अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-July
चिन्तन तथा चारु-चरित्र से आत्मा को प्रबुद्ध कीजिए। उन पर पड़े कुसंस्कारों के आवरण को पुण्य कर्मों से जला डालिये। परोपकार एवं परमार्थ में आस्था रखिये। आस्तिकता के बल पर आत्मा की उपस्थिति पहचानिए, उसे प्रत्यक्ष होने का अवसर दीजिये। आप की बुद्ध एवं प्रबुद्ध आत्मा अपने भीतर छिपे शत-शत स्वर्गों को आपके लिए प्रत्यक्ष एवं उपलक्ष्य बना देगी।
चिन्तन से मनुष्य को आत्मा के स्वरूप को समझने में सहायता मिलती है। आत्म-ज्ञान उसके अन्दर महान बल पैदा करता है सारे विश्व में उसका महत्व आच्छादित है पर उसे पाते वही हैं जो उसके प्रशासन में रहते हैं अर्थात् उसकी आज्ञायों का पालन करते हैं।
चिन्तन किया जायेगा वह मनुष्य के स्वभाव का चित्र बन जाता है और धीरे-धीरे चेतना पर छा जाया करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-September
चिन्तन किया करते हैं अपनी विकृत विचारा धारा के कारण वे प्रसन्नतापूर्वक कारणों में भी अप्रसन्नता के कारण खोज निकालते हैं। प्रतिकूल विचारों से अपने मन का माधुर्य मस्तिष्क की शक्ति नष्ट करते रहना उचित नहीं। मानव जीवन एक दुर्लभ उपलब्धि है। इसे कुत्सित विचारों की आग में जलाने के स्थान पर उच्च विचारों, सद्भावनाओं तथा उनके अनुरूप सदाचरण द्वारा उच्च से उच्चतर स्थिति में पहुँचाना ही उचित है और यही मनुष्य का लक्ष्य है भी और होना भी चाहिये।
चिन्तन के रोग से अपने को मुक्त करके उसके स्थान पर विश्वासपूर्ण विचारों की स्थापना नहीं करेंगे।
चिन्तन एवं परमात्मा का स्मरण किया है उसकी आत्मा तो स्वयं ही शरीर बंधन से मुक्त होने के लिये व्यग्र रहती है। वह सोचती है कि कब उसकी शरीर यात्रा समाप्त हो और कब वह पिंजड़े से छूटे पक्षी की तरह मोक्ष की ओर उड़ान भरे।
चिन्तन को स्वार्थ की संकुचित सीमा से बढ़ाकर विशालता तक विस्तारित करना होगा। यदि हम क्षुद्रताओं के जाल में ही पड़े रहे संकीर्णता के गढ्ढे से अपने विचारों का उद्धार न किया तो निश्चय जानिये हमारी महानता की इच्छा एक स्वप्न ही बनी रहेगी। क्षुद्र विचारों से प्रेरित होकर कोई क्षुद्र आचरण ही कर सकता है, तब ऐसी स्थिति में प्रतिष्ठा अथवा प्रसिद्धि का स्वप्न किस प्रकार पूरा हो सकता है।
चिन्तन करते-करते, वे स्वयं ही अनिष्ट के आखेट बन जाया करते हैं। जीवन में यदि उन्नति करना है, सफलता पाना है तो अपने विचारों को उन्नत एवं सृजनात्मक बनाना ही होगा, इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है और यही ईश्वर के अंश मनुष्य के लिए उचित एवं योग्य है।
चिन्तन और हृदयंगम करना (2) गायत्री-उपासना जैसी आस्तिकता की प्रथम शर्त को पूरी करना। प्रसन्नता की बात है कि पाठक इन प्राथमिक कक्षा के दो पाठों को ठीक तरह पढ़ते चले आ रहे हैं।
चिन्तन हमको मनोवाँछित साँचे में ढाल सकता है। विचारों का प्रभाव आचरण पर पड़ता है और आचरण ही मनुष्य की मनोरूप सफलताओं का संवाहक होता है। यदि हम समाज में प्रतिष्ठा तथा संसार में प्रसिद्धि के इच्छुक हैं तो सबसे पहले अपने विचारों, भावनाओं तथा चिन्तन को स्वार्थ की संकुचित सीमा से बढ़ाकर विशालता तक विस्तारित करना होगा। यदि हम क्षुद्रताओं के जाल में ही पड़े रहे संकीर्णता के गढ्ढे से अपने विचारों का उद्धार न किया तो निश्चय जानिये हमारी महानता की इच्छा एक स्वप्न ही बनी रहेगी। क्षुद्र विचारों से प्रेरित होकर कोई क्षुद्र आचरण ही कर सकता है, तब ऐसी स्थिति में प्रतिष्ठा अथवा प्रसिद्धि का स्वप्न किस प्रकार पूरा हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-April
चिन्तन करना है कि जिससे हममें और हमारे देश-निवासियों में कोई अंतर न रहे और देश के कल्याण में अपना कल्याण तथा देश के आनन्द में अपना आनन्द भान होने लगे।
चिन्तन करती है। माँ की तरह हम सब व्यक्तियों का हृदय उदार हो सकता है। यदि हमारा अहंकार सचमुच बड़ा है और हम अपने आपको अन्य लोगों की अपेक्षा कुछ बड़ा समझदार और सुधरा हुआ समझते हैं तो अयोग्य को भी आदर देने की योग्यता हम में होनी ही चाहिए।
चिन्तन धूमिल हो गया, जिसके बल पर वह आज की वास्तविक आवश्यकतायें समझ सके और उनको पूरा करने के लिये प्रयत्न कर सके। आज शताब्दियों से वह जिस दुर्गति के गर्त में पड़ा सड़ रहा है, उसी में पड़े रहने में सन्तोष अनुभव कर रहा है। जीवन को अच्छी प्रकार एक सुव्यवस्थित ढंग से जीने की प्रौढ़ चेतना उसमें दृष्टिगोचर नहीं होती। वह जैसे-तैसे अस्त व्यस्तता के साथ बहुमूल्य जीवन को ठेल कर ठिकाने भर लगा देना ही जिन्दगी का लक्ष्य समझ रहा है। उसे संसार में आगे बढ़ना है।
चिन्तन पर ही अवलम्बित है।
चिन्तन करिये। निरन्तर इस प्रकार का क्रम चलाते रहने से कुछ ही समय में आपका हृदय निर्मल होने लगेगा। निर्मलता की प्रसन्नता का थोड़ा-सा आभास पाते ही फिर मन पुनः अपना परिमार्जन करने में तत्पर हो जायेगा।
चिन्तन विकसित किये बिना नहीं हो सकती, परम्पराओं, प्रथाओं एवं चली आ रही पुरानी रीति, नीतियों एवं अन्ध-परम्पराओं से प्रेरित होकर चलना छोड़कर किसी रीति-नीति को अपनी स्वतंत्र चिंतन से औचित्य के तराजू पर तोल कर अपनाना ही प्रगतिशीलता है। कोई परम्परा अथवा प्रथा केवल इसलिये अपनाये रहना कि वह प्राचीन काल से चली आ रही है अथवा किसी रीति-नीति को केवल इसलिये अपना लेना कि वह आधुनिक है, अप्रगति शीलता है। प्रगतिशीलता तो इसमें है कि हम किसी भी रीति-नीति को प्राचीनता अथवा अर्वाचीनता के आधार पर न अपनाकर उसकी उपयोगिता के आधार पर अपनायें। अनुपयोगी प्राचीन परम्परा को छोड़ने और उपयोगी आधुनिकता को अपनाने का साहस रखने वाले ही प्रगतिशील कहे जा सकते हैं।
चिन्तन रुझान एवं कार्यक्रम देखकर घर वालों को चिन्ता होने लगी। वे चाहते थे कि लड़का कमाये, खाये, मौज करे, कमाई से घर भरे। उन्होंने केशवचन्द्र को उनके इस स्वभाव से विरत करना चाहा, किन्तु बहुत कुछ प्रयत्न करने पर भी वे सफल न हो सके। केशवचन्द्र सेन को जो लगन लग गई सो लग गई। वास्तव में ऐसी ही अटल निष्ठा वाले व्यक्ति संसार में कुछ काम कर भी सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-November
चिन्तन किया जाये तो लगता है कि विश्व के समस्त धर्म ग्रन्थों एवं नीति शास्त्रों का निचोड़ इन थोड़े से अक्षरों में—गागर में सागर की तरह भर दिया गया है। व्यक्ति एवं समाज की सर्वतोमुखी—सर्वकालीन—समस्त समस्याओं का हल—समस्त उलझनों का समाधान इस महामन्त्र की मूल शिक्षाओं से मिल सकता है। यह चौबीस शब्द इतने सारगर्भित हैं कि ऋषियों को उनकी विवेचना, व्याख्या करने के लिए चार वेदों का अवतरण प्रस्तुत करना पड़ा।
चिन्तन, मनन तथा सत्कर्मों के द्वारा उसे अधिकाधिक शुद्ध बनाने में लग जाना चाहिये। स्वार्थ रहित सात्विक आहार-विहार तथा आचार-विचार का अभ्यास अपना लेने से मनुष्य की चारों वृत्तियाँ आप से आप शुद्ध होने लगती हैं। मन को प्रसन्न रखिये, बुद्धि को विकृतियों से बचाइये, चित्त पर शिव संस्कारों की छाप डालिये और अहंकार को शरीर से आत्मा अथवा परमात्मा की ओर उन्मुख करिये, आपका अन्तःकरण शुद्ध हो जायेगा। इस प्रकार का सकर्मक अभ्यास ही आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने का प्रयास है, जिसे पाकर मनुष्य जीवन शाश्वत सुख का अधिकारी बन कर सफल एवं सार्थक हो जाता है। यह आध्यात्मिक उपलब्धि संसार की सारी उपलब्धियों का मूल तथा सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिसे हर प्रयत्न पर प्राप्त कर मनुष्य को अपने नश्वर जीवन को अनश्वर बनाना ही चाहिए।
चिन्तन एवं आचरण कल्याणकारी दिशा में ही चला करता है। जिसे शुभम् का ज्ञान ही नहीं, शिवत्व की पहचान नहीं वह न तो सत्कर्मों की ओर बढ़ सकता है और न चिन्तन में माँगलिक संस्थान ही चित्त की शुद्धता के लक्षण हैं।
चिन्तन मनुष्य को कितनी पीड़ा दे सकता है इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
चिन्तन में माँगलिक संस्थान ही चित्त की शुद्धता के लक्षण हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-October
चिन्तन ने अधिक क्षीण बना दिया था। उनके अनिष्ट विचार ही उनकी हर विपत्ति का मुख्य कारण होते थे। चिन्ता, निराशा, अविश्वास अथवा मृत्यु की कल्पना उन्हें दिन-दिन गिराती चली गई। किन्तु जिस दिन से उन्होंने आत्म-भावना का सहारा लेकर अपने को निरोग तथा आयुष्मान मानना प्रारम्भ किया, उनके स्वास्थ के नियमों का पालन युक्त आहार-विहार तथा पुष्टकर भावना ने उन्हें शीघ्र ही स्वस्थ बना दिया। उनके आशापूर्ण विचारों तथा प्रसन्न चिन्तन ने शीघ्र ही वरदान सिद्ध होकर उन्हें स्वास्थ्य तथा दीर्घ आयु प्रदान की जिससे वे एक लम्बे समय तक काव्य द्वारा मानवता की सेवा करते रहे।
चिन्तन परायण रहना। भोगों के चिन्तन अथवा प्राप्त करने के उपायों में लगा हुआ मनुष्य अपनी वृत्तियों को दूषित कर देता है, संस्कार बिगाड़ लेता है जिससे उसका चित्त सत्कर्म परायण न रहकर भोगों में ही निरत रहता है वह शरीर से मनुष्य होता हुआ भी गुण, कर्म, स्वभाव से पशु ही होता है। मनुष्य की भोगपरक पशु प्रवृत्तियाँ उसके पतन एवं विनाश का कारण बनती हैं। भोग प्रवृत्तियों के पोषण से मनुष्य मृत्यु के उपरान्त निकृष्ट योनियों में भ्रमण करता हुआ नारकीय यातना पाया करता है। जिस पुण्य पूंजी से वह मनुष्य शरीर का अधिकारी बना होता है वह नष्ट हो जाती है फलतः वह निकृष्ट गतियों में जा गिरता है।
चिन्तन करें, अपने भावनात्मक स्तर को ऊँचा उठावें और उत्कृष्ट मानव निर्माण करके भारतीय समाज को देव समाज के रूप में परिणत करने के हमारे उद्देश्य को पूरा करें। पर वैसा न हो सका। अधिकाँश लोग चमत्कारवादी निकले। वे न तो आत्मनिर्माण पर विश्वास कर सके और न लोकनिर्माण में। आध्यात्मिक व्यक्तियों का जो उत्तरदायित्व होता है उसे अनुभव न कर सके।
चिन्तन अथवा प्राप्त करने के उपायों में लगा हुआ मनुष्य अपनी वृत्तियों को दूषित कर देता है, संस्कार बिगाड़ लेता है जिससे उसका चित्त सत्कर्म परायण न रहकर भोगों में ही निरत रहता है वह शरीर से मनुष्य होता हुआ भी गुण, कर्म, स्वभाव से पशु ही होता है। मनुष्य की भोगपरक पशु प्रवृत्तियाँ उसके पतन एवं विनाश का कारण बनती हैं। भोग प्रवृत्तियों के पोषण से मनुष्य मृत्यु के उपरान्त निकृष्ट योनियों में भ्रमण करता हुआ नारकीय यातना पाया करता है। जिस पुण्य पूंजी से वह मनुष्य शरीर का अधिकारी बना होता है वह नष्ट हो जाती है फलतः वह निकृष्ट गतियों में जा गिरता है। मनुष्येत्तर योनियों के जीव कर्म के अधिकारी नहीं होते।
चिन्तन ने शीघ्र ही वरदान सिद्ध होकर उन्हें स्वास्थ्य तथा दीर्घ आयु प्रदान की जिससे वे एक लम्बे समय तक काव्य द्वारा मानवता की सेवा करते रहे।
चिन्तन करने वाले की निर्धारित आयुष्य भी कम हो जाती है जबकि जीवन का विश्वासी व्यक्ति कम होती आयु को आत्मबल से बढ़ा लेता है।
चिन्तन करना प्रारम्भ किया। औषधि के साथ उसने अमृत भावना के घूँट भी पीना प्रारम्भ किया। इस प्रकार प्रतिक्षण अपने स्वस्थ होने की भावना करते-करते एक दिन ऐसा आया कि वह तपेदिक का रोगी पूर्ण स्वस्थ हो गया। उसके रोम-रोम में आरोग्य की पुलक होकर उत्साहपूर्वक अपना काम करने लगा।
चिन्तन निवास किया करता है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि एलेक्जेण्डर पोप जो कि जन्मजात रोगी थे और जिनके बचने की कोई आशा नहीं की जाती थी, उन्होंने अपने स्वास्थ्य लाभ एवं दीर्घ आयु का रहस्य बतलाते हुए लिखा है—
चिन्तन करते और अपनी प्रार्थना में कहते—”प्रभु, मुझे स्वास्थ्य एवं आयु प्रदान कर जिसके कि मैं साहित्य द्वारा मानव समाज की सेवा कर सकूँ। मुझे स्वास्थ्य एवं आयु की कामना इसलिए नहीं है कि मै इस दुनिया के भोग भोगना चाहता हूँ। शुद्ध सात्विक आहार और कल्याणकारी विचारधारा ने उनके रोग को दूर करना प्रारम्भ कर दिया। पोप का कहना है कि उन्होंने अच्छी प्रकार से अनुभव कर लिया था कि उनके स्वास्थ्य को रोगों की अपेक्षा दुर्बल स्वास्थ्य के निरन्तर चिन्तन ने अधिक क्षीण बना दिया था। उनके अनिष्ट विचार ही उनकी हर विपत्ति का मुख्य कारण होते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-May
चिन्तन और विचार द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है। सूक्ष्म इन्द्रियाँ ही उसे जान सकती हैं। अतः उसकी मनोवृत्तियाँ अंतर्मुख होने लगीं । वह कायिक हितों से परोन्मुख होकर अपने निराकार स्वरूप का चिन्तन और उसका रहस्य जानने की इच्छा करने लगा।
चिन्तन और उसका रहस्य जानने की इच्छा करने लगा।
चिन्तन का आधार होती थी। हर बात के साथ “ऐसा क्यों हुआ? का प्रश्न जुड़ा रहता था। अपने आपके सम्बन्ध में, जीवन, मृत्यु, ईश्वर और इस विराट जगत के रहस्य जानने के लिये उनके हृदय में तीव्र अकुलाहट रहती थी। यद्यपि उन्हें वैभव-विलास की कुछ भी कमी न थी, तो भी वे इस प्रश्न का औचित्य सब के लिये एक समान देखते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-December
चिन्तन धारा का अंग बन गये हैं। वे जो कुछ सोच पाते हैं विनाश को सामने रख कर और जो कुछ कर पाते हैं स्वार्थ को सामने रखने कर कर पाते हैं। परोपकार के नाम से किया हुआ उनका प्रवर्तन में किसी निहित स्वार्थ से मुक्त नहीं होता। आज जब शाँति तथा निःशस्रीकरण की कल्याणकारी बात उनके सामने आती है तो उनके अस्तित्व सिहर उठता है शाँति अथवा निःशस्री करण की अवस्था में हम कहीं इतने कमजोर न हो जाएं कि कोई दूसरे हमारे भोग-उपभोगों को छीन ले। भौतिक भोगों के रोगियों के पास आत्मबल अथवा आत्मविश्वास कहाँ?
चिन्तन, मनन के द्वारा हमने जो पाया है, उसका सार—शहद हम अपने इस छोटे परिवार को बाँट जाना चाहते हैं। वैसा करने की हमें सुविधा मिलनी चाहिये।”
चिन्तन करते रहते हैं वे बुद्धिमान कहे जाते हैं। उनके सामने कठिनाइयाँ आती है तो चुटकी बजाते हल कर ली जाती है। पर जो रात के अंधियारे, दिन की सन्ध्या, बादल, बिजली, कड़क मौत, घाटा, असुरक्षा, चोर, भूत के भय काँपते रहते हैं उनके लिए सुख की वस्तुयें भी धोखा सिद्ध होती हैं इसलिये उनकी कल्पना ही क्यों की जाये? हम शुभ सोंचे और सुखद भविष्य की आशा रखें यह कहीं अधिक उत्तम बात है; उससे कठिनाइयों का आधा हल तत्काल हो जाता है।
चिन्तन करने लगता है। वह प्रयत्नपूर्वक स्वयं बढ़ने के बजाय आगे बढ़ने वाले उद्योगी को पीछे खींचने, गिराने अथवा हानि पहुँचाने की दूरभिसंधियां किया करता है। अपनी संकीर्ण मनोवृत्ति अथवा हल्की मनोभूमि के कारण वह अपने को दूसरे से हारा हुआ मान लेता है। इस हीन भावना के कारण उसमें असन्तोष की आग पैदा हो जाती है, जिससे जल-जल कर उसकी न केवल शाँति ही नष्ट होती है बल्कि उन शक्तियों का ही ह्रास होता रहता है जिनके आधार पर वह पुनः उठकर आगे बढ़ सकता है।
चिन्तन करने से वे गुण स्वयं अपने में भी आ जाते हैं तब कोई कारण नहीं कि उन गुणों को पाकर, जिनके बल पर कोई आगे बढ़ा है, कोई दूसरा नहीं बढ़ सकता। अपनी सूझ-बूझ तथा अधिक परिश्रम एवं पुरुषार्थ के बल पर जो हमें पीछे छोड़कर आगे बढ़ गये हैं वे हमारी ईर्ष्या के नहीं, प्रशंसा तथा अनुकरण शीलता के निदर्शन हैं। हमें उनकी सफलता को श्रेय देना ही चाहिये। जीवन क्षेत्र में उदार तथा उदात्त भावना के साथ जो प्रतियोगिता में रहता है वह अवश्य ही आगे बढ़ता है और आगे-पीछे अपने लक्ष्य में सफल होकर ही रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-March
चिन्तन करता है तो कभी भौतिक आकर्षण उसे अपनी ओर खींचते हैं और उसे उन्हीं में पूर्णानन्द की उपलब्धि होती जान पड़ती है। ब्रह्म और माया के बीच की यह रस्साकशी प्रत्येक साधक के मस्तिष्क में प्रस्फुटित होती है। इस संघात से कई बार वह इतना विभ्रमित हो जाता है कि उसकी सारी विचारशक्ति जवाब दे जाती है और वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि जब इस माया या अज्ञानान्धकार का विच्छेदन करना अपनी सामर्थ्य से बाहर है तो फिर क्यों उसके पीछे पड़ा जाय और साँसारिक सुखों का भी तिलाँजलि दे दी जाय।
चिन्तन करता हुआ तड़पा करता है। एक कुढ़न, एक त्रस्तता एक वेदना हर समय उसके मनों-मन्दिर को जलाया करती है। बार-बार असफलता पाने से मनुष्य का अपने प्रति एक क्षुद्र भाव बन जाता है । उसे यह विश्वास हो जाता है कि वह किसी काम के योग्य नहीं है। उसमें कोई ऐसी क्षमता नहीं है, जिसके बल पर वह अपने स्वप्नों को पूरा कर सके, सुख और शान्ति पा सके।
चिन्तन करने में लग जाता है। इससे उसका पूरा जीवन दुःखी की क्रीड़ास्थली बन जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-February
चिन्तन करना और आत्म संकेतों द्वारा आत्मा तथा मन को बलवान बनाना आवश्यक है “मेरा मन पर पूर्ण अधिकार है। मैं अपने मन का स्वामी हूँ। वह मेरी आज्ञा से कार्य करता है। प्रचण्ड अग्नि और भंयकर तूफान भी मुझे नष्ट नहीं कर सकते। मैं अमर हूँ, शाश्वत हूँ।
चिन्तन, साधन एवं वातावरण की श्रेष्ठता अपेक्षित है, वहाँ यह भी आवश्यक है कि एक भावनात्मक एवं प्रेरणात्मक धर्म-परम्परा का प्रचलन हो। विशेष वातावरण में विशेष उद्देश्य के लिए, विशेष विधि-विधानों का प्रभाव भी विशेष ही पड़ता है। वेद-मन्त्रों की अद्भुत शक्ति, यज्ञ आदि वैज्ञानिक शक्ति सम्पुटों का सान्निध्य एवं धर्मानुष्ठानों का समारोह सम्बन्धित लोगों पर ऐसा अदृश्य प्रभाव छोड़ता है कि व्यक्तियों के अन्तःकरण का विकास स्वल्प प्रयत्न से भी ऊर्ध्वगामी होता चला जाता है। यह संस्कारों की विधिव्यवस्था वैज्ञानिक, भावनात्मक एवं प्रशिक्षण की दृष्टि से इतनी प्रभावशाली है कि उसका सत्य परिणाम लाखों वर्षों तक प्राप्त करते रहने के अनुभव को ध्यान में रखा जाय तो किसी प्रकार के अविश्वास या सन्देह की गुंजाइश ही नहीं रह जाती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-January
चिन्तन करना आनन्द का विषय भी बनाया जा सकता है। सिगरेट पीना छूट जायगा तो प्रतिदिन 40 पैसे बचेंगे। एक महीने में 7॥ रुपये और एक वर्ष 84 रुपये बचेंगे। इस तरह की बचत यदि 10 वर्ष की तो पोस्ट आफिस में 900 रुपये की रकम जमा हो सकती है। इसका ब्याज जो बनेगा सो अलग।
चिन्तन करने से उसके प्रति घृणा उत्पन्न होती है उसी तरह उससे छुटकारा मिलने पर होने वाले लाभों का चिन्तन करना आनन्द का विषय भी बनाया जा सकता है। सिगरेट पीना छूट जायगा तो प्रतिदिन 40 पैसे बचेंगे। एक महीने में 7॥ रुपये और एक वर्ष 84 रुपये बचेंगे। इस तरह की बचत यदि 10 वर्ष की तो पोस्ट आफिस में 900 रुपये की रकम जमा हो सकती है। इसका ब्याज जो बनेगा सो अलग।
चिन्तन और दरिद्र नारायण की सेवा।
चिन्तन करे कारण कि वह समय बुद्धि के विकास का है।
चिन्तन किया कीजिये। आप यह सोचा करिये कि आप भी दूसरों की तरह एक बलवान् आत्मा हैं, आपके पास शक्तियों का अभाव नहीं है। अभी तक उनका प्रयोग नहीं किया है इसीलिये भय, संकोच या लज्जा आती है। पर अब आपने जान लिया है कि आपकी भी सामर्थ्य कम नहीं है। आप निर्धन परिवार के सदस्य नहीं, वरन् परमात्मा के वंश में उसकी उत्कृष्ट शक्तियाँ लेकर अवतरित हुए हैं फिर आपको घबराहट किस लिये होनी चाहिये?
चिन्तन की ओर झुक गये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-August
चिन्तन और ईश्वर में अखण्ड विश्वास यहाँ का जीवन प्राण बना हुआ था। सच्चरित्रता तथा सादा जीवन तो इसके अणु-अणु में परिव्याप्त था। छल-कपट, जारी, मक्कारी, स्वार्थ आदि की कुत्सित भावनाओं का भारत वासियों से स्वप्न का भी सम्बंध नहीं था। सरलता, शिष्टता तथा शालीनता भारतीय चरित्र की शोभा थी।
चिन्तन, मनन एवं ग्रहण किया था। वैदिक ज्ञान के वाँग्मय में आरण्यक ग्रन्थों का विशेष स्थान है। ग्रन्थों का यह आरण्यक नाम ही इस बात का द्योतक है कि इनका प्रणयन वनों में ही किया गया है। अरण्य का अर्थ वन ही होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-June
चिन्तन और उपनिषदों की साधना का निष्कर्ष मिला हुआ है।
चिन्तन का विषय जीवन है मृत्यु नहीं। मृत्यु का चिन्तन करने से जीवनी-शक्ति का ह्रास होता है जिससे मृत्यु का भय स्थायी रूप से सूक्ष्म में बस जाया करता है। ऐसी भय पूर्ण स्थिति में कर्त्तव्यों का पालन यथाविधि नहीं हो पाता जो स्वयं एक बड़ा दुःख प्रसंग होता है। मनुष्य जब ठीक प्रकार से अपने कर्त्तव्यों में लगा रहता है मृत्यु का भय उसके पास नहीं फटकने पाता।
चिन्तन-धारा जितनी अधिक जीवन के समीप रहेगी वह उतना ही कम मृत्यु से डरेगा और जिसके विचार जितना अधिक मृत्यु का चिन्तन करेंगे वह उतना ही उससे भयभीत रहेगा। मृत्यु का चिंतन क्या करना। वह अपने समय पर आयेगी, आती रहेगी। उसका विचार छोड़कर मनुष्य को जीवन की आराधना में लगा रहना चाहिये। चिन्तन का विषय जीवन है मृत्यु नहीं।
चिन्तन, विचार-भावना, स्वप्न आदि के माध्यम से तो उसकी एक झलक ही देख सकते हैं। विश्वास की पुष्टि के लिए यद्यपि यह बुद्धि तत्व भी आवश्यक है, तथापि उसके पूर्ण ज्ञान के लिए अपने अन्दर प्रविष्ट होना होगा, आत्मा की सूक्ष्म सत्ता में प्रवेश करना आवश्यक हो जाता है। वहाँ बुद्धि की पहुँच नहीं हो सकती। आत्मा का भेदन आत्मा ही करता है और आत्मा बनकर ही आत्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है। इसी बात को ईश्वरीय ज्ञान के बारे में भी घटित किया जाता है।
चिन्तन की दिशा में बड़ा ही उपयोगी सिद्ध होगा! जवानी की विकृतियों को वृद्धता में बनाये रहने वाले वृद्धों को बड़े कष्ट का सामना करना पड़ता है। संतान से एक बार भोजन-वस्त्र का तकाजा किया जा सकता है किन्तु अनावश्यक व्यसन वासनाओं का नहीं। व्यसनीय व्यक्ति को भोजन वस्त्र का अभाव उतना नहीं सताता जितना कि व्यसनों की आपूर्ति। व्यसनी वृद्ध जनों का जीवन बड़ा ही दयनीय तथा अनादर पूर्ण बन जाता है! व्यसनों को साथ लगाये रहने से उनसे उत्पन्न होने वाले रोगों से भी पीछा नहीं छूटता ऐसी दशा में पर-निर्भरता के साथ व्यसनों की मार से त्रस्त बुढ़ापे की अशक्यता का क्या हाल होगा इसका अनुमान सहज ही में लगाया जा सकता है!
चिन्तन तथा भगवान के भजन करने के लिये होता है, धक्के खाने के लिये नहीं। यही वह मूल्यवान समय होता है जब मनुष्य अपने परलोक-प्रसाद की नींव रखता है। किन्तु यह सम्भव तभी हो सकता है। जब मनुष्य पहले से ही इसकी तैयारी करके अन्तिम चरण में प्रवेश करे जवानी में अथक परिश्रम करके अपने कर्तव्यों को पूरी तरह से पूरा करे। संतानों को इस योग्य बनाये कि वे उसका दायित्व ठीक से सँभाल सकें।
चिन्तन करेंगे वह उतना ही उससे भयभीत रहेगा। मृत्यु का चिंतन क्या करना। वह अपने समय पर आयेगी, आती रहेगी। उसका विचार छोड़कर मनुष्य को जीवन की आराधना में लगा रहना चाहिये। चिन्तन का विषय जीवन है मृत्यु नहीं।
चिन्तन करने से जीवनी-शक्ति का ह्रास होता है जिससे मृत्यु का भय स्थायी रूप से सूक्ष्म में बस जाया करता है। ऐसी भय पूर्ण स्थिति में कर्त्तव्यों का पालन यथाविधि नहीं हो पाता जो स्वयं एक बड़ा दुःख प्रसंग होता है। मनुष्य जब ठीक प्रकार से अपने कर्त्तव्यों में लगा रहता है मृत्यु का भय उसके पास नहीं फटकने पाता।
चिन्तन की क्षमता नहीं तो उसे ‘ढलती उम्र का बालक’ ही कहना चाहिए। छोटे बच्चे तो इसलिए क्षम्य माने जाते हैं कि वे भविष्य को दूर तक देख सकने योग्य बौद्धिक विकास से वंचित रहते हैं। अस्त-व्यस्त तरीके से अपना बचपन गँवाकर जवानी को अन्धकारमय बना लेते हैं तो कम-से-कम इतना कहकर चित्त हलका किया जाता है कि लड़कपन में इतनी अकल न थी जो आगे की बात सोचकर उस समय का ठीक तरह सदुपयोग कर पाते। पर बूढ़ों को तो यह कहने का भी अवसर नहीं कि—”हम में इतनी समझ न थी कि भविष्य का स्वरूप समझ पाते या उसे उज्ज्वल बनाने के लिए कुछ कर पाते।” उनने जो सुना समझा, सीखा और जाना है उसके आधार पर इतना तो विवेक होना ही चाहिए कि अब हमारे जीवन अध्याय के अन्तिम पृष्ठ पूरे होने जा रहे हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-December
चिन्तन के अतिरिक्त और कहीं नहीं। दूरदर्शी और वस्तु स्थिति समझने वाले दृष्टिकोण का नाम स्वर्ग है और पूर्वाग्रहों तथा कुसंस्कारों से छुटकारा पाकर उच्चस्तरीय रीति-नीति अपना सकने के साहस सका नाम मुक्ति। वस्तुतः अध्यात्म-विज्ञान के यही दो प्रधान प्रतिफल हैं। यों उसके साथ पत्र-पल्लवों की तरह ऋद्धि-सिद्धियाँ तो असंख्यों जुड़ी हुई हैं।
चिन्तन का स्तर निकृष्टता के दल-दल में फँस जाने से उत्पन्न विग्रह की चीख-पुकार ही आज दसों दिशाओं में कुहराम गूँज रहा है। संसार में न तो वस्तुओं का अभाव है और न उपयुक्त परिस्थितियों में कोई कमी है। विपत्ति केवल दुर्बुद्धि की उत्पन्न की हुई हैं। सद्भावों का स्थान दुर्भावों ने सत्प्रवृत्तियों के स्थान दुष्प्रवृत्तियों ने पकड़ लिया है। फलस्वरूप जो वस्तुएं सुख-शान्ति एवं प्रगति के अभिवर्धन में लग सकती थीं, वे ही विपत्तियाँ एवं उलझने बढ़ाने में प्रयुक्त हो रही है।
चिन्तन बच जाता है, उस पर समाज का अधिकार स्वीकार किया जाना ही न्यायोचित है। जो हम पाते हैं, वह वस्तुतः असंख्य लोगों के श्रम, सहयोग का ही परिणाम होता है। कृतज्ञता उच्च दृष्टि जब ऋण भार से उऋण होने की बात सोचती है तो उसका समाधान पुण्य परमार्थ की उदार सेवा-साधना में ही सन्निहित दीखता है। दान के पीछे यदि अन्धविश्वासों की मूढ़ मान्यता, विवशता और कुटिलता छिपी न पड़ी हो तो निश्चित रूप से उसके सहारे मनुष्य अपनी महानता विकसित कर सकता है और आत्म-शान्ति पा सकता है।
चिन्तन की बर्बादी करती रहती हैं। इतना सोच-विचार यदि आशंकाओं के निराकरण का उपाय सोचने में लगता तो भी एक बात थी, पर वैसा होता नहीं। अशुभ सम्भावनाओं की बढ़ा-चढ़ा कर देखने से केवल मानसिक सन्तुलन ही बिगड़ सकता है और हड़बड़ी ही पैदा हो सकती है। द्वेष और प्रतिशोध से प्रेरित होकर विपक्षी को नीचा दिखाने की बात हम सोचते भर हैं। साहस और साधन के अभाव में वैसा कुछ कर नहीं पाते।
चिन्तन का अनावश्यक अपव्यय भी रुक सकता है। समय की ही भाँति चिन्तन की बर्बादी को भी रोका जा सके तो आत्मोत्कर्ष और लोकमंगल के अनेक आधार ढूँढ़ निकालने और उन्हें कार्यान्वित करने की रीति-नीति ढूँढ़ी और अपनाई जा सकती है। उस बचत को परमार्थ प्रयोजनों में लगाकर हम दानवीरों जैसी प्रसन्नता प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते हैं।
चिन्तन मनन, पूजा, पाठ अथवा सज्जनोचित निर्वाह में कुछ सार नहीं रह जाता।
चिन्तन की।
चिन्तन को अध्यात्म। यह दोनों ही ईश्वरवाद का जड़ से शोषण प्राप्त करते हैं यदि सत्समर्थक और असत्-विरोधी दिव्य-सत्ता के अस्तित्व से इनकार कर दिया जाय और मात्र भौतिक-सामाजिक आधार पर उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समर्थन किया जाय तो बात बनेगी ही नहीं। स्पष्टतः धार्मिकता और आस्तिकता की मान्यताएँ त्याग, संयम, सेवा, उदारता का दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करती हैं। जिनमें तात्कालिक एवं भौतिक दृष्टि से घाटा ही पड़ता है, नफा नहीं होता। फिर इसे कोई क्यों अपनायेगा?
चिन्तन ही है। स्थिर ज्ञान ही उसका आसन है। उन्मन पाद्य है। तन्मयता अर्घ्य है। निष्ठा आचमन है।
चिन्तन और आदर्श-कृत्य की प्रेरणा भरने वाले तत्त्वज्ञान की स्थापना भी आवश्यक है। युग-निमार्ण साहित्य द्वारा इन्हीं प्रयोजनों की पूर्ति की जा रही है। लेखनी और वाणी के दोनों माध्यमों के ज्ञान-यज्ञ को ज्योतिर्मय बनाने के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है। हम में से प्रत्येक को इस संगठनात्मक और प्रचारात्मक कार्यक्रमों में उत्साह पूर्वक अपना भाव भरा योगदान देना चाहिए।
चिन्तन को शरीरगत संवेदनाओं से प्रभावित आवेश मात्र कहकर विज्ञान दूर जा बैठता है। आत्मा का-निष्ठा का-भाव संवेदना का-आदर्शों के लिए कष्ट सहने का-त्याग करने की उमंगों का-विज्ञान के पास कोई समाधान नहीं? ऐसी दशा में मनुष्य को, आत्मा और भावना से रहित एक रासायनिक यन्त्र कहकर संतोष कर लिया जाय?
चिन्तन-मंथन चल रहा है कि अब अग्नि का वर्चस्व समाप्त होने जा रहा है उसका स्थान वरुण देव ग्रहण करेंगे। मनुष्य को अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए धरती पर आश्रित न रह कर समुद्र का आश्रय ग्रहण करना होगा।
चिन्तन में नष्ट होने से बच सकता है।
चिन्तन के आधार से ऐसे सार्वभौम धर्म की स्थापना की जा सकती है। आज नहीं तो कल यही करना पड़ेगा, अन्यथा पुरातन के प्रति विद्रोही अनास्था अपनी तोड़-फोड़ में उन मर्यादाओं को भी तोड़-फोड़ कर रख देंगे, जो व्यक्ति और समाज की शान्ति और सुव्यवस्था के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं।
चिन्तन को वे भुला बैठे। सूर्य ने यों तो इस के छल की सम्भावना से पहले ही सचेत कर दिया था, पर उन्हें तो अपनी दान-वीरता द्वारा उपलब्ध होने वाली ख्याति की ही चिन्ता थी। सेनापति का कर्तव्य क्या कहता है-इसे तो उनने झुठला ही दिया।
चिन्तन का क्रम ही पूर्णतया असन्तोष और सन्तोष का सृजन करता है और उसी आधार पर लोग प्रसन्न-अप्रसन्न पाये जाते हैं। अनेक झंझटों, शत्रुओं और संकटों के बावजूद कई व्यक्ति अपनी हँसी-खुशी यथावत बनाये रहते हैं। उलझनों को वे शतरंज अथवा टेनिस खेलने की तरह मानत है। हार और जीत दोनों का हलकी मुस्कराहट के साथ स्वागत करते हैं और अगली पकड़ लड़ने के लिए वे अधिक उत्साह के साथ तत्परता प्रदर्शित करते हैं।
चिन्तन और मनोयोग लोक मंगल के लिए-विश्व-मानव की सेवा साधना के लिए किसी मात्रा में लगा रहना हर किसी के लिए सम्भव हो सकता है। विचार पूर्वक आत्मनिरीक्षण किया जाय तो अपने पास समय का बहुत सा अंश ऐसा होता है, जो आलस्य, प्रमाद, गपशप अथवा दूसरे ऐसे निरर्थक कामों में खर्च होता रहता है, जिसे यदि चाहें तो आसानी से बचाया जा सकता है। समय के अपव्यय को तीखी दृष्टि से देखा-परखा जाय तो प्रतीत होगा कि अपना ढेरों समय ऐसी बरबादी में नष्ट होता है, जिसका न अपने लिए कोई प्रयोजन है और न दूसरे अन्य किसी के लिए। समय काटने के लिए हमारे कितने ही निरर्थक काम होते रहते हैं और जो करते हैं उनमें इतनी अन्य मनस्कता एवं शिथिलता बरतते हैं, जिनके कारण कम समय में हो सकने वाला काम दूना-चौगुना समय खा जाता है। यदि इस अस्त-व्यस्तता को हटाकर मुस्तैदी की आदत डाली जाय तो सहज ही ढेरों समय ऐसा बच सकता है, जो पहले फालतू नष्ट होता रहता था।
चिन्तन के परिवार का शिर उतारना पड़ेगा। किसी समय रावण, कुम्भकरण, कंस, जरासन्ध, दुर्योधन, दुशासन, महिषासुर, मधुकैटभ, वृत्रासुर, हिरण्यकश्यपु आदि का दमन धर्म-स्थापना के लिए आवश्यक माना गया था। आज दुष्प्रवृत्तियों के परिपोषक ज्ञान का कलेवर ओढ़कर नग्न-नृत्य करने वाले अज्ञान रूपी महादैत्य का दमन करना पड़ेगा। विचार-क्रान्ति किये बिना समाज निमार्ण की आधार-शिला नहीं रखी जा सकेगी। ज्ञान यज्ञ के बिना सुख शान्ति एवं प्रगति की सर्वतोमुखी संभावनाएं प्रस्तुत कर सकने वाले नव-युग का अवतरण नहीं हो सकेगा।
चिन्तन आधार प्रस्तुत करती है, वरन् उन दुष्कर्मों को करने के लिए भी छूट देती है, जो मनुष्य के गौरव और समाज गत अनुशासन को नष्ट-भ्रष्ट करके रख देते हैं। उद्धत महत्त्वाकाँक्षाएँ मनुष्य को एक प्रकार से ऐसा अर्ध-विक्षिप्त बना देती हैं, जो कामना-पूर्ति के लिए उचित-अनुचित का भेद त्याग कर कुछ भी कर गुजरने के लिए तत्पर हो जाता है। असीम उपयोग की ललक सीमित क्षमता और सामान्य परिस्थिति में पूर्ण नहीं हो सकती। असीम उपलब्धि के साधन नहीं जुटते, ऐसी दशा में हर समय मनुष्य पर खीज चढ़ी रहती है और उसकी अभिवृद्धि से मनः क्षेत्र विषाक्त हो जाता है। ऐसे लोग अपराध-कृत्यों में निरत, उद्धत, अशान्त और हत्या अथवा आत्महत्या के लिए उतारू दीखते हैं, उन्हें अपने चारों ओर का वातावरण प्रतिकूल दीखता है।
चिन्तन को ज्ञान-तप कहा गया है और आत्म-निमार्ण को आध्यात्मिक अग्निहोत्र। बाह्य जगत में स्वाध्याय, सत्संग को ज्ञान का आधार माना गया है। किन्तु अंतर्जगत में आत्म-चिन्तन को ज्ञान देव की-आत्मदेव की आराधना माना है। अपनी अन्तःस्थिति में उत्कृष्ट-तत्वों की स्थापना करके हम आत्मदेव की आराधना करते हैं। आत्मदेव को तत्व-दर्शन ने सर्वोच्च उपास्य माना है और उसकी आराधना का निर्देश किया है-
चिन्तन एक ही दिशा में चल रहा है कि धर्म का स्वरूप सार्वभौम होना चाहिए। उसे देश और जातिगत परम्पराओं अथवा मान्यताओं के आधार पर वर्गीकृत नहीं होना चाहिए। धर्म-शास्त्रों और आप्त-पुरुषों से शाश्वत-धर्म की स्थापना सहायता तो ली जा सकती है, पर उनमें से किसी एक को पूर्ण प्रामाणिकता नहीं मिल सकती। पिछले दिनों यह तो उत्साह हो रहा है कि समस्त विश्व का एक धर्म हो, पर उसके साथ यह आग्रह जुड़ रहा है कि हमारे ही धर्म को मान्यता मिले। समस्त विश्व को अपने ही धर्म के अन्तर्गत लाने के लिए मध्य-काल में कत्लेआम हुए हैं और धरती को बेतरह श्रोणित स्नान कराया गया है।
चिन्तनं ध्यानम्। सर्वकर्म निराकारण-मावाहनम् निश्चलज्ञानमासनम्। समुन्मनं भावः पाद्यम्। सदामनस्कमर्ध्यम्। सदादीपितराचमनीयम्।
चिन्तन की बर्बादी को भी रोका जा सके तो आत्मोत्कर्ष और लोकमंगल के अनेक आधार ढूँढ़ निकालने और उन्हें कार्यान्वित करने की रीति-नीति ढूँढ़ी और अपनाई जा सकती है। उस बचत को परमार्थ प्रयोजनों में लगाकर हम दानवीरों जैसी प्रसन्नता प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते हैं।
चिन्तन व अवांछनीय कृत्य से विरत करना होगा। अन्यथा एक के कषाय-कल्मष दूसरे पर आच्छादित हुए बिना न रहेंगे। सूखी लकड़ी के साथ-साथ गीली लकड़ी भी जल जाती है। छूत की महामारी शुद्ध रक्त वालों को भी चपेट में ले लेती है। तात्पर्य यह है कि कुछ ही मनुष्य सन्त बनकर मुक्ति के अधिकारी बन जाएँ-यह नहीं हो सकेगा।
चिन्तन का नाम है और मुक्ति-आन्तरिक दुर्बलताओं से छूटना। यह विभूतियाँ समस्त मानव समाज को उपलब्ध हो सकें, तभी व्यक्ति का कल्याण सम्भव होगा।
चिन्तन अपने व्यक्तित्व को महान बनाने और सामाजिक सुख-शान्ति का पथ प्रशस्त करने में आश्चर्यजनक रीति से सहायक हो सकता है।
चिन्तन को ज्ञान देव की-आत्मदेव की आराधना माना है। अपनी अन्तःस्थिति में उत्कृष्ट-तत्वों की स्थापना करके हम आत्मदेव की आराधना करते हैं। आत्मदेव को तत्व-दर्शन ने सर्वोच्च उपास्य माना है और उसकी आराधना का निर्देश किया है-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-June
चिन्तन का अभ्यस्त आत्मा मूर्तिमान परमेश्वर है,वह स्वयं धन्य बनताहै और समस्त विश्व के लिए वरदान सिद्ध होता है। अस्तु आत्मोद्धार को ही परम पुरुषार्थ माना गया है। दर्पण की साधना इसी का पथ प्रशस्त करने में महत्वपूर्ण योगदान करती है, गहित गतिविधियाँ और भ्रमग्रसित मान्यताएँ अपनाने के कारण अब तक के जीवन का जिस तरह अपव्यय हुआ उस दुर्भाग्य पर दुःखी होने का अवसर इस साधना से मिलता है। बिना समय गँवाए भूल को सुधार लेने, गतिविधियों के उलट देने की प्रचंड प्रेरणा उठती है। इस समुद्र-मंथन से भावी जीवन की रीति-नीति निर्धारण करने पर अनमोल रत्न निकलते हैं और पूर्वाग्रहों को तिलांजलि देने तथा कथित शुभ चिंतकों के दबाव को अस्वीकार करने की ऐसी दिव्यदृष्टि प्राप्त होती है, जिससे परिष्कृत भावी गतिविधियों का नवनिर्माण सरल और संभव हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-January
चिन्तन से परब्रह्म की प्राप्ति होती है।
चिन्तन करना चाहिए जो जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए अधिकाधिक बल एवं उत्साह प्रदान कर सके। सूक्ष्म जगत में दिनों दिन एक ऐसा दैवी प्रवाह एवं प्रकाश उभर रहा है जो हर जीवन अन्तःकरण में गुदगुदी उत्पन्न करता है और ऊँचा उठने - आगे बढ़ने - के लिए दुलारता, पुचकारता है। सीप की तरह यदि हम तनिक भी मुँह खोल सके तो इन दिनों झर रही कई स्वाति बूँदें उसमें गिर सकती है और कई मोती गर्भ में आ सकते हैं। गुरुदेव पर जो दैवी अनुग्रह बरसते रहे है वे ही अपने लिये भी सहज उपलब्ध है। आवश्यकता केवल उन प्रबल भाव भाव-संवेदनाओं की है जिनके आधार पर उपलब्धियों को हृदयंगम और आत्मसात् कर सकना सम्भव हो सके।
चिन्तन मनन 2. बसन्त पर्व पर किसी न किसी प्रकार छोटे या बड़े आयोजन 3. अखण्ड-ज्योति एवं युग-निर्माण पत्रिकाओं की सदस्य संख्या अभिवर्धन 4. नये छपे प्रचार ट्रैक्टों द्वारा अपने क्षेत्र में युग-निर्माण अभियान के स्वरूप का प्रचार परिचय, यह चारों ही क्रिया कलाप पूरे करने के लिये हम उत्साह पूर्वक जुट पड़े तो उसका परिणाम इस प्रकार सामने आ सकता है जिसके आधार पर निर्दिष्ट लक्ष्य की दिशा में आशातीत सफलता के साथ आगे बढ़ा जा सके।
चिन्तन चेतन का जो वरदान मिला, उसने उसे धन्य बना दिया। इस धरती पर जो शोभा सौंदर्य भरा व्यवस्था क्रम चल रहा है उसमें मानवी बुद्धि वैभव का योगदान कम नहीं है। दूसरे शब्दों में इसी बात को यों कह सकते हैं कि विश्व - वसुधा की शोभा गरिमा में भगवती सरस्वती के ही अनुग्रह ने चार चाँद लगाये है। मनुष्य को सृष्टि के अन्य प्राणियों की तुलना में जो गौरव मिला है उसके पीछे भगवती वीणा - पाणि की अनुकम्पा ही झाँक रही है।
चिन्तन एवं कर्तृत्व के पीछे छिपी अचेतन मन की गतिविधियों का नाम मनोविज्ञान है। - ब्रिजेज
चिन्तन आदि उपयोग को अपनाया जाना चाहिए। अचेतन मन की गरिमा और सम्भावनाओं का पता लगाने के लिए मनः शास्त्री जितने गहरे उतरते जाते हैं, उतना ही यह अनुभव करते हैं कि इस रत्नागार में छिपी बहुमूल्य सम्पदा इतनी अपार और असीम है जिनकी कल्पना तक कर सकना कठिन है।
चिन्तन की व्याधि से ग्रसित हो। आज के उचित वातावरण में बहु संख्यक लोगों की मनोवृत्तियों में पशु प्रवृत्तियों का बाहुल्य हो सकता है। संभवतः फ्रायड से यही भूल जान या अनजान में हुई है वे मनुष्य को कामुकता की कीचड़ में सड़ते रहने वाले कृमि-कीटक मात्र ही समझ सके है। वस्तुतः मानवी सत्ता की गरिमा उससे कही ऊँची है जैसा कि उनने समझा है।
चिन्तन में व्यतीत करना चाहिए जिसकी पृष्ठभूमि में देव जीवन में अपने को अधिक गतिशील बनाने का आवश्यक साहस मिल सके।
चिन्तन और स्वतन्त्र कर्तव्य की क्षमता को भी यदि हम इस दिशा में नियोजित करते तो सच्चे अर्थों में यह कहा जा सकेगा कि हम जीवित है। जीवितों जैसे काम करते हैं और जीवन ईश्वर के लिये जीते हैं।
चिन्तन प्रेरणा ही है। यदि यह विशेषता उसमें न रही होती तो अनेक बातों में कितने ही जीवधारियों की तुलना में वह गया गुजरा हेटा - ठहरता। शरीरगत कोमलता और दुर्बलता को देखते हुए वह प्रकृति से संघर्ष करते हुए अपना अस्तित्व भी कठिनाई से बनाये रह सकता था। किन्तु सोद्देश्य चिन्तन चेतन का जो वरदान मिला, उसने उसे धन्य बना दिया। इस धरती पर जो शोभा सौंदर्य भरा व्यवस्था क्रम चल रहा है उसमें मानवी बुद्धि वैभव का योगदान कम नहीं है।
चिन्तनात्मक शृंखला हम ईश्वर की इच्छानुसार चलने के लिए उसकी सृष्टि संचालन प्रक्रिया का एक घटक भर रहने के लिए बलात् बाध्य है।
चिन्तन करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-August
चिन्तन तो कदाचित ही किसी के पल्ले पड़ता है।
चिन्तन मनुष्य को स्थायी ओर संकीर्ण नहीं रहने देता। वह न तो इन्द्रियों का गुलाम बनता है और न मन का। उसे न लोभ सताता है न मोह। न उसे आत्मश्लाघा व्याकुल करती है और न लोक प्रवाह के साथ बहने में रुचि होती है। कौन समर्थक है कौन विरोधी यह सोचने की भी उसे फुरसत नहीं होती।
चिन्तनशील मनुष्यों ने ही किया हैं। हमारी आज की चिन्तन प्रक्रिया ऐसी लगती है मानों वह स्वतन्त्र एवं उपार्जित है पर सच तो यह है कि हम किन्हीं अन्य लोगों द्वारा सृजन किये विचारों की लहरों पर ही बैठते रहते हैं विशुद्ध स्वतन्त्र चिन्तन तो कदाचित ही किसी के पल्ले पड़ता है।
चिन्तन, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास को अपनी नीति-निष्ठा में परिणित कर लिया जाय तो हमारा जीवन प्रवाह उस दिशा में सहज ही बह निकलेगा जिसमें अक्षय सुख-शान्ति के आनन्द-उल्लास के अनुदान पग-पग पर भरे पड़े हैं।
चिन्तन को अधिक पवित्र और अधिक लोकोपयोगी बनाने की तप साधना में निरत हो।
चिन्तन से भरा प्रचलित ईश्वरवाद भी पहुँचता है। इस प्रकार वे बाहर से एक-दूसरे के प्रतिकूल दिखते हुए भी निष्कर्ष एक ही निकालते हैं। पापाचार के लिए दोनों ही समान रूप से पथ प्रशस्त करते हैं।
चिन्तन और कर्तव्य को बदलकर कोई भी अपनी दुनिया के स्वरूप में सहज ही आमूल चूल परिवर्तन कर सकता है।
चिन्तन में उत्कृष्टता और कर्तृत्व में आदर्शवादिता भरी जाय तो उतने भर से काम चल जायेगा और जीवन काल का रहस्यमय विज्ञान सहज ही करतलगत हो जाएगा। तदनुसार शरीर, मन, साधन और परिवार का सुसंचालन कर सकने में निपुणता प्राप्त हो जाएगी। तब सुख-युक्त परिस्थिति और शान्ति पूर्ण मनः स्थिति का रसास्वादन पग पग पर उपलब्ध होने लगेगा।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व। जिसके अन्त करण में इन दोनों की प्रतिष्ठापना हो गई समझना चाहिए उसने मनुष्य शरीर में रहते हुए ही देवयोनि प्राप्त कर ली।
चिन्तन, निकृष्ट जन समूह का अन्धानुकरण इसी का नाम माया बन्धन है। उसी में फँसा हुआ प्राणी भव बन्धनों में कसा जकड़ा-अगणित विपत्तियों से संत्रस्त रहता है। नरक इसी का नाम है। ग्रसित और विकृत चिन्तन अपना कर हम स्वयं ही अपने जलने गलने के लिए नरक का सृजन करते हैं और स्वयं स्वेच्छापूर्वक उसमें प्रवेश करते हैं।
चिन्तन की परिस्थितियों के साथ ताल-मेल बिठा सकने योग्य परिष्कृत न बन सके उसकी मनोव्यथा का अन्त हो ही नहीं सकता। समस्त परिस्थितियाँ के साथ ताल-मेल बिठा सकने योग्य परिष्कृत न बने सके उसकी मनोव्यथा का अन्त हो ही नहीं सकता। समस्त परिस्थितियाँ सदैव अनुकूल ही बनी रहे यह सर्वथा असंभव है। जिसने असम्भव को सन्तोष का आधार बना रखा हो उसके मानसिक आकाश में हर्षोल्लास की बिजली कभी कभी ही कौंध जाया करे तो बहुत है अन्यथा उसमें नीला काला अन्धकार ही छाया रहेगा।
चिन्तन, आगन्तुकों को परामर्श विभिन्न विषयों के शोधकार्य जैसी प्रवृत्तियाँ वहाँ रह कर चलाते थे और आवश्यकतानुसार भ्रमण करके जन-जागरण की आवश्यकता पूरी करते थे। यही ऋषि जीवन था। संन्यास तो जीवन के अन्तिम एवं अशक्त भाग में लिया जाता था। इससे पूर्व तो वानप्रस्थ की-ऋषि-मुनि की भूमिका ही समस्त आत्म-परायण व्यक्ति निबाहते थे।
चिन्तन पर रोकथाम तो आत्म-नियन्त्रण से ही हो सकता है। कहना न होगा कि इस आत्म-निग्रह में ईश्वर की न्याय और कर्मफल देने की मान्यता ही कारगर सिद्ध हो सकती है। नास्तिकवादी मान्यता अपनाने पर तो, अवांछनीय रीति-नीति अपनाकर अधिकाधिक सुख-साधन कमाने में, फिर कोई बड़ा बन्धन ही नहीं रह जाता। कानून और लोकमत को तो सहज ही बहकाया जा सकता है।
चिन्तन थोड़ा और विचार प्रवाह अत्यन्त क्षीण होता है। किन्तु मनुष्य में भावना, इच्छा, संकल्प, आदर्श आदि की बड़ी शक्तिशाली प्रेरणाएँ चिन्तन क्षेत्र को घेरे रहती हैं। अस्तु उनसे विचार तरंगें भी बहुत शक्तिशाली उत्पन्न होती हैं। यों जिनका चिन्तन शरीर की परिधि में ही एक ढर्रे पर घूमता रहता है, उनकी भी विचार तरंगें बहुत दुर्बल होती हैं। प्रखरता तब आती है जब उनमें किन्हीं विशेष भावनाओं का उभार सम्मिलित रह रहा हो।
चिन्तन को उत्कृष्ट बनाने के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। धर्म और अध्यात्म का एकमात्र प्रयोजन मानवी चेतना को इसी पुण्य पथ पर अग्रसर करना है। ईश्वर अनुग्रह का सर्वोपरि वरदान यही हो सकता है कि भक्ति के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी रहने वाली सद्भावनाएँ उमड़े और सत्प्रवृत्तियों के रूप में प्रत्यक्ष परिलक्षित हो। जहाँ इन उपलब्धियों का दर्शन नहीं होता हो, समझना चाहिए वहाँ आस्तिकता और धार्मिकता की विडम्बना ही है -यथार्थता नहीं।
चिन्तन तक सीमित रहता, तो बात दूसरी थी; पर उसका अत्यन्त दूरगामी प्रभाव हमारी जीवन-यापन सम्बन्धी विचारणा एवं क्रिया-प्रक्रिया पर पड़ता है। कतई इसे विचारभिन्नता कहकर टाला नहीं जा सकता।
चिन्तन करते हुए तथ्यों को ध्यान में रखना चाहिए। विभूतिवान् व्यक्तित्वों का अभिवर्धन करने पर यदि समुचित ध्यान दिया जाये तो ही वह सब प्राप्त हो सकेगा जिसकी कि आज वस्तुतः आवश्यकता है।
चिन्तन आरम्भ कर दें और कुमार्ग गामिता के कदम बढ़ायें।
चिन्तन का जल लगता रहे तो उसके सभी पत्र पल्लव हरे भरे रहेंगे और उसे फला - फूला सुरम्य सुविकसित देखा जा सकेगा। इसी सर्वांगीण सुख शान्ति को मानव जीवन की सार्थकता कहा जा सकता है। उसकी उपलब्धि पूर्णतया अपने हाथ में है। आत्मचिन्तन, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास को अपनी नीति-निष्ठा में परिणित कर लिया जाय तो हमारा जीवन प्रवाह उस दिशा में सहज ही बह निकलेगा जिसमें अक्षय सुख-शान्ति के आनन्द-उल्लास के अनुदान पग-पग पर भरे पड़े हैं।
चिन्तन समस्त विश्व को प्रभावित करता है। ऐसी दशा में हमारे क्रिया द्वारा न सही, विचारों द्वारा ही सही, कुछ क्षति पहुँचाई गई अथवा सेवा सहायता की गई है, तो उसका भला-बुरा परिणाम हमें मिलना ही चाहिए। शारीरिक पुण्य-पापों का अपना महत्त्व है, पर मानसिक पुण्य-पापों को भी काल्पनिक-नगण्य, निरर्थक या विनोद कहकर झुठलाया नहीं जा सकता। जब उनका प्रभाव होता ही है, तो क्या परिणाम नहीं मिलेगा?
चिन्तन अपना कर हम स्वयं ही अपने जलने गलने के लिए नरक का सृजन करते हैं और स्वयं स्वेच्छापूर्वक उसमें प्रवेश करते हैं।
चिन्तन क्षेत्र को घेरे रहती हैं। अस्तु उनसे विचार तरंगें भी बहुत शक्तिशाली उत्पन्न होती हैं। यों जिनका चिन्तन शरीर की परिधि में ही एक ढर्रे पर घूमता रहता है, उनकी भी विचार तरंगें बहुत दुर्बल होती हैं। प्रखरता तब आती है जब उनमें किन्हीं विशेष भावनाओं का उभार सम्मिलित रह रहा हो।
चिन्तन शरीर की परिधि में ही एक ढर्रे पर घूमता रहता है, उनकी भी विचार तरंगें बहुत दुर्बल होती हैं। प्रखरता तब आती है जब उनमें किन्हीं विशेष भावनाओं का उभार सम्मिलित रह रहा हो।
चिन्तन प्रक्रिया ऐसी लगती है मानों वह स्वतन्त्र एवं उपार्जित है पर सच तो यह है कि हम किन्हीं अन्य लोगों द्वारा सृजन किये विचारों की लहरों पर ही बैठते रहते हैं विशुद्ध स्वतन्त्र चिन्तन तो कदाचित ही किसी के पल्ले पड़ता है।
चिन्तन एवं उत्साह का विस्तार ही नहीं, स्तर भी सौर हलचलों से प्रभावित हुआ है।
चिन्तन - ईश्वर को अपने साथ में लेने की अनुभूति का सह सहारा लेकर भी मनुष्य निर्द्वंदता और निश्चिन्तता का लाभ प्राप्त कर सकता है।
चिन्तन के क्षेत्र में कोई सही साथी न मिलने के कारण एकाकी अपनी कल्पना गढ़ते हैं और उसमें शूल-बबूल होकर उलझने, चुभने वाले काँटे खड़े कर लेते हैं। किसी प्रियजन का विछोह, विश्वास घात, ऊँची आकांक्षा पर अप्रत्याशित आघात, अपमान, घाटा, असफलता , आतंक जैसे कारण भी मनुष्य के भय को इतना बढ़ा देते हैं कि उसकी स्थिति विक्षिप्त जैसी बन जाती है। बढ़ी हुई स्थिति में तो ऐसे व्यक्ति को पागल खाने ही भेजने पड़ते हैं।
चिन्तन करने वाले और समाज को दिशा देने वाले सृजनशील व्यक्तित्वों की संख्या घटती चली जा रही है। मस्तिष्क विकसित होते रहे किन्तु ऊर्ध्वगामी प्रखरता सम्पन्न व्यक्तित्व घटते रहे तो हमारी सारी समृद्धि अन्ततः विपत्ति के रूप में ही परिणत होगी। अदूर-दर्शी बुद्धिमत्ता की अपेक्षा निपट मूर्खता कम विनाशक होती है। चतुर किन्तु दुष्ट से बढ़कर कदाचित ही कोई विनाशक तत्त्व इस धरती पर हो सकता है।
चिन्तन करने वाले चरित्रवान एवं सेवाभावी लोग अपनी विचार तरंगों के माध्यम से समस्त विश्व को अपनी प्रखर प्रेरणाओं से लाभान्वित करते हैं, भले ही उनका वह अनुदान दूसरों को प्रत्यक्ष दिखाई न पड़ता हो। यह बात दुष्ट दुरात्माओं के बारे में भी लागू होती है। वे मन ही मन दुरभि संधियों के कुचक्र रचते रहते हैं और इस प्रकार की भयानक विचार तरंगें छोड़ते हैं, जिनके कारण अगणित दुर्बल मनोभूमि के लोग उसी प्रकार का चिन्तन आरम्भ कर दें और कुमार्ग गामिता के कदम बढ़ायें।
चिन्तन में विशिष्टता की जहाँ भी झाँकी होती हो वहाँ उचित हेरफेर कर लिया जाय।
चिन्तन के क्षेत्र में बिना बुलाये ही उमड़ने-घुमड़ने लगेगी। यह सब ऐसे ही उमड़-घुमड़, ऐसे ही समाप्त नहीं हो जाती, वरन् रुचि, रुझान और प्रवृत्तियों का निर्माण करती है। यह तथ्य है कि देर तक जिन विचारों को अपनाया गया है, वे प्रेरणाप्रद बनते हैं और अन्ततः अपनी ही दिशा में काम करने के लिए क्रिया-शक्ति को सहमत-तत्पर कर लेते हैं।
चिन्तन एकांगी और पक्षपाती होता है। ऐसी दशा में उनके आग्रह में आवेश की मात्रा ही अधिक रहेगी, विवेक की कम। कट्टरपन्थी और दुराग्रही लोग ऐसा ही रवैया अपनाते हैं और दार्शनिक प्रश्नों को लेकर वे बेतरह लड़ते झगड़ते हैं। उनका आदर्शवाद इस प्रकार अवांछनीयता की उत्पत्ति करता है जो कि यथार्थ में उसका उद्देश्य है नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-September
चिन्तन में लीन होते देखे जाते है। औद्योगीकरण, जनसंख्या का बाहुल्य, निर्वानीकरण एवं प्रदूषण से ऋण आयन्स घटते चले जाते है। धन आयनों की मात्रा अधिक होने से श्वास से ली जाने वाली वायु भी विकारयुक्त होती है। चूकि ये सीधे मानवी काया एवं मस्तिष्कीय विद्युत प्रवाहों पर प्रभाव डालते है, मनुष्य के दैनन्दिन क्रियाकलाप इनकी कमी व धन आयनों की बढ़ोत्तरी से निरन्तर प्रभावित होते है।
चिन्तन का विकसित रूप कर्म है। कर्म से साधन एकत्रित होते है। जो एकत्रित है उसी को तो वितरण किया जायेगा। सामान्य मनुष्य बुद्धि को मोह जाल में फंसाये रहता है। पूरा जीवन इसी में खप जाता है।
चिन्तन को विकृत कर देने वाले साधनों के बलबूते यह विश्व-तकनीकी दृष्टि से कितना भी बढ़ा-चढ़ा होने पर भी वस्तुतः विनाश को ही प्राप्त होगा। इस सम्बन्ध में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय फ्राँस के आश्चर्यजनक पतन का प्रसंग उल्लेखनीय है। जर्मनी के खूंखार डिक्टेटर हिटलर ने जब नस्लवाद के नाम पर अपनी विनाश लीला का आरम्भ किया तब पोलैंड तो उसने पहले ही दाँव में धूर्तता से हथिया लिया। उसके समक्ष एक विस्तृत साम्राज्य फ्रांस का था जिसे हस्तगत करने पर विश्व विजय की सबसे बड़ी बाधा दूर हो जाती । विदेशी आक्रामकों के बर्बर इरादों से अनभिज्ञ फ्रांसीसी सुरक्षा के स्थान पर विलासिता के मद में चूर बने हुए थे।
चिन्तन ऐसे सरंजाम जुटाने में लगा रहता है इसमें आदि से अन्त तक चकमेबाजी और तिकड़म भिडाने का जाल बुना गया हो।
चिन्तन या स्वभाव पर निर्भर है।
चिन्तन पर आरोपित कर, इस माध्यम से विचारो के बोध जगत का मनुष्य के जीवकोशों एवं चिन्तन प्रवाह पर प्रभाव जानने की आवश्यकता जान पड़ी। इन चिकित्सा विज्ञानियों का मत था कि बहुसंख्य तथाकथित शारीरिक रोगों की उत्पत्ति, जिनमें कैन्सर, हृदयाघात एवं उच्च रक्तचाप जैसी घातक व्याधियों का बाहुल्य है, चौथे आयाम विचार जगत में सर्वाधिक होती देखी जाती है। चाहे इनके कारणों हेतु आधुनिक विज्ञान जगत की उपलब्धियों, जीवन क्रम, एवं प्रदूषण कारक तत्वों का वातावरण में बाहुल्य जैसों का नाम ले लिया जाय लेकिन ये सब मूलतः हर मनुष्य के चारों ओर छाये विचार मण्डल, जिसे डॉ0 अर्नेस्ट बर्जर ने “आयोडियोरिफयर” नाम “बायो” एवं “आयनोस्फियर” की तरह दिया है, में होने वाले असंतुलन की ही प्रतिक्रिया है। इसे समझाने के लिये वे कहते है कि अच्छा होगा कि इस चिकित्सकीय चतुर्थ आयाम की परिकल्पना को आइन्स्टीन के भौतिकी के बलों के एकीकरण व सापेक्षिकता सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय।
चिन्तन के कुचक्र में फंसे रहे, कुसंग में निरत रहे, दुर्व्यसनों के अभ्यस्त बने और क्रमशः अनुपयुक्त मार्ग पर एक के बाद दूसरा कदम उठाते चले गये। परिणति अत्यन्त दुःख दायी हुयी। पतन और पराभव के गर्त में गिरे और अपने तथा दूसरों के लिए संकट खड़ा करते चले गये। मोटे रूप में इन दोनों के मध्यवर्ती अन्तर घटनाक्रमों परिस्थितियों और सहयोगियों के साथ भी जुड़ता है किन्तु वास्तविकता यही थी कि मनः स्थिति ने परिस्थितियाँ गड़ी और उत्थान पतन के सरंजाम जुटा दिये। जिन्हें वातावरण घसीटता रहता है वे एक ही सीमा तक ही आगे-पीछे हट या बढ़ जाते हे।
चिन्तन करने पर पाया कि आत्मबल की दृष्टि से हीन, खोखले नागरिकों को जीता नहीं गया, उन्होंने स्वयं आत्म समर्पण कर दिया।
चिन्तन को मोह-ज्ञान में से निकाला जाय। सौम्य, सात्विक, सरल, निर्लोभ, निर्मोह जीवन का लक्ष्य बनाया जाय। गीता की यही उक्ति ऐसी है जिसे अपनाये बिना और कोई गति नहीं।
चिन्तन के आयाम खुलते चलते जाते है। आइन्स्टीन की जन्म शदी पर पिछले दिनों प्रकाशित विद्वान लेखक नोजल काल्डर की पुस्तक “आइन्सटीन्स यूनीवर्स” में कई ऐसे अविज्ञात तथ्यों का उद्घाटन किया गया है जो अभी तक सूत्र रूप में होने के कारण वैज्ञानिक समझ पाने में असफल रहे है। “बायोलेन्ट यूनीवर्स”, “वेदर मशीन”, “स्पेसशीप आफ माइण्ड”, “द माइण्ड ऑफ द मैन”, एवं “की टू यूनीवर्स” जैसी बेस्ट सेलर पराभौतिकी पर लिखी गयी पुस्तकों के लेखक डा नोजेल काल्डर ने आइन्स्टीन को अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न देवी पुरुष माना है, जिन्होंने परोक्ष जगत की परिकल्पना करने तथा अदृश्य जगत के अनुसंधान हेतु मानवता को मार्ग सुझाया। न केवल ब्रह्मांड भौतिकी अपितु मानवी काया एवं मनस के अविज्ञात आयामों को भी उन्होंने दृश्यमान रूप दिया, जिसे समझने का कार्य अब पैंसठ वर्ष बाद सम्पन्न हो रहा है।
चिन्तन को घेरा हुआ कुहासा, ज्यों ही क्रमशः मिटता चला जा रहा है, विचारणात्व बोध को मानवी स्वास्थ्य से जोड़ पाने में क्रमशः वैज्ञानिकों को सफलता हस्तगत होती जा रही है।
चिन्तन से चरित्र और चरित्र से व्यवहार बनता है। व्यवहार ही कर्म है। कर्म से परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है। पदार्थों का संचय और अनेकों का सहयोग सत्कर्मों के आधार पर ही सम्भव होता है। सत्कर्म और कुछ नहीं सद्विचारों के ही प्रतिफल है।
चिन्तन और समय इन्हीं बातों का ताना-बुना बुनने में बीतता है। सम्पदा का बड़ा भाग इसी में खर्च हो जाता है। विलासी लोगों की जीवनचर्या कहाँ किस प्रकार बीतती है। वे किस प्रकार क्या साधन जुटाते है इसी की खोज-खबर में आंख-कान लगे रहते हे। इस संदर्भ का संचित ज्ञान अनुभव इतना इकट्ठा हो जाता है कि उन्हें विलास का विश्व कोश कहा जा सके।
चिन्तन लड़खड़ा जाता है। उलटा सोचता है और उलटे ही काम करता है। फलतः परिणाम भी उलटे होते है। सारे प्रयास सत्परिणाम उत्पन्न करने के स्थान पर उलटी विपत्ति खड़ी करते है। अस्तु मनुष्य का सर्वप्रथम प्रयास यह होना चाहिए कि बुद्धि को भ्रष्टता की दलदल में न फंसने दे।
चिन्तन और व्यवहार का अभ्यास ही उसे किसी वर्ग विशेष में रहने का आदी बनाता है। यदि संकल्प उलटे तो परिवर्तन तत्काल न सही देर-सवेरे में होने की संभावना रहेगी ही। इसी प्रकार लिंग विशेष के आधार पर किसी को वरिष्ठ-कनिष्ठ मानने की मान्यता भी भ्रामक है,यह स्पष्ट हो जाना चाहिए।
चिन्तन करते है, उन्हें अनेकानेक नई अनुभूतियाँ होती, नये चिन्तन के आयाम खुलते चलते जाते है। आइन्स्टीन की जन्म शदी पर पिछले दिनों प्रकाशित विद्वान लेखक नोजल काल्डर की पुस्तक “आइन्सटीन्स यूनीवर्स” में कई ऐसे अविज्ञात तथ्यों का उद्घाटन किया गया है जो अभी तक सूत्र रूप में होने के कारण वैज्ञानिक समझ पाने में असफल रहे है। “बायोलेन्ट यूनीवर्स”, “वेदर मशीन”, “स्पेसशीप आफ माइण्ड”, “द माइण्ड ऑफ द मैन”, एवं “की टू यूनीवर्स” जैसी बेस्ट सेलर पराभौतिकी पर लिखी गयी पुस्तकों के लेखक डा नोजेल काल्डर ने आइन्स्टीन को अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न देवी पुरुष माना है, जिन्होंने परोक्ष जगत की परिकल्पना करने तथा अदृश्य जगत के अनुसंधान हेतु मानवता को मार्ग सुझाया। न केवल ब्रह्मांड भौतिकी अपितु मानवी काया एवं मनस के अविज्ञात आयामों को भी उन्होंने दृश्यमान रूप दिया, जिसे समझने का कार्य अब पैंसठ वर्ष बाद सम्पन्न हो रहा है।
चिन्तन में इतना मस्त हो जाता है कि उसे परिस्थिति, काल एवं स्वयं की भी सुधि नहीं रहती, दोनों के बीच की भिति टूट जाती है और भक्त-भगवान एक हो जाते है। चेतना रहते हुए भी वह ब्राहा चेतना से विलग हो अपने इष्ट में पूर्णतः लीन हो जाता है। तब सर्वत्र उसे अपना अधिष्ठात्रा ही नजर आता है, समस्त जड़-चेतन उसी के प्रसार-विस्तार रूप में दिखाई पड़ते है। अपने पराये की परिधि समाप्त हो जाती है। स्व का सीमा बन्धन टूटना ही भक्ति का चरमोत्कर्ष है।
चिन्तन, स्वास्थ्य एवं प्रभावोत्पादकता पर तथा आसपास के वातावरण पर तद्नुरूप प्रभाव डालता है, ऐसा उनका मत था।
चिन्तन। जबकि आम आदमी के शिर पर अवसर न मिलने पर भी कामुक कामनाओं का भूत चढ़ा रहता है। यह ललक ही अचेतन मनमे पड़ी रहने पर उसे शिखण्डी स्तर की ओर धकेलते-धकेलते अन्ततः लिंग परिवर्तन जैसी स्थिति तक पहुंचा तक देती है। यह शरीर परिवर्तन भर है।
चिन्तन प्रवाह बहाया गया। अभिरुचि में सृजनात्मक शक्ति है वह अपने अनुरूप सरंजाम जुटाने में बहुत हद तक सफल होती रहती है। चोर जुआरी अपने जैसों की चाण्डाल चौकड़ी जुटा लेते है। वे उन्हें ढूंढ़ लेते है या उस प्रकृति वाले खोजते-खोजते पास आ पहुंचते है। सन्त सज्जनों के सम्बन्ध में भी यही बात है।
चिन्तन प्रवाह को सही दिशा दी जा सके तो अकारण रोगग्रस्त न रह कर समस्वरता से भरी हँसी-खुशी की उपलब्धियों से भरी पूरी जिन्दगी जीने में समर्थ हो सकते है।
चिन्तन करने की ही है। इस तथ्य को हृदयंगम करने वाले ऋषि-मुनि गण सदैव इस सूक्ष्म आयाम में ही जीवन जीते व अपने जीवन की सीमित अवधि को असीम बना लेते थे। उसी उपक्रम का आश्रय लेकर आज भी आयुष्य को बढ़ा पाना एवं रोगों को टाल पाना संभव है, इसमें किंचित मात्र भी सन्देह नहीं होना चाहिए।
चिन्तन प्रवाह पर प्रभाव जानने की आवश्यकता जान पड़ी। इन चिकित्सा विज्ञानियों का मत था कि बहुसंख्य तथाकथित शारीरिक रोगों की उत्पत्ति, जिनमें कैन्सर, हृदयाघात एवं उच्च रक्तचाप जैसी घातक व्याधियों का बाहुल्य है, चौथे आयाम विचार जगत में सर्वाधिक होती देखी जाती है। चाहे इनके कारणों हेतु आधुनिक विज्ञान जगत की उपलब्धियों, जीवन क्रम, एवं प्रदूषण कारक तत्वों का वातावरण में बाहुल्य जैसों का नाम ले लिया जाय लेकिन ये सब मूलतः हर मनुष्य के चारों ओर छाये विचार मण्डल, जिसे डॉ0 अर्नेस्ट बर्जर ने “आयोडियोरिफयर” नाम “बायो” एवं “आयनोस्फियर” की तरह दिया है, में होने वाले असंतुलन की ही प्रतिक्रिया है। इसे समझाने के लिये वे कहते है कि अच्छा होगा कि इस चिकित्सकीय चतुर्थ आयाम की परिकल्पना को आइन्स्टीन के भौतिकी के बलों के एकीकरण व सापेक्षिकता सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-November
चिन्तन एवं कर्तव्य के अन्यान्य क्षेत्रों तक विकसित होकर मनुष्य को जागरूक और तत्पर बनाये रखने में असाधारण रूप से सहायता करती है। छोटे कामों से घृणा न करना सुव्यवस्था को उत्पादक मनोरंजन मानना, ठाली समय का उपयोग करना, आलस्य प्रमाद का हावी न होने देना, काम को अधूरा न छोड़ना, सुसज्जा की अभिरुचि बढ़ाना जैसे अनेकों गुण ऐसे परिवार में बढ़ते हैं, जो देखने में छोटे लगते हैं, पर प्रकृति के अंग बनकर सामने प्रस्तुत कार्यों को सही ढंग से करने पर मिलने वाली सफलता का अंग बनते हैं। टूटी चीजों की मरम्मत करना यो एक गृहशिल्प भी है, उससे अधिक बचत भी है, पर आदत के रूप में बड़ा लाभ यह है कि बर्बादी तनिक भी न होने दी जाय। वस्तुओं से अधिकाधिक काम लिया जाय। कहावत है कि “जो टूटे को बनाना और रूठे को मनाना जानता है, वह बुद्धिमान है।
चिन्तन के आधार पर गढ़े गये होते हैं। आमतौर से लोग अपने को अभाव ग्रस्त मान कर दुःखी रहते हैं। अमुक व्यक्ति के पास कितने साधन है, उतने हमारे पास कहाँ? उसके जैसे ठाठ-बाट हम कहाँ बना पाते हैं, हमारा परिवार अमुक समुन्नत परिवार जैसा धनीमानी कहाँ है? यही चिन्ताएँ आमतौर पर लोगों को सताती रहती है।
चिन्तन करते हैं जो अपने पास नहीं है। चिन्ता, व्यग्रता और खिन्नता का कारण प्रायः अभावग्रस्तता का चिन्तन ही होता है। रुग्णता या दुर्घटना जैसी विपत्तियाँ तो कभी कभी ही आती है। जिन परिस्थितियों में जीवन दूभर हो गया हो ऐसे अभाव भी कभी असाधारण आपत्ति में फंस जाने पर ही आते हैं। भूख से तड़प कर या ठंड से सिकुड़ कर अन्न, वस्त्र के अभाव में भी मरने वाले कुछ तो हो ही सकते हैं पर इतने नहीं जिससे मानवजाति के शोक संतापों में उन्हें प्राथमिकता दी जा सके।
चिन्तन को स्थान देते हुये मंत्र अनुष्ठान का सामान्य लाभ हुआ।
चिन्तन और आदर्श कृत्य को एक परिष्कृत जीवन पद्धति है। जिसे अपनाने पर भीतर संतोष और बाहर सम्मान की वे उपलब्धियाँ प्राप्त होती है जिन पर कुबेर और इन्द्र जितने वैभव को निछावर किया जा सके। व्यक्तित्व की पूर्णता और प्रखरता का सारा आधार आध्यात्मिकता पर ही अवलम्बित माना जा सकता है।
चिन्तन प्रक्रिया का सही उपयोग सीख सके तो केवल स्वर्गीय हर्षोल्लास से भरे पूरे दिन बिता सकते हैं वरन् अभीष्ट दिशा में उच्चतम प्रगति का भी पथ प्रशस्त कर सकते हैं।
चिन्तन किया जाय उतनी ही उसकी गरिमा और विलक्षणता स्पष्ट होती चली जाती है। आज की यांत्रिक सभ्यता जितना शोर उत्पन्न कर रही है उसके दुष्परिणामों से मानव जाति को पूरी न हो सकने वाली क्षति उठानी पड़ेगी। अतिस्वन और जेट विमान आकाश में जितनी आवाज करते हैं उससे उत्पन्न होने वाली हानिकारक प्रतिक्रिया को सर्वत्र समझ रहा है और इन विशालकाय द्रुतगामी वायुयानों को कोलाहल रहित बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है। यंत्र भी ऐसी कर्णातीत ध्वनियाँ उत्पन्न करते हैं जो आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित परिणाम उत्पन्न कर सके।
चिन्तन, आस्था ,दृष्टि एवं आकांक्षा के द्वारा उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रिया को खोजना चाहिए। जड़ पदार्थों को जिस उत्साह से खोजा जा रहा है उसी उत्साह से चेतना की भावसत्ता का अन्वेषण किया जाना चाहिए। और ऐसे तथ्य सामने लाने चाहिये जिससे मनुष्य अपनी शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक सत्ता का सही प्रयोग कर सके साथ ही जो भौतिक पदार्थ उपलब्ध है उनका श्रेष्ठतम उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है इसकी रीति-नीति निर्धारित करने वाले विज्ञान के प्रामाणिक तथ्य विज्ञान को ही प्रस्तुत करने चाहिए। सदाचरण के प्रति डगमगाती जा रही निष्ठा इस प्रकार के शोध कार्यों से पुनः स्थापित की जा सकती है। परस्पर मिल जुल कर रहने और स्नेह सौहार्द भरा उदार व्यवहार करने में घाटा नहीं वरन् लाभ यह तथ्य थोड़े से प्रयत्नों से भौतिक विज्ञान के आधार पर ही प्रतिष्ठापित किया जा सकता है और अध्यात्म की उच्चस्तरीय दार्शनिक मान्यताओं को विज्ञान को ठोस समर्थन मिल सकता है।
चिन्तन की अद्भुत क्षमता मानव प्राणी को नियति का एक ऐसा उपहार है जिसे अद्भुत और अनुपम कह सकते हैं उसमें सुख और सन्तोष के समस्त आधार मौजूद है। साथ ही असीम प्रगति की एक से एक बढ़ी-चढ़ी संभावनाएं भी विद्यमान है। यदि हम चिन्तन प्रक्रिया का सही उपयोग सीख सके तो केवल स्वर्गीय हर्षोल्लास से भरे पूरे दिन बिता सकते हैं वरन् अभीष्ट दिशा में उच्चतम प्रगति का भी पथ प्रशस्त कर सकते हैं।
चिन्तन को परिष्कृत करने वाला क्षेत्र भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की अपेक्षा बड़ा भी है और व्यापक भी। सुविधाओं की अभिवृद्धि के कारण जो समय बचेगा, उसे आगामी पीढ़ियाँ अध्यात्म उत्पादन में लगाया करेगी। संगीत, साहित्य कला के माध्यम से विचारों का परिष्कार करने की आवश्यकता अनुभव की जायेगी और भावनात्मक सहयोग एक के द्वारा दूसरे को मिलता रहे, इसकी आवश्यकता अनुभव की जायेगी। इसलिए मानवी अन्तरात्मा की भूख बुझाने के साधन जुटाने में अगली पीढ़ियों को लगना होगा। चैन करने और मौज उड़ाने की वर्तमान हविस की निरर्थकता होने पर मनुष्य को अंतर्मुखी प्रवृत्तियों के जागरण का अधिक उपयोगी प्रयास करने में जुटना पड़ेगा।
चिन्तन प्रक्रिया पर सवार हो जाता है और एक चिरन्तन प्रवाह का रूप धारण करता है। यह मार्ग मस्तिष्कीय प्रशिक्षण एवं परिवर्तन की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी है। इससे मन को किसी विशेष भूमिका में रमण करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। विकृतियों को सुधारा जा सकता है और अभिरुचि तथा प्रकृति में परिवर्तन लाया जा सकता है। यह अर्थ चिन्तन को स्थान देते हुये मंत्र अनुष्ठान का सामान्य लाभ हुआ।
चिन्तन ही होता है। रुग्णता या दुर्घटना जैसी विपत्तियाँ तो कभी कभी ही आती है। जिन परिस्थितियों में जीवन दूभर हो गया हो ऐसे अभाव भी कभी असाधारण आपत्ति में फंस जाने पर ही आते हैं। भूख से तड़प कर या ठंड से सिकुड़ कर अन्न, वस्त्र के अभाव में भी मरने वाले कुछ तो हो ही सकते हैं पर इतने नहीं जिससे मानवजाति के शोक संतापों में उन्हें प्राथमिकता दी जा सके।
चिन्तन की इस विकृति को हटाकर यदि अपने से पिछड़े लोगों के साथ तुलना करे तो प्रतीत होगा कि जहाँ लाखों से हम पिछड़े हुए है वहाँ करोड़ों की अपेक्षा अधिक सुविधा जनक समुन्नत स्थिति में भी है। ऐसे लोग दुनिया में कम नहीं जिन्हें हमारी जैसी स्थिति मिल जाय तो अपने को बहुत भाग्यवान समझे और फूले न समाये।इन लोगे के साथ यदि तुलना की जाय तो प्रतीत होगा कि अपनी स्थिति अभावग्रस्तता की नहीं साधन सम्पन्नता की है।
चिन्तन, मनन, अध्ययन, प्रवचन करते रहने से केवल बौद्धिक समाधान मिलता है। सत्प्रवृत्तियाँ परिपक्व तो अभ्यास से होती है। अभ्यास के लिए उपकरण चाहिए। जिन लोगों के बीच हमें रहना पड़ रहा है, उन्हें परिष्कृत बनाने के लिए प्रयास करना वस्तुतः अपनी प्रकृति को ही सुधारना है। बेझिझक बात करनी हो तो बात दूसरी है- यदि सचमुच किन्हीं पर बदलने योग्य प्रभाव उत्पन्न करना है तो उसका एक मात्र उपाय अपनी स्थिति का प्रभाव डालने योग्य बनना ही हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-October
चिन्तन के साथ आदर्श कर्तव्य आवश्यक है। देवत्व के पक्षधर मात्र अपने को सन्त, सज्जन बना कर ही नहीं रह जाते वरन् उन्हें लोकमंगल की साधना में निरत रहकर सुसंस्कारिता परिपक्व करनी होती है। एकाँगी अभिरुचि रखने वाले पूजा परायणों की असफलता का एक मात्र कारण यही होता है कि वे परमार्थ परायणता में रुचि नहीं लेते और लोकूँगल को अपनी संचित संकीर्णता के कारण स्वार्थ सिद्धि के लिए आवश्यक न मानकर उसमं निरत बने रहते हैं। यदि यह अपूर्णता बाधक न रहे तो काँने, लँगड़े जैसी कुरूपता और अर्धांग पक्षाघात से पीड़ितों जैसी असमर्थताजन्य असफलता का सामना क्यों करना पड़े ? उपासना का दूसरा पक्ष है- साधना।
चिन्तन अर्थात् स्वर्ग, दूसरे लोकप्रवाह की उपेक्षा अर्थात् मुक्ति, तीसरे प्रामाणिकता और उदार परमार्थ परायणता के आधार पर बरसने वाला असीम सहयोग सहित लोक-सम्मान। असी को देवनुग्रह, ईश्वरीय वरदान कहते हैं।
चिन्तन की विषैली जड़े उसी क्षेत्र में जमी हुई है। उनका सामाजिक गठन, परम्परा प्रचलन, चिन्तन का ढर्रा, स्वभाग आदि के न मिलने से एक प्रवाह ऐसा बन गया है जिसकी प्रचण्ड धारा से पार हो सकने में किसी को भी सफलता नहीं मिल रही है। न तो जन-जातियाँ अपने पुरुषार्थ से उस गर्त से उबार पा रही है और न उद्धार की बात सोचने वालों की समझ में आ रहा है कि इस खाई को पाटने के लिए उनका सामाजिक जीवन में प्रवेश करना और साथ लेकर चलना आवश्यक है।
चिन्तन और चरित्र की दृष्टि से देवत्व सम्पन्न प्रतिभाओं का उपार्जन संचय एवं संगठन। इस प्रयोजन में जितनी सफलता मिलेगी उसी अनुपात से यह समझा जा सकेगा कि मानवी शग्योदय का समय निकट आ गया। युग परिर्वतन या स्वर्ग का अवतरण इसी स्थिति को कहा जाता रहा है।
चिन्तन तथा कर्म को सर्त्यवृत्ति संम्वन्ध में, युग साधना में नियोजित कर सकने का अवसर प्राप्त करते हैं। जागृत आत्माएँ-युग शिल्पी, सृजन-सैनिक, देवमानव, प्रज्ञापुत्र आदि नामों से समय-समय पर इसी समुदाय का उल्लेख होता रहता है। उज्ज्वल श्विष्य की आशाओं के केन्द्र बिंदु दन्ही को माना गया है। शेष तो मोह मदिरा पीकर उन्मादियों अथवा अर्धमृतकों की तरह मनुष्य जीवन को मखौल बनाते हुए दिन गुजारते हैं। प्रतिभाओं की कमी नहीं।
चिन्तन पिछड़े वर्गो को ध्यान में रखते हुए किया गया है। क्योंकि उसमें सस्तेपन, उपक्रम की सरलता साथ ही प्रगतिशीलता सर्म्मधन के सारे तत्व मौजूद हैं। उनके संचालन में किसी वैतनिक कार्यकर्त्ता की नियुक्ति नहीं कनी पड़ती। संस्थापक ही मिल-जुलकर उसके लिए अनुकूल वातावरण बनाने उपयोगी कार्यक्रमों के साथ् उस श्रृंखला को जोड़ते विकसित करते रह सकते हैं।
चिन्तन का ढर्रा, स्वभाग आदि के न मिलने से एक प्रवाह ऐसा बन गया है जिसकी प्रचण्ड धारा से पार हो सकने में किसी को भी सफलता नहीं मिल रही है। न तो जन-जातियाँ अपने पुरुषार्थ से उस गर्त से उबार पा रही है और न उद्धार की बात सोचने वालों की समझ में आ रहा है कि इस खाई को पाटने के लिए उनका सामाजिक जीवन में प्रवेश करना और साथ लेकर चलना आवश्यक है।
चिन्तन और स्वभाव का सड़ा-गला ढर्रा अपनाये रहने वाले तो यह सोच सकते हैं कि उन्हें किन्हीं कठिनाइयों ने जकड़ रखा है और वे समय की माँग को पूरा करने में कुछ भी कर सकने में असमर्थ हो गये हैं। यह बुद्धि भ्रम कके सहारे बुना गया मकड़ी का जाल भर है जो नागपाश जैसा लगता है। दूरदर्शिता को अपनाकर निजी जीवन की समस्याओं को सुलझाया जाय तो वे इतनी सरल और सीधी सादी प्रतीत होंगी उसके समाधान में किसी को रक्ती भर भी कठिनाई का सामना न करना पड़े। औसत भारतीय का निर्वाह स्वीकारने और महत्वाकाँक्षाओं को आदर्शवादिता की ओर से मोड़ देने भर से मनःस्थिति उलट सकती है और परिस्थितियों की विषमता देखते-देखते तिरोहित हो सकती है। वस्तुतः व्यस्त से व्यस्त समझा जाने वाला व्यक्ति भी जीवन में आत्मा की आवश्यकता और ईश्वर की साझेदारी अनुभव करने लगे तो उसके कपाट खुल सकते हैं और ऐसी जीवनचर्या बन सकती है जिसमें आत्मकल्याण और लोकनिर्माण के दोनों प्रयोजन श्ली-शँती पूरे होते रहे, साथ ही निर्वाह एवं परिवार पोषण में राई भर भी कठिनाई अनुभव न करनी पडे।
चिन्तन, निर्णय, और दृष्टिकोण में विकृति भरी रहने के कारण दिशा ठीक बन ही नहीं पाती और सुख अभिलाषा की पूर्ति के लिये किये समस्त कार्य प्रायः दुखदायक ही सिद्ध होते हैं। अभिलाषा पूरी न होने तक आतुर व्याकुलता कष्ट देती है। पूर्ति के कुछ क्षण हड़बड़ी में बीतते हैं सन्तोष पूर्वक तृप्ति के क्षणों का आनन्द ले सकता सम्भव नहीं होता। पूर्ति के पश्चात् संचय एवं उपयोग का इतना अधिक वजन बढ़ता है कि गरदन टूटने लगती हैं और रीढ़ चरमराने लगती है। सरल स्वाभाविक जीवन का आनन्द न जाने वहाँ चला जाता है।
चिन्तन का यदि सचमुच ही अन्तराल में प्रवेश हो सका तो जीवनक्रम के उद्वेश्य और आचरण में जमीन आसमान जैसा अन्तर पडे़ बिना रह नहीं सकता। तब निर्वाह की समस्या हल करने और परिवार का ब्राह्मणोचित क्रिया-कलाप चलते रहने में किसी को श्ी रत्ती श्र श्ी कठिनाई नहीं हो सकती। पत्तियों के मर जाने या अपंग हो जाने की स्थिति में जो अपने शरीर पुरुषार्थ केवल पर अपना ही नहीं चार-चार बच्चों का पालन और विकास श्ी श्ली प्रकार कर लेती हैं। ऐसे प्रतिभा को जगाया जा सके तो गृहव्यवस्था ही नहीं उपार्जन का श्ी उत्साहवर्धक मार्ग निकल सकता है। वे चाहे तो छोटा-मोटा काम करके इतना कमा सकता है कि धर से एक शवनाशील व्यक्ति को युग सृजन जैसे आपत्ति धर्म का परिपालन करने के लिए बिना किसी असविधा के अवसर प्रदान कर सके।
चिन्तन एवं प्रचलन प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। चरणपीठों के स्थापनकर्त्ता यदि उस समुदाय का धार्मिक मोड़ देने की श्रृंखला में अगली कड़ियाँ सामाजिक मान्यताएँ, अभ्यस्त आदतों, रुढ़ि परम्पराओं एवं मूढ़ मान्यताओं के बदलने को जोड़ते रहे तो निश्चित रूप से प्रतिगामिता घटती और उसके स्थान पर प्रगतिशीलता बढ़ती चली जायेगी।
चिन्तन चरित्र और व्यक्तित्व की दृष्टि से अपेक्षा कृत ऊँचे उठे होने चाहिए। यही है वह युग-शक्ति, जिसके सहारे नव सृजन की विशालकाय योजना एवं आवश्यकता को साकार कर सकना सम्भव है।
चिन्तन निखरते ही अब ज्ञानघटों की ही नहीं धर्मघटों की स्थाना का भी उपक्रम चल पड़ा है। जो इतनी नगण्य-सी उदारता दिखाने में भ्ी आना-कानी करते हैं वे देव बिरादरी में बचकाने ही गिने जाते हैं और अपनी दृष्टि में भी उस कृपणता के कारण अपना मूल्य गिराते हैं।
चिन्तन को दिशा मिलती है और जन्म-दिवसोत्सव जैसे आयोजनों से उसे उत्साह बनकर उभरने का आधार मिलता है। सदुद्देश्य को लेकर एकत्रित हुए सद्भाव-सम्पन्नों की श्रद्धा एवं उल्लास भरे वातावरण में जो परोख्ज्ञ प्रेरणाएं दी जाती हैं वे निरर्थक नहीं जाती वरन् अन्तराल की गइराई तक प्रवेश करती और समयानुसार अपने चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करती हैं। इसलिए घर-घर युग-साहित्य पहुँचाने, वापिस लाने और जनम दिन मनाने का श्रीगणेश किया गया है कि इस अश्रद्धा के युग में दूसरों पर बिना किसी प्रकार का भार डाले सहज सेवा के सहारे उपेक्षा को भी समर्थन में बदला जा सकें। यह प्रक्रिया खर्चीली या झंझटभरी होती तो उसे जन-जन द्वारा अपनाया जा सकना सम्भव न बन सकता। फलतः घर-घर में युग-चेता को पहुँचानें और जन-जन को उससे प्रभावित करने का सुयोग ही न बनता।
चिन्तन के इसी परिष्कार की चर्चा इस अड्ड में की गई है। इसे गम्भीरतापूर्वक समझा जा सके तो जागृत आत्माओं में से प्रत्येक को युग धर्म के निर्वाह का न्यूनाधिक अवसर निश्चित रूप से मिल जायगा और वह युग सन्धि को इस पुण्य बेला में आरम्भ हुए छोटे-छोटे क्रिया-कलापों को पूर्ण करने में इतना सफल हो सकेगा जिसे सन्तोषजनक ही नहीं उत्साहवर्धक भी कहा जा सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-March
चिन्तन का आधार हो सकता है, यह निर्देश मस्तिष्क को लाख बार समझाया जाय और उसे सहमत अथवा बाध्य किया जाय कि इसके अतिरिक्त उसे और किसी अनुपयुक्त प्रवाह में बह चलने की छूट न मिल सकेगी।
चिन्तन को प्रोत्साहन कितनी गहराई के साथ किया जा रहा है।
चिन्तन में नरक अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
चिन्तन का कर्तृत्व का स्तर ही उसके सामने दण्ड पुरस्कार के रूप में सामने आयेगा। स्वतन्त्रता दिशा अपनाने भर की है। पर जो कँटीले मार्ग पर चलेगा वह चुभन से बच न सकेगा यह तथ्य भी पूरी तरह स्पष्ट कर दिया गया। धर्म शास्त्र, तत्त्व दर्शन और प्रमाण उदाहरणों से भरा इतिहास इसी यथार्थता को पग-पग पर प्रतिपादित करते रहें है।
चिन्तन के लिए उत्कृष्ट सामग्री प्रदान करना यही है सन्तुलित जीवन क्रम की रीति-नीति इसे जहाँ अपनाया जाएगा वहीं आन्तरिक स्थिरता की वह पृष्ठभूमि बन जाएगी जिसमें ध्यान योग, लययोग जैसी ब्रह्म सम्बन्ध की साधनायें सफल हो सकें।
चिन्तन और कर्तव्य को उच्चस्तरीय बनाया जाना चाहिए। जो इतना कर सकेगा उनकी प्रतिभा में निखार आते देर न लगेगी। युग परिवर्तन के लिए जिन विभूतियों की आवश्यकता है उनमें से भाव शीलता और तज्जनित प्रतिभा को समुचित मात्रा में हम सब सहज ही जुटा सकते हैं। सो उसके लिए अब बिना एक क्षण गँवाये अविलम्ब तत्पर हो ही जाना चाहिए।
चिन्तन में उत्कृष्टता और आचरण में आदर्शवादिता का प्रगाढ़ समावेश कर सकने में समर्थ मनस्विता और तेजस्विता की आवश्यकता पड़ती है। उसे अपनाने का जो शौर्य साहस प्रदर्शित कर सकें उसे भावनाशील कहा जाएगा दूसरे शब्दों में सदुद्देश्य के लिए दुस्साहस पूर्ण संकल्प करने वाले एवं उनके परिपालन में बड़े से बड़ा त्याग बलिदान करने के सुदृढ़ निश्चय को भावनाशीलता कह सकते हैं। सद्भाव सम्पत् व्यक्ति उच्चस्तर पर सोचते हैं और उच्च आचरण पर तत्परता पूर्वक कटिबद्ध अड़े खड़े रहते दीखते हैं। यदि ऐसा न होता तो भावना के खदान में से ही नर रत्न महामानव उपलब्ध होने का तथ्य कैसे मूर्तिमान् रहता? ऐतिहासिक महापुरुषों में से प्रत्येक अनिवार्य रूप से भावना शील रहा है।
चिन्तन से इस प्रकार की घुटन से भर आन्तरिक विग्रह उत्पन्न होता है, जो ज्ञान तन्तुओं के माध्यम से अपने विद्रोह की कोशिकाओं तक पहुँच कर उन्हें रुग्ण कर देता है। इस मानसिक विद्रोह को शान्त करने के लिए अपनी रीति-नीति को सन्मार्गगामी बना लेना ही रोग निवृत्ति का एक मात्र उपाय है। इस आधार पर मनोविज्ञान वेत्ता रोगियों से उनकी भूलें कबूल करते है-पश्चात्ताप और परिवर्तन के संकल्प कराते हैं। तदनुसार रोग निवृत्ति का लाभ भी मिलता है।
चिन्तन प्रक्रिया हो इसके लिए अवतारों के, ऋषियों के-महामानवों के चरित्रों, एवं निर्देशों का श्रवण स्वाध्याय करके हम अपनी मनः स्थिति सही करें-विचारणाओं में परिष्कृत तत्त्वों का समावेश करें इतना भर उद्देश्य इस सारे ज्ञानयोग कलेवर का है। उसका सार-तत्त्व व्यवहार में आया कि नहीं इसकी परख इस कसौटी पर होती है कि सूक्ष्म दृष्टि से अपनी मानसिक हलचलों का बारीकी से अध्ययन-उनके औचित्य का वर्गीकरण-अवांछनीय प्रवाह का दमन और दिव्य चिन्तन को प्रोत्साहन कितनी गहराई के साथ किया जा रहा है।
चिन्तन में उत्कृष्टता का और व्यवहार में आदर्शवादिता का समावेश करना चाहिए। व्यावहारिक अध्यात्म वाद यही है। ईश्वर की पूजा अर्चा पर्याप्त नहीं वरन् भगवान को अपने में आत्मसात् करना चाहिए उसे जीवन सम्पदा का भागीदार , अधिनायक बनना चाहिए और उसके संकेतों पर प्रयुक्त होने के लिए अपनी समस्त उपलब्धियों का समर्पण करना चाहिए। बड़प्पन की भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं से मुँह मोड़ना चाहिए और महानता प्राप्त करने के लिए उसका मूल्य चुकाना आवश्यक है यह मान कर चलना चाहिए। देव मानव स्तर की जो भावनाशीलता उठती हों उसे स्वाध्याय सत्संग एवं मनन चिंतन में उभारना चाहिए।
चिन्तन को बचा सकने में सफलता प्राप्त कर ली होगी। श्रद्धा इसी मनः स्थिति का नाम हैं। उसी को समस्त आत्मिक सम्पदाओं की जननी निर्झरिणी कहा गया है। श्रद्धालु ही आत्मकर्ता के लक्ष्य को पूरा करते देखे जाते हैं।
चिन्तन का, वस्तुतः उत्कृष्टता का कितना अंश घुल-मिल सका है। भावना का अदृश्य पक्ष यही है।
चिन्तन में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता का सघन समावेश करने की। चिन्तन की उत्कृष्टता की निरन्तर प्रेरणा यह रहती है कि उसका व्यक्तित्व आदर्श, उज्ज्वल और अनुकरणीय हो। ऐसा व्यक्ति संयम, सदाचार, कर्तव्य का पूरा-पूरा ध्यान रखता है और अपने पुरुषार्थ को प्रखर बनाकर मानवी क्षमता के सदुपयोग से सम्भव हो सकने वाली प्रगति को सर्वसाधारण के सम्मुख प्रमाण रूप में प्रस्तुत करता है। उत्कृष्ट चिन्तन हर घड़ी इसी प्रयास में लगा रहता है कि किस प्रकार गुण, कर्म, स्वभाव का स्तर श्रेष्ठतम बनाया जाये, पुरुषार्थ को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाय। आत्म निर्माण में प्रचण्ड तत्परता को देखकर ही यह प्रमाण प्राप्त होता है कि चिन्तन का, वस्तुतः उत्कृष्टता का कितना अंश घुल-मिल सका है।
चिन्तन से उत्पन्न बौद्धिक विकृतियों के वे शिकार नहीं होते। जीवन की नीति निर्धारित करने में वे अन्तरात्मा का निर्देश स्वीकार करते हैं। मनुष्य की अपनी विशेषताएँ है और मस्तिष्कीय क्षमताएँ असाधारण रूप से मिली है पर दुर्भाग्य यही है कि वह उसे सही दिशा में प्रयुक्त न करके उद्धत चिन्तन में उलझता है। फलस्वरूप बौद्धिक प्रखरता के लाभ से वंचित रहकर उलटा शोक सन्ताप में बँधा जकड़ा रहता है।
चिन्तन न किया जाय, उसे उपेक्षा के गर्त में डाले रहा जाय तो इस प्रमाद का परिणाम आज न सही अगले दिनों अनन्त पश्चाताप के रूप में ही भुगतना पड़ सकता है।
चिन्तन में उलझता है। फलस्वरूप बौद्धिक प्रखरता के लाभ से वंचित रहकर उलटा शोक सन्ताप में बँधा जकड़ा रहता है।
चिन्तन प्रक्रिया अपनाने न दी जाय। औचित्य-केवल औचित्य-मात्र औचित्य-ही चिन्तन का आधार हो सकता है, यह निर्देश मस्तिष्क को लाख बार समझाया जाय और उसे सहमत अथवा बाध्य किया जाय कि इसके अतिरिक्त उसे और किसी अनुपयुक्त प्रवाह में बह चलने की छूट न मिल सकेगी।
चिन्तन को व्यवस्थित बनाने के लिए विवेकशीलता अपनानी चाहिए। दूसरे लोग अनीति मूलक गति विधियाँ अपनाकर भी क्षणिक सफलताएँ प्राप्त कर लेते हैं पर अन्त में उस कुमार्गगामिता का दुष्परिणाम भी कम नहीं भोगते । किसी भी बुद्धिमान और दूरदर्शी व्यक्ति को यह राह नहीं अपनानी चाहिए।
चिन्तन हर घड़ी इसी प्रयास में लगा रहता है कि किस प्रकार गुण, कर्म, स्वभाव का स्तर श्रेष्ठतम बनाया जाये, पुरुषार्थ को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाय। आत्म निर्माण में प्रचण्ड तत्परता को देखकर ही यह प्रमाण प्राप्त होता है कि चिन्तन का, वस्तुतः उत्कृष्टता का कितना अंश घुल-मिल सका है। भावना का अदृश्य पक्ष यही है।
चिन्तन और मन स्तर का प्रतिफल परिपाक, परिणाम है।
चिन्तन और कर्तृत्व अपनाये तो सहज ही सुख-शान्ति की परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकते हैं। इसके प्रतिकूल चलना अपना पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की तरह है। सुख और दुःख ईश्वर प्रदत्त दण्ड पुरस्कार नहीं वरन् अपने ही सत्कर्म दुष्कर्म के प्रतिफल है।
चिन्तन की उत्कृष्टता की निरन्तर प्रेरणा यह रहती है कि उसका व्यक्तित्व आदर्श, उज्ज्वल और अनुकरणीय हो। ऐसा व्यक्ति संयम, सदाचार, कर्तव्य का पूरा-पूरा ध्यान रखता है और अपने पुरुषार्थ को प्रखर बनाकर मानवी क्षमता के सदुपयोग से सम्भव हो सकने वाली प्रगति को सर्वसाधारण के सम्मुख प्रमाण रूप में प्रस्तुत करता है। उत्कृष्ट चिन्तन हर घड़ी इसी प्रयास में लगा रहता है कि किस प्रकार गुण, कर्म, स्वभाव का स्तर श्रेष्ठतम बनाया जाये, पुरुषार्थ को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाय। आत्म निर्माण में प्रचण्ड तत्परता को देखकर ही यह प्रमाण प्राप्त होता है कि चिन्तन का, वस्तुतः उत्कृष्टता का कितना अंश घुल-मिल सका है। भावना का अदृश्य पक्ष यही है।
चिन्तन आत्मसुधार और आत्मविकास में कितना रस लेता है। यदि चिह्न-पूजा की तरह पूजा पत्री की थोड़ी सी लकीर भर पिटती है तो समझना चाहिए कि अभी बाल बुद्धि-बाल क्रीड़ा में ही निरत है ईश्वर की सच्ची उपासना के साथ ईश्वर का प्रगाढ़ अनुग्रह भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है, जो आत्म बोध के रूप में ही हो सकता है।
चिन्तन में उत्कृष्टता और आचरण में आदर्शवादिता का समावेश करने के लिए तत्पर हों तो कोई कारण नहीं कि उनमें युग-निर्माताओं के उपयुक्त समर्थ क्षमता का उद्भव न हो। इस उपलब्धि से सम्पन्न होकर अपना छोटा सा परिवार उस महान् भूमिका का सहज ही सम्पादन कर सकेगा जिसके लिए उसका सृजन हुआ है।
चिन्तन और व्यक्तित्व का स्तर ऊंचा उठाने के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं।
चिन्तन में नष्ट हो जाती है। इसलिए मानसिक व्यभिचार शरीर भोग की अपेक्षा कहीं अधिक स्वास्थ्य विघातक सिद्ध होता है। यही बात अन्य इन्द्रिय भोगों की ललक लिप्सा के सम्बन्ध में है। संयम की महत्ता जहाँ साधारण स्वास्थ्य नियमों के अनुरूप है वहाँ उसका एक लाभ यह भी है कि वासनात्मक उत्तेजना से होने वाली क्षति से बचा जा सकता है और उस बचाव से स्वास्थ्य संवर्धन में भारी सहायता मिल सकती है। वासना शान्त रहे तो शरीर की अन्तरंग. स्थिति समुचित विश्राम लाभ करती रहेगी और जीवनी शक्ति को अनावश्यक क्षति न पहुँचेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-April
चिन्तन, समस्त प्रार्थनाएँ इस पाशविक शक्ति का ओज में रूपान्तरण करने में सहायता करती है। और उसी से हम आध्यात्मिक शक्ति भी प्राप्त करते हैं। यह ओज ही है मनुष्य का मनुष्यत्व। और केवल मानव शरीर में ही इस शक्ति का संग्रह सम्भव है। समस्त यौन शक्तियों को ओज में परिणत करने वाला व्यक्ति देवता है।
चिन्तन किसी काम के प्रयोजन पर केन्द्रित करें तो कितना उद्देश्य पूरा हो। छात्रों में अनुत्तीर्ण रहने वालों में से अधिकांश ऐसे होते हैं जिन्हें निरर्थक कल्पनाओं से चित्त को हटा कर उसे उपयोगी केन्द्र पर नियोजित करना नहीं आता।
चिन्तन की देन है। विद्रोह के स्वर ऊँचे करते हुए वे कहते हैं -राजनीतिज्ञों, धर्म गुरुओं, समाज के ठेकेदारों, साहित्यकारों, कलाकारों, धनाधीशों बुद्धिवादियों और सुव्यवस्था के ठेकेदारों पर अब विश्वास नहीं किया जा सकता । ये वर्ग निरन्तर आज तक जनता के साथ विश्वासघात करते रहे हैं। मानवता और लोग कल्याण की दुहाई देकर ये लोग खोखली शब्दावली में हमें यथार्थता से विरत कर ऐसे कल्पना लोक में उड़ाते रहे हैं जिसमें भ्रमजाल में उलझे रहने के अतिरिक्त और किसी को कुछ नहीं मिला।
चिन्तन प्रक्रिया में संशोधन ही है। दूषित विचार मानसिक परेशानी के रूप में उत्पन्न होते हैं और अल्सर, कैंसर तथा टी.बी. जैसे भयानक रोगों के रूप में फूट पड़ते हैं। कई बार तो कई जन्मों के कुसंस्कार पीछा करते हैं जिन्हें समझ पाना कठिन होता है। उन सबका इलाज एक ही है, कि मनुष्य व्यवहार और क्रिया की सच्चाई और सच्चरित्रता का परित्याग न करे। आज की सभ्यता इन दोनों को नष्ट करने पर तुली है, इसी कारण तरह तरह की बीमारियाँ उठ खड़ी हो रही है।
चिन्तन करना था। अपने ही देश में कुछ समग्र पूर्व सरदार पटेल और गोविन्द बल्लभ पन्त की मृत्यु के कारणों में ऐसा ही विग्रह प्रधान था।
चिन्तनात्मक एवं भावनात्मक सम्वेदना उत्पन्न करती हो सो बात नहीं। जड़ समझे जाने वाले वृक्ष वनस्पति से लेकर रासायनिक एवं खनिज पदार्थों में भी उसका न्यूनाधिक प्रभाव रहता है। चेतना तत्त्व के सम्बन्ध में जो शोध संशोधन चल रहे हैं, उन्होंने वृक्ष वनस्पतियों को भी प्राणि जगत का ही असंदिग्ध सदस्य बना दिया है। मनुष्य से लेकर वनस्पति तक की विभिन्न प्राण योनियों में सम्वेदनाओं का स्तर विभिन्न प्रकार का पाया जाता है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि इन सभी में चेतन सत्ता आत्मा का अस्तित्व विद्यमान् है।
चिन्तन खरा उतरे तो समझाना चाहिए कि हमारी सोचने की क्षमता सार्थक सिद्ध हो रही है।
चिन्तन की गर्मी उत्पन्न होगी ही नहीं और जिस प्रकार बिना आग के भोजन नहीं पकता, उसी प्रस्तुत कार्य उस सुन्दरता एवं सफलता के साथ न हो सकेगा, जिस प्रकार कि हो सकता था सूर्य की किरणें आतिशी शीशे द्वारा केन्द्रित की जाय तो देखते देखते आग प्रकट हो जाती है। मनोयोग पूर्वक किये गये कार्यों में भी ऐसी ही ऊर्जा होती है फलस्वरूप उनकी सफलता ज्योतिर्मय होकर चमकती है। भाग्य से, संयोग वश अथवा अनैतिक उपायों द्वारा किसी को कम श्रम, कम समय और कम मनोयोग में भी कुछ बड़ी सफलता मिल सकती हे पर उन्हें मनस्वी की भूमिका संपादित कर सकने का श्रेय सौभाग्य तो नहीं ही मिलता ।
चिन्तन में लगाया जाय तो न केवल असाधारण ज्ञान वृद्धि हो सकती है वरन् वर्तमान स्थिति से ऊँचे उठने आगे बढ़ने के उपाय भी सामने आ सकते हैं। उद्वेग की आँधी तो इतनी भयंकर होती है कि उसमें उपयोगी एवं दूरदर्शिता पूर्ण सूझ-बूझ का उठना ही कठिन हो जाता है।
चिन्तन मनन (2) सत्प्रवृत्तियों के सुदृढ़ता पूर्वक अपनाने का व्रत (3) अग्नि होत्र यज्ञीय जीवन, परमार्थ में संलग्नता (4) भक्ति पूर्वक ध्यान उपासना (5) विवेक की प्रधानता (6) आत्मीयता करुणा एवं ममता का विकास कहा भी हैं।
चिन्तन करके जीवनोपयोगी तथ्य हस्तगत किये जाने चाहिए।
चिन्तन क्षमता का कोई समाधान नहीं मिलता। अब वैज्ञानिक निष्कर्ष आणविक हलचलों के ऊपर शासन करने वाली एक अज्ञात चेतन सत्ता को समझने का प्रयास अधिक गम्भीरता पूर्वक कर रहे हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-May
चिन्तन एवं रुझान ऐसा चलता रहता है जिसे लिंग भेद की प्रतिक्रिया से विपरीत कहा जा सके। इस प्रकार के लक्षण यह बताते है कि आत्मा अपने कलेवर से असन्तुष्ट है और अगले दिनों अपना लिंग परिवर्तन करने के लिए भीतर ही भीतर बदलता और ढलता जा रहा है। संकल्प बल में परिस्थितियों के बदल डालने की परिपूर्ण क्षमता है उसके प्रमाणों में एक लिंग परिवर्तन को भी सम्मिलित किया जा सकता है।
चिन्तन अपनाया जाता है। कर्तव्य पालन की बात भुला कर जब व्यामोह की अवांछनीयता अपनाई जाती है, तो परिजन दुर्गुणी और लोभी विलासी बनते जाते हैं। ऐसी दशा में उन्हें सन्तुष्ट करने के लिए किये गए पक्षपात पूर्ण प्रयास भी कारगर सिद्ध नहीं होते, वरन् उल्टे पड़ते जाते है। हेय दृष्टिकोण के रहते प्रजनन बढ़ता ओर समस्याओं का बोझ सिर पर लदता जाता है। स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाने की अपेक्षा जब परिजनों को सुविधाओं से लादने की दृष्टि रहती है तो फिर उस विष सिंचन से मात्र नरक का ही उत्पादन हो सकता है।
चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टतावादी जीवन दर्शन ओत-प्रोत था। फलतः साधनों की कमी रहने पर भी उन दिनों देवत्व उभरा-उभरा फिरता था। आज सुविधाओं की कमी नहीं। शिक्षा और परम्परा का आश्चर्यजनक उत्कर्ष हुआ है। विज्ञान और व्यवसाय में ही नहीं कला और शिल्प में भी अभ्युदय के उच्च शिखर तक पहुँचने में सफलता पाई है।
चिन्तन और चरित्र पर भी होती है। पुनर्जन्म, कर्मफल, परलोक और पाप-पुण्य में आस्था जिस प्रकार व्यक्ति को दुष्कर्मों से बचाये रहती है उसी प्रकार शरीर को ही सत्य और आत्मा को मिथ्या मान लिया जाय तो लगता है कि पाप-पुण्य के पचड़े में पड़ने से क्या लाभ? चतुरता के बल पर जितना भी सम्भव हो सके स्वार्थ सिद्ध किया जाना चाहिए।
चिन्तन शरीरी पर उत्साहवर्धक अनुकूल प्रभाव डालता है और इसके विपरीत ध्वंसात्मक चिन्तन के कारण उद्विग्न हुआ मस्तिष्क अपनी कार्यक्षमता गँवा बैठता है क्योंकि उस स्थिति में मस्तिष्क की सारी शक्तियाँ कुन्द पड़ जाती है और जड़ हो जाती है। जब इन भावनाओं का आधिपत्य रहता है तो मस्तिष्क किंकर्तव्यविमूढ़ होकर यह भूल जाता है कि इन ध्वंसकारी भावनाओं से किस प्रकार उबरा जाए ? उस स्थिति में प्रायः उलटे विचार ही सामने आते है जिन्हें अपनाने पर और नई उलझनें पैदा हो जाती हैं। मकान में आग लगने पर या कोई खतरा अनायास सामने प्रस्तुत होने पर लोग जिस प्रकार अपना सन्तुलन खो बैठते हैं तथा यह नहीं समझ पाते कि क्या किया जाए ? न उनमें कुछ सोचने, विचारने और उपाय ढूँढ़ने की ही कोई सामर्थ्य आती है, उसी प्रकार की स्थिति मस्तिष्क की उस समय होती है जब ध्वंसात्मक चिन्तायें, विचारणायें भभक उठती हैं।
चिन्तन और साहसिक निर्धारण के सहारे अपना मार्ग स्वयं बना सके।
चिन्तन, निर्धारण, स्तर एवं भविष्य इसी स्तर का रहता है। वे दुःख देते ओर दुःख पाते अपना समय बिताते, गँवाते, अंधकार में गिरते मरते है। यह दैत्य परम्परा है।
चिन्तन और पराक्रम की दृष्टि से अपंग जैसा बनकर रह जाता है। उससे ऐसा कुछ सोचते नहीं बन पड़ता जिससे आत्मिक प्रगति, शान्ति शक्ति उपार्जित कर सकना सम्भव हो सके।
चिन्तन और चरित्र को उच्चस्तरीय बनाने में इन दिनों आशाजनक सफलता पाई गई। संसार भर के अनेकानेक उपाय-उपचारों से जो विविध विधि सेवा की जा सकी उसका विवरण विश्व इतिहास के पन्ने-पन्ने पर अंकित है साधन हीन परिस्थितियों में यह सब कैसे बन पड़ा। इसका एक ही उत्तर है - उन दिनों उत्कृष्टता अपनाने में भाव भरी अभिरुचि ओर दूसरे से आगे बढ़ने की स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा। इसी प्रवाह प्रचलन ने उस समय के देवता, युग और उन परिस्थितियों को स्वर्गोपम बनाया था। उन दिनों सच्चे अर्थ में स्वार्थ भी साता और हाथों हाथ फल देने वाले परमार्थ का भी पूरा लाभ उठाया गया।
चिन्तन और चरित्र को साथ सम्बद्ध व्यक्तित्व को परिष्कृत करने को भी समझा जाना चाहिए ही अनुभव किया जाना चाहिए कि जीवन दर्शन ही वह बीज है, जिसकी परिणित, परिस्थितियों का वृक्ष बनती है। दार्शनिक क्रान्ति के सहारे ही मनुष्य की आस्थाओं को ऊँचा उठाया जा सकेगा। उस क्षेत्र का उत्कर्ष ही चिन्तन और चरित्र में शालीनता का समावेश करेगा, उस अभिवृद्घि के आधार पर ही समृद्धि से लेकर शालीनता तक के सभी उपयोगी क्षेत्र हरे-भरे होते चले जायेंगे।
चिन्तन ही अगणित समस्याएँ उत्पन्न करता है।
चिन्तन और कर्म को इसी प्रयोजन में लगाये रहना ही ‘अक्लमन्दी’ की सीमा है। चतुरता यही सिखाती है। वह अपने क्षेत्र में जब उच्छृंखल होने लगती है तो कृपणता, धूर्तता और दृष्टता के रूप में बढ़ती और ऐसे अनाचारी कृत्य करती है, जिससे कर्ता को पतन, तिरस्कार, प्रतिशोध एवं प्रताड़ना का भाजन बनना पड़ता है। उपलब्धियों की मात्रा तो चतुरता के सहारे बढ़ जाती है, पर वह विग्रह और संकट ही खड़े करती है।
चिन्तन और साहसिक निर्धारण ही वह विशिष्टता है जिसके सहारे किन्हीं भाग्यवानों को सामान्य स्थिति में रहते हुए भी महा मानव बनने और असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
चिन्तन के कारण उद्विग्न हुआ मस्तिष्क अपनी कार्यक्षमता गँवा बैठता है क्योंकि उस स्थिति में मस्तिष्क की सारी शक्तियाँ कुन्द पड़ जाती है और जड़ हो जाती है। जब इन भावनाओं का आधिपत्य रहता है तो मस्तिष्क किंकर्तव्यविमूढ़ होकर यह भूल जाता है कि इन ध्वंसकारी भावनाओं से किस प्रकार उबरा जाए ? उस स्थिति में प्रायः उलटे विचार ही सामने आते है जिन्हें अपनाने पर और नई उलझनें पैदा हो जाती हैं। मकान में आग लगने पर या कोई खतरा अनायास सामने प्रस्तुत होने पर लोग जिस प्रकार अपना सन्तुलन खो बैठते हैं तथा यह नहीं समझ पाते कि क्या किया जाए ? न उनमें कुछ सोचने, विचारने और उपाय ढूँढ़ने की ही कोई सामर्थ्य आती है, उसी प्रकार की स्थिति मस्तिष्क की उस समय होती है जब ध्वंसात्मक चिन्तायें, विचारणायें भभक उठती हैं।
चिन्तन का अभ्यास न होने से इस सन्दर्भ में दूर तक जाने में अनख लगता है। प्रचलित ढर्रा स्वभाव का अंग बन जाता है, तो उस का अनुकरण ही सरल लगता है।
चिन्तन क्षेत्र पर पूरी तरह आधिपत्य कर लिया है। फलतः मनुष्य शरीरचर्या के अतिरिक्त कुछ सोचता ही नहीं। आत्म सत्ता को उसकी आवश्यकता का एक प्रकार से भुला ही बैठा है। उपभोग संचय और ममत्व के परिपोषण में ही सामर्थ्य का सारा स्त्रोत चुक जाता है। भीतर से खोखला बाहर से ढकोसला बना आज का मनुष्य अपने ओर दूसरों के लिए समस्या बन कर रह रहा है।
चिन्तन में आत-प्रोत था गति विधियों में आदर्शवाद अनुप्राणित था। चिन्तन और चरित्र के समन्वय का संस्कृति कहते है। दृष्टिकोण को दर्शन कहते है। कर्तृत्व की दिशा धारा धर्म कहलाती है। संस्कृति, दर्शन और धर्म का समन्वय ही अध्यात्म के नाम से जाना जाता है।
चिन्तन तथा शरीर को अनर्थ आचरण करने की छूट नहीं मिल सकती। बुद्धिमान भविष्य का निर्माण करते है और उसके लिए मन की ललक लिप्सा पर नियन्त्रण कर सकने में समर्थ भी रहते है और सफल भी होते है।
चिन्तन की दिशा मोड़ने के लिए साहस जुटाना पड़ेगा। भले ही कितना ही कष्ट साध्य समय साध्य ओर श्रम साध्य क्यों न हो। युग समस्याओं के समाधान में यही नीति अपनानी होगी। सही निदान चिकित्सा बन पड़ती है और सही उपचार होने रोग निवृत्ति का सही आधार बनना है। आवश्यकता जीवन दर्शन में घुसे हुए विभ्रम को निरस्त करने की है।
चिन्तन एवं विशिष्ट साहस के दोनों पंख खोलकर लम्बी उड़ान भरते हैं। ईश्वरीय अनुग्रहों में महा मानव ऋषि कल्प, देवदूत अवतार जैसी कितनी ही ऐसी विभूतियाँ है। जिन्हें पाने वाला धन्य होकर रहता है। इन्हें पाने के लिए परमार्थ अपनाना पड़ता है।
चिन्तन का आलस उन्हें यह देखने सोचने तक का अवसर नहीं देता कि ढर्रे पर चलने वाले समुदाय को किस विपत्ति का सामना करना पड़ रहा है।
चिन्तन अपना कर उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए उठ खड़े होना, यह ही है वह निर्धारण जिसका गुरु कृपा, ईश्वरीय अनुकम्पा साधना की सिद्धि आदि नामों से अतंकारिक वर्णन किया जाता है।
चिन्तन की कभी रहने से उन्हें मुहावरे में अँधी कहते हैं। अंधी इसलिए कि झुण्ड जिधर भी चलता है, वे सभी बिना सोचे समझे उधर ही चलती जाती हैं। अगर उनके मार्ग में कोई कुआँ, खाई आवे तो एक के पीछे एक उसी में गिरती चली जाती है। स्वतन्त्र चिन्तन का आलस उन्हें यह देखने सोचने तक का अवसर नहीं देता कि ढर्रे पर चलने वाले समुदाय को किस विपत्ति का सामना करना पड़ रहा है।
चिन्तन प्रादुर्भूत होता है प्रभावित करती है। अतएव पृथ्वी में व्याप्त चुम्बकत्व से जैव चुम्बकत्व में कोई न कोई साम्य अवश्य होना चाहिये।
चिन्तन और चरित्र के समन्वय का संस्कृति कहते है। दृष्टिकोण को दर्शन कहते है। कर्तृत्व की दिशा धारा धर्म कहलाती है। संस्कृति, दर्शन और धर्म का समन्वय ही अध्यात्म के नाम से जाना जाता है। भारत की आस्था अध्यात्म पर केन्द्रीभूत थी फलतः व्यक्तियों में महानता भरी रही।
चिन्तन की यही स्थिति जब बनी रहेगी विपत्तियों ओर विपन्नताओं का ताँता टूटने नहीं है। प्राचीन काल में अन्तःक्षेत्र की सुव्यवस्था परध्यान दिया गया था। फलतः भौतिक दृष्टि से सुखी, आत्मिक दृष्टि से समुन्नत बनने का दुहरा लाभ उनने लगा था। स्वयं धन्य बने और संसार को धन्य बनाया। आज संकीर्ण स्वार्थपरता खाये जा रही है।
चिन्तन और चरित्र में शालीनता का समावेश करेगा, उस अभिवृद्घि के आधार पर ही समृद्धि से लेकर शालीनता तक के सभी उपयोगी क्षेत्र हरे-भरे होते चले जायेंगे।
चिन्तन के लिए सर्वोपरि समस्या है जीवन का सदुपयोग। यह अलभ्य उपहार कुचक्र से निकल कर पूर्णता तक पहुँचने के लिए समस्त सुविधाओं से भरा पूरा है। उसने बड़ा स्वार्थ साधन दूसरा क्या हो सकता है कि वाह्य जीवन में बन्धन मुक्ति की अनुभूति का आनन्द उठाते हुए इस सुअवसर का लाभ उठाया जाये इसी समस्या का दूसरा पक्ष है प्रगति पथ पर अग्रगमन, अभिनव उपलब्धियों का रसास्वादन। यह सफलता भी आत्मिक क्षेत्र की ही है। भौतिक प्रगति की निर्वाह भरके लिए आवश्यकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-July
चिन्तन नहीं है। इस दृष्टि से उस विभाजन अवधि को पहले की ओर तो कितना ही खिसकाया जा सकता है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि यथा सम्भव पीछे नहीं ही हटानी पड़े। कितने ही छोटे बच्चे पालन पोषण के लिए शेष हों और पूरा समय उनके लिए उपार्जन करने में संलग्न रहे बिना काम न चलता होती बात दूसरी है।
चिन्तन और कर्तृत्व में निरत लोक सेवी धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, में खड़े किये जा सकें तभी धरती पर स्वर्ग के वातावरण प्रस्तुत करने वाले नवयुग का अवतरण सम्भव होगा। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए वाणी और लेखनी के माध्यमों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता पर उससे भी बड़ी आवश्यकता उन व्यक्तियों की है जो अपने तप त्याग से परिष्कृत और आदर्शानुयायी व्यक्तित्व की छाया दूसरों पर छोड़ कर उन्हें महामानव नर-रत्न स्तर का बनने के लिए उत्साहित कर सके। यह कार्य वानप्रस्थ क्षेत्र में प्रविष्ट हुये लोग ही अधिक अच्छी तरह सम्पन्न कर सकते हैं।
चिन्तन जितना विशाल होगा उतना ही समाधान कर सकने की क्षमता सुविस्तृत होगी।
चिन्तन और धर्म कलेवर को ही आधार बनाना होगा। यह कार्य न राजनैतिक स्तर पर हो सकता है और न सामाजिक आर्थिक आधार पर समझाने से काम बन सकता है। यह उथली पृष्ठभूमियाँ हैं- जिन्हें अपनाकर किसी को आदर्शवादी गतिविधियाँ अपनाने के लिए प्रेरित नहीं किया जा सकता। नवनिर्माण के लिए सर्वसाधारण को कुछ त्याग करने, कुछ कष्ट सहने के लिए ही तो बाध्य किया जायगा। इसके बिना सर्वतोमुखी सुजन की आवश्यकता पूरी हो ही नहीं सकती।
चिन्तन के माध्यम से अपनी विचारणा को उत्कृष्टतम स्तर कर उठाना ज्ञानयोग है। योगाभ्यास और तपश्चर्या को गायत्री शक्ति स्रोतों पर अवलम्बित साधना क्रम को भक्तियोग करना चाहिए। लोकमंगल में सहृदय किन्तु साहसी शूर-वीरों की तरह प्राणपण से जुट पड़ने वाली कर्मनिष्ठा को श्रेष्ठतम कर्म योग कहा जा सकता है। इस प्रकार वानप्रस्थ जीवन में तीनों प्रधान योगों में निरन्तर संलग्न रहने की विधि व्यवस्था है। आहार, निद्रा, स्नान जैसे अनिवार्य शरीर धर्म का पालन करने के उपरान्त जो समय बचता है उसे परमार्थ प्रयोजनों में लगाने वाला साधन अनवरत रूप से भगवद्भक्ति में निरत कहा जा सकता है।
चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व का बाहुल्य न रहे। आज ऐसा ब्राह्मण कहां है? जाति पांति के नाम पर वामन कहलाने वाले व्यक्ति करोड़ों की संख्या में होने पर भी उनमें, ब्रह्मपरायण आत्मायें ढूँढ़ निकालना बहुत ही कठिन है। अब ब्राह्मण जीवन का आदर्श प्रत्यक्ष प्रस्तुत करने वाले लोगों की संख्या लगभग शून्य के स्तर पर जा पहुँची है। पेट्रोल के अभाव में मोटर क्या चलेगी?
चिन्तन का प्रयोग नित्य, नियमित रूप से करना चाहिए। जीवन को परिष्कृत और उदार बनाने की प्रेरणा भरने वाला साहित्य स्वाध्याय के लिए चुन लेना चाहिए और उसे मनोयोगपूर्वक पढ़ने के लिए कोई न कोई समय निश्चित निर्धारित कर ही लेना चाहिए। फुरसत के समय यहाँ तक कि रास्ता चलने भी पढ़ना पड़े तो भी चलेगा आत्म-चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण, आत्म-विकास की चतुर्विध आवश्यकताओं को कैसे पूरा किया जा सकता है? वर्तमान ढर्रे में क्या सुधार परिवर्तन किस क्रम में होना चाहिए इसी प्रकार की योजनाएं मनन-चिन्तन में बनाई जाती है। ज्ञानयोग की साधना के लिए उपासना के अतिरिक्त स्वाध्याय और आत्म-चिन्तन का अवसर रहना ही चाहिए।
चिन्तन के रहते किसी को पूर्वार्ध के बीत जाने से दुःखी होने पछताने की जरूरत नहीं पड़ती। वरन् यह अधिक महत्वपूर्ण अवसर हाथ लगते का सन्तोष ही होता है।
चिन्तन की दिशा उलटने में भारी सहायता मिल सकती है।
चिन्तन, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास के तथ्य उनके सामने रहते ही नहीं। ऐसी दशा में वानप्रस्थ की उपयोगिता बेचारे समझ भी कैसे सकेंगे।
चिन्तन की विकृतियों ने ही उत्पन्न की हैं। उनका समाधान आज या हजार वर्ष बाद जब भी होगा, लोक प्रवृत्तियों के अधोगामी प्रवाह को उलट कर ऊर्ध्वगामी बनाने से ही संभव होगा। भौतिक सम्पदायें एवं सुविधाएं चाहे कितनी ही क्यों न बढ़ाली जायं यदि दृष्टिकोण में विकृतियाँ भरी होंगी तो बढ़ी हुई सम्पदा-विनाश सर्वनाश के सर जाम में ही बढ़ाली करेगी- सर्वनाश का दिन ही निकट लायेंगी। इसलिए धन वैभव की भौतिक सुख सुविधाओं की अभिवृद्धि का कार्य दूसरे लोगों पर छोड़ कर वानप्रस्थ को एक ही अछूता काम हाथ में लेना चाहिए कि उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व के लिए आवश्यक वातावरण एवं उत्साह किस प्रकार उत्पन्न किया जायं। ज्ञान यज्ञ एवं विचार क्रान्ति इसी प्रक्रिया को कहा जा सकता है यह नींव यदि ठीक तरह भरली जाय तो नवयुग-निर्माण का भवन खड़ा करने की आधी समस्या सुलझ जायगी।
चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण, आत्म-विकास की चतुर्विध आवश्यकताओं को कैसे पूरा किया जा सकता है? वर्तमान ढर्रे में क्या सुधार परिवर्तन किस क्रम में होना चाहिए इसी प्रकार की योजनाएं मनन-चिन्तन में बनाई जाती है। ज्ञानयोग की साधना के लिए उपासना के अतिरिक्त स्वाध्याय और आत्म-चिन्तन का अवसर रहना ही चाहिए।
चिन्तन करते रहने से संभव नहीं हो सकता। व्यावहारिक अनुभव के लिए क्रियात्मक शिक्षा प्राप्त करने की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। दर्जी, मोची, धोबी, कुम्हार, लुहार, सुनार, जुलाहे, रंगरेज जैसे सामान्य शिल्प भी वर्षों अभ्यास करने के उपरान्त अपने कार्य में निष्णात हो पाते हैं तो यह कैसे संभव हो सकता है कि वानप्रस्थ लेकर अनभ्यस्त परमार्थ जीवन के क्रिया-कलाप को सुसम्पादित किया जा सके। इसलिए भी व्यावहारिक शिक्षा और अनुभव, अभ्यास की कम आवश्यकता नहीं होती। मात्र संस्कार का कर्मकाण्ड पूरा कर लेने और मन चाही रीति-नीति अपनाये रहने से तो इस महान प्रयोजन की पूर्ति नहीं हो सकती।
चिन्तन का स्वरूप। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिंतन के चार चरण ब्रह्मविद्या की उपलब्धि के आधार माने गये हैं। इन्हें साधना परायण जीवन क्षेत्र में प्रवेश करने वाले स्वयमेव भी अपने में तो साधना की आवश्यकता पूरी करते रह सकते है।
चिन्तन को उत्कृष्टता की दिशा न मिली तो बढ़ी हुई सम्पत्ति का परिणाम विपत्ति के अतिरिक्त और कुछ न होगा। बढ़ा हुआ शरीर-बल गुण्डागर्दी की, बढ़ा हुआ धन व्यसन-व्यभिचार की, बढ़ा हुआ बुद्धिबल-उपद्रव उत्पातों की अभिवृद्धि करेगा। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हम आज के शरीरबल सम्पन्न धनी मानी, सत्ताधारी और सुशिक्षितों की गतिविधियों को देखकर सहज ही प्राप्त कर सकते हैं। सद्भाव संवर्धन के लिए प्रयास न किये जाने का ही यह परिणाम है जो सम्पत्तिवानों और विभूतिवानों द्वारा अपनाई गई विघातक दुरभि संधियों के रूप में सामने प्रस्तुत है। वैभव और वर्चस्व का दुरुपयोग देख कर कई बार खीज में यह कहना पड़ता है कि इन बलवानों धनवानों और विद्यावानों की अपेक्षा रुग्ण, निर्धन एवं अनपढ़, समाज के लिये कम हानिकारक है।
चिन्तन और कर्तव्य की दिशा में सहज ही मोड़ा जा सकता है और उसका आश्चर्यजनक परिणाम आंखों के आगे प्रस्तुत देखा जा सकता है।
चिन्तन और दर्शन प्रायः मस्तिष्कीय विलासिता तक-बौद्धिक ऊहापोह तक सीमित होकर रहते देखे गये हैं। उच्च स्तरीय चिन्तन को आदर्शवादी रीति नीति में अपनाना कष्ट साध्य होता है, उसमें सुविधायें छिनती हैं और ऐसी प्रयत्न चेष्टा बढ़ती है जिसमें दूसरों की सूख शाँति की बढ़ती होकर अपना प्रत्यक्ष एवं भौतिक लाभ नहीं के बराबर ही दृष्टिगोचर होता है।
चिन्तन भी इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। जो पढ़ा समझा गया हे उस पर गंभीरता पूर्वक विचार करना-मान्य आदर्शों का जीवन में उतारने की विधि-व्यवस्था सोचना, यही है मनन चिन्तन का स्वरूप। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिंतन के चार चरण ब्रह्मविद्या की उपलब्धि के आधार माने गये हैं। इन्हें साधना परायण जीवन क्षेत्र में प्रवेश करने वाले स्वयमेव भी अपने में तो साधना की आवश्यकता पूरी करते रह सकते है।
चिन्तन प्रक्रिया को अपनाये और ऐसे कार्य करे जिनमें भले ही उसे त्याग करना पड़े अथवा कष्ट सहना पड़े किन्तु दूसरों की समाज और युग की सेवा के लिए बढ़−चढ़ कर अनुदान प्रस्तुत कर सके। इस स्तर के जीवन को ही मानव-जीवन की गौरव गरिमा के साथ अलंकृत और सम्मिलित किया जा सकता है।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व के लिए आवश्यक वातावरण एवं उत्साह किस प्रकार उत्पन्न किया जायं। ज्ञान यज्ञ एवं विचार क्रान्ति इसी प्रक्रिया को कहा जा सकता है यह नींव यदि ठीक तरह भरली जाय तो नवयुग-निर्माण का भवन खड़ा करने की आधी समस्या सुलझ जायगी। तब अनायास ही अगणित रचनात्मक एवं संघर्षात्मक क्रियाकलाप उठ खड़े होंगे और जो अधर्म के उन्मूलन एवं धर्म के संस्थापन का ईश्वरीय प्रयोजन सहज ही पूरा करेंगे।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्त्व को दैनिक जीवन में उतारते हुए जहाँ जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए साहसपूर्ण कदम बढ़ाना है वहाँ सर्वसाधारण को यह विश्वास दिलाना भी ही उच्च आदर्शों में व्यवहारिक जीवन में उतारना न केवल सरल है वरन् सुखद और शान्तिदायक भी है। लोकशिक्षा का यही प्रभावशाली तरीका है। समग्र पुनरुत्थान और अभिनव निर्माण के लिए जन साधारण को कुछ कष्ट उठाना, त्याग करना और अनुदान प्रस्तुत करना ही पड़ेगा। इसी पूँजी से ही प्रगति का भवन बनेगा। लोगों को आदर्शों की बातें तो सुहाती हैं पर उस दिशा में बढ़ने के लिए जो अनुदान प्रस्तुत करना पड़ता है, उसके लिए कोई साहस नहीं करता फलतः लम्बी-चौड़ी योजनाओं को दीमक चाटती रहती है।
चिन्तन को आदर्शवादी रीति नीति में अपनाना कष्ट साध्य होता है, उसमें सुविधायें छिनती हैं और ऐसी प्रयत्न चेष्टा बढ़ती है जिसमें दूसरों की सूख शाँति की बढ़ती होकर अपना प्रत्यक्ष एवं भौतिक लाभ नहीं के बराबर ही दृष्टिगोचर होता है।
चिन्तन में बनाई जाती है। ज्ञानयोग की साधना के लिए उपासना के अतिरिक्त स्वाध्याय और आत्म-चिन्तन का अवसर रहना ही चाहिए।
चिन्तन मनन, स्वाध्याय और निदिध्यासन संभव हो जाता है। आत्मबोध और तत्वबोध की ज्ञान साधना से ही ऋतम्भरा प्रज्ञा प्रकट होती है और जीवात्मा का ‘भूमा’ स्थिति प्रज्ञता में प्रविष्ट होना संभव होता है। आत्मा की यह भूख बुझाने के लिए नये सिरे से विद्याध्ययन करना पड़ता है-यह ब्रह्मचारी की लौकिक शिक्षा से सर्वथा भिन्न होता है, वानप्रस्थ लेने का प्रथम सोपान है-ब्रह्मविद्या का पारायण करना, उसमें पारंगत होना- ज्ञानमृत से परिपूर्ण व्यक्ति ही ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करते हैं और लोक निर्माण जैसे महान प्रयोजन के लिए अधिकारी बनते हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं।
चिन्तन है संलग्न होवे। यह वानप्रस्थ आश्रम की रीति-नीति है।
चिन्तन का अवसर रहना ही चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-September
चिन्तन और उुष्टडडडडडड चरित्र का परिणाम वैसा ही होना चाहिए जैसा कि इन दिनों व्यापक रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार में पवित्रता-प्रखरता का समावेश हो सके और वह अतीन्द्रिय विषयों की सूक्ष्मता को जान सके। तंत्रशास्त्रों में इसे ही परम शिव का अनुग्रह कहा है। सद्गुरु उन्हीं के प्रतीक हैं जो अपनी शक्ति का हस्तान्तरण शिष्य के, साधन के कल्याण हेतु करते हैं।
चिन्तनमग्न था, तभी उसकी पत्नी आयी। पूछा कि बात क्या है, जो आप इतने खोये-खोये लग रहे हैं। उसने जवाब दिया कि यही सोच रहा हूँ कि यह दुनिया कितनी मूर्ख है कि जो कुछ मैं कहता हूँ उसे स्वीकार लेती है। इस पर पत्नी ने प्रतिवाद किया, पर पति महोदय अड़ गये वह तर्कशास्त्री जो थे। जब वाद-विवाद चल रहा था, तो तर्कवादी नाश्ता करने जा रहे थे।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार एवं गुण, कर्म, स्वभाव में कोई परिवर्तन परिलक्षित नहीं होता।
चिन्तन के आगे छोटी-मोटी बातों और घटनाओं पर वे समुचित ध्यान न दे पायें यही इसका मूल कारण हो सकता है, क्योंकि जिस मस्तिष्क ने अपनी अद्भुत सृजन-क्षमता के आधार पर नयी-नयी खोज और रचनायें की, उसकी स्मरण शक्ति इतनी कमजोर होगी, यह बात गले नहीं उतरती। दूसरी ओर जीवन भर सामान्य बने रहने वाले लोग अपनी एकाग्रता और रुचि के आधार पर विस्मयकारी स्मृति का परिचय देते हुए देखे जाते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि स्मृति के संदर्भ में सभी का स्तर समान होता है।
चिन्तनों में खोयी वह पतिदेव की उपस्थिति से सर्वथा अनभिज्ञ हो गयी। पति के प्रश्न का जवाब देने के बजाय उसकी संज्ञा शून्य जैसी स्थिति बन गयी।
चिन्तन आवश्यक है, चिन्तन-मनन के बिना कोई मनुष्य अपने लिए स्थिर नैतिक सिद्धाँतों का निर्धारण नहीं कर पाता और समाज की दिशाधारा के प्रवाह में बह जाता है। उनके अनुसार चिन्तन जीवन का सैद्धान्तिक पक्ष है। उसका व्यावहारिक पक्ष श्रेष्ठ कार्यों के रूप में परिलक्षित होता है। विचार मन्थन से जो सिद्धान्त निर्धारित हों, उनको सत्यता की कसौटी के लिए व्यावहारिक क्षेत्र में उतारना होता है। उच्च आदर्शों व नैतिक सिद्धाँतों का व्यवहार में आना ही नैतिक जीवन है।
चिन्तन में निमग्न हो गये हैं कि सुध-बुध ही खो बैठे।”
चिन्तन एवं जन स्वभाव पर पशुवृत्तियाँ ही छाई रहती हैं। वे जन्म जन्मांतरों की संचित संपदा जो होती हैं। आम प्रचलन भी उन्हीं का पोषक समर्थक होता है। इस प्रकार अंकुर को खाद पानी मिलता रहता है और प्रवृत्ति उसी ढांचे में ढलती रहती है, उसी प्रवाह के साथ बहने लगती है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की दृष्टि से अपने को उत्कृष्ट आदर्शवादिता के साथ जोड़ने की प्रारंभिक जीवन साधना सम्पन्न कर ली है, वे सच्चे अर्थों में ब्राह्मण है। ऐसे व्यक्तियों को ही ब्रह्मतेज उपलब्ध करने, सिद्धियों को हस्तगत करने में सफलता मिलती है। उन्हें ही साधारण उपासना तक सीमित न रह कर गुप्त और रहस्यमयी गायत्री साधना के क्षेत्र में प्रवेश करने का अधिकार मिलता है। ऐसे लोग योग और तप में संलग्न होकर उसका तत्वज्ञान हृदयंगम कर जीवन शोधन कर उसे ऊँचा उठा पाने में सफल होते हैं।
चिन्तन में उत्कृष्टता व स्वभाव में, रहन-सहन में सादगी को समाविष्ट करके चलना पड़ता है। जिसमें बनावट की, अमीरी की, फिजूल खर्ची की गंध आती है, उसे वह कभी अंगीकार नहीं करता। छैल-छबीलों जैसे वेश विन्यास बनाकर-जेवर, फैशन वाले वस्त्र पहनना, केश सजाना, शृंगार, प्रसाधनों की लीपापोती करना उसे भोंड़ेपन का, बचकानेपन का चिह्न मालूम पड़ता है। इन विन्यासों को धारण करने वाला समझता है कि इस विडम्बना को देखकर दर्शक हतप्रभ रह जायेंगे। समझेंगे इन्द्र या कुबेर में से यही कोई है।
चिन्तन करने और अपने से अधिक सुविधा सम्पन्न लोगों के साथ तुलना करते हुए अपने दुर्भाग्य को कोसा ही जा सकता है। दरिद्रता के लिए भाग्य को दोष दिया जा सकता है। पर यदि यह देखा जाय कि हमारे पास जो है, जितना है उतना भी असंख्यों को उपलब्ध नहीं तो हर कोई संतोष की साँस ले सकता है और अपने को आर्थिक दृष्टि से न सही अन्य अनेक क्षेत्रों में अपनी स्थिति को सराहनीय मान सकता है।
चिन्तन हमारा रुका हुआ है।
चिन्तन मनन की क्षमता में ह्रास होता है, सो अतिरिक्त।
चिन्तन की उत्कृष्टता और चरित्र की आदर्शवादिता घटती-मिटती जा रही है। मनुष्य शरीर धारण किए होने पर भी लोग श्मशान वाली भूत, पलीत की मनःस्थिति जिए हुए, डरते-डराते जीवन व्यतीत करते देखे जाते हैं। दुर्व्यसनों की पकड़ इस प्रकार बढ़ती एवं प्रचण्ड होती जाती है, जिसकी तुलना पौराणिक रूप में ग्राह द्वारा ग्रसे गए गज से की जा सके।
चिन्तन और कर्तृत्व इसी एक केन्द्र पर नियोजित किए रहती है। यह सब चलता और बढ़ता भी इसलिए रहता है कि उसके लाभ परिणाम सबके समक्ष प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होते हैं। जब कि चेतना का स्वरूप आत्मिक क्षेत्र की गहराई में उतरने अन्तर्मुखी होने और बारीकी से समझने पर ही स्पष्ट होता है। इतना झंझट कौन उठाए? सम्यक् दृष्टिकोण कौन अपनाए?
चिन्तन की आवश्यकता है।
चिन्तन करूंगा।”
चिन्तन अभी भी यही बना हुआ है कि पाखण्डों के सहारे वे बड़प्पन पा सकते हैं और उसे देर तक स्थिर रख सकते हैं। यदि यह भ्रान्ति मिट गई होती तो लोग बड़प्पन के स्थान पर महानता पसंद करते। सीधा और सरल मार्ग चुनते, वह प्राप्त करते जिसे पाने की उनकी आन्तरिक अभिलाषा थी। ओछे आधार अपनाकर बटोरा गया बड़प्पन तिनकों से बनाये गये महल की तरह हवा के एक ही झोंके में उड़कर कहीं से कहीं जा पहुँचता है।
चिन्तन जीवन का सैद्धान्तिक पक्ष है। उसका व्यावहारिक पक्ष श्रेष्ठ कार्यों के रूप में परिलक्षित होता है। विचार मन्थन से जो सिद्धान्त निर्धारित हों, उनको सत्यता की कसौटी के लिए व्यावहारिक क्षेत्र में उतारना होता है। उच्च आदर्शों व नैतिक सिद्धाँतों का व्यवहार में आना ही नैतिक जीवन है। सिद्धाँतों के कार्यान्वयन के लिए क्रियाशीलता-गतिशीलता नैतिक जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता है, संसार के सभी महापुरुष जीवन भर क्रियाशील रहे, अनवरत श्रम-साधना करते रहे हैं।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार और स्वभाव विनिर्मित करना मनुष्य के अपने हाथ की बात है जो अपने व्यक्तित्व को निखार सकता है। उसे दूसरों का विश्वास अर्जित करने में देर नहीं लगती है। विश्वासी को सहयोग मिलता ही है। सहयोग एक पूँजी है जो अपने निज की सम्पदा की तरह काम आती है। बैंक से ऋण लेकर भी अपना उद्योग चलाया जा सकता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को ऐसा बनाना पड़ता है जो उत्कृष्टता की कसौटी पर खरा सिद्ध हो सके। यही वह विभूति है जिसके आधार पर आत्मसंतोष, जन सम्मान, अजस्र सहयोग का प्रतिफल हाथों हाथ मिलता है। समझदारी तक का तकाजा एक ही है कि अपने क्रियाकृत्यों में ईमानदारी का समावेश रखा जाय। कर्तृत्वों के प्रति जिम्मेदारी निबाही जाय। प्रलोभनों और दबावों के आगे न झुकने का साहस दिखाया जाय।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में भी उसका समुचित समावेश होना चाहिए। नियत स्थान, नियत समय और नियत कार्यक्रम भी निश्चित होना चाहिए। यदि कोई अनिवार्य अपवाद अड़ जाय तो बात दूसरी है अन्यथा प्रमादवश इस निर्धारण का पालन ही करना चाहिए।
चिन्तन का व्यक्ति बनाने में सदा असफल रहेगी। कोई भी व्यक्ति एक अच्छा समाजिक निष्ठ नागरिक तभी बन सकेगा जब उसे आरंभ से नैतिक तत्वों, शाश्वत मूल्यों की जानकारी होगी। एक-सा शिक्षण ही विद्यार्थी को स्वावलम्बी, सहिष्णु, सदाचारी, संयमी, कर्तव्यपरायण, प्रमाणिक तथा परोपकारी बना सकता है। नैतिकता का अवलम्बन ही मनुष्य को सुसंस्कृत, आदर्श और चरित्रनिष्ठ नागरिक बना सकता है। ऐसे व्यक्ति स्वयं ऊँचे उठते, आगे बढ़ते हैं तथा अपनी विशिष्टता एवं वरिष्ठता के सहारे इस विश्व उद्यान को सुरभित समुन्नत रख सकते हैं।
चिन्तन में इतने लीन थे कि यही याद नहीं रहा कि वाकिंग स्टिक को बिस्तर पर रख कर उसकी जगह स्वयं कोने में खड़े हो गये हैं। बाद में गलती का बोध तब हुआ, जब उनकी पत्नी ने उन्हें यह एहसास कराया।
चिन्तनशील-विवेकशील होना चाहिए। सिद्धाँतों को व्यवहार में उपयोग करते समय सतत् चिन्तन आवश्यक है, चिन्तन-मनन के बिना कोई मनुष्य अपने लिए स्थिर नैतिक सिद्धाँतों का निर्धारण नहीं कर पाता और समाज की दिशाधारा के प्रवाह में बह जाता है। उनके अनुसार चिन्तन जीवन का सैद्धान्तिक पक्ष है। उसका व्यावहारिक पक्ष श्रेष्ठ कार्यों के रूप में परिलक्षित होता है। विचार मन्थन से जो सिद्धान्त निर्धारित हों, उनको सत्यता की कसौटी के लिए व्यावहारिक क्षेत्र में उतारना होता है।
चिन्तन की एक क्षमता और किस प्राणी को आती है? आन्तरिक उल्लास और उत्साह किसके भीतर से फूटता है? उचित अनुचित का विभेद करने वाली और औचित्य अपनाने की प्रेरणा किसके भीतर से उभरती है। यह अधिकार केवल मनुष्य को मिला है कि वह अपने भाग्य की संरचना मन चाहे ढंग से, मन चाही दिशा में कर सके। ऐसी दशा में बुद्धिमान वे ही हैं, जो अकारण असंतोष की आग में नहीं जलते और गर्व गौरव अनुभव करते हैं कि हमें मनुष्य जीवन मिला।
चिन्तन को हो क्या गया है! मेरी कल्पना अवरुद्ध क्यों हो गई? विचारणा में वह प्रवाह क्यों नहीं आ पा रहा है, जो कुछ दिन पूर्व था? बड़ी अजीब बात है! अन्तिम पद को मैं बिल्कुल सोच ही नहीं पा रहा हूँ। इसीलिए “गीत गोविन्द” की समाप्ति में विलम्ब हो रहा है और यह सोच-सोच कर मैं परेशान हो रहा हूँ।”
चिन्तन और चरित्र को सही खरा बनाए रखे, उसमें न स्वेच्छाचार स्वयं बरते और न उच्छृंखलता किसी और को बरतने दे।
चिन्तन-मनन के बिना कोई मनुष्य अपने लिए स्थिर नैतिक सिद्धाँतों का निर्धारण नहीं कर पाता और समाज की दिशाधारा के प्रवाह में बह जाता है। उनके अनुसार चिन्तन जीवन का सैद्धान्तिक पक्ष है। उसका व्यावहारिक पक्ष श्रेष्ठ कार्यों के रूप में परिलक्षित होता है। विचार मन्थन से जो सिद्धान्त निर्धारित हों, उनको सत्यता की कसौटी के लिए व्यावहारिक क्षेत्र में उतारना होता है। उच्च आदर्शों व नैतिक सिद्धाँतों का व्यवहार में आना ही नैतिक जीवन है।
चिन्तन सर्वथा एकाँगी है। नीति मर्यादा का पालन करने वाला आदर्शवादी व्यक्ति आत्मकल्याण की साधना के साथ-साथ समाज की भी भलाई करता है। वह समाज के लोगों से सहानुभूति रखता है और उन्हें अपने उत्कृष्ट विचारों एवं श्रेष्ठ व्यवहार से निरन्तर ऊँचा उठाने का प्रयास करता है।
चिन्तन करता है, तो साथ-साथ मस्तिष्क भी सोचता है या दूसरे शब्दों में कहें, तो यह कहना पड़ेगा कि वह मस्तिष्क के माध्यम से ही मनन करता है, किन्तु असत्य यह भी नहीं है कि जब मनुष्य नहीं सोचता है तब मस्तिष्क शाँत नहीं बैठा रहता कुछ न कुछ ताने-बाने बुनता रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-August
चिन्तन बन नहीं पाता और उस अधूरेपन के कारण रास्ता भी सही नहीं मिलता। अप्रसन्नता तो ऐसा मनः क्षेत्र बना देती है जिसकी उर्वरता और प्रखरता एक प्रकार से पलायन ही कर जाय और व्यक्ति समझदार सुयोग्य होते हुए भी मूर्ख जैसे आचरण करने लगे। उल्टा सोचे और उल्टा करे। ऐसी स्थिति में परिणाम का उलटा होना स्वभाविक ही है।
चिन्तन ही मस्तिष्क को असंतुलित करता और शरीर को ऐसे चित्र-विचित्र रोगों से व्यथित करता है जो चिकित्सा करते कराते भी काबू में नहीं आते।
चिन्तन, मनन से ही नहीं, भोजन के साथ घुले हुए सूक्ष्म तत्वों का सन्तुलन बनाकर मनुष्य के सोचने का तरीका भी समुन्नत किया जा सकता है। इतना ही नहीं भावनाओं को दिशा भी बदली जा सकती है। अवाँछनीय दिशा में चल रही भाव विकृति को आहार शुद्धि के माध्यम से वाँछित दिशा में मोड़ा और सुधारा जा सकता है। दुष्प्रवृत्तियों में लगे हुए दुर्भावना ग्रस्त मनुष्य के अन्तःकरण को परिष्कृत किया जा सकता है और उसकी प्रवृत्ति में, मनोवृत्ति में अभीष्ट परिवर्तन किया जा सकता है।
चिन्तन-मनन की प्रक्रिया में उथल-पुथल मचा दी है। यद्यपि इसकी शुरुआत विगत महायुद्धों के विनाशकारी दृश्यों के साथ हुई थी, जिसने मानवी अन्तराल को झकझोर कर रख दिया था। उस घटना ने लोगों को यह सोचने के लिए विवश कर दिया था कि अतिवादी भौतिक चिन्तन की क्या परिणति होती है। अब जो स्फूर्ति, चेतना और उमंग उभरी है, उसके आधार पर मनुष्य ने अपनी सामर्थ्य को पहचाना और अधिकारों को जाना है। प्राचीन रूढ़िवादी परम्पराओं, संकीर्ण विचारधाराओं के शिकंजे में वह अब अधिक दिनों तक जकड़ा नहीं रह सकता।
चिन्तन और आदर्श चरित्र से ज्ञानयोग सधता है, तो समाजसेवा में, लोक आराधना में निरत रहने से कर्मयोग। आत्मीयता के आरोपण की, प्रेम की साधना ही भक्तियोग कहलाती है। अध्यात्म क्षेत्र में प्रगति करने एवं महान उपलब्धियों से लाभान्वित होने के लिए तीनों का ही अवलम्बन लेना होगा। ईश्वरीय दिव्य अनुदानों का वास्तविक आनन्द तभी उठाया जा सकता है।
चिन्तन की सम्पदा ही छोड़ी जा सकती है। अपनो को प्रमाणिक, प्रखर प्रतिभावान बनाने पर ध्यान केन्द्रित करके सच्चे अर्थों में उक्त हित साधन करना चाहिए। बुद्धिमान अभिभावक अपनी संतान को श्रमशीलता, शिष्टता, सुव्यवस्था, मितव्ययिता, उदार सहकारिता रूपी पंचशील की शिक्षा देते हैं। उत्कृष्ट आदर्शवादिता अपनाने की प्रेरणा देते और अभ्यास कराते हैं। साथ ही यह भी ध्यान रखते है कि उत्तराधिकार में हराम का पैसा न मिले, जिसके कारण उनका व्यक्तित्व और भविष्य एक प्रकार से कुँठित होता चला जाय।
चिन्तन की सबसे बड़ी कमी रही है कि इन तीनों धाराओं को अलग-अलग समझा गया, जबकि ये सभी अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। इन्हें अलग कर देने से ही समस्यायें उठ खड़ी हुई हैं और साधकों को अध्यात्म मार्ग की महान उपलब्धियों से वंचित रहना पड़ता है। समुचित लाभ तो तीनों ही अनिवार्य पक्षों को समान रूप से अपनाने से ही मिल पाता है।
चिन्तन की क्या परिणति होती है। अब जो स्फूर्ति, चेतना और उमंग उभरी है, उसके आधार पर मनुष्य ने अपनी सामर्थ्य को पहचाना और अधिकारों को जाना है। प्राचीन रूढ़िवादी परम्पराओं, संकीर्ण विचारधाराओं के शिकंजे में वह अब अधिक दिनों तक जकड़ा नहीं रह सकता। जाग्रत आत्मचेतना ने करवट बदली है और नवीन विचारधारा को-सन्मार्ग को अपनाने और तदनुरूप नई सृष्टि की भव्य समाज की नूतन संरचना में सन्नद्ध होने की आकुलता प्रकट की है।
चिन्तन की पद्धति में भी सुधार दिखाई देने लगता है। अवचेतन अर्थात् अंतर्मन की क्षमता को विकसित किया जा सके तो समस्त बुराइयों, दुष्प्रवृत्तियों पर सरलतापूर्वक विजय पाई जा सकती है। प्रगति के प्रतिभा-उन्नयन के जीवन द्वार-खुल सकते हैं।
चिन्तन की विकृति को आसानी से दूर करके सद्विचारों का बीजारोपण कर सकना संभव है।
चिन्तन और चरित्र मानवी गरिमा के अनुरूप है, यह कम संतोष की बात नहीं है फिर समाज के, ईश्वर के जो उपकार अपने ऊपर हैं, उन्हें एक-एक करके गिना जाय तो प्रतीत होगा कि उपलब्धि सौभाग्य सुयोग भी कम मूल्यवान नहीं है; अपनी असफलताओं की गणना छोड़कर यदि प्राप्त हुई सफलताओं पर दृष्टि डाली जाय तो प्रतीत होगा कि प्रगति की दिशा में अपने कदम कम नहीं उठे हैं।
चिन्तन करते रहा जाय तो उसकी धड़कनों में व्यतिक्रम उत्पन्न होता है। चिन्तातुर व्यक्ति को ‘नर्वस डिस्पेप्सिया’ यानी अपच की शिकायत प्रायः बनी ही रहती है। मस्तिष्क के चेतना प्रवाह, अवचेतन मन की गरिमा पर जब विचार किया जाता है तो प्रतीत होता है कि जीवन का अस्तित्व स्वरूप और भविष्य भी उसी केन्द्र के साथ जुड़ा हुआ है। स्व-संकेत, आत्म-सुझाव एवं आत्म सुधार की क्षमताओं का प्रयोग इसी क्षेत्र में बन पड़ता है। विचार प्रवाह में क्रमबद्धता का उपक्रम बिठाकर इस पर नियंत्रण साधा जा सकता है।
चिन्तन पद्धति भी अपनानी पड़ती है। मैस्लो ने परमार्थ परायण महान पुरुषों के चिंतन एवं दृष्टिकोण का मनःशास्त्र के आधार पर विश्लेषण किया है। उन्होंने उस आधार पर जो निष्कर्ष निकाले हैं, वे अति उपयोगी तथा हर व्यक्ति का मार्ग दर्शन करने में सक्षम हैं।
चिन्तन का निष्कर्ष दिया है। ‘सामान्य लोगों की तुलना में महामानवों का अधिक प्रसन्नचित्त एवं प्रफुल्लित रहना उनको संतुलित एवं परिष्कृत दृष्टिकोण का परिणाम है। ऐसे व्यक्ति वास्तविक अवास्तविक में विभेद करने तथा औचित्य को ग्रहण करने में परिपूर्ण सक्षमता रखते हैं। ऐसी समर्थ ग्राह्य क्षमता उनमें हर क्षेत्र में विद्यमान होती है।
चिन्तन यह सभी सूक्ष्म शरीर की विकृतियाँ है। जिनका स्थूल शरीर पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार परिष्कृत दृष्टिकोण, स्वस्थ उदात्त चिन्तन, आदर्शवादी विचारधारा सूक्ष्म शरीर को तेजस्वी प्रखर बनाती हैं और उसका श्रेष्ठ प्रभाव स्थूल शरीर पर भी स्पष्ट देखा जा सकता है।
चिन्तन एवं दृष्टिकोण ही होता है।
चिन्तन, आदर्शवादी विचारधारा सूक्ष्म शरीर को तेजस्वी प्रखर बनाती हैं और उसका श्रेष्ठ प्रभाव स्थूल शरीर पर भी स्पष्ट देखा जा सकता है।
चिन्तन-अस्वस्थ भावनायें विभिन्न शारीरिक रोगों का कारण बनती हैं। देखा गया है कि कोई मानसिक कष्ट होने पर सारा शरीर शिथिल हो जाता है और क्रियाशक्ति में स्पष्टतः अस्तव्यस्तता दीखने लगती है। भय, चिन्ता शोक, निराशा जैसे प्रसंगों पर किसी भी मनुष्य का चेहरा उदास और सारा शरीर शिथिल देखा जा सकता है। क्रोध, अपमान, द्वेष, प्रतिशोध की स्थिति में किस प्रकार अंग-प्रत्यंगों में उत्तेजना दीख जाती है, इसे किसी आवेश ग्रस्त पर छाये हुए भावोन्माद को देखकर सहज ही देखा-समझा जा सकता है। प्रसन्न और निश्चिन्त रहने वाले स्वस्थ रहते और दीर्घजीवी बनते हैं।
चिन्तन और चरित्र उत्कृष्ट स्तर का हो। व्यवहार में उदार-सज्जनता का गहरा पुट लगा हुआ हो। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए अपराधियों को दण्ड देना भी आता हो। यह व्यक्ति और समाज के हित में है। उद्दण्डता पर नियन्त्रण करने के लिए प्रताड़ना की भी आवश्यकता है।
चिन्तन एवं क्रियाकलाप का स्तर गिरने न पाये। प्रज्ञायोग की छः भागों में विभक्त कृत्य साधना का निर्धारण तो स्पष्ट ही है पर उसकी साधना, सुसंस्कारिता की जीवन साधना और लोकमंगल की परमार्थ साधना को भी एक पक्ष माना जाना चाहिए। इसे आराधना की संज्ञा देनी चाहिए। तभी आत्मिक प्रगति का त्रिवेणी संगम बन पड़ता है।
चिन्तन चल पड़ने से न अपने लिए बुढ़ापा भारभूत होता और न समाज के लिए।
चिन्तन करने से ऊँचा उठने, आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-March
चिन्तन ऐसा होता है, परिस्थितियों के साथ कोई तालमेल नहीं बैठता। कई पिछली घटनाओं का स्मरण करते रहते हैं। जो बीत गया उसे ताजा करके गड़े मुर्दे उखाड़ने की कहावत चरितार्थ करते रहते हैं। कुछ की आदत भविष्य के सपने देखने की होती है, वे मात्र सुखद कल्पनाओं में डूबे रहते हैं और सहज सफलताओं के उपलब्ध होने की कल्पना करते रहते हैं। कइयों का चिन्तन इसके प्रतिकूल होता है।
चिन्तन पद्धति को ही आज के संकट के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं कि चिन्तन की संकीर्णता जहाँ व्यक्ति के दायरे को स्वयं तक, सम्प्रदाय अथवा जाति तक सीमित कर देती है, वही उसकी अधोमुखता हिंसा, क्रोध एवं प्रतिशोध जैसी प्रवृत्तियों को जन्म देती है। इस संकट से उबरने का वे एक ही विकल्प सुझाते हैं- चिन्तन का परिष्कार और उदात्तीकरण।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में मनुष्य कहीं अधिक गई गुजरी दयनीय स्थिति में पहुँच गया है। ऐसे लोग खोजे और देखें नहीं जा रहे हैं जो उचित को ही स्वीकार करें और अनुचित को अस्वीकार करके अपनी आस्था को आदर्शों के प्रति सुनिश्चित सिद्ध करें। ऐसे लोग दूसरों को पतन पराभव के गर्त में गिराने से बचा सकते हैं। पर जब नाविकों का ही कहीं अता पता नहीं तो पार उतारने की सुविधा जन साधारण को कैसे मिले?
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाकर एक प्रकार से आत्मिक कायाकल्प की दिशा में कटिबद्ध और अग्रसर होता है।
चिन्तन की संकीर्णता जहाँ व्यक्ति के दायरे को स्वयं तक, सम्प्रदाय अथवा जाति तक सीमित कर देती है, वही उसकी अधोमुखता हिंसा, क्रोध एवं प्रतिशोध जैसी प्रवृत्तियों को जन्म देती है। इस संकट से उबरने का वे एक ही विकल्प सुझाते हैं- चिन्तन का परिष्कार और उदात्तीकरण।
चिन्तन में अवाँछनीयताओं का घुस पड़ना। तत्वज्ञान से जनमानस को प्रखर बनाये रहने वाला आधार घटते-घटते समाप्तप्राय हो गया। जो बहुमत का क्रियाकलाप है उसी का अनुकरण करने के लिए जनसाधारण का मानस बनता है। अनुकरण प्रियता मनुष्य की स्वाभाविक रुचि एवं प्रवृत्ति है। बच्चे इसी आधार पर बोलना, सोचना, करना सीखते हैं।
चिन्तन क्षेत्र की भ्रष्टता घटाटोप की तरह छाई दिखती है। लोगों का सोचने का तरीका संकीर्ण स्वार्थपरता से बुरी तरह जकड़ गया है। लोभ और अहंकार की तृप्ति के अतिरिक्त और किसी को कुछ सूझता नहीं।
चिन्तन, पेट और प्रजनन के इर्द-गिर्द घूमा करता है एवं इसके लिए ऐसे व्यक्ति कुछ भी नीति-अनीति का आचरण करने के लिए सदा तत्पर रहते हैं। फलतः निरन्तर दुःखी, चिन्तित और शोकपूर्ण जीवन बिताते हैं। हमेशा कार्य में लगे रहने पर भी कोई महत्वपूर्ण लक्ष्य भेद नहीं कर पाते। अस्त-व्यस्त एवं अदूरदर्शितापूर्वक कार्य करने वाले भी इसी वर्ग में आते हैं।
चिन्तन पर चित्त एकाग्र करने में असमर्थ हो जाता है। इस प्रकार के विचारों में निमग्न विद्यार्थी अक्सर परीक्षा में फेल होते रहते हैं। पाठ्यक्रम पर पाठ्य पुस्तकों पर चित्त एकाग्र ही नहीं होता। कुकल्पनायें उसे उड़ाये-उड़ाये फिरती हैं। फलतः वे योजनायें पीछे हट जाती हैं, जिन पर योजनाबद्ध ध्यान दिए जाने की आवश्यकता थी।
चिन्तन में व्यतीत करता है, किन्तु उसके भावों का विकास नहीं हो पाता। यही कारण है कि सामान्य से अप्रिय घटनाओं के उपस्थित हो जाने पर भी वे उद्विग्न हो उठते हैं। इसका कारण यह है कि अधिक विचार भावों का दमन करते हैं, जिससे वे अविकसित रह जाते हैं और समय-समय पर असामान्य व्यवहारों के रूप में प्रकट होते हैं। इसी तरह भावों की दुनिया में विचरण करने वाले-कपोल कल्पनाओं में निरत व्यक्ति विचारों की दृष्टि से बौने रह जाते हैं। इनमें अन्धविश्वास, रूढ़िवादिता अधिक पाई जाती है तथा दूरदर्शिता का अभाव होता है।
चिन्तन को परिष्कृत कर स्वयं को दुर्गुण मुक्त नहीं कर लेता तब तक न तो वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी है और न वर्तमान दुर्गति से बच सकता है। इसी का अनुमोदन करते हुए डब्ल्यू. एच. थ्रोप अपने ग्रन्थ “एनीमल नेचर एंड ह्यूमन नेचर” में प्रसिद्ध जन्तु शास्त्री डॉ. कोनार्ड लोरेन्ज की पुस्तक “ऑन एग्रेसन” पर समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि मनुष्य का जो मूलतः हिंसक एवं क्रोधी स्वभाव का मानते हैं, वह वस्तुतः भूल करते है। यह मनुष्य के विकार हैं, न की मूल प्रवृत्ति इन्हें दूर कर वह, वह सब कुछ बन सकता है, जिसे महान, विलक्षण, अद्भुत, अलौकिक कहा गया है।
चिन्तन चरित्र एवं व्यवहार में उत्कृष्टता अथवा निकृष्टता का चयन कर स्वयं को उठाता अथवा गिराता है। इसी को महर्षि पाताँजलि चित की विभिन्न भूमियाँ कहते हैं एवं इन्हें क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्रता, निरुद्ध के नाम से पुकारते हैं।
चिन्तन के आधार पर परिष्कृत करना, स्वाध्याय, सत्संग से सन्मार्गगामी बनाया जाना चाहिए, वहाँ यह भी आवश्यक है कि उसके लिए आहार-विहार की ऐसी व्यवस्था बनाई जाय जिससे वह स्वयं उच्छृंखलता छोड़कर शालीनता को स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाय इस तथ्य को भारतीय तत्वदर्शियों ने बहुत पहले ही जान लिया था कि मन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष दिलाने वाली सभी शक्तियाँ भरी पड़ी हैं, उसकी सात्विक और विधेयक शक्ति का ज्ञान होने के कारण ही ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि “मेरा मन शिव संकल्प वाला हो।”
चिन्तन और प्रयास को जानना तब और भी अधिक कठिन पड़ता है जब आदर्शवादी आदर्श जीवन्त जाग्रत स्थिति में अपना उदाहरण प्रस्तुत न कर पा रहे हों। तब आदर्शवादी शिक्षा की कथा-वार्ता कह कर उपहास में डाल दिया जाता है, जो उचित, व्यावहारिक शाक्य है उसे प्रत्यक्ष प्रयास के रूप में जीवन्त भी तो होना चाहिए। भले ही आदर्शवादी व्यक्तित्व की संख्या अल्पमत में ही क्यों न हो।
चिन्तन के बोझ के कारण मन अपनी विलक्षणता को धीरे-धीरे गँवाता चला जाता है। इस प्रकार मनुष्य की चिंतन प्रक्रिया जनित विभिन्न सूक्ष्म संस्कार जमा होते रहते हैं और अचेतन मन का निर्माण करते हैं। यदि उनका स्तर निकृष्ट हुआ तो तदनुरूप व्यक्तित्त्व भी बनेगा और मन में भी विक्षोभ पैदा करेगा।
चिन्तनकोष “द बेस ऑफ इण्डियन लाइफ” के अनुसार निर्माण के प्रारम्भिक दौर में विचारक, शिक्षक, लोकसेवी यहाँ तक कि व्यवस्थापक, प्रशासक तक के सारे दायित्व एक को ही निभाने पड़े। ए. जोली. अपने शोध निबन्ध “द ओरिजन ऑफ सोसाइटी” में इसी मत का समर्थन करते हैं। मेसोपोटामिया, सुमेर, मिश्र आदि प्रागैतिहासिक समाजों का हवाला देते हुए उनका कहना है कि मनुष्यता के उदय के साथ शिक्षक का उदय हुआ जो अपने समूह में सर्वोपरि था। उसी के मार्गदर्शन में समाज का ढाँचा बना गढ़ा। भारत के आदि शिक्षक प्रशासक विचारक मनु महाराज थे।
चिन्तन, चरित्र व्यवहार को देखकर की जाती है। विचारणा, भावना एवं क्रिया-कलापों को देखकर ही उसके वास्तविक स्वरूप को जाना जाता है। मन में उठी विचारणायें ही बाह्य क्रिया-कलापों के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं तथा उन कर्तृत्वों के आधार पर व्यक्तित्व का सही मूल्याँकन होता है।
चिन्तन चरित्र एवं व्यवहार में ऐसी उत्कृष्टता ले आते हैं, जिनका अनुकरण कर परिकर में रहने वाले अन्यान्य लोग लाभान्वित होते हैं। भौतिक प्रगति का श्रेय भी इन्हें ही मिलता है। सूझ बूझ के धनी एक साथ अनेकों पक्षों पर दृष्टि रख सकने की क्षमता होने के कारण व्यवस्थापक एवं शासनाध्यक्ष भी कहलाते हैं। कलाकारों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों का वह वर्ग भी इनके अंतर्गत आता है जो लोकमंगल के लिए ही अपनी प्रतिभाओं का सदुपयोग करते हैं। इस प्रकार के मनीषी वैज्ञानिक, साधू, सज्जन, सेवाभावी लोग नगण्य से साधनों से सदाशयता की रीति-नीति अपनाते हुए,हँसता-हँसाता जीवन जी लेते हैं।
चिन्तन व समाज को ऊंचा उठाने वाले सत्कर्म। संधि वेला में ऐसे अनेक नव ब्राह्मण उभरकर आएँगे। जाति, वंश के भेद से परे इन महामानवों की जीवनचर्या परमार्थ पारायण होगी। सतयुग की वापसी तब ही तो होगी।
चिन्तन-चेतना में समाये इस प्रकार के दुर्गुण ही आज के संकट और मनुष्य के अस्तित्व के लिए प्रश्न-चिन्ह बन कर अड़े हुए हैं। जब तक वह अपने चिन्तन को परिष्कृत कर स्वयं को दुर्गुण मुक्त नहीं कर लेता तब तक न तो वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी है और न वर्तमान दुर्गति से बच सकता है। इसी का अनुमोदन करते हुए डब्ल्यू. एच. थ्रोप अपने ग्रन्थ “एनीमल नेचर एंड ह्यूमन नेचर” में प्रसिद्ध जन्तु शास्त्री डॉ. कोनार्ड लोरेन्ज की पुस्तक “ऑन एग्रेसन” पर समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि मनुष्य का जो मूलतः हिंसक एवं क्रोधी स्वभाव का मानते हैं, वह वस्तुतः भूल करते है। यह मनुष्य के विकार हैं, न की मूल प्रवृत्ति इन्हें दूर कर वह, वह सब कुछ बन सकता है, जिसे महान, विलक्षण, अद्भुत, अलौकिक कहा गया है।
चिन्तन का परिष्कार और उदात्तीकरण।
चिन्तन इसके प्रतिकूल होता है। वे अनिष्ट की आशंका का भयावह चित्र खड़ा करते हैं। उन्हें लगता है मानो कोई विपत्ति का पहाड़ सिर पर टूटने वाला है। किसी व्यक्ति के द्वारा कष्ट या हानि पहुँचाये जाने की कुकल्पना उमड़ती घुमड़ती रहती है। यह विचार प्रक्रिया होती तो काल्पनिक है, पर उसकी प्रतिक्रिया समूचे मनः क्षेत्र को हड़बड़ा देती है।
चिन्तन आदि सामान्य दैनिक कार्यों से वह औचित्य और मनुष्यत्व को बनाये रखता है। फलस्वरूप यही रोजमर्रा के काम एक प्रकार से योग साधना बन जाते हैं। इसका प्रभाव मानसिक स्थिति पर पड़ता है। यह विहार क्रम जिसे सात्विक मिला है, उसका मन न कुमार्गगामी होगा न उच्छृंखल, वह उद्धत आचरण नहीं करता। जानता है कि मेरा अस्तित्व सेवा करना है, मुझे सेवक के रूप में बनाया गया है,मेरा कर्तव्य आत्मा की सहायता करना है।
चिन्तन की दिशा को सदैव सृजनात्मक बनाए रखें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-November
चिन्तन व्यवहार में भले ही न उतर पाया हो, अर्थदर्शन के रूप में पूरी तरह लोक समर्थन प्राप्त कर रहा है। उस मान्यता के अनुरूप अधिक संग्रही, अधिक विलासी-अपव्ययी लोग नीतिवान नहीं समझे जाते।
चिन्तन ही है जो अपने प्रेरणा-प्रवाह के सातत्य से इसे जीवन्त बनाता है।
चिन्तन एवं प्रयास में जो सुरक्षात्मक दीवार बनानी पड़ती है, वह सफल भी एक सीमा तक ही होती है, साथ ही अनेकों अन्तर्द्वन्द्व उत्पन्न करने के कारण महंगी बहुत पड़ती है। यह कठिनाई उत्कृष्टता की पक्षधर सज्जनता अपनाने में तनिक भी नहीं आती।
चिन्तन परिक्षेत्र बंजर हो जाने के कारण कार्य भी नागफनी, बबूल जैसे हो रहे हैं। इनसे मानवता का कष्ट पीड़ित होना स्वाभाविक ही है। स्थिति का मूल्याँकन करते हुए आध्यात्मविदों ने इसे “आस्था संकट” का नाम दिया है। उद्योग विज्ञान एवं तर्कवाद की विकृति ने मानव मन से श्रेष्ठता का मूलोच्छेद करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। फलतः पशु प्रवृत्तियाँ, संचित कुसंस्कार भी भड़के हैं और समूची मानव जाति को स्वार्थान्धता की विडम्बना ग्रसित करती चली जा रही है।
चिन्तन एवं श्रेष्ठ आचरण वाले प्रबुद्ध जन इस क्षेत्र में उतरेंगे तभी धर्म तन्त्र को परिमार्जित, परिशोधित, नवनिर्धारित कर धार्मिक नीतिमत्ता के प्रति आस्था की ज्योति जगाए रखी जा सकती है। यह ज्योति ही मानवीय अन्तःकरण को आनन्दित, पुलकित, प्रफुल्लित रख कर प्रगति पथ पर बढ़ते रहने का पाथेय जुटाती रह सकेगी।
चिन्तन दोनों ही गड़बड़ा लेते हैं। उनका व्यक्तित्व दो कौड़ी का बनकर रहता है।
चिन्तन की नई दिशा दी है और कहा है कि आग्रह व दुराग्रह पर न अड़ा जाय एवं समय, परिस्थिति व स्थिति के आधार पर जो औचित्यपूर्ण लगे, उसे अपना लिया जाय, क्योंकि सभी मान्यताएँ आँशिक सत्य होती हैं, उनकी उपयोगिता एक स्थिति में बहुत अधिक हो सकती है, किन्तु दूसरी स्थिति में उसे निरर्थक भी ठहराया जा सकता है। इसमें किसी प्रकार का मानापमान, हार-जीत का विचार नहीं बना लेना चाहिए, अपितु यह माना जाना चाहिए कि हम सभी पूर्ण सत्य की दिशा में खोज करते हुए क्रमशः आगे बढ़ रहे हैं। सभी अपूर्ण हैं, पूर्ण तो केवल ईश्वर है। ऐसी दशा में हम पूर्ण और हमारी मान्यता पूर्ण यह अड़ियल रुख अपना लेने से सत्यान्वेषण की दिशा में हमारी प्रगति ही अवरुद्ध हो जायेगी और हम प्रतिगामिता के पक्षधर बन कर रह जायेंगे, यहाँ सापेक्षवाद हमारी सहायता और जड़ता से रक्षा कर सकता है। सापेक्षवाद का अँगुली-निर्देश सत्यान्वेषी-तथ्यान्वेषी होने के लिए जन-चेतना को सहमत करना है।
चिन्तन की उत्कृष्टता हो। क्रिया-कलाप मूल्यवान अवश्य हैं किन्तु उसके पीछे लगे चिन्तन के महत्व को भी अस्वीकार नहीं जा सकता। करने के महत्व का आधार वह अव्यक्त चिन्तन ही है जो अपने प्रेरणा-प्रवाह के सातत्य से इसे जीवन्त बनाता है।
चिन्तन तुणीर से अगला बाण निकालकर सन्धान किया, तब फिर आपका कथन यह होना चाहिए कि उक्त अपराध करने पर ब्राह्मण नरक नहीं जाएँगे, पतित नहीं होंगे, जबकि दुष्कर्म करने पर अन्य वर्ग पतित समझे जाते हैं।
चिन्तन-धारा में बहे चले जा रहे थे। अनिष्ट की आशंका से रह-रह कर उनका हृदय काँप उठता। अन्ततः खेत आ पहुँचा। मशाल की रोशनी में सभी ने उन्हें ढूँढ़ना प्रारंभ किया
चिन्तन के महत्व को भी अस्वीकार नहीं जा सकता। करने के महत्व का आधार वह अव्यक्त चिन्तन ही है जो अपने प्रेरणा-प्रवाह के सातत्य से इसे जीवन्त बनाता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में अधिकाधिक शालीनता का समावेश किया गया या नहीं। अंतरंग एवं बहिरंग प्रामाणिकता एवं प्रखरता से भरा पूरा है या नहीं। अगले दिनों व्यक्तित्व की यही परिभाषा बनने वाली है। सज्जनता, सद्भावना, श्रमशीलता, मितव्ययिता स्वच्छता, सहकारिता, अनुशासन-प्रियता जैसे सद्गुणों को धारण करने वाले ही अपने व्यक्तित्व को प्रखर एवं तेजस्वी बना पाते हैं। उन्हीं की कृति युगों-युगों तक अमर रहती है।
चिन्तन की दृष्टि से बहुत ऊँची स्थिति में रह रहा हो। व्यक्ति की गरिमा का आकलन मात्र उसकी आँतरिक आस्थाओं को देखकर ही किया जा सकता है। नीयत सच्ची ऊँची रहने पर यदि व्यवहार में भूल अथवा भ्रम से कोई ऐसा काम बन पड़े जो देखने वालों को भला न लगे तो भी यथार्थता जहाँ की तहाँ होगी। व्यवस्था में गड़बड़ फैलाने के कारण उसे दण्डित तो अवश्य किया जा सकता है। किन्तु इतने पर भी उसकी उत्कृष्टता अक्षुण्ण बनी रहेगी।
चिन्तन करते हुए उसे दृढ़ से दृढ़तर बनाते रहना होगा। साधना पथ पर धीरे-धीरे परिस्थिति से सामंजस्य करते हुए चलना होगा। सहसा कोई बड़ा कदम उठा लेना उचित न होगा।
चिन्तन क्षेत्र में व्यापक श्रेष्ठता के तत्व की प्रतिष्ठापना के साथ कार्यों में इसकी बाह्याभिव्यक्ति का उत्कट प्रयास करना होगा।
चिन्तन तन्त्र के लिए यह कठिन पड़ता है कि वह सत्य और तथ्य को ठीक तरह समझ सके और उचित अनुचित का भेद कर सके। अभ्यस्त मान्यताओं के प्रति एक तरह की कट्टरता जुड़ जाती है। उसे अच्छा सिद्ध करने के लिए परम्पराओं के निर्वाह की दुहाई दी जाती है। उसका समर्थन धर्मशास्त्र आप्तवचन, आदि अनेकों तरह से किया जाता है। कई बार तो उसे ईश्वर का आदेश तक घोषित कर दिया जाता है।
चिन्तन के आधार पर ज्ञानयोग की साधना की जाती है और ब्रह्म दर्शन का लाभ मिलता है। पूजा उपासना का विधि-विधान भक्तियोग के अंतर्गत आता है। भक्ति ईश्वर की ही की जाती है। इसलिए सर्वत्र “ईश्वर भक्ति” शब्द ही प्रयोग में आता है। अपनी भुलक्कड़ चेतना को झकझोरने और उसे विकासोन्मुख बनाकर मनोकामना पूर्ति का वरदान दे सकने योग्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
चिन्तन में व्याप्त विकृति को दूर किया जा सके। चिन्तन परिक्षेत्र बंजर हो जाने के कारण कार्य भी नागफनी, बबूल जैसे हो रहे हैं। इनसे मानवता का कष्ट पीड़ित होना स्वाभाविक ही है। स्थिति का मूल्याँकन करते हुए आध्यात्मविदों ने इसे “आस्था संकट” का नाम दिया है। उद्योग विज्ञान एवं तर्कवाद की विकृति ने मानव मन से श्रेष्ठता का मूलोच्छेद करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।
चिन्तन एवं क्रिया की संरचना तथा कार्य विधि को ढाला जाता है। किन्तु हुआ यह कि महापुरुषों के वचनों आर्ष ग्रंथों के प्रतिपादनों की अपने-अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार चित्र विचित्र व्याख्याएँ की गई। फलतः स्वयं की भी आस्थाओं का परिष्कार परिमार्जन न हो सका और लोक मानस भी भ्रम में पड़ा।
चिन्तन परिक्षेत्र में गहरी जमी होने के कारण अदृश्य होती हैं। दीख पड़ने वाला कार्य तने और टहनियों के सदृश है। इसके परिणाम ही वह फूल-फल हैं जो उद्देश्यों का स्वरूप अभिव्यक्त करते हैं।
चिन्तन-शृंखला टूटी। वे जैसे सोये-से जगे। सम्बोधन आरुणि का था। वे कह रहे थे कि इस खुशी के अवसर पर आपके हृदय में कौन-सा शूल चुभ रहा है, जिसके कारण इतने गंभीर हो उठे हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-January
चिन्तन-चेतना व विचारणाओं में से ऐसे परिवर्तन लाकर अपने जीवन के क्रियाकलापों एवं गतिविधियों को बदला, जो प्रकृति प्रकोप के आधारभूत कारण बनते थे। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि इसके पीछे भी विचार-क्रान्ति की ही सक्रिय भूमिका थी।
चिन्तन की कड़ियों को बटोरने की कोशिश करते हुए बुदबुदाई-अभी तक नहीं आए-बारह से ऊपर तो हो गया।
चिन्तन का तात्पर्य है भूतकाल की भूलों को सुधारना और वर्तमान की सार्थकता पर कड़ी नजर रखना। मनन कहते हैं- भावों योजनाओं का निर्धारण और उन्हें पूरा करने के लिए योजनाबद्ध क्रिया -कलाप का निर्धारण। यह चिन्तन-मनन थोड़ा समय हर दिन निकाल कर करते रहना चाहिए, ताकि संयम साधना में कहीं चूक न होने पावे। इसे साप्ताहिक रूप में तो विशेष तत्परतापूर्वक अपनाया जाना चाहिए। इसे अध्यात्मवादी जीवन का प्रारंभिक पाठ समझा जाना चाहिए।
चिन्तन-मनन थोड़ा समय हर दिन निकाल कर करते रहना चाहिए, ताकि संयम साधना में कहीं चूक न होने पावे। इसे साप्ताहिक रूप में तो विशेष तत्परतापूर्वक अपनाया जाना चाहिए। इसे अध्यात्मवादी जीवन का प्रारंभिक पाठ समझा जाना चाहिए।
चिन्तन। बिना किसी आशा अपेक्षा के इनके हित में लगे रहना। प्रेम भाव है, दिव्य भाव, मनुष्य में विकसित देवत्व है यह। जिस किसी भाव का स्वयं को विकास होता है, बाह्य जगत से उसी का प्रतिपादन मिलता है। जिसने अपने अन्दर घृणा पनपाई है, उसे बदले में घृणा के सिवा और कुछ न मिलेगा।
चिन्तन और आदर्शवादी कर्त्तव्य अपनाकर चलने वाले जीवन क्रम में ईश्वरीय उपासना की दिव्य उपलब्धियाँ अधिक अच्छी तरह हो सकती हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म। दूसरे जन्म से तात्पर्य है पशु प्रवृत्तियों से जकड़े हुए सामान्य प्राणि जीवन से ऊँचा उठकर मानवी उत्तरदायित्वों की विशिष्टता भरी भूमिका को अपनाया जाना। नर पशु की रीति-नीति छोड़ कर देव जीवन की महानता अपनाया जाना। इसके लिए व्रत लेना पड़ता है कि वासना-तृष्णा की क्षुद्रता में कृमि कीटकों की तरह निरत नहीं रहा जायगा, वरन् मानवी उत्कृष्टता को जीवनक्रम में ओत-प्रोत करते हुए उच्चस्तरीय सिद्धान्तों को अपनाकर चला जायगा।
चिन्तन करें व उस ऋण से मुक्त होने का प्रयास करें जो हम पर चढ़ा है। समर्पण यदि सही अर्थों में गुरु सत्ता को किया है तो लेना ही नहीं, देना भी सीखें। हम सब विभूति सम्पन्न हैं। श्रमनिष्ठा बुद्धिमत्ता, संपन्नता, समर्थता, कौशल अनेकानेक रूपों में हमारे पास रत्नों के भण्डागार हैं। यदि हम सच्चे मायने में अनुदानों का ऋण चुकाना चाहते हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार का परिशोधन करना पड़ता है। दुष्प्रवृत्तियों से कुसंस्कारों से छुटकारा पाना ही सच्चे अर्थों में ‘मुक्ति’ है। दृष्टिकोण परिष्कृत होना मान्यताओं में आदर्शों के प्रति प्रगाढ़ आस्थाओं का समावेश होना यही है ‘स्वर्ग’ का संवेदनशील अनुभव। जिसे मानवी गरिमा को हृदयंगम करने वाले प्रस्तुत जीवन काल में ही अपने इर्द-गिर्द लहराता देखते हैं। उसके लिए काल्पनिक सुरलोक में पहुँचने की किसी को प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।
चिन्तन कोश में कहता है - मनुष्य सेतु है पशु और देवता के बीच का। इस सेतु को पार करने का शुल्क है विषाद। इससे जूझकर इससे उबरा जा सकता है। पलायन करने वाले फिर पशुता के कुएँ में जा गिरेंगे। आज का आदमी विषादग्रस्तता से उबरने की तकनीक भुला कर पशुता की ओर मुड़ चला है।
चिन्तन में ऐसी प्रगाढ़ निष्ठ भरी थी कि गाँधी के नाम से लहर आती थी और उत्तर दक्षिण में एक विकट तूफान सा उठ पड़ता था। वह शक्ति गाँधी की नहीं थी, जनता की भी नहीं थी। संपूर्ण क्रान्ति की बीज वह “राम-नाम” था जो हर वक्त गाँधी की जबान पर रहता था, उसके हृदय में गूँजता रहता था।
चिन्तन और भावना को उपासना के माध्यम से संवेदनशील बनाया जाता है। साधना में शालीनता और सुसंस्कारिता की अवधारणा है। चरित्र निष्ठा भी इसी को कहते हैं। आराधना में परमार्थ परायणता अपनाने, सेवा साधना में संलग्न होने, उदारता अपनाने से लोक मंगल के कृत्य तथा समय बन पड़ते रहा करते हैं। तीनों का सम्मिश्रण गंगा, यमुना, सरस्वती के मिलने पर तीर्थराज त्रिवेणी संगम जैसा आधार बन पड़ता है।
चिन्तन क्षेत्र को पतन से उबार कर परिपक्व बनाया जा सका तो वह सब कुछ स्वतः होने लगेगा जिसे इक्कीसवीं सदी बनाम सतयुग बनाम उज्ज्वल भविष्य के रूप में पूज्य गुरुदेव बता गए हैं। उन्हीं की चेतना तो चारों ओर सक्रिय हो वह सब करा रही है जो परिवर्तन का पूर्वार्ध है।
चिन्तन करते ही गति और ऊर्जा का तारतम्य उसके साथ जुड़ा हुआ स्पष्ट होता है। इन्हीं की हमें प्रधानतया समर्थ जीवन के लिए आवश्यकता भी है। बुद्धिमत्ता को भी ज्ञान रूपी प्रकाश में गिना जाता है। यह सारी विशेषताएँ सूर्य में सन्निहित मानी जाती हैं।
चिन्तन, दिया आपने॥
चिन्तन सतत् चला रहा तो समष्टि में संव्याप्त परब्रह्म के विश्व उद्यान को सुरम्य बनाये रखने में कोई कसर हम छोड़ेंगे नहीं।
चिन्तन में जितना समय मन भटकता है, समझना चाहिए कि मानसिक स्तर के ब्रह्मचर्य का उतना ही अधिक क्षरण हो रहा है। नर को नारी के प्रति और नारी को नर के प्रति मित्र-सहयोगी की समतापरक भावनाएँ रखनी चाहिए। इसमें माता-पुत्र का, भाई-बहिन का, पिता-पुत्री का मानसिक सम्बन्ध स्थापित करना पड़ता है। नारी में पवित्रता के तत्व अधिक हैं। इसलिए उन्हें देवी के रूप में भी देखा जा सकता है।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार में उतर जाता है। तब दैवी शक्तियाँ अनायास ही उसके समीप खिंचती चली आती हैं। चुम्बक इर्द-गिर्द बिखरे हुए लोह खण्डों को खींचकर अपने साथ चिपका लेता है। महान व्यक्तित्व भी अपने में उच्चस्तरीय सद्गुणों को धारण करते हैं। सद्ज्ञान और सत्कर्म को अपनी जीवनचर्या का अविच्छिन्न अंग बनाते हैं।
चिन्तन, मनन यह चार मानसिक संयम हैं। इनके लिए साप्ताहिक उपवास के दिन न्यूनतम दो घण्टे नियत रखने की व्यवस्था करनी चाहिए। कौन सा समय किसे सुविधा-जनक पड़ता है, यह देखना व्यक्ति विशेष का काम है। प्रातःकाल सुविधा न रहती हों, तो कोई अन्य समय चुना जा सकता है। एकान्त स्थान घर में भी हो सकता है और बाहर खेत, पार्क उद्यान आदि में भी हो सकता है।
चिन्तन व निर्धारणों को दृश्य, श्रव्य माध्यमों से उन तक पहुँचा भर देना होगा। मनोभूमि तो पहले ही बन चुकी है। समाज रूपांतरण को कृतसंकल्प है। यह परिवर्तन, उतार-चढ़ाव उसी अकुलाहट के तो चिन्ह हैं। यदि चिन्तन क्षेत्र को पतन से उबार कर परिपक्व बनाया जा सका तो वह सब कुछ स्वतः होने लगेगा जिसे इक्कीसवीं सदी बनाम सतयुग बनाम उज्ज्वल भविष्य के रूप में पूज्य गुरुदेव बता गए हैं।
चिन्तन कड़ियों को जैसे एक बारगी बिखरा दिया। लम्बी उसांस भर कर उसने एक क्षीण दृष्टि निक्षेप सामने जल रही अँगीठी पर किया। अंगारों की धधकन को राख अपने आवरण में ढ़कने लगी थी। ऊष्मा-ऊर्जा पूरी तरह चुकती इसके पहले वह उठी। उठकर कुछ कोयले लाकर अँगीठी में डाले।
चिन्तन को न भटकने देना। ऐषणाओं, महत्वकाँक्षाओं में मन को न उलझने देना। विचार शक्ति को रचनात्मक योजनाओं में नियोजित किये रहना। विचार ही वे बीज हैं, जो उगने पर अपने स्तर के अनुरूप ही भविष्य का निर्माण करते हैं। महामानवों ने अपने विचारों को दिशा दी है और आदर्शों से प्रेरणा ली है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-February
चिन्तन और जीवन की राह बनेगा। भावी मानवता का आधार भूत जीवन दर्शन बनेगा कवीन्द्र रवीन्द्र ने प्रसन्नता व्यक्त कर अपनी सहमति की मोहर लगा दी।
चिन्तन की शैली समझाने लगे। सिर की ग्रन्थि विशेष से यदि एक तोला रस निकाल लिया जाय तो संसार के बड़े से बड़े विद्वान की सब विद्या विस्मृत हो जाएगी। दिमाग के स्नायु विशेष पर एक चोट पड़ जाय तो बुद्धि का पता भी नहीं रह जाएगा।’
चिन्तन चेतना और भावना में तनिक परिवर्तन करने, उन्हें उच्चस्तरीय बनाने की आवश्यकता है। ऐसा बन पड़ने पर यह संभव है अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर वे लिखते हैं।
चिन्तन आकाश में पूर्ववत मंडरा रहे थे ।
चिन्तनशील मस्तिष्क की देन है। वैज्ञानिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि क्षेत्रों में जीवन की जिन विविधताओं के दृश्य दिखाई दे रहे हैं, उनकी जड़ें भी विचारशील कल्पनाओं में सन्निहित हैं। मौसम विज्ञानी वायु मंडल में विद्यमान आर्द्रता के आधार पर यह पता लगा लेते हैं कि आने वाले दिनों में मौसम कैसा रहेगा। भविष्यदृष्टा मनीषियों का कहना है कि मानव मन में आज जो सृजनात्मक धारणायें जन्म ले रही हैं, उसके आधार पर यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि भविष्य कैसा होगा?
चिन्तन बताता है कि दुख नग्न सत्य है, सुख तो उसकी सुसज्जित करने वाला परिधान-अलंकार मात्र है।
चिन्तन, जीवन के उद्देश्य का विवेक ही तो अभिमान को दूर करेगा।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को संशोधित परिष्कृत करने के लिए लम्बी अभ्यास प्रक्रिया से गुजरना चाहते हैं, जबकि सत्य तो यह है कि इससे कम में आत्मिकी के प्रारंभिक चरण की प्रक्रिया पूरी होती ही नहीं। दूसरी ओर अध्यात्म की धुरी समझी जाने वाली नैतिकता, आस्था, श्रद्धा, विश्वास जैसे आत्मिकी के उपादान कारणों को हम गौण मान बैठे हैं, जबकि यथार्थता यह है कि इसके बिना आत्मिकी का वह पक्ष अधूरा ही रह जाता है, जिसमें पत्थर में भी भगवान प्रकट करने की सामर्थ्य बतायी और वह सब कुछ हस्तगत होने की बात कही गई है, जिससे हमारे आर्षग्रन्थ भरे पड़े हैं। पर विडम्बना यह है कि आज जब श्रद्धा और विश्वास ही नहीं रहा, तो इस विश्व को हम किसी परमसत्ता की कृति क्यों मानने लगे? उसकी बनायी रचना है यह, इसे क्यों स्वीकारने लगे? तब तो हम निहिलिस्ट (शून्यवादी ) ही बन जायेंगे, जिसमें विश्व की उत्पत्ति और लय शून्य से मानी गयी है और यदि ऐसा हुआ तो व्यक्तित्व परिष्कार की भी कोई आवश्यकता नहीं समझी जायेगी तथा चार्वाक एवं चरनिस्मेस्की जैसे सुखवादियों के भोगवादी सिद्धान्त को ही लोग सर्वोपरि समझने लगेंगे कि जिसमें सबसे अधिक सुख मिले, वही कार्य करो।
चिन्तन के प्रवाह और पाँवों की गति अनायास उसे कालेज द्वार तक बहा लायी। गवर्नमेंट काल की विशालकाय बहुमंजिली इमारत सामने थी। इसका विस्तीर्ण प्राँगण छात्रों के प्रसन्न कण्ठ स्वरों से भर उठा था। प्रवेश द्वार से ही अभिनन्दन का ताँता लग गया। अपनी श्रम निष्ठ और व्यवहार-माधुर्य के कारण वह सहपाठियों का सम्माननीय था और अध्यापकजनों का स्नेह पात्र।
चिन्तन में लगा हो, तो आँख के आगे से कोई चीज गुजर जाने पर भी वह दिखाई नहीं देती। बहुत सूक्ष्म वस्तुएँ भी कहाँ दिखाई देती हैं? परमाणु या रोग कीटाणु बिना सूक्ष्मदर्शी यंत्र के दीखते नहीं। किसी पर्दे की आड़ में रखी हुई, संदूक आदि में बंद की हुई, जमीन में गड़ी हुई वस्तुओं को भी आँखें कहाँ देख पाती हैं? सूर्य के प्रकाश के कारण दिन में तारे नहीं दिखते।
चिन्तन की यह एक ऐसी विधेयात्मक दिशाधारा है जो शारीरिक-मानसिक विकास के साथ ही कार्यदक्षता को भी अनेक गुना बढ़ा देती है।
चिन्तन को भी। प्रत्येक की सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि का शीतल अहसास उसे हो रहा था। समाधान के लिए सभी ने गुरुदेव की तरफ ताका।
चिन्तन का चक्र गतिमान हो उठा कहाँ है विश्वमित्र से महाशिल्पी, चाणक्य और पातंजलि जैसे वास्तुकार जो इस छिद्र-छिद्र हो गए पात्र का जीर्णोद्धार कर सकें तब गहन तिमिर में कहीं से कोई प्रकाश रश्मि झलकी यह उसकी आत्म ज्योति थी, महासूर्य न सही उसके उगने पर एक दीपक की टिमटिमाहट तो सम्भव है। ये अस्तित्व की गहराइयों के स्वर थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-May
चिन्तन को सही रास्ते पर लाने के अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकता। इसमें दूसरों के परामर्श एवं सहयोग, कर्म और चिन्तन की दिशा में सुधारने का निजी प्रयत्न कही अधिक समर्थ सार्थक सिद्ध होता है।
चिन्तन और आत्मबल समाप्त हो जायेगा। अस्तु यह क्षेत्र विशुद्ध रूप से अध्यात्मवादियों का है, उन्हें लोक-कल्याण की दृष्टि से उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाने के लिए जन-साधारण को प्रशिक्षित करना चाहिए। ‘ब्रेन वाशिंग‘ उन्हीं का काम है। इसे हाथ से लेकर वे मनुष्य जाति की महती सेवा-साधना कर सकते हैं।
चिन्तन करेंगे। यह सत्र अनेकानेक दृष्टियों से विशिष्ट होगा। ब्रह्मबीज के विस्तार तथा भारतीय संस्कृति के निर्धारणों संबंधी विभिन्न पक्षों पर एक विश्वविद्यालय स्तर की संस्था के निर्माण व स्वरूप पर भी इन्हीं दिनों चर्चा की जाएगी। पर्यटन में रुचि रखने वाले परिजनों के लिए इन दिनों न आना ही ठीक होगा। जो विशिष्ट उद्देश्यों के लिए पूज्यवर को सही अर्थों में श्रद्धासुमन अर्पित करना चाहते हों, वे अभी से आवेदन पत्र भेजकर अपना स्थान सुरक्षित करा लें।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार एवं गुण, कर्म, स्वभाव में तदनुरूप श्रेष्ठता का, शालीनता का समावेश किया जाता है। इस प्रकार से जिन सिद्धियों तथा दिव्यशक्तियों की उपलब्धि होती है, उनका सुविस्तृत वर्णन पतंजलि योग सूत्र विभूतिपाद में सूत्र 16 से 44 तक किया गया है। भूत और भविष्य का ज्ञान, सभी प्राणियों की भाषा समझने, पूर्व जन्म के बारे में जानने, दूसरों के मन की बात समझने की क्षमता, अन्तर्ध्यान, आत्मबल, दूरदर्शन, दूर श्रवण, सर्वज्ञान भूख-प्यास की निवृत्ति सूक्ष्म शरीरधारी दिव्य शक्तियों से संपर्क आदि अनेकों प्रकार की शक्तियाँ योग साधना से प्राप्त होने का उल्लेख है। इसके 36 वें सूत्र में 6 सिद्धियों का वर्णन करते हुए कहा गया है- ततः प्रातिभ श्रावण वेदनदर्शस्वाद वार्ता जायते, अर्थात् उससे प्रातिम, श्रवण, वेदन, आदर्श, अस्वाद और वार्ता-छह सिद्धियों प्रकट होती हैं। योगसूत्र भोजवृति भाष्य में इन सिद्धियोँ का स्वरूप इस प्रकार बताया गया है।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाने के लिए जन-साधारण को प्रशिक्षित करना चाहिए। ‘ब्रेन वाशिंग‘ उन्हीं का काम है। इसे हाथ से लेकर वे मनुष्य जाति की महती सेवा-साधना कर सकते हैं।
चिन्तन करे तो मौत जल्दी आ धमकेगी। यदि सौ वर्ष तक कर्म करते हुए जीने की इच्छा रखे तो मौत दूर ही रहेगी। मनुष्य सदैव ऊँचा सोचे व श्रेष्ठ चिन्तन करे तो वह जीवन मृत्यु का नियंत्रण भी अपने हाथ में ले सकता है। आखिर है भी तो वह स्रष्टा का ज्येष्ठ पुत्र।
चिन्तन और क्रिया के सामान्य जीवन क्रम से जुड़े रहने पर अपने अस्तित्व की जानकारी आसानी से की जा सकती है, किन्तु मानव को महामानव-देवमानव की श्रेणी में पहुँचाने का सामर्थ्य भगवत्-सान्निध्य से संभव है। प्रार्थना उपासना का विधान इसी की पूर्ति के लिए अध्यात्मवेत्ताओं द्वारा सुझाया गया है। यदि दैनन्दिन जीवन में पाँच मिनट का भी समय इस निमित्त निकाला जा सके तो उतने भर से उन दुष्वृत्तियों से पीछा छुड़ाया जा सकता है जो आये दिन सिर पर सवार होकर अनेकानेक प्रकार से त्रास देती रहती हैं। उनने प्रार्थना को प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ सूत्र बताये हैं।
चिन्तन के अभ्यास से संचित-संस्कारों पर निर्भर है। कोई व्यक्ति बड़ी घटना को भी छोटी मानता है और किन्हीं की कल्पना में घटना भी पहाड़ तुल्य भारी होता है। इस हलकेपन और भारीपन का अचेतन, सुपर चेतन क्षेत्र में आघात लगता है। कभी- कभी तो वह सहज होता है और समय के साथ- साथ अनुभूतियाँ धीमी पड़ती जाती हैं किन्तु कभी कभी वे इतनी असह्य होती हैं कि चिंतन तंत्र को ही बुरी तरह झकझोर देती हैं। साथ ही ऐसी स्थिती बना देती हैं कि मानस सही तरीके से सोचने समझने में समर्थ न रहे और प्रवाह जिस ओर भी चल पड़े, फिर रोके न रुके।
चिन्तन की दिशाधारा विधेयात्मक हो। इसमें स्वयं के साथ, अन्यान्यों के कल्याण की भावना भी सन्निहित हो। तभी प्रार्थना का प्रत्युत्तर भी मिलता है। समर्थ सत्ता के समक्ष अपनी इच्छा आकाँक्षा रखते समय इस बात का ध्यान अवश्य रखा जाय कि उसमें कहीं संकीर्ण स्वार्थपरता तो प्रवेश नहीं कर रही है।
चिन्तन का केन्द्र बनाये था।
चिन्तन और (3) प्रार्थना। तीनों के समन्वित प्रयासों के माध्यम से ही जीवन लक्ष्य की प्राप्ति संभव हो पाती है। पर प्रायः देखा यही जाता है कि आमतौर से व्यक्ति प्रथम दो मार्गों पर चलने का प्रयत्न तो करता है, परन्तु तीसरे अति महत्वपूर्ण पक्ष को विस्मृत कर बैठता है।
चिन्तन करे तो वह जीवन मृत्यु का नियंत्रण भी अपने हाथ में ले सकता है। आखिर है भी तो वह स्रष्टा का ज्येष्ठ पुत्र।
चिन्तन ही एक प्रमुख बाधा है। इसी शृंखला में वे कुविचार भी सम्मिलित होते हैं जिन्हें आक्रमणकारी दुर्गुणों के रूप में गिना जाता है। ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, प्रतिशोध,आक्रमण अपहरण के विचार अपने आपको अधिक और प्रतिपक्षी को कम जलाते हैं। अपराधी दुष्प्रवृत्तियाँ प्रतिपक्षी को कितना नुकसान पहुँचा सकेगी यह संदिग्ध है। किन्तु इतना निश्चय है कि जो इन्हें अपने भीतर भरे रहता है वह जीते मक्खी निगलने की तरह अपना अहित तो निश्चित रूप से करता ही है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की उत्कृष्टता हर हालत में बनाये रखी जाय, भले ही इसमें कितनों का विरोध सहना अथवा घाटा उठाना पड़ता हो। आदर्शों के प्रति दृढ़ता और उस मार्ग में चलते हुए कठिनाइयों से जूझना यही तपश्चर्या है और इसी को शौर्य साहस कहते हैं। यदि इतनी सीमा में रहते हुए अपने व्यक्तित्व की उत्कृष्टता ढाल ली जाय, जनकल्याण में संलग्न रहा जाय, अनीति के प्रति जुझारू का रुख रखा जाय तो समझना चाहिए कि मनीषा की आवश्यक परिधि पर आधिपत्य स्थापित कर लिया गया।
चिन्तन की दिशा में सुधारने का निजी प्रयत्न कही अधिक समर्थ सार्थक सिद्ध होता है।
चिन्तन इतना प्रबल व शक्तिशाली बन जाता है, कि वह उसके अवचेतन मन की गहराइयों तक उतर जाता है और अपना काम करने लगता है एवं व्यक्ति को उसी चिंतन चेतना के ढाँचे में ढालना आरंभ कर देता है जैसा उसका निज का होता है। प्रकारान्तर से यह भी मनोवैज्ञानिकों की उसी अवधारण को परिपुष्ट करता है, कि संकल्प के अनुसार मन, प्राण, शरीर भी प्रभावित होते हैं। संकल्प जैसा हुआ प्रभाव भी वैसा ही उत्पन्न करता है। रामकृष्ण परमहंस के बारे में कहा जाता है कि जब वह दक्षिणेश्वर में रह कर हनुमान की साधना कर रहे थे, तो उस दौरान उनके हाव-भाव और आचरण बन्दरों की भाँति ही हो गये थे। वैसे ही उछल कर पेड़ों पर चढ़ जाते जैसे कोई बन्दर।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-October
चिन्तन पद्धति अभिरुचि और आदतें उसी अभ्यस्त ढर्रे में अनायास ही घूमती रहती है। विचारों तक की रोकथाम और मोड़-मरोड़ जब कठिन पड़ती है, तब अचेतन के साथ जुड़े रहने वाले स्वभाव-अभ्यास को कैसे बदला जाय? इसके लिए स्थान बदलने की आवश्यकता पड़ती है। परिस्थितियों का भी मनःस्थिति पर प्रभाव पड़ता है। स्थान बदलने पर वहाँ के पदार्थ और व्यक्तियों के साथ संबंध भी झीने पड़ते हैं।
चिन्तन और दुष्ट चरित्र के कारण विषाक्तता बेतरह बढ़ चली है। समुद्र की सतह पर तेल फैल जाने पर उस क्षेत्र के जलचर घुटन से संत्रस्त होकर मरते देखे जाते हैं। कुवैत के तेल के कुएँ जलने व अलास्का की खाड़ी में तेल का जहाज डूब जाने पर एक विशाल क्षेत्र में यह हम पिछले दिनों घटित हुआ देख चुके हैं। ठीक इसी प्रकार अदृश्य वातावरण में परोक्ष जगत में आसुरी विषाक्तता की वृद्धि से अनेकानेक संकट एवं विग्रह खड़े होते हैं। इनका त्रास घुटन से भी अधिक कष्टकर होता है।
चिन्तन, दुर्भावनाएँ अनुपयुक्त महत्वाकाँक्षाएँ जैसे अनेकों आधार खड़े हो जाने के कारण जनमानस में असंतुलन व आक्रोश उत्पन्न करने वाले तत्वों की ही भरमार दिखाई देती है। व्यक्ति शिक्षित तो है पर जीवन कैसे जीना चाहिए, इस इस विषय में अज्ञानी है। प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता कहीं-कहीं अपवाद रूप में दृष्टिगोचर होती है। तनाव, बेचैनी, खिन्नता, उद्विग्नता, असुरक्षा व एकाकीपन की भावना ही सबके सिर पर छाई दिखाई देती है व लगता है किसी तरह सभी जिन्दगी की लाश ढो रहे हैं। विक्षिप्तों, अर्धविक्षिप्तों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
चिन्तन प्रवाह को अप्रत्याशित मोड़ देने वाली उमंगें नवरात्रि के नौ दिनों में विशेष रूप से उभरती देखी गयी है। इस अवधि में अन्तराल में अनायास ही ऐसी हलचलें उठती हैं, जिनका अनुसरण करने पर आत्मिक प्रगति की व्यवस्था बनने में ही नहीं, सफलता मिलने में भी ऐसा कुछ बन पड़ता है, मानो अदृश्य जगत से अप्रत्याशित अनुग्रह बरस रहा हो।
चिन्तन को किसी दिशा में आगे बढ़ाने के लिए नाम, रूप का अवलम्बन अनिवार्य है। श्रद्धा का आरोपण संवर्धन इस प्रतिभा प्रतिष्ठापन के सहारे महज-सुलभ रीति से अग्रगामी बनता है। मानवी श्रद्धा ही अपनी अभिरुचि एवं आकाँक्षा के अनुरूप किसी केन्द्र बिन्दु का, आस्था का समीकरण करती है उसे सशक्त बनाती है और उससे असाधारण लाभ उठाती है। जिसे साकार रूप में मानना हो वह एकलव्य के द्रोणाचार्य, मीरा के गिरधर गोपाल, रामकृष्ण परमहंस की काली की तरह गायत्री माता के रूप में उनका भाव निर्धारण कर सकता है। जो निराकार रूप में मानते हो, वे उत्कृष्टता के रूप में ऋतम्भरा, प्रज्ञा के रूप में, सविता के स्वर्णिम प्रकाश के रूप में महामंत्र के शब्दार्थ में छुपे हुए भाव के अनुरूप परमात्मा के गुणों के रूप में मानते हुए अपनी उपासना को गतिशील कर सकता है।
चिन्तन छाया रहा या भौतिक स्तर का। यदि साँसारिक मनोकामनाओं की भीड़ उथल-पुथल मचाए रही तो समझना चाहिए यह कृत्य भी विशुद्ध रूप से भौतिक ही हैं। इसमें आत्मिक प्रगति जैसे किसी लाभ की कोई सम्भावना नहीं। यदि उतने समय में शरीर रहित भौतिक प्रभावों से मुक्त ज्योतिर्मय आत्मा ही ध्यान में है और उस महाज्योति के साथ समन्वित हो जाते ही दीप-पतंग जैसी आकाँक्षा उमड़ रही है तो समझना चाहिए कि उपासना का सच्चा स्वरूप अपना लिया गया।
चिन्तन की दिशाधारा का निर्धारण होकर आकाँक्षाओं और विचारणाओं का उत्कृष्टता की दिशा में बहने लगना ही समाधि है। समाधि मूर्च्छित हो जाने को नहीं कहते। विषय भोगों की चंचलता समाप्त होने पर जब स्थित मनःस्थिति प्राप्त कर ली जाती है व आत्मबल उपार्जित किया जाता है, उस स्थिति को ही समाधि कहते है। इस समाधि की फलश्रुति है अंतर्दृष्टि (इंट्यूशन)का प्रकाश उदित होना तथा विलक्षण आनन्द की अनुभूति होना। स्वर्ग से आशय है-परिष्कृत दृष्टिकोण का विकास।
चिन्तन के इस दिव्य प्रवाह को यदि अलंकारिक रूप से नारी के रूप में चित्रित किया गया है, तो उसे उचित ही कहा जा सकता है। इस प्राथमिक प्रतिपादन के रूप में प्रस्तुत किये गये नारी-विग्रह से भी गायत्री महाशक्ति के उच्चस्तरीय स्वरूप में कोई अन्तर नहीं आता।
चिन्तन व प्रवाह का अदृश्य वातावरण से बड़ा गहरा व अन्योन्याश्रय संबंध है। ऐसे विग्रह व संकट न सुलझते हैं, न घटते हैं, न टलते हैं।
चिन्तन किया जाता है, वह परम तेजस्वी, सर्वशक्तिमान, सर्वेश्वर सविता-प्रसविता परमात्मा ही है। उस परमात्मा की सर्वतोमुखी-सर्वोपरि शक्ति को चाहे गायत्री कहें या सावित्री-वस्तुतः एक महत्व से उसका प्रयोजन है। कहा भी गया है-
चिन्तन की दिशाधारा को सुव्यवस्थित करने वाले दिव्य प्रवाह को युगान्तरीय चेतना कहा जा सकता है। यही युग शक्ति गायत्री है और इसी को युग परिवर्तन का उद्गम स्रोत समझा जाना चाहिए।
चिन्तन से पैदा हुआ तनाव इतना विस्फोटक बन गया है कि अगणित रोग यथा उच्च रक्तचाप, हृदयरोग, मस्तिष्कीय रक्तस्राव, अपच, मधुमेह, पेप्टिक अल्सर, दमा जैसी असाध्य व्याधियाँ मात्र इसी कारण हो रही हैं। स्वास्थ्य खराब हो, बीमारी ने घेर रखा हो तो स्वादिष्ट भोजन, रूपवती तरुणी, मधुर गीत वाद्य, सुन्दर दृश्य, सैर सपाटे के साधन सभी निरर्थक हैं। यह अशक्ति हर क्षेत्र में है, चाहे वह शारीरिक, मानसिक या सामाजिक हो अथवा बौद्धिक एवं आत्मिक। श्रुति कहती है कि बलहीन को आत्मोत्कर्ष का पथ नहीं मिलता “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।” तो इस तरह अशक्ति के रहते आज का मनुष्य दुखी है, तो कारण भी समझ में आते हैं।
चिन्तन-प्रतिभा परिष्कार चमत्कारी प्रज्ञा रूप में इन्हें समझ सकते है, दूसरी और विज्ञानमय कोश को असामान्य स्तर की बुद्धि के विकास, परोक्ष से संपर्क जोड़ने की क्षमता तथा आदर्शवादी उमंगों के उभार के रूप में जान सकते हैं।
चिन्तन इतना सीमित होकर रह गया है कि वह सारी सुख-सुविधाओं का अम्बार होते हुए भी उनके सदुपयोग की समझदारी नहीं जुटा पाता। अनेकों भूलें उससे होती चली जाती हैं किन्तु विवेक के, दूरदर्शिता के अभाव में कार्यों को प्रेरणा व दिशा मिलती कहीं दीखती नहीं। फलतः वह दुःखी पीड़ित उद्विग्न होता चला जा रहा है। मनीषियों की बात समझ में आती है कि अज्ञान दुखों का मूलभूत कारण है।
चिन्तन और चरित्र में उच्च स्तरीय उमंगे उभरने लगती हैं तथा उसी स्तर की गतिविधियाँ चल पड़ती हैं। उत्कृष्टता की उपासना ही ईश्वर की उपासना है। उपास्य, लक्ष्य, इष्ट इसी को बनाना पड़ता है। प्राचीन काल में इस संबंध में तत्वज्ञानियों ने एकमत हो स्वीकार किया था कि आत्मिक प्रगति की साधना के लिए इष्ट रूप में गायत्री का ही वरण होना चाहिए। सृष्टि के आदि में ब्रह्माजी ने कमल पुष्प पर बैठ कर आकाशवाणी द्वारा निर्देशित गायत्री उपासना की थी और सृष्टि सृजन का सामर्थ्य प्राप्त किया था।
चिन्तन, आप्तकाम होने का सौभाग्य अनुदान प्राप्त होते हैं। इस बार के नवरात्रि आयोजनों से सारे भारत में शक्तिसाधना का बीजारोपण करने वाले कार्यक्रमों का शुभारंभ हो रहा है। जहाँ भी व्यवस्था बन सकें, वैयक्तिक व सामूहिक स्तर पर क्रमबद्ध अनुष्ठान की व्यवस्था की जाए ताकि परोक्ष जगत से बरसने वाले देवी अनुदानों से सब लाभ उठा सकें।
चिन्तन वालों को सत्यं, शिवं, सुंदरम् का दर्शन हर घड़ी होता है और सर्वत्र स्वर्ग की उपस्थिति प्रतीत होती है। स्वर्ग इसी दिव्य दर्शन का उत्कृष्ट चिन्तन का नाम है। तीसरा अनुदान है मोक्ष-कुसंस्कारों से, कषाय कल्मषों से मुक्ति। बंधन मुक्ति। मोक्ष का अर्थ है आत्मसत्ता को भौतिक न मानकर विशुद्ध चेतन स्वरूप में अनुभव करने लगना।
चिन्तन करने जैसी बुद्धि इसी प्रकार की सिद्धियाँ है। इससे न केवल व्यक्ति की स्वयं की क्षमताएँ परिष्कृत होती हैं, वह दूसरों को प्रभावित कर सकने की प्रतिभा का भी धनी बन जाता है।
चिन्तन के रूप में विश्वव्यापी चेतना ही काम कर रही है तो भी स्पष्ट है मनुष्य की आकाँक्षाएँ, आस्थाएँ दिव्य सत्ता के अनुरूप नहीं है। उनमें निकृष्टता का आसुरी अंश भरा पड़ा है। मनुष्यता की सार्थकता तभी है, जब उसका स्थान और स्तर भी उसी के अनुरूप ऊँचा उठ सके। निम्न योनियों के जीवधारी भोजन और संतति संवर्धन के लिए जीते हैं। स्वार्थ सिद्धि ही उनकी नियति होती है।
चिन्तन में ही चित्त निरत रहने लगा। कहते हैं गायत्री सिद्ध होने के बाद ऐसा कुछ भी नहीं था जो उन्हें प्राप्त न हो। लौकिक कामनायें क्षीण होने के बाद उन्होंने संन्यास धारण कर लिया और केवल एक काठ की लँगोटी पहनने लगे। आप्तकाम हो के बाद उन्हें कई दिव्य शक्तियाँ-अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त हो गयीं। उन्हें दूर दृष्टि प्राप्त थी, कहीं की भी कोई बात वे बिना बताये ही जान लेते थे।
चिन्तन का नाम है। तीसरा अनुदान है मोक्ष-कुसंस्कारों से, कषाय कल्मषों से मुक्ति। बंधन मुक्ति। मोक्ष का अर्थ है आत्मसत्ता को भौतिक न मानकर विशुद्ध चेतन स्वरूप में अनुभव करने लगना। प्रसन्नता-सुखानुभूति आँतरिक परिष्कार के आधार पर उपलब्ध होने के तथ्य पर विश्वास करना।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-June
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार में आदर्शवादिता का समावेश करते और अन्तराल की गहराई में प्रवेश कर उस शाश्वत सत्य के दर्शन करते हैं जिसे पाकर और कुछ प्राप्त करने की इच्छा-आकाँक्षा का सर्वथा समापन हो जाता है। अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार मनुष्य वस्तुतः “स्प्रिचुअल बीइंग“ अर्थात् अध्यात्मिक जीव है। जीवित पदार्थ के अतिरिक्त भी वह कुछ और है। आत्मिक परिपूर्णता अर्थात् क्षुद्रता में महानता में परिवर्तन-प्रत्यावर्तन।
चिन्तन और चिन्तन से क्रिया बन पड़ती है। अतः अनीति युक्त गतिविधियों में प्रत्यक्ष रूप से संलग्न न होकर भी उसकी कल्पना कर हम मानसिक रूप से अपराध तो कर ही बैठते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बुराई की नियति सिर्फ विफलता और दुःख ही है। बुराई सदा हारती है।
चिन्तन, और व्यवहार की उत्कृष्टता ही वह सम्पदा है, जिसे प्राप्त करने वाला व्यक्ति ही सही अर्थों में सफल और महान कहा जा सकता है। यही सच्ची सम्पत्ति है। इसे पाने वाला ही जीवन में शान्ति और संतोष को उपलब्ध कर पाता है।”
चिन्तन करने वाले क्रान्तिदर्शी ऋषि-वैज्ञानिक होते हैं। विज्ञान व अध्यात्म का समन्वय स्थापित करने वाले ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के संस्थापक परम पूज्य गुरुदेव को इस के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। इस विशिष्ट ग्रह स्थिति से इच्छा मृत्यु का वरदान भी प्रमाणित होता है जो दो जून 1990 की (गायत्री जयन्ती की) निर्वाण दिवस की कुण्डली से स्पष्ट हो जाता है।
चिन्तनधारा आगे अटकी, चित्त, इन्द्रियाँ और मन प्रसन्न रहें-निर्मल रहें? ग्रन्थ बन्द करके रख दिया और मेज पर बायें हाथ की कुहनी टेककर हथेली पर सिर रख कर आँखें बन्द कर लीं।
चिन्तन को बढ़ावा देते आए हैं। स्वयं उनने लिखा है कि अन्तर्ग्रही प्रभावों की वैज्ञानिकता को समझा व दृश्य गणित पर आधारित ज्योतिर्विज्ञान को मान्यता दी जानी चाहिए। सत्प्रेरणा देने वाले व्यक्ति को विधेयात्मक चिन्तन की ओर ले जाने वाले ज्योतिर्विज्ञान के समर्थक होने के नाते उनने गायत्री नगर में देव परिवार बसाने के लिए एक वेधशाला स्थापित की, पंचाँग प्रकाशित कराया तथा यहाँ से जन्म समय के आधार पर श्रेष्ठता की दिशा में चलने का मार्गदर्शन तंत्र चलाया।
चिन्तन से क्रिया बन पड़ती है। अतः अनीति युक्त गतिविधियों में प्रत्यक्ष रूप से संलग्न न होकर भी उसकी कल्पना कर हम मानसिक रूप से अपराध तो कर ही बैठते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बुराई की नियति सिर्फ विफलता और दुःख ही है। बुराई सदा हारती है।
चिन्तन को केन्द्रित किया जाय और वैसी ही रीति-नीति अपनाने के लिए उत्साह उभारा जाय, तो थोड़े से अभ्यास में ही यह अनुभव होने लगता है कि अनौचित्य अपनाने की तुलना में औचित्य, सौम्यता और सज्जनता को व्यवहार में उतरना कहीं अधिक सरल और संभव है। कुटिलता अपनाने वालों की, दुराव करने और दूसरों को कुछ का कुछ बताने दिखाने की बाजीगरी असाधारण रूप से झंझट भरा है। छल-प्रपंच में सफलता उन्हीं को मिलती है, जो धूर्तता की कला में प्रवीण पारंगत हो चुके हैं। सरल सज्जनता का मार्ग तो एक बालक भी अपना सकता है। उसे यथार्थता कह गुजरने में किसी प्रकार के दबाव का अनुभव नहीं करना पड़ता।
चिन्तन जहाँ कहीं भी किसी भी भाषा में किसी ने किया हो, वे उसे हृदयंगम करने की क्षमता रखते है।” अपनी मोटी बुद्धि पर शर्मिन्दा उस कार्यकर्त्ता को
चिन्तन की ओर ले जाने वाले ज्योतिर्विज्ञान के समर्थक होने के नाते उनने गायत्री नगर में देव परिवार बसाने के लिए एक वेधशाला स्थापित की, पंचाँग प्रकाशित कराया तथा यहाँ से जन्म समय के आधार पर श्रेष्ठता की दिशा में चलने का मार्गदर्शन तंत्र चलाया।
चिन्तन-मनन करना चाहिए। हजार बार सोचना चाहिए कि क्या हमारा जीवन प्रभु की इच्छाओं पर चलने वाला जीवन है? हमें जो विभूतियाँ मिली थीं, सामर्थ्य मिली थीं, उन्हें क्या हम मानव जीवन और भगवान के उद्देश्यों के अनुरूप खर्च कर रहे हैं या हम पेट के गुलाम होकर ही जी रहे हैं। जो इन्द्रियाँ हमारे पास हैं, जिन्हें हम दुनिया में शान्ति और सुविधा उत्पन्न करने में खर्च कर सकते थे, क्या हम उन्हें पतन के लिए खर्च नहीं कर रहे? इन तीनों प्रश्नों पर आज हमें तीन हजार बार विचार करना चाहिए।
चिन्तन और रुझान में आदर्शों के प्रति लगाव। उत्कृष्टता की दिशा में बह रहे इस प्रवाह से ही यह समझना चाहिए कि महामानव बनने-बनाने तथा युग को बनाने-समाज को बदलने वाली परिस्थितियाँ अनायास ही ढलती चली जा रही हैं।
चिन्तन चेतना बार-बार इसी भावजगत में विचरण करने चली जाती है व रोम-रोम में पुलकन भर देती है।
चिन्तन, शौर्य व योगाभ्यास से संबंधित है। पूज्य गुरुदेव के तृतीय भाव में धनु राशि है, जिसका स्वामी गुरु लगनस्थ है। गुरु की स्थिति यहाँ हर दृष्टि से शुभ है। ऐसे ग्रह प्रभावों वाले व्यक्ति श्रेष्ठतम लेखक होते हैं। पूज्य गुरुदेव के ही अनुसार “हमारा अभी तक का लिखा साहित्य इतना अधिक है कि शरीर के वजन से तौला जा सके।
चिन्तन के माध्यम से प्रकट होता है। किन्तु इसका प्राकट्य वहीं होता है जहाँ शिवत्व हो।” कहकर वह रुक गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-July
चिन्तन ने बाँध कर रखा इससे मुक्ति मिलते ही सही अर्थों में आदमी बंधन मुक्त हो जाता है। हमारी नाभि में खुशी रूपी कस्तूरी छिपी पड़ी है। ढूँढ़ते हम चारों ओर हैं। हर दिशा से वह आती लगती है पर होती अन्दर है।
चिन्तन व क्रियाशीलता दोनों को ही उत्तरोत्तर विकसित करने की रुचि जगाई जा सके तो होने वाले परिणामों को देख चमत्कृत होना पड़ेगा। समूचे व्यक्तित्व का कायाकल्प हो सकेगा। अभी तक की अनगढ़ता के पीछे छुपा प्रतिभाशाली सामर्थ्यवान निज का स्वरूप उभर कर आ सकेगा। जीवन के इस अलौकिक रहस्य को जानें, समझें और आचरण में लाएँ तो हम स्वयं को समाज की अग्रिम पंक्ति में पाएंगे। यह एक प्रकार की जीवन साधना है पर प्रत्यक्ष फल देने वाली चमत्कारी विधा है।
चिन्तन के विकास में जुटें, कर्त्तव्यों एवं जीवन मूल्यों को जानने के लिए अध्ययन करें, अपने ही कार्य की बारीकी जानने का प्रयास करें तो उपजी सूझ-बूझ तथा व्यवस्थित जीवनक्रम उन्हें सामान्य से असामान्य बना देता है। इस तरह मानसिक श्रम प्रधान जीवन वाले व्यक्ति शारीरिक मेहनत करने लगें भले ही उसका स्वरूप बागवानी, व्यायाम, खेलकूद क्यों न हो? इस तरह की उपजी आदत के फल स्वरूप रोग-कष्ट काफूर हो जायेंगे? अभी तक जिन कार्यों को नहीं सम्पन्न किया जा सका तुर्त-फुर्त पूरे होने लगेंगे।
चिन्तनपरक क्षमताओं को देखते हुए प्रतीत होता है कि यह जादुई पिटारे से कम आश्चर्यजनक किसी प्रकार है नहीं। कल्पना, विचारणा, निर्धारणा, भाव संवेदना, मान्यता, आस्था जैसी अगणित परतें इस पिटारी के भीतर विद्यमान हैं। यदि वे प्रसुप्त मूर्च्छित स्थिति में पड़ी रहें तो बात दूसरी है अन्यथा यदि उन्हें तनिक भी समुन्नत स्तर तक उठने का अवसर मिल जाय तो मनुष्य अनगिनत सफलताएँ अर्जित करने वाला सिद्ध पुरुष बन सकता है।
चिन्तन की राह पर तन कर खड़ा हो गया था। उत्पत्ति से लेकर वर्तमान पल तक अनेक घटना क्रम कुम्हार के चाक की तरह घूम गए। छलक पड़े विषाद को पीने की कोशिश में उसने होठों का एक सिरा दाँतों से दबाया।
चिन्तन के साथ उसने एक गर्व भरी नजर स्वयं पर डाली। पर दूसरे ही क्षण तथ्य कठोर प्रहार से गर्व चकनाचूर हो गया। एक के पास जाने के लिए लोग अपना काम छोड़ कर दौड़ पड़ते हैं। दूसरे का नाम सुनते ही दहशत फैल जाती है। भिक्षु की इस लोकप्रियता का कारण?
चिन्तन-मनन का प्रभाव अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करने की दृष्टि में बहुत अंशों में सफल हो सकता है।
चिन्तन के द्वारा नहीं क्रिया के माध्यम से अभिव्यक्त हो रहे थे। इनके सत्य-असत्य होने का निर्णय होता तब चीख पुकार के बीच एक अन्य वाणी उभरी। इसमें आश्वासन था। सभी स्वर मौन हो गए। बस वही मुखर था।
चिन्तन के तरंग वलय-भावों के उतार चढ़ाव के रूप में मुख मण्डल पर प्रकट हो रहे थे।
चिन्तन दोनों के क्षमतावान होने के लिए जिस सामंजस्य की अपेक्षा है, उसकी उपेक्षा की जाती है। शारीरिक श्रम करने वाले मानसिक पक्ष को भूला बैठते हैं। इसके फलस्वरूप उन्हें गँवार मूर्ख जैसे शब्दों से सम्बोधित किया जाता है। मानसिक श्रम करने वाले गँवार भले न कहे जायँ पर शारीरिक पक्ष की ओर ध्यान न दिये जाने के कारण उन्हें दुर्बल, रोगी, जैसी स्थिति से गुजरना पड़ता है। दोनों ही स्थितियों में मानवी प्रतिभा का समुचित उपयोग नहीं हो पाता है।
चिन्तन के लिए समय लगाया जाय तो वह कहीं अधिक उत्तम है। भगवान को रिझाने की अपेक्षा आत्मिक सुधार में समय लगाना कहीं अधिक श्रेयस्कर है।
चिन्तन उत्कृष्ट आचरण से भरा-पूरा जीवन। लेकिन आज.....।
चिन्तन व लेखनी से प्रस्तुत हुए हैं। यदि उन पर अमल किया जा सके तो सारी सिद्धियाँ इसी मस्तिष्क रूपी कल्पवृक्ष से, व्यक्तित्व के उद्यान से उपजती रह सकती हैं।
चिन्तन ने बाँध कर रखा है। हम भगवान के बेटे हैं। हमारे संस्कार हमें कैसे बाँध सकते हैं। सारा शिकंजा चिन्तन ने बाँध कर रखा इससे मुक्ति मिलते ही सही अर्थों में आदमी बंधन मुक्त हो जाता है। हमारी नाभि में खुशी रूपी कस्तूरी छिपी पड़ी है।
चिन्तन में निहित है। हमें हमारे चिन्तन ने बाँध कर रखा है। हम भगवान के बेटे हैं। हमारे संस्कार हमें कैसे बाँध सकते हैं। सारा शिकंजा चिन्तन ने बाँध कर रखा इससे मुक्ति मिलते ही सही अर्थों में आदमी बंधन मुक्त हो जाता है।
चिन्तन, आचरण या क्रिया-व्यवहारों के द्वारा उस प्रवाह में बाधा उत्पन्न कर लेता है तो जीवन तत्व-प्राण ऊर्जा की कमी के कारण अनेकानेक आधि-व्याधियों से ग्रस्त हो जाता है। सतत संकुचित रहने के कारण सम्बद्ध नाड़ी समूह कमजोर पड़ जाते हैं और अत्याधिक सिकुड़ जाने के कारण उनमें प्राण तत्व का प्रवाह रुक जाता है। इस केन्द्र में जीवन तत्व उत्पन्न करने की अद्भुत एवं असीम सामर्थ्य है।
चिन्तन एवं दुष्ट आचरण के नजारे दीखते रहेंगे और सामर्थ्य का अवाँछनीय प्रयोजनों में उपयोग होने से अनेकानेक संकट उत्पन्न होते रहेंगे।
चिन्तन व न करने योग्य दुष्कर्म करने लगता है।
चिन्तन और क्रिया दोनों ही पक्षों में सामंजस्य उपजे। अँग्रेजी विचारक पैक्टनहूड के शब्दों में इस तरह की सन्तुलित श्रमनिष्ठ जिस गति से बढ़ती है जीवन में एक आलौकिक निखार आने लगता है। इस एक बार समझ लिया जाय फिर तो वह आदत बन जाती है। दूसरे लोग भले ही उसे देखकर घबराएँ पर वह हमारी ग्रीवा में पुष्पहार की तरह सुशोभित हो जाती है।
चिन्तन में दिखाई पड़नी चाहिए। इसमें आने वाले अवरोधों, बाधाओं को समाप्त करके समूचे जीवन को आत्मा के गुणों से अलंकृत करना ही व्यक्तित्व का विकास है। केन्द्रीय आयाम करना ही व्यक्तित्व का विकास है। केन्द्रीय आयाम की अवहेलना कर व्यक्तित्व का ठीक-ठीक विकास सम्भव नहीं।
चिन्तन, चरित्र में कितने दोष दुर्गुण समाये हैं। वह अपने आपको निर्दोष ही समझता रहता है और एक बारगी उस ओर ध्यान आकर्षित करने या भर्त्सना के कटु शब्दों में समीक्षा कर देने पर तिलमिला जाता है और सुधार प्रयास को निन्दा या शत्रुता समझने लगता है। ऐसी स्थिति बन जाने पर बात बनती नहीं, बिगड़ती है। सुधार की जो गुंजाइश थी वह भी हाथ से चली जाती है। दोष प्रतिष्ठ का प्रश्न बन जाता है और दोषी चुनौती देने लगता है कि हम अपनी जगह पर सही हैं, जिसमें दम-खम हो बदलने का प्रयास पूरा करके दिखाये।
चिन्तन में मानवी महत्ता के अनुरूप उत्कृष्ट आदर्शवादिता की अधिकाधिक मात्रा की भी धारणा करनी चाहिए। देवपक्ष के विचारों की मात्रा और प्रखरता यदि अन्तराल में विकसित होती रहे तो उस क्षेत्र में दुष्प्रवृत्तियों के पैर टिक ही नहीं पाते। परब्रह्म के राजकुमार का व्यक्तित्व जिस स्तर का होना चाहिए, उसी स्तर का उसे बनाने की उत्कंठा उठती है और यह दिव्य निर्झर जैसा प्रवाह ऐसा है कि इर्द-गिर्द के कूड़े करकट को बहा कर कहीं से कहीं फेंक देता है।
चिन्तन में स्वाध्याय और निर्माण में सत्संग असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होते हैं। आत्म निरीक्षण आत्म सुधार, आत्म निर्माण, और आत्म विकास के निमित्त परिमार्जन और परिष्कार की योजना बनाते रहना चाहिए। अपने चिन्तन में मानवी महत्ता के अनुरूप उत्कृष्ट आदर्शवादिता की अधिकाधिक मात्रा की भी धारणा करनी चाहिए। देवपक्ष के विचारों की मात्रा और प्रखरता यदि अन्तराल में विकसित होती रहे तो उस क्षेत्र में दुष्प्रवृत्तियों के पैर टिक ही नहीं पाते। परब्रह्म के राजकुमार का व्यक्तित्व जिस स्तर का होना चाहिए, उसी स्तर का उसे बनाने की उत्कंठा उठती है और यह दिव्य निर्झर जैसा प्रवाह ऐसा है कि इर्द-गिर्द के कूड़े करकट को बहा कर कहीं से कहीं फेंक देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-April
चिन्तन से ही इसका स्वरूप बनता है। इससे न केवल जीवनी शक्ति का क्षरण होता है वरन् प्रतिभा एवं सृजनात्मक गुणों के विकास का मार्ग भी अवरुद्ध हो जाता है व्यक्तित्व हेय बन कर रह जाता है। “हाऊ टू बी हैपी, टू बि ह्यूमन” नामक अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में मनोविज्ञानी अल्फवेरान ने कहा है कि अवसाद मात्र एक धुएँ का पर्दा है और कुछ नहीं। इस अभिवृत्ति से ग्रस्त व्यक्ति स्वकेंद्रित हो जाता है। ऐसे व्यक्ति न तो कोई महत्वपूर्ण काम कर पाते हैं और न ही जटिल समस्याओं का सामना कर पाते हैं।
चिन्तन मनुष्य के पतन-पराभव का कारण बरता है। विचार परिवर्तन के द्वारा ही उस पर विजय पाई जाती है। चिकित्सकों ने संयुक्त प्रयासों के आधार पर कुछ और तथ्यों पर प्रकाश डाला है। उसके अनुसार व्यक्ति की मनोदशा विचारों का नियन्त्रण नहीं कर सकती वरन् विचारों द्वारा मनोदशा का निर्धारण होता है।
चिन्तन की विकृति के कारण ही मानसिक अवसाद उत्पन्न होता है। उनके अनुसार मनोवृत्तियाँ विचार जगत को प्रभावित करती हैं। उस पर संव्याप्त निषेधात्मक चिन्तन मनुष्य के पतन-पराभव का कारण बरता है। विचार परिवर्तन के द्वारा ही उस पर विजय पाई जाती है। चिकित्सकों ने संयुक्त प्रयासों के आधार पर कुछ और तथ्यों पर प्रकाश डाला है।
चिन्तन की अमुक सीमा निर्धारित करती है। इसलिए वह भी आत्मसत्ता के हर क्षेत्र में संव्याप्त माना जाता है।
चिन्तन के उपरान्त दृढ़तापूर्वक यह कहा जा सकता है कि इन सबके मूल में निश्चय ही उनकी आन्तरिक सुन्दरता विचारणाओं-भावनाओं की उत्कृष्टता निहित थी। इन्हीं ने उन्हें महान बनाया। यही बात सुकरात जैसे दार्शनिक पर भी लागू होती है।
चिन्तन में उत्कृष्टता, चरित्र में आदर्शवादिता और व्यवहार में सज्जनता का समावेश हो। वस्तुतः इसी परिधि में मानव जीवन की समस्त समस्याएँ आती हैं। जिससे इस सुविस्तृत क्षेत्र का समाधान निकले उसी को सच्चे अर्थों में तत्वदर्शन, समाज विज्ञान या शासन तंत्र कहना चाहिए। फिर उसका नाम कुछ भी क्यों न रखा जाय। मनुष्य को सत्प्रयोजन अपनाने की पूरी छूट मिलनी चाहिए।
चिन्तन क्या हो? लोग उसे अपनाने और चरित्र में उतारने की प्रेरणा देने वाला शिक्षण किस प्रकार के विद्यालयों और किस स्तर के साहित्य के सत्संग, स्वाध्याय द्वारा प्राप्त करें।
चिन्तन व्यवस्था और संकल्प भरी साहसिकता को प्रत्याहार कहा गया है। यह आत्मोत्कर्ष की साधना में निरत होने वाले प्रत्येक मनस्वी के लिए नितान्त आवश्यक है।
चिन्तन को झकझोरा है। कितने ही अनुसंधानकर्ताओं, लेखकों ने अपनी-अपनी भाषा में इसके अनुवाद प्रकाशित किये हैं। दि फाण्ट ब्रूनो नामक एक फ्रेंच लेखक की- “नोस्ट्राडेमस : हिस्टोरियन एण्ड प्रोफेट” नामक अनूदित पुस्तक सर्वाधिक प्रामाणिक मानी जाती है। इसके अनुसार लेटिन, इटेलियन, ग्रीक एवं पुराने फ्रेंच में लिखी गयी ये भविष्यवाणियाँ अब तक दो तिहाई इतिहास की कसौटी पर खरी उतरी हैं। इस सदी के अन्तिम दशक के सम्बन्ध में उसका कथन है- सन् 1990 से 2000 के मध्य एक जलता हुआ विशाल आग का गोला अंतरिक्ष से हिन्दमहासागर में गिरेगा।
चिन्तन से सदैव बचे रहना ही श्रेयष्कर है।
चिन्तन को बहिरंग से मोड़कर अन्तर्मुखी बनाकर कर कोई सूर्य की दिव्य सामर्थ्य का लाभ प्राप्त कर सकता है।
चिन्तन की मौलिकता नष्ट होती चली जाती है। काग्नीटिव थैरेपी एण्ड दि इमोशनल डिसऑर्डर नामक अपनी पुस्तक में डॉ. बैक ने बताया है कि चिन्तन की विकृति के कारण ही मानसिक अवसाद उत्पन्न होता है। उनके अनुसार मनोवृत्तियाँ विचार जगत को प्रभावित करती हैं। उस पर संव्याप्त निषेधात्मक चिन्तन मनुष्य के पतन-पराभव का कारण बरता है। विचार परिवर्तन के द्वारा ही उस पर विजय पाई जाती है।
चिन्तन के रूप में नहीं घटनाक्रम और आकारों के रूप में दिखते हैं। अब तो मनोविज्ञान ने भी प्रतीकवाद को सिद्धान्त के रूप में स्वीकार कर लिया है।
चिन्तन और विकृत मनःस्थिति के कारण इसे स्वयं उत्पन्न करता है क्योंकि अंतर्मन की आत्म घृणा और अशुभ चिन्तन से ही इसका स्वरूप बनता है। इससे न केवल जीवनी शक्ति का क्षरण होता है वरन् प्रतिभा एवं सृजनात्मक गुणों के विकास का मार्ग भी अवरुद्ध हो जाता है व्यक्तित्व हेय बन कर रह जाता है। “हाऊ टू बी हैपी, टू बि ह्यूमन” नामक अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में मनोविज्ञानी अल्फवेरान ने कहा है कि अवसाद मात्र एक धुएँ का पर्दा है और कुछ नहीं। इस अभिवृत्ति से ग्रस्त व्यक्ति स्वकेंद्रित हो जाता है। ऐसे व्यक्ति न तो कोई महत्वपूर्ण काम कर पाते हैं और न ही जटिल समस्याओं का सामना कर पाते हैं।
चिन्तन चेतना को गड़बड़ाते और अनेकानेक मानसिक बीमारियों के शिकार बनते हैं। इसका दुष्प्रभाव न केवल मनुष्य की कार्यक्षमता पर पड़ता है वरन् वह शारीरिक अक्षमता-रुग्णता को भी जन्म देता है। सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डॉ. डेविड बर्न्स के अनुसार मानसिक अवसाद के कारण प्रतिवर्ष लाखों व्यक्तियों को तद्जन्य बीमारियों का शिकार होते देखा गया है। उसके शमन के लिए लोग ट्रैक्युलाइजर जैसी नशीली दवाइयों का सेवन करते ओर अपनी शारीरिक मानसिक क्षमता गँवाते रहते हैं। अपनी पुस्तक “फीलिंग गुड” में उन्होंने मानसिक अवसाद का प्रमुख कारण भ्राँतिपूर्ण चिन्तन को माना है।
चिन्तन का आश्रय लेना चाहिए और प्रचलित मत-मतान्तरों में से कौन ज्येष्ठ, और श्रेष्ठ? के झंझट में न पड़ कर नई दृष्टि अपनानी चाहिए। क्या होता रहा है व कैसे वितण्डावाद बढ़ता रहा है इसका उदाहरण शास्त्रार्थों में भाषण प्रतियोगिताओं में ही नहीं अदालत-कचहरियों में भी देखा जा सकता है। झूठे मामले को सच्चा सिद्ध करने के लिए वकील जमीन-आसमान के कुलाबे एक करते हैं और उनमें से कितने ही अपनी चतुरता को सफलता के स्तर तक पहुँचा देते हैं। फैशन, जेवर, खानपान, नशा, व्यसन आदि के सम्बन्ध में जो जिसे सुहाता है वह उसके लिए इतना दुराग्रही होता है, कि सामने वाले पक्ष की उचित बात को भी सुनने के लिए तैयार नहीं होता।
चिन्तन को इस केन्द्र बिन्दु पर एकाग्र करें कि मानवी गरिमा के अनुरूप चिन्तन क्या हो? लोग उसे अपनाने और चरित्र में उतारने की प्रेरणा देने वाला शिक्षण किस प्रकार के विद्यालयों और किस स्तर के साहित्य के सत्संग, स्वाध्याय द्वारा प्राप्त करें।
चिन्तनशीलता और सदाशयता भरी उदारता का भी उसमें सुयोग हो। प्रत्याहार और धारणा का सार्थक समन्वय इसी प्रकार होता बताया गया है। इसके उपरान्त अपनायी गयी ध्यान धारणा निश्चित ही सत्परिणाम देती है।
चिन्तन और कर्त्तृत्व भी उतना ही विस्तृत हो जाता है। पूर्णता का-जीवनमुक्ति का रसास्वादन ऐसी ही स्थिति में होता है।
चिन्तन-पद्धति में आये विलक्षण परिवर्तन से भी सत्य प्रमाणित हो रहा है, भले ही उसके पीछे महाकाल अथवा किसी उच्च स्तरीय सत्ता का परोक्ष हाथ हो, पर इनसे इतना तो निर्विवाद सिद्ध हो गया है कि जैसी मान्यता मानव के विषय में बना कर रखी गई थी, वस्तुतः वह भ्रामक है।
चिन्तन से भी छुटकारा मिलता है वहीं व्यस्तता के कारण नकारात्मक चिंतन से भी छुटकारा मिलता है। एडलर के अनुसार विधेयात्मक चिन्तन से मानव मन की समस्त दुर्बलताएँ क्रमशः दूर होती जाती हैं और वह नूतन ज्ञान से जुड़ जाता है। इसी तरह के विचार मनोविज्ञानी जुँग ने भी प्रकट किये हैं। उनका कहना है कि हीन भावना के शोधन और परिष्कार के लिए विवेकशीलता को जाग्रत करना अनिवार्य है। सकारात्मक विचार एवं दृढ़ संकल्प शक्ति ही इन परिस्थितियों से मनुष्य को उबारते हैं।
चिन्तन से मानव मन की समस्त दुर्बलताएँ क्रमशः दूर होती जाती हैं और वह नूतन ज्ञान से जुड़ जाता है। इसी तरह के विचार मनोविज्ञानी जुँग ने भी प्रकट किये हैं। उनका कहना है कि हीन भावना के शोधन और परिष्कार के लिए विवेकशीलता को जाग्रत करना अनिवार्य है। सकारात्मक विचार एवं दृढ़ संकल्प शक्ति ही इन परिस्थितियों से मनुष्य को उबारते हैं।
चिन्तन तन्तुओं को समेटने-बटोरने की कोशिश में लगा था। बाहरी आकर्षण का सम्मोहन कितनी देर टिकेगा यदि व्यवहार सुगढ़ न हो। इसी के द्वारा तो मिलने वाले एक दूसरे के चरित्र में प्रवेश करते हैं। यदि इस क्षेत्र में कमजोरियाँ रहीं तो व्यवहार कुशलता भी धरी रह जाती है। पनपती है वितृष्णा।
चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार की उत्कृष्टता एवं उदात्तता ही जीवन के वे वातायन हैं जिनके माध्यम से उनका जागरण होता है और दैवी अनुदान तथा दिव्य वरदान व्यक्तित्व में उतरते, उभरते और जीवन को धन्य बना देते हैं। अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास इससे कम में संभव नहीं।
चिन्तन को नए आयाम दिये। जीवन की यथार्थ अनुभूति के साथ यह भी पता चल सका-दरिद्रता की परिभाषा क्या है? असली वैभव क्या है? जानबूझ कर ओढ़ी हुई गरीबी में भी आदर्शों का पुजारी कैसे शानदार जीवन जीता रह सकता है? विश्वभर में साँस्कृतिक चेतना की वह पूँजी जो भारत की अमूल्य थाती रही है, ऐसे दण्डायनों ने ही पहुँचायी।
चिन्तन को माना है। उनका कहना है कि व्यक्ति अपने दोषपूर्ण चिन्तन और विकृत मनःस्थिति के कारण इसे स्वयं उत्पन्न करता है क्योंकि अंतर्मन की आत्म घृणा और अशुभ चिन्तन से ही इसका स्वरूप बनता है। इससे न केवल जीवनी शक्ति का क्षरण होता है वरन् प्रतिभा एवं सृजनात्मक गुणों के विकास का मार्ग भी अवरुद्ध हो जाता है व्यक्तित्व हेय बन कर रह जाता है। “हाऊ टू बी हैपी, टू बि ह्यूमन” नामक अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में मनोविज्ञानी अल्फवेरान ने कहा है कि अवसाद मात्र एक धुएँ का पर्दा है और कुछ नहीं। इस अभिवृत्ति से ग्रस्त व्यक्ति स्वकेंद्रित हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-September
चिन्तन एवं कर्तृत्व को स्थान देना आत्मज्ञान का तृतीय चरण है।
चिन्तन और कर्तृत्व पर कड़ी दृष्टि रखी जाय और परखते रहा जाय कि उनमें निकृष्टता का समावेश तो नहीं हो रहा है। सजगता रहने से अनैतिक तत्वों का आक्रमण प्रायः नहीं हो पाता। रात्रि को सोते समय मरण की गहरी अनुभूमि की जाय। सृष्टा के घर जाने और सौंपे गये उत्तरदायित्वों को लेखा-जोखा देने की बात स्मरण रखी जाय तो रात की शयन बेला और प्रातःकाल की संध्या एक अच्छे धर्मोपदेशक जैसी प्रेरणाएँ देती रह सकती है। ईश्वर की साझेदारी इन्हीं आधारों के अपनाने में सम्भव हो सकती है जब वह जीवन साधना के रूप में परिणित हो।
चिन्तन और चरित्र को देवत्व की दिशा में घसीटा ले जाने वाले सभी तत्व विद्यमान है। उस अवलम्बन से देव युग में स्वर्गीय परिस्थितियों का लाभ चिरकाल इस धरती के निवासी उठाते रहे है। पुनर्जीवित किया जा रहा है। इसे पुनरावर्तन मात्र समझा जा सकता है। अभिनव दीखने पर भी वस्तुतः चिर पुरातत्व है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-April
चिन्तन और मनन के लिए तो विशेष रूप से एकान्त की ही आवश्यकता पड़ती है। आत्मानुसंधान में निरत योगाभ्यासी प्रायः एकान्त वन, पर्वतों की कन्दराओं में रहकर अपने प्रयोग सफलतापूर्वक सम्पन्न करते थे। अभी भी वैज्ञानिक अन्वेषणों के लिए प्रयोगशालाएँ ऐसे ही स्थान और वातावरण में बनी होती है जहाँ बाह्य विक्षेपों का प्रभाव कम से कम पहुँचे।
चिन्तन, दोष-दर्शन, अभाव अनुभव और अवरोध-अन्वेषण की ही आदत है, वे खिन्नता उद्विग्नता, क्षोभ और आवेश से ही इतने भरे रहेंगे कि सामाजिक मंगल का सन्तुलित-चिन्तन और प्रवाहपूर्ण कर्म उनके वश की बात नहीं। वैसे भी, सामाजिक हित की चिन्ता करने वालों में आन्तरिक प्रसन्नता की भी स्वाभाविक प्रवृत्ति सर्वत्र देखी-पाई जाती है। चिड़चिड़ापन, अवसाद, असमंजस और कुण्ठा तो उन्हें ही अधिक घेरती है, जो अपनी ही भौतिक सुविधाओं की चिन्ता एवं अनुकूलताओं की कामना में दिन-रात डूबे रहते हैं।
चिन्तन और मनन से सत्साहित्य पड़ने से, सज्जनों के साथ रहने, उनके अभिवचन सुनने एवं कार्य-कलाप देखने से विद्या का आविर्भाव होता है।
चिन्तनपरक मनःस्थिति से सम्बन्ध है। मूर्धा या सहस्रार में, आनन्दमय कोश में अवस्थिति से ब्रह्मलोक की प्राप्ति स्वाभाविक है, क्योंकि उस स्तर के व्यक्ति इस जीवन में भी ब्रह्म-चेतना से ही निरन्तर जुड़े रहते है।
चिन्तन से ही तन्मय रहने लगे और अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं को हटाने तथा विशेषताओं को बढ़ाने के लिए सुनिश्चित मार्ग ढूंढ़ निकालने में भी सफल हो गये। इस प्रकार यह स्तब्धता जहाँ अनभ्यस्त होने के कारण अखरी तो किन्तु थोड़े समय में वह न केवल सहन ही हो गई वरन् उपयोगी तथा रुचिकर भी लगने लगी।
चिन्तन और कर्त्तव्य मात्र शरीर की चर्चा तक सीमित रहता है। मानव शरीर का उपयोग विशाल क्षेत्र में करना पड़ता हैं, तभी उसकी सार्थकता होती है।
चिन्तन से ऐसे ही लोगों का जी उचटता है और एकान्त उन्हें ही डर लगता है।
चिन्तन और प्रवाहपूर्ण कर्म उनके वश की बात नहीं। वैसे भी, सामाजिक हित की चिन्ता करने वालों में आन्तरिक प्रसन्नता की भी स्वाभाविक प्रवृत्ति सर्वत्र देखी-पाई जाती है। चिड़चिड़ापन, अवसाद, असमंजस और कुण्ठा तो उन्हें ही अधिक घेरती है, जो अपनी ही भौतिक सुविधाओं की चिन्ता एवं अनुकूलताओं की कामना में दिन-रात डूबे रहते हैं।
चिन्तन और कर्म को पूरी तरह नास्तिक नहीं माना जा सकता। नास्तिक तो वह हैं, जिसे कर्मों के सुनिश्चित परिणाम पर एवं कार्य-कारण के अनिवार्य सम्बन्ध पर विश्वास नहीं हैं और इसलिए जो उत्कृष्ट चिन्तन तथा आदर्श कर्तृत्व को मूर्खों तथा उद्भ्रांतों की हरकतें मानता है। ऐसी मान्यता किसी चिन्तन का नहीं, चित्त की विकृति का परिणाम है।
चिन्तन का तो जब भी, जहाँ भी प्रयास होगा, वह प्रत्यक्ष न सही परोक्ष रूप में आस्तिकतावादी मूल्यों और नैतिक प्रतिमानों की ही पुष्टि करेगा।
चिन्तन का नहीं, चित्त की विकृति का परिणाम है।
चिन्तन और आचरण का स्तर है। इसीलिए विवेकानन्द ने कहा था-’जिसे स्वयं पर विश्वास नहीं, वही नयी परिभाषा के अनुसार नास्तिक है। अतिमानस-अतिमानव आदि आदर्शों की संस्थापना करने वाले चिन्तन और कर्म को पूरी तरह नास्तिक नहीं माना जा सकता। नास्तिक तो वह हैं, जिसे कर्मों के सुनिश्चित परिणाम पर एवं कार्य-कारण के अनिवार्य सम्बन्ध पर विश्वास नहीं हैं और इसलिए जो उत्कृष्ट चिन्तन तथा आदर्श कर्तृत्व को मूर्खों तथा उद्भ्रांतों की हरकतें मानता है। ऐसी मान्यता किसी चिन्तन का नहीं, चित्त की विकृति का परिणाम है।
चिन्तन तथा आदर्श कर्तृत्व को मूर्खों तथा उद्भ्रांतों की हरकतें मानता है। ऐसी मान्यता किसी चिन्तन का नहीं, चित्त की विकृति का परिणाम है।
चिन्तन अपना कर मनचाही प्रगति कर सकता है। इस प्रकार यह स्थिति रचनात्मक प्रगति के लिए भी बहुत उपयुक्त बैठती है।
चिन्तन-मनन और वार्तालाप नहीं करते। उससे पढ़े हुये का प्रभाव जीवन में स्थायी नहीं हो पाता। यदि पुस्तकों के सार जीवन में उतारने की प्रक्रिया लोग सीख जायें तो सामार्न्यासी परिस्थितियों में ही हर व्यक्ति उत्कृष्टता क चरम बिन्दु तक पहुँच सकता है। पुस्तकें गौघृत और दुग्ध के समान पौष्टिक आहर है। जो मन, बुद्धि, आचार-विचार, तक व विवेक को परिपुष्ट करके आत्मोत्थान का उज्ज्वल पथ-प्रशस्त करती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-January
चिन्तन का भी सही स्वरूप सामने लाना सम्भव हो जायेगा जिससे अपराधी कहाँ गया है यह सब तुरन्त पता चल जायेगा। यह अनुसंधान भी उसी तथ्य को प्रकट करते और बताते हैं कि एकबार किसी वातावरण को शक्तिशाली आत्म शक्ति - भावनाओं से मथ दिया जाये तो वहाँ चिरकाल तक लोगों को प्रभावित करती रहने वाली परिस्थितियाँ पैदा हो जाती हैं। इन दिनों सारे समाज सारे वातावरण में अनीति, बेईमानी चरित्रहीनता, तृष्णा, लिप्सा और क्षुद्र अहंकार का जो विष समा गया है उसे धोने के लिये यज्ञ और गायत्री के व्यापक विस्तार की क्रान्ति खड़ी करनी पड़ेगी। युग शक्ति गायत्री के अवतरण का यही मूलभूत उद्देश्य है जिसे इस युग की जागृत आत्माओं को अपना कर्त्तव्य समझ कर पूरा करना है।
चिन्तन और अध्यात्म के माध्यम से सृष्टि रहस्यों को सुलझाने की उनकी क्षमता पर दंग रह जाना पड़ा। शास्त्रों में कितने ही ऐसे पेड़ पौधों का उल्लेख है जो वनस्पतियों के सामान्य स्वभाव से अलग विशिष्ट हलचलें करते हैं। ऐसे पेड़ पौधे आज भी दुनिया में यत्र तत्र पाये जाते है।
चिन्तन को एक दिशा में मोड़कर की जाने वाली ध्यान साधना के चमत्कारी परिणाम सामने आ रहे है।
चिन्तन और कर्म होगा। उसी के अनुसार व्यक्तित्व समुन्नत अथवा पतित बनता चला जायेगा।
चिन्तन, उपासना और यज्ञों के विस्तार द्वारा गायत्री मय बनाया जा सके तो युग शक्ति का यह अवतरण सफल और सार्थक हो कर रहेगा। उससे इस देश और विश्व को चिरकाल तक स्वस्थ, स्वच्छ और समर्थ बनाये रखने वाली ऊष्मा का प्रस्फुटन सम्भव होगा। इसे अपना पुनीत कर्त्तव्य मानकर प्रत्येक उस व्यक्ति को, जिसे युग शक्ति गायत्री का संपर्क सान्निध्य मिला है, दूसरों तक पहुँचने के लिए हृदय अन्तःकरण से कटिबद्ध होना पड़ेगा। इतना किया जा सका तो इस महान् सत्ता का अवतरण सफल और सार्थक होकर ही रहेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-October
चिन्तन प्रवाह में निष्कृष्टता भर जाने से वातावरण विकृत होता है। उससे प्रभावित जन मानस में कुकल्पनाएँ, दुर्भावनाएँ और अनीति मूलक उच्छृंखलताएं ज्वार-भाटों की तरह उठती है॥ अचिन्त्य चिन्तन का परिणाम अन्तःकरण में उद्विग्नता और कुटिलताओं के रूप में प्रकट होता है। फलतः संकीर्ण स्वार्थपरता निरंकुश उच्छृंखलता एवं आक्रामक दुष्टता अपनाने पर उतारू होता है। कुविचारों की परिणित दुर्व्यवहार से होती है। फलतः मनोमालिन्य, विलगाव, सहयोग, विरोध एवं विग्रह के रूप में प्रतिद्वन्दिताएँ खड़ी होती हैं और अनेकानेक समस्याएँ उत्पन्न कर देती हैं।
चिन्तन और प्रयास का निर्धारण करता है। “दैवेच्छा क्लीयसी” की उक्ति में इसी कटु सत्य की ओर संकेत किया गया है।
चिन्तन प्रक्रिया अपनाने के कारण उन्होंने इतनी सफलताएँ अर्जित कर दिखाई जो छह प्रतिशत या इससे भी अधिक सक्रिय मस्तिष्क वाले व्यक्ति भी प्राप्त नहीं कर सके। इसका एक ही कारण है कि अस्त-व्यस्त मनःस्थिति और मानसिक विकृतियाँ मस्तिष्क को चौपट करके रख देती हैं। बाहर वालों को न दीख पड़ने पर भी ऐसे व्यक्ति बेतरह जलते कुढ़ते रहते है और अपनी मस्तिष्कीय क्षमताओं को बर्बाद करते रहते हैं।
चिन्तन का परिणाम अन्तःकरण में उद्विग्नता और कुटिलताओं के रूप में प्रकट होता है। फलतः संकीर्ण स्वार्थपरता निरंकुश उच्छृंखलता एवं आक्रामक दुष्टता अपनाने पर उतारू होता है। कुविचारों की परिणित दुर्व्यवहार से होती है। फलतः मनोमालिन्य, विलगाव, सहयोग, विरोध एवं विग्रह के रूप में प्रतिद्वन्दिताएँ खड़ी होती हैं और अनेकानेक समस्याएँ उत्पन्न कर देती हैं। प्रभावित लोग स्वयं उद्विग्न रहते और दूसरों को अप्रसन्न करते हैं।
चिन्तन सूक्ष्म। वायुमण्डल स्थूल है और वातावरण सूक्ष्म। दुष्कर्मों से वायुमण्डल विकृत होता है, प्रकृति रूठती है और परिस्थितियां दुःखदायी बनती हैं। आवश्यक वस्तुओं का अभाव, घटनाक्रम की प्रतिकूलता और कष्ट संकटों का-विरोध विग्रह का अभिवर्धन यह वायुमण्डल की विषाक्तता का परिणाम है। वातावरण चेतन है।
चिन्तन की यह एकाग्रता, मन को एक ही दिशा में केन्द्रित करना आवश्यक है ही लौकिक जगत में भी तब तक सफलता नहीं मिलती जब तक कि अपनी सम्पूर्ण मनःशक्ति को पूर्णतया एक ही दिशा में नियोजित न किया जाय। अभीष्ट दिशा में अपनी सम्पूर्ण मनःशक्ति को नियोजित कर ही संसार में कोई व्यक्ति किसी क्षेत्र विशेष में चमत्कारी सफलतायें प्राप्त कर सका हैं। इसके अतिरिक्त कोई और मार्ग नहीं रहा है तथा न ही सफलता प्राप्त करने का कोई उपाय।
चिन्तन मस्तिष्क का प्रधान कार्य है। यदि वह सही और सन्तुलित हो तो सामान्य स्तर का मस्तिष्क भी पग-पग पर सफलताएँ प्राप्त करता चलता है। संसार में। जितने भी महापुरुष और सफल व्यक्ति हुए हैं, उनमें से अधिकांश के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उनकी मस्तिष्कीय क्षमता का अधिकतम छह प्रतिशत भाग ही सक्रिय रहा। लेकिन सही और सन्तुलित चिन्तन प्रक्रिया अपनाने के कारण उन्होंने इतनी सफलताएँ अर्जित कर दिखाई जो छह प्रतिशत या इससे भी अधिक सक्रिय मस्तिष्क वाले व्यक्ति भी प्राप्त नहीं कर सके।
चिन्तन एवं दुष्ट आचरण के लिए असाधारण दुस्साहस ही करना होता होगा अन्यथा वातावरण के दबाव में सहज ही वैसा कुछ कर सकना सहज नहीं अतीव दुस्तर था। आज आकाँक्षाएँ और विचारणाएँ मानवी आदर्शों से विपरीत दिशा में उद्दण्ड अंधड़ की तरह बह रही हैं उससे अनपढ़ ही नहीं सुशिक्षित और सभ्य कह जाने वाले लोग भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-June
चिन्तन को उत्कृष्टता में रस लेने के लिए सहमत किया जाना है। आत्मा और परमात्मा के बीच की खाई पाटनी होती है। यह सारे कार्य अन्तःपरिशोधन और आत्म परिष्कार से संबन्धित है। इसलिए योग साधना वस्तुतः मन को साधने की ही विद्या है। उसमें अपनी अन्त भूमिका से ही जूझना पड़ता है।
चिन्तन को आगे बढ़ाता है और पुस्तकों के रूप में अपनी विरासत अगली पीढ़ी के लिए छोड़ जाता है। सम्भव है कि इन कार्यों के मूल में व्यक्ति की अपनी महत्वाकाँक्षा भी जुड़ी हो, पर वह महत्वाकाँक्षा इतने ऊँचे स्तर की होती है कि उसमें मनुष्य जाति के कल्याण का उद्देश्य भी जुड़ा होता है और उन आकाँक्षाओं को पूरा करने में जो कठोर श्रम करना पड़ता है तथा जिन कठिनाइयों से सामना होता है वे स्थितियाँ व्यक्ति की साधना को तपसाधना बना देती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-November
चिन्तन के रूप में उनके लघु वृहत् गद्य खण्ड साहित्यलोचकों की दृष्टि से अछूते नहीं रह सकेंगे। अभिव्यक्ति की शैली के रूप में महर्षि की निर्भीकता, स्वामी की तेजस्विता और महात्मा की सहज सरलता आलोचकों की खरी कसौटी पर अपनी स्वर्णिम आभा अंकित करती है
चिन्तन धारा, जीवन पद्धति और कर्मशीलता को आमूल प्रभावित किया है, धीरे धीरे उनका प्रभाव देश के शेष भागों एवं विदेशों में भी परिलक्षित होने लगा है, उनकी लेखनी ने भारतीय धार्मिक एवं साँस्कृतिक ग्रन्थों की सरल टीकायें प्रस्तुत की हैं, प्रचलित चिन्तन पद्धतियों का गम्भीर मनन कर के उनका समन्वित निचोड़, धर्म प्राण जनता एवं सुधि-बुद्धि जीवियों के लिए सुलभ किया है।
चिन्तन मनन का परिचय दिया है। उनकी कृतियाँ चाहे वे रामचरित मानस से प्रगतिशील प्रेरणा की हों या भारतीय संस्कृति का विश्व की “अजस्र अनुदान” वैचारिक क्रान्ति की दृष्टि से अपना अलग अलग महत्वपूर्ण एवं स्थान रखती हैं।
चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में आचार्य श्रीराम शर्मा के चिन्तन का मूल्याँकन।
चिन्तन-
चिन्तन पद्धतियों का गम्भीर मनन कर के उनका समन्वित निचोड़, धर्म प्राण जनता एवं सुधि-बुद्धि जीवियों के लिए सुलभ किया है।
चिन्तन (2) जीवन दर्शन की धारणा और भारतीयेतर चिन्तन (3) जीवन दर्शन के मूल तत्व और उनका विवेचन (4) सामयिक चिन्तन-
चिन्तन का मूल्याँकन।
चिन्तन एवं श्रेष्ठ आचरण वाले जीवन्त देव मानव एवं प्रबुद्ध जन इस क्षेत्र में आगे आयें और धर्मतन्त्र को परिमार्जित, परिशोधित, नवनिर्धारित कर आस्था की ज्योति को जागृत रखें। आस्था ही मानवीय अन्तःकरण को आनन्दित, पुलकित, प्रफुल्लित रख सकती है और प्रगति पथ पर बढ़ते रहने का पाथेय जुटाती रह सकती है।
चिन्तन (3) जीवन दर्शन के मूल तत्व और उनका विवेचन (4) सामयिक चिन्तन-
चिन्तन को अपने जीवन में उतारा और वृहत्तर समाज में विकीर्ण किया। उनके लिखे की लीक पीटने वाले आलोचक भले ही विशुद्ध साहित्य के अंतर्गत न रख सकें किन्तु उनके विचारों जीवन क्रम और कृतित्व ने समाज को इतना अधिक प्रभावित किया है कि विशिष्ट शैली में अभिव्यक्त गम्भीर चिन्तन के रूप में उनके लघु वृहत् गद्य खण्ड साहित्यलोचकों की दृष्टि से अछूते नहीं रह सकेंगे। अभिव्यक्ति की शैली के रूप में महर्षि की निर्भीकता, स्वामी की तेजस्विता और महात्मा की सहज सरलता आलोचकों की खरी कसौटी पर अपनी स्वर्णिम आभा अंकित करती है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-July
चिन्तन को परिष्कृत किया है। इसी आधार पर उनकी गतिविधियाँ सुधरी। चिन्तन और कर्तृत्व इन्हीं दो पैरों के सहारे मनुष्य आगे बढ़ता। यदि वे विकृत स्तर के हों तो प्रगति पतन की दिशा में होगी और स्थिति दुखद एवं निराशाजनक बनती चली जायेगी।
चिन्तन में उलझायें रहती है जिसमें मिलता कुछ नहीं, गँवाना ही गँवाना हाथ लगता है। चिन्ता, निराशा भय, क्रोध, प्रतिशोध, द्वेष जैसे आवेश दोनों ही ज्वार-भाटों की तरह अवाँछनीय उद्वेग उत्पन्न करते है। इस जंजाल में मनुष्य को अपनी उस क्षमता को व्यर्थ नष्ट करना पड़ता है जो यदि सृजनात्मक दिशा में लगी होती तो चमत्कार उत्पन्न किया होता। प्रतिकूल परिस्थितियों में अवसाद और आवेश आता है यह ठीक है, पर यह तो अनगढ़ स्थिति हुई। परिष्कृत मनः स्थिति में इन आवेशों पर नियन्त्रण प्राप्त किया जा सकता है।
चिन्तन की आदत से होती है। ऐसा व्यक्ति अपनी बहुमूल्य चिन्तन क्षमता का बहुत बड़ा भाग इसी भट्टी में झोंकता जलाता रहता है और कुछ महत्वपूर्ण सोच सकने की क्षमता गँवा बैठता है। जब देखो तब चिन्ताओं की काली घटाएँ ही उसके सिर पर छाई रहती हैं।
चिन्तन और मनन। आत्म-चिन्तन द्वारा अपनी समीक्षा आप ही करनी चाहिए। जैसे प्रयोगशाला में पदार्थों का वर्गीकरण कर उनकी संरचना के तत्वों को देखा-परखा जाता है, उसी प्रकार अन्तःकरण की प्रयोगशाला में चिन्तन-प्रक्रिया द्वारा अपनी भीतरी स्थिति का वर्गीकरण कर उसे देखा -परखा जाता है। गुण-कर्म-स्वभाव की स्थिति और प्रकृति समझी जाती है। उनका आदर्श स्वरूप क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है, यह विचारपूर्वक निर्धारित किया जाता है।
चिन्तन की विकृति सदा ही मानसिक दरिद्रता के शोक संताप में डुबाये रहेगी। संसार में सुखद बहुत कुछ है। सज्जनों की भी कमी नहीं। अपने साथ सदा अपकार ही अपकार होते रहे हों ऐसी बात नहीं। अनेकों के सहयोग और उपकार भी समय-समय पर मिलते रहे हैं।
चिन्तन द्वारा अपनी समीक्षा आप ही करनी चाहिए। जैसे प्रयोगशाला में पदार्थों का वर्गीकरण कर उनकी संरचना के तत्वों को देखा-परखा जाता है, उसी प्रकार अन्तःकरण की प्रयोगशाला में चिन्तन-प्रक्रिया द्वारा अपनी भीतरी स्थिति का वर्गीकरण कर उसे देखा -परखा जाता है। गुण-कर्म-स्वभाव की स्थिति और प्रकृति समझी जाती है। उनका आदर्श स्वरूप क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है, यह विचारपूर्वक निर्धारित किया जाता है।
चिन्तन से मस्तिष्क को भरे रहने की हानि को समझा जा सके तो इतने भर से अनायास ही ईश्वर प्रदत्त उस आनन्द और उत्कर्ष का लाभ मिल सकता है जिसके लिए जीवन और उसका महान संरक्षक यह मन हमें प्राप्त हुआ है।
चिन्तन तर्क और अनुमान के सहारे ही तो खड़ा किया जाता है। जो आशंका की गई थी जिस संभावना की कल्पना की गई थी, वह निश्चित रूप से होकर ही रहेगी यह नहीं कहा जा सकता। ऐसी दशा में यदि यह गठन विधेयात्मक स्तर का किया जाय तो क्या हर्ज है। भविष्य के उज्ज्वल होने, सफलताएँ मिलने की आशा भी बँध सकती है। उसके पक्ष में भी तर्क और तथ्य ढूँढ़े जा सकते हैं, जिनमें शत्रुता का भय सोचा गया था, उनके उदासीन रहने अथवा समयानुसार मित्र बन जाने की बात भी सर्वथा अशक्य ही नहीं होती।
चिन्तन करो। तुम लोगों ने यह तो देख लिया कि मात्र इच्छा से कुछ नहीं होता। अब मैं तुम्हारी इच्छा में शक्ति का संचार करता हूँ। तीनों शिष्यों ने फिर मुट्ठियाँ बन्द कर लीं। बाबा के कहने पर जब उन्होंने पाया तो तीनों की मुट्ठियों में इच्छित वस्तुएँ।
चिन्तन अथवा हलचलों के लिए हम जान-बूझ कर कुछ नहीं भी करें तो भी मस्तिष्क तन्त्र स्वयमेव चालू रहेगा। उसे सोते जागते विश्राम कभी नहीं। सोचने विचारने वाला भाग कुछ समय तक नींद में विश्राम भी पा लेता है, पर अवयवों को गतिशील एवं जीवित रखने वाला अचेतन भाग तो जन्म से लेकर मरण पर्यन्त अनवरत रूप से कार्य संलग्न ही रहता है।
चिन्तन-प्रक्रिया द्वारा अपनी भीतरी स्थिति का वर्गीकरण कर उसे देखा -परखा जाता है। गुण-कर्म-स्वभाव की स्थिति और प्रकृति समझी जाती है। उनका आदर्श स्वरूप क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है, यह विचारपूर्वक निर्धारित किया जाता है।
चिन्तन को दिशा मिलेगी। धर्म संस्थानों को अपनी गतिविधियों पर नये सिरे से विचार करना होगा और उनके पुनर्निर्धारण के लिए विवश होना होगा। तुलनात्मक अध्ययन के लिए जो अवसर चाहिये उसे यह शक्ति पीठें प्रस्तुत कर सकेगी ऐसा विश्वास किया जा सकता है। यदि हो सके तो यह एक बड़ी क्रान्ति होगी। धर्म के निमित्त लगने वाली धनशक्ति, धर्मशक्ति, बुद्धिशक्ति और भावशक्ति को यदि सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन की ओर मोड़ा जा सके तो यह ऐसा हो चमत्कार होगा जैसा कि बाढ़ से भूमि और फसल को नष्ट करने वाली नदियों पर बाँध बना कर नहरें निकालना और बिजली घर बनाना।
चिन्तन की भ्रष्टता एवं कर्तृत्व की निकृष्टता का परिष्कार भी इसी प्रकार सम्भव है। इस बात से कोई भी विचारशील इन्कार नहीं कर सकता कि भ्रष्ट चिन्तन एवं निकृष्ट कर्तृत्व वातावरण को उसी प्रकार दूषित कर रहे है जिस प्रकार परमाणविक परीक्षण।
चिन्तन की चमत्कारी शक्ति का ज्ञान होता तो आज की स्थिति में भी उन्हें हँसता-हँसाता पाया जाता, वे स्वयं प्रसन्न रहते और साथियों को प्रसन्नता का लाभ देते दृष्टिगोचर होते।
चिन्तन की विधेयात्मक धारा अपनाने के लिए यदि प्रशिक्षित किया जा सके तो उतने भर से समृद्धि, सफलता, प्रसन्नता एवं उज्ज्वल भविष्य की उत्साह भरी आशा का आनन्द लिया जा सकता है। आँखों में चमकने वाली आशा, साहस बढ़ाती है और उपयोगी पुरुषार्थ करने के लिए प्रेरणा देती है। निराशा में नष्ट होने वाली शक्ति को यदि आशा भरी सृजनात्मक स्थिति में प्रयुक्त किया जा सके तो इतने भर से मनोबल बढ़ने लगेगा और उस अभिवृद्धि से सहज ही ऐसी क्षमता विकसित हो सकेगी जिसके सहारे सचमुच ही उज्ज्वल भविष्य का सृजन हो सके।’
चिन्तन से विरत करके विधेयात्मक दिशा अपनाने के लिए सहमत अभ्यस्त किया जा सके तो यह जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि ही कही जायेगी। संसार के सफलता सम्पन्न महामानवों को सबसे प्रथम अपने चिन्तन को परिष्कृत किया है। इसी आधार पर उनकी गतिविधियाँ सुधरी। चिन्तन और कर्तृत्व इन्हीं दो पैरों के सहारे मनुष्य आगे बढ़ता। यदि वे विकृत स्तर के हों तो प्रगति पतन की दिशा में होगी और स्थिति दुखद एवं निराशाजनक बनती चली जायेगी।
चिन्तन के प्रतिकूल अनायास ही सुखद सम्भावनाएँ विनिर्मित होने लगें। जब परिवर्तन एक तथ्य है तो निराशा के आशा में बदल जाने की सम्भावना को ही क्यों अस्वीकार किया जाय?
चिन्तन एवं निकृष्ट कर्तृत्व वातावरण को उसी प्रकार दूषित कर रहे है जिस प्रकार परमाणविक परीक्षण।
चिन्तन में उतारा जा सके तो सत्प्रवृत्तियों के विकास में असामान्य योगदान मिलेगा। चिन्तन की भ्रष्टता एवं कर्तृत्व की निकृष्टता का परिष्कार भी इसी प्रकार सम्भव है। इस बात से कोई भी विचारशील इन्कार नहीं कर सकता कि भ्रष्ट चिन्तन एवं निकृष्ट कर्तृत्व वातावरण को उसी प्रकार दूषित कर रहे है जिस प्रकार परमाणविक परीक्षण।
चिन्तन और कर्तृत्व इन्हीं दो पैरों के सहारे मनुष्य आगे बढ़ता। यदि वे विकृत स्तर के हों तो प्रगति पतन की दिशा में होगी और स्थिति दुखद एवं निराशाजनक बनती चली जायेगी।
चिन्तन तथा दुष्ट कर्तृत्व वातावरण में ऐसे प्रदूषण भरने लगा जो वायुमण्डल में बढ़ती जाने वाली विषाक्तता से भी अधिक भयंकर है।
चिन्तन क्षमता का बहुत बड़ा भाग इसी भट्टी में झोंकता जलाता रहता है और कुछ महत्वपूर्ण सोच सकने की क्षमता गँवा बैठता है। जब देखो तब चिन्ताओं की काली घटाएँ ही उसके सिर पर छाई रहती हैं।
चिन्तन, मनन, ध्यान, कल्पना, योजना, निष्कर्ष, निश्चय आदि क्रियाएँ वह अपने आप अकेला ही कर लेता है। चलना-फिरना, खाना-पीना, देखना, सुनना, बोलना जैसे कार्य उसे इन्द्रियों की सहायता से कराने पड़ते है।
चिन्तन और अभद्र आचरण पर उतारू होता है तो उसकी प्रतिक्रिया व्यक्तिगत समस्याओं, समाजगत कठिनाइयों के रूप में ही नहीं प्रकृति संतुलन बिगड़ने के रूप में भी सामने आती है। सतयुग की श्रेष्ठ परिस्थितियों में उस समय की सामूहिक मनःस्थिति की उत्कृष्टता ही प्रधान कारण थी। इन दिनों जन समुदाय की अभिरुचि, विचारणा एवं कार्य पद्धति निकृष्टता की दिशा में बढ़ रही है फलतः समस्याओं, विपत्तियों के अतिरिक्त दैवी प्रकोपों की विभीषिका का अनुपात निरन्तर बढ़ रहा है। अति वृष्टि, अनावृष्टि और समुद्री तूफानों के कारण हुई दुर्घटनाओं के समाचार अक्सर सुनने को मिलते रहते है।
चिन्तन कर सकना और सही निष्कर्ष निकाल सकना सम्भव नहीं रहता। थका हुआ आदमी असफलताओं की निराशाजनक बातें सोचता है और नशे में धुत्त व्यक्ति दूनकी हाँकता है। जिसे कुछ विशेष उपलब्धियाँ मिल गई हैं वह फूला नहीं समाता और धरती जोतने जैसे मंसूबे बाँधता है। लो ब्लड प्रेसर और हाई ब्लड प्रेसर के लक्षण भिन्न-भिन्न है, पर कष्ट दोनों ही व्याधियों के रोगी समान रूप से भुगतते हैं।
चिन्तन कहीं अन्यत्र है तो वस्तु सामने रहते भी दिखायी नहीं पड़ती। ध्वनि कम्पन कर्णेन्द्रिय पर बराबर पड़ती रहती है किन्तु सुनायी नहीं पड़ती है। किसी कार्य में तल्लीन रहने पर कोई बुलाता है तो सुनायी नहीं पड़ता। त्वचा द्वारा अनुभव करना,
चिन्तन, मनोयोग, प्रभाव, प्रतिभा और शक्ति को लगाया जाना चाहिए। यदि धन की लिप्सा ने अभीष्ट तृष्णा का रूप धारण कर लिया तो चिन्तन और थम पूरी तरह उसी दिशा में लगा रहेगा। फिर उच्चस्तरीय अध्यात्म प्रयोजन मात्र एक कल्पना की वस्तु बनकर रह जायेगा। फलतः व सारे कार्य अपूर्ण ही पड़े रहेंगे जिनके लिए मनुष्य जीवन का अनुपम उपहार मिला है। दूरदर्शिता इसी में है कि शरीर और परिवार के लिए धन उपार्जन में उतना श्रम किया जाय और मनोयोग लगाया जाय जिससे सामान्य निर्वाह की गाड़ी किसी प्रकार लुढ़कती रहे।
चिन्तन सही भी है। आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के लिए श्रम, समय देने का इससे अच्छा और इससे सुव्यवस्थित सुअवसर कदाचित ही फिर किसी को मिल सकेगा। प्रव्रज्या में सम्मिलित होने का अदृश्य उत्साह भी उसमें कम नहीं उभर रहा है। जैसा कि भवन निर्माण का दृश्य प्रयास सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रहा है। शक्ति पीठों के साथ जुड़कर काम करने के लिए सृजन शिल्पियों के अंतःकरणों में इन दिनों उठ रही उमंगे देखते ही बनती हैं।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की नीति ही अध्यात्म की सच्ची साधना है और उसी का अभ्यास कर सामान्य, स्थिति में रहते हुए भी देवोपम जीवन व्यतीत किया जा सकता है। उसके आलोक से असंख्य व्यक्तियों का भला किया जा सकता है। सही अर्थों में यही अध्यात्म का चमत्कार है। और जिन व्यक्तियों ने भी अध्यात्म के मर्म को समझा है उन्होंने सिद्धियों और चमत्कारों को व्यर्थ बताया है।
चिन्तन और थम पूरी तरह उसी दिशा में लगा रहेगा। फिर उच्चस्तरीय अध्यात्म प्रयोजन मात्र एक कल्पना की वस्तु बनकर रह जायेगा। फलतः व सारे कार्य अपूर्ण ही पड़े रहेंगे जिनके लिए मनुष्य जीवन का अनुपम उपहार मिला है। दूरदर्शिता इसी में है कि शरीर और परिवार के लिए धन उपार्जन में उतना श्रम किया जाय और मनोयोग लगाया जाय जिससे सामान्य निर्वाह की गाड़ी किसी प्रकार लुढ़कती रहे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-August
चिन्तन और दुष्ट आचरण की-छद्म एवं स्वार्थ साधन के लिए कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती। ऐसे उच्चस्तरीय नेतृत्वों का उदय ही जब बन्द हो गया तो लोक चेतना क्यों न जगायें? भटकने और भटकाने वाले लोग ही मिल जुलकर नेता और अनुयायियों की मण्डलियाँ बना-बनाकर जल-कल्याण के नाम पर शालीनता का निर्माण करने में लगे हुए हैं। यह परिस्थिति और किसी तरह दूर नहीं हो सकती। प्रज्ञावतार की प्रेरणा से उत्पन्न उत्कृष्टता सम्पन्न मनःस्थिति ही नेतृत्व के अभाव को पूरा कर सकने में समर्थ हो सकती है।
चिन्तन से ही शान्त होगी। अन्यथा तनिक-तनिक सी बातों पर उत्तेजना, उद्विग्नता के ज्वालामुखी फूटते रहेंगे। वस्तुओं का बाहुल्य और व्यक्तियों का अनुकूलन एक स्वप्न है जिसकी पूर्ति व्यावहारिक जीवन में सम्भव नहीं। हर किसी को ताल-मेल बिठाकर चलना पड़ता है। अधिकार के साथ कर्तव्य को-उपार्जन के साथ सन्तोष को -संघर्ष के साथ सहयोग को-उपभोग के साथ संयम को मिलाकर चलने से ही मानसिक सन्तुलन बनता है।
चिन्तन का परिष्कार, सत्प्रवृत्तियों का अवगाहन। यह दीखते तो तीन है, पर वस्तुतः एक ही तथ्य के तीन रूप हैं। सत्कर्म और सद्ज्ञान वस्तुतः सद्भावों का ही उत्पादन है। यही है जागृत आत्माओं के माध्यम से प्रज्ञावतार द्वारा कराया जाने वाला महा प्रयास। हर जागृत आत्माओं को अगले दिनों अपनी समस्त तत्परता और तन्मयता जन-मानस के परिष्कार कर केन्द्री भूत करनी होगी।
चिन्तन का अभाव नहीं स्वेच्छाचार का नियंत्रण बताया जाता है। अर्थ समस्या का समाधान श्रमशीलता और मितव्ययिता का अभाव नहीं पूँजी का वितरण माना जाता है। अपराधों को रोकने के लिए आस्तिकता का, आध्यात्मिकता का तत्व-दर्शन हृदयंगम कराने की अपेक्षा की जाती है और पुलिस,कचहरी में समाधान सोचा जाता है। राजसत्ता के सुधार की जादुई छड़ी मानकर उस पर आधिपत्य करने के लिए हर महत्वाकाँक्षी लालायित है। धर्मतन्त्र को परिष्कृत करने और उसके सहारे आस्थाओं से झंझट करने का मार्ग किसी को सूझता तक नहीं है।
चिन्तन करने के लिए नियत रहता है। नव जागरण की पुण्य-बेला ऐसे ही विशेष कर्तव्य और उत्तरदायित्वों के निर्वाह के परिपालन की प्रेरणा देता है। जागृत आत्माएं तो उसके लिए एक प्रकार से महाकाल द्वारा बलात् प्रेरित की जाती है। इन दिनों भी ठीक वैसा ही हो रहा है। प्राणवानों को समय की माँग और पुकार को सुनने तथा तदनुकूल कार्यक्रम बनाने के लिए कटिबद्ध होते देखा जा रहा है।
चिन्तन की उपयुक्त दिशा धारा मिलने से उनकी क्रियाधारा उत्कृष्टता की ओर प्रवाहित होती है। इसका परिणाम उस स्तर की सफलता बनकर सामने आता है जिसे सामान्यतया वरदान या चमत्कार की संज्ञा दी जाती है।
चिन्तन। इसका निराकरण आज एक ही उपाय से हो सकता है। अन्तःचेतना का ऊर्ध्वगमन, उन्नयन, अभ्युदय, प्रज्ञावतार की तूफानी गतिविधियाँ जन-जन के अन्तःकरण को झकझोरेंगी और उसे क्रमशः उस दिशा में धकेलती घसीटती ले चलेंगी जहाँ उसे शालीनता और सदाशयता से बढ़कर और कुछ मूल्यवान प्रतीत ही नहीं होता हो। मूर्धन्य देव-मानवों के माध्यम से प्रज्ञावतार आस्था संकट के निवारण का प्रयत्न कर रहा है। धर्म क्षेत्र की नर्सरी में ही महामानवों के कल्पवृक्ष उत्पन्न होते रहेंगे।
चिन्तन में भ्रष्टता और चरित्र में दृष्टता का बाहुल्य रहता ही है। सज्जन प्रकृति के लोग भी यदा कदा अवाँछनीयता की कीचड़ में फिसलते देखे गये है। इस अनुपयुक्तता से जूझना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि सृजन के साधन जुटाना। “
चिन्तन ने दुष्ट आचरण को बढ़ाया है और अवाँछनीयता को उच्छृंखलता के स्तर तक पहुँचने का अवसर मिला है। फलतः अनीति अपनाने में एक-दूसरे से आगे बढ़ना चाहता है। दुष्प्रवृत्तियाँ क्रमशः परम्परा बनती और मनुष्य स्वभाव में सम्मिलित होती जा रही है। फलतः अनीति की क्रिया-प्रतिक्रिया में भयंकर विक्षोभ हो रहे है। उत्पीड़न और विग्रह के फलस्वरूप अनेकानेक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समस्याएँ उत्पन्न हो रही है।
चिन्तन की भ्रष्टता और आचरण की दुष्टता भयावह रूप धारण करती और श्मशान में होने वाले प्रेत पिशाचों के नृत्य जैसा जीवन क्रम एवं वातावरण विनिर्मित करती है। धर्म क्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों तथा बुद्धिवाद के नाम पर पनपी भ्रान्तियों ने इन दिनों अश्रद्धा की भावनात्मक अराजकता उत्पन्न की है। परिणाम सामने है। मनुष्य क्रमशः नरपशु, नरकीटक, नर पिशाच बनता और पतन के गर्त में गिरता चला जा रहा है।
चिन्तन और चरित्र को बदलते हैं। उनकी चेतना नर कीटकों जैसा क्षुद्र जीवन जीने से स्पष्ट इन्कार करती है। पुरानी इच्छाएँ-रुचियों और आदतें बदलना आमतौर से सामान्य व्यक्तियों के लिए अतिकठिन होता है। इसे समुद्र तैरने और पर्वत लाँघते जैसा दुम बताया गया हैं। लोग श्रेष्ठता की दिशा में सोचते तो बहुत कुछ हैं पर संकल्प बल के अभाव में कर कुछ नहीं पाते।
चिन्तन और चरित्र के हर घटक में छाई रहती है जिसमें भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण की-छद्म एवं स्वार्थ साधन के लिए कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती। ऐसे उच्चस्तरीय नेतृत्वों का उदय ही जब बन्द हो गया तो लोक चेतना क्यों न जगायें? भटकने और भटकाने वाले लोग ही मिल जुलकर नेता और अनुयायियों की मण्डलियाँ बना-बनाकर जल-कल्याण के नाम पर शालीनता का निर्माण करने में लगे हुए हैं। यह परिस्थिति और किसी तरह दूर नहीं हो सकती। प्रज्ञावतार की प्रेरणा से उत्पन्न उत्कृष्टता सम्पन्न मनःस्थिति ही नेतृत्व के अभाव को पूरा कर सकने में समर्थ हो सकती है।
चिन्तन के माध्यम से ही आस्थाएँ जगाई जाती हैं, पर वह उथला नहीं गहरा होता है। तर्क का समावेश तो रहता है पर साथ में श्रद्धा भी जुड़ी रहती है। शुष्क तर्क बुद्धि विलास है। बहस के लिए ही बहस करने वाले-मस्तिष्क से चतुर वकीलों की तरह वह प्रतिपादन करते चले जाते हैं, जिन पर उनकी आस्था तनिक भी नहीं है। सच्चे को फँसाने और झूठे को छुड़ाने के लिए वे वकील भी प्रभावी बहस करते देखे गये हैं, जो वस्तु स्थिति को ठीक तरह समझते हैं।
चिन्तन और चरित्र का अविच्छिन्न अंग बना लेना। इस स्तर के व्यक्तित्व लोक प्रवाह से अलग थलग पड़ जाते हैं। लोगों की दृष्ट में वे मूर्ख होते हैं और उनकी दृष्ट में लोग मूर्ख। यह एक प्रकार से लौकिक जीवन का मरण है। जीवित रहते हुए भी वे आस-पास की परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होते अथवा दृष्टिकोण और कार्यक्रम दूसरों के प्रभाव, परामर्श से नहीं अन्तः प्रेरणा से निर्धारित करते है।
चिन्तन और मंथन से हर स्थिति का व्यक्ति अपनी योग्यता और परिस्थिति के अनुरूप काम ढूँढ़ निकालने में सफल हो सकता है। विचार क्रान्ति अभियान ही प्रज्ञावतार की प्रमुख प्रक्रिया है समस्त क्रिया कलाप इसी क्षेत्र में नियोजित रहेंगे। आस्थाओं का कल्प वृक्ष उग पड़ने के उपरान्त उसके पत्र, पल्लव और फल-फूलों की सम्पदा इतनी बढ़ी-चढ़ी होगी कि उसके सहारे प्रस्तुत संकटों के निवारण में कोई अड़चन शेष न रहे।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व से अपने जीवन श्रम को पूरी तरह सजे थे। उनके क्रिया-कलाप साहसिक परमार्थ प्रयोजनों भरे रहते थे। त्याग बलिदान की ही वैभव और वचनों मानते थे। यह परम्परा नष्ट हुई और धर्म का स्वरूप छत्र बनकर रह गया। ऐसी दशा में विनिर्मित हुए वातावरण में महामानवों का उत्पादन बन्द हो जाना स्वाभाविक ही था।
चिन्तन और दुष्टाचरण के साथ जूझने का प्रबल पराक्रम करना होता है। आत्म-सुधार अपने हाथ की बात है इसलिए संत का कार्यक्षेत्र सीमित और सरल है। किन्तु सुधारक को दूसरों को बदलना होता है। इसलिए अपेक्षाकृत अधिक प्राण शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। चरित्र ऊंचा साहस अधिक प्रखर और पुरुषार्थ अधिक बल चाहिए तभी दूसरों को अभ्यस्त अनाचार से विरत करने और सदाशयता अपनाने के लिए सहमत एवं विवश करना सम्भव होता है।
चिन्तन के लिए ब्रह्म विद्या का और व्यवहार में धारणा का आश्रय लेना होगा।
चिन्तन क्षेत्र पर आधिक्य जमाने वाले स्वेच्छाचार के प्रति बरती जानी चाहिए।
चिन्तन को तत्वदर्शन और व्यवहार को धर्म कहते हैं। दोनें को मिलाने से ही समग्र अध्यात्म बनता है। तत्वदर्शन को हृदयंगम करने की पद्धति को योग और व्यवहार में उच्चस्तर का समावेश करने का नाम तप कहा जाता है। तप को साधना और योग को ब्रह्मविद्या कहते हैं। आस्तिकता- आध्यात्मिकता और धार्मिकता की त्रिवेणी मिलने से वह त्रिवेणी बनती है, जिसमें स्नान करने पर रामायण में प्रतिपादित “काक होंहि पिक-बक्हु मराला” का भावनात्मक कायाकल्प संभव होता है।
चिन्तन यह बताता रहा कि भौतिक प्रगति ही सब कुछ है। साधनों के बढ़ने पर मनुष्य के सामने उपस्थित होने वाली सभी कठिनाइयों का समाधान हो जायगा।
चिन्तन, उदार आत्मीयता, अभिनेता जैसी मनःस्थिति बन जाने पर हर परिस्थिति में जी हलका रखा जा सकता है। ऐसा हलका मन रहने पर ही गुत्थियों के समाधान और प्रगति के निर्धारण सही रूप में सम्भव हो सकते हैं। कहना न होगा कि सौजन्य और सौमनस्य श्रद्धा तत्व के ही दो प्रतिफल हैं। मनीषी प्रकारान्तर से श्रद्धालु को ही कहते हैं। विवेक मात्र उन्हीं के मस्तिष्क में रहता है।
चिन्तन को उलझाया और कष्टकारण भूलभुलैयों में भटकाया है। भोले भावुक व्यक्तियों का चतुर लोग अन्धश्रद्धा के रस्से बाँधकर की अनुपयुक्त मान्यताओं के गर्त में धकेलते हैं। निहित स्वार्थों का व्यवसाय अन्धश्रद्धा की अन्धेर नगरी में जिस सफलता के साथ चलता है उतना अन्यत्र कहीं नहीं। भीरुता और बौद्धिक अपंगता मिलकर एक ऐसा दलदल प्रस्तुत करती है जिसमें जादू-टोना, देवभूत ज्योतिष से लेकर सामाजिक कुरीतियों जैसी विकृतियाँ ही पल्ले पड़ती हैं। तथा कथित प्रगतिशीलता अश्रद्धा में और पिछड़ी मनःस्थिति अन्ध श्रद्धा में भटकती है।
चिन्तन का लोभ मोह की कृपणता में बंधे रहना ही भव बन्धन है। विशाल हृदय होना ही जीवन मुक्ति है। श्रद्धा जगेगी तो मनुष्य स्वार्थी नहीं रहेगा। उनका आत्म गौरव अहंता के परिपोषण से नहीं उदात्त आदर्शवादिता अपनाने से ही परितृप्त होगा। ऐसे लोगों की गतिविधियाँ पीड़ा और पतन के उन्मूलन में-सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन में ही लगी रहती है।
चिन्तन और चरित्र में से आदर्श वादिता घटती और दुर्बुद्धिजन्य दुश्चरित्रता बढ़ती जाती है। व्यक्ति के पतन पराभव का एकमात्र कारण यही है। समाज का उत्थान पतन भी इसी तथ्य पर आधारित है। सृष्टि का चिरपुरातन इतिहास साक्षी है कि संकट असाधारण रूप से जब कभी जहाँ कहीं उभरे है वाही सृजन की दुर्बलता और ध्वंस की बलिष्ठता भी नाना आकार प्रकार के संकटों को बनाते उभारते देखा जा सकता है।
चिन्तन को परिष्कृत करने की दिशा में कई प्रचारात्मक कार्य आसानी से सम्पन्न हो सकते है। युगसाहित्य का निर्मा और प्रसारण एक कार्य है। और ज्ञान गोष्ठियों के माध्यम से मनीषियों द्वारा शिक्षण दूसरा। रचनात्मक ओर सुधारात्मक गतिविधियों की सुगठित रूप रेखा बना कर उनमें असंख्यों सद्भाव सम्पन्नों की श्रम-साधना नियोजित की जा सकती। समृद्धि सम्वर्धन के लिए जिस प्रकार सोचा जाता रहा है, जिस प्रकार उसमें साधन, श्रम तथा मनोयोग का नियोजन होता रहा है।
चिन्तन,प्रभाव का पूरी तरह परमार्थ के ब्रह्मानंद पर उत्सर्ग कर दिया। ऐसे लोगों की प्रतिभा एवं क्षमता सामान्य लोगों की तुलना में असंख्यों गुना अधिक होती है। स्व का परिपोषण मनुष्य की अधिकाँश शक्ति से निकल जाता है। यदि उससे बचा जा सके और सच्चे अर्थों में उत्कृष्टता के लिए समर्पण किया जा सके तो अहंता के परिपोषण में लगने वाली इच्छा,विचारणा एवं क्रियाशीलता इतनी अधिक मात्रा में बच जाती हे जिसके आधार पर सामान्य व्यक्ति भी सामान्य स्तर के काम कर सकता है। ऐसी प्रतिभाएं जब कभी,जहाँ कहीं उपलब्ध होती हैं तब वहीं चमत्कार उत्पन्न होते चले जाते है।
चिन्तन और जिस अभ्यास से उभारी जाती हैं, उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। संक्षेप में इसी को प्रज्ञा कहा गया है। गायत्री मंत्र की अन्तरात्मा को “प्रज्ञा की प्रेरणा” माना गया है। प्रज्ञा जीवन्त तभी होती है, जब उसमें प्रेरणा देन-प्रवाह उत्पन्न करने की क्षमता हो। गायत्री महामंत्र में यही सब कुछ है।
चिन्तन और चरित्र की दिशाधारा निर्धारित करती हैं। कौन किस प्रकार जिया और किन परिस्थितियों में रहा इसका निमित्त कारण उनके अन्तःकरण का स्तर ही होता है। यही उत्थान पतन का भाग्य विधान लिखा जाता है। कदाचित विधाता इसी मर्म केन्द्र को कहते है। भाग्य और भविष्य यदि वस्तुतः लिखा जाता होगा उसकी विधि पाठ अन्तराल के मर्मस्थल में ही प्रतिष्ठित होती होगी।
चिन्तन हैं और धर्म व्यवहार। दोनों का मिलाने पर ही समग्र धर्मतन्त्र बनता हैं। यहीं है वह प्रक्रिया जो लोक मानस के अन्तराल तक पहुँचने उसे बदलने और उत्कृष्टता के चरम लक्ष्य तक पहुँचाने में समर्थ हो सकती हैं। आस्थावान और धार्मिक एक ही होते हैं। प्रचलित धर्म परम्परा में भारी परिवर्तन करने की आवश्यकता हैं।
चिन्तन बच जाता है। इस बचत पूँजी से वे समाज का, ईश्वर का अनुग्रह प्रचर परिमाण से प्राप्त कर सकते हैं। आत्म गौरव और आत्म सन्तोष को भी यदि महत्व मिलता हो तो श्रद्धासिक्त व्यक्ति को उसकी अनुभूति हर घड़ी होती रहती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-March
चिन्तन शैली के अभ्यस्त कई समाज शास्त्रियों के अनुसार हत्याओं और अपराधों में यह वृद्धि स्वाभाविक है, क्योंकि भारतीय समाज आज संक्रमण काल से गुजर रहा है और औद्योगिक क्रान्ति के दबाव से नये सामाजिक तनाव पैदा हो रहे हैं। आर्थिक दबाव यानी गरीबी तथा शहरीकरण जनित गुमनामी यानी अपरिचय की सुविधा इसके मुख्य कारण बताये जाते हैं। सामाजिक जागरूकता की वृद्धि गरीबों में धनिकों के प्रति क्षोभ उत्पन्न करती है तथा शहर में एक दूसरे के कुलशील, ठौर-ठिकाने का अता-पता न होने से अपराध कर गुमनाम हो जाना आसान हो जाता है-ऐसा इन समाजशास्त्रियों द्वारा विश्लेषित किया जाता है।
चिन्तन और आदर्श आचरण की महत्ता व्यक्ति के अन्तःकरण में अंकित नहीं होगी, अपराधों की वास्तविक रोकथाम और समाप्ति सम्भव नहीं होगी।
चिन्तन की विकृति ही तो है। आये दिन सड़क से युवतियाँ-महिलाएं दो-चार गुँडे अपहरण कर ले जाते हैं और सैकड़ों लोग ‘तमाशा’ देखते रहते हैं। दिनदहाड़े मार-पीट, खून खराबा मचाया जाता है और हजारों की भीड़ सहमी-सिमटी सब ताकती रहती है। यह सब अन्तः क्षेत्र में घुसी कायरता के अतिरिक्त और क्या है?
चिन्तन और दूषित दृष्टिकोण के अतिरिक्त और क्या है? स्पष्ट है कि मनुष्य को सुसंस्कृत बनाने की ओर यदि ध्यान नहीं दिया गया तो आज की दुःस्थिति बदलने की नहीं।
चिन्तन और भावनाओं की विकृति नहीं तो और क्या है?
