीस की मण्डलियाँ बने भी उनमें आधे चौथाई अवश्य भावनाशील निकलेंगे और कम से कम न्यूनतम अनुदान प्रस्तुत करने की उदारता तो दिखायेंगे ही। फिर सभी इतने कृपण कहाँ होते हैं जो बीस पैसे से अधिक की उदारता न दिखा सकें। पारिवारिक उत्तरदायित्व से निवृत्त, आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी, जिन पर उपार्जन की जिम्मेदारी लदी ही नहीं, ऐसे अगणित व्यक्ति हो सकते हैं जो दो घण्टे की बात क्या, सोने खाने के घण्टे छोड़कर युग धर्म के निर्वाह में अंगद, हनुमान् की तरह-भीम अर्जुन की तरह-अहर्निश जुटे रह सकें।
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन का समर्थ तन्त्र खड़ा करके संचित कषाय-कल्मषों का निष्कासन एवं उच्चस्तरीय आस्थाओं का प्रतिष्ठापन किया जाता है। इस प्रकार इस आरम्भिक सोपान को भी निर्धारण की दृष्टि से पूर्णता युक्त कहा जा सकता है।
स्वाध्याय मण्डल बना। इन पाँचों को अपने-अपने संपर्क क्षेत्र के पाँच-पाँच व्यक्ति ऐसे तलाश करने होते हैं जिनका रुझान धर्म एवं विवेक की ओर हो। वे अपने से सम्बन्धित लोगों को नियमित स्वाध्याय के लिए सहमत करें साथ ही, ऐसा प्रबन्ध करें कि पाँचों सदस्य अपने सम्बन्धित पाँच-पाँच स्वाध्यायशीलों तक प्रज्ञा साहित्य नियमित रूप में देने और वापस लेने का क्रम चलाते रहें। संक्षेप में यही है वह स्वाध्याय मण्डल योजना जिसे प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत सर्वोपरि प्रमुखता दी जा रही है। कल्प साधक अपने पाप नाश एवं पुण्य संवर्धन की दृष्टि से इस प्रयास में पूरी तत्परता के साथ संलग्न हों
स्वाध्याय करने का जिन्हें चस्का लगेगा, अवसर मिलेगा, वे कुछ ही दिन में चिन्तन और व्यवहार की दृष्टि से तेजी से बदलते हुए शालीनता की दिशा में चलते हुए दृष्टिगोचर होंगे। मनोविनोद के लिए पढ़े गये उथले साहित्य की बात दूसरी हैं। उसकी तुलना जाज्वल्यमान प्राण प्रेरणा से भरे पूरे प्रज्ञा साहित्य के साथ नहीं हो सकती।
स्वाध्याय मंडलों में से प्रत्येक को तीस स्वाध्यायशीलों का एक सर्किल बनाना होता है। नियमित रूप से बिना मूल्य प्राणवान साहित्य मिलते रहने से इस मंडली के जीवन-क्रम स्तर में जो उत्साहपूर्वक परिवर्तन होता है उसका आभास पाने भर से हर किसी को उनकी उपयोगिता एवं गरिमा का विश्वास होता चला जाता है।
स्वाध्याय को जीवनचर्या में सम्मिलित रखें साथ ही किन्हीं पाँच अन्यों को भी पढ़ाने का कार्य उतना ही पुण्यफल मानें जितना कि पाँच ब्राह्मणों को भोजन कराने का होता है।
स्वाध्याय इतना अधिक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है कि उसे शास्त्रकारों ने भजन पूजन से भी अधिक आवश्यक माना है और सर्वोपरि प्रमुखता देने योग्य ठहराया है। ब्रह्मदान, ज्ञानदान से बढ़कर और कोई पुण्य परमार्थ इस संसार में है नहीं इसलिए पुरातन काल के देव मानव साधु ब्राह्मण इस प्रयोजन में अहर्निश निरत रहते थे।
स्वाध्याय एवं सत्संग है। आत्म निर्भर दो हैं-एक चिन्तन दूसरा मनन। इन चारों को चारपाई के चार पाये कहा जात सकता है। हाथ, पैर, धड़, सिर-इन चार भागों में शरीर विभक्त है। इसी प्रकार आत्म-निर्माण के लिए भी इन चारों का मनोयोग के साथ अवलम्बन करना पड़ता है।
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन के आधार पर किया जाता है और प्रयोग पक्ष के लिए योगाभ्यास एवं तपश्चर्या के विधि-विधानों का आश्रय लेना पड़ता है। कल्प साधना की प्रक्रिया में जहाँ संयम साधने विवेक अपनाने की शिक्षा दी जाती है वहाँ श्रद्धा उभारने वाली साधनाओं का भी समुचित समावेश रखा गया है। इन्हीं तत्वों का सुनियोजित समावेश रखा गया है। इन्हीं तत्वों का सुनियोजित समावेश कल्प साधना की प्रशिक्षण प्रक्रिया में किया गया है।
स्वाध्याय के योग्य सत्साहित्य पढ़ना या सुनना पड़ता है। मनन, चिन्तन, ध्यान, धारणा आदि का स्वरूप एवं प्रयोग भी तो इसके बिना बन नहीं पड़ता। इसलिए गुरु ज्ञान द्वारा उच्चस्तर की प्रेरणाएँ उपलब्ध करनी होती हैं। इसके लिए समर्थ साहित्य का स्वाध्याय इतना अधिक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है कि उसे शास्त्रकारों ने भजन पूजन से भी अधिक आवश्यक माना है और सर्वोपरि प्रमुखता देने योग्य ठहराया है। ब्रह्मदान, ज्ञानदान से बढ़कर और कोई पुण्य परमार्थ इस संसार में है नहीं इसलिए पुरातन काल के देव मानव साधु ब्राह्मण इस प्रयोजन में अहर्निश निरत रहते थे।
स्वाध्याय, चिन्तन, मनन में दूसरे के साथ रहने से किसी प्रकार का विक्षेप हो प्रातःकाल की नादयोग साधना और अपने ही कमरे में मार्गदर्शक का नियमित प्रवचन-उद्बोधन सुनने का लाभ भी एकान्त में, एकाग्र होने पर ही मिलता है। इसलिए ही साधकों को एक कमरा दिया जाता है। भले ही वह साइज में 10&10 का ही क्यों न हो।
स्वाध्याय की तरह चिन्तन, मनन को परिष्कृत प्रखर और प्रगाढ़ बनाना भी आवश्यक है। कल्प साधना की अवधि में तीन दृश्य आँखों के सामने घूमते रहने चाहिए। इनमें एक है-भवसागर में डूबना, मगरमच्छों द्वारा निगलकर उदरस्थ किए जाने से पूर्व नौका पर अवस्थित महाप्रज्ञा द्वारा उबार लिया जाना। दूसरा है-हाथ में हथकड़ी, पैरों में बेड़ी, गले में लौह जंजीर की जकड़न, बढ़ने और करने में असमर्थता, दिव्य लोक से चक्र सुदर्शन का उतरना और उन बन्धनों को काटकर भव-बन्धनों से मुक्त कर देना। तीसरा है-सघन अन्धकार को छोड़कर उत्कृष्टता के चरम लक्ष्य प्रकाश केन्द्र तक पहुँचने वाली सीढ़ी पर एक− एक कदम उठाते हुए ऊपर उठना, आगे बढ़ना।
स्वाध्याय के प्रति उत्साह बरतें। इन लोगों तक हर दिन बिना भूल युग साहित्य पहुँचाने वापस लेने का सिलसिला नैष्ठिक सदस्यों को ही चलाना होगा। वे अनायास मिलते रहते हों तो उस समय भी यह देने वापस लेने का क्रम चल सकता है। अन्यथा घर जाने और वापस लेने के लिए समय निकालने की बात भी सोचना चाहिए। नैष्ठिक सदस्यों की दुहरी व्रतशीलता है कि वे स्वयं नित्य कर्म की तरह स्वाध्याय को जीवनचर्या में सम्मिलित रखें साथ ही किन्हीं पाँच अन्यों को भी पढ़ाने का कार्य उतना ही पुण्यफल मानें जितना कि पाँच ब्राह्मणों को भोजन कराने का होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-March
स्वाध्याय भी प्रभावशाली होता है। यदि उन्नतिशील बनाने वाले तथ्यों से भरा-पूरा साहित्य मिलता रहे और उसमें प्रस्तुत किये गये विवेक पूर्ण तथ्यों को विवेक पूर्वक अपनाया जाता रहे तो भी संवेदनशील मस्तिष्क उसी प्रकार ढांचे में ढलने लगते हैं जैसे कि वातावरण प्रभावित करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-December
स्वाध्यायशील होना एक बड़ा सद्गुण बताया गया है। सिसरो ने कहा है- “प्रकृति की अपेक्षा स्वाध्याय से अधिक मनुष्य श्रेष्ठ बने हैं।” जबकि शेली का कहना है कि “जितनी ही हम अध्ययन करते हैं, उतना ही हमको अपने अज्ञान का आभास होता जाता है।” इसी कारण श्रुति में कहा गया है- “स्वाध्यायान्नाप्रमदः” अर्थात् स्वाध्याय के क्षेत्र में मनुष्य को प्रमाद नहीं करना चाहिए। वस्तुतः प्रगतिशील विचार धारा-प्रेरणा एवं तत्परता उत्पन्न करने के लिए सत्साहित्य नितान्त आवश्यक है।
स्वाध्याय से अधिक मनुष्य श्रेष्ठ बने हैं।” जबकि शेली का कहना है कि “जितनी ही हम अध्ययन करते हैं, उतना ही हमको अपने अज्ञान का आभास होता जाता है।” इसी कारण श्रुति में कहा गया है- “स्वाध्यायान्नाप्रमदः” अर्थात् स्वाध्याय के क्षेत्र में मनुष्य को प्रमाद नहीं करना चाहिए। वस्तुतः प्रगतिशील विचार धारा-प्रेरणा एवं तत्परता उत्पन्न करने के लिए सत्साहित्य नितान्त आवश्यक है। सत्संग से भी यही प्रयोजन आँशिक रूप से पूरा होता है।
स्वाध्याय के क्षेत्र में मनुष्य को प्रमाद नहीं करना चाहिए। वस्तुतः प्रगतिशील विचार धारा-प्रेरणा एवं तत्परता उत्पन्न करने के लिए सत्साहित्य नितान्त आवश्यक है। सत्संग से भी यही प्रयोजन आँशिक रूप से पूरा होता है।
स्वाध्यायान्नाप्रमदः” अर्थात् स्वाध्याय के क्षेत्र में मनुष्य को प्रमाद नहीं करना चाहिए। वस्तुतः प्रगतिशील विचार धारा-प्रेरणा एवं तत्परता उत्पन्न करने के लिए सत्साहित्य नितान्त आवश्यक है। सत्संग से भी यही प्रयोजन आँशिक रूप से पूरा होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-November
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन और मनन यह चार संस्कार मन पर रगड़ाई करने एवं कलई चढ़ाने के काम में लाये जाते हैं। प्रत्याहार वस्तुतः अवाँछनीयता विरोधी है, जिसके लिए सद्विचारों का सत्प्रवृत्तियों का- नीति मर्यादाओं का- अवगाहन करना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-May
स्वाध्याय। स्वाध्याय का तात्पर्य ऐसे युग मनीषियों के विचार प्रतिपादन पढ़ना है जो सामयिक समस्याओं का व्यवहारिक समाधान सुझाते हैं और चिन्तन, चरित्र, व्यवहार का स्तर ऊँचा उठाते हैं। ऐसी पुस्तकें युग मनीषियों द्वारा लिखी हुई हो सकती हैं। उसके लिए उन पुराने इतिहास पुराणों या निर्धारणों को पढ़ते रहने से उल्टा भ्रम जंजाल गले बंधता है, जो अब असामयिक हो गये। समय के साथ बहुत कुछ बदलता है, इसमें समाधानकारक विचारधारा भी सम्मिलित है।
स्वाध्याय (3) ईश्वर प्रणधान योग। साधना का यह क्रिया पक्ष है। अनेक प्रसंगों, विवादों संदर्भों में उलझने और अनेकानेक क्रिया-काण्डों में से किसे चुनना- यह कार्य बड़ा कठिन है। क्योंकि शास्त्रकार अपने-अपने प्रतिपादनों पर इतना जोर देते हैं कि विश्वासी के लिए वह सर्वोत्तम प्रतीत होता है। फिर जिज्ञासु के लिए अन्य ग्रन्थों को पढ़ने की भी मनाही नहीं है।
स्वाध्याय का तात्पर्य ऐसे युग मनीषियों के विचार प्रतिपादन पढ़ना है जो सामयिक समस्याओं का व्यवहारिक समाधान सुझाते हैं और चिन्तन, चरित्र, व्यवहार का स्तर ऊँचा उठाते हैं। ऐसी पुस्तकें युग मनीषियों द्वारा लिखी हुई हो सकती हैं। उसके लिए उन पुराने इतिहास पुराणों या निर्धारणों को पढ़ते रहने से उल्टा भ्रम जंजाल गले बंधता है, जो अब असामयिक हो गये। समय के साथ बहुत कुछ बदलता है, इसमें समाधानकारक विचारधारा भी सम्मिलित है।
स्वाध्याय, ईश्वर प्रणधाननि क्रियायोगः। अर्थात् क्रियायोग के तीन पक्ष हैं। (1) तप (2) स्वाध्याय (3) ईश्वर प्रणधान योग। साधना का यह क्रिया पक्ष है। अनेक प्रसंगों, विवादों संदर्भों में उलझने और अनेकानेक क्रिया-काण्डों में से किसे चुनना- यह कार्य बड़ा कठिन है।
स्वाध्याय और ईश्वर प्रणधान ही क्रियायोग है। यह अपेक्षातया अधिक सही है और सरल भी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-July
स्वाध्याय-सत्संग ही काम
नहीं दे सकता। उन पर ऐसा दबाव भी पड़ना चाहिए, जिससे आकृति बदलती हुई
दृष्टिगोचर हो सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-August
स्वाध्याय नहीं किया जायगा तो उनका श्रम एक प्रकार से निरर्थक चला जायगा। विद्या ऋण से उऋण होने में स्वाध्याय सत्संग की दैनिक आवश्यकता है। श्रेष्ठ विचारों की श्रवण व्यवस्था कोई भी शिक्षित कर सकता है इसलिए सत्संग कार्य हर शिक्षित सत्परामर्श देने वाले अभिलेखों को सुनते रह कर सत्संगी कहला सकता है।
स्वाध्याय के रूप में भी आँशिक रूप से चुकाया जा सकता है क्योंकि जिन मनीषियों ने युग धर्म का प्रतिपादन किया है उसे यदि स्वाध्याय नहीं किया जायगा तो उनका श्रम एक प्रकार से निरर्थक चला जायगा। विद्या ऋण से उऋण होने में स्वाध्याय सत्संग की दैनिक आवश्यकता है। श्रेष्ठ विचारों की श्रवण व्यवस्था कोई भी शिक्षित कर सकता है इसलिए सत्संग कार्य हर शिक्षित सत्परामर्श देने वाले अभिलेखों को सुनते रह कर सत्संगी कहला सकता है।
स्वाध्याय सत्संग की दैनिक आवश्यकता है। श्रेष्ठ विचारों की श्रवण व्यवस्था कोई भी शिक्षित कर सकता है इसलिए सत्संग कार्य हर शिक्षित सत्परामर्श देने वाले अभिलेखों को सुनते रह कर सत्संगी कहला सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-June
स्वाध्याय की आवश्यकता पड़ती है। साथ ही चिन्तन-मनन की भी। अनौचित्य की हानियों को जितने विस्तार सहित सोचा जा सके। उन्हें अपनाने पर जिन्हें जो संकट सहना पड़ा है। उसका चित्र इतना स्पष्ट होना चाहिए कि उस दिशा में कदम बढ़ाना आग से खेलने के समान भयावह प्रतीत होने लगे।
स्वाध्याय सत्संग, जप, और पूजा पाठ की प्रक्रिया अपनाई जाती है। अन्यथा वह सारा क्रिया-कृत्य विडंबना मात्र बनकर रह जाता है और मिथ्या भ्रम जंजाल में फंसे रहने की मनःस्थिति बन जाती है। अध्यात्म तत्वज्ञान का सार संक्षेप इतने ही है कि मनुष्य श्रेष्ठ और उदार बने, पवित्र और प्रखर रहे। विज्ञान अपनी जगह प्रशंसनीय है, अध्यात्म के साथ-साथ चलकर ही वह अभिनन्दनीय बनता है।
स्वाध्याय मण्डलों को अपने-अपने यहाँ एक विद्यालय की स्थापना करनी चाहिए जिसमें कम से कम दस प्रज्ञा प्रचारक प्रशिक्षण प्राप्त करें। प्रशिक्षण के उपरान्त वे न्यूनाधिक मात्रा में जो गतिविधियाँ अपनायेंगे उनसे चेतनात्मक वातावरण का स्तर ऊँचा उठाने में असाधारण सहायता मिलेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-April
स्वाध्यायशील व्यक्तियों के सामने ही आदर्श वादियों की कार्य पद्धति होती है। इतिहास में ही ऐसे श्रेष्ठ पुरुष खोजे जा सकते हैं। वे कभी-कभी और कहीं-कहीं ही होते हैं। उन्हें आदर पूर्वक पढ़ने, सुनने और समझने में ही इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि कितने ही लोगों ने प्रत्यक्ष घाटा उठाते हुए भी आदर्शों का परिपालन किया है और सर्व साधारण के सामने अनुकरणीय पथ प्रदर्शन प्रस्तुत किया है। ऐसे लोग यदि भावनाशील हुए और आदर्शों को अपनाने से किस प्रकार महान बना जा सकता है यह समझ सके तो फिर अपने को ढाँचे में ढालता है और समय-समय पर दूसरों को भी वैसी ही सलाह देते हैं।
स्वाध्याय सत्संग आवश्यक है। जिसे बाहरी स्थिति ऐसी मिलेगी वही चिन्तन और मनन भी ऊंचे स्तर का कर सकेगा। उसके द्वारा अन्यान्यों को भी ऊंचे स्तर का परामर्श एवं सहयोग मिलेगा। इन्हीं कसौटियों पर कसकर यह देखा जा सकता है कि किसका व्यक्तित्व किस स्तर का है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-May
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन, के उपायों को अन्तःचेतना के अभिवर्धन में सहायक माना गया है। पर यह बाह्य प्रयोग ही पर्याप्त नहीं है। उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने वाले जिस आन्तरिक उल्लास की आवश्यकता है उसमें सूर्याराधना विशेष रूप से सहायक होती है।
स्वाध्याय, सेवा आदि का माध्यम अपना कर भीतर के देवत्व को जगाना पड़ता है। शाप-वरदान देने की सामर्थ्य के मूल में मात्र अभिचार कृत्य ही काम नहीं करते, कर्मकाण्ड ही काम नहीं दे जाते वरन् अपने जीवन का ढाँचा भी तद्नुकूल ही विनिर्मित करना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-March
स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान। यह पाँचों यदि क्रियामात्र के रूप में
संपन्न किये जाएँ तो वे लोकाचार ही रह जाएँगे। शरीर और कपड़ों की सफाई सभी
करते हैं, पर आध्यात्मिक शौच में वैचारिक एवं भावनात्मक स्वच्छता का भी
समावेश होता है। संतोषी तो आलसी, प्रमादी, दरिद्र स्तर के लोग भी होते हैं।
भाग्यवादियों का चिंतन इसी प्रकार का होता है, पर यहाँ संकेत इस बात का है
कि अनिवार्य निर्वाह को सामान्य नागरिक स्तर पर अपनाया जाए।
स्वाध्याय ऐसा ही पत्थर है, जिसके संपर्क में निरंतर रहना ही चाहिए।
स्वाध्याय, संयम और सेवा आत्मोत्कर्ष के यह चार प्रमुख सोपान हैं। इन्हें निबाहा जाय, इसका हर व्यक्ति की मनःस्थिति एवं परिस्थिति के अनुरूप ऐसा निर्धारण किया जाता है। जो बिना किसी कठिनाई के भविष्य में भी कार्यान्वित हो सके।
स्वाध्याय का अर्थ
पुस्तकें पढ़ते रहना नहीं, वरन् ‘स्व’ के संबंध में अध्यवसाय निरत होना है।
ईश्वर प्राणिधान में जप-ध्यान-पूजा-अर्चा के क्रिया कृत्य ही नहीं आते।
उसका वास्तविक स्वरूप है, सर्वव्यापी, कर्मफल में निष्पक्ष न्यायाधीश जैसी
स्थिति के परमेश्वर के अनुशासन को ठीक तरह पालन करना। कोई भी दुष्कर्म
छिपकर भी न किया जाय। कर्मफल में विलंब होते देखकर निष्ठा को डगमगाने न
देना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-June
स्वाध्याय, सत्संग, सेवा और साधना के चारों आधार जीवन-चर्या के अविच्छिन्न अंग बनाये जाने चाहिए। चिन्तन और मनन की प्रक्रिया में अधिकाधिक समय लगाना चाहिए। चिन्तन का प्रयोजन होना चाहिए परिशोधन और मनन का उद्देश्य रहे-भावी गतिविधियों को सत्प्रवृत्तियों में सुनियोजित करने की उमंग भरी विचारणा रहनी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-August
स्वाध्याय, सत्संग के अतिरिक्त मनन-चिंतन की भी आवश्यकता पड़ती है। इन्हें व्यक्ति स्वयं भी जुटा सकता है। आवश्यक नहीं कि इस संदर्भ में दूसरों की सहायता अनिवार्य ही हो। सद्ज्ञान-स्रोतों की कमी नहीं, उनके साथ संबंध जोड़ने के लिए उत्सुक व्यक्ति गई गुजरी स्थितियों में भी अवसर प्राप्त कर लेते हैं, जिनके सहारे वह विज्ञजनों की पंक्ति में बैठ सकें। सभ्य और सुसंस्कृत रहना सीखें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-February
