अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-July
मनन करके यही निष्कर्ष निकाला कि यदि यह युवक भारत में मरने-खपने के बजाय हम लोगों के बीच इंग्लैण्ड में आ जाये तो बहुत कुछ काम कर सकता है। निदान उन्होंने मद्रास पोर्ट ट्रस्ट अधिकारी को लिख दिया कि उस भारतीय युवक रामानुजम् को किसी प्रकार इंग्लैण्ड भेज दें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-September
मनन एवं चिन्तन हमको मनोवाँछित साँचे में ढाल सकता है। विचारों का प्रभाव आचरण पर पड़ता है और आचरण ही मनुष्य की मनोरूप सफलताओं का संवाहक होता है। यदि हम समाज में प्रतिष्ठा तथा संसार में प्रसिद्धि के इच्छुक हैं तो सबसे पहले अपने विचारों, भावनाओं तथा चिन्तन को स्वार्थ की संकुचित सीमा से बढ़ाकर विशालता तक विस्तारित करना होगा। यदि हम क्षुद्रताओं के जाल में ही पड़े रहे संकीर्णता के गढ्ढे से अपने विचारों का उद्धार न किया तो निश्चय जानिये हमारी महानता की इच्छा एक स्वप्न ही बनी रहेगी। क्षुद्र विचारों से प्रेरित होकर कोई क्षुद्र आचरण ही कर सकता है, तब ऐसी स्थिति में प्रतिष्ठा अथवा प्रसिद्धि का स्वप्न किस प्रकार पूरा हो सकता है।
मनन-क्षेत्र में अवतरित होती है। यह अवतरण ही मनुष्य को महापुरुष, सिद्ध-पुरुष एवं अतिमानव के रूप में विकसित करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-April
मनन किया जाता है, तब उसकी सारी असलियत सामने आ जाती है और उस दशा में यदि वह दर्शन सत्य पर आधारित है तो उसके अपनाने में किसी हानि की संभावना नहीं रहती और वह यदि यों ही कपोल कल्पित चिंतन पर आधारित होगा तो किसी भी विवेकशील व्यक्ति पर प्रभाव न डाल सकेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-November
मनन तथा ग्रहण ही है। विद्वानों तथा महापुरुषों के जो विचार उनके मुख से सुने जा सकते हैं, वे उनकी लिखी पुस्तकों से आँखों द्वारा पढ़े जा सकते हैं, एक बार बौद्धिक सत्संग में विचार अस्त-व्यस्त भी हो सकते हैं। किन्तु पुस्तकों में संचित विचार व्यवस्थित तथा स्थिर होते हैं। ग्रन्थ कर्ता अपनी पुस्तक में ज्ञान की परिपक्वता से ओत-प्रोत विचार ही अंकित किया करता है। स्वाध्याय रूपी सत्संग द्वारा कोई भी व्यक्ति उन विद्वानों का विचार-संग किसी समय भी, किसी स्थान पर प्राप्त कर सकता है, जो आज संसार में नहीं है अथवा जो सुदूर देशान्तर में रह रहे हैं।
मनन-चिन्तन किया जाये तो लगता है कि विश्व के समस्त धर्म ग्रन्थों एवं नीति शास्त्रों का निचोड़ इन थोड़े से अक्षरों में—गागर में सागर की तरह भर दिया गया है। व्यक्ति एवं समाज की सर्वतोमुखी—सर्वकालीन—समस्त समस्याओं का हल—समस्त उलझनों का समाधान इस महामन्त्र की मूल शिक्षाओं से मिल सकता है। यह चौबीस शब्द इतने सारगर्भित हैं कि ऋषियों को उनकी विवेचना, व्याख्या करने के लिए चार वेदों का अवतरण प्रस्तुत करना पड़ा।
मनन तथा सत्कर्मों के द्वारा उसे अधिकाधिक शुद्ध बनाने में लग जाना चाहिये। स्वार्थ रहित सात्विक आहार-विहार तथा आचार-विचार का अभ्यास अपना लेने से मनुष्य की चारों वृत्तियाँ आप से आप शुद्ध होने लगती हैं। मन को प्रसन्न रखिये, बुद्धि को विकृतियों से बचाइये, चित्त पर शिव संस्कारों की छाप डालिये और अहंकार को शरीर से आत्मा अथवा परमात्मा की ओर उन्मुख करिये, आपका अन्तःकरण शुद्ध हो जायेगा। इस प्रकार का सकर्मक अभ्यास ही आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने का प्रयास है, जिसे पाकर मनुष्य जीवन शाश्वत सुख का अधिकारी बन कर सफल एवं सार्थक हो जाता है। यह आध्यात्मिक उपलब्धि संसार की सारी उपलब्धियों का मूल तथा सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिसे हर प्रयत्न पर प्राप्त कर मनुष्य को अपने नश्वर जीवन को अनश्वर बनाना ही चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-October
मनन-चिन्तन करें, अपने भावनात्मक स्तर को ऊँचा उठावें और उत्कृष्ट मानव निर्माण करके भारतीय समाज को देव समाज के रूप में परिणत करने के हमारे उद्देश्य को पूरा करें। पर वैसा न हो सका। अधिकाँश लोग चमत्कारवादी निकले। वे न तो आत्मनिर्माण पर विश्वास कर सके और न लोकनिर्माण में। आध्यात्मिक व्यक्तियों का जो उत्तरदायित्व होता है उसे अनुभव न कर सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-December
मनन के द्वारा हमने जो पाया है, उसका सार—शहद हम अपने इस छोटे परिवार को बाँट जाना चाहते हैं। वैसा करने की हमें सुविधा मिलनी चाहिये।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-March
मनन किया था। उन्हें विश्वास था कि संसार की सारी जड़-चेतन प्रकृति में एक चैतन्य सत्ता का निवास है जो कि ‘ब्रह्म’ नाम से भारत के विज्ञान-दर्शन में विख्यात है। श्री वसु ने इसी सत्य को भौतिक यन्त्रों द्वारा खोज निकालने में अपना जीवन लगा दिया और जीवितों की भाँति जड़ों पर भी भौतिक परिवर्तनों तथा प्रतिक्रियाओं को सिद्ध कर दिखाया। इससे भारतीय दर्शन सिद्धान्तों की गरिमा में अभिवृद्धि हुई।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-February
मनन करने से आत्मा के रहस्य ज्ञात होते हैं, वास्तविक रूप का ज्ञान होता है और यह ज्ञान ही मनुष्य को सृष्टि के आदि कारण परमात्मा को जानने की प्रेरणा प्रदान करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-August
मनन एवं ग्रहण किया था। वैदिक ज्ञान के वाँग्मय में आरण्यक ग्रन्थों का विशेष स्थान है। ग्रन्थों का यह आरण्यक नाम ही इस बात का द्योतक है कि इनका प्रणयन वनों में ही किया गया है। अरण्य का अर्थ वन ही होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-December
मनन, पूजा, पाठ अथवा सज्जनोचित निर्वाह में कुछ सार नहीं रह जाता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-June
मनन करो। इस श्रुति के अनुसार प्रयत्नपूर्वक उस आत्मा की ही सेवा करनी चाहिए। वह बंधनों से छुड़ाती है ।
मनन और चिंतन की प्रक्रिया में ही संलग्न रहना पड़ता है। बाहर की बातें न सोचने की मनाही इसीलिए की गई है कि आत्मचिंतन में बाधा न पड़े। चार दिन तक संन्यासी जैसी मनःस्थिति में ज्ञान और वैराग्य की भूमिका में रहने का निर्देश इसीलिए किया गया है कि अंतर्मुखी स्थिति बनाने का अवसर जो प्रायः कभी भी नहीं मिलता, वह यहाँ मिल सके।
मनन-चिंतन और भजन में भी कुछ रस आने लगता है। बच्चों की जिम्मेदारियों से प्रायः छुटकारा मिल लेता है। सादगी का रहन-सहन अपनाने में कुछ विशेष कठिनाई नहीं होती। इन सभी अनुकूलताओं की दृष्टि से ढलती आयु ही अध्यात्म साधनाओं के उपयुक्त पड़ती है। यदि यह अवधि ऐसे ही निकल जाए तो पेंसठ-सत्तर की आयु तक पहुँचते-पहुँचते शरीर का कचूमर निकल जाता है, तब जरा-जीर्ण शरीर ही एक भार बन जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-January
मनन चिन्तन से परब्रह्म की प्राप्ति होती है।
मनन का दूसरा अर्थ है- आत्मबोध। अपना वास्तविक स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, शरीर और आत्मा का संबंध , श्रेय और प्रेय में से एक का चुनाव-अपनी गतिविधियों और रीति-नीतियों का सुनियोजित निर्धारण जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण निर्णय इसी केंद्र पर टिके हुए हैं कि आत्मबोध हुआ या नहीं यह चेतना जब तक जगेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचंड ह बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की प्रबलता उभरी ही रहेगी, माया पाश के भव-बंधनों छुटकारा मिलेगा ही नहीं, फलतः व्यथा वेदनाओं में झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा भी नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन उद्देश्य और आनंद हाथ से चला गया।
मनन और चिंतन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अंतःकरण की स्वस्थता, प्रखरता, परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीन आधारों पर ही निर्भर है। गायत्री महामंत्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को कहा जा सकता है।
मनन साधना पर लागू होती है। वातावरण शांत और स्थान एकांत होना चाहिए। आँखें बंद करे आराम कुर्सी पर पड़े हुए यह सोचना चाहिए कि -”शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकल कर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा। अब पड़ी हुई लाश के अंग-प्रत्यंगों को पोस्टमार्टम के समय उघाड़े गये अवयवों की तरह उलटना-पलटना चाहिए और समझना चाहिए कि कपड़ों से भरी हुई पेटी की तरह ही यह काया अपने सामयिक उपयोग के लिए मिली थी। इसी प्रकार मस्तिष्क को एक छोटे डिब्बे की तरह खोलकर देखना चाहिए कि उसमें मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के चार आभूषण, उपकरण औजार सुसज्जित रखे थे।
मनन अर्थात् आत्मबोध। शरीर और आत्मा के स्वार्थों और संबंधों का पृथक्करण जीवन-लक्ष्य के प्रति आस्था और रीति-नीति का साहस पूर्वक निर्धारण। दोनों की साधना विधियाँ सरल है। एक ही समय या पृथक-पृथक सुविधा के समय और शांत एकांत स्थान में, सुसंतुलित चित्त से यह दोनों ध्यान, चिंतन, किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनमें लगेगी उतनी ही अंतर्ज्योति प्रखर होती चली जायेगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय परिणाम होने पर जिन दिव्य संपदाओं की उपलब्धि होनी चाहिए वे सहज ही करतल गत होती चली जायेगी।
मनन- चिंतन। जो पड़ा है उस पर बार-बार कई दृष्टिकोणों से विचार करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उस प्रकाश को बढ़ाने का क्या उपाय है? आदर्शों को अपने व्यक्तित्व में घुलाने के प्रसंग पर ऊहापोह करना, मनन और चिंतन का मुख्य उद्देश्य है। कमरे में नित्य झाडू लगाते हैं, स्नान रोज करते हैं, दाँत रोज साफ किये जाते हैं, बर्तन रोज साफ करने पड़ते हैं। मन की मलीनता की आदत से विरत करने के लिए उसे स्वाध्याय और मनन-चिंतन के बन्धन में नित्य बाँधना चाहिए।
मनन और चिंतन का मुख्य उद्देश्य है। कमरे में नित्य झाडू लगाते हैं, स्नान रोज करते हैं, दाँत रोज साफ किये जाते हैं, बर्तन रोज साफ करने पड़ते हैं। मन की मलीनता की आदत से विरत करने के लिए उसे स्वाध्याय और मनन-चिंतन के बन्धन में नित्य बाँधना चाहिए। रास्ते पर चलने के लिए वह तभी सहमत हो सकेगा।
मनन-चिंतन के बन्धन में नित्य बाँधना चाहिए। रास्ते पर चलने के लिए वह तभी सहमत हो सकेगा।
मनन 2. बसन्त पर्व पर किसी न किसी प्रकार छोटे या बड़े आयोजन 3. अखण्ड-ज्योति एवं युग-निर्माण पत्रिकाओं की सदस्य संख्या अभिवर्धन 4. नये छपे प्रचार ट्रैक्टों द्वारा अपने क्षेत्र में युग-निर्माण अभियान के स्वरूप का प्रचार परिचय, यह चारों ही क्रिया कलाप पूरे करने के लिये हम उत्साह पूर्वक जुट पड़े तो उसका परिणाम इस प्रकार सामने आ सकता है जिसके आधार पर निर्दिष्ट लक्ष्य की दिशा में आशातीत सफलता के साथ आगे बढ़ा जा सके।
मनन, चिन्तन आदि उपयोग को अपनाया जाना चाहिए। अचेतन मन की गरिमा और सम्भावनाओं का पता लगाने के लिए मनः शास्त्री जितने गहरे उतरते जाते हैं, उतना ही यह अनुभव करते हैं कि इस रत्नागार में छिपी बहुमूल्य सम्पदा इतनी अपार और असीम है जिनकी कल्पना तक कर सकना कठिन है।
मनन और चिंतन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए। गायत्री महामंत्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही संभव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका माहात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया गया है।
मनन, (3) चिंतन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समय साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाय तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए भजन, मनन और चिंतन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-February
मनन इन दोनों के समन्वय से तप का प्रयोजन पूरा होता है। इसलिए स्वाध्याय को भी तप का अंग माना गया है।
मनन, स्वाध्याय और सत्संग के आधार पर सद्भावनाओं का समुचित संग्रह अपने भीतर जमा करें और उसमें से साररूप में जो सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हो, उसी को जिह्वा पर आने दें। जीभ में अमृत भी है और विष भी। विषपान करने वाले मुख के रास्ते ही उसे भीतर ले जाते हैं। दुर्भावग्रस्त संस्कारसहित वाणी को भी विष ही कहा गया है। वह प्रथम अनर्थ वक्ता का ही करती है, उसकी गरिमा का हनन करती है और दूसरों की दृष्टि में उसका सम्मान गिरा देती है; किंतु यदि अमृतवचन बोले जाए तो उसमें वक्ता को अपने आप में उल्लास का उभार दीखता है और समीपवर्त्ती लोग उसका रसास्वादन करके तृप्त होते हैं।
मनन-चिंतन, ध्यान-धारणा का फल, मन को जीवन का स्वरूप और लक्ष्य समझाने के लिए, इच्छा-आकांक्षाओं को आत्मकल्याण के लिए, कुछ सोचने-करने के लिए, उत्साहित एवं अभ्यस्त करने का प्रयोजन पूरा करती है। साधनों का अंतिम चरण आस्था को, श्रद्धा को, भावना को, आकांक्षा को देवदृष्टि के साथ जोड़ देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-August
मनन स्थिति में जिन्दगी के दिन बिताए हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-September
मनन्तं ब्रहा”, अर्थात् ब्रहा अनन्त अपरिमित है। वह समस्त जड़-चेतन में उसी प्रकार रमा हुआ है, जैसे इस संसार में वायु के अणु। निराकार जल से जैसे साकार बर्फ जम जाती है, उसी प्रकार प्रार्थना रूपी शीतलता से उस अगोचर ईश्वर-सत्ता का साक्षात्कार किया जा सकता है। वह सत्ता सर्वज्ञ है, सर्व-शक्तिमान है। हम उसके आगे अबोध बालक से है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-November
मनन, अध्ययन, प्रवचन करते रहने से केवल बौद्धिक समाधान मिलता है। सत्प्रवृत्तियाँ परिपक्व तो अभ्यास से होती है। अभ्यास के लिए उपकरण चाहिए। जिन लोगों के बीच हमें रहना पड़ रहा है, उन्हें परिष्कृत बनाने के लिए प्रयास करना वस्तुतः अपनी प्रकृति को ही सुधारना है। बेझिझक बात करनी हो तो बात दूसरी है- यदि सचमुच किन्हीं पर बदलने योग्य प्रभाव उत्पन्न करना है तो उसका एक मात्र उपाय अपनी स्थिति का प्रभाव डालने योग्य बनना ही हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-March
मनन चिंतन में उभारना चाहिए। और इतना साहस एकत्रित करना चाहिए कि आन्तरिक दुर्बलताओं एवं बाहरी अवरोधों से जूझते हुए उस प्रयोजन में तत्पर हुआ जा सके जो युग-निर्माण परिवार के सदस्यों के सामने विशेष रूप प्रस्तुत हुआ है। हमें इस मिशन का साधारण समर्थन कर्ता सदस्य ही नहीं बने रहना चाहिए वरन् एक कदम आगे बढ़ाकर सृजन सेना का ऐसा सैनिक बनना चाहिए जिसके पीछे अनुयायियों की एक बड़ी पंक्ति भी कदम से कदम मिला कर अग्रसर होती हुई दिखाई दें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-April
मनन (2) सत्प्रवृत्तियों के सुदृढ़ता पूर्वक अपनाने का व्रत (3) अग्नि होत्र यज्ञीय जीवन, परमार्थ में संलग्नता (4) भक्ति पूर्वक ध्यान उपासना (5) विवेक की प्रधानता (6) आत्मीयता करुणा एवं ममता का विकास कहा भी हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-May
मनन का महात्म्य इसीलिए बनाया गया है कि उससे आत्म सुधार और आत्म निर्माण के दोनों पक्ष पूरे होते है स्वाध्याय ओर सत्संग की महिमा भी इसी आधार पर इतने विस्तार से बखानी गई है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-July
मनन, स्वाध्याय और निदिध्यासन संभव हो जाता है। आत्मबोध और तत्वबोध की ज्ञान साधना से ही ऋतम्भरा प्रज्ञा प्रकट होती है और जीवात्मा का ‘भूमा’ स्थिति प्रज्ञता में प्रविष्ट होना संभव होता है। आत्मा की यह भूख बुझाने के लिए नये सिरे से विद्याध्ययन करना पड़ता है-यह ब्रह्मचारी की लौकिक शिक्षा से सर्वथा भिन्न होता है, वानप्रस्थ लेने का प्रथम सोपान है-ब्रह्मविद्या का पारायण करना, उसमें पारंगत होना- ज्ञानमृत से परिपूर्ण व्यक्ति ही ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करते हैं और लोक निर्माण जैसे महान प्रयोजन के लिए अधिकारी बनते हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं।
मनन-चिन्तन का प्रयोग नित्य, नियमित रूप से करना चाहिए। जीवन को परिष्कृत और उदार बनाने की प्रेरणा भरने वाला साहित्य स्वाध्याय के लिए चुन लेना चाहिए और उसे मनोयोगपूर्वक पढ़ने के लिए कोई न कोई समय निश्चित निर्धारित कर ही लेना चाहिए। फुरसत के समय यहाँ तक कि रास्ता चलने भी पढ़ना पड़े तो भी चलेगा आत्म-चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण, आत्म-विकास की चतुर्विध आवश्यकताओं को कैसे पूरा किया जा सकता है? वर्तमान ढर्रे में क्या सुधार परिवर्तन किस क्रम में होना चाहिए इसी प्रकार की योजनाएं मनन-चिन्तन में बनाई जाती है। ज्ञानयोग की साधना के लिए उपासना के अतिरिक्त स्वाध्याय और आत्म-चिन्तन का अवसर रहना ही चाहिए।
मनन चिन्तन का स्वरूप। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिंतन के चार चरण ब्रह्मविद्या की उपलब्धि के आधार माने गये हैं। इन्हें साधना परायण जीवन क्षेत्र में प्रवेश करने वाले स्वयमेव भी अपने में तो साधना की आवश्यकता पूरी करते रह सकते है।
मनन चिन्तन करते रहने से संभव नहीं हो सकता। व्यावहारिक अनुभव के लिए क्रियात्मक शिक्षा प्राप्त करने की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। दर्जी, मोची, धोबी, कुम्हार, लुहार, सुनार, जुलाहे, रंगरेज जैसे सामान्य शिल्प भी वर्षों अभ्यास करने के उपरान्त अपने कार्य में निष्णात हो पाते हैं तो यह कैसे संभव हो सकता है कि वानप्रस्थ लेकर अनभ्यस्त परमार्थ जीवन के क्रिया-कलाप को सुसम्पादित किया जा सके। इसलिए भी व्यावहारिक शिक्षा और अनुभव, अभ्यास की कम आवश्यकता नहीं होती। मात्र संस्कार का कर्मकाण्ड पूरा कर लेने और मन चाही रीति-नीति अपनाये रहने से तो इस महान प्रयोजन की पूर्ति नहीं हो सकती।
मनन-चिन्तन में बनाई जाती है। ज्ञानयोग की साधना के लिए उपासना के अतिरिक्त स्वाध्याय और आत्म-चिन्तन का अवसर रहना ही चाहिए।
मनन चिन्तन के माध्यम से अपनी विचारणा को उत्कृष्टतम स्तर कर उठाना ज्ञानयोग है। योगाभ्यास और तपश्चर्या को गायत्री शक्ति स्रोतों पर अवलम्बित साधना क्रम को भक्तियोग करना चाहिए। लोकमंगल में सहृदय किन्तु साहसी शूर-वीरों की तरह प्राणपण से जुट पड़ने वाली कर्मनिष्ठा को श्रेष्ठतम कर्म योग कहा जा सकता है। इस प्रकार वानप्रस्थ जीवन में तीनों प्रधान योगों में निरन्तर संलग्न रहने की विधि व्यवस्था है। आहार, निद्रा, स्नान जैसे अनिवार्य शरीर धर्म का पालन करने के उपरान्त जो समय बचता है उसे परमार्थ प्रयोजनों में लगाने वाला साधन अनवरत रूप से भगवद्भक्ति में निरत कहा जा सकता है।
मनन, चिंतन के चार चरण ब्रह्मविद्या की उपलब्धि के आधार माने गये हैं। इन्हें साधना परायण जीवन क्षेत्र में प्रवेश करने वाले स्वयमेव भी अपने में तो साधना की आवश्यकता पूरी करते रह सकते है।
मनन चिन्तन भी इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। जो पढ़ा समझा गया हे उस पर गंभीरता पूर्वक विचार करना-मान्य आदर्शों का जीवन में उतारने की विधि-व्यवस्था सोचना, यही है मनन चिन्तन का स्वरूप। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिंतन के चार चरण ब्रह्मविद्या की उपलब्धि के आधार माने गये हैं। इन्हें साधना परायण जीवन क्षेत्र में प्रवेश करने वाले स्वयमेव भी अपने में तो साधना की आवश्यकता पूरी करते रह सकते है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-September
मनन करता है, किन्तु असत्य यह भी नहीं है कि जब मनुष्य नहीं सोचता है तब मस्तिष्क शाँत नहीं बैठा रहता कुछ न कुछ ताने-बाने बुनता रहता है।
मनन के बिना कोई मनुष्य अपने लिए स्थिर नैतिक सिद्धाँतों का निर्धारण नहीं कर पाता और समाज की दिशाधारा के प्रवाह में बह जाता है। उनके अनुसार चिन्तन जीवन का सैद्धान्तिक पक्ष है। उसका व्यावहारिक पक्ष श्रेष्ठ कार्यों के रूप में परिलक्षित होता है। विचार मन्थन से जो सिद्धान्त निर्धारित हों, उनको सत्यता की कसौटी के लिए व्यावहारिक क्षेत्र में उतारना होता है। उच्च आदर्शों व नैतिक सिद्धाँतों का व्यवहार में आना ही नैतिक जीवन है।
मनन की क्षमता में ह्रास होता है, सो अतिरिक्त।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-August
मनन- अपराह्न में आत्मपर्यवेक्षण करते हुए आत्म समीक्षा, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की सामयिक योजना बनाना और उसे कार्यान्वित करने के लिए संकल्पपूर्वक अग्रगमन।
मनन से ही नहीं, भोजन के साथ घुले हुए सूक्ष्म तत्वों का सन्तुलन बनाकर मनुष्य के सोचने का तरीका भी समुन्नत किया जा सकता है। इतना ही नहीं भावनाओं को दिशा भी बदली जा सकती है। अवाँछनीय दिशा में चल रही भाव विकृति को आहार शुद्धि के माध्यम से वाँछित दिशा में मोड़ा और सुधारा जा सकता है। दुष्प्रवृत्तियों में लगे हुए दुर्भावना ग्रस्त मनुष्य के अन्तःकरण को परिष्कृत किया जा सकता है और उसकी प्रवृत्ति में, मनोवृत्ति में अभीष्ट परिवर्तन किया जा सकता है।
मनन की प्रक्रिया में उथल-पुथल मचा दी है। यद्यपि इसकी शुरुआत विगत महायुद्धों के विनाशकारी दृश्यों के साथ हुई थी, जिसने मानवी अन्तराल को झकझोर कर रख दिया था। उस घटना ने लोगों को यह सोचने के लिए विवश कर दिया था कि अतिवादी भौतिक चिन्तन की क्या परिणति होती है। अब जो स्फूर्ति, चेतना और उमंग उभरी है, उसके आधार पर मनुष्य ने अपनी सामर्थ्य को पहचाना और अधिकारों को जाना है। प्राचीन रूढ़िवादी परम्पराओं, संकीर्ण विचारधाराओं के शिकंजे में वह अब अधिक दिनों तक जकड़ा नहीं रह सकता।
मनन, चिन्तन करने से ऊँचा उठने, आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-March
मननीय तथ्य है कि शिक्षक कोई पद नहीं यह विकसित व्यक्तित्व की विशेष अवस्था है। इन्हीं विशिष्ट व्यक्तित्वों ने मानव की अनगढ़ भीड़ को समाज का स्वरूप दिया। भीड़-झुण्ड को समाज नहीं कहा जा सकता। इसका अपना विशिष्ट स्वरूप है। जिसके साथ शिक्षक के अंतर्संबंध गहनता से जुड़े हैं।
मनन चिन्तन के आधार पर परिष्कृत करना, स्वाध्याय, सत्संग से सन्मार्गगामी बनाया जाना चाहिए, वहाँ यह भी आवश्यक है कि उसके लिए आहार-विहार की ऐसी व्यवस्था बनाई जाय जिससे वह स्वयं उच्छृंखलता छोड़कर शालीनता को स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाय इस तथ्य को भारतीय तत्वदर्शियों ने बहुत पहले ही जान लिया था कि मन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष दिलाने वाली सभी शक्तियाँ भरी पड़ी हैं, उसकी सात्विक और विधेयक शक्ति का ज्ञान होने के कारण ही ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि “मेरा मन शिव संकल्प वाला हो।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-November
मनन की मूर्तियों ने 19वीं सदी के प्रारंभिक दशक में भी आवाजें उत्पन्न की थी, किन्तु इस बात की कोई और साक्षी उपलब्ध नहीं होने के कारण इतिहास वेत्ता इसे प्रामाणिक नहीं मानते। हाँ, फ्राँस का “रिव्यू एन्साइक्लोपीडिक” (भाग 9, पृ. 598, पेरिस, मार्च 1821) ही एक मात्र ऐसा उपलब्ध ग्रन्थ है, जो ए. स्मिथ के इस कथन को पुष्टि करता है, कि आधुनिक काल में भी ये मेमनन के प्रस्तर विग्रह अचानक एक बार पुनः मुखर हो उठे थे। इसके पश्चात अधुनातन समय में फिर किसी ने इनकी बोलियाँ नहीं सुनीं, और न ही इस संबंध में कोई लिखित रिकार्ड पाया गया है।
मनन भी करते जा रहे थे, अभी थोड़ी ही देर हुई होगी कि कुटीर के अंदर से पत्नी की वाणी उनने कानों से टकरायी “स्वामी”! भोजन तैयार है, ग्रहण कर लें।”
मनन” नामक रचना में लार्ड कर्जन ने इससे पैदा होने वाली धुन को न अधिक सुरीली न बहुत कर्कश कहकर वर्णित किया है।
मनन की मूर्तियों से विकीर्ण साज से काफी कुछ मिलती जुलती हैं।
मनन”। इसमें उनने अनेक तर्कों, तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि यह ध्वनियाँ मूर्ति के अन्दर किसी याँत्रिक उपकरण का परिणाम नहीं है। उन्होंने इसे मानने से स्पष्ट इन्कार कर दिया है कि संगीत प्रस्तर खण्ड के अन्दर किसी मानव निर्मित वाद्य यंत्र की फलश्रुति है। इसके समर्थन में वे यह तर्क देते हैं कि यदि ऐसा होता तो एक ही प्रकार की ध्वनि उनसे निःसृत होनी चाहिए थी किन्तु विभिन्न पर्यटकों के यात्रा-विवरणों से ऐसा विदित नहीं होता, दूसरे वे अपने निर्माण-काल के बहुत समय बाद तक मौन रहीं फिर उन्होंने बोलना शुरू किया और लम्बे समय के पश्चात एक बार पुनः मौन धारण कर लिया है। इतिहासकारों के अनुसार ईसा पूर्व 20वीं शताब्दी से लेकर सन् 196 तक यह मूर्तियाँ प्रत्येक सुबह नहीं तो कम-से-कम वर्ष में अनेक बार अवश्य बोलती थीं, किन्तु इसके उपरान्त यह एकबार पुनः मौनव्रत का अनुपालन कर रही हैं और कब तक करती रहेंगी, यह अविज्ञात है।
मनन-की प्रतिमा कहा जाता है। इनकी सबसे बड़ी विशिष्टता यह है कि ये सूर्योदय अथवा इसके आस-पास विचित्र प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न करती हैं, इसी से यह पर्यटकों का आकर्षण केन्द्र बनी हुई हैं। सैलानी प्रायः फरवरी अथवा मार्च के महीने में नील नदी के किनारे इसीलिए इकट्ठे होते हैं, ताकि वे इन निर्जीव प्रतिमाओं की सजीव आवाजें सुन सकें, किन्तु विचित्रता यह है कि अब तक जितने लोगों ने इनकी बोलियाँ सुनी हैं, सभी ने उसे भिन्न-भिन्न प्रकार की ध्वनियाँ बतायी हैं। इन पर्यटकों में स्ट्रबो, प्लीनी, पाउसेनियस, जुवेनल, विलकिन्सन जैसे ख्याति प्राप्त तत्कालीन पुरातत्ववेत्ता भी सम्मिलित हैं। स्ट्रबो के अनुसार इनकी आवाज हवा के हल्के झोंके अथवा घूँसे के प्रहार से मिलती-जुलती हैं।
मनन के प्रस्तर विग्रह अचानक एक बार पुनः मुखर हो उठे थे। इसके पश्चात अधुनातन समय में फिर किसी ने इनकी बोलियाँ नहीं सुनीं, और न ही इस संबंध में कोई लिखित रिकार्ड पाया गया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-January
मनन के अंतर्गत किया जाता है। चिन्तन का तात्पर्य है भूतकाल की भूलों को सुधारना और वर्तमान की सार्थकता पर कड़ी नजर रखना। मनन कहते हैं- भावों योजनाओं का निर्धारण और उन्हें पूरा करने के लिए योजनाबद्ध क्रिया -कलाप का निर्धारण। यह चिन्तन-मनन थोड़ा समय हर दिन निकाल कर करते रहना चाहिए, ताकि संयम साधना में कहीं चूक न होने पावे। इसे साप्ताहिक रूप में तो विशेष तत्परतापूर्वक अपनाया जाना चाहिए।
मनन यह चार मानसिक संयम हैं। इनके लिए साप्ताहिक उपवास के दिन न्यूनतम दो घण्टे नियत रखने की व्यवस्था करनी चाहिए। कौन सा समय किसे सुविधा-जनक पड़ता है, यह देखना व्यक्ति विशेष का काम है। प्रातःकाल सुविधा न रहती हों, तो कोई अन्य समय चुना जा सकता है। एकान्त स्थान घर में भी हो सकता है और बाहर खेत, पार्क उद्यान आदि में भी हो सकता है।
मनन करने से पता चलता है कि अर्जुन को कोई शरीर कष्ट न था। कष्ट था मानसिक कारण से बनी सामने आयी परिस्थिति। उसने भी पहले बाह्य परिस्थिति का विवेचन करके निर्णय लिया भाग चलो। पलायन वाद का जामा सिर्फ इसलिए ओढ़ा गया क्योंकि विचार प्रणाली दोष पूर्ण थी। भगवान गुरु ने इसे सुधारा “आत्मन् विद्धि” उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत” अर्थात् विचार न कर पाने के दोष स्वयं की सत्ता को निरन्तर अवसाद में मत डालो।
मनन कहते हैं- भावों योजनाओं का निर्धारण और उन्हें पूरा करने के लिए योजनाबद्ध क्रिया -कलाप का निर्धारण। यह चिन्तन-मनन थोड़ा समय हर दिन निकाल कर करते रहना चाहिए, ताकि संयम साधना में कहीं चूक न होने पावे। इसे साप्ताहिक रूप में तो विशेष तत्परतापूर्वक अपनाया जाना चाहिए। इसे अध्यात्मवादी जीवन का प्रारंभिक पाठ समझा जाना चाहिए।
मनन कर्ता बनता है। जिससे उसका चरित्र समाज में सामान्य समाज पुरुष की अपेक्षा सदैव ऊँचा बना रहे, तभी वह अन्य लोगों पर अपने चरित्र का प्रभाव डाल सकता है। वह अपनी भावनाओं से जन-जन के हृदय में अपना स्थान बना लेता है। घर-घर अलख जगाने की प्रक्रिया संपन्न करता है। तभी तो समाज उसके पदचिह्नों पर चलता है तथा उसे भरपूर सम्मान भी देता है।
मनन थोड़ा समय हर दिन निकाल कर करते रहना चाहिए, ताकि संयम साधना में कहीं चूक न होने पावे। इसे साप्ताहिक रूप में तो विशेष तत्परतापूर्वक अपनाया जाना चाहिए। इसे अध्यात्मवादी जीवन का प्रारंभिक पाठ समझा जाना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-May
मनन चिन्तन करेंगे। यह सत्र अनेकानेक दृष्टियों से विशिष्ट होगा। ब्रह्मबीज के विस्तार तथा भारतीय संस्कृति के निर्धारणों संबंधी विभिन्न पक्षों पर एक विश्वविद्यालय स्तर की संस्था के निर्माण व स्वरूप पर भी इन्हीं दिनों चर्चा की जाएगी। पर्यटन में रुचि रखने वाले परिजनों के लिए इन दिनों न आना ही ठीक होगा। जो विशिष्ट उद्देश्यों के लिए पूज्यवर को सही अर्थों में श्रद्धासुमन अर्पित करना चाहते हों, वे अभी से आवेदन पत्र भेजकर अपना स्थान सुरक्षित करा लें।
मनन करने में लग गया था। अब उसे बोध हो गया था कि कैसे वह अपने पथ से विचलित हो गया था। सही समय पर आकर गुरु ने उसे मार्ग दर्शन न दिया होता तो संभवतः अपने ही अहंकार से चूर वह लक्ष्य से भटक कर न जाने किधर चल दिया होता। व्यवहारिक जीवन जीते हुए, संघर्ष करते हुए, दुखों का सामना करते हुए जो तपकर कुन्दन की तरह दमकता है, वही सही अर्थों में तपस्वी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-October
मनन कीजिए वायु को निकालने में प्रायः उतना ही समय लगाना चाहिए जितना खींचने में लगा था।
मननीय है। उनके लिए पृथक-पृथक गायत्री मंत्रों का प्रावधान नहीं है, जो ऐसा बताते है,वह उनकी मनगढ़न्त मान्यता है। वस्तुतः गायत्री का शुद्ध स्वरूप उतना ही है, जितना गायत्री परिवार के लोग जपते और जानते है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-June
मनन करना चाहिए। हजार बार सोचना चाहिए कि क्या हमारा जीवन प्रभु की इच्छाओं पर चलने वाला जीवन है? हमें जो विभूतियाँ मिली थीं, सामर्थ्य मिली थीं, उन्हें क्या हम मानव जीवन और भगवान के उद्देश्यों के अनुरूप खर्च कर रहे हैं या हम पेट के गुलाम होकर ही जी रहे हैं। जो इन्द्रियाँ हमारे पास हैं, जिन्हें हम दुनिया में शान्ति और सुविधा उत्पन्न करने में खर्च कर सकते थे, क्या हम उन्हें पतन के लिए खर्च नहीं कर रहे? इन तीनों प्रश्नों पर आज हमें तीन हजार बार विचार करना चाहिए।
मनन-चिन्तन करने वाले क्रान्तिदर्शी ऋषि-वैज्ञानिक होते हैं। विज्ञान व अध्यात्म का समन्वय स्थापित करने वाले ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के संस्थापक परम पूज्य गुरुदेव को इस के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। इस विशिष्ट ग्रह स्थिति से इच्छा मृत्यु का वरदान भी प्रमाणित होता है जो दो जून 1990 की (गायत्री जयन्ती की) निर्वाण दिवस की कुण्डली से स्पष्ट हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-December
मनन के बाद चाणक्य इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे। ‘धी’ अपने विशुद्ध रूप में ऋतम्भरा है। परन्तु अनुभूति करा पाना किसी व्यक्ति के बूते की बात नहीं। तुम कुछ काल यहाँ निवास करो और अपने को शान्त बनाकर उनकी कृपा पाने की चेष्टा करो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-July
मनन का प्रभाव अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करने की दृष्टि में बहुत अंशों में सफल हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-April
मनन और पाँच ज्ञानेन्द्रियों के समूह के मिलने से बनता है। इसे इच्छाशक्ति कह सकते हैं। बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियों का समन्वय विज्ञानमय कोश है। यह ज्ञान शक्ति है। इसी प्रकार कारण रूप अविद्या में रहने वाला, रज और तम से मलिन सत्व के कारण मुदित वृत्ति वाला आनन्देच्छुक कोश आनन्दमय कोश है।
मनन से उत्पन्न करता है, इसका समाधान प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा है कि ऐसे व्यक्ति उन कारणों का पता लगाकर प्रयास करने पर स्वयमेव इस स्थिति से छुटकारा पा सकते हैं। विचारों को विचारों से काटा जाता है। उदासीनता के स्थान पर शान्ति और समस्वरता उत्पन्न करने वाले सृजनात्मक विचारों को आमंत्रित करना चाहिए तथा ऐसी रीति-नीति अपनाना चाहिए जो ध्यान बँटा सके, उत्साह बढ़ा सके। जीवन लक्ष्य सामने होने एवं सतत उसके उज्ज्वल पक्ष की ओर दृष्टिपात करते रहने से क्रियाएँ भी तद्नुरूप चल पड़ती हैं। सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य को समाज के अधिक समीप होना चाहिए अर्थात् उसे सामाजिक उत्तरदायित्वों, जिम्मेदारियों को अधिक सजगतापूर्वक वहन करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-September
मनन करने योग्य और अनुभव करने योग्य है। अपने आपको-आत्मा को-जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है। यही अमरत्व का साधन है-यह आत्म- कल्याण का मार्ग है।
मनन्तानाँ सुखानाँ कोषमालिका।” -योगवाशिष्ठ 4/23/4 और 18
मनन्तानाँ दुःखाना कोषमालिका। ज्ञस्यत्वियमनन्तानाँ सुखानाँ कोषमालिका।” -योगवाशिष्ठ 4/23/4 और 18

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-April
मनन और वार्तालाप नहीं करते। उससे पढ़े हुये का प्रभाव जीवन में स्थायी नहीं हो पाता। यदि पुस्तकों के सार जीवन में उतारने की प्रक्रिया लोग सीख जायें तो सामार्न्यासी परिस्थितियों में ही हर व्यक्ति उत्कृष्टता क चरम बिन्दु तक पहुँच सकता है। पुस्तकें गौघृत और दुग्ध के समान पौष्टिक आहर है। जो मन, बुद्धि, आचार-विचार, तक व विवेक को परिपुष्ट करके आत्मोत्थान का उज्ज्वल पथ-प्रशस्त करती हैं।
मनन से सत्साहित्य पड़ने से, सज्जनों के साथ रहने, उनके अभिवचन सुनने एवं कार्य-कलाप देखने से विद्या का आविर्भाव होता है।
मनन के लिए तो विशेष रूप से एकान्त की ही आवश्यकता पड़ती है। आत्मानुसंधान में निरत योगाभ्यासी प्रायः एकान्त वन, पर्वतों की कन्दराओं में रहकर अपने प्रयोग सफलतापूर्वक सम्पन्न करते थे। अभी भी वैज्ञानिक अन्वेषणों के लिए प्रयोगशालाएँ ऐसे ही स्थान और वातावरण में बनी होती है जहाँ बाह्य विक्षेपों का प्रभाव कम से कम पहुँचे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-January
मनन चिंतन की सारी प्रक्रिया इसी पर घूमती है। योग साधना एवं तपश्चर्या के विभिन्न उपचार इसी क्षेत्र में विभूतियां उत्पन्न करने के लिए किये जाते हैं। ऋद्धि-सिद्धियों का चमत्कारी और विभूतियों का स्वर्ग एवं मुक्ति का- आत्म साक्षात्कार ब्रह्म साक्षात्कार का यही क्षेत्र है।
मनन, निदिध्यासन भी चाहिए।’
मनन करता है वही सच्चा मुनि है--धम्मपद (धम्मदृवग्गो)

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-November
मनन कर के उनका समन्वित निचोड़, धर्म प्राण जनता एवं सुधि-बुद्धि जीवियों के लिए सुलभ किया है।
मनन का परिचय दिया है। उनकी कृतियाँ चाहे वे रामचरित मानस से प्रगतिशील प्रेरणा की हों या भारतीय संस्कृति का विश्व की “अजस्र अनुदान” वैचारिक क्रान्ति की दृष्टि से अपना अलग अलग महत्वपूर्ण एवं स्थान रखती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-July
मनन। यही बात गाँधी जी अपने ढंग से इस प्रकार कहते थे- “तपस्या जीवन में सरल सौंदर्य की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है।” इस प्रकार गाँधी जी की दृष्टि में तपस्वी होना ही सचमुच सुन्दर होना है।
मनन”। स्पष्ट है कि यह सुन्दरता बाहरी नहीं हो सकती। सत्य और शिव ही सुन्दर है इसीलिये सुन्दरता के मनन का अर्थ है-सत्यं और शिव का मनन। यही बात गाँधी जी अपने ढंग से इस प्रकार कहते थे- “तपस्या जीवन में सरल सौंदर्य की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है।” इस प्रकार गाँधी जी की दृष्टि में तपस्वी होना ही सचमुच सुन्दर होना है।
मनन। आत्म-चिन्तन द्वारा अपनी समीक्षा आप ही करनी चाहिए। जैसे प्रयोगशाला में पदार्थों का वर्गीकरण कर उनकी संरचना के तत्वों को देखा-परखा जाता है, उसी प्रकार अन्तःकरण की प्रयोगशाला में चिन्तन-प्रक्रिया द्वारा अपनी भीतरी स्थिति का वर्गीकरण कर उसे देखा -परखा जाता है। गुण-कर्म-स्वभाव की स्थिति और प्रकृति समझी जाती है। उनका आदर्श स्वरूप क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है, यह विचारपूर्वक निर्धारित किया जाता है।
मनन का अर्थ है-सत्यं और शिव का मनन। यही बात गाँधी जी अपने ढंग से इस प्रकार कहते थे- “तपस्या जीवन में सरल सौंदर्य की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है।” इस प्रकार गाँधी जी की दृष्टि में तपस्वी होना ही सचमुच सुन्दर होना है।
मनन करना आवश्यक है। मनन से कर्त्तव्यों का स्मरण रहेगा। आत्म-निर्माण की दिशा याद आती रहेगी और अपना संकल्प भी प्रबल बना रहेगा। तभी आत्मविकास सम्भव होगा।
मनन करना, उस हेतु निर्धारित उपायों को अपनाना और अभीष्ट दिशा में जीवन-क्रम को ढालते जाना साधना का अगला चरण है। यह कठिन कार्य यों ही नहीं हो जाता। एक तो आत्म- समीक्षा ही कठिन है। अपने दोष देखने की सामान्यतः व्यक्ति में प्रवृत्ति नहीं होती। वैसी प्रवृत्ति अपनाना सरल नहीं है।
मनन से कर्त्तव्यों का स्मरण रहेगा। आत्म-निर्माण की दिशा याद आती रहेगी और अपना संकल्प भी प्रबल बना रहेगा। तभी आत्मविकास सम्भव होगा।
मनन, ध्यान, कल्पना, योजना, निष्कर्ष, निश्चय आदि क्रियाएँ वह अपने आप अकेला ही कर लेता है। चलना-फिरना, खाना-पीना, देखना, सुनना, बोलना जैसे कार्य उसे इन्द्रियों की सहायता से कराने पड़ते है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-March
मनन कर अपने जीवन को वैसे ही बनाने का प्रयत्न करना चाहिये। तभी उसका पूर्ण लाभ है”।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-May
मनन चिन्तन आदि के द्वारा अपनाया जाता है। धर्मानुष्ठानों के सहारे उसे अभ्यास में उतारा जाता है। यह वैयक्तिक प्रयत्न हुए। सामूहिक एवं सुसंगठित रूप से उसे जनमानस में जगाने और जमाने के लिए जो कारगर उपाय ढूंढ़े गये हैं उनमें तीर्थ प्रक्रिया का असाधारण स्थान है उनमें चलने वाली गतिविधियों की प्रतिक्रिया बनाने के लिए अतीत के गौरव भरे इतिहास में प्रामाणिक साक्षी के रूप में पढ़ा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-February
मनन अंतर्दर्शन, अन्तःअवलोकन कर अभ्यास नहीं रहा, तो ईश्वरानुभूति कठिन होगी ही।
मनन तो उपयोगी है ही, “रामचरित मानस” जैसा लोकोपयोगी ग्रन्थ उस तत्वज्ञान को समझने का एक सर्वसुलभ उपकरण है। तुलसीदास जी ने ‘मानस’ के प्रारम्भ में ही, मंगलाचरण के द्वितीय श्लोक में इसकी स्पष्ट व्याख्या की है-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-September
मनन एवं शास्त्रों का सत्संग इसी निमित्त किया जाता है। यह अध्यात्म विद्या का तत्त्वदर्शन वाला पक्ष हुआ, जिसमें मान्यताओं की श्रद्धा-तर्क के आधार पर मान्यताओं से काट की जाती है।
मनने लगता है। चिनगारी से आग और आग से दावानल बन जाता है। बुरे-भले सब तरह के लोग उसके प्रभाव में आते हैं। कीचड़ और दलदल में भी आग लग जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-November
मनन-चिंतन द्वारा साधना को सींचा जाता है। उसके उपरान्त उसे सस्ती प्रशंसा लूटने के लिए दिखाये जाने वाले चमत्कारों से बचाया जाता है। सिद्धियों को लोभ-मोह के उथले प्रयोजन पूरे करने में भी खर्च किया जा सकता है अपने को तथा दूसरों को आत्म-कल्याण की दिशा में प्रेरित करने के लिए भी उसका उपयोग हो सकता है। स्वल्प श्रम में अधिक भौतिक सफलताएँ पाना कर्म विज्ञान के विपरीत है। उसके लिए यदि मन्त्र शक्ति का प्रयोग किया जाएगा तो वह देर तक टिक न सकेगी और उसी खिलवाड़ में नष्ट हो जाएगी।
मनन चिंतन करके अध्यात्म और धर्म का अति महत्वपूर्ण कलेवर खड़ा किया है। उसे जन मानस में प्रविष्टि कराने के लिए अगणित साधु ब्राह्मणों ने तिल-तिल करके अपना जीवन जलाया है। अगणित धर्मग्रंथ लिखे गये हैं और उन्हें पढ़ने, सुनने, समझने तथा हृदयंगम करने की स्थिति उत्पन्न करने के लिए अगणित मानवतावादी परम्पराओं या रीति-रिवाजों प्रक्रियाओं, पूजा-पद्धतियों एवं कर्मकाण्डों का प्रचलन किया है। लगातार उस विचारधारा से सम्पर्क बनाये रखने के लिए उन्होंने धर्म एवं अध्यात्म का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-July
मनन करते हुए हठात लगा की भीतर एक ऐसा आलोकन है कि बाहर का अवलोकन अनावश्यक हो गया हैं। वे एक ऐसे अन्तरसुख में मगन हो गये कि उन्हें कैवल्य और मोक्ष की भी कामना न रही।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-January
मनन के बाद हम एक निष्कर्ष पर पहुँचें है और मनन के बाद हम एक निष्कर्ष पर पहुँचे है और बिना लाभ-लपेटे, दिपाव व दुराव के अपनी स्वतन्त्र नीति-निर्धारण करने में समर्थ हुए हैं हम सीधे राजनीति को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका संपादित करेंगे और यही अन्त तक करते रहेंगे। अपना संगठन यदि अपने प्रभाव और प्रकाश को सर्वथा तिरस्कृत नहीं कर देता तो उसे भी इसी मार्ग पर चलते रहना होगा।
मनन के बाद हम एक निष्कर्ष पर पहुँचे है और बिना लाभ-लपेटे, दिपाव व दुराव के अपनी स्वतन्त्र नीति-निर्धारण करने में समर्थ हुए हैं हम सीधे राजनीति को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका संपादित करेंगे और यही अन्त तक करते रहेंगे। अपना संगठन यदि अपने प्रभाव और प्रकाश को सर्वथा तिरस्कृत नहीं कर देता तो उसे भी इसी मार्ग पर चलते रहना होगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-August
मनन व अवधारण करने को प्रस्तुत हों, ताकि उसकी ऊर्जा से अनुप्राणित होकर हम राष्ट्र के, स्वधर्म के प्रति जागरूक हो सकें और अपसंस्कृति के मोहक, कुटिल रूप, छद्म व्यूह जाल को तहस-नहस कर अपनी आध्यात्मिक, साँस्कृतिक एवं भौतिक प्रगति के पथ पर आगे कदम बढ़ा सकें और अंधेरे में भटकते समूचे विश्व को प्रकाश पथ दिखला सकें व पुनः अपने उसी राष्ट्रीय गौरव पर प्रतिष्ठित हो जाए, जिसकी कल्पना हम सबने आज से पचास वर्ष स्वतन्त्रता मिलने पर की थी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-October
मनन, चिंतन से परब्रह्म की प्राप्ति होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-April
मनन करना चाहिए। यह प्रक्रिया हर कार्य अथवा किसी विशेष कार्य को करने से पहले की जाय तो ओर भी अच्छा। इस क्रम में धीरे-धीरे हमारा दृष्टिकोण उनके अनुरूप ढल जाएगा और वे विचार हमें अन्दर से सहायता करते रहेंगे। प्रसिद्ध मनोचिकित्सक एमिल कू ने इसे ही ‘काँशियस आटोसजेशन’ का नाम दिया है।
मनन, चिन्तन द्वारा श्रेष्ठ विचारों को जानकर, समझकर उन्हें आत्मसात कर सकते हैं। इसके लिए हर रोज अपनी दिनचर्या शुरू करने से पहले कतिपय श्रेष्ठ वैचारिक सूत्रों का मनन करना चाहिए। यह प्रक्रिया हर कार्य अथवा किसी विशेष कार्य को करने से पहले की जाय तो ओर भी अच्छा। इस क्रम में धीरे-धीरे हमारा दृष्टिकोण उनके अनुरूप ढल जाएगा और वे विचार हमें अन्दर से सहायता करते रहेंगे। प्रसिद्ध मनोचिकित्सक एमिल कू ने इसे ही ‘काँशियस आटोसजेशन’ का नाम दिया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-February
मनन भी वर्जित होगा, उनकी तस्वीर और छवि से अपने आप को दूर रखना होगा। यह शर्तें जिन्हें स्वीकार हुईं, वे ही वहाँ रह सके, शेष वापस चले गये। संहिता में इस बात का भी प्रावधान रखा गया कि यदि बात का भी प्रावधान रखा गया कि यदि कभी अकस्मात् किसी नारी-मूर्ति से आमना-सामना हो जाय, तो तत्काल अपने को आड़ में करना पड़ेगा। स्वयं को छिपाने के लिए और नारी-दर्शन से बचने के लिए वहाँ के प्रत्येक व्यक्ति को सिर में अरबों जैसा एक दुपट्टा बाँधना अनिवार्य होता है। अन्तर सिर्फ इतना है कि अरबों का दुपट्टा सिर के पीछे पीठ पर लटकता रहता है, जबकि इनका चेहरे के सामने पर।
मनन वाला। पाँडित्य पूर्ण विचार में हम एक विषय को अनेकानेक पहलुओं पर ध्यानाकर्षित किया करते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे कुशल जौहरी एक हीरे को विभिन्न दृष्टिकोणों से खरीदता है। इसमें भी वही समीपता का काम करता है, अन्तर मात्र इतना भर है कि अभ्यस्त एवं परिष्कृत मन प्रयोजन केन्द्रित उड़ाने भरता है और अनभ्यस्त-अनगढ़ मन निष्प्रयोजन। सधे निग्रहित मन और बिना सधे मन में जमीन-आसमान का अन्तर होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-March
मनन करते रहने से मन पर शिव संस्कारों की स्थापना होती है, जिससे चित्त अपने आप दुष्कृत्यों की ओर से फिर जाता है। स्वाध्यायी व्यक्ति पर कुसंग का प्रभाव नहीं पड़ने पाता इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है। जिसकी स्वाध्याय में रुचि है और जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय तो स्वाध्याय में ही तो लगाता है। इसलिए उनके पास को फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा तथा दूषित वातावरण अवांछनीय तत्व ग्रहण कर लायेगा।
मनन नहीं करता है और सोच लेता है कि जब मैं इतना क्रियाकाण्ड करता हूँ तो इसके बाद अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, आत्म ज्ञान अथवा परमात्मा विभूति करा देने के लिए इतना ही पर्याप्त है तो निश्चय ही भ्रम में है। आत्मा का क्षेत्र वैचारिक क्षेत्र है, सूक्ष्म भावनाओं और मनन चिंतन का क्षेत्र है।
मनन चिंतन का क्षेत्र है।
मनन भी किया जाये तो बहुत कुछ उस दिशा में बढ़ा जा सकता है। स्वाध्याय स्वयं ही एक तप, आसन और निर्दिष्टयासन के समान है। इसका नियम निर्वाह करने से आप ही आप अनेक नियम, संयमों का अभ्यास हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-July
मनन पर आधारित ग्रंथ है।
मनन सबके लिए सुलभ है। उसके द्वारा अल्प प्रयास से ही वेदों का मुख्य तत्व प्राप्त किया जा सकता है।
मनन और निदिध्यासनरूपी तीन चरणों का उल्लेख मिलता है। मोक्ष की कामना करने वाला गुरु, ग्रंथों तथा महापुरुषों से सदा ब्रह्म के विषय में बारंबार श्रवण करे। इसके विषय में श्रद्धापूर्वक मनन-चिंतन करे, क्योंकि यही ब्रह्म ही एकमात्र मननीय व चिंतनीय है।निदिध्यासन ध्यान का पर्याय है। इस अवस्था में साधक गुरु द्वारा ज्ञान व साधना में लीन हो जाए।
मनन-चिंतन करे, क्योंकि यही ब्रह्म ही एकमात्र मननीय व चिंतनीय है।निदिध्यासन ध्यान का पर्याय है। इस अवस्था में साधक गुरु द्वारा ज्ञान व साधना में लीन हो जाए। उसे संकल्पपूर्वक अपनी समस्त दुर्बलताओं को त्यागकर संयम द्वारा साधना के पथ पर आरुढ़ होना चाहिए। यही उपनिषद् की पावन व दिव्य शिक्षा है, जिसे अपनाकर हम अपने आँतरिक विकास के साथ-साथ नैतिकता तथा उच्च मानवीय मूल्यों का भी संवर्द्धन कर सकते है।
मनन-चिन्तन करना, इन्हें क्रियान्वित करना आपका परम कर्त्तव्य है। ध्यान रहे यदि आपके अन्तःकरण में गुरु-प्रेम की दीवानगी हिलोरे मार रही है- तो यह साधना पथ आपके लिए है। यह साधना केवल उनके लिए है जिन्हें अपने प्यारे गुरुवर के बिना रहा नहीं जाता। जो अपने अस्तित्त्व को सद्गुरु की चेतना में समर्पित-विसर्जित और विलीन कर देना चाहते हैं। शिष्य संजीवनी की यह महाऔषधि उनके लिए है- जो श्रेष्ठ शिष्यों की अग्रिम कतार में खड़ा होना चाहते हैं।
मनन द्वारा अपने चारों ओर एक उच्चतर वातावरण तैयार किया जाए। क्रमशः यह आदत व्यक्तित्व के भावनात्मक ढाँचे के रूपांतरण में एक महत्त्वपूर्ण कारक बन जाता है।
मनन योग्य है। वह कहते थे- गायत्री साधना के चमत्कार अनुभव करने हैं- तो मन को इधर-उधर मत भटकावों, अधिक नहीं तो अनुष्ठान के नियमों का पालन करते हुए 24-24 हजार के अनुष्ठान करते रहो। समर्पित भाव श्रद्धा के साथ की गई निरन्तर, निष्ठापूर्वक और लम्बे समय की साधना के परिणाम में गायत्री महामंत्र तुम्हें सब कुछ दे देगा। इस साधना में भाव श्रद्धा कैसी हो इस बारे में गोस्वामी जी महाराज के वचन है-
मननीय व चिंतनीय है।निदिध्यासन ध्यान का पर्याय है। इस अवस्था में साधक गुरु द्वारा ज्ञान व साधना में लीन हो जाए। उसे संकल्पपूर्वक अपनी समस्त दुर्बलताओं को त्यागकर संयम द्वारा साधना के पथ पर आरुढ़ होना चाहिए। यही उपनिषद् की पावन व दिव्य शिक्षा है, जिसे अपनाकर हम अपने आँतरिक विकास के साथ-साथ नैतिकता तथा उच्च मानवीय मूल्यों का भी संवर्द्धन कर सकते है।
मनन करें।
मनन मन की प्रसुप्त आध्यात्मिक शक्तियों को जगाता है और इस तरह आध्यात्मिक जीवन दर्शन को दैनन्दिन गतिविधियों में अभिव्यक्त होने का अवसर मिलता है। इस अभ्यास द्वारा व्यक्ति की इच्छा शक्ति का विकास होता है। इच्छा शक्ति के अभाव में वह आदर्श को व्यवहार में जीवन्त नहीं कर सकता। यह एक सहज नियम है कि बिखराव से ऊर्जा का क्षय होता है और एक बिन्दु पर केन्द्रित होने पर यह अत्यन्त शक्तिशाली बन जाती है। सामान्यतया मानसिक शक्ति विविध भाव संवेगात्मक वृत्तियों, अभिरुचियों और गतिविधियों में बिखरी रहती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-November
मनन्तोअहं चिरन्तनः॥490॥
मनन करना होगा। यदि आप ऐसा कर रहे हैं तो निश्चित मानिये कि आपके अपने जीवन में योग अनुभूतियों के द्वार बस खुलने ही वाले हैं।
मनन चिंतन से बचना चाहिए। रोगी को पथ्य में शीघ्र पचने वाले हलके तथा ठंडे आहार देना चाहिए। जौ, गेहूँ का दलिया, मूँगदाल, पुराने चावल की खिचड़ी, पतली रोटी, डबल रोटी, हरा शाक, पालक, चौलाई बथुआ, तोरई घिया की सब्जी, बकरी या गाय का दूध, दूध की लस्सी, नींबू का शर्बत, नारियल के पानी का सेवन इस रोग में हितकारी है। पथ्य परहेज युक्त संयमित जीवनचर्या स्वास्थ्य रक्षा के स्वर्णिम सूत्र है, इन्हें ध्यान में रखा जाना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-August
मनन ज्यों-ज्यों प्रगाढ़ होगा, त्यों-त्यों हमारी चेतना द्वितीय सूत्र के लिए तैयार हो जायेगी। यह द्वितीय अखण्ड ज्योति के लिए अगले माह के पृष्ठो में स्वयमेव प्रकट होगा। तब तक प्रथम सूत्र की साधना का क्रम बना रहे।
मनन-चिंतन करने वे साधना जीवन की अनेकों समस्याओं का समाधान होता है। साधना पथ पर बिखरे हुए अनगिन कंटक अपने आप ही दूर हो जाते हैं। नये-नये साधना रहस्यों का मर्म अंतर्दृष्टि में उजागर होता है। अन्तर्यात्रा की दुरुहता-जटिलता स्वयं ही सुगम हो जाती है। यह अनुभव किसी अकेले एक का नहीं, बल्कि उन अनगिनत साधकों का है, जो दृढ़ निष्ठ होकर संकल्पित एवं समर्पित भाव से साधनारत हैं।
मनन करने वाला,) जो इच्छा, भय, क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है।
मनन करने वाला ही मुक्ति का, ध्यान की सफलता का, परब्रह्म से साक्षात्कार का सही अधिकारी है, परंतु यह श्लोक श्रीकृष्ण का अंतिम वाक्य नहीं है इस अध्याय में। आखिरी बात, परम वचन तो उस महावाक्य के रूप में है, जो अंतिम उनतीसवें श्लोक के रूप में अभिव्यक्त हुआ है। सारे कर्मयोग का मर्म बताता है तथा पुरुषोत्तम के स्वरूप को स्पष्ट करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-February
मनन, अपने स्तर पर अपने यहाँ छोटा दीपयज्ञपरक आयोजन, संगठन−सशक्तीकरण की दिशा में आत्ममंथन एवं विद्याविस्तार के निमित्त हमारे सुनिश्चित संकल्प, इन चारों को पूरा करने के निमित्त मनाया जाए, तो ही हमारी गुरुसत्ता के प्रति समर्पण की सार्थकता है।
मनन और निदिध्यासन के लिए बरबस प्रेरित किया।
मनन और इनका आचरण साधकों के लिए राजमार्ग है। साधना का यह पथ बड़ा ही सरल, सुगम और निरापद है। श्री रामकृष्ण परमहंस देव के अनेक शिष्य थे। उनमें से कई बहुत पढ़े-लिखे, विद्वान और तपस्वी थे। स्वामी विवेकानन्द जी महाराज की अलौकिक प्रतिभा से तो समूची दुनिया चमत्कृत रह गयी।
मनन व निदिध्यासन को भी उन्होंने अपनी साधना का एक अनिवार्य व अविभाज्य अंग मान लिया है। इस अपूर्व साधना ने उनके जीवन में कई अलौकिक अनुभूतियों व उपलब्धियों के द्वार भी खोले हैं। साधना पथ के इन प्रगति द्वारों का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। योग कथा की विगत कड़ी में आगत कड़ी कुछ यूँ जुड़ती रहेगी जैसे भक्त व भगवान् की भावनाएँ जुड़ती हैं, शिष्य और गुरु के हृदय जुड़ते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-September
मननशीलता एवं विचारशीलता ही उसकी नैसर्गिक विशेषता है। परन्तु विज्ञान ने इस नैसर्गिकता का हनन करके विष कुँभ पैदा किया है, जिसे न तो पीया ही जा रहा है और न छोड़ा। हम गहरे द्वन्द्व में उलझ गए हैं। सही एवं गलत के बीच निर्णय करने की भेद दृष्टि समाप्त हो गयी है। और इस उचित-अनुचित के निर्णयात्मक विचारों के अभाव में हम अनजाने-अनायास ही ऐसे विचारों के शिकार हो जाते हैं, जिन्हें हम पसन्द तक नहीं करते।
मनन-चिन्तन) जिन्होंने भी किया है- वे इसके औषधीय गुणों को अनुभव करने लगे हैं। अपने व्यक्तित्व में उन्हें नए परिवर्तन का अहसास हो रहा है। कुछ ऐसा लग रहा है- जैसे अन्तःकरण में कहीं शिष्यत्व की मुरझाई-कुम्हलायी बेल फिर से हरी होने लगी है। निष्क्रिय पड़े भक्ति एवं समर्पण के तत्त्वों को सक्रियता का नया उछाह मिल गया है। आन्तरिक जीवन में भावान्तर की अनुभूति उन सबको है- जो इस अमृत औषधि को ले रहे हैं।
मनन करने का मौका नहीं मिला। मनन ही मन का सर्वोपरी गुण है। आग की उष्णता एवं बर्फ की ठण्डकता के समान मन की मननशीलता एवं विचारशीलता ही उसकी नैसर्गिक विशेषता है। परन्तु विज्ञान ने इस नैसर्गिकता का हनन करके विष कुँभ पैदा किया है, जिसे न तो पीया ही जा रहा है और न छोड़ा। हम गहरे द्वन्द्व में उलझ गए हैं।
मनन एवं निदिध्यासन करते हुए हजारों-हजार योग साधक अपनी अन्तर्यात्रा के लिए चल पड़े हैं। यह यात्रा उन्हें नित-नयी रोचक, रोमाँचक एवं रहस्यमयी अनुभूतियों के वरदान दे रही है। हर बढ़ते पग पर उन्हें अहसास हो रहा है कि दिव्यलोक में तपोलीन महर्षि पतंजलि की सूक्ष्म चेतना उनके साथ है। और परम पूज्य गुरुदेव हर पल उनका हाथ थामे हैं। युगाचार्य स्वामी विवेकानन्द ने अलीपुर जेल की काल-कोठरी में महर्षि अरविन्द को अतिमानस का बोध कराया था।
मननशील मनीषी हैरान हैं, उन्हें सूझ ही नहीं रहा है कि आखिर हो क्या गया है? वे सोचने के लिए अवश-विवश हैं, परन्तु समाधान के सूत्र नजर नहीं आ रहे हैं। वे विचारते हैं कि आखिर बात क्या है? बात दरअसल यह है कि उनके उत्तर मरणासन्न हैं और प्रश्न जीवन्त हैं।
मनन, श्रेष्ठ पुस्तकों के स्वाध्याय द्वारा श्रेष्ठतम कर्म करते हुए अपनी जीवन यात्रा को आगे बढ़ाए। उसका इहलोक-परलोक दानों ही सध जाएंगे।
मनन, चिंतन का रस प्राप्त नहीं हो सकता। आत्मिक निर्बलता हो तो सत्संग, प्रेम, भक्ति आदि का आत्मानंद दुर्लभ हैं इतना ही नहीं, निर्बलों को मिटा डालने के लिए प्रकृति का ‘उत्तम की रक्षा’ सिद्धांत काम करता है। कमजोर को सताने और मिटाने के लिए अनेकों तथ्य प्रकट हो जाते हैं। निर्दोष, भले और सीधे-सादे तत्व भी उसके प्रतिकूल पड़ते है। सरदी, जो बलवानोँ की बलवृद्धि करती है, रसिकों को रस देती, वह कमजोरों को निमोनिया, गठिया आदि का कारण बन जाती है।
मनन एवं आचार-व्यवहार की देन है। अपर्याप्त नींद या अनिद्रा के कारण व्यक्ति की कार्यक्षमता तो घटती ही है, साथ-ही-साथ इसके अनेकानेक दुष्प्रभाव भी शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर स्पष्ट परिलक्षित होने लगते हैं। इससे त्रस्त व्यक्ति नींद लाने वाली गोलियों, नशीली दवाओं आदि का सहारा लेने लगता है। रोग का मूल कारण हटाए- मिटाए बिना व्याधि मिटती नहीं, वरन् नए एवं परिवर्तित रूपों में उभरती रहती है।
मनन ही मन का सर्वोपरी गुण है। आग की उष्णता एवं बर्फ की ठण्डकता के समान मन की मननशीलता एवं विचारशीलता ही उसकी नैसर्गिक विशेषता है। परन्तु विज्ञान ने इस नैसर्गिकता का हनन करके विष कुँभ पैदा किया है, जिसे न तो पीया ही जा रहा है और न छोड़ा। हम गहरे द्वन्द्व में उलझ गए हैं। सही एवं गलत के बीच निर्णय करने की भेद दृष्टि समाप्त हो गयी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-May
मनन एवं व्यवहार में रमाया हो, वही ऐसे आदर्श मृत्यु महोत्सव को प्राप्त कर सकता है। इस आदर्श देह-त्याग विधि को मनीषियों ने ‘सल्लेखना’ कहा है। जीवन रूपी इस प्रवाह में आये राग-द्वेष, लोभ-मोह, काम-क्रोध के प्रसंग कितने ही बने पर विवेकीजन प्राण-प्रयाण बेला में मात्र सत्य का ही चिंतन-मनन करते हैं, अपने आँखों के आगे उन्हीं उत्कृष्ट आदर्शों को उमड़ते-घुमड़ते देखते हैं। वे शरीर की अन्तिम विदाई में इस महानद का श्रवण करते हैं, महा सत्य का साक्षात्कार करते हैं। उनके मृत्यु काल में जैन दर्शन का ‘सल्लेखना’ शब्द घटित होता है, प्रकट होता है।
मनन योग्य है-
मनन करते हैं, अपने आँखों के आगे उन्हीं उत्कृष्ट आदर्शों को उमड़ते-घुमड़ते देखते हैं। वे शरीर की अन्तिम विदाई में इस महानद का श्रवण करते हैं, महा सत्य का साक्षात्कार करते हैं। उनके मृत्यु काल में जैन दर्शन का ‘सल्लेखना’ शब्द घटित होता है, प्रकट होता है।
मनन, चिंतन व निदिध्यासन से उनकी चेतना में अनेकों नये आयाम खुल रहे है। उन्हें यह तथ्य भली भाँति समझ में आ रहा है कि यह योगकथा केवल बौद्धिक विचार विन्यास नहीं है। इसमें शब्दों का नियोजन नहीं बल्कि महासाधकों की अनुभूतियों का समायोजन किया गया है। इस योगकथा की प्रत्येक पंक्ति अनुभूति रस में सनी-लिपटी एवं रची-बसी है। यह आमंत्रण पत्रिका है, उनके लिए जो अन्तर्यात्रा विज्ञान को समझना चाहते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-March
मननीय है। इनमें से छठवें मंत्र में ऋषि कहते हैं-‘यावयावृक्यं वृकं यवय स्तेनभूर्म्ये। अथा नः सुतरा भव’॥ 6॥ ‘हे रात्रिमयी चित्शक्ति! तुम कृपा करके वासनामयी वृकी तथा पापमय वृक को अलग करो। काम आदि तस्कर समुदाय को भी दूर हटाओ। तदन्तर हमारे लिए सुख पूर्वक तरने योग्य बन जाओ।
मनन किया जाएगा, उतना ही अपना विश्वास प्रचंड हो जाएगा एवं गुरुवर के विचारों की आग सतत सक्रिय बनाती रहेगी। मन उल्लसित, तनावमुक्त रहेगा।
मनन करने योग्य और अनुभव करने योग्य है। अपने आपको, आत्मा को जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है। यही अमरत्व का साधन है, यही आत्मकल्याण का मार्ग है।
मनन के द्वारा यह शक्ति जागृत होने लगती है और साधक को अपनी प्रकृति के अनुरूप अभीष्ट कर देती है। अपने सूक्ष्म भौतिक स्वरूप के अनुरूप यह अभीष्ट लौकिक मनोकामना को पूर्ण करते हैं और आध्यात्मिक प्रकृति के अनुरूप यह साधक के अन्तःकरण में वाँछित हेर-फेर कर मनोभूमि को इतना परिष्कृत करती है कि अभीष्ट ईश्वरीय चेतनधारा अवतरित हो सके और साधक के माध्यम से प्रवाहित हो सके। इस तरह मंत्र विश्व-ब्रह्मांडव्यापी सूक्ष्म एवं अलौकिक शक्तिधाराओं को स्फूरित कर अपने अनुकूल बनाने वाली विद्या है। यह एक ऐसी विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है जिससे शक्ति का उद्भव होता है। यह ज्ञान एवं प्रकाश का एक ऐसा पुञ्ज है जो जागृत होने पर अज्ञान, तमस एवं अंधकार का हरण करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-June
मननशीलता का होना जरूरी है, वहीं दिव्यता तक, परमात्मा तक पहुँचने के लिए मन का न होना यानि ‘अमनी भावदशा’ का उपलब्ध होना आवश्यक है।
मनन और धारण किया जाता है, ईश्वरीय सत्ता का बोध उतना ही निर्मल होता चला जाता है। उसके लिए न तो मनुष्य को कहीं अलग जाने की आवश्यकता है और न कुछ और अध्ययन की। गीता के नवें अध्याय में इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए भगवान कृष्ण ने कहा है-
मनन निदिध्यासन का क्रम बनाये रखें।
मनन और आत्म निर्माण के लिए चिन्तन अनिवार्य नित्य कर्म माना जाना चाहिए। सही मायने में यही प्रगतिशीलता है, आत्मोत्कर्ष है।
मनन करें, जिससे आध्यात्मिक विकास त्वरित गति से हो। मन को प्रशिक्षित करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। ज्ञान या विज्ञान के रूप में यही वह लक्ष्य है, जो जीवन को अर्थ देता है। वही ज्ञान वास्तव में मूल्यवान है, जो जीवन को परमात्मा की ओर ले जाता है।
मनन द्वारा आत्मतत्त्व, परमात्मतत्त्व को जानने का प्रयास करता है।
मनन-निदिध्यासन हो। और इस निदिध्यासन का फल है कि साधक को तत्त्वदृष्टि मिले, उसे ज्ञान हो। तथा ज्ञान का महाफल है कि उसे सद्गुरु के नाम की महिमा का बोध हो। उनके नाम में प्रीति जगे। उन्हें नमन का बोध जगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-April
मनन करें, तब आपको वह पद सौंपने का प्रसंग बनेगा।”
मननपूर्वक याद करने का प्रभाव दीर्घकालिक होता है, अतः स्मृति में रखने के लिए आवश्यक है कि याद करने वाली योग्य और अच्छी बातों को ही मन में रखा जाए और शेष को भुला दिया जाए। इससे मन पर दबाव एवं बोझ नहीं पड़ेगा और वह हलका तथा प्रसन्न रहेगा। ऐसा मन ही स्मरणशक्ति को दीर्घकाल तक बनाए रखता है।
मनन−चिंतन करने की बात कहकर टाल दिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-August
मनन किये हुए विचार ही जीवन रूपी सर्वोच्च परीक्षा में व्यवहृत एवं परीक्षित होकर धर्म बन जाते हैं। दर्शन का अभ्यास धर्माचरण की पूर्ति करना भी तो है।
मनन करने योग्य हैं। इसमें तो कुछ सन्देह ही नहीं कि कृत्रिम उपाय पूर्ण रूप से निर्दोष नहीं होते और उनसे प्रायः कुछ न कुछ हानि होती ही है। संयम का मार्ग उससे कहीं अधिक श्रेष्ठ है इसे मानने से भी कोई समझदार व्यक्ति इनकार नहीं कर सकते। फिर भी अगर हम कृत्रिम साधनों को थोड़े या अधिक अंशों में स्वीकार करें तो उसका एक मात्र कारण विवशता ही समझना चाहिए। कृत्रिम उपाय उन्हीं लोगों के लिए किसी हद तक क्षम्य माने जा सकते हैं, जो संयम करने की शक्ति नहीं रखते।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-February
मनन करने से धर्म का निश्चय किया जा सकता है (अनुशासन पर्व 162/7-8) धर्म का ज्ञान होने के तीन साधन हैं-वेद, अनुभव और परम्परागत आचार। पर इन तीनों में वास्तविक दृष्टि से कोई फर्क नहीं है। आचार केवल परम्परा से चले आये हैं, इसलिए प्रमाण नहीं है, उनके भी कारणों की छान-बीन करनी चाहिये (शान्ति. 262।54) धर्म अधर्म का निर्णय करने के लिए बुद्धि का अवलम्बन करना ही आवश्यक हैं (शान्ति. 141।102) बुद्धि से गलत ठहरने वाला शास्त्र वचन निरर्थक है (शान्ति. 141।
मननशील, निःस्वार्थी साधु लोग समाज के हित अथवा मनुष्यों के कल्याण को ध्यान में रखकर समय-समय पर धर्म-संस्थापना किया करते हैं, इन सात्विक बुद्धि के स्थित-प्रज्ञ साधुओं को ही धर्म-निर्णय और धर्म-परिवर्तन का अधिकार है। उनकी शुद्ध, सात्विक बुद्धि द्वारा ही यह निश्चय होता है कि समाज कल्याण कारी और श्रेयस्कर कर्म कौन से हैं। यद्यपि परलोक का स्वरूप निश्चित करना कठिन है, तथापि जो कर्म इहलोक में श्रेयस्कर हैं वही परलोक में भी श्रेयस्कर होंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-March
मनन किया, पर दोनों में से उन्हें कोई ठीक न जान पड़ा। तब उन्होंने संन्यास त्याग दिया और अपना एक नवीन सम्प्रदाय स्थापित किया जिसे ब्रह्मा सम्प्रदाय या पूर्ण यज्ञ के नाम से भी पुकारते हैं। इसमें विष्णु को जगत का नियन्ता बतलाया गया है। समस्त सृष्टि उन्हीं से उत्पन्न हुई है ओर वे ही जीवों को उनके शुभाशुभ कर्मों का फल देते हैं। परमात्मा तथा जीवात्मा दोनों अनादि हैं, किन्तु दोनों एक नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-October
मनन करें और इस घातक जाति-प्रथा को, जिसके कारण जन्म से ही किसी व्यक्ति को पतित और अयोग्य मान लिया जाता है, समाप्त करने या इसमें आवश्यकीय परिवर्तन करने को कटिबद्ध हो जायें। अन्यथा इस जाति को अभी और भी बुरे दिन देखने पड़ेंगे।]
मनन से मनुष्य की 40 भौतिक एवं साँसारिक कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं। वैदिक मंत्र विद्या की यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण पुस्तक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-April
मनन कर चुके हैं और उन्होंने इस सम्बन्ध में ‘सर्पेण्टाइल पावर’ नाम का बहुत बड़ा ग्रन्थ भी लिखा है जो आज भी सभ्य संसार में आदरणीय स्थान रखता है। हमारे देश के तो बहुसंख्यक व्यक्ति आज भी योगाभ्यास की कितनी ही क्रियाओं को करके लाभ उठाते रहते हैं और वे चाहें तो कुण्डलिनी योग द्वारा अपनी छठी इन्द्रिय को विकसित करके दूरदृष्टि द्वारा कुछ उपकार कर सकते हैं।
मनन न हुआ हो।
मनन, चिन्तन से काम चला सकती है, पर जिनकी वह भूमिका जागृत नहीं है, उस कोटि-कोटि जन समूह के लिये दृश्य आकर्षण युक्त देव-मंदिरों की आवश्यकता रहती है। लोग उन देवस्थानों की शोभा, विशालता, विचित्रता, विशेषता तथा समय-समय पर होते रहने वाले उत्सव आयोजनों को देखने कौतूहलवश जाते हैं, पर अन्ततः धर्म-बुद्धि के विकास का, भगवत् स्मरण का न्यूनाधिक अवसर वहाँ मिल ही जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-July
मनन करते रहने से भोग के दुर्भाग्य पूर्ण परिणाम दिखाई दे जाते हैं। धीरे-धीरे इनसे घृणा उत्पन्न होने लगती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-September
मनन -चिंतन।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-June
मनन करें-अमृतवाणी का।
मनन के द्वारा प्रकट होता है, और निदिध्यास अविद्या को निवृत्त करने में सफल होता है ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-August
मनन के कारण ही यह मार्ग ब्रह्मचर्य कहलाया।
मनन करना-इसे उपासना को सफलता का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-May
मनन का अध्यवसाय भी दिशा निर्धारण कर सकता है। पर उपयुक्त वातावरण में अभीष्ट ऊर्जा उपलब्ध करने का महत्व भी कम नहीं है। इसलिए समय के अनुरूप अपनी गतिविधियों को उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने के लिए इन सत्रों में सम्मिलित होने के लिए कहा गया है। व्रतधारी को अपनी परिस्थिति के अनुरूप भावी कार्यक्रम बनाने में अधिक सुविधा रह सकती है। वैसे कुछ विचार विमर्श तो पत्र व्यवहार से भी संपन्न हो जाता है।
मनन-चिंतन और लेखन-संकलन में ही लग रहते। अपनी संस्कृति को जीवित करने को उनकी अदम्य भावना ने स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं देने दिया। आयु जैसे-जैसे ढलती गयी वैसे-वैसे उनका शरीर ही निर्बल नहीं होता गया वरन् पीठ में कूबड़ भी निकल आया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-April
मनन जैसे उपाय अपनाने पड़ते हैं। जीवन का दूसरा पक्ष है चरित्र। इसे क्रिया कृत्य या कर्मकाँड भी कहते हैं। दुष्प्रवृत्ति का निरोध और सत्प्रवृत्तियों का अभ्यास ही वह अन्तःक्षेत्र का साहस भरा पराक्रम है, जिसे तप कहा जाता है। तप अर्थात् संयम अनुशासन।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-November
मनन चिंतन अध्ययन करने पर ही पड़ता है पर चित्र तो देखने मात्र से प्रभावित करते हैं। अपने घर में समझ बूझ के साथ चित्र लगायें, ऐसी प्रेरणा सबको मिले इसी में समय को समझदारी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-December
मनन आदि का आश्रय लेना पड़ता है। अच्छे वातावरण और संपर्क के साथ जुड़ना हो तो दुष्प्रवृत्तियां खर पतवार की तरह हर खेत में उगी रहती हैं थ्ब्न्ज्ञ प्ज्ञन्भ् क् भी हरियाली है। जलकुँभी की तरह उन्हें कभी भी जलाशय में छा जाने में देर नहीं लगती। व्यक्तियों का समुदाय अवाँछनीय प्रवृत्तियों से भरा पड़ा है। कुकृत्यों का सर्वत्र प्रचलन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-October
मनन। अपने दोष, गुणों को सूक्ष्म दृष्टि में देखना-परखना अपनी मान्यताओं, आकाँक्षाओं, अभिरुचियों को आदर्शवाद की कसौटी पर कसना यही है चिंतन। इसे रोग का निदान कह सकते हैं। निदान के उपराँत ही चिकित्सा बन पड़ती है। आत्म परिष्कार के समस्त पक्षों पर समग्र दृष्टि में विचार करना और साथ ही उनसे पीछा छुड़ाने के लिए सुनिश्चित संकल्प करना, तथा साहसिक दृढ़ निश्चय करना ही ‘मनन’ है।
मनन इससे अगली आवश्यकता पूरी करना है। यह सुधारवादी योजना बनाकर देता है साथ ही उसे अपनाकर एकाकी चल पड़ने का साहस प्रदान करता है। ऐसे निश्चय यदि कल्पना लोक में ही मँडराते रहे तो बात दूसरी है अन्यथा यदि उन्हें कार्य रूप में विकसित होने का अवसर मिले तो उसका प्रभाव परिणाम किसी को भी सामान्य से असामान्य बना सकता है।
मनन शक्ति के आधार पर ईर्ष्या को समाप्त कर दिया जाय, इसी में व्यक्ति का भी उत्कर्ष है और समाज का भी। वेद का यही आदेश है--
मनन करना है। इस बीच में आपको जप और अनुष्ठान करना है, योगाभ्यास करना है, और अपने आपका परिशोधन करना है। तो क्या हम अकेले कर लेंगे? नहीं आप अकेले कहाँ हैं। पीठ पीछे हम जो हैं।
मनन’ है। इस निमित्त एक सुनियोजित कार्यक्रम बनाना होता है। दूरगामी योजना बनाते हुए उस पर अंत तक चलते रहने का व्रत धारण करना यही है मनन। चिंतन में भूतकाल से लेकर वर्तमान तक का निरीक्षण-परीक्षण करते हुए खोटों को समझना पड़ता है। मनन इससे अगली आवश्यकता पूरी करना है।
मनन शक्ति मनुष्य के कल्याण के लिए बड़ी कठिनाई से तुझे ईर्ष्या की प्रसिद्ध औषधि के रूप में ग्रहण कर उत्तम प्रकार से तेरा पालन किया और तुझे धारण किया है। दावानल की तरह मनुष्यों को पृथक्-पृथक् जलाती रहने वाली ईर्ष्याग्नि तू उसी प्रकार शाँत कर जैसे जल अग्नि को शाँत करता है।”
मनन का अभाव भी माना जाता है। यह सही भी है। सर्वविदित प्रतिपादनों में इनका भी कम महत्व नहीं है। हम जो पढ़ते, सुनते, देखते हैं उसी आधार पर मानसिक स्तर का निर्माण होता है। चूँकि शिक्षितों द्वारा सुने गये तत्वदर्शन से लेकर कथा प्रसंगों तक सब कुछ ऐसा होता है, जो विवेक जगाता नहीं वरन् उसे और भी अधिक कुँठित करता है, अंधविश्वासों, मूढ़ मान्यताओं भाग्यवादी परावलंबन शैली का समर्थन करता है अतः चिंतन भी वैसा ही बनता चला जाता है।
मनन का सूत्र बन गया था। शस्त्र का त्याग करके वन को प्रस्थान करने वाले तपस्वी को दिया गया यह आशीर्वाद कोई भौतिक लक्ष्यबेध उसका तात्पर्य नहीं हो सकता था यह बहुत स्पष्ट बात थी। ऋतक्रथु को कोई विलंब नहीं हुआ था यह समझने में कि महर्षि का तात्पर्य क्या है?
मनन। चिंतन में भूतकाल से लेकर वर्तमान तक का निरीक्षण-परीक्षण करते हुए खोटों को समझना पड़ता है। मनन इससे अगली आवश्यकता पूरी करना है। यह सुधारवादी योजना बनाकर देता है साथ ही उसे अपनाकर एकाकी चल पड़ने का साहस प्रदान करता है। ऐसे निश्चय यदि कल्पना लोक में ही मँडराते रहे तो बात दूसरी है अन्यथा यदि उन्हें कार्य रूप में विकसित होने का अवसर मिले तो उसका प्रभाव परिणाम किसी को भी सामान्य से असामान्य बना सकता है।
मनन का आश्रय लेकर आमतौर से लोग सुधरते और आगे बढ़ते हैं। इसलिए सर्वमान्य, सर्वसुलभ विधि व्यवस्था यही है। इतने पर भी यह नहीं समझना चाहिए कि बात समाप्त हो गई। अभी उन रहस्यों को समझना शेष है, जो अंतराल की किन्हीं गहरी पर्तों में छिपे बैठे रहते हैं और जब ज्वालामुखी की तरह फूटते हैं तो स्वाध्याय, सत्संग जैसे अवलंबनों से जो हाथ लगा था, उसे लावे की तरह उछालकर दूर फेंक देते हैं यही समझ में आ जाय तो भटकाव की विडंबना से मानव बच जाय। जीवन साधना यही है कि सतत् अपने को श्रेष्ठ विचारों में लीन रखा जाय, पतनोन्मुखी विचार प्रवाह से स्वयं को बहने से रोका जाय तथा विभिन्न व्यावहारिक अध्यात्म के उपचारों से आत्मोत्थान के प्रयास किये जाते रहें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-July
मनन करें और उस पर एक कदम चलने से भी कितना लाभ होता है, इसका प्रत्यक्ष अनुभव करें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-September
मननपूर्वक पढ़ना जीवनोन्नति के लिये बहुत अधिक सहायक हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-April
मनन करो। जो कोई काम करना हो, जवां मर्द की तरह करो। दिन में कई बार आइने में चेहरा देखो और हंसो। कोई चीज़ खाओ तो कुछ लोगों के साथ खाओ। खूब चबा चबाकर खाओ, बाँट-बाँटकर खाओ, हंस हंसकर खाओ अकेले खाने में कोई मजा न आयेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-October
मनन के द्वारा अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकता है। अर्थात् अपनी मनोवृत्तियों पर साधक जब विजय प्राप्त कर लेता है तब उसे बाह्य प्रकृति प्रभावित-शासित नहीं कर सकती। इस साधना की बागडोर आत्मबल, मनन, विचारशीलता और चिन्तन के हाथ में है। यहाँ हमें हर कदम पर सावधान रहना चाहिए, कहीं अपनी पगडंडी से फिसल न जायें।
मनन, विचारशीलता और चिन्तन के हाथ में है। यहाँ हमें हर कदम पर सावधान रहना चाहिए, कहीं अपनी पगडंडी से फिसल न जायें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-October
मनन करके, इन्द्रियों द्वारा पूरा करे। मनुष्य का यह अधिकार जन्म सिद्ध है। यदि वह अपने इस अधिकार का सदुपयोग नहीं करता तो वह केवल अपना कुछ खोता ही नहीं है, बल्कि ईश्वरीय आज्ञा के अवहेलना करने के कारण पाप का भागी बनता है।
मनन करने से ऐसा हो सकता है। हर चमकीली भड़कीली चीज पर मन को न चलाओ। सादा वस्त्र पहनो, सात्विक भोजन करो और कभी भी अश्लील पुस्तकें न पढ़ो, न भद्दी तस्वीरें ही देखो। प्राणायाम का अभ्यास भी उत्तम है। संसार के नाना प्रपंचों से बचो।
मनन किया करो। ‘आप भला तो जग भला’ के अनुसार अपना मन साफ रखो, तुम्हें दुनिया का मन साफ दिखाई देगा। मन की पवित्रता पर ही मनुष्य का चरित्र निर्भर है। चरित्रवान बनो। नम्रता, शील, सत्य और साहस से मन पवित्र होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-July
मनन में लगाते हैं, तब आपका बौद्धिक विकास ठीक चल रहा है। आगे आशा है।
मनन करो। क्रोध करने से तुम्हारे मस्तिष्क में क्रोध करने वाले अणुओं की संख्या की वृद्धि होती है। चिंता, शोक, भय व खेद करने से इन्हीं, कुविचारों के अणुओं का तुम पोषण करते हो और मस्तिष्क को निर्बल बनाते हो। भूतकाल की दुर्घटनाओं या दुखद प्रसंग को स्मरण कर, खेद या शोक के वशीभूत होकर मस्तिष्क को निर्बल मत बनाओ। शरीर में बल होते हुए भी उसका उपयोग न करने से, बिना उपयोग से बल क्षीण होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-November
मनन करो। अपने सिद्धान्तों पर विचार करो। जो गन्दगी या कूड़ा-करकट हो, उसे साफ करो और इस प्रकार भगवान् को प्राप्त करो। यही हर युग के सन्त-महात्माओं के उपदेशों का सार है। बुद्ध, ईसा, मुहम्मद शिन्टो, चैतन्यदेव, शंकर आदि के उपदेश को पढ़ो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-September
मनन पाठन करती हैं और अठारह पुराण धरे के धरे रह जाते हैं परन्तु इस उन्नीसवें का निशाना अचूक है। किसी में इतनी शक्ति नहीं कि उसका विरोध कर सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-March
मनन में, कला के विभिन्न रूप जैसे चित्रकारी, संगीत, काव्य लेखन, पच्चीकारी, नृत्य, परोपकारी, पूजन, धर्म प्रसार, उपदेश इत्यादि के अनेक भागों में आप अपनी कुत्सित वासनाओं की कल्मष धो सकते हैं। किसी ललित कला को लेकर अपना सब कुछ उसमें उड़ेल दीजिए।
मनन शक्ति का उपयोग। मस्तिष्क को उन्नत करने के लिए उसके सूक्ष्म अणुओं की संख्या में अभिवृद्धि करना आवश्यक है। मस्तिष्क के किसी भाग में रक्त की गति तीव्रता से संचार करने से वह भाग परिपुष्ट होता है, उसकी शक्ति विकसित होती है किन्तु दुष्ट मनोविकारों अभद्र शंकाओं एवं निराशा के वशीभूत होकर उन ज्ञान-तन्तुओं की स्वाभाविक शक्ति के विकास का मार्ग बन्द हो जाता है। घृणा, द्वेष, क्रोध चिड़चिड़ाहट, कुढ़ने से मस्तिष्क के महाशक्तिशाली अणु संकुचित होकर क्षीण हो जाते हैं। अनेक सूक्ष्म अणु बिल्कुल विनष्ट होकर गायब हो जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-May
मनन किया और जब उसकी समझ में अहिंसा का वास्तविक तात्पर्य आ गया तो महाभारत में जुट पड़ा। अठारह अक्षौहिणी सेना का संहार हुआ तो भी अर्जुन को कुछ पाप न लगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-December
मनन करें अधिक। हमें यह स्मरण रखना चाहिये कि स्वयं विचारक एवं मनन शील बनने पर ही हम उस वस्तु को ढूँढ़ने की योग्यता संपादित कर सकेंगे।
मनन करना। यदि हम में मन न हो, हम विचार न करें तो हम मनुष्य नहीं। सारा मानव संसार विचार करता है, बोलता है, काम करता है और अनुभव करता हैं पर बहुत से लोग बड़े-बड़े विद्वान तक यह नहीं जानते कि सबका कारण ‘मन’ है। अज्ञात रूप से विचार चलते रहते हैं उसी के कारण वे बनते बिगड़ते हैं फिर भी कहते हैं कि हमको विचार नहीं आते या हमने बिना विचारे काम कर लिया आदि-तथा हमको विचार शक्ति का रहस्य नहीं मालूम। परन्तु यदि सूक्ष्म दृष्टि से उनके जीवन या संसार में किसी भी कार्य की जड़ देखी जाय तो मालूम होता है कि कोई भी कार्य बाहर दृश्य स्थूल जगत में तैयार हो जाता है-जो संबंध बीज और वृक्ष का है वह संबंध हमारे विचारों और कार्यों में हैं।
मनन शील बनने पर ही हम उस वस्तु को ढूँढ़ने की योग्यता संपादित कर सकेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-January
मनन इत्यादि करते हैं अर्थात् जिन विचारों की मन में पुनरावृत्ति होगी उसी प्रकार का मनुष्य का भविष्य में स्वभाव (Nature) बनने लगेगा।
मनन (ढ्ढठ्ठह्लह्शह्यश्चद्गष्ह्लद्बशठ्ठ) निरीक्षण (ह्रड्ढह्यद्गह्क्ड्डह्लद्बशठ्ठ) परीक्षा (श्वफ्श्चद्गह्द्बद्वद्गठ्ठह्लह्य) स्मृति (रुद्गद्वशह्ब्) संवेदन, अवधान (्नह्लह्लद्गठ्ठह्लद्बशठ्ठ) चेतना, विकार (स्नद्गद्गद्यद्बठ्ठद्द) संकल्प (ख्द्बद्यद्य) प्रतिफल क्रियाएँ (क्रद्गद्धद्यद्गफ् ड्डष्ह्लद्बशठ्ठह्य) इत्यादि कैसे होती हैं? क्या है? किन मूल नियमों द्वारा संचालित होते हैं? इनका कार्य क्या है? -ये सब व्याख्याएं और उनका नियमबद्ध वर्णन मनोविज्ञान के विषय हैं।
मनन, निरीक्षण, क्रियाशीलता का मूल केन्द्र हमारा मन है। भय, साहस आनन्द, उद्वेग, विकार, संकल्प, संवेदन क्रोध, क्षोभ इत्यादि आन्तरिक भावनाओं का उदय भी हमारे मन से संयुक्त स्नायु तंतुओं, क्रियाओं, एवं प्रवृत्तियों द्वारा होता है। मनुष्य किन परिस्थितियों में क्या सोचता है? इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख कल्पना, संकल्प, ज्ञान किस प्रकार होते हैं? मानसिक वृत्तियों का मर्म, उनकी नियमबद्ध व्याख्या एवं कार्यशैली का शास्त्रीय अध्ययन मनोविज्ञान का विषय है।
मनन, चित्र निर्माण करो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-April
मनन कीजिये। इससे बुरे स्वप्न रुक जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-June
मनन से विकसित होती है। इधर-उधर चंचलतापूर्वक भ्रमण करने से, चिन्ताओं एवं भ्रान्तियों के वशीभूत होने से, मनः प्रवृत्ति अनेक दुर्दमनीय कष्टों का, अनेक पराजयों का कारण बनती है। यदि एक निर्दिष्ट कार्य में मन एकाग्र न किया जाय तो समस्त प्रयत्न निष्फल होते हैं। निर्दिष्ट समय पर अन्य समस्त विचारों को मनः प्रदेश से बर्हिगत कर एक तत्व पर अन्तनेत्र एकाग्र करने से मन की शक्ति प्रकट होती है।
मनन से मन की शक्ति बढ़ती है। निर्दिष्ट समय पर दूसरे सब विचारों को छोड़कर एक “आत्म तत्व” पर मन को एकाग्र करना चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-December
मनन्तानां दुःखाना कोशमालिका। अस्यत्विय मनन्तानां सुखानां कोशमालिका॥”
मनन किया है, अपने अन्दर विपुल रत्न राशि का भण्डार पाया है, जिसे प्रयुक्त कर वे स्वयं धन्य बने और सहस्रों को कृतार्थ कर गये।
मनन्तानां सुखानां कोशमालिका॥”
मनन और समुद्र मंथन जैसे प्रयास का प्रतिफल है। स्वेच्छाचारी कल्पनाओं और मनगढ़ंत मान्यताओं के आधार पर इन्हें गढ़ा नहीं गया है और न किसी अंध श्रद्धा से सम्मोहित होकर उन्हें सच्चाई मान बैठने जैसे भ्रम-जंजाल की इन पर छाया है। जो कहा जा रहा है जिस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के लिए अनास्थावानों को भी विवश होना पड़े। विज्ञान के अनुसंधानों को प्रयोगशाला में परीक्षित-प्रमाणित किया जाता है। इसके उपरांत ही उपलब्धियों की घोषणा की जाती है।
मनन-चिन्तन करना पड़ता है। राजकुमार सिद्धार्थ का जिस क्षण आत्म-बोध उभरा उसी क्षण वे भगवान बुद्ध बन गये। जिस अश्वतरु के नीचे यह सुयोग बना वह भी ‘बोधि वृक्ष’ के रूप में श्रद्धास्पद बना- प्रख्यात हुआ और कृत्य-कृत्य हो गया। आत्मज्ञान की महत्ता, प्रतिक्रिया एवं सिद्धि परिणति का इतना अधिक प्रतिपादन हुआ है कि उससे बढ़कर इस संसार में और कोई बड़ी उपलब्धि मानी ही नहीं गई। गीताकार ने “अपने को ही अपना मित्र और अपने को ही अपना शत्रु बताते हुए कहा है कि अपना उद्धार आप करो, अपने को गिराओ मत।
मनन-चिन्तन के माध्यम से चिन्तन प्रक्रिया एवं भाव संवेदना के क्षेत्र में निकृष्टता के निराकरण एवं उत्कृष्टता के संस्थापन, अभिवर्धन की प्रक्रिया सहज गति से चलती रहती है। इस आधार पर बनायी गयी स्वनिर्मित चेतना को प्रभावित करने वाला विचार वातावरण उत्कृष्टता संवर्धन में ऐसा चमत्कार दिखता है मानो वह किसी अन्य लोक से, समर्थ देवता या सिद्ध पुरुष द्वारा वरदान की तरह दिया गया है।
मनन। यह चारों ही उद्देश्यपूर्ण एवं सुनियोजित होने चाहिए। अपने चिन्तन ने जिस स्तर की निकृष्टताएँ दृष्टिगोचर हों उसके लिए उसी स्तर का प्रतिपक्ष ढूँढ़ा जाना चाहिए और अनौचित्य की टक्कर में औचित्य का पक्ष मजबूत बनाकर खड़ा कर देना चाहिए। लोहे को लोहे से काटा जाता है। काँटे से काँटा निकलता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-November
मनन जैसे कई व्रत नियम हैं। भविष्य निर्धारण के लिये परामर्श- पिछली भूलों में खोदी गई खाई को पाटने वाली क्षति पूर्ति- का भी इसी साधना क्रम में अविच्छिन्न समावेश है। इन अभ्यासों को योग साधना की संज्ञा दी गई है और मन क्षेत्र के परिष्कार, परिवर्तन, उन्नयन का लाभ दे सकने वाली व्यवस्था की गई है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-February
मनन, चिन्तन का क्रम आरम्भ करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-March
मनन तथा चिन्तन को प्रभावित करना भी होगा। चुम्बक से चिकित्सा की बातें अभी तक विज्ञान की कसौटी पर कसी नहीं गई हैं, लेकिन इस दिशा में वैज्ञानिक प्रयत्नशील हैं। विज्ञान सतत् रूप से यह सिद्ध करने की दिशा में अग्रसर हो रहा है कि चुम्बक जीवन में भलाई के लिये परिवर्तन करेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-June
मनन यह चार अवलम्बन ब्रह्म विद्या को हृदयंगम कराते हैं। उपनिषदों का यही विषय है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-July
मनन- उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों का परामर्श एवं सहयोग यह सभी पक्ष तीर्थ सेवन से साथ जुड़े रहने के कारण उसे उतनी महता एवं गरिमा प्रदान की गई।
मनन, मंथन की आवश्यकता पड़ती है। प्रेरणा के लिए जप, तप, भजन, पूजन, दान, पुण्य आदि अनेकों कर्मकांडों का आश्रय लेना पड़ता है। इन्हीं दोनों प्रयोजनों के लिए अध्यात्म का एक चिन्तनपरक और धर्म का क्रियापरक विशालकाय ढाँचा खड़ा किया गया है। ऋषियों के इसी अनुदान ने नर-पशु को नर-नारायण स्तर तक विकसित कर सकने वाले अध्यात्म विज्ञान की संरचना की है। यह इतना महत्वपूर्ण है कि उसे सुविधा सम्वर्धन वाले पदार्थ विज्ञान की तुलना में कुछ अधिक ही वजनदार कहा जा सकता है।
मनन को न केवल मस्तिष्क ही प्रभावित करता है वरन् इससे भी अलग एक शक्ति है जो विचारणाओं को प्रेरित करती है। उस चेतन शक्ति की संपूर्ण जानकारी तो नहीं मिल पाई है लेकिन यह निश्चित है कि मृत्यु के बाद भी उस चेतना का अस्तित्व बना रहता है।’’