चिन्तन करते-करते तद्रूप हो जाता है, उसी प्रकार साधक को भी केवल परमात्मा का ही चिंतन करके परमात्मा रूप हो जाना चाहिए। विवेक और वैराग्य की शिक्षा देने के कारण यह मेरा शरीर भी एक गुरु है। यद्यपि यह शरीर अनित्य है। तो भी इससे परम पुरुषार्थ का लाभ हो सकता है। मैंने इस प्रकार प्रकृति के चौबीस गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की तथा जीवन-मुक्त होने का मार्ग पाया।
चिन्तन, साधक को भी ईश्वर बना देता है। अग्नि में पड़ कर ईधन जिस प्रकार अग्निमय हो जाता है, उसी प्रकार ध्यान द्वारा साधक अपनी चेतना को ईश्वर में आहुत कर स्वयं भी ईश्वर स्वरूप हो जाता है। यह ध्यान साधना का अलंकारिक प्रतिपादन नहीं है। ईश्वरीय सत्ता का तन्मयतापूर्वक भाव भरा चिन्तन व्यक्ति चेतना को क्रमशः विकसित करता चलता है और आत्मा से परमात्मा की मँजिल तक पहुँचा जा सकता है। यह यात्रा किस प्रकार सम्पन्न होती है यह तो अनुभव गम्य ही है परन्तु इस साधना के पीछे छुपे तत्व दर्शन का विश्लेषण तो किया ही जा सकता है।
चिन्तन और कर्तृत्व तथा जीवनयापन के क्रम में परिवर्तन किया होगा। इतने पर भी मानव की मूल सत्ता-जिसे ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति कहा जाता है आरम्भ से ही अपनी मौलिक विशेषताओं को साथ लेकर जन्मी है और उन्हें पूर्णता का जीवन लक्ष्य प्राप्त करने तक अपने अन्तरंग में धारण किये ही रहेगी।
चिन्तन किया करें तो बहुत ही अच्छा, पर चूँकि यह सबके लिए सम्भव नहीं, इसीलिए हमें प्रतिदिन कम से कम कुछ घण्टों के लिये ईश्वर स्मरण करना ही चाहिए”।
चिन्तन व्यक्ति चेतना को क्रमशः विकसित करता चलता है और आत्मा से परमात्मा की मँजिल तक पहुँचा जा सकता है। यह यात्रा किस प्रकार सम्पन्न होती है यह तो अनुभव गम्य ही है परन्तु इस साधना के पीछे छुपे तत्व दर्शन का विश्लेषण तो किया ही जा सकता है। सर्वविदित है कि बिखरी हुई शक्तियाँ और वस्तुएँ बहुत दुर्बल होती हैं। बिखरी हुई बुहारी की सीकों से धूल का एक कण भी साफ नहीं किया जा सकता, परन्तु वे जुड़ कर सूत्र में बंध कर एक दिशा में कार्य करने लगती हैं तो सारी गन्दगी देखते ही देखते साफ हो जाती है बिखरी हुई सूर्य किरणों से साधारण गर्मी तथा प्रकाश ही मिलता है। परन्तु उन्हें केन्द्रित कर लिया जाय तो विराट् ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।
चिन्तन से सम्बन्धित हैं। सामाजिक परिवेश अपराधों के लिए उत्तरदायी तो है, किन्तु सामाजिक परिवेश का अर्थ समाज का भौतिक ढ़ाँचा या समाज में साधनों- उपकरणों का औसत नहीं है। अपितु समाज में किन गुणों, मूल्यों और आदर्शों की प्रतिष्ठा है, इससे सामाजिक परिवेश बनता है।
चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व अपनाने पर ही मानसिक सन्तुलन ठीक रहता है तथा दीर्घ जीवन प्राप्त होता है। इस संदर्भ में शास्त्र कहते हैं -

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-May
चिन्तन और चरित्र से मिल कर बनता है। आस्थाओं में आदर्शवादी मान्यताओं का जितना गहरा समावेश होगा इच्छाएँ, विचारणाएँ, क्रियाएँ उसी स्तर की बन पड़ेगी। बहुत समय तक जिस दिशा धारा में बहते रहा जाय वही आदत बन जाती है और स्वभाव के रूप में प्रकट होती है। व्यक्तित्व इसी परिकर का नाम है। व्यक्तित्व में चुम्बकत्व होता है।
चिन्तन करने से प्रतीत होता है कि इस पुण्य प्रयोजन को इतनी लोक मान्यता मिलने के पीछे कई कारण है।
चिन्तन, आत्मसुधार, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के चारों ही चरण पूरा करने में यह तीर्थ वास का वातावरण हर दृष्टि से उपयोगी सिद्ध होता था। पापों का प्रायश्चित करने के लिए कई तपश्चर्याएं आवश्यक होती है। वे भी यहाँ रहकर करने से वह प्रयोजन पूरा होता था; जिसमें तीर्थों के महात्म्य से पाप निवृत्ति को जोड़ा गया है। यह निश्चित रूप से प्रायश्चित विधान की ओर संकेत है। आत्मोत्कर्ष के लिए कई प्रकार के साधन करने पड़ते है।
चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश ही मनुष्यता है। मर्यादाओं के पालन और आदर्शों का अवलम्बन अन्य प्राणियों से नहीं बन पड़ता। उसे मात्र मनुष्य ही निवाहता है, इसी में उसका गौरव है। मनुष्य शरीर के साथ जुड़ी हुई उपलब्धियों का रसास्वादन एक सौभाग्य है, उसे सुअवसर की सार्थकता इस पर निर्भर है कि मानव गौरव के अनुरूप आदर्शवादिता अपनाई गई या नहीं। सच्चे अर्थों में मनुष्य उसी को कहा जा सकता है, जो मानवी उत्कृष्टा का अवधारणा करके शालीनता, कर्मठता और परमार्थ परायणता का परिचय दे।
चिन्तन की आवश्यकता है। साथ ही यह भी अभीष्ट है कि भ्रान्ति या विकृति की इस क्षेत्र में जहाँ घुस पैठ हुई है उसका परिमार्जन, परिशोधन और नवनिर्धारण किया जाय।
चिन्तन आदि के द्वारा अपनाया जाता है। धर्मानुष्ठानों के सहारे उसे अभ्यास में उतारा जाता है। यह वैयक्तिक प्रयत्न हुए। सामूहिक एवं सुसंगठित रूप से उसे जनमानस में जगाने और जमाने के लिए जो कारगर उपाय ढूंढ़े गये हैं उनमें तीर्थ प्रक्रिया का असाधारण स्थान है उनमें चलने वाली गतिविधियों की प्रतिक्रिया बनाने के लिए अतीत के गौरव भरे इतिहास में प्रामाणिक साक्षी के रूप में पढ़ा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-February
चिन्तन में इतना लोच आ सके तो समझना चाहिए कि खीजने को सारा संकट अनायास ही टल गया।
चिन्तन की समस्वरता ही बिगाड़ कर रख देती है। बुढ़ापे में प्रायः मनुष्य चिड़चिड़ा जिंदगी उसकी बन जाती है। उसका कारण स्वाभाविक अवसाद उतना नहीं होता जितना कि आवेशों के दबाव से मानसिक समस्वरता का अस्त-व्यस्त हो जाना।
चिन्तन उपासना को प्रभावशाली और फलवती बनाता है तथा एकाग्रता और तन्मयता से किये गये कार्य ही सफलता तक पहुँचाते है। उनसे उत्पन्न हुई धनात्मक शक्ति व्यक्ति की बढ़ा यह है आत्मविश्वास, आत्मगौरव और आत्मबल को बढ़ाती है जीवन के सभी क्षेत्रों में साधी गई एकाग्रता ईश्वर प्राप्ति की साधना को भी प्रखरतम बनाती है तथा व्यक्ति का स्तर दिनों-दिन उच्च से उच्चतर और उच्चतम की और बढ़ता है।
चिन्तन के भ्रष्टता और आचरण की दुष्टता के रूप में परिलक्षित होने वाला निकृष्टता के प्रति उच्चस्तरीय अन्त करणों में प्रचण्ड आक्रोश उभरता है। असुरता से लड़ पड़ने के अतिरिक्त उनके पास कोई चारा ही नहीं रहता। ईश्वर अवतरण के दो ही लक्ष्य हैं, धर्म का संस्थापन और अधर्म का निराकरण। जिसकी अन्तरात्मा में ईश्वरत्व की मात्रा जितनी बढ़ेगी उसे उसी अनुपात से इन दोनों प्रयोजनों के लिए अपनी तत्परता नियोजित करनी पड़ेगी।
चिन्तन उद्देश्य, व्यवहार समझा जायगा। वहाँ उनके व्यक्तित्व को उभारने वाले ऐसे परामर्श भी दिये जायेंगे, जिन्हें अपना कर अपनी प्रतिभा और प्रभावशीलता को अधिक प्रखर बनाया जा सके। जन संपर्क का आनन्द तभी है जब उससे दूसरों को आवश्यक प्रकाश एवं उत्साह मिल सकें। यह किसे लिए किस प्रकार का संभव हो सकता है इसका विधिवत प्रशिक्षित व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुरूप उन पाँच महीने के परिव्राजक सत्रों में चलता रहेगा।
चिन्तन-मनन अंतर्दर्शन, अन्तःअवलोकन कर अभ्यास नहीं रहा, तो ईश्वरानुभूति कठिन होगी ही।
चिन्तन। यह सूक्ष्म शरीर की शक्ति है।
चिन्तन तंत्र को ही गड़बड़ा देती है। फलतः न तो यही उपाय सूझता है और न सही उपाय अपनाये बनता है। ऐसी दशा में परिस्थितियों को बदलने और व्यक्तियों को सुधारने का उद्देश्य तनिक भी पूरा नहीं होता और असफलता जनम निराशा मस्तिष्क पर नई विपत्ति की तरह और भी अधिक बोझिल बनकर लद पड़ती है।
चिन्तन बुद्धि का व्यापार है। समझ, सूझ-बूझ, विचार, कल्पना, निर्णय सब इसी के अंग हैं। किन्तु चिन्तन की दिशा क्या होगी, यह निर्भर करता है अन्तः-करण में उठने वाली भाव-संवेदनाओं के स्वरूप पर। अन्तःकरण को ही कारण शरीर कहा जाता है। मनुष्य के प्रत्येक कार्य का आधारभूत कारण उसके अन्तःकरण में उठी उमंगें, आकाँक्षायें, प्रेरणायें ही होती है।
चिन्तन की दिशा क्या होगी, यह निर्भर करता है अन्तः-करण में उठने वाली भाव-संवेदनाओं के स्वरूप पर। अन्तःकरण को ही कारण शरीर कहा जाता है। मनुष्य के प्रत्येक कार्य का आधारभूत कारण उसके अन्तःकरण में उठी उमंगें, आकाँक्षायें, प्रेरणायें ही होती है। अन्तःकरण की प्रेरणा ही जीवन-दिशा का निर्धारण करती है। इस अन्तःकरण में घनीभूत भाव-संवेदना का नाम ही श्रद्धा है।
चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश किया जा सके, दृष्टिकोण में आदर्शवादिता को समावेश किया जा सके, दृष्टिकोण में आदर्शवादिता को स्थान मिल सके तो लोक प्रवाह में सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों का बाहुल्य दीखेगा। ऐसी दशा में युग संकट के कुहासे को दूर होते देर न लगेगी। समस्या दार्शनिक है। आर्थिक, राजनैतिक या सामाजिक नहीं। जन मानस को परिष्कृत किया जा सके तो प्रस्तुत विभीषिकाओं का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा।
चिन्तन और विचार को एक दिशा में नियोजित किया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-June
चिन्तन की मुद्रा में प्रोफेसर के घर की ओर चल पड़ा।
चिन्तन का ही नाम है। ऐसे व्यक्ति कुछ संग्रह तो कर सकते हैं पर साथ ही बढ़ती हुई तृष्णा के कारण उस सुख से वंचित ही रहते हैं जो उदार रहने पर उन्हें अनवरत रूप से मिलता रह सकता था।
चिन्तन सुदूर कोनों तक पहुँचाया जा सकेगा। साथ ही इसके द्वारा किसी भी वर्ग के व्यक्ति उसी स्थान पर पहुँच सकेंगे, जिसके लिए भारतीय अध्यात्म अनादिकाल से अंगुलि-निर्देश करता रहा हैं।
चिन्तन और प्रयास का निर्धारण करता है। “दैवेच्छा वलीयसी” की उक्ति में इसी सत्य की ओर संकेत किया गया है।
चिन्तन में परिणत करने की साधना ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है। इसका अभ्यास देव प्रतिमाओं सहारे किया जा सकता है। सामान्य जीवन-क्रम में इस सम्बन्ध में अधिक अनुशासन बरतने की मर्यादाएँ बनानी और पालन करनी चाहिए।
चिन्तन का परिणाम अन्तःकरण में उद्विग्नता और कुटिलताओं के रूप में प्रकट होता है। फलतः संकीर्ण स्वार्थपरता, निरंकुश उच्छृंखलता एवं आक्रामक दुष्टता अपनाने पर उतारू होता है। कुविचारों की परिणति दुर्व्यवहार से होती है। फलतः मनोमालिन्य, विलगाव, असहयोग, विरोध एवं विग्रह के रूप में प्रतिद्वन्द्विता खड़ी होती है और अनेकानेक समस्याएँ उत्पन्न कर देती है। प्रभावित लोग स्वयं उद्विग्न रहते और दूसरों को अप्रसन्न करते हैं।
चिन्तन पर एक ही सवाल हावी था। उनके सभी प्रयोग और सिद्धान्त सिर्फ इस बिन्दु पर केन्द्रित हो गए थे कि मनुष्य की आत्मा को कुछ समय के लिए शरीर से अलग करके उसे पुनः शरीर में लौटाया जा सकता है। पहली बार विचार आने पर उनके वैज्ञानिक दिमाग ने इसे फौरन अस्वीकृत कर दिया था। मगर धीरे-धीरे रिसर्च करते हुए उन्होंने इसे सम्भव मान लिया कि आत्मा या प्राणतत्व पदार्थ से अलग अस्तित्व रख सकता है अब उन्हें अपने भारत-प्रवास के दौरान सुनी गई आचार्य शंकर की कहानी में कुछ सार नजर आने लगा था। जिसके अनुसार जगद्गुरु शंकराचार्य अपने शरीर को शिष्यों के हवाले करके अपनी आत्मा से निहित कार्य करने के बाद पुनः अपने शरीर में लौट आए थे।
चिन्तन में डूबे वे महर्षि कृष्णपाद के पास जा पहुँचे। महर्षि के चरणों में प्रणाम करते हुए उन्होंने संक्षेप में राजदरबार की घटना कह सुनायी। सब कुछ सुनकर महर्षि ने मुसकराते हुए कहा-”परेशान क्यों हो वत्स! जिस ईश्वर की स्तुति करते हो, उसी पर विश्वास रखो।”
चिन्तन से अनुप्राणित कर सकें।
चिन्तन उभरने का अभ्यास होता रहे। सरस्वती, लक्ष्मी, काली आदि अन्य देवियों की प्रतिमाओं में भी यौवन के साथ भावभरी श्रद्धा संजोये रहने की मान्यता है इसी प्रकार देवताओं को रूप-यौवन संपन्न बनाकर नारी को यह अभ्यास करने का अवसर नारी को यह अभ्यास करने का अवसर दिया गया है कि वे पर यौवन से कामुक उत्तेजना ग्रहण न करें, वरन् ईश्वर तुल्य पवित्र मान्यताओं का अभ्यास करें। मीरा आदि की आराधना इसी स्तर की थी। यौवन विकारों को पवित्र चिन्तन में परिणत करने की साधना ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है। इसका अभ्यास देव प्रतिमाओं सहारे किया जा सकता है।
चिन्तन की ही सलाह देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यदि अवसाद अत्यन्त तीव्र हो और रोगी की प्रवृत्ति आत्महत्या की ओर अधिक हो तो फिर रोगी को अविलम्ब अस्पताल में भरती करना चाहिए। ऐसे में यदि औषधियाँ सन्तोषजनक लाभ नहीं देतीं तो चिकित्सक विद्युत चिकित्सा की सहायता लेते हैं यद्यपि यह उपाय भी सामयिक है। वास्तविक उपाय तो मन की गहराइयों में जाकर अवसाद के कारणों के निकाल फेंकना है।
चिन्तन की तन्मयता में अनुभव करते स्वयं को कमलपत्र पर पड़े हुए अबोध बालक की तरह तैरते हुए ध्यान करना चाहिए। ध्यान की इस भावभूमि में अनुभव करें कि बालक पैर का अँगूठा अपने मुख से चूस रहा है। इस प्रकार का प्रलयकालीन दृश्य चित्र के रूप में बाजार में भी बिकता है। चित्र में वर्णित यह अनुभूति मन को शान्त करने की दृष्टि से बहुत उपयुक्त है। इस भावभूमि की प्रगाढ़ता में स्पष्ट अनुभव होता है कि संसार में कोई व्यक्ति, वस्तु, हलचल, समस्या, आवश्यकता है ही नहीं सर्वत्र पूर्ण नीरवता ही भरी पड़ी है।
चिन्तन की तथा जीवन जीने की परिष्कृत प्रक्रिया को जनमानस में प्रतिष्ठापित करना पड़ेगा जो मानवीय गरिमा के अनुरूप है। इन सातों आन्दोलनों से वे सभी आधार प्रबल होंगे, जिनके चलते न अनैतिकताओं के लिए कोई स्थान रह जाएगा और न ही झूठी मान्यताओं के लिए। सप्त-आन्दोलनों के निर्मल प्रवाह द्वारा स्वच्छ और निष्पक्ष चिन्तन सुदूर कोनों तक पहुँचाया जा सकेगा। साथ ही इसके द्वारा किसी भी वर्ग के व्यक्ति उसी स्थान पर पहुँच सकेंगे, जिसके लिए भारतीय अध्यात्म अनादिकाल से अंगुलि-निर्देश करता रहा हैं।
चिन्तन का स्तर उच्चस्तरीय था। उनकी कामनाएँ, रुचियाँ, महत्वाकाँक्षा उच्चस्तरीय थीं। ऊँचा चाहते और ऊँचा सोचते थे। फलतः इनके क्रिया-कलापों में आदर्शों का पुट पग-पग पर परिलक्षित होता था। ऐसे व्यक्तियों के स्वभाव में शालीनता, चरित्र में सज्जनता, व्यवहार में उदारता घुला रहना स्वाभाविक है।
चिन्तन एवं दुष्ट आचरण के लिए असाधारण दुस्साहस ही करना होता होगा अन्यथा वातावरण के दबाव में सहज ही वैसा कुछ कर सकना सहज ही वैसा कुछ कर सकना सहज नहीं अतीव दुस्तर था। आज आकाँक्षाएँ और विचारणाएँ मानवी आदर्शों से विपरीत दिशा में उद्दण्ड अंधड़ की तरह बह रही हैं। उससे अनगढ़ ही नहीं सुनिश्चित और सभ्य कहे जाने वाले लोग भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
चिन्तन सूक्ष्म। वायुमण्डल स्थूल है और वातावरण सूक्ष्म। दुष्कर्मों से वायुमण्डल विकृत होता है, प्रकृति रूठती है और परिस्थितियाँ दुःखदायी बनती हैं। आवश्यक वस्तुओं का अभाव घटनाक्रम की प्रतिकूलता और कष्ट-संकटों का विरोध-विग्रह का अभिवर्द्धन यह वायुमण्डल की विषाक्तता का परिणाम है। वातावरण चेतन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-September
चिन्तन की गुँजाइश कहाँ रही?
चिन्तन आमूलचूल आशावादी मिलता है। यह वह समय था जब राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सभी स्तरों पर अराजकता का भयानक दौर था। किंतु पूज्यवर ने लिखा है कि - “हमारी युग-परिवर्तन की भविष्यवाणी के मूल में एकमात्र महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि यह है कि भावनाशील मनुष्यों का अधिकाँश समय पेट-प्रजनन की सीमित स्वार्थपरता में न खपेगा। उसका एक बड़ा अंश उस प्रगति के निमित्त लगेगा, जिसे आत्मिक आदर्शवादिता और भौतिक सुख-शान्ति के निमित्त बन पड़ने वाली सहकारिता कहा जा सकता है। इसे कठिन समझा जा सकता है, पर वस्तुतः वह ऐसा है नहीं।
चिन्तन का परिणाम अन्तःकरण में उद्विग्नता और कुटिलताओं के रूप में प्रकट होता है। फलतः संकीर्ण स्वार्थपरता, निरंकुश उच्छृंखलता एवं आक्रमण, दुष्टता पर उतारू होने की प्रवृत्ति पनपती है और मनोमालिन्य, विलगाव असहयोग, विरोध एवं विग्रह के रूप में प्रतिद्वन्द्विताएँ खड़ी होती हैं और अनेकानेक समस्याएँ उत्पन्न कर देती है। प्रभावित लोग स्वयं उद्विग्न रहते हैं और दूसरों का अप्रसन्न करते हैं। गर्हित दृष्टिकोण ही है जिसे अपनाने वाले स्वयं दुःख पाते हैं दूसरों को दुःख देते हैं। सहयोग के अभाव में प्रगति के द्वार रुक जाते हैं।
चिन्तन सूक्ष्म। वायुमण्डल स्थूल है-वातावरण सूक्ष्म। दुष्कर्मों से वायुमण्डल विकृत होता है, प्रकृति रूठती है और परिस्थितियाँ दुःखदायी बनती हैं। आवश्यक वस्तुओं का अभाव घटनाक्रम की प्रतिकूलता और कष्ट-संकटों का, विरोध-विग्रह का अभिवर्द्धन यह वायुमण्डल की विषाक्तता का परिमाण हैं वातावरण चेतन हैं मान्यताओं, आस्थाओं और विचारणाओं के समन्वय से उत्पन्न चिन्तन-प्रवाह में निकृष्टता भर जाने से वातावरण विकृत होता है। उससे प्रभावित जनमानस में कुकल्पनाएँ, दुर्भावनाएँ और अनीतिमूलक उच्छृंखलताएँ ज्वार-भाटों की तरह उठती है।
चिन्तन में भाव सम्वेदनाओं की उत्कृष्टता उभारे, तप-साधना के प्रयास अधूरे व एकाँगी ही बने रहते हैं। इस मूल तथ्य को सबसे पहले समझा जाना चाहिए कि उच्चस्तरीय आस्थाओं की वरीयता स्वीकार करके ही साधना पथ पर आगे बढ़ा जा सकता है।
चिन्तन के रूप में आत्मतत्व रूपी सद्गुरु अथवा आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति काया में विद्यमान प्रत्यक्ष गुरु की सहायता ली जाती है। गुरु उस सद्गुरु से दिशा-निर्देश प्राप्ति में सहायता करता है। व पात्रता के अनुरूप अपनी शक्ति का एक अंश भी साधक को देता है, परन्तु वास्तविक सहायता उसी आत्मतत्व से मिलती है। जिसे अपने अन्तःकरण में जगाया जाता है। यदि आत्मतत्व परिष्कृत, जागा हुआ न हो तो गुरुकृपा भी सूखी चट्टान पर बरसे वर्षा जल की तरह निरर्थक चली जाती है।
चिन्तन-मनन एवं शास्त्रों का सत्संग इसी निमित्त किया जाता है। यह अध्यात्म विद्या का तत्त्वदर्शन वाला पक्ष हुआ, जिसमें मान्यताओं की श्रद्धा-तर्क के आधार पर मान्यताओं से काट की जाती है।
चिन्तन तथा कर्तृत्व के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने में आनन्द अनुभव करें श्रद्धा अन्तःकरण की श्रेष्ठतम उपलब्धि है। इसका जहाँ जितना अंश स्फुरित होता है, उतना ही महानता दृष्टिगोचर होती है। उतने ही अंशों में आदर्शवादी चिन्तन की तरंगें उमगने लगती हैं, उत्कृष्ट क्रिया-कलाप स्वयमेव पनपने लगते हैं। इसी उपलब्धि के सहारे सामान्य परिस्थितियों में जन्में पले व्यक्ति भी ऐतिहासिक महामानवों की भूमिका निभाते और विश्वनिर्माण में असाधारण योगदान देते हैं।
चिन्तन क्षेत्र को घेरे रहती हैं। अस्तु, उनसे विचार-तरंगें भी बहुत शक्तिशाली उत्पन्न होती हैं। यों जिनका चिन्तन शरीर-यात्रा की परिधि में ही एक ढर्रे का घूमता रहता है, उनकी विचार तरंगें भी बहुत दुर्बल होती हैं। प्रखरता तब आती है, जब उनमें किन्हीं विशेष भावनाओं की उभार सम्मिलित रह रहा हो।
चिन्तन की तरंगें उमगने लगती हैं, उत्कृष्ट क्रिया-कलाप स्वयमेव पनपने लगते हैं। इसी उपलब्धि के सहारे सामान्य परिस्थितियों में जन्में पले व्यक्ति भी ऐतिहासिक महामानवों की भूमिका निभाते और विश्वनिर्माण में असाधारण योगदान देते हैं।
चिन्तन एवं सत्कर्म के मूल आधारों का व्यापक विस्तार। इन्हीं भावनाओं को अपनाए जाने एवं न-जन तक विस्तार होने से समस्याओं एवं विकृतियों को जड़ से उखाड़ा जा सकेगा। गायत्री एवं यज्ञ का युग्म किसी धर्मविशेष की मान्यता अथवा किन्हीं प्रचलित कर्मकाण्डों की उठा-पटक तक सीमित नहीं है। इसके तत्वज्ञान में मनुष्यता का जीवनदर्शन निहित है। ऐसा जीवनदर्शन जो जाति-धर्म, क्षेत्र एवं राष्ट्र की सीमाओं से परे है।
चिन्तन-भाव संवेदनापरक ध्यानयोग। इन्हीं दो में सारे साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
चिन्तन और प्रयास का निर्धारण करता है। ‘दैवेच्छा बलीयसी’ की उक्ति में इसी कटु सत्य की ओर संकेत किया गया है।
चिन्तन एवं कर्तव्य को सही दिशा में चलने के लिए नियन्त्रित-प्रशिक्षित करती है। जीवन-विद्या का जिसे सफल-सार्थक जीवन-विद्या का जिसे जितना ज्ञान अभ्यास है, वह उतना ही सफल- सार्थक जीवन है, वह उतना ही सफल- सार्थक जीवन जिएगा। अंतरंग क्षेत्र में उसे महानता का आनन्द और बहिरंग में बड़प्पन का श्रेय-सम्मान मिलेगा।
चिन्तन की गहराई में उतरने गये, उन्होंने अनुभव किया कि व्यक्ति और समाज से इन कलाओं का कितना गहरा सम्बन्ध है? इन्हीं कलाओं के समन्वय को आज के समय में ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया’ कहा जाता है और इस वैज्ञानिक युग में उसका कितना द्रुत तथा आकर्षक विकास हुआ है, यह किसी से छिपा नहीं है।
चिन्तन से पवित्र एवं श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं।
चिन्तन भी एकाँगी है और केवल कर्म भी अपूर्ण। उसके लिए चिन्तन और कर्म दोनों का ही समन्वित स्वरूप ही पूर्ण होता है बिजली के दोनों तार अलग-अलग हों तो विद्युतधारा का प्रवाह उत्पन्न नहीं होता है। दोनों के जुड़ने पर ही विद्युत धारा प्रवाहित होना सम्भव है। इसी के साथ यह सत्य भी स्मरणीय है कि लक्ष्य जब व्यापक हो तो सद् चिन्तन एवं सत्कर्म के युग्म का भी व्यापक समायोजन करना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हो जाता है।
चिन्तन का स्तर उच्चस्तरीय था। उनकी कामनाएँ, रुचियाँ, महत्वकाँक्षाएँ उच्चस्तरीय थी। लोग ऊँचा चाहते और ऊँचा सोचते थे। फलतः इनके क्रिया-कलापों में आदर्शों का पुट पग-पग पर परिलक्षित होता था। ऐसे व्यक्तियों के स्वभाव में शालीनता, चरित्र में सज्जनता, व्यवहार में उदारता घुला रहना स्वाभाविक है।
चिन्तन परिष्कार और यज्ञ अभियान के द्वारा कर्मशोधन प्रक्रिया को जन-जन तक पहुँचाना चाहिए।
चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश करने वाले प्रतिपादन को ब्रह्मविद्या कहते हैं। इसमें ईश्वरीय निर्देशों एवं ऋषि अनुभवों को इसी प्रकार गूँथा गया है कि मानवी अन्तःकरण उसे स्वीकार कर ले। शास्त्र-वचनों का स्वाध्याय चिन्तन-मनन एवं शास्त्रों का सत्संग इसी निमित्त किया जाता है। यह अध्यात्म विद्या का तत्त्वदर्शन वाला पक्ष हुआ, जिसमें मान्यताओं की श्रद्धा-तर्क के आधार पर मान्यताओं से काट की जाती है।
चिन्तन करने वाले चरित्रवान एवं सेवाभावी लोग अपनी विचार-तरंगों के माध्यम से समस्त विश्व को अपनी प्रखर प्रेरणाओं से लाभान्वित करते हैं, भले ही उनका वह अनुदान दूसरों को प्रत्यक्ष दिखाई न पड़ता हो। यह बात दुष्ट-दुरात्माओं पर भी लागू होती है। वे मन ही मन दुरभिसन्धियों के कुचक्र रचते हैं और इस प्रकार की भयानक तरंगें छोड़ते हैं, जिनके कारण अगणित दुर्बल मनोभूमि के लोग उसी प्रकार का चिन्तन प्रारम्भ कर दें और कुमार्गगामिता के कदम बढ़ाएँ।
चिन्तनपरक कहा जा सकता है तथा दूसरा है प्रत्यक्ष, जिसे कर्मपरक कहा जाना चाहिए। परोक्ष स्वरूप में जप, ध्यान-धारणा, लय तथा तत्त्वज्ञान, योगाभ्यास का समावेश किया गया है तथा कर्मपरक प्रत्यक्ष अभियान में या आन्दोलन का। इस तरह के प्रयास व्यक्तिगत रूप से तो लम्बे समय से किए जाते रहे हैं-परन्तु अब इसमें सामूहिकता का समावेश किया गया है, जिसे अपने युग की नवीनता और विशेषता कहा जा सकता है। गायत्री और यज्ञ का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक है।
चिन्तन एवं क्रिया-कलापों का तूफान खड़ा करते हैं। प्रज्ञावतार से उत्पन्न युगान्तरीय चेतना की विशेषता यही है कि अनायास ही जन-जीवन के अंतःकरण में मुरझाए और सूखे पड़े श्रम के बीज अंकुरित हो। श्रद्धा का समुद्र हिलोरें लेने लगे, ताकि उनकी अन्तःप्रेरणा वह कार्य कर सके जो सामान्य व्यक्ति के लिए सामान्य परिस्थितियों में सम्भव नहीं होता। असम्भव को सम्भव बना देने वाला अवतार प्रक्रिया का यह चमत्कार श्रद्धा के बलबूते ही बन पड़ता है।
चिन्तन के क्षेत्र में बिना बुलाए ही उमड़ने लगेगी। यह सब उमड़-घुमड़ ऐसे ही समाप्त नहीं हो जाती वरन् रुचि, रुझान और प्रवृत्तियों का निर्माण करती है। यह तथ्य है कि देर तक जिन विचारों को अपनाया गया है, वे प्रेरणाप्रद बनते हैं और अन्ततः अपनी ही दिशा में करने के लिए क्रियाशक्ति को सहम तत्पर कर लेते हैं।
चिन्तन एवं दुष्ट आचरण के लिए असाधारण दुस्साहस ही करना होता होगा अन्यथा वातावरण के दबाव में सहज ही वैसा कुछ कर सकना सरल नहीं, अतीव दुष्कर था। आज आकाँक्षाएँ एवं विचारणाएँ मानवीय आदर्शों को विपरीत दिशा में उद्दण्ड अन्धड़ की तरह बह रही हैं, उससे अनगढ़ ही नहीं सुशिक्षित और सभ्य कहे जाने वाले लोग भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
चिन्तन एवं सत्कर्म की उपेक्षा-अवहेलना स्पष्ट देखी जा सकती है। इसी उपेक्षा-अवहेलना ने वातावरण एवं वायुमण्डल को विषाक्त कर रखा है। यह वातावरण और वायुमण्डल ही सृष्टि वृक्ष की यह जड़ है-जिसे गीतकार ने ‘उर्ध्वमूलं अधः शाखं’ कहकर सम्बोधित किया है।
चिन्तन एवं सत्कर्म के युग्म का भी व्यापक समायोजन करना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हो जाता है।
चिन्तन में निमग्न होने की प्रेरणा देती हैं। यह समझना, अनुभव करना व उस स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास करना हर किसी से नहीं बन पाता । इसी कारण यह अछूता पड़ा रह जाता है। स्वभाव बदलता नहीं, आदतें सुधरती नहीं, पशुवृत्तियों से मोर्चा लेते बनता नहीं व जीवन-शकट जैसे-तैसे खिंचता रहता है।
चिन्तन और आचरण, पारिवारिक मर्यादाओं और सामाजिक परम्पराओं मर्यादाओं और सामाजिक परम्पराओं को सिक हद तक उच्छृंखल ओर क्रूर बना दिया है, उसकी घटनाएँ आए दिन समाचार पत्रों में छपती रहती हैं।
चिन्तन और कर्म दोनों का ही समन्वित स्वरूप ही पूर्ण होता है बिजली के दोनों तार अलग-अलग हों तो विद्युतधारा का प्रवाह उत्पन्न नहीं होता है। दोनों के जुड़ने पर ही विद्युत धारा प्रवाहित होना सम्भव है। इसी के साथ यह सत्य भी स्मरणीय है कि लक्ष्य जब व्यापक हो तो सद् चिन्तन एवं सत्कर्म के युग्म का भी व्यापक समायोजन करना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हो जाता है।
चिन्तन एवं सत्कर्म के मूल आधारों को अपनाए बगैर पूरी तरह से सम्भव नहीं इसके अलावा वायुमण्डल और वातावरण का परिशोधन उन अध्यात्म प्रयत्नों पर निर्भर है, जिन्हें व्यक्तिगत धर्मधारणा एवं सामूहिक सह-साधना के आधार पर सम्पन्न किया जाता है। वायुमण्डल की परिशुद्धि के लिए यज्ञोपचार से बढ़कर और कोई शक्तिशाली माध्यम अब तक ढूँढ़ा नहीं जा सका। इसी तरह वातावरण के परिशोधन के लिए गायत्री की व्यक्तिगत एवं सामूहिक साधनाएँ अत्यधिक कारगर सिद्ध होती हैं।
चिन्तन की आधारभूत और परमात्मा की अभिव्यक्त सत्ता गायत्री और सत्कर्म के मूर्तिमान स्वरूप यज्ञ से जोड़ दिया। नास्तिक संसार को आस्तिक संसार में बदलने का सृष्टि के आविर्भाव से लेकर अब तक यह सब बड़ा उपक्रम है, विराटतम, महानतम आँदोलन है।
चिन्तन शरीर-यात्रा की परिधि में ही एक ढर्रे का घूमता रहता है, उनकी विचार तरंगें भी बहुत दुर्बल होती हैं। प्रखरता तब आती है, जब उनमें किन्हीं विशेष भावनाओं की उभार सम्मिलित रह रहा हो।
चिन्तन में पूरी तरह स्वीकारा है। उनका मानना है कि इनसानी जिन्दगी के प्रायः सभी क्रियाकलाप किसी न किसी तरह से पर्यावरण से सम्बद्ध हैं। आधुनिक भौतिकी, वैज्ञानिक अनुसंधान एवं औद्योगिक क्रियाकलापों को पर्यावरण से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इन्होंने इकॉलाजी के दो भागों में बाँटा है-शैलो इकॉलाजी एवं डीप इकॉलाजी। शैलो इकॉलाजी मनुष्य के प्राकृतिक मूल्यों के सम्बन्धों तथा उपयोग को दर्शाती है, जबकि डीप इकॉलाजी में मानवीय अन्तः- कारण की पर्यावरण से अभिन्नता की व्याख्या है।
चिन्तनक्षेत्र को उच्चस्तरीय पृष्ठभूमि पर अवस्थित करने की आस्था निर्धारण करने का विधि विधान है। अध्यात्म का विवेचनात्मक और साधनात्मक विशालकाय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। ईश्वर-जीव-प्रकृति के स्वरूप का प्रतिपादन, जीवन-लक्ष्य का निर्धारण-गति विधियों का नियमन, नियमन, नियन्त्रण और वस्तुओं का उपयोग एवं व्यक्तियों से व्यवहार की जो नीति-मर्यादा निरूपित होती उस मान्यता और आकांक्षा का एक उत्कृष्ट आधार बनता है। यही है संजीवनी-विद्या का लक्ष्य। इसी को पाकर मनुष्य का व्यक्तित्व ऊँचा उठता है, देव भूमि में विकसित होता है।
चिन्तन थोड़ा और विचार प्रवाह अत्यन्त क्षीण होता है। किन्तु मनुष्य में भावना, इच्छा, संकल्प, आदर्श आदि की बड़ी शक्तिशाली प्रेरणाएँ चिन्तन क्षेत्र को घेरे रहती हैं। अस्तु, उनसे विचार-तरंगें भी बहुत शक्तिशाली उत्पन्न होती हैं। यों जिनका चिन्तन शरीर-यात्रा की परिधि में ही एक ढर्रे का घूमता रहता है, उनकी विचार तरंगें भी बहुत दुर्बल होती हैं। प्रखरता तब आती है, जब उनमें किन्हीं विशेष भावनाओं की उभार सम्मिलित रह रहा हो।
चिन्तन एवं क्रिया का सुनियोजन
चिन्तन और सत्कर्म का मूल आधार है, और परस्पर एक-दूसरे के पूरक है।
चिन्तन एवं सत्कर्म को पूरी ही निष्ठा से पालन करने का संकल्प ही जीवन को ऊर्जा एवं प्रकाश से भरता है।
चिन्तन एवं सत्कर्म का अभाव ही प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है। समस्या पर्यावरण अथवा स्वास्थ्य से सम्बन्धित हो अथवा फिर भ्रष्टाचार या किसी सामाजिक कुरीति की, वहाँ उस क्षेत्र में सद् चिन्तन एवं सत्कर्म की उपेक्षा-अवहेलना स्पष्ट देखी जा सकती है। इसी उपेक्षा-अवहेलना ने वातावरण एवं वायुमण्डल को विषाक्त कर रखा है। यह वातावरण और वायुमण्डल ही सृष्टि वृक्ष की यह जड़ है-जिसे गीतकार ने ‘उर्ध्वमूलं अधः शाखं’ कहकर सम्बोधित किया है।
चिन्तन, एक ही क्रम से, ऐसे ढंग से चला मानो एक-दूसरे की नकलची परीक्षार्थियों की तरह नकलटीप या चोरी की हो। वस्तुतः यह विशेष मनोयोगपूर्वक निःसृत विचारधारा का ही चमत्कार होता है। जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक दौड़ जाने से रोका नहीं जा सकता।
चिन्तन को बड़ी उत्सुकता पूर्वक सभी के द्वारा सुना गया। लॉसएंजेल्स, सेक्रामेण्टो, सेनफाँसिस्कों, साँन होजे, शिकागो, अटलाण्टा, हास्टन, वाशिंगटन मियामी, न्यूजर्सी न्यूयार्क, बोस्टन, अलबामा
चिन्तन प्रारम्भ कर दें और कुमार्गगामिता के कदम बढ़ाएँ।
चिन्तन और क्रिया के दो भागों में विभक्त किया है। चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश करने वाले प्रतिपादन को ब्रह्मविद्या कहते हैं। इसमें ईश्वरीय निर्देशों एवं ऋषि अनुभवों को इसी प्रकार गूँथा गया है कि मानवी अन्तःकरण उसे स्वीकार कर ले। शास्त्र-वचनों का स्वाध्याय चिन्तन-मनन एवं शास्त्रों का सत्संग इसी निमित्त किया जाता है। यह अध्यात्म विद्या का तत्त्वदर्शन वाला पक्ष हुआ, जिसमें मान्यताओं की श्रद्धा-तर्क के आधार पर मान्यताओं से काट की जाती है।
चिन्तन-प्रवाह में निकृष्टता भर जाने से वातावरण विकृत होता है। उससे प्रभावित जनमानस में कुकल्पनाएँ, दुर्भावनाएँ और अनीतिमूलक उच्छृंखलताएँ ज्वार-भाटों की तरह उठती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-November
चिन्तन तंत्र भी है , जो यह निर्धारित करता है कि अनिवार्य कारणों-वश रक्त की कहाँ सर्वाधिक आवश्यकता है ताकि इसे वहीं पम्प कर पहुँचाया जा सके । पाचन के समय पाचन संस्थान के तथा व्यायाम आदि के समय माँसपेशियों व हृदय स्वयं को सर्वाधिक रक्त संचार की आवश्यकता पड़ती है । यह सप्लाई कहाँ से काटकर कहाँ जोड़ी जाए, यह विवेक हृदय को रहता है । इसीलिए हृदय स्वयं की एवं मस्तिष्क की रक्त- संचार प्रक्रिया को कभी प्रभावित नहीं होने देता-इसमें कोई भी स्थिति आने पर रक्त प्रवाहित होता ही रहता है ।
चिन्तन की दार्शनिक प्रवृत्तियाँ यूनानी जन जीवन पर सर करने लगी। आनन्द मुनि के शिक्षण का तरीका बहुत मोहक था । वे अत्यन्त सरल तरीके से गूढ़तम रहस्यों का बोध करा देते। एक दिन वह भारी भीड़ के सामने प्रवचन कर रहे थे। तभी भीड़ के सामने प्रवचन कर रहे थे।
चिन्तन-क्षेत्र की गड़बड़ी के कारण पैदा होते हैं । इसके विपरीत जब हमारी भावनाएँ किसी श्रेष्ठतम की तरह उदात्त तथा उत्कृष्ट होती हैं, तो उसकी परिणति न सिर्फ सामाजिक क्षेत्र में सफलता के रूप में सामने आती है, अपितु शारीरिक, मानसिक क्षेत्र में प्रसन्नता, स्वस्थता, शान्ति, सौंदर्य और चिरयौवन के रूप में प्रकट प्रत्यक्ष होती है । इसकी शान्ति इतनी महान और क्षमतावान् है कि इससे हम स्वस्थता तथा सौंदर्य की उपलब्धि भी कर सकते हैं और शरीर की एनाटॉमी (आन्तरिक संरचना) और फिजियोलॉजी (शरीर की क्रिया प्रणाली) को परिवर्तित-प्रभावित भी ।
चिन्तनों अरुचिकर सामाजिक प्रचलनों अनपेक्षित दबावों को प्रमुख माना जाता है। जिनकी भौगोलिक एवं वातावरण संबंधी चुम्बकीय परिस्थिति किन्हीं पर अतिरिक्त प्रभाव डाले और उसे इस प्रकार उन्माद में जकड़ दें।
चिन्तन का शरीर पर गहन असर पड़ता है । बुढ़ापे का मूलभूत कारण यहीं निहित है, अतः इसे दूर भी यहीं से करना पड़ेगा । जानने योग्य तथ्य यह है कि सम्पूर्ण अध्यात्म विज्ञान में मन को, चिन्तन को एक अति सामर्थ्यवान तत्व के रूप में स्वीकार किया गया और कहा गया है कि जिस दिशा में जैसी उसकी गति होगी, वैसा ही वह शरीर को, उसके अधु-अणु को, परिस्थितियों को एवं मनुष्य को बनाता-ढालता चलता है । इस आधार पर भी इस उपर्युक्त सत्य की ही पुष्टि होती है कि शरीर का आधार मन है । मन यदि स्वस्थ, उत्फुल्ल और उदात्त स्तर का बना रहा, तो शरीर में भी उसकी परिणति स्वस्थता, प्रसन्नता, स्फूर्ति और ऊर्जस्विता के रूप में दृष्टिगोचर होगी ।
चिन्तन को एक अति सामर्थ्यवान तत्व के रूप में स्वीकार किया गया और कहा गया है कि जिस दिशा में जैसी उसकी गति होगी, वैसा ही वह शरीर को, उसके अधु-अणु को, परिस्थितियों को एवं मनुष्य को बनाता-ढालता चलता है । इस आधार पर भी इस उपर्युक्त सत्य की ही पुष्टि होती है कि शरीर का आधार मन है । मन यदि स्वस्थ, उत्फुल्ल और उदात्त स्तर का बना रहा, तो शरीर में भी उसकी परिणति स्वस्थता, प्रसन्नता, स्फूर्ति और ऊर्जस्विता के रूप में दृष्टिगोचर होगी । यौवन की यही पहचान है । चेहरे में चमक, आँखों में तेज और रोम-रोम से अभिव्यक्त होता उत्साह-यह स्थिति जवानी को और अधिक सुदीर्घ बनाती है ।
चिन्तन का विकार सम्पूर्ण शरीर तंत्र को प्रभावित करता है । मन की कुढ़न एवं चिन्तन के प्रदूषण सिर्फ उन्हीं क्षेत्रों तक सीमित होकर नहीं रहते वरन् अपना व्यापक विस्तार शरीर-परिधि तक करते हैं, फलस्वरूप ऐसी अगणित असमानताएँ और शारीरिक कठिनाइयाँ उद्भिजों की तरह प्रकट होने लगती हैं, जिनके बारे में पहले न कभी सुना गया था, न जाना । इसे चिन्तन और मन की अद्भुत सामर्थ्य ही कहनी चाहिए कि जब वे उलटा सोचते और उलटा करते हैं, तब उसका उलटा असर सर्वप्रथम उसी को प्रभावित करता है, जहाँ से इसका प्रादुर्भाव हुआ । आग जहाँ जलती है, सबसे पहले उसी को गर्म करती है । शारीरिक व्याधियों के संदर्भ में यह एक उल्लेखनीय तथ्य है ।
चिन्तन को ऐसे व्यामोह में डाल देता है कि उसे तात्कालिक लाभ को छोड़ने का साहस ही नहीं होता, भले ही पीछे प्रतिफल कुछ भी क्यों न भुगतना पड़े । इसी व्यामोह में ग्रस्त होकर अधिकतर लोग आलस्य प्रमाद से लेकर व्यसन व्यभिचार तक और क्रूर कुकर्मों की परिधि तक बढ़त चल जाते है। इन्द्रिय लिप्सा में ग्रस्त होकर लोग अपना स्वास्थ्य चौपट करते हैं । वासना तृष्णा के गुलाम किस प्रकार बहुमूल्य जीवन की निरर्थक गतिविधियों में जीवन गँवाते हैं यह प्रत्यक्ष है। आन्तरिक दोष दुर्गुणों, शट्रिपुओं को अपनाए रहकर व्यक्ति किस प्रकार खोखला होता चला जाता है इसका प्रमाण आत्म समीक्षा करके हम स्वयं ही पा सकते हैं।
चिन्तन की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित बना ले, तो कोई कारण नहीं कि यह संस्थान उसका जीवन भर साथ न दे।
चिन्तन और मन की अद्भुत सामर्थ्य ही कहनी चाहिए कि जब वे उलटा सोचते और उलटा करते हैं, तब उसका उलटा असर सर्वप्रथम उसी को प्रभावित करता है, जहाँ से इसका प्रादुर्भाव हुआ । आग जहाँ जलती है, सबसे पहले उसी को गर्म करती है । शारीरिक व्याधियों के संदर्भ में यह एक उल्लेखनीय तथ्य है । इन्हें मनोकायिक रोग कहते हैं । यह चिन्तन-क्षेत्र की गड़बड़ी के कारण पैदा होते हैं ।
चिन्तन-क्षेत्र से उपजी मान्यता को गुरुसत्ता की प्रेरणा का नाम देकर अनुभूति-अन्तः स्फूर्त प्रेरणा बताते हुए स्वयं को भी भरमाते हैं, अपने पीछे चलने वाले समुदाय को भी दिग्भ्रमित करते हैं। यह प्रश्न मात्र आत्मावलोकन-आत्मविवेचन की दृष्टि से अपने आप से किया जात रहा है एवं सभी अपनों से करने का निवेदन किया जा रहा है कि कहीं आत्मप्रवंचना की इस मृगतृष्णा में हममें से कोई उलझ तो नहीं गया। यदि उत्तर ‘नहीं’ में है तो यह सकारात्मक चिन्ह है एवं हमें प्रेरक बल प्रदान करते हुए शक्ति देता है, भविष्य के उज्ज्वल होने का संकेत भी देता है।
चिन्तन के प्रदूषण सिर्फ उन्हीं क्षेत्रों तक सीमित होकर नहीं रहते वरन् अपना व्यापक विस्तार शरीर-परिधि तक करते हैं, फलस्वरूप ऐसी अगणित असमानताएँ और शारीरिक कठिनाइयाँ उद्भिजों की तरह प्रकट होने लगती हैं, जिनके बारे में पहले न कभी सुना गया था, न जाना । इसे चिन्तन और मन की अद्भुत सामर्थ्य ही कहनी चाहिए कि जब वे उलटा सोचते और उलटा करते हैं, तब उसका उलटा असर सर्वप्रथम उसी को प्रभावित करता है, जहाँ से इसका प्रादुर्भाव हुआ । आग जहाँ जलती है, सबसे पहले उसी को गर्म करती है । शारीरिक व्याधियों के संदर्भ में यह एक उल्लेखनीय तथ्य है । इन्हें मनोकायिक रोग कहते हैं ।
चिन्तन और भावना की शक्ति को प्रकट करते हैं । आज की समस्या इन्हीं से जुड़ी हुई है । वे शारीरिक कम , मानसिक अधिक है । विज्ञान इनका स्थूल उपचार करने की कोशिश कर रहा है, जबकि होना चाहिए इनका सूक्ष्म इलाज । इन दिनों के मानवीय चिन्तन एवं भावना को यदि सही दिशा दी जा सके एवं उन्हें सही ढंग से सोचने व उच्चस्तरीय संवेदना पैदा करने का तरीका बताया तथा प्रशिक्षण दिया जा सके, तो कोई कारण नहीं कि हम स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन न जी सकें ।
चिन्तन का प्रभाव स्पष्ट झलकने लगा।भारतीय चिन्तन की दार्शनिक प्रवृत्तियाँ यूनानी जन जीवन पर सर करने लगी। आनन्द मुनि के शिक्षण का तरीका बहुत मोहक था । वे अत्यन्त सरल तरीके से गूढ़तम रहस्यों का बोध करा देते। एक दिन वह भारी भीड़ के सामने प्रवचन कर रहे थे।
चिन्तन की तरंग उठने लगती हैं । यह ध्यान का आध्यात्मिक गुण है, जो एक नगण्य मानव को देव और दिव्य भाव में परिवर्तित कर परमात्मीय कर देता है । विश्वविख्यात स्वामी विवेकानन्द नित्य दो घण्टे ध्यान की अनन्त गहराई में विचरण करते थे । अध्यात्म जगत में भगवान बुद्ध को सबसे प्रखर ध्यानी माना जाता है ।
चिन्तन एवं भावना को यदि सही दिशा दी जा सके एवं उन्हें सही ढंग से सोचने व उच्चस्तरीय संवेदना पैदा करने का तरीका बताया तथा प्रशिक्षण दिया जा सके, तो कोई कारण नहीं कि हम स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन न जी सकें ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-July
चिन्तन करते देह त्याग करते तो यमलोक तो आते नहीं। शुभकर्म का फल भोगने स्वर्ग जाते। स्वर्ग सुख भोगने के पश्चात् उनका क्या होता?
चिन्तन के अनुसार जन्म हम नहीं दे सकते, विवश होकर हमें इन्हें मुक्त करना पड़ेगा।” धर्मराज ने बात स्पष्ट की जो अपने मुक्तात्मा सद्गुरु का चिन्तन करता, उनमें आसक्त प्राणी प्राण त्याग करता है, तो मोक्ष उसका अधिकार बन जाता है।
चिन्तन करते हुए मरता है। मृत्यु के उपरान्त वह अपने स्वर्ग या नरक के भोग प्राप्त करके उन्हें पूर्ण कर लेता है। तब उसे पृथ्वी पर उसके संसर्ग में जन्म लेना चाहिए, जिसका चिन्तन करते हुए वह मरा है। लेकिन जिसका चिन्तन करते हुए वह मरा है वह जीव अभी स्वर्ग या नरक में है। तब इस दूसरे जीव को पितृलोक में प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
चिन्तन, दृष्टिकोण में आदर्शवादिता और उत्कृष्टता का समावेश करते हों। इसके बिना मनुष्य के अन्तराल में छिपी हुई रहस्यमय दिव्यता का विकास नहीं हो पाता। विद्या का स्वरूप है-विचारणा एवं भावना के स्तर को उच्चस्तरीय बनाने वाला ज्ञान, अनुभव और अभ्यास। इसी से गुण-कर्म-स्वभाव का परिष्कृत व्यक्तित्व विनिर्मित होता है। शिक्षा और विद्या का समन्वय स्वार्थपरता को हटाता और राष्ट्रनिष्ठा को बढ़ाता है।
चिन्तन करता, उनमें आसक्त प्राणी प्राण त्याग करता है, तो मोक्ष उसका अधिकार बन जाता है।
चिन्तन करते हुए वह मरा है वह जीव अभी स्वर्ग या नरक में है। तब इस दूसरे जीव को पितृलोक में प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। एक प्रकार का प्रतीक्षालय है पितृलोक।
चिन्तन था।” धर्मराज ने सूत्र सुना दिया।
चिन्तन करने में असमर्थ है। उसका कण्ठ आर्द्र हो गया प्रयत्न करके भी तत्वों के विवेचन प्रस्रयान में एकाग्र नहीं हो पाता हूँ। सृष्टि एवं प्रलयक्रम का विचार विवेचन क्षणभर में समाप्त हो जाता है। फिर इस सब में मुझे कोई रस भी नहीं आता। मन अपनी मनमानी करने में कब जुट जाता है मुझे पता भी नहीं चलता।
चिन्तन में निमग्न हो गए।
चिन्तन में शालीनता, व्यवहार में सहृदयता तथा क्रियाकलापों में प्रखरता का समावेश होता है, ऐसे लोग ही राष्ट्र को विभूतिवान् व समृद्ध बनाते हैं। इसलिए अन्ततः कहना यही होगा कि भारतीय समाज एवं राष्ट्र का विकास यहाँ के लोकमानस के परिष्कार पर अवलम्बित है। किसी राष्ट्र का गौरव उसके लौह-नागरिक होते हैं, यही उसके वास्तव में बहुमूल्य मणि-माणिक्य हैं। सच्ची समृद्धि इसी रत्नराशि की तुलना पर निर्भर है। राष्ट्र-निर्माण उज्ज्वल चरित्र-सुसंस्कृत और निस्वार्थ लोकसेवा निरत व्यक्ति ही अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर रह सकते हैं, जो अवांछनीयताओं के विरुद्ध मोर्चाबंदी कर लड़ने के लिए साहसी शूरवीरों की भूमिका प्रस्तुत कर सकें।
चिन्तन की इस महिमा पर चित्रगुप्त ने सिर झुका लिया। वह गहन चिन्तन में निमग्न हो गए।
चिन्तन में निमग्न थे। अखण्ड-ज्योति कार्यालय मथुरा के अपने एकान्त कक्ष में बैठे वह सोच रहे थे कि इस स्वाधीनता को पूर्ण कैसे किया जाय ? उनकी आँखें खुशी और गम आँसुओं से भीगी थीं। उन्हें खुशी थी, निश्चित ही बेहद खुशी, क्योंकि आज भारतमाता की गुलामी की बेड़ियाँ टूट गईं। वह आजाद हो गयीं।
चिन्तन करते हुए वह मरा है। लेकिन जिसका चिन्तन करते हुए वह मरा है वह जीव अभी स्वर्ग या नरक में है। तब इस दूसरे जीव को पितृलोक में प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। एक प्रकार का प्रतीक्षालय है पितृलोक।
चिन्तन पर ध्यान नहीं दे रहे हैं।” धर्मराज ने चित्रगुप्त को दिशा-संकेत दिया।
चिन्तन के अनुसार देने के लिए कर्म नियन्ता विवश है। लोकगुरु पूर्णआवतार भगवान श्रीकृष्ण ने भी यही घोषणा की है-
चिन्तन करता है, पृथ्वी पर उसे प्रथम जन्म उस चिन्तन के अनुसार देने के लिए कर्म नियन्ता विवश है। लोकगुरु पूर्णआवतार भगवान श्रीकृष्ण ने भी यही घोषणा की है-
चिन्तन ठीक दिशा में था।
चिन्तन करते हुए शरीर छोड़ा है और स्वामी निरन्जनानन्द जी तो निर्वाण प्राप्त कर चुके।”
चिन्तन एवं चरित्र होता है। संयमी, सदाचारी, सन्तुष्ट, कर्मठ, कर्तव्यपरायण नागरिक ही राष्ट्र को जीवन्त व जाग्रत बनाए रखते हैं। जिनके चिन्तन में शालीनता, व्यवहार में सहृदयता तथा क्रियाकलापों में प्रखरता का समावेश होता है, ऐसे लोग ही राष्ट्र को विभूतिवान् व समृद्ध बनाते हैं। इसलिए अन्ततः कहना यही होगा कि भारतीय समाज एवं राष्ट्र का विकास यहाँ के लोकमानस के परिष्कार पर अवलम्बित है। किसी राष्ट्र का गौरव उसके लौह-नागरिक होते हैं, यही उसके वास्तव में बहुमूल्य मणि-माणिक्य हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-January
चिन्तन प्रणाली होती है। इसी की ऊर्जा से नवसमाज के भ्रूण को पोषण मिलता है, उसमें परिपक्वता आती है। बाद में भी उसी विचार-प्रणाली से जन्मी प्रथा-परम्पराएँ इसका विस्तार करती हैं जन्म लेने वाले समाज के जीवन की दीर्घता, सबलता और सुदृढ़ता अपनी जन्मदात्री विचारधारा के अनुरूप ही होती है। समाज की व्यापकता एवं विस्तार भी इसे जन्म देने वाली चिन्तन प्रणाली की समग्रता के अनुरूप ही होती है।
चिन्तन तो एकाकी भी हो सकता था पर इसका कार्यान्वित होना ऐसा ही असंभव समझा गया, जैसा विश्वामित्र की युग-परिवर्तन चेष्टा और परशुराम की विचार-परिवर्तन प्रक्रिया को तत्कालीन लोगों ने उपहासास्पद बताया था। उन दिनों योजनाएं रंग लाई। धर्मतन्त्र से लोकशिक्षण का विचार भी कार्यरूप में परिणत हुआ और आज संसार चकित है कि किस प्रकार यह सृजन सरंजाम साधन रहित परिस्थितियों में भी जुटाकर सफलता की ओर तूफानी गति से आगे बढ़ा।
चिन्तन शैलियों को सकते में डाल दिया, वही द्रुतगामी संचार एवं परिवहन के साधनों में भौगोलिक सीमा रेखाओं को एक-दूसरे से मिला दिया। विचारों और साधनों के एक छोर से दूसरे छोर तक प्रवाहित होने लगने से स्थितियाँ बदल गयी। ऐसे में प्राचीन मूल्यों एवं मानदंडों का टूटने-दरकने लगना स्वाभाविक है।
चिन्तन प्रणाली, यही से चीन, जापान, कम्बोडिया, इण्डोनेशिया आदि अनेक देशों में गयी। और जाने के साथ ही अपनी मौलिक विशेषताओं को बनाए रखने के बावजूद वही के अनुरूप ढल-बन गयी। आज यदि विभिन्न देशों में फैले बौद्ध समाज की रीति-रिवाजों, प्रथा-परंपराएं, कर्मकाण्डों, पर्वों-त्यौहारों, का विवेचन-विश्लेषण करें, तो उनमें परस्पर काफी बड़ा फर्क देखने को मिलता है। ऐसा ही फर्क अन्य चिन्तन प्रणालियों से उपजी दूसरी सामाजिक संरचनाओं में भी है।
चिन्तन की कड़ियाँ जोड़ी और अपनी राजनैतिक एवं सामाजिक रचनाओं को प्रस्तुत किया। दर्शनशास्त्री लाँक तो न्यूटन से इतना प्रभावित थे कि स्वयं न्यूटन के आधीन काम करने वाला मजदूर बताने में गौरव अनुभव करते थे। उडम स्मिथ ने भी याँत्रिकी सिद्धान्तों से प्रभावित होकर स्वतन्त्र बाजार, वित्तीय व्यवस्था तथा श्रम विभाजन के सिद्धान्त बनाए है। ‘सोशियोलाँजी’ शब्द के जन्मदाता आगस्ट काँमटे ने भी इसी से प्रभावित होकर समाज विज्ञान को पहले-पहल सोशल फिजिक्स (समाज भौतिकी) कहा।
चिन्तन के प्रमुख सूत्र एकात्मकता, व्यापकता एवं सामंजस्य को अब विज्ञान ने भी खोज लिया है। भावी समाज में विज्ञान की उपलब्धियाँ मनुष्य में एक ऐसे चिन्तन को प्रदीप्त करेंगी जो आध्यात्मिक भावों से भरा होगा। आज की टूटती-दरकती व्यवस्था से सब और कुछ ऐसा नया जन्म लेगा जहाँ पराएपन की अनुभूति न होगी।
चिन्तन प्रणाली की समग्रता के अनुरूप ही होती है।
चिन्तन प्रणालियों से उपजी दूसरी सामाजिक संरचनाओं में भी है।
चिन्तन एवं उद्देश्यों में साम्य रखने वाली संस्थाओं के साथ मिलकर सम्पन्न करेगा। आशा करनी चाहिए की 1991 तक सारे भारत ही नहीं, विश्वभर में साँस्कृतिक नवोन्मेष की यह प्रक्रिया किया रूप लेती देखी जा सकेगी एवं फिर युग परिवर्तन बहुत दूर नहीं, प्रत्यक्ष अपने सामने देखा जा सकेगा।
चिन्तन बलवती बनाने के लिए पढ़े, यह विशेष लेख।
चिन्तन और मनन के बाद हम एक निष्कर्ष पर पहुँचें है और मनन के बाद हम एक निष्कर्ष पर पहुँचे है और बिना लाभ-लपेटे, दिपाव व दुराव के अपनी स्वतन्त्र नीति-निर्धारण करने में समर्थ हुए हैं हम सीधे राजनीति को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका संपादित करेंगे और यही अन्त तक करते रहेंगे। अपना संगठन यदि अपने प्रभाव और प्रकाश को सर्वथा तिरस्कृत नहीं कर देता तो उसे भी इसी मार्ग पर चलते रहना होगा।
चिन्तन से सामयिक समाधान मिलते हैं। जो विचार मंथन के लिए प्रेरित करे, वही युग साहित्य है।
चिन्तन को प्रदीप्त करेंगी जो आध्यात्मिक भावों से भरा होगा। आज की टूटती-दरकती व्यवस्था से सब और कुछ ऐसा नया जन्म लेगा जहाँ पराएपन की अनुभूति न होगी।
चिन्तन के माध्यम से प्रज्ञा के मनोबल, चरित्र, स्तर स्वाभिमान एवं शौर्य को जगाया-बढ़ाया जाय। स्वतन्त्रता संग्राम वे धीरे-धीरे चला रहे थे। क्रान्तिकारियों से उनके मतभेद का मूल कारण यह था कि वे चाहते थे स्वराज्य धीरे-धीरे उस क्रम से आगे जिस क्रम से देश उसे सँभालने योग्य प्रतिभा अपने में पैदा कर ले स्वतन्त्रता संग्राम के साथ चरखा, खादी हरिजन सेवा, ग्रामोद्योग, राष्ट्रीय शिक्षा, सफाई जैसी प्रवृत्तियों को जोड़ देना यों तो अटपटा लगता है असहयोग आन्दोलन और सत्याग्रह की दार्शनिकता कितनी ही ऊंची क्यों नहीं हो। पर उसका व्यावहारिक पक्ष यह था कि इन सरलतम उपायों द्वारा जनता अपनी मूल चेतना विकसित करे और स्वराज्य धारण कर सकने में समर्थ हो जाय। वे जानते थे कि विभूति प्राप्त करने से अधिक उसे पचाना कठिन होता है।
चिन्तनीय, अदृश्यमान और सूक्ष्मतम स्वरूप है जो उसके मूल निर्गुण तत्व से सगुण की ओर उसके मूल निर्गुण तत्व से सगुण की ओर आने की प्राथमिक अभिव्यक्ति है। यही शब्द ब्रह्म है इसीलिए कालान्तर में परमेश्वर के नारी रूप को शब्द ब्रह्ममयी, परात्परमयी, ज्योतिर्मयी और वाङ्मयी आदि विशेषणों से सम्बोधित किया है। बाद के समय में विकसित शाक्तदर्शन एवं उससे जुड़ी साधना पद्धति का मूल आधार वाक् की ही अवधारणा है। इस संदर्भ में ऋग्वेद का देवी सूक्त या वागाम्भूण्ी सूक्त (मण्डल 10 सूक्त, सूक्त 125) विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वैदिक इतिहास के अनुसार महर्षि अम्भूण की पुत्री वाक् इसकी मंत्रदृष्टा ऋषि थी।
चिन्तन की संस्कार महोत्सवों में ज्ञानयज्ञ के माध्यम से विराट प्रदर्शनी के रूप में एक अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया गया है।
चिन्तन और जीवन में भारी उलट-फेर कर दी। तर्क एवं प्रयोगों ने जहाँ भावुकता एवं आस्था परायण चिन्तन शैलियों को सकते में डाल दिया, वही द्रुतगामी संचार एवं परिवहन के साधनों में भौगोलिक सीमा रेखाओं को एक-दूसरे से मिला दिया। विचारों और साधनों के एक छोर से दूसरे छोर तक प्रवाहित होने लगने से स्थितियाँ बदल गयी। ऐसे में प्राचीन मूल्यों एवं मानदंडों का टूटने-दरकने लगना स्वाभाविक है।
चिन्तन को बढ़ावा मिलेगा।
चिन्तन की दिशा अलग है, हम अधिक बारीकी से सोचते हैं। शासन की असफलता से हम दुखी है। हमें बहुत खेद है कि विगत वर्षों में जितना बढ़ा जा सकता था, उतना नहीं बढ़ा गया। प्रगति कुछ भी न हुई हो सो बात नहीं पर दूसरे देशों की तुलना में हमारी चाल इतनी धीमी है कि इस क्रम से हजारों वर्ष में भी प्रगतिशील देशों की पंक्ति में भौतिक दृष्टि से भी खड़े न हो सकेंगे। गाँधीजी के धर्मराज्य, रामराज्य और विश्वमंगल की आध्यात्मिक प्रगति तो अभी लाखों मील आगे की बात है।
चिन्तन एवं जीवन में भी लागू किए जा सकते हैं। और हुआ भी यही, जीवन और समाज धीरे-धीरे याँत्रिक व्यवस्था में ढलने लगा। वैसे सर न्यूटन की यह सोच कोई नई बात नहीं थी। पहले भी प्राचीन यूनानी दार्शनिकों का विश्वास था कि सामाजिक एवं राजनैतिक सम्बन्धों तथा बाहरी दुनिया के बारे में सोचने के तौर-तरीकों में गहरा सम्बन्ध है। हइराक्लीइटस के संघर्ष एवं तनाव के सिद्धान्त समाज में लोगों पर भी लागू होते हैं।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार और प्रचलन को सही रखने की जिम्मेदारी उठा सकने में मात्र धर्मतन्त्र ही समर्थ है। मनःस्थिति को पवित्र और प्रखर बनाये रहने में धर्मतन्त्र की भूमिका ही कारगर हो सकती है। इसलिए दुर्दशाग्रस्त धर्मतन्त्र को पुनर्जीवित किया जाए। इसके लिए देश के प्रगतिशील धर्म-प्रेमियों को संगठित किया जाय और उनकी संयुक्त शक्ति को लोकमानस के परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन में यथा तथ्य रूप में लगाया जाय। यह चिन्तन तो एकाकी भी हो सकता था पर इसका कार्यान्वित होना ऐसा ही असंभव समझा गया, जैसा विश्वामित्र की युग-परिवर्तन चेष्टा और परशुराम की विचार-परिवर्तन प्रक्रिया को तत्कालीन लोगों ने उपहासास्पद बताया था।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन के लिए कारगर प्रयास कब और किस प्रकार किया जाय? प्रज्ञा अभियान ही है जिसने इस संदर्भ में गम्भीरतापूर्वक सोचा, कदम उठाया और वह कर दिखाया जिस पर सहज बुद्धि को सहज विश्वास ही नहीं हो सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-August
चिन्तन की विधि एवं दिशा में परिवर्तन सम्भव है। अमेरिका के तंत्रिका विज्ञानी डा. रोजरहारपी सुदीर्घ काल से संचित अवांछनीय आदतों से पिण्ड छुड़ाने और उनके स्थान पर नये अभ्यासों को गहराई से अपना लेने सम्बन्धी अपनी शोध में सफल हुए हैं।
चिन्तन ही है यों भी उसे प्रभावित करने के सभी सम्भव हथकण्डे सत्ताधारी अपनाते रहें हैं। धर्म, कला, साहित्य, भाषण एवं दृश्य-श्रव्य माध्यमों से मानवी मेधा को मोहित और मृतप्राय बनाने की चेष्टाएँ पहले से ही होती रहीं हैं। अब विज्ञान का सहारा लेकर उस कार्य को अभूतपूर्व तत्परता और शक्ति के साथ पूरा किया जा सकेगा। इस भयानक षड्यन्त्र के विरुद्ध जनमत जाग्रत किया जाना चाहिए और समझाया जाना चाहिए कि स्वतन्त्र चेतना का अपहरण मनुष्य की स्वाभाविक प्रगति के मार्ग में एक दीवार की तरह है। इससे न तो भौतिक उन्नति सम्भव है न आत्मिक, जितनी जल्दी विज्ञान के सत्ताधीशों की इन दुरभिसंधियों से बचा जा सके, उतना ही अच्छा।
चिन्तन चेतना के आधार स्तम्भ आर॰ एन॰ ए॰ नामक रसायन की मात्रा को चेतना की विभिन्न परतों के हिसाब से घटा-बढ़कर प्राणियों के चिन्तन की विधि एवं दिशा में परिवर्तन सम्भव है। अमेरिका के तंत्रिका विज्ञानी डा. रोजरहारपी सुदीर्घ काल से संचित अवांछनीय आदतों से पिण्ड छुड़ाने और उनके स्थान पर नये अभ्यासों को गहराई से अपना लेने सम्बन्धी अपनी शोध में सफल हुए हैं।
चिन्तन को दूसरे लोग कठपुतली की तरह संचालित कर रहें होंगे।
चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार में ऐसी उथल-पुथल हुई देखते हैं, जिसे कायाकल्प के समतुल्य कहा जा सके। ऐसे ही लोगों से यह आशा की जा सकती है कि वे अपने परिवर्तन का प्रभाव दूसरों पर छोड़ेंगे और जलते दीपक की तरह अपने संपर्क क्षेत्र में नवचेतना का आलोक वितरण करेंगे।
चिन्तन सोता रहता है। दोनों एक साथ कार्यरत नहीं रह सकते। योगनिद्रा उत्पन्न करके पूर्ण या आँशिक समाधि में जाया जा सकता है और अतिमानवी अनुभूतियों के क्षेत्र में प्रवेश किया जा सकता है। यदि चेतन मस्तिष्क पूर्ण सजग रहे और तर्कबुद्धि के साथ निद्रित न होने का संकल्प किए रहे तो आध्यात्मिक जाग्रति असंभव है। जाग्रत मन को निद्रित करके ही अचेतन को अध्यात्म भूमिका में कुछ अधिक योगदान दे सकने योग्य बनाया जा सकता है।
चिन्तन। इन तीनों से ही मन की चंचलता बनती है, लेकिन यदि मन का शब्द का मध्यमान न मिले तो उसे चंचलता नहीं प्राप्त हो सकती। उसकी गति शब्द की बैसाखी पर निर्भर है। सारी स्मृतियाँ, कल्पनाएँ, तथा चिन्तन शब्द के माध्यम से चलते हैं।
चिन्तन-चेतना को मोड़ने-मरोड़ने की अद्भुत क्षमता होती है।
चिन्तन को मोड़ने, मरोड़ने और इच्छित प्रयोजन की दिशा में घसीट ले जाने में भी सफलता की आशा की जा सकती है। ऐसी कई दवाएँ पहले ही बना ली गयी है, जिनसे दर्द की अनुभूति को घटाया-मिटाया जा सके। यह रसायन रेटिक्यूलर एक्टिवेटिंग सिस्टम को इस कदर जकड़ लेती है कि पीड़ा की अनुभूति हो ही नहीं पाती, भले ही उस दौरान अंगों की कटाई-छँटाई ही क्यों न चल रही हो। विशेषज्ञों का कथन है कि रेटिक्यूलर तंत्र की गतिविधियों को जिस परिमाण में समझा और प्रभावित किया जा सकेगा, उतनी ही मानवी सम्वेदनाएँ नियमित-नियंत्रित हो सकेंगी। तब बिना किसी घटना के भी हर्ष और विशाद की प्रतीति कराई जा सकेगी।
चिन्तन करने, अच्छी योजनाएँ बनाने में लगाऊँगा। हमारे पिताजी ठीक ही कहा करते थे। सचमुच मेरे खेतों में अपार धन है।
चिन्तन शब्द के माध्यम से चलते हैं।
चिन्तन, आत्मसमीक्षा और भविष्य के कार्यक्रमों के लिए बल मिलता है, सो स्वाधीनता की स्वर्ण जयंती के साथ-साथ शान्तिकुञ्ज की रजत जयंती परमपूज्य गुरुदेव के हिमालय से जून १९७२ में शान्तिकुञ्ज आकर ऋषि परम्परा का बीजारोपण करने के २५ वर्श पूरे होने के संदर्भ में इस जुलाई से मनाई जा रही है। मिशनरी गरिमा के अनुरूप समारोह सम्पन्न करने की प्रेरणा अपने पथ-प्रदर्शकों ने दी है। यहाँ उसकी सम्पूर्ण रूपरेखा प्रस्तुत की जा रही है।
चिन्तन और सत्कर्म के मूल आधार गायत्री और यज्ञ को घर-घर विस्तार इस क्षेत्र में सक्रिय अपने परिजनों से भावी कार्यक्रमों पर चर्चा और राजतंत्र बुद्धिजीवी तंत्र से मात्र धर्मनिरपेक्ष न बने रहकर आध्यात्मिक मूल्यों के बुद्धि एवं विकास-सम्मत स्वरूप के संरक्षण पर विचार-विनिमय
चिन्तन करने से पूर्व पवित्रता का चिंतन करो। पवित्रता वह चाभी है जिससे ध्यान रूपी द्वार खुलता है, समाधि के आगार में प्रवेश मिलता है और सर्वशक्तिमान से मिलन होता है।
चिन्तन यहाँ के एकान्त एवं शान्त वातावरण में आकर किया था। समर्थ गुरु रामदास को राष्ट्र को संगठित करने एवं एकता के सूत्र में बाँधने की प्रेरणा-शक्ति इसी आद्य स्थान में रामदूत हनुमान से मिली थी। स्वामी विवेकानन्द एवं स्वामी रामतीर्थ ने सनातन धर्म को विश्व व्यापी बनाने की विचारणा तपोभूमि हिमालय की गोद में बैठ कर की थी।
चिन्तन की दिशा में भी यह मनोवृत्ति रोड. बनकर अड़ी रही और महत्त्वाकाँक्षी अधिनायक जनसमूह का उपयोग मक्खी-मच्छरों भेड़-बकरियों की तरह करने लगें, तो मानव जाति भयंकर विभीषिका में फंस जाएगी। फिर सम्पूर्ण बौद्धिक दासता का एक निरंकुश साम्राज्य स्थापित हो जाएगा। सिर्फ सत्ताधारी समर्थजन इस दासता से मुक्त होंगे और वे ही मनुष्य-जाति के सार्वभौम स्वामी होंगे, तब प्रगति की दिशाएँ भी रुद्ध और बद्ध हो जाएँगी । मानवी प्रकृति का आधार स्वतन्त्र चिन्तन ही है यों भी उसे प्रभावित करने के सभी सम्भव हथकण्डे सत्ताधारी अपनाते रहें हैं। धर्म, कला, साहित्य, भाषण एवं दृश्य-श्रव्य माध्यमों से मानवी मेधा को मोहित और मृतप्राय बनाने की चेष्टाएँ पहले से ही होती रहीं हैं।
चिन्तन, परिष्कृत श्रवण एवं परिष्कृत दर्शन करें तथा परिष्कृत वाणी बोलते हुए परिष्कृत ही आचरण करें। यदि ऐसा हो सका, तभी यह समझा जाना चाहिए कि समग्र आहार की अवधारणा और उसमें छिपे तत्त्वज्ञान को हम सही-सही समझ सकें, इससे कम में नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-December
चिन्तनशीलता लौटने को हुई। नारी का सम्मान जागता प्रतीत हुआ आर वह सही रास्ते पर लौटी ही आखिर। वह स्थिर हो उठी। अब उसके माथे पर पसीना न था। आँखों में वासनाजनित उत्तेजना या व्याकुलता न थी।
चिन्तन लौकिक पिताओं की तरह नहीं, उससे भिन्न, उदात्त और उत्कृष्ट स्तर का है। साँसारिक पिताओं की दृष्टि में उसका कोई पुत्र अधिक और कोई कम प्रिय हो सकता है, पर परमपिता का प्यार सबके लिए एक समान है। उसके राज्य में किसी प्रकार के भेदभाव की कोई गुँजाइश नहीं
चिन्तन यदि रहता, तो मानवीय मेधा के विलक्षणता के बावजूद आज दो वर्गों में इतनी बड़ी खाईं नहीं दिखती। निर्माण तो हो, पर कौतुक के लिए नहीं, सर्वजनहितार्थ सृजन के लिये ही।
चिन्तन एवं भाव वृत्तियों को परिशोधित कर उन्हें ईश्वरोन्मुखी किया जाए।
चिन्तन एवं कर्तृत्व का ऐसा निर्माण, जो आज की स्थिति में हमें कुछ करने की प्रेरणा दे सके। इन महापुरुषों की अलग-अलग फिल्म न बनाकर उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं को एक ही धारावाहिक में आबद्ध किया जाये, ताकि कार्यक्रमों की भिन्नता रहते हुए भी महामानवों का लक्ष्य एक ही रहने की बात समझ में आये।
चिन्तन में लीन रहने लगे। उनकी जगह अन्य कोई होता, तो कदाचित अब तक नास्तिक हो गया होता, पर आस्तिकता की परीक्षा ऐसे ही अवसरों पर होती है, जब यह देखा जाता है कि व्यक्ति की श्रद्धा कितनी अटल तथा विश्वास कितना अडिग है, वह ईश्वरीय न्याय को किस हद तक बर्दाश्त कर सकता है। जो इसमें उत्तीर्ण होते, वे बहुत कुछ खोकर भी सब कुछ प्राप्त कर लेते हैं। धन-साधन गँवाकर भी परम धन प्राप्त कर लेना उन्हीं के वशवर्ती होता है, जो धन परम धन के मार्ग में आड़े आता हो, वह किस काम का? राय दम्पत्ति ने आज यह तत्त्वबोध प्राप्त कर लिया था।
चिन्तन-व्यवहार में भारी परिवर्तन ला देते हैं। एक अंगूठी अथवा गाउन पहनाने तथा पादरी के स्पर्श कर देने से पति-पत्नी का सम्बन्ध बन जाता है। शब्दरहित संकेतों एवं प्रतीकों के कारण पादरी की शक्तियाँ बढ़ जाती हैं। ईसाइयों के कुछ धार्मिक प्रतीक हैं- डबलरोटी, शराब, क्रास । अन्य धर्मों में मृत्यु व जीवन, सूर्य व चन्द्र प्रतीकों की पूजा की जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-October
चिन्तन और सेवा - वृत्ति है। जो इन्हें जितने अंशों में अपनाते और और व्यवहार में उतारते हैं , समझना चाहिए भगवान के वे उतने ही निकट और स्नेह पात्र हैं। कर्मयोगियों के जीवन में घटने वाली घटनाएँ इसकी पुष्टि करती हैं।
चिन्तन और उदात्त गतिविधियों के द्वारा इसे स्वर्ग जैसा सुन्दर , सुखद और श्रेष्ठ बना दे तथा चाहे तो नरक की निकृष्टता में धकेल दे। यह पूर्णतया आदमी की अपनी इच्छा पर निर्भर है। बुरे कार्यों के लिए दण्ड और प्रताड़ना की सर्वत्र व्यवस्था है एवं अच्छे कार्यों के लिए पुरस्कार दिये जाते हैं। पुत्र कुमार्गगामी बने और घर बर्बाद करे - यह किस पिता को पसन्द होगा, इसके विपरीत उसके उत्तम कार्यों की प्रशंसा भी होती है और पारितोषिक भी मिलते हैं। परमपिता के कार्यों में सहभागी बनकर इन दिनों हम ऐसे ही इनाम - इकराम के रूप में उनके दिव्य अनुदान और वरदान प्राप्त कर सकते हैं।
चिन्तनशैली में राई - रत्ती भी अन्तर नहीं दिखाई पड़ता। इसका एक ही कारण समझ में आता है, वह यह कि उसे बाह्य उपचार को तो अपना लिया, किन्तु उसके साथ जुड़े रहने वाले आन्तरिक अनुशासन और तत्त्वज्ञान को आत्मसात् न किया। आत्मिक प्रगति न तो जप से संभव है, न ध्यान से। वे तो मात्र एक तत्त्वदर्शन हैं , जो इस बात की प्रेरणा देते हैं कि हमें परम-सत्ता से घनिष्ठता स्थापित करनी चाहिए। यह घनिष्ठता ईश्वरीय अनुशासन को कठोरतापूर्वक अपनाकर ही सम्पन्न की जा सकती है, इससे कम में नहीं।
चिन्तन का अभाव है। वह नीति-अनीति भला-बुरा लाभ-हानि उत्कृष्ट-निकृष्ट का निर्णय कर सकने में असमर्थ है। मानवी बुद्धि में यह समर्थता भाव-संवेदना की फलश्रुति मानी जानी चाहिए। इसलिए मस्तिष्क का कम्प्यूटर से और मानव का यंत्रमानव से तुलना करना गलत होगा। यंत्र सिर्फ निर्देशों का पालन करते हैं, वे भले हैं या बुरे, नैतिक हैं या अनैतिक, इससे उनका कोई सरोकार नहीं है।
चिन्तन का अवसर मिलता है। ऐसी ही प्रार्थना श्रेष्ठ, सर्वश्रेष्ठ है।
चिन्तन के पश्चात् इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि समानता का आधार एक पक्षीय नहीं हो सकता। यदि ऐसा होने लगे तो फिर विवेकपूर्ण निर्णय कर पाना असंभव होगा और संसार में नीति, धर्म, गुण, सदाचार की धज्जियाँ उड़ जाएँगी। उदाहरण के लिए आदमी और वनमानुष को लिया जा सकता है। दोनों के आकार-प्रकार लगभग एक जैसे हैं। दोनों को ही ‘बाइपेडल लोकोमोशन’ ( दो पैरों से चलने की क्षमता ) मिला हुआ है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-April
चिन्तन-चेतन एवं भावनात्मक आध्यात्मिक विकास के उपक्रमों से सम्पन्न हो पाते हैं। बुद्धिमान भावनाशील, राष्ट्रभक्त पिता का क्लोन भी वैसा ही निकलेगा जरूरी नहीं।
चिन्तन परिष्कृत होगा, तो कर्म भी सात्त्विक ही होंगे। गुरुकृपा से इनमें कवित्व शक्ति जाग्रत होंगे। गुरुकृपा से इनमें कवित्व शक्ति जाग्रत हुई थी। इनके पदों में लोकशिक्षा, वैराग्य, तत्वज्ञान और भगवद्भक्ति के गम्भीर भाव हैं। कर्नाटक संगीत के ये उद्धारक कहे जाते हैं।
चिन्तन, आचरण एवं आदतों के बारे में सटीक विवेचन कर देते हैं। इसकी अगर समुचित जानकारी हो सके तो जीवन के कई अदृश्य पहलुओं को जाना जा सकता है।
चिन्तन का है। यह पूरी तरह हम पर कि हम क्या अपनाते हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में शालीनता जुड़ ही नहीं पाती। दुर्भाग्य से हमारे दर्शन और इतिहास में भी वैज्ञानिक सुख-सुविधा, स्वार्थ-मुक्ति, सिद्धि, देव अनुकम्पा आदि की ही विशेष रूप से चर्चा है। सामाजिकता की उपेक्षा से ही जाने लगी तभी से विघटन अनेक रूपों में प्रकट होते गये। आर्थिक आधार को लेकर अनेकों संगठन बनते हैं। अनाचारी षड्यंत्रों का गिरोहबंदी के आधार पर व्यवसाय चलता है।
चिन्तन और चरित्र में निकृष्टता एवं आचरण में भ्रष्टता का असाधारण समावेश, अन्तर्ग्रही परिस्थितियों एवं क्रुद्ध प्रकृति की विनाश-लीला के मिले-जुले परिणाम मानव समाज के लिए अहितकर ही हो सकते हैं। युगसन्धि की इस वेला में इस खतरे से सावधान रहने और बिना किसी भय-आतंक के, शौर्य और साहस के साथ इन्हें निरस्त करने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है।
चिन्तन होगा, दयामय प्रभु। लोकहित में लगे मुझ सेवक का येगक्षेम वहन करेंगे और यदि समाज पर भरोसा है, तो अपनी उपार्जित सम्पत्ति को यह सोचते हुए व्यय करेगा, जिस समाज की सेवा में संलग्न हूँ, वह हमारे जीवन निर्वाह की व्यवस्था अवश्य करेगा। जिसे इन तीनों पर एक साथ भरोसा हो उसका कहना ही क्या?
चिन्तन को असाधारण मोड़ देना पड़ेगा।
चिन्तन नहीं करेंगे, बताकर उसके साथ भेड़ के क्लोन बनाने जैसे हथकण्डे रचते रहेंगे एवं मनुष्य जाति का अस्तित्व खतरे में डाल देंगे। कम से कम भगवान को यह सब मंजूर नहीं है एवं वह ऐसा होने नहीं देगा।
चिन्तन चलता रहा। कपिल ने सोचा-हिस्से के रूप में राज्य प्राप्त करने पर राजा के बेटों और मुझमें प्रतिस्पर्धा की भावना जाग्रत हो सकती है। आपस में लड़ाई-झगड़े की पूर्ण सम्भावना है तो फिर पूरा राज्य हासिल कर लूँ।
चिन्तन एवं गलत शिक्षा का परिणाम है।
चिन्तनशील मन है। उसकी आभाएँ मानसिक प्रकाश की विभिन्न तीव्रताओं को सूचित करती है। चैत्य प्रकाश का रंग उसके द्वारा प्रकट होने वाली वस्तुओं के अनुरूप होता है। चैत्य प्रेम गुलाबी या पाटल होता है। चैत्य पवित्रता श्वेत होती है।
चिन्तन हमारा व्यक्तित्व टूटने और बिखरने से बचता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ऐसा होगा, जिसका प्रभाव असंख्यों को प्रभावित करेगा। इसका शुभारंभ शाँतिकुँज से हुआ है।
चिन्तन के उस रास्ते को, जो हमारी जिन्दगी को शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियों से भर दे।
चिन्तन निरन्तर अबाध गति से चलता रहा और कपिल अपने आप में तृप्त न हो सके।
चिन्तन, व्यवहार के आधार पर निर्णय लिए जाएंगे। सँपूर्ण व्यवस्था-तंत्र अन्तरात्मा की आवाज पर टिका रहेगा।
चिन्तन अनुसार व्याख्या करने का प्रयत्न किया। उन्होंने भी किसी वैज्ञानिक या युक्तियुक्त आधार पर अपने मत प्रकट नहीं किये, अपितु प्रायः कलपना व अनुमान का ही आश्रय लिया। तुर्की के बोगज कोई नामक स्थान पर प्राप्त एक उत्कीर्ण लेख में इन्द्रमित्रावरुणो और नास्तयौ का उल्लेख है, जो वैदिक देवता है। इस लेख को 1400 ई. पूर्व का माना जाता है। 18वीं से 12वीं दी ई. पू. तक बैबिलोनिया में जिस जाति का शासन था वह शूरिअ (सूर्य) और मर्य्त (मरुत) की उपासिका थी।
चिन्तन और मन में संचित घृणा, द्वेष, ईर्ष्या और भय के संस्कारों के कारण वातावरण से तालमेल बिठाना थोड़ा मुश्किल जरूर है।
चिन्तन, दृष्टिकोण असाधारण रूप से बदल गया और समय लगभग ऐसा आ गया, जिसे सतयुग की वापसी कहा जाय, तो अत्युक्ति न होगी।
चिन्तन और व्यवहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।
चिन्तन और दृष्टिकोण अध्यात्मवादी नहीं बना पाते, उनका उपचेतन मन का सम्बन्ध बराबर वासनालोक की प्रेतात्माओं से बना रहता है, जिसके कारण प्रेतात्माएं उनके सिर चढ़कर अपनी अवाँछनीय आकाँक्षाएँ आसानी से पूरी करती रहती हैं। इन दिनों नैतिकी का जितना अधिक अवमूल्यन हुआ है, उतना कदाचित् ही पहले कभी रहा हो। यही कारण है कि आज सर्वसाधारण द्वारा उलटा सोचते और उलटा करते ही बन पड़ रहा है। कारण उनका संपर्क उच्च आयामों के देवतुल्य आत्माओं से न होकर उनके मन-मस्तिष्क पर सदा निम्न स्तर की निकृष्ट आत्माओं का ही आधिपत्य बना रहता है। यही हमारे आध्यात्मिक विकास के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा और बारबार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेने का निमित्त बन जाता है।
चिन्तन के लिए प्रयास करते ही हमारी चेतना विचारों के उच्चस्तरीय आयामों से जुड़ने लगती है। उच्चस्तरीय आयामों से जुड़ने लगती है। अनायास ही हम हम देव-चेतना, ऋषि चेतना के संपर्क में आ जाते हैं। हमारी मनोभूमि में जैसे अलौकिक प्रकाश की बाढ़ आ जाती है। जीवन के अँधेरे कोने में भी उजाले से भर जाते हैं।
चिन्तन में निमग्न व्यक्ति की बुद्धि जब समस्या के समाधान में निरुपाय होती प्रतीत होती है, तभी न जाने कहाँ से वैसे विचार की एक ऐसी किरण मस्तिष्क में कौंध उठती है कि हल सरल और साधारण जान पड़ने लगता है। इस सहायता में भी अदृश्य आत्माओं का ही हाथ है। गुह्मवेत्ताओं का कथन है कि मनुष्य की पचास प्रतिशत विचारणाएँ ऐसी ही अगोचर आत्माओं द्वारा प्रेरित होती है। शेष में पचास प्रतिशत विचार ही ऐसे होते हैं, जिन्हें उनके निजी और मौलिक कहे जा सकते हैं।
चिन्तन द्वारा श्रेष्ठ विचारों को जानकर, समझकर उन्हें आत्मसात कर सकते हैं। इसके लिए हर रोज अपनी दिनचर्या शुरू करने से पहले कतिपय श्रेष्ठ वैचारिक सूत्रों का मनन करना चाहिए। यह प्रक्रिया हर कार्य अथवा किसी विशेष कार्य को करने से पहले की जाय तो ओर भी अच्छा। इस क्रम में धीरे-धीरे हमारा दृष्टिकोण उनके अनुरूप ढल जाएगा और वे विचार हमें अन्दर से सहायता करते रहेंगे। प्रसिद्ध मनोचिकित्सक एमिल कू ने इसे ही ‘काँशियस आटोसजेशन’ का नाम दिया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-February
चिन्तन से लिया जाना चाहिए, जिसके न बन पड़ने पर उदात्त व्यक्तित्व की न तो नींव रखी जा सकती है, न लोकमंगल जैसे कार्य सम्पन्न किये जा सकते हैं। इसके लिए सर्वप्रथम उस दिशा में सोचना-विचारना पड़ता है, उसके लाभ-हानि का लेखा-जोखा लेना और उस क्षेत्र के अनुभवियों से परामर्श करना पड़ता है, तब कहीं जाकर इस बात का पक्का निर्णय हो पाता है कि यह घाटे का सौदा नहीं। यही वह अवस्था है, जब मन बार-बार उस ओर आकर्षित होता और उससे मिलने वाली उपलब्धियों की कल्पना कर गदगद होता रहता है। फिर लोभ-मोह और वासना-तृष्णा की हेय लिप्सा मनःस्थिति को अपने खिंचवा में बाँधे रख पाने में सफल नहीं हो पाती। सच्चे अर्थों में यही जाग्रति हैं।
चिन्तन देने का प्रयास विगत कुछ अंकों से कर रहे हैं। इसी तत्व-दर्शन का एक व्यावहारिक पक्ष “युग निर्माण योजना” पत्रिका में आता रहेगा। दोनों ही पत्रिकाओं के प्रधान लेखों को गुजराती युग शक्ति गायत्री, बंगाली, उड़िया व मराठी पत्रिकाओं में अनूदित कर प्रकाशित किया जाता रहा है।
चिन्तन, दर्शन, श्रवण सब कुछ के अयोग्य है।
चिन्तन इसी परिधि में घूमे और वृत्ति कूपमण्डूकों जैसी बनी रहें, वहाँ श्रेष्ठ आचार एवं उत्तम विचार की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? वहाँ सुव्यवस्था एवं स्वच्छ प्रशासन कैसे आ सकते हैं? वहाँ शान्ति और प्रगति की आशा करना दुराशा मात्र होगी। दार्शनिकों ने इसी को ‘तमसाच्छन्न’ स्थिति कहा है और ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ जैसे सूत्रों द्वारा इससे उबारने व ऊँचा उठाने की प्रार्थना की है। अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाँजन शलाकया, चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।
चिन्तन-मनन भी वर्जित होगा, उनकी तस्वीर और छवि से अपने आप को दूर रखना होगा। यह शर्तें जिन्हें स्वीकार हुईं, वे ही वहाँ रह सके, शेष वापस चले गये। संहिता में इस बात का भी प्रावधान रखा गया कि यदि बात का भी प्रावधान रखा गया कि यदि कभी अकस्मात् किसी नारी-मूर्ति से आमना-सामना हो जाय, तो तत्काल अपने को आड़ में करना पड़ेगा। स्वयं को छिपाने के लिए और नारी-दर्शन से बचने के लिए वहाँ के प्रत्येक व्यक्ति को सिर में अरबों जैसा एक दुपट्टा बाँधना अनिवार्य होता है। अन्तर सिर्फ इतना है कि अरबों का दुपट्टा सिर के पीछे पीठ पर लटकता रहता है, जबकि इनका चेहरे के सामने पर।
चिन्तन करते हैं। वहाँ के बाजारों में मरियम के चित्र के अतिरिक्त कोई अन्य नारी तस्वीर नहीं बिकती और न स्त्रियोचित सौंदर्य प्रसाधन नहीं मिलते हैं। वस्त्र के नाम पर दुकानों में सिर्फ भगवा परिधान ही उपलब्ध हैं।
चिन्तन, वाणी, लेखनी सभी कुछ केवल भगवान के लिए लगाया, तो आपने देखा न कि हमारी बुद्धि, लेखनी का कितना विकास हुआ। यह सारा भगवान को सौंपने के कारण हुआ है। हमने तो एक साधारण परिवार में जन्म लिया, परन्तु भगवान ने हमें न जाने कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया। आज संसार भर में लोग हमें एक महापुरुष के रूप , एक महान व्यक्ति के रूप में जानते हैं। हमारे विचार अभी सात भाषाओं में प्रकाशित हो रहे हैं।
चिन्तन की यह घोर पराकाष्ठा है और अकृतज्ञ मनुष्य का अक्षम्य अपराध । होना तो यह चाहिए कि नारियों को और भी अधिक सम्मान, श्रद्धा और सहयोग उनकी ओर से मिले, ताकि उनके परिपालन में जो कष्ट-कठिनाइयों का उनने सामना किया, कम से कम उसके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रदर्शित हो सके, पर मनुष्य की स्वार्थपरता को क्या कहा जाय, जो काम बनते ही तोते की तरह आँखें फेर ले!
चिन्तन और आचरण में असभ्यता और उद्दण्डता की मात्रा बढ़ा लेता है। अपने लिए और दूसरों के लिए संकट खड़े करता है। शक्ति का अपव्यय होने पर जो रिक्तता आती है, उसे भरना भी कठिन हो जाता है। इन दुष्परिणामों को देखते हुए नशेबाजी का सभी विचारशीलों ने विरोध किया है और करने वालों को उद्धत और उद्दण्ड बताकर उन्हें हेय कहा और भर्त्सना का अधिकारी, असभ्य ठहराया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-May
चिन्तन किया जाता। केवल दुग्ध उत्पादन को ही बढ़ावा देने के कारण भैंस प्रजाति को ही बढ़ावा देने के कारण भैंस प्रजाति को ही प्रोत्साहन मिला है , क्योंकि ये दूध अधिक देती है और इनके दूध में वसा की मात्रा ज्यादा होती है। गाय का दूध गुणात्मक दृष्टि से अच्छा होने के बावजूद भैंस के दूध से कम खपने लगा, क्योंकि इसमें घी कम मात्रा में होता है।
चिन्तन और कृत्य पर एक नजर डालकर देखें-कहीं हम असुरता के पक्षधर तो नहीं हो गए ? कहीं हम अपनी हठधर्मी में अपने ही नव-सृजन अभियान को नुकसान तो नहीं पहुँचा रहे ? जिसे हम बरसों से अपने रक्त-प्रवाह , प्राण−प्रवाह से सींचते आए हैं संगठन अपने प्रभु का विराट शरीर है, पारस्परिक सहयोग एवं सहकार ही उनकी इस विराट मूर्ति की अर्चना-आराधना हैं तनिक आत्मावलोकन करके देखें कि कहीं हमीं अपने कृत्यों से अपने प्रभु के शरीर पर आघात तो नहीं कर रहे ।
चिन्तन को बढ़ावा देने वाले व्यक्तियों के समूह का नाम है, किसी संप्रदाय का नहीं। इसमें सभी मत, पंथ , जाति लिंग के व्यक्ति हैं एवं आज के कलियुग के चमत्कार में मात्र सज्जनों के संगतिकरण एकत्रीकरण के लिए इसकी स्थापना युगऋषि द्वारा अनिवार्य मानकर की गयी। यह परिवार नए सिरे से स्थापित नहीं है। पूर्वजन्मों की संचित सुसंस्कारों आत्माओं का संगठन मात्र है, जो नित-निरन्तर बढ़ता ही चला जा रहा हैं प्रश्न पूछने वाले सज्जन एवं वे सभी जो अभी मात्र पत्रिका के पाठक है-गायत्री परिवार के सदस्य बनने हेतु आमंत्रित है, जिसकी कोई शर्त व सौदा नहीं है। एक ही अनुबन्ध है-श्रेष्ठता से जुड़ने का, जो निश्चित ही घाटे का सौदा नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-July
चिन्तन चेतना फूटती है वहीं दूसरी ओर भावना के धरातल से उदारता, सज्जनता, संयमशीलता एवं शालीनता पनपती, विकसित होती है। अतः एस. ब्रायन की मान्यता है कि बुद्धि के साथ भावना का पुट व्यक्तित्व का गठन करता है। और व्यक्तित्व सर्वांग सुन्दर बनता है।
चिन्तन करती है। जहाँ भी त्रुटियाँ एवं गल्तियाँ दिखाई देती हैं उसे सदैव दूर करने का प्रयास करती है।
चिन्तन-मनन मन की प्रसुप्त आध्यात्मिक शक्तियों को जगाता है और इस तरह आध्यात्मिक जीवन दर्शन को दैनन्दिन गतिविधियों में अभिव्यक्त होने का अवसर मिलता है। इस अभ्यास द्वारा व्यक्ति की इच्छा शक्ति का विकास होता है। इच्छा शक्ति के अभाव में वह आदर्श को व्यवहार में जीवन्त नहीं कर सकता। यह एक सहज नियम है कि बिखराव से ऊर्जा का क्षय होता है और एक बिन्दु पर केन्द्रित होने पर यह अत्यन्त शक्तिशाली बन जाती है। सामान्यतया मानसिक शक्ति विविध भाव संवेगात्मक वृत्तियों, अभिरुचियों और गतिविधियों में बिखरी रहती है।
चिन्तन करना, इन्हें क्रियान्वित करना आपका परम कर्त्तव्य है। ध्यान रहे यदि आपके अन्तःकरण में गुरु-प्रेम की दीवानगी हिलोरे मार रही है- तो यह साधना पथ आपके लिए है। यह साधना केवल उनके लिए है जिन्हें अपने प्यारे गुरुवर के बिना रहा नहीं जाता। जो अपने अस्तित्त्व को सद्गुरु की चेतना में समर्पित-विसर्जित और विलीन कर देना चाहते हैं। शिष्य संजीवनी की यह महाऔषधि उनके लिए है- जो श्रेष्ठ शिष्यों की अग्रिम कतार में खड़ा होना चाहते हैं।
चिन्तन के साथ-साथ सृजनात्मक दृष्टिकोण भी होता है जो सफलता के लिए एक अपरिहार्य मानदण्ड है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-November
चिन्तन के समान है। उनके नाम का थोड़ा सा कीर्तन भी शिव-कीर्तन के बराबर है। सद्गुरु का स्मरण और उन्हें ही समर्पण-शिष्यों के जीवन का सार है। इस सरल किन्तु समर्थ साधना से उन्हें सब कुछ अनायास ही मिल जाता है।
चिन्तन कर रहा था, तो उसके अस्तित्त्व में कुछ आश्चर्यकारी एवं विस्मयजनक दृश्यावली प्रकट हो गयी। उसने अनुभव किया कि दोनों भौहों के बीच गोल आकार का श्वेत प्रकाश बहुत ही सघन हो गया है। यूँ तो यह प्रकाश पहले भी कभी-कभी झलकता था। यदा-कदा सम्पूर्ण साधनावधि में भी यह प्रकाश बना रहता था। पर आज उसकी सघनता कुछ ज्यादा ही थी।
चिन्तन भी शिव-चिन्तन के समान है। उनके नाम का थोड़ा सा कीर्तन भी शिव-कीर्तन के बराबर है। सद्गुरु का स्मरण और उन्हें ही समर्पण-शिष्यों के जीवन का सार है। इस सरल किन्तु समर्थ साधना से उन्हें सब कुछ अनायास ही मिल जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-August
चिन्तन के भी नए-नए आयामों व नूतन वरदानों को प्रकट होना चाहिए। वैज्ञानिक प्रगति के साथ दार्शनिक प्रगति के कदम मिला कर चलने से ही मानवीय जीवन में समाधान का स्वर संगीत प्रकट होगा। इक्कीसवीं सदी में दर्शन के मूल्य एवं महत्त्व के बल पर ही समस्याओं की सृष्टि, समाधान की सृष्टि में रूपांतरित होगी। परिष्कृत दार्शनिक चिन्तन ही मानवीय क्रिया-कौशल का परिशोधन करने में समर्थ है। एकमात्र दार्शनिक मूल्य ही, वैज्ञानिक समृद्धि से उपजे मानवीय सन्ताप की महाऔषधि है।
चिन्तन शैली के विकास और सुधार से इस विकृति की परिष्कृति की जा सकती है। दर्शन की दृष्टि मिले तो ही इन्सानी जिन्दगी का अन्धापन दूर हो सकता है। और मनुष्य-व्यक्ति व समाज के रूप में अपनी समस्याओं के सार्थक समाधान पा सकता है।
चिन्तन ही मानवीय क्रिया-कौशल का परिशोधन करने में समर्थ है। एकमात्र दार्शनिक मूल्य ही, वैज्ञानिक समृद्धि से उपजे मानवीय सन्ताप की महाऔषधि है। इसे ग्रहण करके ही इन्सानी जिन्दगी सम्पूर्ण स्वास्थ्य एवं सार्थक समाधान का वरदान पा सकती है।
चिन्तन शैली को परिष्कृत करने की यह दार्शनिक साधना होती रही है। हर युग एवं प्रत्येक काल खण्ड में दर्शन के मूल्य और महत्त्व को स्वीकारा गया है। हाँ इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी की चकाचौंध से चुँधियाई आँखों ने दर्शन के मूल्य और महत्त्व की अवमानना की है। वैज्ञानिक क्रियात्मकता के प्रसार में दार्शनिक चिन्तन की गति काफी मन्द हुई है। परिष्कृत चिन्तन विहीन मानवीय क्रिया ने जीवन की दशा और दिशा को संकटों व कंटकों से भर दिया है।
चिन्तन की विकृति से ही पनपी है। चिन्तन शैली के विकास और सुधार से इस विकृति की परिष्कृति की जा सकती है। दर्शन की दृष्टि मिले तो ही इन्सानी जिन्दगी का अन्धापन दूर हो सकता है। और मनुष्य-व्यक्ति व समाज के रूप में अपनी समस्याओं के सार्थक समाधान पा सकता है।
चिन्तन विहीन मानवीय क्रिया ने जीवन की दशा और दिशा को संकटों व कंटकों से भर दिया है।
चिन्तन को ही दोषी ठहराते हैं।
चिन्तन के अभाव में क्रिया कितना ही विस्तार क्यों न ले ले, पर वह अपना अर्थ और औचित्य सिद्ध नहीं कर पाती। वैज्ञानिक प्रगति की तीव्रता के युग में हो रही दार्शनिक उपेक्षा को देखकर ही विश्व मनीषी बट्रेण्ड रसेल से यह कहे बिना न रहा गया कि हम आज ऐसे युग में जीवन जी रहे हैं, जिसका साधन है मानवीय दक्षता किन्तु साध्य है मानवीय मूर्खता। रसेल के इस कथन का अन्तर्भाव यही है कि मानवीय क्रियात्मकता का विस्तार जितना बढ़ता जाता है- परिष्कृत चिन्तन शैली एवं प्रकाशपूर्ण जीवन दृष्टि की आवश्यकता उतनी ही तीव्र हो जाती है।
चिन्तन की गति काफी मन्द हुई है। परिष्कृत चिन्तन विहीन मानवीय क्रिया ने जीवन की दशा और दिशा को संकटों व कंटकों से भर दिया है।
चिन्तन सुधरे तो जीवन संवरे’। जीवन की प्रायः सभी समस्याएँ चिन्तन की विकृति से ही पनपी है। चिन्तन शैली के विकास और सुधार से इस विकृति की परिष्कृति की जा सकती है। दर्शन की दृष्टि मिले तो ही इन्सानी जिन्दगी का अन्धापन दूर हो सकता है। और मनुष्य-व्यक्ति व समाज के रूप में अपनी समस्याओं के सार्थक समाधान पा सकता है।
चिन्तन शैली एवं प्रकाशपूर्ण जीवन दृष्टि की आवश्यकता उतनी ही तीव्र हो जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-December
चिन्तन चेतना को यदि इसमें जोड़ा जा सके तो यह अनुसंधान प्रक्रिया अपनी सम्पूर्णता में अभिव्यक्त हो सकेगी। वैदिक ऋषियों के अनुसार आचार्य एवं शिष्य की भावनाओं का मिलन ही ज्ञान का सृजन है। इसलिए उन्हीं के स्वरों में प्रभु से प्रार्थना है- ‘सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-January
चिन्तन में लगा हुआ व्यक्ति हमेशा ही अशान्ति एवं दुःखों से पीड़ित होकर मरता है।
चिन्तन करते रहना चाहिए।
चिन्तन करते हुए भिक्षुओं ने तथागत को प्रणाम किया और ध्यान के लिए चले गए।
चिन्तन ही शिष्य के लिए महासाधना है। जिससे जीवन में सभी सुफल अनायास ही मिल जाते हैं। इस कथा की अगली कड़ी अखण्ड ज्योति के अगले अंक की विषयवस्तु होगी। तब तक साधकगण गुरुदेव के स्वरूप का ध्यान करते हुए गुरुमंत्र की साधना में संलग्न रहें।
चिन्तन करते हुए सोना कि हमारा समूचा अस्तित्त्व प्रभु में समर्पित-विसर्जित एवं विलीन हो रहा है। प्रत्येक दिन अपने नए जीवन का एवं प्रत्येक रात्रि अपनी मृत्यु का अनुभव करना ही आत्मबोध-तत्त्वबोध की साधना का सार है।
चिन्तन करते हुए अध्ययन करें। इस क्रम में साधकगण गुरुदेव के साधना परक साहित्य का चुनाव करें।
चिन्तन में खो गया। उसे लगा कि स्वयं अन्तर्यामी सर्वव्यापी परमेश्वर सामने बैठे अपने दिव्य स्वरूप का बोध करा रहे हों। उसे कुछ सूझा नहीं, उनके चरणों में माथा रखने के सिवा। मन अन्तःकरण में यह प्रार्थना के स्वर फूट पड़े-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-February
चिन्तन अथवा फिर क्रिया सभी कुछ सम्मिलित रूप से एक ही दिशा में- सद्गुरु के चरणों की ओर प्रवाहित होना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-September
चिन्तन, मनन एवं निदिध्यासन करते हुए हजारों-हजार योग साधक अपनी अन्तर्यात्रा के लिए चल पड़े हैं। यह यात्रा उन्हें नित-नयी रोचक, रोमाँचक एवं रहस्यमयी अनुभूतियों के वरदान दे रही है। हर बढ़ते पग पर उन्हें अहसास हो रहा है कि दिव्यलोक में तपोलीन महर्षि पतंजलि की सूक्ष्म चेतना उनके साथ है। और परम पूज्य गुरुदेव हर पल उनका हाथ थामे हैं। युगाचार्य स्वामी विवेकानन्द ने अलीपुर जेल की काल-कोठरी में महर्षि अरविन्द को अतिमानस का बोध कराया था।
चिन्तन करें और उसे अपने जीवन में आत्मसात करने के लिए संकल्पित हों। इसके बीच-बीच में शिष्य संजीवनी के प्रकाश में अपने को परखते रहें कि हम अपनी शिष्यत्व साधना में कहाँ तक खरे उतर रहे हैं। दृढ़ निष्ठ एवं श्रद्धा सिक्त समर्पण ही इस महासाधना का सम्बल है।
चिन्तन करने के लिए भी अपने मन व विचार को अभ्यास कराया जा सकता है। मानसिक विकास के लिए एवं श्रेष्ठ विचार के लिए अभीष्ट दिशा में सोचने हेतु अपनी प्रकृति को तोड़ा-मरोड़ा भी जा सकता है। प्रयत्नपूर्वक नयी अभिरुचियाँ भी पैदा की जा सकती हैं।
चिन्तन और प्रभु प्रेम में भीगा हुआ मन जब एक बार उनके चरणों में विलीन हो जाता है- तो किसे याद रह जाते हैं विषय भोग। कहाँ याद रह पाती है- इन्द्रिय विलास की बातें। सब कुछ साँप की केंचुल की तरह उतर जाता है। पेड़ से सूखे पत्ते की भाँति झड़ जाता है।
चिन्तन की प्रक्रिया भी चलती है। चयन किए गए विचारों के अनुसार ही दृष्टिकोण का विकास होता है, जो विश्वास को जन्म देता है। वह पुष्ट और परिपक्व होकर पूर्व धारणा में परिवर्तित हो जाता है।
चिन्तन नहीं करते, संचार माध्यम से केवल तैयार विचारों का आयात करते हैं।
चिन्तन में जमीन-आसमान का अन्तर आया है। संयुक्त परिवारों के बिखरने से जहाँ उनका पारिवारिक दायरा सिमटा है, वही माता-पिता के द्वारा ‘कम्पीटिशन’ की दौड़ में उन्हें बलात् धकेल दिये जाने से दुनिया के बारे में नन्हीं सी उम्र में ही उन्हें ढेरों जानकारियाँ हो जाती हैं। इन सबके बाद भी क्या बालसुलभ भावनाओं को बदला जा सकता है? बच्चे कल के हों या आज के, उनका नैसर्गिक भोलापन कैसे बदल सकता है? उनकी सरलता, उनकी सहृदयता को सकारात्मक बाल साहित्य का सृजन एक नयी दिशा दे सकता है।
चिन्तन) जिन्होंने भी किया है- वे इसके औषधीय गुणों को अनुभव करने लगे हैं। अपने व्यक्तित्व में उन्हें नए परिवर्तन का अहसास हो रहा है। कुछ ऐसा लग रहा है- जैसे अन्तःकरण में कहीं शिष्यत्व की मुरझाई-कुम्हलायी बेल फिर से हरी होने लगी है। निष्क्रिय पड़े भक्ति एवं समर्पण के तत्त्वों को सक्रियता का नया उछाह मिल गया है। आन्तरिक जीवन में भावान्तर की अनुभूति उन सबको है- जो इस अमृत औषधि को ले रहे हैं।
चिन्तन की कला सिखाती है। यह हमें श्रेय और प्रेय में अन्तर बताती है, उचित और अनुचित में फर्क दिखाती है तथा उपयुक्त, उत्कृष्ट व श्रेष्ठ को चुनाव करने की क्षमता देती है। लेकिन आज हमें हमारी जीवनदायिनी संस्कृति की अपेक्षा भोग-उपभोग की संस्कृति अच्छी लग रही है। यही हमारे जीवन का चरम-परम लक्ष्य बन गया है कि जीवन को अधिकतम रूप में भोग लिया जाय। और उपभोक्तावादी संस्कृति का भी यही मूल मंत्र है।
चिन्तन नहीं दुश्चिंतन घर कर गया है, तथा स्वभाव भोगवादी एवं आरामतलब बन गया है। सद्चिंतन के अभाव में मस्तिष्क क्रियाहीन एवं पंगु बनकर रह गया है। विज्ञान के इस युग में हम यंत्रमानव में बदल गए हैं। कुछ विचारक-विद्वानों को विज्ञान से ऐसी ही उम्मीद और आशा थी। उन्होंने पहले ही मानव जाति को सचेत व सतर्क कर दिया था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-May
चिन्तनमचेष्टनम्। निद्रासुखं चाभ्यधिकं कफहृद्रोगलक्षणम्॥
चिन्तन्नैर्वेगाविधारणैश्च हृदामयः पञ्चविधः प्रदिष्टः॥
चिन्तन-चेतना में पल-पल अपने आराध्य के लिए कुछ नया कर गुजरने की कोपलें फूटती थीं। ‘देकर भी करता मन-दे दूँ कुछ और अभी’- यही उनका जीवन दर्शन था। प्रभु की देशना के अनुसार उन्होंने सत्कर्म और सत्प्रवृत्ति के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। अनाथों का सच्चा सहारा बनकर उन्होंने अपने नाम को सार्थक कर दिया था। उनके सत्कार्यों की यशप्रभा से दिगन्त अलोकित हो रहे थे।
चिन्तन करें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-March
चिन्तन में क्रान्ति को जन्म देने वाली परिस्थितियों का बड़ा ही विचारपूर्ण विवेचन किया है। उनका कहना है कि राष्ट्र की हर इकाई अलग होने की माँग करने लगे, व्यवस्थाओं की स्थिरता समाप्त होती दिखे, चारों ओर आतंक का साया घना हो जाय, अविश्वास इतना बढ़ जाय कि समाज के दरो-दीवार टूटने लगे और युवाओं में असन्तोष की ज्वालाएँ धधकती नजर आए तो समझो कि अब क्रान्ति में देर नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-June
चिन्तन अनिवार्य नित्य कर्म माना जाना चाहिए। सही मायने में यही प्रगतिशीलता है, आत्मोत्कर्ष है।
चिन्तन पर मनन निदिध्यासन का क्रम बनाये रखें।
चिन्तन करने वाले दूरदर्शी स्वभाव में मानसिक संतुलन के लक्षण प्रकट होते हैं। जो उपलब्ध है उस पर सन्तोष एवं आनन्द अनुभव किया जाय और अधिक प्राप्त करने के लिए एवं आगे बढ़ने के लिए उत्साहपूर्वक प्रयत्नरत रहा जाय। यही सुदृढ़ मानसिक संतुलन है। ऐसी मनःस्थिति वाला आपदाओं विपदाओं में भी दुःख शोक, हताशा, निराशा,उद्विग्नता के दुष्चक्र में नहीं उलझता है। वह हरेक परिस्थितियों को शान्त भाव से स्वीकार करता है।
चिन्तन और चरित्र विनिर्मित होता है। यही वास्तविक उपार्जन-उपलब्धि है, जिसे परिष्कृत व्यक्तित्व के रूप में जाना-समझा जाता है। यही वह प्रतिभा है जिसे दैवी सम्पदा कहा जाता है।
चिन्तन उदार और कर्त्तव्य आदर्शपरक होना चाहिए। हमारा स्वभाव समाज निष्ठ होना चाहिए। व्यक्तिवाद के बदले समूहवाद को प्रश्रय देने से ही सामाजिकता का विकास हो सकता है।
चिन्तन में उत्कृष्टता से ही इसका निराकरण किया जा सकता है।
चिन्तन-मनन-निदिध्यासन हो। और इस निदिध्यासन का फल है कि साधक को तत्त्वदृष्टि मिले, उसे ज्ञान हो। तथा ज्ञान का महाफल है कि उसे सद्गुरु के नाम की महिमा का बोध हो। उनके नाम में प्रीति जगे। उन्हें नमन का बोध जगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-October
चिन्तन के समान है। गुरुदेव के नाम का थोड़ा सा भी कीर्तन भगवान् शिव के अनन्त नाम कीर्तन के बराबर है॥ 54॥
चिन्तनं। स्वदेशिकस्यैव च नाम कीर्तनं भवेदनन्तस्य शिवस्य कीर्तनं॥ 54॥
चिन्तन महर्षि के अगले सूत्र की विषय वस्तु है। जो अखण्ड ज्योति के अगले अंक में प्रकट होगा।
चिन्तन की नवीन कोपलें फूटती हैं। चेतना का अंधियारा समाप्त होता है।
चिन्तन भी बदल जाता है और असंभव लगने वाला कार्य भी संभव बन जाता है। आत्मविश्वास के बिना कोई भी सफलता के शिखर तक नहीं पहुँच पाता।
चिन्तन एवं लेखन में बीतता था। दिन के अन्तिम प्रहर में सन्ध्या से पूर्व आचार्य अपने भाष्य के लिखित अंशों को शिष्यों को पढ़ाते थे।
चिन्तनं भवेदनन्तस्य शिवस्य चिन्तनं। स्वदेशिकस्यैव च नाम कीर्तनं भवेदनन्तस्य शिवस्य कीर्तनं॥ 54॥
चिन्तन की कला है। यह सम्प्रज्ञात समाधि का पहला तत्त्व है। जो व्यक्ति आन्तरिक शान्ति पाना चाहता है, उसे वितर्क को अपनाना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति ज्यादा प्रकाशमय पक्ष की ओर देखता है। वह फूलों को महत्त्व देता है, काँटों को भूल जाता है।
चिन्तन भगवान् शिव के स्वरूप के अनन्त चिन्तन के समान है। गुरुदेव के नाम का थोड़ा सा भी कीर्तन भगवान् शिव के अनन्त नाम कीर्तन के बराबर है॥ 54॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-April
चिन्तन स्वयं आराध्य का ही चिन्तन है। इसलिए कल्याण की कामना को करने वाला साधक इसे अवश्य करे। तीनों लोकों में निवास करने वाले सभी इस सत्य को कहते हैं कि गुरुमुख में ही ब्रह्मविद्या स्थित है। गुरुभक्ति से ही इसे प्राप्त किया जा सकता है। गुरु ही अज्ञान के अन्धकार को हटाने वाले प्रकाश स्रोत हैं।
चिन्तन है। इसलिए कल्याण की कामना को करने वाला साधक इसे अवश्य करे। तीनों लोकों में निवास करने वाले सभी इस सत्य को कहते हैं कि गुरुमुख में ही ब्रह्मविद्या स्थित है। गुरुभक्ति से ही इसे प्राप्त किया जा सकता है। गुरु ही अज्ञान के अन्धकार को हटाने वाले प्रकाश स्रोत हैं।
चिन्तन। यही स्मृति का सार्थक उपयोग है। मानव चेतना के रहस्य इसी से उजागर होते हैं। अपने स्मृति विभ्रम के कारण हम भूल चुके हैं कि आखिर हम कौन हैं? हमारा अपना ही परिचय हमसे खो गया है।
चिन्तन व आचरण आपको श्रेष्ठतम अधिकारी बनाने के लिए है। अपने जीवन को रूपांतरित करके आप वह पा सकते हैं, जो महर्षि पतंजलि आपको सौंपने के लिए इच्छुक हैं, परम पूज्य गुरुदेव ने जिसे खास आपको देने के लिए सम्हाल कर रखा हुआ है। महर्षि कहते हैं कि वृत्तियों के फेर में हमारा जीवन भले ही कितना ही क्लिष्ट क्यों न हो, पर यह योग विधि से अक्लिष्ट या सुखकर हो सकता है। इसी क्रम में पिछली कड़ियों में वृत्तियों की विशद् विवेचना होती रही है। चार वृत्तियों को क्रमिक रूप से सुखकर बनाने के सन्देश के बाद अब महर्षि पांचवीं और अन्तिम वृत्ति के रहस्य को उजागर करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-November
चिन्तन करने से वह ग्रन्थि समाप्त हो सकेगी।
चिन्तन या ध्यान शक्ति द्वारा अपने शरीर में प्रविष्ट कर सबल तथा मेधावी बन सकते हैं, इसे ओज शक्ति के नाम से स्मरण किया जाता है।
चिन्तन के साथ-साथ कार्य क्षेत्र भी सँभाला वे ही महापुरुष कहलाये। वे कोई अपूर्व व्यक्ति थे ऐसा मैं नहीं मानता। वे भी जन्म मृत्यु के प्रवाह में से ही आते रहे हैं अन्तर है तो सिर्फ कर्तव्य का। वे अपने यत्न द्वारा सन्त बने, देव बने। सूर्य प्रकाश तो सर्वत्र नजर आता है किन्तु सूर्यकान्त मणि में उसकी झलक विशेषता पूर्ण होती है, इसे नहीं भूलना चाहिये।
चिन्तन से मुक्त करना सर्वोत्तम-शिक्षा का उद्देश्य है। विचार और क्रिया मनुष्य के चेतन मन की वस्तु हैं, परन्तु उसके भावों का उद्गम-स्थान उसका अचेतन मन है। इसलिये विचार और क्रियाओं को उन्नत कर लेना भावों की उन्नति करने की अपेक्षा सरल है। परन्तु भाव मनुष्य के गम्भीरतम मन की वस्तु है। वह उसके स्वरूप को जितना प्रदर्शित करता है उतना विचार और क्रिया नहीं प्रकट करते।
चिन्तनीय दशा वनस्पति घी की है। वनस्पति घी रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा बनाया हुआ मूँगफली का ऐसा तेल है जिससे प्राणी की पाचन और जनन शक्ति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सैंकड़ों रोगों की सृष्टि होती है, और मनुष्य नामर्द हो जाता है। इस जहरीले तेल के लिये कुछ वर्ष पूर्व 21 लाख एकड़ भूमि में मूँगफली की खेती हो रही थी और अब तक इस मात्रा में काफी वृद्धि हो चुकी है। इतनी जमीन में 10-12 लाख परिवारों का सहज में भरण पोषण हो सकता है।
चिन्तन की अंग हैं। यदि हमें संसार को, देश को, मानव-सभ्यता को शान्तिपूर्वक प्रगति की ओर ले जाना है तो कुछ ऐसे सिद्धान्त अपनाने आवश्यक हैं जो हमें एक दूसरे के निकट ले जाते हैं।
चिन्तन और व्यस्तता ही है।
चिन्तन शक्ति का विकास भी होता है। जब तक मनुष्य के सामने कोई जटिल व्यावहारिक समस्या नहीं आती तब तक उसे गम्भीरतापूर्वक सोचने की आवश्यकता ही नहीं होती। अतएव मनुष्य के विचार का विकास उसकी कार्य क्षमता के साथ-साथ ही होता है।
चिन्तन वह है जो दूसरों के विचारों पर आधारित न होकर अपने अनुभव पर आधारित रहता है जिसका उद्देश्य जीवन की किसी विशेष प्रकार की समस्या का हल करना रहता है, विचार के लिये विचार करना मनुष्य को निकम्मा बनाना है। पोथी-पण्डित किसी सिद्धान्त का अभ्यास करने में प्रवीण होते हैं, परन्तु जब उन्हें कोई व्यावहारिक समस्या हल करनी पड़ती है तो वे निकम्मे सिद्ध होते हैं।
चिन्तन-शक्ति में कमी हो जाती है। मौलिक-चिन्तन वह है जो दूसरों के विचारों पर आधारित न होकर अपने अनुभव पर आधारित रहता है जिसका उद्देश्य जीवन की किसी विशेष प्रकार की समस्या का हल करना रहता है, विचार के लिये विचार करना मनुष्य को निकम्मा बनाना है। पोथी-पण्डित किसी सिद्धान्त का अभ्यास करने में प्रवीण होते हैं, परन्तु जब उन्हें कोई व्यावहारिक समस्या हल करनी पड़ती है तो वे निकम्मे सिद्ध होते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-May
चिन्तन द्वारा अपूर्व आनन्द प्राप्त करते हैं। पश्चिम के विद्वान वैज्ञानिक प्रकृति के गुणधर्म को जानकर पदार्थों में रहने वाली गुप्त शक्तियों से कार्य लेते हैं जबकि पूर्व के तपस्वी, अपनी ही आत्मा में जो अमोघ और अपरिमित अन्तर शक्ति पाई जाती है, अधिकाँश उसी शक्ति के द्वारा अपने सब कामों को सिद्ध करते हैं।
चिन्तन भजन-गायन, और अर्चन से बुद्धि को शुद्ध बनाये, यही हमारे अहंकार को दूर कर सकता है और चित्त शुद्ध कर सकता है।
चिन्तन और प्राकृतिक जीवन में लगना होगा। हमें अपने पूर्वजों के “सादा जीवन, उच्च विचार” वाले नियम को अनुगत करना होगा। सादा वस्त्र पहनो। प्रतिदिन भ्रमण करो, सिनेमा और उपन्यास अध्ययन का परित्याग करो। सादा भोजन करो।
चिन्तन और जीवन को गठित किया। मैं उन सब शिक्षादाताओं का ऋण कैसे भूल सकता हूँ? साधारणतया रास्ते में खड़े हुये एक दीन मजदूर के साथ भी एक मिनट भी बात की जाती है, उससे भी कोई-कोई अज्ञात बात प्राप्त हो जाती है। इसी प्रकार एक व्यक्ति जो कुछ भी नहीं बोलता हैं, के चेहरे की ओर स्थिर चित्त से दो मिनट भी देखा जाय तो उसके आन्तरिक भावों की उपलब्धि होने लगती है। उससे सम्बन्धित अनेक ज्ञान की किरणों का प्रकाश हमारे हृदय में प्रकट हो जाता है।
चिन्तन और एकाग्रता की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रतीक रूप में मूर्ति-पूजा की योजना बनी है। साधक अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान की कोई भी मूर्ति चुन लेता है और साधना करने लगता है। उस मूर्ति को देखकर हमारी अन्तः चेतना ऐसा अनुभव करती है मानो साक्षात् भगवान से हमारा मिलन हो रहा है।
चिन्तन करना बुरा बतलाया’। इस तरह एक-एक व्यक्ति की एक-एक बात ने मेरे कर्म, वाक्य, चिन्तन और जीवन को गठित किया। मैं उन सब शिक्षादाताओं का ऋण कैसे भूल सकता हूँ? साधारणतया रास्ते में खड़े हुये एक दीन मजदूर के साथ भी एक मिनट भी बात की जाती है, उससे भी कोई-कोई अज्ञात बात प्राप्त हो जाती है। इसी प्रकार एक व्यक्ति जो कुछ भी नहीं बोलता हैं, के चेहरे की ओर स्थिर चित्त से दो मिनट भी देखा जाय तो उसके आन्तरिक भावों की उपलब्धि होने लगती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-February
चिन्तन होने से मनुष्य वाणी से पाप करता है, असत्य भाषण, चुगली, असम्बद्ध प्रलाप और कठोरता की वाणी बोलता है। इसी प्रकार शरीर से होने वाले अनेक पाप हैं जैसे हिंसा, पर दारा सेवन, दूसरे की वस्तुओं पर बलपूर्वक अधिकार आदि। इनमें से प्रत्येक की उत्पत्ति तब होती है, जब मनुष्य के मन में कुविचार का जन्म होता है। बीज में वृक्ष की तरह शरीर में वासनायें छिपी रहती हैं। तनिक-सा प्रोत्साहन पाकर ये उद्दीप्त हो उठती हैं और गन्दगी की ओर प्रेरित करती हैं।
चिन्तन के ही पाप हैं। मन में अनिष्ट चिन्तन होने से मनुष्य वाणी से पाप करता है, असत्य भाषण, चुगली, असम्बद्ध प्रलाप और कठोरता की वाणी बोलता है। इसी प्रकार शरीर से होने वाले अनेक पाप हैं जैसे हिंसा, पर दारा सेवन, दूसरे की वस्तुओं पर बलपूर्वक अधिकार आदि। इनमें से प्रत्येक की उत्पत्ति तब होती है, जब मनुष्य के मन में कुविचार का जन्म होता है। बीज में वृक्ष की तरह शरीर में वासनायें छिपी रहती हैं।
चिन्तन से ही प्रारम्भ होते हैं। पर-द्रव्य, पर-स्त्री, पराई वस्तुओं को लेने की इच्छा, व्यर्थ का अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष आदि सब कुचिन्तन के ही पाप हैं। मन में अनिष्ट चिन्तन होने से मनुष्य वाणी से पाप करता है, असत्य भाषण, चुगली, असम्बद्ध प्रलाप और कठोरता की वाणी बोलता है। इसी प्रकार शरीर से होने वाले अनेक पाप हैं जैसे हिंसा, पर दारा सेवन, दूसरे की वस्तुओं पर बलपूर्वक अधिकार आदि। इनमें से प्रत्येक की उत्पत्ति तब होती है, जब मनुष्य के मन में कुविचार का जन्म होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-January
चिन्तन करने में अपना जीवन व्यतीत करते हैं। यद्यपि ऐसे अति मानवों में राग द्वेष का अभाव हो जाने से इच्छा और क्रिया की शक्तियाँ शिथिल पड़ जाती हैं और वे प्रकट में साँसारिक व्यवहारों से यथा संभव कम से कम सम्बन्ध रखते हैं, पर वे मनोवैज्ञानिक रीति से समग्र जाति का मार्गदर्शन का कार्य करके बिना भेद भाव के सबकी महान सेवा करते हैं। वैदिक संस्कृति में ऐसे अतिमानवों को ब्राह्मण की श्रेणी में गिना गया था। अनेक सम्प्रदाय ऐसे ही व्यक्तियों को ईशावतार की श्रेणी में गिनते हैं। ऐसा अति मानवपन अथवा ब्राह्मणत्व सिद्धान्त रूप से सबके लिये खुला है, पर वास्तव में उसका प्राप्त कर सकना अत्यन्त दुःसाध्य है।
चिन्तन में लगाकर प्राणशक्ति का क्षय कर लेते हैं, जिन पर वस्तुतः हमारा कोई वश नहीं है, जिन्हें हम बदल ही नहीं सकते और जो हमारी पहुँच के बाहर हैं। व्यर्थ की चिन्ताएँ हमारे मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट कर देती है और निराधार भयों से परिपूर्ण कर देती है। भय, स्वास्थ्य और शान्ति का भयानक शत्रु है। हर क्षण किसी आने वाली आपत्ति की चिन्ता करना या अनहोनी बेबुनियाद कल्पनाएं करना अपनी शक्तियों का क्षय कर लेना है। मनोवैज्ञानिकों ने परीक्षण करके देखा है कि चिन्ता से मनुष्य इतना सूख जाता है कि उसकी उत्पादक शक्तियाँ विकसित होने से पूर्व ही मारी जाती हैं।
चिन्तन करने वाला अनागत विधाता है। उठ जो तेरे साथ की पंक्ति में है उन्हें पीछे छोड़ और जो अगली पंक्ति में हैं, उनमें जा मिल।
चिन्तन तथा सात्विक भोजन पर लेखमाला प्रकाशित कर रही हैं और उनको जनता का काफी समर्थन प्राप्त हो रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-June
चिन्तन करने से एकाग्रता की वृद्धि होती है। आध्यात्मिक शक्तियाँ बढ़ती हैं। आजकल की पाश्चात्य मनोविज्ञान की प्रणालियाँ जैसे साइकोथैरेपी, मैस्मेरिज्म, थाटरीडिंग, क्लेरोंवेन्स आदि सभी योग द्वारा सम्भव हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-July
चिन्तन करना चाहिए कि मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? कहाँ जाना है? मेरा लक्ष्य क्या है? अपने लक्ष्यपूर्ति के लिए मैंने जो साधन अपनाए हैं क्या वह मेरे लक्ष्य तक पहुँचाने में समर्थ हैं?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-September
चिन्तन का मुझको अवकाश न होगा, दूषित विकार का उर में अब कभी विकास न होगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-October
चिन्तन, विचार-विशुद्धि, भावनाओं की पवित्रता तथा भगवन्नाम के रस से ही होती है। इन साधनों की प्राप्ति के लिए न किसी धन की आवश्यकता है न किसी विशेष कर्म की। यदि आवश्यकता है तो केवल अपने ध्यान को अंतर्गत करने की, आत्म निरीक्षण की और अपने मन में भगवन्नाम की कामना उत्पन्न करने की।
चिन्तन करता है, कि ईश्वर सच्चिदानन्द है, न्यायकारी है, दयालु है, इत्यादि—तो उसके भीतर नैमित्तिक रीति से ही क्यों न हो, सच्चिदानन्द आदि गुणों का संयोग-सम्बन्धवत समावेश हो जाया करता है। और इस प्रकार मनुष्य को मोक्ष के दोनों पहलू प्राप्त हो जाते हैं। यह तो जीवनोद्देश्य का स्थूल ढाँचा हुआ। यह ढाँचा किन साधनों से बना करता है, अब उस पर कुछ विचार करना चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-April
चिन्तन की- अर्थात् मन की शक्तियों को एकाग्र करने और उनका विकास करने की प्रेरणा मिली थी। उसे ‘मिस्टिस्ज्मि’ अथवा भक्ति का युग कहा जा सकता है। उस समय कई संत पुरुष पैदा हुए। सिर्फ भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि दुनिया के बहुत से देशों में- जैसे मिश्र और इटली में भी- पैदा हुये। हर जगह उसी तरह का ध्यान, वही चिन्तन, भजन दिखाई देता है।
चिन्तन से काम चला सकती है, पर जिनकी वह भूमिका जागृत नहीं है, उस कोटि-कोटि जन समूह के लिये दृश्य आकर्षण युक्त देव-मंदिरों की आवश्यकता रहती है। लोग उन देवस्थानों की शोभा, विशालता, विचित्रता, विशेषता तथा समय-समय पर होते रहने वाले उत्सव आयोजनों को देखने कौतूहलवश जाते हैं, पर अन्ततः धर्म-बुद्धि के विकास का, भगवत् स्मरण का न्यूनाधिक अवसर वहाँ मिल ही जाता है।
चिन्तन या मनन न हुआ हो।
चिन्तन, भजन दिखाई देता है। अर्थात् मन के अन्दर जो शक्तियाँ थीं उनका आह्वान कर जिन्दगी को शक्ति शाली बनाना और उसका उपयोग दुनिया की भलाई के लिये करना उनका उद्देश्य था। सर्वत्र यह आध्यात्मिक संशोधन कार्य चल रहा था। भारतवर्ष में तुलसीदास, नानक, चैतन्य, तुकाराम आदि अनेक संत हुये। वैसे ही योरोप में भी हुये, पर हम उन्हें नहीं जानते।
चिन्तन की प्रेरणा

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-August
चिन्तन चरित्र में तुम, सद्भावना तुम्हीं हो। व्यक्तित्व ही मिशनमय, कर आपने दिया है॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-March
चिन्तन और भावनाओं को शोधित-परिष्कृत कर इस योग्य बनाया जा सके कि उनमें देवपुरुषों के अनुग्रह को आकर्षित करने की क्षमता पैदा हो जाय, तो निश्चय ही हममें से प्रत्येक देवभूमियों के दिव्य-दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करने में सफल हो सकेगा, जो के अंतर्गत आते रहे हैं। यही नहीं, उस मनोभूमि में पहुँचने पर जो आध्यात्मिक लाभ ऋद्धि-सिद्धियों को रूप में संभव है, हस्तगत हो पाना इस माध्यम से शक्य हो सकता है। प्रचंड आध्यात्मिक पुरुषार्थ से यह असंभव भी नहीं हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-April
चिन्तन को अपनाकर अच्छे भले आदमी अनाचारी वर्ग में सम्मिलित होते हैं, उसका अंत होना चाहिए। ऐसी व्यापक जनभावना ही ईश्वरेच्छा बन जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-December
चिन्तन, नया उत्साह जगाना है। असली भारत बिखरे देहातों में बसता है। हमें प्रधानतया उसी समुदाय के साथ संपर्क साधना चाहिये इसके लिए गायत्री यज्ञों, दीप यज्ञों और साथ ही युग निर्माण सम्मेलनों का संयुक्त कार्यक्रम बनाया गया है। इस हेतु प्रचारकों की टोलियाँ आवश्यक उपकरणों के साथ योजनाबद्ध रूप से देश व विदेश के प्रवास पर निकलती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-May
चिन्तन करते हुए समय बिता रहे थे, वे अब भगवान् की प्रेरणा पाकर विश्व को सच्चे शान से आलोकित करने के लिये कार्यक्षेत्र में उतरे हैं। इसी से आज भूत, निर्जीव और प्राणहीन भारत फिर जाग उठा है। क्षीणकाय, दुर्बल शरीर, रक्त मज्जा हीन, भारत के सपूत, खाली हाथ बिना सहायता के अस्त्र शस्त्र हीन होते हुए भी आज संसार पर विजय प्राप्त करने के लिये कमर कस कर तैयार हुए हैं। संसार की मदान्य जातियाँ मद में चूर होकर भारत को तुच्छातितुच्छ समझ कर उसके अवहेलना करती थीं, पर आप इन थोड़े दिनों में ही समस्त संसार विस्मित और विस्फारित नेत्रों से भारत की ओर देख रहा है। भारतवर्ष की यह जाग्रति, स्वप्न नहीं है, मिथ्या नहीं है, भ्रम नहीं है, भारत वर्ष जाग उठा है, वह जागृति जितनी शीघ्रता से संपादित हुई है, उतनी ही स्थायी रहेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-October
चिन्तन करता है उसी में उसकी समीचीन बुद्धि हो जाती है। यह समीचीनता ही रमणीयता के रूप में परिवर्तित होकर हमारे मन को आकर्षित करती रहती है। अब विचारना चाहिए कि विषयों में वास्तव में रमणीयता है या नहीं और यदि नहीं है तो रमणीयता क्यों भासती है?
चिन्तन-विचारशीलता की आवश्यकता है। साधक मनन के द्वारा अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकता है। अर्थात् अपनी मनोवृत्तियों पर साधक जब विजय प्राप्त कर लेता है तब उसे बाह्य प्रकृति प्रभावित-शासित नहीं कर सकती। इस साधना की बागडोर आत्मबल, मनन, विचारशीलता और चिन्तन के हाथ में है। यहाँ हमें हर कदम पर सावधान रहना चाहिए, कहीं अपनी पगडंडी से फिसल न जायें।
चिन्तन के हाथ में है। यहाँ हमें हर कदम पर सावधान रहना चाहिए, कहीं अपनी पगडंडी से फिसल न जायें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-August
चिन्तन, आत्मशुद्धि, तपश्चर्या यही तीन कार्य प्रधान रूप से इन दिनों रहेंगे सो. 1 से 7 अगस्त तक पाठकों के पत्रों का उत्तर न दिया जा सके तो उन्हें चिन्ता न करनी चाहिए इस बीच में पत्र भेजने वालों या मिलने के लिए आने वालों से कष्ट न करने के लिए करबद्ध प्रार्थना करते हैं क्योंकि इससे हमारी साधना में विक्षेप पढ़ेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-October
चिन्तनशील प्रकृति के हैं, बात को समझ बूझ कर ही स्वीकार करते हैं, तो आपके इर्द-गिर्द आने वाले सभी व्यक्ति आपसे सलाह मशवरा लेंगे। चिन्तनशील व्यक्ति श्रद्धा एवं आदर के पात्र होते हैं। लेकिन गंभीरता की अति करना मूर्खता है। वृद्धि होकर गम्भीरता एवं चिंतन शुष्क निराशावादिता, दार्शनिकता या (Melancholia) उदासी, विवाद तथा चिंताकुलता जैसे मानसिक रोगों में परिणीत हो जाता है। मस्तिष्क के तन्तुओं का अत्यधिक तनाव बड़ा घातक है।
चिन्तनशील व्यक्ति श्रद्धा एवं आदर के पात्र होते हैं। लेकिन गंभीरता की अति करना मूर्खता है। वृद्धि होकर गम्भीरता एवं चिंतन शुष्क निराशावादिता, दार्शनिकता या (Melancholia) उदासी, विवाद तथा चिंताकुलता जैसे मानसिक रोगों में परिणीत हो जाता है। मस्तिष्क के तन्तुओं का अत्यधिक तनाव बड़ा घातक है। इससे कभी-कभी प्रमाद तक हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-July
चिन्तन में, हो गए सब जीवों में कम।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-November
चिन्तन करो। उनके साकार और सगुण रूप का ही ध्यान करो। नित्य ऐसी प्रार्थना करो-हे भगवान! मुझ पर दया करो। मेरी अन्तः दृष्टि खोल दो। मुझे दिव्य चक्षु प्रदान करो।
चिन्तन करता है तथा इन्द्रियों को उनमें बलात् रोकता है, मिथ्याचारी कहलाता है,” इस सम्बन्ध में ध्यान देने योग्य है। भगवान का आदेश है कि हम तब तक कर्म करते रहें जब तक कि हमारी वासनाएं परिमार्जित नहीं हो जाती और हम तब तक संसार को छोड़ने की बात न सोचें जब तक कि हमें भक्तिभाव का आधिक्य ही एतदर्थ प्रेरित तथा बाध्य नहीं करता।
चिन्तन उसे रुचिकर नहीं होता। अन्य किसी का ध्यान करने को उसके पास समय ही नहीं होता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-March
चिन्तन करना चाहिए कि अणुओं की तेजी से वृद्धि हो रही है एवं समस्त शरीर के अणु रोग विहीन होकर परम विशुद्ध हो रहे हैं। हम व्यर्थ उत्तेजित करने वाली वृत्ति के कभी वशीभूत न होंगे। हम ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध पर पूर्ण संयम करेंगे। हमारे मस्तिष्क का निर्माण विशुद्ध रीति से हो रहा है। एकाग्रता के समय मन को अत्यन्त शान्त एवं समाधान की स्थिति में रखो और संकल्प युक्त करो।
चिन्तन छोड़ो, आज से सत्य, शुभ, सुख, स्वास्थ्य का ही चिंतन करो। दूसरों के साथ वाणी या मन से भी अशुभ बात न करो, या दूसरों की अशुभ की बात न सुनो। केवल भलाई, सब की भलाई, स्वास्थ्य, दीर्घायु का विचार, सब से आत्मभाव का दर्शन, उत्तमता का दर्शन ही तत्व चिंतन है। तत्व चिंतन से मनुष्य समस्त दुःख एवं क्लेशों से मुक्त हो जाता है। तत्व चिंतन एकाग्रता से होता है।
चिन्तन, मानस पूजा करना इस प्रदेश में पहुँचने की प्रथम सीढ़ी है। अपने मन में, दूसरों में भी अशुभ न देखना प्रत्युत अन्तर बाह्य सुख, शान्ति, ऐश्वर्य, और सब प्रकार की आरोग्य पूर्ण स्वास्थ्य का ही दर्शन करना भ्रान्ति के विक्षेप से मुक्ति पाने तथा शीलता प्रकट करने वाली समाधान वृत्ति का उदय करने का साधन है। यह वृत्ति एकाग्रता पर अवलम्बित है। एकाग्रता की वृद्धि से मन और बुद्धि आत्मस्वरूप में लीन हो जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-January
चिन्तन, मनन, निरीक्षण, क्रियाशीलता का मूल केन्द्र हमारा मन है। भय, साहस आनन्द, उद्वेग, विकार, संकल्प, संवेदन क्रोध, क्षोभ इत्यादि आन्तरिक भावनाओं का उदय भी हमारे मन से संयुक्त स्नायु तंतुओं, क्रियाओं, एवं प्रवृत्तियों द्वारा होता है। मनुष्य किन परिस्थितियों में क्या सोचता है? इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख कल्पना, संकल्प, ज्ञान किस प्रकार होते हैं? मानसिक वृत्तियों का मर्म, उनकी नियमबद्ध व्याख्या एवं कार्यशैली का शास्त्रीय अध्ययन मनोविज्ञान का विषय है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-December
चिन्तन नहीं कर सकते तो कम से कम दिन में एक बार तो किया करो, प्रातः काल अथवा रात्रि में। प्रातः काल अपना ध्येय निश्चित कर लो और सोते समय अपनी परीक्षा कर लो तुमने क्या किया है, मन, वचन और कर्म से तुमने कैसा व्यवहार किया है।
चिन्तन को दूरदर्शी विवेकशीलता के सहारे घटाया या हटाया जा सकता है। पर इतने से भी कुछ काम चलने वाला नहीं है क्योंकि प्रेरणाओं का उद्गम स्त्रोत तो अन्तःकरण में उठने वाली दुर्भावना, आदर्शों के प्रति अनास्थाएँ ही होती हैं। प्रत्यक्ष और परोक्ष में उसी की चित्र-विचित्र भूमिकाएँ अनेकानेक कुकर्मों एवं दुर्घटनाओं के रूप में सामने आती रहती हैं। वास्तविक उपचार इसी क्षेत्र का होना चाहिए।
चिन्तन प्रवाह में संचित निकृष्टता भरी रहती है। परिचितों का आग्रह और प्रचलनों का दबाव भी उसी दिशा में घसीटता है ऐसी दिशा में अपनी चेतना को अपने बलबूते ही उछालने का प्रयत्न करना होता है। इसके लिए आत्म निरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्मसुधार के सुनिश्चित एवं कारगर कदम उठाने के लिए संकल्प युक्त व्रतशील रीति-नीति अपनानी और दूरदर्शी योजना बनानी पड़ती है। इस प्रयोजन के चार उपचार काम में आते हैं (1) स्वाध्याय (2) सत्संग (3) चिन्तन (4) मनन। यह चारों ही उद्देश्यपूर्ण एवं सुनियोजित होने चाहिए।
चिन्तन (4) मनन। यह चारों ही उद्देश्यपूर्ण एवं सुनियोजित होने चाहिए। अपने चिन्तन ने जिस स्तर की निकृष्टताएँ दृष्टिगोचर हों उसके लिए उसी स्तर का प्रतिपक्ष ढूँढ़ा जाना चाहिए और अनौचित्य की टक्कर में औचित्य का पक्ष मजबूत बनाकर खड़ा कर देना चाहिए। लोहे को लोहे से काटा जाता है। काँटे से काँटा निकलता है।
चिन्तन प्रक्रिया एवं भाव संवेदना के क्षेत्र में निकृष्टता के निराकरण एवं उत्कृष्टता के संस्थापन, अभिवर्धन की प्रक्रिया सहज गति से चलती रहती है। इस आधार पर बनायी गयी स्वनिर्मित चेतना को प्रभावित करने वाला विचार वातावरण उत्कृष्टता संवर्धन में ऐसा चमत्कार दिखता है मानो वह किसी अन्य लोक से, समर्थ देवता या सिद्ध पुरुष द्वारा वरदान की तरह दिया गया है।
चिन्तन एवं चरित्र के रूप में उसी का अनुशासन चलता है। कहना न होगा कि अन्तराल की गहन गुफा में विद्यमान यह सचेतन किन्तु अदृश्य व्यक्तित्व ही मनुष्य के भाग्य का निर्माण करता है। तिरष्कृत, विकृत, अस्त-व्यस्त, अव्यवस्थित किये जाने पर उसी के शाप उभरते हैं और मनुष्य को दुःखी, दरिद्र, पतित, पराजित बनाकर दयनीय स्थिति में पटक देते हैं। उसी सत्ता को सम्मानित, सुसंस्कृत, समुन्नत, सुव्यवस्थित बनाने पर विभूतियाँ अन्तराल से उभरती हैं उन्हीं के सम्बन्ध में यह समझा जाता है कि वे किसी अदृश्य लोक से, दैवी शक्ति द्वारा सौभाग्य या वरदान की तरह अनुग्रह पूर्वक दी गई है।
चिन्तन और साधनों की बचत को परमार्थ प्रयोजनों में लगाकर पुण्यफल एवं सुख सन्तोष अर्जित करता है। अधिक कमाने की छूट है, किन्तु अध्यात्म प्रेमी को औसत नागरिक के स्तर का निर्वाह क्रम अपनाना पड़ता है और बचत की सत्प्रवृत्ति संवर्धन की धर्म धारणा में लगाना पड़ता है। यह नीति व्यक्ति के लिए भी श्रेयस्कर है और समाज कल्याण में भी सहायक। अपव्यय के बदले ही असंख्यों दोष-दुर्गुण खरीदे जाते हैं, यदि मितव्ययिता की नीति अपनाली जाय तो फिर वासना, तृष्णा, ललक, लिप्सा, उद्धत प्रदर्शन जैसे दुष्प्रवृत्तियों से भी सहज ही बचा जा सकेगा। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए साधना प्रयोजनों में अर्थ संयम की व्रतशील तपश्चर्या में सम्मिलित रखा गया है।
चिन्तन करना पड़ता है। राजकुमार सिद्धार्थ का जिस क्षण आत्म-बोध उभरा उसी क्षण वे भगवान बुद्ध बन गये। जिस अश्वतरु के नीचे यह सुयोग बना वह भी ‘बोधि वृक्ष’ के रूप में श्रद्धास्पद बना- प्रख्यात हुआ और कृत्य-कृत्य हो गया। आत्मज्ञान की महत्ता, प्रतिक्रिया एवं सिद्धि परिणति का इतना अधिक प्रतिपादन हुआ है कि उससे बढ़कर इस संसार में और कोई बड़ी उपलब्धि मानी ही नहीं गई। गीताकार ने “अपने को ही अपना मित्र और अपने को ही अपना शत्रु बताते हुए कहा है कि अपना उद्धार आप करो, अपने को गिराओ मत।
चिन्तन सम्पदा को भटकने बिखरने नहीं दिया और अभीष्ट प्रसंगों में ही जोड़े दबोचे रखा। मुनि, मनीषी, वैज्ञानिक, कलाकार अपनी प्रवीणता का एक ही कारण बताते हैं कि उनने विचारों को उच्छृंखल नहीं बनने दिया वरन् प्रिय प्रसंग में रुचि लेने एवं निरत रहने के लिए ठोक पीट कर विवश कर दिया।
चिन्तन ने जिस स्तर की निकृष्टताएँ दृष्टिगोचर हों उसके लिए उसी स्तर का प्रतिपक्ष ढूँढ़ा जाना चाहिए और अनौचित्य की टक्कर में औचित्य का पक्ष मजबूत बनाकर खड़ा कर देना चाहिए। लोहे को लोहे से काटा जाता है। काँटे से काँटा निकलता है। ‘विष एवं विषमौषधम्’ ‘शठे शाठयं समाचरेत्’ घूंसे का जवाब लात के रूप में देने की बात साधना समर में ही समग्र रूप से प्रयुक्त होती है। गीता रहस्य का असली महाभारत यही है जो अन्तराल के धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र में लड़ा जाता है।
चिन्तन शक्ति का अपव्यय ही नहीं करतीं प्रकारान्तर से दुष्परिणाम भी उत्पन्न करती हैं।
चिन्तन के माध्यम से चिन्तन प्रक्रिया एवं भाव संवेदना के क्षेत्र में निकृष्टता के निराकरण एवं उत्कृष्टता के संस्थापन, अभिवर्धन की प्रक्रिया सहज गति से चलती रहती है। इस आधार पर बनायी गयी स्वनिर्मित चेतना को प्रभावित करने वाला विचार वातावरण उत्कृष्टता संवर्धन में ऐसा चमत्कार दिखता है मानो वह किसी अन्य लोक से, समर्थ देवता या सिद्ध पुरुष द्वारा वरदान की तरह दिया गया है।
चिन्तन और कर्त्तृत्व इसी दिशा में नियोजित रहना चाहिये। यही है आत्मबोध, यही है आत्मिक जीवनक्रम। इसी को अपनाकर- जीवन में उतारकर हम अपने अवतरण की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं।
चिन्तन एवं साधनात्मक उपचार ही एकमात्र अवलंबन बनकर रह जाते हैं। योग भावना को उत्कृष्टता के साथ जोड़ता है और तप कुसंस्कारिता को गलाकर सुसंस्कारिता में ढालने वाली भट्टी का प्रयोजन पूर्ण करता है।
चिन्तन, कृत्य, व्यवहार रुझान इस प्रकार का बनाना पड़ेगा, जिससे वह उपयुक्त प्रयोजन में ठीक तरह काम दे सकने योग्य बन सके। प्रेत आह्वान उतना कठिन नहीं है जितना कि उसके लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण। यदि शरीर और मन का स्तर तद्नुकूल बना लिया गया तो समझना चाहिए कि तीन चौथाई मंजिल पार हो गई। अघोरी या पालिक प्रेत-सिद्ध अपने प्रयोग का आरम्भ यहीं से करते हैं। कि उनकी काय सत्ता प्रेतों के लिए आकर्षक अनुकूल एवं अनुरूप बन सके।
चिन्तन में निरत रहकर कुमार्ग पर धकेलती है। दुष्प्रवृत्तियां ही उलटकर विपत्तियों की तरह बरसती हैं। यमदूत और कुछ नहीं अपने ही कुसंस्कारों द्वारा उत्पन्न किये गये भूत-प्रेत हैं। जो क्रिया की प्रतिक्रिया का परिचय देते हैं और अनाचारों को तोड़ मरोड़ कर रख देते हैं। नरक और यम-त्रास मनुष्य की आत्म-सत्ता में ही सृष्टा ने सुनियोजित रीति से गुँथ दिये हैं।
चिन्तन मनन किया है, अपने अन्दर विपुल रत्न राशि का भण्डार पाया है, जिसे प्रयुक्त कर वे स्वयं धन्य बने और सहस्रों को कृतार्थ कर गये।
चिन्तन को एक प्रचण्ड शक्ति के रूप में प्रतिपादित किया गया है और कहा गया है कि उसे डाइनामाइट अणु विखण्डन-रेडियो विकिरण से भी अधिक शक्तिशाली चेतन क्षमता माना जाना चाहिए। प्रतिपादनकर्त्ताओं का कहना है कि विचार क्षेत्र के उतार-चढ़ाव ही व्यावहारिक जीवन में उत्थान-पतन की सम्भावनाएँ खड़ी करते हैं। ताप, प्रकाश, शब्द की ध्वनि तरंगों की तरह वे विचारों को भी एक दिव्य ऊर्जा मानते हैं और उसके प्रवाह को ईथर में संव्याप्त सूक्ष्म ध्वनि तरंगों की तरह न केवल चिरस्थायी वरन् प्रचंड शक्तिशाली भी मानते हैं।
चिन्तन, चरित्र, सहयोग, वातावरण बनता है और इस प्रकार अपनी ही गढ़ी हुई दुनिया में मनुष्य अपने ढंग का निर्वाह करता है। अन्तःकरण की प्रेरणा से मन बुद्धि को काम करना पड़ता है। मन के निर्देशन पर काया काम करती है। संक्षेप में बाह्य जीवन का जैसा भी स्वरूप है उसे अन्तःकरण का प्रतीक प्रतिबिम्ब ही समझा जाना चाहिए। यह अन्तराल ही कारण शरीर है।
चिन्तन और चरित्र की दृष्टि से पवित्र-प्रतिभा और वरिष्ठता की दृष्टि से प्रखर व्यक्तित्व की हाँडी उच्च चेतन के चूल्हे पर ही पकती है। महामानव, सिद्ध पुरुष, ऋषि-मनीषी, महाप्रज्ञ और देवदूत स्तर की प्रतिभाएँ इसी महासागर में मणि मुक्तकों की तरह भरी पाई जाती हैं। चमत्कारी ऋषि सिद्धियों की चर्चा विवेचना से इतिहास पुराणों के पन्ने भरे पड़े हैं। आध्यात्मिक समर्थता वाले सिद्ध पुरुषों के शाप वरदान फलित होते देखे गये हैं। अतीन्द्रिय क्षमताओं को कभी देवी देवताओं की अनुकम्पा, भूत-प्रेतों की सहायता तथा जादू विद्या जैसी कोई अविज्ञात कारणों से उत्पन्न हुई चमत्कारी घटना समझा जाता रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-November
चिन्तन पद्धति जब हाथ लग जाती है तो समस्याओं का स्वरूप और समाधान उपलब्ध हो जाता है। ऐसी स्थिति में जो गहरी आत्म-तुष्टि और अनवरत प्रफुल्लता बनी रहती है, उसी का नाम समाधि है। आत्म स्वरूप का, आत्मिक गरिमा का जब अनुभव होने लगे तो समझना चाहिए कि आत्म साक्षात्कार की, ईश्वरीय अनुदान प्राप्ति की स्थिति आगयी।
चिन्तन और रुझान में भारी परिवर्तन किया जाय। यह महान कार्य सामान्य प्रयासों से सम्भव नहीं उसके लिए अन्तःकरण को टटोलने और उसमें ईश्वर प्रदत्त महानता को उभारने की आवश्यकता पड़ेगी। परिस्थितियों से जुड़ी हुई विभिन्नता का परिशोधन सहृदयता उगाने एवं जगाने से ही सम्भव हो सकता है। सभी प्रख्यात भौतिकविद् मनीषी इस बात पर जोर देते रहे हैं कि कब सहृदयता उभारने के लिए मानवी अन्तःकरण में नई तैयारी के साथ नई कृषि की जानी चाहिए। इस क्षेत्र की उपार्जित फसल से ही मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक भूख बुझेगी।
चिन्तन एवं आदर्शवादी आचरण की प्रेरणा देने वाली अध्यात्मवादी आस्थाओं को अवास्तविक ठहराना, उन्हें निरर्थक कहना आरम्भ कर दिया है। फलतः विज्ञान समर्थित प्रत्यक्षवाद से प्रभावित लोकमानस ने उसे सहज स्वीकार करना आरम्भ कर दिया है। इन दिनों नैतिक मूल्यों का बेतरह ह्रास हो रहा है। उससे अर्थतन्त्र में विकृति, सामाजिक अव्यवस्था, शासकीय भ्रष्टता, दरिद्रता, अशिक्षा जैसे अनेकों अभिशाप जुड़ चले हैं। पर उन क्षेत्रों में जो भी अवांछनियता अपनाई जाती है, वह अपने पक्ष का खुला समर्थन नहीं करती, कुकृत्यों पर पर्दा डाले रहती है और कम से कम प्रदर्शन एवं कथन में तो नीतिगत मान्यताओं का ही समर्थन करती है।
चिन्तन की परिधि से निकाल बाहर कर सकते हैं। जो शान्त चुपचाप खड़ा हो हमारी हर गतिविधि, हर परिस्थिति का अवलोकन करता रहे। वस्तुतः यह हमारे भीतर है- जिसे हम ‘सुपर माइंड’ कहते हैं जो एक लाइट हाउस की तरह दूर-दूर अपनी घुमावदार किरणें (रिवाल्विंग बीम) छोड़ता रहता है। हिमखंडों, तूफानों से जहाजों को बचाता है, पर स्वयं शान्त बिना विचलित हुए खड़ा रहता है।
चिन्तन एवं स्वभाव का अंग बनी हुई हैं। तथ्यों के आधार पर समीक्षा करने पर जिनकी न तो उपयोगिता जान पड़ती है और न ही महत्ता। पर लम्बे समय से मन-मस्तिष्क में उपयोगी होने जैसी मान्यता के रूप में बने रहने के कारण वे स्वभाव का अनिवार्य अंग-सा बन गयी हैं, जिन्हें न निकालते बनता है और न ही छोड़ते।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-April
चिन्तन के अभाव में केवल स्थूल लाभ मात्र ही प्राप्त किये जा सकते हैं।
चिन्तन में निकृष्टता और आचरण में भ्रष्टता बढ़ गई तो उसका परिणाम दृश्य संकटों और विग्रहों के रूप में तो होगा ही इससे अदृश्य अंतरिक्ष में भी ऐसी विभीषिकाएं उत्पन्न होंगी जो समस्त संसार के लिए दुःखद हों। साथ ही उन उद्धत लोगों को भी विनाश के गर्त में ले डूबें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-February
चिन्तन में हल्कापन लाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। जो मनोविकारों से दबे हुए हैं उन्हें उनसे छुड़ाने की प्रक्रिया को चिकित्सा विज्ञान में सम्मिलित करना चाहिए।
चिन्तन करें कि तनाव, निराशाएं रोग चिन्ताएं एवं समस्याएं दूर हो रही हैं। भरपूर उदर श्वसन और श्वास-प्रश्वास के प्रति सजग रहने से शाँति एवं शिथिलता की अनुभूति होती है। शरीर व मन को पर्याप्त विश्राम मिलता है। इसका अभ्यास कोई भी व्यक्ति कहीं भी कर सकता है। अभ्यास के बाद शक्ति, स्वास्थ्य की अनुभूति होने लगती है।
चिन्तन का स्तर इतना परिष्कृत होना चाहिए कि परिस्थितियों को अनावश्यक महत्व न दिया जाय, जो तिल का ताड बनाते हैं। सामान्य सी प्रतिकूलता देखकर चिन्तित, भयभीत, निराश होने लगते हैं उन्हें वास्तविक कठिनाई से कई गुना कष्ट उठाना पड़ता है। मनःस्थिति को यदि सन्तुलित और हल्की-फुल्की रखा जा सके तो फिर जीवन में आते-जाते रहने वाले प्रिय एवं अप्रिय प्रसंग इतना दबाव नहीं डाल सकते कि प्रसन्नता और सरलता से रहित भारभूत जीवन जीने के लिए विवश होना पड़े।
चिन्तन के रूप में कराया जाता है। यह सभी एक प्रकार की शिथिलीकरण प्रक्रिया ही है। योगाभ्यासों में जो शिथिलीकरण का अभ्यास कराया जाता है उसका मूल उद्देश्य शारीरिक व मानसिक तथा भावनात्मक तनावों से मुक्ति पाना ही है। शिथिलीकरण द्वारा रक्तचाप व हाइयोथेल्मस जैसी नर्वस सिस्टम की क्रियाओं पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया जाता है। इसी प्रकार हृदय रोगी का एक बार इलाज करने के उपरांत पुनः दौरा न पड़े इससे बचने के लिए शिथिलीकरण बहुत ही लाभकारी सिद्ध हुआ है।
चिन्तन का क्रम आरम्भ करना चाहिए।
चिन्तन से बचकर हल्की-फुल्की जिंदगी जीने की नीति पसंद की जा सके तो जागृत दिखने वाली स्वास्थ्य समस्या को सरलतापूर्वक सुलझाया जा सकता है।
चिन्तन आदि के सहारे जो ज्ञानवृद्धि होती है उससे मस्तिष्क का बहुत छोटा अंश ही विकसित हो पाता है। इसके सहारे उपार्जन, लोक व्यवहार तथा निर्वाह के सामान्य प्रयोजन ही पूरे होते हैं। शक्ति का स्त्रोत तो अचेतन है और उसे प्रभावित कर सकना ही कठिन है। यदि उसे प्रभावित किया जा सके, अचेतन तक पहुँच पाना संभव हो जाए और उसे अभिष्ट दिशा में बदला जा सके तो व्यक्तित्व का स्वरूप ही बदल सकता है। तब सामान्य को असामान्य के रूप में विकसित हुआ देखा जा सकता है।
चिन्तन को एक दिशा विशेष में संकल्पपूर्वक नियोजित रखा। इसके विपरीत दुर्भाग्य का पश्चाताप उन्हें सहन करना पड़ता है, जो लम्बी योजना बनाकर उस पर निश्चयपूर्वक चलते रहना तो दूर अपनी दिनचर्या बनाने तक की आवश्यकता नहीं समझते और बहुमूल्य समय को ऐसे ही आलस्य प्रमाद की अस्त-व्यस्तता में गंवाते रहते हैं। कहते हैं कि लक्ष्य और क्रम बनाकर चलने वाली चींटी पर्वत शिखर पर जा पहुँचती है जब कि प्रमादी गरुड़ ऐसे ही जहाँ-तहाँ पंख फड़फड़ाता और बीट करता दिन गुजारता है।
चिन्तन को विचार करने के लिए एक दिशा मिलती है। व्यवस्थित कार्यक्रम बनाकर चलने से शरीर को उसमें संलग्न रहने की इच्छा रहती तथा प्रवीणता मिलती है। फलतः सूझबूझ के साथ निश्चित किया गया कार्यक्रम सरलता और सफलतापूर्वक सम्पन्न होता चला जाता है।
चिन्तन क्षेत्र में घुसी हुई अनुपयुक्त मान्यताएं एवं विचारणाएं हटाई गईं तो वे बिना दवादारू के ही अच्छे होने लगे और खोया हुआ स्वास्थ्य पुनः वापिस प्राप्त कर सके।
चिन्तन। जो अन्तरंग के आस्था क्षेत्र में उत्पन्न होता है। महानता की और बढ़ने का साहस जुटा सकना तो उदात्त भावनाओं द्वारा संभव है।
चिन्तन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो तथा जो हममें गति संघर्ष और बेचैनी पैदा करे। हमें सुलाए नहीं बल्कि जगाए और जगाकर, उठने, उठकर आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करे।’’
चिन्तन को किसी सुनिश्चित दशा में निरन्तर गतिशील रखना।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-March
चिन्तन को प्रभावित करना भी होगा। चुम्बक से चिकित्सा की बातें अभी तक विज्ञान की कसौटी पर कसी नहीं गई हैं, लेकिन इस दिशा में वैज्ञानिक प्रयत्नशील हैं। विज्ञान सतत् रूप से यह सिद्ध करने की दिशा में अग्रसर हो रहा है कि चुम्बक जीवन में भलाई के लिये परिवर्तन करेगा।
चिन्तनीय और शोचनीय हो जाती है। इस समय परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों के पास करीब 50 हजार एटम बम हैं। हाइड्रोजन बम और वैसे ही अन्य संहारक अस्त्रों का भण्डार तो इस गणना से अलग ही है। इतने परमाणु अस्त्र पृथ्वी के पूरे जीवन को सात बार नष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं। यद्यपि एक बार विनाश के बाद दुबारा उनके उपयोग की आवश्यकता तो नहीं ही होगी फिर भी यह स्थिति कितनी भयावह है कि उपलब्ध शस्त्रास्त्र सात बार पृथ्वी पर से जीवन को नष्ट कर सकते हैं।
चिन्तन करने वालों को भी अपना बना देती है। सौमनस्यता उत्पन्न करने के लिए किये गये हजारों प्रयास वह परिणाम उत्पन्न नहीं कर पाते जो करुणा उत्पन्न करती है। सब में अपने ही समान आत्मा देखने और प्राणिमात्र का दुःख-दर्द समझने वाले व्यक्ति अपने लाभ के लिए भी किसी प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचा सकते। घटना सन् 1940 की है। उन दिनों महात्मा बाँधी के आश्रम सेवा ग्राम में परचुरे शास्त्री नामक एक विद्वान भी रहते थे जो कुष्ठ रोग से पीड़ित थे।
चिन्तन एवं चेष्टा करता है। वही लोक का अतिक्रमण करता है और मृत्यु के रूपों का भी वह अतिक्रमण करता है।
चिन्तन से अलग बिल्कुल भिन्न प्रकार की होती है। कुछ रसायन ऐसे हैं जो मस्तिष्कीय कणों को वर्तमान परिस्थिति एवं उपस्थिति से सर्वथा भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ सामने उपस्थित करते हैं, मस्तिष्कीय कणों की चिंतनधारा को सामने प्रस्तुत पदार्थों से सर्वथा असम्बद्ध करके किसी ऐसे कल्पना लोक में उड़ा ले जाते हैं जिनका वास्तविकता से दूर का भी संबंध नहीं है। पुराने नशे वर्तमान स्थिति से किसी न किसी रूप में जोड़े तो भी रहते थे पर अभी नये प्रकाश में आए इन नशीले पदार्थों का प्रभाव तो ऐसा होता है कि वर्तमान के साथ मस्तिष्क का तारतम्य बिल्कुल टूट जाता है और आँखें वह देखने लगती हैं जो सामने प्रस्तुत यथार्थता से सर्वथा भिन्न होता है।
चिन्तन चलते रहने के कारण उनके अन्तस् में देवताओं के प्रति घृणा घनीभूत हो गई और घृणा के साथ देवगणों के प्रति आक्रोश, रोष भी उत्पन्न हुआ। उन्होंने संकल्प किया कि तप के द्वारा भगवान आशुतोष को प्रसन्न कर मैं उनसे देवताओं को ही नष्ट करने का वरदान मागूँगा।
चिन्तन मौत से अधिक कष्ट कारक होता है। जीवन का सच्चा मार्ग उत्कृष्ट विचारों एवं आदेश कर्त्तव्यों से ही मनुष्य जान पाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-June
चिन्तन एवं अन्वेषण में विघ्न पड़ता है। यह तथ्य आज भी प्राचीनकाल की तरह ही यथावत् बना हुआ है।
चिन्तन और मनन यह चार अवलम्बन ब्रह्म विद्या को हृदयंगम कराते हैं। उपनिषदों का यही विषय है।
चिन्तन प्रक्रिया में संशोधन ही है। दूषित विचार मानसिक परेशानी के रूप में उत्पन्न होते हैं तथा अल्सर, कैंसर, टी.बी. जैसे भयंकर रोगों के रूप में फूट पड़ते हैं। कई बार तो कई जन्मों के संस्कार इस बुरी तरह पीछा करते हैं कि उन्हें समझ पाना ही कठिन होता है। उन सबका एक ही उपचार है कि मनुष्य व्यवहार, आचरण और कर्तव्य में सच्चाई का परित्याग न करे।
चिन्तन और चरित्र में जो उपयोगी परिवर्तन हो सकता है उसका प्रत्यक्ष परिचय इस स्वाध्याय के फलस्वरूप कुछ ही समय में दृष्टिगोचर होने लगेगा।
चिन्तन और चरित्र दिन-दिन परिष्कृत होता चलता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-July
चिन्तन उत्कृष्ट एवं कर्तृत्व आदर्शवादी होते जाने पर उसकी अन्तःशक्तियों का विकास स्वयं होने लगता है।
चिन्तन और कर्तृत्व के प्रथम उद्देश्य अनेकानेक विधि-विधानों के सहारे सम्पन्न होते हैं, किन्तु ऋषि प्रणीत निर्धारणों में एक ऐसा भी है जिससे दोनों ही प्रयोजनों की पूर्ति एक साथ होती है और उसका लाभ हर स्तर का व्यक्ति अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुरूप ले सकता है। उस निर्धारण का नाम है- तीर्थ सेवन। उसका वास्तविक स्वरूप उपयुक्त वातावरण में रहकर परिष्कार और अभ्युदय के लिए महत्वपूर्ण आधार उपचार का आश्रय लेना है।
चिन्तन। शरीर का कर्तृत्व। इन दोनों को समुन्नत बनाते-बनाते पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचना यही है प्रगति का वास्तविक क्रम। इसकी पूर्ति के लिए तत्वदर्शियों ने दो महत्वपूर्ण विज्ञानों का निर्धारण किया है। चिन्तन की उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने के लिए अध्यात्म दर्शन और आचरण में शालीनता भर देने के लिए धर्म विधान।
चिन्तन किया जाता है, तो उसके कण-कण में संव्याप्त चेतना के भी दर्शन होते हैं। पर बात यहीं तक सीमित नहीं है। चेतना विश्व ब्रह्माण्ड के विस्तार जितनी असीम है। अदृश्य जगत के वास्तविक दृश्य चलचित्र को हम चेतना जगत में परिभ्रमण कर स्वप्नों के माध्यम से देख सकते हैं। यही कारण है कि भारतीय मनीषी भौतिक जगत के विकास की अपेक्षा अतीन्द्रिय चेतना के विकास पर अधिक बल देते रहे हैं।
चिन्तन मनन- उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों का परामर्श एवं सहयोग यह सभी पक्ष तीर्थ सेवन से साथ जुड़े रहने के कारण उसे उतनी महता एवं गरिमा प्रदान की गई।
चिन्तन और प्रयास कल्पना को साकार रूप देने में लग गये। जिज्ञासा कल्पना तक सीमित नहीं रही वरन् क्रिया में परिणित हुई। चलचित्र का विकास हुआ। ‘फ्रीजग्रीने’ को चलचित्र का आविष्कारक माना जाता है। कालान्तर में चल-चित्र में आश्चर्यजनक विकास हुआ।
चिन्तन से इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि मनुष्य के अन्तराल में आदर्शवादी आस्था बनाये रहना और नीति मर्यादा का पालन कराना धर्मधारणा के सहारे ही सम्भव हो सकता है। भौतिक लाभों को प्रधानता देकर चलने और सदाचरण के अनुबंधों को तोड़ देने से उपलब्ध सम्पदाएँ दुष्प्रवृत्तियों को ही बढ़ायेंगी और अन्ततः विनाश का कारण बनेंगी। वैभव पर धर्म का अंकुश रहने से ही शान्ति और व्यवस्था बनाये रह सकना सम्भव होगा।
चिन्तन एवं गुणावगुण परक मंथन से निकले हुए नवनीत हैं। उन्हें समुद्र तल में गहरी डुबकी लगाकर न ढूंढ़े गये मणि मुक्तकों के समतुल्य माना जा सकता है। इस स्तर के अनेकानेक निर्धारणों में तीर्थ सेवन की एक ऐसी प्रक्रिया का आविर्भाव किया गया जिसे समस्याओं के समाधान एवं समग्र अभ्युत्थान की दृष्टि से अतीव उपयोगी कहा जा सके।
चिन्तन, स्वाध्याय सत्संग एवं उच्चस्तरीय परामर्श के सहारे वर्तमान को समुन्नत बनाना संभव हो सके।
चिन्तन का प्रादुर्भाव हमारी शोध प्रक्रिया से हो रहा है। मान्यता अब अधिक पृष्ठ होती जा रही है कि अन्तरिक्ष ऊर्जा एवं पदार्थ वस्तुतः एक ही तत्व है। उनका उद्गम किसी एक से हुआ है।
चिन्तन के लिए धारणा और कर्तृत्व के लिए प्रेरणा आवश्यक है। धारण के लिए स्वाध्याय, सत्संग, मनन, मंथन की आवश्यकता पड़ती है। प्रेरणा के लिए जप, तप, भजन, पूजन, दान, पुण्य आदि अनेकों कर्मकांडों का आश्रय लेना पड़ता है। इन्हीं दोनों प्रयोजनों के लिए अध्यात्म का एक चिन्तनपरक और धर्म का क्रियापरक विशालकाय ढाँचा खड़ा किया गया है। ऋषियों के इसी अनुदान ने नर-पशु को नर-नारायण स्तर तक विकसित कर सकने वाले अध्यात्म विज्ञान की संरचना की है।
चिन्तन नये अनुसन्धानों में निरत रहता है। फलस्वरूप वे अनेकानेक उपलब्धियों से समाज को लाभान्वित करते हैं। मानवी जिज्ञासा की यह भौतिक परिणति हुई, जो एक सीमा तक आवश्यक है, उपयोगी भी। पर जीवनपर्यन्त बनी रहने वाली जिज्ञासा इस बात की परिचायक है कि वह बहिर्जगत की उधेड़-बुन द्वारा मात्र सन्तुष्ट नहीं हो सकती। वह तो सृष्टि के मूलभूत सत्य के साक्षात्कार द्वारा ही शान्त होगी।
चिन्तन एवं क्रिया-कलाप इसी खोजबीन में लगा रहा। अंततः उसे सफलता मिली। स्काटलैण्ड के बोस्टन नगर में पहली टेलीफोन संचार व्यवस्था बनाने में ग्राह्मबेल सफल हुआ। आज समर्पण विश्व में मनुष्य को एक दूसरे के निकट लाने में, संपर्क जोड़ने में यह व्यवस्था कितनी समर्थ सिद्ध हुई है, इस तथ्य से हर कोई भली-भांति परिचित है।
चिन्तन की उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने के लिए अध्यात्म दर्शन और आचरण में शालीनता भर देने के लिए धर्म विधान। एक शब्द में इन्हीं दोनों का समन्वय ही आत्म-विद्या एवं ब्रह्म विद्या है। शास्त्रों की समग्र संरचना इसी एक प्रयोजन को विभिन्न तर्कों, तथ्यों एवं उदाहरणों के सहारे प्रस्तुत करते हुए हर वर्ग के हर पक्ष की उत्कृष्टता की दिशा में बढ़ाने धकेलने के लिए हुई है।
चिन्तनपरक और धर्म का क्रियापरक विशालकाय ढाँचा खड़ा किया गया है। ऋषियों के इसी अनुदान ने नर-पशु को नर-नारायण स्तर तक विकसित कर सकने वाले अध्यात्म विज्ञान की संरचना की है। यह इतना महत्वपूर्ण है कि उसे सुविधा सम्वर्धन वाले पदार्थ विज्ञान की तुलना में कुछ अधिक ही वजनदार कहा जा सकता है। वैभव की तुलना में आत्मबल की गरिमा भी तो स्पष्टतः अधिक है। दो कदम बढ़ाते हुए ही लम्बी मंजिल पूरी की जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-October
चिन्तन का खाका, व्यक्तित्व का ढाँचा इस तरह विनिर्मित होता है कि संपर्क में आया व्यक्ति भी उच्चस्तरीय जीवन की ओर अभिमुख हो जाता है। शहीद, समाज सुधारक, लोकसेवी, सन्त, सामान्य, परजीवट के धनी व्यक्ति इसी श्रेणी में आते हैं। वे जो जीवन जीते हैं, आदर्शों रूपी ईश्वर को समर्पित होता है। अपनी निष्ठाओं के आधार पर वे स्वयं तो उच्च प्रगतिशीलता की भूमिका को प्राप्त होते ही हैं, सहज श्रद्धा व जन-सम्मान के भी पात्र बनते हैं। अध्यात्म उनके भीतर से प्रस्फुटित होता रहता है।
चिन्तन-मनन द्वारा ज्ञान के उस स्त्रोत तक पहुंचा जा सकता है जिसे शास्त्रकारों से आत्म-ज्ञान, ब्रह्म-ज्ञान के नाम से वर्णन किया है।
चिन्तन तन्त्र को ही नियोजित नहीं करता वरन् शरीर वाहन को भी इसी प्रयोजन के लिए-नियोजित करता है। अन्तःकरण का आदेश मन मानता है और मन के इशारे पर चलने वाला शरीर स्वामी भक्त सेवक की भूमिका निभाने लगता है। इसमें उसे भला-बुरा सोचने या किसी प्रकार का ननुनच करने की भी इच्छा नहीं होती। संक्षेप में अन्तराल को ही मनःसंस्थान और काय-कलापों का सूत्राधार कह सकते हैं। जो किया या सोचा जाता है उस समूचे क्रिया तन्त्र का अधिष्ठाता अन्तःकरण को ही कहा- माना जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।
चिन्तन की श्रेष्ठता को न जोड़ा जायेगा तो फिर लक्ष्य यही बन जायेगा कि भौतिक समृद्धि को किसी भी प्रकार उपार्जित किया जाय। समृद्धि के मनचाहे उपयोग में आकर्षण की अधिकता रहती है। यदि उस पर भावनात्मक उत्कृष्टता का अंकुश न रहे, तो फिर समृद्धि की उत्कंठा ऐसी आतुरता उत्पन्न करेगी कि उसे धर्म-मर्यादाओं का स्मरण दिलाने से भी नियन्त्रित न किया जा सकेगा और वह कुछ भी- किसी भी उपाय से कर गुजरने- अनीति और उच्छृंखलता बरतने तक में प्रवृत्त होती दिखाई पड़ेगी। ऐसी प्रगति व्यक्ति को दुर्गुणी और समाज को अनाचारी बना देगी। कहना न होगा कि प्रकृति और चेतना के शाश्वत नियम इस प्रकार के अनुपयुक्त मार्ग से उपार्जित सम्पदा को सहन न करेंगे, फलतः सर्वत्र संकट, विग्रह और विनाश के दृश्य उपस्थित होंगे।
चिन्तन प्रखर होने पर स्वयं को ऊँचा उठा हुआ पाता है। आत्मिक प्रगति के विभिन्न सोपानों को पार करता हुआ वह अपने लक्ष्य तक जा पहुँचता है।
चिन्तन मनन किया जा सके तो क्रमशः आत्मोत्कर्ष की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए विराट् सत्ता के निकट पहुँचा जा सकता है। जिसके निकट पहुँचने-उसके दिव्य स्वरूप का दिग्दर्शन करने के उपरान्त कोई कामना अवशेष नहीं रहती। एक अनिर्वचनीय आनन्द में साधक सदा डूबा भौतिक जगत में रहते हुए भी निर्लिप्त बना रहता है।
चिन्तन’ की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि “चिन्तन ही मनुष्य है। अध्ययन, कथन अथवा श्रवण वह नहीं हो सकता। लगातार चिन्तन के द्वारा वह किसी भी परिस्थिति को पार कर सकता है। चाहे वह गरीबी से संबंधित हो अथवा पाप से, स्वास्थ्य संबंधी हो अथवा डर-भ्रम से।”
चिन्तन प्रक्रिया को बुद्धिमत्ता या दूरदर्शिता ही कहा जा सकता है, पर अन्तःकरण का विस्तार इतने सीमित क्षेत्र में ही समाप्त नहीं हो जाता, वरन् इसके आगे की उच्चस्तरीय स्थिति है- अन्तरात्मा। यह विशुद्ध रूप में उन्हीं आदर्शों का समर्थन करती है जो व्यक्ति और समाज के बुद्धिसंगत प्रतिपादनों से भी कहीं ऊँचे होते हैं।
चिन्तन के द्वारा वह किसी भी परिस्थिति को पार कर सकता है। चाहे वह गरीबी से संबंधित हो अथवा पाप से, स्वास्थ्य संबंधी हो अथवा डर-भ्रम से।”
चिन्तन एवं प्रयास को नियोजित किये रहते हैं। इसी परिधि की उपलब्धियों के अनुरूप अपने को सुखी-दुःखी, सफल-असफल मानते रहते हैं।
चिन्तन के क्षेत्र में जितना रस विभोर करने का अवसर प्राप्त किया है, यह उसकी भावनात्मक क्षमता सम्भावना की प्रक्रिया का ही परिचायक है।
चिन्तन दुःखद विरोधी परिस्थितियों से न प्रभावित होकर अति मन के भीतर में उभर कर आना चाहिए। वस्तुतः जो कुछ भी सुन्दर है, शिव है, शुभ है वह मानवी स्थिति में नहीं, अतिमानवी स्थिति में ही करतलगत हो सकता है। केवल एक ही परिस्थिति ऐसी हो सकती है जिसमें स्थायी सुख-शान्ति, अनिर्वचनीय आनन्द की प्राप्ति हो। वह अतिमानव के स्तर पर बनती है जिसे “कास्मिक गुडनेस” “सुपर कांशसस्टेज” कहा जा सकता है। हर धर्म, पंथ, मत ने ही यही मूल दर्शन सबको सिखाया है कि परम तत्व को पाने के लिए भौतिक मन, ‘लोअर सेल्फ’ से ऊँचे उठो।
चिन्तन से सद्विचारों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सिद्धान्तों के प्रति-अपनी दिव्यताओं के प्रति अनास्था मनुष्य को एकाँगी, स्वार्थी एवं अहंकारी बना देती है।
चिन्तन एवं मनन द्वारा अन्तःकरण की भावनाएँ स्वतः उमड़ने लगती हैं। सही रूप से महामंत्र का अवगाहन, आराधन एवं चिन्तन मनन किया जा सके तो क्रमशः आत्मोत्कर्ष की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए विराट् सत्ता के निकट पहुँचा जा सकता है। जिसके निकट पहुँचने-उसके दिव्य स्वरूप का दिग्दर्शन करने के उपरान्त कोई कामना अवशेष नहीं रहती। एक अनिर्वचनीय आनन्द में साधक सदा डूबा भौतिक जगत में रहते हुए भी निर्लिप्त बना रहता है।
चिन्तन ही मनुष्य है। अध्ययन, कथन अथवा श्रवण वह नहीं हो सकता। लगातार चिन्तन के द्वारा वह किसी भी परिस्थिति को पार कर सकता है। चाहे वह गरीबी से संबंधित हो अथवा पाप से, स्वास्थ्य संबंधी हो अथवा डर-भ्रम से।”
चिन्तन का परिपक्व अभ्यास।
चिन्तन का एवं शरीर मात्र संचालन, कार्य सम्पादन का उत्तरदायित्व ही नहीं सम्भालता है। शरीर और मस्तिष्क का कार्यक्षेत्र वहीं तक सीमित नहीं है। जितना कि समझा जाता है। बल्कि उसकी परिधि बहुत व्यापक है। परामनोविज्ञान जो काफी समय से इन शक्तियों का प्रतिपादन पुष्टीकरण करता आ रहा है, आरम्भ में भूतविद्या जैसी जादुई चर्चा कहा गया था।
चिन्तन-मनन काम परिष्कार का सशक्त माध्यम है। बुद्धि और भाव के क्षेत्र में काम की शक्तिधारा परिष्कृत और परिशोधित होकर प्रवाहित होने पर उनमें उत्कृष्ट विचारों और उदात्त भावों से भर देती है। शरीर के स्थूल केंद्रों की ओर उसका प्रवाह अपने-आप कम होता जाता है। फलतः कामोद्वेग नहीं रहता।
चिन्तन व्यवहार में भले ही बहतर पाया हो- अर्थ-दर्शन के रूप में वह पूरी तरह लोक-समर्थन प्राप्त कर रहा है। उस मान्यता के अनुरूप अधिक संग्रही, अधिक विलासी, अधिक अपव्ययी लोग नीतिवान नहीं समझे जाते। अस्तु, उन पर ‘अनीति की कमाई-विलास की लड़ाई’ -की उक्ति के अनुरूप तरह-तरह के लाँछन लगाये जाते हैं। वैभव की चकाचौंध तो अभी भी है और उसे लोग झपटना हड़पना तो अभी भी चाहते हैं किन्तु इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि, वैभववानों की प्रशंसा एवं प्रभावों के दिन लद गये। उन पर हर कोई अनीति उपार्जन का लाँछन लगाता है, भले ही वह अनुचित ही क्यों न हो?
चिन्तन और बौद्धिक प्रगल्भता की सम्भावनाओं से भरा होने के कारण ही मानवी मस्तिष्क को जादुई पिटारा कहा जाता है। मस्तिष्क का यह परिचय उसकी विशेषताओं का यह विश्लेषण तो बहुत आधा-अधूरा है। इसके गहन अन्तराल में उतरने पर प्रतीत होता है कि इसमें वे दिव्य चेतनाएँ भरी हुई हैं जिन्हें अलौकिक और अतीन्द्रिय कहा जा सके। इन सम्भावनाओं और विशेषताओं की व्याख्या सामान्य मस्तिष्कीय गतिविधियों के आधार पर नहीं की जा सकती। प्राचीन काल में ऋषि, मुनि योग-साधना द्वारा उस दिव्य चेतना को विकसित करने में एक बड़ी सीमा तक सफल हुए थे।
चिन्तन से अपना ही अहित होता है। क्रोध, ईर्ष्या, चिन्ता, भय, आशंका जैसे मनोविकार धारण कर्ता ही सर्वनाश करते हैं। जिनके विरुद्ध दुर्भाव रखे जाते हैं उनका अहित तो कदाचित ही स्वल्प मात्रा में हो पाता है। आपत्तियों का कारण आमतौर से मनुष्य के अब के या पिछले विभ्रम, दोष दुर्गुण या कुकृत्य ही होते हैं। दण्ड का तात्पर्य इतना ही है कि मनुष्य भविष्य में अधिक सावधानी बरतें और अधिक सही सभ्य रहें।
चिन्तन का अभाव एवं उत्कृष्टता के प्रति अनास्था अन्ततः उद्दंडता को जन्म देती है। विकृत चिन्तन से सद्विचारों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सिद्धान्तों के प्रति-अपनी दिव्यताओं के प्रति अनास्था मनुष्य को एकाँगी, स्वार्थी एवं अहंकारी बना देती है।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की विशिष्टता जुड़ी हुई है। उसे समझने समझाने में भी कोई बड़ी कठिनाई नहीं होती। उपदेश पग-पग पर नीति के एवं उदारता के समर्थन में सुने जाते हैं। उन्हें स्वीकारने में भी किसी को कोई आपत्ति ही होगी। किन्तु कठिनाई तब पड़ती है जब निकृष्ट परिस्थितियों से गुजरते-गुजरते जो आदतें अन्तरंग की गहराई में घुस गई हैं उन्हें सुधारने, बदलने की बात सोची जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-August
चिन्तन की अंतर्मुखी ज्ञान साधना से काम चलायेंगे। जिज्ञासाएं न्यूनतम उभारेंगे, श्रद्धा की स्थापना में विशेष प्रकार का पराक्रम अपनायेंगे। समय-समय पर तीर्थ के सूत्र संचालक युग-ऋषि से विचार विनिमय का वही सामयिक समाधान का अवसर प्राप्त होता रहेगा। पर मानकर यहीं चलना चाहिए कि यहाँ सीखने सुनने के लिए नहीं धारणाओं को परिष्कृत परिपक्व करने के लिए जाया रहा है। इसमें सुनने-पूछने की कम और अन्तरंग को उभारने उछालने की आवश्यकता अधिक पड़ती है।
चिन्तन की ही विशेषता थी। जिसके अध्ययन ने ‘दारा शिकोक’ जैसे मुसलमान को मदमस्त-दिव्य आनन्द से सराबोर कर दिया।
चिन्तन की अथवा अपने साथियों से विचार विमर्श की? यह प्रश्न सतहत्तर गणितज्ञों से पूछा गया था। आश्चर्य है कि सतहत्तर मे से इक्यावन ने इसका उत्तर दिया था कि उन्हें अपने गणित सम्बन्धी प्रश्नों को समझाने में स्वप्न एवं अपने अचेतन से सहायता मिलती है।
चिन्तन किया और यह जानने की जीतोड़ कोशिश की कि कल क्या होगा? इस तरह के प्रयत्नों के परिणाम स्वरूप ही फलित ज्योतिष का जन्म हुआ। ज्योतिष यों एक विज्ञान है, जिसमें ग्रह-नक्षत्रों और अन्तरिक्ष की गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है। इसे विज्ञान भी कहा जाता है क्योंकि इसके अपने सुनिश्चित सिद्धान्त हैं जो लम्बे समय तक किये गये पर्यवेक्षण, निरीक्षण और प्रयोगों के आधार पर स्थिर किये गए हैं। फलित ज्योतिष में भी ग्रह-नक्षत्रों की गतियों को आधार मानकर भविष्य की सम्भावनाओं का अध्ययन किया जाता है।
चिन्तन को मोड़ने-मरोड़ने वाली स्वाध्याय, सत्संग जैसी परिचर्या चलती है वरन् मेजर आपरेशनों जैसी, प्लास्टिक सर्जरी जैसी सुविधा भी रहती है। अन्तराल को, अचेतन मन के रहस्यमय क्षेत्रों को सुधारने संभालने का कार्य तीर्थों में होता रहा है। उसकी कुछ-कुछ तुलना वैज्ञानिक उपचारों से किये जाने वाले ‘ब्रेन वाशिंग’ से की जा सकती है। अतीन्द्रिय क्षमताओं को उभारने वाले, व्यक्तित्व को सामान्य से असामान्य बनाने वाले उपचार एवं अभ्यास केंद्रों के रूप में ही महा-मनीषियों ने तीर्थों की स्थापना की थी। अपने समय में वह पूर्ण या सफल भी रही।
चिन्तन एवं कृत्य किस प्रकार स्थान एवं वातावरण पर असर डालते हैं, इसकी परीक्षा की जा सकती है। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर में जाते अथवा निकट से होकर गुजरने पर मन को विशेष शान्ति मिलती है। बाजार, मेला, भीड़-भाड़ के कोलाहल में पहुँचने पर मन उद्विग्नता एवं अशान्ति से भर उठता है। कसाई खाने में पहुंचने पर हृदय उद्वेलित हो उठता है। घृणा उत्पन्न होती है।
चिन्तन-मनन कर रहे होते। उनके जीवन चरित्र का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि संन्यास लेने के बाद तो उनके कर्मों में और अधिक प्रखरता एवं गति आयी। अपनी अल्पायु में वे मानव जाति के लिए इतना कर गये जितना कि कोई भी व्यक्ति अपने दीर्घ जीवन में भी नहीं कर पाता।
चिन्तन करने से निष्कर्ष यही निकलता है कि लौकिक क्षणिक सुखों में आनन्द की तलाश ही रोग, शोक, निराशा व तनाव को जन्म देती है। इसका साक्षात्कार यदि अपने अंतःकरण में किया जा सके, साधना द्वारा अन्तः की परतों को उत्तेजित किया जा सके तो आँतरिक प्रगति का पथ-प्रशस्त किया जा सकता है।
चिन्तन में संव्याप्त अनेकानेक भ्रान्तियों में से एक है- दर्शन सम्बन्धी भ्रान्तियाँ। किसी भी देश एवं समाज की सर्वांगीण प्रगति इसी बात पर निर्भर करती है कि प्रचलित दर्शन व्यक्ति एवं समाज के विकास में कितना सहायक है। भारतीय दर्शन को विश्व दर्शनों में जो सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है, वह अकारण नहीं है। वेदान्त एवं उपनिषदों में मानव ही नहीं समस्त प्राणि-मात्र के लिए जो उदात्त भाव मिलता वह अन्यत्र दुर्लभ है। प्रकृति, जीव, ब्रह्म, सृष्टि आदि का गूढ़ वर्णन एवं उनके आपसी सम्बन्धों का विवेचन, विश्लेषण इतना सुन्दर विश्व के किसी भी धर्म ग्रन्थ में नहीं मिलता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-May
चिन्तन और उसके नशे में कुमार्ग का अनुसरण। उठने और  गिरने के दोनों मार्ग हर किसी के लिए खुले पड़े हैं। इनमें से कोई किसी का भी स्वेच्छापूर्वक वरण कर सकता है और मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस तथ्य की यथार्थता अपने उदाहरण से सर्वथा सत्य एवं सार्थक सिद्ध कर सकता है।
चिन्तन एवं व्यवहार का समग्र ढाँचा खड़ा करें और उन्हें क्रियान्वित करने के लिए प्रतिभाओं को उभारने तथा साधन जुटाने का उत्तरदायित्व वहन करें। दोनों संकल्प सर्वविदित हैं (1) ‘‘मनुष्य में देवत्व का उदय’’ अर्थात् व्यक्तित्वों का आदर्शवादी निर्माण (2) ‘‘धरती पर स्वर्ग का अवतरण’’ अर्थात् क्षमताओं और सम्पदाओं का मात्र सत्प्रयोजनों के लिये नियोजन।
चिन्तन को नहीं बदला गया तो मनुष्य की अपनी ही दुर्बुद्धि उसे मार डालेगी।
चिन्तन एवं औचित्य का अवलम्बन कर सकने में असमर्थ बनता है।
चिन्तन से उत्तम स्वास्थ्य)। उसे पढ़ते ही उसका चिंतन आमूलचूल बदल गया। चिंता एवं निराशा को मन से निकाल फेंका, उसने मन में अच्छे विचारों को जगह देने का संकल्प लिया।
चिन्तन वस्तुतः बहुत ही खतरनाक होता है। यह वैसे प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर नहीं होता, इसीलिये इसकी गम्भीर भयावहता तब तक समझ नहीं आती जब तक कि वह शारीरगत व्याधि का रूप न ले ले। डा. शिंडलर नामक एक विख्यात चिकित्सक जो विस्कांसिन (अमेरिका) में अध्यात्म चिकित्सा करते थे- कहा करते थे अधिकांश लोगों की बीमारी का कारण सी, डी, टी होता है। पूछने पर वे व्याख्या करते हुये बताते कि- ‘सी’ अर्थात् केयर (चिन्ता) ‘डी’ अर्थात् डिफिकल्टीज (कठिनाईयाँ) और ‘टी’ अर्थात् ट्रबल्स (कष्ट) इन तीनों की परिणिति मानसिक निराशा में होती है। कोई इंजेक्शन, औषधि उपचार ऐसे रोगी को स्वस्थ नहीं कर सकता।
चिन्तन और दुष्ट वातावरण में रहना पड़े तो उस ढांचे में ढलते हुए भी उसे देर नहीं लगती। अनाचारी, अपराधी, दुर्गुणी, दुर्व्यसनी लोगों की बढ़ती हुई संख्या यही बताती है कि संपर्क एवं अनुकरण का प्रभाव कितना प्रचण्ड होता है। निष्कृष्ट विचारणा अपनाने वाला व्यक्ति क्रमशः पतन की दिशा में बढ़ता और नरक जैसी दुर्गन्ध भले दलदल में धँसता चला जाता है। यही बात परिस्थितियों के संबन्ध में भी है। सत्संग की महिमा सर्वविदित है, कुसंग का प्रभाव उससे भी अधिक होता है।
चिन्तन को महत्ता दी गयी थी। किताब का शीर्षक था “बेटर हेल्थ थ्रू पॉजेटिव थिंकिंग’’ (विधेयात्मक चिन्तन से उत्तम स्वास्थ्य)। उसे पढ़ते ही उसका चिंतन आमूलचूल बदल गया। चिंता एवं निराशा को मन से निकाल फेंका, उसने मन में अच्छे विचारों को जगह देने का संकल्प लिया।
चिन्तन प्रखर होने पर स्वयं को ऊँचा उठा हुआ पाता है। आत्मिक प्रगति के विभिन्न सोपानों को पार करता हुआ अपने लक्ष्य तक जा पहुँचता है।
चिन्तन और साधना उपक्रम के योग-तप भी आज की तरह विभाजित नहीं थे। इस विभाजन में विग्रह ढूंढ़ना व्यर्थ है। वस्तुतः क्षेत्र विस्तार होने पर खेत में क्यारियाँ बनाने की तरह व्यवस्था बनाये रखने की दृष्टि से इस प्रकार के विकेंद्रीकरण की आवश्यकता अनिवार्य होकर सामने आ खड़ी होती है। नये परिवार का आरम्भ करते समय पति-पत्नि दो ही होते हैं और छोटे बच्चे भी साथ-साथ लिपटे रहते हैं। पर जब कुटुम्ब बढ़ता है, बेटे-पोते वयस्क होते हैं, बन्धुओं और जामाताओं की अच्छी खासी भीड़ जमने लगती है, तो विशालकाय परिवारों का संयुक्त रहना सुविधा का नहीं, अव्यवस्था का कारण बनता है।
चिन्तन, दृष्टिकोण आदमी में तनाव की सृष्टि करते हैं और तनाव से मुक्ति व्यक्ति स्वयं ही पा सकता है।
चिन्तन से सद्विचारों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सिद्धांतों के प्रति, अपनी दिव्यताओं के प्रति अनास्था मनुष्य को एकांगी स्वार्थी एवं अहंकारी बनाती है।
चिन्तन का अभाव एवं उत्कृष्टता के प्रति अनास्था अन्ततः उद्दंडता को जन्म देती है। विकृत चिन्तन से सद्विचारों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सिद्धांतों के प्रति, अपनी दिव्यताओं के प्रति अनास्था मनुष्य को एकांगी स्वार्थी एवं अहंकारी बनाती है।
चिन्तन एवं व्यवहार एक ही निर्धारण के अंतर्गत समाहित होते थे। उस निर्धारण का नाम था- धर्म। उन दिनों अनुशासन और निर्धारण एक ही तन्त्र के अंतर्गत होता था। पुरोहित और शासक या तो एक ही होते थे या दोनों मिल-जुलकर व्यवस्था बनाने और चलाने की संयुक्त जिम्मेदारी उठाते थे। उन दिनों स्वास्थ्य, शिक्षा, उपार्जन, परम्परा, सुरक्षा जैसे विभाग पृथक-पृथक नहीं थे।
चिन्तन के विषय में हो, चाहें अपने पिछले कर्मों के विषय में अथवा विधेयात्मक भविष्य की रूपरेखा बनाने के रूप में।
चिन्तन में अभीष्ट हेर-फेर के लिए हलचल मचा रही है। इन सूक्ष्म प्रेरणाओं को ही किसी सर्वे समर्थ शक्ति के प्राकट्य का संकेत समझा जा सकता है जिसका उल्लेख मदर शिप्टन ने अपनी भविष्यवाणियों में किया है।
चिन्तन और दुष्ट सान्निध्य से मनुष्य को न पशु बनने में देर लगती है और न पिशाच बनने में।
चिन्तन तथा असन्तुलन की ओर बढ़ सकता है। ‘प्रायश्चित प्रक्रिया’ (कन्फेशन) के रूप में यह चर्च संस्था चिकित्सा का कार्य करती रही। मध्यकाल में बहिरंग पर ही दृष्टि केन्द्रित हो जाने से पंक्तियों को ही सुधारने, सँवारने का कार्य चला, जड़ पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। शारीरिक सुख एवं भौतिक सम्पदा समृद्धि ही सब कुछ है- इसी पर जोर दिया जाता रहा। रोगों का बाहुल्य हुआ एवं समृद्धि के अपरिमित साधनों के बावजूद मानसिक अशान्ति एवं शरीरगत व्याधियाँ बढ़ती चली गयीं।
चिन्तन है जो इन दिनों पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से प्रकाशन में आ रहे हैं। कारण के बिना कोई क्रिया नहीं होती। सूक्ष्मदर्शी जानते हैं कि कोई समर्थ शक्ति विश्व मनीषा को झकझोर रही तथा उनके चिन्तन में अभीष्ट हेर-फेर के लिए हलचल मचा रही है। इन सूक्ष्म प्रेरणाओं को ही किसी सर्वे समर्थ शक्ति के प्राकट्य का संकेत समझा जा सकता है जिसका उल्लेख मदर शिप्टन ने अपनी भविष्यवाणियों में किया है।
चिन्तन और चरित्र में उच्छृंखलता की मात्रा बढ़ाकर ही की है। यदि विपत्तियां अरुचि कर या असहाय प्रतीत होती हों तो उसे ही अपने कदम वापिस लौटाने होंगे।
चिन्तन पर भी आच्छादित होती चली जाती हैं। फलस्वरूप शरीर और मन दोनों की शक्तियों का अन्धाधुन्ध अपव्यय होता है और दोनों क्षेत्रों पर छाई रहने वाली उत्तेजना अन्ततः चित्र-विचित्र रोगों के रूप में फूटती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-September
चिन्तन और चरित्र की पक्षधर आस्थाओं को अपनाने की पृष्ठभूमि कैसे बने? वह न बने तो फिर महामानवों का उद्भव कैसे हो? ये न उपजें तो विश्व व्यवस्था का सदाशयता सम्पन्न नवनिर्माण किस प्रकार सम्भव हो?
चिन्तन ही समग्रता की बात सोच सकता है। इसमें कमी रहने के कारण भविष्य दृष्टाओं ने भविष्य की प्रगति के एकाँगी एवं अधूरे चित्र तैयार किए हैं।
चिन्तन वाणी एवं क्रिया-कलाप तीनों में एकरूपता स्थापित करनी होगी। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष व्यक्तित्वों में जिसकी भूमिका मनुष्य के विकास में सहायक हो सकती है, इसका निर्धारण कैसे हो? क्योंकि कभी-कभी स्थिति उलटी भी हो सकती है। अप्रत्यक्ष व्यक्तित्व सुसंस्कारी हो सकता है और प्रत्यक्ष कुसंस्कारी। इस विषम स्थिति में किसकी बात मानी जाय और चिन्तन एवं अभ्यास द्वारा किसे सशक्त बनाया जाय, उसका उत्तर प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग ने दिया है जो प्रकारान्तर से भारतीय अध्यात्म का ही समर्थन करता है।
चिन्तन की नई दिशा दे डाली।
चिन्तन और विश्वासों के बारे में पूछा तो उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि 61 विद्वानों ने कठिनतम प्रश्नों और प्रमेयों का हल स्वप्न में ही किया था। स्वामी रामतीर्थ के सम्बन्ध में तो प्रसिद्ध है कि गणित का कोई कठिन प्रश्न आने पर वे उसे हल करने की भरसक कोशिश करते। फिर भी हल नहीं होता तो वे थक कर सो जाते थे और सोते समय स्वप्न में ही उन्हें अपने प्रश्नों का हल मिल जाता था।
चिन्तन प्रवाह की श्रेष्ठता की ओर घसीट ले जाने में दर्शन की असामान्य भूमिका होती है।
चिन्तन, चरित्र और लोक परम्पराओं को प्रभावित करे। इन क्षेत्रों में घुसी हुई भ्रान्तियों एवं अवांछनियताओं को उसी प्रकार निरस्त करें जिस प्रकार उसने पिछले दिनों भौतिक जगत की वस्तुस्थिति के सम्बन्ध में यथार्थता की जानकारी रखते हुये सत्य की शोध का अधिष्ठाता कहलाने का क्षेत्र सम्मान पाया और अपना महान उत्तरदायित्व निभाया है। उसकी यह सेवा पिछली सहस्राब्दियों में प्रस्तुत किये गये अनुदानों की तुलना में अकेली ही अत्यधिक भारी-भरकम सिद्ध होगी। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि “जो धर्म वैज्ञानिक अनुशासन पर सही न ठहराया जा सके उसे नष्ट कर देना चाहिये। जितनी जल्दी ये अनावश्यक अन्ध-परम्परायें व मूढ़-मान्यतायें धर्म से निकाल दी जायें, उतना ही ठीक है।
चिन्तन देने वाले विचारक भावनाओं को उद्वेलित विस्तृत करने वाले कवि, संगीतज्ञ, कलाकार क्या धार्मिक नहीं कहे जा सकते?
चिन्तन, प्रयोग परीक्षण और संकल्पबल के सहारे ‘सेफ्टी लैंप’ के आविष्कार में अनन्तः सफलता प्राप्त कर ली। उन्होंने उसे पेटेन्ट करवा कर धन कमाने के बजाय जनता में बिना किसी मूल्य के प्रचलित कर दिया। इस पर उनके मित्र ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा- ‘‘यदि तुम इसे पेटेन्ट करवा देते, तो पाँच या दस हजार वार्षिक कमा सकते थे।” तब डेवी ने उत्तर दिया- “मेरा तो उद्देश्य मानवता की सेवा करना है न कि धन कमाना। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मेरे अपने दो हाथ पर्याप्त हैं, अधिक धन मुझे पथ-भ्रष्ट कर देगा।
चिन्तन के क्षेत्र में उत्कृष्टता और व्यवहार के क्षेत्र में उदार सहकारिता जैसी सत्प्रवृत्तियाँ प्रदान की हैं और उसकी गौरव गरिमा को बढ़ाया है। इस विशिष्टता की जितनी उपेक्षा की जायेगी उतनी ही विपत्ति उभरेगी और विनाश की विभीषिका बढ़ेगी। इस सत्प्रवृत्ति को पुरातन भाषा में ‘आध्यात्मिकता’ कहा जाता है। यह शब्द किसी को अटपटा लगता हो तो “दूरदर्शी आदर्शवादिता” जैसा कोई शब्द देने में किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिये। यही है कि वह कसौटी जिस पर अद्यावधि प्रगति के उपयोग में हुई भूलों को सुधारना और जो उपलब्ध हैं, उसका सर्वहित में सदुपयोग कर सकना सम्भव हो सकता है।
चिन्तन एवं क्रिया प्रणाली के सूक्ष्म संस्कार जमा होते रहते हैं और अचेतन पक्ष का निर्माण करते हैं। यदि उनका स्तर निकृष्ट हुआ तो भारी विक्षोभ पैदा करेंगे। फ्रायड जैसे मनोवैज्ञानिक का कहना है कि “मनुष्य चिन्तन कुछ और करता है तथा उसका प्रत्यक्ष भूमिका भिन्न प्रकार की होती है। चिन्तन में यदि वासना, तृष्णा एवं लोभ के तत्व विद्यमान हैं तथा वाणी से वह आदर्शों की बात करता है तो व्यक्तित्व में विघटन यहीं से आरम्भ हो जाता है और द्विमुखी व्यक्तित्व का निर्माण होता है।”
चिन्तन के अनुरूप निष्कर्ष निकाले हैं। जिसकी दृष्टि में जिस तथ्य का अधिक महत्व है उसने उसी प्रकार की प्रगति की महत्व दिया और भविष्य का कल्पना चित्र उभारा है। समग्र चिन्तन ही समग्रता की बात सोच सकता है। इसमें कमी रहने के कारण भविष्य दृष्टाओं ने भविष्य की प्रगति के एकाँगी एवं अधूरे चित्र तैयार किए हैं।
चिन्तन कुछ और करता है तथा उसका प्रत्यक्ष भूमिका भिन्न प्रकार की होती है। चिन्तन में यदि वासना, तृष्णा एवं लोभ के तत्व विद्यमान हैं तथा वाणी से वह आदर्शों की बात करता है तो व्यक्तित्व में विघटन यहीं से आरम्भ हो जाता है और द्विमुखी व्यक्तित्व का निर्माण होता है।”
चिन्तन करने पर विवश करती हैं। उचित यही है कि अपने ऊपर आने वाले संकटों से बेखबर न रहा जाय। संभावित प्रतिकूलताओं को पहले से ही सोच कर यह निर्धारित किया जाय कि इनसे बचाव के लिए क्या किया जा सकता है। व्यक्ति को अच्छे से अच्छे की आशा करनी चाहिए पर बुरे से बुरे के प्रति असावधान नहीं रहना चाहिए। विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति करके आधुनिक मानव सफलताओं के प्रति आशान्वित तो रहता है, पर यह प्रयास एकांगी है, यदि वह अध्यात्म का दूसरा पक्ष अपनाने के लिए तैयार न हो।
चिन्तन को आदर्शनिष्ठ और सिद्धान्त निष्ठ बनाना। ऐसे विचार प्रवाह देना जिससे मनुष्य उत्कृष्टता की ओर चल पड़े। विश्व भर में प्रचलित समस्त आस्तिकवादी दर्शन अपने-अपने ढंग से इस लक्ष्य की ही आपूर्ति करते हैं। मनुष्य श्रेष्ठ कैसे बने- आदर्शों भरा जीवनयापन कैसे अपनाये, यही है मूलभूत लक्ष्य जिसके लिए अनेकों प्रकार के दर्शन समय-समय पर बने। मानवी चिन्तन प्रवाह की श्रेष्ठता की ओर घसीट ले जाने में दर्शन की असामान्य भूमिका होती है।
चिन्तन, स्वभाव, कौशल, स्वर, चातुर्य आदि पर एक विशेष आवरण चढ़ा पाया जाता है। यों सुधार प्रयत्नों का कुछ लाभ तो होता ही है, पर जन्मजात विशेषता में उतना परिवर्तन नहीं होता जितना कि होना चाहिए।
चिन्तन, उथले प्रयासों में बन पड़ने वाले छुटपुट क्रिया-कलापों को ही सब कुछ मान बैठते हैं। उतावले उतने होते हैं कि हाथों हाथ फल न मिले तो ऊबने लगते हैं। परिणामों की आतुरता में न कठोर परिश्रम ही करते बनता है और न तन्मयता भरा मनोयोग ही एकाग्र होता है। ऐसी दशा में वे लाभ किस प्रकार मिले जो अनवरत श्रम, उत्साह भरे मनोरोग एवं लम्बे समय तक टिके रहने वाले धैर्य की कीमत पर ही खरीदे जाते रहे हैं। इस मनोयोग को प्रकारान्तर से तल्लीनता की साधना भी कहा जा सकता है।
चिन्तन, आदर्श चरित्र और श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही- उसका आयनोस्फियर है। उसकी सहायता से ही सुरक्षा और प्रगति- शान्ति और समृद्धि के बहुमुखी उद्देश्य पूरे होते हैं।
चिन्तन या आचरण अपनाये जाते हैं। नीति की पक्षधर यह चिनगारी अपना अस्तित्व पूर्णतया किसी भी स्थिति में खोती नहीं। उपेक्षित, तिरस्कृत, दुर्बल होने पर भी उसका अनीति विरोधी संघर्ष चलता ही रहता है भले ही वह परिस्थिति के अनुरूप कितना ही धीमा या धूमिल क्यों न हो।
चिन्तन में यदि वासना, तृष्णा एवं लोभ के तत्व विद्यमान हैं तथा वाणी से वह आदर्शों की बात करता है तो व्यक्तित्व में विघटन यहीं से आरम्भ हो जाता है और द्विमुखी व्यक्तित्व का निर्माण होता है।”
चिन्तन एवं अभ्यास द्वारा किसे सशक्त बनाया जाय, उसका उत्तर प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग ने दिया है जो प्रकारान्तर से भारतीय अध्यात्म का ही समर्थन करता है। वे कहते हैं कि “प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष से परे मनुष्य की मूल सत्ता” दी अनडिसकवर्ड सेल्फ है। जो अपनी प्रेरणाएँ उदात्त भावनाओं के रूप में सतत् संप्रेषित करता रहता है। अपने चिन्तन एवं गतिविधियों को उसकी प्रेरणा के अनुरूप ही ढाला जाय। व्यक्तित्व को पूर्ण तभी बनाया जा सकता है।
चिन्तन एवं गतिविधियों को उसकी प्रेरणा के अनुरूप ही ढाला जाय। व्यक्तित्व को पूर्ण तभी बनाया जा सकता है।
चिन्तन एवं आदर्श कार्या को करने की जीवट आदि विषय स्थूल मस्तिष्क के नहीं हैं। चेतना की परिधि में आने वाली इन विशिष्टताओं का विशद अध्ययन परामनोवैज्ञानिक कर रहे हैं। इन सबके निष्कर्ष यही हैं कि प्रस्तुत शक्तियों का जागरण एवं मानसिक क्षमताओं का पूर्ण उपयोग ही जीवन की समस्त सफलताओं का मूल है। यही जीवन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-January
चिन्तन ही हताश और निराश का द्योतक है। अन्यथा मनुष्य अपने आप में इतना सर्वांगपूर्ण है कि यदि वह ठीक ढंग से सोचना, समझना सीख जाए और समुचित रीति से प्रयत्न करने लगे तो परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हों वह आगे बढ़ने और प्रगति करने की राह निकाल ही लेता है। कठिन में कठिन और प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी यदि मनुष्य अपना आत्मविश्वास, साहस, सूझ-बूझ और मनोबल न खोये तो कोई कारण नहीं कि परिस्थितियों से हार न माननी पड़े।
चिन्तन और अमंगलकारी आशंकाओं से ही बचा जाना चाहिए। लेकिन यह स्वभाव में सम्मिलित हो गया है और अपने आपके प्रति अविश्वास बहुत गहरे तक बैठ गया तो उसके लिए भी प्रयत्न करना चाहिए। इस दिशा में सचेष्ट होते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि हम स्वयं ही भय की रचना करते हैं, उसे बुलाते और अपनी हत्या के लिए आमन्त्रित करते हैं। यह जान लिया गया तो यह समझ पाना भी कठिन नहीं है कि स्वयं ही भय को नष्ट भी किया जा सकता है। अपने लगाये पेड़ को स्वयं काटा भी जा सकता है और सन्दर्भों में यह बात लागू होती हो अथवा नहीं होती हो किन्तु मन के सम्बन्ध में यह बात शत प्रतिशत लागू होती है कि वह तभी भयभीत होता है, जब जाने अनजाने उसे भयभीत होने की आज्ञा दे दी जाती है।
चिन्तन दिया है, वह निषेधात्मक ही रहा है। इन तीनों भविष्यविदों ने आशावादी दृष्टिकोण से कई पुस्तकें भी लिख हैं व बताया कि समृद्धि तन्त्र अपना रास्ता बदलने में पूरी तरह से समर्थ है। उसे सही चिन्तन देने वाले मनीषी भी विश्व में हैं जो तीसरी दुनिया जिसमें भारत भी शामिल है, उसे उदित होकर एक स्वर्णिम युग अगले बीस वर्षों में लाकर दिखायेंगे।
चिन्तन व अनुमान के आधार पर बताया कि विश्व का भविष्य उज्ज्वल है। “दुनिया कहाँ जा रही है” इस शीर्षक से फिल्म बना रहे अमेरिकी टेलीविजन संवाददाता केल्विन सेण्डर्स ने डा. मार्गरेटमीड (अब स्वर्गीय), हरमन कॉन एवं विलीयम टामसन से साक्षात्कार लिया। “स्पॉन” पत्रिका (अप्रैल 1979) में प्रकाशित इस विचार मंथन पर सारे विश्व के बुद्धिजीवियों का ध्यान गया है। वस्तुतः अभी तक जिन-जिन बुद्धिजीवियों ने अपना चिन्तन दिया है, वह निषेधात्मक ही रहा है। इन तीनों भविष्यविदों ने आशावादी दृष्टिकोण से कई पुस्तकें भी लिख हैं व बताया कि समृद्धि तन्त्र अपना रास्ता बदलने में पूरी तरह से समर्थ है।
चिन्तन चुनने के पीछे भी कारण है। विगत के कटु अनुभवों, असफलताओं और कठिनाइयों से पीड़ित मन वर्तमान में भी लौट-लौटकर उन्हीं स्मृतियों को दोहराता रहता है और जाने-अनजाने अशुभ कल्पनायें करता रहता है। यह कल्पनाएँ ही व्यक्ति में भय उत्पन्न करती हैं। जबकि स्मरण के लिए अतीत के सुखद अनुभव, सफलताएँ और अनुकूलताएँ भी हैं। यदि उन्हें याद किया जाता रहे तो भविष्य के प्रति आशंकित होने के स्थान पर सुखद सम्भावनाओं से आशान्वित भी हुआ जा सकता है।
चिन्तन किया जाता है, फ्यूचरालॉजी (भविष्य विज्ञान) नाम दिया गया है, जो पिछले एक दशक मात्र की ही उत्पत्ति है। यूटोपिया एक इसी प्रकार की विद्या है जिसमें वैज्ञानिक कल्पनाएँ करते हैं जो उपलब्ध तथ्यों को मूल आधार बनाकर की जाती हैं।
चिन्तन प्रवाह को सुनियोजित करने से ही साधना के मार्ग में प्रगति मिलती है। मन का स्तर योगी के आहार पर निर्भर है। यह जितना सात्विक होगा, मन उसी अनुपात से निर्मल बनता चला जाएगा। अन्नमय कोष भी साधना के लिये अन्न की महिमा को प्रधानता देते हुए ही साधनाक्रम बिठाया जाता है। आहारशास्त्री बताते हैं कि अस्सी फीसदी रोगों के कारण आहार का व्यतिक्रम है।
चिन्तन देने वाले मनीषी भी विश्व में हैं जो तीसरी दुनिया जिसमें भारत भी शामिल है, उसे उदित होकर एक स्वर्णिम युग अगले बीस वर्षों में लाकर दिखायेंगे।
चिन्तन कभी कामुकता में लीन नहीं हो सकता। किसी भी साधक, आत्मिक प्रगति के विद्यार्थी के लिये इसलिये इन प्राथमिक अभ्यासों को साधना में आवश्यक बताया गया है।
चिन्तन, व्यवस्था, सम्बन्धी सुझावों का एक सुनिश्चित प्रभाव इस पीढ़ी पर पड़ ही रहा है। इसे हम रोक नहीं सकते। अगली पीढ़ी अमेरिकी ग्लैमर की नकलची नहीं होगी अपितु वह इन दबावों तथा तनाव के मध्य से गुजर कर-तपकर विकेंद्रीकरण एवं प्राकृतिक जीवन-व्यवहार को की अपना आदर्श बनायेगी।
चिन्तन क्यों नहीं करता, क्यों वह अशुभ ही अशुभ सोचता है?
चिन्तन आशंकाएं और आशाएँ सब मन के ही खेल हैं। इनमें पहले वर्ग का चुनाव जहाँ व्यक्ति को आत्मघाती स्थिति में धकेलता है वही दूसरे प्रकार का चुनाव उसे उत्कर्ष तथा प्रगति के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। सर्वविदित है कि आत्मघात, व्यक्तित्व का हनन या असफलता का चुनाव व्यक्ति किन्हीं विवशताओं के कारण ही चुनता है। अन्यथा सभी अपना विकास, प्रगति और अपने अभियानों में सफलता चाहते हैं। जब सभी लोग सफलता और प्रगति की ही आकाँक्षा करते हैं तो मन में समाये भय के भूत को जगाकर क्यों असफलताओं को आमन्त्रित करता है?
चिन्तन, भविष्य के प्रति आशंकित रहने और व्यर्थ के भयों को पालने की आदत से छुटकारा प्राप्त करें।
चिन्तन बाद के लिए भी छोड़ दें और मात्र काय संरचना और विभिन्न अंगों की सुव्यवस्था सहकार पर विचार करें तो इस क्षेत्र में भी सब कुछ अद्भुत दिखाई पड़ सकता है। लगता है यह रचनाकार का हँसी-मजाक अथवा मात्र संयोग नहीं है। बल्कि सब कुछ सोद्देश्य ही है।
चिन्तन की प्रखरता, तेजस्विता, मनस्विता के रूप में सामने आती है। वृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है-
चिन्तन का विकल्प सामने रहते हुए भी अशुभ चिन्तन को ही अपनाया।
चिन्तन तथा भावनाओं को उत्कृष्टता की ओर नियोजित कर स्वयं को आध्यात्मिक दृष्टि से भी ऊँचा उठा सका है।
चिन्तन ही समस्त व्याधियों का मूल है। यह मनुष्य को अपनी अन्तःवृत्तियों का दास बनने पर विवश कर देता है। अन्नमय कोष की साधना आहार सम्बन्धी अपने दृष्टिकोण के परिष्कार की साधना है। साँसारिक जीवन में सफलता की बात हो या आत्मिक उत्कर्ष की, सुखी स्वस्थ जीवन दोनों के लिये जरूरी है। जो अपनी वृत्तियों का परिशोधन कर अपने जीवनक्रम में परिवर्तन कर लेता है वह अन्नमयकोश जागरण की साधना के इस प्रथम चरण को पार कर लेता है।
चिन्तन, एक बहुत बड़ी आबादी के लिए साक्षरता की व्यवस्था का निर्धारण एवं एक सुनियोजित तकनीकी बुद्धिजीवी समुदाय की क्षमता के उचित उपयोग की व्यवस्था का निर्माण।
चिन्तन-मनन के लिए एक खजूर के पेड़ के नीचे बैठते थे। कुछ समय बाद उन्हें वह स्थान छोड़कर अन्यत्र जाना पड़ा। तब उन्होंने उस खजूर को कटवा दिया।
चिन्तन को ही अपनाया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-August
चिन्तन, सींगों वाले आदमी आधा आदमी आधा भैंसा इस तरह की भ्राँत कल्पनाएं जिनका अर्थ तो कुछ भी नहीं होता, पर अपनी मानसिक दुर्बलता के कारण वैसे विचार मस्तिष्क में आते और डराते रहते हैं। साधना काल में यह स्थिति बड़ी ही कष्टदायक प्रतीत होती है। इसलिए दुर्बल मनोभूमि के व्यक्तियों को योग की दीक्षा नहीं दी जाती। यदि मस्तिष्क की इन विकल्पनाओं पर विजय न प्राप्त की जा सके, तो उच्च भूमिका में पहुँचे हुए साधक भी स्त्री और बालकों के समान भयग्रस्त होकर साधनाएं छोड़ सकते हैं।
चिन्तन भी कम शक्ति क्षय नहीं करता। फ्रायड का कथन है कि मनुष्य जो इच्छाएं प्रत्यक्ष संसार में पूर्ण नहीं कर पाता, अवचेतन मन उसकी सृष्टि स्वप्नावस्था में करता है। साधक को कुछ ही दिन के अभ्यास से रात में मधुर-मधुर स्वप्न दिखाई देने लगते हैं। जागने पर उनका बार-बार स्मरण होता है और मन अपने आपको उसी तरह का सुख प्राप्त करने की चेष्टा कराता है। साधक स्वयं वैसा नहीं चाहता, पर वह स्मृति उसे बार-बार उस सुख की याद दिलाती है।
चिन्तन किया जैसे कोई स्वप्न में किसी रमणी के साथ समागम का दृश्य देखता है। इससे उत्पन्न हुए विकार को व्यर्थ न जाने देने के लिए उन्होंने तीन प्रकार के रसायन (1) सतोगुणी जिसे विष्णु का अंश कहते हैं (2) रजोगुणी- ब्रह्मा का अंश और (3) तमोगुणी - शिव का अंश तैयार किये। यह तीनों एक प्रकार से अण्ड थे जिनमें उन्होंने अपने वीर्य कोष स्थापित किये। भ्रूण के विकास के लिए उचित परिस्थितियाँ आवश्यक होती हैं। इसलिए इन तीनों को बाद में उन्होंने अनुसूइया के गर्भ में उसी प्रकार बिना सम्भोग के प्रतिष्ठित किया जिस प्रकार ब्रिटेन में प्रयोग करके श्रीमती एमीनेरी जोन्स के गर्भ में कृत्रिम गर्भाधान कराकर मोनिका नामक लड़की को जन्म दिया (इस आशय का विस्तृत समाचार लन्दन से छपने वाले मासिक पत्र के 15 जुलाई 1967 के ‘टिट्विट्स’ पत्रिका में छपा है।
चिन्तन करते हैं, धार्मिक विश्वास उतने ही परिपुष्ट होते चले जाते हैं। हमें विश्वास करना पड़ता है कि दृश्य संसार में कुछ अदृश्य सत्य भी हैं जो दिखाई तो नहीं देते, पर मनुष्य उन संवेगों से भी चिरकाल से जुड़ा हुआ है। जब तक वे सुखी नहीं होते, मनुष्य पूर्णतः सुखी नहीं हो पाता।
चिन्तन ने एक बड़े कार्यक्रम को जन्म दिया। सोचा गया कि पृथ्वी में पाई जाने वाली परतदार चट्टानें नदियों द्वारा पृथ्वी के बहाव के कारण हैं नदियाँ बहती हैं तो अपने साथ मिट्टी भी छीलती जाती है यह मिट्टी किसी एक स्थान पर जमा होती गई और उस पर अनेक पर्तें चढ़ती गईं। बहुत अध्ययन के बाद पता चला कि 1 फुट मोटी परत 880 वर्ष में तैयार होती है जबकि अब तक अधिकतम मोटाई वाली चट्टान 5 लाख 14 हजार फुट की मिली है। इस सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी की आयु 514000 * 880 =542320000 वर्ष होती है। इनमें कल्पनाओं का अंश अधिक होने से यह हल भूगर्भ शास्त्रियों ने बाद में स्वयं ही अमान्य कर दिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-June
चिन्तन में ही नष्ट हो जाता है। तृष्णा, वासना, लोभ-मोह, शौक-मौज, द्वेष-दुर्गुणों के द्वारा उत्पन्न की हुई इतनी ज्यादा शक्तियाँ सामने होती हैं कि उनका हल ढूंढ़ना ही मस्तिष्क के विचार के लिए कठिन पड़ता है। ऐसी दशा में बौद्धिक चेतना की ज्ञानवृद्धि एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन में कैसे लगाया जाय? इसी कुचक्र में पड़े हुए हम अपनी मानसिक क्षमताओं को नष्ट-भ्रष्ट करते रहते हैं और खाली हाथ इस संसार से उठ जाते हैं। यदि इस कुचक्र को तोड़ने की मनस्विता का परिचय दिया जा सके तो समझना चाहिए कि हमने साहस के देवता की पूजा का दूसरा चरण पूरा कर लिया शरीर और मन को व्यवस्थित और सत्प्रवृत्तियों का अनुगामी बनाने के लिये जो अपने आप में संघर्ष करना पड़ता है वही गीता में वर्णित महाभारत है।
चिन्तन की एक बहुत बड़ी शक्ति का महत्वपूर्ण अंश यों ही निरर्थक खर्च हो जाता है। अपने स्वभाव में जिन अनावश्यक आदतों की घुसपैठ है उन्हें हटाने के लिए क्या किया जाए? जो सद्गुण एवं सत्प्रवृत्तियाँ अपने में नहीं हैं उनका अभ्यास अभिवर्धन कैसे किया जाय? इन प्रश्नों पर कभी सोचने का प्रयत्न नहीं किया जाता। अपना व्यक्तिगत जीवन क्रम कितना अस्त-व्यस्त है और पारिवारिक ढाँचे को सुधारने बदलने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
चिन्तन-मनन करें तो हमारा मस्तिष्क हमारे लिए कल्प वृक्ष का काम कर सकता है। पर उसका अधिकाँश भाग तो अनर्गल चिन्तन में ही नष्ट हो जाता है। तृष्णा, वासना, लोभ-मोह, शौक-मौज, द्वेष-दुर्गुणों के द्वारा उत्पन्न की हुई इतनी ज्यादा शक्तियाँ सामने होती हैं कि उनका हल ढूंढ़ना ही मस्तिष्क के विचार के लिए कठिन पड़ता है। ऐसी दशा में बौद्धिक चेतना की ज्ञानवृद्धि एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन में कैसे लगाया जाय? इसी कुचक्र में पड़े हुए हम अपनी मानसिक क्षमताओं को नष्ट-भ्रष्ट करते रहते हैं और खाली हाथ इस संसार से उठ जाते हैं।
चिन्तन और लेखन-संकलन में ही लगे रहते। अपनी संस्कृति को जीवित करने की उनकी अदम्य भावना ने स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं देने दिया। आयु जैसे-जैसे ढलती गई, वैसे-वैसे उनका शरीर ही निर्बल नहीं होता गया, वरन् पीठ में कूबड़ भी निकल आया।
चिन्तन, आत्म सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की महती सम्भावना विद्यमान है। विवाह दिन मनाने की परिष्कृत प्रथा चल पड़े तो हमारा दाम्पत्य जीवन व परिवार नई हरियाली से सुशोभित हो सकता है गायत्री महामन्त्र के तत्वज्ञान को समझाकर विवेकशीलता की समस्त धाराएँ प्रवाहित की जा सकती हैं भावनात्मक नव-निर्माण का जैसा सुन्दर तत्वज्ञान इन चौबीस अक्षरों में भरा पड़ा है वैसा अन्यत्र कही नहीं मिलेगा। इन महामन्त्र को उपासना का माध्यम बनाकर विशृंखलित समाज का केन्द्रीयकरण किया जा सकता है आत्म-दल बढ़ाने की दिशा मिल सकती है और विचार क्रान्ति की महान आधुनिक आवश्यकता को प्राचीनतम आधार के सहारे भली-भाँति पूरा किया जा सकता है इसी प्रकार यज्ञीय कर्मकाण्ड से चिर-परिचित, चिर अभ्यस्त भारतीय जनता यज्ञीय जीवन, यज्ञीय परम्पराओं का प्रकाश ग्रहण कर सकती है और व्यक्ति वाद को समूहवाद में- स्वार्थ को परमार्थ में बदलने की व्यापक भूमिका बन सकती है।
चिन्तन में लग गई।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-March
चिन्तन के द्वारा उन्हें निकाल बाहर करना चाहिए। असद्प्रवृत्तियों के मिल जाने पर हमारा मस्तिष्क साफ-सुथरा होकर सद्विचारों का सृजन करने लगेगा। सद्विचार ही हमारी बहुमूल्य शक्ति है। इसी के आधार पर हम बनते और बिगड़ते हैं।
चिन्तन किया जाता है तो मन से विद्युत चुम्बकीय तरंगें फूट पड़ती हैं। ठीक विद्युत धारा के समान इसमें भी धन और ऋण (पॉजिटिव एण्ड निगेटिव) अयन होते हैं। इन तरंगों में इच्छा शक्ति के अनुरूप लम्बाई कुछ फीट से हजारों मील दूरी तक की हो सकती है, जितनी तीव्र इच्छा-शक्ति होगी, वह उतनी ही दूरवर्ती पदार्थ को भी प्रभावित कर रही होगी। इन प्रारम्भिक जानकारियों को लेकर आज पश्चिमी देशों में व्यापक खोज प्रारम्भ कर दी गई है, जब हमारे देशवासी ध्यान की एकाग्रता जैसी महत्वपूर्ण योग प्रणाली को भूलते जा रहे हैं।
चिन्तन करते हैं, समाज क्या उन्हें इसी स्थिति में रखेगा।” पर वे मनस्वी महात्मा थे। परिस्थितियों से विचलित होना यज्ञदीति के स्वभाव में नहीं था। उन्होंने धर्मपत्नी के कान में कुछ कहा- “पत्नी भीतर गई और एक कटोरे में कुछ ले आई, बच्चे ने प्रसन्नतापूर्वक दूध पी लिया और खेलने गया। उस बेचारे को क्या पता था कि श्वेत रंग दिया हुआ तरल पदार्थ दूध नहीं चावल के आटे का घोल है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-January
चिन्तन न तो वर्तमान में कोई सहायता करता है और न भविष्य का निर्माण। बल्कि वह उस व्यामोह को और भी सघन तथा दृढ़ बना देता है, जिसके अधीन मनुष्य विगत वैभव का सोच किया करते हैं। उत्थान अथवा अवनति के माया जाल से बचने के लिए आवश्यक है कि उनके प्रति व्यामोह के अंधकार से बचे रहा जाय। इस सत्य में तर्क की जरा भी गुँजाइश नहीं है कि संसार परिवर्तन के चक्र से बँधा हुआ घूम रहा है। यहाँ पर कोई भी सदैव एक जैसी स्थिति के प्रति आश्वस्त रहने का अधिकार नहीं रखता।
चिन्तन को बढ़ा पायें तो देखें कि सूर्य−चन्द्रमा, बुध−बृहस्पति और सारा ब्रह्मांड ही हलचल में है। हलचल गति या वेग की उन्मुक्त अवस्था जिसे हम मस्तिष्क में एक क्षण रुककर अनुभव करते हैं, सदैव−सदैव के लिये प्राप्त कर लें तो परमगति को प्राप्त करना भी हमारे लिये सम्भव हो सकता है। वही मुक्ति, मोक्ष या परम−पद है और मुक्ति किसी स्थान विशेष में नहीं है।
चिन्तन न करने के कारण ही हमारी बुद्धि जड़तावादी हो गई है। पृथ्वी हमें इसीलिये जड़ दिखाई देती है, क्योंकि हमने अपनी भावनात्मक चेतना के द्वारा उसे देखने का प्रयत्न नहीं किया। अब आप यह मानिये कि आप एक छोटे बच्चे हैं। आपके एक हाथ में एक हथौड़ा है, दूसरे में पृथ्वी छोटे से मिट्टी के गेंद के समान। हथौड़े से पृथ्वी को पीस डालिये।
चिन्तन किया करता है, उसका भविष्य उज्ज्वल और भाग्य अनुकूलतापूर्वक निर्मित होता है।
चिन्तन करने से मनुष्य का सफल स्वरूप ही सामने आता है और वह आगे उन्नति करने के लिए प्रेरणा पाता है। विचारों का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर बड़ा गहरा पड़ता है। जो व्यक्ति अपनी अवनति और अनिश्चित भविष्य के विषय में ही सोचता रहता है, उसका जीवन चक्र प्रायः उसी प्रकार से घूमने लगता है। इसके विपरीत जो अपनी उन्नति और विकास का चिन्तन किया करता है, उसका भविष्य उज्ज्वल और भाग्य अनुकूलतापूर्वक निर्मित होता है।
चिन्तन के कारण भविष्य भी प्रभावित होता है। अनासक्त भाव से, परिवर्तन में विश्वास रखते हुए उत्साहपूर्वक अपना कर्तव्य करते हुए जो स्थिति प्राप्त हो, उसे मित्र की भाँति स्वीकार करने से जीवन में अशाँति और असुख की सम्भावना नहीं रहती।
चिन्तन करना अपने जीवन में निराशा और दुःख को पाल लेना है।
चिन्तन जीवन के उत्थान और विश्वास के लिए अच्छा नहीं होता।
चिन्तन में इतना डूब जाता है कि उसे अपने शरीर की आवश्यकताओं का भी ध्यान नहीं रहता। वह यह देखकर ही कहते थे कि कुछ अनुभव है, उनसे यह व्यक्त होता है कि मेरा ईश्वर यहाँ विद्यमान है। वह शक्ति जो ऐसी अनुभूतियाँ कराती है। चिन्तन में बाँध लेती है, वही आत्मा है, ईश्वर है, उसी को धार्मिक चिन्तन द्वारा प्रगाढ़ बनाते हैं।
चिन्तन क्रिया बड़ी महत्वपूर्ण होती है। चिन्तन को यदि उपासना की संज्ञा दे दी जाए, तब भी अनुचित न होगा। जो लोग उपासना करते हैं, उन्हें अनुभव होगा कि जब वे अपना ध्यान परमात्मा में लगाते हैं तो अपने अन्दर एक विशेष प्रकार का प्रकाश और पुलक पाते हैं। उन्हें ऐसा लगता है, मानो परमात्मा की करुणा उनकी ओर आकर्षित हो रही है। यह कल्याणकारी अनुभव उस उपासना, उस चिन्तन अथवा उन विचारों का ही फल होता है, जिनके अन्तर्गत कल्याण का विश्वास प्रवाहित होता रहता है।
चिन्तन ही करना है तो इस प्रकार करना चाहिए। हमने इस−इस प्रकार से अमुक−अमुक काम किए थे। जिससे इस−इस तरह की उन्नति हुई थी। उन्नति के इस मार्ग में इस−इस तरह के विघ्न आए थे। जिनको हमने इस नीति द्वारा दूर किया था।
चिन्तन ही करना चाहिए। निराशापूर्ण चिन्तन जीवन के उत्थान और विश्वास के लिए अच्छा नहीं होता।
चिन्तन में बाँध लेती है, वही आत्मा है, ईश्वर है, उसी को धार्मिक चिन्तन द्वारा प्रगाढ़ बनाते हैं।
चिन्तन द्वारा प्रगाढ़ बनाते हैं।
चिन्तन करके इस प्रकार सोचता रहता है तो उसके हृदय में एक हूक उठती रहती है—एक समय ऐसा था कि हमारा कारोबार जोरों से चलता था। लाखों रुपयों की आय थी। हजारों आदमी अधीनता में काम करते थे। बड़ी−सी कोठी और कई हवेलियाँ थीं। मोटर कार पर चलते थे।
चिन्तन को यदि उपासना की संज्ञा दे दी जाए, तब भी अनुचित न होगा। जो लोग उपासना करते हैं, उन्हें अनुभव होगा कि जब वे अपना ध्यान परमात्मा में लगाते हैं तो अपने अन्दर एक विशेष प्रकार का प्रकाश और पुलक पाते हैं। उन्हें ऐसा लगता है, मानो परमात्मा की करुणा उनकी ओर आकर्षित हो रही है। यह कल्याणकारी अनुभव उस उपासना, उस चिन्तन अथवा उन विचारों का ही फल होता है, जिनके अन्तर्गत कल्याण का विश्वास प्रवाहित होता रहता है।
चिन्तन पर इसीलिये जोर देते हैं कि हम अधिक से अधिक मस्तिष्क में रहें, ताकि यथार्थ हमारी समझ में उतरता रहे।
चिन्तन से ही प्रतीत होते हैं। इसलिये उसे एक स्वतंत्र रूप में अध्ययन का विषय बनाया जाना चाहिये था, जैसा कि भारतवर्ष में किया गया। यहाँ पदार्थ के गुणों के रूप में भी भौतिक विज्ञान का पर्याप्त विकास किया गया और चेतना के अस्तित्व की जानकारी के लिये भी योग विज्ञान का प्रादुर्भाव किया गया, जिससे स्थूल रूप से धर्म और ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति की जा सके। आर. ए. मिलिकान ने पता लगाकर बताया कि इलेक्ट्रान में भी चार्ज होता है, इसी से सिद्ध हो जाता है कि सम्पूर्ण प्रकृति में एक मस्तिष्क (इन्टेलीजेन्स) काम करता है और वही आत्मा और भगवान का स्वरूप हो सकता है। यह एक प्रकार से आत्मा या परमात्मा की स्थूल व्याख्या ही है।
चिन्तन−मनन और अनुभव का विषय है। आशा, उत्साह, साहस और धैर्य की परीक्षा का प्रसंग है। प्रयत्न की असफलता स्वयं एक परीक्षा है। मनुष्य को उसे स्वीकार करना और उत्तीर्ण करना ही चाहिए।
चिन्तन अथवा उन विचारों का ही फल होता है, जिनके अन्तर्गत कल्याण का विश्वास प्रवाहित होता रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-April
चिन्तन कर रहे थे। बसन्त के दिन वैसे ही रमणीक होते हैं, उस पर मन्दराचल की सौंदर्यमयी छटा तो वातावरण को और भी चारु बना रही थी। सघन तरुवरों पर फैली स्वर्णलताओं की हरीतिम प्रभा, कोयल की कूक मयूरों का नृत्य, सरोवर में कारण्डव, जल कुक्कुट और कलहंसों का कूजन, कमल-पुष्प का हास और सुवास बिखेरता सौरभ वैसे ही साधकों के चित में माधुर्य जगा रहे थे। फिर आज तो एक और मधुर झंकार प्रातःकाल से ही आश्रम में गूँज रही थी, पायलों की झंकार। नृत्य और कोयल-कण्ठ को लुभाने वाला मधुरिम गीत।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-November
चिन्तन के बाद आत्मतत्व की स्पष्ट अनुभूति नहीं कर ली, इस विषय में दुविधा पूर्ण स्थिति में रहता आया है। आत्मा का कोई अस्तित्व है भी अथवा नहीं। यह एक ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसे सुलझा न पाने वाले जीवन भर उलटी और अंधकार पूर्ण दिशाओं में भटकते रहते हैं पर जो इस स्थिति के बारे में निश्चिन्त होकर आत्मानुभूति कर लेते हैं, वे अपना जीवन धन्य मानते हैं।
चिन्तन किया जाये तो पता चलेगा कि मनुष्य ने यह एक ऐसी जटिल किन्तु सर्व समर्थ मशीन बनाई है कि उसका मूल्य रुपयों में कभी मापा ही नहीं जा सकता। टूटे-फूटे छप्पर और कटी-फटी दीवारों वाले घर के मकान साज, सज्जा और कलाकारिता ही नहीं सीमेंट पत्थर चूने और उसमें पायी जाने वाली सुख सुविधाओं की सामग्री से परिपूर्ण होते हैं। मनुष्य शरीर जैसे यंत्र पर अन्य दृष्टि से विचार करते हैं, तो पता चलता है कि सम्पन्न व्यक्ति के भव्य भवन के समान मनुष्य को भी यह, परमात्मा की असाधारण देन और वरदान है, यदि उसका सच्चा उपयोग किया जा सके तो मनुष्य इसी शरीर से देवता और भगवान हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-September
चिन्तन की दिशाओं, कार्य पद्धतियों एवं आचार संहिताओं का निर्धारण होगा। अब सारी दुनिया वैज्ञानिक विकास के कारण दिन-दिन अधिक छोटी होती जाती है। सुदूरवर्ती प्रदेश गली-मुहल्ले की तरह एक दूसरे के समीप होते चले जा रहे हैं। एक स्थान की घटनाओं का प्रभाव व्यापक क्षेत्र पर पड़ता है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का आदर्श अब जाने या अनजाने में, चाहने या न चाहने पर भी एक प्रत्यक्ष तथ्य बनता चला जा रहा है। एक विश्व, एक राष्ट्र, एक धर्म, एक जाति, एक संस्कृति, एक आचार और एक विचार की आवश्यकता लोग तेजी से अनुभव कर रहे हैं और पूरी सम्भावना इस बात की है कि इसी आधार पर नये संसार का, नये समाज का और नये व्यक्ति का बनने बदलने के अतिरिक्त जीवन रहने का और कोई उपाय ही शेष न रह जाये।
चिन्तन में लग सके तथा मनन-चिन्तन में कोई अवरोध उपस्थित न हो।
चिन्तन करें, तो भी वह मेरे-तेरे के भाव से छूट नहीं पाता। पर जब वह साँसारिक जीवन में इतना घुल जाता है कि उसे अनन्त जीवन का भान ही नहीं होता, तब वह चौथी जागृत स्वप्न अवस्था में होता है-
चिन्तन में लग जाऊंगा।
चिन्तन और मनोयोग उस दिशा में बढ़ेगा ही तथा जन संपर्क के द्वारा लोक मानस को प्रभावित करने की उपयोगिता समझ ली गई तो उसके लिए जो सच्चे मन से प्रयत्न होंगे, उनका सत्परिणाम सामने आयेगा ही। इतने बड़े विशाल परिवार के इस मनोवृत्ति के लोगों की संख्या नगण्य नहीं होनी चाहिए, वरन् नगण्य वह वर्ष रहे जिसे लोक मंगल और आत्मिक कर्तव्यों का बोध नहीं हो पाया। थोड़ा कूड़ा कबाड़ा तो अनाज की छाँट फटक में भी निकल जाता है, इतने बड़े परिवार में थोड़े लोग अन्यमनस्क रहें, तो उनकी उपेक्षा की जा सकती है। पर अधिकाँश को इस कसौटी पर खरा ही उतरना चाहिए कि मिशन की विचारधारा इतने लम्बे समय से पढ़ते रहने पर थोड़ा बहुत रंग चढ़ा या नहीं- अथवा इस कान से सुन उस कान निकाल देने वाली उपहासास्पद विडम्बना ही अब तक चलती रही।
चिन्तन करते हुए श्री फैरेल चलचित्र की छाया की तरह नीचे उतरने लगे और थोड़ी देर में ही वहाँ पर जा पहुँचे जहाँ साधु बैठे थे। वहाँ एक व्यक्ति के आराम करने भर की जगह और धूनी में जल रही आग के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था वहाँ।
चिन्तन में कोई अवरोध उपस्थित न हो।
चिन्तन में निमग्न हो गये हैं-ऐसा समझकर कुछ आगे की बात न करके शिष्य सौभरि भी चुप हो गये और वहाँ से उठकर आचार्य देव के लिये सन्ध्यादि के प्रबन्ध में जुट गये।
चिन्तन से वीर्य। बड़ी मात्रा में पेशाब के साथ रक्त का जो क्षार और तेजाब बाहर निकल आता है। उसे पूरा करने के लिये शरीर में हड्डियों के अतिरिक्त और कोई दूसरा स्रोत मिलता नहीं। फलस्वरूप रक्त अपना संतुलन बनाये रखने के लिये क्षार और तेजाब हड्डियों से चूसने लगता है। इस प्रकार माँसाहारी व्यक्ति की हड्डियाँ कमजोर होती चली जाती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-February
चिन्तन की दिशा बदलना ही युग परिवर्तन है। परिवर्तन का केन्द्र-बिन्दु चिन्तन ही है। चिन्तन की बदली हुई दिशायें ही व्यक्ति को विविध विधि भली-बुरी गतिविधियाँ अपनाने के लिए प्रेरित एवं प्रस्तुत करती हैं। निकृष्ट चिन्तन व्यक्ति को दुष्ट, दुराचारी, पतित, पिशाच, उच्छृंखल एवं अवाँछनीय स्तर का बना सकता है और यदि चिन्तन की धारा उत्कृष्टता की ओर मुड़ जाय तो वही व्यक्ति सन्त, सज्जन, महान, विचारवान, विद्वान एवं परमार्थ परायण बनकर देवत्व की भूमि का सम्पादन कर सकता है।
चिन्तन आदि के द्वारा मस्तिष्क में यह संकल्प सुदृढ़ कर लेता है कि साँसारिक आवश्यकतायें यथा इन्द्रियसुख, पद-यश, वित्त, पुत्र यह सब चेतना के ऊपर चढ़ी झिल्ली की खुजलाहट, क्रियाशीलता अथवा माँग उसकी निज की नहीं, तब उसका दृष्टिकोण ही बदल जाता है। आसक्ति नष्ट होकर वह शुद्ध चैतन्य की प्राप्ति का प्रयत्न करने लगता है। तब वह बार-बार अनेक तरह के शरीर धारण करने की चिंता से भी मुक्त हो जाता है।
चिन्तन कर सका होता, तब उसे सृष्टि के छोटे से छोटे जीव और जर्रे-जर्रे में अपनी ही प्रतिच्छाया दिखाई देती, तब न किसी के साथ द्वेष होता न दुर्भाव। शक्ति, क्रियाशीलता, संतोष और आनन्द की विभूतियों से आच्छादित हो गया होता।
चिन्तन की—अध्यात्म की धारा सत्पथ गामिनी बनकर विश्व-मंगल की संभावनाएँ मूर्तिमान कर सके।
चिन्तन और संकल्प प्रणाली को जीत लिया है। चेतना की पीठ पर खड़े होकर जब हमने अपने शरीर के भीतर देखा तो यही विराट जगत अपने में दिखाई दे गया। इस निखिल ब्रह्मांड में बिखरे पड़े हैं ‘प्राण मेरे’ का गीत फूट पड़ा था। इस विराट की अनुभूति कर सकना मनुष्य के लिए संभव हो तो वह इसी शरीर से आत्म-कल्याण की भूमिका सम्पादित कर सकता है। दूसरे शरीरों में तो उसे कर्मफल भोगने पड़ते हैं और यदि वह मनुष्य शरीर की उपयोगिता नहीं अनुभव करता, अमानवीय कृत्य करता है तो उन्हें भोगता भी रहता है।
चिन्तन न बदला तो विज्ञान तथा धन द्वारा उपलब्ध हो सकने वाली विपुल सुविधाएं भी हमें सुख-शाँति से वंचित ही करती रहेंगी। अंतरंग में जलने वाली दुर्बुद्धि की आग शाँति और सुव्यवस्था को भस्म करके ही छोड़ेगी।
चिन्तन व्यक्ति को दुष्ट, दुराचारी, पतित, पिशाच, उच्छृंखल एवं अवाँछनीय स्तर का बना सकता है और यदि चिन्तन की धारा उत्कृष्टता की ओर मुड़ जाय तो वही व्यक्ति सन्त, सज्जन, महान, विचारवान, विद्वान एवं परमार्थ परायण बनकर देवत्व की भूमि का सम्पादन कर सकता है।
चिन्तन मनुष्य को लोभी, स्वार्थी, कृपण, शोषक तथा संग्रही बनाता है, यदि वह अशुद्ध, शुद्ध हो जाय तो वही व्यक्ति अपनी संपदा एवं विभूति को लोक-मंगल के लिये उत्सर्ग करके अपना जीवन धन्य बनाने तथा दूसरों को आदर्शवादी प्रेरणायें देने में समर्थ हो सकता है। व्यक्ति तथा समाज का हित अनहित वर्तमान और भविष्य उनकी आस्थाओं तथा चिन्तन की धाराओं पर निर्भर है। हमें इसी मर्म स्थल का स्पर्श करना चाहिए और उन उपायों को खोज निकालना चाहिए कि समग्र चिन्तन की—अध्यात्म की धारा सत्पथ गामिनी बनकर विश्व-मंगल की संभावनाएँ मूर्तिमान कर सके।
चिन्तन के लिए वह प्रतिदिन कुछ समय निकालता। एक दिन शाम आठ बजे उसे एकाएक ऐसा लगा कि ‘विला कैथर्स’ की पुस्तक ‘डेथ कम्स फॉर दि आर्कविशप’ पुस्तक पढ़नी चाहिए। इसके प्रसंग पाठक की अन्तर्वेदना का स्पर्श करते हैं। यह उपन्यास बैंकर पहले भी पढ़ चुका था। फिर अकारण वही पुस्तक दुबारा पढ़ने का मन क्यों हुआ-यह उसकी समझ में नहीं आया।
चिन्तन अध्यात्म वर्तमान निकृष्ट स्तर से ऊँचे उठे तथा उत्कृष्टता की आस्थाओं से अनुप्रमाणित रह सके। इसी एक प्रक्रिया पर मानव-जाति का भविष्य निर्भर है। सुख-सुविधाएँ बढ़ाने के लिए बहुत कुछ किया जाता रहा है, किन्तु चिन्तन न बदला तो विज्ञान तथा धन द्वारा उपलब्ध हो सकने वाली विपुल सुविधाएं भी हमें सुख-शाँति से वंचित ही करती रहेंगी। अंतरंग में जलने वाली दुर्बुद्धि की आग शाँति और सुव्यवस्था को भस्म करके ही छोड़ेगी।
चिन्तन ही है। चिन्तन की बदली हुई दिशायें ही व्यक्ति को विविध विधि भली-बुरी गतिविधियाँ अपनाने के लिए प्रेरित एवं प्रस्तुत करती हैं। निकृष्ट चिन्तन व्यक्ति को दुष्ट, दुराचारी, पतित, पिशाच, उच्छृंखल एवं अवाँछनीय स्तर का बना सकता है और यदि चिन्तन की धारा उत्कृष्टता की ओर मुड़ जाय तो वही व्यक्ति सन्त, सज्जन, महान, विचारवान, विद्वान एवं परमार्थ परायण बनकर देवत्व की भूमि का सम्पादन कर सकता है।
चिन्तन की धारा उत्कृष्टता की ओर मुड़ जाय तो वही व्यक्ति सन्त, सज्जन, महान, विचारवान, विद्वान एवं परमार्थ परायण बनकर देवत्व की भूमि का सम्पादन कर सकता है।
चिन्तन कर सका होता तो यह शक्ति को एक अत्यन्त शुद्ध और विशाल अवस्था में होता। अज्ञानता का दम्भ और अहंकार तो स्वयं उसी के लिए कष्टदायक सिद्ध होता है। अहंकार के वशवर्ती मनुष्य अपने घर, पास-पड़ोस वालों से भी मैत्री बनाये रख पाता। यदि वह अपनी इस सूक्ष्मता का चिन्तन कर सका होता, तब उसे सृष्टि के छोटे से छोटे जीव और जर्रे-जर्रे में अपनी ही प्रतिच्छाया दिखाई देती, तब न किसी के साथ द्वेष होता न दुर्भाव। शक्ति, क्रियाशीलता, संतोष और आनन्द की विभूतियों से आच्छादित हो गया होता।
चिन्तन का उद्देश्य वैज्ञानिक मन को विकसित करना ही रहा है। उसके द्वारा अनेक अज्ञात बातें साधक को सिनेमा के पर्दे की भाँति मालूम हो जाती हैं। पर उस विज्ञान को आज लोग भूलते जा रहे हैं। जब से हमारे भीतर भरा आकाश तत्व शुद्ध होता है और ऐसी अनेक अनुभूतियों का द्वार खुलता है, जिसका संकेत डॉ. मैस्मर ने किया और इस घटना द्वारा पुष्टि डॉ. राइन ने की।
चिन्तन की बदली हुई दिशायें ही व्यक्ति को विविध विधि भली-बुरी गतिविधियाँ अपनाने के लिए प्रेरित एवं प्रस्तुत करती हैं। निकृष्ट चिन्तन व्यक्ति को दुष्ट, दुराचारी, पतित, पिशाच, उच्छृंखल एवं अवाँछनीय स्तर का बना सकता है और यदि चिन्तन की धारा उत्कृष्टता की ओर मुड़ जाय तो वही व्यक्ति सन्त, सज्जन, महान, विचारवान, विद्वान एवं परमार्थ परायण बनकर देवत्व की भूमि का सम्पादन कर सकता है।
चिन्तन की दिशा एकाँगी हो। वही तथ्य जब हमारे सिद्धान्त पुष्ट करते हों, तब भी हम अपने दर्शन अपनी धार्मिक मान्यताओं से बिलकुल आँखें मूँदे रहें, इससे बढ़कर दुर्भाग्य हमारे लिये और क्या हो सकता है।
चिन्तन की धाराओं पर निर्भर है। हमें इसी मर्म स्थल का स्पर्श करना चाहिए और उन उपायों को खोज निकालना चाहिए कि समग्र चिन्तन की—अध्यात्म की धारा सत्पथ गामिनी बनकर विश्व-मंगल की संभावनाएँ मूर्तिमान कर सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-May
चिन्तन प्रणाली को विचार मन्थन की अग्नि में जलाकर उसमें सद्विचारों और सत्कर्मों की निरन्तर आहुतियाँ जिससे विचार और कर्म में सत्प्रवृत्तियों का समावेश हो जाये। कल्कि पुराण के अनुसार भगवान कल्कि की कार्यप्रणाली ऐसी ही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-July
चिन्तन करने की आवश्यकता अनुभव करते। झगड़ा इसलिये पैदा हुआ कि धर्म विज्ञान के तर्क (लॉजिक) को सन्तुष्ट नहीं कर सका।
चिन्तन अथवा साधना में लगे रहे तो आवश्यकताओं की पीड़ा से उसका चित्त अस्थिर रहेगा और शरीर जवाब देगा जिसका फल अनानुभूति के सिवाय और कुछ भी नहीं हो सकता। इस प्रकार की आध्यात्मिक साधना उसके लिये मृत्यु की तरह कष्टदायक बन जायेगी। इसी प्रकार यदि आध्यात्मिक साधना से विरत होकर केवल भौतिक भोगों की ही उपासना की जाती रहे तो भी मानवीय लक्ष्य दूर से दूरतर होता चला जायेगा। दोनों का समुचित समन्वय ही उद्देश्य-पूर्ति का कारण बन सकता है, जिसका अनुपात कम-से-कम पच्चीस और पचहत्तर का ही होना चाहिए। इससे कम अनुपात में लक्ष्य-प्राप्ति के लिए अनेक जन्म-जन्मान्तरों तक प्रयत्न एवं प्रतीक्षा करनी होगी।
चिन्तन, क्रिया-कलाप छोड़कर मस्तिष्क बन जायें या मस्तिष्क में केन्द्रीभूत हो जायें अर्थात् समय मस्तिष्क की रचना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जब हम अपने आपको समय के ऊपर उठकर देखते हैं तो हमें अपनी मस्तिष्कीय चेतना के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं देता, तब हमारा सही रूप से एक भिन्न व्यक्तित्व होता है। तब हम लगातार विचार, ज्ञान, अनुभूति या प्रकाश की किरण के समान हो जाते हैं और स्थूल शरीर के प्रति अपना मोह-भाव समाप्त हो जाता है। माँडूक्य कारिका [2। 14] में इसी बात को शास्त्रकार ने यह शब्द दिये हैं-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-October
चिन्तन के माध्यम से प्रजा के मनोबल, चरित्र स्तर, स्वाभिमान एवं शौर्य को जमाया बढ़ाया जाय। स्वतंत्रता संग्राम वे धीरे-धीरे चला रहे थे। क्राँतिकारियों से उनके मतभेद का मूल कारण यह था कि वे चाहते थे स्वराज्य धीरे-धीरे उस क्रम से आये जिस क्रम से देश उसे संभालने योग्य प्रतिभा अपने में पैदा कर ले। स्वतंत्रता संग्राम के साथ चर्खा, खादी, हरिजन सेवा, ग्रामोद्योग, राष्ट्रीय शिक्षा, सफाई जैसी प्रवृत्तियों को जोड़ देना यों बहुत अटपटा लगता है। असहयोग आन्दोलन और सत्याग्रह की दार्शनिकता कितनी ही ऊंची क्यों न हो पर उसका व्यावहारिक पक्ष यह था कि इन सरलतम उपायों द्वारा जनता अपनी मूल चेतना विकसित करे और स्वराज्य धारण कर सकने में समर्थ हो जाय।
चिन्तन लक्ष्य की ओर चलते रहना ही धर्म बन गया है जिसके ऊपर राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता निर्भर है। राष्ट्र की बात ही क्यों सोचें, विश्व कल्याण का मार्ग भी यही है। जन-जागरण और लोक मानस में उत्कृष्टता, आदर्शवादिता का बीजाँकुर बोया जाना वस्तुतः इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण का अभिनव प्रयोग है। हम इसी दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया को हाथ में लेकर धर्म साहस, निश्चय और प्रबल पुरुषार्थ के साथ आगे बढ़ रहे हैं और जहाँ तक हमारा प्रभाव क्षेत्र है उसे उसी दिशा में घसीटते लिये चल रहे हैं।
चिन्तन की दिशा अलग है, हम अधिक बारीकी से सोचते हैं। शासन की असफलता से हम दुःखी हैं। हमें बहुत खेद है कि विगत 22 वर्षों में जितना बढ़ा जा सकता था उतना नहीं बढ़ा गया। प्रगति कुछ भी न हुई हो सो बात नहीं पर दूसरे देशों की तुलना में हमारी चाल इतनी धीमी है कि कम से हजार वर्ष में भी प्रगतिशील देशों की पंक्ति में भौतिक दृष्टि से भी बड़े न हो सकेंगे। गाँधी जी के धर्म राज्य, रामराज्य और विश्व मंगल की आध्यात्मिक प्रगति तो अभी लाखों मील आगे की बात है।
चिन्तन और मनन के बाद हम एक निष्कर्ष पर पहुँचे हैं और बिना लाग−लपेट छिपाव व दुराव के अपनी स्वतंत्र नीति निर्धारण करने में समर्थ हुए हैं। हम सीधे राजनीति में प्रवेश नहीं करेंगे वरन् राजनीति को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करेंगे और यही अन्त तक करते रहेंगे। अपना संगठन यदि अपने प्रभाव और प्रकाश को सर्वथा तिरस्कृत नहीं कर देता तो उसे इसी मार्ग पर चलते रहना होगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-April
चिन्तन और व्यवहार की गति अपने आगोश में सबको समेटती जाती है। विगत इतिहास के उन कालों में जिन्हें स्वर्णिम युग कहा गया है, इन्हीं अतिचेतन की प्रक्रियाओं द्वारा जीवन का संचालन रहा है जबकि नरसंहार के काल में अवचेतन का पशु प्रतिनिधि प्रभावी रहा है। मनोविज्ञान की नवविद्या “हिस्टाँरिका साइकोलॉजी” में समूचे इतिहास की घटनाओं का अध्ययन करने के बाद प्रतिपादित किया गया है कि ये घटनाएँ कुछ व्यक्तियों के प्रभावी अवचेतन का ही परिणाम थी।
चिन्तन को विधेयात्मक दशा मिलती और उक्त हारमोन्स के स्रवण पर काबू पाया जा सकता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए मानसिक स्तर की स्वस्थता अति आवश्यक है। मनःसंस्थान को निरोग रखने के लिए उनने संवेग, अहं और तर्क जैसे तीन घटकों को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना है। इच्छा-शक्ति के द्वारा इन पर नियंत्रण करके प्रतिरक्षा चेतना तंत्र को आवश्यकतानुसार सक्रिय और शिथिल बना सकना सरल भी है और संभव भी। अत्याधुनिक विज्ञान की भाषा में इस स्वायत्त प्रतिरक्षा चेतन तंत्र को दिव्य बोध अर्थात् छठी इन्द्रिय के नाम से भी संबोधित किया जाने लगा है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को देवोपम बनाने में विद्या का प्रभाव और दबाव ही काम आता है। यदि इस लाभ से लाभान्वित हुआ जा सके तो व्यक्तित्व का वह स्वरूप निखर कर सामने आता है जिसके प्रभाव से अन्तरंग और बहिरंग क्षेत्रों में आनन्द एवं उल्लास बखेरने वाले प्रकाश को प्रज्वलित हुआ देखा जा सके।
चिन्तन में विवेकशीलता और संयमशीलता का अभ्युदय हो उठता है। ऐसी स्थिति में मस्तिष्क रसायन न केवल प्रतिरक्षा तंत्र का ही नियंत्रण करते हैं वरन् उस तंत्र को अनुप्राणित कर सकने की क्षमता भी रखते हैं। इन रासायनिक संदेशों का मूलभूत प्रयोजन समूची काया को जीवाणु, विषाणु और संक्रामकता के बारे में सूचित करने का है। इन प्रतिरक्षा कोशिकाओं का सीधा स्थापित हो जाता है। रोगी का मानसिक संतुलन बढ़ता-उत्साह-उमंग को प्रादुर्भाव होता और आरोग्य लाभ मिलने लगता है।
चिन्तन-क्षेत्र में उभारने और संयमशील अपनाने के लाभों पर गंभीरतापूर्वक देर तक विचार करते रहा जाय। इस प्रकार अनौचित्य की आदतों एवं मान्यताओं से छुटकारा पाने की पृष्ठभूमि बनती है। संयम को तप कहा गया है। सर्वप्रथम यह तपश्चर्या जिह्वा संयम से आरंभ होनी चाहिए। भक्षण और वचन दोनों में ही सात्विकता के अधिकाधिक समावेश की योजना बनानी और चेष्टा करनी चाहिए।
चिन्तन और कुदृष्टि की भयंकरता भी समझने ही योग्य है। मानसिक पाप भी आधे पाप होते हैं। अचिन्त्य चिन्तन से भी व्यक्ति अपराधी बनता है भले ही वह सरकारी कानूनों की पकड़ से बच जाता है। इसलिए माता-पुत्र की, बहिन-भाई की, पिता-पुत्री की, धर्मपत्नी और धर्मपति की भावना ही नर नारी एक दूसरे के प्रति विकसित करें। दृष्टि में भी इसी प्रकार की पवित्रता आती जाय तभी वास्तविक ब्रह्मचर्य सधता है अन्यथा “मुख में राम बगल में छुरी” रहने की तरह पाखंडी प्रवंचना ही बन पड़ती है।
चिन्तन करने, बेकार की बातों का चिन्तन करने की अपेक्षा, अपने चिन्तन करने की जो सामर्थ्य है। उस सारी की सारी सामर्थ्य को भगवान के निमित्त लगा दो। उनकी खेती में बोओ, यह तुम्हारी बुद्धि सौ गुनी होकर तुमको मिल जायेगी।
चिन्तन-मनन ही नहीं उपयुक्त मार्गदर्शन और प्रत्यक्ष उदाहरण भी सामने होने चाहिए। इन्हें जुटा सकने वाले ही उत्कर्ष अभ्युदय की दिशा में बढ़ पाते हैं। चिरस्थाई, व्यापक और सर्वतोमुखी प्रगति के लिए इस सुयोग की व्यवस्था होनी ही चाहिए। इस प्रयास-अभ्यास को जीवन साधना के नाम से जाना जाता है। इसी समग्र मार्ग को अपना सकने पर व्यक्तित्व निखरता और प्रगति का पथ प्रशस्त होता है।
चिन्तन नष्ट होता रहता है, उसकी सहज ही बचत हो सकती है और उस क्षमता को शान-शौकत की, बड़प्पन-प्रदर्शन की मूर्खता से बचा कर किसी उपयोगी काम में लगाया जा सकता है।
चिन्तन धाराएँ हैं। जब हम स्वर्ग की किन्हीं अन्य लोकों में कल्पना कर उसकी प्राप्ति हेतु शरीर को बेतुके क्रिया-काण्डों में लगाकर इस बहुमूल्य जीवन को बरबाद करते और रीते हाथ रह जाते हैं, तो हमारी मनःस्थिति विक्षिप्तों जैसी हो जाती है। यही नरक है। धर्म इसी नरक से बचने बचाने का नाम है और व्यक्ति जब इससे बच जाता है, तो वही उसकी मुक्ति बन जाती है, वही उसका स्वर्ग है, किन्तु लेखक के अनुसार स्वर्ग-मुक्ति जीवन का लक्ष्य नहीं है। उसका चरम लक्ष्य तो जीवन की पूर्ण अनुभूति है।
चिन्तन अर्थात् दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन के लिए उपाय-उपचारों का निर्धारण। योजना इस प्रकार बनती रहनी चाहिए कि दिनचर्या में दोषों की कटौती और सद्गुणों की बढ़ोत्तरी का क्रम व्यावहारिक रूप में कार्यान्वित होता रहे। नित्य राई-राई भर दोष घटाने और नित्य तिल-तिल भर सद्गुणों के बढ़ाने से भी एक समय ऐसा आ सकता है जिसमें शरीर सेवा की तरह आत्म साधना भी भली प्रकार बन सके और स्वाध्याय का वास्तविक प्रयोजन पूरा हो सके।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में शालीनता का समावेश होता है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को देवोपम बनाने में विद्या का प्रभाव और दबाव ही काम आता है। यदि इस लाभ से लाभान्वित हुआ जा सके तो व्यक्तित्व का वह स्वरूप निखर कर सामने आता है जिसके प्रभाव से अन्तरंग और बहिरंग क्षेत्रों में आनन्द एवं उल्लास बखेरने वाले प्रकाश को प्रज्वलित हुआ देखा जा सके।
चिन्तन करने की जो सामर्थ्य है। उस सारी की सारी सामर्थ्य को भगवान के निमित्त लगा दो। उनकी खेती में बोओ, यह तुम्हारी बुद्धि सौ गुनी होकर तुमको मिल जायेगी।
चिन्तन का क्षेत्र पहले की अपेक्षा कहीं बड़ा हो गया है। विश्व के अनेकानेक दर्शनों के आपस में गूंथने और आदान-प्रदान करने का अवसर मिला है। तर्क, तथ्य, प्रमाण और उदाहरण हर संदर्भ में माँगे जा रहे हैं। बढ़ते हुए भौतिकवाद की प्रतिक्रिया भी प्रत्यक्षवाद को सामने लाई है। ऐसी दशा में शास्त्र वचन श्रद्धालुओं के ही काम के रह गए हैं।
चिन्तन। चिन्तन अर्थात् दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन के लिए उपाय-उपचारों का निर्धारण। योजना इस प्रकार बनती रहनी चाहिए कि दिनचर्या में दोषों की कटौती और सद्गुणों की बढ़ोत्तरी का क्रम व्यावहारिक रूप में कार्यान्वित होता रहे। नित्य राई-राई भर दोष घटाने और नित्य तिल-तिल भर सद्गुणों के बढ़ाने से भी एक समय ऐसा आ सकता है जिसमें शरीर सेवा की तरह आत्म साधना भी भली प्रकार बन सके और स्वाध्याय का वास्तविक प्रयोजन पूरा हो सके।
चिन्तन नष्ट होने देने की हानि से बचा जाता रहे।
चिन्तन-मनन से भी बन पड़ता है। वैसे मोटे तौर से जीवन समस्याओं के आदर्शवादी समाधान का पक्षधर अध्ययन विचार-विनिमय भी इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। सद्ग्रन्थों का पठन और मुनि मनीषियों के सत्संग से भी वह प्रयोजन पूरा होता है। इन में से जो भी जिससे जिस प्रकार बन पड़े, उसके लिए समय निकालना चाहिए।
चिन्तन करने की अपेक्षा, अपने चिन्तन करने की जो सामर्थ्य है। उस सारी की सारी सामर्थ्य को भगवान के निमित्त लगा दो। उनकी खेती में बोओ, यह तुम्हारी बुद्धि सौ गुनी होकर तुमको मिल जायेगी।
चिन्तन से भी व्यक्ति अपराधी बनता है भले ही वह सरकारी कानूनों की पकड़ से बच जाता है। इसलिए माता-पुत्र की, बहिन-भाई की, पिता-पुत्री की, धर्मपत्नी और धर्मपति की भावना ही नर नारी एक दूसरे के प्रति विकसित करें। दृष्टि में भी इसी प्रकार की पवित्रता आती जाय तभी वास्तविक ब्रह्मचर्य सधता है अन्यथा “मुख में राम बगल में छुरी” रहने की तरह पाखंडी प्रवंचना ही बन पड़ती है। साप्ताहिक ब्रह्मचर्य में कायिक ही नहीं, मानसिक चिन्तन की पवित्रता का भी समावेश रहना चाहिए और उसे एक दिन की चिन्ह पूजा न मान कर भावी जीवन की एक सुरक्षित रीति-नीति बना लेने का प्रयास करना चाहिए। दाम्पत्य जीवन में भी यथा संभव इस व्रतशीलता का अधिकाधिक लम्बे समय का अनुबन्ध करना चाहिए।
चिन्तन ओछेपन और बचकानेपन का ही परिचायक होगा। लोग अपने कर्त्तव्यों में व्यस्त रहें और स्वयं हम अपनी शक्ति वैसे कार्यों में नियोजित करें, जो आडम्बर का प्रपंच कर लोगों को दिग्भ्रांत करने और साधन का अपव्यय करने में न लगती हो।
चिन्तन में भी अधिकाधिक सात्विकता के समावेश करने का विचार चलते रहना चाहिए।
चिन्तन की बहुलता से बिताना चाहिए।
चिन्तन की पवित्रता का भी समावेश रहना चाहिए और उसे एक दिन की चिन्ह पूजा न मान कर भावी जीवन की एक सुरक्षित रीति-नीति बना लेने का प्रयास करना चाहिए। दाम्पत्य जीवन में भी यथा संभव इस व्रतशीलता का अधिकाधिक लम्बे समय का अनुबन्ध करना चाहिए। इस वर्जना के परित्याग से दोनों ही पक्षों की असाधारण हानि है। यह तथ्य गहराई से समझ लेने पर दृष्टि की भावना और शरीर की संयमशीलता निभाती रहने में सरलता पड़ती है। साप्ताहिक ब्रह्मचर्य वाले दिन मानसिक चिन्तन में भी अधिकाधिक सात्विकता के समावेश करने का विचार चलते रहना चाहिए।
चिन्तन से पूरी हो सकती है। सुविधानुसार एकान्त में बैठकर एकाग्र चित्त से आत्मस्थिति की समीक्षा की जा सकती है। आदर्शवाद की निर्धारणाओं में अपना जीवन क्रम कितना पीछे है, इन त्रुटियों को निष्पक्ष भाव से पैनी दृष्टि से स्वयं खोज निकालना मनन है। इस आत्म समीक्षा के लिए हर कोई दिन भर में कोई न कोई समय निकाल ही सकता है। उस कमियों को खोज ही समता है जो उसे उत्कृष्टता की दृष्टि से पिछड़ा हुआ बनाए हुए हैं।
चिन्तन करने, वासनाओं का चिन्तन करने, बेकार की बातों का चिन्तन करने की अपेक्षा, अपने चिन्तन करने की जो सामर्थ्य है। उस सारी की सारी सामर्थ्य को भगवान के निमित्त लगा दो। उनकी खेती में बोओ, यह तुम्हारी बुद्धि सौ गुनी होकर तुमको मिल जायेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-November
चिन्तन जो अनेक विग्रह और संकट खड़े करता है।
चिन्तन के स्वातंत्र्य का राजमार्ग उद्घाटित करते हैं। पर पथ गमन स्वयं ही करना होगा। इसके बिना उद्घाटन का भी महत्व कम हो जाता है। इसी भाव की अभिव्यक्ति करता हुआ उपनिषद् का ऋषि ‘श्रोतव्यः मन्तव्यः निदिध्यासितव्यः’ का सूत्र प्रतिपादित करता है। मात्र श्रवण करके उसे व्यवहार में उतारने लगना अविवेकपूर्ण है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-May
चिन्तन में-सबमें घुला हुआ है। हमारे तीन शरीर हैं, आपके भी तीन शरीर हैं। एक है हमारा कारण शरीर जिसको अन्तरात्मा या अन्तःकरण कहते हैं। उससे हमने उपासना की है, मस्तिष्क से साधना और शरीर से आराधना की है।
चिन्तन करते हैं, समाज क्या उन्हें इसी स्थिति में रखेगा।” पर वे मनस्वी महात्मा थे। परिस्थितियों से विचलित होना उनके स्वभाव में नहीं था। उन्होंने धर्म-पत्नी के कान में कुछ कहा-”पत्नी भीतर गई और एक कटोरे में कुछ ले आयीं। बच्चे ने प्रसन्नतापूर्वक दूध पी लिया।
चिन्तन के रूप में इतना सुदृढ़ हो जाता है कि अब तक जो चिन्तन मात्र था, वह व्याधि के रूप में प्रकट और प्रत्यक्ष होने लगता है। आरोग्यशास्त्र का उक्त सिद्धान्त प्रकारान्तर से उसी अध्यात्म मान्यता को परिपुष्टि करता है कि विचार और विश्वास को यदि सबल और सशक्त बना लिया जाय, तो जो कुछ सोचा गया था, उसके मूर्तिमान होने में विलम्ब नहीं लगता। गीता में इसी का समर्थन “‘श्रद्धामयोयम पुरुषः यच्छृद्धः स एवं सः” कह कर किया गया है।
चिन्तन साधना में और अन्तःकरण उपासना में लगा दिया है। यह है चमत्कारों के स्रोत। आप इसको सुनना, नोट करके रखना और जहाँ तक संभव हो सके वहाँ तक चलना। भागना नहीं आता दौड़ना नहीं आता तो छोटे बच्चे की तरीके से दीवाल पकड़ कर गाड़ी के सहारे चलना सीखिये-एक कदम आगे बढ़िये। लोभ, मोह की हथकड़ी और बेड़ी को-जिसने आपको मजबूती से जकड़ रखा है-छोड़िये-थोड़ा ढीला करिये फिर देखिये आपको आगे बढ़ने का मौका मिलता है कि नहीं श्रेष्ठता की दिशा में, शालीनता की दृष्टि में, महानता की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाइये।
चिन्तन मात्र था, वह व्याधि के रूप में प्रकट और प्रत्यक्ष होने लगता है। आरोग्यशास्त्र का उक्त सिद्धान्त प्रकारान्तर से उसी अध्यात्म मान्यता को परिपुष्टि करता है कि विचार और विश्वास को यदि सबल और सशक्त बना लिया जाय, तो जो कुछ सोचा गया था, उसके मूर्तिमान होने में विलम्ब नहीं लगता। गीता में इसी का समर्थन “‘श्रद्धामयोयम पुरुषः यच्छृद्धः स एवं सः” कह कर किया गया है।
चिन्तन मनन यह साधना की प्रारंभिक आवश्यकताएँ हैं, शिखिध्वज! आज तुम्हारी मंत्र दीक्षा संपन्न हुई। पूजन की सामग्री उपयुक्त पात्र, कुश आसन यह अपने पास रखने होंगे। पंचोपचार पूजन सहित मंत्र जप करते हुए शुभ ज्योति स्वरूप निराकार गायत्री का ध्यान करना। जब तुम इस प्रारंभिक साधना को सफलतापूर्वक पूरा कर लोगे, तो आगे उच्चस्तरीय साधना के लिए तुम्हें अग्नि दीक्षा भी देंगे।’ यह कहते हुए महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-July
चिन्तन का आधार होती थी। हर बात के साथ “ऐसा क्यों हुआ” का प्रश्न जुड़ा रहता था। अपने आपके संबंध में, जीवन, मृत्यु ईश्वर और इस विराट जगत के रहस्य जानने के लिये उनके हृदय में तीव्र अकुलाहट रहती थी।
चिन्तन दृष्टिकोण, व्यक्तित्व का स्तर गिर जाने से हुआ है। इस क्षेत्र की सफाई और रंगाई करने के लिए लोक मानस का परिष्कार निताँत आवश्यक है। जन मानस में घुसी हुई अवाँछनीयताओं का उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन आवश्यक है। इसके लिए जितने भी उपाय-उपचार हो सकते हैं, उन्हें संगठित रूप में करने का प्रयत्न होना चाहिए।
चिन्तन में, परमार्थ साधनाओं में संलग्न रहते थे तो भी उनको अष्ट सिद्धि नवनिधि सरीखी लोकोत्तर शक्तियाँ उपलब्ध रहती थी। भारत प्राचीन काल में बुद्धिमान बनने के लिये ज्ञान की और बलवान बनने के लिये ज्ञान की और बलवान बनने के लिये विज्ञान की उपासना करने में सदैव संलग्न रहता था। योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है, यह निर्विवाद है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में सुसंस्कारिता के समावेश का। इसके बिना समुचित साधन उपलब्ध कर लेने पर भी सार्वजनिक शान्ति और प्रगति का सुयोग बन नहीं पड़ता। धर्मतंत्र इसी महती आवश्यकताओं की पूर्ति करता था। इसी को परिष्कृत रूप में प्रस्तुत करने की आज आवश्यकता है।
चिन्तन में उत्कृष्टता उभरती है और चरित्र एवं व्यवहार को ऐसा सुगढ़-समर्थ बना देती है कि उसके सहारे में न केवल निजी जीवन वरन् संपर्क में आने वाले परिकर को भी समुन्नत बनाने का अवसर मिलता है।
चिन्तन और दृष्टिकोण की निष्पत्ति है। गिलास आधा भरा है, आधा खाली है- इस पर दोनों तरह से सोचा जा सकता है। एक तरीका यह है कि हाय, हमारा गिलास आधा खाली है। इसमें अब रस कहाँ, स्वाद कहाँ। दूसरा तरीका यह है कि हमारा गिलास तो आधा भरा है, लाखों ऐसे हैं जिनके गिलास में एक बूँद भी जल नहीं हैं।
चिन्तन चेतना काम करती रह सकती है। कि वर्तमान अवरोध से निपटा और नये सिरे से नया कदम उठा सकना संभव हो सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-January
चिन्तन से संस्कारों में सम्मिलित कर लेते हैं, बहुत कुछ पूजा-पाठ, सत्संग और धार्मिक साहित्य का अध्ययन करते रहने पर भी उनमें मुक्त नहीं हो पाते। वे चाहते है कि संसार के नश्वर भोग और अकल्याण कर वासनाओं से विरक्ति हो जाए, लेकिन उनकी यह चाहत अधूरी बन रहती है।
चिन्तन-मनन की निरन्तरता के फलस्वरूप वे माँगलिक विचार संस्कार बन-बन कर संचित होने लगेंगे जिनका प्रकाश चरित्र की असंख्य रश्मियाँ बनकर फूट निकलेगा। इनके प्रकाश में हमारा अपना भविष्य उज्ज्वल, उदीयमान, उत्कृष्ट बन सकेगा।
चिन्तन और मनन किया जाता रहे-तो संस्कार भी शुभ और सुन्दर बनेंगे। इसके विपरीत यदि असद् विचारों को ग्रहण कर मस्तिष्क में बसाया और मनन किया जाएगा-तो संस्कारों के रूप में कूड़ा-करकट ही इकट्ठा होता रहेगा।
चिन्तन-मनन की प्रक्रिया भी अबाधगति से चलती रहती है और वह विषय अवचेतन में जा जाकर संस्कारों का रूप लेता रहता है। इसी नियम के अनुसार प्रायः देखा जाता है कि अनेक लोग, जो कि प्रियता के कारण भोग-वासनाओं को निरन्तर चिन्तन से संस्कारों में सम्मिलित कर लेते हैं, बहुत कुछ पूजा-पाठ, सत्संग और धार्मिक साहित्य का अध्ययन करते रहने पर भी उनमें मुक्त नहीं हो पाते। वे चाहते है कि संसार के नश्वर भोग और अकल्याण कर वासनाओं से विरक्ति हो जाए, लेकिन उनकी यह चाहत अधूरी बन रहती है।
चिन्तन की मुद्रा में कुछ सोच रहे थे, तभी एक छात्र उधर से गुजरा, पूछा-”सर, आज आप कुछ उद्विग्न और परेशान नजर आ रहे हैं।”
चिन्तन में लीन होती, तो अपने आसन से प्रायः तीन फुट उत्थित हो जातीं। सोलहवीं सदी की इस महिला संत के संबंध में प्रसिद्ध है कि एक बार स्थानीय विशप आलमेरेस डे गोनडोसा इनसे मिलने आये, तो यह देख कर वे चकित रह गये कि साध्वी खिड़की की ऊँचाई जितने अधर में बैठी हुई है।
चिन्तन-सागर मैं डूबने-उतरने लगे और समस्या का कोई आत्यन्तिक हल ढूँढ़ निकालने के बारे में सोचने लगे, तभी उनके दिमाग में एक माह पूर्व का वह हृदयविदारक दृश्य कौंध गया और साथ ही छात्र जेम्स यंग सिम्पसन का वह संकल्प भी, जिसमें कुछ कर गुजरने की अभीप्सा थी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-June
चिन्तन दृष्टि विवेकपूर्ण, सूक्ष्म और दूर दृष्टि न रहे तो यहाँ जो कुछ भी सौंदर्य और जीवन व्यवस्था दिखाई देती है कुछ भी न रहे। जो लोग अपने में भी यह दृष्टि और दूरदर्शिता बनाये रखते है। वे न केवल स्वयं सम्मान और ट और दूरदर्शिता बनाये रखते है। वे न केवल स्वयं सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करते है अपितु अपने परिवार परिजनों को भी प्रगति पथ पर अग्रसर करने में सफल होते है।
चिन्तन करने पर एक ही तथ्य उधर करे भ्रमक आता है कि प्राचीन आयुर्वेद के साथ सारे परिवार के ऊर्जा प्रवाहों का रहस्यात्मक ज्ञान धुला मिला था। आयुर्वेद की सफलता का श्रेय भी कभी इसी नियम को था।
चिन्तन, एकान्त सेवन मौन-जप-ध्यान आदि आत्मशुद्धि के उपचार भी होने चाहिए। उन उपवास में सूर्य की किरणों द्वारा अभीष्ट दैवी शक्ति का आह्वान करना चाहिए। सूर्य की सप्तवर्ण किरणों में राहु-केतु को छोड़कर अन्य सातों ग्रहों की रश्मियां सम्मिलित होती है। सूर्य-में तेजस्विता, ऊष्णता पित्त प्रकृति प्रधान है। चन्द्रमा-शीतल शान्तिदायक, उज्ज्वल कीर्तिकारक।
चिन्तन को गतिशील करने की सामर्थ्य है तथा विचारों को विकार मुक्त की भाव संवेदनाओं की परिष्कृति कर पाने की ताकत है। यही कारण है कि गुरुसत्ता, परिवर्तनकारी सत्ताएँ तत्कालीन परिस्थितियों में इष्ट का निर्धारण मानव मात्र के लिए करती रही है। कपिल तंत्र में एक उल्लेख आता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-September
चिन्तन करने वाले उन करुणामय के नेत्र भर आये थे।” प्रायः सभी अल्पायु होते जा रहे हैं और उनकी मेधा शक्ति क्षीण होती जा रही हैं।”
चिन्तन एवं संवेदना भाषा को संस्कृति की वाहिका कहा गया है, जैसी संस्कृति होगी वैसी ही भाषा होगी।
चिन्तन की जितनी उदारता इस संस्कृति का अंग रही है, वैसी विश्व में कभी कहीं भी नहीं देखी सुनी गयी। चार्वाक दर्शन के आचार्य बृहस्पति कहते हैं कि- “चैतन्मविशिष्टः कायःपुरुषः” अर्थात् चेतना से युक्त यह शरीर ही पुरुष है, तो विज्ञानवादी बौद्ध कहते हैं कि- चित्त, मन और विज्ञसि के रूप में क्रियाशील विज्ञान अर्थात् कान्शसनेस ही वास्तविक है, आकार आदि उसी की अनुभूतियाँ मात्र है। इससे पृथक इनकी सत्ता अवास्तविक है। शून्यवादी बौद्ध कहते हैं कि परम सत्य तो शून्य ही है। साँख्य दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीवात्मा एक स्वतंत्र पुरुष है और इस प्रकार असंख्य पुरुष है, जबकि वेदान्त दर्शन मानता है कि एक ही सर्वव्यापी चेतना के अंश है ये जीवात्माएँ।
चिन्तन मग्न पैल नाम सुनते ही चौंक पड़ा। उसके चिंतन की कड़ियाँ एक-एक करके बिखरने लगीं।
चिन्तन और भावनायें होंगी वैसी ही उसकी भाषा शैली होगी। परिमार्जित परिष्कृत भाषा उत्कृष्ट एवं परिष्कृत चिन्तन एवं संवेदना भाषा को संस्कृति की वाहिका कहा गया है, जैसी संस्कृति होगी वैसी ही भाषा होगी।
चिन्तन रुकता और अनावश्यक शक्ति क्षरण बन्द होता है, जबकि शारीरिक श्रम से शरीर मजबूत बनता एवं उसकी स्वास्थ्यता बढ़ती है। समृद्धि और सम्पन्नता में अभिवृद्धि होती है, सो अलग।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-March
चिन्तन और प्रयास जब भिन्न-भिन्न दिशाओं में चलते हैं तो भीतरी खींचतान शुरू होती है और ऐसी स्थिति बनती है जिसकी हैरानियों सवार रहने लगें। यह बाहर से तो कठिनाई से ही पहचानी, पकड़ी जाती है पर आन्तरिक स्थिति ऐसी है जिसे आवेशग्रस्त कहने में अत्युक्ति नहीं समझी जानी चाहिए।
चिन्तन को एक वैज्ञानिक आधार पर प्रतिष्ठित किया है। उनके अनुसार मन में निहित विकास की इन उच्च अवस्थाओं को प्रकट करने के लिए शारीरिक, मानसिक एवं व्यावहारिक परिष्कार करने की जरूरत पड़ती है। गुण, कर्म स्वभाव में उत्कृष्टता का समावेश करना पड़ता है। महर्षि अरविन्द की सहयोगिनी श्री माँ के शब्दों में इसके लिए सरल तरीका है-अपनी एकाग्रता को प्रगाढ़ बना लेना। काम-छोटा हो या बड़ा उसे समूची एकाग्रता पहले अचेतन की शक्तियोँ को प्रकट करती है।
चिन्तन के लिए उत्कृष्ट सामग्री प्रदान करना, यहीं है सन्तुलित जीवनक्रम की रीति−नीति। इसे जहाँ अपनाया जाएगा वहीं आन्तरिक स्थिरता की वह पृष्ठभूमि बन जायगी जिसमें ध्यानयोग, लययोग जैसी ब्रह्मसान्निध्य की साधनायें सफल हो सकें। ध्यानयोग के लिए जिस शरीरगत− अंतःशांति की नितान्त आवश्यकता होती है, वह श्रद्धा, समन्वित मनःस्थिति से ही संभव हो पाती है।
चिन्तन एक पहुँचाने की शक्ति तो मनोरंजन में विधेयात्मक दृष्टि रखने से ही प्राप्त हो सकती है।
चिन्तनीय बात है। यह स्थिति देखकर लगता है कि राष्ट्र सचमुच साया पड़ा है, वह भी सामान्य निद्रा में नहीं मूर्छा जैसी गहन अचेतनता के गर्त। उसे चैतन्य, जाग्रत, सक्रिय बनाने के लिए विशेष प्रयास किए ही जाने चाहिए।
चिन्तन और स्वभाव की उत्कृष्टता उभारना भी एक अनिवार्य अंग है। इसी प्रकार उस प्रयोग उपचार में एकाग्रता और तन्मयता का समावेश करने के लिए ध्यान, धारण एवं श्रद्धा−भक्ति का−समर्पण का अभ्यास करना पड़ता है। व्यक्ति सत्ता के प्रत्यक्ष पक्ष को उभारने में तपश्चर्या का और परोक्ष पक्ष को परिष्कृत करने में ‘ब्रह्म विद्या’ का आश्रय लेना पड़ता है। इसके अतिरिक्त विधान, अनुशासन एवं उपकरणों की इस परम्परा का ध्यान रखना होता है जो अध्यात्मिकता तत्त्वदर्शियों ने अपने दीर्घकालीन अनुभवों और प्रयोग द्वारा निर्धारित की है।
चिन्तन और चरित्र का पर्यवेक्षण किया जाय तो प्रतीत होगा कि अन्तराल में कोई प्रकार की सनकें तथा विक्षिप्ततायें अपना-अपना काम करती रहती है। बाहर से साधारण प्रतीत होने वाला मनुष्य प्रायः असाधारण होता है। उसे कितनी प्रकार की कुत्सायें, कुण्ठायें घेरे रहती है। आवेश अवसाद छाये रहते हैं जिस प्रकार समुद्र में ज्वार-भाटे आते रहते हैं उसी प्रकार कभी मनुष्य उत्तेजित, आवेशग्रस्त होता है और कभी अपने को असहाय, दीन−दुर्बल अनुभव करने लगता है।
चिन्तन के माध्यम से प्रकट रूप से संसार में समाये सत्य को अनुभव कराता है। दूसरी ऊँची ‘परत प्रबुद्ध मन’ है जिस के द्वारा शान्ति, शक्ति, ज्योति एवं सत्य प्रतिफलित होता है। इसके द्वारा सत्य को देखा या सुना जा सकता है। इसके ऊपर तीसरा स्तर है। ‘प्रज्ञामानस’ का, जहाँ ज्ञान-ज्ञाता व ज्ञेय में कोई भेद नहीं रह जाता है।
चिन्तन में आमूल चूल परिवर्तन किये बिना अर्थ संकट से छुटकारा पा सकना किसी भी प्रकार संभव नहीं हो सकता।
चिन्तन को गड़बड़ाता है। फलतः मानसिक रोगों के चित्र-विचित्र रूप सामने आते और उभरते हैं।
चिन्तन भावनात्मक स्तर के ही कला है जिसमें व्यक्ति के भावनात्मक स्तर का परिष्कार परिमार्जन होता है। इसी के फलस्वरूप समय-समय पर लोगों ने मनोविदों के उपक्रमों को चलाया है।
चिन्तन में बताये गए मानसिक विकास के इस क्रम को अब पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक भी स्वीकारने लगे है। उन्होंने सचेतन-अचेतन के उलझाव से परे अतिचेतन के उच्चस्तरीय स्तरों की बात को भी स्वीकारा है और इस उपलब्धि को जीवन का ध्येय भी माना है। वस्तुतः कार्य कौशल से लोक-व्यवहार बनता है। बुद्धि विवेक से ठीक-ठीक निर्णय होते है। पर अन्तराल तो समूचे व्यक्तित्व का अधिष्ठाता है।
चिन्तन को सँवारे तथा परिष्कृत बनाए।
चिन्तन, चरित्र और स्वभाव को, गुण कर्म और भाव संवेदना को दिनों दिन अधिक उत्कृष्ट बनाते चलने की आवश्यकता को ध्यान में रखने पर जोर दिया गया है। साथ ही आवश्यक यह भी है कि इस विराट विश्व की कामधेनु की अनुकूलता प्राप्त करके अमृत भरे पय पान का लाभ उठाते रहा जाय।
चिन्तन, प्रतिपादन और समर्थन इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए हुआ, इसलिए इस समस्त विचार परिकर को ऋचा या मंत्र कहा गया और आत्मिकी को माँत्रिकी के नाम से जाना गया। उनका लक्ष्य सदा अध्यात्म और विज्ञान−आत्मिकी और भौतिकी के समन्वय का एवं उस समुद्र मंथन से प्राप्त नवनीत से जन मानस को लाभान्वित कराने का रहा है। यांत्रिकी और माँत्रिकी−दोनों ही विषयों में मनीषियों ने गंभीरता−पूर्वक अनुसंधान किया था। एक का क्षेत्र स्वयं का काय कलेवर तथा दूसरे का पदार्थ जगत था। उन्होंने यह जान लिया था कि यान्त्रिकी की तरह ही मान्त्रिकी भी समर्थ है।
चिन्तन विश्लेषण द्वारा सही परामर्श दे सके तथा आदर्श जीवन पद्धति से मूर्तिमान प्रेरणा रूप बन कर जिए उसी से पुरोहित का दायित्व निभा सकना सम्भव है।
चिन्तन जिनके स्वभाव में है तथा उसके अनुरूप जीवन प्रक्रिया चलाने के जो थोड़े बहुत अभ्यस्त हैं वे ही इस कार्य में आगे आ सकते हैँ। तात्कालिक लाभ की मृग-मरीचिका में भटकते नागरिकों को जो दूरगामी परिणामों का स्मरण दिलाकर अपेक्षाकृत अधिक स्थाई लाभ प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करने की प्रेरणा दे, ऐसे विकसित दृष्टिकोण तथा व्यक्तियों का यह कार्य है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-February
चिन्तन का स्वरूप यह बनाना पड़ता है कि साँस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ काय-कलेवर में भीतर प्रवेश कर रहे है। यह प्रवेश मात्र आवागमन नहीं है, वरन् प्रत्येक अवयव पर सघन आधिपत्य बन रहा है। इस तरह एक-एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगों के चित्र की कल्पना की जाती है और अनुभव करना पड़ता है कि उसमें भगवान की सत्ता चिरस्थायी रूप में समाविष्ट हो गयी। हृदय, फेफड़े, आमाशय, आँतें, जिगर, गुर्दे, तिल्ली आदि में भगवत्-सत्ता का प्रवेश हो गया। रक्त के साथ अस्थि-पिंजर सहित प्रत्येक नस-नाड़ी और कोशिकाओं पर भगवान ने अपना शासन स्थापित कर लिया।
चिन्तन से हटाकर उपयोगी दिशा में चलने की क्षमता प्राप्त रही है। इसके बिना चंचलता की वारन वृत्ति से ग्रसित व्यक्ति न किसी प्रसंग पर गहराई से सोच सकता है और न किसी कार्यक्रम पर देर तक स्थित रह सकता है। शिल्प, कला, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, व्यवस्था आदि महत्वपूर्ण सभी प्रयोजनों की सफलता में एकाग्रता की शक्ति ही प्रधान भूमिका निभाती है। चंचलता को तो असफलता की सगी बहिन माना जाता है। वयस्क होने पर भी यदि कोई चंचल ही बना रहे-विचारों की दिशाधारा बनाने और चिन्तन पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल न हो सके तो समझना चाहिए कि आयु बढ़ जाने पर भी उसका मानसिक स्तर बालकों जैसा ही बना हुआ है।
चिन्तन में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता भर देती है। इसे महान परिवर्तन की आन्तरिक कायाकल्प की संज्ञा दी जा सकती है। ‘सोऽहम्’ साधना का यही है भावनात्मक एवं व्यवहारिक स्वरूप। ईश्वर साक्षात्कार की यह सबसे सरल, सहज एवं सर्वोपयोगी साधना है जिसे अपना कर हर कोई लाभान्वित हो सकता है।
चिन्तन नहीं कर पाते। मनःस्थिति के अनुरूप ही परिस्थितियों का निर्माण होता तथा भविष्य की रूपरेखा तैयार होती है। इस संबन्ध में उन्होंने दो बातों का उल्लेख प्रमुख रूप से किया है। पहली यह कि इस संसार में भली-बुरी दोनों ही प्रकार की परिस्थितियाँ क्रियाशील पायी जाती हैं, जिनके गतिक्रम को रोका नहीं जा सकता, किन्तु भविष्य को प्रकाशमय देखने वाले उनके साथ अपनी मनःस्थिति का तालमेल बिठाने की क्षमता रखते हैं, और अनिष्टकारक संभावनाओं को टाल सकने की भी।
चिन्तन का गहरा पुट लगने पर पर ही आत्मिक भूमिका में हलचलें होती हैं और प्रगति का सरंजाम जुटता है। यदि मन इष्ट पर जमे नहीं-मंत्र देने वाले गुरु पर श्रद्धा में कमी हो-ऐसी दशा में मंत्रोच्चारण का श्रम-जीभ की कसरत भर बनकर रह जाएगा।
चिन्तन में उत्पन्न हुए असंतोष का विवरण सुनाया।
चिन्तन को नकारता है। उसी से यह सहन नहीं होता कि कोई अपनी स्वतंत्र सत्ता का परिचय दे और जो अरुचिकर लगे उसे गले उतारना अस्वीकार कर दे। हर व्यक्ति की अपनी स्वतंत्र चेतना है। उसकी अभिरुचि एवं पसंदगी का भी महत्व है। जो अधिकार एक को मिला है उसी को दूसरा भी अपना अधिकार कह सकता है।
चिन्तन का ऐसा क्रम बनाया जाय, जिससे कि उस दिशा में चलने के सत्परिणामों के सम्बन्ध में तर्क, तथ्य, प्रमाण एवं उदाहरणों के आधार पर अपनी इष्ट निष्ठा और गुरुभक्ति को प्रगाढ़ किया जाय। यह प्रगाढ़ता ही साधक में-तन्मयता को जन्म देती है। शनैः शनैः इ तन्मयता का ही रूपांतरण ध्यान में होता है। फिर ध्यान की प्रगाढ़ गम्भीरता को सविकल्प समाधि-आत्म-बोध के क्षणों में बदलते भला कितनी देर है?