स्वाध्याय मंडलों ने प्रज्ञा पीठों ने समर्थ शाखाओं ने बना ली हैं और उन नामों वाले व्यक्तियों के साथ संपर्क साधने की तिथि निर्धारण कर ली है। किस समय कहाँ होते चलना और किस मार्ग से कब तक घर वापस लौटना यह सुनिश्चित योजना बन गई है। समर्थों ने संकल्प किया है कि जब तक वे 14 शाखाएँ न बना लेंगे तब तक हजामत न बनायेंगे या शक्कर न खायेंगे। ऐसे अनुबंधों से संकल्प में प्राण भर जाते है और निश्चय पूरे होकर रहते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-November
स्वाध्याय संदर्भ की तरह पढ़ते हैं जो पढ़ा है, उसका मनन चिन्तन करते है। और जो पढ़ा समझा है, उसे जीवनचर्या में उतारने का सामर्थ्य भर प्रयत्न करते हैं।
स्वाध्याय का महत्व इसीलिये गाया गया है अस्तु विचार पद्धति एवं जीवनचर्या का उत्कृष्ट बनाने के लिये सत्साहित्य का महापुरुषों की जीवन गाथा का अवगाहन करना चाहिए। उससे भी किसी सीमा तक उस प्रयोजन की पूर्ति हो जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-January
स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा पीठ समर्थ शाखा संगठन कार्य क्षेत्र में उतरेंगे तो विश्वास है कि नये शाखा संगठन जिनमें तीन तीन सदस्य हों एक लाख की संख्या में एक वर्ष के भीतर ही बन जायेंगे।
स्वाध्याय सत्संग मनन चिन्तन के आत्म निर्माण करने वाले तरीके भी हो सकते हैं मनःस्थिति भी परिस्थिति बनाती हैं पर आध्यात्मिक उपचारों में ऐसी प्रतिभा प्राप्त करने के लिए प्राणायाम प्राणाकर्षण जैसे उपचार भी है। उन उपचारों में सबसे ऊँची प्रक्रिया कुण्डलिनी जागरण की है। इस सूर्योपासना के माध्यम से भी संपन्न किया जा सकता है। सूर्य को भौतिक ऊर्जा का स्रोत मानना अपर्याप्त होगा आत्मिकी के सिद्धान्त उसे परब्रह्म का दृश्यमान स्वरूप भी मानते हैं और उसे गर्मी रोशनी का ग्रह गोलक भर न मानकर अन्तरात्मा में अंतःकरण में और उसके प्रत्येक स्फुल्लिंग में जीवट का अभिनव संचारकर्ता भी मानते हैं। वस्तुतः वह है भी ऐसा ही सविता की तेजस्विता यदि साधना तपश्चर्या सघन श्रद्धा एवं प्रबल इच्छा शक्ति के सहारे धारण की जाय तो साधक को निराश न होना पड़ेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-September
स्वाध्याय सत्संग का सुयोग न मिलने पर भी अन्तःप्रेरणा के रूप में ऐसा ज्वार आता है कि अनेक अवरोधों और संकटों के अभावों के रहते हुए भी उस मार्ग पर चल पड़ना सम्भव हो जाता है जिस पर कि साहसी, शूरवीर और आदर्शवादी कर्मवीर ही साहस संजो पाते हैं।
स्वाध्याय और सत्परामर्श से भी यह जाना जा सकता है। पर वह सुधार परिवर्तन करना स्वयं ही पड़ेगा। हम आहार निद्रा, शिक्षा, मल-मूत्र त्याग आदि कार्य स्वयं अपने बलबूते ही करते हैं। ठीक इसी प्रकार सुसंस्कारिता संवर्धन भी स्वयं ही करना पड़ता है। दूसरे रास्ता बता सकते हैं, पर अपने के बदले वे चल नहीं सकते।
स्वाध्याय मंडल और समीपवर्ती शाखाएं एक जुट होकर कार्य।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-July
स्वाध्याय-सत्संग का, चिंतन-मनन का आश्रय तो लेना पड़ता है, साथ ही एक कदम बढ़कर प्राणतत्त्व की अतिरिक्त मात्रा का भी संचय करना पड़ता है। सामान्यतया हर किसी को प्राणतत्त्व की एक समिति मात्रा ही उपलब्ध होती है। उस विभूति को अधिक मात्रा में हस्तगत करने के लिए प्राणाकर्षण की विशेष साधना करनी पड़ती है। प्राणाकर्षण का अर्थ है— ब्रह्मांडव्यापी महाप्राण में से खींचकर अपनी पात्रता को फुला-फैलाकर उसमें अभीष्ट वैभव को संचित-संकलित करना। इसी क्रिया विज्ञान को प्राणायाम भी कहते हैं।
स्वाध्याय और सत्संग की व्यवस्था भी हुई है। परामर्श और प्रवचन की शैली का विकास हुआ है। सही सोचने के सत्परिणाम और गलत ढंग से सोचने के दुष्परिणामों का विस्तारपूर्वक विवेचन हुआ है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-June
स्वाध्याय भी वैसा ही उपयोगी है। जिन जीवित या स्वर्गीय महापुरुषों से प्रत्यक्ष सत्संग सम्भव नहीं उनकी पुस्तकें पढ़कर सत्संग का लाभ उठाया जा सकता है। एकान्त में स्वयं भी अच्छे विचारों का चिन्तन और मनन करके तथा अपने मस्तिष्क को उसी दिशा में लगाये रहने से भी आत्म सत्संग होता है जो आत्मोन्नति के लिए अति आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-May
स्वाध्याय, आत्मोन्नति, ईश्वराधना आदि सभी उपयोगी दिशाओं से मुँह मोड़ लेते हैं। धनपतियों को एक प्रकार का नशा सा चढ़ा रहता है, जिससे उनकी सद्बुद्धि, दूरदर्शिता और सत् असत् परीक्षणी प्रज्ञा कुण्ठित हो जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-September
स्वाध्याय, ध्यान और मनुष्य जाति की सेवा। जब ध्यान में उन्नति हो जाय तो सेवा और स्वाध्याय को भी कुछ काल के लिये छोड़ दो। जब निर्विकल्प अवस्था में पहुँच जाओ तो गीता का ज्ञान-यज्ञ प्रारम्भ करो अर्थात् दिव्य ज्ञान का उपदेश करो इसी का प्रचार करो और उसके लिये ही कार्य करो।
स्वाध्याय को भी कुछ काल के लिये छोड़ दो। जब निर्विकल्प अवस्था में पहुँच जाओ तो गीता का ज्ञान-यज्ञ प्रारम्भ करो अर्थात् दिव्य ज्ञान का उपदेश करो इसी का प्रचार करो और उसके लिये ही कार्य करो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-August
स्वाध्याय,सत्संग, कथा, कीर्तन,दान, पुण्य, होम, यज्ञ, पूजा, अर्चा आदि सभी धार्मिक कृत्यों का अपना-अपना महत्व और लाभ है। इन सभी से आत्मिक उन्नति, पवित्रता, एवं पुण्य परमार्थ की वृद्धि होती है पर “आत्म शक्ति” की वृद्धि का प्रयोजन ‘तप’ के अतिरिक्त और किसी मार्ग से पूरा नहीं हो सकता। घर्षण से उष्णता पैदा होती है, जहाँ अग्नि न होगी वहाँ गर्मी भी न होगी। इसी प्रकार आत्मशक्ति वहीं मिलेगी जहाँ तपस्या का आधार होगा। विलासी मनुष्य, विद्वान और उपदेशक तो हो सकता है पर उनका अन्तस्तल खोखला होता है, इसलिये उनकी निष्प्राण विद्वता एवं वाचालता न उनके अपने लिए कुछ लाभदायक होती है और न दूसरों के लिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-April
स्वाध्याय, सत्संग, कथा, कीर्तन, हवन, दान आदि का अपना महत्व है, पर तप की महत्ता सर्वोपरि है। क्योंकि आत्मबल का, ब्रह्म तेल का, अन्तःप्रकाश का उद्भव तप के बिना अन्य किसी मार्ग से नहीं हो सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-March
स्वाध्याय और सत्संग का आयोजन होना चाहिए। तीसरे उसे यह भी चाहिए कि वर्तमान काल के प्रलोभनों, तात्कालिक क्षुद्र साँसारिक लाभों की अपेक्षा दूरवर्ती, जन्म जन्मान्तरों तक फल देने वाले परिणामों को महत्व देने वाला दृष्टिकोण अपनाये। जो इस निष्ठा का अवलम्बन करता है, वह सच्चा ब्राह्मण बन जाता है, उसका ब्रह्मत्व दिन-दिन सुविकसित होता है और स्वल्प काल में ही पूर्ण ब्राह्मी स्थिति प्राप्त हो जाती है।
स्वाध्याये युक्त स्तान् पूजयाम्यहम् ॥14॥
स्वाध्याय करते हैं उनकी मैं सदा पूजा करता हूँ॥ 14॥
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-February
स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन या जैसे भी सम्भव हो मन में केवल उत्कृष्ट कोटि की विचारधारा एवं भावना को स्थान मिले। इसी प्रकार अपने कार्यों को ऐसा निर्मल बनाया जाना चाहिए कि उनमें अनीति, छल, असत्य, पाप एवं अकर्म के लिए कोई स्थान न रहे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-August
स्वाध्याय के रूप में हम सुनते-समझते भी रहते हैं, पर वैसे आदर्श कार्यों के उदाहरण देखने को न मिल सकने से वे बातें सिद्धान्तों तक ही सीमित रह जाती हैं। व्यवहार में तो वे ही बातें सीखी जाती हैं जो अपने चारों ओर दिखाई पड़ती हैं। तमाखू पीने की बुरी आदत बेतरह बढ़ती जा रही है। उससे लाभ किसी प्रकार का कुछ भी नहीं, हानि अनेक प्रकार की है। इसका कारण देखा−देखी का भाव ही है।
स्वाध्याय के आयोजन होते रहेंगे। इनमें गायत्री माता का एक बड़ा चित्र भी स्थापित किया जायगा। पुराने मंदिरों में धर्म प्रवृत्तियाँ आरंभ कराने का भी कितनी ही जगह प्रयत्न चल रहा है। कुछ टूटे मंदिरों की मरम्मत करके उन्हें पूजा-उपासना और सत्संग आदि के कार्यक्रमों के उपयुक्त बनाया जा रहा हैं।
स्वाध्याय कहा जा सकता है। इससे हम उन भूलों से भी बच सकते हैं जो संसार की उलझनों के कारण समय-समय पर पैदा होती है और जिनमें फंसकर मनुष्य मार्गच्युत हो जाता है।
स्वाध्याय, ध्यान, भजन, कथा-कीर्तन, व्रत, उपवास द्वारा अपने स्वभाव को ऐसा बनावे जिससे आध्यात्मिक आदर्शों के अनुकूल गति-विधियाँ स्वाभाविक रूप से अपनाने लगे। सत्कर्मों के पुण्यफल से ही तो सुख शान्ति की प्राप्ति होती है और सत्कर्म तभी होने लगते हैं जब कि मन में सद्गुणों का निवास हो जाय। इसलिये शास्त्रों में सद्विचारों और सद्गुणों को ही समस्त सुख-शान्ति का मूल बतलाया है और उनके निरन्तर अभ्यास तथा वृद्धि पर अत्यधिक जोर दिया है।
स्वाध्याय भी बहुत प्रेरणा प्रदान कर सकेगा और मनुष्य को सन्मार्ग पर काफी दूर तक बढ़ा सकेगा।
स्वाध्याय योग्य बतलाया गया है। पूजा और उपासना की तरह जीवन की स्थूल समस्याओं और मानसिक उलझनों को समझना तथा उनको हल करने का ठीक मार्ग जानना आवश्यक है। जो पुस्तकें इस उद्देश्य की पूर्ति करने वाली हों उनमें से किसी न किसी को नित्य नियमपूर्वक पढ़ते रहना और उसके उपदेशों को मनन और चिन्तनपूर्वक व्यवहार में लाने का प्रयत्न करना ही सच्चा स्वाध्याय कहा जा सकता है। इससे हम उन भूलों से भी बच सकते हैं जो संसार की उलझनों के कारण समय-समय पर पैदा होती है और जिनमें फंसकर मनुष्य मार्गच्युत हो जाता है।
स्वाध्याय की आवश्यकता समझाना शुरू कर दिया है। कितने ही अध्यापक अपने छात्रों को अतिरिक्त रूप से नैतिकता और मानवता की शिक्षा भी देने लगे हैं। पुरोहितों ने अपने यजमानों को धर्म शिक्षा देनी आरंभ कर दी है। जिन लोगों के पास अवकाश है उनमें से कई वयोवृद्ध सज्जनों ने रामायण, गीता की कथाएँ कहना और पाठशालाएँ चलाना आरम्भ कर दिया है। सन्त-महात्मा भी इधर आकर्षित हुये हैं और उन्होंने भी शिक्षा-प्रसार के कार्यक्रम में सहयोग देना आरम्भ कर दिया है।
स्वाध्याय को पूजा का ही एक अंग माना गया है। उत्तम और सदुपदेशपूर्ण ग्रंथों के पढ़ते रहने से विचारो की शुद्धि और उन्नति होती है। इसके लिये युग-निर्माण-योजना में कथा, पुराण और धर्म शास्त्रों के साथ-साथ वर्तमान समय में रची गई सद्विचारयुक्त और जीवन-निर्माण में सहायक बन सकने वाली पुस्तकों को स्वाध्याय योग्य बतलाया गया है। पूजा और उपासना की तरह जीवन की स्थूल समस्याओं और मानसिक उलझनों को समझना तथा उनको हल करने का ठीक मार्ग जानना आवश्यक है। जो पुस्तकें इस उद्देश्य की पूर्ति करने वाली हों उनमें से किसी न किसी को नित्य नियमपूर्वक पढ़ते रहना और उसके उपदेशों को मनन और चिन्तनपूर्वक व्यवहार में लाने का प्रयत्न करना ही सच्चा स्वाध्याय कहा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-June
स्वाध्याय जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है । उसकी उपेक्षा करने से आन्तरिक विकास की समस्या हल नहीं हो सकती ।
स्वाध्याय को नित्य नियमित रूप से करते रहने के लिए उत्पन्न हो सके ऐसा प्रयत्न किया जाना चाहिए। इस प्रवृत्ति की अभिवृद्धि पर युग-निर्माण योजना की सफलता बहुत कुछ निर्भर रहेगी ।
स्वाध्याय की साधना
स्वाध्याय को भी साधना का ही एक अंग माना जाय और कुछ समय इसके लिए नियत रखा जाय। कुविचारों को शमन करने के लिए नित्य सद् विचारों का सत्संग करना आवश्यक है। व्यक्ति का सत्संग तो कठिन पड़ता है पर साहित्य के माध्यम से संसार भर के जीवित या मृतक सत्पुरुषों के साथ सत्संग किया जा सकता है। यह जीवन का महत्वपूर्ण लाभ है, इससे किसी को भी वंचित नहीं रहना चाहिए। जो पढ़े-लिखे नहीं हैं उन्हें दूसरों से सत्साहित्य पढ़ाकर सुनने की व्यवस्था करनी चाहिए।
स्वाध्याय, उपासना, व्यायाम, दान, सोना-उठना आदि हर कार्य की निर्धारित मर्यादाएँ अपनी परिस्थितियों के अनुकूल निर्धारित करके उसका कड़ाई के साथ पालन करने की आवश्यकता हर व्यक्ति अनुभव करे, ऐसा लोक शिक्षण किया जाय। बुरी आदतों को क्रमशः घटाते चलना और सद्गुणों को निरन्तर बढ़ाते चलना भी इस आन्दोलन का एक अंग रहे। साधना-मय, संयमी और मर्यादित जीवन बिताने की कला हर व्यक्ति को सिखाई जाय ताकि उसके लिए प्रगतिशील हो सकना संभव हो सके।
स्वाध्याय को प्रथम स्थान दिया गया है। युग-निर्माण योजना को सफल बनाने के लिए भी देश की विशाल जनसंख्या को देखते हुए व्यापक परिमाण में सत्साहित्य प्रस्तुत करने एवं उसे जनसाधारण तक पहुँचाने के लिए हमें एक विशाल एवं सुव्यवस्थित तंत्र विकसित करना पड़ेगा जो राष्ट्र की बढ़ती हुई ज्ञान-क्षुधा को तृप्त कर सके। विचार क्रान्ति के लिए यह सत्साहित्य हमारा प्रथम शस्त्र हो सकता है।
स्वाध्याय से ही होता है। साहित्य की शक्ति स्थायी और प्रवचनों की अस्थायी रहती है। इसलिए साहित्य एवं उसके स्वाध्याय को प्रथम स्थान दिया गया है। युग-निर्माण योजना को सफल बनाने के लिए भी देश की विशाल जनसंख्या को देखते हुए व्यापक परिमाण में सत्साहित्य प्रस्तुत करने एवं उसे जनसाधारण तक पहुँचाने के लिए हमें एक विशाल एवं सुव्यवस्थित तंत्र विकसित करना पड़ेगा जो राष्ट्र की बढ़ती हुई ज्ञान-क्षुधा को तृप्त कर सके। विचार क्रान्ति के लिए यह सत्साहित्य हमारा प्रथम शस्त्र हो सकता है।
स्वाध्याय की तरह प्रयत्न तो हम लोगों को एकाकी ही आरम्भ करने होंगे। पर चूँकि योजना का सम्बन्ध दूसरों से भी जुड़ता है। दूसरों के कठोर मनों को मुलायम करने के लिए, अपने अनुकूल ढालने के लिए केवल आदेश कर देना मात्र न होगा वरन् उन्हें तर्क, कारण, प्रमाण, उदाहरण एवं विवेचना के आधार पर आवश्यक तथ्यों को समझाना पड़ेगा, तभी अपरिचित मनों में वह भावना उत्पन्न होगी जो युग निर्माण कार्य विस्तार के लिए आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-April
स्वाध्याय आरम्भ करना चाहिए। सत्संगों और विचार गोष्ठियों में इसे पढ़ा और दुहराया जाना चाहिए। एक व्यक्ति संकल्प का एक-एक वाक्य पढ़े और बाकी लोग उसे दुहरावें। इस सत्संकल्प का पढ़ा जाना हमारे नित्य नियमों का एक अंग रहना चाहिए।
स्वाध्याय के उपयुक्त साहित्य भी कहीं-कहीं ही दृष्टिगोचर होता है। पुस्तक विक्रेताओं की दुकानें खोज मारने पर मुश्किल से ही कुछ पुस्तकें ऐसी मिलेंगी जो जीवन निर्माण के लिए आज की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए व्यवहारिक सुझाव प्रस्तुत करती हों। प्रेसों में ऐसा कूड़ा कचरा दिन रात छपता है जिसे पढ़कर लोगों के दिमाग और भी अधिक खराब हों।
स्वाध्याय-सत्संग के बाद पानी से सींचना विशाल वट वृक्षों को रोपने के समान इस युग का सबसे बड़ा पुण्य परमार्थ समझा जाना चाहिए। पतित मनोभूमि का मनुष्य दीन, हीन और तुच्छ घृणित ही समझा जा सकता है, पर यदि वह आत्मबल सम्पन्न हो तो नर-रत्न, महापुरुष, ऋषि और अवतार भी बन सकता है। तुच्छ को महान बना देने की शक्ति केवल उत्कृष्ट विचारों में ही रहती है। स्वाति का जल सीप में पड़ने से मोती बनता है, बाँस में पड़ने से बंसलोचन और केला में जाने से कपूर बनता है। सद्विचारों की स्वाति बूँद जिस मन मस्तिष्क में प्रवेश करती है उसे अजर-अमर ही बना देती है, वह उज्ज्वल नक्षत्र की तरह स्वयं चमकता है और अन्य अनेकों को प्रकाश देने का निमित्त बन जाता है।
स्वाध्याय, व्रत, पर्व, अनुष्ठान, कथा, कीर्तन, सत्संग, देव दर्शन, हवन, तीर्थयात्रा, श्राद्ध आदि के द्वारा यह प्रयत्न निरन्तर होते हैं कि व्यक्ति को सुसंस्कारी बनाने की प्रक्रिया बन्द न होने पावे, उसका क्रम किसी न किसी प्रकार चलता ही रहे।
स्वाध्याय के लिये नियम किया गया है उसी प्रकार रात को सोते समय कुछ मिनट अपने दिन भर के कामों पर समीक्षक की कठोर दृष्टि से आवश्यक विवेचन करने में लगाये जायँ। शरीर से प्रायः कम ही दुष्कर्म होते हैं पर मन में यह बुरी लत पड़ी रहती है कि छोटे कारणों को लेकर बुरी-बुरी बातें सोचने लगे। किसी का रूप यौवन देखकर उसकी ओर अनैतिक भाव उठते हैं, कोई हमारी थोड़ी-सी हानि कर दे तो उसके प्रति मारने मरने तक की प्रतिहिंसा जगती है, किसी की बढ़ती को देखकर ईर्ष्या होना, कहीं स्वार्थ सधता दीखे तो चोरी की इच्छा होना जैसे अनेकों दुर्भाव मन में उठते रहते हैं। यद्यपि वह दुर्भाव कार्यान्वित नहीं हो सके, किसी पर प्रकट भी नहीं हुए, पर उनसे अपनी जो हानि होनी थी वह तो हुई ही। मनोभूमि अपवित्र हुई, अनीति को प्रश्रय मिला और पाप का बीजाँकुर उत्पन्न हुआ।
स्वाध्याय, रात को एक या आधा घण्टा आत्म-निरीक्षण एवं निर्माण की विवेचना का यदि नित्य नियम रहे और दिनभर अपने विचारों और आचरणों पर कड़ी निगरानी रखी जाय तो हमारी आन्तरिक गतिविधियों में भारी परिवर्तन हो सकता है। दैनिक जीवन में क्या परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर आमतौर से क्या विचार उठा करते हैं उन्हें समझना चाहिए और यह विचार करना चाहिये कि उनमें कितना औचित्य एवं कितना अनौचित्य रहता है। जो अनुचित हो उसे छोड़कर उसके स्थान पर उचित दृष्टिकोण अपनाने की बात सोची जाय तो यह विचारणा कार्य रूप में भी परिणत होने लगती है।