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-October
मनन काम परिष्कार का सशक्त माध्यम है। बुद्धि और भाव के क्षेत्र में काम की शक्तिधारा परिष्कृत और परिशोधित होकर प्रवाहित होने पर उनमें उत्कृष्ट विचारों और उदात्त भावों से भर देती है। शरीर के स्थूल केंद्रों की ओर उसका प्रवाह अपने-आप कम होता जाता है। फलतः कामोद्वेग नहीं रहता।
मनन द्वारा ज्ञान के उस स्त्रोत तक पहुंचा जा सकता है जिसे शास्त्रकारों से आत्म-ज्ञान, ब्रह्म-ज्ञान के नाम से वर्णन किया है।
मनन किया जा सके तो क्रमशः आत्मोत्कर्ष की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए विराट् सत्ता के निकट पहुँचा जा सकता है। जिसके निकट पहुँचने-उसके दिव्य स्वरूप का दिग्दर्शन करने के उपरान्त कोई कामना अवशेष नहीं रहती। एक अनिर्वचनीय आनन्द में साधक सदा डूबा भौतिक जगत में रहते हुए भी निर्लिप्त बना रहता है।
मनन द्वारा अन्तःकरण की भावनाएँ स्वतः उमड़ने लगती हैं। सही रूप से महामंत्र का अवगाहन, आराधन एवं चिन्तन मनन किया जा सके तो क्रमशः आत्मोत्कर्ष की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए विराट् सत्ता के निकट पहुँचा जा सकता है। जिसके निकट पहुँचने-उसके दिव्य स्वरूप का दिग्दर्शन करने के उपरान्त कोई कामना अवशेष नहीं रहती। एक अनिर्वचनीय आनन्द में साधक सदा डूबा भौतिक जगत में रहते हुए भी निर्लिप्त बना रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-August
मनन कर रहे होते। उनके जीवन चरित्र का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि संन्यास लेने के बाद तो उनके कर्मों में और अधिक प्रखरता एवं गति आयी। अपनी अल्पायु में वे मानव जाति के लिए इतना कर गये जितना कि कोई भी व्यक्ति अपने दीर्घ जीवन में भी नहीं कर पाता।
मनन चिन्तन की अथवा अपने साथियों से विचार विमर्श की? यह प्रश्न सतहत्तर गणितज्ञों से पूछा गया था। आश्चर्य है कि सतहत्तर मे से इक्यावन ने इसका उत्तर दिया था कि उन्हें अपने गणित सम्बन्धी प्रश्नों को समझाने में स्वप्न एवं अपने अचेतन से सहायता मिलती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-May
मनन में भी उसने पर्याप्त रुचि ली और कुछ ही समय बीतते वह पूजा−पाठ करने लगी, उसने वेद पुराणों और आर्ष ग्रन्थों के कई अंश कण्ठस्थ कर लिए। किशोरावस्था में प्रवेश करने तक तो वह ज्योतिष, अंकशास्त्र, पराविद्या, ब्रह्मविद्या, योगचक्र कुण्डलिनी आदि के विषय में भी इस प्रकार बातें करने लगी, जैसे वह इन विषयों की अधिकारी विद्वान हो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-January
मनन के लिए एक खजूर के पेड़ के नीचे बैठते थे। कुछ समय बाद उन्हें वह स्थान छोड़कर अन्यत्र जाना पड़ा। तब उन्होंने उस खजूर को कटवा दिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-August
मनन में प्रसन्नता अनुभव होने लगती है। रचना-शक्ति का विकास होने लगता है, सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा वह अधिक उन्नतिशील होता है स्वःलोक अग्नि तत्व की प्रधानता की अवस्था है। सूर्य में अग्नि तत्वों वाले जीव ही रह सकते हैं या यों कहना चाहिये कि सूर्य का ध्यान करते रहने से अग्नि अर्थात् उष्णता, विद्युत् और प्रकाश के परमाणुओं का शरीर में विकास होता है। ऐसे शरीर वाले व्यक्ति में संहार और पालन की शक्ति, वचन-सिद्धि आदि गुण होते हैं। उस शक्ति को दुर्गुणों से घृणा होने लगती है तथा परमार्थ व सेवा में आनन्द मिलने लगता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-June
मनन करें तो हमारा मस्तिष्क हमारे लिए कल्प वृक्ष का काम कर सकता है। पर उसका अधिकाँश भाग तो अनर्गल चिन्तन में ही नष्ट हो जाता है। तृष्णा, वासना, लोभ-मोह, शौक-मौज, द्वेष-दुर्गुणों के द्वारा उत्पन्न की हुई इतनी ज्यादा शक्तियाँ सामने होती हैं कि उनका हल ढूंढ़ना ही मस्तिष्क के विचार के लिए कठिन पड़ता है। ऐसी दशा में बौद्धिक चेतना की ज्ञानवृद्धि एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन में कैसे लगाया जाय? इसी कुचक्र में पड़े हुए हम अपनी मानसिक क्षमताओं को नष्ट-भ्रष्ट करते रहते हैं और खाली हाथ इस संसार से उठ जाते हैं।
मनन-चिन्तन और लेखन-संकलन में ही लगे रहते। अपनी संस्कृति को जीवित करने की उनकी अदम्य भावना ने स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं देने दिया। आयु जैसे-जैसे ढलती गई, वैसे-वैसे उनका शरीर ही निर्बल नहीं होता गया, वरन् पीठ में कूबड़ भी निकल आया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-March
मननशील पदार्थ ही है। महापुरुषों के मुख-मण्डल पर दिखाई देने वाला यह तेजोवलय उस विचार-सत्ता की तीव्र इच्छा-शक्ति, विचार-शक्ति या दिव्य संकल्प-शक्ति का ही प्रतीक है। उसे ही इच्छा शरीर कह सकते हैं, क्योंकि यह प्रकाश-अणु केवल मुख-मण्डल से ही प्रस्फुटित नहीं होते वरन् सम्पूर्ण शरीर से प्रस्फुटित होते रहते हैं। अमेरिका की सुप्रसिद्ध अध्यात्म साधिका श्रीमति डॉ. जे. सी. ट्रस्ट ने इस प्रकार स्फुरित होने वाले प्रकाश अणुओं को मानव-अणु नाम दिया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-January
मनन और अनुभव का विषय है। आशा, उत्साह, साहस और धैर्य की परीक्षा का प्रसंग है। प्रयत्न की असफलता स्वयं एक परीक्षा है। मनुष्य को उसे स्वीकार करना और उत्तीर्ण करना ही चाहिए।
मनन्ताहो इयमित्यवभासते॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-November
मनन भी किया जिससे उसकी भगवन् के प्रति निष्ठा जाग गई। उसने आदर, सत्कार, सम्पत्ति और सम्मान की सारी भावनायें छोड़ दी और सामान्य लोगों में ही धर्म भावनायें जागृत करने लगे।
मनन करने वाला और कार्य करने वाला ही विज्ञानमय आत्मा है।
मनन किया हो। तोते की वह असाधारण क्षमता इस बात का संकेत है कि अच्छे या बुरे कोई भी कर्म अपने सूक्ष्म संस्कारों के रूप में जीव का कभी भी पीछा नहीं छोड़ते चाहे वह बन्दर हो या तोता।
मनन चिन्तन के बाद आत्मतत्व की स्पष्ट अनुभूति नहीं कर ली, इस विषय में दुविधा पूर्ण स्थिति में रहता आया है। आत्मा का कोई अस्तित्व है भी अथवा नहीं। यह एक ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसे सुलझा न पाने वाले जीवन भर उलटी और अंधकार पूर्ण दिशाओं में भटकते रहते हैं पर जो इस स्थिति के बारे में निश्चिन्त होकर आत्मानुभूति कर लेते हैं, वे अपना जीवन धन्य मानते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-September
मनन्तानाँ सुखानाँ कोशमालिका॥    -योग वशिष्ठ 4/23/4 और 18
मनन्तानाँ दुःखाना कोशमालिका।
मनन-चिन्तन में कोई अवरोध उपस्थित न हो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-February
मनन्द के मुकाबले की शक्ति खड़ी कर ली और तब उसने मगध पर आक्रमण कर दिया और महापद्मनन्द को परास्त कर स्वयं वहाँ का शासक बन बैठा।
मनन्द को परास्त कर स्वयं वहाँ का शासक बन बैठा।
मनन, चिन्तन आदि के द्वारा मस्तिष्क में यह संकल्प सुदृढ़ कर लेता है कि साँसारिक आवश्यकतायें यथा इन्द्रियसुख, पद-यश, वित्त, पुत्र यह सब चेतना के ऊपर चढ़ी झिल्ली की खुजलाहट, क्रियाशीलता अथवा माँग उसकी निज की नहीं, तब उसका दृष्टिकोण ही बदल जाता है। आसक्ति नष्ट होकर वह शुद्ध चैतन्य की प्राप्ति का प्रयत्न करने लगता है। तब वह बार-बार अनेक तरह के शरीर धारण करने की चिंता से भी मुक्त हो जाता है।
मनन्द पर चन्द्रगुप्त ने कई बार आक्रमण किये पर उसे एक बार भी सफलता हाथ न लगी। जिस प्रकार एक महीने में ही करोड़पति एक वर्ष में ही बड़े से बड़ा पद और कुछ ही दिनों में बीमारी से मुक्ति के उतावलेपन में कई बार लोग ऐसे ऊट-पटाँग काम कर बैठते हैं कि उनके हाथ की सम्पत्ति, आजीविका योग्य नौकरी और रहा-सहा स्वास्थ्य भी चौपट हो जाता है। उसी प्रकार मगध को जीतने के उतावलेपन में चन्द्रगुप्त अपनी सेना से भी हाथ धो बैठा। एक बार उसे जंगलों की खाक छाननी पड़ी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-December
मननीय और प्राप्त करने योग्य है, उसे जानने के लिये इतनी क्षमताओं से विभूषित शरीर परमात्मा ने दिया है। पर मनुष्य वास्तविकता को समझने की चेष्टा न करते हुये मानवेत्तर जीव-जन्तुओं की सी तुच्छ भोग वृत्तियों में पड़ा रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-October
मनन के बाद हम एक निष्कर्ष पर पहुँचे हैं और बिना लाग−लपेट छिपाव व दुराव के अपनी स्वतंत्र नीति निर्धारण करने में समर्थ हुए हैं। हम सीधे राजनीति में प्रवेश नहीं करेंगे वरन् राजनीति को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करेंगे और यही अन्त तक करते रहेंगे। अपना संगठन यदि अपने प्रभाव और प्रकाश को सर्वथा तिरस्कृत नहीं कर देता तो उसे इसी मार्ग पर चलते रहना होगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-August
मनन दर्शन या निदिध्यासन की बारी आती है।
मनन किया, उसका साराँश यह निकला कि बहुत सारा विस्तार ज्ञान हैं, बहुत सारा विस्तार धर्म और अध्यात्म है लेकिन इसके सार में तीन चीजें समान हुई है (1) आस्तिकता अर्थात् ईश्वर का विश्वास (2) आध्यात्मिकता अर्थात् स्वावलंबन, आत्म बोध, और अपने आपको परिष्कृत करना अपनी जिम्मेदारियों को स्वीकार करना और (3) धार्मिकता अर्थात् कर्तव्य परायणता। कर्तव्य परायणता, स्वावलंबी और ईश्वर परायण कोई भी व्यक्ति गायत्री मंत्र का उपासक कहा जा सकता है और गायत्री मंत्र के ज्ञान पक्ष के द्वारा जो शाँति और सद्गति मिलनी चाहिए उसका अधिकारी बन सकता है। हमारे जीवन का यही निष्कर्ष है विज्ञान पक्ष में तीन धारायें और ज्ञान पक्ष में तीन धारायें, इनको जो कोई प्राप्त का सकता हो गायत्री मंत्र की कृपा से निहाल बन सकता है और ऊँची से ऊँची से स्थिति प्राप्त करके इसी लोक में स्वर्ग और मुक्ति का अधिकारी बन सकता है। ऐसा हमारा अनुभव ऐसा हमारा विचार और ऐसा हमारा विश्वास है।
मनन के तथ्य को प्रसुप्त स्थिति में ही पड़ा रहने दे, आस पास की परिस्थितियों पर नजर ही न डाले और उनसे कुछ अनुभव ही संचित न करें, तो मस्तिष्कीय क्षमता का विकास अपने आप कहाँ विकसित होने वाला है।
मनन किया जाय। साथ ही अपने संपर्क क्षेत्र में सुधार कार्य जारी रखा जाय। सत्प्रवृत्ति संवर्धन का सेवा कार्य किसी न किसी रूप में कार्यान्वित ही करते रहा जाय। इतना करने पर ही मन को स्वच्छ, निर्मल व स्वयँ को प्रगति के पथ पर अग्रगामी बनाये रखा जा सकता है।
मनन चिंतन ज्ञानार्जन में है व ज्ञान की सार्थकता भगवद् भक्ति में है। जहाँ ये सभी मिल जायें व लेखनी इसकी सधी हुई दिशा में चले वहाँ जिस उच्चस्तरीय साहित्य का सृजन होगा, उसे पढ़कर कौन ऐसा होगा, जो प्रभावित न हों?
मनन, स्वाध्याय में अपना जीवन क्यों खपा देते?
मनन न्यूनतम पंद्रह मिनट तो करना ही चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-December
मनन एवं स्वाध्याय को ताक पर रख दिया। अंधी भेड़ों की तरह जिस किसी तरह आड़ा तिरछा चलने में विश्वास करने लगे। ऐसी स्थिति में अवगति स्वाभाविक है। यदि किसी ने ठीक पगडंडी का चुनाव कर उस पर चलना शुरू कर दिया है तो उसे मंजिल जरूर मिलेगी। हो सकता है इसमें थोड़ी देर सबेर हो जाय, पर जिसकी कोई पगडंडी नहीं, बस यूँ ही घने जंगल में भटक रहा है, उसके पल्ले थकान के अलावा कुछ नहीं हाथ लगेगा, भले ही उसने कितनी ही भाग-दौड़ क्यों न की हो ?
मनन, और दोहन के फल स्वरूप जो कुछ भी सार हम पा लेते हैं, उसी को भविष्य की दुनिया के लिए एकत्र करके दे देना यह सबसे बड़ा कर्तव्य, पुरुषार्थ हो जाता है। शांति, समाधान, संतोष, प्रसन्नता और सर्वतोभद्रता यही होना चाहिए उस अवस्था का वायु मंडल। ऐसी अवस्था प्राप्त होने पर जीवन स्वामी जगदीश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव हृदय में उदय होता है और ऐसी कृतज्ञता के कारण प्रसन्नता बढ़ती है तथा पाया हुआ जीवन का सार सर्वस्व घनिष्ठ होता है। इस संसार से बिदा होने की यह कितनी सुँदर तैयारी है।
मनन करें, अमृतवाणी का।
मनन करना चाहिए कि आज की निर्धारित दिनचर्या पूरी हुई या नहीं ? यदि उसमें कुछ त्रुटियाँ रहीं हों तो भविष्य में कड़ाई के साथ ऐसी भूलों के परिमार्जन की बात सोचनी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-April
मनन को सार्थक स्तर का समझा जा सकता है।
मनन से भी बन पड़ता है। वैसे मोटे तौर से जीवन समस्याओं के आदर्शवादी समाधान का पक्षधर अध्ययन विचार-विनिमय भी इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। सद्ग्रन्थों का पठन और मुनि मनीषियों के सत्संग से भी वह प्रयोजन पूरा होता है। इन में से जो भी जिससे जिस प्रकार बन पड़े, उसके लिए समय निकालना चाहिए।
मनन ही नहीं उपयुक्त मार्गदर्शन और प्रत्यक्ष उदाहरण भी सामने होने चाहिए। इन्हें जुटा सकने वाले ही उत्कर्ष अभ्युदय की दिशा में बढ़ पाते हैं। चिरस्थाई, व्यापक और सर्वतोमुखी प्रगति के लिए इस सुयोग की व्यवस्था होनी ही चाहिए। इस प्रयास-अभ्यास को जीवन साधना के नाम से जाना जाता है। इसी समग्र मार्ग को अपना सकने पर व्यक्तित्व निखरता और प्रगति का पथ प्रशस्त होता है।
मनन है। इस आत्म समीक्षा के लिए हर कोई दिन भर में कोई न कोई समय निकाल ही सकता है। उस कमियों को खोज ही समता है जो उसे उत्कृष्टता की दृष्टि से पिछड़ा हुआ बनाए हुए हैं। त्रुटियाँ ध्यान आती रहें और उन्हें सुधारने का अनवरत प्रयत्न चलता रहे तो मनन को सार्थक स्तर का समझा जा सकता है।
मनन और चिन्तन से पूरी हो सकती है। सुविधानुसार एकान्त में बैठकर एकाग्र चित्त से आत्मस्थिति की समीक्षा की जा सकती है। आदर्शवाद की निर्धारणाओं में अपना जीवन क्रम कितना पीछे है, इन त्रुटियों को निष्पक्ष भाव से पैनी दृष्टि से स्वयं खोज निकालना मनन है। इस आत्म समीक्षा के लिए हर कोई दिन भर में कोई न कोई समय निकाल ही सकता है। उस कमियों को खोज ही समता है जो उसे उत्कृष्टता की दृष्टि से पिछड़ा हुआ बनाए हुए हैं।
मनन का दूसरा पक्ष है चिन्तन। चिन्तन अर्थात् दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन के लिए उपाय-उपचारों का निर्धारण। योजना इस प्रकार बनती रहनी चाहिए कि दिनचर्या में दोषों की कटौती और सद्गुणों की बढ़ोत्तरी का क्रम व्यावहारिक रूप में कार्यान्वित होता रहे। नित्य राई-राई भर दोष घटाने और नित्य तिल-तिल भर सद्गुणों के बढ़ाने से भी एक समय ऐसा आ सकता है जिसमें शरीर सेवा की तरह आत्म साधना भी भली प्रकार बन सके और स्वाध्याय का वास्तविक प्रयोजन पूरा हो सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-November
मनन करने की आवश्यकता है। तभी अपनी परिस्थितियों के अनुरूप सामंजस्य बिठा कर सही निष्कर्ष निकाला जा सकता है। यह क्रिया ही समस्या का पूर्ण समाधान दे सकने में सक्षम है।
मनन और
मनन व निदिध्यासन है। इसी को चिंतन की स्वतंत्र का नाम दिया गया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-May
मनन यह साधना की प्रारंभिक आवश्यकताएँ हैं, शिखिध्वज! आज तुम्हारी मंत्र दीक्षा संपन्न हुई। पूजन की सामग्री उपयुक्त पात्र, कुश आसन यह अपने पास रखने होंगे। पंचोपचार पूजन सहित मंत्र जप करते हुए शुभ ज्योति स्वरूप निराकार गायत्री का ध्यान करना। जब तुम इस प्रारंभिक साधना को सफलतापूर्वक पूरा कर लोगे, तो आगे उच्चस्तरीय साधना के लिए तुम्हें अग्नि दीक्षा भी देंगे।’ यह कहते हुए महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए।
मनन्द के शरीर को माध्यम बनाया और दोनों साथियों पर अपने शरीर की रक्षा भार सौंपकर उसमें सूक्ष्म शरीर से जा घुसे। सारे राज्य में छाई दुख की लहर एकाएक खुशी में बदल गयी। चारों ओर उत्सव मनाये जान लगे। कुशाग्र बुद्धि महामंत्री शकटार ने जब पुनर्जीवित महापद्मनन्द के गुण, कर्म, स्वभाव, व्यवहार एवं पाण्डित्य में परिवर्तन पाया तो उन्हें वस्तु स्थिति समझते देर न लगी कि यह सारा खेल योग विद्या के ज्ञाता देवदत्त का है। उन्होंने निश्चय किया कि जैसे भी हो देवदत्त का है।
मनन्द के गुण, कर्म, स्वभाव, व्यवहार एवं पाण्डित्य में परिवर्तन पाया तो उन्हें वस्तु स्थिति समझते देर न लगी कि यह सारा खेल योग विद्या के ज्ञाता देवदत्त का है। उन्होंने निश्चय किया कि जैसे भी हो देवदत्त का है। उन्होंने निश्चय किया कि जैसे भी हो देवदत्त के पूर्ववर्ती शरीर को ढूंढ़ कर शवदाह करा दिया जाय ताकि महापद्मनन्द को इस रूप में जीवित रखा जा सके। यह वह समय था जब सिकन्दर सम्राट पुरु पाटलिपुत्र से ही होने वाली थी। ऐसी स्थिति में अपने सिपाहियों का मनोबल बढ़ाये रखना आवश्यक था।
मनन्द को इस रूप में जीवित रखा जा सके। यह वह समय था जब सिकन्दर सम्राट पुरु पाटलिपुत्र से ही होने वाली थी। ऐसी स्थिति में अपने सिपाहियों का मनोबल बढ़ाये रखना आवश्यक था। अतएव शकटार ने अपने विश्वासपात्र सैनिकों को भेजकर व्याधि के विरोध के बावजूद भी देवदत्त के शरीर का अग्नि संस्कार करा दिया। देवदत्त को जब इस बात का पता चला तो माथा पीटते रह गये।
मनन्द के मृत शरीर में प्रवेश तो पा लिया था, फिर बाहर निकल नहीं सके थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-January
मनन किया जाएगा-तो संस्कारों के रूप में कूड़ा-करकट ही इकट्ठा होता रहेगा।
मनन किया जाता रहे-तो संस्कार भी शुभ और सुन्दर बनेंगे। इसके विपरीत यदि असद् विचारों को ग्रहण कर मस्तिष्क में बसाया और मनन किया जाएगा-तो संस्कारों के रूप में कूड़ा-करकट ही इकट्ठा होता रहेगा।
मनन की प्रक्रिया भी अबाधगति से चलती रहती है और वह विषय अवचेतन में जा जाकर संस्कारों का रूप लेता रहता है। इसी नियम के अनुसार प्रायः देखा जाता है कि अनेक लोग, जो कि प्रियता के कारण भोग-वासनाओं को निरन्तर चिन्तन से संस्कारों में सम्मिलित कर लेते हैं, बहुत कुछ पूजा-पाठ, सत्संग और धार्मिक साहित्य का अध्ययन करते रहने पर भी उनमें मुक्त नहीं हो पाते। वे चाहते है कि संसार के नश्वर भोग और अकल्याण कर वासनाओं से विरक्ति हो जाए, लेकिन उनकी यह चाहत अधूरी बन रहती है।
मनन और विश्वास के साथ संस्कार रूप में प्रौढ़ किया जाय। पुराने संस्कार बदलने के लिए नए संस्कारों को रचना परमावश्यक है।
मनन करते रहने से सात्विक भावों की अभिवृद्धि होती है। मानसिक शक्ति का विकास होता और सद्गुणों की प्राप्ति होती है। अतः यह आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है कि अपने सोचने विचारने की प्रक्रिया पर नये सिरे से मंथन किया जाय और उसमें से खोज-खोजकर निकृष्ट एवं हेय स्तर के विचारों को निकाल फेंका जाय। साधना, स्वाध्याय,संयम,सेवा के उपाय-उपचारों द्वारा सद्विचारों का आरोपण सहज संभव हो जाता है। प्रखर, प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का निर्माण एवं उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण इसी आधार पर संभव हो सकेगा।
मनन की निरन्तरता के फलस्वरूप वे माँगलिक विचार संस्कार बन-बन कर संचित होने लगेंगे जिनका प्रकाश चरित्र की असंख्य रश्मियाँ बनकर फूट निकलेगा। इनके प्रकाश में हमारा अपना भविष्य उज्ज्वल, उदीयमान, उत्कृष्ट बन सकेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-June
मनन से ही अन्तःकरण की भावनाएँ स्वतः उमड़ने लगती हैं एवं साधक के व्यक्तित्व का कायाकल्प हुए बिना नहीं रहता। गायत्री मंत्र को आधार बनाकर किया गया, सविता आराधना आत्मोत्कर्ष के चरम शिखर पर हम सबको पहुँचा सकता है।
मनन द्वारा ज्ञान के उस स्रोत तक पहुँचा जा सकता है जिसे शास्त्रकारों ने आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान के नाम से वर्णन किया है।
मनन्त फलदं भवेत् ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-March
मनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तय्यः सम्यम्य्यवसितो हि सः॥ (33/9)
मनन, निदिध्यासन भी चाहिए।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-February
मनन चिन्तन के एकाकी प्रयत्न से भी सम्भव हो सकता है।
मनन चिन्तन का ऐसा क्रम बनाया जाय, जिससे कि उस दिशा में चलने के सत्परिणामों के सम्बन्ध में तर्क, तथ्य, प्रमाण एवं उदाहरणों के आधार पर अपनी इष्ट निष्ठा और गुरुभक्ति को प्रगाढ़ किया जाय। यह प्रगाढ़ता ही साधक में-तन्मयता को जन्म देती है। शनैः शनैः इ तन्मयता का ही रूपांतरण ध्यान में होता है। फिर ध्यान की प्रगाढ़ गम्भीरता को सविकल्प समाधि-आत्म-बोध के क्षणों में बदलते भला कितनी देर है?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-March
मनन अर्थात् चिन्तन। यह पशु-पक्षियों से ऊँचा स्तर है। इस पर पहुँचे हुए जीव से मनुष्य संज्ञा में गिना जाता है। कल्पना, तर्क, विवेचना, दूरदर्शिता जैसी चिन्तात्मक विशेषताओं के सहारे औचित्य-अनौचित्य का अन्तर करना संभव होता है। स्थिति के साथ तालमेल बिठाने के लिए इच्छाओं पर अंकुश रख सकना इसी आधार पर संभव होता है।
मननात्-मनुश्यः । मनुष्य नाम इसलिए पड़ा कि वह मनन कर सकता है। मनन अर्थात् चिन्तन। यह पशु-पक्षियों से ऊँचा स्तर है। इस पर पहुँचे हुए जीव से मनुष्य संज्ञा में गिना जाता है।
मनन कर सकता है। मनन अर्थात् चिन्तन। यह पशु-पक्षियों से ऊँचा स्तर है। इस पर पहुँचे हुए जीव से मनुष्य संज्ञा में गिना जाता है। कल्पना, तर्क, विवेचना, दूरदर्शिता जैसी चिन्तात्मक विशेषताओं के सहारे औचित्य-अनौचित्य का अन्तर करना संभव होता है।
मनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गुहाया परमे व्योमेन्। सोऽश्नुते सर्वान् कामान्सह ब्रह्मणा विपश्रितेति-तैज्ञरीय
मनन का विधान है। अध्यात्म दर्शन की यही पृष्ठभूमि है।
मननशील साधक को सुदृढ़ बुद्धि से इस खेचरी विद्या का अभ्यास करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-October
मनन और चिन्तन कर सकना सम्भव होता है आत्म सत्ता की स्थिति, आकांक्षा एवं आवश्यकता को समझने और तद्नुरूप साधन जुटाने की बात तभी बनती है, जब अन्तर्जगत को ठीक तरह देख और समझ सकना सम्भव हो सके। यह कार्य ध्यान में तीक्ष्णता उत्पन्न होने पर ही बन पड़ता है
मनन करें और धर्म प्रचारक का प्रशिक्षण प्राप्त करें। यह यात्राएँ आज की स्थिति में और भी अधिक आवश्यक है। उनसे यात्री की तपश्चर्या और युग की माँग पूरी करने के दोनों ही उद्देश्य समान रूप से पूरे हो सकते हैं।
मनन द्वारा जैसा मनोभाव प्राप्त किया है उसी के आधार पर अपने-अपने कर्मों के अनुसार कितने ही जीवात्मा देह धारणार्थ विभिन्न योनियों को प्राप्त होते हैं और अनेकों जीवात्मा अपने कर्मानुसार वृक्षलता पर्वत आदि स्थानों पर पदार्थों के यप में ग्रहण कर लेते हैं।
मनन स्थिति के चरण चूमती रही है और यही क्रम अनन्त काल तक बना रहेगा।
मनन आदि कोई भी आधार लिया जा सकता है।
मनन करें। गुलाब पुष्प कोमल शीतल, सुगन्धित, कब्ज निवारक, वायु विकार नाशक आदि गुणों का स्मरण करें, विचार करें। गुलाब की खेती, उसे लाभ, गुलाब की आध्यात्मिक प्रकृति-काँटों के बीच सन्तोषपूर्वक रहना, हँसना-हँसाना, खिलना खिलाना, परिवेश का सौंदर्य बढ़ाना, सुगन्ध और पराग का दान, प्रभु चरणों में समर्पण आदि का विचार करें। तात्पर्य यह कि घंटों गुलाब पुष्प पर ही सोचते रहें। उद्देश्य है-मन की अस्त-व्यस्त घुड़दौड़ को परिधिबद्ध व व्यवस्थित करना।
मनन, चिंतन से परब्रह्म की प्राप्ति होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-November
मनन स्थितियाँ भी हैं और परिस्थितियाँ भी। इन्हें आस्थाओं की गहराई में प्रवेश करने के लिए जिस दर्शन की आवश्यकता है वह आस्तिकता का ही हो सकता है। निजी और तात्कालिक संकीर्ण स्वार्थपरता पर अंकुश लगाकर ही सामाजिक और आदर्शवादी मूल्यों का परिपोषण हो सकता है। प्रत्यक्षवाद का दबाव यह रहता है कि अपना सामयिक स्वार्थ सिद्ध किया जाय भले ही उसके फलस्वरूप भविष्य में अपने को ही हानि उठानी पड़े अथवा सार्वजनिक अहित करना पड़े। इस पशु प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने से ही मानवी आदर्शों की नींव रखी जा सकती है।
मनन कर सकने की क्षमता प्राप्त होती है। वह परब्रह्म ही नेत्रों को देखने की, कानों को सुनने की, प्राणों को जीने की शक्ति प्रदान करता है। परब्रह्म ऐसा नहीं है जिसे इन्द्रियों से देखना और मन से समझाना सम्भव हो सके। वह सर्वान्तर्यामी और निरपेक्ष है। वह कोई देवता नहीं है और न वैसा है जिसकी परब्रह्म नाम से उपासना की जाती हैं।
मनन, चिन्तन जुड़ा हुआ है। ईश्वर सद्गुणों का पुँज है। पवित्रता, करुणा, ममता, उदारता जैसी सद्भावनाएँ ईश्वरीय अनुकम्पा के फलस्वरूप उपलब्ध होने वाली विभूतियाँ है। इस मान्यता से ईश्वर सान्निध्य के लिए-उपासना आदि प्रयास करते हुए मनुष्य अधिकाधिक चरित्र निष्ठ और समाज-निष्ठ बनने का प्रयत्न करता है समाज-निष्ठा को धार्मिकता और सभ्यता कहते हैं। चरित्र-निष्ठा को धार्मिकता और सभ्यता कहते हैं।
मनन शक्ति प्राप्त होती है। उस परम तत्त्व की सामर्थ्य से ही मन को मनन कर सकने की क्षमता प्राप्त होती है। वह परब्रह्म ही नेत्रों को देखने की, कानों को सुनने की, प्राणों को जीने की शक्ति प्रदान करता है। परब्रह्म ऐसा नहीं है जिसे इन्द्रियों से देखना और मन से समझाना सम्भव हो सके। वह सर्वान्तर्यामी और निरपेक्ष है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-February
मनन आवश्यक है। उसे नित्य कर्म में सम्मिलित रखा जाय। मस्तिष्क में ऐसी कल्पना फिल्में घूमती रहनी चाहिए जिनमें उत्कृष्ट चरित्रों के घटनाक्रम एवं संस्मरण भरे पड़े हों। जीवन समस्याओं के सुलझे हुए समाधान प्रस्तुत करने वाली पुस्तकें हमारी सच्ची मित्र हो सकती है। इस स्वाध्याय के लिए सत्साहित्य को उपलब्ध करने के साधन जुटाये जाएँ।
मनन नित्य का संध्या वन्दन समझा जा सकता है। इसमें फुरसत न मिलने जैसा कुछ बहाना करने की भी गुँजाइश नहीं है। आँख खुलते ही जीवन का महत्त्व, उद्देश्य, स्वरूप एवं उपयोग स्मरण किया जाय। इस अनुदान के पीछे ईश्वर की अपेक्षा तथा अपने कन्धे पर आई जिम्मेदारी को यदि समझा जा सके तो एक-एक क्षण का- क्षमताओं के एक-एक कण का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात ही सामने होगी। उठने से लेकर सोने तक के समय विभाजन, चिन्तन तथा सतर्कताओं का क्रम बना लेना चाहिए।
मनन, चिन्तन किया जाना चाहिए। यह आत्म-निरीक्षण जितना गहरा होगा उतने ही ऐसे तथ्य उभर कर आवेंगे, जिन पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है परिशोधन की आवश्यकता समझी जा सके और उसके सत्परिणामों का मूल्यांकन किया जा सके तो पुरानी अभ्यस्त अवाँछनीयताओं के विरुद्ध संघर्ष करने की साहसिकता जाग सकती है। इस प्रकार के देवासुर संग्राम को आत्मोत्कर्ष का प्रथम चरण माना गया है। गीता में जिस महाभारत को वर्णन किया गया है और अर्जुन को जिस युद्ध में प्रवृत्त किया गया है वह वस्तुतः अन्तःक्षेत्र में घुसी हुई अवांछनीयता के उन्मूलन में प्रवृत्त शौर्य, साहस ही कहा जा सकता है यह स्थिति बन पड़े तो समझना चाहिए कि अवरोधों को चीर कर ऊँचाई की ओर अग्रसर हो सकने का आधार उपलब्ध हो गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-September
मनन चिन्तन की चतुर्विधि साधन सामग्री से अपने मनःक्षेत्र को घेरे रहने वाला उपयोगी वातावरण बनता है। इसके अतिरिक्त आत्म बलवर्धक व्यायामों में सर्वसुलभ एवं सर्वश्रेष्ठ उपाय है-ध्यान ध्यान मग्न होकर हम अपना इष्ट आराध्य स्वयं विनिर्मित करते हैं और उसके साथ श्रद्धासिक्त घनिष्ठता स्थापित करके तादात्म्य की दिशा में बढ़ते चले जाते हैं। ध्यान लोक वस्तुतः स्वनिर्मित ऐसा स्वर्गीय नन्दन वन है, जिसका सृजन, संवर्द्धन, परिपोषण हम स्वयं ही करते हैं। इसे परिपक्व बनाते हैं। पत्र, पल्लवों से सजाते हैं और फल फूलों से लदा हुए परम मंगलमय उद्यान के रूप में विकसित कर लेते हैं।
मनन करना आवश्यक है, पर निर्णय लेने के बाद अभीष्ट प्रयोजन के लिए तत्परतापूर्वक जुट जाना होता है। चिन्ता का तब अवकाश ही नहीं रहना चाहिए। चिन्ता तो निष्क्रियता की उत्पत्ति भी है और उत्पादक भी। चिन्ता से विक्षुब्ध मन, शक्ति का कितना ह्रास करता है, यह यदि लोग जान जाए तो कभी भी उद्विग्नता और तनाव की जननी चिन्ता को प्रश्रय न दें। अधिकाँश लोग प्रतिकूल परिस्थितियों में चिन्ताग्रस्त होकर हताशा के गहन अन्धकार के विवर्तों, में फँसकर अपना सब कुछ गँवा बैठते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-December
मननात् त्राति षट्चक्र गायत्री तेन कथ्यते-तन्त्र कौमुदी
मनन के बाद होता है। लीमर जीव जब अपने शरीर की सफाई करता है तो उसके बहुत से बाल दाँतों में फँस जाते हैं। उस बेचारे को जिन्दगी भर इस परेशानी का सामना करना पड़ता यदि रचयिता ने उसकी जीभ के नीचे एक दूसरी छोटी कंघीनुमा जीभ नहीं लगाई होती। इसकी सहायता से वह फँसे हुए वालों को निकाल लेता है। यदि इस सहायक जीभ को नहीं लगाया गया होता तो बेचारे का मुँह न जाने कब का सड़ जाता।
मनन से मिलने वाली जानकारी से आत्मज्ञान भिन्न है। उसमें अपने स्तर, स्वरूप, उद्देश्य और कर्तव्य की उच्चस्तरीय अनुभूति होती है और यह सघन विश्वास बन कर जीव चेतना का अंग बन जाती है। यह आन्तरिक काया-कल्प है। साधारणतया मनुष्य शरीर अध्याय में ही नख-शिख् पर्यन्त डूबा रहता है और इन्द्रिय लिप्सा, सम्पत्ति लालसा और बड़प्पन की अहमन्यता जैसे भौतिक उत्साह ही उस पर छाये रहते हैं। इन्हीं की पूर्ति में जीवन गुजरता है।
मननात् यतः। मननात् त्राति षट्चक्र गायत्री तेन कथ्यते-तन्त्र कौमुदी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-May
मनन अंतःक्षेत्र में चलता रहे। उस अवधि में अपने गुण कर्म स्वभाव को श्रेष्ठ बनाने का अभ्यास किया जाय। वैसी गतिविधियाँ अपनाई जाये जिससे भविष्य में व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश स्थायी तथ्य बन जाय। इन यात्राओं में चिन्तन और क्रिया-कलाप उच्चस्तरीय रखने से ही तीर्थ यात्रा का फल मिलता है वस्तुतः यह आचरण बन्ध नहीं पुण्यफल का प्रधान कारण है-
मननशील योगी दोनों हाथों से दोनों कानों को बन्द कर जिस ध्वनि को सुनता है, जब तक स्थिर पद को प्राप्त न हो जाय, तब तक उस ध्वनि में चित्त को स्थिर करें।
मनन-चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। इसके अतिरिक्त एक और भी कारगर उपाय है- मनोमय कोश की योग साधना। काम-काजी मस्तिष्क समेत मन-क्षेत्रीय की स्तरीय परतें मनोमय कोश की परिधि में आती है। जिस प्रकार वन्य पशुओं को साधकर पालतू बनाया जाता है। उनसे अनेक प्रकार के लाभ लिये जाते हैं, उसी प्रकार मन के महादैत्य की यदि साधना द्वारा सधा लिया जाय तो ऐसे लाभ मिल सकते हैं जिन्हें देवोपम उपलब्धियाँ प्राप्त करना कहने में अत्युक्ति नहीं मानी जा सकती।
मनन्यधीः।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-June
मनन से लेकर ध्यान धारणा तक के अवलम्बन अपनी मनःस्थिति के अनुरूप अपनाने पड़ते हैं। विचारणा, भावना एवं आस्था की प्रगाढ़ प्रतिष्ठापना इसी आधार पर सम्भव होती है। तपश्चर्या के औजारों से जमे हुए कुसंस्कारों को उखाड़ना पड़ता है। तप की अग्नि में तपा कर आत्मसत्ता में आर्द्रता उत्पन्न करना और उसे देवत्व के साँचे में ढालना सम्भव होता है। योग को सृजनात्मक और तप को शोधनात्मक ध्वंसात्मक प्रक्रिया कह सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-January
मनन का।
मनन को पहला और चिन्तन को दूसरा चरण कहा जाएगा इस प्रक्रिया के लिए पूजा उपचार की तरह कोई विशेष शारीरिक, मानसिक स्थिति बनाने की या पूजा उपचार जैसी कोई साधन सामग्री एकत्रित करने की आवश्यकता नहीं है। चित का शान्त और स्थान का कोलाहल रहित होना ही इसके लिए पर्याप्त नहीं हैं। प्रातः सायं का समय खाली न हो तो सुविधा का कोई अन्य समय निर्धारित किया जा सकता है। आधा घण्टा की सीमा भी अनिवार्य नहीं है। यह काम चलाऊ मापदण्ड हैं।
मनन से आत्म-समीक्षा का और अवांछनीयताओं का परिशोधन आता है। चिन्तन से आत्म निर्माण और आत्म-विकास की प्रक्रिया जुड़ती है।
मनन को प्रथम और चिंतन को द्वितीय चरण माना जाना चाहिए। दर्जी पहले कपड़ा काटता है, पीछे उसे सीता है। डाक्टर पहले नश्तर लगाता है। पीछे मरहम पट्टी करता है। यों यह दोनों ही कार्य मिले जुले हैं और तनिक से अन्तर से साथ प्रायः साथ साथ ही चलते हैं, फिर भी यदि प्रथम द्वितीय का प्रश्न हो तो मनन को पहला और चिन्तन को दूसरा चरण कहा जाएगा इस प्रक्रिया के लिए पूजा उपचार की तरह कोई विशेष शारीरिक, मानसिक स्थिति बनाने की या पूजा उपचार जैसी कोई साधन सामग्री एकत्रित करने की आवश्यकता नहीं है।
मनन दूसरे को चिन्तन कहते हैं। मनन से आत्म-समीक्षा का और अवांछनीयताओं का परिशोधन आता है। चिन्तन से आत्म निर्माण और आत्म-विकास की प्रक्रिया जुड़ती है।
मनन-चिन्तन द्वारा मनः स्थिति में कुविचार फैल ही नहीं सकते। ब्रह्मचर्य व्रतधारी महापुरुषों, हनुमान्, भीष्म, शंकराचार्य, समर्थ गुरु रामदास, विवेकानन्द आदि के उज्ज्वल चरित्रों का स्मरण-चिन्तन-मनोभूमि के पवित्र संस्कारों को सुदृढ़ बनाता है। स्वादेन्द्रिय और कामेन्द्रिय की स्थूल एवं सूक्ष्म लिप्साओं पर नियन्त्रण ही इन्द्रियनिग्रह की दिशा व विधि है।
मनन उसकी महत्ता व गरिमा का स्मरण कराता है। आज चारों ओर बढ़ रहे शोर से प्रदूषण उत्पन्न होने की चिन्ता चारों और व्यक्त की जा रही है तथा इस शोर को सामाजिक तनाव, बेचैनी और विकृति के कारणों में से एक कहा- बताया जा रहा है। ध्वनियों के अप्रत्याशित आश्चर्यजनक परिणामों की लगातार जानकारी मिल रही है। सभी जानते हैं कि वर्तमान यांत्रिक सभ्यता का शोर सम्पूर्ण मानव जाति पर गहरा दुष्प्रभाव डाल रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-July
मनन में आत्म समीक्षा मुख्य विषय रहता है। उसमें गुण अवगुण दोनों पर बारीकी से, निष्पक्ष भाव से विचार किया जाता है। अब तक के जीवन क्रम की अवांछनीय गतिविधियों पर दो चार दिन में ही दृष्टि डाली जा सकती है। उन पर पश्चाताप किया जा सकता है और दण्ड स्वरूप दुष्कर्मों से समाज को पहुँचाई गई क्षति की पूर्ति करने के लिए अपराधों को तोल के अथवा न्यूनाधिक मात्रा में पुण्य कर्म किये जा सकते हैं। दण्ड प्रायश्चित इसी प्रकार सम्भव होता है।
मनन, ध्यान एवं भजन का उद्देश्य है। पाप कर्मों के दण्ड से भयभीत रहे और मर्यादाओं का उल्लंघन करने पर उसके कठोर प्रतिफल का ध्यान रखते हुए अनीति एवं अन्याय न करे। उपासक अथवा धर्म भीरु के लिए यह अनिवार्य आवश्यकता है कि उसकी ईश्वरीय न्याय और कर्मफल की सुनिश्चितता में आस्था हो, अन्यथा उसकी समस्त भक्ति भावना निरर्थक ही सिद्ध होगी।
मनन, दैनिक कृत्य कर दिया जाना चाहिए। शरीर से दुष्कर्म मन से अशुभ चिन्तन और अन्तःकरण से दुर्भाव की अवांछनीयता तो नहीं बरती जा रही है। इसका निरन्तर ध्यान रखा जाय। जब भी इन तीनों क्षेत्रों में जो गड़बड़ी उत्पन्न हो रही हो उसे तत्काल अत्यन्त कठोरतापूर्वक रोक दिया जाय। मन में संचित कुसंस्कार प्रायः उठते रहते हैं कभी कभी वे अत्यधिक प्रबल हो उठते हैं।
मनन प्रक्रिया के अंतर्गत आता है।
मनन और चिन्तन इन दोनों से सूक्ष्म है। इनके सहारे आत्म समीक्षा और आत्म निर्माण के दोनों महा प्रयोजन सिद्ध हो सकते हैं। इसके लिए यों तो प्रायः चारपाई पर से उठने का समय और रात्रि को बिस्तर पर जाने के बाद का समय अत्युत्तम है, पर रोक किसी भी समय नहीं है। उन्हें किसी भी समय और किसी भी परिस्थिति में कितनी ही देर किया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-April
मनन और साधना समाधि तक के अगणित प्रगति प्रयास इसी आधार पर होते हैं। व्यक्तित्व और वर्चस्व की-प्रखरता की समस्त सम्भावनायें इसी क्षेत्र के साथ जुड़ी हुई है। परा प्रकृति की साधना एवं गायत्री उपासना के सहारे ही अन्तःचेतना का विकास होता है।
मनन करते हुए सो जाने पर अचेतन मस्तिष्क द्वारा सोते समय ही उसका कोई ऐसा समाधान ढूँढ़ निकालना, जो जागने पर बुद्धि-पटल पर स्पष्टतः उभरकर विस्मित कर दें) आदि सभी के प्रति वैज्ञानिकों की मान्यता यही है कि वे अवचेतन मस्तिष्क की गतिविधियाँ है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-December
मनन, चिन्तन द्वारा आत्मा को ही प्राप्त करो।”
मनन कर अपने जीवन को वैसे ही बनाने का प्रयत्न करना चाहिये। तभी उसका पूर्ण लाभ हैं।”
मनन और दिव्य दृष्टि से भी उपलब्ध की जा सकती हैं। तप साधा इस प्रयोजन को भी बड़े सुंदरता के साथ पूरा कर सकती है और करेगी। हम इस प्रसंक्त को इस स्तर तक पहुंचा देंगे कि संसार भर कि विचारशील लोगों को अध्यात्मवा को ‘गरिमा’ सचाई और उपयोगिता को स्वीकार करके उसकी शरण में आने के लिए विवश होना पड़े।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-September
मनन करने के बाद आइन्स्टीन को भी कहना ही पड़ा कि मनुष्य का इस प्रकार समय, स्थान या देश, गति और कारण (टाइम, स्पेस, मोशन, एण्ड कांजेशन) की संकीर्णता में बँधना उसकी भयंकर भूल है। उन्होंने बताया कि वह सम्पूर्ण चीजें हैं ही नहीं। संसार में न तो समय का कोई अस्तित्व है, न स्थान का, न गति का और नहीं किसी कारण या परिणाम का। यह चारों मस्तिष्क की उपज है और हम जब तक इनसे प्रतिबन्धित है, तब तक अन्तिम सत्य (एब्सोल्यूट) की अनुभूति नहीं कर सकते। अन्तिम सत्य वह है, जो इन चारों से बँधकर नहीं इनको बाँधकर रखता है।
मनन के द्वारा आत्म-निरीक्षण और आत्म-समीक्षा अपने दोष दुर्गुणों को प्रकाश में लाती है। आत्म-सुधार के लिए शरीरगत बुरी आदतों और मनोगत दुष्प्रवृत्तियों से संघर्ष करके पुराने क्रम में आमूल चूल परिवर्तन करना पड़ता है। तपश्चर्या इसे ही कहते हैं। तप साधना का यही उद्देश्य है। यह वनवास की तरह घर में रहकर भी की जा सकती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-May
मनन करिये। अच्छे विचार वालों से संसर्ग करिये, अच्छे विचारों का साहित्य पढ़िये और इस प्रकार हर ओर से अच्छे विचारों से ओत-प्रोत हो जाइये। कुल ही समय में आपके उन शुभ विचारों से आपकी एकात्मक अनुभूति जुड़ जायेगी, उनके चिन्तन-मनन में निरन्तरता आ जायेगी, जिसके फलस्वरूप वे मांगलिक विचार चेतन मस्तिष्क से अवचेतन मस्तिष्क में संस्कार बन-बनकर संचित होने लगेंगे और तब उन्हीं के अनुसार आपका चरित्र निर्मित और आपकी क्रियायें स्वाभाविक रूप से आपने आप संचालित होने लगेंगी। आप एक आदर्श चरित्र वाले व्यक्ति बनकर सारे श्रेयों के अधिकारी बन जायेंगे
मनन-शक्ति स्मृति, संकल्प, वेग, मनोरथ, कामना, योग, प्राण-शक्ति आदि सभी उस परमात्मा की सत्ता का ज्ञान कराने वाले है। जो परमात्मा की जान लेता है, वह इस लोक से उठकर स्वर्गलोक में ब्रह्म के साथ सभी दिव्य मोमों को पाता है। यह ज्ञानी अमृतत्व को प्राप्त होता है।
मनन में निरन्तरता आ जायेगी, जिसके फलस्वरूप वे मांगलिक विचार चेतन मस्तिष्क से अवचेतन मस्तिष्क में संस्कार बन-बनकर संचित होने लगेंगे और तब उन्हीं के अनुसार आपका चरित्र निर्मित और आपकी क्रियायें स्वाभाविक रूप से आपने आप संचालित होने लगेंगी। आप एक आदर्श चरित्र वाले व्यक्ति बनकर सारे श्रेयों के अधिकारी बन जायेंगे
मनन की प्रक्रिया भी अबाध गति से चलती रहती है और वह विषय अवचेतन में जा-जाकर संस्कार रूप में परिणत होता रहता है। इसी नियम के अनुसार बहुधा देखा जाता है कि अनेक लोग, जो कि प्रियता के कारण भोग वासनाओं को निरन्तर चिन्तन से संस्कारों में सम्मिलित कर लेते हैं, बहुत कुछ पूजा-पाठ सत्संग और धार्मिक साहित्य का अध्ययन करते रहने पर भी उनसे मुक्त नहीं ड़ड़ड़ड़ चाहते है कि संसार के नश्वर भोगों और ड़ड़ड़ड़ वासनाओं से विरक्ति हो जाये, लेकिन उनकी ड़ड़ड़ड पूरी नहीं हो पाती
मनन किया जायेगा तो संस्कारों के रूप में कूड़ा-कर्कट ही इकट्ठा होता जायेगा।
मनन करने से मन और मोक्ष प्राप्त करने से चेतना को विधि रूप में देखा जाता है। अहंकार रूप से उस ही ड़ड़ड़ड़ कहते है। इस पर विभिन्न नामों का एक ही आधार है। चेतना इन चेतना को शक्तियों को मूलाधार शक्ति को ही कुण्डलिनी कहा जाता है। ज्ञान और अनुभव के पाँचों कोष के बीच रूप से इसी में पायी जाती है, इसलिये कुण्डलिनी शक्ति जागृत कर लेने वाला इन्द्रियों को उसी तरह पक्ष में कर देता है जिस तरह लगाम लगे हुये घोड़ों को वश में कर लिया जाता है जिसने इन्द्रियों को जीते लिया संसार में उसका भय जो निर्भय हो गया वही विजय-विजेता हो गया।
मनन और धारण किया जाता है, ईश्वरीय सत्ता का बोध उतना ही निर्मल होता चला जाता है। उसके लिये न तो मनुष्य को कही अलग जाने की आवश्यकता है और न कुछ और अध्ययन कीं गीता के 9 वे अध्याय में इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए भगवान् कृष्ण ने कहा था-
मनन्ति तपांसि सर्वाि च युद्ववन्ति ड़ड़ड़ड़ ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पद सगंहेण ब्रबीमि।
मनन किया जाता रहे तो मनुष्य के संस्कार शुभ और सुन्दर बनेंगे इसके विपरीत यदि अशुद्विचारों को ग्रहण कर मस्तिष्क में बसाया और मनन किया जायेगा तो संस्कारों के रूप में कूड़ा-कर्कट ही इकट्ठा होता जायेगा।
मनन और विश्वास के द्वारा संस्कार रूप में प्रौढ़ और परिपुष्ट किया जाय। पुराने संस्कार बदलने के लिये नये संस्कारों की रचना परमावश्यक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-March
मनन-चिन्तन का क्षेत्र हैं।
मनन भी किया जाये तो बहुत कुछ उस दिशा में बढ़ा जा सकता है। स्वाध्याय स्वयं ही एक तप, आसन और निदिप्यास के समान है। इसका नियम निर्वाह से आप ही आप अनेक नियम, संयमों का अभ्यास हो जाता है।
मनन करते रहने से मन पर शिव संस्कारों की स्थापना होती हैं, जिससे चित्त अपने आप दुष्कृत्यों की ओर से फिर जाता है। स्वाध्यायी व्यक्ति पर कुसंग का भी प्रभाव नहीं पड़ने पाता, इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है। जिसकी स्वाध्याय में रुचि है ओर जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है, वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय स्वाध्याय में तो लगाता है। इसलिये उसके पास कोई फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा और दूषित वातावरण से अवांछनीय तत्त्व ग्रहण कर लायेगा।
मनन नहीं करता। सोच लेता है जब मैं इतना क्रिया-काण्ड करता हूँ तो इसके बाद अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। आत्म-ज्ञान अथवा परमात्म अनुभूति करा देने के लिए इतना ही पर्याप्त है तो निश्चय ही वह भ्रम में है। आत्मा का क्षेत्र वैचारिक क्षेत्र है, सूक्ष्म भावनाओं एवं मनन-चिन्तन का क्षेत्र हैं।
मनन और अन्तःमन्थन के आधार पर यह सुनिश्चित रूप से कह सकते हैं कि हमें यदि अन्तरंग विभूतियाँ प्राप्त हुई हैं और उनके आधार पर बाह्य जगत में कुछ हलचलें उत्पन्न करने का अवसर मिला है तो इसका एक मात्र कारण हमारे अन्तःकरण में आदि से अन्त तक लबालब भरा हुआ प्यार ही है। ईश्वर को माध्यम बनाकर उसकी कृषि की गई और जब वह उगा और फला तो उसका प्रकाश निकटवर्तियों से लेकर दूरवर्तियों तक व्यापक क्षेत्र में फैला। दूसरों ने उससे लाभ उठाया और हम स्वयं स्वर्गीय उल्लास की अनुभूति हर घड़ी करते रहे। उसी आवेश में लोक-सेवा और आत्मबल संवर्धन के वे कार्य बन पड़े जो वस्तुतः तुच्छ हैं पर दूसरे उन्हें बहुत बढ़ा-चढ़ा देखते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-February
मनन करता रहता है।
मनन करते रहने से मनोदशा में सात्विक भाव की वृद्धि होती है। मनुष्य का आचरण उदात्त तथा उन्नत होता है। मानसिक शक्ति का विकास होता है, गुणों की प्राप्ति होती है। जिसका आचरण उन्नत है, जिसका मन दृढ़ और बलिष्ठ है, जिसमें गुणों का भण्डार भरा है, उसको सुख शाँति के अधिकार से संसार में कौन वंचित कर सकता है। भारतीय मंत्रों का अभिमत दाता होने का रहस्य वही है कि बार बार जपने से उनमें निवास करने वाला दिव्य विचारों का सार मनुष्य के अन्तःकरण में भरा है, उसको सुख शाँति के अधिकार से संसार में कौन वंचित कर सकता है।
मनन कर श्रेय पाया है, निर्विवाद रूप से उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत द्वारा सबसे पहले शक्ति की ही साधना की है। वासना को जीत और इन्द्रियों पर अधिकार कर सकने पर ही वे जीवन में श्रेयस्कर कार्य कर सकने में सफल हो सके है।
मनन करे, मुझे परमात्मा ने अनन्त शक्ति दी है, मुझे किसी दूसरे पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। परमुखापेक्षी रहना मानवीय व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं परावलम्बी होना कोई विवशता नहीं है। वह तो मनुष्य की एक दुर्बल वृत्ति ही है। मैं अपनी इस दुर्बल वृत्ति का त्याग कर दूँगा और स्वयं अपने परिश्रम तथा उद्योग द्वारा और स्वयं अपने परिश्रम तथा उद्योग द्वारा अपने मनोरथ सफल करूँगा परावलम्बी व्यक्ति पराधीन रहता है और पराधीन व्यक्ति संसार में कभी सुख और शाँति नहीं पा सकता, मैं साधना द्वारा अपनी आन्तरिक शक्तियों का उद्घाटन करूँगा, शारीरिक शक्ति का उपयोग करूँगा और इस प्रकार स्वावलम्बी बनकर अपने लिये सुख शाँति की स्थिति स्वयं अर्जित करूँगा निश्चय ही इस प्रकार के अनुकूल विचारों की साधना से मनुष्य की परावलम्बन की दुर्बलता दूर होने लगेगी और उसके स्थान पर स्वावलम्बन का सुखदायी भाव बढ़ने और दृढ़ होने लगेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-August
मनन करने के बाद आइन्स्टीन को भी कहना ही पड़ा कि मनुष्य का इस प्रकार समय, स्थान या देश, गति और कारण (टाइम, स्पेस, मोशन, एण्ड कांजेशन) की संकीर्णता में बँधना उसकी भयंकर भूल है। उन्होंने बताया कि वह सम्पूर्ण चीजें हैं ही नहीं। संसार में न तो समय का कोई अस्तित्व है, न स्थान का, न गति का और नहीं किसी कारण या परिणाम का। यह चारों मस्तिष्क की उपज है और हम जब तक इनसे प्रतिबन्धित है, तब तक अन्तिम सत्य (एब्सोल्यूट) की अनुभूति नहीं कर सकते। अन्तिम सत्य वह है, जो इन चारों से बँधकर नहीं इनको बाँधकर रखता है।
मनन के द्वारा आत्म-निरीक्षण और आत्म-समीक्षा अपने दोष दुर्गुणों को प्रकाश में लाती है। आत्म-सुधार के लिए शरीरगत बुरी आदतों और मनोगत दुष्प्रवृत्तियों से संघर्ष करके पुराने क्रम में आमूल चूल परिवर्तन करना पड़ता है। तपश्चर्या इसे ही कहते हैं। तप साधना का यही उद्देश्य है। यह वनवास की तरह घर में रहकर भी की जा सकती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-July
मनन्ताहो इयमित्यव भासते॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-October
मनने कहा नहीं। जीवन के दृश्य भाग नश्वर हैं, क्षणिक हैं, असन्तोषप्रद है, जब तक मनुष्य पूर्णता नहीं प्राप्त कर लेता, तब तक उसे ऐसी कोई मान्यता नहीं बना लेनी चाहिये। इस चिन्तन से कल वाला बोझ हल्का हो गया। राजकुमार नीरवता ने मान लिया कि वह भी शरीर में अभिव्यक्त, अव्यक्त आत्मा है और उसे पाने के लिये अहंभाव छोड़ना ही पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-November
मनन यह साधना की प्रारम्भिक आवश्यकतायें है, शिखिध्वज! आज तुम्हारी मन्त्र-दीक्षा सम्पन्न हुई। पूजन की सामग्री, उपयुक्त पात्र, कुश-आसन यह अपने पास रखने होंगे। पंचोपचार पूजन सहित मंत्र जप करना चाहिये और शुभ्र ज्योति स्वरूप निराकार भगवती गायत्री का ध्यान करना चाहिये। जब तुम इस प्रारम्भिक साधना को सफलतापूर्वक पूरा कर लोगे तो आगे उच्चस्तरीय साधना के लिये, तुम्हें अग्नि-दीक्षा भी देंगे।” यह कहकर महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-November
मनन की आवश्यकता रहेगी। इसके लिए समय चाहिए। जीवन साहित्य पढ़ने के लिए—उपयोगी मार्ग−दर्शन सुनने, समझने के लिए—उनको कार्य रूप में परिणत करते समय आने वाली कठिनाइयों का समाधान करने के लिए दूरदर्शी एवं गम्भीर ऊहापोह की आवश्यकता है। यह कार्य समय साध्य है। उतावली में जादू की छड़ी घुमाकर परिष्कृत जीवन को योजना बनाना और उसे कार्य रूप में परिणत करने की बात पक्की करने के लिए भारी बौद्धिक श्रम करना पड़ेगा और गम्भीर दूरदर्शिता का उपयोग करना पड़ेगा।
मनन से भी ले सकती है। पशु को मनुष्य बनाने के लिए उस सद्ज्ञान की अनिवार्य आवश्यकता रहती है जो उसकी चिन्तन प्रक्रिया एवं कार्य−पद्धति में उच्चस्तरीय उभार उत्पन्न कर सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-December
मनन आदि द्वारा प्रशिक्षित एवं परिष्कृत किया जा सकता है पर अचेतन पर इन प्रक्रियाओं का बहुत थोड़ा प्रभाव पड़ता है। उसे निरन्तर के दीर्घकालीन अभ्यास ही प्रभावित करते हैं। इस दृष्टि से तत्व वेत्ताओं ने कितने ही प्रकार की विशिष्ट साधनाएँ विनिर्मित की हैं। इन्हें योगाभ्यास के नाम से पुकारा जाता है। जप और ध्यान इस प्रयोजन की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता पूरी करते हैं।
मननशील मनुष्य—कहा जाता है। मनुष्य के सर्वांगीण उत्कर्ष ने उसे अनेक परिस्थितियों और समस्याओं से निपटने के लिए बाध्य किया है इसलिए उसकी चेतना का भी बहुमुखी विकास हुआ है। अन्य जीवों के सामने वैसा कुछ उन्हें मात्र शरीर यात्रा के सम्बन्ध में ही सोचना पड़ता है आहार, विश्राम, सुरक्षा एवं प्रजनन की समस्याओं को सुलझाने के अतिरिक्त उन्हें अधिक कुछ नहीं सोचना पड़ता। उनका समाज बहुत छोटा और निर्माण या संचय उन्हें नहीं करना पड़ता। अस्तु मस्तिष्क को अधिक कुछ सोचने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-March
मनन अध्ययन और निदिध्यासन करने के लिए अग्रसर होने का निश्चय ही आत्म−साधना का—उपासना, तपश्चर्या और योगसाधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश, परामर्श इस प्रकार है—

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-September
मनन देखते ही बनता था। कभी−कभी वह गम्भीर समस्या को लेकर उलझ जाते थे और घण्टों लगे रहकर उसका समाधान प्रस्तुत करते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-April
मनन चिन्तन− योग तप आदि के समस्त साधन,उपचार,ईश्वर प्राप्ति का लक्ष्य पूरा करने के लिए ही बनाये गये हैं।
मनन चिन्तन में सम्भव हो सकता है। टेलीफोन वार्ता की तरह भगवान से वार्तालाप करने की और टेलीविजन पर चलते−फिरते ईश्वर को देखने की निरर्थक उड़ानें उड़ना छोड़कर ही हम वास्तविकता के निकट पहुँच सकते हैं। भ्रम जंजाल गढ़ कर तो हम अपने आपको अवास्तविकता के ऐसे जाल में अधिकाधिक फँसाते चले जायेंगे जिसमें बालू से तेल निकालने जैसे निरर्थक प्रयासों की तरह निराशा ही हाथ लगेगी। सुखद कल्पना गढ़ लेना और ईश्वर के साथ क्रीड़ा कल्लोल, हास−विलास करते रहना एक बात है और वैसी यथार्थता का होना दूसरी। कलपना की उड़ानें सम्भव है किसी का भावनात्मक समाधान कर सकें पर वास्तविकता के क्षेत्र में उसके हाथ कोई बड़ी उपलब्धि मिल नहीं सकेगी यह भी सत्य है।
मनन, चिन्तन, ध्यान प्रभृति, ज्ञान पक्ष तक सीमित रहने वाली प्रक्रिया अपूर्ण एवं एकांगी है। इसी प्रकार जिन्होंने चिन्तन परिष्कार को तिलाञ्जलि देकर मात्र जप, तप के, हठ योग के, काय−कष्ट तक सीमित विधि−विधान को ही सब कुछ मान लिया है वे भी एक पहिये की गाड़ी चलाने वालों की तरह असफल रहते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-August
मनन्तं ब्रह्म। —तैत्तरीयोपनिषद् 2 वल्ली 1

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-July
मनन किया जाय। उन प्रेरणाओं को क्या अपने जीवन−क्रम में उतारना सम्भव है? यदि है तो किस क्रम से, कितनी मात्रा में—इन प्रश्नों पर विचार करने का नाम ही चिन्तन−मनन है।
मनन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-February
मनन द्वारा संभव होती है।
मनन करने से उनकी मूर्ति हमारे मन में उत्पन्न हो सकती है। अगर हम उस पर बराबर ध्यान लगाते रहें तो वैसे वैसे ही उसका रूप हमारे मन में अधिकाधिक स्पष्ट होता जायेगा और हम उसके विषय में कही अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेंगे।
मनन, उन्हें ग्रहण करने का प्रयत्न करना, उस पर अग्रसर होने की चेष्टा करना। सच्चे शिव के उपासक वही हैं जो अपने मन में स्वार्थ भावना त्याग कर परोपकार की मनोवृत्ति को अपनाते हैं जब हमारे मन में यह विचार उत्पन्न होने लगते हैं तो हम अपने आत्मीयजनों के साथ झूठ, छल,कपट, धोखा, बेईमानी, ईर्ष्या, द्वेष आदि से मुक्त हो जायेंगे। यदि शिवरात्रि व्रत के दिन हम इस महा पथ का अवलम्बन नहीं लेते तो शिव का व्रत और पूजन केवल लकीर पीटना मात्र रह जाता है। उसका कोई विशेष लाभ नहीं होता ।
मनन के लिए उत्तम अवसर होता है। अधिक खाने वाले व्यक्तियों के विचार स्थूल होते हैं। वह कोई सूक्ष्म बात नहीं सोच सकते। पेटू लोग प्रायः स्थूल बुद्धि के होते हैं इसलिए बुद्धि में तीव्रता लाने के लिए हमारे धर्म शास्त्रों में व्रतों का विधान है। व्रत के दिन जो विचार मन में आते हैं, उनकी एक अमिट छाप मस्तिष्क पर पड़ जाती है।
मनन ये मनुष्य की 40 भौतिक साँसारिक कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं। वैदिक मंत्र विद्या व यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण पुस्तक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-May
मनन इत्यादि करना चाहिए। इस सम्बन्ध में कुछ पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों की नई खोजें और बहुमूल्य विचार यहाँ उद्धृत किये जाते हैं। मानस रोगों के सम्बन्धों में डॉक्टर डेविड हैराल्ड फिल्क के विचार क्रान्तिकारी हैं। वे लिखते हैं-
मनन व आचरण करना चाहिए। जो अशिक्षित है वे लोग भी धर्मात्माओं के संग से इतनी शक्ति प्राप्त कर सकते हैं कि जिसमें अपने आपको संभाल सकें और विपत्ति के समय अपने पैरों पर खड़ा हो सकें। स्वयं भगवान गीता में कहते हैं