चिन्तन पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल न हो सके तो समझना चाहिए कि आयु बढ़ जाने पर भी उसका मानसिक स्तर बालकों जैसा ही बना हुआ है। ऐसे लोगों का भविष्य उत्साह वर्धक नहीं हो सकता।
चिन्तन अपनी निर्धारित दिशा धारा में ही सीमित रहता है। इतने भर में एकाग्रता का प्रयोजन पूरा हो जाता है। यद्यपि इस प्रकार के बौद्धिक पुरुषार्थों में मन और बुद्धि को असाधारण रूप से गतिशील रहना पड़ता है और कल्पनाओं को अत्यधिक सक्रिय करना पड़ता है तो भी उसे चंचलता नहीं कहा जा सकता।
चिन्तन में अप्रासंगिक विक्षेपों का ही निषेध है। निर्धारित परिधि में कितनी ही, कितने प्रकार की कल्पनाएँ-विवेचनाएँ करते रहने की पूरी छूट है।
चिन्तन हो रहा हो तो अनेक व्यक्तियों का समुदाय भी एक साथ मिल बैठकर एकाग्रता का अभ्यास भली प्रकार कर सकता है। नितान्त एकान्त में बैठना वैज्ञानिक, तात्विक शोध अन्वेषण के लिए आवश्यक हो सकता है, उपासना के सामान्य संदर्भ में एकान्त ढूंढ़ते फिरने की कोई खास आवश्यकता नहीं है। सामूहिकता के वातावरण में ध्यान-धारणा और भी अच्छी तरह बन पड़ती है। सेना का सामूहिक कार्य साथ-साथ कदम मिलाकर चलना-सैनिकों में से किसी का ध्यान नहीं बंटाता वरन् साथ-साथ चलने की पग ध्वनि के प्रवाह में हरेक के पैर और भी अच्छी तरह अपने आप नियतक्रम से उठने चले जाते हैं। सहगमन से पगक्रम को ठीक रखने में बाधा नहीं पड़ती वरन् सहायता ही मिलती है।
चिन्तन बार-बार हावी होकर उसी अदूरदर्शिता को अपनाने को बाध्य करता है-जो तुरन्त लाभ की है।
चिन्तन के एकाकी प्रयत्न से भी सम्भव हो सकता है।
चिन्तन के कारण सामने आई हो।
चिन्तन सिमटकर स्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो जाना।
चिन्तन ही विक्षेप करता है। एक बेसुरा वादन पूरे आरकेस्ट्रा के ध्वनि प्रवाह को गड़बड़ा देता है, ठीक इसी प्रकार चिन्तन में अप्रासंगिक विक्षेपों का ही निषेध है। निर्धारित परिधि में कितनी ही, कितने प्रकार की कल्पनाएँ-विवेचनाएँ करते रहने की पूरी छूट है।
चिन्तन करना पड़ता है कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक व्यावहारिक यथार्थता के, प्रत्यक्ष तथ्य के रूप में दृष्टिगोचर होने लगे।
चिन्तन को आधार बना लिया जाय तो सौंदर्य, शालीनता, सदाचार, नैतिकता, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता जैसे सरल अनार्थिक मूल्यों का भी अस्तित्व तब रह सकेगा जब वे आर्थिकता की कसौटी पर खरे उतरते हों। नीति-अनीति के मामले में भी यही आर्थिक चिन्तन बार-बार हावी होकर उसी अदूरदर्शिता को अपनाने को बाध्य करता है-जो तुरन्त लाभ की है।
चिन्तन भी न कर सकेगा।
चिन्तन के अनुरूप ही दिखाई देती है।
चिन्तन क्यों न किया जाय, कितनी ही कल्पनाएँ, कितनी ही स्मृतियाँ, कितनी ही विवेचनाएँ क्यों न उभर रही हों वे एकाग्रता की स्थिति में तनिक भी विक्षेप
चिन्तन चेतना में आमूल-चूल परिवर्तन की बात करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-March
चिन्तन की चेतन और आदतों की अचेतन के नाम से व्याख्या करता है। उसकी दृष्टि से कारण शरीर-भाव संस्थान-अचेतन की ही एक गहरी परत है जिसे सुपर चेतन-इगो आदि नाम दिये जाते हैं। आध्यात्मिक मनोविज्ञान की दृष्टि से कारण शरीर ही जीव चेतना का केन्द्र है। आस्थाओं की जैसी पर्ते उस पर चढ़ी होती है। वैसी ही गतिविधियों का संचालन मन और शरीर द्वारा सम्पन्न होता रहता है।
चिन्तन। यह पशु-पक्षियों से ऊँचा स्तर है। इस पर पहुँचे हुए जीव से मनुष्य संज्ञा में गिना जाता है। कल्पना, तर्क, विवेचना, दूरदर्शिता जैसी चिन्तात्मक विशेषताओं के सहारे औचित्य-अनौचित्य का अन्तर करना संभव होता है। स्थिति के साथ तालमेल बिठाने के लिए इच्छाओं पर अंकुश रख सकना इसी आधार पर संभव होता है।
चिन्तन में तेजस् और आस्थाओं में ‘वर्चस्’ के नाम से जानी जाती है। इस अन्तः क्षमता को -आत्म शक्ति को -प्राण तत्त्व को अधिकाधिक मात्रा में संचय करने वाला ही जीवन का आनन्द लेता और उसे सार्थक बनाता है।
चिन्तन के कारण शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य भी चौपट हो जाता है। ऐसे लोग पिछड़े, असफल, असंतुष्ट और उद्विग्न ही देखे जाते हैं। मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थितियाँ बनती हैं, इस तथ्य को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता। इसके विपरीत जो आत्मसत्ता को जितना परिष्कृत कर लेते हैं वे अपने सुधरे हुए दृष्टिकोण तथा व्यवस्थित क्रिया-कलाप के आधार पर प्रखरता का परिचय देते हैं। सफलताएँ उनकी ओर खिंचती चली आती हैं।
चिन्तन, मनन का विधान है। अध्यात्म दर्शन की यही पृष्ठभूमि है।
चिन्तन की पृष्ठभूमि बनाने वाले तत्त्व ज्ञान का नाम है-अध्यात्म और आदर्श कर्तृत्व में निष्ठा उत्पन्न करने की प्रक्रिया धर्म कहलाती है। किसी समय अध्यात्म की-श्रद्धा और धर्म की निष्ठा का गहरा आरोपण जन-मानस में करने के ऋषि प्रयास सफल हुए थे और अपने देश के नागरिक देवोपम जीवन जीने और अपनी सम्पर्क भूमि हो ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ बनाने में समर्थ हुए थे। आज एकांगी प्रगति की ललक गगनचुम्बी हो चली है, पदार्थ ही सब कुछ बन गया है। आदर्शवादी आस्थाओं के आधार पर चेतनात्मक परिष्कार की उपेक्षा की जा रही है । इस असन्तुलन से कुरूपता बढ़ रही है और समस्याएँ उलझ रहीं है।
चिन्तन पर ब्रह्म-विद्या और (2) साधना परक तपश्चर्या-दोनों ही हर दृष्टि से तथ्यपूर्ण है। वे आस्था की दृष्टि से ही उपयोगी नहीं है वरन् तर्क, तथ्य और प्रमाणों की दृष्टि से भी स्वीकार करने योग्य है। उनके समर्थन में इतना कुछ कहा जा सकता है कि अनास्था के लिए कम ही गुँजाइश रह जाएगी। अनुभवों की कसौटी पर कस कर इसके प्रभाव की स्वयं परीक्षा की जा सकती है। दूसरों से प्रमाण पूछने की अपेक्षा यह आत्म-साक्षी और भी अधिक समाधान कारक हो सकती है।
चिन्तन और क्रिया के दो भागों में विभक्त है। चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश करने वाले प्रतिपादन को ब्रह्म विद्या कहते हैं। इसमें ईश्वरीय निर्देश देव सन्देश-ऋषि अनुभव के तत्त्व इस प्रकार जोड़े गये हैं कि मानवी भाव सम्वेदना उसे श्रद्धा पूर्वक स्वीकार कर लें। मान्यताओं को मान्यताओं से काटने के लिए शास्त्र का स्वाध्याय सत्संग का चिन्तन, मनन का विधान है। अध्यात्म दर्शन की यही पृष्ठभूमि है।
चिन्तन और घृणित कर्तृत्व बना रहे तो किसी भी पूजा पाठ से दैवी अनुग्रह प्राप्त नहीं हो सकता। उपासना कपड़े को रंगने के समान है। इससे पूर्व धुलाई होनी चाहिए। मैले कपड़े पर रंग कहाँ चढ़ता है। दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति अपनाये रहने पर साधना फलवती नहीं होती।
चिन्तन और आदर्शवादी कर्तृत्व की सघन स्थापना की गई थी। उत्कृष्ट चिन्तन की पृष्ठभूमि बनाने वाले तत्त्व ज्ञान का नाम है-अध्यात्म और आदर्श कर्तृत्व में निष्ठा उत्पन्न करने की प्रक्रिया धर्म कहलाती है। किसी समय अध्यात्म की-श्रद्धा और धर्म की निष्ठा का गहरा आरोपण जन-मानस में करने के ऋषि प्रयास सफल हुए थे और अपने देश के नागरिक देवोपम जीवन जीने और अपनी सम्पर्क भूमि हो ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ बनाने में समर्थ हुए थे। आज एकांगी प्रगति की ललक गगनचुम्बी हो चली है, पदार्थ ही सब कुछ बन गया है। आदर्शवादी आस्थाओं के आधार पर चेतनात्मक परिष्कार की उपेक्षा की जा रही है ।
चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश करने वाले प्रतिपादन को ब्रह्म विद्या कहते हैं। इसमें ईश्वरीय निर्देश देव सन्देश-ऋषि अनुभव के तत्त्व इस प्रकार जोड़े गये हैं कि मानवी भाव सम्वेदना उसे श्रद्धा पूर्वक स्वीकार कर लें। मान्यताओं को मान्यताओं से काटने के लिए शास्त्र का स्वाध्याय सत्संग का चिन्तन, मनन का विधान है। अध्यात्म दर्शन की यही पृष्ठभूमि है।
चिन्तन में उत्कृष्टता और कर्तृत्व में कुशलता का समावेश हुए बिना परिष्कृत जीवन-क्रम का आधार बन ही नहीं सकता। प्रगति चाहे भौतिक हो, चाहे आत्मिक दोनों के ही लिए अपने-अपने स्तर के ज्ञान और विज्ञान की अनुभव और साधन की आवश्यकता रहेगी ही।
चिन्तन के इस दिव्य प्रवाह को यदि अलंकारिक रूप से नारी प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है तो उसे उचित ही कहा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-August
चिन्तन ही है। यों भी उसे प्रभावित करने के सभी सम्भव हथकंडे सत्ताधारी अपनाते रहे हैं। धर्म कला, साहित्य, भाषण एवं दृश्य श्रव्य माध्यमों से मानवर मेधा को मोहित और मृतप्राय बनाने की चेष्टाएं पहले से ही होती रही है। अब विज्ञान का सहारा लेकर उस कार्य को अभूतपूर्व तत्परता और शक्ति के साथ पूरा किया जा सकेगा। इस भयानक अमानवीय षडयन्त्र के विरुद्ध विश्व व्यापी जनमत जागृत किया जाना चाहिए।
चिन्तन और आदर्श कर्तव्य ही ऐसी मानसिक प्रखरता दे सकता है। इस प्रखरता में लक्ष्य के प्रति समर्पण की दृढ़ता सदैव ही बनी रहती है। नैतिक दृढ़ता के बिना सच्ची विनम्रता की कल्पना भी असम्भव है। वह ओढ़ी हुई विनम्रता होगी और अधिक समय तक टिकेगी नहीं।
चिन्तन तत्व की इतिश्री हुई और व्यक्ति उसी तरह विज्ञान की अधिपति सत्ता के आधीन हो गया जिस तरह पालतू पशुओं का भला बुरा उपयोग उनके स्वामी कहलाने वाले मनुष्यों द्वारा होता है।
चिन्तन से सूक्ष्म शरीर का-एवं सौजन्य सद्भाव से कारण शरीर का स्वास्थ्य संरक्षण होता है। मात्र हाड़ मांस का शरीर ही सम्पूर्ण आरोग्य का केन्द्र नहीं
चिन्तन शैली का नाम ही नरक और स्वर्ग है। प्रतिगामी चिन्तन के अभ्यास अपने चारों ओर कष्टकर परिस्थितियों और विद्वेषी व्यक्तियों का घेरा खड़ा करते हैं। यह उनकी विकृत कल्पना शक्ति का सृजन होता है। वस्तुतः वे दूसरे असंख्यों की तरह सामान्य स्थिति में ही रह रहे होते हैं। अपनी विषेधात्मक मान्यताएँ और आशंकाएँ ही डरावनी प्रतिक्रिया बनाती और डरावनी प्रतीत होती हैं।
चिन्तन के क्षेत्र में आदर्शवादी उत्कृष्टता ही छाई रहे तो समझना चाहिए कि लोभ और भय के कारण दुष्कर्म बन पड़ने और दुर्भाव उठाने का आधार ही नष्ट हो गया। ब्रह्मचेतना में सदाशयता एवं सज्जनता के ही तत्व भरे रहते हैं। जिसका भाव संस्थान इस प्रकार की कोमलता जितनी संचय कर सके समझना चाहिए उसे उतने ही अनुपात में ब्रह्म सान्निध्य उपलब्ध हो चला।
चिन्तन की उत्कृष्टता ही नहीं मस्तिष्क की प्रखरता भी बढ़ा सकता है। मानसिक दृष्टि से पिछड़े हुए मनुष्य को बौने मन वाला और भी उपहासास्पद माना जाता है।
चिन्तन को व्यवहार में क्रियान्वित होते हुए सहज ही देखा जा सकता है।
चिन्तन की शैली बदल ली। कबीर कहते हैं -
चिन्तन एवं कर्म ही आनन्द का स्रोत बन जाता है और पग-पग पर अन्तः उल्लास की अनुभूति होती रहेगी। जो हँसता-हँसाता दिखाई पड़े, जो हलकी फुलकी जिन्दगी जी रहा हो, जिसकी आँखों में आशा और उमंग चमकती हो, जिस पर आदर्शों की खुमारी छाई हो समझलो इस आनन्दी जीव ने आनन्द-कन्द परमेश्वर की समीपता का लाभ लेना आरम्भ कर दिया।
चिन्तन के लिए ही प्रेरित प्रशिक्षित किये जा सकेंगे। कैलीफोर्निया इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी के डॉ. रोगरस्परी ने सुदीर्घकाल से संचित आदतों अभ्यासों से मुक्त होने तथा सर्वथा नये अभ्यासों को गहराई से अपना प्रयोगों में सफलता प्राप्त की है।
चिन्तन विधि में सर्वथा नयी है। डॉ. जे0 वी0 ल्यूको ने यही प्रयोग तिलचट्टों के साथ किया। डॉ. राबर्ट थामसन ने यही प्रयोग प्लेरियन नामक कीड़े पर किये है। यह आध इंच आकार का जलचर कीड़ा है, इसे रेडियो संकेतों के सहारे कुछ भी करने के लिए विवश करना पूरी तरह सम्भव हो गया है।
चिन्तन करने की क्षमता ही नष्ट हो जाती है। मनोविकारों से उत्तेजित मस्तिष्क से अगणित शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। वासना, तृष्णा ओर अहंता की मात्रा जितनी बढ़ी चढ़ी होगी मस्तिष्क में इतनी ही आग जलेगी और उतनी ही अशान्ति रहेगी। जो है। उस पर प्रसन्न रहा जाय, अधिक पाने के लिए उत्साहपूर्वक प्रयत्न किया जाय किन्तु अभीष्ट लाभ न मिलने पर खिन्न होने की आदत न डाली जाय।
चिन्तन और कर्म की त्रिवेणी प्रचण्ड मस्तिष्कीय ऊर्जा के रूप में प्रवाहित होती है। वह सृजनात्मक गतिविधियों और अनुभूतियों का आधार बनती है। प्रबल अवरोधों से टकराकर भी टिके रहने और प्रवाहित रहने की शक्ति उसमें आ जाती है। यह त्रिवेणी व्यक्तित्व को दिव्य पवित्र बनाती है। वस्तुतः श्रेष्ठ व्यक्तित्व उस स्थिति का ही नाम है, जहाँ मध्य में होती है, प्रखर उत्कृष्ट विचार शक्ति और उसमें भावना निष्ठा आस्था की हृदय शक्ति तथा तद्नुरूप आचरण व्यवहार की क्रियाशील का समन्वय होता है।
चिन्तन और आकाँक्षाओँ का बिन्दु वही एक हो जाता है। मनुष्य उसी उधेड़बुन में लगा रहता है। उसी प्रयोजन के लिए प्रतिफल, सक्रिय, जागरुक एवं गतिशील रहता है। आस्था उसी आदर्श में दृढ़ होती है। विचारो का केन्द्र वही होता है और गतिविधियों का प्रेरणा सूत्र भी वही होता है॥ आस्था, चिन्तन और कर्म की त्रिवेणी प्रचण्ड मस्तिष्कीय ऊर्जा के रूप में प्रवाहित होती है।
चिन्तन को मोड़ने, मरोड़ने और इच्छित प्रयोजन की दिशा में घसीट ले जाने में भी सफल बनाया जा सकता है।
चिन्तन की दिशा भी इसके द्वारा प्रतिबन्धित कर दी गई और महत्वाकांक्षी अधिनायक, जन समूह का उपयोग मक्खी, मच्छरों, भेड़ बकरियों की तरह करने लगे तो मानव जाति भयंकरतम विभीषिका में फंस जाएगी। यह अणुबमों के प्रयोग से भी अधिक भयानक विभीषिका होगी। सम्पूर्ण बौद्धिक दासता का एक निरंकुश साम्राज्य स्थापित हो जाएगा। सिर्फ सत्ताधारी समर्थ जन इस दासता से मुक्त होंगे और वे ही मनुष्य जाति के सार्वभौम स्वामी होगे, तब प्रगति की दिशाएं भी रुद्ध और बद्ध हो जायेगी। मानवीय प्रगति का आधार स्वतन्त्र चिन्तन ही है।
चिन्तन एवं क्रिया कलाप में घुसी हुई निकृष्टता का उन्मूलन करने के लिए अपने आप से हर घड़ी जूझना पड़ता है वह निरन्तर चलने वाला तप है। आदर्शों को अपनाने में संचित कुसंस्कार भारी अवरोध उत्पन्न करते हैं उन्हें अभ्यस्त और सहमत करने के लिए भी संकल्पपूर्वक अपने सुधार का उपक्रम बनाना पड़ता है। इन प्रयत्नों को तपश्चर्या कहा जा सकता है। इनका अभ्यास करने के लिए शरीर और मन को तितीक्षा के आधार पर प्रशिक्षित करना पड़ता है। स्वेच्छापूर्वक सदुद्देश्यों के लिए किया गया कष्ट सहन साधना विज्ञान का महत्वपूर्ण अंग है।
चिन्तन पद्धति हाथ लगने पर समस्याओं का स्वरूप और समाधान उपलब्ध हो जाता है। ऐसी दशा में जो गहरी आत्म तुष्टि और अनवरत प्रफुल्लता बनी रहती है; उसी का नाम समाधि है। आत्म स्वरूप का, आत्मिक गरिमा का अनुभव होने लगे तो शरीर और मन की स्थिति स्वामी की नहीं सेवक का बन जाती है। यही आत्म- साक्षात्कार है। आदर्शवादी उत्कृष्टता के रंग में हर घड़ी रगें रहना-अपने आपको आत्मीयता को- व्यापक उपलब्धियां आत्म-परिष्कार के अनुपात से मिलती चली जाती हैं।
चिन्तन, श्रम, साधन थोड़े से कुपात्र लोगों पर थोप दिये जाते हैं और सत्पात्रों को उचित अनुदान पाने से भी वंचित रहना पड़ता है। स्वयं मोहग्रस्त भी तो अनीति पोषक एवं अविवेकी बनता ही है।
चिन्तन भर करते रहा जा सके तो आनन्द की सभी भी कमी नहीं रहेगी। दुःखद सम्भावनाएं तो यहाँ इतनी स्वल्प हैं कि उन्हें हँसकर भी टाला जा सकता है।
चिन्तन की आधारशिला मानी जाती रही और समझा जाता रहा कि जिसका मस्तिष्क जितना भारी और बड़ा होगा वह उतना ही बुद्धिमान होगा। इस मान्यता के कारण मस्तिष्क के स्वरूप का विकास करने के लिए ऐसी औषधियों और खाद्य पदार्थों का सरंजाम जुटाया जाता रहा जो उस अवयव को परिपुष्ट बनाने में सहायक सिद्ध हो सके। अब वह अध्याय समाप्त होते जा रहा है और समझा जा रहा है कि इस संस्थान के अंतरंग क्षेत्र में काम करने वाली विद्युत शक्ति ही विचार शक्ति बनती है। इस विद्युत को लगभग उसी स्तर की भौतिक विद्युत द्वारा प्रभावित किया जा सकता है और चिन्तन के बाहरी दबाव से उभारा या दबाया जा सकता है।
चिन्तन के बाहरी दबाव से उभारा या दबाया जा सकता है।
चिन्तन और दिव्य कर्त्तव्य में असाधारण रस है। प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। प्रेम किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति असाधारण आसक्ति को समझा जाता है पर वस्तुतः वह वैसा है नहीं। प्रेम में उदारता,आत्मीयता का गहरा पुट रहने से उसका व्यावहारिक स्वरूप निस्वार्थ सेवा भावना बन जाता है। प्रेमी को अपने प्रेम पात्र के प्रति इसी प्रकार का दृष्टिकोण अपनाना और व्यवहार करना पड़ता है।
चिन्तन चाहिए-जैसे उपकरणों और साधनों की आवश्यकता है उन्हें जुटाना अन्तरिक्ष यंत्रों से भी कठिन सिद्ध होगा। इतने पर भी यह तथ्य है कि अपनी धरती की ‘दुनिया’ उतनी छोटी नहीं है जितनी कि मनुष्यों द्वारा सोची और जानी गयी है। इसी धरती पर असंख्य जाति के जीवधारी निवास करते हैं। उनकी संख्या भी इतनी बड़ी है कि तुलनात्मक दृष्टि से 400 करोड़ मनुष्यों का संख्या बल बहुत ही नगण्य एवं उपहासास्पद प्रतीत होगा। संख्या बल के अतिरिक्त उनकी प्रकृति, आवश्यकता, पारस्परिक सहयोग व्यवस्था, निर्वाह, विनोद, वंशवृद्धि, प्रसन्नता, आयुष्य आदि की परिस्थितियाँ इतनी विचित्र मिलेंगी जिन्हें देखते हुए उन्हें मनुष्यों की ‘दुनिया’ से सर्वथा भिन्न एवं विलक्षण स्तर की कहा जा सकता है।
चिन्तन को दूसरे लोग कठपुतली की तरह संचलित कर रहे होंगे और वह मदारी की रस्सी के इशारे पर उछल कूद करने वाले बन्दर के अतिरिक्त और कुछ शेष ही नहीं रह गया होगा।
चिन्तन के अभ्यास अपने चारों ओर कष्टकर परिस्थितियों और विद्वेषी व्यक्तियों का घेरा खड़ा करते हैं। यह उनकी विकृत कल्पना शक्ति का सृजन होता है। वस्तुतः वे दूसरे असंख्यों की तरह सामान्य स्थिति में ही रह रहे होते हैं। अपनी विषेधात्मक मान्यताएँ और आशंकाएँ ही डरावनी प्रतिक्रिया बनाती और डरावनी प्रतीत होती हैं।
चिन्तनीय है और अशोभनीय भी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-October
चिन्तन कारी एवं स्वाध्यायी बनना चाहिए। हमें अपने विचार दृढ़ बनाना चाहिए, “मैं मन, वचन तथा कर्म से पवित्र हूँ। दूसरों के सुख-दुःख मेरे ही सुख दुःख है, संसार की सभी दिशाओं से मुझे प्यार ही मिल रहा है।” ऐसे विचार जब मन में दृढ़ होंगे तब हमें संसार में कोई दूसरा दिखाई ही नहीं पड़ेगा और “आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की भावना ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की और ले जाने में समर्थ होगी। यही है ‘जीवन का अर्थ’ जिसके लिए महात्मा टॉलस्टाय का हृदय विक्षुब्ध हुआ था और उन्होंने साहित्य से विरत होकर ईश्वर’-चिन्तन में ही आत्म-कल्याण करने की प्रेरणा प्राप्त की थी।
चिन्तन का बलपूर्वक प्रतिरोध करना और धारणा का तात्पर्य है जो अभीष्ट है उसे अंगीकार करने के लिए अतिशय आग्रह करना। यह सरकस में वन्य पशुओं को प्रशिक्षित करने जैसी प्रक्रिया है। ताड़ना और प्रलोभन की उलटी-सीधी चालें चलकर उद्दण्ड पशुओं को साधना पड़ता है। चित्त वृत्तियों की स्थिति भी लगभग वैसी ही है। साधने की सफलता में उन पशुओं को भी यश मिलता है और शिक्षक की कुशलता भी सराही जाती है।
चिन्तन की और नहीं झुके थे। संसार के इन्द्रिय भोगों को जितना उसने भोगा शायद ही किसी दूसरे का वह सौभाग्य मिला हो। आत्म विश्वास और निश्चिन्तता का जीवन व्यतीत करने वाले उस लेखक को कौन सा ऐसा आघात लगा, जिसने उसकी जीवन दिशा को ईश्वर-चिन्तन की और मोड़ दिया। अब तक वह ‘जीवन’ का क्या उद्देश्य है?” इन प्रश्न को नहीं समझ सके थे।
चिन्तन विकृति के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है।
चिन्तन में ही आत्म-कल्याण करने की प्रेरणा प्राप्त की थी।
चिन्तन में अपने को लीन कर देने के लिए लालायित हो रहे थे तब उनके अभिन्न मित्र तुर्गनेव ने एक पत्र लिखकर यह अनुरोध किया था कि ‘ओ’ सरस्वती साधक मेरी अन्तिम इच्छा यह है कि आप अपनी परिपक्व प्रतिभा के निर्णायक बरस धार्मिकता में बरबाद न करें, क्योंकि यह वर्तमान दुनिया के लिए निरर्थक एवं अनुपयोगी है। मेरी बार-बार प्रार्थना है कि आप पुनः साहित्य के क्षेत्र में लौट आयें। “टॉलस्टाय ने उनकी बिनती सुनी हो या न सुनी हो परन्तु इसका उत्तर देने से पहले ही तुर्गनेव इस संसार से कूच कर गये थे।
चिन्तन सुलझ जाने पर सन्तुलन बनते और तालमेल बैठते देर नहीं लगती। आत्मीयता के व्यापक होती ही सर्वत्र अपनापन फैला दीखता है और हर वस्तु अपनी दीखने के कारण रुचिकर और सुखद लगने लगती है। कण-कण में ईश्वर की झाँकी का ब्रह्मानन्द मिलने में अपनी चिन्तन विकृति के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है।
चिन्तन की धारा तत्काल किसी उपयोगी प्रयोजन में लगा देने की विशेषता प्राप्त कर ले तो समझना चाहिए कि उसने भव-बन्धनों को काट लिया और स्वर्गीय आनन्द को करतल गत कर लिया।
चिन्तन-विवेचन इसमें सहायक होगा। विराट् ब्रह्म को इस चराचर जगत का शरीर मानते हुए कल्पनाएँ की जाए। इस विराट ब्रह्म का एक क्षुद्रतम घटक है अपना ‘अहम्’। इसका स्वतन्त्र क्या अस्तित्व? हमारी सत्ता ब्रह्म सत्ता कह ही एक इकाई है।
चिन्तन की इस विश्रृंखलता के साथ-साथ अवांछनीय तत्त्व ही लिपट पड़ते हैं। कहते हैं कि “खाली दिमाग शैतान की दुकान।” यदि विचारों को व्यवस्थित एवं उपयोगी कार्यों में न लगाया जायेगा, तो उसके अभाव का लाभ आसुरी तत्त्व उठावेंगे और पतनोन्मुख पशु प्रवृत्तियों का मनःक्षेत्र पर अधिकार सघन होता चला जाएगा। एकाग्रता से बिखराव सिमटता है और उससे शक्ति उत्पन्न होती है। सभी जानते हैं कि छोटे से आतिशी शीशे पर फैली हुई सूर्य किरणें एक बिन्दु पर एकत्रित कर दी जाएँ तो आग जलने लगती है।
चिन्तन जब सारे मानसिक संस्थान को आँधी, तूफान की तरह तोड़-मरोड़कर रख देने जितना प्रचण्ड होता है तो ही उससे तनाव उत्पन्न होता है। सामान्य स्थिति में तो औंधे-औंधे विचार आते-जाते रहते हैं। उनका प्रभाव न गहरा होता है और न स्थायी।
चिन्तन तन्त्र को बुरी तरह लड़खड़ा देती है। यदि जीवन को सार्थक बना सकने के योग्य उच्चस्तरीय मनोभूमि का निर्माण आवश्यक समझा जाय तो उसे इन त्रिविध विनाशकारी विपत्तियों से बचाये रहना ही उचित है।
चिन्तन से आत्मा की दुर्गति होती हैं। प्रकाश न होगा तो अन्धकार का साम्राज्य ही होना हैं। सद्ज्ञान का आलोक बुझ जाएगा तो अनाचार की व्यापकता बढ़ेंगी ही। भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट कर्तव्य का परिणाम व्यक्ति और समाज की भयानक दुर्दशा के रूप में ही सामने आ सकता है। यह सिद्धान्त मात्र नहीं -प्रत्यक्ष तथ्य हैं।
चिन्तन की और मोड़ दिया। अब तक वह ‘जीवन’ का क्या उद्देश्य है?” इन प्रश्न को नहीं समझ सके थे।
चिन्तन-विकृत विचार प्रवाह का निराकरण करने से उत्पन्न हुई चित्त स्थिरता से नादानुसंधान में सफलता मिलती है। व्यावहारिक जीवन में सत्कर्म परायणता-सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन एवं आदर्श वादी चरित्रनिष्ठा से उस वाक् शक्ति का उदय होता है जो मन्त्रों को लक्ष्य बेधी बाण की तरह सामर्थ्यवान बनाती है। साधना विधियाँ सरल हैं, कठिन तो वह प्रक्रिया है जिसमें क्रिया, विचारणा और भावना को परिष्कृत परिमार्जित करने के लिए निरन्तर आत्म संघर्ष करना पड़ता है। शब्द विद्या का लाभ उठाने के लिए उसके लिए उपयुक्त यन्त्र उपकरण अपना परिष्कृत व्यक्तित्व ही होता है। शब्द को शब्द-ब्रह्म बना सकना ऐसे ही व्यक्तित्व सम्पन्न साधकों के लिए सम्भव होता है।
चिन्तन कर रहा होता है तो वह देवोपम बन जाता है। तथा जब वह आत्यन्तिक स्वार्थ के वशीभूत होकर दूसरों के लाभ-अलाभ की परवाह किये बिना अपने ही भले की बात सोचता और कतरा है तो उसमें असुरता के लक्षण प्रकट होते हैं। देवताओं का जैसा चित्रण शास्त्र-पुराणों में मिलता है वह पढ़ सुनकर हर किसी का मन लुभा जाता है। स्वतः ही यह आकांक्षा उठने लगती है कि काश हम भी देवता हुए होते।
चिन्तन का व्यावहारिक उपयोग न होने के कारण वह युग धर्म न बन सका।
चिन्तन करता है कि हमारा सहायक कौन हो सकता है? हमारी रक्षा कौन कर सकता है? हमारा उद्धार कौन कर सकता है? साथ ही सत्पथ ज्ञान कौर करा सकता है? उत्तर एक ही है-धर्म।
चिन्तन और दृष्टिकोण का अन्तर ही है जिसके कारण वस्तुओं और व्यक्तियों से चित्र विचित्र प्रकार की अनुभूतियाँ होती है।
चिन्तन और दुष्ट कर्तव्य का परिणाम व्यक्ति और समाज की भयानक दुर्दशा के रूप में ही सामने आ सकता है। यह सिद्धान्त मात्र नहीं -प्रत्यक्ष तथ्य हैं। आज हम चारों और आँख उठाकर यही सब देख रहे हैं। रोटी कपड़े के बिना कोई नहीं मर रहा हैं-निर्वाह की आवश्यकता किसी की भी रुकी नहीं पड़ी हैं फिर भी हर व्यक्ति वैसा सोच रहा हैं-वैसा कर रहा हैं जिससे मनुष्यता का गौरव नहीं बढ़ता। समाज में शान्ति का वातावरण नहीं बनता।
चिन्तन भ्रष्टता की, विष बेल पर लगने वाले छोटे-छोटे फल मात्र हैं।
चिन्तन की परिधि बनाकर किया जा सकता है। किसी गीत या श्लोक के भावार्थ, संगीत की किसी धुन के विवेचन, किसी गुण विशेष जैसे ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा, संयम, उदारता आदि का सुदीर्घ विश्लेषण-मनन आदि कोई भी आधार लिया जा सकता है।
चिन्तन कर सकना सम्भव होता है आत्म सत्ता की स्थिति, आकांक्षा एवं आवश्यकता को समझने और तद्नुरूप साधन जुटाने की बात तभी बनती है, जब अन्तर्जगत को ठीक तरह देख और समझ सकना सम्भव हो सके। यह कार्य ध्यान में तीक्ष्णता उत्पन्न होने पर ही बन पड़ता है
चिन्तन के लिए मन चेतना प्रशिक्षित ही न हो सकेगी। बुद्धिमत्ता के विकास साधनों में व्यवस्थित परिभ्रमण को भी उच्चस्तरीय स्थान प्राप्त है। पठन-पाठन से उसका महत्त्व किसी भी प्रकार कम नहीं है। अनुभव वृद्धि कुशलता सम्पादन में यात्रा प्रसंगों का बहुत महत्त्व है। इन दिनों यात्री बसों, यात्री रेलों या जोन टिकटों के सहारे जल्दी-जल्दी मन्दिरों या दार्शनिक स्थानों को आँख से देखने भर की भगदड़ मची रहती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-November
चिन्तन और कर्तृत्व एक ही -दिशा में नियोजित रहने से अत्यधिक प्रखर और गतिशील हो उठता है। यही नहीं उसके साथ पवित्रता की एक ऐसी भावना सन्निहित रहती है, जो ध्येय को भौतिक प्रवंचनाओं से धराशायी होने से बचाती रहती है।
चिन्तन के स्तर के प्रति जैसे सभी को यही विश्वास है कि वह सामान्य से भी कुछ निष्कृष्ट ही होगा, उत्कृष्ट नहीं। व्यक्तिगत जीवन में जिस दुर्बुद्धि के साम्राज्य में कुंठा, कलह, कुत्सा और कायरता बढ़ रही है, समष्टि क्षेत्र में उसी के विस्तार ने अणु-आयुध जैवीय संहार-पिण्ड घातक गैसें, मृत्यु-किरण प्रक्षेपास्त्र आदि का विशाल सरंजाम जुटा दिया है, जिससे किसी उन्मत्त मूर्ख की एक धृष्टता देखते-देखते इस सुन्दर संसार को महा-श्मशान बनाकर रख दे सकती है।
चिन्तन प्रणाली का सन्तुलन खो बैठता है और दैनिक कार्य पद्धति के निर्धारण संचालन में चूक पर चूक होने लगती है। अपनी स्थिति का सही मूल्यांकन कर सकना भी संभव नहीं रहता। गिरे ढंग से सोचने पर निराशा छा जाती है और भविष्य डरावना तथा अन्धकारमय दीखने लगता है। ऐसे लोग उदासी, अकर्मण्यता एवं अस्त-व्यस्तता के शिकार हो जाते हैं। यदि आवेश-उत्तेजना का अतिवाद छाया तो फिर दुष्टता, दुस्साहस, आक्रोश एवं विग्रह की घटनाएँ घटित होने लगती है।
चिन्तन करते रहने से दिल टूटेगा और जो प्राप्त कर लिया गया उस पर दृष्टि डालने से प्रसन्नता की लहर दौड़ जाएगी । चिन्तन की दिशाधारा बदल कर खिन्नता को प्रसन्नता में बदला जा सकता है तो, यह हर दृष्टि से सस्ता सौदा है। इसमें बेखटके हाथ डाला जा सकता है और स्वल्प प्रयास में बड़ी उपलब्धि का लाभ लिया जा सकता है।
चिन्तन तन्त्र के उलट जाने से उत्पन्न होती है। अच्छा खासा ट्रक उलट जाय तो उस दुर्घटना से जान माल की भारी क्षति होती है। मस्तिष्क उलट जाय तो समझना चाहिए जीवन सम्पदा के द्वारा मिल सकने वाले सुख सौभाग्य का अन्त ही होगा। अब जो कुछ हाथ रह जाएगा वह मस्तिष्कीय तनाव का अभिशाप मात्र ही पाया जाएगा ।
चिन्तन के परिष्कार का विचार ही विस्मृति कर दिया गया है, सद्भावनाओं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन की चर्चा भी झण्ट-झमेले जैसी लगने लगी है और शेष रह गया है, उथला, आडम्बरी, छत्रा, शिष्टाचार। जीवन-रस सूख गया है और सामाजिक व्यवहार एक रेतीला विस्तार बनकर रह गया है। इस शुष्क, निष्प्राण वातावरण में मनुष्य को क्या रस मिलेगा? वह अतृप्त और व्यस्त-त्रस्त रहते हुए दुर्वह भार से मनःस्थिति निरन्तर दुर्बलतम होती जा रही है। यों इसके अपवाद भी मौजूद है।
चिन्तन को चित् शक्ति के नाम से जाना जाता है। शरीर में सक्रियता मन में सूझबूझ यही दो प्रमुख आधार भौतिक जीवन की विभिन्न क्षेत्रों की प्रगतियों ओर समृद्धियों को उपलब्ध करते हैं। श्रम और बुद्धि का ही वह सब उत्पादन हैं, जिसे हम सम्पदाओं और सुखानुभूति के साधनों की तरह देखते हैं। भौतिक उपलब्धियों का रथ इन्हीं दो चक्रों के सहारे घूमता है। इन्हीं की न्यूनता से पिछड़ापन बना रहता है और जब वे पर्याप्त मात्रा में होते हैं तो सफलताओं के अम्बार लगाते चले जाते हैं।
चिन्तन यह होना चाहिए कि प्रकृति व्यवस्था से जो कठिनाइयाँ सामने आ खड़ी हुई उनसे मल्ल युद्ध करके अपनी वरिष्ठता सिद्ध करने का लाभ कमाया जाय।
चिन्तन तन्त्र की प्रकृति का अंग बन जाता है। विकृत दृष्टिकोण के कारण हर व्यक्ति वस्तु या परिस्थिति का अँधेरा पक्ष देखने लगता है और उजला सूझ ही नहीं पड़ता। ऐसी मनःस्थिति निषेधात्मक कही जाती है और उसमें खीज और निराशा जन्य उद्विग्नता ही पल्ले बँधकर रह जाती है। ऐसे तनाव चिरस्थायी होते हैं, बहुत हुआ तो कभी कभी सन्तुलन की बिजली कौंधी अन्यथा हर दिशा में निराशा छाई और विपत्ति बरसती दीखती है। ऐसे मनुष्यों को कदाचित ही कभी प्रसन्न देखा जा सके।
चिन्तन एवं कर्म का ही सत्परिणाम कह सकते हैं। साधना से सिद्धि की उक्ति अक्षरशः सत्य है। इस संसार में ने तो कुछ अनायास होता है और न अप्रत्याशित। प्रकृति की विलक्षण घटनाओं से लेकर मानवी उत्थान-पतन तक की समस्त हलचलें किसी क्रमबद्ध प्रतिक्रिया के सुनिश्चित परिणाम है। भले ही हम उस प्रक्रिया से परिचित न होने के कारण भाग्य, दैव आदि का कुछ भी नाम देते रहें।
चिन्तन की दिशा और क्रिया की धारा को प्रभावित करती है। इसी मर्मस्थल से व्यक्तित्व का भला या बुरा निर्माण आरम्भ हो जाता है।
चिन्तन में इतनी सी जानकारी है कि हमारे क्रिया कृत्यों को अनगढ़ नहीं-सुव्यवस्थित होना चाहिए। भले ही वह उच्चारण ही क्यों न हो? वाणी को शिष्टाचार-सन्तुलन सभ्यता का अंग माना जाता है। जो ऐसे ही अण्ड-बण्ड बोलते रहते हैं वे असभ्य कहलाते और तिरस्कार के पात्र बनते हैं। ऐसी दशा में मन्त्र प्रयोजनों में यदि उसके साथ जुड़े हुए व्यवस्था नियमों का पालन किये जाने का निर्देश है तो उसका पालन होना ही चाहिए।
चिन्तन एवं चरित्र को, उच्चस्तरीय बनाने के भागीरथ प्रयत्न में जुटना होता है। मन्त्रोच्चारण की विधि-व्यवस्था कुछ घण्टों में सीखी जा सकती है। उसका परिपूर्ण अभ्यास कुछ दिनों में हो सकता है। किन्तु व्यक्तित्व की मूल सत्ता का स्तर ऊँचा उठाना काफी कठिन है। उसके लिए प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है।
चिन्तन की दिशाधारा बदल कर खिन्नता को प्रसन्नता में बदला जा सकता है तो, यह हर दृष्टि से सस्ता सौदा है। इसमें बेखटके हाथ डाला जा सकता है और स्वल्प प्रयास में बड़ी उपलब्धि का लाभ लिया जा सकता है।
चिन्तन की प्रक्रिया अपनाने से ही सम्भव हो सकता है। यथार्थता वादी दृष्टिकोण अपनाया जा सके और हलकी-फुलकी जिन्दगी का महत्त्व समझा जा सके तो सामान्य परिस्थितियों में भी असामान्य लोगों की तरह आनन्दित जीवन जिया जा सकता है। अपने समय के सर्वनाशी महारोग मानसिक तनाव से बचना हो तो इसी विवेकशील दूरदर्शिता को अपनाने की आवश्यकता अनुभव करनी होगी।
चिन्तन जुड़ा हुआ है। ईश्वर सद्गुणों का पुँज है। पवित्रता, करुणा, ममता, उदारता जैसी सद्भावनाएँ ईश्वरीय अनुकम्पा के फलस्वरूप उपलब्ध होने वाली विभूतियाँ है। इस मान्यता से ईश्वर सान्निध्य के लिए-उपासना आदि प्रयास करते हुए मनुष्य अधिकाधिक चरित्र निष्ठ और समाज-निष्ठ बनने का प्रयत्न करता है समाज-निष्ठा को धार्मिकता और सभ्यता कहते हैं। चरित्र-निष्ठा को धार्मिकता और सभ्यता कहते हैं।
चिन्तन इसी की शक्ति हैं। कल्पना, निर्णय, विश्वास के मन, बुद्धि, चित्त के नाम से-चेतना अचेतन, उच्च चेतन के नाम से-इस चिन्तन को चित् शक्ति के नाम से जाना जाता है। शरीर में सक्रियता मन में सूझबूझ यही दो प्रमुख आधार भौतिक जीवन की विभिन्न क्षेत्रों की प्रगतियों ओर समृद्धियों को उपलब्ध करते हैं। श्रम और बुद्धि का ही वह सब उत्पादन हैं, जिसे हम सम्पदाओं और सुखानुभूति के साधनों की तरह देखते हैं। भौतिक उपलब्धियों का रथ इन्हीं दो चक्रों के सहारे घूमता है।
चिन्तन की गरिमा का स्तर ऊँचा होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-February
चिन्तन, स्वभाव एवं मनोरथ उतने तक ही सीमित बनकर रह जाता है। यह स्थिति शरीर निर्वाह के कामचलाऊ प्रयोजन तो पूरे कर देती है, पर जीवन महत्त्वपूर्ण समस्याओं को सुलझाने एवं प्रगति का पथ-प्रशस्त करने में असफल रहता है।
चिन्तन परक एवं संवेदनात्मक गतिविधियों का उभार एवं अवसाद इसी प्राण शक्ति की स्थिति पर निर्भर रहता है। इस प्राण शक्ति की प्रखरता ही शरीर में संव्याप्त होकर उसे ओजस्वी बनाती है। मन संस्थान में उभरती है, जिससे व्यक्ति मनस्वी दीखता है और अन्तःकरण में उसका समुचित समावेश होने पर मनुष्य तेजस्वी बनकर अपने आत्म तेज से समीपवर्ती वातावरण को प्रकाशित करता है।
चिन्तन किया जाता है। आँखें बन्द रहती है, पर अनुभव यही होने लगता है कि किसी निर्जन प्रदेश में हम उपस्थित हैं और उदीयमान सविता देवता की इष्टदेव के रूप में भाव भरी झाँकी कर रहे हैं।
चिन्तन तथा सतर्कताओं का क्रम बना लेना चाहिए। उस निर्धारित कार्यक्रम पर दिन भर आरुढ रहना चाहिए। रात्रि को सोते समय, मृत्यु की गोद में जाने की स्थिति अनुभव करनी चाहिए। संन्यासी, वैरागी, निस्पृह खिलाड़ी की तरह निश्चित होकर सोया जाय। अपने मन का भार ईश्वर को सौंपकर सोने से चित्त कितना हलका और शान्त रहता है, उसकी दिव्य अनुभूति का लाभ हर दिन उठाना चाहिए।
चिन्तन से- पक्ष-विपक्ष के मंथन से ही उत्पन्न किया जा सकता है अन्यथा अन्धी भावुकता भोले व्यक्ति को किसी धूर्त द्वारा बेमौत मारने वाला शिकार ही बनाकर छोड़ती है। प्रेम और उदारता के दुरुपयोग की तरह अन्य सत्प्रवृत्तियों के अदूरदर्शी प्रयोग से हानिकारक परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं। अस्तु आदर्शों को अपनाने और कार्यान्वित करने में भी प्रथम स्थान विवेक एवं औचित्य को देना चाहिए। श्रद्धा की सराहना की जा सकती है, किन्तु अन्ध-श्रद्धा अपनाने से तो मनुष्य ठगा ही जाता रहोगे और उससे धूर्तता को ही परिपोषण मिलता रहेगा।
चिन्तन किया जाना चाहिए। यह आत्म-निरीक्षण जितना गहरा होगा उतने ही ऐसे तथ्य उभर कर आवेंगे, जिन पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है परिशोधन की आवश्यकता समझी जा सके और उसके सत्परिणामों का मूल्यांकन किया जा सके तो पुरानी अभ्यस्त अवाँछनीयताओं के विरुद्ध संघर्ष करने की साहसिकता जाग सकती है। इस प्रकार के देवासुर संग्राम को आत्मोत्कर्ष का प्रथम चरण माना गया है। गीता में जिस महाभारत को वर्णन किया गया है और अर्जुन को जिस युद्ध में प्रवृत्त किया गया है वह वस्तुतः अन्तःक्षेत्र में घुसी हुई अवांछनीयता के उन्मूलन में प्रवृत्त शौर्य, साहस ही कहा जा सकता है यह स्थिति बन पड़े तो समझना चाहिए कि अवरोधों को चीर कर ऊँचाई की ओर अग्रसर हो सकने का आधार उपलब्ध हो गया।
चिन्तन की परिपक्वता एवं प्रौढ़ता की परख इस आधार पर होती है कि आज की गतिविधियों के परिणाम भविष्य में क्या हो सकते है? खुली आँखों से स्वल्प सीमा तक ही दृश्य दीख पड़ता है यदि बहुत दूर की वस्तुएँ देखनी हों तो दूरबीन का सहारा लेना पड़ता है। उस उपकरण से दूरवर्ती दृश्य दीखने लगते हैं और जो सामान्यतः अविदित था, उसकी प्रत्यक्ष जानकारी मिल जाती है। जिसके उपयोग से लगता है कि दूरबीन कितना महत्त्व पूर्ण उपकरण है।युद्ध क्षेत्र में शत्रुओं की गतिविधियों पर नजर रखने और अपनी मोर्चाबन्दी सही बनाने के लिए इस दूरदर्शन से बड़ी सहायता मितली है।
चिन्तन के बिखराव का केन्द्रीकरण किया जाता है। एकाग्रता की शक्ति का सदुपयोग करने वाले ही अपने अपने विषय में प्रवीण, साहित्यकार, वैज्ञानिक, शिल्पी, व्यवस्थापक, योगी अपने-अपने विषय में उच्चस्तरीय प्रगति मुख्यतया एकाग्रता के अभ्यास से ही कर पाते हैं। एकाग्रता और कुछ नहीं मस्तिष्कीय संयम है। इन्द्रिय संयम, विचार संयम, समय संयम, वाणी संयम, धन संयम आदि के रूपं में यदि अपव्यय को रोकना और सामर्थ्यों का सत्प्रयोजनों में एक निष्ठा भाव से लगाना संभव हो सके तो समझना चाहिए कि प्रगति का राजमार्ग मिल गया। और उस पर चलते हुए आत्मोत्कर्ष का उद्देश्य भी उसी प्रकार संभव हो सकता है जिस प्रकार भौतिक सफलताओं के मार्ग पर चलते हुए उत्साहपूर्वक प्रतिफल प्राप्त किया जाता है।
चिन्तन एवं व्यवहार का पुट लगाते चलने से बात बन जाती हैं सामान्य कामों के कर्मयोग बनाया जा सकता है यदि उनमें उद्देश्य, स्वरूप, चिन्तन एवं व्यवहार का उच्चस्तरीय समावेश किया जाय। महत्त्व क्रिया का नहीं, उसके पीछे काम करने वाली मनोवृत्ति एवं विचारणा का है। यदि सदुद्देश्य रखकर शालीनता पूर्वक सामान्य समझे जाने वाले कृत्यों में भी संलग्न रहा जाय तो आत्मोत्कर्ष का द्वार खुला रह सकता है और उस पर चलते हुए चरम लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव हो सकता है।
चिन्तन, मनन नित्य का संध्या वन्दन समझा जा सकता है। इसमें फुरसत न मिलने जैसा कुछ बहाना करने की भी गुँजाइश नहीं है। आँख खुलते ही जीवन का महत्त्व, उद्देश्य, स्वरूप एवं उपयोग स्मरण किया जाय। इस अनुदान के पीछे ईश्वर की अपेक्षा तथा अपने कन्धे पर आई जिम्मेदारी को यदि समझा जा सके तो एक-एक क्षण का- क्षमताओं के एक-एक कण का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात ही सामने होगी। उठने से लेकर सोने तक के समय विभाजन, चिन्तन तथा सतर्कताओं का क्रम बना लेना चाहिए।
चिन्तन तथा व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाने वाली ऐसी कितनी ही महत्त्वपूर्ण दिशा धाराओं का समावेश है, जिनका अवगाहन करके हम स्वयं देव स्तर पर पहुँच सकते हैं।
चिन्तन में विवेक को स्थान मिलना चाहिए। औचित्य की कसौटी पर कसने के पश्चात् ही किसी इच्छा का समर्थन करे और उसे कार्यान्वित करने के लिए तभी कदम उठाये जब हर दृष्टि से ठोक-बजाकर यह देख लिया जाय कि जो किया जा रहा है। उसमें उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ पूरी तरह सन्निहित है। इसके लिए पथ और विपक्ष दोनों की ओर से सभी पहलू प्रस्तुत किया जाने चाहिए और बुद्धि का इतना अवसर देना चाहिए कि वह शान्त-चित्त से उपयुक्त निर्णय करने में समर्थ हो सके। न्यायालयों में यही नियम अपनाया जाता है।
चिन्तन लगाने से लगता है, पर कुछ ही समय में प्रतीत होने लगता है कि यह घाटा उच्चस्तरीय लाभ प्राप्त करने की भूमिका भर था। बीज के गलने में आरम्भिक घाटा भर है कुछ ही समय में वह अंकुर पौधा और वृक्ष बनकर जल फलता-फूलता है तो उससे विशाल आकार एवं वैभव को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि यह आरम्भिक त्याग भावी उत्कर्ष का आधार सिद्ध हुआ ओर इसका आयोजन दूरदर्शी बुद्धिमत्ता सिद्ध हुआ।
चिन्तन इसी प्रयास में प्रवृत्त रहने के लिए प्रोत्साहित करता है। दूरदर्शिता का यही मार्ग है जो जीवन के हर क्षेत्र में अपनाया जाना चाहिए।
चिन्तन करना होता है कि शरीर अर्ध निद्रित जैसी स्थिति में शिथिल हो रहा है। मन में भगदड़ बन्द कर दी और वह शान्ति, स्थिरता तृप्ति एवं सरसता का अनुभव करते हुए अर्धतंद्रित बन रहा है। शरीर शिथिल-मन शान्त की स्थिति उत्पन्न कर लेना ध्यान साधन की पृष्ठभूमि बनाने के लिए आवश्यक है। वासना, तृष्णा और अहंता की उत्तेजनाएं ही शरीर को दुष्प्रवृत्तियों में मन को कुकल्पनाओं में और अन्तःकरण को दुर्भावनाओं में घसीटती रहती है। ध्यान के पूर्वाभ्यास में इन तीनों के शान्त होने का संकल्प एवं विश्वास जमाना पड़ता है।
चिन्तन एवं व्यवहार का उच्चस्तरीय समावेश किया जाय। महत्त्व क्रिया का नहीं, उसके पीछे काम करने वाली मनोवृत्ति एवं विचारणा का है। यदि सदुद्देश्य रखकर शालीनता पूर्वक सामान्य समझे जाने वाले कृत्यों में भी संलग्न रहा जाय तो आत्मोत्कर्ष का द्वार खुला रह सकता है और उस पर चलते हुए चरम लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव हो सकता है।
चिन्तन की प्रखरता के अनुरूप ही प्राण संचरण में सबलता आती है।
चिन्तन-मनन आवश्यक है। उसे नित्य कर्म में सम्मिलित रखा जाय। मस्तिष्क में ऐसी कल्पना फिल्में घूमती रहनी चाहिए जिनमें उत्कृष्ट चरित्रों के घटनाक्रम एवं संस्मरण भरे पड़े हों। जीवन समस्याओं के सुलझे हुए समाधान प्रस्तुत करने वाली पुस्तकें हमारी सच्ची मित्र हो सकती है। इस स्वाध्याय के लिए सत्साहित्य को उपलब्ध करने के साधन जुटाये जाएँ।
चिन्तन एवं संग्रहित अनुभव के आधार पर ही दूरगामी परिणामों के सम्बन्ध में सोचा जा सकता है वे साधन जिसके पास जितने कम होंगे वह भावी परिणामों के सम्बन्ध में उतना ही अनजान बना रहेगा। तात्कालिक इच्छाएँ लोलुपता की तरंगें भी होती है। वे कभी-कभी आँधी-तूफान की तरह उठती है। इनमें से अनेकों अशोभनीय और अवांछनीय होती है। इतने पर भी उनमें प्रबलता रहती है।
चिन्तन ओर क्रिया-कलापों में समाये हुए कुसंस्कारों के उन्मूलन तथा सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में लगाई जाय तो वह आत्म-निर्माण का प्रयास तथा व्यक्तित्व में काया-कल्प प्रस्तुत कर सकने वाली चमत्कारी सिद्ध हो सकती है। आत्मिक विभूतियों को बढ़ाने के लिए ऐसे कर्म करने पड़ते हैं जिन्हें परमार्थ एवं जन-कल्याण के नाम से जाना जाता है ऐसे कार्यों में रुचि लेने-समय श्रम एवं चिन्तन लगाने से लगता है, पर कुछ ही समय में प्रतीत होने लगता है कि यह घाटा उच्चस्तरीय लाभ प्राप्त करने की भूमिका भर था। बीज के गलने में आरम्भिक घाटा भर है कुछ ही समय में वह अंकुर पौधा और वृक्ष बनकर जल फलता-फूलता है तो उससे विशाल आकार एवं वैभव को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि यह आरम्भिक त्याग भावी उत्कर्ष का आधार सिद्ध हुआ ओर इसका आयोजन दूरदर्शी बुद्धिमत्ता सिद्ध हुआ।
चिन्तन में अधीरता, उत्तेजना एवं भ्रान्तियों का भर जाना ही सबसे बड़ा कारण हैं। स्पष्ट हैं कि तनावग्रस्त मनुष्य उन समस्याओं के समाधान में अपंग, असमर्थ सिद्ध होता है, जिन्हें इस दबाव का कारण समझा और माना जाता है। उलटे अति महत्त्वपूर्ण जीवन रस उसी व्यर्थ की उलझन को समेटने में नष्ट होता चला जाता है, जिसे प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए आवश्यक साधन के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता था। तनाव स्वाभाविक कम और अस्वाभाविक अधिक हैं। उसे प्राकृतिक कम और कृत्रिम अधिक कह सकते हैं।
चिन्तन एवं दर्शन का सहारा लिया जाय। इसलिए भाव भरा एवं गम्भीर स्वाध्याय एवं चिन्तन-मनन आवश्यक है। उसे नित्य कर्म में सम्मिलित रखा जाय। मस्तिष्क में ऐसी कल्पना फिल्में घूमती रहनी चाहिए जिनमें उत्कृष्ट चरित्रों के घटनाक्रम एवं संस्मरण भरे पड़े हों। जीवन समस्याओं के सुलझे हुए समाधान प्रस्तुत करने वाली पुस्तकें हमारी सच्ची मित्र हो सकती है।
चिन्तन, व्यवहार ही यदि अपने को प्रभावित करता रहे तो फिर आदर्शवादी क्रिया कलाप अपनाने की आशा नहीं के बराबर ही रहेगी। लोग तो वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति के अतिरिक्त और किसी उद्देश्य के लिए न तो कुछ सोचते हैं और न करते हैं। उनका प्रभाव और परामर्श अपने ही प्रभाव में घसीटता है यदि उत्कृष्टता की दिशा में बढ़ना है तो अपना प्रेरणा स्रोत बदलना पड़ेगा। परामर्श के नये आधार अपनाने पड़ेंगे। अनुकरण के नये आदर्श ढूँढ़ने होंगे।
चिन्तन की बात सामने न होती तो पशुओं की तरह मनुष्य भी भविष्य निर्माण की कोई योजना न बना पाते। व्यापारी पूँजी लगाते हैं। शिल्पी सृजन में संलग्न रहते हैं। कलाकार अभ्यास में तन्मय रहते हैं। उन्हें तत्काल क्या मिलता है?
चिन्तन की आदत से बढ़ कर व्यक्ति के लिए दुःखद दुर्भाग्य दूसरा नहीं हो सकता। जो सोचा या चाहा जा रहा है उसमें कितना औचित्य है? इस मार्ग पर चलने से कोई खतरा तो नहीं है? यह पगडंडी कही कँटीली झाड़ियों में तो नहीं भटका देगी? ऐसी आशंकाएँ मन में न उठें और जो भी भली-बुरी उमंग जी में उठे उसी को चरितार्थ करने को मन मचलने लगे तो समझाना चाहिए अनिष्ट की घटाएँ सिर पर घुमड़ रही है और विपत्ति के बादल बरसने ही वाले है।
चिन्तन तक पहुँचा दिया जाय तो मनुष्य जीवन की सार्थकता के समस्त आधार बन जाते हैं। कुण्डलिनी जागरण साधना से आत्मा को ऊर्ध्वगामी बनाने वाली प्रबल प्रेरणा मिलती है। यदि इस उद्भव को चिरस्थायी बनाया जा सके और सदुपयोग हो सके तो समझना चाहिए कि साधना कि सिद्धि मिलने का उद्देश्य प्रत्यक्ष रूप से पूर्ण हो गया।
चिन्तन कितना विकृत और कर्तव्य कितना उद्धत बना दिया हैं। विग्रह और विद्वेष में-कलह और संघर्ष में-वास्तविक कारण कम रहते हैं और अहंकार की प्रधान रूप से उबलता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-September
चिन्तन एवं परिष्कृत कर्तृत्व अपनाकर व्यक्तित्व को ‘सुसंस्कृत बनाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। इसी प्रयोजन की सिद्धि के लिए पूजा, उपासना, जप, तन आदि के विधि-विधान बनाने गये हैं। आत्म-निमार्ण ही ईश्वर प्राप्ति का एक मात्र उपाय है। परिष्कृत आत्मा ही परमात्मा बनकर सामने आ खड़ा होता है। भगवान को लुभाने-फुसलाने की सारी तिकड़म निरर्थक सिद्ध होती हैं।
चिन्तन-ब्रह्म वन्दन सम्भव हो सकता है। साधना उपचार में ‘एकान्त’ की चर्चा बहुत होती है उसे आवश्यक माना जाता है। यहाँ एकान्त से मतलब किसी गुफा, कुटी आदि में अकेले रहने से नहीं वरन् संसारी प्रभावों से मुक्त होकर विशुद्ध अध्यात्म लोक में जा पहुँचना है।
चिन्तन के आधार पर साधना की गई वाक् शक्ति की क्षमता असीम है। मंत्राराधन उसी के बलबूते सफल होता है।
चिन्तन, रुझान, क्रिया कलाप का और चरित्र का अध पतन भी कम विघातक नहीं है। एक का गरम आग, दूसरी को शीत की थरथराहट कह सकते हैं। विनाश की क्षमता दोनों में लगभग समान है। हाँ एक बिजली की तरह गिर सकती है जब कि दूसरी विपत्ति जलाने की तुलना में गलाने में अधिक धैर्य का परिचय देगी और अधिक समय लेगी।
चिन्तन एवं कर्म में संलग्न रहने की विधि न सीख पता तो औरों की तरह मुझे भी चिन्ता में घुल-घुलकर मरना होता । “
चिन्तन से लेकर भक्तियोग तक की समस्त आध्यात्मिक साधनाएँ यहीं से फलित और विकसित होती हैं। ओजस्, तेजस् और ब्रह्मवर्चस् के रूप में पराक्रम, विवेक एवं आत्मबल की उपलब्धियों का अभिवर्धन यहीं से उभरता है।
चिन्तन की चतुर्विधि साधन सामग्री से अपने मनःक्षेत्र को घेरे रहने वाला उपयोगी वातावरण बनता है। इसके अतिरिक्त आत्म बलवर्धक व्यायामों में सर्वसुलभ एवं सर्वश्रेष्ठ उपाय है-ध्यान ध्यान मग्न होकर हम अपना इष्ट आराध्य स्वयं विनिर्मित करते हैं और उसके साथ श्रद्धासिक्त घनिष्ठता स्थापित करके तादात्म्य की दिशा में बढ़ते चले जाते हैं। ध्यान लोक वस्तुतः स्वनिर्मित ऐसा स्वर्गीय नन्दन वन है, जिसका सृजन, संवर्द्धन, परिपोषण हम स्वयं ही करते हैं। इसे परिपक्व बनाते हैं। पत्र, पल्लवों से सजाते हैं और फल फूलों से लदा हुए परम मंगलमय उद्यान के रूप में विकसित कर लेते हैं।
चिन्तन, चरित्र, इतिहास, उद्देश्य एवं संस्कार के समन्वय से व्यक्तित्व का निर्माण होता है। यह व्यक्तित्व मुख खोलते ही वाणी के माध्यम से सहज ही निसृत होते देखा जा सकता है। बात जो भी कही गई हो उसका प्रत्यक्ष अर्थ या उद्देश्य कुछ भी होता हो, प्रभाव उतने भर से ही नहीं पड़ता, उसके साथ व्यक्तित्व की एक अनोखी छाप भी जुड़ी होती है, वस्तुतः भला या बुरा प्रभाव उसी का पड़ता है। अनेक प्रसंगों में लम्बे चौड़े अनुरोध या प्रतिपादन तर्क और प्रमाण संगत होने पर भी प्रभावहीन एवं अविश्वस्त ठहरते हैं। उन्हें आशंका की दृष्टि से देखा जाता है और दुरित संधि की गंध सूँघी जाती है।
चिन्तन से इन लोगों को भी शारीरिक थकावट, निराशा, चिन्ता वृद्धि, शंकालुता के अकारण उदय आदि से ग्रस्त-त्रस्त होना पड़ा। अधिक समय तक इसी में लगे रहने वाले ऐसे डाक्टरों को भी औरों की तरह ‘न्यूरेस्थेनिया’ का रोग हो गया। “साइकालाजी एण्ड मारल्स” नामक पुस्तक में मनोविज्ञानवेत्ता प्रोफेसर हेडफील्ड ने लिखा है कि स्वच्छन्द यौनाचरण का परामर्श देना, व्यक्ति को विनाश के मार्ग में ले जाने की विधि है।
चिन्तन एवं घृणित कर्तव्य अधोगामी, दुष्प्रवृत्ति का परिणाम है नरक। उसमें द्वेष, क्रोध, असन्तोष, रोष आदि मानसिक विक्षोभ भरे पड़े हैं। साथ ही मानसिक विपन्नता से शारीरिक रोगों की सृष्टि होती है और व्यवहार में असन्तुलन आ जाने से हर कार्य में असफलता ही मिलती चली जाती है। यही नरक है।
चिन्तन से ही वह विरोधी प्रतिक्रिया उत्पन्न हो सकती है जिसके कारण दुष्कर्मों के प्रति भीतर से घृणा उपजती है, पश्चाताप होता है। यह घृणा और पछतावा ही वे आधार हैं जिनके सहारे भविष्य में वैसा न होने की आशा की जा सकती है। अन्यथा कारणवश उपजा सदाचरण का उत्साह, श्मशान वैराग्य की तरह ठण्डा हो जाएगा और फिर उसी पुराने ढर्रे पर गाड़ी के पहिये लुढ़कने लगेंगे। प्रथम चरण पश्चाताप की उपयोगिता इसी दृष्टि से है कि अन्तःकरण में अनाचार विरोधी प्रतिक्रिया इतने उग्र रूप से उभरे कि भविष्य में उस प्रकार के आचरण की गुँजाइश ही शेष न रह जाय।
चिन्तन कर आत्म विश्लेषण करना, उन्हें न दोहराने का संकल्प एवं विज्ञजनों के समक्ष उनका प्रकटीकरण करते हुए प्रायश्चित का संकल्प लेना।
चिन्तन और लोक मंगल के कार्य में लगाया जिससे उसकी शूली शूल मात्र रह गई। और छोटे भाई ने दुष्कार्यों के परिणाम स्वरूप राजगद्दी के लाभ को सवर्ण मुद्राओं तक सीमित कर दिया’
चिन्तन, मनन करना आवश्यक है, पर निर्णय लेने के बाद अभीष्ट प्रयोजन के लिए तत्परतापूर्वक जुट जाना होता है। चिन्ता का तब अवकाश ही नहीं रहना चाहिए। चिन्ता तो निष्क्रियता की उत्पत्ति भी है और उत्पादक भी। चिन्ता से विक्षुब्ध मन, शक्ति का कितना ह्रास करता है, यह यदि लोग जान जाए तो कभी भी उद्विग्नता और तनाव की जननी चिन्ता को प्रश्रय न दें। अधिकाँश लोग प्रतिकूल परिस्थितियों में चिन्ताग्रस्त होकर हताशा के गहन अन्धकार के विवर्तों, में फँसकर अपना सब कुछ गँवा बैठते हैं।
चिन्तन में घुसी कुत्साओं के उन्मूलन में जुटा देना साधनात्मक व्यायाम प्रक्रिया है जिसके आधार पर आत्मबल बढ़ाया जाता है और देव वर्ग की सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन किया जाता है। इस आत्म परिष्कार के फलस्वरूप उन विभूतियों की चाबी हाथ लग जाती है जो फलस्वरूप उन विभूतियों की चाबी हाथ लग जाती है जो परमेश्वर ने पहले से ही हमारे भीतर रत्न भण्डार के रूप में सुरक्षित कर दी है। साधना अन्तःकरण में वह प्रकाश उत्पन्न करती है, जिससे अपने लक्ष्य और कर्तव्य को समझा जा सके। साधना वह शक्ति प्रदान करती है, जिससे आत्मबल विकसित हो सके और सन्मार्ग पर चलने के लिए पैरों में अभीष्ट क्षमता रह सके। साधना और आकर्षणों को दुत्कारते हुए कर्तव्य की चट्टान पर दृढ़तापूर्वक अग्रसर रहा जा सके और हर विघ्न बाधा का-कष्ट कठिनाई का-धैर्य और सन्तुलन के साथ सामना किया जा सके।
चिन्तन के समय का-तथा उसे व्यवहार में लाने की स्थिति का-जो दिव्य आनन्द है उसका महत्व और मूल्य समझा जाय । निकृष्ट चिन्तन एवं घृणित कर्तव्य अधोगामी, दुष्प्रवृत्ति का परिणाम है नरक। उसमें द्वेष, क्रोध, असन्तोष, रोष आदि मानसिक विक्षोभ भरे पड़े हैं। साथ ही मानसिक विपन्नता से शारीरिक रोगों की सृष्टि होती है और व्यवहार में असन्तुलन आ जाने से हर कार्य में असफलता ही मिलती चली जाती है। यही नरक है।
चिन्तन पर अन्तः प्रेरणा उठती है और उसी ऊर्जा के सहारे मनुष्य दिशा निर्धारित करते-उठते एवं गिरते देखे जाते हैं। अंतःस्रावी ग्रन्थियों की स्थिति सुधारने और समूची वैयक्तिक स्थिति में परिवर्तन करने के लिए वैज्ञानिक उपाय सोचे और प्रयोग में लाये जा रहे हैं, पर उनसे अभीष्ट परिणाम निकल नहीं रहा है। कई बार तो उलटे परिणाम भी देखे गये हैं। उपचार ने लाभ के स्थान पर हानि प्रस्तुत की हैं।
चिन्तन तो अनिवार्य है। किसी रास्ते या कार्य-विशेष को चुनने के पहले उसके सभी पहलुओं पर भली-भांति चिन्तन, मनन करना आवश्यक है, पर निर्णय लेने के बाद अभीष्ट प्रयोजन के लिए तत्परतापूर्वक जुट जाना होता है। चिन्ता का तब अवकाश ही नहीं रहना चाहिए। चिन्ता तो निष्क्रियता की उत्पत्ति भी है और उत्पादक भी। चिन्ता से विक्षुब्ध मन, शक्ति का कितना ह्रास करता है, यह यदि लोग जान जाए तो कभी भी उद्विग्नता और तनाव की जननी चिन्ता को प्रश्रय न दें।
चिन्तन और प्रयास उनके मन में चलता रहता है। अधिकार का उपयोग वे नहीं करते मात्र कर्तव्य का पालन करते रहने से ही वे अपनी मित्रता की यथार्थता प्रमाणित करते रहते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-December
चिन्तन और दृष्टिकोण में आज जो संकीर्णता भरी हुई है वह नहीं ही होती ।
चिन्तन-मनन के बाद होता है। लीमर जीव जब अपने शरीर की सफाई करता है तो उसके बहुत से बाल दाँतों में फँस जाते हैं। उस बेचारे को जिन्दगी भर इस परेशानी का सामना करना पड़ता यदि रचयिता ने उसकी जीभ के नीचे एक दूसरी छोटी कंघीनुमा जीभ नहीं लगाई होती। इसकी सहायता से वह फँसे हुए वालों को निकाल लेता है। यदि इस सहायक जीभ को नहीं लगाया गया होता तो बेचारे का मुँह न जाने कब का सड़ जाता।
चिन्तन विश्लेषण चल रहा है। उसके अस्तित्व के एक एक भाग को समग्र शास्त्र का रूप दिया गया है। शरीर शास्त्र , मन शास्त्र , समाज शास्त्र, अर्थ शास्त्र जैसे खण्डों की जानकारी भी है तो, उपयोगी पर समग्र मानव को समझे बिना उसकी मूल प्रकृति पर ध्यान दिये बिना एकांगी आंशिक समाधानों से कुछ बनेगा नहीं। एक छेद सीते-सीते दूसरे और नये फट पड़े तो उस मरम्मत से कब तक काम चलेगा। विज्ञान की शोधें मनुष्य की कतिपय आवश्यकताओं को पूरा करने और जानकारियों को बढ़ाने के उद्देश्य से पूरी की जाती है किन्तु उस महाविद्या की ओर से क्यों उदासी है जिसे समग्र मानव की विवेचना साइंस आफ मैन कह सकते हैं।
चिन्तन और चरित्र से कइयों को अनुयायी बनाता है और कितनों को ही कष्ट कारक परिस्थितियों में धकेलता है। अस्तु समग्र प्रगति की सुख-शान्ति दायिनी दिशा अभीष्ट हो तो व्यक्ति के अन्तराल को परिष्कृत बनाने के लिए भी उतने ही प्रयत्न करने पड़ेंगे जितने कि भौतिक सुविधा संवर्द्धन के लिए किये जाते हैं। भीड़ को दिशा निर्देश देने का काम चलता रहे पर व्यक्तित्वों की गहरी परतें कितनी मूल्यवान है इसका महत्व आँखों से ओझल न होने पाये इसका पूरा-पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए।
चिन्तन अद्वैतवादी है।”
चिन्तन और अधूरे श्रम से हर काम अधूरा और कुरूप रहता है। असफलताएँ प्रायः इस अधूरेपन की ही प्रतिक्रियाएँ होती हैं। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, प्रौढ़ मनःस्थिति का व्यक्ति अपनी समूची जागरूकता और क्रियाशीलता वर्तमान के निरूपण में-नियोजन में केन्द्रित करता है। इससे अंतःक्षेत्र में आत्मशक्ति बढ़ने का और बाह्य क्षेत्र में श्रेय साधन उपलब्ध करने का सुअवसर मिलता है। जे0 कृष्णामूर्ति ठीक ही कहते हैं- जो वर्तमान में जीवित है वही जीवित है अन्य तो अज्ञान में भटकते हैं।
चिन्तन और आदर्श क्रिया-कलाप प्रकारान्तर से इसी को महानता कहते हैं।
चिन्तन तन्त्र पर छाई हुई शिथिलता को दूर किया जाय। इसके लिए ध्यान धारण के सभी उपचार न्यूनाधिक मात्रा में लाभदायक ही सिद्ध होते हैं। उपासना में ध्यान धारण पर जोर देने के अनेक लाभों आध्यात्मिक लाभों के अतिरिक्त एक अतिरिक्त लाभ यह भी है कि उसे करते रहने पर विस्मृति की शिकायत पनपने नहीं पाती।
चिन्तन के आधार पर ही अपना समय गुजारते हैं। वर्तमान और भविष्य के लिए उपयुक्त साधन उनके पास उस स्थिति में नहीं होते अस्तु भूतकालीन स्मृतियों का दबाव ही उन पर छाया रहता है। सम्भवतः मृतात्माओं का नाम करण ‘भूत’ इसी आधार पर किया गया हो। पुनर्जन्म में कइयों को कितनी ही घटनाएँ पिछले जीवन की याद बनी रहती है और ऐसे कथन बहुत बार आश्चर्यजनक रीति से सत्य पाये जाते हैं। इतनी तो हर किसी को होता है कि भूतकाल के अनुभव एवं संस्कार जन्म-जन्मान्तरों तक चलें जाते हैं।
चिन्तन को वर्तमान पर केन्द्रित कर सकना ठीक तरह बन ही नहीं पड़ता।
चिन्तन और रुझान में आमूल-चूल परिवर्तन होना चाहिए। प्रचलित मान्यताओं में बहुत थोड़ी ऐसी बच गई हैं जिनमें बदली हुई परिस्थितियों को देखते हुए प्रगति में सहायक और शान्ति की संरक्षक कहा जा सके। यदि इस पुनर्निर्माण की ओर ध्यान न दिया गया तो वैयक्तिक विद्वेष और सामाजिक कलह बढ़ते ही चले जाएँगे। इन अवांछनीयताओं की अभिवृद्धि से विनाश ही प्रस्तुत होगा। बढ़े हुए सुख साधनों से भी पतन की दुःखदायी प्रतिक्रिया को रोका न जा सकेगा।
चिन्तन और कर्म का समन्वय करते हुए अपने व्यक्तित्वों को एक सफल प्रयोगशाला के रूप में प्रस्तुत कर सके तो जन साधारण में भी उसके लिए उत्साह उत्पन्न होगा। लक्ष्य ऊँचा हो और संकल्प प्रखर तो फिर मनुष्य के लिए बड़े से बड़ा उत्सर्ग कर सकना भी कुछ कठिन नहीं है। चिन्तन और व्यवहार का समन्वय करती हुई आदर्शवादी आस्थाओं की स्थापना ही अपने युग की महान क्रान्ति हो सकती है। उज्ज्वल भविष्य की आशा उसी से बँधेगी। इसका नेतृत्व करने के लिए ऐसे अग्रगामियों की आवश्यकता है जो लोक शिक्षण के लिए सबसे प्रभाव शाली उपाय आदर्श के अनुरूप आत्म निर्माण अपना सकें और जलते दीपक द्वारा नये दीपकों के जलने की परम्परा स्थापित कर सकें।
चिन्तन दृष्टि। संस्कृति को प्राण और सभ्यता को काया कह सकते हैं। उत्कृष्ट आस्थाएँ मनुष्यता का प्राण है और सद्व्यवहार का लोकाचार उसका कलेवर। कलेवर कितना ही सुसज्जित क्यों न हो यदि उसके भीतर निवास करने वाली चेतन सत्ता निष्प्राण है तो फिर उस सुसज्जा से कितना प्रयोजन पूरा हो सकेगा। जीवन स्तर 'लिविंग स्टेंडर्ड' बढ़े इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है, पर यदि जीवन को दिशा देने वाला आस्था परक स्तर गया-गुजरा ही बना रहा तो मात्र जीवनयापन की सुविधायें बढ़ जाने से क्या काम चलेगा ?
चिन्तन। जीवन को और उसके संपर्क क्षेत्र को अधिक समुन्नत बनाने वाले प्रयासों एवं साधनों का अभिवर्धन। मानवी गतिविधियों का प्रवाह यदि अपव्यय से हटाकर सृजन में नियोजित किया सके तो समय की कुरूपता को भविष्य के स्वर्गीय सौंदर्य में बदल देना सहज सम्भव हो सकता है।
चिन्तन और रुझान का परिवर्तन। अनौचित्य के परित्याग और औचित्य को स्वीकार करने का नये सिरे से साहस भरा प्रयास। अपराध और अनाचार का वातावरण बनाने वाली बुद्धि के लिए क्या यह सम्भव नहीं कि वह अपनी गतिविधियाँ सुधारे जो मनोयोग तथा श्रम प्रयत्न को उन कामों में लगाये जिनमें वैचारिक श्रेष्ठता और व्यावहारिक शालीनता का अभ्यास प्रयोग के आने लगे। जिस प्रकार आज एक दूसरे से निष्कृष्टता का प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं उसी तरह बदली हुई परिस्थितियों में एक दूसरों की सद्भावना का भी अनुकरण करने के लिए उत्साह ग्रहण कर सकते हैं। भुखमरी, बेकारी, बीमारी, अशिक्षा एवं पिछड़ेपन से ग्रसित असंख्य मानवों में सुयोग्य एवं सम्पन्न व्यक्तियों की सहायता पग पग पर चाहिए।
चिन्तन और व्यवहार का समन्वय करती हुई आदर्शवादी आस्थाओं की स्थापना ही अपने युग की महान क्रान्ति हो सकती है। उज्ज्वल भविष्य की आशा उसी से बँधेगी। इसका नेतृत्व करने के लिए ऐसे अग्रगामियों की आवश्यकता है जो लोक शिक्षण के लिए सबसे प्रभाव शाली उपाय आदर्श के अनुरूप आत्म निर्माण अपना सकें और जलते दीपक द्वारा नये दीपकों के जलने की परम्परा स्थापित कर सकें।
चिन्तन में गहराई हो, साथ ही श्रद्धा युक्त नम्रता भी। अन्तरात्मा में दिव्य-प्रकाश की ज्योति जलती रहे। उसमें प्रखरता और पवित्रता भरी रहे तो पर्याप्त है। पूजा के दीपक इसी प्रकार टिमटिमाते हैं। आवश्यक नहीं कि उनका प्रकाश बहुत दूर तक फैले।
चिन्तन की उपयोगिता इतनी ही है कि उसके आधार पर वर्तमान की गतिविधियों को सुनियोजित किया जाय। भूत या भविष्य में उलझे रहने वाले मस्तिष्क को वर्तमान पर समुचित ध्यान देना कठिन हो जाता है। कल्पनाएँ भावुकताएँ इस सीमा तक बढ़ जाती है कि चिन्तन को वर्तमान पर केन्द्रित कर सकना ठीक तरह बन ही नहीं पड़ता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-May
चिन्तन और भ्रष्ट क्रिया-कलाप के रहते अन्य किसी उपाय से इस आनन्द का दर्शन हो नहीं सकता। आनन्द की आकांक्षा करने वाले हर व्यक्ति को आनन्दमय कोश की गहराई में उत्तर कर उस उद्गम स्त्रोत तक पहुँचना पड़ता है जहाँ से दिव्य आनन्द की प्रकाश किरणें फूटती है।
चिन्तन का स्तर उत्कृष्ट रखे और क्रिया कलाप में आदर्शवादिता के समावेश का अधिकाधिक प्रयत्न करे। धर्म और अध्यात्म का ढाँचा इसी लिए खड़ा किया गया है। आज तो इन चरित्र निर्माण और सामाजिक सहयोग के आधार भूत तन्त्र का उपयोग ठीक उलटे प्रयोजनों में हो रहा है। सत्कर्मों से जो फल मिलता है उसे छूट-पुट कर्मकाण्डों से ही सम्भव बना कर उस दिशा में कष्ट सहने और त्याग करने की उमंग को ही मटियामेट किया जा रहा है। इसी प्रकार दुष्कर्मों के प्रति निर्भयता उत्पन्न करने के लिए सस्ते पाप नाशक उपायों का प्रतिपादन किया जा रहा है।
चिन्तन तन्त्र को कल्पना संस्थान को प्रखर बनाने में जितनी सफलता मिलती है उतना ही आत्मिक प्रगति के लिए की जाने वाली साधनाएँ सरल एवं सफल होने लगती है। अस्त त्राटक को - ध्यानयोग को प्रथम प्रक्रिया माना गया हैं।
चिन्तन और क्रिया में चमकता है। यह चमक ही बौद्धिक क्षेत्र में तेजस्विता और क्रिया क्षेत्र में ओजस्विता कहलाती है। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में यही मनस्विता प्रतिभा बनकर दीप्तिमान होती है। प्राण शक्ति ही सर्वतोमुखी समर्थता कही जाती है।
चिन्तन पद्धति का अभ्यास करता है। अपने सद्गुणों को बढ़ाता है और दूसरों का सद्गुण प्रधान पक्ष खोजता है सृष्टि में यों कुरूपता भी विद्यमान् है और मनुष्य में तामसिकता के अंश भी मौजूद है, बदलने और सुधारने के लिए रचनात्मक प्रवृत्ति की आवश्यकता है। असहयोग, विरोध और दण्ड जैसे कुकृत्यों का निषेध नहीं है, पर वे द्वेष और घृणा से प्रेरित नहीं, सुधार की हित कामना से होने चाहिए। इस प्रकार संसार के अशुभ पक्ष से निपटते हुए भी आन्तरिक उत्कृष्टता स्थिर रखा जा सकती है। श्रेष्ठता का पक्ष तो अधिक मात्रा में है ही अन्धकार से प्रकाश इस संसार में अधिक है।
चिन्तन, मनन अंतःक्षेत्र में चलता रहे। उस अवधि में अपने गुण कर्म स्वभाव को श्रेष्ठ बनाने का अभ्यास किया जाय। वैसी गतिविधियाँ अपनाई जाये जिससे भविष्य में व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश स्थायी तथ्य बन जाय। इन यात्राओं में चिन्तन और क्रिया-कलाप उच्चस्तरीय रखने से ही तीर्थ यात्रा का फल मिलता है वस्तुतः यह आचरण बन्ध नहीं पुण्यफल का प्रधान कारण है-
चिन्तन सुसंस्कृत दृष्टिकोण एवं सुसंयत क्रिया-कलाप के रूप में देखा जा सकता है।
चिन्तन परक और भाव परक परिष्कार करने के लिए साधकों -चित जीवन प्रक्रिया का निर्धारण करना चाहिए। भूमि की उर्वरता पर बीज का उगना और फलित होना निर्भर रहता है। साधना अपने आपे को साधने से-व्यवस्थित एवं परिष्कृत होने के साथ आरम्भ होती है। इसके लिए प्रस्तुत दोष दुर्गुणों का-पिछले दिनों की अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों का विवरण प्रस्तुत करना और उनके निराकरण के लिए जीवन प्रक्रिया में किस प्रकार परिवर्तन किया जाय यह निर्धारण आवश्यक है। वन पड़े पापों का लेखा जोखा सामने हो तो उसके प्रायश्चित परिमार्जन का रास्ता निकलेगा।
चिन्तन और क्रिया-कलाप उच्चस्तरीय रखने से ही तीर्थ यात्रा का फल मिलता है वस्तुतः यह आचरण बन्ध नहीं पुण्यफल का प्रधान कारण है-
चिन्तन की अशुभ एवं शुभ प्रतिक्रिया ही समझा जाना चाहिए। हर व्यक्ति इमर्सन की तरह ही अपने लिए अपने सुखद स्वर्ग का सृजन दृष्टिकोण को परिष्कृत करके सहज ही कर सकता है। समाधि से स्वर्ग को अनुभूति और प्राप्ति होना सुनिश्चित है। इसी का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-
चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। इसके अतिरिक्त एक और भी कारगर उपाय है- मनोमय कोश की योग साधना। काम-काजी मस्तिष्क समेत मन-क्षेत्रीय की स्तरीय परतें मनोमय कोश की परिधि में आती है। जिस प्रकार वन्य पशुओं को साधकर पालतू बनाया जाता है। उनसे अनेक प्रकार के लाभ लिये जाते हैं, उसी प्रकार मन के महादैत्य की यदि साधना द्वारा सधा लिया जाय तो ऐसे लाभ मिल सकते हैं जिन्हें देवोपम उपलब्धियाँ प्राप्त करना कहने में अत्युक्ति नहीं मानी जा सकती।
चिन्तन के दुर्दिन चले गये। सर्वत्र आनन्द और उल्लास ही आलोकित हो रहा है। ईश्वरीय प्रकाश शरीर में सत्प्रवृत्ति ओर मन की सद्भावना बन कर ज्योतिर्मय हो चला। अँधेरे में भटकने वाली काली निशा का अन्त हो गया, भगवान की दिव्य ज्योति ने सर्वत्र अपना आधिपत्य जमा लिया।
चिन्तन के आधार पर प्रकाश बिन्दु देव प्रतिमा की स्पष्ट झाँकी कर सकना सम्भव हो सके। मंद एवं भोंथरे चिन्तन प्रक्रिया में कोई ध्यान प्रतिमा स्पष्ट रूप से नहीं उभरती। कल्पना चित्र स्पष्ट नहीं होते। तब एकाग्रता का एक महत्त्वपूर्ण मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। ऐसी दशा में नादयोग आदि से किया जाने वाला शब्दयोग एवं ध्यान धारणा के आधार पर किया गया बिन्दुयोग में से एक भी सफल नहीं होता।
चिन्तन और घृणित चरित्र की स्थिति में सुधार, परिवर्तन न हो तो फिर समझना चाहिए कि पूजा-पाठ के उपचार मात्र कौतुक कौतूहल ही बनकर रह गये। घिनौने व्यक्तित्व किसी दैवी शक्ति के प्रिय पात्र नहीं बन सकते । उनका कोई साधन विधान आत्म-शक्ति के अभिवर्धन में सहायक नहीं हो सकता। इसके बिना वे लाभ मिल ही नहीं सकते जो आध्यात्मिक उपलब्धियों के नाम से जाने जाते हैं। धूर्तता के आधार पर जादूगरों
चिन्तन प्रक्रिया में कोई ध्यान प्रतिमा स्पष्ट रूप से नहीं उभरती। कल्पना चित्र स्पष्ट नहीं होते। तब एकाग्रता का एक महत्त्वपूर्ण मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। ऐसी दशा में नादयोग आदि से किया जाने वाला शब्दयोग एवं ध्यान धारणा के आधार पर किया गया बिन्दुयोग में से एक भी सफल नहीं होता। तब मात्रा प्रत्यक्ष प्रतिमाओं को देखकर- कीर्तन गायन तथा श्रवण सत्संग आदि स्थूल उपायों में मन की भगदड़ रोकने के मोटे प्रयोग किये जाते हैं ।
चिन्तन के दुष्परिणाम आये दिन संकटों और विग्रहों के रूप में भुगतने पड़ते हैं।
चिन्तन का स्तर एवं दृष्टिकोण ही प्रधान भूमिका प्रस्तुत करता है। मानसिक विकास का मूल्यांकन इसी स्थिति को देखकर किया जाता है। उच्च शिक्षा प्राप्त, क्रिया कुशल, तीक्ष्ण बुद्धि लोगों में से कितने ही कुमार्गगामी देखे जाते हैं, वे अपने और दूसरों के लिए अभिशाप सिद्ध होते हैं। महत्ता मस्तिष्कीय तीक्ष्णता की नहीं मानसिक स्तर के उत्कृष्ट होने की है। उसे परिष्कृत चिन्तन सुसंस्कृत दृष्टिकोण एवं सुसंयत क्रिया-कलाप के रूप में देखा जा सकता है।
चिन्तन तथा कर्म का समुचित लाभ मिल सकने की स्थिति बन जाती है, इसलिए आनन्दमय कोश की साधना के प्रथम चरण में समाधि परक प्रयोग किये जाते हैं। यह जागृत समाधि है। इसमें मूर्च्छित होने की आवश्यकता नहीं पड़ती, वरन् प्रलोभन एवं भय की उत्तेजनाओं को शान्त करना पड़ता है। ऐषणाओं के आवेश ठण्डे पड़ने पर मनुष्य अपना लक्ष्य देख पाता है। निर्धारित दिशा में चल पड़ने की बात इससे पूर्व बन ही नहीं पड़ती ।
चिन्तनम्।
चिन्तन की दिशा निर्धारण हो जाना और आकांक्षाओं एवं विचारणाओं का उत्कृष्टता की दिशा में बहने लगना ही समाधि है। समाधि का अभ्यास होने पर बिखराव भटकाव समाप्त होता है और चिन्तन तथा कर्म का समुचित लाभ मिल सकने की स्थिति बन जाती है, इसलिए आनन्दमय कोश की साधना के प्रथम चरण में समाधि परक प्रयोग किये जाते हैं। यह जागृत समाधि है। इसमें मूर्च्छित होने की आवश्यकता नहीं पड़ती, वरन् प्रलोभन एवं भय की उत्तेजनाओं को शान्त करना पड़ता है। ऐषणाओं के आवेश ठण्डे पड़ने पर मनुष्य अपना लक्ष्य देख पाता है।
चिन्तन की दिशा धारा सही न होने पर अनुपयुक्त सूझ पड़ता है और उपयुक्त क्या हो सकता है? यह तथ्य पकड़ में ही नहीं आता। ऐसे लोगों की विकृत चिन्तन के दुष्परिणाम आये दिन संकटों और विग्रहों के रूप में भुगतने पड़ते हैं।
चिन्तन का नाम है। उसे कोई स्थान विशेष नहीं माना जाना चाहिए, वह वस्तुतः एक दृष्टिकोण भर है। नरक और स्वर्ग को निकृष्ट ओर उत्कृष्ट चिन्तन की अशुभ एवं शुभ प्रतिक्रिया ही समझा जाना चाहिए। हर व्यक्ति इमर्सन की तरह ही अपने लिए अपने सुखद स्वर्ग का सृजन दृष्टिकोण को परिष्कृत करके सहज ही कर सकता है। समाधि से स्वर्ग को अनुभूति और प्राप्ति होना सुनिश्चित है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-June
चिन्तन में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता भर देती हैं ऐसे ही व्यक्ति महामानव ऋषि, देवता एवं अवतार के नाम से पुकारे जाते हैं। ‘सो’ में भगवान का शासन आत्म-सत्ता पर स्थापित करने और ‘हम’ में अहंता का विसर्जन करने का भाव है। प्रकारान्तर से इसे महान् परिवर्तन का आन्तरिक कायाकल्प की बीजारोपण कह सकते हैं सोऽहम् साधना का यही है भावनात्मक एवं व्यावहारिक स्वरूप
चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है। शासन परिवर्तन जैसी राज्यक्रान्ति जैसी यह भाव भूमिका है जिसमें अनाधिकारी अनाचारी शासनसत्ता का तख्ता उलट कर उस स्थान पर सत्य न्याय और प्रेम संविधान वाली धर्म सत्ता का राज्याभिषेक किया जाता है। सोऽहम् साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अन्तःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियन्त्रण नहीं रहा उसका समग्र संचालन देव सत्ता द्वारा किया जा रहा है।
चिन्तन का स्वरूप यह होना चाहिए कि साँस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ काय कलेवर में भीतर प्रवेश कर रहें है। यह प्रवेश मात्र आवागमन नहीं है, वरन् प्रत्येक अवयव पर सघन आधिपत्य बन रहा है। एक एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगों के चित्र की कल्पना करनी चाहिए और अनुभव करना चाहिए उसमें भगवान की सत्ता चिरस्थायी रूप से समाविष्ट हो गई। हृदय फुफ्फुस, आमाशय, आँखों ,गुर्दे जिगर, तिल्ली आदि में भगवान का प्रवेश हो गया। रक्त के साथ प्रत्येक नस नाडी और कोशिकाओं पर भगवान ने अपना-शासन स्थापित कर लिया।
चिन्तनम्। आसनं तद्विजानीयादन्यत् सुखविनाशनम्॥ (तेजबिन्दू0)
चिन्तन एवं कर्तव्य अपनाया जाय तो उस रीति-नीति को दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा
चिन्तन) परम सिद्धिदायक है। इसे ही ‘हंस’, ‘हंसो’ या ‘सोह’ मंत्र कहते हैं।
चिन्तन मौन आहार तप प्रत्याहार धारणा ध्यान निदिध्यासन, सहित जप हवन वस्तु, मुद्रा, प्राणायाम जल के नाम पर मात्र गंगाजल का उपयोग त्राटक आदि की साधनाएँ साधक की व्यक्तिगत स्थिति को देखते हुए पृथक् पृथक् बताई जायेंगी। हर साधक का एक जैसा क्रम न रहने से उन्हें सामूहिक कराया न जाएगा वरन् हर साधक की साधना उसी की स्थिति के अनुरूप होगी और प्रतिक्रिया को गम्भीरतापूर्वक देखते हुए आवश्यकतानुसार परिवर्तन किये जाते रहेंगे यह सब नये आरण्यक आश्रम में ही सम्भव है। शान्ति कुँज में चल रहें ब्रह्म वर्चस सत्र तो उसकी पूर्वभूमा मात्र है। आरण्यक बन तो रहा है पर आर्थिक कारणों से निर्माण की गति धीमी है। जब भी उसमें निवास की स्थिति बन जाएगी तभी उपरोक्त साधना क्रम आरम्भ कर दिया जाएगा तब तक साधकों के नाम नोट किये जाते रहेंगे और आरम्भ होते ही उन्हें बुलाने में प्राथमिकता रखने के आश्वासन भेजे जाते रहेंगे।
चिन्तन से विवेक दृष्टि उपलब्ध होती है। कर्तव्य पालन ही अपनी आकांक्षा बन कर रह जाता है। स्वामित्व भगवान का -सेवा धर्म अपना” इतना सोच लिया जाय तो समूचा दृष्टिकोण ही बदल जाता है। तृष्णा- अहंता के कारण जो अकर्म करने पड़ते हैं और अनावश्यक चिन्ताओं के बोझ शिर पर लदे रहते हैं, उन सबसे सहज ही छुटकारा मिल जाता है।
चिन्तन प्रवाह एवं अभ्यस्त कुसंस्कारों का परिशोधन भी सम्भव हो सके। चिन्तन और चरित्र को परिष्कृत बना सकने में समर्थ साधना पद्धति ही उपचारात्मक मन शास्त्र कह सकते हैं। विश्व के मूर्धन्य मनोविज्ञानवेत्ता मात्र विवेचनाएँ और व्याख्याएँ कर सके है उसके एक कदम आगे बढ़ कर हमें विकृतियों के निराकरण का कारगर उपाय भी खोजना है। निस्संदेह यह कार्य अब कभी भी सम्पन्न होगा तब उसमें योग साधना के ही आधारों को अपनाना पड़ेगा। मान्यताओं के गहन मर्मस्थल का स्पर्श इसी आधार पर सम्भव हो सकता है।
चिन्तन, (साँस लेते समय ‘सो’ छोड़ते समय ‘ह’ का चिन्तन) परम सिद्धिदायक है। इसे ही ‘हंस’, ‘हंसो’ या ‘सोह’ मंत्र कहते हैं।
चिन्तन और चरित्र को परिष्कृत बना सकने में समर्थ साधना पद्धति ही उपचारात्मक मन शास्त्र कह सकते हैं। विश्व के मूर्धन्य मनोविज्ञानवेत्ता मात्र विवेचनाएँ और व्याख्याएँ कर सके है उसके एक कदम आगे बढ़ कर हमें विकृतियों के निराकरण का कारगर उपाय भी खोजना है। निस्संदेह यह कार्य अब कभी भी सम्पन्न होगा तब उसमें योग साधना के ही आधारों को अपनाना पड़ेगा। मान्यताओं के गहन मर्मस्थल का स्पर्श इसी आधार पर सम्भव हो सकता है। ब्रह्मवर्चस् आरण्यक से इस स्तर की शोधें करने का विचार है।
चिन्तन में तनिक भी समावेश न होने पाये, इस पर तीखे नजर रखी जाय। जब कुछ ऐसा होता दिखाई पड़े तो उसे रोकने के लिए अपने आपको सजग किया जाय। अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों से हर घड़ी जूझते रहने के लिए जागरूक प्रहरी की हमें भूमिका निबाहनी चाहिए। चोर घर में घुसने न पाये, घुसने का दुस्साहस करे तो मार भगाया जाय इसी में सतर्कता की सराहना है। इस संदर्भ में हमें निरन्तर जागरूक रहना चाहिए।
चिन्तन करना पड़ता है कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक व्यावहारिक यथार्थता के-प्रत्यक्ष तथ्य के-रूप में प्रस्तुत दृष्टिगोचर होने लगें।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की दिशा में साहस भरे कदम उठाने से लिए अदम्य उत्साह का-भावभरी उमंगों को उठना यह है उल्लास। भगवान इन्हीं दो प्रेरणाओं को निरन्तर पेण्डुलम गति से प्रदान करते रहते हैं। मानव जीवन जैसी सृष्टि की अनुपम उपलब्धि को पाकर यदि अन्तःकरण आनन्दित रहे और छोटे मोटे अभावों की और अधिक ध्यान न देकर चारों और बिखरी हुई सदाशयता का अनुभव करते हुए सन्तुष्ट सन्तुलित रहे तो समझना चाहिए आनन्द की उपलब्धि हो रही है हर्षातिरेक में उछलने कूदने या बढ़ चढ़कर शेखीखोरी की बातें करने का नाम आनन्द नहीं है। उस स्थिति में दृष्टिकोण परिपक्व हो जाता है और परिष्कृत, इसलिए जिन अभावों और असफलताओं में दूसरे लोग उद्विग्न उत्तेजित हो उठते हैं, उन्हें वह विनोद कौतुक भर समझते हुए अपनी मनःस्थिति को सुसंतुलित बनाये रहता है। जिनकी मनोभूमि ऐसी हो उसे आनन्द की प्राप्ति हो गई ऐसा कहा जा सकता है।
चिन्तन प्रक्रिया हुई। शक्ति संवर्धन के लिए व्यक्तिगत जीवन में इन्द्रिय निग्रह एवं मनोनिग्रह के द्वारा अपव्यय के छिद्र बन्द किये जोते हैं। दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन कर सकने योग संकल्प साहस शौर्य एवं पराक्रम उभारना पड़ता है। ड़ड़ड़ड़ तप इसी धुरी के इर्द-गिर्द परिभ्रमण करते हैं। दूसरों की सहायता कर सकने, वातावरण को सुधारने ड़ड़ड़ड़ अवांछनीयताओं को निरस्त करने के लिए भागीरथ दधिची, च्यवन, विश्वमित्र जैसे और विशिष्ट तप करने पड़ते हैं।
चिन्तन का नियोजन किस प्रकार होगा इसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए। यह कार्य प्रातःकालीन ब्रह्म संध्या की तरह है। इसे अवकाश न मिलने की शिकायत किये बिना, कोई भी बिना किसी कठिनाई, विधि-विधान या साधन उपकरण के अत्यन्त सरलतापूर्वक करता रह सकता है। इसे आत्म-बोध की योग साधना कहा जाता है।
चिन्तन हो सके वही आसन योगी को उपादेय है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-January
चिन्तन की दृष्टि से दूरदर्शी विवेकवान् आत्मानुशासन की दृष्टि से प्रखर, व्यक्तित्व की दृष्टि से आत्मानुशासन की दृष्टि से आत्मावलम्बी और सम्मानित हर श्रेष्ठ मनुष्य में यह विशेषताएँ होनी चाहिए। चरित्र की दृष्टि से उदार और स्वभाव की दृष्टि से मृदुल एवं हँसते-हँसाते रहने वाला उसे होना चाहिए। सादगी और सज्जनता मिले जुले तत्त्व हैं। आन्तरिक विभूतियाँ और बाह्य साधन सम्पत्तियों का सुव्यवस्थित सदुपयोग कर सकने वालों को सुसंस्कृति कहते हैं। अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को समझने वाले और उनके पालन को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर चलने वालों को सभ्य कहा जाता है।
चिन्तन और कर्तृत्व को उत्कृष्ट बनाना ही आध्यात्मिक प्रगति है। इससे कम कुछ भी नहीं। सही दिशा में चलने पर मनुष्य में देवत्व के उदय की प्रक्रिया का प्रारम्भ अनिवार्य है। योग वस्तुतः एक भाव विज्ञान है, जो जीव को ब्रह्म से चिरमिलन की भाव भूमिका की और ले जाता है। लघु को महान् बनाने की यह विद्या है।
चिन्तन-मनन का।
चिन्तन ओर चेतन क्षेत्र शिथिल रहता है। इसी का लाभ उनके अचेतन को मिलता है। कुत्तों की घ्राण-शक्ति अति सूक्ष्म होती है। चमगादड़ के ज्ञानतन्त्र राडार क्षमता से सम्पन्न होते हैं। उसका अचेतन मस्तिष्क अपने साधारण से शरीर द्वारा ही विभिन्न वस्तुओं से उत्सर्जित तरंग को पहचानने में समर्थ होता है ओर इसी कारण से अँधेरे में भी वह अपने परिवेश का तथा वहाँ की वस्तुओं का स्वरूप एवं स्थान समझकर बिना किसी वस्तु से टकराये, उड़ने का क्रम जारी रखे रहता है।
चिन्तन ही मनोविकारों को नष्ट करता है। इसके लिए स्वाध्याय सत्संग, मनन-चिन्तन द्वारा मनः स्थिति में कुविचार फैल ही नहीं सकते। ब्रह्मचर्य व्रतधारी महापुरुषों, हनुमान्, भीष्म, शंकराचार्य, समर्थ गुरु रामदास, विवेकानन्द आदि के उज्ज्वल चरित्रों का स्मरण-चिन्तन-मनोभूमि के पवित्र संस्कारों को सुदृढ़ बनाता है। स्वादेन्द्रिय और कामेन्द्रिय की स्थूल एवं सूक्ष्म लिप्साओं पर नियन्त्रण ही इन्द्रियनिग्रह की दिशा व विधि है।
चिन्तन कहते हैं। मनन से आत्म-समीक्षा का और अवांछनीयताओं का परिशोधन आता है। चिन्तन से आत्म निर्माण और आत्म-विकास की प्रक्रिया जुड़ती है।
चिन्तन-शक्ति एवं संकल्प शक्ति को शिथिल करते हुए वहाँ लगे तेजस् को अचेतन में नियोजित किया जाता है, तभी अनुपम दिव्यताएँ प्रकट होना शुरू होती हैं। इस दिशा में जो जितनी अधिक प्रगति करता है वह उतना ही समर्थ सिद्ध पुरुष कहा जाता है। बौद्धिक चेतना नियन्त्रित रहे और वह अचेतन को दबाने की बजाय उसकी सहायता करे, यही योगसाधना की दिशा हैं।
चिन्तन तत्त्व में उत्कृष्टता भरने की आवश्यकता यांत्रिक पद्धति कदाचित ही पूरी कर सकेंगी।
चिन्तन एवं क्रिया-कलाप अपनाये रहते हैं। उनका स्वार्थ इस परिधि से आगे नहीं बढ़ता। जीवन सम्पदा का इसी कुचक्र में भ्रमण करते हुए कोल्हू के बैल जैसी जिन्दगी पूरी कर लेते हैं। मनुष्य का पद बड़ा है। अन्य प्राणियों की तुलना में ईश्वर ने उसे अनेकों असाधारण क्षमता दिव्य धरोहर की तरह दी है और अपेक्षा की है कि उन्हें इस संसार को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए प्रयुक्त किया जाय।
चिन्तन तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, वरन् उस दिशा में अपनी श्रद्धा की गहराई एवं जीवन्त कर्मनिष्ठा का परिचय भी देना चाहिए। यह बसन्त पर्व इतने उत्साह के साथ मनाया जाना चाहिए कि उसे स्वर्ण-जयन्ती साधना वर्ष की उत्साहवर्धक पूर्णाहुति के स्तर का माना जा सके।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाये रहने पर यह सम्पदा क्रमिक गति से संचित होती है। चंचल बुद्धि वाले नहीं संकल्प-निष्ठ सतत् प्रयत्नशील और धैर्यवान् व्यक्ति ही इस वैभव का उपार्जन कर सकने में समर्थ होते हैं। चक्की के दोनों पाटों के बीच में गुजरने वाला अन्न ही आटा बनता है। सद्विचार और सत्कर्म के दबाव से व्यक्तित्व का सुसंस्कृत बन सकना सम्भव होता है। अपना लक्ष्य यदि आदर्श मनुष्य बनना हो तो इसके लिए आवश्यक उपकरण अलंकार जुटाये जाते रहेंगे इन्हीं प्रयत्नों का परिणाम समयानुसार आत्म-निर्माण के रूप में परिलक्षित होता दिखाई देगा।
चिन्तन आत्म-सुधार आत्म-निर्माण और आत्म-विकास के नाम से निरूपित किया है। इन चारों प्रयोजनों को दो भागो में बाँट कर दो-दो के युग्म बनते हैं। एक को मनन दूसरे को चिन्तन कहते हैं। मनन से आत्म-समीक्षा का और अवांछनीयताओं का परिशोधन आता है। चिन्तन से आत्म निर्माण और आत्म-विकास की प्रक्रिया जुड़ती है।
चिन्तन को दूसरा चरण कहा जाएगा इस प्रक्रिया के लिए पूजा उपचार की तरह कोई विशेष शारीरिक, मानसिक स्थिति बनाने की या पूजा उपचार जैसी कोई साधन सामग्री एकत्रित करने की आवश्यकता नहीं है। चित का शान्त और स्थान का कोलाहल रहित होना ही इसके लिए पर्याप्त नहीं हैं। प्रातः सायं का समय खाली न हो तो सुविधा का कोई अन्य समय निर्धारित किया जा सकता है। आधा घण्टा की सीमा भी अनिवार्य नहीं है। यह काम चलाऊ मापदण्ड हैं।
चिन्तन, घटिया रुचि, घटिया बातों तथा पदार्थों का संचय, घटिया लोगों का संसर्ग संपर्क हमारे जीवन के प्रति घटिया दृष्टिकोण के परिचायक हैं। ये सब हमें निश्चय ही एक दिन शोचनीय अधोगति तक पहुँचा देंगे इस महानाश से बचने के लिए हमें अपने जीवन लक्ष्य सम्बन्धी दृष्टिकोण में उत्कृष्टता लानी होगी। सदा ध्यान से देखते रहना पड़ेगा कि उत्कृष्टता के प्रति ईमानदारी कहीं पर घट तो नहीं रही है। यदि भूल से रंच-मात्र भी हमारा दृष्टिकोण घटियापन से प्रभावित हो गया तो हम क्षमा की पात्रता खो सकते हैं। आगे आने वाली पीढ़ी द्वारा निन्दनीय बन सकते हैं।
चिन्तन और आचरण में में इतना समय एवं मनोयोग लगता है कि उतनी सामर्थ्य वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे किसी उपयोगी कार्य में लगा देने पर उच्चस्तरीय सफलताएँ प्राप्त की जा सकती हैं। जितनी दिलचस्पी अश्लील यौनाचार के इर्द-गिर्द घुमड़ती रहती है, उतनी को ही कला साधना में नियोजित किया जा सके तो उतने भर से मनुष्य अपनी रुचि की संगीत, साहित्य आदि किसी भी कलाकारिता में प्रवीण एवं पारंगत बन सकता है। यही बात अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में है। वे अपनी ललक लिप्साओं के रसास्वादन में भटकती रहती है। यह स्मरण ही नहीं रहता कि उपभोग की समर्थता बनाये रहने के लिए इन्द्रिय शक्ति के संयम और सुनियोजन की कितनी अधिक आवश्यकता है।
चिन्तन अपने आपकी समीक्षा है। अपने दोष दुर्गुणों को ढूँढ़ निकालने का प्रयास भी इसे कहा जा सकता है। प्रयोगशालाओं में पदार्थों का विश्लेषण वर्गीकरण होता है और देखा जाता है कि इस संरचना में कौन-कौन तत्त्व मिले हुए हैं? शवच्छेद की प्रक्रिया में देखा जाता है कि भीतर के किस अवयव की क्या स्थिति थी, उनमें कहीं चोट या विषाक्तता के लक्षण तो नहीं थे। रोगी की स्थिति जानने के लिए उसके मल, मूत्र, ताप, रक्त, धड़कन आदि की जाँच पड़ताल की जाती है।
चिन्तन से बचाने के लिए प्रतिपक्षी पवित्र भावों को मन में लम्बे समय तक स्थान देना चाहिए। सृजनात्मक शुभ चिन्तन ही मनोविकारों को नष्ट करता है। इसके लिए स्वाध्याय सत्संग, मनन-चिन्तन द्वारा मनः स्थिति में कुविचार फैल ही नहीं सकते। ब्रह्मचर्य व्रतधारी महापुरुषों, हनुमान्, भीष्म, शंकराचार्य, समर्थ गुरु रामदास, विवेकानन्द आदि के उज्ज्वल चरित्रों का स्मरण-चिन्तन-मनोभूमि के पवित्र संस्कारों को सुदृढ़ बनाता है। स्वादेन्द्रिय और कामेन्द्रिय की स्थूल एवं सूक्ष्म लिप्साओं पर नियन्त्रण ही इन्द्रियनिग्रह की दिशा व विधि है।
चिन्तन की दिशा धारा ही बदल गई है। अब जिस तरह सोचता हूँ और जिस नीति को अपना रहा हूँ, यदि वह प्रेरणा अब से पहले ही मिल गई होती, तो इतना जीवन व्यर्थ के कार्यों में नष्ट न होता।
चिन्तन करना मानसिक व्यभिचार है और आत्मिक प्रगति में उससे भारी अवरोध आ उपस्थित होता है।
चिन्तन की प्रखरता भी अचेतन द्वारा ही प्रदत्त होती है, यद्यपि प्रतीत यही होता है कि यह सचेतन मन की दक्षता है। बुद्धिमान विवेकशील, दूरदर्शी और शीघ्रता से सही निर्णय लेने में समर्थ तथा सही ढंग से काम करने वाले व्यक्ति अपने अचेतन की गहरी परतों से ही इन विशेषताओं को प्राप्त करते हैं। अचेतन एक तिजोरी है, हम उससे जिस तरह के रत्नों, आभूषणों को आगे कर लेंगे, उनकी ही आभा सचेतन में दीप्त होती दीखेंगी अचेतन एक समुद्र है, जिसमें सभी तरह के रस एवं विष भरे हैं, हम जिसे उभार ले, वे ही सचेतन पर अधिकार जमाए दीखेंगे
चिन्तन और साधनों का इतना अंश बचा रहता है कि उससे परमार्थ प्रयोजनों की भूमिका निबाही जाती रह सके। आत्मीयता का विस्तार होने से शरीर और कुटुम्बियों की ही तरह सभी प्राणी अपनेपन की भावश्रद्धा में बँध जाते हैं और सबका दुःख अपना दुःख और सबका सुख अपना सुख बन जाता है। वसुधैव कुटुम्बकम् की विश्व परिवार की आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावनाएँ बलवती होने पर मनुष्य का स्वार्थ-परमार्थ में परिणत हो जाता है। जो अपने लिए चाहा जाता था वही सब को मिल सके ऐसी आकांक्षा जगती है। जो व्यवहार, सहयोग दूसरों से अपने लिए पाने का मन रहता है।
चिन्तन में निरत थे- परमात्मा की यह सृष्टि कितनी सुन्दर है और सर्वेश्वर की कृति आनन्दप्रद। पक्षी दिन भर के श्रम से थक कर आये अपने घोंसलों में विश्राम से पूर्व चहक रहे थे। लगता था वे अपने बच्चों के साथ बैठ कर सन्ध्या गीत गा रहे हो।
चिन्तन द्वारा मनः स्थिति में कुविचार फैल ही नहीं सकते। ब्रह्मचर्य व्रतधारी महापुरुषों, हनुमान्, भीष्म, शंकराचार्य, समर्थ गुरु रामदास, विवेकानन्द आदि के उज्ज्वल चरित्रों का स्मरण-चिन्तन-मनोभूमि के पवित्र संस्कारों को सुदृढ़ बनाता है। स्वादेन्द्रिय और कामेन्द्रिय की स्थूल एवं सूक्ष्म लिप्साओं पर नियन्त्रण ही इन्द्रियनिग्रह की दिशा व विधि है।
चिन्तन मुद्रा में लीन हुए और फिर बोले-तुम कर्ण का रथ तो हाँक ही रहे हो। वह निश्चय ही बड़ा शूरवीर और शक्ति सम्पन्न है। अर्जुन का उसके सामने टिकना कठिन है। इसलिए तुम युद्ध में कर्ण को निरुत्साहित करते रहना। निरुत्साहित व्यक्ति की आधी सामर्थ्य समाप्त हो जाती है।
चिन्तन व कर्म में अपूर्व साम्य था। श्री विलिस इन्हें पुनर्जन्म की ही घटनाएँ मानते हैं। उनके टिमाना के रूप में जन्म लिया। शोपनहावर बुद्ध के अवतार कहें जा सकते हैं। फिश्टे, हीगल कान्ट को भी भारतीय आत्माएँ कहा जा सकता है।
चिन्तन-मनोभूमि के पवित्र संस्कारों को सुदृढ़ बनाता है। स्वादेन्द्रिय और कामेन्द्रिय की स्थूल एवं सूक्ष्म लिप्साओं पर नियन्त्रण ही इन्द्रियनिग्रह की दिशा व विधि है।
चिन्तन दोनों ही बदल दिये। कुसंस्कार जो जीवन क्रम में सघन बन कर सम्मिलित हो गये थे, अब पतझड़ में गिरने वाले पत्तों की तरह झड़ते चले जा रहें हैं। अगले दिनों बसंती पुष्प-पल्लवों से अपना जीवन वृक्ष शोभायमान होगा, ऐसी आशा प्रबल हो रही है।
चिन्तन (2) आत्म-सुधार (3) आत्म-निर्माण और (4) आत्म विकास के नाम से पुकारा जाता है। इन्हें एक एक करके नहीं वरन् समन्वित रूप से सम्पन्न किया जाता है। रोटी, साग, चावल, दाल का आहार मिला-जुला कर करते हैं। ऐसा नहीं होता कि कुछ समय दाल ही पीते रहे-कुछ शाक खाकर रहे, फिर चावल खाया करे और बहुत दिन बाद केवल रोटी पर ही निर्भर रहे। स्कूली पढ़ाई में भाषा, गणित, भूगोल, इतिहास की पढ़ाई साथ चलती है, ऐसा नहीं होता कि एक वर्ष भाषा दूसरे वर्ष गणित तीसरे वर्ष भूगोल और चौथे वर्ष केवल इतिहास ही पढ़ाया जाय।
चिन्तन मनन उसकी महत्ता व गरिमा का स्मरण कराता है। आज चारों ओर बढ़ रहे शोर से प्रदूषण उत्पन्न होने की चिन्ता चारों और व्यक्त की जा रही है तथा इस शोर को सामाजिक तनाव, बेचैनी और विकृति के कारणों में से एक कहा- बताया जा रहा है। ध्वनियों के अप्रत्याशित आश्चर्यजनक परिणामों की लगातार जानकारी मिल रही है। सभी जानते हैं कि वर्तमान यांत्रिक सभ्यता का शोर सम्पूर्ण मानव जाति पर गहरा दुष्प्रभाव डाल रहा है।
चिन्तन से आत्म निर्माण और आत्म-विकास की प्रक्रिया जुड़ती है।
चिन्तन को बदलने को बदलने वाली अन्तः स्फुरणा अथवा दबाव भरी परिस्थितियाँ होनी जाने लगा है कि माता-पिता का स्तर सुधारे बिना सुसन्तति की समस्या प्रयोगशालाओं द्वारा न हो सकेगी। वनस्पति अथवा पशुओं में सुधार उत्पादन सरल है, पर मनुष्यों में पायें जाने वाले चिन्तन तत्त्व में उत्कृष्टता भरने की आवश्यकता यांत्रिक पद्धति कदाचित ही पूरी कर सकेंगी।
चिन्तन विधि है। सभी प्रतिभाशाली अपने काम को मनोयोगपूर्वक करते हैं ओर इस तरह मेडीटेशन की प्रक्रिया को ही अपनाते हैं। मेडीटेशन वस्तुतः मस्तिष्क की अस्त-व्यस्तता और बिखराव पर नियन्त्रण पाने की एक कला है। वह एक मस्तिष्कीय व्यायाम है। उसे आध्यात्मिक साधना का पर्याय बताना अनुचित है।
चिन्तन प्रक्रिया को गड़बड़ाते हैं और ध्यान को कहीं से कहीं उड़ा ले जाते हैं। यह अवांछनीय एवं अनावश्यक विचार कई बार इतने तीव्र होते हैं कि सारे विचार तन्त्र में हलचल खड़ी कर देते हैं और असामान्य प्रबलता के कारण विवेक को विरोध करने तक में असमर्थ कर देते हैं। आवेश की तरह छाते हैं और मनुष्य को कहीं से कहीं घसीट कर ले जाते हैं। ऐसी ही आवेशग्रस्त स्थिति में व्यक्ति कुछ से कुछ अनचाहा कर बैठता है और पीछे उस कृत्य पर पछताता है।
चिन्तन और चरित्र पर होती है। पुनर्जन्म, परलोक, आत्मा के अस्तित्व की जब कोई बात ही नहीं है तो पाप-पुण्य के पचड़े से क्या लाभ? चतुरता के बल पर जितना भी स्वार्थ सिद्ध किया जा सकता हो करना चाहिए। समाज और शासन के दण्ड से बच निकलने के हथकण्डों से तो भली प्रकार परिचित हैं। अंकुश मात्र परमात्मा के शासन और आत्मा को कर्मफल भोगने भर का था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-July
चिन्तन और उसका समाधान यह कार्य उन्हीं दिनों पूरा हो जाता है जिस समय कि आत्म समीक्षा आरम्भ की जाती है। दण्ड प्रायश्चित अनुदान वाली प्रक्रिया समय साध्य होती है। वह कार्य एक दिन में नहीं हो जाता वरन् प्रायश्चित अनुदानों को चिरकाल तक जारी रखना होता है। इससे पाप कटते हैं और पुण्य बढ़ते हैं। इस प्रकार लगी हुई ठोकर भी अच्छी चेतावनी तथा सुधार प्रक्रिया में सहयोग देने वाली बन जाती है।
चिन्तन, मनन, ध्यान एवं भजन का उद्देश्य है। पाप कर्मों के दण्ड से भयभीत रहे और मर्यादाओं का उल्लंघन करने पर उसके कठोर प्रतिफल का ध्यान रखते हुए अनीति एवं अन्याय न करे। उपासक अथवा धर्म भीरु के लिए यह अनिवार्य आवश्यकता है कि उसकी ईश्वरीय न्याय और कर्मफल की सुनिश्चितता में आस्था हो, अन्यथा उसकी समस्त भक्ति भावना निरर्थक ही सिद्ध होगी।
चिन्तन और अन्तःकरण से दुर्भाव की अवांछनीयता तो नहीं बरती जा रही है। इसका निरन्तर ध्यान रखा जाय। जब भी इन तीनों क्षेत्रों में जो गड़बड़ी उत्पन्न हो रही हो उसे तत्काल अत्यन्त कठोरतापूर्वक रोक दिया जाय। मन में संचित कुसंस्कार प्रायः उठते रहते हैं कभी कभी वे अत्यधिक प्रबल हो उठते हैं। विवेक खो जाता है और शिर पर चढ़ा कुसंस्कारों का भूत मनुष्य को कठपुतली की तरह नचाने लगता है।
चिन्तन इन दोनों से सूक्ष्म है। इनके सहारे आत्म समीक्षा और आत्म निर्माण के दोनों महा प्रयोजन सिद्ध हो सकते हैं। इसके लिए यों तो प्रायः चारपाई पर से उठने का समय और रात्रि को बिस्तर पर जाने के बाद का समय अत्युत्तम है, पर रोक किसी भी समय नहीं है। उन्हें किसी भी समय और किसी भी परिस्थिति में कितनी ही देर किया जा सकता है।
चिन्तन इसी योजना प्रक्रिया का नाम है।
चिन्तन के सहारे यह निर्माण खड़ा किया जा सकता है। अपनी रुचि के भविष्य का मार्गदर्शन कर सकने वाले जीवन चरित्रों का संग्रह करना चाहिए। उन्हें ध्यान पूर्वक पढ़ना चाहिए और उनमें जो प्रेरक प्रसंग हो अपनी वर्तमान परिस्थितियाँ कार्यान्वित हो सकते योग्य हो, उन्हें अलग से नोट कर लेना चाहिए। जब भी अवकाश मिले उन प्रसंगों के कल्पना चित्र मस्तिष्क में एक सुनियोजित फिल्म का तरह प्रस्तुत करने चाहिए। श्रेष्ठ मार्ग पर चलते हुए समुन्नत स्थिति तक पहुँचे हुए महामानवों की जीवनियाँ, गतिविधियाँ, नीतियाँ आदि अपने कल्पना लोक में दृढ़तापूर्वक जड़े जमा सके और अनायास ही स्मरण आती रहे तो समझना चाहिए कि बाहरी दुनिया के पतनोन्मुख प्रभात को निरस्त कर सकने वाला स्वनिर्मित वातावरण बनकर तैयार हो गया।
चिन्तन में अपने सुधार, कायाकल्प, की योजनाएँ रहनी चाहिए। सुधार परिवर्तन किस क्रम से लाया जाय और उसके लिए वर्तमान गतिविधियों में रीति नीतियों में आदत अभ्यासों में रुचि आकांक्षाओं में किस प्रकार है हेर फेर किया जाय? यह विचार योजनाबद्ध रीति से किया जाना चाहिए। महामानवों ने जिस स्तर का उत्कृष्ट, चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाया है, उसी के अनुरूप अपने को ढाला जाय। इसके लिए सर्व प्रधान आवश्यकता इस बात की है कि श्रेष्ठ सज्जनों की प्रकृति में जिन सद्भावनाओं, सत्प्रवृत्तियों का समावेश होता आया है उसी के अनुरूप आकांक्षाओं को जगाया और आदतों को बढ़ाया जाय।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाया है, उसी के अनुरूप अपने को ढाला जाय। इसके लिए सर्व प्रधान आवश्यकता इस बात की है कि श्रेष्ठ सज्जनों की प्रकृति में जिन सद्भावनाओं, सत्प्रवृत्तियों का समावेश होता आया है उसी के अनुरूप आकांक्षाओं को जगाया और आदतों को बढ़ाया जाय। चिन्तन इसी योजना प्रक्रिया का नाम है।
चिन्तनधारा में अनावश्यक विचारों का प्रवेश नहीं हो पाता। सतर्कता और क्रियाशीलता, निरुपयोगिता और अस्तव्यस्तता की विरोधी स्थितियाँ है। मन दोनों स्थितियों में एक साथ नहीं रह सकता। विचार ही विचारों को बुलाते और भगाते रहते हैं। सतर्कता क्रियाशीलता में विचार गन्दे निरुपयोगी विचारों को भगाकर ही रहते हैं, ठहरने नहीं दे सकते ।
चिन्तन वह पक्ष है जिसमें दुर्बलताएँ हटाने और विभूतियाँ बढ़ाने की क्रमबद्ध योजना बनती है और उत्कृष्टता को कार्य रूप में परिणत करने का ढाँचा खड़ा किया जाता है। दोष दुर्गुणों को छोड़ देना तो फूटे बर्तन के छेद बन्द करने के बराबर है। इससे अपव्यय और अनर्थ रुकता हो किन्तु आत्मोत्कर्ष के लिए जिन दिव्य विभूतियों की, गुण कर्म स्वभाव की, उत्कृष्टता की आवश्यकता पड़ती है उनका अभाव ही बना रहा तो छेद बन्द करने से भी तो लक्ष्य पूर्ति के लिए आवश्यक क्षमता का संग्रह न हो सकेगा। अस्तु चिन्तन में अपने सुधार, कायाकल्प, की योजनाएँ रहनी चाहिए। सुधार परिवर्तन किस क्रम से लाया जाय और उसके लिए वर्तमान गतिविधियों में रीति नीतियों में आदत अभ्यासों में रुचि आकांक्षाओं में किस प्रकार है हेर फेर किया जाय?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-April
चिन्तन आदर्श कर्तव्य एवं परमार्थ प्रयोजनों में सघन तत्परता रखने वाले उदात्त महा मानव भी अपने ढंग के सिद्ध पुरुष ही बनते हैं। उनका यश एवं वर्चस्व योगी, तपस्वियों से किसी भी प्रकार कम नहीं रहता, आत्म-कल्याण और विश्व कल्याण में उनकी भूमिका आत्मिक प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँचे हुए लोगों के समतुल्य ही होती है।
चिन्तन शक्ति को अस्त-व्यस्तता ही उसे गई-गुजरी स्थिति में डाले रखने के लिए जिम्मेदार है। यदि हम क्षमताओं का सदुपयोग सम्भव हो सके तो उसका सत्परिणाम देखते ही बनेगा। सांसारिक जीवन में अनायास ही आकस्मिक सफलताएँ तो कदाचित ही किसी का मिलती होगी। सामान्यतः हर प्रगतिशील व्यक्ति को अपनी क्षमताओं को बिखराव से रोककर अभीष्ट लक्ष्य के लिए नियोजित करना पड़ता है प्रगति की सम्भावना का मार्ग इसी उपाय से प्रशस्त होता है जो अपने श्रम, समय को-चिन्तन मनोयोग को-दिशा धारा को किसी लक्ष्य विशेष पर नियोजित न कर सकें, तो वे सुयोग्य एवं साधन सम्पन्न होने पर भी कुछ कहने लायक सफलता प्राप्त न कर सकेंगे। इसके विपरीत स्वल्प बुद्धि और स्वल्प साधन होते हुए भी कितने ही व्यक्ति उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचते देखे गये है।
चिन्तन, आदर्शवादी विचारधारा सूक्ष्म-शरीर को तेजस्वी प्रखर बनाती है। और उसका श्रेष्ठ प्रभाव स्थूल शरीर पर भी स्पष्ट देखा जा सकता है।
चिन्तन में उत्कृष्टता और क्रिया-कलाप में आदर्शवादिता का मनोवेश करने वाली वे सद्विचारणाएं भी क्षेत्र में विकसित होती है जो चरित्रनिष्ठा विकसित करने के लिए उत्तरदायी है।
चिन्तन की आश्चर्यजनक महत्ता के प्रतिपादन में डा. बैनेट ने स्वयं को ही प्रस्तुत किया है। 50 वर्ष की आयु तक डा. बैनेट निराशा और अवांछनीय चिन्तन के कारण अपना स्वास्थ्य पूरी तरह गँवा बैठे। उन्हें जब ऊर्ध्वगामी चिन्तन की इस असीम उपादेयता का पता चला तो उन्होंने अपना जीवन क्रम ही बदल डाला। मन की जड़ता और विषय विकारों का जुआ उनने उतार फेंका, हृदय को श्रद्धा आस्था से भरा, सदैव प्रसन्न प्रफुल्ल रहने की आदत बना ली। 20 वर्षों के अपने इस जीवन को स्वर्गीय सुख से ओत-प्रोत बनाते हुए डा. बैनेट ने अपनी 50 वर्षीय फोटो तथा 70 वर्षीय फोटो भी इस पुस्तक में छापी है।
चिन्तन मनोयोग को-दिशा धारा को किसी लक्ष्य विशेष पर नियोजित न कर सकें, तो वे सुयोग्य एवं साधन सम्पन्न होने पर भी कुछ कहने लायक सफलता प्राप्त न कर सकेंगे। इसके विपरीत स्वल्प बुद्धि और स्वल्प साधन होते हुए भी कितने ही व्यक्ति उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचते देखे गये है। सफलताओं में से अधिकाँश का श्रेय कर्ता की तत्परता एवं मन्मयता पर ही निर्भर रहता है। इसी को एकाग्रता भी कहते हैं।
चिन्तन में लगावें। जो इस प्रकार निरन्तर अपने हृदय में परमात्मा के साक्षात्कार का अभ्यास करता है वह प्रज्वलित दीपक के समान प्रकाशित होने वाले अपने मनोमय प्रदीप के द्वारा निराकार परमेश्वर का साक्षात्कार करके तत्काल मुक्त हो जाता है।
चिन्तन और कर्म निर्धारित करने के लिए प्रेरणा देनी वाली विद्युत प्रणाली कानों में विद्यमान् है। साँप की फुफकार सुनते ही यह प्रणाली खतरे से सावधान करती है और भाग चलने की प्रेरणा देने के लिए रोंगटे खड़े कर देती है। ऐसी बहुद्देशीय संरचना किन्हीं ध्वनि-ग्राहक यन्त्रों में सम्भव नहीं हो सकती।
चिन्तन की इस असीम उपादेयता का पता चला तो उन्होंने अपना जीवन क्रम ही बदल डाला। मन की जड़ता और विषय विकारों का जुआ उनने उतार फेंका, हृदय को श्रद्धा आस्था से भरा, सदैव प्रसन्न प्रफुल्ल रहने की आदत बना ली। 20 वर्षों के अपने इस जीवन को स्वर्गीय सुख से ओत-प्रोत बनाते हुए डा. बैनेट ने अपनी 50 वर्षीय फोटो तथा 70 वर्षीय फोटो भी इस पुस्तक में छापी है। पहली में उनका चेहरा झुर्रियों से पिचके गाल, धँसी आँखों के कारण मनहूस दिखाई देता है। जबकि 70 वर्ष की आयु में वे स्वस्थ सशक्त दिखाई देते हैं, झुर्रियाँ न जाने कहाँ चली गई, चेहरे में उद्दीप्ति है और युवकों जैसी सक्रियता।
चिन्तन, सूक्ष्म शरीर की विकृतियाँ है, जिनका स्थूल शरीर पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार परिष्कृत दृष्टिकोण स्वस्थ-उदान्त चिन्तन, आदर्शवादी विचारधारा सूक्ष्म-शरीर को तेजस्वी प्रखर बनाती है। और उसका श्रेष्ठ प्रभाव स्थूल शरीर पर भी स्पष्ट देखा जा सकता है।
चिन्तन के कारण अपना स्वास्थ्य पूरी तरह गँवा बैठे। उन्हें जब ऊर्ध्वगामी चिन्तन की इस असीम उपादेयता का पता चला तो उन्होंने अपना जीवन क्रम ही बदल डाला। मन की जड़ता और विषय विकारों का जुआ उनने उतार फेंका, हृदय को श्रद्धा आस्था से भरा, सदैव प्रसन्न प्रफुल्ल रहने की आदत बना ली। 20 वर्षों के अपने इस जीवन को स्वर्गीय सुख से ओत-प्रोत बनाते हुए डा. बैनेट ने अपनी 50 वर्षीय फोटो तथा 70 वर्षीय फोटो भी इस पुस्तक में छापी है। पहली में उनका चेहरा झुर्रियों से पिचके गाल, धँसी आँखों के कारण मनहूस दिखाई देता है।
चिन्तनात्मक प्रयोजन पूरे कर सकती है।
चिन्तन कार्य कोशिकाओं में महत्वपूर्ण रासायनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ा देते हैं और वे अधिक संवेदनशील बनकर बुद्धिमान का क्षेत्र विस्तार करती है।
चिन्तन की दिशा धारा मोड़ देने से यह परिवर्तन सम्भव हो सकता है। वर्षा का जल यदि अनियन्त्रित फैले तो खेतों, घरों को डुबाकर हानिकारक सिद्ध होगा। पर यदि नदी लाले के माध्यम से बाँध बनाकर संग्रह किया जाय ओर नहरों के माध्यम से सिंचाई के लिए खेतों तक पहुँचाया जाय तो इससे हर प्रकार लाभ ही लाभ है अनियन्त्रित काम प्रवृत्ति का निरोध इसी प्रकार उचित है उसे हठ पूर्वक नष्ट कर देने की बात न सोची जाय, वरन् ऐसे प्रयोजन में लगा दिया जाय जिसमें उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति हो।
चिन्तन, मनन और साधना समाधि तक के अगणित प्रगति प्रयास इसी आधार पर होते हैं। व्यक्तित्व और वर्चस्व की-प्रखरता की समस्त सम्भावनायें इसी क्षेत्र के साथ जुड़ी हुई है। परा प्रकृति की साधना एवं गायत्री उपासना के सहारे ही अन्तःचेतना का विकास होता है।
चिन्तन एवं संकल्प को एकत्रित करने की कला सीख ली जाय और उसे मनःसंस्थान में अवस्थित विभिन्न क्षमता केन्द्रों पर इकट्ठा कर लिया जाय, तो वे संस्थान जागृत होगे और जो विशेषताएँ अपने भीतर पहले नहीं थी वे समुन्नत होने लगेंगी। इस आधार पर स्मरण शक्ति जैसी कितनी ही क्षमताएँ विकसित की जा सकती है।
चिन्तन और घृणित कर्तृत्व से यदि हाथ खींच लिया जाय तो फिर आत्मिक प्रखरता के कारण उपलब्ध होने वाली असंख्य ऋद्धि-सिद्धियों के मार्ग में और कोई बड़ा व्यवधान शेष नहीं रह जाता।
चिन्तन अनायास ही नहीं फूट पड़ते। पहले-पहले उनका अनुमान आभास होगा, पीछे वे हाँडी के चावलों की तरह मस्तिष्क में पड़े-पड़े पकते रहते हैं। माता के पेट में प्रवेश हुए भ्रूण की तरह यह आभास अनपढ़ होते हैं किन्तु भीतर ही भीतर कोई अविज्ञात चेतना उन्हें अपने ढंग से पकाती रहती है। तदुपरान्त ऐसी स्थिति आती है। जिसे उत्साह और विश्वास का सम्मिश्रण कह सकते हैं।
चिन्तन आदि की विशिष्ट एवं व्यवस्थित पद्धति का अनुसरण करना होता है। जैसे बच्चों को सुयोग्य बनाने के लिए उन्हें साधन ही नहीं श्रेष्ठ संस्कार भी देने पड़ते हैं, इसी प्रकार इन कोशिकाओं के लिए भी आहार व्यवहार से लेकर ध्यान उपासना तक के अनेक माध्यम अपनाने होते हैं। उन सबके संयोग से ही अन्नमय कोश की प्रभावशाली साधना का स्वरूप बनता है।
चिन्तन, क्षेत्र में आध्यात्मिकता और कर्मक्षेत्र में धार्मिकता के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
चिन्तन स्फुरणा के साथ जुड़ा हुआ है। विचारणा और आकांक्षा के समन्वय से जो ‘संकल्प’ उठता है। उसी में प्रगति की समस्त संभावनाएँ सन्निहित है। विकासवादी प्रगति पर दृष्टिपात करने पर हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है। वे एक जैसी परिस्थितियों में रहने पर भी एक की प्रगति दूसरे की यथास्थिति और तीसरे के अवगति का अन्तर देखकर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-December
चिन्तन, मनन और दिव्य दृष्टि से भी उपलब्ध की जा सकती हैं। तप साधा इस प्रयोजन को भी बड़े सुंदरता के साथ पूरा कर सकती है और करेगी। हम इस प्रसंक्त को इस स्तर तक पहुंचा देंगे कि संसार भर कि विचारशील लोगों को अध्यात्मवा को ‘गरिमा’ सचाई और उपयोगिता को स्वीकार करके उसकी शरण में आने के लिए विवश होना पड़े।
चिन्तन द्वारा आत्मा को ही प्राप्त करो।”
चिन्तन क्या करें तो बहुत ही अच्छा पर चूँकि यह सबके लिए सम्भव नहीं इसीलिये हमें प्रति दिन कम से कम कुछ घण्टों के लिये ईश्वर स्मरण करना ही चाहिये।”
चिन्तन, सारा क्रिया-कलाप और सारा शारीरिक, मानसिक अस्तित्व इन घटकों के ऊपर ही अवलम्बित रहता हैं। देखने में सभी का मस्तिष्क लगभग एक जैसा दीखेगा पर उसकी सूक्ष्म स्थिति में पृथ्वी, आकाश जैसा कि अन्तर दीखता हैं, उसके आधार पर व्यक्तियों का घटिया-बढ़िया होना सहज ही आँका जा सकता हैं। यही सूक्ष्मता कुण्डलिनी के सम्बन्ध में व्यक्त की जा सकती हैं। मूलाधार, सहस्रार, ब्रह्म-नाड़ी, इड़ा, मिला इन्हें शल्य क्रिया द्वारा नहीं देखा जा सकता। यह सारी विश्वरचना ऐसी सूक्ष्म हैं, जो देखी तो नहीं जा सकती पर उसका अस्तित्व प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-September
चिन्तन और मनन के द्वारा आत्म-निरीक्षण और आत्म-समीक्षा अपने दोष दुर्गुणों को प्रकाश में लाती है। आत्म-सुधार के लिए शरीरगत बुरी आदतों और मनोगत दुष्प्रवृत्तियों से संघर्ष करके पुराने क्रम में आमूल चूल परिवर्तन करना पड़ता है। तपश्चर्या इसे ही कहते हैं। तप साधना का यही उद्देश्य है। यह वनवास की तरह घर में रहकर भी की जा सकती।
चिन्तन का परिचय देता है। भेड़चाल को तोड़कर जो विवेकशीलता का रास्ता अपनाता है, वह बहादुर है। अपनी संस्कृति और परम्परा के अनुरूप यदि हमारा आचरण है तो कोई भी परखने वाला हमें दूरदर्शी, विवेकशील एवं दृढ़ चरित्र ही कहेगा। सादगी हमें फिजूल-खर्ची से बचाकर आर्थिक स्थिरता में ही समर्थ नहीं करती वरन् हमारी चारित्रिक दृढ़ता भी प्रमाणित करती है। अकारण उत्पन्न होने वाली ईर्ष्या और लाँछना से बचने का भी यही सल मार्ग है।
चिन्तन की धारा यदि उपलब्ध सुविधाओं और सद्भावनाओं की ओर प्रवाहित हो चले तो संतोष और उल्लास की अभीष्ट मात्रा उपलब्ध करने के लिये पर्याप्त आधार मिल जाएगा
चिन्तन और मनन करने के बाद आइन्स्टीन को भी कहना ही पड़ा कि मनुष्य का इस प्रकार समय, स्थान या देश, गति और कारण (टाइम, स्पेस, मोशन, एण्ड कांजेशन) की संकीर्णता में बँधना उसकी भयंकर भूल है। उन्होंने बताया कि वह सम्पूर्ण चीजें हैं ही नहीं। संसार में न तो समय का कोई अस्तित्व है, न स्थान का, न गति का और नहीं किसी कारण या परिणाम का। यह चारों मस्तिष्क की उपज है और हम जब तक इनसे प्रतिबन्धित है, तब तक अन्तिम सत्य (एब्सोल्यूट) की अनुभूति नहीं कर सकते। अन्तिम सत्य वह है, जो इन चारों से बँधकर नहीं इनको बाँधकर रखता है।
चिन्तन की आदत है, दूसरों के दोष-दुर्गुण और अपने अभाव अवरोध ढूँढ़ने की आदत है, जो इसी शोध में लगे रहते हैं और जो प्रतिकूलताएँ दिखती हैं, उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर सोचते हैं, उन्हें अपने चारों और केवल दुष्टता और विपन्नता ही दिखाई देती है। ऐसे लोगों को क्षुब्ध ही रहना पड़ेगा, वे असमंजस, खिन्नता और उद्विग्नता ही अनुभव करते रहेंगे। रोष उनकी वाणी से और असन्तोष उनकी आकृति से टपकता रहेगा, ऐसे व्यक्ति स्वयं दुःखी रहते हैं और अपने संपर्क में आने वाले दूसरों को दुःखी करते रहते हैं।
चिन्तन करें, हमें हँसने के लिए प्रसन्न, रहने के लिए बहुत कुछ मिलेगा। यदि हम हँसना और हँसाना जीवन जी सकें तो समझना चाहिये कि हमने एक सच्चे कलाकार की जैसी मंगलमयी सफलता एवं उल्लास भरी उपलब्धि प्राप्त कर ली।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-January
चिन्तन करें। क्या सचमुच कोई सत्ता है, जो अणु प्रतीत हो पर उसमें ब्रह्माण्ड की सी चेतना सन्निहित हो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-June
चिन्तन के अभाव में, विश्लेषण अथवा प्रमाणों के अभाव में वह रहस्य मुंदे के मुंदे रहे जाते है। एक बार बालक नचिकेता को भी ऐसी ही प्रबल जिज्ञासा उठी थी, उसने भी यमाचार्य से ऐसा ही प्रश्न किया था-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-May
चिन्तन से संस्कारों में सम्मिलित कर लेते हैं, बहुत कुछ पूजा-पाठ सत्संग और धार्मिक साहित्य का अध्ययन करते रहने पर भी उनसे मुक्त नहीं ड़ड़ड़ड़ चाहते है कि संसार के नश्वर भोगों और ड़ड़ड़ड़ वासनाओं से विरक्ति हो जाये, लेकिन उनकी ड़ड़ड़ड पूरी नहीं हो पाती
चिन्तन मनन और धारण किया जाता है, ईश्वरीय सत्ता का बोध उतना ही निर्मल होता चला जाता है। उसके लिये न तो मनुष्य को कही अलग जाने की आवश्यकता है और न कुछ और अध्ययन कीं गीता के 9 वे अध्याय में इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए भगवान् कृष्ण ने कहा था-
चिन्तन और मनन किया जाता रहे तो मनुष्य के संस्कार शुभ और सुन्दर बनेंगे इसके विपरीत यदि अशुद्विचारों को ग्रहण कर मस्तिष्क में बसाया और मनन किया जायेगा तो संस्कारों के रूप में कूड़ा-कर्कट ही इकट्ठा होता जायेगा।
चिन्तन के साथ यदि मनुष्य की भावनात्मक अनुभूति जुड़ जाती है तो वह विषय मनुष्य का बड़ा प्रिय बन जाता है। यही प्रियता उस विषय को मानव-मस्तिष्क पर हर समय प्रतिबिम्बित बनाये रहती है। फलतः उसी विषयों में चिन्तन, मनन की प्रक्रिया भी अबाध गति से चलती रहती है और वह विषय अवचेतन में जा-जाकर संस्कार रूप में परिणत होता रहता है। इसी नियम के अनुसार बहुधा देखा जाता है कि अनेक लोग, जो कि प्रियता के कारण भोग वासनाओं को निरन्तर चिन्तन से संस्कारों में सम्मिलित कर लेते हैं, बहुत कुछ पूजा-पाठ सत्संग और धार्मिक साहित्य का अध्ययन करते रहने पर भी उनसे मुक्त नहीं ड़ड़ड़ड़ चाहते है कि संसार के नश्वर भोगों और ड़ड़ड़ड़ वासनाओं से विरक्ति हो जाये, लेकिन उनकी ड़ड़ड़ड पूरी नहीं हो पाती
चिन्तन-मनन में निरन्तरता आ जायेगी, जिसके फलस्वरूप वे मांगलिक विचार चेतन मस्तिष्क से अवचेतन मस्तिष्क में संस्कार बन-बनकर संचित होने लगेंगे और तब उन्हीं के अनुसार आपका चरित्र निर्मित और आपकी क्रियायें स्वाभाविक रूप से आपने आप संचालित होने लगेंगी। आप एक आदर्श चरित्र वाले व्यक्ति बनकर सारे श्रेयों के अधिकारी बन जायेंगे
चिन्तन, मनन की प्रक्रिया भी अबाध गति से चलती रहती है और वह विषय अवचेतन में जा-जाकर संस्कार रूप में परिणत होता रहता है। इसी नियम के अनुसार बहुधा देखा जाता है कि अनेक लोग, जो कि प्रियता के कारण भोग वासनाओं को निरन्तर चिन्तन से संस्कारों में सम्मिलित कर लेते हैं, बहुत कुछ पूजा-पाठ सत्संग और धार्मिक साहित्य का अध्ययन करते रहने पर भी उनसे मुक्त नहीं ड़ड़ड़ड़ चाहते है कि संसार के नश्वर भोगों और ड़ड़ड़ड़ वासनाओं से विरक्ति हो जाये, लेकिन उनकी ड़ड़ड़ड पूरी नहीं हो पाती
चिन्तन करके यह अनुभव करना चाहिये कि मैं ही सर्वरूप ब्रह्मं हूँ, मैं ही परम सुख रूप हूँ। जल में जल डालने से, दूध में दूध डालने ओर घी में घी मिला देने से वे एक रूप हो जाते है। उसी प्रकार परमात्मा के मिल जाने पर उनमें कोई अन्तर नहीं रह जाता। जब इस तरह ज्ञान द्वारा देहाभिमान नष्ट हो जाता है और बुद्धि अखण्डाकार हो जाती हे कर्मों में कोई आसक्ति नहीं रह जाती, मोह और वासनायें जलकर नष्ट हो जाते है, तभी अद्वैत ब्रह्मा की प्राप्ति होती है।”
चिन्तन-मनन और विश्वास के द्वारा संस्कार रूप में प्रौढ़ और परिपुष्ट किया जाय। पुराने संस्कार बदलने के लिये नये संस्कारों की रचना परमावश्यक है।
चिन्तन, स्वाध्याय, सत्संग आदि का और अन्तःकरण क्षेत्र में भाव तन्मयता, दृष्टि परिष्कार, समक्ष, समाधि तय, वैराग्य आदि निष्ठाओं का अपना महत्व है। इन प्रकरण को भी वाधि विषानपूर्वक अनुभव मार्ग-दर्शन में अग्रसर किया जाना चाहिये। आस्मिक प्रगति के लिये इनकी भी आवश्यकता है और उनके लिये समुचित प्रयत्न परिश्रम होना चाहिये, किन्तु यह नहीं मान बैठना चाहिये किम उपासना पद्धतियों का डडडड ही आत्मा कल्याण एवं देव अनुग्रह प्राप्त कर लेने के लिये पर्याप्त है। तथ्य यह है कि उपासना के साथ साधना जुड़ी हुई होनी चाहिये। उपासना शरीर है और साधना प्राप्त।
चिन्तन और मनन करिये। अच्छे विचार वालों से संसर्ग करिये, अच्छे विचारों का साहित्य पढ़िये और इस प्रकार हर ओर से अच्छे विचारों से ओत-प्रोत हो जाइये। कुल ही समय में आपके उन शुभ विचारों से आपकी एकात्मक अनुभूति जुड़ जायेगी, उनके चिन्तन-मनन में निरन्तरता आ जायेगी, जिसके फलस्वरूप वे मांगलिक विचार चेतन मस्तिष्क से अवचेतन मस्तिष्क में संस्कार बन-बनकर संचित होने लगेंगे और तब उन्हीं के अनुसार आपका चरित्र निर्मित और आपकी क्रियायें स्वाभाविक रूप से आपने आप संचालित होने लगेंगी। आप एक आदर्श चरित्र वाले व्यक्ति बनकर सारे श्रेयों के अधिकारी बन जायेंगे

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-March
चिन्तन आदि कुछ भी हो सकता है। हम सब का परम कर्तव्य है कि अपनी योग्यता, स्थिति और परिस्थिति के अनुसार इनमें से किसी भी साधना को ग्रहण कर उसमें नियमित रूप से लगे रहें। धीरे-धीरे साधना संचित होती रहेगी और एक दिन किसी न किसी जन्म में पूर्ण होकर अपना सम्पूर्ण फन प्रदान करेगी।
चिन्तन करने पर यह बात भी स्पष्ट हो जाती है। पदार्थ की तीन अवस्थायें साधारणतया सबको ज्ञात हैं - (1) घन (पत्थर की तरह कड़ी), (2), द्रव, (3) गैस। लोहा घन है पर उसे तेज आँच दें तो वह पिघल कर द्रव में परिणत हो जाता है। ज्यादा गर्मी दी जाये तो वही भाप बन जायेगा। यही अवस्था दूसरे पदार्थों की भी है।
चिन्तन का क्षेत्र हैं।
चिन्तन तथा वासनापूर्ण वार्तालाप आदि ब्रह्मचर्य में बाधक होते हैं। सदाचार एवं आहार स्वाध्याय, सत्संग, श्रम, ईश्वर -चिन्तन तथा दृढ़ संकल्प आदि के साधन अभ्यास करते रहने से कठिन कहा जाने वाला ब्रह्मचर्य का व्रत सरल तथा सुखदायक बन जाता है। जीवन की सफलता तथा स्वास्थ्य के लिए ब्रह्मचारी होकर रहना ही श्रेयस्कर तथा कल्याणकारी है।
चिन्तन, मनन और अन्तःमन्थन के आधार पर यह सुनिश्चित रूप से कह सकते हैं कि हमें यदि अन्तरंग विभूतियाँ प्राप्त हुई हैं और उनके आधार पर बाह्य जगत में कुछ हलचलें उत्पन्न करने का अवसर मिला है तो इसका एक मात्र कारण हमारे अन्तःकरण में आदि से अन्त तक लबालब भरा हुआ प्यार ही है। ईश्वर को माध्यम बनाकर उसकी कृषि की गई और जब वह उगा और फला तो उसका प्रकाश निकटवर्तियों से लेकर दूरवर्तियों तक व्यापक क्षेत्र में फैला। दूसरों ने उससे लाभ उठाया और हम स्वयं स्वर्गीय उल्लास की अनुभूति हर घड़ी करते रहे। उसी आवेश में लोक-सेवा और आत्मबल संवर्धन के वे कार्य बन पड़े जो वस्तुतः तुच्छ हैं पर दूसरे उन्हें बहुत बढ़ा-चढ़ा देखते हैं।
चिन्तन तथा दृढ़ संकल्प आदि के साधन अभ्यास करते रहने से कठिन कहा जाने वाला ब्रह्मचर्य का व्रत सरल तथा सुखदायक बन जाता है। जीवन की सफलता तथा स्वास्थ्य के लिए ब्रह्मचारी होकर रहना ही श्रेयस्कर तथा कल्याणकारी है।
चिन्तन, अध्ययन और स्मरण करने से इन लोकों की हलचलों का ही पता नहीं लगाया जा सकता वरन् उनसे पृथ्वी पर अब से हजारों वर्ष बाद तक पड़ने वाले प्रभाव को भी देखा जा सकता है। चार युग बाँटकर उनमें होने वाले क्रिया-कलापों को योगियों ने पहले ही लिखकर रख दिया था, वह आज अक्षरशः सत्य उतर रही हैं। अब तो हम भविष्य के सम्बन्ध में कहा करते हैं उनकी सत्यता को संसार शीघ्र ही स्वीकार करेगा।
चिन्तन और व्यवस्थित योजना के अधीन होती है। फिर सद्वृत्तियाँ तो उन्नति, सफलता और अमृत तक की प्रदायिका होती हैं, उन्हें आत्म-गौरव और आत्म-श्लाघा होना ही चाहिये। अब तक कोई उनका आह्वान नहीं करेगा, उनसे संपर्क स्थापित नहीं करेगा, जब तक वे किसी की सेवा सहायता के लिए अपने-आप क्यों दौड़ने लगेंगी।
चिन्तन मनन भी किया जाये तो बहुत कुछ उस दिशा में बढ़ा जा सकता है। स्वाध्याय स्वयं ही एक तप, आसन और निदिप्यास के समान है। इसका नियम निर्वाह से आप ही आप अनेक नियम, संयमों का अभ्यास हो जाता है।
चिन्तन-मनन नहीं करता। सोच लेता है जब मैं इतना क्रिया-काण्ड करता हूँ तो इसके बाद अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। आत्म-ज्ञान अथवा परमात्म अनुभूति करा देने के लिए इतना ही पर्याप्त है तो निश्चय ही वह भ्रम में है। आत्मा का क्षेत्र वैचारिक क्षेत्र है, सूक्ष्म भावनाओं एवं मनन-चिन्तन का क्षेत्र हैं।
चिन्तन करे रहने से मनुष्य स्वयं ही विराट रूप होकर संसार और शरीर की संकीर्णता से मुक्त होकर भव-भावना से छूट जाया करता है। उसको अपना जीवन लक्ष्य मिल जाता है, उसकी आत्मा परमात्मा के तादात्म्य प्राप्त कर लेती है।
चिन्तन करें तो ऐसा स्वयं ही जान पड़ता कि कोई महामना शक्ति ही उसका संचालन कर रही है। उसका यह चमत्कार शक्ति ही अद्भुत है, मनुष्य तो इस सृष्टि की तुलना में कुछ भी नहीं के बराबर है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-April
चिन्तन किया जा सकता है। सो हम भी करते हैं पर व्यवहारिक सेवा के लिए हर किसी का एक सीमित क्षेत्र ही है, सो ही हमारा भी है।
चिन्तन करते रहने से मस्तिष्क निर्बल और मानसिक धरातल हल्का हो जाता है। ऐसी दशा में आवेशों, आवेगों ओर उत्तेजनाओं को रोक सकना कठिन हो जाता है। यह विचार सफलतापूर्वक मनुष्य को संचालित कर अपराध अथवा पाप घटित कर डालने पर विवश कर देते है और यदि वह पाप अथवा अपराध करने को साहस परिस्थिति अथवा अवकाश नहीं पा पाता-अर्थात् उसका आवेश क्रिया द्वारा निकल पड़ने का अवसर नहीं पाता तो वह सीधा मस्तिष्क पर आघात करता है, जिससे उसमें विकार पैदा हो जाते है और मनुष्य सनकी, पागल अथवा उन्मादी बन जाता है। दोनों स्थितियों में चाहे वह अपराध अथवा पाप कर बैठे या बौद्धिक विकार से ग्रस्त हो जाये, उसका जीवन बिगड़ जाता है, जिन्दगी बरबाद हो जाती है। विचारों में बड़ी प्रचण्ड शक्ति होती है।
चिन्तन करने का व्यसन हो जाता है। बहुत से ऐसे विचार जो मनुष्य के जाने हुए नहीं होते यदि उनका परिचय न कराया जाय तो न तो उनकी याद आवे और न उनके समान दूसरे विचारों का ही जन्म ही। गन्दे साहित्य में दूसरों द्वारा लिखे अवांछनीय विचारों से अनायास ही परिचय हो जाता है और मस्तिष्क में गन्दे विचारों की वृद्धि हो जाती है। अस्तु, गन्दे विचारों से बचने के लिए अश्लील और असद्साहित्य का पठन पाठन वर्जित रखना चाहिए।
चिन्तन करते हैं तब कल्याणकारी ज्योति स्वरूप परमात्मा का नाद रूप में साक्षात्कार होता है। (यह संगीत ध्वनि बहुत मधुर होती है।) योगी को सिद्धासन से बैठकर वैष्णवी मुद्राधारण कर अनाहत ध्वनि को सुनना चाहिये। इस अभ्यास से बाहरी कोलाहल शून्य होकर अन्तरंग तुर्य पद प्राप्त होता है।
चिन्तन में प्रवृत्ति होती हो उनकी अच्छाई बुराई को अच्छी तरह परख लेने की आवश्यकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-February
चिन्तन तथा मनन करे, मुझे परमात्मा ने अनन्त शक्ति दी है, मुझे किसी दूसरे पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। परमुखापेक्षी रहना मानवीय व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं परावलम्बी होना कोई विवशता नहीं है। वह तो मनुष्य की एक दुर्बल वृत्ति ही है। मैं अपनी इस दुर्बल वृत्ति का त्याग कर दूँगा और स्वयं अपने परिश्रम तथा उद्योग द्वारा और स्वयं अपने परिश्रम तथा उद्योग द्वारा अपने मनोरथ सफल करूँगा परावलम्बी व्यक्ति पराधीन रहता है और पराधीन व्यक्ति संसार में कभी सुख और शाँति नहीं पा सकता, मैं साधना द्वारा अपनी आन्तरिक शक्तियों का उद्घाटन करूँगा, शारीरिक शक्ति का उपयोग करूँगा और इस प्रकार स्वावलम्बी बनकर अपने लिये सुख शाँति की स्थिति स्वयं अर्जित करूँगा निश्चय ही इस प्रकार के अनुकूल विचारों की साधना से मनुष्य की परावलम्बन की दुर्बलता दूर होने लगेगी और उसके स्थान पर स्वावलम्बन का सुखदायी भाव बढ़ने और दृढ़ होने लगेगा।
चिन्तन तथा मनन करता रहता है।
चिन्तन एवं उद्वेग का कारण बनेंगे और यदि कहीं उनका दुरुपयोग होने लगा, तब तो सर्वनाश की भूमिका ही सामने लाकर खड़ी कर देंगे
चिन्तन और मनन करते रहने से मनोदशा में सात्विक भाव की वृद्धि होती है। मनुष्य का आचरण उदात्त तथा उन्नत होता है। मानसिक शक्ति का विकास होता है, गुणों की प्राप्ति होती है। जिसका आचरण उन्नत है, जिसका मन दृढ़ और बलिष्ठ है, जिसमें गुणों का भण्डार भरा है, उसको सुख शाँति के अधिकार से संसार में कौन वंचित कर सकता है। भारतीय मंत्रों का अभिमत दाता होने का रहस्य वही है कि बार बार जपने से उनमें निवास करने वाला दिव्य विचारों का सार मनुष्य के अन्तःकरण में भरा है, उसको सुख शाँति के अधिकार से संसार में कौन वंचित कर सकता है।
चिन्तन करता है, वह उतने ही साफ और सार्थक स्वप्न देखता है और भविष्य की या प्रियजनों की खबरें भी देते रहते है।
चिन्तन मनन कर श्रेय पाया है, निर्विवाद रूप से उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत द्वारा सबसे पहले शक्ति की ही साधना की है। वासना को जीत और इन्द्रियों पर अधिकार कर सकने पर ही वे जीवन में श्रेयस्कर कार्य कर सकने में सफल हो सके है।
चिन्तन होता है। वाणी संयम के कारण चित्तवृत्ति अन्तर्मुखी हो जाती है और आध्यात्मिक लक्ष्य और सरल हो जाता है। इसलिये तब एक समय निश्चित रूप से लोग एकान्तवास किया करते थे, गृहस्थ आश्रम के बाद थोड़ा-थोड़ा एकान्त का अभ्यास किया जाता था। पर चौथे चरण में तो नितान्त अन्तर्वासी हो जाया जाता था।
चिन्तन जो नित्य नेम से करता है। उसकी भक्ति मात्र पाने को, नर इच्छा नहिं रखता है॥ धर्म, कर्म या संत संगति में मग्न सदा जो रहता है। अपने पैरों आप खड़ा हो जो संसार विचरता है॥
चिन्तन करते तो उन्हें पता चल जाता कि तन्मात्राओं की अनुभूति करने वाला कोई और तत्व भी है, वह इन चार तत्वों से भिन्न है। अदृश्य वस्तु के अस्तित्व को कोई इनकार नहीं कर सकता। तार में होकर बिजली चलती है पर वह दिखाई नहीं देती इसका यह तात्पर्य नहीं कि उसके अस्तित्व से इनकार कर दिया जायें विद्युत न होती तो बल्ब कहाँ से जलता प्रकाश कहाँ से आता?
चिन्तन-धारा में मुख्य बाधा भी यह शहरी शोर हैं, जिसके कारण मनुष्य अपने कल्याण की भी बात अच्छी तरह सोच नहीं पाता।
चिन्तन का विषय है। हमें उस अखंडित जीवन की कल्पना करते समय मनुष्येत्तर प्राणियों की गतिविधियों को भी देखना पड़ेगा। हमें यह अनुभव करना पड़ेगा कि जीवन जन्तु पशु पक्षी भी आत्म विकास और अखण्ड जीवन के खण्ड है। मनुष्य की विशेषता उसका ज्ञान और जीवन के प्रति श्रद्धा है। यह श्रद्धा और ज्ञान प्राणिमात्र के हित में रहना चाहिये।
चिन्तन द्वारा यहाँ शक्ति के स्वामी और आत्म तेज के भण्डार बनने की परम्परा रही है, यजुर्वेद में कहा गया है-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-August
चिन्तन और मनन के द्वारा आत्म-निरीक्षण और आत्म-समीक्षा अपने दोष दुर्गुणों को प्रकाश में लाती है। आत्म-सुधार के लिए शरीरगत बुरी आदतों और मनोगत दुष्प्रवृत्तियों से संघर्ष करके पुराने क्रम में आमूल चूल परिवर्तन करना पड़ता है। तपश्चर्या इसे ही कहते हैं। तप साधना का यही उद्देश्य है। यह वनवास की तरह घर में रहकर भी की जा सकती।
चिन्तन का परिचय देता है। भेड़चाल को तोड़कर जो विवेकशीलता का रास्ता अपनाता है, वह बहादुर है। अपनी संस्कृति और परम्परा के अनुरूप यदि हमारा आचरण है तो कोई भी परखने वाला हमें दूरदर्शी, विवेकशील एवं दृढ़ चरित्र ही कहेगा। सादगी हमें फिजूल-खर्ची से बचाकर आर्थिक स्थिरता में ही समर्थ नहीं करती वरन् हमारी चारित्रिक दृढ़ता भी प्रमाणित करती है। अकारण उत्पन्न होने वाली ईर्ष्या और लाँछना से बचने का भी यही सल मार्ग है।
चिन्तन की धारा यदि उपलब्ध सुविधाओं और सद्भावनाओं की ओर प्रवाहित हो चले तो संतोष और उल्लास की अभीष्ट मात्रा उपलब्ध करने के लिये पर्याप्त आधार मिल जाएगा
चिन्तन और मनन करने के बाद आइन्स्टीन को भी कहना ही पड़ा कि मनुष्य का इस प्रकार समय, स्थान या देश, गति और कारण (टाइम, स्पेस, मोशन, एण्ड कांजेशन) की संकीर्णता में बँधना उसकी भयंकर भूल है। उन्होंने बताया कि वह सम्पूर्ण चीजें हैं ही नहीं। संसार में न तो समय का कोई अस्तित्व है, न स्थान का, न गति का और नहीं किसी कारण या परिणाम का। यह चारों मस्तिष्क की उपज है और हम जब तक इनसे प्रतिबन्धित है, तब तक अन्तिम सत्य (एब्सोल्यूट) की अनुभूति नहीं कर सकते। अन्तिम सत्य वह है, जो इन चारों से बँधकर नहीं इनको बाँधकर रखता है।
चिन्तन की आदत है, दूसरों के दोष-दुर्गुण और अपने अभाव अवरोध ढूँढ़ने की आदत है, जो इसी शोध में लगे रहते हैं और जो प्रतिकूलताएँ दिखती हैं, उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर सोचते हैं, उन्हें अपने चारों और केवल दुष्टता और विपन्नता ही दिखाई देती है। ऐसे लोगों को क्षुब्ध ही रहना पड़ेगा, वे असमंजस, खिन्नता और उद्विग्नता ही अनुभव करते रहेंगे। रोष उनकी वाणी से और असन्तोष उनकी आकृति से टपकता रहेगा, ऐसे व्यक्ति स्वयं दुःखी रहते हैं और अपने संपर्क में आने वाले दूसरों को दुःखी करते रहते हैं।
चिन्तन करें, हमें हँसने के लिए प्रसन्न, रहने के लिए बहुत कुछ मिलेगा। यदि हम हँसना और हँसाना जीवन जी सकें तो समझना चाहिये कि हमने एक सच्चे कलाकार की जैसी मंगलमयी सफलता एवं उल्लास भरी उपलब्धि प्राप्त कर ली।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-July
चिन्तन भी करते रह जाये तो यह भी एक जन-सेवा ही होगी जो परमार्थ पुण्य से रहित नहीं हो सकती। विश्व-कल्याण की भावना ही सेवा कार्यों की वास्तविकता और उसका प्राण मानी गई हैं। विश्वकल्याण से रहित बड़ी से बड़ी लोक-सेवा भी निर्जीव और निस्सार ही मानी जायेगी। स्वार्थ का अंशमात्र भी बड़े से बड़े परमार्थ को व्यर्थ कर देती है।
चिन्तन ही किया करते हैं। वाक्पटुता, व्यवहार कुशलता, दया, करुणा, प्रेम अथवा उदारता के कितने ही कृत्रिम आवरण क्यों न डाले जायें किन्तु दुर्भाव छिपाये नहीं छिप सकता। जिस प्रकार शत्रुता मुख में मिश्री घोल लेने पर भी छिप सकती उसी प्रकार दुर्भाव भी सौ आवरणों के भीतर से भी समझ जाता है। मनुष्य का मुख हृदय का दर्पण कहा गया है। दुर्भावना पूर्ण शक्ति कितनी ही अनुकूलता क्यों नहीं प्रकट करे किन्तु उसका अन्तर्भाव मुख के भावों से, आँखों तथा मुद्राओं से प्रकट ही होता रहता है।
चिन्तन, साधन, धन, पुरुषार्थ एवं उत्साह जैसे साधन एक दूसरे को नीचा दिखाने में, आक्रमणों से सुरक्षा रखने में खर्च होते हैं वे कल सामूहिक, समृद्धि, शान्ति का सृजन कर रहे होंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-October
चिन्तन देकर मनुष्य को और भी अशान्त किया, किसी अन्तिम निष्कर्ष पर पहुँचना संभव न हुआ।
चिन्तन और क्रमबद्ध ज्ञान (राशनल नॉलेज) दोनों ही आधार है, जो हमारा सम्बन्ध सीधे परम अवस्था या अपने मूलीत उद्देश्य से जोड़ देता है।
चिन्तन (लॉजिकल थिंकिंग) से बताये तो उसका निर्णय गलत बैठेगा। वान एक शक्तिशाली साधन है, पदार्थ के अध्ययन का, पर अन्तिम उद्देश्य केवल धर्म द्वारा ही निर्धारित किये जा सकते है। वैज्ञानिकों शोधों का मूल्यांकन और उन्हें मानवीय जीवन में उतारना एक सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है, जिसे केवल धर्म ही पूरा कर सकता है।
चिन्तन (लॉजिकल थिंकिंग) सही दे सकता है, उदाहरण के लिये वह मौसम की जानकारी दे सकता है। बम विस्फोट से कितनी ऊर्जा (एनर्जी) पैदा होगी, यह बता सकता है, पृथ्वी से चन्द्रमा के बीच की दूरी को नाप सकता है, किन्तु मानवीय व्यवहार और न्याय का एक क्षेत्र है, उसे विज्ञान अपनी तार्किक चिन्तन (लॉजिकल थिंकिंग) से बताये तो उसका निर्णय गलत बैठेगा। वान एक शक्तिशाली साधन है, पदार्थ के अध्ययन का, पर अन्तिम उद्देश्य केवल धर्म द्वारा ही निर्धारित किये जा सकते है। वैज्ञानिकों शोधों का मूल्यांकन और उन्हें मानवीय जीवन में उतारना एक सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है, जिसे केवल धर्म ही पूरा कर सकता है।
चिन्तन से कल वाला बोझ हल्का हो गया। राजकुमार नीरवता ने मान लिया कि वह भी शरीर में अभिव्यक्त, अव्यक्त आत्मा है और उसे पाने के लिये अहंभाव छोड़ना ही पड़ता है।
चिन्तन देने के लिये विवश हो जाता है।
चिन्तन से एक बात सामने आई-जब देह नष्ट हो जाती है, तब भी क्या राजा ड़ड़ड़ड़ स्त्री-पुरुष बाल-वृद्ध का भेद रह जाता है, नहीं नहीं। मनने कहा नहीं। जीवन के दृश्य भाग नश्वर हैं, क्षणिक हैं, असन्तोषप्रद है, जब तक मनुष्य पूर्णता नहीं प्राप्त कर लेता, तब तक उसे ऐसी कोई मान्यता नहीं बना लेनी चाहिये। इस चिन्तन से कल वाला बोझ हल्का हो गया। राजकुमार नीरवता ने मान लिया कि वह भी शरीर में अभिव्यक्त, अव्यक्त आत्मा है और उसे पाने के लिये अहंभाव छोड़ना ही पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-November
चिन्तन और मनन यह साधना की प्रारम्भिक आवश्यकतायें है, शिखिध्वज! आज तुम्हारी मन्त्र-दीक्षा सम्पन्न हुई। पूजन की सामग्री, उपयुक्त पात्र, कुश-आसन यह अपने पास रखने होंगे। पंचोपचार पूजन सहित मंत्र जप करना चाहिये और शुभ्र ज्योति स्वरूप निराकार भगवती गायत्री का ध्यान करना चाहिये। जब तुम इस प्रारम्भिक साधना को सफलतापूर्वक पूरा कर लोगे तो आगे उच्चस्तरीय साधना के लिये, तुम्हें अग्नि-दीक्षा भी देंगे।” यह कहकर महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए।
चिन्तन के फलस्वरूप इतना मानसिक ताप हो जाता है कि बहुत बार मानसिक और शारीरिक बीमारियाँ तक पैदा हो जाती है। इसी विरोधाभास के कारण हृदय कमजोर होकर बैठ जाते है और कभी कभी लोग इस आपत्ति से पागल तक हो जाते है। अन्दर बाहर का यह विरोधाभास भयंकर यातना भरी स्थिति है। इसमें कैसे अबुद्धिमान लोग एक क्षण को भी शाँति के लिए तरसते रहते है। इस द्विविधि जीवन से उसी तरह बचते रहना चाहिये, जिस प्रकार सावधान लोग दुमुँही साँप से बचते है।
चिन्तन से बचाकर नीर-क्षीर विवेचना ऋतम्भरा प्रज्ञा का आश्रय लेने के लिए तत्पर किया जाय। आज की स्थिति में समाज की यही सबसे बड़ी सेवा है। विचार-क्राँति ही वर्तमान दुर्दशा को पलट कर धरती पर स्वर्ग का अवतरण सम्भव कर सकेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-October
चिन्तन और कर्म को एक तारतम्य में बाँधते हुए प्रबल प्रयास करना पड़ता है। इसके बिना महत्वपूर्ण सफलताओं की उपलब्धि किसी के लिए सम्भव नहीं होती। कल्पना के हवाई पर चढ़कर जो मनोरथों की मंजिल सहज ही पूरे करने के सपने देखते रहते हैं उन्हें निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। इतना सब होने पर भी सतर्कता को साथ लेकर चलना पड़ता है। जो कर रहे हैं उसमें कुछ चूक तो नहीं हो रही।
चिन्तन प्रक्रिया और कर्म−पद्धति को प्रभावित करता है। समाज, संस्कृति, चरित्र, संयम, सेवा, पुण्य परमार्थ आदि सद्वृत्तियों को अपनाने से व्यक्ति की भौतिक सुख−सुविधाओं में निश्चित रूप से कमी आती है, भले ही उस बचत का उपयोग लोक−कल्याण में कितनी ही अच्छाई के साथ क्यों न होता हो। आदर्शवादिता के मार्ग पर चलते हुए जो प्रत्यक्ष क्षति होती है उसकी पूर्ति ईश्वरवादी स्वर्ग, मुक्ति, ईश्वरीय प्रसन्नता आदि विश्वासों के आधार पर कर लेता है। इसी प्रकार अनैतिक कार्य करने के आकर्षण सामने आने पर वह ईश्वर के दण्ड से डरता है। नास्तिकवादी के लिए न तो पाप के दण्ड से डरने की जरूरत रह जाती और न पुण्य परमार्थ का कुछ आकर्षण रहता है।
चिन्तन भ्रष्टता ही है जिसने मनुष्य को दुर्भावग्रस्त और दुष्प्रवृत्ति संलग्न निकृष्ट कोटि का नर−पशु बनाकर रख दिया है।
चिन्तन बहुत पहले ही पूर्णता के स्तर तक पहुँच चुका है और समस्याओं का समाधान उपयुक्त रीति से खोजा जा चुका है।
चिन्तन एवं प्रतिपादन और भी अधिक गम्भीरता एवं विस्तार के साथ किया जाता है। अभी अधिक सोचे, अधिक लिखे और अधिक पढ़े जाने की आवश्यकता में कमी नहीं की जा सकती, बढ़े हुए बुद्धिवाद और विज्ञान ने जो असंख्यों विसंगतियाँ, विभूतियाँ और विडम्बनाएँ रचकर खड़ी कर दी हैं, उन्हें निरस्त करने के लिए प्रखर चिन्तन और प्रतिपादन की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है। उसमें भी कटौती नहीं की जा सकती। चिह्न पूजा के लिए तो अखण्ड−ज्योति निकल नहीं रही है। सैकड़ों पत्र−पत्रिकाओं की भीड़ के एक सदस्य बने रहने की उसकी तनिक भी इच्छा नहीं है।
चिन्तन से उत्पन्न होती हैं न कि विद्युत आवेशों और रासायनिक पदार्थों की घट−बढ़ से। मनुष्य की वर्तमान दुर्गति का कारण वह चिन्तन भ्रष्टता ही है जिसने मनुष्य को दुर्भावग्रस्त और दुष्प्रवृत्ति संलग्न निकृष्ट कोटि का नर−पशु बनाकर रख दिया है।
चिन्तन और प्रतिपादन की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है। उसमें भी कटौती नहीं की जा सकती। चिह्न पूजा के लिए तो अखण्ड−ज्योति निकल नहीं रही है। सैकड़ों पत्र−पत्रिकाओं की भीड़ के एक सदस्य बने रहने की उसकी तनिक भी इच्छा नहीं है। पत्रिका निकालने के लिए निकालना—यह निरर्थक नीति हमें तनिक भी पसन्द नहीं।
चिन्तन स्तर का भी होना चाहिए। अन्यथा वंश परम्परा के खोट हटा देने अथवा रक्त −माँस का स्तर बदल देने से अधिक से अधिक इतना ही हो सकेगा कि शारीरिक एवं बौद्धिक दृष्टि से नई पीढ़ी समय की परिस्थिति के अनुरूप ढल जाय। आस्थाओं की उत्कृष्टता के बिना मनुष्य ‘यन्त्र मानव’ भर रह जायगा। उसमें महामानवों का गौरवास्पद स्तर बनाये रहने की और संसार में सद्भावनाओं का स्वर्गीय वातावरण बनाने की क्षमता कैसे उत्पन्न होगी? और इसके बिना वह क्रियाशील किन्तु भाव रहित पीढ़ी संसार के दिव्य सौंदर्य संरक्षण अभिवर्धन कैसे कर सकेगी?
चिन्तन और कर्तृत्व की एक नीति नियम के अंतर्गत बहुत हद तक जकड़े रहने में सफल होती है। इन दार्शनिक बन्धनों को उठा लिया जाय तो मनुष्य की पशुता कितनी उद्धत हो सकती है और उसका दुष्परिणाम किस प्रकार समस्त संसार को भुगतना पड़ सकता है इसकी कल्पना भी कँपा देने वाली है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-November
चिन्तन—संकीर्णता और खीज यही सब उनके पल्ले बँधा है। शारीरिक रुग्णता से भी दो कदम आगे उन्हें मानसिक रुग्णता घेरे हुए है।
चिन्तन की प्रतिभा, प्रखरता भी नष्ट कर दी है पिछड़ापन और अनौचित्य हमारी चिन्तन प्रक्रिया के साथ भयावह रूप से जुड़−जकड़ गया है। राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने के उपरान्त हमारा ध्यान इसी विकृति के परिशोधन पर केन्द्रित होना चाहिए था। गिरा को उठाने वाला, व्यक्ति और समाज के प्रत्येक क्षेत्र को परिष्कृत स्तर की प्रबल प्रेरणा देने वाला साहित्य, सृजा जाना चाहिए था और उसे घर−घर पढ़ाने एवं जन−जन को सुनाने का प्रयास किया जाना चाहिए था पर वैसा कुछ हुआ नहीं। सच तो यह है कि जो हुआ है वह उलटा हुआ है। स्वाधीनता प्राप्त होने के उपरान्त पिछले 28 वर्षों में जो लिखा गया है, जो छापा गया और बेचा गया है उस सबको इकट्ठा करके स्तर का निष्कर्ष निकाला जाय तो उसे दुखद, दुर्भाग्यपूर्ण ही कहना चाहिए।
चिन्तन की—मानसिक स्थिति की—भिन्नता ही मूल कारण थी। एक दुर्जनता के पथ पर चलते हुए पतन के गर्त में गिरता है और दूसरा सज्जनता की नीति अपना कर क्रमशः प्रगति के उच्च शिखर पर चढ़ता जाता है उसमें कोई अन्य कारण नहीं मात्र चिन्तन की धारा, मस्तिष्क की गतिविधि ही प्रमुख आधार होती हैं।
चिन्तन परिष्कार से ही सम्भव होगा। यह प्रयोजन विद्या तत्व की आवश्यकता समझने और उसे उपलब्ध करने के साधन खड़े करने से ही सम्भव होगा। अपने युग की यह सबसे बड़ी माँग, पुकार और आवश्यकता है। सर्वनाश की ओर दौड़ी जा रही नामक जाति को सामूहिक आत्म हत्या से विरत करने की रोकथाम विद्या अभिवर्धन के बिना और किसी प्रकार हो नहीं सकेगी। उज्ज्वल भविष्य की आशा विद्या प्राप्त करने के साधन खड़े किये बिना और किसी प्रकार फलित नहीं हो सकती।
चिन्तन और मनन से भी ले सकती है। पशु को मनुष्य बनाने के लिए उस सद्ज्ञान की अनिवार्य आवश्यकता रहती है जो उसकी चिन्तन प्रक्रिया एवं कार्य−पद्धति में उच्चस्तरीय उभार उत्पन्न कर सके।
चिन्तन और धर्म कर्तृत्व को युग के अनुरूप बनाने के लिए हम प्रबल प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए चार कार्य पद्धति अपनाई गई हैं। (1) वाणी द्वारा−सत्संग व्यवस्था के अनुरूप सत्र शिक्षा पद्धति (2) अपने घरों पर स्वाध्याय कर सकने योग्य विचारोत्तेजक स्वाध्याय सामग्री (3) आयोजनों और सम्मेलनों द्वारा जनमानस को उद्वेलित करने वाला लोक शिक्षण (4) रचनात्मक और संघर्षात्मक आन्दोलन का सुव्यवस्थित अभियान। यह सारी प्रक्रिया पिछले दिनों गायत्री तपोभूमि मथुरा में स्थापित युग−निर्माण योजना द्वारा संचालित होती रही है। भविष्य में भी सुविस्तृत क्रिया−कलाप वहीं से चलेगा।
चिन्तन एवं कर्त्तृत्व को सही दिशा में चलने के लिए नियंत्रित प्रशिक्षित करती है। जीवन विद्या का जिसे जितना ज्ञान अभ्यास है वह उतना ही अधिक सफल सार्थक जीवन जियेगा। अन्तरंग क्षेत्र में उसे महानता का आनन्द और बहिरंग क्षेत्र में बड़प्पन का श्रेय सम्मान मिलेगा।
चिन्तन की धारा, मस्तिष्क की गतिविधि ही प्रमुख आधार होती हैं।
चिन्तन और कर्तृत्व में जो कायाकल्प उत्पन्न किया जा सके उसी विचारक्रान्ति के लिये हमारे विविध−विध प्रयत्न चल रहे हैं। लक्ष्य एक है—कार्यक्रम समय की माँग पूरी करने के लिये कई बनाने पड़ रहे हैं। वस्तुतः हम युगान्तर प्रस्तुत करने वाली चेतना का ज्ञान गंगा का अवतरण करने के लिये भागीरथ प्रयत्न कर रहे हैं। हमारा ज्ञान यज्ञ सतयुग की कल्पना को साकार करने वाले नवयुग को धरती पर उतारने के लिए है। हम मनुष्य में देवत्व का उदय देखना चाहते हैं और इन्हीं स्वप्नों को साकार करने के लिए समुद्र को पाट कर अपने अण्डे पुनः प्राप्त करने के लिये चोंच में बालू भर−भर डालने में निरत टिटहरी की तरह उत्कट संकल्प लेकर जुटे हैं।
चिन्तन की त्रुटियों से गुत्थियाँ उलझती हैं समस्याएँ उत्पन्न होती हैं और विपन्न विपरीतताएं सामने आ खड़ी होती हैं। अस्तु व्यक्तियों और परिस्थितियों को सुधारने के साथ−साथ अपनी दुर्बलताओं, विकृतियों और विसंगतियों को सुधारने पर जुट जाना चाहिए। हम सर्वथा सही ही हैं यह मानना अत्यन्त हानिकारक, अवाँछनीय, अवास्तविक और पाखण्डपूर्ण है जितनी कमियाँ हम दूसरों में सोचते हैं शायद उससे अधिक दूसरे हमारे सम्बन्ध में सोचते हैं। दोनों पक्ष अपनी−अपनी बात पर अड़े रहे—विपरीत मान्यताएँ बनाये रहे तो मिलन−समन्वय का कभी अवसर ही न आवेगा और खाई चौड़ी होती जायगी।
चिन्तन अनुभव किन्हीं को है फलतः यदि पूछने बताने की बात भी निरर्थक सिद्ध होती है कई बार तो उलटे परामर्श देकर भौंड़े सलाहकार कई बार गुत्थी और भी अधिक उलझा देते हैं। आदर्शवादी सिद्धान्त जिनका आज बहुत ढोल पीटा जाता है—इन परिस्थितियों में किस हद तक—किस प्रकार−−किस स्तर पर प्रयुक्त किये जा सकते हैं और क्रमिक पग बढ़ाने की प्रक्रिया क्या हो सकती है। इसे कोई विरले ही जानते हैं। आदर्श और व्यवहार की संगति न बैठ पाने के कारण अब उन्हें केवल कहने सुनने की—चर्चा विनोद की अव्यावहारिक प्रक्रिया भर मान लिया गया है। यह कितनी दुखद विडम्बना है।
चिन्तन एवं साधन को अपने−अपने घरों पर देर तक चालू रखें। उसके परिणामों के बारे में सूचित करते रहें। यह प्रयोग पिछले दिनों छोटे किन्तु व्यवस्थित रूप में चलता रहा है। उसके जो परिणाम सामने आये हैं उन्हें देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यह प्रशिक्षण तीन चौथाई परिणाम में बहुत ही सफल रहा। उसे उत्साह वर्धक और आशातीत भी कहा जा सकता है।
चिन्तन और भावोल्लास में उत्कृष्टता का निखार। इसके बिना मनुष्य के अंतराल में छिपी हुई रहस्यमय दिव्यता का विकास नहीं हो सकता। मानवता एवं महानता की आन्तरिक श्रेष्ठता का विकास जिस क्रम से होता है उसी क्रम से मनुष्य की आकाँक्षाएँ, विचारधाराएँ और गतिविधियाँ उच्चस्तरीय बनती जाती है। गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से उसका स्तर उठता जाता है। मन, वचन, कर्म में ऐसी विशेषताएँ दीख पड़ती हैं जिनके संपर्क में आने वाला हर मनुष्य प्रसन्नता अनुभव करता है, प्रकाश ग्रहण करता है।
चिन्तन के उपरान्त हरिद्वार में अवस्थित शान्ति−कुञ्ज आश्रम ने विद्या तत्व की प्रयोगशाला के रूप में अपने को प्रस्तुत किया है। विद्यालय के नाम तो सर्वत्र सुने जाते हैं, पर नाम को सार्थक करने वाली उपलब्धियाँ जहाँ से मिलती हों ऐसे संस्थान ढूंढ़ने में निराशा ही हाथ लगती है। शिक्षालय हैं—रहें और रहने चाहिएँ पर विद्यालयों की परम्परा समाप्त नहीं हो जानी चाहिए। इस अभाव से जूझने के लिए—इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए शान्ति−कुञ्ज न सत्र शृंखला के अंतर्गत एक विनम्र प्रयास प्रारम्भ किया है। आशा की जानी चाहिए कि स्वल्प साधनों से प्रारम्भ किया गया यह छोटा सा प्रयास अपने युग की एक महती आवश्यकता को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करेगा।
चिन्तन के ऊहापोह में गहरी दिलचस्पी रखने वाले—लेखक के लिए अनायास ही कुछ प्रयास करते रहने वाले ही अपनी रुचि विशेषता एवं अध्ययन क्षमता के आधार पर ही लेखक बन सकते हैं। जो चाहे वही लेखक बन तो सकता है पर उसके लिए दीर्घकालीन अध्यवसाय की आवश्यकता पड़ती है। अध्यापक स्तर के वे लोग जिनकी शिक्षा ग्रेजुएट समकक्ष है अधिक आसानी से और कम समय में लेखन की क्षमता उपलब्ध कर सकने में सफल हो सकते हैं। इसलिए लोक शिक्षण सत्र में ही इस शिक्षा व्यवस्था को भी सम्मिलित कर दिया गया है जिसे जून 74 के पन्द्रह−पन्द्रह दिवसीय दो सत्रों में सम्पन्न किया गया था। इस वर्ष अधिक व्यस्त समय और अधिक श्रम करे ऐसा पाठ्य क्रम बनाया गया है जिसमें पन्द्रह दिन जितनी स्वल्प अवधि में ही लोक शिक्षण की विधि−व्यवस्था और लेखन के लिए तथ्यों को हृदयंगम किया जाना आवश्यक है उन्हें सार रूप से किन्तु गम्भीरतापूर्वक समझा दिया जायगा।
चिन्तन एवं स्वभाव को लोकसेवी की महान् परम्परा के अनुरूप परिष्कृत करने का विशेष रूप से शिक्षण दिया जायगा और यह सिखाया जायगा कि युग की आवश्यकता पूरी करने के लिए उन्हें विचार क्रान्ति का−−नैतिक क्रान्ति का—सामाजिक क्रान्ति का शंखनाद किन प्रचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक प्रवृत्तियों के साथ करना होगा। संगइन−वक्तृत्व−संचालन, नेतृत्व एवं व्यवस्था से सम्बन्धित अनेकों सूत्र एवं उतार−चढ़ाव लोकसेवक के ज्ञान एवं अनुभव अभ्यास में रहने चाहिए उनकी सांगोपांग जानकारियाँ इस एक महीने की स्वल्प अवधि में अत्यन्त कुशलतापूर्वक पूरी कराने का प्रयत्न किया जाता है। हर रोज दस−दस घण्टे शिक्षण अभ्यास में संलग्न रहकर शिक्षार्थी उसे पूरा भी कर लेते हैं और इस योग्य बन जाते हैं कि कार्य क्षेत्र में जाकर उन्हें उपहासास्पद न बनना पड़े।
चिन्तन प्रक्रिया के साथ भयावह रूप से जुड़−जकड़ गया है। राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने के उपरान्त हमारा ध्यान इसी विकृति के परिशोधन पर केन्द्रित होना चाहिए था। गिरा को उठाने वाला, व्यक्ति और समाज के प्रत्येक क्षेत्र को परिष्कृत स्तर की प्रबल प्रेरणा देने वाला साहित्य, सृजा जाना चाहिए था और उसे घर−घर पढ़ाने एवं जन−जन को सुनाने का प्रयास किया जाना चाहिए था पर वैसा कुछ हुआ नहीं। सच तो यह है कि जो हुआ है वह उलटा हुआ है। स्वाधीनता प्राप्त होने के उपरान्त पिछले 28 वर्षों में जो लिखा गया है, जो छापा गया और बेचा गया है उस सबको इकट्ठा करके स्तर का निष्कर्ष निकाला जाय तो उसे दुखद, दुर्भाग्यपूर्ण ही कहना चाहिए।
चिन्तन एवं कर्तृत्व को अध्यात्म दर्शन के अनुरूप कैसे ढाला जाय—व्यावहारिक जीवन में उत्कृष्टता एवं आदर्शवाद का समन्वय कैसे किया जाय इसकी विशद् एवं सुबोध चर्चा की जाती रही है। प्रत्यावर्तन सत्रों की अवधि थोड़ी ही रखी गई थी क्योंकि उस समय आवश्यक जानकारियाँ देना ही अभीष्ट था। साधना का शुभारम्भ मात्र इस अवधि में कराया गया। अभ्यास तो अपने−अपने घरों पर ही लम्बे समय तक करना था। पाँच दिन का स्वल्प समय सर्वसाधारण की व्यस्तता को ध्यान में रख कर निर्धारित किया गया था।
चिन्तन एवं कर्त्तव्य इसी आधार पर विकसित हुआ था। यह एक सनातन शाश्वत एवं अकाट्य तथ्य है कि अन्तरात्मा का गहन स्तर ही व्यक्तित्व को दिशा देता एवं समर्थ बनाता है। अति महत्वपूर्ण—अतिमानव कहे जाने वाले व्यक्ति अपने इसी स्तर का दिशा विशेष में परिपुष्ट करके आगे बढ़े हैं। जिसका अन्तस्—अहम्—खोखला होगा वह प्रचुर साधन सम्पन्न होते हुए भी व्यक्तित्व की दृष्टि से ओछा, बौना एवं गया गुजरा ही बना रहेगा। ऐसे मनुष्य भौतिक सफलताएँ, सम्पदाएँ प्राप्त करलें तो भी उनका सदुपयोग नहीं कर पाते।
चिन्तन−दृष्टिकोण सही बना लिया। विकृत मनःस्थिति का ही दूसरा नाम नरक है। परिस्थितियाँ भली बुरी कैसी भी क्यों न हों ऐसे लोग स्वयं रोष आवेश में जल रहे होंगे और अपने सम्बन्धियों को भी जला रहे होंगे। जिसे मस्तिष्क की क्षमता को समझने और उसके सदुपयोग की कला आती है वह देवोमय स्वर्गीय जीवन जी रहा होगा। विपरीतताओं के साथ घोर संघर्ष करने में भी उसकी आन्तरिक शालीनता यथा स्थान बनी रहेगी।
चिन्तन प्रक्रिया एवं कार्य−पद्धति को आदर्शवादी परम्पराओं का अवलंबन करने की प्रेरणा देता हो। सौभाग्य और दुर्भाग्य की परख इस सद्ज्ञान संपदा के मिलने न मिलने की स्थिति को देखकर की जा सकती है। जिसे प्रेरक प्रकाश न मिल सका वह अँधेरे में भटकेगा, जिसे सद्ज्ञान की ऊर्जा से वञ्चित रहना पड़ा, वह सदा पिछड़ा और पतित ही बना रहेगा। पारस छू कर लोहे को सोना बनाने वाली किंवदंती सच हो या झूठ, यह सुनिश्चित तथ्य है सद्ज्ञान की उपलब्धि मनुष्य को सौभाग्य के श्रेष्ठतम स्तर तक पहुँचा देती है।
चिन्तन−मनन की आवश्यकता रहेगी। इसके लिए समय चाहिए। जीवन साहित्य पढ़ने के लिए—उपयोगी मार्ग−दर्शन सुनने, समझने के लिए—उनको कार्य रूप में परिणत करते समय आने वाली कठिनाइयों का समाधान करने के लिए दूरदर्शी एवं गम्भीर ऊहापोह की आवश्यकता है। यह कार्य समय साध्य है। उतावली में जादू की छड़ी घुमाकर परिष्कृत जीवन को योजना बनाना और उसे कार्य रूप में परिणत करने की बात पक्की करने के लिए भारी बौद्धिक श्रम करना पड़ेगा और गम्भीर दूरदर्शिता का उपयोग करना पड़ेगा।
चिन्तन चेतना में आदर्शवादी मान्यताओं का समावेश करने वाले साहित्य का युद्ध स्तरीय प्रयास करना होगा। न केवल लेखन का वरन् प्रकाशन, विक्रय, वितरण का भी कार्य हाथ में लेना होगा। इसके लिए पूँजी जुटाने और संस्थान खड़े करने की दुस्साहसपूर्ण व्यवस्था भी जुटानी पड़ेगी।
चिन्तन कर सकने योग्य बना सकेगी।
चिन्तन प्रक्रिया एवं कार्य−पद्धति में उच्चस्तरीय उभार उत्पन्न कर सके।
चिन्तन एवं कर्तृत्व का ऐसा निर्माण जो आज की स्थिति में ही हमें कुछ करने की प्रेरणा दे सके—रास्ता बता सके। इन महापुरुषों के अलग अलग फिल्म न बनाकर उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं को एक ही शृंखला में आबद्ध किया जाय ताकि कार्यक्रमों की भिन्नता रहते हुए भी महामानवों का लक्ष्य एक ही रहने की बात स्पष्ट हो सके।
चिन्तन की उत्कृष्टता और क्रिया कलाप में आदर्शवादिता का जो समावेश कर सके ऐसी विद्या का बीजारोपण उत्पादन एवं अभिवर्धन इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस तथ्य को समझा जाना चाहिए और उसके लिए प्रबल प्रयत्न किया जाना चाहिए। रक्त शोधन से ही दाद, खाज, फोड़े, चकत्ते, चेचक विस्फोट अच्छे होंगे ऊपरी उपचारों का क्षणिक परिणाम ही मिलेगा। चर्म रोगों की जड़ काटने के लिए रक्त−शोधन आवश्यक है। आज की अनेकानेक समस्याओं, विपत्तियों, कुत्साओं और कुण्ठाओं का निराकरण मनुष्य के चिन्तन परिष्कार से ही सम्भव होगा।
चिन्तन में निमग्न होने की प्रेरणा देती हैं इसे समझना और अनुभव करना हर किसी के बस−बूते का नहीं है। अस्तु यह स्तर अविकसित अछूता ही पड़ा रहता है। परिस्थिति वश उसका जैसा भी कुछ भला बुरा निर्माण हो गया उसी लीक पर जीवन संकट चलता लुढ़कता रहता है। स्वभाव बदलता नहीं, आदत सुधरती नहीं, जैसी बातें अक्सर सुनी जाती हैं जिनका अर्थ होता है आस्था स्तर की गहराई में उतर कर वहाँ सुधार परिष्कार करना अशक्य हैं। बात बहुत अंशों में है भी ऐसी ही।
चिन्तन इसी छोटे क्षेत्र में अवरुद्ध रहता है। ऐसे व्यक्ति जिन्दगी तो जी लेते हैं पर वह निरर्थक स्तर की होती है। जीव−जन्तु इन्हीं कार्यों में लगे रहते हैं और सृष्टि क्रम की धुरी पर लुढ़कते हुए जन्मते, बढ़ते और मृत्यु के ग्रास बनते हैं। मनुष्य जन्म जैसा सुविधा सम्पन्न साधन प्राप्त करके भी जो नर पशु भर बना रहा उसे ‘तुच्छ’ कहा जाय तो कुछ अनुचित नहीं।
चिन्तन क्षेत्र को उच्चस्तरीय पृष्ठभूमि पर अवस्थित करने की—आस्था निर्धारण की—दार्शनिक भूमिका है। योग और तप का द्विविधि क्रिया−कलाप इसी प्रयोजन को अभ्यास में उतारने की साधना है। अध्यात्म का विवेचनात्मक और साधनात्मक विशाल काय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। ईश्वरीय जीव प्रकृति के स्वरूप का प्रतिपादन—जीवन लक्ष्य का निर्धारण, गति विधियों का निर्धारण और वस्तुओं का उपयोग एवं व्यक्तियों से व्यवहार की जो नीति मर्यादा निरूपित होती है उस मान्यता और आकाँक्षा का एक उत्कृष्ट आधार बनता है। यही है अध्यात्म का लक्ष्य।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-December
चिन्तन करते रहते हैं। दुराचरण में रस लेते रहते हैं फलतः मनःस्थिति दुष्प्रवृत्तियों से समझौता कर लेती हैं और प्रकारान्तर से उनकी समर्थक बन जाती हैं। बाहर से विरोध भीतर से समर्थन भी दुहरे व्यक्तित्व वाली मनःस्थिति का होना कुछ आश्चर्यजनक नहीं है। इन दिनों तो ऐसा बहुत अधिक ही होता है। दम्भ का अर्थ ही भीतर और बाहर की स्थिति में भिन्नता का होना है।
चिन्तन तन्त्र ही सड़−गल जाता है फिर उसके लिए कोई ऊँची बात सोच सकना तक कठिन हो जाता है।
चिन्तन करने पर ही घृणा उत्पन्न होती है। इससे व्यक्ति या स्थिति का निकृष्ट स्तर ही उभरता है और मस्तिष्क पर छाया रहता है। इस विषाक्त घुटन से अपना चिन्तन तन्त्र ही सड़−गल जाता है फिर उसके लिए कोई ऊँची बात सोच सकना तक कठिन हो जाता है।
चिन्तन की गहराई में उतर कर आत्म−निरीक्षण करने पर लगता है −जीवन की धारा रुक गई और अशुभ में अंग−अंग को जकड़ लिया। किसी काम में मन लगता,सब कुछ उजड़ा और नीरस दिखाई पड़ता है।
चिन्तन, कला−कौशल शौर्य, साहस जैसे सद्गुणों का बाहुल्य रहता है। ओजस्विता एवं मनस्विता उसी का नाम है। दूसरे शब्दों में इसे प्रचण्ड संकल्प शक्ति भी कह सकते हैं उसी से आन्तरिक व्यक्तित्व का निर्माण होता है और उसी के आधार पर उस पुरुषार्थ की उपलब्धि होती है जो कठिन परिस्थितियों को चीरते हुए सुदूर लक्ष्य तक ले पहुँचने में समर्थ होता है। योग और तप की साधना इसी मानवी विद्युत शक्ति को बढ़ाने के लिए की जाती है।
चिन्तन, मनन आदि द्वारा प्रशिक्षित एवं परिष्कृत किया जा सकता है पर अचेतन पर इन प्रक्रियाओं का बहुत थोड़ा प्रभाव पड़ता है। उसे निरन्तर के दीर्घकालीन अभ्यास ही प्रभावित करते हैं। इस दृष्टि से तत्व वेत्ताओं ने कितने ही प्रकार की विशिष्ट साधनाएँ विनिर्मित की हैं। इन्हें योगाभ्यास के नाम से पुकारा जाता है। जप और ध्यान इस प्रयोजन की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता पूरी करते हैं।
चिन्तन उनकी ममता को−कोमल भावना को एक प्रकार से समाप्त ही करके रख देता है। यह हानि इतनी बड़ी है जिसकी तुलना में घृणास्पद का विनाश करना भी कम महत्व का रह जाता है।
चिन्तन अपनाये बिना महानता प्राप्त करने का और मार्ग नहीं। यह तथ्य जितनी जल्दी समझ लिया जाय, उतना ही उत्तम है।
चिन्तन पक्ष की—आस्था आधार की है। उसका स्तर नीचे गिरेगा तो व्यक्ति और समाज को पतनोन्मुख दिशा में चलते और अनेकानेक संकटों में ग्रसित होते दिशा जा सकेगा, यदि दर्शन में उत्कृष्टता आदर्शवादिता भरी रही तो चेतना को महामानव स्तर पर विकसित करने का अवसर मिलेगा और भौतिक एवं आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त होता चला जायगा। प्रगति के लिए जितने भौतिक प्रयास किये जाते रहे हैं यदि उतने ही दार्शनिक उत्कृष्टता को विकसित एवं परिपुष्ट करने के लिए किये गये होते तो आजे जिन जटिल समस्याओं के समाधान के लिए हमें घोर प्रयत्न करने हुए भी अँधेरे में भटकना पड़ रहा है उनके प्रस्तुत होने की ही आवश्यकता न पड़ती। तब कोई संकट एवं अभाव दिखाई ही न पड़ता।
चिन्तनों की दुर्गन्ध से भर देती है। घृणा का अभ्यासी इतना शंकाशील और विग्रही हो जाता है कि फिर उसके लिए सज्जनों के प्रति भी श्रद्धा और विश्वास रख सकना सम्भव नहीं रहता। दुष्टता का गहरा चिन्तन करने पर ही घृणा उत्पन्न होती है। इससे व्यक्ति या स्थिति का निकृष्ट स्तर ही उभरता है और मस्तिष्क पर छाया रहता है। इस विषाक्त घुटन से अपना चिन्तन तन्त्र ही सड़−गल जाता है फिर उसके लिए कोई ऊँची बात सोच सकना तक कठिन हो जाता है।
चिन्तन की यथार्थता और उपयोगिता सिद्ध कर सके। सूक्ष्मदर्शी यह भली प्रकार समझ रहे हैं कि उत्कृष्टतावादी दर्शन को बुद्धिमानी प्रतिपादन का जो नया आधार मिला है उसके परिणाम दूरगामी होंगे। समय को पलटने की—युग परिवर्तन की बात अब दिवास्वप्न न समझी जायगी। धरती पर स्वर्ग के अवतरण और मनुष्य में देवत्व का उदय की संभावना अगले दिनों निश्चित रूप से यथार्थता बनकर सामने आवेगी।
चिन्तन में यह गुंजाइश भी छोड़ी जानी चाहिए कि शोध की प्रगति किन्हीं भूतकालीन मान्यताओं को सही भी सिद्ध कर सकती है। उचित यही है कि हम प्रमाणित सिद्धांतों को स्वीकार करते हुए मस्तिष्क को इसके लिए खुला हुआ रखें कि अतीत की अध्यात्म सम्बन्धी मान्यताओं को भविष्य में सही सिद्ध हो सकने की सम्भावना है। सामाजिक कुरीतियों के रूप में जो हानिकारक प्रचलन हैं उन्हें निस्संकोच हटाया जाय, पर अध्यात्म मान्यताओं के सम्बन्ध में उतावली न बरती जाय। तत्वदर्शी ऋषियों के अनुभव सहज ही उपहासास्पद नहीं ठहरा दिये जाने चाहिए और उन्हें तत्काल अन्ध-विश्वासों की श्रेणी में नहीं गिन लेना चाहिए।
चिन्तन का आश्रय लेकर ही उपार्जित किया जा सकता है। विद्या, बुद्धि, बलिष्ठता, प्रतिभा एवं गुण, कर्म, स्वभाव सम्बन्धी उत्कृष्टता के आधार पर ही सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर अग्रसर हुआ जा सकता है। यह विभूतियाँ अनायास ही किसी को प्राप्त नहीं हो जाती। प्रबल इच्छा शक्ति एवं अथक अभ्यास के आधार पर ही इन्हें उगाया, बढ़ाया जाता है। यही बात बाह्य सफलताओं के सम्बन्ध में भी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-June
चिन्तन की निष्कृष्ट संकीर्णता है उससे अन्याय का ही पोषण हो सकता है और संघर्ष विद्वेष ही बढ़ सकता है।
चिन्तन से ऊर्ध्वगामी विद्युत का ह्रास होता है उसी प्रकार अवाँछनीय रति क्रिया से भी मनुष्य की प्रतिभा विगलित होती चली जाती है। ब्रह्म चिन्तन और वीर्य रक्षण यह दोनों ही प्रयोग मानवी विद्युत की गरिमा को दिन−दिन ऊँचा उठा सकते हैं। किन्तु यदि हेय संपर्क से अधिक रुझान हो तो फिर इस क्षेत्र में घाटा ही घाटा हाथ लगेगा।
चिन्तन तथा क्रिया −कलापों में बीता है तो उस अवधि में डरावने नारकीय दृश्य दीखते रहेंगे और वैसी ही कष्टकारक अनुभूति होती रहेगी मृत्यु और जीवन जन्म के बीच में जो थोड़ा अवकाश मिलता है उसमें आत्मा को यही स्वप्न दिखाई देते रहते हैं। इन्हें ही परलोक गत स्वर्ग नरक कहा जा सकता है स्वर्गीय दृश्य देखकर सुखद सन्तुष्ट निद्रा पूरी करके जगा हुआ जीव−ताजगी और स्फूर्ति लिए होता है और नवीन जग में प्रगतिशील मनःस्थिति तथा परिस्थिति प्राप्त करता है इसके विपरीत नरक के दृश्यों से डरता, काँपता आधा अधूरा विश्राम लेकर नये शरीर में प्रवेश हुआ प्राणी डडडड बुद्धि, कुसंस्कारी एवं हीन व्यक्तित्व का होता है वैसे ही घटिया वातावरण में उसे जन्म भी मिलता है। स्वर्ग नरक और पुनर्जन्म में कैसी अनुभूति मिलेगी, कैसी स्थिति रहेगी इसे जानने के लिए किसी व्यक्ति का जीवन −क्रम कि प्रकार व्यतीत हुआ है इसे देखना होगा। जो जैसा सोचता और करता रहा है उसे तद्नुरूप में परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। कर्मफल एक ऐसी सुनिश्चित संभावना है जिसे किसी भी प्रकार टाला नहीं जा सकता।
चिन्तन पद्धति को अपनाया जाना आवश्यक है अन्यथा हम यथार्थता का आग्रह करते हुए वस्तुतः दुराग्रही हठवादिता के ही चंगुल में जकड़े रहेंगे। सत्य शोधक को जो लाभ मिलने चाहिए वे हमें कभी भी प्राप्त न हो सकेंगे।
चिन्तन, उदात्त दृष्टिकोण, उदार व्यवहार जैसी वैयक्तिक क विशेषताओं का संरक्षण एवं अभिवर्धन ऐसी विभूतियाँ हैं जिन पर गर्व करना उचित कहा जा सकता है। इन विभूतियों को नष्ट होने देने के लिए जो सुरक्षात्मक मनोबल अन्तःकरण में विद्यमान रहता है उसे स्वाभिमान कहते हैं। इस स्वाभिमान की रक्षा के लिए हमें प्राण−प्रण से प्रयत्न अहंकाकर को निरस्त करना ही श्रेयस्कर हैं।
चिन्तन को उभारना होगा। अगले दिनों मानव समाज को एक बनकर रहना होगा। एकता की उपासना करनी होगी साथ ही चिन्तन और कर्त्तव्य को प्रेरणा देने वाली सार्वभौम यथार्थता के निकट पहुँचना होगा। भटकाव और विलगाव पर विजय प्राप्त करके स्नेह, सौहार्द्र बढ़ाने के लिए यदि आगे बढ़ना हो तो उसका एक ही तरीका है—सत्य शोधक—पक्षपात रहित दृष्टिकोण का विकास और उसके आधार पर उपयुक्त सिद्ध होने वाले तथ्यों को अपना सकने योग्य साहस का संचय सम्पादन और अभिवर्धन।
चिन्तन से कामविकारों का सहज शयन सम्भव हो जाता है। यदि यह उभय−पक्षीय शक्ति प्रवाह ठीक तरह सँजोया, संभाला जा सके तो उसका प्रभाव व्यक्तित्व के समान विकास में चमत्कारी स्तर का देखा जा सकता है।
चिन्तन और वीर्य रक्षण यह दोनों ही प्रयोग मानवी विद्युत की गरिमा को दिन−दिन ऊँचा उठा सकते हैं। किन्तु यदि हेय संपर्क से अधिक रुझान हो तो फिर इस क्षेत्र में घाटा ही घाटा हाथ लगेगा।
चिन्तन और कर्त्तव्य को प्रेरणा देने वाली सार्वभौम यथार्थता के निकट पहुँचना होगा। भटकाव और विलगाव पर विजय प्राप्त करके स्नेह, सौहार्द्र बढ़ाने के लिए यदि आगे बढ़ना हो तो उसका एक ही तरीका है—सत्य शोधक—पक्षपात रहित दृष्टिकोण का विकास और उसके आधार पर उपयुक्त सिद्ध होने वाले तथ्यों को अपना सकने योग्य साहस का संचय सम्पादन और अभिवर्धन।
चिन्तन मनुष्य की वाणी एवं दृष्टि से प्रखरता उत्पन्न करता है। सूझ−बूझ और प्रभावशीलता को बढ़ाता है। किन्तु यदि उन्हें निकृष्ट चिन्तन में निरत रखा जाय तो प्रतिभा विगलित होती चली जायगी और व्यक्ति निकृष्ट से निकृष्टतम बनता चला जायगा। यही बात जननेन्द्रिय में सन्निहित काम शक्ति के बारे में उसका रति प्रयोजन मात्र सन्तानोत्पादन अथवा इन्द्रिय सुख तक ही सीमित नहीं है वरन् दो व्यक्तियों के तेजस् को एक दूसरे में परिवर्तित भी करना है। समर्थ पक्ष असमर्थ पक्ष से महत्वपूर्ण अनुदान दे सकता है।
चिन्तन में निरत रखा जाय तो प्रतिभा विगलित होती चली जायगी और व्यक्ति निकृष्ट से निकृष्टतम बनता चला जायगा। यही बात जननेन्द्रिय में सन्निहित काम शक्ति के बारे में उसका रति प्रयोजन मात्र सन्तानोत्पादन अथवा इन्द्रिय सुख तक ही सीमित नहीं है वरन् दो व्यक्तियों के तेजस् को एक दूसरे में परिवर्तित भी करना है। समर्थ पक्ष असमर्थ पक्ष से महत्वपूर्ण अनुदान दे सकता है। इसमें तेजस्वी पक्ष घाटे में रहते हैं। अस्तु प्रतिभावानों को रति संयोग से विरत रहकर अपनी गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रहने का परामर्श दिया जाता है।
चिन्तन और स्वभाव में दुर्गन्ध आ रही होगी उसका न तो कोई मित्र रहेगा और न सहयोगी। शत्रुता और निन्दा का वातावरण ही उसे अपने चारों ओर घिरा हुआ दिखाई पड़ेगा। भीतर की स्थिति यदि सद्भाव सम्पन्न एवं शालीनता युक्त है तो उसका चुम्बकत्व सज्जनों का सहयोग अपने इर्द−गिर्द जमा कर देगा।
चिन्तन और कर्तृत्व नियोजित रहता है। पेट भरने और तन ढकने की आवश्यकता तो कम प्रयास से सामान्य शरीर श्रम से ही पूरी हो जाती है। उसके लिए कदाचित ही किसी को अभावग्रस्त रहना पड़ता हो। व्यग्रता एवं उद्विग्नता तो मानसिक क्षुधा को पूरा करने के लिए साधन जुटाने की ही रहती है। यह मानसिक भूखे या माँगे मध्यवृत्ति के लोगों में विलास वैभव के लिए लालायित रहती हैं किन्तु जब अन्तःकरण का स्तर ऊँचा उठता है तो प्रेम का अमृत पीने और पिलाने की एक मात्र साज शेष−रह जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-March
चिन्तन को उत्कृष्ट और कर्तृत्व को आदर्श बनाने की दार्शनिक प्रेरणा है। अन्तरंग जीवन में श्रेष्ठता का बहिरंग जीवन में उदार स्नेह सहयोग का — अभिवर्धन यही अध्यात्म का लक्ष्य है। आत्मवत् सर्व भूतेषु और वसुधैव कुटुंबकम् की भावना अपना कर अध्यात्मवादी की अधिकाधिक पवित्र और उदार बनना पड़ता है। अपने सुखों का बाँट देने और दूसरों के दुख बँटा लेने की अन्तःकरण प्रबल होती है और अनेकता में से एकता ढूंढ़ निकालने की दृष्टि रहती है। इन्हीं विशेषताओं के कारण अध्यात्म किसी वर्ग विशेष की सम्पत्ति न रह कर सार्वभौम रहता है।
चिन्तन की धारा को दर्शन और बहिरंग हलचलों के ऊहापोह को विज्ञान कहा जाता रहा है। इतने होते हुए भी यह स्पष्ट है कि दोनों के मिलाये बिना न तो चिन्तन में स्पष्टता आती है और न वैज्ञानिक प्रगति का पथ प्रशस्त होता है।
चिन्तन आज बढ़ रहा है और आर्थिक एवं वैज्ञानिक प्रगति के साथ−साथ यह भी आवश्यक समझा जा रहा है कि चिन्तन की उत्कृष्टता बनाये रहने वाली प्राचीनता को भी मानवी आवश्यकता का−प्रगति का −एक अंग स्वीकार किया गया।
चिन्तन, मनन अध्ययन और निदिध्यासन करने के लिए अग्रसर होने का निश्चय ही आत्म−साधना का—उपासना, तपश्चर्या और योगसाधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश, परामर्श इस प्रकार है—
चिन्तन और कर्तृत्व में, देव स्तर का बनाये बिना रह नहीं सकता। यह महामानव देव−मानव बनने का कल्प विधान है जिसे अपना कर लघु को महान बनने का अवसर मिलता है। योग का उपयोग इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए किये गये प्रयास अभ्यासों के साथ जोड़ा जाय तो ही इस महान् भाव विज्ञान की आत्मा को यथार्थ रूप में समझा और समझाया जा सकेगा।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की आस्था विकसित हुए बिना कोई मनुष्य न तो आत्म−संयम के लिए तैयार होगा और न अपनी उपलब्धियों को सेवा प्रयोजनों में प्रयुक्त करने के लिए सहमत होगा। आपाधापी ही ऐसी दिशा में एक मात्र नीति बन जायगी। तब स्वार्थों का संघर्ष दिन−दिन विकट होता जायगा। स्वार्थवादी बुद्धिमत्ता विकसित होते−होते एक दूसरे को फाड़ खाने की स्थिति उत्पन्न करेगी। सर्वत्र आशंका और अविश्वास का वातावरण छाया रहेगा।
चिन्तन एवं क्रिया कलाप का नये सिरे से निर्धारण करे।
चिन्तन का उपयुक्त प्रकाश न मिलने पर ऐसा अवरोध उत्पन्न हो जाता है, जिससे सर्वांगीण विकास के किन्हीं महत्वपूर्ण आधारों को लकवा ही मार जाय और व्यक्ति को गई गुजरी हेय घृणित तथा दयनीय परिस्थिति में पड़े रहने के लिए विवश होना पड़े।
चिन्तन गुणग्राही होना चाहिए। युग के अनुरूप परिवर्तनों का स्वागत किया जाय, विकृतियों और अवाँछनीय प्रथा−परम्पराओं का उन्मूलन किया जाय किन्तु यह ध्यान रखा जाय कि प्राचीनता में शाश्वत सत्यों और उपयोगी तथ्यों की भी कमी नहीं है। उन्हें न केवल सुरक्षित ही रखा जाना चाहिए वरन् सींचा भी जाना चाहिए। प्रगति का प्रयोजन सन्तुलित दृष्टिकोण रख कर चलने से ही पूरा हो सकता है।
चिन्तन में स्पष्टता आती है और न वैज्ञानिक प्रगति का पथ प्रशस्त होता है।
चिन्तनशील व्यक्ति को उपयोगी सफलता मिलेगी। विद्यार्थी, वकील, लेखक, कवि, शिल्पी, कलाकार, सर्जन आदि बुद्धिजीवी वर्ग के लोग जब अपना काम मनोयोग पूर्वक करते हैं, प्रस्तुत विषय में तन्मय हो जाते हैं तो वे गहराई में घुस कर कीमती मोती बीन लाते हैं। शोधकर्ता वैज्ञानिकों को यह अवलम्बन अनिवार्य रूप में उनका मस्तिष्क उलझा रहता है। सोते, जागते वे उसी क्षेत्र की समस्याओं को सुलझाने में लगे रहते हैं। कलाकारों और कारीगरों के बारे में भी यही बात लागू होती है, यदि वे अपना कार्य पूरी दिलचस्पी से करें, हाथ के कार्य को मनोयोग पूर्वक सम्पन्न करें तो उनकी अपेक्षा कहीं अधिक सफलता प्राप्त करते हैं जो अस्त व्यस्त मन से बेगार भुगतने की तरह काम का बोझा सिर पर से उतारते हैं।
चिन्तन के सुसंतुलन का सम्मिश्रण ही मानव−जीवन के समग्र विकास की पृष्ठभूमि बन सका है। रथ के दो पहियों की तरह हमारा प्रगतिशील एवं सुख−सुविधा सम्पन्न जीवन, विज्ञान और दर्शन के समन्वय से ही गतिशील हो रहा है।
चिन्तन विज्ञान का विकास और विश्वव्यापी घनिष्टता की कुछ धारायें ऐसी भी हैं जो क्रमशः संसार में अधिकाधिक प्रगतिशील उत्पन्न करेंगे और उन विकृतियों को निरस्त करेगी जो भविष्य को अन्धकारमय बनाये में लगी हुई हैं।
चिन्तन एवं क्रियाकलाप को आत्मानुगामी, परमार्थ परायण बनाये बिना रह ही नहीं सकता। ऐसे ही यथार्थ आत्मज्ञान का स्वरूप समझाते हुए शास्त्र कहता है—
चिन्तन की उत्कृष्टता बनाये रहने वाली प्राचीनता को भी मानवी आवश्यकता का−प्रगति का −एक अंग स्वीकार किया गया।
चिन्तन को उलट देने की सामर्थ्य गीतवाद्य में मौजूद है। भावों की अधिष्ठात्री सरस्वती देवी है। उसकी वीणा का अर्थ है संगीत—पुस्तक का अर्थ है साहित्य। लेखनी और वाणी के माध्यम से ही मनुष्य की हत्तन्त्री को झंकृत किया जाता रहा है और भविष्य में भी इन्हीं माध्यमों से वह महान प्रयोजन पूरा किया जाता रहेगा।
चिन्तन तक सीमित रहना ही है। मनुष्य ने प्रगति पथ पर अग्रसर होते हुए सृष्टि का मुकुटमणि बनने की जो अद्भुत सफलता पाई है, उसका मूल कारण उसकी बुद्धिमत्ता नहीं−सहृदयता है। परस्पर स्नेह सहयोग की प्रवृत्ति ने एक दूसरे के साथ घनिष्ठतापूर्वक रह सकने की स्थिति उत्पन्न की और एक ने दूसरे के अनुभव से लाभ उठाकर अपनी ज्ञान सम्पदा को आग बढ़ाया है। बुद्धि प्रधानता ने सहयोग बढ़ाया, यह कथन अवास्तविक है। तथ्य यह है कि मनुष्य की सहृदयता क्रमशः आगे बढ़ती गई और स्नेह सहयोग की प्रकृति ने मिलजुल कर एक दूसरे को अपने अनुभव अनुदानों से लाभान्वित करने का कदम बढ़ाया।
चिन्तन हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि सहृदयता ही उदार सहयोग के लिए प्रेरित कर सकती है। आदर्शवादी प्रवृत्ति ही दूसरों के साथ सेवा, सहयोग, स्नेह एवं अनुदान भरा उदार व्यवहार करने की प्रेरणा देती है। शुद्ध स्वार्थ ही यदि मूल प्रकृति रही हो उस संघर्ष में हर किसी को अपने ही लाभ को प्रधानता देनी पड़ेगी, ऐसी दशा में संघर्ष प्रधान रहेगा और सहयोग कभी नहीं पनपेगा। मत्स्य न्याय से एक दूसरे को खाते तो रहेंगे पर कोई किसी के सुख−दुख में भाग न लेगा। समुद्र में रहने वाली बहुसंख्यक और विशालकाय मछलियों में यदि सहयोग रहा होता— वे एक दूसरे के सुख−दुख में शामिल रहने की आवश्यकता समझ गई होतीं तो मनुष्य को समुद्र में पैर धरने की भी हिम्मत न पड़ती।
चिन्तनशील व्यक्ति किसी भी भली−बुरी समस्या पर गहराई से विचार कर सकता है। विचारणीय तथ्य पर मनोयोग पूर्वक यदि विचार किया जायगा तो हर चिन्तनशील व्यक्ति को उपयोगी सफलता मिलेगी। विद्यार्थी, वकील, लेखक, कवि, शिल्पी, कलाकार, सर्जन आदि बुद्धिजीवी वर्ग के लोग जब अपना काम मनोयोग पूर्वक करते हैं, प्रस्तुत विषय में तन्मय हो जाते हैं तो वे गहराई में घुस कर कीमती मोती बीन लाते हैं। शोधकर्ता वैज्ञानिकों को यह अवलम्बन अनिवार्य रूप में उनका मस्तिष्क उलझा रहता है। सोते, जागते वे उसी क्षेत्र की समस्याओं को सुलझाने में लगे रहते हैं।
चिन्तन पक्ष का सम्बन्ध है, उच्चस्तरीय विचारणाओं का संचार भी मस्तिष्कीय कोशिकाओं में होने वाले रक्त संचार की तरह ही आवश्यक है। चिन्तन का उपयुक्त प्रकाश न मिलने पर ऐसा अवरोध उत्पन्न हो जाता है, जिससे सर्वांगीण विकास के किन्हीं महत्वपूर्ण आधारों को लकवा ही मार जाय और व्यक्ति को गई गुजरी हेय घृणित तथा दयनीय परिस्थिति में पड़े रहने के लिए विवश होना पड़े।
चिन्तन प्रक्रिया को नियोजित करना अधिक उपयोगी रहता है। जिनका मस्तिष्क सधा हुआ होता है वे मन्दबुद्धि होते हुए भी बहुमूल्य समाधान ढूँढ़ निकालते हैं। यहीं है एकाग्रता का−मेड़ीटेशन का− सर्वविदित महत्व। बात जितनी बड़ी है उतनी ही उसे बताया जाना चाहिए। बात को बतंगड़ बनाने की आदत बुरी है।
चिन्तन के ही फलस्वरूप सामने आये हैं और मनुष्य क्रमबद्ध एवं परिष्कृत पद्धति से चिन्तन के सुसंतुलन का सम्मिश्रण ही मानव−जीवन के समग्र विकास की पृष्ठभूमि बन सका है। रथ के दो पहियों की तरह हमारा प्रगतिशील एवं सुख−सुविधा सम्पन्न जीवन, विज्ञान और दर्शन के समन्वय से ही गतिशील हो रहा है।
चिन्तन एवं कर्तृत्व को उलट कर उसे सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों में परिणत करना पड़ता है। अध्यात्म साधनाओं का लक्ष्य यही है। इसकी पूर्ति के लिए प्रत्याहार धारण, ध्यान और समाधि की मनः विज्ञान समर्थित योगाभ्यास क्रियाओं को अपनाना पड़ता है। यही है वह लक्ष्य जिसकी ओर योग शिक्षकों की तत्परता और शिक्षार्थियों की दिलचस्पी को आगे बढ़ना बढ़ाया जाना चाहिए।
चिन्तन के विस्तार से एक बात बिलकुल स्पष्ट हो गई हैं कि भौतिक जगत का कोई ऐसा रहस्य नहीं है जो अपने आगे भी किसी रहस्य की ओर इंगित न करता हो।
चिन्तन, चरित्र एवं समूह के सम्बन्ध में क्रमिक प्रगति ने आज का सुसंगठित समाज विकसाया है। इस प्राचीनता में निश्चित रूप से ऐसे आधार मौजूद हैं और सर्वांगीण प्रगति का पथ प्रशस्त करते हैं। यदि अति उत्साह भरे विद्रोही स्वर पुरातन के नाम से चिढ़ते रहे और प्राचीनता को उखाड़ फेंकने की आवेश−ग्रस्तता में ही उत्तेजित रहे तो इससे उस लक्ष्य को भी प्राप्त नहीं किया जा सकेगा जिसके लिए वह आवेश उत्पन्न किया गया था। ऐसी विवेकहीन क्रान्ति प्रतिगामी, प्रतिक्रान्ति भी सिद्ध हो सकती है।
चिन्तन में भौतिक तथ्यों का समावेश करने का परिणाम चरित्रहीनता, उच्छृंखलता और असामाजिकता के रूप में सामने आया है। जिस भौतिकवादी आस्थाओं के आधार पर श्रेष्ठ और सुखी समाज की कल्पना की जाती थी, वह अब खोखली और धूमिल हो चली। अवाँछनीय के नाम पर खड़ा किया गया विद्रोह अब वाँछनीय को भी बख्शने के लिए तैयार नहीं उस अन्धड़ ने सब कुछ उड़ा देने, उजाड़ देने की ठान ठानी है। इस उपद्रव ने आधुनिकता के अन्ध समर्थन को शिक्षित कर दिया है और विचारक वर्ग यह सोचने के लिए विवश हो रहा है कि प्राचीनता को सर्वथा बहिष्कृत कर देना न तो बुद्धिमान पूर्ण होगा और न दूरदर्शितापूर्ण। कुछ दिन पूर्व जिनने विप्लव और विद्रोह के स्वर गुँजाये थे और जो है उसमें आग लगा कर नई दुनियाँ बसाने के सपने देखे थे, वे अब पुनर्विचार करने को बाध्य हुए हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि प्राचीनता को सर्वथा बहिष्कृत करके नवीनता का अभिनव सृजन बहुत महंगा पड़ेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-February
चिन्तन में उत्कृष्टता की समुचित मात्रा बनाये रखने का भी ध्यान रखा जान चाहिये था। दुर्भाग्य इस युग का यही रहा है, जन−जीवन और चिन्तन को दिशा देने वाले मनीषियों ने समृद्धि को ही सब कुछ बताने की भूल बरती। साम्यवादी दर्शन में समस्त समस्याओं की जड़ ‘अर्थ, को ही माना है और उसी के सुधार पर संसार में सुख−शान्ति और प्रगति की सम्भावना का प्रतिपादन किया है। अस्तु लोक−मंगल की इच्छुक समस्त शक्तियाँ अर्थ व्यवस्था पर अपने सारे प्रयासों को केन्द्रित किये हुये हैं। चरित्र एवं चिन्तन उपेक्षणीय समझा जाता रहा है, इस संदर्भ में उथली चर्चायें भर होती रही हैं कुछ ऐसा नहीं सोचा अथवा किया गया, जिसे ठोस अथवा गम्भीर कहा जा सके।
चिन्तन की उत्कृष्टता का अभिवर्धन इतना अधिक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है कि उसे भौतिक प्रगति से भी पहले स्थान दिया जाना चाहिए। सद्भाव सम्पन्न लोग अभाव−ग्रस्त परिस्थितियों में भी सुखी रहने और सुखी रहने देने की व्यवस्था बनाये रह सकते हैं पर दुर्भाव सम्पन्न दुष्टता तो बढ़े−चढ़े साधनों को अपने और दूसरे के पतन में ही प्रयुक्त करके रहेगी, तब उस समृद्धि का परिणाम अभाव ग्रस्त स्थिति से भी महंगा पड़ेगा।
चिन्तन मानव-जीवन की बहुमूल्य सम्पदाऐं हैं। इन्हें साहस और पुरुषार्थ पूर्वक सत्प्रयोजन में लगाने की तत्परता बुद्धिमत्ता की दूसरी कसौटी है। जिनने इन ईश्वर-प्रदत्त बहुमूल्य अनुदानों को पेट-प्रजनन में-विलास और अहंकार में खर्च कर डाला, समझना चाहिए वे बहुमूल्य रत्नों के बदले काँच-पत्थर खरीदने वाले उपहासास्पद मनःस्थिति के बाल-बुद्धि लोग हैं। वस्तु का सही मूल्यांकन न कर सकने वाले और उपलब्धियों के सदुपयोग में प्रमाद बरतने वाले मूर्ख ही कहे जायेंगे। जीवन-क्षेत्र में अपनी सफलता-असफलता का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते समय यह देखना चाहिए कि कहीं दूरदर्शिता के अभाव में हम सौभाग्य को दुर्भाग्य में तो नहीं बदल रहे हैं?
चिन्तन को भारी क्षति पहुँचावेंगे।
चिन्तन की सार्थकता और विकास क्रम की पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।
चिन्तन को देर तक सीमित किया जा सकता है। ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा, संयम, उदारता जैसे गुणों की व्याख्या, प्रयोग, पद्धति एवं प्रतिक्रिया के अनेक पक्ष हो सकते हैं और उन सब पर क्रमशः विचार करते हुए देर तक मन को उसी परिधि में प्रतिबन्धित रहने के लिए बाध्य किया जा सकता है।
चिन्तन का स्तर गिरना और फलस्वरूप मानवी गतिविधियों में निकृष्टता का भर जाना ही है। सुविधा−साधनों की अभिवृद्धि के लाभ को मटियामेट कर देने वाली, इसी विभीषिका को यथा स्थान बना रहने दिया जाय तो फिर वैज्ञानिक आर्थिक एवं बौद्धिक प्रगति का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। जो प्रगति अपने साथ विपत्तियों को भी बढ़ाती चले, उसे कैसे सराहा जा सकेगा। एकांगी प्रगति का यही फल हो सकता है जो सामने है। भौतिक प्रगति के अनुरूप ही आत्मिक प्रगति भी होनी चाहिये अन्यथा एकाँगी प्रगति के परिणामों में विघ्न−असन्तुलन ही पैदा होगा।
चिन्तन और आदर्श-कर्तव्य अपनाने से ही पूरा हो सकता है। जब आत्मा और शरीर की भिन्नता को—उनकी विभिन्न आवश्यकताओं को समझ ही नहीं लिया जाता, वरन् शरीर की तुलना में आत्मा के महत्व को स्वीकार करते हुए आत्म-कल्याण के प्रयास में तत्पर हुआ जाता है, तब यह माना जाता है कि आत्म-ज्ञान की दिव्य किरणें अन्तःकरण में झाँकने लगीं और आत्मा का स्वरूप जाना ही नहीं गया, वरन् उसका लक्ष्य भी माना गया।
चिन्तन तक ही उसकी पहुँच है। आत्म-कल्याण की बात उस दृष्टि से सोची जाय तो पञ्च-तत्वों से बने धर्मोपकरणों का, तीर्थ-मन्दिर, दान, उपवास जैसे साधनों का ही उपयोग करने की ही बात सूझती है।
चिन्तन जब कार्यरूप में परिणित होता हैं। तब वह परिस्थिति बनती है, जिसमें आत्मा को शान्ति एवं तृप्ति प्राप्त हो सके। इस प्रकार के आनन्द की आरम्भिक झाँकी स्वाध्याय और सत्संग में मिल सकती है, जो काय-कलेवर और आत्मा की मित्रता का—उनके पारस्परिक सम्बन्धों का विवेचन विश्लेषण कर सके एवं वासना-तृष्णा की सुखलिप्सा से ऊँचे उठकर उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता अपना कर आंतरिक उल्लास की उपलब्धि का मार्ग-दर्शन कर सके। विषय-चर्चा से जिस प्रकार कानों को रस मिलता है, मनोरम दृश्य देखकर आँखें जिस प्रकार मुदित होती हैं, उसी प्रकार आत्म-चेतना को उस उद्बोधन में प्रसन्नता मिलती हैं, जिसके आधार पर अन्तःकरण को सद्भावनाओं से ओत-प्रोत बनाया जा सके। आत्म-शान्ति का द्वार तब खुलता है, जब सत्प्रवृत्तियों से भरी-पूरी गतिविधियाँ अपना कर यह अनुभव किया जाता है कि जीवन के स्वरूप और लक्ष्य के अनुरूप गतिविधियाँ अपना कर अपूर्णता से पूर्णता की ओर कदम बढ़ते चल रहे हैं।
चिन्तन को दिशा देने वाले मनीषियों ने समृद्धि को ही सब कुछ बताने की भूल बरती। साम्यवादी दर्शन में समस्त समस्याओं की जड़ ‘अर्थ, को ही माना है और उसी के सुधार पर संसार में सुख−शान्ति और प्रगति की सम्भावना का प्रतिपादन किया है। अस्तु लोक−मंगल की इच्छुक समस्त शक्तियाँ अर्थ व्यवस्था पर अपने सारे प्रयासों को केन्द्रित किये हुये हैं। चरित्र एवं चिन्तन उपेक्षणीय समझा जाता रहा है, इस संदर्भ में उथली चर्चायें भर होती रही हैं कुछ ऐसा नहीं सोचा अथवा किया गया, जिसे ठोस अथवा गम्भीर कहा जा सके। परिणाम सामने है।
चिन्तन आज की अपनी स्थिति पर निर्भर रहता है। दूसरों आश्वासनों की नींव पर महल खड़ा नहीं किया जाता। क्योंकि सद्भाव सम्पन्न स्वजन भी कई बार बहुत भावुक होते हैं और अपना सहयोग देने तथा दूसरों का दिलाने के लम्बे चौड़े सब्ज बाग दिखाते हैं। उनमें से कुछ तो भावुकता वश सब्ज बाग दिखा बैठते हैं और कुछ सामयिक प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए झूँठ-मूँठ बहकाते हैं। ऐसे लोग कम ही होते हैं, जो सहयोग का नपा-तुला ऐसा आश्वासन देते हैं, जो समय पर उपलब्ध भी किया जा सके।
चिन्तन विजय तो स्नेहासिक्त सद्भावनाओं की ही होती है। शिव शरीर पर सर्पों के लिपटे रहने के पीछे यही प्रतिपादन है।
चिन्तन को बचपन ही कहना चाहिए कि आत्म-शान्ति की आन्तरिक तृप्ति के संदर्भ में भी वासना-तृष्णा के साधन जुटाने वाले तथाकथित स्वर्गीय परिस्थितियों में ही आनन्द और सन्तोष मिलने की बात सोचें।
चिन्तन हर दृष्टि से सराहनीय है। इससे हमारी काल्पनिक भावुकता और बिना पर के आसमान में उड़ने के यथार्थवादी जोश को वस्तुस्थिति समझने का अवसर मिलता है। अपने साधनों को तोलकर जो भी निर्णय किये जाते हैं व कदम बढ़ाते जाते हैं, वे आमतौर से सफल ही होते हैं।
चिन्तन तथा कर्तृत्व को परिष्कृत बनाने के लिए दूर-दर्शिता के साथ प्रयुक्त किया जाय तो निस्सन्देह सर्वतोमुखी प्रगति और सुख-शान्ति के अभिवर्धन में धर्म की महती भूमिका हो सकती है। आज की विकृत दुर्दशा की कीचड़ से धर्म को निकाल कर उसे आदर्शवादी उत्कृष्टता के साथ जोड़ना—मानवी हित-साधना की दृष्टि से अतीव आवश्यक कार्य माना जाना चाहिए।
चिन्तन-तन्त्र किस जटिल संरचना और किस संचरण, सन्तुलन का प्रदर्शन करता है। उसे देखकर हतप्रभ रह जाना पड़ता हैं।
चिन्तन को परिष्कृत किया जाय, इस दिशा में एक प्रकार से आँख ही मूँद ली गई हैं। उपेक्षित क्षेत्र में पिछड़ापन ही बढ़ेगा समृद्धि बढ़ी सो ठीक है पर चिन्तन में उत्कृष्टता की समुचित मात्रा बनाये रखने का भी ध्यान रखा जान चाहिये था। दुर्भाग्य इस युग का यही रहा है, जन−जीवन और चिन्तन को दिशा देने वाले मनीषियों ने समृद्धि को ही सब कुछ बताने की भूल बरती। साम्यवादी दर्शन में समस्त समस्याओं की जड़ ‘अर्थ, को ही माना है और उसी के सुधार पर संसार में सुख−शान्ति और प्रगति की सम्भावना का प्रतिपादन किया है। अस्तु लोक−मंगल की इच्छुक समस्त शक्तियाँ अर्थ व्यवस्था पर अपने सारे प्रयासों को केन्द्रित किये हुये हैं।
चिन्तन की अत्यधिक आवश्यकता पड़ती है।
चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की योजना बद्ध रीति−नीति का निर्धारण ध्यान योग का एक महत्वपूर्ण विषय है। अपने को दोष, दुर्गुणों से रहित, पवित्र और उत्कृष्ट स्तर का मानने तथा उसके लिए प्रबल प्रयास करने का प्रचण्ड संकल्प उभारना ध्यान योग के अंतर्गत ही आता है।
चिन्तन करने और उसके साथ तादात्म्य होने की प्रक्रिया प्रचलित है। भगवान के किसी भी रूप का ध्यान करते हुए उसको अपनी सघन आत्मीयता का आरोपण साकार ध्यान साधना कहा जाता है।
चिन्तन नितान्त आवश्यक है। भावुक काल्पनिकता इस दिशा में सहायक नहीं, बाधक ही अधिक होती है। असफलता का एक ही झोंका ऐसे लोगों की उमंगों को तोड़ मरोड़ कर रख देता है और वे आरम्भ में जितने उत्साही थे अन्त में उतने ही निराशावादी और शंकाशील बन जाते हैं। इसलिए अभिलाषाओं को मूर्त रूप देने के लिए यथार्थवादी चिन्तन की अत्यधिक आवश्यकता पड़ती है।
चिन्तन और आदर्श कर्तव्य में ही उपासना और साधना के सारे रहस्य सन्निहित हैं और उन्हें अपनाने वाला सच्चे अर्थों में ईश्वर भक्त एवं सिद्ध पुरुष बन सकता है।
चिन्तन करते हुए, जब भौतिक अहम् विलीन हो जाय तो समझना चाहिए, मैं और तू से ऊपर उठा हुआ, परब्रह्म परमात्मा उपलब्ध हो गया।
चिन्तन के भावनात्मक आधारों को एक प्रकार से विस्मृत ही नहीं तिरष्कृत भी बना दिया गया। अब धर्म, अध्यात्म, चरित्र, कर्त्तव्य, लोक−मंगल जैसे प्रसंगों की चर्चा और चेष्टा करने वाले उपहासास्पद माने जाते हैं। प्रगतिशीलता का अर्थ चतुरता से भी आग बढ़ कर धूर्तता तक जा पहुँचा है। अब बुद्धिमान वह है जो दूसरों को उल्लू बना कर किसी भी प्रकार अपना मतलब सिद्ध करले। ऐसी परम्परा जब लोक−प्रकृति का अंग बन जाय तो व्यक्ति गत महानता और सामाजिक समस्वरता का टिकना किस आधार पर सम्भव हो सकता है?
चिन्तन इस दिशा में काफी आगे बढ़ चुका है अड़चन केवल भावुक लोकमत की बाधा की है। आशा की जाती है कि विकसित बुद्धिवाद के आगे अगले दिनों किसी प्रकार की भावुकता को बाधक नहीं रहने दिया जायगा और तब वृद्ध-वध का प्रचलन उसी सहज सरलता से होने लगेगा जिस प्रकार अब बूढ़े पशुओं को बूचड़खाने में भेजने में कोई विरोध-आन्दोलन नहीं होता।
चिन्तन उपेक्षणीय समझा जाता रहा है, इस संदर्भ में उथली चर्चायें भर होती रही हैं कुछ ऐसा नहीं सोचा अथवा किया गया, जिसे ठोस अथवा गम्भीर कहा जा सके। परिणाम सामने है। जन−मानस सुविधा−साधनों की उपलब्धि को ही लक्ष्य स्वीकार और उस अत्युत्साह में चरित्र एवं चिन्तन के भावनात्मक आधारों को एक प्रकार से विस्मृत ही नहीं तिरष्कृत भी बना दिया गया। अब धर्म, अध्यात्म, चरित्र, कर्त्तव्य, लोक−मंगल जैसे प्रसंगों की चर्चा और चेष्टा करने वाले उपहासास्पद माने जाते हैं। प्रगतिशीलता का अर्थ चतुरता से भी आग बढ़ कर धूर्तता तक जा पहुँचा है।
चिन्तन को प्रखर और केन्द्रीभूत बना कर लक्ष्य प्राप्ति के लिए एकाग्रतापूर्वक प्रयुक्त किया जाय। ध्यान इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। इसलिए प्रायः सभी साधना मार्गों में ध्यान को प्रधानता दी गई है। उसके बिना आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त होना कठिन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-September
चिन्तन—सारा कर्तव्य शरीर और मन की आकाँक्षाएँ पूरी करने में ही लगता है। पेट और प्रजनन के लिए ही जीते हैं। इन्द्रिय जन्य वासनाओं की पूर्ति और मनोगत तृष्णाओं को जुटाने के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। आकाँक्षा की धुरी−लोभ और मोह के पहियों के सहारे ही घूमती है। यही है मानव−जीवन का घृणित और भ्रमित स्वरूप।
चिन्तन और मनन देखते ही बनता था। कभी−कभी वह गम्भीर समस्या को लेकर उलझ जाते थे और घण्टों लगे रहकर उसका समाधान प्रस्तुत करते थे।
चिन्तन और प्रखर प्रोत्साहन से अन्तःचेतना पर चढ़ी हुई मंदता का भी निराकरण निवारण हो सकता है।
चिन्तन की प्रक्रिया सही है या नहीं। जो बिना किसी वेदना अथवा विक्षोभ के हँसी−खुशी और सन्तोष, उत्साह भरा जीवन जी रहा हो उसे मानसिक दृष्टि से स्वस्थ कहा जा सकता है। दूसरों के सुख को अपने सुख से अधिक महत्व देने वाले—दाम्पत्य जीवन से संतुष्ट, विनोद प्रिय, चिड़चिड़ेपन से युक्त—असफलता और निराशा के वातावरण में भी अपना विवेक संतुलन बनाये रहने वाले मानसिक दृष्टि से स्वस्थ कहे जा सकते हैं।
चिन्तन करते रहने की बुरी आदत से बचे रहना; किसी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य संतुलन का उपयुक्त प्रमाण माना जा सकता है।
चिन्तन में अधिक उलझा रहना और कमाई पर कम ध्यान देना भी था। एक दिन उनकी पत्नी ने कहा—बुढ़ापे में निर्धन होना कितना कष्ट कर है—क्या आपको यह स्थिति अखरती नहीं?
चिन्तन यदि उन परिस्थितियों का निकट लाने में केन्द्रित किया जाय; जिन्हें हम चाहते हैं तो निश्चित रूप से चमत्कारी प्रतिफल सामने आयेगा। अभीष्ट परिस्थितियाँ जो निराशा के क्षणों में बहुत कठिन दिख पड़ती हैं वे सरल और साध्य बनती चली जायेगी। निराशा जन्य विपत्तियों और आशा के साथ सम्बद्ध उपलब्धियों पर यदि तुलनात्मक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि गर्त में गिरने और ऊँचा उठने के लिए प्रयास करने की तरह वे अन्ततः व्यक्ति को कितनी भिन्न परिस्थितियों तक ले पहुँचती हैं।
चिन्तन एवं कर्तव्य को निरत रखा जा सकेगा। संक्षेप में भारतीय धर्म, संस्कृति और सभ्यता का आधार मूल उद्देश्य एक ही था कि व्यक्ति को नर−पशु से ऊँचा उठाकर नर−नारायण के रूप में विकसित करने के लिए अगणित स्तर के प्रेरणा प्रयोजन खड़े किये जाँय और सुसंस्कृत जीवन जीने की गरिमा के प्रति आस्थावान बनाया जाय।
चिन्तनात्मक विशेषताओं ने उसे सुख−साधनों का उपार्जन एवं उपभोग करने योग्य बनाया है। ईश्वर प्रदत्त ऐसी ही विशेषताओं में एक और भी है वह है−आनन्दानुभूति। यह मस्तिष्कीय क्षेत्र में आने की चीज है। अन्तःकरण के विकास के साथ साथ यह आकाँक्षा जाग्रत होती है कि इन्द्रिय जन्म स्वल्प सुखों तक सीमित न रहकर उस आनन्द का रसास्वादन किया जाय, जिसे मानव जीवन का परम लक्ष्य माना गया है।
चिन्तन और कर्तृत्व का स्तर परख कर सहज ही प्राप्त किया जा सकता है। कौन भव−बन्धनों में जकड़ा पड़ा है और किसने जीवन मुक्ति प्राप्त करली इसकी परीक्षा एक ही कसौटी पर हो सकती है कि अहंता का क्षेत्र कितना सीमित अथवा विस्तृत है। जो निकृष्ट स्तर की बातें सोचता है जिसकी अभिलाषाएँ पाशविक हैं उसे भव−बन्धन में आबद्ध नर−पशु कहा जायगा किन्तु जिसने अपनी चेतना को परिष्कृत एवं विस्तृत बनाकर सबमें अपने को संव्याप्त समझा उसने देव योनि प्राप्त करली ऐसा समझा जायगा।
चिन्तन और आदर्श कर्तव्य अपनाते हुए जिन्दगी का अधिकाँश समय बिताया उनके अचेतन में दिव्य संस्कार जगे रहते हैं और वे उस मरणोत्तर निद्रा काल में दिव्य स्वप्न बनकर उभरते हैं उस सुखद स्वप्न शृंखला को स्वर्ग कहते हैं। स्वर्ग नरके के सुहावने डरावने सपने यह छाया डालने आते हैं कि भविष्य में किस दिशा में चलना उपयुक्त और किस ओर चलना अनुपयुक्त रहेगा।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व हर किसी के लिए प्रगति का मापदण्ड बना हुआ था।
चिन्तन और कर्तव्य लोगों के अनुकरण या परामर्श पर निर्धारित न रहने देकर विवेक भरी दूरदर्शिता के सहारे निश्चित करना पड़ता है। जो ऐसा कर सके समझना चाहिए कि वह जीवित रहते हुए भी मोक्ष का महान् अनुदान प्राप्त कर सकने में सफल हो गया।
चिन्तन एवं आर्थिक उपार्जन से जो कुछ मिलता है वह शरीर, मन और परिवार के लिए ही कम पड़ता है। अभाव अनुभव होता रहता है और अधिक कमाकर उसकी पूर्ति की उद्विग्नता छाई रहती है। ऐसी दशा में जीवनोद्देश्य को पूर्ति के लिए—लोक−मंगल के लिए कुछ करना सम्भव ही नहीं हो पाता है।
चिन्तन कर सकने में समर्थ बना सकते हैं अनिश्चित रूप से प्रेरक विचार यदि अन्तःक्षेत्र में प्रवेश कर सकें तो वे क्रियारूप में परिणित हुए बिना रह नहीं सकते। विचार क्रांति ही क्रिया क्रान्ति बनकर सामने आती रही है और भविष्य में आती रहेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-January
चिन्तन करने पर यह तथ्य सामने आता है कि उच्चतम मनःस्थिति के लोग साधु−संस्था में प्रवेश करते थे और अपनी अभिनव भावनाओं से उसकी उत्कृष्टता सुरक्षित बनाये रहते थे, वह आयात क्रम टूटा तो उस खण्डहर में उल्लू और चमगादड़ बसने लग गये।
चिन्तन में निकृष्टता का समावेश रहने से ही लोग व्यसनी और अपव्ययी बनते हैं। दुष्प्रवृत्तियाँ बुरी आदतें, पैसा भी करती है और समय भी। उत्कृष्ट चिन्तन को कूट कूट कर मनःक्षेत्र में भरने वाली वानप्रस्थ शिक्षा उन सब भ्रष्ट अस्त−व्यस्तताओं की जड़ काट देती है। सुधरी हुई प्रकृति का मनुष्य अपने लिए और समस्त परिवार के लिए अपेक्षाकृत अधिक उपयोगी सिद्ध होता है यह स्पष्ट है। प्राचीनकाल में छोटे−छोटे अबोध बच्चों को गुरुकुलों में ऋषियों के पास प्रसन्नता पूर्वक माता−पिता भेजते रहते थे उन्हें इस बात की आशंका नहीं होती थी कि बाबाजी के साथ रह कर हमारा बालक भी गृहस्थ लोग आत्मज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने सन्तों के पास रहते थे पर किसी को यह भय नहीं होता था जायगा पर आज की स्थिति विचित्र है।
चिन्तन एवं धर्म−कर्त्तव्य कहते हैं। इन दोनों का समन्वय ही परिष्कृत व्यक्तित्व कहलाता है। वस्तुतः इस संसार की यही सबसे बड़ी सम्पदा है—इसी को मानव−जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि कह सकते हैं। यह जहाँ भी होगी जब भी होगी—तब स्वल्प−साधनों में भी हर्षोल्लास का वातावरण बनेगा और पारस्परिक सहकारिता के आधार पर सम्पत्ति के अभिवर्धन के असंख्य द्वार खुल जायेंगे। मिलजुलकर बाँट खाने की नीति जहाँ अपनाई जायगी, वहाँ थोड़े से साधन भी—प्रगति और समृद्धि के अनेकानेक आधार प्रस्तुत कर देंगे।
चिन्तन—असुधार—आत्म−निर्माण और आत्म−विकास का चतुर्थ क्रियाकलाप अपनायें और आत्मोत्कर्ष की ऊँची सीढ़ी चढ़ने के लिए प्रबल प्रयत्न करता रहे। गुण, कर्म, स्वभाव में ऐसे परिवर्तन करें, जिनसे मानवी महानता गौरव होती हो। व्यावहारिक जीवन में आध्यात्मिक आदर्श किस प्रकार—किस क्रम से समाविष्ट किया जा सकता वस्तुतः इसी का नाम विद्या अथवा आत्म−साधन इस संदर्भ में शिक्षा और साधना के उभय−पक्षीय उच्च शिक्षार्थी के सामने प्रस्तुत रहेंगे तो यह आशा की जा सकती है वह अपना व्यक्तित्व इस स्तर तक परिष्कृत करलें कि उसे साँचे की संज्ञा दी जा सके और उसके संपर्क में आने वाले खिलौने सुन्दर एवं सराहनीय बनेंगे, ऐसी आशा की जा सके।
चिन्तन एवं कर्तृत्व को सर्वतोभावेन निरत रखें। इस दुस्साहस जैसे महान् उत्तरदायित्व का निर्वाह कर सकना केवल उन तपःपूत एवं ऋषि−कल्प आत्मा के लिए ही सम्भव हो सकता है, जो भौतिक महत्वाकाँक्षाओं को पैरों तले कुचल कर अपने को अनुकरणीय आदर्श के रूप में प्रस्तुत करें, साथ ही लोक−मंगल को ही सर्वोत्तम सफलता का माध्यम मानकर अपनी क्रिया−पद्धति का निर्माण करें। इस दिशा में जो संकल्प पूर्वक बढ़ते हैं, उन्हीं को साधु−ब्राह्मण कहा जाता है। ऐसे व्यक्तित्वों की तुलना कल्पवृक्षों से की जा सकती है। वे जहाँ भी उगेंगे, वहाँ न कोई अभाव रहेगा और न कष्ट।
चिन्तन को कूट कूट कर मनःक्षेत्र में भरने वाली वानप्रस्थ शिक्षा उन सब भ्रष्ट अस्त−व्यस्तताओं की जड़ काट देती है। सुधरी हुई प्रकृति का मनुष्य अपने लिए और समस्त परिवार के लिए अपेक्षाकृत अधिक उपयोगी सिद्ध होता है यह स्पष्ट है। प्राचीनकाल में छोटे−छोटे अबोध बच्चों को गुरुकुलों में ऋषियों के पास प्रसन्नता पूर्वक माता−पिता भेजते रहते थे उन्हें इस बात की आशंका नहीं होती थी कि बाबाजी के साथ रह कर हमारा बालक भी गृहस्थ लोग आत्मज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने सन्तों के पास रहते थे पर किसी को यह भय नहीं होता था जायगा पर आज की स्थिति विचित्र है। किसी सद्गृहस्थ को यह मंजूर नहीं कि उसके बच्चे या बात शीशे की तरह स्पष्ट है कि इन भ्रान्त विचारों में उलझे हुए सनकी लोगों के पास बैठने वाला भाग्यवाद, अकर्मण्यता, अनुत्तरदायित्व, नशेबाजी जैसी बुरी बातें ही छूत की बीमारी की तरह लेकर आवेगा। जहाँ जो चीज होगी वहाँ से वही तो मिलेगी।
चिन्तन और कर्तृत्व में भावना पूर्वक स्थान देना आरम्भ कर दिया है। यही कारण है कि पत्रिका के लेख और पाठकों की रुचि वाली बात अब योजनों पीछे रह गई। उसके स्थान पर सूर्य और उसकी किरणों जैसा—पुष्प और उसकी पंखुड़ियों जैसा—काया और अस्थि−माँस जैसा अविछिन्न रिश्ता विकसित हो गया है। भौतिक−दृष्टि से पुस्तकों के अपने−अपने परिवार हैं—उनके अपने−अपने स्त्री−बच्चे, भाई−बहिन, माँ−बाप आदि हैं, पर जहाँ तक भावना−क्षेत्र का सम्बन्ध है—’अखण्ड−ज्योति परिवार’ के सदस्य अपने मिशन के साथ सघनतम आत्मीयता विनिर्मित करते चले जा रहे हैं। इसका सत्परिणाम हर दृष्टि से श्रेयस्कर हो रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-May
चिन्तन में घुस पड़ी निकृष्टता को हटा में किया जाय। वातावरण और परिस्थितियों के प्रभाव मनुष्य ने निकृष्टता अपनाई है यदि साहस पूर्वक समाज का ढाँचा बदल देने के लिए कटिबद्ध हुआ जाय जो फिर भूतकाल की तरह भविष्य में भी इस धरती पर स्वर्ग वातावरण और नर−देवों का निवास सम्भव हो सकता है। निराशा और खीज के वातावरण में यन्त्र मात्र बनाने की झंझट भरी और अति दुस्तर प्रक्रिया अपनाने की अपेक्षा बुद्धिमानी इसमें है कि वर्तमान मनुष्यों को परिष्कृत बनाने का प्रयत्न किया जाय। इस प्रयत्न फलस्वरूप सजीव मानवों की जो फसल पैदा होगी यंत्र मानवों की अपेक्षा कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध होगी
चिन्तन एवं कर्म की दृष्टि से उत्कृष्ट कोटि का निर्मित करने की दिशा में प्रबल पुरुषार्थ करे। उसी को जीवन का प्रमुख प्रयोजन एवं सर्वोपरि लाभ समझें।
चिन्तन, प्रयत्न पुरुषार्थ का प्रतिफल होलोग्राफी जैसा सामने आ सकता है जिस चेतना द्वारा यह सब सोचा गया और प्रस्तुत किया गया है उसका स्वरूप समझना और उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करना यदि हमारा प्रिय विषय बन गया होता तो भौतिक उपलब्धियों की अपेक्षा लाख गुनी अधिक महत्वपूर्ण विभूतियाँ हमारे हाथ आई होतीं और उनके सहारे इतना अधिक वर्चस्व करतल गत हुआ होता कि अपूर्णता जैसी कोई वस्तु ही शेष न रहती। पूर्ण से उत्पन्न हुए हम सब पूर्णता का आनन्द ले रहे होते और मानवी सत्ता को धन्य बना रहे होते।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-April
चिन्तन, ध्यान प्रभृति, ज्ञान पक्ष तक सीमित रहने वाली प्रक्रिया अपूर्ण एवं एकांगी है। इसी प्रकार जिन्होंने चिन्तन परिष्कार को तिलाञ्जलि देकर मात्र जप, तप के, हठ योग के, काय−कष्ट तक सीमित विधि−विधान को ही सब कुछ मान लिया है वे भी एक पहिये की गाड़ी चलाने वालों की तरह असफल रहते हैं।
चिन्तन को हेय स्तर से ऊँचा उठाकर देव स्तर तक ले जाता है और मनोवृत्तियों को ब्रह्म चेतना में नियोजित करता है। कर्म योग वह है जिसमें दैनिक क्रिया−कलाप को परमार्थ प्रयोजन के आधार पर संचालित किया जाता है। शरीर और मन को पूर्व संचित पशु संस्कारों से विरत करके दिव्य जीवन के लिए अभ्यस्त करने की जो शारीरिक, मानसिक व्यायाम पद्धतियाँ हैं वे भी योगाभ्यास के नाम से प्रसिद्ध हैं। आसन प्राणायाम, जप, ध्यान, व्रत, तप, मुद्रावंध आदि साधनायें उसी स्तर की हैं।
चिन्तन तक उसके लिए असम्भव है। मानवी जानकारी से बाहर भी न जाने कितनी निहारिकाएँ और होंगी, वे जितने घेरे को स्पष्ट करती होंगी, उनके भीतर भिन्न−भिन्न प्रकार की परिस्थितियां और शक्तियाँ काम कर रही होंगी? उनमें रहने वाले जड़ चेतन पदार्थों की स्थिति में कितनी भिन्नता और कितनी विशेषता होगी उनका सबक नियन्त्रण संचालन का सूत्र संचालन का सूत्र संभालने वाला कितना कार्य किस प्रकार करता होगा? इन सब प्रश्नों पर जब विचार करना आरम्भ करते हैं। तो तत्वदर्शी मनीषियों की तरह हमें भी अचिन्त्य,अनिर्वचनीय अनादि,नेति नेति आदि कहकर अपनी चिंतनात्मक असमर्थता और तुच्छता स्वीकार करनी पड़ती है।
चिन्तन से जो मस्तिष्कीय विद्युत प्रवाह उमड़ते हैं वे ही यौन लिप्सा में मनुष्य को बलात् प्रवृत्त करते है। यह विद्युत धारा घटाई भी जा सकती है और बढ़ाई भी। तदनुसार संयम और असंयम के लिए पृष्ठभूमि अपने ही प्रयास से बन सकती है। इसके लिए सोचने का तरीका बदलने भर से काम नहीं चलता हारमोन प्रवाह क की रोकथाम कर सकने वाली अन्तःचेतना का बलिष्ठ होना भी आवश्यक है। जो योगाभ्यास जैसे उपायों से ही सम्भव है।
चिन्तन और श्रेष्ठ कर्मों के साथ अपने को बाँधे रहकर ही हम सुसंस्कारों की सम्पत्ति उपार्जित कर सकते है और उस आधार पर अपने उज्ज्वल भविष्य का सुखद निर्माण कर सकने में सफल हो सकते है।
चिन्तन में निरत और लिप्सा, लालसाओं के साधन जुटाने में व्यत मनुष्य के लिए यह सम्भव ही नहीं हो पाता कि अन्त क्षेत्र में प्रवेश करके वहाँ करके वहाँ भरे पड़े अमृत भण्डार को कल्प वृक्ष को पारस को देखने और समझने में समर्थ हो सके। जब इतना ही नहीं बन पड़ो उस रतन भण्डार को कुरेद कर बहुमूल्य रत्नों को प्राप्त कर सकना तो बन ही कैसे पड़ेगा?
चिन्तन में सम्भव हो सकता है। टेलीफोन वार्ता की तरह भगवान से वार्तालाप करने की और टेलीविजन पर चलते−फिरते ईश्वर को देखने की निरर्थक उड़ानें उड़ना छोड़कर ही हम वास्तविकता के निकट पहुँच सकते हैं। भ्रम जंजाल गढ़ कर तो हम अपने आपको अवास्तविकता के ऐसे जाल में अधिकाधिक फँसाते चले जायेंगे जिसमें बालू से तेल निकालने जैसे निरर्थक प्रयासों की तरह निराशा ही हाथ लगेगी। सुखद कल्पना गढ़ लेना और ईश्वर के साथ क्रीड़ा कल्लोल, हास−विलास करते रहना एक बात है और वैसी यथार्थता का होना दूसरी। कलपना की उड़ानें सम्भव है किसी का भावनात्मक समाधान कर सकें पर वास्तविकता के क्षेत्र में उसके हाथ कोई बड़ी उपलब्धि मिल नहीं सकेगी यह भी सत्य है।
चिन्तन करते रहें और समुन्नत परिस्थितियाँ प्राप्त हो जायँ यह नहीं हो सकता। यदि हेय स्तर के विचार मन में भरें रहेंगे तो कुकर्म करने की सुविधाएँ बढ़ती चलेगी और निकृष्ट स्तर का कर्तव्य दुखद दुष्परिणामों को दल−बल सहित सामने लाकर खड़ा कर देंगे। इस तथ्य को यदि ठीक तरह समझ लिया जाय तो जिस स्थिति में रहना या पहुँचना अभीष्ट हो उसी प्रकार के विचारों का संचय करने और निरन्तर मस्तिष्क में भरें रहने का सर्वप्रथम कदम बढ़ाना पड़ेगा। चिंतन की अवगति एवं अस्त-व्यस्तता को यदि देखा समझा न जायें उसमें सुधार परिवर्तन न किया जाय तो बाह्य क्षेत्र में भी अभीष्ट परिवर्तन सम्भव न होगा। जैसे विचार होते है वैसा जीवन का स्वरूप बनता है।
चिन्तन −उपयुक्त साधन ओर अविचल संकल्प −बल हो तो ही घोषणा के लिए कदम बढ़ाना चाहिए, अन्यथा जो बन पड़ेगा वह अधिक से अधिक तत्परता एवं सदाशयता के साथ करते इतना कथन ही पर्याप्त हैं।
चिन्तन परिष्कार को तिलाञ्जलि देकर मात्र जप, तप के, हठ योग के, काय−कष्ट तक सीमित विधि−विधान को ही सब कुछ मान लिया है वे भी एक पहिये की गाड़ी चलाने वालों की तरह असफल रहते हैं।
चिन्तन कर सकने वाले तत्वदर्शी विवेकवान तो कोई विरले ही होते हैं।
चिन्तन− योग तप आदि के समस्त साधन,उपचार,ईश्वर प्राप्ति का लक्ष्य पूरा करने के लिए ही बनाये गये हैं।
चिन्तन और कर्म में निरत रहते है। इन हलचलों के जो संस्कार अन्तः चेतना पर जमेंगे वे निश्चित रूप से आसुरी ही होंगे। उनका प्रति फल उस जीवन में एवं मरणोत्तर काल में दुखदायी विपत्तियों की ही वर्षा करेगा। अपनी करनी का फल हमें भुगतना ही पड़ेगा, भले ही उन संकटों का दोष किसी दूसरे पर मढ़ते हुए हम आत्म प्रवंचना करते है।
चिन्तन की गहराई में उतर कर इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि अनन्त में संव्याप्त दिव्य चेतना का लाभ ही ईश्वर हे। मनुष्य और इस ईश्वर का मिलन स्थल मानवी अन्तःकरण ही हो सकता है। व्यक्ति की समाविष्ट दिव्य चेतना का केन्द्र स्थल उसका अन्तःकरण ही है। सजातीय के साथ ही सजातीय का मिलना सम्भव है। आत्मिक−चेतना ही ईश्वरीय चेतना के समकक्ष है।
चिन्तन का एकमात्र आधार भविष्य ही रह जाता है। उसी पर वे तरह−तरह के सुखद आरोपण करते हैं। भविष्य में यह पावेंगे—वहाँ जावेंगे—यह खायेंगे—यह करेंगे जैसी चर्चाएँ ही उनके मुँह सुनी जाती हैं। वे कल्पनाओं को ही वास्तविकता समझने लगते हैं और सम्भावनाओं की सुनिश्चितता का ऐसा बाना पहनाते हैं मानों जो कुछ वे सोच या कह रहे हैं अवश्य ही वैसा होकर रहेगा। उनके इस भोलेपन पर अभिभावक रस लेते हैं, पर साथ ही उस बचपन पर हँसते भी हैं जिसकी कल्पना और यथार्थता के बीच में कितनी बड़ी खाई होती डडडड बाल–कल्पनाओं और घोषणाओं का यदि कोई लेखा−जोखा रखा जा सके तो प्रतीत होगा कि वे जितनी भोली भाली और मृदुल थीं उससे अधिक वे अवास्तविक भी थीं।
चिन्तन में सुधार एवं परिस्थिति परिवर्तन के रूप में भी किया जाना चाहिए।
चिन्तनशील जागृत मस्तिष्क अपने विचार−प्रवाह में बहता रहता है। शरीरगत क्रिया−कलापों की स्नायविक उत्तेजना भी चेतना पर छाई रहती है। इस दबाव से मूल संस्कार अचेतन मनः क्षेत्र में दबे पड़ें रहते हैं। तब उन्हें उतना अधिक उभरने का अवसर नहीं मिलता, थोड़ा बहुत जो मिलता है, उसके अनुसार तत्काल कर्मफल भी मिलने लगते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-August
चिन्तन और चरित्र को परिष्कृत बनाने का पूरा-पूरा प्रयास करना चाहिए। इस संदर्भ में कुछ अभिवचन इस प्रकार हैं—
चिन्तन और देव कर्म में नियोजित कर देना ही ईश्वर भक्ति —योगसाधना एवं तपश्चर्या है। सारा साधना विज्ञान और तत्व-दर्शन इसी धुरी के इर्द-गिर्द घूमता है। इस संदर्भ में आप्त वचन इस प्रकार हैं—
चिन्तन एवं क्रिया-कलाप को परिष्कृत कर लें तो उन छिपी हुई शक्तियों और विशेषताओं से सम्पन्न हो सकते हैं जो सर्वतोमुखी प्रगति का ‘महत्वपूर्ण आधार अपने गर्भ में सँजोये हुए हैं।
चिन्तन पर—सद्ज्ञान पर आधारित है। इसके लिए उच्चचरित्र निष्ठा वाले सत्कर्म परायण, तत्वदर्शी गुरुजनों के पास जाना चाहिए और चिन्तन, समय, तप एवं सत्कर्मों के सहारे उसे न केवल मस्तिष्क में वरन् जीवन के समय क्रिया-कलाप में समाविष्ट करना चाहिए। जो ज्ञान व्यावहारिक जीवन का अंश बन सके वस्तुतः वहीं सच्चा ज्ञान है। कहा गया है—
चिन्तन, समय, श्रम, मनोयोग, कौशल एवं धन का बहुत बड़ा अंश नष्ट करना पड़ता है। ब्रह्मचर्य की बात इसी दृष्टि से है। कामुकता की प्रेरणा से पत्नी ढूँढ़ना—पत्नी के बच्चे होना-बच्चों के उत्तरदायित्व का गरदन तोड़ कर रख देने वाला भार पड़ना, कितना जटिल और कितना कठिन होता है इसे प्रत्येक भुक्त भोगी भली प्रकार जानता है। राई रत्ती जितनी वासना का विस्तार इतना अधिक होता चला जाता है कि मनुष्य अपनी शत प्रतिशत शक्ति को उसी जंजाल में झोंक देने के उपरान्त भी सन्तोषजनक स्थिति की परिवार व्यवस्था नहीं जुटा पाता और बेतरह रोता-कलपता संसार से विदा होता है। यदि कामुकता पर नियन्त्रण रखा जा सके तो जीवन की समस्त सम्पदा को कोल्हू में पेल कर उसका एक-एक बूँद तेल जो गृहस्थ में जलाना पड़ता है उसकी बचत सहज ही हो जाय और उस बचत से आत्म-कल्याण एवं विश्व-कल्याण का उद्देश्य सहज ही पूरा किया जा सके।
चिन्तन पथ-प्रशस्त करती है। यह कल्प-वृक्ष जिसे प्राप्त हो गया वह उपयुक्त और अनुपयुक्त परिस्थितियों से समान रूप से लाभान्वित हो सकता है और हरी भली-बुरी परिस्थिति में खट्टे-मीठे आनन्द का अनुभव करता रह सकता है। बिना अन्तः विक्षोभ का सामना किये मात्र अपनी आन्तरिक विभूतियों के आधार पर किस तरह सुखी, संतुष्ट रहा जा सकता है, इस कला का नाम ब्रह्मविद्या है। वस्तुओं पर—
चिन्तन, समय, तप एवं सत्कर्मों के सहारे उसे न केवल मस्तिष्क में वरन् जीवन के समय क्रिया-कलाप में समाविष्ट करना चाहिए। जो ज्ञान व्यावहारिक जीवन का अंश बन सके वस्तुतः वहीं सच्चा ज्ञान है। कहा गया है—

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-July
चिन्तन मनन किया जाय। उन प्रेरणाओं को क्या अपने जीवन−क्रम में उतारना सम्भव है? यदि है तो किस क्रम से, कितनी मात्रा में—इन प्रश्नों पर विचार करने का नाम ही चिन्तन−मनन है।
चिन्तन−मनन है।
चिन्तन में उथले लोग उलझे रहते, है। उस क्रिया-कलाप की गहराई में नहीं उतरते जिसके सहारे वह सफलता प्राप्त की जाती है आकाँक्षा और उसकी पूर्ति के बीच में एक बड़ी लम्बी-चौड़ी और गहरी खाई होती है, उसे पाटने के लिए कितने साहस की-कितने अध्यवसाय की - कितने प्रयास की आवश्यकता पड़ेगी इसे तो भूला ही दिया जाता है। सफलता की मंजिल तक पहुँचने के कितने साधन जुटाने पड़ेंगे और उनके लिए क्या-क्या करना पड़ेगा? अड़चनों से किस तरह निपटा जायगा और जो साधन नहीं जुट सके उनका विकल्प क्या होगा? इन बातों पर जो विचार नहीं कर सकता और इच्छा के बाद सफलता को ही दूसरा चरण मानता है, वह पूरा शेखचिल्ली ही बना रहेगा।
चिन्तन में अधिक तेजस्वी प्रकाश का समन्वय किया था। अभी वह समय नहीं आया कि उस क्रमिक अग्रगमन का पटाक्षेप का दिया जाय। अभी हमारे लिए सोचने और सुधारने की दिशा में बहुत चलना बाकी है। पूर्णता की प्राप्ति तक हमारे चरण अनवरत गति से आगे बढ़ते रहने चाहिए। विज्ञान की उपलब्धियों ने इस भूखण्ड के निवासियों को अत्यन्त समीप ला दिया है।
चिन्तन का विषय बनी हुई है। मनुष्य का प्रेत होता है, यह भी जाना और माना जाता रहा है। अब यह नया तथ्य सामने आया है कि महत्वपूर्ण घटनाओं के’—महत्वपूर्ण पदार्थों के और प्रचण्ड संकल्प-सत्ताओं के भी प्रेत हो सकते हैं। स्थूल के नष्ट हो जाने पर भी सूक्ष्म का अस्तित्व बना रहता है। इस सूक्ष्म का गहन अन्वेषण हो सके तो हमारे ज्ञान-विज्ञान में एक नई किन्तु अति महत्वपूर्ण कड़ी जुड़ सकती है।
चिन्तन सम्भव हो जाता है। जो पाना है, जो करना है, वह निश्चित हो जाने पर मस्तिष्क को वैसा ही ताना-बाना बुनने की बात सूझती है। इसके लिए अपनी बौद्धिक क्षमता क्या बढ़ानी है? साधन क्या जुटाने हैं? संपर्क किन से बनाना है?
चिन्तन में उत्कृष्टता के तत्व घुस गये है जो आदर्शवादी जीवनयापन के लिए साहस एकत्रित कर रहे हैं उन्हें आज की स्थिति में असामान्य ही कहा जायगा। अखण्ड ज्योति के पाठक अहंकारवश नहीं वस्तुस्थिति के विश्लेषण के आधार पर अपने इसी स्थिति में पायेंगे। उन्हें अनुभव होगा कि उनके जीवन पुष्प को खिलने का सुअवसर आ रहा है और कोई माली उनके विकास के लिए—संरक्षण के लिए ही नहीं—देवता के चरणों तक पहुंचा देने के लिए भी अपनी भावना सँजोये बैठा है।
चिन्तन के साथ रसानुभूति की डडडड प्रक्रिया को समन्वित करना पड़ेगा। मस्तिष्क को जगाना स्कूली शिक्षा का काम है। दर्शन की भावनाएँ उभरनी चाहिए और मनुष्य को इतना सम्वेदनशील बनना चाहिए कि वह अपने दुखों के प्रति जितना दुखी होता है उससे अधिक दूसरों का दुख देखकर द्रवित होने लगे। अपने सुखोपभोग में जितनी प्रसन्नता होती है उससे अधिक दूसरों को सुखी बनाने में होने लगे। दार्शनिक दृष्टिकोण वह है जो हर व्यक्ति और हर पदार्थ में सत्−चित और आनन्द की अनुभूति को ढूँढ़ और जमा सकता है।
चिन्तन की कलाबाजी का खेल खड़ा करते रहने वाला दर्शन भ्रान्तियों का भंडार बन जायगा, वह हमें अवास्तविक कल्पनाओं की उड़ान में उड़ते रहने वाला—दिवास्वप्न देखते रहने वाला—मात्र बना कर रख देगा। इसी प्रकार जड़ पदार्थों की क्षमता पर निर्भर होते-होते हम स्वयं हृदयहीन मशीनी मनुष्य मात्र बनकर रह जायेंगे। विज्ञान को दर्शन के साथ और दर्शन को विज्ञान के साथ अपना ताल-मेल बिठाना पड़ेगा। यद्यपि आज यह बहुत कठिन दीखता है पर कल इसकी अनिवार्यता अनुभव की जायगी। सत्य और तथ्य का समन्वय करने से ही सर्वतोमुखी प्रगति के दोनों पहिये गतिशील हो सकेंगे।
चिन्तन को प्रखर, सत्यान्वेषी, यथार्थवादी और नीर−क्षीर विवेकी बना सकता है। सत्य के समीप हम इसी आधार को अपनाकर पहुँच सकते है। भौतिक विज्ञान का आराध्य सत्य है। वह परखा नहीं करता कि अब से पहने क्या कहा और क्या माना जाता रहा है। वह बिना किसी प्रकार का दबाव या संकोच किये जो तर्क संगत और तथ्य समर्पित प्रतीत होता है उसे प्रस्तुत करता है।
चिन्तन की विडम्बना से जितना बचा जा सके उतना ही उत्तम है। सोचना चाहिए कि एक निर्धारित दिशा में ही सफलता प्राप्त कर सकने के साधन मनुष्य के पास होते हैं, इसलिए यह निर्धारण करना चाहिए कि हमें भविष्य में क्या करना और क्या पाना है। यह निर्धारण ऐसा होना चाहिए जो अपनी आज की योग्यता एवं परिस्थितियों के साथ ताल-मेल खाता हो। आधारहीन कुलाचें भरने में टाँग टूटने का खतरा ही उभर कर आगे आता रहेगा।
चिन्तन की ओर उन्मुख हो सकना भी बड़ा कठिन है। युग प्रवाह भोग और स्वार्थ की परिधि से एक इञ्च भी आगे नहीं बढ़ने दे सकता। जिनके चिन्तन में उत्कृष्टता के तत्व घुस गये है जो आदर्शवादी जीवनयापन के लिए साहस एकत्रित कर रहे हैं उन्हें आज की स्थिति में असामान्य ही कहा जायगा। अखण्ड ज्योति के पाठक अहंकारवश नहीं वस्तुस्थिति के विश्लेषण के आधार पर अपने इसी स्थिति में पायेंगे। उन्हें अनुभव होगा कि उनके जीवन पुष्प को खिलने का सुअवसर आ रहा है और कोई माली उनके विकास के लिए—संरक्षण के लिए ही नहीं—देवता के चरणों तक पहुंचा देने के लिए भी अपनी भावना सँजोये बैठा है।
चिन्तन और उसके प्रस्तुतकर्त्ताओं के प्रति पूर्ण आदर रखते हुए भी सत्यान्वेषण की प्रक्रिया या को जारी रखा जा सकता है आखिर इन पूर्वजों ने भी तो अपने पूर्वजों के चिन्तन में अधिक तेजस्वी प्रकाश का समन्वय किया था। अभी वह समय नहीं आया कि उस क्रमिक अग्रगमन का पटाक्षेप का दिया जाय। अभी हमारे लिए सोचने और सुधारने की दिशा में बहुत चलना बाकी है। पूर्णता की प्राप्ति तक हमारे चरण अनवरत गति से आगे बढ़ते रहने चाहिए। विज्ञान की उपलब्धियों ने इस भूखण्ड के निवासियों को अत्यन्त समीप ला दिया है।
चिन्तन हमारी विचारणा को इस केन्द्र पर केन्द्रीभूत करता है कि अपने चेतनात्मक अस्तित्व का स्वरूप एवं प्रयोजन समझें और जीवन के बहुमूल्य क्षणों को इस प्रकार प्रयुक्त करें, कि अन्ततः पश्चाताप करने की स्थिति सामने न आवे। सुरदुर्लभ मानव जीवन के दैवी वरदान का सदुपयोग कर सकने की प्रेरणा एवं सक्रियता उत्पन्न करना ही अध्यात्म विज्ञान का एकमात्र लक्ष्य है।
चिन्तन की सूक्ष्मतर परिधि कह सकते हैं। नृत्य गायन कला नहीं, कला का आवरण है उस माध्यम से अन्तःकरण में जो उल्लास पूर्ण प्रस्फुरण उमँगता है वह सम्वेदना ही कला है। काव्य किन्हीं तुकबंदी या छन्द विन्यास को नहीं कहते। शब्दों का आवरण उठा कर विशिष्ट स्तर के भावोद्रेक को सजाया भर जाता है। उन शब्दों के अन्तरंग में जो कोमलता झाँकती है और चेतना में गुदगुदी पैदा करती है वही कविता है।
चिन्तन और प्रयास को अभीष्ट लक्ष्य पर नियोजित रखने वाले इतनी सफलता प्राप्त कर लेते हैं जिसे दैवी वरदान अथवा अप्रत्याशित तक कहा जा सके।
चिन्तन और औचित्य का अवलम्बन जिन्होंने अपनाया उन्हें विचार क्षेत्र का वैज्ञानिक ही कहना चाहिए। दूसरे शब्दों में उसे दार्शनिक भी कह सकते हैं।
चिन्तन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। क्षणभर में दुष्ट जैसी और क्षणभर में सन्त जैसी आकाँक्षाएँ मन में उठ सकती हैं, पर एक साथ दोनों प्रकार की क्षमताएँ नहीं जुटाई जा सकती। अस्त-व्यस्त, अव्यवस्थित और असन्तुलित अभिलाषाओं को मस्तिष्क में घुमड़ते रहना सरल है, पर उनकी पूर्ति असम्भव है। मनुष्य उन कार्यों में उतनी ही मात्रा में सफल हो सकता है, जितने कि उसके पास अन्तरंग अथवा बहिरंग साधन होते हैं। योग्यता एवं साधन सुविधा में क्रमशः बढ़ोतरी हो सकती है, तब अपनी आकाँक्षाएँ भी विकसित की जा सकती हैं, पर आज जिनकी बुद्धि संगत संगति नहीं हैं और व्यावहारिक सम्भावना नहीं हैं, उनके लिए कल्पना की उड़ाने लगाना सर्वथा निरर्थक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-February
चिन्तन मनन, उन्हें ग्रहण करने का प्रयत्न करना, उस पर अग्रसर होने की चेष्टा करना। सच्चे शिव के उपासक वही हैं जो अपने मन में स्वार्थ भावना त्याग कर परोपकार की मनोवृत्ति को अपनाते हैं जब हमारे मन में यह विचार उत्पन्न होने लगते हैं तो हम अपने आत्मीयजनों के साथ झूठ, छल,कपट, धोखा, बेईमानी, ईर्ष्या, द्वेष आदि से मुक्त हो जायेंगे। यदि शिवरात्रि व्रत के दिन हम इस महा पथ का अवलम्बन नहीं लेते तो शिव का व्रत और पूजन केवल लकीर पीटना मात्र रह जाता है। उसका कोई विशेष लाभ नहीं होता ।
चिन्तन करते रहते हैं, उनकी अधिकाँश मानसिक शक्तियाँ इसी जंजाल में उलझ कर नष्ट भ्रष्ट हो जाती हैं।
चिन्तन का यह एक छोर है। नौ आसमानों में आखरी आसमान स्वर्ग है।
चिन्तन के प्रकाश के सिवाय और किसी तरह का ज्ञान नहीं है, तो कई ऐसे भी हैं जो आत्मा के स्वर्ग को प्रकाशित कर रहे हैं। स्वर्ग अपना आनंद तो सबको देता है, परंतु अपनी शक्ति किसी किसी को ही प्रदान करता है। ऐसे प्राणी इस संसार में प्रतीत नहीं होते, फिर भी वे इसी संसार के हैं वर्तमान काल में उनको जैसा आत्म ज्ञान और बल प्राप्त हुआ है वैसा बहुत समय से नहीं हुआ था। उसी शक्ति से वे आज भूतकाल की समस्त वस्तुओं को चकनाचूर करके भविष्य की जातियों के लिये बिखेर रहे हैं।
चिन्तन और मनन द्वारा संभव होती है।
चिन्तन करके अन्त में उनकी दुर्गति का दृश्य उपस्थित करना और सत्कर्म करने वालों को देव संज्ञा में लेकर अंत में उन्हें विजय, समृद्धि कीर्ति, सद्गति, मुक्ति आदि से लाभांवित होते दिखाना यही पौराणिक उपाख्यानों का मूल प्रयोजन है। साधारण उपदेशों की अपेक्षा कथानक के रूप में कोई तथ्य उपस्थित किया जाय तो वह अधिक प्रभावशाली होता है इसलिए शिक्षा के आदेश ग्रन्थों की अपेक्षा पुराणों का ढंग अधिक आकर्षक एवं प्रभावशाली सिद्ध हुआ। जनता ने उसे पसंद भी किया। कथाएं स्वभावतः रोचक होती हैं। आवश्यकता के अनुरूप वस्तुएं बढ़ती घटती हैं।
चिन्तन करते रहने वाले व्यभिचारी इस वासना की तेज और नशीली शराब में अपना आध्यात्मिक कलेजा जला डालते हैं। मूल्यवान मानसिक शक्तियाँ इसी आग में जल जाती हैं। ऐसे लोगों के अंदर कोई ऐसी महत्वपूर्ण प्रतिभा जीवित नहीं रहती जिसके आधार पर वह कोई आदर्श या आध्यात्मिक पुरुषार्थ का उदाहरण उपस्थित कर सके। मानसिक व्यभिचार की बीमारी से ग्रसित लोग एक के बाद एक नीची सीढ़ी पर ही उतरते हैं, उनके विचार और कार्य दिन दिन दुर्बल ही होते जाते हैं। इन हानियों को ध्यान में रखते हुए आत्म विद्या के तत्व दर्शियों ने ब्रह्मचर्य एवं इन्द्रिय निग्रह को धर्म का अंग माना है।
चिन्तन का दूसरा छोर है।
चिन्तन और मनोरंजन सभी कुछ लक्ष्य के अनुकूल हृदय मंदिर में जलती रहे और उसका कोना-कोना प्रकाशित रहे, इस बात को स्मरण रखना है।
चिन्तन की अपेक्षा पवित्र भावनाएं रखने का निर्देश किया है। गृहस्थों की भी भोग सीमा को मर्यादित किया है। यह सब प्रतिबंध आत्मनिर्माण की दृष्टि से आवश्यक है। धन के लोभ की भाँति, कामवासना पर नियंत्रण स्थापित करना व्यक्ति तथा समाज के स्वस्थ विकास में सहायक होने के कारण इन्हें धर्म का महत्व पूर्ण अंग मान लिया गया है।
चिन्तन करें, उनके असली आशय को अनुभव करें, उनके तमाम गुप्त अर्थों को उनमें से निकाल लेवें। हमारी चित्त वृत्ति एकाग्र होनी चाहिये ताकि शब्दों के अवसरण को छोड़कर हम ग्रंथकर्ता की चित्त वृत्ति का भाव ग्रहण कर सकें। इस प्रकार का पाठ करना अथवा पढ़ना शिक्षा का काम देता है और हमारी मानसिक उन्नति में बड़ा सहायक होता है। जिस पाठ में इतना प्रयत्न नहीं किया जायगा वह दिल को बहलाने वाला और हमारे ज्ञान भण्डार को कुछ बढ़ाने वाला ही हो सकता है, पर उससे हमारी उतनी मानसिक उन्नति और वृद्धि नहीं हो सकती जैसी कि पूर्ण चिन्तन और मनन द्वारा संभव होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-April
चिन्तन से हमें प्रतीत होगा कि हमारी वर्तमान परिस्थिति दुख दारिद्र से भरी नहीं, वरन् सुख सुविधाओं से सम्पन्न है।
चिन्तन से बलवान बनता है—इस विषय में प्रसिद्ध मनोविज्ञान बेन्ता प्रो॰ लालजीराम शुक्ल की सम्पत्ति दीर्घकालीन अनुभव का निचोड़ है। वे लिखते हैं, “मनुष्य के मन में अपार शक्ति है। वह जितनी शक्ति की आवश्यकता का अनुभव करता है, उतनी शक्ति अपने भीतर से (अर्थात् गुप्त मन से) ले सकता है। जो व्यक्ति अपने आपको कर्त्तव्य -दृष्टि से बड़े-बड़े संकटों में डालता रहता है, वह अपने भीतर अपार शान्ति की अनुभूति भी करने लगता है। उसे अपने संकटों को पार करने के लिए असाधारण शक्ति भी मिल जाती है।
चिन्तन करें, साथ ही यह भी सोचें कि यदि यह बातें उपलब्ध न होती तो उनके अभाव में अपना जीवन कितना नीरस होता- तो इस चिन्तन से हमें प्रतीत होगा कि हमारी वर्तमान परिस्थिति दुख दारिद्र से भरी नहीं, वरन् सुख सुविधाओं से सम्पन्न है।
चिन्तन से मनुष्य शान्तिपूर्वक परिस्थिति पर विचार करना सीखता है। ठंडे मन से विचारने से कर्त्तव्य बुद्धि स्वच्छ हो जाती है, उचित अनुचित का विवेक जाग उठता है। कर्त्तव्य सम्बन्धी उलझे हुए विचार सुलझ जाते हैं। ये विचार सुलझते ही वास्तविक और काल्पनिक कठिनाइयों का स्पष्टीकरण हो जाता है। जो व्यक्ति अपने चारों ओर आपत्तियों को घिरा हुआ पाता है, उसका कारण उसके उलझे विचार ही हैं।
चिन्तन करें।
चिन्तन करते हैं और उन उपलब्धियों पर संतोष प्रकट करते हुए प्रसन्न रहते हैं और उस कृपा के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते रहते हैं। थोड़े से अभाव एवं कष्ट उन्हें वैसे ही कौतूहल वर्धक लगते है जैसे माता अपने सुन्दर बालक के माथे पर काजल की बूँद लगा कर “डिढौरा” बना देती है कि कहीं ‘नजर’ न लग जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-May
चिन्तन करना ही है। यदि आप उसे कोई अच्छी या बुरी समस्या दिये रहेंगे, तो निश्चय जानिये, वह उसी समस्या के उखाड़-पछाड़ में संलग्न रहेगा। वह विश्राम की परवाह न कर बौद्धिक चिन्तन ही किए जायगा।
चिन्तन मनुष्य के शरीर के लिए हानिकारक है। जो जितना अधिक मानसिक चिन्तन करता है, उसका शरीर उतना ही क्षीण होता जाता है। भूख नष्ट हो जाती है। भोजन में कोई भी रुचि नहीं रह जाती। रक्तचाप, व्रण, हृदय रोग, सिर दर्द आदि उभर उठते हैं।
चिन्तन, विचार और मनन इत्यादि करना चाहिए। इस सम्बन्ध में कुछ पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों की नई खोजें और बहुमूल्य विचार यहाँ उद्धृत किये जाते हैं। मानस रोगों के सम्बन्धों में डॉक्टर डेविड हैराल्ड फिल्क के विचार क्रान्तिकारी हैं। वे लिखते हैं-
चिन्तन से हटकर अन्य कार्यों में लगता है। इससे मस्तिष्क को आराम मिलता है। डॉक्टर फिल्क ने अपने मानस रोगियों को कम से कम एक घन्टे तक कुछ न सोचने की सलाह दी है। ऐसा करने से भावात्मक तनाव कम होता है।
चिन्तन में लगाये रखने से स्नायु पर अतिरिक्त भार पैदा हो गया। इससे शारीरिक क्रियाओं में रुकावट उत्पन्न होने लगी। फलस्वरूप अपने को मानसिक दृष्टि से थका हुआ पाने लगे।
चिन्तनशील प्रकृति के हैं? सारे दिन अपनी बाबत कुछ न कुछ गंभीरता से सोचा ही करते हैं? कल हमारे व्यापार में हानि होगी या लाभ, बाजार के भाव ऊँचे जायेंगे, या नीचे गिरेंगे। अमुक ने हमारा रुपया उधार ले रखा है, वह वापस करेगा भी या हड़प लेगा? दिनों दिन बाजार में महंगाई उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है।
चिन्तन करते-करते उसे इतना कार्य बोझिल बना दिया कि मानसिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। अधिक सोचने-विचारने से, दिमाग सारे दिन चिन्तन में लगाये रखने से स्नायु पर अतिरिक्त भार पैदा हो गया। इससे शारीरिक क्रियाओं में रुकावट उत्पन्न होने लगी। फलस्वरूप अपने को मानसिक दृष्टि से थका हुआ पाने लगे।
चिन्तन करते रहते हैं।
चिन्तन करता है, उसका शरीर उतना ही क्षीण होता जाता है। भूख नष्ट हो जाती है। भोजन में कोई भी रुचि नहीं रह जाती। रक्तचाप, व्रण, हृदय रोग, सिर दर्द आदि उभर उठते हैं। चिन्तनशील व्यक्ति प्रायः भयभीत से, शंकालु से और भविष्य के लिए चिन्तित रहते हैं।
चिन्तन या मानसिक श्रम करने वालों के स्वास्थ्य को देखिए। वे पहले दुबले रहते हैं तो भी शरीर पर माँस नहीं बढ़ता। उनकी हड़ियाँ ही हड्डियाँ चमका करती हैं। मेरे एक मित्र हैं जो लेखन का काम करते हैं। एक दिन मेरे पास आये।
चिन्तन के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले मानसिक रोग उन्हें नहीं सताते। उनका मानसिक संतुलन पुरुषों की अपेक्षा स्वस्थ होता है।
चिन्तन करें, उतना ही शारीरिक कार्य करें, हाथ पाँव हिलायें। खूब खेलें कूदें, अपने शरीर से भी परिश्रम करें।
चिन्तन और सब संसार जैसे खो चुका हो। रात में सोते, तो स्वप्न में भी परीक्षा में बैठे-2 पर्चे करते ही अनुभव करते। फल यह हुआ कि सारा मस्तिष्क भारी थकान में बोझिल हो उठा।
चिन्तन ही किए जायगा।
चिन्तन है। अधिक बौद्धिक चिन्तन से स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव पड़ता है। उसी की प्रतिक्रिया इनके शरीर पर दिखाई देती है। इन्होंने अपने मस्तिष्क को आराम नहीं दिया वरन् लगातार चिन्तन करते-करते उसे इतना कार्य बोझिल बना दिया कि मानसिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। अधिक सोचने-विचारने से, दिमाग सारे दिन चिन्तन में लगाये रखने से स्नायु पर अतिरिक्त भार पैदा हो गया।
चिन्तन करना है बहुत सोच विचार करने से मस्तिष्क थकान से भर जाता है और स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कुछ मानसिक रोगियों का परीक्षण करने से मैंने पाया है कि वे आवश्यकता से अधिक सोच विचार करते हैं। इन लोगों के मस्तिष्क सदैव व्यस्त रहते हैं। वे वास्तविक या काल्पनिक समस्याओं की उधेड़ बुन में सदैव लगे रहते हैं या हम समस्याओं के अभाव में यही कल्पना करते रहते हैं कि अमुक स्थिति के उत्पन्न होने पर हमारी प्रतिक्रिया क्या होगी। इस सतत चिन्तन के फलस्वरूप जो मानसिक तनाव स्वास्थ्य पर तो पड़ता ही है, भावात्मक सम्बन्ध भी अव्यवस्थित हो जाते हैं।
चिन्तन की क्रिया में डाल देते हैं। जैसे गाड़ी का पहिया किसी लीक में पड़ कर आगे निरन्तर उसी दिशा में बढ़ता रहता है, उसी प्रकार मस्तिष्क को चिन्तन की किसी भी समस्या में उसको लगा देने से वह उसी में फँसा रहता है। वह खुद रुकता नहीं बल्कि चिन्तन के प्रवाह में आगे बढ़ता रहता है। मस्तिष्क तो चिन्तन का एक यंत्र है। उसका कार्य चिन्तन करना ही है।
चिन्तन के फलस्वरूप जो मानसिक तनाव स्वास्थ्य पर तो पड़ता ही है, भावात्मक सम्बन्ध भी अव्यवस्थित हो जाते हैं।
चिन्तन की अपेक्षा बहुत करती हैं। उनके मस्तिष्क में अति चिन्तन की आदत नहीं होती। एक कारण यह है कि वे अधिक पढ़ी-लिखी नहीं होती। इस वजह से सतत चिन्तन के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले मानसिक रोग उन्हें नहीं सताते। उनका मानसिक संतुलन पुरुषों की अपेक्षा स्वस्थ होता है।
चिन्तन की आदत नहीं होती। एक कारण यह है कि वे अधिक पढ़ी-लिखी नहीं होती। इस वजह से सतत चिन्तन के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले मानसिक रोग उन्हें नहीं सताते। उनका मानसिक संतुलन पुरुषों की अपेक्षा स्वस्थ होता है।
चिन्तनशील व्यक्ति प्रायः भयभीत से, शंकालु से और भविष्य के लिए चिन्तित रहते हैं। गुप्त मन में बैठा हुआ उनका भय ही उन्हें खाया करता है।
चिन्तन से स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव पड़ता है। उसी की प्रतिक्रिया इनके शरीर पर दिखाई देती है। इन्होंने अपने मस्तिष्क को आराम नहीं दिया वरन् लगातार चिन्तन करते-करते उसे इतना कार्य बोझिल बना दिया कि मानसिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। अधिक सोचने-विचारने से, दिमाग सारे दिन चिन्तन में लगाये रखने से स्नायु पर अतिरिक्त भार पैदा हो गया। इससे शारीरिक क्रियाओं में रुकावट उत्पन्न होने लगी।
चिन्तन की किसी भी समस्या में उसको लगा देने से वह उसी में फँसा रहता है। वह खुद रुकता नहीं बल्कि चिन्तन के प्रवाह में आगे बढ़ता रहता है। मस्तिष्क तो चिन्तन का एक यंत्र है। उसका कार्य चिन्तन करना ही है। यदि आप उसे कोई अच्छी या बुरी समस्या दिये रहेंगे, तो निश्चय जानिये, वह उसी समस्या के उखाड़-पछाड़ में संलग्न रहेगा।
चिन्तन का एक यंत्र है। उसका कार्य चिन्तन करना ही है। यदि आप उसे कोई अच्छी या बुरी समस्या दिये रहेंगे, तो निश्चय जानिये, वह उसी समस्या के उखाड़-पछाड़ में संलग्न रहेगा। वह विश्राम की परवाह न कर बौद्धिक चिन्तन ही किए जायगा।
चिन्तन ध्यान संभव नहीं, इसलिए उपासकों की सफलता के लिये रूप कल्पना की गई।
चिन्तन के प्रवाह में आगे बढ़ता रहता है। मस्तिष्क तो चिन्तन का एक यंत्र है। उसका कार्य चिन्तन करना ही है। यदि आप उसे कोई अच्छी या बुरी समस्या दिये रहेंगे, तो निश्चय जानिये, वह उसी समस्या के उखाड़-पछाड़ में संलग्न रहेगा। वह विश्राम की परवाह न कर बौद्धिक चिन्तन ही किए जायगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-October
चिन्तन कर सकना भी कठिन है। अब तक जिन एक सहस्र प्रमुख गुणों का पता इस विद्या के वैज्ञानिकों ने लगाया है केवल उन्हीं का उल्लेख गायत्री सहस्र नाम से हुआ है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-November
चिन्तन की दृष्टि से एक नियत समय पर ही थोड़ा सोचना उचित है। हर घड़ी अपने बारे में सोचते रहने वाले लोग स्वार्थी समझे जाते हैं, उन्हें दूसरे लोग उपेक्षणीय एवं तिरस्कार के योग्य ही समझते हैं। प्रभावशाली व्यक्ति बनने के लिये यह आवश्यक है कि हम दूसरों की दृष्टि में अपस्वार्थी सिद्ध न हों। दूसरों में दिलचस्पी लेकर सामाजिक प्राणी बन कर ही कोई व्यक्ति दूसरों को अपनी उदारता से प्रभावित कर सकता है और तभी बदले में हमें दूसरों का प्रेम, आदर एवं सहयोग मिल सकता है। अपने मतलब में चौकस रहने वाले, अपने ही सुख की फिराक में रहने वाले व्यक्ति, दूसरों की सद्भावना से वंचित रहते हैं, फलस्वरूप वे कुछ भी उन्नति नहीं कर पाते।
चिन्तन का मुख्य विषय होती हैं। दूसरों से जब भी बात करेगा अपना रोना रोवेगा, अपनी शेखी मारेगा। वह यह भूल जाता है कि दूसरों को तुम्हारे रोने गाने सुनने की न तो फुरसत है और न उसमें कोई दिलचस्पी। हर आदमी अपनी जिम्मेदारियों से लदा हुआ है, उसे दूसरे की सहानुभूति या सहायता चाहिए। यह जानते हुए भी जो लोग अपनी राम कहानी ऐसे लोगों को सुनाते हैं जो उसको हल नहीं कर सकते तो ऐसा सुनाना एक प्रकार से उनका समय नष्ट करना ही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-June
चिन्तन से बन्धन और मोक्ष के कारणों को ढूँढ़ा सुख और दुःख क्या है? और क्या होते हैं? इत्यादि जीवन के अनन्त प्रश्नों का समाधान खोजा और अपनी उदात्त वाणी से अनुभव की अमृतवर्षा कर मानवों को अजर-अमर बना दिया। धर्म मानव के मस्तिष्क की सबसे महत्वपूर्ण उपज है। धर्म के सम्बन्ध में जितना चिन्तन गहराई और अनेक दृष्टि-बिन्दुओं से भारतवर्ष में हुआ है उतना विश्व के अन्य किसी भी देश में नहीं हुआ साथ ही जीवन में भी धर्म की जितनी प्रतिष्ठा भारतीय मानवों में हुई, उतनी अन्यत्र शायद ही कहीं हुई हो।
चिन्तन गहराई और अनेक दृष्टि-बिन्दुओं से भारतवर्ष में हुआ है उतना विश्व के अन्य किसी भी देश में नहीं हुआ साथ ही जीवन में भी धर्म की जितनी प्रतिष्ठा भारतीय मानवों में हुई, उतनी अन्यत्र शायद ही कहीं हुई हो। भारत में ऐसे ज्ञानी, योगी, भक्त , जीवनमुक्त सन्त महात्मा हुए इनकी तुलना में अन्य किसी भी देश के किसी भी व्यक्ति को नहीं रखा जा सकता। ऐसे गौरवशाली भारतवर्ष की आज जो स्थिति है, उसका जितना नैतिक पतन हो गया है, उसे देखकर अवश्य ही हृदय को गहरा आघात लगता है। थोड़े वर्षों पहले तक जो नीतिमय जीवन और धर्म-भावना यहाँ के जन-जन में दिखाई देती थी, उसका सहसा इतना अधिक लुप्त हो जाना बड़ी ही विचारणीय और अखरने वाली बात है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-July
चिन्तन करता है वह अपनी बहुत सी शक्ति व्यर्थ की चिन्ता में खो देता है। ऐसे व्यक्ति का आत्म-विश्वास नष्ट हो जाता है। फिर उसकी कार्य क्षमता भी जाती रहती है और उससे अनेक प्रकार की भूलें होती रहती हैं।
चिन्तन का परिणाम है। जो मनुष्य वर्तमान काल के कर्तव्य पर ही अपने ध्यान को केन्द्रित करता है और बची हुई शक्ति को आध्यात्मिक चिन्तन में लगाता हैं, उसका आत्म-विश्वास नष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति प्रत्येक काम में आगे पीछे की बात को बहुत कुछ सोचता रहता है जो भविष्य के बारे में अत्यधिक चिन्तन करता है वह अपनी बहुत सी शक्ति व्यर्थ की चिन्ता में खो देता है। ऐसे व्यक्ति का आत्म-विश्वास नष्ट हो जाता है। फिर उसकी कार्य क्षमता भी जाती रहती है और उससे अनेक प्रकार की भूलें होती रहती हैं।
चिन्तन भी है। परमात्मा की खोज में इसे लगा देना ही अधिक महत्वपूर्ण है। संसार के सारे धर्म कर्म, योग, साधना, उपासना आदि इसी केन्द्र पर केन्द्रित हैं।
चिन्तन में लगा है, उसके लिए कोई कामना शेष नहीं रहती। जिस साधक में ज्ञान का अभाव है, वह सत्य का निरूपण करने में समर्थ नहीं होता।
चिन्तन करते हैं, वे मुझे प्राप्त होते हैं। अतः साधक के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह सेवा-भावी बने।
चिन्तन में लगाता हैं, उसका आत्म-विश्वास नष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति प्रत्येक काम में आगे पीछे की बात को बहुत कुछ सोचता रहता है जो भविष्य के बारे में अत्यधिक चिन्तन करता है वह अपनी बहुत सी शक्ति व्यर्थ की चिन्ता में खो देता है। ऐसे व्यक्ति का आत्म-विश्वास नष्ट हो जाता है। फिर उसकी कार्य क्षमता भी जाती रहती है और उससे अनेक प्रकार की भूलें होती रहती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-March
चिन्तन करते रहने से और उसके उपकारों के प्रति श्रद्धा से मस्तक झुकाने से नम्रता, मधुरता और सहिष्णुता आदि सद्गुण स्वयमेव उत्पन्न होने लगते हैं। उसके अन्तःकरण में सेवा की वृत्ति जागृत होने लगती है। वह सबको प्यार करने लगता है और सब उसको प्यार करने लगते हैं। इस प्रकार के सद्व्यवहार से वह इस लोक में यशस्वी बनकर जीवन व्यतीत करता है और मरने पर सद्गति को प्राप्त होता है। इस प्रकार लौकिक व्यवहार के लिए जो गुण आवश्यक हैं वे भी भगवान की पूजा उपासना से उत्पन्न होने लगते हैं।
चिन्तन आदि के बिना मनुष्य का मस्तिष्क पशु श्रेणी में ही बना रहता है। जिस प्रकार शरीर के लिए संतुलित भोजन, मन के लिए उत्तम विचार आवश्यक है उसी प्रकार जीवात्मा को स्वस्थ रखने, बलवान बनाने और विकसित करने के लिए नित्य प्रति भगवत् साधना का संतुलित भोजन आवश्यक है। जैसे भोजन के अभाव में शरीर का विकास रुक जाता है और उत्तम विचारों के न मिलने पर मन कुँठित हो जाता है उसी प्रकार भगवान की पूजा उपासना न करने से भी जीवात्मा की शुभ करने की प्रेरक शक्ति कुँठित हो जाती है और अपने पूर्ण विकास की स्थिति परमात्मा की प्राप्ति से वंचित रह जाती है।
चिन्तन और पालन कर सके, कैसा उत्तम हो।
चिन्तन की वैज्ञानिक क्रिया को निरंतर करते रहना चाहिए जब तक उन्नति की सीमा तक न पहुँच जावे।
चिन्तन और मनन निरंतर चलते रहना आवश्यक है। ‘भृंग कीट’ के उदाहरण में जब कीड़ा निरन्तर भृंग का ध्यान करता है तो वह शरीर समेत भृंग ही बन जाता है, इसी प्रकार मनुष्य भी भगवान के स्वरूप और गुणों की चिन्तन करता हुआ उसी जैसा बन जाता है।
चिन्तन करना आवश्यक है। इसके बिना अन्तःकरण में जमे हुए कुसंस्कार नष्ट नहीं होते हैं। जिस प्रकार बिना चौका लगाये भोजन करना उचित नहीं है इसी प्रकार बिना परमात्मा के भजन के दैनिक जीवन प्रारम्भ करना अशुद्ध ही रहता है।
चिन्तन करता है और उनसे आकर्षित होकर उससे मिलने के लिए तड़पने लगता है। इस जप, तप, पूजा उपासना से अन्तरात्मा में एक दिव्य घर्षण होता है। इस घर्षण की वैज्ञानिक प्रक्रिया से अन्तःकरण में एक आध्यात्मिक विद्युत उत्पन्न होती है जिसमें एक चैतन्य चुम्बकत्व सन्निहित रहता है। कुतुबनुमा की सुई पर चुम्बक होने से उत्तरी ध्रुव की तरफ की धाराएँ उस सुई को अपनी ओर आकर्षित करती रहती हैं। जब तक यह चुम्बक उस सुई पर रहता है तब तक ही उत्तरी धारा उसे अपनी ओर खींचती रहती है।
चिन्तन करता हुआ उसी जैसा बन जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-August
चिन्तन किया और अपने सूक्ष्म नेत्रों से देखा तो उन्हें इस समस्त क्रिया शीलता का आधार ब्रह्म ही दिखाई दिया। उपनिषदों का कर्म के सम्बन्ध में यही अनुभव सिद्ध एवं सत्य सन्देश है।
चिन्तन करने से चित्त प्रसन्न रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-December
चिन्तन की शक्ति निर्बल पड़ जाती है। मनुष्य की मानसिक दशा ऐसी हो जाती है कि वह व्यावहारिक जीवन व्यतीत करने में असमर्थ हो जाता है। अन्त में वह सामाजिक परिस्थितियों के साथ साम्य स्थापन नहीं कर पाता। पास-पड़ोस, सगे-संबंधी, ईष्ट-मित्र सभी उसे त्यागने लगते हैं और अन्त में उसका मानसिक स्वास्थ्य पूर्णतया नष्ट हो जाता है। विभिन्न खाद्य पदार्थों का भिन्न-भिन्न प्रभाव मन पर पड़ता है।
चिन्तन आवश्यक होता है, उसे अधिक समय तक नहीं किया जा सकता। देर तक काम करने से वह याँत्रिक बन जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-May
चिन्तन करता हुआ बाहर से त्याग का आडंबर करने वाला तो गीता के मत से मिथ्याचारी ही कहा जायगा। राजा जनक इतने बड़े योगी थे कि उनसे बड़े-बड़े ऋषि योगविद्या सीखने आते थे। गृहस्थ रह कर ही संन्यासी बनने का अभ्यास करना चाहिये। निष्काम भाव से कर्तव्य धर्म का पालन करते हुए निस्वार्थ प्रेम की स्थापना करनी चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-December
चिन्तन करने पर एक ही बात प्रतीत होती है कि ईश्वरीय महान प्रेरणा का निमित्त बन जाने का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ है। भगवान राम को रावणवाद का नाश करना था पर बेचारे क्षुद्र बन्दर भी यश के भागी बन गये। कौरववाद का ध्वंस होना था पर पाण्डवों को अनायास ही कीर्ति मिल गई। इस युग में व्यापक रीति से फैले हुए असत्य, पाप, पाखण्ड एवं कुविचारों को भगवान नाश करने वाले हैं। निस्संदेह उसके स्थान पर सत्य की, धर्म की, प्रेम की तथा न्याय की स्थापना होगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-June
चिन्तन, आराधन अन्वेषण यही तो ब्रह्म यज्ञ है। एकान्त होकर ईश्वर जीव प्रकृति के सम्बन्ध में अखण्ड आत्मा, अखंड जीवन अखंड जगत के सम्बन्ध में निदिध्यासन, भजन आदि करना ब्रह्म यज्ञ ही तो ठहराया जायगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-March
चिन्तन (2) ईश्वर प्रार्थना (3) ‘मैं क्या हूँ’ पुस्तक में बताई हुई विधि से अखण्ड आत्मा, अखण्ड जीवन, अखण्ड जगत का ध्यान। मृत्यु से निर्भय रहते हुए तृष्णा वासनाओं को त्याग कर जीवनोद्देश्य को पूरा करने की दृष्टि से हर एक काम को करने की भावना जागृत करना।
चिन्तन और ईश्वर उपासना के लिए एक घन्टा उसी में बने रहो। बाहर का एक भी विचार इस समय मन में नहीं आना चाहिए। शरीर को ढीला करके किसी मुलायम बिछौने या आराम कुर्सी पर शान्तिपूर्वक बैठ जाओ। नेत्र बन्द करके अपने अन्तर हृदय का ही ध्यान करो, बाहरी बातों को इस समय बिल्कुल भुला देना चाहिए। शरीर और मन को स्थिर करके मन ही मन परमात्मा से प्रार्थना करो कि ‘हे प्रभो! मुझे ऐसी दिव्यदृष्टि प्रदान कीजिए जिससे मैं सर्वत्र आपके सत् चित् आनन्द स्वरूप का दर्शन कर सकूँ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-October
चिन्तन करता है, वह वैसा ही हो जाता है।” सर स्काट ने कहा-’यदि मुझे यह मालूम हो जाय कि अमुक व्यक्ति की भावना क्या हैं, तो मैं बता दूँगा कि आगे चल कर वह क्या होगा।” भृंग के सत्संग से कीड़े का भृंग बन जाने की जो किंवदंती प्रचलित है, वह कहाँ तक ठीक है अभी यह नहीं जाना जा सका पर शत-शत मुखो से मनःशास्त्र के पण्डितों ने यह स्वीकार किया है कि, जो जैसा ध्यान करता है, वह वैसा ही हो जाता है। दिव्य गुणों से सम्पन्न कृष्ण का तीव्र संवेदना के साथ ध्यान करने वालों की योग्यतायें उसी प्रकार की बनने लगेंगी यह एक असंदिग्ध मनोवैज्ञानिक सचाई है, जिससे कोई इन्कार नहीं कर सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-April
चिन्तन करना चाहिये। भजन, कथा, कीर्तन और उपदेशों में शामिल होना चाहिये। सत्य धर्म के मन्तव्यों को स्वयं अपनाना चाहिये और जनता में उनका प्रचार करना चाहिये।
चिन्तन करना चाहिये और स्याही में गंगाजल डाल कर पवित्रता, एकाग्रता और विचारपूर्वक निम्न संकल्प लिखना चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-August
चिन्तन मेरे प्रिय विषय बन गये हैं।
चिन्तन करीब 3 घन्टे करता रहा। अन्त में कातर प्रार्थना करता हुआ कि अब परीक्षा फल प्रकाशित होने वाला ही है, लज्जा आपके हाथ है, घर आया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-October
चिन्तन को एक जगह रोक पाना कठिन है। सही दिशा-धारा न होने से विकृतियों का घुसना स्वाभाविक है। इन्हीं का परिणाम मनोरोग है। अतएव इनसे बचने के लिए उपरोक्त तरीका ही अच्छा है। इसको अपना कर मन को स्वस्थ व शक्ति सम्पन्न बनाया जा सकता है।
चिन्तन ने आचरण को भ्रष्ट करके रख दिया है। शालीनता का स्थान निष्ठुरता ने ग्रहण कर लिया हैं वासना, तृष्णा और अहंता की कभी न पूरी होने वाली खाई, को पाटने में लोग अहर्निश इस प्रकार लगे हैं, मानों कुबेर के साधन और इन्द्र के वैभव से उन्हें कम नहीं, अधिक ही चाहिए। इस व्यामोह के कुचक्र से मनुष्य इतने गहरे दलदल में धँसता ही चला गया है कि उबरने की बात सोचना तक संभव नहीं बन पड़ रहा है, फिर छुटकारा मिले भी तो कैसे?
चिन्तन करते रहने की विधा को त्राटक साधना कहा गया है। इससे चर्म चक्षुओं में आत्म तेज का आविर्भाव होता है और दृष्टिकोण के परिमार्जन का क्रम चल पड़ता है। योगाभ्यास परक साधना क्रम में इससे मनकी एकाग्रता सधती है और अभ्यास क्रम में बढ़ते हरने पर वह अतंतः समाधि स्थिति तक साधक को पहुँचा देती है।
चिन्तन की सही संगति न बिठा सकने के कारण ही इतनी बड़ी संख्या में लोग मानसिक बीमारी से जकड़ते जा रहे हैं।
चिन्तन और जीवन शैली में ठीक तरह से सामंजस्य बिठा कर चलने और हँसने हँसाने की आदतों को अपना कर तनाव से एवं तद्जन्य व्यथाओं से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है।
चिन्तनशीलता किसी व्यक्ति तक सीमित न रह कर समूचे समाज सारी सभ्यता को आप्लावित कर लेंगे। उन्हीं को स्वाभाविक मानकर जीना पड़ेगा। यद्यपि प्रवाह से कोई बचेगा नहीं। किन्तु बच निकलने की कोशिश वाले उसी तरह पिछड़ गया। भावी युग के मनुष्य की तुलना में अजा का अनगढ़ मानव कुछ इसी प्रकार का होगा।
चिन्तन की ही दो दिशाएँ हैं। पहली में पड़कर व्यक्ति अपना सन्तुलन गँवा बैठता है। झाड़ी का भूत बन जाना-रस्सी का साँप दिखाई देना, जैसी भ्रम की प्रतिक्रिया प्रत्यक्ष हो जाती है। जबकि दूसरी के अनुरूप चिन्तन को सही रख सकना सम्भव हो सकता है। परिस्थितियों के साथ चिन्तन की सही संगति न बिठा सकने के कारण ही इतनी बड़ी संख्या में लोग मानसिक बीमारी से जकड़ते जा रहे हैं।
चिन्तन चलता है न अश्लील छेड़-छाड़ की विडम्बना की पनपती है। गर्भाधान का उपयुक्त अवसर आने पर मादा की ओर से प्रणय निवेदन होता है। नर एक प्रयोग में ही उस आवश्यकता को पूरी कर देता है। फिर जब तक वैसी स्थिति न बने, दोनों पक्षों में से कोई भी यौनाचार का विचार नहीं करता। इस मर्यादा पालन के कारण ओजस् यथावत बना रहता है और उनकी दृढ़ता को अक्षुण्ण बनाये रखता है।
चिन्तन को अपनी प्रयोगात्मक कसौटी पर खरा सिद्ध किया है। उनके अनुसार जब कोई बात किसी समूह में कही जाती है तो प्रत्येक व्यक्ति उसे बलग ढंग से समझाता है। वक्ता ने अपने कथन को जिस भाव से कहा है, इसे ठीक उसी तरह ग्रहण नहीं किया जाता इसके स्थान पर ऐसी चीज को ग्रहण किया जाता है जो उसके मन में पहले से भरी हो।
चिन्तन को सुगढ़ बनाने के लिए सतत् प्रयासरत रहना चाहिए।
चिन्तन को श्रेष्ठ माना जाने लगा। भावनाएँ उदय हुई। परिवार व्यवस्था पनपी, समाज सुसंगठित हुआ। इसी समय प्रथम काव्य मुखरित हुआ वेदों की ऋचाएँ गूंजी। यह था धरती का प्रथम सतयुग, अथवा यों कहें भावनामय युग।
चिन्तन संवारा। साथ ही मनोरोगी होने की जगह स्वस्थ और सबल हुआ। विक्टोर का मानना है कि मन को आदर्श में न तन्मय करने से चिन्तन को एक जगह रोक पाना कठिन है। सही दिशा-धारा न होने से विकृतियों का घुसना स्वाभाविक है। इन्हीं का परिणाम मनोरोग है।
चिन्तन में सदाशयता का समावेश किये रहना बन पड़ता है वे अपनी उपलब्धियों से ही नहीं आसपास के वातावरण से भी पर्याप्त मात्रा में आनन्द उपलब्ध कर लेत हे। इस प्रयोजन में प्रकृति की संरचना उसका स्वाभाविक रूप से समुचित सहयोग करती है। आनन्द से उत्पन्न हुआ व्यक्ति अपने निजी चुम्बकत्व के अनुरूप वातावरण स्वयमेव एकत्रित कर लेता है।
चिन्तन को सही रख सकना सम्भव हो सकता है। परिस्थितियों के साथ चिन्तन की सही संगति न बिठा सकने के कारण ही इतनी बड़ी संख्या में लोग मानसिक बीमारी से जकड़ते जा रहे हैं।
चिन्तन में समायी हैं। इसी को सँवारना होगा। अभी हम सोचते हैं कि किसे कब-कब क्या क्या दुर्व्यवहार हमारे साथ किया? अब तक कितनी बार असफलताएँ मिलीं कितनी हानियाँ उठानी पड़ी? सामान्यतया हमारी सोच इसी सबका लेखा जोखा करती रहती है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में निकृष्टता ही छाई रही है तो समझना चाहिए कि स्थिति पूर्ववत् गई-गुजरी ही बनी हुई है। लोगों को भ्रम में डालने के लिए अपने प्रभाव और प्रताप के झूठे किस्से भी गढ़े जा सकते हैं। बाजीगरों को भाँति किन्हीं को भ्रम में डालने वाला कौतुक चमत्कार भी दिखाया जा सकता है। किन्तु यह निश्चित है कि व्यक्तित्व को परिमार्जित किये बिना कोई सिद्ध पुरुष नहीं बन सकता।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की दृष्टि से स्थिति दिन-दिन पतन पराभव की ओर गिरते जाने का परिणाम यह हुआ है कि चेतनात्मक वातावरण का हर क्षेत्र प्रदूषण से भर गय है। वायु, जल, मिट्टी, आकाश आदि में बढ़ते जा रहे प्रदूषण इसके अतिरिक्त हैं। आशंका और अविश्वास बढ़ते-बढ़ते आगामी संभावित महायुद्ध की तैयारियों में जुट गये हैं। वैज्ञानिक आयुधों के ऐसे आविर्भाव हुए हैं, जो यदि चल पड़े तो इस सुन्दर दुनिया का और उसकी प्राणि सम्पदा का अस्तित्व भी शेष रहने देंगे या नहीं, इसमें सन्देह है। साधारण क्रम से भी विषाक्तता जिस तेजी से बढ़ रही है उसे देखते हुये लगता है कि कहीं दुनिया धीमी आत्महत्या की ओर नहीं बढ़ रही बढ़ती हुई नशेबाजी और अन्धाधुन्ध जनसंख्या वृद्धि ऐसे दो उदाहरण हैं जो प्रगति और शान्ति की संभावनाओं को धूमिल करके दुख देते हैं।
चिन्तन भी विकसित है। उसे सरलता चाहिए और सुन्दरता, सम्पन्नता प्रशंसा भी अतएव उसका विचार क्षेत्र विस्तृत हो जाता हैं वह लोभ, मोह और अहंता के परिपोषण का भी प्रयास करता है। इसलिए उसके सोचने का कार्य क्षेत्र भी विस्तृत हो जाता है। उसकी व्यवस्था बुद्धि अनेक प्रकार के नीच-ऊँच सोचती है, मोड़ मरोड़ों से होकर गुजरती हैं। इसलिए उसे विचारशील ही नहीं बुद्धिमान भी माना जाता हैं।
चिन्तन करने पर होता है। यह सृजित विचार एक आकार धारण करके उसे खोजने के लिए निकल जाता है। यदि इस विचार के पीछे कोई संकल्प नियोजित है, तो मानसिक क्षेत्र से निकला यह विचारमय आकार अपने को चरितार्थ करने की चेष्टा करता है।
चिन्तन और चरित्र। व्यक्तित्व का परिष्कार भी इसी को कहते है॥ प्रतिभा परिवर्धन भी इसी को कहते है। प्रतिभा परिवर्धन भी इसी के साथ जुड़ा रहता है। इन विशेषताओं से सम्पन्न होने पर व्यक्ति उस स्तर का बन जाता है जिस श्रद्धेय, सम्माननीय, प्रामाणिक अनुकरणीय, अभिनन्दनीय कहा जा सकें।
चिन्तन किया है। आचार्य शंकर का इस सदी में मानना है, कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना मानसिक जगत होता है। इसे विचारों एवं कल्पनाओं का संसार कह सकते हैं। यद्यपि विचार की प्रक्रिया में बुद्धि की प्रधानता होती हैं। पर व्यापक अर्धो में दोनों ही मानसिक चेतना के अंतर्गत आते है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-May
चिन्तन और दुष्ट आचरण को बहिष्कृत कर देना। अपनी कौशल और साधना को पुण्य परमार्थ में उत्सर्ग करते रहना। यही है क्रमशः उपासना, साधना और आराधना के तीन वर्ग। इनसे आत्मा सत्ता के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर तीनों ही कृतकृत्य होते हैं। आध्यात्म तत्वज्ञान और योग साधना के विधि विधान का यह परम प्रयोजन है।
चिन्तन अधोगामी हैं, चरित्र पर स्वार्थपरता छाई हुई है और व्यवहार में जिनने निकृष्टता धारण करके सेवा धर्म अपनाने की भावना ही त्याग दी है। जिनसे लिप्सा, वैभव और अहंकार प्रदर्शन करने वाली महत्वाकाँक्षाओं के अतिरिक्त और कुछ बन ही नहीं पड़ता। मनुष्य कलेवर मिला है तो अंतरंग भी उसी स्तर का होना चाहिए। यदि पैर से सिर तक पशुता ही छाई रहे तो अच्छा यह था कि भीतर और बाहर एक जैसा दिखाने के लिए पशुओं जैसा मुखौटा और आच्छादन ओढ़ कर रहा जाता। अपना नाम नर पशुओं की श्रेणी में लिखाया होता साथ ही यह आशा भी रखी गई होती अपनी वर्तमान स्थिति और संभावना भी इसी स्तर की बन कर रहेगी।
चिन्तन और दुष्ट आचरण ही प्रकारान्तर से दैत्य-दानव की भूमिका निभाते हैं। गुम्बज में अपनी ही आवाज प्रति-ध्वनि बनकर गूँजती है। छोटी-बड़ी समस्याएँ हमारे अपने ही द्वारा आमंत्रित हैं। यदि क्रम उलट दिया जाय तो प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदलते देर नहीं लगती। समय-समय पर अनेक बार यही होता रहा है।
चिन्तन में ही निरत देखे जाते है। उन्हें भविष्य अन्धकारमय ही दीखता है।
चिन्तन में भ्रष्टता का, चरित्र में दुष्टता का अनुपात बढ़ता जा रहा हो। जो सब करते हैं, उसी का अनुकरण किया जा रहा है। अधिकाँश व्यक्ति प्रमाद में समय गुजारते हैं और अकरणीय कृत्य करने के अभ्यस्त होते हैं। उनमें अपनी पहचान अलग रहनी चाहिए। नर पशुओं के झुण्ड में उन्हीं का एक सदस्य बनकर रहा गया तो यह मानवी गरिमा का संरक्षण कहाँ हुआ?
चिन्तन-मनन में भी बाधा नहीं पड़ती और आत्म विश्लेषण, अन्तःकरण निरीक्षण में भी कोई बाधा नहीं पड़ती। परिस्थिति जन्य एकान्त वह है जहाँ सर्वथा एकाकी रहना पड़ें। मनःस्थिति जन्य एकान्त वह है। जिसमें व्यक्तियों के इर्द-’गिर्द रहते हुए भी उनसे लगाव हटा लिया जाय या हट जाय।
चिन्तन से विपरीत है। इसके अलावा भी इसमें दो प्रधान दोष है। पहला मनुष्य मनुष्य के बीच बलगाव की दीवार खड़ी करना। क्योंकि हर मनुष्य जब सुविधा साधनों को इकट्ठा करने के लिए जुट पड़ेगा, तो इन्हें कहीं से छीन-झपट कर ही जुटाया जा सकेगा। छीनने वाला शोषक होगा, जिसका छीना गया है, वह शोषित।
चिन्तन क्षेत्र में घुमड़ते रहने और मस्तिष्क को कुछ काम देने वाली एक विशेषताभर समझा जाता था, परन्तु अब इसे भी विद्युत के समतुल्य ही प्रभावोत्पादक शक्ति माना जाने लगा है। यह न केवल शारीरिक हलचलों को जन्म देती है वरन् व्यक्ति, पदार्थ एवं वातावरण पर भी अपना प्रभाव डालती है और उन्हें बदलने तक में अपनी आश्चर्यजनक भूमिका सम्पन्न करती है। विचारों के विद्युत प्रवाह दूरस्थ व्यक्ति को उसी प्रकार प्रभावित करते हैं जैसा कि चाहा जाता है। जब मानव विचार एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क तक भेजे जाते हैं तो उसे “टेलीपैथी” या “विचार संप्रेषण” कहते हैं विश्व के अनेक वैज्ञानिक एवं परामनो-वैज्ञानिक इस क्षेत्र में अनुसंधानरत हैं।
चिन्तन करने वाले कितने है? अधिकाँश तो अशुभ चिन्तन में ही निरत देखे जाते है। उन्हें भविष्य अन्धकारमय ही दीखता है।
चिन्तन अपनाने की आदत रही होती तो निराश होकर मनोबल गँवाने और कल्पित उलझनों में सचमुच ही उलझ जाने से क्यों न बच सका गया होता?
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में ओतप्रोत कर लेना। इससे कम में ईश्वरीयसत्ता का आत्मसत्ता में समावेश बन ही नहीं पड़ता।
चिन्तन, मनन, सत्परामर्श आदि उपाय काम में लाये जाते हैं। यह उपाय साधन जिन्हें उपलब्ध नहीं होते वे कूपमण्डूक बने रहते हैं। वे जीवन का भार ढोने के अतिरिक्त और कुछ कर नहीं पाते। इसीलिए जहाँ चेतना की शक्ति पर विचार किया जाता है वहाँ प्रकारान्तर से उसे विचार शक्ति का विशेष सुनियोजन किया जाना कहा जाता है। विचारशील ही महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाते, महत्वपूर्ण कार्य करते और सफल महापुरुष कहलाते हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ऐसा है जिनके कारण अवांछनीयता बढ़ती जाने की सहज संभावना मन में उतरती है। नशेबाजी जैसा दुर्व्यसन किस प्रकार मनुष्य को खोखला कर रहे है, आंखों के सामने है। दांपत्य जीवन की मर्यादाओं का उल्लंघन, व्यभिचार और उसके कारण परिवार संस्था का भावी संतति का पराभव सामने है। आर्थिक क्षेत्र का भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है। पदार्थों में मिलावट दफ्तरों में रिश्वत, वस्तुओं की महँगाई विलासिता जन्य फिजूलखर्ची बढ़ते हुये अपराध यदि एक पंक्ति में रखकर देखे जायें तो उनका समुच्चय इतना बड़ा बन जाता है।
चिन्तन, ब्रह्मध्यान, मनोनिग्रह, विवेक, वैराग्य आदि का विस्तृत विवेचन हुआ हैं वहाँ अनेक देवताओं की उपासना के भी विधि-विधानों एवं महत्वों की चर्चा हुई है। कई उपनिषद् देवताओं के नाम पर ही हैं। उसमें प्रतिपादित देवता के गुण, धर्म एवं उपासना के प्रतिफल विस्तारपूर्वक बताये गये है। उच्च मनोभूमि के साधक वेदान्त की अद्वैत साधना में संलग्न रहें एवं उससे कुछ नीची श्रेणी के साधक देव-उपासना द्वारा अभीष्ट काम्य-प्रयोजनों की भी पूर्ति करते रहें। क्रमशः आगे अध्यात्म मार्ग पर चलते हुए ब्रह्म प्राप्ति के परम श्रेयस्कर लक्ष्य की ओर अभिमुख हो जायँ, ऐसा अभिमत ऋषियों का रहा है।
चिन्तन चेतना को परिष्कृत कर विचार बुद्धि को सुस्थिर रखना और आत्मसत्ता को परमात्म सत्ता से एकाकार करना।
चिन्तन के निषेधात्मक होने के कारण युग परिवर्तन असंभव मानते हों। यह तथ्य सुनिश्चित रूप से समझ लिया जाना चाहिए कि दैवी प्रवाह से जुड़ने वाला हर व्यक्ति आने वाले दिनों में श्रेय सम्मान का श्रेयाधिकारी बन सकेगा साथ ही नवयुग की आधारशिला रखने वाला नींव का पत्थर बनने का यश भी अर्जित करेगा।
चिन्तन के अवरुद्ध द्वार खोले। मानव जाति का भविष्य इसी समन्वय पर टिका हुआ है।
चिन्तन को झकझोर कर उल्टे प्रवाह को उलट कर सीधा किया था। नेपोलियन, मार्टिनलूथर, जोन ऑफ आर्क कार्लमार्क्स, लेनिन आदि ने किस प्रकार लोक चेतना को अपने पक्ष में मोड़कर कितनी बड़ी सफलतायें पाई थीं, इसे कौन नहीं जानता?
चिन्तन को भी दिनचर्या का अविच्छिन्न अंग बनाना चाहिए। इसी को ईश्वर स्मरण पूजा पाठ, दैनिक उपासना, संध्यावन्दन आदि नामों से जाना जाता है।
चिन्तन, मनन, विचार-व्यवहार में सरलता उत्कृष्टता का समावेश होने पर जीवन भी परिष्कृत बनेगा साथ ही मन भी अनगढ़ और कुसंस्कारी न रह सकेगा। अध्यात्म उपचारों का अवलम्बन इसमें सर्वोत्तम परिणाम प्रस्तुत करता है। फिर सार्थक स्वप्न भी अधिक मात्रा में देखे जा सकेंगे। वैसे भी जब भी ऐसे संकेत मिलें उनसे प्रेरणा लें व जीवन की रीति-नीति में उन प्रेरणाओं को समाविष्ट कर उनसे लाभ उठाने का प्रयास करें।
चिन्तन अपनाकर इस तरह भी सोचा जा सकता था-कि जब सृजनात्मक सफलताओं के आधार पर मानवी प्रगति का सिलसिला अब तक चलता आया है तो प्रस्तुत कुछेक कठिनाइयों से साहस और विवेक का आश्रय लेकर क्यों सामना न किया जा सकेगा? समस्याओं का सुलझाना, कठिनाइयों को निरस्त करना और अवरोधों को उलटना क्यों संभव न होगा? मनोबल बढ़ने और उज्ज्वल भविष्य के आधार प्रस्तुत कर सकने वाले जब अनेकों तथ्य देखे और ढूंढ़े जा सकते है। तो निराश क्यों हुआ जाय? आशंकित और आतंकित क्यों रहा जाय?
चिन्तनचेतना में ही है।” भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए कहा था- ‘‘भिक्षुओं! वर्तमान में हम जो कुछ हैं अपने विचारों के ही कारण हैं और भविष्य में जो कुछ भी बनेंगे वह इसी के कारण।”
चिन्तन-मनन किया जाता रहे। वस्तुतः आत्म सुधार और आत्म परिष्कार की प्रक्रिया जिस आधार पर पूरी होती है, वही सच्चा “भजन” एवं सच्चा “ध्यान” है।
चिन्तन के फेर में साहस और उत्साह क्यों गँवाया जाय? मिलजुल कर सृजन प्रयोजनों के निमित्त क्यों न सोचा जाय? जो उपयुक्त लगे उसे कर गुजरने का योजनाबद्ध उपक्रम क्यों न बनाया जाय? यदि सही स्तर का चिन्तन अपनाने की आदत रही होती तो निराश होकर मनोबल गँवाने और कल्पित उलझनों में सचमुच ही उलझ जाने से क्यों न बच सका गया होता?
चिन्तन और भावना क्षेत्र की विकृतियों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनके अनुसार संगीत के स्वरों से शरीर मन को संचालित करने वाली अंतःस्रावी ग्रन्थियों को भी प्रभावित उत्तेजित किया जा सकता है। यह कह कर उन्होंने प्रकारान्तर से संगीतशास्त्र की रोग निवारक क्षमता का ही समर्थन किया है, जिसमें शरीर-मन की विभिन्न अवस्थाओं को प्रभावित करने के लिए विभिन्न राग रागिनियों को का निर्धारण है। पश्चिम जर्मनी के डाँ. डोनाल्ड ड्रोह एवं पूना विश्व विद्यालय के डाँ. तम्हाने का मत है कि एड्रिनोलिन के कारण उत्पन्न होने वाले विकारों को संगीत द्वारा उसके स्राव को सामान्य संतुलित बना कर सही किया जा सकता है। उन्होंने बच्चों पर इसका प्रयोग कर उत्साह वर्धक परिणाम प्राप्त किया।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार पर पशुता ही जड़ जमाये बैठी है। तृष्णा, वासना और अहंता ही इष्ट देवियाँ बनकर रह गईं तो सोचना चाहिए कि वस्तुतः पशुता का ही बोलबाला रहा। मुखौटा पहन कर, पोशाक अलंकार धारण करके अभिनेता अपनी वास्तविकता छिपाते और कुछ के स्थान पर कुछ दिखाने में सफल हो जाते हैं। यही स्थिति उनकी भी है जिनके चिन्तन अधोगामी हैं, चरित्र पर स्वार्थपरता छाई हुई है और व्यवहार में जिनने निकृष्टता धारण करके सेवा धर्म अपनाने की भावना ही त्याग दी है। जिनसे लिप्सा, वैभव और अहंकार प्रदर्शन करने वाली महत्वाकाँक्षाओं के अतिरिक्त और कुछ बन ही नहीं पड़ता।
चिन्तन भी। स्वाध्याय और लेख भी इन परिस्थितियों में ठीक तरह संभव हो जाता है। यों सर्वथा एकान्त तो समाधि स्थिति में ही भले बन पड़े अन्यथा शारीरिक आवश्यकताएँ और मानसिक स्मृतियाँ भी किसी न किसी प्रकार के विक्षेप उत्पन्न करती रहतीं है, वैज्ञानिक शोध एवं आध्यात्मिक अवगाहन जैसे कार्यों में विक्षेप डालती है। सरल यही है कि प्रत्यक्ष और स्मृति जन्य लगाव अन्यत्र बिखरने न दिया जाय। इतने से भी वह काम चल जाता है जो एकान्त माँगता हैं।
चिन्तन और प्रयास जुड़ते हुए वह आधार बन सका था, जिसके सहारे उसे अन्तिम रूप में उद्घोषित किया गया। धर्म अध्यात्म जैसी उच्चस्तरीय भावनात्मक चेतनाएँ किसी एक आदमी का काम नहीं है। इनके क्रमिक विकास में अनेक पीढ़ियों के हजारों साल लगे है। यह उन सबके परस्पर सहयोग का ही परिणाम हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-February
चिन्तन की भावी परिणति के प्रत्यक्ष प्रमाण है।
चिन्तन, चरित्र - व्यवहार सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित करते हैं। इनको उच्चस्तरीय बना कर वह अपने समीपवर्ती वातावरण को अनुकूल बनाने में समर्थ तो है, ग्रह-नक्षत्रों एवं अदृश्य शक्तियों के कुप्रभाव को रोकने में व्यक्तिगत अथवा सामूहिक प्रयास अधिक एवं समर्थ होते हैं। सामूहिक उपासनाएँ, प्रार्थनाएँ, धर्मानुष्ठान इसी आधार पर सफल होते हैं।
चिन्तन क्षेत्र भी बुरी तरह लड़खड़ा जाता है। फलतः ज्ञानेन्द्रियों की ग्रहण क्षमता को भारी आघात पहुँचता है और व्यक्ति असामान्य गतिविधियाँ अपनाने लगता है। इन आवेगों के प्रभाव से आँखों की पुतली फैल कर बड़ी हो जाती है। श्वास प्रश्वास और हृदय गति बढ़ जाती है। साथ ही रक्त का दबाव भी ऊँचा हो जाता है।
चिन्तन में दूरदर्शिता सम्मिलित हो। जाने पर मिल ही जाती है, जिसके सहारे भवितव्यता के अनुरूप अपनी विचारणा ओर क्रिया को मोड़-मरोड़ कर अभीष्ट परिणामों के सन्निकट पहुँचा सके।
चिन्तन एवं आदर्शवादी कर्तृत्व से इसमें अभिवृद्धि होती है। इस संदर्भ में गुहा .. के प्रसिद्ध ग्रंथकार पैरासेल्स ने कहा है कि सूक्ष्म मर्म स्थानों से निस्सृत इस तेजस्वी ऊर्जा का विनाश नहीं होता वरन् शरीर से बाहर निकलने के पश्चात् चारों ओर वलय रूप में घिरी रहती है। उसके अनुसार यह अर्ध प्राकृतिक किरणें हैं जो यह प्रदर्शित करती हैं कि मनुष्य उत्कृष्ट चिन्तन तथा श्रेष्ठ भावना सम्पन्न है अथवा निकृष्ट विचारों एवं दूषित अंतःकरण से ग्रसित है। जीवन के मूल तत्व यही दोनों माने गये हैं जिनके दूषित होने पर शरीर रोगग्रस्त हो जाता है जिससे चेहरे–मुहरे से सुन्दर व्यक्ति उदास, निस्तेज, आलसी होने पर मरा गिरा सा टूटा हुआ प्रतीत होता है। जब कि उत्कृष्ट चिन्तन वाला व्यक्ति स्वस्थ,सुसन्तुलित एवं काला कुरूप होने पर भी प्रभावोत्पादक,व्यक्तित्व का स्वामी होता है।
चिन्तन और दृष्टि को विधेयात्मक बनाये रखें। सदैव मुस्कान बिखेरने और आत्मीयता बाँटने से बदले में प्यार, सम्मान मिलता है। छोटे छोटे बच्चों की उछल कूद भोलापन और तोतली वार्ता में सम्मिलित रहकर पार्क, उद्यानों, नदी-सरोवरों का भ्रमण करके भी मन को प्रसन्न रखा जा सकता है। अपनी आन्तरिक स्थिति और चारों ओर का वातावरण यदि अपने अनुकूल नहीं है तब तक सहज और सरल जिन्दगी नहीं जी जा सकती। आन्तरिक शान्ति से ही मन को प्रसन्न रखा जा सकता है और अनेकों मनो रोगों से बचा जा सकता है।
चिन्तन चरित्र व्यवहार में उत्कृष्ट आदर्शवादिता की अधिकाधिक मात्रा का समावेश हो सके।
चिन्तन-चेतना जिस स्तर की होती है, वह उसी ओर आकर्षित होती है। उत्कृष्ट स्तर की चेतना सदा सजातीय की ओर खिंचती चली आती है, जब कि निकृष्ट स्तर की प्राण चेतना निकृष्टतम की ओर प्रवाहित होती है।
चिन्तन और चरित्र के पतन ने आज सर्वत्र संकट खड़े किये है। मनुष्य जाति को उसने बचाने का एक ही मार्ग है। सद्विचारों की प्रतिष्ठापना और सन्मार्ग का अवलम्बन। प्रज्ञा अभियान के छोटे छोटे जान पड़ने वाले हमारे कार्यक्रम मनुष्य जीवन को उसी दिशा में उसी प्रकाश की ओर गतिशील कर रहें है। इन आयोजनों को देखने वाला प्रत्येक व्यक्ति इस बात से आश्वस्त हुए बिना नहीं रहता-यह कार्यक्रम 21 वीं सदी के मनुष्य को निश्चित ही सुखी समुन्नत बना कर रहेंगे।
चिन्तन और चरित्र लोक श्रद्धा अर्जित करके अपने व्यक्तित्व और प्रभाव का दुहरा दबाव डाल कर प्रस्तुत तर्कों, तथ्यों प्रमाणों को सशक्त बना सकें और अनेकानेक विचारशीलों समर्थक, सहयोगी बन सकें। इसके बाद सच्चे मन से अपनाया गया प्रतिपादन कार्य रूप में परिणित होने लगता है। लोग उसे करने भी लगते है। जो उनने समझा और सही माना था।
चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश, (2) चरित्र में निष्ठा और (3) व्यवहार में पुण्य परमार्थ के पुरुषार्थ की प्रचुरता। इन्हीं को उपासना साधना और आराधना कहते हैं। आत्मिक प्रगति का लक्षण है मनुष्य में देवत्व का अभिवर्धन। देवता देने वाले को कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसे धर्म धारणा या सेवा साधना भी कह सकते हैं।
चिन्तन तथा व्यवहार में सम्मिलित किया जाय। इसी पद्धति को आम लोग अपनाते ओर विश्वासपूर्वक कदम उठाते है। भविष्य-ज्ञान का मोटा अनुभव सरलतापूर्वक दूरदर्शी समझदारी के सहारे अर्जित किया जा सकता है। यों सर्वथा सही, अनुकूल, एवं सुनिश्चित भविष्य की सही आरे पुरी जानकारियाँ प्राप्त कर लेना तो किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। अविज्ञात को कैसे बनाया जाय?