स्वाध्याय से पहले इसे एक बार भावनापूर्वक पढ़ना और तब स्वाध्याय आरम्भ करना चाहिए। सत्संगों और विचार गोष्ठियों में इसे पढ़ा और दुहराया जाना चाहिए। एक व्यक्ति संकल्प का एक-एक वाक्य पढ़े और बाकी लोग उसे दुहरावें। इस सत्संकल्प का पढ़ा जाना हमारे नित्य नियमों का एक अंग रहना चाहिए।
स्वाध्याय के लिए, मनन चिन्तन के लिए कोई तो समय चाहिए ही। दूसरों को प्रेरणा देने के लिए उनके पास जाना, बैठना, चर्चा करना समय लगाने पर ही संभव होगा। इसलिए शरीर के लिए, कमाने-खाने की ही तरह ही आत्मा के लिए ज्ञान यज्ञ में कुछ समय लगाना भी हमें आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य समझना चाहिए।
स्वाध्याय-सत्संग के लाभ से लाभान्वित करना यह प्रथम कार्य है और साथ ही नई पीढ़ी को जन्म देने के लिए तपश्चर्या करने वाले साहसी व्यक्तियों को उपयुक्त तैयारी के लिए प्रेरणा देना दूसरा कार्यक्रम है। इन दोनों को ही उत्साह-पूर्वक अपनाया जाना चाहिये ताकि जल्दी ही परिपक्व मनोभूमि वाले संस्कारी युग-पुरुषों की एक बड़ी सेना सामने प्रस्तुत दिखाई देने लगे।
स्वाध्याय ये सभी अतीर्थ हो जाते हैं। पर जिस व्यक्ति ने अपनी इन्द्रियों को-वासनाओं को वश में कर लिया है, वह जहाँ कहीं निवास करता है, वहीं उसके लिये कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य और पुष्कर आदि तीर्थ हो जाते हैं।”
स्वाध्यायशील बनें, मनन और चिन्तन द्वारा आत्म-निर्माण के लिए सद्विचारों को व्यवहारिक जीवन में उतारें, अपने परिवार के हर सदस्य को इस लाभ से लाभान्वित होने के लिए प्रेरित करें। साथ ही यह भी प्रयत्न करें कि अपने समीपवर्ती क्षेत्र, में सभी प्रिय परिचित जनों में उस विचारधारा का विस्तार हो। जिन पर भी अपना प्रभाव हो, उन्हें ऐसी प्रेरणा देनी चाहिए कि वे सद्विचारों को नियमित रूप से अपनाने की अभिरुचि उत्पन्न करें। प्रभाव वही सराहनीय है जिससे प्रभावित व्यक्तियों को उत्कर्ष की प्रेरणा मिले। जिस में भी सुसंस्कारों का बीजाँकुर दिखाई पड़े उसे सींचने के लिए हमें अवसर और अवकाश निकाल ही लेना चाहिए।
स्वाध्याय ही पर्याप्त नहीं, उसके साथ-साथ जीवित प्रेरणा जुड़ी रहे तो ही सोने-सुगन्धि का योग बनता है। ‘अखण्ड-ज्योति’ जिस विचारधारा को प्रस्तुत करती है उसकी सजीव प्रेरणा, पाठकों को देना अपने प्रबुद्ध परिजनों का काम है। अपने को, अपने परिवार को और अपने प्रभाव क्षेत्र को आवश्यक प्रकाश देने की क्षमता हममें से प्रत्येक में मौजूद है, अब समय है कि उसका उचित उपयोग आरम्भ कर दिया जाय।
स्वाध्याय का पानी मिलने लगे तो वे अवश्य ही सुविकसित होंगे।
स्वाध्याय में जो पढ़ा गया था, उस आदर्श तक पहुँचने के लिए हम प्रयत्न करें, जो कुछ सुधार संभव है उसे किसी न किसी रूप में जल्दी ही आरम्भ करें। श्रेष्ठ लोगों के चरित्रों को पढ़ना और वैसा ही गौरव स्वयं भी प्राप्त करने की बात सोचते रहना मनन और चिन्तन की दृष्टि से आवश्यक है।
स्वाध्याय से, सत्संग से, मनन से, चिन्तन से जैसे भी बन पड़े वैसे यह प्रश्न करना चाहिए कि हमारा मस्तिष्क उच्च विचारधारा में निर्मग्न रहे। यदि इस प्रकार के विचारों में मन लगने लगे, उनके आनन्द का अनुभव होने लगे तो समझना चाहिए कि आधी मंजिल पार कर ली गई।
स्वाध्याय के लिए कोई निश्चित समय निर्धारित करना चाहिए। (3) नित्य युग निर्माण का सत्संकल्प पढ़ना चाहिये। (4) सोते समय आत्मनिरीक्षण का कार्यक्रम नियमित रूप से चलाना चाहिये। (5) दिन में समय-समय पर कुविचारों से लड़ते रहने की तैयारी करनी चाहिये। यह पाँच कार्यक्रम आत्मनिर्माण की दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक हैं।
स्वाध्याय का साधन “अखण्ड ज्योति” प्रस्तुत करती है, सत्संग की प्रेरणा पूर्ति हम स्वयं करें। उभय पक्षीय लाभों के प्रभाव से अपने परिवार को पूरी तरह लाभान्वित करें। इसमें हमारा धर्म-कर्तव्य पालन होता है, स्वजनों का जीवन सुधारता है और युग-निर्माण का एक सबसे महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न होता है। ऐसे उपयोगी कार्य के लिए हमें प्रयत्नशील होना ही चाहिए।
स्वाध्याय का अवसर मिलता है उतने थोड़े समय ही तो अच्छे विचार मस्तिष्क में ठहर पाते हैं। इसके बाद वही पुराने कुविचार आँधी तूफान की तरह आकर उन श्रेष्ठ विचारों की छोटी-सी बदली को उड़ाकर एक ओर भगा देते हैं। निकृष्ट विचारों में तात्कालिक लाभ और आकर्षण स्वभावतः अधिक होता है, चिरकाल से अभ्यास में आते रहने के कारण उनकी जड़ें भी बहुत गहरी हो जाती हैं। इन्हें उखाड़ कर नये श्रेष्ठ विचारों की स्थापना करना सचमुच बड़े अध्यवसाय का काम है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-September
स्वाध्याय दोसंह-
स्वाध्याय और परस्पर विचार विनिमय द्वारा भावनात्मक उत्कर्ष करते रहें। साथ ही परमार्थिक कार्यों में भी आवश्यक अभिरुचि लेते रहें तो उनके शरीरों में वे तत्व उत्पन्न हो सकते हैं जिनके कारण नर रत्नों को जन्म दे सकना संभव होता है। हमारी हार्दिक इच्छा है कि गायत्री परिवार के सद्गृहस्थों के यहाँ उच्च कोटि की आत्माएँ जन्म लें। युग निर्माण के लिए वैसी ही विभूतियों की आवश्यकता भी पड़ेगी। दशरथ-कौशल्या, वसुदेव-देवकी, दुष्यन्त-शकुन्तला की तरह प्रबुद्ध दम्पत्ति ही यह सौभाग्य लाभ कर सकते हैं।
स्वाध्याय किया करें। विचारशील लोगों का सत्संग अब सुलभ नहीं रहा। जो निठल्ले लोग चेला मूँड़ने के लिए सत्संग के नाम पर अंट-संट बकते रहते हैं, उसे सुनने से लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होती है। इसलिए जीवन की समस्याओं का व्यावहारिक हल सुझाने वाले सत्साहित्य को श्रद्धा और भावनापूर्वक एकाग्र चित्त से पढ़ना ही आज की स्थिति में सत्संग की आवश्यकता को भी पूरा करता है। संसार के श्रेष्ठ महापुरुष अपने विचार और अनुभव सुनाने के लिए पुस्तकों के माध्यम से हमारे लिये हर घड़ी प्रस्तुत रहते हैं।
स्वाध्याय-सत्संग में उस पर नियन्त्रण तो रहता है, पर जब कभी भीतर से कामना एवं वासना का प्रबल वेग उठता है तो उस बाह्य नियंत्रण को तोड़-फोड़ कर मनुष्य को दुष्कर्म में प्रवृत्त कर देता है। दुष्प्रवृत्तियाँ रुक नहीं पाती।
स्वाध्याय का अवसर मिलने लगे तो यह उपवास का क्रम साधक के लिए ही नहीं उसके सारे परिवार के लिए श्रेयष्कर सिद्ध हो सकता है।
स्वाध्याय और सत्संग बहुत सहायक होता है, उपासना तथा दूसरे धार्मिक कर्मकाण्डों का भी बहुत कुछ असर होता है पर सबसे अधिक प्रभाव अन्न का होता है। जिस प्रकार का, जिस स्तर का आहार किया जाता है उसी तरह का मन बनता है। वस्तु जैसी कुछ बनी है उसका प्रधान गुण तो वही रहेगा। सुधार और संस्कार से उसकी प्रगति में कुछ न कुछ अन्तर तो आता है पर पूरा परिवर्तन नहीं होता। आज साधना मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति आहार पर उतना ध्यान नहीं देते जितना कि देना चाहिए।
स्वाध्याय के अतिरिक्त ‘सत्संकल्प’ का नित्य पाठ किया करें। उसका मनन और चिन्तन किया करें। यह विचार करें कि इन तथ्यों में से हमारे जीवन में कौन-कौन कितनी मात्रा में प्रयुक्त होता है। जो कमी रहती हो उसे कैसे पूरा किया जाय उसका उपाय सोचते रहना चाहिए। मनोभूमि को विधेयात्मक और परिष्कृत बनाने में यह दोनों ही साधन असाधारण रूप से उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
स्वाध्याय का प्रतिफल पारस पत्थर जैसा होता है। पारस द्वारा लोहे को सोना बना सकना भले ही कठिन कार्य हो पर स्वाध्याय के माध्यम से निष्कृष्ट मनोभूमि का उत्कृष्ट बन सकना सर्वथा सरल और सम्भव है।
स्वाध्याय, संकल्प पाठ और चिन्तन, मनन द्वारा अपने लिये जो प्रकाश प्राप्त किया गया है, उसे दूसरों को भी देने का क्रम बनाना चाहिये। जो पढ़ा समझा है उसे लिखने सुनने से परिपक्वता आती है, इसे सभी छात्र और शिक्षक जानते हैं। जो कुछ हम समझते और सोचते हैं उसे दूसरों को ध्यान अध्यापक या परीक्षक मान कर सुनाने, समझाने लगें तो उससे अपना अभ्यास परिपक्व होगा और वह विचार गहराई तक मनोभूमि में प्रवेश करके संस्कार के रूप में सुदृढ़ भी होते चलेंगे। ज्ञान दान का पुण्य इस संसार के सबसे बड़े दान धर्मों में गिना गया है। उसे एकत्रित करते रहने से दैवी सम्पदाओं की पूँजी बढ़ती है और मनुष्य सच्चे अर्थों में अमीर बनता चला जाता है।
स्वाध्याय, करने, बड़ों के चरण स्पर्श, साप्ताहिक उपवास, नागरिकता, सामूहिकता आदि सत्प्रवृत्तियों को अपनाने की प्रतिज्ञाएँ यज्ञ भगवान की साक्षी में कराई जातीं। यज्ञ कार्य प्रायः सभी जगह पं. शिवप्रसाद शुक्ल ने कराये । प्रातः काल का कार्यक्रम प्रायः दस बजे तक चलता था। दोपहर को भोजन, विश्राम और व्यक्तिगत परामर्श का कार्यक्रम चलता और तीसरे पहर अगले गाँव की यात्रा के लिए टोली रवाना हो जाती।
स्वाध्याय और सत्संकल्प पाठ को अपने दैनिक जीवन में अनिवार्य रूप से स्थान देना आरम्भ कर दे। जैसे भोजन, मलशोधन और शयन शरीर संतुलन के लिये आवश्यक माना जाता है उसी प्रकार मानसिक प्रगति के लिये इन दोनों साधनाओं को पूरी तत्परता और निष्ठा के साथ कार्यान्वित करते ही रहना चाहिए।
स्वाध्याय के माध्यम से निष्कृष्ट मनोभूमि का उत्कृष्ट बन सकना सर्वथा सरल और सम्भव है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-September
स्वाध्याय-आत्म चिंतन (8) सत्प्रयोजन के लिए कष्ट सहना (9) सादगी (10) अहिंसा (11) सत्य (12) अक्रोध (13) अभिमान का त्याग (14) अनुद्वेग (15) निन्दा चुगली आदि से दूर रहना (16)दयालु (17)निर्लोभता (18) सहृदयता (19)दुष्कर्मों के करने में लज्जा (20) छिछोरपन से बचना (21)तेजस्विता (22) क्षमा (23) धैर्य (24) सफाई (25) शत्रुता का भाव न रखना (26) अपने को दूसरे से श्रेष्ठ न समझना, यह आत्मिक गुण है। जिनकी आत्म बलवान है, उनमें इन गुणों का अधिकाधिक विकास देखा जायेगा। यह विकास जितना ही अधिक होगा उतनी ही आत्म संतोष की मात्रा में अधिक वृद्धि होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-November
स्वाध्याय, दान और यज्ञ, पहला स्कन्ध है। तप दूसरा और आचार्यकुल में ब्रह्मचारी तीसरा स्कन्ध है। यहाँ धर्म की एक वृक्ष के साथ उपमा दी गयी है और इसके अंगों को वृक्ष के तने या टहनियों के रूप में दिखाया गया है। यह समानता उचित है। वृक्ष एक जीवित चीज है और उसके तने भी जीवित चीजें हैं।
स्वाध्याय, यज्ञ करना और दान देना। वेद स्वाध्याय के साथ सत्य ज्ञान की पुस्तकों का स्वाध्याय भी आ जाता है। यज्ञ में हर प्रकार से जनता की सेवा भी है। यज्ञ और दान में बड़ा भेद यह है कि दान करने वाला अपनी कमाई का एक विशेष भाग किसी के कष्ट निवारण के लिए व्यय करता है। उसे इस बात का ज्ञान होता है कि किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों के कष्ट निवारण के लिए वह अपना धन दे रहा है।
स्वाध्याय दान और उपकार, सोसायटी के धर्म का पहला स्कन्ध या तना है। कोई सोसायटी इनके बिना जीवन व्यतीत नहीं कर सकती।
स्वाध्याय भी आ जाता है। यज्ञ में हर प्रकार से जनता की सेवा भी है। यज्ञ और दान में बड़ा भेद यह है कि दान करने वाला अपनी कमाई का एक विशेष भाग किसी के कष्ट निवारण के लिए व्यय करता है। उसे इस बात का ज्ञान होता है कि किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों के कष्ट निवारण के लिए वह अपना धन दे रहा है। यज्ञ में उसे यह भी मालूम नहीं होता कि वह किस को फायदा पहुँचाता है।
स्वाध्याय के साथ सत्य ज्ञान की पुस्तकों का स्वाध्याय भी आ जाता है। यज्ञ में हर प्रकार से जनता की सेवा भी है। यज्ञ और दान में बड़ा भेद यह है कि दान करने वाला अपनी कमाई का एक विशेष भाग किसी के कष्ट निवारण के लिए व्यय करता है। उसे इस बात का ज्ञान होता है कि किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों के कष्ट निवारण के लिए वह अपना धन दे रहा है। यज्ञ में उसे यह भी मालूम नहीं होता कि वह किस को फायदा पहुँचाता है।
स्वाध्याय समाज की सभ्यता की नींव है। यह तीनों बातें स्वाध्याय दान और उपकार, सोसायटी के धर्म का पहला स्कन्ध या तना है। कोई सोसायटी इनके बिना जीवन व्यतीत नहीं कर सकती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-March
स्वाध्याय करो, प्रवचन करो। तप, दम, शभ, अग्निहोत्र, अतिथि सेवा, सन्तानोन्नति करो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-October
स्वाध्याय, सद्विचार एवं सत्कार्यों में ही करना चाहिए। दसवें दिन हवन तथा पूर्णाहुति के उपलक्ष में यथाशक्ति दान करना चाहिये। शास्त्र में कहा गया है कि बिना दक्षिणा का यज्ञ निष्फल होता है। केवल जप मात्र का अनुष्ठान, जिसमें दान का कोई प्रयोग न हो एक प्रकार से लंगड़ी, लूली, कानी, एकाँगी साधना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-April
स्वाध्याय। जितनी पुस्तकें आज सस्ती हैं, वैसी कभी नहीं रही। इतनी सुविधाएं मनुष्य को कभी प्राप्त नहीं हुई हैं। शिक्षा के अनेक कोर्स पृथक भी बिकते हैं, जिन्हें खरीद कर आप अपनी योग्यता बना सकते हैं। यह मत समझिये कि आपको कोई आकर्षक सी डिग्री प्राप्त नहीं हुई।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-December
स्वाध्याय करो, अधिक से अधिक ज्ञान संचय करो। आत्मोन्नति एवं आत्मतुष्टि के लिए नियमित रीति से आध्यात्मिक ग्रन्थों का पठन-पाठन, अध्ययन, मनन, विद्वानों के सत्संग, भाषण सुनना एक चिर साधना है जिनसे लोग श्रद्धालु होते हैं, संसृति का निर्माण होता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास स्वभाव-निर्माण, चरित्र-निर्माण, सुखी जीवन-निर्माण के लिए विस्तृत कार्य क्षेत्र काम करने के लिए खाली पड़ा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-June
स्वाध्याय, (4) गायत्री गीता, (5) रामायण, गीता आदि की धार्मिक कथाएँ कहने का रोचक अभ्यास।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-March
स्वाध्याय के लिए विशाल पुस्तकालय, सत्संग,साँस्कृतिक शिक्षा आदि के अनेक लाभ ऐसे हैं जो अन्यत्र कठिनाई से ही मिल सकते हैं। जो यहाँ निवास करना चाहें वे पत्र व्यवहार एवं परामर्श कर लें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-August
स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान प्रभृति दिव्य गुण पाप, अनाचार, अनैतिकता आदि के बड़े से बड़े आँधी-तूफानों से मेरी रक्षा करते थे। साथ ही देश में रहने वाले सब मनुष्य देवजन भी मेरी रक्षा के लिए उद्यत थे। मुझे अपनी रक्षा की चिन्ता स्वयं नहीं करनी पड़ती थी, किन्तु मुझे अपना महान् नेता मान कर देशवासी ही मेरी रक्षा के लिए चिन्तित रहते थे। मुझे किंचितमात्र सिर दर्द होने पर देश के बड़े-बड़े चिकित्सक अपनी सेवाएं देने के लिए मेरे पास दौड़े चले आते थे। मुझे किंचितमात्र धन की आवश्यकता होने पर देश के बड़े-बड़े धनपति अपनी समस्त पूँजी मेरे चरणों में न्यौछावर करने के लिए लालायित रहते थे।
स्वाध्याय और सत्संग
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-February
स्वाध्याय निरन्तर, पाप सभी का क्षय हो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-November
स्वाध्याय करे जिसमें योगवाशिष्ठ रामायण, गीता, महाभारत, उपनिषद् आदि का पठन होना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-January
स्वाध्याय और उनके उपदेशों के प्रचार में यथाशक्ति क्षेम देना) और बलिवैश्वदेव यज्ञ (गाय बैल, अश्व, श्वानादि पशुओं से सेवा लेने के फलस्वरूप जो हमने उन्हें कष्ट पहुँचाया है उसका प्रत्युपकार करने के लिए उनको प्रथम खिलाना) सम्मिलित है। इन पञ्च महायज्ञों में देवयज्ञ का सम्बन्ध हवन यज्ञ में है, और हवन यज्ञ का संबंध हमारे व्यक्तिगत भौतिक जीवन से विशेष है। यद्यपि हवन का प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे शारीरिक स्वास्थ्य पर विशेष पड़ता है, परन्तु परोक्ष रूप से यह हमारे सारे जीवन को प्रभावित करता है। हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के इस व्यापक प्रभाव को ध्यान में रखते हुए ही कहा गया है कि ‘शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्’ अर्थात् शरीर ही सब प्रकार के धर्मों की सिद्धि का साधन है। और शरीर को स्वस्थ रखने का साधन हवन यज्ञ है।
स्वाध्याय करते हैं तो उनके पारिवारिक के प्रेम की भी वृद्धि होती तथा उन्हें अपने कर्तव्यों का ठीक-2 ज्ञान होता है इसमें सन्देह नहीं।
स्वाध्याय, पितृ-सेवा, अतिथि पूजन तथा बलिवैश्व धर्म सभी को यज्ञ कहा है, श्रीमद्भागवत् गीता में भी द्रव्य यज्ञ तपोयज्ञ, योग-यज्ञ, स्वाध्याय यज्ञ, प्राणायाम यज्ञ तथा ज्ञान यज्ञ की ओर संकेत करके उनके अभ्यासियों को “सर्वेघते यज्ञ विदः” कहा गया है, बृहदारण्यक के पंचांग विद्या प्रकरण में यज्ञ के अर्थ को और अधिक व्यापकता दे दी गई।
स्वाध्याय मनन चिन्तन करना भी आवश्यक है। गायत्री उपासना में गायत्री ज्ञान का, साहित्य का भी प्रमुख स्थान है।