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-November
मनन करना चाहिए। मन को हम जैसे संकेत देते हैं वह अपनी गति को उसी ओर मोड़ लेता है। हमें पूर्ण विश्वास है कि यदि हम इन श्रेष्ठ संकेतों को पुनः पुनः ध्यान में लाते रहेंगे तो हमारा जीवन एक नये साँचे में ढलता जायेगा और उसके अनुसार हम अपने आपको मनुष्य कहलाने के अधिकारी बना लेंगे। प्राणी-मात्र इस श्रेष्ठ मार्ग पर चले, उस दयालु माता से यही विनम्र प्रार्थना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-June
मनन करेंगे, उतना ही उसका महत्व अधिकाधिक प्रकट होता जायगा।
मनन से मनुष्य की 40 भौतिक साँसारिक कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं। वैदिक मंत्र विद्या की यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण पुस्तक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-July
मननाद्यतः।
मनन करें और हृदयंगम करने का प्रयत्न करें। ‘अखण्ड-ज्योति’ उनकी जिह्वा है, वाणी है। जिस प्रकार किसी ब्राह्मण को भोजन कराते समय उसके जिह्वा के मधुर और तृप्त करने वाला आहार प्रदान करते है, उसी प्रकार आचार्यजी की जिह्वा ‘अखण्ड-ज्योति’ को सींच कर हम उन्हें तृप्त कर सकते हैं, उनके निश्चय को सफल बनाने का पुण्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अखण्ड ज्योति को हम नियमित रूप से पढ़ें, दूसरों को पढ़ावें, उसमें उल्लिखित विचारों को आध्यात्मिक लोगों में प्रशस्त करें तो एक बड़ी बात आचार्य जी को तृप्त करने के लिए हो सकती है। इस वर्ष अखण्ड ज्योति के ग्राहक काफी घट जाने से आचार्यजी अज्ञातवास जाने से पूर्व काफी खिन्न और चिंतित थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-September
मनन शक्ति मंत्र रूप है।
मननात्सर्वाभावानाँ त्राण्यात्संसर सागरात्।
मनन करने से सब अभाव दूर होते हैं, तथा जिसके द्वारा संसार सागर में त्राण मिलता है वह मनन शक्ति मंत्र रूप है।
मनन्तं ब्रह्म’ अर्थात्—ब्रह्म-सत्य रूप ज्ञान रूप और अनन्त है। अथर्ववेद 12।1।1 का वचन है—सत्यं ऋतं वृहत् अर्थात्—सत्य स्वरूप परमेश्वर से ही यह विश्व ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ है। छाँदोग्य 6।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-March
मनन चिन्तन की वैज्ञानिक क्रिया को निरंतर करते रहना चाहिए जब तक उन्नति की सीमा तक न पहुँच जावे।
मनन चिन्तन और पालन कर सके, कैसा उत्तम हो।
मनन निरंतर चलते रहना आवश्यक है। ‘भृंग कीट’ के उदाहरण में जब कीड़ा निरन्तर भृंग का ध्यान करता है तो वह शरीर समेत भृंग ही बन जाता है, इसी प्रकार मनुष्य भी भगवान के स्वरूप और गुणों की चिन्तन करता हुआ उसी जैसा बन जाता है।
मनन चिन्तन करते रहने से और उसके उपकारों के प्रति श्रद्धा से मस्तक झुकाने से नम्रता, मधुरता और सहिष्णुता आदि सद्गुण स्वयमेव उत्पन्न होने लगते हैं। उसके अन्तःकरण में सेवा की वृत्ति जागृत होने लगती है। वह सबको प्यार करने लगता है और सब उसको प्यार करने लगते हैं। इस प्रकार के सद्व्यवहार से वह इस लोक में यशस्वी बनकर जीवन व्यतीत करता है और मरने पर सद्गति को प्राप्त होता है। इस प्रकार लौकिक व्यवहार के लिए जो गुण आवश्यक हैं वे भी भगवान की पूजा उपासना से उत्पन्न होने लगते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-August
मनन चिन्तन किया और अपने सूक्ष्म नेत्रों से देखा तो उन्हें इस समस्त क्रिया शीलता का आधार ब्रह्म ही दिखाई दिया। उपनिषदों का कर्म के सम्बन्ध में यही अनुभव सिद्ध एवं सत्य सन्देश है।
मनन और निदिध्यासन करने योग्य है। हे मैत्रेयी, उसे देखने, सुनने, समझने और अनुभव करने से इस संसार में जो कुछ है वह सब जाना जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-December
मनन से मनुष्य की 40 भौतिक एवं साँसारिक कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं। वैदिक मंत्र विद्या की यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण पुस्तक हैं।
मनन्तः पुण्यसम्भवः॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-February
मनन करना और असत्य में से सत्य ढूँढ़ लेना यह कार्य है जो अवतार के भक्तों को करना होगा। प्रेम शब्द की व्यापकता महान है। सिनेमाबाज, छैल-छबीले लड़के, प्रेम के नाम पर व्यभिचार के जो गीत गाते फिरते हैं वह प्रेम नहीं है, यौन आकर्षण तो एक भौतिक प्रतिक्रिया है, जैसे भूख लगने पर रोटी की तरफ मन खिंचता है। कोई बालक रोटी खाने के लिये मचल रहा है तो यह नहीं कहा जा सकता है कि उसे रोटी के प्रेम की व्याकुलता है। यह मचलना तो उसकी शारीरिक भूख और जिह्वा इन्द्रिय की लोलुपता का सूचक है।
मनन के पश्चात प्रतीत होता है कि अन्याय की जननी अशक्ति है। अत्याचारी उतना बड़ा पापी नहीं है, जितना कि अशक्त। प्रभु ने अनन्त शक्तियों का भण्डार मनुष्य को देकर उसे इस भूमंडल पर निर्भयता के साथ विचरण करने के लिए भेजा है। उसके अन्दर इतना तेज एवं पराक्रम परिपूर्ण है कि कोई उसकी ओर आँख उठाकर नहीं देख सकता। जो व्यक्ति अपनी ईश्वरदत्त सत्ता को गंवा देता है, वह अवश्य ही बड़ा भारी पापी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-May
मनन करना होगा। अन्ततः सूक्ष्म बुद्धि से दूरदर्शिता के साथ जब सोचता है, तो एक नया प्रकाश पाता हूँ। मानव जाति के अनेकानेक कष्टों का कारण वे अभाव नहीं है जो प्रत्यक्षतः दिखाई पड़ते हैं। समस्त दुखों की जननी अविद्या है। बीमार को दवा से अच्छा नहीं किया जा सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-December
मनन के आधार पर इन सद्ग्रन्थों की रचना की है। इनकी एक पंक्ति में आध्यात्मिक तत्वज्ञान भरा हुआ है। यह रचनाएं इसी मास छप कर तैयार हुई हैं। पाठकों को इनकी एक-एक प्रति अवश्य मंगा लेनी चाहिए।
मनन करने योग्य होगी। यह अंक अपूर्व और अद्भुत गुप्त बातों की जानकारियों से परिपूर्ण होगा। विचारवान व्यक्तियों के लिए यह अंक प्राण-प्रिय हुए बिना न रहेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-September
मनन कर, वह बात सत्य ही जँचती है, जिससे चित्त शान्त हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-March
मनन कीजिए और उसके अनुसार आचरण कीजिए। तथा इसी प्रकार के दूसरे पाँच पर्चे लिखकर अन्य सज्जनों को दीजिए, ताकि वे भी आपकी ही तरह पाँच-पाँच लिखकर औरों को दें, सत्य-सन्देश की इस अमर बेल को फैलाने से आपको अमर फल मिलेगा। और इस अमर बेल को तोड़ देने से पाप के भागी होंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-October
मनन करने योग्य होगी। यह अंक अपूर्व और अद्भुत गुप्त बातों की जानकारियों से परिपूर्ण होगा। विचारवान् व्यक्तियों के लिए यह अंक प्राण-प्रिय हुए बिना न रहेगा।
मनन और विवेचन में किसी बात को ठीक मान लिया जाता है, तो भी लोग ग्रहण करने को तैयार नहीं होते। कहते हैं कि विचारों से जीवन निर्माण होता है, पर विचार होते हुए भी आचरणों में अन्तर देखा जाता है। एक पंडित कथा कहते हुए बड़े बलपूर्वक यह उपदेश करता है कि धर्म पूर्वक जीवन बिताना चाहिए, परन्तु उसका निजी जीवन दुराचार से भरा हुआ देखा जाता है। पुजारी जी ईश्वर की पूजा करते हैं और उसे सर्वज्ञ मानते हैं, यदि कोई सर्वज्ञता के विरोध में कोई कुछ कहे, तो लड़ने को तैयार हो जाते हैं, परन्तु स्वयं चोरी करने के आदी हैं, मन्दिर में आई हुई पूजा की वस्तुओं को ही चुरा लेते हैं। मन्दिरों में बहुमूल्य वस्तुओं की चोरियों के समाचार अक्सर मिलते हैं, इन घटनाओं में प्रायः उन्हीं ईश्वर-सेवकों की करतूतें होती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-April
मनन्दसिंह जी सहनोरा, महन्त सुन्दरदास जी खुन्दपुर जैसे साहसी महानुभावों का काम है।
मनन करेंगे, तो उन्हें ‘सत्’ आन्दोलन की गहरी नींव का प्रमाण मिलेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-January
मनन किया है और कितनी ही बातें ऐसी पाई हैं, जो अन्य धर्मों की पुस्तकों में मिलना मुश्किल हैं, हिन्दू धर्म को मानव धर्म कहा जा सकता है। यह एक आचार शास्त्र है, जो मजहबों की बनिस्बत कही ऊँचा है। सनातन वैदिक धर्म इतना परिपूर्ण है कि उसमें दोष निकालना बहुत कष्ट साध्य है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-December
मनन और चिंतन भी प्रकारांतर से स्वाध्याय और सत्संग की आंशिक आवश्यकता पूरी करते हैं। अपनी तर्कबुद्धि विकसित की जानी चाहिए और सामने प्रस्तुत समस्याओं में से प्रत्येक पर पक्ष हो या विपक्ष दोनों को आधार मानकर विचार करना चाहिए। इस प्रकार अपनाया गया जीवनक्रम विचारशीलता को परिमार्जित करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-May
मनन में भी बाधा नहीं पड़ती और आत्म विश्लेषण, अन्तःकरण निरीक्षण में भी कोई बाधा नहीं पड़ती। परिस्थिति जन्य एकान्त वह है जहाँ सर्वथा एकाकी रहना पड़ें। मनःस्थिति जन्य एकान्त वह है। जिसमें व्यक्तियों के इर्द-’गिर्द रहते हुए भी उनसे लगाव हटा लिया जाय या हट जाय।
मनन-चिन्तन भी। स्वाध्याय और लेख भी इन परिस्थितियों में ठीक तरह संभव हो जाता है। यों सर्वथा एकान्त तो समाधि स्थिति में ही भले बन पड़े अन्यथा शारीरिक आवश्यकताएँ और मानसिक स्मृतियाँ भी किसी न किसी प्रकार के विक्षेप उत्पन्न करती रहतीं है, वैज्ञानिक शोध एवं आध्यात्मिक अवगाहन जैसे कार्यों में विक्षेप डालती है। सरल यही है कि प्रत्यक्ष और स्मृति जन्य लगाव अन्यत्र बिखरने न दिया जाय। इतने से भी वह काम चल जाता है जो एकान्त माँगता हैं।
मनन, विचार-व्यवहार में सरलता उत्कृष्टता का समावेश होने पर जीवन भी परिष्कृत बनेगा साथ ही मन भी अनगढ़ और कुसंस्कारी न रह सकेगा। अध्यात्म उपचारों का अवलम्बन इसमें सर्वोत्तम परिणाम प्रस्तुत करता है। फिर सार्थक स्वप्न भी अधिक मात्रा में देखे जा सकेंगे। वैसे भी जब भी ऐसे संकेत मिलें उनसे प्रेरणा लें व जीवन की रीति-नीति में उन प्रेरणाओं को समाविष्ट कर उनसे लाभ उठाने का प्रयास करें।
मनन किया जाता रहे। वस्तुतः आत्म सुधार और आत्म परिष्कार की प्रक्रिया जिस आधार पर पूरी होती है, वही सच्चा “भजन” एवं सच्चा “ध्यान” है।
मनन, सत्परामर्श आदि उपाय काम में लाये जाते हैं। यह उपाय साधन जिन्हें उपलब्ध नहीं होते वे कूपमण्डूक बने रहते हैं। वे जीवन का भार ढोने के अतिरिक्त और कुछ कर नहीं पाते। इसीलिए जहाँ चेतना की शक्ति पर विचार किया जाता है वहाँ प्रकारान्तर से उसे विचार शक्ति का विशेष सुनियोजन किया जाना कहा जाता है। विचारशील ही महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाते, महत्वपूर्ण कार्य करते और सफल महापुरुष कहलाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-February
मनन के लिए उपासना साधना के लिए उपयुक्त बताया है। ओर परिश्रम के लिए उपार्जन के लिए लोक आराधना के लिए पुरे दिन को रखा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-March
मनन चिन्तन की शक्ति से भी परे गहराई में जाने पर उन क्षमताओं का अस्तित्व सामने आता है जिन्हें अतीन्द्रिय क्षमता अथवा दैवी अनुकम्पा के नाम से जाना जाता है। वस्तुतः वह व्यक्ति की अविज्ञात उच्च स्तरीय सामर्थ्य ही है, जिसे प्रयत्नपूर्वक जाग्रत किया और बढ़ाया जा सकता है। इन समस्त अलौकिक क्षमताओं के केंद्र व्यक्ति के मस्तिष्क में विद्यमान है जो चेतना से सम्बन्धित है तथा अतिसूक्ष्म है। ये व्यष्टि सत्ता को समष्टि से जोड़ते है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-June
मनन कभी व्यर्थ नहीं जाता। जितनी अवधि तक सार्थक जीवन जीना हो, मनुष्य को अपनी प्रसुप्त क्षमताओं को जमाने, प्रतिभा को खरादते रहने, स्वाध्यायशील ही बने रहने का प्रयत्न करना चाहिए। यह प्रयास क्रिया की प्रतिक्रिया की तरह सुनिश्चित प्रतिफल देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-January
मनन, चिंतनकर स्वयं को कृतकृत्य किया।
मननकर आचरण में उतारने वाले गांधी जी ने गीता माता में अपने सार-निष्कर्ष को स्पष्ट करते हुए लिखा है— “गीता के अनुसार आचरण करने में प्रतिदिन निष्फलता प्राप्त होती है, इस निष्फलता में हम सफलता की उगी हुई किरणों की झाँकी देखते है।"
मनन के क्रम में अपनी स्थिति का विवेचन और उदात्तीकरण। कुछ दिन के अभ्यास से इन चारों को दिनचर्या का अविच्छिन्न अंग बना लेना सरल संभव हो जाता है।
मनन और चिंतन किया है और इसे शक्ति प्राप्त करने की एक वैज्ञानिक पद्धति घोषित किया है। इसकी महत्ता पर प्रकाश डालते हुए प्रसिद्ध विचारक मनीषी डेल कार्नेगी ने कहा है— “यदि लोगों को यह ज्ञात हो जाता कि प्रार्थना से शांति और संतोष मिलता है, तो जो आत्महत्या की चेष्टा करते हैं अथवा पागल हो जाते हैं, उनमें से अधिकांश को बचाया जा सकता है।” उन्होंने चिंताओं-मनोविकारों से छुटकारा प्राप्त करने का उपाय प्रार्थना को बताया है। नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध वैज्ञानिक डाॅ॰ अलेक्सिस कैरेल ने अपनी पुस्तक  'मैन द अननोन' में लिखा है कि, "प्रार्थना द्वारा कठिन रोगों से भी छुटकारा पाया जा सकता है।" इसी तरह की मान्यता वैज्ञानिक अलबर्ट विल्क की भी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-April
मनन वाले कठिन कार्या को सर्वोत्कृष्ट क्षमता वाले अपने उस जैवसमय में किया करते थे जब सायं अँधेरा छाने लगता। विख्यात वैज्ञानिक थामस एडीसन को तो रात में ही काम करने का शौक था किन्तु सबसे बड़ी बाधा अँधेर की थी इसे दूर करने में भी उनने सफलता पाई और विधुत बल्ब का आविष्कार इसी अवधि में कर डाला। इसी तरह पाश्चात्य सिनेमा के जाने माने कलाकार फ्रैंस सिनाट्रा को राम में कार्य आरंभ करने और सफलता तक पहुँचने की धुन सवार रहती थी। अपनी प्रसिद्ध फिल्म-”एहोल इन दी हेड” को उसने एक रात्रि में पूर्ण कर दिखाया जबकि उस समय आम प्रचलन दिन में ही कार्य करने का था।
मनन का वह सबसे उपयुक्त समय होता है। विद्यार्थियों के अध्ययन का भी यही समय सर्व श्रेष्ठ माना गया है। अध्यात्म वेत्ताओं ने तो उषाकाल को आध्यात्मिक क्रियाकृत्यों हेतु सबसे अच्छा समय बताया है। आसन-प्राणायाम, ध्यान धारणा जैसे योगाभ्यासपरक अध्यात्म उपचारों को अपनाकर जैविक लय की सक्रियता को बढ़ाया और चिरस्थायी बनाया जा सकता है।
मनन का सहयोग रहता है। इस क्षेत्र की सशक्तता को नकारा नहीं जा सकता और व्यक्ति निर्माण के लिए, व्यक्तिगत संपर्क की उपेक्षा नहीं की जा सकती। चरित्रवान और क्रियाकुशल व्यक्ति देश की, समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यह कार्य प्रधानता व्यक्ति को सद्गुणों की सत्प्रवृत्तियों क ओर अग्रसर करने से ही हो सकता है। इसमें उत्कृष्टता का अभ्यास भी साथ में जुड़ा रहना चाहिए।
मनन, आचार विचार, संस्कृति एवं व्यक्तिगत रुचि रुझान पर निर्भर करता है। बाह्म याँत्रिकी घड़ी में तो एक रूपता होती है किन्तु भीतरी जैविक घड़ी में भिन्नता क्यों है? इसका उत्तर गहन अनुसंधान के पश्चात ढूँढ़ निकाला है - बोस्टन विश्वविद्यालय के वरिष्ठ मनोविज्ञानी डा विलियम एस काँडन और उनके सामर्थ्यों ने उनके अनुसार नवजात शिशु की जैव घड़ियों का तारतम्य आरंभ के कुछ घण्टों तक अपनी जन्मदात्री माँ से मिला रहता है। किन्तु ज्योंही उस अन्य लोगों की आवाजें सुनने को मिलती हैं वह उन लयों के अनुसार अपने को ढालने लगता है। यह जीवंत घड़ियाँ याँत्रिकी घड़ों की तरह ठीक समय पर टिक-टिक तो नहीं करती पर प्रकृति की लय के साथ अवश्य मिली होती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-November
मनन की सुविधा होती है पर इसके लिए मन को फुरसत तो मिलनी चाहिए। लालसा जिज्ञासाओं से उसे छुटकारा तो मिलना चाहिए। यह कार्य ईश्वर का सान्निध्य स्थापित कर लेने के उपरान्त ही बन पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-May
मनन किया जाये। चींटियां यों ढेर में बिलबिलाती दिखती हैं पर उनका हर कार्य व्यवस्थित−नियन्त्रित और अपनी प्रभु सत्ता सम्पन्न रानी के इंगित पर चलता है। कोई भी चींटी न तो कभी निष्क्रिय होगी न व्यर्थ के कार्य करेगी। जो कार्य जिसे सुपुर्द है वह वही करेगी। नर का काम है परिश्रम पूर्वक खाद्यान्न व्यवस्था, सैनिक पहरेदारी करते, मजदूर बोझा ढोते, शव बाहर निकालते हैं और शिल्ली भवन निर्माण में जुटे रहते हैं।
मनन चिन्तन से ईश्वर प्राप्ति के लिए उत्सुकता बढ़ती है। यह उत्सुकता जितनी ही प्रगाढ़ होगी उतना ही मन उसमें सरसता अनुभव करने लगेगा और उसी के इर्द−गिर्द छाया रहेगा। एकाग्रता का यह प्रथम सौपान है। भौतिक प्रयोजनों में भी मन लगाने के लिए यही करना पड़ता है। शिक्षा, शिल्प, खेल, धन, यश, शोध, अध्ययन आदि का माहात्म्य जितनी अच्छी तरह समझ लिया गया होगा।
मनन चिन्तन के सहारे मन की अभिरुचि बदलती है और वह उस संदर्भ में भी रुचि लेने लगता है। इस संदर्भ में थोड़ी−थोड़ी धीरे−धीरे सफलता मिले तो भी उसे उत्साहवर्धक एवं आशाजनक समझना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-July
मनन, चिन्तन की साधना इसी प्रयोजन के लिए की जाती है। इसे ज्ञानयोग कहते हैं। अध्यात्म विवेचना के ग्रन्थ इसी निमित्त रचे गये हैं।
मनन, चिन्तन के चारों तत्व गुंथे हुए हैं। शारीरिक और मानसिक संयम अनुशासन की कठोर विधि व्यवस्था का पालन करना पड़ता है। प्रवचन और परामर्श का दैनिक लाभ मिलता है। दिनचर्या, इतनी अनुशासित और व्यवस्थित रहती है कि इस ढर्रे में ढल जाने वाला भविष्य में अपने आपको सर्वतोमुखी प्रगति में सहायक ढाँचे में ही ढाल लेता है। वातावरण का प्रभाव अभिनव परिवर्तन के रूप में निरन्तर अनुभव होता रहता है।
मनन, चिन्तन की गणना होती है। विज्ञान पक्ष में उपासना और साधना का समावेश है। इन्हें योग और तप भी कह सकते हैं। योग धारा में मस्तिष्कीय क्षेत्र में होने वाले प्रयोगों की गणना है। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के चिन्तन परक चारों ही उपचार योग है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-October
मनन, आकांक्षा, अभिरुचि आदि मानसिक गतिविधियों का केन्द्र व माध्यम है। इसका प्रधान कार्यस्थल मस्तिष्क ही है, यद्यपि सामान्यतः यह पूरे स्थूल शरीर में उसी तरह व्याप्त है, जैसे दूध में घी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-February
मनन चिन्तन करें।
मनन का क्रम अन्तर में। लहरें उठें हृदय-सागर में॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-September
मनन के साथ ही तीसरे चरण चिन्तन का भी आश्रय आवश्यक है। शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को उत्कृष्ट आदर्शों के आधार पर अनुशासित सन्तुलित रखना ही चिन्तन का उद्देश्य है। इसके लिए प्रातः उठते ही दिनभर को अपने लिए जीवन का एक अनुपम उपहार मानना और उसके सर्वोत्तम सदुपयोग का संकल्प कर तदनुरूप योजना बनाना अनिवार्य है। माना जाय कि एक ही दिन के लिए यह जन्म है और आज ही रात को मृत्यु देवी की गोद में विश्राम करना है। अतः समय की सम्पदा और भावों के वैभव का श्रेष्ठतम समायोजन कर लिया जाना चाहिए, ताकि इस एक दिन के जीवन का अधिकाधिक लाभ लिया जा सके और इस मार्ग की सभी बाधाएं दूर की जा सकें।
मनन साधन भी वांछित है। ये सभी भावनात्मक साधनाएं हैं। जिनके लिए ब्राह्ममुहूर्त का अनिवार्य बन्धन नहीं। सुविधा और समय के अनुसार इसे आगे−पीछे भी किया जा सकता है पर एकान्त स्थान तथा शान्त वातावरण जरूरी है, तभी अभीष्ट परिणाम सम्भव है। आंखें बन्दकर विचार किया जाए कि हमारा शरीर मृत अवस्था में पड़ा है।
मनन, और चिन्तन तीनों जरूरी हैं। इन्हें ही गायत्री महामन्त्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणाओं की त्रिवेणी कहा जा सकता है।
मनन और चिन्तन की त्रिवेणी में दिनभर सतत् स्नान करते हुए किए गए कर्म की वास्तविक अध्यात्म साधना का आनन्द अनुदान देते हैं। रात्रि को सोते समय बिस्तर पर जाने पर दिनभर के कर्तव्यों का शक्ति एवं निष्ठा में निर्वाह करने का स्मरण किया जाय। शेष रहे कार्य तथा दायित्व ईश्वर को सौंपकर पूर्ण निश्चिन्तता के साथ अनासक्त कर्मयोगी की तरह निद्रा−मृत्यु की गोद में विश्राम किया जाय। यही ‘हर दिन नया हर जन्म, हर रात नई मृत्यु’ सूत्र पर आचरण की विधि है। यही श्रेष्ठतम साधना है।
मनन द्वारा आत्मबोध अर्थात् जीवन−लक्ष्य का स्मरण, अपनी ऐन्द्रिक तृष्णाओं और आत्मिक आवश्यकताओं का अन्तर समझना। दोनों अभ्यास जितनी अधिक गहराई से किए जाएंगे तथा भावना जितनी ही प्रगाढ़ वह गहरी होगी अन्तर्ज्योति उतनी ही प्रखर−प्रदीप्त होती चली जाएगी। इससे श्रेष्ठतम उपलब्धियाँ भी सरल होती जाएंगी।
मनन से तो मन में अवांछित इच्छाओं के प्रति विरक्ति ही दृढ़ हो जाएगी। शरीर की आवश्यकताएं प्रयोजन−पूर्ति में साधक या बाधक होने की कसौटी पर कसी जाएंगी। ईश्वरीय प्रयोजन का वाहन शरीर सुदृढ़−स्वस्थ रहे, यही आवश्यक है।
मनन और (3) चिन्तन। तीनों का सन्तुलन ही समग्र साधना का स्वरूप है। तीनों में से एक की भी कमी अन्न, जल और वायु में से एक की कमी होने जैसा है। जीवन−यात्रा के लिये जैसे ये तीनों जरूरी हैं, जीवन साधना के लिए उसी तरह भजन, मनन, और चिन्तन तीनों जरूरी हैं। इन्हें ही गायत्री महामन्त्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणाओं की त्रिवेणी कहा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-March
मनन्द का महान् पांडित्य ही सन्देह के लिए पर्याप्त था उधर शकटार को यह भी ज्ञात था कि “देवदत्त” ही एक मात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें परकाया प्रवेश की विद्या आती थी सो यह अनुमान करते देर न लगी कि महापद्मनन्द के शरीर में “देवदत्त” की आत्मा के अतिरिक्त और कोई हो नहीं सकता था।
मनन्द की मृतक देह में प्रवेश कर स्वयं पद्मनन्द बनूँगा, इसी खुशी में राजभवन में उत्सव होगा दान−दक्षिण बटेगी उसी में इस धन का प्रबन्ध वररुचि को कर दूँगा। व्याडी इस बीच मेरे शव की रक्षा करें ताकि अपना कार्य पूरा करते ही मैं पुनः अपनी देह में आ जाऊँ।
मनन्द के शरीर में “देवदत्त” की आत्मा के अतिरिक्त और कोई हो नहीं सकता था।
मनन्द वे चाहे जोहों पुनः मरने नहीं दिया जाना चाहिए। शकटार को कई दिनों से व्याडी का पता नहीं चल रहा था जबकि वररुचि इन दिनों व्यर्थ ही राजभवन के आसपास घूमते दिखाई देते थे, अतएव उसे यह अनुमान करते देर न लगी कि व्याडी और कही नहीं देवदत्त के शव की रक्षा में ही होगा। शकटार ने विश्वास पात्र सैनिकों को भेजकर व्याडी के विरोध के बावजूद देवदत्त के पूर्ववर्ती शरीर का “शवदाह” करा दिया। महापद्मनन्द के शरीर में निर्वासित देवदत्त को इस बात का पता चला तो वे माथा पीटते रह गये, पर अब बाजी हाथ से निकल चुकी थी, अतएव रहे तो महापद्मनन्द ही पर अब वह पद्मनन्द नहीं थे जो कभी पहले थे। बदले की भावना से उन्होंने जीवन भर स्वामि भक्त सेवक की तरह काम करने वाले महामन्त्री शकटार को ही बन्दी बना लिया और वररुचि को अपना महामन्त्री नियुक्त कर लिया।
मनन्द) ने सर्वत्र अस्त−व्यस्तता फैलाई उसी का प्रतिफल यह हुआ कि उसे एक दिन चाणक्य के हाथों पराजय का मुँह देखना पड़ा।
मनन चिन्तन एवं साधना अभ्यास का अवसर मिलता था। उसमें स्थिति के परिवर्तन का समुचित अवसर मिलता था। लोग जिस स्थिति में जाते थे उसकी तुलना में अपना बाहरी और भीतरी स्वरूप बहुत कुछ बदल कर ही आते थे।
मनन्द ही पर अब वह पद्मनन्द नहीं थे जो कभी पहले थे। बदले की भावना से उन्होंने जीवन भर स्वामि भक्त सेवक की तरह काम करने वाले महामन्त्री शकटार को ही बन्दी बना लिया और वररुचि को अपना महामन्त्री नियुक्त कर लिया। राजकाल से सर्वथा शून्य देवदत्त (अब महापद्मनन्द) ने सर्वत्र अस्त−व्यस्तता फैलाई उसी का प्रतिफल यह हुआ कि उसे एक दिन चाणक्य के हाथों पराजय का मुँह देखना पड़ा।
मनन्द के शरीर में निर्वासित देवदत्त को इस बात का पता चला तो वे माथा पीटते रह गये, पर अब बाजी हाथ से निकल चुकी थी, अतएव रहे तो महापद्मनन्द ही पर अब वह पद्मनन्द नहीं थे जो कभी पहले थे। बदले की भावना से उन्होंने जीवन भर स्वामि भक्त सेवक की तरह काम करने वाले महामन्त्री शकटार को ही बन्दी बना लिया और वररुचि को अपना महामन्त्री नियुक्त कर लिया। राजकाल से सर्वथा शून्य देवदत्त (अब महापद्मनन्द) ने सर्वत्र अस्त−व्यस्तता फैलाई उसी का प्रतिफल यह हुआ कि उसे एक दिन चाणक्य के हाथों पराजय का मुँह देखना पड़ा।
मनन्द पुनः जीवित हो उठे। यह घटना इतिहास प्रसिद्ध घटना है। सारे राज्य में छाई दुःख की लहरें एकाएक खुशी में बदल गई। चारों ओर उत्सव मनाये जाने लगे।
मनन, चिन्ता भी इसी के अंग रहे हैं। तीर्थों के संस्कारित वातावरण में इन सभी का प्रभाव और लाभ बढ़ जाना स्वाभाविक हैं। प्रखर साधन और समुचित वातावरण का संयोग सोने में सुहाग की उक्ति चरितार्थ करता रहा है।
मनन्द से ही होने वाली थी। यदि उनके निधन की बात सिकन्दर तक पहुँच जाती तो उसका तथा उसके सिपाहियों का मनोबल बढ़ जाता, अतएव शकटार ने निश्चय किया कि महापद्मनन्द वे चाहे जोहों पुनः मरने नहीं दिया जाना चाहिए। शकटार को कई दिनों से व्याडी का पता नहीं चल रहा था जबकि वररुचि इन दिनों व्यर्थ ही राजभवन के आसपास घूमते दिखाई देते थे, अतएव उसे यह अनुमान करते देर न लगी कि व्याडी और कही नहीं देवदत्त के शव की रक्षा में ही होगा। शकटार ने विश्वास पात्र सैनिकों को भेजकर व्याडी के विरोध के बावजूद देवदत्त के पूर्ववर्ती शरीर का “शवदाह” करा दिया। महापद्मनन्द के शरीर में निर्वासित देवदत्त को इस बात का पता चला तो वे माथा पीटते रह गये, पर अब बाजी हाथ से निकल चुकी थी, अतएव रहे तो महापद्मनन्द ही पर अब वह पद्मनन्द नहीं थे जो कभी पहले थे।
मनन्द के शरीर में प्रवेश किया। महापद्मनन्द पुनः जीवित हो उठे। यह घटना इतिहास प्रसिद्ध घटना है। सारे राज्य में छाई दुःख की लहरें एकाएक खुशी में बदल गई। चारों ओर उत्सव मनाये जाने लगे।
मनन्द ने देह परित्याग कर दिया है, मुझे परकाया प्रवेश−विद्या आती है। मैं महापद्मनन्द की मृतक देह में प्रवेश कर स्वयं पद्मनन्द बनूँगा, इसी खुशी में राजभवन में उत्सव होगा दान−दक्षिण बटेगी उसी में इस धन का प्रबन्ध वररुचि को कर दूँगा। व्याडी इस बीच मेरे शव की रक्षा करें ताकि अपना कार्य पूरा करते ही मैं पुनः अपनी देह में आ जाऊँ।
मनन तथा निदिध्यासन कर भारतीय तत्वदर्शियों ने कहा कि उसे ही जानो उसे ही प्राप्त करो। आत्मा को जाने बिना व्यक्ति की क्षुद्रताएँ, तृष्णा और वासनाएँ, अभाव अशक्ति और अज्ञान विगलित नहीं होते।
मनन्द के संस्कार, गुण, कर्म, स्वभाव, मूल सम्राट के गुणों से बिलकुल भिन्न संस्कृत के अल्पज्ञ महापद्मनन्द का महान् पांडित्य ही सन्देह के लिए पर्याप्त था उधर शकटार को यह भी ज्ञात था कि “देवदत्त” ही एक मात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें परकाया प्रवेश की विद्या आती थी सो यह अनुमान करते देर न लगी कि महापद्मनन्द के शरीर में “देवदत्त” की आत्मा के अतिरिक्त और कोई हो नहीं सकता था।
मनन्द और चाणक्य भी प्रख्यात हैं, पर वे केवल शासकीय दृष्टि से। बहुत थोड़े लोग जानते हैं कि महापद्मनन्द का शरीर एक था, पर उस शरीर से यात्रायें दो आत्माओं ने की थी। एक स्वयं महापद्मनन्द ने तो दूसरे तत्कालीन विद्वान् आचार्य उपवर्ष के प्रसिद्ध योगी शिष्य “इन्द्र दत्त” ने।
मनन्द नहीं थे जो कभी पहले थे। बदले की भावना से उन्होंने जीवन भर स्वामि भक्त सेवक की तरह काम करने वाले महामन्त्री शकटार को ही बन्दी बना लिया और वररुचि को अपना महामन्त्री नियुक्त कर लिया। राजकाल से सर्वथा शून्य देवदत्त (अब महापद्मनन्द) ने सर्वत्र अस्त−व्यस्तता फैलाई उसी का प्रतिफल यह हुआ कि उसे एक दिन चाणक्य के हाथों पराजय का मुँह देखना पड़ा।
मनन्द बनूँगा, इसी खुशी में राजभवन में उत्सव होगा दान−दक्षिण बटेगी उसी में इस धन का प्रबन्ध वररुचि को कर दूँगा। व्याडी इस बीच मेरे शव की रक्षा करें ताकि अपना कार्य पूरा करते ही मैं पुनः अपनी देह में आ जाऊँ।
मनन्द का शरीर एक था, पर उस शरीर से यात्रायें दो आत्माओं ने की थी। एक स्वयं महापद्मनन्द ने तो दूसरे तत्कालीन विद्वान् आचार्य उपवर्ष के प्रसिद्ध योगी शिष्य “इन्द्र दत्त” ने।
मनन्द ने तो दूसरे तत्कालीन विद्वान् आचार्य उपवर्ष के प्रसिद्ध योगी शिष्य “इन्द्र दत्त” ने।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-January
मनन, चिन्तन द्वारा विवेक बुद्धि परिष्कृत होती है और इन्द्रियनिग्रह द्वारा मन चले मन को सत्संकल्प करने वाले उपयोगी चित्र गढ़ने वाला बनाया जाता है। यही है आत्म-साधना की पृष्ठभूमि और संक्षिप्त रूप रेखा।
मनन, चिन्तन, ध्यान, धारणा जैसी चिन्तन प्रधान साधनाओं में नियोजित किया जाता है। सबसे ऊँची स्थिति भाव सम्वेदनाओं के उभार उल्लास की है। इसी में भक्तियोग बन पड़ता है। आत्मवत् सर्व भूतेषु-वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता इसी आत्म विश्वास की स्थिति में हृदयंगम हो पाती है। सब हमारे-हम सबके की उच्च मनोभूमि बन पड़ने पर मनुष्य साधु-ब्राह्मण, परिव्राजक, लोकसेवी की तरह आचरण करता है उसका ‘अहम्’ विस्तृत होते-होते ‘त्वम्’ बन जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-November
मनन’-अर्चनाना ने समझाया और श्यावाश्व अपने पिता की चरण धूलि लेकर निकल पड़े। स्नातक ब्रह्मचारी तो वह थे ही, आश्रम का निर्वाह भी भिक्षाटन से ही होता था, ऋषि कुमार का चिन्तन मनन भी निरन्तर ही चलता रहता था। मन्त्रदर्शन की साधना में नया अंग था केवल प्रव्रज्या और लोकशिक्षण का।
मनन भी निरन्तर ही चलता रहता था। मन्त्रदर्शन की साधना में नया अंग था केवल प्रव्रज्या और लोकशिक्षण का।
मनन करना ही जीवन प्रगति का आधार बनता है। ऐसी पुस्तकें व्यक्ति की पथ-प्रदर्शक गुरू बनती हैं और उनके भीतर निहित क्षमताओं को उभारकर उन्हें विकसित व्यक्तित्व का स्वामी बनाती हैं।
मनन। मनोरंजन मात्र के लिये पढ़ी जाने वाली पुस्तकें आस्था के आधार नहीं प्रस्तुत कर पातीं। ज्ञान की जिज्ञासा का समाधान एवं तृप्ति प्रदान करने वाली पुस्तकों को पढ़ना, उन पर सोचना, मनन करना ही जीवन प्रगति का आधार बनता है। ऐसी पुस्तकें व्यक्ति की पथ-प्रदर्शक गुरू बनती हैं और उनके भीतर निहित क्षमताओं को उभारकर उन्हें विकसित व्यक्तित्व का स्वामी बनाती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-June
मनन,- चिन्तन के अभ्यास, योगसाधना के अन्तर्गत ही आते हैं। प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की पाँच साधनाएँ योगसाधना का अन्तःस्पर्शी अभ्यास है। इनसे पहले तीन को लोकव्यवहार का मर्यादापालन कहना चाहिए। उनमें सामाजिक अनुशासन है। उच्छृंखलता का नियन्त्रण इन्हीं तीन में किया जाता है; इसलिए उन्हें तप वर्ग में गिना गया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-April
मनन कर लेते हैं तो आधा काम पूरा हो जाता है। फिर वे इस वातावरण में स्वयं को- अपने परिवार को पूरी तरह नियोजित कर सकने में समर्थ हो सकेंगे। यदि कहलवाना ही हो तो निर्वाह- परिवार- व्यवस्था जैसे शब्दों का प्रयोग न करके लोभ और व्यामोह का ही नाम लिया जाना चाहिए। इन खाइयों को हिरण्यकश्यपु, रावण जैसे धन कुबेर और प्रतापी भी पाट सकने में असफल रहे। इस कुचक्र में फँसे हुए ही यह कह सकते हैं कि उन्हें आर्थिक और पारिवारिक परेशानियाँ युग की पुकार सुनने और वरिष्ठ अग्रदूतों की जिम्मेदारी नहीं निभाने देती।
मनन दूसरा है क्रिया परक। दोनों के मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता का समन्वय करना पड़ता है। लोक सेवा या लोक शिक्षा इसी धुरी के इर्द-गिर्द घूमती है। इससे विरत होने पर भौतिक कार्यों में संलग्न समस्त भौतिक श्रमिक लोकसेवी कहलाने लगेंगे। साधन जुटाने और अभाव पूरे करने में तो कृषकों से लेकर मेहतर तक सभी श्रमजीवी उसी प्रयास में निरत रहते और बदले में वेतन पाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-October
मनन का अवसर मिला है, तभी मैं यह सोचता रहा हूँ कि दूर रहने वाले भगवान को तलाश करने की अपेक्षा यह क्या बुरा है कि अपनी अन्तरात्मा को इतना अच्छा बनाया जाय कि वह ईश्वर के समतुल्य समझी जा सके। जिन्हें पूजा से प्रेम है, उनसे मैं इतना और कहता हूँ कि पूजा करने वाले को इस लायक बनाओ कि पुजारी कहलाने के हकदार बना सको।”
मनन प्रक्रिया जितनी सघन होगी- भाव श्रद्धा से अभिपूरित होगी, सफलता उसी क्रम से हस्तगत होती चली जायेगी। इसके लिए प्रतिमा को ही अवलम्बन बनाया जाय, अनिवार्य नहीं। सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय भी एक प्रकार से श्रेष्ठ विचारों का सामीप्य पाना- महामानवों के चिन्तन से तादात्म्य स्थापित करना है। मार्ग कोई भी अपनाया जाए, माध्यम कुछ तो बनाना ही पड़ेगा ही- इसे समझना उतना ही अनिवार्य है जितना कि किसी भाषा को समझने के लिए उसकी लिपि एवं बोल-चाल के स्वरूप को सीखना- हृदयंगम करना। श्रेष्ठ चिन्तन यदि किसी भी प्रतीक को माध्यम बनाकर लक्ष्य के प्रति नियोजित कर दिया जाए तो उसकी उपलब्धियाँ निश्चित ही महत्वपूर्ण फलदायी होंगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-September
मनन्तं ब्रह्म”, अर्थात् ब्रह्म अनन्त अपरिमित है। वह समस्त जड़-चेतन में उसी प्रकार रमा हुआ है, जैसे इस संसार में वायु के अणु। निराकार जल में जैसे साकार बर्फ जम जाती है, उसी प्रकार प्रार्थना रूपी शीतलता से उस अगोचर ईश्वर-सत्ता का साक्षात्कार किया जा सकता है। वह सत्ता सर्वज्ञ है, सर्व-शक्तिमान है। हम उसके आगे अबोध बालक से हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-March
मनन एवं विज्ञान से इस सबका ज्ञान हो जाता है।’