चिन्तन के काम आता है। कल्पना, बुद्धि विचारणा आदि उसी के माध्यम से क्रियारत रहते है। सूझ-बूझ समझदारी और योजनाओं का निर्माण इसी क्षेत्र में होता है। यह अगला भाग है। पिछले भाग में अचेतन की स्वचालित गतिविधियों का स्वसंचालित तारतम्य बनता है।
चिन्तन वाला व्यक्ति स्वस्थ,सुसन्तुलित एवं काला कुरूप होने पर भी प्रभावोत्पादक,व्यक्तित्व का स्वामी होता है। ऐसा व्यक्ति जहाँ जाता है, अपनी उपस्थिति से वातावरण प्रभावशाली बना देता है।
चिन्तन-चेतना जैसी होती है, उसी रूप में वह इस चेतना के समुद्र में संचारित हो जाती है, पर इसे ग्रहण करना पूर्णतः ग्रहीता पर निर्भर करता हैं। यहाँ भी ग्रहण अवधारण नियमानुसार होता है। जिस प्रकार समान धर्मी व्यक्ति और विचार परस्पर मिलते और घनीभूत होते हैं वही बात चेतना के संबंध में भी कही जाती है। चिन्तन-चेतना जिस स्तर की होती है, वह उसी ओर आकर्षित होती है। उत्कृष्ट स्तर की चेतना सदा सजातीय की ओर खिंचती चली आती है, जब कि निकृष्ट स्तर की प्राण चेतना निकृष्टतम की ओर प्रवाहित होती है।
चिन्तन और भावना क्षेत्र से हे जिसमें आये क्षणिक परिवर्तन से भी इस में अंतर आ जाता है और अपने चारों ओर के वातावरण को प्रभावित करता है।
चिन्तन ओर प्रचण्ड पुरुषार्थ-परक प्रयास भी सँजोये रहना चाहिए।
चिन्तन-मनन के लिए उपासना साधना के लिए उपयुक्त बताया है। ओर परिश्रम के लिए उपार्जन के लिए लोक आराधना के लिए पुरे दिन को रखा है।
चिन्तन में न्यून या क्षीण होती है।जो भटकाव से ग्रसित हो कर अचिन्त्य चिन्तन में निरत रहते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँच नहीं पाते कि अवांछनीय प्रचलन से हट कर अपने लिए किस मार्ग का चयन करें? संपर्क क्षेत्र के सम्मुख क्या उदाहरण प्रस्तुत करें? जिसके आधार पर स्वयं पार होने ओर दूसरों को पार करने का सुयोग बन सकें।
चिन्तन पद्धति के आधार पर यह अनुमान लगाया है कि यदि प्रचलित क्रम यथावत बना रहा तो उसके भावी परिणाम क्या हो सकते है? यह कम्प्यूटर आधारित प्रक्रिया है। किन्तु प्रवाह एक रस ही बहता। उतार-चढ़ाव भी आते हे। किन्तु ऋतु प्रभाव से तूफान, बवण्डर, चक्रवात भी उठते रहते हैं, मानसून दिशा बदलते रहते हे।
चिन्तन, चरित्र ओर व्यवहार उससे पुरी तरह प्रभावित हो रहा हो तो समझना चाहिए कि सत्य को पहचाना एवं अपनाया गया। वास्तविकता तो यह है कि हमारा समूचा आचरण समूचा जीवन सत्यमय होना चाहिए।
चिन्तन करने व निर्धारण की प्रेरणा देती है।
चिन्तन को भ्रान्तियों और विकृतियों से लपेट लेने का तात्पर्य है मूढ़मति। यह प्रसाद की ही प्रतिक्रिया है। अवांछनियताएं कुरीतियाँ मूढ मान्यताएं उन्हीं के मानस पर अधिकार जमाये रहती है। जो चिन्तन में न्यून या क्षीण होती है।जो भटकाव से ग्रसित हो कर अचिन्त्य चिन्तन में निरत रहते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँच नहीं पाते कि अवांछनीय प्रचलन से हट कर अपने लिए किस मार्ग का चयन करें?
चिन्तन के ज्वार-भाटे कह कर भी निश्चित नहीं हुआ जा सकता। क्योंकि इस प्रवाह के साथ असाधारण शक्ति जुड़ी हुई पायी जाती है। मनुष्य जैसा सोचना है उसी क अनुरूप बनने टलने लगाता है। कीट-पतंगों का उदाहरण प्रख्यात है। भृंग की आकृति ओर प्रकृति में तन्मय होकर कीट तद्रूप बन जाता है।
चिन्तन और चरित्र में मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्टता दृष्टिगोचर होती है या नहीं। साथ ही परमार्थ परायणता की ललक कार्यान्वित होती है या नहीं।
चिन्तन कर सकने का पथ प्रशस्त हो सके तो समझना चाहिए कि सर्व समर्थ मनुष्य को अपनी समस्याएँ आप हल करने का मार्ग मिल गया। अपंगों, असमर्थों या दुर्घटना ग्रस्तों को छोड़कर कोई ऐसा नहीं है जो सही चिंतन करने का मार्ग मिल जाने पर ऊँचा उठ न सके, आगे न बढ़ सके, अपनी समस्याओं का आप हल न कर सके। इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए प्रधानतया यही नीति अपनानी चाहिए कि लोक मानस के परिष्कार के लिए, सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए अपनी योग्यता और परिस्थिति के अनुसार भरसक प्रयत्न किया जाय।
चिन्तन प्रणाली को बुरी तरह गड़बड़ा देते है। प्रत्यक्ष न सही छिपा आक्रोश दुर्भावना, डाह, निन्दा, चुगली जैसी दुरभि सन्धियों के रूप में प्रकट होती है। ऐसे जाल जंजाल में उलझे व्यक्ति की मन स्थिति अधिकाधिक विपन्न होती चली जाती है और आन्तरिक अशान्ति की प्रतिक्रिया मनोविकारों के रूप में शारीरिक रोगों, कष्टों क्लेशों के रूप में फूट पड़ती है। मन की उद्विग्नता और अशान्ति मनुष्य की नैसर्गिक क्षमताओं को भी नष्ट-भ्रष्ट कर डालती है। इतना ही नहीं इससे भावना और विचारणा का क्षेत्र भी ऊपर बंजर मरुस्थल जैसा बन जाता है।
चिन्तन और स्वभाव को विनिर्मित कर सकें। बुद्धिमत्ता और कुशलता के अनुदानों से लाद सकें।
चिन्तन तथा श्रेष्ठ भावना सम्पन्न है अथवा निकृष्ट विचारों एवं दूषित अंतःकरण से ग्रसित है। जीवन के मूल तत्व यही दोनों माने गये हैं जिनके दूषित होने पर शरीर रोगग्रस्त हो जाता है जिससे चेहरे–मुहरे से सुन्दर व्यक्ति उदास, निस्तेज, आलसी होने पर मरा गिरा सा टूटा हुआ प्रतीत होता है। जब कि उत्कृष्ट चिन्तन वाला व्यक्ति स्वस्थ,सुसन्तुलित एवं काला कुरूप होने पर भी प्रभावोत्पादक,व्यक्तित्व का स्वामी होता है। ऐसा व्यक्ति जहाँ जाता है, अपनी उपस्थिति से वातावरण प्रभावशाली बना देता है।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता आदर्शवादिता और शालीनता धर्म की देन है। इसी के कारण मनुष्य मर्यादाओं में बँधा रहता और मानव होने का गौरव प्राप्त करता है। वह जब भी नीति निष्ठा की मर्यादाओं का परित्याग कर वर्जनाएँ अपनाता है, मनुष्य कहलाने का श्रेय सम्मान गवाँ बैठता है। इसी से व्यक्तिगत जीवन में अनुशासन और सामाजिक जीवन में लोकश्रद्धा का सुयोग मिल पाता है। यह धर्म ही है, जो विज्ञान के कुतर्कों को अपनी आदर्शनिष्ठा की कसौटी पर कस कर उसे निरस्त करता और अभिनव मार्गदर्शन मार्गदर्शन देता है।
चिन्तन ओर अवाँछनीय गतिविधियाँ अपनाने से ही उत्पन्न हुई है। यदि इस प्रवाह को बदला जा सके तो उलटे को उलट देने पर सीधा बन जोन की उक्ति सुनिश्चित रूप से चरितार्थ होती दृष्टिगोचर होगी।
चिन्तन क्षेत्र की सबसे बहुमूल्य सम्पदा है। यों प्रत्यक्षतः उसका कोई स्वरूप या महत्व दीख नहीं पड़ता। इतने पर भी शक्ति उसी में सबसे अधिक होती है, जो जैसा सोचता है, वह वैसा बन जाता है। इसी को कहते है - भविष्य-निर्धारण।
चिन्तन का सम्बंध है, वहाँ तक यही कहना पड़ेगा कि भावी निर्धारणों का स्वरूप ही चिन्तन क्षेत्र की सबसे बहुमूल्य सम्पदा है। यों प्रत्यक्षतः उसका कोई स्वरूप या महत्व दीख नहीं पड़ता। इतने पर भी शक्ति उसी में सबसे अधिक होती है, जो जैसा सोचता है, वह वैसा बन जाता है। इसी को कहते है - भविष्य-निर्धारण।
चिन्तन में निरत रहते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँच नहीं पाते कि अवांछनीय प्रचलन से हट कर अपने लिए किस मार्ग का चयन करें? संपर्क क्षेत्र के सम्मुख क्या उदाहरण प्रस्तुत करें? जिसके आधार पर स्वयं पार होने ओर दूसरों को पार करने का सुयोग बन सकें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-September
चिन्तन के स्तर पर पूरी योजना तैयार करनी होगी। प्रयत्न पूर्वक इन्हें व्यवहार में उतारने के प्रयास करने होंगे।
चिन्तन उन्माद बनकर उभरता है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि शरीर रोगियों की तुलना में मनोरोगी बढ़ रहे हैं। आधी अस्वस्थता तो मानसिक विक्षेपों द्वारा उत्पन्न की हुई होती है और उसका कारण होता है, परिस्थिति के साथ मनःस्थिति का तालमेल न बिठा पाना। यहाँ यह समझ रखने की बात है कि परिस्थितियाँ इच्छानुरूप बना सकने की अपेक्षा यह ही सरल है कि मन को परिस्थितियों की प्रतिकूलता सह सकने योग्य बनाया जाय और सहनशक्ति को बढ़ाया जाय।
चिन्तन में स्पष्ट रूप से मिलती है। उपनिषद् साफ शब्दों में मानव मात्र को “अमृतस्य पुत्रा” का सम्बोधन देते हैं, जो मनुष्य को मूलतः दिव्य सिद्ध करता है। इसके साथ ईश्वर सम्बन्धी मान्यता के पीछे उपरोक्त मनोवैज्ञानिक रहस्य झाँकता है। इस मान्यता के द्वारा जीवन को तदनुरूप आदर्शयुक्त सुयोग्य व सक्षम गठित करने का ही भाव है। इस भाव को ठीक-ठीक समझ लेने पर वर्तमान पूरी तरह रूपांतरित होने लगता है।
चिन्तन वालों को अपनी और खींचता रहता है।
चिन्तन को सुसम्बद्ध करना होगा।
चिन्तन की दृष्टि से बालक जैसे अविकसित ही बने रहते हैं। पड़ोसियों का ढर्रा अपनाकर गतिविधियाँ बनती हैं और यह यथार्थता, दूरदर्शिता तथा उपयोगिता की परख करना अनावश्यक मान लिया जाता है। यह अपरिपक्वता ही मानव जीवन की आन्तरिक प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है।
चिन्तन करता है उसकी ओर आइडियोस्फियर की तदनुरूप चिन्तन धारा स्वतंत्र सत्ता का रूप धारण कर आकर्षित होती और उन्हें सन्मार्ग-कुमार्ग पर ले चलने की प्रेरणा भरती है। क्रूर कृत्यों में संलग्न व्यक्तियों का चिन्तन चूँकि अन्याय और अनाचारपूर्ण होता है, अतः उनका संपर्क सदा ऐसे ही सूक्ष्म असुर प्रवाह से बना रहता है। इनसे उन्हें तब तक मुक्ति नहीं मिल पाती जब तक वे अपनी चिन्तन-चेतना को परिष्कृत - परिवर्तित नहीं कर लेते।
चिन्तन धारा स्वतंत्र सत्ता का रूप धारण कर आकर्षित होती और उन्हें सन्मार्ग-कुमार्ग पर ले चलने की प्रेरणा भरती है। क्रूर कृत्यों में संलग्न व्यक्तियों का चिन्तन चूँकि अन्याय और अनाचारपूर्ण होता है, अतः उनका संपर्क सदा ऐसे ही सूक्ष्म असुर प्रवाह से बना रहता है। इनसे उन्हें तब तक मुक्ति नहीं मिल पाती जब तक वे अपनी चिन्तन-चेतना को परिष्कृत - परिवर्तित नहीं कर लेते।
चिन्तन में मौजूद रहते हैं। अपने सोच विचार के तौर-तरीके पर ध्यान देना होगा। जैसे जैसे दृष्टि अन्तर्मुखी होगी पता चलेगा कि हमारा बहुत सारा समय निरुपयोगी चीजों को सोचने में चला जाता है। कभी किसी की बुराई सोचते हैं। कभी बिना मतलब की कल्पनाएँ करते हैं।
चिन्तन को लड़खड़ाती है। भय से विचारों को भर देती है और भविष्य को इस रूप में दिखाती है मानो वह अंधकार से भर गया हो। उस पर पराजय के घुटन भरे बादल छा गये हों। ऐसी स्थिति देर तक बनी रहने पर मानस तंत्र की कोमलता अस्त व्यस्त हुए बिना नहीं रहती। अशुद्ध चिन्तन उन्माद बनकर उभरता है।
चिन्तन और व्यवहार को ही बदल लिया जाय। इन तरीकों में से कोई एक मनुष्य को स्वयं ही अपनाना पड़ता है ताकि प्रतिकूलताएँ बनी रहने पर भी अपना काम किसी प्रकार चलता रहे। मनुष्य की बुद्धिमत्ता इसी में है। यों मिट जाने या मिटा देने की नीति भी अपनायी जा सकती है। पर वह इतनी महंगी है कि सहज गले नहीं उतरती।
चिन्तन और कुकर्मों से सड़े गले जीवन से अन्तःकरण ऐसा दूषित हो जाता है कि उसमें ईश्वर सत्ता विद्यमान होते हुए भी आभास मिल नहीं पाता। इस अवरोध को दूर करने के आत्म शोधन के ही प्रयास करे पड़ते हैं। अपूर्णता से उबर कर पूर्णता प्राप्त करने का यही एक मात्र मार्ग है। अध्यात्म तत्व दर्शन में इसी का प्रतिपादन है। साधनापरक समस्त कर्मकाण्ड इसी की पूर्ति के लिए विनिर्मित किये गये हैं।
चिन्तन को निहारना होगा। यह प्रक्रिया का दूसरा चरण है। कठिन होने के बावजूद इसकी जरूरत है। बिना इसके काम नहीं चलता। व्यवहार के बीज चिन्तन में मौजूद रहते हैं।
चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में घुसी हुई दुष्प्रवृत्तियों से जूझने और हटाने का एक काम ही नहीं करना पड़ता, उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों का जगाने का उससे भी अधिक कष्टसाध्य कार्य भी करना पड़ता है। इस उन्मूलन और आरोपण के दुहरे प्रयोजन को पूरा करना प्रायः वैसा ही है जैसा भगवान परशुराम के फरसा और फावड़ा चलाने के दुहरे पराक्रम का का परिचय देना। उन्होंने झंखाड़ काटे और उद्यान लगाये थे। इसी पराक्रम का परिचय हर साधक को अपने जीवन क्षेत्र में देना पड़ता है। इससे कम में काम चलता नहीं और इससे अधिक और कुछ करने की आवश्यकता नहीं।
चिन्तन भी विकसित हो रहा है, पर सौजन्य के अभाव में हर किसी को चिन्ता, आशंका, अविश्वास एवं असंतोष का मानस लेकर निरन्तर उद्विग्न रहना पड़ रहा है। सुरक्षा और संभावना के संबंध में हर किसी को अनिश्चितता की स्थिति में रहना पड़ रहा है। मनोविकारों की अभिवृद्धि ने जनसाधारण को दुर्बल, रुग्ण, सनकी एवं अर्धविक्षिप्त स्तर का बना कर रख दिया है। अपराधों की संख्या और विचित्रताओं की इतनी अभिवृद्धि हो रही है, मानो बढ़ी हुई चतुरता ने इसी विपन्नता के साथ गठ-बन्धन कर लिया हो। आश्चर्य ही कहना चाहिए कि विकास की डींगें हाँकते हुए भी हम निरन्तर पतन के गर्त में गिरते चले जा रहे हैं।
चिन्तन और व्यवहार तथा वातावरण को प्रभावित किया जाता है संगीत में अनेकों राग-रागनियां हैं, पर वे सभी सात स्वरों से ही बने होते हैं। किन्हीं-किन्हीं में मात्र पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। वाद्य यंत्रों के साथ रागों में स्वरों और आलापों में परिवर्तन के आधार पर उत्पन्न प्रकंपन शरीर और मन को अलग-अलग प्रकार से प्रभावित करते हैं।
चिन्तन में निषेधात्मक तत्व भर लेता है और आरम्भ में सनकी बनता है। सनकें ही व्यक्तित्व को विखण्डित कर देती हैं और उसे विक्षिप्तता के कटघरे में बन्द कर देती हैं। मस्तिष्क को हम स्वयं ही बिगाड़ते हैं। चाहें तो स्वयं ही बिगड़े को बना सकते हैं। यह अपनी संकल्प शक्ति के ऊपर निर्भर है।
चिन्तन चूँकि अन्याय और अनाचारपूर्ण होता है, अतः उनका संपर्क सदा ऐसे ही सूक्ष्म असुर प्रवाह से बना रहता है। इनसे उन्हें तब तक मुक्ति नहीं मिल पाती जब तक वे अपनी चिन्तन-चेतना को परिष्कृत - परिवर्तित नहीं कर लेते।
चिन्तन की पद्धति में परिवर्तन ला देना। ईश्वरी चेतना तो सर्वदा और संपूर्णतः मंगलमय है। फिर हम मंगलमय से दूर क्यों? सिर्फ इसलिए कि हम अपने विचार जगत में शुभ के स्रोत और मंगल के निधान ईश्वर से सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते।
चिन्तन-चेतना को परिष्कृत - परिवर्तित नहीं कर लेते।
चिन्तन के सामने मार्क्स गाँधी फीके लगते हैं। स्वयं की चरित्र निष्ठा विवेकानन्द दयानन्द से बढ़कर आँकी जाती है। व्यावहारिक क्रिया कलापों के सामने राम मोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर बौने लगते हैं। अपने में कहीं कोई दोष दिखाई नहीं पड़ता। भूले भटके कोई कोई कमियाँ दिखाने का प्रयास भी करे तो उसे ईर्ष्यालु या शत्रु की संज्ञा प्रदान की जाती है।
चिन्तन और भ्रष्ट चरित्र का भारी लदान लाद कर आत्मिक प्रगति की लम्बी छलाँग लगा सकना कठिन है। कौतूहल करना और जादू दिखाना ही अभीष्ट हो तो मूर्खों को बहकाने वाले धूर्तों की सर्वत्र भरमार पाई जा सकती है। ‘छुट पुट’ पूजा विधानों में लम्बे चौड़े चमत्कार बताने वालों की कमी नहीं। सस्ती लूट के लालची वहाँ भीड़ लगाये भी रहते हैं। जब तक संसार में सस्ते मोल में बहुत पाने की लिप्सा जीवित रहेगी तब तक यह गोरख-धंधा भी चलता रहेगा।
चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश होने का है। साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती। इसके विपरीत जिनके जीवनक्रम में निकृष्टता और दुष्टता भरी पड़ी है, जिन्हें छल छद्म ही रुचते हैं, जिन्हें लोभ मोह से आगे की कोई बात सूझती ही नहीं, जिनके लिये वासना और तृष्णा ही सब कुछ हैं-इन्हीं प्रयोजनों के लिए अपना श्रम, समय और मनोयोग लगाये रहते हैं, इन्हीं के लिए पूजा-पाठ का ढोंग रचते हैं ऐसे व्यक्ति निष्प्राण उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त समझने वाले जानते हैं कि आस्तिकता की सफलता के साथ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश होने की शर्त भी जुड़ी हुई है।
चिन्तन की प्रतिकूलता एवं निषेधात्मकता के कारण सूक्ष्म जगत की आसुरी शक्तियां उन पर सवार होतीं और विनाशकारी कुचक्र रचने की प्रेरणा भरती हैं। इतिहास साक्षी है कि जिन व्यक्तियों ने मनुष्य और समाज के लिए क्रूरतम कार्य किये, उन पर सदा असुर सत्ताएँ ही छाई और अहितकर कार्य कराती रही एवं अन्ततः उनके अन्त का भी निमित्त कारण बनी।
चिन्तन का बोल बाला रहा है और उसी के प्रभाव से अनाचारों में बाढ़ आने से समूचा वातावरण प्रभावित हुआ है। इसकी रोकथाम आवश्यक है। अन्यथा नव सृजन के बीजाँकुर ऐसे ही बिना विकसित हुए अनुपयुक्त वातावरण के बीच नष्ट हो जायेंगे।
चिन्तन-चेतना की आवृत्ति मेल खाती है। आज सर्वत्र आपाधापी और विनाशकारी वातावरण दिखाई पड़ता है। अधिसंख्यक लोग अनैतिक कृत्यों में रुचि लेते दिखाई पड़ते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि चिन्तन की प्रतिकूलता एवं निषेधात्मकता के कारण सूक्ष्म जगत की आसुरी शक्तियां उन पर सवार होतीं और विनाशकारी कुचक्र रचने की प्रेरणा भरती हैं। इतिहास साक्षी है कि जिन व्यक्तियों ने मनुष्य और समाज के लिए क्रूरतम कार्य किये, उन पर सदा असुर सत्ताएँ ही छाई और अहितकर कार्य कराती रही एवं अन्ततः उनके अन्त का भी निमित्त कारण बनी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-August
चिन्तन चलता रहे तो स्वभाव में ऐसी आदत सम्मिलित नहीं हो पाती जो स्वास्थ्य बिगाड़े, मस्तिष्क तनावग्रस्त रहे। बेतुके आचरण अपनाये और व्यवहार कुशलता के अभाव में जैसे असहयोग तथा विग्रह का सामना करना पड़ता है, उस प्रकार का त्रास सहना पड़े।
चिन्तन की यह विकृति समूचे जीवनक्रम को दोषपूर्ण बनाती है।
चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में भाव परक उत्कृष्टता भरने वाले अध्यात्म प्रयास में निरत रहते देखा जाता था और देश की मान मर्यादा को उच्च शिखर पर बनाये रखने का श्रेय सम्पादित करता रहता था। इन दिनों आदर्शवादी आकाँक्षाओं में बुरी तरह गिरावट आई है। अपनी जीवनचर्या से दूसरों को कारगर प्रकाश दे सकने वाले प्राणवान ढूंढ़े नहीं मिलते। बकवादी तो पहले से भी अधिक बढ़ गये हैं जो कथनी और करनी में भारी अन्तर रहने के कारण गंदगी बखेरते और अश्रद्धा का वातावरण बनाते देखे जाते हैं।
चिन्तन ही अपनी समग्र भूमिका निभाता है। कठपुतली को बाजीगर के इशारे पर ही तो नाचना पड़ता है।
चिन्तन को सद्गुणों में बदलता है और सद्गुणों के लिए चिरस्थायी सम्मान एवं सहयोग सुरक्षित रहता है। सही निर्णय, सही स्वभाव, सही आचरण यहीं श्रृंखला अनेकानेक सफलताओं का आधारभूत कारण बनती है। जो इस तथ्य को नहीं समझते वे विचार तंत्र को उच्छृंखलता के खाई खंदकों में भटकने देते हैं फलस्वरूप उनका व्यक्तित्व अवाँछनीय हेयस्तर का बन जाता है। पग पग पर ठोकरें लगती हैं। हर दिशा में तिरस्कार, उपहास, विरोध बरसता है।
चिन्तन की समीक्षा करता है। उसके सामने औचित्य का स्वीकरण और अनौचित्य का निवारण करके व्यक्तित्व गठन ही एक मात्र उद्देश्य रहता है। सर्जन की कुशलता उसे शल्य क्रिया के लिए चुस्त - दुरुस्त बनाती है। हमारी अनपढ़ आँखें भले उसके चाकू-छुरी चलाने की बारीकी न समझ पाएँ। पर उसे पूरी तरह ध्यान रहता है कि कहीं कोई शिरा धमनी जरूरी अंग अवयव यों ही न फट जायँ।
चिन्तन का परिणाम दुष्ट आचरण के रूप में ही परिलक्षित होता है।
चिन्तन को अपनाकर अच्छे भले आदमी अनाचारी वर्ग में जा सम्मिलित होते हैं उसका अन्त होना चाहिए। ऐसी व्यापक जन भावना ही ईश्वर इच्छा भी बन जाती है। अनाचार की प्रतिक्रिया का नाम ही दैवी अवतार है। प्रतिभाएँ जब संशोधन कार्य में जुटती हैं तो उनकी सहायता में दैवी अनुकूलन का सहयोग भी मिलता है। ध्रुव, प्रहलाद, हरिश्चंद्र से लेकर गाँधी - बुद्ध तक को देवी सफलताएँ हस्तगत हुई, जिन्हें मानवी सहयोग के साथ दैवी अनुग्रह भी जुड़ा हुआ कह सकते हैं।
चिन्तन संसार में केवल बाहरी बदलाव लाकर समाज में सुख शान्ति स्वतन्त्रता को स्थापित करने में जुटा हुआ है। इन प्रयासों व परिणामों को देखने से साफ होता है कि इनका आधार स्वतन्त्रता न होकर स्वच्छन्दता है इससे जुड़ने पर सक्षमता निर्माण के स्थान पर ध्वंस ही करती है।
चिन्तन का शासन स्थापित होता जायगा। क्रान्ति की गति बढ़ती जाएगी। बढ़ती गति के साथ इसका प्रभाव क्षेत्र भी बढ़ेगा। जिससे व्यक्ति और समाज दोनों अपना खोया सौंदर्य पा सकेंगे।
चिन्तन, प्रचलन, व्यवहार एवं लक्ष्य अपनाया जा रहा है, वह लगभग उलटे स्तर का है। हर किसी को आपाधापी पड़ी है। जो जितना भी, जिस प्रकार भी बटोर सकता है उसमें कमी नहीं रहने दे रहा है। साथ ही जो उपलब्ध है, उसका भौंड़ा उपयोग करने में ही अहंकार की पूर्ति मानी जा रही है। उद्दण्डता ही समर्थता का पर्यायवाचक बनने का प्रयत्न कर रही है।
चिन्तन को थोड़ा झकझोरा जा सके तो वैसे पुनरावर्तन की व्यवस्था फिर नये सिरे से बन सकती है और रिटायर्ड व्यक्तियों, ब्रह्मचारियों, विधवाओं, विधुरों, परित्यक्ताओं का एक बड़ा समूह पारिवारिक लदान से लदा होने का बहाना ढूंढ़ने से बच सकता है। प्राचीनकाल में लोक सेवियों को विशेषतया चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में भाव परक उत्कृष्टता भरने वाले अध्यात्म प्रयास में निरत रहते देखा जाता था और देश की मान मर्यादा को उच्च शिखर पर बनाये रखने का श्रेय सम्पादित करता रहता था। इन दिनों आदर्शवादी आकाँक्षाओं में बुरी तरह गिरावट आई है। अपनी जीवनचर्या से दूसरों को कारगर प्रकाश दे सकने वाले प्राणवान ढूंढ़े नहीं मिलते। बकवादी तो पहले से भी अधिक बढ़ गये हैं जो कथनी और करनी में भारी अन्तर रहने के कारण गंदगी बखेरते और अश्रद्धा का वातावरण बनाते देखे जाते हैं।
चिन्तन का अभ्यासी बनाने के साथ साथ अपनी समस्याओं का अपने बलबूते स्वयमेव हल खोज सके। अपने बलबूते स्वावलम्बी बन सके। स्थायित्व इसी में है। अन्यथा दूसरों के साधन अनुदानों का आसरा तकते तकते आन्तरिक दृष्टि से भी दीन हीन बन बैठेगा और देवताओं से लेकर श्रीमंतों शक्तिशालियों के सामने गिड़गिड़ा कर कुछ प्राप्त कर लेने की तरकीबें ढूँढ़ता रहेगा। दीनता हीनता की स्थिति अपना लेगा।
चिन्तन आगे भी इसी स्थिति में नहीं रहेगा।
चिन्तन को उलट दिया जाय आज हम सब भ्रान्तियों के युग में जी रहे हैं। भटकाव की दिशा में चल रहे हैं। परिणामतः सुख-सुविधा के लिए किए गए प्रयास कुछ ही समय में अनेक गुनी हानि लेकर सामने आ उपस्थिति होते हैं। फुरती उत्तेजना के लिए पिया गया नशा कुछ समय तो अपना चमत्कार दिखाता है पर थोड़े ही दिनों में पीने वाले के शरीर को पोला और मन को ढीला बना कर रख देता है। अर्थसंकट, परिवार विग्रह अपयश जैसी अनेकों हेय प्रतिक्रियाएँ सामने आ खड़ी होती हैं।
चिन्तन का अन्धड़ उमड़ पड़ने पर आँखों में धूल भर जाती है और यथार्थता को सही रीति से देख पड़ना कठिन पड़ता है। क्रियाएँ अपने आप नहीं बन पड़ती। उनके पीछे आकाँक्षाओं, मान्यताओं एवं विचारधाराओं का गहरा पुट रहता है। शरीर मन का वाहन है। उसे वही करना पड़ता है, जिसके लिए मन रूपी संचालक उसे निर्देश देता और दबाव डालता है।
चिन्तन अपनाते ही दुष्ट आचरण बन पड़ने का सिलसिला तो तेजी से चल पड़ता है। यही सामाजिक विकृतियों की उद्गम स्थली है। जहाँ उभरने वाला प्रवाह अपने प्रभाव क्षेत्र में कीचड़ ही कीचड़ भरता है। पाचन तंत्र खराब हो जाने पर बढ़ती हुई विषाक्तता असंख्यों आकार प्रकार के रोग उत्पन्न करने लगती है। ठीक इसी प्रकार विकृत चिन्तन का अन्धड़ उमड़ पड़ने पर आँखों में धूल भर जाती है और यथार्थता को सही रीति से देख पड़ना कठिन पड़ता है।
चिन्तन का प्रवाह प्रायः इसी दिशा में बह रहा है और उसकी प्रतिक्रिया अनेकानेक अनर्थों के रूप में सामने आ रही है। हर अपराध कर्मी अपने कृत्यों के पक्ष में इतनी दलीलें और साक्षियां प्रस्तुत करता है कि साधारण सोच वाले को यही ठीक लगता है कि तत्काल लाभ को प्रधानता देने वाला बुद्धिपरक प्रतिपादन ही सही है। भ्रान्तियाँ इसी आधार पर पनपती हैं। अवांछनियताएं इसी रीति से बन पड़ती है फलतः व्यक्तिगत रूप में असंतोष भरी अशाँति की बाढ़ आती है। सामूहिक जीवन में इस निर्धारण के आधार पर चित्र-विचित्र स्तर के अनाचार बन पड़ते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-March
चिन्तन क्षेत्र की सबसे बहुमूल्य सम्पदा है। प्रत्यक्षतः भविष्य दिखाई न पड़ने पर भी शक्ति उन काल्पनिक निर्धारणों में सर्वाधिक व्यय होती है, जिनके माध्यम से आने वाले कल का ताना बाना बुन जाता है। समूहगत चिन्तन प्रवाह जिस दिशा में बहने लगता है, तदनुरूप ही उसकी नियति बन जाती है इसी को कहते है-भविष्य निर्धारण।
चिन्तन को आगे बढ़ाते हुए अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर कहा था कि युग संधि की यह प्रसव बेला तभी तक है जब तक संसार नई सृष्टि का स्वागत करने के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सन् 1162 के आरम्भ से ही इस नई सृष्टि की चेतना धरती पर काम में लगी है। सतत् सन् 2000 तक सक्रिय रहेगी। समस्त महान परिवर्तन अपनी पहली अमोघ शक्ति तथा प्रत्यक्ष निर्माणकारी सामर्थ्य एक व्यक्ति के या थोड़े से व्यक्तियों के श्रेष्ठ मन एवं उदात्त आत्म भाव से ही प्राप्त करते है। समुदाय तो अनुसरण करता है।
चिन्तन प्रवाह जिस दिशा में बहने लगता है, तदनुरूप ही उसकी नियति बन जाती है इसी को कहते है-भविष्य निर्धारण।
चिन्तन में अभिवृद्धि हो रही है एवं दुष्कर्म ही अवाय गति से मानव स्वभाव के अंग बनते रहे है।
चिन्तन का बिखरा हुआ प्रवाह ऊर्ध्वगामी है। तो चुम्बकीय धाराएँ शक्ति संवर्धन एवं मनोबल संकल्प बल में प्रचण्ड बुद्धि करती देखी जा सकती है। यही प्रवाह अधोगामी होने पर शक्ति का क्षरण करता व काय संतुलन को अस्त व्यस्त कर देता है। एकाग्रता व संयम द्वारा शक्ति का निग्रह व उसे ऊर्ध्वगामी बनाने में ही मनुष्य की समझदारी है।
चिन्तन करें, उन गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।
चिन्तन, चरित्र, दृष्टिकोण एवं व्यवहार के अनुसार इसमें घट बढ़ होती रहती है मनुष्य की प्राणशक्ति यही है जो शरीर के अंग-अवयवों, कोशिकाओं की विकृतियों को दूर करती और टूटी हड्डियों को शीघ्र जुड़ने में सहायक होती है। भावनात्मक स्तर में उत्कृष्टता की अभिवृद्धि के साथ जीवन क्षेत्र अधिकाधिक सघन होता चला जाता है, फलतः व्यक्ति पूर्णतः स्वस्थ सन्तुलित एवं सुखी समुन्नत बनता चला जाता है। इसकी विरलता व्यक्ति की आन्तरिक कमी को दर्शाती है। यह मस्तिष्क के आसपास विशेष रूप से दृष्टिगोचर होती है जिसका चित्रांकन करना अभी सम्भव नहीं है अब इसमें आने वाला उतार चढ़ाव व्यक्ति की बाह्य बनावट से सम्बन्धित नहीं है। वरन् आन्तरिक बनावट एवं पर्यावरण के विद्युतीय दबाव से सम्बन्धित है।
चिन्तन क्षेत्र के निर्धारणों के रूप में विद्यमान रहते है। ब्रह्माण्ड का हर घटक इन घटनाक्रमों से जुड़ा होता है, चाहे वह जड़ हो अथवा चेतन।
चिन्तन बनाये रख यह विश्वास सँजोना चाहिए कि भावी समय उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं को लेकर आ रहा है। इन दिनों विश्व में क्या कुछ घटित हो रहा है, होने जा रहा है? उसका विवेचन यहाँ किया जा रहा है।
चिन्तन की शक्ति से भी परे गहराई में जाने पर उन क्षमताओं का अस्तित्व सामने आता है जिन्हें अतीन्द्रिय क्षमता अथवा दैवी अनुकम्पा के नाम से जाना जाता है। वस्तुतः वह व्यक्ति की अविज्ञात उच्च स्तरीय सामर्थ्य ही है, जिसे प्रयत्नपूर्वक जाग्रत किया और बढ़ाया जा सकता है। इन समस्त अलौकिक क्षमताओं के केंद्र व्यक्ति के मस्तिष्क में विद्यमान है जो चेतना से सम्बन्धित है तथा अतिसूक्ष्म है। ये व्यष्टि सत्ता को समष्टि से जोड़ते है।
चिन्तन की उल्टी दिशाधारा को उलट कर सीधा किया जाये। उसे सही दिशा में सोचने और करने का विवश किया जाये। भावनाओं के परिष्कार में ही उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ निहित है।
चिन्तन, तीसरे उपयोग में आने वाले साधनों की बारी आती है। इन तीनों के साथ सुव्यवस्थित, सुनियोजित और जागरूक स्तर का दृष्टिकोण रखा जा सकें तो समझना चाहिए कि देखने में जितना मन मोहक संपर्क क्षेत्र लगेगा उससे भी अधिक प्रयोक्ता की वह सूक्ष्म बुद्धि विकसित होती रहेगी, जिसके आधार पर लोग बड़े बनते और बड़े काम सम्पन्न करते है।
चिन्तन क्षेत्र का अधिकाँश हिस्सा भविष्य की कल्पनाओं में ही सदैव निरत रहता है। इसे यों कहना ठीक रहेगा कि भावी निर्धारणों का स्वरूप ही चिन्तन क्षेत्र की सबसे बहुमूल्य सम्पदा है। प्रत्यक्षतः भविष्य दिखाई न पड़ने पर भी शक्ति उन काल्पनिक निर्धारणों में सर्वाधिक व्यय होती है, जिनके माध्यम से आने वाले कल का ताना बाना बुन जाता है। समूहगत चिन्तन प्रवाह जिस दिशा में बहने लगता है, तदनुरूप ही उसकी नियति बन जाती है इसी को कहते है-भविष्य निर्धारण।
चिन्तन में मानसिक विकास के नाम से जानी जाती है। इसी विनष्टीकरण की प्रक्रिया को वेदान्त ने मनोदशा का नाम दिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-June
चिन्तन करना या नर का नारी के रूप यौवन विशेषतया जननेन्द्रियों की कल्पना करते रहना आरंभ में प्रतिपक्ष के प्रति थोड़ा आकर्षण तो बढ़ाता है, पर कुछ ही दिनों में ऐसी मनःस्थिति बन जाती है कि इष्ट के प्रति समर्पित होने की भावना बलवती होने लगती है। हिजड़ों में वही देखा गया है। वे या तो नर होकर नारी वेषभूषा या मनः स्थिति के प्रति अपने को समर्पित करते हैं या नारी अपनी स्थिति को अपर्याप्त मानकर पुरुष के गौरव, वर्चस्व या सौंदर्य के प्रति अपने को समर्पित कर देती है। ऐसी दशा में पुरानी संरचना और नवीन आकर्षण के बची द्वन्द्वयुद्ध चल पड़ता है और स्थिति मध्यवर्ती बन जाती है।
चिन्तन को प्रधानता देते रहे। यही कारण है कि इस पुण्य भूमि पर विचारक मनीषियों की न्यूनता कभी नहीं रही। प्राचीन भारत के ऋषियों ने जीव व ब्रह्म की गुत्थियों को सुलझाकर उनमें एकत्व के दर्शन किये। परमात्मा को आदर्शों एवं सिद्धान्तों के समुच्चय के रूप में देखा एवं अपनाया। मानव सेवा को ही परमात्म सेवा समझा।
चिन्तन और चरित्र उसी ढाँचे में ढल जाता है।
चिन्तन तंत्र पर छाई शिथिलता-मलीनता भी दूर होती है। साथ ही विस्मृति की शिकायत नहीं पनपने पाती।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश रहता है। गण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से वह उस ऊँचाई पर बना रहता है, जिस की कि सृष्टि के मुकुटमणि समझे जाने वाले सृष्टा के युवराज। मनुष्य से आशा-अपेक्षा की जाती है।
चिन्तनरत होता है कि उसे अपनी स्थिति पर असंतोष और दूसरे पक्ष का वर्चस्व प्रतीत होने लगे। ऐसी दशा में मनःस्थिति, शारीरिक स्थिति और सामाजिक व्यवस्था में व्यतिक्रम उत्पन्न होता है और यह अतिवाद बड़ी उपहासास्पद और चिन्ताजनक समस्याएँ उत्पन्न करता है।
चिन्तन का विकृत विचार-प्रवाह का निराकरण करने में यह शत-प्रतिशत सफल सिद्ध होता है। जब अकेले नाद में इतनी सामर्थ्य है, तो नादों के समुच्चय-संगीत में कितनी शक्ति होगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। नाद की यह शक्ति सभी जीवधारियों में समान रूप से सक्रिय देखी जा सकती है।
चिन्तन करता है वह उसी ढाँचे में ढलता जाता है। यह एक प्रसिद्ध एवं सर्वविदित मानसिक तथ्य है। तत्वज्ञानी इस संदर्भ में कीट-पतंगे का उदाहरण देते रहते हैं। इष्टदेव का ध्यान करके उन्हीं विशेषताओं से अपने का ढालने का प्रयत्न किया जाता है।
चिन्तन में संस्कृति की सराहना में बहुत कुछ कहा जाता है। धर्म, अध्यात्म, दर्शन आदि का उसे आधार माना जाता है। भारतीय देव संस्कृति पर हम सभी गर्व करते हैं और कहते हैं कि जब सुसंस्कारिता का वातावरण था, तब सतयुग विराजता था। मनुष्य का व्यक्तित्व देवोपम था। शालीनता और सज्जनता का प्रचलन रहने पर इसी धरती पर स्वर्ग विराजता था।
चिन्तन के लिए काम करने वाले मस्तिष्कीय कोशों में गहराई तक प्रवेश नहीं करती और जल्दी ही विस्मरण के गर्त में गिरकर खो जाती हैं। इसके विपरीत जिन प्रसंगों में अपनी दिलचस्पी होती है, उन्हें ध्यानपूर्वक सुना, देखा और समझा जाता है। फलतः उनके मानस चित्र अधिक स्पष्ट बनते हैं और स्मृति पटल पर उनका अंकन इतना गहरा हो जाता है कि आवश्यकतानुसार उसे फिर पूर्ववत् देखा जा सके। यों समय बीतने के साथ-साथ सभी स्मृतियाँ धुँधली पड़ती जाती हैं, फिर भी जिन्हें मनोयोगपूर्वक अपनाया गया है, उनकी रेखायें अमिट न सही, चिरस्थायी तो बनी ही रहती है।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार के सभी क्षेत्रों पर उसका प्रभाव और दबाव बढ़ रहा है।
चिन्तन और चरित्र उन्हें नर-नारायण का स्तर प्रदान करता है। ऐसे लोग देवात्मा पुण्यात्मा एवं पुरुष-पुरुषोत्तम जैसी विभूतियों से अलंकृत किए जाते हैं। उनकी परादृष्टि की स्थिति को “समाधि” नाम से भी संबोधित करते हैं। सामान्य परिस्थितियों में भी उनकी मनः स्थिति उच्चकोटि की बनी रहती है। मनुष्य कलेवर में वे देवों की तरह रहते और लोकोपयोगी कार्यों में निरत रहते हैं।
चिन्तन क्षेत्र में स्थान दे। आदर्शयुक्त कार्यों को ही आचरण में उतरने दे। किसी के साथ भी ऐसा व्यवहार न होने दे, जो मानवी गरिमा की दृष्टि से हेय पड़ता हो। यह व्यावहारिक समाधि है। सर्वसुलभ भी और सर्वोपयोगी भी।
चिन्तन में प्रकृति की विभिन्न शक्तियों को देवता माना गया है। इसके अनुसार मनुष्य जाति इनसे सहयोग का व्यवहार करके प्रसन्न बने रहकर समृद्धि से भर पूर हो सकेगी। गीतकार के शब्दों में -”इन देवताओं को मनुष्य संरक्षण दे तो देवता मनुष्य को संरक्षण देंगे”। दोनों इस प्रकार सहयोग का आचरण करते हुए उन्नति व विकास को प्राप्त होंगे। यही है वह मार्ग-जिस पर चलकर पशुता की ओर जा रही मानव जाति देवत्व की ओर बढ़ सकती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-July
चिन्तन से चरित्र प्रभावित होता है और चरित्र के अनुरूप व्यवहार बन पड़ता है। विकृति इसी क्षेत्र घुस पड़े तो रंगीन चश्मा पहनने पर सब कुछ उसी रंग का दीख पड़ने की तरह कुछ का कुछ समझ पड़ने की स्थिति बन जाती है। तथ्य को समझते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि अपनी और अपने परिकर की मनःस्थिति को सुधारा जा सके तो प्रतिकूलताओं को अनुकूलताओं में बदलने में देर न लगे। विचार क्रान्ति के अंचल में नैतिक क्रान्ति बौद्धिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति तीनों ही महान परिवर्तन समाहित हैं। यदि वैसा कुछ बन पड़े तो समझना चाहिए कि विपन्नताओं के उन्मूलन का राज मार्ग मिल गया और वह सब कुछ हाथ लग गया जिसकी कि इन दिनों जन-जन को आवश्यकता है।
चिन्तन करते रहने को कहा जाता है। इससे प्रभावशाली विद्युतप्रवाह जन्म लेने लगता हे। इसकी प्रत्यक्ष परिणति जी.एस.आर. बायोफिडबैक के रूप में देखी जा सकती है जिसमें व्यक्ति चिन्तन द्वारा ही अपनी त्वचा प्रतिरोध घटाता-बढ़ाता व स्वयं भी उसे देखता है। इसी प्रकार श्वसनदर, हृदय की गति, रक्तचाप आदि को स्वसंकेतों से प्रभावित किया जा सकता है। विपश्यना ध्यान एवं जेन ध्यान पद्धति इसी स्वसंकेत पद्धति पर आधारित हैं।
चिन्तन, चरित्र, व्यवस्था, आस्था, विश्वास श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा की यदि उच्चस्तरीय स्थिति हो तो उसका प्रभाव-परिणाम धारणकर्ता तक ही सीमित नहीं रहता, वह उड़ते बादलों की तरह अपने कार्यक्षेत्र में अन्न-जल से लेकर प्राण ऊर्जा तक न जाने क्या-क्या बरसाते रहने में लगा रहता है। उसका तेजोवलय न जाने कितनों पर विशेषतया संपर्क क्षेत्र वालों पर शक्ति पात की, उठाने-उछालने की क्रिया-प्रक्रिया सम्पन्न करता है। तेजोवलय अन्तरिक्ष में उड़ता और जहाँ भी पहुंचता है, वही अपने अनुरूप चेतना-वसन्त खिलाता चलता है। पारस को छूकर लोहा सोना बनता है या नहीं, इसमें अभी संदेह है, पर यह सुनिश्चित है, प्रतापी व्यक्ति असंख्यों को अपना अनुयायी-सहयोगी बना लेते हैं। महामानवों में से अधिकाँश की जीवनगाथा यही बताती है कि अपनी प्रामाणिकता और प्रखरता के बल पर हर दिशा से संग्रह करते हुए न जाने कहाँ से चल कर कहाँ जा पहुँचे।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार में अधिकाधिक शालीनता का समावेश करे। जिन्हें धर्म में वस्तुतः कुछ रुचि है उन्हें देवोपम स्तर का जीवन यापन करते देखा जाना चाहिए। उनका अंतरंग और बहिरंग दोनों ही प्रमाणिकता एवं प्रखरता से भरे होने चाहिए। अनौचित्य को अपना कर भी लोग सुविधाओं का संग्रह और चारण चाटुकारों के माध्यम से मिल सकने वाली प्रशंसा बटोर लेते हैं, पर उनमें न तो गहराई होती है और न स्थिरता। धुएँ में बने बादल कितने ही घने क्यों न हों, हवा के एक झोंके से जिधर तिधर बिखर जाते हैं।
चिन्तन, महापुरुषों के गुणों के अपने अन्दर समावेश होने की भावना से सजातीय विचार खिंचते चले आते हैं व वाँछित विद्युत्प्रवाहों को जन्म देने लगते हैं।
चिन्तन इसमें सहायक होता है। इस आधार पर भी प्राण चेतना बढ़ती है, उसी प्रकार जिस प्रकार माँ के स्तनपान से बालक एवं गुरु की शक्ति से शिष्य लाभान्वित होता हैं
चिन्तन प्रवाह के आदर्शोन्मुख, श्रेष्ठता की और गतिशील होने पर व्यक्ति का मुख मण्डल चमकने लगता है। दूसरों को आकर्षित करना है एवं ऐसे व्यक्ति के कथन प्रभावोत्पादक होते हैं, इस सीमा तक कि अन्य अनेकों में भी परिवर्तन ला सके। एक प्रकार से स्वसंकेतों द्वारा अपने आभामण्डल को एक सशक्त चुंबक में परिणत किया जाता है। मनोवैज्ञानिक कहते है-”चिंक एण्ड गा्रे रिच” अथवा “एडाँप्ट पॉजेटिव प्रिंसिपल टूडे”। आशय यह कि सोचिये, विधेयात्मक सोचिये एवं अभी इसी क्षण सोचिये ताकि आप स्वयं को श्रेष्ठ बना सकें।
चिन्तन प्रायः इसी में लगा रहता था कि विरोधियों का सफाया करते न बन पड़े तो कम से कम उन्हें नीचा तो दिखा ही दिया जाय। सामर्थ्य का अधिकाँश भाग इसी उधेड़बुन और उठक पटक में लग जाता था। पर वैसी बात नहीं रही। प्राथमिकता इसको मिलने लगी है कि अपने उत्कर्ष, अभ्युदय, सुधार परिष्कार के निमित्त क्या किया जाय? ताकि योग्यता की, पात्रता की अभिवृद्धि के साथ अधिक अनुकूलता अर्जित करने, अधिक तेजी से प्रगति पथ पर बढ़ चलने का अवसर मिले।
चिन्तन एवं कौशल को उपयोगी कार्य में निरन्तर लगाये रहे, तो कहा जा सकता है कि रुग्णता और दरिद्रता में से एक भी उसके पास फटकने न पायेगा। दीर्घजीवी प्राय वहीं हुए हैं, जिनने अपने आप को प्रचण्ड पुरुषार्थ के साथ सर्वदा नियोजित रखा। आलसी और प्रमादी तो जीवित रहते हुए भी मृतकों में गिने जाते हैं।
चिन्तन कर अंतः के दोष-दुर्गुणों से मुक्त होते रहने की भावना की जाय। वह परमसत्ता बड़ी दयालु है। भूत को भुलाकर अब यह अनुभूति की जाय कि भीतरी संरचना में प्राणविद्युत बढ़ रही है और उसकी तेजस्विता त्वचा के ऊपरी भाग में चमक बढ़ाने से लेकर अंग अंग से फूटी पड़ रही है। पहले जो निस्तेज-क्षीण दुर्बल काय सत्ता थी, वह बदल गयी है एवं शरीर के रोम-रोम में विद्युतशक्ति की छायी हुई है। विकास क्रम में उभार आ रहा है।
चिन्तन और दुष्ट आचरण में संलग्न देखा जाता है। इन सबका कारण वस्तुओं के अभाव, परिस्थितिकी विग्रह आदि को समझा जाता है। पर देखा गया है कि आतंक पर उतारू लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक विषमताओं का सामना करने वाले अपनी सहिष्णुता और समझदारी के माध्यम से कई गुनी बड़ी चढ़ी विपन्नताओं को भी अपने ढंग से सुलझा लेने या सहलेने में सफल हो जाते है ईंधन न डालने पर आग के स्वयं बुझ जाने का सिद्धान्त सरलतापूर्वक सम्पन्न कर लेते हैं।
चिन्तन द्वारा ही अपनी त्वचा प्रतिरोध घटाता-बढ़ाता व स्वयं भी उसे देखता है। इसी प्रकार श्वसनदर, हृदय की गति, रक्तचाप आदि को स्वसंकेतों से प्रभावित किया जा सकता है। विपश्यना ध्यान एवं जेन ध्यान पद्धति इसी स्वसंकेत पद्धति पर आधारित हैं। कोई कारण नहीं कि सही पद्धति का आश्रय लेने पर प्रतिभा में वाँछित परिवर्तन न उत्पन्न किया जा सकें। (2) दर्पण साधना-यह मूलतः आत्मावलोकन की, आत्मसुधार व आत्मपरिष्कार की साधना है।
चिन्तन में गहराई तक घुसी हुई भ्रष्टता से कैसे निबटा जाय और उसके फलस्वरूप जो दृष्ट आचरण का सिलसिला चल पड़ा है, उसके उद्गम को बन्द कैसे किया जाय? धूर्तता इन दिनों इस कदर बढ़ी हुई है कि वह कानूनी दण्ड-व्यवस्था से लेकर धर्मावेश स्तर की नीति-मर्यादा को भी अंगूठा दिखाती है। सदाशयता का जोर-शोर से समर्थन करने वाले ही जब नये-नये मुखौटे बदल कर कृत्य-कुकृत्य करने की दुरभिसंधियाँ रचते रहें, तो उन्हें कौन किस प्रकार समझाये? जागते हुए को क्या कह कर सोते से जग पड़ने की आवश्यकता समझाये?
चिन्तन क्रम होता है। क्षणमात्र में यह बदल भी सकता है व पुनः वैसा ही सोचने पर पूर्ववत् भी हो सकता है। इसी चिन्तन प्रवाह के आदर्शोन्मुख, श्रेष्ठता की और गतिशील होने पर व्यक्ति का मुख मण्डल चमकने लगता है। दूसरों को आकर्षित करना है एवं ऐसे व्यक्ति के कथन प्रभावोत्पादक होते हैं, इस सीमा तक कि अन्य अनेकों में भी परिवर्तन ला सके। एक प्रकार से स्वसंकेतों द्वारा अपने आभामण्डल को एक सशक्त चुंबक में परिणत किया जाता है।
चिन्तन से अन्तराल को और दुष्ट आचरण से कायकलेवर को बचाये रहने का प्रयत्न किया जाय। यह तभी बन पड़ेगा जब अवाँछनीय महत्वाकाँक्षाओं की हथकड़ी बेड़ी से हाथ पैर खुल रहें। लोगों की उत्सुकता और उत्कंठा धनवान बनने में रहती है ताकि विलासिता के विपुल साधन जुटाये जा सकें। साथ ही अभावग्रस्तों की बिरादरी से अपने को बढ़ा-चढ़ा सिद्ध करने की मूंछें मरोड़ी जा सकें। इतनी छोटी सीमा में जिनका अन्तराल केन्द्रीभूत होकर रह गया है, वे महान कार्यों के प्रति उन्मुख हो ही, नहीं सकते, जो मानवी गरिमा चार चाँद लगाते हों।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-April
चिन्तन सम्बन्धी दोनों ही पक्षों के विकास क लिए उत्तरदायी है। यही कारण है कि प्राचीनकाल के अध्यात्मवेत्ताओं ने स्वास्थ्य संवर्धन एवं मानसिक-आत्मिक विकास में गंध साधना को एक अनिवार्य अंग के रूप में सम्मिलित किया। पूजा-उपासना-जैसे धर्मानुष्ठानों से लेकर वातावरण परिशोधन के विविध उपक्रमों में सुगंधित द्रव्यों को रखने या जलाने का अनिवार्य प्रचलन रखा। पूजा में सुवासित पुष्प इसी की पूर्ति करते है।
चिन्तन में उन्माद लाने वाले चन्द्र प्रभावों की व्याख्या करना अत्यन्त जटिल है क्योंकि पूर्णिमा काल में पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा तीनों ही एक सीधी रेखा में आ जाते हैं। उस वक्त उनके सम्मिलित विद्युत चुम्बकीय प्रभाव एवं गुरुत्वाकर्षण में जो परिवर्तन होता है-वह काया के सूक्ष्म विद्युतीय प्रवाहों पर सीधा प्रभाव डालता है और उसमें परिवर्तन लाकर स्वास्थ्य को सीधे प्रभावित करता है।
चिन्तन मनन का सहयोग रहता है। इस क्षेत्र की सशक्तता को नकारा नहीं जा सकता और व्यक्ति निर्माण के लिए, व्यक्तिगत संपर्क की उपेक्षा नहीं की जा सकती। चरित्रवान और क्रियाकुशल व्यक्ति देश की, समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यह कार्य प्रधानता व्यक्ति को सद्गुणों की सत्प्रवृत्तियों क ओर अग्रसर करने से ही हो सकता है। इसमें उत्कृष्टता का अभ्यास भी साथ में जुड़ा रहना चाहिए।
चिन्तन मनन वाले कठिन कार्या को सर्वोत्कृष्ट क्षमता वाले अपने उस जैवसमय में किया करते थे जब सायं अँधेरा छाने लगता। विख्यात वैज्ञानिक थामस एडीसन को तो रात में ही काम करने का शौक था किन्तु सबसे बड़ी बाधा अँधेर की थी इसे दूर करने में भी उनने सफलता पाई और विधुत बल्ब का आविष्कार इसी अवधि में कर डाला। इसी तरह पाश्चात्य सिनेमा के जाने माने कलाकार फ्रैंस सिनाट्रा को राम में कार्य आरंभ करने और सफलता तक पहुँचने की धुन सवार रहती थी। अपनी प्रसिद्ध फिल्म-”एहोल इन दी हेड” को उसने एक रात्रि में पूर्ण कर दिखाया जबकि उस समय आम प्रचलन दिन में ही कार्य करने का था।
चिन्तन मनन का वह सबसे उपयुक्त समय होता है। विद्यार्थियों के अध्ययन का भी यही समय सर्व श्रेष्ठ माना गया है। अध्यात्म वेत्ताओं ने तो उषाकाल को आध्यात्मिक क्रियाकृत्यों हेतु सबसे अच्छा समय बताया है। आसन-प्राणायाम, ध्यान धारणा जैसे योगाभ्यासपरक अध्यात्म उपचारों को अपनाकर जैविक लय की सक्रियता को बढ़ाया और चिरस्थायी बनाया जा सकता है।
चिन्तन के माध्यम से ही संभव हुई है। विज्ञान का प्रयोग मशीनों के माध्यम से होता है। पर उन मशीनों का आविष्कार, आविर्भाव मनुष्य के बुद्धिबल से ही हुआ है। आकाशगमन, उपग्रह, कम्प्यूटर, अणु शक्ति आदि अनेकों, एक से एक विचित्र विज्ञान की शाखाएँ कार्यरत दिखाई पड़ती हैं। पर यह सब आकाश से नहीं टपका है।
चिन्तन और व्यवहार को तद्नुरूप ढालते थे। सही मार्ग पर चलने वाले सरलतापूर्वक लक्ष्य तक पहुँचते थे। सुख शान्ति की प्रगति और समृद्धि की उन दिनों कहीं कमी न थी। यह सतयुग का विवेचन हुआ।
चिन्तन पर हावी रहती है। व कहती है कि जो कुछ भी सामने है, उसे देखते हुए तो नहीं लगता कि इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य का संदेश लेकर आ रही है। हर कोई दूसरे पर आक्षेप लगाता देखा जाता है। आत्मानुशासन एवं आत्म सुधार की ललक जागती नहीं। यह इसलिए की गीता का “यदा यदा हि धर्मस्य” वाला श्लोक तो उसे याद रहता है व कहता भी है कि अवतार आने वाला है, तब परिवर्तन आएगा।
चिन्तन को पास न फटकने दें। सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य तभी सधता है जब शरीर संयम के साथ-साथ मानसिक श्रद्धा का भी समन्वय रखा जाय। इससे मनोबल बढ़ता है और कामुकता के साथ जुड़ने वाली अनेकानेक दुर्भावनाओं से सहज छुटकारा मिलता है। सप्ताह में हर दिन इस लक्ष्य पर भावनायें केन्द्रित रखी जायँ तो उसका प्रभाव भी अगले छः दिनों तक बना रहेगा।
चिन्तन ने ही इनका सूत्रपात किया है और उन्हें क्रियारत होने की स्थिति तक पहुँचाया है।
चिन्तन के सहारे ही कल्पनायें करते, योजनायें बनाते है। निष्कर्ष निकालते है। भूत से शिक्षा ग्रहण करना और भविष्य की परिकल्पनायें अपनाना भी अपनी निजी विशेषतायें है। उन्हीं के आधार पर प्रतिभाएँ ऊँचा उठतीं, आगे बढ़ती है या पतन की दिशा में चल पड़ती है। यह कथन बहुत अंश में सच है कि किसी पेड़ पर दो पत्ते एक जैसे नहीं होते।
चिन्तन और व्यवहार मानवीय गरिमा के अनुरूप है, जिन्हें उत्कृष्ट आदर्शवादिता अपनाने पर गहरी आस्था है, वे प्रचलन से प्रभावित नहीं होते, वरन् अपनी रीति-नीति एवं दिशाधारा स्वयं निर्धारित करते है। इतना ही नहीं उस ऊँचाई पर ले जाने वाले मार्ग पर एकाकी चल पड़ने का साहस भी बटोरते है। उन्हें समीपवर्ती वातावरण से एकाकी जूझना पड़ता है, कारण कि पानी के ढलान की तरफ बहने की भाँति ही लोक प्रवाह में भी पतन की आरे ले जाने वाले-पशुता की ओर लौटाने वाले तत्व ही भरे होते है। वे अपने साथ चलने के लिए लोभ और भय बताते हुए दबाव डालते है। इन्हें नकारना उच्चस्तरीय साहस है।
चिन्तन-मनन, आचार विचार, संस्कृति एवं व्यक्तिगत रुचि रुझान पर निर्भर करता है। बाह्म याँत्रिकी घड़ी में तो एक रूपता होती है किन्तु भीतरी जैविक घड़ी में भिन्नता क्यों है? इसका उत्तर गहन अनुसंधान के पश्चात ढूँढ़ निकाला है - बोस्टन विश्वविद्यालय के वरिष्ठ मनोविज्ञानी डा विलियम एस काँडन और उनके सामर्थ्यों ने उनके अनुसार नवजात शिशु की जैव घड़ियों का तारतम्य आरंभ के कुछ घण्टों तक अपनी जन्मदात्री माँ से मिला रहता है। किन्तु ज्योंही उस अन्य लोगों की आवाजें सुनने को मिलती हैं वह उन लयों के अनुसार अपने को ढालने लगता है। यह जीवंत घड़ियाँ याँत्रिकी घड़ों की तरह ठीक समय पर टिक-टिक तो नहीं करती पर प्रकृति की लय के साथ अवश्य मिली होती हैं।
चिन्तन और निजी निर्णय पुरुषार्थ के आधार पर विकसित किया जाता है। इसमें दूसरों का परामर्श भी किसी सीमा तक काम करता है। साहित्य का भी प्रभाव रहता है। फिल्म अभिनय जैसे दृश्य भी निजी व्यक्तित्व के विकास में सहायता करते है। पूर्व-संचित संस्कारों की वंश परम्परा की भी किसी अंश में भूमिका रहती है।
चिन्तन का नियमन। (3) अपनी शारीरिक सेवाएँ यथा संभव स्वयं की करना। (4) हिंसायुक्त चमड़े के उपकरणों का प्रयोग न करना। पलंग की अपेक्षा तख्त या जमीन पर सोना। इन सब नियमों का उद्देश्य यह है कि नौदिन तक विलासी या अस्त-व्यस्त निरंकुश जीवन न जिया जाय।
चिन्तन में आदर्श, उत्साह और संतोष का समावेश करो। तुम देखोगे कि कुछ ही दिन में मेरी तरह प्रसन्न रहने का स्वभाव बन जायगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-November
चिन्तन के पटरी से उतर जाने से यह विपत्ति आ सवार होती है। प्रतिकूलताएँ तथा अनचाही घटनाएँ भी इसका कारण हो सकती है, किन्तु असन्तोषजनक को सर्वथा रोक सकना किसी के बस की बात नहीं है पर मानसिक लचीलेपन से हम हर परिस्थिति में तनाव मुक्त रह सकते है। इसके लिए मन को प्रशिक्षित करना पड़ता है। शिथिलीकरण मुद्रा का शवासन का अभ्यास ऐसा है जिसे आसानी से सीखा जा सकता है।
चिन्तन उभारती है।
चिन्तन की उत्कृष्टता को उभारती और वह सब करने को बाध्य कर देती हैं जो मानवी गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए नियामक सत्ता को अभीष्ट है।
चिन्तन, आदर्श चरित्र एवं सद्व्यवहार का स्वभाव बना लेने का प्रयत्न करना चाहिए। ऐसा करने से मन की घुड़दौड़ बन्द हो जाती है। विचार विहीन उच्च आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त होती है। मन का इस स्थिति में होना उसका वास्तविक परिशोधन है। सर्वथा विचार विहीन मनःस्थिति तो समाधि स्थिति में ही बन पड़ती है।
चिन्तन, अपनी रीति-नीति, दिशाधारा के संबंध में कोई सुनिश्चित निर्णय किया जा सके। अनिश्चय की स्थिति में नीरसता और निष्ठुरता की मनोभूमि बनती है, जो मरघट में रहने वाले प्रेत-पिशाचों की तरह डराने और व्यथित कर देने के लिए बाधित करती है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में घुसता जा रहा प्रदूषण इतना भयावह है कि उनके कारण उत्पन्न होने वाली विकृतियों और समस्याओं का कोई अन्त ही नहीं है। पारस्परिक विश्वास उठता जा रहा है। मित्र द्वारा अपनाये गये शत्रुवत् व्यवहार की भरमार को देखते हुए प्रतीत होता है कि स्नेह सौजन्य, सहयोग का उदार व्यवहार कहीं कथा-कहानियों की तरह पोथी-पत्राओं में पढ़ी जाने वाली विडम्बनाओं की तरह मन बहलाने की चीजें बनकर तो नहीं रह रही है। इस दूसरे के प्रति बरते गये दुर्व्यवहार को देखते हुए आशंका होती है कि मैत्री पूरी तरह खतरे से भरी हुई है। दूसरी एक आफत यह भी है कि नितान्त एकाकी बनकर रहना भी तो कम असुविधाओं से भरा हुआ नहीं है।
चिन्तन और दुष्ट आचरण के विरुद्ध एक प्रचण्ड विचारक्रान्ति का अवतरण हो रहा है। ऐसा अवतरण जिसने कि किसी समय धरती की प्यास बुझाने के लिए गंगा को स्वर्ग का आनन्द छोड़कर धरती पर बहने और खेत खेत को खींचने के लिए बाधित किया था। ऐसा अवतरण जिसमें के अरुणोदय होते ही अंधकार के विशाल साम्राज्य को देखते-देखते तिरोहित होना पड़ता है।
चिन्तन तक सीमित कर देता है। चिन्तन को उन्माद स्तर तक पहुँचा देता है और जमीन रहते हुए आकाश जैसी कल्पनाएं करने के लिए विवश कर देता है। सही निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए प्रिय कल्पना को ही सब कुछ नहीं मान लिया जाना चाहिए वरन् देखना यह भी चाहिए कि ऐसी संभावनाएं तो सामने नहीं आ रही जो वर्तमान मान्यता के सर्वथा विपरीत है। संभव और असंभव, उचित और अनुचित की उभयपक्षीय विवेचना करने के उपरान्त ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। इस संदर्भ में प्रायः अतिभावुक व्यक्ति असफल ही रहते है।
चिन्तन को उन्माद स्तर तक पहुँचा देता है और जमीन रहते हुए आकाश जैसी कल्पनाएं करने के लिए विवश कर देता है। सही निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए प्रिय कल्पना को ही सब कुछ नहीं मान लिया जाना चाहिए वरन् देखना यह भी चाहिए कि ऐसी संभावनाएं तो सामने नहीं आ रही जो वर्तमान मान्यता के सर्वथा विपरीत है। संभव और असंभव, उचित और अनुचित की उभयपक्षीय विवेचना करने के उपरान्त ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। इस संदर्भ में प्रायः अतिभावुक व्यक्ति असफल ही रहते है। बिना विचारे कुछ भी कदम उठा लेने के लिए उत्तेजित करने वाली एकाँगी भावुकता प्रायः पछताने वाले प्रसंग ही उपस्थिति करती है।
चिन्तन-तंत्र और जीवनक्रम बदलने का अभियान आरंभ किया, जिसमें उसे काफी सहायता मिली तथा देश की स्थिति में उत्तरोत्तर सुधार होता चला गया।
चिन्तन और चरित्र में गहराई तक स्थापित किया है। इस प्रकार आस्था संस्थान को उत्कृष्ट बना लेना हर किसी के लिए हर प्रकार लाभदायक सिद्ध होता है। समझा जाना चाहिए कि अध्यात्म तत्वदर्शन से संबंधित अनेकानेक प्रतिपादन, अनुभव एवं कर्मकाण्ड इसी उद्देश्य को लेकर बनाये गये हैं जो लोक और परलोक को प्रत्यक्ष और परोक्ष हर कसौटी पर बहूमूल्य सिद्ध करने में समर्थ होते है। जिस आस्था संकट ने अनेकानेक समस्याओं, उलझनों, विपत्तियों, विडंबनाओं और आशंकाओं को जन्म दिया है उन्हें निरस्त करने का वास्तविक उपाय यही है कि लोकमानस को आदर्शवादी निष्ठाओं से अनुप्राणित किया जाय। हर किसी का हर प्रकार कल्याण इसी अवलम्बन को अपनाने में है।
चिन्तन पद्धति में परिवर्तन ला देना। परिवर्तन ईश्वर में नहीं होता है। वह तो सर्वदा शुभ और शिव हैं। फिर हम इससे दूर क्यों? सिर्फ इसलिए कि स्वयं के विचार जगत में शुभ के स्त्रोत और मंगलमय ईश्वर से एकात्मता नहीं है और समूचा जीवन दिव्य हो जाता है।
चिन्तन की दिशाधारा गड़बड़ा जाना भर है। कभी-कभी काम की अधिकता तथा चिन्तन के पटरी से उतर जाने से यह विपत्ति आ सवार होती है। प्रतिकूलताएँ तथा अनचाही घटनाएँ भी इसका कारण हो सकती है, किन्तु असन्तोषजनक को सर्वथा रोक सकना किसी के बस की बात नहीं है पर मानसिक लचीलेपन से हम हर परिस्थिति में तनाव मुक्त रह सकते है। इसके लिए मन को प्रशिक्षित करना पड़ता है। शिथिलीकरण मुद्रा का शवासन का अभ्यास ऐसा है जिसे आसानी से सीखा जा सकता है।
चिन्तन मनन की सुविधा होती है पर इसके लिए मन को फुरसत तो मिलनी चाहिए। लालसा जिज्ञासाओं से उसे छुटकारा तो मिलना चाहिए। यह कार्य ईश्वर का सान्निध्य स्थापित कर लेने के उपरान्त ही बन पड़ता है।
चिन्तन कर रहे थे। अचानक उनके मन में विचार उठा कि जिस रीति से वे हल कर रहे हैं, वह वस्तुतः गलत है। उन्हें प्रेरणा के बाद व कागज कलम लेकर बैठ गये और सचमुच उस ढंग से समस्या सुलझ गई।
चिन्तन पर बहुत ही पछताये। उन्होंने सोचा-”मनुष्य यांत्रिक और बिना परिश्रम के जीवन के आकर्षण में न पड़ता तो वह न तो अस्वस्थ होता न तो रोगी।” उनने माली से अपनी स्त्री की ही राय मान लेने की सीख दी वहाँ से वापस चलें आए। माली अपनी पूर्व जीवन पद्धति में आकर पुनः स्वस्थ हो गया।
चिन्तन की धारा इसी दिशा में चल पड़ी क्यों ने राज्य, शासन, युद्ध तथा अन्याय परेशान करने वाले दायित्व से छुटकारा पा लिया जाय?
चिन्तन, विवेचन एवं सूझ-बूझ का संस्थान। इस क्षेत्र में प्राण प्रक्रिया की विशिष्टता में मनुष्य बुद्धिमान, विवेकशील एवं सूझ-बूझ, प्रभाव-प्रतिभा का धनी बनता है। मनीषियों की गणना ऐसे ही प्रावधानों में की जाती है। वे विचारणा का वातावरण बनाते एवं सुधारते है। अनन्त आकाश में फैली हुई ज्ञान सम्पदा को इच्छानुसार बटोर बुलाते है।
चिन्तन और क्रिया-कलाप गड़बड़ा जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-December
चिन्तन और कर्म दोनों का ही समन्वित स्वरूप सम्पूर्ण होता है। बिजली के दोनों तार अलग-अलग हों तो विद्युत धारा का प्रवाह उत्पन्न नहीं होता है। दोनों तारों के जुड़ने पर ही विद्युत धारा प्रवाहित होना सम्भव है।
चिन्तन परिष्कार और यज्ञ अभियान के द्वारा कर्म शोधन की प्रक्रिया को जन-जन तक पहुँचाना चाहिए। युग शक्ति के रूप में जिस गायत्री चेतना के अवतरण की बात कही जाती रही है उसके दो रूप हैं। पहला है परोक्ष, जिसे चिंतन परक कहा जा सकता है। तथा दूसरा है प्रत्यक्ष, जिसे कर्म परक कहा जाना चाहिए। परोक्ष स्वरूप में जप, ध्यान धारणा, लय तथा तत्वज्ञान, योगाभ्यास का समावेश किया गया है तथा कर्म परक-प्रत्यक्ष अभियान में यज्ञ आन्दोलन का।
चिन्तन भी एकांगी है और केवल कर्म भी अपूर्ण। उसके लिए चिन्तन और कर्म दोनों का ही समन्वित स्वरूप सम्पूर्ण होता है। बिजली के दोनों तार अलग-अलग हों तो विद्युत धारा का प्रवाह उत्पन्न नहीं होता है। दोनों तारों के जुड़ने पर ही विद्युत धारा प्रवाहित होना सम्भव है।
चिन्तन में अध्यात्म तत्वज्ञान का और व्यवहार में धर्मधारणा का समावेश। इस प्रयास की उपेक्षा जब तक होती रहेगी तब तक उज्ज्वल भविष्य की आशा मृगतृष्णा ही बनी रहेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-May
चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण एवं आत्म विकास को ध्यान में रखते हुए वर्तमान स्थिति की समीक्षा और प्रगति की भावी योजना बनाने की प्रक्रिया नियमित रूप से जारी रखी जाय।
चिन्तन की धारा दुःख से त्राण पाकर आनन्द प्राप्ति की ओर ही प्रवाहित रहती है। मनुष्य समाज के तत्वान्वेषी ऋषि, मुनि, सन्त, महात्मा, विचारक, चिन्तक आदि जितने भी महापुरुष हो गये हैं तथा जिन्होंने धर्मशास्त्रों का प्रणयन किया है, उन सभी ने एक स्वर से दुःख से त्राण पाने का उपाय और सुख प्राप्ति का मार्ग ही बताया है। सुख प्राप्ति के मार्ग को ही ‘धर्म’ कहा गया है। व्यक्तिगत सुख के मार्ग को ‘व्यक्ति का धर्म’, परिवार को सुखी बनाने वाले मार्ग को ‘कुटुम्ब धर्म’, जिससे समाज को सुख मिले उसे सामाजिक धर्म, जिससे राष्ट्र खुशहाल हो, उसे ‘राष्ट्र धर्म’, जिससे विश्व सुखी हो, उसे सार्वभौम धर्म और जिससे प्राणिमात्र सुख की अनुभूति करें, ऐसे धर्म को ‘सनातन धर्म’ कहा गया है।
चिन्तन और आदर्श कर्तव्य की नीति अपना कर सज्जनता और परमार्थ परायणता के समन्वय को जीवन साधना कहा जा सकता है। उपासना व्यायाम है और साधना आहार। उपासना बीज है और साधना उपजाऊ भूमि। उपासना पौधा है और साधना सिंचाई। उपासना कारतूस है और साधना बन्दूक।
चिन्तन और मनन किया जाये। चींटियां यों ढेर में बिलबिलाती दिखती हैं पर उनका हर कार्य व्यवस्थित−नियन्त्रित और अपनी प्रभु सत्ता सम्पन्न रानी के इंगित पर चलता है। कोई भी चींटी न तो कभी निष्क्रिय होगी न व्यर्थ के कार्य करेगी। जो कार्य जिसे सुपुर्द है वह वही करेगी। नर का काम है परिश्रम पूर्वक खाद्यान्न व्यवस्था, सैनिक पहरेदारी करते, मजदूर बोझा ढोते, शव बाहर निकालते हैं और शिल्ली भवन निर्माण में जुटे रहते हैं।
चिन्तन मग्न बैठे विचार कर रहे थे कि इतनी तपस्या कर, शरीर को सुखा डालने के उपरान्त भी उन्हें सद्ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ—तभी उनके पास से ग्राम्य बालाओं का एक समूह गाना गाते हुए निकला। गौतम के कानों में आए इन सुरीले शब्दों का आशय इस प्रकार था,”अपनी सितार के तारों को ढीला न छोड़—कस कर रख, पर इतना भी न कस कि वे टूट ही जायं।”
चिन्तन करने के लिए बैठ गए। उन्होंने अन्न जल सभी छोड़ दिया।
चिन्तन अपने तक ही सीमित न रहकर प्राणि मात्र के हित की बात सोचने लगता है। यह स्थिति अपने आप में ही एक ऐसी आन्तरिक स्फुरणा प्रदान करती है, जिसमें शान्ति, शीतलता, सन्तोष और प्रसन्नता की निर्झरणी अपने भीतर ही फूटती प्रतीत होती है।
चिन्तन के सहारे मन की अभिरुचि बदलती है और वह उस संदर्भ में भी रुचि लेने लगता है। इस संदर्भ में थोड़ी−थोड़ी धीरे−धीरे सफलता मिले तो भी उसे उत्साहवर्धक एवं आशाजनक समझना चाहिए।
चिन्तन की क्षमता−यही वह तत्व हैं जो मृत और जीवित का अन्तर स्पष्ट करते हैं। अतएव जीवन को बौद्धिक क्षमता में केन्द्रित कर वैज्ञानिक प्रयोगों की प्रणाली अपनाई गई। इस दिशा में मस्तिष्क की जटिल संरचना एक बहुत बड़ी बाधा है इस कारण रहस्य अभी तक रहस्य ही बने हुये हैं, तथापि अब तक जितना जाना जा सका है, उससे वैज्ञानिक यह अनुभव करने लगे हैं कि बुद्धि एक सापेक्ष तत्व है अर्थात् सृष्टि के किसी कोने से समष्टि मस्तिष्क काम कर रहा हो तो आश्चर्य नहीं, जीवन जगत उसी से जितना अंश पा लेता है उतना ही बुद्धिमान होने का गौरव अनुभव करता है।
चिन्तन करने से, बहुत दिन तक लगातार इस संदर्भ में प्रशिक्षित करते रहने से, स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिन्तन के सहारे मन की अभिरुचि बदलती है और वह उस संदर्भ में भी रुचि लेने लगता है। इस संदर्भ में थोड़ी−थोड़ी धीरे−धीरे सफलता मिले तो भी उसे उत्साहवर्धक एवं आशाजनक समझना चाहिए।
चिन्तन में बदल जाना ऐसा चमत्कार है जिसे रसायन शास्त्री स्वयं प्रस्तुत कर सकने में अपने को सर्वथा असहाय अनुभव करते हैं।
चिन्तन का अभ्यासी हो जाने के कारण उसकी दिशा धारा उस ओर बहने लगती है जो नैतिकता एवं प्रकृति व्यवस्था के प्रतिकूल होती है। शरीर तो औजार, उपकरण मात्र है। उसे वाहन की संज्ञा ठीक ही दी गई है। मन भली दिशा में चले या बुरी में शरीर को अपने स्वामी का उसका पालन करना पड़ेगा, वह वफादार नौकर की तरह है। साथ ही उसमें सोचने, तर्क करने या अवज्ञा करने जैसी सामर्थ्य भी नहीं है, ऐसी दशा में स्वामी का आज्ञानुवर्ती होकर ही उसे रहना पड़ता है।
चिन्तन प्रवाह का रचनात्मक उपयोग कर नहीं पाता। फलतः मानसिक उत्पादन भाप की तरह उड़ता और अन्तरिक्ष में विलीन होता रहता है। इस अपव्यय को यदि रोका जा सके और निहित प्रयोजन के लिए लगाया जा सके तो शक्ति के नये स्रोत खुलते हैं और प्रतीत होता है कि प्रवीणता प्राप्त कर सकने की सामर्थ्य का किसी दिव्य लोक से अभिनव वरदान प्राप्त हुआ है।
चिन्तन या कर्म में तन्मयता पूर्वक संलग्न हुआ जाय तो निश्चित ही गहरी जानकारी और कुशल प्रवीणता हस्तगत होती चली जायगी। यही है प्रगति और सफलता का आधार अवलम्बन।
चिन्तन को एक ही प्रवाह में बहने देना। उसे अस्त−व्यस्त उड़ानों में भटकने से रोकना। यह कार्य किसी एक ही लक्ष्य पर कुछ समय तक विचार तरंगों को केन्द्रीभूत किये रहना। वैज्ञानिक अपनी शोध परिधि में, साहित्यकार अपने सृजन क्षेत्र में, उपासक अपने इष्ट देव में सारी विचार शक्ति को नियोजित करते हैं। एक बिन्दु पर केन्द्रीकरण आरम्भ में ही सम्भव नहीं।
चिन्तन तो मात्र विज्ञान द्वारा ही सम्भव है।
चिन्तन से मानवीय शक्ति का ह्रास होता है पशु−पक्षियों में भी यह प्रक्रिया यथावत होती है। इनमें कुछ तो डर जाते हैं कुछ बीमार पड़ जाते हैं सम्भवतः इन्हीं कारणों से वे जीवन की गहराइयों में नहीं जाकर प्राकृतिक प्रेरणा से सामान्य जीवन यापन और आमोद−प्रमोद के क्रिया−कलापों तक ही सीमित रह जाते हैं। इस दृष्टि से देखा जाये तो मानवीय चिन्तन प्रक्रिया भी उतनी उन्नत नहीं है, वह भी तो अपनी बुद्धि का उपयोग मात्र ऐसी ही उपलब्धियों में करता है जिससे उसकी भौतिक प्रसन्नता तथा सुख−सुविधा बढ़ती है। अन्तरात्मा की अन्तरंग गहराइयों तक पहुँचने की तो उसे कल्पना भी बहुत कठिनाई से होती है। सो वह भी कुछ ही बुद्धिजीवियों में होती है जबकि यही सबसे बड़ा प्रश्न है, जिसे सुलझाने में मानवीय क्षमताओं की प्रतिष्ठा हो सकती है।
चिन्तन उदार और कर्त्तृत्व आदर्श रखना पड़ता है। हमारा स्वभाव समाजनिष्ठ होना चाहिए। व्यक्तिवाद के प्रति उपेक्षा और समूहवाद के प्रति निष्ठा रखने वाले व्यक्तियों का समाज ही समुन्नत होता है और उसके सदस्य सुखी रह सकते हैं यह तथ्य हर किसी को हृदयंगम करना और कराना चाहिए।
चिन्तन ध्यानयोग के अन्तर्गत आ जायगा। दिशा धारा का अतिक्रमण न करने से काम चल जाता है। नदी एक दिशा में बहती रहे तो काम चल जाता है। उसमें लहरें उठती रहें। भँवर पड़ते रहें तो इससे कोई विशेष हर्ज नहीं है।
चिन्तन से ईश्वर प्राप्ति के लिए उत्सुकता बढ़ती है। यह उत्सुकता जितनी ही प्रगाढ़ होगी उतना ही मन उसमें सरसता अनुभव करने लगेगा और उसी के इर्द−गिर्द छाया रहेगा। एकाग्रता का यह प्रथम सौपान है। भौतिक प्रयोजनों में भी मन लगाने के लिए यही करना पड़ता है। शिक्षा, शिल्प, खेल, धन, यश, शोध, अध्ययन आदि का माहात्म्य जितनी अच्छी तरह समझ लिया गया होगा।
चिन्तन आत्मनिष्ठ होता है, वस्तुपरक नहीं और वस्तुपरक चिन्तन तो मात्र विज्ञान द्वारा ही सम्भव है।
चिन्तन को नोकदार बनाने के लिए उसे एकाग्रता के पत्थर पर घिसना पड़ता है। मानसिक बिखराव को फैली हुई सूर्य−किरणों के समतुल्य समझा जा सकता है। आतिशी शीशे के सहारे उनका केन्द्रीकरण किया जाता है। यह प्रखर एकाग्रता मनः संस्थान के जिस भी केन्द्र पर अपना प्रभाव डालती है उसमें गर्मी उत्पन्न होती है। गर्मी से हर चीज फैलती और उठती है।
चिन्तन को मूर्त रूप दे सकना क्रिया−कलापों के द्वारा ही बन पड़ता है। कार्य रूप में परिणित किये बिना तो मस्तिष्कीय भाग-दौड़ मात्र कल्पना या योजना बना कर रह जायगी।
चिन्तन प्रक्रिया भी उतनी उन्नत नहीं है, वह भी तो अपनी बुद्धि का उपयोग मात्र ऐसी ही उपलब्धियों में करता है जिससे उसकी भौतिक प्रसन्नता तथा सुख−सुविधा बढ़ती है। अन्तरात्मा की अन्तरंग गहराइयों तक पहुँचने की तो उसे कल्पना भी बहुत कठिनाई से होती है। सो वह भी कुछ ही बुद्धिजीवियों में होती है जबकि यही सबसे बड़ा प्रश्न है, जिसे सुलझाने में मानवीय क्षमताओं की प्रतिष्ठा हो सकती है।
चिन्तन प्रवाह को एक दिशा धारा में प्रवाहित करने वाली ध्यान धारणा कुछ कठिन नहीं रह जाती।
चिन्तन में स्वार्थ−परता को नियन्त्रित और परमार्थ परायणता को प्रोत्साहित करने वाले तत्वों का समावेश अधिकाधिक मात्रा में होना आवश्यक है। उदार समाज सेवियों की प्रतिष्ठा बढ़नी चाहिए और आक्रामक एवं छल−छद्म अपनाने वाले दुरात्माओं की तरह उनकी भी भर्त्सना होनी चाहिए, जिनके लिए स्वार्थ ही सब कुछ है जो वासना, तृष्णा और अहंता के परिपोषण के अतिरिक्त और कुछ सोचने या करने के लिए तैयार ही नहीं होते। लोक हित में जिनकी कोई रुचि नहीं−सामूहिक उत्थान पतन से कोई मतलब न रखकर अपने तक ही जिनकी आकांक्षाएँ सीमित हैं। ऐसे लोग निर्दोष लगते भले ही हैं। वस्तुतः उनका संकीर्ण दृष्टिकोण समाजगत श्रेष्ठता और व्यक्तिगत गरिमा को नष्ट−भ्रष्ट किये बिना रह नहीं सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-August
चिन्तन और कर्तृत्व कम ही है। खुला छोड़ने का ही परिणाम है कि वर्तमान पीढ़ी असभ्य, उद्दण्ड और उच्छृंखल होती चली जा रही है। अनेक ऐसे उदाहरण हैं जब हम जंगली जानवरों को यहाँ तक कि खूँखार जन्तुओं को भी प्रशिक्षित कर उन्हें मनोरंजक सहिष्णु और उपयोगी बना लेते हैं तो मनुष्य तो गीली मिट्टी का बना है उसे तो किसी भी इच्छित दिशा में मोड़ा, सजाया-सँवारा जा सकता है।
चिन्तन की उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए विविध प्रयासों को योग कहते हैं और कर्म को आदर्श बनाने का नाम ही तप है। इसके लिए तप तितीक्षा अथवा भजन पूजन के क्रिया-कलाप जो भी अपनायें जाएं उनका मूल संकेत आत्म परिष्कार ही रहता है। इस दिशा में जितनी प्रगति होती है उसी अनुपात से ईश्वरीय अनुग्रह स्वार्थ मुक्ति एवं सिद्धि चमत्कार जैसी अनेकानेक भौतिक एवं आत्मिक उपलब्धियाँ मिलती चली जाती हैं।
चिन्तन में आत्म विश्वास, वाणी में आश्वासन, व्यवहार में प्रामाणिकता का सहज ही परिचय मिलता है। यह जीवट व्यक्ति के आचरण, उद्देश्य और क्रिया-कलाप के कण−कण से प्रकट होती है। वह ओछी या खोखली नहीं होती। उनके निर्णय अनिश्चित और अस्त−व्यस्त नहीं होते। दूरदर्शी सूझबूझ भी ऐसे ही लोगों के पास रहती है।
चिन्तन तन्त्र के लिए कठिन पड़ता है कि वह सत्य और तथ्य को ठीक तरह समझ सके और उचित-अनुचित का भेद कर सके। अभ्यस्त मान्यताओं के प्रति एक प्रकार की कट्टरता जुड़ जाती है। इसे अच्छी सिद्ध करने के लिए परम्पराओं के निर्वाह की दुहाई दी जाती है। उसका समर्थन धर्मशास्त्र, आप्तवचन, देश भक्ति आदि के नाम पर किया जाता है और कई बार तो उसे ईश्वर का आदेश तक घोषित कर दिया जाता है।
चिन्तन मनुष्य का निरन्तर रक्त सुखाता है और उसकी शक्तियों को अकारण ही अनावश्यक रूप से नष्ट करता है हमें इन मानसिक दुर्बलताओं से बचने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। अपने स्वभाव को शौर्य, साहस से भरा पूरा बनाना चाहिए, निर्भयता अपनानी चाहिए और हिम्मत रखनी चाहिए कि यदि कभी कोई विपत्ति आवेगी तो अपने पराक्रम से उसका सामना करेंगे। सज्जनों की सद्भावना तथा ईश्वर की सहायता मिलेगी और बेड़ा पार हो जायगा। इतने पर भी कुछ भुगतना पड़ा तो बहादुरों की तरह उसका हँसते−हँसाते सामना करेंगे। दूसरों से लड़ने मरने वाली बहादुरी की तो कभी−कभी ही आवश्यकता पड़ती है, पर अपने को भीरुता से बचाने और साहसी बनाये रहने वाली वीरता की अपेक्षा तो हर मनुष्य को हर घड़ी रहती है।
चिन्तन प्रक्रिया रखा जा सके तो इस महाव्याधि से बच रह सकना सरल है। साथ ही जो इस कुचक्र में फँस गये हैं उनको छुटकारा पाना भी कुछ कठिन नहीं है।
चिन्तन को झुठलाना पड़ेगा।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में घुला हुआ हो उसे जीवट की सम्पदा से सुसम्पन्न समझा जा सकता है।
चिन्तन को आस्ति और नास्ति के बीच कोई स्वरूप दिशा धारा मिल सके।
चिन्तन में उत्कृष्टता के समन्वय की तरह ही कर्म क्षेत्र में आदर्शवादिता को भी अविच्छिन्न बनना पड़ता है। योग और तप दोनों की ही आत्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य आवश्यकता है।
चिन्तन को परिष्कृत ओर क्रिया-कलाप को व्यवस्थित बना लिया जाय तो परिस्थितियों की प्रतिकूलता बहुत हद तक स्वतः ही सरल हो जायगी। जो बच रहेगी उससे सूझ−बूझ और साहस के सहारे निपट लेना कुछ अधिक कठिन न रहेगा। प्रतिकूलताओं से डरने की अपेक्षा यह अधिक उपयुक्त है कि उनसे निपटने के कौशल को उभारा और परिपक्व किया जाय।
चिन्तन में लगा कर प्रसन्न रहने का तरीका क्या बुरा है? वस्तुतः बुद्धिमानी का यही मार्ग है।
चिन्तन शक्ति से आगे गहराई में उतरने पर उन क्षमताओं का अस्तित्व सामने आता है जिन्हें अतीन्द्रिय या दैवी कहते हैं। वस्तुतः वे भी व्यक्ति की अपनी ही अविज्ञात एवं उच्चस्तरीय सामर्थ्यं ही होती हैं। उन्हें प्रयत्नपूर्वक जगाया या बढ़ाया जा सकता है।
चिन्तन-शकट बचाओ। कथनी का युग बीत गया अब करनी कुछ दिखलाओ॥
चिन्तन को उज्ज्वल भविष्य की कल्पना में लगाया गया होगा। सुखद कल्पनाओं की−प्रगति और सफलताओं के मानसिक चित्र बनाये गये होते तो उनके कारण उत्साह रहता, आशा बँधती और अधिक सक्रिय रहने की प्रेरणा मिलती, भविष्य में क्या होने वाला है इसकी यथार्थता किसी को भी विदित नहीं है। उसकी मात्र कल्पनाएँ और अटकलें ही लगाई जाती हैं। यदि ऐसा ही है तो कुकल्पनाओं में उलझा कर अपनी मानसिक शक्ति नष्ट करने की अपेक्षा उसे सुखद कल्पनाओं के द्वारा उत्साहवर्धक चिन्तन में लगा कर प्रसन्न रहने का तरीका क्या बुरा है? वस्तुतः बुद्धिमानी का यही मार्ग है।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व के रूप में ईश्वरीय आदेशों के अनुरूप अपने दृष्टिकोण एवं क्रिया-कलाप को ढालने का साहस जुटाना पड़ता है। इस साहसिकता को व्यवहार में उतारना ही तप साधन है।
चिन्तन द्वारा दोष दुर्गुणों को ढूँढ़ निकालना, आत्मसुधार द्वारा विकृतियों की जड़ें उखाड़ना, आत्म−निर्माण द्वारा सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बनाना, आत्मविकास द्वारा आत्मीयता का क्षेत्र सुविस्तृत करते जाना, यही हैं वे चतुर्विधि प्रयोग जिनके सहारे जीवन जाना−यही हैं वे चतुर्विधि प्रयोग जिनके सहारे जीवन साधना सम्पन्न होती है इन्हीं आधारों को अपनाने से आत्मोत्कर्ष के लिए की गई योगाभ्यासी तपश्चर्याओं में उत्साहवर्धक सफलता मिलती है।
चिन्तन उत्कृष्टता के और कर्तृत्व आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालना। अनगढ़ जीवन को सुगढ़ बनाना। बैल, घोड़ा, रीछ, बानर, सर्प, सिंह जैसे पशुओं को सधा लेने से वे कितने उपयोगी सिद्ध होते हैं और पालने वालों का कितना हित साधन करते हैं यह स्पष्ट देखा जाता है। कुम्हार साधारण मिट्टी से कितने सुन्दर खिलौने बना देता है। मूर्तिकार पत्थर से देव प्रतिमा गढ़ता है।
चिन्तन चाहिए। वह हिम्मत और मनोबल भी चाहिए जो उसे इस कठिन साधना से विचलित होने और आकर्षणों से बचाने में सहायक हो, मनुष्य जीवन के रहस्यों, आत्मा पर पड़े हुए पर्दे, सृष्टि रचना का आधार और उसकी नियम व्यवस्था जानना सभी कुछ सम्भव है, पर इस दिशा में मिलने वाला संरक्षण और मार्गदर्शन उतना ही प्रौढ़, सूक्ष्म, सम्वेदनशील और कल्याण की भावना से ओत-प्रोत होना चाहिए। इन जीवों में ऐसी अकल्पित क्षमताएँ हो सकती हैं तो मनुष्य की विवेचन शक्ति का तो कहना ही क्या? पर उसका विकास स्वतः कभी-कभी ही हो सकता है अधिकांश में प्रशिक्षण आवश्यक होता है। वातावरण आवश्यक होता है, जिसकी व्यवस्था बड़ों को ही करनी पड़ती है।
चिन्तन और चरित्र का स्तर गिरने न दिया जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-July
चिन्तन परक चारों ही उपचार योग है। तप में वे सभी क्रियाएँ आती हैं, उनमें अभ्यस्त अवांछनीयताओं के विरुद्ध विद्रोह किया जाता है और उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए संघर्ष किया जाता है। शरीर पर छाई हुई अनुपयुक्त आदतों और मन पर छाई गई मान्यताओं को उलटने में समझने समझाने की सामान्य पद्धति बहुत अधिक कारगर सिद्ध नहीं होती। बहुत बार ऐसा प्रतीत होता है कि मस्तिष्क तर्क तथ्य, प्रमाण सामने प्रस्तुत करने पर किसी बात को सिद्धान्ततः स्वीकार कर लेता है, पर भीतरी मान्यताओं एवं आदतों की जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि उन्हें बदलना, उस सैद्धान्तिक सहमति से भी बन नहीं पड़ता। ऐसी दशा में तीखे उपाय और पैने प्रहार की उस गहराई तक पहुँचने और आवश्यक परिवर्तन कर सकने में समर्थ होते हैं।
चिन्तन, विवेक एवं रस सौन्दर्य है। यह विशेषतायें ज्ञानेन्द्रियों में विद्यमान हैं। ज्ञानेन्द्रियों में प्राण सत्ता और कर्मेन्द्रियों में तत्व क्षमता ही उभरती उछलती दृष्टिगोचर होती है। जब जड़ तत्व, चेतन प्राणों के साथ मिलते हैं, तब उनकी प्रतिक्रिया भी संयुक्त होती है। इस प्रतिक्रिया को तन्मात्रा कहते हैं।
चिन्तन की इतनी अद्भुत सत्ता का समावेश किया है कि किसी सूक्ष्मदर्शी को आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। निर्माण, व्यवस्था और परिवर्तन की जो रीति-नीति विनिर्मित की है उसके तारतम्य को देखते हुए मनीषियों ने कला की कल्पना और विज्ञान की धारणा का मूर्त रूप दिया है। ऐसे सर्व सम्पन्न सृष्टा से कर्म व्यवस्था के सम्बन्ध में चूक होगी यह सोचना अपनी ही बाल बुद्धि का खोखलापन दर्शाना है। जिसकी दुनिया में दिन और रात की, ग्रह-नक्षत्रों के उदय-अस्त की, पदार्थ की प्रकृति और प्राणियों की परम्परा की विधि-व्यवस्था में कहीं राई-रत्ती अन्तर नहीं पड़ता- वह कर्मफल को सन्देहास्पद बनाकर अराजकता का और आत्मघात का विग्रह खड़ी नहीं कर सकती।
चिन्तन की जो सामर्थ्य काम करती दीखती है उसे अग्नि के ही भेद-उपभेदों के अन्तर्गत गिना जा सकता है। इसी अग्नि का एक नाम आपत है। आध्यात्म क्षेत्र में उसके उत्पन्न करने पद्धति का नाम ‘तप’ है। तपस्वी ही ओजस्वी, तेजस्वी और मनस्वी कहलाते हैं। यह सभी शब्द ‘शक्ति मंत्रों’ के प्रतीक हैं।
चिन्तन और कर्तृत्व से मनःक्षेत्र में उत्पन्न होने वाला अंतर्द्वंद्व दुहरा व्यक्तित्व रच देता है और उससे निरन्तर उठने वाली आन्तरिक कलह सारे मनोभूमि को क्षत-विक्षत करके रख देती है। संचालक को आहत, घायल, उद्विग्न होने पर उसके आधीन काम करने वाले तन्त्र की दुर्दशा होना स्वाभाविक है। शरीर के अनाचार और मस्तिष्क के मनोविकार ही वे कारण हैं जिनके कारण आत्म-सत्ता का स्वसंचालित तन्त्र अनेकानेक प्रकार के आत्म-दण्डों की व्यवस्था अपने आप ही कर लेता।
चिन्तन के चारों तत्व गुंथे हुए हैं। शारीरिक और मानसिक संयम अनुशासन की कठोर विधि व्यवस्था का पालन करना पड़ता है। प्रवचन और परामर्श का दैनिक लाभ मिलता है। दिनचर्या, इतनी अनुशासित और व्यवस्थित रहती है कि इस ढर्रे में ढल जाने वाला भविष्य में अपने आपको सर्वतोमुखी प्रगति में सहायक ढाँचे में ही ढाल लेता है। वातावरण का प्रभाव अभिनव परिवर्तन के रूप में निरन्तर अनुभव होता रहता है।
चिन्तन वर्ग के प्रयोजन पूरे करते रहते हैं। यह इन दोनों का निर्वाह मात्र के लिए चलते रहने वाला स्वल्प कार्य है। यदि उन दोनों की तन्द्रा छुड़ा दी जा सके और वे समर्थ सक्रिय हो उठें तो फिर समझना चाहिए कि अनन्त शक्तियों के सिद्धियों के स्रोत खुल पड़ेंगे और मनुष्य साधारण से असाधारण बन जायेगा। ऋषि, देवता और अवतारी मनुष्य इसी स्तर के होते हैं। उनकी आन्तरिक मूर्छना जागृति में परिणित हो गई होती है।
चिन्तन में कितनी पवित्रता है। व्यक्तित्व में मानवोचित महानता सिद्ध करने वाले सद्गुणों का कितना बाहुल्य है और वह व्यक्ति किस सीमा तक संयमशीलता, सादगी और सज्जनता का अपने व्यवहार में समावेश कर सका है।
चिन्तन क्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों की ओर ध्यान नहीं दिया गया। वहाँ जमी हुई वितृष्णाओं और विपन्नताओं का समाधान न किया गया तो आहार-विहार का सन्तुलन बनाये रहने पर भी रुग्णता से पीछा छूट नहीं सकेगा। चिकित्सा उपचार से भी मन बहलाने के अतिरिक्त और कुछ प्रयोजन सिद्ध हो नहीं सकेगा। अब क्रमशः औषधि उपचार का महत्व घटता जा रहा है और मानसोपचार को प्रमुखता दी जा रही है। मानसिक बीमारियों की पिछले दिनों अलग से गणना होती रही है और उनका क्षेत्र अलग रहा है।
चिन्तन की साधना इसी प्रयोजन के लिए की जाती है। इसे ज्ञानयोग कहते हैं। अध्यात्म विवेचना के ग्रन्थ इसी निमित्त रचे गये हैं।
चिन्तन की गणना होती है। विज्ञान पक्ष में उपासना और साधना का समावेश है। इन्हें योग और तप भी कह सकते हैं। योग धारा में मस्तिष्कीय क्षेत्र में होने वाले प्रयोगों की गणना है। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के चिन्तन परक चारों ही उपचार योग है।
चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की चारों प्रक्रियाएँ किस प्रकार सम्पन्न की जानी चाहिए इसका कार्यक्रम साधन की स्थिति के अनुरूप बनाया जाता है। साधना के साथ-साथ स्वाध्याय, संयम और सेवा के तीन अवलम्बन भी अपनाये जाने चाहिए और उनकी अनिवार्य आवश्यकता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह प्रत्येक साधक को विस्तारपूर्वक समझाया और करने को सुव्यवस्थित कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है। समग्र जीवन में उत्कृष्टता भर देने वाली रीति-नीति को ही आत्मोत्कर्ष की सफलता के लिए अनिवार्य बताकर उसका समुचित मार्ग-दर्शन किया जाता है।
चिन्तन विचित्र और विलक्षण होता है। कितने ही दुष्टता की भाषा में सोचते और हर किसी पर दोषारोपण करते हुए शत्रुता की परिधि में लपेटते हैं। कितने ही आशंकाओं, सन्देहों, आक्षेपों के इतने अभ्यस्त होते हैं कि उन्हें अपनी पत्नी, बेटी, बहिन आदि तक के चरित्र पर अकारण संदेह बना रहता है। सम्बन्धियों और पड़ौसियों को अपने विरुद्ध कुचक्र रचते हुए देखते हैं। दुर्भाग्य और ग्रह-नक्षत्रों के प्रकोप से कितने हर घड़ी कांपते रहते हैं और विपत्ति का पहाड़ अपने ऊपर टूटता ही अनुभव करते रहते हैं।
चिन्तन का प्रकाश उनकी आँखें चौंधिया देती हैं और औचित्य को समझने स्वीकार करने जैसा साहस उनके जुटाये जुट ही नहीं पाता। इस वर्ग के लोगों को मानसिक दृष्टि से अविकसित नर-पशुओं की श्रेणी में ही रखा जा सकता है।
चिन्तन बहुत ही सामयिक रह जाता। बुद्धिमत्ता का विकास उचित-अनुचित का-लाभ-हानि का विचार करने पर ही होता है। यदि संसार में सब कुछ ठीक ठाक ही चलता रहता, व्यतिक्रम न होते तो फिर बुद्धि-बल को विकसित करने की आवश्यकता ही न पड़ती। फलतः प्राणी अविकसित स्थिति में ही पड़े रहते। अवांछनीयता के दुष्परिणाम का भय और सत्प्रवृत्ति के सत्परिणामों का लोभ ही है जो प्राणी को क्रमशः आगे धकेलते और ऊँचा उठाते हुए विकास की वर्तमान सीमा तक घसीट लाया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-October
चिन्तन और चरित्र सुदृढ़ बना लिया जाय तो फिर इतने से ही वातावरण के द्वारा पहुँचने वाली हानि से बच निकलने की सम्भावना सहज ही बन जाती है।
चिन्तन के लिए काम करने वाले कणों में गहराई तक प्रवेश नहीं करती और जल्दी ही विस्मरण के गर्त में गिरकर खो जाती हैं।
चिन्तन उद्धत बन जाता है। ऐसी दशा में आक्रमण प्रत्याक्रमण का क्रम चल पड़ने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं रह जाता। यदि तथ्यों को खोज निकालने का दूरदर्शिता अपनाते रहा जाय, कारणभूत तथ्यों को ढूँढ़ निकाला जाय और न्यायोचित समाधान के लिए प्रयास किया जाय तो तीन चौथाई लड़ाइयाँ सहज ही निरस्त हो सकती हैं। न्याय और औचित्य को अपनाने वाली उदार सद्भावना का विकास हो सके तो युद्ध प्रवृत्ति पर अंकुश लग सकता है। विग्रह की चिनगारी अन्ततः कितने बड़े दुष्परिणाम प्रस्तुत कर सकती है, इस पर सही ढंग से विचार किया जा सके तो विग्रह की हानि और समाधान का सत्परिणाम सोचा जा सकेगा ऐसी दशा में युद्ध से बचे रहने की प्रवृत्ति पनपेगी और शान्ति का पक्ष मजबूत होता चला जायगा।
चिन्तन को ऊर्ध्वगामी बनाये रखने तथा जनमानस में आदर्शवादी आस्थायें विकसित करने की प्रक्रिया को भी प्राप्त था। समाज का एक मूर्धन्य वर्ग जनमानस को उत्कृष्ट और परिष्कृत बनाये रखने के लिए अहर्निश प्रयत्नशील रहता था और अपना सारा समय इसी कार्य में लगाता था। उद्योग धन्धों और उत्पादक कार्यों में लगे व्यक्तियों की जीविका तो उनसे प्राप्त होने वाले पारिश्रमिक से होता था। चूँकि वे उत्पादक श्रम में लगते थे इसलिए उत्पादन में उनका एक भाग आसानी से उन्हें मजदूरी या वेतन के रूप में मिल जाता था। परन्तु जो वर्ग जनमानस के निर्माण में, समाज में उत्कृष्ट आदर्शवादी आस्थाओं के विकास में रचनात्मक श्रम करते थे, उससे तो कोई स्थूल सम्पत्ति का उत्पादन नहीं होता था।
चिन्तन-मनन, आकांक्षा, अभिरुचि आदि मानसिक गतिविधियों का केन्द्र व माध्यम है। इसका प्रधान कार्यस्थल मस्तिष्क ही है, यद्यपि सामान्यतः यह पूरे स्थूल शरीर में उसी तरह व्याप्त है, जैसे दूध में घी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-February
चिन्तन ज्ञान योग दिन भर की कर्त्तव्यनिष्ठा कर्मयोग और रात्रि की प्रभु परायणता भक्तियोग है। इस जीवन साधना में तीनों प्रमुख योगाभ्यासों का समन्वय समझा जाय।
चिन्तन ही भूत बनकर डराता है यदि विचारों में विधेयात्मक स्तर पर सोचने की कला जुड़ सके तो उसके क्रमिक विकास के प्रकृति क्रम को ध्यान में रखते हुए उज्ज्वल भविष्य के लिए सोचना बन पड़ेगा। तब निराशा का कोई कारण न रहेगा। आशा की अभिनव किरणें सदा आगे बढ़ने का उत्साह भरती रहेंगी। शरीर के जीर्ण होने या कलेवर बदल जाने जैसे सामान्य से प्रकृति परिवर्तन पर किसी को खेद करने की आवश्यकता नहीं।
चिन्तन ही होता है। मनुष्य यदि शरीर और मन को उपयोगी कामों में व्यस्त रखे तो बेकार की बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता ही न पड़ेगी। भारी कामों के साथ−साथ कुछ हलके काम और हलके चिन्तन भी दिनचर्या में जुड़े रहने चाहिए। उपयोगी शौकों में फूल या शाक उगाना, वस्तुओं की सफाई सज्जा, टूट−फूट की मरम्मत, गीत वाद्य, सामूहिक प्रार्थना, खेलकूद जैसे कई कार्य सम्मिलित रखे जा सकते हैं। इनसे व्यस्तता और मनोरंजन का दुहरा उद्देश्य पूरा होता है और मस्तिष्क पर भारीपन नहीं जमने पाता।
चिन्तन सायंकाल तीन घण्टे लोक सेवा शिक्षण। यही नौ घण्टे की दैनिक वर्चस् साधना है । वानप्रस्थ तपश्चर्या में आर्य परम्परा के अनुसार इन्हीं तीन तथ्यों का अभ्यास अवगाहन करना पड़ता है इन संगतियों के आधार पर कोई चाहे तो ब्रह्म वर्चस् को वानप्रस्थ साधनाश्रम भी कह सकता है। थोड़े−थोड़े समय के छोटे−छोटे सत्र बना देने से ही यह प्रतीत होता है कि यह शिक्षण वानप्रस्थ साधना से कोई भिन्न वस्तु है। उसे थोड़े−थोड़े समय की वानप्रस्थ साधना एवं उसकी पूर्व तैयारी कहा जाय तो भी कुछ अनुचित न होगा।
चिन्तन वाली हो। रज्जु विवेकमयी डाली हो॥
चिन्तन अपूर्ण ही नहीं अनुपयुक्त भी है। मध्यकाल में अहिंसा के प्रतिपादन में कुछ सम्प्रदायों ने अतिवाद बरता। किसी से भी बैर न करना−किसी से भी न लड़ना−हर किसी को क्षमा करने जैसी एक पक्षीय मान्यता पनपी तो सज्जनता का पक्ष अति दुर्बल हो गया और दुष्टता को आतंकवादी अनाचार को निर्वाध रूप से बरतते रहने की खुली छूट मिली और सामाजिक अधःपतन सामने आया।
चिन्तन करें।
चिन्तन उसी आधार पर दिशा पकड़ता है और गतिविधियों का निर्माण इसी प्रेरणा से बन पड़ता है। इन दूसरों को ही अध्यात्म की भाषा में−श्रद्धा, आस्था मान्यता, आकांक्षा आदि के नामों से पुकारा गया है। मनोविज्ञान की भाषा में इन्हें संचित संस्कार, दृष्टिकोण एवं अभ्यस्त आदतें कहते हैं। ईमान या नीयत इसी का नाम है। हम क्या चाहते हैं इसी आधार पर क्या सोचते और क्या करते हैं−इसकी पृष्ठभूमि बनती है।
चिन्तन, विवेकपूर्ण निर्धारण और सत्साहस की आवश्यकता है। बसन्त पर्व इसी शर्त पर दिव्य सत्ता के साथ साझीदारी करने और प्रचुर लाभ कमाने का सन्देश अनुरोध, आग्रह लेकर उपस्थित हुआ है। इसे स्वीकार करने में ही समझदारी है।
चिन्तन क्षेत्र पर लोभ और मोह के रूप में वासना और तृष्णा के रूप में शत प्रतिशत आधिपत्य जमाये हुए है। वासना और तृष्णा की, स्वार्थ और अहंकार की पेट और प्रजनन की परिधि से एक इंच आगे बढ़ सकना सम्भव नहीं होता है। शरीरगत सुविधा से आगे की बात न सोचने देने की विवशता को ही माया कहते हैं। उसी की जकड़न भव बन्धन कहलाती है। उसी के निविड़ पाश में दुर्भाग्यग्रस्त बन्दी की तरह प्राणी को अगणित कष्ट सहने पड़ते हैं।
चिन्तन, आत्म चिन्तन सायंकाल तीन घण्टे लोक सेवा शिक्षण। यही नौ घण्टे की दैनिक वर्चस् साधना है । वानप्रस्थ तपश्चर्या में आर्य परम्परा के अनुसार इन्हीं तीन तथ्यों का अभ्यास अवगाहन करना पड़ता है इन संगतियों के आधार पर कोई चाहे तो ब्रह्म वर्चस् को वानप्रस्थ साधनाश्रम भी कह सकता है। थोड़े−थोड़े समय के छोटे−छोटे सत्र बना देने से ही यह प्रतीत होता है कि यह शिक्षण वानप्रस्थ साधना से कोई भिन्न वस्तु है। उसे थोड़े−थोड़े समय की वानप्रस्थ साधना एवं उसकी पूर्व तैयारी कहा जाय तो भी कुछ अनुचित न होगा।
चिन्तन भी दिनचर्या में जुड़े रहने चाहिए। उपयोगी शौकों में फूल या शाक उगाना, वस्तुओं की सफाई सज्जा, टूट−फूट की मरम्मत, गीत वाद्य, सामूहिक प्रार्थना, खेलकूद जैसे कई कार्य सम्मिलित रखे जा सकते हैं। इनसे व्यस्तता और मनोरंजन का दुहरा उद्देश्य पूरा होता है और मस्तिष्क पर भारीपन नहीं जमने पाता।
चिन्तन स्वार्थ−संकीर्णता की अँधेरी गुफा में ही कैद नहीं रह सकेगा। संसार के यथार्थ को समझने में कोई बहुत बड़ी बाधायें नहीं है। विराट् के साथ तादात्म्य की अनुभूति की सारी सम्भावनायें मानव−मन में विद्यमान है, पर जब उसे अन्तः प्रक्रिया पर दृष्टिपात का अवसर मिले तब न? उसने तो माया−मोह के भ्रम जाल में, मेरे तेरे की संकीर्णता, काम क्रोध की कुत्सा और इन्द्रिय सुखों की ललक इस चार दीवारी में ही अपने को उस तरह बन्दी बना लिया है जिस तरह पिंजड़े में कैद शुक पिंजड़े के द्वार खोल देने पर भी उन्मुक्ति को कपोल कल्पना मान लेता है ओर फिर−फिर पिंजड़े में कैद हो जाता है। दृष्टिकोण विशाल बने तो ही सम्भव है कि जीवन के उच्च रहस्य हमारे सामने अभिव्यक्त हो और हम उच्च−आदर्शों और कर्तृत्व में आरूढ़ हों।
चिन्तन को−भावी निर्माण को−सुखद कल्पनाओं में नियोजित रखना पड़ता है। किशोर की दृष्टि में बचपन का अनगढ़पन चला जाना हानिकारक नहीं समझा जाता। प्रौढ़ावस्था आने पर किशोर काल की अनुभव हीनता समाप्त होने का दुःख नहीं मनाया जाता। वयोवृद्ध अपनी परिपक्वता पर गर्व करते हैं और प्रौढ़ों की अनुभवहीनता के लिए प्रताड़ना देते हैं। बच्चे किशोरावस्था की प्रतीक्षा करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-September
चिन्तन को नियोजित किये रहने से कार्य की सफलता का पथ-प्रशस्त होता है। किन्तु मनोनिग्रह की प्रक्रिया का यह आरम्भ है अन्त नहीं। निकृष्टता के साथ जुड़े हुए निषेधात्मक चिन्तन के प्रवाह को उलट कर उसे उत्कृष्टता की दिशा में लगाना और उससे सृजनात्मक गतिविधियों की नई रूपरेखा बनाना यही है मनोनिग्रह का वास्तविक उद्देश्य। चिन्तन जब उच्चस्तरीय उद्देश्यों को अपनाने के लिए कटिबद्ध होता है और परिष्कृत जीवन क्रम के साथ-साथ आन्तरिक विभूतियों और बहिरंग सफलताओं का द्वार खुलता है। विचारशक्ति मानव जीवन की सर्वोपरि सम्पदा है उसका सही उपयोग कर सकने वाले ही सुखी रहते और समुन्नत बनते देखे गये हैं।
चिन्तन तीनों जरूरी हैं। इन्हें ही गायत्री महामन्त्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणाओं की त्रिवेणी कहा जा सकता है।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व को अपनाकर यदि हलका फुलका-कलात्मक स्नेह सौजन्य से भरा-पूरा जीवन जिया जा सके तो इतने भर से शारीरिक और मानसिक व्यथाओं से बहुत हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। परिष्कृत व्यक्तित्व से महान कार्यों का सम्पादन और आत्मिक गरिमा से जीवन लक्ष्य की प्राप्ति जैसे वे लाभ भी इस मार्ग पर चलने से मिल सकते हैं जो शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं।
चिन्तन जब उच्चस्तरीय उद्देश्यों को अपनाने के लिए कटिबद्ध होता है और परिष्कृत जीवन क्रम के साथ-साथ आन्तरिक विभूतियों और बहिरंग सफलताओं का द्वार खुलता है। विचारशक्ति मानव जीवन की सर्वोपरि सम्पदा है उसका सही उपयोग कर सकने वाले ही सुखी रहते और समुन्नत बनते देखे गये हैं।
चिन्तन की त्रिवेणी में दिनभर सतत् स्नान करते हुए किए गए कर्म की वास्तविक अध्यात्म साधना का आनन्द अनुदान देते हैं। रात्रि को सोते समय बिस्तर पर जाने पर दिनभर के कर्तव्यों का शक्ति एवं निष्ठा में निर्वाह करने का स्मरण किया जाय। शेष रहे कार्य तथा दायित्व ईश्वर को सौंपकर पूर्ण निश्चिन्तता के साथ अनासक्त कर्मयोगी की तरह निद्रा−मृत्यु की गोद में विश्राम किया जाय। यही ‘हर दिन नया हर जन्म, हर रात नई मृत्यु’ सूत्र पर आचरण की विधि है। यही श्रेष्ठतम साधना है।
चिन्तन का तिनका अस्थिरता की आँधी में जहाँ−तहाँ उड़ता फिरेगा और किसी निश्चित स्थान तक पहुँच नहीं सकेगा।
चिन्तन में शालीनता जोड़ रखी जाय-दृष्टिकोण में आदर्शवादिता और जीवन कला के जाने माने तत्व घुले रहें तो इतनी उद्विग्नता का कोई कारण न रहेगा जिसके कारण इन भयानक आधि-व्याधियों का शिकार बनना पड़े।
चिन्तन क्षेत्र में उतरे तब उनका अवतरण स्थल उस परत से कहीं गहरा था जिसे मस्तिष्क सम्पदा कहते हैं। यह अन्तःकरण ही है जो न केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों का आधारभूत कारण है, वरन् मानवी व्यक्तित्व की उत्कृष्टता और सामाजिक संगठनों का उद्गमस्रोत भी यही है। यदि अन्तःकरण तत्व को मनुष्य से छीन लिया जाय तो उससे न वैज्ञानिक शोधों की आरम्भिक अनुभूति पाने की क्षमता रहेगी और न पशु आचरणों से ऊँचे उन आधारों के अपनाने की आशा की जा सकेगी, जिसे मानवी संस्कृति कहा जाता है। सर्वतोमुखी प्रगति का श्रेय जितना शारीरिक और मानसिक श्रमशीलता को दिया जाता है उससे भी अधिक संस्कृति को मिलना चाहिए।
चिन्तन को सुनियोजित दिशा में लगाये रहना भी नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं को पालन करने की तरह है। विचारों को कुछ भी सोचने की छूट नहीं मिलनी चाहिए। विशेषतया अनावश्यक, अव्यावहारिक अनुपयुक्त प्रसंगों पर तो मनःशक्ति का छोटा−सा अंश भी नहीं लगना चाहिए। बर्बादी में बिखराव भी एक कारण है। विचार शक्ति को दिशा विशेष में न लगाया जा सके तो फिर उसकी स्वेच्छाचारिता भटकती भर रहती है, उपार्जन उससे तनिक भी नहीं बन पड़ता।
चिन्तन हो ही न सके तो फिर यह अत्यन्त कठिन रहेगा किसी बात के हर पक्ष पर विचार कर सकना और सही निष्कर्ष पर पहुँच सकना सम्भव हो सके।
चिन्तन को सुसंस्कृत बनाने का सरल किन्तु प्रभावोत्पादक उपाय है।
चिन्तन रहने के लिए कुकल्पनाओं के पहाड़ निरन्तर आँखों के सामने से गुजरते रहते हैं। क्षुद्रता का एक दोष यह भी है कि वास्तविकता को असली रूप में समझने नहीं देती परिस्थितियों को बहुत बढ़ा कर या बहुत घटा कर दिखाती है। फलतः सही निर्णय ले सकना भी सम्भव नहीं रहता। अनिश्चितता और भीरुता का समन्वय इतना विकट होता है कि उसके दबाव को सहन कर सकना और संतुलन बनाये रहना अति कठिन हो जाता है।
चिन्तन और सही नियोजन का होता है। यह कार्य ठीक तरह तभी हो सकता है जब सोचने का काम करने वाला विचार−तन्त्र अभीष्ट प्रयोजनों में तन्मयता पूर्वक लगा रहे। थोड़ा वही अभीष्ट स्थान तक पहुँचता है जो सीधे रास्ते ठीक चलता रहे। यदि वह बेसिलसिले चाहे जिस दिशा में असंगत भगदड़ मचाता रहे तो थकान के अतिरिक्त और कुछ पल्ले नहीं पड़ेगा। विचार शक्ति भी अश्वशक्ति की तरह है जिसे अभीष्ट दिशा में लगाये रखा जाय, असंगत भगदड़ से बचाये रखा जाय तो ही आवश्यक क्रिया−कलापों में उत्साहवर्धक सफलता मिल सकती है।
चिन्तन के प्रवाह को उलट कर उसे उत्कृष्टता की दिशा में लगाना और उससे सृजनात्मक गतिविधियों की नई रूपरेखा बनाना यही है मनोनिग्रह का वास्तविक उद्देश्य। चिन्तन जब उच्चस्तरीय उद्देश्यों को अपनाने के लिए कटिबद्ध होता है और परिष्कृत जीवन क्रम के साथ-साथ आन्तरिक विभूतियों और बहिरंग सफलताओं का द्वार खुलता है। विचारशक्ति मानव जीवन की सर्वोपरि सम्पदा है उसका सही उपयोग कर सकने वाले ही सुखी रहते और समुन्नत बनते देखे गये हैं।
चिन्तन शक्ति को अनजाने और अनावश्यक विषयों में दौड़ते रहना ही बहुमूल्य विचार शक्ति को कूड़े करकट में बिखेरने के बराबर है। उत्पादन में श्रम की उपयोगिता को सभी जानते हैं, किन्तु सच पूछा जाय तो उसमें अधिक योगदान सही चिन्तन और सही नियोजन का होता है। यह कार्य ठीक तरह तभी हो सकता है जब सोचने का काम करने वाला विचार−तन्त्र अभीष्ट प्रयोजनों में तन्मयता पूर्वक लगा रहे। थोड़ा वही अभीष्ट स्थान तक पहुँचता है जो सीधे रास्ते ठीक चलता रहे। यदि वह बेसिलसिले चाहे जिस दिशा में असंगत भगदड़ मचाता रहे तो थकान के अतिरिक्त और कुछ पल्ले नहीं पड़ेगा।
चिन्तन के फलस्वरूप मनुष्य उद्विग्न और दरिद्र ही बना रहेगा। पिछड़ेपन और शोक संकट से उसे छुटकारा मिल ही न सकेगा। भले ही परिस्थितियाँ उसके अनुकूल हों अथवा साधनों का बाहुल्य सामने प्रस्तुत हो। व्यक्ति को सुविकसित और समाज को सुव्यवस्थित बनाये रहना इस बात पर निर्भर है कि लोक चेतना का धारा प्रवाह किस दिशा में चल रहा है। इन तथ्यों पर ध्यान देने से धर्म चेतना को वैज्ञानिक उपलब्धियों की तरह ही श्रेयस्कर माना जाएगा।
चिन्तन एकान्त के ही विषय हैं।
चिन्तन करें। उज्ज्वल भविष्य की आशा रखे। कर्तव्य को सही रीति से करने में आत्म-सम्मान अनुभव करें। दूसरों से सीमित अपेक्षा करें। परिस्थितियों से ताल-मेल बिठायें, जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलें और उसे खिलाड़ी की तरह बिना हार-जीत की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाये खेलें।
चिन्तन और क्रिया−कलाप स्वभावतया इसी दिशा में गतिशील रहना चाहिए।
चिन्तन, श्रम और समय की बहुमूल्य सम्पदाओं को नष्ट-भ्रष्ट ही करती चली जाती हैं।
चिन्तन का भी आश्रय आवश्यक है। शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को उत्कृष्ट आदर्शों के आधार पर अनुशासित सन्तुलित रखना ही चिन्तन का उद्देश्य है। इसके लिए प्रातः उठते ही दिनभर को अपने लिए जीवन का एक अनुपम उपहार मानना और उसके सर्वोत्तम सदुपयोग का संकल्प कर तदनुरूप योजना बनाना अनिवार्य है। माना जाय कि एक ही दिन के लिए यह जन्म है और आज ही रात को मृत्यु देवी की गोद में विश्राम करना है। अतः समय की सम्पदा और भावों के वैभव का श्रेष्ठतम समायोजन कर लिया जाना चाहिए, ताकि इस एक दिन के जीवन का अधिकाधिक लाभ लिया जा सके और इस मार्ग की सभी बाधाएं दूर की जा सकें।
चिन्तन, मनन से तो मन में अवांछित इच्छाओं के प्रति विरक्ति ही दृढ़ हो जाएगी। शरीर की आवश्यकताएं प्रयोजन−पूर्ति में साधक या बाधक होने की कसौटी पर कसी जाएंगी। ईश्वरीय प्रयोजन का वाहन शरीर सुदृढ़−स्वस्थ रहे, यही आवश्यक है।
चिन्तन तथा कर्तृत्व को सही बनाये रखा जाय तो फिर वे कारण सहज ही तिरोहित होते दिखाई पड़ेंगे जो असंतोष भड़काने और अप्रसन्न रखने के लिए जिम्मेदार थे।
चिन्तन। तीनों का सन्तुलन ही समग्र साधना का स्वरूप है। तीनों में से एक की भी कमी अन्न, जल और वायु में से एक की कमी होने जैसा है। जीवन−यात्रा के लिये जैसे ये तीनों जरूरी हैं, जीवन साधना के लिए उसी तरह भजन, मनन, और चिन्तन तीनों जरूरी हैं। इन्हें ही गायत्री महामन्त्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणाओं की त्रिवेणी कहा जा सकता है।
चिन्तन और साधनों को बर्बादी करते रहते हैं। इसे बुद्धिमानी कहा जाय या मूर्खता, इसका निर्णय उन्हीं पर छोड़ा जाना चाहिए जो आत्महीनता की ग्रन्थि से ग्रसित रह कर बड़प्पन के उथले सरंजाम खड़े करते रहने में सामर्थ्य का बहुत बड़ा अंश ऐसे ही अस्त−व्यस्त और नष्ट−भ्रष्ट करते रहते हैं।
चिन्तन का बहुत बड़ा अंश इन्हीं निरर्थक जाल जंजालों के रचने में नष्ट होता रहता है। यदि उसे बचाया जा सका होता और उस बचत को सृजनात्मक प्रयोजनों में लगाया जा सकना सम्भव रहा होता तो उतने भर से ही प्रगति के नये आयाम बनते और नये द्वार खुलते।
चिन्तन की उत्कृष्टता इसी में है कि अपनी ही तरह औरों को भी ईश्वरीय−चेतना से समान मात्रा में सम्पन्न मानकर उनके प्रति सम्मान, स्नेह और कर्त्तव्य की भावना रखी जाए। मानसिक प्रतिक्रियाएं हमारी अपनी हलचलें हैं। ऐसा स्मरण रहे, तो दूसरों से व्यवहार में उत्तेजना की बजाय संयम ही रहेगा। उत्तेजना का कारण हमारी अपनी मानसिक दुर्बलता होती है और उसे हम विषयों, पदार्थों, सहकर्मियों या अन्य व्यक्तियों पर आरोपित कर देते हैं। इसकी प्रतिक्रिया में दूसरी ओर से भी उत्तेजना ही होती है।
चिन्तन की तुलना में शुभ सम्भावनाएँ सोचते रहना ही लाभदायक है। उतने समय तक खिन्न रहने की अपेक्षा प्रसन्न रहने का और उस आधार पर शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य संभाले रहने का अवसर मिल गया, यही क्या बुरा रहा? यदि अनिश्चित कल्पना के आधार पर मुस्कान बनाये रखी जा सके तो वह कल्पना भी सृजनात्मक ही रही।
चिन्तनशील व्यक्ति के पास उनके विरोधी सद्विचारों की प्रचण्ड सेना तैयार रहती है। दुर्भावनाओं−कुविचारों के अनुरूप आचरण से होने वाली हानि तथा उनके विरोधी सदाचार के पालन से प्राप्त शान्ति−सन्तोष और शक्ति का गम्भीर ऊहापोह सदा ही सत्पथ पर ले जाता है। सत्पथ पर सतत् यात्रा से ही सदा श्रेष्ठ उपलब्धियाँ करतलगत होती रही हैं और होती रहेंगी।
चिन्तन क्षमता को बर्बाद करते हैं वरन् पतन और संकट के सरंजाम भी जुटा कर खड़े कर देते हैं।
चिन्तन की बहुमूल्य सम्पदा की बर्बादी तो होती ही रहेगी। ‘खाली दिमाग शैतान की दुकान’ वाली लोकोक्ति के अनुसार अवांछनीय विचारों में रस मिलने लगे तो सर्वनाश के आधार बन चलेंगे। सभी जानते हैं कि मस्तिष्क पर कामुकता के अश्लील विचार छाये रहे तो प्रत्यक्ष रति कर्म न हो सकने पर भी शारीरिक, मानसिक और नैतिक क्षति कितने बड़े परिमाण में होती है अन्य, अवांछनीय विचार भी न केवल चिन्तन क्षमता को बर्बाद करते हैं वरन् पतन और संकट के सरंजाम भी जुटा कर खड़े कर देते हैं।
चिन्तन का उद्देश्य है। इसके लिए प्रातः उठते ही दिनभर को अपने लिए जीवन का एक अनुपम उपहार मानना और उसके सर्वोत्तम सदुपयोग का संकल्प कर तदनुरूप योजना बनाना अनिवार्य है। माना जाय कि एक ही दिन के लिए यह जन्म है और आज ही रात को मृत्यु देवी की गोद में विश्राम करना है। अतः समय की सम्पदा और भावों के वैभव का श्रेष्ठतम समायोजन कर लिया जाना चाहिए, ताकि इस एक दिन के जीवन का अधिकाधिक लाभ लिया जा सके और इस मार्ग की सभी बाधाएं दूर की जा सकें। ‘हर दिन नया जन्म, हर रात नई मृत्यु’ का तथ्य सामने होने पर यह कुछ कठिन न होगा।
चिन्तन करते समय हमें सूर्य और पृथ्वी के भविष्य का विचार करना पड़े तो उसे अनावश्यक नहीं माना जाना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-March
चिन्तन के नये आयामों का उदय हुआ। जिसके मस्तिष्क में दो विचार हों उनसे वह अधिक से अधिक चार बना सकता है किन्तु हजार विचारों वाले के लिये लाख चिंतन भी कम है। यह शक्ति मात्र स्वाध्याय से उभरती है−शा में उभरी। स्वाध्याय को जीव का प्राण मानने के कारण ही उन्होंने जीवन के अन्तिम क्षणों तक पढ़ने का क्रम बराबर बनाये रखा और चाहे सब कुछ छोड़ दिया हो। यही स्थिति पाश्चात्य विचारक जान स्टुअर्ट मिल की भी थी।
चिन्तन न कर सकने वाले ही आदर्शवादिता का मार्ग अपनाने में घाटा और मोहग्रस्त जीवन-क्रम बनाये रहने में नफा सोचते हैं। वस्तुतः यह उनका भ्रम है। लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति भी सच्चे अर्थों में उत्कृष्टता अपनाकर ही पाई जा सकती है। जागृत आत्माओं को युग का निमन्त्रण स्वीकार करने में घाटा प्रतीत हो सकता है, पर है उसमें हर दृष्टि से लाभ ही लाभ।
चिन्तन, मनन तथा निदिध्यासन कर भारतीय तत्वदर्शियों ने कहा कि उसे ही जानो उसे ही प्राप्त करो। आत्मा को जाने बिना व्यक्ति की क्षुद्रताएँ, तृष्णा और वासनाएँ, अभाव अशक्ति और अज्ञान विगलित नहीं होते।
चिन्तन भी वैसा ही परिष्कृत हो जाता है जैसा कि ईश्वर के साथ निरन्तर रहने वाले का होना चाहिए। पारस को छूकर लोहे का सोना हो जाना−चन्दन के समीपवर्ती पादपों में सुगन्ध आना, अग्नि की समीपता से उष्णता बढ़ना−समीपवर्ती को छूत लगना यही सही है तो कोई कारण नहीं कि जिसे अपनी अन्तरात्मा में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होता है वह उसी स्तर का बनने में क्यों असफल रहेगा। हाँ, अन्तरात्मा में वैसी अनुभूति न होती हो। जीभ, कान और मस्तिष्क तक ही आत्म−ज्ञान की विडम्बना उलझकर रह गई हो तो बात दूसरी है।
चिन्तन चेतना का असाधारण परिष्कार हो सकता है और हम सहज ही मनोबल सम्पन्न बन सकते हैं। कहना न होगा कि मनोबल की गरिमा शरीर बल, शिक्षा बल, धन बल, कौशल बल, साधन बल आदि सभी की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है। उसके सहारे मनुष्य उन्नति के उस चरम शिखर पर पहुँच सकता है; जिसकी आज तो कल्पना कर सकना भी कठिन है।
चिन्तन एवं रहन−सहन, दूसरे उस क्षेत्र की प्रकृतिगत भिन्नता विशेषता इन दोनों प्रभावों के कारण उस क्षेत्र के निवासियों का एक विशेष ढर्रा बन जाता है और वह गुण, कर्म, स्वभाव में गहराई तक अपनी जड़ जमा लेता है। संस्कृतियों को भिन्नताओं के यही दो प्रमुख आधार है। यों मनुष्य स्वतन्त्र और समर्थ है वह अपनी संकल्प शक्ति के बल पर परम्परागत सभी दबावों को बदल सकने में सैद्धान्तिक दृष्टि से पूर्णतया सक्षम है पर व्यवहार में होता यही है कि वातावरण अपने प्रभाव से उस क्षेत्र के मनुष्यों को ढालता चला जाता है। व्यक्ति की मौलिक विशेषता को मान्यता देते हुए भी यह स्वीकार करना ही होगा कि जन समाज की बहु संख्या विचारपूर्ण नहीं वातावरण के प्रभाव जीवनयापन करती है। व्यापक क्रान्तियाँ कुछ व्यक्तियों के बदलने से सम्पन्न नहीं होती वरन् वातावरण में ऐसा परिवर्तन लाना पड़ता है जिसके प्रभाव से जन साधारण को परिष्कृत ढंग से सोचने और उपयोगी क्रिया कलाप अपनाने का साहस एवं अवसर उपलब्ध हो सके।
चिन्तन और युगान्तर सत्ता के प्राणवान् सत्संग का लाभ जुड़ जाने से उसकी महत्ता बहुत अधिक बढ़ गई है। जागृत आत्माओं को इस वातावरण, इस तीर्थ के पर्व स्नान की तैयारी प्रारम्भ कर देनी चाहिये।
चिन्तन या प्रयत्न से उपलब्ध नहीं होता। मिलजुल कर ही उसे उगाया, कमाया और बढ़ाया जाता है। आत्मीयता का विस्तार करने से जितने क्षेत्र में गहरी घनिष्ठता उत्पन्न कर ली जाती हैं उसमें चल रहे सहयोग से भौतिक आनन्द मिलता है। इस प्रकार का पारस्परिक आदान−प्रदान उच्च आदर्शों के आधार पर ही बन पड़ता है। स्वार्थों की मैत्री में जल्दी ही खींचतान आरम्भ हो जाती है और जहाँ उनमें कमी पड़ती है वहीं टकराव आरम्भ होकर शत्रुता तक की स्थिति बन जाती है।
चिन्तन एवं साधना अभ्यास का अवसर मिलता था। उसमें स्थिति के परिवर्तन का समुचित अवसर मिलता था। लोग जिस स्थिति में जाते थे उसकी तुलना में अपना बाहरी और भीतरी स्वरूप बहुत कुछ बदल कर ही आते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-April
चिन्तन से सामाजिक व्यवस्था ही सुरक्षित रहती है, अर्थात् उस समय धर्म के प्रति मनुष्य की धारणा-विचारणा गलत हो जाने से ‘धर्म’ से होने वाले लाभ नहीं होते व इस तरह धर्म के प्रति विषाक्त धारणा बनाकर जो आचरण किया जाता है वह भी ‘श्रेय’ न होकर ‘प्रेय’ ही अधिक रहता है। अतः धर्म की यह एक प्रकार से क्षति ही हुई ऐसे में श्रीकृष्ण ने अपने अवतार लेने की घोषणा कर धर्म संस्थानार्थ के रूप में यही बात कही है कि जब-जब ऐसी स्थिति होती है तब-तब मनुष्य यदि अपने विवेक का उपयोग करे, अपनी ऋतम्भरा प्रज्ञा का उपयोग कर उचित-अनुचित का निर्धारण को तो धर्म की तथा धर्म को ध्येय मानकर किए जाने वाले आचरण की उपयोगिता व्यक्ति परिष्कार व समाज व्यवस्था की बनी रहेगी।
चिन्तन के सूक्ष्मतम होने से ज्ञान चेतना के कोश परस्पर जुड़ते हुए चले जाते हैं और सामान्य मस्तिष्क जो सन्देश, प्रेरणायें अनुभूतियाँ नहीं ग्रहण कर पाते उनके लिये सुलभ हो जाती हैं। सर आलिवर लाज ने भी अपनी बौद्धिक क्षमतायें इसी आधार पर विकसित की थीं और यह माना था हमारी ज्ञान चेतना पदार्थ जन्म न होकर विराट चेतना का ही एक अंश और अंग है। जब तक इस बात को नहीं समझते तब तक हमारे दृष्टिकोण भी भौतिकतावादी बने रहते हैं। तब पाप−पुण्य में कोई अन्तर ही नहीं रहता, नैतिकता का कोई अर्थ ही नहीं होता। आज जो सर्वत्र पीड़ा और पतन के दृश्य हैं, स्वार्थ संकीर्णता ने पुण्यपरमार्थ को दबोच रखा है, वह उसी मान्यता का दुष्परिणाम है।
चिन्तन, समय प्रभाव एवं धन का कुछ महत्वपूर्ण अंश लगा सकना सम्भव होगा। धर्म स्थापना का दूसरा पक्ष है अधर्म अन्याय कर्ताओं का आक्रमण आघात सहना पड़ता है। दोनों ही दृष्टि से धर्म और नीति के समर्थकों को पग−पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। आदर्शवादिता का निर्वाह इससे कम मूल्य चुकाये हो नहीं सकता। अस्तु श्रेय पथ पर चलने वालों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे पहले से ही अपनी स्थिति ऐसी बना लें जिसमें पीछे शिकायतें करने या पछताने की आवश्यकता ही न रहे।
चिन्तन और व्यवहार में कूट−कूटकर भर लेने की आवश्यकता होती है। नीति का जीवन अपनाने के लिए प्राणवान निष्ठा की आवश्यकता होती है, उसे अपनाना ही पशु जीवन से छूटकर नव जीवन में, मनुष्य जन्म में प्रवेश पाना है।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की दिशा में मनुष्य को अग्रगामी बनाने के लिए कुछ नीति नियमों का निर्धारण है। सम्प्रदाय उस दृष्टिकोण को मानने वाले समुदाय के रहन−सहन का तरीका है। यह तरीका मात्र आदर्शों से ही प्रेरित नहीं होता वरन् परिस्थितियों, साधनों एवं परम्पराओं पर आधारित होता है। उसमें तत्व के सिद्धान्त भी किसी मात्रा में घुले−मिले हो सकते हैं, पर कोई समूचा सम्प्रदाय समूचे धर्म तत्व का प्रतिनिधित्व नहीं करता। उसमें दूसरी चीजों का भी समावेश हो सकता है।
चिन्तन से हम इस संसार को भगवान का विराट् स्वरूप और अपने कलेवर को ईश्वर के मन्दिर जैसा पवित्र अनुभव कर सकते हैं। जहाँ ऐसी दृष्टि होगी वहाँ दूसरों से सद्व्यवहार करने और अपने उत्कृष्टता बनाये रखने की ही आकांक्षा बनी रहेगी और उसे जितना कार्यान्वित करना बन पड़ेगा, उतना ही अपना और दूसरों का सच्चा हित साधन बन पड़ेगा। सुसंस्कृत दृष्टिकोण अपनाकर मनुष्य अपने देवत्व को विकसित करने और वातावरण को सुख−शान्ति से भरा−पूरा बनाने में आशाजनक सफलता प्राप्त कर सकता है।
चिन्तन न करने वाला मनुष्य तो पशु से भी गया बीता है। लंकावतार सूत्र के अनुसार भगवान बुद्ध का वचन है— जब तक संसार का एक भी प्राणी बन्धन में बँधा है, तब तक मैं मोक्ष को स्वीकार न करूँगा। मुझे तो पिछड़ों की सेवा ही अभीष्ट है। स्कन्द पुराण के भक्त प्रह्लाद की भावना है—दुखियारों में ही मुझे भगवान दीखते हैं। पीड़ितों की सेवा में मुझे भजन का आनन्द मिलता है।
चिन्तन, स्वभाव, गुण व उसकी आत्मा तक विस्तृत है। यदि हर मनुष्य इस सत्ता के अधीन अपने को सम्बद्ध कर ले, इस सत्ता के अनुशासन में रह अपना गुण, कर्म, स्वभाव बना ले तो वह स्वयं सत्तामय हो जाय।
चिन्तन की प्रेरणा मिलती है। उत्सव के अवसर पर इसी दृष्टि से प्रवचन उद्बोधनों का क्रम चलता है। आत्म−चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म विकास के चारों पक्ष मिलकर समग्र आत्मिक प्रगति का ढांचा खड़ा करते हैं। उस हर्षोत्सव के समय प्रस्तुत दुर्गुणों में से एक को घटाने और जिनकी कमी है उन सद्गुणों में से एक को बढ़ाने की प्रतिज्ञा ली जाती है।
चिन्तन, दैनिक गतिविधियों पर कड़ी दृष्टि रखना और उनमें अव्यवस्था और अवांछनीयता का समावेश न होने देना। यही छोटा सूत्र आत्म−निर्माण का आधारभूत सिद्धान्त है। इसका आरम्भ कितने ही छोटे रूप में क्यों न किया जाय, पर उस निर्धारण को कार्यान्वित अवश्य किया जाना चाहिए।
चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म विकास के चारों पक्ष मिलकर समग्र आत्मिक प्रगति का ढांचा खड़ा करते हैं। उस हर्षोत्सव के समय प्रस्तुत दुर्गुणों में से एक को घटाने और जिनकी कमी है उन सद्गुणों में से एक को बढ़ाने की प्रतिज्ञा ली जाती है।
चिन्तन शक्ति, भावनाओं, संवेदनाओं को मात्र रासायनिक संवेग मानकर मनुष्य जीवन को नितान्त भौतिक मानने की भूल थोड़े से वैज्ञानिकों ने की है। अधिकाँश ने या तो तथ्यों को अत्यन्त गूढ़ कहकर निष्कर्ष निकालने का विचार ही त्याग दिया या फिर श्रद्धापूर्वक उनने यही स्वीकार किया कि मानवीय चेतना का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है। वह भौतिकीय तत्वों का सम्मिलित मात्र ही नहीं अपितु विराट् चेतना का ही अंश है। वह शरीर रूप नाम का पिंड मात्र नहीं, अनादि अनन्त गुण वाला चेतन तत्व है। शरीरों का इन्द्रियों का विकास उसकी इच्छानुसार, उसके संकल्प के आधार पर हुआ है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-January
चिन्तन को सही धारा से प्रभावित कर सकने का ज्ञान न होने से विचार शक्ति भ्रान्तियों और विकृतियों में भटकती है। इस भटकाव में उद्वेग और विक्षोभ ही हाथ लगता है।
चिन्तन की संकीर्णता न होती तो बात किसी हद तक तब भी ठीक हो सकती थी जब आत्मविकास को अध्यात्मवादी दिशा को उपेक्षणीय मान लिया जाता, किन्तु इस चिन्तन के घोर दुष्परिणाम अपने भौतिक जीवन को भी प्रभावित किये बिना मानते नहीं। रेल चौबीस घंटे चलती रहे यह अच्छी बात है, पर यदि उसे कुछ स्टेशनों के बाद रोक कर पानी न भरा जाये, ईंधन न डाला जाय तो क्या गाड़ी चलती रह सकेगी? शिफ्टें बदल कर मजदूर लगाते रहे जायें, पर मशीन का पहिया न रुके तो मशीन कितने दिन तक चल सकती है। विश्राम के ही क्षण ले लें, यदि उस अवधि में क्रीड़ा, मनोविनोद मन-बहलाव की सुविधा न हो तो ऊब और मानसिक थकावट के कारण व्यक्ति का आयुष्य आधा रह जायेगा। सर्वेक्षणों से पता चला है कि विवाहितों की अपेक्षा विधुरों की मृत्यु का अनुपात अधिक है यह इस बात का प्रतीक है कि जीवन की शुष्कता चाहे किसी भी क्षेत्र में मारक प्रतिफल उत्पन्न करती है जब कि अनेक क्षेत्रों में बौद्धिक अभिव्यक्ति से दीर्घायुष्य और स्वस्थ मनोबल का विकास होता है।
चिन्तन प्रवाह अपना सीधा रास्ता छोड़कर भटकावों में फँस जाता है। प्यार पाने की असफलता का कारण सम्भव है उस व्यक्ति के अपने ही दोष दुर्गुणों में रहा हो, पर इससे क्या उसकी आकाँक्षा तो अतृप्त ही रह गई। वह यह समीक्षा कहाँ कर पाता है कि दोष अपना है या पराया। भोजन किसी भी कारण न मिले, पेट का विक्षोभ तो हर हालत में रहेगा ही। इसी प्रकार प्यार के अभाव में मनुष्य अपना मानसिक सन्तुलन धीरे-धीरे खोता चला जाता है और एक दिन स्थिति वह आ जाती है जिसमें उसे विक्षिप्त एवं अर्ध-विक्षिप्त के रूप में पाया जाता है।
चिन्तन और चरित्र तक इस शक्ति प्रवाह पर आश्रित रहता है। न केवल सूर्य वरन् न्यूनाधिक मात्रा में सौरमण्डल के ग्रह, उपग्रह तथा ब्रह्मांड क्षेत्र के सूर्य तारक भी हमारी सत्ता स्थिरता एवं प्रगति की प्रभावित करते हैं।
चिन्तन, सूझबूझ एवं सही निर्णय लेने जैसी अनेक मानसिक क्षमताओं के विकास में ऐसे खाद्य पदार्थों की सहायता ली जा सकती है जिनमें मानसिक परिपोषण के उपयुक्त रासायनिक पदार्थों की उपयोगी मात्रा मौजूद है।
चिन्तन में स्वस्थ अध्यात्मवादी दृष्टिकोण का भी समावेश होता है जो व्यक्ति समाज और संसार सभी के लिये उज्ज्वल सम्भावनाओं का अध्याय है। संसार की शाँति और प्रगति इसी दृष्टिकोण पर आधारित है यह सुनिश्चित मानना चाहिए।
चिन्तन को इन चारों परतों का समन्वय करने से समग्र ज्ञान साधना का उद्देश्य पूर्ण होता है। इनमें से एकाध का ही उपयोग किया जाय तो बात अधूरी रह जाएगी और विचार शक्ति का जो लाभ मिलना चाहिए वह मिल न सकेगा।
चिन्तन द्वारा विवेक बुद्धि परिष्कृत होती है और इन्द्रियनिग्रह द्वारा मन चले मन को सत्संकल्प करने वाले उपयोगी चित्र गढ़ने वाला बनाया जाता है। यही है आत्म-साधना की पृष्ठभूमि और संक्षिप्त रूप रेखा।
चिन्तन परामर्श दैत्य वर्ग का है। इसमें तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ बताया जाता है और कहा जाता है कि भविष्य की बातें सोचना व्यर्थ है। भविष्य में क्या होना है इसे कौन जाने? प्रत्यक्ष की उपेक्षा करके परोक्ष की अपेक्षा क्यों की जाय? इन तर्कों से प्रभावित जीवात्मा को लोभ और मोहग्रस्त जीवन जीना पड़ता है।
चिन्तन में आदर्शवादी उत्कृष्टता का समावेश करने के लिए स्वाध्याय, सत्संग, अनुभव सम्पादन प्रशिक्षण आदि प्रयत्नों की तरह ही एक अति महत्वपूर्ण उपाय यह है कि आहार ऐसा लिया जाय जिसमें न केवल जल्दी पचने की वरन् सतोगुणी प्रकृति की सूक्ष्म विशेषताएँ भी विद्यमान हों। आहार का निर्धारण करते समय यदि स्वाद को प्रधानता देने के स्थान पर आहार में सन्निहित सतोगुणी विशेषता को ध्यान में रखा जाय तो निश्चय ही इससे मानसिक विकास में असाधारण सहायता मिल सकती है। कहना न होगा कि जीवन की प्रगति और सार्थकता का अवलम्बन मस्तिष्क की दिशा धारा पर निर्भर है और उसको सही रखने के लिए उपयुक्त आहार का महत्व समझने और खाद्य के चयन में सतर्कता बरतने की आवश्यकता होगी।
चिन्तन, ध्यान, धारणा जैसी चिन्तन प्रधान साधनाओं में नियोजित किया जाता है। सबसे ऊँची स्थिति भाव सम्वेदनाओं के उभार उल्लास की है। इसी में भक्तियोग बन पड़ता है। आत्मवत् सर्व भूतेषु-वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता इसी आत्म विश्वास की स्थिति में हृदयंगम हो पाती है। सब हमारे-हम सबके की उच्च मनोभूमि बन पड़ने पर मनुष्य साधु-ब्राह्मण, परिव्राजक, लोकसेवी की तरह आचरण करता है उसका ‘अहम्’ विस्तृत होते-होते ‘त्वम्’ बन जाता है।
चिन्तन के घोर दुष्परिणाम अपने भौतिक जीवन को भी प्रभावित किये बिना मानते नहीं। रेल चौबीस घंटे चलती रहे यह अच्छी बात है, पर यदि उसे कुछ स्टेशनों के बाद रोक कर पानी न भरा जाये, ईंधन न डाला जाय तो क्या गाड़ी चलती रह सकेगी? शिफ्टें बदल कर मजदूर लगाते रहे जायें, पर मशीन का पहिया न रुके तो मशीन कितने दिन तक चल सकती है। विश्राम के ही क्षण ले लें, यदि उस अवधि में क्रीड़ा, मनोविनोद मन-बहलाव की सुविधा न हो तो ऊब और मानसिक थकावट के कारण व्यक्ति का आयुष्य आधा रह जायेगा। सर्वेक्षणों से पता चला है कि विवाहितों की अपेक्षा विधुरों की मृत्यु का अनुपात अधिक है यह इस बात का प्रतीक है कि जीवन की शुष्कता चाहे किसी भी क्षेत्र में मारक प्रतिफल उत्पन्न करती है जब कि अनेक क्षेत्रों में बौद्धिक अभिव्यक्ति से दीर्घायुष्य और स्वस्थ मनोबल का विकास होता है।
चिन्तन प्रधान साधनाओं में नियोजित किया जाता है। सबसे ऊँची स्थिति भाव सम्वेदनाओं के उभार उल्लास की है। इसी में भक्तियोग बन पड़ता है। आत्मवत् सर्व भूतेषु-वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता इसी आत्म विश्वास की स्थिति में हृदयंगम हो पाती है। सब हमारे-हम सबके की उच्च मनोभूमि बन पड़ने पर मनुष्य साधु-ब्राह्मण, परिव्राजक, लोकसेवी की तरह आचरण करता है उसका ‘अहम्’ विस्तृत होते-होते ‘त्वम्’ बन जाता है।
चिन्तन को कुछ अत्यन्त कठोर निर्णय करने आवश्यक हो गई है। परमाणु शक्ति सम्पन्न होने वाली बात ही मुख्य नहीं है, वरन् प्रौद्योगिकी के भीषण विकास का भी प्रश्न है यदि इस पर रोक नहीं लगाई जाती तो विद्युत शक्ति के लिए भी अणु-विखण्डन आवश्यक बना रहेगा और इस तरह भावी पीढ़ी की बाधिता व मनुष्यता के विनाश का चक्र चलता ही रहेगा।
चिन्तन और अधिक प्रखर साहस अपनायें, जिससे जितना अनुदान बन पड़े वह उसके लिए अधिक से अधिक प्रयास करे। यही अपने युग की सबसे बड़ी माँग और यही अन्तरात्मा की सबसे बड़ी पुकार है। बसन्त पर्व इसी नव-जागरण का विशेष संदेश लेकर आ रहा है। इसे सुनना और शिरोधार्य करना ही हमारे लिए श्रेयस्कर है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-November
चिन्तन मनन भी निरन्तर ही चलता रहता था। मन्त्रदर्शन की साधना में नया अंग था केवल प्रव्रज्या और लोकशिक्षण का।
चिन्तनक्रम में चमत्कारी परिवर्तन का कारण बनेंगे।’’
चिन्तन चल पड़ता है जो मस्तिष्क को खिन्नता और शरीर को रुग्णता से ग्रसित बनाये रहे।
चिन्तन की शैली, आकांक्षा और दिशा का प्रभाव न केवल इस जीवन में विविध हलचलों की केन्द्रीय प्रेरणा के रूप में क्रियाशील रहता है, अपितु अगले जीवन में भी यह प्रभाव बना रहता है। व्यक्तित्व को विकसित एवं परिवर्तित कर सकने की वास्तविक शक्ति इन्हीं संस्कारों की प्रखरता में सन्निहित है। संस्कार किसी ग्रह-नक्षत्र की कृपा से नहीं बनते-बिगड़ते। मनुष्य अपने मनोबल, विवेक और पुरुषार्थ से ही उन्हें निखारता है। अतः सत्संस्कारों को ही जन्म-जन्मान्तर तक साथ देने वाले अभिन्न-मित्र समझकर उनकी संख्या और शक्ति बढ़ाने के लिए सदा सजग रहने में ही बुद्धिमानी है।
चिन्तन क्षमता का कोई समाधान नहीं मिलता।
चिन्तन चलता है, भाव-सम्वेदनाओं की अनुभूति होती है। शरीर विज्ञान की अद्यतन शोध प्रगति भी मस्तिष्कीय केन्द्र का रहस्य समझ पाने में असमर्थ रही है। डॉ0 मैकडूगल ने अपनी पुस्तक “फिजियोलॉजिकल साइकोलॉजी” में लिखा है- ‘‘मस्तिष्क की संरचना को कितनी ही बारीकी से देखा समझा जाय यह उत्तर नहीं मिलता कि मानव प्राणी पाशविक स्तर से ऊँचा उठकर किस प्रकार ज्ञान-विज्ञान की धारा में बहता रहता है और कैसे भावनाओं सम्वेदनाओं से ओत-प्रोत रहता है। भाव सम्वेदनाओं की गरिमा को समझाते हुए हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि मनुष्य के भीतर कोई अमूर्त सत्ता भी विद्यमान है, जिसे आत्मा अथवा भाव चेतना जैसा कोई नाम दिया जा सकता है।”
चिन्तन की दृष्टि से बहुत ऊँची स्थिति रह रहा हो। व्यक्ति की गरिमा, मात्र उसकी आन्तरिक आस्थाओं को देखने से ही जानी जा सकती है। नीयत ऊँची रहने पर यदि व्यवहार में भूल या भ्रम से कोई ऐसा काम बन पड़े जो देखने वालों को अच्छा न लगे, तो भी यथार्थता जहाँ की तहाँ रहेगी। अव्यवस्था फैलाने के लिए उसे दोषी समझा और दण्डित किया जा सकता है। इतने पर भी उसकी उत्कृष्टता अक्षुण्ण बनी रहेगी।
चिन्तन का स्तर ऊँचा उठाये। उसे आत्म गौरव की अनुभूति कराने के साथ-साथ सज्जनता को व्यवहार में उतारने का साहस भी प्रदान करे।
चिन्तन और आदर्शवादी व्यवहार से समन्वित देव जीवन किस प्रकार सामान्य अथवा जटिल परिस्थितियों के बीच जिया जा सकता है उसका अनुभवपूर्ण मार्गदर्शन अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर मिलता है। असंख्यों ने इन प्रेरणाओं और परामर्श के आधार पर अपने को बदला और ढाला है। पत्रिका का मार्गदर्शन एक प्रकार से जीवन साधना का पाठ्यक्रम ही कहा जा सकता है।
चिन्तन मनन’-अर्चनाना ने समझाया और श्यावाश्व अपने पिता की चरण धूलि लेकर निकल पड़े। स्नातक ब्रह्मचारी तो वह थे ही, आश्रम का निर्वाह भी भिक्षाटन से ही होता था, ऋषि कुमार का चिन्तन मनन भी निरन्तर ही चलता रहता था। मन्त्रदर्शन की साधना में नया अंग था केवल प्रव्रज्या और लोकशिक्षण का।
चिन्तन भी उत्कृष्टता की प्रेरणा भरता रहे। करना मूल्यवान है, पर सोचना अव्यक्त होते हुए भी क्रिया-कलाप के समतुल्य ही महत्वपूर्ण है। लोगों को श्रेष्ठ काम करने के लिए कहा जाय, पर साथ ही उन्हें यह भी सुझाया जाय कि कर्म का बाह्य स्वरूप ही सब कुछ नहीं है, उसकी आत्मा तो उद्देश्यों में निवास करती है।
चिन्तन पक्ष को उच्चस्तरीय बनाने की दृष्टि से अखण्ड-ज्योति ने जो भागीरथी प्रयास किये हैं उन्हें अनुपम ही माना जाता है।
चिन्तन की मनोभूमि होनी चाहिए। तथ्यों को समझने के लिए पूर्वाग्रहों से मुक्त रहना आवश्यक है। औचित्य को ही प्रधानता दी जाय। तथ्यों को तर्क और प्रमाणों की कसौटी पर कसा जाय। मानवी आदर्शों को सर्वोपरि रखा जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-June
चिन्तन के कारण जो अलग– थलग पड़ता है , वह उस संसार की अति महत्वपूर्ण सरसता से वंचित ही रह जाता है।
चिन्तन व्यक्ति को न केवल जीवन्त रूप से तोड़ देता है, वरन् वे स्रोत भी बन्द कर देता है। जिन पर विचार किया जाता, तो बहुत सम्भावना थी कि निर्धनता इतनी कष्टकारक नहीं बनती। संसार के सभी महापुरुषों ने स्वेच्छा से गरीबी का वरण किया हैं ? गरीबी कोई बुरी चीज नहीं है- बुरी और कष्टकारक है ,उसके प्रति हमारा अपना दृष्टिकोण। भारत और विश्व के इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं ,जिनमें कई महापुरुषों ने अपना जीवन - खर्च चलाया।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाना पड़ता है; इतना करने के बाद ही आत्मा का विकास या आत्मानुभूति का दिव्य लाभ मिल पाता है।
चिन्तन के स्थान पर सद्भावपूर्ण आचरण यथा, – क्षमायाचना, मित्रता ,उपकार आदि का आचरण करें। (3) जुडिशस फारगेटफुलनेश –अर्थात् बार-बार उन बातों को मन में लाने की अपेक्षा, उस समय कोई अच्छी पुस्तक पढ़ने, धर्मपत्नी के साथ मनोविनोद करने, संगीत सुनने जैसे किसी अन्य कार्य में मन को घुलाकर उस बात को भूल जाया करें। (4) इमैजिनेशन अर्थात् अपनी आत्मा के सम्मुख अपने आप को खड़ा करके सम्वेदनापूर्ण चिन्तन किया करें। उस समय अपने आपको अबोध शिशु और अन्तःकरण को माँ मानकर उस तरह की भावनायें जगाया करें, जैसी माँ बेटे के मध्य होती हैं।
चिन्तन किया करें। उस समय अपने आपको अबोध शिशु और अन्तःकरण को माँ मानकर उस तरह की भावनायें जगाया करें, जैसी माँ बेटे के मध्य होती हैं।
चिन्तन को परम सत्य की शोध तथा मानव कल्याण के प्रयास की दिशा में बढ़ने की सफल प्रेरणा दी है। प्रकृति के मूलभूत नियमों की खोज, परामनोविज्ञान आदि धर्म और विज्ञान के मध्य सेतु बनने जा रहे हैं। इस बात के लक्षण दिखाई देने लगे हैं , कि सम्पूर्ण मानवता की एक आत्मा की घोषणा करने वाला वैज्ञानिक धर्म , भविष्य के गर्भ में विकसित हो रहा है। विभिन्न विशिष्ट विज्ञान भी परस्पर समन्वित होकर एक विज्ञान का रूप धारण करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। आशा की जानी चाहिए कि ऐसा समन्वित विज्ञान स्वयं को तथा धर्म को , एक ही वृहद सत्य के दो परस्पर सम्बन्धित पक्ष सिद्ध कर सकेगा।
चिन्तन तन्त्र की दुर्बलता से उत्पन्न होते हैं। भावुक, आतुर एवं आवेशी प्रकृति के मनुष्य प्रायः तनिक-तनिक सी बात पर सन्तुलन खो बैठते हैं। आशंकाएंँ, कुकल्पनाएंँ भी कम हैरानी उत्पन्न नहीं करती। अधीर और भीरु प्रकृति के व्यक्ति तिल का ताड़ बनाते और उद्विग्र रहते देखे गये हैं। कामना पूर्ति में व्यवधान पड़ने पर भी कई लोग बेतरह विक्षुब्ध हो उठते हैं।
चिन्तन के लिए निर्धारित नीति मर्यादा का व्यतिक्रम करना है। व्यक्तिगत जीवन में हर मनुष्य को चरित्र-निष्ठ रहना चाहिए और सम्पर्क - क्षेत्र में समाजनिष्ठ सद्व्यवहार का पालन करना चाहिए। अरोग्य शास्त्र की नियम -मर्यादा इसलिए है कि आहार-विहार का ठीक तरह पालन किया जाय। समाज शास्त्र के अन्तर्गत शासकीय कानून और शिष्टाचार सहित नागरिक कर्तव्यों का निर्वाह आवश्यक है। वैयक्तिक और सामाजिक आचार -संहिता का अनुशासन मानने वाले सज्जन कहलाते हैं।
चिन्तन विराम देने की स्थिति उत्पन्न की जाती है। मनोनिग्रह की यही प्रथम भूमिका है। इससे शारीरिक और मानसिक तनावों पर नियंत्रण सम्भव होता है। उच्चस्तरीय आध्यात्मिक ध्यान सफलतापूर्वक कर सकने की भूमिका बनती है अस्तु इस प्रयोग के अभ्यास को दैनिक कार्यक्रम में स्थान देना चाहिए। आरम्भ पन्द्रह मिनट से करके उसे क्रमशः बढ़ाना चाहिए और सुविधानुसार आधे घण्टे तक पहुंचाना चाहिए।
चिन्तन - स्वाभाविक प्रवाह में अवरोध आता है। उसी से विक्षिप्तता आती मानी जाती है। समझा जाता है कि यदि स्वच्छन्द कथन में वे बातें मुँह से निकल जायें, जो मन पर दबाव डालती थीं, तो उससे वह दिमागी पथरी निकल सकती है, जिन्हें मानसिक ग्रन्थियाँ कहा जाता है और मनोरोगों का कारण माना जाता है। इस स्वच्छन्द कथन के अतिरिक्त रोगी को कुछ सुझाव भी दिये जाते हैं। उसके चित्त में से कुछ मान्यताएँ उखाड़ने और कुछ जमाने के लिए स्नेह युक्त हलका- फुलका वार्तालाप किया जाता है।
चिन्तन, भक्ति साधन जैसे प्रयोजन सध ही नहीं पाते। किसी प्रकार कर्मकाण्डों की चिन्ह पूजा भर करते रहने की बात कुछ बनती नहीं है।
चिन्तन अपने विचार भौतिक सुखों की संकीर्णता तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए।
चिन्तन का ही अभिशाप होती है | मनुष्य का दृश्य शरीर तो यह हाथ -पाँव वाला शरीर है,पर वह वास्तव में उस कठपुतली की तरह है , जिससे मन में बँधे विचारों के धागे सुक्ष्म  –नाड़ी  –मण्डल के द्वारा नचाते रहते है | यदि मन बीमार है, तो शरीर अवश्य बीमार  होगा | मन की गाँठ जितनी कठिन होंगी, व्याधि उतनी ही स्थायी और कष्टप्रद | अब बीमारियों का दोष किसी विषाणु को देने की अपेक्षा, शारीरिक मल को देने की अपेक्षा, पूरी तरह मानसिक विशेष को मान लिया गया है और यह निष्कर्ष पूरी तरह सामने आ गया है कि मनुष्य  सद्विचारों ,सद्भावनाओं में निमग्न रहकर 80 प्रतिशत  बीमारियों से तो तत्काल ही छुट सकता है| 20 प्रतिशत के जो आधार पहले से बन चुके हैं ,उन्हें भी अपनी दुर्भावनाओं ,पापों , कुविचारों को खोलकर , उनका प्रायश्चितकर माफ़ किया जा सकता है जो अटल प्रारब्ध बन गये हों| मन को सम्वेदनाओं यथा असीम करूणा ,परोपकार की भावना ,प्रगाढ़ श्रध्दा ,ईश्वरभक्ति की भावनाओं में डुबाकर होने वाले अटल कष्टों को भी भाले के स्थान पर मात्र कांटे चुभने जैसे हलके रुप से निपटा जा सकता है |
चिन्तन की परिधि से निकाल कर उसे भावभरी सम्वेदनाओं में गहरा उतारा जाये। हाल की कुछ बिलकुल नई शोधों से यह तथ्य और भी स्पष्ट हुए हैं।
चिन्तन की सन्तुलित दिशाधारा लोगों को मालूम नहीं होती, फलतः इधर से उधर भटकने और अचिन्त्य चिन्तन करने लगते हैं। भय, आशंका, निराशा उन्हीं लोगों को होती है , जो परिस्थितियों पर असन्तुलित प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं और घबराहट में अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की तरह मस्तिष्क को विक्षिप्त एवं अर्धविक्षिप्त बना लेते हैं।
चिन्तन में प्रभु प्रार्थना में निरत रखें। आगन्तुकों को तत्काल शान्ति मिलती है और वे अपना कष्टभार हलका हुआ ,अनुभव करने लगते हैं|       Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI
चिन्तन न कर सकने वाले - अविकसित मस्तिष्क वाले भी रोगी ही माने गये हैं। किन्तु सर्वसाधारण की दृष्टि में यह स्वभाव दोष भर है और इनका समझाने बुझाने एवं स्वयं सुधरने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। तथ्य इससे भिन्न है। बुरी आदतें भी बीमारियाँ ही हैं और उनका भी कायरोगों की तरह उपचार हो सकता है।
चिन्तन से भी काम चल सकता है। मित्र की उपस्थिति की अपेक्षा मैत्री की उपस्थिति, कितनी अधिक सरस होती है , इसे कोई प्रेमी ही जानता है।
चिन्तन की गुँजाइश ही कहाँ रही। माना कि इसमें दुष्टता बरतने के गुँजाइश है, पर साथ ही ऐसा भी तो है कि चेतना की स्वेच्छा साधियत गतिविधियाँ अपनाकर उस स्थान पर पहुँचे , जहाँ अवतारी महामानव पहुँचते रहे हैं। समाज नियन्त्रण को सर्वोपरि मान लेने पर वैयक्तिक महानता को विकसित कर सकने वाली आत्म-साधना के लिए अवसर ही नहीं रहता। इसी प्रकार प्रचलित विचार धारा को ही अन्तिम मानना पड़ेगा | उससे भिन्न प्रकार के तथ्यों को उभारना एवं जन साधारण के सामने प्रस्तुत कर सकने की बात ही शेष न रह जायगी। इससे मानवी प्रगति के इतिहास क्रम में भारी बाधा उत्पन्न होगी।
चिन्तन,उच्च संस्कारों से ओत -प्रोत ,, शान्त और निर्मल होगा,स्वप्न उतने ही स्पष्ट और सार्थक होंगे |
चिन्तन करने लगते हैं। भय, आशंका, निराशा उन्हीं लोगों को होती है , जो परिस्थितियों पर असन्तुलित प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं और घबराहट में अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की तरह मस्तिष्क को विक्षिप्त एवं अर्धविक्षिप्त बना लेते हैं।
चिन्तन के अभ्यास, योगसाधना के अन्तर्गत ही आते हैं। प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की पाँच साधनाएँ योगसाधना का अन्तःस्पर्शी अभ्यास है। इनसे पहले तीन को लोकव्यवहार का मर्यादापालन कहना चाहिए। उनमें सामाजिक अनुशासन है। उच्छृंखलता का नियन्त्रण इन्हीं तीन में किया जाता है; इसलिए उन्हें तप वर्ग में गिना गया है।
चिन्तन करते हुए निर्बाध मैत्री सम्बन्ध बनाये रह सकना सम्भव हो सका।   मैत्री अदृश्य है और व्यवहार दृश्य। मैत्री गुणों पर निर्भर है और व्यवहार उपयोगिता पर। कौन हमारे लिए कितना उपयोगी हो सकता है--कौन हमारी कितनी आवश्यकताएँ पूर्ण कर सकता है ,इस आधार पर जिससे भी मित्रता होगी वह उतनी ही उथली रहेगी और उतनी ही क्षणिक अस्थिर रहेगी। यदि किसी से आजीवन मैत्री निवाहनी हो तो उसका एक ही उपाय है।
चिन्तन नितान्त भौतिकवादी न होकर आध्यात्मिक रहना चाहिये। यह सम्भव है, कि हम उस उद्देश्य को समझ पायें, कि मनुष्य जीवन का लक्ष्य और उपयोग क्या हो सकता है।
चिन्तन के लिए भावभरी विराट् सामग्री प्रदान करता है। जीवों की भाँति मनुष्यों में भी यह गुण पाया जाता है ; किन्तु सांसारिकता के भार इस तरह के आह्लाद प्रदान करने वाले गुणों को भी नष्ट कर देते हैं। तब उनकी पाशविकता उभरकर सामने आ जाती है। अच्छे और नये के स्वागत की दृष्टि ने ही भारतीय मनीषा को अनासक्त कर्मयोग का दर्शन दिया है। इस परम्परा को बनाये रखने में न केवल प्रसन्नता , अपितु पवित्रता भी निहित है |अमेरिका के आरेगन राज्य में सिलबर्टन नाम के एक कस्बे के निवासी फ्रैंक ब्रेजियर ने कोली जाति का एक कुत्ता पाला  नाम रखा गया -“बाबी” बाबी बड़ा ही स्वामिभक्त कुत्ता था| वह न केवल तरह-तरह के करतबों से घर वालों का मनोरंजन करता, अपितु वह एक स्वामिभक्त सेवक के सभी कर्त्तव्य निबाहता, घर की रखवाली के अतिरिक्त बच्चों को स्कूल पहुँचाना, जंगली जानवरों से खेतों की रक्षा करना उसकी दिनचर्या में सम्मिलित कार्य थे।
चिन्तन दृष्टि विवेकपूर्ण, सूक्ष्म और दूरदृष्टि न रहे ,तो यहाँ जो कुछ भी सौन्दर्य और जीवन व्यवस्था दिखाई देती है, कुछ भी न रहे। जो लोग अपने जीवन में भी यह दृष्टि और दूरदर्शिता बनाये रखते हैं ; वे न केवल स्वयं सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं ,अपितु अपने परिवार-परिजनों को भी प्रगति पथ पर अग्रसर करने में सफल होते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-April
चिन्तन समाहित हो गया है। वह विशेषण है- ‘सच्चिदानन्द’। इस स्वरूप में ईश्वर, जीव और प्रकृति- तीनों की स्थिति का सम्यक् निरूपण है। प्रकृति केवल सत् है। चेतना का उसमें अंश नहीं है।
चिन्तन करता हूँ तो मुझे तार्किक दृष्टि से भी यह बात शत-प्रतिशत सही जान पड़ती है कि इतनी सुव्यवस्थित संरचना का कोई न कोई समर्थ निर्माता अवश्य होगा। उत्तंग शिखर, विशाल सागर, नदियाँ, झरने, आकाश के टिमटिमाते तारे, सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह नक्षत्र, निहारिकाओं जैसी रचनाएँ तथा उनकी सुव्यवस्थित कार्य प्रणाली किसी दुर्घटना की परिणति हो, इस प्रतिपादन को विवेक स्वीकार नहीं करता सुनिश्चित रूप से ये कुशल और समर्थ निर्माता की देन हैं।
चिन्तन भी एकाँगी है। विचारशीलता इस बात में सन्निहित है कि विवेक के आधार पर औचित्य को अपनाने के लिए सदा तैयार रहा जाय। परिवर्तनशील इस संसार में बदली परिस्थितियों के अनुरूप सामंजस्य बिठा लेना सबसे बड़ी बुद्धिमता है। जो परिवर्तनों को स्वीकार नहीं करते, अपनी मनःस्थिति को जड़वत् बनाये रहते हैं, वे पिछड़ेपन के अभिशाप से लदते एवं प्रगति के अवसर अपने हाथों गँवा बैठते हैं।
चिन्तन में अपने को नियोजित करते हैं।
चिन्तन, विकास और साधन सम्पादन में कितनी ठोकरें खाते रहे हैं। उन्हें न जाने कितने खाई-खन्दक पार करने पड़े हैं। स्थिति जब सन्तोष की साँस लेने और अधिक उज्ज्वल भविष्य की आशा करने योग्य बनी है, तो वज्रपात होने जैसा संकट सामने आ खड़ा हुआ है। नगरों और उद्यानों को भस्मसात् करने वाले दावानल की प्रचण्ड लपटें इसलिए भी कलेजा कँपाती हैं कि महाविनाश के उपरान्त जो बचेगा वह कितना वीभत्स और त्रासदी से भरा होगा। उस मरघट में कोई रहेगा कैसे?
चिन्तन। इन तीनों से ही मन की चंचलता बनती है। लेकिन यदि मन को शब्द का माध्यम न मिले तो उसे चंचलता नहीं प्राप्त हो सकती। उसकी गति शब्द की बैसाखी पर निर्भर है। सारी स्मृतियाँ, कल्पनाएँ तथा चिन्तन शब्द के माध्यम से चलते हैं।
चिन्तन शब्द के माध्यम से चलते हैं।
चिन्तन एवं कार्य में निरत रहने पर निजी व्यक्तित्व को परिष्कृत करने का अवसर न मिले। यह एक ही लाभ इतना बड़ा है जिस पर संसार भर के वैभव को निछावर किया जा सके। इस प्रकार परमार्थ परायण को उभयपक्षीय लाभ मिलते हैं तब संकीर्ण स्वार्थपरता में निरत को दोनों से ही हाथ धोना पड़ता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में घुसी हुई दृष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन और उनके स्थान पर शालीनता का संस्थापन ही हो सकता है। लोकमंगल इसी एक आधार पर बन पड़ता है। समस्त समस्याओं का समाधान इसी प्रयास की सफलता पर निर्भर है। महामानवों में से सभी ने अपने लिए इसी मार्ग को चुना और उसी के लिए सर्वतोभावेन तत्पर तन्मय रहते हुए जीवन बिताया है। आज भी इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग है नहीं।
चिन्तन, मनन कर लेते हैं तो आधा काम पूरा हो जाता है। फिर वे इस वातावरण में स्वयं को- अपने परिवार को पूरी तरह नियोजित कर सकने में समर्थ हो सकेंगे। यदि कहलवाना ही हो तो निर्वाह- परिवार- व्यवस्था जैसे शब्दों का प्रयोग न करके लोभ और व्यामोह का ही नाम लिया जाना चाहिए। इन खाइयों को हिरण्यकश्यपु, रावण जैसे धन कुबेर और प्रतापी भी पाट सकने में असफल रहे। इस कुचक्र में फँसे हुए ही यह कह सकते हैं कि उन्हें आर्थिक और पारिवारिक परेशानियाँ युग की पुकार सुनने और वरिष्ठ अग्रदूतों की जिम्मेदारी नहीं निभाने देती।
चिन्तन मनन दूसरा है क्रिया परक। दोनों के मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता का समन्वय करना पड़ता है। लोक सेवा या लोक शिक्षा इसी धुरी के इर्द-गिर्द घूमती है। इससे विरत होने पर भौतिक कार्यों में संलग्न समस्त भौतिक श्रमिक लोकसेवी कहलाने लगेंगे। साधन जुटाने और अभाव पूरे करने में तो कृषकों से लेकर मेहतर तक सभी श्रमजीवी उसी प्रयास में निरत रहते और बदले में वेतन पाते हैं।
चिन्तन में व्यतीत होता है। उन्हें देश, समाज संस्कृति ही नहीं समस्त मानव जाति के उत्थान की चिन्ता होती है। सार्वजनीन तथा सर्वतोमुखी प्रगति के लिए वे योजना बनाते और चलाते हैं। यह विधेयात्मक चिन्ता ही है जिसकी परिणति रचनात्मक उपलब्धियों के रूप में होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-October
चिन्तन यदि किसी भी प्रतीक को माध्यम बनाकर लक्ष्य के प्रति नियोजित कर दिया जाए तो उसकी उपलब्धियाँ निश्चित ही महत्वपूर्ण फलदायी होंगी। यही उपासना का तत्वदर्शन है जिसे अपनाकर साधना क्षेत्र के राज मार्ग पर बढ़ पाना अधिक सरल हो जाता है।
चिन्तन और जुझारू मनोबल की जरूरत पड़ती है। उपेक्षा बरतने वाले अपरिचितों तक से संपर्क साधकर उन्हें मैत्री की जंजीरों में जकड़ना पड़ता है। प्रगति के आवश्यक साधन सड़क पर पड़े नहीं मिल जाते उनके लिए अवसर ढूंढ़ने, अधिक श्रम करने और उपलब्धियों को अपव्यय से बचाकर अभीष्ट के लिए नियोजित करना पड़ता है। यह चक्रव्यूह बेधने और किला जीतने की तरह शानदार सफलता है, जिसे शानदार लोग ही हस्तगत कर पाते हैं।
चिन्तन को अपनाया जा सके तो वर्तमान जीवन को सार्थक बनाने की दिशा में अग्रसर होने की महत्वपूर्ण प्रेरणा तथा उमंग अपने भीतर जगाई जा सकती है।
चिन्तन से तादात्म्य स्थापित करना है। मार्ग कोई भी अपनाया जाए, माध्यम कुछ तो बनाना ही पड़ेगा ही- इसे समझना उतना ही अनिवार्य है जितना कि किसी भाषा को समझने के लिए उसकी लिपि एवं बोल-चाल के स्वरूप को सीखना- हृदयंगम करना। श्रेष्ठ चिन्तन यदि किसी भी प्रतीक को माध्यम बनाकर लक्ष्य के प्रति नियोजित कर दिया जाए तो उसकी उपलब्धियाँ निश्चित ही महत्वपूर्ण फलदायी होंगी। यही उपासना का तत्वदर्शन है जिसे अपनाकर साधना क्षेत्र के राज मार्ग पर बढ़ पाना अधिक सरल हो जाता है।
चिन्तन की उत्कृष्टता, दूसरी चरित्रगत- आदर्शवादिता, तीसरी- व्यवहार में उदार आत्मीयता। इन प्रश्न-पत्रों को हल किए बिना किसी को भी इतना प्रामाणिक नहीं माना जा सकता कि जन समुदाय उसके सम्मुख श्रद्धा से मस्तक झुकाये, भावभरी श्रद्धांजलि चढ़ाये और कन्धों पर बिठाकर ऊँचा उठाये।
चिन्तन के अनुरूप उसे प्रभावित करता है।
चिन्तन और दुष्ट आचरण की कंटीली राह पर ही चलने के लिए विवश करती है। इस विवशता के रहते कोई न ऊँचा उठ सकता है और न आगे बढ़ सकता है। टोकरी में बन्द पड़े टमाटर की तरह स्वयं भी तेजी से गलता है और जिन्हें छूता है उन्हें भी अपने साथ-साथ ही गलाता चलता है। इस प्रकार स्वार्थ साधन प्रत्यक्षतः लाभदायक दीखते हुए परोक्षतः हानि ही हानि करता चला जाता है।
चिन्तन इतना विस्तृत होता है कि जिससे संसार की यथार्थता समझ में आ जाती है। भौतिक लाभ तो ऐसे हैं जैसे तीर्थयात्रा जाते समय मार्ग में पड़ने वाले किसी नगर से आवश्यक वस्तुयें भी खरीद ली जायें। मूल लाभ आत्मा की ईश्वरीय चेतना में परिणति ही है जिसे यह लाभ मिल जाता है, वह वस्तुतः जीवनमुक्त हो जाता है। उसका जीवन सचमुच धन्य हो जाता है। गायत्री मन्त्र की सफलता का यही मुख्य आधार है जिसे प्रयोग कर लाभान्वित होना हर व्यक्ति के लिए सम्भव है।
चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार में ठीक उल्टी स्थिति होती है। संसारी लोग जो सोचते या करते हैं, मुनि का चिन्तन ठीक उससे उल्टा होता है। व्यवहार में भी ठीक ऐसी ही प्रतिकूलताएँ होती है। स्वयं कबीर के शब्दों में “कहत कबीर यहुँ अकथ कथा है कहता कही न जाई।” विधि की व्यवस्था पर उनका यह संकेत मात्र है।
चिन्तन ठीक उससे उल्टा होता है। व्यवहार में भी ठीक ऐसी ही प्रतिकूलताएँ होती है। स्वयं कबीर के शब्दों में “कहत कबीर यहुँ अकथ कथा है कहता कही न जाई।” विधि की व्यवस्था पर उनका यह संकेत मात्र है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में जमीं-आसमां जैसा अंतर होता है। एक को सज्जनता के अतिरिक्त दूसरा कुछ किसी भी मूल्य पर स्वीकार नहीं। दूसरा उद्दण्ड असुरों की तरह किसी बात का विचार किए बिना लूटते-खसोटते खाते और बिगाड़ते हैं।
चिन्तन और व्यवहार ऐसा रखना है कि वर्जनाओं की तोड़-फोड़ न होने पाए। माता, बहिन, बेटी, पुत्री की मान्यताओं पर किंचित व्यतिरेक न होने पाए।
चिन्तन में नियोजित कर दिया जाय। यह मनन प्रक्रिया जितनी सघन होगी- भाव श्रद्धा से अभिपूरित होगी, सफलता उसी क्रम से हस्तगत होती चली जायेगी। इसके लिए प्रतिमा को ही अवलम्बन बनाया जाय, अनिवार्य नहीं। सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय भी एक प्रकार से श्रेष्ठ विचारों का सामीप्य पाना- महामानवों के चिन्तन से तादात्म्य स्थापित करना है। मार्ग कोई भी अपनाया जाए, माध्यम कुछ तो बनाना ही पड़ेगा ही- इसे समझना उतना ही अनिवार्य है जितना कि किसी भाषा को समझने के लिए उसकी लिपि एवं बोल-चाल के स्वरूप को सीखना- हृदयंगम करना।
चिन्तन और प्रयास बदलना है। उलटे को उलटकर सीधा करना है। गुरुदेव यह सब करते तो अब तक भी रहे हैं पर अब जबकि उनकी सामर्थ्य पाँच गुनी अधिक हो जायेगी तो वे कार्य जो धीमी गति से चलते रहे हैं पाँच गुनी अधिक शक्ति से नियोजित करेंगे और उसका परिणाम भी पाँच गुना नहीं पचास गुना अधिक होगा। दृश्य से अदृश्य की क्षमता अनेक गुनी अधिक जो होती है।
चिन्तन और मनन का अवसर मिला है, तभी मैं यह सोचता रहा हूँ कि दूर रहने वाले भगवान को तलाश करने की अपेक्षा यह क्या बुरा है कि अपनी अन्तरात्मा को इतना अच्छा बनाया जाय कि वह ईश्वर के समतुल्य समझी जा सके। जिन्हें पूजा से प्रेम है, उनसे मैं इतना और कहता हूँ कि पूजा करने वाले को इस लायक बनाओ कि पुजारी कहलाने के हकदार बना सको।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-September
चिन्तन करते हैं, उन्हें अनेकानेक नई अनुभूतियाँ होती, नये चिन्तन के आयाम खुलते चले जाते हैं। आइन्स्टीन की जन्म सदी पर पिछले दिनों प्रकाशित विद्वान लेखक नोजेल काल्डर की पुस्तक “आइन्सटीन्स यूनीवर्स” में कई ऐसे अविज्ञात तथ्यों का उद्घाटन किया गया है जो अभी तक सूत्र रूप में होने के कारण वैज्ञानिक समझ पाने में असफल रहे हैं। “वायोलेन्ट यूनीवर्स”, “वेदर मशीन”, “स्पेसशीप ऑफ माइण्ड”, “द माइण्ड ऑफ मैन”, एवं “की टू यूनीवर्स” जैसी बेस्ट सेलर पराभौतिकी पर लिखी गयी पुस्तकों के लेखक डॉ. नीजेल काल्डर ने आइन्स्टीन को अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न दैवी पुरुष माना है, जिन्होंने परोक्ष जगत की परिकल्पना करने तथा अदृश्य जगत के अनुसंधान हेतु मानवता को मार्ग सुझाया। न केवल ब्रह्मांड भौतिकी अपितु मानवी काया एवं मनस् के अविज्ञात आयामों को भी उन्होंने दृश्यमान रूप दिया, जिसे समझने का कार्य अब पैंसठ वर्ष बाद सम्पन्न हो रहा है।
चिन्तन में इतना मस्त हो जाता है कि उसे परिस्थिति, काल एवं स्वयं की भी सुधि नहीं रहती, दोनों के बीच की भित्ति टूट जाती है और भक्त-भगवान एक हो जाते हैं। चेतना रहते हुए भी वह बाह्य चेतना से विलग हो अपने इष्ट में पूर्णतः लीन हो जाता है। तब सर्वत्र उसे अपना अधिष्ठाता ही नजर आता है, समस्त जड़-चेतन उसी के प्रसार-विस्तार रूप में दिखाई पड़ते हैं। अपने-पराये की परिधि समाप्त हो जाती है। ‘स्व’ का सीमा बन्धन टूटना ही भक्ति का चरमोत्कर्ष है।
चिन्तन या स्वभाव पर निर्भर है।
चिन्तन के सहारे अपनी जीवनी शक्ति का आश्रय लेते हुए मनोबल के सहारे अपनी नाव खे ले जायेगा, यह पूर्वानुमान भी ऑरा के इस विश्लेषण से संभव है।
चिन्तन करने पर पाया कि आत्मबल की दृष्टि से हीन, खोखले नागरिकों को जीता नहीं गया, उन्होंने स्वयं आत्म समर्पण कर दिया।
चिन्तन को मोह-जाल में से निकाला जाय। सौम्य, सात्विक, सरल, निर्लोभ, निर्मोह जीवन का लक्ष्य बनाया जाय। गीता की यही उक्ति ऐसी है जिसे अपनाये बिना और कोई गति नहीं।
चिन्तन प्रवाह बहाया गया। अभिरुचि में सृजनात्मक शक्ति है वह अपने अनुरूप सरंजाम जुटाने में बहुत हद तक सफल होती रहती है। चोर जुआरी अपने जैसों की चाण्डाल चौकड़ी जुटा लेते हैं। वे उन्हें ढूँढ़ लेते हैं या उस प्रकृति वाले खोजते-खोजते पास आ पहुँचते हैं। सन्त सज्जनों के सम्बन्ध में भी यही बात है।
चिन्तन नहीं बन सकता। एक पहिये की गाड़ी एक पटरी पर दौड़ने की कोशिश करती है। अव्यावहारिक तरीका अपनाने के कारण इधर-उधर पड़ती है। सही निर्णय पर पहुंचने के लिए आवश्यक है कि पक्ष और विपक्ष की सभी संभावनाओं को सामने रखा जाये और दोनों के द्वारा प्रस्तुत किये गये तर्कों तथा तथ्यों का गंभीरतापूर्वक पर्यवेक्षण किया जाये।
चिन्तन ऐसे सरंजाम जुटाने में ही लगा रहता है इसमें आदि से अन्त तक चकमेबाजी और तिकड़म भिड़ाने का जाल बुना गया हो।
चिन्तन लड़खड़ा जाता है। उलटा सोचता है और उलटे ही काम करता है। फलतः परिणाम भी उलटे होते हैं। सारे प्रयास सत्परिणाम उत्पन्न करने के स्थान पर उलटी विपत्ति खड़ी करते हैं। अस्तु मनुष्य का सर्वप्रथम प्रयास यह होना चाहिए कि बुद्धि को भ्रष्टता की दलदल में न फंसने दें।
चिन्तन से चरित्र और चरित्र से व्यवहार बनता है। व्यवहार ही कर्म है। कर्म से परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। पदार्थों का संचय और अनेकों का सहयोग सत्कर्मों के आधार पर ही सम्भव होता है। सत्कर्म और कुछ नहीं सद्विचारों के ही प्रतिफल हैं।
चिन्तन को जुटा देते हैं। यह भूल जाते हैं कि प्रस्तुत परिस्थितियों में यह संभव भी है या नहीं। यदि नहीं तो कोई मध्यवर्ती मार्ग निकल सकता है क्या? भावावेश में ऐसा प्रति पक्षी चिन्तन नहीं बन सकता। एक पहिये की गाड़ी एक पटरी पर दौड़ने की कोशिश करती है।
चिन्तन को घेरा हुआ कुहासा, ज्यों ही क्रमशः मिटता चला जा रहा है, विचारणात्व बोध को मानवी स्वास्थ्य से जोड़ पाने में क्रमशः वैज्ञानिकों को सफलता हस्तगत होती जा रही है।
चिन्तन को विकृत कर देने वाले साधनों के बलबूते यह विश्व-तकनीकी दृष्टि से कितना भी बढ़ा-चढ़ा होने पर भी वस्तुतः विनाश को ही प्राप्त होगा। इस सम्बन्ध में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय फ्राँस के आश्चर्यजनक पतन का प्रसंग उल्लेखनीय है। जर्मनी के खूंखार डिक्टेटर हिटलर ने जब नस्लवाद के नाम पर अपनी विनाश लीला का आरम्भ किया तब पोलैंड तो उसने पहले ही दाँव में धूर्तता से हथिया लिया। उसके समक्ष एक विस्तृत साम्राज्य फ्रांस का था जिसे हस्तगत करने पर विश्व विजय की सबसे बड़ी बाधा दूर हो जाती। विदेशी आक्रामकों के बर्बर इरादों से अनभिज्ञ फ्रांसीसी सुरक्षा के स्थान पर विलासिता के मद में चूर बने हुए थे।
चिन्तन को ही सब कुछ मान बैठते हैं। ऐसे ही लोग चाटुकारों और ठगों के कुचक्र में फंसते हैं। जो कहा गया है उसी को सत्य मान बैठते हैं। परामर्श में लाभ ही लाभ देखते हैं। यह भूल जाते हैं कि कथन के पीछे कोई ऐसी दुरुभि सन्धियाँ हो सकती हैं जो पीछे सर्वनाश करके रख दें।
चिन्तन। जबकि आम आदमी के सिर पर अवसर न मिलने पर भी कामुक कामनाओं का भूत चढ़ा रहता है। यह ललक ही अचेतन मन में पड़ी रहने पर उसे शिखण्डी स्तर की ओर धकेलते-धकेलते अन्ततः लिंग परिवर्तन जैसी स्थिति तक पहुंचा देती है। यह शरीर परिवर्तन भर है।
चिन्तन में लीन होते देखे जाते हैं। औद्योगीकरण, जनसंख्या का बाहुल्य, निर्वानीकरण एवं प्रदूषण से ऋण आयन्स घटते चले जाते हैं। धन आयनों की मात्रा अधिक होने से श्वास से ली जाने वाली वायु भी विकारयुक्त होती है। ऐसे स्थानों पर मनोविकारों, असाध्य रोगों का बाहुल्य होता देखा जाता है। आत्म-हत्या, आक्रामक वृत्ति एवं अपराधों को जन्म देने में ऋण आयनों की कमी प्रधान हो सकती है।
चिन्तन अथवा कामोपभोग में नष्ट होती रहती है। किन्तु जब इसका रूपांतरण किया जाता है तो कायिक आणविक संरचना विघटन के स्थान पर नियोजन में परिवर्तित हो व्यक्ति को ओजस्-वर्चस् सम्पन्न बना देती है। विद्युत शरीर सक्रिय हो जाता है एवं जैव चुम्बकत्व का विकिरण शरीर के चारों ओर प्रखर तेजयुक्त घेरा बनाकर एक आभा मण्डल बना देता है जिसकी चेतना जितनी सूक्ष्म होती है, वलयाकार में बना घेरा उतना ही प्रकाशवान होता है। अंतः का भाव मंडल ही आभा मंडल का निर्माण करता है। साधना पराक्रम द्वारा इस भाव मंडल को ही प्रखर शक्तिशाली बनाया जाता है।
चिन्तन, स्वास्थ्य एवं प्रभावोत्पादकता पर तथा आसपास के वातावरण पर तद्नुरूप प्रभाव डालता है, ऐसा उनका मत था।
चिन्तन और समय इन्हीं बातों का ताना-बुना बुनने में बीतता है। सम्पदा का बड़ा भाग इसी में खर्च हो जाता है। विलासी लोगों की जीवनचर्या कहाँ किस प्रकार बीतती है। वे किस प्रकार क्या साधन जुटाते हैं, इसी की खोज-खबर में आँख-कान लगे रहते हैं। इस संदर्भ का संचित ज्ञान, अनुभव, इतना इकट्ठा हो जाता है कि उन्हें विलास का विश्व कोश कहा जा सके।
चिन्तन प्रवाह पर प्रभाव जानने की आवश्यकता जान पड़ी। इन चिकित्सा विज्ञानियों का मत था कि बहुसंख्य तथाकथित शारीरिक रोगों की उत्पत्ति, जिनमें कैन्सर, हृदयाघात एवं उच्च रक्तचाप जैसी घातक व्याधियों का बाहुल्य है, चौथे आयाम विचार जगत में सर्वाधिक होती देखी जाती है। चाहे इनके कारणों हेतु आधुनिक विज्ञान जगत की उपलब्धियों, आहार-विहार का व्यक्तिक्रम, परावलम्बी जीवन क्रम, एवं प्रदूषण कारक तत्वों का वातावरण में बाहुल्य जैसों का नाम ले लिया जाये लेकिन ये सब मूलतः हर मनुष्य के चारों ओर छाये विचार मण्डल, जिसे डॉ. अर्नेस्ट बर्जर ने “आयडियोस्फियर” नाम “बायो” एवं “आयनोस्फियर” की तरह दिया है, में होने वाले असंतुलन की ही प्रतिक्रिया है। इसे समझाने के लिये वे कहते हैं कि अच्छा होगा कि इस चिकित्सीय चतुर्थ आयाम की परिकल्पना को आइन्स्टीन के भौतिकी के बलों के एकीकरण व सापेक्षिकता सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय।
चिन्तन प्रवाह को सही दिशा दी जा सके तो अकारण रोगग्रस्त न रह कर समस्वरता से भरी हँसी-खुशी की उपलब्धियों से भरी पूरी जिन्दगी जीने में समर्थ हो सकते हैं।
चिन्तन का विकसित रूप कर्म है। कर्म से साधन एकत्रित होते हैं। जो एकत्रित है उसी को तो वितरण किया जायेगा। इन सारी भूमिकाओं को बुद्धि ही सम्पन्न करती है। वह कितनी ही तीव्र और सक्षम क्यों न हो पर जब मोह जाल में फंस जाती है, तो मकड़ी के जाले की तरह अपने आप को उसी में फंसा लेती है।
चिन्तन पर आरोपित कर, इस माध्यम से विचारों के बोध जगत का मनुष्य के जीवकोशों एवं चिन्तन प्रवाह पर प्रभाव जानने की आवश्यकता जान पड़ी। इन चिकित्सा विज्ञानियों का मत था कि बहुसंख्य तथाकथित शारीरिक रोगों की उत्पत्ति, जिनमें कैन्सर, हृदयाघात एवं उच्च रक्तचाप जैसी घातक व्याधियों का बाहुल्य है, चौथे आयाम विचार जगत में सर्वाधिक होती देखी जाती है। चाहे इनके कारणों हेतु आधुनिक विज्ञान जगत की उपलब्धियों, आहार-विहार का व्यक्तिक्रम, परावलम्बी जीवन क्रम, एवं प्रदूषण कारक तत्वों का वातावरण में बाहुल्य जैसों का नाम ले लिया जाये लेकिन ये सब मूलतः हर मनुष्य के चारों ओर छाये विचार मण्डल, जिसे डॉ. अर्नेस्ट बर्जर ने “आयडियोस्फियर” नाम “बायो” एवं “आयनोस्फियर” की तरह दिया है, में होने वाले असंतुलन की ही प्रतिक्रिया है। इसे समझाने के लिये वे कहते हैं कि अच्छा होगा कि इस चिकित्सीय चतुर्थ आयाम की परिकल्पना को आइन्स्टीन के भौतिकी के बलों के एकीकरण व सापेक्षिकता सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय।
चिन्तन करने की ही है। इस तथ्य को हृदयंगम करने वाले ऋषि-मुनि गण सदैव इस सूक्ष्म आयाम में ही जीवन जीते व अपने जीवन की सीमित अवधि को असीम बना लेते थे। उसी उपक्रम का आश्रय लेकर आज भी आयुष्य को बढ़ा पाना एवं रोगों को टाल पाना संभव है, इसमें किंचित मात्र भी सन्देह नहीं होना चाहिए।
चिन्तन और व्यवहार का अभ्यास ही उसे किसी वर्ग विशेष में रहने का आदी बनाता है। यदि संकल्प उलटे तो परिवर्तन तत्काल न सही देर-सवेरे में होने की संभावना रहेगी ही। इसी प्रकार लिंग विशेष के आधार पर किसी को वरिष्ठ-कनिष्ठ मानने की मान्यता भी भ्रामक है, यह स्पष्ट हो जाना चाहिए।
चिन्तन के कुचक्र में फँसे रहे, कुसंग में निरत रहे, दुर्व्यसनों के अभ्यस्त बने और क्रमशः अनुपयुक्त मार्ग पर एक के बाद दूसरा कदम उठाते चले गये। परिणति अत्यन्त दुःखदायी हई। पतन और पराभव के गर्त में गिरे और अपने तथा दूसरों के लिए संकट खड़े करते चले गये। मोटे रूप में इन दोनों के मध्यवर्ती अन्तर घटनाक्रमों परिस्थितियों और सहयोगियों के साथ भी जुड़ता है किन्तु वास्तविकता यही थी कि मनःस्थिति ने परिस्थितियाँ गढ़ीं और उत्थान पतन के सरंजाम जुटा दिये। जिन्हें वातावरण घसीटता रहता है वे एक सीमा तक ही आगे-पीछे हट या बढ़ पाते हैं।
चिन्तन की दिशा यदि इस ओर मोड़ी जा सके तो कुकर्म करके जितना पुरुषार्थ प्रकट किया जा सकता है, उससे भी अधिक यश अच्छे कामों में अपनी आन्तरिक ऊर्जा को नियोजित करके लाभान्वित हुआ जा सकता है। अपने को लाभान्वित करने व सम्पर्क क्षेत्र में आने वालों को लाभ देने के लिए यही श्रेष्ठ तरीका है। पर तैयारी पहले से ही कर लेनी चाहिए। पराक्रम हेतु जब शरीर और मन में उमंग उठे तो तभी से यह सोचना होगा कि इस ईश्वरीय वरदान को सत्प्रयोजन में लगाने की योजना बनायी जाये।
चिन्तन के आयाम खुलते चले जाते हैं। आइन्स्टीन की जन्म सदी पर पिछले दिनों प्रकाशित विद्वान लेखक नोजेल काल्डर की पुस्तक “आइन्सटीन्स यूनीवर्स” में कई ऐसे अविज्ञात तथ्यों का उद्घाटन किया गया है जो अभी तक सूत्र रूप में होने के कारण वैज्ञानिक समझ पाने में असफल रहे हैं। “वायोलेन्ट यूनीवर्स”, “वेदर मशीन”, “स्पेसशीप ऑफ माइण्ड”, “द माइण्ड ऑफ मैन”, एवं “की टू यूनीवर्स” जैसी बेस्ट सेलर पराभौतिकी पर लिखी गयी पुस्तकों के लेखक डॉ. नीजेल काल्डर ने आइन्स्टीन को अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न दैवी पुरुष माना है, जिन्होंने परोक्ष जगत की परिकल्पना करने तथा अदृश्य जगत के अनुसंधान हेतु मानवता को मार्ग सुझाया। न केवल ब्रह्मांड भौतिकी अपितु मानवी काया एवं मनस् के अविज्ञात आयामों को भी उन्होंने दृश्यमान रूप दिया, जिसे समझने का कार्य अब पैंसठ वर्ष बाद सम्पन्न हो रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-March
चिन्तन का महत्वपूर्ण योगदान होता है ‘अथऽतो ब्रह्म’ जिज्ञासा से सृष्टि के नियामक सत्ता की खोज आरम्भ होती है तथा आत्म साक्षात्कार तक का कारण बनती है।। श्वेताश्वेतर उपनिषद् के उपाख्यान की शुरुआत जिज्ञासा से युक्त प्रश्नों से होती है। “कि कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाय केन क्वच सम्प्रतिष्ठाः। अधिष्ठिता केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम्॥” अर्थात्- हे महर्षियों! इस जगत का मुख्य कारण ‘ब्रह्म’ कौन है, हम लोग किससे उत्पन्न हुए हैं, किससे जी रहे हैं और किसमें पूर्णतः अवस्थित हैं तथा किसके अधीन रहकर हम लोग सुख-दुःख की निश्चित व्यवस्थानुसार जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
चिन्तन ने आत्म-विज्ञान को जन्म दिया।
चिन्तन की दृष्टि से उतना ही पिछड़ा होगा।” परिवर्तनशील इस संसार में मान्यताओं एवं तथ्यों के बदलते देरी नहीं लगती। अतएव मन-मस्तिष्क को सदा खुला रखना चाहिए ताकि यथार्थता से वंचित न रहना पड़े। खुले मन से हर औचित्य को बिना किसी ननुनच के स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए। तथ्यों की ओर से आँखें बन्द रखने पर कितनी ही जीवनोपयोगी बातों से वंचित रह जाना पड़ता है।
चिन्तन भी सही निष्कर्षों पर नहीं पहुँचने देता। उस चिन्तन में मनुष्य की पूर्व मान्यताओं का भी योगदान होता है। सही विचारणा के लिए यह भी आवश्यक है कि अपनी पूर्व मान्यताओं, आग्रहों तथा धारणाओं का भी गम्भीरता से पक्षपात रहित होकर विश्लेषण किया जाय। पक्ष और विपक्ष दोनों पर ही सोचा जाय। किसी विषय पर एक तरह से सोचने की अपेक्षा विभिन्न पक्षों को ध्यान में रखकर चिन्तन किया जाय।
चिन्तन के लिए उस स्वभावगत ढर्रे को भी तोड़ना आवश्यक है जो मानवी गरिमा के प्रतिकूल है अथवा आत्म विकास में बाधक है।
चिन्तन एवं व्यवहार पर पड़ता है। अनेकों अध्ययनों में यह पाया गया कि सौर गतिविधि के ग्यारह वर्षीय चक्र में आरम्भिक छः वर्षों में सूर्य धब्बे बढ़ जाते हैं तथा बाद के पाँच वर्षों में उनमें कमी आ जाती है। सौर धब्बों के बढ़ने से दिल के मरीजों की स्थिति गम्भीर होती देखी गयी है। कितने ही व्यक्तियों में दिमागी बीमारियाँ तथा तंत्रिका तन्त्र के विकार भी इसी दौरान तेजी से उभरने लगते हैं।
चिन्तन द्वारा विभिन्न अभिव्यक्तियों के माध्यम से सतत् मिल भी रहा है। पर ये परिस्थितियाँ उलट भी सकती हैं, यदि सामूहिक चिन्तन को मोड़ा-मरोड़ा जा सके।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को समझदारी, ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ पूरा करते रहने का कर्मयोग भी उतना ही फलप्रद है।” तपस्वी का समाधान हुआ अहंकार और अज्ञान गला। कर्मयोग की महत्ता समझते हुए वे बिदा हो गये।
चिन्तन वाला व्यक्ति अपने को आत्मवादी माने और ऐसे लोगों को मिलने वाले श्रेय की अपेक्षा करे तो इसे उपहासास्पद ही माना जायेगा।
चिन्तन का सही लाभ लिया जा सकता है।
चिन्तन के अनुरूप ही युग का स्वरूप तथा प्रत्यक्ष वातावरण बनता है। तत्त्वदर्शियों का मत है कि इन दिनों की परिस्थितियाँ अत्यन्त विस्फोटक हो चली हैं। उसका प्रत्यक्ष कारण कुछ भी लगाया जाये पर परोक्ष तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण ध्वंसकारी विचार चक्र की गति एवं स्थिति का तीव्र एवं सुदृढ़ हो जाना है। जिसकी स्थूल प्रतिक्रिया निकृष्ट चिन्तन तथा भ्रष्ट आचरण के रूप में सर्वत्र दिखायी पड़ रही है। युग परिवर्तन में इसी विचार चक्र को तोड़ना तथा क्षीण पड़ गये सृजनधर्मी विचारचक्र को सुदृढ़ करना व गति देना पड़ता है।
चिन्तन तभी बन पड़ता है। एकाँगी मान्यताओं एवं पूर्वाग्रहों को तोड़ना सम्भव हो सके तो सर्वांगीण प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
चिन्तन को उतना ही अधिक अवसर मिलेगा।
चिन्तन करने से भी उथले परिणाम हाथ लगते हैं। एकाग्रवान बन पाने से विषय की गहराई में जाना सम्भव नहीं हो पाता। एक से अधिक विषयों पर एक साथ विचार करने से विचारों में भटकाव आता है, किसी उपयोगी परिणाम की आशा नहीं रहती। कई बातों में विचारों को भटकने देने की खुली छूट देने की अपेक्षा उपयोगी यह है कि एक समय में एक विषय पर सोचा जाय और जितना सोचा जाय पूरे मनोयोगपूर्वक। मनीषी, विचारक, वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्यकार कुछ महत्वपूर्ण समाज को इसीलिए दे पाते हैं कि वे अपने विचारों को भटकने-बिखरने नहीं देते, एक ही विषय के इर्द-गिर्द पूरी तन्मयता के साथ उन्हें घूमने देते हैं।
चिन्तन की प्रक्रिया भी चलती है। चयन किये गये विचारों के अनुरूप भी दृष्टिकोण का विकास होता है जो विश्वास को जन्म देता है। वह परिपक्व होकर पूर्व धारणा बन जाता है। व्यक्तियों की प्रकृति एवं अभिरुचि की भिन्नता के कारण मनुष्य-मनुष्य के विश्वासों, मान्यताओं एवं धारणाओं में भारी अन्तर पाया जाता है।
चिन्तन पद्धति में अर्जित की गयी भली-बुरी आदतों की भी भूमिका होती है। स्वभाव चिन्तन को अपने ढर्रे में घुमा भर देने में समर्थ हो जाता है। स्वस्थ और उपयोगी चिन्तन के लिए उस स्वभावगत ढर्रे को भी तोड़ना आवश्यक है जो मानवी गरिमा के प्रतिकूल है अथवा आत्म विकास में बाधक है।
चिन्तन को मोड़ा-मरोड़ा जा सके।
चिन्तन करते हैं, वहाँ तक आत्मा ही है। अनुभूतियों का केन्द्र वही है।
चिन्तन करने के लिए भी अपने मन को अभ्यस्त किया जा सकता है। मानसिक विकास के लिए अभीष्ट दिशा में सोचने के लिए अपनी प्रकृति को मोड़ा भी जा सकता है।
चिन्तन तथा भ्रष्ट आचरण के रूप में सर्वत्र दिखायी पड़ रही है। युग परिवर्तन में इसी विचार चक्र को तोड़ना तथा क्षीण पड़ गये सृजनधर्मी विचारचक्र को सुदृढ़ करना व गति देना पड़ता है।
चिन्तन किया जाय। स्वस्थ और यथार्थ चिन्तन तभी बन पड़ता है। एकाँगी मान्यताओं एवं पूर्वाग्रहों को तोड़ना सम्भव हो सके तो सर्वांगीण प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
चिन्तन होगा तथा विचार जगत से, भी उसी अनुरूप आदान-प्रदान चलेगा, वस्तुतः मानव की संकल्पशक्ति में गज़ब का बल है। वह पतन की ओर ढकेलने वाले मन-मस्तिष्क पर छाये निषेधात्मक विचारों के परिकर को एक झटके से तोड़ सकती है। यह सम्भव हो सके तो विचार जगत से श्रेष्ठ विचारों के आदान-प्रदान का अविराम क्रम आरम्भ हो सकता है। जिसके फलस्वरूप वह सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है, जो पदार्थ जगत से भी करतलगत कर सकना सम्भव नहीं हो सका है।
चिन्तन में मनुष्य की पूर्व मान्यताओं का भी योगदान होता है। सही विचारणा के लिए यह भी आवश्यक है कि अपनी पूर्व मान्यताओं, आग्रहों तथा धारणाओं का भी गम्भीरता से पक्षपात रहित होकर विश्लेषण किया जाय। पक्ष और विपक्ष दोनों पर ही सोचा जाय। किसी विषय पर एक तरह से सोचने की अपेक्षा विभिन्न पक्षों को ध्यान में रखकर चिन्तन किया जाय। स्वस्थ और यथार्थ चिन्तन तभी बन पड़ता है।
चिन्तन को अपने ढर्रे में घुमा भर देने में समर्थ हो जाता है। स्वस्थ और उपयोगी चिन्तन के लिए उस स्वभावगत ढर्रे को भी तोड़ना आवश्यक है जो मानवी गरिमा के प्रतिकूल है अथवा आत्म विकास में बाधक है।
चिन्तन बन नहीं पड़ता। किसी विचारक का यह कथन शत-प्रतिशत सच है कि “जो जितना पूर्वाग्रही हो वह चिन्तन की दृष्टि से उतना ही पिछड़ा होगा।” परिवर्तनशील इस संसार में मान्यताओं एवं तथ्यों के बदलते देरी नहीं लगती। अतएव मन-मस्तिष्क को सदा खुला रखना चाहिए ताकि यथार्थता से वंचित न रहना पड़े। खुले मन से हर औचित्य को बिना किसी ननुनच के स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
चिन्तन से बचने का एक तरीका यह भी हो सकता है कि अपनी गरिमा पर विचार करते रहा जाय तथा यह अनुभव किया जाय कि मानव जीवन एक महान उपलब्धि है, जिसका उपयोग श्रेष्ठ कार्यों में होना चाहिए। निकृष्ट चिन्तन मनुष्य को उसकी गरिमामय स्थिति से गिराता है, यह विश्वास जितना सुदृढ़ होता चला जायेगा विधेय चिन्तन को उतना ही अधिक अवसर मिलेगा।
चिन्तन मनुष्य को उसकी गरिमामय स्थिति से गिराता है, यह विश्वास जितना सुदृढ़ होता चला जायेगा विधेय चिन्तन को उतना ही अधिक अवसर मिलेगा।
चिन्तन से मनुष्य की वैचारिक क्षमताओं का ह्रास होता है। विधेयात्मक दृष्टिकोण से ही चिन्तन का सही लाभ लिया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-June
चिन्तन सिर पर सदा छाया रहा, फलतः समय कदाचित ही कभी निरर्थक गया हो। शरीर को नित्यकर्म और आवश्यक क्षणिक विश्राम के उपरान्त कदाचित् ही कभी खाली रहने दिया गया हो। इसका सन्तोष है।
चिन्तन में विकृतियों का भर जाना। आस्था संकट ही अपने युग का सबसे बड़ा विनाश कारण है। इससे बड़ा दुर्भिक्ष और कोई हो नहीं सकता। निराकरण का उपाय भी एक ही है। उलटे को उलट-कर सीधा करना।
चिन्तन, चरित्र, आहार, विहार मस्तिष्क अवाँछनीयताओं से भरा रहेगा। फलतः मन लगेगा ही नहीं। लिप्साएं और तृष्णायें जिसके मन को हर घड़ी उद्विग्न किये रहती हैं, उससे न एकाग्रता सधेगी और न चित्त की तन्मयता आयेगी। कर्मकाण्ड की चिन्ह पूजा भर से कुछ बात बनती नहीं। भजन का भावनाओं से सीधा सम्बन्ध है।
चिन्तन में उपासना- चरित्र में साधना और व्यवहार में आराधना का समावेश करने में पूरी-पूरी सतर्कता और तत्परता बरती जाय। उस निर्देशन का अद्यावधि यथासम्भव ठीक तरह ही परिपालन हुआ है। उसी के कारण अध्यात्म अवलम्बन का प्रतिफल इस रूप में सामने आया है कि उसका सहज उपहास नहीं उड़ाया जा सकता।
चिन्तन तथा प्रचलन का घर में प्रवेश नहीं होने दिया गया। इस प्रकार अपव्यय भी नहीं हुआ, दुर्गुण भी नहीं बढ़े- कुप्रचलन भी नहीं चला, सुसंस्कारी परिवार विकसित होता चला गया।
चिन्तन में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो। वे जब तक चाहते नितान्त एकान्त में सर्वथा एकाकी रहते। कोई उनके कार्य में तनिक भी विक्षेप नहीं कर सकता था। जब वे चाहते घण्टी बजाकर नौकर बुलाते और सभी वस्तु या व्यक्ति प्राप्त कर लेते। मिलने वाले मात्र कार्ड जमा करा जाते और जब कभी उन्हें बुलाया जाता तब की महीनों प्रतीक्षा करते।
चिन्तन के परिशोधन की आवश्यकता को देखते हुए जो बन पड़ा है, वह बहुत कम है। सूक्ष्मीकरण के उपरान्त भी इसे जारी रखा जायेगा। कोई भी कार्य आवेश में आने पर करना सम्भव है। भूतावेश के नाम पर कई व्यक्ति अनगढ़ काम करते हैं। देवावेश में भी उच्चस्तरीय घटना क्रम घटित होते रहे हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार तो उस आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालने का प्रयत्न नहीं करते जो आत्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य रूप में आवश्यक है। हमारी साधना पद्धति में इस भूल का समावेश न होने देने का आरम्भ से ही ध्यान रखा गया। अस्तु वह यथार्थ वादी भी है और सर्वसाधारण के लिए उपयोगी भी।
चिन्तन करने का अभ्यास डालने की आवश्यकता है। इस संसार में सदाशयता कहाँ है, कितनी है, अपने साथ उसका कितना, कब, किनके द्वारा पाला पड़ा है, इसका स्मरण करते रहा जाय तो भूतकाल अतीव आनन्द से भरा-पूरा प्रतीत होगा। इस स्तर की घटनाएँ अपने अन्तराल में ऐसी गुदगुदी उत्पन्न करेंगी, जिनकी स्मृति से भी पुलकन उत्पन्न होती रहें। जीवन कृत-कृत्य हुआ अनुभव होता रहे।
चिन्तन प्रवाह से स्वयं को जोड़ने के लिए अधिकाधिक ग्राहक बनाने- इस अंक के माध्यम से नयों को परिचित कराने की एक प्रतिस्पर्धा सी चल पड़ी है। कइयों ने पाँच-पाँच सौ अंक मंगाये हैं।
चिन्तन में अध्यात्म तत्वों का समावेश कर रही हैं। महान कार्यों के लिए किसी जादुई कलेवर वाले लोग नहीं होते। अपने जैसे ही हाड़माँस के लोग जब दृष्टिकोण रुझान एवं पराक्रम की दिशा बदलते हैं तो वे कुछ से कुछ बन जाते हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में होने वाले उच्च स्तरीय परिवर्तन हैं। जिनके लिए अपनी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों पर निरन्तर ध्यान देना पड़ता है। दुरितों के संशोधन में प्रखरता का उपयोग करना पड़ता है और नई दिशाधारा में अपने गुण कर्म, स्वभाव को इस प्रकार अभ्यस्त करना पड़ता है जैसे अनगढ़ पशु−पक्षियों को सरकस के करतब दिखाने के लिए जिस-तिस प्रकार प्रशिक्षित किया जाता है। पूजा कुछ थोड़े समय की हो सकती है, पर साधना तो ऐसी है जिसके लिए गोदी के बच्चे को पालने के लिए निरन्तर ध्यान रखना पड़ता है। फलवती भी वही होती है।
चिन्तन किया जाय? क्यों न सफलता का स्वप्न देखा जाय? उससे भी अच्छा यह है कि हर भली-बुरी परिस्थिति के लिए तैयार रहा जाय। अच्छे से अच्छे सपने देखे और बुरे से बुरे के लिए साहस पूर्वक तैयार रहें तो यह सन्तुलित मनोभूमि बनाये रहने वाली अपने कर्त्तव्य धर्म का परिपालन करते हुए हर परिस्थिति में प्रसन्न रह सकता है।
चिन्तन और उत्तरदायित्व और भी अधिक सघन तथा विरल हो जाता है। किस मोर्चे पर कितने सैनिक भेजना, जो लड़ रहे हैं, उनके लिए गोला बारूद कम न पड़ने देना, रसद का प्रबन्ध रखना, अस्पताल का दुरुस्त होना,मरे हुए सैनिकों को ठिकाने लगाना, अगले मोर्चे के लिए खाइयाँ खोदना जैसे काम बहुमुखी होते हैं। सभी पर समान ध्यान देना होता है। एक में भी चूक होने से बात बिगड़ जाती है। करा-धरा चौपट हो जाता है।
चिन्तन का आरोपण करके ऐसा स्वरूप बनाया जा सकता है, जिससे कुछ का कुछ दीखने लगे। कण-कण में भगवान की- उसकी रस सम्वेदना की झाँकी होने लगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-February
चिन्तन एवं रहन-सहन, दूसरे उस क्षेत्र की प्रकृतिगत भिन्नता विशेषता। इन दोनों प्रभावों को कारण उस क्षेत्र के निवासियों का एक विशेष ढर्रा बन जाता है और वह गुण, कर्म, स्वभाव में गहराई तक अपनी जड़े जमा लेता है। संस्कृतियों की भिन्नताओं के यही दो प्रमुख आधार हैं। यों मनुष्य स्वतंत्र और समर्थ है, वह अपनी संकल्प शक्ति के बल पर परम्परागत सभी दबावों को बदल सकने में सैद्धान्तिक दृष्टि से पूर्णतया सक्षम है। पर व्यवहार में होता यही है कि वातावरण अपने प्रभाव से उस क्षेत्र के मनुष्यों को ढालना चला जाता है।
चिन्तन का ऐसा मार्ग निर्धारित करें जिस पर चलने का प्रयास करते हुए किन्तु उपयोगी उपलब्धियों को हस्तगत करने की सम्भावना बने, आशा बँधे।
चिन्तन, विचारणा एवं गतिविधि के समन्वय से उत्पन्न होता है, मानवी प्रकृति प्रायः उससे ही अधिक प्रभावित होती है। वातावरण के इस पक्ष के विनिर्मित करना पूर्णतः मनुष्य के हाथों में है। जिस परिवेश में वह रहता है उसके सूक्ष्म प्रभावों एवं संस्कारों को ग्रहण करके उसी के अनुरूप ढलता जाता है। उसके गुण-कर्म स्वभाव वैसे ही बन जाते हैं। जैसी भी पीढ़ियाँ बनानी हों, जैसा भी समाज का ढाँचा खड़ा करना हो, उसके अनुरूप ही वातावरण बनाना होगा।
चिन्तन को प्रभावित करने वाला तत्त्वदर्शन भी वैज्ञानिक शोध प्रयोजनों में ही सम्मिलित रहना चाहिए।
चिन्तन की मर्यादाओं का व्यतिक्रम करके कुछ भी सोचने और कुछ भी करने लगे। ऐसे लोग कई बार निष्क्रिय हो बैठते हैं, कई बार आक्रामक रुख अपनाते हैं। कुछ घर छोड़कर कहीं भी चले जाते हैं और कुछ भी करते हुए जिधर-तिधर भटकते हैं। किन्तु अब नये किस्म के उन्मादों में ऐसी धाराएँ भी जुड़ी हैं जिनमें व्यक्ति सामान्यतया लोक व्यवहार निभाता है पर कभी-कभी कोई आवेश चढ़ता है और नशेबाजों की तरह अपनी पूर्व धारणा की अभिव्यक्ति करने लगता है। इन्हें एक विशेष प्रकार की सनकें कहा जा सकता है जो यदा-कदा उभरती हैं और कुछ ऐसी भी होती हैं जो स्वभाव में अपने लिए स्थान बना लेती हैं।
चिन्तन को सीमाबद्ध, दिशाबद्ध रखने वाले ही साहित्यकार, कलाकार, वैज्ञानिक, अन्वेषक स्तर के होते हैं। शोध प्रबन्ध लिखने वालों को इसी मार्ग का अवलम्बन करना पड़ता है। आर्चीटेक्ट स्तर के लोग विशाल भवनों में प्रयुक्त होने वाली छोटी से छोटी वस्तुओं का भी विवरण बना देते हैं। महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाने वाले ऐसे ही सधे हुए मस्तिष्क वाले होते हैं। उस विशेषता का अभाव रहने पर सुविकसित स्तर के मनुष्य भी बेसिलसिले की कल्पनाएँ करते रहते हैं।
चिन्तन चरित्र में, आज असुरता आई। पाप पतन को कुण्ठा कुत्सा, भावों बीच समाई॥
चिन्तन के सहारे साधक उस स्थिति तक पहुँचने का प्रयत्न करता है जिसमें माया से भ्रान्ति से छुटकारा मिल सके। यही मुक्ति की- जीवन मुक्ति की स्थिति है।
चिन्तन का दबाव कम करके भी बहुत हद तक पूरी की जा सकती है। कारण कि नींद का प्रभाव क्षेत्र मात्र सचेतन मस्तिष्क ही है। अचेतन तो जन्म के दिन से लेकर मरण पर्यन्त अनवरत रूप से कार्यरत रहता है। उसे विश्राम देने के लिए तो मरण या समाधि के दो ही रूप अभी तक जाने जा सके हैं। यदि मात्र सचेतन को विश्राम देने का नाम ही नींद है तो ऐसे अन्यान्य उपाय भी हो सकते हैं जो निद्रा का विकल्प बन सकें और अनिद्रा ग्रसितों को राहत दे सकें।
चिन्तन और अनुभव को बहुत महत्वपूर्ण मानते रहे। वे कहते थे कि आन्तरिक अनुभूतियों की दृष्टि से उन दिनों जो मैंने अनुभव पाये, वह जीवन भर के अनुसंधानों से किसी भी प्रकार कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।
चिन्तनों अरुचिकर सामाजिक-प्रचलनों अनपेक्षित दबावों को प्रमुख माना जाता है। अब उसी शृंखला में एस्किमो सम्पर्क के वैज्ञानिकों ने एक कड़ी और जोड़ी है- चुम्बकीय उभारों द्वारा व्यक्ति विशेष पर पड़ने वाले प्रभावों की। वे कहते हैं ध्रुव क्षेत्र की तरह ही कुछ अन्य क्षेत्र भी ऐसे हो सकते हैं जिनकी भौगोलिक एवं वातावरण सम्बन्धी चुम्बकीय परिस्थिति किन्हीं पर अतिरिक्त प्रभाव डाले और उसे इस प्रकार उन्माद में जकड़ दें।
चिन्तन को बहिरंग से मोड़कर अन्तर्मुखी बनाकर हर कोई सूर्य की दिव्य सामर्थ्य का लाभ उठाता रहा रह सकता है।
चिन्तन के प्रवाह को आश्चर्यजनक मोड़ दिया है। सम्पर्क क्षेत्र के व्यक्तियों को परामर्श एवं दबाव से सुधारे बिगाड़े जाने की बात सभी जानते हैं। उसी जानकारी में यह तथ्य भी सम्मिलित किया जाना चाहिए कि दूरवर्ती कुछ लोगों को ही नहीं, व्यापक क्षेत्र के निवासियों को भी दिशा विशेष में चलने बदलने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समावेश करना होता है। अन्तःकरण उमंगों और जीवनचर्या में तद्नुरूप विकास परिवर्तन न हो, यह हो ही नहीं सकता। यदि अन्तरात्मा में प्रकाश उभरा है- ईश्वरीय अनुग्रह उतरा है तो कदम भी उस दिशा में बढ़े हैं, जिसमें परमार्थ भी स्वार्थ साधन जैसा प्रिय लगने लगता है।
चिन्तन और पौरुष में भी प्रखरता का अनुपात बढ़ रहा है। प्रज्ञा परिजनों की गतिविधियों पर दृष्टिपात करने से इस भवितव्यता का पता सहज ही चल जाता है। इस आधार पर यह अनुमान लगाने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि शक्तियों का उद्भव और दुरुपयोग का जो क्रम पिछले दिनों चलता रहा है उससे भिन्न प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न होने में अब देर नहीं है।
चिन्तन क्रम अपनाया जाय। ऐसी मान्यता, भावना एवं आकाँक्षा का घेरा बनाया जाय। जिससे पशु प्रवृत्तियों को उच्छृंखलता प्रकट करने से पूर्व ही जकड़ा और मर्यादा में रहने के लिए बाधित किया जा सके।
चिन्तन पर जोर दिया गया है। ज्ञान और भक्ति उसी क्षेत्र में आते हैं। कर्मयोग के लिए जिस बलिष्ठता और सहन क्षमता की आवश्यकता है उसे उपार्जित करने के लिए तप तितीक्षा का अवलम्बन लेना पड़ता है यह हठयोग है। इसे अनुभवी विशेषज्ञों के संरक्षण में अपनी सहन शक्ति के साथ तालमेल बिठाते हुए ही किया जाना चाहिए। मनमर्जी से कुछ भी हठयोग ठान लेना लाभ के स्थान पर हानिकारक सिद्ध हो सकता है।
चिन्तन के माध्यम से उसे जीवनचर्या में सम्मिलित किया जाय। इस कसौटी पर कसने गायत्री मन्दिर खड़ा करने की तुलना में चल प्रज्ञा संस्थान विनिर्मित करने की उपयोगिता रत्ती भर भी कम सिद्ध नहीं होती। लागत कम और भावी झंझट कम होने की दृष्टि से भी यह अधिक सरल है। देवालयों में पूजा-पुजारी का, बिजली मरम्मत का जितना चालू खर्च बँधता है उसकी तुलना में ज्ञानरथ के लिए नियुक्त कार्यकर्ता कहीं सस्ता पड़ता है। ऐसी ही यथार्थताओं से अवगत प्रज्ञा परिजनों ने बड़ी संख्या में ज्ञानरथ बनाने चलाने का नया उपक्रम अपनाया है।
चिन्तन को सुधारा और सत्प्रयोजन के लिए उभारा जा सके। रूस के आविष्कारक क्षेत्र विशेष के लोगों को जिस आधार पर अस्त-व्यस्त करने में एक सीमा तक सफल हुए हैं, उसी आधार पर मानवी सत्ता की समर्थ प्रयोगशाला में लगे उपकरणों द्वारा व्यापक क्षेत्र के जनमानस को सुधारा सम्भाला भी तो जा सकता है।
चिन्तन देना और शिक्षण चलाना होगा। इसमें वे ही सफल हो सकते हैं जिनने उन विशेषताओं को अपने व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बना लिया है। अवांछनीयताओं की विषाक्तता से भी वर्तमान वातावरण के बदलने तथा ऐसे माहौल को विनिर्मित करने- जिसमें श्रेष्ठ मानवों की ढलाई होती चले, जाज्वल्यमान व्यक्तित्वों की आवश्यकता है जो आगे आएँ, साँचे की भूमिका निभाएँ। जब-जब भी महामानवों की पीढ़ियाँ जन्मी हैं, ऐसे सूक्ष्म घटकों के आधार पर ही विकसित हुई हैं। आगे भी अब आवश्यकता पड़ेगी ऐसे ही वातावरण की जरूरत पड़ेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-August
चिन्तन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि ‘स्व’ के विकास क अभाव में जीवन निरुद्देश्य है। आत्मा निरन्तर अपने प्राकट्य का बोध हमें कराती रहती है लेकिन उसका अहसास हमें तभी हो पाता है जब हम गहराई से अन्तः पर्यवेक्षण करें, अपने अहम् से मुक्ति पाएँ।”
चिन्तन को, भावी व्याधि की सम्भावना वाले एवं शीघ्र ठीक होने वाले व्यक्ति के आयन मण्डल को स्पष्टतः अंकित कर यह निर्धारण किया जा सकता है कि चिकित्सकों की, मनोरोग विशेषज्ञों की भावी दिशाधारा क्या हो? इसे उन्होंने अतीन्द्रिय ज्ञान नहीं अपितु अविज्ञात आयाम की खोज कहा है जिसे विज्ञान, लेसर, मेसर एवं होलोग्राफी के माध्यम से जानता तो था पर विस्मृति की विडंबना से ग्रसित भी था।
चिन्तन शुरू हो जाता है।
चिन्तन का उपयोग हुआ। जबकि एक बड़ा भाग अस्त-व्यस्त जीवन क्रम के कारण यों ही बेकार चला गया। भौतिक जीवन में सफल होने वाले व्यक्ति भी इस गुण के कारण ही सफलता के शिखर पर पहुँच पाते हैं। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक पथ में भी इसका अवलम्बन उतना ही आवश्यक है।
चिन्तन का विषय बनी हुई है। मनुष्य का भी प्रेत होता है, यह अब माना जाने लगा है एवं कई ऐसे नए तथ्य प्रकाश में आए हैं जिनसे महत्वपूर्ण घटनाओं के, महत्वपूर्ण पदार्थों के और प्रचण्ड संकल्प सत्ताओं के भी प्रेत होने की बात सच प्रतीत होती है। स्थूल रूप नष्ट होने पर सूक्ष्म के रूप में उनका अस्तित्व बना रहता है।
चिन्तन में उत्कृष्टता, चरित्र में आदर्शवादिता तथा व्यवहार में शालीनता का समन्वय किया जा सके तो धर्म का वह स्वरूप प्रकट होगा जहां विभेद नहीं, एकत्व स्थापित होगा। संघर्ष नहीं वरन् सर्वत्र प्रेम, सहकार, उदारता, व समर्पण का साम्राज्य होगा।
चिन्तन आरम्भ कर दिया जाय तो क्रमश मनोभूमि निर्धारित ढाँचे में ढलने लगेगी और अभ्यस्त ढर्रा बदलने लगेगा। परायों को अनगढ़ों को जब प्रयत्न पूर्वक सुधारा, सिखाया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि अपना मन और स्वभाव अवांछनीय प्रवाह में बहने से रोककर उपयोगी दिशाधारा अपनाने के लिए सहमत न किया जा सकेगा। आत्म निर्माण ही, भविष्य निर्माण है। उसी को भाग्य निर्माण भी कहते हैं। यह लगता तो अपने बस से बाहर है किन्तु वास्तविक यह है कि प्रयास पूर्वक यह कठिन काम भी सरल बनाया जा सकता है।
चिन्तन के क्षेत्र में भी यही विधेयात्मक रुख अपनाना पड़ता है।
चिन्तन दोनों एक मत हैं। दोनों इस प्रत्यक्ष जगत की विविधता के पीछे परोक्ष में निहित मूल एकता को मानते हैं। लेकिन न ही उपनिषद् एवं न ही प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक बहिरंग से सन्तुष्ट होकर रह जाते हैं। दोनों ही वस्तुओं के अन्तस् को, सत्य के चैतन्य पहलू को जानना चाहते हैं। भौतिकी को दार्शनिक ढंग से समझने- समझाने वालों ने यह प्रयास पूर्वार्त्त दर्शन के सहयोग से भली प्रकार किया है।
चिन्तन एवं कर्म पर सतत् निगरानी रखनी होती है।
चिन्तन की दिशा क्या है? तथा गतिविधियाँ अभीष्ट लक्ष्य की ओर बढ़ रही हैं या नहीं। इसका निरीक्षण करते रहना कुशल माली के समान आवश्यक है। अन्यथा निगरानी के अभाव में बगीचे में उगने-बढ़ने वाले झाड़-झंखाड़ जिस प्रकार पौधों की अभिवृद्धि में बाधक होते हैं, ठीक उसी प्रकार विकृतियों के प्रति जागरुकता का अभाव आत्मोत्कर्ष का मार्ग अवरुद्ध कर देता है। इसके लिए सद्विचारों का पोषण एवं निकृष्ट विचारों का निष्कासन जरूरी हो जाता है।
चिन्तन में शारीरिक एवं मानसिक क्षमता का एक बड़ा भाग नष्ट होता रहता है। समझा यह जाता है कि समय, श्रम एवं चिन्तन का उपयोग हुआ। जबकि एक बड़ा भाग अस्त-व्यस्त जीवन क्रम के कारण यों ही बेकार चला गया। भौतिक जीवन में सफल होने वाले व्यक्ति भी इस गुण के कारण ही सफलता के शिखर पर पहुँच पाते हैं। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक पथ में भी इसका अवलम्बन उतना ही आवश्यक है।
चिन्तन परक परिस्थितियाँ उच्चस्तरीय रहें तो उन्हें समुन्नत होने का अवसर मिलेगा।
चिन्तन की। काया भौतिक है। चेतना अध्यात्म। दोनों की अपनी-अपनी आवश्यकताएँ हैं। शरीर को अन्न, जल, वायु की- भोजन, वस्त्र, निवास की- आवश्यकता पड़ती है।
चिन्तन। साधना अर्थात्-चरित्र। इन दो की चर्चा हो चुकी। अब तीसरी अध्यात्म परिष्कार प्रक्रिया है- आराधना। आराधना किसकी?
चिन्तन में उत्कृष्टता, भावनाओं में पवित्रता, कर्मों में श्रेष्ठता ही इसकी चरम परिणति है। ये त्रिविधि प्रयास ही साधक को साध्य के निकट पहुँचाते हैं। ईश्वरीय प्रकाश निर्मल हृदय में ही अवतरित होता है। इसके लिए अपने चिन्तन एवं कर्म पर सतत् निगरानी रखनी होती है।
चिन्तन अपनाने पर उपहासास्पद बनना पड़ा था। उत्तम भविष्य की सम्भावना का फलित होना भी बरते गये पराक्रम पर निर्भर है। इसी प्रकार अनिष्ट का निराकरण भी प्रयत्न परायणता पर बहुत कुछ निर्भर है। सम्भावनाओं का अनुमान कितना ही सही क्यों न हो उनका निर्धारण किन्हीं के द्वारा भी क्यों न किया गया हो। समझा जाना चाहिए कि उनके साथ मानवी पराक्रम की शर्त अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई है।
चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार पर अवलम्बित है। शरीर को सुविधाएँ उपयुक्त मिलेंगी तो वह सुदृढ़ एवं दीर्घजीवी रहेगा। इसी प्रकार आत्मा के सम्मुख यदि चिन्तन परक परिस्थितियाँ उच्चस्तरीय रहें तो उन्हें समुन्नत होने का अवसर मिलेगा।
चिन्तन संगति प्रभाव एवं परिस्थितियों के दबाव से सरलतापूर्वक बदला जा सकता है।
चिन्तन एवं भविष्य वक्ता वर्ग में, खगोलवेत्ता ज्योतिषी- अदृश्य जगत के पर्यवेक्षण अध्यात्म तत्वदर्शी तथा तथ्यों के सूक्ष्म विवेचन बुद्धिजीवी दूरदर्शी यह तीन वर्ग प्रमुख हैं। इनकी निर्धारणाओं एवं घोषणाओं पर बहुत कुछ विश्वास भी किया जाता है। लोग तद्नुरूप अपनी भावी योजनाएँ बनाने में भी संलग्न होते हैं। इतने पर भी इस मूलभूत मान्यता पर विश्वास किया जाता है कि सम्भावनाओं का अनुमान अटल या अकाट्य नहीं है। उनमें परिस्थिति वश भी हेर-फेर हो सकता है और मानवी पुरुषार्थ से उसमें असाधारण उलट-पुलट होने की भी सम्भावना हो सकती है।
चिन्तन और आधुनिक वैज्ञानिक चिन्तन दोनों एक मत हैं। दोनों इस प्रत्यक्ष जगत की विविधता के पीछे परोक्ष में निहित मूल एकता को मानते हैं। लेकिन न ही उपनिषद् एवं न ही प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक बहिरंग से सन्तुष्ट होकर रह जाते हैं। दोनों ही वस्तुओं के अन्तस् को, सत्य के चैतन्य पहलू को जानना चाहते हैं। भौतिकी को दार्शनिक ढंग से समझने- समझाने वालों ने यह प्रयास पूर्वार्त्त दर्शन के सहयोग से भली प्रकार किया है।
चिन्तन-मनन के लिए बैठना पड़ता है। एकबार (1) आत्म समीक्षा (2) आत्म-सुधार (3) आत्म-निर्माण और (4) आत्म-विकास के सम्बन्ध में अपनी जाँच पड़ताल करने के लिए। दूसरी बात अपने गुण, कर्म, स्वभाव में संयम शीलता का कितना समावेश हो रहा है वह परखने के लिए। चार संयम ही, चार तप कहलाते हैं। इन्हें अपने में बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए।
चिन्तन मनन एवं ऊहापोह करते रह सकते हैं।
चिन्तन द्वारा नितान्त एकान्त में अनेकों बार चिन्तन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि ‘स्व’ के विकास क अभाव में जीवन निरुद्देश्य है। आत्मा निरन्तर अपने प्राकट्य का बोध हमें कराती रहती है लेकिन उसका अहसास हमें तभी हो पाता है जब हम गहराई से अन्तः पर्यवेक्षण करें, अपने अहम् से मुक्ति पाएँ।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-July
चिन्तन मनन हेतु निकालना चाहिए इसमें आत्म समीक्षा-आत्म सुधार की योजना-आत्म निर्माण की विधि और आत्म विकास की स्थिति प्राप्त करने का विचार करना चाहिए। वर्तमान स्थिति में जो बन सकता हो, उसका ताना बाना बुनना चाहिए। चार संयम ही तप हैं। इन्द्रिय, अर्थ, समय और विचारों में से एक भी विभूति का अपव्यय न किया जाये। न्यूनतम में निर्वाह करने और परिवार छोटा स्वावलम्बी बनाने की नीति अपनानी चाहिए।
चिन्तन और अभ्यास के आधार पर हस्तगत होता है। व्यक्तित्व का मूल्याँकन इसी आधार पर होता है। महत्वपूर्ण कार्य इसी के सहारे बन पड़ते हैं। गौरव गरिमा इसी के आधार पर निखरती है। महा मानवों में गणना कराने वाली विभूति यही है।
चिन्तन और दुष्ट आचरण उन्हीं से बन पड़ते हैं जिनके सोचने में संग्रह, उपभोग और प्रदर्शन की निकृष्टता अनावश्यक मात्रा में घुस पड़ी हैं। व्यक्तित्व के इस स्तर को सर्वत्र गर्हित ठहराया जायेगा और इस आधार पर आगे बढ़ने को पीछे हटने के लिए विवश किया जायेगा।
चिन्तन में निरत रहना पड़े। उन दिनों छोटे-छोटे गाँव बसते थे ताकि उनका सुसंचालन भली प्रकार हो सके। एक दूसरे को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने हेतु, समय निकाल सके, ध्यान दे सके। अब मनुष्य बेतरह कट गया है। बड़े गाँव शहरों आदि में रहने व पारस्परिक संपर्क न मिल पाने के कारण मनुष्य जंगली इक्कड़ जानवरों की तरह एकाकी और उच्छृंखल जीवन जीने लगा है।
चिन्तन में स्वर मिलाते हुए अनेकों दार्शनिकों-वैज्ञानिकों ने अपने-अपने मत व्यक्त किए हैं। सर जूलियन हक्सले कहते हैं कि “अपने पास एक मन होने के कारण ही मनुष्य इस जगत के भावी विकास के लिये उत्तरदायी माना जा सकता है। यह स्थिति अन्यान्य जीवों के साथ नहीं है। समष्टि में समाये इस व्यष्टि मन को सर्वव्यापी बनाकर ही वह अपने दायित्व को सही ढंग से निभा सकता है।”
चिन्तन-व्यवहार और व्यवसाय-क्रियाकलाप में तद्नुरूप हेर फेर करना आरम्भ कर देते हैं। उन्हें सुविधा रहती है। आकस्मिक टकरावों की मुसीबत नहीं सहनी पड़ती। जो अड़ियल प्रकृति के हैं, जो चल रहा है उसी को अनादि और अनन्त मान बैठते हैं, उनके लिए बदली परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाना कठिन पड़ता है।
चिन्तन देती हैं। इन्हीं को अदृश्य सहायक की उपमा भी दी जा सकती है। सम्भवतः उच्चस्तरीय सहायक आत्माएँ सूक्ष्म जगत का प्रत्यक्ष जगत से संपर्क जोड़ने के लिए यही माध्यम अपनाती हों।”
चिन्तन की उत्कृष्टता, जीवनक्रम के निर्धारण एवं वातावरण के दबाव से सम्पन्न कराया जाएगा। सभी वैसा ही जीवन जीकर सहकारी प्रयासों में निरत होंगे।
चिन्तन के प्रवाह को मरोड़-बदल सकें। मुनि जहाँ प्रत्यक्ष साधनों का प्रयोग करने की स्वतंत्रता रखते हैं, वहाँ ऋषियों के लिए यह अनिवार्य नहीं। वे अपने सूक्ष्म रूप में भी वातावरण को आन्दोलित करते- सुसंस्कारित बनाये रख सकते हैं।
चिन्तन और चरित्र में बेतरह निकृष्टता भरती जाती है। वासना, तृष्णा, अहन्ता पर आधारित भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण उन्हीं से बन पड़ते हैं जिनके सोचने में संग्रह, उपभोग और प्रदर्शन की निकृष्टता अनावश्यक मात्रा में घुस पड़ी हैं। व्यक्तित्व के इस स्तर को सर्वत्र गर्हित ठहराया जायेगा और इस आधार पर आगे बढ़ने को पीछे हटने के लिए विवश किया जायेगा।
चिन्तन को सही दिशा देने हेतु एक ऐसा विचार प्रवाह खड़ा करना जो किसी भी स्थिति में अवांछनीयताओं को टिकने ही न दे। आज जन समुदाय के मन-मस्तिष्क में जो दुर्मति घुस पड़ी है, उसी की परिणति ऐसी परिस्थितियों के रूप में नजर आती है जिन्हें जटिल, भयावह समझा जा रहा है। ऐसे वातावरण को बदलने के लिए व्यास की तरह, बुद्ध, गाँधी, कार्लमार्क्स की तरह, मार्टिन लूथर, अरविन्द, महर्षि रमण की तरह भूमिका निभाने वाले मुनि व ऋषि के युग्म की आवश्यकता है, जो प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रयासों द्वारा विचार क्रान्ति का प्रयोजन पूरा कर सके। यह पुरुषार्थ अन्तःक्षेत्र की प्रचण्ड तप साधना द्वारा ही सम्भव हो सकता है। इसका प्रत्यक्ष रूप युग मनीषा का हो सकता है जो अपनी लेखनी शक्ति द्वारा उस उत्कृष्ट स्तर का साहित्य रच सके जिसे युगान्तरकारी कहा जा सकता है।
चिन्तन के सुनियोजन का रास्ता ही बन्द है। सरलता और सुख-सुविधा हर किसी को प्रिय लगती है। चाहे दार्शनिक हो या वैज्ञानिक। स्थिति को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि दोनों ही क्षेत्रों में मौलिक विचारकता समाप्त प्रायः हो गई। दोनों को ही अपने मालिकों के लिए धनाध्यक्षों के लिए काम करना पड़ रहा है।
चिन्तन के अनुरूप वैसा ही मानो था। हर मनुष्य के अन्दर फेफड़ों का विस्तृत क्षेत्र होता है। गहरी साँस ले सकने के अभाव में वे उसके थोड़े से ही अंश से गुजारा कर तो लेते हैं लेकिन उथली साँस के परिणाम स्वरूप क्षय रोग, दमा आदि के शिकार भी होते देखे जाते हैं। मस्तिष्क की अपरिमित सामर्थ्य सम्पदा का मात्र तेरह प्रतिशत ही सामान्य से कुछ अधिक असामान्य स्तर वाले व्यक्ति सदुपयोग कर पाते हैं। लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं कि शेष का अस्तित्व नहीं।
चिन्तन उच्चस्तरीय होगा। कोई अपनी अकेले की ही न सोचकर सारे समूह के हित की बात को प्रधानता देगा।
चिन्तन को उभारते थे। ऐसी साधना अनेकों उच्चस्तरीय व्यक्तियों को जन्म देती थी- उनकी प्रसुप्त सामर्थ्य को उजागर कर उन्हें सही दिशा देकर समाज में वाँछित परिवर्तन लाती थी। शरीर की दृष्टि से सामान्य दृष्टिगोचर होने वाले व्यक्ति भी प्रतिभा-कुशलता-चिन्तन की श्रेष्ठता से अभिपूरित देखे जाते थे।
चिन्तन प्रवाह को जन्म दिया होता, सत्साहित्य रचा होता, ऐसे आन्दोलन चलाए होते। हिटलर ने जब नीत्से के सुपरमैन रूपी अधिनायक को अपने में साकार करने की इच्छा की तो सर्वप्रथम सारे राष्ट्र के विचार प्रवाह को उस दिशा में मोड़ा। अध्यापक-वैज्ञानिक वर्ग नाजीवाद का कट्टर समर्थक बना तो उसकी उस निषेधात्मक विचार साधना द्वारा जो उसने “मीन केम्फ” के रूप में आरोपित की। बाद में सारे राष्ट्र के पाठ्यक्रम, अखबारों की धारा का मोड़ उसने उस दिशा में मोड़ दिया जैसा कि वह चाहता था। जर्मन राष्ट्र नस्लवाद के अहं में सर्वश्रेष्ठ जाति का प्रतीक कोने के गर्वोन्माद में उन्मत्त हो व्यापक नर संहार कर स्वयं ध्वस्त हो गया।
चिन्तन, आचरण एवं व्यवहार के सभी पक्षों में काया-कल्प जैसा हेर-फेर होगा। यही युग परिवर्तन है। इस परिवर्तन का आधार दूरदर्शी विवेकशीलता का कसौटी पर कसकर अपनाया गया औचित्य ही होगा। पिछले दिनों का क्या सोचा माना या किया जाता रहा है। इसे भावी रीति-नीति का आधार नहीं माना जायेगा वरन् तर्क, तथ्य, प्रमाण न्याय एवं लोकहित की हर कसौटी पर कसने के उपरान्त जो खरा पाया जायेगा उसी को अपनाया जायेगा।
चिन्तन इस दिशा में चल पड़े, आत्मिकी के अनुसंधान में अपनी प्रज्ञा नियोजित कर वे स्वयं को धन्य बना सकें, ऐसा हमारा प्रयास रहेगा। सारी मानव जाति को अपनी मनीषा के द्वारा एवं शोध अनुसंधान के निष्कर्षों के माध्यम से लाभान्वित करने का हमारा संकल्प सूक्ष्मीकरण तपश्चर्या की स्थिति में और भी प्रखर रूप लेगा इसे आने वाला समय बताएगा।
चिन्तन को उत्कृष्ट बनाने वाला साहित्य रचा गया होता एवं उसकी भूख बढ़ाने का माद्दा जन-समुदाय के मन में पैदा किया गया होता तो क्या ये विकृतियाँ नजर आतीं जो आज समाज में विद्यमान है। दैनन्दिन जीवन की समस्याओं का समाधान यदि सम्भव हो सकता है तो वह युग-मनीषा के हाथों ही होगा।
चिन्तन रहा था जिसके कारण सदा आदर्शों के चिन्तन में निरत रहना पड़े। उन दिनों छोटे-छोटे गाँव बसते थे ताकि उनका सुसंचालन भली प्रकार हो सके। एक दूसरे को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने हेतु, समय निकाल सके, ध्यान दे सके। अब मनुष्य बेतरह कट गया है। बड़े गाँव शहरों आदि में रहने व पारस्परिक संपर्क न मिल पाने के कारण मनुष्य जंगली इक्कड़ जानवरों की तरह एकाकी और उच्छृंखल जीवन जीने लगा है।
चिन्तन, मनन का उपक्रम ऐसा होना चाहिए जिससे चेतना का स्तर सुविकसित होता हो। यह विभूति जिसे उपलब्ध है वह शरीर से चाणक्य जैसा कुरूप अष्टावक्र जैसा अपंग कालिदास जैसा अशिक्षित, सुदामा जैसा निर्धन होते हुए भी इन कमियों के कारण जीवन के किसी भी क्षेत्र में रुकता नहीं। सफलता की दिशा में द्रुतगति से आगे बढ़ता जाता है।
चिन्तन की श्रेष्ठता से अभिपूरित देखे जाते थे।
चिन्तन पर डालता रहता है। वैज्ञानिकों का कथन है कि हर व्यक्ति अपना विचार मण्डल (आयडियोस्फियर) बनाने के लिये पूर्ण रूपेण स्वतन्त्र है। वह चाहे तो इसे विधेयात्मक रूप देकर मनःशक्तियों को विकासोन्मुख कर सकता है, साथ ही निषेधात्मक विचार प्रवाह उसे पतन के गर्त्त में भी ढकेल सकता है। लेकिन इसी आयडियोस्फियर से सम्बन्धित एक और प्रकरण ऐसा है जो दैनन्दिन जीवन क्रम में मानवी व्यवहार में देखने को मिलता है। वह है- कुकल्पनाओं से गढ़ा हुआ विचित्र जगत- जिसमें भूत-पलीत, डायन-चुड़ैल आदि बसते हैं।
चिन्तन में ऐसी उथल-पुथल होगी जिसे उल्टे को उलट कर सीधा करना कहा जा सके।
चिन्तन-मनन स्वाध्याय द्वारा जन-मानस के परिष्कार की अहम् भूमिका निभाते हैं। एक पवित्रता का प्रतीक है तो दूसरा प्रखरता का। दोनों को ही तप साधना में निरत हो सूक्ष्मतम बनना पड़ता है ताकि अपना स्वरूप और विराट् व्यापक बनाकर स्वयं को आत्मबल सम्पन्न कर वे युग चिन्तन के प्रवाह को मरोड़-बदल सकें। मुनि जहाँ प्रत्यक्ष साधनों का प्रयोग करने की स्वतंत्रता रखते हैं, वहाँ ऋषियों के लिए यह अनिवार्य नहीं। वे अपने सूक्ष्म रूप में भी वातावरण को आन्दोलित करते- सुसंस्कारित बनाये रख सकते हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में आदर्शवादिता का समावेश (3) ऐसे वातावरण में रहने का अवसर जिसकी तुलना चन्दन के बगीचे में उगने वाले पौधों से की जा सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-November
चिन्तन की उत्कृष्टता का भी समावेश हुआ होता तो कितनी प्रसन्नता की बात रही होती।
चिन्तन के सीमित क्षेत्र से बाहर निकलने नहीं देती। तथाकथित आधुनिक मनोविज्ञान वस्तुतः आनुवाँशिकी तथा परिस्थितियों द्वारा संचालित है। इस नये मनोविज्ञान के एकाँगी तथा अपूर्ण प्रतिपादनों से लोगों की अकर्मण्यता को परिपोषण मिला है। जब वृत्तियों के अनुरूप जो होना है सो होगा ही, फिर कर्म से श्रेष्ठ बनने का आधार ही लड़खड़ा गया।
चिन्तन को मूल उद्देश्यों से भटकाते हों, पतन की ओर धकेलते हों तो प्रभावशाली तर्कों से युक्त होते हुए भी उन्हें नकारा जाना चाहिए। जो मानवी गरिमा को ऊँचा उठाए, उसमें छिपी महान सम्भावनाओं पर विश्वास रखता हो, वहीं वैज्ञानिक दर्शन वरणीय है।
चिन्तन की अस्तव्यस्तता के कारण भी। एन्डार्फिन द्रव्य समूह को उन्होंने माओ इनहिबिंटर (सक्रियता को नष्ट करने वाला) माना है। जिन व्यक्तियों में इस समूह की अधिकता होती है, वे प्रसन्न, खुली मनोवृत्ति के, कुण्ठा-ग्रन्थि रहित होते हैं तथा वातावरण से प्रभावित नहीं होते। यह निष्कर्ष उन्होंने एक औषधि के प्रभाव को देखकर निकाला। चिकित्सकों द्वारा दी जाने वाली एण्टीडिप्रेसेन्ट औषधियाँ (अवसाद शामक) न्यूरोट्रान्समीटर्स को उत्तेजित करती एवं माओ को निष्क्रिय करती हैं।
चिन्तन पर किया। विकास के लिए सहज सूत्र हाथ लगते ही अवशेष मर्यादाओं के वे बन्धन भी एक झटके से तोड़ दिये गये, जो मनुष्य की निम्नगामी प्रवृत्तियों पर थोड़ा अंकुश रखे हुए थे। कहना न होगा कि विश्व के वर्तमान नैतिक अवमूल्य में यौन वृत्तियों का समर्थन करने वाले चिंतन का विशेष योगदान है। इस कारण संसार में विशेषकर पाश्चात्य जगत में नैतिक पतन का जो सिलसिला चल पड़ा है उसका अन्त कहाँ जाकर होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। पर यह तो सुनिश्चित है कि मनुष्य के उल्टे चिन्तन को तथा प्रचलित मान्यता प्राप्त एकांगी किन्तु निरर्थक दर्शन को उल्टा न गया तो परिणति एक ऐसी विभीषिका के रूप में प्रस्तुत होगी जो अत्यन्त कष्टदायी हो सकती है।
चिन्तन और चरित्र की गहराई में उतरकर किसी की यथार्थता समझने-परखने की फुरसत किसे है? इस पर भी हर किसी का मन शंकाशील रहता है कि संपर्क में आने वाला व्यक्ति प्रामाणिक है या नहीं? जब तक इस सम्बन्ध में किसी निश्चय पर न पहुँचा जाय तब तक भरोसा कैसे हो? उसके बिना बड़ा काम सौंपने और बड़ा सहयोग देने के लिए कोई क्यों तैयार हो? इन सभी असमंजसों का निराकरण व्यक्ति की दृश्यमान परमार्थ परायणता से ही हो सकता है।
चिन्तन, श्रम और धन लगाने लगें तो समझाना चाहिए कि कल्याण ही कल्याण है।
चिन्तन को मनोवैज्ञानिक जंजीरों से बुरी तरह बाँध दिया है। विकास पशु-प्रवृत्तियों के परिपोषण एवं उनकी परितृप्ति में सन्निहित है, इस प्रतिपादन ने विकासवादियों से भी जबरदस्त दार्शनिक कुठाराघात जनमानस के चिन्तन पर किया। विकास के लिए सहज सूत्र हाथ लगते ही अवशेष मर्यादाओं के वे बन्धन भी एक झटके से तोड़ दिये गये, जो मनुष्य की निम्नगामी प्रवृत्तियों पर थोड़ा अंकुश रखे हुए थे। कहना न होगा कि विश्व के वर्तमान नैतिक अवमूल्य में यौन वृत्तियों का समर्थन करने वाले चिंतन का विशेष योगदान है। इस कारण संसार में विशेषकर पाश्चात्य जगत में नैतिक पतन का जो सिलसिला चल पड़ा है उसका अन्त कहाँ जाकर होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।
चिन्तन विकसित कर लिया है। निदान उपचार में आज जिन जटिल उपकरणों का उपयोग होता है, उससे रोग को प्रारम्भिक स्थिति में ही पकड़ लेने दुष्कर कार्य नहीं। व्यक्तियों में रोग एवं उनके लक्षणों के प्रति जागरुकता भी बढ़ी है। एक और पक्ष जो साथ-साथ अभिवृद्धि करता चला गया है, वह है सभ्यता के अभिशाप के रूप में नये-नये रोगों की उत्पत्ति एवं उनका असाध्य होते चले जाना। बढ़ते औद्योगीकरण प्रदूषण, रेडियो धर्मिता एवं निर्वनीकरण ने समस्या को और भी जटिल बना दिया है।
चिन्तन और व्यवहार को नीचे गिराता जा रहा है। इस स्थिति को बदलने में ही कल्याण है।
चिन्तन एकाँगी है- अधूरा है।
चिन्तन तथा उल्टे दर्शन से होने वाले लक्ष्य भटकाव का परिणाम सामने है- नयी पीढ़ी नैतिक मर्यादाओं तथा मानवी उदात्त अनुशासनों के बन्धन स्वीकार करने को तैयार नहीं है। वे अंकुश हटते-टूटते जा रहे हैं। जो व्यक्ति एवं समाज की सुव्यवस्था एवं शालीनता के लिए आवश्यक हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार आदर्शों से समाविष्ट नहीं है, जिन्हें केवल क्रिया-कृत्य ही सब कुछ प्रतीत होते हैं, वे मृगतृष्णा में भटकते हैं। भगवान इतने भोले नहीं हैं कि वे मनुष्य का जीवन क्रम न देखें, केवल नाम-जप, धूप-दीप, नैवेद्य-अक्षत मात्र से प्रसन्न होकर किसी को अपना भक्त समझ लें और वह सद्गति प्रदान करें जो सच्चे भक्तों को प्राप्त होती है। गीता में कही हुई भगवान की उक्त ही उन्हें प्राप्त करने का सच्चा मार्ग है। जो मन और बुद्धि को उन्हें समर्पित करते हैं, उनका स्वल्प कर्मकाण्ड भी निश्चित रूप से उन्हें लक्ष्य की प्राप्ति करा देता है।
चिन्तन से अभिप्रेरित है। फलतः वह न तो कभी महान सत्ता पर विचार करता है, न ही महानता की ओर बढ़ने की उसकी आकाँक्षा जागती है। पशु-प्रवृत्तियों के परिपोषण में ही उसकी सामर्थ्य खपती रहती है। मल-विक्षेपों से आत्म सत्ता का प्रकाश धूमिल हो गया है, उन्हें हटाकर आत्मा की दिव्यता को अभिव्यक्त करना जीवन का, विकास का परम लक्ष्य है, यह आकाँक्षा चिन्तन की पराधीनता के कारण जगने नहीं पाती। फलतः महानता की अभिव्यक्ति के लिए अवसर नहीं मिल पाता।
चिन्तन पर असामान्य प्रभाव डाला। “सृष्टि का विकास किसी परम सत्ता की प्रेरणा से विशिष्ट उद्देश्यों के लिये हुआ है” इस मान्यता को नकारा जाने लगा।” जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाले सिद्धान्त पर आधारित सखाइवल ऑफ द फिटेस्ट के सूत्र को मूल मन्त्र माना जाने लगा।
चिन्तन को प्रबल रूप से प्रभावित करती है।
चिन्तन ही व्यभिचार, अनाचार, चोरी, ठगी, आक्रमण, आघात आदि अपराधों के रूप में प्रकट होते हैं। दूसरा स्तर सनकों का है। चिन्ता, भय, आशंका, अविश्वास, उद्वेग, कामुक, कुदृष्टि, विक्षोभ, निराशा, खीज जैसी अनेकों कुकल्पनाएं है जिन्हें लोग किसी न किसी बहाने उगाते, बढ़ाते और छाती से चिपकाये रहते हैं। वास्तविक कारण तो रंच मात्र होते हैं, पर सनक को स्थापना बनाकर उस पर ऐसा रंग चढ़ाते हैं कि उन्हें स्वयं वस्तुस्थिति जैसी प्रतीत होने लगती है भले ही वह अन्यान्यों को निरर्थक एवं उपहासास्पद प्रतीत होती हो। इन्हीं मनोविकारों में एक उदासी भी है।
चिन्तन को तथा प्रचलित मान्यता प्राप्त एकांगी किन्तु निरर्थक दर्शन को उल्टा न गया तो परिणति एक ऐसी विभीषिका के रूप में प्रस्तुत होगी जो अत्यन्त कष्टदायी हो सकती है।
चिन्तन और आचरण में जितना सुधार परिष्कार हो सके, करें। सादगी और सात्विकता अपनायें। सज्जनता और शालीनता के साँचे में अपने को ढालें। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह अपनाने और वासना, तृष्णा, अहंता की आग में अपनी जीवन-सम्पदा को न जलायें। उच्चस्तरीय सफलताओं के लिए व्यक्तित्व की गरिमा को सम्पन्न बनाया जाना चाहिए।
चिन्तन की अनगढ़ता के कारण स्वभाव की उथली परतों पर बिखरा होता है। उसे आसानी से कुरेदा और बुहारा जा सकता है। इतना बन पड़े तो भी समझना चाहिए कि रुग्णता पर आधी विजय मिल गई।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार पर असर पड़ता है। कामुकताजन्य अपराधों की इन दिनों धूम है। चोरी ठगी, डकैती जैसे अपराधों की तुलना में कामुकता के अपराध कहीं अधिक बढ़ते जा रहे हैं। यह छूत की बीमारी एक से दूसरे को लगती है। दूसरे से तीसरे को।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उन उत्कृष्टताओं का समावेश किया गया है, जो व्यक्तित्व को वरिष्ठता की दिशा में उभारती उछालती है। इनकी गतिविधियों में कुछ नवीनताएँ आयी हैं। ऐसी नवीनता जो देश, धर्म, समाज और संस्कृति के बारे में लगनशील विचार कर सके। न केवल विचार वरन् उसके लिए कुछ कहने लायक पराक्रम भी दिखा सके। ऐसा पराक्रम जो दूसरों को भी अपनी ओर आकर्षित कर सके, जो अन्यान्यों को भी कुछ ऐसा करने की प्रेरणा दे सके।
चिन्तन की परिणति विवेकहीनता, अदूरदर्शिता से भरे कृत्यों के रूप में सर्वत्र देखी जा सकती है। जीवन की इतिश्री जब शरीर के साथ ही होने वाली है, तो फिर अगले जन्म की बात ही क्यों सोची जाय? जैसे भी बने अधिकाधिक उपभोग क्यों न किया जाय? चार्वाक के ‘ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत्’ के सिद्धान्त को अपनाने में हर्ज क्या?
चिन्तन और चरित्र में पवित्रता का संचार करती है या नहीं।
चिन्तन एवं क्रिया-कलाप उच्चस्तरीय प्रेरणाओं से नहीं उपरोक्त चिन्तन से अभिप्रेरित है। फलतः वह न तो कभी महान सत्ता पर विचार करता है, न ही महानता की ओर बढ़ने की उसकी आकाँक्षा जागती है। पशु-प्रवृत्तियों के परिपोषण में ही उसकी सामर्थ्य खपती रहती है। मल-विक्षेपों से आत्म सत्ता का प्रकाश धूमिल हो गया है, उन्हें हटाकर आत्मा की दिव्यता को अभिव्यक्त करना जीवन का, विकास का परम लक्ष्य है, यह आकाँक्षा चिन्तन की पराधीनता के कारण जगने नहीं पाती। फलतः महानता की अभिव्यक्ति के लिए अवसर नहीं मिल पाता।
चिन्तन की पराधीनता के कारण जगने नहीं पाती। फलतः महानता की अभिव्यक्ति के लिए अवसर नहीं मिल पाता।
चिन्तन का प्रतिफल मनोविकार और मनोरोगों के रूप में बढ़ता जा रहा है। कामुकता के विचार इतने सुलभ और सस्ते मिल रहे हैं। इसके साथ-साथ अन्याय अपराधों के घटनाक्रम और दृश्य देखने को मिलते हैं। इसका प्रभाव चारित्रिक अधःपतन के रूप में सामने आता ही है। इसके साथ-साथ मनोरोगों की अभिवृद्धि का सिलसिला भी चल पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-December
चिन्तन के बच्चे पर प्रभाव के अध्ययन हेतु कई माताओं का अध्ययन किया। एक घटना पत्रिका “न्यू साइन्टिस्ट” में उद्धृत करते हुए वे लिखते हैं कि एक स्त्री अपने बच्चे को बेचैन देखकर नींद लाने वाला सिरप देकर काम पर चली गयी। दुर्योगवश डोज कुछ अधिक हो गया, इस कारण बच्चा मर गया। लौटकर यह देखने पर उसके मन पर गहरा सदमा पहुँचा। इसी अवस्था में उसे दूसरा गर्भ ठहर गया।
चिन्तन से तनाव, मनः दौर्बल्य, अवसाद, आवेश जैसे मनोविकारों की उत्पत्ति होती है। जब भी सामान्य क्रिया-कलापों में अति का समावेश हो जाता है, उसका फल काया एवं मन एक साथ भुगतते हैं।
चिन्तन सही रहे पाता है न व्यवहार की शालीनता स्थिर रहती है। फलतः अविश्वास और असन्तोष का वातावरण भीतर भी दीखता है और बाहर भी। ऐसी दशा में मनुष्य के ऊपर दुःख दारिद्रय ही लदेंगे। मनोविकारों की इस परिणति का मनःशास्त्र पूरी तरह समर्थन करता है और अनेकानेक प्रमाणों से सिद्ध करता है कि सरल, सात्विक, सोम्य, सदाचारी चिन्तन चरित्र के सहारे ही व्यक्तित्व सुसंयत बना रह सकता है। उसे अपनाने में ही भलाई है।
चिन्तन करने वाली भावना सम्पन्न सन्ततियाँ जन्म लें। इससे ह्यूमन जेनेटिक इंजीनियरिंग की वर्तमान मान्यताओं को तो चोट पहुँचेगी किन्तु उन्हें सही दिशा मिलेगी व भावी पीढ़ी श्रेष्ठ स्तर की होगी।
चिन्तन चरित्र के सहारे ही व्यक्तित्व सुसंयत बना रह सकता है। उसे अपनाने में ही भलाई है। जो अनीति की राह पर चलेंगे वे अपने पैरों आप कुल्हाड़ी ही मारेंगे।
चिन्तन मनन पूर्वक पढ़ा जाय। साथ ही यह परखते चला जाय कि आदर्शों का हम अनुकरण कर रहे हैं या नहीं। यदि नहीं तो भूल को तुरन्त सुधारा जाय। यदि कर रहे हैं तो उस दिशा में और भी दृढ़ता अपनानी चाहिए। इस मनःस्थिति के साथ समाधान परक साहित्य पढ़ा जाये।
चिन्तन के होते हैं। जैसे ही उनकी बाह्य परिस्थितियों से इस रंग के प्रभाव को हटा दिया जाता है, उनमें विधेयात्मक वृत्ति उभरने लगती है।
चिन्तन के पक्षधर पाश्चात्य जगत के बहुसंख्य व्यक्ति अब यह अनुभव करते हैं कि स्थिति उनके बस में नहीं रही। आधुनिक तकनीकी के क्षेत्र में प्रगति करने वाले इन राष्ट्रों की यह गति क्यों कर हुई, कैसे नासमझी इन पर हो गयी, इसका कारण ढूँढ़ना हो तो हमें इस शताब्दी के प्रारम्भ में प्रतिपादन करने वाले कुछ पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों एवं स्वास्थ्य विज्ञानियों के तर्कों पर दृष्टि डालनी होगी। पूर्वार्त्त मनोविज्ञान एवं दर्शन के सीमित-संयत यौन संपर्क से सर्वथा विपरीत उक्ति व्यक्त करने वाले इन मनीषियों ने काम प्रवृत्ति पर अंकुश को एक कृत्रिम बलपूर्वक किया गया निरोध बताया व कहा कि सारी कुण्ठाओं, तनाव तथा मनोविकारों से मुक्ति पाने के लिये उन्मुक्त यौनाचार की छूट मिलना चाहिए। अन्धे को क्या चाहिए, बस दो आँखें। काम प्रवृत्ति बड़ी बलवती होती है।
चिन्तन, भाव-सम्वेदना का स्तर, गर्भकाल में आस-पास का वातावरण अधिक उत्तरदायी है। पूर्वार्ध मनोविज्ञान एवं दर्शन इसी कारण गर्भकाल में माता के अहार, मानसिक स्वास्थ्य से लेकर उच्चस्तरीय भाव सम्वेदनाओं पर जोर देता रहा है। जैसा संकल्प बल इन दिनों माता के अन्दर विकसित होता है, वैसी ही सन्तति होती है। पुँसवन संस्कार के पीछे भी यही मूलभूत मान्यता है कि भ्रूण में वे संस्कार प्रविष्ट हों जो अभीष्ट हैं। गर्भस्थ भ्रूण पर इस अभौतिक बल के क्या प्रभाव पड़ सकते हैं, इसके कई उदाहरण मिलते हैं।
चिन्तन क्रिया को उत्तेजित करके मनुष्य को तेजस्वी, मनस्वी बनाते हैं। इस प्रक्रिया से सम्बन्धित मनःक्षेत्र को बलिष्ठ बनाने वाले पाँच न्यूरोलॉजिकल सिस्टम हैं- (1) रेटीकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम (2) कार्टीकल न्यूकलाई (3) थेलेमस (4) हाइपोथेलेमस (5) मेड्युला-स्पाइनल कॉर्ड। यों ये शरीर में ही पाये जाते हैं पर इनका संचालन ढर्रे में ही होता है। स्थूल प्रयासों से इन्हें प्रभावित नहीं किया जा सकता। जबकि सूक्ष्म सामर्थ्य के स्पर्श मात्रा से इनमें हलचल मच जाती है और प्रसुप्त की जागृति होते ही मनुष्य आध्यात्मिक क्षेत्र में भी अपनी विशेष बलिष्ठता का परिचय देने लगता है।
चिन्तन किये बिना मन को निरन्तर परमार्थ में निरत रखा हो, तो मेरा पुण्य बाण के साथ जुड़े।
चिन्तन है। समष्टिगत दुष्प्रवृत्तियों का प्रतिफल ही प्रकृति का रौद्र रूप है। यह इकॉलाजी सिद्धान्त की एक ऐसी शाश्वत नियम व्यवस्था है जो अटल, सुनिश्चित है। इससे मुक्त कोई नहीं। सुव्यवस्थित प्रकृति के अनुकूल निर्धारित जीवन क्रम जीते हुए हर कोई सुख-शान्ति का रसास्वादन लेते रह सकता है।
चिन्तन भावना की दृष्टि से भी सुविकसित देवमानवों के विषय में धारणा बनानी चाहिए। पुरातन काल में जैसे मनुष्य इस पृथ्वी पर अवतरित हुए थे, वैसे ही विकसित सभ्यता के सन्देशवाहक ये दूत भी टोह लगाने, संपर्क माध्यम बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इनसे भयभीत होने के स्थान पर हम स्वयं को देवोपम बनाने का प्रयास करें ताकि विकसित तकनीकी के बलबूते आगे कभी संपर्क बनाने- उनकी भाषा समझ पाने का पुरुषार्थ सफल हो सके तो वे हमें उस स्थिति से श्रेष्ठ ही पायें जिस स्थिति में करोड़ों वर्ष पूर्व हमें पृथ्वी पर छोड़ गए थे।
चिन्तन को निषेधात्मक फटकार मिलती रहती है। सतत् ऐसे पोषण से तनाव, बेचैनी का होना स्वाभाविक है।
चिन्तन व भावना के अनुरूप क्रियाशील रहता है, ऐसी उनकी मान्यता है। इसी प्रकार कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय के भूतपूर्व उपकुलपति एवं जीव विज्ञानी सर एरिक एस्बी ने शैंल्ड्रेक के प्रतिपादन को गम्भीरता पूर्वक लिया है व कहा है कि “वनस्पति एवं प्राणी विकास सम्बन्धी परम्परागत मान्यताओं की दृष्टि से यह एक चुनौती भरा रहस्योद्घाटन है। हमें मानवी विकास, उसके चिन्तन एवं व्यवहार के लिये भ्रूण विज्ञान की गहराई तक जाकर ‘फार्मेटिव काजेशन’ के इस सिद्धान्त पर भली-भाँति मनन-चिन्तन करना चाहिए ताकि बाद में उत्पन्न होने वाली विकृतियों के लिए कारण को मूल रूप में ढूँढ़ा जा सके।”
चिन्तन एवं व्यवहार के लिये भ्रूण विज्ञान की गहराई तक जाकर ‘फार्मेटिव काजेशन’ के इस सिद्धान्त पर भली-भाँति मनन-चिन्तन करना चाहिए ताकि बाद में उत्पन्न होने वाली विकृतियों के लिए कारण को मूल रूप में ढूँढ़ा जा सके।”
चिन्तन करना चाहिए ताकि बाद में उत्पन्न होने वाली विकृतियों के लिए कारण को मूल रूप में ढूँढ़ा जा सके।”
चिन्तन के ज्ञात आयामों से परे जाकर ढूँढ़ना देखना होगा। उनके अनुसार जिस प्रकार हम चिड़िया घर के पशु पक्षियों पर निगाह रखते हैं, ठीक उसी प्रकार अन्य ग्रहों के जीव पर हम अपनी निगाह जमाए हुए हैं। उनका इरादा पृथ्वी पर हमला बोलने का नहीं लगता। ये तो पृथ्वी वासी ही हैं जो आपसी टकराव हेतु आयुधों का भण्डार जमा किए बैठे हैं।
चिन्तन, क्रिया-कौशल, प्रतिभा एवं भाव संवेदनाओं तक के लिये वह मार्फोजेनेटिक बल जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जो परोक्ष रूप से माँ के गर्भाशय में चिन्तन व भावना के अनुरूप क्रियाशील रहता है, ऐसी उनकी मान्यता है। इसी प्रकार कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय के भूतपूर्व उपकुलपति एवं जीव विज्ञानी सर एरिक एस्बी ने शैंल्ड्रेक के प्रतिपादन को गम्भीरता पूर्वक लिया है व कहा है कि “वनस्पति एवं प्राणी विकास सम्बन्धी परम्परागत मान्यताओं की दृष्टि से यह एक चुनौती भरा रहस्योद्घाटन है। हमें मानवी विकास, उसके चिन्तन एवं व्यवहार के लिये भ्रूण विज्ञान की गहराई तक जाकर ‘फार्मेटिव काजेशन’ के इस सिद्धान्त पर भली-भाँति मनन-चिन्तन करना चाहिए ताकि बाद में उत्पन्न होने वाली विकृतियों के लिए कारण को मूल रूप में ढूँढ़ा जा सके।”
चिन्तन के परिणाम स्वरूप विकसित हुआ था। किन्तु भौतिक दृष्टि से वंश की श्रेष्ठता पर जोर देने वाले, आनुवाँशिकता को महत्व देने वाले उस मूल प्रेरक बल को भूल जाते हैं जो गर्भस्थ बालक की मनोभूमि बनाता है। सम्भवतः डा. रुपर्ट शैंल्ड्रेक की मार्फोजेनेटिक फील्ड वाली मान्यता क्रमशः वैज्ञानिकों के गले उतरने लगे एवं गर्भस्थ शिशु पर चिन्तन-भावना का विचार पड़ने का प्रतिपादन उन्हें विज्ञान सम्मत लगने लगे। तब फिर आकृति पर नहीं, प्रकृति पर-पीढ़ियों की श्रेष्ठता पर जोर दिया जाने लगेगा। अध्यात्म दर्शन की इस मान्यता को मानने पर वैज्ञानिक विवश होंगे कि जीन याँत्रिकी द्वारा श्रेष्ठ कलमें बनाने के स्थान पर उदात्त-उत्कृष्ट चिन्तन करने वाली भावना सम्पन्न सन्ततियाँ जन्म लें।
चिन्तन, परामर्श, पर्यटन आदि उपाय काम में लाये जाते हैं। यह उपाय साधन जिन्हें उपलब्ध नहीं होते वे कूप मण्डूक बने रहते हैं। वे जीवन का भार ढोने के अतिरिक्त और कुछ कर नहीं पाते। इसलिए जहाँ चेतना की शक्ति पर विचार किया जाता है वहाँ प्रकारांतर से उसे विचार शक्ति का विशेष उपयोग कहा जाता है। विचारशील ही महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाते, महत्वपूर्ण कार्य करते और सफल महापुरुष कहलाते हैं।
चिन्तन वाले व्यक्ति एवं विधेयात्मक व्यक्तित्व में अन्तर उनके ऑरा के विश्लेषण से हो सकता है, यह डा. श्रोडिंजर ने 1976 में बताया।
चिन्तन की वह सारी पूँजी चुकती जाती है, जिसे यदि किसी योजनाबद्ध प्रयास में लगाया गया होता तो उसके परिणाम सामने आते। सर्वथा शेख-चिल्ली की रीति-नीति अपनानी हो तो बात दूसरी है। अन्यथा इस कुचक्र में उनकी शक्ति पूँजी घटती ही चली जाती है।
चिन्तन को प्रधानता दी जानी चाहिए, जिसकी कि बहुधा उपेक्षा कर दी जाती है।
चिन्तन की श्रेष्ठता-निकृष्टता, बुद्धिमत्ता, मूढ़ता का आधार बहुत कुछ इन पर निर्भर है।
चिन्तन-भावना का विचार पड़ने का प्रतिपादन उन्हें विज्ञान सम्मत लगने लगे। तब फिर आकृति पर नहीं, प्रकृति पर-पीढ़ियों की श्रेष्ठता पर जोर दिया जाने लगेगा। अध्यात्म दर्शन की इस मान्यता को मानने पर वैज्ञानिक विवश होंगे कि जीन याँत्रिकी द्वारा श्रेष्ठ कलमें बनाने के स्थान पर उदात्त-उत्कृष्ट चिन्तन करने वाली भावना सम्पन्न सन्ततियाँ जन्म लें। इससे ह्यूमन जेनेटिक इंजीनियरिंग की वर्तमान मान्यताओं को तो चोट पहुँचेगी किन्तु उन्हें सही दिशा मिलेगी व भावी पीढ़ी श्रेष्ठ स्तर की होगी।
चिन्तन अस्त-व्यस्त है वह चरित्र खो बैठता है। दुश्चरित्र से हर किसी के साथ दुर्व्यवहार ही बन पड़ेगा। दुर्गति अपनाने पर दुर्गति ही होती है। इसके विपरीत जिसका दृष्टिकोण सुलझा हुआ है उसे गुत्थियों का सामना नहीं करना पड़ता। उसका व्यवहार ऐसा होता है जिससे जीवन शान्ति के साथ व्यतीत होता रहे और जिन लोगों के साथ सम्बन्ध संपर्क हो वे भी सदा प्रसन्न और सन्तुष्ट रहें।
चिन्तन से प्रभावित होता ही है, बालक के चिन्तन, क्रिया-कौशल, प्रतिभा एवं भाव संवेदनाओं तक के लिये वह मार्फोजेनेटिक बल जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जो परोक्ष रूप से माँ के गर्भाशय में चिन्तन व भावना के अनुरूप क्रियाशील रहता है, ऐसी उनकी मान्यता है। इसी प्रकार कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय के भूतपूर्व उपकुलपति एवं जीव विज्ञानी सर एरिक एस्बी ने शैंल्ड्रेक के प्रतिपादन को गम्भीरता पूर्वक लिया है व कहा है कि “वनस्पति एवं प्राणी विकास सम्बन्धी परम्परागत मान्यताओं की दृष्टि से यह एक चुनौती भरा रहस्योद्घाटन है। हमें मानवी विकास, उसके चिन्तन एवं व्यवहार के लिये भ्रूण विज्ञान की गहराई तक जाकर ‘फार्मेटिव काजेशन’ के इस सिद्धान्त पर भली-भाँति मनन-चिन्तन करना चाहिए ताकि बाद में उत्पन्न होने वाली विकृतियों के लिए कारण को मूल रूप में ढूँढ़ा जा सके।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-January
चिन्तन को सहायता देकर किसी उपयोगी निर्णय तक पहुँचाने का माध्यम बनती है। यह विशेषता जिनमें होती है। उन्हीं को बाहुज्ञ कहते हैं। धारणा की यही विशेषता है कि जो चुना और देखा गया है उसका महत्वपूर्ण अंश संचित संस्कार में जमा होता रहे और समयानुसार काम में आये। इस उपलब्धि को संस्कार कहते हैं।
चिन्तन भी उपयुक्त स्थिति में रहे और अनुकूलता उत्पन्न करने में योगदान करे।
चिन्तन किया है। उनके लेखों और ग्रन्थों में सर्वसाधारण का ध्यान इस ओर खींचा गया है कि बदलते समय की ओर से आँखें बन्द न की जायँ। जो हो चुका उसका प्रभाव वर्तमान पर पड़ा है और वर्तमान की प्रक्रिया भविष्य को प्रभावित किये बिना रहेगी नहीं। इसलिए हमें वर्तमान की ही तरह भूत और भविष्य का भी पर्यवेक्षण करना चाहिए। डैनियल वैल की दृष्टि में अगले दिनों इतने बड़े परिवर्तन होंगे जिन्हें विगत एक हजार वर्ष की प्रगति की तुलना में कहीं अधिक आश्चर्यजनक ठहराया जा सकता है।
चिन्तन तो काफी पूर्व से चल रहा था लेकिन उतने महँगे साधन न जुट पाने से उस आवश्यकता को पूरी करने का सुयोग नहीं बन पा रहा था।
चिन्तन से भी स्वसम्मोहन और स्वसंवेदन, अनुशासन, स्व निर्देशन सम्भव तो है पर इसके लिए मनःशक्ति की प्रखरता अर्जित करनी होती है, अन्यथा कल्पना की उड़ाने उड़ने भर से बात बनती नहीं। अपने आपको दबोचने-घसीटने के लिए संकल्प शक्ति चाहिए। इसके अर्जित करने पर भी ध्यान द्वारा उपलब्ध हो सकने वाली सफलताओं का द्वार खुलता है। इसलिए ध्यानयोग को उच्चस्तरीय साधना माना गया है। इससे पहले की बाल कक्षा, क्रियायोग के रूप में ही सम्पन्न करनी पड़ती है।
चिन्तनधारा के जबरन विस्तार के लिए भी कर सकते हैं।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार बदलने की दृष्टि से हम मुट्ठी भर लोग बहुत ही कम हैं। हमें वंश−वृद्धि करनी चाहिए। अपने जैसे अन्य खोजने, बनाने, उगाने, पकाने के प्रयत्न में हमें लगना चाहिए। अन्यथा बढ़ती हुई भ्रांतियाँ, विकृतियाँ दुष्प्रवृत्तियाँ अगले दिनों अपनी बाढ़ में सब कुछ बहा ले जायेंगी। जो संचित सभ्यता को डुबो देने में समर्थ होंगी।
चिन्तन कितना सशक्त होता है इसे मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म आदि प्रयोगों के रूप में प्रत्यक्ष भी देखा जा सकता है। उसके परोक्ष परिणाम तो और भी अधिक आश्चर्यजनक पाये गये हैं।
चिन्तन का बिखराव होते रहने पर उसकी सामर्थ्य का पता नहीं चल पता, पर जब उसे एकाग्र कर लिया जाता है तो बन्दूक की नली से बारूद दागने और गोली के निशाना बेधने जैसी परिणति हाथ लगती है केन्द्रीभूत चिन्तन कितना सशक्त होता है इसे मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म आदि प्रयोगों के रूप में प्रत्यक्ष भी देखा जा सकता है। उसके परोक्ष परिणाम तो और भी अधिक आश्चर्यजनक पाये गये हैं।
चिन्तन और मनन की प्रक्रिया इसी आधार पर चलती है। प्रार्थना, मनुहार, पूजन सान्निध्य, समर्पण, विलय के रूप में भगवान से तादात्म्य स्थापित करने के आधार पर आत्म शिक्षण का अध्ययन तथा धारण का उभय पक्षीय प्रयोजन पूरा होता है।
चिन्तन एवं स्वभाव पर असर पड़ता है इसलिए शिक्षा तथा परम्परा के क्षेत्र में कुछ ऐसा समावेश होना चाहिए जिसके प्रभाव से आज का मनुष्य कल की अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान, साहसी और सद्गुणी हो सके।
चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का अभिवर्धन। आगे बढ़ने का अर्थ है- समर्थता और सम्पदा का उपार्जन। उपभोग से इन दोनों के समन्वय से जीवन की दिशाधारा बनती है। मान्यता और आकाँक्षाओं का स्तर श्रेष्ठ या निकृष्ट होना व्यक्ति का अपना चुनाव है। जो जिसे वरण करेगा वह उस दिशा में अग्रसर अवश्य होगा।
चिन्तन क्षेत्र के होते हैं। उनमें भावनाएँ, मान्यताएँ आकाँक्षाऐं ही प्रधान रूप से अपनी हलचलें प्रस्तुत करती है।
चिन्तन और व्यवहार में देवत्व का अभिवर्धन होकर चिरस्थाई सुख-शांति के लिए इसकी भी महती आवश्यकता है। आस्तिकता का बीजारोपण एवं परिपोषण करने के लिए न्यूनतम उपासना की भी एक मर्यादा बन चले। यह प्रज्ञा युग की अवतरण बेला है। गायत्री महामन्त्र में युग प्रज्ञा के समस्त तत्वों का समावेश है। किसी उपयुक्त स्थान पर महाप्रज्ञा गायत्री का एक चित्र स्थापित किया जाय।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार कर्त्तव्य पालन के आधार पर विनिर्मित होता है। वह सामाजिक उत्तरदायित्व को पहचानता और मर्यादा का अनुशासन पालते हुए उदारता की रीति-नीति अपनाता है। गरिमा का बोझ रहने से वह भटकता नहीं। शालीनता के राजमार्ग पर बिना भटके ठहरे अनवरत गति से चलता रहता है। ये सभी साधनापरक योगाभ्यास हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-June
चिन्तन का उपक्रम ऐसा होना चाहिए, जिससे चेतना का स्तर सुविकसित होता हों सुसंस्कारों की विभूति जिसे उपलब्ध है, वह शरीर से चाणक्य जैसे कुरूप, अष्टावक्र जैसा अपंग एवं सुदामा जैसा निर्धन होते हुए भी इन कमियों के कारण जीवन के किसी भी क्षेत्र में रुकता नहीं, सफलता की दिशा में दुर्गति से आगे बढ़ता जाता है।
चिन्तन का स्तर गिरता जा रहा है। सोचने की दिशा विकृत होती जा रही है। चारित्रिक स्तर गिर रहा है, गतिविधियों में तेजी से अवांछनीयता प्रवेश कर रही है। पाप-पुण्य का जैसा विश्लेषण हमारे साहित्यकार कर रहें हैं, उससे यही समझा जाने लगा है कि उचित-अनुचित का भेद करना निरर्थक है। अपनी सुविधा और रुचि स्वतन्त्रता के आधार पर जो ठीक लगे सो कर गुजरना चाहिए।
चिन्तन रहता था, जिसके कारण आदर्शवादिता उनके कार्यों में घुली रहती थी। एक-दूसरे को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने, औरों के लिए समय निकालने, ध्यान देने की अनिवार्यता सभी के जीवन में थी। अब यह परम्परा एक तरह से समाप्त हो गयी है।
चिन्तन का विस्तार करना सत्संग के स्वरूप को स्पष्ट करता है। इन दोनों की कार्यों के लिए अभी से ताना-बाना बुना जा रहा है। हिन्दी से जो लोग अंग्रेजी, गुजराती, तमिल, तेलगू, मलयालम, कन्नड़ आदि भाषाओं में अनुवाद कर सकें, ऐसे परिजनों को इन पंक्तियों के माध्यम से आमंत्रित किया जा रहा है।
चिन्तन इसी दिशा में चल रहा है, क्योंकि प्रकाशन में जिनका पैसा लगता है, वो तुरंत–फुरंत लाभ कमाना चाहते हैं। यह तभी सम्भव है, जब लोगों की माँग का पोषण किया जाए। कहना न होगा कि प्रचलित वातावरण में कुरुचि का बढ़ना स्वाभाविक है। कुरुचि का पोषण ही पसन्द किया जा रहा है। ऐसे में व्यवसायी के लिए यही रास्ता लाभदायक है कि वह जल्दी और अधिक लाभ कमाने के लिए कुरुचिपूर्ण उत्पादन करे।
चिन्तनजन्य विकारों के विनाश होने की बात कही गयी है। इसका प्रभाव पापनाशन, मृत्युनाशन तथा दुःखनाशन के रूप में भी प्रतिपादित किया गया है। शौनकीय अथर्ववेद संहिता (7।65।3) के अनुसार यह कुष्ठ रोगनाशक भी है।
चिन्तन का विकास किए बिना और किसी तरह हो ही नहीं सकता। जब तक सुसंस्कारों का संवर्द्धन नहीं किया जाता, तब तक मानव जीवन की, विश्ववसुधा की कुरूपता को हटाना किसी भी तरह सम्भव नहीं। यह संसार, मानव-जीवन सुन्दर और सुखद बनाया गया है, पर कुसंस्कारजन्य दुर्बुद्धि ही है, जिसने सब कुछ विकृत और दुखद बनाकर रख दिया। इस विडम्बना से मुक्ति दिला सकने की क्षमता केवल सार्थक शिक्षा में है। शिक्षा वहीं है, जो मानवीय अन्तःकरण में अच्छे संस्कारों को पल्लवित कर सके, ढर्रे में घुसे हुए अनौचित्य को हिम्मत और निर्भयता के साथ निकाल कर फेंक सके।
चिन्तन शैली और मानसिक प्रखरता आज के दार्शनिकों और वैज्ञानिकों को जन्म देने वाले स्थानों से कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी थी। संसार के सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में अनेकों स्थान पर (3।33।11।10।
चिन्तन की क्षमता पाना ही जीवन जीने का मकसद है। इसी से जीवन और जगत की यथार्थ स्वरूप का बोध होता है। तत्त्वदर्शियों ने इसी को मुक्ति कहा है, जिसे केवल संस्कारवान आत्माएँ ही प्राप्त करती हैं।
चिन्तन को राहुल सांस्कृत्यायन, विंडेल विल्की आदि मनीषियों ने भविष्य दृष्टि देने वाले अपने-अपने ग्रन्थों में प्रतिपादित किया है। समय की नाड़ी को परखते हुए शान्तिकुञ्ज ने भी इसे आन्दोलन को रूप देने का निर्णय किया है। क्योंकि ग्रामीण जीवन की ओर मुड़ना तभी संभव है, जब गाँव आदर्श ग्राम का रूप ले लें। बदबूदार नालियों, स्वास्थ्य-स्वच्छता से रहित एवं पारस्परिक विग्रह-वैमनस्य से ग्रसित आज के गाँव स्वयं अपना समाधान नहीं खोज पा रहे हैं। ऐसी हालत में इनसे राष्ट्र और समाज के लिए समाधान प्रस्तुत करने की आशा रखना उपयुक्त न होगा।
चिन्तन को पहुँचाना पड़ेगा। इसके लिए आवश्यक है कि उन्हीं धर्मों के लोग अपने-अपने शास्त्रों-परम्पराओं का उल्लेख करते हुए वे बातें कहें जो समय की आवश्यकता की पूर्ति करती है, अलगाव घटाती और एकता, समता, सहकारिता, शालीनता जैसी प्रवृत्तियों की मनोभूमि विकसित करती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-February
चिन्तन की सुघड़ अभिव्यक्ति हुई। आर्थिक राजनैतिक, सामाजिक न्याय, समानता, धर्मनिरपेक्षता, जाति, वर्ण, वर्ग, लिंग के भेदभावों से युक्त, मौलिक अधिकारों और राज्य के प्रति नीति-निर्देशक तत्वों पर आधारित एक सार्वभौम लोकतांत्रिक गणतांत्रिक स्वरूप बनाने में हम सफल हुए, परन्तु धीरे-धीरे हमारे देश का नेतृवृन्द त्याग की उपेक्षा करता गया, सेवाभावना की अवहेलना कर सत्ता के मोह से वशीभूत होता गया। परिणति आज की स्थिति हैं हालांकि पिछले ढाई हजार वर्षों के भारत के समाज संस्कृति, राजनीति और इतिहास पर ध्यान दिया जाय तो पराजय, हताशा कुहरा और विभ्रम के बीच से भी प्रकाश की किरण फूटी हैं यह प्रकाश की दीप्तिमान किरण परिवर्तन के सतत् क्रम महाकाल का कालदण्ड परिवर्तन के सतत् प्रहारों से देश की राजनीतिक जड़ता एवं घने अँधेरे को तोड़ देने के लिए उतारू हैं इन तीव्र परिवर्तनों के माध्यम से ही भारत की जनता “क्व कारोमि, कुत्र गच्छामि, को राष्ट्रनुद्वारियसि” की अपनी पहेलियों को सुलझाने में व्यस्त है।
चिन्तन का लक्ष्य। आवश्यकतानुसार देवात्मा हिमालय के हिमशिखरों के मध्य उदय होते सूर्य का चित्र रखा जा सकता है पीछे तो यह ध्यान बिना किन्हीं खास उपकरणों के होने लगता है यह अद्भुत ध्यान है इसके माध्यम से यदि भावनाएं ठीक ढंग से प्रगाढ़ हो जाए तो वहां सूक्ष्म व कारण ऋषिसत्ताओं की प्रत्यक्ष अनुभूति भी सहज सम्भव बन पड़ती है।
चिन्तन करना चाहिए। जब भी समय मिले, चार तथ्यों को चार वेदों का सारतत्व मानकर समझना और हृदयंगम करना चाहिए। यह तथ्य जितनी गहराई तक अन्तःकरण में प्रवेश कर सकेंगे, प्रतिष्ठित हो सकेंगे, उसी अनुपात से आत्म-निर्माण के लिए आवश्यक वातावरण बनता चला जाएगा।
चिन्तनधारा को प्रतिकूल एवं विषमकाल में भी अक्षुण्ण बनाए रखा। इस देश की संस्कृति समूची वसुधा को कुटुम्ब मानने की रही है। इसी कारण इस उर्वर धरा पर समस्त मानवता के कल्याण में तत्पर ऋषि-तपस्वी, अवतार, मानवहितों के लिए समर्पित विचारक एवं लोकसेवी पैदा हुए।
चिन्तन करते हुए मनः क्षेत्र में गहराई तक प्रतिष्ठापित करना चाहिए।
चिन्तन की आवश्यकता है। कहा जाता है। कि जनमा को उसकी योग्यता के और स्तर के मुताबिक ही शासनतंत्र मिलता है देश की जनता द्वारा भ्रष्टाचार और घोटालों के विरुद्ध सशक्त अभियान और पहल का अभाव इस कथन की पुष्टि करता प्रतीत होता हैं हमें इस सत्य का अहसास दिलाता है कि हम अभी भी जाग्रत नहीं हुए।
चिन्तन का केन्द्र मस्तिष्क उससे टपकने वाला आनन्द (मानवी उपलब्धियों का सन्तोष) उल्लास (सत्पथ गमन की प्रबल प्रेरणा) भरा सोमरस हमें उपलब्ध होता हैं जीभ उसे प्राप्त कर पाचन−तंत्र में भेजती हैं और वह अमृत रस-रक्त में घुल-मिलकर क्रियापद्धति के रूप में परिणत होता है इन्हीं भावनाओं को प्रखर बनाना खेचरीमुद्रा का सारतत्व हैं आज्ञाचक्र में देवात्मा हिमालय की दिव्य विभूतियों के अनुग्रह के रूप में रो--रोग में समावेश, अंधकार का पलायन, तमसो मा ज्योतिर्गमय की स्थिति यह सब है भ्रूमध्य में प्रकाश का चिन्तन का लक्ष्य। आवश्यकतानुसार देवात्मा हिमालय के हिमशिखरों के मध्य उदय होते सूर्य का चित्र रखा जा सकता है पीछे तो यह ध्यान बिना किन्हीं खास उपकरणों के होने लगता है यह अद्भुत ध्यान है इसके माध्यम से यदि भावनाएं ठीक ढंग से प्रगाढ़ हो जाए तो वहां सूक्ष्म व कारण ऋषिसत्ताओं की प्रत्यक्ष अनुभूति भी सहज सम्भव बन पड़ती है।
चिन्तन, आत्मसमीक्षा की साधना करनी चाहिए। आत्मदेव की सद्गुरु परमात्मा का प्रतिनिधि, उद्धारकर्ता एवं इष्टदेव के रूप में नमन करना चाहिए और आग्रह भरा अनुरोध करना चाहिए कि अपनी गतिविधियों का स्तर ऊंचा उठाए ताकि लक्ष्य की ओर सुख-शान्ति पूर्वक बढ़ चलाना संभव हो सके।
चिन्तन करते नित्य तन्मय रहते हैं। दिव्य लतातरु, पुष्पित- पल्लवित मधुरफल वनभूमि और रत्नोज्ज्वल गुफाएँ। यहाँ न केवल पशुओं का नाद, पक्षियों का कलरव, भ्रमरों का गुँजन ही, बल्कि निर्झरी की तरंगित ध्वनि में भी ओंकार का दिव्यनाद गूँजता है। यहाँ का पत्ता-पत्ता इस दिव्यगूँज के साथ नर्तन करने में लीन रहता है।
चिन्तन है जो विचार बीज के रूप में समाज को विश्व ही हर समस्याओं के समाधान के रूप में परमपूज्य गुरुदेव लिखकर ‘अखण्ड-ज्योति पत्रिका उसी प्राणचेतना का कलेवर है क्रान्ति की संदेशवाहिका है एवं पूज्यवर के विचारों का प्रतिबिम्ब है। पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वाङ्मय आज से प्रायः सवा दो वर्ष पूर्व आंवलखेड़ा की प्रािम पूर्णाहुति पर पहली बार 24 खण्डों के रूप में सबके समक्ष आया था इसके शेष बीस खण्ड कुछ माही बाद एवं पहले घोषित सत्तर विरात 3 माह में जन-जन पहुंच चुके है कुल 108 में से आगे के अड़तीस खण्डों का संपादन चल रहा हैं एवं संभावना है कि युग संधि की महापूर्णाहुति के साधनावर्ष के साथ-साथ में सब भी प्रकाशित हो जायेंगे जिस खण्ड ज्योति संस्थान घीयामंडी मथुरा के पते पर पत्र लिखकर मागा सकते है।
चिन्तन का इसके अतिरिक्त, और कोई उद्देश्य नहीं। ईश्वरप्राप्ति आत्मसाक्षात्कार, स्वर्ग-उपलब्धि ओर जीवन-मुक्ति का तात्विक स्वरूप यही हैं कि व्यक्ति अपनी समस्त क्षुद्रताओं और निकृष्टता को निरस्त करके सदुद्देश्यपूर्ण सत्प्रयोजनों में निरस्त रहने का अभ्यस्त बन जाय। परिष्कृत आत्मा का नाम ही परमात्मा हैं अपने कषाय-कल्मषों का निराकरण करना ही तप-साधना हैं ईश्वर-प्रेम का सहारा लेकर अन्तःकरण में अपार प्रेमनिष्ठ की धारणा और उसका लाभ उदार सेवा-प्रवृत्ति के रूप में प्राणिमात्र को देना, ईश्वरभक्ति हमें इसी लक्ष्य उदार सेवा-प्रवृत्ति के रूप में प्राणिमात्र को देना, ईश्वरभक्ति हमें इसी लक्ष्य की ओर ले जाती है। अध्यात्म दर्शन की सारी सफलता इस बात पर निर्भर की सारी सफलता इस बात पर निर्भर है कि व्यक्तित्व के समग्र निर्माण के लिए कितना साहस किया गया? दुर्गुणों को निरस्त करने और सद्गुणों को बढ़ाने के लिए कितना प्रयास किया गया।
चिन्तन और आदर्श कर्तव्य की आवश्यकता है, उसे जुटाने के लिए अनवरत अथक प्रयत्न करना इसी का नाम तप-साधना है। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन का इसके अतिरिक्त, और कोई उद्देश्य नहीं। ईश्वरप्राप्ति आत्मसाक्षात्कार, स्वर्ग-उपलब्धि ओर जीवन-मुक्ति का तात्विक स्वरूप यही हैं कि व्यक्ति अपनी समस्त क्षुद्रताओं और निकृष्टता को निरस्त करके सदुद्देश्यपूर्ण सत्प्रयोजनों में निरस्त रहने का अभ्यस्त बन जाय। परिष्कृत आत्मा का नाम ही परमात्मा हैं अपने कषाय-कल्मषों का निराकरण करना ही तप-साधना हैं ईश्वर-प्रेम का सहारा लेकर अन्तःकरण में अपार प्रेमनिष्ठ की धारणा और उसका लाभ उदार सेवा-प्रवृत्ति के रूप में प्राणिमात्र को देना, ईश्वरभक्ति हमें इसी लक्ष्य उदार सेवा-प्रवृत्ति के रूप में प्राणिमात्र को देना, ईश्वरभक्ति हमें इसी लक्ष्य की ओर ले जाती है। अध्यात्म दर्शन की सारी सफलता इस बात पर निर्भर की सारी सफलता इस बात पर निर्भर है कि व्यक्तित्व के समग्र निर्माण के लिए कितना साहस किया गया?
चिन्तन- कृत्व किस तरह औरों के निमित्त नियोजित होता है इसे पढ़कर समझकर भी वाङ्मय को सही अर्थों में आत्मसात कर पाएंगे इस खण्ड में इतना ही नहीं पूज्यवर के बारे में पूज्यवर की कलम से एवं उनके समीप रहे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की कलम से अनुभव सत्य पहली बार सबके समक्ष एक ही कलेवर में बंधकर आ रहे है इतना ही नहीं इस खण्ड के उत्तरार्द्ध के विराट वाङ्मय के किस खण्ड में क्या-क्या हैं इसकी एक संक्षिप्त में क्या क्या है इसकी एक संक्षिप्त सिनाश्रु भी दी गयी है। इस प्रकार एक ही स्थान पर परमपूज्य गुरुदेव परम वंदनीय माताजी के विषय में तथा उनके बहुमुखी क्रिया−कलाप के समग्र वाङ्मय के स्वम्प को इन प्रीपीडिया विश्व को किया सकता है

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-August
चिन्तन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अन्तः करण की स्वस्थता, प्रखरता परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीनों आधारों पर ही निर्भर है। गायत्री महामंत्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को कहा जा सकता है।
चिन्तन एवं दुष्ट आचरण से जूझने हेतु अध्यात्म दर्शन को किस तरह व्यावहारिक रूप में अपनाया जाना चाहिए, उसके लिए विस्तृत व्याख्या के साथ अंत में महाप्रज्ञा के अवलम्बन से संभावित सतयुगी परिस्थितियों की झाँकी दी गयी है। दूसरा खण्ड महामानव खण्ड है। इसमें धर्म के शाश्वत सिद्धान्तों के रूप में प्रचलित।
चिन्तन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए। गायत्री महामंत्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भावसमन्वय से ही सम्भव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका माहात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म-प्रसंगों में किया गया है।
चिन्तन में सुधार एवं परिस्थिति -परिवर्तन के रूप में भी किया जाना चाहिए।
चिन्तन उपलब्ध साधनाओं की मात्रा अधिक न होने पर भी जो हस्तगत है, उससे इतना आनन्द उठाया जा सकता है, जो परिपूर्ण संतोष प्रदान कर सके। इसी तरह भौतिक विज्ञान द्वारा सुविधा साधनाओं की दिशा में निरंतर किये जा रहे अभिवृद्धि के प्रयासों से भी समुचित लाभ तभी उठाया जा सकेगा, जब भावना एवं दृष्टिकोण को ऊँचा उठा सकने में समर्थ धर्म तत्वों को समझने के लिए भी समानान्तर प्रयास किया जाये। आज जहाँ विज्ञान ने शक्ति को पदार्थ के रूप में और पदार्थ को शक्ति के रूप में परिवर्तित करके यह सिद्ध किया है कि सूक्ष्म को स्थूल में और स्थूल को सूक्ष्म में परिवर्तित किया जा सकता है, वही दर्शन और अध्यात्म हजारों वर्षों पूर्व से यह सिद्ध करता आ रहा है कि विचार को घटना के रूप में विकसित किया जा सकता है और घटनाएँ विचारों का निर्माण कर सकने में समर्थ हैं।
चिन्तन और आदर्श कर्तव्य में ही उपासना और साधना के सारे रहस्य सन्निहित हैं और उन्हें अपनाने वाला सच्चे अर्थों में ईश्वर भक्त और सिद्ध पुरुष बन सकता है।
चिन्तन। चिन्तन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का आदर्शवादिता और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसंतुलित निर्धारण। इसके लिए प्रातःकाल उठते ही हर दिन नया जन्म हर रात नयी मौत का तथ्य सामने रखकर आज की समयपरक और भावपरक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। एक ही दिन के लिए यह जन्म है। आज ही रात को मृत्यु, निद्रा की गोदी में जाना है, इसलिए ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदा और वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए, जीवन लाभ लेने के लिए साहस पूर्वक तत्पर होना चाहिए।
चिन्तनशैली से की गयी परिवार सेवा योग साधना बन जाती है। पिता-माता भाई-बहन आदि का भरा पूरा कुटुम्ब किसी भावनाशील व्यक्ति के लिए अपने सद्गुणों के विकास के लिए विनिर्मित प्रयोगशाला ही सिद्ध होता है। इन थोड़े से व्यक्तियों की सुव्यवस्था बनाना एक छोटे राज्य का सुशासन चलाने के समान है। नेतृत्व, सुसंचालन सुव्यवस्था की दिशा में किसने कितनी योग्यता प्राप्त की, उसकी परीक्षा पारिवारिक जीवन में बरती गयी रीति-नीति से होती है। जो उसमें उत्तीर्ण होते हैं, उन्हें भगवान अधिक बड़े क्षेत्र का, अधिक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपते हैं।
चिन्तन के विस्तार में नियोजित होनी चाहिए। यही इस श्रावणी पर्व पर आत्मसमीक्षा हम सभी को करनी है।
चिन्तन है, जिससे व्यक्ति की सामयिक परिस्थितियों की अपेक्षा समष्टि की सर्वांगीण और सर्वकालीन आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता है। मनीषी अलबर्ट का कहना है कि धर्म हमारे भौतिक जीवन को सुखी बनाने में सहायक हो सकता है, पर भौतिक सुखों के लिए धर्म का उपयोग करना न तो उचित होगा और न संभव। धर्म एक आध्यात्मिक भूख है, जिसे तृप्ति करने के लिए भौतिक कष्ट भी सहने पड़ सकते हैं।
चिन्तन) इन तीनों को मिला देने से ही एक समग्र साधन-प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अंग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाये तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए भजन, मनन, और चिन्तन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अन्तः करण की स्वस्थता, प्रखरता परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीनों आधारों पर ही निर्भर है।
चिन्तन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का आदर्शवादिता और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसंतुलित निर्धारण। इसके लिए प्रातःकाल उठते ही हर दिन नया जन्म हर रात नयी मौत का तथ्य सामने रखकर आज की समयपरक और भावपरक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। एक ही दिन के लिए यह जन्म है। आज ही रात को मृत्यु, निद्रा की गोदी में जाना है, इसलिए ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदा और वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए, जीवन लाभ लेने के लिए साहस पूर्वक तत्पर होना चाहिए। किसी भी व्यवधान को इस निर्धारण में बाधक नहीं होने देनी चाहिए।
चिन्तनशील उसके लिए विरोधी विचारों की सेना सदा लड़ने के लिए तैयार रखता है। कभी कामुकता के विचार मन में उठे तो उसे निरस्त करने के लिए व्यभिचार से उत्पन्न होने वाले असंख्य अनर्थों का, संयम-ब्रह्मचर्य से उपलब्ध होने वाले सत्परिणामों की लम्बी सूची तैयार रखता है और जैसे ही उस स्तर के दुष्ट विचार उठे कि प्रतिरोधी सदाचार परायण विचार-श्रृंखला पर गम्भीरतापूर्वक ऊहापोह आरम्भ कर देता है। जहाँ यह प्रक्रिया आरम्भ हुई वहाँ कुविचारों के निराकरण में तनिक भी देर नहीं लगती।
चिन्तन का स्वरूप शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के खाँचे में इस तरह कस देती है कि असावधानी के कारण पनपने वाली दुष्प्रवृत्तियों के पनपने की कोई गुँजाइश न रहे। ढीली-पोली जीवन चर्या पर ही विकृतियाँ सवार होती हैं। यदि जागरूकता और सतर्कता बनी रहे तो दुष्ट दुर्भावों को सेंध लगाने का अवसर नहीं मिले। यदि वे कदाचित आक्रमण करे भी तो चिन्तनशील उसके लिए विरोधी विचारों की सेना सदा लड़ने के लिए तैयार रखता है। कभी कामुकता के विचार मन में उठे तो उसे निरस्त करने के लिए व्यभिचार से उत्पन्न होने वाले असंख्य अनर्थों का, संयम-ब्रह्मचर्य से उपलब्ध होने वाले सत्परिणामों की लम्बी सूची तैयार रखता है और जैसे ही उस स्तर के दुष्ट विचार उठे कि प्रतिरोधी सदाचार परायण विचार-श्रृंखला पर गम्भीरतापूर्वक ऊहापोह आरम्भ कर देता है।
चिन्तन किया है आपने?
चिन्तन और आदर्शवादी कर्तव्य के अंतर्गत ही गिना-समझा जाना चाहिए। कर्तव्य परायण का ही दूसरा नाम धर्म है। शारीरिक मानसिक पारिवारिक सामाजिक और सार्वभौमिक जिम्मेदारियों से मनुष्य की उच्छृंखलता का मर्यादित किया गया है, उसे अपने स्तर के अनुरूप सृष्टि संतुलन के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ भी निबाहनी होती हैं। धर्म का प्रयोजन इसी मानवोचित शालीनता और कर्तव्यनिष्ठा को अक्षुण्ण बनाये रखना है। संस्कृति और सम्प्रदायों में क्षेत्रीय और सामयिक परिस्थितियों के अनुसार आचार-व्यवहार की व्यवस्था रहती है।
चिन्तन चरित्र व्यवहार में उतारें। स्थायी सुख शान्ति तभी मिल सकती है।
चिन्तन किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनमें लगेगी उतनी ही अन्तर्ज्योति प्रखर होती चली जायेगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय-परिणय होने पर जिन दिव्य-सम्पदाओं की उपलब्धि होनी चाहिए, वे सहज ही करतलगत होती चली जाएँगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-December
चिन्तन-परक होता है। योगीजन इन्हीं प्रयत्नों में तल्लीन रहते हैं और अपने संग्रहित कुसंस्कारों को उच्चस्तरीय आस्थाओं में परिणत करने के लिए भावनात्मक पुरुषार्थ करते रहते हैं। निष्कृष्टता जितने अंशों में उत्कृष्टता के साथ जुड़ जाती है, उतने ही अंशों में आत्मा को परमात्मा की प्राप्ति हो चली, ऐसे माना जाता है।
चिन्तनात्मक विशेषताओं के सहारे औचित्य-अनौचित्य का अन्तर करना संभव होता हैं। स्थिति के साथ तालमेल बिठाने के लिए इच्छाओं पर अंकुश रख सकना इसी आधार पर संभव होता है।
चिन्तन करते हैं, तो हमारा मन गर्व से भर उठता है। हमें इस कार्य से काफी संतोष है।
चिन्तन की ओर धकेल दिया है। इसके कारण कहीं भूकम्प, बाढ़, महामारी तो कहीं अनाचार, अत्याचार, पाप की विभीषिका अपना पसारा फैला रही है। अब समय आ गया है कि आपको रचनात्मक कार्यों की ओर चलना है। यह युगसंधि महापुरश्चरण इसी प्रकार का कार्य है, जिसमें आप सभी लोग शामिल है।
चिन्तन-मनन कथा-प्रवचनों का महात्म्य इसी आधार पर बताया गया है ताकि उस प्रक्रिया के सहारे मानवी चिन्तन का परिष्कार होता रहे और विकृत मनोवृत्तियों से छुटकारा मिलता रहे। इससे विवेकयुक्त दूरदर्शिता का पथ प्रशस्त होता है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतम्भरा-इसी परिष्कृत चिन्तन का नाम है।” ऋतं ज्ञानेन मुक्ति” “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमही विद्यते” जैसी उक्तियों में सद्ज्ञान को साधना का प्राण माना गया है। वेदान्त दर्शन को तो विशुद्ध रूप से ज्ञान-साधना ही कहा जा सकता है।
चिन्तन एवं कर्त्तृत्व एक तरह का होता है और दुर्जनों का दूसरी तरह का। इसमें दोनों ही शरीर और मन सर्वथा निर्दोष होते हैं। अन्तःप्रेरणा का निर्देश बजाते रहना भर उनका काम है। इसलिए शरीर को दुष्कर्म करने या मन को दुर्बुद्धिग्रस्त होने का जो दोष दिया जाता है, वह अवास्तविक है। इन दोनों वाहनों को प्रेरणा एवं दिशा देने का काम अन्तःकरण रूपी सारथी का है।
चिन्तन करते-करते हमारा अंतःकरण भी दूषित होता चला जाता है। एक प्रसंग है-श्यामाचरण लाहिड़ी के जीवन का। वे हिमालय में महावतार बाबा के दर्शन कर लौटे। इलाहाबाद कुंभ में स्नान हेतु आए। वहाँ देखा गांजा–सुलफा पीने वाले साधुओं को, उनकी लोकसेवा के स्थान पर अधिक पाने की कामना को।
चिन्तन की नीति अपनाते हैं और जीवनमुक्ति का आनन्द लेते है।
चिन्तन की ओर उन्मुख होते ही तपते मन को शांति मिलती है। संतों के सत्संग की जब बात होती है और जब ‘प्रथम भक्ति संतन कर संग’ की व्याख्या करते हैं तो लगता हैं कि संत की परिभाषा भी होनी चाहिए। गोस्वामी जी के शब्दों में-
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की उदात्त रीति-नीति अपनाने वाले ही इस महान जीवन-लक्ष्य को प्राप्त करते देखे जा सकते हैं।
चिन्तन एवं कर्तृत्व में व्यापक लोकहित की भावना काम करती है। कहना न होगा कि ज्ञानसाधना से बन्धनमुक्त हुई आत्माओं की प्रत्येक विचारणा और प्रत्येक क्रियापद्धति में मात्र आदर्शवादिता ही उभरती-छलकती दिखाई पड़ती है। ऐसे लोग अभावग्रस्त और संकटग्रस्त हो सकते हैं, पर अन्तःकरण में उन्हें असीम आनन्द और सन्तोष की अनुभूति हर घड़ी होती रहती है।
चिन्तन, समय, श्रम, मनोयोग, कौशल एवं धन का बहुत बड़ा अंश नष्ट करना पड़ता है। ब्रह्मचर्य की बात इसी दृष्टि से है। वैसे भी आज की परिस्थितियों में सन्तान का सीमाबंधन युग की अनिवार्य आवश्यकता है। उसकी पूर्ति के लिए ब्रह्मचर्य सर्वोत्तम उपाय है। शक्तियों को सदुद्देश्य में लगाने के लिए, जनसंख्या संकट से लड़ने के लिए ब्रह्मचर्य का श्रेष्ठतम स्थान प्राप्त है।
चिन्तन को आवश्यक माना गया है। हर दिन सूर्योदय से पूर्व या सूर्यास्त के बाद जब चित्त शान्त हो तब अपने अन्तरंग -बहिरंग स्थिति का लेखा-जोखा लेना चाहिए और भूलों को सुधारने, कमियों को पूरा करने तथा भावी प्रगति के लिए जो कदम उठाने आवश्यक है, उनका दूरगामी एवं सामयिक निर्धारण करना चाहिए। निर्धारण ऐसा होना चाहिए कि जो वर्तमान स्थिति में बिना समय गँवाकर कार्यान्वित हो सके।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को सुसंस्कृत बनाने वाले सभी तत्व कूट-कूट कर भरे हैं। आपके द्वारा इस तरह की जानकारी अगर जन-जन तक पहुँचायी जा सकी तो हमारा पूर्ण विश्वास है कि लोकचिंतन और व्यवहार-प्रचलन में उस उत्कृष्टता का समावेश हो सकता है।, जो युग विभीषिका से जूझने और उज्ज्वल भविष्य की संरचना में पूर्ण तथा सफल हो सके।
चिन्तन का नाम है।” ऋतं ज्ञानेन मुक्ति” “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमही विद्यते” जैसी उक्तियों में सद्ज्ञान को साधना का प्राण माना गया है। वेदान्त दर्शन को तो विशुद्ध रूप से ज्ञान-साधना ही कहा जा सकता है।
चिन्तन आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास का सूक्ष्मदृष्टि से प्रकाश-युक्त मार्गदर्शन किया जाता है। दूसरे शब्दों में, इसे जीवात्मा की विवेचना कह सकते हैं।
चिन्तन से नहीं प्रेम से पाइए। भक्ति-सिद्धि में आक्रामक चित्त-ईर्ष्यालु मन एक बाधा को समान है। अतः एक प्रेयसी की तरह ही प्रभु को पाया जा सकता है। प्रभु को पाना है तो अत्यन्त शान्त-निष्काम भाव वाली दशा हो। न अपना पता रहे, न उसका पता।
चिन्तन। चिंतन को ही सजीवता का चिह्न माना जाता है। आस्था, आकांक्षा, भावना, कल्पना, विवेचना आदि उसी के भेद-उपभेद हैं। प्राणवान को साहसी समझा जाता हैं पराक्रमी, पुरुषार्थी और जीवट का धनी। महाप्राण प्रतिभावान होते हैं और अल्पप्राण कहकर दीन-दुर्बलों कायरों का तिरस्कार किया जाता है।
चिन्तन सुधारने और प्रतिभा निखारने के लिए भेजते हैं।
चिन्तन का परिष्कार होता रहे और विकृत मनोवृत्तियों से छुटकारा मिलता रहे। इससे विवेकयुक्त दूरदर्शिता का पथ प्रशस्त होता है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतम्भरा-इसी परिष्कृत चिन्तन का नाम है।” ऋतं ज्ञानेन मुक्ति” “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमही विद्यते” जैसी उक्तियों में सद्ज्ञान को साधना का प्राण माना गया है। वेदान्त दर्शन को तो विशुद्ध रूप से ज्ञान-साधना ही कहा जा सकता है।
चिन्तन करते हुए भी वह सांसारिक पदार्थों एवं व्यक्तियों के प्रति अनासक्त होता है। अर्जुन को सम्बोधित करते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-May
चिन्तन से राष्ट्रीयता की परिभाषा एक समूह चेतना के रूप में की गयी, जो किसी भूखंड पर रहने वाले समाज को उसकी अनेक बाह्य विविधताओं के होते हुए भी एक लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया के फलस्वरूप उस भूमि के प्रति माता-पुत्र भाव से जोड़ देती है।
चिन्तन एवं व्यवहार द्वारा ही जाना जाता है, बाहरी श्रृंगार एवं परिधान से नहीं। कीमती एवं महँगे सूट मात्र दिखावा एवं आडम्बर हैं, इनसे व्यक्ति के अहंकार का व्यर्थ पोषण होता है। इसलिए मैं इसमें अपने परिश्रमजन्य साधन-सम्पत्ति क्यों बर्बाद करूं?