स्वाध्याय द्वारा आत्म निरीक्षण तथा आत्म सुधार करना) देवयज्ञ (अग्निहोत्र द्वारा पञ्चभूतों के विकारों की निवृत्ति)। पितृयज्ञ (अपने को जीवन और शिक्षा देने हारे माता पिता और गुरुजनों की सेवा सत्कार) ऋषियज्ञ (वेदादि सत् शास्त्रों के स्वाध्याय और उनके उपदेशों के प्रचार में यथाशक्ति क्षेम देना) और बलिवैश्वदेव यज्ञ (गाय बैल, अश्व, श्वानादि पशुओं से सेवा लेने के फलस्वरूप जो हमने उन्हें कष्ट पहुँचाया है उसका प्रत्युपकार करने के लिए उनको प्रथम खिलाना) सम्मिलित है। इन पञ्च महायज्ञों में देवयज्ञ का सम्बन्ध हवन यज्ञ में है, और हवन यज्ञ का संबंध हमारे व्यक्तिगत भौतिक जीवन से विशेष है। यद्यपि हवन का प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे शारीरिक स्वास्थ्य पर विशेष पड़ता है, परन्तु परोक्ष रूप से यह हमारे सारे जीवन को प्रभावित करता है। हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के इस व्यापक प्रभाव को ध्यान में रखते हुए ही कहा गया है कि ‘शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्’ अर्थात् शरीर ही सब प्रकार के धर्मों की सिद्धि का साधन है।
स्वाध्याय यज्ञ, प्राणायाम यज्ञ तथा ज्ञान यज्ञ की ओर संकेत करके उनके अभ्यासियों को “सर्वेघते यज्ञ विदः” कहा गया है, बृहदारण्यक के पंचांग विद्या प्रकरण में यज्ञ के अर्थ को और अधिक व्यापकता दे दी गई।
स्वाध्याय करते हुए स्पष्ट नहीं हो तो हवन यज्ञ करते हुए वायु मण्डल की पवित्रता के कारण बुद्धि तीव्र होने से उनका अर्थ समझ में आने लगता है। अग्निभिन्धानो मनसा धियं सचेत मर्त्यः। अग्निभीधे विवस्वभिः॥ ऋ. 8।102।20 साम म, 19 के अनुसार जब हवन की अग्नि को प्रदीप्त करते हुए उसके साथ मन और बुद्धि को जोड़ दिया जाता है और अपने अन्दर ज्ञान की अग्नि को जलाने का प्रयत्न किया जाता है तो उससे आध्यात्मिक उन्नति में भी बड़ी सहायता मिलती है यह मेरा अनुभव सिद्ध विश्वास है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-September
स्वाध्याय, सत्संग, जप, हवन की आध्यात्मिक तथा देश, धर्म, समाज, संस्कृति, चरित्र, शिक्षा, संगठन आदि परमार्थिक सार्वजनिक लोक सेवा की सद्भावनाओं, सत् प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाना, उनमें समय और सहयोग देना इन संगठनों का कार्य-क्रम होना चाहिए। समय-समय पर इनके सम्बन्ध में विचार विनिमय होता रह सकता है। प्रारम्भ में संगठन आवश्यक है। सो करने में अब हम सबको लग जाना चाहिये।
स्वाध्याय में अर्थात् बुद्धिवर्धक-ज्ञानवर्धक-शास्त्रों के नित्य अवलोकन करने में प्रमाद नहीं करना। पढ़ना समाप्त हुआ, अब हमको पठन-पाठन से क्या काम, ऐसा मत समझना। कुशलता साधने वाले, कौशल के कामों के करने से मत चूकना। भूति, विभूति, विभव सम्पादन करने वाले धर्म युक्त कामों के करने से मत चूकना। देवों और पितरों के ऋण चुकाने वाले कामों से मत चूकना।
स्वाध्याय- ये सभी अतीर्थ हो जाते हैं।
स्वाध्याय, सत्संग, यज्ञ, अनुष्ठान, उपासना आदि कार्यों के अतिरिक्त उनमें परस्पर मिलते-जुलते रहने के कारण प्रेम-भाव, संगठन और सहयोग का भी विकास हो, एक दूसरे के अपने अनुभव सुनायें, कठिनाइयों को सुलझाएं और आगे बढ़ने के लिए एक दूसरे से प्रेरणा प्राप्त करें। सुख-दुख के साथी बढ़ावें, जिससे एकाकीपन का भारी, अनिश्चित और चिन्तित जीवन अपेक्षाकृत सरल हो सके। ऐसे संगठन मिलजुल कर अपने निकटवर्ती प्रभाव क्षेत्रों में नये गायत्री उपासक बढ़ाने, गायत्री संगठन बनाने का भी कार्य कर सकते हैं यह सब यदि बिलकुल भी न हो तब भी शुभ उद्देश्य वाले, एक भावना और एक मान्यता के लोगों का परस्पर मिलते-जुलते रहने और प्रेम-सूत्र में सम्बद्ध रहना भी कुछ कम लाभ की बात नहीं है। इन सब बातों पर विचार करते हुए यह निश्चय किया गया है कि जहाँ भी सम्भव हो वहाँ गायत्री प्रेमियों के संगठन स्थापित कर दिये जायं और उनका नाम “गायत्री परिवार” रख दिया जाय। सभा सुसाइटियों के झगड़ालू तरीकों से यह संगठन सर्वथा भिन्न रहे।
स्वाध्याय-अप्रमत्त होकर वेद-शास्त्रादि, ज्ञान-विज्ञान के ग्रन्थों के अध्ययन में निरत रहना, व्रत रखना—उपवास आदि द्वारा इन्द्रिय-संयम को उपलब्ध करना, दैनिक अग्निहोत्र करना, ज्ञान-कर्म-उपासना रूप वेदत्रयी का आचरण, दर्श-पौर्णमास आदि यज्ञों का करना, गृहस्थ धर्म का पालन—संतति का प्रसव, महायज्ञ—सर्वहुत तथा पञ्चमहायज्ञों का करना और अन्त में समग्र यज्ञ पूर्ण जीवन को यज्ञमय ही बना देना ब्रह्मणत्व-प्राप्ति के साधन कहे गये हैं। अन्तिम साधन त्याग की पराकाष्ठा को सूचित करता है। ऐसे ब्राह्मण ही संन्यासी की उस प्रतिज्ञा को पूर्णतया चरितार्थ कर सकते हैं जिनमें पुत्र-वित्त-यश सभी आकांक्षाओं के त्याग का प्रतिपादन है।
स्वाध्याय, व्रत, होम, त्रयी विद्या, इज्या, सुत, महायज्ञ और यज्ञ रूप साधनों का वर्णन किया है। स्वाध्याय-अप्रमत्त होकर वेद-शास्त्रादि, ज्ञान-विज्ञान के ग्रन्थों के अध्ययन में निरत रहना, व्रत रखना—उपवास आदि द्वारा इन्द्रिय-संयम को उपलब्ध करना, दैनिक अग्निहोत्र करना, ज्ञान-कर्म-उपासना रूप वेदत्रयी का आचरण, दर्श-पौर्णमास आदि यज्ञों का करना, गृहस्थ धर्म का पालन—संतति का प्रसव, महायज्ञ—सर्वहुत तथा पञ्चमहायज्ञों का करना और अन्त में समग्र यज्ञ पूर्ण जीवन को यज्ञमय ही बना देना ब्रह्मणत्व-प्राप्ति के साधन कहे गये हैं। अन्तिम साधन त्याग की पराकाष्ठा को सूचित करता है। ऐसे ब्राह्मण ही संन्यासी की उस प्रतिज्ञा को पूर्णतया चरितार्थ कर सकते हैं जिनमें पुत्र-वित्त-यश सभी आकांक्षाओं के त्याग का प्रतिपादन है।
स्वाध्यायान्मा प्रमदः।
कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्। देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।
यान्यनवद्यानि कर्माणितानि सेवितव्यानि, नो इतराणि।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-October
स्वाध्याय ये चार प्रकार के वाणी के पुण्यकर्म हैं।
स्वाध्यायं चेति।
मनसा दयामस्पृहा श्रद्धाञ्चेति॥
स्वाध्याय और अध्ययन है कारण कि अपने निरीक्षण के बिना प्राणी किसी ऐसे सत्य तथा तत्त्व एवं ज्ञान की उपलब्धि ही नहीं कर सकता जो उसमें स्वयं न हो। अतः अपने निरीक्षण द्वारा ही हम वास्तविक सत्य तथा तत्त्व एवं ज्ञान को उपलब्ध कर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-December
स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि-नियमाः।” अर्थात् शौच = आन्तरिक एवं बाह्य- शारीरिक शुद्धि, सन्तोष = अपने जीवन को सन्तोष पूर्वक अग्रसर करना। किसी भी प्रकार का लालच न करना। सत् उद्योग द्वारा जो मिल जाय उसी में आनन्दित रहना, तप = दुःख के द्वंद्वों का सहन करना अर्थात् भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी आदि का सहन करना और बिना विचलित हुए अपने व्रत पर दृढ़ प्रतिज्ञ रहना, स्वाध्याय= सत् शास्त्रों का निरन्तर अभ्यास एवं मनन करना, विशेष कर मोक्ष दायक स्थलों का, ईश्वर प्रणिधानानि = अपने आपको उस परम प्रभु के समक्ष मन, वचन एवं कर्म से अर्पण कर देना और प्रत्येक दशा को उसी का प्रसाद समझ आनन्द पूर्वक सहन करना। यह नियम है।
स्वाध्याय= सत् शास्त्रों का निरन्तर अभ्यास एवं मनन करना, विशेष कर मोक्ष दायक स्थलों का, ईश्वर प्रणिधानानि = अपने आपको उस परम प्रभु के समक्ष मन, वचन एवं कर्म से अर्पण कर देना और प्रत्येक दशा को उसी का प्रसाद समझ आनन्द पूर्वक सहन करना। यह नियम है।
स्वाध्याय करते और सद् ग्रन्थों का अवलोकन करते हैं, ईश्वर से हमारा परिचय होता जाता है। यदि हमें प्रार्थना करना भी नहीं आता तो हमें शास्त्र कथित स्तोत्र देखने चाहिये, जिससे हमें एक आनन्द दायिनी भावना की अनुभूति हो। तदनन्तर तब तक हमें शास्त्र का अध्ययन और चिन्तन करना चाहिये जब तक कि हमें ईश्वरीय सत्ता का कुछ बोध न हो। ईश्वर सर्वत्र समभाव से विराजमान है। इस तरह जब हम उसे पुकारते हैं, तो वह स्वयं हमें अपना परिचय देना प्रारम्भ कर देता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-September
स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन-मन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनि का अवलम्बन लिया जाता है और सरलतापूर्वक लक्ष्य पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ा जाता है।
स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन जैसी सेवा साधना के आधार पर प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय। हर कुविचार की काट कर देना और कुकर्म में प्रतिरोध कर सकना सद्गुरु का ब्रह्म तेजस है जिसके कारण उसे ब्रह्मानि की उपमा दी गई हैं। सत्पवृत्तियों को उभार सकना-सद्भावनाओं को समर्थ बना सकना-सद्गुरु का अनुदान वरदान है। जब अपना अन्तःकरण ज्ञान भक्ति की विविध साधना से सम्पन्न होकर शिष्य के व्यक्तित्व का छा जाने योग्य बन जाय तो समझना चाहिए कि सच्चे सद्गुरु के मिलन का सौभाग्य प्राप्त हो गया। शिष्यत्व के साथ जो दीक्षा संकल्प जुड़ा रहता है वह यही है कि सद्गुरु के निर्देश को शिरोधार्य किया जायगा उसकी प्रेरणा का सच्चे हृदय से अनुगमन किया जायगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-August
स्वाध्याय सत्संग चिन्तन, मनन जैसी सेवा साधना के आधार पर प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय। हर कुविचार की काट कर देना और कुकर्म में प्रतिरोध कर सकना सद्गुरु का ब्रह्मा तेजस है जिसके कारण उसे ब्रह्माग्नि की उपमा दी गई है। सत्प्रवृत्तियों को उभार सकना- सद्भावनाओं को समर्थ बना सकना- सद्गुरु का अनुदान वरदान है। जब अपना अन्तःकरण ज्ञान भक्ति की विविध साधना से सम्पन्न होकर शिष्य के व्यक्तित्व पर छा जाने योग्य बन जाय तो समझना चाहिए कि सच्चे सद्गुरु के मिलन का सौभाग्य प्राप्त हो गया। शिष्यत्व के साथ जो दीक्षा संकल्प जुड़ा रहता है वह यही है कि सद्गुरु के निर्देश को शिरोधार्य किया जायगा उसकी प्रेरणा का सच्चे हृदय के अनुगमन किया जायगा।
स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन-मनन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लिया जाता है और सरलतापूर्वक लक्ष्यपूर्ति की दिशा में आगे बढ़ा जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-September
स्वाध्याय करना और मनन चिन्तन द्वारा उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन का एक अंग बना लेना चाहिए। उपवास और साधना के दिनों में किये गये मनन और चिन्तन का स्थाई प्रभाव हमारे अंतःकरण पर पड़ता है। अंतःकरण की पवित्रता पर ही हमारी सुख शान्ति निर्भर करती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-July
स्वाध्याय द्वारा आत्म-निर्माण करके और जीवन को सफल बनाने वाला रास्ता ढूंढ़ने का प्रयत्न करते हैं। इस परिवार के प्रत्येक सदस्य के अन्तःकरण में यह तथ्य भली प्रकार भर चुका है कि भगवान का अनुग्रह प्राप्त करने,स्वर्गीय शान्ति का रसास्वादन करने, जीवन मुक्ति का आनन्द लेने, आत्मा को परमात्मा में लीन करने जैसे आध्यात्मिक लक्ष को प्राप्त करने के लिए केवल जप, ध्यान, पूजा, उपवास, हवन आदि ही पर्याप्त नहीं हैं वरन् यह भी आवश्यक है कि अपना जीवन सद्विचारों एवं सत्कार्यों से परिपूर्ण बनाया जाय और उसमें लोक-सेवा का समुचित स्थान रहे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-May
स्वाध्यायशील धर्म प्रेमी ही न रहें ऐसी हमारी आंतरिक इच्छा है इस संस्था ने युग निर्माण का परम पुनीत व्रत लिया है इसे सफल बनाने में हम सब शक्ति भर प्रयत्न करें।
स्वाध्याय करना और दूसरे सात धर्म साथियों तक विचार साहित्य पहुँचाना इतना ही कार्यक्रम रखा गया है। इसे पूरा करने में किसी श्रद्धावान एवं एकाभावी धर्मप्रेमी को कोई कठिनाई हो सकती है। यह कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह कार्यक्रम जितना महत्वपूर्ण है उतना ही सरल भी है।
स्वाध्याय और सत्संग
स्वाध्याय से हमारी बात सुनने का समय हर परिजन को निकालना चाहिए। जो हमें अपना स्नेह भाजन मानते हैं, हमारे प्रति सद्भाव रखते हैं, उन्हें यह साहित्य नियमित रूप से पढ़ने का दैनिक पूजन, भजन की भाँति ही कार्यक्रम बना लेना चाहिए। आधा घंटा हमारी बात सुनने के लिए समय निकालना उनके लिए कुछ कठिन न होना चाहिए। जो हमारे मिशन की महत्ता को समझते हैं या व्यक्तिगत रूप से हमारे प्रति सद्भाव रखते हैं। जिन्होंने व्रतधारण किया है उन्हें नियमित रूप से—उपरोक्त योजना के अनुसार सद्विचार पहुँचाने का कार्य हम निरन्तर करते रहेंगे।
स्वाध्याय की अभिरुचि है अखंड-ज्योति पढ़ते हैं—सो ठीक है। दैनिक भजन गायत्री उपासना करते हैं—सो भी ठीक है। साधु सज्जनों का मान सम्मान करते हैं सो भी उत्तम है। तीर्थ, व्रत, पूजन कीर्तन दान पुण्य करते हैं सो भी सराहनीय है। पर इतने तक ही सीमित हो जाने से काम चलने वाला नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-June
स्वाध्याय, गुण कर्म स्वभाव का लेखा जोखा यह चारों काम व्यवहारिक दृष्टि से भी बहुत सरल हैं। इन्हें कौन नहीं कर सकता है? अब तक भी हम लोग अस्त व्यस्त रूप से इन कार्यों को करते ही रहे हैं। फिर नित्य, निरन्तर, नियमित रूप से इन्हें करने की प्रतिज्ञा लेकर अपनी कार्यशैली को अत्यधिक प्रभावशाली बनाने का अवसर आने पर झिझकने की आवश्यकता ही क्या है? यह एक अव्यवस्था को व्यवस्था में, ढिलमिल नीति को तीव्र प्रयत्न में परिणत करने का प्रयत्न है।
स्वाध्याय और सत्संग के द्वारा जिन आत्माओं में आध्यात्मिक चेतना एवं धार्मिकता उत्पन्न हुई है अब उसके चरितार्थ करने का समय आ गया। शिक्षा वही है जो क्रिया में परिलक्षित हो। अन्यथा तोता रटना तो एक मनोरंजन मात्र है।
स्वाध्याय और सत्संग की महिमा धर्मग्रन्थों में बहुत गायी गई है, इनका बहुत महात्म्य बताया गया है। इसका कारण इन दोनों के द्वारा सही चिन्तन प्राप्त होना ही है। आज स्वाध्याय के नाम पर किसी देवता या महापुरुष की कथा वृत्तान्त या एक ही पुस्तक को रोज रोज पढ़ते रहने की रूढ़ि प्रचलित है। एक पुस्तक का रोज-रोज पाठ करके लोग समझ लेते हैं, हम भी स्वाध्याय का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं, हम भी स्वाध्याय का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं, यह लकीर पीटना कोई उद्देश्य पूरा न करेगा, वरन् जीवन के विभिन्न प्रश्नों पर सही दृष्टिकोण देने वाली विचार शृंखला ही स्वाध्याय कहलाने की सच्ची अधिकारिणी है। व्रतधारी नित्य चिन्तन करेगा, जीवन की विभिन्न समस्याओं पर सही दृष्टिकोण में सोचेगा।
स्वाध्याय का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं, हम भी स्वाध्याय का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं, यह लकीर पीटना कोई उद्देश्य पूरा न करेगा, वरन् जीवन के विभिन्न प्रश्नों पर सही दृष्टिकोण देने वाली विचार शृंखला ही स्वाध्याय कहलाने की सच्ची अधिकारिणी है। व्रतधारी नित्य चिन्तन करेगा, जीवन की विभिन्न समस्याओं पर सही दृष्टिकोण में सोचेगा। इस सोचने में, चिन्तन में सहायता देने के लिए यह संस्था इसे उपयुक्त विचार सामग्री देती रहेगी। व्रतधारी के पास संस्था द्वारा प्रति सप्ताह एक अंक भेजने और नित्य ही चिन्तक के लिए कुछ ठोस सामग्री देने का कार्यक्रम बनाया गया है। चिन्तन आवश्यक है।
स्वाध्याय कहलाने की सच्ची अधिकारिणी है। व्रतधारी नित्य चिन्तन करेगा, जीवन की विभिन्न समस्याओं पर सही दृष्टिकोण में सोचेगा। इस सोचने में, चिन्तन में सहायता देने के लिए यह संस्था इसे उपयुक्त विचार सामग्री देती रहेगी। व्रतधारी के पास संस्था द्वारा प्रति सप्ताह एक अंक भेजने और नित्य ही चिन्तक के लिए कुछ ठोस सामग्री देने का कार्यक्रम बनाया गया है। चिन्तन आवश्यक है।
स्वाध्याय एवं सत्संग मानव के अपने पवित्र लक्ष्य की ओर बढ़ने में बहुत बड़े सहायक हैं। इनसे यह ही नहीं कि समय का सदुपयोग होता हो वरन् कुछ समय के लिये उन महान आत्माओं से विचार द्वारा सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इससे मानसिक विकास के साथ-साथ हमारा पथ प्रदर्शन भी होता है। इन उपरोक्त नियमों को ध्यान में रखते हुये प्रत्येक व्यक्ति को अपना सुव्यवस्थित जीवन बना लेना चाहिये। फिर उसके अनुसार आध्यात्म शक्ति से सम्पन्न बनने के लिये सत् प्रयत्न करना चाहिये।
स्वाध्याय का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं, यह लकीर पीटना कोई उद्देश्य पूरा न करेगा, वरन् जीवन के विभिन्न प्रश्नों पर सही दृष्टिकोण देने वाली विचार शृंखला ही स्वाध्याय कहलाने की सच्ची अधिकारिणी है। व्रतधारी नित्य चिन्तन करेगा, जीवन की विभिन्न समस्याओं पर सही दृष्टिकोण में सोचेगा। इस सोचने में, चिन्तन में सहायता देने के लिए यह संस्था इसे उपयुक्त विचार सामग्री देती रहेगी। व्रतधारी के पास संस्था द्वारा प्रति सप्ताह एक अंक भेजने और नित्य ही चिन्तक के लिए कुछ ठोस सामग्री देने का कार्यक्रम बनाया गया है। चिन्तन आवश्यक है।
स्वाध्याय या श्रेष्ठ पुरुषों के सत्संग से मिलते हैं, वे तभी लाभदायक हो सकते हैं, जब उन्हें क्रिया रूप में परिणत किया जाय। देखा गया है कि यही समस्या नहीं सुलझ पाती। व्यावहारिक जीवन का ढर्रा कुछ ऐसे ढंग से चल पड़ा होता है कि उसमें परमार्थ के विचारों को प्रवेश करना किस प्रकार संभव है यह समझ में नहीं आता। आज के अर्थ संकट युग में शारीरिक और मानसिक शक्तिहीनता के कारण तथा सामाजिक दुर्व्यवस्था के कारण उत्पन्न चिन्ताओं से व्यक्ति इतना व्यस्त और परेशान रहता है कि सामने उपस्थित कार्य ही पूरा नहीं हो पाता, फिर परमार्थ के लिए एक नया शिर दर्द कौन बढ़ावे?