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-February
मनन-चिन्तन के माध्यम से उसे जीवनचर्या में सम्मिलित किया जाय। इस कसौटी पर कसने गायत्री मन्दिर खड़ा करने की तुलना में चल प्रज्ञा संस्थान विनिर्मित करने की उपयोगिता रत्ती भर भी कम सिद्ध नहीं होती। लागत कम और भावी झंझट कम होने की दृष्टि से भी यह अधिक सरल है। देवालयों में पूजा-पुजारी का, बिजली मरम्मत का जितना चालू खर्च बँधता है उसकी तुलना में ज्ञानरथ के लिए नियुक्त कार्यकर्ता कहीं सस्ता पड़ता है। ऐसी ही यथार्थताओं से अवगत प्रज्ञा परिजनों ने बड़ी संख्या में ज्ञानरथ बनाने चलाने का नया उपक्रम अपनाया है।
मनन, चिन्तन पर जोर दिया गया है। ज्ञान और भक्ति उसी क्षेत्र में आते हैं। कर्मयोग के लिए जिस बलिष्ठता और सहन क्षमता की आवश्यकता है उसे उपार्जित करने के लिए तप तितीक्षा का अवलम्बन लेना पड़ता है यह हठयोग है। इसे अनुभवी विशेषज्ञों के संरक्षण में अपनी सहन शक्ति के साथ तालमेल बिठाते हुए ही किया जाना चाहिए। मनमर्जी से कुछ भी हठयोग ठान लेना लाभ के स्थान पर हानिकारक सिद्ध हो सकता है।
मनन और चिन्तन के सहारे साधक उस स्थिति तक पहुँचने का प्रयत्न करता है जिसमें माया से भ्रान्ति से छुटकारा मिल सके। यही मुक्ति की- जीवन मुक्ति की स्थिति है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-August
मनन एवं ऊहापोह करते रह सकते हैं।
मनन के लिए बैठना पड़ता है। एकबार (1) आत्म समीक्षा (2) आत्म-सुधार (3) आत्म-निर्माण और (4) आत्म-विकास के सम्बन्ध में अपनी जाँच पड़ताल करने के लिए। दूसरी बात अपने गुण, कर्म, स्वभाव में संयम शीलता का कितना समावेश हो रहा है वह परखने के लिए। चार संयम ही, चार तप कहलाते हैं। इन्हें अपने में बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए।
मनन, चिन्तन आरम्भ कर दिया जाय तो क्रमश मनोभूमि निर्धारित ढाँचे में ढलने लगेगी और अभ्यस्त ढर्रा बदलने लगेगा। परायों को अनगढ़ों को जब प्रयत्न पूर्वक सुधारा, सिखाया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि अपना मन और स्वभाव अवांछनीय प्रवाह में बहने से रोककर उपयोगी दिशाधारा अपनाने के लिए सहमत न किया जा सकेगा। आत्म निर्माण ही, भविष्य निर्माण है। उसी को भाग्य निर्माण भी कहते हैं। यह लगता तो अपने बस से बाहर है किन्तु वास्तविक यह है कि प्रयास पूर्वक यह कठिन काम भी सरल बनाया जा सकता है।
मनन करने वाले सिद्ध साधक इसी ऊँचे उद्देश्य के साथ भूःलोक से भुवः एवं स्वः लोक में ऊर्ध्वगमन करते एवं अपने सूक्ष्म किन्तु विराट् रूप द्वारा समष्टि का कल्याण करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-July
मनन का उपक्रम ऐसा होना चाहिए जिससे चेतना का स्तर सुविकसित होता हो। यह विभूति जिसे उपलब्ध है वह शरीर से चाणक्य जैसा कुरूप अष्टावक्र जैसा अपंग कालिदास जैसा अशिक्षित, सुदामा जैसा निर्धन होते हुए भी इन कमियों के कारण जीवन के किसी भी क्षेत्र में रुकता नहीं। सफलता की दिशा में द्रुतगति से आगे बढ़ता जाता है।
मनन, चिन्तन और अभ्यास के आधार पर हस्तगत होता है। व्यक्तित्व का मूल्याँकन इसी आधार पर होता है। महत्वपूर्ण कार्य इसी के सहारे बन पड़ते हैं। गौरव गरिमा इसी के आधार पर निखरती है। महा मानवों में गणना कराने वाली विभूति यही है।
मनन स्वाध्याय द्वारा जन-मानस के परिष्कार की अहम् भूमिका निभाते हैं। एक पवित्रता का प्रतीक है तो दूसरा प्रखरता का। दोनों को ही तप साधना में निरत हो सूक्ष्मतम बनना पड़ता है ताकि अपना स्वरूप और विराट् व्यापक बनाकर स्वयं को आत्मबल सम्पन्न कर वे युग चिन्तन के प्रवाह को मरोड़-बदल सकें। मुनि जहाँ प्रत्यक्ष साधनों का प्रयोग करने की स्वतंत्रता रखते हैं, वहाँ ऋषियों के लिए यह अनिवार्य नहीं। वे अपने सूक्ष्म रूप में भी वातावरण को आन्दोलित करते- सुसंस्कारित बनाये रख सकते हैं।
मनन की उच्चस्तरीय दिशाधारा कहां से मिल सकती है। इसे खोज पाने का प्रयास निरंतर जारी रखा जायेगा। यह कार्य ईश्वर उपासना, जीवन साधना एवं तपश्चर्या की सहायता से भी हो सकता है। ऋषिकल्प- महामानवों का सान्निध्य, सद्भाव और अनुदान तो इस प्रयोजन के लिए सर्वोपरि रहेगा ही।
मनन हेतु निकालना चाहिए इसमें आत्म समीक्षा-आत्म सुधार की योजना-आत्म निर्माण की विधि और आत्म विकास की स्थिति प्राप्त करने का विचार करना चाहिए। वर्तमान स्थिति में जो बन सकता हो, उसका ताना बाना बुनना चाहिए। चार संयम ही तप हैं। इन्द्रिय, अर्थ, समय और विचारों में से एक भी विभूति का अपव्यय न किया जाये। न्यूनतम में निर्वाह करने और परिवार छोटा स्वावलम्बी बनाने की नीति अपनानी चाहिए।
मनन साधना द्वारा बोध होते ही बुद्ध बन गए। लेकिन समझ में यह नहीं आता कि अपने बारे में ऐसा क्या है, जो मनुष्य नहीं जानता पूछने पर तुरन्त नाम, गोत्र, वंश व्यक्ति बता देता है। काया अलग है, व उसका प्राण आत्मा अलग, जो उसकी नियामक सत्ता है, यह भी अधिसंख्य व्यक्ति जानते हैं। इस प्रसंग का ऊहापोह करने के लिए लोग जाने कितने शास्त्र पढ़ते, पुराण-कथाओं का श्रवण करते देखे जाते हैं, लेकिन इससे क्या आत्मबोध हो पाता है?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-December
मनन चिंतन भी शामिल है। अपनी समस्याओं का सही स्वरूप समझना और उन्हें विवेकपूर्ण ढंग से सुलझाना, यह भी स्वाध्याय है।
मनन पूर्वक पढ़ा जाय। साथ ही यह परखते चला जाय कि आदर्शों का हम अनुकरण कर रहे हैं या नहीं। यदि नहीं तो भूल को तुरन्त सुधारा जाय। यदि कर रहे हैं तो उस दिशा में और भी दृढ़ता अपनानी चाहिए। इस मनःस्थिति के साथ समाधान परक साहित्य पढ़ा जाये।
मनन-चिन्तन करना चाहिए ताकि बाद में उत्पन्न होने वाली विकृतियों के लिए कारण को मूल रूप में ढूँढ़ा जा सके।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-January
मनन की प्रक्रिया इसी आधार पर चलती है। प्रार्थना, मनुहार, पूजन सान्निध्य, समर्पण, विलय के रूप में भगवान से तादात्म्य स्थापित करने के आधार पर आत्म शिक्षण का अध्ययन तथा धारण का उभय पक्षीय प्रयोजन पूरा होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-November
मनन करना शुरू कर दिया। ऐसी थी वह संत राबिया जिसका नाम इतिहास में अमर हो गया।
मनन-रटन को नहीं कहते। जो स्वयं की ओर प्रेरित करें आत्मस्वरूप की ओर इंगित करें, वही स्वाध्याय है। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे-एक टन पढ़ने से श्रेष्ठ है एक छटाँक पढ़ना व उस पर आचरण करना।” इसमें सर्वप्रथम है-उचित पुस्तकों का चुनाव। पहले उनकी किताबें पढ़ें जिनने आत्मदर्शन किया ईश्वरत्व की प्राप्ति की दिशा में कुछ प्रयास किया फिर उनकी किताबों का स्वाध्याय किया जाए, जिनने ईश्वरप्राप्त पुरुषों की संगति की है अथवा उनके गुणों का वर्णन किया है।
मनन काम कर रहा होगा। उनका चरित्र भी गिरावट की ओर और उनका चिंतन भी गिरावट की ओर जाता हुआ दिखायी देगा। सारे जमाने में यही भरा हुआ पड़ा है।
मनन करने में तल्लीन था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-February
मनन, चिन्तन का इसके अतिरिक्त, और कोई उद्देश्य नहीं। ईश्वरप्राप्ति आत्मसाक्षात्कार, स्वर्ग-उपलब्धि ओर जीवन-मुक्ति का तात्विक स्वरूप यही हैं कि व्यक्ति अपनी समस्त क्षुद्रताओं और निकृष्टता को निरस्त करके सदुद्देश्यपूर्ण सत्प्रयोजनों में निरस्त रहने का अभ्यस्त बन जाय। परिष्कृत आत्मा का नाम ही परमात्मा हैं अपने कषाय-कल्मषों का निराकरण करना ही तप-साधना हैं ईश्वर-प्रेम का सहारा लेकर अन्तःकरण में अपार प्रेमनिष्ठ की धारणा और उसका लाभ उदार सेवा-प्रवृत्ति के रूप में प्राणिमात्र को देना, ईश्वरभक्ति हमें इसी लक्ष्य उदार सेवा-प्रवृत्ति के रूप में प्राणिमात्र को देना, ईश्वरभक्ति हमें इसी लक्ष्य की ओर ले जाती है। अध्यात्म दर्शन की सारी सफलता इस बात पर निर्भर की सारी सफलता इस बात पर निर्भर है कि व्यक्तित्व के समग्र निर्माण के लिए कितना साहस किया गया? दुर्गुणों को निरस्त करने और सद्गुणों को बढ़ाने के लिए कितना प्रयास किया गया।
मनन करने एवं जीवन में उतारने जैसा एक संकल्पपत्र कहा एवं तब से ही युगनिर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान, गायत्री परिवार, अखण्ड ज्योति के दर्शन की यह मूल धुरी बना रहा हैं सारी योजनाएं इसी एक केंद्रक के जो विचार क्रान्ति परिक्रमा करती रही हैं। बाह्य ओर परिक्रमा करती रही हैं बाह्य कलेवर भले ही लोगों को धर्मकृत्य, कर्मकाण्ड प्रधान देखने में लगा हो, किन्तु उसका अंतरंग एक ही सूत्र पर टिका है “हम बदलेंगे-युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा। “ उन दिनों प्रकाशित युग निर्माण सत्संकल्प पर एक दृष्टि डालकर देखें तो प्रतीत होगा कि समग्र धर्मशास्त्र-नैतिकी एवं अध्यात्म दर्शन का निचोड़ समाहित है।-
मनन-चिंतन करते थे। सुभाष के एक मित्र ने श्री अरविन्द को पत्र भेजकर अपनी शंका के समाधानार्थ निवेदन किया। श्री अरविन्द का उत्तर आया तो उसने वह सुभाष को भी पढ़वाया। कुछ पंक्तियाँ ऐसी ही थीं जिनने सुभाष के जीवन में बम-विस्फोट का काम किया। ये पंक्तियाँ थीं- ‘‘हममें से प्रत्येक को दैवी विद्युत का डायनेमो बनना चाहिए, जिससे कि हम अनुभूति से ओत-प्रोत हो जाएँ।
मनन-चिन्तन करना चाहिए। जब भी समय मिले, चार तथ्यों को चार वेदों का सारतत्व मानकर समझना और हृदयंगम करना चाहिए। यह तथ्य जितनी गहराई तक अन्तःकरण में प्रवेश कर सकेंगे, प्रतिष्ठित हो सकेंगे, उसी अनुपात से आत्म-निर्माण के लिए आवश्यक वातावरण बनता चला जाएगा।
मनन-चिन्तन करते हुए मनः क्षेत्र में गहराई तक प्रतिष्ठापित करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-August
मनन का दूसरा अर्थ है आत्मबोध। अपना वास्तविक स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, शरीर और आत्मा का सम्बन्ध, श्रेय और प्रेय में से एक का चुनाव अपनी गतिविधियों और रीति-नीतियों का सुनियोजित निर्धारण जैसे अनेक महत्वपूर्ण निर्णय इसी केन्द्र पर टिके हुए हैं कि आत्मबोध हुआ या नहीं। यह चेतना जब तक जगेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचण्ड ही बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की प्रबलता उभरी ही रहेगी। मायापाश के भवबन्धनों से छुटकारा मिलेगा ही नहीं, फलतः व्यथा वेदनाओं में झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा ही नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव-जीवन का उद्देश्य और आनन्द हाथ से चला गया।
मनन अर्थात् आत्मबोध। शरीर और आत्मा के स्वार्थ और सम्बन्धों का पृथक्करण। जीवन लक्ष्य के प्रति आस्था और रीति-नीति का साहस पूर्वक निर्धारण। दोनों की साधना विधियाँ सरल हैं। एक ही समय या दो पृथक-पृथक सुविधा के समय और शान्त एकान्त स्थान में सुसंतुलित चित्त से यह दोनों ध्यान चिन्तन किये जा सकते हैं।
मनन और चिन्तन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए। गायत्री महामंत्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भावसमन्वय से ही सम्भव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका माहात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म-प्रसंगों में किया गया है।
मनन, और चिन्तन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अन्तः करण की स्वस्थता, प्रखरता परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीनों आधारों पर ही निर्भर है। गायत्री महामंत्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को कहा जा सकता है।
मनन (चिन्तन) इन तीनों को मिला देने से ही एक समग्र साधन-प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अंग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाये तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए भजन, मनन, और चिन्तन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अन्तः करण की स्वस्थता, प्रखरता परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीनों आधारों पर ही निर्भर है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-December
मननयुक्त अपूर्णता से त्राण करने वाली, विश्व-विकल्प (दुनियादारी) की झंझटों से मुक्ति दिलाने वाली अनुभूति ही मंत्र है।”
मनन करना नवधा भक्ति के दूसरे प्रसंग में आता है।
मनन त्राण धर्माणों मंत्र” अर्थात् मनन और त्राण मंत्र के ये दो धर्म हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने मंत्र ज पके विषय में लिखा है कि “मंत्र जप वही सार्थक है जिसमें मानसिक एकाग्रता एवं निष्ठा का समुचित समावेश हो। परिष्कृत व्यक्ति की परिमार्जित वाणी से जिसकी साधना की जाए, जिसकी रहस्यमय क्षमता पर गहन श्रद्धा हो तथा जिसका अनावश्यक विज्ञापन न करके उसे गोपनीय रखा जाए।” गोपनीय से यहाँ आशय है- मिलने वाले फलितार्थ कर उस प्रसंग को हलका न बनाना।
मनन अर्थात् चिंतन। यह पशु-पक्षियों से ऊँचा स्तर है। इस पर पहुँचे हुए जीव को मनुष्य संज्ञा में गिना जाता है। कल्पना, तर्क, विवेचना, दूरदर्शिता जैसी चिन्तनात्मक विशेषताओं के सहारे औचित्य-अनौचित्य का अन्तर करना संभव होता हैं। स्थिति के साथ तालमेल बिठाने के लिए इच्छाओं पर अंकुश रख सकना इसी आधार पर संभव होता है।
मनन कथा-प्रवचनों का महात्म्य इसी आधार पर बताया गया है ताकि उस प्रक्रिया के सहारे मानवी चिन्तन का परिष्कार होता रहे और विकृत मनोवृत्तियों से छुटकारा मिलता रहे। इससे विवेकयुक्त दूरदर्शिता का पथ प्रशस्त होता है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतम्भरा-इसी परिष्कृत चिन्तन का नाम है।” ऋतं ज्ञानेन मुक्ति” “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमही विद्यते” जैसी उक्तियों में सद्ज्ञान को साधना का प्राण माना गया है। वेदान्त दर्शन को तो विशुद्ध रूप से ज्ञान-साधना ही कहा जा सकता है।
मनन और चिन्तन को आवश्यक माना गया है। हर दिन सूर्योदय से पूर्व या सूर्यास्त के बाद जब चित्त शान्त हो तब अपने अन्तरंग -बहिरंग स्थिति का लेखा-जोखा लेना चाहिए और भूलों को सुधारने, कमियों को पूरा करने तथा भावी प्रगति के लिए जो कदम उठाने आवश्यक है, उनका दूरगामी एवं सामयिक निर्धारण करना चाहिए। निर्धारण ऐसा होना चाहिए कि जो वर्तमान स्थिति में बिना समय गँवाकर कार्यान्वित हो सके।
मनन-चिंतन में दो बातें अपने आप ही समायी हुई है-परिमार्जन एवं परिष्कार। इन्हें पथ्य और औषधि के रूप में भी समझा जा सकता है। व्यक्तित्व को पवित्र-प्रखर बनाने वाली सत्प्रवृत्तियों को कैसे अपनाया जाय? वर्तमान स्थिति को देखते हुए इस संदर्भ में क्या कदम उठाए जाएँ। इसका निर्धारण ही नहीं, इसे अपनाने का तत्परतापूर्वक प्रयास भी विलम्ब चलना चाहिए।
मननात् ‘मनुष्यः। मनुष्य नाम इसलिए पड़ा कि यह मनन कर सकता है। मनन अर्थात् चिंतन। यह पशु-पक्षियों से ऊँचा स्तर है। इस पर पहुँचे हुए जीव को मनुष्य संज्ञा में गिना जाता है।
मनन और त्राण मंत्र के ये दो धर्म हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने मंत्र ज पके विषय में लिखा है कि “मंत्र जप वही सार्थक है जिसमें मानसिक एकाग्रता एवं निष्ठा का समुचित समावेश हो। परिष्कृत व्यक्ति की परिमार्जित वाणी से जिसकी साधना की जाए, जिसकी रहस्यमय क्षमता पर गहन श्रद्धा हो तथा जिसका अनावश्यक विज्ञापन न करके उसे गोपनीय रखा जाए।” गोपनीय से यहाँ आशय है- मिलने वाले फलितार्थ कर उस प्रसंग को हलका न बनाना।
मनन कर सकता है। मनन अर्थात् चिंतन। यह पशु-पक्षियों से ऊँचा स्तर है। इस पर पहुँचे हुए जीव को मनुष्य संज्ञा में गिना जाता है। कल्पना, तर्क, विवेचना, दूरदर्शिता जैसी चिन्तनात्मक विशेषताओं के सहारे औचित्य-अनौचित्य का अन्तर करना संभव होता हैं।
मनन-चिंतन के निदिध्यासन को यदि नियमित रूप से गम्भीरता पूर्वक करते रहा जाय, तो परिशोधन-परिष्कार के दोनों कदम भी स्वयमेव आगे बढ़ते रहते हैं। यह प्रक्रिया नियमित -निरन्तर चलता रहे तो पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचाने वाला उपक्रम सुनिश्चित तौर से बनता रहेगा। यहाँ एक बात और समझने की है कि मनुष्य पूर्ण उत्पन्न होने के कारण पूर्ण ही है। जन्मजात रूप से उपलब्ध विभूतियों का दुरुपयोग -अपव्यय ही एकमात्र वह कारण है, जिसके कारण कामधेनु का दूध छलनी में दुहने पर जमीन पर गिरता, कपड़े चिकने करता और खेद-पश्चाताप का निमित्त कारण बनता है।इसे रोक देने की समर्थ दूरदर्शिता ही जीवन -साधना कहलाती है।
मनन्यभक्। साधुरेव स मन्तव्यः सभ्यग्व्यसितो हि सः॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-May
मनन अधिक सामीप्य व सान्निध्य प्राप्त करने का प्रयास किया जाए। भोजन के बिना शरीर का काम नहीं चलता। साँस लिए बिना रक्ताभिषरण की प्रक्रिया बिगड़ जाती है। इसी प्रकार ईश्वर की उपेक्षा करने के उपरान्त आन्तरिक स्तर भी नीरस, चिंताग्रस्त, अनिश्चित, अनैतिक, अव्यवस्थित एवं आशंकित बना रहता है। यह हानि कुछ कम हानि नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-September
मनन, स्वाध्याय और सत्संग के आधार पर सद्भावनाओं का समुचित संग्रह अपने भीतर जमा करें और उसमें से साररूप में सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हो उसी को जिह्वा पर आने दें। जीभ में अमृत भी है और विष भी। विषपान करने वाले मुख के रास्ते ही उसे भीतर ले जाते हैं। दुर्भावग्रस्त, संस्कार रहित वाणी को भी विष ही कहा गया है। वह प्रथम अनर्थ वक्ता का ही करती है।
मनन’ - विद्या, विज्ञान, विचार जिसका करने से ‘त्राण’ हो, प्राणों की रक्षा हो। गायत्री मंत्र अर्थात् प्राणों का संरक्षण-परित्राण करने की विद्या। साधना-ग्रंथों में तारक मंत्र के नाम से इसका उल्लेख इसलिए भी हुआ है कि यह भवसागर से तैराकर पार करा देने वाला है। ‘तारक’ अर्थात् पार करा देने वाला। गहरे जलप्रवाह को पार करके निकल जाने को, डूबते हुए को बचा लेने को तारना कहते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-April
मनन चिन्तन द्वारा प्राणवान आत्माएँ आकाश में ऐसे प्रचण्ड प्रवाह छोड़ती थी जिनमें जनमानस का अनायास ही बहते रहने और श्रेष्ठ चिन्तन का उसके फलस्वरूप उस उत्पादित उच्च चरित्र का लाभ मिलाता था। अन्तरिक्ष उच्चस्तरीय विचार सम्पदा से भरी रहता था, इसमें अध्यात्म क्षेत्र के मूर्धन्य मनीषी सदा प्रयत्नरत रहते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-July
मनन करने से इसके नियामक, निर्माता और पालनकर्ता का ध्यान आये बिना नहीं रहता। कैसा अखण्ड अनुशासन है कि एक ही मिट्टी से ऊख मिठास, मिर्च कड़ुवाहट और करौंदा खटास प्राप्त करता है। मिट्टी को चखिये, उसमें इस प्रकार का कोई रस, कोई स्वाद आपको नहीं मिलेगा। इतने रस, इतने स्वाद और इतने गुण एक ही मिट्टी में कहाँ से आ जाते हैं....? यह सारे रस आकार-प्रकार-गुण आदि और कुछ नहीं एक उसी परमात्म-शिल्पी का अपना व्यक्तित्व-अपना अस्तित्व है।
मनन और वार्तालाप नहीं करते। यही कारण है कि उस अध्ययन का प्रभाव जीवन में स्थायी नहीं हो पाता। यदि पुस्तकों-शास्त्रों के सारे जीवन में उतारने की प्रक्रिया लोग सीख जाएँ तो सामान्य-सी परिस्थितियों में ही हर व्यक्ति उत्कृष्टता के चरम बिन्दु तक पहुँच सकता है। अच्छी पुस्तकें, महापुरुषों की जीवन-गाथाएँ गोघृत एवं दुग्ध के समान पौष्टिक आहार हैं, जो मन-बुद्धि आचार-विचार तर्क व विवेक को परिपुष्ट करके आत्मोत्थान का उज्ज्वल पथ प्रशस्त करती हैं।
मनन की महत्ता का प्रतिपादन शास्त्रों में विस्तारपूर्वक किया गया है। मनुस्मृति 3-75 में उल्लेख है-स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्।” अर्थात् स्वाध्याय में नित्य तत्पर रहना चाहिए, क्योंकि इससे सद्विवेक-सद्बुद्धि का विकास होता है और उससे समस्त समस्याओं का समाधान मिलता है। प्राकृत-उत्तराध्ययन (26-10) भी इसका समर्थन करते हुए कहता है। “सज्झाएवा निउत्तेण, सव्वदुक्ख विमोक्खणे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-October
मनन-चिन्तन में सम्भव हो सकता है। टेलीफोन वार्ता की तरह भगवान से वार्तालाप करने की और टेलीविजन पर चलते-फिरते ईश्वर को देखने की निरर्थक उड़ाने उड़ना छोड़कर ही हम वास्तविकता के निकट पहुँच सकते है। भ्रम-जंजाल गढ़कर तो हम अपने आपको अवास्तविकता के ऐसे जाल में अधिकाधिक फँसाते चले जाएँगे, जिसमें बालू से तेल निकालने जैसे निरर्थक प्रयासों की तरह निराशा ही हाथ लगेगी। सुखद कल्पना गढ़ लेना और ईश्वर के साथ क्रीड़ा-कल्लोल हास-विलास करते रहना एक बात है और वैसी यथार्थता का होना दूसरी। कल्पना की उड़ाने सम्भव है किसी का भावनात्मक समाधान कर सकें, पर वास्तविकता के क्षेत्र में उसके हाथ कोई बड़ी उपलब्धि मिल नहीं सकेगी, यह भी सत्य है।
मनन और चिंतन में लगाया। संयम और साधना द्वारा अपना विवेक परिपक्व किया था और अपने ज्ञान-भण्डार को अनुभव की तुला पर तौलकर प्रामाणिक बना लिया था और तब इतनी साधना करने के बाद वे समाज को ज्ञान-दान के योग्य हो पाये थे। उन्होंने उस ज्ञान के बल पर मानवता के प्रति सर्वश्रेष्ठ उपकार किया जिसके लिए वे तब भी पूजित रहे, आज भी है और आगे भी पूजनीय बने रहेंगे ज्ञानोपकार से बढ़कर संसार का कोई अन्य परोपकार है ही नहीं।
मनन-चिन्तन योग-तप आदि के समस्त साधन, उपचार ईश्वरप्राप्ति का लक्ष्य पूरा करने के लिए ही बनाये गये।
मनन चिन्तन करते रहने भर से हस्तगत नहीं होती। उनको नहीं होती। उनको स्वभाव का अंग बनाना पड़ता है। चिन्तन चरित्र और व्यवहार में उन्हें भली प्रकार समाविष्ट करना पड़ता है। यह कार्य प्रत्यक्ष क्रियान्वयन के बिना संभव नहीं होता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-March
मनन एवं भावनाओं के अनुरूप ही कायिक क्रिया-कलापों का निर्धारण होता है। भाव-संवेदनाओं और विचारणाओं की उत्कृष्टता के आधार पर ही हमारी आन्तरिक प्रणाली एवं प्राणऊर्जा का निर्माण होता है। विचार और भावनाओं की अदृश्य शक्ति का हमारे भारतीय शास्त्रों में गहन अध्ययन हुआ है और यह निष्कर्ष निकाला गया है कि स्थूल रूप से मनुष्य का जैसा भी कुछ जीवन है, उसकी भावनाओं का ही परिणाम है, भले ही उनका संबंध इस जीवन से न हो, पर कोई भी कष्ट या दुख, रोग-शोक या बीमारी हमार पूर्वकृत कर्मों और उससे पूर्व पैदा हुए मन के दुर्भावों का ही प्रतिफल है। यही कारण था कि प्राचीनकाल के ऋषि, मनीषी, प्रायः इसी प्रयत्न में रहते थे कि लोगों के मन निम्न और अधोगामी न बनने पायें इसके लिये कष्टसाध्य साधनाओं, तीर्थयात्राओं, सत्संग और नित्य स्वाध्याय के कार्यक्रमों का आध्यात्मिक, धार्मिक और वैराग्यपूर्ण चिन्तन का स्रोत मस्तिष्क में निरन्तर प्रवाहित था कि तब लोग स्वल्प-साधनों में ही अपार सुख-शान्ति का रसास्वादन करते थे।
मनन करता रहता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-January
मनन के लिए-यह शक्ति का स्रोत है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-July
मनन करने से होता है। कोई भी कार्य एक मुख्य उद्देश्य लेकर किया जाता है और उस उद्देश्य के अनुसार ही परिणाम होता है, जो लोग परीक्षा उत्तीर्ण होने का प्रणाम पत्र लेने के उद्देश्य से पढ़ते हैं उन्हें उसी लक्ष की पूर्ति में अपनी पढ़ाई की सफलता दिखती है। परन्तु जिनने जीवन निर्माण के लिए, आत्म शाँति के लिए, गायत्री माता का सन्देश सुना है, वे अपनी शिक्षा की सार्थकता इसी में देखते हैं कि वे प्रतिष्ठा, शाँति, सम्पन्नता और उन्नति का जीवन उपलब्ध करें। उनका यह संकल्प पूर्णरूप से सफल न भी हो तो भी पूर्ण स्थिति में भारी परिवर्तन हो जाना निश्चित है। इसके अनेकों प्रत्यक्ष उदाहरण इस एक वर्ष की अवधि में मैंने देखे हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-November
मनन कर सत्संग से भगवान में श्रद्धा और विश्वास को दूर कर, इन्द्रियों का नियमन करते हुए मन को वश में करे। मन को वश में करना बड़ा ही कठिन कार्य है, अतः उसे अभ्यास और वैराग्य (त्याग) से वश में करे। तथा-
मनन करके अगली पीढ़ी मनुष्य जाति के भावी विकास में मदद देती है। इससे स्पष्ट है कि हमारी यह सीढ़ी, अब तक की पिछली सीढ़ियों के प्रति बहुत ऋणी हैं। इस परम्परा को बनाए रखने के लिए हमें भी समाज की उन्नति में भरसक सहयोग करना चाहिए। बस, हमारा धन ही नहीं, हमारी शक्ति और योग्यता, यहाँ तक कि हमारा जीवन भी मानव समाज के हित के लिए है। हमें तुच्छ खुदगर्जी की जिन्दगी न बितानी चाहिए, अथवा, यह कहना ठीक होगा कि हमारा सच्चा स्वार्थ इस बात में है कि हम समाज के लिए जीवन व्यतीत करें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-June
मनन के फलस्वरूप ही उपजते हैं। उस समय कोलाहल पूर्ण इस धरती से जैसे सम्बन्ध टूट सा जाता है।
मनन करना चाहिए कि उसे यह आभास होने लगे कि जैसा वह आत्म संकेतों द्वारा कर रहा है, वैसा ही वास्तव में वह है। कुछ ही दिनों में आश्चर्यजनक सफलता प्रतीत होगी। यह बात केवल कल्पित ही नहीं है प्रत्युत हमें इसके अनेकों उदाहरण देखने को मिलेंगे। संसार के प्रायः सभी महापुरुषों ने मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त करके ही अपने जीवन का निर्माण किया था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-February
मनन एवं मनोविकारों से लड़ने की तत्परता के आधार पर भी इन्द्रिय लिप्सा पर विजय प्राप्त करना सुगम हो जाता है। इन्द्रियों के चटोरेपन को कभी महत्व न दिया जाय, उनकी पूर्ति करने की सफलता को कभी पुरुषार्थ या सफलता न माना जाय। जब कभी इन्द्रियाँ प्रबल हो रही हों तो उनके समाधान के लिए उस सर्वशक्तिमान सत्ता में सच्चे हृदय से प्रार्थना करनी चाहिए और जब कभी बुद्धि को इन्द्रियाँ हरा दें तब अपने को धिक्कारते हुए उसका पश्चाताप और प्रायश्चित करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-April
मनन के पश्चात करता है, किन्तु निश्चयों में ढ़ोला नहीं रहता। अपनी शक्ति से उनमें सौंदर्य भरता चलता है। उसका दृष्टिकोण कम से कम साधनों द्वारा जीवन को सच्चे सौंदर्य से भर लेना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-January
मनन करने वाला है एवं जिस प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता रहित है, वह स्थिर बुद्धि वाला, भक्तिमान् पुरुष मेरे को प्रिय है।
मननशील है, अर्थात् ईश्वर के स्वरूप का निरन्तर मनन करने वाला है एवं जिस प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता रहित है, वह स्थिर बुद्धि वाला, भक्तिमान् पुरुष मेरे को प्रिय है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-March
मनन करके उससे लाभ उठाना चाहिए। इससे एक दूसरा लाभ यह होगा कि ऐसे स्त्री-पुरुष संसार की आर्थिक समस्या के प्रश्न को हल करने में सहायक होंगे।
मनन, चिन्तन के लिए चाहिए। चिन्तन करना उसकी मूल प्रकृति है। यदि आप न भी चाहेंगे, तब भी वह अपने चिन्तन के निमित्त कोई न कोई विषय स्वयं ढूँढ़ लेगा। जब बिना चिन्तन किये छुटकारा नहीं है, तो क्यों न मन को चिन्तन करने के हेतु कुछ शुभ भाव, उत्कृष्ट कल्पनाएँ सात्विक प्रेरक विचारधारा प्रदान की जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-September
मनन करना चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-May
मनन करते हैं वे लोग भव बाधाओं को तर जाते हैं।
मनन करने पर पता चलता है कि ‘योग‘ और ‘पतिव्रत योग‘ की साधना-प्रणाली में भी अन्तर नहीं है, क्योंकि ‘योगश्चित्तवृत्ति निरोधः’।
मनन और विवाद करने में जिसे रस आता है, जो अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहता है, जिसे ज्ञान संग्रह का शौक है, जो ज्ञानवान बनने के महत्व और आनन्द से परिचित है वह नित्यप्रति अधिक ज्ञानवान होता जायेगा। ज्ञानवान बनने के अनेकों साधन उसे पग पग पर प्राप्त होते रहेंगे। मूढ़मति के मनुष्यों को जहाँ कोई “खास बात” नहीं दिखाई पड़ती, जिज्ञासु व्यक्ति की सूक्ष्म दृष्टि-वहाँ भी बहुत सी जानने योग्य बातें ढूँढ़ निकालती हैं। ज्ञानवान बनने की तीव्र आकाँक्षा हुए बिना मस्तिष्क की वे सूक्ष्म शक्तियाँ संचित नहीं हो सकती जिनके आधार पर शिक्षा और विद्या की प्राप्ति हुआ करती है। ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ के सूत्रकार ने ज्ञान साधना का प्रथम उपाय जिज्ञासा को बताया है जिज्ञासु होना विद्वान होने का पूर्व रूप है।
मनन और निदिध्यासन के द्वारा इस प्रकार के मुमुक्षु सद्ज्ञान लाभ करते थे, पर सुख की चिन्ता में व्यस्त मानव को इतना अवकाश नहीं है कि वह उसके मूल की खोज करे-वह तो कस्तूरी मृग की तरह आत्मज्ञान रूपी सुगंध की खोज में दूर-दूर दौड़ता और भटकता रहा है। ऐसी अवस्था में उसे वाह्य जगत में ही वेदान्त के सिद्धान्तों का दिग्दर्शन कराकर सत्य के निकट लाना है, क्योंकि परिस्थिति बदल जाने के कारण साधन और विधि दोनों ही बदल गये हैं और हम जिस स्थिति में है उसी में उसका समुचित उपयोग करना है।
मनन करो। उनकी गाथाओं को अपने अन्तःकरण में अंकित करो। उन्हीं के समान अद्वितीय कार्य-सम्पादन करने की क्षमता प्रकट कर अपना नाम चिरस्मरणीय बनाओ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-October
मनन ही सत्संग है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-April
मनन द्वारा तुम अपनी नैसर्गिक शक्ति को प्राप्त कर सकते हो।
मनन करने की स्वतंत्रता दीजिए तो वह आपका सच्चा मित्र-सलाहकार बन जायगा। वह निकृष्ट भोगेच्छाओं में परितृप्त न होगा। वह अन्य व्यक्तियों की कृपा पर से आश्रित न रहेगा। मानसिक स्वतन्त्रता प्राप्त करते ही मनुष्य का संसार के प्रति दृष्टिकोण बदल जाता है। मानसिक स्वच्छन्दता के बिना मनुष्य प्रसन्नचित्त नहीं रह सकता।
मनन करने के लिए प्रदान किया गया है। वह सोच समझ कर प्रत्येक वस्तु ग्रहण करें, यों ही प्रत्येक तत्व को अन्धों की तरह ग्रहण न करे-यही इष्ट है। धर्म के आधुनिक रूप ने मानव मन को अत्यन्त संकुचित डरपोक बना दिया है। किताब कलमा, जादू, टोना, तीर्थ न जाने कितनी आफतें मानव मन पर सवार हैं। वह धार्मिक शृंखलाओं के कारण इधर से उधर टस से मस नहीं हो पाता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-February
मनन से इन शक्तियों को सरलतापूर्वक दृढ़ किया जा सकता है। ध्यान के बिना हम अपनी आत्मा को शक्ति नहीं दे सकते। संसार के उत्तम से उत्तम मानसिक अभ्यास करने वालों का विश्वास है कि ये शक्तियाँ निरन्तर अभ्यास, व्यवस्थित, अभ्यास द्वारा बढ़ाई जा सकती हैं। अभ्यास द्वारा जितने अंशों में हम निज आत्मा का विकास कर सकेंगे उतने ही अंशों में उसका यथार्थ उपयोग भी कर सकेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-January
मनन करें तो हमें ज्ञात हो जायेगा कि प्रतिदिन नई-नई योजनाएं तो हम बनाया करते हैं पर शोक! महा शोक! हम मन, वचन, काया से उस आदर्श पर स्थित नहीं रहते। केवल हम अभिलाषा मात्र ही करते रहें और उसकी सिद्धि के हेतु कुछ प्रयत्न न करेंगे तो जल तरंग के अनुरूप उनका उत्थान एवं पतन मन का मन ही में रह जायेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-March
मनन और अखण्ड चिन्तन करो जिससे तुम्हारी स्थिति और आत्मा में विलक्षण परिवर्तन होगा। उस सर्वव्यापक महाप्रभु को जानो जो सब शुभ कामना को पूर्ण कर देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-May
मनन के सहयोग से नई कल्पना उत्पन्न होती है। नया उत्साह आता है तथा प्रतिभा प्राप्त होती है। जिस अध्ययन से प्रेरणा (Inspiration) प्राप्त न हुआ वह अध्ययन कैसा? बहुत सा पढ़ते ही पढ़ते रटने से कुछ भी हाथ नहीं लगता। पढ़ो कम, उस पर सोचो अधिक।
मनन तथा उस पर क्रिया” यही वास्तविक अध्ययन है।
मनन द्वारा हजम करें, अपनी सम्पत्ति बनाएँ, उस पर कार्य करें।
मनन किया करता है। इसका मतलब यह हुआ कि मनुष्य भीतर अपने मन में, अपने मन से, बातचीत किया करता है, कुछ न कुछ बोला करता है। देखने में आया है कि इन अव्यक्त शब्दों का प्रभाव शरीर पर पड़ता जाता है। मनुष्य के मनन करते हुए चेहरे का उतार-चढ़ाव और रंग इस प्रकार से बदलता है कि बिना बोले ही योगी अभ्यासी या इस विद्या के जानने वाले बतला देते है कि यह मनुष्य अमुक बात सोच रहा है। भावनाओं के अनुसार मुख की आकृति और वर्ण बदलता जाता है।
मनन का उपयोग करता है वह शक्ति का उचित उपयोग करता है। लंबा चौड़ा बेमतलब का अध्ययन वैसा ही है जैसा खाया तो बहुत जाय, पर पचे दो चार रत्ती भर। ऐसा अध्ययन व्यर्थ है।
मनन करते हुए चेहरे का उतार-चढ़ाव और रंग इस प्रकार से बदलता है कि बिना बोले ही योगी अभ्यासी या इस विद्या के जानने वाले बतला देते है कि यह मनुष्य अमुक बात सोच रहा है। भावनाओं के अनुसार मुख की आकृति और वर्ण बदलता जाता है। सोचते समय कभी मनुष्य का चेहरा पीला पड़ जाता है, कभी प्रसन्न हो जाता है, कभी ललाट का चर्म सिकुड़ जाता है, कभी भृकुटी तिरछी हो जाती और कभी दोनों कपोल लाल हो जाते हैं। इसके सिवाय और भी कई तरह के रूपांतर और परिवर्तन हुआ करते हैं। इन रूपाँतरों को देखकर किसी के भीतर का भाव या मन का विचार जान लेना कठिन नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-November
मनन करने की दृष्टि से मँगाते हैं। यही कारण है कि यदि कभी इसके प्रकाशन में एक सप्ताह की भी देर हो जाय तो पूछ-ताछ के सैकड़ों पत्र आ जाते हैं। यहाँ से दो-बार जाँच कर ठीक समय पर हर महीने पत्रिका भेजी जाती है, तो भी जिन किन्हीं का अंक रास्ते में खो जाता है वे उसे प्राप्त करने के लिए पूरा प्रयत्न करते हैं। कोई-कोई तो उत्सुकता की अधिकता के कारण अंक मिलने की शिकायत बड़े कटु शब्दों में भी करते हैं। यह कटु शब्द किसी दुर्भावना के नहीं वरन् उस अंक की प्राप्ति संबंधी उत्सुकता के प्रतीक होते हैं।
मनन पूर्वक पढ़ा होगा तो वे यह बिना बतलाये ही समझ गये होंगे कि इस योग की सिद्धि तो यही है जो और सब योगों की अर्थात् आत्मा का परमात्मा से अविच्छिन्न सम्बन्ध का ज्ञान तथा उसका अन्तरतम से निरन्तर सहज भाव से अनुभव। अब साधिका की योग्यता पर विचार करें। वैसे तो गीता में कथित दैवी सम्पत्ति के जितने ही अधिक गुण साधिका उपार्जित कर सके इस पथ में सहायक ही होंगे पर मैं तो उन्हीं गुणों की गणना करूंगी जो कि साधिका के हेतु अनिवार्य अथवा अत्यावश्यक हैं।
मनन, उनके असाधारण, दिव्य कार्यों पर विश्वास और ये विश्वास कि जब आत्मा का परमात्मा से योग हो जाता है तब कोई भी उसके हेतु कार्य असम्भव अथवा असाध्य नहीं रहता, इस पथ के महत्व को समझना तथा इसके हेतु बड़े से बड़ा स्वार्थ त्याग करने को सर्वदा प्रस्तुत रहना, पति को ईश्वर की प्रति-मूर्ति मान कर श्रद्धा रखना, उसके कुविचारों को हटाने का तन मन से पूर्ण प्रयत्न करना, पर श्रद्धा तथा इस भावना को न्यून न होने देना, विवाहकाल की प्रतिज्ञाओं को जानना, उन पर मनन तथा उनकी पूर्ति का पूर्ण प्रयत्न करना। इस विषय में महाकवि हरिऔधजी की निम्न पंक्तियाँ कम महत्वपूर्ण अथवा कम विचारणीय नहीं हैं-
मनन तथा उनकी पूर्ति का पूर्ण प्रयत्न करना। इस विषय में महाकवि हरिऔधजी की निम्न पंक्तियाँ कम महत्वपूर्ण अथवा कम विचारणीय नहीं हैं-
मनन द्वारा सामने उपस्थित सर्वतोमुखी समस्याओं को समझना और उनके सुलझाने का मार्ग तलाश करना।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-July
मनन कर लिया, 1?व651 समझ लेना चाहिए कि वही सच्चा पारखी, जौहरी एवं उपलब्धियों का सदुपयोग कर सकने वाला भाग्यशाली है। जीवन सौंदर्य है, जीवन प्रेम है, जीवन आनन्द है, वह सब कुछ है जो नियन्ता की इस सुविस्तृत सृष्टि में सर्वोत्तम कहा जा सकने योग्य है।
मनन किया जाये तो पृथकता व असंबद्धता का आवरण हट जाता है यथार्थ प्रकट होने से य समझ में आ जाता है कि ये परस्पर विरोधी नहीं, एक दूसरे के पूरक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-May
मनन। हथियारों को तेज करने के लिए उन्हें उल्टी और सीधी ओर से पत्थर पर घिसा जाता है अपने विचारों, योजनाओं और क्रियाकलापों को आरम्भ करने से पूर्व उसे दोनों पहलुओं पर विचार कर लेना चाहिए, तथा ऐसा मार्ग मिलता रहे जिसे व्यवहार एवं सफलता के निकट तक पहुँचा सकने वाला कहा जायें।
मननशील एकाग्र ध्यानस्थ मस्तिष्क में अनेकों विशेषताएं विकसित हो जाती है। फलतः मनुष्य का संबंध सृजनात्मक बौद्धिकता से जुड़ता और उसी परिणति को प्राप्त होने लगता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-November
मनन के लिए तो विशेष रूप से एकान्त की ही आवश्यकता पड़ती है। आत्मानुसंधान में निरत योगाभ्यासी प्रायः एकान्त स्थान में रहकर अपने प्रयोग सफलता पूर्वक सम्पन्न करते थे। अभी भी वैज्ञानिक अन्वेषणों के लिए प्रयोगशालाएँ ऐसे ही स्थान और वातावरण में बनी होती हैं, जहाँ बाह्य विक्षेपों का प्रभाव कम से कम पहुँचे।
मनन चिन्तन कर महत्वपूर्ण नतीजे पर पहुँचने में सफल हो गए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-April
मनन भी इस संदर्भ में काम करता है। वह अपनी इच्छा शक्ति और संकल्प शक्ति से भी अपने आप को प्रभावित करता है। पूर्व संचित संस्कार भी ऐसा वातावरण पाकर स्वतः उभरते हैं। ग्रीष्म ऋतु में घास सूख जाती है फिर भी जमीन के अन्दर उसकी जड़ों में किसी प्रकार नमी बनी रहती है। वर्षा होते ही वह जड़े अनायास ही अंकुरित हो चलती हैं और तेजी से अपना विस्तार करती हुई जमीन पर फैलकर हरीतिमा बिखेरती हैं।
मनन, चिन्तन करे और अपने को उसी ढाँचे में ढालने की योजना बनायें। जीवन की भावी योजना भी उसी स्तर पर बननी चाहिये, जैसे कि सरकारी पंचवर्षीय योजनायें बनती है। रेल एक लाइन पर चलती है तो निश्चित स्टेशनों पर ही ठहरती है और अन्तः में वही रुकती है जहाँ उसका अन्तिम पड़ाव हैं यह नीति सुदृढ़ व्यक्तित्वों वाले मनुष्यों की रहती है। वे संकीर्ण स्वार्थ साधने के लिये कुछ भी करने के लिए आतुर नहीं होते, है, जिसका अनुगमन करते हुए अनेकों श्रेष्ठता के पथ का अनुगमन कर सकें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-December
मनन। भजन के लिए नित्य कर्म से निवृत्त होकर नियत पूजा स्थान पर पालथी मारकर बैठा जाता है। शरीर, मन और वाणी की शुद्धि के लिए जल द्वारा पवित्रीकरण, सिंचन, आचमन किया जाता है देव प्रतिमा के रूप में गायत्री की छवि अथवा धूप-दीप में से कोई प्रतीक स्थापित करके इसे इष्ट, आराध्य माना जाता है। धूप, दीप, नैवेद्य, जल, अक्षत, पुष्प में से जो उपलब्ध हो उससे उसका पूजन किया जाता है। पूजन में प्रयुक्त वस्तुओं की तरह अपने जीवन में उन विशेषताओं को उत्पन्न करने की भावना की जाती है जो इन उपचार, साधनों में पायी जाती है।
मनन है। इसके लिए एकान्त स्थान ढूँढ़ना चाहिये। आंखें बन्द कर के अन्तर्मुखी होना और आत्मसत्ता के सम्बन्ध में परिमार्जन परिष्कार की उभयपक्षीय योजना बनानी चाहिये। इसमें आज के दिन को प्रधान माना जाय। प्रातः से मध्याह्न तक जो सोचा और किया गया हो, उसे आदर्शों के मापदण्ड से जाँचना चाहिये और उस समय से लेकर सोते समय तक जो कुछ करना हो उसकी भावनात्मक योजना बनानी चाहिये, ताकि दिन के पूर्वार्ध की तुलना में उत्तरार्ध और भी अच्छा बन पड़े।
मनन साधना करनी चाहिये। इसे आत्मदर्शन ही समझा जाना चाहिये, जो थोड़ी विकसित अवस्था में ईश्वर दर्शन के रूप में फलित होता है।
मनन। यह मध्याह्नोत्तर कभी भी नहीं किया जा सकता है। समय पन्द्रह मिनट हो, तो भी काम चल जायेगा। इसमें अपनी वर्तमान स्थिति की समीक्षा की जाती है और आदर्शों के मापदण्ड से जाँच पड़ताल करने पर जो कमी प्रतीत हो, उसे पूरा करने की योजना बनानी पड़ती है। यही मनन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-March
मनन आता है। चिंतन का तात्पर्य है-वस्तुस्थिति का अध्ययन, अवगाहन। मन का तात्पर्य है-विकृतियों के परिशोधन और सत्प्रवृत्तियों संवर्धन की विचारणा, योजना और संभावनाओं का अभिनव स्थापना। विद्या का शुभारंभ आत्मिक क्षेत्र चिंतन मनन से प्रारंभ होता है। इससे आगे आत्मा समीक्षा, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म विकास के ऊर्ध्वगामी चरण उठते है।
मनन को आधार माना गया है। यह वातावरण के प्रभाव से ही हस्तगत हो सकता है और पूर्व सचिव संस्कारों के आधार पर अन्तः प्रेरणा से भी जब मनुष्य सोचता है कि वह पशु पक्षियों से जीव जन्तुओं से अधिक विकसित एवं समर्थ है तो उसे अपनी वरिष्ठता का बोध होता है। इस बोध को व्यावहारिक जीवन में उतारने की उत्कंठा मचलती है। यहीं है वह प्रसव पीड़ा जिसमें होकर गुजरने पर दूसरा जन्म द्विजत्व उपलब्ध होता है। ऐसी दशा में पेट प्रजनन गौण हो जाता है और मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्टता अपनाने, आदर्शों को जीवन चर्या में घुला देने की योजना बनती है।
मनन से प्रारंभ होता है। इससे आगे आत्मा समीक्षा, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म विकास के ऊर्ध्वगामी चरण उठते है। ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ आत्म चेतना से सम्बन्ध बिठाने और दोनों के बीच आदान–प्रदान का द्वारा खोलने का उपक्रम आरंभ होता है।
मनन भी थक कर अपनी कोठरी में बैठ गया। कल्पनाएं, चिन्ताएं सभी समाप्त हो गई। यह कृतिक निद्रा की स्थिति है। यह मनोबल के आधार उत्पन्न की जाती है। आरम्भ में शरीरगत उत्तेजना और इच्छा शक्ति की आकाँक्षा के बीच संघर्ष चलता है।
मनन और सोचने समझने की एक गोलाकार परिधि सी बनती जाती है। मनःमस्तिष्क में बहते हुए यह विचार ही एक धारा का रूप ले लेते है। अतः करण में प्रवाहित होने वाली क्षुद्र भावनाओं की धारा को कषाय-कल्मषों की धारा भी कहते है। काम क्रोध मद मत्सर, मोह, राग, द्वेष, भय आदि विषय वासनाओं एषणाओं की धारा मनुष्य के सूक्ष्म और कारण जगत में सदैव प्रवाहित होती रहती है, जबकि सब महापुरुषों में उदारता, आत्मीयता, सहृदयता, करुणा, पवित्रता आदि की शुभ कल्याणकारी धाराएं प्रवाहित होती रहती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-August
मनन करने तथा पतंजलि प्रणीत योग दर्शन के पृष्ठ उलटने पर स्पष्ट हो जाता है कि योग शब्द “युज” धातु से निःसृत हुआ है- जिसका तात्पर्य है जोड़ना। अध्यात्म साधना के क्षेत्र में यह शब्द आत्मा और परमात्मा को मिलाने वाली पुण्य प्रक्रिया के रूप में प्रयुक्त होता है। इसे सद्ज्ञान और सत्कर्म का समन्वय भी कह सकते हैं। संसार में सबसे बड़ा दुःख वियोग है। प्रिय परिजनों से बिछुड़ जाने पर जितना कष्ट होता है उतना अन्यत्र कहीं भी कभी नहीं होता।
मनन करने ओर सींव का निष्कर्ष निकालने में लगाना चाहिए। चित्त का घोड़ा यदि सड़क पर दौड़ने लगे तो उसके साथ बँधा हुआ ताँगा भी लुढ़कने लगता है। मन के पीछे पीछे ही शरीर चलता है। कर्म ही सफलता के निकट तक ले पहुँचते हैं।
मनन आदि उपायों के द्वारा व्यावहारिक रूप में इसे विकसित किया जाता है। बुद्धिमान, विद्वान, कुशल, पारंगत, समुन्नत बनने का अवसर इसी क्षेत्र के परिसर में बन पड़ता है।
मनन की शक्ति इसी आधार पर आँकी जाती हैं कि उन्हें अपनाकर वस्तुस्थिति समझी और भविष्य की उपयोगी विधिव्यवस्था बनाई जाती है। तत्वदर्शी इसी गहराई में उतरते और जन साधारण के लिए ऐसा मार्ग बना जाते हैं जिस पर चलने वाले प्रगति, समृद्धि, सुख शान्ति का सत्परिणाम उपलब्ध करते रहें। यह सभी भविष्य की सही परिकल्पना कर सकने वाले विशेषज्ञ हैं। इन्हें कोई चाहे तो भविष्यवक्ता भी कह सकता है। विशेषता उनकी यही होती है कि वे जो कुछ सोचते हैं, जैसा कुछ निष्कर्ष निकालते हैं, वह साकार होते हैं।
मनन चिन्तन ऐसे ही आधार है किसी एकान्त कोठारी या निर्जन क्षेत्र में बैठकर यह अनुभव किया जा सकता है कि संसार में संव्याप्त अवांछनीयता से अपना संबंध टूट गया। बुरे लोगों का बुरा प्रवाह एक एकाँत के कवच को बेध कर भीतर प्रवेश नहीं कर पा सकेगा। यह ढाल बाहरी अनुपयुक्त प्रभावों से बचाने के लिए एल का काम दे सकती है। शर्त एक है कि उस एकान्त में संसार के अवाँछनीय लोगों का विचार,स्वरूप, कृत्य कल्पना में न आने दिया जाय। सर्वथा कोलाहल रहित स्थान मिलने में कठिनाईयाँ दिखे तो यह प्रयोजन आँखें बंद करके, संसार चिन्तन से मन का निरोध करके भी पुरा किया जा सकता है।
मनन की परिपक्वता ही कारण शरीर को विकसित करती और मनुष्य को इस स्तर तक पहुँचाती है कि वह सद्भाव का श्रद्धा की सुविकसित स्थिति का अनुभव कर सके। यह श्रद्धा ही है जो अन्तराल को परमात्म सत्ता के साथ जुड़ सकने की परिस्थिति पैदा करती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-January
मनन से ऐसा नवनीत निकाला था जो भू-लोक निवासियों के लिए अमृतोपम सिद्ध हो सके। उनकी तपश्चर्याएँ व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए नहीं, वरन विश्व-कल्याण के लिए सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए थी। इन्हीं दोनों में उन्होंने स्वर्ग और मुक्ति का दर्शन किया था। आज देवपूजा तो बहुत है किन्तु ऋषियों द्वारा प्रतिष्ठित मानवी गरिमा की अभ्यर्थना करने का किसी का मन नहीं है। वस्तुतः देव विभूतियाँ ऋषि कल्पों में होकर ही अपना आलोक प्रकट करती और संपर्क साधने वाले को निहाल करती है।
मनन, चिन्तन से उसे व्यवहारिक जीवन में किस प्रकार उतारा जा सकना सम्भव हो सकता है इस प्रयोग के लिए उसी आश्रम से युग-निर्माण विद्यालय की स्थापना हुई जो विगत दो दशाब्दियों से सफलतापूर्वक चल रहा है। इसमें प्रायः पचास छात्रों का बोर्डिंग तथा विद्यालय है। यह सभी छात्र परिष्कृत जीवन की विद्या में तो प्रवीण-पारंगत होते ही हैं, साथ ही औद्योगिक स्वावलम्बन की ऐसी शिक्षा प्राप्त करते है, जिससे नौकरी तलाश करने की आवश्यकता न पड़े और घर रह कर ही समुचित आजीविका उपार्जन कर सकें। यह सभी शिक्षा निःशुल्क है। केवल भोजन व्यय का अपेक्षाकृत सस्ता व्यय छात्रों को वहन करना पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-September
मनन, नीति विषयक क्षेत्र में भारतीय आध्यात्म का गौरव व महत्व स्वीकारे बिना नहीं रह सकता। वैदिक ऋषि इस नीति के कितने मर्मज्ञ थे, प्रकृति के साथ उन्होंने कितना सौजन्यपूर्ण संबंध स्थापित किया था। इसे वैदिक वाङ्मय के अवलोकन से जाना जा सकता है। यजुर्वेद के 13 वे मण्डल के 29 सूक्त की एक ऋचा के अनुसार जो चिरन्तन नियम (सौजन्यतापूर्ण नीति) का पालन करेगा उसके लिए वायु मधुरता से भरी होगी, नदियाँ उसे मधुरता प्रदान करेंगी। सारी वनस्पति उसके लिए मधुर होगी।
मनन में उत्कृष्टता का समावेश करके उस बहुमूल्य सम्पदा को कोष भी अंतरंग सत्ता में स्थापित किया जा सकता हैं। जो अपनी तथा दूसरों की विशेष आवश्यकताओं की पूर्ति में काम आता हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-January
मनन करना होता है। विचार परिष्कार एवं भाव-साधना से ही उत्कर्ष होता है। यंत्र के बीच में बिंदु होता है, जो गतिशीलता का, प्रतीक है। शरीर और ब्रह्माण्ड का प्रत्येक परमाणु अपनी धुरी पर तीव्रतम गति से सतत् चक्कर काट रहा हैं यह सर्वव्यापक है। अतः हमें भी उन्नति के मार्ग पर संतुष्ट नहीं रहना है, वरन् हर क्षण आगे बढ़ने के लिए तत्पर और गतिशील रहना है, तभी शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा गतिशील हो सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-November
मनन चिंतन के एकाकी प्रयत्न से भी सम्भव हो सकता है, पर अधिक सरल और व्यवहारिक यह है कि गायत्री चर्चा के संदर्भ में चलने वाले सत्संगों में उत्साहपूर्वक नियमित रूप से सम्मिलित होते रहा जाय।
मनन-चिन्तन करके अध्यात्म और धर्म का अति महत्वपूर्ण कलेवर खड़ा किया है। उसे जन-मानस में प्रविष्ट कराने के लिए अगणित साधु ब्राह्मणों ने तिल-तिल करे अपनी जीवन जलाया है अगणित धर्म, ग्रन्थ लिखे गये हैं और उन्हें पढ़ने, सुनने, समझने तथा हृदयंगम करने की स्थिति उत्पन्न करने के लिये अगणित मानवतावादी परम्पराओं, या रीति-रिवाजों प्रक्रियाओं, पूजा-पद्धतियों एवं कर्मकाण्डों का प्रचलन किया है लगातार उस विचार-धारा से संपर्क बनाये रखने के लिए उन्होंने धर्म एवं अध्यात्म का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया है।
मनन और चिन्तन का ऐसा क्रम बनाया जाय जिससे उस दिशा में चलने के सत्परिणामों के सम्बन्ध में तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरणों के आधार गायत्री उपासना के लिए श्रम करने की सार्थकता पर श्रद्धा और विश्वास गहरा होता चला जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-July
मनन उनकी चर्चा से लीला प्रसंगों के श्रवण से हुआ वह शक्तिपात नहीं तो और क्या हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-December
मनन करें और कुछ दृढ़ निश्चय लेकर शान्तिकुञ्ज हरिद्वार से पत्र व्यवहार करें। प्रस्तुत है एक विशेष लेख-सब कुछ कहने के लिए विवश न करें।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-September
मनन है जिसे प्रभु, परमात्मा, ईश्वर या भगवान कहा जाता है। सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय को ही भगवान कहते है। विराट्-परब्रह्म तो वह सूत्र-संचालन शक्ति है जिसे सारी सृष्टि की व्यवस्था चलानी होती है। नियम अनुशासन से अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलना ही उसका काम है। उपासना में परब्रह्म को नहीं, भगवान को साकार या निराकार रूप में स्मरण किया जाता है।
मननीय-पठनीय अंश यही हैं, जो ग्यारहवें से तीसवें श्लोक तक फैले हुए है। बारबार अहसास करा रहे हैं भगवान कि इस देह के लिए परेशान मत हो। इन रिश्तेदारों के प्रति जो मरणधर्मा हैं, मोह मत कर। गुरु हर शिष्य को ही हम बुद्धिमानों की भाषा-पांडित्यपूर्ण वचन बोलते हैं- गुरु हमें आइना दिखा देता है। यह गुरूर किसलिए - यह मोह किसके लिए- समाप्त हो जाने वाली काया के लिए-नश्वर संबंधों के लिए।
मनन करने से लोगों को पता चलेगा कि बाहर से सामान्य जीवन क्रम को स्वीकार करते हुये असामान्य असाधारण कैसे बना सकता है गीता कृष्ण इसीलिये तो दसवें अध्याय में कह गए हैं कि - तेशां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकं। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ यानि कि जो मेरे जीवन को बारीकी से जानते हैं, उन्हें मैं बुद्धि योग हूँ। अर्थात् उनकी बुद्धि निष्कल्मष हो जाती है। यही बात योगदर्शन लिखने वाले महर्षि पतंजलि ने कही है कि - वीतराग विषयं वा चित्तं।।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-February
मनन, एवं कार्य प्रणाली मेरी राय में शायद ही कोई अन्य कर रहा हो। राजनीतिज्ञों एवं देश के कर्णधारों को उनका मार्गदर्शन लेना चाहिए। मैं जीवन को कृतार्थ समझूँगा। यदि उनके मार्गदर्शन के अनुसार कुछ कर सकूँ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-August
मनन करने वाले किसी भी विवेकशील व्यक्ति का यह निष्कर्ष हो नहीं सकता कि समय, देश, जाति या कारण की संकीर्णताओं में बँधे रहना मनुष्य की प्रगति की निशानी है। आइन्स्टीन की भी लगभग ऐसी ही मान्यता थी। उनका कहना था कि इनकी वास्तविक सत्ता वस्तुतः है ही नहीं। संसार में न तो समय का कोई अस्तित्व है, न स्थान (देश) का, न गति का, यह न किसी भौतिक कारण या परिणाम का। यह चारों ही मस्तिष्क की उपज हैं हम जब तक इनसे आबद्ध रहेंगे, तब तक अंतिम सत्य की अनुभूति कर ही नहीं सकते।
मननाद्यतः। मनतात् त्रातिषट् चक्रं गायत्री गायत्री तेन कथ्यते॥
मनन में मन को लगायें। कुविचार आते ही उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनसे लड़ने के लिए खड़ी कर दें। नित्य हिसाब रखें किंतु सत्प्रयोजनों में, कृपणता भी न बरतें। संग्रही न बनें पर आमदनी से खर्च कम रखें, कुछ बचत रखें, उधार लेने की आदत न डाले। अपने प्रभाव का ऐसा उपयोग करें जिससे सम्पर्क क्षेत्र की दुष्प्रवृत्तियाँ घटे और सत्प्रवृत्तियों का बीजारोपण और परिपोषण उभरे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-June
मनन के लिये शक्ति मिल सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-March
मनन से लेकर और जप-तप एवं योगाभ्यास परक ध्यान-धारणा समाधि की समस्त प्रक्रियाओं का निर्धारण इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किये गये है। इस प्रकार अपूर्णता से पूर्णता की ओर जब कदम बढ़ चलते है, तब जीवन का वह स्वरूप बन जाता है जिसमें आत्मा भवबंधनों से मुक्त होकर नर नारायण बनने की ओर प्रगति यात्रा को अग्रगामी कर पाती है।
मनन, स्वाध्याय, संयम, सेवा जैसी सुगम विधियाँ भी बताई गई है और मनोनिग्रह, ध्यान, धारणा, त्राटक प्राणायाम जैसी यौगिक क्रियाएँ भी। मनःस्थिति और परिस्थितियों के अनुरूप किसी का भी चयन किया जा सकता है। लक्ष्य मात्र एक ही होना चाहिए विचारों की शुचिता। यदि विचार सही व विधेयात्मक हुए तो व्यक्ति का निर्माण सही होता चला जाएगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-May
मनन हमें नित्य करना चाहिए। इस तरह के मनन को निरन्तर अभ्यास से रूठा मन सहज ही मान जायेगा। फिर तो इसके नित नये चमत्कार समूचे जीवन को अलौकिक बना देंगे।
मनन को निरन्तर अभ्यास से रूठा मन सहज ही मान जायेगा। फिर तो इसके नित नये चमत्कार समूचे जीवन को अलौकिक बना देंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-June
मनन करे, जितना ज्ञान हो उसे परोपकार में लगावे, स्वार्थ भावनाओं का परित्याग करे, अनावश्यक स्थान पर मौन रहे, वह प्रज्ञान पंडित होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-April
मनन करते रहते हैं, वे अदृश्य रूप से संसार की बड़ी सेवा करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-May
मनन करने से उसमें बहुत सी नवीन बातें मालूम होंगी और उसमें अपनी विशेष योग्यता हो जायेगी, दूसरे प्रकृति अपनी निष्पक्ष और उदार न्यायशीलता के अनुसार तुम्हारे परिश्रम का बदला बुद्धि वृद्धि के रूप में दे देगी, जिसके अनुसार तुम किसी विषय पर अधिक सावधानी के साथ उपयोगी सोच-विचार कर सकोगे, उस समय तुम्हारी बुद्धि जो कुछ निर्णय करेगी वह सच्चा और हितकर होगा।
मनन करना बुद्धि बढ़ाने के लिये बहुत ही उत्तम अभ्यास है। इससे सारा बल एक बिन्दु पर एकत्रित होता है और इस एकत्रीकरण से मन की उन्हीं शक्तियों की ओर रक्त की सूक्ष्म स्फुरणा का प्रभाव होता है, जिससे उनके कारण में विशेष सहायता मिलती है।
मनन करो। जितने समय में उतना पढ़ा था, कम से कम उससे दूना समय उसे समझने में लगाओ। इस गंभीरता पूर्वक मनन करने से केवल नवीन अध्ययन ही न होगा वरन् बुद्धि को बढ़ाने वाला व्यायाम भी होगा, मन उचटे तो उसे रोक कर उसी विषय पर लगाओ। परन्तु यदि तुमने रुचिकर विषय चुना है, तो उस पर से मन को उचटने की कोई बात ही नहीं है। चूँकि यह अभ्यास कुछ धार्मिक-दृष्टि से नहीं है, इसलिये यदि तुम्हारा मन धर्म में कम रस लेता हो, तो दूसरा कोई विषय खुशी-खुशी चुन सकते हो।
मनन करने से केवल नवीन अध्ययन ही न होगा वरन् बुद्धि को बढ़ाने वाला व्यायाम भी होगा, मन उचटे तो उसे रोक कर उसी विषय पर लगाओ। परन्तु यदि तुमने रुचिकर विषय चुना है, तो उस पर से मन को उचटने की कोई बात ही नहीं है। चूँकि यह अभ्यास कुछ धार्मिक-दृष्टि से नहीं है, इसलिये यदि तुम्हारा मन धर्म में कम रस लेता हो, तो दूसरा कोई विषय खुशी-खुशी चुन सकते हो। हाँ कोई ऐसा विषय न हो जिसका मन पर कोई दुष्प्रभाव पड़े। इस प्रकार का अभ्यास आरंभ में पन्द्रह मिनट और फिर बढ़ा कर आध घंटा या एक घंटा तक किया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-December
मनन किया करें तो उन्हें बहुत लाभ हो सकता है। एक ही रंग-रूप की विचार-धाराएं आपस में मिलकर बलवती हो जायगी और दूने वेग से दोनों के मन में उच्च कोटि के विचार लावेंगी। इसके द्वारा वे आरोग्यता, आयुष्य और समृद्धि के परमाणुओं को आकर्षित कर सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-February
मनन करने में ही लगाना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-March
मनन करते हैं, उतनी-2 हमारी आत्मिक शक्तियाँ विकसित होती जाती हैं और एक दिन हम महान तथा दिव्य शक्तियों के स्वामी बन जाते हैं। संसार में आज तक जितने भी ऋषि, मुनि, योगी, यति आदि महापुरुष हुए, हैं वे सब अपनी महान शक्तियों के विकास से ही महान तथा उच्च बने हैं। इसलिये यदि हम उच्च तथा महान बनना चाहते हैं, तो हमें भी आत्म चिन्तन द्वारा अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास करना चाहिये। अपने आत्मा को प्रेम से समझा कर उसे निज स्वरूप का बोध कराना चाहिये। यों तो आत्मा को जागृत करने के तपश्चर्या आदि अनेक साधन हैं।
मननीय रचनाएं इसमें रहती हैं। छपाई सफाई बहुत ही सुन्दर है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-September
मनन कर रहे थे कि पास के बिल में एक अजगर सर्प बैठा हुआ दिखाई दिया। वह भारी शरीर के कारण अधिक दौड़-धूप करने में असमर्थ था, इसलिए उसे अक्सर भूखा रहना पड़ता था। जो कुछ थोड़ा-बहुत मिल जाता, उसी से सन्तोष कर लेता अजगर की ओर ध्यान से देखा तो दत्तात्रेय के मन में ऐसे विचार उठे-मानो यह मेरी ओर मुँह करके कह रहा है कि परिस्थितियों के कारण जब हम असमर्थ हों, तो थोड़े में ही संतोष कर लें और न मिलने वाली वस्तु के लिये दुःख करें। दत्तात्रेय ने उसे भी गुरु-भाव से अभिवादन किया।
मनन करो कि अन्दर के शारीरिक और मानसिक विष बलपूर्वक खींच कर बाहर फेंके जा रहे हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-November
मनन चिन्तन करने पर ही पड़ता है लेकिन चित्र तो देखने पर ही मनुष्य को प्रभावित करता है। गन्दे-अश्लील चित्र देखने से बचें। गाँधीजी के बन्दर की तरह बुराई की ओर से आँख मींचलें और अच्छाई को देखें।
मनन, चिन्तन के द्वारा पूजा करने पर तत्काल ही वरदान पाया जा सकता है। हमें नियमित रूप से सद्ग्रन्थों का अवलोकन करना चाहिए। उत्तम पुस्तकों का स्वाध्याय जीवन का आवश्यक कर्तव्य बना लेना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-December
मनन करने वाले ऋषि महात्माओं के आशीर्वाद वरदान, का सत्य इसी मौन के निहित में रहा है। वाणी का संयम मौन वाणी में ओज, तेज, शक्ति , चैतन्य भर देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-January
मनन, आत्म निरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म-विकास की सीढ़ियों पर चढ़े बिना ही क्या किसी का आत्म-कल्याण के लक्ष्य तक पहुँच सकना संभव है? पर जल्दबाज लोग कुछ थोड़ा-सा पूजा, पाठ, दर्शन, झाँकी, दान, दक्षिणा मात्र का सस्ता आधार लेकर जल्दी ही स्वर्ग मुक्ति प्राप्त कर लेना चाहते हैं। इन बेचारों को भला क्या कुछ हाथ लगता होगा?
मनन किया जाय इसके लिये हर जगह पूर्व सूचना एवं प्रेरणा देकर लोगों में उसकी प्रतीक्षा करने की उत्सुकता पैदा करूंगा।
मनन, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग जैसे कार्यक्रमों में व्यस्त रहे। मनोभूमि पर विक्षोभजन्य प्रभाव उत्पन्न न हो तो ही व्रत का पूरा लाभ मिलता है। व्यवसायिक कार्यों में प्रायः झूठ, चोरी, कर्त्तव्य में ढील, राग-द्वेष, लोभ तृष्णा क्रोध-वासना जैसे दोषों का समावेश बना रहता है। इसलिये अच्छा यही है कि व्रत के उपयुक्त स्थान तलाश किया जाय और उन दिनों छुट्टी लेकर आध्यात्मिक जीवन का लाभ लिया जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-September
मनन, चिन्तन, गृहकार्य आदि का एक बंधा हुआ समय हो। और ठीक समय पर अपने काम में लग जाना चाहिए। पत्रों का उत्तर तत्काल दें। दिए हुए समय पर लोगों से मिलने जायें। अपने दैनिक जीवन में छोटे- छोटे कार्यों में भी नियमितता बरतें, समय के पाबन्द बनें।
मनन का, तप और आदर्श का मूर्तिमान प्रतिफल ही कहे जा सकने योग्य है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-October
मनन द्वारा समय-समय पर यह विचार करते रहना चाहिए कि इस आस्था को जीवन में कितना उतार लिया गया तथा कितना उतारना शेष है। जो शेष हो उसकी पूर्ति के लिए रोज ही सोचना चाहिए और रोज ही एक कदम आगे बढ़ाना चाहिए। ‘सत्संकल्प’ के अनुरूप जीवन ढाल लेने में सफलता प्राप्त कर लेने की स्थिति को यदि ‘जीवन मुक्ति’ कहा जाय तो उसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। मुक्त पुरुष का अन्तःकरण कैसा हो सकता है? उसकी गतिविधियाँ कैसी रह सकती हैं?
मनन करना चाहिए। मनोमय कोश की यह साधना गत वर्षों में बताई जा चुकी है।
मनन, चिन्तन करके संसार को समाजवाद की नई दृष्टि प्रदान करने वाला मार्क्स, चार्ल्स डार्विन, दयानन्द, गाँधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, अरविन्द, लोकमान्य तिलक, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, ये सब ऋषि परम्परा के ही तो ज्योर्तिदीप थे। ऋषियों का कोई युग नहीं होता, वे हर युग में ज्ञान की नई-नई शोध, संस्करण करके अवतरित होते रहते हैं।
मनन अध्ययन करके धर्म का निर्माण करते हैं। तात्पर्य है कि हमारा धर्म, हमारी संस्कृति विचार प्रधान है बुद्धि प्रधान है- वेद-प्रधान है। अर्थात् ज्ञान के द्वारा प्रेरित है। वह किसी प्रकार के आग्रह को लेकर नहीं चलती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-August
मनन में संलग्न रहकर अधिक मनोबल संग्रह करते रहे और वहाँ भी उनने कुछ ग्रन्थों की रचना कर डाली।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-May
मनन-
मनन का दर्शन बहुत कम होता है।
मनन भक्ति द्वारा मनुष्य प्रकृति के नियमों का उल्लंघन कर मुक्त हो सकते हैं।
मनन में समुचित समय लगाते हुए अपनी अन्तःभूमिका को अधिकाधिक परिष्कृत करने का प्रयत्न करें। (2) ईश्वर उपासना में अधिक मन लगावें। (3) अपने स्वभाव और संस्कारों को परमार्थ वृत्ति से सम्पन्न करने के लिए लोक-सेवा के कार्यक्रमों को विशुद्ध अध्यात्मिक साधना मानते हुए जन-कल्याण की प्रवृत्तियों में पूरे उत्साह के साथ भाग ले। संयम, सदाचार, त्याग, उदारता, निर्लोभता और निरहंकारता का सतर्कतापूर्वक अभ्यास करें। यह तीनों बातें जिनके जीवन क्रम का अंश बन गई समझना चाहिए कि वानप्रस्थ धर्म अपनाते हुए उसने मानव-जीवन की सफलता का द्वार प्रशस्त कर लिया।
मनन चिन्तन करें और घर के प्रत्येक सदस्य को उस विचारधारा के संपर्क में लावें। यह प्रक्रिया ठीक प्रकार चलती है या नहीं, इसके लिए भी सक्रिय कार्यकर्ताओं को, शाखा संचालकों को, अपने कंधे पर ही उत्तरदायित्व वहन करना पड़ेगा। प्रगति के लिए इस विधि-व्यवस्था को कार्यान्वित किये बिना और किसी प्रकार काम न चलेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-February
मनन करना है। कुछ भी पढ़ा जाय उसे स्वाध्याय नहीं कहा जा सकता। मनोरंजन प्रधान उपन्यास, नाटक एवं शृंगार-रस पूर्ण पुस्तकों को पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। इस प्रकार का साहित्य पढ़ना तो वास्तव में समय का दुरुपयोग करना एवं अपनी आत्मा को कलुषित करना है। कुरुचिपूर्ण गन्दे साहित्य को छूना भी पाप समझना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-March
मनन के द्वारा मन के अन्दर बैठायी जाती है, वही काम में आती है।
मनन करने पर निर्भर है। जिस बात के ऊपर हमने मनन नहीं किया उसका प्रकाशन करना ही व्यर्थ होता है।
मनन नहीं किया उसका प्रकाशन करना ही व्यर्थ होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-January
मनन द्वारा आत्म ज्ञान का सम्पादन।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-October
मनन और अध्ययन का भी समावेश पाते हैं। स्वयं जब हम परिश्रम के द्वारा किसी वस्तु विशेष का समाधान करते हुए उत्तरोत्तर उन्नतोन्मुख होकर किसी नवीन वस्तु की खोज के निष्कर्ष पर पहुँचते हैं तब उसको हम स्वाध्याय द्वारा उपार्जित वस्तु कहते हैं। नवीनता का समारम्भ किसी स्वाध्यायी व्यक्ति द्वारा हुआ और उसकी अविरल तारतम्यता उन्हीं के द्वारा चल रही है। उत्तरोत्तर नवीनता का आविष्कार होने का अर्थ है उन्नति के सोपान पर आरोहण। स्वाध्याय द्वारा प्राप्त ज्ञान वास्तव में ज्ञान होता है।
मनन और अध्ययन कर सकें। उनकी नैतिक शक्ति नष्ट रहती है अतः वे उचित अनुचित तथा तथ्य युक्त और निस्सार वस्तुओं की सम्यक् विवेचना ही नहीं कर सकते हैं। जब उनमें विवेचना करने की शक्ति ही वर्तमान नहीं हैं तो भला वे आगे क्या बढ़ सकते हैं। सदाचार से ही शारीरिक स्वास्थ्य और औद्योगिक प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है। बिना स्वास्थ्य के संसार में हम किसी भी प्रकार की साधना नहीं कर सकते हैं तथा औद्योगिक प्रवृत्ति में हम सदैव आगे बढ़ने से हिचकते रहेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-August
मनन का शौक अवश्य है। क्योंकि मेरी शिकायत किंचित भी नहीं है इसी कारण मैं किन्हीं पवित्र भावों को लेखक कर व्यक्त करने का अभ्यास नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-December
मनन करें और इस प्रकार अपने अनुभवी विचारों की भेंट समाज के चरणों में चढ़ाती रहें तो यह काम आज जितना हीन और गौण माना जाता है, उतना न स्वयं स्त्रियों को ही हीन और गौण मालूम होगा, और न पुरुषों को ही गौण लगेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-June
मननयोग जो मन्त्रों में वैज्ञानिक क्रियाओं से सन्निहित वाह्य वायु तथा विद्युत के अभ्यन्तर सूक्ष्म स्तर की तरंगों द्वारा जड़ और जंगम पर यदि अपना अचूक प्रभाव डालता है तो क्या आश्चर्य है। किसी मन्त्र का जप हो या ईश्वर भजन प्रार्थना मन्त्र का कीर्तन हो उपरोक्त वैज्ञानिक तत्वों की प्रतिक्रिया उन सब में प्रगाढ़ रूप से दृष्टिगोचर होती है और उनके प्रभाव का विस्तार अनन्त होकर के तार द्वारा हृदयों में प्रवेश करता है। मन्त्रों का अनुष्ठान एक ही स्थान में अथवा एक ही समय में अनेकों स्थानों में किए जाने पर वायुमण्डल मात्र में एक विशेष उद्वेलन और संघटन उत्पन्न करता है। जिसका सामूहिक प्रतिफल समष्टि पर अंकित हो जाता है। यही कारण है कि धार्मिक आचार्यों ने पूजा, संध्या समाज प्रार्थना के कुछ निश्चित समय नियत कर दिये हैं।
मनन कुछ क्षण तक करना भी उसका कर्त्तव्य है तो सच्ची शान्ति से उसे भी अवश्य ही वंचित रहना पड़ेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-September
मनन करेगा और दैनिक कार्यक्रम में उन क्रियाओं का अधिक उपयोग करेगा जो अन्तःकरण पर श्रेयष्कर संस्कारों की छाप डालती हैं। इसके विपरीत प्रेम प्रधान भौतिक संस्कृति पर आस्था रखने वाला दिन-दिन अधिक तामसिक आहार ढूँढ़ता जायेगा, माँस, मछली, अण्डे, मदिरा, तमाखू, मिर्च, मसाले, प्याज, लहसुन जैसी तामसिक वस्तुओं की ओर उसकी रुचि बढ़ेगी। नाच तमाशे, व्यभिचार, चटोरापन, गपशप, निन्दा, चुगली, ताश शतरंज, जैसे विषयों में मन लगा रहेगा। अपनी प्रभुता, सत्ता विशेषता, बड़प्पन सिद्ध करने लोगों को अपना वशवर्ती करने के लिये अपव्यय, दर्प, अहंकार, ऐंठ, कटुभाषण, निन्दा, चुगली, ईर्ष्या, द्वेष, कलह, युद्ध उत्पीड़न, छल, षड़यन्त्र आदि का आश्रय लेगा। इन सब बातों की उलझन उसके मस्तिष्क में इतनी भरी रहेगी कि जीवन का महत्व, मनुष्य जन्म की जिम्मेदारी, इंसानियत के कर्त्तव्य, आत्म चिन्तन, परमार्थ, आदि बातों की ओर उसका मन ही न चलेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-December
मनन चिंतन करो।” वस्तुतः हम अपने को शरीर मान कर जीवन की उन गतिविधियों का निर्धारण करते हैं जिनसे केवल शरीर का ही यत्किंचित् स्वार्थ सिद्ध होता है। आत्मा के हित और कल्पना के लिए हमारे जीवन क्रम में प्रायः नहीं के बराबर स्थान रहता है। यदि हम अपने को आत्मा और शरीर को उसका एक वाहन औजार मात्र समझे तो सारा दृष्टिकोण ही बदल जाय। समस्त गतिविधियाँ ही उलट जायें तब हम आत्मा के हित, लाभ और कल्याण को ध्यान में रख कर अपनी रीति-नीति निर्धारित करें।
मनन द्वारा जितनी देर मन मन्दिर में इन सद्गुणों का प्रकाश बना रहे और उनमें अपनी श्रद्धा जमी रहे तो समझना चाहिये कि उतनी देर उच्च-स्तरीय ईश्वर पूजन होता रहा। प्रतिमायें ईश्वर की प्रतीक हैं पर उच्च-भावनायें तो प्रभु की प्रतिनिधि ही मानी गई हैं। इसलिये स्वाध्याय हमारी उपासनात्मकता को पूर्ण करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं।
मनन से शिक्षा पूरी हो सकती है पर विद्या का उद्देश्य तभी पूरा होगा जब उसकी पहुँच अन्तरात्मा तक हो, उसका आधार अध्यात्म, तत्व-ज्ञान रहे और उसका प्रशिक्षण ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया हो जो अपना आदर्श उपस्थित कर उन भावनाओं को हृदयंगम करा सकने में समर्थ हो। यह आधार प्राप्त न हो तो विद्या एक तरह की भौतिक शिक्षा मात्र ही बन कर रह जाती है और उससे अभिष्ट प्रयोजन पूर्ण नहीं होता। आज कल अध्यात्म के नाम पर ज्ञानयोग के नाम पर वाचालता बहुत बढ़ गई है। कथा-प्रवचनों के अम्बार खड़े होते चले जाते हैं पर सुनने वालों का कौतूहल समाधान होने के अतिरिक्त लाभ कुछ नहीं होता। उनके अन्दर प्रभाव, प्रकाश एवं परिवर्तन तनिक भी दिखाई नहीं देता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-August
मनन, चिन्तन, व्रत, उपवास आदि की आवश्यकता शिक्षा से भी अधिक है। प्राचीन काल के गुरुकुलों में शिक्षा संबन्धी विषय गौण माने जाते थे, आत्म-विद्या के विषय अनिवार्य होते थे। मनुष्य के दार्शनिक स्वरूप को यथार्थ, शाश्वत और पूर्णानन्द की प्राप्ति का पाथेय माना जाता था। इसलिये उस पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया जाता था जो व्यक्ति के आत्म गुणों का परिवर्द्धन करती थी। उसकी आवश्यकता आज भी उतनी ही नहीं बल्कि वर्तमान विकृत परिस्थितियों में तो उससे भी अधिक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-July
मनन करके भावी घटनाओं की जानकारी प्राप्त करने में समर्थ होते हैं।
मनन करके और दूसरों से मिला कर सही समझ लें तभी उन पर विश्वास करना चाहिये।
मनन करने वाले विद्वान 30-40 वर्ष पहले ही इस युग की समाप्ति होकर नया युग आने की घोषणा कर चुके थे। इस सम्बन्ध में एक वक्तव्य जो अब से लगभग 25 वर्ष पूर्व पं॰ जवाहरलाल ने दिया था, जब कि वे भारत के प्रधान मन्त्री नहीं वरन् एक आन्दोलनकारी ही थे, उनके दृष्टिकोण को बड़े स्पष्ट रूप में उपस्थित करता है-
मनन करके आगामी समय में होने वाली घटनाओं का पता भी निश्चित रूप से लगा सकते है। वह समय अब पास आता जाता है जब वैज्ञानिक लोग भविष्य की खोज का काम नियमपूर्वक करने लगेंगे। इस समय तक हम लोगों को भविष्य का ज्ञान जो बहुत कम है उसका कारण यही है कि अब तक इस सम्बन्ध में कुछ भी कोशिश नहीं की गई और न किसी जगत प्रसिद्ध विद्वान ने अपना दिमाग इस तरफ लड़ाया है। विज्ञान द्वारा जो भविष्य का ज्ञान प्राप्त किया जायगा उसका मुकाबला आजकल के ज्योतिषियों और हाथ देखने वालों के भविष्य-कथन से नहीं करना चाहिये। इन लोगों की बातों पर सिवाय मूर्खों के और कोई विश्वास नहीं कर सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-January
मनन, क्रिया-कर्म, पठन, श्रवण तथा दृश्य द्वारा ही होता है। मन की स्वाभाविक गति पतनोन्मुख ही है।
मनन करना, कल्याणकारी दृश्य देखना और शुभ वाणी बोलना तथा सुनना ऐसा अभ्यास है जो धीरे-धीरे मन की दूषित प्रवृत्तियों को नष्ट कर सत्प्रवृत्तियों को समाविष्ट कर देता है। जब तक बुराई को अच्छाई और दुर्गुण को गुण से स्थानापन्न न किया जायेगा तब तक चित्त शुद्धि हो सकना संभव नहीं। केवल शुभ में आस्था रखना मात्र ही वह अभ्यास अथवा प्रयास नहीं है जिससे चित्त-शुद्धि की आशा की जा सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-April
मनन तथा स्वाध्याय में अपना जीवन क्यों खपा देते? आध्यात्मिक सिद्धियों के धनी क्या इस प्रकार गली-गली पैसा और प्रतिष्ठा माँगते घूमते हैं? क्या यह शंका और सन्देह का विषय नहीं है कि जो दूसरों को धन, वैभव, संपत्ति, सन्तान का वरदान देने की क्षमता रखता है वह क्यों स्वयं दरिद्री, भिखारी तथा पैसे-पैसे के लिए जान दे रहा है? क्या दूसरों को लाखों का वरदान देकर दो पैसे माँग ले जाने वाला सिद्ध हो सकता है उसकी पूजा की जानी चाहिए ? इस मान्यता में कौन -सी तुक है-यह बात समझ में नहीं आती।
मनन करते रहने से चिन्तायें बढ़ती हैं और उन पर अधिक विचार न करने से नष्ट हो जाती हैं।
मनन करने के बजाय चिन्ता का कारण दूर करने का प्रयत्न किया करता है। वह अपने मस्तिष्क को चिन्ता की शाखा-प्रशाखाएँ छोड़कर बेकार में न तो उलझाया करता है और न उसकी शक्ति क्षीण किया करता है। वह सीधे-सीधे उसका हल निकालने में अपनी सारी शक्तियों को नियोजित किया करता है और ठीक तरह से , ठीक दिशा में शाँत मस्तिष्क से सोचने पर उसका हल निकाल भी लेता है। बहुत करके तो निरर्थक एवं काल्पनिक चिन्तायें ही अधिकतर मनुष्य को घेर लिया करती हैं।
मनन, भजन अथवा कीर्तन करना ही भावना का प्रतीक है। अपेक्षाकृत यह अधिक सरल प्रक्रिया है और इस मार्ग के द्वारा भी अपने आपको सत्य से उस समय तक जोड़े रखा जा सकता है, जब तक सत्य सिद्धि न हो जाये अथवा फिर कभी बुराइयों की ओर आकृष्ट हो जाने का भय शेष न रहे।
मनन का इंधन दें देकर स्वतः बढ़ाया गया है । यदि वे प्रारम्भ में ही इस निकम्पी चिन्ता को अपने मस्तिष्क में प्रवेश न करने देते अथवा आ जाने पर उसे इंधन न देते बल्कि उसे एक प्रेरणा समझकर आय बढ़ाने के उपायों में लग जाते तो निश्चय ही उनकी यह चिन्ता ग्रन्थि बनकर उनके स्वभाव का अंग न बन पाती ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-February
मनन द्वारा बौद्धिक शक्ति का संचय करना चाहते हैं। किन्हीं लोगों का प्रयत्न रहता है कि वे अधिक धन जमा करके अपनी शक्ति का सिक्का जमा सकें। कुछ लोग पद और कुछ लोकप्रियता के द्वारा शक्तिमान बनने के लिए अभ्यास किया करते हैं। अनेक विवेकशील व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जो इन सब शक्तियों की शिरमौर चारित्रिक, नैतिक अथवा आध्यात्मिक शक्ति का संग्रह करने के लिये प्रयत्न किया करते हैं। तात्पर्य यह है कि सभी व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में शक्ति पाना और शक्तिशाली बनना चाहते हैं।
मनन करने के लिये जिस बौद्धिक विकास और मानसिक सन्तुलन की आवश्यकता होती है, वह अशाँति की स्थिति में संभव नहीं। संयम का निर्वाह तभी हो सकता है, जब मनुष्य के विचार निर्विकार, वातावरण अनुकूल और व्यवहार-क्षेत्र के लोग सदाचारी एवं सद्भावी हों, नहीं तो अनुकरण वृत्ति, स्वाभाविक वातावरण और संसर्ग-दोष उसके रहन-सहन में बाधक बनेंगे एवं वाँछित पथ पर आगे बढ़ने से रोकेंगे।
मनन-चिन्तन किया जाए। अन्त में 108 गायत्री मंत्र माला की सहायता से अथवा उंगलियों पर गिन कर पूरे किए जाएं। अन्त में 24 आहुतियों का हवन किया जाए। यदि हवन का विधान न मालूम हो और संकल्प सामग्री न हो तो 24 घी की आहुतियाँ गायत्री मंत्र से दी जा सकती हैं। अन्त में आरती उतार ली जय और सूर्य भगवान को जल का अर्ध दिया जाए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-July
मनन करो, उसी में निरन्तर रमण करते रहो।”
मनन करता है और सत्य पर आरुढ़ रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-August
मनन, सत्संग, अनुभव आदि के द्वारा मन और मस्तिष्क को सुसंस्कृत बना लेना, मानसिक स्वस्थता है। शिक्षा के द्वारा डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, अफसर, वैज्ञानिक, लेखक, सम्पादक, बाजीगर, शिल्पी, व्यापारी, कलाकार, लेखक, मूर्तिकार, चित्रकार, संगीतज्ञ, नट आदि अपनी-अपनी महत्ता प्रकट करते हैं। अपनी योग्यताओं के बल पर संसार को सफलता का सन्तोषदायक आनन्द अनुभव करते हैं, सम्पत्ति कमाते हैं, यशस्वी बनते हैं, तथा मरने बाद नई पीढ़ी के लिए एक आदर्श छोड़ जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-April
मनन करने से मध्यम मार्ग की श्रेष्ठता और आवश्यकता सहज ही समझ में आ जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-June
मनन में, एकात्मभाव से लगाये रहना पड़ता है। मौका पड़ने पर मन को मारना और दबाना पड़ता है। सामाजिक प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए संगठित होना पड़ता है, समूह बनाना पड़ता है और सामूहिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़ना पड़ता है। जैसे साम्प्रदायिक जिम्मेदारियों के लिए, कथा, व्रत, उद्यापन, संस्कार, ब्रह्मभोज, प्रीतिभोज, पूजा, अनुष्ठान, त्यौहार आदि के खर्च तथा व्यवस्था का श्रम वहन करना पड़ता है, वैसे ही अध्यात्मिक उत्तरदायित्वों की पूर्ति के लिए भी मनुष्य को सदैव सचेत रहना पड़ता है। इन्द्रिय दमन करना पड़ता है, स्वार्थों पर अंकुश रखना पड़ता है, हीन भावनाओं को दबाना पड़ता है और अवसर आने पर कहीं अग्नि परीक्षा देने के लिए भी तैयार रहना पड़ता है।
मनन तथा साधन के लिए-थोड़ा भी समय नहीं लगाया जा सकता? क्या सचमुच आत्मा ऐसी तुच्छ वस्तु है, जिसकी शरीर के मुकाबले में इतनी उपेक्षा की जाय?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-January
मनन।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-October
मनन करो, इसी का निदिध्यासन करो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-February
मनन की उत्कृष्टता के बिना कोई मनुष्य अपने लिए स्थिर नैतिक सिद्धान्त का निर्धारण नहीं कर पाता और समाज की दिशाधारा के प्रवाह में बह जाता है। नैतिक सिद्धान्तों के निश्चय, निर्धारण के लिए ज्ञानार्जन अति आवश्यक है। ज्ञानार्जन के लिए व्यक्ति को चिंतनशील-विवेकशील होना चाहिए। परन्तु चिन्तन जीवन का मात्र सैद्धान्तिक पक्ष है उसका व्यावहारिक पक्ष है-श्रेष्ठ कार्यों के रूप में परिलक्षित होना। विचार मन्थन से जो सिद्धान्त निर्धारित हों उनको सत्यता की कसौटी के लिए व्यवहारिक क्षेत्र में उतारना होता है।
मनन एकाग्र होने से लेकर नीरोग-दीर्घायुष्य होने जैसे लाभ सभी को अभीष्ट हैं व ये सभी आहार साधना से मिलते हैं। -क्रमशः

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-September
मनन चिन्तन हर दूरदर्शी को अति गंभीरतापूर्वक करना चाहिए। शरीर यात्रा थोड़े से शारीरिक मानसिक प्रयत्न से चल सकती है। परिवार को स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाने का प्रयास भी निर्वाह क्रम के साथ-साथ ही चलता रहता है। यह दोनों कार्य इतने भारी नहीं हैं उन्हीं के लिए सारी जीवन सम्पदा पूरी तरह खप जाय। आत्मा और परमात्मा के संतोष हेतु भी कुछ किया ही जाना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-May
मनन। विचारणा सदा मानसिक होती है। वह क्रिया के द्वारा मूर्तिमान् बनती और वाणी से अभिव्यक्ति पाती है। वनस्पतियों में क्रिया और वाणी दोनों का अभाव होता है, अस्तु वे जो कुछ भी सोचती हैं, उसे अपनी मूक वाणी द्वारा ही कहती रहती हैं। परिष्कृत यंत्र इसे पकड़ने में सफल हो जाते हैं।
मनन, चिन्तन, स्वाध्याय, सत्संग जैसे विचारमंथनों द्वारा आत्मशोधन की जो प्रक्रिया चलती है उसी को देखते हुये यह जाना जा सकता है कि साधना में कितनी प्रगति हुई। साधक को सिद्धि मिलती है, बिना आत्मशोधन का भजन निरर्थक जाता है। अपवाद रूप में किसी को कोई दैवी अनुग्रह मिल भी जाय तो उसका परिणाम अंततः भस्मासुर, रावण, कुँभकरण, मारीच, कंस, हिरण्यकश्यप, आदि की तरह घोर विपत्ति के रूप में सामने आता है। फलित तो विभीषण, हनुमान जैसे सद्भाव सम्पन्न लोगों की साधना ही होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-June
मनन किया-आत्म चिन्तन किया। पुनः बार-बार लौटकर प्रजा पिता ब्रह्मा से प्रश्न किया। उन्हें समाधान मिला कि शरीर नहीं यह स्थूल काया नहीं, वरन् आत्मसत्ता ही परमसत्य है। सजाना-सँवारना उसे चाहिए। उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई।
मनन (9) अवबोधन (10) आचरण (11) अनुभूति-इतना सारा भाव-इस छोटे शब्द में निहित है। इनकी संख्या कितनी है? इस संदर्भ में भिन्न-भिन्न स्थानों पर अलग-अलग विवरण प्राप्त होते हैं। मुक्तिकोपनिषद् में 108 उपनिषदों की सूची है। उपनिषद्वाक्य महाकोश में 223 उपनिषद् ग्रन्थों को नामोल्लेख हुआ है।
मनन करता है, समझ लेता है और उसके अनुसार आचरण करता है। उसमें उसे विज्ञान यानि अपरोक्ष अनुभूति का लाभ होता है ‘उप’ ‘नि’ ये दो उपसर्ग और ‘सद’ धातु से बने इस शब्द की इस व्याख्या में ‘नि’ अर्थात् निष्ठ से की व्याख्या छूट गई है जिसका उल्लेख एक दूसरी जगह हुआ है। “ब्रह्मचारी आचार्यकुलवासी अत्यन्तम् आत्मानम् आचार्यकुले अवसादयन्” (छान्दोग्य 2/23/1) ब्रह्मचर्यपूर्वक गुरु के पास रहकर (उप) गुरु सेवा में अपने आपको विशेष रूप से (नि) खपाने वाला (सद) जो रहस्यभूत विद्या प्राप्त करता है वह है उपनिषद् ।
मनन-ज्ञानार्जन द्वारा इतने प्रबल हो जाते हैं कि दुष्कर्मों से उसे विरत कर सदैव पवित्र बनाए रखते हैं तो ऐसा व्यक्ति स्थिर चरित्र वाला कहलाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-August
मनन और निदिध्यासन से ध्यान और समाधि से वह परम तत्व अनुभव का विषय बनता है। सत्संग और सदाचार से यह मनुष्य का शरीर इसके भीतर देखने वाला अन्तःकरण वह पवित्र अधिष्ठान बनता है जिसमें आत्मानुभूति स्थिर और अचंचल होकर निवास करती है। सत्य बड़ा गुण है, स्वाध्याय और सत्संग तप है। पर पर-दुःख कातर होकर रात दिन कर्म में तत्पर रहना सर्वत्र आत्मानुभूति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। कार्य के स्वरूप का मूल्य नहीं मूल्यवान और महत्वपूर्ण उसके पीछे विद्यमान भाव है।
मनन का स्वभाव मिलता है। मनन कहते हैं बार बार विचारने को । जिस विचार को बार-बार मन में जमाने की कोशिशें की जाती है वह मन का स्वभाव बन जाता है। अतः मंत्र शक्ति मन तद्नुरूप ढलता है। साथ ही इसे वह ज्ञान व प्रकाश देता है जिससे अज्ञान और अंधकार को दूर किया जा सकता है।
मनन किया । इसके महत्व को बताते हुए वह आगे कहते हैं-’वास्तविक तथ्य यह है कि तंत्रों में जीवन सम्बन्धी बड़े गम्भीर और स्वस्थ विचारों का समावेश है। पर जिस प्रकार हम अपने शरीर में स्थित गुर्दे की उपयोगिता तब तक नहीं समझ पाते जब तक कि जीवित शरीर की संचालन क्रिया में अन्य भागों के साथ उसके सम्बन्ध को न जान लें। उसी प्रकार समस्त मानव जीवन की महत्वपूर्ण क्रियाओं पर विचार किए बिना हम इसकी वास्तविकता नहीं जान सकते। जिनमें वास्तविकता जानने की ललक है वे तंत्र का मूल वेदों में खोज लेते हैं।
मनन कहते हैं बार बार विचारने को । जिस विचार को बार-बार मन में जमाने की कोशिशें की जाती है वह मन का स्वभाव बन जाता है। अतः मंत्र शक्ति मन तद्नुरूप ढलता है। साथ ही इसे वह ज्ञान व प्रकाश देता है जिससे अज्ञान और अंधकार को दूर किया जा सकता है। इसकी साधना से अन्तर्चेतना में कुछ ऐसी फेर-बदल होती है जिसकी वजह से ईश्वरीय शक्ति और आनन्द का अवतरण होने लगता है।
मनन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लिया जाता है और लक्ष्यपूर्ति की दिशा में आगे बढ़ा जाता है। निश्चित ही यह साधना व्यक्ति को देवमानव ऋषि के पद पर प्रतिष्ठित करती व उसे ऋद्धि सिद्धियों का स्वामी बनाती है।
मनन, विज्ञान, विद्या और ज्ञान। मंत्र शक्ति से मनन का स्वभाव मिलता है। मनन कहते हैं बार बार विचारने को । जिस विचार को बार-बार मन में जमाने की कोशिशें की जाती है वह मन का स्वभाव बन जाता है। अतः मंत्र शक्ति मन तद्नुरूप ढलता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-January
मनन से निष्कर्ष नवनीत इतना ही निकलता है । अनेकानेक साधनाओं की सिद्धि इतनी ही है कि मानवी चेतना को उस जाल जंजाल से परित्राण मिले जो लक्ष्य को विस्मृत करती और कुत्साओं के अनेकानेक प्रतिपादनों का एक मात्र उद्देश्य है कि व्यक्ति आत्मबोध की भूमिका से जाग पड़े । उस प्रसुप्ति से छुटकारा पाये जिसमें वासना, तृष्णा और अहंता का गुलाम बनकर नर वानर की तरह निरर्थक उचक मचक करते रहने की उसकी आदत पड़ जाती है । पेट और प्रजनन के लिए पशु जीते हैं । मनुष्यों में भी कितने ही नर पशु होते हैं जिन्हें लोभ और मोह के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं ।
मनन किया जाय तो यह बोध हुए बिना न रहेगा कि प्रगतिशीलता विवेक के विकास की यात्रा है। आधुनिकता का सही मतलब है परिवेश और जीवन में सामंजस्य स्थापित करते हुए उच्चतर उद्देश्यों की ओर बढ़ना, यद्यपि स्वयं की अधोगामी प्रवृत्तियों को ऊर्ध्वमुखी बनाना सरल है। इसमें कठिनाई इतनी भर है कि विगत अभ्यास को छोड़कर नए अभ्यास का प्रारम्भ करना होता है संकल्प को प्रखर बनाना पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-December
मनन शक्ति के आधार पर ईर्ष्या को समाप्त कर दिया जाय, इसी में व्यक्ति का उत्कर्ष है और समाज का भी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-January
मननशील के लिए प्रयुक्त किया गया है। वह कामोद्वेगों के कोलाहलपूर्ण संसार से ऊपर उठ चुका होता है। यहाँ गीताकार ने स्पष्ट कहा है कि योगी जीवनक्रम को पूरी तरह उलट देता है। वह साँसारिक लोगों से ऊपर उठ चुका होता है। यहाँ गीताकार ने स्पष्ट कहा है कि योगी जीवनक्रम को परी तरह उलट देता है।
मनन व चिंतन करने वाले व्यक्तियों की आँखों में चमक दिखाई देती है। चार्ल्स डार्विन न अपनी विख्यात ग्रंथ ‘एक्सप्रेशन ऑफ इमोशन’ में उल्लेख किया है कि संसार में केवल हिंदू जाति के व्यक्तियों में ये समस्त विशिष्टताएँ परिलक्षित होती है, हालांकि इसकी झलक मलायास , न्यूजीलैंड तथा बोर्निया के डूयाक्सके निवासियों में भी दिखाई देती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-July
मनन और दिनचर्या की समस्त गतिविधियाँ उसी ऊर्जा के बूते पर संपन्न होती है। जो लोग औरों से ज्यादा सफल होते हैं , जीन के किन्हीं क्षेत्रों में ऊँचे शिखरों पर चढ़ते हैं, वे अपनी ऊर्जा का दस-बारह प्रतिशत भाग उपयोग कर पाते हैं। शेष नब्बे प्रतिशत भाग बिना उपयोग के ही पड़ा रहता है। सभी धर्म-संप्रदाय इस तथ्य को स्वीकार करते हैं। अपने हिसाब से उस भाग को जगाने का मार्ग भी बताते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-March
मनन, धैर्य आदि इसके कारण ही बन पड़ते हैं। परिष्कृत मन जहाँ अनेक दिव्य क्षमताओं का भाँडागार है, वहीं विकृत मनःस्थिति रोग-शोक एवं आधि-व्याधि का कारण बनती है। आध्यात्मिक साधनाएँ, योग-तप आदि मन को साधने एवं परिष्कृत करने के विविध उपाय-उपचार हैं।
मनन के स्तर पर उनका महत्व है । वे विद्वानों की बौद्धिक और आँतरिक स्थिति को व्यक्त करते हैं । उस स्थिति में भावभरी और एकाग्र पुकार ही अंतस् के द्वार खोलती है । उस द्वार से साधक का अपना इष्ट प्रकट होता है ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-February
मनन करें और आग के गोल की भाँति तेजस्वी होकर समस्त विश्व में व्याप्त हो जाएँ। कभी नालंदा विश्वविद्यालय के शिक्षक विद्यार्थियों को तराशा करते थे। गुरु जी ने सार जीवन यही किया। प्रत्येक व्यक्ति को ऊँचा उठाने में उन्होंने अपना समस्त जीवन लगा दिया। कोई भी हमारा परिजन यह नहीं कह सकता कि गुरु जी के पास से हम खाली हाथ बैट आए हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-September
मनन्वित मनःशक्ति का अद्भुत परिणाम होता है। दीप यज्ञ परमपूज्य गुरुदेव के द्वारा प्रणीत एक समूह-मन के जागरण का दिव्य प्रयोग है, जो उनने 1397-99 में अपनी जीवनावधि के अंतिम दो-तीन वर्षा में जन-जन के सम्मुख रखा। चेतना के विस्फोट से लेकर एक मन से की गई उज्ज्वल भविष्य की, सबके लिए सद्बुद्धि की प्रार्थना का चमत्कार सभी इन दीप यज्ञ प्रधान आयोजनों में देख चुके हैं ऐसा ही एक प्रयोग आठ अक्टूबर को संध्या विशिष्ट अभ्यागतों की उपस्थिति में सात बजकर बीस मिनट से आठ बजे तक संपन्न होगा एवं उसमें सारे विश्व की भागीदारी होगी।
मनन करें, भलीभाँति हृदयंगम करें। मनुष्य-मनुष्यता सीख सके, इसके लिए अवतार वह सब करके दिखाता है जिसका समाना किसी भी मनुष्य को करना पड़ सकता है। भगवान् अगले ही श्लोक में कहते हैं कि यदि मैं कर्म न करूं, तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएंगे और मैं संकरता को (व्यक्तियों में भ्रम उत्पत्ति) जन्म देने वाला बन जाऊँगा तथा जाति के रूप में उनके नाश का कारण बनूँगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-November
मनन करने योग्य हैं। आज के धर्म-तंत्र के स्वरूप को हम देखते, रूखी कर्मकाँडों से भरी अथवा कपोल-कल्पित मिथकों कथा-गाथाओं की विडंबनाओं से युक्त एक प्राणहीन कलेवर ही नजर आता है। धर्म-तंत्र में प्राण फूंकने का “रसों वै सः” की भावना की सही अर्थों में आत्मस्वत्कर अपनी उपासना को प्राणवान् बनाने का एक सशक्त शिक्षण परमपूज्य गुरुदेव ने अपने जीवन से दिया, यह कहा जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी। भक्तियोग का यह पक्ष व्यक्तित्व में समाहित होने पर कैसे उसे परिष्कृत कर मानव को महामानव बना देता है, यह हमें पूज्यवर के माध्यम से जानने को मिलता है।
मनन-चिंतन में ही लीन रहता।” सर्वविदित है कि डॉ. राधाकृष्णन भारतीय दर्शन और विद्या धाराओं के अधिकारी विद्वान थे। ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालय में उन्होंने भारतीय दर्शन पढ़ाया। उनकी अँगरेजी व्याख्याएँ यूरोपीय जगत् में भारतीय दर्शन की प्रामाणिक और प्रतिनिधि रचनाएँ समझी जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-August
मनन करने पर ज्ञात होता है कि जिस अंतराल में यह विकसित होती है, उसका मस्तिष्क एक प्रकार का चुँबकीय गुण प्राप्त कर लेता है, जिससे उसका इच्छित विषय अपने आप खिंचता रहता है। कहते हैं कि वैध को रोगी हर जगह मिल जाते हैं । एक दूसरी कहावत है कि बेगारी को स्वर्ग में भी बेगार मिलेगा। इन उक्तियों में सत्य का अंश यह है कि उसका मानसिक चुँबकत्व अपने अनुकूल स्थितियाँ आकर्षित कर लेता है । निखिल विश्व- ब्रह्माँड में अनंत ज्ञान भरा हुआ हैं ।
मनन एवं गुण, कर्म, स्वभाव पर भी छाई रहती हैं। फलस्वरूप शरीर और मन दोनों की शक्तियों अंधाधुँध अपव्यय होता रहता है और दोनों क्षेत्रों पर छाई रहने वाली उत्तेजना, आवेशग्रस्तता अंततः चित्र-विचित्र रोगों के रूप में फूटती है। महँगे टाँनों, दवाइयों से इन पर नियंत्रण पाना आसान नहीं है। इनसे छुटकारा पाने के लिए हमें मनोकायिक एवं योगपर मनो-आध्यात्मिक उपाय-उपचारों का आश्रय लेना पड़ेगा। समग्र स्वास्थ्य संवर्द्धन की दिशा में तभी आगे बढ़ा और जीवन का सच्चा आनंद उठाया जा सकता है, जब गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार में उत्कृष्टता तथा सदाशयता का समावेश किया जा सके।
मनन कर लिया जाए, तो फिर उससे बड़ा भाग्यशाली कोई नहीं। जीवन सौंदर्य है, सत् - चित - आनंद है। वह सब कुछ है, जो नियंता की इस सृष्टि में सर्वोत्तम कहा जाने योग्य है। हम इसे जीकर तो दिखाएँ।
मनन और अध्ययन-अवगाहन के मानसरोवर में उतरे हंसों की तरह मोती बीनने पड़ते हैं। हंस तो अपना-अपना ही पेट भरते हैं, पर यहाँ उससे बढ़-चढ़कर काम करना होता है। यह मणिमुक्तक वितरण करने जैसी प्रक्रिया है, जिससे अनेकों को सुसज्जित, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाया जा सके। यही वह प्रयत्न है, जिसमें राजहंस की तरह अखण्ड ज्योति के प्रयास पिछले पचास वर्षों से अनवरत तत्परता के साथ चले आ रहे हैं। इसका परिणाम भी आशातीत हुआ है।
मनन एवं विचारधारा के अनुरूप होती हैं। निषेधात्मक, निराशावादी, संशयात्मक चिंतन एवं दृष्टिकोण तनाव को बढ़ावा देते हैं। सुप्रसिद्ध स्नायविक तनाव विशेषज्ञ डॉ0 एडमंड जेकबसन के अनुसार ब्लडप्रेशर, हृदय रोग आदि अब मध्यम वर्ग के लोगों में भी पनप रहा है। इसका मूल कारण उन्होंने अज्ञा भय, चिंता जो अंतर्मन में व्याप्त हो जाती है, को बताया है। इसके फलस्वरूप व्यक्ति की स्वाभाविक खुशी व प्रफुल्लता छिन जाती है।
मनन से खुलता है अखंड ज्योति के पन्नों पर क्रम से इस विषय में पथ के प्रदीप प्रस्तुत है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-April
मननशील मनुष्य।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-July
मननात् मोक्ष माप्नोति चतुर्वर्ग मयोभवेत्।।
मननात् पापतस्त्राति मननात् स्वर्ग मश्नुचे।
मननात् स्वर्ग मश्नुचे।
मनन करने से पाप छूटते हैं, स्वर्ग प्राप्त होता है और मुक्ति मिलती है। तथा चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) सिद्ध होते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-February
मनन होगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-August
मनन कर उन्हें उपयोग में लाने का यत्न करें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-April
मनन करें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-March
मनन करता है तो ‘घृणा’ उसके मन पर प्रभाव नहीं डाल सकती। यदि वह विज्ञान का विचार करता है तो अज्ञानता उसे जड़ीभूत नहीं कर सकती।
मननकर्त्ता की ओर मानसिक क्षेत्र में प्रेरित करता है। इस प्रकार की क्रिया सावधानी से करके सामर्थ्यवान् होने के लिए प्रथम रीति की अपेक्षा अधिक मानसिक उन्नति और एकाग्रता की आवश्यकता है क्योंकि यह साधन करने के लिए संकल्प प्रेरक को मानसिक क्षेत्र पर आत्मदृष्टा होना आवश्यक है। किन्तु संकल्प की स्थानान्तर प्रेरणा शक्ति को हम सब लोग अप्रत्यक्ष और अज्ञात रीति से काम में लाते रहते हैं क्योंकि हमारे सब विचार मानसिक क्षेत्र में कम्पन उत्पन्न करते हैं और नियमानुसार इन कम्पनों का प्रभाव मानसिक प्रकृति पर अवश्य होता है। प्रायः प्रत्येक व्यक्ति अपनी अलग रीति से विचार करते हैं। उसका अपना प्रभाव अपनी मानसिक उन्नति करने में अन्य मनुष्यों की अपेक्षा अधिक बलवान है।
मनन करने की शक्ति प्राप्त कर लें। विचार की तरंगें स्थानान्तर भेजने के लिए स्थिर मनन करने की शक्ति प्राप्त करना आवश्यक है। बहुतों की निर्बल और चपलवृत्ति के कारण संकल्पों से केवल अस्थायी कंपन उत्पन्न होते हैं जो क्षण भर में उत्पन्न होकर पुनः विलीन हो जाते हैं तथा उनका चित्र भी क्षण भंगुर होता है अतः जब तक मनन शक्ति दृढ़ न होगी, विचारों का कंपन भी स्थायी नहीं होगा-मनुष्य चाहे कितना पढ़े, उसकी मानसिक उन्नति उसके विचारों की न्यूनाधिकता के अनुपात से होगी। जब तक वह उस विचार को लेकर उस पर कुछ समय तक मनन न करे तब तक उससे क्षणिक लाभ और बहुत थोड़ा लाभ होगा। अभ्यास से ही पूर्णता अथवा सिद्धि प्राप्त होती है।
मनन न हो तब तक पाठ पचकर मानसिक प्रकृति के साथ एकीभूत नहीं होता इसी से मन की वृद्धि नहीं होतीं और सफलता भी नहीं प्राप्त होती। अतः यदि हम चाहते हैं कि हमारा मन उत्कृष्ट हो और हमारी बुद्धि विकसित हो तो हमें पढ़ना कम, और मनन अधिक करने की आवश्यकता है। पाँच मिनट तक पढ़कर दस मिनट तक मनन करना चाहिए।
मनन करने की शक्ति प्राप्त करना आवश्यक है। बहुतों की निर्बल और चपलवृत्ति के कारण संकल्पों से केवल अस्थायी कंपन उत्पन्न होते हैं जो क्षण भर में उत्पन्न होकर पुनः विलीन हो जाते हैं तथा उनका चित्र भी क्षण भंगुर होता है अतः जब तक मनन शक्ति दृढ़ न होगी, विचारों का कंपन भी स्थायी नहीं होगा-मनुष्य चाहे कितना पढ़े, उसकी मानसिक उन्नति उसके विचारों की न्यूनाधिकता के अनुपात से होगी। जब तक वह उस विचार को लेकर उस पर कुछ समय तक मनन न करे तब तक उससे क्षणिक लाभ और बहुत थोड़ा लाभ होगा। अभ्यास से ही पूर्णता अथवा सिद्धि प्राप्त होती है। यह कथन मन के लिए उतना ही सत्य है जितना कि देह के लिए खाने से पेट भरता है, किन्तु जैसे जब तक आहार पचे नहीं तब तक वह शरीर के लिए व्यर्थ होता है।
मनन करता है तो उसके मन में झूठ के विचार नहीं आ सकते, आते ही लौट जायेंगे। यदि वह प्रेम पर मनन करता है तो ‘घृणा’ उसके मन पर प्रभाव नहीं डाल सकती। यदि वह विज्ञान का विचार करता है तो अज्ञानता उसे जड़ीभूत नहीं कर सकती।
मनन कर्त्ता अपने मानसिक क्षेत्र में दूसरे व्यक्ति का चित्र बनाकर उसके मस्तिष्क तक संकल्प नहीं भेजता किन्तु उसे सीधा दूसरे मननकर्त्ता की ओर मानसिक क्षेत्र में प्रेरित करता है। इस प्रकार की क्रिया सावधानी से करके सामर्थ्यवान् होने के लिए प्रथम रीति की अपेक्षा अधिक मानसिक उन्नति और एकाग्रता की आवश्यकता है क्योंकि यह साधन करने के लिए संकल्प प्रेरक को मानसिक क्षेत्र पर आत्मदृष्टा होना आवश्यक है। किन्तु संकल्प की स्थानान्तर प्रेरणा शक्ति को हम सब लोग अप्रत्यक्ष और अज्ञात रीति से काम में लाते रहते हैं क्योंकि हमारे सब विचार मानसिक क्षेत्र में कम्पन उत्पन्न करते हैं और नियमानुसार इन कम्पनों का प्रभाव मानसिक प्रकृति पर अवश्य होता है। प्रायः प्रत्येक व्यक्ति अपनी अलग रीति से विचार करते हैं। उसका अपना प्रभाव अपनी मानसिक उन्नति करने में अन्य मनुष्यों की अपेक्षा अधिक बलवान है।
मनन न करे तब तक उससे क्षणिक लाभ और बहुत थोड़ा लाभ होगा। अभ्यास से ही पूर्णता अथवा सिद्धि प्राप्त होती है। यह कथन मन के लिए उतना ही सत्य है जितना कि देह के लिए खाने से पेट भरता है, किन्तु जैसे जब तक आहार पचे नहीं तब तक वह शरीर के लिए व्यर्थ होता है। उसी प्रकार मन भी पठन द्वारा भरा जा सकता है किन्तु जब तक उसका मनन न हो तब तक पाठ पचकर मानसिक प्रकृति के साथ एकीभूत नहीं होता इसी से मन की वृद्धि नहीं होतीं और सफलता भी नहीं प्राप्त होती। अतः यदि हम चाहते हैं कि हमारा मन उत्कृष्ट हो और हमारी बुद्धि विकसित हो तो हमें पढ़ना कम, और मनन अधिक करने की आवश्यकता है।
मनन शक्ति दृढ़ न होगी, विचारों का कंपन भी स्थायी नहीं होगा-मनुष्य चाहे कितना पढ़े, उसकी मानसिक उन्नति उसके विचारों की न्यूनाधिकता के अनुपात से होगी। जब तक वह उस विचार को लेकर उस पर कुछ समय तक मनन न करे तब तक उससे क्षणिक लाभ और बहुत थोड़ा लाभ होगा। अभ्यास से ही पूर्णता अथवा सिद्धि प्राप्त होती है। यह कथन मन के लिए उतना ही सत्य है जितना कि देह के लिए खाने से पेट भरता है, किन्तु जैसे जब तक आहार पचे नहीं तब तक वह शरीर के लिए व्यर्थ होता है। उसी प्रकार मन भी पठन द्वारा भरा जा सकता है किन्तु जब तक उसका मनन न हो तब तक पाठ पचकर मानसिक प्रकृति के साथ एकीभूत नहीं होता इसी से मन की वृद्धि नहीं होतीं और सफलता भी नहीं प्राप्त होती।
मनन अधिक करने की आवश्यकता है। पाँच मिनट तक पढ़कर दस मिनट तक मनन करना चाहिए।
मनन करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-June
मनन एवं जप करने मात्र से से सात्विकता के किन्हीं अंशों की निश्चित रूप से वृद्धि होती है, जितने यह अंश बढ़ेंगे उतने अंशों पुराने दूषित तत्वों में कमी होगी। एक वर्तन में जितना पानी भरा जाता है उतनी ही हवा उसमें से निकलती जाती है। इसी तरह जितने सात्विक अंश हृदय में भरते जाते हैं पतित अवस्था को निश्चित रूप से सुधार होता है। यह क्रम यदि दृढ़ता पूर्वक, अधिक तत्परता के साथ चलाया जाय तो अन्तःकरण चतुष्टय में सतोगुण की तीव्रगति से वृद्धि होती है और पतितावस्था विलीन होती जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-September
मनन्तं ब्रह्म