चिन्तन का शिकार हो गया। आखिर में उन्होंने हिप्नोटिज्म चिकित्सा के लिए विख्यात चिकित्सक डॉ. निकोलाई दाँल से संपर्क किया। डॉ. दाँल स्विमनीनोफ को तीन महीने तक लगातार आधे-आधे घण्टे तक सेसन्स में सामान्य हिप्नोटिज्म चिकित्सा के साथ-साथ बार-बार एक ही सजेशन-संकेत देते रहे कि “तुम पुनः संगीत की अच्छी तर्ज बना लोगे और सफलता के साथ बड़ी आसानी से उसका प्रदर्शन कर सकोगे।
चिन्तन ने राष्ट्रीयता को राजनैतिक अवधारणा के रूप में स्वीकार करने पर विवश कर दिया। राजसत्ता को ही राष्ट्र निर्माण का मुख्य माध्यम माना गया। स्पष्ट किया गया कि राष्ट्र निमार्ण हेतु भाषा, नस्ल और राज्य की एकता अनिवार्य है। इस चिन्तन ने भारतीय साँस्कृतिक विविधता को अस्वीकार कर दिया एवं इसकी एकता और अखण्डता को खण्डित करने का प्रयास किया। प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् यूरोप और अमेरिका में राष्ट्रीयता की अवधारणा के बारे में पुनः चिन्तन प्रारम्भ हुआ।
चिन्तन मानव जीवन को शुष्क व नीरस ही नहीं विकृतियों से पूर्ण भी बना देता है। कई प्रकार के दुर्व्यसन पलने हेतु भूमि भी इससे तैयार हो जाती है। यही नहीं बहुविध प्रशिक्षित ऑफिसर्स, मैनेजर्स, व्यापारीगण आदि के पारिवारिक जीवन प्रायः विश्रृंखलित से देखे गये हैं। वे लिखते हैं कि असफल विवाह, विवाहेत्तर सम्बन्धों की बहुलता ऐसे व्यक्तियों में अधिक मिलती है। इनकी सन्तानें भी कई दुर्व्यसनों का शिकार होती देखी गई हैं।
चिन्तन प्रारम्भ हुआ। डब्ल्य, नैस्सन सीनियर ने उल्लेख किया है कि यूरोपीय राष्ट्रीय चिन्तन बर्बरतापूर्ण है एवं राष्ट्र की प्रगति के लिए घोर अभिशाप है। इसके द्वारा कोई भी राष्ट्र विकसित व पल्लवित नहीं हो सकता। सी.जे.एच. ह्येज हेंस कोहन आदि अनेक विद्वानों ने राष्ट्रीयता की इस व्याख्या को अवैधानिक और अनैतिक भी प्रमाणित कर दिखाया। इस पुनः चिन्तन से राष्ट्रीयता की परिभाषा एक समूह चेतना के रूप में की गयी, जो किसी भूखंड पर रहने वाले समाज को उसकी अनेक बाह्य विविधताओं के होते हुए भी एक लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया के फलस्वरूप उस भूमि के प्रति माता-पुत्र भाव से जोड़ देती है।
चिन्तन और प्रयास को सीमित रखने वाले नफे में रहते हैं। यह सोचना अवास्तविक है। उस नीति को अपनाने वाले असन्तोष, असम्मान और दैवी-आक्रोश सहते और दुर्बुद्धिजन्य अनेकानेक दुर्व्यसनों, अनाचरणों में ग्रसित होकर पग-पग पर संकट सहते हैं। इसके विपरीत उदारचेता परमार्थ का आनन्द तो लेते ही हैं।, आत्मबल, उच्च चरित्र एवं जनसहयोग के सहारे सुख-साधनों से भी वंचित नहीं रहते।
चिन्तन क्रम धर्म और अध्यात्म के तत्त्वज्ञान से जुड़ा हुआ है। उसे अपनाया जा सके, तो संसार में फैले पागलपन और असंतुलन से छुटकारा मिल सकता है।
चिन्तन ने दुष्ट आचरण को बढ़ाया है और अवांछनीयता को उच्छृंखलता के स्तर तक पहुँचाने का अवसर मिला है। फलतः अनीति अपनाने में एक-दूसरे से आगे बढ़ना चाहता है। दुष्प्रवृत्तियाँ क्रमशः परम्परा बनती और मनुष्य स्वभाव में सम्मिलित होती जा रही हैं। फलतः अनीति की क्रिया-प्रतिक्रिया में भयंकर विक्षोभ हो रहे हैं। उत्पीड़न और विग्रह के फलस्वरूप अनेकानेक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।
चिन्तन के क्रम में यह लेख 18 वर्ष बाद पुनः प्रकाशित किया जा रहा है। पूज्यवर की लेखनी से प्रसूत इस लेखक के एक-एक शब्द में आज सही सिद्ध हो रही है भवितव्यता की झलक व युगसृजन के संदर्भ में स्पष्ट मार्गदर्शन मिलता है।
चिन्तन के लिए ब्रह्मविद्या का और व्यवहार में धारणा का आश्रय लेना होगा।
चिन्तन बर्बरतापूर्ण है एवं राष्ट्र की प्रगति के लिए घोर अभिशाप है। इसके द्वारा कोई भी राष्ट्र विकसित व पल्लवित नहीं हो सकता। सी.जे.एच. ह्येज हेंस कोहन आदि अनेक विद्वानों ने राष्ट्रीयता की इस व्याख्या को अवैधानिक और अनैतिक भी प्रमाणित कर दिखाया। इस पुनः चिन्तन से राष्ट्रीयता की परिभाषा एक समूह चेतना के रूप में की गयी, जो किसी भूखंड पर रहने वाले समाज को उसकी अनेक बाह्य विविधताओं के होते हुए भी एक लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया के फलस्वरूप उस भूमि के प्रति माता-पुत्र भाव से जोड़ देती है।
चिन्तन ने भारतीय साँस्कृतिक विविधता को अस्वीकार कर दिया एवं इसकी एकता और अखण्डता को खण्डित करने का प्रयास किया। प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् यूरोप और अमेरिका में राष्ट्रीयता की अवधारणा के बारे में पुनः चिन्तन प्रारम्भ हुआ। डब्ल्य, नैस्सन सीनियर ने उल्लेख किया है कि यूरोपीय राष्ट्रीय चिन्तन बर्बरतापूर्ण है एवं राष्ट्र की प्रगति के लिए घोर अभिशाप है। इसके द्वारा कोई भी राष्ट्र विकसित व पल्लवित नहीं हो सकता। सी.जे.एच. ह्येज हेंस कोहन आदि अनेक विद्वानों ने राष्ट्रीयता की इस व्याख्या को अवैधानिक और अनैतिक भी प्रमाणित कर दिखाया।
चिन्तन है और धर्म व्यवहार। दोनों को मिलाने पर ही समग्र धर्मतन्त्र बनता है। यही है वह प्रक्रिया, जो लोकमानस के अन्तराल तक पहुँचने, उसे बदलने और उत्कृष्टता के चरम लक्ष्य तक पहुँचाने में समर्थ हो सकती है। आस्थावान् और धार्मिक एक ही होते है। प्रचलित धर्म-परम्परा में भारी परिवर्तन करने की आवश्यकता है।
चिन्तन व अपने संकल्पों की होनी चाहिए। यदि प्रयास उस दिशा में किए जाएँगे तो आध्यात्मिक, भौतिक सभी क्षेत्रों में सफलताएँ हस्तगत होती चली जाएँगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-September
चिन्तन उसके अन्तःकरण का दर्पण है। उसके द्वारा अभ्यन्तर की झलक-झाँकी प्रस्तुत की जा सकती है- यह शत-प्रतिशत सच है। सौंदर्यबोध वास्तव में और कुछ नहीं, अन्तस् की अभिव्यक्ति है। इससे सामने वाले के उस दृष्टिकोण का पता चलता है, जिससे वह वस्तुओं, व्यक्तियों, स्थानों तथा प्रकृति में सुन्दरता की तलाश करता है। आँखें तो उसे देखने का उपकरण मात्र हैं।
चिन्तन को अधिक स्पष्ट करते है। डोरथी का कहना है कि कई व्यक्ति केवल इसीलिए अधिक गलतियां करते हैं क्योंकि वे काले रंग का प्रयोग अधिक करते हैं। हालाँकि वे स्वीकार करती हैं कि आज फैशन में काले रंग का प्रचलन अधिक चल पड़ा है और इसे पहनने से कई व्यक्ति अधिक आकर्षक दिखते हैं। वे कहती हैं कि जो लोग काला रंग अधिक पसन्द करते हैं, वे अधिकतर किसी होते काम को रोकने वाले, दुःखी तथा दूसरों से अलग-थलग रहने वाले होते हैं।
चिन्तन ने विकृत आस्थाओं पर कुठाराघात करना प्रारम्भ किया। परिणाम यह हुआ कि लम्बे समय से समाज में जड़ें जमाये रहने वाली अंधमान्यताएँ, कुप्रथाएँ और चित्र-विचित्र परम्पराएँ अस्तित्व बचाये रखने वाले ठोस आधार के अभाव में अपनी मौत मरने लगी।
चिन्तन करना पड़ेगा कि वास्तव में विज्ञान है क्या? परिभाषा की दृष्टि से सोचें, तो किसी भी वस्तु के क्रमबद्ध और विवेकसम्मत ज्ञान को ‘विज्ञान’ कहते हैं। इसे इसकी समग्र और पूर्ण परिभाषा कही जा सकती है, कारण कि इसमें सूत्र रूप में वह सारी बातें सन्निहित हैं, जो इसकी समग्रता के लिए अभीष्ट और आवश्यक हों। इतने पर भी इन दिनों विज्ञान से प्रायः जिस विधा का अर्थ लगाया जाता है, वह है-तकनीकी या यांत्रिक ज्ञान। इसमें दो मत नहीं कि पदार्थ सत्ता के लगातार अन्वेषण और अनुसंधान के फलस्वरूप आज उसका वह स्वरूप ही सर्वसाधारण के सामने अधिक स्पष्ट और उजागर है, जिसे ‘मशीनी ज्ञान’ कहते हैं, तो फिर भी पदार्थ विज्ञान सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है।
चिन्तन का फल होती हैं। जब इस प्रकार के विचार मानवी मस्तिष्क में घर कर जाते हैं, तो फिर वह मान्यता बनकर काँटे की तरह चुभने और संताप पहुँचाने लगते हैं, जिसकी फलश्रुति मनोवैज्ञानिक परेशानियों के रूप में सामने आती है। मनःशास्त्र की भाषा में उसे ‘बॉडी डिस्मोरफिक डिसआर्डर’ अर्थात् बी. डी. डी. कहते हैं।
चिन्तन का भावी निर्धारणों का मूल आधार बना। १९९. में परमपूज्य गुरुदेव के सूक्ष्म में विलीन हो विराट रूप लेने के बाद संपन्न २७ अश्वमेध महायज्ञ, प्रथम पूर्णाहुति आँवलखेड़ा एवं अभी-अभी न्यूजर्सी (यू. एस. ए.) में सम्पन्न वाजपेय यज्ञ की सफलता के मूल में उसी शक्ति को देखा जा सकता है, जिनसे लाखों - करोड़ों की मनःशक्ति का एकीकरण कर इस ब्रह्माण्ड में एक विलक्षण प्रयोग का बीजारोपण १९२६ में अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलन के माध्यम से किया था। समूह चेतना का जागरण इसी आधार पर संभव हो पाया है। एवं अब १९९८ का अंतिम उत्तरार्द्ध का भाग आते - आते हम सबकी महाकाल की युग - प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का स्वरूप स्पष्ट रूप से समझ में आ रहा है।
चिन्तन। इसकी कितनी ही शाखाएँ हैं। फिर प्रत्येक की पृथक-पृथक अनेक शाखा-प्रशाखाएँ हैं। इनमें से किसी से भी संबंधित वह प्रकरण विज्ञान की ही विषयवस्तु कहलायेगी। इस प्रकार इसे तर्क और तथ्यसम्मत दृष्टिकोण प्रस्तुत करने वाला प्रामाणिक कहा जा सकता है।
चिन्तन एवं दुष्ट-आचरण यह सभी अन्तःस्फुरणा के विकास में बाधक हैं तथा दाहिने गोलार्ध की क्षमता को खुद बनाते हैं।
चिन्तन, मनन, स्वाध्याय और सत्संग के आधार पर सद्भावनाओं का समुचित संग्रह अपने भीतर जमा करें और उसमें से साररूप में सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हो उसी को जिह्वा पर आने दें। जीभ में अमृत भी है और विष भी। विषपान करने वाले मुख के रास्ते ही उसे भीतर ले जाते हैं। दुर्भावग्रस्त, संस्कार रहित वाणी को भी विष ही कहा गया है। वह प्रथम अनर्थ वक्ता का ही करती है।
चिन्तन की ओर रुझान बढ़ जाता है, मन बार-बार ईश्वर की ओर उन्मुख होने लगता है एवं व्यक्ति स्वयं को एक असाधारण, आनन्ददायक तथा उदात्त मनोदशा में अनुभव करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-April
चिन्तन और चरित्र में उच्चस्तरीय उमंगें उठने लगती हैं तथा उसी स्तर की गति विधियाँ चल पड़ती है। उत्कृष्टता की उपासना ही ईश्वर की उपासना हैं वही उपाय है। लक्ष्य इसी को बनाना पड़ता है। इष्टदेव का निर्धारण किस रूप में किया जाए आज इस संदर्भ में अनेकों विकल्पों के जंजाल बने खड़े है। प्राचीनकाल में ऐसा न था तत्त्वज्ञानी एक निश्चय पर पहुँचे थे और उन्होंने उसी निष्कर्ष को उपयोगी बताकर समस्त साधकों को उसे अपनाने का परामर्श दिया था।
चिन्तन और चरित्र के हर घटक में छाई रहती है जिसमें भ्रष्ट चिन्तन और दृष्ट आचरण की छय़ एवं स्वार्थ-साधन के लिए कही कोई गुँजाइश ही नहीं रह जाती है। ऐसे उच्चस्तरीय नेतृत्वों का उदय ही जब बन्द हो गया तो लोकचेतना कौन जगाए? पीढ़ी का मार्गदर्शन कौन करे? भटकने और भटकाने वाले लोग ही मिल-जुलकर नेता और अनुयायियों की मण्डलियाँ बना-बनाकर जन-कल्याण के नाम पर शालीनता का निर्माण करने में लगे हुए है। यह परिस्थिति और किसी तरह दूर नहीं हो सकती।
चिन्तन में विधायक तत्त्वों को भर लेने दृष्टिकोण को ऊँचा उठा लेने से ही काम चला जाता हैं संव्याप्त विक्षोभ और असन्तोष का समाधान इसी प्रकार होगा। अनुकूल के लिए किया गया पुरुषार्थ तो दूसरा चरण है।
चिन्तन का उसके फलस्वरूप उस उत्पादित उच्च चरित्र का लाभ मिलाता था। अन्तरिक्ष उच्चस्तरीय विचार सम्पदा से भरी रहता था, इसमें अध्यात्म क्षेत्र के मूर्धन्य मनीषी सदा प्रयत्नरत रहते थे।
चिन्तन और चरित्र में से आदर्शवादिता घटती और दुर्बुद्धिजन्य दुश्चरित्रता बढ़ती जाती हैं। व्यक्ति के पतन -पराभव का एकमात्र कारण यही है। समाज का उत्थान पतन भी इसी तथ्य पर आधारित है। सृष्टि का चिरपुरातन इतिहास साक्षी है कि संकट असाधारण रूप से जब कभी जहाँ कहाँ उभरे है वहाँ सृजन की दुर्बलता और कहाँ उभरे है वहाँ सृजन की दुर्बलता और ध्वंस की बलिष्ठता को भी नाना आकार प्रकार के संकटों को बनाते उभारते देखा जा सकता है।
चिन्तन, प्रभाव का पूरी तरह परमार्थ के ब्रह्मानंद पर उत्सर्ग कर दिया। ऐसे लोगों की प्रतिभा एवं क्षमता सामान्य लोगों की तुलना में असंख्यों गुना अधिक होती हैं। स्व का परिपोषण मनुष्य की अधिकाँश शक्ति से निकल जाता है। यदि उससे बचा जा सके और सच्चे अर्थों में उत्कृष्टता के लिए समर्पण किया जा सके तो अहंता के परिपोषण में लगने वाली इच्छा विचारणा एवं क्रियाशीलता इतनी अधिक मात्रा में बच जाती हैं जिसके आधार पर सामान्य व्यक्ति भी असामान्य स्तर के काम कर सकता हैं ऐसी प्रतिभाएँ जब कभी जहाँ कही उपलब्ध होती है तब वही चमत्कार उत्पन्न होते चले जाते है।
चिन्तन के लिए विवश किया है।
चिन्तन की भ्रष्टता और आचरण की दुष्टता भयावह रूप धारण करती और श्मशान में होने वाले प्रेत–पिशाचों के नृत्य जैसा जीवनक्रम एवं वातावरण विनिर्मित करती है। धर्म-क्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों तथा बुद्धिमान के नाम पर पनपी भ्रान्तियों ने इन दिनों अश्रद्धा की भावनात्मक अराजकता उत्पन्न की है। परिणाम सामने है। मनुष्य क्रमशः नरपशु, नरकीटक, नरपिशाच बनता और पतन के गर्त में गिरता चला जा रहा है।
चिन्तन और दृष्ट आचरण की छय़ एवं स्वार्थ-साधन के लिए कही कोई गुँजाइश ही नहीं रह जाती है। ऐसे उच्चस्तरीय नेतृत्वों का उदय ही जब बन्द हो गया तो लोकचेतना कौन जगाए? पीढ़ी का मार्गदर्शन कौन करे? भटकने और भटकाने वाले लोग ही मिल-जुलकर नेता और अनुयायियों की मण्डलियाँ बना-बनाकर जन-कल्याण के नाम पर शालीनता का निर्माण करने में लगे हुए है। यह परिस्थिति और किसी तरह दूर नहीं हो सकती।
चिन्तन और जिस अभ्यास से उभारी जाती है उसे ऋतम्भरा -प्रज्ञा कहते है। संक्षेप में इसी को प्रज्ञा कहा गया है। गायत्री मंत्र की अन्तरात्मा को प्रज्ञा की प्रेरणा माना गया है। प्रज्ञा जीवन्त तभी होती है जब उसमें प्रेरणा देने प्रवाह उत्पन्न करने की क्षमता हो। गायत्री महामंत्र में यही सब कुछ है।
चिन्तनक्षेत्र पर आधिपत्य जमाने वाले स्वेच्छाचार के प्रति बरती जानी चाहिए।
चिन्तन यह बताता रहा कि भौतिक प्रगति ही सब कुछ हैं। साधनों के बढ़ने पर मनुष्य के समान उपस्थित होने वाली सभी कठिनाइयों का समाधान हो जाएगा।
चिन्तन को तत्त्वदर्शन और व्यवहार को धर्म कहते हैं। दोनों को मिलाने से ही समग्र अध्यात्म बनाता है। तत्त्वदर्शन को हृदयंगम करने की पद्धति को योग और व्यवहार में उच्चस्तर का समावेश करने का नाम तप कहा जाता है। तप को साधना और योग को ब्रह्मविद्या कहते हैं। आस्तिकता-आध्यात्मिकता और धार्मिकता की त्रिवेणी मिलने से वह त्रिवेणी बनती है, जिसमें स्नान करने पर रामायण में प्रतिपादित ‘काक होहि पिक-बकहु मराला’ का भावनात्मक कायाकल्प सम्भव होता है।
चिन्तन के माध्यम से ही आस्थाएँ जगाई जाती है, पर वह उथला नहीं गहरा होता है। तर्क का समावेश तो रहता है, पर साथ में श्रद्धा भी जुड़ी रहती है। शुष्क तर्क बुद्धि -विलास है। बहस के लिए ही बहस करने वाले, मस्तिष्क से चतुर वकीलों की तरह वह प्रतिपादन करते चले जाते है, जिन पर उनकी आस्था तनिक भी नहीं है। सच्चे को फँसाने और झूठे को छुड़ाने के लिए वे वकील भी प्रभावी बहस करते देखे गये है, जो वस्तु -स्थिति को ठीक तरह समझते है।
चिन्तन द्वारा प्राणवान आत्माएँ आकाश में ऐसे प्रचण्ड प्रवाह छोड़ती थी जिनमें जनमानस का अनायास ही बहते रहने और श्रेष्ठ चिन्तन का उसके फलस्वरूप उस उत्पादित उच्च चरित्र का लाभ मिलाता था। अन्तरिक्ष उच्चस्तरीय विचार सम्पदा से भरी रहता था, इसमें अध्यात्म क्षेत्र के मूर्धन्य मनीषी सदा प्रयत्नरत रहते थे।
चिन्तन और चरित्र की दिशाधारा निर्धारित करती है। कौन किस प्रकार जिया और किन परिस्थितियों में रहा, इसका निमित्त कारण उनके अन्तःकरण का स्तर ही होता हैं। यहीं उत्थान-पतन का भाग्यविधान लिखा जाता हैं कदाचित विधाता इसी मर्मकेन्द्र को कहते है। भाग्य और भविष्य यदि वस्तुतः लिख जाता होगा तो उसकी विधिपाठ अन्तराल के मर्मस्थल में ही प्रतिष्ठित होती होगी।
चिन्तन और प्रयास ही भली-बुरी परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी होता हैं। प्रकृति की प्रतिकूलता भी कभी किसी सीमा तक कारण होती हैं, पर मनुष्य को परिस्थितियों से जूझने का इतना अनुभव प्राप्त है कि वह उनसे सुरक्षा के उपाय किसी न किसी प्रकार खोज ही लेता हैं प्रकृति-संघर्ष के लम्बे इतिहास में सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक का घटनाक्रम साक्षी है कि मनुष्य हारा नहीं। जीता भले ही न हो पर तालमेल बिठा लेने में, उसे आशाजनक सफलता दिलाने में बुद्धि-कौशल ने सदा-सर्वदा अपना चमत्कार दिखाया हैं।
चिन्तन में तन्मय रहना वस्तुतः मानसिक शहादत है। यह जहाँ होगी वहाँ व्यवहार भी वैसा ही बनेगा। क्रिया–कलापों का निर्धारण और कार्यान्वयन वही होता हैं जो अन्तःकरण में बसा हो। समर्पण एक आस्था के भवबन्धन काटने पड़ते है और आदर्शों के लिए चिन्तन और चरित्र को पूरी तरह नियोजित रखना पड़ता है। अपने को इस ढाँचे में ढाल लेने वाले व्यक्ति अध्यात्म शब्दावली में ऋषि कहलाते हैं शहीद शब्द से यह अधिक उपयुक्त हैं शहीद होने में मरण की आवश्यकता जुड़ी रहती है जबकि ऋषि कहलाते हैं।
चिन्तन से ही शान्त होगी, अन्यथा तनिक-तनिक-सी बातों पर उत्तेजना उद्विग्नता के ज्वालामुखी फूटते रहेंगे। वस्तुओं का बाहुल्य और व्यक्तियों का अनुकूलन एक स्वप्न है जिसकी पूर्ति व्यावहारिक जीवन में सम्भव नहीं। हर किसी को ताल-मेल बिठाकर चलना पड़ता है। अधिकार के साथ कर्तव्य को उपार्जन के साथ सन्तोश को, संघर्ष के साथ सहयोग को उपभोग के साथ संयम को मिलाकर चलने से ही मानसिक सन्तुलन बनता है। किसी को मानसिक तनावों से छुटकारा पाना है तो अनुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त होने तक की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है।
चिन्तन करने वाले विशेषज्ञ यहाँ आमंत्रित किए गए हैं। चिकित्सा विज्ञान भी पुनर्जीवन माँगता है। आयुर्वेद की विद्या दिनोंदिन लोकप्रियता के शिखर पर चढ़ रही है, किंतु इसे पुनर्जीवित करने वाला जो तंत्र बनना चाहिए था, वह नहीं बन पाया हैं। आयुर्वेद की एक रिसर्च विंग सहित वैकल्पिक चिकित्सा से जुड़े सभी तंत्रों की नयी भूमि में प्राण-प्रतिष्ठा की जाएगी वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में अधिक उपकरणों द्वारा जब निर्धारण प्रस्तुत किए जाएँगे। सभी मानने को बरबस सहमत होंगे।
चिन्तन उदार-आत्मीयता अभिनेता जैसी मनःस्थिति बन जाने पर परिस्थिति में जी हलका रखा जा सकता है। ऐसा हलका मन रहने पर ही गुत्थियों के समाधान और प्रगति के निर्धारण सही रूप में सम्भव हो सकते हैं। कहना न होगा कि सौजन्य और सौमनस्य श्रद्धा तत्त्व के ही दो प्रतिफल है। मनीषी प्रकारान्तर से श्रद्धालु को ही कहते हैं। विवेक मात्र उन्हीं के मस्तिष्क में रहता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार कितना घटिया हो गया है कि इससे प्रकृति नेचर भी नाखुश हो गयी है। रोज ही कोई न कोई प्रकृति प्रकोप की घटना देखने व पढ़ने को मिलती है। प्रकृति का प्रकोप होता है, तो आये दिन महामारियाँ देखने को मिलती है। अदृश्य जगत में भयावह वातावरण उत्पन्न हो गया है। प्रकृति के प्रकोप की वजह से आये दिन भूकम्प आते है।
चिन्तन का अभाव नहीं, स्वेच्छाचार का नियंत्रण बताया जाता हैं। अर्थसमस्या का समाधान श्रमशीलता और मितव्ययिता का अभाव नहीं, पूँजी का वितरण माना जाता हैं। अपराधों को रोकने के लिए आस्तिकता का, आध्यात्मिकता का तत्त्व-दर्शन हृदयंगम कराने की उपेक्षा की जाती हैं और पुलिस-कचहरी में समाधान खोजा जाता हैं। राजसत्ता को सुधार की जादुई छड़ी मानकर उस पर आधिपत्य करने के लिए हर महत्त्वाकाँक्षी लालायित हैं। धर्मतन्त्र को परिष्कृत करने और उसके सहारे आस्थाओं से झंझट खत्म करने का मार्ग किसी को सूझता तक नहीं हैं।
चिन्तन को किसी दिशा में आगे बढ़ाने के लिए नाम रूप का अवलम्बन अनिवार्य होता हैं उपासना उपक्रम इस निर्धारण के बिना बन ही नहीं पाता।
चिन्तन को उलझाया और कष्कारण भूल-भुलैया में भटकाया हैं। भोले -भावुक व्यक्तियों को चतुर लोग अन्धश्रद्धा के रस्से बाँधकर ही अनुपयुक्त मान्यताओं के गर्त में धकेलते हैं। निहित स्वार्थों का व्यवसाय अन्धश्रद्धा की अन्धेर नगरी में जिस सफलता के साथ चलता है, उतना अन्यत्र कहीं नहीं। भीरुता और बौद्धिक अपंगता मिलकर एक ऐसा दल-दल प्रस्तुत करती हैं, जिसमें, जादू-टोना देवभूत, ज्योतिष से लेकर सामाजिक कुरीतियों जैसी विकृतियाँ ही पल्ले पड़ती हैं। तथाकथित प्रगतिशीलता अश्रद्धा में और पिछड़ी मनःस्थिति अन्धश्रद्धा में भटकती है।
चिन्तन का परिष्कार, सत्प्रवृत्तियों का प्रतिष्ठापन। यह दीखते तो तीन है, पर वस्तुतः एक ही तथ्य के तीन रूप है। सत्कर्म और सद्ज्ञान वस्तुतः सद्भावों का ही उत्पादन है। यही है जाग्रत आत्माओं के माध्यम से प्रज्ञावतार द्वारा कराया जाने वाला महाप्रयास। हर जाग्रत आत्मा को अगले दिनों अपनी समस्त तत्परता और तन्मयता जन-मानस का परिष्कार पर केन्द्रीभूत करनी होगी।
चिन्तन और चरित्र को बदलते हैं उनकी चेतना नरकीटकों जैसा क्षुद्र जीवन जीने से स्पष्ट इनकार करती हैं। पुरानी इच्छाएँ, रुचियों और आदतें बदलना आमतौर से सामान्य व्यक्तियों के लिए अति कठिन होता हैं। इसे समुद्र-तैरने और पर्वत-लाँघने जैसा दुर्गम बताया गया है। लोग श्रेष्ठता की दिशा में सोचते तो बहुत कुछ है पर संकल्पबल के अभाव में कर कुछ नहीं पाते। शेखचिल्ली जैसे सपने गढ़ते दिवास्वप्न देखते और कल्पना लोग में उड़ते-उड़ते ही जिन्दगी बीत जाती है और सड़ी कीचड़ से निकलने की बात बनती ही नहीं।
चिन्तन की धारा आदि की स्थिति को देखते हुये लगता है जिस मध्यकालीन अंधकार युग को कोसा जाता है उसमें वह अभी भी यथावत विद्यमान है। उसने मात्र अपना पुराना चोला उतारा और नया जामा पहना है। समाज प्रवाह के आधार पर सामान जनमानस ढलता है और लोक प्रवृत्तियाँ पनपती है। यदि उसमें अमानवीय तत्व ही भरे रहे तो फिर यह आशा करना व्यर्थ है कि शालीनता को लोग अपने जीवन व्यवहार में स्थान दे सकेंगे। समाज का स्तर जिस क्रम से नीचे गिरता जा रहा है।
चिन्तन दुर्भाव अनुपयुक्त महत्त्वाकाँक्षा जैसे अनेकों ऐसे आधार खड़े हो गये है। जिनके कारण जनमानस में असंतुलन उद्वेग एवं आक्रोश उत्पन्न करने वाले तत्वों की ही भरमार है। अधिकाँश जनमानस संतोष ओर शान्ति से वंचित है। प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता के लक्षण अपवाद रूप से भी दृष्टिगोचर नहीं होते है। हर व्यक्ति खिन्न चिन्तित उदास दृष्टिगोचर होता है।
चिन्तन में भ्रष्टता ओर चरित्र में दुष्टता का बाहुल्य रहता ही है। सज्जन प्रकृति के लोग भी यदा कदा अवांछनीयता की कीचड़ में फिसलते देखे गये है। इस अनुपयुक्तता से जूझना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि सृजन के साधन जुटाना।
चिन्तन की क्रियाधारा उत्कृष्टता की ओर प्रवाहित होती है। इसका परिणाम उस स्तर की सफलता बनकर सामने आता है, जिसे सामान्यतया वरदान या चमत्कार की संज्ञा दी जाती है।
चिन्तन और दुष्टाचरण के साथ जूझने का प्रबल पराक्रम करना होता हैं आत्म-सुधार अपने हाथ की बात है इसलिए सन्त का कार्यक्षेत्र सीमित और सरल है किन्तु सुधारक को दूसरों को बदलना होता इसलिए अपेक्षाकृत अधिक प्राणशक्ति की आवश्यकता पड़ती हैं चरित्र अधिक ऊँचा साहस अधिक प्रखर और पुरुषार्थ अधिक प्रबल चाहिए तभी दूसरों को अभ्यस्त अनाचार से विरत करने और सदाशयता अपनाने के लिए सहमत एवं विवश करना सम्भव होता है। सुधारकर न केवल लोकप्रवाह में धुली हुई अवांछनीयता से जूझते हैं वरन् साथ ही अभीष्ट परिवर्तन को प्रचलन में जोड़ने और परम्परा बनाने का सृजन प्रयोजन भी पूरा करते है। उन्हें दो मोर्चे सँभालने पड़ते है। जबकि सन्त के लिए एक कार्य कभी पर्याप्त समझा जाता है। सन्त का ब्राह्मण होना पर्याप्त है किन्तु सुधारक को ’ब्रह्मक्षेत्र धर्म अपनाना होता है।
चिन्तन और चरित्र का अविच्छिन्न अंग बना लेना। इस स्तर के व्यक्तित्व लोकप्रवाह से अलग थलग पड़ जाते हैं। लोगों की दृष्टि में लोग मूर्ख। यह एक प्रकार के लौकिक जीवन का मरण है। जीवित रहते हुए भी वे आस-पास की परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होते अथवा दृष्टिकोण और कार्यक्रम दूसरों के प्रभाव-परामर्श से नहीं अन्तःप्रेरणा से निर्धारित करते है तथाकथित स्वजन-सम्बन्धियों का मित्र परिचितों को अनुपयुक्त परामर्श उन्हें रत्तीभर भी प्रभावित नहीं करता।
चिन्तन और पूरी तरह सँजोते थे। उनके क्रिया−कलाप साहसिक परमार्थ-प्रयोजनों से भरे रहते थे। त्याग-बलिदान को ही वैभव और वर्चस्व मानते थे। यह परम्परा नष्ट हुई और धर्म का स्वरूप बनकर रह गया। ऐसी दशा में विनिर्मित हुए वातावरण में महामानवों का उत्पादन बन्द हो जाना स्वाभाविक ही था।
चिन्तन। इसका निराकरण आज एक ही उपाय से हो सकता हैं अन्तःचेतना का ऊर्ध्वगमन, उन्नयन, अभ्युदय, प्रज्ञावतार की तूफानी गतिविधियाँ जन-जन के अन्तःकरण को झकझोरती और उसे क्रमशः उस दिशा में धकेलती-घसीटते ले चलेगी जहाँ उसे शालीनता और सदाशयता से बढ़कर और कुछ मूल्यवान प्रतीत ही न होता हो। मूर्धन्य देव-मानवों के माध्यम से प्रज्ञावतार आस्था-संकट के निवारण का प्रयत्न कर रहा हैं धर्मक्षेत्र की नर्सरी में ही महामानवों के कल्पवृक्ष उत्पन्न होते रहेंगे। इस समय भी उसी के प्रमाण में कल्पवृक्षों की नई पौधे उग रही है।
चिन्तन और चरित्र को पूरी तरह नियोजित रखना पड़ता है। अपने को इस ढाँचे में ढाल लेने वाले व्यक्ति अध्यात्म शब्दावली में ऋषि कहलाते हैं शहीद शब्द से यह अधिक उपयुक्त हैं शहीद होने में मरण की आवश्यकता जुड़ी रहती है जबकि ऋषि कहलाते हैं। शहीद होने में मरण की आवश्यकता जुड़ी रहती है जबकि ऋषि के लिए जीवन या मरण में कोई अन्तर नहीं रहता वह जीवित रहते हुए चतुर लोगों की दृष्टि में मृतक हैं। इतिहासकार उसके मर जाने पर भी जीवितों जैसी अभ्यर्थना करते हैं संत और सुधारक में अपना अहं शेष रहता हैं जबकि समर्पित को वासना, तृष्णा का लोभ-मोह का ही अन्त नहीं करना पड़ता वरन् अहन्ता का भी विसर्जन आवश्यक होता है। आमतौर से लोकसेवियों की लोकेषणा यश और सम्मान की कामना घटने के स्थान पर बढ़ती देखी जाती है जबकि वस्तुतः उसका पूर्णतया विसर्जन होना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-July
चिन्तन करे तो सहज ही वह परमात्मा के अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
चिन्तन, मनन और वार्तालाप नहीं करते। यही कारण है कि उस अध्ययन का प्रभाव जीवन में स्थायी नहीं हो पाता। यदि पुस्तकों-शास्त्रों के सारे जीवन में उतारने की प्रक्रिया लोग सीख जाएँ तो सामान्य-सी परिस्थितियों में ही हर व्यक्ति उत्कृष्टता के चरम बिन्दु तक पहुँच सकता है। अच्छी पुस्तकें, महापुरुषों की जीवन-गाथाएँ गोघृत एवं दुग्ध के समान पौष्टिक आहार हैं, जो मन-बुद्धि आचार-विचार तर्क व विवेक को परिपुष्ट करके आत्मोत्थान का उज्ज्वल पथ प्रशस्त करती हैं।
चिन्तन-मनन की महत्ता का प्रतिपादन शास्त्रों में विस्तारपूर्वक किया गया है। मनुस्मृति 3-75 में उल्लेख है-स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्।” अर्थात् स्वाध्याय में नित्य तत्पर रहना चाहिए, क्योंकि इससे सद्विवेक-सद्बुद्धि का विकास होता है और उससे समस्त समस्याओं का समाधान मिलता है। प्राकृत-उत्तराध्ययन (26-10) भी इसका समर्थन करते हुए कहता है। “सज्झाएवा निउत्तेण, सव्वदुक्ख विमोक्खणे।
चिन्तन एवं कर्तव्य की वस्तुस्थिति समझी-समझाई जाती है और तत्त्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक सम्बन्धों एवं कर्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ सम्बन्ध बनाते हुए परिवार तथा समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निर्धारण किया जाता है। अध्यात्म जगत की यह दो धाराएँ-पवित्र गंगा-यमुना कही जाती हैं। इनका संगम तीर्थराज प्रयाग है, जिसमें स्नान करने से परम पुरुषार्थ का पुण्यफल प्राप्त होता है।
चिन्तन एवं चरित्र को मोड़ा जा सकता है, इतना ही नहीं उन्हें स्वास्थ्य, बल, ज्ञान, पराक्रम जैसी विभूतियों से भी लाभान्वित किया जा सकता है।
चिन्तन की बात कहेंगे और कुमार्ग से पीछे हटाने का प्रयत्न करेंगे पर हुआ ठीक उलटा। मदान्ध द्रुपद उनके उपदेश सुनने तक के लिए तैयार नहीं हुए और अपमानित करके उन्हें सभाभवन में से निकलवा दिया।
चिन्तन चेतना में छायी विषाक्तता का भी निवारण एक ही साथ कर सके और जिसे एक समग्र उपचार की संज्ञा दी जा सके। ऐसा समग्र उपाय उपचार एक ही हो सकता है, जिसकी पहुँच दोनों ही क्षेत्रों में गहराई तक है और वह है-यज्ञ चिकित्सा। यज्ञ-हवन या अग्निहोत्र एक समग्र उपचार प्रक्रिया है, जो शरीर ही नहीं, मन और अन्तःकरण का भी उपचार करती है। इसमें प्रयुक्त होने वाले हव्य एवं मंत्रों के प्रकंपन मानवी मन-मस्तिष्क एवं वातावरण को प्रदूषण से मुक्त करते हैं।
चिन्तन और कर्तृत्व अपनाते हुए दिव्यजीवन की रीति-नीति अपनायी जा सके तो ही इन उपासनात्मक कर्मकाण्डों का महत्व है। आत्मबोध की विचारधाराओं से अन्तःकरण को भरने में सहायता करना ही दर्पण-उपकरण का उद्देश्य है। उसी प्रकार पूजा का उपयोग यही है कि वह जीवन-निर्माण की प्रेरणाओं को उभारें और उन्हें सक्रिय बनाये।
चिन्तन उभर कर आयेंगे। अगले दिनों लोग यह सोचकर अचम्भा करेंगे कि इतने कम समय में इतना परिवर्तन कैसे हो गया। अगर इस समय को आप जान पायें, पहचान पाये तो हमारा ख्याल है कि आप सच्चे अर्थों में भाग्यवान बन सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-October
चिन्तन के सातत्य को देखकर निद्रा दूर ही खड़ी रह गयी। उसे तो बस एक ही ध्यान था। एक ही कल्पना एक ही लक्ष्य -ऋषि युवक रूप
चिन्तन में निरत और लिप्सा-लालसाओं के साधन जुटाने में व्यस्त मनुष्य के लिए वह सम्भव ही नहीं हो पाता कि
चिन्तन योग-तप आदि के समस्त साधन, उपचार ईश्वरप्राप्ति का लक्ष्य पूरा करने के लिए ही बनाये गये।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार में उन्हें भली प्रकार समाविष्ट करना पड़ता है। यह कार्य प्रत्यक्ष क्रियान्वयन के बिना संभव नहीं होता। विचार वे ही प्रौढ़ एवं प्रखर होते है। जो क्रिया में उतरते रहते हैं। डायनेमो घूमता है तो बैटरी चार्ज होती है।
चिन्तन और वर्चस्व घटता और समाप्त होता रहता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के साथ जुड़ने वाली आदर्शवादिता पर अवलम्बित होंगे। मान्यताओं और परम्पराओं में से प्रत्येक को तर्क, तथ्य, प्रमाण परीक्षण एवं अनुभव की कसौटियों पर कसने के उपरान्त ही विश्व-धर्म की मान्यता मिलेगी। संक्षेप में उसे आदर्शवादी व्यक्तित्व और न्यायोचित निष्ठा पर अवलम्बित माना जाएगा। विश्वधर्म की बात आज भले ही सघन तमिस्रा में कठिन मालूम पड़ती हो, पर वह समय दूरी नहीं, जब एकता का सूर्य उगेगा और इस समय जो अदृश्य है, असंभव प्रतीत होता है, वह उस वेला में प्रत्यक्ष एवं प्रकाशवान होकर रहेगा। यही है आने वाली सतयुगी समाज व्यवस्था की कुछ झलकियाँ, जो हर आस्तिक को भविष्य के प्रति आशावान् बनाती है।
चिन्तन में सम्भव हो सकता है। टेलीफोन वार्ता की तरह भगवान से वार्तालाप करने की और टेलीविजन पर चलते-फिरते ईश्वर को देखने की निरर्थक उड़ाने उड़ना छोड़कर ही हम वास्तविकता के निकट पहुँच सकते है। भ्रम-जंजाल गढ़कर तो हम अपने आपको अवास्तविकता के ऐसे जाल में अधिकाधिक फँसाते चले जाएँगे, जिसमें बालू से तेल निकालने जैसे निरर्थक प्रयासों की तरह निराशा ही हाथ लगेगी। सुखद कल्पना गढ़ लेना और ईश्वर के साथ क्रीड़ा-कल्लोल हास-विलास करते रहना एक बात है और वैसी यथार्थता का होना दूसरी। कल्पना की उड़ाने सम्भव है किसी का भावनात्मक समाधान कर सकें, पर वास्तविकता के क्षेत्र में उसके हाथ कोई बड़ी उपलब्धि मिल नहीं सकेगी, यह भी सत्य है।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार व्यक्ति और समाज को तो प्रभावित करता ही है सूक्ष्म जगत भी उससे अछूता नहीं रह पाता। विकृत चिन्तन और भ्रष्ट चरित्र सूक्ष्म जगत के अदृश्य वातावरण को प्रदूषण से भर देते है। प्रकृति की सरल स्वाभाविकता बदल जाती है और वह रुष्ट होकर दैवी आपत्तियाँ बरसाने लगती है। इन दिनों अतिवृष्टि अनावृष्टि बाढ़ दुष्काल भूकम्प जैसी विपत्तियाँ बड़े क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है। शारीरिक ही नहीं मानसिक रोगों में भी भारी बढ़ोत्तरी हो रही है।
चिन्तन और भ्रष्ट चरित्र सूक्ष्म जगत के अदृश्य वातावरण को प्रदूषण से भर देते है। प्रकृति की सरल स्वाभाविकता बदल जाती है और वह रुष्ट होकर दैवी आपत्तियाँ बरसाने लगती है। इन दिनों अतिवृष्टि अनावृष्टि बाढ़ दुष्काल भूकम्प जैसी विपत्तियाँ बड़े क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है। शारीरिक ही नहीं मानसिक रोगों में भी भारी बढ़ोत्तरी हो रही है। मानवी सद्भावना में, व्यक्तित्व के स्तरों में बुरी तरह गिरावट आ रही है।
चिन्तन करते रहने भर से हस्तगत नहीं होती। उनको नहीं होती। उनको स्वभाव का अंग बनाना पड़ता है। चिन्तन चरित्र और व्यवहार में उन्हें भली प्रकार समाविष्ट करना पड़ता है। यह कार्य प्रत्यक्ष क्रियान्वयन के बिना संभव नहीं होता।
चिन्तन के गड़बड़ा जाने पर उद्विग्न कर डालने वाले घटाटोप उमड़ते हैं एवं अर्द्धविक्षिप्तता जैसी स्थिति सामने आ खड़ी होती है।
चिन्तन तक उसके लिए असम्भव है। मानवी जानकारी से बाहर भी न जाने कितनी निहारिकाएँ और होंगी, वे जिन घेरे को स्पष्ट करती होंगी, उनके भीतर भिन्न-भिन्न प्रकार की परिस्थितियाँ और शक्तियाँ काम कर रही होंगी? उनमें रहने वाले जड़-चेतन पदार्थों की स्थिति में कितनी भिन्नता और कितनी विशेषज्ञता होगी, उन सबका नियन्त्रण-संचालन का सूत्र सँभालने वाला कितना कार्य किस प्रकार सम्पन्न करता होगा? उसकी स्वयं की स्थिति कितनी सुविस्तृत होगी? इन सब प्रश्नों पर जब विचार करना आरम्भ करते है, तो तत्त्वदर्शी-मनीषियों की तरह हमें भी अचिन्त्य, अनिवर्चनीय, अनादि, अनंत, नेति-नेति आदि कहकर अपनी चिंतनात्मक असमर्थता और तुच्छता स्वीकार करनी पड़ती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-March
चिन्तन, विचारणा, भावना, आकाँक्षा तक तो वह स्वतंत्र है, किन्तु इसके आगे उस पर समष्टि चेतना का अंकुश है। इस समष्टि चेतना को विज्ञान क्षेत्र में ब्रह्माणी चेतना नाम दिया गया है इस तथ्य को व्यक्ति और समाज के उदाहरण से भी भली-भाँति समझा जा सकता है। व्यक्ति समाज का ही एक अविच्छिन्न अंग है। वह समाज से अलग नहीं रह सकता। एकाकी रहने लगे, तो भी वह समाज से पृथक होने का दावा नहीं कर सकता।
चिन्तनप्रवाह थमा, कुछ क्षण के लिये। उसमें गतिरोध आया, और एक सवाल उभरा पर इसका नायक कौन था अंतर्मन से कोई पूछ रहा था।
चिन्तन को पाकर स्तब्ध थे। यों इनके विवाह को अभी बहुत दिन नहीं हुए थे। विवाह के पूर्व उनकी पत्नी की सामाजिक कार्यों के प्रति लगन, क्रान्तिकारी विचारधारा को देखकर उसके पिता चिन्तित हो उठे कि कहीं बेटी क्रान्तिकारी न हो जाये और उन्होंने उसका विवाह मुम्बई के एक धनी नवयुवक से कर दिया। उम्मीद थी शायद अतुल वैभव के प्रवाह में उसकी विचारणा बह जाये। पर कहाँ?
चिन्तन और व्यवहार में बौनापन न दीखे, इसी में मनुष्य की गरिमा है। चिन्तन और कर्तृत्व का बौनापन आदमी को अधोगामी बनाता तथा पशुस्तर तक नीचे गिराता है यह शारीरिक ठिगनेपन से भी अधिक दुःखदायी स्थिति है, कारण की इसमें जीवात्मा पर मलीनताओं का ऐसा और इतना बोझ बढ़ता है कि उसे हटाने-मिटाने में जन्म-जन्मान्तरों जितना समय लग जाता है। इस भार के न रहने पर इतनी अवधि में कदाचित वह चरम लक्ष्य को प्राप्त कर लेती, पर इसके कारण जन्म-मरण के चक्र में ही आबद्ध रहकर बार-बार उसको इस संसार में आना पड़ता हैं अपने अन्तःकरण के बौनेपन को दूर करके मुक्ति का लक्ष्य शीघ्र पाया जा सकता है। उसमें यदि हिमालय जितनी विशालता हो, तो काया का ठिगनापन महत्वहीन बन जाता है।
चिन्तन-चेता को परिष्कृत करें, परमात्मा का दिव्यप्रवाह हमारे अन्दर प्रवाहित होता चला जायेगा। परिमार्जन से कम स्तर पर जीवसत्ता और परमसत्ता का मिलन-समागम संभव नहीं। अस्तु, इसे नैमित्तिक क्रिया की तरह अभीष्ट और आवश्यक मानते हुए तत्परतापूर्वक सम्पन्न कराने का हर एक को प्रयत्न करना चाहिये
चिन्तन का स्रोत मस्तिष्क में निरन्तर प्रवाहित था कि तब लोग स्वल्प-साधनों में ही अपार सुख-शान्ति का रसास्वादन करते थे।
चिन्तन और प्रयास अपनाते हैं। परन्तु अग्नि की तरह कुसंस्कारों, कल्मषों को तहस-नहस कर धधकती ज्वाला का रूप ले ऊर्ध्वमुख प्रवाहित होने का नाम ही जीवन है।”
चिन्तन में निकृष्टता भरी रहती हैं, उनका अन्तःकरण निरन्तर उद्विग्न रहता हैं। मन में तनिक भी संतोष समाधान नहीं होता। यह उद्विग्नता सारी अन्तःस्थिति में ज्वार-भाटा उठाती और उसे बेतरह मथती रहती है। ऐसी विषम स्थिति में ग्रस्त किसी भी व्यक्ति का स्वास्थ्य सन्तुलित नहीं रह सकता। अच्छा होगा कि अनावश्यक ताप पैदा करने वाले इन मनोविकारों, विक्षोभों से बचने और शाँत-सन्तुलित, संतुष्टि, हंसी-खुशी भरी जीवनरीति अपनाने का प्रयास किया जाय।
चिन्तन की स्थिति और गहरे-ध्यान की अवस्था, दोनों अभिन्न हैं। जब किसी एक विषय -वस्तु के गिर्द विचारणा चलती है, तो वह चिन्तक को धारणा-ध्यान जैसी भूमिका में प्रतिष्ठित कर देती है, अन्तर एक ही है कि मनीषी का चिंतन सापेक्ष सत्य की तलाश कर रहा होता है, एक को पुस्तकीय तथ्य कहें, तो दूसरे को चरम सत्य कहना पड़ेगा। एक माया है, तो दूसरा ब्रह्म, एक कह तुलना बर्फ से करें, तो दूसरे को अगोचर वायप् मानना पड़ेगा। यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, अतः उन्हें दो नहीं, तत्वतः, एक ही कहना चाहिये।
चिन्तन-चेतना को परिष्कृत कर लेते हैं, वो मानसिक एकाग्रता द्वारा अनायास ही ऐसे उच्चस्तरीय विचार-प्रवाहों से संपर्क साधने में सफल होते हैं जो उनके भौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र की कितनी ही समस्याओं से हल ढूंढ़ने में समर्थ सहायक की भूमिका सम्पन्न करते हैं।
चिन्तन के प्रवाह की धारा एक ही दिशा में बहती है। युद्ध और शान्ति के दिनों में इस तथ्य को बड़ी आसानी से साकार हुआ देखा जा सकता है। अपने समय में पूर्वजों के कथन का प्रमाणित मान लेने की श्रद्धा अब उखड़ रही है तथा तर्क और प्रमाणों पर आधारित बुद्धिवाद को मान्यता मिली है। किसी जमाने में त्याग,बलिदान और आदर्शवादिता अपनाने में एक दूसरे के बीच प्रतिस्पर्धा चलती थी और इस क्षेत्र में जो जितना सफल होता था वह उतना ही गौरव अनुभव करता था। अब उससे सर्वथा भिन्न स्थिति है।
चिन्तन-विश्लेषण द्वारा सही परामर्श दे सके तथा आदर्श जीवन-पद्धति से मूर्तिमान प्रेरणा रूप बनकर रहे वही पुरोहित है। अपने जीवन में आदर्श का अभ्यास करने के साथ-साथ व्यक्तिगत हित के साथ-साथ समाजहित की जो कल्पना कर सके, ऐसे व्यक्ति इस वर्ग में आ सकते हैं। राष्ट्रजागरण का कार्य प्रमुख रूप से ऐसे ही प्रकाशवान व्यक्तित्वों का है। ये संगठित होकर स्वयं को इस महान प्रयोजन के लिए समर्पित कर सकें तो यह महान राष्ट्र विश्वमंच पर पुनः सिंहनाद कर सकता है।
चिन्तन और कर्तृत्व का बौनापन आदमी को अधोगामी बनाता तथा पशुस्तर तक नीचे गिराता है यह शारीरिक ठिगनेपन से भी अधिक दुःखदायी स्थिति है, कारण की इसमें जीवात्मा पर मलीनताओं का ऐसा और इतना बोझ बढ़ता है कि उसे हटाने-मिटाने में जन्म-जन्मान्तरों जितना समय लग जाता है। इस भार के न रहने पर इतनी अवधि में कदाचित वह चरम लक्ष्य को प्राप्त कर लेती, पर इसके कारण जन्म-मरण के चक्र में ही आबद्ध रहकर बार-बार उसको इस संसार में आना पड़ता हैं अपने अन्तःकरण के बौनेपन को दूर करके मुक्ति का लक्ष्य शीघ्र पाया जा सकता है। उसमें यदि हिमालय जितनी विशालता हो, तो काया का ठिगनापन महत्वहीन बन जाता है।
चिन्तन वाला था, तो उन विचारों को पकड़ने में सर्वथा विफल रहा, जो दूसरी ओर से उसके लिये भेजे जा रहे थे।
चिन्तन-मनन करता रहता।
चिन्तन प्रवाह अपने में प्रायः एक ही दिशा में होता है। मनस्वी और स्वतंत्र चिन्तक हर समय अपवाद स्वरूप हुए हैं, परन्तु सामान्यतः लोकचिन्तन के प्रवाह की धारा एक ही दिशा में बहती है। युद्ध और शान्ति के दिनों में इस तथ्य को बड़ी आसानी से साकार हुआ देखा जा सकता है। अपने समय में पूर्वजों के कथन का प्रमाणित मान लेने की श्रद्धा अब उखड़ रही है तथा तर्क और प्रमाणों पर आधारित बुद्धिवाद को मान्यता मिली है। किसी जमाने में त्याग,बलिदान और आदर्शवादिता अपनाने में एक दूसरे के बीच प्रतिस्पर्धा चलती थी और इस क्षेत्र में जो जितना सफल होता था वह उतना ही गौरव अनुभव करता था।
चिन्तन-प्रक्रिया की फलश्रुति था।
चिन्तन, मनन एवं भावनाओं के अनुरूप ही कायिक क्रिया-कलापों का निर्धारण होता है। भाव-संवेदनाओं और विचारणाओं की उत्कृष्टता के आधार पर ही हमारी आन्तरिक प्रणाली एवं प्राणऊर्जा का निर्माण होता है। विचार और भावनाओं की अदृश्य शक्ति का हमारे भारतीय शास्त्रों में गहन अध्ययन हुआ है और यह निष्कर्ष निकाला गया है कि स्थूल रूप से मनुष्य का जैसा भी कुछ जीवन है, उसकी भावनाओं का ही परिणाम है, भले ही उनका संबंध इस जीवन से न हो, पर कोई भी कष्ट या दुख, रोग-शोक या बीमारी हमार पूर्वकृत कर्मों और उससे पूर्व पैदा हुए मन के दुर्भावों का ही प्रतिफल है। यही कारण था कि प्राचीनकाल के ऋषि, मनीषी, प्रायः इसी प्रयत्न में रहते थे कि लोगों के मन निम्न और अधोगामी न बनने पायें इसके लिये कष्टसाध्य साधनाओं, तीर्थयात्राओं, सत्संग और नित्य स्वाध्याय के कार्यक्रमों का आध्यात्मिक, धार्मिक और वैराग्यपूर्ण चिन्तन का स्रोत मस्तिष्क में निरन्तर प्रवाहित था कि तब लोग स्वल्प-साधनों में ही अपार सुख-शान्ति का रसास्वादन करते थे।
चिन्तनीय बात है। ऐसा लगता है कि राष्ट्र सचमुच सोया पड़ा है, सामान्य निद्रा में नहीं- मूर्च्छा जैसी गहन स्थिति में। उसे चैतन्य, जाग्रत, सतेज बनाने के लिए विशेष प्रयास किया जाता आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। पर प्रयास करे कौन? राष्ट्रीय-चेतना को कौन उभारे?
चिन्तन जिनके स्वभाव में तथा उसके अनुरूप जीवन प्रक्रिया चलाने के जो थोड़े- बहुत अभ्यस्त हैं, वे ही इस कार्य में आगे आ सकते हैं। तात्कालिक लाभ की मृग-मरीचिका में भटकते नागरिकों को जो दूरगामी परिणामों का स्मरण दिलाकर अपेक्षाकृत अधिक स्थायी लाभप्राप्ति के लिए पुरुषार्थ की प्रेरणा दे सकें, ऐसे विकसित दृष्टिकोण तथा समर्थ व्यक्तियों का यह कार्य है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-January
चिन्तन की दार्शनिक प्रणाली में अनेक प्रकार की त्रुटियां आ गई और उसमें इतनी विसंगतियों एवं कुरीतियों का समावेश हो गया कि व्यक्ति और समाज उन्नति के स्थान पर अवनति की ओर मुड़ चले। वे प्रगतिशील न होकर प्रतिगामी बनने लगे। इससे उबारने का काम विज्ञान ने, चिन्तन की वैज्ञानिक प्रणाली अपने जिम्मे लिया। उसने तर्क, तथ्य और प्रमाणों के आधार पर परम्पराओं तथा मान्यताओं में घुसी रूढ़ियों की बेड़ियाँ तोड़नी प्रारम्भ कीं और यह स्थापित किया कि ओछा तत्वदर्शन अपनायें रहने वाला उठ सकता। यही कारण है कि पिछले दिनों के पिछड़ेपन की अविकसित स्थिति से उबरकर आज हम अपेक्षाकृत अधिक उन्नत और अधिक ऊँचा नहीं उठ सकता।
चिन्तन को वैज्ञानिक कहने में लज्जा अनुभव होती है। यह तो किसी सनकी मस्तिष्क की उपज है, अन्यथा दिमागी प्रखरता का धन से भला क्या सम्बन्ध हो सकता है? यह समझ से परे है। अभावग्रस्तता भौतिक विकास को तो अवरुद्ध कर सकती है, लेकिन बौद्धिक तेजस्विता को वह कैसे प्रभावित करेगी-यह तो विज्ञानवेत्ता ही जाने। दुनिया भर में ढूँढ़ने पर ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएँगे, जहाँ विपन्नता में जीकर भी व्यक्ति ने अपनी बौद्धिक समर्थता के आधार पर उत्कर्ष को प्राप्त किया।
चिन्तन की वैज्ञानिक प्रणाली अपने जिम्मे लिया। उसने तर्क, तथ्य और प्रमाणों के आधार पर परम्पराओं तथा मान्यताओं में घुसी रूढ़ियों की बेड़ियाँ तोड़नी प्रारम्भ कीं और यह स्थापित किया कि ओछा तत्वदर्शन अपनायें रहने वाला उठ सकता। यही कारण है कि पिछले दिनों के पिछड़ेपन की अविकसित स्थिति से उबरकर आज हम अपेक्षाकृत अधिक उन्नत और अधिक ऊँचा नहीं उठ सकता। यही कारण है कि पिछले दिनों के पिछड़ेपर की अविकसित स्थिति से उबरकर आज हम अपेक्षाकृत अधिक उन्नत और अधिक ऊँची अवस्था में पहुँच सके। यह विज्ञान और वैज्ञानिक चिन्तन की उपलब्धि है।
चिन्तन ही है। सोद्देश्य चिन्तन उल्लासभरी मनः स्थिति तथा विधेयात्मक दृष्टिकोण-ये कुछ ऐसी विभूतियाँ हैं जो मात्र मनुष्य को प्राप्त हैं। यही कारण है कि उसने उस धारा को वैभवसंपन्न और सुन्दर बनाने का प्रयास अपने आदिकाल से किया है। इसके पीछे माँ भगवती सरस्वती का अनुग्रह ही प्रत्यक्ष देखा जा सकता है, जो विवेक-सद्बुद्धि के साथ कलादृष्टि भी देती हैं व जीवन को उल्लास के साथ जीना सिखाती हैं।
चिन्तन की उपलब्धि है। दुर्भाग्य की बात है कि अब वही विज्ञान रूढ़िवाद को जन्म दे रहा है।
चिन्तन-शैली है। जड़ के साथ किसी दूसरे प्रकार का भी बरताव हो सकता है, इसे आज का जनमानस अमान्य करता और कहता है कि जड़ के साथ जड़ जैसा ही आचरण हो सकता है। कदाचित इसी मनोवृत्ति और प्रवृत्ति के कारण वर्तमान लोग स्वयं भी जड़ीभूत हो गये हैं। भावनात्मक एकता, प्रेम, स्नेह, श्रद्धा जिन्हें पिछले दिनों तक प्राणी-प्राणी के मध्य का आदान-प्रदान समझा जाता था, वह भी अब कहाँ दिखाई पड़ते? जब जीव-जीव के बीच ही जड़ता को इसके उपयुक्त कैसे स्वीकारा जाता कि उसके साथ सद्भावना का व्यवहार हो सके।
चिन्तन करते हैं, वैसा ही वह हमारे बारे में सोचता हैं। यदि आप भावनाओं के प्रभाव को परखना चाहें तो आज हम दोनों वेश परिवर्तित करके वनभ्रमण करने चलें तथा शुभाशुभ भावों का प्रयोग करके देखें। “
चिन्तन ही हम सब को वरण करना चाहिए, ताकि हम गुरुसत्ता द्वारा सूक्ष्म व कारण जगत से भेजी जा रही आध्यात्मिक प्रेरणाओं को ग्रहण कर सकें
चिन्तन में लगा हो। कर्त्तव्यों में लगा हुआ हो। इस तरह का अगर कोई व्यक्ति है, तो उसे गायत्री का साधक कह सकते हैं। साहब, हम भी साधक हैं, दिन भर चोरी–चकारी करते हैं, सारी जिन्दगी इसी में व्यतीत करते हैं और सबेरे एक घण्टा वक्त मिल जाता है तो माला लेकर बैठ जाते हैं। बेटे, यह साधना नहीं, उसका मखौल है।
चिन्तन भावना एवं कर्म-साधना को राष्ट्र के सशक्त, समर्थ एवं जाग्रत बनाने के लिए उत्सर्ग किया था। उनकी जन्म-शताब्दी के अवसर पर उनके दस स्वप्न को साकार करने का दायित्व हममें से प्रत्येक उस शख्स का है, जो स्वयं को भारतीय कहने में गर्व की अनुभूति करता है।
चिन्तन बनाए रखा जा सकता है, यह राह उन्हीं ने हमें दिखाई एवं 1995 से 2000 तक के समय को अत्यधिक महत्वपूर्ण बताते हुए साधनात्मक पुरुषार्थ को तीव्रतम नियोजित करने की प्रेरणा दी। इस संकट की घड़ी में उच्चस्तरीय चिन्तन ही हम सब को वरण करना चाहिए, ताकि हम गुरुसत्ता द्वारा सूक्ष्म व कारण जगत से भेजी जा रही आध्यात्मिक प्रेरणाओं को ग्रहण कर सकें
चिन्तन उल्लासभरी मनः स्थिति तथा विधेयात्मक दृष्टिकोण-ये कुछ ऐसी विभूतियाँ हैं जो मात्र मनुष्य को प्राप्त हैं। यही कारण है कि उसने उस धारा को वैभवसंपन्न और सुन्दर बनाने का प्रयास अपने आदिकाल से किया है। इसके पीछे माँ भगवती सरस्वती का अनुग्रह ही प्रत्यक्ष देखा जा सकता है, जो विवेक-सद्बुद्धि के साथ कलादृष्टि भी देती हैं व जीवन को उल्लास के साथ जीना सिखाती हैं।
चिन्तन की दो प्रणालियाँ हैं। इनसे विकास में सहायता मिलती है। मध्ययुग में चिन्तन की दार्शनिक प्रणाली में अनेक प्रकार की त्रुटियां आ गई और उसमें इतनी विसंगतियों एवं कुरीतियों का समावेश हो गया कि व्यक्ति और समाज उन्नति के स्थान पर अवनति की ओर मुड़ चले। वे प्रगतिशील न होकर प्रतिगामी बनने लगे। इससे उबारने का काम विज्ञान ने, चिन्तन की वैज्ञानिक प्रणाली अपने जिम्मे लिया।
चिन्तन-मनन के लिए-यह शक्ति का स्रोत है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-August
चिन्तन का घातक प्रभाव मानव मन पर पड़ता है। अपने विपक्ष में सोचना, विचारना अपने पतन का मार्ग तैयार करना है।
चिन्तन द्वारा) तुम्हें और अधिक प्राप्त हो सकती है। यदि तुम्हारे पास साहस की पूँजी है तो उसके संपर्क से शुभ पौरुष पूर्ण विचारों की और भी अभिवृद्धि होगी। जैसा मन में बीज रहेगा, वैसा ही वृक्ष एवं फल प्राप्त होगा। तो चीज थोड़ी है, उसका कारण यह है कि उसका तुम उपयोग नहीं कर रहे हो। अतः एक समय ऐसा आ सकता है, जब इसका पूर्ण रूप से क्षय हो जाय।
चिन्तन तुम्हारी इच्छा, संकल्प, सामर्थ्य की शक्तियों का क्षय करेगा। दिन रात अपनी निर्बलताओं के चिन्तन का घातक प्रभाव मानव मन पर पड़ता है। अपने विपक्ष में सोचना, विचारना अपने पतन का मार्ग तैयार करना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-November
चिन्तन, आमदनी जुटाने में व्यय होता है। उसका मोह बढ़ जाता है। रुपये एकत्रित करने के लोभ में वह बेईमानी का मार्ग भी पकड़ लेता है। कभी-कभी मानसिक भार से उत्तेजित हो वह बच्चों की हत्या तक करने का पाप कर बैठता है।
चिन्तन ही मेरे जीवन का आधार बन जाय।”
चिन्तन के परिच्छेद हैं। मेरे जीवन ने मेरे लिए जो विरासत छोड़ी है वह धैर्य और सहिष्णुता है।
चिन्तन, भजन, पूजन, सुख के लिए समय नहीं बचता। वह जो रुपया-पैसा संग्रह भी करता है, वह भी दो-चार शादियों या शिक्षा में ही व्यय हो जाता है। वृद्धावस्था में, जब उसके शरीर में शक्ति और हृदय में उत्साह नहीं रहता, ये ही आर्थिक संकट मनुष्य को बड़ा परेशान करते हैं। वृद्ध को एक ओर सन्तान को काम से लगाने की चिन्ता होती है, दूसरी ओर अपनी आर्थिक अवस्था को बनाने की फिक्र चलती रहती है। माता पुत्री की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई आयु को देख कर खीजती जाती है।
चिन्तन के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले थे उनकी सत्यता को आज के इस विज्ञान प्रधान युग में गो-भक्षक पाश्चात्य देशों के मनीषियों ने मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया है और वे पुकार-पुकार कर कह रहे हैं कि “गाय सुख-समृद्धि की जननी है। मनुष्य जाति के इतिहास में आज तक जिन जातियों ने गो-रक्षण किया वे उन्नति के शिखर पर पहुँची और जिन्होंने गो-भक्षण किया वे अवनति के गहरे गढ़े में आज तक पड़ी हुई हैं।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-June
चिन्तन एवं मनन के फलस्वरूप ही उपजते हैं। उस समय कोलाहल पूर्ण इस धरती से जैसे सम्बन्ध टूट सा जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-February
चिन्तन, मनन एवं मनोविकारों से लड़ने की तत्परता के आधार पर भी इन्द्रिय लिप्सा पर विजय प्राप्त करना सुगम हो जाता है। इन्द्रियों के चटोरेपन को कभी महत्व न दिया जाय, उनकी पूर्ति करने की सफलता को कभी पुरुषार्थ या सफलता न माना जाय। जब कभी इन्द्रियाँ प्रबल हो रही हों तो उनके समाधान के लिए उस सर्वशक्तिमान सत्ता में सच्चे हृदय से प्रार्थना करनी चाहिए और जब कभी बुद्धि को इन्द्रियाँ हरा दें तब अपने को धिक्कारते हुए उसका पश्चाताप और प्रायश्चित करना चाहिए।
चिन्तन से बली होता है। जिस व्यक्ति को अपने कर्त्तव्य का पूरा निश्चय है, जो उसको पूरा करने के लिए अपना सर्वस्व खोने के लिए तैयार रहता है उसे कोई भी परिस्थिति भयभीत नहीं करती। मनुष्य के मन में अपार शक्ति है। वह जितनी शक्ति की आवश्यकता अनुभव करता है उतनी शक्ति उसे अपने ही भीतर से मिल जाती है। जो व्यक्ति अपने आपको कर्त्तव्य दृष्टि से भारी संकटों में डालता रहा है वह अपने भीतर अपार शक्ति की अनुभूति भी करने लगता है।
चिन्तन मात्र से नहीं आता वही ज्ञान उसे अपनी परिस्थितियों से लड़ने से आ जाता है। जो मानसिक एकता और शान्ति, राग-भोग से नहीं आती वही कठिनाइयों से लड़ने से अपने आप आ जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-April
चिन्तन की ओर, स्वाध्याय एवं सत्संग की ओर उनकी जरा भी रुचि नहीं होती। बड़ों की अवज्ञा करना जिन्हें सुहाता है। कृतघ्नता, छल, विश्वास घात, बेईमानी लीनता, एवं दुष्टता उनकी विशेषता होती है। न स्वयं चैन से बैठते हैं और न दूसरों को बैठने देते हैं। तमोगुण के अज्ञानान्धकार में उनका अन्तःकरण सदा आच्छादित रहता है।
चिन्तन-मनन के पश्चात करता है, किन्तु निश्चयों में ढ़ोला नहीं रहता। अपनी शक्ति से उनमें सौंदर्य भरता चलता है। उसका दृष्टिकोण कम से कम साधनों द्वारा जीवन को सच्चे सौंदर्य से भर लेना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-January
चिन्तन आदि दैवी सम्पदाओं की परवाह नहीं है। उसका बाहरी लिफाफा आकर्षक होना चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-October
चिन्तन, गुण-दर्शन वे दिव्य मानसिक बीज हैं, जिन्हें संसार में बोकर हम आनन्द और सफलता की मधुरता लूट सकते हैं। शुभ भावना का प्रतिबिम्ब शुभ ही हो सकता है। गुण दर्शन एक ऐसा सद्गुण है, जो हृदय में शान्ति और मन में पवित्र प्रकाश उत्पन्न करता है। दूसरे के सद्गुण देखकर हमारे गुणों का स्वतः विकास होने लगता है। हमें सद्गुणों की ऐसी सुसंगति प्राप्त हो जाती है, जिसमें हमारा देवत्व विकसित होता रहता है।
चिन्तन कीजिए, सद्विचार में लगे रहिए, व्यर्थ की कृत्रिम आवश्यकताओं को काटते जाइये, आप देखेंगे, आपका अंतर्द्वंद्व कम हो गया है, मन में अब दुःख की लहरे कम उठती हैं। अपनी पूर्णता की भावना, आत्म शक्ति की भावना अन्तर्मुखी निश्चयात्मा की भावना में दृढ़ता पूर्वक रमण करने से चित्तवृत्ति का निरोध होता है। मन में यह भावना जमाइये :-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-March
चिन्तन करना उसकी मूल प्रकृति है। यदि आप न भी चाहेंगे, तब भी वह अपने चिन्तन के निमित्त कोई न कोई विषय स्वयं ढूँढ़ लेगा। जब बिना चिन्तन किये छुटकारा नहीं है, तो क्यों न मन को चिन्तन करने के हेतु कुछ शुभ भाव, उत्कृष्ट कल्पनाएँ सात्विक प्रेरक विचारधारा प्रदान की जाय।
चिन्तनधारा को सबल अन्तर्मुखी करते जाएं, ऐसा करते हुए हम बहुत कुछ आत्म कल्याण कर सकेंगे। काम करते हमारे अन्दर दोष भी प्रकट होंगे, तो हमें उनको सामने आने देना चाहिए तभी दूर हो सकेंगे।
चिन्तन करते रहें और इस बात का ध्यान रखें कि हमारे चिन्तन में आध्यात्मिकता की बातें ही बार-बार आयें। यों तो मन बहुत ही चंचल है, यह हमें वहाँ से यहाँ उठाता-बैठता और फेंकता रहता है, अतः धीरे धीरे ही इसको वश में किया जा सकता है। अस्तु, हमें सतत इस ओर प्रवृत्त रहने की चेष्टा करनी चाहिए। यदि कोई चीज हमारे मन के अनुकूल न हो, तो हमें उस समय क्रोध अथवा क्षोभ दिखलाने की आवश्यकता नहीं। हम उन्हें रोकें और समझें कि दैनिक जीवन में सभी को इस प्रकार की आशा निराशा और सुख-दुःख का अनुभव करना पड़ना है।
चिन्तन के लिए चाहिए। चिन्तन करना उसकी मूल प्रकृति है। यदि आप न भी चाहेंगे, तब भी वह अपने चिन्तन के निमित्त कोई न कोई विषय स्वयं ढूँढ़ लेगा। जब बिना चिन्तन किये छुटकारा नहीं है, तो क्यों न मन को चिन्तन करने के हेतु कुछ शुभ भाव, उत्कृष्ट कल्पनाएँ सात्विक प्रेरक विचारधारा प्रदान की जाय।
चिन्तन के निमित्त कोई न कोई विषय स्वयं ढूँढ़ लेगा। जब बिना चिन्तन किये छुटकारा नहीं है, तो क्यों न मन को चिन्तन करने के हेतु कुछ शुभ भाव, उत्कृष्ट कल्पनाएँ सात्विक प्रेरक विचारधारा प्रदान की जाय।
चिन्तन किये छुटकारा नहीं है, तो क्यों न मन को चिन्तन करने के हेतु कुछ शुभ भाव, उत्कृष्ट कल्पनाएँ सात्विक प्रेरक विचारधारा प्रदान की जाय।
चिन्तन में आध्यात्मिकता की बातें ही बार-बार आयें। यों तो मन बहुत ही चंचल है, यह हमें वहाँ से यहाँ उठाता-बैठता और फेंकता रहता है, अतः धीरे धीरे ही इसको वश में किया जा सकता है। अस्तु, हमें सतत इस ओर प्रवृत्त रहने की चेष्टा करनी चाहिए। यदि कोई चीज हमारे मन के अनुकूल न हो, तो हमें उस समय क्रोध अथवा क्षोभ दिखलाने की आवश्यकता नहीं। हम उन्हें रोकें और समझें कि दैनिक जीवन में सभी को इस प्रकार की आशा निराशा और सुख-दुःख का अनुभव करना पड़ना है।
चिन्तन करने के हेतु कुछ शुभ भाव, उत्कृष्ट कल्पनाएँ सात्विक प्रेरक विचारधारा प्रदान की जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-September
चिन्तन मनन करना चाहिये।
चिन्तन करता है वह उसकी रचना करने लगता है। रचना के इस कार्य में मानसिक शक्ति खर्च हो जाती है। इस प्रकार मनुष्य तब अपनी शक्ति को खो देता है तो दुःखी हो जाता है। संसार के पदार्थों के विषय में अधिक चिंतन करने से हम अपने आपको ही भूल जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप तब किसी प्रकार का कुचिंतन मन में आ जाता है तो हम उसे रोक नहीं सकते।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-May
चिन्तन मनन और विवाद करने में जिसे रस आता है, जो अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहता है, जिसे ज्ञान संग्रह का शौक है, जो ज्ञानवान बनने के महत्व और आनन्द से परिचित है वह नित्यप्रति अधिक ज्ञानवान होता जायेगा। ज्ञानवान बनने के अनेकों साधन उसे पग पग पर प्राप्त होते रहेंगे। मूढ़मति के मनुष्यों को जहाँ कोई “खास बात” नहीं दिखाई पड़ती, जिज्ञासु व्यक्ति की सूक्ष्म दृष्टि-वहाँ भी बहुत सी जानने योग्य बातें ढूँढ़ निकालती हैं। ज्ञानवान बनने की तीव्र आकाँक्षा हुए बिना मस्तिष्क की वे सूक्ष्म शक्तियाँ संचित नहीं हो सकती जिनके आधार पर शिक्षा और विद्या की प्राप्ति हुआ करती है। ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ के सूत्रकार ने ज्ञान साधना का प्रथम उपाय जिज्ञासा को बताया है जिज्ञासु होना विद्वान होने का पूर्व रूप है।
चिन्तन में ही अपनी सारी शक्ति लगाई। फलतः अखण्ड पद को प्राप्ति कर- (‘दिवौकसाँ मर्धनी तैः कृतं पदम्।,)- उस देव पद को भी ठुकरा दिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-December
चिन्तन (ध्यान) करते हैं तो एक बहुत मोटी किरण ऊपर से उतरती है अकेले मनुष्य पर उतरने वाली किरन का व्यास इतना नहीं होता। एक साथ मिल के साधन करने में आकर्षण बढ़ जाता है और सबके तेजबिन्दु (aura) मिल के वहाँ छा जाते हैं और अपने भंडार से प्रकाश खींचने लगते हैं। इसलिये सत्संग की विशेषता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-April
चिन्तन करने की रीति भी दोनों की मिलती-जुलती हो) ये हैं मित्रता का निष्कण्टक राजमार्ग। ऐसी मैत्री दिन-2 बढ़ती है, टूटने का डर ही नहीं। इसका यह मतलब नहीं कि इन तीनों गुणों के बिना मैत्री हो ही नहीं सकती, अगर अपने पास सहिष्णुता है, धैर्य है, और हैं विमुख और रुष्ट मित्र के लिए भी हार्दिक सद्भाव और शुभकामनाएं तो एक दिन वह आपके इस सच्चे प्रेम का मूल्य समझेगा और हृदय से पश्चाताप दग्ध होकर आपसे क्षमा प्रार्थना करेगा। संसार की कोई भी शक्ति आपकी मित्रता नष्ट नहीं कर सकती क्योंकि सत्य और न्यायपूर्ण पथ पर जगत पिता सर्वशक्ति केन्द्र जगत नियन्ता मनुष्य का सदैव ही सहायक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-February
चिन्तन करते हो कि सब जीव दुख में हैं और अपनी कल्पना शक्ति के द्वारा उन के दुखों का चित्र भी अपने हृदय पट पर खींचते हो कि जिस से तुम्हारी मन में उनके प्रति दया का भाव उत्पन्न हो और तुम से जो कुछ बन सके उनकी सहायता करो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-January
चिन्तन कीजिए क्योंकि जिस प्रकार बीज में सम्पूर्ण वृक्ष सूक्ष्म रूप से रहता है, वैसे ही अन्तर जगत में यह सम्पूर्ण स्थूल जगत सूक्ष्म बीज रूप से रहा हुआ है और जब अन्तर जगत में उपस्थित किसी वस्तु के सूक्ष्म रूप संस्कारों का दृढ़ भावना से पोषण किया जाता है तब वह वस्तु बाह्य जगत में स्थूल रूप धारण किये बिना कभी नहीं रह सकती- यह आध्यात्म शास्त्र का अबाधित सिद्धाँत है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-March
चिन्तन करो जिससे तुम्हारी स्थिति और आत्मा में विलक्षण परिवर्तन होगा। उस सर्वव्यापक महाप्रभु को जानो जो सब शुभ कामना को पूर्ण कर देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-July
चिन्तन कीजिए। फिर ध्यान कीजिये कि आपका मन चंचलता छोड़कर शान्त हो रहा है। मैं शान्त हूँ। मुझमें चंचलता का लेश नहीं। कोई भी विचार मुझे अपनी ओर नहीं खींच सकता।
चिन्तन करेगा, उसकी वासनायें और दृढ़मूल होती जावेंगी। वह अत्यधिक आसक्त और विषयी हो जावेगा। अतएव जब तक भ्रूमध्य में ध्यान किया जावे, कोई विषय, अशुभ वासना मन में न आने पावे! बलपूर्वक मन को लक्ष्य में अथवा शुभ संकल्पों में लगा रखना चाहिये। यदि मन अत्यधिक चंचल हो रहा हो और न मानता हो तो उस समय ध्यान करना बन्द कर देना चाहिये अथवा खुली दृष्टि से नाक की नोक पर त्राटक करना चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-November
चिन्तन करना और वास्तविकता का पता लगाकर उपयोगी मार्ग अवलम्बन करना यही स्वाध्याय का तात्पर्य है।
चिन्तन करते-करते मनुष्य उन्हीं में तन्मय हो जाता है। दूसरी कोई वस्तु उसके सोचने में नहीं आती, फलस्वरूप अपने आराध्य पदार्थों के अतिरिक्त और कुछ मिलता भी नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-July
चिन्तन किया जाय तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उसमें पदार्थ और चेतना दोनों ही भागों का समावेश है। पर आज तो उसकी एकांगी व्याख्या को ही समग्र मान लिया गया है। यही नहीं चेतना को भी जड़ तत्वों की प्रतिक्रिया का ही परिणाम सिद्ध करने के लिए एड़ी-चोटी का भरपूर जोर लगाया जा रहा है। क्या इसे हठवादिता नहीं कहा जाएगा?
चिन्तन करते हुए सार्थक स्वप्न देख मानव कल्याण का हेतु बन सकते है।
चिन्तन-चेतना को परिष्कृत कर वे द्विजत्व की प्राप्ति करते है।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार की उत्कृष्टता बनाये रहकर सुख शान्ति का माहौल बनाये रह सकता है। स्नेह सहयोग की नीति अपना कर हँसती-हँसाती जिन्दगी जी सकता है। जितने साधन उपलब्ध हैं मिल बाँटकर खाते हुए प्रगति और प्रसन्नता भरपूर मात्रा में उपलब्ध कर सकता है। पर वह ऐसा करता नहीं है। क्षुद्रता जब भी साधन सम्पन्न होती है तभी विष उगलती है।
चिन्तन सही रूप में दे सकता है। जैसे यह मौसम की जानकारी दे सकता है, परमाणु विस्फोट से कितनी ऊर्जा पैदा होगी, यह बता सकता है। पर उसके सुनियोजन के बारे में नहीं बता सकता। देखा जा सकता है कि मानवीय व्यवहार और भावनाओं का भी एक क्षेत्र है। उसे भी यदि विज्ञान अपने तार्किक चिन्तन से बताने लगे तो यह निर्णय गलत ही होगा।
चिन्तन होता रहता है पर अन्तराल की गहराई तक वह प्रकाश नहीं पहुँचता।
चिन्तन किया। अपनी गतिविधियों के लिए मन ने धिक्कारा। वह शेष जीवन को सुधारने का विश्वास करके लौटी।
चिन्तन स्वल्प मात्रा में ही उभरता है। मनुष्य की शरीरगत प्रवृत्तियों में एक अहंकार भी है। इसे मानसिक चेतना का उद्भव भी कह सकते है इन्द्रिय भोगों की वासना और उपभोग सामग्री करी तृष्णा इन दोनों का बाहुल्य तो रहता है। पर साथ ही मानसिक विकास के रूप में निज के व्यक्तित्व की कल्पना भी प्रखर होती है। कामनाएँ है।
चिन्तन किया है। इन चिंतकों में बेबर, रोअर, मैक्समूलर, बोइटकलिन्क, विटने, डाँयसन, अल्डेन वर्ग, ओल्ट्रामेअर, हर्टेल, हलेब्रान्त आदि प्रमुख है। डाँयसाय का उपनिषद् विषयक ग्रन्थ उसकी महान विद्वता अध्यवसाय और प्रतिभा का प्रतीक है। इसी तरह स्टोरर का “उपनिषदीय अध्ययन” नामक ग्रंथ महत्वपूर्ण है। इसमें यह उदात्त कल्पना के गयी उपनिषद् ही विश्वधर्म की भावना प्रदान कर सकता है।
चिन्तन पूरी तरह से आत्मपरक होता है, वस्तु परक नहीं। इस तरह के चिन्तन पर तो मात्र विज्ञान का ही एकाधिकार है।
चिन्तन-चेतना में परिष्कृति लाकर न सिर्फ उच्चस्तरीय भाव-तरंगों को पकड़ने में सफल होते हैं, वरन् ब्राह्मी चेतना से भी संपर्क साधने में समर्थ होते हैं।
चिन्तन प्रक्रिया उसी के अनुरूप बन जाती है।
चिन्तन से बताने लगे तो यह निर्णय गलत ही होगा। यह एक शक्तिशाली साधन है। इससे साध्य के प्राप्ति कैसे होगी, इसे धर्म द्वारा ही निर्धारित किया जा सकना सम्भव है। इसके द्वारा की गई शोधों का मूल्याँकन एवं उन्हें मानवीय जीवन में व्यावहारिक धरातल पर लाना एक महत्वपूर्ण कार्य है, जिसे आत्मिकी ही पूरा कर सकती है।
चिन्तन, चरित्र की दृष्टि से बहुत ही गये गुजरे हो गए है। वे धर्म के बाते मा गाल बजाने की तरह करते है, पर उन्हें हृदयंगम करने को बिल्कुल भी तैयार नहीं है। ऐसी दशा में आपका उनके पास जाना व्यर्थ है।”
चिन्तन तंत्र, विलक्षण मनोवृत्तियों का एक मिला जुला मानवी स्वरूप निर्धारित करते है। ऐसी स्थिति में चिन्तन और क्रिया में, योग्यता, बुद्धि, रुचि और लक्ष्य में एकरूपता न होने के कारण उसके जीवन की कोई एक निश्चित दिशा निर्धारित नहीं हो पाती।
चिन्तन मनन किया जाये तो पृथकता व असंबद्धता का आवरण हट जाता है यथार्थ प्रकट होने से य समझ में आ जाता है कि ये परस्पर विरोधी नहीं, एक दूसरे के पूरक है।
चिन्तन और परिश्रम करने से उनके साधन बन जाते है अहंता के नाम पर अन्य प्राणी तो अपनी बलिष्ठता दिखाने के लिए आक्रमण भर करते है। आतंक भर मचाते है। पर मनुष्य को इसके लिए आकुलता भी रहती है और आतुरता भी। जिसे स्नेह नहीं मिला, समझना चाहिए कि उसका जीवन नीरस, निर्जीव, रूखा, कर्कश रह गया। इसी प्रकार जिसे सम्मान ही मिला उसे ऊंचा उठने के लिए जो आधार अवसर मिलना चाहिए था, वहीं छिन गया।
चिन्तन आदर्श चरित्र, स्नेह, सद्भाव का विकसित स्वरूप दीख पड़ता है उन्हें सिद्धपुरुष अपने लिए उपयोगी मान लेते हैं और उन्हें समीप लाने के लिए अर्जित विभूतियों द्वारा निहाल करने के लिए स्वयं ही उन्हें खोज लेते हैं। उनके घर पर जा पहुँचते हैं। विवेकानन्द के घर रामकृष्ण परमहंस स्वयं पहुँचे थे। शिवाजी से समर्थ गुरु रामदास ने किसी बहाने स्वयं संपर्क बनाया था। चाणक्य और चन्द्रगुप्त का सुयोग भी इसी प्रकार बना।
चिन्तनतंत्र विकृत हो जाने के कारण वैसे ही विचार-परमाणु अनायास उसकी ओर आकर्षित होते चले जा रहे हैं। आध्यात्मिक पुरुष अपनी चिन्तन-चेतना में परिष्कृति लाकर न सिर्फ उच्चस्तरीय भाव-तरंगों को पकड़ने में सफल होते हैं, वरन् ब्राह्मी चेतना से भी संपर्क साधने में समर्थ होते हैं।
चिन्तन और क्रिया में, योग्यता, बुद्धि, रुचि और लक्ष्य में एकरूपता न होने के कारण उसके जीवन की कोई एक निश्चित दिशा निर्धारित नहीं हो पाती।
चिन्तन करने पर करने पर यही निष्कर्ष सामने आता है कि विज्ञान ने जड़ जगत् के सम्बन्ध में भी जितनी जानकारियाँ दी है वे अल्प ही है। इनके अतिरिक्त न जाने कितनी बाते ऐसी रह जाती है जिनके बारे में जानना समझना शेष ही है। आधुनिक विज्ञान के मुख्यतः दो सिद्धान्त जिन्हें सापेक्षिकता का सिद्धान्त की तमाम बातें इसलिए नहीं समझ में आती क्योंकि उनका स्पर्श मूलतः चेतना जगत् की परिधि से है, जो सामान्य विज्ञान से बहुत परे की है। इसलिए यदि ऐसा कहा जाय कि जहाँ से विज्ञान का अन्त होता है वहीं से आध्यात्म दर्शन की शुरुआत होती है तो कोई अतिशयोक्ति अथवा अतिरंजन नहीं।
चिन्तन एवं मनुष्य के प्रवृत्तिमूलक प्रतिपादन से विपरीत जो नया वर्ग मनोवैज्ञानिकों का उभर कर आया है, उनमें अमेरिका के मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो का नाम वरिष्ठों में लिया जाता है। अपने प्रतिपादन में उन्होंने कहा है कि “हां व्यक्ति में सर्वोपरि सत्ता का निवास है। समस्त प्राणियों से प्यार-करुणा, दया आदि का भाव रखना उसका मौलिक स्वभाव है। यदि ऐसा न होता तो जितने भी महापुरुष हुए है, अथवा जिन्होंने अपना परिष्कार परिमार्जन करके ऊंचा उठने में सफलता पाई है, वे परमार्थी, परोपकारी एवं रचनात्मक प्रवृत्ति के नहीं होते। वे प्रेम बाँटते और प्रेम पाते है।
चिन्तन पर तो मात्र विज्ञान का ही एकाधिकार है।
चिन्तन के क्षेत्र में स्थूल प्रयासों से परिवर्तन सम्भव नहीं हो सकते क्योंकि भावनाओं, संवेदनाओं का उद्गम स्रोत मन की सूक्ष्म अचेतन परतों में है, जहाँ स्थूल प्रयासों की पहुँच नहीं है। वहाँ आध्यात्मिक उपचारों की ही पहुँच पकड़ सम्भव है। उन्हीं प्रयासों से इनमें परिवर्तन सम्भव है।
चिन्तन करने पर स्पष्ट होता है कि जिन यन्त्र उपकरणों के माध्यम से प्रकृतिगत हलचलों का पता लगाया जाता है, वे जड़ पदार्थों से ही विनिर्मित है। मस्तिष्क का सचेतन, इन्द्रियगम्य ज्ञान भी भौतिक ही है। जानकारियाँ जमा करना इसी का काम है। बुद्धि और अन्वेषण उपकरणों द्वारा तैयार किए गए वैज्ञानिक कहाए जाने वाले इस ढाँचे की अपनी एक सीमा है। चेतन सत्ता की सीमा मन, बुद्धि, इंद्रियों से परे है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-May
चिन्तन के उपरान्त घोषित किया कि उपनिषदों और शंकराचार्य ने जिस ब्रह्म का प्रतिपादन किया है, वह स्पष्ट रूप से वैसा ही है, जैसा की स्पिनोजा का सबर्स्टेशिया।
चिन्तन व साधनात्मक पुरुषार्थ से पा सकना ही सम्भव है। चिन्तन में विकृति होने पर इसकी विकृति भी वासना-तृष्णा के रूप में परिलक्षित होती है। आनन्द की प्रतिच्छाया होने के कारण वासनाएं भी आकर्षक लगती हैं।
चिन्तन में विकृति होने पर इसकी विकृति भी वासना-तृष्णा के रूप में परिलक्षित होती है। आनन्द की प्रतिच्छाया होने के कारण वासनाएं भी आकर्षक लगती हैं।
चिन्तन-चरित्र अपनाने की आवश्यकता है। तद् विषयक जो कुछ परिवर्तन या विकास करना है, उसका स्वरूप सामने आने की बात तभी बनती है जब आत्म निरीक्षण का सिलसिला परिपूर्ण उत्साह के साथ चलाया जायें।
चिन्तन क्षेत्र की बुद्धिमत्ता से ऊंचा उठाकर वहाँ ले जाता है जहाँ समूह मन का आधिपत्य है। जिस प्रकार ब्रह्मांड के अनेक घटक होने पर भी एक ब्रह्माण्डीय व्यवस्था और चेतना काम करती है, उसी प्रकार प्राणि मन से ऊंचा उठकर उसका एक सामूहिक स्वरूप भी है, जिसे परब्रह्म या परमात्मा कहते है। जिस प्रकार पृथ्वी ब्रह्माण्ड का एक छोटा घटक है उसी प्रकार व्यक्ति का ब्रह्मचेतना का एक अंग या अंश है। शासन में जिस प्रकार समस्त प्रजा जनों के स्वार्थों का समावेश होता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्डव्यापी मनस् का लघु अंश व्यक्ति का विवेकशीलता मन भी है, जो अपनी निज की सीमा में सीमित न रहकर इस समस्त विश्व के स्वार्थ और हित का समन्वय सोचता है। जिसकी दृष्टि इस केन्द्र पर केन्द्रीभूत होती है कि प्राणी छोटी परिधि से बाहर निकल कर विराट् की सुव्यवस्था में अपना योगदान दे।
चिन्तन के अनुरूप ही ईश्वर को सृष्टि का नियामक उद्भवकर्ता समष्टि में उसकी उपस्थिति को स्वीकार किया है। श्री बलदेव उपाध्याय ने अपने ग्रन्थ “भारतीय दर्शन” में इसकी तुलना वाचस्पति मिश्र से की है। हालैण्ड के समृद्ध परिवार में जन्मे वारुच दे स्पिनोजा ने वेदान्त के ब्रह्म को सबर्स्टेशिया के रूप में स्वीकारा है। अन्तर मात्र शब्दों का है न कि भावों का। वेदान्त की ही तरह इसने भी इस सत्ता को प्द म मेज दक चमत म ब्वदबपचपजनत अर्थात् “स्वतंत्र तथा स्वतः सिद्ध माना है।
चिन्तन का प्रभाव मात्र विचारणा के स्तर पर ही हो, ऐसा नहीं है। इसकी शोभा ग्रंथालयों, मनीषियों के तर्क-वितर्क वाद-विवाद तक ही सीमित न होकर जन सामान्य तक है। इसकी सुरभि सर्वत्र समान रूप से फैली हुई है। यह व्यक्ति, जाति, देश, धर्म, सम्प्रदाय आदि किसी भी तरह की अर्गलाओं, श्रृंखलाओं से आबद्ध नहीं है। इसमें प्रतिपादित तत्व सर्वथा सार्वभौम व सर्वग्राही है।
चिन्तन की यह प्रखरता स्वयं को उत्कर्ष के सोपानों पर अग्रसर करती जाती है। इस तरह आत्मिक प्रगति के विविध सोपानों को पार करता हुआ वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता जाता है।
चिन्तन की अनुपयुक्तता तब समझ में आती है, जब समय निकल गया होता है।
चिन्तन मनन। हथियारों को तेज करने के लिए उन्हें उल्टी और सीधी ओर से पत्थर पर घिसा जाता है अपने विचारों, योजनाओं और क्रियाकलापों को आरम्भ करने से पूर्व उसे दोनों पहलुओं पर विचार कर लेना चाहिए, तथा ऐसा मार्ग मिलता रहे जिसे व्यवहार एवं सफलता के निकट तक पहुँचा सकने वाला कहा जायें।
चिन्तन समष्टिगत हो जाता है और हित साधना की परिधि में सब कुछ समा जाता है।
चिन्तन की अपनी विशेषता है, जिसको आधार बनाकर कोई भी विकास के चरमोत्कर्ष पर सहज व सुगम ढंग से पहुँचे सकता है।
चिन्तन चरित्र भी उस क्षेत्र को प्रभावित करता है। साधनारत सिद्ध पुरुषों को उसमें घुटन अनुभव होती हैं फलतः वे उन स्थानों को छोड़कर सघन वनों में ऊंचे पर्वतों में इसलिए चले जाते हैं कि उन्हें मानव संकुल से उत्पन्न असुविधा का सामना न करना पड़ें अब यदि उनकी उपस्थिति का पता चल सकें तो खोजी को ऐसे क्षेत्रों में पहुँचना पड़ेगा जो सर्व सुलभ नहीं है। इस कारण अब वह दूरी बहुत बढ़ गई है। जिसको कभी सरलतापूर्वक पार किया जा सकता था ओर सिद्ध पुरुषों से संपर्क साधा जा सकता था। खोजी वर्ग के लोग भी अपनी जीवट और तितीक्षा की दृष्टि से बहुत दुर्बल रहने लगे है।
चिन्तन वाले चिकित्सक द्वारा प्रयोग सफलता पूर्वक हो सकता है। पूर्वार्त्त मनोविज्ञानी की इस चिर पुरातन विधा के पुनर्जीवन की अनिवार्यता अनुभव की जानी चाहिए एवं इस दिशा में निरन्तर शोध चलनी चाहिए।
चिन्तन के क्षेत्र में इसे शीर्ष स्थानीय माना है। विचारकों की यह मान्यता अकारण हो, ऐसा नहीं हैं। सहस्राब्दियों पूर्व ऋषि कहे जाने वाले विचारकों ने विचारों के विशाल क्षीर सागर का मन्थन करके जो नवनीत निस्सृत किया वही वेदांत का रूप संकलित है। इन मनीषियों द्वारा प्रतिपादित सूत्र सिद्धान्त काल की दृष्टि से भले ही चिर-पुरातन हो गए हैं, पर उपादेयता की दृष्टि से सर्वथा नवीन है। जीवन के विकास हेतु आरोहण का पथ आज भी उसी तरह प्रशस्त करते है, जैसा पूर्व में किया था।
चिन्तन चरित्र व्यवहार को तदनुरूप बनाकर समाधि की स्थिति में प्राप्त की। इसी ऐक्य को प्राप्त कर वे सच्चिदानंदोऽहम्, का उद्घोष कर सकें। परम् सत्ता का यह स्वरूप बोध तथा इसको एकाकार होने का पथ-प्रशस्तीकरण भारतीय चिन्तन की अपनी विशेषता है, जिसको आधार बनाकर कोई भी विकास के चरमोत्कर्ष पर सहज व सुगम ढंग से पहुँचे सकता है।
चिन्तन का खाका, व्यक्तित्व का ढाँचा, इस तरह विनिर्मित होता है कि संपर्क में आया व्यक्ति भी उच्चस्तरीय जीवन की ओर उन्मुख हो जाता है। ये स्थूल रूप से भले ही अल्प समय तक रहे पर इनके क्रिया-कलाप-युग-युगान्तर तक प्रकाश संकेतक के सदृश भावी पीढ़ी को विकास का पथ दर्शाते रहते है। आध्यात्म उनके रोम-रोम से प्रस्फुटित होता रहता है। क्रियाओं में विचारणा में, प्रतिभासित होते रहते है। निःसन्देह ‘चित’ ऐसा दिव्य गुण है जो परिष्कृत स्वरूप में सामान्य व्यक्ति को महामानव बना देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-November
चिन्तन में निमग्न निरत रहना अपना लक्ष्य बनाया। जो सूझा, उस पर अनेकों बार विचार किया और फिर प्रकाशन की दिशा में कदम बढ़ाया। साधनों के अभाव में हर प्रकाशन को 500 की संख्या में छपाते रहने का निश्चय करके रुका हुआ कदम आगे बढ़ाया गया। प्रतिपादन इतने सारगर्भित थे कि समर्थकों और विरोधियों ने समान रूप से उन्हें पढ़ना, समझना और अपने जैसे अन्य विचारशीलों को पढ़ने के लिए आग्रह पूर्वक सहमत करना आरंभ किया। क्रमशः माँग बढ़ती गई और लेखक का उत्साह ही नहीं कार्यान्वयन का प्रयास भी बढ़ता गया।
चिन्तन की कमजोरी का लाभ उठाए।
चिन्तन कौशल और क्रिया−कलाप ऐसा होना चाहिए जो उस सुव्यवस्था को अधिक सक्षम रख सके, जिसे नियति ने कण कण में समाविष्ट कर दिया है।
चिन्तन और चरित्र अन्तःकरण की सुसंस्कारिता के आधार पर विकसित होता है। नीति-धर्म, पुण्य परमार्थ उसी गहन अन्तराल पर निर्भर है। किन्तु तीसरी धारा व्यवहार है। उसे संपर्क में रहने वालों से शिक्षण अनुकरण द्वारा सीखा जाता है। उसमें आदर्शों का गहन पुट तो रहता है, परन्तु सीखते समय अल्प विकसित लोग अथवा बालक उसे तत्व ज्ञान को उतनी अच्छी तरह से समझ नहीं पाते।
चिन्तन कर महत्वपूर्ण नतीजे पर पहुँचने में सफल हो गए।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार का ऐसा पुट रहता है जिसके लिए बार-बार सीखने समझने और सुधारने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वह स्वभाव का अंग बन जाता है और क्रिया कलापों में अनायास ही सम्मिलित रहता है। शालीनता इसी को कहा जाता है। सज्जनता यही है। व्यक्ति इसी आधार पर भीतर से सन्तुष्ट प्रफुल्लता रहता है और बाहर से उसे श्रेय, सम्मान, सहयोग मिलते रहने का उपक्रम सहज ही बनता रहता है।
चिन्तन की जानकारी प्राप्त करने में तो बहुत देर लगती है और गहरी खोज बीन की आवश्यकता पड़ती है। व्यवहार पहली दृष्टि में ही सामने आ जाता है। दुकान में क्या समान रखा है, इसकी जाँच पड़ताल समय साध्य है। परन्तु साइनबोर्ड देखकर रास्ता चलता व्यक्ति भी समझ जाता है कि यहाँ क्या रखा और बेचा जाता है? जिसके पास संपर्क साधने का पर्याप्त समय नहीं है, ऐसे अधिकाँश लोग किसी व्यक्ति के बारे में लगे हुए अनुमान, उसके व्यवहार की थोड़ी भी गतिविधियों को देखकर लगाते है।
चिन्तन को प्रधान, चरित्रों का उसका परिपाक और व्यवहार को उसकी अभिव्यक्ति माना जाता है। यह अपने ढंग का विश्लेषण है। परन्तु यह निश्चित है कि व्यवहार ही किसी की आरंभिक पहचान कराता है। चरित्र और चिन्तन की जानकारी प्राप्त करने में तो बहुत देर लगती है और गहरी खोज बीन की आवश्यकता पड़ती है। व्यवहार पहली दृष्टि में ही सामने आ जाता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के साथ जुड़ने वाली आदर्शवादिता पर अवलम्बित होंगे। मान्यताओं और परम्पराओं में से प्रत्येक को तर्क, तथ्य, प्रमाण, परीक्षण एवं अनुभव की कसौटियों पर करने के उपरान्त ही विश्व धर्म की मान्यता मिलेगी। संक्षेप में उसे आदर्शवादी व्यक्तित्व और न्यायोचित निष्ठा पर अवलम्बित माना जाएगा। विश्व धर्म की बात आज भले ही सघन तमिस्रा में कठिन मालूम पड़ती हो पर वह समय दूर नहीं, जब एकता का सूर्य उगेगा और इस समय जो अदृश्य है, असंभव प्रतीत होता है, वह उस बेला में प्रत्यक्ष एवं प्रकाशवान होकर रहेगा। यहीं है आने वाली सतयुगी समाज व्यवस्था की कुछ झलकियाँ जो हर आस्तिक को भविष्य के प्रति आशावान् बनाती है।
चिन्तन का आधार भारतीय वाङ्मय में पाने का प्रयत्न कर रहे हैं। मिल-हिस्ट्री ऑफ इण्डिया के खण्ड 2 के पृष्ठ 47 में एच॰ डब्लू विल्सन के अध्ययन को उन्हीं के शब्दों में कहते हैं “कि भारतीय ऋषि गहन चिन्तक थे, उन्हें पादपों व अन्य परिस्थिति की घटकों तथा स्वयं के बीच मानसिक सम्बन्धों का परिपूर्ण ज्ञान था।” इसकी साक्षी स्वरूप वैदिक ऋषि श्वेताश्वेतर (3.3) तथा मुण्डक उपनिषद् (2.13), प्रश्नोपनिषद् (6.9) छान्दोग्य (8.24) में आकाश को जीवन रक्षक बताते हुए उसे मन की उन्नति का कारण।
चिन्तन चेतना को बदलना है तो उसे सम्पन्न करने की योजना भी असाधारण स्तर की और उपयुक्त माध्यमों और साधनों से सम्पन्न करनी होगी। वही किया भी जा रहा है।
चिन्तन और स्वतंत्र रूप से क्रिया निर्धारण की छूट है। यह सुविधा और किसी घटक को नहीं मिली। ऐसी दशा में उसकी यह निजी जिम्मेदारी बनती है कि अपने को स्वयमेव नियति की अनुशासन व्यवस्था में बाँधे रहे। संयम इसी का नाम है। मानवी मर्यादाओं और वर्जनाओं के विशेष निर्देशों के अंतर्गत उसे यह प्रशिक्षण भी दिया गया है।
चिन्तन और कर्म में निरत रहा जाता है होना यह चाहिए कि आत्मबोध आत्म निरीक्षण आत्म सुधार आत्म निर्माण और आत्म विकास की योजनाएं बने आत्म उत्कर्ष को आत्म परिष्कार को आत्म कल्याण को शरीरगत लिप्सा लालसा की तुलना में अधिक महत्व दिया जाये। चिन्तन चरित्र और व्यवहार में अन्तर्मुखी होकर जिया जाये।
चिन्तन और मनन के लिए तो विशेष रूप से एकान्त की ही आवश्यकता पड़ती है। आत्मानुसंधान में निरत योगाभ्यासी प्रायः एकान्त स्थान में रहकर अपने प्रयोग सफलता पूर्वक सम्पन्न करते थे। अभी भी वैज्ञानिक अन्वेषणों के लिए प्रयोगशालाएँ ऐसे ही स्थान और वातावरण में बनी होती हैं, जहाँ बाह्य विक्षेपों का प्रभाव कम से कम पहुँचे।
चिन्तन में तन्मय रहने लगे और अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं को हटाने तथा विशेषताओं को बढ़ाने के लिए सुनिश्चित मार्ग ढूँढ़ निकालने में भी सफल हो गए। इस प्रकार यह स्तब्धता जहाँ अनभ्यस्त होने के कारण प्रारम्भ में तो अखरी, किन्तु थोड़े ही समय में वह न केवल सहन ही हो गई वरन् उपयोगी तथा रुचिकर भी लगने लगी।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार में आमूल-चूल परिवर्तन करने से है। पतनोन्मुख प्रवृत्तियां तो आँधी तूफान की तरह गति पकड़ लेती है पर उन्हें रोकना और तदुपरान्त उत्कृष्टता की दिशा में उछाल देना असाधारण दुस्साहस भरा प्रयत्न है। कैंसर के मरीज को रोग मुक्त करना और नीरोग होने पर उसे पहलवान स्तर का समर्थ बनाना एक प्रकार से चमत्कारी काया कल्प है। ऐसे उदाहरण सम्राट अशोक स्तर के अपवाद स्वरूप ही दीख पड़ते है। पर जब यही प्रक्रिया सार्वभौम बनानी हो तो कितनी दुरूह होगी इसका अनुमान वे ही लगा सकते हैं जिन्हें असंभव को संभव कर दिखाने का प्रण पूरा करना हो।
चिन्तन से ऐसे ही लोगों का जी उचटता है और एकान्त में उन्हें ही डर लगता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार व्यक्ति और समाज को तो प्रभावित करता ही है, सूक्ष्म जगत भी उससे अछूता नहीं रह पाता है। विकृत चिन्तन और भ्रष्टचरित्र, सूक्ष्म जगत के अदृश्य वातावरण को प्रदूषण से भर देते हैं। प्रकृति की सरल स्वाभाविकता बदल जाती है और वह रुष्ट होकर दैवी आपत्तियाँ बरसाने लगती है। इन दिनों अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़ दुष्काल, भूकम्प जैसी विपत्तियां बढ़े क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है। शारीरिक ही नहीं, मानसिक रोगों में भी भारी बढ़ोतरी हो रही है।
चिन्तन और भ्रष्टचरित्र, सूक्ष्म जगत के अदृश्य वातावरण को प्रदूषण से भर देते हैं। प्रकृति की सरल स्वाभाविकता बदल जाती है और वह रुष्ट होकर दैवी आपत्तियाँ बरसाने लगती है। इन दिनों अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़ दुष्काल, भूकम्प जैसी विपत्तियां बढ़े क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है। शारीरिक ही नहीं, मानसिक रोगों में भी भारी बढ़ोतरी हो रही है। मानवी सद्भावना में, व्यक्तित्व के स्तरों में बुरी तरह गिरावट आ रही है।
चिन्तन एवं प्रवाह को मोड़ने में किस प्रकार सफल हो सकता है, इसका बड़ी योजनाएँ बनाने वाले यदि सूत्र संकेत भर प्राप्त कर सकें, तो अच्छा ही होगा। विश्वास किया जाना चाहिए कि युग चेतना अपनी आवश्यकता किसी अदृश्य प्रेरणा के आधार पर पूरा करेगी और सफलता के चरण लक्ष्य तक जा पहुँचेगी।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार को शालीनता के अनुबंधों में बंधे रहने के लिए कहा गया है।
चिन्तन का उन्नयन और साधना का सुनियोजन यदि इस दिशा में सही निर्धारण के साथ चल सकना संभव हो सके तो मानना चाहिए कि पुण्य परमार्थ का सेवा साधना का वह प्रकाश पा लिया गया जो जीवन लक्ष्य की पूर्ति में पूर्णतया समर्थ है।
चिन्तन की अस्त-व्यस्तता भी ऐसी ही भूल है, जिसे प्रगति क्रम की सबसे बड़ी बाधा माना जा सकता है। जिन दिशाओं को अपनाना है, जिन मार्गों पर चलना है, जिन योग्यताओं का सम्पादन करना है। चिन्तन की यदि अपनी निर्धारित कार्य पद्धति ही सीमित रहे। उन्हीं प्रयोजनों का ताना-बाना बुने, सम्भावित कठिनाइयों से निबटने और आवश्यकताओं की पूर्ति करने की बात पर ही यदि विचारणा को सीमा बद्ध रखा जाय तो अनेकों प्रसंग ऐसे उभर आते हैं जिनकी उपेक्षा करने पर सारी योजना ही असफल हो जाती है। एकाग्रता इसी का नाम है कि सामने प्रस्तुत योजना के ही हर पक्ष को गम्भीरता से विचारा जाय।
चिन्तन और दुष्ट आचरण के कारण जो अनर्थ उपजे है उन्हें कोई दावानल भस्मसात् करके रख दे, यह संभव है। ऐसा समय असाधारण रूप से कष्ट कारक भी हो सकता है। विपत्तियाँ और बढ़ सकती है। संकट और भी अधिक गहरा सकते है, किन्तु साथ ही यह भी निश्चित है कि उज्ज्वल भविष्य का सृजन भी इन्हीं दिनों होगा। प्रतिभाएँ इन्हीं दिनों उभरेगी और उनके द्वारा बहुमुखी सृजन की ऐसी योजनाएँ भी बनेगी जो चरितार्थ होने पर ऐसा बासंती वातावरण बना दें जिसकी इक्कीसवीं सदी के रूप में आशा, उपेक्षा चिरकाल से की जाती रही है।
चिन्तन में विकृत आने पर आटोनामिक तंत्रिका-तंत्र की क्रिया प्रणाली गड़बड़ा जाती है और तनाव, उद्वेग, बेचैनी, सिर दर्द जैसी कितनी ही बीमारियाँ मनुष्य को धर दबोचती है। अनेकों बीमारियों का उदय भावनात्मक असंतुलन के कारण ही होता है। इन्हीं की ऋषि चरक ने प्रज्ञापराध की श्रेणी में माना है।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार में अन्तर्मुखी होकर जिया जाये।
चिन्तन की यदि अपनी निर्धारित कार्य पद्धति ही सीमित रहे। उन्हीं प्रयोजनों का ताना-बाना बुने, सम्भावित कठिनाइयों से निबटने और आवश्यकताओं की पूर्ति करने की बात पर ही यदि विचारणा को सीमा बद्ध रखा जाय तो अनेकों प्रसंग ऐसे उभर आते हैं जिनकी उपेक्षा करने पर सारी योजना ही असफल हो जाती है। एकाग्रता इसी का नाम है कि सामने प्रस्तुत योजना के ही हर पक्ष को गम्भीरता से विचारा जाय। अप्रासंगिक प्रसंगों पर मन को न दौड़ते देने की संकल्प शक्ति को भी जागरुकता कहते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-April
चिन्तन को श्रेष्ठ एवं व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बना सकने में समर्थ हो सकती हैं। उपासना की समग्रता एवं उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों को भली भाँति समझा जा सके तो व्यक्तित्व निर्माण का सबल आधार मिल सकता है। उपासना का लक्ष्य है व्यक्तित्व का परिष्कार। इसके निर्धारण से उससे जुड़े आदर्शों एवं उच्चस्तरीय सिद्धान्तों द्वारा उपासक को श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। उपास्य में तन्मय होने का अभिप्राय है उच्चस्तरीय आदर्शों एवं सिद्धान्तों में लीन हो जाना और उसके अनुरूप आचरण करना।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार को प्रखर प्रामाणिक बनाये। उस साँचे के सदृश सिद्ध हो जिसके संपर्क से महत्वपूर्ण पुर्जे सिक्के ढलते रह सकें। जलता दीपक ही दूसरे दीपक को जलाता है। व्यक्तित्व सम्पन्नों की ही प्रतिभा निखरी है। उन्हीं का प्रभाव दूसरे ग्रहण करते है।
चिन्तन-चरित्र को उत्कृष्ट बनाना पड़ेगा, तभी यह संभव है और सम्भव है उस परम लक्ष्य की प्राप्ति, जिसके लिए हमें मनुष्य योनि मिली है।
चिन्तन, आदर्श चरित्र और सज्जनोचित व्यवहार का समावेश होता है। यह जिनके साथ रहा हो वे शरीर न रहने पर भी अविनाशी आत्मा हैं। अन्य सड़ाँध में दिन काटने वाले और दूसरों को कष्ट देने वाले प्राणी भी ऐसे होते हैं, जिन्हें कोई चाहे तो जीवन धारियों में गिन सकता है।
चिन्तन के कारण अधिकाँशतया धार्मिक होने के नाम पर इधर-उधर भटकते और अँधेरे में ठोकरें खाते फिर रहे है। बड़े मजे की बात तो यह है कि बड़े-बड़े बुद्धिमान लोग भी प्रायः इन पक्षपातपूर्ण आग्रहों और व्यर्थ के झगड़ों में पड़कर इन्हें पुष्टि देते रहे हैं कोई तमोभाव ही उनके बौद्धिक प्रकाश में मिलकर उसे अहंकार या आध्यात्मिक अभ्मान से ढक कर भटकता रहा है।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार ही मनुष्य की चेतन सम्पदाएँ हैं। इन्हीं के सहारे किसी के लिए सर्वतोमुखी प्रगति की दिशा में अग्रसर बनना सम्भव हो सकता है।
चिन्तन आदि की कुछ भी बचत क्यों न हो, उन्हें सत्प्रयोजनों के निमित्त अर्पित करना प्रयास है। संयम साधना में तपश्चर्या सध जाती है और दूसरों की सेवा सहायता में अपनत्व पर विराट के विशालता के किसी घटक के साथ अपनी आत्मीयता सघन होती है। यही योग साधना की पृष्ठभूमि भी है। सेवा, धर्म को सेवायोग भी कहा जा सकता है। उसे अपनाने वाले को प्रथम चरण लोभ मोह और अहंकार का नियमन करने के रूप में उठाना होता है।
चिन्तन की दृष्टि से प्रौढ़ और स्वस्थ व्यक्तित्व उसी का माना जाना चाहिए जो समस्त परिस्थितियों में शान्त होकर कार्य करे। इस तरह ऐसा व्यक्ति भली प्रकार समंजित होता है और उसमें भावात्मक तथा सामाजिक परिपक्वता होती है।
चिन्तन करते रहते अपने ऊपर भी सवार हो जाता है और दुहरी हानि पहुँचाता है इनमें से अपने दुर्भाव हटा कर शत्रु की आक्रामकता को आधी तो हम स्वयं ही घटा सकते है। निपटने के लिये आधा भाग ही शेष रह जाता हैं।
चिन्तन में प्रगति की है और परिस्थितियों के साथ ताल मेल बिठाया है। विभिन्न प्राणियों, क्षेत्रों, साधनों और परिस्थितियों में अधिक समुन्नत स्थिति की संरचना का श्रेय इसी प्रवृत्ति को है। जिनमें यह उत्साह जितना कम विकसित हुआ है वे अभी भी उसी पुरातन स्थिति में रह रहे हैं। फूल के संपर्क में आकर तितली ने अपनी काया बदल ली। हिंस्र जन्तुओं ने रात्रि के समय अपनी घात अच्छी तरह लगने के कारण प्रकृति को निशाचर स्तर का बना लिया।
चिन्तन चल पड़ेगा। तदनुरूप क्रिया कलाप होंगे। निम्न स्तरीय चिन्तन वाले व्यक्ति के क्रिया-कलाप भी घटिया होना स्वाभाविक हैं। ऐसा व्यक्ति अपने जैसे दुराचारी-अनाचारी व्यक्ति विनिर्मित करने में ही सहायक सिद्ध होगा, जबकि उच्चस्तरीय चिन्तन करने वाले सन्त-मनीषी महात्माओं के चिन्तन के अनुरूप उनके क्रिया-कलाप भी उत्कृष्ट कोटि के होते हैं। तदनुरूप उनके सान्निध्य में रहने वाले व्यक्तियों का व्यक्तित्व भी उसी साँचे में ढल कर सुघड़ स्वरूप प्राप्त करता है।
चिन्तन पर लगाम लगानी पड़ती है। लोभ-मोह और अहंकार अपने आकर्षक रूप बना कर प्रलोभनों के सब्ज बाग दिखाते रहते है। अधिकाँश लोग भी उसी प्रकार का आचरण करते दिखाई देते हैं। अनुकरण की सहज वृत्ति भी बहुमत का अनुसरण करने के लिये फुसलाती और धकेलती रहती है। ऐसी दशा में कोई रिले ही अपनी आदर्शवादी रीति-नीति पर स्थिर रह पाते है।
चिन्तन और कर्तव्य को सबसे ऊंचा और बढ़कर मानता है। उसे यह स्वीकार नहीं कि अपनी मान्यताओं और आकाँक्षाओं का औचित्य की कसौटी पर कसे और यह देखे कि वे न्यायसंगत हैं या नहीं। जो चाहा सो कर गुजरना मनुष्य के अन्दर काम करती पशु प्रवृत्ति है। मनुष्य को यह सोचना होता है कि वह जो जानता, मानता हैं, चाहता और कहता है वह सार्वजनिक हित में हैं या नहीं? धर्म और कर्तव्य उसे करने की छूट देते हैं या नहीं?
चिन्तन की गिरावट का ही परिणाम है। इस बात को प्रायः सभी मनोवैज्ञानिक एकमत से स्वीकार करते हैं। चिन्तन की उत्कृष्टता को अपनाने तथा उसे व्यावहारिक जगत में उतारने से ही भावात्मक तथा सामाजिक समंजन प्राप्त हो सकना सम्भव है।
चिन्तन करते है उससे हमारा संपर्क उसी प्रकार स्थापित हो जाता है जिस प्रकार माइक्रोवेव्स द्वारा संसार के विविध रेडियो स्टेशनों से संपर्क हो जाता है। दिव्य सत्ताओं से संपर्क एवं उनसे मिलने वाली प्रेरणाओं से आध्यात्मिक ही नहीं शारीरिक, मानसिक लाभ भी प्राप्त किये जा सकते हैं। प्रत्येक मनुष्य का मस्तिष्क वायरलेस के रिसीवर की तरह ही है जो हर समय भले बुरे विचारों को ग्रहण करता रहता है। मन में किस प्रकार के विचार उत्पन्न होंगे यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम किससे अपना संपर्क जोड़ रहे हैं।
चिन्तन के अनेकानेक उड़गनवृन्दों के मध्य शशि के सदृश वह सुशोभित है। इसमें साम्प्रदायिक जातिगत, देशगत कट्टरता की प्रखरता न होकर- सामंजस्य की स्निग्ध छटा है। इसका दिव्य सन्देश सार्वभौमिक रूप से उपादेय है। पूर्व में आचार्य शंकर के पूर्ववर्ती चिन्तक बोधायन उपषर्ष, टंक, सुन्दुरपाण्ड्य से लेकर परवर्ती अध्येता पद्मपाद वाचस्पति, मधुसूदन, अरविन्द आदि ने एकमत से उसकी उपादेयता को स्वीकारा है।
चिन्तन प्रवाह में आदर्शवादिता का जितना अधिक पुट होगा, उसी स्तर की सफलता प्राप्त होगी। इष्ट से तादात्म्य और उससे मिलने वाले दिव्य अनुदानों से वह आधार बन जाता है जिससे उपासक अपने चिन्तन एवं गतिविधियों को श्रेष्ठता की ओर मोड़ सके।
चिन्तन करते रहने पर उस भावनात्मक सान्निध्य का प्रतिफल यह होता है कि उनकी विशेषताएँ अपनी ओर आकर्षित होती रहती है और धीरे-धीरे ऐसा प्रभाव डालती है कि दोनों के मन एवं व्यक्तित्व अधिकाधिक एकता बनालें। अनुकूल अनुरूप बन जायें। शत्रु के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया ऐसी ही होती है। जो दोष दुर्गुण उस पर आरोपित किये गये है, वे अपनी मान्यता के अनुरूप यथार्थता जैसी प्रतिक्रिया दिखाने वाले बन जाते है। जिस प्रकार प्रेमी के सद्गुणों को अपने में समाविष्ट करते है, उसी प्रकार शत्रु पर आरोपित दुर्गुण भी एक तथ्य बन जाते है और अपनी दुष्प्रवृत्ति का अनुदान उसे अनायास ही देते रहते है, जिसने शत्रुता परिपक्व की हुई हैं।
चिन्तन के लिए आधार ढूँढ़ता है। जैसा माध्यम होगा उसी स्तर का चिन्तन चल पड़ेगा। तदनुरूप क्रिया कलाप होंगे। निम्न स्तरीय चिन्तन वाले व्यक्ति के क्रिया-कलाप भी घटिया होना स्वाभाविक हैं। ऐसा व्यक्ति अपने जैसे दुराचारी-अनाचारी व्यक्ति विनिर्मित करने में ही सहायक सिद्ध होगा, जबकि उच्चस्तरीय चिन्तन करने वाले सन्त-मनीषी महात्माओं के चिन्तन के अनुरूप उनके क्रिया-कलाप भी उत्कृष्ट कोटि के होते हैं।
चिन्तन, मनन भी इस संदर्भ में काम करता है। वह अपनी इच्छा शक्ति और संकल्प शक्ति से भी अपने आप को प्रभावित करता है। पूर्व संचित संस्कार भी ऐसा वातावरण पाकर स्वतः उभरते हैं। ग्रीष्म ऋतु में घास सूख जाती है फिर भी जमीन के अन्दर उसकी जड़ों में किसी प्रकार नमी बनी रहती है। वर्षा होते ही वह जड़े अनायास ही अंकुरित हो चलती हैं और तेजी से अपना विस्तार करती हुई जमीन पर फैलकर हरीतिमा बिखेरती हैं।
चिन्तन करे और अपने को उसी ढाँचे में ढालने की योजना बनायें। जीवन की भावी योजना भी उसी स्तर पर बननी चाहिये, जैसे कि सरकारी पंचवर्षीय योजनायें बनती है। रेल एक लाइन पर चलती है तो निश्चित स्टेशनों पर ही ठहरती है और अन्तः में वही रुकती है जहाँ उसका अन्तिम पड़ाव हैं यह नीति सुदृढ़ व्यक्तित्वों वाले मनुष्यों की रहती है। वे संकीर्ण स्वार्थ साधने के लिये कुछ भी करने के लिए आतुर नहीं होते, है, जिसका अनुगमन करते हुए अनेकों श्रेष्ठता के पथ का अनुगमन कर सकें।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को उदार साहसिकता से ओत-प्रोत कर रखा है, जिनने संयम साधा है। लोभ, मोह, अहंकार से छुटकारा पाया है, उन निस्पृह व्यक्तियों से यह आशा की जा सकती है कि वे लोकमंगल की साधना में निरत हो सकेंगे। पुण्य प्रयोजनों के लिए अपने श्रम, समय मनोयोग एवं साधनों को लगावेंगे। इस स्तर की उत्कृष्ट प्रामाणिकता को सिद्ध करने में जिन्होंने अनेकों बार अग्नि परीक्षाएँ उत्तीर्ण करने के प्रमाण प्रस्तुत किये हैं। उन्हें ही देव पुरुष दिव्य प्रयोजनों के लिए वरण करते हैं।
चिन्तन जग पड़े और उसे कार्यान्वित करने की विधा चल पड़े तो समझना चाहिए कि चिन्तन क्षेत्र में उत्कृष्टता घर बनाने लगी। जब वह कार्यान्वित होने लगे तो मानना चाहिए कि श्रद्धा ने मूर्ति रूप धारण कर लिया।
चिन्तन पूर्वाग्रही बौद्धिकता से कैसे उबरा जाय? क्या कोई ऐसा सूत्र है, जो विविध धर्म मतों सम्प्रदायों तथा दर्शनों के मूल तत्त्व को अपने में पिरोता है? ये प्रश्न ऐसे हैं जिनके समाधान से विश्व मनीषा को नूतन दृष्टि मिलेगी। चिन्तन के नए आयाम का विकास होगा। एक ऐसा सेतु विनिर्मित होगा जिसके सहारे सभी पार हो सकेंगे।
चिन्तन क्षेत्र में उत्कृष्टता घर बनाने लगी। जब वह कार्यान्वित होने लगे तो मानना चाहिए कि श्रद्धा ने मूर्ति रूप धारण कर लिया।
चिन्तन की उत्कृष्टता को अपनाने तथा उसे व्यावहारिक जगत में उतारने से ही भावात्मक तथा सामाजिक समंजन प्राप्त हो सकना सम्भव है।
चिन्तन को लक्ष्य की ओर नियोजित किए रखने के लिए साकार अथवा निराकार कोई भी अवलम्बन लिया जा सकता है। यह आवश्यक है और उपयोगी भी। इस प्रक्रिया के साथ जुड़े चिन्तन प्रवाह में आदर्शवादिता का जितना अधिक पुट होगा, उसी स्तर की सफलता प्राप्त होगी। इष्ट से तादात्म्य और उससे मिलने वाले दिव्य अनुदानों से वह आधार बन जाता है जिससे उपासक अपने चिन्तन एवं गतिविधियों को श्रेष्ठता की ओर मोड़ सके।
चिन्तन एवं उत्कृष्ट व्यक्तित्व के निर्माण का सशक्त माध्यम है। मन की बनावट कुछ ऐसी है, वह चिन्तन के लिए आधार ढूँढ़ता है। जैसा माध्यम होगा उसी स्तर का चिन्तन चल पड़ेगा। तदनुरूप क्रिया कलाप होंगे। निम्न स्तरीय चिन्तन वाले व्यक्ति के क्रिया-कलाप भी घटिया होना स्वाभाविक हैं।
चिन्तन तंत्र अपेक्षाकृत अधिक विकसित हुआ है। प्रकृति की सम्पदा का अधिक भाग उसने अपने अनुकूल बनाने में कुछ उठा नहीं रखा है। इसलिए भोजन, वस्त्र, निवास, परिवार,, आजीविका आदि के क्षेत्र में वह सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में कहीं, अधिक अच्छी स्थिति में हैं। दूसरे प्राणी जब कि प्रकृति प्रकोपों के सामने अपनी सत्ता गँवा बैठते हैं तब मनुष्य ही एक ऐसा दिखाई पड़ता है जो प्रतिकूलताओं के बीच भी अनुकूलता तलाश लेता है। कृषि, पशुपालन, वाहन, पाक-शास्त्र, आच्छादन की बातें तो पुरानी हो गई।
चिन्तन में तल्लीन साहित्यकारों सवाल हल करने में निरत गणितज्ञों के साथ अनेक बार ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जब उन्हें अपनी समीपवर्ती हलचलों की ही जानकारी नहीं मिल पाती। साँसारिक विषय-वासनाओं राग-रंगों में डूबे मन-मस्तक को अन्य अनुभूतियाँ ग्राह्य ही नहीं होतीं, अतः ऐसे व्यक्ति यदि सृष्टा की अनुभूति न कर सकें, तो इससे उसकी निस्सारता नहीं सिद्ध होती।
चिन्तन-चरित्र व्यवहार की त्रिवेणी में बढ़ते जा रहे प्रदूषण को रोकने तथा इसको परिशोधन कर निर्मल परिष्कृत एवं ऊर्ध्वगामी बनाने में-उपासना की आवश्यकता ही नहीं अनिवार्यता भी है। पुरातन काल के ऋषियों तथा आधुनिक काल के सन्तों ने इसका अवलम्बन कर स्वयं के व्यक्तित्व को सुघड़ बनाने के साथ ही समूची मानव जाति के समक्ष प्रकाश संकेतक के रूप में स्वयं को उभारा। आज भी भावनात्मक एवं सामाजिक समंजन सर्वतोमुखी परिष्कार एवं समग्र प्रगति के सभी आधार इसमें विद्यमान हैं। समस्याओं की जटिलता से उबरने तथा अपने व्यक्तित्व को गढ़ने के लिए यह राजमार्ग ही सर्वाधिक उपयुक्त है। *
चिन्तन दुष्ट आचरण अपनाता है तो उसे पिशाच कहते हैं। यह दोनों ही लानतें अधिकाँश मनुष्यों पर लदी होती है। वे अपने दोष, दुर्गुणों को समझ तक नहीं पाते और न यह विदित होता है कि हेय को हटा कर उसके स्थान पर श्रेय की स्थापना कैसे की जाय? ध्यान का दूसरा चरण यह है कि आत्म-निरीक्षण और आत्म-सुधार का प्रयत्न किया जाय। व्यक्तित्व को सद्गुणों के ऐसे अलंकारों से सजाया जाय कि उसकी शोभा सुषमा देखते ही बने।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार बन पड़ता हैं। अध्यात्म भाषा में इन्हीं को प्रज्ञा, श्रद्धा और निष्ठा के नाम से जाना जाता है।
चिन्तन के नए आयाम का विकास होगा। एक ऐसा सेतु विनिर्मित होगा जिसके सहारे सभी पार हो सकेंगे।
चिन्तन को व्यक्तित्व का मूल आधार माना जाने लगा है। इस संदर्भ में हुए शोध प्रयास यह स्पष्ट करते है कि मनुष्य का जैसा आदर्श होगा उसी के अनुरूप उसका व्यक्तित्व विनिर्मित होगा। आदर्श यदि श्रेष्ठ एवं उत्कृष्टता समायेगी। इसके विपरीत निकृष्ट आदर्श निम्नगामी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देंगे, हेय व्यक्तित्व गढ़ेंगे। उपासना में इष्ट निर्धारण परोक्ष रूप से श्रेष्ठ आदर्शों की प्रतिष्ठापना है।
चिन्तन और स्वभाव का स्तर ऊँचा उठाने का है जो पूरी तरह अपने हाथ में है। उसके लिए अतिरिक्त समय की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। अन्य कार्यों के साथ वह भी होता चलता है। शिक्षा संवर्धन से साक्षरता तो कुछ ढूंढ़ खोज भी कराती है, पर स्वाध्याय-सत्संग अपने परिवार या संपर्क में भी चलता रह सकता है। नारी जागरण अवश्य ऐसा है जिसके लिए थोड़ी अधिक चेष्टा करनी पड़ती है।
चिन्तन,चरित्र, व्यवहार एवं वातावरण में ही जीवित रहने का अवसर मिलता है। कहते है कि राजहंस मोती चुगते हैं, कीड़े नहीं खाते। उसी प्रकार यह भी निश्चित है कि अध्यात्म मार्ग के पथिक अपनी उपासना, साधना और आराधना के प्रति निष्ठावान ही होकर जीवन-यापन करते है।
चिन्तनागर में दृष्टि डालनी होगी। इस आगार का सर्वाधिक मूल्यवान मणि भगवद्गीता आज भी अपने स्निग्ध प्रकाश से मानवता का पथ प्रदर्शन कर सकने में सक्षम है। महर्षि कृष्ण द्वैपायन द्वारा सम्पादित यह ग्रन्थ काल की दृष्टि से भले ही लगभग .... वर्ष प्राचीन हो गया है किन्तु उसमें पूर्व की ही भाँति आज भी समन्वय सामंजस्य की अद्भुत क्षमता विद्यमान है।
चिन्तन मन को ही नहीं शरीर को भी प्रभावित करता है। मनोकायिक गड़बड़ियाँ चिन्तन की गिरावट का ही परिणाम है। इस बात को प्रायः सभी मनोवैज्ञानिक एकमत से स्वीकार करते हैं। चिन्तन की उत्कृष्टता को अपनाने तथा उसे व्यावहारिक जगत में उतारने से ही भावात्मक तथा सामाजिक समंजन प्राप्त हो सकना सम्भव है।
चिन्तन वाले व्यक्ति के क्रिया-कलाप भी घटिया होना स्वाभाविक हैं। ऐसा व्यक्ति अपने जैसे दुराचारी-अनाचारी व्यक्ति विनिर्मित करने में ही सहायक सिद्ध होगा, जबकि उच्चस्तरीय चिन्तन करने वाले सन्त-मनीषी महात्माओं के चिन्तन के अनुरूप उनके क्रिया-कलाप भी उत्कृष्ट कोटि के होते हैं। तदनुरूप उनके सान्निध्य में रहने वाले व्यक्तियों का व्यक्तित्व भी उसी साँचे में ढल कर सुघड़ स्वरूप प्राप्त करता है।
चिन्तन करने वाले सन्त-मनीषी महात्माओं के चिन्तन के अनुरूप उनके क्रिया-कलाप भी उत्कृष्ट कोटि के होते हैं। तदनुरूप उनके सान्निध्य में रहने वाले व्यक्तियों का व्यक्तित्व भी उसी साँचे में ढल कर सुघड़ स्वरूप प्राप्त करता है।
चिन्तन एवं गतिविधियों को श्रेष्ठता की ओर मोड़ सके।
चिन्तन चेतना का एक बड़ा भाग ऐसे ही बरबाद हो जाता है। उस बहुमूल्य शक्ति का प्रतिफल कुछ भी हाथ नहीं लगता। इस प्रकार होती रहने वाली बरबादी को निष्ठा का अभाव ही कहा जा सकता है।
चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार में उतारना होगा।
चिन्तन के अनुरूप उनके क्रिया-कलाप भी उत्कृष्ट कोटि के होते हैं। तदनुरूप उनके सान्निध्य में रहने वाले व्यक्तियों का व्यक्तित्व भी उसी साँचे में ढल कर सुघड़ स्वरूप प्राप्त करता है।
चिन्तन की उत्कृष्टता को ध्यान में रखते हुए स्वीडन सरकार ने उन्हें उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश भी बनाया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-December
चिन्तन को मात्र रचनात्मक एवं उच्चस्तरीय विचारों में ही संलग्न रखना चाहिये।
चिन्तन का केन्द्र रहा है मानव की काया, प्राण व मन की सुगठित बनाते हुए अतिमानस तक की विकासयात्रा सम्पन्न करने के साथ सामाजिक परिप्रेक्ष्य में व्यावहारिक जीवन श्रेष्ठ, समुन्नत व आदर्श कैसे बनाया जाय। इस पर सैद्धान्तिक विवेचन एवं व्यवहारिक मार्गदर्शन प्रदान कर व्यष्टिगत एवं समष्टिगत जीवन के सभी पक्षों को ध्यान में रखते हुए सर्वतोमुखी विकास की जो प्रणाली आविष्कृत हुई, महापुरुषों ने उसका नाम ‘धर्म’ दिया।
चिन्तन में उसके विराट् में समाहित होने की प्रक्रिया के कारण संकीर्ण स्वार्थ बुद्धि लुप्त होती जाती है। उसका चिन्तन संकीर्णता से उभर कर सदाशयता के लिए नियोजित होने लगता है। तद्नुरूप उसके व्यावहारिक क्रिया-कलापों में परमार्थ परायणता भी स्पष्ट होती है। जबकि चापलूस दब्बू अपनी संकीर्ण स्वार्थपरता की श्रृंखलाओं में आबद्ध हो अपने चिन्तन, चरित्र, व्यवहार को क्षुद्रता में ही समेटे रहता है, जैसे रेशम का कीड़ा अपने ककून में ही बँधा जाल बुनता रहता है।
चिन्तन को भटकाव के, दिशा शूल के संकट से उबारा जाना चाहिए। मानवी गरिमा को उत्कृष्ट आदर्शवादिता से रहित नहीं होने देना चाहिए। जिन्हें ज्ञान है कि परिस्थितियों की जन्मदात्री मन स्थित ही हैं जो सोचा जाता है वह क्रिया में परिणत होता है जैसा किया जाता है वैसा ही भुगता जाता है। इस तथ्य पर जिनका भी विश्वास हो, उन्हें मनीषा के पक्षधर कहा जा सकता हैं उनका प्रयत्न होना चाहिए कि अपनी पहुँच वाले क्षेत्र में संभालने सुधारने में वैसा प्रमाद न होने दें जैसा कि इन दिनों चल रहा है। लोक चिन्तन को यदि सदाशयता के साथ न जोड़ा गया तो भौतिक जीवन को सुखी बनाने के प्रयास सफल नहीं हो सकेंगे।
चिन्तन के उपरान्त अपने प्रतिपादित निष्कर्ष में उल्लेख करते हुए बर्नार्डशा ने श्रुति के कथन को दुहराया कि “धर्म एक है उसके स्वरूप अवश्य भिन्न है।”
चिन्तनपरक, चारित्रिक एवं उदार सहकारिता के अनुबंधों को तिलांजलि देते हुए ऐसी संस्कृति अपना ली है, जिसे बौद्धिक प्रत्यक्षवाद पर अवलम्बित मानवी सत्ता के हर पक्ष में घुस पड़ी अराजकता ही कहा जा सकता है।
चिन्तन का सिलसिला चलाना। विचार मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। वही कर्म के रूप में परिणत होती और परिस्थिति बनकर सामने आती है। जीवन को कल्प वृक्ष बनाने का श्रेय रचनात्मक विचारों का ही होता है। इस तथ्य को भली प्रकार समझते हुए चिन्तन को मात्र रचनात्मक एवं उच्चस्तरीय विचारों में ही संलग्न रखना चाहिये।
चिन्तन संकीर्णता से उभर कर सदाशयता के लिए नियोजित होने लगता है। तद्नुरूप उसके व्यावहारिक क्रिया-कलापों में परमार्थ परायणता भी स्पष्ट होती है। जबकि चापलूस दब्बू अपनी संकीर्ण स्वार्थपरता की श्रृंखलाओं में आबद्ध हो अपने चिन्तन, चरित्र, व्यवहार को क्षुद्रता में ही समेटे रहता है, जैसे रेशम का कीड़ा अपने ककून में ही बँधा जाल बुनता रहता है।
चिन्तन को निषेधात्मक फटक मिलती रहती है। सतत् ऐसे पोषण से तनाव, बेचैनी का होना स्वाभाविक है।
चिन्तन ने इसकी पूर्ति भी अपने बलबूते करने का निश्चय किया है। पचास वर्ष के अनुभव ने यह बताया है कि योजनाओं की, कार्यकर्ताओं की प्रामाणिकता यदि असंदिग्ध हो तो सहयोगी अयाचित रूप में भी मिल सकता है। विनोबा ठीक ही कहते थे कि जो संस्था लोक श्रद्धा अर्जित कर और स्वेच्छा, सहयोग जुटाने में असफल रहे उसे बन्द हो जाना चाहिए। इस प्रतिपादन को प्रायः आदि शताब्दी से कसौटी पर कसा जाता और खरा पाया जाता रहा है।
चिन्तन की उत्कृष्टता न तो आवश्यक समझी जाती है और न उसके लिए गंभीरतापूर्वक प्रयत्न किये जाते हैं। इस प्रकार से हम भौतिक जीवन में घिर गये हैं वह सरल भी तो नहीं रहा। इतना विपन्न हो गया है कि सही तरह जीवन यापन की सुविधाएं जुटाने में ही सारा समय, श्रम, धन एवं कौशल चुक जाता है। इसमें कुछ अनुचित भी नहीं है, क्योंकि प्राथमिकता तो प्रत्यक्ष जीवन की गतिशील रखने वाले साधनों एवं उपक्रमों को ही देनी पड़ती है।
चिन्तन को यदि सदाशयता के साथ न जोड़ा गया तो भौतिक जीवन को सुखी बनाने के प्रयास सफल नहीं हो सकेंगे। दुर्बुद्धि अनेक अवरोध खड़े करेगी और प्रगति की दिशा को अवगति की ओर मोड़ देंगी। मात्र साधनों के सहारे ही सब कुछ बन पड़ता हो, ऐसी बात नहीं, उसके साथ आदर्शों के अनुरूप सूझ-बूझ और लगन भी होनी चाहिए। अन्यथा जो किया जायेगा उसमें अनेक खोट रहेंगे और लक्ष्य तक पहुँचने की स्थिति लाने में अवरोध ही बने रहेंगे। आदर्शवादिता मात्र स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि आदि तक ही सीमित नहीं है।
चिन्तन केन्द्रित करन के कारण ही हमें एकत्व में अनेकत्व भासित होने लगा हैं। इसी को वास्तविकता समझ बैठने के कारण ही शाश्वत मूल्यों से विमुखता तथा प्रेम के स्थान पर द्वेष ही हमारे पल्ले पड़ रहा हैं।
चिन्तन को परिष्कृत करने वाले मनीषी बुरी तरह पिछड़ रहे हैं। यही कारण है कि नीति, धर्म, सदाचार, कर्तव्य के अभाव में वह सफलता नहीं मिल रही, जो सम्मिलित प्रयत्नों से मिल सकती थी।
चिन्तन में अपनी जड़ें जमाता चला गया, इसी क्रम में मान्यताओं एवं प्रतिपादनों में उलटफेर होता चला गया। परिभाषाएं बदलती चली गई।
चिन्तन इनकी एकात्मता पर सोचने के लिए हमें बाध्य करता है। इनका यह अनितीय भाव भारतीय वाङ्मय के वेद अर्थात् ज्ञान के शीर्षस्थ भाग अर्थात् वेदान्त में स्पष्ट भावित होता है। यह अपने प्रथम सिद्धान्त नाम रूप मिथ्या में सारे द्वंद्वों का निराकरण करता है। इसका तात्पर्य है कि नाम रूप का मोह ही सारे झगड़े की जड़ हैं। वास्तविकता भी यही हैं।
चिन्तन के होते हैं। जैसे ही उनकी बाह्य परिस्थितियों से इस रंग के प्रभाव को हटा दिया जाता है, इनमें विधेयात्मक वृत्ति उभरने लगती है।
चिन्तन करके इस संबंध में बहुत कुछ लिखा है। ये बातें इस तथ्य को प्रमाणित करती है कि आत्मानुसंधान प्रक्रिया में मनोवैज्ञानिक अध्ययन की महत्ता अविच्छिन्न रूप से जुड़ी थी।
चिन्तन के गड़बड़ा जाने पर उद्विग्न कर डालते वाले घटाटोप उमड़ते है एवं अर्ध विक्षिप्तता जैसी स्थिित सामने आ खड़ी होती हैं।
चिन्तन अदृश्य है। उसका कोई रोल ऐसा भी नहीं होता जो तत्काल अपने क्रिया कौशल का परिचय दे सके। ऐसी दशा में प्रस्तुत प्रवाह को देखते हुए उस प्रमुखता को उपेक्षा के गर्त में धकेल दिया जाये तो उसके लिए सामान्य जनों को दोष नहीं दिया जा सकता। दोष उन पर जाता है जिन्हें मनीषा के कर्णधार कहा जा सकता है। जिन्हें दूर दृष्टि प्राप्त है और जो वस्तुस्थिति को समझते हैं।
चिन्तन, चरित्र व्यवहार और प्रयास को अभिनंदनीय अनुकरणीय बनाता है। इसी ढाँचे में उसे ढालने के लिए ऋषियों, ने शास्त्रों की रचना की है,अध्यात्म दर्शन का ढांचा खड़ा किया हैं, योग तप के अनेकों विधान बनाए हैं, ईश्वर भक्ति के अनेकानेक उपचार कर्म काण्डों का सृजन किया है। इन आत्मोत्कर्ष की अनेकानेक विधि व्यवस्थाओं का मूलभूत उद्देश्य एक ही हैं कि मनुष्य इसी जीवन में स्वर्ग, मुक्ति और सिद्धि प्राप्त करे। यह तीनों ही किसी अन्य लोक से संबंधित या जादू चमत्कार जैसी नहीं हैं। वरन् उन्हें व्यक्तित्व की महानता के रूप में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
चिन्तन को दिशा धारा देने में पूर्णतया समर्थ है। प्रेरणाएँ मस्तिष्क में उभरती है। शरीर उनका परिपालन करने लगता है। दुर्बुद्धि अपनाने वाले दुर्गति के भाजन बनते हैं। जिनकी समझ-सूझबूझ नीति निष्ठा अपनाती हैं उन्हें न कुसंग जन्य दुख भोगना पड़ता है और न कुकर्म करने पर जो संकट उठाने पड़ते हैं उनमें फँसने की आवश्यकता होती है।
चिन्तन के सभी पक्षों पर विचार करने में जितना अधिक समय लगे, उतना कम हैं, पर इसे नित्य प्रति, नियमित रूप से करते रहने पर पन्द्रह मिनट भी पर्याप्त हो सकते हैं। एक दिन की छूटी बात को अगले दिन पूरा किया जा सकता है।
चिन्तन कहाँ है? साहस करना तो बहुत आगे की बात है।
चिन्तन देवोपम रहे। चरित्र पर निकृष्टता का दाग धब्बा न लगने दिया जाय। देवत्व से प्रयोजन है- व्यक्तित्व के परिष्कार का। गुण, धर्म, स्वभाव में सज्जनोचित आदर्शवादिता को समाविष्ट किये रहना। इसी में मानवी गरिमा की शोभा है।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार को क्षुद्रता में ही समेटे रहता है, जैसे रेशम का कीड़ा अपने ककून में ही बँधा जाल बुनता रहता है।
चिन्तन भर करते हैं पर जिन्हें दूरदर्शी विवेकशीलता के आधार पर चिरस्थायी समाधान खोजने की क्षमता प्राप्त होती है, उन्हें मनीषियों के वर्ग में गिना जाता है। इसके अतिरिक्त व प्रतिभावान हैं जो हाथ के लिए कामों को आवश्यक सामर्थ्य और कौशल प्राप्त करके सफलता के मार्ग पर बढ़ते-बढ़ते बहुत कुछ कर दिखाते हैं इन दिनों भौतिक क्षेत्र में प्रतिभाएँ तो काम करती दीखतीं हैं, पर लोक चिन्तन को परिष्कृत करने वाले मनीषी बुरी तरह पिछड़ रहे हैं। यही कारण है कि नीति, धर्म, सदाचार, कर्तव्य के अभाव में वह सफलता नहीं मिल रही, जो सम्मिलित प्रयत्नों से मिल सकती थी।
चिन्तन पर नहीं अपितु अनुभूतियों पर अवलंबित है। भारतीय मनीषियों, उपनिषद्कारों ने मन एवं बुद्धि के परे आत्मा के क्षेत्र में प्रविष्ट हो गहन मंथन किया है। इन गहन अनुभूतियों में उन्होंने जाना कि आत्मा का रहस्य जानकर ही पिण्ड एवं ब्रह्मांड की अविज्ञात शक्तियों तथा संपूर्ण रहस्यों का समग्रता से उद्घाटन किया जा सकता है।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-March
चिन्तन में निकृष्टता का समावेश होने से उनकी प्रकृति ऐसी बन जाती है जिससे भविष्य हर दृष्टि से अन्धकारमय ही बनता चला जाता है।
चिन्तन चरित्र एवं व्यवहार में अधिकाधिक गहराई तक सम्मिलित करते चलना आवश्यक हो जाता है। यही आत्मिक प्रगति का सोपान भी है।
चिन्तन की ही तरह बताते है कि परम सत्ता ताओ निराकार और शून्य है- इसी से सबका उद्भव हुआ। लोओं त्यू इसी शून्यता को बताने के लिए अनेक अलंकार लगाते हुए परमतत्व को कभी महाशून्य बताते है कभी अनन्त शून्य। इस शून्यता के बारे में पूर्वी संतों ने कहा कि यह सामान्य शून्यता नहीं है। यह वह महाशून्यता है जिससे शून्य पृथ्वी आदि तत्वों का विकास हुआ। पूर्वी संतों की इस बात को सब एटामिक ऑफ क्वाँटम् फील्ड के वैज्ञानिक एक मत से स्वीकारते हुए निष्कर्ष देते हैं कि ऐसे ही किसी मूलस्रोत से विभिन्नता की उत्पत्ति हुई।
चिन्तन का सूत्र सही न होने से गुत्थी सुलझने के स्थान पर और भी उलझ जाती है। यदि लक्षणों पर विचारपूर्वक गवेषणा की जाय तो वस्तुस्थिति समझने में तनिक भी कठिनाई न पड़े और दोनों ही पक्षों को अपने-अपने अनुकूल समाधान मिल जाये।
चिन्तन, मनन को आधार माना गया है। यह वातावरण के प्रभाव से ही हस्तगत हो सकता है और पूर्व सचिव संस्कारों के आधार पर अन्तः प्रेरणा से भी जब मनुष्य सोचता है कि वह पशु पक्षियों से जीव जन्तुओं से अधिक विकसित एवं समर्थ है तो उसे अपनी वरिष्ठता का बोध होता है। इस बोध को व्यावहारिक जीवन में उतारने की उत्कंठा मचलती है। यहीं है वह प्रसव पीड़ा जिसमें होकर गुजरने पर दूसरा जन्म द्विजत्व उपलब्ध होता है। ऐसी दशा में पेट प्रजनन गौण हो जाता है और मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्टता अपनाने, आदर्शों को जीवन चर्या में घुला देने की योजना बनती है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार। चिन्तन में उत्कृष्टता, चरित्र में आदर्शवादिता और व्यवहार में शालीनता का समावेश करना विद्या का काम है। उसकी बढ़ती हुई मात्रा सुसंस्कारिता के रूप में दृष्टि गोचर होती है। ब्राह्मण और साधु वर्ग के लोग महामानव स्तर के होते है। उनका व्यक्तित्व इतना भारी और वजनदार होता है कि उस दबाव से व्यक्ति, समाज और वातावरण को बदलते, सुधरते देर नहीं लगती।
चिन्तन समझदारों का नहीं होता। बड़प्पन सज्जनता है और उसकी पहचान सादगी से होती है। सादगी का अर्थ है-नम्रता, निरहंकारिता। अपने को जन-साधारण स्तर का समझने वाला खर्चीला रहन-सहन नहीं अपना सकता, क्योंकि उसमें क्षुद्रता और अहमन्यता की स्पष्ट गंध आती है। जो समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का अनुभव नहीं करते, वे ही संग्रही, विलासी और अहंकारी की भूमिका निभा सकते हैं।
चिन्तन में उतरता है और न आचरण में इस स्तर के लोग अपनी लालसाओं को पूरा करने के लिए प्रायः न्याय नीति अपना कर सफल नहीं हो पाते। इसलिए उन्हें अनाचरण अत्याचार का मार्ग अपनाना पड़ता है। अपराधी कृत्य करते रहते है। स्वयं जलते और दूसरों को जलाते, स्वयं गिरते और दूसरों को गिराते रहते है।
चिन्तन उलझ कर रह जाता है और कही से कही जा पहुँचता है। इस भ्रम की अनुभूति इसलिए नहीं होती है कि संपर्क क्षेत्र के अन्य लोग भी तो उसी प्रकार सोचते रहते और चलते दिखाई देते है। इन सबसे अपने को अलग छाँट लेना असामान्य बुद्धि का ही काम है। इसी को शास्त्रकारों ने प्रज्ञा कहा है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की उत्कृष्टता हर हालत में बनाये रखी
चिन्तन में उत्कृष्टता, चरित्र में आदर्शवादिता और व्यवहार में शालीनता का समावेश करना विद्या का काम है। उसकी बढ़ती हुई मात्रा सुसंस्कारिता के रूप में दृष्टि गोचर होती है। ब्राह्मण और साधु वर्ग के लोग महामानव स्तर के होते है। उनका व्यक्तित्व इतना भारी और वजनदार होता है कि उस दबाव से व्यक्ति, समाज और वातावरण को बदलते, सुधरते देर नहीं लगती।
चिन्तन एवं चरित्र पर निर्भर है। शक्तियों का उद्गम स्रोत वहीं है।
चिन्तन और आदर्श चरित्र का समावेश करने के रूप में ज्ञानयोग चरितार्थ करना चाहिए। लोकमंगल को प्रमुखता देते हुए समाज सेवा में निरत रहने के रूप में कर्मयोग का पालन करना चाहिए और साथ ही अंतरात्मा की आत्मीयता से प्रेम भावना से ओत-प्रोत रखना चाहिए। यह भक्तियोग है। तीनों योगों का व्यावहारिक जीवन में अधिकाधिक समावेश करते हुए पूजा पाठ का जप तप का जितना संभव हो अभ्यास करते रहना चाहिए। किन्तु मूलभूत दर्शन को कभी नहीं भूलना चाहिए।
चिन्तन-मनन और सोचने समझने की एक गोलाकार परिधि सी बनती जाती है। मनःमस्तिष्क में बहते हुए यह विचार ही एक धारा का रूप ले लेते है। अतः करण में प्रवाहित होने वाली क्षुद्र भावनाओं की धारा को कषाय-कल्मषों की धारा भी कहते है। काम क्रोध मद मत्सर, मोह, राग, द्वेष, भय आदि विषय वासनाओं एषणाओं की धारा मनुष्य के सूक्ष्म और कारण जगत में सदैव प्रवाहित होती रहती है, जबकि सब महापुरुषों में उदारता, आत्मीयता, सहृदयता, करुणा, पवित्रता आदि की शुभ कल्याणकारी धाराएं प्रवाहित होती रहती है।
चिन्तन और आत्म मनन आता है। चिंतन का तात्पर्य है-वस्तुस्थिति का अध्ययन, अवगाहन। मन का तात्पर्य है-विकृतियों के परिशोधन और सत्प्रवृत्तियों संवर्धन की विचारणा, योजना और संभावनाओं का अभिनव स्थापना। विद्या का शुभारंभ आत्मिक क्षेत्र चिंतन मनन से प्रारंभ होता है। इससे आगे आत्मा समीक्षा, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म विकास के ऊर्ध्वगामी चरण उठते है।
चिन्तन पोषण के अभाव मुरझाते सूखते ही जाता है। इस अड़चन से निपटने के लिए छोटी छोटी दिक्षाएं अपनाने और उन्हें पूरा करते रहने का सिलसिला चलाया जाना चाहिए। तितिक्षाएं प्रमुखतया आदर्शवादी साहसिकता को उभारने के लिए ही की जाती है।
चिन्तन तक में प्रवेश नहीं कर पाती और उस प्रयोजन को कार्य रूप में परिणत कर सकना तो बन ही कैसे पड़े?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-August
चिन्तन, बायोस्फियर अर्थात् जैविक स्तर एवं टेक्नोस्फियर अर्थात् तकनीकी उपलब्धियों का स्तर बतायें है। वे अपनी इस कृति में लिखते है कि मनुष्य की मानसिक गड़बड़ी के कारण ही उसके चिन्तन ने दिशा विहीन होकर असम्बद्ध एवं अमर्यादित टेक्नोस्फियर का निर्माण किया है, जिसने सभी वर्जनाओं को लांघना आरंभ कर दिया है। यही आज की व्यक्तित्व समष्टिगत विभीषिकाओं का मूलभूत कारण है।
चिन्तन मनन करने ओर सींव का निष्कर्ष निकालने में लगाना चाहिए। चित्त का घोड़ा यदि सड़क पर दौड़ने लगे तो उसके साथ बँधा हुआ ताँगा भी लुढ़कने लगता है। मन के पीछे पीछे ही शरीर चलता है। कर्म ही सफलता के निकट तक ले पहुँचते हैं।
चिन्तन की विकृति को सुधारने की तथा सर्वग्राही तर्क-समस्त दर्शन तथा जीवन शैली को अपनाने की आवश्यकता है। ऐसा होने पर ही संभावना है कि संभावना है कि स्थिति में विधेयात्मक परिवर्तन हो सके।
चिन्तन और व्यवहार में श्रेष्ठता की आशा भला कैसे की जा सकती हैं? रुग्ण मानस रुग्ण समाज को ही तो जन्म देगा। मन रोगी हो तो काया का अपना स्वास्थ्य भी अधिक दिनों तक स्थिर नहीं रह सकता। जड़ें सूखते ही काया रूपी वृक्ष तुरंत ढह जाता है।
चिन्तन के आयाम से ऊँचा उठकर भावनात्मक धरातल पर उठने की प्रेरणा देती तथा भ्रान्तियों से भी मुक्त करती है।
चिन्तन की स्थिति में होते हैं पर तभी कोई ऐसा चार यकायक क्रोध उठता है जिससे हल आसान हो जाता है?। यह शक्य है कि ऐसे समय हमारा संपर्क सूत्र कुछ क्षण के लिए आइडियोस्फियर से जुड़ जाता हो पर अधिक देर तक यह अवस्था न बनाये रख पाने के करण संपर्क टूट जाता हो और कोई अनय जानकारी न मिल पाती है।
चिन्तन मंत्र में भटकने से रोककर नियत दिशा में नियोजित करना होता है। यदि दोनों के बीच खींच तान रही तो प्रगति का कदम आगे न बढ़ सकेगा।
चिन्तन का प्रत्युत्तर “इकालाँजिस्ट” पत्रिका में डॉ. पेस्टल एवं मजाँकोविक ने “ए स्टे्रटजी ऑफ सरवाइवल” नामक निबन्ध में दिया है। अपने विद्वतापूर्ण निबन्ध में पर्यावरण की महत्ता को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा है कि “ससैक्स विश्वविद्यालय के उपरोक्त विद्वानों के कथन को किसी भी स्थिति में वाक्चातुर्य से अधिक नहीं माना जाना चाहिए। आज की परिस्थितियाँ व तद्जन्य परिणतियाँ किसी से छिपी नहीं हैं। यदि मनुष्य ने अपनी जीवनशैली में अछपी परिवर्तन नहीं किया तो संभवतः वह जंगलों में रहने के लिए भी अपना अस्तित्व न बचा पाए, यहाँ तक कि आश्रय लेने को जंगल भी शेष न बचे।”
चिन्तन को उलटकर उसे संहारक की जगह सृजनात्मक बना दे। मूलतः तथ्य वहीं है अध्यात्म के स्तर तक पहुँचकर वान द्वारा अपनी दिशा अधो से ऊर्ध्वगामी बनाना।
चिन्तन भी दिया। आज नीति शास्त्री इस पर चकित हो सकते हैं कि कोई भिषक उत्कृष्ट कोटि का नीति मीमांसक भी हो सकता है।
चिन्तन से हीन बताया है।
चिन्तन को आज की समस्याओं के युगानुकूल समाधान के रूप में सुझाते हैं तथा विज्ञान को बाã प्रकृति में उलझे रहने वाला कहकर अस्वीकार करते हैं। इसी प्रकार प्रयोगवादी वैज्ञानिक अपने प्रयोगों के माध्यम से प्राप्त उपलब्धियों को मानव जीवन को सरल एवं सुगम बनाने में सहायक होने की बात कहते हैं। उनके अनुसार ये उपलब्धियां¡ को मानवीय जीवन को कहीं अधिक सुखपूर्ण बना सकेंगी, जबकि वैचारिक कल्पना में खोए रहने वाले दार्शनिक मात्र हवाई किले बनाते रहते है।
चिन्तन ने दिशा विहीन होकर असम्बद्ध एवं अमर्यादित टेक्नोस्फियर का निर्माण किया है, जिसने सभी वर्जनाओं को लांघना आरंभ कर दिया है। यही आज की व्यक्तित्व समष्टिगत विभीषिकाओं का मूलभूत कारण है।
चिन्तन मनन करने तथा पतंजलि प्रणीत योग दर्शन के पृष्ठ उलटने पर स्पष्ट हो जाता है कि योग शब्द “युज” धातु से निःसृत हुआ है- जिसका तात्पर्य है जोड़ना। अध्यात्म साधना के क्षेत्र में यह शब्द आत्मा और परमात्मा को मिलाने वाली पुण्य प्रक्रिया के रूप में प्रयुक्त होता है। इसे सद्ज्ञान और सत्कर्म का समन्वय भी कह सकते हैं। संसार में सबसे बड़ा दुःख वियोग है। प्रिय परिजनों से बिछुड़ जाने पर जितना कष्ट होता है उतना अन्यत्र कहीं भी कभी नहीं होता।
चिन्तन से मन का निरोध करके भी पुरा किया जा सकता है।
चिन्तन, मनन की परिपक्वता ही कारण शरीर को विकसित करती और मनुष्य को इस स्तर तक पहुँचाती है कि वह सद्भाव का श्रद्धा की सुविकसित स्थिति का अनुभव कर सके। यह श्रद्धा ही है जो अन्तराल को परमात्म सत्ता के साथ जुड़ सकने की परिस्थिति पैदा करती है।
चिन्तन के कारण ही पैदा होती हैं। ऐसी स्थिति में तंत्रिका तंत्र एवं ग्रन्थि तंत्र संजीवनी रसायन उत्पन्न करने के स्थान पर ऐसे रसायनों का उत्पादन आरंभ कर देते हैं जो विष तुल्य प्रभाव डालते और अनेकानेक शारीरिक-मानसिक रोगों को जन्म देते हैं। व्यवहार चिकित्सा विशेषज्ञों का मत है कि मन के भावनात्मक दबाव एवं तद्जन्य तनाव ही रोगोत्पादन के कारण बनते हैं।
चिन्तन-विचार करे तो पाते है कि यह भौतिक पदार्थ नितान्त आनन्द से रहित है। यदि इन किसी में आनन्द होता तो मन उसी में लीन रहता। अतएव यह विशेषता इन भौतिक पदार्थों में नहीं है।
चिन्तन तंत्र जिम्मेदार है व्यक्ति यदि सात्विक प्रकृति का रहा है तो उसकी विचारणा भावना भी सौम्य-सात्विक होती है, जो आपनी ही प्रकृति की सतोगुणी व उच्चस्तरीय मस्तिष्कीय रिद्म उत्सर्जित करती हैं। ऐसे ही व्यक्ति सूक्ष्म संदेशों को पकड़ने में सफल होते पाये गये हैं।
चिन्तन और मनन की शक्ति इसी आधार पर आँकी जाती हैं कि उन्हें अपनाकर वस्तुस्थिति समझी और भविष्य की उपयोगी विधिव्यवस्था बनाई जाती है। तत्वदर्शी इसी गहराई में उतरते और जन साधारण के लिए ऐसा मार्ग बना जाते हैं जिस पर चलने वाले प्रगति, समृद्धि, सुख शान्ति का सत्परिणाम उपलब्ध करते रहें। यह सभी भविष्य की सही परिकल्पना कर सकने वाले विशेषज्ञ हैं। इन्हें कोई चाहे तो भविष्यवक्ता भी कह सकता है। विशेषता उनकी यही होती है कि वे जो कुछ सोचते हैं, जैसा कुछ निष्कर्ष निकालते हैं, वह साकार होते हैं।
चिन्तन की परिधि से निकाल बाहर कर सकते हैं? जो शान्त चुपचाप खड़ा हो हमारी हर गतिविधि- हर परिस्थिति का अवलोकन करता रहे? वस्तुतः यह क्षमता हमारे भीतर है- जिसे हम ‘सुपरमाइन्ड’ कहते हैं जो एक लाइट हाउस की तरह दूर-दूर तक अपनी घुमावदार किरणें छोड़ता रहता है, पर स्वयं शान्त बिना विचलित हुए खड़ा रहता है।
चिन्तन की अपनाई हुई दिशा ही स्वभाव बन जाती है। प्रिय लगने लगती है।
चिन्तन करना है, जिन्हें वह स्वयं अपने में महत्वपूर्ण मानता है साथ ही जो उसके जीवन को सुसंस्कृत बनाते है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि दर्शन का प्रमुख कार्य उन मानदंडों की खोज है, जिनके द्वारा विभिन्न साँस्कृतिक क्रियाओं की प्रामाणिकता एवं महत्व को आ¡का जा सकता है।
चिन्तन ने ही कल-कारखाने, सुविधा के साधन, परमाणु हथियारों से पृथ्वी को पाट देने की होड़ शुरू की है। इससे उत्पन्न प्रदूषण से जैविक स्तर का अस्तित्व खतरे में पड़ गया दीखता है। इसी कारण डॉ. वेर्नेद्स्की सारी गड़बड़ियों का मूल कारण नूस्फियर अर्थात् मानवी चिन्तन को मानते हैं।
चिन्तन का महत्वपूर्ण उपक्रम ऐसे ही दिशा विहीन भटकना बौर बर्बाद होता रहता है। जो योजनाबद्ध जीवन जीना चाहते हैं सर्वप्रथम अपनी अभिरुचि इच्छा आकाँक्षा का चुनाव करना चाहिए। इसके उपरान्त उस सीमा में विचारा की कार्यपद्धति एवं संभावना को कल्पना चित्र बनाने की छूट देनी चाहिए। लक्ष्य निर्धारित करने तीर छोड़ने पर उसके निशाने पर लगने की संभावना रहती है। पर यदि उन्हें कौतुक रूप में किसी भी दिशा में चलाते रहा जा तो श्रम की बर्बादी और कुछ न कुछ पाने की लोग हँसाई ही हाथ आती है।
चिन्तन काथा, तो तो वह उन विचारों को पकड़ने में सर्वथा विफल रहा, जो दूसरी ओर से उसके लिए भेजे जा रहे थे।
चिन्तन प्रक्रिया के दौरान उनके मस्तिष्क में अनायास कौंधा था, जो बाद में भौतिकी का आधार स्तम्भ बना।
चिन्तन-मनन आदि उपायों के द्वारा व्यावहारिक रूप में इसे विकसित किया जाता है। बुद्धिमान, विद्वान, कुशल, पारंगत, समुन्नत बनने का अवसर इसी क्षेत्र के परिसर में बन पड़ता है।
चिन्तन की विकृति एवं आचार व्यवहार की निकृष्टता अस्तव्यस्तता की परिणति होते हैं। यदि आत्म निर्देश की पद्धति का ध्यान योग का आश्रय लिया जाय तो न केवल मनोविकारों से मुक्ति पाई जा सकती है, वरन् अंतराल में निहित शक्तियों को जगाया बढ़ाया भी जा सकता है।
चिन्तन की भ्रष्टता,चरित्र की दुष्टता प्रमाणित किए बिना नहीं रहती। ढलान की और पानी अनायास ही बहता है। ऊपर से नीचे गिरने का उपक्रम पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति ही बनाती रहती है। ऊपर उठाने के लिए विशेष प्रयत्न करने की विशेष साधन जुटाने और शक्ति लगाने की आवश्यकता पड़ती हैं। आत्मिक प्रगति के लिए भी लक्ष्य के प्रति उत्साह बढ़ाने वाला मार्ग दिखाने वाला माहौल चाहिए।
चिन्तन को मानते हैं।
चिन्तन कैंसर रोग को जन्म देता है। ऐसे रोगियों का उपचार वे रेडियेशन, शल्य क्रिया आदि की परम्परागत पद्धतियों से अलग हटकर शिथिलीकरण एवं आत्मनिरीक्षण पद्धति से कर रहे हैं। इसमें रोगियों को नियमित रूप से दिन में तीन बार-प्रातः दोपहर एवं सायंकाल में पंद्रह-पंद्रह मिनट का ध्यान करने को कहा जाता है। इस साधना में रोगी “आत्म सम्मोहन” का अभ्यास करता है तथा यह भावना करता है कि उसका मन शान्त, संतुलित और स्वस्थ हो रहा है। दूसरे चरण में उसे रोग ग्रस्त स्थान पर ध्यान धरने को कहा जाता है।
चिन्तन ही वह आयाम है जहाँ से स्थूल कार्यों की अभिव्यक्ति की दिशा नहीं बदली तो भविष्य में प्रकृति का कोई एक परमाणु अथवा परमाणु समुच्चय मात्र नहीं प्रभावित होगा बल्कि समूचा वातावरण एक ऐसा जंजाल बनकर रह जाएगा। यह कहा जा सकता है कि भविष्य वाणियाँ हमेशा सत्य नहीं होतीं किंतु वे असत्य तभी होती है जब वर्तमान का ढर्रा बदला जाय, स्थिति में परिवर्तन आए। आने वाले दिनों में मानव जाति का भविष्य उसकी मनःस्थिति पर निर्भर है यदि उसमें क्रान्ति लायी जा सकी, उसके वर्तमान निषेधात्मक संकल्प बदले जा सके तो निश्चित ही भविष्य उज्ज्वल होगा।
चिन्तन कार्य कारण की संगति बिठाता हैं। तथ्यों की प्रधानता देता है। क्रिया और उसकी परिस्थिति का निर्धारण क्रिया और उसकी परिणति का सही अनुमान लगा सकने की सूझ बूझ को ही प्रमुखता देता है। यही भविष्य विज्ञान का मर्म व तत्व ज्ञान।
चिन्तन ऐसे ही आधार है किसी एकान्त कोठारी या निर्जन क्षेत्र में बैठकर यह अनुभव किया जा सकता है कि संसार में संव्याप्त अवांछनीयता से अपना संबंध टूट गया। बुरे लोगों का बुरा प्रवाह एक एकाँत के कवच को बेध कर भीतर प्रवेश नहीं कर पा सकेगा। यह ढाल बाहरी अनुपयुक्त प्रभावों से बचाने के लिए एल का काम दे सकती है। शर्त एक है कि उस एकान्त में संसार के अवाँछनीय लोगों का विचार,स्वरूप, कृत्य कल्पना में न आने दिया जाय। सर्वथा कोलाहल रहित स्थान मिलने में कठिनाईयाँ दिखे तो यह प्रयोजन आँखें बंद करके, संसार चिन्तन से मन का निरोध करके भी पुरा किया जा सकता है।
चिन्तन और अभ्यास द्वारा मन और विचारणाओं को सामान्य से असामान्य बनाया जा सकता है और भूत अथवा भविष्य की घटनाओं की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
चिन्तन करने की आवश्यकता है। भारत ही एक मात्र वह भूमि है जहां के विचारकों ने प्रारम्भ से दोनों पक्षों को जाना और समझा है। वैदिक साहित्य में चिति और अचिति सम्बन्धी विवेचन ही उपनिषदों में परा और अपरा विद्याओं के रूपों में प्राप्त होता है। यही¡ के ऋषियों ने प्रथम को मुख्य तथा दूसरे को गौण तो कहा है। किन्तु गौण की अवहेलना कर उसे इन्कारा नहीं है।
चिन्तन को स्वयं भुलाते एवं छलावे भरे पाश्चात्य जीवन को अपनाते चले जा रहे हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-January
चिन्तन से ओत-प्रोत रखते हुए भारत की सभी भाषाओं में प्रकाशित किया जाये। ऐसा ही सर्वतोमुखी साहित्य प्रकाशन तंत्र भी खड़ा किया जाय। आवश्यकता पड़ने पर उसे विकेन्द्रित करते हुए बहुक्षेत्रीय भी बनाया जा सकता है।
चिन्तन, चरित्र
चिन्तन, व्यवहार का परिष्कार-उत्कृष्टता का पक्षधर तत्वदर्शन अतीन्द्रिय क्षमताओं की प्रभाव क्षेत्र आदि विषयों पर तो प्रामाणिक विवेचन रहता ही है, इसके अतिरिक्त उसमें गायत्री मंत्र और अग्निहोत्र के संदर्भ में भी विवेचनात्मक चर्चा रहती है। गायत्री यज्ञों का आन्दोलन भी चलता रहा है। कमी इसी बात की थी कि वह प्रतिपादन दार्शनिक एवं शास्त्रीय पृष्ठ भूमि पर ही होता रहा है। उसका वैज्ञानिक अन्वेषण परीक्षण नहीं बन पड़ा था, इसलिए प्रत्यक्षवादी समय-समय पर उस सम्बन्ध में संदेह अविश्वास व्यक्त करते रहते थे। इस विषय को जब वैज्ञानिक प्रयोगशाला के सुपुर्द किया गया तो ऐसे तथ्य उभर कर आये कि उपरोक्त युग्म की उपयोगिता प्रत्यक्ष के आधार पर भी सिद्ध करने की बात बहुत आगे तक बढ़ गई।
चिन्तन और चरित्र के एक रस होने से ही शक्ति उत्पन्न होती है और वह दूसरों को प्रभावित करती है। यदि ऐसा न होता, तो दीखने वाले दृश्य और सुनने वाले शब्द निर्जीव मशीनें भी उत्पन्न करती रहती है। वे अपना उच्चस्तरीय प्रभाव उत्पन्न कर लेती। मनुष्य को उसके लिए श्रम लगाना भी न पड़ता। छपे कागजों और मधुर वचनों की साज-सज्जा में आज बाजार पटा पड़ा है, पर उनका कोई रचनात्मक प्रभाव कहीं देखने को नहीं मिलता।
चिन्तन और क्रिया कलाप में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो चुका है। बात केवल समयदान की रह जाती है। वह भी संकीर्ण स्वार्थपरता में थोड़ी-सी कटौती कर लेने से सरलतापूर्वक हस्तगत हो सकता होगा। इस समयदान का उपयोग उपर्युक्त तीन प्रयोजनों में ही होगा।
चिन्तन को पास भी नहीं फटकने देना चाहिए।
चिन्तन आगे बढ़ता ही नहीं। समूह की-समाज की-परमार्थ की-लोकमंगल की बात कोई सोचता नहीं। सम्प्रदाय, जातिवाद, प्रान्तवाद, भाषावाद के नाम आये दिन फूट-फिसाद होते हैं। राष्ट्रीय एकता-अखण्डता खतरे में पड़ती है। इन सभी समस्याओं का एक मात्र हल है-व्यक्तिवाद के स्थान पर समूहवाद की प्रतिष्ठापन।
चिन्तन पर अवाँछनीय वातावरण और अनुपयुक्त संपर्क से पड़ने वाले दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए स्वाध्याय रूपी साबुन से नित्य परिशोधन किया जाना चाहिए। उससे बुहारी का भी काम लिया जाता है। स्वच्छता का सर्वत्र आदर होता है। सम्पन्नता सर्वत्र प्रभावोत्पादक होती है। सद्ज्ञान के आधार पर चिन्तन की स्वच्छता का भी ऐसा ही महत्व है।
चिन्तन, साधन, प्रभाव, आदि सभी सम्पदाओं को पतन से उतार कर उत्थान की दिशा में नियोजित कर सकता है। साथ ही बाह्य जीवन की उलझन भरी परिस्थितियों को सुलझे हुए स्वर्गीय वातावरण का रसास्वादन करा सकता है।
चिन्तन के क्षेत्र में विशेषतया चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान के क्षेत्र में हम अभी भी पराधीन परावलम्बी बने हुए है। अपना कुछ ऐसा बन पड़ा जिस पर सिर गर्व से ऊँचा किया जा सकता। चिकित्सा के क्षेत्र में तो यह स्थिति और भी अधिक चिन्ता जनक है। देश में 75 प्रतिशत निर्धन बसते है। देहातों में रहते है और छोटे साधन रहित गाँवों में रहकर किसी प्रकार गुजर करते है।
चिन्तन और कर्तव्य सीमाबद्ध रखते है। एक पेट दूसरा प्रजनन। पेट की भूख उन्हें रोटी कमाने के लिए प्रोत्साहित करती है। वहीं बढ़े हुए रूप में लोभ का, तृष्णा का रूप धारण कर लेती है; यौवन का पदार्पण होते ही कामुकता का नशा भूत-पिशाच की तरह चढ़ता है और वह यौनाचार के लिए आकुल-व्याकुल रहने लगता है। इसी की तृप्ति के लिए आमतौर से विवाह किये जाते है।
चिन्तन ने जिस नास्तिकता एवं अनैतिकता को जन्म दिया है। उसे तर्कों तथ्यों प्रमाणों तथा वैज्ञानिक प्रयोगों के निष्कर्षों के माध्यम से निरस्त किया जाना एक ऐसा भागीरथ कार्य था। जिसे प्रत्यक्ष कर दिखाना असम्भव नहीं तो दुष्कर अवश्य कहा जाएगा। यह भी अपने प्रकार का इस युग का समुद्र मंथन है। अध्यात्म तत्व ज्ञान रूपी देव शक्ति और भौतिकी पदार्थ विज्ञान रूपी असुर शक्ति में ताल मेल कैसे बैठे यह सबसे बड़ा असमंजस है।
चिन्तन-स्वभाव में असाधारण अन्तर आ जाता है। युद्धोन्माद भड़क उठने वाले भयंकर मार-काट मचाने में भी यह अंतर्ग्रही बदलाव बहुत बड़ी भूमिका निभाता है।
चिन्तन और कर्म का सघन समन्वय न होने के कारण ही उत्पन्न होता है। ज्ञान और कर्म दोनों का संबंध घनिष्टतापूर्वक जुड़ पड़ने पर ही ऐसा कुछ बन पड़ता है जिसे आदर्शवाद का पक्षधर समग्र परिवर्तन कहा जा सके। इस स्तर का सर्वांगपूर्ण प्रयास गंभीरतापूर्वक कुछ उँगलियों पर गिनने लायक स्थानों पर ही हुआ है। इस दिशा में राजा महेन्द्र प्रताप का प्रेम महा विद्यालय अरविन्द घोष का नेशनल कालेज, कन्याकुमारी का विवेकानन्द पीछ रामकृष्ण मिशन जैसे ज्ञान और कर्म का समन्वय करने वाले आधार खड़े करने में अन्य सुधारवादी व्रतरत रहें है। उनने स्कूल कालेज गुरुकुल जैसे शिक्षा संस्थान तो खोले पर यह नहीं सोचा कि पढ़ने के उपरान्त शिक्षार्थी आजीविका उपार्जन में लग जाने के लिए अतिरिक्त और भी कुछ सोचेंगे करेंगे क्या?
चिन्तन सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध रहता।
चिन्तन कर एक पिरामिड बनाकर उसका प्रभाव पौधों, जन्तुओं प्रयोगशाला के कल्चरमीडिया इत्यादि पर देखने का निश्चय किया। पिरामिड वस्तुतः उलट कर रखा गया यज्ञ-कुण्ड ही है। जहाँ यज्ञकुंड अन्दर संग्रहित ऊर्जा को वातावरण में फेंकता व व्यापक बना देता है, वहाँ पिरामिड ब्रह्मांडीय ऊर्जा को आकर्षित कर अपने केन्द्र पर घनीभूत कर देता है। अभी तो प्रायोगिक परीक्षण हेतु यज्ञशाला के पीछे बनी संगीत विज्ञान वाली नयी प्रयोगशाला में एक मीटर ऊंचा काँच का पिरामिड बनाया गया है। योजना यह है कि ऊपर प्रयोगशाला के एक कक्ष में एक 9 फीट ऊंचा पिरामिड बनाकर 1/3 व 2/3 के मिलन स्थल पर साधक को बिठाया जाय व साधना की अवधि में इसका ई ई जी व ई सी जी पल्स, ब्लडप्रेशर आदि का विश्लेषण किया जाय।
चिन्तन चेतना इसी स्तर की बढ़ी-चढ़ी होना चाहिए। इन उपलब्धियों का हस्तगत कर सकना स्कूली पढ़ाई पूरी कर लेने मात्र से सम्भव नहीं होता। इसके लिए बहुमुखी ज्ञान-सम्पदा का गहराई तक अवगाहन होना चाहिए। इसके लिए सत्साहित्य के निरन्तर अध्ययन के अतिरिक्त और कोई उपाय है नहीं।
चिन्तन-मनन से ऐसा नवनीत निकाला था जो भू-लोक निवासियों के लिए अमृतोपम सिद्ध हो सके। उनकी तपश्चर्याएँ व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए नहीं, वरन विश्व-कल्याण के लिए सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए थी। इन्हीं दोनों में उन्होंने स्वर्ग और मुक्ति का दर्शन किया था। आज देवपूजा तो बहुत है किन्तु ऋषियों द्वारा प्रतिष्ठित मानवी गरिमा की अभ्यर्थना करने का किसी का मन नहीं है। वस्तुतः देव विभूतियाँ ऋषि कल्पों में होकर ही अपना आलोक प्रकट करती और संपर्क साधने वाले को निहाल करती है।
चिन्तन-चेतना को उल्टे से उलट कर सीधा करना था। अस्तु आवश्यक समर्थता का संचार होते ही उस उत्पादन को अभीष्ट प्रयोजन में लगा दिया गया।
चिन्तन ही चरित्र बनता है। वही व्यवहार में उतरता है अपने स्तर के अनुरूप भली-बुरी परिस्थितियों का सृजन करता है। परिस्थितियाँ ही मनुष्य के सुख-दुख का उत्थान-पतन का निमित्त कारण बनती है। इस तत्व-दर्शन को समझ लेने पर आज की अनेकानेक विपन्नताओं का मिश्रित कारण खोजा जा सकता है। निदान सही होने पर उसका उपचार भी ठीक बन पड़ता है।
चिन्तन की स्वच्छता का भी ऐसा ही महत्व है। उसे बौद्धिक क्षेत्र की इतनी बड़ी सम्पन्नता कहा जा सकता है, जिस पर कुबेर जितने धन को भी निछावर किया जा सकें। धन मात्र शारीरिक सुख साध नहीं जुटाता है, पर सद्ज्ञान से चेतना निखर पड़ती है। बुद्धि में समग्रता आती है और भाव-संस्थान को सुसंस्कृत किये जाने की सम्भावना स्पष्ट होती है।
चिन्तन में उत्कृष्टता का दूरदर्शिता और आदर्शवादिता का समावेश किया जाय। उसके मान्यता क्षेत्र में धँसी हुई कुसंस्कारिता-प्रतिगामिता को उखाड़ फेंका जाय। यह कार्य देखने में कठिन मालूम देता है। पर यदि वस्तुतः इस दिशा में प्रतिभावानों के संकल्प उभर तो उसकी पूर्ति किसी भी प्रकार असम्भव नहीं है। वास्तविकता में इतना बल होता है कि वह अग्नि की तरह चिनगारी से दावानल बन सके ओर विशाल क्षेत्र में फैले कूड़े-कबाड़ को अपने अंचल में समेट सके।
चिन्तन की विकृति के कारण मनुष्य निरन्तर खोखला होता चला जा रहा है। मौसम में तनिक-सा बदलाव भी उसे अस्वस्थ कर चिकित्सक की शरण में जाने को विवश कर देता है। चाहे कितनी ही बहुमूल्य औषधियाँ प्रयुक्त की जाय, खोये स्वास्थ्य को लौटाने की कोई सूरत नजर आती नहीं। रोग हेतु जीवाणु, विषाणु को दोष देना व्यर्थ है। जब अपना भीतर का ढाँचा ही जीर्ण-शीर्ण है तो कितने ही एंटीबायोटिक्स प्रयोग कर लिये जायँ, टॉनिक ले लिये जायँ, कुछ परिवर्तन नहीं आने वाला।
चिन्तन और चरित्र पर ही निर्भर रहता है। सामाजिक समस्याओं के समाधान यों आन्दोलनों के रूप में किये जाते रहते है। इसके लिए कानून भी बनते और प्रत्यक्ष स्तर के उपाय भी होते रहते है। किन्तु देखा यह गया है कि उनका प्रभाव नगण्य जितना ही होता है। तालाब में ढेला फेंकने पर प्रहार के स्थान पर पानी फैल जाता है।
चिन्तन का बहुपक्षीय प्रवाह ही मन है। वह अपने स्तर के अनुरूप अपनी दुनिया का सृजन करता है। जीवन के स्वरूप को वही ढालता है और अपने स्वरूप के अनुरूप ही परिस्थिति का परिकर सामने आ खड़ा होता है। मकड़ी अपना जाला स्वयं बुनती है और जब चाहती है उसे समेट कर निगल लेती है। मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता इसी आधार पर कहा जाता है।
चिन्तन से उसे व्यवहारिक जीवन में किस प्रकार उतारा जा सकना सम्भव हो सकता है इस प्रयोग के लिए उसी आश्रम से युग-निर्माण विद्यालय की स्थापना हुई जो विगत दो दशाब्दियों से सफलतापूर्वक चल रहा है। इसमें प्रायः पचास छात्रों का बोर्डिंग तथा विद्यालय है। यह सभी छात्र परिष्कृत जीवन की विद्या में तो प्रवीण-पारंगत होते ही हैं, साथ ही औद्योगिक स्वावलम्बन की ऐसी शिक्षा प्राप्त करते है, जिससे नौकरी तलाश करने की आवश्यकता न पड़े और घर रह कर ही समुचित आजीविका उपार्जन कर सकें। यह सभी शिक्षा निःशुल्क है। केवल भोजन व्यय का अपेक्षाकृत सस्ता व्यय छात्रों को वहन करना पड़ता है।
चिन्तन क्षेत्र का उत्कृष्टता की दिवाला पिट जाने पर सर्वत्र गंदगी छा गई है और उस पर मक्खियाँ भिनक रही है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में शालीनता का समावेश कैसे किया जाय? शान्ति से रहने और रहने देने के लिए क्या उपाय अपनाया जाय? देश, धर्म, समाज, संस्कृति एवं विश्व मानवता की सेवा साधना किस प्रकार बन पड़े? आदि आदि।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-February
चिन्तन की यह भागीरथी अजस्र स्रोतों में प्रवाहित होती हैं।
चिन्तन और रुझान में आमूल-चूल परिवर्तन लाया जाय। यह महान कार्य सामान्य प्रयासों से किसी भी प्रकार संभव नहीं। इसके लिए अन्तःकरण को टटोलने और उसमें ईश्वर प्रदत्त महानता को उभारने की आवश्यकता पड़ेंगी।”
चिन्तन करते ही ऊर्जा और गति का तारतम्य उसके साथ जुड़ा हुआ स्पष्ट होता है। इन्हीं की हमें प्रधानतया समर्थ जीवन के लिए आवश्यकता भी है। बुद्धिमता को भी ज्ञान रूपी प्रकाश में गिना जाता है। यह सारी विशेषताएं सूर्य में सन्निहित मानी जाती है।
चिन्तनधारा का मुकुटमणि वेदान्त एक विचार विज्ञान है जिसमें, वैश्व सत्ता, अपनी वास्तविक प्रकृति एवं मानव के सच्चे स्वरूप को स्पष्ट किया गया है।
चिन्तन की यह धारा उद्घाटित करती है।
चिन्तन धारा की विलक्षणता है। ज्ञान का अवलम्बन लें, अर्थात् विवेक से निर्णित कर अपने स्वधर्म रूप कर्मों को अनासक्त भाव से, भावनापूर्ण हृदय से विराट पुरुष के लिए अर्थात् ‘उसकी अभिव्यक्ति रूप इस विश्व वाटिका को अधिकाधिक सुन्दर, परिष्कृत सुगढ़ बनाने पुष्पित, मंजरित करने में किया जाय तो यह उपासना का सर्वोत्कृष्ट स्वरूप बन सकता है। छोटी-छोटी क्रियाएं भी भावना और विवेक के संयोजन से महत्वपूर्ण बन जाती है। इस प्रकार की उपासना करने के लिए न तो कही पलायन की आवश्यकता है न भागने की। संसार एक रंग-मंच की तरह है।
चिन्तन करना पर्याप्त समझें, जो हमें किसी अनुभूत एवं सुनिश्चित दिशा की ओर ले जाती है।
चिन्तन धारा की गंगोत्री अर्थात् उद्गम स्त्रोत हैं। यहीं से चिन्तन की यह भागीरथी अजस्र स्रोतों में प्रवाहित होती हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में शालीनता का अधिकाधिक समावेश करने के लिए है। दृष्टिकोण का परिष्कार, व्यक्तित्व का निखार और सामाजिक गतिविधियों का सुधार इसी आधार पर बन पड़ना सुगम है कि दृष्टिकोण परिमार्जित किया जाये। मान्यताओं, आस्थाओं आकाँक्षाओं विचारणाओं को इस स्तर का बनाया जाय कि व्यक्ति निजी जीवन में आदर्शवादी और सार्वजनिक जीवन में सेवाभावी बन सके। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिये इन दिनों साम्प्रदायिक प्रचलनों और कर्मकाण्डों की तो धूम है। वे ही सब कुछ बन बैठे हैं।
चिन्तन की यह विधा, तर्क, नैयामिक दृष्टिकोण तथा अनुभूतियों पर आधारित है।
चिन्तन बौद्धों की तरह निषेधात्मक नहीं वरन् विधेयात्मक है। इस चिन्तन को समझकर-अपनाकर पूर्व काल में ऋषियों ने और आधुनिक काल में, सदाशिव ब्रह्मदेव, रामकृष्ण, विवेकानन्द, रामतीर्थ, अभेदानन्द आदि सन्तों ने अपने जीवन का समग्र विकास किया और परम सत्य से एकत्व पा सके।
चिन्तन का सार समाविष्ट है। इसमें अपने आप में पूर्ण समग्रता। वेदों के अन्तिम खण्ड ज्ञान-काण्ड में निहित 208 उपनिषदें ही इस चिन्तन धारा की गंगोत्री अर्थात् उद्गम स्त्रोत हैं। यहीं से चिन्तन की यह भागीरथी अजस्र स्रोतों में प्रवाहित होती हैं।
चिन्तन पुरुषार्थ हेतु प्रेरणा देते हुए निर्देश देता है -
चिन्तन को समझकर-अपनाकर पूर्व काल में ऋषियों ने और आधुनिक काल में, सदाशिव ब्रह्मदेव, रामकृष्ण, विवेकानन्द, रामतीर्थ, अभेदानन्द आदि सन्तों ने अपने जीवन का समग्र विकास किया और परम सत्य से एकत्व पा सके।
चिन्तन उत्कृष्ट ढंग से इस गुत्थी को सुलझाते हुए कहता है - “तत्वमसि” अर्थात् समस्त में वही परम तत्व व्याप्त है। वेदान्त के इस भाव को मानने वाला पड़ोसी को इसलिए नहीं चाहेगा कि उसके ऊपर कोई अहसान कर रहा है अपितु पड़ोसी ही नहीं, सभी के लिए समान रूप से होगा। यही भाव “स्प्रिचुअल वननेस” आध्यात्मिक एकता का केन्द्रीय आधार है। इस दृष्टिकोण को स्वीकार करने वाला किसी को दुःख कष्ट पहुँचाने की तो दूर वह इस बारे में सोचेगा भी नहीं। वेदान्तिक ज्ञान विभिन्न मत मतान्तरों के बीच ही नहीं अपितु वास्तविक धर्म और विज्ञान के सच्चे स्वरूप के बीच समस्वरता व सामंजस्य का स्थापन करता है, जो आज की आवश्यकता है।
चिन्तन क्षेत्र पर आच्छादित रहनी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-September
चिन्तन की उत्कृष्टता, चरित्र की श्रेष्ठता एवं अन्तराल की विशालता के रूप में विकसित व्यक्तित्व की ही परिणति है। जिसे भी इस दिशा में आगे बढ़ना हो, उसके लिए यही एकमात्र राजमार्ग है।
चिन्तन में ओत-प्रोत हो जाने के कारण प्रकृति का संरक्षण
चिन्तन और व्यवहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की उत्कृष्टता ही इस प्रकार की सुखद परिस्थितियाँ उत्पन्न कर रही थी। उनमें सभी चैन से रहें और रहने दे सकें। हँसती-हँसती, खिलती-खिलाती, उठती-उठाती जिन्दगी इस आधार पर बितायी जा सकती है। स्वयं पार उतरना और असंख्यों को अपनी नाव पर बिठाकर पार कराना इसी आधार पर सम्भव हो सकता है। कभी इस देव भूमि में सतयुग था तब समस्त संसार उसका लाभ उठाता था।
चिन्तन और कृत्यों पर निर्भर है। दास-दासियों को वन्य पशुओं की तरह पकड़ने और बेचने वाले अपने पक्ष में अनेकों दार्शनिक दुहाइयाँ देते रहे हैं। वे उसे असभ्यों को सभ्य बनाने का प्रशिक्षण बताते और मानवी सेवा का एक उपयोगी प्रचलन चलाने की बात कहते रहे। दलीलें उनके पास भी कम नहीं थीं।
चिन्तन का ही परिणाम कहा जा सकता हैं। गहराई में उतरने पर धर्म और विज्ञान दोनों ही ऐसे तथ्यों पर आधारित दीखते हैं। जिन पर अविश्वास करने या मिल जुलकर साथ-साथ न चल सकने की आशंका करने का कोई कारण नहीं हैं।
चिन्तनीय ग्रन्थ “ट्रीटाईज ऑन हूमन नेचर” स्कध्न्ध दी के भाग द्वितीय के तीसरे अनुभाग में उल्लेखित करते हुए कहा है कि “ बुद्धि वासनाओं की दासी है।”
चिन्तन अन्य भागों की तरह साँख्य एवं वेदान्त के प्रवर्तक भारत में भी व्यवहार में लाया जा रहा हैं। इसी चिन्तन में ओत-प्रोत हो जाने के कारण प्रकृति का संरक्षण
चिन्तन से दिशा मिल सकती हैं। उनने बताया कि विज्ञान का लक्ष्य वेदान्त में ही हैं भौतिकी विद् वारनर हाइजेन वर्ग ने अपने ग्रन्थ “दि पार्ट एण्ड होल” में इस कथन को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि वैज्ञानिक जगत में इसकी महती आवश्यकता हैं।
चिन्तनवश भूल हो गई हैं, उससे त्राण पा लेन का परम पुरुषार्थ है। मकड़ी अपने लिए जाला अपने भीतर का द्रव निकाल कर स्वयं ही बुनती हैं, स्वयं ही उसमें उलझती और छटपटाती हैं, किन्तु देखा गया हैं कि जब उसमें उमंग उठती है तो उस जाले को समेट बटोर कर स्वयं ही निगल भी जाती हैं। हेय जीवन स्वकृत हैं। जैसा सोचा गया, चाहा गया, माना गया, वैसी ही परिस्थितियाँ बन गई। अब उस बदलने का मन हो तो मान्यताओं आकांक्षाओं और गतिविधियों को उलटने की देर है।
चिन्तन को आदर्श मान कर कार्यान्वित किया जाय तो उचित दिशा−दर्शन के साथ समुचित सफलता मिल सकेगी।
चिन्तन जब संकीर्णता तथा स्वार्थपरता में फस जाता है तो उसे यही यथार्थ व औचित्यपूर्ण भासने लगता है। इसी आभास के कारण विचलित और दिशाहीन बुद्धि तरह-तरह के ऐसे चित्र-विचित्र सिद्धांत गढ़ने प्रारम्भ करती है, जो किए गए कार्यों का समर्थन करें। जे0 बेन्थम प्रिन्सिपल ऑफ मारल्स एण्ड लेजिस्लेशन में ऐसे ही सुखवाद का सिद्धांत प्रतिपादित करते है। उनके अनुसार प्रत्येक वस्तु सुख का साधन मात्र है। सुख ही हमारा स्वाभाविक लक्ष्य हैं, इसे पूरा किया ही जाना चाहिए।
चिन्तन से प्रभावित प्रो. विलियम जेम्स ने कहा था-वैज्ञानिकों को वेदान्त के चिन्तन से दिशा मिल सकती हैं। उनने बताया कि विज्ञान का लक्ष्य वेदान्त में ही हैं भौतिकी विद् वारनर हाइजेन वर्ग ने अपने ग्रन्थ “दि पार्ट एण्ड होल” में इस कथन को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि वैज्ञानिक जगत में इसकी महती आवश्यकता हैं।
चिन्तन मनन में उत्कृष्टता का समावेश करके उस बहुमूल्य सम्पदा को कोष भी अंतरंग सत्ता में स्थापित किया जा सकता हैं। जो अपनी तथा दूसरों की विशेष आवश्यकताओं की पूर्ति में काम आता हैं।
चिन्तन, चरित्र, और व्यवहार में शालीनता जुड़ ही नहीं पाती। दुर्भाग्य से हमारे दर्शन और इतिहास में भी वैज्ञानिक सुख सुविधा, स्वार्थ मुक्ति, सिद्धि, दैव अनुकम्पा आदि की ही विशेष रूप से चर्चा है। सामाजिकता की उपेक्षा जब से की जाने लगी तभी से विगठन अनेक रूपों में प्रकट होते गये। आर्थिक आधार को लेकर अनेकों संगठन बनते हैं। अनाचारी षड़यंत्रों का गिरोह बंदी के आधार पर व्यवसाय चलता हैं।
चिन्तन को असाधारण मोड़ देना पड़ेगा।
चिन्तन का प्रभाव ग्रीक दर्शन पर पड़ने तथा इसका व्यापक प्रसार होने के कारण आध्यात्म की वैज्ञानिकता के कुछ प्रयत्न पश्चिमी चिन्तकों ने भी किए हैं। इसके बारे में दार्शनिक बटेर्रन्ड रसेल ने अपनी पुस्तक “हिस्ट्री ऑफ वेर्स्टन फिलासफी” में बताया है कि पश्चिमी जगत में विज्ञान और दर्शन के समन्वय सामंजस्य का इतिहास पाइथागोरस से आरंभ होता है। सेण्ट आगस्टिन, थामस एक्वीनस, देवर्ति, देकार्ते, स्पिनोजा, लेष्निज ने भी न्याय और तर्क के आधार पर समझाने की कोशिश की है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की कसौटियों पर खरा सिद्ध होना ही वह स्थिति है, जिसे सौ टंच सोना कहते है। पेड़ पर फल-फूल ऊपर से टपक कर नहीं लदते, वरन् जड़ें जमीन से जो रस खींचती हैं उसी से वृक्ष बढ़ता है और फलता-फूलता है। जड़े अपने अन्दर हैं, जो समूचे व्यक्तित्व को प्रभावित करती हैं। इसी प्रखरता के आधार पर वे सिद्धियां-विभूतियाँ प्राप्त होती हैं। जिनके आधार पर अध्यात्मिक महानता और भौतिक प्रगतिशीलता के उभय पक्षीय लाभ मिलते है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-June
चिन्तन के ब्रह्म विद्या प्रकरण में इसी की चर्चा की गई है। इस तरह पारस्परिक तालमेल की आवश्यकता स्पष्ट हो जाती है। यदि ये दोनों परस्पर लड़ने-झगड़ने लगें-एक दूसरे के अस्तित्व को नकारने लगें, अनावश्यक और अप्रामाणिक बताने लगें तब तो यही मानना होगा कि दुःख और दुर्भाग्य ही राहु-केतु के सदृश हमारे चिन्तन क्षेत्र पर ग्रहण की तरह लग गए है।
चिन्तन धाराएँ विज्ञान, मनोविज्ञान व दर्शन क्षेत्र की है। इनमें सर्वाधिक प्रचलित मान्यताएँ तीन तरह की है।
चिन्तन के अभ्यासी इन आलोचक महोदय की पुस्तक के प्रत्युत्तर में प्रख्यात विद्वान तथा यंत्र संगत तर्क देते हुए “क्या भारत सभ्य है” नामक एक पुस्तक प्रकाशित की थी। इसमें उन्होंने कहा है कि रोमन सम्राट नीरों जिसने अपनी सगी माँ अग्रिप्पिना को भी अपनी कुदृष्टि से नहीं बख्शा, को वीर पुरुष का ताज पहनाने वाले विचारकों को मर्यादा पुरुषोत्तम राम तथा मातृवत् परदारेषु की संस्कृति अच्छी न लगे यह स्वाभाविक ही है। अपनी सम्यता पर घमण्ड रखने वाले आर्चर की पोल आइवन ब्लाक की पुस्तक इन बानब्रूट-बेस्टफार वर्जिन्स, के पृष्ठ उलटने से खुल जाती है। यह स्पष्ट हो जाता है कि एक औसत यूरोपियन कितना सभ्य है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की अवधारणा रखने वाले परिश्रमी पुरुषार्थी रहें होंगे। नीति, नियमों को कठोरता पूर्वक अपनाते होंगे। संयम अपनाते और उदात्त सेवा साधना में निरत रहते हुए सहकारी जीवन जीते होंगे। यह प्रयोग तो अभी भी किया जा सकता हैं कि सज्जनों का समुदाय सद्भाव पूर्वक जहाँ रहेगा। मर्यादाओं का पालन करने और वर्जनाओं से बचने की रीति अपनायेगा वहाँ स्वल्प साधनों में प्रसन्न रहने और प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने चलने की स्थिति बनती और टिकती रहेगी।
चिन्तन क्षेत्र पर ग्रहण की तरह लग गए है।
चिन्तन का जो उद्विग्न करने वाला प्रवाह चल रहा हो उसे उलट देने वाले दूसरे हल्की फुलकी विचारधारा का आश्रय लेना ही उपयुक्त है।
चिन्तन हो या कर्म दोनों ही इससे अछूते नहीं सही माने में इसके विचार भारतीय संस्कृति के पुनुरुन्नयन नव जाग्रति के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक शक्ति के रूप में भूमिका निबाहते आ रहे है और निबाह रहे है। एक प्रख्यात चिन्तक ने तो यहाँ तक कहा है कि आध्यात्मिक जीवन के लिए हमें जिन किन्हीं भी आध्यात्मिक सत्यों की आवश्यकता है वे सभी गीता में उपलब्ध हो सकते है। सम्भव है किसी को यह अविश्वासपूर्ण लगे। तथापि यह कहना किसी भी तरह अतिरंजित नहीं कि अधिकाँश सार्वभौम सूत्र इसमें समावेशित है। यही कारण है कि यह भारतवर्ष की ही सीमा में आबद्ध नहीं है।
चिन्तन की विविध धाराओं के पण्डितों-मनीषियों ने विविध समाधान भी प्रस्तुत किए है।
चिन्तन को जी भर गालियाँ भी दी है।
चिन्तन प्रक्रिया द्वारा उसकी दिशा उलटी जा सकती है और नई आदतों से उसे अभ्यस्त कराया जा सकता है। तिलचट्टे एवं बिल्ली-चूहों पर वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा उनके मस्तिष्कीय न्यूरोन्स की सिनेप्टिक हलचलों में हेर-फेर कर मानसिक स्तर पर फेर बदल करके दूसरी तरह सोचने के लिए विवश करने में उन्होंने काफी सफलता पाई है। इस प्रयोग में बिल्ली और चूहे अपनी परम्परागत दुश्मनी भूलकर साथ-साथ हिलमिल कर रहने लगे।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार इसी स्तर का किया। यह मान्यता उस विश्वास को उलटती है जिसमें .... जाता है। कि दुनिया में बुराइयाँ ही बढ़ गई है। आदर्श वातावरण अधिक स्थानों पर दृष्टिगोचर होने से दर्शक के अचेतन में एक मान्यता जमती है कि वस्तुतः युग परिवर्तन की हवा बनने और बहने लगी है। यह एक बहुत बड़ी बात है।
चिन्तन का ढाँचा ढह जाएगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-April
चिन्तन प्रवाह को अवांछनीयता से विरत करके, वाँछनीयता के साथ जोड़ देने वाले कार्य को कोई एक व्यक्ति न कर सकेगा पर इस तथ्य पर अविश्वास नहीं करना चाहिए कि ऐसे अवसर भूतकाल में भी अनेकों बार आये है और जब मनुष्य निराश होने लगे है तब उनमें नये सिरे से नई हिम्मत भरने के लिए प्रभात काल के अरुणोदय की तह नये तूफानी प्रवाह उदय होते रहे हैं जिनके लिए बड़ी से बड़ी उथल पुथल भी असंभव नहीं होती।
चिन्तन की मशीन गड़बड़ा जाने से ही यह अनेक प्रकार की अवांछनीय समस्यायें उत्पन्न हुई है।
चिन्तन का रुझान उसी ओर जाता दिखाई देता है सब जानते है कि स्वच्छता का समुचित प्रबन्ध न किया जाने पर ही सड़न से मक्खी मच्छर पैदा होते बीमारी फैलती है लाखों उपचार के बावजूद ढीठ मच्छर अपना उत्पाद वैसा ही फैलाता ही दिखाई देते है वे मलेरिया छः जैसे रोग आधुनिकतम चिकित्सा साधनों के बावजूद साधन सम्पन्न देशों में दिखाई दे रहे है। वस्तुतः प्रत्यक्ष उपचार सब कुछ नहीं है गंदगी नमी का निराकरण होने पर (खाली) का अभिवर्धन करने हेतु युग ऋषि द्वारा एक सौ आठ अश्वमेधों का शृंखला चलाई गई है जिसका प्रथम चरण आगामी जुलाई माह के शिकागो (यू. एस. ए.) अश्वमेध (28,29,30,जुलाई 95) में समाप्त हो अपनी प्रथम पूर्णाहुति द्वारा नवम्बर में एक कड़ी के रूप में समाप्त होगा इसी के साथ साथ आगामी शृंखला के वर्ष के बाद प्रारम्भ होने तक तथा अब से आँवलखेड़ा पूर्णाहुति तक घर घर तक गायत्री महाशक्ति की स्थापना का आस्तिकता के बीजारोपण का सूक्ष्म जगत के अनुकूलन के नियमित शब्द शक्ति के प्रयोगों का क्रम अनवरत चलता रहेगा दीपयज्ञों-छोटे कुण्डीय यज्ञ संस्कार महोत्सव की शृंखला इस ऊर्जा के विस्तरण की प्रक्रिया पूरी करेगी। सामूहिक विपत्ति टालने के लिए इन दिनों इससे कम में काम नहीं चल सकता है।
चिन्तन की विलक्षण फौज न जाने ब्रह्माण्ड के किस कोने से दौड़ती आती चली जाती है और बादलों की तरह आच्छादित हो बरसने लगती है।
चिन्तन बढ़ा दिया मेरी आत्मा बढ़ा दी आस्थायें बढ़ा दी आत्मज्ञान बढ़ा दिया मेरी सामर्थ्य बढ़ा दी। हमारा मन था कि आप लोगों को बुलाकर आपकी भी ऐसी ही कुण्डलिनी जगा पाऊँ तो कितना अच्छा। मालूम नहीं मेरे सौभाग्य में वैसा कुछ सुयोग है कि नहीं जैसा कि मेरे गुरुजी में था।
चिन्तन परक कह सकते हैं। सोचने की मशीन गड़बड़ा जाने से कैसे कैसे विचित्र आचरण बन पड़ते हैं उसके आश्चर्यजनक कौतूहल आये दिन सामने आते रहते है। सोते समय आदमी इतना बेखबर हो जाता है कि लज्जा ढँकने के कपड़े उतर जाने तक का ध्यान नहीं रहता।
चिन्तन धाराओं पर अब क्यों ढेर सारे सवालिया निशान लग गए?
चिन्तन उत्कर्ष का ही कारण बनता है भारतीय धर्म में देवियों की प्रतिमायें युवा और अति सुन्दर नारियों के रूप में ही बनाई गई है लक्ष्मी दुर्गा सरस्वती गायत्री सावित्री आदि की अति सुन्दर ओर सुसज्जित युवती के कलेवर में ही विनिर्मित हुई होंगी। उनके अंगों में उभार ही रखें गये है। इसलिये कि साधक नारी के इस स्तर के रूप में भी श्रद्धा और पवित्रता का समुचित समावेश कर सके। यदि हम इस रूप में नारी को देवी मान पवित्रता का अभिवर्धन करते रहें तो हमारी साधना सफल सार्थक बन सकती है।
चिन्तन, प्रक्रिया और कर्म पद्धति को प्रभावित करता है। समाज संस्कृति, चरित्र, संयम, सेवा, पुण्य, परमार्थ आदि सत्प्रवृत्तियों को अपनाने से व्यक्ति की भौतिक सुख सुविधाओं में निश्चित रूप से कमी आती हैं। भले ही उस बचत का उपयोग लोक कल्याण में कितनी ही अच्छाई के साथ क्यों न होता हो। आदर्शवादिता के मार्ग पर चलते हुए जो प्रत्यक्ष क्षति होती है उसकी पूर्ति ईश्वरवादी स्वर्ग, मुक्ति, ईश्वरीय प्रसन्नता आदि विश्वासों के आधार कार्य करने के आकर्षण सामने आने पर वह ईश्वर के दण्ड से डरता है। नास्तिकवादी के लिए न तो पाप के दण्ड से डरने की जरूरत रह जाती है और न पुण्य परमार्थ का कुछ आकर्षण रहता है।
चिन्तन और चरित्र जिस स्तर का था, उसे बदल दे। अगर आपके अंतरंग वाला हिस्सा बदल जाय तो मजा आ जाय। अभी तो आपके मन के ऊपर एक ऐसी छाप जम गई है एक ऐसा संस्कार जम गया है कि आप अपने को शरीर मानते है। छोटा आदमी बीमार आदमी कंगाल या अमीर मानते है। अभी तो आप शरीर को मान्यता देते है।
चिन्तन से प्रेरित हुआ समाज स्वयं को ऐसी प्रयोगशाला के रूप विकसित करें जहाँ सभी सुविकसित और सुव्यवस्थित हो रह सकें। नए युग की इस विचार पद्धति में जहाँ प्रचलित दर्शन अपनी पूर्णता खोज सकते है। समाधान तलाशे जा सकते है।
चिन्तन की वह यज्ञ की सत्कर्म की प्रेरणा पहुँचा कर उज्ज्वल भविष्य की स्थापना हेतु संस्कारों का घर घर अभिवर्धन करने की एक अस्त्र के रूप में प्रयुक्त कर इससे वातावरण में छायी विक्षिप्तता, चारित्रिक पतन वाली मानसिकता घुटन पैदा करने वाली अनास्था कि विभीषिका से मोर्चा लेने के लिए वह वातावरण निर्मित किया जा रहा है जिससे श्रेष्ठ विचारों से दुश्चिंतन की काट सम्भव हो सके युग शक्ति गायत्री के अवतरण यही मूल परिजन है इसे इस युग की जागृत आत्माओं को समागत वातावरण बनाकर पूरा करना ही पड़ेगा, चाहे इसमें उन्हें अपनी सम्पूर्ण शक्ति क्यों न झोंक देनी पड़े
चिन्तन करना चाहिए क्या? जप के साथ वस्तुतः ध्यान करना चाहिए। अर्थ चिन्तन के साथ जप करने में व्यवहारिक कठिनाई यह है कि शब्दार्थ के कल्पना चित्र मस्तिष्क में बनाते हुये देर लगती है इतनी देर जप को रोका नहीं जा सकता। उसका प्रवाह रुकना नहीं चाहिए। वह “तैल धारवत्” अविरल चलना चाहिए।
चिन्तन अपनाना होगा। इसके सत्परिणाम मानवी विकास के अनेकानेक सोपानों के रूप में हस्तगत होते रह सकते है यही युगानुकूल भी है।
चिन्तन प्रणालियों की छान बीन करें। आखिरकार अपने समय में नितान्त मूल्यवान समझी जाने वाली इन चिन्तन धाराओं पर अब क्यों ढेर सारे सवालिया निशान लग गए?
चिन्तन कर सके सोचे जब हम शरीर से बाहर निकल जाते हैं और ऊँचाई पर मीनार पर पहाड़ पर जाकर बैठ जाते है वहीं से आपको देखते रहे कि हमारा वह मरा हुआ शरीर पड़ा हुआ है और हम उससे अलग बैठे है हमारे हित अलग है और आत्मा की अपनी अभी तो सब गुड गोबर कर रखा है आपने जो किसी काम का नहीं है।
चिन्तन और भ्रष्ट आचरण पर ही उतारू रहता है मनुष्यता समय समय पर ऐसी आश्चर्य जनक करवटें लेती रही है, जिसके अनुसार देव मानवों का नया वसन्त नये कोपलें नये खेत और नये फल फूलों की सम्पदा लेकर सभी दिशाओं में अट्टहास करता दीख पड़ता रहा है महामानवों देव पुरुषों मनीषियों सुधारकों सृजेताओं का ऐसा उत्पादन होता रहा है मानो वर्षा ऋतु में अगणित वनस्पतियों और जीव जंतुओं की नई फसल उगाने की सौगन्ध खाई हो। अगले ही दिनों आने वाले दशक में नये सृजेताओं की एक नई पीढ़ी ऐसी विकसित होगी जिसके सामने अब तक के सभी संतों सुधारकों और शहीदों के पुरुषार्थ छोटे पड़ जायेंगे ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए।
चिन्तन के साथ जप करने में व्यवहारिक कठिनाई यह है कि शब्दार्थ के कल्पना चित्र मस्तिष्क में बनाते हुये देर लगती है इतनी देर जप को रोका नहीं जा सकता। उसका प्रवाह रुकना नहीं चाहिए। वह “तैल धारवत्” अविरल चलना चाहिए। गायत्री मंत्र का अर्थ भली-भाँति समझ तो लेना ही चाहिए मस्तिष्क में शब्दों के तात्पर्य के कल्पना चित्र बनाने हों तो वह कार्य किसी सुविधा के समय विस्तारपूर्वक करना चाहिए। जप के साथ नहीं।
चिन्तन और कर्तृत्व की एक रीति नियम के अंतर्गत बहुत हद तक जकड़े रहने में सफल होती है। इन दार्शनिक बंधनों को उठा लिया जाय तो मनुष्य की पशुता कितनी उद्धत हो सकती है और उसका दुष्परिणाम किस प्रकार समस्त संसार को भुगतना पड़ सकता है। इसकी कल्पना भी कँपा देने वाली है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-November
चिन्तन का ऐसा क्रम बनाया जाय जिससे उस दिशा में चलने के सत्परिणामों के सम्बन्ध में तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरणों के आधार गायत्री उपासना के लिए श्रम करने की सार्थकता पर श्रद्धा और विश्वास गहरा होता चला जाय।
चिन्तन में अप्रासंगिक विक्षेपों में कितनी ही-कितने ही प्रकार की कल्पनाएँ-विवेचनाएँ करते रहने की पूरी-पूरी छूट है।
चिन्तन की गलने वाली अन्तःस्फुरणा अथवा दबाव भरी परिस्थितियाँ होनी चाहिये। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए यह सोचा जाने लगा है कि माता-पिता का स्वर सुधारे बिना सुसन्तति की समस्या प्रयोगशालाओं द्वारा न हो सकेगी।
चिन्तन अपनी निर्धारित दिशा धारा में ही सीमित रहता है। इतने भर में एकाग्रता का प्रयोजन पूरा हो जाता है। यद्यपि इस प्रकार के बौद्धिक पुरुषार्थों में मन और बुद्धि को असाधारण रूप में गतिशील रहना पड़ता है। और कल्पनाओं को अत्यधिक सक्रिय करना पड़ता है तो भी उसे चंचलता नहीं कहा जाता है। अपनी निर्धारित परिधि में रहकर कितना ही द्रुतगामी चिन्तन क्यों न किया जाय, कितनी ही कल्पनायें, कितनी ही स्मृतियाँ, कितनी ही विवेचनाएँ क्यों न उभर हरी हो वे एकाग्रता की स्थिति में तनिक भी विक्षेप उत्पन्न नहीं करेगी।
चिन्तन का गहरा पुट रहने पर ही आत्मिक भूमिका में हलचलें होती है और प्रगति का सरंजाम जुटाता है। यदि मन इष्ट पर जमे नहीं और मात्र उच्चारण का श्रम चलता रहे तो उसका भी लाभ तो मिलेगा पर इतना स्वल्प होगा जिससे अभीष्ट सत्परिणाम की अपेक्षा पूरी न हो सकेगी। अस्तु यह मानकर चलना चाहिए कि उपासना कृत्य में मनोयोग पर लगाया जाना नितान्त आवश्यक है।
चिन्तन हो रहा हो तो अनेक व्यक्तियों का समुदाय भी एक साथ मिल बैठकर एकाग्रता का अभ्यास भली प्रकार कर सकता है। नितान्त एकान्त में बैठना वैज्ञानिक, तात्त्विक शोध अन्वेषण के लिए आवश्यक हो सकता है, उपासना के सामान्य संदर्भ में एकान्त ढूँढ़ते फिरने की ही कोई खास आवश्यकता नहीं है। सामूहिकता के वातावरण में ध्यान धारणा और भी अच्छी तरह बन पड़ती है। सेना का सामूहिक कार्य-साथ-साथ कदम मिलाकर चलना-सैनिकों में से किसी भी ध्यान नहीं बटाना वरन् साथ-साथ चलने की पग ध्वनि के प्रवाह में हर एक के पैर ओर भी अच्छी तरह अपने आप नियत क्रम से उठते चले जाते हैं। सहगमन से पग क्रम को ठीक रखने में बाधा नहीं पड़ती वरन् सहायता ही मिलती है।
चिन्तन क्यों न किया जाय, कितनी ही कल्पनायें, कितनी ही स्मृतियाँ, कितनी ही विवेचनाएँ क्यों न उभर हरी हो वे एकाग्रता की स्थिति में तनिक भी विक्षेप उत्पन्न नहीं करेगी। गड़बड़ तो अप्रासंगिकता में उत्पन्न होती है। बेतुका-वे सिलसिले का-अप्रासंगिक-अनावश्यक चिन्तन ही विक्षेप करना है। एक बेसुरा वादन पूरे आरकेस्ट्र के ध्वनि प्रवाह को गड़बड़ा देता है ठीक इसी प्रकार चिन्तन में अप्रासंगिक विक्षेपों में कितनी ही-कितने ही प्रकार की कल्पनाएँ-विवेचनाएँ करते रहने की पूरी-पूरी छूट है।
चिन्तन की बातें करो तो मुझे अच्छा लगेगा। राजनीति के मील के पत्थर बहुत पीछे छूट गये। व्यर्थ की माथा-पच्ची से क्या लाभ? व्यर्थ से तो सार्थक चिन्तन सब तरह श्रेष्ठ और हितकर है।
चिन्तन सब तरह श्रेष्ठ और हितकर है।
चिन्तन, कुकल्पनाओं, से इस बढ़ावा मिलता है। उज्ज्वल, भविष्य की कल्पना करने, उसके सरंजाम जुटाने में जो परिश्रमी संलग्न रहते हैं उन्हें ऐसी कुकल्पना करने की फुरसत नहीं होती। अतः अपने लिए न सही दूसरों के लिए ही कुछ करते रहने का अभ्यास बनाना चाहिए। दूरदर्शी विवेक शीलता अपनाकर भय से मुक्ति पाने का प्रयास करना चाहिए।
चिन्तन आत्मा का स्वरूप, क्षेत्र, लक्ष्य समझाने में लगना चाहिए और यह प्रयास रहना चाहिए कि ब्राह्मी चेतना के गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर आत्मा की बहुमूल्य रत्नराशि संग्रह करने का अवसर मिले। उपासना का लक्ष्य स्थिर हो जाने पर उस समय जो विचार प्रवाह अपनाया जाना आवश्यक है उसे पकड़ सकना कुछ कठिन न रह जाएगा।
चिन्तन सिमटकर स्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो जाना।
चिन्तन को ही नहीं बिगाड़ लेता वरन् स्वास्थ्य पर भी बिगाड़ लेता वरन् स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
चिन्तन की दिशाधारा है। उपासना के समय सारा चिन्तन आत्मा का स्वरूप, क्षेत्र, लक्ष्य समझाने में लगना चाहिए और यह प्रयास रहना चाहिए कि ब्राह्मी चेतना के गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर आत्मा की बहुमूल्य रत्नराशि संग्रह करने का अवसर मिले। उपासना का लक्ष्य स्थिर हो जाने पर उस समय जो विचार प्रवाह अपनाया जाना आवश्यक है उसे पकड़ सकना कुछ कठिन न रह जाएगा।
चिन्तन तत्व में उत्कृष्टता भरने की आवश्यकता यांत्रिक गुण सूत्रों में हेर -फेर करके तत्काल जिस नई पीढ़ी कस वचन इन दिनों देखा जा रहा है उसे म्यूटेशन -आकस्मिक परिवर्तन प्रक्रिया कहा जा सकता है मयूटेशन के संदर्भ में पिछले दिनों पैवलब मैकडूगल, मारगन, मुलर, प्रकुति जीन वानियों ने अनेक माध्यमों ओर उपकरणों से विविध प्रयोग किये हैं जनन रस को प्रभावित करने वाली उनने घुतीय ओर रासायनिक उपाय अपनाये सोचा यह गया था कि उससे अभीष्ट शारीरिक ओर मानसिक क्षमता संपन्न होगी पर उनसे मात्र शरीर की दूर दृष्टि थोड़ा हेर फेर हुआ विशेषतया
चिन्तन से हटा कर उपयोगी दिशा में चलाने की क्षमता प्राप्त रही है। इसके बिना चंचलता की वानर वृत्ति से ग्रसित व्यक्ति न किसी प्रसंग पर गहराई के साथ सोच सकता है। और न किसी कार्यक्रम पर देर तक स्थिर रह सकता है। शिल्प, कला, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, व्यवस्था आदि महत्वपूर्ण सभी प्रयोजनों की सफलता में एकाग्रता की शक्ति ही प्रधान भूमिका निभाती है। चंचलता को तो असफलता की सगी-बहिन माना जाता है।
चिन्तन करके अध्यात्म और धर्म का अति महत्वपूर्ण कलेवर खड़ा किया है। उसे जन-मानस में प्रविष्ट कराने के लिए अगणित साधु ब्राह्मणों ने तिल-तिल करे अपनी जीवन जलाया है अगणित धर्म, ग्रन्थ लिखे गये हैं और उन्हें पढ़ने, सुनने, समझने तथा हृदयंगम करने की स्थिति उत्पन्न करने के लिये अगणित मानवतावादी परम्पराओं, या रीति-रिवाजों प्रक्रियाओं, पूजा-पद्धतियों एवं कर्मकाण्डों का प्रचलन किया है लगातार उस विचार-धारा से संपर्क बनाये रखने के लिए उन्होंने धर्म एवं अध्यात्म का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया है।
चिन्तन ही विक्षेप करना है। एक बेसुरा वादन पूरे आरकेस्ट्र के ध्वनि प्रवाह को गड़बड़ा देता है ठीक इसी प्रकार चिन्तन में अप्रासंगिक विक्षेपों में कितनी ही-कितने ही प्रकार की कल्पनाएँ-विवेचनाएँ करते रहने की पूरी-पूरी छूट है।
चिन्तन पर नियन्त्रण स्थगित करने में सफल न हो सके तो समझना चाहिए कि आयु बढ़ जाने पर भी उसका मानसिक स्तर बालकों जैसा ही बना हुआ है। ऐसे लोगों का भविष्य उत्साहवर्धक नहीं हो सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-July
चिन्तन कहेगा, नहीं-नहीं-नहीं आत्मा इतना हेय और हीन नहीं हो सकता। वह इतना अपंग और असमर्थ-पराश्रित और दुर्बल कैसे होगा? यह तो प्रकृति के पराधीन पेड़-पौधों जैसा मक्खी मच्छरों जैसा जीवन हुआ। क्या इसी को लेकर मात्र जीने के लिये जीना। सो भी जीना ऐसा जिसमें न चेन, न खुशी, न शान्ति, न आनन्द, न संतोष।
चिन्तन का बूरा असर पड़ता तो है जब उस उत्पन्न विकृत को शोधने और सुधारने की बारी आती है तो मात्र दृष्टिकोण का परिष्कार ही पर्याप्त नहीं होता जैसा कि पश्चिम के मनोविज्ञानी अब मानने लगे है कि विचार तंत्र को सही कर लेने मात्र से विकृतियों का उन्मूलन संभव है पर भारतीय अध्यात्म इससे भी गहराई में उतर कर समाधान ढूँढ़ता और कहता है कि जब तक अन्तःचेतना के उस उद्गम उत्सव का स्पर्श नहीं कर लिया जाय, जिसे साधना क्षेत्र में आस्था श्रद्धा भावना आकांक्षा के नाम से पुकारा जाता है तब तक बनने वाली नहीं इन दिनों इसके अनेक उदाहरण भी देखें जाते है कई बार रोगी को अच्छी से अच्छी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के बावजूद भी परिणाम निराशा जनक सामने आता है और उसकी स्थिति ज्यों की त्यों बनी रहती है पर जब मरीज की आस्था चिकित्सक के प्रति इस स्तर तक सुदृढ़ बना दी जाती है कि उसे गहन विश्वास हो चलता है कि उक्त डॉक्टर का उपचार उसे अवश्य ठीक कर देगा तो दावा के स्थान पर प्लेसिबो (चीनी की गोली) का प्रयोग भी उसे ठीक करने लगता है और बीमार शीघ्रता से स्वास्थ्य लाभ करता दिखाई पड़ने लगता है यह दवा नहीं श्रद्धा की परिणति है जिसका चमत्कारी परिणाम, जादुई असर प्रस्तुत करता है।
चिन्तन तंत्र का सही उपयोग कर सकने की क्षमता भी सर्वसाधारण में उत्पन्न की जाय। इसके लिये मानसिक परीक्षा की एक समर्थ प्रणाली खड़ी की जानी चाहिये। इसके बिना आत्महत्या जैसे व्यापक संकट उत्पन्न करने वाले मनोरोगों का भड़कता हुआ दावानल रोका न जा सकेगा।
चिन्तन की ओर है। इससे स्पष्ट है कि बुरे चिन्तन के बुरे प्रभाव से सूक्ष्म संस्थान भी सर्वथा अप्रभावित नहीं रहते यह पाश्चात्य दृष्टिकोण है। प्राच्य चिन्तन के मतानुसार बुरे चिन्तन का बूरा असर पड़ता तो है जब उस उत्पन्न विकृत को शोधने और सुधारने की बारी आती है तो मात्र दृष्टिकोण का परिष्कार ही पर्याप्त नहीं होता जैसा कि पश्चिम के मनोविज्ञानी अब मानने लगे है कि विचार तंत्र को सही कर लेने मात्र से विकृतियों का उन्मूलन संभव है पर भारतीय अध्यात्म इससे भी गहराई में उतर कर समाधान ढूँढ़ता और कहता है कि जब तक अन्तःचेतना के उस उद्गम उत्सव का स्पर्श नहीं कर लिया जाय, जिसे साधना क्षेत्र में आस्था श्रद्धा भावना आकांक्षा के नाम से पुकारा जाता है तब तक बनने वाली नहीं इन दिनों इसके अनेक उदाहरण भी देखें जाते है कई बार रोगी को अच्छी से अच्छी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के बावजूद भी परिणाम निराशा जनक सामने आता है और उसकी स्थिति ज्यों की त्यों बनी रहती है पर जब मरीज की आस्था चिकित्सक के प्रति इस स्तर तक सुदृढ़ बना दी जाती है कि उसे गहन विश्वास हो चलता है कि उक्त डॉक्टर का उपचार उसे अवश्य ठीक कर देगा तो दावा के स्थान पर प्लेसिबो (चीनी की गोली) का प्रयोग भी उसे ठीक करने लगता है और बीमार शीघ्रता से स्वास्थ्य लाभ करता दिखाई पड़ने लगता है यह दवा नहीं श्रद्धा की परिणति है जिसका चमत्कारी परिणाम, जादुई असर प्रस्तुत करता है।
चिन्तन, आदर्शवादी विचारधारा सूक्ष्म शरीर को तेजस्वी व प्रखर बनाती है और उसका श्रेष्ठ प्रभाव भी स्थूल शरीर पर स्पष्ट देखा जा सकता है। विज्ञान और मनोविज्ञान के क्षेत्र में पिछले दिनों इस सम्बन्ध में अनेकानेक प्रयोग किये गये। उनसे इस संदर्भ में किसी प्रकार की शंका की गुँजाइश एकदम समाप्त हो गई कि चिन्तन का तदनुरूप प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता।
चिन्तन का तदनुरूप प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता।
चिन्तन द्वारा किये गये आत्म निरीक्षण और आत्मा-निर्माण में सन्निहित है। इसी कारण चिन्तन की अनगढ़ता न सिर्फ स्थूल अंगों को प्रभावित करती है, अपितु सूक्ष्म अवयवों पर भी अपना असर डाले बिना नहीं रहती।
चिन्तन में धनोपार्जन की छूट तो है, पर धन संग्रह पर रोक लगायी गई है। यदि यह बात सही है कि वर्तमान मानसिक अस्वस्थता की जड़ में सम्पदा की प्रधान भूमिका है, तो अर्थवेत्ताओं, तत्वज्ञानियों और समाजशास्त्रियों को मिलजुल कर कोई ऐसा हल वर्तमान संदर्भ में ढूँढ़ना चाहिए जिससे समाज भी सम्पन्न बना रहे और मनुष्य भी मानसिक दृष्टि से
चिन्तन की अनगढ़ता न सिर्फ स्थूल अंगों को प्रभावित करती है, अपितु सूक्ष्म अवयवों पर भी अपना असर डाले बिना नहीं रहती।
चिन्तन, सूक्ष्म शरीर की विकृतियाँ हैं, जिनका स्थूल शरीर पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार परिष्कृत दृष्टिकोण, स्वस्थ-उदात्त चिन्तन, आदर्शवादी विचारधारा सूक्ष्म शरीर को तेजस्वी व प्रखर बनाती है और उसका श्रेष्ठ प्रभाव भी स्थूल शरीर पर स्पष्ट देखा जा सकता है। विज्ञान और मनोविज्ञान के क्षेत्र में पिछले दिनों इस सम्बन्ध में अनेकानेक प्रयोग किये गये। उनसे इस संदर्भ में किसी प्रकार की शंका की गुँजाइश एकदम समाप्त हो गई कि चिन्तन का तदनुरूप प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता।
चिन्तन से अपने धनी बनने की उलटी-सीधी कल्पनाएँ तो कर लेता है, पर उस अनुचित तरीके से समाज को कितना अहित होगा इस पर विचार नहीं करता। वह सिर्फ प्रीतिकर की बात सोचता है और हितकर की उपेक्षा कर देता है। यदि प्रीतिकर एवं हितकर दोनों को ध्यान में रखे, तो शायद वह स्वार्थ को त्याग देगा, क्योंकि स्वार्थवश जो प्रीतिकर लगता है, वह हितकर नहीं होता-इसे वह तब भली-भाँति समझ जायेगा। मार्क्स और केनिज-इन दोनों का एक ही लक्ष्य रहा अर्थ लाभ, सुख एवं संतुष्टि। इतना धन हो जाय कि गरीबी मिट जाय और सुख मिले, किन्तु उस सुख के साथ जो कुछ आ रहा है, उस पर विचार नहीं किया।
चिन्तन कहेगा नहीं नहीं आत्मा इतना हेय और हीन नहीं हो सकता वह इतना अपंग और असमर्थ पराश्रित और दुर्बल कैसे होगा? यह तो प्रकृति के पराधीन पेड़ पौधों जैसा मक्खी मच्छरों जैसा जीवन हुआ। क्या इसी को लेकर मात्र. जीने के जन्मा सो भी जीना ऐसा जिसमें न चैन न खुशी न शान्ति न आनन्द न संतोष यदि आत्मा सचमुच परमात्मा का अंश है तो वह ऐसी हेय स्थिति में पड़ा रहने वाला नहीं हो सकता। या तो मैं ही हूँ नहीं नास्तिकों के प्रतिपादन के अनुसार या तो पाँच तत्वों के प्रवाह में एक भंवर जैसी बबूले जैसी क्षणिक काया लेकर उपज पड़ा हूँ और अगले ही क्षण अभाव के विस्मृति गर्त में समा जाने वाला हूँ या फिर कुछ हूँ तो इतना तुच्छ और अपंग हूँ जिसमें उल्लास और सन्तोष जैसा कोई तत्व नहीं है यदि में शरीर हूँ तो हेय हूँ अपने लिए और विकृत चिन्तन की ओर है। इससे स्पष्ट है कि बुरे चिन्तन के बुरे प्रभाव से सूक्ष्म संस्थान भी सर्वथा अप्रभावित नहीं रहते यह पाश्चात्य दृष्टिकोण है।
चिन्तन के बुरे प्रभाव से सूक्ष्म संस्थान भी सर्वथा अप्रभावित नहीं रहते यह पाश्चात्य दृष्टिकोण है। प्राच्य चिन्तन के मतानुसार बुरे चिन्तन का बूरा असर पड़ता तो है जब उस उत्पन्न विकृत को शोधने और सुधारने की बारी आती है तो मात्र दृष्टिकोण का परिष्कार ही पर्याप्त नहीं होता जैसा कि पश्चिम के मनोविज्ञानी अब मानने लगे है कि विचार तंत्र को सही कर लेने मात्र से विकृतियों का उन्मूलन संभव है पर भारतीय अध्यात्म इससे भी गहराई में उतर कर समाधान ढूँढ़ता और कहता है कि जब तक अन्तःचेतना के उस उद्गम उत्सव का स्पर्श नहीं कर लिया जाय, जिसे साधना क्षेत्र में आस्था श्रद्धा भावना आकांक्षा के नाम से पुकारा जाता है तब तक बनने वाली नहीं इन दिनों इसके अनेक उदाहरण भी देखें जाते है कई बार रोगी को अच्छी से अच्छी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के बावजूद भी परिणाम निराशा जनक सामने आता है और उसकी स्थिति ज्यों की त्यों बनी रहती है पर जब मरीज की आस्था चिकित्सक के प्रति इस स्तर तक सुदृढ़ बना दी जाती है कि उसे गहन विश्वास हो चलता है कि उक्त डॉक्टर का उपचार उसे अवश्य ठीक कर देगा तो दावा के स्थान पर प्लेसिबो (चीनी की गोली) का प्रयोग भी उसे ठीक करने लगता है और बीमार शीघ्रता से स्वास्थ्य लाभ करता दिखाई पड़ने लगता है यह दवा नहीं श्रद्धा की परिणति है जिसका चमत्कारी परिणाम, जादुई असर प्रस्तुत करता है।
चिन्तन किया, पर शेष आधी प्रकृति को अस्वीकार दिया। मूलभूत गलती यहीं हुई।
चिन्तन में उतरते, तो शायद उनकी सुख की अवधारणा भी बदल जाती और अध्यात्मवादी दर्शन को स्पर्श करने पर एक ऐसे अर्थशास्त्र का सृजन होता, जिसमें पदार्थपरक और आत्मपरक दोनों प्रकार की प्रगति की पूरी-पूरी संभावना रहती और जिसे आज के जमाने के उपयुक्त और आदर्शयुक्त अर्थशास्त्र कहा जा सकता था।
चिन्तन से ही संभव है। उसका कहना है कि ऐसी दशा में व्यक्ति और समाज दोनों पर साथ-साथ विचार हो, तभी समस्या का हल निकल सकता हे। अभी व्यक्ति एकांगी चिन्तन से अपने धनी बनने की उलटी-सीधी कल्पनाएँ तो कर लेता है, पर उस अनुचित तरीके से समाज को कितना अहित होगा इस पर विचार नहीं करता। वह सिर्फ प्रीतिकर की बात सोचता है और हितकर की उपेक्षा कर देता है। यदि प्रीतिकर एवं हितकर दोनों को ध्यान में रखे, तो शायद वह स्वार्थ को त्याग देगा, क्योंकि स्वार्थवश जो प्रीतिकर लगता है, वह हितकर नहीं होता-इसे वह तब भली-भाँति समझ जायेगा।
चिन्तन, वातावरण तर्क, वितर्क, नशा एवं रसायन जैसे तत्वों से इसे प्रभावित-उत्तेजित किया जा सकता है। मनोविज्ञान के माध्यम से इसे ही परिष्कृत संतुलित किया जाता है।
चिन्तन के मतानुसार बुरे चिन्तन का बूरा असर पड़ता तो है जब उस उत्पन्न विकृत को शोधने और सुधारने की बारी आती है तो मात्र दृष्टिकोण का परिष्कार ही पर्याप्त नहीं होता जैसा कि पश्चिम के मनोविज्ञानी अब मानने लगे है कि विचार तंत्र को सही कर लेने मात्र से विकृतियों का उन्मूलन संभव है पर भारतीय अध्यात्म इससे भी गहराई में उतर कर समाधान ढूँढ़ता और कहता है कि जब तक अन्तःचेतना के उस उद्गम उत्सव का स्पर्श नहीं कर लिया जाय, जिसे साधना क्षेत्र में आस्था श्रद्धा भावना आकांक्षा के नाम से पुकारा जाता है तब तक बनने वाली नहीं इन दिनों इसके अनेक उदाहरण भी देखें जाते है कई बार रोगी को अच्छी से अच्छी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के बावजूद भी परिणाम निराशा जनक सामने आता है और उसकी स्थिति ज्यों की त्यों बनी रहती है पर जब मरीज की आस्था चिकित्सक के प्रति इस स्तर तक सुदृढ़ बना दी जाती है कि उसे गहन विश्वास हो चलता है कि उक्त डॉक्टर का उपचार उसे अवश्य ठीक कर देगा तो दावा के स्थान पर प्लेसिबो (चीनी की गोली) का प्रयोग भी उसे ठीक करने लगता है और बीमार शीघ्रता से स्वास्थ्य लाभ करता दिखाई पड़ने लगता है यह दवा नहीं श्रद्धा की परिणति है जिसका चमत्कारी परिणाम, जादुई असर प्रस्तुत करता है।
चिन्तन है, जिसे अक्सर सहानुभूति एवं सहायता के लिए अपनाया जाता है। अभिभावकों के कष्ट निवारण के लिये विवाह योग्य कन्याओं का इसलिए आत्मघात कर बैठना कि इससे उनके माता-पिता को अर्थ चिन्ता से छुटकारा मिल जायेगा, ऐसा ही दुस्साहस भरा कदम है। इनमें आदर्शवाद, उदारता, सहानुभूति जैसे तत्वों का पुट तो होता है, पर यह स्मरण नहीं रहता कि इस कदम से अपना बहुमूल्य जीवन ही नष्ट नहीं होगा, अपितु जिनके लिए यह सब किया जा रहा है, उनकी कठिनाई, चिन्ता एवं विपत्ति और अधिक बढ़ जायेगी।
चिन्तन, चरित्र, व्यक्तित्व एवं भविष्य को हेय स्तर का बनाकर उतना पतित बनना पड़ता है जितना कि सेवा से सर्वथा दूर रहने वाले सामान्य दूर रहने वाले सामान्य श्रमिक भी नहीं गिरते। लोक सेवियों में से अधिकाँश को अपने व्यक्तित्व और सेवा क्षेत्र में ऐसे विग्रह उत्पन्न करते देखा जाता है जिसे दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है और सोचना पड़ता है कि यदि यश हजम कर सकने में असमर्थ लोग लोक सेवा के क्षेत्र में न आया करें तो वे अपनी और समाज की अधिक सेवा कर सकते है।
चिन्तन की, धारा दी अविराम, गुरुवर! तुमको कोटि प्रणाम॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-December
चिन्तन में पाये जाते हैं इसमें यही तो बताया गया है कि हमारे पूर्व विकास यात्रा के प्राणिज मानसिक भौतिक संस्कार होने के लिए बाधक हैं। परन्तु फ्रायड की तरह यह कह कर हार नहीं मानी गई कि अचेतन गतिशील और आदिम है तथा शैशव के अनुभवों एवं प्रवृत्तियों से पूर्ण हैं। वह मानव में पशु संस्कारों के रूप में सक्रिय हैं और निरन्तर मानव को गुलाम बनाये रखता है इसके चिन्तक मानव को फ्रायड के इपीपस कांप्लेक्स तथा लिबिडो का गुलाम ठहराकर कोल्हू के बैल की तरह इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमने की बात नहीं करते। इनके विकास सिद्धान्त एडलर के अधिकार प्रेरणा और क्षतिपूर्ति की सिद्धान्त की तरह संकुचित नहीं हैं।
चिन्तन का स्तर यह होना चाहिए कि साँस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ काय कलेवर में भीतर प्रवेश कर रहे हैं। यह प्रवेश मात्र आवागमन नहीं है वरन्! प्रत्येक अवयव पर सघन आधिपत्य बन रहा है। एक-एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगों के चित्र कल्पना करनी चाहिए और अनुभव करना चाहिए उसमें भगवान की सत्ता चिरस्थायी रूप से समाविष्ट हो गई। हृदय, फुफ्फुस, आमाशय, आँखें, गुर्दे, जिगर, तिल्ली आदि में भगवान का प्रवेश हो गया रक्त के साथ प्रत्येक नस-नाड़ी और कोशिकाओं पर भगवान ने अपना शासन स्थापित किया।
चिन्तन एक स्थान पर आ गया है। अभी सत्तर खण्ड प्रस्तावित हैं। इन्हीं को सात हजार रुपये मूल्य में अखण्ड-ज्योति संस्थान द्वारा दिया जा रहा है। इसके लिए हिन्दी भाषी क्षेत्रों के लिए टोलियाँ अखण्ड-ज्योति संस्थान को वाङ्मय लेकर केन्द्र की ओर से भेजी गयी है। इस स्थापना को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाय जितना हमने वैदिक वाङ्मय को माना हैं।
चिन्तन को जोते रहना चाहिए।
चिन्तन एवं विचारणा की पोथियाँ रचने उनके ढेर लगाने के उद्देश्य के पीछे एक ही तथ्य उजागर करते हैं कि इन सब का तात्पर्य उन सूत्रों का निर्माण है जिससे मनुष्य जाति अपने विकास पथ पर बढ़ सके।
चिन्तन का स्तर जिसे मानसिक स्तर कहा जा सकता है। मनुष्य की वर्तमान स्थिति इसी पर आधारित है। विकास की सर्वमान्य परिभाषा के अनुसार तो प्रगतिशीलता इसी को कहा जायेगा कि इसके आगामी स्तरों पर आरोहण हो। यदि ऐसा न होकर गति अधोमुखी हो तो उसे विनाश ही कहा जायेगा।
चिन्तन में एकल बात सामने आयी-जब देह नष्ट हो जाती है, तब भी क्या राजा एक स्त्री-पुरुष बाल-वृद्ध का भेद रह जाता है, नहीं! फिर मेरे राजकुमारत्व को क्या अमर रहना है? नहीं-नहीं। मन ने कहा-नहीं जीवन के दृश्य भाग नश्वर हैं, क्षणिक हैं, असन्तोष प्रद हैं। जब तक मनुष्य पूर्णता प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक उसे ऐसी कोई मान्यता नहीं बना लेनी चाहिए, राजकुमार नीरव्रत ने मान लिया कि वह भी शरीर में अभिव्यक्त अव्यक्त आत्मा है, और उसे पाने के लिए अहंभाव छोड़ना पड़ता है।
चिन्तन करना पड़ता है कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक व्यावहारिक यथार्थता के-प्रत्यक्ष तथ्य के-रूप में प्रस्तुत दृष्टिगोचर होने लगे।
चिन्तन कुछ ही समय में जीवन का एक प्रवाह बन जाता है और साधक का आन्तरिक कायाकल्प होने से बाह्य जीवन अनासक्त कर्मयोगी जैसा उत्कृष्ट दृष्टिगोचर होने लगता है। ऐसा व्यक्ति सांसारिक दृष्टि से कृषक, पशुपालक, श्रमिक, व्यवसायी जैसे सामान्य आजीविका में निरत होने के कारण छोटा भले ही समझा जाय पर वस्तुतः आन्तरिक उत्कृष्टता के कारण वह होता अत्यन्त महान ही है अध्यात्म मूल्याँकनों की कसौटी पर कसने से उसे महामानव एवं ऋषिकाय ही ठहराया जा सकता है। राजा जनक यों साँसारिक दृष्टि के कारण से सदा ब्रह्मवेत्ता ही माने गये। किसी को साधारण स्तर का जीविकोपार्जन करना पड़े इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं यदि सोऽहम् साधना स्तर की मान्यताएँ गहराई तक अन्तःकरण में जड़ जमा लें और वे कार्य रूप में परिणत होने के लिए आतुर हो उठें तो समझना चाहिए इस एक ही साधना ने जीवन लक्ष्य प्राप्त कराने का प्रयोजन पूरा कर दिया।
चिन्तन हमारा हो, यह उस समय की परिस्थितियों में लिखी गयी पंक्तियों के परिप्रेक्ष्य में सभी पढ़ें, मनन करें और कुछ दृढ़ निश्चय लेकर शान्तिकुञ्ज हरिद्वार से पत्र व्यवहार करें। प्रस्तुत है एक विशेष लेख-सब कुछ कहने के लिए विवश न करें।”
चिन्तन कर रहे थे कि किसी व्याध ने तीर का वार कर दिया। जिससे उन्हें प्राण छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा।
चिन्तन की अन्य विधाएँ भी आवश्यक हैं। साँसारिक वस्तुओं की भी आवश्यकता है पर वे मात्र साध नहीं है जिनको आवश्यकतानुसार उपयोग करना ठीक है न कि इनमें डूबे रहना। वास्तविकता को समझ कर विकास पथ पर आरूढ़ होने चल पड़ने में ही सार्थकता है। इस पर चलकर ही हम सही माने में विकासशील कह सकेंगे।
चिन्तन की कूपमण्डूकता है। सीमाबद्धता और पूर्वाग्रही दृष्टिकोण भी इसी को कहते हैं। मनुष्य जब अपने चिंतन को सीमाबद्ध बनाता है, तो वास्तविकता के सन्दर्भ में उसकी भी स्थिति मेढ़कों जैसी हो जाती है। फिर जो सामने और प्रत्यक्ष है, उसी को सर्वोपरि सत्य मानने की भूल करने लगता है। वस्तुस्थिति का भान तो तभी हो पाता है, जब मस्तिष्क को खुला और दृष्टिकोण को व्यापक रखा जाता है।
चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है। शासन परिवर्तन जैसी राज्यक्रान्ति जैसी यह भाव भूमिका है जिसमें अनाधिकारी अनाचारों शासनसत्ता का तख्ता उलट कर उस स्थान सत्य न्याय ओर प्रेम संविधान वाली धर्म सत्ता का राज्याभिषेक किया जाता है। सोऽहम् साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अन्तःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियन्त्रण नहीं रहा उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा रहा है।
चिन्तन क्षेत्र की जुताई करनी पड़ती? तभी उसमें उपयोगिता फसल उगती है। खेत को बार-बार जोतने से ही उसकी उर्वरा शक्ति बढ़ती है। नाम जप को एक प्रकार से खेत की जुताई कह सकते हैं। प्रहलाद की कथा है कि वे स्कूल में प्रवेश पाने के उपरान्त पट्टी पर केवल राम नाम ही लिखते थे।
चिन्तन करके किसी निश्चय पर पहुँच नहीं पा रहा था। आत्मा विभु है, श्रुति कहती तो यही है किन्तु इस सत्य का साक्षात् क्यों नहीं होता?
चिन्तन और उसके प्रयास। जो शक्ति प्रकृति को अपने अनुकूल बना सकती है, वही मनुष्य के लिए संकट भी उत्पन्न कर सकती है। प्राकृतिक कारण एक सीमा तक ही प्रतिकूलताएँ उत्पन्न करते हैं लेकिन आदिकाल से अब तक के इतिहास का प्रगतिक्रम प्रमाणित करता है कि मनुष्य उनसे हारता नहीं है। यह बात अलग है कि वह प्रकृति पर विजय प्राप्त न कर सका हो पर उत्पन्न परिस्थितियों से तालमेल बिठा कर अपनी सुरक्षा अवश्य कर लेता है।
चिन्तन अद्भुत है वह तपः लोक सब परिपूर्ण है, सब आप्तकाम हैं, सब दूसरों को अपने से परम श्रेष्ठ मानते हैं सब सुनना ही चाहते हैं। अखण्ड अनवच्छिन्न श्रवण। सुनाने में भी न कोई बहाने बाजी करता है, न आनाकानी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-September
चिन्तन और आस्थाओं की दृष्टि से कौन हैं, विचारिये।
चिन्तन जीवन में भी उतरे एवं राष्ट्र ही नहीं, युग के निर्माण के श्रेयाधिकारी बनें, ऐसा गुरुदेव चाहते थे। वह इस आचार संहिता के परिपालन से ही संभव हो सकेगा। अगले दिनों वही सम्मान का अधिकारी बनेगा जो अधिकाधिक विनम्र व आदर्शों के परिपालन में प्रतिस्पर्धा करता देखा जाएगा।
चिन्तन के डायमेंशन होते हैं। स्वर्ग भी एक डायमेंशन है- हमारे दृष्टिकोण का। इसमें हम देखना शुरू करते है तो इस दुनिया में बड़ी खुशी खूबसूरती, आनन्द और तरह-तरह के नजारे दिखायी पड़ते है। हमको बेहद शाँति दिखायी पड़ती है चारों ओर इसका नाम स्वर्ग। नर्क क्या है नर्क उसी का नाम कि जहाँ कहाँ भी हम निगाह फेंकते है अथवा ........ कहते है, हाथ डालते, सम्बन्ध बनाते हैं, वो सब बागी हो जाते है।
चिन्तन करने पर व्यक्ति का अन्तःकरण प्रकाशित होता है।
चिन्तन को पियो। जिन्होंने उनके चिन्तन के अनुरूप जीना शुरू किया है, उनका सत्संग करो। रोज न सही तो साप्ताहिक ही सही। ऐसे परिव्राजकों की आज बड़ी संख्या तैयार की जा रही है, जो घूम-घूम कर जनमानस को युग की भावधारा से अनुप्राणित करें। उनके मर्म को स्पर्श कर सम्वेदनाओं को उभारें।
चिन्तन के अनुरूप जीना शुरू किया है, उनका सत्संग करो। रोज न सही तो साप्ताहिक ही सही। ऐसे परिव्राजकों की आज बड़ी संख्या तैयार की जा रही है, जो घूम-घूम कर जनमानस को युग की भावधारा से अनुप्राणित करें। उनके मर्म को स्पर्श कर सम्वेदनाओं को उभारें। “
चिन्तन-मनन है जिसे प्रभु, परमात्मा, ईश्वर या भगवान कहा जाता है। सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय को ही भगवान कहते है। विराट्-परब्रह्म तो वह सूत्र-संचालन शक्ति है जिसे सारी सृष्टि की व्यवस्था चलानी होती है। नियम अनुशासन से अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलना ही उसका काम है। उपासना में परब्रह्म को नहीं, भगवान को साकार या निराकार रूप में स्मरण किया जाता है।
चिन्तन दर्शन का सही मर्म उनके जीवन में छिपा हुआ है उन्होंने जो कहा उसे पूरी तरह किया। बेटा! वह सिर्फ लेखक या कवि नहीं थे। वह ऋषि लेखक या कवि नहीं थे। वह ऋषि थे क्रान्तिदर्शी ऋषि। साहित्यकार और ऋषि में बड़ा फर्क होता है इसका स्मरण रखना।
चिन्तन से सूक्ष्म शरीर से और आराधना के कारण शरीर अन्तःकरण से सम्बन्धित है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के क्षेत्रों में मानवी गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रहना, चरित्र भ्रष्ट न होना, आदर्शों का विधाओं का मर्यादापूर्वक पालन करना, कर्तव्यों का पालन ईश्वर को घट घट वासी मानकर करते रहना ही पर्याप्त है। उसे किसी के धूप दीपकों या मनुहार उपहार की आवश्यकता नहीं। वह निन्दा से या स्तुति से प्रभावित नहीं संवेदनाओं को उच्चस्तरीय बनाये रखने के लिये किया जाता है।
चिन्तन में डूब गया।
चिन्तन चरित्र विनिर्मित करने की प्रेरणा देता है। साहसी मनस्वी इस पथ पर चलकर असीम सामर्थ्य प्राप्त करते हैं, स्वयं को ऊँचा उठाते हैं और दैवी अनुकम्पा उन पर सतत् बरसती रहती है। योगाभ्यास एक पराक्रम है, अपनी अन्तः की दुष्प्रवृत्तियों, से संघर्ष है। जो इस देवासुर संग्राम में जितना अधिक सफल होता है वह बहिरंग जगत में सुसंस्कृत एवं अन्तरंग की दृष्टि से महान बनता चला जाता है।
चिन्तन मनन करने से लोगों को पता चलेगा कि बाहर से सामान्य जीवन क्रम को स्वीकार करते हुये असामान्य असाधारण कैसे बना सकता है गीता कृष्ण इसीलिये तो दसवें अध्याय में कह गए हैं कि - तेशां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकं। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ यानि कि जो मेरे जीवन को बारीकी से जानते हैं, उन्हें मैं बुद्धि योग हूँ। अर्थात् उनकी बुद्धि निष्कल्मष हो जाती है। यही बात योगदर्शन लिखने वाले महर्षि पतंजलि ने कही है कि - वीतराग विषयं वा चित्तं।।
चिन्तन और कृत्य जो हम शरीर से करते हैं। आदमी का चिंतन-बीज है और कृत्य उसका फल। विचार भी एक काम है, उसका परिणाम भी होता है। गंदे विचारों करते रहिये फिर देखिये आपका पतन कैसे होता है, दिमाग कैसे खराब होता है। हेमाद्रि संकल्प इस बात को बताता है कि हमारे जीवन में जो निषेधात्मक पक्ष है-उसको ठीक करें, धोये, लोहा ले, लड़ें, बराबर अपने आपसे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-August
चिन्तन और मनन करने वाले किसी भी विवेकशील व्यक्ति का यह निष्कर्ष हो नहीं सकता कि समय, देश, जाति या कारण की संकीर्णताओं में बँधे रहना मनुष्य की प्रगति की निशानी है। आइन्स्टीन की भी लगभग ऐसी ही मान्यता थी। उनका कहना था कि इनकी वास्तविक सत्ता वस्तुतः है ही नहीं। संसार में न तो समय का कोई अस्तित्व है, न स्थान (देश) का, न गति का, यह न किसी भौतिक कारण या परिणाम का। यह चारों ही मस्तिष्क की उपज हैं हम जब तक इनसे आबद्ध रहेंगे, तब तक अंतिम सत्य की अनुभूति कर ही नहीं सकते।
चिन्तन को सबसे बड़ी हानि अपराधवृत्ति को बढ़ावा देना है। शायद इसी कारण से पश्चिमी राष्ट्र, आज अपराधों के जाल-जंजाल में उलझे हुए है। जहाँ यह मान लिया गया हो कि अपराधी को मार देने से अपराध समाप्त हो जायेंगे, वहाँ कदाचित् इसका अन्त कभी न हो, कारण कि अपराध के लिए दण्ड या फाँसी -यह सामाजिक व्यवस्था है और सरकारी कानून। इससे दुष्कृत्यों पर नियंत्रण तो रखा जा सकता है; पर अपराध विहीन समाज की कल्पना को साकार नहीं किया जा सकता। इसके लिए नियमन नहीं, आत्मानुशासन आस्तिकवादी चिन्तन के बिना सम्भव नहीं।
चिन्तन की गाड़ी एक बनी बनायी पटरी पर लुढ़कती जाती है। मनुष्य की चेतना सुविकसित स्तर पर पहुँची हुई इसीलिए मानी जाती है कि उसकी संकल्प शक्ति, विवेचनात्मक क्षमता ने काफी प्रगति कर ली है जब कि अन्य जीवधारी शारीरिक दृष्टि से अपेक्षाकृत अधिक बलिष्ठ होते हुए भी चेतना की आणविक हलचलों में समानता हो सकती है। पर यह सम्भव नहीं दीखता कि पदार्थ कभी चेतन के समतुल्य प्रगति कर सकने में समर्थ हो सकेगा। जीवन को रासायनिक सिद्ध करने के प्रयत्नों से काम चलता न देखकर कोल्बिन, हैमरीज, किचनर, अरर्हेनिस आदि वैज्ञानिकों ने अपने-अपने शब्दों में यह कहा है कि” जीवन किसी अन्य लोक से भूलता-भटकता पृथ्वी पर आ पहुँचा है, पर वह है पदार्थ से भिन्न।
चिन्तन से लेकर भक्ति योग तक की समस्त साधनायें यहीं से फलित होती और विकसित होती है। ओजस् तेजस और ब्रह्मवर्चस् के रूप में पराक्रम, विवेक एवं आत्मबल की उपलब्धियों का अभिवर्धन यहीं से उभरता है। ईश्वरीय अनुदान इसी पर अवतरित होता है। इस सहस्रार चक्र की साधना द्वारा वह क्षमता विकसित की जा सकती है जिसमें चैतन्य प्रवाहों को ग्रहण कर अपने को दैवीय गुणों से सुसम्पन्न बनाया जा सकें।
चिन्तन करते दिखाई देते है। यही गायत्री महाशक्ति निराकार रूप में लोगों के चिंतन को मनःस्थिति को परिष्कृत कर उन्हें आमूलचूल बदलने के लिए धरती पर अवतरित हुई है व ज्ञान गंगा को इस तरह लाने का भागीरथी पुरुषार्थ करने का श्रेय जाता है उस सत्ता को जिसने आँवलखेड़ा गाँव में जन्म लेकर लघु से विराट बन एक विश्वव्यापी गायत्री परिवार की स्थापना कर डाली, लाखों सद्गृहस्थ पैदा कर दिए व संस्कारों के बीजारोपण की प्रक्रिया आरम्भ करवा दी।
चिन्तन स्फुरणा के साथ जुड़ा हुआ है। विचारणा और आकाँख के समन्वय से जो संकल्प उठता है, उसी में प्रगति की समस्त संभावनाएँ सन्निहित है। विकासवादी प्रगति पर दृष्टिपात करने पर हमें किसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है। एक जैसी परिस्थितियों में रहने पर भी एक की प्रगति, दूसरे की यथास्थिति और तीसरे की अवगति का अन्तर देखकर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि संकल्प शक्ति की न्यूनाधिकता का ही प्रभाव है। साधनों के अभाव में भी आगे आगे बढ़ते है।
चिन्तन को, इन्द्रियों को सबको पुनीत बना रहे है। पवित्र बना रहे है। जो मलिनताएं उनके अन्दर छायी हुई होगी, उनको हम निकालेंगे। न्यास का अर्थ यह ही होता है कि हमारी जो इन्द्रियाँ हैं पाँचों इनका उपयोग हम ठीक तरीके से तरीके से करेंगे। अच्छे काम में करेंगे।
चिन्तन पूज्यवर ने ही पहली बार जन-जन के समक्ष प्रस्तुत किया। प्रामाणिक आँकड़ों के माध्यम से साधना विज्ञान का विज्ञान सम्मत प्रस्तुतीकरण से लेकर सर्वधर्म संभव, यज्ञ विज्ञान व यज्ञोपैथी, मनोविकारों का आध्यात्मिक उपचार, मरणोत्तर जीवन व मानवी काया से लेकर सृष्टि-ब्रह्माण्ड की विलक्षण गुत्थियों को उनने अपने साहित्य के द्वारा जनसमुदाय के समक्ष रखा। व्यक्ति परिवार और समाज निर्माण के आधारभूत सिद्धान्त क्या हों, कैसे दाम्पत्य जीवन को शुचिता पूर्ण तथा परिवार संस्था को अटूट गरिमामय बनाया जा सकता है, नारी का उत्थान कैसे सम्भव है यह युग ऋषि के चिंतन-नवनीत के रूप में प्रकाशित वह निधि है जो प्रत्येक के लिए मार्गदर्शिका के रूप विद्यमान है। रामचरितमानस से प्रगतिशील प्रेरणा से लेकर प्रज्ञापुराण रूपी 19 वें पुराण के अठारह खण्डों का निर्माण कर उनने वह साहित्य निधि समाज को दी जो जीवन के कायाकल्प का माध्यम बन गयी। सामाजिक जीवन में छाई कुरीतियों-मूढ़-मान्यताओं से कैसे मोर्चा लिया जाय, अंधविश्वासों को मिटाकर कैसे भव्य समाज की अभिनव संरचना हो, राष्ट्र एक व अखण्ड कैसे बने, यह मार्गदर्शन भी पत्रिका व पुस्तकों के माध्यम से युगऋषि ने सतत् किया।
चिन्तन के बिना सम्भव नहीं। नीतिमत्ता, कर्तव्यपरायणता, सेवा सहायता-यह सब इसी चिन्तनधारा के अंतर्गत बन पड़ते है; क्योंकि कर्ता का दृढ़ विश्वास होता है कि कर्म के परिणाम आज नहीं तो कल मिल कर सराहेंगे। इसलिए वह प्रायः बुरे कर्मों से बचता है।
चिन्तन, धन एवं प्रभाव की सम्पदा के अनुपयोग, दुरुपयोग एवं सदुपयोग का लेखा-जोखा रखें। अव्यवस्था ढूँढ़ें और उसे साहस पूर्वक सुधारें अभ्यस्त ढर्रों की समीक्षा करें और उसमें अधिकाधिक प्रगतिशीलता का समावेश करने के लिए प्रयत्नशील रहें।
चिन्तन की गहराई में उतरने पर यह स्पष्ट अनुभव होने लगता है कि संसार में भगवान ने अवरोध-विरोध क्यों खड़े किये अथवा लाभ, सुख, प्रसन्नता के साथ-साथ इनके विपरीत तत्वों को क्यों गढ़ा?
चिन्तनधारा के अंतर्गत बन पड़ते है; क्योंकि कर्ता का दृढ़ विश्वास होता है कि कर्म के परिणाम आज नहीं तो कल मिल कर सराहेंगे। इसलिए वह प्रायः बुरे कर्मों से बचता है।
चिन्तन कर रहा है, यह गलत कर रहा है। उसका निवारण करने के लिए भगवान का नया अवतार होना चाहिये। वह प्रज्ञा-अवतार होना चाहिये। निष्कलंक भी इसी को कहते है दसवाँ अवतार या चौबीसवें अवतार निष्कलंक अवतार है। जिसे प्रज्ञा अवतार कहते है।
चिन्तन के प्रवाह में जुड़ने चले आ रहे है। पच्चीस अश्वमेध इसके प्रमाण है। लाखों व्यक्तियों की दुष्प्रवृत्तियाँ छूट गयी। दुर्व्यसनों को त्यागकर देवत्व से जुड़ने को प्रायः छह से दस करोड़ व्यक्ति संकल्पित होते चले गए। श्रेष्ठ संकल्प लेते हुए उनमें अपना जीवन क्रम बदलकर संस्कारों को अपने जीवन में स्थान देना आज का युग धर्म माना और यही सतयुग की आधार शिला बनता चला जा रहा है।
चिन्तन की हानियाँ समझें दिनचर्या बनायें और कठोरता पूर्वक पालन करें। न श्रम से जी चुरायें न समय को प्रमाद में गँवाये। स्वाध्याय की आदत डालें। आत्म-निर्माण की योजना बनाने के चिंतन मनन में मन को लगायें। कुविचार आते ही उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनसे लड़ने के लिए खड़ी कर दें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-October
चिन्तन में इतनी-सी ही जानकारी है कि हमारे क्रिया-कृत्यों को अनगढ़ नहीं-सुव्यवस्थित होना चाहिए। भले ही वह उच्चारण ही क्यों न हो? वाणी को शिष्टाचार-सन्तुलन सभ्यता का अंग माना जाता है। जो ऐसे ही अण्ड-दण्ड बोलते रहते हैं वे असभ्य कहलाते और तिरस्कार के पात्र बनते हैं। ऐसी दशा में मंत्र प्रयोजन में यदि उनके साथ जुड़े हुए व्यवस्था नियमों का पालन किया जाये का निर्देश है तो उसका पालन होना ही चाहिए।
चिन्तन क्यों न विगत में किया जाता रहा हो तथा वर्तमान के क्रिया−कलाप भी वैसे ही क्यों न चल रहे हों। यह एक छलावा है, भ्रान्ति है तथा आत्मप्रवंचना मात्र है। भगवान को नितान्त घटिया मान बैठना, यही समझ बैठना कि जरा-सी प्रार्थना से बिना अन्तरंग साफ किये बिना औरों के प्रति संवेदना जीवन में धारण किये भगवान प्रसन्न हो अनुदान बरसा देगा तो फिर इससे बड़ी नासमझी दुनिया में कोई नहीं हो सकती।
चिन्तन। इन तीनों से ही मन की चंचलता बनती है। लेकिन यदि मन को शब्द का माध्यम न मिले तो उसे चंचलता नहीं प्राप्त हो सकती। उसकी गति शब्द की बैसाखी पर निर्भर है। सारी स्मृतियाँ, कल्पनाएँ तथा चिन्तन शब्द के माध्यम से चलते हैं।
चिन्तन में सिरे से फेर-बदल हुई है और शल्य क्रिया के रचनात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं।
चिन्तन करने पर सुलझे हुए रूप में सामने आ जाते हैं। यह प्रक्रिया लेटे-लेटे घूमते हुए अथवा ध्यान की स्थिति में भी संपन्न की जा सकती है।
चिन्तन से ऊपर की स्थिति है। ढर्रे का चिन्तन ‘कण्डीशण्ड’ यथास्थिति चिन्तन कहलाता है। इसे ही जाग्रत मन ‘चेतन मन’ कह सकते हैं। इसे भारतीय अध्यात्म शाँत अतिचेतन मन तथा "न्यूटेस्टामेंट" स्वर्ग साम्राज्य कहता है। यही हमारा वास्तविक ‘स्व’ है।
चिन्तन का जन प्रचलित ढर्रा ही इस रेखा की एनोटॉमी है। यदि इस बैरियर को तोड़ दिया जाये तो अन्तः के जगत में प्रवेश कर सकना सम्भव है, उस प्रकाश को पाना शक्य है जो अतिमन की जागृति का प्रथम चिन्ह है।
चिन्तन शब्द के माध्यम से चलते हैं।
चिन्तन में निमग्न हो गए हैं-ऐसा समझकर कुछ आगे की बात न करके शिष्य सौभरि भी चुप हो गए और वहाँ से उठकर आचार्य देव के लिए संध्यादि के प्रबन्ध में जुट गए।
चिन्तन के साथ जोड़ा है तो अगले क्रम में शान्त-प्रसन्न स्थिति प्राप्त होती है। शान्त और नीरवता की इस दशा में मस्तिष्क दांए हिस्से की क्षमताएँ आश्चर्यजनक रूप से जाग्रत होती है। बहुत सम्भव है मस्तिष्क की नीरव स्थिति के इसी आश्चर्य जनक प्रभाव को अनुभव कर अनन्त निर्विकल्प का सूत्र दिया है। आखिर वह स्वयं भी चमत्कारी प्रतिमा के स्वामी भी तो थे। क्यों न हम भी सही चिन्तन प्रणाली एवं ध्यान की पद्धति का अनुसरण कर दांए मस्तिष्क की सोई क्षमताओं को जगाएँ और प्रतिभाशाली बनें।
चिन्तन ‘कण्डीशण्ड’ यथास्थिति चिन्तन कहलाता है। इसे ही जाग्रत मन ‘चेतन मन’ कह सकते हैं। इसे भारतीय अध्यात्म शाँत अतिचेतन मन तथा "न्यूटेस्टामेंट" स्वर्ग साम्राज्य कहता है। यही हमारा वास्तविक ‘स्व’ है।
चिन्तन, विचार और कल्पनाओं की उड़ान चलती ही रहती है। मन मस्तिष्क के यही क्रिया-कलाप स्वप्न के रूप में दिखाई देते हैं। मनोविज्ञान अब तक इसी रूप में स्वप्न को व्याख्यायित करता रहा है। किन्तु अब मनोवैज्ञानिक के अनुसार स्वप्न का एक ओर पक्ष उद्घाटित हुआ है, जिन्हें अतीन्द्रिय स्वप्न कहा जाता है। रूसी मनःशास्त्री पावलोव के अनुसार मनुष्य का अवचेतन मन अनन्त सम्भावनाओं और सम्वेदनाओं का भण्डार है, उसे सामान्य रीति से समझ पाना अति दुष्कर है।
चिन्तन करके उन्हें आदर्शवादी चिन्तन के साथ जोड़ा है तो अगले क्रम में शान्त-प्रसन्न स्थिति प्राप्त होती है। शान्त और नीरवता की इस दशा में मस्तिष्क दांए हिस्से की क्षमताएँ आश्चर्यजनक रूप से जाग्रत होती है। बहुत सम्भव है मस्तिष्क की नीरव स्थिति के इसी आश्चर्य जनक प्रभाव को अनुभव कर अनन्त निर्विकल्प का सूत्र दिया है। आखिर वह स्वयं भी चमत्कारी प्रतिमा के स्वामी भी तो थे। क्यों न हम भी सही चिन्तन प्रणाली एवं ध्यान की पद्धति का अनुसरण कर दांए मस्तिष्क की सोई क्षमताओं को जगाएँ और प्रतिभाशाली बनें।
चिन्तन को कोई स्थान नहीं इसमें भय, ऐषणा, शंका की कोई जगह नहीं है। यह सदैव प्रसन्नता से युक्त है तथा आत्मिक एवं भौतिक दृष्टि से सबल सम्पन्न जीवन के यह सपने देखता है।
चिन्तन करते हुए वह नीचे उतरने लगे और थोड़ी ही देर में वहाँ पर जा पहुँचे, जहाँ साधु बैठे थे। वहाँ एक व्यक्ति के आराम करने भर की जगह और धूनी में जल रही आग के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।
चिन्तन कहलाता है। इसे ही जाग्रत मन ‘चेतन मन’ कह सकते हैं। इसे भारतीय अध्यात्म शाँत अतिचेतन मन तथा "न्यूटेस्टामेंट" स्वर्ग साम्राज्य कहता है। यही हमारा वास्तविक ‘स्व’ है।
चिन्तन, जीवन शैली कैसी रखें। पहले मात्र विज्ञप्ति रूप में प्रकाशित यह पंक्तियाँ सर्वसाधारण के लिए हम ‘अखण्ड ज्योति’ में दे रहे हैं ताकि एक आदर्श आचार संहिता के उस पक्ष को परिजन समझ सकें जो गुरुवर की अन्तर्वेदना थी। उनने जीवन भर व्यक्ति गढ़े। यदि कहीं कोई कमी रही है तो वह हमारी ही है उनकी नहीं। उनने अपनी ओर से अनुदान बाँटने, उँगली पकड़कर चलना सिखाने, एक समर्पित स्वयं सेवक कैसे बना जाय, यह शिक्षण देने में कोई कसर नहीं रखी।
चिन्तन एवं चरित्र को, उच्चस्तरीय बनाने के भागीरथी प्रयत्न में जुटना होता है। मन्त्रोच्चारण की विधि-व्यवस्था कुछ घंटों में सीखी जा सकती है- उसका परिपूर्ण अभ्यास कुछ दिनों में हो सकता है। किन्तु व्यक्तित्व की मूल सत्ता का स्तर ऊँचा उठाना काफी कठिन है। उसके लिए प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है। दूसरों को सुधारने में जितनी कठिनाई पड़ती है अपने को सुधारना उससे भी अधिक कष्ट साध्य और श्रम साध्य है।
चिन्तन प्रणाली एवं ध्यान की पद्धति का अनुसरण कर दांए मस्तिष्क की सोई क्षमताओं को जगाएँ और प्रतिभाशाली बनें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-June
चिन्तन प्रधान है, तो आत्मिकी चरित्र प्रधान। अतएव पदार्थ जगत की साधना करने वालों ने मस्तिष्क को विकसित करके चिन्तन व पैनापन तो प्राप्त कर लिया पर इसके आगे समग्र व्यक्तित्व अविकसित स्थिति में ही पड़ा रहा। आत्मजगत के अन्वेषकों का लक्ष्य चूँकि संस्कार कोशों का परिवर्तन, परिवर्धन और जागरण होता है, इसलिए उनकी यात्रा उस मूल इकाई से आरम्भ होती है, जहाँ पर समग्र व्यक्तित्व दबा पड़ा होता है। साधना द्वारा इसी आवरण को हटाना पड़ता है।
चिन्तन, आदर्श चरित्र एवं उदार व्यवहार की शिक्षा देता है। व्यक्ति को ऐसे ढाँचे में ढालता है, जिससे वह समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी से भरा-पूरा जीवन जी सके। एकता और समता की भावनाओं से भरा-पूरा रह सके। धर्म का तत्त्वज्ञान यही है। उसका तत्त्वदर्शन व्यक्ति की चेतना को मानवीय गरिमा के अनुरूप ढालता है।
चिन्तन की घड़ी आ जाती है। क्या हम वह सब कर पाये हैं जो ऋषियुग्म चाहते थे, क्या हम ‘क्वान्टिटी’ के साथ-साथ ‘क्वालिटी’ बढ़ाने की बात साकार कर पाए हैं? यह सब हम सब के लिए विचारणीय कुछ बिन्दु गायत्री जयंती (8 जून) की इस पावन वेला में।
चिन्तन व पैनापन तो प्राप्त कर लिया पर इसके आगे समग्र व्यक्तित्व अविकसित स्थिति में ही पड़ा रहा। आत्मजगत के अन्वेषकों का लक्ष्य चूँकि संस्कार कोशों का परिवर्तन, परिवर्धन और जागरण होता है, इसलिए उनकी यात्रा उस मूल इकाई से आरम्भ होती है, जहाँ पर समग्र व्यक्तित्व दबा पड़ा होता है। साधना द्वारा इसी आवरण को हटाना पड़ता है।
चिन्तन में प्रविष्ट हो हमें आदर्शवाद की दृष्टि से तो नहीं, पर और किसी क्षेत्र में महत्त्वाकाँक्षी तो नहीं बना रही है, यह सतत् आत्म चिन्तन करते रहना हमारा आपका सबका कर्तव्य है।
चिन्तन करने लगा था। ‘नहीं आज मुझे सोचने दीजिए। मैं फिर आऊँगा आपके समीप।’ साधु को उसने रोक दिया बोलने से। वह उठ खड़ा हुआ।
चिन्तन प्रगतिशील और पूर्वाग्रह रहित हो एवं उसमें उन सभी अनिवार्य तत्त्वों का समावेश हो, जो तत्कालीन परिस्थितियों के लिए आवश्यक हों। कोई तथ्य बिलकुल नया होने के कारण ही स्वीकार लिया जाय और दूसरे को इस कारण त्याग दिया जाय, क्योंकि वह पुराना बन चुका-इस आधार पर बात बनने वाली नहीं। हमें निष्पक्ष होकर नीर-क्षीर विवेक का प्रयोग करते हुए उन सभी नये पुराने आधारों का एक समग्र और सर्वांगपूर्ण दर्शन निर्माण करना होगा, जो हर प्रकार से वर्तमान के अनुरूप हो, तभी विज्ञान भी उपयोगी हो सकेगा अन्यथा सुनिश्चित दर्शन के अभाव में वह भी विकलांग बना रहेगा। इसी मत का समर्थन करते हुए महाकवि कालिदास लिखते हैं-
चिन्तन यह होना चाहिए कि प्रकृति व्यवस्था में जो कठिनाइयाँ आ खड़ी हुई हैं, उनसे मल्ल युद्ध करके अपनी वरिष्ठता सिद्ध करने का लाभ कमाया जाय।
चिन्तन स्वयं उन्हें भारी पड़ेगा
चिन्तन से सर्वाधिक प्राण का अपव्यय होता रहता है। इसी कारण से आज के लोग देखने में निर्जीव और क्रिया से निष्प्राण जान पड़ते हैं। इसीलिए आज ब्रह्मचर्य की स्थिति नगण्य जितनी रह गयी है।
चिन्तन काँच की तरह पारदर्शी और स्वच्छ बन जाता है। उसे परम सिद्धि ही मानना चाहिए। जब निर्विचार अवस्था में चित्त पूर्ण रूप से अवस्थान करता है, तो दिव्य दर्शन के दौरान उभरने वाली झांकियों का अन्त हो जाता है। यह इस तथ्य की परिचायक है कि साधके जाग्रत संस्कारों का क्षय हो गया।
चिन्तन की यह विधा जब निर्माण क्षेत्र में लगती है, तो मनुष्य में देवत्व और धरती पर स्वर्ग उतारने की अपूर्व सामर्थ्य प्रदर्शित करती है और विनाश की दिशा में क्रियाशील होने पर हाहाकार मचा देती है। विज्ञान में यह दोनों ही क्षमताएँ हैं, पर मनुष्य का दुःख और दुर्भाग्य यह है कि इन दिनों दोनों ही शक्तियाँ विद्रूप बनी हुई हैं और अनर्थकारी प्रयोजनों में लगी हुई हैं।
चिन्तन को लिपिबद्ध कर अखण्ड-ज्योति रूपी पत्रिका प्रकाशित किये जाने तथा राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के सान्निध्य में जाने, स्वतंत्रता संग्राम के एक सेनानी के नाते सहयोग देने के निर्देश आँवलखेड़ा की इस बस्ती के उनके विशाल घर की छोटी-सी पूजा की कोठरी में ही मिले। यहीं पर उन्होंने बतलाया गया कि साधना स्वाध्याय व स्वतंत्रता संग्राम के एक सेनानी के रूप में मातृभूमि की सेवा के त्रिसूत्री कार्यक्रम के साथ-साथ उन्हें चार बार हिमालय यात्रा करनी पड़ेगी संभावित समय व स्थान के निर्देश भी मिले व जीवन यात्रा के आगामी कार्यक्रम का एक स्वरूप उन्हें समझा दिया गया। तब से बसंत पंचमी को ही उनके आध्यात्मिक जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है।
चिन्तन को सत्य सिद्ध करने वाली धारा। एक यदि चिन्तन-चेतना को गति देता है, तो दूसरा उसे वास्तविकता से धरातल पर ला खड़ा करता है। इतने पर भी दोनों का अपना-अपना मूल्य और महत्त्व है। केवल काल्पनिक ऊहापोह में पड़े रहने से भी काम चलने वाला नहीं और न विशुद्ध विज्ञानवादी बन जाने से ही बात बनने वाली है। समाज में इन दोनों का समन्वय ही वर्तमान संकट का आत्यन्तिक हल हो सकता है।
चिन्तन-चेतना को गति देता है, तो दूसरा उसे वास्तविकता से धरातल पर ला खड़ा करता है। इतने पर भी दोनों का अपना-अपना मूल्य और महत्त्व है। केवल काल्पनिक ऊहापोह में पड़े रहने से भी काम चलने वाला नहीं और न विशुद्ध विज्ञानवादी बन जाने से ही बात बनने वाली है। समाज में इन दोनों का समन्वय ही वर्तमान संकट का आत्यन्तिक हल हो सकता है।
चिन्तन को घर-घर पहुँचाया एवं आज प्रातः साढ़े चार लाख व्यक्ति इस पत्रिका को हिन्दी में पढ़ते तथा दस लाख लोगों को पढ़ाते हैं। इसी के अनुवाद दस भाषाओं में छपकर दस लाख और व्यक्तियों तक पहुँचते हैं। इसी स्थान पर निवास करते हुए उन्होंने हजारों व्यक्तियों से व्यक्तिगत पत्र व्यवहार करते हुए उनको अपना अभिन्न अंग बनाया, उनकी समस्याएँ सुलझाई एवं एक विशाल गायत्री परिवार का सदस्य बना लिया। यही कारण है कि हर जाति, मत, सम्प्रदाय का व्यक्ति उनसे पिता की तरह स्नेह करता एवं उनकी धर्मपत्नी वंदनीय माता भगवती देवी को अपनी माता मानते हुए बदले में अनेक गुना स्नेह ढेरों अनुदान आशीर्वाद पाता रहा। यहीं पर उनने आर्षग्रन्थों का भाष्य कर उन्हें जन सुलभ बनाया, अपने वजन से भी कई गुना साहित्य रचा एवं नियमित अपनी लेखनी चलाते हुए अपनी साधना के शक्ति स्रोत अखण्ड दीपक के प्रकाश में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका एकाकी लिखी, जो कि अपनी लम्बी यात्रा पूरी कर पाँच वर्ष पूर्व ही अपनी स्वर्ण जयन्ती मना चुकी है।
चिन्तन को सतत् उल्लास भरा विधेयात्मक बनाने वाले अपने पिता को पुनः पाँच वर्ष बाद याद करके हम अपनी अंतः पर्यवेक्षण करने की प्रक्रिया को दुहरा रहे हैं। जब आज से प्रायः 9 माह पूर्व हम सबको संरक्षण देकर पीठ थपथपाकर आगे बढ़ने वाली, एक टीम बनाकर उसके द्वारा देवसंस्कृति दिग्विजय के अनेकानेक पराक्रम सम्पन्न करने वाली मातृ सत्ता के महाप्रयाण व उनके अंतिम संदेश को हम याद करते हैं तो पुनः आत्मचिन्तन की घड़ी आ जाती है। क्या हम वह सब कर पाये हैं जो ऋषियुग्म चाहते थे, क्या हम ‘क्वान्टिटी’ के साथ-साथ ‘क्वालिटी’ बढ़ाने की बात साकार कर पाए हैं? यह सब हम सब के लिए विचारणीय कुछ बिन्दु गायत्री जयंती (8 जून) की इस पावन वेला में।
चिन्तन करते रहना हमारा आपका सबका कर्तव्य है।
चिन्तन समाज रूपी काया के मन-प्राण हैं। यदि वही जर्जर हो गया, तो समाज की स्थिति अवसादग्रस्त देह जैसी हो जाती है, जिसमें शरीर समर्थ होते हुए भी कुछ करते धरते नहीं बन पड़ता। दार्शनिकों को इस बारे में बहुत पहले सोचना चाहिए था और समय के अनुरूप फिलॉसफी को ऐसा बनाना चाहिए था कि वैज्ञानिक विचारधारा से उसकी संगति निभती रहे; पर उसकी प्रगति इतनी न हो सकी कि दोनों एक ही आधार पर खड़े होकर एक छप्पर तले रह सकें। परिणामस्वरूप उनमें आकाश-पाताल जैसा अन्तर दीखने लगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-May
चिन्तन की भ्रष्टता भी सम्प्रति लोगों को बुरी तरह जकड़े हुए है। भौंड़ी सोच सजातीय परमाणुओं को ही आकर्षित कर सकती है। यही कारण है कि विश्व स्तर पर इन दिनों विषम और विषाक्त वातावरण बना हुआ है जिधर दृष्टि जाती है उधर आगजनी राहजनी, चोरी, लूटपाट, डकैती, हत्या, अपहरण जैसे दृश्य ही नये नृत्य करते दिखाई पड़ते हैं।
चिन्तन ही पैदा होगा। खराब चिंतन सदा अपने समान गुणधर्म वाले अणुओं को आकर्षित करता है। जहाँ ऐसे विकारयुक्त चिंतन कणों की भरमार हो, वहाँ स्वभाव उदात्त बना रहे यह कठिन है ऐसे में यदि अन्न की प्रकृति सात्विक भी बनी रहीं तो परिणाम कोई बहुत उत्साहवर्धक प्राप्त होगा, इसकी आशा नहीं की जानी चाहिए।
चिन्तन करने से ज्ञात होता है कि पत्नी बच्चों का अन्य किसी से किया जाने वाला प्रेम-प्रेम नहीं मोह होता है। इस मोह और प्रेम में विरोधाभास जैसी स्थिति है। यदि प्रेम को काया कहा जाय, तो मोह को छाया कहा जाना उचित होगा। दोनों में अंतर भी वही होता है, जो काया और छाया में है। एक सजीव होती है, दूसरी निष्प्राण।
चिन्तन को संचालित करती और चिंतन से क्रिया तथा व्यवहार बन पड़ते हैं। इसी तरह भोजन के मूल में समग्र व्यक्तित्व छिपा होता है उसकी प्रकृति और प्रवृत्ति छिपी होती है। इसे नियंत्रित कर लेने से व्यक्तित्व को काफी हद तक नियंत्रित कर सकना संभव है। यहाँ यह जान लेना जरूरी है कि भोजन किस तरह हमारी आदतों का संचालन करता है। इस सम्बन्ध में शरीर शास्त्रियों का कहना है कि मानवी मस्तिष्क में अनेकानेक चैत्य केन्द्र हैं।
चिन्तन मनन हमें नित्य करना चाहिए। इस तरह के मनन को निरन्तर अभ्यास से रूठा मन सहज ही मान जायेगा। फिर तो इसके नित नये चमत्कार समूचे जीवन को अलौकिक बना देंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-April
चिन्तन भी न करना।
चिन्तन करो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-August
चिन्तन भी करते हैं और उसके लिए जैसे-तैसे थोड़ा प्रयत्न भी करते हैं परन्तु अपने कर्तव्य को ठीक चुनने में गड़बड़ा जाते हैं और चक्करदार रास्तों में उलझ कर अपने बीज को ऐसी पथरीली भूमि पर बोते हैं जहाँ वास्तविक फल प्राप्त नहीं होता। तत्वज्ञानी योगी इस बात की खोज करते रहते हैं कि मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य क्या है। अपनी अनेक शंकाओं और असंख्य तर्कों के साथ इस देश के तत्वदर्शियों और जीवन मुक्त महात्माओं ने अनेक अनुसंधानों के पश्चात् यही निश्चित कर पाया है कि मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य आत्मकल्याण करना है। आत्मकल्याण का मार्ग यह है कि बुरे विचार और कर्मों को त्यागता हुआ हृदय को पवित्र बनावे इस पवित्र हृदय में ही परमात्मा का दर्शन होता है। जैसे-जैसे अपनी आत्मा निर्दोष होती जाती है वैसे ही वैसे उसमें भगवान के दिव्य स्वरूप की झाँकी स्पष्ट रूप से होती जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-December
चिन्तन करता है। अर्थात् जड़ विषयों में जो आकर्षण रहता है, उस आकर्षण का ही स्वरूप प्रेम नाम से पहचाने जाने वाले विकार के स्वरूप हैं। सच्चा प्रेम करने वाले, इस प्रकार के दो मनुष्य एक दूसरे से चाहे हजारों मील के अन्तर पर हों, पर उनके प्रेम में फर्क नहीं पड़ता। वह नष्ट नहीं होता और न उससे कभी दुख की उत्पत्ति होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-November
चिन्तन करना चाहिये।
चिन्तन में लगा कर इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था, कि-”जीवन को संयमित बनाओ, वासनाओं पर विजय प्राप्त करो, जो प्राप्त हो, उसी में संतोष करो, यही शाँति का राज-मार्ग है।” किन्तु आज की सभ्यता उन सिद्धान्तों का उपहास करती है और आवश्यकताओं को बढ़ाने में लगी हुई है, फलस्वरूप चिन्ता और अशाँति के बादल चारों और छाये हुए दिखाई पड़ रहें हैं।
चिन्तन करने पर यह मालूम हो सकता है कि इस नाराज़गी में हमारा कितना दोष है। अपनी त्रुटियों को सुधारना हर मनुष्य का धर्म है। हमारी भूल से यदि दूसरों को दुख पहुँचता हो, तो अपना सुधार करना चाहिए और नाराज़ होने वाले से निःसंकोच क्षमा माँग लेनी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-February
चिन्तन करने से ही आत्मा को अपार शाँति और शीतलता प्राप्त होती है। दुष्टों को सदा अपने दुश्मनों का भय बना रहता है कि कहीं कोई हमारा अनिष्ट न कर दे, पर सदाचारी के पास यह सब बातें कहाँ, वहाँ न तो कोई दोस्त है, न दुश्मन। उसके लिये तो सारा संसार एक सा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-October
चिन्तन कीजिए। दस पाँच मिनट प्रतिदिन इसका अभ्यास करने से अंगूठी और हीरे के सम्बंध में बहुत ही सूक्ष्म बातें ध्यान में आने लगेंगी। निरन्तर छः सप्ताह के अभ्यास से बहुत लाभ होगा।
चिन्तन में समय लगाना। ईश्वराराधना, पूजा, पाठ, जप, तप करना इनमें से अपने विश्वास के आधार पर जो कुछ भी अभ्यास सच्चे हृदय से और निष्ठापूर्वक किया जाय, वही इस मार्ग को खोलने में सहायक हो सकता है। चित्त की स्थिरता और हृदय की पवित्रता यह दो गुण इस दिशा में बहुत ही उत्तम सिद्ध होते हैं। दुर्गुणी और दुष्ट प्रकृति के लोग त्रिकाल में भी इस अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकते।
चिन्तन में भी लगाइये कि हमारी आराधना से सन्तुष्ट होने के स्थान पर नाश का वज्र दंड क्यों उठाया जा रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-March
चिन्तन से उदासीन है वह बहुत ही घृणित कर्म में प्रवृत्त है और उसका मुँह थूक देने योग्य ही स्थान है। धनपति अपनी गरीबी को समझ गया। उसने साधु के चरण पकड़ लिये और अपनी भूल सुधारने की प्रतिज्ञा कर ली।
चिन्तन से क्या लाभ? जब स्वस्थ हैं तो भविष्य की क्या चिन्ता! शक्ति के अहंकार में मनुष्य अन्धा हो जाता है। धन के मद में सेठजी की भी वैसी ही दशा थी। उपासना की भी कोई जरूरत है? इस प्रश्न पर कुछ सोचने की उन्हें कभी फुरसत नहीं मिली थी।
चिन्तन” तथा “प्रभु भक्ति”। इस लेख में हम-”आत्म चिन्तन “ पर प्रकाश डालेंगे। आत्म चिन्तन का अर्थ है अपने आत्म स्वरूप का चिन्तन करना। अर्थात् मैं कौन हूँ? मेरा क्या स्वरूप है?
चिन्तन करते रहना ही “आत्म-चिन्तन” कहलाता है। इस प्रकार चिन्तन करते रहने से आत्मा की सोई हुई दिव्य तथा महान शक्तियाँ जागृत होने लगती हैं। जितना-2 हम अपने आत्म-स्वरूप का मनन करते हैं, उतनी-2 हमारी आत्मिक शक्तियाँ विकसित होती जाती हैं और एक दिन हम महान तथा दिव्य शक्तियों के स्वामी बन जाते हैं। संसार में आज तक जितने भी ऋषि, मुनि, योगी, यति आदि महापुरुष हुए, हैं वे सब अपनी महान शक्तियों के विकास से ही महान तथा उच्च बने हैं। इसलिये यदि हम उच्च तथा महान बनना चाहते हैं, तो हमें भी आत्म चिन्तन द्वारा अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास करना चाहिये।
चिन्तन द्वारा जगाने से होता है। इतना ही नहीं प्रत्युत सिपाही के हन्टर से जागे हुए मनुष्य की तरह तपश्चर्या आदि कठोर साधनों के अभाव में आत्मा के पुनः खो जाने की भी आशंका बनी रहती है। इसलिए हमें अपने आत्म को “आत्म चिन्तन “ द्वारा अर्थात् माता की तरह प्रेम की लोरियों देकर ही जगाना चाहिये, कठोरता के साधनों से नहीं। इतना ही नहीं प्रत्युत यदि हमारा आत्मा कभी किसी बुराई में भी फँसने लगे, तब भी उसे प्रेम से ही समझाना चाहिये। कि . . “ऐ मेरे प्रिय आत्मन्! ऐसा कुत्सित कर्म तेरे लिये योग्य नहीं।
चिन्तन” तथा “प्रभुभक्ति”
चिन्तन” कहलाता है। इस प्रकार चिन्तन करते रहने से आत्मा की सोई हुई दिव्य तथा महान शक्तियाँ जागृत होने लगती हैं। जितना-2 हम अपने आत्म-स्वरूप का मनन करते हैं, उतनी-2 हमारी आत्मिक शक्तियाँ विकसित होती जाती हैं और एक दिन हम महान तथा दिव्य शक्तियों के स्वामी बन जाते हैं। संसार में आज तक जितने भी ऋषि, मुनि, योगी, यति आदि महापुरुष हुए, हैं वे सब अपनी महान शक्तियों के विकास से ही महान तथा उच्च बने हैं। इसलिये यदि हम उच्च तथा महान बनना चाहते हैं, तो हमें भी आत्म चिन्तन द्वारा अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास करना चाहिये।
चिन्तन द्वारा अपनी आत्मिक शक्तियों को विकसित किया करते थे किन्तु आज तो परिस्थिति इसके सर्वथा विपरीत है। जैसे कि ऊपर वर्णन कर आये हैं। अतः इस समय हम किस के पास जाकर अपनी आत्मा को जागृत करने वाली मधुर लोरियों को सुनें? यह बात सत्य है आजकल की हमारी भौतिक माताएं हमें वह अमृत-रस भरी पवित्र लोरियों नहीं सुनाती। किन्तु हमारी सभी आध्यात्मिक माता जगत्-जननी हमें अहर्निश अपने वात्सल्य प्रेम से हमारे हित के लिये लोरियों दे रही है।
चिन्तन द्वारा अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास करना चाहिये। अपने आत्मा को प्रेम से समझा कर उसे निज स्वरूप का बोध कराना चाहिये। यों तो आत्मा को जागृत करने के तपश्चर्या आदि अनेक साधन हैं। किन्तु जितना शीघ्र आत्मा को प्रेम से समझाने से अर्थात् आत्मा की अद्भुत शक्तियों का “आत्मचिन्तन” द्वारा उसे बोध कराने से हमारा आत्मा जागृत हो सकता है, उतना कठोरता के साधनों से नहीं। जगाता रास्ते पर सोए हुए मनुष्य को सिपाही भी है और घर में सोए हुए बालक को माता भी।
चिन्तन करते रहने से आत्मा की सोई हुई दिव्य तथा महान शक्तियाँ जागृत होने लगती हैं। जितना-2 हम अपने आत्म-स्वरूप का मनन करते हैं, उतनी-2 हमारी आत्मिक शक्तियाँ विकसित होती जाती हैं और एक दिन हम महान तथा दिव्य शक्तियों के स्वामी बन जाते हैं। संसार में आज तक जितने भी ऋषि, मुनि, योगी, यति आदि महापुरुष हुए, हैं वे सब अपनी महान शक्तियों के विकास से ही महान तथा उच्च बने हैं। इसलिये यदि हम उच्च तथा महान बनना चाहते हैं, तो हमें भी आत्म चिन्तन द्वारा अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास करना चाहिये। अपने आत्मा को प्रेम से समझा कर उसे निज स्वरूप का बोध कराना चाहिये।
चिन्तन” द्वारा उसे बोध कराने से हमारा आत्मा जागृत हो सकता है, उतना कठोरता के साधनों से नहीं। जगाता रास्ते पर सोए हुए मनुष्य को सिपाही भी है और घर में सोए हुए बालक को माता भी। किन्तु दोनों के जगाने में महान् अन्तर है। सिपाही जब रास्ते पर सोए हुए मनुष्य को “हंटर” मार कर जगाता है, तो वह मनुष्य जाग तो जाता है, किन्तु उसके शरीर में आलस्य और तन्द्रा ज्यों की त्यों बनी रहती है। उसमें न स्फूर्ति होती है, न उत्साह।
चिन्तन करता है, वही विचार उसके जीवन के अंग बन जाते हैं। यदि मनुष्य के विचार दीन, हीन तथा मलीन हैं, तो वह अवश्य ही दासता प्रिय, दीन अवस्था वाला तथा मलीन विचारों वाला बनेगा और यदि उसके विचार उच्च तथा पवित्र हैं, तो वह अवश्य ही उच्च, पवित्र तथा महान बनेगा। संसार की कोई भी शक्ति उसे उच्च तथा महान बनने से नहीं रोक सकती। इस लिये हमें अपने विचारों को सदा उच्च तथा महान बनाना चाहिए। अपने आत्मा की दिव्य शक्तियों का चिन्तन करना चाहिये।
चिन्तन का अर्थ है अपने आत्म स्वरूप का चिन्तन करना। अर्थात् मैं कौन हूँ? मेरा क्या स्वरूप है? हम भौतिक जगत से मेरा क्या सम्बन्ध है? मेरे अन्दर कौन-2 सी दिव्य शक्तियाँ निहित हैं।
चिन्तन करते हैं, वह स्थान मेरे देखने में नहीं आया, कृपया उस स्थान को भी दिखाइये, उसे देखने के लिये मैं विशेष उत्सुक हूं।”
चिन्तन करते हैं तो प्रतीत होता है,कि हम अपने स्थान से बहुत दूर भटक गये हैं। आवश्यकताएं कभी पूर्ण नहीं हो सकती है, उन्हें जितना ही तृप्त करने का प्रयत्न किया जायेगा उतना ही वे अग्नि में घृत डालने की तरह और अधिक बढ़ती जायेगी। इसलिए इस छाया के पीछे दौड़ने की अपेक्षा उसकी ओर पीठ फेरनी चाहिए और देखना चाहिए की हम कौड़ियों के लिए क्यों मारे फिर रहें हैं, जब कि हमारे अपने घर में भण्डार भरा पड़ा हुआ है। अन्तर में मुँह डालने पर परमात्मा के निकट उपस्थित होने पर वह ताली मिल जाती है,जिससे सुख और शान्ति के अक्षय भण्डार का दरवाजा खुलता है। अपनी वास्तविक स्थिति को जानने से, आत्म स्वरूप को पहचानने से, संसार के स्वरूप का सच्चा ज्ञान होने से शान्ति की शीतल धारा प्रवाहित होती है, जिसके तट पर असन्तोष की ज्वाला जलती हुई नहीं रह सकती।
चिन्तन “ पर प्रकाश डालेंगे। आत्म चिन्तन का अर्थ है अपने आत्म स्वरूप का चिन्तन करना। अर्थात् मैं कौन हूँ? मेरा क्या स्वरूप है? हम भौतिक जगत से मेरा क्या सम्बन्ध है?
चिन्तन करना। अर्थात् मैं कौन हूँ? मेरा क्या स्वरूप है? हम भौतिक जगत से मेरा क्या सम्बन्ध है? मेरे अन्दर कौन-2 सी दिव्य शक्तियाँ निहित हैं।
चिन्तन “ द्वारा अर्थात् माता की तरह प्रेम की लोरियों देकर ही जगाना चाहिये, कठोरता के साधनों से नहीं। इतना ही नहीं प्रत्युत यदि हमारा आत्मा कभी किसी बुराई में भी फँसने लगे, तब भी उसे प्रेम से ही समझाना चाहिये। कि . . “ऐ मेरे प्रिय आत्मन्! ऐसा कुत्सित कर्म तेरे लिये योग्य नहीं। तू महान है, तू ज्ञानवान् है और दिव्य शक्तियों का निधान है। फिर तू ऐसा कुत्सित कर्म क्यों करता है”
चिन्तन इन दोनों की सहायता से ही भक्त के हृदय में अपने आत्मा तथा परमात्मा का प्रकाश होता है। तात्पर्य यह है कि आत्म साक्षात्कार के दूसरे शब्दों में अपनी आत्मिक शक्तियों के विकास के दो ही मुख्य साधन हैं “आत्म चिन्तन” तथा “प्रभु भक्ति”। इस लेख में हम-”आत्म चिन्तन “ पर प्रकाश डालेंगे। आत्म चिन्तन का अर्थ है अपने आत्म स्वरूप का चिन्तन करना। अर्थात् मैं कौन हूँ?
चिन्तन करना चाहिये। दूसरे शब्दों में अपनी आत्मा को मीठी तथा उदात्त लोरियों देकर उसे ऊँचा उठाना तथा जागृत करना चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-September
चिन्तन करती रहती हैं, सौंदर्य की बनाव संभाल पर उनका विशेष ध्यान रहता है, फलस्वरूप ब्रह्मचर्य के अभाव और स्वास्थ्य के निर्बल होने पर भी वे सुन्दर बनी रहती हैं। इसके विपरीत हमारे घरों में जो स्त्रियाँ सौंदर्य पर ध्यान नहीं देती वे वेश्याओं की अपेक्षा अनेक गुनी सुन्दर होने पर भी उतनी आकर्षक नहीं रहती। नाटकों में स्त्रियों का पात्र खेलने वाले नट बहुत उम्र तक सुन्दर बने रहते हैं। इसके विपरीत अपने को बुजुर्ग कहने के उत्सुक बहुत जल्द बुड्ढे हो जाते हैं।
चिन्तन के समक्ष तुच्छ प्रतीत हो।
चिन्तन के और ख्याल पैदा न होते हों। मन में ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ प्रेम हो और उस प्रेम में समय का कुछ ख्याल न हो अलावा इसके पूजा करते समय किसी बात का संकोच पैदा न हो अर्थात् यह ख्याल न हो कि मुझे कोई देख ही नहीं रहा है। ऐसा ख्याल आने से पूजा में त्रुटि अवश्य पड़ जाती है। मतलब यह कि भगवत्-उपासना करते समय मन में सिवाय भगवत् चिन्तन के और कुछ ख्याल ही न पैदा हो अथवा पैदा हो भी तो वह चिन्तन के समक्ष तुच्छ प्रतीत हो।
चिन्तन करके देखो कि तुम कैसे विचार करते हो। जिस प्रकार की इच्छा और आकाँक्षाएं, तुम्हारे मन में उठती रहती हैं, अवश्य ही तुम वह हो। इस समय बाह्य परिस्थितियां दूसरी भले ही हों, पर निकट भविष्य में तुम उसी ढाँचे में ढल जाओगे। विचार साँचे हैं और जीवन गीली मिट्टी, दोनों एक साथ मिले हुए हैं। ऐसा हो नहीं सकता कि साँचे में रखी हुई मिट्टी पर वैसी ही आकृति अंकित न हो जाय।
चिन्तन के और कुछ ख्याल ही न पैदा हो अथवा पैदा हो भी तो वह चिन्तन के समक्ष तुच्छ प्रतीत हो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-March
चिन्तन और आत्म-शोधन का प्रयत्न जो नहीं करते वे आत्मिक दृष्टि से ऊँचे उठ ही नहीं सकते। जिन्हें स्वाध्याय और सत्संग के लिए अवकाश नहीं उन्हें आत्मिक प्रगति में अभी अभिरुचि ही उत्पन्न नहीं हुई ऐसा निश्चित रूप से कहा जा सकता है।
चिन्तन करने वाला होता है उसी प्रकार बाहर से भी सदैव सबके साथ मधुर व्यवहार करने वाला, सहानुभूति रखने वाला तथा विनीत होता है। वास्तव में उसकी आन्तरिक मैत्री-भावना के परिणामस्वरूप उसका स्वभाव ही ऐसा बन जाता है कि वह किसी के प्रति कठोरता अथवा निर्दयता का व्यवहार नहीं कर सकता और जहाँ तब सम्भव होता है। प्रत्येक की सहायता के लिये हमेशा तैयार रहता है। इस कारण अन्य लोगों के हृदय पर भी उसका प्रभाव पड़ता है और सज्जनों का तो कहना ही क्या दुर्जन व्यक्ति भी अधिक समय तक उसके प्रतिकूल नहीं रह सकते। हम जो अनेक सन्त पुरुषों के जीवन वृत्तांतों में किसी विरोधी के द्वारा उनके सताये जाने और अन्त में स्वयं उनके अनुयायी बनकर पूर्ण सहयोग देने का वृत्तांत पढ़ते है, उसका यही रहस्य है।
चिन्तन की प्रवृत्ति बनाने से अपनी प्रतिज्ञा के प्रति जागरुक बने रहना सम्भव है। मृत्यु का सदैव ध्यान बनाये रखने से पथ से गिरने के भय से सहज ही बचा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-April
चिन्तन अजर-अमर की तरह करते हैं तथा मृत्यु का भय प्रशिक्षण स्मरण रखते हुये धर्माचरण करते हैं।
चिन्तन-प्रणाली, भावनाओं पर गहरी प्रति-क्रिया उत्पन्न होती है। इनमें असन्तुलन अव्यवस्था पैदा हो जाती है, जिससे अनेकों दुष्प्रवृत्तियों को पोषण मिलता है, बुरे कहे जाने वाले कार्यों की वृद्धि होती है। तात्पर्य यही है कि अनेकों पाप कर्मों का सूत्रपात हो जाता है और उनसे पैदा होने वाले दुष्परिणाम स्वरूप मनुष्य को नारकीय कष्ट यन्त्रणाओं का पात्र बनना पड़ता है। झूँठ के सम्बन्ध में दूरदर्शी तत्वज्ञ, जीवन विज्ञान विशारद ऋषियों की वाणी, मानव जाति को उनके निर्देश, विज्ञान की कसौटी पर भी खरे उतरे हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-November
चिन्तन करने पर ही पड़ता है लेकिन चित्र तो देखने पर ही मनुष्य को प्रभावित करता है। गन्दे-अश्लील चित्र देखने से बचें। गाँधीजी के बन्दर की तरह बुराई की ओर से आँख मींचलें और अच्छाई को देखें।
चिन्तन के द्वारा पूजा करने पर तत्काल ही वरदान पाया जा सकता है। हमें नियमित रूप से सद्ग्रन्थों का अवलोकन करना चाहिए। उत्तम पुस्तकों का स्वाध्याय जीवन का आवश्यक कर्तव्य बना लेना चाहिए।
चिन्तनीय समस्या है।
चिन्तन में लीन किसी महापुरुष का चित्र देखकर उससे मनुष्य को गम्भीरता शान्ति की प्रेरणा मिलती है। किसी वीर योद्धा का चित्र देख कर हृदय में शौर्य और साहस के भाव उत्पन्न होते हैं। किसी जनसेवी, परमार्थ परायण शहीद की प्रतिमा देख कर समाज के लिए मर मिटने की भावना जागृत होती है। किसी देवी-देवता या अवतार की प्रतिमा देखकर, किसी मन्दिर, मस्जिद, गिर्जाघर में जाने पर, परमात्मा और उसके दिव्य गुणों का स्मरण होता है। ठीक इसी तरह भद्दे अश्लील कहे जाने वाले, अर्द्धनग्न, असामाजिक, हाव-भाव मुद्रा तथा शारीरिक अंगों के भड़कीले प्रदर्शन वाले चित्र मनुष्य में कई नैतिक बुराइयाँ पैदा करते हैं।
चिन्तनीय विषय है। स्त्रियों का आधुनिक पहनावा इतना फूहड़ और भड़कीला हो रहा है कि हर शर्मदार की आँखें नीची हो जाती हैं। दुराचार को प्रोत्साहन देने में सिनेमा, नाच, अश्लील गाने जितने आवश्यक हो रहे हैं- वस्त्र-सज्जा, उससे कहीं अधिक ही है। हमारी बच्चियाँ अब उन वस्त्रों की ओर अधिक आकर्षित होती हैं जो विचित्र प्रकार के रंग रंगीले तथा आधे- छोटे होते हैं। स्त्रियों के वस्त्र ऐसे होने चाहिएं जिनसे उनका अधिकाँश शरीर ढका रहे किन्तु वस्तु स्थिति इससे सर्वथा विपरीत है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-December
चिन्तन-क्रिया को खाद्य मिलता है। विचार करने के लिए आधार मिलते हैं। अतः पढ़ना अवश्य चाहिए, विद्वानों का सहयोग लेकर उनसे विचार-विमर्श भी करना ही चाहिए। लेकिन पढ़ी हुई या सुनी हुई, सभी बातों को ध्रुव-सत्य मान कर उसका अनुकरण करना भारी भूल होगी। इस तरह का अन्धानुकरण ही मानसिक गुलामी है, विचारों की पराधीनता है।
चिन्तन के लिए मनुष्य को चरित्र-बल, नैतिक-बल की भी आवश्यकता होती है। चरित्र-हीन, अनैतिक व्यक्ति का मन, प्रतिभा, बुद्धि सब निर्बल अवस्था में होते हैं। स्वतन्त्र विचारों को ग्रहण करने की, साधना करने की क्षमता ही नहीं रहती, ऐसे लोगों में। इससे चरित्र की दृढ़ता, मन की सबलता स्वतन्त्र चिन्तन के लिए अत्यावश्यक है। जिस तरह गंगा को धारण करने के लिए—शिवजी जैसे सामर्थ्यवान् व्यक्तित्व की आवश्यकता हुई, ठीक इसी तरह अन्तराकाश से आने वाली वेगयुक्त विचार-गंगा को धारण करने के लिए सबल मस्तिष्क, सशक्त मन, बुद्धि की आवश्यकता होती है।
चिन्तन - सत्य की प्राप्ति का राज- मार्ग है, मौन— आध्यात्मिक विकास का सोपान है, मौन- जीवन में समस्वर सामञ्जस्य पैदा करने का मन्त्र है। मौन- जीवन, जगत, प्रकृति, परमेश्वर के रहस्यों की खुली किताब है। जगत के अपार कोलाहल के बीच, जीवन यात्रा के संघर्षमय क्षणों में ही हमें मौन की साधना करनी होगी, तभी वह अपने अमूल्य वरदानों से हमें कृतार्थ कर सकेगी।
चिन्तन के लिए अत्यावश्यक है। जिस तरह गंगा को धारण करने के लिए—शिवजी जैसे सामर्थ्यवान् व्यक्तित्व की आवश्यकता हुई, ठीक इसी तरह अन्तराकाश से आने वाली वेगयुक्त विचार-गंगा को धारण करने के लिए सबल मस्तिष्क, सशक्त मन, बुद्धि की आवश्यकता होती है। चरित्रहीन व्यक्तियों को तो निस्संदेह दूसरों के विचारों का गुलाम बनना ही पड़ता है।
चिन्तन और मौलिक विचारों के आधार पर ही मनुष्य अपने मन का समाधान कर सकता है, अपने जीवन की समस्याओं को सुलझा सकता है, अपना सही मार्ग निर्धारण कर सकता है। हर नये पैदा होने वाले पौधे को स्वयं अपनी ही जड़ों पर खड़ा होना पड़ता है। धरती से स्वयं को ही जीवन-रस खींचना पड़ता है। जिस तरह शरीर के क्षेत्र में मनुष्य को स्वयं समर्थ होकर अपने ही ऊपर जीवन निर्वाह करना पड़ता है, उसी तरह विचार के क्षेत्र में भी स्वाधीन हुए बिना मनुष्य का समाधान नहीं होता। जीवन-निर्वाह के लिए दूसरों के सहारे रहना पराधीनता है, इसी तरह मन बुद्धि विवेक को ताला लगाकर किसी बात को, विचार को मान लेना भी मानसिक पराधीनता है, विचारों की गुलामी है।
चिन्तन द्वारा स्वीकार कर लिया गया हो।”
चिन्तन में मनुष्य की शक्ति बड़ी तेजी से जलने लगती है। यही कारण है कि निराश व्यक्ति जल्दी ही कमजोर, रुग्ण और अशक्त पाये जाते हैं। नियमानुसार रचनात्मक कार्य और विचारों से शक्तियाँ विकसित होती हैं। लेकिन निषेधात्मक विचार और हीन मान्यता से शक्ति का क्षय होने लगता है।
चिन्तन की आवश्यकता होती है।
चिन्तन करते रहते हैं। इसी कारण उनके मस्तिष्क में निरन्तर द्वंद्व छिड़ा रहता है। कामुकतापूर्ण विचारों वाला व्यक्ति सदैव वैसे ही विचारों से घिरा रहता है, थोड़े से विचार आत्म-कल्याण के बनाता भी है तो अनिश्चयात्मक बुद्धि के कारण तरह-तरह के संशय उठते रहते हैं। जब तक एक तरह के विचार परिपक्व नहीं होते, तब तक उस दिशा में अपेक्षित प्रयास भी नहीं बन पाते। यही कारण है कि मनुष्य किसी भी क्षेत्र में प्रगति नहीं कर पाता।
चिन्तन का स्वतन्त्र विचार क्षमता का अवलम्बन लेना पड़ेगा। इसके सिवाय अन्य कोई रास्ता नहीं है। अपनी प्रकृतिदत्त बुद्धि, विवेक, प्रतिभा से विचारों की गुलामी का पर्दा हटाना होगा, तभी आप स्वतन्त्र निर्णय शक्ति के अधिकारी बनेंगे।
चिन्तन ही ईश्वर साक्षात्कार नहीं।
चिन्तन-मनन करने वाले ऋषि महात्माओं के आशीर्वाद वरदान, का सत्य इसी मौन के निहित में रहा है। वाणी का संयम मौन वाणी में ओज, तेज, शक्ति , चैतन्य भर देता है।
चिन्तन के लिए—स्वतन्त्र विचारों की साधना के लिए सबसे आवश्यक और महत्वपूर्ण जो बात है,वह यह कि अपनी अन्तरात्मा की वाणी सुनें। हमारी आत्मा निरन्तर बोलती है, कहती है, हमें परामर्श देती है। उसे सुनने का यदि हम प्रयत्न करें तो कोई कारण नहीं कि हम अपनी समस्याओं और शंकाओं का समाधान न कर सकें, हम अपना मार्ग न ढूँढ़ सकें।
चिन्तन करते हैं और उन्हीं में तृप्ति अनुभव करते हैं। मन को जब किसी विषय में रुचि नहीं होती तभी वह अन्यत्र भागता है। विषयों की ओर भटकता हुआ मन ही दुख का कारण होता है। इस अवस्था से तब तक छुटकारा नहीं पा सकते जब तक मन की लगाम नहीं खींचते और उसे कल्याणकारी विषयों में नहीं लगाते। प्रसिद्ध दार्शनिक बर्क का यह कथन बिलकुल सत्य प्रतीत होता है— ‘मनुष्य पानी जैसी चञ्चलता से ऊपर नहीं उठता है’ इन शब्दों में मन के इधर-उधर भागते रहने के फलस्वरूप जो मनुष्य का पतन होता है उसी की ओर संकेत है।
चिन्तन मन को एकान्त में स्वयं करना पड़ता है। शरीर का दर्पण अभी तक कोई नहीं बना और न बनेगा। जो व्यक्ति छिद्रान्वेषण करते हैं, वे प्रायः छिप कर करते हैं। पीठ पीछे सब एक दूसरे को भला- बुरा कह लेते हैं, हमारी बात-चीत का विषय ही प्रायः पर-निन्दा होता है। मन में दुर्भावना रहते हुए अक्सर लोग चापलूसी भरी प्रशंसा करते रहते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-January
चिन्तन करता है। सुख में मनुष्य का हृदय संवेदना रहित कठोर बन जाता है और मनुष्य ईश्वर को भूल जाता है।” दुखों में ही अपने भले-बुरे विचार सकने का विवेक पैदा होता है। रहीम जी ने कहा है-
चिन्तन, शान शौकत आदि बढ़ जाते हैं जो सम्पूर्ण जीवन को विकारमय बना देते हैं और इनके कारण मनुष्य को अनेकों कष्टों का सामना करना पड़ता है।
चिन्तन, आत्म-मनन, आत्म निरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म-विकास की सीढ़ियों पर चढ़े बिना ही क्या किसी का आत्म-कल्याण के लक्ष्य तक पहुँच सकना संभव है? पर जल्दबाज लोग कुछ थोड़ा-सा पूजा, पाठ, दर्शन, झाँकी, दान, दक्षिणा मात्र का सस्ता आधार लेकर जल्दी ही स्वर्ग मुक्ति प्राप्त कर लेना चाहते हैं। इन बेचारों को भला क्या कुछ हाथ लगता होगा?