स्वाध्याय के नाम पर किसी देवता या महापुरुष की कथा वृत्तान्त या एक ही पुस्तक को रोज रोज पढ़ते रहने की रूढ़ि प्रचलित है। एक पुस्तक का रोज-रोज पाठ करके लोग समझ लेते हैं, हम भी स्वाध्याय का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं, हम भी स्वाध्याय का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं, यह लकीर पीटना कोई उद्देश्य पूरा न करेगा, वरन् जीवन के विभिन्न प्रश्नों पर सही दृष्टिकोण देने वाली विचार शृंखला ही स्वाध्याय कहलाने की सच्ची अधिकारिणी है। व्रतधारी नित्य चिन्तन करेगा, जीवन की विभिन्न समस्याओं पर सही दृष्टिकोण में सोचेगा। इस सोचने में, चिन्तन में सहायता देने के लिए यह संस्था इसे उपयुक्त विचार सामग्री देती रहेगी। व्रतधारी के पास संस्था द्वारा प्रति सप्ताह एक अंक भेजने और नित्य ही चिन्तक के लिए कुछ ठोस सामग्री देने का कार्यक्रम बनाया गया है।
स्वाध्याय (10) आस्तिकता। इन दस प्रवृत्तियों को लोगों के भावना क्षेत्र में उतारने के लिए समझना, इन्हें चरितार्थ करने के लिए हर व्यक्ति की स्थिति के अनुसार कार्यक्रम देना तथा इनके प्रतिकूल जो आदतें पड़ गई हों उन्हें सुधारना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-January
स्वाध्याय, त्याग और तप करने वाला व्यक्ति गायत्री माता से वह शक्ति प्राप्त कर लेता है जिसके द्वारा कठिन से कठिन कार्य भी सिद्ध किया जा सकता है। उपासकगण अगर इन नियमों का पालन करते हुए साधना करेंगे तो कुछ ही समय में उनको साधना की सफलता का अनुभव होने लगेगा।
स्वाध्याय में भी लगाते रहें। जिस पथ-प्रदर्शक के निरीक्षण में वे साधना कर रहे हैं, उसके द्वारा रचित सभी गायत्री ग्रंथों का पढ़ना व उन पर मनन करना भी नितान्त आवश्यक है। उन्हें संकल्प कर लेना चाहिये कि बिना जप किये भोजन नहीं करेंगे और स्वाध्याय किये बिना शयन नहीं करेंगे। इन ग्रंथों की बातों पर चलते-फिरते उठते-बैठते विचार करना चाहिये और उनको जीवन के व्यावहारिक कार्यों में प्रयोग करने का अभ्यास करना चाहिये।
स्वाध्याय
स्वाध्याय किये बिना शयन नहीं करेंगे। इन ग्रंथों की बातों पर चलते-फिरते उठते-बैठते विचार करना चाहिये और उनको जीवन के व्यावहारिक कार्यों में प्रयोग करने का अभ्यास करना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-April
स्वाध्याय-प्रेम होना आवश्यक है। हम जितना अधिक सद्ग्रन्थों को, विभिन्न विषयों पर विद्वानों की कृतियों को पढ़ेंगे उतना ही अधिक हमारा ज्ञान-भंडार बढ़ेगा और हम अपने लेखों में उपयुक्त सामग्री इकट्ठी कर सकेंगे। दूसरे, इसी प्रकार के स्वतंत्र और पर्याप्त परिमाण में किये गये अध्ययन से हमारा भाषा ज्ञान परिपक्व हो सकेगा और हम विभिन्न शैलियों का अनुशीलन करके अपने लिये भी किस एक शैली का अभ्यास दृढ़ कर सकेंगे। हमारा एक यही अनुमान है कि जिस व्यक्ति को स्कूल या कालेज में कुछ पढ़ने-लिखने का अभ्यास हो चुका है, वह इस कार्य में मन लगाकर उद्योग करने से चार-छह महीने में पत्रकार कला के साधारण नियमों को जान सकता है और धीरे-धीरे थोड़े समय में पत्र संचालन का अनुभव प्राप्त कर सकता है। यदि यह अभ्यास किसी संस्था या योग्य विद्वान की देख-रेख में किया जाय तो शीघ्र ही उन्नति हो सकती है और सीख ने वाला विधिवत् मार्ग से अग्रसर होकर एक-दो वर्ष में ही सफल पत्रकार बन सकता है।
स्वाध्याय के योग्य है। सत्संग भी वही जो जीवन के सर्वांगीण विकास में व्यावहारिक मार्गदर्शन करे। आज कल पौराणिक कथा ग्रन्थों को रोज-रोज पाठ करते रहना स्वाध्याय माना जाता है और आज से लाखों वर्ष पूर्व की परिस्थितियों के अनुरूप वे बातें जो अब असामयिक हो गई हैं बताते रहने वाले औघड़ बाबाजियों की बातें ‘सत् वचन महाराज’ कहते हुए सुनते रहना सत्संग माना जाता है। स्वाध्याय और सत्संग की इस प्रकार लकीर पीट लेने से नहीं वरन् विचारकता एवं विवेक के आधार पर जीवन निर्माण के मूल आधारों को समझने में सहायता करने वाले स्वाध्याय और सत्संग के अवसर तलाश करना मानसिक विकास के सत्कर्म का प्रधान आधार हो सकता है। (3) पारिवारिक जिम्मेदारी में केवल उदर पोषण की व्यवस्था ही नहीं है वरन् प्रत्येक परिजन के चतुर्मुखी विकास में सहायता करना उसे आवश्यक स्नेह, सुविधा एवं सलाह देना भी आवश्यक है।
स्वाध्याय और सत्संग आवश्यक है। जीवन की गुत्थियों को सुलझाने में देश, काल, पात्र का ध्यान रखते हुए जीवन की गुत्थियों को, समस्याओं को, सुलझाने में जो साहित्य सहयोगी सिद्ध हो सके वही स्वाध्याय के योग्य है। सत्संग भी वही जो जीवन के सर्वांगीण विकास में व्यावहारिक मार्गदर्शन करे। आज कल पौराणिक कथा ग्रन्थों को रोज-रोज पाठ करते रहना स्वाध्याय माना जाता है और आज से लाखों वर्ष पूर्व की परिस्थितियों के अनुरूप वे बातें जो अब असामयिक हो गई हैं बताते रहने वाले औघड़ बाबाजियों की बातें ‘सत् वचन महाराज’ कहते हुए सुनते रहना सत्संग माना जाता है। स्वाध्याय और सत्संग की इस प्रकार लकीर पीट लेने से नहीं वरन् विचारकता एवं विवेक के आधार पर जीवन निर्माण के मूल आधारों को समझने में सहायता करने वाले स्वाध्याय और सत्संग के अवसर तलाश करना मानसिक विकास के सत्कर्म का प्रधान आधार हो सकता है।
स्वाध्याय और सत्संग के अवसर तलाश करना मानसिक विकास के सत्कर्म का प्रधान आधार हो सकता है। (3) पारिवारिक जिम्मेदारी में केवल उदर पोषण की व्यवस्था ही नहीं है वरन् प्रत्येक परिजन के चतुर्मुखी विकास में सहायता करना उसे आवश्यक स्नेह, सुविधा एवं सलाह देना भी आवश्यक है। व्रतधारी अपने परिवार के प्रति सब प्रकार के कर्तव्य रहने का प्रयत्न करेगा। समाज को अधिक सदाचारी, सद्गुणी, समृद्ध, सुशिक्षित एवं सुखी बनाने के लिए प्रयत्न करना, दूसरों के साथ नागरिकता, सज्जनता, शिष्टाचार एवं मानवता के आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करना हमारा सामाजिक सत्कर्म है। (4) धार्मिक कर्तव्यों में आत्म-निर्माण के आधारों को बढ़ाने आत्मा को अधिकाधिक पवित्र बनाते चलना तथा समाज सेवा के लिए लोकहित के लिए, सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने के लिए अपने समय, शक्ति, भावना एवं धन का अनुदान देते रहना यह दो ही बातें आती हैं।
स्वाध्याय और सत्संग की इस प्रकार लकीर पीट लेने से नहीं वरन् विचारकता एवं विवेक के आधार पर जीवन निर्माण के मूल आधारों को समझने में सहायता करने वाले स्वाध्याय और सत्संग के अवसर तलाश करना मानसिक विकास के सत्कर्म का प्रधान आधार हो सकता है। (3) पारिवारिक जिम्मेदारी में केवल उदर पोषण की व्यवस्था ही नहीं है वरन् प्रत्येक परिजन के चतुर्मुखी विकास में सहायता करना उसे आवश्यक स्नेह, सुविधा एवं सलाह देना भी आवश्यक है। व्रतधारी अपने परिवार के प्रति सब प्रकार के कर्तव्य रहने का प्रयत्न करेगा। समाज को अधिक सदाचारी, सद्गुणी, समृद्ध, सुशिक्षित एवं सुखी बनाने के लिए प्रयत्न करना, दूसरों के साथ नागरिकता, सज्जनता, शिष्टाचार एवं मानवता के आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करना हमारा सामाजिक सत्कर्म है। (4) धार्मिक कर्तव्यों में आत्म-निर्माण के आधारों को बढ़ाने आत्मा को अधिकाधिक पवित्र बनाते चलना तथा समाज सेवा के लिए लोकहित के लिए, सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने के लिए अपने समय, शक्ति, भावना एवं धन का अनुदान देते रहना यह दो ही बातें आती हैं।
स्वाध्याय माना जाता है और आज से लाखों वर्ष पूर्व की परिस्थितियों के अनुरूप वे बातें जो अब असामयिक हो गई हैं बताते रहने वाले औघड़ बाबाजियों की बातें ‘सत् वचन महाराज’ कहते हुए सुनते रहना सत्संग माना जाता है। स्वाध्याय और सत्संग की इस प्रकार लकीर पीट लेने से नहीं वरन् विचारकता एवं विवेक के आधार पर जीवन निर्माण के मूल आधारों को समझने में सहायता करने वाले स्वाध्याय और सत्संग के अवसर तलाश करना मानसिक विकास के सत्कर्म का प्रधान आधार हो सकता है। (3) पारिवारिक जिम्मेदारी में केवल उदर पोषण की व्यवस्था ही नहीं है वरन् प्रत्येक परिजन के चतुर्मुखी विकास में सहायता करना उसे आवश्यक स्नेह, सुविधा एवं सलाह देना भी आवश्यक है। व्रतधारी अपने परिवार के प्रति सब प्रकार के कर्तव्य रहने का प्रयत्न करेगा। समाज को अधिक सदाचारी, सद्गुणी, समृद्ध, सुशिक्षित एवं सुखी बनाने के लिए प्रयत्न करना, दूसरों के साथ नागरिकता, सज्जनता, शिष्टाचार एवं मानवता के आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करना हमारा सामाजिक सत्कर्म है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-August
स्वाध्याय का कोई विशेष लाभ न होगा। उन्नति के मार्ग पर तभी हम शीघ्रता से अग्रसर हो सकते हैं जब हम बुरे काम को बुरा समझ कर उसे छोड़ दें और अच्छे कार्य को अच्छा समझ कर उसे ग्रहण करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-December
स्वाध्याय का शौक पूरा करने के लिये एडम की दिनचर्या में सर्वाधिक घण्टे पढ़ाई के थे-स्वाध्याय से हर विभूति खरीदी जा कसती है यह उनकी मान्यता थी और कहते हैं अपने इस विश्वास से उसने एक दिन अपनी मृत्यु को भी वश में करके दिखा दिया।
स्वाध्याय से हर विभूति खरीदी जा कसती है यह उनकी मान्यता थी और कहते हैं अपने इस विश्वास से उसने एक दिन अपनी मृत्यु को भी वश में करके दिखा दिया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-March
स्वाध्याय किया था, उनकी जिज्ञासायें बहुत प्रखर थीं इसलिये वे किसी एक अध्यात्मिक व्यक्ति की खोज में रहते थे जिसमें आत्मिक प्रतिभाओं का विकास स्पष्ट देखने में आता हो। उन्होंने इस दृष्टि से परख की तो पता चला कि युक्तेश्वर में वह सारी क्षमतायें है जो किसी योगी में होनी चाहिए। यद्यपि वे सदैव आत्मकल्याण की साधना में लगे रहते थे तथापि लोगों के मन और मस्तिष्क की बातें जान लेने, आशीर्वाद से किसी का भला कर देने, भविष्य जान लेने आदि की अतींद्रिय क्षमताओं का उनमें पूर्ण जागरण हो चुका था। योगानन्द उनके शिष्य हो गये। योग के प्रति उनमें कौतूहल का भाव तो रहता था पर प्रारम्भिक अवस्था होने के कारण वे कठिन साधनाओं में प्रवेश का साहस नहीं कर सकते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-April
स्वाध्याय सत्संग से उसे प्रभावित कर सकता है और दिशा दे सकता है। मस्तिष्क की दिशा जिधर चल पड़ती है जीवन स्वरूप वैसा ही बना जाता है और उसी आधार पर मनुष्य उन्नति अवनति सुख-दुख के परिणाम उपलब्ध करता है। मस्तिष्क मर्म स्थल कहा गया है- उसके ब्रह्म रन्ध्र में क्षीर सागर निवासी विष्णु भगवान् विराजमान हैं इस पौराणिक अलंकार में यही रहस्य छिपा पड़ा है कि समस्त दिव्य शक्तियों, सिद्धियों और विभूतियों का केन्द्र इस मस्तिष्क को ही कहा जाता है। इसे स्वस्थ एवं समुन्नत रखने के लिए विद्याध्ययन से लेकर विचार विनियम तक हमें बहुत कुछ करना होता है। तभी इस मस्तिष्क से समुचित लाभ मिल पाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-August
स्वाध्याय, तप और अनुभव सुवन्धु में यथार्थ योग्यता लादें किन्तु वैसा कुछ देखने में नहीं आया तब उन्होंने सुवन्धु को कुद्ध होकर अपने पद से हटा दिया और उनके स्थान पर किरात तथा आकुली नामक दो असुर तान्त्रिकों को अपना पुरोहित नियुक्त कर दिया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-September
स्वाध्याय की और कला-कौशल की प्रवीणता के लिए अभ्यास, अनुभव का आश्रय लिया जाता है। यह उपयुक्त भी है और प्रचलित भी। इतने पर भी इस मार्ग में एक भारी असमंजस यह बना रहता है कि बहुतों की मूल प्रकृति ही कुछ विचित्र होती है और उन पर इस उत्कर्ष प्रयत्नों का काई कारगर परिणाम प्रस्तुत नहीं होता। मन्दबुद्धि, चंचल, उद्धत, अनगढ़ प्रकृति के ऐसे कितने ही व्यक्ति पाये जाते हैं जिन पर उपयुक्त शिक्षण का प्रभाव भी नगण्य जितना ही होता है। यही बात शारीरिक विकास के संदर्भ में भी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-July
स्वाध्याय ने मुझे औषधि का वरदान दिया। मैंने अपने आपको स्वस्थ अनुभव करने सदैव प्रसन्न रहने सेवा सहयोग प्रेम मैत्री दया करुणा और परोपकार का जीवन जीने का अभ्यास प्रारम्भ कर दिया और उसका जो सुफल मिला वह मेरी 70 वर्ष वाली फोटो में पाठक स्पष्ट देख सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-November
स्वाध्याय द्वारा अपनी इस क्षमता का और भी अधिक विकास किया। उन्होंने
ज्योतिर्विज्ञान पढ़ा, दर्शन पढ़ा और संसार की परिस्थितियों का ज्ञान
प्राप्त किया और इस तरह उनकी प्रतिभा और भी चमकती चली गई। वे उस युग के
मूर्धन्य ज्योतिषी और अतीन्द्रिय दृष्टा माने जाने लगे।
स्वाध्याय, शिक्षण और अभ्यास का ही परिणाम हैं अथवा मस्तिष्क में निवास करने वाले किसी अलौकिक आध्यात्मिक तत्त्व की यह विशेषताएँ हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-June
स्वाध्याय सत्संग आदि गुणों के विकास के साधन बताये गये हैं किन्तु जिस तरह दुर्गुणों का मूल कारण अनियंत्रित महत्वाकांक्षायें होती है वैसे ही सद्गुणों का भी मूल वैराग्य है। शास्त्रकार का कथन है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-February
स्वाध्याय, ध्यान एवं कार्योत्सर्ग को अन्तरंग अर्थात् तप संज्ञा दी गई है। बौद्ध धर्म में स्वपीड़न और परपीड़न विरहित तप को श्रेष्ठ माना गया है।
स्वाध्याय, मनन, चिन्तन से लेकर आत्म-संयम और जप ध्यान की साधना में लग गई। इसी आयु में बहुत मनोविकार प्रबल रहते हैं सो आमतौर से परमार्थ प्रयोजनों के लिए ढलती आयु के व्यक्तियों ही प्रयुक्त किया जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-June
स्वाध्याय कर रहे हम सभी जिज्ञासुओं को दिखाते आ रहे हैं। विदुर ने उनके आज्ञाचक्र जागता है, तब क्या होता है? प्रकाशपुंज- जैसे सर्कस की लाइट होती है - बीम की तरह से वहां जाकर स्थिर हो जाती हैं, जहाँ से सम्बंधित विवरण संजय सुना रहे हैं। हमारे शरीर में पिट्यूटरी व पीनियल के बीच हाइपोथेलेमस नाम का स्थान होता है। इसे द्विदलीय आज्ञाचक्र कहते हैं।
स्वाध्याय एवं चिंतन में व्यस्त रखकर इस अवस्था से पर किया जा सकता है।
स्वाध्याय आत्मा का भोजन।
स्वाध्याय हेतु प्रेरित करेगी एवं विधेयात्मक चिंतन को गतिशील करेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-January
स्वाध्याय -सत्संग के नाम पर धर्म और अध्यात्म की लम्बी-चौड़ी बकवास करते और सुनते रहते है, जो चिन्तन-जीवन को प्रभावित न कर सके उसे मनोविनोद के अतिरिक्त और क्या कहा-समझा जा सकता है।
स्वाध्याय किया है, उन्हें पूरक के रूप में फरवरी 99 का साधना वर्ष विशेषांक पढ़ने को मिलेगा। इस पूरे अंक को इसी उद्देश्य विशेष के लिए तैयार किया गया है कि साधना-वर्ष किस रूप में, किस स्तर पर सभी वर्गों द्वारा मनाया जाना चाहिए।
स्वाध्याय सभी को वह लाभ प्रदान करेगा, जिसकी कि महाकाल को अपेक्षा है। इस विशेषांक को अधिकाधिक व्यक्तियों तक पहुँचाने -पढ़ाने का पुण्य कितना होगा, यह लिखने की नहीं स्वयं समझने-आत्मसात् करने का प्रसंग है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-March
स्वाध्याय का सुनियोजित नियमित क्रम चल रहा हो। साधना की धुरी पर संगठन बनने का भारी दायित्व इससे कम में नहीं उठाया जा सकता। जो भी सप्त-महाक्रान्तियाँ संपन्न होती हैं- वैचारिक धरातल पर नहीं मात्र प्रचारात्मक हलचलें मचाकर नहीं, साधनात्मक धरातल पर ही संपन्न हों सकती हैं। श्रेष्ठ साधक युग मनीषी ही युगपरिवर्तन को साकार कर दिखाएँगे-यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
स्वाध्याय का लाभ अपने समाज को भी देते रहेंगे।
स्वाध्याय, देवपूजा, गायत्री जप, हवन आदि साधनात्मक-उपासनात्मक धार्मिक कृत्यों का नित्य-नियम रखना चाहिए। भूमिशयन एवं ब्रह्मचर्य पालन का विधान आवश्यक है। व्रत का संकल्प लेते समय मुंडन कराने का भी शास्त्र आदेश है, साथ-ही-साथ चांद्रायण का उत्तरार्द्ध पक्ष यह है कि जो खाई खोदी गयी है अर्थात् जो दुष्कृत्य अपने से बन पड़े है, उनकी किसी-न-किसी रूप में भरपाई की जाय। व्रत की समाप्ति पर सामर्थ्यानुसार हवन-यज्ञ ब्राह्मण या कन्याभोज, ब्रह्मभोज जैसे उपक्रम भी अपनाये जा सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-February