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-October
मनन, उद्योग, दृढ़ता प्रतिभा इत्यादि सभी शक्तियाँ मस्तिष्क के निरन्तर उपयोग से बढ़ाई जा सकती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-May
मनन, चिन्तन का रस प्राप्त नहीं हो सकता है। आत्मिक निर्बलता हो तो सत्संग, प्रेम, भक्ति आदि का आत्मानंद दुर्लभ है। इतना ही नहीं निर्बलों को मिटा डालने के लिए प्रकृति का ‘उत्तम की रक्षा’ सिद्धान्त काम करता है। कमजोर को सताने और मिटाने के लिए अनेकों तथ्य प्रकट हो जाते हैं। निर्दोष भले और सीधे साधे तत्व भी उसके प्रतिकूल पड़ते हैं।
मनन करने के उपरान्त उत्तम विचारों के संस्कार दृढ़ होते हैं तब कहीं प्रत्यक्ष जीवन में वे लक्षण प्रकट होते हैं और वह वैसा बन जाता है। गायत्री की साधना से सतोगुण की ब्राह्मी भावनाएं अन्तः प्रदेश में अपना केन्द्र स्थापित करती हैं। उन भावनाओं के अनुरूप आन्तरिक जीवन बन जाता है और उसी प्रकार की प्रवृत्तियाँ वाह्य जीवन में भी दृष्टि गोचर होती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-January
मनन करने वाला विचारक) ऋषि (ऋतम्भरा बुद्धि वाला) पुरोहित (पुर का-नगर का- हित करने वाला) इसी प्रकार अनेकों उपाधियाँ गुरुकुल से प्राप्त होती थीं। छात्र को-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण भी गुरुकुल से ही उसके गुण, कर्म स्वभाव के अनुसार घोषित होता था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-December
मनन।
मनन और ध्यान करना, आज्ञा और निषेध करना, देना, यज्ञ-याग करना, खेती और व्यापार करना, इच्छा करना, निश्चय करना, चुप रहना इत्यादि ये सब कर्म ही हैं चाहे वे कर्म कामिक हों, वाचिक हों, अथवा मानसिक हों (गीता 5-8) और तो क्या जीना मरना भी कर्म ही है। मौका आने पर यह भी विचार करना पड़ता है कि जीना या मरना इन दो कर्मों में से किसको स्वीकार किया जावे। इस विचार के उपस्थित होने पर कर्म शब्द कर अर्थ कर्तव्य कर्म अथवा विहित कर्म हो जाता है। ऐसे विहित कर्म मनुष्य को सदा ही करते रहने चाहिए।
मनन करता जायेगा, वैसे वैसे ही उसका जीवन स्वाभाविक और प्रकृति के अनुकूल बनता जायगा। उसकी सहन शक्ति बढ़ती जायेगी। मन में शक्ति रहेगी और सरदी के साथ प्रेम करना आरंभ हो जायगा। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सरदी उसे हर हालत में उपयोगी दिखाई देगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-January
मनन करने वाले को ही मनुष्य कहते हैं। अपनी भीतरी मलीनताओं को खोजना और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करना इस संसार का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। संसार के प्रत्येक महापुरुष को अनिवार्यतः यह पुरुषार्थ करना पड़ा है। क्या यह कोई ऐसा कठिन काम है जो हम नहीं कर सकते? दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, वह अपना मन अपनी बात न माने, यह कैसे हो सकता है।
मनन-चिन्तन करते रहने से मन की मलीनता हटेगी ही। ईश्वर का उपासक सर्वत्र उस अंतर्यामी को उपस्थित देखेगा तो क्यों पाप में प्रवृत्त होगा और क्यों भय, चिन्ता, शोक, निराशा आदि में डूबेगा? इसी प्रकार सामाजिक सुव्यवस्था के लिए अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह हैं। दूसरों में अपनी ही आत्मा देखकर उनसे प्रेम, सहयोग एवं उदारता का व्यवहार करना अहिंसा है। अपनी न्यायेपार्जित कमाई पर ही गुजारा करना अस्तेय है और निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकताओं से बची हुई प्रतिभा, विद्या, क्षमता, समय एवं सम्पत्ति को समाज के हित में वापिस लौटा देना, दान कर देना अपरिग्रह है।
मनन की आदत पड़े तो मनुष्य आत्म−निरीक्षण कर सकता है और अपनी बुराइयों के एवं दुर्बलताओं के बारे में बहुत कुछ सोच−समझ सकता है, उन्हें छोड़ और सुधार भी सकता है। ऐसी विचार−गोष्ठियाँ जिनमें अपनी मानसिक स्थिति को सुधारने का मार्ग−दर्शन होता रहे बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। ईश्वर उपासना का भी इस दृष्टि से अत्यधिक महत्व है। आस्तिकता एवं उपासना को अपनाने से भी मनुष्य सज्जन बनता है। ईश्वर के निष्पक्ष न्यायकारी और पापों का दण्ड देने वाला मानने से कर्मफल की अनिवार्यता पर निष्ठा जमती है और मनुष्य नरक एवं दुर्गति के भय से, पाप से बचता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-June
मनन का विषय होना चाहिए। कहते हैं कि संजीवनी बूटी का सेवन करने से मृतक व्यक्ति भी जीवित हो जाते हैं। हनुमान द्वारा पर्वत समेत यह बूटी लक्ष्मण जी की मूर्च्छा जगाने के लिए काम में लाई गई थी। वह बूटी औषधि रूप में तो मिलती नहीं है पर सूक्ष्म रूप में अभी भी मौजूद है। आत्म−निर्माण की विद्या—संजीवनी विद्या—कही जाती है इससे मूर्छित पड़ा हुआ मृतक तुल्य अन्तःकरण पुनः जागृत हो जाता है और प्रगति में बाधक अपनी आदतों को, विचार श्रृंखलाओं को सुव्यवस्थित बनाने में लगकर अपने आपका कायाकल्प ही कर लेता है।
मनन, पूजा से निश्चय ही मनुष्य का कल्याण होता है पर इनके साथ-साथ आत्म-सुधार की अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रक्रिया भी चलती रहनी चाहिए। यह सोचना भूल है कि भजन करने से सब सद्गुण अपने आप आ जाते हैं। यदि ऐसा रहा होता तो भारत में 56 लाख संत महात्माओं पंडा पुजारियों की जो इतनी बड़ी सेना विचरण करती है, यह लोग सद्गुणी और सुधरे हुए विचारों के और उच्च चरित्र के रहे होते और उनने अपने प्रभाव से सारे देश को ही नहीं सारे विश्व को सुधार दिया होता। पर हम देखते है कि इन धर्मजीवी लोगों में से अधिकाँश का व्यक्तित्व सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों से भी गयाबीता है। इसलिए हमें यह मानकर ही चलना होगा कि भजन के साथ−साथ व्यक्तित्व सुधारने की आत्म−निर्माण की समानान्तर प्रक्रिया को भी पूरी सावधानी और तत्परता के साथ चलाना होगा।
मनन के बाद इस मार्ग को अपनाया है वे जीवन भर सुनिश्चित रूप से लक्ष की ओर चलते रहते हैं। वेदान्त में ज्ञान की पूर्णता को ही मुक्ति माना गया है। ज्ञान और विवेक बिना अध्यात्म की गाड़ी एक पग भी आगे नहीं बढ़ती।
मनन-चिन्तन किया? (3) आज हमने अपने दिन भर के विचारों और कार्यों की बड़ी समीक्षा करके उनमें क्या−क्या गुण-दोष पाये और कल उन दोषों को सुधारने एवं गुणों को बढ़ाने के लिए क्या निश्चय किया? (4) आज हमने दूसरों को क्या सेवा लाभ दिया? इन चारों बातों पर यदि नित्य बारीक नजर रखी जाय, इनके महत्व को सोचते-समझते रहा जाय और दैनिक जीवन में इनके लिए स्थान दिया जाता रहे तो एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति हो सकती है। ऐसी डायरी रखना और उसे नित्य लिखना प्रत्येक आत्म कल्याण के इच्छुक के लिए आवश्यक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-October
मनन-चिंतन को गत वर्ष जितना विस्तृत एवं क्षेत्र में बिखरा हुआ न रखकर उसे सीमाबद्ध कर रहे हैं, ताकि थोड़े विचारों पर अधिक तत्परता और तन्मयता के साथ चित्त-वृत्तियों को एकाग्र करते हुए मनोभूमि का सुदृढ़ निर्माण किया जा सके । गत मास युगनिर्माण संकल्प आरंभिक पृष्ठ पर छपा है और उसकी विस्तार से व्याख्या भी की गई है। यह संकल्प अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को दैनिक-साधना एवं उपासना की तरह मनोयोगपूर्वक नित्य ही पढ़ना और उस पर मनन रखना चाहिए।
मनन-चिंतन
मनन करते रहना चाहिए। युधिष्ठिर ने बाल्यकाल में ‘सत्यं वद’— इतना-सा गुरु का दिया हुआ पाठ याद करने में बहुत समय लगाया था। सत्संकल्प की विचारधारा इतनी विस्तृत है कि उस पर चिंतन-मनन करते रहने में एक वर्ष का समय लग जाना कुछ अधिक नहीं है।
मनन के समय ऐसे−ऐसे अगणित विचार उठ सकते हैं। उन पर एकांत में बैठकर मनन करते रहना चाहिए। युधिष्ठिर ने बाल्यकाल में ‘सत्यं वद’— इतना-सा गुरु का दिया हुआ पाठ याद करने में बहुत समय लगाया था। सत्संकल्प की विचारधारा इतनी विस्तृत है कि उस पर चिंतन-मनन करते रहने में एक वर्ष का समय लग जाना कुछ अधिक नहीं है।
मनन और चिंतन करते हुए विचार करना चाहिए कि, "ईश्वर ने इस संसार के विविध आनंदों का रसास्वादन करने के लिए यह कितना सुंदर, कितना महत्त्वपूर्ण शरीर दिया है। शरीर छिन जाने पर सूक्ष्मप्राण केवल चेतना रूप रह जाते हैं। फिर संसार की विभिन्न रंग−बिरंगी अनुभूतियों का अनुभव करने की क्षमता हमें कहाँ रह पाती है? देवलोक में कुछ आनंद है, उन्हें प्राप्त करने के लिए जीव स्वर्ग जाने की आकांक्षा करता है। पर कुछ आनंद ऐसे हैं, जो स्वर्गलोक में भी नहीं हैं और जिन्हें प्राप्त करने की इच्छा से देवता भी स्वर्ग छोड़कर नरदेह में जन्म लेते और इस 'स्वर्गादपि गरीयसी'  धरती पर विचरण करने की आकांक्षा करते रहते हैं और जब भी उन्हें ऐसा अवसर मिलता है, तभी अपना सौभाग्य मानते हैं।
मनन करते रहने में एक वर्ष का समय लग जाना कुछ अधिक नहीं है।
मनन चिन्तन करते रहने का कार्य−क्रम अपनाया था। विचारों के परिमार्जन के लिए स्वाध्याय आवश्यक है। कुविचारों की काट सद्विचारों से ही होती है। गरम लोहे को ठंडा लोहा काटता है, काँटे-से-काँटा निकाला जाता है और विष-से-विष का शमन होता है। स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से जो सद्विचार ग्रहण किए जाते हैं, इन्हीं के द्वारा कुविचारों और कुसंस्कारों का प्रतिरोध किया जाता है।
मनन और चिंतन
मनन-चिंतन की साधना पाठकों ने आरंभ की थी और अखण्ड ज्योति के लेखों या किसी भी जीवन निर्माण करने वाली प्रेरणाप्रद पुस्तक को पढ़ने और उस पर मनन चिन्तन करते रहने का कार्य−क्रम अपनाया था। विचारों के परिमार्जन के लिए स्वाध्याय आवश्यक है। कुविचारों की काट सद्विचारों से ही होती है। गरम लोहे को ठंडा लोहा काटता है, काँटे-से-काँटा निकाला जाता है और विष-से-विष का शमन होता है। स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से जो सद्विचार ग्रहण किए जाते हैं, इन्हीं के द्वारा कुविचारों और कुसंस्कारों का प्रतिरोध किया जाता है।
मनन और चिंतन करते रहना चाहिए। गत अंक में इस संबंध में और भी अधिक विस्तारपूर्वक विचार हो चुका है। चिंतन और मनन के समय ऐसे−ऐसे अगणित विचार उठ सकते हैं। उन पर एकांत में बैठकर मनन करते रहना चाहिए। युधिष्ठिर ने बाल्यकाल में ‘सत्यं वद’— इतना-सा गुरु का दिया हुआ पाठ याद करने में बहुत समय लगाया था।
मनन रखना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-December
मनन किया, समझा और चाहा है, उसका साराँश पत्रिका की पंक्तियों में मिल जायेगा। इस सत्संग की उपेक्षा को हम अपनी उपेक्षा ही समझते हैं और प्रत्येक प्रेमी से यह आशा करते हैं कि वह हमें, हमारी भावना, आकाँक्षा और गतिविधियों को समझने के लिये पत्रिका को उसी मनोयोग से पढ़ें जैसे हमारे पास बैठकर हमारी बातों को सुना जाता है।
मनन और चिन्तनपूर्वक हृदयंगम करना चाहिये। हमारी आत्मा से अपनी आत्मा को जोड़ने और भावना के साथ भावना का स्पर्श करने का यही तरीका है। हमारे सान्निध्य और सत्संग की जिन्हें उपयोगिता प्रतीत होती हो उन्हें आदि से अन्त तक ‘अखण्ड ज्योति’ पढ़ते रहना चाहिये। एक महीने में हमने जो कुछ सोचा, विचारा, पढ़ा, मनन किया, समझा और चाहा है, उसका साराँश पत्रिका की पंक्तियों में मिल जायेगा। इस सत्संग की उपेक्षा को हम अपनी उपेक्षा ही समझते हैं और प्रत्येक प्रेमी से यह आशा करते हैं कि वह हमें, हमारी भावना, आकाँक्षा और गतिविधियों को समझने के लिये पत्रिका को उसी मनोयोग से पढ़ें जैसे हमारे पास बैठकर हमारी बातों को सुना जाता है।
मनन निरन्तर करना चाहिए। किसी वस्तु के लाभ सोचने से उसे प्राप्त करने की इच्छा होती है और यदि उसी से जो हानि हो सकती है उसका विचार आरंभ कर दिया जाय तो वही बहुत बुरी और त्याज्य प्रतीत होने लगेगी। किसी व्यक्ति की अच्छाइयों पर यदि विचार करें तो वही देवता दिखाई देगा, पर यदि उसकी बुराइयाँ ढूँढ़ने लगें तो वह भी इतनी अधिक मिल जावेंगी कि साक्षात् शैतान की तरह वह दीखने लगेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-February
मननीय हैं।
मनन और चिंतन द्वारा आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास का आधार ग्रहण करना होगा। अंतःकरण की पवित्रता और पुष्टि के लिए इस अवलंबन को मजबूती से पकड़े रहना आवश्यक है। इसके बिना लौकिक-प्रगति भी संभव नहीं। धर्म और नीति का आधार अध्यात्म है, उसे छोड़ देने पर चतुरता और कूटनीति ही मनुष्य के पल्ले पड़ती है। उससे तात्कालिक लाभ तो हो जाता है, पर अंत बहुत ही दुःखद होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-April
मनन यह आंतरिक उपाय हैं। इन चारों चरणों से मिलकर सर्वांगपूर्ण ज्ञान साधना बनती है और उसी के आधार पर जीव अपने लक्ष्य-मार्ग की ओर गतिशील होता है।
मनन के आधार पर जीवन की गुत्थियों को समझना और उन्हें सुलझाने का मार्ग खोजना संभव होता है; इसलिए मनीषियों ने इस बात पर बहुत जोर दिया है कि मनुष्य को ज्ञानवान बनना चाहिए। अत्यंत आवश्यक कार्यक्रमों में एक कार्यक्रम ज्ञान-संपादन का भी रहना चाहिए।
मनन करने और जीवन में उतारने से ही कोई ज्ञान अथवा सत्परिणाम उत्पन्न कर सकता है।
मनन करना होगा और यदि आध्यात्मिकता पर, उपासना पर वस्तुतः हम विश्वास करते हैं तो नियत समय पर पूजा−पाठ निपटने तक सीमित न रहकर ईश्वर को अपना जीवनसंगी बनाना पड़ेगा, हर घड़ी उसकी उपस्थिति अपने साथ अनुभव करने और अपने सद्विचारों एवं सत्कर्मों से उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करना होगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-March
मनन और चिन्तन में अभिरुचि नहीं, जो प्रस्तुत समस्याओं पर विचार करना नहीं चाहता वह एक प्रकार से पशु ही कहा जा सकता है। ऐसे नर−पशुओं की वृद्धि से धरती का भार बढ़ता है और नाना प्रकार के लोक संकट उत्पन्न होते हैं।
मननीय है। उन्होंने लिखा था—

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-September
मनन और चिन्तन करें तथा निश्चय करें कि हमें अपना जीवन इसी ढाँचे में ढालना है। दूसरों को उपदेश करने की अपेक्षा इस संकल्प पत्र में आत्म निर्माण पर सारा ध्यान केन्द्रित किया गया हैं। दूसरों को कुछ करने के लिए कहने का सबसे प्रभावशाली तरीका एक ही है कि हम वैसा करने लगें। अपना निर्माण ही युग निर्माण का अत्यन्त महत्वपूर्ण कदम हो सकता है । बूँद−बूँद जल के मिलने से ही समुद्र बना है।
मनन और चिन्तन के साथ पढ़ते रहना ही स्वाध्याय है। यदि सुलझे हुए विचारों के जीवन विद्या के ज्ञाता कोई सम्भ्रान्त सज्जन उपलब्ध हो सकते हों तो उनका सत्संग भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है। यों धर्म और अध्यात्म के नाम पर आलस, कर्तव्य त्याग, निराशा, भाग्यवाद परावलम्बन आदि भ्रान्तियों को बढ़ाने वाले प्रवचनकर्ता गली कूँचों में मक्खी, मच्छरों की तरह सत्संग की दुकानें लगाये बैठे हैं, उनमें जाने की अपेक्षा न जाना अधिक उत्तम है। इसी प्रकार स्वाध्याय के नाम पर जीवन निर्माण की ज्वलन्त समस्याओं को सुलझाने में कोई सहायता न देने वाली, किन्हीं देवी देवताओं के गुणानुवाद गाने वाली पुस्तकों का पाठ करते रहने से कोई वास्तविक प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
मनन और चिन्तन यह चार ही उपाय हैं। मानव जीवन की महत्ता को हम समझें, इस स्वर्ण अवसर के सदुपयोग की बात सोचें, अपनी गुत्थियों में से अधिकाँश की जिम्मेदारी अपनी समझें और उन्हें सुलझाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव में आवश्यक हेर−फेर के लिए सदा कटिबद्ध रहें । इस प्रकार की विचार शैली आत्म−निर्माण की प्रेरणा देने वाले सत्साहित्य से, प्रबुद्ध मस्तिष्क के सत्पुरुषों से एवं आत्म−निरीक्षण तथा आत्म−चिन्तन करने से किसी भी व्यक्ति को सहज ही उपलब्ध हो सकती है। दृष्टिकोण बदलते ही परिस्थितियाँ भी निश्चित रूप से बदल सकती हैं।
मनन और चिन्तन करें यह खोज करें कि किन गतिविधियों को अपनाने से व्यक्ति और समाज का प्रवाह सही दिशा में विकसित हो सकता है। जीवन को ठीक तरह से जीने की विद्या से हम अनजान जैसे बने बैठे हैं और अपने लिए तथा दूसरों के लिए अवाँछनीय वातावरण उत्पन्न कर रहे हैं।
मनन और चिन्तन से पूरी होती है। युगनिर्माण के लिए, आत्म−निर्माण के लिए यह प्रधान साधन है। संकल्प की, मन की शुद्धि के लिए इसे ही रामबाण दवा माना गया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-June
मनन करना ही तत्व ज्ञान की परिभाषा है, और शोषनहार ने कहा है कि मृत्यु को देख कर ही मनुष्य के हृदय में पहले पहले तत्वचिन्तन की वृत्ति सजग हुई थी। रवीन्द्र जैसे कवियों ने मृत्यु के दर्शन-शस्त्र पर बहुत कुछ लिखा है, सच कहा जाय तो, रवीन्द्र के मृत्यु सम्बन्धी विचारों से स्वयं मृत्यु भी गौरवान्वित हुई है। मरण जीवन का अन्त नहीं है। वह तो माता के एक स्तन को छोड़ कर दूसरे स्तन के लगने के समान है। मृत्यु को चीर कर भी जीवन का स्त्रोत बहता रहता है।
मनन और ध्यान अव्यवस्थित विचारों को दृढ़ आधार पर ला खड़ा करेंगे।
मनन कर आप ब्रह्म-बिहार करने में कदाचित् ही सफल हों। मन में बार बार ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इस वाक्य चिन्तन करके कदाचित् ही वह भाव आपके अन्तस्तल में पक्की तौर से जमे। अनेक वर्ष से मैं स्वयं इस विचार को अपने हृदय तल में बैठाने का प्रयत्न करता रहा हूँ किन्तु केवल वाचिक प्रयत्न से कोई अधिक सफलता नहीं मिली। जब असली परीक्षा का समय आता है तभी वह विचार चित्त से गायब हो जाता है। अतएव अभी तो कोरा वेदांती हूँ।
मनन करना चाहिए। ऐसा करने पर शीघ्र ही चित्त में उन विचारों से पूर्ण वातावरण की सृष्टि हो जायगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-May
मनन और व्यायाम द्वारा सशक्त बनाए रहता है, परन्तु आलसी मनुष्य संसार की कौन बतावें, स्वयं अपने ही लिये भार−स्वरूप बन जाता है। उसका समय काटे नहीं कटता, वह दर−दर भटकता फिरता है, उसे सूझता ही नहीं कि मुझे क्या करना चाहिये।
मनन से भी निश्चय बहुतेरे साधक आध्यात्मवाद की चोटी पर जा पहुँचते हैं, परन्तु उसका राजमार्ग वही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-February
मनन तथा विचार भी होना चाहिये। विचार में बड़ी शक्ति है। सद्विचारों का प्रभाव तो मन में सदा ही चलता रहना चाहिए। विचार जब परिपक्व होकर परिपक्वावस्था पर पहुँच जायेगा तभी तो वह आचरण का रूप धारण करेगा। कहा गया है:—

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-April
मनन करने से हमारे हृदय में उन सात्विक विचारों का प्रादुर्भाव होता है, जो आत्मा में एक नई आशा, एक नवीन ज्योति तथा एक दिव्य विभूति का संचार करते हैं। हम में सत्−असत् की यथार्थता को तौलने की शक्ति अंकुरित हो जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-December
मनन क्षेत्र में तमोगुण अवश्य बढ़ेगा। इसी प्रकार प्रत्येक हविष्यान्न, चरु, हवि, आज्य, औषधि में कुछ विशेष चेतना तत्व छिपे होते हैं, वे अपना प्रभाव बौद्धिक जगत में उत्पन्न करते हैं। व्यक्तिगत रूप से काम, क्रोध, लोभ, आवेश, चिन्ता, शोक, भय, उन्माद आदि की निवृत्ति के लिए तथा समष्टि रूप में व्यापक वायुमण्डल में फैले हुए पदार्थ परता, युद्धोन्माद आदि को शांत करने के लिए ऐसी हवियों को चुनना पड़ेगा जिनकी सूक्ष्म चेतना शक्ति अभीष्ट प्रयोजन के लिए उपर्युक्त हो। धन प्राप्ति, अरोग्य लाभ, शत्रुता निवारण, अरोग्य बुद्धि, सुसंतति, बुद्धि वृद्धि अनिष्ट शांति आदि काम्य प्रयोजनों के लिए जिस प्रकार आहुतियों के मंत्र अलग अलग हैं, उसी प्रकार हवनीय सामग्रियां और उनकी मात्रा भी अलग अलग होती है। उनका चुनाव करना आवश्यक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-July
मनन कर आप से कहता हूँ कि इन्द्र ने उसे यह वरदान भी दे दिया है कि इन्द्र ने उसे यह वरदान भी दे दिया है कि तू मेरे पास में निवास कर, अग्नि तुझे जला न सकेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-October
मनन व चिंतन करते रहो। कुछ समय में अवश्य ही गुण दृष्टि उत्पन्न हो जायेगी:−

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-November
मननशील, शाँत चित्त, किसी से बैर नहीं, समदृष्टि (किसी से रागद्वेष नहीं) ऐसे पुरुष के मैं (श्री कृष्णचंद्र कहते हैं) पीछे 2 चलता हूँ कि ऐसे की चरण रेणु से मैं पवित्र हो जाऊँ ।। 16 ।।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-March
मनन, लेखन, चिन्तन और विचार विनिमय द्वारा शिक्षा प्राप्त की जायेगी। समय समय पर अन्य प्रतिष्ठित विद्वानों को बुलाकर भी भाषण कराये जायेंगे। प्रार्थना, वायुसेवन, व्यायाम, कथा, सत्संग, विचार विनिमय, नित्य के कार्य होंगे। ब्रज के तीर्थ स्थानों की एक यात्रा भी हुआ करेगी। वेदारंभ संस्कार के साथ शिक्षा आरंभ होगी और संभावर्तन संस्कार के साथ समाप्त होगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-June
मनन करने से पता चलता है कि-”मानव जीवन को स्वस्थ, नीरोग मेधावी और पुरुषार्थी बनाने के लिये फलाहार, शाकाहार और माँसाहार आदि जितने भी प्रकार के भोजन हैं, उसमें शाकाहार का स्थान मध्यम होते हुए भी गो-दुग्ध अमृत तुल्य पौष्टिक पेय पदार्थ है। भारत के प्राचीन रसायन तत्व विशेषज्ञों के विश्लेषण द्वारा यह प्रमाणित हो चुका है, कि जिस प्रकार स्त्री अर्थात् माता का दूध ‘बाल जीवन और प्रत्येक ऋतु तथा प्रत्येक दशा में पथ्य योग्य, मधुर, शीतल, हलका, दीपन, पाचन, धातु-वर्द्धक, रुचिकारक, तृप्तिकारक एवं रुधिर विकारों का रहने वाला, पित्तनाशक सात्म्य और जीवन देने वाला होता है। ठीक उसी प्रकार गाय के दूध में रासायनिक पदार्थों की अधिकता होने तथा स्त्रियों की भाँति गर्भ धारण कर 9-10 मास में प्रसव करने के कारण। इससे बढ़ कर शारीरिक एवं मानसिक शक्ति प्रदान करने वाली संसार में कोई दूसरा प्राणी नहीं है और इसके दूध से बढ़कर दूसरा कोई पुष्टिकर पेय पदार्थ नहीं है, क्योंकि यह शीघ्र पचने वाला, रक्तशोधक, शुक्र जनक, शीतल, मीठा रसायन, वमन विरेचन, वस्तिक्रिया के समान ओज बढ़ाने वाला, उन्माद, मूर्च्छा, हृदयरोग, कुष्ठ रोग आदि अनेक रोगों से मुक्त कर शरीर को पुष्ट और वर्ण को सुन्दर बनाने वाला है। आधुनिक वैज्ञानिकों में डॉ. एस. के. आप्टे, पूना कृषि कालेज के प्रोफेसर राय बहादुर डी. एन. सहश्रबुद्धे ने भी अपने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया है, कि गो-दुग्ध मानव समाज के लिये बहुमूल्य पदार्थ तो है ही, बालकों के लिये तो यह अमृत है, क्योंकि बालकों के बौद्धिक-विकास के लिये स्त्रियों के दूध को छोड़कर संसार में गो-दुग्ध से बढ़कर कोई अन्य पदार्थ नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-May
मनन करने योग्य है।
मनन करना, (3) आत्मचिन्तन करना हैं। और सत्संग का अर्थ-(1) श्रेष्ठ पुरुषों के विचारों को ग्रहण करना, (2) अच्छे विचार दूसरों को देना (3) सेवा या श्रेष्ठ कर्मों में सहयोग करना हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-November
मनन करने से आत्मोत्थान होता है। हाँ, यदि आप अपने को अत्यन्त सुदृढ़ समझते हैं तो सुधार की दृष्टि से बुरे विचार वाले को अपने साथ ले सकते हैं परन्तु सावधान! कहीं उसका उलटा असर आप पर न हो जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-May
मनन द्वारा भी तुम अपने पद, सत्ता, महत्व, गौरव, शक्ति की चेतना प्राप्त कर सको तब भी वह करना ही चाहिए। यदि तुम इन विचारों में हमसे सहमत हो तो केवल पढ़कर ही संतुष्ट मत हो जाओ। अध्ययन करो, मनन करो, आशा करो, साहस करो और सावधानी तथा गंभीरता के साथ साधन पथ की ओर चल पड़ो।
मनन करने से ही मनुष्य है। हम सोच विचार सकते हैं यही हमारी विशेषता है। कितनी गुत्थियों को हमारा मस्तिष्क सुलझाता है। किसी में झगड़ा हो रहा है तुम जाकर शान्त करते हो, आर्थिक कठिनाई का हल निकालते हो, असंतुष्ट लोगों को संतुष्ट करते हो। सामाजिक प्रथाओं में परिवर्तन करते हो, विद्या प्राप्त करते हो, नई व्यापारिक योजनाएं बनाते हो, गुप्त मंत्रणाएं करते हो, षडयंत्र रचते हो, ऐसे ऐसे पेचीदा मामलों को समझते हो, उनका स्वरूप निर्माण करते हो और वह वह तरकीबें सोचते हों जिन्हें देखकर दंग रह जाना पड़ता है।
मनन करने योग्य हैं वह लिखता है- यह सिद्ध करना तो आसान है कि अमुक मजहब झूठा है। लेकिन इससे काम नहीं चलेगा। मनुष्य जीवन के लिए धर्म की नितान्त आवश्यकता है बिना उसके किसी भी प्रकार काम नहीं चल सकता। इसलिए हमें एक सार्वभौम धर्म को प्रकाश में लाना होगा जिससे विश्व बन्धुत्व फैलाया जा सके और उद्विग्न मनुष्यों के हृदयों को शान्ति प्राप्त हो सके। अब आगे का रचनात्मक कार्य होना चाहिए।
मनन करो, आशा करो, साहस करो और सावधानी तथा गंभीरता के साथ साधन पथ की ओर चल पड़ो।
मनन करो कि हमारी प्रगति किस दिशा में हो रही है, हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं, हमारी मोटर किस सड़क पर दौड़ी जा रही है, खेत के चरने का क्या परिणाम होगा। जिस प्रकार एक गहरे षड़यंत्र का सुराग लगाया जाता है वैसे ही पता लगाओ कि हम अपना जीवन रूपी अमूल्य निधि खर्च करके जो कमाते हैं वह हमारे ही पास रहता है या बीच में ही हड़प लिया जाता है? अपने बारे में पूरी तरह से विचार करो तो तुम्हें बहुत नई बातें मालूम होंगी और समझ सकोगे कि किस तरफ बढ़ रहे हो किन्तु वास्तव में किस तरफ बढ़ना चाहिए था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-February
मनन करते जाय और उसे अभ्यास में लाते जाय। एक साथ उच्च कक्षा की चर्चा आरम्भ कर देना अनुचित और निष्फल होगा। हम उन अत्यन्त गुह्य और आश्चर्यजनक एवं सरल और सत्य साधनों को पाठकों के समक्ष उपस्थित करेंगे। पर एकदम उछलना ठीक न होगा। धीरे- धीरे चलिए, आपकी सब इच्छित चीजें क्रमशः मिलेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-December
मनन करना चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-April
मनन करना चाहिये।
मनन करें और अपने जीवन व्यवहार में उतारें। जो कुछ पढ़ते हैं उसे पढ़ने को व्यसन की सीमा तक ही न रखें वरन् कुछ पढ़े और कुछ गुनें।
मनन करो। आ कल विज्ञान ने ज्ञान प्राप्त के साधनों को बड़ा सरल कर दिया है। अलभ्य ज्ञानमयी पुस्तकें स्वल्प मूल्य में सर्वत्र सुलभ हैं। सद्गुरुओं, महापुरुषों से उपदेश ग्रहण करने के लिए जाना आना सुगम है। प्राचीन काल में यह सुविधाऐं नहीं थी, फिर भी जिज्ञासु ज्ञान से वंचित नहीं रहते थे।
मनन करें। जो उपदेश पढ़ते और सुनते हैं उन्हें ग्रहण कर रहे हैं या नहीं, इस बात का भली प्रकार परीक्षण करें। यदि अब तक भूल में रहे हैं तो आगें के लिए सचेत हो जावें यह आदर्श हर क्षण अपने सामने रहे- ‘‘कुछ पढ़ो, कुछ गुनो।’’