चिन्तन के द्वारा मनुष्य विचार करे तो उस भौतिक बाह्य जगत के प्रत्येक क्रिया-कलाप के अंतर्गत एक शक्ति काम करती हुई मालूम पड़ेगी। एक नियत विधान के अनुसार संसार के कार्यों का नियमन, संचालन होता दिखाई देगा। आग छूने पर जला देती है। पानी गीला कर देता है। विद्युत छूने पर प्राण हरण कर लेती है।
चिन्तन द्वारा देखा जाय तो मालूम पड़ता है कि जगत और इसके प्रत्येक कार्य-कलाप के पीछे एक चेतनसत्ता काम कर रही है जो नियामक है।” भारतीय मनीषियों ने तो बहुत पहले ही इस तथ्य की अनुभूति प्राप्त कर ली थी। भारतीय दर्शन तो पद-पद पर इस विश्व-विधायक सत्ता को स्वीकार करके ही आगे बढ़ता है।
चिन्तन, मनन, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग जैसे कार्यक्रमों में व्यस्त रहे। मनोभूमि पर विक्षोभजन्य प्रभाव उत्पन्न न हो तो ही व्रत का पूरा लाभ मिलता है। व्यवसायिक कार्यों में प्रायः झूठ, चोरी, कर्त्तव्य में ढील, राग-द्वेष, लोभ तृष्णा क्रोध-वासना जैसे दोषों का समावेश बना रहता है। इसलिये अच्छा यही है कि व्रत के उपयुक्त स्थान तलाश किया जाय और उन दिनों छुट्टी लेकर आध्यात्मिक जीवन का लाभ लिया जाय।
चिन्तन करते रहने से मनुष्य का मानसिक तथा आत्मिक बल खोखला हो जाता है। शारीरिक दृष्टि से चाहे वह बलवान और आकर्षक जान पड़े, पर नैतिकता, साहस, धैर्य आदि का सर्वथा अभाव हो जाता है। ब्रह्मचर्य और संयम के द्वारा मनुष्य के भीतर से एक प्रकार की शक्ति विद्युत या चुम्बक की-सी पैदा होती है वह इस प्रकार के निकृष्ट विचारों तथा आचार द्वारा जाती रहती है। ऐसे व्यक्ति अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ नहीं रह सकते और न किसी कठिन परिस्थिति में धैर्यपूर्वक उसका मुकाबला कर सकते हैं। चिन्ता, निराशा, आशंका, अविश्वास आदि की भावनायें सदैव उनमें उत्पन्न हुआ करती हैं।
चिन्तन करता रहता है और उनकी पूर्ति में असमर्थ रहता है उसकी विचारधारा दिन पर दिन भ्रष्ट और निकृष्ट होती जाती है और उसका पतन होना और भी अधिक संभव और सुगम होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-June
चिन्तन करते हैं ऐसे लोग पथभ्रष्ट हो जाते हैं। योगभ्रष्ट होने वाले साधक इसी श्रेणी के होते हैं।
चिन्तन मात्र से ही अनेकानेक मानसिक जटिलताएं उत्पन्न हो जाती हैं और मनुष्य अपने श्रेय पथ से विचलित हो जाता है।
चिन्तन, नियमित, व्यवस्थित जीवन, शाँत, गंभीर, सुलझी हुई, राग द्वेष-हीन मनोभूमि चरित्र के परोक्ष अंग हैं। संक्षेप में आत्म-त्याग और अध्यवसाय चरित्र के महत्वपूर्ण आधार स्तंभ हैं। अपने विचार मनोभाव, चेष्टाओं पर अपना नियंत्रण रखना, बुराइयों को छोड़कर जीवन में अच्छाइयों को महत्व देना, आत्म-संयम है। दूसरों के हित कल्याण के लिए अपने सुख और लाभ का ध्यान न रखकर पूरा-पूरा प्रयत्न करना आत्म-त्याग है। जीवन शोधन परमार्थ एवं अपने लक्ष्य पथ पर आगे बढ़ने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना अध्यवसाय है।
चिन्तन तक तो जीवन में कई तरह की विषमतायें पैदा कर देता है। शास्त्रकार ने लिखा है-
चिन्तनम्।
चिन्तन, निष्कामता, निराशा न होना यह जप की सफलता के प्रधान आधार हैं।
चिन्तन एवं योग साधन करना चाहिए, पर इसके लिए घर छोड़कर भाग खड़े होने या सामाजिक उत्तरदायित्वों को तिलाँजलि देने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है।
चिन्तन के आधार पर इन्हें जाना जाय और अपने व्यवहार, कार्यप्रणाली से अंध विश्वासों को दूर किया जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-September
चिन्तन और मनन का, तप और आदर्श का मूर्तिमान प्रतिफल ही कहे जा सकने योग्य है।
चिन्तन
चिन्तन, गृहकार्य आदि का एक बंधा हुआ समय हो। और ठीक समय पर अपने काम में लग जाना चाहिए। पत्रों का उत्तर तत्काल दें। दिए हुए समय पर लोगों से मिलने जायें। अपने दैनिक जीवन में छोटे- छोटे कार्यों में भी नियमितता बरतें, समय के पाबन्द बनें।
चिन्तन में लीन हो जाना आवश्यक है। जब मनुष्य ऐसा नहीं करता, तब भी उक्त प्रकार का असन्तोष पैदा हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-October
चिन्तन का ही परिणाम है।
चिन्तन, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास आवश्यक हैं। ‘व्यक्ति को अपना व्यक्तित्व समष्टि की सत्ता में समर्पित करना चाहिए।’ इस लक्ष्य को लेकर वे पाण्डिचेरी गये और व्यक्ति गत स्वार्थ के लिए नहीं, विश्व-मानव के पुनरुत्थान के लिए वैसा ही तप करने लगे जैसा कि भगीरथ ने गंगा को लाने के लिए किया था। वे भारत भूमि में आध्यात्म की ऐसी ज्ञान गंगा का अवतरण करना चाहते थे जो मानव-जाति के समस्त कषाय कल्मषों को धोकर शुद्ध कर सके। उनने अपने लक्ष्य के प्रति आस्था प्रकट करते हुए कहा है— भारत ही विश्व का नेतृत्व करेगा।
चिन्तन, शोध, प्रयोग, अनुभवों की उपज है। हिन्दू-धर्म का प्रवर्तक कोई एक व्यक्ति नहीं रहा है। यह एक बहुत बड़े विद्वत् समाज की वैज्ञानिक शोध का परिणाम है। इसीलिए हिन्दू-धर्म किन्हीं बँधी बँधायी लकीरों, मान्यताओं पर नहीं चलता वरन् वह ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है जो कभी नहीं बदलते।
चिन्तन एवं मनन द्वारा समय-समय पर यह विचार करते रहना चाहिए कि इस आस्था को जीवन में कितना उतार लिया गया तथा कितना उतारना शेष है। जो शेष हो उसकी पूर्ति के लिए रोज ही सोचना चाहिए और रोज ही एक कदम आगे बढ़ाना चाहिए। ‘सत्संकल्प’ के अनुरूप जीवन ढाल लेने में सफलता प्राप्त कर लेने की स्थिति को यदि ‘जीवन मुक्ति’ कहा जाय तो उसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। मुक्त पुरुष का अन्तःकरण कैसा हो सकता है? उसकी गतिविधियाँ कैसी रह सकती हैं?
चिन्तन करना, क्रोध आते ही अपने से भी वैसी ही भूलें होते रहने की बात सोचना और जिस पर क्रोध किया जा रहा है, उसके प्रति ममता आत्मीयता का आरोपण करने लगना, इन उपायों से दुष्ट विचारों को सद्विचारों से काटा जा सकता है। संघर्ष किये बिना कुविचार हटाये नहीं जा सकते। इसलिए अपनी दुर्वासनाओं के विरुद्ध सद्भावनाओं की सेना तैयार कर लेनी चाहिए और यह नोट कर रखना चाहिए कि जब अमुक प्रकार के कुविचार उठेंगे तब उनका प्रतिरोध अमुक प्रकार के सद्विचारों से किया करेंगे। अवसर आते ही उनका प्रयोग भी आरम्भ कर देना चाहिए।
चिन्तन, परिपूर्णता और सुख की प्राप्ति सत्य से होती है। जब तक लोग पारस्परिक विश्वास प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक किसी प्रकार का कारबार चला नहीं सकते। किसी से अधिक देर तक संपर्क भी इस प्रकार नहीं रखा जा सकता। असत्य के अन्धकार में जब तक वस्तु स्थिति ठीक प्रकार जान नहीं पड़ती तब तक भ्रमवश कोई विश्वास भले ही प्राप्त कर ले किन्तु सत्य का प्रकाश उदय होते ही विद्रूप उत्पन्न हो जायेगा। घृणा और तिरस्कार, निन्दा और निरादर की परिस्थितियाँ आते देर न लगेगी।
चिन्तन मनन अध्ययन करके धर्म का निर्माण करते हैं। तात्पर्य है कि हमारा धर्म, हमारी संस्कृति विचार प्रधान है बुद्धि प्रधान है- वेद-प्रधान है। अर्थात् ज्ञान के द्वारा प्रेरित है। वह किसी प्रकार के आग्रह को लेकर नहीं चलती।
चिन्तन करते हुए उन्हें अपने जीवन में धारण करने की आस्था बनाते हुए यह संकल्प किया गया है कि परमात्मा के अनुग्रह एवं वरदान की एक मात्र विभूति ‘सद्बुद्धि’ को भी हम प्राप्त करते रहेंगे। अपने जीवन को उस ढाँचे में ढालेंगे, जिसमें कि सद्बुद्धि सम्पन्न महामानव अपने को ढालते चले आये हैं। उसी संकल्प को बार-बार पूरी निष्ठा और भावनापूर्वक दुहराने का नाम गायत्री जप है। जप का सच्चा स्वरूप समझते हुए जो उस उपासना को करते हैं, वे उसका अनिर्वचनीय लाभ प्राप्त भी कर लेते हैं। वे इस अमृत को पाकर अमर बन जाते हैं और इस मृत्यु-लोक में रहते हुए भी दिव्य-लोक में निवास करने का स्वर्गीय आनन्द पग-पग पर अनुभव करने लगते हैं।
चिन्तन मनन करना चाहिए। मनोमय कोश की यह साधना गत वर्षों में बताई जा चुकी है।
चिन्तन करके संसार को समाजवाद की नई दृष्टि प्रदान करने वाला मार्क्स, चार्ल्स डार्विन, दयानन्द, गाँधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, अरविन्द, लोकमान्य तिलक, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, ये सब ऋषि परम्परा के ही तो ज्योर्तिदीप थे। ऋषियों का कोई युग नहीं होता, वे हर युग में ज्ञान की नई-नई शोध, संस्करण करके अवतरित होते रहते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-August
चिन्तन व शुभकर्मों से आन्तरिक सौंदर्य के दर्शन होते हैं श्री, समृद्धि और सफलता का सुख मिलता है।
चिन्तन और मनन में संलग्न रहकर अधिक मनोबल संग्रह करते रहे और वहाँ भी उनने कुछ ग्रन्थों की रचना कर डाली।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-July
चिन्तन का आधार होना चाहिये। घटना-पदार्थों के मध्य भी अनन्त सत्य का दर्शन हमारे जीवन का ध्येय, हमारी साधना का लक्ष्य हो।
चिन्तन के लिए हममें से हर एक को अपने से निम्न प्रश्न पूछने चाहिए और उनके उत्तरों को नोट करना चाहिए।
चिन्तन के लिए रात को सोते समय का अवसर सर्वोत्तम है। शैय्या पर जाते ही तुरन्त किसी को नींद नहीं आ जाती, इसमें कुछ देर लगती है। इस अवसर को आत्म-चिन्तन में, अपने आपसे 10 प्रश्न पूछने और उनके उत्तर प्राप्त करने में लगाया जा सकता है। जिनके पास अन्य सुविधा के समय मौजूद हों वे इन कार्यों को सुविधा के अन्य समयों पर भी कर सकते हैं। पर उपरोक्त दो समय व्यस्त से व्यस्त सज्जनों के लिए भी सुविधाजनक रह सकते हैं और इन दोनों प्रक्रियाओं को अपना कर हम आसानी ये आत्मिक प्रगति के पथ पर बहुत आगे तक बढ़ सकते हैं।
चिन्तन करना चाहिए।”
चिन्तन एवं दिनचर्या निर्धारण के लिए एक समय निर्धारित किया जाय। दिनचर्या निर्धारण के लिए, प्रातः सोकर उठते ही जब तक शैय्या त्याग न किया जाय वह समय सर्वोत्तम है। आमतौर से नींद खुलने के कुछ देर बाद ही लोग शैय्या त्यागते हैं। कुछ समय तो ऐसे ही आलस में पड़े रहते हैं। यह समय दैनिक कार्यक्रम बनाने के लिए सर्वोत्तम है।
चिन्तन में जो-जो दोष दृष्टिगोचर हों उन्हें सुधारने के लिए एक क्रम-बद्ध योजना बनाकर आगे बढ़ चले।
चिन्तन, स्वाध्याय को अपने नित्य-नियम मं स्थान दे रखा है न?
चिन्तन में, अपने आपसे 10 प्रश्न पूछने और उनके उत्तर प्राप्त करने में लगाया जा सकता है। जिनके पास अन्य सुविधा के समय मौजूद हों वे इन कार्यों को सुविधा के अन्य समयों पर भी कर सकते हैं। पर उपरोक्त दो समय व्यस्त से व्यस्त सज्जनों के लिए भी सुविधाजनक रह सकते हैं और इन दोनों प्रक्रियाओं को अपना कर हम आसानी ये आत्मिक प्रगति के पथ पर बहुत आगे तक बढ़ सकते हैं।
चिन्तन की प्रवृत्ति हो तो हमारे कार्यों में भ्रष्टाचार घुस नहीं सकता। हमारी आत्मा इस आत्मघाती बुराई के लिए आज्ञा नहीं दे सकती।
चिन्तन का आधार बनाना पड़ेगा।
चिन्तन करता हुआ नारायण एक देवालय में निवास करने लगा। यवन शासन में फैले अनाचार को मिटाकर धर्म संस्थापना की भावना आँखों में से आँसू बन कर उमड़ रही थी। वह यही सोचने में लगा रहता कि आखिर करे तो क्या करे? जो सन्त-महात्मा उधर रहते थे वे संसार को माया और मिथ्या बताकर दुनिया को अपने भाग्य पर मरने के लिए छोड़ने और आनन्द से भजन करने का उपदेश देते। पर ऐसी स्वार्थपरता उन्हें कहाँ पसन्द आती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-May
चिन्तन में वर्तमान की उपेक्षा और उसके प्रति असंतोष पैदा कर लेना, सफलता और सुख-शाँति का द्वार बंद कर लेना है। स्मरण रखिए वर्तमान के प्रति जागरुक और सचेष्ट रहकर ही आप भविष्य की मनोहर कल्पना को साकार कर पायेंगे। वर्तमान की कद्र कीजिए, उसका उपयोग कीजिए, भविष्य के निर्माण में वर्तमान को आधार बनाइये, एक दिन आप सचमुच अपने भविष्य का साकार दर्शन कर सकेंगे।
चिन्तन और अस्वस्थ मनोस्थिति ही हमारे सामने सुरक्षा की तरह मुँह बायें खड़ी समस्याओं, शिकायतों का प्रमुख कारण होती हैं। कभी-कभी हम एक ही विषय पर बहुत अधिक सोच-विचार करने लगते हैं जिससे जीवन के अन्य अंग अविकसित ही रह जाते हैं।
चिन्तन मनन भक्ति द्वारा मनुष्य प्रकृति के नियमों का उल्लंघन कर मुक्त हो सकते हैं।
चिन्तन मनन-
चिन्तन। का सहज आधार होती हैं अपनी कठिनाइयाँ। अतीत की दुःख घटनाएं मनुष्य के सुखी जीवन में भी दुःख, परेशानियों का संचार कर देती हैं। इससे जीवन की उर्वरता नष्ट होती है। शक्तियाँ पंगु हो जाती है जिससे भावी संभावनाएं भी दफन हो जाती हैं।
चिन्तन करें और घर के प्रत्येक सदस्य को उस विचारधारा के संपर्क में लावें। यह प्रक्रिया ठीक प्रकार चलती है या नहीं, इसके लिए भी सक्रिय कार्यकर्ताओं को, शाखा संचालकों को, अपने कंधे पर ही उत्तरदायित्व वहन करना पड़ेगा। प्रगति के लिए इस विधि-व्यवस्था को कार्यान्वित किये बिना और किसी प्रकार काम न चलेगा।
चिन्तन दरअसल मनुष्य के चिन्तन। का सहज आधार होती हैं अपनी कठिनाइयाँ। अतीत की दुःख घटनाएं मनुष्य के सुखी जीवन में भी दुःख, परेशानियों का संचार कर देती हैं। इससे जीवन की उर्वरता नष्ट होती है। शक्तियाँ पंगु हो जाती है जिससे भावी संभावनाएं भी दफन हो जाती हैं।
चिन्तन मनन में समुचित समय लगाते हुए अपनी अन्तःभूमिका को अधिकाधिक परिष्कृत करने का प्रयत्न करें। (2) ईश्वर उपासना में अधिक मन लगावें। (3) अपने स्वभाव और संस्कारों को परमार्थ वृत्ति से सम्पन्न करने के लिए लोक-सेवा के कार्यक्रमों को विशुद्ध अध्यात्मिक साधना मानते हुए जन-कल्याण की प्रवृत्तियों में पूरे उत्साह के साथ भाग ले। संयम, सदाचार, त्याग, उदारता, निर्लोभता और निरहंकारता का सतर्कतापूर्वक अभ्यास करें। यह तीनों बातें जिनके जीवन क्रम का अंश बन गई समझना चाहिए कि वानप्रस्थ धर्म अपनाते हुए उसने मानव-जीवन की सफलता का द्वार प्रशस्त कर लिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-February
चिन्तन करना चाहिए। इसी तरह उत्सव के दिन भी होते हैं- जैसे शरदोत्सव, वसन्तोत्सव। पिछले काल में हमने किया, इसको सोचने के ये मौके हैं। इनमें एक मौका जन्म दिन का भी है।
चिन्तन ईश्वर जीव-प्रकृति की उच्च से आरम्भ नहीं किया जा सकता। कदम तो क्रमशः ही उठाये जाते हैं। नीचे की सीढ़ियों को पार करते हुए ही ऊपर को चढ़ा जा सकता है। सोऽहम्, शिवोऽहम् की ध्वनि करने से पूर्व, अपने को सच्चिदानन्द ब्रह्म मानने से पूर्व हमें साधारण जीवन पर विचार करने की आवश्यकता पड़ेगी और यह देखना पड़ेगा कि ईश्वर का पुत्र-जीव आज कितने दोष दुर्गुणों से ग्रसित होकर पामरता का उद्विग्न जीवन-यापन कर रहा है। माया के बन्धनों ने उसे कितनी बुरी तरह जकड़ रखा है और षडरिपु पग-पग पर कैसा त्रास कर रहे हैं।
चिन्तन
चिन्तन ही साधना का प्रथम सोपान कहा जाता है। यह चिन्तन ईश्वर जीव-प्रकृति की उच्च से आरम्भ नहीं किया जा सकता। कदम तो क्रमशः ही उठाये जाते हैं। नीचे की सीढ़ियों को पार करते हुए ही ऊपर को चढ़ा जा सकता है। सोऽहम्, शिवोऽहम् की ध्वनि करने से पूर्व, अपने को सच्चिदानन्द ब्रह्म मानने से पूर्व हमें साधारण जीवन पर विचार करने की आवश्यकता पड़ेगी और यह देखना पड़ेगा कि ईश्वर का पुत्र-जीव आज कितने दोष दुर्गुणों से ग्रसित होकर पामरता का उद्विग्न जीवन-यापन कर रहा है।
चिन्तन की साधना करनी पड़ती है। ब्रह्मचर्य, तप, त्याग, सत्य, अहिंसा आदि उच्चतम आध्यात्मिक तत्वों को अपनाने से पहले उसे छोटी-छोटी त्रुटिओं को संभालना होता है। परीक्षार्थी पहले सरल प्रश्नों को हाथ में लेते हैं और कठिन प्रश्नों को अन्त के लिए छोड़ रखते हैं। लड़कियाँ गृहस्थ की शिक्षा गुड़ियों के खेल से आरम्भ करती हैं। युद्ध में शस्त्र चलाने की निपुणता पहले साधारण खेल के रूप में उसका अभ्यास करके ही की जाती है।
चिन्तन की साधना भी आरम्भ करनी चाहिए और उसका श्रीगणेश तप-त्याग जैसे उच्च आदर्शों से नहीं, गुण-धर्म स्वभाव का मानवोचित परिष्कार करते हुए व्यक्तित्व को सुविकसित करने में संलग्न होकर करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-March
चिन्तन से सुखी नहीं बना सकता, अर्थात् उसके मन में आध्यात्मिक विचारों का अभाव है उसे बलात् बकवादी बनना पड़ता है। जो व्यक्ति समाज में रहने को जितना अधिक उत्सुक है वह अपने आप में उतना ही अधिक दुखी होता है। अपने दुःख को भुलाने और अपनी आन्तरिक अशाँति का विस्मरण करने के लिए ही मनुष्य बकवाद की शरण लेता है। पर इस प्रकार उसकी शक्ति का और भी ह्रास होता है और उसमें आनन्द प्राप्ति की योग्यता और भी कम हो जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-November
चिन्तन करने से कामवासना प्रबल होती जाती है। इस रागात्मक मनोवृत्ति के विनाश के लिए रूप के दुर्गुणों पर विचार करना आवश्यक है। मुर्दे की कल्पना से संसार के रूपवान व्यक्तियों के प्रति आकर्षण नहीं रहता। इसी प्रकार धन और मान आदि के दुर्गुणों पर चिन्तन करने से इनके प्रति भी विरक्ति सी हो जाती है।
चिन्तन करता हुआ ऐसा ध्यान करें कि शत्रु के केशों को पकड़ कर अपने त्रिशूल से उसका नाश कर रही है। इसी ध्यान में जप और हवन करने से शत्रुओं का नाश होता है।
चिन्तन करने से इनके प्रति भी विरक्ति सी हो जाती है।
चिन्तन करने वाले व्यक्ति को उन्हीं विचारों में रस मिलता है। ज्ञान चर्चा उसके लिए रसहीन होती है। ज्ञान चर्चा मनुष्य की इच्छाओं का नियंत्रण करती है, उनकी तृप्ति नहीं करती। अतएव इस प्रकार की चर्चा में आनंद की अनुभूति करना एक स्वाभाविक सी बात होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-October
चिन्तन, मनन और अध्ययन का भी समावेश पाते हैं। स्वयं जब हम परिश्रम के द्वारा किसी वस्तु विशेष का समाधान करते हुए उत्तरोत्तर उन्नतोन्मुख होकर किसी नवीन वस्तु की खोज के निष्कर्ष पर पहुँचते हैं तब उसको हम स्वाध्याय द्वारा उपार्जित वस्तु कहते हैं। नवीनता का समारम्भ किसी स्वाध्यायी व्यक्ति द्वारा हुआ और उसकी अविरल तारतम्यता उन्हीं के द्वारा चल रही है। उत्तरोत्तर नवीनता का आविष्कार होने का अर्थ है उन्नति के सोपान पर आरोहण। स्वाध्याय द्वारा प्राप्त ज्ञान वास्तव में ज्ञान होता है।
चिन्तन की आवश्यकता है। हम अपने दुर्गुणों को जितना ही दूर करेंगे हमारे जीवन में कठिनाइयाँ उतनी ही कम होती जायेंगी। यदि आप मृदुभाषी और व्यवहार कुशल हैं तो आपके मित्र सदैव आपके कल्याण के लिये तत्पर रहेंगे। सभी लोग आपसे प्रेम करेंगे, आपकी कठिनाइयों को दूर करने में सहायता देंगे। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति झगड़ालू और क्रोधी स्वभाव का है तो उसे पग-पग पर अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
चिन्तन करो और शाँत रहो। मन को शान्त करो, उठते हुए भावों को ताकि बकवादी विचारों को चुप कर दो। अपने हृदय को भीतरी भागों में ले जाओ और अनन्त शान्ति का अनुभव करो। यह मौन रहस्यमय है। इस मौन में प्रवेश करो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-February
चिन्तन और दैवी सम्पत्ति बढ़ रही है, तो हमारी भक्ति मार्ग में उन्नति हो रही है। यदि जगत का चिन्तन है, और दैवी सम्पत्ति का अभाव है तो हमारी निश्चय ही अवनति हो रही है। दोनों का परस्पर में विरोध है, माना जाय कि हमारा मुख जगत की ओर, तो भगवान की ओर पीठ ही होगी, अगर भगवान की ओर मुख करें, तो पीठ जगत की ओर ही रहेगी। यह विलक्षण बात है।
चिन्तन।
चिन्तन के सम्बंध में भी वह इसी उपमा का प्रयोग कर सकता था। आत्म चिन्तन से हम क्षुद्र विचारों से ऊपर उठ जाते हैं, और पहचान सकते हैं कि कौन बात महत्वपूर्ण है और कौन महत्वहीन। इससे अनुभव का आध्यात्मिक भाव स्पष्ट हो जाता है।
चिन्तन की क्रिया आरंभ करने के लिए केवल इतनी ही बात की आवश्यकता है कि मन को ठीक मार्ग पर धकेल दिया जाय। यह प्रारंभिक निर्देशक मन को सार्वभौमिक और व्यक्तित्व शून्य की दिशा में ऊपर की ओर बाहर की ओर ले जाने वाला हो, न कि विशेष आत्म-केन्द्रस्थ की दिशा में नीचे की या भीतर की ओर।
चिन्तन से बड़ी सहायता मिलती है। बच्चा, बूढ़ा, स्त्री, पुरुष जो भी चाहे अपने अवकाश के समय को बड़ी सरलता से चिन्तन में लगा सकता है। बुद्धिपूर्वक सोच समझकर जीवन बिताने के लिए चिन्तन का महत्व है।
चिन्तन में अपने पंख खुले छोड़ दिये हैं।
चिन्तन से नवशक्ति एवं विश्राम मिलता है, आने वाली आवश्यकताओं के लिए शक्ति रक्षित होती है, और जीवन को संतुलित और लचीला बनाये रखने में सहायता मिलती है। इसके द्वारा हम बहुधा अपने अच्छे बुरे कर्मों पर पुनर्विचार कर सकते हैं। इस क्रिया से आन्तरिक विकास में बड़ी सहायता मिलती है।
चिन्तन भक्त का धर्म है और दैवी सम्पदा के गुण उसकी जीवन पद्धति है। वह सब कुछ छोड़ देता है, पर इन गुणों को कदापि नहीं छोड़ता, यह निश्चय है कि वह किसी प्रकार की भी, आसक्ति, ममता, कामना, अहंकार, मोहवश जीवन पद्धति को नहीं बदलता।
चिन्तन है, और दैवी सम्पत्ति का अभाव है तो हमारी निश्चय ही अवनति हो रही है। दोनों का परस्पर में विरोध है, माना जाय कि हमारा मुख जगत की ओर, तो भगवान की ओर पीठ ही होगी, अगर भगवान की ओर मुख करें, तो पीठ जगत की ओर ही रहेगी। यह विलक्षण बात है।
चिन्तन के लिए किसी भौतिक सहायता की आवश्यकता नहीं। केवल बैठने के लिए कोई अच्छा सुखद स्थान होना चाहिए। इसके लिये परिस्थितियों का भी कोई महत्व नहीं क्योंकि एक बार स्वभाव बन जाने पर फिर मनुष्य को परिस्थितियों का भाव नहीं रह जाता। वह चाहे जहाँ भी बैठकर चिन्तन कर सकता है हाँ शाँत और सुन्दर परिस्थितियों से सहायता अवश्य मिलती है और कभी-कभी उनके प्रभाव से ही मन चिन्तन अवस्था में चला जाता है।
चिन्तन अवस्था में चला जाता है।
चिन्तन कर सकता है हाँ शाँत और सुन्दर परिस्थितियों से सहायता अवश्य मिलती है और कभी-कभी उनके प्रभाव से ही मन चिन्तन अवस्था में चला जाता है।
चिन्तन का महत्व है।
चिन्तन में केवल अपने विचारों को जान बूझकर आदेश करना पड़ता है कि वे छुट्टी पर हैं दैनन्दिन जीवन की वास्तविकताओं को छोड़ दें और इस प्रकार इच्छापूर्वक मन की वह अवस्था उत्पन्न कर दें जिसमें मनुष्य कोई मधुर संगीत सुनकर या सूर्यास्त का दृश्य देखकर, या उक्त पर्वत मालाओं पर आश्चर्य से दृष्टिपात करके पहुँच जाता है। यह मन का वह भाव है जिसमें आश्चर्य है पर प्रत्याशा के बिना, ध्यान है पर किसी चेष्टा या अभिसंधि के बिना।
चिन्तन का अभ्यास करते समय पहले थोड़ी-थोड़ी देर के लिए सुन्दरता का स्वरूप, सत्य का अर्थ साहस का भाव, मानव जाति का अदृष्ट, अमरता का गुण प्रभृति किसी सामान्य और अमूर्त विचार पर मन को एकाग्र करना चाहिए। अथवा कोई अनुप्रमाणित करने वाला आप्त वचन लेकर उसे या उससे निकलने वाले विचार को मन में स्थित कीजिए। संभव है कि इससे आपको उसका कोई नवीन अर्थ सूझ जाय, क्योंकि कहा जाता है कि प्रत्येक महाषाक्य के सात का सत्तर अर्थ होते हैं। एक बार विचारधारा को रास्ता दिखा देने के बाद, प्रवाह के साथ-साथ चलिए और जहाँ यह ले जाय वहीं को जाने दीजिए। दर्शक मात्र बन जाइये।
चिन्तन से हम क्षुद्र विचारों से ऊपर उठ जाते हैं, और पहचान सकते हैं कि कौन बात महत्वपूर्ण है और कौन महत्वहीन। इससे अनुभव का आध्यात्मिक भाव स्पष्ट हो जाता है।
चिन्तन में लगा सकता है। बुद्धिपूर्वक सोच समझकर जीवन बिताने के लिए चिन्तन का महत्व है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-December
चिन्तन ओर मनन करें और इस प्रकार अपने अनुभवी विचारों की भेंट समाज के चरणों में चढ़ाती रहें तो यह काम आज जितना हीन और गौण माना जाता है, उतना न स्वयं स्त्रियों को ही हीन और गौण मालूम होगा, और न पुरुषों को ही गौण लगेगा।
चिन्तन के पश्चात् करता है, जबकि इस गुण से विहीन व्यक्ति ढिलमिल, अस्थिर, अनिश्चित स्वभाव का होता है। वह जो कुछ करता है आधे मन से करता है और उसके पग शिथिल से रहते हैं। आत्म विश्वासी के पग दृढ़ता से पड़ते हैं। वह जो कुछ करता है, दृढ़ संकल्पों से करता है। उसे अपने कार्य के प्रति उत्साह होता है वह लगन और परिश्रम से प्रतिदिन अपनी उन्नति करता चलता है।
चिन्तन करते हैं तो बालकों का चरित्र स्वतः ही सुन्दर बन जाता है। प्रेम ही सब सद्गुणों का स्रोत मूल है और घृणा सब दुर्गुणों का। हमारी विश्व प्रेम की भावनाएँ बालकों के हृदय में स्थान कर लेती है और वे उसे अपने आप सदाचारी बना देती हैं।
चिन्तन का परिणाम है। जो मनुष्य वर्तमान काल के कर्त्तव्य पर ही अपने ध्यान को केन्द्रित करता है और बची हुई शक्ति को आध्यात्मिक चिन्तन में लगाता है, उसका आत्मविश्वास नष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति प्रत्येक काम में आगे पीछे की बात में अत्यधिक चिन्तित रहता है वह अपनी बहुत सी शक्ति व्यर्थ की चिन्ता में खो देता है। ऐसे व्यक्ति का आत्म विश्वास नष्ट हो जाता है। फिर उसकी कार्य क्षमता भी जाती रहती है और उससे अनेक प्रकार की भूलें होती रहती हैं।
चिन्तन में लगाता है, उसका आत्मविश्वास नष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति प्रत्येक काम में आगे पीछे की बात में अत्यधिक चिन्तित रहता है वह अपनी बहुत सी शक्ति व्यर्थ की चिन्ता में खो देता है। ऐसे व्यक्ति का आत्म विश्वास नष्ट हो जाता है। फिर उसकी कार्य क्षमता भी जाती रहती है और उससे अनेक प्रकार की भूलें होती रहती हैं।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-June
चिन्तन भी करने से सच्ची शान्ति प्राप्ति हो सकती है। यदि कोई व्यक्ति अपने कर्त्तव्यों का पालन न करे, अपने आश्रितों की रक्षा एवं देख-रेख न करे तथा घर-बार छोड़कर दूर घन-घोर जंगल में जाकर तपस्या करे तो उसे सच्ची शाँति का अनुभव नहीं हो सकता, भले ही वह ज्ञानी हो जाय, ब्रह्म को समझ ले किन्तु उसे सच्ची शान्ति नहीं प्राप्त हो सकती है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति अदनिश भोग-विलास एवं सुखों में निरत रहता है और ईश्वर का ध्यान नाममात्र को भी नहीं लेता, वह समझता ही नहीं कि प्रभु का ध्यान एवं मनन कुछ क्षण तक करना भी उसका कर्त्तव्य है तो सच्ची शान्ति से उसे भी अवश्य ही वंचित रहना पड़ेगा।
चिन्तन करना। संसार से विरक्ति ही ईश्वरी वासना नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-May
चिन्तन हो, जो कुछ कहा जाय स्व पर हितावत् हो, यहीं ध्यान रखिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-September
चिन्तन द्वारा ऐसा बनाना कि सुसंस्कृत समाज का अपने आपको एक महत्वपूर्ण अंग सिद्ध कर सकें। अपने आपको इस प्रकार के गुण कर्म और स्वभाव का बना सकें कि जिसे देख कर लोग यह समझ सकें कि सुसंस्कृत संस्कारित व्यक्ति किस प्रकार के होते हैं। विद्यार्थी वयोवृद्ध, रोगी, कन्याएं, महिलाएं आदि इस श्रेणी वे लोग आते हैं जिनको अधिकतर जन समाज से अलग रह कर एक सीमित क्षेत्र के काम करना होता है। महिलाएं अपनी सहेलियों में अथवा किसी विवाह उत्सव में जाने पर उत्तम विचारों का प्रसार कर सकता है, उपरोक्त चार श्रेणी पुरुषों की भाँति परमार्थ प्रेमी महिलाओं की भी हो सकती हैं।
चिन्तन, उपासना आदि तप करने से मन तथा शरीर की विशेष शुद्धि होती है।
चिन्तन, तप, साधन, सत्संग, तीर्थ यात्रा जैसे सत्कार्यों के लिये भी अवश्य निकालना चाहिये। जिन्हें आना हो उन्हें पूर्व स्वीकृति अवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिये। क्योंकि एक सीमित संख्या में उतने ही व्यक्तियों को हम आने देते हैं जिनके साथ समुचित श्रम करना तथा ध्यान देना सम्भव हो सके। बड़ी भीड़ में सदा ही अव्यवस्था अधिक और लाभ कम होता है।
चिन्तन, परमार्थ, आदि बातों की ओर उसका मन ही न चलेगा। कुछ इच्छा भी उठी तो जरा सी कठिनाई आते ही वह समाप्त हो जायेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-December
चिन्तन कितना स्वार्थ संजोने में लगता है, कितना परमार्थ प्रयोजन में? इसका लेखा-जोखा हम स्वयं ही तैयार कर सकते हैं, क्योंकि बाहर वालों को असलियत मालूम नहीं होती। हमारी अन्तरंग स्थिति ही हमें देव अथवा असुर वर्ग की पंक्ति में बैठा सकती है और इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि परिवर्तन की भावी घड़ियों में हमें महाकाल की एड़ी से कुचले जाने का दण्ड भोगना है अथवा ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति में संलग्न पार्षदों की पंक्ति में खड़े होकर विजय का वरण करना होगा।
चिन्तन की विभूतियों को बचाकर हजार गुनी तन्मयता और तत्परता के साथ परमार्थ प्रयोजन के लिये नियोजित कर देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-August
चिन्तन का ही प्रभाव होती हैं चाहे वह ज्ञान और भक्ति पूर्व जन्मों की हो अथवा इस वर्तमान जीवन की ।
चिन्तन करे।
चिन्तन का नाम है जिसमें हम लोकोत्तर जीवन की कल्पना और सत्य जानने का प्रयास करते हैं। मन बुद्धि, चित्त आदि शक्तियाँ मिलीं भी मनुष्य को इसलिये हैं कि मनुष्य अपना पारमार्थिक उद्देश्य हल कर सके।
चिन्तन यद्यपि उनका आदर्श रहता था, पर ज्ञान और शक्ति के जगमगाते सूर्य ही हुआ करते थे तब के विद्यार्थी। साँचे में ढाले हुए यही बालक-जब गृहस्थ धर्म को संभालते थे तो वहाँ भी सुख और सौभाग्य का स्वर्ग उपस्थित कर देते थे।
चिन्तन किया करें। वैराग्य ऐसे ही चिन्तन का नाम है जिसमें हम लोकोत्तर जीवन की कल्पना और सत्य जानने का प्रयास करते हैं। मन बुद्धि, चित्त आदि शक्तियाँ मिलीं भी मनुष्य को इसलिये हैं कि मनुष्य अपना पारमार्थिक उद्देश्य हल कर सके।
चिन्तन, व्रत, उपवास आदि की आवश्यकता शिक्षा से भी अधिक है। प्राचीन काल के गुरुकुलों में शिक्षा संबन्धी विषय गौण माने जाते थे, आत्म-विद्या के विषय अनिवार्य होते थे। मनुष्य के दार्शनिक स्वरूप को यथार्थ, शाश्वत और पूर्णानन्द की प्राप्ति का पाथेय माना जाता था। इसलिये उस पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया जाता था जो व्यक्ति के आत्म गुणों का परिवर्द्धन करती थी। उसकी आवश्यकता आज भी उतनी ही नहीं बल्कि वर्तमान विकृत परिस्थितियों में तो उससे भी अधिक है।
चिन्तन, सत्संग, तीर्थाटन, व्रत, उपवास, उपासना, साधना के ग्राह्य और सुधरे हुए स्वरूप को समझने और प्रयत्नपूर्वक उन्हें अपने आत्म-विकास में नियोजित करने की बुद्धि जिन लोगों में आ जाती है उन्हें अपने आपको सौभाग्यशाली समझना चाहिये। आत्म-जिज्ञासा आत्म-कल्याण का मुख्य द्वार है। जो उसे पा लेता है वह अपनी जीवन-यात्रा की मंजिल भी आसानी से प्राप्त कर लेता है। गीता अध्याय 1 के 10वें लोक में भगवान् कृष्ण ने भी कहा है-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-March
चिन्तन करना चाहिए। देखना चाहिए कि सबेरे जो योजना बनाई गई थी वह कार्यान्वित हुई या नहीं? त्रुटि हुई तो कितनी और क्यों? उसमें अपना कितना हाथ रहा और परिस्थितियों का कितना? जो कुछ अनुचित बन पड़ा हो, उसके लिए सताये हुए व्यक्ति की तरह आत्मा से तथा परमात्मा से हार्दिक क्षमा याचना करनी चाहिए और अगले दिन अधिक सतर्कतापूर्वक उस तरह के दोषों को न होने देने का संकल्प दुहराना चाहिए।
चिन्तन साधना के आधार पर करते रहना चाहिए। शरीर के लिये कितनी शक्ति खर्च की? और आत्मा के लिये कितना प्रयत्न किया? यह प्रश्न बार-बार अपने से पूछना चाहिये और ऐसी गति-विधि निर्धारित करनी चाहिए जिससे अन्तरात्मा को सन्तोषजनक उत्तर एवं आधार मिल सके।
चिन्तन के समय यह देखना चाहिए कि अपने मनःक्षेत्र में आजकल किन अनुपयुक्त विचारों का घेरा है। उन विचारों को काटने के लिए विवेकशीलता एवं दूरदर्शिता के आधार पर ऐसा प्रतिरोधी विचार-प्रवाह विनिर्मित करना चाहिए जो उन कुविचारों को काटकर निरस्त कर सके।
चिन्तन करना-सत्प्रवृत्तियों में भावना-स्तर को निमग्न करना वस्तुतः अन्तःकरण में परमेश्वर की प्रतिष्ठापना करने का ही एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग है।
चिन्तन की दिशा मोड़ डालने की कला, बुद्धिमत्ता एवं दूरदर्शिता का विकास, साहस, धैर्य एवं मनस्विता का अभ्यास, श्रमशीलता और तन्मयता की प्रवृत्ति, नम्रता, मधुरता, शिष्टता, सज्जनता एवं अनुशासन प्रिय स्वभाव, नियमितता एवं व्यवस्था का गुण, समय और धन को ठीक तरह खर्च करने की आदत, कामनाओं और वासनाओं का नियंत्रण, अनुपयुक्त विचारों को हटाकर उनके स्थान पर उपयुक्त विचारों को स्थापना आदि मानसिक स्वास्थ्य संवर्द्धन के लिए बौद्धिक एवं व्यावहारिक दोनों ही तरह से-थ्योरी और प्रेक्टिस दोनों ही तरीकों से-मानसिक स्वास्थ्य संवर्द्धन की शिक्षा-व्यवस्था नियमित रूप से चलती रहेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-May
चिन्तन ही करते रहना आवश्यक है।
चिन्तन किस प्रकार कर सकता है जिसके लिए मानसिक प्रसन्नता एवं बौद्धिक संतुलन की नितान्त आवश्यकता है।
चिन्तनीय होते हुए भी साकार मूर्ति रूपा हो प्रत्येक प्राणी में सत्वगुण रूप में विराजमान् रहती हो तथा गुणातीत हो। केवल तत्वज्ञान से ही तुम जानी जाती हो । तुम्हीं परब्रह्म रूप से प्रसिद्ध हो।
चिन्तन द्वारा यह विचार करे कि क्या हमने अब तक का जीवन वैसे ही बिताया जैसा कि उसे बिताना चाहिये था? यदि नहीं, तो उस भूल को तुरन्त क्यों न सुधारा जाए? जो सुधार परिवर्तन सम्भव है वह आज से ही क्यों न आरम्भ किया जाए? वे दुर्गुण अपने में कौन-कौन से हैं जो प्रगति में बाधक बन बैठे हैं, उन्हें ढूंढ़ा पहचाना और हटाया जाए। वे सद्गुण कौन-कौन से हैं जो अपने में नहीं हैं, उनका महत्व समझा जाए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-January
चिन्तन करता रहे और तदनुसार कार्य सम्पादित न करे तो उसकी वह क्रिया मनोरथ अथवा कल्पना तक ही सीमित रह जायेगी और उसका भी कोई वाँछित फल प्राप्त नहीं होगा। साथ ही मन तथा क्रिया दोनों का संयोजन कर लेने पर भी यदि कोई सत्कर्मी, वचनों से अश्लील, असद्, अवाँछनीय अथवा विपरीत भाषण करता और सुनता रहे तब भी इसका प्रभाव उसके मानसिक तथा शारीरिक सत्कर्मों के पुण्य फल पर पड़ेगा और चित्त का परिमार्जनपूर्ण प्रेरणा से न हो सकेगा। आवश्यक है कि चित्त शोधन के लिये मन, वचन, कर्म तीनों साधनों का समान नियोजन किया जाये।
चिन्तन करना हमारा पुण्य पवित्र कर्त्तव्य है और आज जनवृद्धि को नियंत्रित करना सबसे बड़ा देशहित साधन है। किन्तु क्या इस प्रकार के लोग इस ओर ध्यान दें पाते हैं?
चिन्तन, मनन, क्रिया-कर्म, पठन, श्रवण तथा दृश्य द्वारा ही होता है। मन की स्वाभाविक गति पतनोन्मुख ही है।
चिन्तन मनन करना, कल्याणकारी दृश्य देखना और शुभ वाणी बोलना तथा सुनना ऐसा अभ्यास है जो धीरे-धीरे मन की दूषित प्रवृत्तियों को नष्ट कर सत्प्रवृत्तियों को समाविष्ट कर देता है। जब तक बुराई को अच्छाई और दुर्गुण को गुण से स्थानापन्न न किया जायेगा तब तक चित्त शुद्धि हो सकना संभव नहीं। केवल शुभ में आस्था रखना मात्र ही वह अभ्यास अथवा प्रयास नहीं है जिससे चित्त-शुद्धि की आशा की जा सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-April
चिन्तन-मनन तथा स्वाध्याय में अपना जीवन क्यों खपा देते? आध्यात्मिक सिद्धियों के धनी क्या इस प्रकार गली-गली पैसा और प्रतिष्ठा माँगते घूमते हैं? क्या यह शंका और सन्देह का विषय नहीं है कि जो दूसरों को धन, वैभव, संपत्ति, सन्तान का वरदान देने की क्षमता रखता है वह क्यों स्वयं दरिद्री, भिखारी तथा पैसे-पैसे के लिए जान दे रहा है? क्या दूसरों को लाखों का वरदान देकर दो पैसे माँग ले जाने वाला सिद्ध हो सकता है उसकी पूजा की जानी चाहिए ? इस मान्यता में कौन -सी तुक है-यह बात समझ में नहीं आती।
चिन्तन शास्त्रार्थ एवं पुरुषों के साथ धर्मानुष्ठान में बराबर भाग लिया करती थीं जिसके फलस्वरूप उनके प्रभाव से उनकी गोद में पली हुई सन्तानें भी संसार में अपनी विद्या-बुद्धि तथा शूर-वीरता का प्रभाव दे सकीं। किन्तु एक ऐसा अन्धकार युग भी आया जब कि राष्ट्र की निर्मात्री नारी को उसके अधिकारों से वंचित कर विविध बन्धनों से जकड़ दिया गया। उनके पढ़ने, समाज में आने-जाने और स्वतन्त्र रूप से अपना विकास करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। उसे केवल चूल्हा चक्की तक घर में सीमित कर सन्तानोत्पत्ति की मशीन-भर माना जाने लगा। जिसके फलस्वरूप उनमें मूढ़ता तथा अन्धविश्वासों का बाहुल्य हो गया और अपने समान ही वे मूढ़ तथा अयोग्य संतानों को जन्म देने लगीं।
चिन्तन चिन्ता दूर करने का सबसे सरल एवं सफल उपाय है।
चिन्तन, समय तथा शाँति का कुछ अंश अवश्य ही दें। मनुष्य के वास्तविक चिन्तायें बहुत कम आती हैं और यदि वे आती हैं तो हर उत्तरदायी व्यक्ति उनका मनन करने के बजाय चिन्ता का कारण दूर करने का प्रयत्न किया करता है। वह अपने मस्तिष्क को चिन्ता की शाखा-प्रशाखाएँ छोड़कर बेकार में न तो उलझाया करता है और न उसकी शक्ति क्षीण किया करता है। वह सीधे-सीधे उसका हल निकालने में अपनी सारी शक्तियों को नियोजित किया करता है और ठीक तरह से , ठीक दिशा में शाँत मस्तिष्क से सोचने पर उसका हल निकाल भी लेता है। बहुत करके तो निरर्थक एवं काल्पनिक चिन्तायें ही अधिकतर मनुष्य को घेर लिया करती हैं।
चिन्तन के बिना मनुष्य एक ऐसा यन्त्र बन जाता है जिसे कोई भी अच्छी बुरी बात, उल्टा सीधा वातावरण अपने अनुरूप सञ्चालित कर सकता है। यह जड़ता है जो विवेकवान् मनुष्य के लिए लज्जा की बात है।
चिन्तन एवं शोध कार्यों में विघ्न पड़ता। वे जटा-जूट रखा सकते थे किन्तु समाज-सेवा में लगे हुए जीवन का एक क्षण भी खराब करना स्वीकार न कर सकते थे। इस प्रकार ऋषि-मुनियों के वेश-विन्यास एवं रहन-सहन में उनकी परिस्थिति तथा स्थिति की अनुरूपता के सिवाय और कुछ न था । किन्तु आज के साधु समाज ने केवल वेश-भूषा को ही धारण करना साधुता की चरमावधि मान लिया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-September
चिन्तन करने लगें तो कुछ ही समय में हमारे सारे गुण नष्ट हो जायेंगे और हम वास्तव में दिन-हीन और मलीन बन जायेंगे। हमारा व्यक्तित्व प्रभावहीन हो जायेगा जो समाज में व्यक्त हुए बिना बच नहीं सकता।
चिन्तन करिये और देखिये कि कुछ ही दिन में आपमें क्राँतिकारी परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगेगा।
चिन्तन के द्वारा मन, बुद्धि और भावनाओं पर ध्यान जमाता हुआ आत्मा के अस्तित्व तक पहुँचता है और इस अनुभव के बाद इस बोध को प्राप्त करता है कि वह परमात्मा जिसमें आत्मा विकसित हो जाती है, आत्माओं से भी परे और सभी में एक ही प्रकार से व्याप्त है।
चिन्तन करता रहता है उनके अनुरूप ही बन जाता है। इसी संदर्भ से एक पौराणिक आख्यान में एक गुरु ने अपने एक अविश्वासी शिष्य की शंका दूर करने के लिये उसे प्रायोगिक प्रमाण दिया उन्होंने उस शिष्य को बड़े-बड़े सींगों वाला भैंसा दिखा कर कहा कि इसका यह स्वरूप अपने मन पर अंकित करके और इस कुटी में बैठकर निरन्तर उसका ध्यान तब तक करता रह जब तक वे उसे पुकारे नहीं। निदान शिष्य कुटी में बैठा हुआ बहुत समय तक उस भैंसे का और विशेष प्रकार से उसके बड़े-बड़े सींगों का स्मरण करता रहा। कुछ समय बाद गुरु ने उसे बाहर निकलने के लिये आवाज दी। शिष्य ने ज्यों ही खड़े होकर दरवाजे में शिर डाला कि वह अटक कर रुक गया।
चिन्तन को आप प्रमुखता दिए होंगे।
चिन्तन करता रहता है, जिन विचारों में प्रधानतया तन्मय रहता है वह उसी प्रकार का बन जाता है।
चिन्तन करते रहते हैं। इस प्रकार यदि आप राम बन जाएंगी तो राम सीता बन जायेंगे। इससे दांपत्य जीवन में क्या व्यवधान पड़ सकता है ? परिवर्तन केवल इतना होगा कि पति पत्नी और पत्नी-पति बन जायगी।” इस उदाहरण में कितना सत्य है नहीं कहा जा सकता, किन्तु यह तथ्य मनोवैज्ञानिक आधार पर पूर्णतया सत्य है कि मनुष्य जिन विचारों का चिन्तन करता रहता है उनके अनुरूप ही बन जाता है।
चिन्तन के लिए समय ही कहाँ मिलेगा ?
चिन्तन करते रहने से एक दिन आपका अवचेतन प्रबुद्ध हो उठेगा आपकी सोई शक्तियाँ जाग उठेंगी, आपके गुण कर्म स्वभाव का परिष्कार हो जायेगा और आप परमार्थ पथ पर, उन्नति के मार्ग पर अनायास ही चल पड़ेंगे और तब न आपको चिन्ता, न निराशा और न असफलता का भय रहेगा और न लोक-परलोक की कोई शंका। उसी प्रकार शुद्ध-बुद्ध तथा पवित्र बन जायेंगे जिस प्रकार के आपके विचार होंगे और जिनके चिन्तन को आप प्रमुखता दिए होंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-February
चिन्तन-मनन करने के लिये जिस बौद्धिक विकास और मानसिक सन्तुलन की आवश्यकता होती है, वह अशाँति की स्थिति में संभव नहीं। संयम का निर्वाह तभी हो सकता है, जब मनुष्य के विचार निर्विकार, वातावरण अनुकूल और व्यवहार-क्षेत्र के लोग सदाचारी एवं सद्भावी हों, नहीं तो अनुकरण वृत्ति, स्वाभाविक वातावरण और संसर्ग-दोष उसके रहन-सहन में बाधक बनेंगे एवं वाँछित पथ पर आगे बढ़ने से रोकेंगे।
चिन्तन करना और उनसे बचना बहुत आवश्यक है। जीवन में यह क्रिया आवश्यक है। जिस तरह शरीर, वस्त्र, घर आदि की नित्य सफाई होती रहती है उसी तरह बुरे विचारों का भी परिमार्जन होता रहना चाहिए।
चिन्तन करने से मन उसी परिधि में घूमता रहता है। उसी क्षेत्र में क्रीड़ा कल्लोल करता रहता है। अतएव मन को रोकने, वश में करने की एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक आवश्यकता भी इस साधना के माध्यम से पूरी हो जाती है।
चिन्तन-मनन द्वारा बौद्धिक शक्ति का संचय करना चाहते हैं। किन्हीं लोगों का प्रयत्न रहता है कि वे अधिक धन जमा करके अपनी शक्ति का सिक्का जमा सकें। कुछ लोग पद और कुछ लोकप्रियता के द्वारा शक्तिमान बनने के लिए अभ्यास किया करते हैं। अनेक विवेकशील व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जो इन सब शक्तियों की शिरमौर चारित्रिक, नैतिक अथवा आध्यात्मिक शक्ति का संग्रह करने के लिये प्रयत्न किया करते हैं। तात्पर्य यह है कि सभी व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में शक्ति पाना और शक्तिशाली बनना चाहते हैं।
चिन्तन किया जाए। अन्त में 108 गायत्री मंत्र माला की सहायता से अथवा उंगलियों पर गिन कर पूरे किए जाएं। अन्त में 24 आहुतियों का हवन किया जाए। यदि हवन का विधान न मालूम हो और संकल्प सामग्री न हो तो 24 घी की आहुतियाँ गायत्री मंत्र से दी जा सकती हैं। अन्त में आरती उतार ली जय और सूर्य भगवान को जल का अर्ध दिया जाए।
चिन्तन करते हुए सोना चाहिए, वह उनसे दूर बंद कमरों में जाकर सोता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-June
चिन्तन की गहन स्थिति में पहुँच गये थे, जो आत्मा का यथार्थ लक्ष्य है। सबको अपना पाठ समझ लेने का सन्तोष था। ऋषि के पदों का अनुकरण करते हुए सभी विद्यार्थी गुरुकुल लौट आये और अपने-अपने सन्ध्या पूजन में लग गये ।
चिन्तन करता है, आत्मा के गुणों के अनुरूप आचरण करता है अन्त में वह साँसारिक, सुख ऐश्वर्य और भोगों को भोगते हुए भी आत्मा को प्राप्त कर लेता है। मन, प्राण एवं प्रकृति के परिवेश से प्रकट में पृथक-पृथक प्रतीत होने पर भी हम आप सब वस्तुतः एक ही आत्मा की अभिव्यक्तियाँ हैं। इसे यों भी कहा जा सकता है कि आत्मा ही विभिन्न रूपों में व्यक्त होकर उन्मुक्त चेतना परमात्मा में परिणत होना चाहती है। जो इस तत्व रूप को खोजते हैं वह तो अपना लक्ष्य पा जाते हैं और जो अपने चित्त की अहंवृत्तियों में ही भूलते-भटकते रहते हैं वह सुख स्वरूप होने पर भी दुःख भुगतते हैं, बन्धन मुक्त होने पर भी बन्धनों में पड़े रहते हैं।
चिन्तन ही उनका स्वभाव होता है। उसी में असीम तृप्ति भी है।
चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। आत्मा की प्राप्ति के लिये जितने भी साधन और उपासनायें बताई गई हैं वह केवल इसी बात को परिपुष्ट करने के लिये हैं कि तुम शरीर नहीं, मन और इन्द्रियाँ भी नहीं हो इनसे परे अनन्त शक्ति स्वरूप आत्मा हो-आत्मा बन्धन रहित है। अपनी इच्छा संकल्प बल से कहीं भी विचरण कर सकती है। प्रकाश खेल खेलता है न उसका कोई बन्धु है न बान्धव, पुत्र न कलत्र, सब विविध रूप आत्मायें ही अपनी-अपनी चित्तवृत्तियों के कारण भाई, पिता माता ऐसे भासते हैं, यही बंधन है। इस बन्धन से छूटकर राग, द्वेष माया, ममता छोड़कर, केवल कर्तव्य पालन का ध्यान रखता हुआ जो व्यक्ति आत्मा में ही रमण करता है।
चिन्तन से इसी सिद्धान्त की पुष्टि होती है।
चिन्तन ही वह उपाय है जिसके द्वारा चेतना की, आत्मा की अनुभूति और प्रगति सम्भव है। विद्वज्जन उसी अक्षर, अविनाशी, अजर-अमर आत्मा का चिन्तन करते हैं। लौकिक जीवन से उतना ही सम्बन्ध रखते हैं जितना आत्मा के आध्यात्मिक विकास के लिये आवश्यक है। अन्यथा आत्मा के गुणों और कौतुक का चिन्तन ही उनका स्वभाव होता है। उसी में असीम तृप्ति भी है।
चिन्तन करते और अन्त में सुखपूर्वक उसी भाव में अन्तर्हित होकर परमात्मा की शरण में चले जाते हैं।
चिन्तन करते हैं। लौकिक जीवन से उतना ही सम्बन्ध रखते हैं जितना आत्मा के आध्यात्मिक विकास के लिये आवश्यक है। अन्यथा आत्मा के गुणों और कौतुक का चिन्तन ही उनका स्वभाव होता है। उसी में असीम तृप्ति भी है।
चिन्तन करने से अपनी आत्मिक धारणा पुष्ट हो जाती है और आत्म-कल्याण का मार्ग दिखाई देने लगता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-July
चिन्तन में लगावें, तो संसार का आधार छोड़ना सम्भव है कि हमारे लिये असाध्य हो।
चिन्तन की ओर, स्वाध्याय सत्संग की ओर जिनकी जरा भी रुचि नहीं होती। बड़ों की अवज्ञा करना जिन्हें सुहाता है। कृतघ्नता, छल, विश्वासघात, मलीनता, दुष्टता उनकी विशेषता होती है। न स्वयं चैन से बैठते हैं और न दूसरों को चैन से बैठने देते हैं। तमोगुण के अज्ञानान्धकार में उनका अन्तःकरण सदा अच्छादित रहता है।
चिन्तन, आत्म निरीक्षण, आत्मशोधन, आत्मनिर्माण यह स्वाध्याय के चार अंग है। इन चारों की पूर्ति के लिए सद्ग्रन्थों का पठन, श्रवण तथा सत्पुरुषों का सत्संग भी उपयोगी है। वैसे तो स्वाध्याय बिना पढ़े मनुष्य भी, बिलकुल अकेले रहकर भी कर सकते हैं। मेरी आत्मा वस्तुतः क्या है? इस जीवन का सच्चा प्रयोजन क्या है?
चिन्तन न करे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-December
चिन्तन को ही हृदय में स्थान देते हैं।
चिन्तन में सहायक होता है।
चिन्तन, सद्वचन, शुभ कर्म में प्रवृत्त रहिये। पवित्र स्थानों में रमण कीजिये। सद्पुरुषों के संपर्क में रह कर उनकी मंजुल वाणी में आवाहन कीजिए। पुराने स्वभाव तथा आदतों को दूर करने का एक ही उपाय है। वह है उनके विरुद्ध उत्तम तथा विशुद्ध संस्कारों का दृढ़ निश्चय तथा दृढ़ता से उन पर कार्य।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-May
चिन्तन ये दैवी तत्व हैं जिससे पाषाण सदृश्य व्यक्ति को भी वश में किया जा सकता है। सत्य धर्म का पालन, दूसरों से सत्य व्यवहार, पवित्र चरित्र, ये ऐसे सूत्र हैं, जो अवश्य अपना प्रभाव दिखलाकर रहेंगे। उत्तम स्वास्थ्य से जगमगाता हुआ मुख देखकर कौन प्रभावित न होगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-August
चिन्तन, मनन, सत्संग, अनुभव आदि के द्वारा मन और मस्तिष्क को सुसंस्कृत बना लेना, मानसिक स्वस्थता है। शिक्षा के द्वारा डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, अफसर, वैज्ञानिक, लेखक, सम्पादक, बाजीगर, शिल्पी, व्यापारी, कलाकार, लेखक, मूर्तिकार, चित्रकार, संगीतज्ञ, नट आदि अपनी-अपनी महत्ता प्रकट करते हैं। अपनी योग्यताओं के बल पर संसार को सफलता का सन्तोषदायक आनन्द अनुभव करते हैं, सम्पत्ति कमाते हैं, यशस्वी बनते हैं, तथा मरने बाद नई पीढ़ी के लिए एक आदर्श छोड़ जाते हैं।
चिन्तन के लिए सत्कर्म के लिए एक मिनट की फुरसत नहीं मिलती, पर वह दिन दूर नहीं जब यही बातें सबसे बड़ी बेवकूफी मालूम पड़ेंगी और इस ना समझी के लिए लकड़हारे की तरह सिर धुन-धुन कर और हाथ मल-मल कर विलाप करना पड़ेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-April
चिन्तन, आत्मनिरीक्षण, आत्मपरीक्षण करना चाहिए। जिससे शत्रुओं की दाल न गलने पावे, मनः क्षेत्र में कुसंस्कार जड़ न जमाने पाएं। जिस घर में घर का मालिक एक बच्चा भी खाँस रहा हो उसमें घुसने की बलवान चोर की भी हिम्मत नहीं पड़ती। घर से घुसे हुए चोर मालिक के जागने की आहट पाकर भाग खड़े होते हैं। क्योंकि असत्य स्वतः कमजोर होता है, कहते हैं कि “चोर के पाँव नहीं होते।
चिन्तन के लिए, आत्म निरीक्षण और परीक्षण के लिए कोई विरले ही थोड़ा समय खर्च करते हैं। इस प्रकार की उपेक्षा के कारण, मैदान खाली देख कर हानिकारक कुप्रवृत्तियाँ और वासनाएं उठ खड़ी होती हैं और निरन्तर बढ़ती, फलती फूलती तथा परिपुष्ट होती रहती हैं। जिस खेत की जुताई, सिंचाई नराई से संस्कारित नहीं किया जाता उसमें खर पतवार और जंगली झाड़ झंखाड़ जड़ जमा लेते हैं। जिस मनोभूमि को संस्कारित नहीं किया जाता उसमें अच्छी फसल नहीं उपजती वहाँ तो कुविचार और कुसंस्कारों का ही उत्पादन होता है।
चिन्तन की साधना।
चिन्तन, ईश्वराधन स्वाध्याय, सत्संग आदि सात्विकता बढ़ाने वाले कामों में विशेष रूप में समय लगाना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-June
चिन्तन, मनन तथा साधन के लिए-थोड़ा भी समय नहीं लगाया जा सकता? क्या सचमुच आत्मा ऐसी तुच्छ वस्तु है, जिसकी शरीर के मुकाबले में इतनी उपेक्षा की जाय?
चिन्तन, दान, सेवा, परमार्थ, आदि कार्यों में प्रायः मन की रुचि कठिनता से झुकती है पर दृढ़ निश्चय के साथ लगातार, प्रतिदिन, उन कार्यों की पुनरावृत्ति करने पर फिर उसी प्रकार की आदत पड़ जाती है और उसी प्रकार के आचरण करने का स्वभाव बन जाता है। दिव्यता की स्थापना का विचार ही करना संकल्प है। क्या दिव्यता स्थापित की जाय? किस प्रकार की जाय? यह योजना मिश्रित करना मन्त्र है, उस योजना के अनुसार कार्य आरम्भ कर देना यज्ञ है।
चिन्तन किया जाय। चिन्तन के लिये आकृति की आवश्यकता है उस आकृति की मूर्ति या चित्र के आधार पर हमारी कल्पना आसानी से ग्रहण कर सकती है। इस साधन की सुविधा के लिये मूर्तियों का आविर्भाव हुआ है।
चिन्तन में, मनन में, एकात्मभाव से लगाये रहना पड़ता है। मौका पड़ने पर मन को मारना और दबाना पड़ता है। सामाजिक प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए संगठित होना पड़ता है, समूह बनाना पड़ता है और सामूहिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़ना पड़ता है। जैसे साम्प्रदायिक जिम्मेदारियों के लिए, कथा, व्रत, उद्यापन, संस्कार, ब्रह्मभोज, प्रीतिभोज, पूजा, अनुष्ठान, त्यौहार आदि के खर्च तथा व्यवस्था का श्रम वहन करना पड़ता है, वैसे ही अध्यात्मिक उत्तरदायित्वों की पूर्ति के लिए भी मनुष्य को सदैव सचेत रहना पड़ता है। इन्द्रिय दमन करना पड़ता है, स्वार्थों पर अंकुश रखना पड़ता है, हीन भावनाओं को दबाना पड़ता है और अवसर आने पर कहीं अग्नि परीक्षा देने के लिए भी तैयार रहना पड़ता है।
चिन्तन के लिये आकृति की आवश्यकता है उस आकृति की मूर्ति या चित्र के आधार पर हमारी कल्पना आसानी से ग्रहण कर सकती है। इस साधन की सुविधा के लिये मूर्तियों का आविर्भाव हुआ है।
चिन्तन, ध्यान और धारण करना चाहिये। विचार शक्ति का चुम्बकत्व ही मनुष्य के पास एक ऐसा अस्त्र है जो अदृश्य लोक की सूक्ष्म शक्तियों को खींच कर लाता है। धनवान बनने के लिये धन का चिन्तन और विद्वान बनने के लिये विद्या का चिंतन आवश्यक है। संसार का जो भी मनुष्य जिस विषय में आगे बढ़ा है, पारंगत हुआ है, उसमें उसने एकाग्रता और आस्था उत्पन्न की है। इसका एक आध्यात्मिक उपाय यह है कि ईश्वर की उस शक्ति का चिन्तन किया जाय।
चिन्तन के लिए, साधना के लिए अक्सर लोग यह कहा करते हैं कि “क्या करें, फुरसत नहीं मिलती।” वे अपने को बहुत कार्य व्यस्त बताते हैं। जरूरी कामों से फुरसत पाये बिना भला आध्यात्मिक कामों के लिए इन्हें किस प्रकार समय मिल सकता है।
चिन्तन और विद्वान बनने के लिये विद्या का चिंतन आवश्यक है। संसार का जो भी मनुष्य जिस विषय में आगे बढ़ा है, पारंगत हुआ है, उसमें उसने एकाग्रता और आस्था उत्पन्न की है। इसका एक आध्यात्मिक उपाय यह है कि ईश्वर की उस शक्ति का चिन्तन किया जाय। चिन्तन के लिये आकृति की आवश्यकता है उस आकृति की मूर्ति या चित्र के आधार पर हमारी कल्पना आसानी से ग्रहण कर सकती है। इस साधन की सुविधा के लिये मूर्तियों का आविर्भाव हुआ है।
चिन्तन न कर सके तो निश्चय ही वह किसी प्रकार का विचार भी न कर सकेगा। जो कीड़े मकोड़े आकृतियों की कल्पना नहीं कर पाते उनके मन में किसी प्रकार के भाव भी उत्पन्न नहीं होते। ईश्वर एवं उसकी शक्तियों के सम्बन्ध में विचार करने के लिये मनःलोक में स्वतः किसी न किसी प्रकार की आकृति उत्पन्न होती है। इन अदृश्य कारणों से उत्पन्न होने वाली सूक्ष्म आकृतियों का दिव्य दृष्टि से अवलोकन करने वाले योगी जनों ने उन ईश्वरीय शक्तियों की-देवी देवताओं की-आकृतियाँ निर्मित की हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-September
चिन्तन, पठन-पाठन, अध्ययन, मौन, लिखना, मितभाषी बनने के सुन्दर उपाय हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-January
चिन्तन करने का प्रधान लाभ यही है कि अपनी आत्मा की महानता प्रतिभासित होती है, पराधीनता छोड़ कर मनुष्य आत्म निर्भर बनता है, आत्म सम्मान, आत्म विश्वास एवं आत्म गौरवता को अनुभव करता है। वेदान्त विज्ञान की समस्त साधनाएं, सोऽहम् तत्वमसि, सर्वखिल्विदं ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म के सिद्धान्त पर टिकी हुई है। आत्म से ही परमात्मा का दर्शन करना, हृदय को परमात्मा की क्रीड़ा भूमि शरीर को आत्मा का मंदिर अपने को राजाओं के राजा परमात्मा का राजकुमार अनुभव करना आत्मनिष्ठा को बढ़ाने वाले विश्वास हैं। तपश्चर्या की साधनाओं द्वारा मनुष्य आत्मनिष्ठा की ओर बढ़ता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अनेकों प्रकार की साधनाएँ करते हुए अनेक साधक देखे जाते हैं।
चिन्तन, आदि के द्वारा मन एक बात को समझ लेता है, उसे ठीक मान लेना है। पर इतने मात्र से ही वह मान्यता व्यवहार रूप में परिणत नहीं हो जाती संस्कार नहीं बन जाती। कितने ही व्यक्ति ऐसे हैं जो सत्य, दया, प्रेम न्याय, संयम आदि सत् सिद्धान्तों को ठीक मानते हैं, उनकी महत्ता स्वीकार करते हैं और उनका समर्थन करते हैं फिर भी व्यवहार में उनके कार्य उन मान्यताओं के बिलकुल विपरित होते हैं। सत्य का उपदेश करने वाले मिथ्याचारी साधु का वेष धरे हुए दुराचारी, आडम्बरी बगुलाभगत, बाहर के मीठे भीतर के कड़ुए अनेकों मनुष्य देखे जाते हैं। विचार और कर्म में भारी अन्तर रखने वाले व्यक्तियों की बाहुल्यता है।
चिन्तन या सत्संग से दूर किया जा सकता है। बहिर्मन का काम पूरा हो गया। उसका क्षेत्र, समझना सोचना और निर्णय करना इतना ही है। इतना कार्य एक दो दिन में भली प्रकार हो सकता है। पर केवल इतने मात्र से ही कोई व्यक्ति आत्मवान् नहीं बन सकता आत्म लाभ नहीं कर सकता।
चिन्तन कहलाता है। मन और निदिध्यासन से प्रज्ञाचक्षु खुलते हैं। सत्संग, विचार विनिमय शंका समाधान प्रवचन आदि के आधार पर ऋतम्भरा बुद्धि को, सत्यासत्य निरूपिणी विवेक शक्ति को जागृत किया जाता है।
चिन्तन करने से, इस प्रकार के व्यवहार की कल्पना करने से अन्तःलोक पुलकित एवं गदगद हो जाता है। आचरण में इस प्रकार के भावों को कार्यान्वित करने पर तो मनुष्य का रोम रोम आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है। सात्विकता को विचारों और कार्यों में आश्रय देने से जो उच्चकोटि का आत्म सन्तोष प्राप्त होता है उसे ही ब्रह्मानन्द या परमानन्द कहते हैं। आत्मा का आशीर्वाद इसी स्थिति में पहुँचने वाले प्राप्त करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-February
चिन्तन में आदर्श और चरित्र में सज्जनोचित व्यवहार का समावेश है।
चिन्तन क्या हो ? लोग उसे अपनाने और चरित्र में उतारने की प्रेरणा देने वाला शिक्षण किस प्रकार के विद्यालयों और कि स्तर के साहित्य सत्संग द्वारा प्राप्त करें ? शासन किस प्रकार चले ? अब तक यही सोचा जाता रहा है ।
चिन्तन में निमग्न रहने की योग साधना का आश्रय लेना पड़ता है।
चिन्तन से सर्वथा ऊँचे उठकर समाज के लोगों से सहानुभूति रखने और उन्हें अपने उत्कृष्ट विचारों एवं श्रेष्ठ व्यवहारों से निरन्तर ऊँचा उठाने का प्रयास करने वाले महामानव ही अपने नैतिक जीवन और आदर्श चरित्र को चरितार्थ करते हैं।
चिन्तन के अभाव में , तेजस्विता-मनस्विता के अभाव में निचले दर्जे के मनुष्य भी उसी हवा में बहते रहते हैं जिसमें कि समय या अवसर उन्हें बहा ले जाता है । गिरिवासी-वनवासी पिछड़े हुए लोग इसी प्रकार दिन काटते हैं । किन्तु जिनमें प्रतिभा है वे परिवर्तन के लिए कमर कसते हैं और वैसा ही कर गुजरते हैं । “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है ।” यह तथ्य भी है और सत्य भी है ।
चिन्तन जीवन का मात्र सैद्धान्तिक पक्ष है उसका व्यावहारिक पक्ष है-श्रेष्ठ कार्यों के रूप में परिलक्षित होना। विचार मन्थन से जो सिद्धान्त निर्धारित हों उनको सत्यता की कसौटी के लिए व्यवहारिक क्षेत्र में उतारना होता है। उच्च आदर्शों एवं नैतिक सिद्धान्तों का व्यवहार में आना ही नैतिक जीवन है।
चिन्तन में उत्कृष्टता, चरित्र में आदर्शवादिता और व्यवहार में सज्जनता का समावेश हो। वस्तुतः इसी परिधि में मानव जीवन की समस्त समस्यायें आती है । जिससे इस सुविस्तृत क्षेत्र का समाधान निकले उसी को सच्चे अर्थों में तत्त्वदर्शन समाज विज्ञान या शासन तंत्र कहना चाहिए , फिर उसका नाम कुछ भी क्यों न रखा जाय । मनुष्य को सत्प्रयोजन अपनाने की पूरी छूट मिलनी चाहिए, पर उसकी धूर्तता को इतने कड़े शिकंजे में कसना चाहिए कि पीछे हटने या आगे बढ़ने की कोई गुँजाइश न रहे ।
चिन्तन-मनन की उत्कृष्टता के बिना कोई मनुष्य अपने लिए स्थिर नैतिक सिद्धान्त का निर्धारण नहीं कर पाता और समाज की दिशाधारा के प्रवाह में बह जाता है। नैतिक सिद्धान्तों के निश्चय, निर्धारण के लिए ज्ञानार्जन अति आवश्यक है। ज्ञानार्जन के लिए व्यक्ति को चिंतनशील-विवेकशील होना चाहिए। परन्तु चिन्तन जीवन का मात्र सैद्धान्तिक पक्ष है उसका व्यावहारिक पक्ष है-श्रेष्ठ कार्यों के रूप में परिलक्षित होना। विचार मन्थन से जो सिद्धान्त निर्धारित हों उनको सत्यता की कसौटी के लिए व्यवहारिक क्षेत्र में उतारना होता है।
चिन्तन,
चिन्तन या चरित्र से है । अपना व्यक्तित्व ही ऐसा है जिसकी क्रियाएँ निरन्तर अपने आपको , अपने जीवनक्रम को प्रभावित करती हैं । यदि वह श्रेष्ठ है तो क्रियाकलाप भी वैसे ही होंगे । गुण-कर्म स्वभाव वैसा ही बनेगा । यदि व्यक्ति गया गुजरा है ।
चिन्तन का आश्रय लेना चाहिए और प्रचलित मतमतान्तरों में से कौन ज्येष्ठ और श्रेष्ठ के झंझट में न पड़ कर नई दृष्टि अपनानी चाहिए कि प्रस्तुत प्रचलनों को किसी विशेष समय की आवश्यकताओं के अनुरूप गढ़ा हुआ मानना चाहिए । ग्राह्य और अग्राह्य का निर्णय तर्कों के सहारे नहीं, वरन् मानवी गरिमा के अनुरूप भावनाओं के सहारे करना चाहिए ।
चिन्तन को इस केन्द्र-बिन्दु पर एकाग्र करें कि मानवी गरिमा के अनुरूप चिन्तन क्या हो ? लोग उसे अपनाने और चरित्र में उतारने की प्रेरणा देने वाला शिक्षण किस प्रकार के विद्यालयों और कि स्तर के साहित्य सत्संग द्वारा प्राप्त करें ? शासन किस प्रकार चले ? अब तक यही सोचा जाता रहा है ।
चिन्तन क्षेत्र में विचरण करने वाले संकल्प भी , परमेश्वर से छिपे नहीं रहते । घट-घटवासी सब जानता है । बाहर के लोगों को तो किसी चतुरता के सहारे धोखे में रखा जा सकता है । वस्तु स्थिति उनसे छिपाई जा सकती है ।सरकार की, समाज की, दण्ड व्यवस्था से तो बचा भी जा सकता है पर जो घट-घट का वासी है सर्वत्र समाया हुआ ।
चिन्तन रहता है। उसकी दृष्टि में मानव मात्र एक समान है। ‘सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः की भावना ही उसके जीवन का मूल उद्देश्य बन जाती है। कालान्तर में ऐसे व्यक्ति का व्यवहार मधुर एवं संतुलित हो जाता है। क्रोध व घृणा से उसका दूर का भी वास्ता नहीं रह जाता है।
चिन्तन-चेतना प्रभावी होती दिखाई पड़ती है। इन दिनों दैवी सत्ता का उदात्त चेतन-प्रवाह बलवती हो उठने के कारण ही समस्त संसार में सर्वत्र विवेक-बुद्धि जाग्रत होती दिखाई पड़ने लगी है। इसका स्पष्ट प्रमाण-परिचय समूचे विश्व में होने वाले युगान्तरकारी परिवर्तनों से मिलने लगा है। अस्तु, अगले दिनों यदि आसुरी सत्ता लुक-छिप कर अपना अस्तित्व बचाने की फिराक में इधर-उधर भयभीत होकर भागती दिखाई पड़े, तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए, अपितु इसे नियन्ता का एक सुनिश्चित पूर्व निर्धारण मानना चाहिए।
चिन्तन का परिष्कार करने वाली विधा का नाम ‘योग‘ है, वहाँ चरित्र में निखार लाने वाली प्रक्रिया ‘तप’ कहलाती है। आत्मिक प्रगति व व्यक्तित्व परिष्कार के ये दो महत्वपूर्ण आधार हैं। इसीलिए साधना प्रक्रिया में ध्यान-धारणा इत्यादि महत्वपूर्ण सोपानों की सफलता तभी मानी जाती है, जब तप-तितिक्षा द्वारा व्यक्ति ने अपने को अग्निपरीक्षा से गुजर जाने दिया हो। तप यों कई प्रकार के हैं, पर ब्रह्मवर्चस् की शोध प्रक्रिया में उसके आहार पक्ष को प्रमुखता देते हुए साधकों पर प्रयोग परीक्षण किये गये कि किस प्रकार आहार का अंतःकरण मन व शरीर पर प्रभाव पड़ता है तथा उस माध्यम से आँतरिक परिशोधन कैसे संभव हो पाता है?
चिन्तन और आदर्श चरित्र की गौरव गरिमा बनाये रखना, पवित्रता एवं प्रखरता पर आधारित व्यक्तित्व को समर्थ बनाये रखना तथा ऐसी योजना बना कर चलना, जिसका अनुकरण करने वाले ऊँचे उठते आगे बढ़ते रहें यही है मनुष्य की नीति-मर्यादा का सार संक्षेप। इसका जो जितना परिपालन करता है वह उतना ही नीतिवान है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-September
चिन्तन देते हैं और देवत्व का स्वभाव देते हैं। यह मैंने आपकी भाषा में कहा है। हमारी परिभाषा इससे अलग है। मैं यह कह सकता हूँ कि आदमी अपने देवत्व के गुणों के आधार पर देवता को मजबूर करता है। देवता पर दबाव डालता है, उसे विवश करता है और यह कहता है कि आपको हमारी सहायता करनी चाहिए और सहायता करनी पड़ती है।
चिन्तन हर दूरदर्शी को अति गंभीरतापूर्वक करना चाहिए। शरीर यात्रा थोड़े से शारीरिक मानसिक प्रयत्न से चल सकती है। परिवार को स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाने का प्रयास भी निर्वाह क्रम के साथ-साथ ही चलता रहता है। यह दोनों कार्य इतने भारी नहीं हैं उन्हीं के लिए सारी जीवन सम्पदा पूरी तरह खप जाय। आत्मा और परमात्मा के संतोष हेतु भी कुछ किया ही जाना चाहिए।
चिन्तन शक्ति एवं विवेक की दरिद्रता और व्यक्तित्व के उथलेपन का परिचायक मानना ही ठीक है। इस बौनेपन के कारण ही भाग्य को बदलने के लिए चमत्कारों का आश्रय खोजने में ही समय, श्रम एवं पुरुषार्थ खपाया जाता है।
चिन्तन, समुचित उत्साह और उपयुक्त परिश्रम की तीन विभूतियाँ अपने आप में अतिशय महत्वपूर्ण हैं। इनका संयोग जहाँ भी होगा वहाँ अग्रगमन का संयोग अनवरत रूप से सामने आता रहेगा। इन तीनों के साथ एक और सद्गुण की आवश्यकता होती है-वह है-सद्भाव भरा सहकार। दूसरों को अपना बना सकने का स्थायी आधार इस विशेषता के सहारे बन पड़ता है। चापलूसी के आधार पर मीठा बोलने वाले, अपने को हितैषी , प्रामाणिक होने की साक्षी देने वाले, कुछ समय तो किन्हीं पर अपनी छाप छोड़ सकते हैं, मित्र बन सकते हैं और सहयोग ले सकते हैं, पर वह आडम्बर देर तक नहीं चलता है।
चिन्तन ही नहीं, कर्म भी ऐसी दिशा विशेष में तनिक से प्रयास-पुरुषार्थ से बढ़ने लगता है जिसकी किसी को कभी संभावना नहीं होती। जो इस अवसर के पहचानते हैं वे कभी चूकते नहीं। आत्मिक प्रगति की व्यवस्था बनाते और साधना-पुरुषार्थ के लिए कटिबद्ध होते हैं।
चिन्तन की दिशाएँ ही और स्वभाव ही अगले जन्म में संस्कार रूप में साथ रहते हैं। साधन-सामग्रियाँ नहीं। यही प्रवृत्तियां अपने अनुरूप साधन जुटाने का समर्थ आधार बन जाती हैं। व्यक्तित्व में ये विशेषताएँ न हुई, तो साधन- उपलब्धियों का विशाल भंडार खाली होते देर नहीं लगती।
चिन्तन तन्त्र को सुनियोजित बना लिया जाय। इसके लिए आत्म समीक्षा की पक्षपात रहित बुद्धि जगायी जाय। शरीर को स्नान कराने की तरह अपने व्यक्तित्वों की कमियों को समझने और उन्हें योजनाबद्ध रूप से सुधारते रहने का अभ्यास किया जाय। यह जब कभी भी कर लेना पर्याप्त नहीं आत्म-समीक्षा और स्वभाव में शालीनता का समावेश करते रहना ऐसा नित्यकर्म है जिसे करते रहने पर व्यक्तित्व की प्रखरता निरंतर बढ़ती रहती है। यही है वह बहुमूल्य सशक्त आयुध, जिसकी सहायता से हर मोर्चे पर सफलता पायी और विजय श्री वरण की जाती है।
चिन्तन में परिवर्तन व परिष्कार की आवश्यकता अनुभव करेंगे। इस विभीषिका के पश्चात् मानवी चिन्तन, चरित्र व व्यवहार में इतना आमूल-चूल अन्तर दृष्टिगोचर होगा, जिसे देख कर लोग यही अनुभव करेंगे कि कोई नयी मानव प्रजाति का उद्भव हो गया है। वस्तुतः इसी के बाद लोग सही चिन्तन की शक्ति को पहचान सकेंगे।
चिन्तन किया जाय तो प्रतीत होगा कि उदासी का काल्पनिक लबादा अकारण ओढ़ रखा गया है। उसे आसानी से उतारा जा सकता है। जब वास्तविक कठिनाइयों से घिरे हुए व्यक्ति हँसते-हँसते उनका सामना कर सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि जिनने निरर्थक का काल्पनिक जाल जंजाल बुन रखा है वे उसे मकड़ी के ताने की तरह तोड़कर न फेंक सकें॥ उदासी ऐसी व्यथा नहीं है जिससे मनुष्य स्वयं पीछा न छुड़ा सकें।
चिन्तन और आचरण। अनेकों संकटों के अनेकों उपाय खोजने में परेशान होने की अपेक्षा एक ही उपाय से समस्त संकटों का निराकरण हो सकता है कि सर्वत्र शालीनता को मान्यता मिले और लोग आत्मवत् सर्वभूतेषु का आदर्श व्यावहारिक जीवन में उतारें। कड़ा परिश्रम करें और उत्पादन , अनुशासन, सदुपयोग के आधार पर जीवनचर्या अपनाने के लिए सहमत हों। अशिक्षा , अस्वस्थता, अभावग्रस्त, अव्यवस्था जैसे अनेकों कारणों को इसी आधार पर हल किया जा सकता है कि मानवी गरिमा के अनुरूप हर व्यक्ति अपने को टाले । जियो और जीने दो की नीति को अपनाने में आनाकानी न करें।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की अनगढ़ताएँ अनेकों विपत्तियाँ खड़ी करती हैं। असंयम और अनाचार ही की मनःस्थिति प्रतिकूल परिस्थितियाँ बनकर सामने आ खड़ी होती हैं। यदि व्यक्तित्व के परिष्कार की सही रीति नीति समझी और समझाई जा सके तो सफलतापूर्वक स्वस्थ, संतुलित और समुन्नत रहा जा सकता है। यह प्रशिक्षण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। ज्ञानयज्ञ या विचार क्रान्ति अभियान की प्रक्रिया को इसी हेतु व्यापक बनाया जा रहा है।
चिन्तन को भी प्रभावित कर सकेंगे। शस्त्रास्त्रों की विभीषिका पूर्णतः समाप्त हो जायेगी। लोग इन विनाशकारी हथियारों को लगभग भूल जायेंगे, जिससे उन्हें अधिक समय तक सुख और शान्ति की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। तब निश्चय ही स्वर्णयुग की वापसी देखी जा सकेगी, जिसमें सभी लोग ईश्वरीय नियमों व अनुशासनों का परिपालन करते दिखाई पड़ेंगे। प्रायः संघर्ष की स्थिति तब पैदा होती है, जब लोगों के विचारों में भिन्नता हो, किन्तु जब सभी की विचारधारा समान हो, सब शासन , अनुशासन और पूजा-आराधना के संबंध में एकमत हों, तो फूट-फसाद का प्रश्न ही नहीं उठता।
चिन्तन पद्धति को भी प्रभावित परिवर्तित करके छोड़ा है। विज्ञान के क्षेत्र में अध्ययन और अनुसंधानों की महत्ता-उपयोगिता इस कदर बढ़ी है कि उसके आगे धर्म दर्शन , साहित्य संगीत, कला आदि के विषय महत्वहीन होते चले गये हैं। कभी जो गरिमा धर्म और अध्यात्म को प्राप्त थी आज विज्ञान ने वह स्थान ग्रहण कर लिया है। तर्क, तथ्य, प्रमाण आदि के अभाव में धर्म की बात को अब संदिग्ध और संदेहास्पद ढंग से देखा जाता है और प्रतिपादन भी उसी के अनुरूप किये जाने लगे हैं।
चिन्तन की उत्कृष्टता है। संसार के महापुरुषों में से हर एक सफल व्यक्ति का इतिहास यही रहा है। सभी छोटे-छोटे खानदानों में पैदा हुए थे। छोटे-छोटे घरों में परिस्थितियों में पैदा हुए थे, लेकिन उन्नति के ऊँचे से ऊँचे शिखर पर ऊँचे से ऊँचे स्थान पर जरूर पहुँचते चले गये। कौन जा पहुँचे?
चिन्तन, चरित्र व व्यवहार में इतना आमूल-चूल अन्तर दृष्टिगोचर होगा, जिसे देख कर लोग यही अनुभव करेंगे कि कोई नयी मानव प्रजाति का उद्भव हो गया है। वस्तुतः इसी के बाद लोग सही चिन्तन की शक्ति को पहचान सकेंगे।
चिन्तन के कारण मैं स्वयं ही विपत्ति में फँसता जा रहा हूँ। उससे उबरना और निकलना पूरी तरह मेरे बस की बात है।
चिन्तन की काली छाया होती है। भय की आशंकाओं में से बहुत ही न्यून परिणाम में चरितार्थ होती देखी गई हैं। अधिकाँश तो कुकल्पनाएँ ही होती हैं।
चिन्तन को समझने का प्रयत्न करना चाहिए । ऐसे लोगों को मानसिक बिखराव से बचना होता है। वे अपने लिए उचित कार्य निर्धारित करते हैं ऐसा जिसमें अनैतिकता का पुट न हो। ऐसा जिसे हेय और आदर्श रहित न समझा जाय। जिसे करते हुए आत्मा न धिक्कारे और समीपवर्ती लोगों को यह न कहना पड़े कि लालच के वशीभूत होकर नीति-नियमों का उल्लंघन किया गया।
चिन्तन के साथ जुड़ी हुई है। यदि मनोबल में एक करारा झटका लगा दिया जाय तो इस अर्धमृत अवस्था में ले पहुँचने वाली उदासी से सहज छुटकारा पाया जा सकता है।
चिन्तन की शक्ति को पहचान सकेंगे।
चिन्तन, दृष्टिकोण महत्वाकाँक्षाएँ और गतिविधियाँ ऊँचे स्तर की हो जाती हैं। इनसानियत एक बड़ी चीज है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-May
चिन्तन में वेदना झलकती रही।
चिन्तन तंत्र सक्रिय हो उठा है। उसने तीव्र पीड़ा का प्रदर्शन किया।
चिन्तन निन्दापरक शब्दों में प्रयुक्त किया गया है। वह इसलिए कि जो वस्तु जैसी है उसे वैसी न दिखाकर वह कुछ को कुछ दर्शाती है और भ्रमित प्राणी उसके आकर्षण में उसी ओर खिंचता चला जाता है। इस मनोविनोद में समय और शक्तियों का अपव्यय तो बहुत होता है, इसमें रुचि भी रहती है पर जब निष्कर्ष और प्रतिफल पर दृष्टि डाली जाती है तो शून्य हाथ लगता दीख पड़ता है।
चिन्तन, चरित्र व व्यवहार में वह सात्विकता क्यों नहीं दिखाई पड़ती जो पूर्वकाल में यहाँ की प्रधान विशिष्टता रही थी? आधुनिक शोधकर्मी इसके दो प्रधान कारण बताते हैं-प्रथम तो यह कि अब वायुमंडल इतना प्रदूषित हो चुका है और उसमें तरह-तरह के विषैले तत्त्वों व गैसों की इतनी भरमार हो चुकी है कि उस सूक्ष्म देव-प्रवाह के आवागमन में व्यतिरेक उत्पन्न होता है और अब वह उस परिमाण में नहीं आ पाता, जितना प्राचीन समय में इनकी अनुपस्थिति और वायुमंडल की शुद्धता की स्थिति में आता था। द्वितीय, जो इस देव-प्रवाह का उद्गम स्रोत है उसे हम जलता हुआ अग्नि पिण्ड मात्र मान कर उसकी अवमानना एवं उपेक्षा कर रहे हैं, जबकि वास्तविकता इससे सर्वथा विपरीत है, वह चेतना का पिण्ड है और समस्त संसार को जाग्रत-जीवन्त बनाये रखता है। इस संबंध में छान्दोग्य उपनिषद् (3/19/3) का कथन है-आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योप व्याख्यानम् सदेवेदमग्र आसीत् “ अर्थात् भूः से द्यु तीनों लोकों को अपनी रश्मियों से जीवन देने साले सूर्य ही सबकी आत्मा हैं।
चिन्तन-चेतना जाती रही और वे निष्क्रिय पड़ गये। मशीन ने इसकी पुष्टि कर दी। मजेदार बात यह रही कि महिला वैज्ञानिक के जाते ही सब की चेतना पुनः लौट आयी। वे चिंतन करने की स्थिति में दुबारा आ गये। उन्होंने क्रिस्टिया के प्रस्थान पर खुशी जाहिर की।
चिन्तन कर रहा है, तो इसका अर्थ ही होता है-मौन-मानसिक मनन। विचारणा सदा मानसिक होती है। वह क्रिया के द्वारा मूर्तिमान् बनती और वाणी से अभिव्यक्ति पाती है। वनस्पतियों में क्रिया और वाणी दोनों का अभाव होता है, अस्तु वे जो कुछ भी सोचती हैं, उसे अपनी मूक वाणी द्वारा ही कहती रहती हैं। परिष्कृत यंत्र इसे पकड़ने में सफल हो जाते हैं।
चिन्तन में आमूलचूल हेरफेर की है। व्यक्ति बहिरंग जीवन में धार्मिक आचरण करे, न करे किन्तु उसके मानस का परिष्कार तो होना ही चाहिए। उसे यह समझना जरूरी है कि बिना भावनात्मक कायाकल्प के सारे बाह्योपचार निरर्थक है। यह तभी संभव हो सकेगा , जब अध्यात्मधर्म के संबंध में, उपासना सिद्धि के संबंध में छाई तमाम भ्रान्तियों का निवारण उसे विज्ञानसम्मत बना कर किया जाय । विज्ञानसम्मत से अर्थ है तर्क, तथ्य, प्रमाण लॉजिक की कसौटी पर कसते हुए ।
चिन्तन, स्वाध्याय, सत्संग जैसे विचारमंथनों द्वारा आत्मशोधन की जो प्रक्रिया चलती है उसी को देखते हुये यह जाना जा सकता है कि साधना में कितनी प्रगति हुई। साधक को सिद्धि मिलती है, बिना आत्मशोधन का भजन निरर्थक जाता है। अपवाद रूप में किसी को कोई दैवी अनुग्रह मिल भी जाय तो उसका परिणाम अंततः भस्मासुर, रावण, कुँभकरण, मारीच, कंस, हिरण्यकश्यप, आदि की तरह घोर विपत्ति के रूप में सामने आता है। फलित तो विभीषण, हनुमान जैसे सद्भाव सम्पन्न लोगों की साधना ही होती है।
चिन्तन को ऐसे व्यामोह में डाल देता है कि उसे तात्कालिक लाभ को छोड़ने का साहस नहीं होता भले ही पीछे उसका प्रतिफल कुछ भी क्यों न भुगतना पड़े। इसी व्यामोह में ग्रस्त होकर अधिकांश जन आलस्य प्रमाद से लेकर व्यसन व्यभिचार तक और क्रूर कर्मों की परिधि तक पड़ते चले जाते हैं। इन्द्रिय लिप्सा में ग्रस्त होकर लोग अपना स्वास्थ्य चौपट करते हैं। वासना-तृष्णा की गुलामी में बहुमूल्य जीवन सम्पत्ति यों ही खपती रहती है। इस चक्रव्यूह में पड़कर व्यक्ति किस प्रकार खोखला होता चला जाता है, इसका प्रमाण आत्म समीक्षा करके हम स्वयं ही पा सकते हैं।
चिन्तन में ही डूबे हुए कहा “नहीं माना जी नहीं। भले ही रात भर जलकर यह दीपक बुझ जाए परन्तु प्रभात अवश्य आएगा। भले ही हम सब मर जायँ, किन्तु भारत माँ की संस्कृति का विजय ध्वज अवश्य फिर फहराएगा अवश्य आकाश के वक्षस्थल पर फिर नर्तन करेगा।”
चिन्तन कर्तृत्व की उत्कृष्टता के रूप में प्रकट होता है। जीवन को सही ढंग से गढ़ कर सर्वांग सुन्दर बनाना इसी के द्वारा सम्भव है।
चिन्तन तंत्र अवश्य है। वह कैसे कार्य करता है? अभी अविज्ञात है। मनुष्य के पास भी यह प्रणाली है। वह सोचता है और उसे क्रियान्वित भी करता रहता है, पर विडम्बना यह है कि अधिकांश समय वह गिरने गिराने,
चिन्तन को प्रभावित किया जा सकता है क्या? इसके लिए उन्होंने एक विशेष प्रयोग किया। एक लड़के को बुलाकर उससे 1 से 15 तक की संख्या में से कोई एक चुन कर मन में रख लेने को कहा, साथ ही यह निर्देश भी दिया है कि सही संख्या पूछने पर भी नकारात्मक उत्तर ही दिया जाय।
चिन्तन प्रणाली कार्य करती है।
चिन्तन के सागर में उतर कर विवेक के मोती बीनने लगे। ऐसा हो सके तो समझना चाहिए कि युग परिवर्तन के महान दायित्व में हमारी भागीदारी बन पड़ी। आज के भागीदार ही तो कल के युग संचालक का गौरव प्राप्त कर सकेंगे।
चिन्तन के साथ “हर रात नई मौत” की भावना लेकर शान्तिपूर्वक सो जाना चाहिए।
चिन्तन मानसिक ऊर्जा का क्षय कर अपनी कार्यक्षमता नष्ट कर डालता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति किंकर्तव्य विमूढ़ हो जाता है और संकट से उबरने की राह पाने में अपंग असमर्थ बन जाता है। ऐसी स्थिति में उलटे विचारों की शृंखला नई उलझनें पैदा कर अधिकाधिक दल-दल में डुबोती जाती हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार का स्तर ऊँचा उठाये, सन्त, सज्जनों की तरह जीना सीखे। अपने को पार करने की कला सीखे। साथ ही यह भी करे कि अपने कंधों पर बिठाकर दूसरों को पार लगा सके।
चिन्तन-किसी अज्ञात का जिसे वह भी नहीं जानता। यही उसकी दिनचर्या बन गई। जंगल से लाए कंदों से पेट भर जाता था।
चिन्तन चेतना में परिष्कृति द्वारा आयाम का यह बदलाव संभव है। योगीजन इसी प्रक्रिया द्वारा स्वयं को अध्यात्म के उच्च सोपानों में पहुँचाते और जो सामान्यजन देख-सुन नहीं पाते वैसी जानकारियाँ अर्जित करते हैं।
चिन्तन की दृष्टि से सबसे हीन इससे अगला वर्ग उनने उनका बताया जो निर्वाह भर में समर्थ प्रयोजनों मात्र हैं ।वे जिस तिस प्रकार जी तो लेते हैं पर श्रेय सम्मान जैसी कोई मानवोचित उपलब्धि उनके साथ नहीं जुड़ी। इससे श्रेष्ठवर्ग प्रतिभाशाली व्यक्तियों का है जो सही अर्थों में युगनेतृत्व कर सकने वाले व्यवस्थापक स्तर के श्रेष्ठ व्यक्ति होते हैं। वे अपनी नाव अपने बलबूते खेते हैं और उसमें बिठाकर अन्यों को भी पार लगाते हैं। संस्कृति व देश व समाज व विश्व की प्रगति व सुव्यवस्था इन्हीं प्रतिभावानों पर निर्भर है।
चिन्तन की भ्रष्टता, वरन् सबका समान उत्कर्ष इसका एकमात्र लक्ष्य है। इस में संलग्न रह कर ही वह मनुष्य जैसे विकसित प्राणी के सुविकसित तंत्र का गौरव प्राप्त कर सकता है। मनुष्य की महानता भी इसी में है कि वह ऐसी ही सोच विकसित करे, अन्यथा शरीर भर मानव को मिल जाने से ही वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता।
चिन्तन करते हुए ही प्रातःकाल जगना और रात्रि को सोना चाहिए । यह क्रम नित्य नियमित रूप से चलता रहे। कल की अपनी सुव्यवस्थित जीवनचर्या को सफलता मानना चाहिए और प्रसन्न होना चाहिए। साथ ही यह भी ध्यान रखने योग्य है कि जो भूलें रहीं हों उस पर दुःख मनाते हुए उनकी क्षतिपूर्ति जल्दी से जल्दी कर ली जाय। यह सिलसिला नियमित रूप से चलता रहे।
चिन्तन एवं कर्मपरक पद्धति है। उपासना उच्चस्तरीय कक्ष का योगाभ्यास कहलाती है और साधना अपने परिष्कृत स्वरूप में तपश्चर्या कहलाती है दोनों के समन्वय से ही जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने का, पूर्णता तक पहुँचने का लक्ष्य पूरा होता है, यही ईश्वर प्राप्ति है।
चिन्तन से क्रमशः उबरते हुए उन्होंने अपनी चर्चा आगे बढ़ाई। “बेल ! तुम पौधों को ठीक सींचता नहीं ! हमारे पौधे सूख गए।” मैं एक दिन उस अप्रसन्न हुआ।
चिन्तन हमारे आचरण व्यवहार को गढ़कर उसको सौंदर्यवान बनाने वाला होता है। इससे व्यक्तित्व में प्रभाविकता आती है विख्यात मनोविद् जे.जे. मैकडरमॉट ने अपने अध्ययन “द् रायटिंग्स आफ विलियम जेम्स "कम्प्रीहेन्सीव एडीसन" में कहा है कि विचारों से ही जीवन को गढ़ा जाता है। इसी के अनुरूप जीवन की अभिव्यक्ति तत्संबंधी क्रियाकलापों गतिविधियों के रूप में होती है उसकी उत्कृष्टता-निकृष्टता प्रेम, उदारता, सहानुभूति अथवा परपीड़न घृणा आदि के रूप में दृष्टिगत होती है।
चिन्तन किया था कि ऐसा भी कुछ हो सकेगा। एक चमत्कार यह भी है कि एक बहुत बड़ा वर्ग औरों की तरह भौतिक जगत के प्रवाह में न बहकर श्रेष्ठता की ओर ले चलने वाले प्रवाह से जुड़ने की सोचने लगा, न केवल सोचने वरन् छोटे-छोटे दीपयज्ञों-यज्ञायोजनों द्वारा सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन के कार्यक्रमों में जुट गया। एक चमत्कार यह है कि नये जन्म लेने वाले बालक-बालिकाओं का एक बड़ा वर्ग भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों को जीवन में उतारने लगा और बौद्धिक व भावनात्मक दोनों ही क्षेत्रों में बहुमुखी प्रतिभा उसकी दृष्टिगोचर होने लगी, क्या यह सभी चमत्कार नहीं हैं? संभवतः इन सबका मूल्याँकन अभी न होकर बाद में हो, अतः फिलहाल उन प्रसंगों की चर्चा हम यहाँ कर रहे हैं, जिनसे स्थूल बहिरंग जगत में दृष्टिगोचर प्रसंगों का ऊहापोह किया जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-June
चिन्तन करने की है, उतनी संभवतः पहले कभी नहीं, रही। क्यों? आज की परिस्थितियों की एक समीक्षा से यह बात स्पष्ट हो जाती है।
चिन्तन के विशेष बिन्दुओं पर गम्भीर चर्चा की और वापस लौट कर अपने प्रयोगों में जुट गए। कुछ ही समय बाद उन्होंने भौतिकी जगत को “अनिश्चितता का सिद्धान्त” दिया। जो और कुछ नहीं वेदान्त के इस तत्व की व्याख्या है कि पदार्थ का स्वरूप प्रतिक्षण अनिश्चित है। उन्होंने अपने ग्रन्थ ‘फिजिक्स एण्ड फिलॉसफी में यहाँ के चिन्तन से स्वयं के प्रभावित होने का मार्मिक वर्णन किया है। नोल्सवोर और इरविन श्रोडिंजर के स्वरों में भी यही गूँज सुनाई देती है।
चिन्तन में ‘अंसटास’ नाम दिया है । इसी तत्व को शेलिंग ने अपने दर्शन में ‘डार्कग्राउण्ड’ कहकर उल्लेख किया है । शोपेनहावर का संकल्पवाद-छान्दोग्य के 7 /4 /2 अंश की व्याख्या भर है । छान्दोग्य उपनिषद् के इस अंश में संकल्प को ब्रह्म रूप देते हुए कहा है कि जो इस संकल्प ब्रह्म की उपासना करता है, वह भगवान के रूप को प्राप्त करता है ।
चिन्तन सभी ओर भारतीय दर्शन प्रधान हो रहा है। थियोसॉफीस्ट्स का कहना है कि मनुष्य मरकर मनुष्य जन्म ही पाएगा, और किसी योनि में नहीं जाएगा। भारतीय संस्कृति कहती है कि जीवन का कोई स्त्री पुरुष लिंग नहीं मनुष्य पशु-पक्षी आदि कोई जाति नहीं। वह तो अपने कर्मानुसार शरीर प्राप्त करता है और निश्चित कर्मों का उपभोग करके शरीर छोड़ देता है, फिर दूसरा शरीर प्राप्त करता है, जब तक कि वह बंधनों से मुक्त नहीं हो जाता।
चिन्तन करें तो कुछ निष्कर्ष सामने आते हैं। प्रागैतिहासिक काल से अब तक विचार करें तो हम पाते हैं कि आर्य संस्कृति से लेकर अब तक अनेकानेक उन्नत संस्कृतियाँ, सभ्यताएँ विकसित हुई, रोम, मिश्र, यूनान की संस्कृतियाँ कभी उन्नति के चरम शिखर तक जा पहुँची थीं किन्तु क्या कारण है कि उनका आज नाम भी शेष नहीं है और सबसे प्राचीन होते हुए भी भारतीय संस्कृति अब तक अपना अस्तित्व बनाए हुए है? विधर्मी विदेशी संस्कृतियों के संघर्ष में वह क्षीण-दुर्बल अवश्य हुई किन्तु उसकी भित्तियाँ, नींव दृढ़ बने रहे। क्या कारण है कि विदेशी संस्कृतियाँ एक ही थपेड़े में अस्त-व्यस्त हो गयीं तथा दूसरी ओर हिंदू संस्कृति अपनों को अपनी मूलसत्ता से पृथक कर पूरे विश्व भर में उनके अनुदान वितरित करती रही अनेकानेक आचारों-संस्कृतियों को जन्म देती रहीं किन्तु समूल नष्ट नहीं हुई जन बल घटता चला गया, फिर भी देव संस्कृति कोटि-कोटि वर्षों के संघर्षों के बाद भी जीवित है। इस विषमता के मूल में कौन सा नियम काम कर रहा है?
चिन्तन के अनुसार चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद मिलता है। वह भी प्राकृतिक विधान से व सौभाग्यवश। आचार्य शंकर कहते हैं कि तीन अतिदुर्लभ पदार्थों, मनुष्यत्व, मुमुक्षत्व रूस महापुरुसंश्रय में सर्वप्रथम मनुष्यत्व ही प्रधान है (सौंदर्य लहरी)।
चिन्तन के प्रभाव स्पष्ट दिखाई देते हैं । इन प्रभावों का विस्तृत अध्ययन इतना व्यापक होगा जिसके लिए अनेकानेक शोध ग्रन्थों के कलेवर छोटे पड़ जायँ। बात इन कतिपय उदाहरणों और छुटपुट प्रयोगों की नहीं समस्त संस्कृति की है जो आज भी समीचीन और सम-सामयिक है।
चिन्तन के प्रति स्वयं को ऋणी माना है । शोपेनहार, विक्टर कजिन, पालडायसन , श्लेगिल आदि पश्चिमी तत्व वक्ताओं ने अपने तत्व अभिव्यक्त किया है । कई जगह तो सिर्फ शब्दों की फेर बदल भर दिखाई देती है । मनीषी टामलिन इसे स्वीकारते हुए कहते हैं “शाँकर दर्शन की दिशा लगभग वही थी जिसे बाद में जाकर काण्ट ने अपनाया । मैक्समूलर के ग्रन्थ “थ्री लेर्क्चस आन द् वेदान्त फिलॉसफी पढ़ें तो पता चलता है कि उपनिषदों ने जिस ब्रह्म का प्रतिपादन किया है उसी को स्पिनोजा ने “सबस्टेशिआ” ‘स्वतन्त्र तत्व’ नाम दिया है ।
चिन्तन से बिल्कुल उल्टी है। वे कहते हैं कि “मोक्ष” के माध्यम से एक हिंदू साधक बहिर्मुखी वृत्तियों से स्वयं को सिकोड़ता है व अपनी अंतःचेतना को परिष्कृत कर ऊर्ध्वमुखी कर लेता है। यह प्रक्रिया इतनी अद्भुत है कि वह एक हिंदू की जीवन पद्धति को ही बदल कर जीवन संबंधी उसकी दृष्टि को त्यागमय बना देती है। संभवतः यही पश्चिम के लिए भारत की सबसे बड़ी देन तथा आज के युग की पीड़ाओं का समाधान भी है। “(साइकोलॉजिकल टाइप्स-सी-जी-जुँग से उद्धृत) एल्डुअस हक्सले अपनी पुस्तक “पेरेनियल फिलॉसफी में कहते हैं कि “मोक्ष का अर्थ भारतीय तत्व दर्शन के अनुसार है अज्ञान, दुष्कर्म व दुःखों से मुक्ति दिलाकर आनन्द, सत्कर्म व ज्ञान प्रदान करने वाला तत्व।
चिन्तन निरर्थक ही जाएगा। उत्तर मात्र यही है कि आज जितनी अधिक आवश्यकता मानव जाति को इस पक्ष पर चिन्तन करने की है, उतनी संभवतः पहले कभी नहीं, रही। क्यों? आज की परिस्थितियों की एक समीक्षा से यह बात स्पष्ट हो जाती है।
चिन्तन वाला प्राणी माना जाता है। वे आत्मा की अमरता-गरिमा पर विश्वास रखते थे।
चिन्तन की उपादेयता पर बल देना पड़ा।
चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में उनके इस सहस्रों पृष्ठो में अंकित विचारों का निकट भविष्य में प्रकाशन निश्चित ही मानव की बौद्धिक-आध्यात्मिक क्षितिज पर एक नए प्रकाश के रूप में उदय होगा। गीता की तरह रामायण ने भी अपने उदयकाल से मनुष्य को देवत्व के प्रति आस्थाओं-मर्यादाओं के प्रति आस्था उमगाई है। रामायण के प्रथम लेखन का श्रेय आदि कवि महर्षि वाल्मीकि को है। परवर्तीकाल में इसकी भाव सम्पदा और मर्यादा-पुरुषोत्तम के उत्कृष्ट चरित्र से आकृष्ट होकर अन्य कवियों ने भी राम-कथा का गान कर संस्कृति की मन्दाकिनी बहाई। संस्कृत भाषा की अन्य रामायणों में आध्यात्म रामायण, चम्पू रामायण, देव रामायण, अगस्त्य रामायण का नाम उल्लेखनीय है।
चिन्तन हमको एक ऐसी सत्ता की जानकारी देता है जो बुद्धिमत्तापूर्ण भी है व इच्छा शक्ति वाली भी । इसे यदि हम नियम व्यवस्था से रूप में इकोलाॅजी विधि व्यवस्था के रूप में समझ लें तो ठीक रहेगा । अलबर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि स्रष्टा के यहाँ कुछ भी अव्यवस्थित नहीं है । यहाँ सब कुछ सुनियोजित है । भगवान कभी पासे नहीं खेलता” ।
चिन्तन इन तीनों ही क्षेत्रों में इस्लामी जगत भारतीय जीवन और विचारधारा से प्रभावित हुआ है । मुंडकोपनिषद् ने इस तथ्य का रहस्योद्घाटन करते हुए सही ही लिखा है-
चिन्तन यह कहता है कि सृष्टि के अवलोकन से चार निष्कर्ष निकलते हैं - (1) सृष्टि नियमानुकूल है नियमों से बँधी हुई है (2) इन नियमों से अपार बुद्धि का परिचय मिलता है (3) यह नियम अटल हैं तथा (4) यह नियम सूक्ष्म से सूक्ष्मतम वस्तु पर भी शासन करते हैं व कोई भी वस्तु इन का उल्लंघन नहीं कर सकती । इस प्रकार वे सिद्ध करते हैं कि ईश्वर इस जगती का नियन्ता है, ज्ञानवान है अर्थात् सर्वज्ञ है, एक रस है तथा सूक्ष्म व सर्वशक्तिमान है ।
चिन्तन सम्पदा के वेदान्त दर्शन ने क्वाण्टम भौतिकी के वैज्ञानिक पारनर हाइज़ेनबर्ग की सोच में व्यापक उलट-फेर कर दी। क्या यह दार्शनिक चिन्तन किन्हीं अनुभूतियों पर आधारित है? क्या इनको आधुनिक विज्ञान के द्वारा परख सकना संभव है? इन महत्वपूर्ण सवालों को लेकर हाइज़ेनबर्ग सन् 1929 में भारत आए। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर से इस चिन्तन के विशेष बिन्दुओं पर गम्भीर चर्चा की और वापस लौट कर अपने प्रयोगों में जुट गए।
चिन्तन, ज्ञान का उपार्जन व श्रेष्ठ कर्म तथा क्षुद्रत्व से अर्थ है निकृष्ट चिंतन व निकृष्ट कर्म। क्षत्रिय वे जो पुरुषार्थी थे व बाहुबल से क्षेत्रों की विजय करके राज्य स्थापना हेतु बाहर जाते रहे।
चिन्तन में ‘मोक्ष’ की भावना की प्रतिष्ठापना करना। जो मोह का क्षय करे, वह मोक्ष है। भारतीय संस्कृति की मान्यता है कि यह मोक्ष, मुक्ति, जीवनमुक्ति जरूरी नहीं कि मरने के बाद मिले, यह संदेह जीवन में कभी भी हर कोई प्राप्त कर सकता है। इसके लिए यहाँ के ऋषियों ने मोक्ष की लक्ष्य प्राप्ति के लिए समुचित मार्गदर्शन मानव मात्र को दिया है।
चिन्तन आज की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में यह दिया है कि संसार में दुःख है, हम उन्हें कर्मों द्वारा कम करना सीखें तथा पूर्णता की प्राप्ति हेतु त्याग करना भी सीखें। इस संसार को माया मानने से आशय है कि भवबंधनों के रूप में कृत्रिम आनन्द की मोह-माया में फँसाने वाले तृष्णा, वासना, अहंता विभिन्न रूपों में हमारे चारों ओर हैं। इन सबको माया का रूप, क्षणिक मात्र मानकर हम स्वयं को अंतर्मुखी बनाएँ मायावाद पूज्यवर के अनुसार जीवन से भागना नहीं सिखाता, पलायनवादी दर्शन नहीं है, अपितु व्यक्ति को वास्तविकता की अनुभूति करता है।
चिन्तन शून्यवाद के रूप में बौद्धों द्वारा प्रणीत हुआ। जिसके अनुसार सब कुछ दुःख ही दुःख से भरा हुआ है इस संसार में पाश्चात्य दार्शनिक लीबन्ब्जि ने तो चिद् बिन्दुविद्या (मोनोडालाजी) के रूप में संवाद के संबंध में यह सिद्धान्त दे दिया कि हरेक का अपना संसार अलग है और प्रत्येक में अपने विकास की सामर्थ्य है। सृष्टि क्यों है? यह कोई दार्शनिक बता नहीं पाया, विभिन्न वादों द्वार मनुष्य को भ्रम जंजालों में उलझाने का प्रयास और किया। वस्तुतः सृष्टि का प्रयोजन है-परमात्मा की बहुविध अभिव्यक्ति और इसके लिए उसने मनुष्य को चुना है।
चिन्तन की प्रेरणा से वह ह्यूमिनिस्टिक साइकोलॉजी की धारणा दे सके हैं।
चिन्तन के प्रभाव विज्ञान की किसी शाखा विशेष तक सीमित नहीं हैं। अन्य शाखाएँ और उनके अध्येता इसकी प्रेरणा और प्रभाव को ग्रहण कर विज्ञान के क्षेत्र में कुछ नया दे सके हैं। “स्टेप्सट्एन इकॉलाजी आँव माइन्ड” की रचना करने वाले ग्रेगरी बैटसन अपने प्रयोगों में मन को एक नए रूप में जान सके। उन्हीं के शब्दों में ‘माइन्ड विदआउट नर्वस सिस्टम’ की धारणा पूर्वी चिन्तन से प्राप्त हुई। इसी प्रकार मनोविज्ञान के क्षेत्र में क्रान्ति लाने वाले आर.डी. लेंग से फ्रिटजोफ काप्रा ने लन्दन में मुलाकात कर उन्हें अवगत कराया कि वह पूर्वी तत्त्वचिंतन और आधुनिक विज्ञान का समन्वय कर रहे हैं।
चिन्तन यह कहता है भगवान जब भी अवतार लेकर आते हैं तो मानव और अपने बीच के परदे को फाड़ने के लिए आते हैं। उस परदे को, जिस अपनी प्रकृति में सीमित मनुष्य उठा तक नहीं पाता।
चिन्तन देती हुई मानवी पुरुषार्थ को दिशा देती हुई उसे उद्योग परायण बनाती है।
चिन्तन कर सृष्टि-ब्रह्म मनुष्य इन सबके विषय में बड़ा ही व्यावहारिक प्रतिपादन प्रस्तुत करते हुए व्यक्ति के धरती पर अवतरण को सोद्देश्य बताया है । सृष्टि के रहस्यों की व्याख्या करते हुए उनने उस विश्वउद्यान को, जो स्रष्टा ने विनिर्मित किया है, सजाते-सँवारते रहने का दायित्व भी मनुष्य को सौंपा है । यह आस्तिकतावादी दर्शन जो व्यक्ति को निरन्तर कर्म-परायण बने रख अंतर्मुखी बनाता है, भारतीय दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है ।
चिन्तन है। इस जीवन में जो भोगाकांक्षी रहा हो, मन में कामनाएँ भोगों को भोगने की रही हों पर वैसे अवसर न मिल पाए हों तो इच्छा शक्ति उस अगले जन्म में भीगी-विलासी बनाती है चाहे वह पूर्व जन्म में धर्म परायण साधक रहा हो। ध्रुव पूर्व जन्म में मुनि कुमार थे किन्तु राजा के बच्चों के साथ खेलते-खेलते राजसी भोग जीने की कामना ने उन्हें दूसरा जन्म राज परिवार में दिलवाया, जहाँ वे अंततः नारद ऋषि के परामर्श को पाकर अन्तिम लक्ष्य पर पहुँचे। वासनाओं का ध्यान द्वारा यदि योगी शमन करता चले, उन्हें परिमार्जित करता चले तो कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
चिन्तन सूत्रों में अपने को खोने लगते थे । हम बोल्ट ने भगवद्गीता को पढ़ने के बाद अपनी अनुभूति व्यक्त करते हुए कहा कि वह परमात्मा को जीवन प्रदान करने के लिए धन्यवाद देता है क्योंकि इस कारण ही उसे भगवद्गीता जैसा उत्कृष्टतम विचारकोश अध्ययन के लिए मिल सका ।
चिन्तन ऋषियों का रहा है। गुरु अपने शिष्य की रुचि व अधिकार के अनुसार उसे विभिन्न साधनों में से एक बतलाते आए हैं। एक ही गुरु के विभिन्न शिष्यों में कोई योगी कोई ज्ञान मार्गी, कोई भक्त, कोई वैष्णव, कोई शैव तथा कोई शाक्त कुछ भी बन सकता है। रुचि भेद के अनुसार इष्ट की आकृति बदल दी जाय तो मनोवैज्ञानिक प्रयोग यह नहीं बताता कि परमेश्वर भी ढेरों हो गए। विश्वभुवन का एक ही स्वामी-एकोविश्वस्य भुवनस्य राजा” बताते हुए आर्ष-वांग्मय मूलतः बहुत्त्व में एकेश्वरवाद का ही प्रतिपादन करता आया है।
चिन्तन एक ही तत्त्वदर्शन आत्मा की शाश्वतता, चिरन्तनता, अखण्डता का आप व्यक्ति का दिग्दर्शन करने में सक्षम है। जीवन का प्रवाह अनादि से अनन्त तक प्रतिपादित करने वाला देव संस्कृति का यह मार्ग दर्शन इतना अनुपम-अद्भुत ह कि अर्नाल्ड टायनवी जैसे विद्वान ने दायसाकू इकेड़ा (सुप्रसिद्ध जापानी चिंतक मनीषी) से चर्चा के दौरान कहा है कि यह विश्वास व्यक्ति को आशावादी व कर्मपरायण
चिन्तन सम्पदा आज के विज्ञान सम्मत प्रयोगों और तर्क प्रवण वैज्ञानिक मन को प्रभावित करने अपने को प्रमाणित ठहरा सकने में समर्थ है। इस सवाल के जवाब में आधुनिक विज्ञान-सर्वश्रेष्ठ विज्ञानियों की अनुभूतियों का उल्लेख कहीं अधिक समीचीन होगा।
चिन्तन प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि “बंधन तीन ही हैं-लोभ मोह और अहंकार। इन्हीं को तृष्णा, वासना और अहंता कहते हैं। यही वास्तविक बंधन हैं। इन लिप्सा-लालसाओं से जो अपने को मुक्त कर लेता है, समाज का एक विनम्र घटक बनकर स्वयं को सेवा साधना में नियोजित कर देता है उसी के बारे में यह मानना चाहिए कि वह जीवनमुक्त है। बंधन सदा दुष्प्रवृत्तियों के होते हैं।
चिन्तन के आधार पर उसके प्रणेताओं ने उपास्य का रूप साधनादि चुनने का अधिकार सबको दे दिया। जो जिस मार्ग से चाहे, परमात्मा के रूप को माने उसका ध्यान करे। अंततः वह आस्तिकतावादी तो बनेगा यह चिन्तन ऋषियों का रहा है। गुरु अपने शिष्य की रुचि व अधिकार के अनुसार उसे विभिन्न साधनों में से एक बतलाते आए हैं। एक ही गुरु के विभिन्न शिष्यों में कोई योगी कोई ज्ञान मार्गी, कोई भक्त, कोई वैष्णव, कोई शैव तथा कोई शाक्त कुछ भी बन सकता है।
चिन्तन है। जिस भी समाज में मनुष्य जाति इन तीनों पुरुषार्थों का सम्पादन कर रही होगी, सही रीति-नीति से जीवन को जी रही होगी, वह कभी दुःखी, विक्षुब्ध हो ही नहीं सकती।
चिन्तन रहा है, वह वही है जो उपकरणों द्वारा शिक्षण-विवेचन की परिधि में आता हो। आर्ष-वांग्मय व्यष्टिगत समष्टिगत जीवन पर एक परिपूर्ण दृष्टि काल से परे डालता है व हो रहे घटनाक्रमों, संभावित भवितव्यताओं का मूलकारण समझाने का प्रयास करता है। सृष्टि की उलट-पुलट से लेकर एक अप्रत्याशित परिवर्तन जिसमें सारा वर्तमान ढाँचा बदल जाने की बात कही जाती है, पूर्णतः तथ्यों पर आधारित है तथा यही देव संस्कृति का प्राण है। भारतीय संस्कृति कहती है कि विश्व इतिहास में संकट की घड़ियाँ अनेक बार आती रही हैं, जिनमें विश्वमानवता पर विनाश के घटाटोप बादल छाये ही नहीं, भयानक रूप से गरजे और सब कुछ डूबा देने की चुनौती देकर मूसलाधार बरसे हैं। यह सब होते हुए भी स्रष्टा की सृजन क्षमता व उसकी न्यायक्षमता पर मनुष्य को, जीवन को विश्वास है।
चिन्तन से स्वयं के प्रभावित होने का मार्मिक वर्णन किया है। नोल्सवोर और इरविन श्रोडिंजर के स्वरों में भी यही गूँज सुनाई देती है। श्रोडिंजर वेदान्त में वर्णित प्रकृति के अनिश्चित स्वरूप की व्याख्या के आधार पर अपना आणविक अध्ययन करने में लगे थे। प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्ष में उन्हें हतप्रभ हो कहना पड़ा “अरे। सचमुच नाम रूप से अजूबा लगने वाला संसार कुछ तरंगों की हलचल भर है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ऐसा होगा, जिसका प्रभाव असंख्यों को प्रभावित करेगा । इसका शुभारंभ शान्तिकुञ्ज से हुआ है । “ (पृष्ठ 26 “नवसृजन के निमित्त महाकाल की तैयारी “ से ) । स्पष्ट है कि दुर्गम हिमालय वासी ऋषि सत्ताओं ने अपनी कार्य स्थली अब शान्तिकुञ्ज को बनाया है व यहाँ से उद्भूत चेतना देव संस्कृति का आलोक अब दिक्-दिगन्त तक विस्तार की प्रतीक्षा कर रहा है शपथ समारोह में एक लाख व्यक्तियों द्वारा इसी निमित्त ली जा रही प्रतिज्ञा इस घोषणा को सही कर रही है कि चूहे साहसी होने जा रहे है
चिन्तन व उसके कर्म पुरुषार्थ के परिप्रेक्ष्य में। योगेश्वर कृष्ण आगे कहते हैं-जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुँव जन्म मृतस्य च ।” (27/2 अ) अर्थात् “जन्में हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है।” स्वयं वे अपने बारे में व अर्जुन के विषय में इस ध्रुव सत्य को लागू करते हुए कहते है-
चिन्तन स्वर जिस एक बात का उद्घोष करते हैं वह है उसका अपनत्व और यही वह पृष्ठ भूमि है जो इसे विश्व संस्कृति का गौरव प्रदान करेगी संस्कृति का उद्देश्य हृदय पर अधिकार पाना है और हृदय की राह समरभूमि की लाल कीच नहीं सहिष्णुता का शीतल प्रदेश है, उदारता का उज्ज्वल क्षीर समुद्र है । ऋषि चिन्तन की वही उर्जस्विता विश्व मानव को वैचारिक संघर्ष से मुक्ति देगी । कल का भविष्य जिस महानतम आश्चर्य को साकार करेगा वह है संसार की सभी विचारधाराओं का अपने मूल स्वर से सामंजस्य । इसी घटना के साथ विश्व संस्कृति के चिन्तन स्वर गूँज उठेंगे “सभानोमत्रः समितिः सभानी, सभानो मनः सह चित्तभेषाम्” सब लोग एक विचार वाले हो जाएँ सभी के मन एक समान हो जाएँ सभी के चित्त में एक से संवेदन उठने लगें । यही वैदिक दर्शन की मान्यता रही है व यही अगले दिनों साकार रूप लेने जा रही है।
चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में सोचें कि यह धर्म है क्या? क्या यह वही धर्म है जिसके नाम पर निष्ठुर लोग एक दूसरे को मारते-परस्पर विद्वेष फैलाते नजर आते हैं? क्या धर्म उसे कहते हैं जिसमें बहिरंग का कर्मकाण्ड, वेश, विन्यास ही प्रमुख होता है एवं आचरण-व्यक्तित्व परिष्कार की कोई आवश्यकता नहीं होती? क्या धर्म वह है जो व्यक्ति को अनैतिक आचरण की प्रेरणा देता है व इसके लिए साक्षियाँ भगवत् सत्ता की देता है? क्या विशिष्ट पूजागृह में जाकर वैसा व्यवहार करना व मुँह चला लेना, यही धर्म है?
चिन्तन “तेन त्यक्तेन भुंजीथाः का (भोग भी त्याग के साथ) रहे तो ही जीवन यात्रा सफल है, नहीं तो यह जन्म-मरण का चक्र चलता ही रहेगा व बार-बार मनुष्य को इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। इस तरह भारतीय मनीषीगण कहते हैं कि अर्थ (आर्थिक मूल्य) तथा धर्म (नैतिक मूल्य) तो साधन हैं किन्तु काम (मानसिक मूल्य-जिनसे सांसारिक सुखों का उपभोग किया जाता है, तथा मोक्ष (आध्यात्मिक मूल्य-जो बंधनमुक्ति का द्वार खोलता है-कल्याण का पक्ष दिखाता है, साध्य है। काम तथा मोक्ष को ही कठोपनिषद् रचयिता प्रेय तथा श्रेय मार्ग कहता है व बताता है कि अर्थ व काम के उपभोग से व्यक्ति असंतुष्ट ही रहता है बेचैनियाँ, तनाव ही उसके पल्ले पड़ती हैं धर्म व्यक्ति की संवेदना-मूलक उस इकाई का नाम है जो चेतना को अलसाई अवस्था में डाले रहती है, किन्तु मोक्ष परिपूर्ण जागरण की अवस्था है। इसीलिए नचिकेता, यमराज द्वारा दिये जा रहे इहलौकिक, पारलौकिक सुखों के प्रलोभन में नहीं पड़ता तथा मैत्रेयी धन संपदा से परे अमरत्व की मोक्ष की प्राप्ति हेतु अपनी जिज्ञासा याज्ञवल्क्य के समक्ष प्रस्तुत करती है।
चिन्तन कोश ‘रिकवरी आँव फेथ’ में इसका उदात्त स्वरूप प्रस्तुत किया है । उनके अनुसार सम्बन्ध वहीं जन्म लेते हैं जहाँ संवेदना का निर्भर फूट रहा हो । विश्व में संवेदनाओं के ये रस स्रोत भिन्न रूपों में देखे जा सकते हैं । उदाहरण के लिए जातीय संवेदना-पारिवारिक संवेदना और राष्ट्रीय संवेदना । अपने वास्तविक स्वरूप में पवित्र होते हुए भी सीमा बन्धन की अनुभूति के लिए विवश हैं ।
चिन्तन ने ही राष्ट्र की सोई कुण्डलिनी जगाई है व वह काम परोक्षसत्ता के निर्देशों द्वारा किया जिसे करने महर्षि चाणक्य, आद्यशंकराचार्य , राम कृष्ण परमहंस, महर्षि रमण, स्वामी विवेकानन्द व योगीराज अरविन्द इस धरती पर आए थे । कोई आश्चर्य नहीं कि उनके ये छोटे-छोटे चूहे-प्रज्ञा परिजन अगले दिनों इतने शक्तिशाली रूप में सामने आएँ कि जन-जन के मनों को मथकर रख दे । स्वयं पूज्यवर अपने क्रान्तिधर्मी साहित्य में लिखते हैं- “नरपशु , नर कीटक, नर पिशाच स्तर के जीवनयापन करने वालों में से ही बड़ी संख्या में ऐसे इन्हीं दिनों निकल पड़ेंगे , जिन्हें नररत्न कहा जा सके । इन्हीं को दूसरा नाम दिव्य प्रतिभा सम्पन्न भी दिया जा सकता है । इनका चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ऐसा होगा, जिसका प्रभाव असंख्यों को प्रभावित करेगा ।
चिन्तन का अद्वैत, इस्लाम में तोहीद, परम सत्य-इस्लाम का ‘मुतलक’ ‘सत्यस्य सत्यम्’ इस्लाम में ‘हकीकत उल हकाहक’ और ज्योति को इस्लाम में नूर-उल-नूरिन कहा है । जिस प्रकार यहाँ के आर्षग्रन्थों में ईश्वर को सर्वव्यापी और अन्तर्यामी कहा है, उस प्रकार इस्लामी चिन्तन में ईश्वर को ‘बातिन’ और ‘जाहिर तथा मुदत’ और ‘सादी’ बतलाया है । विचारों की घनिष्ठता और पारस्परिक साम्य कहीं गहरे में मधुर सम्बन्धों को और भविष्य की किसी उज्ज्वल सम्भावना को व्यक्त करती है । ब्राउन मैक्सहार्टिल, और गोल्ड जीहर आदि अनेकों पाश्चात्य विद्वानों ने अपने गहरे अध्ययन के बाद विश्वास जताया है इस्लाम विचारधारा के प्रमुख तत्व भारतवर्ष से लिए गए हैं (हिस्ट्री आँव फिलॉसफी इस्टर्न एण्ड वेस्टर्न खण्ड-1 / 5 /502) अरब युग में बहुत से प्रमुख भारतीय ग्रन्थों का फारसी और अरबी में अनुवाद हुआ । अलकिण्डी ने भारतीय धर्मों पर एक पुस्तक लिखी, सुलेमान और अलमसूदी ने भारत के विषय में सूचनाएँ इकट्ठी कर लिपिबद्ध किया तथा अलनदीय, अलशरी, अलबरूनी एवं अन्य लोगों ने अपने यात्रा विवरणों में भारत के दार्शनिक विचारों का विस्तार से वर्णन कि या है ।
चिन्तन के व्याख्याता सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपने चिन्तन कोश ‘रिकवरी आँव फेथ’ में इसका उदात्त स्वरूप प्रस्तुत किया है । उनके अनुसार सम्बन्ध वहीं जन्म लेते हैं जहाँ संवेदना का निर्भर फूट रहा हो । विश्व में संवेदनाओं के ये रस स्रोत भिन्न रूपों में देखे जा सकते हैं । उदाहरण के लिए जातीय संवेदना-पारिवारिक संवेदना और राष्ट्रीय संवेदना । अपने वास्तविक स्वरूप में पवित्र होते हुए भी सीमा बन्धन की अनुभूति के लिए विवश हैं ।
चिन्तन हम आचार्य शंकर व योगीराज अरविन्द के बीच समन्वयात्मकता स्थापित करने वाला पाते हैं जिसमें जहाँ संपूर्ण धरित्री के मोक्ष की बात श्री अरविन्द अतिचेतन के माध्यम से करते हैं व अद्वैत वेदान्त के प्रतिपादन द्वारा आचार्य शंकर जीवनमुक्ति की आत्मा के उर्ध्वगमन की चर्चा करते हैं वहाँ संस्कृति पुरुष गुरुदेव मानव में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की व्याख्या द्वारा पूरी समष्टि की बंधनमुक्ति का पथ हम दिखाते हैं, जो हर मुमुक्षु का परम लक्ष्य है।
चिन्तन स्वर गूँज उठेंगे “सभानोमत्रः समितिः सभानी, सभानो मनः सह चित्तभेषाम्” सब लोग एक विचार वाले हो जाएँ सभी के मन एक समान हो जाएँ सभी के चित्त में एक से संवेदन उठने लगें । यही वैदिक दर्शन की मान्यता रही है व यही अगले दिनों साकार रूप लेने जा रही है।
चिन्तन से लेकर जीवन व्यवहार एवं मानवी संवेदना से लेकर समष्टिगत एकता जैसे पक्षों को स्पर्श करती है। सभ्यता की आसानी से नकल की जा सकती है किन्तु संस्कृति को अपनाना समयसाध्य प्रक्रिया है। संस्कृति वह दृष्टिकोण है, जिससे कोई समुदाय विशेष जीवन की समस्याओं पर दृष्टि विक्षेप करता है। संस्कृति उस समयविशेष का लोक प्रचलन, धर्म, वांग्मय, चित्रकला, मूर्तिकला शाश्वत तत्व ऐसे हैं, जिससे बोध होता है अनगढ़ता को सुगढ़ता में बदलने का। यही आध्यात्म है।
चिन्तन में ईश्वर को ‘बातिन’ और ‘जाहिर तथा मुदत’ और ‘सादी’ बतलाया है । विचारों की घनिष्ठता और पारस्परिक साम्य कहीं गहरे में मधुर सम्बन्धों को और भविष्य की किसी उज्ज्वल सम्भावना को व्यक्त करती है । ब्राउन मैक्सहार्टिल, और गोल्ड जीहर आदि अनेकों पाश्चात्य विद्वानों ने अपने गहरे अध्ययन के बाद विश्वास जताया है इस्लाम विचारधारा के प्रमुख तत्व भारतवर्ष से लिए गए हैं (हिस्ट्री आँव फिलॉसफी इस्टर्न एण्ड वेस्टर्न खण्ड-1 / 5 /502) अरब युग में बहुत से प्रमुख भारतीय ग्रन्थों का फारसी और अरबी में अनुवाद हुआ । अलकिण्डी ने भारतीय धर्मों पर एक पुस्तक लिखी, सुलेमान और अलमसूदी ने भारत के विषय में सूचनाएँ इकट्ठी कर लिपिबद्ध किया तथा अलनदीय, अलशरी, अलबरूनी एवं अन्य लोगों ने अपने यात्रा विवरणों में भारत के दार्शनिक विचारों का विस्तार से वर्णन कि या है । साहित्य-विज्ञान और दार्शनिक चिन्तन इन तीनों ही क्षेत्रों में इस्लामी जगत भारतीय जीवन और विचारधारा से प्रभावित हुआ है ।
चिन्तन किया जाता है तो स्पष्ट समझ में आता है कि जब हम भारतीय संस्कृति की बात करते हैं तो इसके सार्वभौम, सर्वकालीन, सामयिक गुणों के प्रसंग में चर्चा कर रहे हैं, न कि जाति, वर्ण, आश्रम, षोडश संस्कार आदि उसके विभिन्न विभाजनों की परिधि तक सीमित रह कर।
चिन्तन की वही उर्जस्विता विश्व मानव को वैचारिक संघर्ष से मुक्ति देगी । कल का भविष्य जिस महानतम आश्चर्य को साकार करेगा वह है संसार की सभी विचारधाराओं का अपने मूल स्वर से सामंजस्य । इसी घटना के साथ विश्व संस्कृति के चिन्तन स्वर गूँज उठेंगे “सभानोमत्रः समितिः सभानी, सभानो मनः सह चित्तभेषाम्” सब लोग एक विचार वाले हो जाएँ सभी के मन एक समान हो जाएँ सभी के चित्त में एक से संवेदन उठने लगें । यही वैदिक दर्शन की मान्यता रही है व यही अगले दिनों साकार रूप लेने जा रही है।
चिन्तन प्रणालियाँ है। कल की जिन्दगी इनमें से किसे चुनेंगी? अथवा किसमें वह सामर्थ्य है जो स्वयं को भावी-समाज के योग्य ठहरा सके। कुछ भी हो सवाल नवयुग की नयी संस्कृति की खोज का है।
चिन्तन चलता है। धर्म अर्थात् नीतिमत्ता, संवेदना, वर्जनाएँ, मर्यादाएँ जीवन को दिशा देने वाला तत्त्वज्ञान वहाँ न होने से भवबंधनों में जकड़ा मानव भोगों जन्य कष्टों को पाता दुःख नजर आता है। मात्र पश्चिम नहीं, यह हर सभ्यता-हर समाज व हर युग पर तथ्य लागू होता है कि जब तक मानवी पुरुषार्थ धर्म पर आश्रित नहीं होता, वह संतापों-दुःखों व विग्रहों-विद्वेषों का ही निमित्त कारण बनता है। ‘धर्म’ पर आमूलचूल जोर देते हुए सारे पुरुषार्थ की त्याग में प्रतिष्ठ कर हमारे ऋषियों ने मानवी जीवन के उदात्तीकरण का आदर्श प्रस्तुत किया है। वे इतने व्यावहारिक भी हैं कि धन संचय के लिए मना नहीं करते किन्तु उसका मुख्य फल धर्म हेतु (नश्वर विषय-सुख हेतु नहीं) करने को, संपदा के समुचित उपार्जन व वितरण की प्रक्रिया पर जोर देने को कहते हैं।
चिन्तन स्पष्ट करता है। ऋषि उसमें कहते हैं-
चिन्तन आत्मसत्ता की महत्ता व पुनर्जन्म की अनिवार्यता बताता है मानवी चिन्तन व उसके कर्म पुरुषार्थ के परिप्रेक्ष्य में। योगेश्वर कृष्ण आगे कहते हैं-जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुँव जन्म मृतस्य च ।” (27/2 अ) अर्थात् “जन्में हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है।” स्वयं वे अपने बारे में व अर्जुन के विषय में इस ध्रुव सत्य को लागू करते हुए कहते है-
चिन्तन में नासूत स्वप्नावस्था को मलकूत सुषुप्ति को जबरुत और तुरीय को लाहूत कहा गया है तुरीयावस्था की सोअहमस्मि का अनुभव चतुर्थ मंजिल लाहूत का अनलहक का अनुभव है ।
चिन्तन बदला व यह माना जाने लगा कि भोगवाद ही प्रधान है, आध्यात्मिक नहीं। आधिभौतिक प्रगति ही सब कुछ है, तब से ही भारत की अंधकार-युग आरंभ हुआ मानना चाहिए। जो भारत अर्ध संस्कृत-हिंसक-आक्रान्ताओं द्वारा पराजित हुआ, वह विलासी भारत था। इतिहास के पृष्ठो का विवेचन यही बताता है।
चिन्तन को मानते थे। एक फ्रेंच इंजीनियर की पुत्री मेरी मेव को सम्मोहन द्वारा अचेत कर उनने पहले उसे उसकी आत्मा को दर्शन कराया व क्रमशः धीरे-धीरे वर्तमान आयु से कम आयु की ओर चलने छोटी होने की न केवल अनुभूति करने सबको बताने को कहा। वह क्रमशः रंगीन प्रकाश की दिव्यज्योति के रूप में आत्मा को तथा फिर अपनी हर आयु के घटनाक्रमों को बताने लगी। क्रमशः उन्होंने उसे पूर्व जन्म के शरीर में पहुँचा दिया। उस बालिका ने बताया कि पूर्व जन्म में वह ब्रिटेन के पूर्वी तट पर रहने वाली मछुआरे की लड़की लीना थी व विवाहोपरांत समुद्री तूफान में डूबकर वह मर गयी थी।
चिन्तन किन्हीं अनुभूतियों पर आधारित है? क्या इनको आधुनिक विज्ञान के द्वारा परख सकना संभव है? इन महत्वपूर्ण सवालों को लेकर हाइज़ेनबर्ग सन् 1929 में भारत आए। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर से इस चिन्तन के विशेष बिन्दुओं पर गम्भीर चर्चा की और वापस लौट कर अपने प्रयोगों में जुट गए। कुछ ही समय बाद उन्होंने भौतिकी जगत को “अनिश्चितता का सिद्धान्त” दिया।
चिन्तन व्यक्ति को अपने जीवन का उद्देश्य जानने व नैतिक आचरण में प्रवृत्त करेगा, अतः इस विचारधारा के व्यापक विस्तार की आवश्यकता आज सभी मनीषी समझते हैं।
चिन्तन से प्राप्त हुई। इसी प्रकार मनोविज्ञान के क्षेत्र में क्रान्ति लाने वाले आर.डी. लेंग से फ्रिटजोफ काप्रा ने लन्दन में मुलाकात कर उन्हें अवगत कराया कि वह पूर्वी तत्त्वचिंतन और आधुनिक विज्ञान का समन्वय कर रहे हैं। लेंग ने हल्की मुसकराहट के साथ कहा समन्वय की बात नहीं पूर्वी चिन्तन पूर्णतया वैज्ञानिक है। वह स्वयं योग और ध्यान का अभ्यास करते हैं। इसी तत्व चिन्तन की प्रेरणा से वह ह्यूमिनिस्टिक साइकोलॉजी की धारणा दे सके हैं।
चिन्तन और इस्लामी दर्शन के अनेकों सिद्धांतों में केवल नाम का ही अंतर है उदाहरण के लिए यहाँ के दार्शनिक चिन्तन का अद्वैत, इस्लाम में तोहीद, परम सत्य-इस्लाम का ‘मुतलक’ ‘सत्यस्य सत्यम्’ इस्लाम में ‘हकीकत उल हकाहक’ और ज्योति को इस्लाम में नूर-उल-नूरिन कहा है । जिस प्रकार यहाँ के आर्षग्रन्थों में ईश्वर को सर्वव्यापी और अन्तर्यामी कहा है, उस प्रकार इस्लामी चिन्तन में ईश्वर को ‘बातिन’ और ‘जाहिर तथा मुदत’ और ‘सादी’ बतलाया है । विचारों की घनिष्ठता और पारस्परिक साम्य कहीं गहरे में मधुर सम्बन्धों को और भविष्य की किसी उज्ज्वल सम्भावना को व्यक्त करती है । ब्राउन मैक्सहार्टिल, और गोल्ड जीहर आदि अनेकों पाश्चात्य विद्वानों ने अपने गहरे अध्ययन के बाद विश्वास जताया है इस्लाम विचारधारा के प्रमुख तत्व भारतवर्ष से लिए गए हैं (हिस्ट्री आँव फिलॉसफी इस्टर्न एण्ड वेस्टर्न खण्ड-1 / 5 /502) अरब युग में बहुत से प्रमुख भारतीय ग्रन्थों का फारसी और अरबी में अनुवाद हुआ । अलकिण्डी ने भारतीय धर्मों पर एक पुस्तक लिखी, सुलेमान और अलमसूदी ने भारत के विषय में सूचनाएँ इकट्ठी कर लिपिबद्ध किया तथा अलनदीय, अलशरी, अलबरूनी एवं अन्य लोगों ने अपने यात्रा विवरणों में भारत के दार्शनिक विचारों का विस्तार से वर्णन कि या है ।
चिन्तन है जो मनुष्य को सतत् पुरुषार्थ परायण बनाते हुए उसे लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सदा प्रेरित करता रहता है।
चिन्तन कर तदनुसार आचरण करने वाले ब्रह्मनिष्ठों के बताए पथ पर चलना धर्म है। वस्तुतः आचरण में नीतिमत्ता को उतारने की प्रेरणा देने वाला कारक तत्व धर्म है।
चिन्तन किया। पुनः बार-बार लौटकर प्रजा पिता ब्रह्मा से प्रश्न किया। उन्हें समाधान मिला कि शरीर नहीं यह स्थूल काया नहीं, वरन् आत्मसत्ता ही परमसत्य है। सजाना-सँवारना उसे चाहिए। उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई।
चिन्तन पूर्णतया वैज्ञानिक है। वह स्वयं योग और ध्यान का अभ्यास करते हैं। इसी तत्व चिन्तन की प्रेरणा से वह ह्यूमिनिस्टिक साइकोलॉजी की धारणा दे सके हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-November
चिन्तन में उदारता, आत्मीयता का अधिकाधिक समावेश करना। अन्तराल में सदाशयता के प्रति श्रद्धा को प्रगाढ़ परिपक्व करना।
चिन्तन देवसंस्कृति की धारा से काफी दूर हो गया है। हमारे यहाँ तो आत्म विजय−मनोजय को ही सबसे श्रेष्ठ विजय माना गया है। जीवन को एक समर का गया है। उसमें आसुरी−पाशविक प्रकृतियों को पराजित करके दैवी प्रवृत्तियों को विजयी बनाया जाता है।
चिन्तन का ही प्रभाव था। यह कार्य प्राचीन काल में तीर्थों देवालयों द्वारा सम्पन्न होते थे। पर आज तो उनका स्वरूप मात्र व्यावसायिक रह गया है। कहीं−कहीं तो पंडाओं का आतंक इतना अधिक है, कि वहाँ एक बार हो आने वाला फिर कभी दुबारा उधर मुड़कर नहीं देखता। इतना ही नहीं, वह उल्टा प्रचार भी करता है ताकि जिस संकट से वह गुजर कर आयु हैं उस चंगुल में दूसरे लोग न पड़े।
चिन्तन को अपने अनुकूल बनाया जा सकता है। यह विराट प्रकृति स्वयं यज्ञीय अनुशासन में रहकर प्राणिमात्र के कल्याण में संलग्न है उसी स्तर की यज्ञीय भावना एवं विचारणात्मक तरंगों से उसका तादात्म्य सहज ही हो जाता है। अभी भी लाखों नर नारी गायत्री उपासना में संलग्न है, इस अभियान से उनकी संख्या करोड़ों साधकों की एकनिष्ठ भावभरी साधना आसमान को हिला सकती है।
चिन्तन, स्वभाव और क्रिया−कलाप लगभग वैसे ही होते हैं, जैसे कि उस प्रदेश में रहने वाले लोगों के समय का प्रभाव युग का प्रवाह इसी को कहते हैं। सर्दी−गर्मी का मौसम बदलने पर प्राणियों के, वनस्पतियों के तथा पदार्थों के रंग−ढंग ही बदल जाते हैं। गतिविधियों में ऋतु के अनुकूल बहुत कुछ परिवर्तन होते हैं।
चिन्तन के देवता और दुष्प्रवृत्ति के दानव पशु दोनों विद्यमान होते है। मनुष्य शरीर में तो यह निराकार होते है। पर वे जब साकार हो जाते है तो ये बाहर दिखाई देने? वाले पशु बन जाते है। अर्थात् बाहर के पशु भाव ही जीव को साकार पशु योनि में ले जाते है।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व का धर्म शिक्षण सर्वसुलभ बनता है। अश्वमेध के इस ज्ञान पक्ष की उपयोगिता का जितना महात्म्य कहा जाय उतना ही कम है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-August
चिन्तन में रस लेने की प्रवृत्ति बढ़ाना-ये सभी वे विघ्न हैं, जिन्हें नियंत्रित करने का सुनिश्चित विधान प्राण-निरोध-प्राण संयम-प्राणधारण-प्राणायाम-सविता के ध्यान तथा गायत्री के जप द्वारा संपन्न होता बताया गया है। मनोभूमि का शोधन व चिर संचित कुसंस्कारों का उन्मूलन कर प्राणधारण की साधना व्यक्तित्व का सुनियोजन करती है तथा उसे मनःशक्ति आत्मबल संपन्न बनाती है।
चिन्तन को रोकती व मनोविकार मिटाती हैं। एक अन्य निष्कर्ष के अनुसार संसार के पचास व्यक्ति यदि एक साथ एक शब्द का तीन घण्टे तक उच्चारण करें तो उससे छह हजार खरब वॉट विद्युत शक्ति पैदा होगी। सारे विश्व में इससे घण्टों तक प्रकाश किया जा सकता है।
चिन्तन-इन सभी का प्रज्ञा पुरश्चरण में समावेश है। साधक पाँच मिनट तक सूर्योदय के साथ ही गायत्री मन्त्र का मौन जप करते हैं। अन्तरिक्ष में ही गायत्री मन्त्र का मौन जप करते हैं। अन्तरिक्ष में परिशोध हेतु आहुतियों का यह परोक्ष यज्ञ है। जितना अधिक उच्चारण इस मन्त्र का सृष्टि के आदि से अभी तक हुआ है उतना किसी का नहीं हुआ।
चिन्तन व प्रवाह का अदृश्य वातावरण से अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है।
चिन्तन में तेजस् और आस्थाओं में वर्चस् नाम से जानी जाती है। इस अंतरु “अतः क्षमता को -आत्म शक्ति को -प्राणतत्व को अधिकाधिक मात्रा में संचय करने हेतु जीवन का अधिकतम आनन्द लेने हेतु गायत्री महाशक्ति का आश्रय लेने की बात ही श्रुति कहती है।
चिन्तन उभरा । मैं इतना आगे आ गया हूँ कि मेरे लिए लौटने के सब द्वार बन्द हो गए हैं। यदि मैं जीवन के सत्य को नहीं पा सकता तो मेरे लिए जीना निष्फल है, क्योंकि जिसे मन आज बार-बार याद कर रहा है , मैं उसी जीवन को तो निस्सार समझकर एक दिन छोड़ आया था। तब उसमें यदि मुझे सन्तोष नहीं मिला तो किस विर्फ्यय से आज इस साधना से विमुख होकर पराजित होकर मुझे फिर कहीं विश्राम मिल सकेगा? यह तो असम्भव है।
चिन्तनशक्ति (मन) का समुच्चय है। इन तीनों के स्वरूप और इनके अंतर्संबंध क्या हैं? इस प्रश्न के उत्तर में शरीर व प्राण के स्वरूप और अंतर्संबंध के लिए आधुनिक प्राचीन चिकित्सा शास्त्र का हवाला दिया जा सकता है। मन का स्वरूप व अन्य से संबंध, प्राच्य पाश्चात्य दर्शन योग की विभिन्न प्रणालियों मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा समझे जा सकते हैं।
चिन्तन को क्रिया में परिणत करने का साहस दिखाता है। आत्मानुशासन की साहसिकता को प्रखर बनाने के लिए ही विविध योग साधनाएं और तपश्चर्याएं सम्पन्न की जाती हैं।
चिन्तन की भरमार से विषाक्त अदृश्य वातावरण और इससे फिर लोक-मानस में असुरता-निकृष्टता का बढ़ना । यह एक ऐसा कुचक्र है जो एक बार चल पड़ने पर फिर टूटने का नाम नहीं लेता । लोक चिन्तन व प्रवाह का अदृश्य वातावरण से अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है।
चिन्तन, शब्द शक्ति की अपरिमित क्षमता एक समय-एक साथ जप ध्यान तथा महाप्रज्ञा की प्रेरणा का चिन्तन-इन सभी का प्रज्ञा पुरश्चरण में समावेश है। साधक पाँच मिनट तक सूर्योदय के साथ ही गायत्री मन्त्र का मौन जप करते हैं। अन्तरिक्ष में ही गायत्री मन्त्र का मौन जप करते हैं। अन्तरिक्ष में परिशोध हेतु आहुतियों का यह परोक्ष यज्ञ है। जितना अधिक उच्चारण इस मन्त्र का सृष्टि के आदि से अभी तक हुआ है उतना किसी का नहीं हुआ।
चिन्तन परस्पर सम्बद्ध हैं। उसी प्रकार ताप और गति को भी अन्योन्याश्रित माना जा सकता है।
चिन्तन के कारण शारीरिक व मानसिक व्याधियों को आमंत्रित करती है। पिछड़ापन , असफलता , उद्विग्नता व असंतोष इसी की परिणति है, इसमें कोई संदेह नहीं। इसके विपरीत जो आत्मसत्ता को सुसंस्कृत कर लेता है, परिष्कृत कर लेता है, वह अपने सुधरे हुए दृष्टिकोण तथा व्यवस्थित क्रियाकलाप के आधार पर सम्मान अजस्र परिमाण में बरसता है।
चिन्तनकोश ‘वैदिक सेज एण्ड हिजे कल्चरे’ के पृष्ठों में इस प्रश्न का उत्तर एक शब्द में मिलता है-नहीं उनके अनुसार भभसाधना कर्म के तत्व का ज्ञान और उसकी सामर्थ्य का सही सुनियोजन है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण इसी को योगः कर्मसु कौशलम्य कहकर सूत्र बद्ध करते हैं।
चिन्तन ने ही आज उन विकृतियों को पैदा किया है जो स्थूल शरीर के स्तर पर असाध्य रोगों के रूप में मनुष्य को प्रभावित करती दिखाई देती हैं। मनःवेद एरिक फ्राम अपनी कृति “मैन फॉर हिमसेल्फ” में लिखते हैं कि “वैयक्तिक जीवन में व्यक्ति का स्वयं को अशक्त-बलहीन महसूस करना आज के मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना है। कहने को तो उसने बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक आते-आते प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली है किन्तु वह अपने आप पर से विश्वास खो बैठा है। सृष्टि के समस्त ज्ञान के बावजूद वह अपने आपे को विस्मृत कर बैठा है, जहाँ शक्ति का जखीरा छिपा पड़ा है किन्तु वह उसको प्रयोग नहीं कर पा रहा।”
चिन्तन क्षेत्र की परिष्कृत के रूप में जबकि कारण शरीर में जब यह उभार आता है, तो वह अन्तराल की भाव-संवेदना के रूप में फट पड़ता है। यह सब प्रकारान्तर से जीवन ऊर्जा के ही प्राकट्य की प्रभाव -परिणति है, जिसकी जानकारी भारतीय साधकों को थी । यही कुण्डलिनी शक्ति है और उसके जागरण की फलश्रुति भी। देव संस्कृति तथा संस्कृति की विश्व मात्र के लिए यह सबसे बड़ी देन है।
चिन्तन का झीना आवरण था। उसका रंग भव्य गौर था, किन्तु इस समय उस पर हल्की सी छाया आ गई थी। उसकी आँखों में असीम वेदना रहस्य, गौरव और जिज्ञासा कांप रही थीं। पलकों में एक अचंचल स्तब्धता थी , जिसे देखकर लगता था कि वह बहुत गहरी अँधेरी में पड़ा हुआ भी प्रकाश की ओर बढ़ रहा था। उसकी खिंची हुई भवें उसके उन्नत ललाट और लम्बी नाक के बीच में ऐसी दिखती थीं जैसे अरुणोदय वाले क्षितिज की पृष्ठभूमि पर रेखा मात्र से दिखाई देने वाले दो जहाजों के पाल अनन्त के वक्ष पर तन गए हों और अज्ञात आलोक की ओर बढ़ चलें हों।
चिन्तन,चरित्र और व्यवहार में आदर्शवादिता का समावेश रहता था। मानवी पुरुषार्थ का भी इस में योगदान रहता था, पर इस प्रयोजन को सफल बनाने में अदृश्य वातावरण की भूमिका-अनुकूलता का भी भारी योगदान रहता था। परिस्थितियाँ मनःस्थिति के आधार पर इतने बड़े करवट लेती है कि उसे भाग्य विधान, ईश्वरेच्छा जैसा नाम देना होता है। इसलिये अदृश्य जगत में संव्याप्त वायुमण्डल की तरह ही उसका दूसरा पक्ष वातावरण भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता।
चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में उसी के द्वारा श्रेष्ठता की अभिव्यक्ति सम्भव है। दूसरे प्राणी न तो किन्हीं आदर्शों के प्रति समर्पित होना जानते न ही अन्तः प्रेरणा से स्वयं को मर्यादित अनुशासित करना । इन दायित्वों का बोध और निर्वाह ही इंसान की विशेषता हो सकती है। शील परमार्थ परायणता और कर्मठता से युक्त, चारित्रिक, भावनात्मक, वैचारिक, उत्कृष्टता का वरण ही मनुष्य संबा मानवी विशेषता को सार्थक करता है। मानव देह के साथ जो सौभाग्य विशेष रूप से जुड़ा है वह आदर्शवादिता के अवलम्बन के द्वारा अर्जित उपलब्धियों के रसास्वादन का सौभाग्य ही है।
चिन्तन लिए एक साथ कई व्यक्तियों द्वारा उच्चारित होती हैं, एक सी तरंगें जन्म लेती हैं और बदले शुभ विचारों की वर्षा ऊपर से करती हैं। “धियो यो नः प्रचोदयात्” “अग्नेनय सुपथा राये अस्मान्” “आनो भद्रा, कृणवो यन्तु विश्वतः” इन सभी मन्त्रों में सारे समूह के लिए श्रेष्ठ विचारों की-सन्मार्ग पर चलने की भारी प्रार्थना की गयी है। एक सी भाव लहरें एक ही चित्त वृति को जन्म देती हैं। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक फ्रीक्वेंसी पर तरंगें उत्पन्न होने पर वे अप्रत्याशित परिवर्तन लाती हैं। अल्ट्रासोनिक तरंगों से रोगों का निदान व चिकित्सा की जाने लगी है।
चिन्तन-मनन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लिया जाता है और लक्ष्यपूर्ति की दिशा में आगे बढ़ा जाता है। निश्चित ही यह साधना व्यक्ति को देवमानव ऋषि के पद पर प्रतिष्ठित करती व उसे ऋद्धि सिद्धियों का स्वामी बनाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-March
चिन्तन के लिए अन्तर्मुखी होना नहीं आता समीक्षा करने और आत्म सुधार के लिए प्रयत्नशील होने की बात एक प्रकार से विस्मृत ही रखी जाती रहती है।
चिन्तन कर सकने योग्य बना है। भौतिक विज्ञान एवं दार्शनिक चिन्तन के सुसंतुलन का सम्मिश्रण ही मानव जीवन के
चिन्तन चेतना के एक नये युग में प्रवेश करेगी , तब न केवल उज्ज्वल भविष्य की सुखद संभावनायें साकार होंगी, वरन् मनुष्य के सारे क्रियाकलाप महानता के लक्ष्य को सामने रखते हुए संचालित होंगे । निश्चय ही वह समय मानव का गौरवपूर्ण काल होगा ।
चिन्तन है जो भारतीय संस्कृति से ही उपजा है। यही आज की नैतिक मूल्यों के ह्रास से पनपी आस्था संकट की समस्या का समाधान भी है। जीवन की निरन्तरता को मानने का अर्थ यह है कि हम जो भी कुछ करते हैं, सोचते हैं, वह कभी नष्ट नहीं होता। उसका फल निश्चय ही मिलता है।
चिन्तन की धारा को दर्शन तथा बहिरंग हलचलों के ऊहापोह को विज्ञान कहा जाने लगा। इतना होते हुए भी यह एक स्पष्ट तथ्य है कि दोनों के मिलाये बिना न तो चिन्तन में स्पष्टता आती है और न वैज्ञानिक प्रगति का पथ प्रशस्त होता है। यथार्थता के मर्मस्थल तक पहुँचने के लिए दोनों में समन्वय का होना आज की अनिवार्य आवश्यकता है।
चिन्तन सत्य पर छाए इन आवरणों को हटाने का प्रयास जो किया जाना चाहिए था, वह पूरी विश्व मान्यता के हित में था। किन्तु छिटपुट कोशिशों के अलावा यहाँ पाश्चात्य संस्कृति भोगवादी चिन्तन व पलायनवादी विचारधारा ही पनपती रही है व इसमें हममें से प्रत्येक का योगदान रहा है, यह कड़ुआ सत्य सबको स्वीकार करना चाहिए।
चिन्तन एवं सही निर्णय लेने जैसी मानसिक क्षमताएँ बढ़ाने में भी खाद्य पदार्थ विशिष्ट भूमिका निभाते हैं ऐसे भोज्य पदार्थों की सहायता ली जा सकती है, जिनमें मानसिक परिपोषण के लिए उपयुक्त तत्व प्रचुर परिमाण में विद्यमान हों।
चिन्तन के लिये अन्तर्मुखी होने की स्थिति ही नहीं बनने देता।
चिन्तन कभी विकास पथ पर बढ़ने न पाए। शाश्वत चिन्तन सत्य पर छाए इन आवरणों को हटाने का प्रयास जो किया जाना चाहिए था, वह पूरी विश्व मान्यता के हित में था। किन्तु छिटपुट कोशिशों के अलावा यहाँ पाश्चात्य संस्कृति भोगवादी चिन्तन व पलायनवादी विचारधारा ही पनपती रही है व इसमें हममें से प्रत्येक का योगदान रहा है, यह कड़ुआ सत्य सबको स्वीकार करना चाहिए।
चिन्तन के अनुरूप प्रस्तुत किया है और कहा है कि नवसृजन में एक ओर जहाँ ध्वंसात्मक गतिविधियाँ तीव्र होती दिखाई देती हैं, वहीं दूसरी ओर निर्माण की प्रक्रिया भी स्थायी रूप से चल रही होती हैं। प्रख्यात दार्शनिक हर्बर्ट स्पेन्सर ने इसे विघटन एवं समन्वधी करण का मिला−जुला रूप कहा है, तो हेगल ने इसे ही यूनिटी एवं डिसयूनिटी का संयुक्तिकरण माना है । इस प्रकार नवनिर्माण की सभी परिभाषायें पूर्वात्य अध्यात्म के एक बिन्दु पर आकर मिल जाती हैं ।
चिन्तन में स्पष्टता आती है और न वैज्ञानिक प्रगति का पथ प्रशस्त होता है। यथार्थता के मर्मस्थल तक पहुँचने के लिए दोनों में समन्वय का होना आज की अनिवार्य आवश्यकता है।
चिन्तन तथा मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं में क्या-क्या परिवर्तन होता है तथा दुग्ध के साथ मट्ठा व शुद्ध मट्ठा (तक्र) का कल्प कैसे व क्यों किस किसको किस प्रकार लाभ पहुँचाता है, यह विशद विवेचन परिजन आगामी अंकों में पढ़ते रह सकते हैं। (क्रमशः)
चिन्तन चेतना का विकास होगा, जिसे अध्यात्मवादी सोच कहने में किसी को कदाचित ही संकोच हों। इस नयी सोच के उन्नयन से अध्यात्मवाद एक बार पुनः सम्पूर्ण विश्व में प्रतिष्ठित होगा। तब सब एक धर्म (मानव धर्म) एक राष्ट्र (विश्व राष्ट्र) के पक्षधर होते दिखाई पड़ेंगे। पूरी दुनिया में उक्त संत की विचारधारा की धूम मच जायेगी। विभिन्न धर्मावलम्बी उन्हें अपने-अपने धर्म व जाति के मार्गदर्शक मानेंगे।
चिन्तन व पलायनवादी विचारधारा ही पनपती रही है व इसमें हममें से प्रत्येक का योगदान रहा है, यह कड़ुआ सत्य सबको स्वीकार करना चाहिए।
चिन्तन द्वारा स्वस्थता प्रदान की जा सकती है । इसके अतिरिक्त अनेकानेक प्रसुप्त क्षमताओं का जागरण एवं विकास भी संभव है । यह सब ऑटोसजेशन और हेट्रोसजेशन की विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा सम्पन्न किया जाता है ।
चिन्तन के ही फलस्वरूप सामने आये हैं और मनुष्य क्रमबद्ध एवं परिष्कृत पद्धति से चिन्तन कर सकने योग्य बना है। भौतिक विज्ञान एवं दार्शनिक चिन्तन के सुसंतुलन का सम्मिश्रण ही मानव जीवन के
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार में मानवोचित उत्कृष्टता का आभास मिलना। इसी उपलब्धि के आधार पर आत्मसंतोष का और लोक सम्मान का अर्जन बन पड़ता है इतना भर भी यदि हस्तगत न किया जा सके तो समझना चाहिए कि चेतना दलदल में फँसी रही, उसे स्वच्छ वातावरण में रहने का अवसर ही न मिला यह अभाव इसलिए सहन करना पड़ता है कि आत्मचिन्तन के लिए अन्तर्मुखी होना नहीं आता समीक्षा करने और आत्म सुधार के लिए प्रयत्नशील होने की बात एक प्रकार से विस्मृत ही रखी जाती रहती है।
चिन्तन के सुसंतुलन का सम्मिश्रण ही मानव जीवन के
चिन्तन का चेहरे-मोहरे पर भी असर पड़ता है? यदि हाँ तो कैसा ? इसके लिए मनोवैज्ञानिक दल ने समान विचारधारा वाले 20 विवाहित जोड़ों का चयन किया । उनके विवाह से पूर्व के और शादी के दस वर्ष पश्चात् के चित्र इकट्ठे किये गये इसके बाद निर्धारित लोगों को दोनों प्रकार की तस्वीरें बारी-बारी से दिखायी गई । शादी से पहले के चित्र को इकट्ठे रख कर उनमें से उनकी सही जोड़ियाँ तैयार करने को कहा गया ।
चिन्तन पर अवलम्बित होता है । चिकित्सा विज्ञान में मनःकायिक रोगों का आधार ही यही है । इसके विपरीत बीमार व्यक्ति को उदात्त चिन्तन द्वारा स्वस्थता प्रदान की जा सकती है । इसके अतिरिक्त अनेकानेक प्रसुप्त क्षमताओं का जागरण एवं विकास भी संभव है । यह सब ऑटोसजेशन और हेट्रोसजेशन की विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा सम्पन्न किया जाता है ।
चिन्तन असामान्य थे । अरबपति बनने से कम की कल्पना में उसका मन न रमता ।
चिन्तन पद्धति का पर्यवेक्षण, आत्मसमीक्षा प्रायश्चित उपचार से लेकर स्वयं के लिए स्वाध्याय हेतु सही विचार परक औषधि की सही मात्रा का चयन यह सब करना जरूरी है। मनः शक्ति संवर्धन किए बिना शरीर शोधन की प्रक्रिया तो बहिरंग की, कलपुर्जों की सफाई भर है। आहार शुचिता की साधना जो कल्प प्रक्रिया से जुड़ी है, इसीलिए अस्वादव्रत को प्रधानता देती आयी है क्योंकि इससे मनोबल की परीक्षा होती है-आत्मानुशासन का कड़ा अभ्यास होता है व मन के मजबूत बन पड़ने पर आगे वह पृष्ठभूमि बन जाती है, जिसके आधार पर और भी विशिष्ट प्रयोग आहार एवं औषधि के किये जा सकें। शाँतिकुँज में गायत्री तीर्थ के आरण्यक में इसी कारण अस्वाद का साप्ताहिक अभ्यास हर साधक को कराया जाता है ताकि वे इन्द्रियसंयम का अभ्यास करते चल सकें। अध्यात्म उपचार जो परम पूज्य गुरुदेव ने जन-जन के लिए सुलभ बनाये हैं, में उनने किसी प्रकार के अतिवाद से बचने व सरल-सूत्रों को हृदयंगम किये जाने पर विशेष जोर दिया है।
चिन्तन और प्रयास मात्र शरीर के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है। उसे पदार्थों और प्राणियों की कायाभर से लगाव होता है। धन संचय ही लक्ष्य स्तर का बनकर आकाँक्षाओं पर छाया रहता है। इन्द्रियों में उठने वाली खुजली जैसी ललक ही अपनी अभिरुचि के अनुरूप साधन जुटाने के लिए मचलती रहती है। काँचन और कामिनी जैसे कुछ ही प्रसंग मनुष्य के प्रिय विषय रहते हैं।
चिन्तन द्वारा देखा जाय तो मालूम पड़ता है कि जगत और इसके प्रत्येक क्रियाकलाप के पीछे एक महान चेतन सत्ता काम कर रही है। भारतीय मनीषियों ने तो इस तथ्य की अनुभूति बहुत पहले प्राप्त करली थी, पाश्चात्य मनीषी उसकी पुष्टि कर रहे हैं।’
चिन्तनधारा से लोगों को यह समझते देर न लगेगी कि उच्च आध्यात्मिकता के आगे भौतिकता की चमक-दमक न सिर्फ फीकी है, वरन् चमकीले साँप की भाँति आकर्षक लगते हुए भी घातक है। संत की यह विचारधारा उनके मत्स्यावतार की तरह बढ़ते शिष्य-समुदाय द्वारा विश्व के कोने-कोने तक में पहुँचायी जायेगी, और इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य की संरचना करेगी।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-January
चिन्तन की परिधि इन प्राणियों में उतनी ही है जिससे कि शरीर की जरूरतें पूरा कर सकें। चारा इकट्ठा कर सकें, घास खा सकें, दौड़ सकें, बच्चे पैदा कर सकें। बस इससे ज्यादा चेतना नहीं है।
चिन्तन को धर्मपरायण बनाना पड़ता है । यदि वे अपनी-अपनी मर्यादाओं को तोड़ने लगें, तो तटबंध टूट जाने पर जिस तरह नदियाँ बाढ़ का रूप धारण करके विनाश पर कटिबद्ध हो जाती हैं, उसी प्रकार कर्त्तव्यपरायणता और धर्मधारणा का व्यक्तिक्रम चल पड़ने पर वैसी ही विसंगतियाँ , विभीषिकाएँ उठ खड़ी होती हैं, जैसी कि वे इन दिनों घटाटोप बनकर सब कुछ उलट-पलट कर देने की चुनौतियाँ दे रही हैं । उपचार एक ही है कि दोनों पक्षों को अपनी मर्यादा में रहने के लिए बाधित किया जाय । न कर्म की उपेक्षा हो, और न धर्म की अवज्ञा भलाई इस अनुशासन के बने रहने में ही है ।
चिन्तन व अन्य विकारों के लिए बल्कि शरीर संबंध गठिया से लेकर कैन्सर तथा हृदयरोग से लेकर आज की नयी बीमारी “क्रॉनिक फटीग सिण्ड्रोम” व डिजेनरेटीव डिसआर्डर्स के लिए उत्तरदायी है यह अब एक स्थापित तथ्य है कि रक्त में कॉलस्ट्राल की सान्द्रता बढ़ाने से लेकर उत्तेजना के लिए उत्तरदायी सिरम कार्टीसाँल जैसे हारमोन्स की वृद्धि इस तमोगुणी आहार के कारण होती है । मिर्च-मसालों की अधिकता, भोजन को तल-भूनकर उन्हें अखाद्य बना देता भी इसी प्रक्रिया को जन्म देता है । जन-जन को उनकी आहार संबंधी आदतों को सुधारकर पौष्टिक , सुपाच्य व सात्विक आहार ही ग्रहण करने की प्रेरणा इस संस्थान ने दी है व यह सत्यापित किया है कि इनसे आनन्द-उल्लास व स्फूर्ति के लिए जिम्मेदार हारमोन रसस्रावों की उत्सर्जन क्रिया बढ़ती है। एन्केफेलीन वर्ग के अन्दर स्रवित होने वाले स्नायु रसायनों की मात्रा शरीर में बढ़ने लगती है व इससे न केवल अनावश्यक चर्बी घटती है, शरीर में स्फूर्ति सतत् तनाव शैथिल्य तथा काम करने की उमंग बढ़ती है।
चिन्तन और जीवन देवोपम बन जाता है । वह अपने लिए कर्तव्यों का निर्धारण करता है । क्या निर्धारण करता है ? “वयं राष्ट्रेजागृयाम पुरोहिताः “ । हम पुरोहित अर्थात् हम ब्राह्मण हम संत हम ऋषि यह उत्तरदायित्व ग्रहण करते हैं और यह घोषणा करते हैं कि “वयं” अर्थात् हम सब, “राष्ट्रे” सारे राष्ट्र को नागरिकों को विश्व मानवता को “जागृयाम” जीवन्त और जाग्रत रखे रहेंगे, जीवन्त और जाग्रत रखने की जिम्मेदारी केवल एक ही वर्ग के लोगों की है, जिनका नाम है ब्राह्मण।
चिन्तन को परिष्कृत कर वह स्वकेन्द्रित शक्ति प्रयोगों से कैसे प्रसुप्त को जगा सकता है तथा अदृश्य जगत से बरस रहे अनुदानों से स्वयं को किस प्रकार लाभान्वित कर सकता है, तो यह अनुसंधान मानवहित का होगा, विज्ञान की उपलब्धियाँ मानवी काया व मन की सूक्ष्म व और भी गहन परतों का रहस्योद्घाटन कर सकें, इस दिशा में उसके प्रयास अब मुड़ने ही चाहिए।
चिन्तन में कमी नहीं। तत्वतः व्यक्ति के प्रसार का नाम समाज है। व्यक्ति की समस्याएं प्रकारान्तर से समाज की समस्याएं हैं। समस्याओं की जड़ को उनने नाम दिया द्वन्द्व। जब तक इसकी समाप्ति नहीं हो जाती तब तक सुख शान्ति कुछ भी वह जो श्रेयस्कर है उपलब्ध नहीं हो सकता।
चिन्तन होगा। संस्कारों के रूप में पदार्थ की कारण सता भी हमारी भावनाओं को प्रभावित करती है। अतः अध्यात्म उपचारों द्वारा सर्वांगपूर्ण प्रगति की दिशा में अपना विकास करने वाले मुमुक्षु साधकों को अपने आहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए ,ऐसी इस संस्थान की मान्यता है। परम पूज्य गुरुदेव ने अपने 24 वर्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण गौदुग्ध की छाछ तथा जौ से बनी रोटी पर संपन्न किए, इसके मूल में यही भावना थी कि तप किये बिना, वह भी स्वादेंद्रियों को साधे बिना जप में गति संभव नहीं,अभीष्ट की प्राप्ति शक्त नहीं। महर्षि पिप्पलाद ने पीपल के फलों व पत्तों पर जीवन भर रहकर अन्नमयकोश की शुद्धि की।
चिन्तन जीवन शैली का ज्यादातर भाग उसे परिवेश से सीखने को मिलता है । सिखाने वाले प्रौढ़ जब स्वयं इस तरह के दूषित जीवन को अपने ऐश्वर्य का, प्रगति का पैमाना मानने लगें, तब उपचार दुष्कर हो जाता है । इस प्रक्रिया की घातक उपलब्धि जर्जर और निर्वीर्य समाज के रूप में होना स्वाभाविक है । जो आज सामने है । तथ्य सिर्फ पश्चिम के किसी एक या अनेक देशों तक सीमित नहीं है ।
चिन्तन द्वारा न सिर्फ शारीरिक-मानसिक बीमारियों से मुक्ति पायी जाती है, वरन् उस काल में साधक की भावना इष्टदेव में समाये गुणों के अनुरूप उच्चस्तरीय होने के कारण उसमें कालान्तर में वैसे ही लक्षण उभरने और मूर्तिमान होने लगते हैं।
चिन्तन अनाचार ही नहीं दुराचार और अत्याचार करने तक पर उतारू हो जाता है । फलतः अंतराल में अंतर्द्वंद्व उठ खड़े होते हैं । दुहरा व्यक्तित्व उभरता है । इस असंतुलन के कारण अविवेकी व्यक्ति की मनःस्थिति सनकी एवं उद्धत , अभिमानी जैसी हो जाती है उस आवेश से सारा शरीर तन जाता है । यह तनाव जिस भी अंग-अवयव का दुर्बल पाता है उसी के ऊपर अपना अधिकार जमा लेता है ।
चिन्तन द्वारा अपने को अशक्त असमर्थ तथा रुग्ण बना लेता है। वे कहते हैं कि यह सब चिन्तन व दृष्टिकोण के भले-बुरे प्रभाव की क्षमता है। इसी संदर्भ में वे आगे लिखते हैं कि संभवतः इसी कारण से भारतीय संस्कृति में प्रतीकोपासना पद्धति का विधान बनाया गया है और उसके माध्यम से श्रेष्ठ व उत्कृष्ट चिन्तन द्वारा न सिर्फ शारीरिक-मानसिक बीमारियों से मुक्ति पायी जाती है, वरन् उस काल में साधक की भावना इष्टदेव में समाये गुणों के अनुरूप उच्चस्तरीय होने के कारण उसमें कालान्तर में वैसे ही लक्षण उभरने और मूर्तिमान होने लगते हैं।
चिन्तन व दृष्टिकोण के भले-बुरे प्रभाव की क्षमता है। इसी संदर्भ में वे आगे लिखते हैं कि संभवतः इसी कारण से भारतीय संस्कृति में प्रतीकोपासना पद्धति का विधान बनाया गया है और उसके माध्यम से श्रेष्ठ व उत्कृष्ट चिन्तन द्वारा न सिर्फ शारीरिक-मानसिक बीमारियों से मुक्ति पायी जाती है, वरन् उस काल में साधक की भावना इष्टदेव में समाये गुणों के अनुरूप उच्चस्तरीय होने के कारण उसमें कालान्तर में वैसे ही लक्षण उभरने और मूर्तिमान होने लगते हैं।
चिन्तन को भी प्रभावित करता है। कई पदार्थ ऐसे हैं जो सीधे हमारे मस्तिष्क के स्नायु संस्थान सूक्ष्म रसस्रावों को जन्म देने वाले स्नायु-तन्तु जाल को प्रभावित कर विचार संस्थान पर गहरा प्रभाव डालते हैं। क्रोध, चिन्ता, बेचैनी, चिड़चिड़ाहट, तनाव जैसे मनोविकार अखाद्य पदार्थों को ग्रहण करने से होते देखे जाते हैं। व्यक्ति उनकी चिकित्सा हेतु बहिरंग को टटोलता है, चिकित्सकों की शरण में जाता है, जबकि कारण व निवारण उसके अपनी ही समीप है । माँसाहारी भोजन व अण्डों का सेवन मानवी काया व मन को कतई स्वीकार नहीं है, न ये उसकी शरीर संरचना के अनुकूल है ।
चिन्तन सही रहता है और कार्य करने की दिशाधारा में सोमनस्य बना रहता है । गलत मार्ग पर उसके कदम प्रायः उठते ही नहीं । उठते भी हैं तो तुरन्त वापस लौट आते हैं । गलती को सुधारने में देर नहीं लगती । इसमें झिझकने, संकोच या विलम्ब करने की आवश्यकता नहीं पड़ती ।
चिन्तन उसे शान्ति की ओर प्रवृत्त करेगा। प्रत्यक्ष में उक्त विवाद के कारण युद्ध जैसी संभावना कई बार बन पड़ेगी पर युद्ध होगा नहीं।
चिन्तन या आचरण मनःक्षेत्र को मथ डालते हैं । आत्मिक प्रेरणा उनसे दूर रहने की प्रेरणा देती है, किन्तु उद्धत चिन्तन अनाचार ही नहीं दुराचार और अत्याचार करने तक पर उतारू हो जाता है । फलतः अंतराल में अंतर्द्वंद्व उठ खड़े होते हैं । दुहरा व्यक्तित्व उभरता है । इस असंतुलन के कारण अविवेकी व्यक्ति की मनःस्थिति सनकी एवं उद्धत , अभिमानी जैसी हो जाती है उस आवेश से सारा शरीर तन जाता है ।
चिन्तन में सतोगुणी प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि होती चली है।
चिन्तन के साथ किया जाय तो सार्थक भी होता है व अन्तरंग- बहिरंग में अनेकानेक परिवर्तन भी लाता है। हम अपने भाग्यविधाता स्वयं हैं, यह बोध सतत् करते हुए अंतर्जगत का प्रबल पुरुषार्थ करते चलें तो हमारी वह यात्रा आरंभ होती है, जिसका लक्ष्य है देवतत्व श्रेष्ठता-उत्कृष्टता। यही तो हम सबका इष्ट भी है गंतव्य भी।
चिन्तन को ही तत्वदर्शन कहते हैं । ईश्वर, कर्मफल, परलोक आदि का ढाँचा मनीषियों ने इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया है कि व्यक्ति का स्वभाव और व्यवहार शालीनता से सुसम्पन्न बना रहे । व्यक्ति की गरिमा इसी एक तथ्य पर निर्भर है कि वह कुत्साओं और कुण्ठाओं पर काबू पाने आन्तरिक महाभारत अर्जुन की तरह निरन्तर लड़ता रहे ।
चिन्तन करने के लिये विवश किया जाता है वरन् उसे सदुद्देश्य अपना कर उपयोगी मार्ग पर चलने के लिये भी सहमत किया जाता है । मानसिक क्षेत्र पर विवेकशील सुव्यवस्था का शासन स्थापित करने के लिये ध्यान योग का विज्ञान विनिर्मित किया गया है ।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ऐसी परिणति उत्पन्न करते हैं कि पराये भी अपनों जैसा बरताव करने लगें । सज्जनता की सद्भावना अनेकों को अनायास ही आकर्षित करती है और सम्मान सहयोग को अनायास ही आकर्षित करती है और सम्मान सहयोग के व्यवहार में अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करती है ।
चिन्तन करता है, शरीर को वैसा आभास होने लगता है। यह एक मनोवैज्ञानिक सच्चाई है। इसी कारण से आज के तथाकथित सुखी-सम्पन्न लोग ऊपरी तौर पर सुविधा-साधनों से युक्त और सुखी जान पड़ने पर भी वास्तव में उनका आन्तरिक जीवन अत्यन्त क्लेशमय होता है। दिन का चैन और रात की नींद एकदम गायब होती है। इसका एकमात्र कारण मन का असंतोष व भटकाव है।
चिन्तन जिम्मेदार है, जो यह बताता है कि डेरी पदार्थों के लिए पशुओं का उपयोग करने के साथ उन्हें काटते चले जाना चाहिए व शरीर को स्वस्थ बनाने के लिए पशुओं का दुहरा उपयोग किया जाना चाहिए । क्या यह एक विडम्बना नहीं कि ऐसा कहने वाले पाश्चात्य चिकित्साविद् ही अब पूरी तरह माँसाहार का समर्थन न कर अपने यहाँ तो शाकाहार के प्रचलन पर जोर दे रहे हैं व तृतीय विश्व व अविकसित देशों में माँसाहार समर्थक प्रतिपादन प्रस्तुत करते हैं । इससे भी बड़ी विडम्बना यह कि हमारे देश में उनके कथन को ब्रह्म-वाक्य मानकर पूजा जाता है तथा हम अपनी संस्कृति के स्वरूप को भूलकर अब अण्डा-माँस कल्चर की पूरी नकल पर उतर आए हैं । कितना व्यापक यह प्रचलन हो गया है , यह यात्रा करते समय दैनन्दिन जीवन में जनसाधारण द्वारा इनका उपयोग करते हुए नित्य देखा जा सकता है। होटल , ढाबों व ठेलों पर इनका अब खुला प्रदर्शन होता है व नई पीढ़ी से लेकर नव धनाढ्य सब इनकी शरण में जाते हैं।
चिन्तन में ही मन रमा रहे । परमार्थ स्तर की योजनायें ही बनती रहें । इतना ही नहीं , वरन् क्रियाकलाप भी ऐसे होने चाहिए जिसमें शरीर का श्रम, समय और मन का एकाग्र भाव पूरी तरह नियोजित रहे ।
चिन्तन करता है ऊँचा ही उसका लक्ष्य होता है। ऊँची ही उनकी विचारणा होती है। वैसे ही देव होते हैं। देव ऋत का पा करके-भगवान का अनुग्रह पाकर के अपना कल्याण करते हैं और समाज का हित भी साधते हैं।
चिन्तन चेतना को व्यापक और प्रखर बनाती है। इसके प्रमाण देश-विदेश के विभिन्न महापुरुषों के जीवन में देखे जा सकते हैं। महान दार्शनिक जान डेविड थोरो को विभिन्न जंगली जानवरों के बीच अपनापन दिखाई देता था। इसी कारण उन्हें सर्वत्र निर्भयता थी। स्वामी रामतीर्थ समूचे भारत को अपना शरीर और संसार को अपना घर कहा करते थे।
चिन्तनशील मन है जो निम्न प्रकृति का परिशोधन चाहता है। एक ऐसा संकल्प है जो देवत्व को जीवन में उतारने के लिए हुलसता रहता है।
चिन्तन है। यह उस निर्बल मन की उपज है-जिसे विषय की पर्याप्त जानकारी नहीं। मानवीय चेतना के जानकार मनीषी प्राण और उसके अनेक स्तरों को भली प्रकार जानते हैं। उनके अनुसार प्राण का एकमेव उद्देश्य है उर्ध्वगमन ताकि मनुष्य दिव्यता के चरम शिखर पर स्वयं को प्रतिष्ठित कर सके। इसका अधोगामी प्रवाह मनुष्य को पशुता की ओर बरबस घसीट ले जाता है।
चिन्तन मनन से निष्कर्ष नवनीत इतना ही निकलता है । अनेकानेक साधनाओं की सिद्धि इतनी ही है कि मानवी चेतना को उस जाल जंजाल से परित्राण मिले जो लक्ष्य को विस्मृत करती और कुत्साओं के अनेकानेक प्रतिपादनों का एक मात्र उद्देश्य है कि व्यक्ति आत्मबोध की भूमिका से जाग पड़े । उस प्रसुप्ति से छुटकारा पाये जिसमें वासना, तृष्णा और अहंता का गुलाम बनकर नर वानर की तरह निरर्थक उचक मचक करते रहने की उसकी आदत पड़ जाती है । पेट और प्रजनन के लिए पशु जीते हैं । मनुष्यों में भी कितने ही नर पशु होते हैं जिन्हें लोभ और मोह के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं ।
चिन्तन क्षेत्र में अवाँछनीयताएँ उद्दण्डतायें पनपने न पायें । जब उठें तो तत्काल उन्हें खेत के खरपतवार की तरह उखाड़ फेंका जाय । आँगन के कूड़ा करकट की तरह बुहार दिया जाय ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-April
चिन्तन तथा अब्राहम लिंकन के प्रयासों को है।
चिन्तन की गहराइयां थीं जो कौटिल्य के नाम से लिखे गये अर्थशास्त्र में, विष्णु शर्मा के नाम से रचे गए पंचतन्त्र में और चाणक्य द्वारा रचित नीतिशास्त्र में प्रकट हुई। यदि मनीषियों का वर्ग जाग्रत हो सका, हममें से हर विचारशील इसके लिए आगे आ सके, तो सारी समस्याओं, उलझनों, परेशानियों के समाप्त होते देर न लगेगी। साथ ही एक स्वस्थ परम्परा चल निकलेगी जिसे वैदिक युगीन ऋषि परम्परा का नूतन संस्करण कहा जाना अनुचित न होगा।
चिन्तन में आवश्यक परिवर्तन किया जाय। तभी हम आज कुरूप लगने वाले संसार को कल सुषमा और सौंदर्य से भरा पूरा देख सकते हैं। टार्च का प्रकाश जितनी परिधि में रोशनी डालता है उतना ही क्षेत्र चमकने लगता है। अपना दृष्टिकोण यदि टार्च जैसा परिष्कृत और प्रकाशवान हो तो वह जितने ही क्षेत्र पर पड़ेगा, वह सभी सुन्दर सुहावना और अनुकूल दीखने लगेगा।
चिन्तन जन-जन तक पहुँचे।
चिन्तन विषय है।
चिन्तन और क्रियाकलाप अपने ढंग से चलते रहें और समीक्षा तथा तितिक्षा अपने उद्देश्य को पूरा करने में लगे रहें । साधारणजन केवल चिन्तन और कर्म का ही भार वहन करते हैं, पर प्रज्ञायोग के साधकों को उसके अतिरिक्त आत्म निरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास के चार प्रयत्नों को अपने प्रयासों में सम्मिलित करना पड़ता है। प्रातःकाल का हर दिन नया जन्म वाला उद्बोधन इसी स्तर की प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है, यदि उसे गंभीरतापूर्वक समझा और अपनाया गया हो।
चिन्तन भी ज्वार भाटे की तरह उठता गिरता रहता है। विवाह के दिनों में नववधू अप्सरा जैसी लगती है। पर कुछ ही समय बाद साथ रहते-रहते वह सामान्य गृहिणी भर रह जाती है। परिवार में अन्य सदस्यों की तरह वह भी एक अंग बन जाती है। अनेक बच्चे जनकर दुर्बल या रुग्ण रहने पर उसका यौवन आकर्षण और भी अधिक चला जाता है।
चिन्तन और कर्म का ही भार वहन करते हैं, पर प्रज्ञायोग के साधकों को उसके अतिरिक्त आत्म निरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास के चार प्रयत्नों को अपने प्रयासों में सम्मिलित करना पड़ता है। प्रातःकाल का हर दिन नया जन्म वाला उद्बोधन इसी स्तर की प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है, यदि उसे गंभीरतापूर्वक समझा और अपनाया गया हो।
चिन्तन से सहायता मिलेगी ।
चिन्तन और व्यवहार को यही ढंग से रखना सीखिए । आपकी अब तक की जिन्दगी वहमों में बीत गयी। अब उनसे मुक्ति पाना सीखिए। अपने आपको दबोचना सीखिए यह नवरात्रि अनुष्ठान का तपश्चर्या वाला हिस्सा है, जिससे हमने आपको अपने आप पर नियंत्रण करना सिखाया। यह बताया कि कम खाने से शरीर का कोई नुकसान नहीं बल्कि लाभ ही होता है।
चिन्तन पक्ष में आती हैं। गायत्री सार्वभौम है, विश्वमाता है व आने वाले भविष्य के समाज का आधार बनेगी । गायत्री की दार्शनिक व व्यवहारिक विवेचना, उपासना पद्धतियाँ, प्राणाग्नि-कुण्डलिनी तथा मंत्र शक्ति का विज्ञान सम्मत विवेचन इसी पक्ष के अंतर्गत आता है।
चिन्तन ठीक इसी प्रकार का होता है। आविष्कार करने वाले, योजनाएँ बनाने वाले, समुन्नत भविष्य की रूपरेखा बनाने वाले अपने मानस को इसी प्रकार प्रशिक्षित करते हैं। और संभावनाओं पर पूरा ध्यान केन्द्रित करते हैं। ऐसे ही लोगों को व्यावहारिक व सफलचेता कहते हैं। व्यवसायी व भावी योजनाओं के निर्माण में प्रायः यही रीति-नीति अपनाते हैं।
चिन्तन पद्धति का नाम है इसका अतीत का गुणगान तो बहुत हो चुका, अब जरूरत है, युगानुकूल संदर्भों में इसके शाश्वत जाज्वल्यमान स्वरूप के प्रस्तुतीकरण की । जीवात्मा को अनन्त संभावनाओं से अभिपूरित बताते हुए उसे परमात्मा बनाने के उपक्रम का और तदनुसार निर्धारित जीवन पद्धति का नाम ही हिन्दु या देवसंस्कृति है। विज्ञान की तरह ही भारतीय संस्कृति भी मनुष्य को, जीवन को, विराट यात्रा की तरह जीने की प्रेरणा देती है। जो चाहें इस क्रम में आत्मिक प्रगति हेतु साधन योगाभ्यास का अवलम्बन ले सकते हैं । जो इसे कठिन समझे, वे समूची जीवन पद्धति को ऐसी बना सकते हैं जिससे भौतिकवादी जीव जीते हुए भी मनुष्य अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।
चिन्तन का, चर्चा का, कल्पना का, निर्धारण का विषय बनाया जाय और समय के साथ चला जाय।
चिन्तन चेतना के द्वारा मानवता को कठिनाइयों के दलदल से उबरने में मदद की। संसार की प्रत्येक प्राचीन सभ्यता के विकास में इन मनीषियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसी वर्ग के चिन्तन के अनुरूप ये सभ्यतायें पनपीं और तद्नुरूप ही उनने अपने स्वरूप को विकसित किया और फली-फूलीं। मनीषियों का यही वर्ग भारत में ऋषियों एवं पाश्चात्य जगत में दार्शनिकों के नाम से विख्यात हुआ।
चिन्तन-दर्शनपक्ष-यह मूलतः भारतीय अध्यात्म का तत्वदर्शन वाला पक्ष है जिसमें वेद उपनिषदों -दर्शन ब्राह्मण- आरण्यक आदि आर्ष वाङ्मय का परिचय समसामयिक संदर्भ में आता है। यह वह शाश्वत चिन्तन है जिसके आधार पर सारी मान्यताओं का निर्धारण संभव बनाया जाता है। मानवी व्यक्तिगत के विभिन्न स्तर, उससे जुड़ी समस्याएँ व समाधान हेतु साधना पद्धतियों का निर्धारण भी उसी में आता है। मन, आत्मा, मोक्ष, परलोक और पुनर्जन्म की व्याख्याएँ इसी धारा में स्पष्ट की जाती हैं। वेदों का सार है गायत्री व उसकी समग्र व्याख्या इसी चिन्तन पक्ष में आती हैं।
चिन्तन करना। उन सभी कारणों व तत्वों पर प्रकाश डालना जिनकी वजह से ऋषि सतयुग की व्यवस्था कर सकें। साँस्कृतिक कार्यक्रम के माध्यम से, संवेदना के जागरण द्वारा नये समाज की परिकल्पना किन आधारों पर की जा सकती है, यह इस विभाजन का मूल उद्देश्य है। आज राजनीतिक आधार पर जुड़े सारे देश, समूह व वर्ग टूटते जा रहे हैं। यदि हमें राष्ट्र की एकता-अखण्डता को बनाये रखना है, एक विश्वसंस्कृति का प्रचार- प्रसार करना है तो वह पारस्परिक संबंधों की संवेदना के आधार पर बनी घनिष्ठतम अवस्था द्वारा ही संभव है।
चिन्तन का विषय माना जाय और सोचा इतना भर जाय कि अगले दिनों जिसकी आवश्यकता पड़ेगी उसके लिए आवश्यक तैयारी करने में अभी से जुट पड़ जाय । वैज्ञानिकों का, राजनीतिज्ञों का, सेनानायकों का चिन्तन ठीक इसी प्रकार का होता है। आविष्कार करने वाले, योजनाएँ बनाने वाले, समुन्नत भविष्य की रूपरेखा बनाने वाले अपने मानस को इसी प्रकार प्रशिक्षित करते हैं। और संभावनाओं पर पूरा ध्यान केन्द्रित करते हैं। ऐसे ही लोगों को व्यावहारिक व सफलचेता कहते हैं।
चिन्तन बदलें और आदत सुधारें । प्रवृत्तियाँ तभी बदल सकती हैं। जीवन जीते समय और मरने के बाद शान्ति ऐसे ही लोगों को मिलती है, क्योंकि चेतना की शान्ति सत्प्रवृत्तियों की चिर सहचरी है।
चिन्तन शैली है। आपके विचारों का प्रतीक है, जो आपके जीवन में एक अंग बन गए हैं। जो संस्कार आपके जन्म-जन्मान्तरों से चले आ रहे हैं, उनका एक रूप आपकी कुदृष्टि व विचारों की झलकी के रूप में देखने को मिलता है । किसी जमाने में आप 84 लाख योनियों में एक कुत्ते भी थे क्या? हाँ गुरुजी जरूर रहे होंगे।
चिन्तन कुकृत्य करने के लिए प्रोत्साहित करती है । इसी कारण चिड़िया जाल में फँसती और मछलियाँ मछुओं का शिकार बनती हैं। दूरदर्शी को भावी परिणाम पर विचार करना होता है और वस्तु स्थिति का निरीक्षण परीक्षण भी । जो इतना कर पाते हैं उन्हें भावी सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हैं हुए सतर्कता भरे कदम उठाने के लिए अवकाश मिल जाता है। फलतः वे उन विपत्तियों से बच जाते हैं जो मृगतृष्णा में भटकने वालो का पीछा करती रहती हैँ।
चिन्तन और पुरुषार्थ को औचित्य की दिशा में नियोजित किया जा सके तो सफलताओं सिद्धियों विभूतियों का इतना बड़ा प्रतिफल पाया जा सकता है जिसके आधार पर कोई अपने को अभावग्रस्त अनुभव न करें। मनुष्य के पास न केवल अपना काम चलाने के लिए, वरन् दूसरों को बाँटने के लिए अपार सम्पदा विद्यमान है। एक बीज बोने पर मक्का और बाजरा जैसी फसलें जब हजार गुनी फलती हैं तो कोई कारण नहीं कि आत्म परिष्कार और लोकमंगल के लिए कुछ कहने योग्य कर सकने पर इतना वैभव हस्तगत किया जा सके जिसकी कि भगवद् भक्ति की प्रशंसा करने वाले उसका महात्म्य वर्णन करते रहे हैं। लोक-परलोक की असंख्य सम्पदायें मिलने की बात ऊँचे स्वर से कहते और जनसाधारण को उस पर विश्वास करने के लिए जोर लगाते रहते हैं।
चिन्तन में निमग्न इसी विषय पर सोच रहे थे । क्षण-क्षण में उनके चेहरे के भाव बदल जाते, जिससे ऐसा प्रतीत होता कि ऋषि भी प्रस्तुत संकट के प्रति उतने ही चिंतित हैं, जितना जनसामान्य। कभी-कभी विचार उठते-तू क्यों वृधा परेशानी मोल ले रहा है ? किन्तु दूसरे ही पल उसके विपरीत विचारधारा हुँकारती सुनाई पड़ती तो तू क्या मौन दर्शक बना रहेगा? हाथ-पर-हाथ धर कर यों ही बैठा रहेगा?
चिन्तन तथा क्रियाकलापों की दिशा में असाधारण परिवर्तन करना चाहिए ।
चिन्तन है जिसके आधार पर सारी मान्यताओं का निर्धारण संभव बनाया जाता है। मानवी व्यक्तिगत के विभिन्न स्तर, उससे जुड़ी समस्याएँ व समाधान हेतु साधना पद्धतियों का निर्धारण भी उसी में आता है। मन, आत्मा, मोक्ष, परलोक और पुनर्जन्म की व्याख्याएँ इसी धारा में स्पष्ट की जाती हैं। वेदों का सार है गायत्री व उसकी समग्र व्याख्या इसी चिन्तन पक्ष में आती हैं। गायत्री सार्वभौम है, विश्वमाता है व आने वाले भविष्य के समाज का आधार बनेगी ।
चिन्तन पर आधारित धर्म धारणा को जीवन का अंग बना लिया जाए तो सारा ऊहापोह व आज समाज में छाई विषमता मिट जाए। आज युगधर्म यही है कि धर्म के संबंध में संव्याप्त भ्राँतियों का कुहासा मिटे तथा मानव मात्र को श्रेष्ठ पथ पर साथ लेकर चलने का चिन्तन जन-जन तक पहुँचे।
चिन्तन की प्रखरता को मिलता है। इन्हीं मनीषियों की प्रवाहमान प्रखर मनीषा ने अनेकानेक मनीषियों को क्राँतिकारियों को, पैदा किया। “स्वराज्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है” का मन्त्र फूँकने वाले तिलक दरिद्रनारायण के सेवा व्रत में अनेकानेक को दीक्षित करने वाले गान्धी धरती पर अतिमानस को उतारने वाले श्री अरविन्द आदि अनेकों ने विवेकानन्द के चिन्तन प्रवाह को अपनी प्रेरणा का स्रोत स्वीकारा है इन मनीषियों ने अपने-अपने ढंग से राष्ट्र की, मानव समुदाय की समस्याओं को सुलझाने में मदद की।
चिन्तन को सही बनाते हुए उसे उदात्त बनाना। कौनसा धर्म सही है? हिंदू, ईसाई, मुस्लिम, ताओ पारसी, यहूदी, जैन शिण्टो या कोई और, इस व्यर्थ के विवाद में न पड़कर यदि विज्ञान सम्मत-प्रगतिशील चिन्तन पर आधारित धर्म धारणा को जीवन का अंग बना लिया जाए तो सारा ऊहापोह व आज समाज में छाई विषमता मिट जाए। आज युगधर्म यही है कि धर्म के संबंध में संव्याप्त भ्राँतियों का कुहासा मिटे तथा मानव मात्र को श्रेष्ठ पथ पर साथ लेकर चलने का चिन्तन जन-जन तक पहुँचे।
चिन्तन के अनुरूप ये सभ्यतायें पनपीं और तद्नुरूप ही उनने अपने स्वरूप को विकसित किया और फली-फूलीं। मनीषियों का यही वर्ग भारत में ऋषियों एवं पाश्चात्य जगत में दार्शनिकों के नाम से विख्यात हुआ।
चिन्तन में संशोधन की आवश्यकता है।
चिन्तन उठे, जो भी कृत्य बने उन्हें तीन कसौटियों पर कसते रहने की अनवरत जागरुकता बरती जाय। 1-पशु प्रवृत्तियों वाले कुसंस्कार हावी तो नहीं हो रहे हैं। उनकी प्रेरणा से ऐसा कुछ तो नहीं बन रहा जिसे मानवी-गरिमा के अनुपयुक्त कहा समझा जा सके। (2) जन साधारण द्वारा अपनायी जाने वाली भेड़चाल से ऊँचा उठकर अपने कृत्यों में आदर्शवादिता का ऐसा पुट लगा रहा है या नहीं, जिसे अभिनंदनीय और अनुकरणीय माना जा सके । (3) विश्व उद्यान को अधिक सुशोभित और अधिक सुसंस्कृत बनाने के लिए आवश्यक पुण्य परमार्थ की किसी अंश में पूर्ति हो रही है या नहीं।
चिन्तन करते हुए सोने वाले को प्रायः गहरी नींद का आनन्द लेने से वंचित रहना पड़ता । दूसरे दिन उठने पर गत रात्रि को किए गए निर्धारण के अनुरूप अगले दिन का ढर्रा सरलतापूर्वक चल पड़ता है और अनवरत प्रगति क्रम में सिद्ध होता है।
चिन्तन और क्रिया के साथ- साथ समीक्षा का भी क्रम चलना चाहिए। वह समीक्षा भी ऐसी सशक्त होनी चाहिए जो अनौचित्य को हटाने और औचित्य को प्रतिष्ठित करने में सशक्त एवं सफल सिद्ध होती रहे ।
चिन्तन प्रवाह को अपनी प्रेरणा का स्रोत स्वीकारा है इन मनीषियों ने अपने-अपने ढंग से राष्ट्र की, मानव समुदाय की समस्याओं को सुलझाने में मदद की।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-December
चिन्तन भी इसी किस्म का एक ठंडा रोग है, जो दृष्टिकोण को तो दूषित करता ही है, चरित्र में दुष्टता और भ्रष्टता की मात्रा बढ़ाता ही है। इस सबसे भी बड़ी बात है कि व्यथा कल्पना क्षेत्र को बुरी तरह अपने चंगुल में जकड़ लेती है। सोते-जागते अश्लील कल्पना चित्र ही मस्तिष्क में उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं ऐसे असंख्य कल्पना चित्र रंगीली तस्वीरों की तरह दीखते रहते हैं, जिनका व्यवहार रूप में उतर सकना कदाचित ही कभी किसी के लिए संभव होता है। जिस मस्तिष्क को कामुकता की गठिया ने जकड़ रखा है, वह कोई उपयोगी चिन्तन प्राप्त कर ही नहीं पाता। अश्लील ललक ही क्षमताओं को अपने जाल में कस कर बाँध लेती है और शिकार को तड़पते, खीजते रहने के अतिरिक्त और कुछ उपयोगी काम कर सकने योग्य रहने नहीं देती।
चिन्तन का सार संक्षेप इन्हीं चार गुणों में समाविष्ट हो जाता है। इन्हें अपनाने पर उपलब्ध होने वाले लाभों की उपेक्षा बरतने पर होने वाली हानियों को यदि समझाते रहने का क्रम चलाया जाय तो उसका सत्परिणाम उत्पन्न हुए बिना नहीं रहता।
चिन्तन और चरित्र के समन्वय का वातावरण तलाश करना और उसमें जितनी उपयुक्तता प्रतीत हो उसे अपने ढंग से अपनाने का प्रयत्न करना। अपने से तात्पर्य है अपनी परिस्थितियों के अनुरूप। पिछले समय में संत होने का एक ही प्रमाण था विरक्त होना। पारिवारिक जिम्मेदारियों की उपेक्षा करके भिक्षाटन पर निर्वाह करना। आज वह पद्धति करने तक की बात चले तो उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिए।
चिन्तन बोया जाय जो भौतिक ...................अमीरी घटने के साथ गरीबी भी घटेगी। ज्वार उठता है तो समुद्र में उससे सटा हुआ जील का भाग नीचे जाता है जिन जलाशयों में पानी समतल रहता है। उछाल नहीं आता उनका पानी भी स्वच्छ रहता है और जल जन्तु भी प्रसन्नता भरा जीवन यापन करते हैं। यही स्थिति मानव समाज की भी होनी चाहिये। व्यवस्था भी इसी स्तर की बनानी चाहिये कि अमीरी बटोरने का अवसर किसी को न मिले।
चिन्तन की ही कष्टकारक परिणति हैं।
चिन्तन बदलते हुए ही सुधारनी पड़ती हैं। विक्षोभ अपना निजी उत्पादन है। अपने खेत में कोई दूसरा बीजारोपण करे और फसल काटे, यह संभव नहीं। अधिकार तो अपना है, फिर जैसा भी कुछ चाहा जाएगा, उसी का बीजारोपण होगा और उसकी प्रतिक्रिया फसल भर कर अपने कोठे भरेगी। खेत में खर-पतवार उगते तो हैं; पर चतुर किसान उन्हें आसानी से उखाड़ फेंकते हैं।
चिन्तन न होने पर ये कोरी भावुकता होकर रह जाती हैं। इनकी श्रेष्ठता हम कितनी ही तरह से क्यों न सिद्ध करें- किन्तु यदि एक मात्र भावना ही सत्य है- तो मनुष्य के बौद्धिक विकास उसके शरीर धर्म का क्या अर्थ रहा? सर्वथा अनुत्तरित प्रश्न है। बौद्धिक विवेचना से पल्ला छुड़ा बैठने के कारण ही इस पथ के अनुयायी रहस्यवादी कहलाए। इस उपाधि धारण करने का एक मात्र कारण-वह अयोग्यता कही जाएगी, जिसके कारण ये अपने अनुभवों को बुद्धि की भाषा में नहीं कह पाए।
चिन्तन क्षेत्र में, मन मस्तिष्क में, अन्तःकरण में आत्मसात कर लेने पर ईर्ष्या क्षण भर नहीं ठहर सकती।
चिन्तन उसका मार्ग दर्शक बनेगा। चिन्तन की यह नयी प्रणाली मानव की नियति है। इसे स्वीकारे बिना अन्य कोई उपाय नहीं। किन्तु किसी को यह नहीं सोचना चाहिए विज्ञान कैसे जीवित रहेगा? “परिवर्तन के महान क्षण” पुस्तक में निहित अस्तित्व भेदी अपने विचारों में परमपूज्य गुरुदेव स्पष्ट करते हैं- “विज्ञान जीवित रहेगा, पर उसका नाम भौतिक विज्ञान न रहकर अध्यात्म विज्ञान रहेगा।
चिन्तन को कुचक्र रचकर दूषित करता है। मिथ्याचार की विडम्बना रचकर चरित्र बिगाड़ता है। और उल्लू सीधा करने की फिराक में रहकर व्यवहार को भी भौंड़ा बना लेता है। तीसरी ऐषणा है पुत्रेषणा जिसे बोलचाल की भाषा में कामांधता या परिवार के प्रति कर्तव्य की सीमा में रहकर उन्हीं के लिये विलास वैभव जुटाते रहने और मरते खटते रहने की लालसा भी कह सकते है। समय और सामर्थ्य हर मनुष्य के पास सीमित है।
चिन्तन में डूब गये?”
चिन्तन शैली का विकास किया है- जो उनके निजी व्यक्तित्व के कारखाने में बनी-ढली और सँवारी गई है। वर्तमान के मनुष्य की मार्ग-दर्शक और भविष्य के मानव के लिए विरासत के रूप में सौंपी गई इस चिन्तन पद्धति को ही उन्होंने “वैज्ञानिक अध्यात्मवाद” का नाम दिया है।
चिन्तन रहने के कारण अनेकानेक बीमारियों से ही नहीं, समस्याओं-कठिनाइयों एवं विपत्तियों से भी ग्रसित रहना पड़ता है। इस तथ्य को समझते हुए हर किसी को स्वास्थ्य रक्षा की तरह मानसिक प्रखरता भी सम्पादित करनी चाहिए।
चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में घुसी हुई दुष्प्रवृत्तियों से जूझने और हटाने का एक काम ही नहीं करना पड़ता, उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों को जगाने का उससे भी अधिक कष्ट साध्य कार्य भी करना पड़ता है। इस उन्मूलन और आरोपण के दुहरे प्रयोजन को पूरा करना प्रायः वैसा ही है, जैसा भगवान परशुराम के फरसा और फावड़ा चलाने के दुहरे पराक्रम का परिचय देना। उन्होंने झंखाड़ काटे और उद्यान लगाये थे। इसी पराक्रम का परिचय हर साधक को अपने जीवन क्षेत्र में देना पड़ता है। इससे कम में काम चलता नहीं।
चिन्तन को इस प्रकार विनिर्मित किया जाना चाहिये कि किसी की महत्वाकाँक्षा न भड़के। धन की आकाँक्षा एक विशेष प्रकार की मानसिक स्थिति है जो आक्रान्ता को तो उद्वेलित करती है साथ ही अपने प्रभाव से उस संपर्क परिकर में रहने वालों को भी प्रभावित किये बिना नहीं रहती।
चिन्तन विश्लेषण चल रहा है। उसके अस्तित्व के एक भाग को समग्र शास्त्र का रूप दे दिया गया है। ...................... ये सब हैं तो उपयोगी पर समग्र मानव को समझे बिना उसकी मूल प्रकृति और प्रवृत्ति पर ध्यान दिये बिना एकाँगी आंशिक समाधानों से कुछ बनेगा नहीं। एक छेद सीते-सीते दूसरे और नए फट पड़े तो उस मरम्मत से कब तक काम चलेगा?”......................उस महाविद्या की ओर से क्यों उदासी है?
चिन्तन पद्धति को ही उन्होंने “वैज्ञानिक अध्यात्मवाद” का नाम दिया है।
चिन्तन, चरित्र को ध्यानपूर्वक देखने के उपरान्त उनका अनुकरण किया जा सकता था। अब वैसा भी नहीं हो सकता। कितने ही श्रेष्ठ जनों की जीवन पद्धति का कुछ कुछ अंश एकत्रित करके ऐसा संकलन बन सकता है जो सब मिलकर अपनी आवश्यकता की पूर्ति कर सकें। इसके लिए अनेक जीवन चरित्रों को चुनना चाहिए। उन्हें पढ़ना चाहिए और जो अंश अपने काम में आने लायक हों उसे दुहराकर, तिहराकर पढ़ना चाहिए।
चिन्तन एवं कर्तृत्व समान थे। वे इन्हें पुनर्जन्म की घटनायें मानते हैं। उनके अनुसार ईसामसीह ने दुबारा अपोलोनिक्स ऑफ टिमाना के रूप में जन्म लिया। शोपेनहांवर बुद्ध के अवतार कहे जा सकते हैं। फिश्टे, हीगल एवं काण्ट जैसे विख्यात दार्शनिकों को भी भारतीय आत्मायें कहा जा सकता है।
चिन्तन की यह नयी प्रणाली मानव की नियति है। इसे स्वीकारे बिना अन्य कोई उपाय नहीं। किन्तु किसी को यह नहीं सोचना चाहिए विज्ञान कैसे जीवित रहेगा? “परिवर्तन के महान क्षण” पुस्तक में निहित अस्तित्व भेदी अपने विचारों में परमपूज्य गुरुदेव स्पष्ट करते हैं- “विज्ञान जीवित रहेगा, पर उसका नाम भौतिक विज्ञान न रहकर अध्यात्म विज्ञान रहेगा। उस आधार को अपनाते ही वे सभी समस्याएँ सुलझ जाएँगी, जो इन दिनों भयावह दीख पड़ती हैं।
चिन्तन ही अस्त व्यस्त हो जाता है। हविस के मारे लोग उन्मादियों की तरह स्वार्थ सिद्धि कि लिये उस सीमा तक आगे बढ़ जाते है जहाँ अनाचार के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रहता। ऐसे व्यक्ति अनर्थ ही सोचते और अनर्थ ही करते है।
चिन्तन और कर्म ही आपस में टकराते रहेंगे-तब परिणाम संहार के सिवा और क्या होगा? उज्ज्वल भविष्य की संसिद्धि का सिर्फ एक उपाय है-इनका सामंजस्य। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के रूप में यही है। इस नए तत्व दर्शन के अनुसार क्रिया और चिन्तन दोनों जहाँ मिल सकते हैं वह स्थान संवेदना है। जाने-अनजाने ये दोनों यहीं अपना जन्म पाते हैं।
चिन्तन प्रणाली से जीवन के सभी अंग-उपाँग अपने चरम विकास की कला सीखते हैं।
चिन्तन में परमार्थ साधनाओं में संलग्न रहते थे तो भी उनको अष्ट सिद्धि, नवनिधि सरीखी लोकोत्तर शक्तियां उपलब्ध रहती थीं। भारत प्राचीन काल में बुद्धिमान बनने के लिये ज्ञान की, और बलवान बनने के लिए विज्ञान की उपासना करने में सदैव संलग्न रहता था। योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे, वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। यह निर्विवाद है।
चिन्तन पद्धति के आविष्कर्ता भले वह हैं, किन्तु इसकी तीव्र आवश्यकता पिछले कुछ समय से सभी मनीषी अनुभव कर रहे थे। “साइन्स एण्ड फर्स्ट प्रिंसिपल्स” के रचनाकार वैज्ञानिक एफ0एस0सी0नार्थ्राय की भाषा में- यही कारण है कि एडिनल आइन्सटाइन तथ व्हास्टहेड जैसे भौतिक शास्त्री ट्रीष, हाल्डेन जैसे शरीर-क्रियाविद् ब्रोबर, हिलवर्ट जैसे गणितज्ञों का भ्री इस ओर उन्मुख होना-यह बताता है-जगत में एक नवीन स्फूर्ति तथा स्वभाव का वातावरण बन रहा है।
चिन्तन सही हो पाता है और कार्य।समय का नियोजन भी वैसा नहीं हो पाता जैसा होना चाहियें। जब तक यह स्थिति बनी रहेगी तब तक समय के साथ काम करने वाली दोनों षक्याँ आपस में सामंजस्य न बिठा सकेंगी। यह अधूरापन रह जाने पर काम भार रूप अरुचिकर बना रहता है और उसमें लगाया गया समय सार्थक नहीं हो पाता।
चिन्तन और भावना से हीन विज्ञान की प्रक्रिया और उपलब्धियों ने मनुष्यता को बारूद के ढेर में बिठा दिया है। उन्मादी अट्टहासों के बीच वह स्वयं के अस्तित्व में आग लगाने पर उतारू है। कारण उसने सोचने की जरूरत नहीं समझी-उपलब्धियाँ किसलिए?”
चिन्तन दोनों जहाँ मिल सकते हैं वह स्थान संवेदना है। जाने-अनजाने ये दोनों यहीं अपना जन्म पाते हैं। इस मिलन बिंदु को अपने मूल स्रोत के रूप में पहचानना-स्वीकारना ही वह उपाय है-जिससे मनुष्य अब तक के अपने विकास को बरकरार रख सम्भावनाओं के नए द्वार खोल सकता है।
चिन्तन है। प्रस्तुत अंक में हम परमपूज्य गुरुदेव के बहु-आयामी व्यक्तित्व पर एक धारावाहिक लेखमाला आरंभ कर रहें हैं। इसका प्रथम पुष्प”वैज्ञानिक अध्यात्मवाद” के जन्मदाता के रूप में इस संबंध में पूज्यवर के विषय में दार्शनिक सोच पर प्रस्तुत है। इसी पक्ष के व्यावहारिक पहलू व शोध संस्थान के जन्म लेकर विगत चौदह वर्षों की प्रगति यात्रा से जुड़े अन्तरंग संस्मरणों को अगले अंक में प्रस्तुत किया जाएगा। विगत दिनों अमेरिका, कनाडा व यू. के. की शाँतिकुँज दल की प्रवास यात्रा पर इन प्रतिपादनों के प्रस्तुतीकरण पर जो उन्हें सफलता मिली, उसकी भी झलक आगे पाठक पढ़ सकेंगे।
चिन्तन सही दो भागों में बंट जाती है फलतः न चिन्तन सही हो पाता है और कार्य।समय का नियोजन भी वैसा नहीं हो पाता जैसा होना चाहियें। जब तक यह स्थिति बनी रहेगी तब तक समय के साथ काम करने वाली दोनों षक्याँ आपस में सामंजस्य न बिठा सकेंगी। यह अधूरापन रह जाने पर काम भार रूप अरुचिकर बना रहता है और उसमें लगाया गया समय सार्थक नहीं हो पाता।
चिन्तन चरित्र व्यवहार और क्रिया कलाप को सज्जनोचित नहीं कर पाता फलतः न उसे सन्तोश मिलता है और अभीष्ट उपलब्धियां सहकार प्राप्त करने का श्रेय सौभाग्य ही। वह अनेक गुने घाटे में जरूर रहता है। चिन्तन को कुचक्र रचकर दूषित करता है। मिथ्याचार की विडम्बना रचकर चरित्र बिगाड़ता है। और उल्लू सीधा करने की फिराक में रहकर व्यवहार को भी भौंड़ा बना लेता है।
चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश होने का है। साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती। इसके विपरीत जिनके जीवनक्रम में निकृष्टता और दृष्टता भरी पड़ी है जिन्हें छल−छद्म ही रुचते हैं, जिन्हें लोभ−मोह से आगे की कोई बात सूझती ही नहीं, जिनके लिये वासना और तृष्णा ही सब कुछ है−इन्हीं प्रयोजनों के लिए अपना श्रम, समय और मनोयोग लगाये रहते हैं, इन्हीं के लिए पूजा−पाठ का ढोंग रचते हैं−ऐसे व्यक्ति निष्प्राण उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त समझने वाले जानते हैं कि आस्तिकता की सफलता के साथ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश होने की शर्त भी जुड़ी हुई है।
चिन्तन प्रणाली को- उनकी भावमय संवेदना को किस हद तक स्वीकार कर सके? इस प्रश्न का उत्तर जिस भाषा में देना है - वह क्रिया है। ऐसी क्रिया जो संवेदनाओं से उपजी है, युग ऋषि का चिन्तन जिसका मार्गदर्शक हो।
चिन्तन पर वह थोड़े लोग ही छाये रहते है तो समझना चाहिये कि जीवन का महत्वपूर्ण अंश इसी जंजाल में नियोजित हो गया। औचित्य की सीमा में रहकर कर्तव्य पालन मात्र से भी काम नहीं चलता।
चिन्तन एवं साधन को सही कामों में नियोजित कर सकते बन ही नहीं पड़ता। इसके स्थान पर दूसरों को हैरान करते चलने का उलटा उपक्रम आगे भी अधिक चल पड़ता है। फलतः दूसरे तो किसी प्रकार उपेक्षा करके पीछा भी छुड़ा लेते हैं, पर अपनी बहुमूल्य मानसिक क्षमता का ऐसा दुरुपयोग होता है, जिसे अपने आप कुल्हाड़ी मारना कहा जा सके। ऐसे व्यक्ति स्वयं ही अतिशय घाटे में रहते हैं, सनकी समझे जाते हैं और स्वजन-संबंधियों के सहयोग तक से वंचित हो जाते हैं। इस परिस्थिति में न तो कोई प्रगति कर सकता है, न सुखी रह सकता है।
चिन्तन उद्विग्न आकाँक्षाओं से भरा रहता है। जो चाहा गया है। उसका बहुत ही छोटा अंश पुरुषार्थ की सीमा और परिस्थितियों की अनुकूलता को देखते हुए कार्यान्वित हो पाता है। होना तो यह चाहिये कि उसे पूरी करने की सारी विधि व्यवस्थाएं ठीक प्रकार से सम्पन्न होती रह सके। तृष्णा के भड़क जाने पर व्यक्ति की स्थिति अतृप्त उन्मादी जैसी हो जाती है।
चिन्तन और अनेक जीवन चरित्रों में से अपने साथ ताल-मेल खाते हुए चरित्र अध्यायों का मधु संचय करना चाहिए। इस प्रकार आज का सत्संग-संकलन पद्धति से ही पूर्ण हो सकता है। इसके बिना वह अधूरा ही बना रहेगा। प्राचीन काल में जिस प्रकार सत्संग बहुमुखी था।
चिन्तन और भ्रष्ट चरित्र का भारी लदान लाद कर आत्मिक प्रगति की लम्बी छलाँग लगा सकना कठिन है। कौतूहल करना और जादू दिखाना ही अभीष्ट हो तो मूर्खों को बहकाने वाले धूर्तों की सर्वत्र भरमार पाई जा सकती है। छिट−पुट पूजा विधानों में लम्बे चौड़े चमत्कार बताने वालों की कमी नहीं। सस्ती लूट के लालची वहाँ भीड़ लगाये भी रहते हैं। जब तक संसार में सस्ते मोल में बहुत पाने की लिप्सा जीवित रहेगी, तब तक यह गोरखधन्धा भी चलता रहेगा, जो इन दिनों अध्यात्म क्षेत्र पर कुहासे की भाँति बेतरह छाया हुआ है।
चिन्तन किये हैं और समाधान ढूँढ़े हैं। आवश्यक नहीं कि आज की स्थिति में उन्हें ज्यों का त्यों अपनाया जा सके। यही बात चरित्रों के सम्बन्ध में भी है। महामानवों में से किसी का भी चरित्र ऐसा नहीं है, जिसकी आज ज्यों की त्यों नकल की जा सके। आदर्श स्थिर रहते हैं पर प्रयोग परिस्थितियों के अनुरूप किये जाते हैं।
चिन्तन जिसका मार्गदर्शक हो।
चिन्तन प्राप्त कर ही नहीं पाता। अश्लील ललक ही क्षमताओं को अपने जाल में कस कर बाँध लेती है और शिकार को तड़पते, खीजते रहने के अतिरिक्त और कुछ उपयोगी काम कर सकने योग्य रहने नहीं देती। ऐसे लोगों को कुटेवों और यौन रोगों से ग्रस्त होते हुए भी देखा जाता है। उन्माद को हल्का करने के फेर में वे अपने शरीर का ही सत्यानाश करते रहते हैं। नर-नारियों में गुप्त रोगों का बढ़ता जाना एड्स जैसे रोग का आगमन इस कामुकता के मंद विष को ढोते रहने के कारण ही संभव हुआ है।
चिन्तन और संवेदना-जीवन के तीन पक्ष अपने एकाकीपन में मनुष्य जाति को जीवन का अर्थ नहीं दे सकते। वह कला नहीं सिखा सकते जिससे अनगढ़ता-भद्दापन मिट सके। इस कला का अभाव ही है-जिसके कारण समृद्धियों के ढेर में दबा-बौद्धिक भार से लदा मनुष्य करुण विलाप कर रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-July
चिन्तन, आत्मनिर्माण, उत्तर दायित्वों की पूर्ति और लोक सेवा के साथ हमें आध्यात्मिक साधनाएं करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अनेक सुयोग्य और कई अयोग्य गुरुओं के संरक्षण में हमने अनेकों, दीर्घकालीन कष्ट साध्य साधनाएं की हैं, अनेकों तपश्चर्याओं में अपने को काफी तपाया है। इस लम्बे साधना काल में हमने जो अनुभव प्राप्त किये हैं, उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अन्य सब साधना विधियों की अपेक्षा गायत्री की साधना अपेक्षाकृत सरल है, शीघ्र सफल होने वाली और अधिक उत्तम परिणाम उत्पन्न करने वाली है। इस साधना में वैसा कोई विक्षेप नहीं आता जैसा कि अन्य साधनाओं में आता है।
चिन्तन करता है, वह धर्म, अधर्म के द्वंद्व से छूट कर परम गति को प्राप्त होता है।
चिन्तन रहता है या गुनगुनाया करता हूँ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-August
चिन्तन की दिशा में मनुष्य को नाना प्रकार की गुप्त प्रकट, दृश्य-अदृश्य सहायताएं मिलती हैं और उस मार्ग में सफलताओं का ताँता बँध जाता है चिन्तन का ऐसा ही महत्व और महात्म्य है। ध्यान योग की महिमा किसी से छिपी नहीं है।
चिन्तन करता है जिन तत्वों पर ध्यान एकाग्र करता है। वह सब धीरे धीरे उस चिन्तन करने वाले की मनोभूमि में स्थिति और वृद्धि को प्राप्त करता जाता है। विचार विज्ञान का विस्तृत विवरण तो कहीं अन्यत्र करेंगे पर उसके सारभूत सिद्धान्तों को हमें समझ लेना चाहिए कि जिन बातों पर हम चित्त को एकाग्र करेंगे उसी दिशा में हमारी मानसिक शक्तियाँ प्रवाहित होने लगेंगी और अपनी अद्भुत सामर्थ्यों के द्वारा सूक्ष्म लोकों में से ऐसे ऐसे साधन, हेतु और उपकरण पकड़ लाती है जिनके आधार पर उसे चिन्तन की दिशा में मनुष्य को नाना प्रकार की गुप्त प्रकट, दृश्य-अदृश्य सहायताएं मिलती हैं और उस मार्ग में सफलताओं का ताँता बँध जाता है चिन्तन का ऐसा ही महत्व और महात्म्य है। ध्यान योग की महिमा किसी से छिपी नहीं है।
चिन्तन (2) ईश्वर को अपने अन्दर धारण करना (3) सद्बुद्धि की प्रेरणा के लिए प्रार्थना। यह तीनों ही बातें असाधारण महत्व की हैं।
चिन्तन, आत्मा की सर्वव्यापकता का चिंतन यदि गहरी अनुभूति और श्रद्धा पूर्वक किया जाय तो आत्मा एक स्वर्गीय दिव्य भाव से ओत प्रोत हो जाता है आत्मा इस दिव्य आनन्द को विचार क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रखता वरन् क्रिया में लाकर इसका सुदृढ़ आनन्द भोगने की और कदम उठाता है।
चिन्तन ज्ञान है, ब्रह्म की धारणा कर्म है और बुद्धि की सात्विकता अभीष्ट प्राप्त की क्रिया प्रणाली एवं उपासना है। वेदों की समस्त ऋचाएं इसी तथ्य को सविस्तार प्रकट करने के लिए प्रकट हुई हैं। वेदों में, ज्ञान कर्म और उपासना यह तीन विषय हैं, गायत्री के बीज में भी उन्हीं तीनों का व्यावहारिक संक्षिप्त, एवं सर्वांग पूर्ण है। इस तथ्य को, इस बीज को सच्चे हृदय से निष्ठा और श्रद्धा के साथ अन्तःकरण में गहरा उतारने का प्रयत्न करना ही गायत्री की उपासना है। इस उपासना से साधक का सब प्रकार कल्याण ही कल्याण है।
चिन्तन करता है, दूसरे की तरक्की को नहीं देख सकता है और दूसरे को पीड़ा देता है ऐसे पुरुषों को काशी वास सिद्धि दायक नहीं।
चिन्तन करने वाले की मनोभूमि में स्थिति और वृद्धि को प्राप्त करता जाता है। विचार विज्ञान का विस्तृत विवरण तो कहीं अन्यत्र करेंगे पर उसके सारभूत सिद्धान्तों को हमें समझ लेना चाहिए कि जिन बातों पर हम चित्त को एकाग्र करेंगे उसी दिशा में हमारी मानसिक शक्तियाँ प्रवाहित होने लगेंगी और अपनी अद्भुत सामर्थ्यों के द्वारा सूक्ष्म लोकों में से ऐसे ऐसे साधन, हेतु और उपकरण पकड़ लाती है जिनके आधार पर उसे चिन्तन की दिशा में मनुष्य को नाना प्रकार की गुप्त प्रकट, दृश्य-अदृश्य सहायताएं मिलती हैं और उस मार्ग में सफलताओं का ताँता बँध जाता है चिन्तन का ऐसा ही महत्व और महात्म्य है। ध्यान योग की महिमा किसी से छिपी नहीं है।
चिन्तन मात्र किया जाय सो बात नहीं, वरन् गायत्री की आत्मा का सुदृढ़ आदेश है कि उस ब्रह्म को, उस दिव्य गुण सम्पन्न परमात्मा को, अपने अन्दर धारण करें उसे अपने रोम रोम में ओत प्रोत कर लें, परमात्मा को अपने कण कण में व्याप्त देखें और ऐसा अनुभव करें कि उन दिव्य गुणों वाला परमात्मा हमारे भीतर बाहर आच्छादित हो गया है और उन दिव्य गुणों में, उस ईश्वरीय सत्ता में अपना ‘अहम’ पूर्णरूप से निमग्न हो गया है। इस प्रकार की धारणा से जितने समय तक मनुष्य ओत प्रोत रहेगा उतने समय तक उसे भूलोक में रहते हुए भी ब्रह्म लोक के आनन्द का अनुभव होगा यह अनुभव इतना गंभीर है कि आगामी जीवन में, बाह्य आचरणों में उसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। उसमें सात्विक तत्वों की मंगलमय अभिवृद्धि न हो ऐसा हो नहीं सकता।
चिन्तन का ऐसा ही महत्व और महात्म्य है। ध्यान योग की महिमा किसी से छिपी नहीं है।
चिन्तन है जो मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आनन्द, दुख का नाश, श्रेष्ठता, तेज, निर्मलता एवं आत्मा की सर्व व्यापकता, आत्मवत् सर्वभूतेषु की मान्यता पर जितना ही ध्यान एकाग्र किया जायगा, मस्तिष्क इन तत्वों की अपने में वृद्धि करेगा।
चिन्तन, दुख शोक रहित ब्राह्मी स्थिति का चिन्तन, श्रेष्ठता, तेजस्विता और निर्मलता का चिन्तन, आत्मा की सर्वव्यापकता का चिंतन यदि गहरी अनुभूति और श्रद्धा पूर्वक किया जाय तो आत्मा एक स्वर्गीय दिव्य भाव से ओत प्रोत हो जाता है आत्मा इस दिव्य आनन्द को विचार क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रखता वरन् क्रिया में लाकर इसका सुदृढ़ आनन्द भोगने की और कदम उठाता है।
चिन्तन, श्रेष्ठता, तेजस्विता और निर्मलता का चिन्तन, आत्मा की सर्वव्यापकता का चिंतन यदि गहरी अनुभूति और श्रद्धा पूर्वक किया जाय तो आत्मा एक स्वर्गीय दिव्य भाव से ओत प्रोत हो जाता है आत्मा इस दिव्य आनन्द को विचार क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रखता वरन् क्रिया में लाकर इसका सुदृढ़ आनन्द भोगने की और कदम उठाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-March
चिन्तन करने वाले पुरुष को उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है, आसक्ति से कामना होती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।
चिन्तन करना, पाये हुए ज्ञान का अनुभव और तर्क द्वारा परीक्षण करना आदि भी तप है। इसके द्वारा ज्ञान अन्तर्मुख होता है। चिंतन द्वारा ज्ञान अपनी चीज बन जाता है। पाये हुए ज्ञान के आधार पर अपने को देखना, निष्पक्षता से अपने गुण दोषों का विचार करना आत्मनिरीक्षण है। आत्मनिरीक्षण के बाद जगहित के लिए ग्रन्थ रचना की जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-June
चिन्तन कर सकते है पर इस समय का महत्व निराला है। बजे तो चाहे जब बजते रहते है पर शादी, पुत्र जन्म, उत्सव आदि के समय पर बजने वाले बाजों में कुछ दूसरा ही उत्साह होता है। ब्राह्ममुहूर्त की साधना का आनंद भी कुछ ऐसा ही अनोखा है उसकी तुलना अन्यों समयों में नहीं हो सकता।
चिन्तन, मनन एवं जप करने मात्र से से सात्विकता के किन्हीं अंशों की निश्चित रूप से वृद्धि होती है, जितने यह अंश बढ़ेंगे उतने अंशों पुराने दूषित तत्वों में कमी होगी। एक वर्तन में जितना पानी भरा जाता है उतनी ही हवा उसमें से निकलती जाती है। इसी तरह जितने सात्विक अंश हृदय में भरते जाते हैं पतित अवस्था को निश्चित रूप से सुधार होता है। यह क्रम यदि दृढ़ता पूर्वक, अधिक तत्परता के साथ चलाया जाय तो अन्तःकरण चतुष्टय में सतोगुण की तीव्रगति से वृद्धि होती है और पतितावस्था विलीन होती जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-May
चिन्तन, प्रिय कल्पना, खेल, गतिशीलता. रुचि, तृप्ति आदि को साम के अंतर्गत लिया जाता है। धन, वैभव, वस्तुओं का संग्रह, शास्त्र, औषधि, अन्न, वस्त्र, धातु, गृह, वाहन, भृत्य आदि सुख साधनों की सामग्रियां ‘अर्थ’ की परिधि में आती हैं।
चिन्तन, मनन करने के उपरान्त उत्तम विचारों के संस्कार दृढ़ होते हैं तब कहीं प्रत्यक्ष जीवन में वे लक्षण प्रकट होते हैं और वह वैसा बन जाता है। गायत्री की साधना से सतोगुण की ब्राह्मी भावनाएं अन्तः प्रदेश में अपना केन्द्र स्थापित करती हैं। उन भावनाओं के अनुरूप आन्तरिक जीवन बन जाता है और उसी प्रकार की प्रवृत्तियाँ वाह्य जीवन में भी दृष्टि गोचर होती हैं।
चिन्तन करते समय एक बेचैनी, लालसा एवं कमी का अनुभव होता है पर सेवा, संयम तथा परमार्थ का चिन्तन करने मात्र से-उनकी कल्पना इच्छा आयोजना करने मात्र से-हृदय में एक दैवी आनन्द का तरंगें उठने लगती हैं। उन इच्छाओं का पूर्ण होना देवाधीन नहीं होता, परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता वरन् पूर्णतया अपने हाथ में होता है। कोई व्यक्ति सत्य वादी, प्रेमी, उदार, सेवा भावी बनना चाहता है, दूसरों के लिए अपनी शक्तियाँ दान करना चाहता है, संयम से रहना चाहता है, प्रेम पूर्ण व्यवहार करना चाहता है, सदाचारी, खरा, ईमानदार बनना चाहता है तो इस में न कोई विघ्न है न किसी की सहायता की आवश्यकता है। इच्छा होते ही उसे कार्यरूप में परिणत किया जा सकता है और क्रिया के साथ साथ ही उस आत्म संतोष के दैवी आनन्द का फल चखा जा सकता है।
चिन्तन, आदि नामों से पुकारते हैं। इन उपायों से आत्मबल प्राप्त होता है, आत्मिक थकान मिटती है, प्रकाश, स्फूर्ति और ताजगी मिलती है। जैसे पूरी निद्रा लेकर, पौष्टिक आहार प्राप्त करके प्रसन्न चित्त हुआ मनुष्य जिस कार्य में जुटता है उसे उत्साह चतुरता और शीघ्रता से पूरा कर लेता है उसी प्रकार साधना के द्वारा आत्मबल प्राप्त करने पर मनुष्य की आन्तरिक स्थिति काफी मजबूत और प्रफुल्लित हो जाती है, उसके द्वारा दैनिक जीवन की गतिविधि का संचालन बड़ी ही आशापूर्ण उत्तमता के साथ होता है।
चिन्तन का रस प्राप्त नहीं हो सकता है। आत्मिक निर्बलता हो तो सत्संग, प्रेम, भक्ति आदि का आत्मानंद दुर्लभ है। इतना ही नहीं निर्बलों को मिटा डालने के लिए प्रकृति का ‘उत्तम की रक्षा’ सिद्धान्त काम करता है। कमजोर को सताने और मिटाने के लिए अनेकों तथ्य प्रकट हो जाते हैं। निर्दोष भले और सीधे साधे तत्व भी उसके प्रतिकूल पड़ते हैं।
चिन्तन करने मात्र से-उनकी कल्पना इच्छा आयोजना करने मात्र से-हृदय में एक दैवी आनन्द का तरंगें उठने लगती हैं। उन इच्छाओं का पूर्ण होना देवाधीन नहीं होता, परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता वरन् पूर्णतया अपने हाथ में होता है। कोई व्यक्ति सत्य वादी, प्रेमी, उदार, सेवा भावी बनना चाहता है, दूसरों के लिए अपनी शक्तियाँ दान करना चाहता है, संयम से रहना चाहता है, प्रेम पूर्ण व्यवहार करना चाहता है, सदाचारी, खरा, ईमानदार बनना चाहता है तो इस में न कोई विघ्न है न किसी की सहायता की आवश्यकता है। इच्छा होते ही उसे कार्यरूप में परिणत किया जा सकता है और क्रिया के साथ साथ ही उस आत्म संतोष के दैवी आनन्द का फल चखा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-November
चिन्तनीय विषय हमारे सामने बच रहता है धर्म की तात्त्विकता या वास्तविकता का। धर्म के व्यापक विचार को छोड़ कर उसके दो पहलुओं पर हम विचार कर लें। पहला है उसका श्रद्धा पक्ष और दूसरा आधार पक्ष श्रद्धा की दृष्टि से किसी को इन पर अपवाद नहीं मिल सकता कि प्रत्येक को सम्प्रदाय में ईश्वर या शक्ति विशेष पर श्रद्धा आधारित रहती है और व्यक्तिगत गुणों की भिन्नता रहने में अंश को कोई भिन्नता के कारण अधार्मिक माना जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-December
चिन्तन में आता निज स्वरूप।। उस सतत ध्यान को नमस्कार।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-January
चिन्तन करते रहने से मन की मलीनता हटेगी ही। ईश्वर का उपासक सर्वत्र उस अंतर्यामी को उपस्थित देखेगा तो क्यों पाप में प्रवृत्त होगा और क्यों भय, चिन्ता, शोक, निराशा आदि में डूबेगा? इसी प्रकार सामाजिक सुव्यवस्था के लिए अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह हैं। दूसरों में अपनी ही आत्मा देखकर उनसे प्रेम, सहयोग एवं उदारता का व्यवहार करना अहिंसा है। अपनी न्यायेपार्जित कमाई पर ही गुजारा करना अस्तेय है और निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकताओं से बची हुई प्रतिभा, विद्या, क्षमता, समय एवं सम्पत्ति को समाज के हित में वापिस लौटा देना, दान कर देना अपरिग्रह है।
चिन्तन और मनन की आदत पड़े तो मनुष्य आत्म−निरीक्षण कर सकता है और अपनी बुराइयों के एवं दुर्बलताओं के बारे में बहुत कुछ सोच−समझ सकता है, उन्हें छोड़ और सुधार भी सकता है। ऐसी विचार−गोष्ठियाँ जिनमें अपनी मानसिक स्थिति को सुधारने का मार्ग−दर्शन होता रहे बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। ईश्वर उपासना का भी इस दृष्टि से अत्यधिक महत्व है। आस्तिकता एवं उपासना को अपनाने से भी मनुष्य सज्जन बनता है। ईश्वर के निष्पक्ष न्यायकारी और पापों का दण्ड देने वाला मानने से कर्मफल की अनिवार्यता पर निष्ठा जमती है और मनुष्य नरक एवं दुर्गति के भय से, पाप से बचता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-June
चिन्तन करें तो लगेगा कि वह साक्षात् देवी के रूप में हमारे घर अवतरित हुई है। उसी प्रकार पिता−माता के एक कटुवाक्य पर क्षुब्ध हो उठने उपकार, वात्सल्य एवं सहायता की लम्बी शृंखला पर विचार करें तो उत्तेजनावश कह दिया गया एक कटु शब्द बहुत ही तुच्छ प्रतीत होगा। मन को बुराई के बीच अच्छाई ढूँढ़ निकालने की आदत डालकर ही हम अपनी प्रसन्नता को कायम रख सकते हैं।
चिन्तन किया? (3) आज हमने अपने दिन भर के विचारों और कार्यों की बड़ी समीक्षा करके उनमें क्या−क्या गुण-दोष पाये और कल उन दोषों को सुधारने एवं गुणों को बढ़ाने के लिए क्या निश्चय किया? (4) आज हमने दूसरों को क्या सेवा लाभ दिया? इन चारों बातों पर यदि नित्य बारीक नजर रखी जाय, इनके महत्व को सोचते-समझते रहा जाय और दैनिक जीवन में इनके लिए स्थान दिया जाता रहे तो एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति हो सकती है। ऐसी डायरी रखना और उसे नित्य लिखना प्रत्येक आत्म कल्याण के इच्छुक के लिए आवश्यक है।
चिन्तन और मनन के बाद इस मार्ग को अपनाया है वे जीवन भर सुनिश्चित रूप से लक्ष की ओर चलते रहते हैं। वेदान्त में ज्ञान की पूर्णता को ही मुक्ति माना गया है। ज्ञान और विवेक बिना अध्यात्म की गाड़ी एक पग भी आगे नहीं बढ़ती।
चिन्तन और मनन का विषय होना चाहिए। कहते हैं कि संजीवनी बूटी का सेवन करने से मृतक व्यक्ति भी जीवित हो जाते हैं। हनुमान द्वारा पर्वत समेत यह बूटी लक्ष्मण जी की मूर्च्छा जगाने के लिए काम में लाई गई थी। वह बूटी औषधि रूप में तो मिलती नहीं है पर सूक्ष्म रूप में अभी भी मौजूद है। आत्म−निर्माण की विद्या—संजीवनी विद्या—कही जाती है इससे मूर्छित पड़ा हुआ मृतक तुल्य अन्तःकरण पुनः जागृत हो जाता है और प्रगति में बाधक अपनी आदतों को, विचार श्रृंखलाओं को सुव्यवस्थित बनाने में लगकर अपने आपका कायाकल्प ही कर लेता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-October
चिन्तन करते रहने का कार्य−क्रम अपनाया था। विचारों के परिमार्जन के लिए स्वाध्याय आवश्यक है। कुविचारों की काट सद्विचारों से ही होती है। गरम लोहे को ठंडा लोहा काटता है, काँटे-से-काँटा निकाला जाता है और विष-से-विष का शमन होता है। स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से जो सद्विचार ग्रहण किए जाते हैं, इन्हीं के द्वारा कुविचारों और कुसंस्कारों का प्रतिरोध किया जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-December
चिन्तनपूर्वक हृदयंगम करना चाहिये। हमारी आत्मा से अपनी आत्मा को जोड़ने और भावना के साथ भावना का स्पर्श करने का यही तरीका है। हमारे सान्निध्य और सत्संग की जिन्हें उपयोगिता प्रतीत होती हो उन्हें आदि से अन्त तक ‘अखण्ड ज्योति’ पढ़ते रहना चाहिये। एक महीने में हमने जो कुछ सोचा, विचारा, पढ़ा, मनन किया, समझा और चाहा है, उसका साराँश पत्रिका की पंक्तियों में मिल जायेगा। इस सत्संग की उपेक्षा को हम अपनी उपेक्षा ही समझते हैं और प्रत्येक प्रेमी से यह आशा करते हैं कि वह हमें, हमारी भावना, आकाँक्षा और गतिविधियों को समझने के लिये पत्रिका को उसी मनोयोग से पढ़ें जैसे हमारे पास बैठकर हमारी बातों को सुना जाता है।
चिन्तन करें। महात्म्यों का वर्णन इसीलिए किया जाता है कि किसी कार्य के अच्छे पहलू अपनी समझ में आवें और अभिरुचि उत्पन्न हो। कथावार्ता का सारा आधार यही तो होता है कि आध्यात्मिक विषयों की उपयोगिता और उनसे प्राप्त होने वाले लाभों को समझने से प्रवृत्तियाँ उस ओर झुकें। जहाँ भी मनुष्य लाभ देखता है, जिधर भी उसे आकर्षण दीखता है, उधर ही मन झुकने लगता है। सद्गुणों के महात्म्य को हम जितनी गंभीरता से सोचेंगे, उनके सत्परिणामों पर जितना अधिक विचार करेंगे, उतना ही उन्हें प्राप्त करने की आकाँक्षा प्रबल होगी।
चिन्तन और मनन निरन्तर करना चाहिए। किसी वस्तु के लाभ सोचने से उसे प्राप्त करने की इच्छा होती है और यदि उसी से जो हानि हो सकती है उसका विचार आरंभ कर दिया जाय तो वही बहुत बुरी और त्याज्य प्रतीत होने लगेगी। किसी व्यक्ति की अच्छाइयों पर यदि विचार करें तो वही देवता दिखाई देगा, पर यदि उसकी बुराइयाँ ढूँढ़ने लगें तो वह भी इतनी अधिक मिल जावेंगी कि साक्षात् शैतान की तरह वह दीखने लगेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-February
चिन्तन में अखण्ड ज्योति के पाठकों को भी सम्मिलित कर लिया जाय। यह अंक इसी संदर्भ में प्रस्तुत किया जा रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-August
चिन्तन, मिल तुरत जाये अमिय कन॥

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-March
चिन्तन करता है उसी अनुपात से परमात्मा रूप में बदलता जाता है। साधारण आत्माओं से महात्मा बनते कितनों को ही देखा गया है। जीवन का लक्ष आत्मोत्कर्ष है उसकी पूर्ति में परमात्मा का स्मरण चिन्तन एवं भजन पूजन की प्रक्रिया का अपनाया जाना आवश्यक है।
चिन्तन न किया जाय तो उसका विस्मरण हो जाना स्वाभाविक ही है। उपयोग में आने वाली सामान्य वस्तुऐं भी यदि बहुत दिन तक व्यवहार में नहीं आती तो हम उन्हें भूल जाते हैं। मनुष्य का स्वभाव ही कुछ भुलक्कड़ ढंग का है यदि ऐसा न होता तो उसके मस्तिष्क में पुरानी स्मृतियाँ इतनी अधिक भरी रहतीं कि नई बातों को सुनने−समझने का स्थान ही न बचता। यह भुलक्कड़पन उन बातों पर तो बहुत ही अधिक प्रभाव डालता है जो सामने नहीं है, दीखती नहीं तथा इन्द्रियों द्वारा अनुभव में नहीं आती।
चिन्तन आदि उसके उपाय हैं। पर इतने मात्र को ही अध्यात्म का पूर्ण स्वरूप नहीं माना जा सकता यह तो उसका एक अंश मात्र है। पूर्णता तब आती है जब बाह्य वातावरण में भी वह अध्यात्म भावनाऐं साकार रूप से दिखाई देती हैं। जैसे हमारा मन अध्यात्म तत्व में डूबा रहने पर सुख प्राप्त करता है वैसे ही हमारा समाज यदि आध्यात्मिक आदर्शों को अपना कर धर्म नीति पर चले तो शान्ति की स्थापना हो सकती है। भीतर उत्पन्न होने वाली दुर्भावनाओं की बाहर फैलने वाली सडांद ही अशान्ति के रूप में प्रकट होती है।
चिन्तन एवं भजन पूजन की प्रक्रिया का अपनाया जाना आवश्यक है।
चिन्तन में अभिरुचि नहीं, जो प्रस्तुत समस्याओं पर विचार करना नहीं चाहता वह एक प्रकार से पशु ही कहा जा सकता है। ऐसे नर−पशुओं की वृद्धि से धरती का भार बढ़ता है और नाना प्रकार के लोक संकट उत्पन्न होते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-September
चिन्तन करें यह खोज करें कि किन गतिविधियों को अपनाने से व्यक्ति और समाज का प्रवाह सही दिशा में विकसित हो सकता है। जीवन को ठीक तरह से जीने की विद्या से हम अनजान जैसे बने बैठे हैं और अपने लिए तथा दूसरों के लिए अवाँछनीय वातावरण उत्पन्न कर रहे हैं।
चिन्तन करना जरूरी है। अपनी त्रुटियों और बुराइयों को रोज ही ढूँढ़ना चाहिए और अगले दिन उन्हें घटाने की बात सोचनी चाहिए। रस्सी की थोड़ी−थोड़ी रगड़ रोज पड़ते रहने से पत्थर पर निशान बन जाता है तो सुधार का थोड़ा−थोड़ा प्रयत्न भी यदि चलता रहे, उस मार्ग पर धीरे−धीरे भी हम चलें तो कुछ ही दिनों में हमारा बहुत कुछ सुधरा हुआ स्पष्ट दीखने लगेगा। निरन्तर चलते रहने वाला मंदगामी कछुआ भी जब लम्बी यात्राऐं पूरी कर सकता है तो अपनी खराबियों को सोचने, सुधारने और निरंतर चलने वाला क्रम हमें एक दिन पूर्ण पवित्रता के लक्ष तक क्यों नहीं पहुँचा देगा?
चिन्तन के साथ पढ़ते रहना ही स्वाध्याय है। यदि सुलझे हुए विचारों के जीवन विद्या के ज्ञाता कोई सम्भ्रान्त सज्जन उपलब्ध हो सकते हों तो उनका सत्संग भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है। यों धर्म और अध्यात्म के नाम पर आलस, कर्तव्य त्याग, निराशा, भाग्यवाद परावलम्बन आदि भ्रान्तियों को बढ़ाने वाले प्रवचनकर्ता गली कूँचों में मक्खी, मच्छरों की तरह सत्संग की दुकानें लगाये बैठे हैं, उनमें जाने की अपेक्षा न जाना अधिक उत्तम है। इसी प्रकार स्वाध्याय के नाम पर जीवन निर्माण की ज्वलन्त समस्याओं को सुलझाने में कोई सहायता न देने वाली, किन्हीं देवी देवताओं के गुणानुवाद गाने वाली पुस्तकों का पाठ करते रहने से कोई वास्तविक प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
चिन्तन करें तथा निश्चय करें कि हमें अपना जीवन इसी ढाँचे में ढालना है। दूसरों को उपदेश करने की अपेक्षा इस संकल्प पत्र में आत्म निर्माण पर सारा ध्यान केन्द्रित किया गया हैं। दूसरों को कुछ करने के लिए कहने का सबसे प्रभावशाली तरीका एक ही है कि हम वैसा करने लगें। अपना निर्माण ही युग निर्माण का अत्यन्त महत्वपूर्ण कदम हो सकता है । बूँद−बूँद जल के मिलने से ही समुद्र बना है।
चिन्तन में लगाना चाहिए। इस समय में फुरसत न मिलने जैसे बहाने का भी कोई प्रश्न नहीं है। सर्वव्यापक निष्पक्ष, न्यायकारी, परमेश्वर से सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करने की प्रार्थना इस समय मन ही मन करते रहनी चाहिए। गायत्री मन्त्र का भावार्थ भी यही है। मानसिक गायत्री जाप इसे कहा जा सकता है।
चिन्तन से पूरी होती है। युगनिर्माण के लिए, आत्म−निर्माण के लिए यह प्रधान साधन है। संकल्प की, मन की शुद्धि के लिए इसे ही रामबाण दवा माना गया है।
चिन्तन के लिए और सायंकाल का समय आत्म−निरीक्षण के लिए नियत करना चाहिए। नित्य कर्म से निवृत्त होकर नियमित संध्या जप ध्यान करना एक उचित धर्म विधान है। उसे पालन करने का प्रयत्न हम सब लोग करें। असुविधा और परिस्थितियों के कारण इसमें कुछ व्यतिरेक होना क्षम्य भी कहा जा सकता है पर शैया पर नींद खुलने से लेकर जमीन पर पैर रखने के बीच का जो थोड़ा−सा समय रहता है वह अनिवार्य रूप से हम में से हर एक को ईश्वर चिन्तन में लगाना चाहिए। इस समय में फुरसत न मिलने जैसे बहाने का भी कोई प्रश्न नहीं है।
चिन्तन यह चार ही उपाय हैं। मानव जीवन की महत्ता को हम समझें, इस स्वर्ण अवसर के सदुपयोग की बात सोचें, अपनी गुत्थियों में से अधिकाँश की जिम्मेदारी अपनी समझें और उन्हें सुलझाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव में आवश्यक हेर−फेर के लिए सदा कटिबद्ध रहें । इस प्रकार की विचार शैली आत्म−निर्माण की प्रेरणा देने वाले सत्साहित्य से, प्रबुद्ध मस्तिष्क के सत्पुरुषों से एवं आत्म−निरीक्षण तथा आत्म−चिन्तन करने से किसी भी व्यक्ति को सहज ही उपलब्ध हो सकती है। दृष्टिकोण बदलते ही परिस्थितियाँ भी निश्चित रूप से बदल सकती हैं।
चिन्तन
चिन्तन और उपासना
चिन्तन करने से किसी भी व्यक्ति को सहज ही उपलब्ध हो सकती है। दृष्टिकोण बदलते ही परिस्थितियाँ भी निश्चित रूप से बदल सकती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-May
चिन्तन तो नहीं करते रहते? कामोत्तेजक, संगीत, सिनेमा, वार्तालाप चित्र एवं साहित्य से दूर रहते हैं न?
चिन्तन की प्रवृत्ति जागृत करनी चाहिए। दोष दर्शन एवं आलोचना करने की कुशलता को यदि अपने ऊपर मनुष्य प्रयुक्त करने लगे तो कल्याण के सभी अवरुद्ध मार्ग खुल सकते हैं। अपनी भूलों को समझने और सुधारने के लिए जो प्रयत्नशील है उसे देर तक दुरावस्था से घिरा नहीं रहना पड़ सकता। यह सिद्धान्त जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है। लौकिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में मनुष्य निश्चित रूप में आशाजनक उन्नति अपने प्रयत्न और पुरुषार्थ के आधार पर कर सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-September
चिन्तन करने तथा मानसिक अन्तर द्वन्द्व के कारण मन की सारी शक्ति का ह्रास हो जाता है और तब मनुष्य अशान्त रूप हो जाता है।
चिन्तन, वासना का ताण्डव कुकल्पना−चक्र टूट जायगा और आप मन के साथ चलायमान न होंगे। मन के व्यापार के साथ निज आत्मा की समस्वरता न होने दें। इसी अभ्यास द्वारा वह आज्ञा देने वाला न रह कर सीधा−सादा आज्ञाकारी अनुचर बन जायगा—
चिन्तन में ही अपना समय व्यतीत करता है। इस तरह के कुचिंतन में ही अपना समय व्यतीत करता है। इस तरह के कुचिंतन से उसका आध्यात्मिक बल नष्ट हो जाता है और वह दुःख में डूब जाता है।
चिन्तन द्वारा उनका दर्शन प्राप्त करके यह कहा था−”मैं राज्य नहीं चाहता, मेरे पास मेरे परम प्रियतम अब मौजूद हैं। श्रीहरि के साक्षात् दर्शन करके अब मेरी समस्त आकाँक्षायें तृप्त हो गईं। मेरे चित्त में किसी साँसारिक वस्तु की चाह नहीं है।”
चिन्तन में लगाये रखने से अनावश्यक निद्रा से प्रायः मुक्ति मिल जाती है।
चिन्तनशील सत् प्रवृत्तियाँ पंगु हो उठती हैं तथा हम विषयवासना, आर्थिक लोभ, स्वार्थ, संकुचिततावश प्रलोभन के शिकार बन जाते हैं। अन्ततः उनसे उत्पन्न होने वाली हानियों, कष्टों, त्रुटियों, अपमान तथा अप्रतिष्ठा से दुग्ध होते रहते हैं। प्रलोभन जीवन की मृगतृष्णा है, तो बुद्धि का भ्रम मोह का मधुर रूप!
चिन्तन करने में लगाना चाहिये। शान्त अवस्था में मनुष्य जैसा अपने विषय में विचार करता है वह वैसा ही अपने आप को पाता है। किसी भी प्रकार का निश्चय जब किसी−प्रकार के संशय से दूषित नहीं होता तो फलित होता है। कितने ही लोग किसी विशेष प्रकार की शक्ति की प्राप्ति के लिये मन्त्र, जप अथवा यज्ञ आदि करते हैं। ये सब क्रियाएं अपने निश्चय को दृढ़ करने के लिये आवश्यक हैं।
चिन्तन से मुक्त होकर अन्तर्मुखी बनती है। क्षुद्र बाह्य पदार्थों तथा रूपों से आसक्ति हटते ही उसे आत्मानुभव होने लगता है। वह जान लेता है कि मैं हाड़, माँस, वासना, तृष्णा मोह नहीं हूँ, मैं तो सत्−चित् आनन्द स्वरूप, विशुद्ध आत्मा परमात्मा हूँ।
चिन्तन के अभ्यास से प्रलोभन से मुक्ति मिल सकती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-June
चिन्तन को नहीं समझती। उसकी मानसिक मूर्तियाँ बिखरी हुई होती हैं। केवल विचारक, दार्शनिक एवं योगियों की मानसिक कल्पनाएँ सुव्यवस्थित एवं स्पष्ट होती हैं। एकाग्रता और ध्यान के अभ्यासियों की भावनाएँ दृढ़ एवं सुघड़ होती हैं।
चिन्तन की वृत्ति सजग हुई थी। रवीन्द्र जैसे कवियों ने मृत्यु के दर्शन-शस्त्र पर बहुत कुछ लिखा है, सच कहा जाय तो, रवीन्द्र के मृत्यु सम्बन्धी विचारों से स्वयं मृत्यु भी गौरवान्वित हुई है। मरण जीवन का अन्त नहीं है। वह तो माता के एक स्तन को छोड़ कर दूसरे स्तन के लगने के समान है। मृत्यु को चीर कर भी जीवन का स्त्रोत बहता रहता है।
चिन्तनशील प्रकृति के व्यक्तियों के साथ रह कर उदास बनते हैं। ऐसे व्यक्तियों के साथ रहिये जो पुष्प के समान तरोताजा और खिले हुए रहते हैं, जो चिन्ताओं को चुटकियों में उड़ाते हैं। अपने चारों ओर ऐसे चित्र रखिए जिसमें मनुष्य हंस खेल रहे हों। स्वयं अपने ऐसे चित्र खिंचवाइये जिनमें आप प्रसन्न और आह्लादमयी मुखमुद्रा में हों। इन चित्रों को देखकर स्वयं अपनी उदास सूरत पर आपको लज्जा आयेगी और उदासी दूर हो जायगी।
चिन्तन करके कदाचित् ही वह भाव आपके अन्तस्तल में पक्की तौर से जमे। अनेक वर्ष से मैं स्वयं इस विचार को अपने हृदय तल में बैठाने का प्रयत्न करता रहा हूँ किन्तु केवल वाचिक प्रयत्न से कोई अधिक सफलता नहीं मिली। जब असली परीक्षा का समय आता है तभी वह विचार चित्त से गायब हो जाता है। अतएव अभी तो कोरा वेदांती हूँ। किन्तु अब विचार करता हूँ कि “मैं शरीर से भिन्न हूँ” इस विचार का क्रियात्मक अनुभव जब तक न करूंगा तब तक यह विचार केवल कल्पना-मात्र ही रहेगा।
चिन्तन कर मन को चिन्ता और कल्पित वेदना के भार से भर लेते हैं। यदि आप अपने गुण सुविधाओं और समृद्धियों अर्थात् अपने उन्नत पक्ष से दूसरों का मिलान करते रहें और अपने प्रति हितैषी बने रहें, तो आप जीवन के प्रति संतत एक चाव, नई रुचि, उत्साह और उन्नति की ओर लगे रहेंगे। आप की योग्यताएँ उत्तरोत्तर बढ़ती रहेंगी और विवेक परिपक्व हो जायगा।
चिन्तन में लीन होकर मन को उदासी से भर देता है। अतः आप कुछ कीजिए। कोई आनन्ददायी कविता या उपन्यास नाटक या अपनी प्रिय पुस्तक पढ़िये। उदासी के कारण को भूलने के लिए कविता बड़ी उपयोगी है। दो चार ऐसी कविताएं कंठस्थ कर लीजिए जिनको पुनः उच्चारण करने से मन में प्रेरणा उत्पन्न होती है।
चिन्तन करने से शरीर के प्रति अनुराग नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार धन, मान आदि के दुर्गुणों पर नित्य विचार करने से इनके प्रति अनुराग नष्ट हो जाता है। यही अशुभ भावना है।
चिन्तन मन का साधारण स्वभाव है। ईश-स्मरण के बजाय वह गंदे विचारों में तत्काल फँस जाता है। नित्य प्रयत्न और त्याग द्वारा ही परमात्मा की ओर उसे मोड़ना चाहिए। स्वभाव के प्रतिपक्षी होने पर भी उसे इस ओर शिक्षित करना होगा। साँसारिक दुख-दर्दों से बचने के लिए और कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
चिन्तन करने वाले व्यक्ति के मन में साँसारिक विचार आते हैं। उसे इसी प्रकार के विचारों में रस मिलता है। यदि कही ज्ञानचर्चा होती है तो वह उसे रस-हीन समझता है। साँसारिक लोगों को ज्ञान-चर्चा के समय जल्दी से नींद आ जाती हैं। ज्ञान-चर्चा मनुष्य की इच्छाओं के ऊपर नियंत्रण करती है।
चिन्तन करो। यह महान् साधना है। गीता के दिव्य विचारों को मन में जमाओ। उपनिषद् और योगवाशिष्ठ के उन्नत विचारों का ध्यान करो। आत्मा में उन्मुख बन कर आन्तरिक ध्यान करो, विचार करो, तर्क करो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-May
चिन्तन करके उसके मन से अपने मन का सम्बन्ध जोड़ सकते हैं। ऐसा करने पर हम उससे वही विचार करवा सकते हैं जो कराना चाहते हैं। किसी व्यक्ति के प्रति नित्य प्रति हमारे हृदय में आने वाले विचार उस व्यक्ति को प्रभावित करते हैं वह हमारे विषय में भी वैसा सोचने लगता है जैसे कि हम उसके विषय में सोचते हैं। जितना ही हम इस सिद्धान्त पर विश्वास करते हैं कि रेडियो की लहरों की भाँति विचारों की लहरें दूर−दूर के लोगों को प्रभावित करती हैं उतना ही हम प्रत्यक्ष रूप से अपने विचारों द्वारा दूसरे लोगों को प्रभावित करने में समर्थ होते हैं। दूसरों के कल्याण के विचार जितने बली होते हैं उतने अकल्याण के विचार नहीं होते अतएव कल्याण के सभी विचारों से अवश्य लाभ होता है।
चिन्तन करेगा तब तुझे अवश्य ही ब्रह्म का ध्यान होगा क्योंकि जीवन को जैसा निर्माण करना चाहते हो उससे कुछ आगे का, उत्कृष्ट, सर्वोत्तम आदर्श अपने सम्मुख रखो और फिर सुई की तरह अपने आदर्श में गड़ जाओ।
चिन्तन में लीन हो जा।
चिन्तन अथवा ज्ञान−अभ्यास द्वारा नष्ट कर दे और ब्रह्मशक्ति द्वारा चमत्कृत हो। ब्रह्म−अवस्था को पुनः प्राप्त करने की चेष्टा करे। अपने सत्−चित आनन्द स्वरूप में रमण कर।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-February
चिन्तन किया करते हैं। उस स्थिति में उनका सन्तुलन स्थिर रहता था। यदि हम सन्तुलित मनः अवस्था के इच्छुक हैं, तो हमें भोजन, संगति और वातावरण तीनों ओर से आत्म−सुधार करना चाहिये।
चिन्तन किया जावेगा वे वस्तुएँ निश्चित रूप से हमारे समीप चली आयेंगी। अतः जिसे हम प्राप्त करना चाहते हैं सदा उसी का विचार करें। इन्हीं विचारों में निर्मलता लाने के लिए दो महान गुणों की प्रशंसा हमारे शास्त्रों में भरी पड़ी है। वे हैं दया तथा क्षमा। दया के विचारों से निर्मलता आती है तथा क्षमा से निर्मलता को स्थिरता प्राप्त होती है।
चिन्तन किया है वे उसके अधिकाधिक समीप आ पहुँचती हैं। मनुष्य अपने विचारों से ही उच्च तथा नीच बनता है। वैसे स्थूल शरीर तो सबका लगभग एक-सा होता ही है। महान पुरुषों की महानता का एक यही कारण है कि वे कठिन से कठिन परिस्थितियों में अपने सद्विचारों का क्षण मात्र के लिए भी परित्याग नहीं करते।
चिन्तन−मात्र से दुःख पहले तुम्हें ही आकर प्राप्त होगा।
चिन्तन करता है वैसी ही वाणी बोलता है। जैसी वाणी बोलता है वैसा ही कर्म करता है तथा जैसा कर्म करता है अन्त में वैसा ही फल प्राप्त करता है।
चिन्तन और सद्विचारों को फैलाया जाय, उतना ही लाभ हो सकता है।
चिन्तन से बचना, मन के विपरित कार्य करना—ये अन्य साधन हैं जिनका पालन करने से आत्म विश्वास बढ़ता रहता है। नवरात्रि में नौ दिन का व्रत संयम का एक अच्छा साधन है। सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्वाद, अस्तेय, अपरिग्रह, अभय इन सप्त व्रतों के निरन्तर अभ्यास से दृढ़ता आती है।
चिन्तन की आदत डालनी चाहिए प्रतिपक्षी के गुणों का विचार करना चाहिए। आइए हम परमेश्वर के पवित्र तेज का ध्यान कर उससे ऐसी सत्प्रेरणा प्राप्त करें कि वह हमें ऐसी सुबुद्धि दे कि हम महात्मा तुलसीदास जैसी ही प्रार्थना करें कि हम दूसरों के गुणों को देखें, दोषों को नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-April
चिन्तन अर्थात् स्मरण, चिन्तन, ध्यान, स्वतः होने लगता है। अतः मन को शुद्ध करने के लिए प्राणी को सतत् प्रयत्नशील रहना चाहिये। इसमें हार स्वीकार करना भूल है, क्योंकि मन को शुद्ध करने के लिये प्रत्येक प्राणी सर्वदा स्वतंत्र है। परतंत्रता केवल उपभोग में है, उपार्जन में नहीं।
चिन्तन मिट जाता है। व्यर्थ चिन्तन मिटते ही सार्थक चिन्तन अर्थात् स्मरण, चिन्तन, ध्यान, स्वतः होने लगता है। अतः मन को शुद्ध करने के लिए प्राणी को सतत् प्रयत्नशील रहना चाहिये। इसमें हार स्वीकार करना भूल है, क्योंकि मन को शुद्ध करने के लिये प्रत्येक प्राणी सर्वदा स्वतंत्र है। परतंत्रता केवल उपभोग में है, उपार्जन में नहीं।
चिन्तन, ध्यान, स्वतः होने लगता है। अतः मन को शुद्ध करने के लिए प्राणी को सतत् प्रयत्नशील रहना चाहिये। इसमें हार स्वीकार करना भूल है, क्योंकि मन को शुद्ध करने के लिये प्रत्येक प्राणी सर्वदा स्वतंत्र है। परतंत्रता केवल उपभोग में है, उपार्जन में नहीं।
चिन्तन न करे।”
चिन्तन में हमें अभ्यस्त करता है, अतएव काम की मौलिकता उसके हेतु में ही है। विद्वान् पुरुष को चाहिये कि वह अपने जीवन के कार्यों का अन्तिम हेतु स्वार्थ साधन न बनावे। स्वार्थ साधन को अनन्त के प्राप्ति की सीढ़ी माने। मनुष्य का जीवन पानी के बुद-बुदे के समान है, पर उस बुदबुदे का आश्रय अनन्त जल है, हमें इस आश्रय को अपनी कल्पना से अलग न करना चाहिए। सब लोग इस प्रकार के कार्य नहीं करते, जो दूसरों का ध्यान आकर्षित कर सकें, पर सभी लोग ऐसे कार्य कर सकते हैं, जो उन्हें अनन्त से मिलादें, जिनसे उन्हें आत्म ज्ञान और आत्म शान्ति हो।
चिन्तन मिटते ही सार्थक चिन्तन अर्थात् स्मरण, चिन्तन, ध्यान, स्वतः होने लगता है। अतः मन को शुद्ध करने के लिए प्राणी को सतत् प्रयत्नशील रहना चाहिये। इसमें हार स्वीकार करना भूल है, क्योंकि मन को शुद्ध करने के लिये प्रत्येक प्राणी सर्वदा स्वतंत्र है। परतंत्रता केवल उपभोग में है, उपार्जन में नहीं।
चिन्तन से बच सको, तथा अहितकर कल्पनाओं से बच कर अपना जीवन दिव्य प्रबन्ध से सुव्यवस्थित कर सको। तुम्हें वही ग्रहण करना चाहिये जो शुभ हो। स्वास्थ्य, पवित्र भोजन, सात्त्विक वस्तुओं के भोजन पर निर्भर है। तुम जो भोजन करते हो, उसी के अनुसार तुम्हारी भावनाओं का निर्माण होता है। सात्त्विक वस्तुओं−गेहूँ, चावल, फल, तरकारियाँ, दूध, मेवे, इत्यादि पर बना हुआ स्वस्थ मनुष्य आत्म निर्माण सरलता से कर सकता है।
चिन्तन का अभ्यास डालना चाहिए। प्रतिपक्षी के गुणों का विचार करना चाहिये। चीनी कवि यू−उन−चान की कविता की कुछ पंक्ति यों का अनुवाद हमारे इस कथन का समर्थक है:—

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-December
चिन्तन कर चुका था। समस्त जीवन नहीं तो कम से कम मंत्राराधन के समय तो तपस्वी और इन्द्रिय निग्रही रहना आवश्यक ही है। इसके बिना वह शक्ति उत्पन्न नहीं होती तो अभीष्ट प्रयोजन की सफलता के लिये आवश्यक है।
चिन्तन करने वाले योगी या मन्दिर में पूजा करने वाले सच्चे पुजारी की भाँति अपने मनः क्षेत्र में यज्ञ भगवान की प्रतिष्ठा किए रहता है। निरन्तर नियमित रूप से उपासना की हुई अग्नि की सूक्ष्म आध्यात्मिक विशेषता दिन दिन उसी प्रकार बढ़ती रहती है जैसे पौष्टिक पदार्थों का सेवन करती हुई कलिका दिन-दिन विकसित होती हुई बलवान एवं परिपुष्ट युवती बनती जाती है उसी प्रकार यज्ञ कुँड में विराजमान अग्नि भी प्रतिदिन घी मेवा, मिष्टान्न हविष्यान्न तथा नाना प्रकार का गुणवान औषधियाँ खा-खा कर प्रचण्ड शक्ति सम्पन्न भवानी का साक्षात् आकार ही बन जाती है। उसके प्रभाव से अनेक अनिष्ट रोग, शोक, क्लेश, कलह, पाप, ताप, अनायास ही नष्ट होते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-March
चिन्तन करना चाहिए अर्थात् उन्हें अपने मानसिक संस्थान को कुछ न कुछ नई प्रवृत्ति, नई प्रेरणा, नया रुख देना चाहिए।
चिन्तन मात्र करता है, वह एकाँगी है, अपूर्ण है। मस्तिष्क नए ज्ञान को ग्रहण करे और फिर नव−निर्माण करे, नई वस्तु नए विचार अथवा योजना प्रदान करे।
चिन्तन से मस्तिष्क की शक्तियाँ बढ़ती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-March
चिन्तन और विचार विनिमय द्वारा शिक्षा प्राप्त की जायेगी। समय समय पर अन्य प्रतिष्ठित विद्वानों को बुलाकर भी भाषण कराये जायेंगे। प्रार्थना, वायुसेवन, व्यायाम, कथा, सत्संग, विचार विनिमय, नित्य के कार्य होंगे। ब्रज के तीर्थ स्थानों की एक यात्रा भी हुआ करेगी। वेदारंभ संस्कार के साथ शिक्षा आरंभ होगी और संभावर्तन संस्कार के साथ समाप्त होगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-January
चिन्तन करने से एक आवेश पैदा हो जाता और इस मानसिक आवेश का प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है तदनुसार मेज, प्लेनचिट तथा पेन्सिल की हरकतें होने लगती हैं। जो उत्तर प्राप्त होते हैं वे प्रयोग करने वालों के मस्तिष्क में उत्पन्न हुए होते हैं। जैसे ‘हाजरात’ में बालक को भंगी, भिस्ती, देवता दिखाई पड़ते हैं वैसे ही प्रेतात्माओं के आवेश में उत्तर लिखे जाते हैं। बाहरी रूपरेखा दो हैं पर सिद्धान्त एक ही है। प्रेतात्मा आवाहन विधि की कलई तब खुल जाती है भुलावे में डालने वाले, परीक्षा दृष्टि से प्रश्न पूछे जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-April
चिन्तन किया जाय तो निश्चय ही पेट साफ हो जायगा इसी प्रकार यदि उसकी उपेक्षा की जाय और समय को बिलकुल भुला दिया जाय तो अक्सर वह क्रिया निर्बल और शिथिल पड़ जाती हैं और उपरोक्त दोनों बातों में से जिसे भी कुछ काल तक निरंतर किया जाय वहीं स्वभाव में आ जाती हैं।
चिन्तन कर करके दुखी होते रहते हैं उनके शरीर में कोष उसी साँचे में ढल जाते हैं। यदि तुम अपने शरीर और मन में अच्छी उपयोगी आदतें उत्पन्न करना चाहते हो तो उचित हैं कि बार बार अपने मन में स्वास्थ्य और आनन्द के विचार करो। अपने को समर्थ समझो और उच्च सत्ता-परमात्मा से प्रेम करके उसके उच्च गुणों को आकर्षित करके अपने अन्दर धारण करो। ऐसा करने से गुप्त मन शरीर और मस्तिष्क में सद्गुण उत्पन्न करेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-May
चिन्तन करना हैं। और सत्संग का अर्थ-(1) श्रेष्ठ पुरुषों के विचारों को ग्रहण करना, (2) अच्छे विचार दूसरों को देना (3) सेवा या श्रेष्ठ कर्मों में सहयोग करना हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-December
चिन्तन अथवा कर्म द्वारा बुरा चाहते हैं तो उसका वैसा ही चित्र नभ मण्डल पर तैयार हो जाता है जो समय पाकर हमारे बैरी शत्रु के रूप में प्रगट होकर हमें हानि पहुँचा जाता है। इसी प्रकार जब हम किसी का मन-वाणी कर्म द्वारा हित चाहते और करते हैं तो इस प्रकार की प्रति इच्छाएँ और क्रियाएँ इसी गुप्त चित्र द्वारा तैयार होकर हमारे मित्रों, शुभ-चिन्तकों-सहायकों के रूप में प्रगट होकर हमारा भला कर जाते हैं। शास्त्रों में इसीलिये यह उपदेश लिखा गया है-कि सदैव भला सोचो भला करो, धर्म को ग्रहण करो अधर्म को त्यागो। क्योंकि शुभ-चिन्तन कर्त्ता की उन्नति और अशुभ चिन्तन उसकी अधोगति का कारण होते हैं।
चिन्तन उसकी अधोगति का कारण होते हैं।
चिन्तन कर्त्ता की उन्नति और अशुभ चिन्तन उसकी अधोगति का कारण होते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-September
चिन्तन, नरनारायण की सेवा की असाधारण लगन आदि तपश्चर्याओं के कारण इसने अपना माँस सुखा डाला है। इस कृश काया में कोई खास सुन्दरता नहीं है फिर भी क्षणभर गंभीरतापूर्वक इसके चेहरे को देखने से प्रतीत होता है कि यह तेज का पुँज है, विद्या, अनुभव और ज्ञान की प्रौढ़ता इसके नेत्रों में से फूटी पड़ती है। बालक सा सरल, पुष्प सा पवित्र, धेनु सा उपकारी, स्नेह, दया शान्ति और निष्कपटता की मूर्ति यह सच्चा ब्राह्मण अपने ढंग का अनोखा व्यक्ति हमने अपने जीवन में देखा। इसका नाम है-आचार्य श्री राम शर्मा। साधारण आचार्य जी कहकर इनको सब लोग सम्बोधन करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-November
चिन्तन होना असम्भव है। हमें यह अनुभव कभी नहीं हो सकता कि हमारा चित्त निराकार में लीन हो गया हो, क्योंकि जड़ विषय और गुणों की मिश्र अवस्था के देखने का हमें अभ्यास हो गया है गुणों के बिना जड़ विषय और जड़ विषयों के बिना गुणों का चिन्तन नहीं किया जा सकता, इसी तत्व के अनुसार हिन्दुओं ने गुणों का मूर्ति रूप दृश्य स्वरूप बनाया है। मूर्तियां ईश्वर के गुणों का स्मरण कराने वाले चिन्ह मात्र है। चित्त चंचल न होकर सद्गुणों की मूर्ति ईश्वर में तल्लीनता होने के हेतु मूर्तियाँ बनाई गई हैं। हरएक हिंदू जानता है कि पत्थर की मूर्ति ईश्वर नहीं है।
चिन्तन तो करो, देखो तुम्हें कैसी शीतलता और शाँति प्राप्ति हुई मालूम होती है।
चिन्तन स्मरण भी कर सकता है यदि मनुष्य चाहे तो। परन्तु मनुष्य करना खुद नहीं चाहता है और बहाने ढूंढ़ता है कि कोई अच्छा गुरु नहीं मिलता।
चिन्तन नहीं किया जा सकता, इसी तत्व के अनुसार हिन्दुओं ने गुणों का मूर्ति रूप दृश्य स्वरूप बनाया है। मूर्तियां ईश्वर के गुणों का स्मरण कराने वाले चिन्ह मात्र है। चित्त चंचल न होकर सद्गुणों की मूर्ति ईश्वर में तल्लीनता होने के हेतु मूर्तियाँ बनाई गई हैं। हरएक हिंदू जानता है कि पत्थर की मूर्ति ईश्वर नहीं है। इसी से वे पेड़, पत्ती, आग, जल, पत्थर आदि सभी दृश्य वस्तुओं की पूजा करते हैं।
चिन्तन में डूबा हुआ था उसके मस्तिष्क के पास यन्त्र को रख कर फोटो लिया गया तो उसी सुन्दरी की तस्वीर खिंच गई। इसी प्रकार क्रोध, क्षोभ शान्ति, प्रेम, विरह, खुशी, निराशादि भावनाओं के फोटो खिंचने लगें हैं इस यन्त्र की सहायता से जाना कर सकता है कि अमुक व्यक्ति क्या सोच रहा है।
चिन्तन कैसे किया जाय? जो विलास स्वरूप हो जिसकी संज्ञा (Noun) हो तो उसके चिन्तन को भी किया जा सकता है।
चिन्तन को भी किया जा सकता है।
चिन्तन स्मरण बार एक दिन मृत्यु भीषण रूप देखा नहीं और यह भी रूप में हमारे सामने आ उपस्थित होती है और हमें इच्छा न रहते हुए भी मजबूर होकर एक सिटपिटाई हुई हालत में अपने मित्रों और सम्बन्धियों से विदा माँगनी पड़ती है, न इस जीने में ही सुख है और न मृत्यु में ही ............अब प्रश्न केवल इतना है कि क्या हम किसी उपाय से अपने जीवन को बना सकते हैं?
चिन्तन भी उसके चरित्रों द्वारा हो सकता है, यदि मनुष्य चाहे तो।
चिन्तन स्मरण बार-बार करते हैं। कहते हैं इनका रूप देखा नहीं और यह भी कहते हैं मेरा मन भजन, इष्टदेव में नहीं लगता, स्थिर नहीं होता, हमारी बुद्धि में यह बात नहीं आती, इसी तरह उस अव्यक्त व ध्यान और चिन्तन भी उसके चरित्रों द्वारा हो सकता है, यदि मनुष्य चाहे तो।
चिन्तन नहीं कर सकता। मस्जिद, चर्च, क्रूस, अग्नि, आकाश, समुद्र, आदि दृश्य पदार्थ हैं। हिंदुओं ने उनके स्थान में मूर्ति की कल्पना की तो क्या बेजा किया? निराकार की स्तुति करने वाले लोग मूर्तियाँ पूजकों को घृणा की दृष्टि से देखते हैं, परन्तु उन्हें इस कल्पना की गन्ध तक नहीं है कि मनुष्य ईश्वर हो सकता है। वे बेचारे चार दीवालों की कोठारी में बंद हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-May
चिन्तन में लगाये रहता है वही परम पद को पाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-February
चिन्तन करना चाहिए। यदि आप किसी दफ्तर में क्लर्क हैं तो क्या जरूरत है कि आप अपना काम हर्ज करके रेलवे कम्पनी के हानि लाभों की समालोचना करें। आपकी उन्नति का मार्ग तो यही हो सकता है कि जिस कार्य में लगे हुए हैं उसकी और उससे सम्बन्धित अन्य बातों की जानकारी प्राप्त करें एवं दूसरों के मुकाबले में अपने को अधिक उपयोगी सिद्ध करें।
चिन्तन में इतना लीन रहता है, सोते समय न जाने कहाँ कहाँ घूम आता है, गहन समस्याओं के हल करने में शरीर की सुध- बुध भूल जाता है, अभ्यास द्वारा शरीर की स्वाभाविक क्रियाओं में आश्चर्य जनक घट- बढ़ कर लेता है क्या वह शारीरिक क्रियाओं की स्फुरण मात्र है? मैस्मरेजम, योगशास्त्र, तन्त्र विज्ञान द्वारा जो अद्भुत चमत्कार देखने में आते हैं, भूत प्रेतों के कभी- कभी दर्शन होते हैं, कुछ लोग अपने पूर्व जन्म की कथा सप्रमाण बताते हैं, किन्हीं- किन्हीं बालकों में जन्म जात अद्भुत प्रतिभा होती है यह बातें क्या जीव के अभाव में भी हो सकती हैं? हमारा अन्तःकरण इसे स्वीकार नहीं करता। पूर्वजों के स्मारक बनाने, उनकी कीर्ति को अमर रखने, मृतक के साथ सहानुभूति प्रकट करने की प्रथा बुद्धि विरुद्ध नहीं है। अनादि काल से मनुष्य जीव का अस्तित्व मानता आ रहा है, उसका खण्डन केवल यह कहकर नहीं किया जा सकता है कि वैज्ञानिक यन्त्र से अभी सिद्ध नहीं कर पाये हैं।
चिन्तन कीजिए कि खींचे हुए तत्व मेरे अंग प्रत्यंग में व्याप्त हो रहे हैं। वायु निकालते समय कल्पना कीजिए कि अपने अंदर के तमाम शारीरिक और मानसिक कषायों को बाहर फेंक रहा हूँ। हवा को बाहर रोकते समय सोचिये मेरे सब विकार बाहर चले गये हैं और मैंने अपने अन्दर का दरवाजा बन्द करके उनका फिर से भीतर प्रवेश कर सकना असंभव कर दिया है। इस प्रकार की सुदृढ़ भावना किसी भी मन्त्र से कम उपयोगी साबित नहीं होती। मन्त्र या भावना का जप मन ही मन होना चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-January
चिन्तन और कर्तृत्व बढ़ता ही नहीं। ऐसी दशा में अन्तःकरण को पोषण मिल ही नहीं पाता और वह भूख-प्यास से संत्रस्त मृत प्रायः स्थिति में ही पड़ा रहता है। शरीर की बुद्धि की-सम्पति की सत्ता की दृष्टि से कितने ही व्यक्ति बहुत बढ़े-चढ़े एवं सफल श्रेयाधिकारी पाये जाते हैं। भावना की दृष्टि से जिनमें अभीष्ट कोमलता जीवन्त रह रही हो ऐसे कोई विरले ही दीखते हैं। यंत्रवत जीवन जीने वालों को इसकी कुछ आवश्यकता प्रतीत नहीं होती ।
चिन्तन और कर्तृत्व की प्रतिक्रिया मात्र है । उत्थान और पतन की अन्तःस्थिति का प्रतिबिम्ब मात्र कहना चाहिए । विक्षोभ और उल्लास का तात्विक विवेचन किया जाय तो उन्हें चेतना के श्वासोच्छास भर कह सकते हैं और आन्तरिक स्तर में हेरफेर सम्भव हो सके तो परिस्थितियों के बदलने में एक क्षण भर की भी देर नहीं लगती। इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं कि मनुष्य की अन्तःनिष्ठा एवं आकांक्षा प्रवाह में परिवर्तन हुआ तो वाह्य जीवन का सारा ढाँचा ही उलट गया। भीतरी परिवर्तन का वाह्य जीवन पर परिवर्तन प्रभाव देखने को न मिले ऐसा हो ही नहीं सकता आज का दुखी कल सुखी बन सकता है आज का पतित कल प्रातः स्मरणीय और अभिवंदनीय बन सकता है, आज का उलझन भरा व्यक्ति कल समुन्नत और सन्तोष जनक स्थिति का आनन्द ले सकता है।
चिन्तन करता है।
चिन्तन करें मैं उसको बतला दूँगा। हमें मालूम था कि वे संस्कृत अरबी जर्मन आदि भाषाएं नहीं जानते। इसलिए हम लोगों ने प्रथम संस्कृत अरबी और जर्मन भाषा के वाक्य मन में लिये। कुछ देर इधर उधर की बातें होने के बाद उन्होंने कहा कि घंटे भर पहले जो कागज के टुकड़े मैंने आप लोगों को दिये थे उन्हें जेबों से निकाल कर पढ़िये। हमने निकाल कर पढ़ा तो अक्षरशः वही वाक्य लिखे मिले जो हमने मन में सोचे थे।
चिन्तन को हृदयङ्गम और आदर्श कर्तृत्व को क्रियान्वित करने के लिए आन्तरिक और वाह्य अवरोधों को तोड़ता हुआ कटिबद्ध हो सके। उपासना के अनेकों विधि विधान प्रचलित हैं पर उनका एक मात्र उद्देश्य यही है। कर्मकाण्डों, साधना उपक्रमों की बाल पोथी के साथ भावनात्मक उत्कर्ष की उचस्तरीय शिक्षा व्यवस्था की जाती है। सीड़ियों के सहारे ऊपर चढ़ते हैं केवल मुंगदरों के सहारे पहलवान बनते हैं पुस्तकों के सहारे विद्या प्राप्त करते हैं ठीक इसी प्रकार साधना विधानों के सहारे भावनात्मक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा किया जाता है। जिन साधनाओं में भावोत्कर्ष का तथ्य अछुता छोड़ दिया जाता है और शारीरिक क्रिया कलाप अथवा वस्तुओं का हेरफेर भर जुड़ा रहता है वे प्रायः बाल क्रीड़ा बन कर ही रह जाती हैं उनसे कोई महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
चिन्तन की जरूरत ही क्या? ईश्वर के विषय में उक्त धारणाएं रख कर हम समय समय पर विरोधियों के सिर तोड़ने को तैयार हो जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-December
चिन्तन करना चाहिये और अपनी मृत्यु को भूलना न चाहिये।
चिन्तन करते हुए सोना उचित है।
चिन्तन में लगे रहने वाले व्यक्ति एक प्रकार के शेखचिल्ली हैं। बुद्धिमान वह है जो भूत के अनुभव और भविष्य की आज्ञा के आधार पर वर्तमान का निर्माण करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-August
चिन्तन करता है, वह पाखण्डी कहा जाता है। इस प्रकार के पाखण्ड से कोई भी लाभ नहीं है। इस बाह्य त्याग के द्वारा कोई भी नैष्कर्म्यावस्था को नहीं पाता।
चिन्तन और अन्वेषण के पश्चात जाना था कि दुनिया में सबसे बड़ा काम जो मनुष्य के करने का है वह यह है कि अपनी आत्मा का उद्धार करे। मूर्ख इसे नहीं जानते। वे पत्ते-पत्ते को सींचते फिरते हैं फिर भी पेड़ मुरझाता ही चला जाता है। संसार की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक शारीरिक सभी प्रकार की समस्यायें इसी एक बात पर निर्भर हैं कि आदमी ईमानदार बने, सदाचारी हो, आत्म कल्याण करे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-April
चिन्तन करो, नकलों पर मत ललचाओं, असल को खोजो। अपने अन्तर में मुँह डालो, अंतर्मुखी होओ, देखो कि अब तक कितना खो चुके हो, बहुत घाटा हुआ, पाया कुछ नहीं। व्यापार में बड़ी हानि हुई, अब इस घाटे को पूरा करने में लगो। हिसाब लगाओं कि कितनी पूँजी शेष रह गई है। इसे किस प्रकार चोरों से बचावें।
चिन्तन करें, मनन करें। जो उपदेश पढ़ते और सुनते हैं उन्हें ग्रहण कर रहे हैं या नहीं, इस बात का भली प्रकार परीक्षण करें। यदि अब तक भूल में रहे हैं तो आगें के लिए सचेत हो जावें यह आदर्श हर क्षण अपने सामने रहे- ‘‘कुछ पढ़ो, कुछ गुनो।’’
चिन्तन करना चाहिये और अपनी मृत्यु को भूलना न चाहिये।
चिन्तन करते हुये सोना उचित है।
चिन्तन छोड़ रखते।
चिन्तन और निस्वार्थ भावनाऐं होनी चाहिए। दूसरों को अपना समझकर उनके हित का ध्यान रखते हुए उदारता पूर्वक जो बर्ताव किया जाता है वही उत्तम व्यवहार है। यदि आप दूसरों को अपना बनाना चाहते हैं, दूसरों से ऐसा व्यवहार कराना चाहते हैं जिसे आप अपने लिए पसन्द करें तो स्मरण रखिये, आपको यह कला सीखनी पड़ेगी कि दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करें? यह व्यवहार केवल भलमनसाहत का बर्ताव हो सकता है। भले बनिये भलमनसाहत का बर्ताव कीजिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-March
चिन्तन करते रहते हैं। अशक्ति हानि की दशा में अपने विरोधियों को मानसिक कष्ट पहुँचाते हैं। क्योंकि सूक्ष्म शरीर की गति सूक्ष्म शरीर तक ही है। अक्सर देखा गया है कि हत्यारों के मन सदा उद्विग्न बने रहे हैं उन्हें दुःस्वप्न आते हैं और सोते सोते चौंक पड़ते हैं। क्रोध और आशंका हर क्षण चित्त पर चढ़ी रहती है।
चिन्तन करना, लोक परलोक कुछ नहीं सब डकोसिला है, ऐसा मन में निश्चय करना, ये तीन प्रकार के मानसिक पाप हैं॥ 5॥
चिन्तनम् ।
चिन्तन करें कि जिसकी यह छाया है उस अखण्ड आनन्द को मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरी युग-युग की प्यास कैसे बुझ सकती है? इस अँधेरे में कहाँ से प्रकाश पा सकता हूँ जिससे अपना स्वरूप और लक्ष्य की ओर बढ़ने का मार्ग भली प्रकार देख सकूँ ? सच्चे अमृत को मैं कैसे और कहाँ से प्राप्त कर सकता हूँ ?
चिन्तन करते ही नसों एक बिजली सी दौड़ जाती है। आदमी युगों से आनन्द की खोज कर रहा है उसका अन्तिम लक्ष्य ही अखण्ड आनन्द है। यह राजहंस मोतियों की तलाश में जगह-जगह भटकता फिरता है। विभिन्न प्रकार के पत्तों पर पड़ी हुई ओस की बूँदें उसे मोती दीखती हैं, उन्हें लेने के लिए बड़े प्रयत्न के साथ वहाँ तक पहुँचता है, पर चोंच खोलते ही यह गिर पड़ती हैं और राजहंस अतृप्त का अतृप्त ही बना रहता है। एक पौधे को छोड़ कर दूसरे पर दूसरे को छोड़ कर तीसरे पर और तीसरे को छोड़ कर चौथे पर जाता है पर संतोष कहीं नहीं मिलता।
चिन्तन करने वाले और आध्यात्म पथ पर अग्रसर होने वालों के लिए तो प्राणायाम मानो राजमार्ग ही है। चित्त का निग्रह मन की निरोधता प्राणायाम बिना होना कठिन है। षट् चक्रों का बेधन और कुण्डलिनी जागरण का आरंभ प्राणायाम सिद्ध के बाद होता है। धारणा और ध्यान की अवस्थिति का ठीक प्रकार से होना भी इसी साधन की सहायता पर अवलंबित होता है।
चिन्तन नहीं किया। अखण्ड ब्रह्मचारी पुरुषों का भी अभाव नहीं है। यहाँ यह स्पष्ट हो जाता है कि एक सी शारीरिक शक्ति रखने वाले दो व्यक्तियों में से एक संयमी और दूसरा असंयमी है तो उसका कारण दोनों की मत विभिन्नता ही है। मन स्वतंत्र रूप से कुछ नहीं कर सकता। हम जहाँ चाहते हैं उसे फेंकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-October
चिन्तन करोगे तो उसे प्राप्त कर लोगे। परन्तु इसे भौतिक कार्यों में ही अपना हृदय दे डालोगे तो तुम्हारी सफलता केवल कुछ समय के लिये होगी। अच्छी तरह याद रक्खो कि आत्मा की आज्ञा का पालन करना भी आवश्यक है। जब तक आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार की बातों में समान उन्नति न हो लौकिक आनन्द भी प्राप्त नहीं हो सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-January
चिन्तन और कर्म क्षेत्र में सुविकसित स्तर का देव मानव ही दृष्टिगोचर होता है।
चिन्तन परक उपासनाएं की जाती हैं। कारण शरीर से केवल भावना की पहुँच है। निष्ठा, आस्था, श्रद्धा का भाव भरा समन्वय ‘भक्ति’ कहलाता है। प्रेम संवेदना इसी को कहते हैं। यह स्थिति तर्क से ऊपर है।
चिन्तन के लिए दी जा सके तो उस परिष्कृत मनोभूमि से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, चिन्ता, निराशा, भय आदि का कोई कुविचार, मनोविकार पनप न सकेगा। सृजनात्मक शुभ चिन्तन के विचारों से मन को भरा पूरा रखने के लिए स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन का आश्रय लेकर मनोभूमि ऐसी प्रौढ़, परिपक्व बनाई जा सकती है जिसमें कुविचारों को पैर जमाने के लिए तनिक भी गुंजाइश न रहे।
चिन्तन और कर्तृत्व की रीति−नीति भी लक्ष्य के अनुरूप ही ढालनी पड़ेगी।
चिन्तन प्रवाह को दिशा विशेष में नियोजित रखा जाता है और सात्विक जीवन के नियमोपनियमों का तत्परता पूर्वक पालन किया जात है। इन सबका मिला-जुला परिणाम व्यक्तित्व पर चढ़ी हुई दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण करने तथा सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बनाने में सहायक सिद्ध होता है। सुसंस्कारों का अभिवर्धन प्रत्यक्षतः दैवी वरदान है। उसके मूल्य पर हर व्यक्ति अभीष्ट प्रयोजन की दिशा में अग्रसर को सकता है और उत्साहवर्धक सत्परिणाम प्राप्त कर सकता है।
चिन्तन जैसी प्रक्रियाओं का सहारा इसी प्रयोजन के लिए लिया जाता है।
चिन्तन भी मानसिक व्यभिचार माना गया है और उससे होने वाली हानि को आत्मिक प्रगति के मार्ग में भारी व्यवधान माना गया है। मन को कामुक चिन्तन से बचाने के लिए उसके प्रति−पक्षी पवित्र भावों को अधिक समय तक मन में स्थान देना चाहिए। जितनी देर अशुद्ध चिन्तन के लिए मस्तिष्क को छूट दी जाती है, उतनी ही सुविधा यदि परिष्कृत चिन्तन के लिए दी जा सके तो उस परिष्कृत मनोभूमि से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, चिन्ता, निराशा, भय आदि का कोई कुविचार, मनोविकार पनप न सकेगा। सृजनात्मक शुभ चिन्तन के विचारों से मन को भरा पूरा रखने के लिए स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन का आश्रय लेकर मनोभूमि ऐसी प्रौढ़, परिपक्व बनाई जा सकती है जिसमें कुविचारों को पैर जमाने के लिए तनिक भी गुंजाइश न रहे।
चिन्तन कथन और क्रिया−कलाप आरम्भ हुआ उसने अन्यान्य कितनी ही नई समस्याएँ उत्पन्न करके रख दीं। कई बार तो उद्विग्नता शारीरिक, मानसिक अस्वस्थता उत्पन्न करने में भी आगे बढ़ जाती है और आत्म−हत्या अथवा दूसरों की हत्या कर डालने जैसे संकट उत्पन्न करती है।
चिन्तन को उत्कृष्ट और कर्तृत्व को आदर्श बनाया जाता है। यह जमीन को जोतकर खाद, पानी लगाकर उर्वर बना लेने की तरह है। ऐसी ही परिष्कृत मनोभूमि पर उपासना का बीजारोपण किया जाता है। तभी बोई हुई फसल लहलहाती है। ऐसी ही उर्वरा भूमि पर लगाया गया उद्यान फलता−फूलता देखा जाता है।
चिन्तन प्रवाह से हटाकर अमुक दिशा में नियोजित करने की प्रक्रिया ही ध्यान कहलाती है। इसका प्रारम्भ भटकाव के स्वेच्छाचार से मन को हटाकर एक नियम निर्धारित दिशा में लगाने के अभ्यास से आरंभ होता है। इष्टदेव पर अथवा अमुक स्थिति पर मन को नियोजित कर देने का अभ्यास ही तो ध्यान में करना पड़ता है। मन पर अंकुश पाने—उसका प्रवाह रोकने में—सफलता प्राप्त कर लेना ही ध्यान की सफलता है। यह स्थिति आने पर कामुकता शोक संतप्तता, क्रोधान्धता, आतुरता ललक, लिप्सा जैसे आवेशों पर काबू पाया जा सकता है।
चिन्तन को हटाकर यों सोचना चाहिए कि ‘चित्त निरोध’ नहीं ‘चित्तवृत्तियों का निरोध’ आवश्यक है। एकाग्रता नहीं ‘एक दिशा’ अभीष्ट है। यदि ऐसा बन पड़े तो समझना चाहिए कि योग साधना की सही पृष्ठभूमि बन चली।
चिन्तनात्मक काया-कल्प हो गया। आरम्भ में ऐसे लोगों को मखौल बनता और विरोध होता है, पर जब वे अपनी निष्ठा का परिचय देते हैं तब दुनिया उनके चरणों में झुक जाती है और सिर आँखों पर बिठाकर भाव भरी श्रद्धाँजलि समर्पित करती है।
चिन्तन क्षेत्र को प्रभावित करने वाले समस्त ज्ञान विस्तार को सम्मिलित किया गया है। वेद शास्त्र, उपनिषद्, दर्शन, नीतिशास्त्र आदि इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए रचे गये हैं। पाठ, स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन का- कथा प्रवचनों का- माहात्म्य इसी आधार पर बताया गया है कि उस प्रक्रिया के सहारे मानवी चिन्तन का परिष्कार होता रहे। अवांछनीय पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कार छुड़ाने में, यह ज्ञान साधना साबुन का काम करती है। विकृत मनोवृत्तियों से छुटकारा मिलता है और विवेक युक्त दूर दर्शिता का पथ-प्रशस्त होता है।
चिन्तन चलते रहने से अवसर आने पर वे अड़चनें अप्रत्याशित नहीं लगतीं और सोचा जाता है यह तो होना ही था, इसकी तैयारी तो पूर्वाभ्यास के रूप में देर से की जाती रही है।
चिन्तन हवा में उड़ते रहने वाले तिनकों की तरह है और एकाग्रतापूर्वक चिन्तन को केन्द्रीभूत करके किसी विशेष प्रयोजन में लगा देना ऐसे शब्दबेधी बाण की तरह है जिसका सुनिश्चित परिणाम होकर ही रहता है।
चिन्तन से कर्म और कर्म से पदार्थ उत्पन्न होता है। इस तथ्य को जीवन के हर क्षेत्र में नित्य ही प्रयुक्त होते देखा जा सकता है। धन का लाभ सोचकर उसे कमाने की आकाँक्षा उठती है मस्तिष्क उसके लिए व्यवसाय ढूँढ़ता है, शरीर उसके लिए श्रम करता है, फलतः विभिन्न पदार्थों का उत्पादन एवं विनिमय आरम्भ हो जाता है। इसी तथ्य ने सृष्टि के आदि में ब्राह्मी चेतना में हलचल उत्पन्न की। इसे एक से बहुत बनकर क्रीड़ा−कल्लोल करने की इच्छा उत्पन्न हुई।
चिन्तन और लोक प्रवाह में भारी अन्तर रहता है। इस रस्साकशी कुसंस्कारी चित्तवृत्तियां योगवाद का ही समर्थन करती हैं। इस प्रवाह को आत्मिक साहस के बल पर उलटने का नाम ‘चित्तवृत्ति निरोध’ है। यही योगी का प्रबल पुरुषार्थ माना जाता है।
चिन्तन में असमर्थ—स्थूल भूमिका की मनःस्थिति के लिए यही कृत्य सरल पड़ता है और चेतना का स्तर आगे बढ़ाने में सहायता करता है। प्रतीक उपासना का सारा ढाँचा इसी प्रयोजन के लिए विनिर्मित हुआ समझा जाना चाहिए।
चिन्तन से—स्वेच्छाचार से रोककर उसे अरुचिकर होते हुए भी अमुक ‘चिन्तन में बलपूर्वक लगाने के लिए कड़ाई बरतने का नाम ही तो ध्यानयोग है। इस दिशा में न्यूनाधिक जितनी सफलता मिलती चलेगी उतना ही भौतिक एवं आत्मिक प्रगति का द्वार खुलता जायगा।
चिन्तन मनन द्वारा आन्तरिक उत्कृष्टता को उभार कर उच्चस्तरीय निष्ठाओं पर आरूढ़ हुआ जाता है। दर्शन शास्त्र इसी काट छांट के लिए बना है। तत्वदर्शन के अन्तर्गत यों अन्य कई विषय भी आते हैं, पर उसका मूल प्रयोजन विचारणा का स्तर परिष्कृत करना ही माना गया है।
चिन्तन को उभारना भी जीवन को दिशा देने की दृष्टि से आवश्यक है। यथा समय इन सभी प्रयोजनों के समन्वय की आवश्यकता पड़ी है और यदि वह सब उद्देश्यपूर्ण रीति से किया गया हो तो समुचित लाभ भी मिलता है।
चिन्तन की उत्कृष्टता एवं कर्तृत्व की आदर्शवादिता के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। उनकी उपेक्षा करके मात्र कर्मकाण्डों के सहारे कोई बड़ी सफलता हाथ नहीं लग सकती। व्यक्तित्व को अमुक विधि-विधानों के सहारे ऊँचा उठाने की शिक्षा की किंडरगार्डन शिक्षण में प्रयुक्त होने वाले मनोरंजन उपकरणों से तुलना की जा सकती है, जो बच्चे के अविकसित मस्तिष्क में अमुक जानकारी को ठीक तरह जमाने में सहायता करती है। पहलवानी में सफलता पाने वाले डंबल, मुद्गर आदि उपकरणों का सहारा लेकर अपनी बल की वृद्धि करते हैं। ऊँचा चढ़ने के लिए लाठी की और जल्दी पहुँचने के लिए वाहन की जरूरत पड़ती है।
चिन्तन करते रहा जाय, मनुष्य की सत्ता उसी ढाँचे में ढलने लगती है। रूप, यौवन पर ध्यान केन्द्रित रखने से वेश्याएँ ढलती आयु में भी सुन्दर बनी रहती हैं और विपत्ति एवं मृत्यु की बात सोचने वाले लोग भरी जवानी में बूढ़े होते और मौत के मुँह में घुसते देखे गये हैं। यह सब इच्छा या अनिच्छा से किसी केन्द्र बिन्दु पर अपने चिन्तन को केन्द्रित करने का परिणाम है।
चिन्तन तन्त्र को व्यवस्थित किया, अभ्यस्त विचार-पद्धति का नये सिरे से पर्यवेक्षण किया, अनौचित्य को साहसपूर्वक सुधारा और विवेक का आश्रय लेकर विचारणा को उच्चस्तरीय बनाया। लोक-प्रवाह के विपरीत आदर्शवादी मौलिकता अपनाई, फलस्वरूप उनका चिन्तनात्मक काया-कल्प हो गया। आरम्भ में ऐसे लोगों को मखौल बनता और विरोध होता है, पर जब वे अपनी निष्ठा का परिचय देते हैं तब दुनिया उनके चरणों में झुक जाती है और सिर आँखों पर बिठाकर भाव भरी श्रद्धाँजलि समर्पित करती है।
चिन्तन उनके लिए सम्भव नहीं होता। अस्तु उन्हें उनकी स्थिति के अनुरूप दृश्य प्रतिमाओं के आधार पर परमात्मा की समीपता का उपासना उद्देश्य पूरा कराना होता है।
चिन्तन और कर्तृत्व का ढाँचा विवेक के सहारे खड़ा करना पड़ता है। यह लगभग लोक प्रचलन में बहुत करके विपरीत ही बैठता है। लोग उसे मूर्ख कहते हैं और वह लोगों को मूर्ख समझता है। स्वतंत्र चिन्तन और लोक प्रवाह में भारी अन्तर रहता है। इस रस्साकशी कुसंस्कारी चित्तवृत्तियां योगवाद का ही समर्थन करती हैं।
चिन्तन की उत्कृष्टता के कारण स्वयं हर घड़ी सदा सन्तुष्ट, उल्लसित एवं प्रफुल्लित बना रहता है। अवाँछनीय मानसिक भार से छुटकारा पाने के कारण उसकी सूझ-बूझ, दूरदर्शी तत्त्वदर्शी बन जाती है और उसका लाभ न केवल सम्पर्क क्षेत्र को वरन् समस्त संसार को मिलता है।
चिन्तन विकृतियों की, पराधीनता है जिसके कारण हर दृष्टि से ‘अद्भुत’ विचारणा सर्वनाश के गर्त में गिरती और नष्ट होती रहती है।
चिन्तन तथा अकर्म करने में निरत रहता है। आदर्शों को अपनाने के लिए न उसकी उत्कंठा जगती है और न चेष्टा होती है। सड़ी कीचड़ में कुलबुलाते रहने वाले घिनौने कीड़ों की तरह उसे कुत्साओं और कुण्ठाओं की शोक संतापों की प्रताड़नाएँ सहन करते हुए सुर−दुर्लभ अवसर को रोते कलपते गंवाना पड़ता है। इस अंधकार में भटकने से त्राण पाने के लिए आत्मा प्रकाश को पुकारती है। यह प्रकाश भगवान ही हो सकता है।
चिन्तन को सूक्ष्म और क्रिया को स्थूल कहा जा सकता है। इस युग्म समन्वय से ही यौगिकों, रासायनिक पदार्थों, तत्वों एवं निर्जीव अणुओं से बने पदार्थों की शोभा-सुषमा दृष्टिगोचर होती। भौतिकी अत्यन्त कुरूप, कर्कश और निष्ठुर है, उसे जीवन्त बनाने का भार तो कला ही वहन करती है।
चिन्तन किया जाय, उस पक्ष के समर्थन वाले तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरणों को पर्याप्त मात्रा में स्वाध्याय, मनन आदि की सहायता से संग्रह किया जाय। उन पर बार−बार गहराई से विचार किया जाय। कामुकता तथा शालीनता के दोनों पक्षों को अपनी−अपनी बात के समर्थन का अवसर देकर यदि विवेक द्वारा निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह फैसला करने का अवसर दिया जाय तो पुराने अवाँछनीय चिन्तन अभ्यास को आसानी से काटा जा सकता है। शारीरिक दुष्प्रवृत्तियों के संबंध में भी यही बात है। नशा, व्यसन, आलस्य जैसे दुर्गुणों से निपटना, कठोर संकल्प एवं दृढ़ निश्चय से ही सम्भव हो सकता है।
चिन्तन परक होता है। योगीजन इन्हीं प्रयत्नों में तल्लीन रहते हैं और अपने संग्रहीत कुसंस्कारों को उच्चस्तरीय आस्थाओं में परिणत करने के लिए भावनात्मक पुरुषार्थ करते रहते हैं। निष्कृष्टता जितने अंश में उत्कृष्टता के साथ जुड़ जाती है उतने ही अंशों में आत्मा को परमात्मा की प्राप्ति हो चली; ऐसा माना जाता है।
चिन्तन में बलपूर्वक लगाने के लिए कड़ाई बरतने का नाम ही तो ध्यानयोग है। इस दिशा में न्यूनाधिक जितनी सफलता मिलती चलेगी उतना ही भौतिक एवं आत्मिक प्रगति का द्वार खुलता जायगा।
चिन्तन एवं जीवन यापन पद्धति में आकाश पाताल जैसा अंतर है। फिर अन्य लोकवासी चैतन्य प्राणियों की रीति−नीति के बारे में तो कहा ही क्या जा सकता है? समूचा ब्रह्म न तो हमारी समझ में भी आ सकता है और न उसे समझने की आवश्यकता है। मानवी चेतना के साथ ब्रह्म चेतना का जितना अंश संबंधित है उस भाग को ईश्वर या परमेश्वर कहते हैं। हमारे आनन्द एवं उत्थान में उसी की भूमिका रहती है।
चिन्तन हलचलों में बदला, कर्म का गठन हुआ और उस सूक्ष्म कर्म ने स्थूल पदार्थ का रूप धारण कर लिया।
चिन्तन एवं कर्तृत्व की श्रेष्ठता बनाये रहने वाली आस्था ही भाव निष्ठा है। प्रपंच, प्रलोभनों के आकर्षणों में व्यस्त निरर्थक अनर्थ भरा पतनोन्मुख जीवन जीने वाले लोग आत्मबल सम्पादित नहीं कर पाते। आकाँक्षाओं का स्तर ऊँचा रहना ही भाव शुद्धि है। यह तथ्य सदा स्मरण बना रहे इसीलिए तीसरा आचमन किया जाता है।
चिन्तन के फलस्वरूप मानसिक विकृति घड़ी−घड़ी उत्पन्न होती रहती है। काम सेवन से जिस प्रकार शारीरिक शक्ति घटती है उसी प्रकार काम चिन्तन से मनोबल एवं आत्मबल घटता है इससे आत्म−शक्ति में कमी पड़ती जाती है। ऐसी दुर्बल मनःस्थिति में वे आधार नहीं बन पाते जिनसे आत्मोत्कर्ष की दिशा में आशाजनक प्रगति संभव होती है। पुरुषों को नारियों के प्रति और नारियों को पुरुषों के प्रति पवित्र दृष्टि रखनी चाहिए। कामुक चिन्तन भी मानसिक व्यभिचार माना गया है और उससे होने वाली हानि को आत्मिक प्रगति के मार्ग में भारी व्यवधान माना गया है।
चिन्तन धाराओं का परब्रह्म के उदात्त संकेतों का अनुगमन ही है। ‘मैं’ और ‘तू’ में से एक को मिटा देने की बात सूफी संत और भक्त योगी एक स्वर से कहते रहे हैं। मैं मिटता है तो तू रह जाता है। “मेरा मुझ में कुछ नहीं जो कुछ है सो तोर” की—“अपनी खुदी मिटा दे तेरा खुदा मिलेगा” की—अनुभूति भक्तियोग में होती है। इसी तथ्य को थोड़े से शब्दों की उलट−पुलट में दूसरी तरह भी कहा जा सकता है—‘अयमात्मा ब्रह्म—प्रज्ञानं ब्रह्म—तत्वमसि—सच्चिदानंदोऽहम्’—शिवोऽहम् की मान्यता में ‘तू’ मिट जाता है और मैं रह जाता है।
चिन्तन विस्तार का उतना ही क्षेत्र विद्यमान है जितना साकारवादी मान्यताओं में। जब मन को इतनी दौड़−धूप करने और इतने भिन्न प्रकार के अनुभव करने की छूट रही तो वह एकाग्रता कैसी बनी?