स्वाध्याय-आध्यात्मिक संगठन आदि का अखण्ड यज्ञ देवालयों में चलता रहे। पर व्यवहार में आज यह सब नहीं रहा। लोग आते हैं, चन्दन-अक्षत-पुष्प-पाई-पैसा आदि की सस्ती भेंट चढ़ाकर अपनी अन्धश्रद्धा व्यक्त करके चले जाते हैं। उनके जीवन में किसी प्रकार का प्रकाश उत्पन्न नहीं होता। वही आसक्ति, वही वासना, क्रोध-मोह सबका सब वही।
स्वाध्याय रूपी गम्भीर प्रयोग भी हैं। अपने देवपरिवार के स्वजनों से इस सम्बन्ध में कतिपय महत्वपूर्ण अपेक्षाएँ भी की गयी है। इनमें से सर्वप्रथम यह है, परिजन-दैवी सन्देश देने वाली पत्रिका अखण्ड ज्योति एवं युगनिर्माण योजना मासिक को व्यापक बनाएँ। साधना वर्ष में कोई भी निष्ठावान् साधक ऐसा नहीं होना चाहिए, जिसने अपने जैसे पाँच नये निष्ठावान् अखण्ड ज्योति के सदस्य नहीं बनाए हों। पत्रिकाओं के पठन-पाठन के साथ युगऋषि के सम्पूर्ण वांग्मय के विस्तार का अगला चरण भी अपने परिजनों को निभाना चाहिए।
स्वाध्याय का प्रचलन बढ़े। आज स्वाध्याय चाहे वह साहित्य के रूप में हो अथवा टेलीविजन चैनलों के माध्यम से- मनोरंजन का रूप ले चुका है स्वाध्याय, आत्मनिर्माण से लेकर लोकमंगल के लिए हो- चाहे श्रेष्ठ विचारों के विस्तार हेतु माध्यम कोई भी प्रयुक्त किया जाय। यदि विवेक स्थिर रहा तो समाज से कुप्रचलन-अंधमान्यताएँ रूढ़िवादी रीति-रिवाज-धर्म के नाम पर चलने वाली कुरीतियों का स्वतः अंत हो जाएगा।
स्वाध्याय, आत्मनिर्माण से लेकर लोकमंगल के लिए हो- चाहे श्रेष्ठ विचारों के विस्तार हेतु माध्यम कोई भी प्रयुक्त किया जाय। यदि विवेक स्थिर रहा तो समाज से कुप्रचलन-अंधमान्यताएँ रूढ़िवादी रीति-रिवाज-धर्म के नाम पर चलने वाली कुरीतियों का स्वतः अंत हो जाएगा।
स्वाध्याय यह अवश्य करना चाहिए। जप व ध्यान के साथ मिलन प्राणायाम द्वारा विश्वप्राण के साथ एकात्म होने के भाव का क्रम भी रोज चलाया जा सकता है। (कृपया विस्तार हेतु ‘प्रज्ञा अभियान’ पाक्षिक दिनाँक 16 जनवरी, 1999 का पृष्ठ 2 देखें)
स्वाध्याय साधना वर्ष के साधकों का अनिवार्य अनुबन्ध है, ऐसा सुनिश्चित मानना चाहिए।
स्वाध्याय, संयम, सेवा रूपी चार बातों द्वारा संघर्षात्मक-सुधारात्मक क्रान्तियों में भागीदारी हर साधक को करनी चाहिए।
स्वाध्याय चाहे वह साहित्य के रूप में हो अथवा टेलीविजन चैनलों के माध्यम से- मनोरंजन का रूप ले चुका है स्वाध्याय, आत्मनिर्माण से लेकर लोकमंगल के लिए हो- चाहे श्रेष्ठ विचारों के विस्तार हेतु माध्यम कोई भी प्रयुक्त किया जाय। यदि विवेक स्थिर रहा तो समाज से कुप्रचलन-अंधमान्यताएँ रूढ़िवादी रीति-रिवाज-धर्म के नाम पर चलने वाली कुरीतियों का स्वतः अंत हो जाएगा।
स्वाध्याय एवं तप ही है। विचारों में संक्रमण एवं ग्रहणशीलता रहती है। जब मनुष्य स्वाध्याय में निरन्तर संलग्न रहता है, तब उसको अपने विचारों द्वारा विद्वानों-मनीषियों ऋषियों-महर्षियों के विचारों के बीच से बार-बार गुजरना पड़ता है। ग्रन्थों में लिखे विचार अविचल एवं स्थिर होते हैं। उनके प्रभावित होने अथवा बदलने का प्रश्न ही नहीं उठता।
स्वाध्याय में निरन्तर संलग्न रहता है, तब उसको अपने विचारों द्वारा विद्वानों-मनीषियों ऋषियों-महर्षियों के विचारों के बीच से बार-बार गुजरना पड़ता है। ग्रन्थों में लिखे विचार अविचल एवं स्थिर होते हैं। उनके प्रभावित होने अथवा बदलने का प्रश्न ही नहीं उठता। स्वाभाविक है कि अध्ययनकर्ता के ही विचार प्रभाव ग्रहण करते हैं। जिस प्रकार के विचारों की पुस्तक पढ़ी जाएगी, अध्येता के विचार उसी प्रकार ढलने लगेंगे।
स्वाध्याय की ही महिमा है। यहाँ की संस्कृति सदा से अपने अनुयायियों को विवेकशील बनने का सन्देश देती रही है, मूढ़ अथवा अन्धविश्वासी बनने का नहीं।
स्वाध्याय- दूसरा चरण है, जिसके आधार पर वैचारिक क्राँति द्वारा उन सभी कुरीतियों से जूझने का ज्ञानयज्ञ चल रहा है, जिनका उन्मूलन किए बिना समाज निर्माण संभव नहीं। कुरीति उन्मूलन आंदोलन को युग-निर्माण योजना द्वारा इसी धुरी पर खड़ा किया गया है, विवेक जाग्रत तब हो जब पतन-निवारण में सहायता करने वाले स्वाध्याय का प्रचलन बढ़े। आज स्वाध्याय चाहे वह साहित्य के रूप में हो अथवा टेलीविजन चैनलों के माध्यम से- मनोरंजन का रूप ले चुका है स्वाध्याय, आत्मनिर्माण से लेकर लोकमंगल के लिए हो- चाहे श्रेष्ठ विचारों के विस्तार हेतु माध्यम कोई भी प्रयुक्त किया जाय। यदि विवेक स्थिर रहा तो समाज से कुप्रचलन-अंधमान्यताएँ रूढ़िवादी रीति-रिवाज-धर्म के नाम पर चलने वाली कुरीतियों का स्वतः अंत हो जाएगा।
स्वाध्याय का मिला-जुला सुयोग ही है।
स्वाध्याय के बिना विचार-परिष्कार नहीं, विचार-परिष्कार के बिना विवेक और विवेक के बिना ज्ञान नहीं। जहाँ ज्ञान नहीं वहाँ अन्धकार होना स्वाभाविक है और अँधेरा-जीवन में शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार के भयों को उत्पन्न करने वाला है, जबकि प्रखर साधन वर्ष का प्रधान एवं मूलभूत प्रयोजन इस गहन और जटिल अन्धकार को दूर करना ही है। इस वर्ष का सर्वकालिक महामंत्र- तमसो मा ज्योतिर्गमय ही है, जिसकी साधना तप एवं स्वाध्याय का मिला-जुला सुयोग ही है।
स्वाध्याय का तात्पर्य सत्यं, शिवं, सुंदरम् साहित्य पढ़ने से है। सद्विचारों तथा सदुद्देश्य से पूर्ण साहित्य ही पढ़ने योग्य होता है, साथ ही इसमें शाश्वत मूल्यों को, देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप परिभाषित भी होना चाहिए। इन गुणों से भरपूर एवं सभी कसौटियों पर खरा उतरने वाला अपना युगसाहित्य ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-May
स्वाध्याय की प्रति रुचि जगती है। पाचक अग्नि तीव्र होकर क्षुधा को बढ़ाती है। वेद में जल को अमृत और जीवन का नाम दिया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-July
स्वाध्याय की आदत डालें आत्म-निर्माण की योजना बनाने के चिंतन मनन में मन को लगाए। कुविचार आते ही उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनसे लड़ने के लिए खड़ी कर दें। नित्य हिसाब रखें किन्तु सत्प्रयोजनों में कृपणता भी न बरतें। संग्रही न बनें पर आमदनी से खर्च कम रखें कुछ बचत करें, उधार लेने की आदत न डालें। अपने प्रभाव का ऐसा उपयोग करें, जिससे संपर्क क्षेत्र की दुष्प्रवृत्तियाँ घटे और सत्प्रवृत्तियों का बीजारोपण और परिपोषण उभारे।
स्वाध्याय आवश्यक है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-November
स्वाध्यायबुद्धि को ही दिया जा सकता है।
स्वाध्याय एवं सद्विचार।
स्वाध्याय’,’शील’,’महाव्रत’,’भगवद्गीता’,’गोसेवा’ आदि रूपों में गाँधी जी का व्यक्तित्व अराजनीतिक अधिक सिद्ध होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-October
स्वाध्याय किया एवं कुछ पाया है, जो जन-जन को दिशा दे सकता है, सही अर्थों में हम सभी को साधक बना सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-April
स्वाध्याय और वातावरण यह तीन साधनाकाल के महत्वपूर्ण पाथेय हैं। यदि ये उच्चस्तरी नहीं हुए, तो साधक का पतन आवष्यींवी है। जब वह अनाहत-चक्र की अवस्था से होकर गुजरता है, तो ऐसे समय में से दृढ़ इच्छाशक्ति एवं विश्वास से भरपूर होना चाहिए तथा अपना अधिकांश समय ऐसे व्यक्तियों, पुस्तकों एवं वातावरण के संपर्क में बिताना चाहिए, जो उसके आत्मविश्वास को विकसित करने अथवा उसे मजबूत बनाने में सहायक हों। मन को इतना बलवान बनाना चाहिए कि वह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी चट्टान की तरह अडिग रहे। इन सब कसौटियों में खरा उतरने पर ही साधक इस अवस्था को सफलतापूर्वक पार करता और आगे की प्रगति करता है।
स्वाध्याय, सत्संग जैसे कार्यक्रमों में व्यस्त रहे। मनोभूमि पर विक्षोभजनक प्रभाव उत्पन्न न हो, तो ही व्रत का पूरा लाभ मिलता है। व्यावसायिक कार्यों में प्रायः झूठ, चोरी, कर्तव्य में ढील, राग-द्वेष, लोभ, तृष्णा, क्रोध, वासना जैसे दोषों का समावेश बना रहता है। इसलिए अच्छा यही है कि चाँद्रायण के उपयुक्त स्थान तलाश किया जाय और उन दिनों छुट्टी लेकर आध्यात्मिक जीवन का लाभ लिया जाय। इस संबंध में परिजनों के लिए गायत्री तीर्थ, शांतिकुंज सर्वाधिक उपयुक्त पड़ेगा।
स्वाध्याय, मौन आदि शुभ कर्मों के लिए कुछ-न-कुछ अवसर साधारण दैनिक कार्यक्रम चलाते हुए भी निकाल ही लेना चाहिए।
स्वाध्याय, भोजन आदि कर्म आते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-December
स्वाध्याय और सामाजिक संस्कार के प्रयोग नियमित चलते रहते थे। कहना न होगा कि भारत की गौरव-गरिमा को स्थिर रखने में शुद्ध आध्यात्मिक स्तर के प्रयत्नों का योगदान विलक्षण ही था। उसे आधारभूत श्रेणी का ही मानना होगा।
स्वाध्याय, गहन आत्मविश्लेषण, वैचारिक अभिव्यक्ति द्वारा हम जीवन के उच्चतम मूल्यों पर आधारित जीवन के लक्ष्य का एक चित्र खींच सकते हैं। हम इसके अनुरूप इसे दैनिक, साप्ताहिक, वार्षिक व दीर्घकालिक खंडों में बाँट सकते हैं। इसके बाद ही इसे मूर्त रूप देने की- व्यवहार में परिणत करने की बारी आती है।
स्वाध्याय मंडल-प्रज्ञासंस्थान हरिद्वार और मथुरा की संस्थाएँ जो कार्य करती दिखती हैं, उनके पीछे इन्हीं सहयोगियों का रीछ वानरों जैसा भी और अंगद-हनुमान-नल-नील जैसा पराक्रम एवं त्याग कार्य करता देखा जा सकता है। निश्चित ही यह अखण्ड ज्योति की प्राणचेतना का ही प्रभाव है कि उसने हम सबको एकजुट रख युगपरिवर्तन की प्रक्रिया में गतिशील बनाए रखा है। एक शब्द में यही कहा जा सकता है कि यह हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाली ऋषिचेतना का समन्वित अथवा उसके प्रतिनिधि रूप में ऋषियुग्म की सत्ता का सूक्ष्म सूत्र-संचालन है।
स्वाध्याय की प्रक्रिया चलानी चाहिए। वक्ता का सुलझे विचारों वाला होना ही पर्याप्त नहीं है, उसकी मान्यताएँ उसके आचरण में भी झलकनी चाहिए, व्यक्तित्व कम-से-कम औसत से तो ऊपर हो। इतना हो सके तो मंदिर पुनः जीवंत और जाग्रत् हो सकें। समाज ने उन्हें ‘वरेण्य’ और श्रेष्ठ बनाया है, जिनके लिए समय, श्रम, साधन निकालना ही चाहिए। वे वरेण्य और श्रेष्ठ बने रहें, इसके लिए हमें जीवंत और जाग्रत् भी होना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-June
स्वाध्याय और परमार्थ ब्राह्मणत्व की कसौटी है। जो इस कसौटी पर खरा उतरता है वही सच्चा ब्राह्मण है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-September
स्वाध्याय, सत्संग, संयम, सदाचार तथा सच्चिदानंद प्रभु का आश्रय लेना होता है। ऐसी शिक्षा अपने प्रकाश से अन्तरात्मा के अन्धकार को दूर करके आत्मिक और साँसारिक जीवन को सुखी बना सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-November
स्वाध्याय, शम, दम, विनय, आर्जव, दया, श्रद्धा, विवेक, वैराग्य, एकान्तवास, अपरिग्रह,
समाधान, उपरामता, तेज, क्षमा, धैर्य, अद्रोह, अमय, निरहंकारता, शान्ति और ईश्वर में अनन्य भक्ति इत्यादि।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-October
स्वाध्याय।
स्वाध्याय का फल नहीं मिलता।
स्वाध्याय का प्रयत्न करना बताया है। ऐसा करने से अन्तःकरण की शुद्धि तथा बुद्धि निर्मल होकर मनुष्य का जीवन अपने तथा दूसरों के लिए हितकर हो जाता है। जितनी भी इस शुभ कर्म में श्रद्धा और विश्वास हो उतना ही अविधा आदि क्लेशों का ह्रास होता है। जो जिज्ञासु गायत्री मन्त्र को प्रेम और नियमपूर्वक उच्चारण करते हैं उनके लिए यह संसार सागर में तरने की नाव और आत्म प्राप्ति की सड़क है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-April
स्वाध्याय, सत्संग आदि कार्यों द्वारा उत्तम महत्व की प्राप्ति होती है तथा ऐसे परिणाम प्राप्त होते है। जिनसे सुखदायक विकास होता है। दूसरी दिशा वह है जिस पर चलने से साँसारिक भोग विलास के साधन, धन-संपदा आदि को प्राप्त किया जाता है।
स्वाध्याय, तपश्चर्या, दया, सत्य, अहिंसा, नम्रता, धैर्य, अद्रोह प्रेम, न्यायशीलता, निरालस्य, आदि दैवी गुणों के कारण जो सुख मिलता है उसकी तुलना किसी भी भौतिक सम्पदा से नहीं हो सकती, इसलिए अपना दैवी सम्पदाओं का कोष बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए।
स्वाध्यायशाला, सत्संग, अध्यात्म साधन आदि की अनेकों लोकोपयोगी प्रवृत्तियाँ संचलित होती थी। इन प्रवृत्तियों का संचालन करने के लिए जो विद्वान सदाचारी कर्मनिष्ठ ब्रह्मवृत्ति का लोक सेवक रहता था उसे पुरोहित या पुजारी कहते थे। इस पुरोहित को सम्मान सहित जीविका देने के लिए भगवान का भोग मंदिर का चढ़ावा आदि निमित्त रखे गये थे। जिससे लोग भगवान की नियत पूजा की अनिवार्यता को न भूलें और पुरोहित के खर्च में कमी न पड़ने पावे। यही बात सोलह संस्कार यज्ञ आदि कर्मकाण्ड कथा पर चढ़ावा पर्वदान, ब्रह्मभोज आदि की दक्षिणा के नाम पर अन्य पुरोहितों की जीविका के लिए चालू की गई थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-August
स्वाध्याय, परमार्थ, प्रेम, संगठन और आत्मिक उन्नति को ही यहाँ सदा सम्मानित किया जाता रहा है।
स्वाध्याय को समय की बर्बादी करना कहा जाता है और उन निरुपयोगी पुस्तकों को लोग रात-रात भर जाकर घोटते हैं जो नौकरी दिलाने वाले सर्टीफिकेट के लिए आवश्यक होती हैं। तप, त्याग, संयम, परमार्थ, साधु बैरागियों के लिए छोड़ दिया गया है। आज तो कूटनीति का, डिप्लोमैसी का बोलबाला है। इन परिस्थितियों में ओछे, तुच्छ, नीच, कमीने, कायर, स्वार्थी, बदमाश, इन्द्रिय लोलुप, स्वार्थी, चोर, व्यसनी, लोभान्ध, मनुष्यों का ही निर्माण हो सकता है। यह विचार-धाराएं वैसे महापुरुषों को उत्पन्न नहीं कर सकतीं, वैसे समाज की रचना नहीं कर सकतीं, जैसा कि हमारे अतीत काल में रहा है।
स्वाध्यायं चेति।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-May
स्वाध्याय, सत्संग ऐसे ही प्रयोजन हैं जिनके द्वारा मन को प्रभावित, अभ्यस्त और संस्कृत बनाकर दिव्यत्व की ओर-द्विजत्व की ओर-बढ़ाया जाता है। इन सब का उद्देश्य केवल मात्र इतना ही है कि मन, पाशविक वृत्तियों से मुड़कर दिव्यत्व की ओर अग्रसर हो। यदि ऐसा करना अपने आप ही, सरलतापूर्वक हुआ होता तो यज्ञोपवीत को व्यर्थ बताने वाले तर्क को स्वीकार करने में किसी को कुछ आपत्ति न होती। उस दशा में यह पृथ्वी ब्रह्म लोक होती ओर वैसा समय सतयुग कहा जाता। पर आज तो वैसा नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-January
स्वाध्याय। स्वाध्याय की प्रक्रिया में ही मन का अप्रतिम सौंदर्य छिपा पड़ा है। यह अत्यन्त सहज-सुलभ है और हर कोई इसे प्राप्त कर सकता है। मनस्वी का मन बड़ा सुन्दर होता है। स्वाध्याय ही इसका गूढ़ रहस्य है।
स्वाध्याय की प्रक्रिया में ही मन का अप्रतिम सौंदर्य छिपा पड़ा है। यह अत्यन्त सहज-सुलभ है और हर कोई इसे प्राप्त कर सकता है। मनस्वी का मन बड़ा सुन्दर होता है। स्वाध्याय ही इसका गूढ़ रहस्य है। इसके अभाव में मन रूपी दिव्य दर्पण में कुविचारों की धूल जमती रहती है और इसकी नैसर्गिक सुन्दरता नष्ट हो जाती है।
स्वाध्याय द्वारा मन रूपी दर्पण को सदा स्वच्छ एवं साफ रखा जाना चाहिए। जिससे कि आन्तरिक सुन्दरता की झलक-झाँकी देखी जा सके। मन ही वह तत्त्व है जो बाह्य और आन्तरिक दोनों प्रकार के सौंदर्य का अनुभव कर सकता है।
स्वाध्याय ही इसका गूढ़ रहस्य है। इसके अभाव में मन रूपी दिव्य दर्पण में कुविचारों की धूल जमती रहती है और इसकी नैसर्गिक सुन्दरता नष्ट हो जाती है।
स्वाध्यायरूपी ज्ञान यज्ञ करने वाले हैं।”
स्वाध्याय की-स्व के प्रशिक्षण व अध्ययन की प्रक्रिया को भी यज्ञ बताते हैं (9) तथा अंत में कहते हैं कि यह राजयोगी एवं हठयोगी गणों द्वारा किए गए प्राणायाम जैसे योग भी हो सकते हैं। (10, 11, 12)
स्वाध्याय यज्ञ (10) अपान में प्राणवायु का यजन (11) प्राण का अपान वायु में यजन (12) प्राणों का प्राणों में यजन।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥
स्वाध्याय करे। प्रेरणाप्रद जीवन निर्माण के साहित्य आदि के अध्ययन से उच्च विचारों का प्रवाह बना रहता है। यही प्रवाह बच्चों की मनोभूमि का निर्माण करता है। माँ जैसा चिन्तन करेगी उसी तरह से उसके बालक का स्वभाव विनिर्मित होगा। अतः गर्भवती माता को सदैव प्रसन्नचित्त, सन्तुष्ट एवं शान्त रहना चाहिए, जिससे कि उसके गर्भ से श्रेष्ठ आत्मा का अवतरण हो सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-April