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-March
मनन किया करते हैं और अच्छे बुरे की पहचान भी होती रहती हैं क्योंकि जब बाहर से विचारों का आगमन बन्द हो जाता है।
मनन के बाद मेरी निश्चित धारणा हो गई है कि। त्याग से बढ़कर प्रत्यक्ष और तुरन्त फलदायी और कोई धर्म नहीं है त्याग की कसौटी आदमी के खोटे खरे रूप से दुनिया के सामने उपस्थित करती है। मन में जमे हुए कुसंस्कार और विकारों के बोझ को हलका करने के लिए त्याग से बढ़कर अन्य साधन हो नहीं सकता।
मनन करना चाहिये कि यह बात कहाँ तक ठीक है। गले न उतरे तो छोड़ देना चाहिये। पर यह न समझ लेना चाहिये कि जो हम जानते हैं उसके अलावा सब बातें झूठ हैं। अपने को ज्ञान पथ का पथिक जिज्ञासु समझते रहना भी क्रोध के एक बड़े द्वार को बन्द कर देना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-October
मनन किये बिना कोई ‘मनुष्य’ नहीं बन सकता। पशुता से मानवता की ओर जाने का मार्ग विद्या और ज्ञान द्वारा ही प्राप्त होता है। फिर मेरा पुत्र अशिक्षित रहकर हीन जीवन क्यों व्यतीत करे?” ऋषि आरुणि के हृदय में यह विचार हलचल मचा रहे थे वे अपने खिलाड़ी लड़के श्वेतकेतु को विद्या पढ़ने के लिये कई बार कह चुके थे पर उसके ऊपर कोई कहने लायक असर न हुआ था। पिता की आँख बची कि श्वेतकेतु पोथी पटक कर गायब।
मनन करने पर हम एक निष्कर्ष पर पहुँचते हैं जो सभी शंकाओं का निराकरण कर देता है। हम पुण्य सिर्फ इस उद्देश्य से नहीं करते कि उससे दूसरे को लाभ पहुँचता है बल्कि इसलिये भी कि दूसरे की लाभार्थ उस किये गये उपकार के कारण अपना ही हित अधिक होता है। विचार शुद्ध होने से मन पवित्र होता जाता है जिससे धीरे-धीरे सात्विकता को अपनाता हुआ मनुष्य परम पद को प्राप्त कर लेता है जो मानव जीवन का अन्तिम उत्कर्ष है। हम अगर कुछ भला कर्म करते हैं तो उसका संस्कार मन में जाता और वह संस्कार बार-बार सुकर्म की प्रेरणा करता है। यही नियम बुरे कार्यों के लिये भी है।
मनन करने पूर्ण अनुसंधान करने के पश्चात् ही कोई बात माननी चाहिए किन्तु तर्क का अवलंब श्रद्धा हो। श्रद्धा की आधार शिला पर बैठ कर ही तर्क सफल होगा अन्यथा वह हलके बादल की तरह क्षण भर में एक स्थान से दूसरे स्थान को उड़ जायेगा। श्रेष्ठ से श्रेष्ठ पक्ष से लगा कर बुरी से बुरी बात तक के पक्ष में बड़ी लच्छेदार दलीलें हो सकती हैं और हमारा अपूर्ण मस्तिष्क उनके आगे परास्त हो सकता है ऐसी दशा में भला हम कहीं खड़े हो सकते हैं? तर्क बेचारा अंधा और लंगड़ा है वह मनुष्य जीवन की आधार भित्ति का निर्माण नहीं कर सकता और न ईश्वर और धर्म का मार्ग दिखा सकता है तर्क की अन्तिम गति नास्तिकता तक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-January
मनन आदि के द्वारा गहरा गोता मारने, कोमल संवेदनाओं को उभारने—किसी बात पर देर तक गम्भीर चिन्तन कर सकने योग्य विकसित न किया गया होगा तो समुचित ध्यान कर सकना सम्भव ही न हो सकेगा। अविकसित मानसिक स्तर के लोग इन्द्रिय सम्वेदना भर अनुभव करते हैं, वे कान या आँख की सहायता से देख या सुनकर कुछ सोच−समझ सकते हैं। कवियों, वैज्ञानिकों एवं दृष्टाओं जैसा सूक्ष्म चिन्तन उनके लिए सम्भव नहीं होता। अस्तु उन्हें उनकी स्थिति के अनुरूप दृश्य प्रतिमाओं के आधार पर परमात्मा की समीपता का उपासना उद्देश्य पूरा कराना होता है।
मनन आदि की सहायता से संग्रह किया जाय। उन पर बार−बार गहराई से विचार किया जाय। कामुकता तथा शालीनता के दोनों पक्षों को अपनी−अपनी बात के समर्थन का अवसर देकर यदि विवेक द्वारा निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह फैसला करने का अवसर दिया जाय तो पुराने अवाँछनीय चिन्तन अभ्यास को आसानी से काटा जा सकता है। शारीरिक दुष्प्रवृत्तियों के संबंध में भी यही बात है। नशा, व्यसन, आलस्य जैसे दुर्गुणों से निपटना, कठोर संकल्प एवं दृढ़ निश्चय से ही सम्भव हो सकता है।
मनन जैसे उपचार बीजारोपण की तरह हैं जो खाद पानी, निराई, गुड़ाई, रखवाली आदि की चिरकाल तक अपेक्षा करते हैं और समयानुसार कल्प-वृक्ष बनकर मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाते हैं। आन्तरिक दृष्टि से आनन्द विभोर और बहिरंग दृष्टि से श्रद्धा का पात्र बना हुआ भूदेव यह अनुभव करता है कि आत्म-विज्ञान ही जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ है।
मनन द्वारा आन्तरिक उत्कृष्टता को उभार कर उच्चस्तरीय निष्ठाओं पर आरूढ़ हुआ जाता है। दर्शन शास्त्र इसी काट छांट के लिए बना है। तत्वदर्शन के अन्तर्गत यों अन्य कई विषय भी आते हैं, पर उसका मूल प्रयोजन विचारणा का स्तर परिष्कृत करना ही माना गया है।
मनन, चिन्तन जैसी प्रक्रियाओं का सहारा इसी प्रयोजन के लिए लिया जाता है।
मनन का- कथा प्रवचनों का- माहात्म्य इसी आधार पर बताया गया है कि उस प्रक्रिया के सहारे मानवी चिन्तन का परिष्कार होता रहे। अवांछनीय पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कार छुड़ाने में, यह ज्ञान साधना साबुन का काम करती है। विकृत मनोवृत्तियों से छुटकारा मिलता है और विवेक युक्त दूर दर्शिता का पथ-प्रशस्त होता है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतंभरा इसी परिष्कृत चिन्तन का नाम है। ‘ज्ञानामुक्ति’, ‘नहिं ज्ञानेन सदृश पवित्र मिह विद्यते’ जैसी उक्तियों में सद्ज्ञान को अध्यात्म का प्राण माना गया है।
मनन, चिन्तन का आश्रय लेकर मनोभूमि ऐसी प्रौढ़, परिपक्व बनाई जा सकती है जिसमें कुविचारों को पैर जमाने के लिए तनिक भी गुंजाइश न रहे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-May
मनन जैसे माध्यम अपनाकर उसकी क्षमता को निरन्तर प्रखर बनाया जायगा। यह पोषण मिलते रहने पर मस्तिष्क की भूख बुझती रहेगी और उसे अधिक विकसित परिष्कृत होने का अवसर मिलता रहेगा। यदि इस ओर ध्यान न दिया जाय, प्रमादग्रस्त रहा जाय, मूढ़ मान्यताओं में जकड़े रखा जाय तो समझना चाहिए कि विलक्षण मनः शक्ति देने के साथ-साथ सन्निहित ईश्वरीय प्रयोजन को नष्ट कर दिया गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-June
मनन किया। इस विचार-मन्थन के परिणामस्वरूप जो निष्कर्ष निकले, उन्हें ही लोगों के समक्ष अपनी दार्शनिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत किया। इसी से वे अभिमान रहित होकर अपने सिद्धान्तों का सही प्रतिपादन कर सकने में समर्थ हो सके। कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने प्रशंसा-प्रसिद्धि व अभिमान के लिए ‘गीतांजलि’ की रचना नहीं की वरन् विश्वात्मा-परमात्मा के प्रति उनने भाव-सुमन अर्पित किये। इसी तरह गौतम बुद्ध, रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण, महात्मा गाँधी आदि युग पुरुषों ने प्रशंसा, प्रसिद्धि की सदा उपेक्षा की और अभिमान के विष से अपने को सदा मुक्त रखा तभी जनता जनार्दन को सही मार्ग दिखाने में समर्थ हो सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-February
मनन एवं चिन्तन किया जाय। साथ ही कामुकता से होने वाली क्षति के प्रत्येक पक्ष पर गम्भीरतापूर्वक सोचा जाय और उस प्रकार के प्रमाण, उदाहरणों की शृंखला मस्तिष्क के सामने मूर्तिमान की जाय। दोनों पक्षों की लाभ−हानि की तुलना की जाय और यह विचार किया जाय कि उनमें से क्या ग्राह्य और क्या अग्राह्य है? अन्तरात्मा का विवेक सही फैसला देगा और उस फैसले के आधार पर अवाँछनीय विचारों की जड़ें खोखली होंगी तथा उस स्थान पर सद्विचारों का वट−वृक्ष बढ़ने फैलने लगेगा।
मनन की यह विचारणा भी जुड़ी हुई है कि उन आदर्शों को अपने जीवन−क्रम में समाविष्ट करने की रूपरेखा किस प्रकार बन सकती है। सत्साहित्य पढ़ने का भी लाभ है। उनसे प्रकाश और दिशा मिलती है। पर सारा प्रयोजन इतने से ही पूरा नहीं हो जाता। सोचा यह भी जाना चाहिए कि महामानवों द्वारा प्रस्तुत परामर्शों को अपने जीवन−क्रम में किस हद तक और किस प्रकार उतारा जा सकता है।
मननपूर्वक पढ़ा, समझा जायगा और प्रस्तुत प्रेरणाओं को अपनाया जायगा ऐसी अपेक्षा की गई है।
मनन भी इसी से जुड़ा हुआ है। (2) जीवन के स्तर को परिष्कृत करने के लिए आत्म−चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की प्रक्रिया (3) दिव्य−सत्ता केन्द्र से मिलने वाले विशिष्ट अनुदान जो साधकों की श्रद्धा एवं सम्वेदना के आधार पर ग्रहण किये जाते एवं फलित बनते हैं।
मनन किया गया है। साधना के नाम पर हमारे जीवन का जो भी बहुमूल्य समय लगा है उसका प्रत्येक क्षण गायत्री को आधार मानकर ही प्रयुक्त किया गया है। इस प्रयोग में जो अनुभव हुए हैं उनने व्यक्तिगत रूप से भी हमारी निष्ठा को क्रमशः अधिकाधिक परिपक्व ही किया है। ऐसी दशा में हमारा परामर्श भी अपने विश्वास एवं अनुभव के आधार पर ही हो सकता है। दैनिक सामान्य उपासना के लिए तथा विशेष शक्ति संचय के लिए गायत्री उपासना ही हमें सर्वश्रेष्ठ लगी है तदनुसार जिनने भी हमारा परामर्श एवं सहयोग माँगा है, उन्हीं के लिए कहा है।
मनन, स्वाध्याय को सर्वांगपूर्ण बनाता है। अन्य पठन मात्र से तो उपयोगी समयक्षेप ही बना पड़ा रहा जा सकेगा। एक घण्टा सत्साहित्य पढ़ने के लिए नियत रखा जाय। चिन्तन, मनन इसी के साथ−साथ भी चल सकता है और ऐसा भी हो सकता है कि पढ़ते समय प्रेरक तथ्यों को नोट करते रहा जाय और पीछे अवकाश के साथ यह मंथन किया जाय कि अपने लिए उस परामर्श में से कितना और किस प्रकार अपनाये जाने योग्य हो सकता है। जो सम्भव हो उसकी रूपरेखा बनाने के लिए कल्पना शक्ति दौड़ाई जानी चाहिए और आज की अपेक्षा कल अधिक आदर्शवादिता अपनाये जाने का ताना-बाना बुनना चाहिए।
मनन इसी के साथ−साथ भी चल सकता है और ऐसा भी हो सकता है कि पढ़ते समय प्रेरक तथ्यों को नोट करते रहा जाय और पीछे अवकाश के साथ यह मंथन किया जाय कि अपने लिए उस परामर्श में से कितना और किस प्रकार अपनाये जाने योग्य हो सकता है। जो सम्भव हो उसकी रूपरेखा बनाने के लिए कल्पना शक्ति दौड़ाई जानी चाहिए और आज की अपेक्षा कल अधिक आदर्शवादिता अपनाये जाने का ताना-बाना बुनना चाहिए।
मनन्तं यत्परं ब्रह्माहमेवतत्॥ एवं निरन्तराभ्यस्ता ब्रह्मै वास्मीति वासना। हरत्यविद्या विक्षेपान रोगानिव रसायनम्॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-October
मनन करने एवं अपनाने के लिए प्रबल प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है। यह कार्य विचार संघर्ष का महाभारत खड़ा किये बिना और किसी तरह सम्भव नहीं हो सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-July
मनन किया जाता है।
मनन किया और वहीं पर बैलों की जोड़ी को छोड़कर निकल पड़े, विकास का द्वार खटखटाने; जिसका नतीजा दासों को मुक्त करवाना था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-March
मनन-चिंतन द्वारा साधना को सींचा जाता है। उसके उपरान्त उसे सस्ती प्रशंसा लूटने के लिए दिखाये जाने वाले चमत्कारों से बचाया जाता है। सिद्धियों को लोभ, मोह के उथले प्रयोजन पूरे करने में भी खर्च किया जा सकता है और अपने को तथा दूसरों को आत्म-कल्याण की दिशा में प्रेरित करने के लिए भी उसका उपयोग हो सकता है। स्वल्प श्रम में अधिक भौतिक सफलतायें पाना कर्म विज्ञान के विपरीत है। उसके लिए यदि मन्त्र शक्ति का प्रयोग किया जायगा तो यह देर तक टिक न सकेगी और उसी खिलवाड़ में नष्ट हो जायगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-December
मनन, चिन्तन जैसे माध्यम अपनाये जाते हैं। कथा, प्रवचनों का सिलसिला इसी सन्दर्भ में चलता है। धर्म-शास्त्रों का- तत्व दर्शन का विशालकाय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है।
मनन, चिन्तन आदि के सहारे पूरा होता है। मस्तिष्कीय क्षमता विकास की उपयोगिता भी सर्वविदित है। इसीलिए अपनी-अपनी परिस्थिति के अनुसार स्कूली अथवा दूसरी प्रकार की शिक्षा पद्धति अपनाई जाती है और जानकारी, समझदारी बढ़ाने के लिए यथासम्भव प्रयत्न किया जाता है शिक्षा का दूसरा चरण जानकारी की कमी को पूरा करना है। इससे विचार शक्ति बढ़ती है, बुद्धि तीक्ष्ण होती है और व्यवहार कुशलता आती है। बौद्धिक विकास के लिए शिक्षा परक जो भी उपाय किये जाते हैं, वे सभी सराहनीय हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-June
मनन नहीं किया। शब्द दुहराते चले जायें और आशय कुछ न निकालें तो उस अध्ययन का लाभ ही क्या होगा? जो कुछ पढ़ें, उसे भली प्रकार मनन करें तो वह बात परिपक्व होकर ज्ञान का रूप धारण करती है। विचारों को तदनुरूप कर्मों में प्रसारित करें “स्वाध्याय” शब्द तब कहीं सार्थक होता है। अक्षरों को शब्द रूप दे देना ही काफी नहीं है।
मनन आदि ईश्वर-चिन्तन में मनुष्य की बुद्धि सुख का अनुभव करती है। इस तरह मेरी उपासना करते हुये जो लोग गुरुजन, माता, पिता, भाई, पत्नी एवं देवताओं की समुचित सेवा करते रहते हैं, ऐसा करते हुये जिन्हें तनिक भी अभिमान नहीं होता वे निष्काम भाव से मुझे ही भजते हैं, तब मैं भी सदैव उन्हीं के हृदय में विश्राम किया करता हूँ। सदैव उस कर्मयोगी के अन्तःकरण में ही ओतप्रोत रहता हूँ।”
मनन करें तो वह बात परिपक्व होकर ज्ञान का रूप धारण करती है। विचारों को तदनुरूप कर्मों में प्रसारित करें “स्वाध्याय” शब्द तब कहीं सार्थक होता है। अक्षरों को शब्द रूप दे देना ही काफी नहीं है। उनका अर्थ भी समझें तो आपका सीखना सही माना जायेगा।
मनन करने से आती है। आचरण का बीज है विचार। विचारों को यदि सत्य की ओर या रचनात्मक प्रवृत्तियों में लगाये रहें और उन्हीं में सुख अनुभव करें तो ब्रह्मचर्य धारण की एक बहुत बड़ी कठिनाई हल हो जाती है। गाँधीजी कहा करते थे कि “आलसी मनुष्य कभी भी ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर सकता। वीर्य संग्रह करने वालों में एक अमोघ शक्ति पैदा होती है।
मनन कर सकें, काम, क्रोध, लोभ, और मोह के रागात्मक भाव यदि मन में न आयें तो ही यह मानना चाहिये कि हम ईश्वर प्राप्ति या जीवन-लक्ष्य सिद्धि के अधिकारी हैं। किन्तु यदि मन उस अवस्था में जाकर भी विचलित हो तो केवल एकान्त में रहना छल मात्र है। इस स्थिति का सुधार पुनः व्यावहारिक जीवन में आकर भावनाओं के परिष्कार द्वारा ही किया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-February
मनन चिन्तन में लगाये रखें। जितनी देर आपका मन आन्तरिक विचारों के क्षेत्र में डूबा रहेगा, उतनी देर इन्द्रिय-विषय भी बिलकुल नहीं उठेंगे। यदि ऐसी स्थिति आती है, तो उन्हें बहलाकर फिर से सद्-चिन्तन में लगा देना चाहिये। इसके लिए मन का संकल्पवान् होना आवश्यक है, इसी से इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखा जा सकता है।
मनन, पूजन, कथा-कीर्तन प्राकृतिक दृश्यों से अनुराग, भ्रमण आदि अनेकों साधन काम में लाये जा सकते हैं। पर इतने से यह आशा नहीं की जाती कि आप का आवेश रुक गया या आग फिर कभी न उठेगी। अंतर्मन में प्रस्तुत कामुक चेष्टायें संयोग पाते ही उठ खड़ी होंगी और इच्छा न होते हुये भी आपको विभ्रमित करने लगेंगी।
मनन, अभ्यास से मन की अशुभ वृत्तियाँ बुरे संस्कार भी क्षीण हो जाते हैं और एक दिन मन शुद्ध निर्मल बन जाता है।
मनन करते रहने से भोग के दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम दिखाई दे जाते हैं। धीरे-धीरे इनसे घृणा उत्पन्न होने लगती है।
मनन, ध्यान, पूजा, उपासना बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने का महत्वपूर्ण उपाय है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-November
मनन किये बिना प्राप्त नहीं होता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-December
मनन, चिन्तन हो वे हमें अपनी जानकारी की सूचना दे दें, ताकि उनके परामर्श एवं सहयोग से उपरोक्त प्रकार के भाषण तैयार करने का कार्य आरम्भ किया जा सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-January
मनन, अधिक सामीप्य, सान्निध्य प्राप्त करते रहा जाय। भोजन के बिना शरीर का काम नहीं चल सकता, साँस लिए बिना रक्ताभिषरण की प्रक्रिया बिगड़ जाती है। इसी प्रकार ईश्वर की उपेक्षा करने के उपरान्त आन्तरिक स्तर भी नीरस, चिन्ताग्रस्त, अनिश्चित, अनैतिक, अव्यवस्थित एवं आशंकित बना रहता है। यह हानि कुछ कम हानि नहीं है। दीखने वाली हानियों को लोग आसानी से समझ लेते हैं, पर इस जीवन के सारे आनन्द और उद्देश्य को ही नष्ट कर देने वाली हानि को हम न तो देख पाते हैं और न समझते ही हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-September
मनन और उसके प्रभाव आदि पर कुछ भी ध्यान न देकर केवल भोगों की काम-क्रीड़ा में लगे रहते हैं।
मनन करने से इसके नियामक, निर्माता और पालनकर्ता का ध्यान आये बिना नहीं रहता। कैसा अखण्ड अनुशासन है कि एक ही मिट्टी से ईख मिठास, मिर्च कड़ुवाहट और करौंदा खटास प्राप्त करता है। मिट्टी को चखिये, उसमें इस प्रकार का कोई रस, कोई स्वाद आपको नहीं मिलेगा। इतने रस, इतने स्वाद और इतने गुण एक ही मिट्टी में कहाँ से आ जाते हैं? ये सारे रस, आकार-प्रकार, गुण आदि और कुछ नहीं एक उसी परमात्म शिल्पी का अपना व्यक्तित्व, अपना अस्तित्व है।
मनन के आधार पर नर-नारायण की उपासना के निष्कर्ष पर पहुँचे।
मनन और विचार द्वारा हृदय-आत्मा से ईश्वरीय स्थिति को स्वीकार कर लिया है उससे भूलकर भी कोई ऐसा कार्य न होगा जिससे किसी को कष्ट पहुँचता हो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-May
मनन, चिन्तन तथा जीवन में धारण करने से मिलता है। ‘हनुमान-चालीसा’ पढ़ने से शायद उतना लाभ नहीं मिले, किन्तु जो बजरंगी की तरह संयमित जीवन, कठोर परिश्रम, मोटा-झोटा खाना, उसी में मस्त रहना सीख जाता है, वह हनुमान स्तोत्र का पाठ न करे, तो भी स्वस्थ, बलिष्ठ हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-July
मनन से मनुष्य की अन्तर्मुखी दृष्टि जागृत होती है। वह समझने लगता है कि नाशवान् शरीर के प्रयोजन उतने आवश्यक नहीं जितने आत्म-कल्याण के। इससे उसमें निश्चयात्मक वृत्ति आती है और वह धीरे-धीरे मन को वशवर्ती बनाने की अभ्यास करने लगता है। मन अभ्यास का गुलाम है, उसे तो आप जिधर ही लगा देंगे उधर ही आपकी आज्ञाओं का पालन करने लगता है। खुली छूट और स्वेच्छाचारिता बरतने देने से ही मन उद्दण्ड और विषय लोलुप बनता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-November
मनन अध्ययन और निदिध्यासन करने के लिए अग्रसर होने का निश्चय ही आत्म साधना का उपासना, तपश्चर्या और योग साधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश परामर्श इस प्रकार है-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-December
मनन का विषय बनाने की ललक भी पीछे छोड़ना है। स्वाध्याय और सत्संग को परस्पर पूरक-अन्योन्याश्रित माना जाता रहा है अस्तु दोनों कदम साथ-साथ उठते चलने में मंजिल तक पहुँचने की बात बनती है। दो पहियों के बिना किसी गाड़ी का चल सकना सम्भव नहीं होता।
मननात्सर्वं भवानाँ गरुणात्संसार सागरात्। मन्त्र रुपा हि तटछक्तिर्मं तनत्राण रुपिणी॥ -प्रपंच सारतंत्र
मनन और भावनायें समस्त जगत का त्राण करने वाली शक्ति का नाम मन्त्र है। वह मूल में एक होते हुए भी प्रयोग में अनेक हो जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-September
मनन-चिन्तन एक आत्मानुशासन स्थापित करता है। व्याहृतियों का दर्शन वस्तुतः मनुष्य की अन्तःभूमि को सुसम्बद्ध रूप से विकसित करने की एक सुव्यवस्थित विद्या है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-May
मनन है जिसे प्रभु, परमात्मा, ईश्वर या भगवान कहा जाता है। सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय को ही भगवान कहते हैं। विराट्-परब्रह्म तो वह सूत्र-संचालन शक्ति है जिसे सारी सृष्टि की व्यवस्था चलानी होती है। नियम अनुशासन से अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलना ही उसका काम है। उपासना में परब्रह्म को नहीं, भगवान को साकार या निराकार रूप में स्मरण किया जाता है।
मनन करने से मनुष्य कहलाता है। शास्त्र कहते हैं-
मननात् मनुष्यः। अर्थात् मनन करने से मनुष्य कहलाता है। शास्त्र कहते हैं-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-April
मनन, चिन्तन जैसे माध्यम अपनाए जाते हैं। कथा-प्रवचनों का सिलसिला इसी संदर्भ में चलता है। धर्मशास्त्रों का-तत्वदर्शन का विशालकाय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-July
मनन के चार आधार अपनाने पड़ते हैं। एकाग्रता (मेडीटेशन) ध्यान योग के अंतर्गत ये प्रयोजन भी जुड़े रहते हैं। अन्यथा मन को एक कल्पना भर देकर रोके रहने से योगाभ्यास का वह उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा जिसके आधार पर आत्मसत्ता को आत्मिकी की प्रयोगशाला के रूप में परिणति करने की व्यवस्था बनती थी।
मनन, चिन्तन एवं विचार विमर्श ही यजन माना जाता है। दिनचर्या उसी आधार पर बनती है। यह सामूहिक होते हैं और अधिक समय तक चलते हैं।
मनन’ कहलाता है।
मनन के बिना कोई मनुष्य अपने लिए स्थिर नैतिक सिद्धान्त का निर्धारण नहीं कर पाता और समाज की दिशाधारा के प्रवाह में बह जाता है। नैतिक सिद्धान्तों के निश्चय-निर्धारण के लिए ज्ञानोपार्जन अत्यावश्यक है। ज्ञानार्जन के लिए व्यक्ति को चिन्तनशील- विवेकशील होना चाहिए। सिद्धान्तों को व्यावहारिक जीवन में उपयोग करते समय सतत् चिन्तन आवश्यक है।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-January
मनन, चिन्तन आदि की समूची बौद्धिक कसरत की जाती है। उस पर विचार करने की बात छोड़ देने पर तो दिशाधारा का निर्धारण तक संभव न हो सकेगा और कुछ करने का झंझट उठाने की इच्छा ही न उभरेगी। तब मनुष्य जड़भरत, परमहंस, अवधूत आदि कुछ भी क्यों न हो जाय, प्रगतिशील मनुष्य-समुदाय की बिरादरी से हटकर किसी कल्पना लोक का निवासी भर बनकर रह जाएगा। यह मानवी सत्ता की संरचना को देखते हुए किसी भी प्रकार शक्य नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-October
मनन, शोध, अध्ययन का बहुत प्रयत्न किया जाना है और उन उपलब्धियों के फलस्वरूप अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के प्रतिपादन की अधिक स्पष्ट और अधिक उपयोगी झाँकी भी मिलने लगेगी। प्रयत्न यह किया जायेगा कि पाश्चात्य वैज्ञानिकों, अन्वेषकों, तार्किकों, अनुसंधानकर्ताओं, प्रत्यक्षदर्शियों एवं अनुभवकर्ताओं के अनुभव एवं प्रतिपादनों को प्रधानता देते हुए, यह सिद्ध किया जाय कि इनकी क्रमिक प्रगति भी तत्त्व-ज्ञान, धर्म एवं अध्यात्म की ओर किस प्रकार बढ़ रही हैं। नास्तिकता का बुखार अब किस प्रकार घटते हुए स्वाभाविक तापमान पर पहुँच रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-May
मनन करता रहता है, वे विचार अपने अनुरूप मस्तिष्क में रेखायें बना देते हैं, ऐसी प्रणालियाँ तैयार कर दिया करते हैं कि मस्तिष्क की गति उन्हीं प्रणालियों के बीच ही उसी प्रकार बंध कर चलती है, जिस प्रकार नदी की धार अपने दोनों कूलों से मर्यादित होकर। यदि दूषित विचारों को लेकर मस्तिष्क में मन्थन किया जायेगा, तो मस्तिष्क की धारायें दूषित हो जायेगी, उनकी दिशा विकारों की ओर निश्चित हो जायेगी और उसकी गति दोषों के सिवाय गुणों की ओर न जा सकेगी। इसी प्रकार जो बुद्धिमान मस्तिष्क में परोपकारी और परमार्थी विचारों का मनन करता रहता है, उसका मस्तिष्क परोपकारी और परमार्थी बन जाता है और उसकी धारायें निरंतर कल्याणकारी दिशा में ही चलती रहती हैं।
मनन करते रहना मस्तिष्क का प्रशिक्षण कहा गया है। उदाहरण के लिये जब कोई व्यक्ति अपने मस्तिष्क में कोई विचार रख कर उसका निरन्तर चिन्तन एवं मनन करता रहता है, वे विचार अपने अनुरूप मस्तिष्क में रेखायें बना देते हैं, ऐसी प्रणालियाँ तैयार कर दिया करते हैं कि मस्तिष्क की गति उन्हीं प्रणालियों के बीच ही उसी प्रकार बंध कर चलती है, जिस प्रकार नदी की धार अपने दोनों कूलों से मर्यादित होकर। यदि दूषित विचारों को लेकर मस्तिष्क में मन्थन किया जायेगा, तो मस्तिष्क की धारायें दूषित हो जायेगी, उनकी दिशा विकारों की ओर निश्चित हो जायेगी और उसकी गति दोषों के सिवाय गुणों की ओर न जा सकेगी। इसी प्रकार जो बुद्धिमान मस्तिष्क में परोपकारी और परमार्थी विचारों का मनन करता रहता है, उसका मस्तिष्क परोपकारी और परमार्थी बन जाता है और उसकी धारायें निरंतर कल्याणकारी दिशा में ही चलती रहती हैं।
मनन करता रहता है, उसका मस्तिष्क परोपकारी और परमार्थी बन जाता है और उसकी धारायें निरंतर कल्याणकारी दिशा में ही चलती रहती हैं।
मनन करते हुए, मस्तिष्क का परिष्कार कर डाले। इस अभ्यास से कोई भी कितना ही बुद्धिमान, परोपकारी, परमार्थी और मुनि, मानव या देवता का विस्तार पा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-January
मनन से क्रमशः उत्पन्न और परिपक्व होती है। जो भावावेश में एक ही क्षण दुर्जन से सज्जन बन जाते हैं उन्हें फिर फिसल कर दूसरे ही दिन अपनी पुरानी जगह पहुँचने में देर नहीं लगती। इसलिए नई दुनियाँ बसाने के लिए आज जो क्रम शुरू किया जाता है वह यह है कि उत्कृष्टता की विचारणा का वैज्ञानिक और बुद्धिसंगत, तर्क और प्रयासों से परिपुष्ट स्वरूप जन साधारण की मनोभूमि तक पहुँचाने के लिए अथक प्रयत्न किया जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-November
मनन करना पड़े, आराधना, उपासना अथवा पूजा-पाठ करना पड़े। वास्तविक ज्ञान के बिना न तो जीवन में सच्ची शान्ति मिलती है और न उसको परकल्याण प्राप्त होता है।
मनन द्वारा ही करना पड़ता है। पुस्तक पढ़ लेने अथवा किसी महात्मा का कथन सुन लेने भर से वास्तविक ज्ञान की उपलब्धि नहीं हो सकती। वास्तविक ज्ञात तो आत्मानुभूति के द्वारा ही सम्भव हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-March
मनन और चिन्तन में लगाया था। संयम और साधना द्वारा अपना विवेक परिपक्व किया था और अपने ज्ञान भण्डार को अनुभव की तुला पर तोल कर प्रामाणिक बना लिया था और तब इतनी साधना करने के बाद वे समाज को ज्ञान-दान करने के योग्य हो पाये थे। उन्होंने उस ज्ञान के बल पर मानवता के प्रति सर्वश्रेष्ठ उपकार किया। जिसके लिए वे तब भी पूजित रहे, आज भी हैं और आगे भी पूजनीय बने रहेंगे। ज्ञानोपकार से बढ़ कर संसार का कोई अन्य परोपकार है ही नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-September
मनन करते रहा जाए। अपने मन और मस्तिष्क में आने वाले विचारों को सम्पादित करते रहना चाहिए। मनुष्य के मस्तिष्क में नित्य ही हजारों विचार आते-जाते रहते हैं, किंतु वे सबके सब ही उपयोगी और सार्थक हों यह आवश्यक नहीं। मस्तिष्क में प्रतिक्षण आने वाले विचारों को देखते-परखते रहना चाहिए और जो विचार अपने उद्देश्य और प्रयोजन के लिए आवश्यक और उपयोगी दिखें उन्हें तो रहने दिया जाए और बाकी के सारे बेकार विचारों को निकाल कर फेंक देना चाहिए।
मनन आदि की विशेषताओं की सुविधा न होती, मनुष्य भी सीधा-सादा अन्य प्राणियों की तरह ही एक निकृष्ट प्राणी होता। मनुष्य को अपने जीवन-लक्ष्य के लिये एक लम्बी प्रगति परम्परा पूरी करनी है। उसका जीवन लक्ष्य मोक्ष है। जो अगति पूर्ण स्थिति में पड़े रहने से कभी नहीं पाया जा सकता। मनुष्य को अपना वह लक्ष्य पाने के लिये प्रगति-प्रति-प्रगति करते हुए ही बढ़ना होगा।
मनन करते रहिये- ‘‘अनन्त चैतन्य, निरामय, तत्व स्वरूप परमात्मा तथा मेरे जीवन में एकता है। वह परमात्मा ही मेरे जीवन का जीवन है। मैं उसी की तरह चैतन्य स्वरूप हूँ, मेरी प्रकृति दिव्य है, उसमें किसी विकार के लिये स्थान नहीं है। जो रोग-शोक तथा कष्ट, क्लेश अनुभव होते हैं वह सब देहाभिमान के कारण ही यह अभिमान किया है जिसे मैं त्याग रहा हूँ और अपने हृदय का द्वार उस अनन्त सत्ता की ओर खोलता हूँ जिससे उसकी प्रेमधारा मेरे जीवन में भरकर छलक उठे। सारे प्राणी, सारे जीव मेरे अपने बन्धु हैं।
मनन करत रहा जाए। इससे हृदय में एक गम्भीरता का समावेश होगा। बाहर की सारी चंचलताएँ और अन्दर की सारी चंचलताएँ नष्ट होती चलेंगी और तब मन में एकाग्रता का भाव आने लगेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-December
मनन, स्मृतः, संकल्प, गति, कामना आदि को बताया गया है। इनका विकास बाह्य पदार्थों से नहीं अन्तःवृत्तियों के द्वारा ही प्राप्त कर सकना सम्भव है। धर्म हमारी अन्तःवृत्तियों को जागृत और विकसित करता है, इसलिये उसका परित्याग कर हम जिन्दा नहीं रह सकते, विश्व-कल्याण के महान परिणाम भी उपलब्ध नहीं कर सकते।
मनन, चिन्तन और स्मरण करने की आवश्यकता होती है। परमात्मा सूक्ष्माति-सूक्ष्म तत्व है, उसे साधारण और स्थूल बुद्धि द्वारा यदा-कदा मनन, स्मरण करने से हृदयंगम नहीं किया जा सकता। उसे हृदय की गहराई और सूक्ष्म विवेक द्वारा निरन्तर चिन्तन करने से ही धारण किया जा सकता है।
मननशील आत्मा को जानना चाहिये।’’
मनन द्वारा ही हो सकती है। चिन्तन की यह सूक्ष्मता हृदय की गहराई से और हृदय की गहराई प्रेम द्वारा और प्रेम की उत्पत्ति सम्पूर्ण आत्म-समर्पण द्वारा ही सम्भव है। और इन सब का आदि सूत्र उपासना ही है। इस आध्यात्मिक क्रम को उपासना से प्रारम्भ कर दुःखों के आत्यांतिक अभाव तक आसानी से पहुँचाया जा सकता हैं
मनन, स्मरण करने से हृदयंगम नहीं किया जा सकता। उसे हृदय की गहराई और सूक्ष्म विवेक द्वारा निरन्तर चिन्तन करने से ही धारण किया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-July
मनन और अनुभव। जिज्ञासा लेकर ज्ञानी पुरुषों के पास जाया जाय और उनसे सत्संग प्रदान करने की प्रार्थना की जाय। वे जो कुछ कहें अथवा बतलायें वह ध्यान से सुना जाये और विश्वासपूर्वक उसे न केवल हृदयंगम किया जाये बल्कि उस पर यथोचित आचरण भी किया जाये। उन व्यक्तियों के लिए जिन्हें शिक्षा का अवसर नहीं मिला है, सत्संग ही एक उपाय है। जिससे ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है।
मनन करने लगते हैं। वह एक दिव्य पुरुष बन जाता है।
मनन करना पड़ता है, जब तक वह पूरी तरह बुद्धिसात् न हो जाय। इस प्रकार बुद्धिसात् हुआ विषय जब आचरण में उतर आता है, तभी वह सच्चा ज्ञान बनता है। ऐसे परिपक्व ज्ञान में कितना आनन्द और कितनी शक्ति होती है इसे स्वाध्यायवान ही जान सकते हैं।
मनन और अनुभव के आधार पर व्यक्ति को सद्ज्ञान प्राप्त करने का निरन्तर प्रयास करते ही रहना चाहिये।
मनन और सत्संग का क्रम चलाइये। ऐसा पुरुषार्थ करिये जिससे आपको ज्ञान की उपलब्धि हो। यदि आप अपने को निर्बल अनुभव करते हैं तो अपने में साहस स्वास्थ्य और विश्वास की अभिवृद्धि करिए। साहसपूर्ण साहित्य पढ़िए और साहसी वीर और धीर पुरुषों का संग करिए। तात्पर्य यह है कि जो अभाव अथवा त्रुटि आपको दीनता की ओर ढकेलती हो उसे उपायपूर्वक दूर करने में जग जाइये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-August
मनन करने पर विदित होता है कि भ्रमवश मनुष्य की यह धारणा विश्वास के रूप में बदल गई है कि प्रसन्नता का सुख, साधनों की उपलब्धि एवं अनुकूलता पर निर्भर है। बाह्य साधनों का संपर्क अथवा उनका उपभोग मनुष्य की आत्मा में प्रसन्नता को जन्म देता है। यदि साधन-सुविधायें नहीं हैं तो उसको प्रसन्नता की ओर से निराश ही रहना होगा।
मनन करने के लिए समय की बहुत आवश्यकता रहती है।
मनन-चिन्तन करके अध्यात्म और धर्म का अति महत्वपूर्ण कलेवर खड़ा किया है। उसे जन-मानस में प्रविष्ट कराने के लिए अगणित साधु ब्राह्मणों ने तिल-तिल करने अपना जीवन जलाया है। अगणित धर्म ग्रंथ लिखे गये हैं और उन्हें पढ़ने, सुनने, समझने तथा हृदयंगम करने की स्थिति उत्पन्न करने के लिये अगणित मानतावादी परम्पराओं या रीति-रिवाजों, प्रक्रियाओं, पूजा-पद्धतियों एवं कर्मकाण्डों का प्रचलन किया है। लगातार उस विचार-धारा से संपर्क बनाये रखने के लिये, उन्होंने धर्म एवं अध्यात्म का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया है। मन्दिर, तीर्थ, कथा, कीर्तन, पूजा, पाठ, दान-पुण्य, साधन, संयम आदि सारा धर्म प्रकरण इसीलिये है कि मनुष्य की अध्यात्म एवं धर्म के मान्य सिद्धान्तों पर आस्था बनी रहे और वह संयमी, सदाचारी, परमार्थी एवं आदर्शवादी जीवन जीने के लिए- गतिविधियाँ अपनाने के लिये अन्तःप्रेरणा के आधार पर तत्पर हो सके।
मनन करते रहना ही चाहिये और सत्साहित्य वही हो सकता है, जो हमें ज्ञान का ऐसा प्रकाश प्रदान करे, जिसमें हम अपने को अपनी आत्मा को और अपनी शक्तियों को ठीक से पहचान सकें।
मनन और आत्मसात् किया जाये। और सत्संग वह कि योग्य व्यक्तियों की पुस्तकों को ही उनका स्वरूप और उसके विषय को ही उनका प्रवचन मान लिया जाये। निःसन्देह ऐसी निष्ठा एवं आस्था रखने वालों को पुस्तक का सान्निध्य भी विद्वान के संपर्क की तरह ही फलीभूत होता है। पुस्तकों के माध्यम से वर्तमान एवं दूरस्थ व्यक्तियों का ही नहीं सुदूर भूतकाल में चले गये, विद्वानों, चिन्तकों, मनीषियों तथा महात्माओं का सत्संग प्राप्त किया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-September
मननशील मानव ने अपने अस्तित्व की शुरुआत में ही यह अनुभव कर लिया था कि उसके जीवन में एक छोर पर यदि अनेकों सीमाएँ हैं, तो दूसरे छोर पर असीम और अनन्त सम्भावनाएँ भी हैं। जिन्हें स्वयं को परिशोधित कर, परमात्मा के विराट् अस्तित्व से अपने को मिलाकर ही साकार किया जा सकता है। आत्म परिशोधन और विराट् पुरुष से मिलन की यह प्रक्रिया ही योग है। प्राचीन ऋषियों की अपूर्व अंतर्दृष्टि, प्रतिभा एवं ज्ञान का मूल इसी में निहित रहा है।
मनन और चिन्तन की चतुर्विधि साधन सामग्री से सभी परिचित हैं। इससे अपने मनःक्षेत्र को घेरे रहने वाला उपयोगी वातावरण बनता है। लेकिन इन सबसे कहीं अधिक सर्वसुलभ और सर्वश्रेष्ठ उपाय है- ध्यान। मनोमयकोश के परिष्कार की यह सर्वोत्तम साधना विधि है। ध्यानमग्न होकर हम अपने ईष्ट के साथ श्रद्धासिक्त घनिष्ठता स्थापित करके तादात्म्य की दिशा में बढ़ते चले जाते हैं।
मनन योग्य है- ‘यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है, अर्थात् उसने भली प्रकार निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन के समान अन्य कुछ भी नहीं है। इसलिए वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परमशान्ति को प्राप्त हो जाता है। हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।’ प्रभु प्रणीत योग के इस प्राचीन सत्य में ही आधुनिक विज्ञान का तथ्य भी है।
मनन के लिए प्रेरित होता था। यहाँ रह रहे तपस्वी एवं ज्ञानी पुरोहितों-आचार्यों के मार्गदर्शन में जीवन की गुत्थियों का समाधान मिलता था और भावी जीवन की रीति-नीति का निर्धारण होता था, इस तरह उच्च आदर्शों के अनुरूप जीवन को गढ़ने व सँवारने के संकल्प एवं आत्मबल के साथ व्यक्ति तीर्थ से प्रस्थान करता था। साँस्कृतिक गौरव गरिमा का पुरातन अध्याय वस्तुतः इस वातावरण के प्रभाव की ही गाथा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-August
मनन की साधना भी सम्मिलित थी। इस साधना में प्रत्येक साधक द्वारा प्रतिदिन 600 गायत्री मंत्र जपने का प्रावधान रखा गया था। उपासना क्रम को छह भागों में विभाजित किया गया था, आत्मशोधन के लिए षट्कर्म, प्रतीक पूजा उपचार, सोऽहम्, प्राणयोग, गायत्री जप और ध्यान, खेचरी मुद्रा तथा सूर्यार्घ्य दान। प्रत्येक का महत्व विस्तार से सात पृष्ठ के संपादकीय द्वारा समझाया गया था। एक लाख साधकों द्वारा पूज्यवर ने प्रतिदिन छह करोड़ प्रतिदिन की साधना संपन्न कराई।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-November
मनन-चिंतन हेतु रखा गया है। इस समग्र दिनचर्या से साढ़े चार दिन में साधक काफी कुछ शक्ति का उपार्जन कर सकेंगे, अपनी जीवन की दिशाधारा का निर्धारण कर सकेंगे। प्रत्येक सत्र में 20 व्यक्तियों को ही स्थान दिया गया है, साथ ही इनका पंजीयन कड़ी जाँच-पड़ताल के बाद किया जा रहा है। इसलिए जिस किसी को भी आना हो, पत्राचार करके सुनिश्चित अनुमति मिल जाने के बाद ही आना चाहिए।
मनन करना और जो कुछ निम्न एवं हेय है उसको त्यागते हुए, श्रेष्ठ एवं उदात्त का वरण एवं विकास करना है। इस तरह जब भिक्षु अपने बुरे विचारों पर विजयी हो जाएगा, वह एक दिन अपने मन का स्वामी बनेगा और सदैव के लिए बुराई एवं दुःख से मुक्त हो जाएगा।’
मनन अतीव उपयोगी एवं सहयोगी हैं। इसी के प्रकाश में इच्छा शक्ति के जागरण एवं विकास की प्रक्रिया गति पकड़ती है, जिसमें तीन चीजें अभिन्न रूप से जुड़ी होती हैं- 1. सत् और असत्, उचित और अनुचित के बीच सतत विवेक, 2. जो सही है, उसको करने में संलग्नता और 3. जो अवाँछनीय व अनुचित है, उसके प्रतिकार में जागरुकता।
मनन।
मननशील है, यही जानने वाला है। और यही कर्त्ता और विधाता है। छाया रहित और शरीर से परे इस आत्मतत्त्व को जो जान लेता है, वह महाज्ञानी और सर्वज्ञ हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-January
मनन में उतरे। कोई भक्त अपने इष्ट-आराध्य को जिस आतुरता से पुकारता है, इसे ही व्यग्र भाव से उन्होंने ‘पत्नी’ की साधना की। माता-पिता-गुरु और संत की आराधना-उपासना कर हजारों साधक मुक्ति के लक्ष्य तक पहुँचे होंगे। स्वामी निगमानंद ने पत्नी की आराधना की और सिद्ध स्तर पर पहुँचे। पश्चिम बंगाल के नदिया क्षेत्र में हुए इस संन्यासी को लोगों ने नहीं स्वीकारा, लेकिन स्वामी निगमानंद ने इसकी कभी चिंता नहीं की।
मनन करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-May
मनन की एकाँत साधना के लिए अगर आप प्रातःकाल का समय निकाल पाएँ, तो बहुत अच्छा। कदाचित् प्रातःकाल का समय निकालना आपके लिए संभव न हो तो आप ऐसा करें कि और कोई समय एक साथ मनोयोगपूर्वक काम करने हेतु आप निकाल ले। जब कभी आप यह देख पाएँ कि एक आधा घंटा या पंद्रह मिनट का समय ऐसा निकलता है, जिसमें आप शांतचित्त है। इसमें मन के लिए शांतचित्त होना जरूरी है। भागदौड़ में, रास्ता चलते, चलते-फिरते कहीं भी जप कर लेंगे, नहीं, ऐसा मत कीजिए।
मनन की धाराएँ और दो चिंतन की धाराएं चारों को मिला दीजिए। यह चारों वेदों का सार है। यह चारों दिशाओं से भगवान् के बरसने वाले अनुदानों को प्राप्त करने का सही तरीका है। आपकी उपासना में चिंतन और मनन का भी स्थान रहना चाहिए और न केवल स्थान रहना चाहिए, बल्कि उसे मजबूती से पकड़े रहना चाहिए। छोड़ना किसी भी कीमत पर न हो, अगर आपका ऐसा संकल्प हो तो आप अध्यात्म जीवन में तेजी से आगे बढ़ेंगे और वह लाभ प्राप्त करेंगे जो अध्यात्मवाद की शक्ल में प्राप्त होते रहें हैं।
मनन के लिए ऐसा संभव नहीं है। इसके लिए ऐसा स्थान होना चाहिए जहाँ बाहरी विक्षेप उत्पन्न न होता हो और आपका मन शांत और एकाग्र हो जाता हो। इसके लिए कोई मुनासिब एकाँत का स्थान मिल जाए, तो और भी अच्छा, लेकिन अगर न मिले, तो आप आँखें बंद करके भी ऐसी जगह बैठ सकते हैं, जहाँ कोलाहल न हो। आँखें बंद कर लेंगे, तब भी गुफा निवास की स्थिति बन जाती है। गुफा में चले जाना और शांत-एकाँत में चले जाना एक की बात है।
मनन के लिए आप कहीं थोड़ी देर के लिए शांतचित्त से बैठ जाएं और यह समझें कि हम अकेले हैं, कोई हमारा साथी और सहकारी नहीं है। साथी अपनी जगह पर, सहकारी अपने स्थान पर, कुटुँबी अपने स्थान पर, पैसा अपने स्थान पर, व्यापार अपने स्थान पर, खेती बाड़ी अपने स्थान पर इन सबको अपने-अपने स्थान पर रहने दीजिये। आप तो सिर्फ यह अनुभव कीजिए कि हम एकाकी हैं और एकाँत में बैठे हुए हैं। फिर क्या करें? फिर आप दो तरह के विचार करना शुरू कीजिए।
मननपरक आत्मनिर्माण एक और आत्मविकास दो। दो मनन की धाराएँ और दो चिंतन की धाराएं चारों को मिला दीजिए। यह चारों वेदों का सार है। यह चारों दिशाओं से भगवान् के बरसने वाले अनुदानों को प्राप्त करने का सही तरीका है। आपकी उपासना में चिंतन और मनन का भी स्थान रहना चाहिए और न केवल स्थान रहना चाहिए, बल्कि उसे मजबूती से पकड़े रहना चाहिए।
मनन क्या है? मनन के भी दो हिस्से हैं। जिस तरह चिंतन के दो हिस्से हैं, उसी तरह मनन के दो हिस्से हैं। इनमें से एक का नाम हैं, ‘आत्मनिर्माण और दूसरे का नाम है आत्मविकास आत्मनिर्माण क्या है? आत्मनिर्माण उसे कहते हैं कि जो चीज आपके पास नहीं है या जो उच्चस्तरीय गुण, कर्म, स्वभाव आपके व्यक्तित्व में शामिल नहीं है, वह शामिल कीजिए।
मनन के लिए किसी कर्मकाँड की जरूरत नहीं है, किसी पूजा-विधान की जरूरत नहीं है और किसी समय निर्धारण की जरूरत नहीं है। अच्छा तो यह हो कि इन सब कामों के लिए आप सबेरे का समय ही रखें। अध्यात्म साधना के लिए सबसे अच्छा प्रातःकाल का ही है। दूसरे कामों के लिए भी प्रातःकाल का ही हैं, यानी कि चौबीस घंटों में जो सबसे अच्छा समय हैं, वह प्रातःकाल का ही हैं। प्रातःकाल के समय को आप जिस भी काम में लगा देंगे, उसी काम में आपको बड़ी प्रसन्नता मिलेगी और सफलता भी मिलेगी।
मनन’ का दूसरा हिस्सा कह सकते हैं अथवा चिंतन-मनन की चौथी वाली कड़ी कह सकते हैं। उसका नाम है, ‘आत्मविकास’ आत्मविकास का क्या मतलब है? आत्मविकास का यह मतलब है कि अपने आपका, अपने ‘अहं’ के दायरे को बढ़ा देना। लोगों का दायरा कूप-मंडूक के तरीके से बहुत छोटा है। वे अपने शरीर को ही अपना मानते हैं।
मनन’। चिंतन और मनन के लिए किसी कर्मकाँड की जरूरत नहीं है, किसी पूजा-विधान की जरूरत नहीं है और किसी समय निर्धारण की जरूरत नहीं है। अच्छा तो यह हो कि इन सब कामों के लिए आप सबेरे का समय ही रखें। अध्यात्म साधना के लिए सबसे अच्छा प्रातःकाल का ही है। दूसरे कामों के लिए भी प्रातःकाल का ही हैं, यानी कि चौबीस घंटों में जो सबसे अच्छा समय हैं, वह प्रातःकाल का ही हैं।
मनन का भी स्थान रहना चाहिए और न केवल स्थान रहना चाहिए, बल्कि उसे मजबूती से पकड़े रहना चाहिए। छोड़ना किसी भी कीमत पर न हो, अगर आपका ऐसा संकल्प हो तो आप अध्यात्म जीवन में तेजी से आगे बढ़ेंगे और वह लाभ प्राप्त करेंगे जो अध्यात्मवाद की शक्ल में प्राप्त होते रहें हैं।
मनन अनुयायी को साधना परंपरा में आगे बढ़ने के लिए शक्ति और प्रेरणा देता है। यहाँ गीता-रामायण आदि ग्रंथों का परामर्श कुछ विशेष कारणों से दिया गया है। गिनाए गए शास्त्रों को दो वर्गों में रख सकते हैं। एक तत्वदर्शनप्रधान और दूसरे कथानकप्रधान। गीता, उपनिषद् सूत्र आदि शास्त्र तात्विक है।
मनन’। मनन क्या है? मनन के भी दो हिस्से हैं। जिस तरह चिंतन के दो हिस्से हैं, उसी तरह मनन के दो हिस्से हैं। इनमें से एक का नाम हैं, ‘आत्मनिर्माण और दूसरे का नाम है आत्मविकास आत्मनिर्माण क्या है?
मनन की चौथी वाली कड़ी कह सकते हैं। उसका नाम है, ‘आत्मविकास’ आत्मविकास का क्या मतलब है? आत्मविकास का यह मतलब है कि अपने आपका, अपने ‘अहं’ के दायरे को बढ़ा देना। लोगों का दायरा कूप-मंडूक के तरीके से बहुत छोटा है। वे अपने शरीर को ही अपना मानते हैं।
मनन की प्रेरणा इसलिए दी जाती है कि वे इसकी सहायता से अपने अंतर्जगत में प्रवेश करें। बिना किसी के बताए सिखाए लाखों लोग आज भी गीता के एक-एक अध्याय का नियमित पाठ करते हैं।
मनन में विचार करने की गुंजाइश हैं, मन को भागने की पूरी छूट है। ध्यान में तो एक केंद्र ही करना पड़ता है, पर इसमें एक केंद्र में नहीं कर पड़ता। इसके लिए विचार करने के लिए काफी लंबी-चौड़ी गुंजाइश है।
मनन करने जब बैठें, तब यह विचार किया कीजिए। यह तीसरी वाली बात निर्माण वाली धारा है।
मनन को अस्त-व्यस्त बनाकर रखें। यह भी कोई ढंग हैं? यह क्या हैं? यह भी गलतियाँ है। व्यक्तिगत जीवन में आपके गुण, कर्म, स्वभाव संबंधी गलतियाँ क्या हुई और क्राइम-अपराध, जुर्म करने के संबंध में क्या भूलें हुईं?
मनन का क्षेत्र और व्यापक रखना चाहते हैं, वे चाहें तो उपनिषदों का अध्ययन भी कर सकते हैं।
मनन भी उतना ही जरूरी
मनन के भी दो हिस्से हैं। जिस तरह चिंतन के दो हिस्से हैं, उसी तरह मनन के दो हिस्से हैं। इनमें से एक का नाम हैं, ‘आत्मनिर्माण और दूसरे का नाम है आत्मविकास आत्मनिर्माण क्या है? आत्मनिर्माण उसे कहते हैं कि जो चीज आपके पास नहीं है या जो उच्चस्तरीय गुण, कर्म, स्वभाव आपके व्यक्तित्व में शामिल नहीं है, वह शामिल कीजिए। मसलन आप पढ़े-लिखे नहीं हैं, विद्या नहीं है आपके पास, तो आप कोशिश कीजिए कि आपको विद्या पढ़नी है।
मनन के दो हिस्से हैं। इनमें से एक का नाम हैं, ‘आत्मनिर्माण और दूसरे का नाम है आत्मविकास आत्मनिर्माण क्या है? आत्मनिर्माण उसे कहते हैं कि जो चीज आपके पास नहीं है या जो उच्चस्तरीय गुण, कर्म, स्वभाव आपके व्यक्तित्व में शामिल नहीं है, वह शामिल कीजिए। मसलन आप पढ़े-लिखे नहीं हैं, विद्या नहीं है आपके पास, तो आप कोशिश कीजिए कि आपको विद्या पढ़नी है। हम ईमानदारी से रहते हैं, बीड़ी भी नहीं पीते?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-March
मनन के बाद जो निर्धारण हो, उस पर अमल भी किया जाए। यह निर्धारण किसी और के साथ मिलकर नहीं, स्वयं ही करना चाहिए। तुलना और समीक्षा का यह अभ्यास संतोष की सिद्धि तक पहुँचाएगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-April
मनन कीजिए “नया जन्म नई मौत” “और हर दिन को नया जन्म और हर रात को नई मौत।” इस मौत और जिंदगी के झूले में आप झूलते हुए अपने फर्ज, कर्तव्य और बुद्धिमत्ता के बारे में विचार करेंगे, तो ऐसी हजारों बाते मालूम पड़ेंगी, जिसके आधार पर आपका जन्म सार्थक हो सके आप अध्यात्मवाद के सच्चे अनुयायी और उत्तराधिकारी बन सकें। आज आप से यही कहना था। ॥ॐ शांति॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-June
मनन शक्ति, स्मृति संकल्प, वेग, मनोरथ, कामना, भोग, प्राण शक्ति आदि सभी उस परमात्मा की सत्ता का ज्ञान कराने वाले हैं। जो परमात्मा को जान लेता है, वह इस लोक से उठकर स्वर्गलोक में ब्रह्म के साथ सभी दिव्य भोगों को पाता है। वह ज्ञानी अमृतत्व को प्राप्त होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-December
मनन करें। हीरक जयंती साधना वर्ष के एक बड़े महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हैं हम सभी। सारे विश्व में महायुद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। विश्व एक महात्रासदी से गुजर रहा है। जो भी परिस्थितियाँ पैदा हुई हैं, अप्रत्याशित नहीं है, पर निश्चित ही यह संकट टलेगा, नवसृजन की संभावनाएं , साकार होंगी एवं वर्तमान विभीषिका का समापन होगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-October
मनन−चिंतन हेतु रखा गया है तथा 20.15 से 20.50 तत्त्वबोध साधना (निर्देशों द्वारा) संपन्न होकर साधकों को योगनिद्रा एवं विश्राम में चले जाना है।
मनन−चिंतन का क्रम है।
मनन हेतु लगाना होगा। पढ़ने के लिए पूरी साधनावधि तक समाचार पत्र, अन्य कोई साहित्य उपलब्ध नहीं होगा। भोजन, गंगाजल एवं प्रज्ञापेय साधना कक्षा में ही दोनों समय पहुँचा दिए जाएँगे। भोजन में हविष्यान्न की एक रोटी, औषधियों की चटनी एवं साधक की इच्छानुसार चावल या दलिया की सब्जी मिश्रित खिचड़ी दी जाएगी। अन्य कोई पदार्थ सेवन नहीं कर सकेंगे।
मनन−चिंतन, 12.45 से अनुलोम−विलोम प्राणायाम, 13 से 13.30 जपयोग तथा 13.30 से 14.00 बिंदु योग अंतः त्राटक (दीपक की ज्योति) हेतु निर्धारित है।
मनन−चिंतन में लगेंगे। औसत दो घंटे स्वाध्याय−मनन−चिंतन हेतु होंगे। साधक अपनी विशिष्ट अनुभूतियों को लिख सकेंगे। बाद में इस आधार पर परामर्श एवं जिज्ञासा−समाधान भी पत्र द्वारा प्राप्त कर सकेंगे। समापन पर वे युगधर्म के परिपालन के क्रम में अपने अंदर उभरे संकल्प भी लिखकर देंगे।
मनन−चिंतन हेतु होंगे। साधक अपनी विशिष्ट अनुभूतियों को लिख सकेंगे। बाद में इस आधार पर परामर्श एवं जिज्ञासा−समाधान भी पत्र द्वारा प्राप्त कर सकेंगे। समापन पर वे युगधर्म के परिपालन के क्रम में अपने अंदर उभरे संकल्प भी लिखकर देंगे। इनका भी विधिवत संकल्प कराया जाएगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-January
मनन करते हुए, इसी प्रकार बुद्धि द्वारा असद्भावनाओं को सत्य मानते हुए मानव अपने जीवन में सुलभ शक्ति का दुरुपयोग करता रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-February
मनन करें, इसकी सत्यता स्वयं ही स्पष्ट हो जायगी। मेरे विचार में तो राष्ट्रोन्नति में दिमाग और शारीरिक शक्ति की अपेक्षा चरित्र का स्थान कहीं ज्यादा ऊँचा है। शारीरिक शक्ति एवं दिमाग शासन चलाने एवं बाहरी आक्रमणों से देश की रक्षा के लिए निस्संदेह ही आवश्यक है, लेकिन चरित्र तो पहली चीज है, जो व्यक्तियों के प्रतिदिन एक दूसरे से व्यवहार करने में प्रयोग आता है और जिसके बिना किसी भी प्रकार की उन्नति एवं उत्थान संभव ही नहीं है। चरित्र तो भूमि है जिस पर दूसरी चीजें पैदा होती हैं और यदि चरित्र ही दोषपूर्ण है तो किसी उन्नति की आशा करना ही व्यर्थ है। व्यक्तियों को ईमानदार, वचन का पक्का, एक दूसरे के प्रति उदार हृदय होना चाहिए।
मनन, ईशपूजन में लगाइए, सदैव परोपकार में निरत रहिए। दूसरों की सेवा, सहायता एवं उपकार से हम परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं।
मनन करना।
मनन से ही उनमें इतनी क्षमता आ जाती थी वे दूसरों का मार्ग दर्शन कर सकें। लेकिन आजकल वातावरण बिल्कुल ही बदल गया है और उसके लिये हम ही दोषी हैं। यह वातावरण, जिसमें धर्म के लिये कोई स्थान नहीं है, चरित्र निर्माण में अत्यन्त ही बाधक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-March
मननपूर्वक इन चार सूत्रों का आविष्कार किया था। किसी भी मनुष्य के भीतर जितनी भी अभिलाषायें या मनोभावनायें हो सकती हैं उन्हें इन्हीं चार विभागों में बाँटा जा सकता है। इन्हीं चारों तत्वों को अपनाकर मनुष्य अपने जीवन को पूर्ण सफल बना सकता है। खेद है कि आजकल के मनुष्य केवल दो तत्वों अर्थ और काम को अपना कर वह भी बड़े गलत तरीके से सम्पूर्ण मनोरथों के सिद्ध होने की आशा किया करते हैं। धर्म एवं मोक्ष के प्रति अब किसी में आस्था नहीं रह गई है।
मननशील प्राणी है जो सोच विचार कर आचरण करता है। यदि वह ऐसा न करे तो उसमें और पशु में कोई अन्तर नहीं समझा जा सकता। बहुधा देखने में आया है कि जिन बच्चों को भेड़िये आदि उठाले जाते हैं और अपनी माँद में पाल लेते हैं वे बड़े होने पर भेड़िये की सी आदतें सीख लेते हैं।
मनन एवं विचार पूर्वक जिन सत्कर्मों का करना अपना कर्तव्य समझता है उनकी पूर्ति के लिये जीवन पर्यन्त प्रयत्नशील रहना धर्म कहलाता है। मनुष्य जिस समाज, देश एवं राष्ट्र में जन्म लेता है उस समाज, अथवा देश की सेवा करना, उसकी सर्वांगीण उन्नति में योग देना, उसकी मान-मर्यादा के लिये जीवन को बलिवेदी पर चढ़ा देना भी मनुष्य का सच्चा धर्म है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-August
मनन करें और यह निर्णय करें कि हमारा वर्तमान भोजन अवनति की ओर ले जाने वाला है या उन्नति की ओर? उससे हमारे चरित्र का उत्थान होता है या पतन?
मनन्य भाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यगव्यवसितो हि सः॥ क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छन्तिं निगच्छति।
मननशील और अध्ययनशील साधुओं ने ही किया है। सामान्य और संकुचित बुद्धि वालों की समझ में न आने वाले साधन ही अदृष्टार्थ साधन हैं। जो कर्म तात्कालिक सुख या लाभ के जान पड़ते हैं वे दूर तक विचार करने से बहुधा परिणाम में अनिष्टकारक होते हैं। उन्हें ही शास्त्रकार पापकर्म बतलाते हैं।”
मनन और अनुभव से भी हम इन बातों की सत्यता का अनुभव कर सकते हैं, और हिंदू धर्म की दृष्टि से ये ही स्वार्थ और परमार्थ को सिद्ध करने वाले साधन हैं।
मनन किया है? क्या हमने कभी इस आश्चर्यजनक शरीर-यंत्र-रचना को समझने के लिए अपने मस्तिष्क पर बल दिया है? कारण स्पष्ट है, हमारे जीवन में कृत्रिम आहार-विहार की प्रधानता है, अतः हमारे जीवन में औषधियों की भरमार है, कुछेक तो औषधियों के बलबूते पर ही जीते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-June
मनन करने का फल नहीं है वरन् इनकी आध्यात्मिक सूझ का परिणाम है। इसी कारण ऋषियों को वेद में पाये जाने वाले सत्य तत्वों का रचयिता नहीं समझा जाता वरन् वे केवल उनके देखने वाले हैं, जिन्होंने अपनी आत्मा को विश्वात्मा से तादात्म्य करके एक परम सत्यों का दर्शन कर लिया है। उनके वचनों का आधार आवेश पूर्ण सूझ नहीं है वरन् हृदय में स्थित शक्ति और जीवन का अनवरत अनुभव है। वेदों को सर्वश्रेष्ठ प्रमाण इसीलिए माना जाता है क्योंकि वास्तविकता ही सबसे बड़ी प्रामाणिकता है। ईश्वर हमारा कोई प्रिय आदर्श नहीं है, वह तो उस सत्य नाम है जिसका हम अनुभव करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-May
मनन करना, और जहाँ तक सम्भव हो सके उनसे शिक्षा ग्रहण करके उन पर अमल करना, साधारण लोगों के लिये उन्नति तथा कल्याण का एक सहज साधन है। जिस देश में ऐसे महापुरुषों का मान नहीं किया जाता उसे मृत प्रायः ही समझना चाहिये। महापुरुषों के चरित्र और कार्य ही हमारे सच्चे पथ प्रदर्शक हैं- “महाजनो येन गतः स ग्रन्थ ।”
मनन से, उनके वास्तविक दर्शन करने से, उनका नाम लेकर भी हम उसका लाभ उठा सकते हैं। शिवाजी के नाम में जो जोर था वह औरंगजेब की प्रचण्ड सेना में भी न था। यही कारण शिवाजी का स्वर्गवास होने के बाद भी औरंगजेब मराठों को न हरा सका। पर जब मराठे शिवाजी का नाम भूल गये तो उनके शासन की भी इतिश्री हो गई।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-November
मनन करें। आप उनको अपना ही बना लें और जिस धर्म को अभी तक मानते आये हैं उसी के नाम से पुकारें। हमको नामों की ज्यादा परवाह नहीं है, क्योंकि हम उस धर्म का समर्थन करते हैं जो प्राचीन धर्म-शास्त्र में पाया जाता है और आधुनिक दार्शनिक तथा वैज्ञानिक ग्रन्थों में भी मिलता है। हमारा मतलब उस धर्म से है जो गली-गली में पाया जाता है, जो पत्तियों में लिखा हुआ है, जिसका गुणानुवाद हवा और झरने करते हैं और जो तुम्हारी रग-रग में जोश मार रहा है। हमारा तात्पर्य उसी धर्म से है जो सचमुच आपका है, जो आपके नित्य प्रति के काम से सम्बन्ध रखता है और जिसके अभ्यास के लिए किसी विशेष मन्दिर, मस्जिद या गिरजाघर में जाने की आवश्यकता नहीं।
मनन चिंतन कर इसे विकसित करें। तमोगुण हमारे अन्तःकरण में मलीनता उत्पन्न करता है जिससे अशुभ विचार आते हैं। अतः अपने शुद्ध, सत्त, चित्त, आनन्द रूप का ही ध्यान करना चाहिए। चित्त में शान्त, पवित्र और उक्त विचारों को ही दृढ़ता से जमाइये। अपनी महत्ता, अपनी शक्ति, अपने दैवी गुणों का चिन्तन करने से मस्तिष्क बलशाली बनता है और हृदय से प्रफुल्लता का झरना प्रवाहित होने लगता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-October
मनन को न केवल मस्तिष्क ही प्रभावित करता है। वरन् इससे भी अलग एक शक्ति है जो विचारणाओं को प्रेरित करती है। उस चेतन शक्ति की सम्पूर्ण जानकारी तो नहीं मिल पायी है यह लेकिन यह निश्चित है कि मृत्यु के बाद भी उस चेतना का अस्तित्व बना रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-January
मनन की दिशाधारा बदल गई और सत्य की खोज में ही उनका अधिकाँश समय व्यतीत हुआ। जीवन के अन्तिम दिनों में उन्होंने एक दर्शन का विकास किया जिसने बुद्धिवादियों और धार्मिकों को एक सूत्र में पिरोया। इस दर्शन से पश्चिमी विज्ञान 300 वर्षों तक बराबर प्रभावित बना रहा। स्वप्न के तथ्य इतने शक्तिशाली थे जिनसे न केवल डेस्कार्ट्रेस प्रभावित हुए वरन् सम्पूर्ण वैज्ञानिक जगत इन सम्भावनाओं से अनुप्राणित हुआ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-March
मनन की ज्ञानयोग प्रक्रिया है। जो आध्यात्मिक अनुशासनों में सम्पन्न कराई जाती है। मनोविकारों एवं शरीरगत रोगों से दूर रहना हो तो यही एकमात्र अवलम्बन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-April
मनन-चिन्तन से यह तथ्य भली प्रकार हृदयंगम हो गया था कि दसों इन्द्रिय प्रत्यक्ष और ग्यारहवीं अदृश्य मन इन सबका निग्रह कर लेने पर बिखराव से छुटकारा मिल जाता है और आत्म संयम का पराक्रम बन पड़ने पर मनुष्य की दुर्बलताएँ समाप्त हो जाती हैं और विभूतियाँ जग पड़ती हैं। सशरीर सिद्ध पुरुष होने का यही राजमार्ग है। इन्द्रिय निग्रह, अर्थ निग्रह, समय निग्रह और विचार निग्रह यह चार संयम हैं। इन्हें साधने वाले महामानव बन जाते हैं और काम क्रोध, लोभ, मोह इन चारों में मन को उबार लेने पर लौकिक सिद्धियाँ हस्तगत हो जाती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-September
मनन, कथा-कीर्तन आदि के सहारे जीवनचर्या में सतोगुण बढ़ाने का मार्ग-दर्शन मिलता है। पर उसका कहना सुनना ही पर्याप्त नहीं। उस राह पर चलना भी तो चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि हमारे चिन्तन और चरित्र का प्रवाह निरन्तर उत्कृष्टता के मार्ग पर चले। आचरण में अधिकाधिक आदर्शवादिता और पुण्य परमार्थ की गतिविधियों का समावेश बढ़े।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-August
मनन से काम लेना पड़ता है। कर्म के लिए उद्देश्यपूर्ण प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। भक्ति के लिए कोई उच्चस्तरीय आधार भगवान का गढ़ना पड़ता है। यों प्यार तो स्त्री बच्चों से भी होता है पर उसके पीछे स्वार्थ और आदान-प्रदान के तत्व काम करते हैं। इस अभ्यास को आगे बढ़ाने के लिए आदर्श के समुच्चय इष्टदेव की प्रतिमा गढ़ते हैं और एकान्त एकाग्रता के समय अंतर्मुखी होकर उसके साथ अपने को घुला देने की भावना करते हैं।
मनन से ही मन की भ्रष्टता का निराकरण होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-June
मननशील एकाग्र ध्यानस्थ मस्तिष्क में अनेकों विशेषताऐं विकसित होती हैं।
मनन में यह तथ्य भी समाविष्ट रहना चाहिए कि व्यक्तित्व का निर्धारण एवं विकास इस प्रकार किया जाय, जिससे उसका अनुशासन निभे और प्रसन्नता भरा अनुग्रह हस्तगत हो। देवालयों, तीर्थ स्थानों की दर्शन झाँकी इस तथ्य की स्मृति पटल पर गहराई के साथ जमाये रहने के लिए की जाती है। यह सामान्य क्रम है जिसे उसे जितनी अधिक बार चरितार्थ कर सकना सम्भव हो उतना करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-December
मनन चिन्तन का भाव है। मातृ शक्ति की यही प्रतिभा है। मानवी गरिमा की वह अधिष्ठात्री है, इसलिए उसकी एक दिशा धारा, एक प्रतिपादन के रूप में एक मुख है।
मनन से सम्पन्न होता है। अन्तरंग की योजनाएँ इसी आधार पर बनती हैं। आमतौर से लोग दूसरों की बुराई देखते हैं और अपने सम्बन्ध में बेखबर रहते या पक्षपात बरतते हैं। अन्तर्मुखी होकर ही यह सुधार परिष्कार, निर्माण या विकास का कार्य किया जा सकता है। इसलिए दिनचर्या में इसके लिए कोई समय और स्थान निश्चित निर्धारित करना चाहिए।
मनन के अभ्यासों में भी मन रुकता है और एकाग्रता की स्थिति बढ़ती जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-May
मनन चिन्तन करने से भी मनःक्षेत्र की प्रतिक्रिया यही होती है कि काम कौतुक के चित्र समर्थन की तरह ही खण्डन रूप भी छाये रहते हैं और मन उसी प्रवंचना में उलझा रहता है। इसलिए उस सम्बन्ध में इतना करना ही उपयुक्त है कि उसकी उपेक्षा की जाय और व्यर्थ का सिर दर्द माना जाय। यही बात अस्वाद के सम्बन्ध में भी है। स्वाद अपनाने की तरह ही अस्वाद का पालन करेंगे यदि यह प्रसंग गम्भीरतापूर्वक मन में भरने का प्रयत्न किया जाय तो वह पालन करते हुए भी खण्डन जैसा हो जायेगा। अर्थात् स्वाद उलट-पलट कर मस्तिष्क में छाये रहेंगे और इन्द्रिय जय का प्रयोजन पुरा न होने देंगे।
मनन द्वारा सम्भव होती है। लोग कर्मकाण्ड मात्र से अध्यात्म लक्ष्य की प्राप्ति करना चाहते हैं। यह एकाँगी प्रयास सफल नहीं होता। उपासना क्रिया-कृत्यों का रहस्य ज्ञानपूर्वक समझना चाहिए और उन्हें करते समय तद्विषयक भावनाओं को प्रदीप्त करना चाहिए। अन्यथा कर्मण्ड का मात्र शरीर श्रम एवं वस्तुओं की उलट पुलट मात्र बन रह जायेगा और उनका वह प्रतिफल न मिलेगा जो शास्त्रकारों द्वारा बताया गया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-February
मनन से भी यह शालीनता का मार्ग किसी को भी सहज सुलभ हो सकता है। उच्चस्तरीय व्यक्तियों के क्रिया कलाप में सम्मिलित रहने से भी उस प्रकार की उत्कृष्टता, आदर्शवादिता हस्तगत हो सकती है। ऐसे लोग जब चमत्कार तो नहीं दिखाते और न वरदान आशीर्वाद देते हैं पर ऐसे योगियों की तुलना में अपना और अन्यान्यों का−समाज और समय का जो हित साधन करते हैं, वह किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं होता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-August
मनन है। चिंतन और मनन करते रहने वाला व्यक्ति अपनी बौद्धिक, चरित्र एवं लौकिक दुर्बलताओं को आत्म निरीक्षण एवं आत्म आलोचना के आधार पर भली प्रकार जान सकता है और जिस प्रकार रोग का निदान होने पर चिकित्सा सरल हो जाती है उसी प्रकार अपनी त्रुटियों को जानने वाला उन्हें सुधारने का उपाय भी ढूँढ़
मनन यह चार कार्य भावात्मक साधना के अंतर्गत आते हैं। इनसे विचारों की, दृष्टिकोण की भावना की शुद्धि होती है। क्रियात्मक साधना से संस्कारों का संशोधन एवं पोषण होता है। जो अशुभ संस्कार मनोभूमि में गहराई से जमे हैं उन्हें उखाड़ने का कार्य क्रियात्मक साधना द्वारा ही संभव होता है। शुभ संस्कारों का बीजारोपण तथा उनका परिपोषण भी क्रियात्मक साधना द्वारा ही संभव होता है।
मनन से किस चिन्तन से किस साधन अभ्यास से किया जाए, इसकी विवेचना यहाँ नहीं हो सकती। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को मनोभूमि में दूसरों की अपेक्षा कुछ भिन्नता होती है और उस भिन्नता को ध्यान में रखकर ही व्यक्ति की अन्तःभूमिका को शुद्ध करने का मार्ग दर्शन संभव हो सकता है। इसी प्रकार किस व्यक्ति में कौन-सी सत्प्रवृत्तियाँ विकासोन्मुख हैं और उनका अभिवर्धन करने के लिए किस प्रकार का स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन, ध्यान, संकल्प एवं अभ्यास आवश्यक है इनका विवेचन भी लेख रूप में नहीं हो सकता क्योंकि व्यक्ति की मनोभूमि का स्तर पहचान कर ही उनका भी निर्णय हो सकना संभव है।
मनन करते रहने वाला व्यक्ति अपनी बौद्धिक, चरित्र एवं लौकिक दुर्बलताओं को आत्म निरीक्षण एवं आत्म आलोचना के आधार पर भली प्रकार जान सकता है और जिस प्रकार रोग का निदान होने पर चिकित्सा सरल हो जाती है उसी प्रकार अपनी त्रुटियों को जानने वाला उन्हें सुधारने का उपाय भी ढूँढ़
मनन बिना पुस्तक बिना साथी का स्वाध्याय सत्संग ही है। अपने आप अपनी स्थिति पर, अपना त्रुटियों और दुर्बलताओं पर विचार करके, बुराइयों को छोड़ने और अच्छाइयों को बढ़ाने के लिए अकेले में सोच विचार करना चिंतन है और उत्थान पथ पर अग्रसर करने वाली सत् शिक्षा के महत्व एवं महात्म्य पर विस्तार पूर्वक सोचना एवं उसी ढाँचे में अपने को ढालने की योजना बनाना मनन है। चिंतन और मनन करते रहने वाला व्यक्ति अपनी बौद्धिक, चरित्र एवं लौकिक दुर्बलताओं को आत्म निरीक्षण एवं आत्म आलोचना के आधार पर भली प्रकार जान सकता है और जिस प्रकार रोग का निदान होने पर चिकित्सा सरल हो जाती है उसी प्रकार अपनी त्रुटियों को जानने वाला उन्हें सुधारने का उपाय भी ढूँढ़
मनन यह चार उपाय अपनी अन्तःभूमि के निरीक्षण, परीक्षण करने, त्रुटियों एवं दोषों को समझने तथा कुविचारों को त्याग कर सत्प्रवृत्तियों अपनाने के है। यह चार उपाय भी साधना के ही अंग हैं। जीवन समस्याओं को सुलझाने में सहायक सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना हर विचारशील धर्मप्रेमी व्यक्ति का एक दैनिक नित्यकर्म होना चाहिए। आज किन्हीं पौराणिक कथा ग्रन्थों या आज हजारों लाखों वर्ष पूर्व की स्थिति के अनुरूप मार्ग दर्शन करने वाले संस्कृत ग्रन्थों का बार-बार पढ़ना ही स्वाध्याय माना जाता है। यह मान्यता अस्वाभाविक है।
मनन, चिन्तन, ध्यान, संकल्प एवं अभ्यास आवश्यक है इनका विवेचन भी लेख रूप में नहीं हो सकता क्योंकि व्यक्ति की मनोभूमि का स्तर पहचान कर ही उनका भी निर्णय हो सकना संभव है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-July
मनन शीतलता या विचार से निश्चित होता है, भावनाओं या परंपराओं से नहीं। उसका तीसरा लक्षण उसका मुक्ता चुनना है, कहावत प्रसिद्ध है- ‘कै हंसा मोती चुगे कै लघंन कर जाय।’ ज्ञानी योगी के जीवन का लक्ष भी मुक्ति या अनासक्ति है। उसे जो आनन्द प्यार में, व्रत या उपवास में आता है वह भोग में नहीं आता। इस प्रकार शिव मानवीय जीवन के उच्चतम आदर्श के प्रतीक है जिसकी प्राप्ति के लिए पूर्ण निभ्राँत ज्ञान, योग की उच्चतम सिद्धि और तप की आवश्यकता है।
मनन करने से निष्कर्ष निकलता है कि इनका विशेष आध्यात्मिक रहस्य है और ये मानव जीवन के किसी उच्च आदर्श के प्रतीक हैं। विभिन्न कवियों ने अपनी-अपनी योग्यता और भावना के अनुसार इनके वर्णन किये हैं। इन सभी वर्णनों को विशेष ध्यान से पढ़ने पर प्रतीत होता है कि आदि काल से दो भिन्न प्रकार के ‘आदर्श’ मनुष्य को आकर्षित करते रहे है। इन्हीं दो प्रकार के आदर्शों में से एक के प्रतीक शिव और दूसरे के विष्णु हैं। शिव उस आदर्श के प्रलक जो केवल ज्ञान से ही मनुष्य का परम कल्याण संभव समझता है।
मनन में निरन्तर संलग्न रहेगा, वह सब प्रकार के ज्ञान को निश्चय ही प्राप्त कर सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-October
मनन, इन चार आधारों पर मानसिक दुर्बलता को हटाना और आत्मबल बढ़ाना निर्भर रहता हैं। इसके बिना न मन की जड़ता जाती हैं और न संकीर्णता, गंदगी मूढ़ता, विषयासक्ति आदि से छुटकारा मिलता है। शास्त्रों में सत्संग की बड़ी महिमा गाई गई हैं। उसकी तुलना पारस मणि से हुई है। स्वाध्याय को एक अनिवार्य दैनिक धर्म, कर्तव्य माना गया है और लिखा है कि जिस दिन स्वाध्याय नहीं किया जाता उस दिन मनुष्य चाण्डाल तुल्य अपवित्र हो जाता है।
मनन एवं चिन्तन करें तो ही स्वाध्याय की प्रेरणा अन्तःकरण में गहराई तक उतर सकेगी। इस प्रयोजन के लिए अभी अखण्ड-ज्योति से भी काम चल सकता है। उसका एक-एक लेख नित्य इसी दृष्टि से पढ़ा जाय। महीने में दो तीन बार भी उन लेखों को दुहराया जा सकता है। अब अखण्ड-ज्योति दैनिक स्वाध्याय के उपयुक्त ही पाठ्य सामग्री प्रस्तुत किया करेगी।
मनन और चिन्तन करने पर अपने सुधार और प्रतिक्षण की बात समझ में आ जाती है तो आधी समस्या हल हो जाती हैं। आज तक संसार में जितने किसी भी दिशा में प्रगति की है उन्हें यही मार्ग अपनाना पड़ा हैं।
मनन को तो एक प्रकार से योग साधना में ही सम्मिलित कर लिया गया हैं। कहा गया है कि-मनन और चिन्तन के बिना न आत्म साक्षात्कार होता हैं और न ईश्वर ही मिलता हैं। ठीक भी हैं, उसकी मनोभूमि उड़ता से जकड़ी हुई हैं उसमें आत्मा और परमात्मा का चैतन्य-तत्त्व प्रवेश भी कैसे करेगा? आत्म कल्याण के लिए भजन, ध्यान, जप, तप, कथा-कीर्तन व्रत, दान, तीर्थ, पूजा, पाठ आदि की आवश्यकता मानी जाती हैं। इन्हीं के आधार, पर लोग स्वर्ग और मुक्ति की आशा करते हैं।
मनन और चिन्तन के बिना न आत्म साक्षात्कार होता हैं और न ईश्वर ही मिलता हैं। ठीक भी हैं, उसकी मनोभूमि उड़ता से जकड़ी हुई हैं उसमें आत्मा और परमात्मा का चैतन्य-तत्त्व प्रवेश भी कैसे करेगा? आत्म कल्याण के लिए भजन, ध्यान, जप, तप, कथा-कीर्तन व्रत, दान, तीर्थ, पूजा, पाठ आदि की आवश्यकता मानी जाती हैं। इन्हीं के आधार, पर लोग स्वर्ग और मुक्ति की आशा करते हैं। पर इनमें सबसे अधिक महत्व की साधना आत्म-शिक्षण की हैं।
मनन और चिन्तन अधिक किया जाय। लेख में प्रस्तुत किये हुए तथ्य कहाँ तक उचित हैं यह विवेकपूर्वक सोचना चाहिए। उस पर तर्क विश्लेषण और विचार करके यह देखा जाय कि बात कहाँ तक ठीक हैं। यह आवश्यक नहीं कि पढ़ी हुई पंक्तियों से पाठक पूर्णतया सहमत ही हैं। जो बात अनुपयुक्त लगे उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिए और जो उपयोगी लगे उसकी महत्ता पर बारबार अनेक दृष्टियों से सोच विचार किया जाय।
मनन और चिन्तन से अपने उज्ज्वल भविष्य की जो कामना जागृत की गई हैं उसे सींचते रहा जाय तो एक दिन उसका पल्लवित होना भी सुनिश्चित हैं।
मनन करें। इसमें वर्णित साधनाएँ उपयोगी दिखें तो उनकी महत्ता को परखने के लिए परीक्षा की तरह एक वर्ष के लिए इन्हें अपनाकर देखें। यदि पाँचों साधनायें न बन पड़े तो इनमें से कुछ को भी अपनाया जा सकता हैं। उतने अंश से भी लाभ ही होने वाला हैं।
मनन से ही मनुष्य किसी निष्कर्ष पर पहुँचता हैं। ऐसा निष्कर्ष ही मनोभूमि में गहराई तक उतरता हैं। जहाँ बन्द करके हर बात को ठीक मान लेने की प्रवृत्ति मानसिक दुर्बलता का चिह्न हैं। इस दृष्टि से जो पढ़ा सुना जाएगा वह बहुत ही उथला रहेगा, जड़ न पकड़ेगा और कुछ ही समय में उसका प्रभाव चला जाएगा। इसलिए जो भी पढ़ा जाय उसका मनन किया जाय।
मनन और चिन्तन भी किया जाय
मनन किया जाय।
मनन और चिन्तन पर निर्भर रहता हैं।
मनन और चिन्तन से आत्म-निरीक्षण की प्रवृत्ति पैदा होती हैं। मन का स्तर हीनता से उठकर उच्चता की ओर अग्रसर होता हैं। मनोमय कोश का आवरण सद्विचारों से ही खुलता हैं। जिसके मस्तिष्क में प्रगतिशील और प्रकाशवान् विचारों का नया जल नहीं पहुँचता, उसका अन्तः प्रदेश सड़े, गले, गन्दे नाले की तरह अवरुद्ध पड़ा हुआ दिन-दिन अधिक दुर्गन्धित बनता जाता हैं। मन की शक्ति विचारों पर ही अवलम्बित हैं।
मनन करने की प्रथा भी इसी दृष्टि से उपयुक्त ही है। उनके स्वर्गवासी की निधन तिथि या जयन्ती भी इसी उद्देश्य से मनाई जाती है। कृतज्ञता का गुण हमें अपने अन्तःकरण से अधिकाधिक बढ़ाना चाहिए। इस अभिवृद्धि के साथ हमारा मनुष्यत्व बढ़ेगा और देवत्व निकट आवेग ।
मनन का तात्पर्य यह है कि सामने उपस्थित तथ्य की उपयोगिता अनुपयोगिता पर पक्ष-विपक्ष के विचार से आवश्यक काट-छाँट करते हुए, वस्तु स्थिति को समझने का प्रयत्न किया जाय। इस प्रकार के मनन से ही मनुष्य किसी निष्कर्ष पर पहुँचता हैं। ऐसा निष्कर्ष ही मनोभूमि में गहराई तक उतरता हैं। जहाँ बन्द करके हर बात को ठीक मान लेने की प्रवृत्ति मानसिक दुर्बलता का चिह्न हैं। इस दृष्टि से जो पढ़ा सुना जाएगा वह बहुत ही उथला रहेगा, जड़ न पकड़ेगा और कुछ ही समय में उसका प्रभाव चला जाएगा।
मनन हैं । जो पढ़ा गया हो उस पर बारबार विचार करना चाहिए। अनेक दृष्टिकोणों से उस बात को सोचना चाहिए और तर्क-वितर्क के बाद यदि वह बात उचित प्रतीत हो तो सच्चे मन से उसे हृदयंगम कर लेना चाहिए। चिन्तन इससे आगे का कदम हैं। प्रस्तुत स्वाध्याय में से जो बात हृदयंगम की गई हो उसे अपने जीवन में कैसे ढाला जाय इसकी योजना बनाना चिन्तन हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-April
मनन की ओर कोई ध्यान नहीं देता। शिक्षित जन केवल साधारण अख़बार, सस्ते विचारों से पूर्ण लेखादि या कहानी उपन्यास पढ़ते है, जिनका उनके चरित्र पर उत्तम प्रभाव नहीं पड़ता। उच्चकोटि का साहित्य, दर्शन, अर्थशास्त्र और नैतिक शास्त्र इसलिए नहीं पढ़ा जाता कि उनके पढ़ने में मानसिक श्रम करना पड़ता है, जब कि अधिकांश शिक्षित जन केवल मनोरंजन के लिए पढ़ते है। बहुत से लोग सैर-सपाटे और शृंगार की सामग्री पर धन व्यय कर देते है परन्तु अपने मानसिक विकास के लिए साल में दस-बारह रुपये भी साहित्य खरीदने में नहीं खर्च करते।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-May
मनन को केन्द्र एकदेशीय अथवा व्यक्तिगत न होकर विश्वगत हो, समष्टिमय हो। हर व्यक्ति अपने आपकी स्वतन्त्र सत्ता न समझे वरन, उसका सम्बन्ध अखिल विश्वभुवन स्वतः चेतन जगत से है। धर्म का दूसरा आधार है मानव जीवन का स्वस्थ निर्माण। धर्म का तीसरा आदर्श है अपने जीवन को स्वस्थ एवं सशक्त सबल बनाते हुए उसे मानव जाति के हित में अर्पण कर दे, परमार्थमय बना दे। जीवन के सारे क्रिया कलाप समुदाय के लिए हो।
मनन और पठन-पाठन करना उचित है। उसके लिए अनेक पुराण इतिहास उपलब्ध है। उन महापुरुषों का नाम स्मरण करना, उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने वाले आयोजन भी समय-समय पर करते रहना चाहिए जिससे वीर पूजा की परम्परा जारी रहे और वर्तमान पीढ़ी के लोगों को भी वीर एवं महान बनने की प्रेरणा मिले।
मनन करते हैं और न उन्हें अपने अन्तःकरण में उतारने के लिए सचेष्ट होते हैं। इस स्थूल स्मरण और अनुकरण से कुछ विशेष आयोजन सिद्ध होने वाला नहीं है।
मनन और निदिध्यासन के द्वारा अपनी अनुभूति को बढ़ाना चाहिए कि मैं संकीर्ण क्षुद्र व्यष्टि नहीं हूँ मैं समष्टि स्वरूप हूँ मेरा सत्य रूप उस विश्वगत चेतन सत्ता से सम्बन्धित है। मैं उसी श्रृंखला की एक कड़ी मात्र हूँ। जिस चेतन सत्ता में अतीत काल से बुद्ध ईसा, राम, कृष्ण, गाँधी, मुहम्मद की आत्मायें निवास करती हैं, उसी में मेरा भी धारणा पोषण, लय स्थित है, मैं सब का आत्म स्वरूप हूँ। इस समय जगत के साथ मैं अभिन्न हूँ। इन धारणाओं के माध्यम से अपने भेदविभेद रूपी अवधारणा को छिन्न भिन्न करके समस्त जगत का अखण्डत्व, एकत्व देश नहीं धर्म की प्रमुख बुनियाद है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-December
मनन और चिन्तन के साथ पढ़ा करें तो उनकी आत्मा से हमारी आत्मा का स्पर्श होने लगे। इसका और भी विस्तार इस प्रकार हो सकता है कि अखंड-ज्योति के पाठक पत्रिका में प्रस्तुत विचारों को, कथाओं, प्रसंगों, दृष्टान्तों उदाहरणों को अपने घर तथा बाहर के लोगों को स्वयं सुनाया करें, अपनी पत्रिका कई-कई व्यक्तियों को पढ़ने देने स्वयं जाया करें, उनसे प्रस्तुत लेखों के संबन्ध में चर्चा किया करें। छपे हुए कागज के टुकड़े युग निर्माण नहीं कर सकते। अखंड-ज्योति में हम कुछ भी क्यों न लिखते रहें उसका प्रभाव और विस्तार तब तक नहीं हो सकता जब तक कि आप स्वजनों का त्यक्त्वा मिलकर ही गायन और वाद का जोड़ा बन सकता है। बिना बाजे के गाना और बिना गाने का बाजा अपूर्ण रह जाता है, इसी प्रकार हमारे विचारों का समुचित प्रभाव तभी हो सकता है जब उनके प्रसार में आपका व्यक्तिगत उत्साह, उल्लास एवं श्रम सम्मिलित हो।
मनन और चिन्तन के साथ नित्य स्वाध्याय (3)प्राणाकर्षण प्राणायाम (4) सोकर उठते ही अपने उपकारियों का मानसिक अभिवन्दन, पृथ्वी पर पैर धरते ही धरती माता को प्रणाम, माता, पिता, पति, गुरुजनों के चरणस्पर्श, उनके अभाव में चरणों की प्रतिमूर्ति को नमन एवं रात को सोते समय दिन भर के उपकारियों का स्मरण (5) जप के साथ अपने को एक वर्ष के बालक के रूप में मानते हुए माता की गोदी में खेलने एवं उसका स्तन पान का ध्यान यह सब कार्य न तो अधिक समय साध्य है ओर न श्रमसाध्य। थोड़ी सी इच्छा, श्रद्धा और निष्ठा हो तो इनके लिए अवकाश भी हर किसी से सकते है। गायत्री, उपासना जिनकी अब तक बिलकुल नहीं चलती, वे इस आधार पर थोड़ी-सी से ही आरम्भ कर सकते है। जिनकी चलती है वे ध्यान के द्वारा उसे और परि-पुष्ट कर सकते है।
मनन, तत्त्व दर्शन और आत्म ज्ञान द्वारा अपने अंतः करण का पूर्ण समाधान कर चुका हो। अपने संशय, भ्रम, मोह, अज्ञान का पूर्णतया निवारण कर चुका हो तथा अन्य व्यक्तियों की आन्तरिक एवं साँसारिक जीवन की समस्या को धार्मिक एवं व्यवहारिक समन्वय के आधार पर हल करने की क्षमता जिसने प्राप्त कर ली हो तो ऐसा ही व्यक्ति संसार के मार्ग दर्शन के लिए धर्मोपदेश के लिए अधिकारी कहा जा सकता है, उसे ही परिव्राजक बनना चाहिये, उसे ही संन्यास लेना चाहिए।
मनन में संलग्न रहने, ऊँची से ऊँची साधना, तपस्या और उपासना करने के उदाहरण मिलते है। यह सत्य है कि स्त्री का प्रधान कार्य-क्षेत्र घर-गृहस्थी ही मानी गई है। गृहस्थ आश्रम के पश्चात् पत्नी भी पति के साथ वानप्रस्थ आश्रम में रह कर ईश्वरोपासना करती थी और उसके संन्यासी हो जाने पर वह भी उसी प्रकार का त्यागमय जीवन व्यतीत करती थी। इस प्रकार धार्मिक दृष्टि से इस देश की स्त्रियों का दर्जा कभी हीन अथवा निकृष्ट नहीं समझा गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-May
मनन’ का बहुत सहयोग करती है।
मनन यह खोज करता है कि अमुक श्रेष्ठता के विकास के लिए हृदय में किस भाव का जाग्रत होना आवश्यक है। इस भाव को जाग्रत करने के लिए मानस में किस वृत्ति का सुदृढ़ निर्माण करना अनिवार्य है, तथा ऐसी मनोवृत्ति निर्मित करने के लिए दिनचर्या में कौन से कार्य तथा व्यवहार अधिक से अधिक अभ्यास में लाने होंगे ? इस प्रकार के क्रियापरक मनन नवीन श्रेष्ठ कार्यों को आरम्भ करने का उत्साह जगाते हैं, व्यक्तित्व को विकसित करने का अवसर बढ़ाते हैं तथा अन्ततः जीवात्मा की उच्चतर स्थिति प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। अतः क्रियापरक मनन को बल और पोषण देने के लिए सत्साहित्य अध्ययन को अपने नित्य कर्म में सम्मिलित करना प्रगति के प्रत्येक इच्छुक व्यक्ति के लिए बहुत हितकारी सिद्ध होगा।
मनन सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है, अतः वह श्रेष्ठता के साधक का विश्वसनीय साथी है।
मनन का अर्थ है “अपने विगत जीवन तथा वर्तमान जीवन का गम्भीरतापूर्वक अवलोकन करना और अपने व्यक्तित्व के स्तर को ऊपर उठाने की प्रेरणा देना।” अतः मनन उद्देश्यपूर्ण विचार करने की शैली हैं । मनन स्थूल हानि-लाभों को महत्व नहीं देता।
मनन की जोड़ी हीनताओं को हटाने, न्यूनताओं को पूरा करने तथा श्रेष्ठताओं को बढ़ाने में सक्रिय योगदान दे सकती है। हमारी नियमितता और निष्ठा उसके साथ जुड़ी हो तो वह अत्यन्त सन्तोषप्रद प्रगति की अनुभूति अनिश्चय ही करा सकती है।
मनन द्वारा यह खोजने और स्वीकार करने का साहस कर सके कि अमुक कार्य को करने का उसका असली उद्देश्य क्या था ? उस समय उसकी मनोवृत्ति क्या चल रही थी, क्या सुझाव दे रही थी? हृदय में कौन सी इच्छा जागी हुई थी ? ईश्वर, समाज और स्वयं की दृष्टि में क्या यह सब उचित माना जा सकता है, अथवा इन मनोभावों में सुधार की आवश्यकता है, तब मन उस सत्यनिष्ठ साधक को क्रमशः उस स्थान तक पहुँचा देने की क्षमता रखता है, जहाँ से मनोमय कोश के विकास का राजमार्ग प्रारम्भ होता है। इस उपलब्धि में ‘चिन्तन’ की प्रभावशाली प्रक्रिया ‘मनन’ का बहुत सहयोग करती है।
मनन का सामान्य अर्थ गम्भीरतापूर्वक विचार करना है। स्वाध्याय के संदर्भ में मनन का अर्थ है “अपने विगत जीवन तथा वर्तमान जीवन का गम्भीरतापूर्वक अवलोकन करना और अपने व्यक्तित्व के स्तर को ऊपर उठाने की प्रेरणा देना।” अतः मनन उद्देश्यपूर्ण विचार करने की शैली हैं । मनन स्थूल हानि-लाभों को महत्व नहीं देता।
मनन भी उत्तम वैद्य है। वह न तो हीनता की भावना जगाता है न ही निकृष्टता की। शारीरिक असंयम से दूषित पर्यावरण में रहने से शरीर का रोगी हो जाना स्वाभाविक है। मानसिक असंयम से, चारों ओर संव्याप्त दूषित वातावरण से मन का मैला हो जाना, बुद्धि का भ्रष्ट हो जाना भी स्वाभाविक है। मनन गहरे उतर कर मानस में उन मनोवृत्तियों, दृष्टिकोणों तथा आदतों की खोज करता है जहाँ यह दोष उपजते और पोषण पाते हैं और वैसे ही कर्मों के रूप में दैनिक जीवन में दिखाई देते हैं।
मनन करते समय अपने दोष सहज भाव से स्वीकार कर लेना चाहिए। उत्तम वैद्य के समान मनन तब धैर्य बँधाता है। मानसिक एवं भावात्मक स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने की आकाँक्षा जगाता है, राह बताता है और उस पर चलने की हितकारी प्रेरणा देता है।
मनन के निष्कर्षों को कार्यान्वित कराने लगती है। तभी सुधार प्रारम्भ हो जाता है।
मनन इस परिहित वृत्ति और उदारता की भावना का अवलोकन और मूल्याँकन करता है, उन पर यदि स्वार्थ अथवा यश की कामना की धूल जमने लगी हो तो सचेत करता है निखार आ रहा हो तो प्रसन्नता और सन्तोष व्यक्त करता है मनन व्यक्ति की अपनी क्षमता के अनुसार इन श्रेष्ठताओं की ओर बढ़ाने की सम्भावना ढूंढ़ता है। महामानवों के जाज्वल्यमान उदाहरण प्रस्तुत कर और आगे बढ़ने का प्रोत्साहन देता है और इस अनुग्रह के लिए सर्वोच्च सत्ता तथा गुरुसत्ता के प्रति कृतज्ञतापूर्वक नमन अर्पित करता है। मनन सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है, अतः वह श्रेष्ठता के साधक का विश्वसनीय साथी है।
मनन नवीन श्रेष्ठ कार्यों को आरम्भ करने का उत्साह जगाते हैं, व्यक्तित्व को विकसित करने का अवसर बढ़ाते हैं तथा अन्ततः जीवात्मा की उच्चतर स्थिति प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। अतः क्रियापरक मनन को बल और पोषण देने के लिए सत्साहित्य अध्ययन को अपने नित्य कर्म में सम्मिलित करना प्रगति के प्रत्येक इच्छुक व्यक्ति के लिए बहुत हितकारी सिद्ध होगा।
मनन परिजन नित्य किया करें। चाहें तो उसका एक ही पद चुन लें। उसके संदर्भ में गम्भीरतापूर्वक विचार किया करें कि इस पद में लक्ष्य क्या है और हम कैसा जीवन जी रहे हैं, यह हमारे ही विकास का प्रश्न है। अतः अपनी जीवन शैली में कौन सा परिवर्तन किस प्रकार से करना हमारे लिए सम्भव है। यह मनन प्रतिदिन हम करें।
मनन इन श्रेष्ठताओं के मूल को भी इन्हीं मनःक्षेत्र तथा भाव-क्षेत्र में खोजता है। जैसे बाह्य जगत में आदि कोई व्यक्ति मानव सेवा का कार्य कर रहा है तो इसका कारण उसके मन की परहित वृत्ति है। यह श्रेष्ठ-वृत्ति यदि उसके मन में गहरे समा गई है, यदि उसे बार-बार उसके मन को परहित चिन्तन की ओर खींच ले जाती है, तो इसका कारण यह है कि वह परमार्थ वृत्ति भाव क्षेत्र हृदय में स्थित ‘उदारता’ से निरन्तर पोषण पा रही है। मनन इस परिहित वृत्ति और उदारता की भावना का अवलोकन और मूल्याँकन करता है, उन पर यदि स्वार्थ अथवा यश की कामना की धूल जमने लगी हो तो सचेत करता है निखार आ रहा हो तो प्रसन्नता और सन्तोष व्यक्त करता है मनन व्यक्ति की अपनी क्षमता के अनुसार इन श्रेष्ठताओं की ओर बढ़ाने की सम्भावना ढूंढ़ता है। महामानवों के जाज्वल्यमान उदाहरण प्रस्तुत कर और आगे बढ़ने का प्रोत्साहन देता है और इस अनुग्रह के लिए सर्वोच्च सत्ता तथा गुरुसत्ता के प्रति कृतज्ञतापूर्वक नमन अर्पित करता है।
मनन भटके मन का ध्रुवतारा है।
मनन बहुत सहायक होता है। क्रियापरक मनन यह खोज करता है कि अमुक श्रेष्ठता के विकास के लिए हृदय में किस भाव का जाग्रत होना आवश्यक है। इस भाव को जाग्रत करने के लिए मानस में किस वृत्ति का सुदृढ़ निर्माण करना अनिवार्य है, तथा ऐसी मनोवृत्ति निर्मित करने के लिए दिनचर्या में कौन से कार्य तथा व्यवहार अधिक से अधिक अभ्यास में लाने होंगे ? इस प्रकार के क्रियापरक मनन नवीन श्रेष्ठ कार्यों को आरम्भ करने का उत्साह जगाते हैं, व्यक्तित्व को विकसित करने का अवसर बढ़ाते हैं तथा अन्ततः जीवात्मा की उच्चतर स्थिति प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। अतः क्रियापरक मनन को बल और पोषण देने के लिए सत्साहित्य अध्ययन को अपने नित्य कर्म में सम्मिलित करना प्रगति के प्रत्येक इच्छुक व्यक्ति के लिए बहुत हितकारी सिद्ध होगा।
मनन उद्देश्यपूर्ण विचार करने की शैली हैं । मनन स्थूल हानि-लाभों को महत्व नहीं देता।
मनन मनोमय कोश की उच्चस्तरीय साधना है। यह कोश की शुद्धि का सबसे प्रधान एवं सबसे महत्वपूर्ण साधन है कि मस्तिष्क में अधिक से अधिक समय तक श्रेष्ठ विचारधारा प्रवाहित होती रहे। अतः इस साधना के इच्छुकों को अपनी रीति-नीति को परिमार्जित करना होगा। हीन श्रेणी के जिन विचारों ने मनोभूमि पर अधिकार कर रखा है, मनन द्वारा उसकी सफाई करनी होगी। व्यक्ति के खुले तथा गोपनीय जीवन में झाँक करने वाला मनन दोषों को हटाने व श्रेष्ठताओं को बढ़ाने का प्रमुख प्रेरणा स्रोत है।
मनन उच्छृंखल विचारणा नहीं है। स्वाध्याय जैसी अति महत्वपूर्ण क्रिया के पश्चात् सम्पन्न किये जाने वाले मनन में विचार क्रमबद्ध व प्रगतिशील होते हैं, निर्धारित दिशा मेँ दूर तक और गहराई तक जाते हैं और किसी निष्कर्ष अथवा निर्णय अथवा प्रेरणा पर निश्चय ही पहुँचते हैं।
मनन प्रतिदिन हम करें। निश्चय ही यह अभ्यास स्वभाव एवं व्यक्तित्व के विकास में अति हितकारी सिद्ध होगा।
मनन अपने ही प्रति हीन भावना उत्पन्न करेगा। स्वाध्याय के समान मनन भी उत्तम वैद्य है। वह न तो हीनता की भावना जगाता है न ही निकृष्टता की। शारीरिक असंयम से दूषित पर्यावरण में रहने से शरीर का रोगी हो जाना स्वाभाविक है। मानसिक असंयम से, चारों ओर संव्याप्त दूषित वातावरण से मन का मैला हो जाना, बुद्धि का भ्रष्ट हो जाना भी स्वाभाविक है।
मनन तब धैर्य बँधाता है। मानसिक एवं भावात्मक स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने की आकाँक्षा जगाता है, राह बताता है और उस पर चलने की हितकारी प्रेरणा देता है।
मनन व्यक्ति की अपनी क्षमता के अनुसार इन श्रेष्ठताओं की ओर बढ़ाने की सम्भावना ढूंढ़ता है। महामानवों के जाज्वल्यमान उदाहरण प्रस्तुत कर और आगे बढ़ने का प्रोत्साहन देता है और इस अनुग्रह के लिए सर्वोच्च सत्ता तथा गुरुसत्ता के प्रति कृतज्ञतापूर्वक नमन अर्पित करता है। मनन सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है, अतः वह श्रेष्ठता के साधक का विश्वसनीय साथी है।
मनन स्थूल हानि-लाभों को महत्व नहीं देता।
मनन में विचार क्रमबद्ध व प्रगतिशील होते हैं, निर्धारित दिशा मेँ दूर तक और गहराई तक जाते हैं और किसी निष्कर्ष अथवा निर्णय अथवा प्रेरणा पर निश्चय ही पहुँचते हैं।
मनन’ है।
मनन, चिन्तन ये तीन शब्द ही तीन फलकों वाला अंकुश है जिसे युग निर्माण योजना-गायत्री परिवार अश्वमेध महायज्ञों के प्रथम अनुयाज कार्यक्रम के रूप में अपनाने और जन-जन में प्रचार-प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहे है। शब्द कोष में इनके जो भी अर्थ दिए गए हों, पर पूज्य गुरुदेव ने अपने प्रवचनों लेखों तथा पंचकोशी साधना विवरण में जिन विशिष्ट अर्थों में इनका प्रयोग किया है वही हमारे लिए ग्रहण करने योग्य है। उनके बताये अर्थ ही हमें जानना चाहिए, उन अर्थों में ही इन तीन शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
मनन गहरे उतर कर मानस में उन मनोवृत्तियों, दृष्टिकोणों तथा आदतों की खोज करता है जहाँ यह दोष उपजते और पोषण पाते हैं और वैसे ही कर्मों के रूप में दैनिक जीवन में दिखाई देते हैं। दोष यदि और गहरे पैठ गये हों तो भाव-क्षेत्र हृदय का निकृष्ट हो जाना भी उतना ही स्वाभाविक है। अन्तस् के दोषों से मुक्त होने के इच्छुक साधक को मनन करते समय अपने दोष सहज भाव से स्वीकार कर लेना चाहिए। उत्तम वैद्य के समान मनन तब धैर्य बँधाता है। मानसिक एवं भावात्मक स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने की आकाँक्षा जगाता है, राह बताता है और उस पर चलने की हितकारी प्रेरणा देता है।
मनन द्वारा उसकी सफाई करनी होगी। व्यक्ति के खुले तथा गोपनीय जीवन में झाँक करने वाला मनन दोषों को हटाने व श्रेष्ठताओं को बढ़ाने का प्रमुख प्रेरणा स्रोत है। उसमें विलक्षण ऊर्जा व क्षमता है। यदि साधक निष्पक्ष भाव से और ईमानदारीपूर्वक मनन द्वारा यह खोजने और स्वीकार करने का साहस कर सके कि अमुक कार्य को करने का उसका असली उद्देश्य क्या था ? उस समय उसकी मनोवृत्ति क्या चल रही थी, क्या सुझाव दे रही थी?
मनन का तीसरा पक्ष उन श्रेष्ठताओं से संबंधित है जो यद्यपि अभी साधक में नहीं है किन्तु जिन्हें अपने व्यक्तित्व में अधिक निखार लाने के लिए विकसित किया जाना चाहिए। ऐसी श्रेष्ठताओं के विकास में क्रियापरक मनन बहुत सहायक होता है। क्रियापरक मनन यह खोज करता है कि अमुक श्रेष्ठता के विकास के लिए हृदय में किस भाव का जाग्रत होना आवश्यक है। इस भाव को जाग्रत करने के लिए मानस में किस वृत्ति का सुदृढ़ निर्माण करना अनिवार्य है, तथा ऐसी मनोवृत्ति निर्मित करने के लिए दिनचर्या में कौन से कार्य तथा व्यवहार अधिक से अधिक अभ्यास में लाने होंगे ? इस प्रकार के क्रियापरक मनन नवीन श्रेष्ठ कार्यों को आरम्भ करने का उत्साह जगाते हैं, व्यक्तित्व को विकसित करने का अवसर बढ़ाते हैं तथा अन्ततः जीवात्मा की उच्चतर स्थिति प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
मनन दोषों को हटाने व श्रेष्ठताओं को बढ़ाने का प्रमुख प्रेरणा स्रोत है। उसमें विलक्षण ऊर्जा व क्षमता है। यदि साधक निष्पक्ष भाव से और ईमानदारीपूर्वक मनन द्वारा यह खोजने और स्वीकार करने का साहस कर सके कि अमुक कार्य को करने का उसका असली उद्देश्य क्या था ? उस समय उसकी मनोवृत्ति क्या चल रही थी, क्या सुझाव दे रही थी? हृदय में कौन सी इच्छा जागी हुई थी ?
मनन है।
मनन का दूसरा पक्ष भी ऐसा ही प्रेरक व उत्साहवर्धक है। स्वाध्याय दोषों की ही नहीं, श्रेष्ठताओं की भी जानकारी देता है। तो उत्साहित हुआ मनन इन श्रेष्ठताओं के मूल को भी इन्हीं मनःक्षेत्र तथा भाव-क्षेत्र में खोजता है। जैसे बाह्य जगत में आदि कोई व्यक्ति मानव सेवा का कार्य कर रहा है तो इसका कारण उसके मन की परहित वृत्ति है। यह श्रेष्ठ-वृत्ति यदि उसके मन में गहरे समा गई है, यदि उसे बार-बार उसके मन को परहित चिन्तन की ओर खींच ले जाती है, तो इसका कारण यह है कि वह परमार्थ वृत्ति भाव क्षेत्र हृदय में स्थित ‘उदारता’ से निरन्तर पोषण पा रही है।
मनन निम्रता के विरुद्ध सचेतक तथा श्रेष्ठता के प्रति प्रेरक है। अतः सामान्य विचारधारा की अपेक्षा मनन के उद्देश्य, पद्धति तथा कार्यक्षेत्र अधिक व्यापक हैं- मनन भटके मन का ध्रुवतारा है।
मनन के उद्देश्य, पद्धति तथा कार्यक्षेत्र अधिक व्यापक हैं- मनन भटके मन का ध्रुवतारा है।
मनन को बल और पोषण देने के लिए सत्साहित्य अध्ययन को अपने नित्य कर्म में सम्मिलित करना प्रगति के प्रत्येक इच्छुक व्यक्ति के लिए बहुत हितकारी सिद्ध होगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-September
मनन करें- अमृतवाणी का।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-February
मनन साधना पर लागू होती है। उसे भजन के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। वातावरण शान्त ओर स्थान एकान्त होना चाहिए । आंखें बंद करके आराम से कुर्सी पर पड़े हुए यह सोचना चाहिए कि -” शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकलकर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा। अब पड़ी हुई लाश के अंग प्रत्यंगों को पोस्टमार्टम के समय उघाड़े गये अवयवों की तरह उलटना पलटना चाहिए कि कपड़ों से भरी हुई पेटी की तरह खोलकर देखना चाहिए।
मनन चिंतन करेंगे, उतना ही गुरु सत्ता के मर्म को समझ पायेंगे। नीचे के पैराग्राफ में मार्मिक हृदय स्थल को स्पर्श करने वाले अंश इसी लेख में दिये जा रहे है।
मनन के साथ इसका समापन करे। यदि यह क्रम नियमित चल गया तो 15 लाख नये व्यक्ति अन्यान्य सम्प्रदायों के या अल्पशिक्षित वर्ग के इस मिशन के साथ जुड़ेंगे ।
मनन, चिंतन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए। गायत्री महामंत्र के उपासनात्मक कर्म काण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही संभव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका महात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया जाता रहा है।
मनन के इन दो साधनों को तपश्चर्या अनुसंधान की पृष्ठ भूमि माना जा सकता है। प्रायश्चित के विभिन्न पक्ष भी इस पूर्वार्ध में सन्निहित है। उत्तरार्द्ध और भी अधिक महत्वपूर्ण है जिसमें प्रगति की दिशा में कदम बढ़ाये जाते हैं। आत्म परिष्कार के बाद यदि मन व अंतर्जगत के क्रमबद्ध दिशा नहीं मिलेगी तो उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी। औषधि सेवन को इसलिए महत्व दिया गया है एवं निर्धारण इस प्रकार किया गया है कि शरीर की सूक्ष्म आध्यात्मिक संरचना इससे प्रभावित, उत्तेजित हो और प्रसुप्त जागरण में भाव योग की उच्चस्तरीय स्थितियों में पहुँचने का साधक को अवसर मिल सके ।
मनन, और चिंतन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समग्र साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल, वायु के तीनों अंग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाये तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए भजन, मनन, और चिंतन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है।
मनन, और चिंतन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अंतःकरण की स्वस्थता, प्रखरता, परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीनों आहारों पर निर्भर है। गायत्री महामंत्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को ही कहा जाता है।
मनन अर्थात् आत्मबोध। शरीर और आत्मा के स्वार्थों और संबंधों का पृथक्करण। जीवन लक्ष्य के प्राप्त आस्था और रीति नीति का साहस पूर्ण निर्धारण । दोनों की साधना विधियाँ सरल है। एक ही समय या दो पृथक पृथक सुविधा के समय और शान्त एकान्त स्थान में, सुसंतुलित चित्त में यह दोनों ध्यान, चिंतन किये जा सकते हैं।
मनन करें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-April
मनन-चिन्तन (2) विश्व कल्याण के लिए समर्पित गायत्री मन्त्र जप अथवा भगवन्नाम जप, अथवा अपने-अपने धर्म सम्प्रदाय का मंत्र जप। (3) गायत्री मन्त्र अथवा भगवन्नाम लेखन। (4) ज्ञान-यज्ञ, दीप यज्ञ आदि द्वारा आस्था जागरण, मिशन का विस्तार। (5) तुलसी का व्यापक रोपण-रक्षण-सिंचन। (6) पंच महावृक्षों तथा जैनोसिया अशोक का व्यापक रोपण रक्षण-सिंचन।
मनन के योग्य है। यह इसलिए भी जरूरी है कि ये सभी मनीषीगण इक्कीसवीं सदी का भविष्य उज्ज्वल बताते हुए मानव मात्र को आश्वासन देते हैं कि वर्तमान में जो कुछ भी अवाँछनीय दिखाई पड़ रहा है, वह बदलेगा, ध्वंस का स्थान सृजन लेगा और सर्वत्र सुख-शान्ति एवं स्थिरता का वातावरण बनेगा।
मनन-चिन्तन सर्वप्रथम क्रियापरक कार्यक्रम है। प्राणवान परिजनों से शुभाकाँक्षियों से तथा आत्मोन्नति के इच्छुक पाठकों से अपेक्षा और आग्रह भी कि वे इस स्वाध्याय त्रिवेणी को गहराई से जानें-समझे और मानव में प्रसुप्त पड़ी वैचारिक व भावात्मक चेतना को जाग्रत करने का नैष्ठिक प्रयास करें। इसका क्रियापक्ष, अगले अंक के चार लेखों में परिजन पढ़ सकेंगे। विश्वास रखें इक्कीसवीं सदी का उज्ज्वल भविष्य दिवा स्वप्न नहीं है, महाकाल द्वारा निर्धारित भवितव्यता है। इसे चरितार्थ करने के लिए अब आवश्यकता विश्वास और उमंग भरे मन वालों का है।
मनन-चिन्तन आज की सर्वोपरि आवश्यकता है।
मनन-चिन्तन की सर्वोत्कृष्टता
मनन-चिन्तन प्रक्रिया। समय की कसौटी पर यह त्रिपदा प्रक्रिया सदा ही खरी उतरी है। यह सम्पूर्ण मन्थन भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इस निर्णयात्मक वैचारिक युद्ध को लड़ने व विजयी होने के लिए स्वाध्याय-मनन-चिन्तन आज की सर्वोपरि आवश्यकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-October
मनन और वार्तालाप नहीं करते। उससे पढ़े हुए का प्रभाव जीवन में स्थायी नहीं हो पाता। यदि पुस्तकों के सार जीवन में उतारने की प्रक्रिया लोग सीख जाएँ, तो सामान्य-सी परिस्थितियों में हर व्यक्ति उत्कृष्टता के चरम बिन्दु तक पहुँच सकता है। पुस्तकें गौघृत और दुग्ध के समान पौष्टिक आहार हैं। जो मन, बुद्धि, आचार-विचार, विवेक को परिपुष्ट करके आत्मोत्थान का उज्ज्वल पथ प्रशस्त करती है।
मनन से मस्तिष्क में विचारों का समुद्र लहराने लगा।
मनन करने के बाद आइन्स्टीन को भी कहना पड़ा कि मनुष्य का इस प्रकार समय, स्थान, गति और कारण की संकीर्णता में बँधना उसकी भयंकर भूल है। उन्होंने बताया कि ये संपूर्ण चीजें है ही नहीं। संसार में न तो समय का कोई अस्तित्व है, न स्थान का, न गति का और न किसी कारण या परिणाम का। यह चारों मस्तिष्क की उपज हैं और हम जब तक इनसे प्रतिबंधित हैं, तब तक अंतिम सत्य की अनुभूति नहीं कर सकते। अंतिम सत्य वह है जो इन चारों से बँधकर नहीं इनको बाँधकर रखता है।
मनन उपयोगी है। श्रद्धा और विश्वास अंतःकरण की शक्तियाँ हैं। स्थूल शरीर की शक्ति क्रिया है, सक्रियता के बिना न तो जीवित रहा जा सकता है। न ही प्रगति-उपलब्धि संभव है। इस सक्रियता का प्रेरक है- चिन्तन बुद्धि का व्यापार है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-August
मनन के लिए था ।
मनन एवं कार्य प्रणाली मेरी राय में सिर्फ यहीं से परिचालित हो रही है। राजनीतिज्ञों एवं देश के कर्णधारों को यहाँ से मार्गदर्शन लेना चाहिए। में मानव सेवा में अपना योगदान देने का संकल्प लेता हूँ।
मनन, स्वाध्याय का क्रम अपनाना तथा छोटे-छोटे दीपों द्वारा जन-जन को युगपरिवर्तन की विचारधारा से अनुप्राणित करना यह त्रिविध उद्देश्य इन कार्यकर्ता गोष्ठियों का था, जो तीन दिन टुकड़ों-टुकड़ों में पूरा होता चला गया। संध्याकाल में वन्दनीया माताजी के उद्बोधन के पूर्व गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक पण्डित लीलापत शर्मा का प्रेरक उद्बोधन हुआ। उन्होंने पू. गुरुदेव के विद्या-विस्तार कार्यक्रम के प्रसार हेतु उनके लिखे साहित्य को उन सभी मिशन का आलोक नहीं पहुँच पाया है। इसके पश्चात् वन्दनीया माताजी का सारगर्भित प्रवचन हुआ। जिसमें उन्होंने उपासना, साधना, आराधना के मर्म को पूज्यवर के जीवन के परिप्रेक्ष्य में समझाया।
मनन, चिन्तन (9) 1.30 से 2.30 प्रवचन (10) 2.30 से 3 जलपान (11) 3 से 5 साधना का तृतीय सोपान (12) 5 से 5.30 शौच आदि (13 ) 5.30 से 6 में भोजन (14 ) 6 से 7 टहलना (15) 7 से 8 भाव संगीत (15) 8 से 4 तक शयन ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-March
मनन और चिन्तन द्वारा इन्हें किस प्रकार कितनी मात्रा में अपनी दिनचर्या में सम्मिलित रखा गया, इस पर अति गम्भीरतापूर्वक विचार करते रहना चाहिए। यदि इससे भावी जीवन की कोई परिष्कृत रूपरेखा बन सकी और उसे व्यवहार में उतारने का साहस जग सका तो समझना चाहिए कि उतने ही परिमाण में गायत्री माता का प्रसाद तत्काल मिल गया। यह सुनिश्चित मानना चाहिए कि श्रेष्ठता भरी गतिविधियाँ अपनाते हुए ही भगवान की शरण में पहुँच सकना और उनका अनुग्रह प्राप्त करना सम्भव हो सकता है।
मनन का क्रम चलेगा। इसी अवधि में नौ दिनों में से कुछ दिन वे ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान भी परीक्षण हेतु जायेंगे। शाम को आरती के पश्चात् नादयोग साधना के बाद परमपूज्य गुरुदेव का विशेष वीडियो संदेश प्रतिदिन विभिन्न विषयों पर वे श्रवण कर रात्रि की संध्या-शमन से पूर्व शिथिलीकरण योग निद्रा में प्रवेश कर रात्रि भर होने वाले विशिष्ट प्राण संचार हेतु स्वयं को तैयार करेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-July
मनन इन्हें खोजता है। अपने जीवन पर इनके कौन-कौन से अच्छे बुरे प्रभाव पड़ रहे हैं, इस पर व्यावहारिक रूप से विचार करता है।
मनन में लगाइये, पूजा में लगाइये , उपासना में लगाइये, और अच्छे लोगों के संपर्क में लगाइये, अच्छी बातों के सोचने में लगाइये , गंगा के किनारे जा करके रहिये। पूरा का पूरा समय आपका ऐसा हो जिसमें कहीं अवाँछनीयता के लिये जगह न हो। आपका चिन्तन ऐसा हो, जिसमें अवाँछनीयता के लिये कोई गुँजाइश न हो। बस, यह एक तीर्थ हमने बनाया है। मान्धाता की सहायता से जगतगुरु शंकराचार्य ने चार धाम बनाये थे, चार तीर्थ बनाये थे।
मनन- चिन्तन प्रक्रिया का एक उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है। मूल बिन्दुओं को ध्यान में रखकर अपनी रुचि तथा पूर्व अभ्यास के अनुसार इसमें साधारण हेर-फेर किया जा सकता है।
मनन-चिन्तन करना पड़ता है। राजकुमार सिद्धार्थ का जिस क्षण आत्म-बोध उभरा, उसी क्षण वे भगवान बुद्ध बन गये। जिस वटवृक्ष के नीचे यह सुयोग बना वह भी ‘बोधि वृक्ष’ के रूप में श्रद्धास्पद बना-प्रख्यात हुआ और कृत-कृत्य हो गया। आत्मज्ञान की महत्ता, प्रतिक्रिया एवं सिद्धि परिणति का इतना अधिक प्रतिपादन हुआ है कि उससे बढ़कर इस संसार में और कोई बड़ी उपलब्धि मानी ही नहीं गई। गीताकार ने “अपने को ही अपना मित्र और अपने को ही अपना शत्रु बताते हुए कहा है कि अपना उद्धार आप करो, अपने को गिराओ मत।
मनन- स्वाध्याय ने संयम वृत्ति व नियमितता के कच्चेपन को भी स्पष्ट किया। मैंने अपनी यह दुर्बलता स्वीकार कर ली। इन्हें परिपक्व स्थिति में लाने के लिए मैंने मनन प्रारम्भ किया। मन को टटोला तो समझ में आया कि सुस्वादु भोजनों और आकर्षक किन्तु हेय मनोरंजनों का लोभ संयम वृत्ति को ढीला कर देता है, फलस्वरूप नियमितता का संकल्प भी टूट जाता है । अतः इस लोभ का शमन करना व संयम वृत्ति को स्थिर बनाना होगा।
मनन ने जो श्रेष्ठताएं खोजी हैं, उन्हें कैसे बढ़ाया जा सकता है, जो विकारग्रस्त मनोवृत्तियाँ व कुसंस्कार खोजे हैं, उन्हें हटाने के लिए ऐसे कौन से उपाय करने चाहिए जो अपनी क्षमता में हैं- यह ‘चिन्तन’ है। कुल मिलाकर वर्तमान जीवन व्यवहारों को अधिक अच्छा बनाने के लिए चिन्तन लगातार व्यवहारिक योजनाएँ बनाता रहता है।
मनन, ‘चिन्तन’ में बदल गया। नियमितता से संबंधित अन्य श्रेष्ठ कार्य क्या हो सकते हैं ? संयम वृत्ति से संबंधित अन्य श्रेष्ठ विचारणाएं क्या हो सकती है, जो इस आकाँक्षा को तीव्र करने में सहायक सिद्ध हो सके ? इन व्यावहारिक उपायों को ऐसे प्रस्तुत किया जा सकता है-
मनन-चिन्तन करना चाहिए। पहले षट्कर्म सम्पन्न करने के बाद संक्षिप्त स्वाध्याय आदि प्रक्रिया में दस मिनट समय लगाना उपयुक्त होगा। उसके बाद जप करने से विचारों की दिशा श्रेष्ठता की ओर मुड़ जाएगी तो जप-ध्यान आदि भी क्रमशः उच्च स्तर के होते जायेंगे।
मनन की साधना वस्तुतः मस्तिष्कीय क्षेत्र में घुसे मनोविकारों को, दुष्प्रवृत्तियों को निरस्त करने के लिए लड़ा जाने वाला महाभारत है। जो इसमें सफल होते हैं वे ही सच्चे अर्थों में जीवन का आनन्द उठाते हुए आत्मोत्कर्ष का परम लाभ प्राप्त करते हैं।
मनन-चिन्तन करने से ही श्रेष्ठ जीवन जीने की आकाँक्षा जागती है। आस्था और मान्यता में सुधार होता है, तो उस दिशा में में प्रयास भी होने लगते हैं। अतः इन तीन प्रक्रियाओं को एक बार फिर समझ लेना चाहिए।
मनन प्रारम्भ किया। मन को टटोला तो समझ में आया कि सुस्वादु भोजनों और आकर्षक किन्तु हेय मनोरंजनों का लोभ संयम वृत्ति को ढीला कर देता है, फलस्वरूप नियमितता का संकल्प भी टूट जाता है । अतः इस लोभ का शमन करना व संयम वृत्ति को स्थिर बनाना होगा। इसके लिए मैंने भाव क्षेत्र हृदय में झाँकने का प्रयास किया। संयम टूटने पर हृदय पर क्या प्रतिक्रिया होती है ?
मनन-चिन्तन इन कार्यों को भली प्रकार कर सकते हैं, इस दृष्टि से व अब हमारी जीवनचर्या का अनिवार्य अंश बन जाने चाहिए।
मनन-चिन्तन तीनों को एक साथ सम्पन्न किया जाना चाहिए। अपनी महत्ता के कारण स्वाध्याय-त्रिवेणी- भजन-उपासना के समकक्ष पुण्य फलदायक साधना मानी जाती है। यह विचारों के सामान्यतः निम्न प्रवाह को उत्कृष्टता की ओर मोड़ देती है। इस स्थिति में जप ध्यान भी श्रेष्ठ स्तर के बन पड़ते हैं। अतः आश्वमेधिक अनुयाज में इसे जप से पहले सम्पन्न करने की अनुशंसा की गई है।
मनन
मनन-चिन्तन” के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक प्रतिपादन को प्रस्तुत किया जा रहा है। मनोविज्ञान कहता है कि मन को नये ढाँचे में ढालने के लिए अभ्यस्त स्थिति से उबार कर नये सिरे से प्रशिक्षित करना पड़ता है। इसी तकनीक को विस्तृत विवेचन द्वारा विगत चार माह से समझाया जा रहा है। एक बार आत्मसात् कर लेने पर यह कितना सरल व चित्त को सुसंस्कारिता से ओत-प्रोत कर लेने वाला बन सकेगा, यह पाठक स्वयं देखेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-June
मनन-चिन्तन की तीन पदों वाली विचार शैली में ‘चिन्तन’ अन्तिम पद है। एक पैर अथवा दो पैरों वाली तिपाई खड़ी नहीं होती। तीन पैरों वाली स्थिर खड़ी नहीं होती। तीन पैरों वाली स्थिर खड़ी तिपाई ही उपयोग में लाई जा सकती है। उपयोग में लाई जा सकती है।
मनन महत्वपूर्ण क्रियाएँ होते हुए भी फलहीन बनी रहती हैं और इच्छित परिणाम प्रस्तुत नहीं कर पाती। चिंतन के साथ जुड़कर ही वे पूर्णता। चिन्तन के साथ जुड़कर ही वे पूर्णता प्राप्त करती हैं। और सार्थकता सिद्ध करती है।
मनन द्वारा इन दोष-गुणों को विस्तार से ढूँढ़ भी लिया गया। जहाँ से वे पोषण पाते हैं, उन मनोवृत्तियों, संस्कारों को भी देख लिया गया। किन्तु इतना जान लिये व खोज गया। किन्तु इतना जान लेने व खोजे लेने से तो दोष घटेंगे-मिटेंगे नहीं । न तो गुण विकसित हो पायेंगे, न ही इच्छित परिणाम प्राप्त होगा, क्योंकि अभी एक सोच और बच रहा है-
मनन के निष्कर्षों के अनुरूप सरल, साध्य अभ्यासों की बना करता है। इतना ही नहीं वह कार्य-योजना का विस्तार भी उतना ही करता है, जितना अपनी वर्तमान क्षमता व इच्छाशक्ति के द्वारा संपन्न होना सम्भव हैं इस कारण चिन्तन व्यावहारिक एवं उपयोगी होती है। कुल मिलाकर चिन्तन प्रक्रिया का उद्देश्य बहुत सीधा और स्पष्ट है “आज हमारी जैसी भी मनः स्थिति व परिस्थिति है, जैसी भी क्षमता व इच्छाशक्ति है, हमें तो उतने से ही अपने दोषों को हटाने और गुणों को बढ़ाने का प्रयास करना है। अतः हम निश्चित करें कि हम अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कौन-कौन से उपायों-अभ्यासों का सतत् प्रयोग कर पायेंगे, जिससे कि वर्तमान स्थिति से बेहतर मानसिक व आत्मिक प्रगति की ओर बढ़ सकें।
मनन-चिन्तन को मन्त्र जप के समान महत्व देते हुए आश्वमेधिक अनुयाज में इसीलिए प्रथम स्थान दिया गया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-January
मनन से होती है। विक्षेप दूर होता है उपासना निदिध्यासन या ध्यान से और आवरण समाधि भगवत्कृपा से स्वतः तिरोहित हो जाता है।
मनन-निदिध्यासन से अज्ञान दूर हो जाता है। बुद्धि उसी परमतत्व की सत्यता को समझ लेती है। “ गोपीनाथ जी कहते जा रहे थे - “हृदय स्वीकार कर ले तो ठीक। अशक्ति पूर्ण हृदय अशक्ति का वेग प्रबल होने पर बुद्धि को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। वह पुनः भ्रान्त हो जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-January
मनन एवं सेवाभाव के बीज पारिवारिक सदस्यों में बोने चाहिए। पिता ही प्रथम शिक्षक और पथ प्रदर्शक है। ऊँचा उत्साही, मिलनसार, भावुक, परोपकारी, अधिक परिश्रमी, अटल विश्वासी, व्यवहार कुशल, सच समालोचक, विनोदपूर्ण होना चाहिए। जिस संलग्नता से वह पवित्र जीवन व्यतीत करेगा। उसी परोपकारिकता, पितृभक्ति और मृदुता से उसका परिवार उसके पद चिन्हों पर चलेगा।
मनन तथा सहवास करने से मनुष्य सबसे बुद्धिमान आत्माओं के सहवास में हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-July
मनन योग्य हैं। अखण्ड ज्योति संचालक आचार्य द्वारा गायत्री का जो असाधारण प्रकाश हुआ वह तो आश्चर्यजनक है।
मनन और चिन्तन द्वारा अध्ययन किया। इस सम्बन्ध में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त होने पर मेरे भावों में काफी जाग्रति का प्रसार होने लगा। दृढ़ता के साथ नियमित उपासना करना तभी से प्रारम्भ कर दिया। परन्तु शारीरिक अस्वस्थता के कारण मनोवृत्ति को केन्द्रीभूत करने में बहुत कुछ कठिनाई होती थी। फिर भी मैंने अपनी उपासना का कार्य जारी ही रखा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-February
मनन, तथा निरूपण की चीज नहीं वरन् कार्य रूप में पालन करने की चीज है। जिस प्रकार बड़े से बड़े स्वास्थ्य संबन्धी ग्रन्थ को पढ़ कर और कण्ठस्थ करके भी हम जब तक अपना आहार विहार न सुधारें, नियमित रूप से कोई शारीरिक व्यायाम न करें, स्वच्छता और सफाई के नियमों का अच्छी तरह पालन न करें, इसी प्रकार उपनिषद्, गीता, योगवशिष्ठ के सैकड़ों पारायण भी हमको आध्यात्मिकता के निकट नहीं पहुँचा सकते अगर हम उनके उपदेशों के वास्तविक मर्म को ग्रहण न करके तद्नुसार आचरण न करें।
मननपूर्वक अध्ययन करिये। नियमित रूप से नित्य निदिध्यासन करिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-May
मनन होते थे और महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे जाते थे। शास्त्र विद्या से लेकर शिल्प विद्या तक की वैज्ञानिक शिक्षा उन आश्रमों से प्रादुर्भूत होती थी। खगोल विद्या, भूगर्भ विद्या, आदि अनेकानेक विद्याओं की महत्वपूर्ण प्रयोगशालाएँ वहाँ रहती थीं। इतने महानतम राष्ट्रोपयोगी कार्य करते हुये भी वे ऋषि सर्वथा निस्पृह, त्यागी थे। ऐसे महाभाग तपस्वी अपनी शरीर रक्षा के लिए और अपने वैज्ञानिक कार्यों के लिए भिक्षा माँगने के अधिकारी थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-April
मनन तथा अध्ययन और पूजा पाठ, ईश्वर-चिन्तन आदि में अपना मन लगाइये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-June
मनन्ति,

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-December
मनन एवं चिन्तन करो।’

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-March
मनन करने वाले मुनि लोग प्राण को भूः कहते हैं। यह प्राण सर्वत्र समष्टि रूप से फैला हुआ है। इस से सिद्ध है कि यहाँ सब समान हैं। अतएव सब मनुष्यों और प्राणियों को अपने समान ही समझना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-November
मनन करते हुए उनकी शिक्षाओं को आचरण में उतारना चाहिए एवं जिस प्रकार कृषि में विशेष उन्नति का इच्छुक कृषक विशेष जानकारी के हेतु बड़े उन्नत कृषि फार्मों से खाद बीज जुताई, सम्बन्धी जानकारी प्राप्त करने के लिए उनके अनुभवी कृषि विशेषज्ञों से परामर्श लेता है और उनके रचित साहित्य का अवलोकन करके ज्ञान बढ़ाता है इसी प्रकार अध्यात्म विषय के विशेषज्ञ जो साधु, संत महात्मा, आचार्य, विद्वान हैं, उनसे प्रेमपूर्वक अति विनम्र भाव से इस विषय में परामर्श लेना चाहिए। और छल छोड़ कर मन कर्म वचन से उनके होकर उनके आदेशों और शिक्षाओं का पालन करना चाहिए। हमारे तीर्थ स्थान अब भी ऐसे अध्यात्म विशेषज्ञों से खाली नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-October
मनन्द ब्रह्मचारी लेसारीघाट मेरठ
मनन्दन प्रसाद, यादवपुर बखरी