चिन्तन का आश्रय लेकर मनोभूमि ऐसी प्रौढ़, परिपक्व बनाई जा सकती है जिसमें कुविचारों को पैर जमाने के लिए तनिक भी गुंजाइश न रहे।
चिन्तन के कारण मनुष्य न सोचने योग्य सोचता है और बाल बुद्धि की योजनाएँ बनाकर उनमें बहुमूल्य विचार शक्ति को नष्ट करता रहता है। चिन्ता, निराशा, खीज, आवेश, उत्तेजना, निष्ठुरता, घबराहट, कायरता, कृपणता, ईर्ष्या, द्वेष, आत्म-हीनता, उद्दण्डता जैसे अनेकों मानसिक रोग मस्तिष्क को घेरे रहते है और सौ रोगों से ग्रसित शरीर की जो दुर्गति होती है वैसा ही वे मनोविकार, विचार संस्थान को, सूक्ष्म शरीर को बनाये रहते हैं। यह मनोगत कुसंस्कारों की, चिन्तन विकृतियों की, पराधीनता है जिसके कारण हर दृष्टि से ‘अद्भुत’ विचारणा सर्वनाश के गर्त में गिरती और नष्ट होती रहती है।
चिन्तन को केन्द्रित करने का परिणाम है।
चिन्तन से मानसिक पंक्ति की कितनी बर्बादी होती है और उन्हें एकाग्र करके दिशा विशेष में निरत कर देने पर कितने चमत्कार उत्पन्न होते हैं इस तथ्य को पग−पग पर परखा और सही पाया जा सकता है। हर काम में असफल रहने वाले लोगों में से अधिकाँश वे होते हैं जिन्हें किसी विषय का एकाग्र चिन्तन नहीं आता और जो किसी काम में मन लगाकर देर तक जुटे रहना नहीं जानते। ऐसे लोग बुद्धिमान, क्रिया कुशल एवं साधन सम्पन्न होते हुए भी मात्र चंचल तथा अस्थिर स्वभाव के कारण हर कार्य में असफल बनते हैं। लगातार एक काम पर सोचना और अभिरुचि को निर्धारित कार्य में नियोजित किये रहना जिनसे बन नहीं पड़ता, उनकी चित्र−विचित्र उछल−कूद तो बहुत होती है, पर सफलता के नाम पर पल्ले कुछ नहीं पड़ता।
चिन्तन के निखार एवं गतिविधियों के सुधार पर निर्भर है। जीवन इन्हीं तीन धाराओं में प्रवाहित होता है। शक्ति के स्रोत इन्हीं में भरे पड़े हैं और अद्भुत उपलब्धियाँ उन्हीं में से उद्भूत होती हैं। इन्हें किस आधार पर सुधारा, सँभाला जाय इसकी एक विशिष्ट पद्धति है जिसे साधना कहते हैं। साधना का अर्थ है अपने अन्तरंग और बहिरंग को उच्चस्तर तक उठा ले चलना।
चिन्तन से मनोबल एवं आत्मबल घटता है इससे आत्म−शक्ति में कमी पड़ती जाती है। ऐसी दुर्बल मनःस्थिति में वे आधार नहीं बन पाते जिनसे आत्मोत्कर्ष की दिशा में आशाजनक प्रगति संभव होती है। पुरुषों को नारियों के प्रति और नारियों को पुरुषों के प्रति पवित्र दृष्टि रखनी चाहिए। कामुक चिन्तन भी मानसिक व्यभिचार माना गया है और उससे होने वाली हानि को आत्मिक प्रगति के मार्ग में भारी व्यवधान माना गया है। मन को कामुक चिन्तन से बचाने के लिए उसके प्रति−पक्षी पवित्र भावों को अधिक समय तक मन में स्थान देना चाहिए।
चिन्तन क्षेत्र की जुताई करनी पड़ती है, तभी उसमें उपयोगी फसल उगती है। खेत को बार−बार जोतने से ही उसकी उर्वरा शक्ति बढ़ती है। नाम जप को एक प्रकार से खेती की जुताई कह सकते हैं। प्रहलाद की कथा है कि वे स्कूल में प्रवेश पाने के उपराँत पट्टी पर केवल राम नाम ही लिखते हैं। आगे की बात पढ़ने के लिए कहे जाने पर भी राम नाम ही लिखते रहे और कहते रहे।
चिन्तन बिन्दु पर केन्द्रित कर सकने की प्रवीणता प्राप्त करना है। इस प्रयोग में जिसे जितनी सफलता मिलती जाती है उसकी अन्तःचेतना में उसी अनुपात से बेधक प्रचण्डता उत्पन्न होती जाती है। शब्दबेधी बाण की तरह लक्ष्यवेध कर सकना उसके लिए सरल हो जाता है। यदि अध्यात्म उसका लक्ष्य होगा तो उस क्षेत्र में आशाजनक प्रगति होगी और विभूतियों से—दिव्य ऋषि−सिद्धियों से उसका व्यक्तित्व भरा−पूरा दिखाई पड़ेगा। यह लक्ष्य भौतिक उन्नति है तो भी इस एकाग्रता का समुचित लाभ मिलेगा और अभीष्ट प्रयोजनों में आशाजनक सफलता मिलती चली जायगी।
चिन्तन प्रक्रिया भी उन कार्यों में तन्मयतापूर्वक संलग्न रहती है। शरीर की सक्रियता और मन की तन्मयता का संयोग जहाँ जितनी अधिक मात्रा में हो रहा होगा वहाँ उसी अनुपात में एक से एक बढ़ी−चढ़ी सफलताएँ भी सामने प्रस्तुत होती चली जा रही होंगी।
चिन्तन का परिष्कार होता रहे। अवांछनीय पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कार छुड़ाने में, यह ज्ञान साधना साबुन का काम करती है। विकृत मनोवृत्तियों से छुटकारा मिलता है और विवेक युक्त दूर दर्शिता का पथ-प्रशस्त होता है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतंभरा इसी परिष्कृत चिन्तन का नाम है। ‘ज्ञानामुक्ति’, ‘नहिं ज्ञानेन सदृश पवित्र मिह विद्यते’ जैसी उक्तियों में सद्ज्ञान को अध्यात्म का प्राण माना गया है।
चिन्तन चेतना की दिव्य ज्योति को यदि जाज्वल्यमान किया जा सके तो कोई भी व्यक्ति वर्तमान की तुलना में अपने भविष्य को निश्चित रूप से उज्ज्वल बना सकता है।
चिन्तन को केन्द्रीभूत करके किसी विशेष प्रयोजन में लगा देना ऐसे शब्दबेधी बाण की तरह है जिसका सुनिश्चित परिणाम होकर ही रहता है।
चिन्तन तथा अनर्थ कार्य में निरत रहकर अपनी दुर्गति अपने हाथों आप बनाता है। साधना का उद्देश्य मनःक्षेत्र में भरी कुण्ठाओं और शरीर क्षेत्र में अभ्यस्त कुत्साओं के निराकरण के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। सर्वतोमुखी निर्मलता का अभिवर्धन ही ईश्वर प्राप्ति की दिशा में बढ़ने वाला महान् प्रयास माना गया है। सोऽहम्−साधना की प्रतिक्रिया यही होनी चाहिए।
चिन्तन से काम नहीं चलता वरन् प्रियतम के साथ एकाकार होने के भावोन्माद को जगाना पड़ता है। मीरा, चैतन्य, रामकृष्ण परमहंस आदि में यह उन्माद मुखरित हो उठा था। ऋषियों में तत्वदर्शी मनीषियों में यह सौम्य शाँत रस बनकर रचनात्मक प्रयोजनों में लगा रहता है। आवश्यकता पड़ने पर वह बुद्ध और गाँधी की तरह सामयिक समस्याओं के समाधान में अवतारी महामानवों की भूमिका भी सम्पन्न करता है।
चिन्तन और कर्तृत्व सरपट दौड़ने लगते हैं। व्यक्तित्व क्या है- आस्था। मनुष्य क्या है- श्रद्धा। चेष्टाएँ क्या हैं- आकांक्षा की प्रतिध्वनि। गुण, कर्म स्वभाव अपने आप ने बनते हैं न बिगड़ते हैं।
चिन्तन की नीति अपनाते हैं और जीवन मुक्ति का आनन्द लेते हैं।
चिन्तन का स्तर ही उनमें कभी प्रसन्नता अनुभव करता और कभी उद्विग्न हो उठता है। अनुभूतियों में परिस्थितियाँ नहीं, मनःस्थिति की भूमिका ही काम करती है।
चिन्तन का नाम है। ‘ज्ञानामुक्ति’, ‘नहिं ज्ञानेन सदृश पवित्र मिह विद्यते’ जैसी उक्तियों में सद्ज्ञान को अध्यात्म का प्राण माना गया है। वेदान्त दर्शन को तो विशुद्ध रूप से ज्ञान साधना ही कहा जा सकता है।
चिन्तन, चिन्तन से कर्म और कर्म से पदार्थ उत्पन्न होता है। इस तथ्य को जीवन के हर क्षेत्र में नित्य ही प्रयुक्त होते देखा जा सकता है। धन का लाभ सोचकर उसे कमाने की आकाँक्षा उठती है मस्तिष्क उसके लिए व्यवसाय ढूँढ़ता है, शरीर उसके लिए श्रम करता है, फलतः विभिन्न पदार्थों का उत्पादन एवं विनिमय आरम्भ हो जाता है। इसी तथ्य ने सृष्टि के आदि में ब्राह्मी चेतना में हलचल उत्पन्न की। इसे एक से बहुत बनकर क्रीड़ा−कल्लोल करने की इच्छा उत्पन्न हुई।
चिन्तन, आत्म सुधार, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास का सूक्ष्मदर्शी प्रकाश युक्त मार्ग दर्शन किया जाता है। दूसरे शब्दों में इसे जीवात्मा की विवेचना भी कह सकते हैं।
चिन्तन की शीतल सात्विकता स्थापित करने के लिए है। अशुद्धि, अपराधी, दुष्ट, दुर्बुद्धि के कारण यदि मस्तिष्क में अशान्ति के आँधी तूफान उठते रहेंगे तो उसमें मनस्विता एवं तेजस्विता उपयुक्त न हो सकेगी, बहुमूल्य विचारशक्ति ऐसे ही अवाँछनीय छिद्रों में होकर नष्ट होती रहेगी और खोखले मन क्षेत्र में—ब्रह्मलोक में—दिव्य सत्ता का अवतरण न हो सकेगा। मानसिक पवित्रता को साधना की सफलता के लिए नितान्त आवश्यक माना जाय इस मान्यता को सुदृढ़ बनाने की बात ध्यान में बनी रहे यह उद्देश्य दूसरे आचमन का है।
चिन्तन एवं कर्म को अपने ढर्रे पर चलाती है—अपनी लाठी से हाँकती है। शरीर को यह पराधीनता, वासना के बंधन में बाँधकर बेतरह घसीटती है, उसका स्वास्थ्य चौपट करती है, दीर्घजीवन से वंचित करती है और सत्कर्म निरत रहकर समृद्धियाँ, सफलताएँ प्राप्त करने के स्थान पर ऐसा कुछ करते रहने में लगता है जिसके कारण रुग्णता, निन्दा, असफलता, दरिद्रता, कुरूपता जैसी विपन्नताएँ ही आये दिन सामने खड़ी रहती हैं। विवेक कई बार सोचता है कि अपनी गतिविधियों में अमुक प्रकार का परिवर्तन करना चाहिए। किन्तु औचित्य समझते हुए भी वैसा कुछ बन नहीं पड़ता। आदतें इतनी जबरदस्त सिद्ध होती हैं कि उपयोगी सुधार के मनसूबे एक कोने में रखे रह जाते हैं और आदतें अपनी बेढंगी राह पर शरीर को घसीटती चली जाती हैं और वे काम कराती हैं जिनके लिए पीछे पश्चाताप ही करना शेष रह जाता है।
चिन्तन विस्तार को हृदयंगम करते हैं। ध्यान प्रक्रिया की दृष्टि से यह प्रतीक का पूजन और ध्यान की दोनों ही आवश्यकताएँ पूरी कर सकता है। पूजा की चौकी पर इसकी स्थापना करके पञ्चोपचार कृत्य किये जा सकते हैं। प्रातःकालीन सूर्य को उदयाचल से प्रकट होते हुए और साधक के रोम−रोम में अपनी प्रकाश किरणें प्रवेश करते हुए अनुभव किया जा सकता है। आगे चलकर इसी को भ्रू मध्य भाग में अवस्थित आज्ञाचक्र में प्रकाशवान भी देखा जा सकता है।
चिन्तन रोकने के लिए जो प्रयत्न किये जाते है, उन सभी को तपश्चर्या का अंग माना गया है।
चिन्तन को उच्चस्तरीय बनाने के लिए प्रथम प्रयास के रूप में तत्परता बरतनी होती है। अन्यथा मात्र कर्मकाण्डों के सरल विधि−विधान अपनाने भर से देवत्व की उपलब्धि जैसे महान प्रयोजन की पूर्ति न हो सकेगी।
चिन्तन धाराएँ उभरने लगीं। शाँत वातावरण में विक्षोभ उत्पन्न हुआ, चिन्तन हलचलों में बदला, कर्म का गठन हुआ और उस सूक्ष्म कर्म ने स्थूल पदार्थ का रूप धारण कर लिया।
चिन्तन तन्त्र का सुव्यवस्थित सदुपयोग करके कोई भी व्यक्ति विद्वान, वैज्ञानिक, कलाकार, दूरदर्शी, मनीषी बन सकता है। विचारणा को सन्मार्गगामी बना सकते वाले व्यक्ति—सामान्य साधनाओं के बल पर—सामान्य परिस्थितियों में रहते हुए—व्यक्तित्व को परिष्कृत ढाँचे में ढाल सकते हैं और महामानवों की श्रेणी में गिने जा सकने की स्थिति में सरलतापूर्वक जा पहुँचते हैं। ऐतिहासिक महापुरुषों के जीवन तत्त्व का विश्लेषण करने पर विशेषता एक ही दिखाई पड़ती है कि उन्होंने अपने चिन्तन तन्त्र को व्यवस्थित किया, अभ्यस्त विचार-पद्धति का नये सिरे से पर्यवेक्षण किया, अनौचित्य को साहसपूर्वक सुधारा और विवेक का आश्रय लेकर विचारणा को उच्चस्तरीय बनाया। लोक-प्रवाह के विपरीत आदर्शवादी मौलिकता अपनाई, फलस्वरूप उनका चिन्तनात्मक काया-कल्प हो गया। आरम्भ में ऐसे लोगों को मखौल बनता और विरोध होता है, पर जब वे अपनी निष्ठा का परिचय देते हैं तब दुनिया उनके चरणों में झुक जाती है और सिर आँखों पर बिठाकर भाव भरी श्रद्धाँजलि समर्पित करती है।
चिन्तन-परक होती हैं और उनमें कितने ही स्तर के ध्यान करने पड़ते हैं। नादयोग, बिन्दुयोग, लययोग, ऋजुयोग, प्राणयोग, हंसयोग, षट्चक्र वेधन, कुण्डलिनी जागरण जैसे बिना किसी श्रम या उपकरण के लिये जाने वाले मात्र मनोयोग के सहारे संपन्न किये जाने वाले सभी कृत्य ध्यानयोग की श्रेणी में गिने जाते हैं। इसके साकार और निराकार दो वर्ग हैं। साकार में अमुक देवी−देवताओं के स्वरूप एवं सान्निध्य की भावना की जाती है। प्रकाश का—सूर्य का ध्यान भी साकार ध्यान में ही गिना जाता है।
चिन्तन कर सकने योग्य विकसित न किया गया होगा तो समुचित ध्यान कर सकना सम्भव ही न हो सकेगा। अविकसित मानसिक स्तर के लोग इन्द्रिय सम्वेदना भर अनुभव करते हैं, वे कान या आँख की सहायता से देख या सुनकर कुछ सोच−समझ सकते हैं। कवियों, वैज्ञानिकों एवं दृष्टाओं जैसा सूक्ष्म चिन्तन उनके लिए सम्भव नहीं होता। अस्तु उन्हें उनकी स्थिति के अनुरूप दृश्य प्रतिमाओं के आधार पर परमात्मा की समीपता का उपासना उद्देश्य पूरा कराना होता है।
चिन्तन एवं कर्तव्य का बिखराव रोककर अभीष्ट प्रयोजन के केन्द्र बिन्दु पर केन्द्रीभूत करना पड़ता है। इसके लिए अपनी गति विधियाँ लगभग उसी स्तर की रखनी पड़ती हैं जैसे कि भौतिक क्षेत्र में सफलताएँ पाने वाले लोगों को अपनानी होती हैं।
चिन्तन नहीं आता और जो किसी काम में मन लगाकर देर तक जुटे रहना नहीं जानते। ऐसे लोग बुद्धिमान, क्रिया कुशल एवं साधन सम्पन्न होते हुए भी मात्र चंचल तथा अस्थिर स्वभाव के कारण हर कार्य में असफल बनते हैं। लगातार एक काम पर सोचना और अभिरुचि को निर्धारित कार्य में नियोजित किये रहना जिनसे बन नहीं पड़ता, उनकी चित्र−विचित्र उछल−कूद तो बहुत होती है, पर सफलता के नाम पर पल्ले कुछ नहीं पड़ता।
चिन्तन, मनन आदि के द्वारा गहरा गोता मारने, कोमल संवेदनाओं को उभारने—किसी बात पर देर तक गम्भीर चिन्तन कर सकने योग्य विकसित न किया गया होगा तो समुचित ध्यान कर सकना सम्भव ही न हो सकेगा। अविकसित मानसिक स्तर के लोग इन्द्रिय सम्वेदना भर अनुभव करते हैं, वे कान या आँख की सहायता से देख या सुनकर कुछ सोच−समझ सकते हैं। कवियों, वैज्ञानिकों एवं दृष्टाओं जैसा सूक्ष्म चिन्तन उनके लिए सम्भव नहीं होता। अस्तु उन्हें उनकी स्थिति के अनुरूप दृश्य प्रतिमाओं के आधार पर परमात्मा की समीपता का उपासना उद्देश्य पूरा कराना होता है।
चिन्तन की परम सुखद प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए उसे ‘स्वर्ग’ कहा गया है। ललक और लिप्सा निकृष्टता एवं कुसंस्कारी आदतों के भव-बन्धनों को तोड़ फेंकने की स्थिति ‘मुक्ति’ कहलाती है। स्वर्ग किसी ग्रह नक्षत्र पर बसा हुआ गाँव नहीं है और न मुक्ति से किसी लोक विशेष में जाकर भगवान जी के साथ रंग रेलियाँ करने का मजा मिलता है। यह तो अलंकारिक आख्यायिकाएँ हैं। तथ्य इतना भर है कि, परिष्कृत दृष्टिकोण अपनाने वाला स्वर्गीय सुख सन्तोष पाता है और आत्मीयता के विस्तार के साथ संबद्ध, सेवा उदारता की नीति अपनाने वाले को लोभ-मोह की जकड़न से छुटकारा मिल जाता है।
चिन्तन एवं अवाँछनीय सम्वेदनाओं का कष्ट देने में समर्थ न हो सके। समस्त विपन्नताओं की जड़ यह पराधीनता ही है। जीवन का आनन्द उठाने से इसी विवशता के कारण वंचित रहना पड़ता है। यही बन्धन मनुष्य को उच्चस्तर तक पहुँचा कर देवोपम आनन्द, उल्लास उपलब्ध करने के मार्ग में एकमात्र व्यवधान बने रहते हैं। इस स्थिति को बदल सकना यही मनुष्य का परम पुरुषार्थ है—इसी को ‘मुक्ति’ कहा गया है।
चिन्तन में मोड़ा−मरोड़ा जा सकता है। कहते हैं कि अपने को वश में कर लेने वाला—सारे संसार को वश में कर लेता है। आत्म−नियंत्रण की यह स्थिति प्राप्त कर लेता है। आत्म−नियन्त्रण की यह स्थिति प्राप्त करने में ध्यान साधना से बढ़कर और कोई उपाय नहीं है। इसका लाभ आत्मिक और भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से मिलता है।
चिन्तन उस ढर्रे में ढला हुआ होता है, जिसकी प्रतिक्रिया ही हमें अर्धविक्षिप्त स्तर का बनाये रहती है। कितने प्रकार की सनकें, कितने वहम, कितने भ्रम मस्तिष्क में लदे होते हैं यदि उन्हें ठीक तरह समझा जाय तो प्रतीत होगा कि विवेकवान व्यक्ति की तुलना में ‘चालू आदमी’ निस्संदेह अधपगला होता है। लोक−प्रवाह का संशोधन करने अवतारी आत्माएँ उतरती हैं उनके चले जाने के बाद फिर विकृतियाँ उभरने लगती हैं और समाजिक प्रचलनों में गन्दे नाले जैसी गन्दगी भरती चली जाती है। जन मान्यताएँ—लोगों के प्रचलित ढर्रे ही अपने को सुहावने लगते हैं। कुरीतियाँ, मूढ़ मान्यताएँ, अन्य विश्वासों के सहारे न जाने कितनी उपहासास्पद भ्राँतियाँ मस्तिष्क में जड़ जमाकर बैठ जाती हैं।
चिन्तन की गहराई में उतरने के प्रयत्न में, हमें चैन और सन्तोष मिलता है। एक परत इससे भी गहरी है- जिसे अन्तरात्मा कहते हैं। यहाँ आस्थाएँ रहती हैं। अपने सम्बन्ध में, प्रिय और अप्रिय के, उचित और अनुचित के, आदतों और प्रचलनों के, पक्ष और सिद्धान्तों के सम्बन्ध में अनेकानेक मान्यताएँ; इसी केन्द्र में गहराई तक जड़ें जमाये बैठी रहती हैं। व्यक्तित्व का समूचा ढाँचा, यहीं विनिर्मित होता है।
चिन्तन से बचाने के लिए उसके प्रति−पक्षी पवित्र भावों को अधिक समय तक मन में स्थान देना चाहिए। जितनी देर अशुद्ध चिन्तन के लिए मस्तिष्क को छूट दी जाती है, उतनी ही सुविधा यदि परिष्कृत चिन्तन के लिए दी जा सके तो उस परिष्कृत मनोभूमि से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, चिन्ता, निराशा, भय आदि का कोई कुविचार, मनोविकार पनप न सकेगा। सृजनात्मक शुभ चिन्तन के विचारों से मन को भरा पूरा रखने के लिए स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन का आश्रय लेकर मनोभूमि ऐसी प्रौढ़, परिपक्व बनाई जा सकती है जिसमें कुविचारों को पैर जमाने के लिए तनिक भी गुंजाइश न रहे।
चिन्तन का जो प्रवाह इन दिनों चल पड़ा है उसे रोकने और भाव भरी दिव्य श्रद्धा की, प्रतिभा उसे मानने की जन चेतना उत्पन्न करने की दृष्टि से भी यह स्थापना अतीव उपयोगी है। मानवता की, सद्बुद्धि की, सत्प्रवृत्तियों की प्रतिमा भी उसे माना जा सकता है।
चिन्तन को जोते रहना चाहिए।
चिन्तन चेतना की दिव्य ज्योति। इसका मोटा लाभ मस्तिष्क की तीक्ष्णता, स्मरण शक्ति, दूर−दृष्टि, गहराई में जा पहुँचने वाला पर्यवेक्षक—सूझबूझ आदि के रूप में देखा जाता है। मन्दबुद्धि और तीक्ष्ण बुद्धि होने का फैसला इस आधार पर किया जाता है कि उसकी सूझ−बूझ एवं समझदारी किस स्तर की है। शारीरिक बलिष्ठता और सक्रियता के आधार पर मिलने वाले सुखों और लाभों की तरह मानसिक सक्षमता के सुखद प्रतिफल भी कम नहीं हैं। स्कूली पढ़ाई ऊँची श्रेणी में उत्तीर्ण करने वाले लोगों को अफसरी के ऊँचे पद मिलते हैं।
चिन्तन के लिए मस्तिष्क को छूट दी जाती है, उतनी ही सुविधा यदि परिष्कृत चिन्तन के लिए दी जा सके तो उस परिष्कृत मनोभूमि से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, चिन्ता, निराशा, भय आदि का कोई कुविचार, मनोविकार पनप न सकेगा। सृजनात्मक शुभ चिन्तन के विचारों से मन को भरा पूरा रखने के लिए स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन का आश्रय लेकर मनोभूमि ऐसी प्रौढ़, परिपक्व बनाई जा सकती है जिसमें कुविचारों को पैर जमाने के लिए तनिक भी गुंजाइश न रहे।
चिन्तन अभ्यास को आसानी से काटा जा सकता है। शारीरिक दुष्प्रवृत्तियों के संबंध में भी यही बात है। नशा, व्यसन, आलस्य जैसे दुर्गुणों से निपटना, कठोर संकल्प एवं दृढ़ निश्चय से ही सम्भव हो सकता है। व्यक्तित्व का कायाकल्प कर सकने वाले व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में शूर−वीर कहे जाते हैं और उन्हीं को भौतिक जगत की प्रत्येक दिशा में बढ़ चलने का द्वार खुला मिलता है। इस जीवन−प्राण कहे जा सकने वाले चेतना−तत्व को प्राण कहते हैं।
चिन्तन के विचारों से मन को भरा पूरा रखने के लिए स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन का आश्रय लेकर मनोभूमि ऐसी प्रौढ़, परिपक्व बनाई जा सकती है जिसमें कुविचारों को पैर जमाने के लिए तनिक भी गुंजाइश न रहे।
चिन्तन और कर्तृत्व में ही मनुष्य की अधिकाँश शक्तियों का अपव्यय होता रहता है, दुर्बुद्धिग्रस्त और दुष्कर्म निरत व्यक्ति अपना ओजस् नष्ट करते रहते हैं और उस प्राण शक्ति को गँवा बैठते हैं जो उच्चस्तरीय प्रगति के लिए उसी प्रकार आवश्यक है जैसे मोटर के लिए पैट्रोल। बिना तेल के मोटर कैसे चलेगी, बिना प्रखर प्राण शक्ति के आत्मिक प्रगति किस प्रकार सम्भव होगी। अस्तु न साधना द्वारा चिन्तन को उत्कृष्ट और कर्तृत्व को आदर्श बनाया जाता है। यह जमीन को जोतकर खाद, पानी लगाकर उर्वर बना लेने की तरह है। ऐसी ही परिष्कृत मनोभूमि पर उपासना का बीजारोपण किया जाता है।
चिन्तन से न केवल मन:स्थिति, वरन् सारी जीवन सत्ता ही उसी ढाँचे में ढलने लगती है।
चिन्तन परक—मान्यता प्रधान और दूसरा क्रिया परक—कर्म प्रधान है। मानवी सत्ता भी चेतन आत्मा और जड़ शरीर के समन्वय से बनी है। उन दोनों को ही परिष्कृत करना पड़ता है। भाव शुद्धि की तरह क्रिया शुद्धि भी आवश्यक है। भाव शुद्धि को योग तथा क्रिया शुद्धि को तप कहा जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-May
चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व से भरा पूरा जीवन निर्वाह करना पड़ता है।
चिन्तन को बदलने एवं कर्तव्य को उलटने की गुंजाइश न रह गई होगी।
चिन्तन देकर ही पूरी की जा सकती हैं।
चिन्तन के कितने ही उत्कृष्ट आधार प्रदान करती है। आज हम हिन्दू, भारतीय एवं पुरुष हैं। कल के जन्म में ईसाई, योरोपियन या स्त्री हो सकते हैं। ऐसी दशा में क्यों ऐसे कलह बीज बोयें, ऐसी अनैतिक परम्पराएँ प्रस्तुत करें जो अगले जन्म में अपने लिए ही विपत्ति खड़ी कर दें। आज का सत्ताधीश, कुलीन मनुष्य सोचता है कल प्रजाजन, अछूत, एवं पशु बनना पड़ सकता है उस स्थिति में उच्च स्थिति वालों का स्वेच्छाचार उनके लिए कितना कष्ट कारक होगा।
चिन्तन करने मात्र से बड़ी प्रसन्नता होती है। यदि उनका विस्तार सद्भावनाओं के अभिवर्धन के लिए- सत्प्रवृत्तियों का पोषण करने के लिए सम्भव हो सके तो वह संकल्प शक्ति से उत्पन्न पुरुषार्थ उच्च कोटि की उपलब्धियाँ प्रस्तुत कर सकता है यदि मैं का दायरा अत्यन्त छोटी ‘व्यक्तिवादी’ परिधि से आगे बढ़कर ‘हम’ की सीमा का स्पर्श कर सके तो बात कहाँ से कहाँ पहुँच जाय और प्रतिभा का चमत्कार आदर्शवादी परम्पराओं के निर्वाह में संलग्न दिखने लगे।
चिन्तन, प्रभाव की ईश्वर प्रदत्त विभूतियाँ मौजूद हैं। इनके सहारे धन, संपत्ति, विद्या, बलिष्ठता, कीर्ति और सुविधा रूपी पाँच संपत्तियां कमाई जाती हैं। इन विभूतियों और संपत्तियों से न्यूनाधिक मात्रा में हर व्यक्ति सम्पन्न है।
चिन्तन की महत्व-पूर्ण धाराओं को कर्त्तव्य-निष्ठा के साथ सुनियोजित कर दिया जाय।
चिन्तन एवं कौशल का एक-एक कण लोक-साधना में निरत है। धन तो सबसे हलकी वस्तु होने के कारण उसकी एक-एक पाई पहले से ही समर्पित हो चुकी है। समर्पण की अध्यात्म दर्शन में असीम महिमा है। यह समर्पण-शरणागति- वाचालता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए उसे यथार्थवादी होना चाहिए।
चिन्तन आदि के सहारे जो ज्ञान वृद्धि होती है उससे मस्तिष्क का एक बहुत छोटा अंश ही विकसित हो पाता है। इसके सहारे उपार्जन-लोक, व्यवहार तथा निर्वाह के सामान्य प्रयोजन ही पूरे होते हैं। शक्ति का स्रोत तो अचेतन है। उसके ऊपर प्रभाव डालना अति कठिन है। यदि उस तक पहुँचा जा सके और अभीष्ट दिशा में बदला जा सके तो व्यक्तित्व का स्वरूप बदल सकता है।
चिन्तन की आवश्यकता पड़ेगी।
चिन्तन की उत्कृष्टता कह सकते हैं। भक्तियोग द्वारा प्रेम सम्वेदना को विकसित किया जाता है। दया, करुणा, मैत्री, उदारता, सेवा, सज्जनता, सहृदयता आदि अन्तःकरण की दिव्य विशेषताएं प्रेम विस्तार के साथ-साथ परिपुष्ट होती हैं। अस्तु योग की तीन धाराओं में क्रमशः कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग की साधना प्रक्रिया अपनाई जाती है।
चिन्तन द्वारा विकृत नहीं किया जायगा- विद्याध्ययन, स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन जैसे माध्यम अपनाकर उसकी क्षमता को निरन्तर प्रखर बनाया जायगा। यह पोषण मिलते रहने पर मस्तिष्क की भूख बुझती रहेगी और उसे अधिक विकसित परिष्कृत होने का अवसर मिलता रहेगा। यदि इस ओर ध्यान न दिया जाय, प्रमादग्रस्त रहा जाय, मूढ़ मान्यताओं में जकड़े रखा जाय तो समझना चाहिए कि विलक्षण मनः शक्ति देने के साथ-साथ सन्निहित ईश्वरीय प्रयोजन को नष्ट कर दिया गया।
चिन्तन, मनन जैसे माध्यम अपनाकर उसकी क्षमता को निरन्तर प्रखर बनाया जायगा। यह पोषण मिलते रहने पर मस्तिष्क की भूख बुझती रहेगी और उसे अधिक विकसित परिष्कृत होने का अवसर मिलता रहेगा। यदि इस ओर ध्यान न दिया जाय, प्रमादग्रस्त रहा जाय, मूढ़ मान्यताओं में जकड़े रखा जाय तो समझना चाहिए कि विलक्षण मनः शक्ति देने के साथ-साथ सन्निहित ईश्वरीय प्रयोजन को नष्ट कर दिया गया।
चिन्तन की सही रीति-नीति से अपरिचित होने के कारण ही तरह-तरह के विक्षोभ हमें घेरते हैं। संसार में ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं जो अनेकों समस्याओं और कठिनाइयों से घिरे रहने पर भी अपनी मनःस्थिति को विक्षुब्ध नहीं होने देते और हँसते-हँसाते सामने प्रस्तुत उलझनों को सुलझाने के लिए धैर्य और साहस पूर्वक जुटे रहते हैं। इसके विपरीत ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो राई की बराबर कठिनाई को पहाड़ के बराबर मान लेते हैं और तिल को ताड़ के रूप में देखने की मानसिक दुर्बलता के कारण निरन्तर उद्विग्न बने रहते हैं।
चिन्तन और चरित्र को परिष्कृत करने की बात किन्हीं विरलों की ही समझ में आती है। अस्तु मिशन को सफल बनाना हो तो युग लोलुप और दूसरे प्रकार के प्रत्यक्ष प्रतिफल चाहने वाले तथाकथित धनीमानियों के दरवाजे खटखटाने से भी कुछ नहीं बनेगा। इस अभाव की पूर्ति हम सबको अपनी रोटी में से कुछ दाने बचाकर पूर्ति करनी पड़ेगी। जिनके पास सम्पत्तिवान कहला सकने जितनी सम्पदा है उनसे कहना पड़ेगा कि उत्तराधिकार में वंशधरों को अमीर बनाने की बात सोचने की अपेक्षा यह अच्छा है कि मनुष्य के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए उसका सराहनीय उपयोग कर लिया जाय।
चिन्तन है कि कीट नाशक रासायनिक प्रभाव से मानवी आहार को किस प्रकार बचाया जाय। यह चिन्ता एक देश की नहीं वरन् समस्त विश्व की समस्या है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-June
चिन्तन कर सकने वालों में मूर्धन्य गिने जाते हैं।
चिन्तन और कर्तृत्व की कोई भी धारा अपनाने की उसे सुविधा रहती है। इतना लाभ लेने वाली प्रजा के ऊपर कुछ विशेष कर्तव्य उत्तरदायित्व भी आते हैं। वे आत्म-नियन्त्रण के हैं। उपलब्ध अधिकारों का समाजद्रोही क्रिया-कलापों में उपयोग किसी भी प्रकार नहीं करना चाहिए। कानूनी प्रतिबन्धों से भी अधिक प्रजातन्त्र के प्रजाजनों को आत्म-नियन्त्रण बरतना चाहिए।
चिन्तनीय हो गई है कि वैज्ञानिकों के लिए कुछ समय बाद प्राणवायु कहाँ से मिलेगी-यह विकट पहेली बन गई है।
चिन्तन कर सकने में असमर्थ रहता है इच्छा शक्ति की तीव्रता का ही दूसरा नाम आतुरता है। वह धैर्य के बाँध तोड़ती है और जिस तरह भी हो सके प्रयोजन पूरे करने के लिए ललकती है। इसी मनः स्थिति में अपराधी प्रवृत्तियाँ पनपतीं हैं। जल्दी ही सफलता न मिलने पर निराशा छा जाती है और असफल रहने पर तो उसकी स्थिति छत से उठाकर खाई में पटक देने जैसी हो जाती है। उसे दुहरी चोट लगती है और इस स्थिति में अत्युत्साही व्यक्ति ही सब से अधिक निराश, खिन्न होते हैं।
चिन्तन, उज्ज्वल-चरित्र और आदर्श-कर्तृत्व। दूसरा पक्ष है- मानवी काया और चेतना में छिपी रहस्यमय शक्तियों का जागरण और उसका चमत्कारी उपयोग। भूतकाल में दोनों ही पक्षों पर समान रूप से ध्यान दिया जाता था। अतएव योगदर्शन और योग साधन की समन्वयात्मक प्रक्रिया जन साधारण को आत्मिक और भौतिक क्षेत्र में सर्वतोमुखी उत्कर्ष की सम्भावनाएँ उत्पन्न करती थीं।
चिन्तन कर्तृत्व एवं साधनों की भावभरी श्रद्धाँजलि प्रस्तुत करनी चाहिए।
चिन्तन, मनन किया। इस विचार-मन्थन के परिणामस्वरूप जो निष्कर्ष निकले, उन्हें ही लोगों के समक्ष अपनी दार्शनिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत किया। इसी से वे अभिमान रहित होकर अपने सिद्धान्तों का सही प्रतिपादन कर सकने में समर्थ हो सके। कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने प्रशंसा-प्रसिद्धि व अभिमान के लिए ‘गीतांजलि’ की रचना नहीं की वरन् विश्वात्मा-परमात्मा के प्रति उनने भाव-सुमन अर्पित किये। इसी तरह गौतम बुद्ध, रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण, महात्मा गाँधी आदि युग पुरुषों ने प्रशंसा, प्रसिद्धि की सदा उपेक्षा की और अभिमान के विष से अपने को सदा मुक्त रखा तभी जनता जनार्दन को सही मार्ग दिखाने में समर्थ हो सके।
चिन्तन और अनुभव बढ़ता है। सक्रियता के फलस्वरूप उत्पादन बढ़ता है और उससे व्यक्ति तथा समाज को लाभ होता है।
चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व में नियोजित रखने के लिए ही धर्म और अध्यात्म की संरचना हुई थी। तत्वदर्शियों का वह प्रयोग इतिहास के पृष्ठों को स्वर्ण अक्षरों में लिखता रहा तो अब उसका वैसा ही उपयोग क्यों नहीं हो सकता? इसका उत्तर तर्क से नहीं प्रयोग परीक्षण से किया गया। तथ्य सामने है। षोडश संस्कारों के माध्यम से व्यक्ति और परिवार-निर्माण की- पर्व, त्यौहारों के आयोजनों से सामाजिक उत्कर्ष की- कथा, सत्संगों के माध्यम से जन-मानस परिष्कार की-गायत्री यज्ञों के माध्यम से लोक-प्रवाह को उलटने की जो चेष्टा की गई उससे आशातीत परिणाम निकले।
चिन्तन को ऊबड़-खाबड़ न रहने देकर उसे व्यवस्थित और परिष्कृत करके उपयोगी दिशा में लगाये जाने का नाम ही बुद्धिमानी है। आदिमकाल के चिन्तन को किस प्रकार व्यक्तियों तथा परिस्थितियों के साथ ताल-मेल बिठा सकने में सक्षम रखा जा सकता है। वह उपार्जन, उपभोग एवं सुरक्षात्मक प्रयोजनों में किस प्रकार प्रवीण हो सकता है ऐसी जानकारी देने की कला को शिक्षा कहते हैं। विद्यालयों तथा अन्य प्रकार के शिक्षणों से इस आवश्यकता को पूरा किया जाता है। मस्तिष्क के भीतर क्या भरा है?
चिन्तन को किस प्रकार व्यक्तियों तथा परिस्थितियों के साथ ताल-मेल बिठा सकने में सक्षम रखा जा सकता है। वह उपार्जन, उपभोग एवं सुरक्षात्मक प्रयोजनों में किस प्रकार प्रवीण हो सकता है ऐसी जानकारी देने की कला को शिक्षा कहते हैं। विद्यालयों तथा अन्य प्रकार के शिक्षणों से इस आवश्यकता को पूरा किया जाता है। मस्तिष्क के भीतर क्या भरा है? उसके कोष्ठक किस प्रकार जड़े जकड़े हैं।
चिन्तन और आदर्शवादी क्रिया-कलाप की प्रेरणाओं का संकलन किया जाय और उससे न केवल उन धर्मों के धर्मावलम्बियों को वरन् मात्र को उससे परिचित कराया जाय। इससे विभेद की दीवारें झीनी होंगी एवं सर्व धर्म सद्भाव का क्षेत्र विस्तृत होगा।
चिन्तन को चिरकाल से मोड़ा जाता रहा है। पशु प्रवृत्ति में एकाकीपन की प्रधानता रहती है। अन्य प्राणी इसीलिए पिछड़े रह गये कि वे सहयोग का महत्व न समझ सके। कई प्राणी झुण्ड बनाकर तो रहते हैं, पर एक दूसरे के लिए आदान-प्रदान बहुत ही स्वल्प मात्रा में करते हैं। जिन प्राणियों में जितना अधिक सहयोग है वे अपने को उतना ही सुरक्षित और सुखी अनुभव करते हैं।
चिन्तन एवं प्रस्तुतीकरण प्रयास आरम्भ होना है। संसार की तीन चौथाई जनता इन्हीं तीन धर्मों पर केन्द्रित है। विभिन्न धर्मों के धार्मिक कर्मकाण्डों के पीछे कितनी वैयक्तिक एवं सामाजिक स्थिति को प्रखर बनाने की कितनी प्रेरणा विद्यमान है। उन धर्मों के कथा, पुराण किस प्रकार नैतिक एवं सामाजिक शिक्षा प्रस्तुत करके मानवी गरिमा एवं एकता को परिपुष्ट करते हैं। इस तथ्य से सर्व साधारण को परिचित कराया ही जाना चाहिए।
चिन्तन के नाम पर एक निराशा पूर्ण पलायनवादी दृष्टिकोण पल्लवित हो गया है- जगत मिथ्या है, माया का खेल मात्र है। यहाँ की हर वस्तु दुःख और बन्धन का कारण है। इससे छुटकारा पाकर भागो। वनों और पर्वतों में जाकर छिप जाओ। तभी ब्रह्म साक्षात्कार व मुक्ति प्राप्त हो सकेगी।
चिन्तन, आदर्श कर्तृत्व पर आधारित है। चरित्र-निष्ठा और समाज-निष्ठा जिसका लक्ष्य है। एकता और समता जिसका स्वभाव है। धर्म की यह आत्मा सार्वभौम एवं सर्वजनीन है। इसमें मौलिक एकता है।
चिन्तन पर यन्त्रों का इतना दबाव पड़ेगा कि वह स्वतन्त्र रीति से कुछ सोच ही न सकेगा और लगभग पराधीन हो जायगा। प्रेस प्रकाशन, रेडियो, टेलीविजन और फिल्में चलाने का अधिकार, सत्ता अथवा सम्पत्ति के आधार पर चन्द लोगों के हाथों चला जा रहा है। वे लोक-मानस पर अपनी मर्जी का दबाव आकर्षक पोटलियों में लपेट कर इस कदर डालते हैं कि आदमी उससे भिन्न प्रकार नहीं सोच सकते उसे हाथ-पाँवों की हरकत करने भर की आजादी रहती है सोचने की नहीं। फलतः वह बौद्धिक कठपुतली बनता जा रहा है। यह एक बड़ा खतरा है जिसमें जीवित मनुष्य सोचने की दिशा में उसी तरह पराधीन होंगे जैसे कि ग्रामोफोन की मशीन बोलने के लिए अपने मालिक की आज्ञानुवर्ती होती है।
चिन्तन प्रक्रिया लोक-व्यवहार से आगे बढ़ेगी और प्रत्याहार, धारणा, ध्यान समाधि की कक्षाएँ उत्तीर्ण करते हुए वह स्थिति पैदा करेगी जिसमें आत्मा अपने आपको विश्वास की दिव्य क्षमताओं से सुसम्पन्न अनुभव कर सके। आत्मा को परमात्मा का उत्तराधिकार पाने का अधिकार है। अधिकार पत्र पाने के लिए जिस क्षमता और प्रामाणिकता की आवश्यकता पड़ती है उसी की पूर्ति उपासना द्वारा सम्भव होती है।
चिन्तन लगा रहता है। ईर्ष्या, द्वेष, निराशा, चिन्ता, भय, आशंका और आवेश के क्षणों में हमारा रक्त और मस्तिष्क भट्टी में पड़ी लकड़ियों की तरह जलता रहता है। दूसरों को नीचा दिखाने और बदला लेने में कितने उत्साहपूर्वक दिलचस्पी ली जाती है। आलस्य, प्रमाद और दुर्व्यसनों में कितना अपव्यय होता है। यदि इस सबको बचाया जा सके और क्रमबद्ध रूप से उन्हें रचनात्मक, सृजनात्मक प्रयोजनों में जुटाया जा सके तो इसका सत्परिणाम देखते ही बनेगा।
चिन्तन की उपेक्षा की जाने लगी। फलतः योग का स्वरूप धीरे−धीरे जादू जैसा बनने लगा उसे इच्छा शक्ति के चमत्कार क्षेत्र को कौतूहल भरी सफलताओं की परिधि में सीमित रहना पड़ा। योग सिद्धि और चमत्कार प्रदर्शन लगभग पारिभाषिक शब्द बन गये। इस स्तर की योग साधना भारत में वाम मार्ग कहलाई और पाश्चात्य देशों में उसे मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म, ऑकल्ट साइन्स, टेलीपैथी आदि नाम दिये गये। पाश्चात्य लोगों का योग संकल्पबल मनोबल और इच्छा शक्ति के अभिवर्धन तक सीमित रहा जबकि भारतीय वामाचार में अमुक देवी देवताओं की सहायता से साँसारिक सफलताओं को प्राप्त करने वाली बात भी सम्मिलित थी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-August
चिन्तन को बहुत छोटे दायरे तक ही सीमित रखता है जबकि आन्तरिक स्फूर्ति हर बात पर गहराई से सोचने और हर काम को अधिक सर्वांगपूर्ण अधिक कलात्मक बनाने का ताना-बाना बुनती रहती है। आन्तरिक स्थिति में जो अवसाद एवं उत्साह भरा रहता है उसी को चेहरे की तेजस्विता के रूप में देखा जा सकता है। इसके विपरीत जहाँ मानसिक आलस्य घिरा होगा वहाँ सोचने से लेकर करने तक की सभी स्थूल और सूक्ष्म क्रियाएं अतीव मन्द गति से चल रही होंगी। ऐसे लोग अपनी जन्म-जात प्रतिभा, क्षमता के सौ वें हिस्से का भी लाभ नहीं उठा पाते, उसे यों ही निरर्थक गवाँ देते हैं।
चिन्तन का अभ्यास करें-तो प्रतीत होगा कि अपने लिए देवता लोग दिव्य वरदानों के उपहार लिए सामने खड़े हैं और आकाश से अब अपने ऊपर पुष्प वर्षा होने ही वाली है। उज्ज्वल भविष्य के प्रति यदि आशा और आस्था संजोई जाय तो मस्तिष्क उस सम्भावना के समर्थन में अनेकानेक तर्क कारण, उदाहरण प्रस्तुत करेगा और भावी घटनाक्रम का ऐसा सुनहरा चित्र उपस्थित करेगा मानों वह सब अगले ही दिनों मूर्तिमान होने जा रहा हो। इस सुखद पृष्ठभूमि के सहारे हमें सदा प्रमुदित रहने का अवसर मिलता रहेगा, भले ही वे सुखद कल्पनाएँ कभी भी वास्तविकता न बन सकें।
चिन्तन की दिशा ही मानव जीवन की अनुभूतियों का आधार है तो फिर अँधेरे में भटकाने वाले चित्र गढ़ने की अपेक्षा उज्ज्वल आलोक का आह्वान करने के लिए ही अपने आपको तैयार क्यों न करें?
चिन्तन की धारा निषेधात्मक रहेगी तो उसकी गढ़ी हुई विभीषिकाएँ हमें हर घड़ी नरक में डुबोये रहेंगी। व्यक्ति डरावने लगेंगे और आशंकाएँ शूल भौंकने जैसे कष्ट प्रदान करती रहेंगी। इस नरक से और कोई हमें बचा नहीं सकता क्योंकि यह अपने द्वारा ही विनिर्मित किया गया है। यदि चाहें तो हम स्वयं ही इस स्थिति से उबर सकते हैं और सामने खुले पड़े स्वर्ग द्वार में प्रवेश कर सकते हैं।
चिन्तन एवं कर्तृत्व की दृष्टि से घटिया स्तर का रह जाता है। इस घटियापन को ही व्यक्तिवाद, संकीर्ण स्वार्थपरता, अनैतिकता, असुरता आदि नामों से पुकारते हैं। इस मन:स्थिति का मनुष्य अपने छोटे-छोटे स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए दूसरों को बड़ी से बड़ी हानि पहुँचाने में नहीं चूकता। अनेकानेक नाम रूपों के अनाचार, भ्रष्टाचार, दुष्कर्म, अपराध करने में उसे कोई हिचक नहीं होती वरन् उन क्रूर कर्मों को करने पर अपने को दुस्साहसी, शूरवीर आतंकवादी आदि विशेषताओं से युक्त मान कर गौरवान्वित अनुभव करता है। इन्हीं प्रवृत्तियों को असुरता कहते हैं, इनमें जो जितना ग्रसित है उतने ही स्तर का असुर कहलाता है।
चिन्तन एवं कर्म में प्रकारान्तर से देवता एवं असुरों की सेना का सैनिक एवं समर्थक बनकर दोनों में से किसी न किसी को सफल एवं असफल बनाने का प्रयत्न कर रहा होता है। देवासुर संग्राम मल्लयुद्ध की तरह अथवा तीर-तलवारों से तो कभी-कभी ही देखने में आता है, पर वह सत्प्रवृत्तियों और दुष्प्रवृत्तियों में टकराव की तरह सर्वत्र होता रहता है। पुराणों में इसी सूक्ष्म स्थिति को विभिन्न कथानकों के रूप में चित्रित किया है। देवताओं और असुरों के नामों की तथा घटनाक्रमों की भिन्नता के रूप में व्यापक क्षेत्र में फैली हुई प्रवृत्तियों के बीच होते रहने वाले संघर्ष की ही चर्चा है।
चिन्तन में विकारी एवं आदर्शवादी विचारों की, उपभोग में संयम-असंयम की, आचरण में आदर्शवादिता एवं भ्रष्टता की, दर्शन में आस्तिकता नास्तिकता की आकांक्षाएं हर घड़ी, हर क्षण मल्ल युद्ध करती हैं। यही देवासुर संग्राम है। परस्पर विरोधी दिशा में चल रही खींच-तान में से कब किसकी विजय हुई यह आत्म निरीक्षण यदि सतर्कतापूर्वक जारी रखा जाय तो स्पष्ट हो जायगा कि अन्तर्द्वन्द्व के महाभारत में किस पक्ष की सेना हारती और किसकी जीतती है ?
चिन्तन और निर्धारित प्रयोजन को पूरा करने में नियोजित किया जा सके तो सही दिशा में धीरे-धीरे किन्तु अनवरत गति से चलने वाले कछुए की तरह बाजी मारी जा सकती है और अस्त-व्यस्त उछल-कूद करते फिरने वाले सामर्थ्यवान खरगोशों को प्रतिस्पर्धा में हराया जा सकता है।
चिन्तन कर कर्तव्य में काया-कल्प जैसा क्राँतिकारी परिवर्तन किया जाय। यही है ईश्वर की तात्विक शरणागति। इस शरणागति नीति को अपनाने के बाद देवत्व निश्चित रूप से जीतता है और अपना खोया वर्चस्व पुनः प्राप्त करता है।
चिन्तन में ही उसे रस आता है और ऐसे कर्तृत्व में ही उसे सन्तोष मिलता है।
चिन्तन की इससे दिशा धारा मिली है। दृष्टिकोण में औचित्य के समावेश की-आस्थाओं में सद्भावना की-क्रिया पद्धति में सत्प्रवृत्तियों की मात्रा आशातीत मात्रा में बढ़ी है। लगता है युग-परिवर्तन की परिकल्पना में इस प्रयास ने अपनी उपयोगिता पूरी तरह सिद्ध की है।
चिन्तन एवं परामर्श की सुविस्तृत आवश्यकता होगी। प्रतिपादन का ढाँचा खड़ा हो जाने पर उसका प्रकाशन कराना होगा । उसके प्रसार के लिए कार्यकर्त्ताओं का प्रशिक्षण किया जायेगा। यह प्रचार समान रूप से सभी धर्मों की जनता को एक स्थान पर एकत्रित किया जाता रहेगा और यह समझा जाया करेगा कि सभी धर्म अपनी-अपनी विशेषताएं तथा भिन्नताएं रखते हुए भी मूलतः मानवतावादी आदर्शों को प्रेरणा देने के लक्ष्य पर पूरी तरह केन्द्रित होते हैं। विश्वास है कि उससे विभेद की दीवारें एकता तथा उत्कृष्टता का सर्वतोमुखी समर्थन मिलने से गिरेंगी जिससे जनमानस के परिष्कार का प्रयोजन अधिक अच्छी तरह सम्पन्न हो सकेगा।
चिन्तन और आदर्श कर्तव्य के रूप में समुद्री लहरों जैसा परिचय देते देखा जा सकता है। ब्रह्मलोक में परमात्म सत्ता का साम्राज्य है। परमात्मा को देखना हो तो उसकी प्रतिमा विराट ब्रह्म के रूप में हर घड़ी दृश्यमान है। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों के द्वारा विश्व मानव की सेवा साधना की जा सकती है और उसका प्रतिफल महानात्मा के रूप में असीम श्रेय सहित प्राप्त किया जा सकता है। अपने भौतिक साधनों को जितने अधिक अनुपात से ब्रह्मार्पित किया जा सके उसी अनुपात से साकार उपासना का अधिक उच्चस्तरीय प्रतिफल प्राप्त किया जा सकता है।
चिन्तन की दिशा मोड़ कर यदि मान्यताओं को शुभ सम्भावनाओं की दिशा में चलने के लिए प्रोत्साहित करें-विधेयात्मक चिन्तन का अभ्यास करें-तो प्रतीत होगा कि अपने लिए देवता लोग दिव्य वरदानों के उपहार लिए सामने खड़े हैं और आकाश से अब अपने ऊपर पुष्प वर्षा होने ही वाली है। उज्ज्वल भविष्य के प्रति यदि आशा और आस्था संजोई जाय तो मस्तिष्क उस सम्भावना के समर्थन में अनेकानेक तर्क कारण, उदाहरण प्रस्तुत करेगा और भावी घटनाक्रम का ऐसा सुनहरा चित्र उपस्थित करेगा मानों वह सब अगले ही दिनों मूर्तिमान होने जा रहा हो। इस सुखद पृष्ठभूमि के सहारे हमें सदा प्रमुदित रहने का अवसर मिलता रहेगा, भले ही वे सुखद कल्पनाएँ कभी भी वास्तविकता न बन सकें।
चिन्तन की आदत नहीं डालते अस्तु उनकी प्रतिभा अविकसित पड़ी रहती है फलतः उन्हें पग-पग पर असफलताओं का कष्ट एवं उपहास सहना पड़ता है। व्यवस्था बुद्धि हर कोई विकसित कर सकता है यदि वह अपने कामों के सम्बन्ध में बारीकी से सोचने और उनके प्रत्येक पक्ष पर गहराई के साथ ध्यान देने का प्रयत्न करे। अनुभवी लोगों का मार्ग-दर्शन परामर्श एवं सान्निध्य भी इस सन्दर्भ में बहुत सहायक सिद्ध होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-November
चिन्तन तथा आदर्श कर्तृत्व के साहसिक जीवन के प्रति अदम्य उत्साह के कारण अनवरत उठती हों। इन दो प्रेरणाओं को भगवान पेंडुलम-गति से लगातार देते ही रहते हैं।
चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व की, ब्रह्म-सत्ता की प्रतिष्ठापना की अनुभूति गहरी होती जाती है। अनुभूति की गहनता ही परिणामकारी होगी। अन्यथा यह सब उथली कल्पनाओं की मनोरंजक क्रीड़ा ही सिद्ध होगी। सार्थकता उन्हीं विचारों-संकल्पों की है, जो क्रिया रूप में परिणत हैं। अन्यथा सब मनमोदक मात्र है।
चिन्तन की भी क्षमता रखता है। लेकिन सम्पूर्ण शरीर के निर्माण के लिए शरीरस्थ सभी जीवाणु मिलकर कार्य करते हैं। इनका नेतृत्व करता है ‘सुपरईगो’ या अहं-तत्व। वही सबका संचालक निर्देशक है। वह कमाण्डर है, लेकिन फौज के प्रत्येक जवान में, शरीरस्थ हर एक जीवाणु में स्वतन्त्र विचार-शक्ति भी है।
चिन्तन के स्वरूप को ऊँचा उठाने की दिशा में अग्रसर होता है। योग का बहिरंग रूप इन व्यायामों, कर्मकाण्डों के रूप में सामने आना आपत्तिजनक नहीं। किन्तु यह है योग का कलेवर ही, यह स्मरण रखा जाना और कराया जाना चाहिए। प्राण है- उपनिषद् प्रतिपादित वह अध्यात्म-दर्शन जो उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की प्रेरणा देता था तथा जिसे प्राचीनकाल में ब्रह्म-विद्या कहा जाता था।
चिन्तन जीवन-प्रवाह बन जाए, तभी वह चिन्तन है। अन्यथा मानसिक रति-विनोद ही कहा जाएगा।
चिन्तन करके भविष्य के लिए ऐसी रीति-नीति निर्धारित करें जिससे आत्म-परिष्कार तथा लोक-निर्माण के दोनों तत्व उत्साहवर्धक मात्रा में जुड़े हुए हों। चौथा कारण ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों के विरुद्ध रोष-आक्रोश बनाये रहने और असहयोग प्रतिरोध संजोये रहने की चेतावनी के रूप में है। निर्माण के प्रति उत्साह और ध्वंस के प्रति आक्रोश के समन्वय से ही सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकना सम्भव हो सकता है। प्रस्तुत उपवास अपने उद्देश्य के लिए आवश्यक वातावरण बनाने और परिस्थितियाँ बनाने में सहायक सिद्ध होगा, ऐसी आशा सहज ही की जा सकती है।
चिन्तन और युगीन प्रवृत्तियों-अन्तर्धाराओं के क्षेत्र में भी यही बात है। मर्यादाओं का मर्दन, नीति के आवरण तले नीचता का नर्तन, आत्म-प्रवंचना और पर पीड़न को ही बुद्धि कौशल समझने का प्रचलन, क्रान्ति की अहर्निशि रट लगाने वालों के चित्त में केन्द्रीभूत भ्रान्तियाँ, समाज-सुधार की संकल्प-घोषणाओं के तले अपनी लोलुपता की तुष्टि के लिए कुर्सी का विकल्प ढूँढ़ते हुए थके हारे लोगों की एकत्रित सड़न और इन सबके बीच एक अनन्त सी यातना में पिस रही मानवता का क्रन्दन ऐसे वातावरण में नये युग के अभिनन्दन की बात यदि कौतुक-कल्पना और ढाढ़स बँधाने जैसी चेष्टा मात्र प्रतीत हो, तो अचरज नहीं। लेकिन यह सत्य है कि नया युग बढ़ता हुआ चला आ रहा है। मनुष्य को अस्वाभाविक रूप से अपनाई गई अपनी समस्त दुष्प्रवृत्तियों से मुक्त होना होगा, भले वह आज उन्हें स्वाभाविक और अनिवार्य मान रहा हो। उसे अपनी चिन्तन की प्रक्रिया बदलनी होगी और क्रिया-पद्धति में आमूल परिवर्तन लाना होगा।
चिन्तन की दृष्टि से बालक जैसे अविकसित ही बने रहते हैं। पड़ौसियों का ढर्रा अपनाकर गतिविधियाँ बनती हैं और यह यथार्थता, दूरदर्शिता तथा उपयोगिता की परख करना आवश्यक मान लिया जाता है। यह अपरिपक्वता ही मानव जीवन की आन्तरिक प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है।
चिन्तन की सर्वथा नई दिशा दी।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की प्रेरणा देता था तथा जिसे प्राचीनकाल में ब्रह्म-विद्या कहा जाता था।
चिन्तन से वस्तुतः बहुत अधिक शक्ति बर्बाद होती है। मधुर स्वप्नों का बार-बार स्मरण भी इसी में शामिल है।
चिन्तन एवं चरित्र को मोड़ा जा सकता है। इतना ही नहीं उन्हें स्वास्थ्य, बल, ज्ञान, पराक्रम जैसी विभूतियों से लाभान्वित किया जा सकता है।
चिन्तन एकाग्र और एकरस हो जाता है, जो शरीर-मन स्वयमेव उसी स्थिति में पहुँच जाते हैं।
चिन्तन एवं साधनों की अपनी सम्पदा उसी निमित्त नियोजित करने से कम में चैन नहीं पड़ता। विलासिता, संग्रह और तृष्णा के उभार शांत हो जात हैं और पेट भरने, तन ढ़कने जैसे स्वल्प निर्वाह आवश्यकताओं की पूर्ति के उपरान्त फिर कोई अनावश्यक तृष्णा, ऐषणा पास भी नहीं फटकने पाती। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की ब्राह्मण परम्परा उसके रोम-रोम में बस जाती है। फलतः स्वार्थ में नियोजित साधनों का उपयोग परमार्थ में होने लगता है। विराट् ब्रह्म और विशाल विश्व की एकता का भान होने पर फिर सत्कर्मों द्वारा ईश्वर की पूजा करते हुए ही जीवन का प्रत्येक क्षण व्यतीत होता है।
चिन्तन का ढर्रा, इच्छाओं का रुझाना, विश्वासों का गठन, अभ्यास का पुनरावर्तन जैसे तत्व ही मिल कर स्वभाव का सृजन करते हैं और उसी को व्यक्तित्व के साथ में प्रस्फुटित होते देखते हैं। इस प्रकार अचेतन मन ही वस्तुतः सारे जीवन पर छाया हुआ मिलता है। आदतें तो अचेतन मन में रहती हैं, पर उन्हें पूरी करने के लिए योजना बनाना-व्यवस्था करना एवं समर्थन में तर्क गढ़ना-प्रमाण ढूंढ़ना चेतन मन का काम है। समझने की सुविधा के लिए चेतन-अचेतन का विभाजन है वस्तुतः वह एक ही मनः तत्व की दुहरी क्रिया पद्धति है। एक ही व्यक्ति विद्वान और पहलवान-चित्रकार और साहित्यकार-वक्ता और नर्तक हो सकता है।
चिन्तन की प्रक्रिया बदलनी होगी और क्रिया-पद्धति में आमूल परिवर्तन लाना होगा। आज परिस्थितियाँ ही ऐसी लगती हैं कि वे मानो अनिवार्यतः वर्तमान में चल रही क्रियाओं को जन्म दे रही हैं। मात्र विचार परिवर्तन से ये परिस्थितियाँ क्योंकर बदलेंगी? ऐसा लग सकता है। बिना परिस्थिति की विवशता के कोई व्यक्ति सचाई के कठिन रास्ते पर क्योंकर चलेगा?
चिन्तन के आधार पर हृदयंगम किया जाता रहे तो आत्मबोध की स्थिति उत्पन्न हो सकती है और ज्ञान वैराग्य का प्रकाश अन्तरात्मा में परिलक्षित हो सकता है। वेदान्त साधनाओं की अहं-ब्रह्मादिकपरक-सोऽहम् शिवोऽहम् की उद्बोधक वृत्ति ज्ञानयोग का प्रयोजन पूरा कर सकती है। उसे आत्मबोध की स्थिति जागृत करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
चिन्तन है। अन्यथा मानसिक रति-विनोद ही कहा जाएगा।
चिन्तन तथा क्रिया-पद्धति को उच्चस्तरीय बनाये रही।
चिन्तन करते हुए सार्थक स्वप्न देख मानव कल्याण का हेतु बन सकते हैं।
चिन्तन का अभ्यास किया जाता है। वह क्षमता विकसित हो जाती है तो प्रतीत होता है कि आत्मसत्ता को दुर्बल बनाने वाली और प्रगति की सम्भावनाओं को कुण्ठित करने वाली विकृतियों अपने ऊपर किस हद तक कब्जा जमाये हुए हैं।
चिन्तन से अथवा अनुकरण से होता है, पर जब वे जड़े जमा लेती हैं तो फिर उन्हें उखाड़ना कठिन हो जाता है। नशेबाजी के सम्बन्ध में प्रायः यही होता है। दुष्परिणामों को देखते, समझते हुए भी नशेबाज अपनी आदत के सामने एक प्रकार से विवश हो जाता है और छोड़ने की कल्पना, जल्पना, करते रहने पर भी कुछ बन नहीं पड़ता। आर्थिक, शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक एवं समाज सम्मान की अपार क्षति सहन करते हुए वह दम तो तोड़ देता है, पर उस आदत से पिण्ड छुड़ाने में अपने को असमर्थ पाता है। यही बात अन्यान्य भली-बुरी आदतों के बारे में भी कही जा सकती है।
चिन्तन स्तर की अन्तरंग उमंगें ही बहिरंग जीवन पर छायी रहती हैं। उनसे ही दिशा-निर्धारण और परिस्थिति-निर्माण होता है। भावना का यह मर्मस्थल परिष्कृत सन्तुलित बने, यही योग एवं अध्यात्म शिक्षा का लक्ष्य हो सकता है।
चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। हिमालय पवित्र धाराओं का सृजन कर उन्हें समुद्र-मिलन की प्रेरणा देकर अपने कर्त्तव्य की पूर्ति मान लेता है और आजीवन प्राण-अनुदान ही देता रहता है। कहाँ घाट या पुल बनें, पानी का कहाँ क्या उपयोग हो इसकी हिमालय को चिन्ता नहीं। परमात्मा ने भी अपनी परिस्थितियों और क्षमताओं से तालमेल बिठाने की बुद्धि देकर मनुष्य को जिम्मेदारी दे दी है। इस जिम्मेदारी को निभाना मनुष्य का निजी कर्त्तव्य-कौशल है।
चिन्तन की मानसिक विकृतियाँ प्रधान कारण है। अब मनोविकारों को न केवल मस्तिष्कीय रोगों का वरन् शारीरिक रोगों का भी सर्वोपरि कारण माना जा रहा है। यह पाया गया है कि मनोबल सम्पन्न, साहसी और सन्तुलित व्यक्ति सामान्य अथवा घटिया शारीरिक स्थिति में निरोगी की तरह काम करता और प्रसन्नचित रहता है। जबकि अस्त-व्यस्त मनः स्थिति वाला अकारण ही गिरी-मरी स्थिति में पड़ा रहता है। कितने ही दर्द एवं रोग ऐसे होते हैं जिनकी जड़ शरीर में नहीं मन में होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-February
चिन्तन किया जाय। साथ ही कामुकता से होने वाली क्षति के प्रत्येक पक्ष पर गम्भीरतापूर्वक सोचा जाय और उस प्रकार के प्रमाण, उदाहरणों की शृंखला मस्तिष्क के सामने मूर्तिमान की जाय। दोनों पक्षों की लाभ−हानि की तुलना की जाय और यह विचार किया जाय कि उनमें से क्या ग्राह्य और क्या अग्राह्य है? अन्तरात्मा का विवेक सही फैसला देगा और उस फैसले के आधार पर अवाँछनीय विचारों की जड़ें खोखली होंगी तथा उस स्थान पर सद्विचारों का वट−वृक्ष बढ़ने फैलने लगेगा।
चिन्तन और तत्वबोध मनन भी इसी से जुड़ा हुआ है। (2) जीवन के स्तर को परिष्कृत करने के लिए आत्म−चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की प्रक्रिया (3) दिव्य−सत्ता केन्द्र से मिलने वाले विशिष्ट अनुदान जो साधकों की श्रद्धा एवं सम्वेदना के आधार पर ग्रहण किये जाते एवं फलित बनते हैं।
चिन्तन एवं अन्तरात्मा में सद्भाव बन कर दिव्य प्रेरणाएँ भरता है। अपने को अधिकाधिक परिष्कृत एवं उदार बनाने की आकाँक्षाएँ जगना इसी की प्रचुरता का प्रमाण है। इसमें दुहरा प्रवाह होता है। एक अवाँछनीयताओं से जूझना दूसरे उत्कृष्टताओं को बढ़ाना भगवान के अवतार का प्रयोजन है। जब भी जहाँ भी ईश्वर का अवतरण हुआ है, तब उसने धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का दुहरा प्रयत्न किया है।
चिन्तन को कर्मरूप में परिणत करने के लिए लगने चाहिएं। लोक−मंगल के परमार्थ प्रयोजनों में यह समय लगना चाहिए। व्यक्तिगत जीवन ही सब कुछ नहीं है−अपने लिए जिन्दा रहते वासना, तृष्णा की और मरने के बाद स्वर्ग मुक्ति की बात सोचते रहना स्वार्थ साधन ही कहा जायगा। मनुष्य जीवन ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए−इस संसार को अधिक सुन्दर, सुव्यवस्थित, सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए मिला है। यह प्रयोजन लोक−मंगल की श्रम−साधना में संलग्न होने से ही पूरा हो सकता है।
चिन्तन के आधार पर विकसित किया जाता है लोक−साधना में यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। व्यक्ति अपनी क्रियाशीलता और बौद्धिक स्थिति में प्रवीणता उत्पन्न करते और भौतिक प्रगति का पथ−प्रशस्त करते हैं सूक्ष्म साधना में अन्तरात्मा का स्तर ऊँचा उठाना पड़ता है। इसके लिए परमात्म सत्ता के साथ सम्पर्क बनाना पड़ता है। भौतिक प्रगति के लिए भौतिक क्षमता और आत्मिक प्रगति के लिए आत्मिक क्षमता चाहिए। इसके लिए जो प्रयोग प्रयत्न करने पड़ते हैं− उन्हें अध्यात्म साधना कहते हैं।
चिन्तन छाया रहा या भौतिक स्तर का। यदि साँसारिक मनोकामनाओं की उथल−पुथल मची हुई है और इष्टदेव से तरह−तरह के भौतिक वरदान पाने की ललक उठ रही हो तो समझना चाहिए कि यह उपासना कृत्य भी विशुद्ध रूप से भौतिक है। इससे आत्मिक प्रगति जैसा कोई लाभ मिल नहीं सकेगा। यदि उतने समय शरीर रहित−भौतिक प्रभावों से मुक्त−ज्योतिर्मय आत्मा ही ध्यान में है और उसमें महाज्योति के साथ समन्वित हो जाने की दीप−पतंग जैसी आकाँक्षा उठ रही है, तो समझना चाहिए कि उपासना का सच्चा स्वरूप अपना लिया गया और उससे अभीष्ट उद्देश्य पूरा हो सकने की सम्भावना बन रही है।
चिन्तन−मनन किया गया है। साधना के नाम पर हमारे जीवन का जो भी बहुमूल्य समय लगा है उसका प्रत्येक क्षण गायत्री को आधार मानकर ही प्रयुक्त किया गया है। इस प्रयोग में जो अनुभव हुए हैं उनने व्यक्तिगत रूप से भी हमारी निष्ठा को क्रमशः अधिकाधिक परिपक्व ही किया है। ऐसी दशा में हमारा परामर्श भी अपने विश्वास एवं अनुभव के आधार पर ही हो सकता है। दैनिक सामान्य उपासना के लिए तथा विशेष शक्ति संचय के लिए गायत्री उपासना ही हमें सर्वश्रेष्ठ लगी है तदनुसार जिनने भी हमारा परामर्श एवं सहयोग माँगा है, उन्हीं के लिए कहा है।
चिन्तन एवं परमार्थ परायण जीवन−क्रम अपना नहीं सकता। दोनों में सन्तुलन करना हो तो इतना ही बन सकता है कि गरीब स्तर का आवश्यक निर्वाह प्राप्त करने की भौतिक आवश्यकता सीमित की जाय। कम समय, कम श्रम, कम मनोयोग और कम पैसों में सन्तोषपूर्वक गुजारा किया जाय और इसके बाद जो कुछ बचता है उसे आदर्शवादी रीति नीति अपनाने में प्रयुक्त करते रहा जाय ‘‘सादा जीवन−उच्च विचार’’ की ही रीति−नीति है। इसे अपनाने वाले को मितव्ययी, स्वल्प−सन्तोषी एवं ऐषणा रहित बनना पड़ता है। वह कम खर्चे में गुजारा चलता है, निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकताओं तक सीमित रहता है और विलासी अपव्यय तीखी नजर से कटौती करके फैंक देता है।
चिन्तन से भी हो सकता है, पर वैसे बहुत समय के अभ्यास और एकाग्र एकात्म स्तर मिल जाने पर ही सम्भव है। आरम्भ में दृश्य मुक्त चिन्तन मनःक्षेत्र पर छाया रहे ऐसा ही अभ्यास लेकर चलना चाहिए। ध्यान इसी को कहते हैं उपासना में ध्यान अनिवार्य है। यदि उसे छोड़ कर मात्र क्रिया−कृत्य ही किये जा रहे होंगे तो मन इधर−उधर भागता रहेगा और अधूरा शरीर कर्म ही पूजा−पाठ के नाम पर अपनी लंगड़ी−लूली गाड़ी घसीट रहा होगा।
चिन्तन, क्रिया−कलाप एवं अभ्यास में कितनी ही ऐसी अवाँछनीयताएँ भर गई हैं जिन्हें छोड़ा जाना ही श्रेयस्कर है। बहुत बार उन्हें छोड़ने की सोचते हैं, पर पुरानी रुचि तथा आदत फिर उसी ढर्रे पर घसीट ले जाती है। अपने ऊपर अपना काबू न होना बड़ा विचित्र और बड़ा उपहासास्पद है, पर होता वैसा ही है। कई बुरे विचार, बुरे आचरण और बुरे स्वभाव रह रहकर अपने ऊपर हावी बने रहते हैं और सुधार की आकाँक्षा को मटियामेट बनाकर रख देते हैं।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व के रूप में अंकुरित और पल्लवित होना चाहिए।
चिन्तन की तरह की निरर्थक है। कहते हैं बुड्ढे भूतकाल की बातें सोचते और बच्चे भविष्य की कल्पनाओं में उलझे रहते हैं प्रौढ़ावस्था की बुद्धिमत्ता इसी में है कि वर्तमान को देखा समझा जाय और प्रस्तुत अवसर का अधिक से अधिक सदुपयोग करने में तत्पर हुआ जाय। हमारा चिन्तन यथार्थवादिता पर निर्भर होना चाहिए और भावी प्रगति के लिए आज जो किया जाना सम्भव है, उसी पर ध्यान केन्द्रित रहना चाहिए।
चिन्तन क्रम मिलाकर प्रायः एक घण्टा ही हो जाता है। इतनी उपासना, श्रद्धा एवं तत्परता मनोयोगपूर्वक निभती चली जाय तो समझना चाहिए कि आत्मिक प्रगति का सुनिश्चित आधार बन गया। आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में विशेष तप साधना का उपक्रम बन जाया करे तो उसका प्रभाव भी छह−छह महीने बने रहने का महत्वपूर्ण आधार बन जायगा।
चिन्तन भी सम्पत्ति है। वस्तुतः असली सम्पत्ति तो यही तीन हैं। इनका अपव्यय जहाँ हो रहा होगा वहाँ भी लाँछन ही लगेंगे। आलसी, प्रमादी, हरामखोर, कामचोर, दीर्घसूत्री, गैरजिम्मेदार, लापरवाह जैसी गलतियाँ भी लगभग चोर, डाकू, ठग, बेईमान जैसे अपराध वर्ग के समीप ही जा पहुँचती हैं उच्च विचार मात्र कल्पना लोक में विचरण करके समाप्त नहीं हो जाते हैं उन्हें भी दुर्बुद्धि की तरह ही कार्य रूप में परिणित होने की बेचैनी रहती है। इसका अवसर उन्हीं को मिलेगा, जो अपनी शक्ति एवं साधनों को सदुद्देश्य में संलग्न कर सकेंगे।
चिन्तन एवं काम−क्रोध, लोभ−मोह, मद−मत्सर जैसे दुर्गुण मिल कर किसी का भी मस्तिष्क अर्द्धविक्षिप्त जैसा बना सकते हैं, ऐसे व्यक्तियों का सोचना और करना प्रायः अनुपयुक्त ही होता है। फलतः उनके व्यवहार एवं प्रयासों की उलटी प्रतिक्रिया होती है। और झल्लाहट से ग्रसित व्यक्ति प्रायः इसी प्रकार के बड़बड़ाये मानसिक स्तर के होते हैं।
चिन्तन को भी आकृतियाँ बना कर ही आगे चलता है। वैज्ञानिक के गहरे चिन्तन को निराकार कहा जाता है, पर वस्तुतः वह भी जो सोचता है उसमें कल्पना क्षेत्र की एक पूरी प्रयोगशाला सामने रहती है और प्रयोगात्मक हलचलें आंधी−तूफान की तरह अपना काम कर रही होती हैं। अन्तर इतना ही होता है कि वह स्थूल प्रयोगशाला के उपकरण छोड़ कर वही सारा प्रयोग कृत्य काल्पनिक प्रयोगशाला में कर रहा होता है ध्यान में आकृति से पीछा छुड़ाना सम्भव नहीं हो सकता अस्तु किसी को साकार−निराकार के वितंडावाद में न पड़ कर ध्यान धारणा के सहारे आत्म चिन्तन का प्रयोजन पूरा करना चाहिए।
चिन्तन की ईश्वर प्रदत्त सम्पत्ति को यदि निरर्थक, अनर्थ मूलक गतिविधियों से हटाया जा सके और उन्हें सार्थक सदुद्देश्यों के लिए प्रयुक्त किया जा सके तो समझना चाहिए कि महानता का जीवन जी सकने की सम्भावनाएँ मूर्तिमान होने में अब कोई बड़ी कठिनाई शेष नहीं रह गई है।
चिन्तन क्षेत्र में उपयोगी हलचलें आरम्भ हो जाएंगी।
चिन्तन−मनन, स्वाध्याय को सर्वांगपूर्ण बनाता है। अन्य पठन मात्र से तो उपयोगी समयक्षेप ही बना पड़ा रहा जा सकेगा। एक घण्टा सत्साहित्य पढ़ने के लिए नियत रखा जाय। चिन्तन, मनन इसी के साथ−साथ भी चल सकता है और ऐसा भी हो सकता है कि पढ़ते समय प्रेरक तथ्यों को नोट करते रहा जाय और पीछे अवकाश के साथ यह मंथन किया जाय कि अपने लिए उस परामर्श में से कितना और किस प्रकार अपनाये जाने योग्य हो सकता है। जो सम्भव हो उसकी रूपरेखा बनाने के लिए कल्पना शक्ति दौड़ाई जानी चाहिए और आज की अपेक्षा कल अधिक आदर्शवादिता अपनाये जाने का ताना-बाना बुनना चाहिए।
चिन्तन और कर्म पर छाया रहना चाहिए। उसे अनुभव करना चाहिए कि उसकी दृष्टि से कोई वस्तु छिपी नहीं। प्रत्यक्ष कर्म और अप्रत्यक्ष चिन्तन किसका किस स्तर का है? उसे वह भली-भाँति जानता है। इसी कसौटी पर वह किसी को खरा−खोटा−भक्त−अभक्त मानता है।
चिन्तन का प्रयोजन पूरा करना चाहिए।
चिन्तन कर सकना, योजना बनाना तथा कार्यान्वित कर सकना एक प्रकार से असम्भव ही हो जाता है।
चिन्तन के कारण ही उत्पन्न हुआ है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता सामाजिक, नैतिक और बौद्धिक क्रान्ति की है। इसके लिए अपना ज्ञान−यज्ञ अभियान युग−निर्माण आन्दोलन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। लोक सेवा के लिए इससे बढ़कर इन दिनों और कोई कदम नहीं हो सकता। हमारे श्रम, समय एवं मनोयोग को इसी परमार्थ−प्रयोजन में बिना इधर−उधर भटके संलग्न होना चाहिए।
चिन्तन किसका किस स्तर का है? उसे वह भली-भाँति जानता है। इसी कसौटी पर वह किसी को खरा−खोटा−भक्त−अभक्त मानता है। इसी आधार पर उसका अनुग्रह एवं दोष मिलता है। आस्तिकता की यह मान्यता मनुष्य की सज्जनता और शालीनता बढ़ाती है।
चिन्तन को ध्यान में रखकर किये गये सभी काम कर्मयोग की श्रेणी में गिने जाएंगे ओर उनका परिणाम योगाभ्यास के लिए की गई तप साधना जैसा श्रेयस्कर ही होगा।
चिन्तन की विकृति से ऐसी गतिविधियाँ बन पड़ती हैं जो विपत्ति को और अधिक बढ़ा देती हैं। चिन्ता, निराशा, उद्वेग, आवेश, भय, आशंका, सनक जैसे विकृत चिन्तन एवं काम−क्रोध, लोभ−मोह, मद−मत्सर जैसे दुर्गुण मिल कर किसी का भी मस्तिष्क अर्द्धविक्षिप्त जैसा बना सकते हैं, ऐसे व्यक्तियों का सोचना और करना प्रायः अनुपयुक्त ही होता है। फलतः उनके व्यवहार एवं प्रयासों की उलटी प्रतिक्रिया होती है। और झल्लाहट से ग्रसित व्यक्ति प्रायः इसी प्रकार के बड़बड़ाये मानसिक स्तर के होते हैं।
चिन्तन के अंकुर खाद पानी के अभाव में मुरझाते सूखते चले जाएंगे। सेवा साधना से बच कर मात्र भजन, पूजन में निरत रहने वाले तथाकथित साधक इसी कारण छूंछ रहते हैं कि वे उदारता को चरितार्थ करने वाला सत्साहस जुटा नहीं पाते और व्यक्तिगत उपलब्धियों की संकीर्णता में ही घिर कर रह जाते हैं।
चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−परिष्कार की प्रक्रिया पर दिया जा सके तो निश्चय ही आत्म−विश्वास की मात्रा अनेकों गुनी बढ़ सकती है। प्रसुप्त शक्तियों को जगाने और बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित हो सके−अपने से लड़−झगड़कर शरीर और मन को आलस्य, प्रमाद त्यागने के लिए सहमत किया जा सके तो प्रतीत होगा कि किसी नये देव−दानव की सामर्थ्य अपने साथ जुड़ गई। बिखराव की बाल चंचलता यदि छोड़ी जा सके और निर्धारित लक्ष्य पर एकाग्र भाव से चला जा सके तो कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो सकते हैं।
चिन्तन क्षेत्र की हलचलें हैं। अन्तरात्मा का स्तर ऊँचा उठने से सहज ही देवत्व की मात्रा बढ़ती चली जाती है और उसी फलस्वरूप साधक में अनेकों अलौकिक विशेषताएँ जगमगाने लगती हैं। उपासना का कलेवर तो विधि−विधानों और कर्मकाण्डों से सँजोया जाता है, पर उसका प्राण संबद्ध विचारणाओं और भावनाओं में ही सन्निहित रहता है। भाव में ही देवता की स्थापना मानी गई है। उन्हीं के कारण पाषाण प्रतिमा में देवत्व का प्रकटीकरण होता है।
चिन्तन तन्त्र को गड़बड़ा देते हैं फलतः उनकी कार्य शक्ति को भी काठमार जाता है। कहते हैं विपत्ति अकेली नहीं आती अपनी सहेलियों की पूरी सेना साथ लेकर चलती है। यह कथन इसलिए सही है कि उद्विग्न मस्तिष्क सही निष्कर्ष निकालने और सही कार्य पद्धति निर्धारित करने में असमर्थ बन जाता है। उसके निर्णय प्रायः गलत होते हैं गलत दिशा में उठे कदम गलत प्रतिफल उत्पन्न करेंगे ही। यही है विपत्ति के साथ चलने वाली सेना शृंखला।
चिन्तन में हमें अपंग−असमर्थ−बनाकर रख दे। लाभ का− सुविधा सम्पत्ति का उपयोग यह है कि सफलता देख कर उत्साह प्राप्त करें और उपलब्धियों का अधिकाधिक सदुपयोग करके उनसे अपने सम्पर्क क्षेत्र को लाभान्वित करें। हानि, विपत्ति या विकृति सामने आने पर उससे दूसरी प्रकार का लाभ लिया जाना चाहिए। सोचा जाना चाहिए कि अपनी भूलें या दुर्बलताएँ तो इस कठिनाई में कुछ कारण नहीं रही हैं? यदि रही हों तो उस प्रमाद को अविलम्ब हटा देने में तत्परता बरतनी चाहिए, ताकि वैसी दुर्घटना की पुनरावृत्ति भविष्य में न हो, ठोकर लगने का दण्ड भविष्य में अधिक सतर्कता बरतने की चेतावनी देता है।
चिन्तन एवं कर्त्तृत्व एक तरह का होता है और दुर्जनों का दूसरी तरह का। इसमें दोनों के शरीर और मन सर्वथा निर्दोष होते हैं। अन्तः प्रेरणा का निर्देश बजाते रहना भर उनका काम है। इसलिए शरीर को दुष्कर्म करने या मन को दुर्बुद्धिग्रस्त होने का जो दोष दिया जाता है वह अवास्तविक है। इन दोनों वाहनों को प्रेरणा एवं दिशा देने का काम अन्तःकरण रूपी सारथी का है।
चिन्तन घटाटोप की तरह छाये रहना। सामान्य जीवन में आत्म सत्ता शरीर रूप में ही काम करती है अस्तु अपना आपा शरीर मात्र ही अनुभव होने लगता है। शरीर से सम्बन्धित समस्याओं का विस्तार अत्यधिक है। उनके खट्टे मीठे स्वाद भी चित्र−विचित्र हैं और वे सभी बड़े आकर्षक हैं। यों प्रिय अप्रिय स्तर की परस्पर विरोधी अनुभूतियाँ सामने आती हैं, पर वे दोनों ही अपने−अपने ढंग के गहरे प्रभाव चेतना पर छोड़ती हैं।
चिन्तन प्रक्रिया केन्द्रित किये रहने के लिए अभ्यस्त न किया जा सके।
चिन्तन, मनन इसी के साथ−साथ भी चल सकता है और ऐसा भी हो सकता है कि पढ़ते समय प्रेरक तथ्यों को नोट करते रहा जाय और पीछे अवकाश के साथ यह मंथन किया जाय कि अपने लिए उस परामर्श में से कितना और किस प्रकार अपनाये जाने योग्य हो सकता है। जो सम्भव हो उसकी रूपरेखा बनाने के लिए कल्पना शक्ति दौड़ाई जानी चाहिए और आज की अपेक्षा कल अधिक आदर्शवादिता अपनाये जाने का ताना-बाना बुनना चाहिए।
चिन्तन एकाग्र नहीं हो सकता जिस पुष्प की वह गन्ध है उसकी आकृति भी अनचाहे ही सामने आती रहेगी। ध्यान में आकृति से पीछा नहीं छूट सकता। मस्तिष्क की बनावट ही ऐसी है कि वह निराकार कहलाने वाले चिन्तन को भी आकृतियाँ बना कर ही आगे चलता है। वैज्ञानिक के गहरे चिन्तन को निराकार कहा जाता है, पर वस्तुतः वह भी जो सोचता है उसमें कल्पना क्षेत्र की एक पूरी प्रयोगशाला सामने रहती है और प्रयोगात्मक हलचलें आंधी−तूफान की तरह अपना काम कर रही होती हैं। अन्तर इतना ही होता है कि वह स्थूल प्रयोगशाला के उपकरण छोड़ कर वही सारा प्रयोग कृत्य काल्पनिक प्रयोगशाला में कर रहा होता है ध्यान में आकृति से पीछा छुड़ाना सम्भव नहीं हो सकता अस्तु किसी को साकार−निराकार के वितंडावाद में न पड़ कर ध्यान धारणा के सहारे आत्म चिन्तन का प्रयोजन पूरा करना चाहिए।
चिन्तन का बहुत−सा भाग निरर्थक कामों में खर्च होता रहता है। कुछ हलचलें तो ऐसी होती हैं जिन्हें निरर्थक कहा जा सकता है और कुछ ऐसी होती हैं जिनसे अनर्थ जुड़ा होता है। व्यसन, गप्पबाजी, आवारागर्दी, यारवाशी, मटरगश्ती, ताश, चौपड़ जैसे काम ऐसे ही हैं जिनसे किसी प्रकार का लाभ नहीं। इन्हें मनोरंजन भी नहीं कह सकते। स्वस्थ, मनोरंजन दूसरे होते हैं जो आनन्द, उल्लास और प्रेरणा उत्पन्न करते हैं।
चिन्तन के लिए जो दिशा सौंपी गई है उसी की परिधि में अपना श्रम नियोजित रखे। निरर्थक सोचने में रंच मात्र भी दौड़−धूप न करे। अभीष्ट प्रयोजनों की पूर्ति के लिए कितने साधन जुटाये जाने हैं− कितने अवरोधों को हल किया जाना है इसके लिए सोचने का सुविस्तृत क्षेत्र सामने पड़ा है फिर उसी में सोचने विचारने की बात को सीमित क्यों न रखा जाय? जो न तो आवश्यक है और न वर्तमान परिस्थितियों में सम्भव, ऐसी उड़ानें उड़ने से मस्तिष्क को रोका जाना चाहिए। वह रोक−थाम तभी हो सकती है जब चिन्तन के लिए निर्धारित क्षेत्र बना कर दिया जाय और उसके लिए आवश्यक साधन सामग्री प्रस्तुत की जाय।
चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की प्रक्रिया (3) दिव्य−सत्ता केन्द्र से मिलने वाले विशिष्ट अनुदान जो साधकों की श्रद्धा एवं सम्वेदना के आधार पर ग्रहण किये जाते एवं फलित बनते हैं।
चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व को अपनाये रहने का निर्देश हुआ है। कन्धे पर, हृदय पर, कलेजे पर, पीठ पर चारों ओर से काया के महत्वपूर्ण भाग को लपेटा जाता है। इसका अर्थ है। मानवता के उच्चस्तरीय आदर्शों का भार कन्धे पर वहन किया जायगा, हृदय में धारण किया जायगा, कलेजे में समा लिया जायगा, पीठ पर लादा जायगा। सद्ज्ञान की शिला शरीर किले के सर्वोच्च स्थान पर−शिर पर फहराती रहे और यज्ञीय जीवन जीने का−व्रत निबाहने को स्मरण दिलाते रहने वाला यज्ञोपवीत धारण किया जाय−वह प्रतीक प्रेरणा का उपयुक्त माध्यम है।
चिन्तन और आदर्श की उदात्त रीति−नीति अपनाने वाले ही इस महान् जीवन−लक्ष्य को प्राप्त करते देखे जाते हैं।
चिन्तनक्रम अस्तव्यस्तता में भ्रमण नहीं करता और बिना ननुनच किये अपने निर्धारित क्रम में जुटा रहता है।
चिन्तन,मंथन, अनुभव और कठिनाइयों के साथ जूझते हुए चिरकाल तक प्रयास जारी रखने का निश्चय जैसे अनेकों मानसिक उपक्रम जुड़े होते हैं।
चिन्तन यथार्थवादिता पर निर्भर होना चाहिए और भावी प्रगति के लिए आज जो किया जाना सम्भव है, उसी पर ध्यान केन्द्रित रहना चाहिए।
चिन्तन को सुख कहा जा सकता है। उत्थान−पतन की दोनों धाराएँ अपनी ही मान्यताओं और रुचियों की चाल लेकर सीधी−उलटी दिशाओं में प्रवाहित होती हैं। उन्हीं के कारण देवत्व प्राप्त होता है और वे ही हमें दानव स्तर का बना देती हैं।
चिन्तन का महत्व और माहात्म्य।
चिन्तन ही स्वर्ग है। द्वितीय−राग−द्वेष रहित सुसन्तुलित स्नेह, सद्भाव। तृतीय−महत्वाकाँक्षाओं की मोड़−जीवन का काया−कल्प (4) सद्ज्ञान के तीन लेख हैं। प्रथम −कर्मयोग की सर्वसुलभ साधना। द्वितीय−सफलता के लिए प्रखर कर्म और उसके लिए संकल्प बल चाहिए।
चिन्तन मनःक्षेत्र पर छाया रहे ऐसा ही अभ्यास लेकर चलना चाहिए। ध्यान इसी को कहते हैं उपासना में ध्यान अनिवार्य है। यदि उसे छोड़ कर मात्र क्रिया−कृत्य ही किये जा रहे होंगे तो मन इधर−उधर भागता रहेगा और अधूरा शरीर कर्म ही पूजा−पाठ के नाम पर अपनी लंगड़ी−लूली गाड़ी घसीट रहा होगा।
चिन्तन का सही तरीका मालूम न होने से लोग जीवन समस्याओं पर उथले, ओछे और गलत ढंग से विचार करते हैं फलतः कठिनाइयों के समाधान तो मिलते नहीं उलटे चिन्तन की विकृति से ऐसी गतिविधियाँ बन पड़ती हैं जो विपत्ति को और अधिक बढ़ा देती हैं। चिन्ता, निराशा, उद्वेग, आवेश, भय, आशंका, सनक जैसे विकृत चिन्तन एवं काम−क्रोध, लोभ−मोह, मद−मत्सर जैसे दुर्गुण मिल कर किसी का भी मस्तिष्क अर्द्धविक्षिप्त जैसा बना सकते हैं, ऐसे व्यक्तियों का सोचना और करना प्रायः अनुपयुक्त ही होता है। फलतः उनके व्यवहार एवं प्रयासों की उलटी प्रतिक्रिया होती है। और झल्लाहट से ग्रसित व्यक्ति प्रायः इसी प्रकार के बड़बड़ाये मानसिक स्तर के होते हैं।
चिन्तन की भ्रष्टता ने मनुष्य को अन्धा, अविवेकी, बहरा, अहंकारी, गूँगा कुण्ठाग्रस्त, मृतक, पराश्रित, दूसरों के लिए भार भूत बनाकर रख दिया है।
चिन्तन में उन तथ्यों का स्थान रहना चाहिए। सन्तान बढ़ाना भार लादना माना जाता चाहिए, जिनके बिना किसी का कोई हर्ज नहीं होता वरन् अन्य महत्वपूर्ण कार्य करने में उसी अनुपात में बाधा उत्पन्न होती है।
चिन्तन सर्वथा एकांगी है। बाह्य साधन अथवा व्यक्ति सुविधा तो उत्पन्न करते हैं, पर उन सुविधाओं का उपयोग कैसे किया जाय यह सर्वथा अपने ही दृष्टिकोण एवं व्यक्तित्व पर अवलंबित है। प्रचुर मात्रा में धन मिल जाने भर से कोई सुखी नहीं बन सकता धन का उपयोग यदि व्यसनों में उद्धत अवाँछनीयताओं में किया जायगा तो उसका परिणाम उससे भी बुरा होगा जो निर्धन स्थिति में रहने से होता है। इसी प्रकार शारीरिक बल से जहाँ उपयोगी पुरुषार्थ करके उपयोगी सफलताएँ प्राप्त की जा सकती हैं यहाँ सर्वनाशी कुकर्मों का भी ठाठ रोपा जा सकता है अपने लिए तथा दूसरों के लिए संकट उत्पन्न किया जा सकता है। बुद्धिबल, रूप सौन्दर्य, चतुरता, भरा-पूरा परिवार, धन सम्पत्ति, उच्च पद आदि जिन बातों को सुख साधना माना जाता है, वे ही कुपात्रों के हाथों में पहुँचकर दुरुपयोग में प्रयुक्त होते हैं और सुख देने के स्थान पर दुःखदायी संकट उत्पन्न करते हैं।
चिन्तन−मनन की यह विचारणा भी जुड़ी हुई है कि उन आदर्शों को अपने जीवन−क्रम में समाविष्ट करने की रूपरेखा किस प्रकार बन सकती है। सत्साहित्य पढ़ने का भी लाभ है। उनसे प्रकाश और दिशा मिलती है। पर सारा प्रयोजन इतने से ही पूरा नहीं हो जाता। सोचा यह भी जाना चाहिए कि महामानवों द्वारा प्रस्तुत परामर्शों को अपने जीवन−क्रम में किस हद तक और किस प्रकार उतारा जा सकता है।
चिन्तन क्षेत्र में उत्कृष्टता और क्रिया क्षेत्र में आदर्शवादिता अपनाने के लिए विवश कर सके। यही है उपासना का त्रिविधि स्वरूप। गायत्री मन्त्र में तीन व्याहृतियाँ इसीलिए हैं। आठ−आठ अक्षरों के तीन चरण होने के कारण इस महाशक्ति को त्रिपदा कहा गया है। उपासना के इन तीनों आधारों को अपना कर गायत्री मन्त्र के सहारे अथवा कोई और अवलम्बन अपना कर ईश्वर की साकार निराकार जो भी उपासना अपनाई जायगी निश्चित रूप से सफल होगी और अभीष्ट सत्परिणाम उत्पन्न करेगी।
चिन्तन और शक्ति की बर्बादी ही कहना चाहिए। बारीकी से देखा जाय कि कहीं अपना समय भी ऐसी निरर्थकता में नष्ट तो नहीं होता। यदि होता हो तो उसे तुरन्त रोका जाना चाहिए और उस उपयोगी बचत को किसी महत्वपूर्ण काम में लगाने की बात सोचनी चाहिए।
चिन्तन से जो निष्कर्ष निकाले हैं वे बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। उन्हें भारत को अपनाया था और उस आधार पर सर्वतोमुखी उत्कर्ष का लाभ उठाया था।
चिन्तन क्षेत्र को पकड़−जकड़कर बैठी रहेंगी। ईश्वर प्राप्ति की आत्मिक प्रगति की महा यात्रा आरम्भ हुई तब माननी चाहिए जब उत्कृष्टता का जीवन−लक्ष्य निर्धारित कर लिया जाय। अन्यथा साँसारिक मनोकामनाओं की मनौती मनाने के लिए पूजा−पाठ की उपहासास्पद विडंबना तो सर्वत्र फैली पड़ी है ही।
चिन्तन के क्षेत्र में इतनी भ्रान्तियाँ इन दिनों घुस पड़ी हैं कि उनने ईश्वर के राजकुमार मनुष्य को नरक−कीट जैसी दयनीय स्थिति में पटक दिया है। परिष्कृत चिंतन के अभाव में अवाँछनीय मान्यताएँ हर क्षेत्र में घुस पड़ी हैं और उन्होंने ऐसी अगणित विपत्तियाँ तथा समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं जो न टाले टलती हैं न सुलझाये सुलझती हैं। चिन्तन की भ्रष्टता ने मनुष्य को अन्धा, अविवेकी, बहरा, अहंकारी, गूँगा कुण्ठाग्रस्त, मृतक, पराश्रित, दूसरों के लिए भार भूत बनाकर रख दिया है।
चिन्तन, आत्म−सुधार आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की चतुर्मुखी चेष्टा अमुक समय से ही नहीं, वरन् हर घड़ी अपनानी पड़ती है कुशल अध्यापक की तरह अपनी ही अन्तरात्मा को कठोर समीक्षक और अभिनव मार्ग−दर्शक की तरह नियुक्त करना पड़ता है। वह आत्म-मंथन कुछ दिन तो कठिन जान पड़ता है किन्तु कुछ ही समय में सब कुछ सरल और स्वाभाविक बन जाता है।
चिन्तन क्षेत्र की असम्बद्धता को निरस्त किया जा सकेगा तो कर्मक्षेत्र में प्रगतिशील दिशा अपनायी जा सकना सरल है। यदि मस्तिष्क में विकृतियाँ जड़ जमाये बैठी होंगी, तो फिर उपयोगी कार्य पद्धति का निर्धारण देर तक टिक न सकेगा। विकृत विचार प्रक्रिया भीतर ही भीतर कोंच−नोंच करती रहेगी और जो प्रगतिशील कार्यक्रम निर्धारित किया था वह कुछ ही समय चल कर शिथिलता के, उपेक्षा के गर्त में गिरता है और समाप्त हो जाता है।
चिन्तन को निराकार कहा जाता है, पर वस्तुतः वह भी जो सोचता है उसमें कल्पना क्षेत्र की एक पूरी प्रयोगशाला सामने रहती है और प्रयोगात्मक हलचलें आंधी−तूफान की तरह अपना काम कर रही होती हैं। अन्तर इतना ही होता है कि वह स्थूल प्रयोगशाला के उपकरण छोड़ कर वही सारा प्रयोग कृत्य काल्पनिक प्रयोगशाला में कर रहा होता है ध्यान में आकृति से पीछा छुड़ाना सम्भव नहीं हो सकता अस्तु किसी को साकार−निराकार के वितंडावाद में न पड़ कर ध्यान धारणा के सहारे आत्म चिन्तन का प्रयोजन पूरा करना चाहिए।
चिन्तन प्रवाह भी ऐसा वैभव है जिसका मूल्याँकन करने पर प्रतीत होता है कि उसमें अद्भुत चमत्कार भरी सम्भावनाएँ सान्निहित हैं। शरीर और मस्तिष्क की क्षमताओं को परिष्कृत बनाना और सदुपयोग बन पड़ना यदि सम्भव हो सके तो अभीष्ट मार्ग पर चलते हुए उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचा जा सकता है।
चिन्तन के लिए निर्धारित क्षेत्र बना कर दिया जाय और उसके लिए आवश्यक साधन सामग्री प्रस्तुत की जाय।
चिन्तन एवं कर्तृत्व का परिवर्तन निश्चित रूप से मनुष्य को आन्तरिक दृष्टि से ऊँचा उठाता और दिव्य विभूतियों से सुसज्जित बनाता है। आत्मिक प्रगति का यही यथार्थ मार्ग है। सन्तोषी सर्वदा सुखी की उक्ति में यही तथ्य स्पष्ट होता है कि निरर्थक और अनर्थमूलक वासना और तृष्णा के जंजाल से मनःस्थिति को मुक्त कर लेने वाले व्यक्ति अपने को असाधारण रूप से हलका और सन्तुष्ट अनुभव करता है। उसी स्थिति में किसी के पास समय, श्रम, मनोयोग एवं धन की इतनी मात्रा खाली बच सकती है जिसके सहारे वह स्वयं पर- कल्याण की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण प्रगति कर सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-October
चिन्तन की दृष्टि से इसे आत्म-विस्तार कह सकते हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि तोड़ कर “आत्मवत् सर्व भूतेषु” की आत्मा बना लेने वालों का आचरण विश्व नागरिक जैसा होता है और वे परमार्थ प्रयोजनों को ही वास्तविक स्वार्थ साधन मानते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से ओत-प्रोत होकर वे अपना क्रिया-कलाप इस स्तर का बनाते हैं जिसके आधार पर लोक मंगल के महान प्रयोजनों में अपनी क्षमता संलग्न रह सके। यह आत्म विकास या आत्म विस्तार हुआ। अध्यात्मवादी इसी दिशा में प्रयत्नशील रहते और आगे बढ़ते हैं।
चिन्तन अपने साथ क्रिया-प्रक्रिया लेकर लक्ष्य की दिशा में अग्रसर होता है और बहुत अंशों में सफल ही होकर रहता है। छोटे-बड़े परिणाम में हर स्थिति के व्यक्ति को भावी कल्पनाएँ करनी और योजनाएँ बनानी पड़ती हैं। किसान अनुमान लगाता है कि अगले वर्ष अमुक कारणों से अमुक फसल बोने से अधिक लाभ हो सकता है। अस्तु वह अपने अमुक खेत में अमुक बीज बोने की तैयारी बहुत विचार मन्थन के बाद आरम्भ करता है। इस प्रकार प्रायः हर स्तर के व्यक्ति भविष्य दर्शन का प्रयत्न करते हैं- कल्पना तथ्य और अनुभव का समन्वय ऐसे निष्कर्ष निकालता है जो सचाई और सम्भावना के बहुत कुछ समीप होते हैं।
चिन्तन को बदला जा सके तो प्रवृत्तियाँ उलटेंगी फलतः अंधकार को निरस्त करने वाला नवयुग का स्वर्णिम प्रभात उदय होते हुए हर किसी को दृष्टिगोचर होगा।
चिन्तन की एकाग्रता का ही परिणाम है कि लोग अपने विषय के विशेषज्ञ बनते और सद्विषयक सफलता के उच्चशिखर पर जा पहुँचते हैं।
चिन्तन करने पर तथ्य सर्वथा उलट जाते हैं। जितनी गहराई में उतरते हैं उतनी ही यह सचाई सामने आती है कि मनुष्य की मौलिक विशेषता सद्भावना है इसीलिए उस की इस प्रधान महत्ता को मनुष्यता का नाम दिया जाता रहा है।
चिन्तन कर्तृत्व एवं जीवनयापन के क्रम प्रकरण में भी परिवर्तन किया होगा इतने पर भी उसकी मूल सत्ता-जिसे ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कला-कृति कहा जाता है आरम्भ से ही अपनी मौलिक विशेषताओं को साथ लेकर जन्मी होगी और उन्हें पूर्णता का जीवन-लक्ष्य प्राप्त करने तक अपने अन्तरंग में धारण ही किये रहेगी।
चिन्तन से बचा जा सके, निर्धारित लक्ष्य की परिधि में ही विचार प्रक्रिया को नियन्त्रित किया जा सके तो तद्विषयक बौद्धिक प्रगति आश्चर्यजनक रीति से होती देखी जा सकती है। मन्द बुद्धि समझे जाने वाले लोग भी अपनी रुचि के विषय में प्रवीण पाये जाते हैं। इसका एक ही कारण है उन्होंने जिस दिशा में गहराई और रुचिपूर्वक सोचते रहने का प्रयास किया, उसी संदर्भ में उन्हें प्रवीणता उपलब्ध हो गई। पर चिन्तन की एकाग्रता का ही परिणाम है कि लोग अपने विषय के विशेषज्ञ बनते और सद्विषयक सफलता के उच्चशिखर पर जा पहुँचते हैं।
चिन्तन चेतना को जकड़ लेते हैं। इन्हें काटने के लिए विपरीत स्तर के सद्विचारों को पढ़ने, सुनने, सोचने, मनन करने एवं अपनाने के लिए प्रबल प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है। यह कार्य विचार संघर्ष का महाभारत खड़ा किये बिना और किसी तरह सम्भव नहीं हो सकता।
चिन्तन एवं कर्म की समाप्ति वाली आत्मिक अथवा कृत्रिम निःचेष्टता अभीष्ट हो सकती है। सामान्य स्थिति में तो यह अनुत्पादक ही है। इससे कोई लाभ दिखाई नहीं पड़ता। बहुधा ध्यान की तन्मयता में मस्तिष्कीय निःचेष्टता की अपेक्षा की जाती है, यह व्यर्थ है। उपयोगी यह है कि मात्र बिखराव को रोका जाय।
चिन्तन उखड़ा रहेगा। तन्मयता में विचारणा ही नहीं इच्छा, आकाँक्षा की ललक भी जुड़ी होती है। इस ललक को ही भक्तियोग कहते हैं। ज्ञानयोग और भक्तियोग का समन्वय मानसिक बलिष्ठता का-तन्मयता का उपार्जन करता है। इसे एकाग्रता की सिद्धि प्राप्त करने का अति महत्वपूर्ण अंग कह सकते हैं।
चिन्तन का प्रतिफल कर्म है और कर्म के वृक्ष पर परिणाम के फल-फूल लगा करते हैं। मनःस्थिति सुधरने के अतिरिक्त परिस्थिति बदलने का और कोई आधार हो ही नहीं सकता। नरक और स्वर्ग हम स्वयं ही तो सृजन करते हैं। भाग्य का निर्माता मनुष्य स्वयं ही तो है। चिन्तन को बदला जा सके तो प्रवृत्तियाँ उलटेंगी फलतः अंधकार को निरस्त करने वाला नवयुग का स्वर्णिम प्रभात उदय होते हुए हर किसी को दृष्टिगोचर होगा।
चिन्तन प्रणाली में परिवर्तन करने में वह स्वतन्त्र है। यही मनुष्य का कर्त्तव्य है।
चिन्तन और कर्तृत्व को यदि सँभाला, सुधारा न जाय तो पतन के गहरे गर्त में गिरने की गति निरन्तर तीव्र होती जाती है। भव-बन्धन निरन्तर कड़े होते जाते हैं। इस स्थिति से बचना हो तो अपने आपे के साथ प्रबल संघर्ष खड़ा करना होता है। अनायास ही इस दुर्गति से कोई छूट नहीं सकता।
चिन्तन करते हैं, पर वह होता सीमाबद्ध है। मस्तिष्कीय चंचलता तो बुद्धिमानों को भी मूर्खों की तरह असफल बनाती रहती है। अस्तु आत्मिक प्रगति के आकाँक्षी योगीजनों को शास्त्र ने चंचलता के निरोध का अनुशासन मानने के लिए कहा है। जो ऐसा कर सकेगा वही अपनी बहुमूल्य क्षमताओं को योजनाबद्ध रूप से अभीष्ट दिशा में लगा सकने में समर्थ हो सकेगा। सफलता के लिए यह प्रथम शर्त है।
चिन्तन और अनावश्यक कर्म से बचा जाय। इस प्रकार अपव्यय से बची हुई सामर्थ्य को अभीष्ट प्रयोजन में लगाकर सफलता की दिशा में द्रुतगति से आगे बढ़ा जा सकता है।
चिन्तन में उलझे रहते हैं जिनका अपनी वर्तमान परिस्थितियों के साथ कोई ताल मेल नहीं बैठता। असंगत और निरर्थक सोचते रहने से इस उपयोगी सामर्थ्य का अपव्यय होता है। जो विचार आज की समस्याओं के समाधान में योग दे सकते हैं-भविष्य निर्माण का पथ प्रशस्त करते हैं उन्हें उथलेपन के साथ नहीं वरन् गहराई और दिलचस्पी के साथ अपनाया जाना चाहिए। किन्तु जो अनुपयोगी एवं अनैतिक हैं, उन कल्पनाओं से पिण्ड छुड़ाते रहने में ही लाभ है। किन विचारों को मस्तिष्क में स्थान दिया जाय किन्हें न दिया जाय इनका फैसला पहले से ही कर लिया जाय तो प्रवेश उन्हीं को दिया जायगा जिनकी उपयोगिता असंदिग्ध है।
चिन्तन है। माता के स्वास्थ्य और सौन्दर्य की रक्षा के लिए समुचित ध्यान दिये जाने और सौन्दर्य की रक्षा के लिए समुचित ध्यान दिये जाने और उसकी सुरक्षा व्यवस्था बनाने की बात का औचित्य सहज ही समझ में आता है। इस सन्दर्भ में जो कुछ भी सम्भव हो सो किया ही जाना चाहिए, पर यहाँ ध्यान रखने योग्य बात यह भी है कि जिस बालक को आमन्त्रित करके बुलाया गया है उसके परिपोषण एवं विकास के सम्बन्ध में कृपणता क्यों बरती जाय?
चिन्तन क्षमता को प्रायः महत्व ही नहीं दिया जाता। लोग ऐसे चिन्तन में उलझे रहते हैं जिनका अपनी वर्तमान परिस्थितियों के साथ कोई ताल मेल नहीं बैठता। असंगत और निरर्थक सोचते रहने से इस उपयोगी सामर्थ्य का अपव्यय होता है। जो विचार आज की समस्याओं के समाधान में योग दे सकते हैं-भविष्य निर्माण का पथ प्रशस्त करते हैं उन्हें उथलेपन के साथ नहीं वरन् गहराई और दिलचस्पी के साथ अपनाया जाना चाहिए। किन्तु जो अनुपयोगी एवं अनैतिक हैं, उन कल्पनाओं से पिण्ड छुड़ाते रहने में ही लाभ है।
चिन्तन उपलब्ध कर सकते हैं। इस आधार पर मनुष्य को उन श्रद्धा सम्वेदनाओं का अनुदान मिलता है जिन्हें देव स्तर की कहा जाता है। इस अवतरण में व्यक्ति अधिकाधिक पवित्र एवं सुसंस्कृत बनता जाता है। आत्मीयता का विस्तार होने से संकीर्ण स्वार्थपरता झड़ने लगती है और उसके स्थान पर “सब को अपने में और अपने को सब में” देखने का दृष्टिकोण विकसित होता है। ऐसी स्थिति में दूसरों के दुःखों को बँटा लेने और अपने सुखों को बाँट देने की नीति अपनाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रह जाता।
चिन्तन और शारीरिक श्रम को अभीष्ट लक्ष्य की ओर पूरे उत्साह के साथ नियोजित किये रहे हैं, द्रुतगामी खरगोश से मन्दगामी कछुए ने बाजी जीती थी, यह ईसप की नीति कथा प्रायः सभी ने सुनी है। कछुआ अपनी बुद्धि और क्रिया को एक ही दिशा में नियोजित किये रहा और अधिक समर्थ खरगोश से आगे पहुँचा। खरगोश इसलिए हारा कि चंचलता उसे घेरे रही और अपने समय तथा क्रिया कलाप को अस्त व्यस्त ढंग से बखेरता हुआ उपहासास्पद और असफल बनकर रह गया। एकाग्रता और क्रमबद्धता का उसे अभ्यास रहा होता तो कछुआ की तुलना में उसी को बाजी जीतने का अवसर मिलता। मनुष्य जीवन को आये दिन मिलने वाली सफलताओं और असफलताओं के पीछे प्रायः यही तथ्य काम करता पाया जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-July
चिन्तन की दिशाधारा में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता पड़ेगी। स्कूली शिक्षा से लेकर साहित्य कला और प्रचार तन्त्र के समस्त साधनों को ऐसे लोक शिक्षण में लगाना चाहिए जिसके आधार पर जीवन के उच्चस्तरीय मूल्यों को समझने और निर्वाह करने की प्रेरणा मिल सके। समाज का ऐसा पुनर्गठन होना चाहिए, जिसमें बड़े कुटुम्बों के रूप में लोग मिल−जुल कर रहें और हिल-मिलकर काम करने, बाँटकर खाने और स्नेह सूत्र में बंधकर पारस्परिक सहायता में संलग्न रह सकें।”
चिन्तन के परिष्कार का अवसर ही नहीं मिलने दे सकती थीं। सभ्यता ही है जिसने उसे आदर्श अपनाने और मर्यादा पालन के लिए प्रोत्साहित किया। यही था वह सभ्यता का अवलम्बन जिसके सहारे आदिकाल में नर-वानर को आज के समुन्नत मानव के स्तर तक पहुँचने का श्रेय प्राप्त हुआ है।
चिन्तन के आधार पर ज्ञानयोग की साधना की जाती है और ब्रह्म दर्शन का लाभ मिलता है। पूजा, उपासना का विधि-विधान भक्तियोग के अन्तर्गत आता है। भक्ति ईश्वर की की जाती है। इसलिए सर्वत्र “ईश्वर भक्ति” शब्द ही प्रयोग में आता है। अपनी भुलक्कड़ चेतना को झकझोरने और उसे विकासोन्मुख बनाकर मनोकामना पूर्ति का वरदान दे सकने योग्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की नीति अध्यात्म की सच्ची साधना है, जिनके पास यह आधार मौजूद है वे सामान्य स्थिति में रहते हुये भी देवोपम जीवन का आनंद ले सकते और उस आलोक से असंख्यों को लाभान्वित कर सकते हैं। यही सच्चे अर्थों में अध्यात्म का चमत्कार है।
चिन्तन दोष है जिसे सुधार कर अपव्यय को उपयोगिता की दिशा में मोड़ा जा सकता है।
चिन्तन को सीमाबद्ध, क्रमबद्ध एवं दिशाबद्ध भी किया है। कल्पना शक्ति, संकल्प शक्ति, तुलनात्मक समीक्षा दृष्टि, दूरगामी परिणामों की अनुभूति, समाज-निष्ठा, चरित्र-निष्ठा जैसी विशेषताओं को अति मानस का विकास कह सकते हैं। विकास का यही वह केन्द्र बिन्दु है जहाँ से पशु और मनुष्य के बीच मौलिक अन्तर आरम्भ होता है। व्यक्तित्व की अनुभूति को ही आत्मा कहते हैं। निकृष्ट स्तर के जीव क्रिया तो बहुत करते हैं, पर अपने आपे के सम्बन्ध में निजी तौर से कुछ सोच नहीं पाते।
चिन्तन, मनन किया जाता है।
चिन्तन के सारे साधन झोंक देने पर भी अभावों की पूर्ति होती नहीं दीखती। अत्यधिक व्यस्त बनते जाने पर भी जो पल्ले पड़ता है वह आकाँक्षाओं की तुलना में बहुत कम पड़ता है। फलतः मनुष्य को अतृप्तिजन्य खिन्नता के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। व्यस्तता से भी तो तुष्टि नहीं मिलती। तनाव और खीज के कारण जीवन सम्पदा की पूँजी बेतरह और असमय चुकती चली जाती है।
चिन्तन उसका परितोष ध्वंस में देखता है। वह अपेक्षाकृत सरल है। एक बालक भी माचिस की तीली लेकर आग लगा सकता है और पूरे घर, गाँव को भस्म कर सकता है। आतंकवादी आये दिन ऐसे ही उत्पात करते रहते हैं। और ध्वंस के द्वारा अपनी विशिष्टता सिद्ध करते रहते हैं।
चिन्तन को ‘सत्यं शिवं सुन्दरं’ की अनेकों कलात्मक भाव-सम्वेदना के रसास्वादन का अवसर मिलता है।
चिन्तन के प्रति रोष प्रकट करने के स्थान पर उन्हें सहन करने तथा कभी-कभी तो प्रोत्साहन करने तक की प्रवृत्ति देखी जाती है। यह सब थोड़ी ही मात्रा में क्यों न हो है भयंकर? छोटी चिनगारी भी कभी व्यापक विध्वंस खड़ा कर सकती है। सभ्यता के प्रति अनास्था बढ़ती गई और उस खतरे को न समझा गया तो इसकी प्रतिक्रिया वैसी ही होगी जैसी कि अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की।
चिन्तन और आचरण के पीछे कर्तव्य-पालन की आस्था काम करती है। इस आस्था को व्यवहार में परिणत होने को जितना ही अवसर मिलता है उतना ही सन्तोष होता है, मानवतावादी सज्जनोचित अनुकरणीय चरित्र-निष्ठा जिस अनुपात से फलवती होती है उसी अनुपात से सन्तोष मिलेगा।
चिन्तन की ही प्रतिक्रिया है। इन्हें सभ्यता की प्रगति के अतिरिक्त और कोई नाम नहीं दिया जा सकता।
चिन्तन अहंमन्यता के आवेश में और आधा आत्महीनता जन्य निराशा के अवसाद में नष्ट होता चला जाता है। दूरदर्शिता, विवेकशीलता, उदारता और आत्मसंयम जैसी विभूतियाँ क्षीण होती चली जा रही हैं। फलतः मनुष्य और मनुष्य के बीच का स्नेह, सहयोग, शिष्टाचार की विडम्बना बनता चला जा रहा है।
चिन्तन करने का अधिकार है, रुचि के अनुसार व अपना कार्य कर सकता है। जिसके लिए अनुकूल वातावरण की आवश्यकता है। लिंकन जब अपना खेत जोत रहे थे तो अचानक किसी अज्ञात शक्ति ने उन्हें पुकारा लिंकन यह काम तेरे योग्य नहीं है, आत्मा की आवाज को सुना, मनन किया और वहीं पर बैलों की जोड़ी को छोड़कर निकल पड़े, विकास का द्वार खटखटाने; जिसका नतीजा दासों को मुक्त करवाना था।
चिन्तन और बाहर आदर्श कर्तृत्व सक्रिय रहता है। तदनुसार भीतर शान्ति की मनःस्थिति और बाहर सुख भरी परिस्थिति भरी-पूरी दृष्टिगोचर होती है। स्वर्ग इसी स्थिति का नाम है। जो ऐसी भूमिका में निर्वाह करते हैं। उन्हें देवता कहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-March
चिन्तन प्रक्रिया को प्रस्तुत करना, यही है वह उत्तरदायित्व जो विचारकाल अध्यात्मवेत्ताओं को निवाहना चाहिए। कारण जितना गहरा है समाधान भी उसी स्तर का होना चाहिए। यदि योग को उथले क्रिया काण्डों तक सीमित कर दिया गया तो निकट भविष्य में इस दिशा में उत्पन्न हुआ आकर्षण समाप्त हो जायगा और वह निराशा नास्तिकता से भी महंगी पड़ेगी। नास्तिकता में यह गुंजाइश थी कि आस्तिकता यदि सच निकली तो उसमें आशा की किरणें विद्यमान हैं पर यदि आस्तिकता को भी खोखली मान लिया गया तो फिर उससे उत्पन्न हुई अनास्था को मिटा सकना कठिन हो जायगा। योग प्रचारकों को इस खतरे का भी ध्यान रखना चाहिए और अपनी योगशिक्षा में उस दार्शनिकता का समन्वय करना चाहिए जो उद्विग्न लोक मानस को समुचित समाधान दे सके।
चिन्तन की विकृतियाँ ही हमें अशान्त बनाये रहती हैं। सन्तान न होने पर कितने ही व्यक्ति दुःखी रहते हैं जबकि उत्तरदायित्वों का बोझ हलका होने के कारण उन्हें सन्तान का भार वहन करने में बेतरह पिसते हुए लोगों की तुलना में अधिक प्रसन्न होना चाहिए था। इसी प्रकार अनेकों अनावश्यक महत्वाकाँक्षाएँ दुःखी बनाये रहती हैं। जिनके जीवन−क्रम का सामान्य निर्वाह क्रम रुकता नहीं। ऐसी अनावश्यक महत्वाकाँक्षाओं का− तृष्णाओं का बोझ आसानी से हलका किया जा सकता है और सादगी जीवन का आनन्द लिया जा सकता है।
चिन्तन की विकृति मनुष्य के चेहरे पर छाई खीज और मस्तिष्क में भरी उद्विग्नता के अनुपात से नापी, आँकी जा सकती है।
चिन्तन को उत्कृष्टता के साथ जोड़ा जा सके तो सामान्य स्थिति का निर्धन व्यक्ति भी उस स्तर का बन सकता है जिसे सन्त, सज्जन एवं श्रद्धास्पद कहा जा सके।
चिन्तन की इस निषेधात्मक धारा को विवेकपूर्ण पर्यवेक्षण से बहुत कुछ हलका किया जा सकता है। भविष्य में क्या होना है? किसी को पता नहीं, यदि यही बात हैं तो विपत्ति की आशंका करने की अपेक्षा उज्ज्वल सम्भावनाओं की कल्पना क्यों न की जाय और निराशा के स्थान पर आशा को क्यों न अपनाया जाय? साथियों के दोष ही दोष क्यों देखे जाय? उनमें जो गुण हैं उन्हें क्यों न समझें?
चिन्तन की दिशा जिस ओर मुड़ती है उसी प्रकार की गतिविधियाँ विनिर्मित होने लगती हैं, कौन किस प्रकार का जीवन जी रहा है इसे देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उसकी चिन्तन धारा किस दिशा में बह रही है। जीवन का स्वरूप जो कुछ भी है, व्यक्ति के चिन्तन की प्रतिक्रिया भर है।
चिन्तन का परिष्कृत स्तर मन का भार हलका करने में बहुत सहायक सिद्ध हो सकता है। खोज करने पर प्रतीत होगा कि दुःखी मनःस्थिति का बहुत बड़ा कारण सही ढंग से सोच सकने में त्रुटि रहना ही था। उसे सुधार लेने पर अधिकाँश समस्याओं का हल मिल जाता है फिर भी जो रह जाय उसे हर किसी को कुछ न कुछ कमी, कठिनाई रहने के सामान्य क्रम को ऐसे ही हँसते−खेलते सहन किया जा सकता है।
चिन्तन की इस नई मोड़ ने संसार का ध्यान अध्यात्म की ओर आकर्षित किया है। चूँकि भारत योग एवं अध्यात्म के उत्पादन, उत्थान एवं परीक्षण प्रयोग का क्षेत्र रहा है इसलिए जब योग अध्यात्म की बात सोची जाती है तो उसे समझने के लिए भारत की ओर सहज ही सबका ध्यान चला जाता है। विदेशों में तब और भी अधिक प्रसन्नता होती है जब कोई भारतीय योग प्रचारक ‘योगी’ के रूप में वहाँ पहुँचता है। वे घर आये देवता से बहुत कुछ जानने, सीखने और पाने की आशा करते हैं। अस्तु योगविद्या के छात्रों और शिष्यों की सहज ही भीड़ लग जाती है।
चिन्तन, सारा क्रियाकलाप और सारा शारीरिक, मानसिक अस्तित्व इन घटकों के ऊपर ही अवलम्बित रहता है। देखने में सभी का मस्तिष्क लगभग एक जैसा दीखेगा पर उसकी सूक्ष्म स्थिति में पृथ्वी, आकाश जैसा अन्तर दीखता है, उसके आधार पर व्यक्तियों का घटिया बढ़िया होना सहज आँका जा सकता है। यही सूक्ष्मता कुण्डलिनी के सम्बन्ध में व्यक्त की जा सकती है। मूलाधार, सहस्रार, ब्रह्म−नाड़ी, इड़ा पिंगला इन्हें शल्य−क्रिया द्वारा नहीं देखा जा सकता। यह सारी दिव्य रचना ऐसी सूक्ष्म है, जो देखी तो नहीं जा सकती पर उसका अस्तित्व प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है।
चिन्तन और प्रचलन का वह सारा ही ढाँचा बदलना पड़ेगा जो अवांछनीयताएँ उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी है।
चिन्तन की प्रतिक्रिया भर है।
चिन्तन जब मस्तिष्क में उथल−पुथल पैदा कर देता है, तब उन अवयवों का दर्शन यदि भावनात्मक हलचल को उच्छृंखल बनादे तो आश्चर्य ही क्या है? यहाँ यह रहस्य जान लेना ही चाहिए। मूत्र स्थान में बैठी हुई कुण्डलिनी शक्ति प्रसुप्त स्थिति में भी इतनी तीव्र है कि उसकी प्रचण्ड धाराएँ खुली प्रवाहित नहीं रहने दी जा सकतीं। उन्हें आवरण में रखने से उनका अपव्यय बचता है और अन्यों के मानसिक सन्तुलन को क्षति नहीं पहुँचती। छोटे बच्चों को भी कटिबन्ध इसलिए पहनाते हैं।
चिन्तन और कर्तृत्व के दोनों पैरों के सहारे से किसी भी दिशा में− कितनी ही लम्बी यात्रा भली प्रकार कर सकते हैं। दूसरे तो यत्किंचित् सहारा भर ही दे सकते हैं। उनके बलबूते कोई बड़ी योजना बनाना और उसके पूरा होने का स्वप्न देखना निरर्थक है।
चिन्तन और मन्थन की सर्वत्र आवश्यकता समझी जाती है। परस्पर चर्चा इसी प्रसंग पर होती है और स्थिति के अनुरूप अगले कदम किस प्रकार उठें, इसका निर्धारण होता है। यही रीति−नीति मिशन के संचालकों की रही है और इसी का अनुसरण परिजनों एवं शाखा−संगठनों द्वारा किया जाता रहा है। इस बार स्वर्ण जयन्ती वर्ष रहा तो उत्साह की मात्रा भी बढ़ी हैं− आयोजन भी बढ़े हुए हैं और भावी प्रयासों के निश्चय व्यक्त करने वाले समाचार भी अधिक बड़े और अधिक संख्या में आये हैं। यह सन्तोष की बात है कि अपने आयोजनों के पीछे प्रदर्शन एवं विनोद का नहीं, वरन् युग देवता के चरणों पर अपने अनुदानों को अधिकाधिक मात्रा में समर्पित करना ही उद्देश्य रहता है।
चिन्तन का शिकार है। इसकी जीवन नाव दृष्टि दोष के भँवर में फँसकर डूबने की तैयारी कर रही है। पटरी से उतरा हुआ इञ्जन जमीन में धँस जाता है, तब उसके लिए न आगे बढ़ना सम्भव होता है न पीछे हटना। कलपुर्जों की दृष्टि से उसकी बढ़ी−चढ़ी समर्थता तब निरर्थक सिद्ध होती है और वह अपने उद्धार के लिए क्रेन या जैक की सहायता चाहता है। रेलगाड़ी कीमती होती है।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्त्व का अधिकाधिक समावेश करके व्यक्तित्व की प्रखरता उत्पन्न करने में तत्परतापूर्वक संलग्न है। साथ ही अपने समय की समस्याएं सुलझाने के लिए अपने अंशदान, योगदान देने के लिए अनुकरणीय परम्पराएँ प्रस्तुत करने के लिए तत्परता बरतने में भी पीछे नहीं रह रहा है। यही अपना परिवार है। संख्या की दृष्टि से सही गणना तो नहीं हो सकी, पर अनुमान है कि जिन्हें हम लोग परिजन कहते हैं, उन प्रखर व्यक्तित्वों की गणना एक लाख से कम नहीं है।
चिन्तन का परिष्कार हुआ। मनोविकारों को धोया जा सकता है और मस्तिष्क की स्थिति ऐसी बन सकती है जिसमें मात्र देवत्व का ही साम्राज्य हो। यह प्रयत्न रासायनिक पदार्थों और विद्युत धाराओं के आधार पर भौतिक विज्ञानियों द्वारा किये जा रहे हैं। अध्यात्म विज्ञान द्वारा यह कार्य और भी अधिक ऊँचे एवं उपयोगी ढंग पर किया जाना सम्भव है।
चिन्तन की धारा उत्कृष्ट और क्रिया−प्रक्रिया आदर्श होती हैं तो अन्तःकरण में अपार संतोष और आनन्द भरा रहता है। कस्तूरी के हिरन को अपनी नाभि की महक से दशों दिशाएँ सुगन्धित दीखती हैं। यही स्वर्ग है। दर्पण में अपना ही प्रतिबिम्ब दीखता है। अपनी सज्जनता बाहर के लोगों की श्रद्धा, सहानुभूति एवं सहायक योगदान लेकर वापस लौटती है।
चिन्तन के क्षेत्र में परिवर्तन किये जाने चाहिएं और प्रचलनों को बदलना चाहिए अन्यथा अपराधी दंड पाते रहेंगे और अपराध बढ़ते रहेंगे।
चिन्तन के लिए− ब्रह्म शक्ति के संचय के लिए अवसर ही नहीं मिलता। इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव मूलाधार में भरी प्रचण्ड क्षमता को कार्य शक्ति में लगा दिया जाय तो मनुष्य पर्वत उठाने एवं समुद्र मथने जैसे कार्यों को कर सकता है। क्रिया−शक्ति मानव प्राणी में असीम है। किन्तु उसका क्षय कामुकता विषय−विकारों में होता रहता है। यदि इस प्रवाह को गलत दिशा से रोक कर सही दिशा में लगाया जा सके तो मनुष्य की कार्य−क्षमता साधारण न रहकर दैत्यों अथवा देवताओं जैसी हो सकती है।
चिन्तन से उद्विग्न मस्तिष्क अपनी कार्य क्षमता गँवा बैठता है− किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाता है और उबरने की राह पाने में अपंग, असमर्थ बन जाता है। उस स्थिति में प्रायः उलटे विचार ही सामने आते हैं जिन्हें अपनाने पर नई उलझनें पैदा होती हैं और दल−दल में अधिक गहरे पाँव फँसते जाते हैं।
चिन्तन मरोड़ा और कर्तृत्व मोड़ा गया था। यह दिव्य अनुदान कितना सार्थक सिद्ध हुआ−इससे व्यक्ति और समाज ने कितना लाभ उठाया यह सर्वविदित है।
चिन्तन में उत्कृष्टता और प्रखरता उत्पन्न करने के दोनों प्रयोजन पूरे होते हैं।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाकर कोई भी मनुष्य आन्तरिक प्रसन्नता और बाहर से सज्जनों का सद्भाव−सम्पन्न सहयोग पाकर यह अनुभव कर सकता है कि वह स्वर्गीय आनन्द का रसास्वादन कर रहा है। ऊर्ध्वगमन− ही स्वर्गारोहण है। पाण्डव इसी शान्त शीतलता की तलाश में हिमालय की चोटियों पर चढ़े थे। इस उपाख्यान में यह अलंकार व्यक्त किया गया है कि जितनी अधिक मात्रा में उत्कृष्टता अपनाई जायगी, अपनी स्थिति दूसरों की तुलना में उतनी ही ऊँची उठ जायगी और उतनी ही मात्रा में शान्त शीतलता का अनुभव होगा। स्वर्ग इसी प्रकार पाया जाता है।
चिन्तन किया जाय उतनी ही उसकी गरिमा और विलक्षणता स्पष्ट होती चली जाती है। बादलों की गरज से ऊँची इमारतें फट जाती हैं। आज की याँत्रिक सभ्यता जितना शोर उत्पन्न कर रही हैं उसके दुष्परिणामों से मानवजाति को पूरी न हो सकने वाली क्षति उठानी पड़ेगी। इस तथ्य से समस्त संसार चिन्तित है। अतिस्वन और जेट विमान आकाश में जितनी आवाज करते हैं उससे उत्पन्न होने वाली हानिकारक प्रतिक्रिया को सर्वत्र समझा जा रहा है और इन विशालकाय द्रुतगामी वायुयानों को कोलाहल रहित बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है।
चिन्तन धारा किस दिशा में बह रही है। जीवन का स्वरूप जो कुछ भी है, व्यक्ति के चिन्तन की प्रतिक्रिया भर है।
चिन्तन तो और भी अधिक गहरे दलदल में फँसा देता है। उज्ज्वल भविष्य की आशा छोड़ दी जाय तो फिर चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार दिखाई देगा और हलकी−सी कठिनाई को पार करना भी पहाड़ उठाने जैसा भारी मालूम पड़ेगा।
चिन्तन से लेकर भक्तियोग तक की सारी आध्यात्मिक साधनाएँ तथा मनोबल, आत्म−बल एवं संकल्प जन्य सिद्धियों का केन्द्रबिन्दु इसी स्थान पर है।
चिन्तन में थोड़ा हेर−फेर करके हम खिन्न, उद्विग्न जीवन को हँसता−हँसाता बनाने में अभीष्ट सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-December
चिन्तन ने ही हर क्षेत्र में भयंकर विपत्तियाँ खड़ी की हैं और समस्याएँ उलझाई हैं। इनका उपचार-विचार क्रान्ति के अतिरिक्त दूसरा कुछ हो ही नहीं सकता। ज्ञान-यज्ञ के नाम पर जन-मानस के परिष्कार का पुण्य प्रयास इसी प्रयोजन के लिए चल रहा है। भजन-पूजन के समतुल्य ही जीवन-क्रम में आदर्शवाद के इस समन्वय को भी आवश्यक समझा जाना चाहिए। इस दिशा में बरती गई उपेक्षा बताती है कि अध्यात्म को व्यवहार में उतारने की आवश्यकता नहीं समझी गई और अमुक कर्मकाण्डों को ही ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त करने का सस्ता नुस्खा समझने की भूल अपना ली गई।
चिन्तन का उपयोग भी करना पड़ता है और भावनाओं का भी। ब्रह्म विद्या का विशालकाय-कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। योग क्रियापरक नहीं विचारपरक है। उसकी परिधि में आत्मा और परमात्मा के बीच जुड़े हुए असंख्य सूत्रों का विविध आधारों पर गहन चिन्तन करना पड़ता है। दर्शनशास्त्र की रचना इसीलिए हुई है।
चिन्तन आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की सुनियोजित रीति-नीति का निर्धारण ध्यानयोग का एक महत्वपूर्ण विषय है।
चिन्तन को नैतिक एवं उपयोगी मर्यादाओं में बाँधने का-आदर्शवादी उत्कृष्टता अपनाने के लिए उपयुक्त प्रशिक्षण ब्रह्मविद्या के अन्तर्गत किया गया है। उसी आधार पर यह सम्भव हो सका कि सामान्य स्तर का मनुष्य तनुधारी जीव अपनी प्रतिभा एवं प्रखरता को समुन्नत बनाते हुए महामानव कहलाने का अधिकारी बने। जीवात्मा से क्रमिक विकास करते हुए महात्मा- देवात्मा एवं परमात्मा के स्तर तक पहुँचे। आत्म-विज्ञान के अन्तर्गत चेतना को समुन्नत बनाने वाले सभी प्रयास आते हैं। उन्हें अध्यात्म साधना कहते हैं।
चिन्तन चलता है उसे रज कहते हैं। सक्रियता मिलन की ही प्रतिक्रिया है। बिजली के दो तार अलग रहें तो निष्क्रियता रहेगी, पर जब वे मिलेंगे तो चिनगारियाँ छूटेंगी और विद्युत प्रवाह बह निकलेगा। रजस् मिलन की प्रतिक्रिया भर है उसका स्वतन्त्र अस्तित्व कुछ नहीं।
चिन्तन और भाव संवेदन से समुद्र में अधिकाधिक गहराई तक प्रवेश करते ही चला जाना पड़ता है।
चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व से मनुष्य ऊँचा उठता है। और ब्रह्म परायण व्यक्तियों को मिलने वाले आन्तरिक सन्तोष, उल्लास और बाह्य सम्मान, सहयोग का अधिकारी बनता है।
चिन्तन आदि के सहारे पूरा होता है। मस्तिष्कीय क्षमता विकास की उपयोगिता भी सर्वविदित है। इसीलिए अपनी-अपनी परिस्थिति के अनुसार स्कूली अथवा दूसरी प्रकार की शिक्षा पद्धति अपनाई जाती है और जानकारी, समझदारी बढ़ाने के लिए यथासम्भव प्रयत्न किया जाता है शिक्षा का दूसरा चरण जानकारी की कमी को पूरा करना है। इससे विचार शक्ति बढ़ती है, बुद्धि तीक्ष्ण होती है और व्यवहार कुशलता आती है। बौद्धिक विकास के लिए शिक्षा परक जो भी उपाय किये जाते हैं, वे सभी सराहनीय हैं।
चिन्तन में प्रखरता एवं पैनापन हो, वित्तेषणा एवं शोकेषणा का जो दमन कर लें। अपने विशाल परिवार में उपरोक्त स्थिति के जो व्यक्ति हों, वो अपनी मनःस्थिति ओर परिस्थिति का परिचय देते हुए पत्र-व्यवहार कर लें।
चिन्तन का समावेश है, जिसमें आत्मा का स्वरूप, लक्ष्य, कर्तव्य, तत्व-दर्शन के रूप में समझा जाता है और जीवन की सार्थकता के लिए उच्चस्तरीय मार्ग दर्शन मिलता है। अन्तः करण की आस्थाओं, आकांक्षाओं, अभिरुचियों, स्फुरणाओं, सम्वेदनाओं को परिष्कृत करने के लिए आवश्यक होता है वह ब्रह्मविद्या में सन्निहित सद्ज्ञान द्वारा ही सम्भव होता है। इसके लिए स्वाध्याय, सद्ज्ञान द्वारा ही सम्भव होता है। इसके लिए स्वाध्याय, सत्संग मनन, चिन्तन जैसे माध्यम अपनाये जाते हैं। कथा, प्रवचनों का सिलसिला इसी सन्दर्भ में चलता है।
चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। आत्म-चिन्तन और आत्म मन्थन पर विचार शक्ति को केन्द्रित करना होता है। भगवान बुद्ध और आत्मज्ञानियों को अपनी साधना का केन्द्र बिन्दु इसी को मान कर चलना पड़ा था। अध्यात्म की भाषा में इसे योग कहते हैं। योग का अर्थ है जोड़ना।
चिन्तन जैसे माध्यम अपनाये जाते हैं। कथा, प्रवचनों का सिलसिला इसी सन्दर्भ में चलता है। धर्म-शास्त्रों का- तत्व दर्शन का विशालकाय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है।
चिन्तन एवं कर्तृत्व को देवोपम बना दिया। जहाँ यह शर्त पूरी की गई है वहीं निश्चित रूप से ईश्वरीय अनुकम्पा की वर्षा भी हुई है, पर जहाँ फुसलाने का धूर्तता को भक्ति का नाम दिया गया है वहाँ निराशा ही हाथ लगी है।
चिन्तन चलता है। सृष्टि के मूलतत्व ब्रह्म को सत् कहा गया है और उसके आवरण, उपकरण को प्रकृति एवं तमस् कहते हैं। इस प्रकार प्रकृति और पुरुष की दो सत्ताएँ बनती हैं और इन्हें एवं तम की तात्विक स्थिति कह सकते हैं। यह द्वैत कहलाया। वस्तुतः इस संसार में जड़ चेतना-प्रकृति पुरुष-प्रकाश अन्धकार-सर्दी-गर्मी-जल-थल की तरह दो ही बड़े तथ्य हैं।
चिन्तन, रुझान, आहार, निर्वाह, प्रजनन, पुरुषार्थ समाज आदि का लेखा-जोखा तैयार किया जाए तो वह नृतत्व विज्ञान से किसी भी प्रकार कम न बैठेगा। फिर संसार भर में मछलियों की भी करोड़ों जातियाँ-उपजातियाँ हैं और उनमें परस्पर भारी मित्रता पाई जाती है। इन सबका भी पृथक-पृथक शरीर शास्त्र, मनोविज्ञान, निर्यात विधान एवं उत्कर्ष-अपकर्ष का अपने-अपने ढंग का विधिविधान है। यदि मछलियों की तरह ज्ञान और साधन मिले होते तो उनने अपनी जातियों-उपजातियों का उतना बड़ा ज्ञान भण्डार विनिर्मित किया होता जिसे मानव विज्ञान से आगे न सही पीछे तो किसी भी प्रकार नहीं कहा जा सकता था। बात अकेली मछली की नहीं है।
चिन्तन एवं कर्तव्य में अवाँछनीयताओं की भरमार। साधना का उद्देश्य है- व्यक्ति का काया-कल्प, चेतना का परिमार्जन-परिष्कार इतना बन पड़े तो अपना आपा ही कल्प-वृक्ष बन जाता है और स्वर्गीय उपलब्धियों को सहज ही प्रस्तुत करता है। कितने ही साधकों को विभिन्न देवताओं द्वारा विभिन्न प्रकार के वरदान मिलने के कथानक कथा-गाथाओं में पढ़ने सुनने को मिलते हैं। यह वरदाता इष्टदेव अपना उच्चस्तरीय अंतस् ही है। जो कल्पना के अनुरूप वेष बनाकर सामने आ खड़ा होता है।
चिन्तनशील माँस पिण्ड है। उसका क्रिया-कलाप पेट एवं प्रजनन पूर्ति की धुरी पर भ्रमण करता दीखता है। मन की लिप्सा, लोभ, मोह और अहंकार का खट-मिट्ठा रसास्वादन करने के लिए मचलती रहती है। महत्वाकाँक्षाओं में उछलता हुआ और निराशाओं से सिसकता जीवधारी ज्यों-त्यों करके मौत के दिन पूरे करता है। पदार्थ मिलते हैं और खिसक जाते हैं व्यक्ति जुड़ते हैं और बिछुड़ जाते हैं आशाओं और निराशाओं का –उपलब्धियों और असफलताओं का चक्र ऐसा है जिसका न आदि न अन्त।
चिन्तन और कर्तव्य रजस् स्तर का कहा जाता है।
चिन्तन और आत्म मन्थन पर विचार शक्ति को केन्द्रित करना होता है। भगवान बुद्ध और आत्मज्ञानियों को अपनी साधना का केन्द्र बिन्दु इसी को मान कर चलना पड़ा था। अध्यात्म की भाषा में इसे योग कहते हैं। योग का अर्थ है जोड़ना। यह चिन्तन पर प्रक्रिया है।
चिन्तन की विकृतियों के दुष्परिणाम प्रत्यक्ष हो रहे हैं। दूरदर्शी विवेक का दबाव कुमार्ग छोड़कर सन्मार्ग पर वापिस लौटने के लिए विवश करेगा। इसके बिना सर्वभक्षी विभीषिकाओं से छुटकारा पाने का कोई अन्य उपाय भी नहीं है। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का नव-युग आने ही वाला है । मनुष्य अपने चिन्तन और कर्तव्य का नये सिरे से निर्धारण करने ही वाला है।
चिन्तन और कर्तव्य का नये सिरे से निर्धारण करने ही वाला है। उज्ज्वल भविष्य का यही एकमात्र रास्ता है। भविष्यवक्ता देखते हैं कि अगले कुछ ही समय में अन्धकार का युग बीतेगा और उसके स्थान पर नव-युग का प्रकाश उदय होगा। यही है उपरोक्त भविष्यवादियों का निष्कर्ष।
चिन्तन को, आस्था-आकाँक्षा को, आत्मसत्ता को उस महानता के साथ जोड़ा जाता है जो सर्वसमर्थ और सर्वोपरि है। विषयानन्द की नगण्य सी अनुभूति से यह आभास मिल सकता है कि ब्रह्मानन्द कितना अधिक उल्लासपूर्ण हो सकता है। यह उपलब्धि योग साधना का ही प्रतिफल है। नाला गंगा में मिल कर गंगा बनता है-बूँद समुद्र में मिल कर समुद्र हो जाती है। स्त्री आत्म-समर्पण करके पति की प्राणबल्लभा बनती है।
चिन्तन पर प्रक्रिया है। आत्मा को परमात्मा से -जीव को ब्रह्म से -सामान्य के असामान्य से सम्बद्ध करने के लिए चिन्तन का उपयोग भी करना पड़ता है और भावनाओं का भी। ब्रह्म विद्या का विशालकाय-कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। योग क्रियापरक नहीं विचारपरक है। उसकी परिधि में आत्मा और परमात्मा के बीच जुड़े हुए असंख्य सूत्रों का विविध आधारों पर गहन चिन्तन करना पड़ता है।
चिन्तन करना पड़ता है। दर्शनशास्त्र की रचना इसीलिए हुई है। इसी परिधि में भावनाओं को उच्चस्तरीय प्रगति की दिशा में उभारना भी आता है। इसे भक्ति कहते हैं। प्रेम का निकृष्ट स्वरूप तो मोह और वासना के स्वरूप जैसा घटिया और घिनौना हो जाता है, पर उसकी ऊँची स्थिति आत्मीयता की संवेदनाओं को अधिकाधिक व्यापक बनाने के रूप में होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-September
चिन्तन तथा कर्तव्य को एकरूपता प्रस्तुत कर सकने वाला राजमार्ग बनाना पड़ेगा। जीवन और मरण के बीच और कोई विकल्प नहीं। सद्भावपूर्वक निर्वाह करने या मर-कट कर नष्ट हो जाने के अतिरिक्त शान्ति का और कोई मार्ग नहीं, मतभेद जितने ही बने रहेंगे विनाश का असुर उतना ही भयावह होता चलेगा।
चिन्तन तन्त्र की गति-विधियों का निरूपण निर्धारण करते हैं। इसके आगे की अति चेतन स्थिति बहुत ही अद्भुत है और उसके रहस्य समझने में अति कठिनाई उत्पन्न होती है। यों शरीर संरचना के घटकों का क्रिया-कलाप और पारस्परिक योग भी कम विचित्र नहीं हैं। ज्ञानेन्द्रियों के आधार पर जिस प्रकार मस्तिष्क की सूचनाएं मिलती हैं और उस विधान के अनुसार वह स्थिति का स्वरूप निर्धारित करता है वह तन्त्र भी कम विलक्षण नहीं है। शारीरिक और मानसिक हलचलों को मोटे रूप में देखा जाय तो बात दूसरी है अन्यथा थोड़ी गहराई में प्रवेश किया जाय तो प्रतीत होगा कि हमारी सामान्य गति-विधियों के पीछे कितनी असामान्य विधि-व्यवस्था काम कर रही है।
चिन्तन को अपनाये जाने की आवश्यकता जन-साधारण को समझाई जानी चाहिए।
चिन्तन तक सीमित न रह जायं वरन् उन्हें प्रस्फुटित होने का समुचित अवसर मिले हम सब के यही प्रयास तत्परतापूर्वक होने चाहिएं। इस संदर्भ में क्या किया जाना है इसकी संक्षिप्त सी न्यूनतम रूपरेखा ऊपर दी गई है। इसमें अधिकाधिक जिनसे जो कुछ आदर्शवादी गतिविधियाँ अपना सकना बन पड़े उन्हें उसके लिए बढ़-चढ़ कर साहस संजोना चाहिए। इस विशेष पर्व की सार्थकता और सफलता इसी में है।
चिन्तन की अद्भुत विशेषता उत्पन्न होती है। विचारों के आँधी-तूफान और भावनाओं के ज्वार भाटे किस आधार पर उठते हैं? आदतों और आकाँक्षाओं में इतनी विचित्रता एवं भिन्नता क्यों रहती है? प्राणियों में शरीर निर्वाह भर की कुशलता पाई जाती है, पर मनुष्य के मस्तिष्क में जो ज्ञान विज्ञान का भण्डार संजोये रह सकने योग्य जो स्वरूप बना हुआ है उसका कारण क्या है? मानवी मस्तिष्क की विचित्र स्थिति के लिए उत्तरदायी कौन है?
चिन्तन की प्रवृत्ति से जीवन-मरण के रहस्य का अनावरण होता है। उसे यह आभास मिलता है कि मानव को यहां वे सारी परिस्थितियां प्राप्त हैं जिनके सहारे सक्रिय होने पर वह अपनी विकास यात्रा आसानी से पूरा कर सकता है।
चिन्तन प्रक्रिया में कितना उतार-चढ़ाव रहता है- यह सर्वविदित है। एक समय की लोक रुचि-मान्यता दूसरे समय से भिन्न होती है लोगों का चिन्तन प्रवाह अपने समय में प्रायः एक ही दिशा में होता है। मनस्वी और स्वतन्त्र चिन्तकों के कुछ अपवाद तो सर्वथा पाये जाते रहते हैं पर सामान्यतः चिन्तन प्रवाह की धारा एक ही दिशा में बहती है। अपने समय में पूर्वजों के कथन को प्रमाणित मान लेने की श्रद्धा उखड़ रही है और तर्क तथा प्रमाणों पर आधारित बुद्धिवाद को मान्यता मिली है। किसी जमाने में त्याग, बलिदान और आदर्श-वाद अपनाने में एक, दूसरे से प्रतिस्पर्धा लगाता था और इस क्षेत्र में जो जितना सफल होता था उतना ही गौरव अनुभव करता था।
चिन्तन। दोनों से ही अपने-अपने ढंग के विद्युत -प्रवाह निसृत होते हैं। शरीर में घर्षणात्मक क्रिया होती है। हृदय की धड़कन, नाड़ी समूह में रक्त का आवागमन-फेफड़ों द्वारा श्वास का ग्रहण विसर्जन-माँस-पेशियों का आकुंचन-प्रकुंचन एक प्रकार का घर्षण उत्पन्न करता है और उन हलचलों से जो गर्मी उत्पन्न होती है उसे शरीरगत ऊर्जा कह सकते हैं। इसी के बल पर शरीर यन्त्र विभिन्न प्रकार के क्रिया-कृत्य करने में समर्थ होता है।
चिन्तन से सत्य की शोध की जा सकती है। सत्य को अपना कर ही एकता की ओर बढ़ा जा सकता है। इसके लिए पूर्वाग्रहों की खिड़कियाँ खोलकर उन्मुक्त निष्पक्ष चिन्तन को अपनाये जाने की आवश्यकता जन-साधारण को समझाई जानी चाहिए।
चिन्तन और कर्तृत्व का विनियोग भी अधिक मात्रा में किया जाना स्वाभाविक है। पूजा-पाठ के छुट-पुट प्रयोग बालकक्षा के छात्रों द्वारा विद्या प्राप्ति के लिए किया गया पट्टी-पूजन जैसा छोटा किन्तु अति उपयोगी प्रयास है। बात इतने भर से नहीं बन सकती। जप, ध्यान जैसे प्रयास आत्मिक प्रगति की दिशा में उठाये गये आरम्भिक चरण हैं इन्हें किसी किसान द्वारा बीज बोने के समतुल्य माना जा सकता है। यह आवश्यक तो है, पर पर्यवेक्षण करना और उन्हें नये सिरे से सुव्यवस्थित करने का नाम ही श्रेय पथ का अवलम्बन है।
चिन्तन प्रवाह अपने समय में प्रायः एक ही दिशा में होता है। मनस्वी और स्वतन्त्र चिन्तकों के कुछ अपवाद तो सर्वथा पाये जाते रहते हैं पर सामान्यतः चिन्तन प्रवाह की धारा एक ही दिशा में बहती है। अपने समय में पूर्वजों के कथन को प्रमाणित मान लेने की श्रद्धा उखड़ रही है और तर्क तथा प्रमाणों पर आधारित बुद्धिवाद को मान्यता मिली है। किसी जमाने में त्याग, बलिदान और आदर्श-वाद अपनाने में एक, दूसरे से प्रतिस्पर्धा लगाता था और इस क्षेत्र में जो जितना सफल होता था उतना ही गौरव अनुभव करता था। आज स्थिति उससे सर्वथा भिन्न है।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व ही धर्म धारणा का एकमात्र प्रमाण है। चरित्रनिष्ठा और समाज-निष्ठा किसमें कितनी परिपक्व हुई इसी कसौटी पर कस के किसी की आत्मबल-वृद्धि एवं आत्मिक प्रगति का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। आस्तिकवाद का लक्ष्य यह है कि व्यक्ति अधिकाधिक प्रामाणिक सज्जन, कर्त्तव्य परायण एवं लोकसेवी बनता चला जाय और ईश्वर के समतुल्य भावना क्षेत्र में उदात्त एवं परिष्कृत सिद्ध हो सके।
चिन्तन के अतिरिक्त और कोई अनुपयुक्त उद्देश्य नहीं ढूंढ़ा जा सकता। वह मित्रता तो अदूरदर्शिता मात्र है जिसमें प्रसन्नता प्रदान करने के लिए अनुचित को भी सहन किया जाता है और अनौचित्य में भी सहयोग दिया जाता है। इसमें मित्र को प्रसन्न करने भर का लक्ष्य है उसका भविष्य अन्धकारमय बनने के संदर्भ में उपेक्षा बरती गई होती है। इससे मित्र का अन्ततः अहित ही होता है। प्रत्यक्षतः उसका रूप कुछ भी क्यों न हो परिणामतः यह प्रसन्न करते रहने भर की नीति शत्रुता से कम विघातक सिद्ध नहीं होती।
चिन्तन प्रवाह की धारा एक ही दिशा में बहती है। अपने समय में पूर्वजों के कथन को प्रमाणित मान लेने की श्रद्धा उखड़ रही है और तर्क तथा प्रमाणों पर आधारित बुद्धिवाद को मान्यता मिली है। किसी जमाने में त्याग, बलिदान और आदर्श-वाद अपनाने में एक, दूसरे से प्रतिस्पर्धा लगाता था और इस क्षेत्र में जो जितना सफल होता था उतना ही गौरव अनुभव करता था। आज स्थिति उससे सर्वथा भिन्न है। अपने समय में विलासिता की धूम है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-April
चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व अपनाने वाले लोग द्विज हैं। इन वर्गों को स्थायित्व नहीं है। आज का स्वार्थी कल आदर्शवादी बन सकता है। इसी प्रकार आज का श्रेष्ठ व्यक्ति कल निकृष्ट भी बन सकता है। अस्तु शूद्र द्विज होते रहते हैं और द्विजों में से अगणित पतित होकर शूद्र वर्ग में चले जाते हैं।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की समन्वित प्रक्रिया-द्विजत्व का जुड़ा रहना भी आवश्यक है। संध्या का सामान्य निर्देश तो हर किसी के लिए है पर साथ ही यह भी बताया जाता रहा है कि उपासना का पूरा लाभ लेना हो तो द्विजत्व के नाम से जानी जाने वाली जीवन साधना को अपनाया जाना भी अनिवार्य रूप से आवश्यक समझना चाहिए।
चिन्तन और आदर्शवादी कर्त्तव्य अपनाकर चलने वाले जीवन क्रम में ईश्वरीय उपासना की दिव्य उपलब्धियाँ अधिक अच्छी तरह हो सकती हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म। दूसरे जन्म से तात्पर्य है पशु प्रवृत्तियों से जकड़े हुए सामान्य प्राणि जीवन से ऊँचा उठकर मानवी उत्तरदायित्वों की विशिष्टता भरी भूमिका को अपनाया जाना। नर पशु की रीति नीति छोड़कर, देव जीवन की महानता अपनाया जाना। इसके लिए व्रत लेना पड़ता है कि वासना तृष्णा की क्षुद्रता में कृषि कीटकों की तरह निरत नहीं रहा जायगा वरन् मानवी उत्कृष्टता को जीवन क्रम से ओत प्रोत करते हुए उच्च स्तरीय सिद्धान्तों को अपनाकर चला जायगा।
चिन्तन के खारे समुद्र में ही उठते हैं। विवेक सर्वोपरि है। सद्बुद्धि से बढ़कर इस संसार में और कुछ नहीं है। यह तथ्य प्रज्ञा की देवी गायत्री को सर्वोपरि ठहराने में सन्निहित है।
चिन्तन एवं कर्तृत्व औचित्य और विवेक की कसौटी पर कसने से खोटा सिद्ध होता है। दुर्बल मनःस्थिति के लोग उसी लकीर के फकीर बनते हैं जिस पर अंधी भेड़ों का बहुमत भटकता-भटकाता है। ओछे लोगों की सलाह ओछी ही हो सकती है। उनकी अभिरुचि एवं मान्यताओं में पिछड़ापन ही अधिक मात्रा में भरा रहता है। साहसी लोगों में अपनी मौलिकता होती है वे केवल आत्मा का, परमात्मा का, नीति का, विवेक का अनुशासन मानते हैं और यह नहीं देखते कि लोग क्या कहते और क्या करते हैं?
चिन्तन के शिकार बनते और अहिर्निश दुःख दुर्भाग्य का रोना रोते और त्रास सहते हैं। इसके विपरीत जिनके सोचने की पद्धति सही है वे स्वल्प साधनों के- कठिन परिस्थितियों के और अनगढ़ लोगों के बीच रहते हुए भी ताल-मेल बिठा लेते हैं और हँसती-हँसती हल्की फुलकी जिन्दगी जी लेते हैं। समझा यह जाता है कि परिस्थितियाँ मनुष्य को प्रभावित करती और सुख-दुःख के आधार बनाती हैं। जबकि वस्तुस्थिति मनःस्थिति की प्रधानता सिद्ध करती है और बताती है कि चिन्तन का स्तर ही औंधे-सीधे दृश्य दिखाता है और वही रुलाने-हँसाने वाले सपने सामने ला खड़े करता है। यह स्वप्न भूमिका जहाँ से प्रादुर्भूत होती है उस केन्द्र को समझ पकड़ लिया जाय तो फिर खीज से सदा सर्वदा के लिए छुटकारा पाया जा सकता है और आनन्द, उल्लास का वातावरण अविच्छिन्न रूप से जीवन क्रम के साथ जुड़ा रह सकता है।
चिन्तन को हल्का फुलका रखने वाले दृष्टिकोण को भी अपनाने का प्रयास करना होगा। समग्र प्रसन्नता का मूल उद्गम वही तो है।
चिन्तन स्तर के अनुरूप उसमें सामयिक परिवर्तन होते रहते हैं। सूक्ष्मदर्शी उसकी भिन्नताओं को रंग बदलते हुए परिवर्तनों के रूप में देख सकते हैं। शान्ति और सज्जनता की मनःस्थिति हलके नीले रंग में देखी जायगी। विनोदी, कामुक, सत्तावान, वैभवशाली, विशुद्ध व्यवहार कुशल स्तर की मनोभूमि पीले रंग की होती है। क्रोधी, अहंकारी, क्रूर, निष्ठुर, स्वार्थी, हठी, और मूर्ख मनुष्य लाल वर्ण के तेजोवलय से घिरे रहते हैं।
चिन्तन का स्तर ही औंधे-सीधे दृश्य दिखाता है और वही रुलाने-हँसाने वाले सपने सामने ला खड़े करता है। यह स्वप्न भूमिका जहाँ से प्रादुर्भूत होती है उस केन्द्र को समझ पकड़ लिया जाय तो फिर खीज से सदा सर्वदा के लिए छुटकारा पाया जा सकता है और आनन्द, उल्लास का वातावरण अविच्छिन्न रूप से जीवन क्रम के साथ जुड़ा रह सकता है।
चिन्तन और कर्तव्य के दोनों ही क्षेत्र सद्ज्ञान एवं सत्कर्म से ओत प्रोत हो चलें। प्रबल पुरुषार्थ से तात्पर्य इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने से है अन्यथा सामान्य पुरुषार्थ तो दुष्ट दुर्गुणी भी करते ही हैं। जहाँ सद्बुद्धि की प्रेरणा से सत्कर्म परायणता का प्रबल पुरुषार्थ जगेगा, वहां किसी को किसी वस्तु का- किसी बात का अभाव नहीं रहेगा।
चिन्तन क्षमता को निष्कृष्ट प्रयोजनों से विरत करके उस तरह सोचना आरम्भ करता है, जिससे जीवनचर्या का सारा ढांचा ही बदल जाय और मात्र आदर्शवादी गतिविधियों को कार्यान्वित करने की ही सम्भावना शेष रहे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-March
चिन्तन के विषय और बोझ को दिमाग से बाहर ही उतार कर रख दें जब सोने के लिए शय्या पर पैर रक्खें।
चिन्तन, विचारशीलता चाहे अच्छी दिशा में चले या बुरी में उसका आप पर अधिकार नहीं होना चाहिए। जब आप चाहें तब सोचें और जब न चाहें तब सोचना बन्द कर दें ऐसा अभ्यास होने पर ही यह आपकी निद्रा में बाधक नहीं बन सकते। महात्मा गाँधी कितने उच्च विचारक थे लेकिन जब उन्हें विश्राम करना होता था तो तत्काल सो जाते थे इतना संयम था उन्हें अपने मन पर।
चिन्तनशील प्रकृति के होते हैं। दिन-रात उनका दिमाग किसी उधेड़-बुन में ही डूबा रहता है। ऐसे लोग चारपाई पर पड़कर करवटें बदलते हैं, चुपचाप होकर पलकें बन्द करते हैं किन्तु उनके चिन्तन का क्रम एकान्त पाकर अधिक तीव्र होता है और उन्हें नींद नहीं आती। इसके विपरीत दिन-भर का हारा थका मजदूर कठोर भूमि में भी तत्काल सो जाता है। क्योंकि वह चिन्तन के अधिक झगड़े में नहीं पड़ता।
चिन्तनशील होना बहुत ही महत्वपूर्ण है। चिन्तन के क्षणों में ही नव अन्वेषण का कार्य होता है, लेकिन इसकी सीमा भी होनी चाहिए। कम से कम उस समय तक तो आप अपने चिन्तन के विषय और बोझ को दिमाग से बाहर ही उतार कर रख दें जब सोने के लिए शय्या पर पैर रक्खें।
चिन्तन से मनुष्य के स्नायु अत्यधिक उत्तेजित हो जाते हैं। मन का स्वभाव है वह जिस विषय को पकड़ लेता है उसका ही ताना-बाना बुनने लगता है और बरबस मनुष्य विचारों में खो जाता है। ऐसे व्यक्ति को कुछ झपकी लग भी जाय तो उसकी नसें इतनी उत्तेजित रहती हैं कि स्वप्न के माध्यम से वे अपना काम करने लगती हैं। और इससे नींद अपूर्ण ही रह जाती है। जो रात स्वप्नों में बीती हो उस दिन उठने पर आपका बदन थका-थका अलसाया सा होगा।
चिन्तन न करें केवल अवगुणों पर ही दृष्टिपात करें तो अपना प्रत्येक प्रियजन भी अनेकों बुराइयों दोषों में ही ग्रस्त दिखाई देगा। अतः स्नेह, आत्मीयता, सौजन्यता तथा प्रेमपूर्ण व्यवहार में कमी आयेगी, जिससे जीवन के सुखों का अभाव हो जायगा। अपने बच्चों के छोटे-मोटे दोष भूल जाने की पिता की दृष्टि ही सच्ची होती है। माँ यदि बेटों की गलतियाँ ढूँढ़ा करे तो उसे दण्ड देने से ही फुरसत न मिले। अवगुणों को उपेक्षा की दृष्टि से ही देखना उचित है।
चिन्तन, स्वाध्याय, सत्संग और विवेक आदि। किन्तु तुमने उसे दिया क्या? कुतर्क, असमञ्जस, स्थगन, अकर्मण्यता, अविद्या, कुसंग और अज्ञान आदि। आत्मा की माँग थी—परिमार्जन, परिष्कार, संस्कार, शोधन, साधन, धर्म, धीरता, कर्म, परोपकार व सदाचार आदि। किन्तु तुमने उसे इसके विपरीत दिया—अन्धकार, अज्ञान, कलुष, अवज्ञा, उपेक्षा, अवहेलना और तिरस्कार आदि! फलतः यह सब तुम से विमुख होकर बुझे दीपक की भाँति तुम्हारे पास रह गये।
चिन्तन के अधिक झगड़े में नहीं पड़ता। इसके माने यह नहीं कि चिन्तन बुरा है। मनुष्य को सोच विचार ही नहीं करना चाहिये। नहीं, मनुष्य का चिन्तनशील होना बहुत ही महत्वपूर्ण है। चिन्तन के क्षणों में ही नव अन्वेषण का कार्य होता है, लेकिन इसकी सीमा भी होनी चाहिए।
चिन्तन का क्रम एकान्त पाकर अधिक तीव्र होता है और उन्हें नींद नहीं आती। इसके विपरीत दिन-भर का हारा थका मजदूर कठोर भूमि में भी तत्काल सो जाता है। क्योंकि वह चिन्तन के अधिक झगड़े में नहीं पड़ता। इसके माने यह नहीं कि चिन्तन बुरा है। मनुष्य को सोच विचार ही नहीं करना चाहिये।
चिन्तन के क्षणों में ही नव अन्वेषण का कार्य होता है, लेकिन इसकी सीमा भी होनी चाहिए। कम से कम उस समय तक तो आप अपने चिन्तन के विषय और बोझ को दिमाग से बाहर ही उतार कर रख दें जब सोने के लिए शय्या पर पैर रक्खें।
चिन्तन अपने आत्मविकास का साधन है। संसार इससे और उसकी परिस्थितियों पर विचार करने की शक्ति आती है। भौतिकता से हट कर संसार की सूक्ष्म प्रतिक्रियाओं की ओर ध्यान जाता है। एक बार जैसे ही आत्म-ज्ञान के लिए असंतोष पैदा हुआ कि यों समझिये आपके आध्यात्मिक जीवन का सूत्रपात हुआ। यह परिस्थिति बन जाय तो जीवन लक्ष्य की ओर उन्मुख होना निश्चय ही समझिये।
चिन्तन बुरा है। मनुष्य को सोच विचार ही नहीं करना चाहिये। नहीं, मनुष्य का चिन्तनशील होना बहुत ही महत्वपूर्ण है। चिन्तन के क्षणों में ही नव अन्वेषण का कार्य होता है, लेकिन इसकी सीमा भी होनी चाहिए। कम से कम उस समय तक तो आप अपने चिन्तन के विषय और बोझ को दिमाग से बाहर ही उतार कर रख दें जब सोने के लिए शय्या पर पैर रक्खें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-June
चिन्तन तथा लोकोपकारी साधनाओं में खर्च करना चाहिये। अनावश्यक आसक्ति और मोह के कारण प्रायः लोग परिवार को छोड़ना नहीं चाहते, उसी से चिपटे रहना चाहते हैं। उन्हें यह गलतफहमी होती है कि यदि वे नहीं रहेंगे तो शायद बालकों का जीवित रहना कठिन हो जायगा। यह मोह-बुद्धि परिवार में अनेक बखेड़ों का कारण बनती है। गृहस्थी का संचालन सुचारु रूप से चलते रहने देने की दृष्टि से अपना शरीर परिवार से हटा लेना कुछ बुरा नहीं, वरन् यह एक नैतिक धर्म कर्त्तव्य है।
चिन्तन, आत्म निरीक्षण की साधना भी चलती रहे तो मनुष्य स्वस्थ और स्वाभाविक जीवन जीते हुये भी अपना जन्म उद्देश्य पूरा कर सकता है, शाश्वत शान्ति प्राप्त कर सकता है।
चिन्तन और गुण कीर्तन के साथ किसी कार्य का शुभारम्भ करने से मनुष्य को सच्चा आत्म-बल मिलता है। वह बुराइयों से सावधान होता है और साँसारिक बन्धनों में लिप्त न होकर सम्पूर्ण कर्त्तव्यों का पालन एक दार्शनिक की भाँति करता है। रामायण का प्रारम्भ इसी शैली में हुआ है। यह व्यावहारिक प्रशिक्षण है कि प्रत्येक शुभ कर्म में पहले ईश्वर-आराधना की जाये ताकि मनुष्य का कदम दोषपूर्ण ने हो जाय। वह स्थिरतापूर्वक अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता चले।
चिन्तन के नितान्त आन्तरिक, आरम्भिक और अलौकिक सत्य तक पहुँचने के लिये कुछ समय एकान्त में भी बिताना चाहिये। इसी तरह के जीवन क्रम से अपनी पवित्रता और शान्ति को स्थायी रख सकना सम्भव होता है।
चिन्तन के लिये कुछ एकान्त की भी व्यवस्था बनाये रखें ताकि वह जीवन साफल्य के आवश्यक प्रश्नों पर गहराई से छानबीन कर सके।
चिन्तन के लिये भी मिलता रहे तो आत्म-ज्ञान की उच्च-कक्षा मनुष्य स्वाभाविक तौर पर उत्तीर्ण कर सकता है।
चिन्तन में मनुष्य की बुद्धि सुख का अनुभव करती है। इस तरह मेरी उपासना करते हुये जो लोग गुरुजन, माता, पिता, भाई, पत्नी एवं देवताओं की समुचित सेवा करते रहते हैं, ऐसा करते हुये जिन्हें तनिक भी अभिमान नहीं होता वे निष्काम भाव से मुझे ही भजते हैं, तब मैं भी सदैव उन्हीं के हृदय में विश्राम किया करता हूँ। सदैव उस कर्मयोगी के अन्तःकरण में ही ओतप्रोत रहता हूँ।”
चिन्तन करना और उसकी व्यावहारिक बातों पर आचरण करना महत्वपूर्ण है। रामायण को जीवन में उतारने से मनुष्य अधिक सरलतापूर्वक धर्म-तत्व का अवगाहन कर सकता है, वही कारण है कि अनेक धार्मिक नेता, सुधारक तथा संतजन रामायण के माध्यम से ही लोगों को सन्मार्ग की प्रेरणा देते हैं। ऐसे पाठ, पारायण तथा प्रवचनों का लाभ निःसंदेह बहुत अधिक है पर वह मिलेगा तभी जब उन्हें जीवन में अवतरित होने का अवसर भी मिलेगा।
चिन्तन करने से ही ईश्वर-प्रेम प्राप्त पैदा होता है। आत्मा का परमात्मा से चिर-सम्बन्ध है, अतः आत्मस्वरूप की जानकारी के साथ उनके साथ उनका प्रेम डडडड जागृत होना भी स्वाभाविक ही है।
चिन्तन करें तो वह महाप्राण, अनेक विचित्रताओं से संयुक्त और जीवन दाता समझ में आयेगा। दृष्टिकोण के परिवर्तन से समझने की स्थिति बदलती है और क्रमशः अधिक आनन्द की ओर अग्रसर होने लगते हैं। दैनिक जीवन में ऐसी अनेकों बातें आती हैं जो यों सामान्य-सी लगती हैं किन्तु वे अपने भीतर बहुत बड़ा अनोखापन और विज्ञान छिपाये होती है। हमारा दृष्टिकोण बोधक न होकर उथला, रिपट जाने वाला होता है इसलिये अत्यन्त महत्व पूर्ण वस्तुओं को छोड़ जाते हैं और केवल उन्हीं सुखों के चिन्तन में लगे रहते हैं जो स्थूल प्रयोग में आ चुके होते हैं।
चिन्तन में विचरण करता हुआ मनुष्य अन्त में संन्यास की स्थिति में प्राण त्यागकर आनन्द की अन्तिम स्थिति में विलीन हो जाता है।
चिन्तन करें तो यह मालूम पड़ता है कि शरीर की विविधता या आवरण में भी पौरुष या आत्मा ही विद्यमान है। अविनश्वर आत्मा के कल्याण के लिये शरीर के प्रति आकर्षण मानवोचित नहीं हैं। यह सोचना चाहिये कि इस शरीर में हाड़, माँस, मल-मूत्र आदि गन्दी वस्तुयें ही भरी पड़ी है। रुपहली चमक के पीछे अपनी आत्मा के कल्याण को विस्मृत नहीं किया जा सकता है। दो क्षण के इन्द्रिय सुख के लिये जीवन के बहुमूल्य हित पर कुठाराघात नहीं किया जा सकता।
चिन्तन और आत्म शोधन के लिये भी पर्याप्त समय निकालते थे। वह उत्तर जो हमें भी आन्तरिक शान्ति दे सकती है उसे बाह्य वस्तुओं में पाया जाना असम्भव है। आत्म-जगत, परमात्मा और जग को अधिक समीप से देखने के लिये कोलाहलपूर्ण वातावरण नहीं, एकान्त चाहिये, जहाँ मनुष्य निर्विघ्न, उदासीनतापूर्वक प्रश्न की गहराइयों में डूब जाय और विचारों के उमड़ते हुये समुद्र में से सत्य की सीपी ढूँढ़ कर बाहर निकल आये। आने वाली रात को सुन्दर बनाने वाले तारागणों की, ग्रह-नक्षत्र और उल्काओं की वैज्ञानिक शोध हमारे ऋषियों ने घाटियों, पहाड़ियों की निस्तब्ध निर्जनता में ही की थी।
चिन्तन में लगे रहते हैं जो स्थूल प्रयोग में आ चुके होते हैं।
चिन्तन वह क्यों करेगा? भय उसका क्या करेगा जिसके मन हृदय और आत्मा में प्रेम का प्रकाश उदय हो गया है। वह दूसरों में दोष दुर्गुण नहीं सच्चे सौंदर्य के दर्शन करता है। मनुष्य जीवन की प्रेम ही सच्ची दृष्टि है।
चिन्तन में आनन्द नहीं आता। दृष्टिकोण की उत्कृष्टता का सवाल है, जिस तरह सम्पूर्ण चेष्टायें भौतिक उन्नति में लगी हैं उसी तरह आध्यात्मिक उपलब्धियों में भी मन लग सकता है पर पहले अपना लक्ष्य निर्धारित करना पड़ेगा। अपना हर कार्य इस दृष्टि से पूरा करना पड़ेगा कि हम शरीर नहीं आत्मा हैं।
चिन्तन से, अश्लील दृश्यों के अवलोकन या बार-बार मनन करने से आती है। आचरण का बीज है विचार। विचारों को यदि सत्य की ओर या रचनात्मक प्रवृत्तियों में लगाये रहें और उन्हीं में सुख अनुभव करें तो ब्रह्मचर्य धारण की एक बहुत बड़ी कठिनाई हल हो जाती है। गाँधीजी कहा करते थे कि “आलसी मनुष्य कभी भी ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर सकता। वीर्य संग्रह करने वालों में एक अमोघ शक्ति पैदा होती है।
चिन्तन करते हैं, विचार करते हैं वैसे ही क्रिया-कलाप भी होते हैं, और तद्नुसार वैसे ही अच्छे बुरे कर्म भी बन पड़ते हैं। सुख और दुःख बन्धन और मुक्ति चूँकि इन्हीं कर्मों का परिणाम हैं इसलिये हमारे उद्धार और पतन का कारण भी हमारा मन ही है।
चिन्तन और जीवन शोध के लिये सामाजिक जीवन का अनुभव और अध्ययन जरूरी है। इसी के आधार पर आत्म-शोध और ईश्वर प्राप्ति की पात्रता प्राप्त कर पाता है।
चिन्तन और आदेश पालन को प्रमुख अपने जीवन का धर्मान समझें। डडडडकिसी भी डडडडनिराशा में भगवान् का प्रेम महान् है। इसी बात को गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है, “ऐ मनुष्य! डडडड डडडडतू सम्पूर्ण धर्मों का पग पग डडडड डडडड परित्याग कर केवल मेरी शरण में आ जायेगा। मैं तेरे सभी पापों का बिना डडडड विनाश कर तुझे पवित्र तथा डडडड बंधन मुक्त कर दूँगा।”
चिन्तन में ही है। यही दैवी सम्पत्ति है। पर यह बात समझ में नहीं आयेगी क्योंकि अभी तक हमने सुख और संसार के प्रति अपना रुख नहीं बदला। दृष्टिकोण बदल जायेगा तो सर्वत्र आनन्द ही बिखरा दिखाई देगा।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-October
चिन्तन का सूत्रपात करेंगे तो विचारों की शृंखला बँध जायगी। पक्ष के भी विचार आयेंगे, विपक्ष के भी आयेंगे। आप अपनी निर्णायक शक्ति द्वारा भले-बुरे की छटनी करते रहिये। अशुभ विचारों को छोड़ दीजिये और भले विचारों को क्रिया में परिवर्तित कर दीजिये। धीरे-धीरे सही सोचने और सही करने का अभ्यास बन जायगा।
चिन्तन काल में सार्थक विचारों का एक पूरा समूह ही मस्तिष्क में काम करने लग जाता है, जो किसी भी नये अनुसन्धान में मदद करता है। इसलिये जान-बूझकर किसी समस्या के अच्छे-बुरे सभी पहलुओं पर बारीकी से विचार करना चाहिये। इससे सूक्ष्म-विचार तरंगों को पकड़ने वाली बुद्धि का विकास होता है और नये-नये विचार पैदा होने की अनेक सम्भावनायें बढ़ जाती हैं।
चिन्तन करने से आपके ज्ञान-तन्तु लड़खड़ा जायेंगे और आप एक भी विषय का हल ढूँढ़ न सकेंगे। खाने का प्रश्न उठे तो केवल खाद्य के ही विषयों पर विचार कीजिए। उस समय पढ़ाई, भ्रमण या मकान बनाने की समस्या पर मानसिक शक्तियों को लगाने से एक भी समस्या का सही और पूर्ण हल न पा सकेंगे। एक काम रहेगा तो मन एकाग्र हो जायगा। इससे वह काम अच्छा बन सकेगा, पर थोड़ा-थोड़ा सभी ओर दौड़ने से कोई भी काम पूरा नहीं हो सकेगा और आपका उतना समय और श्रम व्यर्थ चला जायगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-February
चिन्तन, मनन, ध्यान, पूजा, उपासना बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने का महत्वपूर्ण उपाय है।
चिन्तन इस पंचभौतिक शरीर की दृष्टि से ही करते रहते हैं। पर जब इस जीवन का नाटक खतम होता है और हम शरीर के स्टेज से उतार दिये जाते हैं, तो कितने दुःखी हो सकते हैं, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
चिन्तन का अभ्यास परिपक्व होने पर मन की चंचलता से छुटकारा मिल जाता है। शुभ के चिन्तन, मनन, अभ्यास से मन की अशुभ वृत्तियाँ बुरे संस्कार भी क्षीण हो जाते हैं और एक दिन मन शुद्ध निर्मल बन जाता है।
चिन्तन की कसौटी पर ही सही-सही परखे बिना व्यवहार में नहीं लाना चाहिए।
चिन्तन में लगाये रखें। जितनी देर आपका मन आन्तरिक विचारों के क्षेत्र में डूबा रहेगा, उतनी देर इन्द्रिय-विषय भी बिलकुल नहीं उठेंगे। यदि ऐसी स्थिति आती है, तो उन्हें बहलाकर फिर से सद्-चिन्तन में लगा देना चाहिये। इसके लिए मन का संकल्पवान् होना आवश्यक है, इसी से इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखा जा सकता है।
चिन्तनशील व दार्शनिक है। प्रेम व आत्मीयता की भावना से आप चाहे किसी जीव-जन्तु को देखें, वह भयभीत न होकर आपके उदार भाव की अन्तरमन से प्रशंसा करने लगेगा।
चिन्तन से, संग्रहीत साँसारिक अनुभवों के सहारे, अधिक उत्साह पूर्वक कार्य करने की शक्ति जागृत होती है। पश्चाताप और आत्मग्लानि की दुश्चिन्ता से कार्यनिष्ठा, साहस शक्ति और कुशलता का नाश होता है। आप सदैव इन से बचने का प्रयत्न कीजिए। जीवन के प्रति आशंकापूर्ण भावनायें कदापि न करें। सदैव भविष्य के मंगलमय होने की कल्पना किया करें।
चिन्तन में लगा हो तो आँख के आगे से कोई चीज गुजर जाने पर भी वह दिखाई नहीं देतीं। बहुत सूक्ष्म वस्तुएँ भी कहाँ दिखाई देती है? परमाणु या रोग कीटाणु बिना सूक्ष्मदर्शी यन्त्र के दीखते नहीं। किसी पर्दे की आड़ में रखी हुई, सन्दूक आदि में बन्द की हुई, जमीन में गढ़ी हुई वस्तुओं को भी आँखें कहाँ देख पाती हैं? सूर्य के प्रकाश के कारण दिन में तारे नहीं दीखते।
चिन्तन-मनन, पूजन, कथा-कीर्तन प्राकृतिक दृश्यों से अनुराग, भ्रमण आदि अनेकों साधन काम में लाये जा सकते हैं। पर इतने से यह आशा नहीं की जाती कि आप का आवेश रुक गया या आग फिर कभी न उठेगी। अंतर्मन में प्रस्तुत कामुक चेष्टायें संयोग पाते ही उठ खड़ी होंगी और इच्छा न होते हुये भी आपको विभ्रमित करने लगेंगी।
चिन्तन, जीवन और जगत का अनुभव, निर्भयता पूर्वक सीखने और सिखाने की लगन, उत्साह, ईश्वर भक्ति , परमात्मा की पूजा उपासना आदि ऐसे आधार हैं, जिनके द्वारा हम अपनी बुद्धि का विकास कर सकते हैं। बौद्धिक विकास के क्षेत्र में न तो किन्हीं प्राचीन ग्रन्थों के पाठ करने से काम चलेगा, न पूर्वजों की गुण गाने से। इसी तरह वर्तमान युग के उच्छृंखल लहरों में बह जाने से भी कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। बौद्धिक विकास के लिए आधुनिक युग के अनुरूप नई प्रयोगशालाएं बनानी पड़ेंगी, जहाँ प्राचीन और अर्वाचीन समन्वय के नवीन प्रयोग करने होंगे, नई सूझ-बूझ का परिचय देना होगा, नई राह निकालनी पड़ेगी।
चिन्तन, मनन, अभ्यास से मन की अशुभ वृत्तियाँ बुरे संस्कार भी क्षीण हो जाते हैं और एक दिन मन शुद्ध निर्मल बन जाता है।
चिन्तन में लगा देना चाहिये। इसके लिए मन का संकल्पवान् होना आवश्यक है, इसी से इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखा जा सकता है।
चिन्तन में मन को लगाए रहिए। इस पर भी यदि वह उच्छृंखलता बरते तो उस पर ध्यान न दीजिए। आपने जो निश्चय किया है, जो लक्ष्य और कार्यक्रम बनाया है, उसी की धुन निरन्तर सुनते रहे। अपने मन को आप देखेंगे एक दिन आपका मन अपनी समस्त उच्छृंखलता, उद्दण्डता, चंचलता छोड़कर आपका दास बन जायगा। मन की साधना के लिए उपयुक्त वातावरण, अनुकूल परिस्थितियों का होना भी आवश्यक है।
चिन्तन करने लग जायें। तभी आत्मग्लानि और शरीर, मन और वाणी के शक्ति -विनाश से बच सकते हैं, तभी तत्परता पूर्वक अपने जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ते रह सकते हैं।
चिन्तन मनन करते रहने से भोग के दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम दिखाई दे जाते हैं। धीरे-धीरे इनसे घृणा उत्पन्न होने लगती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-November
चिन्तन का विषय बनाया और उसे अपने धैर्य की कसौटी समझकर प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया। क्षुधा का आक्रमण होने पर वे चुपचाप एक ओर बैठ जाते और अपने पर उसकी क्रिया प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करते। इस प्रकार अध्ययन करते-करते वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मनुष्य में जहाँ भूख, प्यास की पीड़ा अनुभव करने वाला एक अंश हैं वहाँ एक अंश ऐसा भी है जिस पर इन सब बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और यदि मनुष्य अपने उस प्रभाव-शून्य अंश के साथ मित्रता रख कर रहे तो उसे संसार का कोई भी दुःख पीड़ा नहीं पहुँचा सकता। वह हर दशा में पूर्ण प्रसन्न तथा सन्तुष्ट रह सकता है। स्पष्ट है मनुष्य के ये दोनों अंश शरीर और आत्मा हैं।
चिन्तन में समय खराब करने का अर्थ है आप अपने उज्ज्वल भविष्य के लिये भी अन्धकार का प्रबन्ध कर रहे हैं। जितनी देर आप बैठकर खिन्नता की क्रिया-प्रतिक्रियाओं को सहन करते और पीड़ित होते हैं, उतनी देर यदि प्रसन्न चित्त रहकर काम करें तो जीवन में अनेक सफल कदम आगे बढ़ सकते हैं।
चिन्तन और भी गहरा तथा यथार्थपरक हो गया।
चिन्तन करते-करते उनके मस्तिष्क के सूक्ष्म से सूक्ष्म तन्तु खुलने लगे और वे हर विषय पर गहराई से विचार कर सकने में समर्थ हो गये।
चिन्तन) असूया (किसी के गुण में दोष लगना) किसी के धन को हर लेना, वाणी और दण्ड की कठोरता-ये 8 क्रोध से उत्पन्न होने वाले व्यसन हैं।
चिन्तन में लगे रहने से जोन की आत्मा प्रकाशित हो उठी जिसकी चमक उसके भोले मुख पर एक विलक्षण सौंदर्य बनकर दमकने लगी जिससे वह साकार रूप देवी की तरह आकर्षक हो उठी। उसका पवित्र हृदय प्रसाद, प्रसन्नता बनकर उसके अंग-प्रत्यंग में स्फुरित होने लगा।
चिन्तन तथा ज्ञान जन-साधारण के लिये था। वे एथेन्स की गली गली में घूमते और जहाँ भी चार-छः आदमियों को इकट्ठा देखते वहीं अपने विचार प्रकट करने लगते। वे गहरे से गहरे विचार इस प्रकार साधारण बातचीत के रूप में रखते थे कि सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी उसे दैनिक व्यवहार के रूप में ग्रहण कर लेता था। इस प्रकार वे वास्तव में जनता को उपदेश नहीं देते थे बल्कि एक शिल्पी की तरह जन-जन का निर्माण करते घूमते थे। वे स्त्री, पुरुष धनी और निर्धन तथा ऊँच और नीच से समान रूप से बातचीत किया करते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-April
चिन्तन करने से आता है। आत्म-ज्ञान का उदय होते ही परिस्थितियाँ बदलती हैं और सुख का सही स्वरूप हमारे आगे परिलक्षित होने लगता है।
चिन्तन के क्षेत्र में प्रविष्ट होते हैं तो एक अनिर्वचनीय आनन्द की स्थिति हमें प्राप्त होती हैं। भोग और विलास से मनुष्य की यह आध्यात्मिक क्षुधा मिटती नहीं। राजा बृहद्रथ, विश्वामित्र, ययाति और बाजिश्रवा के महान् ज्ञानी पुत्र नचिकेता आदि ने वैभव त्याग के द्वारा साँसारिक सुखों की निस्सारता को अपने चरित्र, त्याग और तपमय जीवन के द्वारा प्रमाणित किया था। तप के ही आत्मा का उत्थान संभव है। संसार को सही रूप से समझने के लिये उसमें भोग नहीं ढूंढ़ना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-December
चिन्तन एक प्रकार की उपासना ही होती है। जिस देवता की चिन्तन द्वारा निरन्तर उपासना की जाती है, वह प्रसन्न होकर अपने अनुरूप वरदान करता है। यदि आप अपने क्षुद्र विचारों का निरन्तर चिन्तन करते रहेंगे तो अवश्य ही आपको क्षुद्रता की सिद्धि होगी और अनचाहे भी वह आपके जीवन में बस जायेगी।
चिन्तन को दीन-दुखियों की सेवा करने में क्रियात्मक रूप दे दिया। वे राह चलते बटोहियों के सर का बोझ अपने सर पर ले लेते और उनको उनके गन्तव्य स्थान तक पहुँचा देते। किसानों के खेतों की रखवाली करते, उन्हें खेत जोतने, बोने में मदद करते। किसी के बैलों तथा किसी की गायों के लिए चारा काट लाते और अपने हाथ से बड़े प्रेम से खिलाते। तीर्थ यात्रियों के सूजे हुये पैरों को अपने हाथ से धोते और घण्टों तक उनकी सिकाई करते रहते।
चिन्तन द्वारा निरन्तर उपासना की जाती है, वह प्रसन्न होकर अपने अनुरूप वरदान करता है। यदि आप अपने क्षुद्र विचारों का निरन्तर चिन्तन करते रहेंगे तो अवश्य ही आपको क्षुद्रता की सिद्धि होगी और अनचाहे भी वह आपके जीवन में बस जायेगी।
चिन्तन करने से भी ऋषियों के प्रति श्रद्धा से हृदय गदगद हो जाता है।
चिन्तन में ऐसी प्रगाढ़ निष्ठा भरी थी कि गान्धी के नाम से लहर आती थी और उत्तर-दक्षिण में एक विकट तूफान सा उठ पड़ता था। वह शक्ति गान्धी की नहीं थी, जनता की भी नहीं थी। सम्पूर्ण क्रान्ति का बीज वह “राम-नाम” था जो हर वक्त गान्धी की जबान पर रहता था, उसके हृदय में गूँजता रहता था।
चिन्तन आदि के माध्यम से ऊर्ध्वगामी होना ही चाहिये। मन सुधर जाय तो जीवन सुधर जाय। मन बदल जाय तो जीवन की दिशा बदल जाय। शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा है कि बन्धन और मोक्ष का कारण भी मन ही है।
चिन्तन हो वे हमें अपनी जानकारी की सूचना दे दें, ताकि उनके परामर्श एवं सहयोग से उपरोक्त प्रकार के भाषण तैयार करने का कार्य आरम्भ किया जा सके।
चिन्तन करते रहेंगे तो अवश्य ही आपको क्षुद्रता की सिद्धि होगी और अनचाहे भी वह आपके जीवन में बस जायेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-August
चिन्तन-शील होता है। वह अपनी बुद्धि की सूक्ष्मता तथा ब्रह्मतेज से युक्त होकर अपने चारों ओर की परिस्थितियों को प्रभावित करता है। उसके संपर्क में आने वाले व्यक्ति एक अलौकिक प्रकाश का अनुभव करते हैं और उन्हें भी सत्कर्मों की प्रेरणा होती है। समाज में सदाचार और सत्प्रवृत्तियाँ जागृत होती हैं तो उससे सामाजिक एवं राष्ट्रीय विकास की संभावनायें तीव्रता से विकसित होती हैं।
चिन्तन और अनुभव के आधार पर सुख-शाँति पूर्ण जीवन-यापन की जो पद्धति खोज निकाली है उसको धर्म का नाम देकर दश लक्षणों अथवा कर्तव्यों की सीमा में समाहित कर दिया है। जो मनुष्य इन दश गुणों अथवा कर्तव्यों को अपना कर चलता है वह न केवल स्वयं सुखी रहता है अपितु दूसरों के लिये भी सुख का हेतु बनता है!
चिन्तन में ही न लगा रहे इसका सर्वोच्च उपाय यह है कि उसे हर घड़ी कार्य व्यस्त रखा जाय। आलस्य एक बहुत बड़ा अपराध है जिससे शरीर की स्थूल और सूक्ष्म, बाह्य और आन्तरिक सभी प्रकार की शक्तियों का तेजी से पतन होता है खुराफात की बातें प्रायः आलसी प्रकृति वालों को ही सूझती हैं। जिनके पास कोई काम न होगा उन्हीं के मस्तिष्क में कूड़ा-कचरा भर रहा होगा और वे अपने आपको उतना ही परेशान अनुभव कर रहे होंगे।
चिन्तन का अभाव एक बहुत बड़ा कारण है।
चिन्तन की विकृति से जिस तरह मनोभूमि अस्वच्छ और दूषित होती है उसी तरह आहार-विहार में असंयम से भी मन दुष्प्रवृत्तियों की ओर आकर्षित होता है इस बात को ध्यान में रखकर ही हिन्दू धर्म में अनेक निषेध एवं निर्देश लगाये गये हैं। नशीली वस्तुओं के प्रयोग, माँस, मदिरा आदि अभक्ष्य, मादक, तीखे, चटपटे खाद्यों पर प्रतिबन्ध लगाने का यही तात्पर्य रहा है कि इस तरह मनुष्य का मन स्वस्थ रहे, शरीर स्वस्थ रहे। नित्य शारीरिक व्यायाम आदि की आवश्यकता भी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये है। स्वास्थ्य रक्षा के यह दोनों ही पहलू आवश्यक हैं इनमें से कोई एक भी उपेक्षणीय नहीं है।
चिन्तन करते रहना रोग का प्रमुख कारण है इससे मन की शक्ति अकारण खर्च होती है जिससे शेष शरीर की शक्ति खिंचकर मानसिक चिन्ता में खर्च होने लगती है।
चिन्तन, शाश्वत और सनातन सत्य रहे हैं जिनकी अनुभूति ऋषियों ने प्रबल तपश्चर्याओं के द्वारा अर्जित की थी, वह प्रभाव धूमिल भले ही हो गया हो किन्तु अभी तक भी लुप्त नहीं हुआ है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-January
चिन्तन, मनन, अधिक सामीप्य, सान्निध्य प्राप्त करते रहा जाय। भोजन के बिना शरीर का काम नहीं चल सकता, साँस लिए बिना रक्ताभिषरण की प्रक्रिया बिगड़ जाती है। इसी प्रकार ईश्वर की उपेक्षा करने के उपरान्त आन्तरिक स्तर भी नीरस, चिन्ताग्रस्त, अनिश्चित, अनैतिक, अव्यवस्थित एवं आशंकित बना रहता है। यह हानि कुछ कम हानि नहीं है। दीखने वाली हानियों को लोग आसानी से समझ लेते हैं, पर इस जीवन के सारे आनन्द और उद्देश्य को ही नष्ट कर देने वाली हानि को हम न तो देख पाते हैं और न समझते ही हैं।
चिन्तन करके निराश हो जाते हैं। और कई भविष्य के खतरों की कल्पना करके अवसादग्रस्त हो जाते है। लेकिन यह दोनों ही स्थितियाँ मानसिक अस्वस्थता के चिह्न है। जो बातें हो चुकीं, जो घटनाएं बीत गई, उन पर विचार करना, उन्हें स्मरण करना उतनी ही बड़ी भूल है, जितना गड़े मुर्दे उखाड़ना। जो बातें बीत चुकीं उन्हें भुला देने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है।
चिन्तन में मन को लगायें। मौन में बड़ी शक्ति है जो व्यक्ति वाणी का संयम कर यथासम्भव मौन का पालन करता है, उसकी वाणी में बड़ा रस आता है।
चिन्तन और अकर्मण्यता के कारण भाग्य के भरोसे बैठे रहते हैं। उसकी मनौतियाँ करते रहते हैं किन्तु भाग्य की अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। न भाग्य मनुष्य को परवश पशु की तरह ही हाँकता है। हमारा पूर्व पुरुषार्थ ही आज का भाग्य बन कर आता है और आज का पुरुषार्थ भावी भाग्य रेखायें खींचता हैं। महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है-
चिन्तन, सच्चिन्तन में मन को लगायें। मौन में बड़ी शक्ति है जो व्यक्ति वाणी का संयम कर यथासम्भव मौन का पालन करता है, उसकी वाणी में बड़ा रस आता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-September
चिन्तन करे तो सहज ही वह परमात्मा के अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
चिन्तन और मनन के आधार पर नर-नारायण की उपासना के निष्कर्ष पर पहुँचे।
चिन्तन-मनन और विचार द्वारा हृदय-आत्मा से ईश्वरीय स्थिति को स्वीकार कर लिया है उससे भूलकर भी कोई ऐसा कार्य न होगा जिससे किसी को कष्ट पहुँचता हो।
चिन्तन, मनन और उसके प्रभाव आदि पर कुछ भी ध्यान न देकर केवल भोगों की काम-क्रीड़ा में लगे रहते हैं।
चिन्तन का त्याग कर हितकर सुन्दर साहित्य पढ़ना और उपयुक्त दिशा में विचार करना प्रारम्भ कर दिया!
चिन्तन करने के बाद उन्होंने निश्चय किया कि सर्व-साधारण तक आत्म-ज्ञान का लाभ पहुँचाने के लिये भ्रमण करना चाहिये। इस निश्चय के साथ ही उन्होंने परिव्राजन प्रारम्भ किया और घूम-घूम कर लोगों को उपदेश देने लगे। उनके उपदेशों को सुनकर लोग बहुत प्रभावित होने लगे और यह अनुभव करने लगे कि भोग ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य नहीं है। मनुष्य जिन परिस्थितियों को लेकर जन्मा है वे सब आत्म-कल्याण के लिये हैं और उनका उपयोग भी अवश्य होना चाहिये।
चिन्तन अवश्य किया करते थे। उस समय तो लोग उनके इस काम को एक पागलपन समझते थे और कहा करते थे कि यह लड़का अकेले में बैठ कर न जाने क्या सोचा करता है। पर बाद में आगे चल कर उनके कामों को देखकर लोगों को पता चला कि वह बालक यों ही निरर्थक कल्पना लोक में विहार नहीं करता था, बल्कि देश और धर्म के विषय पर बड़े ही क्रियात्मक ढंग से विचार करता था।
चिन्तन करते हुए, आँखें डबडबाये रहते। सारे मित्र, सारे प्रियजन और परिजन किसी समय भी छूटते दीखते। डाक्टरों ने जवाब दे दिया, सारे परिवार वाले निराश हो गये। अनन्त धन व्यय करने और उपचार की हद करने पर भी कोई लाभ न हुआ। परिचितों ने उस जाने की तैयारी में पड़े कार्नेरो के पास आना जाना कम कर दिया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-May
चिन्तनेनैव विनेन्धनमिवानलः॥
चिन्तन तथा धैर्य धारण किया जाता है, जो इन्द्रियों में एक तरह की ज्योति है, वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।”
चिन्तनेनैधते चिन्ता त्विन्धनेनेव पावकः।
चिन्तन तथा जीवन में धारण करने से मिलता है। ‘हनुमान-चालीसा’ पढ़ने से शायद उतना लाभ नहीं मिले, किन्तु जो बजरंगी की तरह संयमित जीवन, कठोर परिश्रम, मोटा-झोटा खाना, उसी में मस्त रहना सीख जाता है, वह हनुमान स्तोत्र का पाठ न करे, तो भी स्वस्थ, बलिष्ठ हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-July
चिन्तन करने की योग्यता नहीं है। प्राकृतिक प्रेरणा से अन्य जीव, सामयिक प्रयोजन के अनुसार आहार, निद्रा, भय और विहार में रत रहते हैं। इससे अतिरिक्त आत्म-कल्याण की बात सोच लेना अन्य जीवों के वश की बात नहीं है। ऐसी विकेन्द्रित शक्ति और क्षमताएं भी उन्हें नहीं मिली हैं।
चिन्तन और परमात्मा के उपकारों को स्मरण रखना ही मनुष्य की सच्ची प्रार्थना है। महात्मा गाँधी कहा करते थे—मैं कोई काम बिना प्रार्थना के नहीं करता। मेरी आत्मा के लिए प्रार्थना उतनी ही अनिवार्य है, जितना शरीर के लिए भोजन।
चिन्तन करना प्रारम्भ करें। आप देखेंगे कि अन्दर ही अन्दर उस अंग में क्षणिक उत्तेजना जागृत होनी है और वह अंग शिथिल पड़ने लगता है। इसी प्रकार क्रम से सारे अंगों को शिथिल बनाकर पूर्ण विश्राम का आनन्द प्राप्त करना आसान हो जायेगा। एक दो सप्ताह में यह क्रिया स्वाभाविक हो जायेगी। सोने या विश्राम करने के पूर्व शरीर को इस प्रकार शिथिल कर लेने से सच्ची व गहरी नींद आती है।
चिन्तन का उनमें बिलकुल अभाव होता है। विचारों की पराधीनता का नाम अविद्या है। जो मनुष्य को स्वाधीन बनाये सर्वोपरि साहसी बनाये, विद्या कहलाने का गौरव उसे ही मिल सकता है।
चिन्तन करते रहने के कारण ही मनुष्य हानि-लाभ के व्यापार में फँस जाता है। पहले तो वह इन साँसारिक विषयों का चिन्तन करता है, किन्तु वह व्यापार जब पूर्ण रूप से अभ्यास में आ जाता है तो विषय स्वयं ही उसे आबद्ध कर लेते हैं। इस बात का अनुभव तब होता है जब यह महसूस करते हैं कि हम गलत दिशा में भटक रहे हैं और मन पर नियंत्रण करने की चेष्टा करते हैं। वे उतनी ही तेजी से प्रत्याक्रमण करते हैं और जीव को बार-बार अपनी ओर घसीटते हैं इससे मानसिक द्वंद्व बढ़ता है, बौद्धिक, क्षमता घटती है और अशान्ति बढ़ती जाती है। थक जाने से जिस तरह शारीरिक शक्ति का पतन होता है और निर्बलता अनुभव होती है, विषय चिन्तन से ठीक उसी प्रकार मानसिक-थकावट बढ़ती है और सही सोचने की मानसिक शक्ति बिल्कुल नष्ट हो जाती है।
चिन्तन से साधारण मानसिक चिन्तायें नष्ट हो जाती हैं। बाह्य जगत का चिन्तन करते रहने के कारण ही मनुष्य हानि-लाभ के व्यापार में फँस जाता है। पहले तो वह इन साँसारिक विषयों का चिन्तन करता है, किन्तु वह व्यापार जब पूर्ण रूप से अभ्यास में आ जाता है तो विषय स्वयं ही उसे आबद्ध कर लेते हैं। इस बात का अनुभव तब होता है जब यह महसूस करते हैं कि हम गलत दिशा में भटक रहे हैं और मन पर नियंत्रण करने की चेष्टा करते हैं। वे उतनी ही तेजी से प्रत्याक्रमण करते हैं और जीव को बार-बार अपनी ओर घसीटते हैं इससे मानसिक द्वंद्व बढ़ता है, बौद्धिक, क्षमता घटती है और अशान्ति बढ़ती जाती है।
चिन्तन करता है, किन्तु वह व्यापार जब पूर्ण रूप से अभ्यास में आ जाता है तो विषय स्वयं ही उसे आबद्ध कर लेते हैं। इस बात का अनुभव तब होता है जब यह महसूस करते हैं कि हम गलत दिशा में भटक रहे हैं और मन पर नियंत्रण करने की चेष्टा करते हैं। वे उतनी ही तेजी से प्रत्याक्रमण करते हैं और जीव को बार-बार अपनी ओर घसीटते हैं इससे मानसिक द्वंद्व बढ़ता है, बौद्धिक, क्षमता घटती है और अशान्ति बढ़ती जाती है। थक जाने से जिस तरह शारीरिक शक्ति का पतन होता है और निर्बलता अनुभव होती है, विषय चिन्तन से ठीक उसी प्रकार मानसिक-थकावट बढ़ती है और सही सोचने की मानसिक शक्ति बिल्कुल नष्ट हो जाती है।
चिन्तन से ठीक उसी प्रकार मानसिक-थकावट बढ़ती है और सही सोचने की मानसिक शक्ति बिल्कुल नष्ट हो जाती है।
चिन्तन की ओर मोड़ना चाहिये। बुराई के प्रति भय दिखाते रहना चाहिये।
चिन्तन में लगे रहना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-November
चिन्तन, स्वभाव, समय निर्धारण, कार्यक्रम, व्यवहार में जो परिवर्तन अभीष्ट है उसका शुभारंभ इन्हीं दिनों किया गया जाना चाहिए और इस अवसर को अभीष्ट प्रयोजन के लिए सर्वोत्तम मुहूर्त मानना चाहिए।
चिन्तन को स्थानापन्न करने की सामर्थ्य सामान्य साधनों में कहाँ हो सकती है ? ऐसे महान प्रयोजन में परशुराम का फरसा ही अभीष्ट की पूर्ति कर सकता है। जलते धरातल और प्राणि समुदाय की प्यास कुछ बूँदों में बुझती न थी। उसकी परितृप्ति तभी हो सकती थी जब स्वर्ग से उतर कर गंगा धरती पर विचरे। इतने बड़े प्रयोजनों की पूर्ति में बादलों में बाँस से छेद करने की कपोल कल्पना बाल योजना काम नहीं दे सकती।
चिन्तन क्रम चले पड़े तो दुस्साहस उभरने में भी देर नहीं लगती और कुकर्मों का सिलसिला चल पड़ता है। यदि उस दिशा में सहयोग जुटने तथा सफलता मिलने की आशा बैठने लगे तो फिर पतन के मार्ग पर बढ़ते हुए कदम रुकते नहीं।
चिन्तन एवं क्रिया-कलाप का नये सिरे से निर्धारण करें। आत्मदेव की साधना इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर की जाती है।
चिन्तन सुस्थिर बनाये रहता है। और देर-सवेर में उच्चस्तरीय प्रगति तक पहुँच कर रहता है।
चिन्तन तथा व्यवहार के साथ जोड़ना पड़ता है। आदर्शों की कसौटी पर खरा उतरने के लिए शौर्य, पराक्रम एवं त्याग बलिदान की वरिष्ठता का भी परिचय देना पड़ता है। सूक्ष्म शरीर ऐसे ही आधार अपनाने से बलिष्ठ होता है। उसका सहयोग पाकर स्थूल शरीर की क्षमता अनेक गुनी बढ़ जाती है। व्यक्तित्व की प्रखरता प्रतिभा के रूप में प्रकट होती है।
चिन्तन एवं क्रिया-कलापों को आत्मानुगामी, परमार्थ परायण बनाये बिना रह नहीं सकता। ऐसे ही यथार्थ आत्मज्ञान का स्वरूप समझाते हुए ईशोपनिषद् में कहा गया है। “ज्ञान ओर अज्ञान के अवलम्बन के परिणाम अत्यन्त भिन्न है। यह अनुभव हमने उनसे सुना है जिन्होंने तत्व गहन अवगाहन किया है।”
चिन्तन चरित्र की-उदास दृष्टिकोण एवं उत्कृष्टता की पक्षधर साहसिकता की विभूतियाँ प्रदान करती हैं। जो इन्हें जितनी मात्रा में ग्रहण साधारण करता है वह उसी अनुपात स्तर का महामानव, ऋषि, मनीषी, सिद्ध पुरुष एवं देवदूत बनाता चला जाता है। देवत्व की उपासना का यही सत्परिणाम है। देवता जिस पर भी प्रसन्न होते हैं इन्हें अपनी गहरी हलकी प्रसन्नता के अनुरूप सत्प्रवृत्तियों को अपनाने की उमंग भरते हैं। यह दैवी वरदान है।
चिन्तन और व्यवहार क्षेत्र का यह समन्वित रूप ही आदर्शवादी व्यक्तित्व का ढाँचा बनाता है। इस फर्मे में विकसित हो कर ही साधारण से मनुष्य महामानव बनते-महत्वपूर्ण भूमिका निभाते देखे जाते हैं।
चिन्तन की विकृति ही है।
चिन्तन प्रवाह। ताप का अर्थ है- संयम, अनुशासन, परिशोधन, साहस और अनौचित्य के साथ संकल्प युक्त संघर्ष। यहाँ उतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि आत्मोत्कर्ष का सुनिश्चित आधार खड़ा हो गया। आत्मबल का भण्डार भरा और व्यक्ति सर्व समर्थ-सिद्ध पुरुष- महामानव बना।
चिन्तन करने से आशा बंधती है और उसे अपनाये रहने पर कठिन मंजिलों को पार करते हुए भी दूरदर्शी लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव होता है।
चिन्तन के लिए महत्वपूर्ण विषयों पर उससे परामर्श करते तथा तदनुसार ही कार्य करते थे। अन्यायों को तो उसका दर्शन नहीं होता था पर सुकरात उसके साथ वैसा ही संपर्क परामर्श करते थे, मानों कोई जीवित व्यक्ति सामने बैठा हो।
चिन्तन, मनन अध्ययन और निदिध्यासन करने के लिए अग्रसर होने का निश्चय ही आत्म साधना का उपासना, तपश्चर्या और योग साधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश परामर्श इस प्रकार है-
चिन्तन में लीन थे। इतने ही में डा. महेन्द्रनाथ सरकार उधर आये और उन्होंने स्वामीजी को बाग का माली समझकर फूल तोड़ लाने को कहा। स्वामी जी मान अपमान से परे निर्मल स्थिति में थे, उन्होंने तत्काल फूल तोड़कर डाक्टर साहब को दे दिए। दूसरे दिन ये डाक्टर साहब स्वामी जी को देखने आये तब उन्हें अपनी भूल मालूम हुई और उनकी निराभिमानता पर द्रवित हो गये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-December
चिन्तन कर गहरे गाड़ देता हूँ। सोचता हूँ अपने लिए तो समय रहते जगह बना ही लूँगा। एक बात और मन में आती है कि यही सपना औरों की भी समझ में आ जाय तो सम्भवतः खुदा को हैरान न होना पड़े, जिन्दा प्रेत कहीं नजर न आएँ, सारा संसार सही अर्थों में मनुष्यों से घिरा-सुख-समुन्नति की ओर बढ़ता दिखाई देने लगे।”
चिन्तन और आचरण तो अविकसित और
चिन्तन मनन का विषय बनाने की ललक भी पीछे छोड़ना है। स्वाध्याय और सत्संग को परस्पर पूरक-अन्योन्याश्रित माना जाता रहा है अस्तु दोनों कदम साथ-साथ उठते चलने में मंजिल तक पहुँचने की बात बनती है। दो पहियों के बिना किसी गाड़ी का चल सकना सम्भव नहीं होता।
चिन्तन ही वस्तुतः प्रच्छन्न नास्तिकता के रूप में प्रकट होता है। पर इसकी जड़ें उन मान्यताओं में हैं जो प्रत्यक्षवाद की सीमित जानकारियों की पृष्ठभूमि पर बनी होती है।
चिन्तन करते हैं तो भी दोनों ही प्रकार की मान्यताएँ उपयोगी लगती है। मानवी प्रकृति दो रूपों में विभाजित है-एक भाव प्रधान, दूसरी बुद्धि प्रधान। जो भावनाशील हैं-जिनके हृदय में सम्वेदनाओं के लिए स्थान है उनके लिए ईश्वर का क्रिया वाला स्वरूप अधिक श्रेष्ठ एवं उपयोगी है। समर्पण की उदात्त भावना के कारण वे निश्चिन्त रहते हैं, उनमें कर्त्तव्य का अहंकार नहीं पैदा होता। इस सुदृढ़ अवलम्बन द्वारा वे अपने कृत्यों को परमात्मा में अर्पित करते हुए क्रमशः लक्ष्य की और बढ़ते चले जाते हैं।
चिन्तन घूमता है। इनमें प्राप्त अधूरे अपूर्ण और भ्रामक ज्ञान परोक्ष जगत को समझने में मदद नहीं कर सकता। आत्मा और परमात्मा का अस्तित्व तो और भी सूक्ष्म हैं। उन्हें अगोचर कहा गया है। इन्द्रियों से प्राप्त भौतिक जानकारियों के सहारे उनके अस्तित्व एवं वैभव को समझना सम्भव नहीं।
चिन्तन और व्यवहार को प्रभावित करने वाला कोई ऐसा तत्वदर्शन हाथ लगे जिसके सहारे सुखपूर्वक रहा और शान्तिपूर्वक जिया जा सके। पिछले दिनों प्रत्यक्षवाद ने यह आशा दिलाई थी कि उसके सहारे प्रगतिशील जीवन जिया जा सकेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-February
चिन्तन की न तो आवश्यकता अनुभव होती है और न ही उस क्षेत्र में प्रवेश करने का अनुभव अभ्यास। अतएव उनके लिए यह समझना कठिन पड़ता है कि अपना चिन्तन, स्वभाव, दिशा निर्धारण या कार्य प्रयास भी कठिनाइयों का कारण, अनुकूलता में अवरोध बन सकता है। आत्म समीक्षा कर सकने के क्षेत्र में जो भी पिछड़े होंगे, वे मात्र परिस्थितियों से उलझे रहेंगे। अपने प्रवाह में हरे फेर करने की बात वे विवेक पूर्वक नहीं सोच सकेंगे। ऐसी दशा में उनकी सफलता उसी सीमा तक की होगी जितनी कि अनुकूलता शक्य हो सके।
चिन्तन, स्वभाव, दिशा निर्धारण या कार्य प्रयास भी कठिनाइयों का कारण, अनुकूलता में अवरोध बन सकता है। आत्म समीक्षा कर सकने के क्षेत्र में जो भी पिछड़े होंगे, वे मात्र परिस्थितियों से उलझे रहेंगे। अपने प्रवाह में हरे फेर करने की बात वे विवेक पूर्वक नहीं सोच सकेंगे। ऐसी दशा में उनकी सफलता उसी सीमा तक की होगी जितनी कि अनुकूलता शक्य हो सके।”
चिन्तन एवं विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किये जाने वाले क्रियाकलापों में खप जाती है। कम पड़ती है तो शरीर ढीला-पोला पड़ जाता है। थका-हारा आलस्य सुस्ती से ग्रसित उदास परास्त जैसा दीख पड़ता है। यदि वह पर्याप्त मात्रा में हो तो चुस्ती-फुर्ती बनी रहती है और हँसती-हँसाती जिन्दगी कटती है। किन्तु यदि उत्पादन खपत से अधिक हो तो मनुष्य कुछ अतिरिक्त करने के लिए उमंगता रहता है।
चिन्तन और चरित्र को पवित्र एवं प्रखर बनाना। अग्निहोत्रों का तात्पर्य ऐसी ऊर्जा उत्पन्न करना है जो न केवल शरीर को ओजस्, मन को तेजस् आत्मा को वर्चस् दे सके वरन् इस प्रकृति ब्रह्माण्ड में भी अनुकूलताओं का अनुपात बढ़ा सके।
चिन्तन किया है। ऐसे विद्वानों में आलपोर्ट, मेस्लोव, एडलर, जुग, काण्ड एवं ग्रीन का नाम लिया जा सकता है।
चिन्तन आदर्शों से ही अभिप्रेरित एवं संचालित होती हैं।
चिन्तन किया तथा इस संदर्भ में बहुत कुछ लिखा है। आत्मसत्ता एवं उसकी असाधारण महत्ता पर इन विद्वानों ने प्रकाश डाला है। यह इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने आत्मानुसंधान को मनोविज्ञान का एक अभिन्न तथा महत्वपूर्ण अंग माना था।
चिन्तन को यदि जीवनचर्या में सर्वोपरि स्थान मिले तो उसे न तो अनुचित कहा जाना चाहिए और न अत्युक्ति। पेट भरने के बाद मनुष्य की इच्छा आवश्यकता मनःक्षेत्र में ही उगती है। वहीं से उपलब्धियों का उपाय खोजा और प्रयत्न किया जाता है। फलतः जो भली-बुरी अनुभूतियाँ होती हैं वह भी प्रकारांतर से मस्तिष्क के हिस्से में ही आती हैं। वासना, तृष्णा, अहंता का बाह्य रूप “रसास्वादन” ठाट-बाट के रूप में भी दृष्टिगोचर हो सकता है, पर तथ्य यही है कि वह गोरख धन्धा है, मनःक्षेत्र में चलती रहने वाली उथल पुथलों का ही।
चिन्तन और प्रयत्न का गतिचक्र अपनी धुरी पर परिभ्रमण करता रहा है। समयानुसार नये तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण, कारण दबाव बढ़ते-घटते रहते हैं।
चिन्तन अविकसित व्यक्तित्व का परिचायक है। छोटे प्राणिमात्र परिस्थितिजन्य संवेदनाओं से ही प्रभावित होते हैं और उन्हीं के साथ तालमेल बिठाने, बदलने या बढ़ाने में लगे रहते हैं। उन्हें आत्म चिन्तन की न तो आवश्यकता अनुभव होती है और न ही उस क्षेत्र में प्रवेश करने का अनुभव अभ्यास। अतएव उनके लिए यह समझना कठिन पड़ता है कि अपना चिन्तन, स्वभाव, दिशा निर्धारण या कार्य प्रयास भी कठिनाइयों का कारण, अनुकूलता में अवरोध बन सकता है। आत्म समीक्षा कर सकने के क्षेत्र में जो भी पिछड़े होंगे, वे मात्र परिस्थितियों से उलझे रहेंगे।
चिन्तन की उत्कृष्टता बनाये रख देवत्व युक्त जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है। ‘परलोक सुधारना’ सम्भवतः इसी को कहा जाता रहा हो। कुछ भी हो, प्रेत-पितरों के अस्तित्व के विषय में कोई सन्देह नहीं है। अदृश्य जगत का अन्वेषण कुछ और भी गहराई से हो तो कई महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लग सकते हैं।
चिन्तन में रस लेना, अपने आपको- अपने लक्ष्य को अधिक अच्छी तरह जानने का प्रयास करना। ऐसी स्थिति में व्यक्ति परमार्थरत रहते हुए भी लोक प्रवाह में नहीं बहता। सदैव स्वयं को व अन्यों को गिराने वाले परामर्शों से बचाता एवं लक्ष्य का बोध कराता रहता है। अन्तिम है जीवन आदर्शों का सदैव ध्यान रख अपने आपको कभी दिग्भ्रान्त न होने देना। प्रौढ़ व्यक्ति की सारी चेष्टाएँ एवं चिन्तन आदर्शों से ही अभिप्रेरित एवं संचालित होती हैं।
चिन्तन एवं परिपक्व व्यक्तित्व के आधार पर स्वयं उपार्जित करनी पड़ती है। इसका जीने की कला के साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध है। जो यह जानता है कि जीना किसे कहते हैं और उसके लिए किस स्तर का दृष्टिकोण तथा व्यवहार अपनाया जाना चाहिए, वही अपने भीतर प्रसन्नता उगा सकता है और उसके सुगन्ध भरे सौंदर्य से समीपवर्ती वातावरण में अनुकूलता तथा सहानुभूति भरा आकर्षण उत्पन्न कर सकता है।
चिन्तन का विषय रहा है। पूर्वार्त्त मनोविज्ञान इसकी संरचना, विकास के स्वरूप एवं लक्ष्य प्राप्ति की संभावनाओं पर पाश्चात्य चिन्तकों से अलग विचार प्रकट करता रहा है। जहाँ पाश्चात्य विद्वानों ने व्यक्तित्व की प्रौढ़ता-परिपक्वता पर नहीं के बराबर विचार व्यक्त किये हैं, वहाँ भारतीय विद्वान व्यक्तित्व को ब्रह्म का ही एक अंश मानकर उसके विकास की असीम संभावनाएँ बताते हैं। प्रवृत्तियों पर ही केन्द्रित पाश्चात्य मनोविज्ञान के अध्येताओं में से कुछ विद्वान ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने इस विषय पर ढर्रे से अलग चिन्तन किया है। ऐसे विद्वानों में आलपोर्ट, मेस्लोव, एडलर, जुग, काण्ड एवं ग्रीन का नाम लिया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-March
चिन्तन के अनुरूप परिस्थितियाँ नहीं बन पातीं और जिनकी इच्छा तनिक न थी, उन्हें उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं। देखना होगा कि वह व्यवधान क्या हो जो ईश्वर के अंश राजकुमार प्रतिनिधि कहे जाने वाले मनुष्य को इस प्रकार खिन्न विपन्न रखे रहता है। उसकी इच्छा आकांक्षाओं में से अधिकांश को मृग तृष्णा ही बनाये रहता है। जिसे भी देखा जाय, असन्तुष्ट उद्विग्न पाया जाता है।
चिन्तन कैंसर रोग को जन्म दे सकता है। फोटवर्थ टैक्सास के डॉ. कार्ल साइमन्टन ने कैंसर के रोगियों का उपचार ‘रेडियेशन’, ‘केमोथेरेपी’ तथा ’शल्य’ क्रिया की परम्परागत उपचार पद्धति से अलग हटकर रिलैक्सेशन (शिथिलीकरण) और विजुवलाइजेशन (आत्म निरीक्षण) पद्धति से कर रहे हैं। इसमें रोगियों को नियमित रूप से दिन में तीन बार प्रातः उठते समय, दोपहर और रात्रि सोते समय 15-15 मिनट का ध्यान करने को कहा जाता है, इस साधना में रोगी ‘आटोसजेशन’ का अभ्यास करता है तथा यह भावना करता है कि उसका मन शान्त सन्तुलित और स्वस्थ हो रहा है। दूसरे चरण में उसे कैंसर ग्रस्त स्थान पर ध्यान करना पड़ता है, जिसमें वह प्रबल भावना का आरोपण करता है कि शरीर के श्वेत कण कैन्सरग्रस्त स्थान पर एकत्रित हो रहे हैं तथा रुग्ण कोशिकाओं को शरीर के बाहर निकाल रहे हैं। रोगियों को सदा प्रसन्नचित रहने तथा आशावादी दृष्टिकोण अपनाये रखने का ही निर्देश दिया जाता है।
चिन्तन के उलटते तथा सही मार्ग पर आते ही अपनी भूल का पता चलता तथा अनुभव होता है कि जो सोचा और किया जा रहा था वह अज्ञान से अभिप्रेरित था। ‘दि डिवाडडेडसेल्फ’ में एक घटना का उल्लेख है जो विधेयात्मक चिन्तन की असाधारण महत्ता पर प्रकाश डालती है-
चिन्तन की असाधारण महत्ता पर प्रकाश डालती है-
चिन्तन एवं व्यवहार को बदलने की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए जो तैयार रहते हैं, वे प्रसन्न रहते पाये जाते हैं। जिन्हें देश, काल, पात्र के अनुरूप अपने व्यवहार में परिवर्तन करना आता है, समझना चाहिए कि उन्हें संसार में रहना हलका-फुलका जीवन जीना आ गया। अड़ियल लोग ही प्रायः हैरान पाये जाते हैं। आदर्शवादी सिद्धांतों पर अडिग रहना और अपनी निजी जीवनचर्या को उसी ढाँचे में ढालना- इतने भर का आग्रह रखना पर्याप्त है।
चिन्तन पर भी उसका आधिपत्य है तो उसी का यह दायित्व भी है कि वह आत्मिकी के सूत्रों पर प्रयोग-अनुसंधान कर उसे प्रामाणिक ठहराने हेतु वैसा ही वातावरण बनाए, साधन जुटाए तथा ऐसे समस्त उपायों पर मंथन करे जिनके प्रयोग से मानवी काया तथा मनःसंस्थान की प्रसुप्त क्षमताओं को उभारा, जा सके- व्यक्ति को वर्तमान से कहीं अधिक सक्षम, समर्थ, असामान्य बनाया जा सके। अविज्ञात घटनाओं को मात्र संयोग या चमत्कार न कहकर उनकी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि में जा पाना तभी सम्भव है जब विज्ञान स्वयं इसका दायित्व अपने हाथ में लेगा।
चिन्तन व क्रिया दोनों में इन्द्रिय संयम घटते चले जाने से मनोबल में भी कमी आई है। आहार की शुद्धता न रहने से चित्त की चंचलता भी असाधारण रूप से बढ़ गई है। फिर प्रत्यक्ष कुछ कर गुजरने वाले अपनी सफलता देखकर अनुचरों में प्रगाढ़ विश्वास उत्पन्न करने वाले मार्गदर्शक भी कहां रहे हैं? फिर भी अध्ययन पर आधारित निष्कर्ष इस सम्बन्ध में असीम संभावनाओं का स्रोत मानवी काया को बताते हुए उस दिशा में पराक्रम पुरुषार्थ की महत्ता सिद्ध करते हैं। मानवी विद्युत सामान्यतया निर्वाह के काम चलाऊ प्रयोजनों में ही खपती रहती है किन्तु विशेष स्थिति में उसका उपयोग अन्य प्रयोजनों के लिए भी हो सकता है।
चिन्तन में इस प्रकार संजोये रहता है मानो वे वास्तविक हैं। प्रेमी-प्रेमिकाओं ने एक दूसरे की भावना का चित्रण अपनी-अपनी कल्पना के आधार पर करते हैं। इसी प्रकार मित्रता, शत्रुता की थी, सम्भावना, आशंका आदि के सम्बन्ध में भी ऐसे ही सर्जनाएं कर लेता है जो वास्तविक जैसी लगती है और मस्तिष्क पर छाई रहती हैं और तद्नुसार काम करने की प्रेरणा देती है।
चिन्तन प्रवाह को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण आदि के आधार पर वैज्ञानिक दृष्टि से लिखा और कहा जाता है फलतः उसका प्रभाव भी जन साधारण को अनुप्राणित करता है।
चिन्तन और चरित्र ही है जिसे महानता सम्पन्न व्यक्तित्व कहते हैं। यदि उसकी उपेक्षा की जाय और मात्र क्रिया-कृत्यों के साथ दिव्य विभूतियों, सिद्धियों को अर्जित करने की बात सोची जाय तो यह उपहासास्पद होगा। मात्र कृत्यों के आधार पर जो चमत्कार दिखाये जाते हैं उन्हें जादूगरी बाजीगरी कहते हैं। अध्यात्म उससे भिन्न है उच्चस्तरीय है। उसमें कहने योग्य सफलता प्राप्त करने के लिए व्यक्तित्व के परिष्कार से बच निकलने का कोई सरल सस्ता मार्ग ढूंढ़ निकालने की गुँजाइश है नहीं।
चिन्तन के एक अंश श्रद्धांजलि के रूप में प्रस्तुत करते रहना है। अपनी कमाई को अपने ही उदर में ठूंसते नहीं रहना है वरन् जो मिलता है उसे मिल-बाँटकर खाना है।
चिन्तन चल पड़ा है, उससे यही विश्वास दृढ़ होता चला जाता है।
चिन्तन के कारण उसे असाध्य जान पड़ने वाले रोग से छुटकारा मिला। जीवन, जो उसे भारभूत निरर्थक जान पड़ता था। अब उत्साह उमंग से भरा तथा सार्थक लगने लगा।
चिन्तन और व्यवहार में श्रेष्ठता की आशा भला कैसे की जा सकती है। रुग्ण मानस रुग्ण समाज को ही जन्म देगा। मन रोगी हो तो काया भी अपना स्वास्थ्य अधिक दिनों तक स्थिर नहीं रख सकती।
चिन्तन और स्वभाव ही गड़बड़ा गया और उसे भटकाव ने ग्रस्त लिया है कि सुखी सन्तुष्ट एवं समुन्नत जीवनयापन के लिए क्या सोचना और क्या करना चाहिए। प्रचलित ढर्रे ने किस प्रकार, कितना, क्या हेर-फेर करना चाहिए। इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि जन-जन के सम्मुख उपस्थित समस्याओं और विभीषिकाओं में से अधिकाँश का- अधिकांश समाधान मिल गया है और संकटों का घटाटोप अनुकूल हवा बहते ही उड़ गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-September
चिन्तन में आत्मीयता, उदारता का अधिकाधिक समावेश करना अन्तराल में सदाशयता के प्रति श्रद्धा को प्रगाढ़ परिपक्व करना।
चिन्तन आमूल चूल बदलना होगा ताकि वह अपना ही नहीं सबका हित सोचने लगे।
चिन्तन एवं चरित्र में निरन्तर बढ़ती चली जाने वाली गिरावट में आश्चर्यजनक कमी हो सकती है । समर्थ शासन के लिये इन सुधारवादी कदमों को उठाने में कोई अड़चन नहीं होनी चाहिये जिनके निहित स्वार्थों में बाधा पड़ती है। उनकी चिल्लियों को भवें तरेरते ही ठंडा किया जा सकता है।
चिन्तन ने विश्व मानस पर एक अमिट छाप छोड़ी है। सामूहिक उपासना का जो स्वरूप उन्होंने महाप्रज्ञा के अनुष्ठान के रूप में अनुमोदित किया है, वह प्रज्ञा परिजनों द्वारा आरम्भ किया जा चुका । नैष्ठिक साधना के रूप में तो युग सन्धि की उपासना साथ चल ही रही है। जन-मानस से आद्य शक्ति के युग शक्ति के रूप में बदलने की सम्भावना को साकार होते देखने में अब कोई संशय नहीं रहना चाहिए।
चिन्तन की यह विकृति भी दे रही है, जो उसे परावलंबन, अन्धाधुन्ध औषधि सेवन तथा उन्मुक्त आचरण की ओर प्रेरित करती है। बढ़ती व्याधियों की इस विभीषिका से भी मानवता को त्राण पाना ही होगा।
चिन्तन विधेयात्मक रहे और आवेशों से परहेज रखे तो सीधी सादी, सरल, सन्तोष और सही जिन्दगी आसानी से गुजर सकती है। ऐसी दशा में विक्षोभ रहित मस्तिष्क सही काम को सही ढंग से करते हुए क्रमिक प्रगति करता रहेगा। तीसरा आधार है - प्रशिक्षण। अभ्यास के आधार पर शरीर के किसी भी अवयव को परिपुष्ट किया जा सकता है। फिर मस्तिष्क भी शरीर का एक अंग ही है।
चिन्तन को परिष्कृत करने का सन्देश गायत्री मन्त्र देता आया है। इसके व्याहृति भाग की यह प्रेरणा है कि प्रभु की सुरम्य वाटिका के किसी भी कण का दुरुपयोग हम अपनी पाशविक वृत्तियों लिप्साओं को सन्तुष्ट करने में न करें।
चिन्तन की अग्नि में झुलसने से बच जाता है एवं प्रतिपल परमात्मा का दर्शन कर परमानन्द का रसपान करता रहता है। गीत में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को यही विराट स्वरूप दिखाकर माया से मुक्ति दिलाई थी। इसी विशालता की सृष्टि में व्याप्त अपने स्वरूप की झाँकी भगवान राम ने अपने जन्मकाल में कौशल्या को कराई थी। परमात्मा की इसी भूमिका को प्रत्येक द्विज के, मानवता का उत्तरदायित्व समझने वाले व्यक्ति के अन्तःकरण में स्थापित कर देना गायत्री मन्त्र का प्रथम उद्देश्य है।
चिन्तन प्रयास की ही परिणति ज्ञान विज्ञान की धाराओं के रूप में, तत्वज्ञान एवं अध्यात्म के अमृत के रूप में होती है। जिसका लाभ असंख्य व्यक्ति उठाते हैं।
चिन्तन से मनीषी समुदाय को अपनी भूमिका प्रखर बनाने एवं महाकाल की योजना में सहभागी बनने की प्रेरणा मिली है, समय समय पर उन्होंने इसे व्यक्त भी किया है ताकि सृजन समर्थक शक्तियाँ एकजुट हो सकें।
चिन्तन करने व व्यवहार में उतारने हेतु प्रखरता का सम्बल भी देती है।
चिन्तन एवं व्यवहार की दृष्टि से, सीमित किन्तु प्रचण्ड शक्ति सामर्थ्य से भरे पूरे समुदाय ने जन-मानस को यह आश्वासन भी दिया है कि यह जीर्ण-क्षीण होती जा रही सृष्टि का नूतन कायाकल्प भर है इस चिन्तन से मनीषी समुदाय को अपनी भूमिका प्रखर बनाने एवं महाकाल की योजना में सहभागी बनने की प्रेरणा मिली है, समय समय पर उन्होंने इसे व्यक्त भी किया है ताकि सृजन समर्थक शक्तियाँ एकजुट हो सकें।
चिन्तन की निकृष्टता और दुष्कृत्यों ने प्रकृति को भी विक्षुब्ध बना दिया है। फलतः वह गत एक दशक से अनेकानेक प्रकार के प्रकोप बरसा रही है। भविष्य में इस क्षेत्र में और भी भयावह संकटों की सम्भावना विज्ञजन बताते हैं। असंतुलित मौसम, अतिवृष्टि, भूकम्प, अनावृष्टि, महामारी, भूस्खलन, तूफान जैसे संकट प्रकृति प्रकोप स्तर के ही हैं। अपराधों, सामूहिक बलात्कारों, वधू-दहन जैसे प्रकरणों की वृद्धि दुर्बुद्धिजन्य दुरभि सन्धि ही है।
चिन्तन एक आत्मानुशासन स्थापित करता है। व्याहृतियों का दर्शन वस्तुतः मनुष्य की अन्तःभूमि को सुसम्बद्ध रूप से विकसित करने की एक सुव्यवस्थित विद्या है।
चिन्तन में भ्रष्टता भरी होगी, मानवी समुदाय में परिवर्तन आने वाला नहीं है। यही वह मूल स्रोत है जहाँ से अपराध, विग्रह-अलगाव, युद्धोन्माद, प्रकृति के साथ अनाचार जैसी विकृतियाँ जन्म लेती हैं। परिस्थितियाँ भी कुछ सीमा तक प्रस्तुत परिस्थितियों के लिये उत्तरदायी ठहरायी जा सकती हैं परन्तु गहराई में विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि यह दुर्गति वस्तुतः दुर्मतिजन्य है। यदि मनीषी समुदाय वस्तुतः सजग रहा होगा तो न पिछले दो विश्वयुद्ध होते, न ही वर्तमान विसंगतिपूर्ण सभ्यता का स्वरूप नजर आता। कला, लेखनी, वाणी, विज्ञान, वैभव जैसी सम्पदा के धनी ये मनीषी यदि चाहते तो सारे विश्व को नयी दिशा दे सकते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-May
चिन्तन, आदर्श चरित्र एवं उदात्त व्यवहार का भी अभ्यास करें तभी वह प्रक्रिया पूरी होती है जिसके आधार पर उपासना का महत्व एवं माहात्म्य वर्णित किया जाता रहा है। निश्चय है कि गायत्रीमय जीवनचर्या अपनाने पर व्यक्तित्व में उत्कृष्टता का समावेश होगा और उस प्रक्रिया में संलग्न व्यक्ति को प्रगति, समृद्ध, संस्कृति एवं सुख शान्ति जैसे प्रतिफलों से लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा।
चिन्तन, विषयासक्ति निन्दा इसी की गई है और इसी को शत्रु मानने, बचने का परामर्श दिया है।
चिन्तन अवास्तविक है। यदि लोक मान्यता यही रही होती तो जिनके पास प्रचुर साधन हैं और जिन्हें प्रतिकूलताओं का भी सामना नहीं करना पड़ता, वे सदा प्रमुदित और सन्तुष्ट पाए जाते। इसके विपरीत जिनके पास स्वल्प सम्पदा है, जो अभावग्रस्त परिस्थितियों में रहते और प्रतिकूलताओं के मध्य जीवनयापन करते हैं, वे सभी दुःखी देखे जाते।
चिन्तन कर लिया जाय। कठिनाइयों को समझ लिया जाय और उन्हें कितने समय तक श्रम करना पड़ेगा। इसकी सुविस्तृत कल्पना करते हुए परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाते हुए योजनाबद्ध निर्धारण स्थिर कर लिया जाय। इसके बिना ऐसे ही आवेशग्रस्त होकर किसी कार्य में लग पड़ना भूल है। जो सही और व्यावहारिक योजना बनाने तक में एकाग्रता नियोजित न कर सके वे काम को सही ढंग से करने में समग्र मनोयोग किस प्रकार लगा सकेंगे?
चिन्तन को हर क्षण प्रभावित करता है। मंगल- इच्छा, वासना, काम से सम्बन्धित है। बुध- मन की विविध क्षमताओं से सूक्ष्म रूप से जुड़ा है। गुरु (बृहस्पति) आध्यात्मिक शक्ति, सम्वेदना, भावना, श्रद्धा को प्रभावित करता है। शुक्र- अंतर्मुखी प्रवृत्तियों को जन्म देता है।
चिन्तन को उत्कृष्टता के पर्यवेक्षण और आरोपण के लिए प्रशिक्षित कर लिया जाय तो दृश्य कुछ दूसरी तरह के ही सामने आएँ।
चिन्तन ही परिपक्व होकर कर्म बनता है। कामुक कल्पनाएँ या तो व्यभिचार बलात्कार के रूप में प्रकट होती हैं या फिर अपने लिए कोई और रास्ता ढूँढ़कर मर्यादा उल्लंघन के अनाचारी कृत्य कराने लगती हैं।
चिन्तन और हेय आरोपण की आदत है, वह हर स्तर की अनुकूलता में रहते हुए भी अपनी दुर्गति का जिस-तिस पर प्रयोग करेगा। फलस्वरूप कीचड़ फेंक कर साफ कपड़े को भी कुरूप बना देने की तरह सर्वत्र विपन्नता का दर्शन करेगा। हो यह भी सकता है कि यदि चिन्तन को उत्कृष्टता के पर्यवेक्षण और आरोपण के लिए प्रशिक्षित कर लिया जाय तो दृश्य कुछ दूसरी तरह के ही सामने आएँ।
चिन्तन न केवल उत्तेजक वरन् निरर्थक भी होता है। कामुकता मर्यादा रहित है वह किसी के भी सम्बन्ध में काम सेवन का ताना-बाना बुन सकती है। जब कि प्रस्तुत समाज व्यवस्था के अंतर्गत वह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं। अपनी ओर से जिस रूप सौंदर्य पर आसक्ति उभारी जा रही है आवश्यक नहीं कि दूसरा पक्ष भी उसके लिए सहमत हो। ऐसी दशा में निराशा के अतिरिक्त और क्या हाथ लगने वाला है।
चिन्तन की आवश्यकता है। लोग क्या कहते और क्या करते हैं, इस आधार पर जो किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहते हैं, वे भूल करते हैं। एक केन्द्र से अनेक दिशाओं में अनेक पगडण्डियाँ जाती हैं। उनमें से हर एक पर प्राणी गए होते हैं इनमें से अपने लिए एक का चुनाव ही करना होगा, सभी पर नहीं जाया जा सकता है। अनेक पगडण्डियों में से एक का चुनाव अपनी ही विवेक बुद्धि के आधार पर करना होता है।
चिन्तन तन्त्र को इस प्रकार जकड़ लेता है कि हर घड़ी वैसी ही कल्पनाएँ उठती, इच्छाएँ उभरती और योजनाएँ बनती रहती हैं। यह समूचा चिन्तन न केवल उत्तेजक वरन् निरर्थक भी होता है। कामुकता मर्यादा रहित है वह किसी के भी सम्बन्ध में काम सेवन का ताना-बाना बुन सकती है। जब कि प्रस्तुत समाज व्यवस्था के अंतर्गत वह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं। अपनी ओर से जिस रूप सौंदर्य पर आसक्ति उभारी जा रही है आवश्यक नहीं कि दूसरा पक्ष भी उसके लिए सहमत हो।
चिन्तन और प्रयोग अहितकर ही समझा जा सकता है। शास्त्रकारों ने मात्र सात्विक ‘काम’ का ही समर्थन किया है।
चिन्तन में ठंडक को स्थान देने वाले देर तक जीवित रहने वाले पाये गए हैं। शरीर पर हल्का-फुल्का दबाव रहे और मानसिक स्थिति हंसने-हंसाने जैसी बनी रहे तो लम्बी आयुष्य संभव होती है। उद्विग्न और असंतुष्ट व्यक्ति जल्दी मरते हैं। यह मानसिक दबाव बीमारियों की तरह ही काया को घुलाता है और समय से पूर्व मरने की परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है।
चिन्तन-मनन है जिसे प्रभु, परमात्मा, ईश्वर या भगवान कहा जाता है। सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय को ही भगवान कहते हैं। विराट्-परब्रह्म तो वह सूत्र-संचालन शक्ति है जिसे सारी सृष्टि की व्यवस्था चलानी होती है। नियम अनुशासन से अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलना ही उसका काम है। उपासना में परब्रह्म को नहीं, भगवान को साकार या निराकार रूप में स्मरण किया जाता है।
चिन्तन चरित्र विनिर्मित करने की प्रेरणा देता है। साहसी मनस्वी इस पथ पर चलकर असीम सामर्थ्य प्राप्त करते हैं, स्वयं को ऊँचा उठाते हैं और दैवी अनुकम्पा उन पर सतत् बरसती रहती है। योगाभ्यास एक पराक्रम है, अपनी अन्तः की दुष्प्रवृत्तियों से संघर्ष है। जो इस देवासुर संग्राम में जितना अधिक सफल होता है वह बहिरंग जगत में सुसंस्कृत एवं अन्तरंग की दृष्टि से महान बनता चला जाता है।
चिन्तन सम्भव नहीं। दार्शनिक, वैज्ञानिक, साहित्यकार, सृजेता स्तर के लोगों को जिस स्तर की एकाग्रता आवश्यक है। वैसी बन पड़ना कामुक उत्तेजना के रहते सम्भव नहीं। इसी प्रकार हेय उपयोग की अनियन्त्रित आकाँक्षा मनुष्य की अपराधी प्रवृत्तियां अपनाने के लिए घसीट ले चलती है। जब किसी के भी साथ काम सेवन की योजना बन सकती है तो उसका धन, अधिकार आदि के अपहरण में भी क्यों संकोच होगा?
चिन्तन प्रकारान्तर से एक प्रकार का उन्माद है जिसमें व्यवहारिकता अव्यावहारिकता का कोई भान नहीं रहता। नीति-अनीति भी विस्मरण हो जाती है।
चिन्तन मस्तिष्क पर नशे की तरह छाया रहता है और उसके सन्तुलन पर बुरी तरह आघात करता है। यह प्रवृत्ति क्रोध, आवेश, उन्माद जैसी अवाँछनीय है। उसका आकर्षक प्रवाह चिन्तन तन्त्र को इस प्रकार जकड़ लेता है कि हर घड़ी वैसी ही कल्पनाएँ उठती, इच्छाएँ उभरती और योजनाएँ बनती रहती हैं। यह समूचा चिन्तन न केवल उत्तेजक वरन् निरर्थक भी होता है। कामुकता मर्यादा रहित है वह किसी के भी सम्बन्ध में काम सेवन का ताना-बाना बुन सकती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-April
चिन्तन की यथार्थता को जाँचने के लिए चरित्र एवं व्यवहार की ही जाँच परख करनी पड़ती है।”
चिन्तनधारा में नहीं बहते, विधेयात्मक ढंग से ही सोचते तथा हर समस्या का हल शान्तिपूर्ण ढंग से निकालने का प्रयत्न करते हैं।
चिन्तन पद्धति भी अपनानी पड़ती है। मैस्लो ने परमार्थ परायण महापुरुषों के चिन्तन एवं दृष्टिकोण का मनःशास्त्र के आधार पर विश्लेषण किया है। उन्होंने उस आधार पर जो निष्कर्ष निकाले हैं, वे अति उपयोगी तथा हर व्यक्ति का मार्गदर्शन करने में सक्षम है।
चिन्तन होता तो उसमें भी है पर चेतन की घुड़दौड़ में उसे अवसर ही नहीं मिलता। फलतः उस समय तो चुप बैठा रहता है, पर जैसे ही बुद्धिमत्ता की पकड़ ढीली पड़ती है, अचेतन का अपनी उमंगों के अनुरूप एक नई स्वप्न सृष्टि रच लेने का अवसर मिल जाता है। यह विसंगत इसलिए होते हैं कि अचेतन मनःक्षेत्र में भूतकाल की अनेकानेक प्रिय अप्रिय, सार्थक निरर्थक स्मृतियाँ दबी पड़ी होती हैं। इनमें से जो भी हाथ पड़ जाती हैं उसी से स्वेच्छाचारी बालक की तरह खेलने लगता है। अचेतन की कुछ अपनी इच्छाएँ भी होती हैं।
चिन्तन एक बात है; उसे तो वृद्धजन भी करते रहते हैं, किन्तु शारीरिक क्षमता विशुद्ध रूप से उस क्षेत्र के स्नायविक, रक्त-प्रवाह एवं ऊर्जा प्रदान करने वाले उन तत्वों पर निर्भर है, जो शुक्राणुओं में पाये जाते हैं।
चिन्तन में प्रखरता, वाणी की ओजस्विता, हृदय की विशालता के रूप में दृष्टिगोचर होता है। काम की सुंदरतम अभिव्यक्ति यही है। उसकी चरम परिणति ईश्वरीय प्रेम के रूप में होती है। ईश्वरीय सान्निध्य के दिव्य रसास्वादन का यही आधार बनता है।
चिन्तन दुष्ट आचरण की प्रलोभन देती हैं। त्याग से जिस स्वर्ग को प्राप्त होने की बात कही जाती है वह किसी अन्य लोक में अवस्थित ग्राम नगर नहीं वरन् श्रेष्ठता का रसास्वादन कराने वाला दृष्टिकोण भर है जब अपनी आकाँक्षा, विचारणा एवं चेष्टा सत्प्रयोजनों में निरत होती है तो आत्म-सन्तोष, लोक सम्मान तथा दैवी अनुग्रह के रूप में ऐसी अनुभूति होती है जिसे स्वर्ग की उपमा दी जा सके। इसे कोई प्रदान नहीं करता। वरन् शालीनता की चाबी से स्वयं ही इस द्वार को खोला और प्रवेश किया जाता है।
चिन्तन का स्वरूप भी निर्धारित करना पड़ता है। कारण कि उत्कृष्ट जीवन की ओर चलने में सर्वाधिक सहायक अथवा बाधक अपना चिन्तन एवं दृष्टिकोण ही होता है।
चिन्तन में निरन्तर निरत रहने वाले शारीरिक दृष्टि से भी रति कर्म के लिए उपयुक्त क्षमता बनाये हुए हैं। उसकी जाँच-पड़ताल के स्थिति क्रमशः निराशाजनक बनती जा रही है, क्रमशः मनुष्य नपुँसकता की ओर बढ़ रहे हैं। यह तथ्य न केवल पुरुषों पर लागू होता है, वरन् नारियों पर भी यही छाया घिरी हुई है। इसी कमी के कारण प्रजनन की उपलब्धियाँ भी शिथिल स्तर की होती है। सन्तानें दुर्बल, निस्तेज और आलसी होती जाती है।
चिन्तन एवं अवाँछनीय क्षरण से बचाव करने का ध्यान तो रखना ही होगा। साधना, उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों का सान्निध्य, तीर्थसेवन, वातावरण संपर्क इसी निमित्त किये जाते रहे हैं। स्वाध्याय की महत्ता भी इसीलिए मानी गयी है। गर्भाधान की अवधि में माता को श्रेष्ठता का ही वातावरण मिले, उसके लिये आवश्यक है कि अमर्यादित प्रजनन तो रुके ही; साथ ही ऐसा वातावरण भी बने जिससे कामुकता को प्रश्रय न मिलकर सत्प्रवृत्ति संवर्धन श्रेष्ठता का महत्व मिले। दायित्व न केवल व्यक्ति एवं परिवार का है वरन् सारे समाज का है।
चिन्तन का निष्कर्ष दिया गया है। “सामान्य लोगों की तुलना में महामानव अधिक प्रसन्नचित्त एवं प्रफुल्लित पाये जाते हैं। यह उनकी सन्तुलित एवं परिष्कृत दृष्टि का ही परिणाम होता है। उनमें यथार्थता को पहिचानने एवं ग्रहण करने को भी अद्भुत क्षमता पायी जाती है।” असली नकली चीजों में विभेद करने की भी इन महामानवों में विलक्षण सामर्थ्य देखी गयी है।
चिन्तन जैसे माध्यम अपनाए जाते हैं। कथा-प्रवचनों का सिलसिला इसी संदर्भ में चलता है। धर्मशास्त्रों का-तत्वदर्शन का विशालकाय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है।
चिन्तन, चरित्र और व्यक्तित्व की छाप भी किये हुए कार्यों पर छोड़ता है और यह छाप इतनी विलक्षण होती है कि कामों का स्तर बनाने तथा परिणाम उत्पन्न करने में आश्चर्यजनक भूमिका निभाती है।
चिन्तन एवं दृष्टिकोण का मनःशास्त्र के आधार पर विश्लेषण किया है। उन्होंने उस आधार पर जो निष्कर्ष निकाले हैं, वे अति उपयोगी तथा हर व्यक्ति का मार्गदर्शन करने में सक्षम है।
चिन्तन प्रवाह मोड़ देने पर बिना उपचार के ही बहुत कुछ ठीक हो गया।
चिन्तन का प्रवाह अस्त-व्यस्त होने लगता है। अपनों का बचाव, दूसरों से दुराव की मनोभूमि बनती हैं। मनुष्य भ्रष्टता के मार्ग पर चल पड़ता है। ऐसी दशा में न सदाशयता टिकती है न धार्मिकता निभती है।
चिन्तन यदि कल्पनाओं की उड़ान का जाल-जंजाल हो तो बात दूसरी है अन्यथा जिन विचारों का मनः क्षेत्र पर आधिपत्य होगा वे व्यवहार में परिणति हुए बिना रहेंगे ही नहीं, विचार यदि विश्वासयुक्त हों तो वे मनःक्षेत्र तक सीमित न रहकर व्यवहार में उतरते और सत्प्रवृत्तियों को अपनाने के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। अस्तु अन्तःक्षेत्र के चिन्तन की यथार्थता को जाँचने के लिए चरित्र एवं व्यवहार की ही जाँच परख करनी पड़ती है।”
चिन्तन एवं दृष्टिकोण ही होता है।
चिन्तन या क्रिया कलाप में व्यस्त रहता है उसकी प्रतिच्छाया, स्वप्न में अनबूझ पहेली बनकर दीखती है और अपनी स्थिति तथा आवश्यकता की जानकारी साँकेतिक भाषा में देती है। यदि इस भाषा को समझा जा सके तो किसी व्यक्ति की उसकी शारीरिक एवं मानसिक स्थिति का विश्लेषण किया जा सकता है। यह पता लग सकता है कि वह किस प्रवाह में बह रहा है इस आधार पर उसका भविष्य क्या बन सकता है और अशुभ की रोकथाम तथा शुभ की सम्भावना को फलित करने के लिए क्या किया जा सकता है?
चिन्तन ही होता है, जिसमें मनुष्य काम को छोटा मानकर उनमें रस नहीं लेता। सामान्य और असामान्य व्यक्तियों में मौलिक अन्तर यह पाया जाता है कि सामान्य व्यक्ति जिस काम को छोटा मानकर उपेक्षा कर देते अथवा उसे करने में मनोयोग का परिचय नहीं देते, महापुरुष उनमें भी पूरी तल्लीनता-मनोयोग से जुटे दिखायी पड़ते अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर करते देखे जाते हैं। वे काम के प्रतिफल पर नहीं उसके स्तर पर अपना ध्यान केन्द्रित रखते हैं। यह असाधारण मनोयोग ही अन्ततः श्रेष्ठ परिणामों का भी कारण बनता है।
चिन्तन तथा प्रयास उस स्तर का नहीं बनने दिया जिसकी गर्मी से अभीष्ट की उपलब्धि पकती, फलती और उत्साहवर्धक उपलब्धि के रूप में हाथ आती।
चिन्तन को।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-July
चिन्तन सर्वथा एकाँगी है। आदर्श व्यक्ति आत्म-कल्याण की साधना के साथ-साथ समाज की भी भलाई करता है। वह समाज के लोगों से सहानुभूति रखता है और उन्हें अपने उत्कृष्ट विचारों एवं श्रेष्ठ व्यवहार से निरन्तर ऊँचा उठाने का प्रयास करता है।”
चिन्तन साधक को वैसा ही बनने की प्रेरणा देता है।
चिन्तन की प्रमुखता थी। इनका व्यक्तित्व आशावादिता से सम्पन्न था जो उन्हें विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी मनःस्थिति को विचलित नहीं होने देता था। कुछ जीवित व्यक्तियों को मेसलाव ने कोर्सेकॉफ टेस्ट से भी गुजारा। सारी स्थिति का पर्यवेक्षण कर उन्होंने, महामानव- जिन्हें उन्होंने ‘‘सेल्फ एक्चुअलाजिंग” व्यक्ति सम्बोधन दिया है के ये लक्षण बताये हैं।
चिन्तन की परिष्कृति, दृष्टिकोण की व्यापकता तथा सुनियोजित भाव-सम्वेदनाओं की परिणति भी स्वस्थ, प्रफुल्लचित्त हल्के-फुल्के व्यक्ति के रूप में दृष्टिगोचर होती है।
चिन्तन रहन-सहन और प्रयत्नों को देखते हुए लगता है कि मनुष्यों के बीच देश, धर्म, भाषा, संस्कृति के आधार पर ही विभाजन नहीं हुए हैं वरन् दृष्टिकोण एवं जीवन दर्शन के भी इतने विभेद हैं जिन्हें पास-पास रखकर देखने अथवा उनके स्तर का मूल्याँकन करने पर प्रतीत होता है कि यहाँ अनेकता के बीच एकता विद्यमान है।
चिन्तन की परिष्कृति को। इन सबका समुचित समन्वय जिस चिकित्सा पद्धति में हो वही सर्वांगपूर्ण उपचार प्रणाली कही जा सकती है। इसी से मनुष्य आत्मिक, मानसिक एवं कायिक दृष्टि से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर अपनी सामर्थ्यों का सुनियोजन भौतिक अथवा आध्यात्मिक किसी भी क्षेत्र में करते हुए प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है।
चिन्तन की बात इसलिए कही जा रही है कि अक्सर इनको बड़े हल्के रूप में ले लिया जाता है। इससे लाभ मिलना तो दूर- अध्यात्म के समीप भी साधक पहुँचता नहीं देखा जाता। वस्तुतः यह गीत में वर्णित महाभारत है जो अंतर्जगत के धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में लड़ा जाता है। भाव कल्प- चिन्तन का परिष्कार- समग्र प्रत्यावर्तन ही इस प्रक्रिया की फलश्रुति है।
चिन्तन करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है।
चिन्तन-मनन के बिना कोई मनुष्य अपने लिए स्थिर नैतिक सिद्धान्त का निर्धारण नहीं कर पाता और समाज की दिशाधारा के प्रवाह में बह जाता है। नैतिक सिद्धान्तों के निश्चय-निर्धारण के लिए ज्ञानोपार्जन अत्यावश्यक है। ज्ञानार्जन के लिए व्यक्ति को चिन्तनशील- विवेकशील होना चाहिए। सिद्धान्तों को व्यावहारिक जीवन में उपयोग करते समय सतत् चिन्तन आवश्यक है।”
चिन्तन-कुकल्पनाओं ने मस्तिष्क में घर बना रखा हो तो काया बाहर से भले ही स्वस्थ दीखे, अध्यात्म मान्यता के अनुसार अस्वस्थ ही कहलाती है। अज का रोग भूतकाल के मनोविकारों एवं शुष्क अन्तःकरण की ही परिणति हैं, यह एक सुनिश्चित सत्य है। तनाव वस्तुतः उस हिम खण्ड के समान है जो बाहर से दिखाई नहीं पड़ता, पर किसी भी क्षण जहाज से टकराकर उसे तहस-नहस कर सकता है। शरीर का हर जीवकोश अन्तः के विक्षोभ की प्रतिक्रिया बहिरंग में दिखाता है, इसे वैज्ञानिक अब “लाइ डिटेक्टर” के माध्यम से सिद्ध भी किया जा चुका है।
चिन्तन में उदात्तता का समावेश होने पर सर्वत्र स्नेह, सौंदर्य, सहयोग और सद्भाव ही दृष्टिगोचर होता है। सुखद- दूसरों को ऊँचा उठाने- श्रेष्ठ देखने की ही कल्पनाएँ मन में उठती हैं। उज्ज्वल भविष्य का चिन्तन चलता तथा उपक्रम बनता है। इस उदात्त दृष्टिकोण का नाम स्वर्ग है। स्नेह, सहयोग और सन्तोष का उदय होते ही स्वर्ग दिखाई पड़ने लगता है।
चिन्तन अपनाता, अपने निर्धारण आप करता है। प्रचलनों एवं परामर्शों से प्रभावित न होकर श्रेय पथ पर एकाकी चल पड़ता है। विवेक अवलम्बन जन्य इस स्थिति को ही मुक्ति कहते हैं, जो महाप्रज्ञा गायत्री का तत्वदर्शन समझकर उनके आश्रय में जाने वाले सच्चे साधक को अवश्य ही मिलती है।
चिन्तन सर्वथा भिन्न है। परिष्कृत दृष्टिकोण को ही स्वर्ग कहते हैं। चिन्तन में उदात्तता का समावेश होने पर सर्वत्र स्नेह, सौंदर्य, सहयोग और सद्भाव ही दृष्टिगोचर होता है। सुखद- दूसरों को ऊँचा उठाने- श्रेष्ठ देखने की ही कल्पनाएँ मन में उठती हैं। उज्ज्वल भविष्य का चिन्तन चलता तथा उपक्रम बनता है।
चिन्तन एवं विचार विमर्श ही यजन माना जाता है। दिनचर्या उसी आधार पर बनती है। यह सामूहिक होते हैं और अधिक समय तक चलते हैं।
चिन्तन और कर्म में स्वभावतः श्रेष्ठता का समावेश होना ही चाहिए। यदि मन्त्र जाप के पूर्व ही उसे ‘इफ’ और ‘बट’ की आशंकाओं के जाल में उलझा दिया गया तो सारा प्रयोजन ही गड़बड़ा जाता है।
चिन्तन किया जाय और अपनी समूची चेतना को उसी में सराबोर होने दिया जाय। उद्देश्यपूर्ण स्वाध्याय और सत्संग भी ध्यानयोग के ही अंग माने गये हैं। उत्कृष्टता की गरिमा पर श्रद्धा केन्द्रित करने को ‘चिन्तन’ और उसे आज की स्थिति में क्रियान्वित करने की आकाँक्षा को उभारना, योजना बनाना ‘मनन’ कहलाता है।
चिन्तन और कर्म को उत्कृष्टता का अभ्यास कराने के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यकता पड़ती है- यह समझना और समझाना आत्मिकी के पुनर्जागरण में शुभारम्भ की तरह आवश्यक माना जाना चाहिए और इसके लिए गम्भीरता से प्रयास चलना चाहिए।
चिन्तन, मनन के चार आधार अपनाने पड़ते हैं। एकाग्रता (मेडीटेशन) ध्यान योग के अंतर्गत ये प्रयोजन भी जुड़े रहते हैं। अन्यथा मन को एक कल्पना भर देकर रोके रहने से योगाभ्यास का वह उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा जिसके आधार पर आत्मसत्ता को आत्मिकी की प्रयोगशाला के रूप में परिणति करने की व्यवस्था बनती थी।
चिन्तन का बिखराव रोककर यदि उसे किसी एक प्रयोजन में लगाया जा सके तो उसकी सफलता असंदिग्ध हो जाती है। वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्यकार बुद्धिजीवी इसी विशेषता को अर्जित करके अपने कार्यों में प्रगति करते और सफल होते हैं। अर्जुन के मत्स्य बेध की कथा प्रसिद्ध है। यह सफलता उसने एकाग्रता की सिद्धि प्राप्त करके ही पाई थी।
चिन्तनशील होता है। चिन्तन-मनन के बिना कोई मनुष्य अपने लिए स्थिर नैतिक सिद्धान्त का निर्धारण नहीं कर पाता और समाज की दिशाधारा के प्रवाह में बह जाता है। नैतिक सिद्धान्तों के निश्चय-निर्धारण के लिए ज्ञानोपार्जन अत्यावश्यक है। ज्ञानार्जन के लिए व्यक्ति को चिन्तनशील- विवेकशील होना चाहिए। सिद्धान्तों को व्यावहारिक जीवन में उपयोग करते समय सतत् चिन्तन आवश्यक है।
चिन्तनों में होता है। फलतः बिखराव की स्थिति बनी रहना स्वाभाविक है। अनेकानेक पक्षों की मस्तिष्कीय क्षमता का थोड़ा-थोड़ा अंश मिलता है और उन सभी का ढर्रा किसी न किसी प्रकार लुढ़कता रहता है। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए सृष्टा ने मनःशक्ति की संरचना इस प्रकार की है जिससे वह जीवन के हर क्षेत्र का परिपोषण करती रहे और कहीं भी अभावग्रस्त की स्थिति उत्पन्न न होने पाये। इसी व्यवस्था को चंचलता कहते हैं।
चिन्तनशील- विवेकशील होना चाहिए। सिद्धान्तों को व्यावहारिक जीवन में उपयोग करते समय सतत् चिन्तन आवश्यक है।”
चिन्तन को सुनियोजित एवं प्रभावोत्पादक बना सकता है।
चिन्तन आवश्यक है।”
चिन्तन जीवन का सैद्धान्तिक पक्ष है। जीवन का व्यावहारिक पक्ष- चिन्तन श्रेष्ठ कार्यों के रूप में परिलक्षित होता है। विचार मन्थन से जो सिद्धान्त निर्धारित हों उनको सत्यता की कसौटी के लिए व्यावहारिक क्षेत्र में उतारना होता है। उच्च आदर्शों व नैतिक नैतिक सिद्धान्तों का व्यवहार में आना ही नैतिक जीवन है। सिद्धान्तों के कार्यान्वयन के लिए क्रियाशीलता- गतिशीलता नैतिक जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता है।
चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश नहीं करते, ऐसे ही लोगों की उपासना प्रायः निष्फल रहती है। इसी प्रकार लोग विभिन्न शंकाएं उठाते देखे गये हैं और कुतर्क का जाल बुनकर भावना के क्षेत्र में कुहराम मचाते पाये गये हैं।
चिन्तन चलता तथा उपक्रम बनता है। इस उदात्त दृष्टिकोण का नाम स्वर्ग है। स्नेह, सहयोग और सन्तोष का उदय होते ही स्वर्ग दिखाई पड़ने लगता है।
चिन्तन स्तर ऊँचा होता है। स्वयं कष्ट सहते हुये सिद्धान्तों के प्रति अटूट निष्ठा इन्हें कुछ उच्चस्तरीय आनन्द की अनुभूति होती है” -ऐसा मेस्लोव का मत है। मात्र पेट और प्रजनन के लिये जीने वाले एवं सिद्धान्तों के प्रति समर्पित व्यक्तियों का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए उन्होंने लिंकन जैसे चालीस व्यक्तित्वों की तलाश की जिनमें से कुछ ऐतिहासिक व कुछ जीवित थे।
चिन्तन’ और उसे आज की स्थिति में क्रियान्वित करने की आकाँक्षा को उभारना, योजना बनाना ‘मनन’ कहलाता है।
चिन्तन और कृत्य को भ्रष्ट और बाह्योपचार को प्रधानता दी जाती रही तो प्रतिफल उस चिन्तन की दुष्टता के ही मिलेंगे। उन्हें बाह्योपचारों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। इन्हीं उपचारों में मुँह से जप लेना, जल्दी-जल्दी या उँघते-उँघते माला घुमा लेना, किसी तरह संख्या पूरी कर लेना, मात्र कृत्य तक ही सीमित रहना भी आता है। इतना अन्तर तो सभी को समझना चाहिए और तथ्यों को भली-भाँति हृदयंगम करना चाहिए। उपासना यदि लाभ न दे तो नुकसान भी कभी नहीं पहुँचाती।
चिन्तन और क्रिया कलाप व्यर्थ निरर्थक ही नहीं जाता, अनर्थ सँजोने में भी लगा रहता है। साधने से मन सध जाता है। मन सध जाने से शरीर में ऐसी एक भी असत्य व्यस्तता शेष नहीं रहती जो प्रकारान्तर से अनेकानेक कष्ट संकटों का निमित्त कारण बनी रहे।
चिन्तन और कर्त्तव्य में साम्य होता है। मनुष्य को अपने गुण और अवगुणों का बोध तभी होता है जब समाज के लोगों के संपर्क में आता है। बाह्य जीवन में वह सामान्य मनुष्यों की भाँति रहता है। आदर्श व्यक्ति का मस्तिष्क स्वतन्त्र विचार के जगत में विचरण करता है, पर हृदय संसार के सामान्य लोगों के साथ बहता है।”
चिन्तन में सतत् चलते रहते हैं पर फिर भी एकान्तवास इन्हें अधिक प्रिय होता है।
चिन्तन श्रेष्ठ कार्यों के रूप में परिलक्षित होता है। विचार मन्थन से जो सिद्धान्त निर्धारित हों उनको सत्यता की कसौटी के लिए व्यावहारिक क्षेत्र में उतारना होता है। उच्च आदर्शों व नैतिक नैतिक सिद्धान्तों का व्यवहार में आना ही नैतिक जीवन है। सिद्धान्तों के कार्यान्वयन के लिए क्रियाशीलता- गतिशीलता नैतिक जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता है। संसार के सभी महापुरुष जीवन भर क्रियाशील रहे- अनवरत श्रम-साधना करते रहे हैं।
चिन्तन की दुष्टता के ही मिलेंगे। उन्हें बाह्योपचारों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। इन्हीं उपचारों में मुँह से जप लेना, जल्दी-जल्दी या उँघते-उँघते माला घुमा लेना, किसी तरह संख्या पूरी कर लेना, मात्र कृत्य तक ही सीमित रहना भी आता है। इतना अन्तर तो सभी को समझना चाहिए और तथ्यों को भली-भाँति हृदयंगम करना चाहिए। उपासना यदि लाभ न दे तो नुकसान भी कभी नहीं पहुँचाती।
चिन्तन एवं चरित्र का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। प्रधानता भावना की है, क्रिया की नहीं। जो जल में रहकर भी उससे दूर है, जीवन व्यापार को निभाते हुए भी उसमें लिप्त नहीं है, उसका मूल्याँकन उसके अन्तरंग के अनुसार ही किया जा सकता है- बहिरंगीय क्रिया-कलापों के आधार पर नहीं।” ऋषिका का समाधान हुआ, एक नहीं दृष्टि मिली।
चिन्तन को जन्म देती है। इस “पैथालॉजी” का मापन करने वाला कोई यन्त्र नहीं है लेकिन इससे होने वाली विकृतियों की फलश्रुति जिन शरीरगत व्याधियों, मनोशारीरिक रोगों, कायविद्युत सम्बन्धी अव्यवस्थाओं के रूप में प्रकट होती हैं, उसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। साथ ही चिन्तन की परिष्कृति, दृष्टिकोण की व्यापकता तथा सुनियोजित भाव-सम्वेदनाओं की परिणति भी स्वस्थ, प्रफुल्लचित्त हल्के-फुल्के व्यक्ति के रूप में दृष्टिगोचर होती है।
चिन्तन का परिष्कार- समग्र प्रत्यावर्तन ही इस प्रक्रिया की फलश्रुति है।
चिन्तन चलेगा। मन में सत्कार्यों के प्रति उमंग उमड़ेंगी। अन्याय भौतिक अवलम्बनों की तुलना में ईश्वर का सम्बल अधिक समर्थ, सहायक तथा फलदायी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-January
चिन्तन आदि की समूची बौद्धिक कसरत की जाती है। उस पर विचार करने की बात छोड़ देने पर तो दिशाधारा का निर्धारण तक संभव न हो सकेगा और कुछ करने का झंझट उठाने की इच्छा ही न उभरेगी। तब मनुष्य जड़भरत, परमहंस, अवधूत आदि कुछ भी क्यों न हो जाय, प्रगतिशील मनुष्य-समुदाय की बिरादरी से हटकर किसी कल्पना लोक का निवासी भर बनकर रह जाएगा। यह मानवी सत्ता की संरचना को देखते हुए किसी भी प्रकार शक्य नहीं है।
चिन्तन करने के लिए प्रेरित करती हैं। उस स्तर का चिन्तन करने वाले चरित्रवान एवं सेवा भावी लोग अपनी तरंगों के माध्यम से समस्त विश्व को अपनी प्रखर प्रेरणाओं से लाभान्वित करते हैं, भले ही उनका वह अनुदान दूसरों को प्रत्यक्ष न दिखाई पड़ता हो। यही बात दुष्ट दुरात्माओं के सम्बन्ध में भी लागू होती है। वे मन ही मन दुरभि सन्धियों के कुचक्र रचते रहते हैं और इस प्रकार की भयानक विचार तरंगें छोड़ते हैं जिनके कारण अगणित दुर्बल मनोभूमि के लोग उसी प्रकार का चिन्तन आरम्भ कर देते हैं तथा कुमार्गगामिता की ओर बढ़ाने लगते हैं। पतन का एक प्रवाह ही चल पड़ता है।
चिन्तन उभरने लगता है।
चिन्तन शरीर यात्रा की परिधि में एक ही ढर्रे पर घूमता है उनकी चिन्तन तरंगें दुर्बल होती हैं। उनमें प्रखरता तभी आती है जब किन्हीं विशेष भावनाओं का उभार उनमें सम्मिलित रह रहा है।
चिन्तन मन के माता पिता एवं अभिन्न सहयोगी हैं। मन और विचार को अस्त-व्यस्त रखते हुए प्राणायाम की उच्चस्तरीय साधना तो असम्भव है ही, अस्त व्यस्त मन की स्थिति में प्राणायाम का अधिक समय तक अभ्यास व्यक्तियों को पागल भी बना देता है। अतः प्राणायाम सदैव तत्त्वबोध एवं ध्यान अभ्यास के साथ करना चाहिए। मन की प्रचण्ड संकल्प शक्ति को अभीष्ट दिशा में नियोजित किये बिना प्राण-साधना मात्र श्वास-प्रश्वास का साधारण व्यायाम और फेफड़ों की कसरत होकर रह जाती है। उससे स्वास्थ्य लाभ तो सम्भव है, किन्तु वह न तो योग है और न ही उसके द्वारा प्राण-शक्ति पर नियन्त्रण हो सकता है।
चिन्तन करने वाले चरित्रवान एवं सेवा भावी लोग अपनी तरंगों के माध्यम से समस्त विश्व को अपनी प्रखर प्रेरणाओं से लाभान्वित करते हैं, भले ही उनका वह अनुदान दूसरों को प्रत्यक्ष न दिखाई पड़ता हो। यही बात दुष्ट दुरात्माओं के सम्बन्ध में भी लागू होती है। वे मन ही मन दुरभि सन्धियों के कुचक्र रचते रहते हैं और इस प्रकार की भयानक विचार तरंगें छोड़ते हैं जिनके कारण अगणित दुर्बल मनोभूमि के लोग उसी प्रकार का चिन्तन आरम्भ कर देते हैं तथा कुमार्गगामिता की ओर बढ़ाने लगते हैं। पतन का एक प्रवाह ही चल पड़ता है।
चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का अभिवर्धन। आगे बढ़ने का अर्थ है- समर्थता और सम्पदा का उपार्जन उपयोग। दोनों के समन्वय से जीवन की दिशाधारा बनती है। मान्यताओं, आकाँक्षाओं का स्तर श्रेष्ठ या निकृष्ट होना व्यक्ति का अपना चुनाव है। जो जिसे वरण करेगा वह उस दिशा में अग्रसर अवश्य होगा।
चिन्तन थोड़ा और विचार प्रवाह अत्यन्त क्षीण होता है। किन्तु मनुष्य में भावना इच्छा, संकल्प, आदर्श आदि की बड़ी शक्तिशाली प्रेरणाएँ चिन्तन क्षेत्र को घेरे रहती हैं। इसलिए उनसे उत्पन्न होने वाली विचार तरंगें भी अति शक्तिशाली होती हैं। जिनका चिन्तन शरीर यात्रा की परिधि में एक ही ढर्रे पर घूमता है उनकी चिन्तन तरंगें दुर्बल होती हैं। उनमें प्रखरता तभी आती है जब किन्हीं विशेष भावनाओं का उभार उनमें सम्मिलित रह रहा है।
चिन्तन परोक्ष रूप से सारे विश्व को प्रभावित करता है, ऐसी दशा में हमारे क्रिया-कलापों द्वारा न सही, विचारों द्वारा ही कुछ क्षति पहुंचाई गई अथवा सेवा सहायता की गई तो उसका भला-बुरा परिणाम हमें निश्चित रूप से मिलना चाहिए और वह मिलता है। शारीरिक पुण्य-पापों का अपना महत्व है, लेकिन मानसिक पुण्य-पापों को भी काल्पनिक, नगण्य, निरर्थक या विनोद कहकर झुठलाया नहीं जा सकता। जब उनका प्रभाव होता है तो परिणाम क्यों नहीं मिलेगा?
चिन्तन में- विचार तरंगों में- प्रखरता उत्पन्न करती हैं? एक ही शब्द में यदि इसका उत्तर देना हो तो कहना होगा- आदर्शवादी भावनाएँ। आदर्शवादी भावनाएँ ही मनुष्य को उच्च स्तर का चिन्तन करने के लिए प्रेरित करती हैं। उस स्तर का चिन्तन करने वाले चरित्रवान एवं सेवा भावी लोग अपनी तरंगों के माध्यम से समस्त विश्व को अपनी प्रखर प्रेरणाओं से लाभान्वित करते हैं, भले ही उनका वह अनुदान दूसरों को प्रत्यक्ष न दिखाई पड़ता हो। यही बात दुष्ट दुरात्माओं के सम्बन्ध में भी लागू होती है।
चिन्तन एवं क्रिया-कलाप तत्काल प्रतिक्रिया दिखाकर समाप्त नहीं हो जाते वरन् एक सूक्ष्म वातावरण का भी निर्माण करते हैं। जिसे थोड़े प्रयत्नों से अनुभव किया जा सकता है। स्थानों की महत्ता सर्वविदित है। वे अदृश्य किन्तु जीवन्त व्यक्तित्व होते हैं। देवालय, तीर्थ मदिरालय, बूचड़खाना, अपने-अपने स्तर के वातावरण बनाते, प्रभाव छोड़ते तथा प्रेरणा देते हैं।
चिन्तन आरम्भ कर देते हैं तथा कुमार्गगामिता की ओर बढ़ाने लगते हैं। पतन का एक प्रवाह ही चल पड़ता है।
चिन्तन तरंगें दुर्बल होती हैं। उनमें प्रखरता तभी आती है जब किन्हीं विशेष भावनाओं का उभार उनमें सम्मिलित रह रहा है।
चिन्तन कुचेष्टाएँ समाप्त होने लगती हैं- लालसाएँ कम होने लगती तथा चेष्टाएँ अन्तर्मुखी बन जाती हैं। ऐसा आत्म बोध चेतना के उद्गम स्थल पर ही पहुँचने पर सम्भव है।
चिन्तन क्षेत्र को घेरे रहती हैं। इसलिए उनसे उत्पन्न होने वाली विचार तरंगें भी अति शक्तिशाली होती हैं। जिनका चिन्तन शरीर यात्रा की परिधि में एक ही ढर्रे पर घूमता है उनकी चिन्तन तरंगें दुर्बल होती हैं। उनमें प्रखरता तभी आती है जब किन्हीं विशेष भावनाओं का उभार उनमें सम्मिलित रह रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-August
चिन्तन, शब्द शक्ति की अपरिमित क्षमता एक समय-एक साथ जप ध्यान तथा महाप्रज्ञा की प्रेरणा का चिन्तन-इन सभी का प्रज्ञा पुरश्चरण में समावेश हैं। साधक पाँच मिनट तक सूर्योदय के साथ ही गायत्री मन्त्र का मौन-जप करते हैं। अन्तरिक्ष में परिशोधन हेतु आहुतियों का यह परोक्ष यज्ञ है। जितना अधिक उच्चारण इस मन्त्र का सृष्टि के आदि से अभी तक हुआ है, उतना किसी का नहीं हुआ। शब्द शक्ति ओंकार गुँजन के रूप में समग्र अन्तरिक्ष में संव्याप्त है।
चिन्तन एवं दुष्ट आचरण के साथ ही अन्तर्ग्रही परिस्थितियाँ भी इन दिनों बड़ी तेजी से बदली हैं। कहा यह भी जा सकता है कि प्रस्तुत विक्षुब्ध वातावरण के निर्माण में विकृत चिन्तन का भी योगदान है। महाकाल के इस बदलते समय में प्रलयंकर स्वरूप को देखते हुए यह चिन्तन सहज ही उभरता है कि क्या यह परमसत्ता अपनी शक्ति से बिना किसी अप्रिय घटनाक्रम को अपने अशुभ को शुभ में नहीं बदल सकती थी?
चिन्तन और नया निर्धारण करने की उमँग उठाने भर से काम बन जायगा और उस अवरोध को राई होते हवा में उड़ते देखा जा सकेगा जो कृपणता के कारण पर्वत जैसा भारी और समुद्र जैसा दुस्तर प्रतीत होता है।
चिन्तन की विकृति एवं भ्रष्ट आचरण अगले दिनों चरम सीमा पर होगा, लेकिन महाकाल का चाबुक अपनी कड़ी दण्ड व्यवस्था द्वारा उन्हें सुधार कर ही रहेगा।” इन ज्योतिर्विज्ञानियों ने राष्ट्रों की कुण्डलियाँ बनाते हुए ग्रहों के दुष्प्रभावों को इनसे जोड़ा है व यह कहा है कि “पूर्वी एशिया से उदित एक महाशक्ति संघबद्ध प्रयास कर नूतन सृष्टि को जन्म देगी। सारे मत-मतान्तर मिट जायेंगे, वर्ण सम्प्रदाय-भाषावाद-प्राँतीयवाद -नस्लवाद जैसी दुष्प्रवृत्तियों का नामोनिशान ही मिट जायगा। इतना अवश्य है कि इस सब नव निर्माण की प्रक्रिया के पूर्व प्राकृतिक विक्षोभ चरम सीमा पर होंगे एवं अन्तर्ग्रही परिस्थितियाँ विषम बनी रहेंगी। भूकम्प विश्व के किसी न किसी कोने में बराबर आयेंगे।
चिन्तन-एक प्रयास जब आँधी की तरह चलता है, सारे वातावरण को हिलाकर रख देता है। इसका एक उदाहरण ‘युद्धोन्माद’, “मॉब मेन्टलिटी” के रूप में देखा जा सकता है। ऐसी स्थिति में दिमाग पर मात्र लड़ने का आवेश छाया होता है। हवा में तेजी और गर्मी कुछ ऐसी होती है जिसके कारण सामान्य व्यक्ति भी सम्मोहित होकर, असामान्य पुरुषार्थ करते देखे जाते हैं।
चिन्तन चरित्र से उत्पन्न हुई प्रतिक्रिया है।
चिन्तन करना है। जब-जब ऐसी स्थिति आयी है, गिने-चुने व्यक्तियों के पुरुषार्थ ने ही महाप्रलय को टाला है। दिव्य दृष्टि सम्पन्न महामनीषी गणों का भी यही कथन है कि आगामी कुछ वर्षों में अवाँछनीयता विस्तार के साथ ही सत्प्रवृत्ति संवर्धन वाली गतिविधियाँ भी जन्म लेंगी। प्रज्ञा परिजनों के अन्तर इसके बीजाँकुर विद्यमान हैं। जिस गति से विभीषिकाओं के घटाटोप बादल उमड़े हैं, उसी अनुपात में जनमानस भी सारे विश्व में जागृत हुआ है।
चिन्तन को रोकती व मनोविकार मिटाती हैं। एक अन्य निष्कर्ष के अनुसार संसार के पचास व्यक्ति यदि एक साथ एक शब्द का तीन घण्टे तक उच्चारण करें तो उससे छह हजार खरब वाट विद्युत शक्ति पैदा होगी। सारे विश्व में इससे घण्टों तक प्रकाश किया जा सकता है।
चिन्तन लिए एक साथ कई व्यक्तियों द्वारा उच्चारित होती है, एक सी तरंगें जन्म लेती है और बदले में शुभ विचारों की वर्षा ऊपर से करती हैं। “धियो यो नः प्रचोदयात्”, “आग्नेय सुपथा राये अस्मान्”, “आनो भद्रा कृणवो यन्तु विश्वतः”-इन सभी मन्त्रों में सारे समूह के लिए श्रेष्ठ विचारों की-सन्मार्ग पर चलने की भारी प्रार्थना की गयी है। एक सी भाव लहरें एक ही चित्तवृत्ति को जन्म देती है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक फ्रीक्वेंसी पर तरंगें उत्पन्न होने पर वे अप्रत्याशित परिवर्तन लाती है। अल्ट्रासोनिक तरंगों से रोगों का निदान व चिकित्सा की जाने लगी है।
चिन्तन को एक प्रयत्न और करना चाहिए कि उसके प्रयत्न से न्यूनतम पाँच अन्य व्यक्ति भी इसे अपनाने लगें। इसके लिए अपने घर परिवार के लोगों से चर्चा की जाय। उसका लाभ और महत्व बताया जाय तो उनमें से कुछ अनगढ़ों को छोड़कर प्रायः सभी विचारशील सहज सहमत होंगे और दस पाँच दिन याद दिलाने-साथ लेने के उपरान्त स्वयं रस लेने लगेंगे। अभ्यास पड़ने पर तो उसे छोड़ने का विचार तक न करेंगे। आलस्य प्रमाद के अतिरिक्त इसमें और कोई बाधा नहीं।
चिन्तन का भी योगदान है। महाकाल के इस बदलते समय में प्रलयंकर स्वरूप को देखते हुए यह चिन्तन सहज ही उभरता है कि क्या यह परमसत्ता अपनी शक्ति से बिना किसी अप्रिय घटनाक्रम को अपने अशुभ को शुभ में नहीं बदल सकती थी?
चिन्तन के साथ तालमेल बिठाने और आकस्मिक हानि के साथ संगति जोड़ने जैसा कुछ है नहीं। यह एक उच्चस्तरीय कौशल उपार्जित करने का स्वर्ण सुयोग है। डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर कलाकार आदि बनने के लिए कई-कई वर्ष की ट्रेनिंग प्राप्त करनी पड़ती है साथ ही निर्वाह, फीस, पुस्तकें आदि का खर्च भी जेब से देना पड़ता है। योग्यता वृद्धि के लिए किया गया यह त्याग वस्तुतः बीज बोकर सौ गुना काटने के समान है। आरम्भ में घाटा उठाकर भविष्य में समुचित लाभ उठाने वालों में किसान, माली, विद्यार्थी, व्यापारी, शिल्पी, पहलवान, अफसर, आदि उपयोगी पद प्राप्त करने वालों का बहुत बड़ा समुदाय है जो भावी योजनाओं के निमित्त जी खोलकर पूँजी लगाता और अथक परिश्रम करता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को प्रभावित करने वाली ‘आस्था’ विकृत हो जाने से हर क्षेत्र में अनेकानेक संकट खड़े हुये हैं। आत्यंतिक समाधान के लिए तब तक प्रतीक्षा ही करती रहनी पड़ेगी जब तक कि आस्था संकट से निपटने के लिए कारगर प्रयत्न नहीं किये जाते। इस संबंध में एक छोटे से प्रयत्न- अन्धेरे में टिमटिमाते दीपकों की तरह प्रज्ञा अभियान का मूल्यांकन भी किया जा सकता है।
चिन्तन और कर्त्तव्य को बदलें। प्रज्ञा अभियान ऐसी ही पृष्ठभूमि खड़ी करते हेतु सृजा गया एक प्रयास-पुरुषार्थ है।
चिन्तन-इन सभी का प्रज्ञा पुरश्चरण में समावेश हैं। साधक पाँच मिनट तक सूर्योदय के साथ ही गायत्री मन्त्र का मौन-जप करते हैं। अन्तरिक्ष में परिशोधन हेतु आहुतियों का यह परोक्ष यज्ञ है। जितना अधिक उच्चारण इस मन्त्र का सृष्टि के आदि से अभी तक हुआ है, उतना किसी का नहीं हुआ। शब्द शक्ति ओंकार गुँजन के रूप में समग्र अन्तरिक्ष में संव्याप्त है।
चिन्तन में अवाँछनीयता बढ़ रही है और प्रकृति प्रकोपों का दौर चल पड़ा है। वर्षा होती है तो धरती पर हरी चादर बिछती है। जल जंगल एक होते हैं। सर्दी का पतझड़ और गर्मी की जलन का सामना करते समय उसका कारण अदृश्य में ही खोजना पड़ता है। दृश्य के प्रत्यक्ष से निपटने की सामर्थ्य जब कुण्ठित हो चले तो परोक्ष की ओर दृष्टि डालनी चाहिए।
चिन्तन क्षेत्र ही कहा जा सकता है। इसकी रणनीति में अधिक लोगों का अधिक सहयोग एक बहुत बड़ा आधार है। प्रज्ञा पुरश्चरण में अध्यात्म तत्वज्ञान के उच्चस्तरीय अवलम्बनों के अतिरिक्त उसमें अधिकाधिक लोगों का अधिकाधिक सहयोग अर्जित करना भी ध्यान में रखा गया।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में आदर्शवादिता का समावेश रहता था। मानवी पुरुषार्थ का भी इसमें योगदान रहता था, पर इस प्रयोजन को सफल बनाने में अदृश्य वातावरण की भूमिका-अनुकूलता का भी भारी योगदान रहता था। परिस्थितियाँ मनःस्थिति के आधार पर इतने बड़े करवट लेती है कि उसे भाग्य विधान, ईश्वरेच्छा जैसा नाम देना होता है। इसलिये अदृश्य जगत में संव्याप्त वायुमण्डल की तरह ही उसका दूसरा पक्ष वातावरण भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता।
चिन्तन और प्रचलन में कहीं कोई तत्व दिखाई नहीं पड़ते जिसमें व्यक्ति को सुखी सुसंस्कृत एवं समाज को समृद्ध समर्थ बनाने की आशा बंध सके। बुद्धिमानों की कमी नहीं। मूर्धन्य प्रतिभायें भी हर क्षेत्र में विद्यमान और सक्रिय हैं फिर भी दो गज जुड़ने के साथ-साथ चार गज टूटने जैसी विपन्नता बढ़ती जा रही है। मनुष्य कृत उत्पातों का प्रतिफल किसी भी दिन विश्व विनाश की स्थिति उत्पन्न कर सकता है। युद्धोन्माद किसी भी दिन मनुष्य समुदाय की सामूहिक आत्म-हत्या के लिए विवश कर सकता है।
चिन्तन, विश्वास, स्वभाव एवं निर्धारण एक निश्चित दिशा में प्रवाहित अग्रसर होता है। इतने लोगों द्वारा नियत समय पर नियत विधान एक विश्वास के आधार पर किया गया साधना उपचार यदि चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करता है तो उसमें सन्देह की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
चिन्तनीय बनता जा रहा है, उसे महामारी प्रवाह की तरह किसी अदृश्य विष वमन का परिणाम समझा जा सकता है। अच्छा हो प्रत्यक्ष को ही सब कुछ न समझकर परोक्ष की ओर भी दृष्टि दौड़ाई जाय और उस क्षेत्र में संव्याप्त अशुभ से निपटने तथा शुभ का परिपोषण करने के लिए उपाय सोचे और प्रयास किये जायें। न सुलझने वाली गुत्थियों को सुलझाने के लिए हमारा ध्यान परोक्ष की ओर मुड़े और अदृश्य के सन्तुलन का प्रयास चले तो उसे यथार्थ का अवलम्बन ही कहा जायेगा।
चिन्तन सहज ही उभरता है कि क्या यह परमसत्ता अपनी शक्ति से बिना किसी अप्रिय घटनाक्रम को अपने अशुभ को शुभ में नहीं बदल सकती थी?
चिन्तन मुख्य है। महाकाल की अनुशासित विधि-व्यवस्था को गलाने वाली एक विशाल भट्टी एवं ढालने वाली मशीन के रूप में समझा जा सकता है। यह क्रिया-कलाप देखने में तो बड़ा वीभत्स, उन्मादियों का किया हुआ लगता है पर है सारा अभिनव और सुखद सृजन के निमित्त ही।
चिन्तन की उलट-पलट, उथल-पुथल को प्रमुख माना गया है।
चिन्तन जिस प्रकार भ्रष्ट होता जा रहा है, उससे प्रतीत होता है, ध्वंस सुनिश्चित है। प्राकृतिक विक्षोभ और कुछ नहीं, मानव के कृत्यों की ही परिणतियाँ हैं। आने वाले दिनों में सारा विश्व इनका बाहुल्य देखेगा। पारस्परिक व्यवहार में विद्वेष एवं अलगाव तथा सामूहिक व्यवहार में युद्धोन्माद जैसी स्थिति 1991 तक बनी रहेगी। तत्पश्चात् ही सृजन में विश्वास रखने वाली शक्तियाँ उभर कर आएँगी।
चिन्तन व प्रवाह का अदृश्य वातावरण से अन्योन्याश्रय संबंध है।
चिन्तन और दुष्ट चरित्र के कारण विषाक्तता बेतरह बढ़ चली है। समुद्र तल पर तेल बिखर जाने से उन क्षेत्रों के जलचर घुटन से संत्रस्त होकर मरण के मुख में जाते देखे जाते हैं। ठीक इसी प्रकार अदृश्य वातावरण में आसुरी तत्वों की वृद्धि से अनेकानेक संकट एवं विग्रह खड़े होते हैं। न सुलझते हैं। न घटते हैं, न टलते हैं।
चिन्तन और चरित्र का जो गिरा हुआ स्तर है, कुकृत्यों की समाज परिकर में जो भरमार है, उनकी सामूहिक प्रतिक्रिया मात्र एक ही परिणति के रूप में दिखाई देती है- विश्व विनाश लगता है मनुष्य ने सामूहिक आत्महत्या का सरंजाम ही जुटा लिया हो और उस विपत्ति से उबर पाने का कोई कारगर उपाय ही नहीं बन पा रहा हो।
चिन्तन में जिन्हें आदत हो वे मन समझाने के लिए ऐसा भी सोच सकते हैं और एक वर्ष का समय निकाल सकते हैं। उतनी अवधि के लिए संचित साधनों से अथवा अन्य परिजनों पर भार सौंपकर युग पुकार के लिए समय निकालने का तालमेल बिठा सकते हैं। आखिर मनुष्य के चले जाने पर भी तो घर परिवार की व्यवस्था किसी प्रकार बन ही जाती है। यदि अपनी उदारता, साहसिकता और सूझ-बूझ का उपयोग करके वैसा कुछ आदर्शवादी प्रयोजनों के लिए स्वेच्छापूर्वक किया जा सके तो समझना चाहिए सचमुच ही सौभाग्य सूर्य का उदय हो गया।
चिन्तन में उन्हें स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि, पूजा प्रतिष्ठा जैसे लाभ मिले ही मिले हैं, पर वे प्रखरता की दृष्टि से दुर्बल होते गये और असुरता के संगठित आक्रमण अनाचार का सामना न कर सके। यह है असुरों की आरम्भिक सफलता का पर्यवेक्षण। यदि देवताओं ने आरम्भ में ही असुरों जैसा संगठन और सम्मिलित योजना का महत्व समझा- ध्यान रखा होता, तो उस दुर्गति का कष्ट एवं अपयश न ओढ़ते, जिसकी चर्चा सुनने भर से आदर्शवादियों के मन छोटे होते हैं।
चिन्तन-आदर्श आचरण” का नारा दिया ताकि भवितव्यता को टाला जा सके। इस आधार पर ही वे नवीन सुसंस्कृत विश्व की कल्पना करते हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की है कि संघबद्ध प्रतिभावान उदारचेता ही नव सृजन में प्रमुख भूमिका निभाएँगे।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-June
चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता- संयम और सेवा की जीवन साधना अनिवार्य रूप से आवश्यक है, यह एक अकाट्य तथ्य है, जिसे समझा जाना चाहिए।
चिन्तन में निषेधात्मक तत्वों का बाहुल्य होता है। अपने प्रति अपनायी गयी निषेधात्मक दृष्टि ही मनःऊर्जा की गति एवं प्रवाह को अवरुद्ध करती तथा प्रगति पथ को अवरुद्ध कर देता है।” उनका मत है कि “व्यापक स्तर पर जन समुदाय में ऐसा निषेधात्मक दृष्टि बनाने में जिम्मेदार वे तथाकथित दर्शन भी हैं जो डार्विन तथा फ्रायड जैसे नियतिवादी दार्शनिकों द्वारा दिये गये हैं। भ्रान्त करने वाले उस वैचारिक जाल से मनुष्य को बाहर निकलना होगा तथा अपने ही भीतर महानता के बीजों को टटोलना-खोजना होगा जो हर व्यक्ति के मन की अदृश्य सूक्ष्म परतों में विद्यमान है और विकास के लिए मनुष्य से समुचित खाद पानी की अपेक्षा करते हैं। मानसिक परतन्त्रता की यह स्थिति ही इस युग की हर समस्या के लिए जिम्मेदार है जिसके पाश को तोड़ना एवं उससे निकलना आगे बढ़ने ऊँचे उठने की दिशा में पहला साहसिक कदम है।
चिन्तन से बचने, दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा पाने, सत्प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठापना करने के लिए उन्होंने मनःशास्त्रियों की तरह मात्र वैचारिक स्तर पर ही समाधान प्रस्तुत नहीं किया। वरन् उन्हें आदत व्यवहार एवं आचरण का अंग बनाने की दृष्टि से सुनिश्चित उपाय भी सुझाया है जो हर युग के लिए शाश्वत एवं अपरिवर्तनीय है।
चिन्तन से ही कामोत्तेजना उत्पन्न होती है और मन को उस प्रसंग से विरत कर लेने पर उसका समाधान भी सरलतापूर्वक हो जाता है। महाभारत आपद्धर्म प्रसंग में उल्लेख है-
चिन्तन एवं संरचनात्मक कार्यों में निरत रहने से ही बनी रह सकती है।
चिन्तन और आत्म विश्वास के अतिरिक्त और किसी का समर्थन किसी को कदाचित ही कभी मिला हो, वैसी आशा हमें भी क्यों करनी चाहिए?
चिन्तन के भटकाव के कारण मनःऊर्जा की होती है। क्योंकि हमारी अधिकाँशतः इच्छाएँ और चेष्टाएँ अनुपयुक्त और अदूरदर्शितापूर्ण होती हैं। सुनिश्चित उच्चस्तरीय आदर्श एवं दिशाधारा का चयन और निर्धारण हो सके तो उस फुलझड़ी की भाँति व्यर्थ उड़ जाने वाली मनःशक्ति का सुनियोजित और सदुपयोग सम्भव हो सकता है। श्रेष्ठ आदर्श का निर्धारण और उसकी पूर्ति की उत्कट आकाँक्षा स्वयं में एक ऐसी प्रेरक शक्ति है जो प्रेरणा के साथ-साथ दूरदर्शी विवेक को जगाती है। दूरदर्शी विवेक का अभ्युदय एक ऐसी महान उपलब्धि है जिसके सहारे मनुष्य के सामान्य से असामान्य महामानव बनने तक की सम्भावना बन जाती है।
चिन्तन, आदर्श चरित्र और उदात्त व्यवहार को अपनाने की शर्त पूरी करने पर ही साधक कहलाने का अधिकार मिलता है। ओछा और घिनौना व्यक्तित्व बनाये रखकर कोई मात्र पूजा पाठ के मन्त्र-तन्त्र के सहारे उन सफलताओं को प्राप्त नहीं कर सकता जो माहात्म्य प्रतिपादन में बताई गई हैं।
चिन्तन को दिशा देने वाले तत्वदर्शन को जीवनधारा कहा गया है। उसी पर किसी का उत्थान-पतन निर्भर रहता है। इसी सीढ़ी पर चढ़ते हुए लोग स्वर्ग या नरक में प्रवेश करते हैं।
चिन्तन एवं चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश करने तथा व्यक्तित्व में पवित्रता प्रखरता भर देने की सुव्यवस्था का दूसरा नाम है। इस दिशा में जो जितना आगे बढ़ता है, उसकी पात्रता प्रामाणिकता का स्तर उतना ही ऊँचा उठता जाता है। फलतः आत्मवत् के रूप में साहस, संकल्प एवं पुरुषार्थ के सत्प्रयोजनों में तत्परतापूर्वक निरत देखा जाता है। सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों से व्यक्तित्व भरा-पूरा दीखता है। जहाँ ऐसी स्थिति होगी वहाँ आत्मिक ही नहीं, भौतिक सम्पदाओं की भी कमी न रहेगी।
चिन्तन एवं दुष्ट आचरण के विरुद्ध मोर्चाबन्दी करता है, उसका सृजन पक्ष लोकमानस के परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन में निरत है। इसे धुलाई-रंगाई की, गलाई-ढलाई की समन्वित प्रक्रिया कह सकते हैं। इस प्रयत्न-प्रवाह की सफलता-असफलता पर ही भविष्य का अन्धकारमय होना या समुज्ज्वल बनना पूरी तरह निर्भर है। इस तथ्य को गम्भीरता पूर्वक समझा और विश्वासपूर्वक अपनाया जाना चाहिए। इन दिनों करने को असंख्यों काम सामने हैं, पर आपत्ति धर्म की तरह जिसे प्रमुखता मिलनी चाहिए, वह एक ही है कि प्रज्ञा अभियान को व्यापक एवं सफल बनाने के लिए प्राण-पण से प्रयत्न किया जाय।
चिन्तन और कथन-श्रवण से भी कामुक प्रसंगों का परित्याग किया जाता है।
चिन्तन में देखा जा सकता है। फलस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति अर्धविक्षिप्त बना किसी प्रकार अपने जीवन के दिन पूरे कर रहा है। मानसिक व्याधियों की इतनी बहुलता पहले कभी नहीं देखी गई थी। निस्संदेह असन्तुलित मनःस्थिति समस्त आधि-व्याधियों की जननी है।
चिन्तन को जहाँ-तहाँ बहने दिया जाय तो न केवल उसकी क्षमता मारी जाती है वरन् दुष्प्रयोजनों में निरत होकर कई बार तो अनेकों प्रकार के विग्रह विक्षोभ उत्पन्न करती है। भाव सम्वेदनाएँ इन दोनों की तुलना में कहीं अधिक मूल्यवान है। वह जितनी सूक्ष्म है उतनी अधिक गतिवान भी होती है। उनका उभार एवं उफान वेगवती नदी की भाँति उमड़ता है। अनियन्त्रित होने पर वे बुद्धि और शरीर को भी अपने साथ मनचाही दिशा में बहा ले जाती हैं।
चिन्तन को परिपुष्ट करते-करते दुरभि सन्धियाँ- दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिए कटिबद्ध हो जाता है। जुआ, सट्टा,लाटरी, गढ़ा खजाना आदि की ललक इसी आधार पर उभरती है। उत्तराधिकार में- दान दहेज में विपुल धन मिलने की लिप्सा भी इसी कारण प्रचंड बनती और लूट खसौट को अधिकार मानती- उसके लिए हठ करती देखी गई है। एक कदम और आगे बढ़ने पर मनुष्य छल प्रपंच रचता या अपराध आक्रमण पर उतारू होता है। मुफ्तखोरी अनैतिकता- अवाँछनीयता की जन्मदात्री है।
चिन्तन, श्रम एवं उपार्जन खप जाता है फिर भी पल्ले कुछ नहीं पड़ता, वरन् उल्टे ईर्ष्या का शिकार होना पड़ता है। अपव्ययजन्य तंगी और उसकी पूर्ति के लिए अनीति अपनाने का एक कुचक्र अलग ही चल पड़ता है।
चिन्तन में उत्कृष्टता एवं व्यवहार में औदार्य पूर्ण सहकारिता की सत्प्रवृत्तियों को हम ‘आध्यात्मिक’ नाम दे सकते हैं।
चिन्तन और कर्तृत्व में इन्हीं सहज क्रियाओं का ताना-बाना चलता रहा है।
चिन्तन का स्तर ही व्यक्तित्व का आधार है। उसी के आधार पर आकाँक्षाएँ उभरती मान्यताएँ बनती, विचारणा तरंगें बहती और गतिविधियाँ चलती हैं। यही कारण है, कि चिन्तन को दिशा देने वाले तत्वदर्शन को जीवनधारा कहा गया है। उसी पर किसी का उत्थान-पतन निर्भर रहता है। इसी सीढ़ी पर चढ़ते हुए लोग स्वर्ग या नरक में प्रवेश करते हैं।
चिन्तन और चरित्र उच्चस्तरीय था। यह कहने की आवश्यकता नहीं समझी गई कि इस क्षेत्र के प्रवेशकर्ताओं का व्यक्तित्व की दृष्टि से पवित्र एवं प्रखर होना आवश्यक है। इस आरम्भिक शर्त से उन दिनों सभी परिचित थे। अस्तु उसकी चर्चा विस्तारपूर्वक करने की आवश्यकता नहीं समझी गई और आदि तथा अन्त बताते हुए यह अनुमान लगा लिया गया कि मध्यवर्ती प्रक्रिया तो सर्वविदित है उसे तो लोग सामान्य बुद्धि से ही समझ रहे होंगे। फिर पिसे को पीसने से क्या लाभ?