स्वाध्याय करना जैसे सूत्रों को अपनाया जाना चाहिए। शारीरिक और मानसिक तल पर इन सभी अनुशासन सूत्रों को अपनाने वाला अपने आप ही सुपात्र, सत्पात्र बन जाता है। उसमें उपासना द्वारा प्राप्त शक्ति केबल पर ब्रह्मतेज चमकने, छलकने लगता है। यदि उपासना और साधना का ऐसा सुयोग कुछ वर्षों तक नियमित रूप से रह सके तो फिर उसके संकल्प मिथ्या नहीं होते। उसके द्वारा सोचे गए कार्य अनायास ही होने लगते हैं।
स्वाध्याय करें, पाठ्य सामग्री का संकलन करें व उसे नियमित भेजते रहें। वे अपने कार्यक्रम जिनमें वे अति व्यस्त रहते थे, वहाँ भी उस सामग्री को बुलवाने में संकोच नहीं करते। इससे लेखक शिष्य को भी सरलता हो जाती थी, प्रत्यक्ष मार्गदर्शन भी मिल जाता था। श्री जौहरी जी के बालावा सतींद्रदत्ता, रमाकाँत शर्मा रमन, निर्मलराय, श्री प्रभाकर सहित ऐसे न जाने कितने नाम हमारे स्मृतिपटल पर आ जाते हैं, जो अपने दैनंदिन जीवन के अतिरिक्त इसी साधना में नियोजित कर दिए गए। इसका लाभ उन्हें भी मिला एवं मिशन को भी।
स्वाध्याय मंडलों से जाड़ा जाएगा। इस समिति के सदस्यों का निर्धारण क्षेत्रीय स्तर पर सर्वसम्मति से होकर केंद्र द्वारा उसका अनुमोदन होगा। तदुपराँत सभी एक ही बैनर तले विभिन्न प्रकोष्ठों में कार्य करेंगे। चाहे वह उस जिले के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन हो, प्रज्ञा संस्थान/संस्थानों के वार्षिकोत्सव हों, प्रज्ञापुराण या महिला जागरण सम्मेलनों के आयोजन हों अथवा प्रबुद्ध वर्ग के सम्मेलन, वर्कशॉप या भारतीय संस्कृति ज्ञानपरीक्षा संबंधी गोष्ठियाँ-सभी एक ही मंच तले संपन्न होगी। केंद्र द्वारा अनुमोदित इस जिला स्तरीय समन्वय समिति का एक सुनिश्चित कार्यकाल होगा तथा निष्क्रिय सदस्यों को बदला जाता रहेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-May
स्वाध्याय, सेवा का मूल यही है कि स्वयं को परिष्कृत एवं परिमार्जित करे तथा उसके दिव्य स्वरूप का अनुभव प्राप्त करें।
स्वाध्याय ये सभी साधन हैं, जो किसी भी साधक के हृदय की श्रद्धा को बढ़ा सकते हैं। बुद्धि द्वारा ग्रहण ज्ञान हृदय द्वारा आत्मसात किया जाए और यह भी तभी संभव हैं, जब साधक ध्यान में शाँतभाव से मनन करने में रुचि रखे। अध्ययन-मनन द्वारा एकत्र ज्ञान व्यवहार में लाने पर उसके प्रति निरंतर श्रद्धा बढ़ती रहने पर सारे संशयों से निवृत्ति मिल जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-December
स्वाध्याय, अंशदान की नियमितता एवं गौसेवा के लिए किए जाने वाले प्रयासों की चर्चा की। संकल्पों की भावभरी पृष्ठभूमि इन चार गोष्ठियों ने बना दी थी, इसीलिए शाम का दीपमहायज्ञ अलौकिक वातावरण में शपथ के साथ सम्पन्न हुआ।
स्वाध्यायशील साधक द्वारा जनसेवा में लगेगी। तीनों पत्रिकाएँ हर परिजन पढ़ें, इस पर उनने विशेष जोर दिया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-August
स्वाध्याय, चिन्तन-मनन व निदिध्यासन की झलक मिलती है। माता पार्वती की जिज्ञासा भी हम सब गुरुभक्तों की कल्याण कामना के उद्देश्य से उपजी थी। सर्वज्ञानमय माँ ने अपनी सन्तानों की आध्यात्मिक उन्नति के लिए देवेश्वर शिव से प्रश्न किया था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-March
स्वाध्याय संगठन एवं रचनात्मक आँदोलनों को गति दी जा सके। इसी तरह तमिलनाडु का केन्द्र चैन्नई में स्थापित किया जा चुका हैं यहाँ भी प्रकाशन केंद्र , एक गुरुकुल, गौशाला एवं ध्यानकक्ष बनाने का प्रस्ताव आया है। इसी तरह तिरुअनंतपुरम् एवं बैंगलोर में भी प्राँतीय केंद्र बनाने की प्रक्रिया चल रही है। चारों प्राँतों के केंद्र शाँतिकुँज हरिद्वार के मार्गदर्शन में कार्य करेंगे। इसके लिए एक ‘दक्षिण भारत प्रकोष्ठ’ की स्थापना शाँतिकुँज में कर दी गई है।
स्वाध्याय से आरंभ होकर सद्ज्ञान प्रसार के लिए किए जाने वाले प्रबल प्रयत्नों तक फैलता है..... ज्ञान ही है जो पशु को मनुष्य, मनुष्य को देवता और देवता को भगवान बनाने में समर्थ होता है। ज्ञान से ही प्रसुप्त मनुष्यता जागती है और वही आत्मा को अज्ञान के अंधकार में भटकने से उबारकर कल्याणकारी प्रकाश की और उन्मुख करता है।” (पृष्ठ 59)।
स्वाध्याय मंडलों, साधना प्रशिक्षण केंद्रों तक यही ज्ञानयज्ञ संपन्न होता दिखाई देता है। स्वामी विवेकानंद पत्रावली में से एक पत्र जो उनके द्वारा उनके एक शिष्य को लिखा गया, स्पष्ट होता है कि ज्ञानयज्ञ क्या है? वे अपने एक शिष्य को जिन्हें वह अध्यापक महोदय संबोधन देते है, लिखते हैं, “मैं विचारचक्र का प्रवर्तन कर रहा हूँ, ताकि अच्छे-अच्छे विचार घर-घर पहुँचें। मेरे जीवन की यही महत्त्वाकांक्षा हैं।” यही ज्ञान यज्ञ है, जो स्वामी जी ने जीवन भर किया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-November
स्वाध्याय से सत्प्रेरणा मिलती है और सत्संग से सद्भावना पुष्ट होती है। जब ये आचरण में उतरती हैं, तो परिवर्तन सामने आता है, एक ऐसा परिवर्तन, जो सतत प्रवहमान रहे, तो मानव को महामानव और समाज को स्वर्ग बना देता है।
स्वाध्याय और सत्संग की नियमित दिनचर्या दिखलाई पड़ने पर भी उनकी वह परिणति सामने नहीं आती, जो आनी चाहिए।
स्वाध्याय और सत्संग की वे अच्छी बातें अप्रभावी सिर्फ इसलिए सिद्ध होती है कि वे अंतराल की गहराई में उतरकर उस बिंदु को नहीं छू पातीं, जो बदलाव उत्पन्न करता है। यदि इस संदर्भ में अध्येता और श्रोता गंभीर बने रहें और पढ़े अथवा सुने हुए प्रसंग के प्रति इतनी संवेदनशीलता उत्पन्न कर सकें कि वे अंदर चलकर सीधे मर्म में आघात करें, तो रूपांतरण तत्क्षण घटित होना आरंभ हो जाएगा।
स्वाध्याय और सत्संग। स्वाध्याय से सत्प्रेरणा मिलती है और सत्संग से सद्भावना पुष्ट होती है। जब ये आचरण में उतरती हैं, तो परिवर्तन सामने आता है, एक ऐसा परिवर्तन, जो सतत प्रवहमान रहे, तो मानव को महामानव और समाज को स्वर्ग बना देता है।
स्वाध्यायशील रहे हैं। आचार्य अत्रे उन दिनों बीमार पड़े थे। फिर भी चारपाई पर सिरहाने, बगल में उन्होंने ढेरों पुस्तकें जमा कर रखी थीं। उस कष्टकर मनःस्थिति में पढ़कर मन को हलका करते थे। एक मित्र मिलने आए और उन्होंने पूर्ण विश्राम की बात कहते हुए पढ़ने से बचने का परामर्श दिया।
स्वाध्याय के प्रति जाग उठे, तो उनका व्यक्तित्व भी अपूर्ण न रहे। जो इसमें पिछड़ जाते हैं, वे पछताते हैं।
स्वाध्याय और सान्निध्य परिवर्तन की अनुकूलता तो उपलब्ध कराते हैं, पर इतना ही पर्याप्त नहीं हैं, अंतस् की हलचल और उथल पुथल भी अभीष्ट आवश्यक है। जहाँ इस प्रकार की क्रियाएँ नहीं होती, वहाँ परिवर्तन की प्रतिक्रिया भी दृष्टिगोचर नहीं होती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-September
स्वाध्याय, अपनी नियमित ध्यान साधना बस यही उनकी दिनचर्या के अनिवार्य तत्त्व थे। घर में सबसे छोटी होते हुए भी वह परिवार के अन्य सभी सदस्यों की देख-भाल किया करती थी। किसको, कब, क्या और कितनी जरूरत है, इस बात का उन्हें हमेशा ध्यान रहता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-July
स्वाध्याय को भी एक प्रकार का सत्संग ही बताया गया है और उसके लाभों की प्रशंसा भी की गई है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-September
स्वाध्याय प्रेस का काम तो था ही। इन सबके बावजूद न कोई उनकी शिकवा शिकायत थी और न असुविधाओं का रोना। उनकी इस अद्भुत जीवन शैली-अपूर्व कर्मठता ने केसकर जी को दंग कर दिया। सहस्र कुण्डीय महायज्ञ में वही केसकर जी जब तीस वर्ष बाद आए तो उन्होंने सभी के सामने उनके चरण स्पर्श किए।
स्वाध्यायरत रह, श्रेष्ठ व्यक्तियों के समूह में रह कर व्यक्तियों को सही चिन्तन की शैली का अभ्यास करना चाहिए, यह सत्संकल्प का प्रथम पाठ है एवं सही कहा जाय तो यही मर्म है। यदि इतनी व्यवस्था भी कोई जीवन में कर ले तो वह बदल जाए, साथ ही अनेकों को बदल दे।
स्वाध्याय, योग आदि द्वारा ब्रह्म को प्राप्त करते हैं वैसे ही स्त्रियाँ ब्रह्मचारिणी रह कर आत्मनिर्माण एवं परमार्थ का संपादन करती हैं।” अथर्ववेद का उल्लेख हैं कि “ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम” (अथर्व 11/6/18) अर्थात् कन्या ब्रह्मचर्य का अनुष्ठान करती हुई उसके द्वारा उपयुक्त पति को प्राप्त करती है।
स्वाध्याय, लेखनी की साधना) के अतिरिक्त थी। यह सोचा जा सकता है कि 24 घंटे में 21 घंटे जब इसमें चले गए तो वे सोते कब थे। यही तो अलौकिक सिद्धि है जो किसी भी नाम से पुकारी जा सकती है पर उनके निकटवर्ती जानते हैं कि प्रातः 1 बजे से उठकर जो उनने कार्य आरंभ किया है तो उसे बिना विराम दिये सतत् रात्रि 10 बजे तक सम्पन्न किया है। यह संभव है तपोबल से अर्जित सामर्थ्य के सहारे।
स्वाध्याय, लेखन-प्रकाशन की व्यवस्था, कागज का प्रबंध, पत्रिका के लिए रजिस्ट्रेशन की अनुमति आदि की भागदौड़ कैसे कर सकता है। पर यह सब उनने अकेले उस अवधि में किया जब ब्रिटिश प्रशासन का दमन चक्र अपने चरम पर था एवं सभी सामग्री युद्ध के कारण आसानी से नहीं मिल पा रही थी। उस पर भी संकल्प यह कि हम बिना किसी से साधन माँगे, किसी प्रकार की वित्तीय सहायता लिए पत्रिका प्रकाशित करेंगे। जिन्हें पत्रिका या समाचार पत्र निकालने का कटु अनुभव है वे जानते हैं कि प्रतिकूल परिस्थितियों में सब कुछ कर पाना एकाकी व्यक्ति के वश की बात नहीं। पर पूज्य गुरुदेव के संकल्प के साथ गुरु का बल जुड़ा था, महाकाल का आश्वासन साथ में था कि वे किसी से भी बिना किसी सहायता माँगे विचारक्राँति का माहौल तैयार करेंगे।
स्वाध्याय के आधार पर अपनी पहली पुस्तक लिखी थी “मैं क्या हूँ।” यह पुस्तक अखण्ड ज्योति कार्यालय फ्रीगंज आगरा से उसी वर्ष प्रकाशित हुई थी। इस प्रथम चिन्तन नवनीत में उनके वही विचार उभर कर आये है जिन्हें वे व्यवहार के माध्यम से सबके समक्ष प्रकट कर रहे थे। वह था अपनी प्रसुप्त संकल्प शक्ति का जागरण और आत्मदेव की आराधना, जीवन देवता की साधना के बल पर प्रचण्ड पुरुषार्थ कर दिखाना। इस पुस्तक की कुछ पंक्तियाँ देखने योग्य हैं-
स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना व उनका संचालन बाल संस्कार शालाओं तथा प्रौढ़ पुरुषों व महिलाओं की साक्षरता हेतु नियमित कक्षाएँ चलाना, वृक्षारोपण द्वारा हरीतिमा विस्तार करना तथा नशा निवारण आँदोलन चलाना-थे अनेकों कार्यों में से कुछ थे जिन पर पूज्यवर सतत् जोर देते रहे।
स्वाध्याय मंडलों के गठन का महत्वपूर्ण निर्देश उनकी लेखनी से वसंत पर्व के दिन उद्भूत हुआ। प्रकारांतर चल देवालयों व चल प्रज्ञापीठों की स्थापना थी जिसके माध्यम से युग साहित्य का जन-जन तक विस्तार होना था। देखते देखते चौबीस हजार स्वाध्याय मण्डल विनिर्मित हो अपने अपने क्षेत्र में सक्रिय क्रिया–कलापों में नियोजित हो गए। अप्रैल 1983 में अपने एक महत्वपूर्ण सम्पादकीय में उनने लिखा कि “प्रज्ञा परिवार की खानातलाशी इस दृष्टि से ली जा रही है कि इस फटी गुदड़ी में भी कहीं लाल छिपे हो सकते हे। ये हाथ लगे तो काम चले।
स्वाध्याय,
स्वाध्याय मण्डल स्थापित होते चले गए। पहले जिन्हें गायत्री परिवार की शाखाएं कहा जाता था व जिनने 1958 के सहस्रकुंडीय महायज्ञ से साधना स्वर्ण जयन्ती समारोह तक महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई थी, उन्हीं को प्रकारान्तर से इन्हें स्थापित करने का श्रेय मिला। कुछ ऐसे नये प्राणवान व्यक्ति भी उभर कर आए जिन्हें आगे चलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभानी थी।
स्वाध्याय, उपासना आदि का नाश करने लगे।
स्वाध्याय, साधना में लगा सकें। आज की परिस्थितियों में यह भले ही अव्यावहारिक प्रतीत होता हो किन्तु मिशन का सूत्र संचालक जिन आदर्शों पर जीवन भर चला था, उनके माध्यम से ही अपनी रीति नीति का निर्धारण कर रहा था। यदि इसे एक आदर्श शुरुआत कहें तो उचित होगा क्योंकि वे आने वाले दिनों में प्रज्ञा परिजनों प्रवासियों तथा विश्वभर के नागरिकों में घूम घूम कर प्रचार करने वाले विवेकानन्दों, रामतीर्थों, कुमारजीवों, महेन्द्रों व संघमित्राओं के लिए एक उदाहरण सामने रखना चाहते थे। यह यात्रा एक बीजारोपण मात्र थी इसलिए सूत्र संचालक ने 80 वर्ष के जीवन के अढ़ाई माह इस कार्य के लिए निर्धारित कर दिए किन्तु यह कार्य बाद में भी सतत् चलना ही था।
स्वाध्याय मण्डल विनिर्मित हो अपने अपने क्षेत्र में सक्रिय क्रिया–कलापों में नियोजित हो गए। अप्रैल 1983 में अपने एक महत्वपूर्ण सम्पादकीय में उनने लिखा कि “प्रज्ञा परिवार की खानातलाशी इस दृष्टि से ली जा रही है कि इस फटी गुदड़ी में भी कहीं लाल छिपे हो सकते हे। ये हाथ लगे तो काम चले।” पूरे वर्ष वे स्वयं जनसंपर्क से विरत रह समयदान के लिए प्रज्ञापरिजनों को झकझोरते रहे। प्रज्ञा पुरश्चरण को भी तीव्रगति इसी वर्ष दी गयी।
स्वाध्याय द्वारा जो पढ़ा, दैवी सत्ता ने जो परोक्ष ज्ञान उन्हें दिया उसे वे बहुमूल्य विचारों के रूप में, सशक्त संजीवनी के रूप में लिपिबद्ध करते गये। एक बात और ध्यान रखने योग्य है कि पढ़ने के बाद कभी संदर्भ ग्रन्थ सामने नहीं रखते थे। इतनी विलक्षण स्मृति थी। लगभग ढाई हजार पुस्तकों के रूप में, अनूदित भाष्यों के रूप में स्वरचित प्रज्ञापुराण के रूप में इतना कुछ वे दे गए है वह आने वाले दस वर्षों के लिए इतना कुछ लिख कर दे गये है कि अखण्ड ज्योति सतत् प्रकाशित होती रहेगी; सदा ज्वलन्त देदीप्यमान बनी रहेगी। भले ही लेखनी किसी की भी हो विचार उन्हीं की प्रेरणा से आयेंगे।
स्वाध्याय में प्रमाद करता है, वह कभी अच्छा चिन्तक नहीं हो सकता। जीवनभर युगसाहित्य की संजीवनी द्वारा जीवन जीने की कला से लेकर आत्मिक प्रगति के उच्चतम सोपानों का शिक्षण देने वाले आचार्य श्री बचपन से ही अध्ययनशील थे। यदि स्कूली पढ़ाई ही उनका लक्ष्य होता तो पांचवीं से आगे भी अपनी पढ़ाई जारी रखते किन्तु उसके बाद वह कार्य कहाँ होता जो वे कर पाए।
स्वाध्याय व अपनी भावी तैयारी हेतु गहन मन्थन में लगाया। इसके लिए उनने कलकत्ता, पटना, वाराणसी, दिल्ली, पूना, मद्रास की विभिन्न लायब्रेरीज छान मारी। अध्यात्म तत्वज्ञान से लेकर समाज के नव निर्माण संबंधी आवश्यक संदर्भ और विवरण संकलित कर उन्हें सिलसिलेवार जमाया। इसके बाद शुरुआत दो हजार संस्कारवान आत्माओं से की। इन व्यक्तियों से उनका संपर्क या तो प्रत्यक्ष हो चुका था या वे परोक्ष रूप से उनकी रुचि को जानते थे।
स्वाध्याय हेतु श्रेष्ठतम पाठ्य सामग्री प्रदान की गयी थी। जो साहित्य विगत पचास वर्षों में पूज्य गुरुदेव ने लिखा वह युग साहित्य कहलाया जिसमें सामयिक समस्याओं का समाधान व उलझनों का हल परिस्थितियों के अनुरूप किया गया था। जब उनने इसी अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर (अप्रैल अखण्ड ज्योति 1980, पृष्ठ 33 से 56) प्रेरणाप्रद वातावरण में देवस्तर की ढलाई हेतु बसने वाले देव परिवार का अंग बनने के लिए जागृतात्माओं को निवास आमंत्रण भेजा, तब यही परिकल्पना उनके मन में रही कि गायत्री नगर को गुरुकुल, आरण्यक स्तर का बनाया जाय, जहाँ रहकर अखण्ड ज्योति युग निर्माण योजना एवं युग शक्ति गायत्री के पाठक-गुरुदेव के सभी मानस पुत्र तीर्थ कल्प का भी लाभ ले सकें तथा अपनी प्रतिभा का परिष्कार कर उन महामानवों की पूर्ति कर सकें जिनके अभाव से ही समाज में सारी समस्याएँ पनपी हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-April
स्वाध्याय के लिए युग साहित्य का प्रयोग (२) सत्संग के लिए प्रवचन, परामर्श, विचार विनिमय आदि की व्यवस्था (३) प्रशिक्षण एवं साधना के लिए नियोजित किये जाने वाले सत्रों में सम्मिलित होना (४) सामूहिक समारोह, दीपयज्ञ, तीर्थयात्रा, जुलूस, प्रदर्शन आदि प्रयोजनों द्वारा अलख जगाने जनसंपर्क साधने की क्रिया प्रक्रिया को अपनाया जाना। युग परिवर्तन के लिए इन चारों ही माध्यमों को समुचित प्रश्रय मिलना चाहिए।
स्वाध्याय आदि में लेखबद्ध प्रशिक्षण का प्रभुत्व है। पढ़े और बिना पढ़े दोनों ही वर्गों में इन माध्यमों से किसी न किसी रूप में प्रकाश पहुँचाया जा सकता हैं। पढ़े लिखे लोग युग साहित्य को अनपढ़ों को पढ़ कर सुना सकते हैं।
स्वाध्याय और सत्संग के उभयपक्षीय शक्तिशाली चरण उठने ही चाहिए। छोटे-बड़े रूप में इस प्रयोजन के लिए नियमित रूप से उत्साहपूर्वक निरत रहा जाना चाहिए।
स्वाध्याय और सत्संग के दोनों ही प्रयोजन एक साथ जुड़ जाते हैं।