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-July
मनन्द की सरसता का परिचय दिया जाता है। अपने ‘स्व’ को इष्टदेव की सत्ता में भाव्यरिक के साथ गुथा दिया जाय- मन में मन को, प्राण में प्राण को, आत्मा में आत्मा को घुला देने का अभ्यास करें तो भक्ति भाव की उच्च भूमिका उत्पन्न होती है और शान्त चित्त की मनःस्थिति बन जाती है। ईधन का आग में बूँद का समुद्र में ,नमक का पानी में- जिस प्रकार विलय हो जाता हैं। दो शरीर जिस प्रकार एक प्राण बन जाते हैं उसी स्तर की भावना इष्टदेव के साथ करने में जितनी सफलता मिलेगी वह उतना ही ‘शान्ति चित्त का अनुभव करेगा । द्वैत ही चंचलता और अद्वैत ही एकाग्रता की भूमिका है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-March
मनन, चिन्तन द्वारा प्राणवान आत्माएँ आकाश में ऐसे प्रचण्ड प्रवाह छोडती थी जिसमें जन मानस को अनायास ही बहते रहने और श्रेष्ठ चिन्तन का उसके फलस्वरुप उस उत्पादित उच्च चरित्र का लाभ मिलता था। अन्तरिक्ष उच्चस्तरीय विचार सम्पदा से भरा रहता था। इसमें अध्यात्म क्षेत्र के मूर्धन्य मनीषी सदा प्रयत्नरत रहते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-January
मनन द्वारा अपनी ज्ञान संपदा भी बढ़ाई थी। लोग विभिन्न जिज्ञासुओं के समाधान तथा ज्ञान प्राप्ति की आशा से रैम्य आश्रम में आया करते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-November
मनन से सन्त भी थके हुए थे। उन्होंने ग्रन्थ बन्द किया और लेट गये।
मनन-परोक्ष है। आत्मिक प्रगति के लिए इन प्रयोजनों को भजन ध्यान से कम महत्वपूर्ण एवं कम आवश्यक न माना जाय।
मनन से ही यह पात्रता सम्भव है। इसके लिये परिश्रम और तपस्या चाहिए। अपात्र के पास विद्या कभी सफल नहीं हुआ करती।”
मनन’ कहलाता है। स्वाध्याय सत्संग-प्रत्यक्ष और चिन्तन मनन-परोक्ष है। आत्मिक प्रगति के लिए इन प्रयोजनों को भजन ध्यान से कम महत्वपूर्ण एवं कम आवश्यक न माना जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-February
मननशील मनुष्य बन कर भद्र पुरुषों के लिए उत्तम उपदेश कर ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-April
मनन-भूतकाल से लेकर अध्यावधि चलते आ रहे जीवन क्रम कर पर्यवेक्षण। उसमें से परिवर्तन योग्य प्रसंगों को ढूँढ निकालना। 4. चिन्तन-भविष्य के लिए नीति निर्धारण और उस अपनाने के लिए अभीष्ट उपायों का सुनियोजन। इन चारा आधारों के समन्वय से ही जीवन आत्मोर्त्कष के लक्ष्य तक पहुँचते और महती सफलता का आनन्द लाभ करते है। गायत्री नगर में बसने वालों को इसी स्तर की साधना पद्धति अपनानी पड़ती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-December
मनन ही काफी नहीं अभिरुचि की प्रगाढ़ता से आस्था बलवती होती है। उसी बलिष्ठता के बलबूते मनुष्य महान बनता है। पर अभिरुचि का आकर्षण आमतौर से इन्द्रिय लिप्सा और मानसिक समर्थता में से एक को प्रधान बनाना होता है। इनमें से जिस पर अभिरुचि केन्द्रित रहेगी प्रगति उसी दिशा में होगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-May
मनन का अर्थ है-जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए अभीष्ट आदर्शों का अपने जीवन क्रम में-गुण कर्म स्वभाव में कितना समन्वय को सका इसका विश्लेषण और जो न हो सका उसकी पूर्ति के लिए आयोजन-नियोजन।
मनन और समापन इन चार भागों में हमें अपनी उपासना पद्धति को विभाजित कर लेना चाहिए।
मनन की प्रक्रिया चलाई जा सकती है। कम से कम पन्द्रह मिनट तो इसमें भी लगाने चाहियें। चिन्तन करना चाहिये कि अपना आपा-ईश्वर का अंश पुत्र और प्रतिनिधि, शुद्ध, निर्विकल्प दिव्य चेतना एवं दिव्य क्षमताओं से परिपूर्ण है। अपना शुद्ध स्वरूप यही है, शरीर और मन अपने दो औजार-वाहन हैं। इन्हें अपने से पृथक रखकर दो सेवकों के रूप में देखने समझने की मान्यता विकसित करनी चाहिए।
मनन का महत्व पूर्ण अंग है। विचारणा के इन क्षणों में यह योजना बनानी चाहिए कि अपनी हेय गति विधियों को कैसे छोड़ा जा सकता है। आदर्श महा मानव बनने के लिए क्या कदम उठाया जा सकता है? इस परिवर्तन का आरम्भ कैसे किया जाय और अन्त कहाँ किया जाय? इस प्रकार योजनायें बनाना और उन्हें कार्यान्वित करने के लिए मन को वैसा ही उद्बोधन देना चाहिए जैसा कि जामवन्त ने समुद्र लाँघने के लिये हनुमान को दिया था।
मनन की एक ही प्रक्रिया समझी जा सकती है। उसे दो खण्डों में विभक्त माना जा सकता है। इसके लिए सर्वोत्तम समय वह है जब प्रातःकाल आँख खुल जाती है और शैया त्यागने की तैयारी में थोड़ी देर करवटें बदली जाती हैं। आमतौर से लोग आँख खुलते ही शैया त्याग नहीं कर देते वरन् कुछ समय ऐसे ही उनींदे पड़े रहते हैं। यह समय सुविधा का है।
मनन इसी चिन्तन प्रवाह का पूरक है। अपनी मानसिक गति-विधियों और शारीरिक क्रिया कलापों का शवच्छेद विश्लेषण करना चाहिए और देखना चाहिए कि मनुष्यता के आदर्शों में से कितना अंश गुण, कर्म, स्वभाव में सम्मिलित हो गया। उपलब्धियों पर सन्तोष व्यक्त करना चाहिए और जो कमी दिखाई पड़े उन्हें पूरा करने के लिये क्या किया जाय? कैसे किया जाया? कब किया जाय?
मनन आदि से शुद्ध कर दिया जाय तो समाधान होने के बाद भी वह सदा उसी स्थिति में बना रहेगा ऐसी आशा नहीं की जानी चाहिए।
मनन, चिन्तन और समापन की गतिविधि उपासना पद्धति गुरु देव के प्रत्येक परिचित और संपर्क में रहने वाले को आरम्भ कर देनी चाहिए। इस प्रकार जोती हुई भूमि में उनके लिए उन विभूति वृक्षों का आरोपण सम्भव होगा जिनकी कि इन दिनों वे पौध तैयार कर रहे हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-November
मनन त्राण धर्माणो मन्त्राः
मनन और त्राण की शक्ति से सम्पन्न शक्ति का नाम मन्त्र है।
मननार्त्सव भावानाँ त्राणात्संसार सागरात्।
मनन किये जाने के कारण, प्राणों का उत्थान करने के कारण, मेरे रूप का ज्ञान उत्पन्न करने के कारण मेरा अनुष्ठान किये जाने के कारण मन्त्र मन्त्र बनते हैं।
मनन, चिंतन के आधार पर परिष्कृत करना, स्वाध्याय, सत्संग से सन्मार्गगामी बनाया जाना चाहिए वहाँ यह भी आवश्यक है कि उसके लिए आहार विहार की ऐसी व्यवस्था बनाई जाय जिससे वह स्वयं उच्छृंखलता छोड़कर शालीनता को स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाय।
मननात् प्राणनाञ्चैव मद्रू पस्याववोधनात् मन्त्र मित्युच्यते ब्रह्मन् यद्धिष्ठान तोपि वा।
मनन द्वारा जैसा मनोभाव प्राप्त किया है उसी के आधार पर अपने-अपने कर्मों के अनुसार कितने ही जीवात्मा देह धारणार्थ विभिन्न योनियों को प्राप्त होते हैं और अनेकों जीवात्मा अपने कर्मानुसार वृक्ष लता पर्वत आदि स्थलों पर पदार्थों के रूप को ग्रहण कर लेते हैं।
मनन और भावनायें तथा समस्त जगत- का त्राण करने वाली शक्ति का नाम मन्त्र है। वह मूल में एक होते हुए भी प्रयोग में अनेक हो जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-July
मनन किया जाना चाहिए उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए और अपनाया जानी चाहिए। शब्दाडम्बर के रूप में नहीं सचाई के साथ गहरी आस्था के रूप में ऐसा आसानी से किया जा सकता है। इसमें न तो कोई कठिनाई है न अड़चन, यह आशंका भी व्यर्थ है कि आदर्श वादी जीवन कठिनाइयों से भरा है। सादगी को अपनाने भर से सारा काम सहज ही चल जाता है और दृष्टि कोण में अन्तर आते ही सामान्य भौतिक गति-विधियाँ सरलता पूर्वक चलते हुए आत्मिक प्रगति का क्रम भली प्रकार चलता रह सकता है। गुरु देव इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
मनन और चिन्तन। इन्हें अपनाया जा सके तो जीवन का स्वरूप बदलेगा और अवसाद उत्कर्ष में परिणत होगा।
मनन चिन्तन से वह कुछ समय को हट जाती है पर अवसर पाते ही वह फिर जमा हो जाती है। एक बार के ज्ञानोदय को पर्याप्त नहीं मान लेना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-January
मनन और साधना समाधि तक के अगणित प्रयोग किये जाते रहते हैं। इस व्यावहारिक क्षेत्र को गायत्री उपासना-परा प्रकृति की साधना ही कहना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-October
मनन, निदिध्यासन द्वारा आत्मा को जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है। इसलिये जो ज्ञान इन्द्रियों के वेग को शान्त करने वाला है, वही ज्ञान है; उपनिषदों का यह निश्चित सिद्धान्त है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-February
मनन्दन प्रसाद सिंह ने गुरुदेव का परिचय कराया उन्हें पत्र लिखा। उत्तर बहुत ही सान्त्वना भरा हुआ और जल्दी ही ठीक होने का पक्का आश्वासन था। पत्र पाते ही स्थिति सुधरनी शुरू हुई और भला-चंगा होकर अपने कार्य में लग गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-August
मनन हमें नित्य ही एकान्त में करना चाहिए। मन के साथ वार्तालाप करने का नाम ही मनन चिन्तन है। उसी को स्वाध्याय सत्संग की उच्च भूमिका भी कहते हैं।
मनन चिन्तन है। उसी को स्वाध्याय सत्संग की उच्च भूमिका भी कहते हैं।
मनन से ही नहीं-आहार के साथ घुले हुए सूक्ष्म तत्वों का सन्तुलन बनाकर मनुष्य के सोचने का तरीका भी समुन्नत किया जा सकता है। इतना ही नहीं भावनाओं की दिशा भी बदल सकती है। अवाँछनीय दिशा में चल रही भाव विकृति को आहार शुद्धि के आधार पर मोड़ा और सुधारा जा सकता है। दुष्प्रवृत्तियों में लगे हुये दुर्भावना युक्त मनुष्य के अन्तःकरण को छुपाया जा सकता है और उनकी प्रवृत्ति-मनोवृत्ति में अभीष्ट परिवर्तन किया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-September
मनन-चिंतन करने से इसी की प्रेरणा हमें प्राप्त होती है।
मनन द्वारा व्यक्ति अपने आप भी अपने मानसिक स्तर को बढ़ाता है। इन दिनों मस्तिष्कीय विज्ञानवेत्ताओं का शोधकार्य यह चल रहा है कि परंपरागत मंथर उपायों के अतिरिक्त कुछ ऐसे उपाय प्राप्त किए जाएँ; जिनमें मस्तिष्कीय स्थिति में अभीष्ट परिवर्तन तुर्त-फुर्त किया जा सके आज इस स्तर की गतिविधियाँ जो अपनाने हुए हैं, वह कल दूसरी तरह की स्वेच्छापूर्वक अपना लें। आज के डाकू को कल संत बनाया जा सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-April
मनन के चारों प्रयोग उपचार इसी एक आवश्यकता की पूर्ति में नियोजित किये जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-February
मनन। चिंतन को आत्मसमीक्षा और आत्मसुधार कह सकते हैं। उसे वस्तुतः तपश्चर्या की, संयम-अनुशासन अपनाने की पृष्ठभूमि कहना चाहिए। मनन को आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास की पृष्ठभूमि कहना चाहिए। क्षुद्रता को, महानता के साथ जोड़ देना ही योग है।
मनन के चार प्रयोजनों में निरत रहना पड़ता है। नित्यकर्म उपासना के अतिरिक्त जो भी समय खाली मिले उसमें इन्हीं चार प्रयोजन में मन को लगाए रहना पड़ता हैं। इन चारों का लक्ष्य एक ही हैं— आत्मपरिष्कार। उज्ज्वल भविष्य का योजनाबद्ध निर्धारण। इसके लिए आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास के चार प्रसंगों पर गंभीरतापूर्वक समुद्र-मंथन जैसा आत्मचिंतन करते रहना होता है।
मनन को आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास की पृष्ठभूमि कहना चाहिए। क्षुद्रता को, महानता के साथ जोड़ देना ही योग है। इस उद्देश्य के लिए कामना को भावना में, तुच्छ को महान में, सीमित को असीम में परिवर्तित करना होता है। यही योग है। उसमें अपनी आस्थाएँ, आकांक्षाएँ एवं चिरसंचित आदतें किस प्रकार उच्चस्तरीय बन सकें, इसका निर्धारण एवं कार्यान्वयन करना होता है।
मनन का उपक्रम जारी रखा जा सकता है। चिंतन का विषय है—आत्मशोधन, मनन का उद्देश्य है— आत्मपरिष्कार। दोनों को एकदूसरे का पूरक कहना चाहिए। मलत्याग करने के उपरांत की पेट खाली होता है, तभी भूख लगती है और भोजन गले उतरता है। धुलाई के उपरांत रंगाई होती है।
मनन के लिए सतत मंथन के अतिरिक्त एक घंटा नित्य अलग से निकाल लिया जाए, जिसमें मात्र आत्मसमीक्षा, सुधार, निर्माण व विकास की प्रक्रिया में ही निरत रहा जाए। इसके अतिरिक्त भी कभी भी खाली रहने या काम करते रहने की स्थिति में यह चिंतन−मनन का उपक्रम जारी रखा जा सकता है। चिंतन का विषय है—आत्मशोधन, मनन का उद्देश्य है— आत्मपरिष्कार। दोनों को एकदूसरे का पूरक कहना चाहिए। मलत्याग करने के उपरांत की पेट खाली होता है, तभी भूख लगती है और भोजन गले उतरता है।
मनन, इसी के अंग हैं।
मनन , श्रवण−स्वाध्याय ज्ञानयोग की साधना के अंतर्गत आता है। कथा, सत्संग, प्रवचन इसी उद्देश्य से सुने भी जाते हैं; पर ये तो मात्र निर्देश हैं, दिशा में चलने के संकेत भर हैं, जीवन की दिशा निर्धारित करने के आधार नहीं। मस्तिष्क को वांछित प्रवाह में चलने देने के लिए अवतारों के, ऋषियों के–महामानवों के विचारों व चरित्र का अवलोकन–श्रवण–स्वाध्याय के माध्यम से करके हम अपनी मनःस्थिति को उत्कृष्टतापरायण बना सकते हैं। विचार संस्थान हमेशा परिष्कृत−पवित्र−विधेयात्मक चिंतन से युक्त हो, यही लक्ष्य रहे। अपनी मानसिक हलचलों का सूक्ष्मदृष्टि से अध्ययनकर यह सतत देखा जा सकता है कि अवांछनीय प्रवाह का दमन व दिव्य चिंतन का अनुसरण कितना हो पा रहा है।
मनन का उद्देश्य है— आत्मपरिष्कार। दोनों को एकदूसरे का पूरक कहना चाहिए। मलत्याग करने के उपरांत की पेट खाली होता है, तभी भूख लगती है और भोजन गले उतरता है। धुलाई के उपरांत रंगाई होती है। नींव खोदने पर ही दीवार चुनी जाती है।
मनन के माध्यम से ही बनती है।
मनन पल−पल चले। तभी नित्य की क्रियाओं में साधना अपना चमत्कार दिखाने लगेगी। अपने क्रियाकलापों में वे सारी उपलब्धियाँ साकार होती दिखाई देने लगेंगी जिनकी चर्चा आप्त वचनों व शास्त्रों में की गयी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-June
मनन और चिन्तन। इन दिनों की— विशेषतया आज की अपनी स्थिति का पर्यवेक्षण मनन हो और भूलों को सुधारने अभीष्ट को अपनाने के लिए अगले दिन का कार्यक्रम बनाना—चिन्तन। संक्षेप उसे सामयिक आत्म समीक्षा और प्रगति चेतना का ताना− बाना बुनना कहा जा सकता है। इतना करते हुए निद्रा की—प्रज्ञा की गोद में सो जाने का नित्य नियम अपनाना चाहिए। यह न्यूनतम है।
मनन हो और भूलों को सुधारने अभीष्ट को अपनाने के लिए अगले दिन का कार्यक्रम बनाना—चिन्तन। संक्षेप उसे सामयिक आत्म समीक्षा और प्रगति चेतना का ताना− बाना बुनना कहा जा सकता है। इतना करते हुए निद्रा की—प्रज्ञा की गोद में सो जाने का नित्य नियम अपनाना चाहिए। यह न्यूनतम है। इसमें स्नान का, समय का, उपचार सामग्री का कोई बन्धन नहीं है।
मनन चिन्तन की आदत डालनी होगी।
मनन और चिन्तन की निदिध्यासन को आवश्यक माना गया है। हर दिन सूर्योदय से पूर्व या सूर्यास्त के बाद—जब चित्त शान्त एकान्त हो तब अपने अन्तरंग बहिरंग स्थिति का लेखा−जोखा लेना चाहिए, और भूलों को सुधारने, कमियों को पूरा करने तथा भावी प्रगति के लिए जो कदम उठाने आवश्यक हैं उनका दूरगामी एवं सामयिक निर्धारण करना चाहिए। निर्धारण ऐसा होना चाहिए जो वर्तमान स्थिति बिना समय गँवाये कार्यान्वित हो सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-December
मनन और (3) चिन्तन कहा जा सकता है। इन्हें त्रिपदा गायत्री के भावपक्ष के तीनचरण कहा जा सकता है।
मनन, (3)चिन्तन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समग्र साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अंग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाय तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार जीवन के लिए भजन, मनन और चिन्तन का सूक्ष्म आहार, प्रस्तुत करना पड़ता है।
मनन और चिन्तन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए तथा उपासनात्मक कर्मकाण्ड के साथ−साथ इस भाव साधना को भी चलाना चाहिए। गायत्री महामन्त्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही सम्भव होती है और इसी के परिणाम स्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका महात्म्युत वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया गया है।
मनन का दूसरा अर्थ है−आत्मबोध। अपना वास्तविक स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, शरीर और आत्मा का सम्बन्ध, श्रेय और प्रेय में से एक का चुनाव—अपनी गतिविधियाँ और रीति−नीतियों का सुनियोजित निर्धारण जैसे अनेक महत्वपूर्ण निर्णय इसी केन्द्र पर टिके हुए हैं कि आत्मबोध हुआ या नहीं। यह चेतना जब तक जगेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचण्ड ही बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की प्रबलता उभरी ही रहेगी, माया पाश के भव−बन्धनों से छुटकारा मिलेगा ही नहीं, फलतः व्यथा वेदनाओं में झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा भी नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन का उद्देश्य और आनन्द हाथ से चला गया।
मनन चिन्तन को उभारते थे—स्वाध्याय सत्संग की योजना बनाते और जन−मानस के परिष्कार को ध्यान में रखते हुए लोक−शिक्षण में लगे रहते थे। ऋषि उन्हें कहा जाता था जो काय सत्ता को चेतना क्षेत्र की एक सर्व सम्पन्न प्रयोगशाला मानते थे और उसमें मूर्धन्य वैज्ञानिकों की तरह शोध अनुसन्धान—प्रयोग परीक्षण में लगे रहते थे। वे व्यक्तित्व की प्रसुप्त क्षमताओं को जगाने के क्षेत्र में गहरी डुबकी लगाते और बहुमूल्य मणि मुक्तक बीन कर लाते थे। जबकि मुनियों का प्रयास दूरदर्शी विवेकशीलता—सभ्य सुसंस्कारिता को लोक प्रचलन में समाविष्ट किये रहने के प्रयत्नों में निरत रहना होता था। लेखनी और वाणी की शक्ति वे इसी निमित्त करते थे।
मनन और चिन्तन का सूक्ष्म आहार, प्रस्तुत करना पड़ता है। अन्तःकरण की स्वस्थता, प्रखरता, परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीन आधारों पर ही निर्भर है। गायत्री महामन्त्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को कहा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-July
मनन के चार आधार अपनाने पड़ते हैं। एकाग्रता, मेडीटेशन, ध्यान योग के अंतर्गत यह प्रयोजन भी जुड़े रहते हैं अन्यथा मन को एक कल्पना तक देर तक रोके रहने से योगाभ्यास का वह उद्देश्य पूरा न हो सकेगा जिसके आधार पर आत्म−सत्ता की आत्मिकी को प्रयोगशाला के रूप में परिणित करने की सम्भावनाओं को साकार किया जाना है।
मनन को न केवल मस्तिष्क ही प्रभावित करता है वरन् इससे भी आगे एक शक्ति की सम्पूर्ण जानकारी तो नहीं मिल पायी है लेकिन यह निश्चित है कि मृत्यु के बाद भी उस चेतना का अस्तित्व तना रहता है।”
मनन कहलाता है। योगाभ्यास की ध्यान योजना के अंतर्गत आत्म−समीक्षा, आत्म−परिष्कार, आत्म−निर्माण, आत्म−विकास की सुविस्तृत रूपरेखा खड़ी करना तथा उसे सफल बनाने के लिए कटिबद्ध होना प्रमुख कार्य है। इसी के निमित्त साधना, स्वाध्याय, चिन्तन, मनन के चार आधार अपनाने पड़ते हैं। एकाग्रता, मेडीटेशन, ध्यान योग के अंतर्गत यह प्रयोजन भी जुड़े रहते हैं अन्यथा मन को एक कल्पना तक देर तक रोके रहने से योगाभ्यास का वह उद्देश्य पूरा न हो सकेगा जिसके आधार पर आत्म−सत्ता की आत्मिकी को प्रयोगशाला के रूप में परिणित करने की सम्भावनाओं को साकार किया जाना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-August
मनन करो। इस श्रुति के अनुसार प्रयत्नपूर्वक उस आत्मा की ही सेवा करनी । वह बंधनों से छुड़ाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-October
मनन, पूजन, भजन तक सीमित न रहकर कुछ ऐसा करने के लिए भी कहा जाना चाहिए, जिसमें उसे श्रम करना और सहयोग देना पड़ता हो। यही प्रज्ञा अभियान में सम्मिलित होने का व्रत-धारण है। प्रज्ञापरिजनों को इस देव परिवार का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम एक घंटा समय और दस पैसा नित्य की अपने क्षेत्र में रचनात्मक प्रवृत्तियों को गतिशील बनाने के लिए नियमित रूप से देना होता है। इससे कम में किसी को प्रज्ञापरिजन कहलाने का अधिकार नहीं मिलता। यह समय अपने समीपवर्त्ती क्षेत्र में मिशन की बीससूत्री योजना में लगाना पड़ता है।
मनन के रूप में विकसित किया जाए और फिर किसी भाव-भरे निष्कर्ष-निर्धारण पर स्वेच्छापूर्वक पहुँचा जा सके, साधना के माध्यम से ऐसी संकल्पशक्ति उभरती है कि वह उत्कृष्टता का न केवल पक्ष-समर्थन करे; वरन उसे आत्मसात करने, जीवन व्यवहार में उतारने के लिए आवश्यक श्रद्धासिक्त साहसिकता भी उभार सके। सूत-सौनिक की कथा-पुराणशैली की तरह साधना के साथ योग वाशिष्ठ को हृदयंगम कराने वाले तीर्थसेवन को भी समान महत्त्व मिलता था। इन दिनों भी पुरातन सतयुग की वापसी के लिए उन चिर परीक्षित प्रयोगों की आज की आवश्यकता एवं प्रक्रिया के साथ नए सिरे से पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। यही प्रयोजन प्रकारांतर से घरेलू संस्कार-प्रक्रिया एवं गाँव-मुहल्ले की पर्व परिपाटी के साथ भी भली प्रकार निभाना है। जन्म-दिवसोत्सव, विवाह-दिवसोत्सव, विद्यारंभ, उपनयन, वानप्रस्थ आदि वैयक्तिक संस्कारों के कर्मकांड-पद्धति में वे तत्त्व विद्यमान हैं जो उस छोटे आयोजन को पारिवारिक ज्ञान-गोष्ठी में परिणत कर सके और वातावरण के धार्मिक होने के कारण उपस्थित लोगों को आदर्शवादिता के पक्ष में सहमत कर सके।
मनन-चिंतन के माध्यम से हृदयंगम करने वाले तदनुकूल वातावरण और तप-साधना का समन्वय भी साथ-साथ चलना चाहिए। यह प्रयोग शान्तिकुञ्ज की गायत्री तीर्थ के रूप में विकसित करके कल्प-साधना सत्रों के रूप में वह प्रयोग चल रहा है, जिसमें सम्मिलित होने वाला जीवन-दर्शन बदल सके। भविष्य के लिए आदर्शवादी निर्धारण साथ लेकर वापस लौट सके। प्राचीनकाल में मात्र तीर्थयात्रा ही नहीं होती थी, उस प्रयास का तीर्थसेवन प्रमुख अंग था, जिसका अर्थ था तेजस्वी वातावरण में, मनस्वी-ऋषियों के संरक्षण में, साधना के साथ-साथ उत्कृष्टता को आत्मसात करना। इन दिनों तो पर्यटकों की भगदड़ ही तीर्थयात्रा के ध्वंसावशेषों का परिचय देती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-March
मनन एवं शास्त्रज्ञों का सत्संग इसी निमित्त किया जाता है। यह अध्यात्म विद्या का तत्वदर्शन वाला पक्ष हुआ जिसमें मान्यताओं की श्रद्धा−तर्क के आधार पर मान्यताओं से काट की जाती है।
मनन को सूक्ष्म ज्ञानयोग तथा व्रतोपवास के अनुशासन को कर्मयोग कहा जाता है। इस समन्वय में तीनों शरीरों को परिष्कृत करने वाली तीन प्रकार की विधि-व्यवस्था के अंतर्गत समूचे
मनन− स्वाध्याय द्वारा साफ कर लिया तो सदा वह वैसा ही बना रहेगा, ऐसी आशा निरर्थक है। अभी आकाश साफ है। उस पर कब आँधी, कुहासा धूलि−बादल छा जायेंगे प्रकृति कब कुपिता हो जाएगी कहा नहीं जा सकता। अन्तरात्मा पर निरन्तर छाते रहने वाले इन मलिन आवरणों की सफाई के लिये उपासना की नित्य निरन्तर आवश्यकता पड़ती है ईश्वरीय गुणों का समावेश अपने चिन्तन व्यवहार में इससे कम में हो ही नहीं सकता। आग के समीप बैठे बिना गर्मी आये कैसे?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-May
मननचिन्तन की निर्धारित दिशाधारा में विक्षेप न पड़े।
मनन के सहारे भविष्य निर्धारण का निश्चय जिसमें जुड़ा हुआ हो उसी को तीर्थसेवन कहा गया है। शास्त्रों में उसी के पुण्यफल की चर्चा है। प्रतिमा−दर्शन, जल, स्नान, और लुटेरों जैसी भगदड़ से तो तीर्थ पुण्य तो दूर, पर्यटन का मनोरंजन भी पूरा नहीं होता। प्रस्तुत परिजन−सत्र की अवधि तो कम है पर उनमें उन तथ्यों का समुचित समावेश किया गया है जिन्हें यदि ठीक तरह समझा जा सके तो अन्तराल में ऐसा बीजारोपण हो सकता है जिसे कल्पवृक्ष की उपमा दी जा सके। प्राचीन काल के तीर्थों में गुरुकुल, तीर्थ−परायण और आरण्यक–यह तीन उपक्रम चलते थे।
मनन।
मनन क्षेत्र की अवाँछनीयता को हटाने की भूमिका निभाते हैं। लययोग, प्राणयोग से परब्रह्म के साथ एकात्म सधता है। और द्वैत से अद्वैत की ओर अन्तराल की उन्मुखता, गतिशीलता में तीव्रता उत्पन्न होती है। इस त्रिविधि, त्रिवेणी, संगम में तीर्थराज के अवगाहन का वह पुण्यफल मिलता है जिसे रामायणकार ने कौए को कोयल, बगुले को हंस बनने की उपमा दी है। प्रकारान्तर से यह आन्तरिक कायाकल्प का ही अलंकारिक संकेत है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-November
मनन में दूसरे के साथ रहने से किसी प्रकार का विक्षेप हो प्रातःकाल की नादयोग साधना और अपने ही कमरे में मार्गदर्शक का नियमित प्रवचन-उद्बोधन सुनने का लाभ भी एकान्त में, एकाग्र होने पर ही मिलता है। इसलिए ही साधकों को एक कमरा दिया जाता है। भले ही वह साइज में 10&10 का ही क्यों न हो।
मनन का प्राधान्य है। कल्प साधकों को इन तीनों ही उपक्रमों को समान महत्व देते हुए नियमित रूप से भावनापूर्वक सम्पन्न करने के लिये कहा जाता है। परिणति स्वरूप इनसे उन विभूतियों का प्रत्यक्ष रसास्वादन होने लगता है जो अध्यात्म मार्ग पर सही रूप से संकल्पपूर्वक चलने वालों को मिलना चाहिए।
मनन को परिष्कृत प्रखर और प्रगाढ़ बनाना भी आवश्यक है। कल्प साधना की अवधि में तीन दृश्य आँखों के सामने घूमते रहने चाहिए। इनमें एक है-भवसागर में डूबना, मगरमच्छों द्वारा निगलकर उदरस्थ किए जाने से पूर्व नौका पर अवस्थित महाप्रज्ञा द्वारा उबार लिया जाना। दूसरा है-हाथ में हथकड़ी, पैरों में बेड़ी, गले में लौह जंजीर की जकड़न, बढ़ने और करने में असमर्थता, दिव्य लोक से चक्र सुदर्शन का उतरना और उन बन्धनों को काटकर भव-बन्धनों से मुक्त कर देना। तीसरा है-सघन अन्धकार को छोड़कर उत्कृष्टता के चरम लक्ष्य प्रकाश केन्द्र तक पहुँचने वाली सीढ़ी पर एक− एक कदम उठाते हुए ऊपर उठना, आगे बढ़ना।
मनन का समय कहना चाहिए। यह बिस्तर पर पड़े-पड़े भी हो सकता है। हर साधक का निवास स्वतन्त्र कमरे में रहता है। पति-पत्नी साथ हैं तो भी उन्हें पृथक्-पृथक् कमरों में रहना पड़ता है। यह व्यवस्था इसीलिए बनी है कि साधना, स्वाध्याय, चिन्तन, मनन में दूसरे के साथ रहने से किसी प्रकार का विक्षेप हो प्रातःकाल की नादयोग साधना और अपने ही कमरे में मार्गदर्शक का नियमित प्रवचन-उद्बोधन सुनने का लाभ भी एकान्त में, एकाग्र होने पर ही मिलता है।
मनन भविष्य का होता है पिछले दिनों स्तर का समय बीता? कितना खाया पाया? इसका पर्यवेक्षण अपने को आत्मा मानकर करना चाहिए। शरीर मानकर इस प्रकार का विहंगावलोकन सम्भव नहीं। शरीर तो मात्र साधनों की न्यूनाधिकताओं, व्यक्ति यों की भली-बुरी गतिविधियों का और प्रभाव छोड़ने वाली घटनाओं के ऊहापोह में ही उलझा रहता है।
मनन। इन चारों को चारपाई के चार पाये कहा जात सकता है। हाथ, पैर, धड़, सिर-इन चार भागों में शरीर विभक्त है। इसी प्रकार आत्म-निर्माण के लिए भी इन चारों का मनोयोग के साथ अवलम्बन करना पड़ता है। एकान्त एक कमरे की व्यवस्था इसी के लिए बनी है कि साधकों को उपयुक्त वातावरण में उपयुक्त अभ्यास करने में सुविधा रहे।
मनन तभी सार्थक है जब उससे विगत के प्रमाद की भरपाई करने के लिए चौगुने, सौगुने पराक्रम की उमंगें उभरें। इस एक मास की अवधि में चिन्तन तो दो चार दिन का ही पर्याप्त हो सकता है। शेष 26 दिन एक ही योजना बनानी चाहिए कि जिन आदर्शवादी प्रेरणाओं का यहाँ माहौल है। उनका अवधारण-कार्यान्वयन कैसे सम्भव हो। उसके लिए किस क्रम में क्या कदम उठाये जाने चाहिए और उस निर्धारण में जो आन्तरिक प्रमाद तथा बाह्य व्यवधान आड़े आने वाला है उससे कैसे निपटा जाना चाहिए।
मनन में उपयोग। यही है-त्रिविधि सोपानों वाला प्रज्ञायोग। यह संक्षिप्त होते हुए भी अति प्रभावशाली एवं समग्र है। अपने अस्त-व्यस्त बिखराव वाले साधना क्रम को समेटकर इसी केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित करना चाहिए। महान के साथ अपने क्षुद्र को जोड़ने के लिए योगाभ्यास का विधान है।
मनन में लग सके तो और भी अच्छा। इस सुयोग से हिमालय की शक्ति धारा को साधक की आत्म सत्ता में गहराई तक प्रवेश करने और रोम-रोम में रम जाने का अवसर मिलता है। यह साधना एकाकी भी हो सकती है और टेप रिकार्डर की सहायता से सामूहिक भी।
मनन योग्य है।
मनन, चिन्तन, ध्यान, धारणा आदि का स्वरूप एवं प्रयोग भी तो इसके बिना बन नहीं पड़ता। इसलिए गुरु ज्ञान द्वारा उच्चस्तर की प्रेरणाएँ उपलब्ध करनी होती हैं। इसके लिए समर्थ साहित्य का स्वाध्याय इतना अधिक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है कि उसे शास्त्रकारों ने भजन पूजन से भी अधिक आवश्यक माना है और सर्वोपरि प्रमुखता देने योग्य ठहराया है। ब्रह्मदान, ज्ञानदान से बढ़कर और कोई पुण्य परमार्थ इस संसार में है नहीं इसलिए पुरातन काल के देव मानव साधु ब्राह्मण इस प्रयोजन में अहर्निश निरत रहते थे।
मनन में नियोजित रखना चाहिए। चिन्तन भूतकाल का और मनन भविष्य का होता है पिछले दिनों स्तर का समय बीता? कितना खाया पाया? इसका पर्यवेक्षण अपने को आत्मा मानकर करना चाहिए। शरीर मानकर इस प्रकार का विहंगावलोकन सम्भव नहीं।
मनन, चिन्तन का समर्थ तन्त्र खड़ा करके संचित कषाय-कल्मषों का निष्कासन एवं उच्चस्तरीय आस्थाओं का प्रतिष्ठापन किया जाता है। इस प्रकार इस आरम्भिक सोपान को भी निर्धारण की दृष्टि से पूर्णता युक्त कहा जा सकता है।
मनन− चिन्तन, संयम तपश्चर्या आदि से किसकी शारीरिक, मानसिक स्थिति में क्या अन्तर पड़ा। पिछले साधना सत्रों में अधिकाधिक साधक सात्विक आहार की फलश्रुति अपने जीवन क्रम में प्रत्यक्ष देखकर गये। उनकी इन्द्रिय चेतना, स्फूर्ति और मस्तिष्कीय क्षमता में असाधारण वृद्धि हुई।
मनन के आधार पर किया जाता है और प्रयोग पक्ष के लिए योगाभ्यास एवं तपश्चर्या के विधि-विधानों का आश्रय लेना पड़ता है। कल्प साधना की प्रक्रिया में जहाँ संयम साधने विवेक अपनाने की शिक्षा दी जाती है वहाँ श्रद्धा उभारने वाली साधनाओं का भी समुचित समावेश रखा गया है। इन्हीं तत्वों का सुनियोजित समावेश रखा गया है। इन्हीं तत्वों का सुनियोजित समावेश कल्प साधना की प्रशिक्षण प्रक्रिया में किया गया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-January
मनन के सहारे आत्मसुधार और आत्मविकास का प्रयोजन कर सके, उनके लिए वस्तुपरक एवं क्रियापरक कर्मकांडों का आश्रय लेना ही उपयुक्त पड़ता है। अपने दोष-दुर्गुणों को ढूँढ़ निकालना और उन्हें सुधारने तक आत्मशोधन तक की साधना में निरत रहना होता है। विचारों से विचारों को काटने की प्रणाली अपनानी पड़ती है; पर इस सबके लिए बलिष्ठ मनोबल चाहिए। उसमें कमी पड़ती हो तो वस्तुओं से, वातावरण से, सहयोग से एवं क्रियाओं में सुधार कार्य को अग्रगामी बनाना पड़ता है। धार्मिक कर्मकांडों की संरचना इसी निमित्त हुई है कि उन हलचलों को प्रत्यक्ष देखते हुए आधार-अवलंबन अपनाकर साधक अपनी श्रद्धा को परिपक्व कर सके।
मनन के रूप गहराई तक, अधिक गहराई तक हृदयंगम करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-March
मनन द्वारा ही उत्पन्न होती है। दिव्य प्रेरणाएं हृदय देश से भी उभरती हैं। ईश्वरीय संदेश वहीं मिलते हैं और वहीं से अविज्ञात प्रकृति रहस्यों की जानकारियाँ हस्तगत होती हैं। जिन वैज्ञानिकों ने अद्भुत आविष्कार किये हैं उनसे पूछा गया कि ऐसा अनोखा विचार आपको कैसे हस्तगत हुआ तो उनमें से प्रत्येक ने यही कहा कि “यह भीतर से उभरा” भीतर से शब्द से उनका तात्पर्य मस्तिष्क से नहीं, वरन् अन्तराल में उभरने से है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-December
मनन और आप्त जनों के परामर्श से यह निष्कर्ष निकाला, कि जीवनचर्या में आदर्शों का समावेश और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन की सेवा साधना ही सच्चे आध्यात्म का प्रयोजन पूरा करती है। वे सीमित उपासना का क्रम बनाकर शेष समय लोक साधना में लगाने लगे।
मनन। अपनी समस्याओं का कारण एवं निदान तलाश करने पर अपने आप भी मिल सकता है। सत्य तो यह है कि अपनी समस्याओं के संबंध में दूसरा कोई इतनी अच्छी तरह जान नहीं सकता जितना कि हम स्वयं जानते हैं। पर पक्षपात, पूर्वाग्रह की एक परत मन-मस्तिष्क पर ऐसी जमी होती है जो अपने को सदा निर्दोष बताती रहती है। जो विग्रह या संकट हैं, उनके दोष दूसरों पर मढ़ती रहती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-November
मनन यह चार संस्कार मन पर रगड़ाई करने एवं कलई चढ़ाने के काम में लाये जाते हैं। प्रत्याहार वस्तुतः अवाँछनीयता विरोधी है, जिसके लिए सद्विचारों का सत्प्रवृत्तियों का- नीति मर्यादाओं का- अवगाहन करना पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-July
मननयुक्त होता है। समझ-बूझकर अंतिम उपाय के रूप में उपयोग में लाया जाता है। अस्वस्थ क्रोध में मनुष्य को सोचने-विचारने की शक्ति नहीं रहती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-August
मनन में डूब गये?”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-June
मनन की भी। अनौचित्य की हानियों को जितने विस्तार सहित सोचा जा सके। उन्हें अपनाने पर जिन्हें जो संकट सहना पड़ा है। उसका चित्र इतना स्पष्ट होना चाहिए कि उस दिशा में कदम बढ़ाना आग से खेलने के समान भयावह प्रतीत होने लगे। ठीक यही बात औचित्य के समर्थन के लिए भी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-April
मनन भी ऊंचे स्तर का कर सकेगा। उसके द्वारा अन्यान्यों को भी ऊंचे स्तर का परामर्श एवं सहयोग मिलेगा। इन्हीं कसौटियों पर कसकर यह देखा जा सकता है कि किसका व्यक्तित्व किस स्तर का है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-May
मनन, के उपायों को अन्तःचेतना के अभिवर्धन में सहायक माना गया है। पर यह बाह्य प्रयोग ही पर्याप्त नहीं है। उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने वाले जिस आन्तरिक उल्लास की आवश्यकता है उसमें सूर्याराधना विशेष रूप से सहायक होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-March
मनन क्यों नहीं किया? क्या तुम्हें पातंजलि का योग सूत्र एवं गीता का “समत्वं योग उच्यते” वाला तत्त्वदर्शन यह नहीं सिखाता कि आत्मिक संपदा से संपन्न विभूतिवान को किसी प्रकार की राजकृपारूपी भिक्षा नहीं चाहिए। तुम्हारा आत्मसम्मान, अन्दर का ब्राह्मणत्व तो इस ज्ञान से और भी प्रखर होना था। किंतु तुम तो उसे भी गिरा बैठे।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-June
मनन करने की इसकी नियामक सत्ता, निर्माता और पालनकर्ता का ध्यान आये बिना नहीं रहता। कैसा अखण्ड अनुशासन है कि एक ही मिट्टी से ईख मिठास, मिर्च कड़ुवाहट और करौंदा खटास प्राप्त करता है? मिट्टी को चखिए। उसमें इस प्रकार का कोई रस कोई स्वाद आपको नहीं मिलेगा। उसमें इस प्रकार का कोई रस कोई स्वाद आपको नहीं मिलेगा।
मनन का उद्देश्य रहे-भावी गतिविधियों को सत्प्रवृत्तियों में सुनियोजित करने की उमंग भरी विचारणा रहनी चाहिए।
मनन की प्रक्रिया में अधिकाधिक समय लगाना चाहिए। चिन्तन का प्रयोजन होना चाहिए परिशोधन और मनन का उद्देश्य रहे-भावी गतिविधियों को सत्प्रवृत्तियों में सुनियोजित करने की उमंग भरी विचारणा रहनी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-August
मनन्तमपारं विज्ञान घन एवं (2/4/12) अर्थात्-”यह महद्भूत, महान सत्ता (व्यष्टिगत ब्राह्मी सत्ता) अनन्त और अपार है। वह केवल विज्ञान या चित् का घनत्व है।” वेदों में जिस शक्ति को “ज्योतिषाँ ज्योतिः कहा गया है, वह यही विद्युत तत्त्व है जो अपना परिचय कभी संकल्प बल के रूप में, कभी प्रचण्ड जिजीविषा के रूप में, कभी प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने वाले अग्नि के दहकते शोलों के रूप में देता रहता है। इस महाशक्ति का यदि सुनियोजन सोचा जा सके एवं नष्ट होने से बचा कर प्रसुप्त पड़ी सामर्थ्य को जगाने में उसका सदुपयोग हो सके तो मनुष्य अपरिमित शक्ति का स्वामी हो सकता है। अपनी जागृत सामर्थ्य से वह ऋद्धि-सिद्धियों को करतलगत कर अपनी आत्मिक प्रगति का तथा समष्टि के कल्याण का पथ प्रशस्त करता रह सकता है।
मनन-चिंतन की भी आवश्यकता पड़ती है। इन्हें व्यक्ति स्वयं भी जुटा सकता है। आवश्यक नहीं कि इस संदर्भ में दूसरों की सहायता अनिवार्य ही हो। सद्ज्ञान-स्रोतों की कमी नहीं, उनके साथ संबंध जोड़ने के लिए उत्सुक व्यक्ति गई गुजरी स्थितियों में भी अवसर प्राप्त कर लेते हैं, जिनके सहारे वह विज्ञजनों की पंक्ति में बैठ सकें। सभ्य और सुसंस्कृत रहना सीखें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-April
मनन द्वारा प्राप्त होती है, जिसके लिये आत्मनिरीक्षण करना होता है। ब्रह्मविघा का अवलंबन लेना पड़ता है। सत्यासत्य के बीच अंतर करने एवं सत्यावलम्बन के लिए प्रेरित करने वाली बुद्धि का नाम ही विद्या है।
मनन्त शक्तिं
मनन किया है उनके लिए असमंजस खड़ा होता है।  एक संप्रदाय से दूसरे की पटरी नहीं खाती। कभी-कभी तो थोड़ा-बहुत ही अंतर होता है, किंतु कभी-कभी मतभेद जमीन-आसमान जितना हो जाता है। भक्तिपंथी राधा-कृष्ण के गुणानुवाद गाते-गाते नहीं थकते और उस स्मरण में भावविभोर हो जाते हैं; पर जो बौद्ध हैं; सांख्यवादी हैं, वे ईश्वर के अस्तित्व से ही इंकार करते हैं। बौद्ध और जैन धर्म की ऐसी ही मान्यता है।
मनन्तफलं भवेत्“।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-November
मनन भी है। विशुद्ध तक और तथ्य के आधार पर भी यह सिद्ध किया जा सकता है कि पवित्रता और प्रखरता यह दो अवलंबन ऐसे है, जिनसे प्रामाणिकता उभरती है।
मनन चिन्तन करते है। और जो पढ़ा समझा है, उसे जीवनचर्या में उतारने का सामर्थ्य भर प्रयत्न करते हैं।
मनन और अध्ययन-अवगाहन के मानसरोवर में उतर कर हंसों की तरह मोती बीनने पड़ते हैं। हंस तो अपना-अपना ही पेटी भरते हैं, पर यहाँ उससे बढ़ बढ़ कर काम करना पड़ता है। यह मणि मुक्तक वितरण करने जैसे प्रक्रिया है, जिससे अनेकों को सुसज्जित समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाया जा सके। यही है वह प्रयत्न जिसमें राजहंस की तरह अखण्ड ज्योति के प्रयास पिछले 51 साल से अनवरत तत्परता के साथ चले आ रहे हैं। इसका परिणाम भी आशातीत हुआ है।
मनन और अध्ययन अवगाहन में संलग्न व्यक्ति बहिरंग व्यवस्था बना सकने में अवकाश उपलब्ध करते हैं और उससे प्रचार तंत्र संभाल सकना संभव ही होता है। फिर पाँच सौ से आरम्भ होने वाला तंत्र अढ़ाई लाख ग्राहकों और पच्चीस लाख पाठकों समेत लगभग सत्ताईस लाख जितना कैसे बन गया? उसकी प्रेरणाओं ने वंशवृद्धि की तरह किस प्रकार लाखों करोड़ों की विचारणा और दिशाधारा में किस प्रकार कायाकल्प जैसा चमत्कार उत्पन्न किया? इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक ही है- इस सोमपान की रसास्वादन जिनने किया, उनने उस महाप्रसाद से अन्यान्यों को भी उपलब्ध कराने का प्राणपण से प्रयत्न किया। यही है मिशन के विकास में महती भूमिका संपन्न करने वाली प्रक्रिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-December
मनन-चिंतन का प्रतीक मानना चाहिए। ईश्वर प्रार्थना, भजन, कीर्तन, प्रवचन, मंत्र-जप आदि जीभ से ही होते हैं। यदि जिव्हा का परिशोधन हो चुका है तो उपरोक्त सभी कार्य ठीक प्रकार बन पड़ेंगे और अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करेंगे। यदि जिव्हा कुधान्य खाने और कुसंस्कारिता के दुर्गुणों की अभ्यस्त, है तो फिर समझना चाहिए कि साधना-प्रयोजन के लिए जिव्हा माध्यम से जो कुछ किया गया है, वह सभी निरर्थक चला जाएगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-October
मनन, चिन्तन करना चाहिए, जिसमें कहा गया है कि मनुष्य को परमात्मा में आत्म सता को समर्पित करके अपनी स्थिति अद्वैतवत् बनानी चाहिए। अपने गुण, कर्म, स्वभाव में से दोष दुर्गुणों का पूरी तरह निष्कासन करना चाहिएं परमेश्वर श्रेष्ठताओं का समुच्चय है। हमें वैसा ही बनना चाहिए। भीतर से भी और बाहर से भी।
मनन चिन्तन किया हो, आचरणों में भावनाओं में उत्कृष्टताओं का भरपूर समावेश रखा हो साथ ही साधना विधान के हर पक्ष को भली भाँति समझा हो। ऐसे मार्गदर्शकों के अभाव में साधक के सामने यह कठिनाई आती है कि वह स्थूल शरीर के परिमार्जन हेतु मंत्र साधना का उपयोग किस प्रकार करे? द्विविधा से किस प्रकार मुक्ति पाये? सरल और सीधे मार्ग पर किस प्रकार चल सकें?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-January
मनन चिन्तन के आत्म निर्माण करने वाले तरीके भी हो सकते हैं मनःस्थिति भी परिस्थिति बनाती हैं पर आध्यात्मिक उपचारों में ऐसी प्रतिभा प्राप्त करने के लिए प्राणायाम प्राणाकर्षण जैसे उपचार भी है। उन उपचारों में सबसे ऊँची प्रक्रिया कुण्डलिनी जागरण की है। इस सूर्योपासना के माध्यम से भी संपन्न किया जा सकता है। सूर्य को भौतिक ऊर्जा का स्रोत मानना अपर्याप्त होगा आत्मिकी के सिद्धान्त उसे परब्रह्म का दृश्यमान स्वरूप भी मानते हैं और उसे गर्मी रोशनी का ग्रह गोलक भर न मानकर अन्तरात्मा में अंतःकरण में और उसके प्रत्येक स्फुल्लिंग में जीवट का अभिनव संचारकर्ता भी मानते हैं। वस्तुतः वह है भी ऐसा ही सविता की तेजस्विता यदि साधना तपश्चर्या सघन श्रद्धा एवं प्रबल इच्छा शक्ति के सहारे धारण की जाय तो साधक को निराश न होना पड़ेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-September
मनन के बाद आती है। इसके लिए पक्ष-विपक्ष के तर्क तथा प्रमाण उदाहरण ढूंढ़े जाते हैं और उनका तुलनात्मक विवेचन करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है कि कौन-सा पक्ष अधिक वचनदार है। न्यायाधीशों को यही करना पड़ता है। वे वादी और प्रतिवादी के कथनों और प्रस्तुत किये गये प्रमाणों की वास्तविकता, अवास्तविकता का विचार करते हैं और जिस ओर से प्रतिपादन अधिक वचनदार प्रतीत होता है उसी पक्ष में फैसला देते हैं। सामान्य जीवन में भी ऐसी स्थिति बार-बार आती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-July
मनन का आश्रय तो लेना पड़ता है, साथ ही एक कदम बढ़कर प्राणतत्त्व की अतिरिक्त मात्रा का भी संचय करना पड़ता है। सामान्यतया हर किसी को प्राणतत्त्व की एक समिति मात्रा ही उपलब्ध होती है। उस विभूति को अधिक मात्रा में हस्तगत करने के लिए प्राणाकर्षण की विशेष साधना करनी पड़ती है। प्राणाकर्षण का अर्थ है— ब्रह्मांडव्यापी महाप्राण में से खींचकर अपनी पात्रता को फुला-फैलाकर उसमें अभीष्ट वैभव को संचित-संकलित करना। इसी क्रिया विज्ञान को प्राणायाम भी कहते हैं।
मनन संस्थान को समुन्नत इसी प्रकार रखा जा सकता है।
मनन-चिंतन का उपक्रम अपनाने मंथन करते हुए दूरदर्शी विवेकशीलता की परिधि तक पहुँचा जाता है। प्रज्ञा का, मेधा का भूमा का उदय कारणशरीर में होता है, पर उसके पूर्व मानसिक संतुलन की, परिष्कृत दृष्टिकोण की पृष्ठभूमि बनती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-June
मनन करके तथा अपने मस्तिष्क को उसी दिशा में लगाये रहने से भी आत्म सत्संग होता है जो आत्मोन्नति के लिए अति आवश्यक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-January
मनन, शब्दों को याद करो, कुछ लिखने सीखने के विषय में कहता है किन्तु विद्यार्थी उसकी नहीं सुनता। फल, अशिष्टता या स्कूल कालेज छोड़ देना होता है।
मनन तथा ज्ञान-विज्ञान आदि सब कुछ है, किन्तु यदि दूसरे आपका मान नहीं करते हैं, आवश्यकता के समय आपको रुपया प्राप्त नहीं होता, या जन्म, विवाह, मृत्यु के अवसरों पर आपके चार जातीय बन्धु आकर आपका सुख-दुःख नहीं बाँटते है, तो आपका ज्ञान-विज्ञान सब व्यर्थ है।
मनन आदि से जो गुप्त मन निर्मित होता था, वह पवित्रतम भावनाओं का प्रतीक होता था। घर का वातावरण भी उच्च नैतिकता से परिपूर्ण होता था, जिससे एक पीढ़ी के पश्चात् दूसरी पीढ़ी उन्हीं संस्कारों को निरन्तर विकसित करती चली आती थी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-September
मनन कर लो। किसी भी बात को बार-बार मत कहो।
मनन करने से जितना ज्ञान होता है, उतना ज्ञान मित्रों के साथ घड़ी भर वार्तालाप करने से हो जाता है और हम अधिकाधिक बुद्धिमान बनते चले जाते हैं।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-August
मनन और चिंतन कर सके। पुनः पुनः स्मृति में संगृहीत ज्ञान की आवृत्ति करने से ज्ञान दृढ़ होता है और संस्कार परिपुष्ट होते हैं।
मनन द्वारा मालूम करनी चाहिए। प्रति सप्ताह सात दिनों के कार्यों पर विचार करना चाहिये। जाँच का कार्य महत्वपूर्ण है। इससे नीर क्षीर हो जाता है। हम जिस ज्ञान को अपना समझते हैं, वह प्रायः अधूरा धुँधला, अपूर्ण निकलता है।
मनन :- अर्थात् पढ़ी हुई बात पर पुनः पुनः चिंतन, सोचना, विचार करना जिससे कि वह मन में बैठ सके और भूला न जा सके। पढ़ी बात पर जितना ही चिंतन किया जायगा, वह उतनी ही स्मृति में अच्छी तरह बस जायगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-April
मनन, यम-नियमादि का संपालन, सदाचार का प्रथम सोपान है और मैत्री, करुणा, परोपकार, अहिंसा, दयाभाव, आत्मत्याग, निस्वार्थ-व्यक्तित्व, सेवा तथा अन्य सद्गुण ही सदाचार के प्रथम सोपान को पार करके, स्वतः ही आपके जीवन में ओत-प्रोत हो जाते हैं, आपको विशेष श्रम नहीं करना पड़ता। यदि आधार दृढ़ हो गया तो आप विशालतर से विशालतम-भाव का निर्माण आसानी से कर सकते हैं। इसी प्रकार ईश्वर चिन्तन के लिये जपादि नित्य धर्मों का अक्षरशः पालन करते हुए, आप अपने जीवन के सभी कार्यों को यथोचित-रीत्या करते रहें और किसी को दुःख और क्लेश न दें तो आप सहसा एक दिन अनुभव करेंगे कि सदाचार आपके जीवन का अभिन्न अंग हो गया है और आपके आचरण में व्याप्त हो गया है, जिसके अतिरिक्त आप किसी प्रकार के अन्य भौतिक आचरण को श्रेयस्कर नहीं समझते। जिस तरह फिटकिरी धीरे-धीरे आश्चर्यपूर्ण आचरण से जल में मिल जाती है, उसी प्रकार आपका जीवन भी जप और कीर्तन और ईश्वर-प्रेम में धीरे-धीरे आश्चर्यपूर्ण आचरण द्वारा समाधिस्थ होता जायगा और आप काम करते हुए, भोजन करते हुये तथा संसार के प्रापचिक कार्यों को करते हुए भी अपने सदाचरण से विचलित नहीं हो पायेंगे। परन्तु ईश्वर भावना का परित्याग कर, यदि केवल मात्र लौकिक-सामाजिक व्यवहारों का पालन करोगे तो यह सीमित और अस्थायी ही रह जायगा और आप उसमें शाश्वत-जीवन संचरित कर ही नहीं पायेंगे।
मनन करें तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि मानव-धर्म के सदाचार रूपी व्यावहारिक कर्म का विस्मरण करके ही समस्त मानव समाज, अशान्ति का उदयीभूत कर रहा है। हमारा अधः पतित दृष्टिकोण ही हमारे विश्व में अन्याय का साम्राज्य छत्रमान किये हैं। हमारी नैतिक दुर्बलताएँ हमारे भौतिक दुःख और क्लेश को जन्म देती हैं। शास्त्रनिषिद्ध कर्मानुसरण कर निज-निज धर्मानुसारित-कर्त्तव्यों को त्यागते हुये हमारा लौकिक आचरण अपने सत्य युगी अधिष्ठान से नीचे की और पतित किया गया है। यदि समाज अथवा राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति किसी भी कार्य को करने के पूर्व ही यह विचार करे कि तद्-विचारित-कार्य सदाचार-प्रभूत-धर्म की उपक्रमणिका में आता है कि नहीं- तो वह निश्चय ही अपने जीवन को सफल और कल्याणमय और विमल तथा पवित्र बना सकेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-March
मननशील, शान्त चित्त, वैर रहित, समदृष्टि (राग द्वेष रहित) ऐसे पुरुष के मैं (श्री कृष्णचन्द्र कहते हैं) पीछे-2 चलता हूँ कि ऐसे की चरण रेणु से मैं पवित्र हो जाऊँ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-February
मनन, चिन्तन या जैसे भी सम्भव हो मन में केवल उत्कृष्ट कोटि की विचारधारा एवं भावना को स्थान मिले। इसी प्रकार अपने कार्यों को ऐसा निर्मल बनाया जाना चाहिए कि उनमें अनीति, छल, असत्य, पाप एवं अकर्म के लिए कोई स्थान न रहे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-August
मनन और चिन्तनपूर्वक व्यवहार में लाने का प्रयत्न करना ही सच्चा स्वाध्याय कहा जा सकता है। इससे हम उन भूलों से भी बच सकते हैं जो संसार की उलझनों के कारण समय-समय पर पैदा होती है और जिनमें फंसकर मनुष्य मार्गच्युत हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-April
मनन चिन्तन करना चाहिए, आलस्य हट जायगा। जब कामुकता जग रही हो तो ब्रह्मचर्य, मातृ-भावना एवं चारित्रिक पवित्रता की विचारधारा को मन में स्थान देना चाहिए वासना शाँत हो जायगी।
मनन और चिन्तन द्वारा आत्म-निर्माण के लिए सद्विचारों को व्यवहारिक जीवन में उतारें, अपने परिवार के हर सदस्य को इस लाभ से लाभान्वित होने के लिए प्रेरित करें। साथ ही यह भी प्रयत्न करें कि अपने समीपवर्ती क्षेत्र, में सभी प्रिय परिचित जनों में उस विचारधारा का विस्तार हो। जिन पर भी अपना प्रभाव हो, उन्हें ऐसी प्रेरणा देनी चाहिए कि वे सद्विचारों को नियमित रूप से अपनाने की अभिरुचि उत्पन्न करें। प्रभाव वही सराहनीय है जिससे प्रभावित व्यक्तियों को उत्कर्ष की प्रेरणा मिले। जिस में भी सुसंस्कारों का बीजाँकुर दिखाई पड़े उसे सींचने के लिए हमें अवसर और अवकाश निकाल ही लेना चाहिए।
मनन चिन्तन के लिए कोई तो समय चाहिए ही। दूसरों को प्रेरणा देने के लिए उनके पास जाना, बैठना, चर्चा करना समय लगाने पर ही संभव होगा। इसलिए शरीर के लिए, कमाने-खाने की ही तरह ही आत्मा के लिए ज्ञान यज्ञ में कुछ समय लगाना भी हमें आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य समझना चाहिए।
मनन से, चिन्तन से जैसे भी बन पड़े वैसे यह प्रश्न करना चाहिए कि हमारा मस्तिष्क उच्च विचारधारा में निर्मग्न रहे। यदि इस प्रकार के विचारों में मन लगने लगे, उनके आनन्द का अनुभव होने लगे तो समझना चाहिए कि आधी मंजिल पार कर ली गई।
मनन चिन्तन करना आत्म कल्याण की दृष्टि से आवश्यक है। सद्भावनाओं की शिक्षा दूसरों को देना परोपकार की सबसे पुनीत प्रक्रिया है। इन दोनों का समावेश ज्ञान यज्ञ में होता है। प्रेरणाप्रद सद् विचारों की सम्पत्ति अपने लिए जमा करना और उस श्रेय-साधन से दूसरों को लाभान्वित बनाना इतना श्रेष्ठ सत्कर्म है कि उसकी तुलना और किसी शुभ कार्य से नहीं हो सकती। ज्ञान यज्ञ की तुलना में अन्य सब यज्ञ तुच्छ ही माने जा सकते हैं।
मनन करते-करते अपनी मनोभूमि को प्रलोभन और कठिनाइयों से टक्कर लेने की क्षमता से सुसम्पन्न बना लिया हो। बाह्य आवेश से नहीं वरन् अन्तरात्मा की सुस्थिर प्रेरणा के आधार पर जो लोग श्रेष्ठता के सन्मार्ग पर आरुढ़ होते हैं उन्हीं के लिए अन्त तक उस पर चलते रहना संभव होता है।
मनन करना चाहिये। जब भी मस्तिष्क खाली रहे यह सोचना आरम्भ कर देना चाहिए कि आज के स्वाध्याय में जो पढ़ा गया था, उस आदर्श तक पहुँचने के लिए हम प्रयत्न करें, जो कुछ सुधार संभव है उसे किसी न किसी रूप में जल्दी ही आरम्भ करें। श्रेष्ठ लोगों के चरित्रों को पढ़ना और वैसा ही गौरव स्वयं भी प्राप्त करने की बात सोचते रहना मनन और चिन्तन की दृष्टि से आवश्यक है।
मनन और चिन्तन की दृष्टि से आवश्यक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-September
मनन धारणा, ध्यान, समाधि का आयोजन ईश्वरीय सत्ता से एकीभूत होने के लिए, शक्ति प्रेरणा पाने के लिए, मानसिक सन्तुलन प्राप्त करने के लिए हुआ। मन के अन्तर्द्वन्द्व शान्त होने पर मनुष्य को क्लेश पहुँचाने वाले अनेकों मनोभावों का सहज ही निवारण हो जाता है।
मनन पूर्ण होकर सही सही निष्कर्ष निकला तभी उस विचार को लोक कल्याणार्थ रखा। एक बार न्यूटन से किसी ने कहा था “आपने तो पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया है।” इस पर उस निरभिमानी वैज्ञानिक ने कहा “मेरे सामने ज्ञान का अथाह समुद्र फैला पड़ा है जिसके किनारे के कुछ ही रज कण मैं उठा पाया हूँ।” एक ओर ऐसे व्यक्तियों की स्थिति पर तरस आता है जो बेचारे कही से कुछ पढ़ सुनकर, थोड़ा बहुत अध्ययन कर अभिमानवश अपने आपको विद्या का धनी, पण्डित विद्वान मान बैठते हैं। अपनी विद्वता, पाण्डित्य की दुहाई देने वालों की स्थिति एक खोखले पोले ढोल की तरह ही होती है।
मनन करते रहने से अन्तःकरण में सत् तत्व की अभिवृद्धि होती हैं। इसलिये अन्तःकरण में आवश्यक सत्प्रेरणाएँ भी उद्भूत होने लगती हैं।
मनन और चिन्तन किया करें। यह विचार करें कि इन तथ्यों में से हमारे जीवन में कौन-कौन कितनी मात्रा में प्रयुक्त होता है। जो कमी रहती हो उसे कैसे पूरा किया जाय उसका उपाय सोचते रहना चाहिए। मनोभूमि को विधेयात्मक और परिष्कृत बनाने में यह दोनों ही साधन असाधारण रूप से उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
मनन द्वारा अपने लिये जो प्रकाश प्राप्त किया गया है, उसे दूसरों को भी देने का क्रम बनाना चाहिये। जो पढ़ा समझा है उसे लिखने सुनने से परिपक्वता आती है, इसे सभी छात्र और शिक्षक जानते हैं। जो कुछ हम समझते और सोचते हैं उसे दूसरों को ध्यान अध्यापक या परीक्षक मान कर सुनाने, समझाने लगें तो उससे अपना अभ्यास परिपक्व होगा और वह विचार गहराई तक मनोभूमि में प्रवेश करके संस्कार के रूप में सुदृढ़ भी होते चलेंगे। ज्ञान दान का पुण्य इस संसार के सबसे बड़े दान धर्मों में गिना गया है। उसे एकत्रित करते रहने से दैवी सम्पदाओं की पूँजी बढ़ती है और मनुष्य सच्चे अर्थों में अमीर बनता चला जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-September
मनन पूर्वक अध्ययन करिये। नियमित रूप से नित्य निदिध्यासन करिये अविद्या और अज्ञान के गहन अन्धकार से बाहर निकलिये और ज्ञान रूपी सूर्य की जगमगाती ज्योति में स्नान करिये। इस ज्ञान में दूसरों को भी साथी बनाइये। अपवित्र इच्छाएं और असुविधा आपको बहला लेती हैं। अतः इसे भी कभी मत भूलिये कि मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य और अन्तिम लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार करना ही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-June
मनन मपि श्रेष्ठस्य विद्धेत्॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-November
मनन करे इससे सुख-दुख की क्षणिकता का ध्यान आने पर मन में हर्ष और शोक का द्वंद्व नहीं होगा। दुख आता और चला जाता है ओर सुख भी सदा नहीं रहता इस रहस्य के जानने से मन समभाव को पा लेता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-August
मनन करने के लिए मजबूर कर देती है और निदिध्यासन द्वारा आत्मा के एकत्व का बोध और साक्षात्कार दोनों ही हो जाते हैं। यही आत्मानुभूति की अवस्था है। यहाँ पहुँच कर साधक अनेक रूपों, आकृतियों और शक्तियों वाली एक ही आत्मा के दर्शन करता है। तब उसे अपने से भिन्न कुछ भी दिखाई नहीं देता। बल्कि समस्त संसार उस अकेले का ही विस्तार मालूम होने लगता है।
मनन रूपी फल साधक को अवश्य मिलता है। प्रबलता की जितनी कमी होगी मनन रूप फल की प्राप्ति भी उतनी ही कठिन रहेगी।
मनन और निदिध्यासन के फलस्वरूप इस ज्ञान की अनुभूति में साधक परा शान्ति को प्राप्त करता है।
मनन, योग्यता की वृद्धि में गर्व का अनुभव करते हैं। वे सरल सादे वस्त्रों का प्रयोग करते हैं। साधारण किन्तु पौष्टिक भोजन काम में लाते हैं, आमदनी से आधा व्यय करते हैं। अपनी मौलिकता के प्रकाश में उन्हें दूसरों के अनुकरण से अधिक स्वाद आता है। वे स्वावलम्बी होने के साथ आत्मनिग्रही भी होते हैं।
मनन हुए बिना रहा ही नहीं जा सकता क्योंकि जहाँ तीव्रता होती है वहाँ प्रमाद होता ही नहीं। प्रमाद में जड़ता होती है और तीव्रता में गति। चेतना की जितनी बुद्धि होगी जड़ता उतनी ही कम होती जायगी। चेतना ही ज्ञान है। ज्ञान होने पर न प्रमाद रहता है और न जड़ता।
मनन की आवश्यकता होती है। मनन चित्त पर पड़े हुए अनेक पर्दों को खोलता हुआ आगे बढ़ता है। मनन से बड़ी गर्मी उत्पन्न होती है जैसे-जैसे यह ऊष्मा बढ़ती जाती है वैसे-वैसे ही वे सभी आवरण नष्ट होते जाते हैं जिन्होंने आत्म तत्व को ढँक रखा होता है। मनन करते-करते मन सूक्ष्मदर्शी और बुद्धि सूक्ष्म ग्राहिणी हो जाती है। इसके बाद निदिध्यासन की क्रिया आरंभ होती है।
मनन से बड़ी गर्मी उत्पन्न होती है जैसे-जैसे यह ऊष्मा बढ़ती जाती है वैसे-वैसे ही वे सभी आवरण नष्ट होते जाते हैं जिन्होंने आत्म तत्व को ढँक रखा होता है। मनन करते-करते मन सूक्ष्मदर्शी और बुद्धि सूक्ष्म ग्राहिणी हो जाती है। इसके बाद निदिध्यासन की क्रिया आरंभ होती है। तल्लीनता ही निदिध्यासन का दूसरा रूप है। यही ध्यान कहलाता है।
मनन और निदिध्यासन रूप साधना का उपदेश दिया है। वे कहते हैं-
मनन की क्रिया न होने से श्रवण का कोई फल नहीं होता। श्रवण को अधिक गहरा और व्यापक बनाने के लिए मनन की आवश्यकता होती है। मनन चित्त पर पड़े हुए अनेक पर्दों को खोलता हुआ आगे बढ़ता है। मनन से बड़ी गर्मी उत्पन्न होती है जैसे-जैसे यह ऊष्मा बढ़ती जाती है वैसे-वैसे ही वे सभी आवरण नष्ट होते जाते हैं जिन्होंने आत्म तत्व को ढँक रखा होता है। मनन करते-करते मन सूक्ष्मदर्शी और बुद्धि सूक्ष्म ग्राहिणी हो जाती है।
मनन न हुआ तो आगे की क्रिया अपने आप बन्द हो जाती है। पर आकाँक्षा की तीव्रता वर्धमान रहती है, साधक क्रमशः एक के बाद दूसरा रास्ता तय करता हुआ आगे बढ़ता है। तीव्रता और मन्दता के अनुमान से ही सिद्धि की प्रगति होती है। इसका सम्बन्ध आकाँक्षा के साथ है। तत्व को जानने या पाने की जितनी तीव्र उत्कंठा होगी, उतना ही अधिक विनय होगा, विनय के साथ श्रवण के प्रति उतना ही तीव्र अनुराग होगा, और श्रवण होने पर मनन हुए बिना रहा ही नहीं जा सकता क्योंकि जहाँ तीव्रता होती है वहाँ प्रमाद होता ही नहीं।
मनन की स्थिति का सूचक है।
मनन करता है। जो सुना है बार बार उसी के सम्बन्ध में विचारना, जीवन के व्यावहारिक क्षेत्रों में किस प्रकार और कहाँ उसका विस्तार है इसे समझने के लिए मन और बुद्धि को खुला रखना, जो सुना है उसका साक्षात्कार करने के लिए जागृत रहना और साक्षात्कार की तीव्र प्रेरणा के साथ कर्म क्षेत्र में अग्रसर रहना मनन की स्थिति का सूचक है।
मनन चित्त पर पड़े हुए अनेक पर्दों को खोलता हुआ आगे बढ़ता है। मनन से बड़ी गर्मी उत्पन्न होती है जैसे-जैसे यह ऊष्मा बढ़ती जाती है वैसे-वैसे ही वे सभी आवरण नष्ट होते जाते हैं जिन्होंने आत्म तत्व को ढँक रखा होता है। मनन करते-करते मन सूक्ष्मदर्शी और बुद्धि सूक्ष्म ग्राहिणी हो जाती है। इसके बाद निदिध्यासन की क्रिया आरंभ होती है। तल्लीनता ही निदिध्यासन का दूसरा रूप है।
मनन करना चाहिए और निदिध्यासन करना चाहिए।
मनन करते-करते मन सूक्ष्मदर्शी और बुद्धि सूक्ष्म ग्राहिणी हो जाती है। इसके बाद निदिध्यासन की क्रिया आरंभ होती है। तल्लीनता ही निदिध्यासन का दूसरा रूप है। यही ध्यान कहलाता है। तल्लीनता, एकाग्रता, ध्यान और निदिध्यासन सब एक ही क्रिया का परिचय देते हैं।
मनन रूप फल की प्राप्ति भी उतनी ही कठिन रहेगी।
मनन होना ही चाहिए उसी प्रकार आकाँक्षा होने पर श्रवण भी स्वाभाविक होता है। ये सब एक दूसरे के बाद आने वाले नित्य के स्नेही हैं। अर्थात् इन सबके साथ आत्मा का नित्य का सम्बन्ध है। आत्मा तो सब जगह अनेक रूपों से वर्धमान रहता है शास्त्रों में बतलाया गया है कि-
मनन। भारत के लिए रहन-सहन की दृष्टि से उन्होंने भारतीय आदर्श उपस्थित किया था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-March
मननशील व्यक्ति ऐसा होगा जो उनको तपस्वी नहीं स्वीकार करे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-October
मनन, शरणागत रक्षण, दीन जनों पर दया, पीड़ितों की शुश्रूषा, स्वदेश या स्वधर्म की सेवा, विश्व प्रीति भक्ति, ईश्वरोपासना इत्यादि कर्तव्यों से मिलने वाला आनन्द सकाम भाव से किया जाय तो घन्टों पर्यन्त बना रहता है। और यदि इस विश्व सेवा आदि कर्मयोग का पालन निष्काम भाव से करते रहने का स्वभाव हो जाए, तो निरन्तर आनन्द का नशा बना ही रहता है। इस रीति से आनन्द की जाति और स्थिरता में अंतर रहता है। इनमें से विवेकी जन विचार शक्ति द्वारा विवेक करके तुच्छ विषयों के आनन्द का त्याग करते हैं और अपनी संवेदनावृत्ति के अनुकूल क्रमशः अधिकाधिक श्रेष्ठ कोटि के आनन्द की जिज्ञासा करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-February
मनन करते हुए मन भी उसी साँचे में ढल जाता है। परिणाम यह होता है कि चिन्तन की स्वतन्त्र दिशा का लोप हो जाता है। यहाँ तक कि चिन्तन की स्वतन्त्रता भी नष्ट हो जाती है।
मनन करता है और वैसा ही चिन्तन और मनन करते हुए मन भी उसी साँचे में ढल जाता है। परिणाम यह होता है कि चिन्तन की स्वतन्त्र दिशा का लोप हो जाता है। यहाँ तक कि चिन्तन की स्वतन्त्रता भी नष्ट हो जाती है।
मनन के लिये कुछ संकल्प नीचे दिये जाते हैं। इन शब्दों को नेत्र बन्द करके मन ही मन दुहराना चाहिए और कल्पना शक्ति की सहायता से इनका मानस चित्र मनः लोक में भली प्रकार अंकित करना चाहिए-
मनन एवं चिन्तन करने से अन्तःकरण में उन तत्वों की वृद्धि होती है जो मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाते हैं। वह भाव बड़े ही शान्तिदायक उत्साहप्रद सतोगुणी, उन्नायक एवं आत्मबल बढ़ाने वाले हैं। इन भावों का नित्य प्रति कुछ समय मनन करना चाहिए।
मनन करना चाहिए। एक एक शब्द पर कुछ क्षण रुकना चाहिए और उस शब्द का कल्पना-चित्र मन में बनाना चाहिए।
मनन करें, ध्यान करें , गुणगान करें , और उसे अपना जीवन सहचर बनावें , यही उचित है।
मनन करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-April
मनने॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-December
मनन, विद्वानों के सत्संग, भाषण सुनना एक चिर साधना है जिनसे लोग श्रद्धालु होते हैं, संसृति का निर्माण होता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास स्वभाव-निर्माण, चरित्र-निर्माण, सुखी जीवन-निर्माण के लिए विस्तृत कार्य क्षेत्र काम करने के लिए खाली पड़ा है।
मनन निर्भीक चरण।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-May
मनन नहीं करते, उनसे भली प्रकार लाभ नहीं उठा सकते। लेखक पहले इस विषय पर अपने विचारों का उल्लेख करेगा इस लेख का तात्पर्य यहाँ है कि प्रत्येक पाठक को इस विषय पर विचार करने को प्रस्तुत किया जाय, ताकि जीवन की सबसे महत्वपूर्ण समस्या को अपने आप सुलभ कर सकें।
मनन और सत्संग द्वारा सुविकसित किया हुआ मस्तिष्क (4) जीवनोपयोगी साधन सामग्रियों का समुचित मात्रा में संचय (5) सच्चे मित्रों, बान्धवों एवं सहयोगियों की अधिकता (6) ईमानदारी, मधुरता, परिश्रम सफलता, आत्मसम्मान की रक्षा, सद्व्यवहार, उदारता जैसे गुणों से परिपूर्ण उत्तम चरित्र (7) ईश्वर और धर्म में सुदृढ़ आस्था, ओमज्ञान, कर्मयोगी दृष्टिकोण, निर्मल मनोभूमि, सतोगुणी विचार व्यवहार, परमार्थ परायणता, यह सात प्रकार के बल प्रत्येक मनुष्य के लिए अतीव आवश्यक हैं। इन सबका साथ-साथ संतुलित विकास होना चाहिए। स्वादिष्ट भोजन वह है जिसमें नमक, मसाला, घी, मीठा, आटा, बेसन, मावा आदि संतुलित मात्रा में हो यदि इनमें से कोई वस्तु आवश्यकता से बहुत ज्यादा और कोई बहुत कम होगी तो भोजन चाहे कितने ही श्रम से क्यों न बनाया गया हो वह असंतुलित होने के कारण अखाद्य बन जायगा। शरीर का कोई अंग बहुत मोटा और कोई बहुत पतला रह जाय तो ऐसा असंतुलित शरीर रोगी ही समझा जायगा। इसी प्रकार यह सातों बल उचित मात्रा में संचय करने चाहिए।
मनन कीर्तन, अध्ययन, चिंतन, इत्यादि कैसे आ सकते है? जिसका शरीर और मन वश में नहीं वह नीति के अनुसार सत्-असत् का विवेक किस प्रकार कर सकता है? जिसे क्रोध आता है वह दूसरे के मान अपमान का विचार क्या करेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-June
मनन और चिन्तन करना ही हमारी जिज्ञासा का चरम बिन्दु है। यही ज्ञान की पराकाष्ठा है। आत्मा को पहचानना ही परमात्मपन को उपलब्ध करना है, जहाँ से संसार के बदलते हुए भावों को अवलोकन किया जा सके। आत्म-स्वरूप को न पहिचानने के कारण ही आज संसार में इतना अज्ञानान्धकार व दुख छाया हुआ है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-April
मनन-चिन्तन एवं निदिध्यासन करते हुए एक दिन बुद्धत्व की उपलब्धि की।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-May
मनन करना, और जीवन को उसके अनुसार बनाना।
मनन नहीं कर पाता था, नींद नहीं आती थी। वे दिन अब भी इन आँखों के सामने नाच रहे हैं। पूज्य आचार्य जी की वह सरल एवं वात्सल्य से ओतप्रोत मुखाकृति अनुक्षण सन्मार्ग पर मुझे अग्रसर कर रही है। मेरे पूज्य आचार्य जी 6 सहस्र नर नारियों को अपने पुत्र और पुत्रियों के रूप में देखा करते थे। आचार्य जी का यह हार्दिक वात्सल्य अन्तिम दिन रात को व्याख्यान के समय अच्छी तरह व्यक्त हो गया था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-March
मनन करना चाहिए। इन्हें कार्य रूप में परिणत करना चाहिए। उपरोक्त चारों संकल्पों में सन्निहित 13 तथ्य तथा 1 इन्हें कार्य रूप में परिणत करने की जिम्मेदारी, इस प्रकार कुल 14 रत्न अध्यात्म समुद्र- मंथन से निकलने वाले यह 14 रत्न हैं। इन्हें ही 9 लड़े 4 गांठें 1 ब्रह्मग्रन्थि इस प्रकार के यज्ञोपवीत के 4 भाग माने गये हैं। स्त्रियाँ अनन्त चतुर्दशी को 14 गाँठ का अनन्त धारण करती हैं, यह भी एक प्रकार का यज्ञोपवीत ही है।
मनन करना चाहिये। हम कैसा बनना चाहते हैं, यह भी गम्भीर चिन्तन और मनन के फल स्वरूप अपने अन्तर से ही उत्पन्न होता है, दूसरा इसे नहीं दे सकता। हाँ सद्गुरु इस चेतना को निर्मल और ग्रहण शक्ति सम्पन्न बना सकते हैं।
मनन है अन्यथा वह सत्वहीन है—कागज का फूल मात्र है।
मनन का परिणाम।
मनन के फल स्वरूप अपने अन्तर से ही उत्पन्न होता है, दूसरा इसे नहीं दे सकता। हाँ सद्गुरु इस चेतना को निर्मल और ग्रहण शक्ति सम्पन्न बना सकते हैं।
मनन करके विचार-दिशा प्रदान करें और मैं चुपचाप हाकें जाने वाले पशु की भाँति केवल उस पथ का अनुसरण करता चलूँ। उस पथ के अच्छे और बुरे होने का उत्तरदायित्व मेरे ऊपर नहीं हो, कोई इसे बुरा होने का दोष मेरे शिर नहीं डाल सके, पर ऐसा करते समय उसे यह पता नहीं होता, कि आखिर अनेकों पथों में से इसी राह को अपने चलने के लिए चयन कर लेने में तो उसी का ही एकमात्र उत्तरदायित्व हो जाता है। इसीलिए वे सभी भाँति अपने को निर्दोष सिद्ध करने में सफल नहीं हो सकते। फिर भी ऐसों जनों का मानसिक और बौद्धिक आलस्य दूर नहीं हो पाता। ऐसे मनुष्यों की, उन भेड़ों से बहुत कुछ समता की जा सकती है, जो एक भेड़ के पीछे चलने की वृत्ति रख कर कुएँ में भी गिर सकती हैं।
मननशील व्यक्ति अपने थोड़े से अध्ययन के सहाप्य से भी समाज और राष्ट्र में अपना एक विशिष्ट व्यक्तित्व निर्मित कर लेते हैं।
मनन तथा निदिध्यासन के ही उसे आत्मा का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। वह भक्तों की ऊँची श्रेणी में गिना जाता है और दैवी सम्पदाओं का आनन्द प्राप्त करता है।
मनन के कारण अन्तःकरण पर एक अभीष्ट छाप छोड़ती है। महापुरुषों और देवताओं की जन्म जयन्तियाँ उन महान आत्माओं के कार्यों, चरित्रों और उपदेशों को हमारे सम्मुख रखने के लिए सचमुच ही बहुत भारी प्रेरणा अपने अन्दर छिपाये रहती हैं। यदि इन संस्कारों, त्यौहारों, पर्वों, व्रतों, जयन्तियों को लकीर पीटना मात्र न रख कर प्रेरणाप्रद उत्सवों का प्राचीनकाल जैसा रूप दे दिया जाय। प्रभावशाली, चरित्रवान और निस्वार्थ पुरोहित यदि इन कार्यक्रमों को पूरी दिलचस्पी के साथ लोकमानस निर्माण की दृष्टि से कराने लगे तो यह निश्चित है कि जितना कार्य अनेकों सभा सोसाइटियों, अखबार, पर्चे, लाउडस्पीकर, विद्यालय, शिविर नहीं कर सकते वह सब अनायास ही बहुत सुगम रीति से हो सकता है। जीवन के महान आदर्शों की शिक्षा देने के लिए वह संस्कार, त्यौहार आदि के अवसर सर्वोत्तम माध्यम सिद्ध हो सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-August
मनन, चिन्तन किया जाता है। वह स्वयं तो पहिचानने में आता नहीं प्रत्युत उसी के द्वारा सब कुछ पहिचाना जाता है।
मनन, चिन्तन में आता नहीं है लेकिन उसी के द्वारा सब कुछ मनन, चिन्तन किया जाता है। वह स्वयं तो पहिचानने में आता नहीं प्रत्युत उसी के द्वारा सब कुछ पहिचाना जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-February
मनन कर लिया जाता है, वही ब्रह्म है।
मनन कर विश्व को यह दिखा दें कि विश्व के लिये यदि कोई कल्याणकारी धूम हो सकता है तो वह केवल यज्ञ धूम ही है। यज्ञ धूम से यदि विश्वव्याप्त होगा तो इसकी मस्तिष्क शक्ति स्वयमेव विकसित होगी एवं इस धूम से सम्पन्न समस्त वर्षा पृथ्वी के प्रत्येक पदार्थ में एक विशेष गुण की अधायक होगी।
मनन नहीं कर पाते, पर स्वयं मन ही जिसके द्वारा मनन कर लिया जाता है, वही ब्रह्म है।
मनन।
मनन करेंगे और उन्हें अपनायेंगे तो सतत् अभ्यास के बाद वह हमारे स्वभाव का अंग बन जायेंगे और हम वशीकरण मंत्र के ज्ञाता हो जायेंगे। तब हम देखेंगे कि हमें सभी पसन्द करते हैं, सभी हमसे संतुष्ट हैं।
मनन करना बन्द कर दीजिये। अन्य मनुष्यों के अवगुणों की सूची बना लीजिए और उनमें से किसी मुख्य पर ध्यान दीजिए और मनन कीजिए। अपने गुणों को बढ़ाने का प्रयत्न करिए। देखिए कि आप किन-किन बातों में दूसरे मनुष्यों से बढ़कर हैं और उन बातों पर विचार कीजिए। अपने विषय में सोचने के स्थान में दूसरों के विषय में सोचिए।
मनन से सभी वैसे अवश्य ही हो सकते हैं।
मनन कीजिए। अपने गुणों को बढ़ाने का प्रयत्न करिए। देखिए कि आप किन-किन बातों में दूसरे मनुष्यों से बढ़कर हैं और उन बातों पर विचार कीजिए। अपने विषय में सोचने के स्थान में दूसरों के विषय में सोचिए। किसी भी काली लड़की का अत्यन्त सुन्दर महिलाओं की संगति में अपने आपको हीन अथवा निकृष्ट नहीं समझना चाहिए।
मनन के द्वारा एक सूक्ष्म चित्र निर्मित होता है। यह सूक्ष्म चित्र गम्भीर निदिध्यासन में पीछे घुल-मिल जाता है। जो कुछ तब रह जाता है वह है चिन्मात्रा अथवा केवल अस्ति।
मनन करने से होता है। जो मनुष्य जितना ही अधिक अपने आदर्श के विषय में चिन्तन करता है वह उतना ही अधिक मानसिक शक्ति को बढ़ा लेता है।”
मनन करने में और उसके अनुसार अपने आचार-विचार को ढालने में निहित है।
मनन करना।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-January
मनन चिन्तन करना भी आवश्यक है। गायत्री उपासना में गायत्री ज्ञान का, साहित्य का भी प्रमुख स्थान है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-July
मनन करे तो हर्ष एवं शोक का द्वन्द्व नहीं हो सकेगा क्योंकि यह दोनों अवस्थायें अस्थायी हैं। किसी के जीवन में सदा एक सी दशा नहीं रहती। दुःख के बाद सुख एवं सुख के बाद दुःख आता रहता है। दोनों ही अल्पकालीन—क्षणस्थायी—हैं, अतः इसमें हर्ष एवं शोक करना व्यर्थ है। इस रहस्य को पा लेने पर मन समभाव को पा लेता है।
मननयोग्य है कि ‘कायर पुरुष मरने के पहले ही अनेक बार मरता है और वीर पुरुष जीवन में एक बार ही मरता है। वीर पुरुष काल्पनिक मौत का शिकार नहीं होता।’ इसी प्रकार उदार पुरुष के मन में वे अशुभ विचार नहीं आते, जो सामान्य लोगों को सदा पीड़ित किया करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-September
मनन रहित सभी बालकों की संज्ञा शूद्र है। संस्कार सम्पन्न होकर ही वे द्विज कहलाने के अधिकारी बनते हैं। संस्कार निश्चित रूप से मन का ही होता है।
मनन ही, परन्तु उनकी शिक्षा के अनुसार चलने का भी प्रयत्न करें। कृष्ण की शिक्षा में ही देश का कल्याण निहित है। आज अब आर्य जाति पर चतुर्मुखी आक्रमण हो रहे हैं, श्रीकृष्ण की शिक्षा की अत्यन्त आवश्यकता है। गीता के अन्त में कही गई संजय की निम्न उक्ति में हमें अद्भुत सत्य के दर्शन होते है:–
मनन किया जाय। न केवल मनन ही, परन्तु उनकी शिक्षा के अनुसार चलने का भी प्रयत्न करें। कृष्ण की शिक्षा में ही देश का कल्याण निहित है। आज अब आर्य जाति पर चतुर्मुखी आक्रमण हो रहे हैं, श्रीकृष्ण की शिक्षा की अत्यन्त आवश्यकता है। गीता के अन्त में कही गई संजय की निम्न उक्ति में हमें अद्भुत सत्य के दर्शन होते है:–
मनन करना चाहिये। मन की शक्ति अपने निश्चय के अनुसार घटती और बढ़ती है। मनुष्य अपने मन में वैसी ही शक्ति का उदय होते हुए पायेगा जैसी शक्ति का वह निश्चय कर लेगा। अपने साधारण व्यावहारिक जीवन में हम अपनी अद्भुत मानसिक शक्तियों का परिचय पाते हैं। पर विचार न करने के कारण हम उन शक्तियों का भली प्रकार से साक्षात्कार नहीं कर पाते।
मनन द्वारा सिद्ध होती है। जिस व्यक्ति के जीवन में चिन्तन ने प्रवेश नहीं किया, वह तम्थुष की भाँति स्थिर रह सकता है, चरकी तरह गतिशील नहीं बन सकता। जो गतिशील नहीं है वह विकसित भी नहीं है। आर्य-संस्कृति में ‘जन्मना जायते शूद्रः’ का भी यही अर्थ है। निश्चिन्त, मनन रहित सभी बालकों की संज्ञा शूद्र है।
मनन से भी ऊपर की है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-October
मनन की हुई सामग्री को व्यक्त करना।
मनन और ध्यान अव्यवस्थित विचारों को दृढ़ आधार पर ला खड़ा करेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-December
मनन होता है वही वाणी से बोला जाता है और जो वाणी से बोला जाता है, वह कार्य रूप में किया जाता है। मनोयोग जितना प्रबल होगा उतनी ही कार्य की सिद्धि सरल हो जायगी। साधना के लिये हमें शिरो भाग के विभिन्न अंग चाहिये। गज का मस्तक उसका अर्थ स्थल होता है। इसी कारण सर पर नन्हें से अंकुश से हाथी वश में आ जाता है।
मनन वा संकल्प देखने में आता है। क्रिया-मनन और प्रयोजन सदा एक ही सूत्र में गुंथे रहते हैं। इस प्रयोजन का नाम वासना है। पहले वासना उत्पन्न होती है, यह कर्म की प्रथम अवस्था है। फिर संकल्प करते हैं, कि इस वासना की सिद्धि करेंगे यह दूसरी अवस्था है।
मनन में ही व्यतीत होने लगेगा। बस यही तो सुख और शान्ति है।
मनन और आचरण करना चाहिए। जो अशिक्षित हैं, वे लोग भी धर्मात्माओं के सत्संग से इतनी शक्ति प्राप्त कर सकते हैं, जिससे अपने आप को सम्हाल सकें और विपत्ति के समय अपने पैरों पर खड़े हो सकें। स्वयं भगवान् गीता में कहते हैं-
मनन” करना। अपने को यदि परमात्मा के रूप के ध्यान में, उसके गुणगान में उसकी सामर्थ्य एवं व्यापकता में तथा तद्विषयक प्रेम में लगा दें तो मन को वासना की तरफ दौड़ने का अवसर ही प्राप्त न हो सकेगा। वह इस प्रकार से ईश्वर के प्रेम में फंस जायगा कि उसका सारा समय उसके विचारों के मनन में ही व्यतीत होने लगेगा। बस यही तो सुख और शान्ति है।
मनन और प्रयोजन सदा एक ही सूत्र में गुंथे रहते हैं। इस प्रयोजन का नाम वासना है। पहले वासना उत्पन्न होती है, यह कर्म की प्रथम अवस्था है। फिर संकल्प करते हैं, कि इस वासना की सिद्धि करेंगे यह दूसरी अवस्था है। अन्त में अभीष्ट लाभ के लिये कार्य करते हैं, यह कर्म की तीसरी अवस्था है।
मनन करना, विशेष कर मोक्ष दायक स्थलों का, ईश्वर प्रणिधानानि = अपने आपको उस परम प्रभु के समक्ष मन, वचन एवं कर्म से अर्पण कर देना और प्रत्येक दशा को उसी का प्रसाद समझ आनन्द पूर्वक सहन करना। यह नियम है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-June
मननशीलता ने उसे प्रगति के पथ पर आगे बढ़ाया है पर यह बात सही नहीं है। तथ्य यह है कि सहयोग के आधार पर एक दूसरे के साथ घनिष्ठता स्थापित करते हुए पारस्परिक आदान प्रदान का क्रम चला और उससे मस्तिष्कीय विकास का द्वार खुला।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-December
मनन किया जाय कि उत्कृष्टता अपनाने के लिए कुछ किया जा सकता है ?
मनन किया जाय कि उस कसौटी पर अपनी स्थिति कितनी खरी उतरती है। साथ ही यह भी मनन किया जाय कि उत्कृष्टता अपनाने के लिए कुछ किया जा सकता है ?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-March
मनन-चिन्तन द्वारा साधन को सींचा जाता है। उसके उपरान्त उसे सस्ती प्रशंसा लूटने के लिए दिखाये जाने वाले चमत्कारों से बचाया जाता है। सिद्धियों को लोभ, मोह के उथले प्रयोजन पूरा करने में भी खर्च किया जा सकता है और अपने को तथा दूसरों को आत्म-कल्याण की दिशा में प्रेरित करने के लिए भी उसका उपयोग हो सकता है। स्वल्प श्रम में अधिक भौतिक सफलताएँ पाना कर्म विज्ञान के विपरीत है। उसके लिए यदि मन्त्र शक्ति का प्रयोग किया जायेगा तो वह देर तक टिक न सकेगी और उसी खिलवाड़ में नष्ट हो जायेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-September
मनन करने की शक्ति है, वाणी में जो बोलने की शक्ति है, प्राणमें जो संचालन शक्ति है, आँखों में जो देखने की शक्ति है, वह देवात्मा ही जीवन का संचार करती है।
मनन जैसी सेवा साधना के आधार पर प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय। हर कुविचार की काट कर देना और कुकर्म में प्रतिरोध कर सकना सद्गुरु का ब्रह्म तेजस है जिसके कारण उसे ब्रह्मानि की उपमा दी गई हैं। सत्पवृत्तियों को उभार सकना-सद्भावनाओं को समर्थ बना सकना-सद्गुरु का अनुदान वरदान है। जब अपना अन्तःकरण ज्ञान भक्ति की विविध साधना से सम्पन्न होकर शिष्य के व्यक्तित्व का छा जाने योग्य बन जाय तो समझना चाहिए कि सच्चे सद्गुरु के मिलन का सौभाग्य प्राप्त हो गया। शिष्यत्व के साथ जो दीक्षा संकल्प जुड़ा रहता है वह यही है कि सद्गुरु के निर्देश को शिरोधार्य किया जायगा उसकी प्रेरणा का सच्चे हृदय से अनुगमन किया जायगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-August
मनन जैसी सेवा साधना के आधार पर प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय। हर कुविचार की काट कर देना और कुकर्म में प्रतिरोध कर सकना सद्गुरु का ब्रह्मा तेजस है जिसके कारण उसे ब्रह्माग्नि की उपमा दी गई है। सत्प्रवृत्तियों को उभार सकना- सद्भावनाओं को समर्थ बना सकना- सद्गुरु का अनुदान वरदान है। जब अपना अन्तःकरण ज्ञान भक्ति की विविध साधना से सम्पन्न होकर शिष्य के व्यक्तित्व पर छा जाने योग्य बन जाय तो समझना चाहिए कि सच्चे सद्गुरु के मिलन का सौभाग्य प्राप्त हो गया। शिष्यत्व के साथ जो दीक्षा संकल्प जुड़ा रहता है वह यही है कि सद्गुरु के निर्देश को शिरोधार्य किया जायगा उसकी प्रेरणा का सच्चे हृदय के अनुगमन किया जायगा।
मनन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लिया जाता है और सरलतापूर्वक लक्ष्यपूर्ति की दिशा में आगे बढ़ा जाता है।
मनन करने की शक्ति है, वाणी में जो बोलने की शक्ति है, प्राण में जो संचालन शक्ति है, आंखों में जो देखने की शक्ति है, वह देवात्मा ही जीवन का संचार करती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-April
मनन कर सकना सम्भव हो सके जो अभिनव उद्देश्य की पूर्ति के लिए तड़पन उठा सके।
मनन के फलस्वरूप जब यह विश्वास होता है कि हमारा अस्तित्व मात्र काया तक सीमित नहीं हैं वरन् उससे ऊँची उठी कोई आत्मसत्ता भी विद्यमान है, तो यह भी निश्चित करना पड़ता है कि आत्मा की क्षुधाएँ समझने और उसकी पूर्ति के लिए भी प्रयत्न किया जाना चाहिए। जिस प्रकार शरीर की भूख पेट और प्रजनन की−लोभ और मोह की गतिविधियों के साथ तृप्ति का अनुभव करती है, उसी प्रकार आत्मा का सन्तोष परिष्कृत व्यक्तित्व के साथ जुड़े रहने वाले उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की परिधि में ही सम्भव होता है।
मनन करने वाले प्राणी को ही ‘मनुष्य’ कहा गया है। मनन उसे कई नये प्रश्नों पर सोचने के लिए विवश करता है। अन्य प्राणियों से ऊँचे स्तर की इन्द्रियाँ और चेतना उसे किस प्रयोजन के लिए मिली? और उनका सही सदुपयोग क्या हो सकता हैं? इन प्रश्नों पर गहराई से विचार करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि जो अन्य प्राणियों को नहीं मिला वह उसे अतिरिक्त रूप से उपलब्ध है तो अवश्य ही उसके साथ कुछ विशिष्ट उत्तरदायित्व भी जुड़ा होना चाहिए।
मनन परायण विवेकवान व्यक्ति गहराई में उतरते हैं और दूर की सोचते हैं उन्हें उदरपूर्ति और कामतृप्ति जैसे क्षुद्र लाभ अपर्याप्त लगते हैं। मानवी गरिमा का स्वरूप और लक्ष्य समझ में आ जाने से वे निरन्तर उस महानता की ओर अग्रसर होते हैं; जिसे मनीषियों ने आध्यात्मिकता का नाम दिया है। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व मनन मंथन की महानतम उपलब्धि है। आत्म−बल का उदय इसी पृष्ठभूमि पर होता है और उसी के प्रकाश में ऐसा नीति निर्धारण बन पड़ता है जिसे देवोपम कहा जा सके। मनुष्य मनुष्यों के बीच पाई जाने वाली निष्कृष्टता और महानता की भिन्नता का यही है आन्तरिक विवेचन−विश्लेषण।
मननशील व्यक्ति का निष्कर्ष यह होता है कि अपनी चेतना में उत्कृष्ट चिन्तन का समावेश किया जाय और अपनी कार्य−पद्धति के साथ आदर्शवादी क्रिया−कलाप जोड़ कर रखा जाय। दोनों के समन्वय का नाम है परिष्कृत व्यक्तित्व। आत्मा को इसी स्तर पर पहुँचने की आकुलता रहती है। उसका निर्माण जिन तत्वों से हुआ है वे इससे कम ऊँचाई पर रहकर सन्तुष्ट ही नहीं हो सकते। मनन के फलस्वरूप जब यह विश्वास होता है कि हमारा अस्तित्व मात्र काया तक सीमित नहीं हैं वरन् उससे ऊँची उठी कोई आत्मसत्ता भी विद्यमान है, तो यह भी निश्चित करना पड़ता है कि आत्मा की क्षुधाएँ समझने और उसकी पूर्ति के लिए भी प्रयत्न किया जाना चाहिए।
मनन मंथन की महानतम उपलब्धि है। आत्म−बल का उदय इसी पृष्ठभूमि पर होता है और उसी के प्रकाश में ऐसा नीति निर्धारण बन पड़ता है जिसे देवोपम कहा जा सके। मनुष्य मनुष्यों के बीच पाई जाने वाली निष्कृष्टता और महानता की भिन्नता का यही है आन्तरिक विवेचन−विश्लेषण।
मनन उसे कई नये प्रश्नों पर सोचने के लिए विवश करता है। अन्य प्राणियों से ऊँचे स्तर की इन्द्रियाँ और चेतना उसे किस प्रयोजन के लिए मिली? और उनका सही सदुपयोग क्या हो सकता हैं? इन प्रश्नों पर गहराई से विचार करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि जो अन्य प्राणियों को नहीं मिला वह उसे अतिरिक्त रूप से उपलब्ध है तो अवश्य ही उसके साथ कुछ विशिष्ट उत्तरदायित्व भी जुड़ा होना चाहिए। यदि एक प्राणी को अन्य सभी की तुलना में अधिक ऐश्वर्य एवं उपभोग के साधन नियामक सत्ता देती तो स्पष्ट ही एक भारी अन्याय होता और फिर सृष्टि के समस्त प्राणी उस पक्षपात से रुष्ट होकर नियामक सत्ता को कोसते।
मनन’ कहते हैं। मनन करने वाले प्राणी को ही ‘मनुष्य’ कहा गया है। मनन उसे कई नये प्रश्नों पर सोचने के लिए विवश करता है। अन्य प्राणियों से ऊँचे स्तर की इन्द्रियाँ और चेतना उसे किस प्रयोजन के लिए मिली? और उनका सही सदुपयोग क्या हो सकता हैं?
मननशील व्यक्ति शरीरगत पशु प्रवृत्तियों के समाधान तक अपने चिन्तन और कर्तृत्व को अवरुद्ध नहीं करता वह उसका स्तर ऊँचा उठाता है। आत्म−निरीक्षण, आत्मसुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की बात सोचता है। इसका प्रयोजन केवल इतना ही है कि सोचने और करने के घटिया स्तर को ऊँचा उठाकर वैसा बनाया जाय जिससे मानवता गौरवान्वित हो− आत्मा को सन्तोष मिले और व्यक्तित्व को देव स्तर का विकसित हुआ माना जाय।
मनन’ कहते हैं। मनन के आधार पर आत्म−बोध होता है और आत्मा के अस्तित्व को−गौरव को अनुभव करते हुए उसकी क्षुधा पूरी करने की आकाँक्षा जागृत होती हैं। जबकि अविकसित प्राणी पेट और प्रजनन के साधन जुटाने की परिधि से आगे की बात सोच ही नहीं सकते। उनके भीतर मात्र प्रकृति प्रेरणा ही काम करती हैं। उन्हें मनुष्य जैसा उत्कृष्ट चिन्तन तन्त्र मिली ही नहीं जिसके आधार पर मनन कर सकना सम्भव हो सके जो अभिनव उद्देश्य की पूर्ति के लिए तड़पन उठा सके।
मनन शक्ति का जिसमें विकास हुआ वस्तुतः वही मनुष्य है। नर जन्म का स्वरूप, प्रयोजन और उपभोग क्या हो सकता है−क्या होना चाहिए इसके तलाश करने में चिन्तन शक्ति की तत्परता को ‘मनन’ कहते हैं। मनन के आधार पर आत्म−बोध होता है और आत्मा के अस्तित्व को−गौरव को अनुभव करते हुए उसकी क्षुधा पूरी करने की आकाँक्षा जागृत होती हैं। जबकि अविकसित प्राणी पेट और प्रजनन के साधन जुटाने की परिधि से आगे की बात सोच ही नहीं सकते। उनके भीतर मात्र प्रकृति प्रेरणा ही काम करती हैं।
मनन के आधार पर आत्म−बोध होता है और आत्मा के अस्तित्व को−गौरव को अनुभव करते हुए उसकी क्षुधा पूरी करने की आकाँक्षा जागृत होती हैं। जबकि अविकसित प्राणी पेट और प्रजनन के साधन जुटाने की परिधि से आगे की बात सोच ही नहीं सकते। उनके भीतर मात्र प्रकृति प्रेरणा ही काम करती हैं। उन्हें मनुष्य जैसा उत्कृष्ट चिन्तन तन्त्र मिली ही नहीं जिसके आधार पर मनन कर सकना सम्भव हो सके जो अभिनव उद्देश्य की पूर्ति के लिए तड़पन उठा सके।
मनन परायण व्यक्ति अनुभव करता है कि यह प्रचलित लोक−प्रवाह मानव जीवन के गौरव को सार्थक नहीं बनाता। यह तो मात्र पाशविक प्रयोजनों की ही पूर्ति हुई।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-September
मनन करते रहें। सौ वर्ष तक के जीवन काल में हम इस परमात्मा का गुणगान गाते रहें। सौ वर्ष के जीवन में हम कभी भी दीनता वृत्ति प्रकट न करें। सौ वर्षों से यदि अधिक जीवन भी मिले तब भी हम अपने जीवनकाल में उक्त कार्य करते रहें।
मनन और चिन्तन का स्थाई प्रभाव हमारे अंतःकरण पर पड़ता है। अंतःकरण की पवित्रता पर ही हमारी सुख शान्ति निर्भर करती है।
मनन और अभ्यास करने से ही हुआ है।
मनन करना चाहिए। समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए जो जो महान् कार्य उन्होंने असहनीय कष्ट झेल कर किये हैं, उन पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। यदि अपनी परिस्थितियाँ आगे बढ़ने से रोकती हों तो जिन कठिन परिस्थितियों में उन्होंने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन का उत्थान किया है, इसका अध्ययन करना चाहिए और उनके ऋण को चुकाने के लिए जन कल्याण के लिए सत्संकल्प करने चाहिएं। प्रायः संकल्प के बिना बड़े कार्य सफल नहीं होते। इसलिए इनका हमारे शास्त्रों में विधान रखा गया है।
मनन कीजिये और सोचिये, पक्षपात से रहित होकर देखिये, मन में कितनी बड़ी शक्ति है। उसकी इच्छा-शक्ति कितनी प्रबल है। आप बलवान् और स्वतंत्र बनने के लिये मन की इच्छा-शक्ति से काम लिये हुये उस पर विश्वास रख कर आगे बढ़िये, आप अवश्य नीरोग, वीर्यवान् बन जायेंगे। वास्तव में हमारी आत्मा ही ईश्वर है, जब हमारे शरीर में ईश्वर का वास है, तब हम रोगी कैसे हो सकते हैं ऐसा विश्वास रखते हुये संकल्प करना चाहिये गोस्वामी जी ने कैसा साफ साफ कहा— “भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा- विश्वासरुपिणौ” गोस्वामी जी के पूर्वोक्त वचनों का भावार्थ यह है कि- शंकर अर्थात् परमात्मा विश्वास-रूप ही है। हमारा विश्वास ही सब कुछ करता है।
मनन चिन्तन द्वारा उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन का एक अंग बना लेना चाहिए। उपवास और साधना के दिनों में किये गये मनन और चिन्तन का स्थाई प्रभाव हमारे अंतःकरण पर पड़ता है। अंतःकरण की पवित्रता पर ही हमारी सुख शान्ति निर्भर करती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-October
मनन करके उसके महत्व को समझ के उसके अनुकूल जीवन बनाकर स्वयं को, राष्ट्र को, समाज को धन्य बनाना प्रत्येक ब्राह्मण का आवश्यक कर्तव्य है। आज ऐसे ही सच्चे ब्राह्मणत्व का गौरव प्रिय है अपने कर्तव्यों की ओर ध्यान देना और उनके पालन करने के लिए तत्पर होना आवश्यक है। ब्राह्मणत्व की जिम्मेदारी महान है। उसकी ओर जागरुक रहने के लिए ही वेद भगवान ने इस मंत्र में आदेश किया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-July
मनन, निदिध्यासन से प्रतिबन्ध क्षय होने पर क्रमशः बन्धन से मुक्त हो जाता है।”
मनन और स्मरण किये बिना हम अपने ऊपर पड़ने वाले संस्कारों का महत्व नहीं समझ सकते और उनका पड़ना या न पड़ना हमारे हित की दृष्टि से व्यर्थ ही रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-May
मनन करना प्रत्येक परिजन का कर्तव्य है। अपनी जैसी धार्मिक अभिरुचि के अपने कुटुम्बी, संबंधी मित्र परिचित ऐसे और ढूंढ़ने चाहिए जिनमें इनके पढ़ने की अभिरुचि हो या पैदा की जा सके।
मनन किया, तथा दूर-दूर के देशों में आपकी नीतिमय शिक्षा का प्रचार किया।
मनन और चिन्तन करें, अपने विचार और विश्वासों को उसी के अनुरूप ढालें। साथ ही इस तैयारी में अपने समीपवर्ती और भी कुछ लोगों को साथ ले लें। यदि ऐसे साथी 7 मिल सकें तो बहुत ही प्रसन्नता एवं सफलता की बात मानी जायगी। पर यह 7 साथी से न्यूनाधिक भी हो सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-June
मनन करने से चित्त प्रदेश में इसकी धारणा को पक्का करने के लिए नियमित साधना एवं अभ्यास की आवश्यकता है। अभ्यास के अभाव में न वासनाओं पर नियंत्रण हो सकता है, न तत्त्व ज्ञान की प्राप्ति हो सकती और बहिर्मुखी वृत्ति अंतर्मुख हो सकती है इन सबके लिए अभ्यास एवं ज्ञान सहित वैराग्य की धारणा परमावश्यक है। योगविज्ञान में भी इनकी ही प्रधानता है।
मनन करके उसने प्रकृति के नियमों की एकरूपता को समझ लिया तो वह ब्रह्म और प्रकृति की अखण्डता को अनुभव करने लगा। वह समझने लगा कि संसार में भिन्न-भिन्न रूप और नाम दृष्टि-गोचर होते हैं वास्तव में उनका उद्गम स्थान एक ही है और व्यवहार में पृथक-पृथक जान पड़ने पर भी उनके भीतर एक ही सत्ता-एक ही शक्ति कार्य कर रही है। इस से उसके हृदय में ज्ञान, प्रेम, भक्ति के उच्च भावों का उदय होने लगा और उसकी क्षुद्र वृत्तियाँ दूर होने लगीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-February
मनन योग्य जान पड़े। उन्होंने बड़े स्पष्ट रूप में यह बतलाया है कि वर्तमान दुर्गति का कारण राजनीति से धर्म का, आध्यात्मिकता का बहिष्कार कर देना ही है। उनका कथन है कि-
मनन से मनुष्य की 40 भौतिक एवं साँसारिक कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं। वैदिक मन्त्र विद्या की यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण पुस्तक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-January
मनन करके, प्रेम द्वारा और सर्व भी तेरे लिए त्याग करके इस प्रकार बाह्यन्तःकरण के अनेक उपासना पद्धति द्वारा मैं तुझे पूजता हूँ और तू अनेक नाम धारण कर अनेक शरीर धारण कर प्रपंच में प्रसिद्ध और दिव्य और आश्चर्य कारक अनेक कार्य किये हुए ऐसी चरित्र वाली हे भगवती ओजमयी गायत्री तुझे नमस्कार है।
मनन, विज्ञान (साइंस) विद्या, ज्ञान।” इस शब्दार्थ से विदित हुआ कि ‘गायत्री-मंत्र’ में वह रहस्य वर्णित होना चाहिये जिसमें किसी व्यक्ति, परिवार, मानव समाज अथवा प्राणी मात्र की प्राण रक्षा हो, वे सदा सुखानन्द भोग करते रहें, तथा इतने समर्थ बने रहें कि इस संसार में अपने-अपने स्थान पर ठीक ढंग से स्थिर रहकर अपने योग्य कार्य को उचित रूप से पूरा कर सकें। इस प्रकार ‘गायत्री-मंत्र’ शब्द का अर्थ हुआ ‘प्राण रक्षण विद्या’ अथवा ‘जीवन विज्ञान’ अथवा ‘साइंस आफ लाइफ’। इसी को भारतीय जनता ‘तारक-मंत्र’ के नाम से पुकारती है, और इसके जप से परम पुण्य समझती है, महा कल्याण मानती है। हमें यह भी समझ लेना चाहिये कि यह ‘प्राण-रक्षा’ केवल मानव जाति की ही नहीं, अपितु समस्त जीवित, जागृत प्राणी मात्र की है।
मनन कर रहा हूँ और हे माता सब को सफल सुख प्रदान करने वाली तू मुझे शीघ्र ही प्रत्यक्ष होकर संतृप्ति कर।
मननशील भाग है। बुद्धि से ही ज्ञान कर्म की अविच्छिन्न धाराओं का उद्गम होता है। ज्ञान और कर्म का ही समन्वय होने पर मनुष्य नूतन जीवन में प्रवेश पाता है। गायत्री मंत्र मनुष्य की बुद्धि को सुसंस्कृत परिमार्जित बनाकर तपोमय, व्रतशील जीवन के प्रारंभ करने की शिक्षा देता है।
मनन करना भी नितान्त आवश्यक है। उन्हें संकल्प कर लेना चाहिये कि बिना जप किये भोजन नहीं करेंगे और स्वाध्याय किये बिना शयन नहीं करेंगे। इन ग्रंथों की बातों पर चलते-फिरते उठते-बैठते विचार करना चाहिये और उनको जीवन के व्यावहारिक कार्यों में प्रयोग करने का अभ्यास करना चाहिये।
मनन करने से जिज्ञासु को यह विदित हो सकता है कि सत्य ही इस सृष्टि को रचने वाला कोई महाप्रभु है। इससे वह अपनी अज्ञता और परमात्मा की सर्वज्ञता को अनुभव करने लगेगा। उसे यह भी अनुभव होने लगेगा कि हिमालय के सम्मुख एक मच्छर की हस्ती तो हो सकती है, किन्तु इस महान जगत की तुलना में मेरी कोई हस्ती नहीं हो सकती। इसलिए जैसे दुर्बल किसी बड़ी शक्ति का सहारा ढूँढ़ता है उसी प्रकार हम भी अपनी आत्मिक शक्ति बढ़ाने के लिये उस महती शक्ति के समीप जाने का प्रयत्न करते हैं। परमात्मा की अनन्त शक्ति को दिखाने के लिये, उसके अनन्त गुणों का अनुमान करने के लिए, तथा जीवन में भक्ति तथा श्रद्धा उत्पन्न करके परमात्म तत्व से शक्ति प्राप्त करने के लिये गायत्री एक बहुत बड़ा साधन है।
मनन करना और उसके रहस्यों को हृदयंगम करना परम आवश्यक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-April
मनन करके, उनके मतभेदों और उलझनों में न पड़कर, उसका रस निचोड़ लेना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-December
मनन करना, सब प्रकार की स्थिति में संतोष रखना और ऐसी श्रेष्ठ स्थिति के होते हुये अपना जीवन और व्यवहार ऐसा रखना कि जिससे दूसरों के ऊपर प्रभाव पड़ सके-यही सब मनुष्यों की भावना होनी चाहिये। खास कर जो व्यक्ति साँसारिक दुःखों को कम करना चाहते हैं उनका तो यही एकमात्र मार्ग है। यदि कोई मनुष्य अपने भीतर पाये जाने वाले अविवेक, असंतोष और अन्य दोषों को दूर न कर सका हो, और उनके होते हुये भी ऐसा विचार करता हो कि किसी शास्त्रीय सिद्धान्त या सम्प्रदाय के प्रचार से दुनिया सुखी बन सकेगी तो वह वास्तव में बड़ी भूल करता है। जो मनुष्य सदैव कठोर, कटु शब्द बोलता हो, खराब रास्ते पर चलता हो अथवा असंतोषी हो, तो वह दुनिया के दुःखों को बढ़ाने वाला है। इसके विपरीत जो मनुष्य प्रत्येक समय संतोष रख कर परोपकार का विचार करता रहता है और संतोष के भाव को भली प्रकार स्थिर रखता है वह दुनिया के सुख को बढ़ाया करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-August
मनन शक्ति का वरदान दें ताकि अपने जीवन में हम सत्य व्रतों का आचरण कर सकें।”
मनन से मनुष्य की 40 भौतिक एवं साँसारिक कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं।
मनन्ति, तपाँसि सर्वाणि च यद्वदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति,
मनन शक्ति हमें पुनः अच्छे कामों के लिए, उत्तम जीवन और ईश्वर दर्शन के लिए प्राप्त हों” (3। 54)। “हे विद्या दान करने वाले विद्वानों! आप दिव्य गुणों से युक्त श्रेष्ठ पुरुष हैं, हमें मनन शक्ति का वरदान दें ताकि अपने जीवन में हम सत्य व्रतों का आचरण कर सकें।”
मनन शक्ति को हम जीवन में सत्य व्रतों के धारण करने में लगा दें तो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, चिन्ता, कलह, क्लेश, दुःख, ईर्ष्या, द्वेष, राग आदि शत्रुओं से दूर होकर सुख शान्ति को प्राप्त कर सकते हैं। मन चाहे तो हमें देवता बना सकता है, आत्मा का साक्षात्कार करा सकता है, भवसागर से पार उतार सकता है। पृथ्वी लोक से द्यौलोक में पहुँचा सकता है अर्थात् निकृष्ट पशुवत् जीवन से उठाकर श्रेष्ठ मार्ग की ओर मोड़ सकता है। नरक से निकाल कर स्वर्ग का अधिकारी बना सकता है। इस लोक को ब्रह्मलोक में बदल सकता है।
मनन शक्ति की महत्ता को प्रकट करने वाले यजुर्वेद में कई मन्त्र आते हैं।
मनन करके उन्हें आचरण में लाना सरल होता है।
मनन शक्ति से संसार की उत्पत्ति हुई है”(17। 25)

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-December
मनन करने योग्य है-सूर्य की गर्मी पिछले कुछ समय से कम हो रही है वैज्ञानिक हैरान है कि सूर्य के इस हाश्र का कारण क्या हो है वे इस कारण भी चिन्तित है कि सूर्य की ऊर्जा व गर्मी समाप्त हो जाने से सारे भौतिक साधन होने पर भी मनुष्य जाति का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है और उससे बचने का कोई उपाय उनकी समझ में नहीं आ रहा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-March
मनन द्वारा प्राप्त करो संसार समुद्र के बीच प्रत्येक पदार्थ को कवि की दिव्य से देखना चाहिए। जो ध्यान में स्थित होकर तेज को मूल स्थान को ढूंढ़ते हैं वही आत्मा का पूर्ण रहस्य प्राप्त करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-April
मनन आदि गुणों वाला तथा गुणों से भी अतीत कहा गया है।
मनन स्वाध्याय सत्संग से उसे प्रभावित कर सकता है और दिशा दे सकता है। मस्तिष्क की दिशा जिधर चल पड़ती है जीवन स्वरूप वैसा ही बना जाता है और उसी आधार पर मनुष्य उन्नति अवनति सुख-दुख के परिणाम उपलब्ध करता है। मस्तिष्क मर्म स्थल कहा गया है- उसके ब्रह्म रन्ध्र में क्षीर सागर निवासी विष्णु भगवान् विराजमान हैं इस पौराणिक अलंकार में यही रहस्य छिपा पड़ा है कि समस्त दिव्य शक्तियों, सिद्धियों और विभूतियों का केन्द्र इस मस्तिष्क को ही कहा जाता है। इसे स्वस्थ एवं समुन्नत रखने के लिए विद्याध्ययन से लेकर विचार विनियम तक हमें बहुत कुछ करना होता है। तभी इस मस्तिष्क से समुचित लाभ मिल पाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-October
मनन काम परिष्कार का सशक्त माध्यम है। बुद्धि और भाव के क्षेत्र में काम की शक्तिधारा परिष्कृत और परिशोधित होकर प्रवाहित होने पर उनमें उत्कृष्ट विचारों और उदात्त भावों से भर देती है। शरीर के स्थूल केंद्रों की ओर उसका प्रवाह अपने-आप कम होता जाता है। फलतः कामोद्वेग नहीं रहता।
मनन द्वारा ज्ञान के उस स्त्रोत तक पहुंचा जा सकता है जिसे शास्त्रकारों से आत्म-ज्ञान, बाह्य-ज्ञान के नाम से वर्णन किया है।
मनन किया जा सके तो क्रमशः आत्मोत्कर्ष की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए विराट् सत्ता के निकट पहुँचा जा सकता है। जिसके निकट पहुँचने-उसके दिव्य स्वरूप का दिग्दर्शन करने के उपरान्त कोई कामना अवशेष नहीं रहती। एक अनिर्वचनीय आनन्द में साधक सदा डूबा भौतिक जगत में रहते हुए भी निर्लिप्त बना रहता है।
मनन द्वारा अन्तःकरण की भावनाएँ स्वतः उमड़ने लगती हैं। सही रूप से महामंत्र का अवगाहन, आराधन एवं चिन्तन मनन किया जा सके तो क्रमशः आत्मोत्कर्ष की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए विराट् सत्ता के निकट पहुँचा जा सकता है। जिसके निकट पहुँचने-उसके दिव्य स्वरूप का दिग्दर्शन करने के उपरान्त कोई कामना अवशेष नहीं रहती। एक अनिर्वचनीय आनन्द में साधक सदा डूबा भौतिक जगत में रहते हुए भी निर्लिप्त बना रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-August
मनन किया करते हैं। जो संसार की बातें एवं घटनायें अन्य व्यक्तियों के लिये नगण्य एवं सार शून्य होती है। ज्ञानार्थी के लिए वे बड़े-बड़े रहस्य रखती है। ज्ञान पाने का जिज्ञासु व्यक्ति हर घटना के पीछे छिपे, कारण कारक अथवा किसी मानव मनोविज्ञान का रहस्य खोजकर अपने ज्ञान की श्रीवृद्धि किया करते हैं। सामान्य जन जिन अपनी अनेक समस्याओं का कारण एवं निवारण स्वयं नहीं जानते, जानकार ज्ञानी लोग उनका हेतु एवं समाधान बतला देते हैं।
मनन, भावानुभूति चलती रहती है उसे सविकल्प समाधि कहते हैं) लेना चाहते थे। उन्होंने अनुभव किया कि महर्षि चित्र यह रहस्य पहले से ही जानते हैं सो पिता पुत्र दोनों महर्षि चित्र के पास गये और उनके प्रश्न का उत्तर सविनय उन्हीं से बताने का आग्रह करने लगे। उनकी जिज्ञासा को समझकर महर्षि चित्र ने उन्हें मृत्यु की अवस्था और देवयान मार्ग द्वारा स्वर्ग प्राप्ति का जो ज्ञान दिया है कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् का वह सारा का सारा ही आख्यान महान् वैज्ञानिक सत्यों ओर आश्चर्यों से ओत-प्रोत है। उससे यह पता चलता है कि भारतीय तत्व-दृष्टा न केवल प्राण और जीवन के रहस्यों से विज्ञ थे वरन् उन्हें सूक्ष्म से सूक्ष्म भौगोलिक ओर खगोल विद्या के रहस्यों का भी ज्ञान था। आज जब उस ज्ञान को विज्ञान की कसौटी पर कसते हैं तो मानना पड़ता है कि भारतीय साधनायें किसी भी भौतिक विज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण हैं और जीवन से सम्बन्धित समस्त जिज्ञासाओं और समस्याओं का वही सर्वश्रेष्ठ विकल्प है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-May
मनन द्वारा हमें उन संकल्पों की याद करनी चाहिये और मनुष्य-जीवन के महान् सदुपयोग का लाभ लेना चाहिये ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-July
मनन्तं यत्परं ब्रह्माहमेवतत्॥
मनन-चिन्तन और अन्य परीक्षण किये तब कहीं उसका उत्तर उसकी समझ में आया। वह उत्तर उन्होंने इस घटना के माध्यम से देते हुए आगे लिखा है के एक दिन युवक ने पूछ ही लिया अपनी नव विवाहिता से- तुम्हारे शरीर में अन्तर क्यों नहीं पड़ा ?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-November
मनन का फल यही है कि व्यक्ति अपने आचरण को श्रेष्ठ बनाने के लिए अग्रसर है। ज्ञान की यथार्थता चरित्र की कसौटी पर ही परखी जाती है।
मनन किया जाए तो पता चलेगा कि मनुष्य की अंतःप्रकृति के समान ही बाह्य प्रकृति भी एक विराट मस्तिष्क की स्वामिनी और सहचरी है। उसकी रचनाएँ मानवीय ज्ञान से कहीं अधिक सर्वशक्तिमान ज्ञान का अस्तित्व प्रतिपादित करती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-June
मनन्तोऽहमतान्तोऽहं चिरन्तनः॥
मनन-चिन्तन और उन्हें गुनगुनाते रहने से इसी मूल-भावना की दिनों दिन पुष्टि भी की जा सकती है। जीवन लक्ष्य प्राप्ति की आवश्यकता तो इससे स्वयमेव फलित होती है। “व्यास भाष्य” में बताया गया है-
मनन किया जाना चाहिए और यदि वे उचित जंचे तो तद्नुकूल अपनी मनोभूमि एवं क्रिया-पद्धति में ढालने के लिए विचार किया जाना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-February
मनन, चिन्तन से लेकर आत्म-संयम और जप ध्यान की साधना में लग गई। इसी आयु में बहुत मनोविकार प्रबल रहते हैं सो आमतौर से परमार्थ प्रयोजनों के लिए ढलती आयु के व्यक्तियों ही प्रयुक्त किया जाता है।
मनन करने की अत्यन्त महत्वपूर्ण वस्तु है- वशिष्ठ ने राम को वह तत्वज्ञान जिन शब्दों में दिया योग वशिष्ठ में उन्हें तीसरे अध्याय के 55 सूत्र में 39, 40, 41 और 4 श्लोकों में इस प्रकार बताया है-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-January
मनन के लिए एक खजूर के पेड़ के नीचे बैठते थे। कुछ समय बाद उन्हें वह स्थान छोड़कर अन्यत्र जाना पड़ा। तब उन्होंने उस खजूर को कटवा दिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-June
मनन में। यदा -कदा कोई मृग शावक मुनि से सटकर बैठ जाता, शायद वह इसी बहाने हद्पुर्वक मुनि का लाड़ -दुलार पा लेना चाहता थे पर अंततः विफल प्रयासी हो, उसे पुलिनों की ओर चले जाना पड़ता। मुनि स्नानार्थ नदी की ओर बढ़ते . तो आश्रम का कोई - न-कोई शुक समूह उनके साथ ही मंडराता चलता, उन्हें भला एक निस्पृह मुनि से क्या भय हो सकता था। उस दिन ब्रह्ममुहूर्त "ओम् विशवनी देव सबितुर दुरितानि ... " का धीर -गंभीर स्वर आश्रम में एक विचित्र वातावरण की सृष्टि कर रहा था। मुनि अभी नेत्र निमीलित किये ध्यानावस्थित थे।
मनन और अनुभव पर मुझे गर्व था, वह मिथ्या हुआ। मेरे ये ग्रन्थ, जिन्हें मैं प्राणों से भी अधिक प्रिय समझता था, अब इन्हें आग में झोंक देना होगा, क्योंकि अन्य कोई मार्ग नहीं है। बस, आप एक बार अपने श्रीमुख से कह दे। "
मनन कर सकूँ। भिक्षुक की आँखों में प्रसन्नता की चमक आ गयी। उन्हें अनुभव हो रहा था की तीर लक्ष्य तक पहुँच चुका है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-January
मनन-शक्ति स्मृति, संकल्प, वेग, मनोरथ, कामना, भोग, प्राणशक्ति आदि सभी उस परमात्मा की सत्ता का ज्ञान कराने वाले है। जो परमात्मा को जान लेता है, वह इस लोक से उठकर स्वर्गलोक में ब्रह्म के साथ दिव्य भोगों को पाता है। वह ज्ञानी अमृतत्व को प्राप्त होता है।
मनन, चिंतन का प्रतीक मानना चाहिए। ईश्वर-प्रार्थना भजन-कीर्तन प्रवचन, मंत्रजप आदि जीभ से ही होते है। यदि जीभ का परिशोधन हो चुका है, तो उपर्युक्त सभी कार्य ठीक प्रकार बने पड़ेंगे और अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करेंगे। यदि जिह्वा कुधान्य खाने और कुसंस्कारिता के दुर्गुणों की अभ्यस्त है, तो फिर समझना चाहिए कि साधना-प्रयोजन के लिए जिह्वा के माध्यम से जो कुछ किया गया है, वह सभी निरर्थक चला जाएगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-September
मनन में किया और कालांतर में एक सफल लेखक बना। जेल अधिकारियों ने उसकी लगन और श्रमशीलता को देखकर सुविधाएँ प्रदान कीं। कुछ समय पश्चात उसकी प्रथम साहित्यिक रचना-दी फोट्रेस’ प्रकाशित हुई और जर्मनी में काफी लोकप्रिय हुई। जेल में बंद मुलजिम जाइगोर समय के सदुपयोग एवं अपनी श्रमनिष्ठा से साहित्य जगत का सिरमौर बन गया।
मननीय-पठनीय अंश यही हैं, जो ग्यारहवें से तीसवें श्लोक तक फैले हुए है। बारबार उत्साह करा रहे हैं भगवान कि इस देह के लिए परेशान मत हो। इन रिश्तेदारों के प्रति जो मरणधर्मा हैं, मोह मत कर। गुरु हर शिष्य को ही हम बुद्धिमानों की भाषा-पांडित्यपूर्ण वचन बोलते हैं- गुरु हमें आइना दिखा देता है। यह गुरूर किसलिए - यह मोह किसके लिए- समाप्त हो जाने वाली काया के लिए-नश्वर संबंधों के लिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-May
मनन करना है गीता एक दर्शन है, जीवन संजीवनी है। इसे पौराणिक ढंग से मात्र श्लोकों के पाठ तक सीमित ना रख कर इसे भगवान की वाणी समझते हुए आत्मसात् करने का प्रयास किया जाना चाहिए, यह दैनंदिन जीवन में कार्य करने की शैली में अभिव्यक्त होना चाहिए, तभी गीता पाठ का महत्त्व है। इसी श्रीमद्भगवद्गीता महात्म्य प्रकरण में आगे आता है-
मनन मचलने लगे।
मनन करने के बाद हमें अन्य शास्त्रों के विस्तार में जाने की क्या आवश्यकता है। यह तो स्वयं पद्मनाभ भगवान विष्णु के मुखारविंद से निकली है, ऐसे में इसका महात्म्य जितना बताया जाये कम है। जब हम इस पद को समझने का प्रयास करते है, तो ज्ञात होता है कि यह मात्र गीता का पाठ नहीं- अर्थ एवं भावसहित उसे अन्तः करण में धारण कर लेना- मनन करना है गीता एक दर्शन है, जीवन संजीवनी है। इसे पौराणिक ढंग से मात्र श्लोकों के पाठ तक सीमित ना रख कर इसे भगवान की वाणी समझते हुए आत्मसात् करने का प्रयास किया जाना चाहिए, यह दैनंदिन जीवन में कार्य करने की शैली में अभिव्यक्त होना चाहिए, तभी गीता पाठ का महत्त्व है। इसी श्रीमद्भगवद्गीता महात्म्य प्रकरण में आगे आता है-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-July
मनन में मन को लगाए। कुविचार आते ही उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनसे लड़ने के लिए खड़ी कर दें। नित्य हिसाब रखें किन्तु सत्प्रयोजनों में कृपणता भी न बरतें। संग्रही न बनें पर आमदनी से खर्च कम रखें कुछ बचत करें, उधार लेने की आदत न डालें। अपने प्रभाव का ऐसा उपयोग करें, जिससे संपर्क क्षेत्र की दुष्प्रवृत्तियाँ घटे और सत्प्रवृत्तियों का बीजारोपण और परिपोषण उभारे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-November
मनन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि निश्चित उद्देश्य वाले व्यक्ति कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं और कोई भी शक्ति इच्छाशक्ति को नहीं रोक सकती। जो अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने समूचे अस्तित्व को दाँव पर लगाने को तैयार हैं, उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं।
मनन करो, उसी को अपने सपने में पा लो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, स्नायुतंत्र व समूचे अंग-प्रत्यंगों को इसी आदर्श के विचार से ओत−प्रोत कर दो और अन्य विचारों को एक तरफ हटा दो। फिर देखो सफलता कैसे तुम्हारे कदम चूमती है। यदि तुम अपना जीवन सफल बनाना चाहते हो व समूची मानवजाति के लिए वरदान बनना चाहते हो तो तुम्हें गहराई में जाना होगा। दृढ़ निश्चयी व्यक्ति को उसका लक्ष्य रूपी ध्रुवतारा बड़ी-से-बड़ी बाधाओं को पार करने की शक्ति देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-October
मनन मूर्ति की स्थापन के पंद्रह शताब्दी बाद कदाचित यह अवधारणा स्थापित हुई हो और तभी से अपरिवर्तित चली आ रही हो। तत्कालीन मिस्रवासियों के लिए यह मूर्ति सम्माननीय तो थी,; पर पूजनीय नहीं। उनके लिए वे सिर्फ एमेनहोटेप कि प्रतिमाएँ थीं। इससे उनके दैवीय होने का खंडन होता है।
मनन में लिखते हैं कि यदि विग्रह शुरू से ही उक्त गुणसम्पन्न होता, तो इसका उल्लेख कहीं-न-कहीं अवश्य होता। इस बात की भी चर्चा नहीं मिलती कि ये तत्कालीन लोगों के श्रद्धा के केंद्रबिंदु थे। उनका मानना है कि इतनी चमत्कारिक घटना का वर्णन कहीं न हो, यह अपने आपमें आश्चर्यजनक है। प्रायः ऐसा होता नहीं, अतएव वे मानते उन्हें महिमामंडित करने वाले शायद ग्रीक यात्री हों। जब मिस्र पर रोमानो का आधिपत्य हुआ, तो मेमनन मूर्ति की स्थापन के पंद्रह शताब्दी बाद कदाचित यह अवधारणा स्थापित हुई हो और तभी से अपरिवर्तित चली आ रही हो।
मनन कि नहीं, वरन् अमेन्होटेप की हैं, परन्तु चिर काल से यह मेमनन के नाम से ही प्रसिद्ध है। अगल-बगल बनी इन प्रतिमाओं में से प्रत्येक की ऊँचाई ५० फुट है और दोनों के बीच की दूरी भी इतनी ही है।
मनन के नाम से ही प्रसिद्ध है। अगल-बगल बनी इन प्रतिमाओं में से प्रत्येक की ऊँचाई ५० फुट है और दोनों के बीच की दूरी भी इतनी ही है।
मनन के नाम से विख्यात यह भीमकाय मूर्तियाँ मिस्र में नील नदी के किनारे पर थीब्स के भग्नावशेषों के मध्य लम्बे काल से खड़ी हैं। कहा जाता है कि यह मूर्तियाँ वास्तव में मेमनन कि नहीं, वरन् अमेन्होटेप की हैं, परन्तु चिर काल से यह मेमनन के नाम से ही प्रसिद्ध है। अगल-बगल बनी इन प्रतिमाओं में से प्रत्येक की ऊँचाई ५० फुट है और दोनों के बीच की दूरी भी इतनी ही है।
मनन की प्रतिमा सचमुच बोलती है। यह थे तत्कालीन प्रसिद्ध इतिहासकार स्ट्रैबो। अपने यात्रा वृत्तांत में इस बात का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि उससे निकलने वाली ध्वनि हलके प्रहार जैसी थी एक अन्य यात्री पउसैनियाज वह वीणा के तर टूटने जैसी थी। उल्लेखनीय है की पउसैनियाज ने थीब्स की यात्रा १३० में सम्राट हैड्र यिन के साथ की थी इन भिन्नताओं के आधार पर ध्वनि की तान के बारे में किसी एक निश्चय पर पहुँच पाना संभव नहीं; पर इसके समय के संबंध में सभी एकमत थे। सभी ने मेमनन की आवाज़ का समय सूर्योदय के करीब बताया है।
मनन की मूर्ति मुखर हुई थी।
मनन का विग्रह मौन है; लेकिन इ. स्मिथ नामक एक अंग्रेज पर्यटक ने इसे मार्च १८२१ में सुनने का दावा किया है। यों तो किसी उन्नीसवीं सदीं में किसी अंग्रेज घुमंतू के मिस्र पहुँचने थीब्स जाने का कोई प्रमाणिक सुबूत नहीं मिलाता, फिर भी इस बात को तात्कालिक ग्रंथों में ढूंढ़ा जा सकता है कि उस दौरान भी लोग वहाँ आते-जाते रहे। रिव्यू इन्साईक्लोंपीडिक ही एकमात्र ऐसा ग्रन्थ है, जिसमें ए. स्मिथ की मिस्रयात्रा की चर्चा है इसलिए विशेषज्ञ इस बारे में संदेहशील है कि निकट भूत में मेमनन की मूर्ति मुखर हुई थी।
मनन की आवाज़ का समय सूर्योदय के करीब बताया है। मूर्ति पर अंकित यात्रियों के विवरण से ज्ञान होता है कि दो बार प्रतिमा की ध्वनि सूर्योदय से पूर्व निकली थी। १८ बार यह सूर्योदय के बाद सुनी गयी। ८ बार सूर्योदय के बाद के प्रथम घंटे में, ६ बार सूर्योदय सूर्योदय के एक घंटे बाद, २ बार सूर्योदय के दूसरे घंटे में तथा ३ बार सूर्योदय के दो घंटे पश्चात्। इस प्रकार कुल ३९ पर्यटकों द्वारा अपने भ्रमणकाल में कर की गई ध्वनि का समय विग्रह पर उल्लिखित है उक्त उल्लेख से ऐसा विदित होता है कि इनमें से अधिकाँश ध्वनियाँ फरवरी और मार्च के महीने में सुनी गईं।
मनन की मूर्ति से ध्वनि निस्सृत हुई थी। उस समय से सन ६ तक बीच-बीच में लम्बे-छोटे अंतराल पर उसकी आवाजें सुनी गईं, तदुपराँत उसके सुने जाने का कोई साक्ष्य नहीं मिलता। ईसापूर्व में पहली बार किसी प्रमाणिक व्यक्ति ने इस बात की पुष्टि की कि मेमनन की प्रतिमा सचमुच बोलती है। यह थे तत्कालीन प्रसिद्ध इतिहासकार स्ट्रैबो। अपने यात्रा वृत्तांत में इस बात का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि उससे निकलने वाली ध्वनि हलके प्रहार जैसी थी एक अन्य यात्री पउसैनियाज वह वीणा के तर टूटने जैसी थी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-April
मनन, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग जैसे कार्यक्रमों में व्यस्त रहे। मनोभूमि पर विक्षोभजनक प्रभाव उत्पन्न न हो, तो ही व्रत का पूरा लाभ मिलता है। व्यावसायिक कार्यों में प्रायः झूठ, चोरी, कर्तव्य में ढील, राग-द्वेष, लोभ, तृष्णा, क्रोध, वासना जैसे दोषों का समावेश बना रहता है। इसलिए अच्छा यही है कि चाँद्रायण के उपयुक्त स्थान तलाश किया जाय और उन दिनों छुट्टी लेकर आध्यात्मिक जीवन का लाभ लिया जाय। इस संबंध में परिजनों के लिए गायत्री तीर्थ, शांतिकुंज सर्वाधिक उपयुक्त पड़ेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-August
मनन कर, जब तक प्रगति की राह न दिखाई पड़े। थोड़ी-बहुत ज्योति आदि का दर्शन कर यह मत समझो कि तुम्हें सिद्धि मिल गई, मोक्ष प्राप्त हो गया।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-December
मनन से कोई संबंध नहीं रखने वाले साधु बाबा भी इसी आशय के श्लोकों के उद्धरण देते और वैसी ही व्याख्या करते रहते हैं।
मनन से नई-नई भावनाएँ उठती अनुभव करते हैं। इसके बावजूद यह सही है कि गीता वैराग्य अथवा वीतराग भाव को जन्म देती है। संसार के प्रति उपराम करती है। अभिभावक अपने बच्चों को गीता पढ़ने से इसीलिए रोकते हैं।
मनन, चिंतन, उपासना, योगाभ्यास, शोध, अनुसंधान, विज्ञान आदि ऐसे कार्य हैं, जिनमें अधिक गंभीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की जरूरत है। इसलिए इनका आरंभ भी ऐसे ही समय में होना चाहिए, जब शरीर के सूक्ष्म कोष चंद्रमा की शीतलता को ग्रहण कर रहें हों।
मनन, पूजन के लिए एकांत की आवश्यकता है; किंतु उत्साह भरने और युद्ध में प्रवृत्त होने के लिए उत्तेजक वातावरण की जरूरत पड़ती है। ऐसी उचित स्थितियों में किए हुए कार्य अवश्य फलीभूत होते हैं। इसी आधार पर स्वरयोगियों ने निर्देश किया है कि विवेकपूर्ण और स्थायी कार्य चंद्र स्वर में किए जाने चाहिए। अध्ययन, मनन, चिंतन, उपासना, योगाभ्यास, शोध, अनुसंधान, विज्ञान आदि ऐसे कार्य हैं, जिनमें अधिक गंभीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की जरूरत है। इसलिए इनका आरंभ भी ऐसे ही समय में होना चाहिए, जब शरीर के सूक्ष्म कोष चंद्रमा की शीतलता को ग्रहण कर रहें हों।
मनन करते हैं। पूरे ग्रंथ को कंठस्थ कर लेने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी है। पाठ करने और याद रखने का अपने आप में विशेष महत्त्व नहीं है, लेकिन इतना अभ्यास करने वालों का जीवन भी कुछ विशेषता लिए हुए होता है। महात्मा गाँधी कहा करते थे कि गीता का अध्ययन करने वालों को विषाद बहुत कम सताता है। उनके अपने शब्दों में, “गीता संपूर्ण वैदिक शिक्षाओं के तत्त्व का सार है।
मनन ही नहीं, श्रद्धा से पाठ करना भी साधक का कल्याण करता है। स्वामी चिन्मयानंद गीता के एक श्लोक की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि वे लोग भी प्रशंसनीय हैं, जो इसका सतही पाठ भी करते हैं, धीरे-धीरे वे शास्त्र की पावन गहराइयों में खिंचे चले जाते हैं। ऐसा पाठक अनजाने ही आत्मदेव की तीर्थयात्रा पर चल पड़ता है और स्वाभाविक ही वह आत्मविकास की यात्रा पर निकल पड़ता है। गता का विषय सुनना और पढ़ना ही पर्याप्त नहीं है, उसके साथ व्यक्तित्व का सुगठित होना भी आवश्यक है। उस गठन में श्रद्धा भाव भी आवश्यक है और दोष दृष्टि का अभाव भी आवश्यक है।
मनन व अपनी साप्ताहिक-दैनिक योजना बनाना मन के अच्छे व्यायाम हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-February
मनन और धारण शक्ति का विकास होता है, आत्मबल की वृद्धि होती है, विषयवासना नष्ट हो जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-November
मनन के द्वारा निज आत्माओं को ईश्वरीय ज्ञान से अलोकित कर उत्तम ग्रन्थों का निर्माण किया। अतएव उन्होंने संसार को अमूल्य ज्ञान निधि भेंट की। वे मानव के हित चिन्तक और विश्व धर्म के पालक थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-October
मनन योग्य है प्रह्लाद के शब्द हैं।
मनन इत्यादि पर केन्द्रित नहीं होता, सब कुछ झंझट सा प्रतीत होता है। सब कुछ नियंत्रण तोड़ डालने को मन करता है। असंयम की ओर प्रवृत्ति होती है, मादक दृव्य हमें अपनी ओर खींचते हैं। साधक के लिए यह परीक्षा की घड़ी होती है। यहाँ उसके धैर्य और संयम की परीक्षा होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-April
मनन किया जाय तो सद्ज्ञान का अविरल स्रोत प्रस्फुटित होता है। नीचे संक्षिप्त सा गायत्री मंत्रार्थ दिया जाता है।
मनन करना आवश्यक है। उसका महत्व समझना आवश्यक है। प्रत्येक कार्य के कारण पर विचार किया जाय कि ऐसा हुआ तो क्यों हुआ? और ऐसा नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? अमुक मनुष्य कार्य कर सकता है तो मैं क्यों नहीं कर सकता?
मनन किया फिर भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ। एक ही बात एक को भोग की ओर आकर्षित करने वाली होती है और दूसरे को त्याग की ओर। इससे स्पष्ट है कि वह शक्ति घटनाओं में नहीं, हमारे विचारों में ही है। विचारों से ही मनुष्य बनता है और उन्हीं से बिगड़ता भी है। अतः जीवन की हर एक समस्या-हर एक घटना पर, चाहे वह कितनी ही तुच्छ और साधारण क्यों न जान पड़े मनन करना आवश्यक है।
मननमपि श्रेष्ठस्य विदधेत्॥
मनन शील, विद्वान और लोक सेवी ब्राह्मणों द्वारा प्राप्त होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-August
मनन और आत्म ज्ञान में लिप्त रहना चाहिए। ऐसा व्यक्ति सामाजिक झुण्डों से दूर, भौतिक वस्तुओं से विरक्त अपने आप को संयमित करने में ही अधिक समय देता है। सोचता है-अपना बाहरी जीवन सरल बनाने का प्रयत्न करना चाहिए, और भौतिक एवं सामाजिक आवश्यकताओं को घटाने का प्रयत्न करना चाहिए। शरीर के कार्य आत्मा के विकास, परिष्कार और प्रतीति के लिए होने चाहिए। बाह्य जीवन अर्थात् बाहरी आडम्बरों तथा झंझटों में लिप्त जीवन से कुछ अधिक नहीं हो सकता।
मनन करना चाहिए, जो यज्ञोपवीत के साथ सन्निहित हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-January
मनन से यह पुष्ट होता है। और इसका आधार है स्वाध्याय। स्वाध्याय की प्रक्रिया में ही मन का अप्रतिम सौंदर्य छिपा पड़ा है। यह अत्यन्त सहज-सुलभ है और हर कोई इसे प्राप्त कर सकता है। मनस्वी का मन बड़ा सुन्दर होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-April
मनन्तम् ब्रह्म’ कहा। उन तत्त्वदर्शी महर्षियों के अनुरूप ज्ञान सत्य है, अनन्त है और ब्रह्म है। आधुनिक विज्ञानवेत्ता ज्ञान के तत्त्व की इस समग्रता से अनजान हैं। वे केवल इतना जान पाए हैं कि ज्ञान सत्य है, इसकी अनन्तता एवं पूर्णता के ब्रह्मस्वरूप की उन्हें कोई खोज खबर नहीं। ज्ञान के जिस सत्य को वह व्यवस्था देने की कोशिश करते हैं, वह भी सामयिक होता है, शाश्वत नहीं।
मनन्तम् ब्रह्म’ की अनगिन चेतन धाराओं की अनुभूति पायी जा सकती है। ज्ञान के युग सत्य का बोध हो सकता है।
मनन्यभाक्। साधुरेव व मनतवयः सम्यग्यवसितों हि सः॥9/3

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-July
मनन व निदिध्यासन को समर्थ साधना विधि के रूप में बताया था। इस गुरुगीता का उपदेश कैलाश शिखर पर भगवान सदाशिव ने माता पार्वती को दिया था। बाद में यह गुरुगीता नैमिषारण्य के तीर्थ स्थल में सूत जी ने ऋषिगणों को सुनायी। भगवान व्यास ने स्कन्द पुराण के उत्तरखण्ड में इस प्रसंग का बड़ी भावपूर्ण रीति से वर्णन किया है।
मनन व निदिध्यासन से गुरुतत्त्व का बोध पा सकें, परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से लाभान्वित हो सके, इसलिए इस ज्ञान को धारावाहिक रीति से क्रमिक ढंग से प्रकट किया जा रहा है। अब से प्रत्येक महीने की अखण्ड ज्योति में मंत्र क्षमता वाले गुरुगीता के श्लोकों की भावपूर्ण व्याख्या की जाएगी।
मनन, पाठ-पठन व निदिध्यासन से अनेकों को अपने गुरुदेव का संग-सुपास मिला है। उन्होंने दिव्य लोक में रह रहे अपने सद्गुरु की चेतना का संस्पर्श पाने में सफलता प्राप्त की गोस्वामी जी के शब्दों का माँत्रिक महत्व है। इसकी गुणवत्ता तब शत-सहस्र गुणित हो जाती है, जब अन्तर्चेतना में इसका अर्थ बोध समाहित हो जाय। गुरुचरण चरित के मंत्रदृष्टा महाकवि तुलसी इसका प्रारम्भ करते हुए कहते हैं-
मनन द्वारा इससे आँतरिक ज्ञान में वृद्धि होती है, जो गुरु समर्पण से मिलता चला जाता है। वासनामुक्त अंतःकरण में, ऐसे ज्ञान की वृद्धि होती जाती है, जिसके प्रकाश में हमारी बुद्धि पर घने घटाटोप बादलों की तरह छाए संशय निवृत्त हो जाते हैं (ज्ञान संछिन्न संशयम्)। ज्ञान सूर्य मानो उन बादलों को, अज्ञानजन्य भ्राँतियों को अपने प्रकाश से छाँट देता है, नष्ट कर देता है। ऐसा व्यक्ति स्वतः आत्मपरायण हो जाता है (आत्मवन्तं), वह परमचैतन्य अवस्था को प्राप्त हो जाता है। फिर इस लौकिक जगत् और उसकी क्रियाएँ उसे वासनाओं की बेड़ियों में नहीं जकड़ पातीं (न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय)।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-June
मननशील मुनि एवं विचारशील ऋषि मिलकर उपलब्ध ज्ञान की त्रुटियों का निवारण-निराकरण करें। उसे जीवनोपयोगी सार्थकता प्रदान करें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-May
मनन द्वारा एकत्र ज्ञान व्यवहार में लाने पर उसके प्रति निरंतर श्रद्धा बढ़ती रहने पर सारे संशयों से निवृत्ति मिल जाती है।
मनन किया। जो अपनी सम्यक् दृष्टि से इस पहले सूत्र का रहस्य जान चुके हैं, उनके लिए महर्षि पतंजलि समाधिपाद के दूसरे सूत्र में योग के सत्य को समझाते हैं। योग के स्वरूप को परिभाषित करते हैं। इसकी व्याख्या करते हैं। क्योंकि जिनकी अन्तर्चेतना में शिष्यत्व जन्म ले चुका है, जो अपने सद्गुरु द्वारा दिए गए अनुशासन को स्वीकारने के लिए कृतसंकल्प हैं।
मनन करने की चेष्टा करने लगे।
मनन करने में रुचि रखे। अध्ययन-मनन द्वारा एकत्र ज्ञान व्यवहार में लाने पर उसके प्रति निरंतर श्रद्धा बढ़ती रहने पर सारे संशयों से निवृत्ति मिल जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-December
मनन और निदिध्यासन की है। आवश्यकता इस तत्वचिंतन के गहरे अभ्यास की है। पिछली कड़ी में सभी साधकों को मन की पाँचों वृत्तियों का सामान्य परिचय दिया गया था। यह बताया गया था कि ये पंचवृत्तियां मन की पाँच शक्तियाँ और विभूतियाँ हैं। इनके सम्यक् प्रयोग से योग साधक बहुत कुछ आश्चर्यजनक उपलब्धि हस्तगत करने में सक्षम हो सकते हैं।
मनन करने वाला कर्मयोगी का त्याग प्राप्त होना कठिन है। योग के आचरण से शुद्ध हुआ भगवत्स्वरूप को मनन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है (न चिरेण ब्रह्म अधिगच्छति)।
मनन और निदिध्यासन करेंगे, उन्हें इन महामंत्रों से सत्य और ऋत् की प्रकाश किरणें फूटती अनुभव होगी। इस अनुभूति के क्षणों में उन्हें ऐसा लगेगा कि जो कुछ इन मंत्रों में है, वह तो मात्र संकेत है यथार्थ तो कहीं और भी अधिक विस्तृत और विराट् है।
मनन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है (न चिरेण ब्रह्म अधिगच्छति)।
मनन करते रह कर्मयोगी बनने का प्रयास करे, यही हमारा आदर्श होना चाहिए। वे यह भी कहते है कि निष्काम कर्म के अनुष्ठान के बिना संन्यास दुःख प्राप्ति का मार्ग बनकर रह जाता है। परमपूज्य गुरुदेव के कथनों व अनुभवों से आज के संन्यास की विडंबना भी विगत अंक में बताई गई थी। अब आगे पढ़े।
मनन में डूब गए?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-August
मनन व निदिध्यासन की झलक मिलती है। माता पार्वती की जिज्ञासा भी हम सब गुरुभक्तों की कल्याण कामना के उद्देश्य से उपजी थी। सर्वज्ञानमय माँ ने अपनी सन्तानों की आध्यात्मिक उन्नति के लिए देवेश्वर शिव से प्रश्न किया था।
मनन किया गया, तो सभी बुद्धिसंगत प्रतीत हुई। वह गाने वाले का त्राण उसे समग्र रूप से स्वस्थ बनाकर करती है।
मनन एवं निदिध्यासन करके गोस्वामी जी द्वारा रचित रामचरित मानस के सत्य की अनुभूति की जा सकती है। रामचरित के इस अद्भुत मानस सरोवर का शीतल स्पर्श किया जा सकता है। तुलसी की भक्ति साधना एवं काव्य सौंदर्य का रसपान किया जा सकता है। इसकी कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा है-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-October
मनन करते रहते हैं।
मननशील मनीषियों को इसकी प्राप्ति हेतु ही सभी श्रेष्ठ कर्तव्य कर्म करना चाहिए।
मननशील मनीषी हैं, वे शीघ्र ही इस गूढ़ रहस्य को समझ जाते हैं कि अपनी जाग्रत् आत्मा ही सद्गुरु है अथवा गुरुदेव भगवान् ही अपनी जाग्रत् आत्मा है। इस कथन में सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाला शब्द ‘मनीषी’ है। मनीषी सब नहीं होते। ये बड़े ही विशेष प्रकार के साधना परायण व्यक्ति होते हैं। इनका विश्वास जीवन की याँत्रिक गतिविधियों में फँसकर सब कुछ गवाँ देने में नहीं होता।
मनन हेतु प्रस्तुत कर दी गई हैं। अब इनकी समीक्षा व क्यों व किन परिस्थितियों में यह सब लिखा गया, इसके आगे का उनका मार्गदर्शन क्या रहा, यह अगले अंक में पढ़ सकेंगे। अभी इतना ही।
मनन किया है, वह अहं के परित्याग (संन्यास) और कामनाओं के त्याग (सच्चा कर्मयोगी) में कोई भेद नहीं करता। पढ़ा−लिखा होते हुए भी, बाहर से पंडित समान वेश धारण किए, ढेरों डिग्री लिए व्यक्ति यदि दोनों योगों को अलग−अलग बताता है तो फिर उसे ज्ञानी नहीं बालक ही मानना चाहिए, बुद्धिमान नहीं, मूर्ख ही जानना चाहिए। ऐसी अपरिपक्व बुद्धि वाली जनता हम से अनजान नहीं है। हमारे चारों ओर ही ऐसे ढेरों व्यक्ति हमें मिल जाएँगे, जो संन्यास का न कोई मर्म जानते हैं, न निजी जीवन में उसे उतारते हैं, हाँ बाहर से मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, संन्यासी का चोला अवश्य पहने हुए हैं। स्वयं छलावे में जी रहे हैं, औरों को भी इसी मृगतृष्णा में उलझाने की कोशिश कर रहे हैं।
मनन, एवं निदिध्यासन किया था। यह जाना था कि साक्षी होने के अलावा अन्य सभी अवस्थाओं में मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य हो जाता है। अब इससे अगले यानि की पाँचवे सूत्र में महर्षि पतंजलि इस तत्त्व को और अधिक सुस्पष्ट करते हैं। इस सूत्र में वह कहते हैं- ‘वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टक्लिष्टः’ (1/5)। यानि मन की वृत्तियाँ पाँच हैं।
मननशील मनीषियों को शीघ्र ही इस यथार्थता का अहसास हो जाता है कि सद्गुरु की कृपाशक्ति से ही आत्मचेतना में जागृति आती है। और जब आत्म चेतना जाग्रत् होती है, तो यह सत्य अनुभूति का रूप ले लेता है कि सद्गुरुदेव की कृपाचेतना ही अपनी आत्मचेतना है। इन दोनों में कोई भिन्नता नहीं है। इसलिए गहन अर्थ में सद्गुरु के सत्य स्वरूप का साक्षात्कार ही आत्म साक्षात्कार है। सद्गुरु की प्राप्ति ही आत्मप्राप्ति है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-March
मनन करने से तत्त्वज्ञान का दर्शन-अनुभव स्वतः स्फूर्त होता है। इसी रहस्य को आगे श्लोक- ‘ज्ञेयं यत् तत प्रवक्ष्यामि-यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते, अनादिमत्परंब्रह्म न सत तन्नासदुच्यते’ (13/12)। अर्थात्- ज्ञेय है, जानने योग्य है उसे मैं (श्रीकृष्ण) विस्तार से कह रहा हूँ- जिसे (अध्यात्मज्ञान को) जानकर मनुष्य अमरता का अनुभव करता है। वह न सत् है, न असत् है। इस परमात्मतत्त्व या अध्यात्मतत्त्व में सत्-असत् शब्दों की वाणी की प्रवृत्ति होती ही नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-November
मनन करते रहने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है।
मनन एवं निदिध्यासन करते हैं। साथ ही भाव भरी प्रतीक्षा करते हैं अगले महीने प्रकाशित होने वाली कड़ी की। जिससे कि योग साधना एवं तत्त्वदर्शन के एक नए आयाम में प्रवेश हो सके। जीवन की अनूठी अन्तर्यात्रा में एक कदम और आगे बढ़ा जा सके। साधकों की इन भावनाओं से हम सुपरिचित हैं।
मनन करने वाले ध्यानयोगी) ‘न चिरेण’ अर्थात् शीघ्र ही ‘ब्रह्म अधिगच्छति’ अर्थात् ब्रह्मपद को प्राप्त करते है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-September
मनन करते जाएँ और उसे अभ्यास में लाते जाएं। एक साथ उच्च कक्षा की चर्चा आरंभ कर देना अनुचित और निष्फल होगा”।
मनन व चिंतन, स्वास्थ्य व सत्संग से रोक कर सही दिशा दिखाती हैं व सदैव आत्मनिर्माण, आत्मविकास की प्रेरणा देती रहती है। सद्विचारों के लिए श्रेष्ठ साहित्य ही वरेण्य होना चाहिए व सतत् स्वाध्यायरत रह, श्रेष्ठ व्यक्तियों के समूह में रह कर व्यक्तियों को सही चिन्तन की शैली का अभ्यास करना चाहिए, यह सत्संकल्प का प्रथम पाठ है एवं सही कहा जाय तो यही मर्म है। यदि इतनी व्यवस्था भी कोई जीवन में कर ले तो वह बदल जाए, साथ ही अनेकों को बदल दे।
मनन के माध्यम से उनका परिचय पा सके अथवा प्रसुप्त सुसंस्कारिता के बीजाँकुर जिनमें विद्यमान हैं व भविष्य में जिनकी उस विराट नवयुग अभियान में जुड़ने की संभावना है, सभी को परिलक्षित हो। यदि इस प्रयास, में कुछ सफलता मिल सकी जिसमें कोई सन्देह नहीं है, तो यही गुरुसत्ता के प्रति सच्ची श्रद्धाँजलि होगी।
मनन, स्वाध्याय, लेखनी की साधना) के अतिरिक्त थी। यह सोचा जा सकता है कि 24 घंटे में 21 घंटे जब इसमें चले गए तो वे सोते कब थे। यही तो अलौकिक सिद्धि है जो किसी भी नाम से पुकारी जा सकती है पर उनके निकटवर्ती जानते हैं कि प्रातः 1 बजे से उठकर जो उनने कार्य आरंभ किया है तो उसे बिना विराम दिये सतत् रात्रि 10 बजे तक सम्पन्न किया है। यह संभव है तपोबल से अर्जित सामर्थ्य के सहारे।
मनन करें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-April
मनन कर लेना चाहिए एवं अपनी जिज्ञासा का समाधान करते हुए भ्रमजंजालों की मृग-मरीचिका से उबर आना चाहिए।
मनन के पश्चात् वे इसी निष्कर्ष पर पहुँच पाये है कि व्यक्ति की कषाय-कल्मषों से मुक्ति अपने भीतर की प्रसुप्त चेतना को जगाने के उपरान्त ही संभव है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-November
मनन करने के बजाय, “मुझे क्या करना चाहिए?” इस पर विचार करना चाहिए?” कुछ क्षण के लिए कार्लाइल का यहाँ सुझाव मान भी लिया जाय, तो क्या बिना आत्मबोध और स्वरूपबोध के कर्तव्यबोध कर पाना संभव है? कदाचित् नहीं। जब गन्तव्य ही न मालूम हो, तो कोई कदम किस ओर बढ़ायेगा?
मनन स्वाध्याय का क्रम अपनाना तथा छोटे-छोटे दीपयज्ञों द्वारा जन-जन को युगपरिवर्तन की विचारधारा से अनुप्राणित करना, यही त्रिविध उद्देश्य इन कार्यकर्ता गोष्ठियों का था जो तीनों दिन टुकड़ों-टुकड़ों में पूरा होता चला गया। संध्याकाल में वंदनीया माताजी के उद्बोधन के पूर्व गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक पण्डित लीलापत जी शर्मा का प्रेरक उद्बोधन हुआ। अपनी ओजस्वी शैली में पं. लीलापत शर्मा ने पूज्य गुरुदेव के विद्या-विस्तार कार्यक्रम के विस्तार हेतु उनके लिखे साहित्य को उन सभी क्षेत्रों तक पहुँचाने की प्रेरणा दी, जहाँ अभी मिशन का आलोक नहीं पहुँच पाया हैं। वंदनीया माता जी के उपासना, साधना, आराधना परक त्रिविध अध्यात्म प्रधान प्रसंगों, पर उद्बोधन इसके पश्चात् हुआ। “ऋषिचिन्तन” नाम फिल्म के साथ ही कार्यक्रम समाप्त हुआ।
मनन चारों ही आवश्यक हैं। स्कूली शिक्षा जहाँ तक संभव हो, वहाँ तक प्राप्त करनी चाहिए पर नौकरी लक्ष्य न रखा जाय, तो ही अच्छा है क्योंकि भविष्य में हर शिक्षित को नौकरियाँ नहीं मिलने वाली हैं। उपार्जन के लिए पैतृक धन्धे को ही विकसित करने की योजना सरल पड़ती, पर यदि वैसा संभव न हो, तो दूसरे उद्योग की बात सोची जा सकती है। शिक्षा का उद्देश्य जीवनोपयोगी-समाजोपयोगी ज्ञान का संवर्धन है। इसके सहारे मनुष्य बुद्धिमान बनता है।
मनन से उन्हें अपनाने और कार्यान्वित करने के प्रयास में जब भी अवसर हो समय लगाना चाहिए और उसे आत्मशोधन की साधना मानकर चलना चाहिए जो ईश्वर उपासना के ही समतुल्य है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-December
मनन्द ने तो दूसरे तत्कालीन विद्वान आचार्य उपवर्ष के प्रसिद्ध योगी शिष्य-इन्द्रदत्त ने।
मनन्द और चाणक्य की कथा भी प्रख्यात है। लोग जानते हैं कि महापद्मनन्द का शरीर एक था, पर उस शरीर से यात्राएँ दो आत्माओं ने की थीं। एक स्वयं महापद्मनन्द ने तो दूसरे तत्कालीन विद्वान आचार्य उपवर्ष के प्रसिद्ध योगी शिष्य-इन्द्रदत्त ने।
मनन्द का शरीर एक था, पर उस शरीर से यात्राएँ दो आत्माओं ने की थीं। एक स्वयं महापद्मनन्द ने तो दूसरे तत्कालीन विद्वान आचार्य उपवर्ष के प्रसिद्ध योगी शिष्य-इन्द्रदत्त ने।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-May
मनन-चिन्तन सज्जनों का संग आदि कुछ ऐसे उपाय हैं जिनके द्वारा अपनी विचारशक्ति की प्रभावोत्पादकता को बढ़ाया और स्वयं के उज्ज्वल भविष्य की संभावना को सुनिश्चित किया जा सकता है।
मनन उनके आकार को स्थायित्व प्रदान करने के साथ ही उन्हें चिरकालिक बनाता है। निरुद्देश्य एवं अस्थिर मनःस्थिति में किये गये संकल्प भी क्षणिक होते हैं। छोटे-मोटे प्रभाव छोड़कर वे थोड़े दिनों में समाप्त हो जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-June
मनन भी। इन सब के समन्वय से उद्देश्य लक्ष्य की एक दिशाधारा विनिर्मित होती है। संकल्प बनता है और वह गहराई में उतरकर व्यक्तित्व को एक विशेष ढाँचे में ढालता है जिसके कारण विचारणा और क्रिया का सुनिश्चित स्वरूप बनता है। यही दृष्टिकोण है। उसमें इतना बल होता है कि सैद्धान्तिक निश्चय और व्यवहारिक क्रिया−कलाप में सुनिश्चित रूप से एकीकरण हो जाता है यह एकात्मता ही व्यक्तित्व है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-February
मनन का समय मिलता है और न आदर्शों के प्रति अभिरुचि जाग्रत होती है।
मनन करने, तदनुरूप प्रयासरत बने रहने से प्रसुप्त मानसिक क्षमताओं का विकास होता और जीवन सब प्रकार से सफल सिद्ध होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-August
मनन करते जाएँ और उसे अभ्यास में लाते जाएं। एक साथ उच्च कक्षा की चर्चा आरंभ कर देना अनुचित और निष्फल होगा”।
मनन व चिंतन, स्वास्थ्य व सत्संग से रोक कर सही दिशा दिखाती हैं व सदैव आत्मनिर्माण, आत्मविकास की प्रेरणा देती रहती है। सद्विचारों के लिए श्रेष्ठ साहित्य ही वरेण्य होना चाहिए व सतत् स्वाध्यायरत रह, श्रेष्ठ व्यक्तियों के समूह में रह कर व्यक्तियों को सही चिन्तन की शैली का अभ्यास करना चाहिए, यह सत्संकल्प का प्रथम पाठ है एवं सही कहा जाय तो यही मर्म है। यदि इतनी व्यवस्था भी कोई जीवन में कर ले तो वह बदल जाए, साथ ही अनेकों को बदल दे।
मनन के माध्यम से उनका परिचय पा सके अथवा प्रसुप्त सुसंस्कारिता के बीजाँकुर जिनमें विद्यमान हैं व भविष्य में जिनकी उस विराट नवयुग अभियान में जुड़ने की संभावना है, सभी को परिलक्षित हो। यदि इस प्रयास, में कुछ सफलता मिल सकी जिसमें कोई सन्देह नहीं है, तो यही गुरुसत्ता के प्रति सच्ची श्रद्धाँजलि होगी।
मनन, स्वाध्याय, लेखनी की साधना) के अतिरिक्त थी। यह सोचा जा सकता है कि 24 घंटे में 21 घंटे जब इसमें चले गए तो वे सोते कब थे। यही तो अलौकिक सिद्धि है जो किसी भी नाम से पुकारी जा सकती है पर उनके निकटवर्ती जानते हैं कि प्रातः 1 बजे से उठकर जो उनने कार्य आरंभ किया है तो उसे बिना विराम दिये सतत् रात्रि 10 बजे तक सम्पन्न किया है। यह संभव है तपोबल से अर्जित सामर्थ्य के सहारे।
मनन करें।