स्वाध्याय उपक्रम अधिकाधिक लोगों तक पहुँच सके, इसके लिए शान्तिकुञ्ज द्वारा उस साहित्य का अभिनव सृजन किया गया है जो युगधर्म की रूप-रेखा सामयिक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए दूरदर्शी विवेकशीलता को जागता है।
स्वाध्याय का सरंजाम जुटाती है और वाणी से कानों के छिद्र में मान्यताओं को प्रवेश कराने के रूप में मस्तिष्क को झकझोरा जाता है। धर्मतंत्र के अंतर्गत इन्हीं दोनों को प्रमुखता दी गई हैं। कथा, प्रवचन, कीर्तन आदि में वाणी काम करती है। पाठ, स्वाध्याय आदि में लेखबद्ध प्रशिक्षण का प्रभुत्व है। पढ़े और बिना पढ़े दोनों ही वर्गों में इन माध्यमों से किसी न किसी रूप में प्रकाश पहुँचाया जा सकता हैं।
स्वाध्याय और सत्संग भी कहते हैं। लेखनी स्वाध्याय का सरंजाम जुटाती है और वाणी से कानों के छिद्र में मान्यताओं को प्रवेश कराने के रूप में मस्तिष्क को झकझोरा जाता है। धर्मतंत्र के अंतर्गत इन्हीं दोनों को प्रमुखता दी गई हैं। कथा, प्रवचन, कीर्तन आदि में वाणी काम करती है। पाठ, स्वाध्याय आदि में लेखबद्ध प्रशिक्षण का प्रभुत्व है।
स्वाध्याय, सत्संग संगठन और उल्लास उभार के कई कार्यक्रमों की चर्चा हो चुकी है। उनमें से कोई एकाकी कुछ न कुछ कार्य भी अपना सकता है। पर यदि संगठन की क्षमता हो, मुखरता और सक्रियता अपनाते बन पड़े तो बड़े क्षेत्र को अपने सेवा प्रयोजन के लिए चुना जा सकता है। दस बीस गाँव का एक मण्डल निर्धारित करके उनमें बसने वालों के साथ सघन संपर्क जोड़ा जा सकता है और उन खेतों को जोतने बोने बाद पानी देने रखवाली करने में एक कर्मठ किसान की तरह निरत रहा जा सकता है। साथ ही हीरे मोतियों जैसी फसल से कोठे भरने की प्रतीक्षा भी की जा सकती है
स्वाध्याय और सत्संग यह दोनों ही मनुष्य की मानसिक एवं भावनात्मक आवश्यकताएँ है। इनकी पूर्ति वैयक्तिक, पारिवारिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में अपनी परिस्थितियों के अनुरूप क्रियान्वित करते ही रहना है। इन पंक्तियों में इसे पारिवारिक क्षेत्र में आरंभ करने के लिए इसलिए कहा गया है ताकि उसे सहज सुगमता के साथ सीखा और सिखाया जा सके। उसका प्रत्यक्ष लाभ अपनों को विकसित करने के रूप में उठाया जा सके और सामाजिक क्षेत्र में क्रियान्वित करने के लिए प्रभावी अभ्यास करने में प्रवीणता प्राप्त हो सके। युग अवतरण अभियान को अग्रगामी बनाने के लिए तो यह युक्ति ऐसी हैं जिसे हर हालत में प्राथमिकता देनी पड़ेगी।
स्वाध्याय एवं सत्संग प्राप्त करते रहने का अवसर अधिकाधिक लोगों को मिलता रह सके ऐसे छोटे बड़े कार्यों में निरत रहने के लिए परिस्थितियों के अनुरूप प्रयत्न करते ही रहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-November
स्वाध्याय प्रामाणिक और दूरदर्शी व्यक्तियों के सान्निध्य-परामर्श का अवसर भी ढूँढ़ते रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त प्रस्तुत समस्याओं तथा प्रचलनों के औचित्य -अनौचित्य के सम्बन्ध में पूर्वाग्रह रहित विचार मंथन स्वयं भी करना चाहिए और लोगों का अन्धानुकरण करने की अपेक्षा जो दूरदर्शी विवेकशीलता की कसौटी पर खरा उतरता हो उसी को स्वीकार करना चाहिए। सही निष्कर्ष तक पहुँचना ही पर्याप्त नहीं, उसे कार्यान्वित करने के उपयुक्त साहस एवं पराक्रम भी संचित करना चाहिए।
स्वाध्याय का क्रम अपनाना तथा छोटे-छोटे दीपयज्ञों द्वारा जन-जन को युगपरिवर्तन की विचारधारा से अनुप्राणित करना, यही त्रिविध उद्देश्य इन कार्यकर्ता गोष्ठियों का था जो तीनों दिन टुकड़ों-टुकड़ों में पूरा होता चला गया। संध्याकाल में वंदनीया माताजी के उद्बोधन के पूर्व गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक पण्डित लीलापत जी शर्मा का प्रेरक उद्बोधन हुआ। अपनी ओजस्वी शैली में पं. लीलापत शर्मा ने पूज्य गुरुदेव के विद्या-विस्तार कार्यक्रम के विस्तार हेतु उनके लिखे साहित्य को उन सभी क्षेत्रों तक पहुँचाने की प्रेरणा दी, जहाँ अभी मिशन का आलोक नहीं पहुँच पाया हैं। वंदनीया माता जी के उपासना, साधना, आराधना परक त्रिविध अध्यात्म प्रधान प्रसंगों, पर उद्बोधन इसके पश्चात् हुआ। “ऋषिचिन्तन” नाम फिल्म के साथ ही कार्यक्रम समाप्त हुआ।
स्वाध्याय सत्संग, चिन्तन और मनन चारों ही आवश्यक हैं। स्कूली शिक्षा जहाँ तक संभव हो, वहाँ तक प्राप्त करनी चाहिए पर नौकरी लक्ष्य न रखा जाय, तो ही अच्छा है क्योंकि भविष्य में हर शिक्षित को नौकरियाँ नहीं मिलने वाली हैं। उपार्जन के लिए पैतृक धन्धे को ही विकसित करने की योजना सरल पड़ती, पर यदि वैसा संभव न हो, तो दूसरे उद्योग की बात सोची जा सकती है। शिक्षा का उद्देश्य जीवनोपयोगी-समाजोपयोगी ज्ञान का संवर्धन है। इसके सहारे मनुष्य बुद्धिमान बनता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-October
स्वाध्याय में दत्तचित्त थे कि किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी, वहीं से उन्होंने पूछा “अरे भाई! किसे खोज रहे हो?” आगन्तुक ने विनम्र वाणी में उत्तर दिया बायजिद को मिलना चाहता हूँ।” “बायजिद ने द्वार खोलते हुए कहा हाँ भाई मैं भी तो पिछले पच्चीस वर्षों से बायजिद को ही तलाश रहा हूँ पर वह अभी तक मिला नहीं।” आगन्तुक ने अनुभव किया,”आत्मा को पा लेना ही सर्वोपरि खोज है।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-May
स्वाध्याय, मनन-चिन्तन सज्जनों का संग आदि कुछ ऐसे उपाय हैं जिनके द्वारा अपनी विचारशक्ति की प्रभावोत्पादकता को बढ़ाया और स्वयं के उज्ज्वल भविष्य की संभावना को सुनिश्चित किया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-June
स्वाध्याय सत्संग का भी पड़ता है, पर यदि निर्धारित साधन उपचार भी अपनाए जा सकें तो और भी अच्छा। इनका समावेश रहने से उपरोक्त दोनों केन्द्रों में प्रगति की और भी अधिक संभावना रहती है। सूक्ष्म शरीर के लिए जप और कारण शरीर के लिए ध्यान प्रक्रिया का, अनुभवी साधना विज्ञानियों ने निर्धारण किया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-February
स्वाध्याय और सत्संग की प्रक्रिया को वह तेजी देना, जिससे दूर अनेकों व्यक्ति जीवन-साधना को अपना सकें; स्वयं के व्यक्तित्व को परिपक्व बना सकें।
स्वाध्याय, जप-तप, रात्रि के कुछ घंटों को नींद के लिए छोड़कर ध्यान। क्रम की निरंतरता अनवरत चल रही थी। उन्हीं दिनों सिक्खों के दसवें गुरू गोविंद सिंह जनजागरण के लिए देश भर की यात्रा के लिए निकले थे। पंचवटी पहुँचने पर उन्होंने इस तरुण तपस्वी का साधनाक्रम देखा। आस-पास के लोगों से पता लगाया।
स्वाध्याय'। इसका तात्पर्य उन पुस्तकों का अध्ययन है जो अपने को समझने में सहायक हो, जिसकी मदद से स्वयं के चिंतन, चरित्र व व्यवहार को सुधारा जा सके। चौथी का नाम है— सुहृत प्राप्ति अथवा 'सत्संग'; ऐसे लोगों का संग, जो हमें समय की पहचान कराएँ, हमारे मनोबल को मजबूत बनाएँ, जिससे जीवन-साधना अविराम चलती रहे। पाँचवीं सिद्धि है— 'दान' अर्थात अपने समय का कुछ भाग स्वयं के अनुभवों को दूसरों को बताने व उन्हें सन्मार्ग की ओर मोड़ने में लगाना। अपने प्रयत्नों से स्वाध्याय और सत्संग की प्रक्रिया को वह तेजी देना, जिससे दूर अनेकों व्यक्ति जीवन-साधना को अपना सकें; स्वयं के व्यक्तित्व को परिपक्व बना सकें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-August
स्वाध्याय प्रेस का काम तो था ही। इन सबके बावजूद न कोई उनकी शिकवा शिकायत थी और न असुविधाओं का रोना। उनकी इस अद्भुत जीवन शैली-अपूर्व कर्मठता ने केसकर जी को दंग कर दिया। सहस्र कुण्डीय महायज्ञ में वही केसकर जी जब तीस वर्ष बाद आए तो उन्होंने सभी के सामने उनके चरण स्पर्श किए।
स्वाध्यायरत रह, श्रेष्ठ व्यक्तियों के समूह में रह कर व्यक्तियों को सही चिन्तन की शैली का अभ्यास करना चाहिए, यह सत्संकल्प का प्रथम पाठ है एवं सही कहा जाय तो यही मर्म है। यदि इतनी व्यवस्था भी कोई जीवन में कर ले तो वह बदल जाए, साथ ही अनेकों को बदल दे।
स्वाध्याय, योग आदि द्वारा ब्रह्म को प्राप्त करते हैं वैसे ही स्त्रियाँ ब्रह्मचारिणी रह कर आत्मनिर्माण एवं परमार्थ का संपादन करती हैं।” अथर्ववेद का उल्लेख हैं कि “ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम” (अथर्व 11/6/18) अर्थात् कन्या ब्रह्मचर्य का अनुष्ठान करती हुई उसके द्वारा उपयुक्त पति को प्राप्त करती है।
स्वाध्याय, लेखनी की साधना) के अतिरिक्त थी। यह सोचा जा सकता है कि 24 घंटे में 21 घंटे जब इसमें चले गए तो वे सोते कब थे। यही तो अलौकिक सिद्धि है जो किसी भी नाम से पुकारी जा सकती है पर उनके निकटवर्ती जानते हैं कि प्रातः 1 बजे से उठकर जो उनने कार्य आरंभ किया है तो उसे बिना विराम दिये सतत् रात्रि 10 बजे तक सम्पन्न किया है। यह संभव है तपोबल से अर्जित सामर्थ्य के सहारे।
स्वाध्याय, लेखन-प्रकाशन की व्यवस्था, कागज का प्रबंध, पत्रिका के लिए रजिस्ट्रेशन की अनुमति आदि की भागदौड़ कैसे कर सकता है। पर यह सब उनने अकेले उस अवधि में किया जब ब्रिटिश प्रशासन का दमन चक्र अपने चरम पर था एवं सभी सामग्री युद्ध के कारण आसानी से नहीं मिल पा रही थी। उस पर भी संकल्प यह कि हम बिना किसी से साधन माँगे, किसी प्रकार की वित्तीय सहायता लिए पत्रिका प्रकाशित करेंगे। जिन्हें पत्रिका या समाचार पत्र निकालने का कटु अनुभव है वे जानते हैं कि प्रतिकूल परिस्थितियों में सब कुछ कर पाना एकाकी व्यक्ति के वश की बात नहीं। पर पूज्य गुरुदेव के संकल्प के साथ गुरु का बल जुड़ा था, महाकाल का आश्वासन साथ में था कि वे किसी से भी बिना किसी सहायता माँगे विचारक्राँति का माहौल तैयार करेंगे।
स्वाध्याय के आधार पर अपनी पहली पुस्तक लिखी थी “मैं क्या हूँ।” यह पुस्तक अखण्ड ज्योति कार्यालय फ्रीगंज आगरा से उसी वर्ष प्रकाशित हुई थी। इस प्रथम चिन्तन नवनीत में उनके वही विचार उभर कर आये है जिन्हें वे व्यवहार के माध्यम से सबके समक्ष प्रकट कर रहे थे। वह था अपनी प्रसुप्त संकल्प शक्ति का जागरण और आत्मदेव की आराधना, जीवन देवता की साधना के बल पर प्रचण्ड पुरुषार्थ कर दिखाना। इस पुस्तक की कुछ पंक्तियाँ देखने योग्य हैं-
स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना व उनका संचालन बाल संस्कार शालाओं तथा प्रौढ़ पुरुषों व महिलाओं की साक्षरता हेतु नियमित कक्षाएँ चलाना, वृक्षारोपण द्वारा हरीतिमा विस्तार करना तथा नशा निवारण आँदोलन चलाना-थे अनेकों कार्यों में से कुछ थे जिन पर पूज्यवर सतत् जोर देते रहे।
स्वाध्याय मंडलों के गठन का महत्वपूर्ण निर्देश उनकी लेखनी से वसंत पर्व के दिन उद्भूत हुआ। प्रकारांतर चल देवालयों व चल प्रज्ञापीठों की स्थापना थी जिसके माध्यम से युग साहित्य का जन-जन तक विस्तार होना था। देखते देखते चौबीस हजार स्वाध्याय मण्डल विनिर्मित हो अपने अपने क्षेत्र में सक्रिय क्रिया–कलापों में नियोजित हो गए। अप्रैल 1983 में अपने एक महत्वपूर्ण सम्पादकीय में उनने लिखा कि “प्रज्ञा परिवार की खानातलाशी इस दृष्टि से ली जा रही है कि इस फटी गुदड़ी में भी कहीं लाल छिपे हो सकते हे। ये हाथ लगे तो काम चले।
स्वाध्याय,
स्वाध्याय मण्डल स्थापित होते चले गए। पहले जिन्हें गायत्री परिवार की शाखाएं कहा जाता था व जिनने 1958 के सहस्रकुंडीय महायज्ञ से साधना स्वर्ण जयन्ती समारोह तक महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई थी, उन्हीं को प्रकारान्तर से इन्हें स्थापित करने का श्रेय मिला। कुछ ऐसे नये प्राणवान व्यक्ति भी उभर कर आए जिन्हें आगे चलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभानी थी।
स्वाध्याय, उपासना आदि का नाश करने लगे।
स्वाध्याय, साधना में लगा सकें। आज की परिस्थितियों में यह भले ही अव्यावहारिक प्रतीत होता हो किन्तु मिशन का सूत्र संचालक जिन आदर्शों पर जीवन भर चला था, उनके माध्यम से ही अपनी रीति नीति का निर्धारण कर रहा था। यदि इसे एक आदर्श शुरुआत कहें तो उचित होगा क्योंकि वे आने वाले दिनों में प्रज्ञा परिजनों प्रवासियों तथा विश्वभर के नागरिकों में घूम घूम कर प्रचार करने वाले विवेकानन्दों, रामतीर्थों, कुमारजीवों, महेन्द्रों व संघमित्राओं के लिए एक उदाहरण सामने रखना चाहते थे। यह यात्रा एक बीजारोपण मात्र थी इसलिए सूत्र संचालक ने 80 वर्ष के जीवन के अढ़ाई माह इस कार्य के लिए निर्धारित कर दिए किन्तु यह कार्य बाद में भी सतत् चलना ही था।
स्वाध्याय मण्डल विनिर्मित हो अपने अपने क्षेत्र में सक्रिय क्रिया–कलापों में नियोजित हो गए। अप्रैल 1983 में अपने एक महत्वपूर्ण सम्पादकीय में उनने लिखा कि “प्रज्ञा परिवार की खानातलाशी इस दृष्टि से ली जा रही है कि इस फटी गुदड़ी में भी कहीं लाल छिपे हो सकते हे। ये हाथ लगे तो काम चले।” पूरे वर्ष वे स्वयं जनसंपर्क से विरत रह समयदान के लिए प्रज्ञापरिजनों को झकझोरते रहे। प्रज्ञा पुरश्चरण को भी तीव्रगति इसी वर्ष दी गयी।
स्वाध्याय द्वारा जो पढ़ा, दैवी सत्ता ने जो परोक्ष ज्ञान उन्हें दिया उसे वे बहुमूल्य विचारों के रूप में, सशक्त संजीवनी के रूप में लिपिबद्ध करते गये। एक बात और ध्यान रखने योग्य है कि पढ़ने के बाद कभी संदर्भ ग्रन्थ सामने नहीं रखते थे। इतनी विलक्षण स्मृति थी। लगभग ढाई हजार पुस्तकों के रूप में, अनूदित भाष्यों के रूप में स्वरचित प्रज्ञापुराण के रूप में इतना कुछ वे दे गए है वह आने वाले दस वर्षों के लिए इतना कुछ लिख कर दे गये है कि अखण्ड ज्योति सतत् प्रकाशित होती रहेगी; सदा ज्वलन्त देदीप्यमान बनी रहेगी। भले ही लेखनी किसी की भी हो विचार उन्हीं की प्रेरणा से आयेंगे।
स्वाध्याय में प्रमाद करता है, वह कभी अच्छा चिन्तक नहीं हो सकता। जीवनभर युगसाहित्य की संजीवनी द्वारा जीवन जीने की कला से लेकर आत्मिक प्रगति के उच्चतम सोपानों का शिक्षण देने वाले आचार्य श्री बचपन से ही अध्ययनशील थे। यदि स्कूली पढ़ाई ही उनका लक्ष्य होता तो पांचवीं से आगे भी अपनी पढ़ाई जारी रखते किन्तु उसके बाद वह कार्य कहाँ होता जो वे कर पाए।
स्वाध्याय व अपनी भावी तैयारी हेतु गहन मन्थन में लगाया। इसके लिए उनने कलकत्ता, पटना, वाराणसी, दिल्ली, पूना, मद्रास की विभिन्न लायब्रेरीज छान मारी। अध्यात्म तत्वज्ञान से लेकर समाज के नव निर्माण संबंधी आवश्यक संदर्भ और विवरण संकलित कर उन्हें सिलसिलेवार जमाया। इसके बाद शुरुआत दो हजार संस्कारवान आत्माओं से की। इन व्यक्तियों से उनका संपर्क या तो प्रत्यक्ष हो चुका था या वे परोक्ष रूप से उनकी रुचि को जानते थे।
स्वाध्याय हेतु श्रेष्ठतम पाठ्य सामग्री प्रदान की गयी थी। जो साहित्य विगत पचास वर्षों में पूज्य गुरुदेव ने लिखा वह युग साहित्य कहलाया जिसमें सामयिक समस्याओं का समाधान व उलझनों का हल परिस्थितियों के अनुरूप किया गया था। जब उनने इसी अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर (अप्रैल अखण्ड ज्योति 1980, पृष्ठ 33 से 56) प्रेरणाप्रद वातावरण में देवस्तर की ढलाई हेतु बसने वाले देव परिवार का अंग बनने के लिए जागृतात्माओं को निवास आमंत्रण भेजा, तब यही परिकल्पना उनके मन में रही कि गायत्री नगर को गुरुकुल, आरण्यक स्तर का बनाया जाय, जहाँ रहकर अखण्ड ज्योति युग निर्माण योजना एवं युग शक्ति गायत्री के पाठक-गुरुदेव के सभी मानस पुत्र तीर्थ कल्प का भी लाभ ले सकें तथा अपनी प्रतिभा का परिष्कार कर उन महामानवों की पूर्ति कर सकें जिनके अभाव से ही समाज में सारी समस्याएँ पनपी हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-January
स्वाध्याय कर रहे थे। अचानक बाहर से दरवाजा पीटने की आवाजें आईं। पोथी बंदकर वह उठे और धीरज से द्वार खोला। बाहर कुछ स्त्री-पुरुष छोटे-छोटे बच्चों सहित बदहवास खड़े थे। क्या हो गया तुम्हें ?
स्वाध्याय की निरंतरता ने उनके भीतर विवेक को जाग्रत किया, चिंतन को विकसित किया था। पति के द्वारा तैयार की गई इन पांडुलिपियों को एक सरसरी निगाह से देखा तो अवाक रह गई। लज्जा और क्रोध से उनका चेहरा आरक्त हो गया। साहित्य के नाम पर यह प्रवंचना उन्हें असह्य लगी।
स्वाध्याय के क्षणों में पढ़े जा रहे श्वेताश्वतर उपनिषद के कथन— “तू ही स्त्री है, तू ही पुरुष, तू ही सभी के रूप में प्रकट है।”, ने कायरता के मुँह पर जोरदार थप्पड़ जमाया। मन में विचार दृढ़ हुआ। परमात्मा के लिए ही तो संन्यास लिया है और उपनिषद् के शब्दों में वह तो सभी रूपों में है। उसकी सेवा के लिए एकांत सुख का त्याग करना ही होगा।
स्वाध्याय कर रहे हैं। पूछा— "क्या पढ़ रहे हैं ?" "उपनिषद्।"— उत्तर मिला।