चिन्तन प्रणाली निषेधात्मक है। मनोविकारों का बाहुल्य उनके चिन्तन में देखा जा सकता है। फलस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति अर्धविक्षिप्त बना किसी प्रकार अपने जीवन के दिन पूरे कर रहा है। मानसिक व्याधियों की इतनी बहुलता पहले कभी नहीं देखी गई थी। निस्संदेह असन्तुलित मनःस्थिति समस्त आधि-व्याधियों की जननी है।
चिन्तन से कामोत्तेजना उत्पन्न होती है। सेवन करने पर वह और भी अधिक प्रचण्ड हो उठती है। किन्तु जब विज्ञजन उस ओर से मन हटा लेते हैं तो उसके समाप्त होने में भी देर नहीं लगती।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-October
चिन्तन के द्वारा माया बन्धनों और साँसारिक अज्ञान को काट लेते हैं और विषय विकारता से छूट जाते हैं तो हम मुक्त हो जाते हैं किन्तु ऐसी मुक्ति तब तक नहीं मिल सकती, जब तक सृष्टि के शेष प्राणी बन्धन में पड़े हैं।
चिन्तन, मनन, शोध, अध्ययन का बहुत प्रयत्न किया जाना है और उन उपलब्धियों के फलस्वरूप अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के प्रतिपादन की अधिक स्पष्ट और अधिक उपयोगी झाँकी भी मिलने लगेगी। प्रयत्न यह किया जायेगा कि पाश्चात्य वैज्ञानिकों, अन्वेषकों, तार्किकों, अनुसंधानकर्ताओं, प्रत्यक्षदर्शियों एवं अनुभवकर्ताओं के अनुभव एवं प्रतिपादनों को प्रधानता देते हुए, यह सिद्ध किया जाय कि इनकी क्रमिक प्रगति भी तत्त्व-ज्ञान, धर्म एवं अध्यात्म की ओर किस प्रकार बढ़ रही हैं। नास्तिकता का बुखार अब किस प्रकार घटते हुए स्वाभाविक तापमान पर पहुँच रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-May
चिन्तन एवं मनन करता रहता है, वे विचार अपने अनुरूप मस्तिष्क में रेखायें बना देते हैं, ऐसी प्रणालियाँ तैयार कर दिया करते हैं कि मस्तिष्क की गति उन्हीं प्रणालियों के बीच ही उसी प्रकार बंध कर चलती है, जिस प्रकार नदी की धार अपने दोनों कूलों से मर्यादित होकर। यदि दूषित विचारों को लेकर मस्तिष्क में मन्थन किया जायेगा, तो मस्तिष्क की धारायें दूषित हो जायेगी, उनकी दिशा विकारों की ओर निश्चित हो जायेगी और उसकी गति दोषों के सिवाय गुणों की ओर न जा सकेगी। इसी प्रकार जो बुद्धिमान मस्तिष्क में परोपकारी और परमार्थी विचारों का मनन करता रहता है, उसका मस्तिष्क परोपकारी और परमार्थी बन जाता है और उसकी धारायें निरंतर कल्याणकारी दिशा में ही चलती रहती हैं।
चिन्तन एवं मनन करते हुए, मस्तिष्क का परिष्कार कर डाले। इस अभ्यास से कोई भी कितना ही बुद्धिमान, परोपकारी, परमार्थी और मुनि, मानव या देवता का विस्तार पा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-February
चिन्तन का परित्याग करके बार-बार परमात्मा के चिन्तन में लगा रहता है। बुद्धि भी जड़-पदार्थों में तन्मय न रहकर परमात्म ज्ञान में अधिक से अधिक सूक्ष्मदर्शी होकर दिव्य भाव में बदल जाती है। स्वयं का ज्ञान और तार्किक शक्ति इतनी बलवान नहीं होती कि मनुष्य निरन्तर उचित अनुचित, आवश्यक-अनावश्यक के यथार्थ और दूरवर्ती परिणामों की आत्मा के अनुकूल होने का विश्वास दे सके। तर्क प्रायः व्यर्थ से दिखाई देते हैं। ऐसे समय जब अपने कर्मों के औचित्य का अनौचित्य को परम प्रेरक शक्ति के हाथों सौंप देते हैं तो एक प्रकार की निश्चिन्तता मन में आ जाती है।
चिन्तन में लगा रहता है। बुद्धि भी जड़-पदार्थों में तन्मय न रहकर परमात्म ज्ञान में अधिक से अधिक सूक्ष्मदर्शी होकर दिव्य भाव में बदल जाती है। स्वयं का ज्ञान और तार्किक शक्ति इतनी बलवान नहीं होती कि मनुष्य निरन्तर उचित अनुचित, आवश्यक-अनावश्यक के यथार्थ और दूरवर्ती परिणामों की आत्मा के अनुकूल होने का विश्वास दे सके। तर्क प्रायः व्यर्थ से दिखाई देते हैं। ऐसे समय जब अपने कर्मों के औचित्य का अनौचित्य को परम प्रेरक शक्ति के हाथों सौंप देते हैं तो एक प्रकार की निश्चिन्तता मन में आ जाती है।
चिन्तन करते हुए अपने को अधिकाधिक पवित्र उत्कृष्ट एवं आदर्श बनाने का प्रयत्न जारी रखना चाहिए। दिन भर की शारीरिक और मानसिक दिनचर्या पर सतर्कतापूर्वक नियन्त्रण रखना और रात को वैराग्य की भावना के साथ निश्चित होकर निद्रा माता की गोद में सो जाना। यह क्रम यदि एक वर्ष तक नियमपूर्वक जारी रखा जा सके तो इस प्रकार से आध्यात्मिक कायाकल्प हो सकता है। लोगों को पूजा पाठ का मनोवाँछित लाभ न मिलने की शिकायत करते सुना जाता है, पर जीवन साधना का सत्परिणाम न मिले ऐसा कदापि सम्भव नहीं। जो चाहे परीक्षा करके देख ले।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-November
चिन्तन न करना, आत्मा के प्रति सस्तापन उपस्थित करना है। शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा को सस्ता बनाकर चलने वाले किसी भी श्रेय के अधिकारी नहीं बन पाते। इस अपराध के कारण वे स्वयं भी अस्तित्व और व्यक्तित्व से सस्ते होकर एक निकृष्ट तथा निम्नकोटि का जीवन भोगा करते हैं।
चिन्तन एवं मनन द्वारा ही करना पड़ता है। पुस्तक पढ़ लेने अथवा किसी महात्मा का कथन सुन लेने भर से वास्तविक ज्ञान की उपलब्धि नहीं हो सकती। वास्तविक ज्ञात तो आत्मानुभूति के द्वारा ही सम्भव हो सकता है।
चिन्तन किया जाय, तो वही ईश्वर है, और उसे पृथक-पृथक रूप से देखने पर वही यह दृश्यमान संसार है- व्यष्टि है। विराट् ब्रह्म, अखंड चिन्तन वह इकाई है। जिसमें लाखों छोटी-छोटी इकाइयों का योग है। उसी के ध्यान से ही सारे विश्व को प्रेम करना सम्भव है।
चिन्तनशील बनाना, मन को बलिष्ठ, विश्वासी तथा अविचल रखना, आत्मा को जीवन का सर्वोपरि तत्व मानकर उसका सम्मान करना, शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा को महत्वपूर्ण बनाना है। जो महानुभाव जीवन और उसके समग्र तत्व से सस्तेपन को निकालकर उनमें महत्व गरिमा तथा आदर्श का समावेश करते हैं, वे निश्चय ही मानव से महामानव और जीव से ईश्वर बन कर अपना अंतिम लक्ष्य पा लेते हैं। जीवन बड़ा महत्वपूर्ण अवसर है, इसे सस्ता न बनाना चाहिये।
चिन्तन वह इकाई है। जिसमें लाखों छोटी-छोटी इकाइयों का योग है। उसी के ध्यान से ही सारे विश्व को प्रेम करना सम्भव है।
चिन्तन, क्रिया-कलाप, रहन-सहन, आहार-विहार और व्यवहार-बर्ताव अपनाती थीं, जिससे बच्चा उसी मनोभूमि में ढल जाता था, जिसमें वह चाहती थीं। इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि उनके पहले सभी बच्चे ज्ञानी, सन्त और ब्रह्मनिष्ठ होते गये। अजात-शत्रु की प्रार्थना पर उन्होंने अन्तिम गर्भस्थ बच्चे को राज-नेता के अनुरूप ढाला। उसी ने पिता का राज्य-सिंहासन सम्भाला और कुशल राजनीतिज्ञ हुआ।
चिन्तन मनन करना पड़े, आराधना, उपासना अथवा पूजा-पाठ करना पड़े। वास्तविक ज्ञान के बिना न तो जीवन में सच्ची शान्ति मिलती है और न उसको परकल्याण प्राप्त होता है।
चिन्तन का भाव, त्याग और उदारता, संयम और आस्तिकता का भाव होगा, वह ऊर्ध्व लोकों की हलचलों से प्रकाश और गर्मी पाते रहेंगे, इसलिये इनकी उन्नति सम्भव होगी और पहली प्रकार के व्यक्तियों की अवनति। इस सिद्धान्त के अन्वेषक श्री ई. आर. आर. होल्मवर्ग का भी ऐसा विश्वास है कि भविष्य में दिन रात के घन्टों की संख्या 24 से बढ़ जायेगी हमारी घड़ियों का मान छोटा हो जायेगा, तब मनुष्य समाज पर कई तरह के परिवर्तन परिलक्षित होंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-March
चिन्तन धारा को उन्मुख कर लेते हैं, वे मानो एक ऐसा पुण्य प्रतिपादित करते हैं जिसका सुफल उन्नति एवं यश के रूप में ही प्रतिफलित होता है।
चिन्तन से मुक्त कर उज्ज्वल एवं उदात्त विचार-धारा को स्थान दीजिये। जो बुद्धिमान व्यक्ति समृद्धि एवं सिद्धि की दिशा में अपनी चिन्तन धारा को उन्मुख कर लेते हैं, वे मानो एक ऐसा पुण्य प्रतिपादित करते हैं जिसका सुफल उन्नति एवं यश के रूप में ही प्रतिफलित होता है।
चिन्तन में लगाया था। संयम और साधना द्वारा अपना विवेक परिपक्व किया था और अपने ज्ञान भण्डार को अनुभव की तुला पर तोल कर प्रामाणिक बना लिया था और तब इतनी साधना करने के बाद वे समाज को ज्ञान-दान करने के योग्य हो पाये थे। उन्होंने उस ज्ञान के बल पर मानवता के प्रति सर्वश्रेष्ठ उपकार किया। जिसके लिए वे तब भी पूजित रहे, आज भी हैं और आगे भी पूजनीय बने रहेंगे। ज्ञानोपकार से बढ़ कर संसार का कोई अन्य परोपकार है ही नहीं।
चिन्तन वृत्ति पुरुष को नारी ने ही दी है।
चिन्तन किया जाता है, वह परम तेजस्वी सर्व शक्तिमान्, सर्वेश्वर सविता, प्रसविता परमात्मा ही है। और उस परमात्मा की सर्वतोमुखी, सर्वोपरि शक्ति को चाहे गायत्री कहें अथवा सावित्री वस्तुतः एक ही महत्तत्व से उसका प्रयोजन है। सावित्री और गायत्री की एकता के कुछ प्रमाण देखिये-
चिन्तन व्यवहार करते रहने से इनके साथ मनुष्य की आसक्ति और ममता का भाव जुड़ जाता है। धीरे-धीरे यह अभ्यास इतना गूढ़ हो जाता है कि जीवन का एक अंग ही बन जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-September
चिन्तन-मनन आदि की विशेषताओं की सुविधा न होती, मनुष्य भी सीधा-सादा अन्य प्राणियों की तरह ही एक निकृष्ट प्राणी होता। मनुष्य को अपने जीवन-लक्ष्य के लिये एक लम्बी प्रगति परम्परा पूरी करनी है। उसका जीवन लक्ष्य मोक्ष है। जो अगति पूर्ण स्थिति में पड़े रहने से कभी नहीं पाया जा सकता। मनुष्य को अपना वह लक्ष्य पाने के लिये प्रगति-प्रति-प्रगति करते हुए ही बढ़ना होगा।
चिन्तन-मनन करते रहा जाए। अपने मन और मस्तिष्क में आने वाले विचारों को सम्पादित करते रहना चाहिए। मनुष्य के मस्तिष्क में नित्य ही हजारों विचार आते-जाते रहते हैं, किंतु वे सबके सब ही उपयोगी और सार्थक हों यह आवश्यक नहीं। मस्तिष्क में प्रतिक्षण आने वाले विचारों को देखते-परखते रहना चाहिए और जो विचार अपने उद्देश्य और प्रयोजन के लिए आवश्यक और उपयोगी दिखें उन्हें तो रहने दिया जाए और बाकी के सारे बेकार विचारों को निकाल कर फेंक देना चाहिए।
चिन्तन से उत्पन्न यही आनन्ददायक ज्ञान जीवन का सर्वोपरि तत्त्व और सर्वोच्च उपलब्धि है। इसकी प्राप्ति के पश्चात फिर कुछ पाने न पाने का महत्व नहीं रह जाता। मनुष्य संसार में जीवन साधनों के लिये प्रयत्न करता है। वह उन्हें पा भी सकता है और बहुत बार उसे अपने उस प्रयत्न में असफलता भी हो सकती है। अनेक बार पर्याप्त साधनों का अधिकारी बन सकता है तो अनेक बार उस अपर्याप्त साधनों तक ही रह जाना पड़ता है।
चिन्तन से ही प्राप्त हो सकता है। आत्म-चिन्तन में तल्लीन व्यक्ति को बुद्धि स्थिर हो जाती है। शुभाशुभ कर्मों से उत्पन्न होने वाला हर्ष-शोक, विक्षोभ, प्रसन्नता आदि असन्तुलन उसे प्रभावित नहीं करने पाते। वह हर्ष-शोक, अनुकूलता-प्रतिकूलता दोनों, स्थितियों में समान बना स्थित रहता है। इस निरपेक्ष समानता में जो आनन्द है वही सच्चा आनन्द है।
चिन्तनधारा में अनावश्यक विचार प्रवेश ही न करने पाएँगे। इस प्रकार जब मन में शुद्ध तथा सुन्दर विचार दृढ़ होने लगेंगे तो वे स्वयं भी अपने से विरोधी विचारों को अपने क्षेत्र में नहीं ठहरने देंगे। विचार विचारों को स्वयं भी बुलाते और भगाते रहते हैं।
चिन्तन द्वारा ज्ञान को प्राप्त कर लेता है तो, पहले से ही पास में आनन्द की निधि होने से उस पर इस स्थिति का प्रभाव नहीं पड़ता है। भरे पात्र में और भरना अथवा उसमें कुछ न आना एक ही बात है। कुछ डाला जाएगा तो भी अन्तर न आएगा और कुछ न डाला जाए तब भी भरे का भरा ही है। इसी प्रकार आत्म-ज्ञानी जो स्वयं अपनी आत्मा में संतुष्ट है सुख-साधनों की बहुतायत अथवा अल्पता से प्रभावित नहीं होता।
चिन्तन में ही लगाना चाहिए। जो लोग अपने ध्येय से अलग अपनी विचारधारा को बहनें देते हैं उनका मन अस्त-व्यस्त चंचल ही बना रहता है। वह छिन्न-भिन्न होकर यहाँ-वहाँ भटकता रहता है जिससे उसकी वह शक्ति विकसित नहीं हो पाती जो जीवन की सफलता के लिए आवश्यक होती है।
चिन्तन में तल्लीन व्यक्ति को बुद्धि स्थिर हो जाती है। शुभाशुभ कर्मों से उत्पन्न होने वाला हर्ष-शोक, विक्षोभ, प्रसन्नता आदि असन्तुलन उसे प्रभावित नहीं करने पाते। वह हर्ष-शोक, अनुकूलता-प्रतिकूलता दोनों, स्थितियों में समान बना स्थित रहता है। इस निरपेक्ष समानता में जो आनन्द है वही सच्चा आनन्द है। इसी को आध्यात्मिक आनन्द कहा जाता है।
चिन्तन और मनन करत रहा जाए। इससे हृदय में एक गम्भीरता का समावेश होगा। बाहर की सारी चंचलताएँ और अन्दर की सारी चंचलताएँ नष्ट होती चलेंगी और तब मन में एकाग्रता का भाव आने लगेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-December
चिन्तन करते हैं, उतने ही महत्वपूर्ण रहस्य प्रकट होते हैं। ऐसा लगता है कि उनको जाने बिना मनुष्य का यथार्थ कल्याण सम्भव नहीं। शास्त्रकार का यह थन कि सुन्दर स्वर-संगीत, सुगन्धित वस्तुयें, सुन्दर भोजन, रति, सुख-दुःख, साधन, श्रृंगार यह सब भौतिक आवरण हैं। इनके बीच घिरी हुई साक्षी आत्मा को जब तक नहीं जान लिया जाता, यह सारा ज्ञान निरर्थक है। यथार्थ सुख-शान्ति और बन्धन-मुक्ति दिलाने वाली आत्मा है, उसको जाने बिना मनुष्य शरीर और पशु शरीर में कोई अन्तर नहीं रह जाता।
चिन्तन एवं मनन द्वारा ही हो सकती है। चिन्तन की यह सूक्ष्मता हृदय की गहराई से और हृदय की गहराई प्रेम द्वारा और प्रेम की उत्पत्ति सम्पूर्ण आत्म-समर्पण द्वारा ही सम्भव है। और इन सब का आदि सूत्र उपासना ही है। इस आध्यात्मिक क्रम को उपासना से प्रारम्भ कर दुःखों के आत्यांतिक अभाव तक आसानी से पहुँचाया जा सकता हैं
चिन्तन सूझ-बूझ और आध्यात्मिक उपलब्धियों के लिये तैयार हो जाता है। सारा तप और प्रायश्चित-विधान इसी शुद्धिकरण और जीव को ऊर्ध्वगामी चेतना देने के लिये बनाया गया है, वह न तो असत्य है और न झुठलाये जाने योग्य। मानवीय सत्ता का सच्चा कल्याण इसी सिद्धान्त व पथ के अनुसरण में सन्निहित है।
चिन्तन में हृदय की गहराई उसी के लिये आविर्भूत होती है, जिससे प्रेम होता है। प्रेमी के जीवन में उसका प्रियतम साँगोपाँग रूप से ओत-प्रोत हो जाता है। उसकी सारी भावनायें और कर्मों की सीमा अपने प्रियतम तक केन्द्रित हो जाती हैं। वह उसी के लिये जीता और उसी के लिये मरता है। प्रियतम प्रेमी का सर्वस्व बन जाता है और प्रेमी प्रियतम का रूप हो जाया करता है।
चिन्तन के लिए- ब्रह्मशक्ति संचय के लिए अवसर ही नहीं मिलता। इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव- मूलाधार में भरी प्रचण्ड क्षमता को कार्य शक्ति में लगा दिया जाय, तो मनुष्य पर्वत उठाने एवं समुद्र मथने जैसे कार्यों को कर सकता है। क्रिया शक्ति मानव प्राणी में असीम है। किन्तु उसका क्षय कामुकता के विष-विकारों में होता रहता है। यदि इस प्रवाह को गलत दिशा में रोककर सही दिशा में लगाया जा सके, मनुष्य की कार्य-क्षमता साधारण न रहकर दैत्यों अथवा देवताओं जैसी हो सकती है।
चिन्तन और स्मरण करने की आवश्यकता होती है। परमात्मा सूक्ष्माति-सूक्ष्म तत्व है, उसे साधारण और स्थूल बुद्धि द्वारा यदा-कदा मनन, स्मरण करने से हृदयंगम नहीं किया जा सकता। उसे हृदय की गहराई और सूक्ष्म विवेक द्वारा निरन्तर चिन्तन करने से ही धारण किया जा सकता है।
चिन्तन से लेकर भक्तियोग तक की सारी आध्यात्मिक साधनायें तथा मनोबल, आत्म-बल एवं संकल्पजन्य-सिद्धियों का केन्द्र-बिन्दु इसी ड़ड़ड़ड़ पर है।
चिन्तन जब मस्तिष्क में उथल-पुथल पैदा कर देता है, तब उन अवयवों का दर्शन यदि भावनात्मक हलचल को उच्छृंखल बनादे तो आश्चर्य ही क्या? यहाँ यह रहस्य जान लेना ही चाहिये। मूत्र संस्थान के मूत में बैठी हुई कुंडलिनी शक्ति प्रसुप्त स्थिति में भी इतनी तीव्र है कि उसकी प्रचण्ड धारायें खुली प्रवाहित नहीं रहने दी जा सकती हैं। उन्हें आवरण में रखने से उनका अपव्यय बचता है और अन्यों के मानसिक संतुलन को क्षति नहीं पहुंचती। छोटे बच्चो को भी कटिबन्ध इसलिये पहनाते हैं।
चिन्तन की यह सूक्ष्मता हृदय की गहराई से और हृदय की गहराई प्रेम द्वारा और प्रेम की उत्पत्ति सम्पूर्ण आत्म-समर्पण द्वारा ही सम्भव है। और इन सब का आदि सूत्र उपासना ही है। इस आध्यात्मिक क्रम को उपासना से प्रारम्भ कर दुःखों के आत्यांतिक अभाव तक आसानी से पहुँचाया जा सकता हैं
चिन्तन के आधार पर सम्भव हो सकता है। सतत् चिन्तन की सिद्धि तब ही सम्भव है, जब उपासना द्वारा परमात्मा के संपर्क में रहा जाये।
चिन्तन करने से ही धारण किया जा सकता है।
चिन्तन की सिद्धि तब ही सम्भव है, जब उपासना द्वारा परमात्मा के संपर्क में रहा जाये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-April
चिन्तन क्रम को पूरा करना चाहिये। अपने कार्यक्रम से ही सबेरे ही इसको भी किसी स्थान पर फिट कर लेना चाहिये। पूजा में ही आगे-पीछे इसे भी मिला सकते हैं। समय और क्रम की बात परिजनों के ऊपर ही छोड़ी जा रही है, ताकि वे एक दो दिन में अपनी सुविधानुसार इसे भी यथावत जमा लें।
चिन्तन पद्धति के साथ किया जाना चाहिये। इस पद्धति के तीन अंग हैं- (1) जीवन के स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग को समझना और उसके अनुरूप गतिविधियों का निर्माण करना, (2) ‘हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत’ सूत्र के अनुसार जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग करने के लिये दिन भर की शारीरिक कार्य पद्धति एवं मानसिक विचार पद्धति का निर्धारण करना। (3) रात को सोते समय मृत्यु के समय आवश्यक वैराग्य का अनुभव करना। इन तीन चिन्तन क्रम में से दो प्रातः और तीसरे को रात्रि के सोते समय प्रयुक्त करना चाहिये।
चिन्तन, मार्गदर्शन, अध्ययन एवं अनुभव के आधार पर यह पाया है कि उपासना में पूजा के अतिरिक्त भावना और साधना का भी समन्वय होना चाहिए, तभी वह अभीष्ट परिणाम प्रस्तुत करने में समर्थ हो सकती है। जितना ध्यान पूजा पद्धति पर दिया जाता है, उससे भी अधिक भावना तथा साधना पर दिया जाना चाहिए। तीनों का सम्मिश्रण जहाँ भी होगा वहाँ सफलता निश्चित रूप से मिलेगी।
चिन्तन करने से मन उसी परिधि में घूमता रहता है। उसी क्षेत्र में क्रीड़ा कल्लोल करता रहता है। अतएव मन को रोकने, वश में करने की एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक आवश्यकता भी इस साधना के माध्यम से पूरी हो जाती है।
चिन्तन में लगाने की अपेक्षा इन बे-सिर-पैर की बातों में नष्ट करना सर्वथा अवाँछनीय है। इसी प्रकार उपरोक्त अन्य मनोविकार भी मस्तिष्क की सारी सृजनात्मक क्षमता को अपने ही जंजालों में उलझाए रह कर उसे नट करते रहते हैं। इतना ही नहीं वरन् मानस क्षेत्र को विषैला कर उसे इतना दुर्बल बना देते हैं कि किसी महत्वपूर्ण योजना को बनाने और उसे ठीक तरह चलाने की क्षमता ही नहीं बनती है।
चिन्तन क्रम में से दो प्रातः और तीसरे को रात्रि के सोते समय प्रयुक्त करना चाहिये।
चिन्तन होता रहे। इस कार्य के लिए पन्द्रह मिनट से लेकर आधा घण्टे का समय पर्याप्त होना चाहिये। उस निर्धारित दिनचर्या को कागज पर नोट कर लेना चाहिये और समय-समय पर जाँचते रहना चाहिये कि निर्धारण के अनुरूप कार्यक्रम चल रहा है या नहीं? जहाँ भी चूक होती हो वहीं उसे तुरन्त सुधारना चाहिए। यदि सतर्कतापूर्वक दिनचर्या के पालन का ध्यान रखा जाय, शारीरिक आलस्य और मानसिक प्रमाद से पग-पग पर लड़ते रहा जाय तो प्रातःकाल की निर्धारित योजना रात को सोते समय तक ठीक ही चलती रहेगी।
चिन्तन, आत्म-निरीक्षण, आत्म-शोधन, आत्म-निर्माण और आत्म-विश्वास में संलग्न होना वस्तुतः ‘ईश्वरीय-मित्रता’ का आधार साधन जुटाना ही है। इस प्रगति के साथ-साथ उपासक ईश्वर की ओर और ईश्वर उपासक की ओर स्वयं बढ़ने लगते हैं और बढ़ते-बढ़ते दोनों तादात्म्य और एकात्म होने का वह प्रयोजन की पूर्ण कर लेते हैं, जो ईश्वर की महान प्रतिकृति- मानव सृजन का पुण्य प्रयोजन है।
चिन्तन, आत्म-शोधन, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास की प्रक्रिया अपनाकर अंतः शरीर का परिशोधन आवश्यक है। नित्य कर्म केवल शरीर शुद्धि तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए वरन् नित्य धर्म के रूप में आन्तरिक मलीनताओं का निष्कासन भी नित्य किया जाना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-June
चिन्तन कर सकता है? रोगी रहने वाला मनुष्य किसी लौकिक और पारलौकिक प्रगति के लिए एक प्रकार से असमर्थ ही बन जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-July
चिन्तन, मनन और अनुभव। जिज्ञासा लेकर ज्ञानी पुरुषों के पास जाया जाय और उनसे सत्संग प्रदान करने की प्रार्थना की जाय। वे जो कुछ कहें अथवा बतलायें वह ध्यान से सुना जाये और विश्वासपूर्वक उसे न केवल हृदयंगम किया जाये बल्कि उस पर यथोचित आचरण भी किया जाये। उन व्यक्तियों के लिए जिन्हें शिक्षा का अवसर नहीं मिला है, सत्संग ही एक उपाय है। जिससे ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है।
चिन्तना अभ्यास पाते-पाते अविचल, असंदिग्ध अतर्क और अविकल्प हो जाती है, तभी मनुष्य में आत्म-ज्ञान का दिव्य प्रकाश आपसे-आप विकीर्ण हो जाता है, दिव्य-शक्तियाँ स्वयं आकर उसका वरण करने लगती और वह साधारण से असाधारण, सामान्य से दिव्य और व्यष्टि से समष्टि रूप होकर संसार के लिए आश्चर्य, योगी, अवतार अथवा सिद्ध रूप हो जाता है।
चिन्तन अभ्यास से निश्चय ही आपका चरित्र चमक उठेगा, आपकी शक्तियाँ विकसित हो उठेंगी और आप संसार में बहुत से उल्लेखनीय कार्य कर सकेंगे।
चिन्तन धारा बदलनी पड़ेगी। मनुष्य की आत्मा में अद्भुत शक्तियाँ छिपी पड़ी हैं। उनका चिन्तन करने से वे जाग पड़ती हैं और मनुष्य के चरित्र में समाविष्ट होकर अपना चमत्कार दिखलाने लगती हैं। आत्म-निन्दा के स्थान पर यदि आत्म-प्रशंसापूर्वक अपना चिन्तन किया जाय तो पता चलेगा कि हम एक उदात्त चरित्र और महान शक्तियों वाले व्यक्ति हैं। हम भी उन दैवी गुणों और विभूतियों के भण्डार हैं, जिनका कोई दूसरा है या हो सकता है।
चिन्तन का प्रेम पकड़ सकता है। लोभ तो सत्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है। जिसे लोभ के पिशाच ने पकड़ लिया उसके सत्य की रक्षा हो ही नहीं सकती। लोभ सदैव ही अपने अधिकार से अधिक पाने की लिप्सा किया करता है। अधिकार से अधिक पाने के लिए छल-कपट और असत्य आदि अपकर्मों को ग्रहण करना पड़ता है।
चिन्तन है, जिसे विचार-क्रिया भी कह सकते हैं। इस प्रकार यदि हम इस विचार का अभ्यास करते हुए लगातार आगे बढ़ते रहें कि- “हम स्थूल नहीं सूक्ष्म जीवन हैं, जो अजर और अमर है, जिसका सीधा सम्बन्ध उस परमात्म-तत्व से ही रहता है। किन्तु अज्ञान का अन्धकार उस सत्य का अनुभव नहीं होने देता। इसलिये अब हम उस अन्धकार से निकल कर प्रकाश में आ गये हैं। हमारी यह प्रतीति निरन्तर बढ़ती जाती है कि हम बिन्दु रूप में सिन्धु और आत्मा के रूप में परमात्मा ही हैं, तो कोई कारण नहीं कि हम शीघ्र ही अपने सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त न कर लें।
चिन्तन किया जाय तो पता चलेगा कि हम एक उदात्त चरित्र और महान शक्तियों वाले व्यक्ति हैं। हम भी उन दैवी गुणों और विभूतियों के भण्डार हैं, जिनका कोई दूसरा है या हो सकता है। इस प्रकार के अनुकूल चिन्तन अभ्यास से निश्चय ही आपका चरित्र चमक उठेगा, आपकी शक्तियाँ विकसित हो उठेंगी और आप संसार में बहुत से उल्लेखनीय कार्य कर सकेंगे।
चिन्तन-मनन और अनुभव के आधार पर व्यक्ति को सद्ज्ञान प्राप्त करने का निरन्तर प्रयास करते ही रहना चाहिये।
चिन्तन एक अद्भुत कला है। इससे जहाँ आपको अपने गुणों का आभास होगा वहाँ उन न्यूनताओं का भी पता चलेगा, जो आपको दैन्य की ओर ले जाती हैं। आत्म-चिन्तन करने पर आप जिस किसी समय ऐसी कमी अपने में पायें, जो आपको दीनता अथवा हीनता की ओर ले जाती हों उसे तुरन्त दूर करने का प्रयत्न करिये। यदि आपका धनाभाव आपको दीन बनाता है तो या तो संतोष और सादगी में सुख लीजिए अथवा किसी ऐसे क्षेत्र में उद्योग कीजिए, जिसमें धन प्राप्ति के लिए अवसर हो। यदि अज्ञान के कारण आप में हीन भावना घर किए है तो अध्ययन, मनन और सत्संग का क्रम चलाइये।
चिन्तन और मनन करना पड़ता है, जब तक वह पूरी तरह बुद्धिसात् न हो जाय। इस प्रकार बुद्धिसात् हुआ विषय जब आचरण में उतर आता है, तभी वह सच्चा ज्ञान बनता है। ऐसे परिपक्व ज्ञान में कितना आनन्द और कितनी शक्ति होती है इसे स्वाध्यायवान ही जान सकते हैं।
चिन्तन करने पर आप जिस किसी समय ऐसी कमी अपने में पायें, जो आपको दीनता अथवा हीनता की ओर ले जाती हों उसे तुरन्त दूर करने का प्रयत्न करिये। यदि आपका धनाभाव आपको दीन बनाता है तो या तो संतोष और सादगी में सुख लीजिए अथवा किसी ऐसे क्षेत्र में उद्योग कीजिए, जिसमें धन प्राप्ति के लिए अवसर हो। यदि अज्ञान के कारण आप में हीन भावना घर किए है तो अध्ययन, मनन और सत्संग का क्रम चलाइये। ऐसा पुरुषार्थ करिये जिससे आपको ज्ञान की उपलब्धि हो। यदि आप अपने को निर्बल अनुभव करते हैं तो अपने में साहस स्वास्थ्य और विश्वास की अभिवृद्धि करिए।
चिन्तन करने से वे जाग पड़ती हैं और मनुष्य के चरित्र में समाविष्ट होकर अपना चमत्कार दिखलाने लगती हैं। आत्म-निन्दा के स्थान पर यदि आत्म-प्रशंसापूर्वक अपना चिन्तन किया जाय तो पता चलेगा कि हम एक उदात्त चरित्र और महान शक्तियों वाले व्यक्ति हैं। हम भी उन दैवी गुणों और विभूतियों के भण्डार हैं, जिनका कोई दूसरा है या हो सकता है। इस प्रकार के अनुकूल चिन्तन अभ्यास से निश्चय ही आपका चरित्र चमक उठेगा, आपकी शक्तियाँ विकसित हो उठेंगी और आप संसार में बहुत से उल्लेखनीय कार्य कर सकेंगे।
चिन्तन जिसे आत्म-ज्ञान का उपाय माना गया है, अपने प्रति विचार करना ही तो है। विचार-शक्ति के द्वारा ही हम अपने प्रति किसी स्थायी प्रतीति का सृजन कर सकते हैं। विचार ही यह माध्यम है जो आत्मा और परमात्मा के बीच सम्बन्ध-सूत्र की भूमिका पूरी किया करते हैं। अपने विचारों को विचार द्वारा देखिये और पता लगाइये कि आप किस स्थिति में हैं। आपका जीवन यान ठीक उस पथ पर अग्रसर हो रहा है या नहीं जो परमात्म तत्व की प्राप्ति के सर्वोच्च लक्ष्य की ओर जाता है।
चिन्तन के सिवाय क्या हो सकता है? जब यह चिन्तना अभ्यास पाते-पाते अविचल, असंदिग्ध अतर्क और अविकल्प हो जाती है, तभी मनुष्य में आत्म-ज्ञान का दिव्य प्रकाश आपसे-आप विकीर्ण हो जाता है, दिव्य-शक्तियाँ स्वयं आकर उसका वरण करने लगती और वह साधारण से असाधारण, सामान्य से दिव्य और व्यष्टि से समष्टि रूप होकर संसार के लिए आश्चर्य, योगी, अवतार अथवा सिद्ध रूप हो जाता है।
चिन्तन करिये, आपका सारा दैन्य दूर हो जायेगा और आप अपने को संसार में सर्वशक्तिमान परमात्मा का उत्तराधिकारी अनुभव करेंगे।
चिन्तन द्वारा अपनी महानताओं विशेषताओं और क्षमताओं का द्वार खोलिये और देखिये कि आपके अन्दर सोया महापुरुष जाग पड़ा है। अपने को दीन-हीन और मलीन माने रहना अपनी हत्या करनी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-August
चिन्तन करके अध्यात्म और धर्म का अति महत्वपूर्ण कलेवर खड़ा किया है। उसे जन-मानस में प्रविष्ट कराने के लिए अगणित साधु ब्राह्मणों ने तिल-तिल करने अपना जीवन जलाया है। अगणित धर्म ग्रंथ लिखे गये हैं और उन्हें पढ़ने, सुनने, समझने तथा हृदयंगम करने की स्थिति उत्पन्न करने के लिये अगणित मानतावादी परम्पराओं या रीति-रिवाजों, प्रक्रियाओं, पूजा-पद्धतियों एवं कर्मकाण्डों का प्रचलन किया है। लगातार उस विचार-धारा से संपर्क बनाये रखने के लिये, उन्होंने धर्म एवं अध्यात्म का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया है। मन्दिर, तीर्थ, कथा, कीर्तन, पूजा, पाठ, दान-पुण्य, साधन, संयम आदि सारा धर्म प्रकरण इसीलिये है कि मनुष्य की अध्यात्म एवं धर्म के मान्य सिद्धान्तों पर आस्था बनी रहे और वह संयमी, सदाचारी, परमार्थी एवं आदर्शवादी जीवन जीने के लिए- गतिविधियाँ अपनाने के लिये अन्तःप्रेरणा के आधार पर तत्पर हो सके।
चिन्तन और मनन करते रहना ही चाहिये और सत्साहित्य वही हो सकता है, जो हमें ज्ञान का ऐसा प्रकाश प्रदान करे, जिसमें हम अपने को अपनी आत्मा को और अपनी शक्तियों को ठीक से पहचान सकें।
चिन्तन अथवा भजन-पूजन करने के बाद अकर्मण्य होकर बैठ रहता है और प्रतीक्षा किया करता है कि अब उसकी उपासना के मूल्यरूप धन-दौलत और सुख-साधन का हेतु परमात्मा का वरदान उस पर बरसने वाला ही है, जिसके परिणामस्वरूप उसके लिए उन्नति, विकास तथा वैभव का द्वार स्वयं खुल जायेगा और वह बैठे बैठाये मुफ्त में ही मालामाल होकर सर्व सुख सम्पन्न हो जायेगा।
चिन्तन-मनन करने के लिए समय की बहुत आवश्यकता रहती है।
चिन्तन इस अवरोध के कारण खोजने में ही लगा रहता है। किन्तु कारण मिलता ही नहीं।
चिन्तन, उच्चविचार, शान्ति और शासन आदि के ऐसे गुण आते हैं जो किसी भी विषम परिस्थिति में मनुष्य को सहायक होते हैं। जो अच्छाई-बुराई, कर्तव्य-अकर्तव्य, सत्य-असत्य, पथ और विपथ में निर्णय कर सकने वाली बुद्धि से रहित हैं, जिसकी बुद्धि चंचल, अशान्त और असंतुलित होगी, जिसमें इन्द्रियों और मन पर शासन करने की योग्यता न होगी वह व्यक्ति श्रेष्ठता की दिशा में आवश्यक प्रगति कर सकने की आशा नहीं कर सकता। जिसकी बुद्धि योग्यता पूर्वक निर्णय दे सकती है, ऊहापोह को समय नष्ट करने से वारित रख सकती है। इन्द्रियों तथा मानसिक वृत्तियों पर शासन रखकर उन्हें कर्तव्य पर चला और अकर्तव्य से रोक सकती है वह किसी भी श्रेष्ठता को प्राप्त कर सकने के लिए योग्य मानी जा सकती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-September
चिन्तन की इसी नवीन गरिमा से अनुप्राणित होकर आधुनिक युग में योग के प्रचार की आवश्यकता है।
चिन्तन, चरित्र व व्यवहार के माध्यम से हर पल प्रकट होते हैं।
चिन्तन शक्ति एवं भाव शक्ति के अनुदान दिए हैं। इनमें से प्रत्येक शक्ति का सदुपयोग किया जाना चाहिए। उसे जीवन लक्ष्य के सुनिश्चित उद्देश्य के लिए नियोजित करना चाहिए। लेकिन व्यवहार में यह कहीं दिखता नहीं।
चिन्तन और गहरे आत्म विश्लेषण से ही जाना जा सकता है कि हम अपनी क्रिया शक्ति, चिन्तन शक्ति एवं भाव शक्ति का कितना सदुपयोग अथवा दुरुपयोग कर रहे हैं। इनके दुरुपयोग को तत्काल रोककर इन्हें आत्मोन्मुखी या ईश्वरोन्मुखी करना ही संयम है।
चिन्तन की चतुर्विधि साधन सामग्री से सभी परिचित हैं। इससे अपने मनःक्षेत्र को घेरे रहने वाला उपयोगी वातावरण बनता है। लेकिन इन सबसे कहीं अधिक सर्वसुलभ और सर्वश्रेष्ठ उपाय है- ध्यान। मनोमयकोश के परिष्कार की यह सर्वोत्तम साधना विधि है। ध्यानमग्न होकर हम अपने ईष्ट के साथ श्रद्धासिक्त घनिष्ठता स्थापित करके तादात्म्य की दिशा में बढ़ते चले जाते हैं।
चिन्तन एवं प्रवृत्तियों के विकास सम्बन्धी प्रयोग एवं शिक्षण। 2. स्वास्थ्य के अंतर्गत मनुष्य के शारीरिक, मानसिक स्वस्थ जीवन के लिए आयुर्वेद सहित अन्य वैकल्पिक चिकित्सा विधियों पर गहन शोध, शिक्षा एवं चिकित्सा की व्यवस्था जुटायी जाएगी। 3. शिक्षा के अंतर्गत मानव जीवन के सभी आयामों को दैवी जीवन के अनुरूप प्रशिक्षित करने वाले दार्शनिक, साहित्यिक एवं वैज्ञानिक पाठ्यक्रमों को लागू किया जाएगा। 4. स्वावलम्बन के अंतर्गत उन पाठ्यक्रमों एवं योजनाओं को क्रियान्वित किया जाएगा जो ‘बहुजन हिताय एवं बहुजन सुखाय’ की नीति का पालन करते हुए युवा पीढ़ी को मूल्यनिष्ठ, स्वावलम्बी एवं सुखी बना सके, साथ ही पर्यावरण के अनुकूल हों।
चिन्तन शक्ति एवं भाव शक्ति का कितना सदुपयोग अथवा दुरुपयोग कर रहे हैं। इनके दुरुपयोग को तत्काल रोककर इन्हें आत्मोन्मुखी या ईश्वरोन्मुखी करना ही संयम है।
चिन्तन शक्ति से किया गया तो ज्ञानयोग की सप्तभूमियाँ स्पष्ट होती हैं और भाव शक्ति के माध्यम से योग साधना के तत्त्वदर्शन का अभ्यास करने पर भक्तियोग का मार्ग प्रशस्त होता है।
चिन्तन-मनन के लिए प्रेरित होता था। यहाँ रह रहे तपस्वी एवं ज्ञानी पुरोहितों-आचार्यों के मार्गदर्शन में जीवन की गुत्थियों का समाधान मिलता था और भावी जीवन की रीति-नीति का निर्धारण होता था, इस तरह उच्च आदर्शों के अनुरूप जीवन को गढ़ने व सँवारने के संकल्प एवं आत्मबल के साथ व्यक्ति तीर्थ से प्रस्थान करता था। साँस्कृतिक गौरव गरिमा का पुरातन अध्याय वस्तुतः इस वातावरण के प्रभाव की ही गाथा है।
चिन्तन से ज्ञानयोगी बनो, चरित्र से भक्तियोगी और व्यवहार से कर्मयोगी। फिर तुम पर भी वैसी ही अनुभूतियों एवं उपलब्धियों की वर्षा होगी, जैसे कि मुझ पर हुई है। उनके इस अनुशासन को मानकर योग साधना में लगे हुए शिष्य समुदाय के लिए उनका एक ही आश्वासन है- ‘न में भक्तः प्रणश्यति’ मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता।
चिन्तन की लिप्तता एवं दुराचरण की आँधी-व्यक्ति को जीवन आदर्श एवं ध्येय से विचलित कर पशु-पिशाच स्तर पर लाकर पटक देती है।
चिन्तन एवं भावना में बार-बार भटकाव आता है। चित्त और उसकी वृत्तियाँ बार-बार अपनी परिचित राहों पर दौड़ने-भागने के लिए लालायित होती हैं। लालसाओं के ये अनगिनत छिद्र ही बहुमूल्य जीवन ऊर्जा की बरबादी के कारण हैं।
चिन्तन एवं चित्त वृत्तियों को परिशोधित कर लिया है, वही शुद्ध इन्द्रिय वाला हो सकता है। जो ज्ञानयोग को बौद्धिक क्रिया-कलापों से जोड़ते हैं, उनके लिए इस उपलब्धि को पाना सम्भव नहीं। क्योंकि ज्ञानयोगी के लिए महर्षि अष्टवक्र एक अन्य स्थान पर ‘गलित धीः’ शब्द का प्रयोग करते हैं। गलित धीः का अर्थ है जिसकी बुद्धि गल गयी है। सत्य यही है कि बुद्धि की सीमाओं से परे जाकर ही ज्ञानयोग की साधना सम्भव है।
चिन्तन की दिशा, आकाँक्षाएँ और विचारणाएँ सभी भगवान् के चरणों में अर्पित, समर्पित होने के लिए बह चलें। यह जाग्रत् समाधि है, जो एक केन्द्र पर सोचते रहने की मानसिक विधि नहीं, वरन् लक्ष्य का सुनिश्चित निर्धारण और अभिगमन है।
चिन्तन अपने आप ही पनपता है। सृष्टि में यों कुरूपता भी विद्यमान है और मनुष्य में तामसिकता के अंश भी मौजूद हैं। पर समाधि का भाव प्रगाढ़ता होते ही मन-मस्तिष्क में अपने आप ही एक सात्त्विक उत्साह छा जाता है। और एक नूतन सौंदर्य दृष्टि विकसित हो जाती है। जिससे अपने आप ही विश्व व्यापी सौंदर्य के दर्शन होने लगते हैं।
चिन्तन एवं ब्रह्म में रमण का।
चिन्तन एवं भावनाओं की दशा और दिशा सभी कुछ बदल जाती है। एक नयी दुनिया के द्वार खुलते हैं। इसे अनुभवी ही देख, जान और समझ सकते हैं।
चिन्तन की अंतरंग उमंगें ही बहिरंग जीवन का पर आच्छादित होती हैं। उन्हीं से परिस्थितियाँ बनती हैं, घटनाएँ घटती हैं और दिशाएँ मुड़ती हैं। योग शिक्षा का उद्देश्य इसी भावनात्मक मानवी मर्मस्थल को परिष्कृत और संतुलित करना होना चाहिए। योग की सार्थकता इसी प्रयास की सफलता के साथ जोड़ी, आँकी जानी चाहिए।
चिन्तन में ज्ञान का स्वाभाविक प्रकाश उत्पन्न होता है। जिसे ज्ञानयोग की साधना से और अधिक प्रखर बनाया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-November
चिन्तन से परिचित कराया। अब तो सब भी गार्ग्य की ही भाँति आत्म साधना के लिए संकल्पित हो उठे। सभी के मनों में एक साथ- ‘तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु’ के संकल्प स्वर गूँज उठे।
चिन्तन परम्परा और वैज्ञानिक उपलब्धियों के बीच मचे तुमुलद्वन्द्व के समाधान के युग ऋषि आचार्य श्रीराम शर्मा ने महर्षि दयानन्द की परम्परा को और भी आगे बढ़ाया। उन्होंने महर्षि दयानन्द की पाखण्ड खण्डिनी पताका को और भी अधिक ऊँचाई दी। धार्मिक रूढ़ियों, पाखण्डों, मूढ़-मान्यताओं पर कड़े प्रहार करते हुए वैदिक ऋषियों के स्वर को फिर से मुखरित किया।
चिन्तन एवं चेतना पर होने वाले प्रभावों का शोध अध्ययन चल रहा है। इनके निष्कर्ष शीघ्र ही शोध ग्रन्थों एवं रिसर्च बुलेटिनों में प्रकाशित होने जा रहे हैं। देव संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ देव संस्कृति नाम की शोध पत्रिका का प्रकाशन शीघ्र ही होने वाला है। इनके माध्यम से यह निष्कर्ष अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित एवं प्रसारित किए जाएँगे। इनसे न केवल इस दिशा में चल रहे वैज्ञानिक अनुसंधानों को एक नई दिशा मिलेगी।
चिन्तनीय स्थिति यह है कि देश के सर्वोच्च इंजीनियरिंग संस्थान आई.आई.टी से तैयार होने वाले इंजीनियरों में से 60' विदेशों की राह पकड़ लेते हैं। इसी प्रकार अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान चिकित्सा संस्थान से प्रशिक्षित चिकित्सकों में 50' उच्च शिक्षा एवं नौकरी के बहाने विदेशों में चले जाते हैं। एक बार विदेश पहुँचने के बाद ये प्रशिक्षित मानव संसाधन विदेशों की राष्ट्रीय आय की वृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। औद्योगिक रूप से विकसित राष्ट्रों में नागरिकता प्राप्त करने वाले श्रेष्ठतम भारतीय विशेषज्ञों की संख्या 6000 तक पहुँच चुकी है। पलायन करने वालों में सर्वाधिक 32' डॉक्टर 5' व्यावसायिक तथा शेष 35' अन्य विषयों के विशेषज्ञ होते हैं।
चिन्तन एवं उदात्त भावनाएँ। इसे अपनाकर व्यक्ति तनावजन्य विषाक्त परिस्थिति को क्रमशः तिरोहित करते हुए सुख-शान्ति से भरी-पूरी स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण कर सकता है।
चिन्तन तथा भगवद् भजन करना चाहिए। शिथिलीकरण एवं प्राणायाम जैसे सरल यौगिक क्रियाओं का भी अनुसरण किया जा सकता है। इन्हीं उपायों से मन को शान्त कर तनाव से मुक्त हो पाना सम्भव है। अतः ईश्वर के प्रति समर्पित भाव से जीआ गया आस्था एवं श्रद्धापूर्ण जीवन और सामंजस्यपूर्ण व्यवहार ही तनाव रूपी महाव्याधि के उपचार का एकमात्र प्रभावी उपाय है।
चिन्तन एवं दृढ़ संकल्प से जीवन को सकारात्मक दिशा दी।
चिन्तन के इतिहास में आचार्य श्री का व्यक्तित्व महाक्रान्ति बनकर उभरा। वह उन विरल प्रज्ञ पुरुषों में थे, जिनमें ऋषित्व और मनीषा एकाकार हुई थी। उन्होंने धर्म का आच्छादन तोड़ने, दर्शन को बुद्धिवाद के चक्रव्यूह से निकालने की हिम्मत जुटायी। यही नहीं, धर्म-दर्शन और विज्ञान के कटु-तिक्त, कषाय हो चुके सम्बन्धों को अपनी अन्तर्प्रज्ञा की निर्झरिणी से पुनः मधुरता प्रदान की। उन्होंने अपने आध्यात्मिक अनुभवों के आधार पर बताया कि मानव की समस्याओं का यथार्थ और सार्थक समाधान उसकी अपनी चेतना में है।
चिन्तन यात्रा में पग-पग पर प्रकट हुआ है। वैदिक ऋषियों ने अपनी तपःपूत शोध साधना में मानव की समस्याओं पर गहराई से विचार किया है। और समाधान के लिए वे मानव चेतना के गहनतम प्रदेशों में प्रविष्ट हुए। अपने शोध निष्कर्षों में उन्होंने बताया- ‘एक ध्रुव सत्य है, जो कि सत्य से छिपा हुआ है। जहाँ सूर्य अपने अश्वों को विमुक्त करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-December
चिन्तन में भारी उथल-पुथल के रूप में प्रकट होगी। विचार क्रान्ति ही इसकी दिशा निर्धारित करेगी और युग परिवर्तन को साकार रूप देगी।
चिन्तन, चरित्र व दृष्टिकोण में ऐसा परिवर्तन कर दे जो जीवन भर के सुधरने के प्रयास के बावजूद भी नहीं हो पाता। यह

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-October
चिन्तन में उभरा। उनके द्वारा प्रेरित एवं प्रवर्तित विचार क्रान्ति अभियान योग्य जनों का ऐसा ही समूह है, जिसमें जीवन के अस्तित्व में समायी सम्भावनाओं की बोध कराने की क्षमता है। इसमें व्यक्ति, समाज एवं विश्व सभी के समुचित विकास की गहरी दृष्टि है। इसके द्वारा प्रचारित सूत्रों को समझकर मानवीय जीवन के उत्कर्ष के शिखर तक सुनिश्चित तौर पर पहुँचा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-April
चिन्तन तक मत करो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-September
चिन्तन करने लगता था। इस प्रकार मन के चंचल हो जाने से विचार में विक्षेप हो जाता था। इस कमजोरी को दूर करने के लिए उन्होंने एक सेब खरीदा और उसे अपने पढ़ने की मेज के ऊपर सामने ही रख लिया। वे प्रतिदिन उसकी ओर टकटकी लगाकर देखते थे। इस प्रकार आठ दिन तक उन्होंने उसकी ओर देखा।
चिन्तन कर रहे हैं उसी के समान मानस-चित्र भी बनने लगते हैं। इन मन्त्रों की सहायता से ठोस पदार्थों की तरह उन मानस आकृतियों का चित्र खींच जाता है। विचार हर क्षण मस्तिष्क में से निकल कर बाहर की ओर उड़ते रहते हैं। उन उड़ते हुये विचारों का चित्र ठीक वैसे ही आता है जैसी कि मनुष्य की कल्पना होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-January
चिन्तन किया है, उसी तरह कुरान और बाइबिल का भी किया है। इसलिए मैं मुसलमान और ईसाइयों की ओर से उनका प्रतिनिधि बनकर कहता हूँ कि उन दोनों धर्मों में ऐसी कोई बात नहीं है कि गाय का बलिदान हो। उन धर्मों में बलिदान की बात तो है। वैसे हिंदु-धर्मों में भी है। परन्तु गाय का ही बलिदान होना चाहिए, ऐसी कोई बात उन धर्मों में नहीं है।
चिन्तनधारा और कर्मधारा का साधारण परिचय प्राप्त करने में भी समर्थ नहीं है। शास्त्रज्ञों का यह असामर्थ्य उतना ही देश के लिए अकल्याणकारी है, जितना कि एक निताँत भौतिकवादी पश्चिमोपासना की आज का संस्कृत का छात्र जहाँ कालेज के स्टूडेंट को हर तरह से अनुकरण करने को तैयार रहता है, वहाँ पर उसकी निर्भयता या उद्दण्डता तक नहीं पहुँच पाता। वह संकोच शील है, परन्तु इतना की उसका यह गुण, अवगुण बन जाता है। इसका कारण घुटे-घुटे से वातावरण में रहने से उसका विकसित न होना ही है। इसके अतिरिक्त पाठ्यक्रम में ऐक्य का अभाव और विभिन्न बोर्डों द्वारा परीक्षा प्रणाली भी एक भारी दोष है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-February
चिन्तन, मनन, ईशपूजन में लगाइए, सदैव परोपकार में निरत रहिए। दूसरों की सेवा, सहायता एवं उपकार से हम परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं।
चिन्तन, प्रार्थना, पूजा इत्यादि नियमपूर्वक किया करें, आत्मा के गुणों का विकास करें। सच्चे आध्यात्मिक व्यक्ति में प्रेम, ईमानदारी, सत्यता, दया, श्रद्धा, भक्ति और उत्साह आदि स्थाई रूप से होने चाहिए। दीर्घकालीन अभ्यास तथा सतत शुभचिंतन एवं सत्संग से इन दिव्य गुणों की अभिवृद्धि होती है।
चिन्तन में लगाना चाहिए। दैनिक जीवन का उत्तरदायित्व पूर्ण करने के उपरान्त भी हममें से प्रायः सभी ईश्वर को प्राप्त कर ब्रह्मानन्द लूट सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-June
चिन्तन करना, निस्वार्थ भाव से धर्म सेवा करने वाले लोगों के जीवन वृत्तांत पढ़ना, ऐसी ही चर्चायें, करना तथा सुनना आवश्यक है। यदि अपने को उत्साहित करते रहने वाली प्रेरणा प्राप्त न करते रहा जायगा तो व्रतधारी का उत्साह भी ठण्डा पड़ जायगा। इसलिए व्रतधारी का प्रथम कर्तव्य आत्म प्रेरणा प्राप्त करते रहना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-July
चिन्तन करते रहोगे, वह एक दिन तुम्हारे सामने अवश्य आयेगी। एक नवयुवक जो सब तरह मजबूत था और जिसे किसी प्रकार का रोग न था, किसी भ्रम वश यह समझने लग गया कि मैं अधिक समय नहीं जी सकता। उसकी यह धारणा ऐसी पक्की हो गई कि वह रात दिन इसी मृत्यु के विचार में डूबा रहता और वास्तव में कुछ ही महीनों में वह मर गया। जो व्यक्ति सारे दिन दुःख, शोक, असहायता के विचारों में ही लगे रहते हैं और दुःखमय स्थिति का ही चिंतन किया करते हैं, वे दीन, दुखी और दरिद्रावस्था को प्राप्त होकर बड़ी बुरी दशा में अपने जीवन का अन्त करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-November
चिन्तन करता है। व्यावहारिक जीवन में धर्म और विज्ञान का विशेष है। धर्म का आधार विश्वास है और उसकी प्रवृत्ति हृदय से होती है। विज्ञान का सम्बन्ध मस्तिष्क से है और उसके आधार तर्क और विचार है।
चिन्तन करने से मस्तिष्क बलशाली बनता है और हृदय से प्रफुल्लता का झरना प्रवाहित होने लगता है। अपने सत्वगुण पर विचार करने से आत्म-बल की वृद्धि होती है। आपकी सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि आप कितने अंशों में अपनी महत्ता अनुभव करते हैं, अपने प्रति आपका कितना विश्वास है, आप उसको कितना व्यवहार में प्रत्यक्ष करते हैं।
चिन्तनशील विद्वत्जनों को, वाणी के आराधकों को, सेवाभावी कार्यकर्ताओं को पहिले यही करना होगा जिसके लिए और जिसको लेकर सारी सामाजिक एवं आर्थिक योजनाएं हैं वह भारत का हृदय, यह मानव बहुत करके अब भी मानो अछूता ही रह गया है, शोरगुल में। उसे स्पर्श करना होगा, उसके अन्तर में बैठना होगा, उसे झकझोर कर जगाना होगा कि हे ग्राम-देवता, हे ग्राम- लक्ष्मी जागो। भारत की कोटि-कोटि मानवता के जीवन-स्रोत अँगड़ाई लेकर उठो। रथ तुम्हें पुकार रहा है, पथ तुम्हें पुकार रहा है, आज की संतति का भविष्य तुम्हें पुकार रहा है, आगे आने वाली अनुत्पन्न पीढ़ियाँ तुम्हें पुकार रही हैं, जीवन की अगणित चुनौतियाँ तुम्हें पुकार रही हैं, उनका उत्तर देने के लिए उठो। राष्ट्र का और मानवता का रथ आगे बढ़ाओ।
चिन्तन करो। महानता ही तुम्हारा आदर्श है। अतः अपनी कल्पना का मानसिक चित्र अपने विषय में विशाल, महान् एवं सुन्दर बनाओ और दृढ़ प्रयत्न करो।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-October
चिन्तन क्षमता का कोई समाधान नहीं मिलता। अब वैज्ञानिक निष्कर्ष आणविक हलचलों के ऊपर शासन करने वाली एक अज्ञात चेतन सत्ता को समझने का प्रयास गम्भीरतापूर्वक कर रहे हैं।
चिन्तन, आदर्श चरित्र और परमार्थ परायण व्यवहार की तीन विभूतियाँ सर्वोपरि हैं। इनको प्राप्य करने के लिए निरन्तर जीवन को अभ्यस्त करना अपने आप में एक सर्वसुलभ ओर अत्यन्त उच्चतर का योगाभ्यास है। इसे कर गुजरने वाले अपने समीपवर्ती वातावरण को स्वर्ग जैसा सुखद पाते हैं। अनाचार की पशु प्रवृत्तियाँ छूटते ही वे भव-बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। वे सिद्धियाँ जिन्हें विलक्षणताएँ कहते हैं, वे पवित्र आत्माओं के इर्द-गिर्द अनायास ही घूमती और उपेक्षित होती रहती हैं।
चिन्तन एवं क्रिया-कलाप को लगाये रखने पर भटकाव की भी गुँजाइश नहीं रहती। मनोनुकूलता श्रेष्ठ व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक सिद्ध होती है।
चिन्तन चेतना की है। उसी के अनुरूप व्यक्ति बनते, बढ़ते और बदलते हैं। पेट की भूख बुझाने में जो स्थान आहार का है वही मानसिक एवं भावनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति में विचार संपदा का। अभक्ष्य खाने पर रुग्णता एवं अकाल मृत्यु का संकट सामने आ खड़ा होता है। अचिन्त्य चिन्तन को उत्साहित करने वाले कुविचार भी प्रायः ऐसा ही संकट उत्पन्न करते और पतन पराभव के गर्त्त में धकेलते देखे जाते हैं।
चिन्तन, नीति निर्णय एवं आदर्शवादी कार्य पद्धति के बल पर ही आगे बढ़े हैं।
चिन्तन चरित्र अपनाने की आवश्यकता है। तद्विषयक जो परिवर्तन या विकास करना है उसका स्वरूप सामने आने की बात तभी बनती है जब आत्म-निरीक्षण का सिलसिला परिपूर्ण उत्साह के साथ चलाया जाय।
चिन्तन आदि के उद्देश्य सिर पर सवार रहते हैं और उसे मानसिक कामाचार के फलस्वरूप मनुष्य खोखला होता जाता है। मानसिक विशेषताएँ- विभूतियाँ एक-एक करके विदा होने लगती हैं और उच्च स्तरीय चिन्तन के अभाव में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के षट् रिपु श्रृंखलाबद्ध अथवा व्यतिरेक क्रम से मनुष्य पर आरूढ़ होने लगते हैं। उनके आवेश उद्विग्नता की आग में जलाते रहे हैं और परिणाम चित्र-विचित्र स्तर की नारकीय यातनाएँ प्रस्तुत करते रहते हैं। अपने शरीर में भी तीनों लोक हैं। उसमें से क्या चयन करना है यह मनुष्य की अपनी इच्छा के ऊपर निर्भर है।
चिन्तन के अभाव में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के षट् रिपु श्रृंखलाबद्ध अथवा व्यतिरेक क्रम से मनुष्य पर आरूढ़ होने लगते हैं। उनके आवेश उद्विग्नता की आग में जलाते रहे हैं और परिणाम चित्र-विचित्र स्तर की नारकीय यातनाएँ प्रस्तुत करते रहते हैं। अपने शरीर में भी तीनों लोक हैं। उसमें से क्या चयन करना है यह मनुष्य की अपनी इच्छा के ऊपर निर्भर है।
चिन्तन की दो विकृतियाँ हैं एक को आवेश दूसरे को अवसाद कहते हैं। चिंता, क्रोध, आवेग, ईर्ष्या, प्रतिशोध आदि से उत्तेजित व्यक्ति की स्थिति ज्वर ग्रस्त जैसी हो जाती है।
चिन्तन को उत्साहित करने वाले कुविचार भी प्रायः ऐसा ही संकट उत्पन्न करते और पतन पराभव के गर्त्त में धकेलते देखे जाते हैं।
चिन्तन, चिन्तन के अनुरूप पुरुषार्थ, पुरुषार्थ के अनुरूप सहयोग एवं साधनों का एकत्रीकरण-तदुपरान्त सफलता का श्रेय। इसी प्रक्रिया का अनुसरण करते हुए सामान्य स्तर के लोग, आश्चर्यजनक सफलतायें प्राप्त करते रहे हैं।”
चिन्तन प्रदान करते हैं। कैलीफोर्निया युनिवर्सिटी के वैज्ञानिक द्वय जॉन ह्यूजेज एवं श्री लीक्स तथा जॉन हापकिन्स मेडीकल स्कूल के ‘सोलोमन स्नीडर’ द्वारा आविष्कृत इन हारमोन्स से चिकित्सकों को तो मनोरोगों एवं भावनात्मक विक्षोभों का समाधान करने में सहायता मिली है परन्तु अध्यात्म विधा के अध्येता इस अमृत कलश के सदुपयोग का, सहस्रार के जागरण से भाव योग, श्रद्धा-समर्पण से अद्वैत की स्थिति की प्राप्ति का प्रतिपादन करते हैं। यही वस्तुतः सहस्रार का शाश्वत स्वरूप भी है।
चिन्तन के अनुरूप पुरुषार्थ, पुरुषार्थ के अनुरूप सहयोग एवं साधनों का एकत्रीकरण-तदुपरान्त सफलता का श्रेय। इसी प्रक्रिया का अनुसरण करते हुए सामान्य स्तर के लोग, आश्चर्यजनक सफलतायें प्राप्त करते रहे हैं।”
चिन्तन सुधारने और प्रतिभा निखारने के लिए भेजते हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ऐसा बनाया जाय कि जो संपर्क में आये प्रभावित हुए बिना न रहे और अपनी तुलना में अधिक विकसित सद्गुणी अनुभव करते हुए सम्मान ही नहीं सहयोग भी प्रदान करे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-January
चिन्तन में निरति पकानी पड़ती है। शरीर और आत्मा का भेद समझना पड़ता है। शरीरजन्य इन्द्रियाँ, मनोजन्य तृष्णाएं कितनी आकर्षक और कितनी अभ्यस्त होती हैं? उनसे मन को विरत करके यथार्थता को समझना यही आत्मज्ञान है, आत्मज्ञान होने पर तीसरा नेत्र खुल जाता है और निरर्थक के लिए मरते-खपते रहने, सार्थक की ओर से मुँह मोड़े रहने का अन्तर समझ में आता है। इसी का नाम योग है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की दृष्टि से मनुष्य को ऐसा होना चाहिए जिससे उसकी गरिमा एवं वरिष्ठता का प्रमाण परिचय मिल सके।
चिन्तन और व्यवहार में कठोर संयम की दोनों ही व्यवस्था बना लेने से मन की उच्छृंखलता काबू में आती है।
चिन्तन का, व्यक्तित्व के परिष्कार का तो सुयोग मिलता ही कहाँ है?
चिन्तन क्षेत्र को उलट देता है। इसके लिए आत्मचिन्तन में निरति पकानी पड़ती है। शरीर और आत्मा का भेद समझना पड़ता है। शरीरजन्य इन्द्रियाँ, मनोजन्य तृष्णाएं कितनी आकर्षक और कितनी अभ्यस्त होती हैं? उनसे मन को विरत करके यथार्थता को समझना यही आत्मज्ञान है, आत्मज्ञान होने पर तीसरा नेत्र खुल जाता है और निरर्थक के लिए मरते-खपते रहने, सार्थक की ओर से मुँह मोड़े रहने का अन्तर समझ में आता है।
चिन्तन, दृष्टिकोण इत्यादि का निर्धारण इन्हीं के द्वारा होता है। मनःशास्त्रियों एवं जैव वैज्ञानिकों ने समय-समय पर अपनी शोध निष्कर्षों के हवाले से कहा है कि शरीर संरचना सम्बन्धी बहुत कुछ जानकारी होते हुए भी यह कहना कठिन है कि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में वैचारिक एवं भावनात्मक विकास अलग-अलग प्रकार से क्यों होता है? ‘‘आकल्ट केमिस्ट्री’’ एवं ‘‘एस्ट्रालाजीकल कोरिलेशन ऑफ डक्टलेस ग्लैड्स’’ जैसे ग्रन्थों में विद्वान लेखकों का कहना है कि ब्रह्मांडीय चेतना सूक्ष्म रूप में अन्तःस्रावी ग्रन्थियों को प्रभावित करती है एवं व्यक्तित्व की विविध क्षमताओं को उभारने में सहायक भूमिका निभाती है। आवश्यक हारमोन्स को बढ़ाना एवं अनावश्यक को कम करना अन्नमय कोश की साधना द्वारा सम्भव है। ऐसा योगवेत्ताओं का मत है।
चिन्तन एवं शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से दुर्बल व्यक्तियों पर विधेयात्मक प्रभाव डाला जा सकता है।
चिन्तन मनन की दिशाधारा बदल गई और सत्य की खोज में ही उनका अधिकाँश समय व्यतीत हुआ। जीवन के अन्तिम दिनों में उन्होंने एक दर्शन का विकास किया जिसने बुद्धिवादियों और धार्मिकों को एक सूत्र में पिरोया। इस दर्शन से पश्चिमी विज्ञान 300 वर्षों तक बराबर प्रभावित बना रहा। स्वप्न के तथ्य इतने शक्तिशाली थे जिनसे न केवल डेस्कार्ट्रेस प्रभावित हुए वरन् सम्पूर्ण वैज्ञानिक जगत इन सम्भावनाओं से अनुप्राणित हुआ।
चिन्तन और कुकर्म करने से उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्ति स्वयं तो सदा बेचैन रहते ही हैं, जिनके भी संपर्क में आते हैं उन्हें भी सताते रहते हैं। कुकर्मी, दुर्व्यसनी भी होते हैं। उन्हें नशेबाजी, व्यभिचार, चोरी, छल, ठगी, शेखीखोरी जैसी कितनी ही कुटेवें पीछे लग लेती हैं। और उनकी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं पारिवारिक स्थिति दयनीय बना देती हैं।
चिन्तन सम्बन्धी दोनों ही पक्षों के विकास के लिए उत्तरदायी है। पूल्सविले मेरी लैण्ड (यू॰ एस॰ ए॰) की ‘‘ब्रेन इवॉल्युशन एण्ड बिहेवियर’’ विषय पर कार्यरत प्रयोगशाला के प्रमुख वैज्ञानिक डा॰ पाल मैक्लिन ने यह निष्कर्ष निकाला है कि मस्तिष्क की सबसे भीतरी परत को, जिसे एनिमल ब्रेन, प्रिमीटिव ब्रेन (आदिम-पुरातन मस्तिष्क) कहकर नकारा जाता रहा है, गन्ध शक्ति से तो सम्बन्धित है ही, व्यवहार विकास सम्बन्धी अनेकानेक पक्षों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
चिन्तन करने की मौलिक क्षमता सम्बन्धी केन्द्र यही होते हैं।
चिन्तन शरीराभ्यास के साथ बुरी तरह गुँथ जाता है। अपने को निरन्तर शरीर समझता है। शरीरगत सुख ही उसके सुख और शरीरगत दुःख ही उसके दुःख बन जाते हैं। इन्द्रियजन्य वासनाएं और मनोगत तृष्णा से इन्हीं दो की पूर्ति में शरीर लगा रहता है। इन दो के अतिरिक्त तीसरी है- अहंता।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार शुद्ध होने से ही निखरती हैं। व्यक्तित्व जितना मजा हुआ होगा। साधना द्वारा कषाय-कल्मषों का जितना अधिक निराकरण हो चुका होगा, उतनी ही यह वाणियाँ तेजस्वी होती चली जाएंगी।
चिन्तन को एक ओर से खींच कर दूसरी ओर नियोजित करने का नाम योग है। इसमें आंखें मूँद कर अंतर्मुखी होना पड़ता है और जो भीतर है, उसके कल्याण की साधना करनी पड़ती है।
चिन्तन कर पाये हैं, न वे इसे प्रतिपादित कर पाने की स्थिति में हैं। किन्तु मनश्चिकित्सा, फेथ हीलिंग, सायकिक हीलिंग जैसे पक्षों पर उन्होंने विचार अवश्य किया है व अनेक महत्वपूर्ण निष्कर्ष भी निकाले हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-March
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार का गठन−यही है। स्थायी प्रसन्नता का वह आधार जिससे परिवर्तनशील परिस्थितियाँ न खिन्नता उत्पन्न करती हैं और न किसी कारण प्रसन्नता में व्यवधान आता है। आत्मबोध के अभाव में ही हम रोते−कलपते हैं। इसे प्राप्त किया जा सके तो फिर सदा सर्वदा आनन्द ही आनन्द है।
चिन्तन का सहारा लेता है। प्रकारान्तर से यही आत्मविश्लेषण की, आत्मावलोकन की चिन्तन−मनन की ज्ञानयोग प्रक्रिया है। जो आध्यात्मिक अनुशासनों में सम्पन्न कराई जाती है। मनोविकारों एवं शरीरगत रोगों से दूर रहना हो तो यही एकमात्र अवलम्बन है।
चिन्तन दुष्कर्म से स्पर्श ही नहीं होता, फिर नरक कहाँ से आये?
चिन्तन करता है उसे अकारण खिन्नता ओढ़नी पड़ती है।
चिन्तन करना। जब भी अवसर मिले चासनी पर टूट पड़ने वाली मक्खी की तरह अपने पैर और पंख फँसाने में आनन्द ही आनन्द का अनुमान लगाते रहना। चटोरापन पेट को बिगाड़ना और दुर्बलता, रुग्णता एवं अकाल मृत्यु को न्योंत बुलाता है।
चिन्तन अर्थात् अधोगामी, अस्त−व्यस्त व निकृष्ट विचारधारा। अतः उसका प्रभाव भी मानसिक विक्षिप्तता, तनाव तथा शारीरिक रोगों के रूप में देखा जा सकता है।
चिन्तन। तद्नुरूप वह मन को प्रफुल्लित तथा शरीर को दीर्घकाल तक स्वस्थ समर्थ बनाये रखता है। दूसरे तरफ निषेधात्मक चिन्तन अर्थात् अधोगामी, अस्त−व्यस्त व निकृष्ट विचारधारा। अतः उसका प्रभाव भी मानसिक विक्षिप्तता, तनाव तथा शारीरिक रोगों के रूप में देखा जा सकता है।
चिन्तन लोगों को दिया है उससे वह अधिकाधिक स्वार्थी, विलासी और अपव्ययी होता चला गया है। उसके क्रिया−कलापों में ऐसे कृत्य भी सम्मिलित हो गये हैं, जिनमें अपने लाभ के लिए दूसरों को कष्ट देने में कोई हर्ज नहीं माना जाता। यह दर्शन पशु-पक्षियों के माँस और चमड़े का वैसा प्रयोग करने की छूट देता है जिससे अपने स्वाद और सौंदर्य की इच्छा पूर्ति होती है। औषधियों में इस प्रयोग का भरपूर प्रचलन है।
चिन्तन का प्रवाह निरन्तर चलता रहे तो किसी भी परिस्थिति में व्यक्ति अपना तालमेल बिठा सकता है तथा प्रगतिशील जीवन जी सकता है।
चिन्तन के अनुसार सही समझी जाती रही हैं, पर आज उनकी कोई उपयोगिता नहीं समझी जाती तो पुस्तकों के उल्लेख, किसी बड़े आदमी के अनुकरण या विद्वान के कथन को प्रमाण मानकर उन पुरातन व्यवहारों का अनुसरण करने की आवश्यकता नहीं समझी जानी चाहिए। विवेक, औचित्य न्याय को इस कसौटी पर कसा जाना चाहिए कि मान्यता या निर्णय की प्रतिक्रिया स्वयं उनके ऊपर बीतने पर क्या होगी? यह विवेक और औचित्य का सारथी रखकर ही निर्णय किया जा सकता है।
चिन्तन से, आधि भौतिक पारिवारिक व सामाजिक परिस्थितियों से तथा आधिदैविक प्राकृतिक प्रकोपों से सम्बन्धित हैं। परन्तु वस्तुतः इन तीनों का सम्बन्ध मनःस्थिति से है। मन में उत्कृष्ट चिन्तन का प्रवाह निरन्तर चलता रहे तो किसी भी परिस्थिति में व्यक्ति अपना तालमेल बिठा सकता है तथा प्रगतिशील जीवन जी सकता है।
चिन्तन करना है। इन विचारों की अनवरत यात्रा अपने स्वरूप भेद के अनुसार समस्त मानव शरीर को प्रभावित करती हैं। आमतौर से चिन्तन का स्वरूप विधेयात्मक भी हो सकता है और निषेधात्मक भी। विधेयात्मक अर्थात् उच्चस्तरीय व प्रगतिशील चिन्तन। तद्नुरूप वह मन को प्रफुल्लित तथा शरीर को दीर्घकाल तक स्वस्थ समर्थ बनाये रखता है।
चिन्तन और चरित्र दुष्प्रवृत्तियों से घिरा रहे और जीभ से राम नाम के अक्षरों को उच्चारण करने भर से यह आशा की जाने लगे कि भक्तों जैसी सिद्धि और सद्गति पीछे−पीछे फिरेगी। राम का नाम और राम का काम दोनों परस्पर गुँथे होने चाहिए। किसने कितनी बार किन अक्षरों का उच्चारण किया इस आधार पर भक्ति का लक्ष पूरा नहीं होता। पहली शर्त अन्तःकरण की पवित्रता श्रद्धा, सद्भावना और सेवा परायणता है। इसके उपरान्त पूजा उपासना का कर्मकाण्ड है।
चिन्तन की उत्कृष्ट एवं चरित्र की आदर्शवादिता के साथ सम्बद्ध किया है।
चिन्तन−मनन की ज्ञानयोग प्रक्रिया है। जो आध्यात्मिक अनुशासनों में सम्पन्न कराई जाती है। मनोविकारों एवं शरीरगत रोगों से दूर रहना हो तो यही एकमात्र अवलम्बन है।
चिन्तन का स्वरूप विधेयात्मक भी हो सकता है और निषेधात्मक भी। विधेयात्मक अर्थात् उच्चस्तरीय व प्रगतिशील चिन्तन। तद्नुरूप वह मन को प्रफुल्लित तथा शरीर को दीर्घकाल तक स्वस्थ समर्थ बनाये रखता है। दूसरे तरफ निषेधात्मक चिन्तन अर्थात् अधोगामी, अस्त−व्यस्त व निकृष्ट विचारधारा। अतः उसका प्रभाव भी मानसिक विक्षिप्तता, तनाव तथा शारीरिक रोगों के रूप में देखा जा सकता है।
चिन्तन एवं व्यवहार यदि यह है कि हमें किसी के लिए त्याग न करना पड़े, दूसरे ही सदा हमारी सेवा सहायता के लिए दौड़े आयें। सदा सद्भावना व्यक्त करते रहें और हम अपनी उपेक्षा वृत्ति पर ही कायम रहें तो समझना चाहिए कि यह मनोरथ कभी पूरा न हो सकेगा।
चिन्तन को उत्कृष्ट स्तर का बनाये। व्यक्तित्व में पवित्रता और प्रखरता का अधिकाधिक समावेश करें। जो साधन अपने पास हैं उन्हें लोक मंगल के लिए खेत में बोयें। हरी−भरी फसल की आशा इसी आधार पर की जा सकती है।
चिन्तन से मुक्त कर देती है। मनुष्य स्वभावतः क्रूर, आक्रामक व शक्ति का भूखा होता है।
चिन्तन और चरित्र को क्रमशः अधिकाधिक निखारते जाना। सब की सत्ता को अपने में और अपने व्यक्तित्व को सब में संव्याप्त देखना। इस मनोभूमि को अपनाने वाला संकीर्ण स्वार्थपरता में सीमाबद्ध नहीं रह सकता। उसे व्यापक विश्व में अपनी आत्मीयता को विकसित करना होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-April
चिन्तन की दुर्बलता ही कारण है। मन मजबूत हो तो साथियों की तलाश क्यों करनी पड़े? उनके न मिलने पर एकाकीपन का डर क्यों लगे। जंगली पशु पक्षी अकेले रहते हैं। उनके लिए तो हिंस्र पशु-पक्षी भी आक्रमण करने को बैठे रहते हैं।
चिन्तन बिठा लिया जाय, तो भी काम चल जाता है। इतनी महत्वपूर्ण शिक्षाऐं उस क्षेत्र की समस्याओं का सामना करने के हल निकल आये।
चिन्तन भय की ओर मुड़े तो इस संसार में सब कुछ डरावना है। यदि साहस साथ दे तो हाथ-पैर, आँख मुख और मन, बुद्धि इतनों का निरंतर साथ रहने पर डरने का क्या कारण हो सकता है? वन्य पशुओं में कुछ ही हिंसक होते हैं। फिर मनुष्य निर्भय रहे, उनके प्रति अन्तः से प्रेम भावना रखें तो खतरे का अवसर आने की कम ही सम्भावना रहती है। राजा हरिश्चंद्र श्मशान की जलती चिताओं के बीच रहने की मेहतर की नौकरी करते थे।
चिन्तन से यह तथ्य भली प्रकार हृदयंगम हो गया था कि दसों इन्द्रिय प्रत्यक्ष और ग्यारहवीं अदृश्य मन इन सबका निग्रह कर लेने पर बिखराव से छुटकारा मिल जाता है और आत्म संयम का पराक्रम बन पड़ने पर मनुष्य की दुर्बलताएँ समाप्त हो जाती हैं और विभूतियाँ जग पड़ती हैं। सशरीर सिद्ध पुरुष होने का यही राजमार्ग है। इन्द्रिय निग्रह, अर्थ निग्रह, समय निग्रह और विचार निग्रह यह चार संयम हैं। इन्हें साधने वाले महामानव बन जाते हैं और काम क्रोध, लोभ, मोह इन चारों में मन को उबार लेने पर लौकिक सिद्धियाँ हस्तगत हो जाती हैं।
चिन्तन चलता रहा। लेकिन गुरुदेव उन्हें पूरी तरह पढ़ रहे थे। मेरी कसक उन्हें भी दुःख दे रही थी।
चिन्तन भी चलता रहा। एकाकी रहने में मन पर दबाव पड़ता है। क्योंकि वह सदा के समूह में रहने का अभ्यासी है। एकाकीपन से उसे डर लगता है। अन्धेरा भी डर का एक बड़ा कारण है।
चिन्तन अपनाता और दुष्कर्म करता है। दुर्मति−जन्य दुर्गति हाथों-हाथ सामने आती जाती है। यह अदृश्य लोक में भर गए विकृत वातावरण का प्रतिफल है। इस स्थिति में जो भी रहेगा, नर पशु और नर पिशाच जैसे क्रिया-कृत्य करेगा। भगवान की इस सर्वोत्तम कृति धरती और सत्ता को इस प्रकार नरक बनते देखने में व्यथा होती है।
चिन्तन-अन्तःकरण आपको-विश्व मानवता को समर्पित है।” उनने प्रसन्न वदन स्वीकारोक्त प्रकट की एवं परावाणी से निर्देश व्यक्त करने का उन्होंने संकेत किया।
चिन्तन और क्रियान्वयन जिस प्रकार शान्तिकुंज के तत्वावधान में चल रहा है, उसे एक शब्द में अद्भुत एवं अनुपम ही कहा जा सकता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार परिष्कृत कर लिया हो वही सच्चा साधक है। उसे मार्गदर्शक खोजने नहीं पड़ते वरन् वे दौड़कर स्वयं उनके पास आते और उंगली पकड़कर आगे चलने का रास्ता बताते हैं। जहाँ वे लड़खड़ाते हैं वहाँ गोदी में उठाकर कन्धे पर बिठाकर पार लगाते हैं। हमारे सम्बन्ध में यही हुआ है। घर बैठे पधारकर अधिक सामर्थ्यवान बनाने के लिए 24 वर्ष का गायत्री पुरश्चरण उन्होंने कराया एवं उसकी पूर्णाहुति में सहस्र कुण्डी गायत्री यज्ञ सम्पन्न कराया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-September
चिन्तन और चरित्र का प्रसंग है जिसे कोई भी ऊँचा रख सकता है और ऐसी प्रसन्नता में डुबा रहने का अवसर हाथ रहता है जो किसी के छीने से न छिन सके।
चिन्तन करने वाले अपना मानसिक सन्तुलन गँवा बैठते हैं और भविष्य के लिए निराश हो बैठते हैं। ऐसी स्थिति में होना यह चाहिए कि बुरी से बुरी परिस्थिति आ धमकने पर भी उसका सामना करने के लिए तैयार रहा जाय।
चिन्तन कर टालना सम्भव हो पाता है। ‘‘सौ वक्ताओं को एक चुप हराने’’ वाली बात बिल्कुल सही है। व्यर्थ की बकवाद में अपनी ही शक्ति नष्ट होती है, यह स्पष्ट जानना चाहिए।
चिन्तन करते रहते हैं वे महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हस्तगत कर अपना तथा समाज का भला करते हैं।
चिन्तन और आदर्श चरित्र का परिचय देना चाहिए। इसमें अनाचार से हाथ खींचना पड़ता है। लोगों को यह कठिन प्रतीत होता है। सरल यह लगता है कि अनाचार से मिलने वाले लाभों को दोनों हाथों से समेटते रहें और पूजा-पाठ की चित्र−विचित्र चिन्ह पूजा करके भगवान को भी बहकाते फुसलाते रहें। दोनों हाथ लड्डू भरे रहने की यह विडम्बना मात्र मन को बहकाने भर के काम आती है।
चिन्तन एक प्रकार की विचार शैली है जिसमें व्यक्ति विषम या प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपना मनोबल ऊँचा बनाये रखता है और अच्छे परिणामों की आशा रखता है। विपन्न परिस्थितियाँ, प्रतिकूलताएँ एक नया स्वर्णिम सुअवसर लेकर आती हैं जिनसे वह सबक सीखना और अपने व्यक्तित्व को निखारना, प्रखर बनाना अनिवार्य समझता है। विधेयात्मक पक्ष की ओर देखना, सोचना, संकल्पयुक्त विवेकशील मन की एक प्रक्रिया है जो व्यक्ति के चयन पर निर्भर करती है।
चिन्तन, आदर्श चरित्र एवं सज्जनोचित व्यवहार की आवश्यकता है उन्हीं को श्लोकों में समाविष्ट किया गया है। इस दृष्टि से उस भाग की प्रगतिशीलता का समर्थक एक शास्त्र सोचा जा सकता है। कथानकों में तो उन सिद्धान्तों का सरस समर्थन है ही।
चिन्तन और चरित्र का प्रवाह निरन्तर उत्कृष्टता के मार्ग पर चले। आचरण में अधिकाधिक आदर्शवादिता और पुण्य परमार्थ की गतिविधियों का समावेश बढ़े। यह दिन भर में घंटे आध घंटे की चिन्ह पूजा नहीं है। उस मार्ग पर निरन्तर चला जाना चाहिए। भूल न होने पाये- कुसंस्कारों का आक्रमण चढ़ न दौड़े, इसका निरीक्षण परीक्षण हर घड़ी चलना चाहिए।
चिन्तन को निकालने के लिए बोस्टन के प्रख्यात चिकित्सक डा. सारा जार्डन का सुझाया गया मार्ग सर्वमान्य है। डा. जार्डन का कहना है कि प्रत्येक दिन सुबह अपने मस्तिष्क को विचार से रिक्त कर उसे शैम्पू से धोइये। समस्त वैचारिक गन्दगी युक्त धूल-निषेधात्मक चिन्तन को बुहार बाहर करें और उस रिक्त स्थान की पूर्ति सद्विचारों को मन में धारण करें। दिन भर उन्हीं सद्विचारों से अपने को ओत-प्रोत रखें। प्रतिदिन नये विचारों को अपनाने और अपनाये हुए विचारों को स्मृति पटल पर दुहराते रहने से मनःसंस्थान इतना शक्तिशाली हो जाता है कि बुरे विचार पास तक नहीं आ पाते।
चिन्तन करने वाले अथवा उदासीन रहने वाले को अपनी ही बौद्धिक भ्रम ग्रस्तता के कारण ऐसी जोखिम उठानी पड़ सकती है जिसमें कि वह हर्ष-विषाद की दोनों ही परिस्थितियों में अपना सन्तुलन गँवा बैठे और भविष्य में कुछ करने का साहस ही न करे।
चिन्तन और क्रिया-कलाप शरीर सुख के लिए ही नियोजित न रहे उसमें आत्म-कल्याण के लिए भी समुचित स्थान रहे। ऐसी उमंगें उठने लगें तो समझना चाहिए कि ‘आत्मबोध’ हुआ और आत्म-कल्याण का द्वार खुला। जब तक कानों से सुनने, जीभ से कहने और हाथों से वस्तुओं की उलट-पुलट को ही अध्यात्म साधना समझा और उतने भर से ही सन्तोष किया जाता हो, तब तक यही समझना चाहिए कि अभी मन बाल-क्रीड़ाओं में रम भर रहा है।
चिन्तन पर नियन्त्रण किया जा सके, तो काम सेवन की प्रक्रिया फिर कुछ भी कठिन न रह जायेगी।
चिन्तन पर यदि नारी अवयवों का आकर्षण छाया रहे तो वे भी विपरीत स्तर की प्रवृत्ति अपनाने लगते हैं।
चिन्तन में अधिक रुचि लेती हैं। इसका परिणाम सामान्यतः यह होता है कि स्वाभाविक प्रवृत्ति में अन्तर पड़ना आरम्भ हो जाता है। कड़ी मेहनत वाले खेलों में अधिक तत्परता दिखाने वाली युवतियों के चेहरे पर बाल उगने लगते हैं और आवाज पुरुषों जैसी भारी हो जाती है। अन्य महिला अवयवों में भी इस आधार पर अस्वाभाविकता आ जाती है। पुरुषों के चिन्तन पर यदि नारी अवयवों का आकर्षण छाया रहे तो वे भी विपरीत स्तर की प्रवृत्ति अपनाने लगते हैं।
चिन्तन, मनन, कथा-कीर्तन आदि के सहारे जीवनचर्या में सतोगुण बढ़ाने का मार्ग-दर्शन मिलता है। पर उसका कहना सुनना ही पर्याप्त नहीं। उस राह पर चलना भी तो चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि हमारे चिन्तन और चरित्र का प्रवाह निरन्तर उत्कृष्टता के मार्ग पर चले। आचरण में अधिकाधिक आदर्शवादिता और पुण्य परमार्थ की गतिविधियों का समावेश बढ़े।
चिन्तन ही मुख्य विषय रखा जाय। आत्मा और शरीर की भिन्नता अनुभव करने के साथ यह भी सोचना चाहिए कि मानवी शक्तियों का भण्डार अन्तःक्षेत्र में ही विद्यमान है, उसे उपलब्ध करने के लिए आत्म परिष्कार की कार्यविधि निर्धारित करने में चिन्तन को नियोजित किया जा सके तो निश्चय ही मौन साधना का समुचित प्रतिफल प्राप्त होता है।
चिन्तन को नियोजित किया जा सके तो निश्चय ही मौन साधना का समुचित प्रतिफल प्राप्त होता है।
चिन्तन को प्रकारान्तर से दूरदर्शिता पूर्ण कहा जा सकता है।
चिन्तन का सर्वथा अभाव होना तो सहज नहीं। पर मौन काल में इतना तो सरलतापूर्वक हो सकता है कि इस अवधि में आत्म चिन्तन ही मुख्य विषय रखा जाय। आत्मा और शरीर की भिन्नता अनुभव करने के साथ यह भी सोचना चाहिए कि मानवी शक्तियों का भण्डार अन्तःक्षेत्र में ही विद्यमान है, उसे उपलब्ध करने के लिए आत्म परिष्कार की कार्यविधि निर्धारित करने में चिन्तन को नियोजित किया जा सके तो निश्चय ही मौन साधना का समुचित प्रतिफल प्राप्त होता है।
चिन्तन अधिक करते हैं और स्त्रियाँ पुरुषों सम्बन्धी चिन्तन में अधिक रुचि लेती हैं। इसका परिणाम सामान्यतः यह होता है कि स्वाभाविक प्रवृत्ति में अन्तर पड़ना आरम्भ हो जाता है। कड़ी मेहनत वाले खेलों में अधिक तत्परता दिखाने वाली युवतियों के चेहरे पर बाल उगने लगते हैं और आवाज पुरुषों जैसी भारी हो जाती है। अन्य महिला अवयवों में भी इस आधार पर अस्वाभाविकता आ जाती है। पुरुषों के चिन्तन पर यदि नारी अवयवों का आकर्षण छाया रहे तो वे भी विपरीत स्तर की प्रवृत्ति अपनाने लगते हैं।
चिन्तन और चरित्र पर निर्भर करता है। निषेधात्मक या विधेयात्मक चिन्तन मनुष्य को हेय नर-पशु अथवा उठा हुआ देव मानव बना देता है। विधेयात्मक चिन्तन एक प्रकार की विचार शैली है जिसमें व्यक्ति विषम या प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपना मनोबल ऊँचा बनाये रखता है और अच्छे परिणामों की आशा रखता है। विपन्न परिस्थितियाँ, प्रतिकूलताएँ एक नया स्वर्णिम सुअवसर लेकर आती हैं जिनसे वह सबक सीखना और अपने व्यक्तित्व को निखारना, प्रखर बनाना अनिवार्य समझता है। विधेयात्मक पक्ष की ओर देखना, सोचना, संकल्पयुक्त विवेकशील मन की एक प्रक्रिया है जो व्यक्ति के चयन पर निर्भर करती है।
चिन्तन और चरित्र की पवित्रता एक आवश्यक शर्त है पर इसके लिए मनोबल, साहस, पराक्रम की भी कमी नहीं रहनी चाहिए। यह आत्म-विश्वास और आत्म-गौरव का प्रसंग है। जिसकी अभिवृद्धि के लिए चरित्र निष्ठा के अतिरिक्त स्वतन्त्र प्रयोग होना चाहिए।
चिन्तन करने वाला व्यक्ति कायर नहीं हो सकता। वह स्वयं के जीवन में, मानवता और ईश्वर में विश्वास रखता है, अपनी योग्यता और क्षमता को पहचानता है। वह निर्भीक और अपराजेय होता है। जो कुछ सामने आता है उसी से अपने उपयोग की अच्छाइयाँ छाँट लेता है।
चिन्तन मनुष्य को हेय नर-पशु अथवा उठा हुआ देव मानव बना देता है। विधेयात्मक चिन्तन एक प्रकार की विचार शैली है जिसमें व्यक्ति विषम या प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपना मनोबल ऊँचा बनाये रखता है और अच्छे परिणामों की आशा रखता है। विपन्न परिस्थितियाँ, प्रतिकूलताएँ एक नया स्वर्णिम सुअवसर लेकर आती हैं जिनसे वह सबक सीखना और अपने व्यक्तित्व को निखारना, प्रखर बनाना अनिवार्य समझता है। विधेयात्मक पक्ष की ओर देखना, सोचना, संकल्पयुक्त विवेकशील मन की एक प्रक्रिया है जो व्यक्ति के चयन पर निर्भर करती है।
चिन्तन को बुहार बाहर करें और उस रिक्त स्थान की पूर्ति सद्विचारों को मन में धारण करें। दिन भर उन्हीं सद्विचारों से अपने को ओत-प्रोत रखें। प्रतिदिन नये विचारों को अपनाने और अपनाये हुए विचारों को स्मृति पटल पर दुहराते रहने से मनःसंस्थान इतना शक्तिशाली हो जाता है कि बुरे विचार पास तक नहीं आ पाते। प्रकारान्तर से यह आत्म शोधन का संकेत है। समाज में अगणित व्यक्तियों की तरह विचार और चरित्र भी भरे पड़े हैं।
चिन्तन भी कम भयानक नहीं है। मस्तिष्क में जिस स्तर के विचार आते हैं उसी स्तर की क्रिया के निमित्त मन मचलने लगता है और इस आतुरता की पूर्ति के लिए सही गलत अनेक उपाय सूझते हैं। कई बार तो उसके लिए कोई न कोई तरकीब भी ढूंढ़ निकाली जाती है। इसीलिए भारतीय मनोविज्ञान वेत्ताओं ने परामर्श दिया है कि काम चिन्तन पर नियन्त्रण किया जा सके, तो काम सेवन की प्रक्रिया फिर कुछ भी कठिन न रह जायेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-August
चिन्तन अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित करती है कि उसके अन्तराल में अति महत्वपूर्ण क्षमताओं का भी भण्डार भरा बड़ा है जिसे थोड़ा विकसित कर लेने पर वह काया की दृष्टि से यथावत् रहते हुए भी व्यक्तित्व कि दृष्टि से यथावत् रहते हुए भी व्यक्तित्व की दृष्टि से महानतम बन सकता है।
चिन्तन तल्लीन रहने से उसी सीमा तक सीमित रह जाता है। फलतः उनके दैनिक जीवन की गतिविधियों को देखकर लोग जहाँ सनकी मानने लगते हैं। वहाँ उनकी कार्य विशेष में अद्भुतता की छाप भी मानते हैं।
चिन्तन के निम्न सिद्धान्तों को जो कि तथ्य परक है, अपना कर स्वास्थ्य लाभ किया जा सकता है-
चिन्तन कर पाता है एवं सही चिन्तन ही स्वल्प काया के लिये उत्तरदायी है। यह एक प्रतिष्ठित प्रामाणित तथ्य है। बहिरंग उपचार पर तो अधिकाँश पद्धतियाँ, मन एवं विशेषज्ञ जोर देते चले आये हैं। पर अन्तरंग जिसे स्थूल का पोषण करने वाला मूल केन्द्र कहा जा सकता है, पर कारगर होने वाली पद्धति के लिये समुचित प्रयास चिकित्सा जगत में नहीं किये गये।
चिन्तन में निरत दिखाई देते हैं। उनका एक ही रोना रहता है कि वे मजबूत हैं, अक्षम हैं, परिस्थितियों के कारण कार्य कर पाने में असमर्थ हैं एवं ये परिस्थितियाँ ही उनकी समस्त विपत्तियों का, यहाँ तक कि कुस्वास्थ्य का भी प्रधान कारण हैं। पश्चिम में भौतिक सुख सुविधाओं के बावजूद सर्जनात्मकता का अभाव कुस्वास्थ्य का कारण बनता चला जा रहा है। सर पील के अनुसार “जो कुछ भी मनुष्य कहता है, वह उसके विचारों में होता है, वह निश्चय ही जीवन में क्रियान्वित होता है। जो व्यक्ति वय की दृष्टि से वृद्ध होते हुये भी यह कहता है कि अभी तो मैं स्वस्थ हूँ, युवा हूँ, निश्चित मानिये, उसे ‘जरा’ स्पर्श भी नहीं कर सकती।
चिन्तन और मनन से काम लेना पड़ता है। कर्म के लिए उद्देश्यपूर्ण प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। भक्ति के लिए कोई उच्चस्तरीय आधार भगवान का गढ़ना पड़ता है। यों प्यार तो स्त्री बच्चों से भी होता है पर उसके पीछे स्वार्थ और आदान-प्रदान के तत्व काम करते हैं। इस अभ्यास को आगे बढ़ाने के लिए आदर्श के समुच्चय इष्टदेव की प्रतिमा गढ़ते हैं और एकान्त एकाग्रता के समय अंतर्मुखी होकर उसके साथ अपने को घुला देने की भावना करते हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उन आदर्शों का समावेश करना होता है जो मानवी गरिमा के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। तथ्य एक ही है। उसके निमित्त अपनाये गये उपचारों में प्रकृति भिन्नता के कारण अन्तर हो सकता है। पर जिसमें क्रिया काण्ड ही सब कुछ समझा गया हो और व्यक्तित्व को सामान्य जनों की अपेक्षा अधिकाधिक उत्कृष्ट बनाने की उपेक्षा की जा रही हो, समझना चाहिए कि बाल कौतूहल जैसी विडम्बना मात्र है। भले ही उसका नाम साधना रख लिया जाय।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार, दृष्टिकोण और क्रिया-कलाप से काया-कल्प जैसा परिवर्तन लाने की आवश्यकता है, वहाँ यह संख्या नगण्य न सही अपर्याप्त अवश्य है। हमारा मन था कि जीवन का अंतिम अध्याय पूरा करते-करते हम एक करोड़ हनुमान, अंगद न सही पर रीछ वानर तो मोर्चे पर खड़े कर सकेंगे पर वैसा बना नहीं। अन्य संगठनों की दृष्टि से तुलनात्मक रूप से 20 लाख समर्थक सदस्य होना बड़ी बात हो सकती है। पर काम जितना करने को पड़ा है और समय जितना विषम है, उसे देखते हुये साथियों की संख्या निश्चित रूप से अपर्याप्त है।
चिन्तन की दिशा बदलने की है। विद्वता, बुद्धिमत्ता की कहीं कमी नहीं। सफलता के एक से एक बड़े कीर्तिमान प्रस्तुत करने वालों की सामर्थ्य और प्रतिभा की कम नहीं आँकी जा सकती। वैभव भी कम नहीं। जितना धन सरकारों के सम्पन्नों के पास है वह इसके लिए पर्याप्त है कि संसार के दो तिहाई वनमानुषों और पिछड़ों को उनकी स्थिति से उबार कर देवोपम न बन पड़े तो भी बुद्धिमान मनुष्यों की तरह सुविधा सम्पन्न जीवन तो जी ही सकते हैं।
चिन्तन ही स्वल्प काया के लिये उत्तरदायी है। यह एक प्रतिष्ठित प्रामाणित तथ्य है। बहिरंग उपचार पर तो अधिकाँश पद्धतियाँ, मन एवं विशेषज्ञ जोर देते चले आये हैं। पर अन्तरंग जिसे स्थूल का पोषण करने वाला मूल केन्द्र कहा जा सकता है, पर कारगर होने वाली पद्धति के लिये समुचित प्रयास चिकित्सा जगत में नहीं किये गये।
चिन्तन का अकसर मिला और उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि प्रचलित शासन प्रणालियों में से एक भी पूर्ण निर्दोष नहीं है। इन्हें मथ कर नवनीत निकाला जाना चाहिए और समाज व्यवस्था तथा शासन प्रणाली का अभिनव गठन इसी आधार पर किया जाना चाहिए। व्यक्ति के चिन्तन चरित्र और व्यवहार का स्वरूप भी नये ढाँचे में ढाला जाना चाहिए। वर्तमान मनुष्य की उपयुक्त जीवनचर्या अपनाने की मनःस्थिति में नहीं है। ऐसी दशा में व्यक्तियों के अनुरूप ही समाज एवं शासन का स्तर हो सकता है।
चिन्तन में पवित्रता और प्रखरता का काया कल्प स्तर का परिवर्तन न हुआ हो तो समझना चाहिए कि वह दिव्य दर्शन भी दिवा स्वप्न के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। ऐसा तो हिप्नोटिज्म के आधार पर किसी को भी ईश्वर, देवता या और कुछ दिखाया जा सकता है।
चिन्तन गंवाते रहते हैं। इस आधार पर जो प्रदर्शनात्मक प्रपंच खड़ा किया गया था। वह क्षणिक और अवास्तविक विडम्बना खड़ा करने के अतिरिक्त और किसी काम नहीं आता।
चिन्तन, आदर्श चरित्र और उदार व्यवहार का समन्वय कह सकते हैं। यह सहजीवन का महा मानव स्तर है। इसे जो अपनाते हैं वे क्षुद्र प्रयोजनों में निरत नहीं रहते। पेट और प्रजनन का कार्य भी वे निपटाते तो रहते हैं, पर ऐसा नहीं होता कि उन्हीं में अपना सीमा बन्धन बाँध लें। वे लोक-कल्याण एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन के सामयिक क्रिया-कलापों को अपने जीवन क्रम में अविच्छिन्न रूप से सम्मिलित करते हैं।
चिन्तन ने उन्हें साम्यवादी परिधि में अवरुद्ध नहीं रहने दिया वरन् मानतावादी बन गये। उनने इंग्लैण्ड की नागरिकता ग्रहण कर ली। इसके उपरान्त वे क्रमशः अध्यात्मवाद की ओर अधिकाधिक झुकते चले गये।
चिन्तन मनन से ही मन की भ्रष्टता का निराकरण होता है।
चिन्तन बहुत अंश तक साम्यवादी प्रभाव से ही किसी हद तक प्रभावित बना रहा और उनने श्रद्धा की तुलना में आलोचना को अधिक मान्यता दी। इस पर भी उनने वे भारतीय संस्कृति, दर्शन एवं अतीत के प्रति श्रद्धा व्यक्त की है और उसे मानव जाति के उत्कर्ष में उपयुक्त योगदान दे सकने योग्य कहा है।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार का स्वरूप भी नये ढाँचे में ढाला जाना चाहिए। वर्तमान मनुष्य की उपयुक्त जीवनचर्या अपनाने की मनःस्थिति में नहीं है। ऐसी दशा में व्यक्तियों के अनुरूप ही समाज एवं शासन का स्तर हो सकता है। इस चिन्तन ने उन्हें साम्यवादी परिधि में अवरुद्ध नहीं रहने दिया वरन् मानतावादी बन गये। उनने इंग्लैण्ड की नागरिकता ग्रहण कर ली।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-November
चिन्तन बुरा नहीं, पर उसे बीज की तरह गलना और उगना चाहिए अन्यथा नयनाभिराम वट वृक्ष की छाया में बैठकर सरसता का आस्वादन संभव न हो सकेगा। ध्यान और योग की अपनी उपयोगिता है, पर उतने भर से सच्चिदानन्द का सान्निध्य सम्भव नहीं। भगवान का कोई स्थिर रूप नहीं, वे सक्रियता के रूप में गतिशील हो रहे हैं। इस विश्व की शोभा, स्वच्छता जिस दिव्य गतिशीलता पर निर्भर है। हम उसका अनुसरण करके ही प्रभु प्राप्ति के राजमार्ग पर चल सकते हैं।
चिन्तन हो सकता हो उसे कर लेने के उपरान्त ही नया कदम उठाना चाहिए और उस नये प्रयोग में इतनी सूझ−बूझ और प्रामाणिकता का परिचय देना चाहिए कि बदलने के कारण जो चर्चा का माहौल बना है उस कालिख पर सफेदी पुत सके।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता आदर्शवादिता का दूरदर्शी सूझ−बूझ का समुचित मात्रा में समावेश किये रखा जाय। अपने साथ कड़ाई करने और दूसरों के साथ नरमी बरतने की नीति अपनाई जाय। महापुरुष की जीवन गाथाओं से उनके कर्तृत्व और व्यक्तित्व के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई महानता को गम्भीरता पूर्वक समझने का प्रयत्न किया जाय। जो व्यक्तित्व की दृष्टि से खरा है वह बहुमूल्य सोने या हीरे की तरह है। उसकी गरिमा और कीर्ति अक्षुण्ण है।
चिन्तन जैसी काल्पनिकता के आधार पर नहीं हो सकती और न बूढ़ों की तरह उसे अतीत की स्मृतियों की चर्चा करते रहकर पाया जा सकता है। उसके लिए कर्मनिष्ठ तरुणों की तरह वर्तमान से जूझना पड़ेगा। आनन्द गहरे कुएँ का जल है, जिसे ऊपर लाने के लिए देर तक प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। मोती लाने वाले गहराई में उतरते और जोखिम उठाते हैं। आनन्द पाने के लिए गोताखोरों जैसा साहस और कुआँ खोदने वालों जैसा संकल्प होना चाहिए।
चिन्तन को रोकती व मनोविकार मिटाती हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को ऊँचे स्तर का बनाने के लिए आत्मसुधार और आत्मविकास का आश्रय लेना पड़ता है। यही है सुनिश्चित फलदायिनी आत्मदेव की साधना।
चिन्तन के फलस्वरूप आनन्द की प्राप्ति का जो माहात्म्य बताया गया है उसका आधार यही है कि वस्तु स्थिति को नये सिरे से समझें और जीवन−नीति का नये सिरे से निर्धारण करें।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में जितनी उत्कृष्टता और प्रामाणिकता होती है, उसी अनुपात से अन्यान्यों की अन्तरात्मा तक गहरी छाप पड़ती है। इसी आधार पर प्राप्त की हुई सफलता अभिनन्दनीय और अनुकरणीय बनती है।
चिन्तन का ही प्रति फल है। बच्चों का अपहरण और माँगी रकम न देने पर उनका कतल यह अब अनहोनी घटना नहीं रही। कुछ समय पूर्व चोर डाकू भी स्त्री−बच्चों पर हाथ नहीं उठाते थे पर अब स्वर्ग−नरक, पाप−पुण्य, लोक−परलोक, आत्मा−परमात्मा की मान्यताओं ने−भौतिकवादी दर्शन ने समाप्त कर दिया तो मनुष्य को और मछली को मारने खाने में अन्तर ही क्या रह गया। नागरिकता और समाज व्यवस्था के नाम पर मनुष्य की पशुता को दबाया नहीं जा सकता। उसके लिए दार्शनिक निष्ठा की आवश्यकता होती है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में प्रमुख स्थान देना चाहिए। समग्र सुख शान्ति का यही मार्ग है।
चिन्तन का विषय बनी हुई है। मनुष्य का प्रेत होता है, यह भी जाना और माना जाता रहा है। अब यह नया तथ्य सामने आया है कि महत्वपूर्ण घटनाओं के−महत्वपूर्ण पदार्थों के और प्रचण्ड संकल्प सत्ताओं के भी प्रेत हो सकते हैं। स्थूल के नष्ट हो जाने पर भी सूक्ष्म का अस्तित्व बना रहता है।
चिन्तन इसके लिए प्रेरणा देता है, लक्ष्य तक पहुँचने के लिए चलना तो पैरों को ही पड़ेगा। भावनाओं में प्राणों की प्रतिष्ठापना कर्मनिष्ठा ही काम करती है। सत्कर्मों में निरत हुए बिना आनन्द की अनुभूति आज तक किसी को भी नहीं हो सकी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-June
चिन्तन की उत्कृष्टता है प्रतीकों एवं प्रतिमाओं के प्रति श्रद्धा को केन्द्रित करना और उसे देवता के रूप में श्रद्धा प्रदान करना यह सामान्य तथ्य नहीं है। जड़ को चेतन के समतुल्य मान्यता देना यदि अन्धविश्वास नहीं है तो फिर उसे दर्शन की चरम सीमा ही कहा जायेगा।”
चिन्तन से निष्कर्ष वह नहीं निकलता जो मोटी दृष्टि से समझा या सोचा जाता है। सफलता या सम्पदा के सत्परिणाम उसी स्थिति में उपलब्ध हो सकते हैं जब सदुपयोग की शालीनता समर्थक सदाशयता की दृष्टि भी प्रखर परिपुष्ट बन सके।
चिन्तन का यही आधार है। यज्ञीय वातावरण में मंत्र के माध्यम से श्रेष्ठ विचारों का स्फोट किया जाता है जो यज्ञ ऊर्जा के सान्निध्य में पहुँचकर और भी सूक्ष्म हो जाते हैं तथा अंतरिक्ष में फैल जाते हैं। अपने अनुरूप ही विचारों को अंतरिक्ष से संकलित करके पुनः यजन कर्ता के निकट पहुँचते हैं। अपने उद्गम स्त्रोत में पहुँचकर वे और भी अधिक सशक्त एवं समर्थ बन चुके होते हैं। यज्ञीय ऊर्जा में मंत्र शक्ति से निकले शक्तिशाली विचार यजन कर्ता के चारों ओर छाये रहते हैं।
चिन्तन, हेय चरित्र, हेय व्यवहार करने की सूझ भी नहीं सूझेगी। दण्ड देने वाला सामने जो खड़ा है। सिखाने वाला सटकर जो खड़ा है। इस प्रकार की भावनाएं उठे तो समझना चाहिए कि साकार उपासना ठीक चल रही है, अन्यथा भिखारी का, जेबकट का बाना पहन कर भगवान के पास जाया गया तो उसे निकृष्टता के कारण दुत्कार सहनी पड़ेगी। माता गोद में बच्चे को तब उठाती है, जब उसे अच्छी तरह धो लेती है।
चिन्तन के आधार बनते और उसके अनुरूप ही गतिविधियाँ चलती हैं। सत् चिन्तन एवं अनैतिक चिन्तन का यही आधार है। यज्ञीय वातावरण में मंत्र के माध्यम से श्रेष्ठ विचारों का स्फोट किया जाता है जो यज्ञ ऊर्जा के सान्निध्य में पहुँचकर और भी सूक्ष्म हो जाते हैं तथा अंतरिक्ष में फैल जाते हैं। अपने अनुरूप ही विचारों को अंतरिक्ष से संकलित करके पुनः यजन कर्ता के निकट पहुँचते हैं। अपने उद्गम स्त्रोत में पहुँचकर वे और भी अधिक सशक्त एवं समर्थ बन चुके होते हैं।
चिन्तन और कर्तव्य को इस कसौटी पर कसते हैं कि भविष्य में इसकी परिणति होगी। यह विवेक ही किसी के वास्तविक उत्थान और पतन का कारण होता है।
चिन्तन का स्वरूप समझने के लिए यह देखना होता है कि इन्द्रियों की वासना वृत्ति को उच्छृंखलता बरतने छूट तो नहीं मिल गई है। इन्द्रियों का गणना क्रम स्वादेन्द्रिय से होता है, इसके बाद ही कामेन्द्रियाँ आती हैं। पाण्डवों में थे तो पाँच। पर पराक्रम की दृष्टि से अर्जुन और भीम मूर्धन्य माने गए हैं। इसी प्रकार मनोनिग्रह के प्रसंग में इन्द्रिय दमन की साधना करने वालों को दो मोर्चे फतह करने की प्रमुखता देनी होती है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समावेश कर सकता है। प्रार्थना मन्त्रों में न्यूनाधिक मात्रा में ऐसे संकेत भी हैं।
चिन्तन को बारीकी से देखता है और इसी आधार पर आक्रोश एवं उपहार जन्य प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहता है। भगवान है। इतना मान लेना पर्याप्त नहीं। उसकी प्रतिमा का दर्शन करने या नाम जपने भर से उद्धार हो जाता है यह मान्यता भी अपूर्ण है। आस्तिकता तभी सार्थक होती है जब भगवान को अपनी जीवनचर्या में स्थान दिया जाय।
चिन्तन-चेतना से सम्बन्धित अन्तरंग एवं दूसरा काय-कलेवर तथा उसका बहिरंग व्यवहार। समग्र व्यक्तित्व इन दो घटकों का समुच्चय भर है। इन दोनों ही पक्षों को कुमार्गगामी न बनने देने के निमित्त सतर्कता परिष्कार प्रखरता की आवश्यकता पड़ती है, साथ ही प्रगति पथ पर सुनियोजन हेतु भावभरी तत्परता की। प्रगतिशीलता का आधार मात्र इसी एक केन्द्र पर केन्द्रीभूत है कि व्यक्तित्व का स्तर कितना ऊँचा उठाया गया? भौतिक सफलता भी उसकी ही परिणति है।
चिन्तन में उच्चस्तरीय आदर्शों का समावेश। यों व्यक्तिगत जीवन में इस प्रयोग की चर्चा हुई है पर वह समाज पर भी समान रूप से लागू होती है। जो व्यक्तिगत जीवन में पवित्र है वह सामूहिक प्रयोजनों में दुष्टता या भ्रष्टता को नहीं अपना सकता। इसी ज्ञान के कारण कृष्ण, कृष्ण हुए और बुद्ध, बुद्ध। स्थित प्रज्ञता से दोनों का मतलब है ‘थियोसोफिकल फिलासाफी।
चिन्तन में परिवर्तन के इस महत्वपूर्ण मोड़ ने विज्ञान को नयी दिशाधारा दी है, नये सिरे से सोचने का अवसर दिया है।
चिन्तन एवं अनैतिक चिन्तन का यही आधार है। यज्ञीय वातावरण में मंत्र के माध्यम से श्रेष्ठ विचारों का स्फोट किया जाता है जो यज्ञ ऊर्जा के सान्निध्य में पहुँचकर और भी सूक्ष्म हो जाते हैं तथा अंतरिक्ष में फैल जाते हैं। अपने अनुरूप ही विचारों को अंतरिक्ष से संकलित करके पुनः यजन कर्ता के निकट पहुँचते हैं। अपने उद्गम स्त्रोत में पहुँचकर वे और भी अधिक सशक्त एवं समर्थ बन चुके होते हैं। यज्ञीय ऊर्जा में मंत्र शक्ति से निकले शक्तिशाली विचार यजन कर्ता के चारों ओर छाये रहते हैं।
चिन्तन को केन्द्रीभूत नहीं करने देता। इसलिए कहा गया है कि यौनाचार का प्रत्यक्ष व्यवहार तो कुछ मिनटों में ही समाप्त हो जाता है पर शृंगारिक अश्लील चिन्तन ढेरों समय उन्माद की तरह छाया रहता है। ऐसी स्थिति में वह मनोविकार बन जाता है और उससे शरीर की अपेक्षा मन को अधिक क्षति पहुँचती है।
चिन्तन का उन्माद मनोभूमि पर छाया रहता है।
चिन्तन और मनन में यह तथ्य भी समाविष्ट रहना चाहिए कि व्यक्तित्व का निर्धारण एवं विकास इस प्रकार किया जाय, जिससे उसका अनुशासन निभे और प्रसन्नता भरा अनुग्रह हस्तगत हो। देवालयों, तीर्थ स्थानों की दर्शन झाँकी इस तथ्य की स्मृति पटल पर गहराई के साथ जमाये रहने के लिए की जाती है। यह सामान्य क्रम है जिसे उसे जितनी अधिक बार चरितार्थ कर सकना सम्भव हो उतना करना चाहिए।
चिन्तन करने और उन पर विक्षुब्ध रहने पर भी उनका निराकरण कहाँ होता है? इसलिए उचित यही है कि विक्षोभों में भी मनः सन्तुलन बनायें और अपनी सामर्थ्य उपयोगी कार्यों के लिए सुरक्षित रखें।
चिन्तन का स्तर कैसे परिमार्जित किया जाय, जिससे संसार को अच्छी दृष्टि से देखना सम्भव हो और सुखद अनुभूतियों से भरा-पूरा समझा जा सके।
चिन्तन ढेरों समय उन्माद की तरह छाया रहता है। ऐसी स्थिति में वह मनोविकार बन जाता है और उससे शरीर की अपेक्षा मन को अधिक क्षति पहुँचती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-December
चिन्तन, मनन के अभ्यासों में भी मन रुकता है और एकाग्रता की स्थिति बढ़ती जाती है।
चिन्तन और आदर्श चरित्र का आश्रय लेने पर आत्मा को परमात्मा का दिया हुआ उपहार हर दृष्टि से सार्थक होता है। क्षणिक रसास्वादन के लिए भविष्य को हर दृष्टि से अन्धकारमय बना लेने में कोई बुद्धिमानी नहीं है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार भी देखता नहीं परखता है। इसलिए इसकी कसौटी तो एक ही रहती है कि कौन उसकी इच्छाओं की पूर्ति और आज्ञाओं का पालन करने में किस सीमा तक लगा हुआ है। यह कार्य जन संपर्क में संलग्न रहने विशेषतया पिछड़ों को ऊँचा उठाने में ही सम्भव हो सकता है। इसी रीति−नीति को अपनाने पर ईश्वर की प्रसन्नता निर्भर है।
चिन्तन का भाव है। मातृ शक्ति की यही प्रतिभा है। मानवी गरिमा की वह अधिष्ठात्री है, इसलिए उसकी एक दिशा धारा, एक प्रतिपादन के रूप में एक मुख है।
चिन्तन की दिशा विशेष में नियोजित रखने के लिए एकान्त की आवश्यकता होती है। भौतिक विज्ञानी भी अपने अन्वेषण, पर्यवेक्षणों में अपनी प्रयोगशाला ऐसे स्थान पर बनाते हैं जहाँ ध्यान बटाने वाला शोरगुल न हो। मन को अपने विशेष लक्ष्य में तादात्म्य होने की सुविधा रहे। गहन विषयों के आविष्कारक अपने लिए ऐसी ही परिस्थितियाँ तलाश करते रहते हैं।
चिन्तन की भगदड़ को पकड़कर एक खूँटे से बाँधना पड़ता है। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन के अभ्यासों में भी मन रुकता है और एकाग्रता की स्थिति बढ़ती जाती है।
चिन्तन में जो समय नष्ट होता है और विक्षोभ उभरता है उसे बचा लेना ही बुद्धिमानी है। चिन्तन को उस केन्द्र से हटाकर जो सम्भव है उसे करने में क्यों नियोजित न किया जाय?
चिन्तन का समय आता है तब यह भी भुला दिया जाता है कि अपना पराया कौन है। उनकी सही पहचान भी नहीं रहती और व्यवहार करते समय ठीक उलटा बरताव किया जाता है।
चिन्तन पर ही निर्भर रहना पड़ता है वे एकांत ही नहीं ढूंढ़ते वरन् एकाकी निवास का भी प्रबन्ध करते हैं। मौन भी धारण करते हैं। पर यह सदा के लिए नहीं हो सकता। कुछ सीमित काल के लिए ही होता है। क्योंकि अन्न, वस्त्र, आग जैसी दैनिक आवश्यकताएँ लम्बे समय के लिए संग्रह करके नहीं रखी जा सकतीं।
चिन्तन और मनन से सम्पन्न होता है। अन्तरंग की योजनाएँ इसी आधार पर बनती हैं। आमतौर से लोग दूसरों की बुराई देखते हैं और अपने सम्बन्ध में बेखबर रहते या पक्षपात बरतते हैं। अन्तर्मुखी होकर ही यह सुधार परिष्कार, निर्माण या विकास का कार्य किया जा सकता है। इसलिए दिनचर्या में इसके लिए कोई समय और स्थान निश्चित निर्धारित करना चाहिए।
चिन्तन को उस केन्द्र से हटाकर जो सम्भव है उसे करने में क्यों नियोजित न किया जाय?
चिन्तन एवं स्वभाव व्यवहार की ऐसी लकीर पकड़ लेना जो अटपटी मालूम होती है और उनसे संपर्क रखने में कोई भी कतराने लगता है। वे कर्मचारी हैं तो बॉस और बॉस हैं तो कर्मचारी भीतर ही भीतर कुढ़ते रहते हैं और पारस्परिक व्यवहार में कई बार खीज प्रकट करने लगते हैं, अवज्ञा भी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-July
चिन्तन वाले वैज्ञानिकों का मत है कि अपने सौरमण्डल में नौ ग्रह हैं, इक्कीस उपग्रह हैं और जो गिन लिये गये ऐसे बीस हजार क्षुद्र ग्रह हैं। ये सभी अपनी-अपनी कक्षा मर्यादाओं में निरन्तर गतिशील रहने के कारण ही दीर्घ जीवन का आनन्द ले रहे हैं। यदि वे व्यतिक्रम पर उतारू हुए होते तो इनमें से एक भी जीवित न बचता। कब के वे परस्पर टकराकर चूर्ण विचूर्ण हो गये होते।
चिन्तन करता है वह व्यभिचार कर चुका।
चिन्तन से ग्रस्त, भयभीत, शंका शंकित रहने के कारण उसे क्रमशः खोते, गँवाते चले जाते हैं।
चिन्तन और आत्मबल समाप्त हो जायेगा। अस्तु यह क्षेत्र विशुद्ध रूप से अध्यात्मवादियों का है। उन्हें लोककल्याण की दृष्टि से उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाने के लिए जन−साधारण को प्रशिक्षित करना चाहिए। “ब्रेन वाशिंग’’ उन्हीं का काम है। इसे हाथ में लेकर वे मनुष्य जाति की महती सेवा साधना कर सकते हैं।
चिन्तन, साधन आदि जो कुछ भी उपलब्धियाँ पास में हैं। वे इन्हीं दोनों की ललक लिप्सा में खप जाती हैं। इनके आकर्षण इतने तीव्र होते हैं कि इनसे छूटने की इच्छा तक नहीं होती। फिर उत्कृष्टता के मार्ग पर चलना और चढ़ना बन कैसे पड़े। यह दोनों ही हथकड़ी बेड़ी की तरह बंध जाती हैं।
चिन्तन के बिखराव के एकीकरण से प्रकट होने वाले परिणामों से इनकी एक झलक भर मिलती है। इस पर भी यह नहीं मान लेना चाहिए कि इतने भर से प्रगति-पथ प्रशस्त हो गया। इससे तो एक पक्ष की ही पूर्ति होती है जिसे परिष्कृत व्यक्तित्व कह सकते हैं। यह गाड़ी के एक पहिए के समान है। दूसरा पहिया सक्षम न हो तो बात कैसे बने?
चिन्तन तथा मूर्धन्यों का निष्कर्ष एक ही केन्द्र पर एकत्रित हुआ है कि संपदा का अधिक मात्रा में उपार्जन एवं अधिक सही उपयोग सहकारी रीति-नीति अपनाने से ही सम्भव हो सकता है। प्रजातन्त्र, समाजवाद जैसे सिद्धान्तों का राजनैतिक क्षेत्रों में इसी आधार पर विकास हुआ है कि मानवी प्रगति के भूतकालीन इतिहास को देखते हुए भावी विकास के लिए भी सहकारिता को हर क्षेत्र में मान्यता दी जाय और उसे आगे बढ़ाने के लिए जहाँ, जिस प्रकार जो सम्भव हो सके, उसके लिए प्रयत्न किया जाय।
चिन्तन में गहराई तक उतारने का प्रबन्ध करना होगा।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाने के लिए जन−साधारण को प्रशिक्षित करना चाहिए। “ब्रेन वाशिंग’’ उन्हीं का काम है। इसे हाथ में लेकर वे मनुष्य जाति की महती सेवा साधना कर सकते हैं।
चिन्तन एवं कौशल को इसी फेर में लगाये रहने के लिए बाधित करती है। यदि यह मार्ग न अपनाया गया होता तो मध्यवर्ती गुजारा थोड़े से उपार्जन में ही हो सकता था। वह ईमानदारी के साथ थोड़े समय में ही कमाया जा सकता है। और बचे हुए साधन आत्म-कल्याण एवं विश्व-कल्याण में अत्यन्त आवश्यक एवं उपयोगी कामों में लग सकते हैं। इस मार्ग का अवलंबन करने वाला महामानव कहलाता है और अपने कल्याण के साथ−साथ अन्य असंख्यों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने में सफल होता है।
चिन्तन मनुष्य की दुराग्रही बनाता है पर जब विपरीत पक्ष को ध्यान में रखते हुए विचार करने का अवसर मिलता है तो वह अपनी राह बदल भी सकता है।
चिन्तन उसका अपना निज का उपार्जन नहीं है। इसके पीछे चिरकाल की, असंख्यों की अनुभूतियों एवं उपलब्धियों का अनुदान क्रम चला जा रहा है। मिट्टी के उपलों पर आड़ी-टेढ़ी लकीरें बनाने की प्रक्रिया के सहारे एक ने दूसरे को अपने विचारों से अवगत कराने का जो भौंड़ा सिलसिला चलाया, वही आज सुव्यवस्थित लिपि, भाषा, शब्दकोष आदि के रूप में सामने है। अन्न उगाने, पेड़ लगाने, पशु पालने, आग जलाने, वस्त्र बनाने, घर घरौंदे खड़े करने की विद्या भी अतीत काल में आज के बिजली जैसे आविष्कारों जैसी ही उत्साहवर्धक उपयोगी सिद्ध हुई थी। वह समस्त उपार्जन किसी एक व्यक्ति के नहीं थे वरन् अनुभवी का लाभ एक से दूसरे को मिलते−मिलते उस स्थिति तक पहुँचना सम्भव हुआ कि उपरोक्त सुविधा, साधनों से लाभ उठाया जा सके।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ढलता है। यह ढलाई यदि आदर्शों के साँचे में ढल सके तो समझना चाहिए कि जीवन की सार्थकता का राजमार्ग मिल गया।
चिन्तन किया और अनुभव किया कि सचमुच ही उसने महान सन्त पर सामान्य लोगों के कहने से शक किया? वह बोला हे पवित्र आत्मा! मुझे क्षमा करें मैं सचमुच भ्रम में पड़ गया था। अब आपके और महाप्रभु के निर्देशों का ही पालन करूंगा।”
चिन्तन को प्रकट कर पाते हैं। उनके अभ्यस्त सहायक मन्तव्य समझ लेते हैं और जिन वैज्ञानिकों के साथ वे काम कर रहे हैं उन्हीं के सामने प्रस्तुत कर देते हैं।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाने से ही सम्भव है। लोक प्रतिभा के आधार पर जितने प्रभावित होते हैं उसकी तुलना में मनुष्य की ईमानदारी सज्जनता, शालीनता के प्रसंगों का यथार्थवादी परिचय जानना चाहते हैं और उसे आसानी से कर भी लेते हैं। हमारी भीतरी और बाहरी दुश्चरित्रता को पैरों तले की जमीन, ऊपर का आसमान देखता है और हवा के साथ उस वास्तविकता को समूचे वातावरण में बिखेर देता है फलतः वह विश्वास के रूप में न सही आशंका के रूप में हर किसी के मन में जा बैठता है। अप्रामाणिकता पर कोई विश्वास नहीं करता और यह सन्देह हर किसी को बना रहता है कि ऐसी ही कुटिलता धूर्तता से कोई कभी हमें भी हानि न पहुंचा बैठे। ऐसे लोग सीधे रास्ते प्रगति तो कर ही नहीं पाते।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-May
चिन्तन, रहन-सहन क्रिया-कलाप ऐसा है जिनमें अनीति उपार्जन, दुर्व्यसनों में अपव्यय तथा कुरीतियों का अन्धानुकरण स्वाभाविक है। जो सबके साथ चलेगा उसे अनिवार्यतः यही रीति-नीति अपनानी पड़ेगी। जिसे यह सहायता नहीं, आदर्शों का ध्यान है उसे अपनी गतिविधियां अलग से बनानी होंगी और वे सभी ऐसी होंगी जिनके कारण, पग-पग पर व्यंग, उपहास, तिरस्कार, विरोध सहना पड़ेगा और यदि अपनी गम्भीरता तथा सहिष्णुता उच्च कोटि की न हुई तो झगड़ा झंझट भी हो सकता है।
चिन्तन किया जाता है, उसे ध्यान कहते हैं। ध्यान की विशेषता यह है कि मनोवृत्तियां उसी ढांचे में ढल जाती है। उसे प्राप्त करने के लिए भावनाएं काम करती है और प्राप्ति के लिए प्रयास चल पड़ते हैं।
चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता-पुण्य और परमार्थ में संलग्नता। इस आधार पर किये गये सत्कर्मों का वह प्रतिफल प्राप्त होता है जिससे लोक और परलोक दोनों ही सुख-शान्तिमय बन सकें।
चिन्तन और चरित्र का सार संक्षेप लिपिबद्ध होकर कागज के पन्नों पर चिपका होता है। इस तथ्य पर हमें विश्वास करना चाहिए कि प्रज्ञा परिवार के विस्तार और उसके प्रयासों की जो विश्व भर में चर्चा है उसका श्रेय यदि किसी एक को देने का मन हो तो निःसंकोच उसे ‘‘अखण्ड-ज्योति’’ को दिया जा सकता है। हरिद्वार और मथुरा के संस्थान 2400 प्रज्ञा पीठें, 12 हजार प्रज्ञा संस्थान एवं दस लाख प्रज्ञा परिजन उसी के बेटे, पोते, परपोते हैं। अब इस कल्पवृक्ष की सिंचाई की अनिवार्य आवश्यकता पड़ रही है, अन्यथा जितना कुछ पिछले दिनों बन पड़ा उसी में विराम लग जायेगा।
चिन्तन और आकृत्य करने से मजबूत रोकथाम की जा सके।
चिन्तन और चरित्र अधोगामी हो रहा है। इस सबके फलस्वरूप भविष्य के भयंकर और अन्धकारमय हो जाने में कोई सन्देह नहीं रह जाता। ऐसे प्रवाह को उलटना-उलटकर उलटे को सीधा करना- असामान्य संकल्प है। 500 करोड़ मनुष्यों की नियति को तमिस्रा से आलोक की ओर घसीट ले जाना सामान्य कार्य नहीं है। असामान्य प्रयास असामान्य व्यक्तियों से ही बन पड़ते हैं।
चिन्तन, चरित्र एवं स्तर का पता लगा लेते हैं।
चिन्तन करने से भी मनःक्षेत्र की प्रतिक्रिया यही होती है कि काम कौतुक के चित्र समर्थन की तरह ही खण्डन रूप भी छाये रहते हैं और मन उसी प्रवंचना में उलझा रहता है। इसलिए उस सम्बन्ध में इतना करना ही उपयुक्त है कि उसकी उपेक्षा की जाय और व्यर्थ का सिर दर्द माना जाय। यही बात अस्वाद के सम्बन्ध में भी है। स्वाद अपनाने की तरह ही अस्वाद का पालन करेंगे यदि यह प्रसंग गम्भीरतापूर्वक मन में भरने का प्रयत्न किया जाय तो वह पालन करते हुए भी खण्डन जैसा हो जायेगा। अर्थात् स्वाद उलट-पलट कर मस्तिष्क में छाये रहेंगे और इन्द्रिय जय का प्रयोजन पुरा न होने देंगे।
चिन्तन को नियोजित करें? यह जिज्ञासा उठना ही श्रेय मार्ग का अवलम्बन है। अन्यथा ढर्रे का जीवन सभी जीते हैं। पेट और प्रजनन की आकाँक्षाऐं ऐसी हैं कि काम करने की प्रेरणा देती हैं। इन्द्रियों के साथ जुड़ी हुई लिप्साएं अपने विनोद के लिए काया को जहाँ-तहाँ घसीटे घसीटे फिरती हैं।
चिन्तन मनन द्वारा सम्भव होती है। लोग कर्मकाण्ड मात्र से अध्यात्म लक्ष्य की प्राप्ति करना चाहते हैं। यह एकाँगी प्रयास सफल नहीं होता। उपासना क्रिया-कृत्यों का रहस्य ज्ञानपूर्वक समझना चाहिए और उन्हें करते समय तद्विषयक भावनाओं को प्रदीप्त करना चाहिए। अन्यथा कर्मण्ड का मात्र शरीर श्रम एवं वस्तुओं की उलट पुलट मात्र बन रह जायेगा और उनका वह प्रतिफल न मिलेगा जो शास्त्रकारों द्वारा बताया गया है।
चिन्तन सही है उसका चरित्र भी आदर्शवादी होगा। व्यवहार सज्जनोचित का पड़ेगा। मनःस्थिति के सज्जनोचित होने पर परिस्थितियाँ भी ऐसी बनती हैं जिनमें सुख-शांति की कमी नहीं रहती। गायत्री मंत्र में यही विशेषता भरी पड़ी है।
चिन्तन और चरित्र बनने लगता है। इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए पूजा उपासना में ध्यान को अत्यधिक महत्व दिया गया है। मात्र कर्मकाण्डों की उपेक्षापूर्वक करते रहा जाय तो उसे निरर्थक चिह्न पूजा माना जाता है।
चिन्तन का प्रवाह जम जाता है।
चिन्तन और चरित्र होता है उसी के अनुरूप परिस्थितियाँ घिर आती हैं। वैसे ही लोगों से संपर्क सधता है वैसी ही मण्डली बनती है। वैसे ही साधन जुटते हैं। वैसे ही काम बन पड़ते हैं। यही है मनुष्य का समग्र स्वरूप जो अनुरूप प्रतिफल खींच बुलाता है।
चिन्तन करने में बहुत समय चला गया। इसी धुरी पर घूमते रहने से रहा बचा समय भी चला जायेगा। अब कुछ करने की बात है। यही इस अवसर पर प्रस्तुत श्रद्धाँजलि का स्वरूप हो सकता है। गुरुदेव ने अपने मार्गदर्शक के निर्देशन पर न अनावश्यक सोच-विचार किया है न अपनी इच्छा से योजनाऐं बनाई हैं।
चिन्तन का भटकाव ही असंख्य समस्याओं का मूल है। सड़े कीचड़ में से दुर्गन्धित कृमि कीट उपजते हैं और रक्त के विषाक्त होने पर अनेकानेक चर्म रोगों का उद्भव होता है। प्रज्ञा युग के अवतरण के लिए हमें घर-घर युग चेतना का अलख जगाना और जन-जन के मन-मन में युग संदेश का आलोक पहुँचाना है। युग समस्याओं को प्राथमिकता देते हुए हम कुछ समय के लिए धर्मशाला, मन्दिर, कूप, तालाब, औषधालय, प्याऊ, सदावर्त आदि ख्याति प्रदान करने वाले निर्माणों से हाथ खींच सकते हैं, और सर्वप्रथम सर्वोत्तम एवं सामयिक प्रज्ञा प्रसार को अग्रगामी बनाने के लिए प्रयत्नरत हो सकते हैं। इसके लिए जैसे-जैसे लोभ, मोह के बन्धन शिथिल होते जाँय, समय एवं साधन दान को आज की परम आवश्यकता मानते हुए हर परिजन को युग धर्म के निर्वाह में जुट जाना चाहिए।
चिन्तन की घेराबन्दी। शालीनता अपनाने के लिए विवशता उत्पन्न करने वाली आस्था। मानवी गरिमा का पक्षधर दर्शन ही धर्म है। उसे हटा दें तो फिर मनुष्य के पास ऐसा कोई मजबूत आधार नहीं रह जाता जिससे अचिन्त्य चिन्तन और आकृत्य करने से मजबूत रोकथाम की जा सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-February
चिन्तन के साथ जोड़ भर दिया जाय तो इसे राई का पर्वत बनाने में कितनी देर लगती है।
चिन्तन और भय आशंका के कारण उत्पन्न हुए हैं, उनकी जड़ मनःक्षेत्र में होती है और उनके अंकुर शरीर में फूटते ही रहते हैं। एक से निपटने नहीं पाते कि दूसरे की उत्पत्ति एवं अभिवृद्धि अपना कमाल दिखाने लगती है। जड़ हरी रहने पर पत्तों को तोड़ते रहने से कोई काम नहीं चलता। मस्तिष्कीय विकृति शारीरिक रुग्णता से मिलकर एक−एक मिलकर ग्यारह होने का उदाहरण बनता है। संक्षेप में यही है तनाव की महाव्याधि जिससे एक तिहाई लोग ग्रसित पाये जाते हैं।
चिन्तन न केवल अधूरा वरन् अनुपयुक्त भी सिद्ध होता जा रहा है। इसमें दोनों पक्ष के लोगों की ही अधिक हानि हुई है। वे ही मरते या घायल होते रहे हैं। उनके आश्रितों की संख्या बढ़ने से फिर दुर्बल वर्ग बढ़ गया जिसे कि वे समाप्त करना चाहते थे। इससे तो तैमूरलंग आदि को कत्लेआम पद्धति अधिक तर्क संगत थी, जिसमें मजबूत आदमी गुलामों के रूप में पकड़कर आश्रित बना लिए जाते थे और कमजोरों को काटते मारते चले जाते थे।
चिन्तन पद्धति का है उसे ज्ञान कहा गया है। गीताकार का कथन है कि− ‘‘ज्ञान से अधिक श्रेष्ठ और पवित्र अन्य कोई वस्तु नहीं है। “न हि ज्ञानेन पवित्रमिद्द विद्यते”
चिन्तन सीधा उलटा होकर सुख−दुःख की भूमिका बनाता है। उत्थान और पतन का अधिष्ठाता निश्चित रूप से वही है।
चिन्तन धारा में व्यतिरेक उत्पन्न हो जाय। इससे तात्कालिक राहत भी मिलती है। पर जैसे ही नशा उतरता है, विस्मृति दूर हो जाती है और आदत के अनुसार विपत्ति भरी कल्पनाएँ शिर के इर्द−गिर्द नाचने लगती हैं और उनका प्रभाव शरीर को अस्त−व्यस्त करने वाली रोग श्रृंखला के रूप में अपना त्रास दिखाने लगता है।
चिन्तन को सर्वप्रथम और सर्वाधिक प्रभावित करता है। यह जन्मजात सहचर है। दूसरा रस कामुकता का है इसके लिए यौवन के उभार तक की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। वयोवृद्ध होने पर वह असमर्थता के कारण अनायास ही समाप्त भी हो जाती है, किन्तु रसना की स्वाद लिप्सा ऐसी है जो जन्म से लेकर मरण पर्यन्त साथ रहती है। अर्थ और अनर्थ उसी के द्वारा सबसे अधिक होते हैं।
चिन्तन तथा चरित्र के लिए आस्थावान बनने तथा बनाने की प्रक्रिया। यदि ज्ञान का अभाव हो तो मनुष्य को भी अन्य प्राणियों की भाँति स्वार्थ परायण रहना होगा। उसकी गतिविधियाँ पेट की क्षुधा निवारण तथा मस्तिष्कीय खुजली के रूप में काम वासना का ताना−बाना बुनते रहने में ही नष्ट हो जायेगी। अन्यान्य सभी जीवधारी पेट और प्रजनन के सम्बन्ध में ही सोचते और इन्हीं दो कृत्यों में निरत रहते हैं। अकेला मनुष्य ही है जो जीवन का मूल्य और महत्व समझता है।
चिन्तन−क्रियाकलापों की डोर भी इन सूक्ष्म रसस्रावों के मजबूत हाथों में है। पीनियल, पीटुटरी, थायराइड, पैराथायराइड, थाइमस, एडरीनल्स एवं गोनेड्स नाम से ये सात ग्रन्थि समूह काया के शिखर स्थल से पेडू तक उत्तरी ध्रुव से लेकर दक्षिणी ध्रुव तक विद्यमान होते हैं एवं शरीर के सभी जैव रासायनिक क्रियाकलापों पर अपना कठोर नियन्त्रण रखते हैं। यौन-विकास, दृष्टिकोण का परिष्कार, पुंसकत्व एवं कामेच्छा पर नियन्त्रण इन ग्रन्थि समूहों के आधार पर ही बन पड़ता है। स्थूल स्तर की आहार−विहार की एवं बंध, मुद्रा, आसन जैसी सूक्ष्म काय संस्थान को प्रभावित करने वाली साधनाएं हारमोन्स को सीधे प्रभावित कर उच्चस्तरीय साधना हेतु अभीष्ट सक्षमता प्रदान करती है। बहिरंग की दृष्टि से कितना ही सुन्दर, आकर्षक कोई क्यों न हो, जब तक उसके अन्तरंग में सक्रिय−रक्त में घुले हारमोन्स का स्तर नहीं, बदला जाता, वह भावनात्मक एवं आत्मिक दृष्टि से अपरिपक्व ही रहेगा।
चिन्तन की तल्लीनता का प्रतिफल है। जो भी काम पूरी दिलचस्पी और तन्मयता के साथ किये जाते हैं वे सही सुन्दर और सफल होते हैं। यही है ध्यान का चमत्कार।
चिन्तन तथा कर्म से उसी में घुल जायें तो समझना चाहिए कि व्यावहारिक जीवन में हम ध्यान योगी हो गये। फलतः जो भी करेंगे वह सफल और शानदार होगा।
चिन्तन−आदतों सभी में समानता पाई जाती है। यह एक अणु से एक पर्यावरण में विकसित होने की परिणति है। मानव, पृथ्वी, सूर्य भी इसी तरह से एक ही अणु से विनिर्मित होने के कारण सहानुभूति के आधार पर परस्पर प्रभावित होते हैं। यही ज्योतिर्विज्ञान का केन्द्र बिन्दु है। हर क्षण, हर पल, पृथ्वी के कण−कण का सूर्य के महाकणों से एक सम्बन्ध सूत्र जुड़ा हुआ है।
चिन्तन, समय और श्रम बर्बादी से बचाया जा सके। यदि वह सही है तो उसकी प्रामाणिकता इस तरह निखर कर आनी चाहिए जिसे कोई चुनौती न दे सके। बिजली को, आग को, बर्फ को, विष को कोई चुनौती नहीं दे सकता। क्योंकि उनके लाभ और हानि प्रत्यक्ष हैं। अध्यात्म विज्ञान भी ठीक इसी तरह है उसका कोई भी पक्ष ऐसा नहीं है जिसे झुठलाया जा सके।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार, मान्यता, आकाँक्षा, भावना, क्रिया, सभी कुछ अवाँछनीय दिशा में उलट गई हैं। उसे उलटेपन को उलट कर यदि सीधा किया जा सके तो आज की चिन्ताएँ और समस्याएं कल ही सरल और सुगम हो गई दृष्टिगोचर होंगी।
चिन्तन परिधि से कल्पना शक्ति से बाहर की चीज है। इसलिए उस कल्पना की तुक बिठाने के लिए सूर्य को एक मध्यवर्ती आधार मानकर चलें तो उस तुलना को करने में थोड़ी सहायता मिलेगी। यद्यपि ब्रह्माण्ड में करोड़ों सूर्य अपने ग्रह उपग्रहों के साथ अपना−अपना सौर−मंडल बना कर भ्रमण करते रहते हैं और फिर से स्वयं भी किसी महाकेन्द्र की परिक्रमा में संलग्न रहते हैं। तो भी अपने सौर−मण्डल के केन्द्र सूर्य का ही ऊहापोह इतना विशाल हो जाता है कि उसकी कल्पना करने से ही मानवीय बुद्धि एक प्रकार से हताश होकर स्तब्ध रह जाती है। फिर करोड़ों सूर्यों की सम्मिलित शक्ति एक विशालता की कल्पना किस तरह की जाय?
चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता सिखाने से होता है। राजयोग का पूर्वार्ध यम, नियम, और आसन प्राणायाम हैं, अर्थात् शारीरिक, मानसिक पवित्रता− परिपक्वता। वह स्थिति पूरी होने पर अगले चार चरणों को सीखने की बारी आती है। प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि का अभ्यास इसके आदत करना पड़ता है। छोटी कक्षाओं के बालक, वर्णमाला, मात्रा−स्वर, व्यंजन, गिनती, पहाड़े आदि याद करते हैं।
चिन्तन ही मेरे लिए अभीष्ट है। इसे करने में मुझे इस प्रकार जुटना है कि शक्ति का एक कण भी बिखरने न पाये। यही वह विधान है जिसे मैं अपने हर कृत्य में अपनाता हूं। इस प्रकार जागृत स्थिति में निरन्तर ध्यान योग में तल्लीन रहता हूं। यहाँ तक कि विश्राम के समय भी यही मनःस्थिति रहती है।
चिन्तन को परोक्ष रूप से प्रभावित करने में मौसम की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह भी प्रकारान्तर से ग्रह नक्षत्रों से आने वाली किरणों के प्रवाहों से विनिर्मित होता है। इस तरह कई बार जब अपराधों, आत्म−हत्याओं, रोगों की अनायास बाढ़ सी आने लगती है तो देखा जाना चाहिए कि कहीं अंतर्ग्रही परिस्थितियाँ तो इसका कारण नहीं हैं। यदि ऐसा है तो स्वयं को, अन्यों को इन प्रभावों से बचाकर अपने सुरक्षा कवच को मजबूत बनाकर अप्रिय प्रसंगों से बचा जा सकता है। ज्योतिर्विज्ञान की जानकारी इस प्रकार अनिवार्य भी है, लाभकारी भी।
चिन्तन ने असुरता को बढ़ावा दिया है और पाप अनाचार की बाढ़ आई है। अस्तु “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाला सिद्धान्त विचारशील समाज द्वारा अमान्य और निन्दनीय ठहराया गया है। संसार में कर्म के प्रतिफल की मान्यता जीवित ही रहनी चाहिए।
चिन्तन में जल्दबाजी मची रहती है उसी उतावली से काम भी बनते चले जाँय। पानी के बबूले उठते तो बहुत जल्दी हैं पर उन्हें फूटने में भी देर नहीं लगती। यह खेल−खिलवाड़ की दृष्टि से तो ठीक है पर महत्वपूर्ण कार्यों के लिए जितना श्रम और समय चाहिए उसे देखते हुए उतावली का कोई मूल्य नहीं है।
चिन्तन मनन से भी यह शालीनता का मार्ग किसी को भी सहज सुलभ हो सकता है। उच्चस्तरीय व्यक्तियों के क्रिया कलाप में सम्मिलित रहने से भी उस प्रकार की उत्कृष्टता, आदर्शवादिता हस्तगत हो सकती है। ऐसे लोग जब चमत्कार तो नहीं दिखाते और न वरदान आशीर्वाद देते हैं पर ऐसे योगियों की तुलना में अपना और अन्यान्यों का−समाज और समय का जो हित साधन करते हैं, वह किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं होता।
चिन्तन की आदत परिपक्व हो जाती है और अपने लिए−परिवार के लिए−व्यवसाय के लिए संकट की सम्भावना चारों ओर दिखाई पड़ती है और लगता है कि मित्र सम्बन्धी दगा देने जा रहे हैं या अफसर द्वेष मानते हैं और नीचा दिखाने वाले हैं। कल्पना को अशुभ चिन्तन के साथ जोड़ भर दिया जाय तो इसे राई का पर्वत बनाने में कितनी देर लगती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-August
चिन्तन और मनन बिना पुस्तक बिना साथी का स्वाध्याय सत्संग ही है। अपने आप अपनी स्थिति पर, अपना त्रुटियों और दुर्बलताओं पर विचार करके, बुराइयों को छोड़ने और अच्छाइयों को बढ़ाने के लिए अकेले में सोच विचार करना चिंतन है और उत्थान पथ पर अग्रसर करने वाली सत् शिक्षा के महत्व एवं महात्म्य पर विस्तार पूर्वक सोचना एवं उसी ढाँचे में अपने को ढालने की योजना बनाना मनन है। चिंतन और मनन करते रहने वाला व्यक्ति अपनी बौद्धिक, चरित्र एवं लौकिक दुर्बलताओं को आत्म निरीक्षण एवं आत्म आलोचना के आधार पर भली प्रकार जान सकता है और जिस प्रकार रोग का निदान होने पर चिकित्सा सरल हो जाती है उसी प्रकार अपनी त्रुटियों को जानने वाला उन्हें सुधारने का उपाय भी ढूँढ़
चिन्तन से किस साधन अभ्यास से किया जाए, इसकी विवेचना यहाँ नहीं हो सकती। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को मनोभूमि में दूसरों की अपेक्षा कुछ भिन्नता होती है और उस भिन्नता को ध्यान में रखकर ही व्यक्ति की अन्तःभूमिका को शुद्ध करने का मार्ग दर्शन संभव हो सकता है। इसी प्रकार किस व्यक्ति में कौन-सी सत्प्रवृत्तियाँ विकासोन्मुख हैं और उनका अभिवर्धन करने के लिए किस प्रकार का स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन, ध्यान, संकल्प एवं अभ्यास आवश्यक है इनका विवेचन भी लेख रूप में नहीं हो सकता क्योंकि व्यक्ति की मनोभूमि का स्तर पहचान कर ही उनका भी निर्णय हो सकना संभव है।
चिन्तन, ध्यान, संकल्प एवं अभ्यास आवश्यक है इनका विवेचन भी लेख रूप में नहीं हो सकता क्योंकि व्यक्ति की मनोभूमि का स्तर पहचान कर ही उनका भी निर्णय हो सकना संभव है।
चिन्तन, मनन यह चार कार्य भावात्मक साधना के अंतर्गत आते हैं। इनसे विचारों की, दृष्टिकोण की भावना की शुद्धि होती है। क्रियात्मक साधना से संस्कारों का संशोधन एवं पोषण होता है। जो अशुभ संस्कार मनोभूमि में गहराई से जमे हैं उन्हें उखाड़ने का कार्य क्रियात्मक साधना द्वारा ही संभव होता है। शुभ संस्कारों का बीजारोपण तथा उनका परिपोषण भी क्रियात्मक साधना द्वारा ही संभव होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-January
चिन्तन, आत्मशोधन एवं आत्मनिर्माण का कार्य उतना ही सरल है जितना शरीर को सर्वांगासन, मयुरासन, शीर्षासन आदि आसनों के लिए अभ्यस्त कर लेना। आरम्भ में इस झंझट में पड़ने से मन आनाकानी करता है, पुराने अभ्यास को छोड़कर नया अभ्यास डालना अखरता है, कुछ कठिनाई एवं परेशानी भी होती है, यदि अभ्यासी इन बातों से डर कर अभ्यास न करें या छोड़ दे तो आसनों के द्वारा होने वाले सत्परिणामों से लाभान्वित होना संभव न होगा। इसी प्रकार यदि आत्म-निरीक्षण करने में, अपने दोष ढूँढ़ने में उत्साह न हो, जो कुछ हम करते या सोचते हैं सो सब ठीक है, ऐसा दुराग्रह हो तो फिर न तो अपनी गलतियाँ सूझ पड़ेगी और न उन्हें छोड़ने को उत्साह होगा। वरन् साधारण व्यक्तियों की तरह अपनी बुरी आदतों का भी समर्थन करने के लिये दिमाग कुछ तर्क और कारण ढूँढ़ता रहेगा जिससे दोषी होते हुए भी अपनी निर्दोषिता प्रमाणित की जा सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-October
चिन्तन और मनन को तो एक प्रकार से योग साधना में ही सम्मिलित कर लिया गया हैं। कहा गया है कि-मनन और चिन्तन के बिना न आत्म साक्षात्कार होता हैं और न ईश्वर ही मिलता हैं। ठीक भी हैं, उसकी मनोभूमि उड़ता से जकड़ी हुई हैं उसमें आत्मा और परमात्मा का चैतन्य-तत्त्व प्रवेश भी कैसे करेगा? आत्म कल्याण के लिए भजन, ध्यान, जप, तप, कथा-कीर्तन व्रत, दान, तीर्थ, पूजा, पाठ आदि की आवश्यकता मानी जाती हैं। इन्हीं के आधार, पर लोग स्वर्ग और मुक्ति की आशा करते हैं।
चिन्तन इससे आगे का कदम हैं। प्रस्तुत स्वाध्याय में से जो बात हृदयंगम की गई हो उसे अपने जीवन में कैसे ढाला जाय इसकी योजना बनाना चिन्तन हैं। सद्गुणों, सद्विचारों, सत्कर्मों के बारे में मढ़ लेना या उनकी उपयोगिता स्वीकार कर लेना ही पर्याप्त न होगा वरन् यह भी विचार करना पड़ेगा कि इन उपयोगिता बातों को हमारे जीवन में व्यवहारिक रूप से स्थान कैसे मिले? यह ठीक है कि आज ही सारे कुविचार और कुसंस्कार नहीं छूट सकते और सारी उत्तम योजनाएँ आज ही पूरी तरह जीवन में उतार लेना संभव नहीं हो सकता, पर आखिर उस संबन्ध में सोचना विचारना तो आवश्यक ही हैं इससे मनोभूमि तो तैयार होगी, रुचि तो बढ़ेगी, दृष्टिकोण तो बनेगा। फिर धीरे-धीरे उस दिशा में कदम भी बढ़ने लगेंगे।
चिन्तन भी किया जाय
चिन्तन हैं। सद्गुणों, सद्विचारों, सत्कर्मों के बारे में मढ़ लेना या उनकी उपयोगिता स्वीकार कर लेना ही पर्याप्त न होगा वरन् यह भी विचार करना पड़ेगा कि इन उपयोगिता बातों को हमारे जीवन में व्यवहारिक रूप से स्थान कैसे मिले? यह ठीक है कि आज ही सारे कुविचार और कुसंस्कार नहीं छूट सकते और सारी उत्तम योजनाएँ आज ही पूरी तरह जीवन में उतार लेना संभव नहीं हो सकता, पर आखिर उस संबन्ध में सोचना विचारना तो आवश्यक ही हैं इससे मनोभूमि तो तैयार होगी, रुचि तो बढ़ेगी, दृष्टिकोण तो बनेगा। फिर धीरे-धीरे उस दिशा में कदम भी बढ़ने लगेंगे। आज न सही तो कल, मनुष्य के सपने साकार होते ही हैं।
चिन्तन से आत्म-निरीक्षण की प्रवृत्ति पैदा होती हैं। मन का स्तर हीनता से उठकर उच्चता की ओर अग्रसर होता हैं। मनोमय कोश का आवरण सद्विचारों से ही खुलता हैं। जिसके मस्तिष्क में प्रगतिशील और प्रकाशवान् विचारों का नया जल नहीं पहुँचता, उसका अन्तः प्रदेश सड़े, गले, गन्दे नाले की तरह अवरुद्ध पड़ा हुआ दिन-दिन अधिक दुर्गन्धित बनता जाता हैं। मन की शक्ति विचारों पर ही अवलम्बित हैं।
चिन्तन पर निर्भर रहता हैं।
चिन्तन तो एक स्वतंत्र-साधना है जिसे जप के समय नहीं वरन् कोई अतिरिक्त समय निकाल कर करना चाहिए। जप, योग-साधना का एक अंग है। योग चित्तवृत्तियों के निरोध को कहते हैं। जप के समय चित्त एक लक्ष्य में लगा रहना चाहिए। यह कार्य ध्यान द्वारा ही सम्भव है, इसलिए विज्ञ, उपासक जप के साथ ध्यान किया करते हैं।
चिन्तन की बात सर्वथा अव्यावहारिक है। अर्थ चिन्तन तो एक स्वतंत्र-साधना है जिसे जप के समय नहीं वरन् कोई अतिरिक्त समय निकाल कर करना चाहिए। जप, योग-साधना का एक अंग है। योग चित्तवृत्तियों के निरोध को कहते हैं। जप के समय चित्त एक लक्ष्य में लगा रहना चाहिए।
चिन्तन करने पर अपने सुधार और प्रतिक्षण की बात समझ में आ जाती है तो आधी समस्या हल हो जाती हैं। आज तक संसार में जितने किसी भी दिशा में प्रगति की है उन्हें यही मार्ग अपनाना पड़ा हैं।
चिन्तन से अपने उज्ज्वल भविष्य की जो कामना जागृत की गई हैं उसे सींचते रहा जाय तो एक दिन उसका पल्लवित होना भी सुनिश्चित हैं।
चिन्तन के बिना न आत्म साक्षात्कार होता हैं और न ईश्वर ही मिलता हैं। ठीक भी हैं, उसकी मनोभूमि उड़ता से जकड़ी हुई हैं उसमें आत्मा और परमात्मा का चैतन्य-तत्त्व प्रवेश भी कैसे करेगा? आत्म कल्याण के लिए भजन, ध्यान, जप, तप, कथा-कीर्तन व्रत, दान, तीर्थ, पूजा, पाठ आदि की आवश्यकता मानी जाती हैं। इन्हीं के आधार, पर लोग स्वर्ग और मुक्ति की आशा करते हैं। पर इनमें सबसे अधिक महत्व की साधना आत्म-शिक्षण की हैं।
चिन्तन एक स्वतंत्र साधन है। गायत्री के एक एक शब्द में सन्निहित अर्थ और भाव पर पाँव-पाँच मिनट भी विचार किया जाय तो एक बार पूरा एक गायत्री मंत्र करने में कम से कम आधा या एक घण्टा लगना चाहिये। अधिक तन्मयता से वह अर्थ चिन्तन किया जाय तो पूरे एक मंत्र की भावनाएँ हृदयंगम करने में कई घंटे लग सकते हैं। मंत्र जप उच्चारण कितनी जल्दी से हो जाता है उतनी जल्दी उसके शब्दों का अर्थ ध्यान में नहीं लाया जा सकता। इसलिए जप के साथ अर्थ चिन्तन की बात सर्वथा अव्यावहारिक है।
चिन्तन किया जाय तो पूरे एक मंत्र की भावनाएँ हृदयंगम करने में कई घंटे लग सकते हैं। मंत्र जप उच्चारण कितनी जल्दी से हो जाता है उतनी जल्दी उसके शब्दों का अर्थ ध्यान में नहीं लाया जा सकता। इसलिए जप के साथ अर्थ चिन्तन की बात सर्वथा अव्यावहारिक है। अर्थ चिन्तन तो एक स्वतंत्र-साधना है जिसे जप के समय नहीं वरन् कोई अतिरिक्त समय निकाल कर करना चाहिए। जप, योग-साधना का एक अंग है।
चिन्तन करें तो ही स्वाध्याय की प्रेरणा अन्तःकरण में गहराई तक उतर सकेगी। इस प्रयोजन के लिए अभी अखण्ड-ज्योति से भी काम चल सकता है। उसका एक-एक लेख नित्य इसी दृष्टि से पढ़ा जाय। महीने में दो तीन बार भी उन लेखों को दुहराया जा सकता है। अब अखण्ड-ज्योति दैनिक स्वाध्याय के उपयुक्त ही पाठ्य सामग्री प्रस्तुत किया करेगी।
चिन्तन अधिक किया जाय। लेख में प्रस्तुत किये हुए तथ्य कहाँ तक उचित हैं यह विवेकपूर्वक सोचना चाहिए। उस पर तर्क विश्लेषण और विचार करके यह देखा जाय कि बात कहाँ तक ठीक हैं। यह आवश्यक नहीं कि पढ़ी हुई पंक्तियों से पाठक पूर्णतया सहमत ही हैं। जो बात अनुपयुक्त लगे उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिए और जो उपयोगी लगे उसकी महत्ता पर बारबार अनेक दृष्टियों से सोच विचार किया जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-November
चिन्तन में लगावें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-April
चिन्तन मनन की ओर कोई ध्यान नहीं देता। शिक्षित जन केवल साधारण अख़बार, सस्ते विचारों से पूर्ण लेखादि या कहानी उपन्यास पढ़ते है, जिनका उनके चरित्र पर उत्तम प्रभाव नहीं पड़ता। उच्चकोटि का साहित्य, दर्शन, अर्थशास्त्र और नैतिक शास्त्र इसलिए नहीं पढ़ा जाता कि उनके पढ़ने में मानसिक श्रम करना पड़ता है, जब कि अधिकांश शिक्षित जन केवल मनोरंजन के लिए पढ़ते है। बहुत से लोग सैर-सपाटे और शृंगार की सामग्री पर धन व्यय कर देते है परन्तु अपने मानसिक विकास के लिए साल में दस-बारह रुपये भी साहित्य खरीदने में नहीं खर्च करते।
चिन्तन करते रहना एवं भगवान का भजन स्मरण करते हुए ही उनकी आज्ञानुसार कर्तव्य तथा कर्मों का निस्वार्थ भाव से केवल परमेश्वर के लिए आचरण करना यह सब प्रकार से परमात्मा के अनन्यशरण होना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-May
चिन्तन का यही तात्पर्य है। गायत्री मंत्र का अर्थ समझने और उसके अनुसार मनोभूमि को ढालने से असत् और उसके अनुसार मनोभूमि को ढालने से असत् को, अनुचित को छोड़ कर सत् एवं उचित को धारण करने की आकाँक्षा जागृत होती है। नैतिकता का, मानवता का एवं समाज की सुस्थिरता का आधार भी है।
चिन्तन के आधार पर विभिन्न समुदायों का भिन्न धर्म होना कोई बुरी बात नहीं है किन्तु यदि इनका अर्थ गलत लगाकर अथवा एक देशीय और संकीर्ण रूप देकर एकांगी बना लिया जाय तो वे धर्म मनुष्य का हित साधन नहीं कर सकते। इन सब का आधार मानव धर्म होना चाहिए जो भिन्नता को एकत्व की ओर अग्रसर करता है। जहाँ स्वयं में ही भेदविभेद की संकीर्ण सीमायें कायम होंगी उससे विश्व एकता, मानव एकता की कैसे आशा की जा सकती है? मार्ग अलग-अलग हों किन्तु हमारे विचार और भावनाओं का व्यापक और सीमातीत होना आवश्यक है। मानव धर्म की इस बुनियाद को भुला देने पर तो धर्म नाम की वास्तविकता ही समाप्त हो जाती है।
चिन्तन करते हुए उन्हें अपने अन्तः करण में धारण करने एवं बुद्धि को कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग में लगाने का विधान है। इस चिन्तन के करने से मनोभूमि में दिव्य सद्गुणों का और अभिनव विवेक का जागरण होता है। साथ ही यह भी विश्वास जमता है कि इस जीवन में सबसे बहुमूल्य वरदान सद्बुद्धि है। यही सबसे बड़ी सम्पदा है उसे प्राप्त करने के लिए हमें प्राण पण से प्रयत्नशील होना चाहिए। चिन्तन का यही तात्पर्य है।
चिन्तन और धार्मिक दृष्टिकोण को भी अग्रगामी बनाना होगा। अपनी संकीर्णताओं को त्याग कर अपने लिये विशाल एवं उदार दृष्टिकोण अपनाना होगा। आलोचना प्रत्यालोचना और शास्त्रार्थ के द्वारा हार-जीत करने का जमाना चला गया। आज के युग की माँग है-मानवता का गठन और उसका एक्य। तीखी समालोचना और कट्टरता के माध्यम से मानवजाति अपना बहुत अहित कर चुकी अब उसकी पुनरावृत्ति नहीं की जानी चाहिए।
चिन्तन और जप की पहली तथा प्राण प्रक्रिया की दूसरी भूमिका में प्रवेश करना पड़ता है। प्रस्तुत लेख में प्राण प्रक्रिया की ही चर्चा की जा रही है। ध्यान धारण का विवेचन भी समयानुसार किया जावेगा।
चिन्तन के करने से मनोभूमि में दिव्य सद्गुणों का और अभिनव विवेक का जागरण होता है। साथ ही यह भी विश्वास जमता है कि इस जीवन में सबसे बहुमूल्य वरदान सद्बुद्धि है। यही सबसे बड़ी सम्पदा है उसे प्राप्त करने के लिए हमें प्राण पण से प्रयत्नशील होना चाहिए। चिन्तन का यही तात्पर्य है। गायत्री मंत्र का अर्थ समझने और उसके अनुसार मनोभूमि को ढालने से असत् और उसके अनुसार मनोभूमि को ढालने से असत् को, अनुचित को छोड़ कर सत् एवं उचित को धारण करने की आकाँक्षा जागृत होती है।
चिन्तन एवं जप है। इस महामंत्र के 24 अक्षरों में ईश्वर के उत्तम गुणों का चिन्तन करते हुए उन्हें अपने अन्तः करण में धारण करने एवं बुद्धि को कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग में लगाने का विधान है। इस चिन्तन के करने से मनोभूमि में दिव्य सद्गुणों का और अभिनव विवेक का जागरण होता है। साथ ही यह भी विश्वास जमता है कि इस जीवन में सबसे बहुमूल्य वरदान सद्बुद्धि है। यही सबसे बड़ी सम्पदा है उसे प्राप्त करने के लिए हमें प्राण पण से प्रयत्नशील होना चाहिए।
चिन्तन और दृष्टिकोण आकाश जैसा विशाल होना चाहिए। अपनी समस्त संकीर्ण धारणाओं का त्याग आवश्यक है। हमें नित्य ही धारण करनी चाहिए, मनन और निदिध्यासन के द्वारा अपनी अनुभूति को बढ़ाना चाहिए कि मैं संकीर्ण क्षुद्र व्यष्टि नहीं हूँ मैं समष्टि स्वरूप हूँ मेरा सत्य रूप उस विश्वगत चेतन सत्ता से सम्बन्धित है। मैं उसी श्रृंखला की एक कड़ी मात्र हूँ। जिस चेतन सत्ता में अतीत काल से बुद्ध ईसा, राम, कृष्ण, गाँधी, मुहम्मद की आत्मायें निवास करती हैं, उसी में मेरा भी धारणा पोषण, लय स्थित है, मैं सब का आत्म स्वरूप हूँ।
चिन्तन के पश्चात जप का विधान है। आधार पर गायत्री में सन्निहित भावनाओं का अन्तःकरण में स्वयमेव विकास होना आरम्भ होता है। कुमार्ग से घृणा और सन्मार्ग के लिए अभिलाषा की जागृति होती है। गुण, कर्म, स्वभाव में परिवर्तन आता है। फलस्वरूप अनेकों ऐसी साँसारिक कठिनाइयाँ सरल हो जाती है जो अपने ही दोषयुक्त गुण कर्म स्वभाव के कारण उत्पन्न होती होती तथा बढ़ती थी।
चिन्तन ओर दृष्टि कोण की व्यापकता के लिये है। मानव मात्र प्रयोजन विशेष से पढ़ाई लिखाई, काला, रोग, धनी, गरीब, मोटा, दुबला, स्वभाव एवं योग्यता क आधार पर एक दूसरे से काफी भिन्न है। वहाँ वह अपना अलग अलग व्यक्तित्व भी रखता है। किन्तु इन सबके मूल में जहाँ हमारे अस्तित्व को मूल आत्मा का निवास है हम सबमें कोई विशेष भिन्नता नहीं है। हम सब एक ही आत्मसत्ता में स्थित है जो एक देशीय नहीं सार्वभौमिक है।
चिन्तन मनन को केन्द्र एकदेशीय अथवा व्यक्तिगत न होकर विश्वगत हो, समष्टिमय हो। हर व्यक्ति अपने आपकी स्वतन्त्र सत्ता न समझे वरन, उसका सम्बन्ध अखिल विश्वभुवन स्वतः चेतन जगत से है। धर्म का दूसरा आधार है मानव जीवन का स्वस्थ निर्माण। धर्म का तीसरा आदर्श है अपने जीवन को स्वस्थ एवं सशक्त सबल बनाते हुए उसे मानव जाति के हित में अर्पण कर दे, परमार्थमय बना दे। जीवन के सारे क्रिया कलाप समुदाय के लिए हो।
चिन्तन कहाँ तक ठीक है? कितना व्यापक और विशाल दृष्टिकोण है? कितना कितना व्यापक और विशाल दृष्टिकोण है? हमारा चिन्तन और दृष्टिकोण आकाश जैसा विशाल होना चाहिए। अपनी समस्त संकीर्ण धारणाओं का त्याग आवश्यक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-December
चिन्तन के साथ पढ़ा करें तो उनकी आत्मा से हमारी आत्मा का स्पर्श होने लगे। इसका और भी विस्तार इस प्रकार हो सकता है कि अखंड-ज्योति के पाठक पत्रिका में प्रस्तुत विचारों को, कथाओं, प्रसंगों, दृष्टान्तों उदाहरणों को अपने घर तथा बाहर के लोगों को स्वयं सुनाया करें, अपनी पत्रिका कई-कई व्यक्तियों को पढ़ने देने स्वयं जाया करें, उनसे प्रस्तुत लेखों के संबन्ध में चर्चा किया करें। छपे हुए कागज के टुकड़े युग निर्माण नहीं कर सकते। अखंड-ज्योति में हम कुछ भी क्यों न लिखते रहें उसका प्रभाव और विस्तार तब तक नहीं हो सकता जब तक कि आप स्वजनों का त्यक्त्वा मिलकर ही गायन और वाद का जोड़ा बन सकता है। बिना बाजे के गाना और बिना गाने का बाजा अपूर्ण रह जाता है, इसी प्रकार हमारे विचारों का समुचित प्रभाव तभी हो सकता है जब उनके प्रसार में आपका व्यक्तिगत उत्साह, उल्लास एवं श्रम सम्मिलित हो।
चिन्तन, मनन, तत्त्व दर्शन और आत्म ज्ञान द्वारा अपने अंतः करण का पूर्ण समाधान कर चुका हो। अपने संशय, भ्रम, मोह, अज्ञान का पूर्णतया निवारण कर चुका हो तथा अन्य व्यक्तियों की आन्तरिक एवं साँसारिक जीवन की समस्या को धार्मिक एवं व्यवहारिक समन्वय के आधार पर हल करने की क्षमता जिसने प्राप्त कर ली हो तो ऐसा ही व्यक्ति संसार के मार्ग दर्शन के लिए धर्मोपदेश के लिए अधिकारी कहा जा सकता है, उसे ही परिव्राजक बनना चाहिये, उसे ही संन्यास लेना चाहिए।
चिन्तन के साथ नित्य स्वाध्याय (3)प्राणाकर्षण प्राणायाम (4) सोकर उठते ही अपने उपकारियों का मानसिक अभिवन्दन, पृथ्वी पर पैर धरते ही धरती माता को प्रणाम, माता, पिता, पति, गुरुजनों के चरणस्पर्श, उनके अभाव में चरणों की प्रतिमूर्ति को नमन एवं रात को सोते समय दिन भर के उपकारियों का स्मरण (5) जप के साथ अपने को एक वर्ष के बालक के रूप में मानते हुए माता की गोदी में खेलने एवं उसका स्तन पान का ध्यान यह सब कार्य न तो अधिक समय साध्य है ओर न श्रमसाध्य। थोड़ी सी इच्छा, श्रद्धा और निष्ठा हो तो इनके लिए अवकाश भी हर किसी से सकते है। गायत्री, उपासना जिनकी अब तक बिलकुल नहीं चलती, वे इस आधार पर थोड़ी-सी से ही आरम्भ कर सकते है। जिनकी चलती है वे ध्यान के द्वारा उसे और परि-पुष्ट कर सकते है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-September
चिन्तन, आत्म शोधन, आत्म परिष्कार आत्म दर्शन एवं आत्म कल्याण के महा कार्य को हाथ में ही नहीं लिया। ऐसी अव्यवस्थित साधना के परिणामों से वैसी ही आशा की जा सकती है जैसी कि आज दृष्टिगोचर हो रही है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-March
चिन्तन में आणविक अस्त्रों और क्षेपास्त्रों से भय अवश्य पैदा हुआ है। लोग यह समझने लगे कि लड़ाई होगी तो सर्वनाश होगा पर उनको यह विश्वास हो रहा है कि रूस और अमेरिका नहीं लड़ेंगे, यानी बड़ी लड़ाई नहीं होगी। छोटी लड़ाई हो सकती है लेकिन आणविक युद्ध नहीं होगा- इस विश्वास के बावजूद उसके जीवन मुख्य धारा आज भी भौतिकवादी है। वह यह नहीं समझते कि बड़ी या छोटी लड़ाई के बीज भौतिकवादी विचार में ही निहित है।
चिन्तन, शोध, संस्कृति के विकास आदि में लगायें।
चिन्तन हुआ फिर भी आज हम उलझन में पड़े हैं और निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि किस दिशा में कदम बढ़ायें। तो सर्व प्रथम भारत की जनता को यह निश्चय करना है कि वह किधर जाय, उसका क्या आदर्श हो। हमारे देश में जो चुने हुए लोग है, जो समाज का नेतृत्व करते हैं, उन पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। आज दिल्ली, बम्बई और कलकत्ता जैसे नगरों में जो आदर्श वे स्थापित कर रहे हैं, जो शान-शौकन की जिन्दगी का नमूना वे पेश कर रहे हैं, वह हमारा आदर्श नहीं हो सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-February
चिन्तन के लिए, तप और ध्यान के लिये क्यों सूनापन ढूँढा़ जाता? दूरदर्शी महापुरूषों का मूल्यवान समय क्यों उस असुखकर श्रकेज्ञेपन में व्यतीत होता?
चिन्तन करेगा, उससे सच्चरित्रता की, पाप-रहित मार्ग पर चलाने की प्रार्थना करता रहेगा, वह अमर जीवन की और अग्रसर होगा। ऐसा जीवन प्राप्त करने के लिए सच्चरित्रता सबसे पहली शर्त है, क्योंकि भगवान के दरबार में दुश्चरित्र व्यक्ति का प्रवेश नहीं हो सकता। वह तो पापों की ओर ही प्रेरित होगा और परिणाम स्वरूप नाश को प्राप्त होगा।
चिन्तन की पुरानी आदत सक्रिय हो उठीं सोचने लगा - अकेलेपन का डर क्यों लगता है?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-December
चिन्तन में दूरदर्शिता सम्मिलित हो जाय तो अनागत का इतना अनुमान तो अर्जित किया ही जा सकता है जिसमें यदि तदनुकूल प्रयास और पुरुषार्थ शामिल हो जाए तो भवितव्यता के समीप पहुंचा जा सके।
चिन्तन और व्यवहार में सम्मिलित किया जाय। आमतौर पर इसी पद्धति को सर्वसामान्य अपनाते और विश्वासपूर्वक कदम उठाते हैं । इस प्रकार के भविष्य - ज्ञान का मोटा अनुभव दूरदर्शी समझदारी के सहारे प्राप्त किया जा सकता है। यों भविष्य सम्बन्धी शत-प्रतिशत सही जानकारी तो किसी के लिए भी संभव नहीं , फिर भी यदि चिन्तन में दूरदर्शिता सम्मिलित हो जाय तो अनागत का इतना अनुमान तो अर्जित किया ही जा सकता है जिसमें यदि तदनुकूल प्रयास और पुरुषार्थ शामिल हो जाए तो भवितव्यता के समीप पहुंचा जा सके।
चिन्तन प्रक्रिया है, जिसे इसके अन्वेषकों के नाम से भारतीय संस्कृति कहा गया है। इसकी इसी उत्कृष्टता एवं विशेषता को स्वीकार करते हुए भारत में पोलैंड के राजदूत मार्या वुस्को ने कहा था-” भारत और भारतीय संस्कृति ने मेरे लिए दर्पण का काम किया है जिस तरह दर्पण के सामने खड़े होकर आदमी अपने को देखता पहचानता और अपना मूल्यांकन करता है उसी तरह भारत आकर मैंने स्वयं को समझा और पहचाना है और स्वयं को समझा और पहचाना है। स्वयं सुधारने -संवारने को कोशिश की है। इसके इसी निर्दोष स्वरूप स्वीकारने , अपनाने का आह्वान करते हुए साने गुरुजी के शब्द है-” मैं उत्कृष्टतापूर्वक संस्कृति का पालन प्रकाश मिले। इसे धारण कर सभी तेजस्वी हो।
चिन्तन प्रवाह है, जो समय-समय पर परिजनों तक पहुँचता रहा है वह सदैव सामयिक रहा है, रहेगा। संपादन मण्डल द्वारा जी सामयिक संदर्भ दिये जाते हैं वे भी उनके द्वारा दिए गए मार्गदर्शन के अंतर्गत ही लिखे जाते हैं, एक मिलीमीटर भी इधर-उधर नहीं हटकर विगत की व सबकी पत्रिका के प्रवाह में देखकर यह अन्तर नहीं बता सकता कि यह गुरुसत्ता की लेखनी से लिखे गए हैं या नहीं।
चिन्तन तो भविष्य की कल्पनाओं में ही निरत रहता है। कामनाएं और कुछ नहीं भविष्य की लालसा ही है। उन्हीं के अनुरूप यह निश्चित किया जाता है। कि अगले दिनों के लिए जो निर्धारण किया गया है। उसका नाना-बाना कैसे बुना जाय?
चिन्तन में प्रखरता लाने की आवश्यकता पूरी करेंगे।
चिन्तन करें, तो कोई कारण नहीं कि ऐसी प्राणघातक बीमारियों से पिण्ड न छुड़ा सकें इस प्रकार के अधिकांश उदाहरणों में हमारा अस्वाभाविक आचरण ही इसके लिए जिम्मेदार होता है इसके प्रति सतर्क रहे, तो स्वस्थता सुनिश्चित हो नहीं, अवश्यम्भावी बन जाएगी।
चिन्तन ऐसा भ्रष्ट हो गया है।
चिन्तन का भाव परिणति के प्रत्यक्ष प्रमाण है।
चिन्तन दिया जाय, अश्लील पत्र-पत्रिकाओं से दूर रखा जाय, भोजन में भी सात्विकता का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाय , तले-भुने पदार्थों एवं मिर्च-मसालों का कम से कम उपयोग किया जाय, कवायद अथवा पुरुष जैसे श्रमसाध्य व्यायामों से परहेज किया जाय। वे कहते हैं। कि इनके द्वारा बहुत हद तक रजोदर्शन की आयु की बढ़ाया जा सकता है यह उम्र को बढ़ाया जा सकता है। यह उम्र जितनी अधिक होगी, स्तन कैंसर की सम्भावना उतनी ही घट जाएगी ऐसा उनका मत है। कैंसर के मूल में जाकर विचार करें तो पता चलेगा कि इसका वास्तविक कारण क्रोमोसोम्स हैं यह गुण-सूत्र जो हमारी हर जीवन कोशिका में होते हैं।
चिन्तन करते थे। तभी तो भारतीय मनीषी डाफ॰ राधाकृष्णन ने अपनी एक वक्तृता में कहा था -” भारतीय संस्कृति का अर्थ है मेल, सारी जातियों का मेल। इस प्रकार के महामेल को पैदा करने की इच्छा रखने वाली, सारी मानव जाति की उसके मंगल -कल्याण की ओर ले जाने की इच्छा रखने वाली यह ऋषि प्रणीत संस्कृति है। इसी विशाल दृष्टिकोण के कारण भारतवासी अपनी आध्यात्मिक एवं भौतिक सम्पदा को विश्व के कोने-कोने में बाँटने हेतु पहुँचे ।
चिन्तन किया जाय योजना बनायी जाय क्रिया पद्धति अपनायी जाए प्रयास और साधन जुटाये जाए एवं इसके लिए जिनके सहयोग अभीष्ट हो उनसे सम्बन्ध जोड़ें जाए।
चिन्तन क्षेत्र की सबसे बहुमूल्य सम्पदा है यों प्रत्यक्षतः उसका कोई पर भी शक्ति उसी में सबसे अधिक होती हैं जो जैसा सोचता है वह वैसा ही बन जाता है इसी को कहते हैं -’भविष्य - निर्धारण ।’
चिन्तन कर यह निर्णय करे कि उसे अपनी सत्ता इस धरती पर बनाये रखनी है अथवा बंध्यत्व का शिकार होकर वंशवृद्धि गंवानी है मर्जी उसकी है, निश्चय उसका है।
चिन्तन और प्रदूषित कोशिका वातावरण के कारण जब इनमें बदलाव आता है तो उससे प्रभावित कोशिका कैंसर सेल की भांति कार्य करने लगती है। कई बार तो जीन में पैदा होने वाली इस प्रकार की गड़बड़ी को हमारा शरीर तंत्र स्वतः ही सुधार लेता है पर जब इस प्रकार का आक्रमण लेता है पर जब इस प्रकार का आक्रमण बार-बार होने लगता है तो वह तंत्र भी कमजोर पड़ जाता है और आगे आक्रमण बर्दाश्त न कर पाने की स्थिति में रुग्ण बन जाता है। बचाव-कार्य में प्रायः ऐंजाइम ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं यह ऐंजाइम कैंसरजन्य तत्वों को निष्क्रिय बनाकर मूत्र के साथ शरीर के बाहर निकाल देते हैं। अध्ययनों से कैंसर की गाँठ बनते समय कोशिका के अन्दर होने वाले परिवर्तनों का भी पता चला है ज्ञात हुआ है कि जिन परिस्थितियों में कैंसर जीन निरंकुश होकर कैंसर पैदा करते हैं , उनमें कभी-कभी कैंसर जीनों की संख्या में अतिशय वृद्धि हो जाती है। अथवा वे अत्यधिक सक्रिय हो उठते हैं इसका कारण बताते हुए विज्ञानवेत्ता कहते हैं कि कई बार जिस गुणसूत्र पर यह जीन लगे होते हैं उसका कोई हिस्सा टूट जाता है तो कभी किसी अन्य गुणसूत्र का कोई खण्ड टूटकर उससे जुड़ जाता है।
चिन्तन किया जाये और कुछ दिन पश्चात् इसका उत्तर निद्रावस्था में संकेत रूप से मिल जाए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इसका समर्थन न्यूयार्क राकफेलर युनिवर्सिटी के तंत्रिकाविज्ञानी डॉ. जोनाथन विन्सन ने भी किया है वे अपनी ‘ब्रेन एण्ड दि साइक ‘ कृति में कहते हैं कि प्रसुप्त की क्षमता को यदि जगाया -उभारा जा सके, तो वह हमें ने केवल सपनों के माध्यम से अनागत की सूचना दे सकती है वरन् पूर्ण चेतना की अवस्था में भी हम उससे उसी स्तर का कार्य ले सकते हैं।
चिन्तन एवं जीवन स्तर हेय स्तर का रहा हैं उनको दम घुटने एवं डूबने जैसी अकुलाई भी होती है। लेकिन जिन्होंने जीवन दर्शन को समझा है, उन्हें मरण सुखद की लगता है तभी तो प्राणिशास्त्री विलियम हण्टर ने मरने से पूर्व मन्द स्वर में कहा था,” यदि मुझ में लिखने की ताकत होती तो विस्तार से लिखता कि मृत्यु कितनी सरल और सुखद हैं ।”
चिन्तन का सम्बन्ध है वहां तक यही कहना पड़ेगा कि भावी निर्धारण का स्वरूप ही चिन्तन क्षेत्र की सबसे बहुमूल्य सम्पदा है यों प्रत्यक्षतः उसका कोई पर भी शक्ति उसी में सबसे अधिक होती हैं जो जैसा सोचता है वह वैसा ही बन जाता है इसी को कहते हैं -’भविष्य - निर्धारण ।’
चिन्तन जैसा होता है। वह के अनुरूप ढलने लगता है विज्ञान में मन के गड़बड़ाने के स्वस्थ का लड़खड़ाना और शरीर का बीमार पड़ना प्रसिद्ध है। चिन्तन विकृति के अनुरूप यहां काया की प्रत्यक्ष हो उठती है । भृंग की आकृति और प्रकृति से तन्मय होकर कीट तद्रूप बन जाता है टिड्डे गर्मी के दिनों में सब और छाया देखकर अपना रंग भी पीला बना लेते हैं। वर्षा आने पर हरीतिमा बिखरे देखने पर पुनः अपना रंग बदलने और हर छा जाते हैं भयभीत रहने वाले अपना स्वास्थ्य गवा बैठते हैं।
चिन्तन विकृति के अनुरूप यहां काया की प्रत्यक्ष हो उठती है । भृंग की आकृति और प्रकृति से तन्मय होकर कीट तद्रूप बन जाता है टिड्डे गर्मी के दिनों में सब और छाया देखकर अपना रंग भी पीला बना लेते हैं। वर्षा आने पर हरीतिमा बिखरे देखने पर पुनः अपना रंग बदलने और हर छा जाते हैं भयभीत रहने वाले अपना स्वास्थ्य गवा बैठते हैं। इसके विपरीत जिन्हें अगले दिनों बड़ी सफलता मिलने और सम्पदा प्राप्त करने का विश्वास जमा होता है वे अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ सुन्दर और समर्थ बनते चले जाते हैं यह भाव चिन्तन का भाव परिणति के प्रत्यक्ष प्रमाण है।
चिन्तन की महती भूमिका है यो के क्रिया-कलापों और भूतकाल का अनुभवों का उल्लेखनीय योगदान है पर भावा समय का ताना-बाना यदि सूझ-बूझ और सतर्कतापूर्वक नहीं हुआ तो वर्तमान के प्रयास और विगत का अभ्यास भी एक प्रकार से निरर्थक ही साबित होते हैं।
चिन्तन कह सकते हैं
चिन्तन के ज्वार - भाटे कहकर भी निश्चित नहीं हुआ जा सकता क्योंकि इस प्रवाह के साथ असाधारण शक्ति जुड़ी हुई पायी जाती है। मनुष्य का चिन्तन जैसा होता है। वह के अनुरूप ढलने लगता है विज्ञान में मन के गड़बड़ाने के स्वस्थ का लड़खड़ाना और शरीर का बीमार पड़ना प्रसिद्ध है। चिन्तन विकृति के अनुरूप यहां काया की प्रत्यक्ष हो उठती है । भृंग की आकृति और प्रकृति से तन्मय होकर कीट तद्रूप बन जाता है टिड्डे गर्मी के दिनों में सब और छाया देखकर अपना रंग भी पीला बना लेते हैं।
चिन्तन का स्वरूप लेकर आती है। प्रतिमाह परिजनों के घरों में ज्ञान का आलोक लेकर पहुँचने वाली यह आध्यात्मिक पत्रिका मात्र एक अखबार या लेखों का पुलिंदा नहीं अपितु प्रचाण् प्राण ऊर्जा के मान है, जो परमपूज्य की लेखनी मातृसत्ता के ममत्व भरे मार्गदर्शन का निर्वाह यथावत् करती आ रही है। जैसे प्रतिया के लिए अपनी अनिवार्यता को स्पष्ट करता जा रहा है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-May
चिन्तन या बुरा विचार अथवा भावनात्मक प्रतिक्रिया रोगों के रूप में प्रस्फुटित हुई है। इन क्रिया-कलापों को कैसे ठीक किया जाय ? इस तरह की आत्म विश्लेषण क्रिया को अपनाकर हम खुद अपने रोगों के मूल कारणों को जान कर उन्हें रोक सकते हैं। जिस बुरी आदत, संकीर्ण चिन्तन एवं दूषित भावना की प्रतिक्रियाओं ने हमें रोगग्रस्त बनाया है तथा कष्टमय जीवन जीने को मजबूर किया है, उससे हम सहज ही छुटकारा पा सकते हैं।
चिन्तन को स्थान देते हुए मन्त्रानुष्ठान का सामान्य लाभ हुआ।
चिन्तन - स्तर के अनुरूप कितनी ही प्रकार की अल्फा वीटा, डेल्टा आदि किरणें निकलती हैं। उनके आयाम और दैर्ध्य - चिन्तन का - स्थिति का विवरण प्रस्तुत करते हैं।
चिन्तन शैली। भारत की विचार-पद्धति आत्मा और चेतनापरक है। यहाँ पहला स्थान आत्मा का है, उसके बाद पदार्थ का नम्बर आता है। आत्मा की प्रधानता को अभिव्यक्त करते हुए यहाँ के दार्शनिक कहते हैं - ‘देयर इज ए सोल विदिन दि बॉडी’ अर्थात् हर शरीर में एक आत्मा निवास करती हैं, जबकि इस संबंध में पाश्चात्य मान्यता पदार्थपरक है। वे कहते हैं - देयर इज ए बॉडी सराउण्डिंग ए सोल’ अर्थात् प्रत्येक शरीर अपने अन्दर के कारण ही दोनों संस्कृतियों में भारी अन्तर है, फलतः समाज - व्यवस्था में भी स्फुट अन्तर झलकता है।
चिन्तन देती हैं। इन्हीं को अदृश्य सहायक की ‘इन्विजिबल हेर्ल्पस’ की उपमा भी दी जा सकती है। संभवतः उच्च स्तरीय सहायक आत्मायें सूक्ष्म-जगत का प्रत्यक्ष-जगत से संपर्क जोड़ने के लिए यही माध्यम अपनाती हों।
चिन्तन में वह सारे कार्य इसके अंतर्गत आते हैं, जिसमें किसी को मनसा - वाचा-कर्मणा चोट पहुँचायी गई हो। शारीरिक क्षति तो इसकी पराकाष्ठा मानी गई हैं। स्पष्ट है - पूर्व और पश्चिम की सोच में भारी अन्तर हैं, पर महत्वपूर्ण यहाँ वह व्यतिरेक नहीं। महत्व की बात तो यह है कि हम जिसे भी हिंसा मानते हैं, उसके औचित्य - अनौचित्य को किस सीमा तक स्वीकारते हैं। उदाहरण के लिए मार्क्स के साम्यवाद, हिटलर के नाजीवाद, मुसोलिनी के फासीवाद और आज के आतंकवाद को लिया जा सकता है।
चिन्तन क्षमता का कोई समाधान नहीं मिलता। अब वैज्ञानिक निष्कर्ष आणविक हलचलों के ऊपर शासन करने वाली एक अज्ञात चेतन-सत्ता को समझने का प्रयास गंभीरतापूर्वक कर रहे हैं।
चिन्तन की ओर खींच ले जाती है, तो इसका कारण यह है कि वह परमार्थ वृत्ति भाव क्षेत्र हृदय में स्थित ‘उदारता’ से निरन्तर पोषण पा रही है। मनन इस परिहित वृत्ति और उदारता की भावना का अवलोकन और मूल्याँकन करता है, उन पर यदि स्वार्थ अथवा यश की कामना की धूल जमने लगी हो तो सचेत करता है निखार आ रहा हो तो प्रसन्नता और सन्तोष व्यक्त करता है मनन व्यक्ति की अपनी क्षमता के अनुसार इन श्रेष्ठताओं की ओर बढ़ाने की सम्भावना ढूंढ़ता है। महामानवों के जाज्वल्यमान उदाहरण प्रस्तुत कर और आगे बढ़ने का प्रोत्साहन देता है और इस अनुग्रह के लिए सर्वोच्च सत्ता तथा गुरुसत्ता के प्रति कृतज्ञतापूर्वक नमन अर्पित करता है। मनन सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है, अतः वह श्रेष्ठता के साधक का विश्वसनीय साथी है।
चिन्तन का - स्थिति का विवरण प्रस्तुत करते हैं।
चिन्तन की प्रतिष्ठान ही एक मात्र वह सार्वभौम उपाय-उपचार है जिसके आधार पर मानव समुदाय को स्वस्थ तथा समुन्नत जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है। शरीर चिकित्सा-विज्ञानियों का भी मनः चिकित्सकों की भाँति ध्यान अब इस ओर आकृष्ट हुआ है और वे रोगों के निर्धारण करने से पूर्व, मात्र शारीरिक स्थिति को ही नहीं निरखते-परखते, वरन् मानसिक स्थितियों व मस्तिष्कीय स्तर का भी अध्ययन करते हैं। इस तथ्य से भली भाँति परिचित चिकित्सक ही बहुधा सफल होते हैं।
चिन्तन का एवं शरीर-संचालन का ही उत्तरदायित्व निभाने तक सीमित नहीं है। उसकी परिधि इतनी व्यापक और विस्तृत है कि अतीन्द्रिय अनुभूतियों और चमत्कारों का भी तथ्य उसी के अंतर्गत स्वीकारना पड़ेगा। समय-समय पर बुद्धि को चकराने वाले प्रसंग वास्तव में और कुछ नहीं, वरन् परिष्कृत मन-मस्तिष्क के ही कौशल हैं। आये दिन ऐसे कितने ही चमत्कार प्रकाश में आते रहते हैं।
चिन्तन को दिग्भ्रान्त करने में बहुत सफलता पायी है। स्वार्थपरता, उच्छृंखलता और आक्रामकता को बल मिला है। व्यक्तिगत चरित्र और भौतिक प्रगति में विज्ञान ने बहुत सहायता दी है, किन्तु उसके द्वारा चेतना क्षेत्र में जो विकृति उसके द्वारा चेतना क्षेत्र में जो विकृति उत्पन्न हुई है, उसकी हानि भी कम नहीं है। पतन-पराभव का घटाटोप अनेकानेक विभीषिकायें उत्पन्न कर रहा है। लगता है महाविनाश के दिन तेजी से निकट आते जा रहे हैं।
चिन्तन किया जाय उतनी ही उसकी गरिमा और विलक्षणता स्पष्ट होती चली जाती है। बादलों की गरज से ऊँची इमारतें फट जाती हैं। आज की याँत्रिक सभ्यता जितना शोर उत्पन्न कर रही है उसके दुष्परिणामों से मानव जाति को अपूर्णनीय क्षति उठानी पड़ेगी। इस तथ्य से समस्त संसार चिन्तित है। अतिस्वन और जेट-विमान आकाश में जितनी आवाज करते हैं उससे उत्पन्न होने वाली हानिकारक प्रतिक्रिया को सर्वत्र समझा जा रहा है और इन विशालकाय द्रुतगामी यानों को कोलाहल रहित बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है।
चिन्तन करने एवं ईश्वर के प्रति दृढ़ विश्वास रखने की विधा बतायी गयी तो वह उससे पूर्णतः सहमत ही नहीं हुई, वरन् उसे अपनी जीवनचर्या का अंग भी बना लिया । धीरे-धीरे उसका मानसिक स्तर परिवर्तित होने लगा और घृणा के स्थान पर प्रेम के भाव पुनः प्रस्फुटित होने लगे। फलतः सुधार प्रक्रिया भी स्वयमेव आरम्भ हो गयी और कुछ ही महीनों में वह गठिया रोग से पूर्णतः मुक्त हो गयी। आज वह दूसरों को रोगों का मानसिक उपचार सिखाती हैं।
चिन्तन-चेतना की विकृति एवं मानसिक तनाव की इस तरह के रोगों का प्रमुख कारण है। यदि रोगी स्वयं ही अपनी समस्याओं का विश्लेषण करे तो चिन्ता एवं इस तरह की शारीरिक अपंगता से बच सकता है और यही हृदय , मस्तिष्क एवं प्रभावित अंग- प्रत्यंगों का सार्वभौमिक उपचार है। यह मात्र कोरी कल्पना नहीं है, वरन् ऐसी घटनायें लोगों के जीवन में घट चुकी हैं तथा लोगों ने स्वयं ही अपने प्रयासों से अपने को रोगमुक्त किया है।
चिन्तन’ की प्रभावशाली प्रक्रिया ‘मनन’ का बहुत सहयोग करती है।
चिन्तन एवं दूषित भावना की प्रतिक्रियाओं ने हमें रोगग्रस्त बनाया है तथा कष्टमय जीवन जीने को मजबूर किया है, उससे हम सहज ही छुटकारा पा सकते हैं।
चिन्तन-चेतना में तेजी से परिवर्तन आया है। आपा-धापी एवं मारा-मारी भरे इस युग में अधिकाँश नर-नारी भावनात्मक उथल-पुथल के कारण तनावग्रस्त बनते और अपने स्वास्थ्य को गँवाते चले जाते हैं। अतः समग्र निदान के लिए चिकित्सकों को चाहिए कि वे लोगों का अध्ययन करें कि वे किस तरह रहते हैं, किस तरह सोचते हैं तनाव एवं अप्रसन्नता का मूल कारण क्या है ? यही वे आधार हैं जिनमें समग्र चिकित्सा के सूत्र सन्निहित हैं।
चिन्तन विचार-प्रक्रिया पर सवार हो जाता है और एक चिरंतन प्रवाह का रूप धारण करता है। यह मार्ग मस्तिष्कीय प्रशिक्षण एवं परिवर्तन की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी है। इससे मन को किसी विशेष भूमिका में रमण करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। विकृतियों को सुधारा जा सकता है और अभिरुचि तथा प्रकृति में परिवर्तन लाया जा सकता है। यह अर्थ चिन्तन को स्थान देते हुए मन्त्रानुष्ठान का सामान्य लाभ हुआ।
चिन्तन ये तीन शब्द ही तीन फलकों वाला अंकुश है जिसे युग निर्माण योजना-गायत्री परिवार अश्वमेध महायज्ञों के प्रथम अनुयाज कार्यक्रम के रूप में अपनाने और जन-जन में प्रचार-प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहे है। शब्द कोष में इनके जो भी अर्थ दिए गए हों, पर पूज्य गुरुदेव ने अपने प्रवचनों लेखों तथा पंचकोशी साधना विवरण में जिन विशिष्ट अर्थों में इनका प्रयोग किया है वही हमारे लिए ग्रहण करने योग्य है। उनके बताये अर्थ ही हमें जानना चाहिए, उन अर्थों में ही इन तीन शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
चिन्तन अथवा प्रभावित किये कोई भावनात्मक व्यवधान है जो शरीर के रासायनिक तत्वों में परिवर्तन कर देते हैं तो उसने स्वीकार किया कि अपने शरीर की यह हालत मैंने ही बनायी है। उसने बताया कि अपने जिस बेटे को वह सर्वाधिक चाहती और स्नेह करती थी, उसने उसे अपमानित किया। उसका व्यवहार ऐसा हो गया था जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। बेटे ने माता-पिता की समूची आशाओं पर पानी फेर दिया था। माँ जहाँ अपने बेटे को एक आदर्श व्यक्तित्व के रूप में देखना चाहती थी, वहीं वह उतना दुष्ट एवं क्रूर निकला जिसे चाह कर भी वह क्षमा नहीं कर सकी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-September
चिन्तन एवं दृष्टिकोण का भी अनुदान इसी के आधार पर प्राप्त करता है। मानवी विद्युत के विज्ञान को जो लोग समझते हैं उन्हें स्वीकार करने में तनिक भी कठिनाई न होगी कि प्रबल विद्युत सम्पन्न व्यक्ति अपने से दुर्बल साथियों को अनायास ही प्रभावित करता व छाप छोड़ता रहता है। पर्यवेक्षण से इस तथ्य को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है कि मनुष्य पर सूक्ष्म स्तर का प्रभाव अन्य सबकी अपेक्षा माता का ही अधिक पड़ता है।
चिन्तन का शासन स्थापित होता जाएगा, क्रान्ति की गति बढ़ती जाएगी। बढ़ती गति के साथ इसका प्रभाव क्षेत्र भी बढ़ेगा। जिससे अकेली नारी नहीं समूची नारी जाति अपनी उस खोयी स्वतन्त्रता को पा सकेगी, जिसे वह आकुलतापूर्वक खोज रही है।
चिन्तन क्रम भी चलता रहता। गर्भस्थ शिशु पर इसका प्रभाव पड़ा और बड़े होने पर युद्धभूमि उसका सर्वाधिक प्रिय स्थान बन गयी। वह सदा सैनिकों के साथ मोर्चे पर रहता तथा उसके ही तम्बू के पास आ -आकर शत्रु की तोपों से छूटे गोले गिरते रहते। नेपोलियन अविचलित अपने कार्य में संलग्न रहता। इस निर्भयता और रणप्रियता में गर्भ अवधि की घटनाओं का भी प्रभाव निश्चित ही था।
चिन्तनक्रम और समुचित श्रम तथा विश्राम की व्यवस्था जुटाना, पति एवं परिवार के आत्मीयजनों का कर्तव्य है। ऐसा करने की पात्रता व शक्ति अर्जित किए बिना, एक नवागन्तुक सुकुमार अतिथि को आमन्त्रित करना अनुचित और अपराधपूर्ण कृत्य है।
चिन्तन, दृष्टिकोण उसी स्तर का होगा। व्यवस्थाएँ और परम्पराएँ उसी ढाँचे में ढलेंगी। जनसाधारण की गतिविधियाँ उसी दिशा में उन्मुख होंगी। शासनतन्त्र, धर्मतन्त्र, समाजतन्त्र और अर्थतन्त्र का सारा क्लेश उसी स्तर पर पुनर्निमित होगा। ऐसी स्थिति में नारी को हर क्षेत्र में विशेष भूमिकाएँ निबाहनी पड़ेंगी, विशेष उत्तरदायित्व सँभालने पड़ेंगे, कारण कि अध्यात्म की विभूतियाँ जन्मजात रूप से उसी को अधिक परिणाम में उपलब्ध हुई हैं।
चिन्तन स्तर परिष्कृत नहीं है तो इसमें भावी पिता का, भावी दादा-दादी, भावी बुआ-चाची आदि का दोष कम नहीं आंका जाएगा ।
चिन्तन और अनुभव जगत की सामर्थ्य तो और भी विस्तृत और अकूल है। फिर वह पारिवारिक संवेदना के नाम पर दो चार तरह की ही संवेदनाओं से परिचित हो नर नारी का यौनाकर्षण, काम भाव, सन्तान के प्रति मोह, वृद्धों के प्रति सामान्य औपचारिकता परिवार के नाम पर हो, तो उस उसके विराट व्यक्तित्व के अनुरूप शोभा नहीं देता। प्रारंभ से यदि इतने सीमित रिश्ते और भावनात्मक रंग ही उसे ज्ञात रहे तो इससे उसके व्यक्तित्व में एकाँगिता ही आएगी।
चिन्तन को एक ओर झटककर उसने पति के कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा, “आर्य भोजन तैयार है।”
चिन्तन को अपने हाव-भावों से दूषित कर दे अथवा व्यक्तित्व के गुणों का समुच्चय, चरित्र उच्च मानवीय गुणों से युक्त हो और कर्तृत्व सत्प्रवृत्तियों का निर्झर हो जिसकी विशालता के कारण अनेक जिन्दगियाँ विकसित हों। उसके पूछे गए प्रश्न के यही दो उत्तर हैं, जो आदि काल से वातावरण में गूँज रहे हैं- किसी एक को चुनना है।
चिन्तन का, महत्वाकाँक्षाओं का, कुछ कर सकने का परिस्थिति का प्रधान योगदान होता है।वह न मिले तो खाद-पानी न मिलने वाले पौधे की तरह ज्वलन्त सम्भावनाएँ भी नष्ट हो जाती है। ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा कितनी ही क्यों न हो, मालिकों की मर्जी के बिना उसका उपयोग कर सकने का महिलाओं के लिए कोई अवसर नहीं । इच्छा तो आखिर हर किसी की कुछ न कुछ होती ही है। उन्हें फलवती करने का जब अधिकार ही नहीं , तो आकाँक्षाओं की चिंता और राख मनःक्षेत्र में घुटन की दुर्गन्ध ही भरे रहेगी ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-November
चिन्तन तो घोर स्वार्थपरता के अंधकूप में डुबो देता है।
चिन्तन और आचरण का प्रभाव न कहें तो और क्या कहें।
चिन्तन क्रान्तिकारी और लोकोपयोगी हो, जिनका जीवन परमार्थ एवं पुरुषार्थ परायण हो वे सब इसी कोटि में आते हैं। जिस स्थान पर नदियाँ बहती और निर्झर प्रवाहित होते हैं, वहाँ दूर तक उनकी कल-कल ध्वनि सुनाई पड़ती है, किन्तु नाले में बहने जल का पता तो बगल से गुजरने वाले राहगीर तक को नहीं चल की लगभग इसी स्तर का अन्तर जीवन्त और मृतप्राय जीवन गुजारने वालों गुजारने वालों में हैं।
चिन्तन देकर रचनात्मक कार्यों के प्रति रुचि जगाने का भी उपक्रम होता रहता है।
चिन्तन ही समाये होते हैं। कोई यदि किसी की सम्पत्ति का छल-बल द्वारा अपहरण करता है , तो यहाँ भी धनवान बनने की उसकी संकीर्णता का ही परिचय मिलता है और कोई किसी का शोषण-उत्पीड़न करता है, तो यह भी कर्ता की विकृत मानसिकता को ही दर्शाता है। दोनों ही अपने-अपने प्रकार के अपराध और अपराधियों से समाज को तब तक मुक्त नहीं किया जा सकता, जब तक उनका चेतनात्मक परिष्कार न हो, जेल और कानून तो एक प्रकार के नियंत्रक हैं, मुक्ति प्रदाता नहीं। सम्पूर्ण मुक्ति और अहिंसक समाज को स्थापना अध्यात्म उपचार के अवलम्बन से ही सम्भव है, इससे कम में नहीं।
चिन्तन में ही उसकी अपनी भलाई निहित है, व्यष्टिवादी चिन्तन तो घोर स्वार्थपरता के अंधकूप में डुबो देता है।
चिन्तन स्वार्थ-संकीर्णता की अंधेरी गुफा में ही कैद नहीं रह सकेगा। शायद इसी कारण मानवीय सभ्यता के आदिम जमाने से लेकर आज तक अपने समय के मनीषी, वैज्ञानिक भांति-भाँति से इस पहेली का हल निकालने की कोशिश कर रहें हैं। साहित्यकारों ने इन प्रयासों को अपनी कल्पना के रंगों से सजाया है। तभी तो प्रायः हर देश के पुराण-कथा साहित्य में लोक-लोकान्तर की कथाएँ पढ़ी-सुनी जा सकती हैं। सम्भवतः इन सबका उद्देश्य मानवीय दृष्टिकोण व्यापक बनाना रहा है।
चिन्तन के अनुरूप ही बच्चे के संस्कार व आदतें बनती हैं और तद्नुरूप ही वह व्यवहार करने लगता है। इस संदर्भ में जर्मन अखबार ‘सर्ज’ ने जर्मन वैज्ञानिकों के नवीनतम एवं महत्वपूर्ण अनुसंधानों को प्रकाशित किया है, जिसके अनुसार वहाँ के बच्चों को माँ के गर्भ में ही प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसमें गर्भस्थ शिशु को इस आधुनिक संसार की जानकारियाँ सुनाई जाती हैं। भाषा के अभाव में गर्भस्थ शिशु भाषा तो नहीं सीख सकता, किन्तु उसका अवचेतन मन संकेत रूप में अधिकाँश जानकारियों को संग्रहित करता जाती है।
चिन्तन है, वे वर्तमान स्थिति का सार्थक विश्लेषण कर सकते हैं। घोटालों के इन चढ़ते-बढ़ते प्रकरणों के पीछे स्पष्ट देखा जा सकता है-अपनी साँस्कृतिक परम्पराओं, जीवन-मूल्यों का अवमूल्यन। हमारे देश की साँस्कृतिक दुरावस्था इतनी कभी नहीं हुई जितनी कि आज है। त्याग की अग्निशिखा, भोग की बूँदों से घिर गई लगती है। ऐसे में आवश्यकता उन व्यक्तित्वों की है, जो अपने स्वार्थों की आहुति साँस्कृतिक क्रान्ति के लिए कर सकें।
चिन्तन करें। क्या सचमुच कोई ऐसी सत्ता है, जो अणु प्रतीत हो पर उसमें ब्रह्माण्ड की सी चेतना सन्निहित हो?
चिन्तन ही नहीं बदलेगा, वरन् वह वृत्तियाँ भी बदलेंगी, जो आज विश्व-समुदाय के लिए गहरे संकट खड़े कर रही हैं। तब मनुष्य मात्र अपने निजी स्वास्थ्य की ही चिंता न करेगा, अपितु उस दिशा में सोचने के लिए भी विवश होगा, जिससे सम्पूर्ण समुदाय के लिए समग्र स्वास्थ्य की प्राप्ति की जा सके। इस दिशा में उसका प्रथम कदम पर्यावरण की रक्षा होगा, कारण कि पर्यावरण और जन-स्वास्थ्य एक दूसरे से गहरे सम्बद्ध हैं और एक की रक्षा के बिना दूसरे की उपलब्धि किसी भी कीमत पर शक्य नहीं।
चिन्तन किया जा सकता है, वह परब्रह्म मैं ही हूँ। मैं सर्वदा चित्त स्वरूप रहता हूँ। मैं सर्वदा चित्त स्वरूप रहता हूँ। मुझे कोई जान और समझ नहीं सकता । मैं बुद्धि के बिना ही सब कुछ जानने, स्थूल कानों के बिना सब कुछ सुनने और स्थूल आँखों के बिना सब कुछ देखने की सामर्थ्य रखता हूँ।
चिन्तन बदलने की बात है। जन-जागरण की बात है। इसके लिए आपको ही आगे आना पड़ेगा। इसे कोई और नहीं कर सकता, आप ही कर सकते हैं। आपको करना भी चाहिए।
चिन्तन में खुलापन आया है और व्यापकता भी आयी है। एक हद तक उसने पूर्वाग्रही मान्यताओं से पीछा भी छुड़ाया है। कुछ समाजवादी और इस्लामी देशों को छोड़ दिया जाय, तो यही कहना पड़ेगा कि वर्तमान समाज और शासन प्रणाली में उतनी और वैसी कट्टरता अब नहीं रही, जिसके लिए पूर्ववर्ती व्यवस्था बदनाम थी। आज न तो किसी बालक को छोटी-सी चोरी के लिए मौत की सजा दी जाती है, जैसा कि प्राचीन इंग्लैण्ड में प्रचलित था और न किसी वयस्क को स्वतंत्र विचार-अभिव्यक्ति के जुर्म में फाँसी के फंदे पर लटकाया जाता है। हाँ, समाज-प्रणाली को छिन्न-भिन्न करने वालों के लिए दण्ड-व्यवस्था अवश्य है, होनी भी चाहिए।
चिन्तन पहले की तुलना में अधिक विकसित, सभ्य और प्रगतिशील है; शासन-तंत्र भी अधिक सुव्यवस्थित है। इतने पर भी क्या कारण है कि आपराधिक वृत्तियाँ पहले की अपेक्षा ज्यादा बढ़ी हैं। उत्तर एफ. टैनिनबाँन अपनी पुस्तक ‘क्रिमिनोलाँजी’ में देते हैं। वे लिखते हैं कि अपराध को सीधे सभ्यता और प्रगतिशीलता के साथ जोड़ना उतना न्यायसंगत नहीं होगा। हाँ, यह भी कुछ सीमा तक निमित्त कारण हो सकती है, पर वास्तविक कारण समाज में फैली विसंगतियाँ ही हैं, उनके अनुसार यदि कोई दो दिनों का भूखा बालक कहीं से क्षुधातृप्ति के लिए कुछ रोटियाँ चुरा लेता है, तो इसे उसकी आपराधिक मनोवृत्ति कहना गलत होगा और यह कहना भी अनुचित होगा कि माता-पिता ने गीली मिट्टी के समान उसके मन को सद्प्रवृत्तियों के साँचे में गढ़ने की कोशिश नहीं की।
चिन्तन के विकल्पों में करवटें बदलने लगे। अहो, धिक्कार है मेरे अकृतज्ञ मंत्रियों को। मैंने निरन्तर उनका सत्कार किया। उन्हें कितना धन-मान दिया, उच्च पद दिया। फिर भी मेरे निर्दोष पुत्र के साथ वे दाँवघात कर रहे हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-April
चिन्तन, व्यक्तित्व उन्नयन, समग्र प्रगति, सामाजिक सुव्यवस्था, अर्थ सन्तुलन जैसे व्यक्ति और समाज से सम्बन्धित अनेकानेक क्षेत्रों पर धर्म धारणा का असाधारण प्रभाव देखा जा सकता है। उसके कारण इन सभी क्षेत्रों के समुन्नत बनने की सम्भावना सुनिश्चित बनती है। अधर्म का अनौचित्य अपनाने का परिणाम मात्र असन्तोष विग्रह और विनाश का ही वातावरण बनता है। धर्मतत्व का एकमात्र स्वरूप सद्भावना, सज्जनता, सहकारिता, संयमशीलता, उदारता जैसे शालीनता समर्थक सरंजाम जुटाता है।
चिन्तन, महापुरुषों के गुणों को अपने अन्दर समावेश होने की भावना से सजातीय विचार अपने भीतर खिंचते चले आते हैं और वाँछित सद्गुणों को-विद्युत प्रवाहों को जन्म देने लगते हैं।
चिन्तन करने वाले इन सभी के प्रयास निश्चय ही सहनीय है।, किन्तु विशाल मानव समुदाय को प्रभावित करने में, मानव मन को मर्यादा की सीमा में रखने में, तमस् से मोड़कर सत् की दिशा में प्रेरित करने में उनकी सार्थकता अभी तक सिद्ध नहीं हो पाई है। इस असफलता का एक तर्कसंगत कारण यह समझ पड़ता है कि वे दुष्कृत्यों को रोकने में ही अपनी पूरी शक्ति व्यय कर रहे हैं, दुष्कृत्य जहाँ जन्म लेते हैं और पनपते हैं उस भूमि को सुधारने-संवारने का प्रयत्न नहीं रहे। सूख रहे वृक्ष के पत्तों पर तो दवा का छिड़काव करते हैं, किन्तु जड़ में समाए रोग को दूर करे की चिन्ता नहीं करते। फलस्वरूप इन बलवान प्रयासों को भी असफलता का मुँह देखना पड़ रहा है।
चिन्तन (2) विश्व कल्याण के लिए समर्पित गायत्री मन्त्र जप अथवा भगवन्नाम जप, अथवा अपने-अपने धर्म सम्प्रदाय का मंत्र जप। (3) गायत्री मन्त्र अथवा भगवन्नाम लेखन। (4) ज्ञान-यज्ञ, दीप यज्ञ आदि द्वारा आस्था जागरण, मिशन का विस्तार। (5) तुलसी का व्यापक रोपण-रक्षण-सिंचन। (6) पंच महावृक्षों तथा जैनोसिया अशोक का व्यापक रोपण रक्षण-सिंचन।
चिन्तन कर लेते हैं, निरन्तर जिन विचारों और भावों में संलग्न रहते हैं, क्रमशः वैसे ही ढलते जाते हैं। जैसे हमारे आदर्श होते हैं, ठीक उन्हीं का प्रतिबिम्ब हमारे मुखमण्डल पर द्युतिमान हो उठता है और कुछ काल पश्चात् हम वैसे ही हो जाते हैं। वैसे ही मारा आभामण्डल बनता चला जाता है।
चिन्तन और चरित्र के उभारने वाले प्रयोजनों में यह शक्ति लग सके तो उसकी परिणति उससे भी अधिक श्रेयस्कर हो सकती है जितनी कि शासन द्वारा विभिन्न प्रकार के कल्याणकारी काम हाथ में लेने से सम्भव होती है। बलिष्ठता, सम्पदा और बुद्धिमत्ता को मानवी शक्ति माना जाता है किन्तु यदि थोड़ी गहराई में उतरकर देखा जाय तो प्रतीत होगा कि अन्तराल की गहन परतों में विद्यमान आस्थाएँ ही उसकी वास्तविक सामर्थ्य हैं। उत्थान और पतन के लिए पूरी तरह वही जिम्मेदार है। व्यक्ति की महानता और राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता उसी के आधार पर विकसित होती है। यहाँ एक तथ्य और भी समझा लेना चाहिए कि इस शक्ति स्रोत को उभारने और दिशा देने का कार्य मात्र धर्म ही करता रहा है।
चिन्तन की मुद्रा में थे।
चिन्तन-व्यवहार में परिवर्तन पर गहन विचार-विमर्श होना चाहिए। सूक्ष्म जगत के परिशोधनार्थ किये जा रहे युगसंधि महापुरश्चरण की इस समय बड़ी स्पष्ट भूमिका है।
चिन्तन आज की सर्वोपरि आवश्यकता है।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार को परिष्कृत कर उच्चस्तरीय बनाना। सिद्धि का अर्थ है-शक्ति अथवा पूर्णता की प्राप्ति। साधना का क्रम तब तक चलते रहना चाहिए जब तक साधक सिद्ध न हो जाय। साधक की योग्यता, स्वभाव, रुचि, अभीप्सा, ज्ञान तथा विकास के भेद से साधना में भेद होता है। अधिकारी साधक की प्रकृति के अनुसार ही साधना में अन्तर पड़ता है।
चिन्तन को उत्कृष्टता और व्यवहार की आदर्शवादिता को लोकमानस में इतनी गहराई तक उतार देना किस प्रकार सम्भव होगा, जहाँ किसी भी भय-प्रलोभन से मानवी आदर्शवादिता को न गँवाने की व्रतशीलता अडिग चट्टान की तरह खड़ी रहे।
चिन्तन में साथ ले गए। यह ‘याज’ था, अश्वमेध की सद्य-सुगन्ध थी, जो उन छः करोड़ से अधिक नर-नारी बच्चों के मानस में फैल गई और मिशन के प्रति श्रद्धा व अपनेपन की सुवास भर गई।
चिन्तन प्रकोष्ठ) विनिर्मित होकर एक आकार लेगा ताकि सभी प्रतिभाशालियों की भागीदारी उसमें हो सके एवं सभी के सुझावों के आधार पर यह विराट महासंकल्प निभ सके। परिजन परिजन अपने क्षेत्र के किसी सभी विषय के विशेषज्ञों को जो इस परिधि में आते हों, संपर्क कर इन तिथियों में शांतिकुंज आने की प्रेरणा दें एवं पूर्व से सूचित कर दें कि कहाँ से कितने बंधु या बहिनें इसमें सम्मिलित हो रही हैं। इसमें शिक्षण विज्ञान, मनोविज्ञान, चिकित्सा, समाजशास्त्र, इंजीनियरिंग, प्लानिंग, समाज विज्ञान से लेकर सभी विषय के व्यक्ति भाग ले सकते हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार का स्तर वह स्वेच्छापूर्वक गिरा या उठा सकता है, इसी आधार पर उसके भविष्य का तारतम्य बनता है। यदि पहले से ही किसी का भाग्य निश्चित है, तो पुरुषार्थ की क्या उपयोगिता रही? फिर भाग-छोड़ सोच-विचार करना व्यर्थ है। जब भवितव्यता निश्चित ही है तो फिर उसकी प्रतीक्षा करने भर से काम चल सकता है। फिर व्यक्तित्व निर्माण और परिस्थितियों के अनुकूलन की क्या आवश्यकता रही?
चिन्तन। धर्म व्यक्तित्व का गठन करता है। शासन साधनों के उत्पादन वितरण से लेकर सुरक्षा व्यवस्था जैसे भौतिक प्रयोजनों की पूर्ति करता है। यों साधनों की कमी या अव्यवस्था से भी कम कष्ट नहीं होता, इसलिए उसकी साज-संभाल रखने की जिम्मेदारी उठाने वाले शासन का भी महत्व एवं वर्चस्व है। अर्थ और दण्ड की शक्ति उसके हाथ में रहने से आकर्षण एवं भय के आधार पर उसका लोहा भी माना जाता है।
चिन्तन प्रवाह के आदर्शोन्मुख, श्रेष्ठता की ओर गतिशीलता होने पर व्यक्ति का मुखमंडल चमकने लगता है। दूसरों को आकर्षित करता है एवं ऐसे व्यक्ति के कथन प्रभावोत्पादक होते हैं, इसी सीमा तक कि अन्य अनेकों में भी परिवर्तन ला सकें। एक प्रकार से स्व संकेतों द्वारा अपने आभा मंडल को-व्यक्तित्व को एक सशक्त चुम्बक में परिणत किया जाता है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं-’थिंक एण्ड ग्रो रिच’ अथवा ‘एडाँप्ट पॉजिटिव प्रिंसिपल टूडे’। आशय यह कि सोचिये-विचारिये- पर विधेयात्मक सोचिये एवं अभी इसी क्षण सोचिये ताकि आप स्वयं को श्रेष्ठ एवं समुन्नत बना सकें।
चिन्तन शक्ति आदि सभी शक्ति के व्यक्त रूप हैं। साधना की सफलता भी साधक की प्राणशक्ति पर ही निर्भर करती है।
चिन्तन और आचरण को नहीं बदला गया, तो ईश्वर की न्याय-व्यवस्था से बच पाना मुश्किल है।
चिन्तन सर्वप्रथम क्रियापरक कार्यक्रम है। प्राणवान परिजनों से शुभाकाँक्षियों से तथा आत्मोन्नति के इच्छुक पाठकों से अपेक्षा और आग्रह भी कि वे इस स्वाध्याय त्रिवेणी को गहराई से जानें-समझे और मानव में प्रसुप्त पड़ी वैचारिक व भावात्मक चेतना को जाग्रत करने का नैष्ठिक प्रयास करें। इसका क्रियापक्ष, अगले अंक के चार लेखों में परिजन पढ़ सकेंगे। विश्वास रखें इक्कीसवीं सदी का उज्ज्वल भविष्य दिवा स्वप्न नहीं है, महाकाल द्वारा निर्धारित भवितव्यता है। इसे चरितार्थ करने के लिए अब आवश्यकता विश्वास और उमंग भरे मन वालों का है।
चिन्तन प्रक्रिया। समय की कसौटी पर यह त्रिपदा प्रक्रिया सदा ही खरी उतरी है। यह सम्पूर्ण मन्थन भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इस निर्णयात्मक वैचारिक युद्ध को लड़ने व विजयी होने के लिए स्वाध्याय-मनन-चिन्तन आज की सर्वोपरि आवश्यकता है।
चिन्तन क्रम होता है। क्षण मात्र में यह बदल भी सकता है व पुनः वैसा ही सोचने पर पूर्ववत् भी हो सकता है। इसी चिन्तन प्रवाह के आदर्शोन्मुख, श्रेष्ठता की ओर गतिशीलता होने पर व्यक्ति का मुखमंडल चमकने लगता है। दूसरों को आकर्षित करता है एवं ऐसे व्यक्ति के कथन प्रभावोत्पादक होते हैं, इसी सीमा तक कि अन्य अनेकों में भी परिवर्तन ला सकें। एक प्रकार से स्व संकेतों द्वारा अपने आभा मंडल को-व्यक्तित्व को एक सशक्त चुम्बक में परिणत किया जाता है।
चिन्तन क्षेत्र में आरोपित करने का अभ्यास कर लेना चाहिए जैसे-जैसे आन्तरिक अभ्यास परिपक्व होने लगता है मनःसंस्थान उन्हीं संस्कारों में ढल जाता है जैसा कि बहिरंग के व्यवहार में उन्हें झलकना चाहिए। स्वे-स्वे आचरेण शिक्षयेत का सिद्धान्त हमारे ऋषिगण हमें पढ़ा गए हैं। उसे हमें अच्छी तरह आत्मसात् कर अपनी जीवन शैली ढालने का प्रयास करते रहना चाहिए। (क्रमशः)
चिन्तन-मनन के योग्य है। यह इसलिए भी जरूरी है कि ये सभी मनीषीगण इक्कीसवीं सदी का भविष्य उज्ज्वल बताते हुए मानव मात्र को आश्वासन देते हैं कि वर्तमान में जो कुछ भी अवाँछनीय दिखाई पड़ रहा है, वह बदलेगा, ध्वंस का स्थान सृजन लेगा और सर्वत्र सुख-शान्ति एवं स्थिरता का वातावरण बनेगा।
चिन्तन की सर्वोत्कृष्टता

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-October
चिन्तन, मनन और वार्तालाप नहीं करते। उससे पढ़े हुए का प्रभाव जीवन में स्थायी नहीं हो पाता। यदि पुस्तकों के सार जीवन में उतारने की प्रक्रिया लोग सीख जाएँ, तो सामान्य-सी परिस्थितियों में हर व्यक्ति उत्कृष्टता के चरम बिन्दु तक पहुँच सकता है। पुस्तकें गौघृत और दुग्ध के समान पौष्टिक आहार हैं। जो मन, बुद्धि, आचार-विचार, विवेक को परिपुष्ट करके आत्मोत्थान का उज्ज्वल पथ प्रशस्त करती है।
चिन्तन प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन लाने वाली ऋषि संस्कृति, देव संस्कृति, हिन्दू संस्कृति ही उसका आधार बनेगी। अपने राष्ट्र में भले ही उसके चिन्ह अभी उस व्यापक परिमाण में दृष्टिगोचर न हो रहे हों, सारे विश्व राष्ट्र में यह परिवर्तन प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है, उसके लक्षण स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।
चिन्तन बुद्धि का व्यापार है। समझ-सूझबूझ, विचार, कल्पना, निर्णय सब इसी के अंग हैं। किन्तु चिंतन की दिशा क्या होगी, यह निर्भर करता है अंतः में उठने वाली भाव-संवेदनाओं के स्वरूप पर। अंतःकरण को ही कारण शरीर कहा जाता है। मनुष्य के प्रत्येक कार्य का आधारभूत कारण उसके अंतःकरण में उठी उमंगे, आकाँक्षाएं, प्रेरणाएँ ही होती हैं।
चिन्तन, चरित्र और भावनाओं को प्रभावित करता है। यह अनुभूतिजन्य है। वैज्ञानिक यंत्रों और उपकरणों से इनका निरीक्षण-परीक्षण कर पाना अभी संभव नहीं हुआ है।
चिन्तन और मनन करने के बाद आइन्स्टीन को भी कहना पड़ा कि मनुष्य का इस प्रकार समय, स्थान, गति और कारण की संकीर्णता में बँधना उसकी भयंकर भूल है। उन्होंने बताया कि ये संपूर्ण चीजें है ही नहीं। संसार में न तो समय का कोई अस्तित्व है, न स्थान का, न गति का और न किसी कारण या परिणाम का। यह चारों मस्तिष्क की उपज हैं और हम जब तक इनसे प्रतिबंधित हैं, तब तक अंतिम सत्य की अनुभूति नहीं कर सकते। अंतिम सत्य वह है जो इन चारों से बँधकर नहीं इनको बाँधकर रखता है।
चिन्तन में उतारा जा सके तो सत्प्रवृत्तियों के विकास में असामान्य योगदान मिलेगा। चिंतन की भ्रष्टता एवं कर्तृत्व की निकृष्टता का परिष्कार भी इसी प्रकार संभव है। इस बात से कोई भी विचारशील इनकार नहीं कर सकता कि भ्रष्ट चिंतन एवं निकृष्ट कर्तृत्व वातावरण को इसी प्रकार दूषित कर रहे हैं, जिस प्रकार परमाणविक परीक्षण।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-August
चिन्तन में अध्यात्म, तत्वज्ञान का और व्यवहार में धर्म-धारणा का समावेश। इस प्रयास की उपेक्षा जब तक होती रहेगी तब तक उज्ज्वल भविष्य की आशा, मृगतृष्णा ही बनी रहेगी।
चिन्तन, मनन के लिए था ।
चिन्तनीय विषय नहीं है, पार्थ यह तो आत्मा का चोला बदलना मात्र है। एक शरीर को छोड़कर जब आत्मा दूसरे शरीर में प्रवेश करती है तब उसे हम मृत्यु कहते हैं। मृत्यु को देहान्त भी कहते हैं क्योंकि मृत्यु को देहान्त भी कहते हैं। क्योंकि मृत्यु केवल देह अथवा ऊपरी आवरण अथवा चोला का ही अन्त करती है, आत्मा की नहीं।...................।
चिन्तन मिला।
चिन्तन में यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि एकाकी लेख प्रकाशन इसके लिए पर्याप्त नहीं। इसके लिए अनुसंधान का दृश्यमान रूप खड़ा करना पड़ेगा। शोध का समर्थ तंत्र विकसित करना होगा। शोध-संस्थान का स्वरूप कैसा हो ? शोध अन्वेषण के सूत्र क्यों हों?
चिन्तन को पास नहीं फटकने देना चाहिए।
चिन्तन अब ऐसा ही बन रहा है, किन्तु तुम निराश मत होना, चार साल बहुत होते हैं ।”
चिन्तन ने ऐसी नयी करवट ली कि उसे उपेक्षित समस्या का प्राथमिकता देने के लिए विश्वव्यापी स्फुरणा उत्पन्न हुई। इस सबका-समन्वय सन् 75 के उस महान संकल्प में देखा जा सकता है। जिसने पर्दे के पीछे रहते हुए कितनी ही अभिनव हलचलों का सृजन किया । इसके प्रभाव और परिणाम भी उसी अनुरूप हुए । यों समय-समय पर कई आन्दोलन खड़े होते हैं और अपने संयोजकों के प्रभाव तथा उत्साह के अनुरूप उठते, बढ़ते तथा समाप्त हो जाते हैं।
चिन्तन-जिसमें यह मान्यता चित्र मस्तिष्क में अधिकाधिक स्पष्टता के साथ जमानी होती है कि आज का एक दिन पूरे जीवन की तरह है इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग किया जाना चाहिए। समय का एक क्षण न तो व्यर्थ गँवाया जाना चाहिए और न अनर्थ कार्यों में लगाया जाना चाहिए। सोचा जाना चाहिए कि ईश्वर ने अन्य किसी जीवधारी को वे सुविधाएँ नहीं दीं जो मनुष्य को प्राप्त हैं। यह पक्षपात या उपहार नहीं वरन् विशुद्ध अमानत हैं जिसे उत्कृष्ट आदर्शवादी रीति-नीति अपनाकर पूर्णता प्राप्त करने, स्वर्ग और मुक्ति का आनन्द इसी जन्म में लेने के लिए दिया गया है। यह प्रयोजन तभी पुरा होता है जब प्राप्त क्षणों का योजनाबद्ध रूप से सदुपयोग किया जाय।
चिन्तन (9) 1.30 से 2.30 प्रवचन (10) 2.30 से 3 जलपान (11) 3 से 5 साधना का तृतीय सोपान (12) 5 से 5.30 शौच आदि (13 ) 5.30 से 6 में भोजन (14 ) 6 से 7 टहलना (15) 7 से 8 भाव संगीत (15) 8 से 4 तक शयन ।
चिन्तन, आत्म-निरीक्षण, पश्चाताप और कल के लिए सतर्कता-वैरागी एवं संन्यासी जैसी हल्की-फुलकी मनः- स्थिति लेकर शयन करने से दुर्भावनाएँ एवं दुर्वासनाएँ अपने आप पीछा छोड़ देती हैं।
चिन्तन और आदर्श कर्तव्य को दैनिक जीवन में उतारते हुए जहाँ जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए साहसपूर्ण कदम बढ़ाना है, वहाँ सर्वसाधारण को यह विश्वास दिलाना भी है कि उच्च आदर्शों को व्यावहारिक जीवन में उतारना न केवल सरल है वरन् सुखद और शान्तिदायक भी है । लोकशिक्षा का यही प्रभावशाली तरीका है । समग्र पुनरुत्थान और अभिनव निर्माण के लिए ‘जनसाधारण को कुछ कष्ट उठाना, त्याग करना और अनुदान प्रस्तुत करना ही पड़ेगा । इसी पूँजी से ही प्रगति का भवन बनेगा । लोगों को आदर्शों की बाते यों सुहाती है पर उस दिशा में बढ़ने के लिए जो अनुदान प्रस्तुत करना पड़ता है उसके लिए कोई साहस नहीं करता ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-March
चिन्तन उभरने का अर्थ है- “लोकसेवी की दृष्टि खो जाना।” ऐसा चिन्तन उस मस्तिष्क में ही उभरेगा जो सेवा कार्य को कर्तव्य नहीं किसी पर किया गया अहसान मानता है। सेवा भाव से
चिन्तन में सतत् तन्मय रहना ही शहीद की वास्तविक परिभाषा है। जिसने अहं को अपनी क्षुद्र महत्वाकांक्षाओं को गला दिया. वही सच्चा शहीद जिन्हें अवतार के प्रत्यक्ष दर्शन करने हों वे ऊपर बताए तीन वर्गों का विस्तार एवं स्तर उभरता देखकर युगपरिवर्तन की प्रक्रिया का अनुमान लगा सकते हैं।
चिन्तन और आदर्श कर्त्तव्य अपने क्रियाकलापों में अधिकतम मात्रा में कैसे जुड़ा रह सकता है, उसका ढांचा स्वयं ही खड़ा करना चाहिए और उसे दृढ़तापूर्वक निबाहने का संकल्प करना चाहिए। भावी जीवन की रूपरेखा ऐसी निर्धारित की जाय जिसमें शरीर और परिवार के प्रति कर्त्तव्यों का निर्वाह करते हुए आत्मकल्याण के लिए कुछ करते रहने की गुंजाइश बनी रहे। साधना-स्वाध्याय-संयम-सेवा, यही है आत्मोत्कर्ष के चार चरण। इनमें एक भी ऐसा नहीं है, जिसे छोड़ा जा सके और एक भी ऐसा नहीं है जिस अकेले के बल पर आत्मकल्याण का लक्ष्य पूरा किया जा सके। अस्तु मनन और चिन्तन द्वारा इन्हें किस प्रकार कितनी मात्रा में अपनी दिनचर्या में सम्मिलित रखा गया, इस पर अति गम्भीरतापूर्वक विचार करते रहना चाहिए।
चिन्तन के द्वारा अवरुद्ध कर दिये है। विज्ञान की कुछ प्रगति अवश्य इसलिए हुई है कि उसने नये ज्ञान के प्रकाश के लिए अपने द्वारा खुले रखे हैं और अपनी भूलों को समझने तथा सुधारने के लिए निरन्तर प्रयत्न जारी रखा है। इस भिन्नता के कारण ही विज्ञान आगे निकल गया और धर्म पिछड़ गया दीखता है यदि शोध और सुधार का द्वार धर्म ने भी खुला रखने का शुभारंभ किया तो निःसंदेह धर्म को भी वैसी ही मान्यता मिलती जैसी की आज विज्ञान को मिली है।
चिन्तन, मनन का क्रम चलेगा। इसी अवधि में नौ दिनों में से कुछ दिन वे ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान भी परीक्षण हेतु जायेंगे। शाम को आरती के पश्चात् नादयोग साधना के बाद परमपूज्य गुरुदेव का विशेष वीडियो संदेश प्रतिदिन विभिन्न विषयों पर वे श्रवण कर रात्रि की संध्या-शमन से पूर्व शिथिलीकरण योग निद्रा में प्रवेश कर रात्रि भर होने वाले विशिष्ट प्राण संचार हेतु स्वयं को तैयार करेंगे।
चिन्तन उस मस्तिष्क में ही उभरेगा जो सेवा कार्य को कर्तव्य नहीं किसी पर किया गया अहसान मानता है। सेवा भाव से
चिन्तन एवं भावनात्मक प्रसंग में श्रद्धा की आत्मानुभूति को मान्यता दी जाय। अतः आवश्यकता इस बात की है कि जिस प्रकार योजनाबद्ध तरीके से वैज्ञानिक प्रगति के लिए कार्य व अनुसंधान हो रहा है उसी प्रकार धर्म और अध्यात्मिक क्षेत्र में भी चिन्तन चेतना को परिष्कृत करने के लिए योजनाबद्ध ढंग से शोध को प्रमुखता दी जाय। , तभी मानव-जाति की समग्र प्रगति व उत्थान हो सकता है विज्ञान वेत्ताओं की तुलना में दार्शनिकों एवं अध्यात्मवेत्ताओं का कार्यक्षेत्र एवं उत्तरदायित्व अधिक विस्तृत है।
चिन्तन के लिए निर्धारित समय में इन्हीं प्रसंगों का ऊहापोह होते रहना चाहिए। जिन प्रसंगों पर ध्यान किया जाता है।
चिन्तन, चेतन एवं क्रिया-कलापों में परिवर्तन करके उज्ज्वल भविष्य की सुनिश्चित संभावना को साकार करने में सहायक भी बना जा सकता है।
चिन्तन प्रवाह को जन्म दिया होता, सत्साहित्य रचा होता और ऐसे आन्दोलन चलाये होते जो जन मानस को उच्चस्तरीय बनाकर रख देते। आज के दुर्बल बुद्धिवाद को प्रज्ञा स्तर की उर्वरक की आवश्यकता है। अध्यात्म वेत्ता समय-समय पर इस जिम्मेदारी को अपने ऊपर लेते रहे हैं और लोकमानस में संव्याप्त-भ्राँतियों से मानवता को उबारते रहे हैं। आध्यात्मिक शक्ति विज्ञान से भी बड़ी है। दर्शन या अध्यात्म ही व्यक्ति के अन्तराल में प्रविष्ट कर विकृतियों से लड़ सकने, उन्हें निरस्त कर सकने में सक्षम तत्वों की प्रतिस्थापना कर पाता है।
चिन्तन का प्रभाव चरित्र पर पड़ता है। इसलिए उसे परिष्कृत करने के लिए साधना परायण को स्वाध्याय, संयम और सेवा की आवश्यकता अनुभव की जानी चाहिए और उसकी व्यवस्था भी आहार, वस्त्र, विश्राम की तरह ही बननी चाहिये। अब ऐसा सत्संग सम्भव नहीं इसलिये अब वह कार्य प्रेस की वर्तमान सुविधा और श्रेष्ठजनों की दुर्लभता में सत्साहित्य से ही चलाना होता है, संयम को तपश्चर्या कहते हैं। आत्म-अनुशासन भी वही है। इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम, विचार संयम, के चार अनुशासन अपने ऊपर स्थापित किये जायँ तो अपव्यय और अस्तव्यस्तता में नष्ट होने वाली शक्तियां बचायी जा सकती हैं।
चिन्तन में चरम शिखर पर थे। वैदिक ऋषि मंत्रद्रष्टा थे। बुद्धि के स्थान पर उनने प्रज्ञा को प्रमुखता दी थी। बुद्धि तो अन्वेषण करके कई प्रकार की सामग्री--”डाटा” का ढेर लगा देती है, पर उसके सदुपयोग का सुयोग उससे बहुत कम ही बैठ पाता है। उच्च स्तरीय वैज्ञानिक भी अन्तः प्रज्ञा के बल पर इन डाटाओं में से सिद्धान्तों की रचना करते हैं, केवल बुद्धि के बल पर नहीं।
चिन्तन में अब तक के जीवन की समीक्षा करके उसकी भूलों को समझने और प्रायश्चित के द्वारा परिशोधन की रूपरेखा बनानी चाहिए। वर्तमान की गतिविधियों का नये सिरे से निर्धारण करना चाहिए। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्त्तव्य अपने क्रियाकलापों में अधिकतम मात्रा में कैसे जुड़ा रह सकता है, उसका ढांचा स्वयं ही खड़ा करना चाहिए और उसे दृढ़तापूर्वक निबाहने का संकल्प करना चाहिए। भावी जीवन की रूपरेखा ऐसी निर्धारित की जाय जिसमें शरीर और परिवार के प्रति कर्त्तव्यों का निर्वाह करते हुए आत्मकल्याण के लिए कुछ करते रहने की गुंजाइश बनी रहे। साधना-स्वाध्याय-संयम-सेवा, यही है आत्मोत्कर्ष के चार चरण।
चिन्तन द्वारा इन्हें किस प्रकार कितनी मात्रा में अपनी दिनचर्या में सम्मिलित रखा गया, इस पर अति गम्भीरतापूर्वक विचार करते रहना चाहिए। यदि इससे भावी जीवन की कोई परिष्कृत रूपरेखा बन सकी और उसे व्यवहार में उतारने का साहस जग सका तो समझना चाहिए कि उतने ही परिमाण में गायत्री माता का प्रसाद तत्काल मिल गया। यह सुनिश्चित मानना चाहिए कि श्रेष्ठता भरी गतिविधियाँ अपनाते हुए ही भगवान की शरण में पहुँच सकना और उनका अनुग्रह प्राप्त करना सम्भव हो सकता है।
चिन्तन एवं स्वभाव में उत्कृष्टता भर लेने को सुसंस्कारिता कहते हैं और व्यवहार में, आदतों में शालीनता के समावेश का सभ्यता कहा जाता है। सभ्यता और सुसंस्कारिता का समन्वय ही व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाता है। व्यक्तित्व संपन्न ही देव मानव कहे जाते हैं। वे स्वर्गीय वातावरण में रहते और दूसरों के लिये स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार में उतारना पड़ेगा, उसकी अनुभूति करनी पड़ेगी, तभी वह सत्य सही अर्थों में सत्य कहलायेगा। समग्र मानव जाति के त्राण के लिए महर्षि अरविन्द के “नास्टिक बीइंग” अर्थात् अध्यात्मजीवी मनुष्य के साथ साथ अब “ओथोन्टिक बीइंग” अर्थात् प्रमाणिक मनुष्य के अवतरण की भी आवश्यकता है और यह कार्य दार्शनिक प्रज्ञा के जागरण से ही संभव है, कोरे बुद्धिवाद से नहीं।
चिन्तन चेतना को परिष्कृत करने के लिए योजनाबद्ध ढंग से शोध को प्रमुखता दी जाय। , तभी मानव-जाति की समग्र प्रगति व उत्थान हो सकता है विज्ञान वेत्ताओं की तुलना में दार्शनिकों एवं अध्यात्मवेत्ताओं का कार्यक्षेत्र एवं उत्तरदायित्व अधिक विस्तृत है।
चिन्तन और चरित्र की, गुण कर्म स्वभाव की, विशिष्टता चाहिये ही यह विभूतियाँ अनायास ही किसी को नहीं मिलतीं इसके लिये प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। जीवन साधना का यही स्वरूप है। देवों की उपासना का प्रतिफल संदिग्ध हो सकता है किन्तु जीवन देवता की साधना का पुण्यफल तो हाथों-हाथ मिलता है। व्यक्तित्व का निर्माण इतनी बड़ी सम्पदा है कि उसके बदले इस संसार के बाजार में से कुछ भी खरीदा जा सकता है। जीवन को कल्पवृक्ष, पारस अमृत कहा गया है जो उसकी साधना कर सका वह सुनिश्चित रूप से कृत-कृत्य होकर रहा है।
चिन्तन शृंखला को भंग कर दिया। वह इधर-उधर उस ध्वनि का उद्गम ढूँढ़ने लगा। उसने दो कि महर्षि एकत का मुखमण्डल ज्योतिपूर्ण हो गया है और अवरुद्ध ध्वनि उनके समीप जाने पर बड़े प्रखर वेग से मस्तिष्क में गूँजने लगती हैं सम्भवतः महर्षि अपने प्राणों से परावाणी में इन मन्त्रों का उच्चारण कर रहे है।
चिन्तन के लिए न्यूनतम पन्द्रह मिनट का समय निश्चित रहना चाहिए। आत्मनिरीक्षण, आत्म सुधार आत्म निर्माण और आत्म-परिष्कार के सम्बन्ध में अपनी जाँच पड़ताल कड़ाई के साथ करनी चाहिए। मानवीय गरिमा के अनुरूप जीवन निर्वाह में कहाँ त्रुटि रही रही है। अशोभनीय, व्यर्थ, निरर्थक और अनर्थमूलक चिंतन और व्यवहार कब किस प्रकार बन पड़ता है और उन आदतों को कैसे सुधारा जाना चाहिए। इस ऊहापोह में आत्म-समीक्षा और आत्म-सुधार की प्रक्रिया बन पड़ती है।
चिन्तन की मलीनताओं सारे के सारे समाज में असंख्य परिस्थितियाँ पैदा करती हैं-- राष्ट्रीय सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन में। इसलिए हम समाज निर्माण के लिए इस बात का शिक्षण करते हैं कि शालीनता, सज्जनता, भलमनसाहत, ईमानदारी, और शराफत आदि तत्वों को आगे बढ़ाना चाहिए। समाज का अभिनव निर्माण इन्हीं आधारों पर खड़ा होगा।
चिन्तन बदल देंगे। हम हर आदमी का मन बदल देंगे। मन बदलने से क्या होगा ? मन बदलने से व्यक्ति की समस्याएँ और समाज की असंख्य समस्याएँ-इन सबका एक ही कारण है-आदमी का मन। आदमी का मन अगर सड़ेगा तो उसमें से कीड़े, मच्छर, मक्खी आदि बीसों चीजें पैदा होंगी, बदबू पैदा होगी।
चिन्तन विशेष रूप से करना चाहिए। मन को चिन्ताओं से जितना खाली रखा जा सके-अस्तव्यस्तता से जितना मुक्त हुआ जा सकें, उसके लिए प्रयासरत रहना चाहिएं आत्मचिन्तन में अब तक के जीवन की समीक्षा करके उसकी भूलों को समझने और प्रायश्चित के द्वारा परिशोधन की रूपरेखा बनानी चाहिए। वर्तमान की गतिविधियों का नये सिरे से निर्धारण करना चाहिए। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्त्तव्य अपने क्रियाकलापों में अधिकतम मात्रा में कैसे जुड़ा रह सकता है, उसका ढांचा स्वयं ही खड़ा करना चाहिए और उसे दृढ़तापूर्वक निबाहने का संकल्प करना चाहिए। भावी जीवन की रूपरेखा ऐसी निर्धारित की जाय जिसमें शरीर और परिवार के प्रति कर्त्तव्यों का निर्वाह करते हुए आत्मकल्याण के लिए कुछ करते रहने की गुंजाइश बनी रहे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-July
चिन्तन तीनों को एक साथ सम्पन्न किया जाना चाहिए। अपनी महत्ता के कारण स्वाध्याय-त्रिवेणी- भजन-उपासना के समकक्ष पुण्य फलदायक साधना मानी जाती है। यह विचारों के सामान्यतः निम्न प्रवाह को उत्कृष्टता की ओर मोड़ देती है। इस स्थिति में जप ध्यान भी श्रेष्ठ स्तर के बन पड़ते हैं। अतः आश्वमेधिक अनुयाज में इसे जप से पहले सम्पन्न करने की अनुशंसा की गई है।
चिन्तन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि ‘स्व’ के विकास के अभाव में जीवन निरुद्देश्य है। आत्मा निरन्तर अपने प्राकट्य का बोध हमें कराती रहती है लेकिन उसका अहसास हमें तभी हो पाता है। जब हम गहराई से अन्तः पर्यवेक्षण करें, अपने अहम् से मुक्ति पाएँ।”
चिन्तन और आचरण में जितना सुधार, परिष्कार हो सके, करें। सादगी और सात्विकता अपनायें। सज्जनता और शालीनता के साँचे में अपने को ढालें। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह अपनाने और वासना, तृष्णा, अहंता की आग में अपनी जीवन-सम्पदा को न जलायें। उच्चस्तरीय सफलताओं के लिए व्यक्तित्व की गरिमा को सम्पन्न बनाया जाना चाहिए।
चिन्तन’ में बदल गया। नियमितता से संबंधित अन्य श्रेष्ठ कार्य क्या हो सकते हैं ? संयम वृत्ति से संबंधित अन्य श्रेष्ठ विचारणाएं क्या हो सकती है, जो इस आकाँक्षा को तीव्र करने में सहायक सिद्ध हो सके ? इन व्यावहारिक उपायों को ऐसे प्रस्तुत किया जा सकता है-
चिन्तन
चिन्तन” के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक प्रतिपादन को प्रस्तुत किया जा रहा है। मनोविज्ञान कहता है कि मन को नये ढाँचे में ढालने के लिए अभ्यस्त स्थिति से उबार कर नये सिरे से प्रशिक्षित करना पड़ता है। इसी तकनीक को विस्तृत विवेचन द्वारा विगत चार माह से समझाया जा रहा है। एक बार आत्मसात् कर लेने पर यह कितना सरल व चित्त को सुसंस्कारिता से ओत-प्रोत कर लेने वाला बन सकेगा, यह पाठक स्वयं देखेंगे।
चिन्तन प्रक्रिया में उपयोगी कुछ व्यावहारिक सुझाव इन बिन्दुओं से स्पष्ट होते हैं। इन्हें दुहरा लेना चाहिए।
चिन्तन इन कार्यों को भली प्रकार कर सकते हैं, इस दृष्टि से व अब हमारी जीवनचर्या का अनिवार्य अंश बन जाने चाहिए।
चिन्तन, 17 प्रतिशत में कुकृत्यों का पश्चाताप, 7 प्रतिशत में भ्रान्तियों का योगदान तथा 16 प्रतिशत में असाध्य रोग तथा 7 प्रतिशत मानसिक बीमारियों के कारण आत्मघात के लिए विवश हुए। इन चिकित्सकों का कहना है कि इस प्रवृत्ति को जन्म देने वाले कुछ प्रमुख कारणों में दुर्भावना, तिरस्कार, मनोबल क्षीण होना, सामाजिक एकाकीपन, सहानुभूति का अभाव, भविष्य के प्रति घोर निराशा है। यह सब होता है दुर्बल मनःस्थिति के कारण। आय लोग अशुभ का चिन्तन करते हैं और अशुभ और अन्धकारमय भविष्य की कल्पनाएँ करते रहते हैं। विपत्ति और सफलताओं की आशंकाओं से उनका मन काँपने लगता है और उन्हें ऐसे तर्क सूझते रहते हैं जो पुष्टि कर सकें कि वे जो सोच रहे है वह सही हैं।
चिन्तन ऐसा हो, जिसमें अवाँछनीयता के लिये कोई गुँजाइश न हो। बस, यह एक तीर्थ हमने बनाया है। मान्धाता की सहायता से जगतगुरु शंकराचार्य ने चार धाम बनाये थे, चार तीर्थ बनाये थे। वह शानदार तीर्थ बनाने के इच्छुक थे , इसलिये उन्होंने शानदार ही बना डाले। भगवान बुद्ध ने बहुत सारे तीर्थ बनवाये थे।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार, वातावरण गढ़ी हुई दुनिया में मनुष्य अपने ढंग का निर्वाह करता है। अंतःकरण की प्रेरणा से मन, बुद्धि को काम करना पड़ता है। मन के निर्देशन पर काया काम करती है। संक्षेप में बाह्य जीवन का जैसा भी स्वरूप है, उसे अन्तः करण का प्रतीक-प्रतिबिम्ब ही समझा जाना चाहिए। यह अन्तराल ही कारण शरीर है।
चिन्तन की गंगा एवं यमुना का पवित्र संगम है, जिसमें सरस्वती सी मौलिकता गुप्त होते हुए भी प्रकट है।
चिन्तन के माध्यम से समझना होगा। मानवी काया, जिसे इस अदृश्य लोक का यन्त्र उपकरण बताया गया है, का सूक्ष्म कलेवर इस दृष्टि से दो भागों में विभक्त माना जा सकता है। एक मस्तिष्क के ऊर्ध्व भाग में स्थित ब्रह्मरन्ध्र, सहस्रार रूपी विद्युत, स्फुल्लिंगों के निर्झर एवं आज्ञाचक्र का समुच्चय। दूसरा निचले छोर पर स्थित प्राणाग्नि का सघन पुँज जिसे मूलाधार,
चिन्तन की आश्चर्यजनक महत्ता के प्रतिपादन में डॉ0 बेनेट ने स्वयं को ही प्रस्तुत किया है। 50 वर्ष की आयु तक वे निराशा और अवाँछनीय चिन्तन के कारण अपना स्वास्थ्य पूरी तरह गँवा बैठे। उन्हें जब ऊर्ध्वगामी चिंतन की इसी असीम उपादेयता का पता चला तो उन्होंने अपना जीवनक्रम ही बदल डाला। मन की जड़ता और विषय विचारों का जुआ उनने उतार फेंका, हृदय को श्रद्धा, आस्था से भरा, सदैव प्रसन्न-प्रफुल्ल रहने की आदत बना ली। 20 वर्षों के अपने इस जीवन को स्वार्गीय सुख से ओत-प्रोत बनाते हुए डॉ0 बैनेट से अपनी 50 वर्षीय फोटो तथा 60 वर्षीय फोटो भी इस पुस्तक में छापी है।
चिन्तन द्वारा नितान्त एकान्त में अनेकों बार चिन्तन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि ‘स्व’ के विकास के अभाव में जीवन निरुद्देश्य है। आत्मा निरन्तर अपने प्राकट्य का बोध हमें कराती रहती है लेकिन उसका अहसास हमें तभी हो पाता है। जब हम गहराई से अन्तः पर्यवेक्षण करें, अपने अहम् से मुक्ति पाएँ।”
चिन्तन, ध्यान, तप में संलग्न रहते थे। भोजन मिल जाए तो भी ठीक और न मिले तो भी ठीक, उन्हें तो जैसे देह का भान ही नहीं रह गया था। कई बार तो हफ्तों महीनों उन्हें निराहार भी रहना पड़ जाता। परन्तु वे अपना हाथ फैलाने के लिए अपनी गुफा छोड़कर कहीं भी नहीं तो थे।
चिन्तन- मनन, ‘चिन्तन’ में बदल गया। नियमितता से संबंधित अन्य श्रेष्ठ कार्य क्या हो सकते हैं ? संयम वृत्ति से संबंधित अन्य श्रेष्ठ विचारणाएं क्या हो सकती है, जो इस आकाँक्षा को तीव्र करने में सहायक सिद्ध हो सके ? इन व्यावहारिक उपायों को ऐसे प्रस्तुत किया जा सकता है-
चिन्तन में पूर्व एवं पश्चिम अनायास समा गये हैं। सहस्राधिक पुस्तकों एवं अखण्ड ज्योति के लक्षाधिक पृष्ठों में लहराते उनके सम्बोधि सागर में कहीं निषेध का भाव नहीं है। आचार्य जी पहले महायोगी हैं फिर विचारक एवं लोक-नायक । उनके विचार योग के गहन आयामों में प्रत्यक्ष सत्य, सूक्ष्म से स्थूल में घटित होने वाले भविष्य की अनुभूति का बौद्धिक विश्लेषण हैं । उनका चिन्तन विचारों के इतिहास में क्रान्ति होते हुए भी किसी भी विचार का स्थान नहीं ग्रहण करता, बल्कि उसे आदर देकर पहले की अपेक्षा कहीं अधिक उपादेय बनाता है।
चिन्तन प्रक्रिया का एक उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है। मूल बिन्दुओं को ध्यान में रखकर अपनी रुचि तथा पूर्व अभ्यास के अनुसार इसमें साधारण हेर-फेर किया जा सकता है।
चिन्तन-मनन की साधना वस्तुतः मस्तिष्कीय क्षेत्र में घुसे मनोविकारों को, दुष्प्रवृत्तियों को निरस्त करने के लिए लड़ा जाने वाला महाभारत है। जो इसमें सफल होते हैं वे ही सच्चे अर्थों में जीवन का आनन्द उठाते हुए आत्मोत्कर्ष का परम लाभ प्राप्त करते हैं।
चिन्तन विचारों के इतिहास में क्रान्ति होते हुए भी किसी भी विचार का स्थान नहीं ग्रहण करता, बल्कि उसे आदर देकर पहले की अपेक्षा कहीं अधिक उपादेय बनाता है। एक अपूर्व सामंजस्य का प्रकाश स्तम्भ यहाँ है, जिससे लाखों लोग प्रकाश ले रहे हैं।
चिन्तन करना चाहिए। पहले षट्कर्म सम्पन्न करने के बाद संक्षिप्त स्वाध्याय आदि प्रक्रिया में दस मिनट समय लगाना उपयुक्त होगा। उसके बाद जप करने से विचारों की दिशा श्रेष्ठता की ओर मुड़ जाएगी तो जप-ध्यान आदि भी क्रमशः उच्च स्तर के होते जायेंगे।
चिन्तन करना पड़ता है। राजकुमार सिद्धार्थ का जिस क्षण आत्म-बोध उभरा, उसी क्षण वे भगवान बुद्ध बन गये। जिस वटवृक्ष के नीचे यह सुयोग बना वह भी ‘बोधि वृक्ष’ के रूप में श्रद्धास्पद बना-प्रख्यात हुआ और कृत-कृत्य हो गया। आत्मज्ञान की महत्ता, प्रतिक्रिया एवं सिद्धि परिणति का इतना अधिक प्रतिपादन हुआ है कि उससे बढ़कर इस संसार में और कोई बड़ी उपलब्धि मानी ही नहीं गई। गीताकार ने “अपने को ही अपना मित्र और अपने को ही अपना शत्रु बताते हुए कहा है कि अपना उद्धार आप करो, अपने को गिराओ मत।
चिन्तन, आदर्शवादी विचार-धारा सूक्ष्मशरीर को तेजस्वी और प्रखर बनाती हैं एवं उसका सही प्रखरतावर्धक प्रभाव स्थूल शरीर पर भी स्पष्ट देखा जा सकता है।
चिन्तन करने से ही श्रेष्ठ जीवन जीने की आकाँक्षा जागती है। आस्था और मान्यता में सुधार होता है, तो उस दिशा में में प्रयास भी होने लगते हैं। अतः इन तीन प्रक्रियाओं को एक बार फिर समझ लेना चाहिए।
चिन्तन लगातार व्यवहारिक योजनाएँ बनाता रहता है।
चिन्तन’ है। कुल मिलाकर वर्तमान जीवन व्यवहारों को अधिक अच्छा बनाने के लिए चिन्तन लगातार व्यवहारिक योजनाएँ बनाता रहता है।
चिन्तन की अनगढ़ता के कारण स्वभाव की उथली परतों पर बिखरा होता है। उसे आसानी से कुरेदा और बुहारा जा सकता है। इतना बन पड़े तो भी समझना चाहिए कि रुग्णता पर आधी विजय मिल गई।
चिन्तन, सूक्ष्म, शरीर की विकृतियाँ हैं, जिनका स्थूल शरीर पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार परिष्कृत दृष्टिकोण स्वस्थ-उदात्त चिन्तन, आदर्शवादी विचार-धारा सूक्ष्मशरीर को तेजस्वी और प्रखर बनाती हैं एवं उसका सही प्रखरतावर्धक प्रभाव स्थूल शरीर पर भी स्पष्ट देखा जा सकता है।
चिन्तन लयबद्ध संगीत है, जो उनके अपने अनुभव पर आधारित है। वे परम प्रज्ञा को उपलब्ध सन्त थे। उनके बोधमय स्वरों में प्राच्य एवं पाश्चात्य चिन्तन की गंगा एवं यमुना का पवित्र संगम है, जिसमें सरस्वती सी मौलिकता गुप्त होते हुए भी प्रकट है।
चिन्तन और किसी भी अभ्यास द्वारा यदि मन को विचारणाओं के सामान्य धरातल से ऊपर उठाकर आकाश में घुमाया जा सके तो वह भूत और भविष्य की अनेक घटनाओं को बेतार के तार के संदेश की तरह प्राप्त कर सकता है। ‘न्यू फ्रान्टियर्स ऑफ माइण्ड’ नामक पुस्तक में उन्होंने ऐसी अनेक घटनाओं का विवरण भी दिया है, जो उक्त कथन की सत्यता प्रतिपादित करती हैं। यह एक विज्ञानसम्मत प्रक्रिया है अंधविश्वास नहीं।
चिन्तन की व्यभिचार, अनाचार, चोरी, ठगी, आक्रमण, आघात आदि अपराधों के रूप में प्रकट होते हैं। दूसरा स्तर सनकों का है। चिन्ता, भय, आशंका, विश्वास, उद्वेग, कामुक कुदृष्टि, विक्षोभ, निराशा, खीज जैसी अनेकों कुकल्पनाएँ हैं जिन्हें लोग किसी न किसी बहाने उगाते, बढ़ाते और छाती से चिपकाये रहते हैं। वास्तविक कारण तो रंचमात्र होते हैं, पर सनक को स्थायी बनाकर उस पर ऐसा रंग चढ़ाते हैं कि उन्हें स्वयं वस्तुस्थिति जैसी प्रतीत होने लगती है, भले ही वह अन्यान्यों को निरर्थक एवं उपहासास्पद प्रतीत होती हो। इन्हीं मनोविकारों में एक उदासी भी है।
चिन्तन के कारण अपना स्वास्थ्य पूरी तरह गँवा बैठे। उन्हें जब ऊर्ध्वगामी चिंतन की इसी असीम उपादेयता का पता चला तो उन्होंने अपना जीवनक्रम ही बदल डाला। मन की जड़ता और विषय विचारों का जुआ उनने उतार फेंका, हृदय को श्रद्धा, आस्था से भरा, सदैव प्रसन्न-प्रफुल्ल रहने की आदत बना ली। 20 वर्षों के अपने इस जीवन को स्वार्गीय सुख से ओत-प्रोत बनाते हुए डॉ0 बैनेट से अपनी 50 वर्षीय फोटो तथा 60 वर्षीय फोटो भी इस पुस्तक में छापी है। पहली में उनका चेहरा झुर्रियों से, चिपके गाल, धंसी आँखों के कारण मनहूस दिखायी देता है।
चिन्तन स्तर तक घसीट ले जाना। श्रेष्ठता का आधार सनातन है, निकृष्टता की दिशाएँ भी गिनी चुनी है। उतार-चढ़ाव उसी झूले पर झूलते रहते हैं, पर पुरानी सुधार प्रक्रिया हर बार नई बदलनी पड़ती है। क्योंकि मूल तथ्य यथास्थान रहने पर भी सामयिक परिस्थितियों के साथ जुड़ी हुई विकृतियों का स्वरूप पहले की अपेक्षा भिन्न होता है । भगवान बुद्ध के समय यज्ञीय हिंसा की वाममार्गी असुरता अट्टहास कर रही थी, तो स्वामी दयानन्द के समय पाखण्डी अनाचार गगनचुम्बी बना हुआ था।
चिन्तन करते हैं और अशुभ और अन्धकारमय भविष्य की कल्पनाएँ करते रहते हैं। विपत्ति और सफलताओं की आशंकाओं से उनका मन काँपने लगता है और उन्हें ऐसे तर्क सूझते रहते हैं जो पुष्टि कर सकें कि वे जो सोच रहे है वह सही हैं।
चिन्तन एवं सद्भावों की तरंगों को फैलाने लगे। दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन-सत्प्रवृत्ति सम्वर्द्धन का क्रम चल पड़ा। इसी बीच माण साहेब और खीम साहेब मोक्षधाम सिधार गये। भीकम साहेब की देह भी जरा- जीर्ण हो चली थी। उन्होंने ने अपने अनुयायियों से कहाँ था कि मेरे मृत शरीर को समुद्र स्थान में माण साहेब एवं खीम साहेब की समाधियों के बीच दफना दिया जाए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-June
चिन्तन और दूषित दृष्टिकोण के अतिरिक्त और दूषित दृष्टिकोण के अतिरिक्त और क्या है? स्पष्ट है कि मनुष्य को सुसंस्कृत बनाते की ओर यदि ध्यान नहीं दिया गया तो आज की दुःस्थिति बदलने की नहीं।
चिन्तन बेतुकी और काल्पनिक कार्य योजना नहीं बनाता, न ही ऐसी दुरूह योजनाएँ बनाता है। जिन्हें कार्यान्वित करने में उच्च इच्छाशक्ति संपन्न भी कठिनाई अनुभव करें। वह तो स्वाध्याय व मनन के निष्कर्षों के अनुरूप सरल, साध्य अभ्यासों की बना करता है। इतना ही नहीं वह कार्य-योजना का विस्तार भी उतना ही करता है, जितना अपनी वर्तमान क्षमता व इच्छाशक्ति के द्वारा संपन्न होना सम्भव हैं इस कारण चिन्तन व्यावहारिक एवं उपयोगी होती है। कुल मिलाकर चिन्तन प्रक्रिया का उद्देश्य बहुत सीधा और स्पष्ट है “आज हमारी जैसी भी मनः स्थिति व परिस्थिति है, जैसी भी क्षमता व इच्छाशक्ति है, हमें तो उतने से ही अपने दोषों को हटाने और गुणों को बढ़ाने का प्रयास करना है।
चिन्तन’ दुर्गुणों को नष्ट करने के लिये की गई व्यूह रचना है।
चिन्तन’ अन्तिम पद है। एक पैर अथवा दो पैरों वाली तिपाई खड़ी नहीं होती। तीन पैरों वाली स्थिर खड़ी नहीं होती। तीन पैरों वाली स्थिर खड़ी तिपाई ही उपयोग में लाई जा सकती है। उपयोग में लाई जा सकती है।
चिन्तन व्यावहारिक एवं उपयोगी होती है। कुल मिलाकर चिन्तन प्रक्रिया का उद्देश्य बहुत सीधा और स्पष्ट है “आज हमारी जैसी भी मनः स्थिति व परिस्थिति है, जैसी भी क्षमता व इच्छाशक्ति है, हमें तो उतने से ही अपने दोषों को हटाने और गुणों को बढ़ाने का प्रयास करना है। अतः हम निश्चित करें कि हम अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कौन-कौन से उपायों-अभ्यासों का सतत् प्रयोग कर पायेंगे, जिससे कि वर्तमान स्थिति से बेहतर मानसिक व आत्मिक प्रगति की ओर बढ़ सकें।
चिन्तन मनोमय कोश की उच्चस्तरीय साधना है। उत्कृष्ट जीवन जीने की आकांक्षा, अपनी थोड़ी या अधिक क्षमता पर विश्वास तथा धर्म जैसे गुणों के साथ नियमित अभ्यास करने से जीवन की अनेक प्रकार की समस्याओं का सफल समाधान खोजने में तथा व्यक्तित्व के विकास में यह साधना बहुत सहायक है। स्वाध्याय, मनन-चिन्तन को मन्त्र जप के समान महत्व देते हुए आश्वमेधिक अनुयाज में इसीलिए प्रथम स्थान दिया गया है।
चिन्तन’ का भी आरम्भ होता है
चिन्तन’ है।
चिन्तन क्रम में नियोजित किये रहते हैं और उसके आश्चर्य-जनक सत्परिणाम उपलब्ध करते हैं। पंचकोशों और कुण्डलिनी जागरण की ध्यान-धारणा में यही नीति अपनाई गई हैं
चिन्तन और व्यवहार को प्रामाणिकता की कसौटी पर खरा सोना साबित करने वाले ये लोग ही भविष्य में समाज एवं शासन की बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां उठाने में समर्थ होंगे।
चिन्तन की विकृति ही है। मौन दर्शक बना रहकर वह उसमें सहभागी हो रहा है, बात उसे समझ में ही नहीं आती। आए दिन सड़क से युवतियों, महिलाओं का दिन-दहाड़े मार-पीट, खून-खराबा मचाया जाता है और हजारों की भीड़ सहमी-सिमटी सकपकाती रहती है। यह सब अन्तः क्षेत्र में घुसी कायरता के अतिरिक्त और क्या है?
चिन्तन शैली के अभ्यस्त कई समाजशास्त्रियों के अनुसार हत्याओं और अपराधों में यह बढ़ोत्तरी स्वाभाविक है, क्योंकि भारतीय समाज आज संक्रमण काल से गुजर रहा है और औद्योगिक क्रान्ति के दबाव से नए सामाजिक तनाव पैदा हो रहे हैं। आर्थिक दबाव यानि कि अपरिचय, इसके मुख्य कारण बताए जाते हैं। सामाजिक जागरुकता की वृद्धि गरीबों में धनिकों के प्रति क्षोभ उत्पन्न करती है तथा शहर में एक-दूसरे के कुल-शील, ठौर-ठिकाने का अता पता न होने से अपराध कर गुलाम हो जाना आसान हो जाता है। ऐसा इन समाजशास्त्रियों द्वारा विश्लेषित किया जाता है।
चिन्तन करें कि हमारे पाँव किधर मुड़ चले हैं। लगता है हम राह भटक गए। लगता है हम यह भटक गए। शायद यही कारण है कि इन्सानी पुरुषार्थ अपराधों के चक्रव्यूह में जा फँसा है। डाँवाडोल आस्थाएँ, भ्रमित मान्यताएं उसे दिशा न दे सकीं।
चिन्तन की कार्य योजना बनाते समय उपयुक्तता के आधार पर किया जा सकता है।
चिन्तन श्रेष्ठ गुण की अभिवृद्धि करने के लिये उपयुक्त सहायता करने की व्यावहारिक विधि को खोजता है। उदाहरण के लिये, केवल सेवा-भाव से किये जा रहे कार्य में सहानुभूति अथवा करुणा का समान रूप से योग करना।
चिन्तन था, जो उस समय साकार न हो सका। पर गाल्टन ने इस तथ्य को वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में रखकर बताया, कि डार्विन की ‘प्राकृतिक चयन’ (नेचुरल सलेक्शन) की तकनीक के बजाय समाज को बुद्धिमान प्राणी देने के लिए ‘सोशल सलेक्शन’ की विधि अपनाई जानी चाहिए।
चिन्तन’ इन सभी मोर्चों से आक्रमणों को विफल करने की प्रभावी कार्य योजना बनाता है। साथ ही श्रेष्ठ संस्कारों के, सत्कर्मों के, संयम और संकल्प आदि के अपने भी ऐसे मोर्चे खड़े करता है। जहाँ से इन दोषों-दूषित मनोवृत्तियों पर प्रत्याक्रमण कर उन्हें उखाड़ा जा सके। अतः जब तक देवासुर संग्राम होता रहेगा, जब तक श्रेष्ठता और निम्नता के मध्य युद्ध जारी रहेगा, तब तक विजय के लिए ‘चिन्तन’ जैसे कुशल देव-सेनापति की अनिवार्य आवश्यकता बनी रहेगी।
चिन्तन कभी निषेधात्मक नहीं होता वह कभी निराश नहीं करता, क्योंकि वह कर्म और भविष्य में विश्वास करता है।
चिन्तन-दुर्गुण का शमन, उन्मूलन करने के लिये विपरीत सद्गुण का विकास करने वाली उपयुक्त क्रियाओं का अभ्यास निर्मित करता है। उदाहरण स्वरूप, लोभ का शमन करने के लिये अपनी शुद्ध आये के एक निश्चित अंश का श्रेष्ठ कार्यों के लिए नित्य विनम्र अर्पण करना। जिस प्रकार वायु की सहायता पाकर अग्नि अधिक प्रज्ज्वलित होती है। जल की सहायता पाकर पृथ्वी अधिक उपजाऊ बन जाती है। वैसे ही सत्कर्म या सद्भाव के साथ सहयोगी सत्कर्म या सद्भाव को संबद्ध कर देने से उसकी प्रभावशीलता व गुणवत्ता बढ़ जाती है।
चिन्तन में शालीनता झलकती है और पीड़ित के प्रति ममता। ये सेवा और सहायता के पात्र है, इन्हें वह मिलनी भी चाहिए। मिलती भी है। लेकिन इनसे नेतृत्व की आशा कना, मार्गदर्शन की जिम्मेदारी सौंपने की बात सोचना व्यर्थ है।
चिन्तन के लिए प्रेरित नहीं होगी, आचरण की महत्ता व्यक्ति के अंतःकरण में अंकित नहीं होगी और अपराधों के चक्रव्यूह को तोड़ पाना सम्भव नहीं हो सकेगा।
चिन्तन करते हुए भी वह साँसारिक पदार्थों एवं व्यक्तियों के प्रति निरासक्त होता है।
चिन्तन प्रक्रिया का उद्देश्य बहुत सीधा और स्पष्ट है “आज हमारी जैसी भी मनः स्थिति व परिस्थिति है, जैसी भी क्षमता व इच्छाशक्ति है, हमें तो उतने से ही अपने दोषों को हटाने और गुणों को बढ़ाने का प्रयास करना है। अतः हम निश्चित करें कि हम अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कौन-कौन से उपायों-अभ्यासों का सतत् प्रयोग कर पायेंगे, जिससे कि वर्तमान स्थिति से बेहतर मानसिक व आत्मिक प्रगति की ओर बढ़ सकें।
चिन्तन से सम्बन्धित है। सामाजिक परिवेश अपराधों के लिए उत्तरदायी तो है किन्तु सामाजिक परिवेश का अर्थ समाज का भौतिक ढाँचा या समाज में साधनों -उपकरणों का औसत नहीं है। बल्कि समाज में किन गुणों, मूल्यों और आदर्शों की प्रतिष्ठा है, इससे सामाजिक परिवेश बनाया है।
चिन्तन, स्वभाव, कौशल, स्वर, चातुर्य आदि पर एक विशेष आवरण चढ़ा पाया जाता है। यों सुधार प्रयत्नों का कुछ लाभ तो होता ही है, पर जन्मजात विशेषता में उतना परिवर्तन नहीं होता जितना कि होना चाहिए।
चिन्तन’ जिन उपायों को साधनों को, काम में लाता है उनमें से अधिकांश वैचारिक स्तर के होते हैं, कुछ स्थूल-साधन भी होते हैं।
चिन्तन को मन्त्र जप के समान महत्व देते हुए आश्वमेधिक अनुयाज में इसीलिए प्रथम स्थान दिया गया है।
चिन्तन की दृष्टि से, आदर्शों की दृष्टि से, सारा समाज लगभग एक ही स्तर पर जा पहुँचा है। इसमें धनी और निर्धन का भेद करना बड़ा मुश्किल है, पढ़े और बिना पढ़े का भेद करना बड़ा मुश्किल है। जहाँ तक गफलत का सम्बन्ध है, दुर्भावनाओं का सम्बन्ध है, दोनों ही क्षेत्र एक-दूसरे से बाजी मारने पर तुले हुए हैं। पढ़े-लिखे कम कमा पाते हैं, यह बात अलग है। पढ़े - लिखे आदमी ज्यादा चालाक होते हैं, बिना पढ़े-लिखे कम चालक होते हैं, यह बात और है।
चिन्तन एवं चरित्र के रूप में उसी का अनुशासन चलता है। कहना न होगा कि अन्तराल की गहन गुफा में विद्यमान यह सचेतन किन्तु अदृश्य व्यक्ति ही मनुष्य के भाग्य का निर्माण करता है। तिरस्कृत, विकृत, अस्त-व्यस्त, अव्यवस्थित किये जाने पर उसी के शाप उभरते हैं और मनुष्य को दुःखी दरिद्र, पतित, पराजित बनाकर दयनीय स्थिति में पटक देते हैं। उसी सत्ता को सम्मानित, सुसंस्कृत, समुन्नत, सुव्यवस्थित बनाने पर विभूतियाँ अन्तराल से उभरती है, उन्हीं के सम्बन्ध में यह समझा जाता है कि वे किसी अदृश्य लोक से, दैवी शक्ति द्वारा सौभाग्य या वरदान की तरह अनुग्रहपूर्वक दी गई हैं।
चिन्तन दो प्रकार की व्यूह रचना प्रमुख रूप से करता है। जिस प्रकार प्रकाश से अन्धकार को दूर किया जाता है, जल से अग्नि को बुझाया जाता है। वैसे ही सत्कर्म से दुष्कर्म को, सद्विचार से कुविचार को और सद्भाव से दुर्भाव को काटा जाता है। अतः चिन्तन-दुर्गुण का शमन, उन्मूलन करने के लिये विपरीत सद्गुण का विकास करने वाली उपयुक्त क्रियाओं का अभ्यास निर्मित करता है। उदाहरण स्वरूप, लोभ का शमन करने के लिये अपनी शुद्ध आये के एक निश्चित अंश का श्रेष्ठ कार्यों के लिए नित्य विनम्र अर्पण करना।
चिन्तन)। सम्भव है कि इतनी तैयारियों के बाद भी अगला दंगल फिर हार जाये। किन्तु हार उसका मनोबल नहीं तोड़ पाती, क्योंकि उसने जीतने का संकल्प मन में ठाना है। अगले-और-अगले दंगल के लिये वह लगन के साथ दंगल के लिये वह लगन के साथ अपना बल और कौशल बढ़ाता रहता है। ‘अगला दंगल मुझे ही जीतना है’ इस आशा भरे विश्वास को वह उत्साहपूर्वक सँजोए रखता है।
चिन्तन और भावनाओं की विकृति नहीं तो और क्या है?
चिन्तन के साथ जुड़कर ही वे पूर्णता प्राप्त करती हैं। और सार्थकता सिद्ध करती है।
चिन्तन’ जैसे कुशल देव-सेनापति की अनिवार्य आवश्यकता बनी रहेगी।
चिन्तन तंत्र पर अधिकार अपना नियन्त्रण स्थापित करना । यह कार्य विचारों की अनियन्त्रित उछल-कूद की इच्छित दिशा धारा में लगा सकने के रूप में सम्पन्न होता है इसका अभ्यास ध्यानयोग के द्वारा किया जाता है। कुसंस्कारी मन आलस्य, प्रमाद से लेकर दुर्व्यसनों, दुष्कर्मों, दुष्प्रवृत्तियों में रस लेने में अभ्यस्त रहा हैं उसे रोकने, सम्हालने, साधने और सुसंस्कृति बनाने के लिए ही ध्यानयोग का समूचा शास्त्र गढ़ा गया है। ध्यान के कई उद्देश्य हैं- अनगढ़ दिमागी उछल-कूद को नियन्त्रित करना नियन्त्रित विचार शक्ति को अभीष्ट प्रयोजनों में नियोजन करना, एकाग्रता द्वारा बौद्धिक प्रखरता उत्पन्न करना, संकल्प शक्ति को किसी भी चमत्कारी हलचलें उत्पन्न करना, चेतना की रहस्यमयी परतों को अपने की मनोबल से उभारना, उछालना, अवांछनीय कुसंस्कारों का उन्मूलन, प्रतिकूलताओं के बीच भी सन्तुलन बनाये रहना, हर स्थिति में आनन्द और उल्लास भरी मनोभूमि बनायें रहना, अपनी विचार-विद्युत से संपर्क क्षेत्र को प्रभावित करना और वातावरण में सुख शान्ति संवर्धक तत्वों को बढ़ाकर लोक मंगल का पथ प्रशस्त करना। यह ध्यान धारणा के लौकिक-बौद्धिक प्रयोग है।
चिन्तन-शक्ति पर पड़ता है। मन्द मति, अर्थ विक्षिप्त, सनकी, बेसिर पैर की कल्पनाएँ करने वाले, निराश, भयभीत आदि स्तर के लोग ऐसे ही होते हैं, जिनके मस्तिष्क के किसी क्षेत्र विशेष में विद्युत प्रवाह कम पड़ता है। आलसी और प्रवाह कम क्षेत्र विशेष में विद्युत प्रवाह कम पड़ता है। आलसी और प्रमादी कम पड़ता है। आलसी और प्रमादी भी ऐसे ही होते हैं।
चिन्तन की तीन पदों वाली विचार शैली में ‘चिन्तन’ अन्तिम पद है। एक पैर अथवा दो पैरों वाली तिपाई खड़ी नहीं होती। तीन पैरों वाली स्थिर खड़ी नहीं होती। तीन पैरों वाली स्थिर खड़ी तिपाई ही उपयोग में लाई जा सकती है। उपयोग में लाई जा सकती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-January
चिन्तन कर लेना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-January
चिन्तन इत्यादि विशेष महत्व रखता है। सतीत्व तथा एक पत्नीव्रत की पवित्रता से समुज्ज्वल, मातृत्व के मृदुल वात्सल्य से विभूषित, उत्तरदायित्वों के मनोरम भार से परिपूर्ण, प्रेम के प्रवाह से पूज्य भारतीय विवाहित जीवन त्याग को तेजोमय तीर्थ और पुण्य एवं कर्म की भूमि है। इसी के द्वारा स्त्रियों में स्त्रीत्व तथा पुरुषों में पुरुषत्व का विकास होता है। नर-नारी के मंगलमय चिर सम्मिलित के समय भारतीय समाज उन दोनों के प्रणय-सूत्र में आबद्ध करने के साथ ही साथ इस जन्म तथा मृत्यु के पश्चात् परलोक में भी परस्पर सहायता, सहानुभूति एवं स्नेहमय व्यापार के प्रतिज्ञा सूत्र में आबद्ध करता है।
चिन्तन, ममन, सत्संग तथा दूसरों के अनुभव द्वारा हम में से प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको सुसंस्कृत बना सकता है। मनुष्य स्वयं अनेक शक्तियों को लेकर भूतल पर अवतरित हुआ है। जन्म से प्रायः हम सब समान ही हैं। अंतर केवल विकास का ही है। स्वाध्याय द्वारा ही हमारा विकास सम्भव है।
चिन्तन, आत्मनिरीक्षण, निर्माण और उपदेश होते हैं। वह संसार की वासनाओं के ऊपर शासन करता है।
चिन्तनशील पाठक उत्तम संस्कृति और सात्विक मनोरंजन प्राप्त कर सकता है। कविताएं, गीत, दोहे, चौपाई सस्ते से सस्ते सात्विक मनोरंजन हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-July
चिन्तन द्वारा अध्ययन किया। इस सम्बन्ध में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त होने पर मेरे भावों में काफी जाग्रति का प्रसार होने लगा। दृढ़ता के साथ नियमित उपासना करना तभी से प्रारम्भ कर दिया। परन्तु शारीरिक अस्वस्थता के कारण मनोवृत्ति को केन्द्रीभूत करने में बहुत कुछ कठिनाई होती थी। फिर भी मैंने अपनी उपासना का कार्य जारी ही रखा।
चिन्तन करता है उससे इन्द्रिय सुख की ही कामना करता है बेटी को वात्सल्य, बहिन का सौहार्द, माता की आराधना, लोग भूलते से जा रहे हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-May
चिन्तन धारा उत्पन्न हुई और जीवन का एक महान लक्ष्य निर्दिष्ट हुआ। अपने जीवन के महान लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए उन्होंने एक योजना निर्मित की और उसे सफल बनाने के प्रयास में लग गये। उन्होंने राज पाट और कुटुम्बियों का त्याग किया, बाहर वर्ष तक अत्यंत कठोर तपस्या की, अनेकों उपसर्ग और बाधाओं को सहन किया एवं बड़े-बड़े विशाल जंगल, पहाड़ और शहरों की खाक छानी। इस भाँति एक सुन्दर योजना द्वारा उन्होंने अपने विचारों को पुष्ट और सबल बना कर भारतीय स्थिति का सुन्दर निर्माण किया। महामना महावीर के प्रभावशाली संगठन और उनके दर्शन में स्थान-स्थान पर सुन्दर योजनाओं अर्थात् व्यवस्थित कार्य पद्धतियों के दर्शन होते हैं।
चिन्तन, आत्म विश्वास, आत्म गौरव , आत्मनिष्ठ, आत्म साधन, आत्म उन्नति, आत्म निर्माण यह वह कार्य है। जिनमें हमारी इच्छा शक्ति, कल्पना शक्ति एवं क्रिया शक्ति का उपयोग होना चाहिये। क्योंकि अन्दर का मूल केन्द्र, उद्गम स्त्रोत आत्मा ही है। जिसने आत्मा के साथ रमण करना सीख लिया उसे स्वर्ग की अप्सराएं भी चुड़ैलों जैसी तुच्छ एवं कुरूप दिखाई देने लगती है। क्योंकि आत्मा ही अन्तर यौवन और अनन्त सौंदर्य है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-September
चिन्तन में समय लगाना चाहिए और उसको अपनी आदत बना लेनी चाहिये।
चिन्तन करने से मनुष्य की पुरानी मानसिक ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं। अब उसे अपने सुख के लिए इधर उधर दौड़ना नहीं पड़ता। उसे अपने विचारों में असीम आनन्द मिलने लगता है। अब अनेक प्रकार की साँसारिक चिन्ताएं किसी प्रकार की मानसिक अशान्ति उत्पन्न नहीं करतीं। मनुष्य निजानन्द में निमग्न रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-April
चिन्तन आदि में अपना मन लगाइये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-December
चिन्तन में वह अपने आप को भी भूल जाती है।
चिन्तन किया करता है, वह भी उन कर्मों को किये बिना रह नहीं सकता। ऐसे कार्य उसके लिए एक प्रकार के नशा जैसे व्यसन हो जाते हैं। वह व्यक्ति अनायास ही दूसरों की निंदा और अकल्याण सोचने में लग जाता है। दूसरों की स्तुति सुनकर उसे बुखार जैसा आ जाता है।
चिन्तन करना चाहिए। कृष्ण भगवान् ने दुर्योधन का वध कराया, किन्तु यह उसके कल्याण के लिए। जो व्यक्ति किसी का स्वप्न में भी अकल्याण नहीं चाहता वह अपने विषय में भी अकल्याण के विचार न पायेगा। यदि ऐसे व्यक्ति के मन में अपने विषय में अकल्याण का विचार आ भी जाए, तो वह उस विचार के अपने पूर्व अभ्यास के कारण शीघ्र ही मुक्त हो जाएगा। ऊपर कहा जा चुका है कि अभ्यास के कारण ही मनुष्य अपने आपके अकल्याण के विचारों को रोकने में असमर्थ होता है।
चिन्तन भला लगता है वह अपनी बुराई का भी चिन्तन करने लगता है। फिर इस प्रकार के विचार उनके मन को नहीं छोड़ते। अब यदि वह चाहे कि अमुक अशुभ विचार को छोड़ दे, तो भी अब वह उसे छोड़ने में असमर्थ होता है। वही मनुष्य अपने विचारों पर नियंत्रण कर सकता है जिसकी आत्मा बलवान और विवेकी है। जो यह जानता है कि जिस साँप को हम दूसरों के काटने के लिए पाले हैं, वही साँप किसी असावधानी की अवस्था में हम को काट सकता है।
चिन्तन करती है कभी कभी तो यह निष्ठा इतनी अधिक हो जाती है कि शिशु के चिन्तन में वह अपने आप को भी भूल जाती है।
चिन्तन करो।’
चिन्तन करने लगता है। फिर इस प्रकार के विचार उनके मन को नहीं छोड़ते। अब यदि वह चाहे कि अमुक अशुभ विचार को छोड़ दे, तो भी अब वह उसे छोड़ने में असमर्थ होता है। वही मनुष्य अपने विचारों पर नियंत्रण कर सकता है जिसकी आत्मा बलवान और विवेकी है। जो यह जानता है कि जिस साँप को हम दूसरों के काटने के लिए पाले हैं, वही साँप किसी असावधानी की अवस्था में हम को काट सकता है।
चिन्तन करता है और जो परोक्ष रूप से भी यह जानता है कि मनुष्य का मन ही सुखों और दुःखों का कारण है। ऐसे ही मनुष्य में भले और बुरे विचारों के पहचानने की शक्ति उत्पन्न होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-March
चिन्तन करें-विचारों में आदर्श का व्यवहारिक रूप देखें और सफलता के आनन्द में विभोर हो उठें। आप भयभीत न हों-क्योंकि जो अपने आदर्श की असफलता के स्वप्न देखा करता है उसका निश्चय ही पतन होता हैं। स्वप्न-शक्ति या विचार-शक्ति आपको इसलिए नहीं दी गयी है कि वह आशंकाएँ उत्पन्न करें। उसके पीछे सत्य छिपा हुआ है। यह एक ईश्वर प्रदत्त गुण है जो दैवी कोष से दैवी धन देता है और आप साधारण व्यक्तियों की श्रेणी से उठकर असाधारण पुरुषों की श्रेणी में रहने लगते हैं-दुर्व्यवस्था से वह आपको दिव्य आदर्शों में निमग्न कर देता है।
चिन्तन के आधार पर मनुष्य के गुण, धर्म, स्वभाव बनते हैं, तद्नुसार वह अपने अनुकूल वातावरण में पहुँच जाता है, वैसी ही परिस्थितियाँ उसके सामने आ खड़ी होती हैं। जो प्रभाव बाह्य संगति से बहुत समय में पड़ता है वह मानसिक संगति से स्वल्प काल में ही परिस्थिति होने लगता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-October
चिन्तन करना भी हमारे लिए धन कमाने से कम महत्वपूर्ण न होना चाहिए। इन कार्यों के लिए भी उतना ही समय और मनोयोग लगाना चाहिए जितना कि धन के लिए लगता है। पर यह सम्भव तभी है जब कि धन की अत्यधिक बढ़ी प्रतिष्ठा को घटा कर उतना ही रखा जाये जितना की वास्तव में है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-July
चिन्तन में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता का समावेश करना है। यह दोनों ही कार्य उथले भोतिक दर्शनों के आधार पर चिरस्थायी रुप से सम्पन्न नहीं किये जा सकते हैं। इन्हें लालच, लुभा कर नहीं-श्रद्धा भरे सद्भावना जगाकर ही सम्पन्न कराया जा सकता है। यह कार्य वस्तुतः धर्म और अध्यात्म का है। भौतिक दर्शन के आधार पर समृद्धि सर्म्बधन में अमेरिका, रुस, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्राँस आदि कितने ही देश आर्श्चयजनक परिमाण में सफल हुए है ।
चिन्तन और कल्पना आदि मस्तिष्क की सभी शक्तियाँ उसी दिशा में सक्रिय हो जाती हैं और तब एक जीवित चुम्बकत्व तैयार हो जाता है । जिस प्रकार चुम्बक को कूडे़ कचरे में भी फिराया जाय तो धातुओं के इधर-उधर बिखरे हुए टुकडे़ उससे चिपक जाते हैं उसी प्रकार विशिष्ट आकाँक्षाएँ मन में उत्पन्न होती हैं ता व्यक्ति की जागृत शक्तियाँ उस सभी तथ्यों को ढूँढ और प्राप्त कर लेती हैं जो सफलता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है
चिन्तन पर ही टिकी हुई है। यदि कम उम्र का व्यक्ति अपने आपका प्रोढ़ समझे और तदनुरुप उत्तरदायित्व ओढे़ तो वह प्रौढ़ो की भूमिका प्रस्तुत कर सकता है इसके विपरीत उपेक्षा और अवसाद के कारण जवानी भी बुढ़ापे में बदल सकती है। बुढ़ापे में भी जवान रहा जा सकता है यह मनुष्य के साहस, उत्साह, परिश्रम और मनोबल पर निर्भर है। ऐसे कई ऐतिहासिक उदाहरण मिल सकते हैं जिन्होंने वृद्धावस्था में जवानों से अधिक स्फूर्ति दर्शायी और जीवन के सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण काम किये। गोस्वामी तुलसीदास ने पचास वर्ष की आयु हो जाने के बाद रामचरित मानस लिखना श्रु किया था ।
चिन्तन में उत्कृष्टता और चरित्र में आदर्शवादिता की मात्रा देखकर ही यह अनुमान लगाया जाता है कि किसे ईश्वर की कितनी समीपता प्राप्त हुई और कौन कितनी रसानुभूति कर रहा है। अमृतत्व इसी प्रकार की भाव सम्वेदना को कहा गया है। इस स्थिति में एक विशेष प्रकार का आवेश छाया रहता है। जिसमे उच्च स्तरीय निर्णय,साहस एवं प्रयास करने में तनिक भी कठिनाई का अनुभव नहीं होता । परिष्कृत दृष्टिकोण ही र्स्वग है।
चिन्तन में एक भारी भूल यह है कि शरीर और आत्मा को एक ही मान लिया गया है । हम अपने स्वरुप को भूल बैठे हैं और शरीर के साथ इतने रम गये हैं कि दोनों की सत्ता एक ही मानने लगे हैं। इसका दुष्परिणाम यह हूआ है कि शरीर के-मन के-स्वार्थ अपने सुख-दुःख प्रतीत होने लगे हैं। जबकि वस्तुतः वे सर्वथा भिन्न हैं। शरीर का स्वार्थ वासना में और मन का तृष्णा की पूर्ति में हो सकता हैं, पर आत्मा की शान्ति तो जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए किए गये प्रयासों के साथ ही जुडी हुई हैं।
चिन्तन , विचार और कल्पनाओं की उड़ान चलती ही रहती है । मन मस्तिष्क के यही क्रिया-कलाप स्वप्न के रुप में दिखाई देते हैं । मनोविज्ञान अब तक इसी रुप में स्वप्न को व्याख्यायित करता रहा हे । किन्तु अब मनावैज्ञानिक के अनुसार स्वप्न का एक और पक्ष उद्घाटित हुआ है , जिन्हें अतीन्द्रिय स्वप्न कहा जाता है । रुसी मनःशास्त्री पावलोव के अनुसार मनुष्य का अवचेतन मन अनन्त सम्भावनाओं और सम्वेदनाओं का भण्डार है , उसे सामान्य रीति से समझ पाना अति दुष्कर है ।
चिन्तन ओर हेय कर्तृत्व में उलझाता है । इसी से वर्तमान पर शोक-सन्तोष की घटायें छाई रहती है ओर भविष्य अन्धकारमय बनता है । यदि अपने और संसार के सम्बन्धों का पुनर्निर्धारण किया जा सके तो उस तत्वबोध के आधार पर सहज ही विचार क्षेत्र में उत्कृष्टता और क्रिया क्षेत्र में आदर्शवादिता भर सकती है । फलस्वरुप बाह्ना जीवन में स्वर्गीय वातावरण तथा अन्तः-जीवन में आनन्द और उल्लास के द्वारा मुक्ति जैसा आलोक अपने भीतर उत्पन्न किया जा सकता है ।
चिन्तन की त्रुटि । हमारे चिन्तन में एक भारी भूल यह है कि शरीर और आत्मा को एक ही मान लिया गया है । हम अपने स्वरुप को भूल बैठे हैं और शरीर के साथ इतने रम गये हैं कि दोनों की सत्ता एक ही मानने लगे हैं। इसका दुष्परिणाम यह हूआ है कि शरीर के-मन के-स्वार्थ अपने सुख-दुःख प्रतीत होने लगे हैं। जबकि वस्तुतः वे सर्वथा भिन्न हैं।
चिन्तन और अकरणीय कर्मो का प्रभाव वातावरण में बना रहता हैं और सर्म्पक में आने वाले व्यक्यों एवं वस्तुओं को प्रभावित करते हैं। उनका प्रभाव स्थायी रुप से विद्यमान रहता है। इस तथ्य को सूक्ष्मदर्शी जानते है। यही कारण है कि शास्त्रो से लेकर महामानवों तक सबने ही नीतियुक्त उपार्जन एवं उपभाग पर ही बल दिया है। दुष्कर्मा से बचने तथा सत्कर्मा की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-March
चिन्तन और प्रयास में उस तत्परता का समावेश करना है-जो युग सन्धि के ऐतिहासिक अवसर पर युग प्रहरियों द्वारा अपनाई ही जानी चाहिए। यह समय न आलस्य का है न प्रमोद का। न ललक लिप्स में फँसे रहने का है न लोभ मोह के बन्धनों में जकड़े रहने का। वासना और तृष्णा किसी कृमि कीटक की योनि में भी पूरा करनेका अवसर रहता है। पेट ओर प्रजनन के लिए मरने खपने से कभी कोई रोक-टोक नही।
चिन्तन का उसके फलस्वरुप उस उत्पादित उच्च चरित्र का लाभ मिलता था। अन्तरिक्ष उच्चस्तरीय विचार सम्पदा से भरा रहता था। इसमें अध्यात्म क्षेत्र के मूर्धन्य मनीषी सदा प्रयत्नरत रहते थे।
चिन्तन द्वारा प्राणवान आत्माएँ आकाश में ऐसे प्रचण्ड प्रवाह छोडती थी जिसमें जन मानस को अनायास ही बहते रहने और श्रेष्ठ चिन्तन का उसके फलस्वरुप उस उत्पादित उच्च चरित्र का लाभ मिलता था। अन्तरिक्ष उच्चस्तरीय विचार सम्पदा से भरा रहता था। इसमें अध्यात्म क्षेत्र के मूर्धन्य मनीषी सदा प्रयत्नरत रहते थे।
चिन्तन और प्रवाह को नये आधार मिल सकेंगे। फलतः प्रस्तुत परिस्थितियों में काया-कल्प जैसी परिवर्तन दृष्टिगोचर हो सकेगा।
चिन्तन में प्रौढ़ता और प्रखरता की अधिकाधिक मात्रा बढ़ने चाहिए।
चिन्तन एवं कर्त्तव्य निर्धारण के अवसर मिल सके यही है इस संकलन का प्रयोजन सम्भावनाओं का साहसपूर्वक सामना करने की आवश्यक तैयारी करना ही पुरुषार्थ है। आशंकाओं से घबरा वाले तो अपने और दूसरों के लिए कठिनाई ही उत्पन्न करते हैं। युग सन्धि की विषम वेला में हम सबके चिन्तन में प्रौढ़ता और प्रखरता की अधिकाधिक मात्रा बढ़ने चाहिए।
चिन्तन, नये अनुभव और नये अनुभव का पथ प्रशस्त करता है। जीवन प्रगतिशील है, अस्तु उसमें परिवर्तन आवश्यक होता है और अनिवार्य भी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-January
चिन्तन को भ्रष्ट और आचरण को दुष्ट बनाता हैं तो उसकी प्रतिक्रिया अदृश्य जगत का सन्तुलन बिगाड़ती है और विपत्तियों का विक्षोभ उत्पन्न करती हैं। दैवी प्रकोप प्रत्यक्ष में लगते तो ऐसे हैं मानो अदृश्य द्वारा मनमानी की जा रही है। किन्तु अदृश्य और अप्रत्यक्ष को जो जानते हैं उनका स्पष्ट मत हैं कि पानी में पत्थर फेंकने और छींटे उठाने की जिम्मेदारी उन लड़कों की हैं जो तालाब के एक कोने पर बैठे शरारत करते रहते है। तालाब अकारण उछलने लगे और अपने जलचर परिवार के लिए संकट उत्पन्न करे ऐसी बात है नही, प्रतीत भले ही होती हो।
चिन्तन में परिवर्तन करके प्रतिकुलताओं भीमें भी दर्शन किया जा सकता है।
चिन्तन एवं आस्था-इनकी मूलभूत शक्तियाँ है। इन तीनों शक्तियों का श्रेष्ठतम सदूपयोग की काय, वाणी एवं चित्त का संस्कार है। संस्कृत मनुष्य वही है, जो इन संस्कारों से सम्पन्न हो।
चिन्तन का संस्कार है। परिष्कृत, उदात्त, सत्यनिष्ठ चिन्तन की वाक्-संस्कार है। इसलिए वैदिक-ऋषि कहते है-’
चिन्तन एवं प्रयास तो चल ही पड़ता है। वही सम्भव है।
चिन्तन और चरित्र से उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रिया जो प्रकृति की नियामक सत्ता ‘नियति’ पर प्रभाव डालती है। अनाचरण से नियति की अन्तरात्मा क्षुब्ध होती है फलतः उसका प्रकृति कलेवर भी आक्रोश का-आवेश का-परिचय देता है। दैवी प्रकोपों के मूल में जितना दोष प्रकृति व्यवस्था को उद्धत रुप से छेड़खानी करने का है उससे भी अधिक भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण का आश्रय लेने वाली मानवी निकृष्टता का है। नियति उसी से रुष्ट होती है और उसी के फलस्वरुप दृश्य एवं अदृश्य विपत्तियाँ, समस्याएँ तथा विभीषिकाएँ उभरती-त्रास देती है।
चिन्तन के स्तर का है।
चिन्तन के रुप् में सक्रिय होती है तो उसे मध्यमा-वाक् कहते है। वहीं जब ध्वनि-समूह के रुप् में अभिव्यक्ति होती है, तो वैखरी कहलाती है। इस प्रकार वाक्-शक्ति का समग्र रुप में चिन्तन-शक्ति है। अतः वाक्-संस्कार का अर्थ मधुर-सरस उच्चारण भर नहीं, वरन् चिन्तन का संस्कार है। परिष्कृत, उदात्त, सत्यनिष्ठ चिन्तन की वाक्-संस्कार है।
चिन्तन-शक्ति है। अतः वाक्-संस्कार का अर्थ मधुर-सरस उच्चारण भर नहीं, वरन् चिन्तन का संस्कार है। परिष्कृत, उदात्त, सत्यनिष्ठ चिन्तन की वाक्-संस्कार है। इसलिए वैदिक-ऋषि कहते है-’
चिन्तन का आधार बदल जाने पर ब्राह्म स्वरुप भी परिवर्तित हो जाता है। सुख दुःख भले बुरे की बीच अन्तर परिस्थितियों को नहीं वरन् चिन्तन के स्तर का है।
चिन्तन करते थे, इसकी एक बहुचर्चित घटना इस प्रकार है। न्यूटन किसी अध्ययन में निरत थे। एक भोजन पर आमत्रित मित्र उनसे मिलने आये और उन्हें व्यस्त देखकर कमरे के एक कौने में बैठ गये। नौकर एक ट्रे भोजन लेकर आया। अतिथि ने पहले तो कुछ इन्तजार किया, पीछे समय बचाने का दृष्टि से भोजन करना आरम्भ कर दिया।
चिन्तन को उर्ध्वगामी बनाया जाय। मान्यताओं में परिवर्तन किया जाय। यह संसार को आन्तरिक विचारों को प्रतिबिंब मानने से ही सम्भव हो सकता है। इस तथ्य को समझने एवं अनुभव करने से ही मन को सन्तुलित रखा एवं प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्नचित रहा जा सकता है।
चिन्तन और दुष्ट आचरण का आश्रय लेने वाली मानवी निकृष्टता का है। नियति उसी से रुष्ट होती है और उसी के फलस्वरुप दृश्य एवं अदृश्य विपत्तियाँ, समस्याएँ तथा विभीषिकाएँ उभरती-त्रास देती है।
चिन्तन और उपयुक्त कर्तव्य के लिए आवश्यक आलोक तो मिलता ही रहता है। द्वारा तो उनके लिए खुला है। अनजान तो उन्हें नहीं रहना पड़ रहा है। अन्धकार का घेरा तो उनके सामन नहीं है। यह दूसरी बात है कि मनःस्थिति में साहसिकता और परिस्थिता में प्रगतिशीलता का समावेश कर सकना उनसे बन पड़ता है या नहीं।
चिन्तन और अभ्यस्त क्रियाकलाप में उपयुक्त परिवर्तन करने में जो ऊर्जा प्रयुक्त होती है, उसी का नाम-’आत्म बल’ है। इसकी प्रचेर मात्रा हर किसी को जन्मजात रुप् से उपलब्ध है। कठिन तो पड़ता है, वह उसी अनुपात से कृतकृत्य बनता है। आत्म निर्माण बनता है। आत्म निर्माण और भाग्य निर्माण दोनों एक ही है, एक को क्रिया और दूसरे को परिणिति कह सकते है।
चिन्तन की वाक्-संस्कार है। इसलिए वैदिक-ऋषि कहते है-’
चिन्तन-परिष्कार, विचार-संयम आवश्यक है। शब्द की सहायता के बिना विचार नहीं होता। अतः विचार-साधना और वाक्-साधना पर्यायवत् है। छान्दीग्य उपनिषद् में सनत्कुमारजी नारद से कहते है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-October
चिन्तन के साथ आदर्श कर्तव्य आवश्यक है। देवत्व के पक्षधर मात्र अपने को सन्त, सज्जन बना कर ही नहीं रह जाते वरन् उन्हें लोकमंगल की साधना में निरत रहकर सुसंस्कारिता परिपक्व करनी होती है। एकाँगी अभिरुचि रखने वाले पूजा परायणों की असफलता का एक मात्र कारण यही होता है कि वे परमार्थ परायणता में रुचि नहीं लेते और लोकूँगल को अपनी संचित संकीर्णता के कारण स्वार्थ सिद्धि के लिए आवश्यक न मानकर उसमं निरत बने रहते है। यदि यह अपूर्णता बाधक न रहे तो काँने, लँगड़े जैसी कुरुपता और अर्धांग पक्षाघात से पीड़ितों जैसी असमर्थताजन्य असफलता का सामना क्यों करना पड़े ? उपासना का दूसरा पक्ष है- साधना।
चिन्तन के इसी परिष्कार की चर्चा इस अड्ड में की गई है। इसे गम्भीरतापूर्वक समझा जा सके तो जागृत आत्माओ में से प्रत्येक को युग धर्म के निर्वाह का न्यूनाधिक अवसर निश्चित रुप से मिल जायगा और वह युग सन्धि को इस पुण्य बेला में आरम्भ हुए द्दोटे-द्दोटे क्रिया-कलापो को पुर्ण करने में इतना सफल हो सकेगा जिसे सन्तोषजनक ही नहीं उत्साहवर्धक भी कहा जा सके।
चिन्तन जीवन-क्रम को घेरने लगे तो आशा की किरण एक ही रह जाती है कि मानवी अन्तराल के किसी कोने में प्रसुप्त पड़ी उस शालीनता को जगाया जाए, जिसे आध्यात्म की भाषा की में श्रद्धा और बोल-चाल में उदार सज्जनता कहा जाता रहा है। यह श्रद्धा और सज्जनता आदर्शवादी तत्वज्ञान को हृदयंगम करने पर ही उभरती है। एक शब्द में इसी को धर्म-धारणा कहा है, साम्प्रदायिक हठवादिता और अन्ध-विश्वासी भावुकता से यदि इस तत्वज्ञान को बचाया जा सके तो इस एक ही अव लम्बन को डूबते को तिनके का सहारा कहा जा सकता है। भौतिक जगत के संकटों-विग्रहों और अन्तःजगत के उद्वेग-विक्षोभों का समाधान भी इसी एक केन्द्रबिन्दु पर आधारित है। व्यक्त्िभी और समाज भी एक अवलम्बन के सहारे सुखी ही नहीं समुन्नत भी हो सकता है।
चिन्तन और चरित्र का स्तर एवं प्रतिफल ही भली-बुरी परिस्थिति बनकर सामने आता है। समस्याओं और विपत्तियों से जुझने में जितना काम साधनों और पराक्रमी के सहारे होता है, उससे हजार गुनी भूमिका लोकचिन्तन की गतिशीलता सम्पन्न करती है। इसलिए पराक्रमी सृजन प्रयोजनों के साधन जुटाते हैं और तत्वदर्शी ऐसी योजना बनाने की भूमिका निभाने में संलग्न रहते हैं, जिससे लोकचिन्तन के प्रवाह को उत्कृष्टता की पक्षधर दिशाधारा मिल सके। संक्षेप में यही युग सृजन कातात्विक स्वरुप और योजनाबद्ध क्रिया- कलाप-जिसे इन्हीं दिनों सम्पन्न किया जाना है। विलम्ब करने और अनर्थ सहने की गुँजायश अब नहीं रह गई हैं।
चिन्तन को दिशा मिलती है और जन्म-दिवसोत्सव जैसे आयोजनों से उसे उत्साह बनकर उभरने का आधार मिलता है। सदुद्देश्य को लेकर एकत्रित हुए सदभाव-सम्पन्नों की श्रद्धा एवं उल्लास भरे वातावरण में जो परोख्ज्ञ प्रेरणाएं दी जाती हैं वे निरर्थक नहीं जाती वरन् अन्तराल की गइराई तक प्रवेश करती और समयानुसार अपने चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करती हैं। इसलिए घर-घर युग-साहित्य पहुँचाने, वापिस लाने और जनम दिन मनाने का श्रीगणेश किया गया है कि इस अश्रद्धा के युग में दूसरों पर बिना किसी प्रकार का भार डाले सहज सेवा के सहारे उपेक्षा को भी समर्थन में बदला जा सकें। यह प्रक्रिया खर्चीली या झंझटभरी होती तो उसे जन-जन द्वारा अपनाया जा सकना सम्भव न बन सकता। फलतः घर-घर में युग-चेता को पहुँचानें और जन-जन को उससे प्रभावित करने का सुयोग ही न बनता।
चिन्तन की विषैली जड़े उसी क्षेत्र में जमी हुई है। उनका सामाजिक गठन, परम्परा प्रचलन, चिन्तन का ढर्रा, स्वभाग आदि के न मिलने से एक प्रवाह ऐसा बन गया है जिसकी प्रचण्ड धारा से पार हो सकने में किसी को भी सफलता नहीं मिल रही है। न तो जन-जातियाँ अपने पुरुषार्थ से उस गर्त से उबार पा रही है और न उद्धार की बात सोचने वालों की समझ में आ रहा है कि इस खाई को पाटने के लिए उनका सामाजिक जीवन में प्रवेश करना और साथ लेकर चलना आवश्यक है।
चिन्तन तथा उत्कृष्ट कतृत्व को प्रधानता दिया जाने लगें तो युग निर्माण परिवार के लाखों परिजन करोड़ो मनुष्यों के समाज को प्रभावित कने में निश्चिय सक्षम हो सकेंगे ? इसमें कोई सन्देह नहीं हैं।
चिन्तन के प्रवाह को उत्कृष्टता की पक्षधर दिशाधारा मिल सके। संक्षेप में यही युग सृजन कातात्विक स्वरुप और योजनाबद्ध क्रिया- कलाप-जिसे इन्हीं दिनों सम्पन्न किया जाना है। विलम्ब करने और अनर्थ सहने की गुँजायश अब नहीं रह गई हैं।
चिन्तन निखरते ही अब ज्ञानघटों की ही नहीं धर्मघटों की स्थाना का भी उपक्रम चल पड़ा है। जो इतनी नगण्य-सी उदारता दिखाने में भ्ी आना-कानी करते हैं वे देव बिरादरी में बचकाने ही गिने जाते हैं और अपनी दृष्टि में भी उस कृपणता के कारण अपना मूल्य गिराते है।
चिन्तन की गतिशीलता सम्पन्न करती है। इसलिए पराक्रमी सृजन प्रयोजनों के साधन जुटाते हैं और तत्वदर्शी ऐसी योजना बनाने की भूमिका निभाने में संलग्न रहते हैं, जिससे लोकचिन्तन के प्रवाह को उत्कृष्टता की पक्षधर दिशाधारा मिल सके। संक्षेप में यही युग सृजन कातात्विक स्वरुप और योजनाबद्ध क्रिया- कलाप-जिसे इन्हीं दिनों सम्पन्न किया जाना है। विलम्ब करने और अनर्थ सहने की गुँजायश अब नहीं रह गई हैं।
चिन्तन अर्थात् र्स्वग, दूसरे लोकप्रवाह की उपेक्षा अर्थात् मुक्ति, तीसरे प्रामाणिकता और उदार परमार्थ परायणता के आधार पर वरसने वाला असीम सहयोग सहित लोक-सम्मान। असी को देवनुग्रह, ईश्वरीय वरदान कहते है।
चिन्तन का ढर्रा, स्वभाग आदि के न मिलने से एक प्रवाह ऐसा बन गया है जिसकी प्रचण्ड धारा से पार हो सकने में किसी को भी सफलता नहीं मिल रही है। न तो जन-जातियाँ अपने पुरुषार्थ से उस गर्त से उबार पा रही है और न उद्धार की बात सोचने वालों की समझ में आ रहा है कि इस खाई को पाटने के लिए उनका सामाजिक जीवन में प्रवेश करना और साथ लेकर चलना आवश्यक है।
चिन्तन तथा कर्म को सर्त्यवृत्ति संम्वन्ध में, युग साधना में नियोजित कर सकने का अवसर प्राप्त करते है। जागृत आत्माएँ-युग शिल्पी, सजृन-सैनिक, देवमानव, प्रज्ञापुत्र आदि नामों से समय-समय पर इसी समुदाय का उल्लेख होता रहता है। उज्जवल श्विष्य की आँशाओ के केन्द्र विन्दु दन्ही को माना गया है। शेष तो मोह मदिरा पीकर उन्मादियों अथवा अर्धमतृको की तरह मनुष्य जीवन को मखौल बनाते हुए दिन गुजारते है। प्रतिभाओं की कमी नही।
चिन्तन में समाया हुआ ‘भ्रष्ट’ और चरित्र में जमा हुआ ‘भ्रष्ट’ इतने प्रकार की अवाँछनियताएँ अपनाने के लिए विवश करता है कि भ्रमित मस्तिष्क उस भूल भूलैयाँ से भरे-पूरे तिलस्म में से छुटकारे का कोई रास्ता ही नहीं खोज पाता। शासकीय कानून व्यवस्था और दण्ड विधान का प्रबन्ध तो है पर अपराधियों में से कितनों को सुधारने, बदलने में वह खर्चीला प्रबन्ध सफल हो पाता है इसे हम सभी जानते हैं। कभी समाज का अनुशासन था और लोग लोक-लाज जनमत तथा समाजगत अवमानना से डरते थे। फलतः नीतिमत्ता का पक्षधर अनुशासन किसी कदर बना रहता था। अब तो सभी धोती के भीतर नंगे हैं।
चिन्तन एवं प्रचलन प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। चरणपीठों के स्थापनकर्त्ता यदि उस समुदाय का धार्मिक मोड़ देने की श्रृंखला में अगली कड़ियाँ सामाजिक मान्यताएँ, अभ्यस्त आदतों, रुढ़ि परम्पराओं एवं मूढ़ मान्यताओं के बदलने को जोड़ते रहे तो निश्चित रुप से प्रतिगामिता घटती और उसके स्थान पर प्रगतिशीलता बढ़ती चली जायेगी।
चिन्तन, श्रम और साधन की संयुक्त शक्ति इतनी बड़ी है कि युग प8रिवर्तन जैसे दुष्कर कार्य में सरलता और सफलतापूर्वक बन सकने की आशा उसका प्रयोग बन पड़ने पर हसज ही की जा सकती है। संसार के बीस मनुष्यों पीछे एक युग परिवार परिजन की संख्या आती है। इतने लोगों के परिवार को गृहपति सम्भाल सकता है, तो कोइ कारण नहीं कि भावनात्मक परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति सर्म्बधन जैसे लोक-प्रिय कार्यो को अग्रसर करने में उतनी जागृत आत्माएँ समर्थन हो सके। फिर कठिनाई क्या रही? इसका उत्तर ढूँढ़ने पर लौट कर वहाँ पहूँचना पड़ता है, जहाँ से चर्चा आरम्भ हुई थी।
चिन्तन पिछड़े वर्गो को ध्यान में रखते हुए किया गया है। क्योंकि उसमें सस्तेपन, उपक्रम की सरलता साथ ही प्रगतिशीलता सर्म्मधन के सारे तत्व मौजूद हैं। उनके संचालन में किसी वैतनिक कार्यकर्त्ता की नियुक्ति नहीं कनी पड़ती। संस्थापक ही मिल-जुलकर उसके लिए अनुकूल वातावरण बनाने उपयोगी कार्यक्रमों के साथ् उस श्रृंखला को जोड़ते विकसित करते रह सकते है।
चिन्तन और चरित्र की दृष्टि से देवत्व सम्पन्न प्रतिभाओं का उपार्जन संचय एवं संगठन। इस प्रयोजन में जितनी सफलता मिलेगी उसी अनुपात से यह समझा जा सकेगा कि मानवी शग्योदय का समय निकट आ गया। युग परिर्वतन या र्स्वग का अवतरण इसी स्थिति को कहा जाता रहा है।
चिन्तन और स्वभाव का ढाँचा ही उलटना होगा। प्रचलनों में से अधिकाँश को निरस्त करने के अतिरिक्त अगणित ऐसी स्िपनाएँ करनी होंगी जिन्हें आज भी लोग जानते और पसन्द तो करते हैं, पर अपनाने के लिए किसी के भी कदम नहीं बढ़तें। प्रस्तुत विपन्नता को एक प्रकार से उलट देना ही युग परिवर्तन है। इतने भरे से वे सभी सपने साकार होने लगेंगे जिन्हें सतयुग का पुरावर्तन या उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण कहा जा सकें।
चिन्तन की उत्कृष्टता और व्यवहार की आदर्शवादिता ही वे तत्व हैं जिनके संहार इस धरती की सुख शान्ति प्रगति और समृद्धि फलती-फूलती है। यदि उन्हें निरस्त कर दिया जाय तो फिर पदार्थ वैभव कितना ही प्रचुर क्यों न हो मात्र विनाशकारी दुष्परिणाम ही उत्पन्न करेगा। मूल्य वैभव का नहीं उसके उपयोग का है। दुरुपयोग से तो अमृत भी विष बन जाता है। वस्तुओ का सदुपयोग सामर्थ्यों का नियोजन और पारस्परिक स्नेह, सहयोग मात्र आध्यात्मिक प्रवृत्तियाँ है।
चिन्तन का यदि सचमुच ही अन्तराल में प्रवेश हो सका तो जीवनक्रम के उद्वेश्य और आचरण में जमीन आसमान जैसा अन्तर पडे़ बिना रह नहीं सकता। तब निर्वाह की समस्या हल करने और परिवार का ब्राह्मणोचित क्रिया-कलाप चलते रहने में किसी को श्ी रत्ती श्र श्ी कठिनाई नहीं हो सकती। पत्तियों के मर जाने या अपंग हो जाने की स्थिति में जो अपने शरीर पुरुषार्थ केवल पर अपना ही नहीं चार-चार बच्चों का पालन और विकास श्ी श्ली प्रकार कर लेती हैं। ऐसे प्रतिभा को जगाया जा सके तो गृहव्यवस्था ही नहीं उपार्जन का श्ी उत्साहवर्धक मार्ग निकल सकता है। वे चाहे तो छोटा-मोटा काम करके इतना कमा सकता है कि धर से एक शवनाशील व्यक्ति को युग सृजन जैसे आपत्ति धर्म का परिपालन करने के लिए बिना किसी असविधा के अवसर प्रदान कर सके।
चिन्तन चरित्र और व्यक्तित्व की दृष्टि से अपेक्षा कृत ऊँचे उठे होने चाहिए। यही है वह युग-शक्ति, जिसके सहारे नव सृजन की विशालकाय योजना एवं आवश्यकता को साकार कर सकना सम्भव है।
चिन्तन और निर्धारित जीवनचर्या में क्रान्तिकारी उलट-पुलट करनी होती है। जो ऐसा साहस जुटा पाते हैं जुटाने के लिए प्राणपण से प्रयत्न करतेहैं उन्हीं को साधक कहतें हैं। साधना से सिद्धि मिलने का सिद्धान्त सुनिश्चित है। सिद्धि का तात्पयै जादुई चमत्कार दिखा कर किसी को अचम्भे में डालना नहीं वरन् यह है कि अपनी प्रबल मनस्विता और पुरुषार्थ परायणता के सहारे अभीष्ट लक्ष्य तक हर कीमत पर पहुँच कर ही रहा जाए। युग शिली यदि यह अनुभव करते हैं कि महाकाल ने इन दिनों उनके लिए युग सृजन की साधना ही सर्वोपरि सहत्व की समक्षी और निर्धारित की है तो फिर उन्हें अंगद, हनुमान, अर्जून, विवेकानन्द, रामतर्थ, गोविन्दसिंह, समर्थरामदास चाणक्य, बुद्ध, महावीर, गाँधी विनाबा आदि के चरणचिन्हों पर चलते हुए युग धर्म के निर्वाह में एक निष्ठ भाव से लग जाना चाहिए।
चिन्तन और स्वभाव का सड़ा-गला ढर्रा अपनाये रहने वाले तो यह सोच सकते है कि उन्हें किन्हीं कठिनाईयों ने जकड़ रखा है और वे समय की माँग को पूरा करने में कुछ भी कर सकने में असमर्थ हो गये हैं। यह बुद्धि भ्रम कके सहारे बुना गया मकड़ी का जाल भर है जो नागपाश जैसा लगता है। दूरदर्शिता को अपनाकर निजी जीवन की समस्याओं को सुलझाया जाय तो वे इतनी सरल और सीधी सादी प्रतीत होंगी उसके समाधान में किसी को रक्ती भर भी कठिनाई का सामना न करना पड़े। औसत भारतीय का निर्वाह स्वीकारने और महत्वाकाँक्षाओं को आदर्शवादिता की ओर से मोड़ देने भर से मनःस्थिति उलट सकती है और परिस्थितयों की विषमता देखते-देखते तिरोहित हो सकती है। वस्तुतः व्यस्त से व्यस्त समझा जाने वाला व्यक्ति भी जीवन में आत्मा की आवश्यकता और ईश्वर की साझेदारी अनुभव करने लगे तो उसके कपाट खुल सकते है और ऐसी जीवनचर्या बन सकती है जिसमे आत्मकल्याण और लोकनिमार्ण के दोनो प्रयोजन श्ली-शँती पूरे होते रहे, साथ ही निर्वाह एवं परिवार पोषण में राई भर भी कठिनाई अनुभव न करनी पडे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-November
चिन्तन को परिष्कृत करने वाली प्रथम आवश्यकता ‘जिज्ञासा’ को माना गया है। जिज्ञासा उस ज्ञान पियासा को कहते हैं जिससे पूर्ण मान्यताओं के लिए दृढ़ नहीं रहता। विज्ञान की प्रगति इसी आधार पर हुई है धर्म इसलिए पिछड़ा कि उसने पुरातन को पत्थर की लकीर माना और बदलते हुए संदर्भों का ध्यान र रखते हुए जो पुराना सो भला-जो अपना सो सही का दुराग्रह अपनाया। क्रमिक गतिशीलता प्राणियों से लेकर पदार्थों तक की प्रगति व्यवस्था का अनिवार्य अंग है फिर पुरातन मान्यताओं में कभी कोई परिवर्तन न करना पड़े यह नहीं हो सकता। सापेक्षवाद को अंगुलिय निर्देश सत्यान्वेषी-तथ्यान्वेषी होने के लिए जन चेतना को सहमत करना है।
चिन्तन का अभ्यास डाला जाय। मनोविकारों तथा निरर्थक कल्पनाओं की धमाचौकड़ी को रोकने के लिए मस्तिष्क को खाली न रहने देना। अध्ययन या सृजन चिन्तन में लगाने की आवश्यकता है। बुरे विचारों को भले विचारों से काटने का संघर्ष निरंतर जारी रक्षा जाय। प्रमाद तनिक भी न बरता जाय।
चिन्तन मस्तिष्क को इस तरह आच्छादित कर लेते हैं कि निजी मान्यताएं ही सत्य जैसी दिखाई पड़ने लगती है। र्स्वग और नरक स्व निर्मित होते हैं। प्रेत लोक का वातावरण शान्त है, इतने पर भी हर प्रेतात्मा को उसकी निजी मानसिक स्थिति से उत्पन्न प्रतिक्रियाओं का अनुभव अपने-अपने ढंग से करना पड़ता है। अधर्मी नरक का और धर्मात्मा र्स्वग का अनुभव किस प्रकार करते हैं इसका विवरण दिव्य-दर्शियों ने कथा-पुराणों में विस्तारपूर्वक लिखा है।
चिन्तन एक अति शक्तिशाली चुम्बक है जो अपने अनुकूल साधन और सहयोग खींच बुलाने में पूर्णतया समर्थ है। सोचने से इच्छा जगती है और संकल्प उठता है। इसके बाद पुरुषार्थ का उपक्रम चल पड़ता है। मनोयोग युक्त पराक्रम की शक्ति इतनी बड़ी है कि उसके सहारे उतना कमाया पाया जा सकता है जिसे सामान्य प्रगति प्रक्रिया की तुलना में दैवी वरदान कहा जा सके।
चिन्तन, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास के तथ्यों पर विचार करते रहने से संयम साधना के उपाय सूझते और प्रबल होते चलते।
चिन्तन’ ओर उन्हें क्रियान्वित करने की योजना बनाना ‘मनन’ कहलाता है। स्वाध्याय सत्संग-प्रत्यक्ष और चिन्तन मनन-परोक्ष है। आत्मिक प्रगति के लिए इन प्रयोजनों को भजन ध्यान से कम महत्वपूर्ण एवं कम आवश्यक न माना जाय।
चिन्तन को परिष्कृत करने में निरत हैं। अनेकों व्यक्ति अभी भी सच्चे ब्राह्मणाँ, वानप्रस्थों, परिव्राजकों की तरह इन दिनों भी प्राचीन काल की संत परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। इनके गुजारे का प्रबन्ध करना सच्चे अथों में ब्रह्मभोज है। ऐसे ही सार्थक दान पुण्य को शास्त्रों में देव अनुग्रह, वरदान, आशीर्वाद एवं र्स्वग सद्गति देने वाला बताया गया है। प्रज्ञा अभियान में संलग्न कार्यकर्त्ताओं का निर्वाह एवं उस प्रयोजनों के लिए साधनों के लिए पैसा चाहिए।
चिन्तन की नई दिशा दी है और कहा है कि आग्रह एवं दुराग्रह पर न अड़ा जाय। प्रचलित सभी मान्यताएं आँशिक सत्य हैं और उनकी उपयोगिता एक स्थिति में बहुत अधिक हो सकती है किन्तु दूसरी स्थिति में उसे निरर्थक भी ठहराया जा सकता है। इसमें किसी को मान-अपमान का - हार-जीत का-अनुभव नहीं करना चाहिए। वरन् यह मानकर चलना चाहिए कि हम सभी पूर्ण सत्य की दिशा में क्रमिक खोज करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। सभी अपूर्ण हैं।
चिन्तन में लगाने की आवश्यकता है। बुरे विचारों को भले विचारों से काटने का संघर्ष निरंतर जारी रक्षा जाय। प्रमाद तनिक भी न बरता जाय। सदा जागरुक रहा जाय।
चिन्तन मनन-परोक्ष है। आत्मिक प्रगति के लिए इन प्रयोजनों को भजन ध्यान से कम महत्वपूर्ण एवं कम आवश्यक न माना जाय।
चिन्तन को और युग निर्माण का कर्म को दिशा देना है। यह ज्ञान कर्म का समन्वय-कृष्ण, अजफ्रन का - राम हनुमान का समन्वय जैसा युग्म समझा जा सकता है। इन पत्रिकाओं को दो बार पढ़ा जाय। एक बार सिद्धान्त समझने की दृष्टि से और दूसरी बार यह सोचने के लिए कि क्या इन प्रतिपादनों में से कुछको अपने जीवन क्रम में समिमलित किया जा सकता है। यदि हाँ तो वर्तमान परिस्थितियों में उसके लिए किस प्रसंग में, किस क्रम से कदम बढ़ाया जाय?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-June
चिन्तन में उत्कृष्टता एवं व्यक्तित्व में समग्रता के समावेश के लिए उपासना का अवलम्बन आवश्यक है। इसमें व्यक्ति एवं समाज के सर्वतोमुखी परिष्कार एवं प्रगति के सभी आधार विद्यमान है। समस्याओं की जटिलता एवं परिस्थितियों की विषमता के निराकरण के लिए उपासना आज की सर्वोत्तम आवश्यकता है।
चिन्तन मन ही नहीं शरीर को भी प्रभावित करते है। मनोकायिक अधिकाँश रोग निकृष्ट चिन्तन के ही परिणाम होते है। इस तथ्य को मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में एक मत से स्वीकार किया जा रहा है। उपासना श्रेष्ठ चिन्तन एवं उत्कृष्ट व्यक्तित्व के निर्माण का एक सशक्त माध्यम है। मस्तिष्क की बनावट कुछ ऐसी है वह चिन्तन के लिए आधार ढूँढ़ता है।
चिन्तन को श्रेष्ठ एवं व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बना सकने में समर्थ हो सकती है। उपासना की समग्रता एवं उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों को भली-भाँति समझा जा सके तो व्यक्तित्व निर्माण का एक सुदृढ़ आधार मिल सकता है। व्यक्तित्व का परिष्कार ही उपासना का लक्ष्य होता है।
चिन्तन प्रवाह में आदर्शवादिता का जितना अधिक पुट होगा उसी स्तर की सफलता प्राप्त होगी। इष्ट से तादात्म्य और उससे मिलने वाले दिव्य अनुदानों से वह आधार बन जाता है जिससे साधक अपने चिन्तन एवं गतिविधियों को श्रेष्ठता की ओर मोड़ सके।
चिन्तन एवं उत्कृष्ट व्यक्तित्व के निर्माण का एक सशक्त माध्यम है। मस्तिष्क की बनावट कुछ ऐसी है वह चिन्तन के लिए आधार ढूँढ़ता है। जैसा माध्यम होगा उसी स्तर का च्िन्तन चल पडे़गा। तद्नुरुप क्रिया-कलाप होगे। वातावरण का व्यक्ति पर पड़ने वाला प्रभाव एक तथ्य है।
चिन्तन और संकल्प की क्षमता को जब अचेतन के साथ जोड़ दिया जाता है तो उसकी अद्भुत और अनुपम दिव्यताएँ जागृत होना आरम्भ कर देती है। इस दिशा में जो जितनी सफलता प्राप्त करता चलता है उसे उतना ही समर्थ और सिद्ध पुरुष कहा जाता है। उसे उतना ही समर्थ और सिद्ध पुरुष कहा जाता है। इन प्रयोगों को यदि व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से किया जा सके तो निस्संदेह मनुष्य साधारण न रह कर असाधारण बन जाता है।
चिन्तन को लक्ष्य की ओर नियोजित किए रखने के लिए साकार अथवा निराकार कोई भी अवलम्बन लिया जा सकता है। यह आवश्यक है और उपयोगी भी। उपासना के साथ जुड़े चिन्तन प्रवाह में आदर्शवादिता का जितना अधिक पुट होगा उसी स्तर की सफलता प्राप्त होगी। इष्ट से तादात्म्य और उससे मिलने वाले दिव्य अनुदानों से वह आधार बन जाता है जिससे साधक अपने चिन्तन एवं गतिविधियों को श्रेष्ठता की ओर मोड़ सके।
चिन्तन एवं गतिविधियों को श्रेष्ठता की ओर मोड़ सके।
चिन्तन व्यक्तियों एवं वातावरण से प्रभावित होता है। गतिविधियाँ एवं अनुभूतियाँ भी उसी स्तर की होती है।
चिन्तन और गतिविधियों में भी उत्कृष्टता का समावेश होगा। इसके विपरीत निकृष्ट आदर्श निम्नगामी प्रवृत्तियों को प्रोत्सान देगे। हेय व्यक्तित्व ही गढ़ेगें। उपासना में इष्ट का निर्धारण परोक्ष रुप में श्रेष्ठ आदर्शों की ही प्रतिष्ठापना है। जिसके निकट आने, तादात्म्य स्थापित करने वाला भी उसी के अनुरुप ढलता-बनता चला जाता है।
चिन्तन के ही परिणाम होते है। इस तथ्य को मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में एक मत से स्वीकार किया जा रहा है। उपासना श्रेष्ठ चिन्तन एवं उत्कृष्ट व्यक्तित्व के निर्माण का एक सशक्त माध्यम है। मस्तिष्क की बनावट कुछ ऐसी है वह चिन्तन के लिए आधार ढूँढ़ता है। जैसा माध्यम होगा उसी स्तर का च्िन्तन चल पडे़गा।
चिन्तन के लिए आधार ढूँढ़ता है। जैसा माध्यम होगा उसी स्तर का च्िन्तन चल पडे़गा। तद्नुरुप क्रिया-कलाप होगे। वातावरण का व्यक्ति पर पड़ने वाला प्रभाव एक तथ्य है। दुर्जन, अनाचारी के साथ रहने वाला व्यक्ति उनसे प्रभावित होता है।
चिन्तन को व्यक्तित्व का मूल आधार माना जाने लगा है। मनोविज्ञान की शोधों ने सिद्ध किया हे कि मनुष्य का जैसा भी आदर्श होगा उसके अनुरुप ही उसका व्यक्तित्व ढलेगा। आदर्श यदि श्रेष्ठ है तो चिन्तन और गतिविधियों में भी उत्कृष्टता का समावेश होगा। इसके विपरीत निकृष्ट आदर्श निम्नगामी प्रवृत्तियों को प्रोत्सान देगे। हेय व्यक्तित्व ही गढ़ेगें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-December
चिन्तन में ही निमग्न। न उसे प्रकृति सौनदर्य के अवलोकन में रस आया और न उसने किसी अन्य दिशा में अपना ध्यान बँटने दिया।
चिन्तन को संकिर्ण स्वार्थपरता से विरत करके लोकहित के उदार उद्देश्यों के साथ जोड़ा जाय। ऐसा बन पड़े तो विग्रह, विलास, और बडप्पन में संलग्न क्रियाशीलता को बर्बादीसे बचने और नव सृजन में जुट पड़ने का आवसर मिलेगा। जो कुशलता और सक्रियता, विनाश और विग्रह की दुष्प्रवृत्तियों कोइतनी समर्थ बना सकती है वे यदि सत्प्रवृत्ति सर्म्वधन में लगेगी तो कोई कोई कारण नहीं वर्तमान नरक को भविष्य के र्स्वग
चिन्तन होगी कि कुछ लोग कठिन शारिरिक रोगों का निवारण भी उदार आत्माओं के सहयोग से करने में सिद्ध हस्त होते है । प्रख्यात लेखिका मेरी काडिगटन ने अपनी पुस्तक ‘इन सर्थ आफ द हीलिंग पावर, में इस तरह के कई अफ्रीकी ताँत्रिको का विवरण लिखा है जो आत्माओं की सहायता से टूटी हड्डियाँ जोड़ देते है, तान्त्रिकों द्वारा प्रयुक्त मारक प्रयोगों को निष्प्रभावी कर देते है ।
चिन्तन की उर्वरता और आदर्श चरित्र की नमी विद्यमान हो । मात्र कर्म काण्ड ही सब कुछ नहीं है । पूजा से ही देवता प्रसन्न नहीं होते । इस समस्त विधि-व्यवस्था की उपयोगिता तभी है जब साधक को अपने व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाना आता हो । कुशल किसान वह है जो बीजारोपण के साथ-साथ पौधे के उगने एवं फलने के लिए अभीश्ट आवश्कताओं को भी समझता और उन्हें जुटाने का प्रयत्न करता है ।
चिन्तन को क्रिया में परिणित कर सकने वाली ऊर्जा की आवश्यकता पड़ेगी। कितना श्रम, पुरुषार्थ, मनोबल एवं साधनों का ईधन झोकने पर वह भट्टी गरम होगी जिसमें गलाने और ढालने का दुहरा प्रयोजन साथ-साथ पूरा हो सके, यह किसी ने विचारा ही नहीं। प्रस्ताव और परामर्शो में घूम रहने से यह बातें जानी-पहचानी सी लगती है, पर यथार्थता यह है कि इस दिशा में चिन्ह पूजा के अतिरिक्त कोई ठोस काम हुआ ही नहीं। ठोस काम किसे कहतें हैं? उसे जानना हो तो बुद्ध के धर्मचक्र, प्रवर्तन, गाँधी के सत्याग्रह आन्दोलन, ईसाई मिशन, साम्यवादी विचार विस्तार जैसे सफल आन्दोलनों के ढाँचे और प्रयास पुरुषार्थ का गम्भीर अध्ययन करके यह पता लगना होगा कि आन्दोलन क्यों सफल होते और क्यों असफल रहतें हैं।
चिन्तन परक है उपनिषद् में योग का प्रतिपादन इसीरुप में हुआ हैं।
चिन्तन की दिशा धारा में परिवर्तन होते ही गतिविधियों में उलट-पुलट होती हैं और तदनुरुप् परिस्थितियों में जमीन, आसमान जैसा अन्तर दृष्टिगोचर होने लगता है। युग परिवर्तन का आधारभूत सिद्धान्त एक ही है कि मनुष्य के चिन्तन को संकिर्ण स्वार्थपरता से विरत करके लोकहित के उदार उद्देश्यों के साथ जोड़ा जाय। ऐसा बन पड़े तो विग्रह, विलास, और बडप्पन में संलग्न क्रियाशीलता को बर्बादीसे बचने और नव सृजन में जुट पड़ने का आवसर मिलेगा। जो कुशलता और सक्रियता, विनाश और विग्रह की दुष्प्रवृत्तियों कोइतनी समर्थ बना सकती है वे यदि सत्प्रवृत्ति सर्म्वधन में लगेगी तो कोई कोई कारण नहीं वर्तमान नरक को भविष्य के र्स्वग
चिन्तन द्वारा ऐसे सिद्वान्तों का निर्माण भी किया जिनके आधार पर आज भी उसी स्तर को प्राप्त किया जा सकता है । प्रगति के वही शिखर छुए जा सकते है । य़द्यपि भारत की ज्ञान सम्पदा का अधिकाँश भाग विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा जलाये गये ग्रन्थालयों तथा मारे गये अपने-अपने क्षेत्र के प्रतिभा सम्पन्नों के कारण नष्ट हो गया है । फिर भी अब तक 141 ऐसे ग्रन्थों का पता लगाया जा चुका है, जिनमें वास्तुकला और शिल्प शास्त्र का विस्तृत विवेचन हुआ है । विश्वकर्म प्रकाश भानसार तथा भोजदेव कृत ‘समराँगण’, ‘सूत्राधार’, आदि ग्रन्थ अब भी बड़ी सुलभता से प्राप्त हो जाते है ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-February
चिन्तन और प्रयास को सीमित रखने वाले नफे में रहते हैं यह सोचना अवास्तविक है। उस नीति को अपनाने वाले असन्तोष, असम्मान और दैवी, आक्रोश सहते और दुर्बुद्धिजन्य अनेकानेक दुर्व्यसनों, अनाचरणों से ग्रसित होक पग-पग पर संकट असहते हैं । इसके विपरीत उदार चेता परमर्थ का आनन्द तो लेते ही हैं, आत्मबल उच्च चरित्र एवं जन सहयोग के सहारे सुख साधनों से भी वंचित नहीं रहते । महामानवों के जीवन इतिहास का प्रत्येक पृष्ठ बताता है कि उन्हें स्व उपार्जित समाज प्रदत्त और दैवी अनुग्रह के रुप में इतनी अधिक उपलब्धियाँ प्राप्त हुई जितनी किसी संकीर्ण स्वार्थपरायण को कभी भी मिल नहीं सकीं । यह उनकी इच्छा का विषय था कि उनने उन्हें खाया नहीं दूसरे को खिला दिया ।
चिन्तन को उत्कृष्ट बनाने के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं, धर्म और अध्यात्म का एकमात्र प्रयोजन मानवी चेतना को इसी पुण्य पथ पर अग्रसर करना है । ईश्वर अनुग्रह का सर्वोपरि वरदान यही हो सकता है कि भक्ति के साथ अविछिन्न रुप से जुड़ी रहने वाली सद्भावनाएँ उमड़े और सत्प्रवृत्तियों के रुप में प्रत्यक्ष परिलक्षित हों । जहाँ इन उपलब्धियों का दर्शन नहीं होता हो, समझना चाहिए वहाँ आस्तिकता और धार्मिकता की विडम्बना ही है यथार्थता नहीं।
चिन्तन एवं क्रिया-कलाप ही इस देश को इस गौरव गरिमा के स्तर तक पहुँचाने में समर्थ रहा । प्राचीन भारत के देवमानवों ने अपने आदर्श कतृत्व और उत्कृष्ट चिन्तन से न केवल अपने देश को समृद्ध, समर्थ और सुसंस्कृत बनाया वरन् अपने अनुदानों से विश्व के कोने काने में बसे मनुष्यों को भी नव-जीवन प्रदान किया । प्राचीनकाल की सुखद परिस्थितियों का कारण उस समय के लोगों की उत्कृष्ट मनःस्थिति ही कही जानी चाहिए ।
चिन्तन की परिष्कृत धाराएँ जब आन्तरिक क्षेत्र में प्रविष्ट करती हैं तो वे ही जीवन-दर्शन बन जाती है जो सत्य एवं सत्ता की खोज का सशक्त आधार बनती हैं । दार्शनिक भावना का परम लक्ष्य यही है।
चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास को अपनी नीति-निष्ठा में परिणित कर लिया जाय तो हमारा जीवन प्रवाह उस दिशा में सहज ही वह निकलेगा जिसमें अक्षय सुख-शान्ति के आनन्द उल्लास के अनुदान पग-पग पर भरे पड़े हैं । यदि कोई उनसे वंचित है तो उसका कारण यह नहीं है कि इनमें कोई अवरोध नहीं है । अवरोध है तो अपनी ही ओर से दृष्टिकोण परिष्कार की आवश्यकता को समझा और पूरा किया जाय तो निश्चित मानना चाहिए कि जीवन साधना में सफलता और सिद्धि प्राप्त कर ली गई है ।
चिन्तन और पुरुषार्थ बदलना मनुष्य के अपने हाथ में, उन्हें बदलने पर किसी का भी भविष्य बदल सकता है। इसलिए उसमें स्थिरता नहीं होती । अस्तु सामान्य मनुष्यों के भविष्य कथन प्रायः गलत निकलते हैं । विशिष्ट व्यक्तियों की बात दूसरी है । ‘कम्प्यूटर’ भविष्य कथन करते हैं और वे सही निकलते हैं ।
चिन्तन और दुष्ट आचरण के लिए असाधारण दुस्साहस ही करना होता होगा, अन्यथा वातावरण के दबाव में सहज ही वैसा कुछ कर सकना सहज नहीं, अतीव दुष्कर ही था ।
चिन्तन एवं ज्ञान में निरपेक्ष ज्ञान की तुलना में भौतिक ज्ञान को ही अधिक महत्व दिया गया । सारा मानवी पुरुषार्थ प्रकृति एवं जड़ पदार्थो की खोजबीन करने में सिमट कर रह गया । पदार्थो की उधेड़-बुन से स्वस्थ और अस्वस्थ दोनों तरह के परिणाम दृष्टिगोचर हुए । अच्छे परिणामों से अनेकों सुख-साधन मिलें किन्तु दुष्परिणाम यह हुआ कि मनुष्य आन्तरिक जीवन से दूर हटता गया । पदार्थो के आकर्षण ने उसे अपनी चेतना से दूर धकेल दिया ।
चिन्तन को केन्द्रीभूत नहीं कर सकती । यह तो तभी बन पाता है जब विश्वास के सहारे किसी भी विषय पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाता है । दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि श्रद्धा के अभाव में विचारणा-तर्क का प्रार्दुभाव सम्भव नहीं है । किसी विषय पर आस्था ही तर्को का सृजन करती उस पर सोचने, सत्यता को ढूँढ़ निकालने को प्रेरित करती है । श्रद्धा मानवी व्यक्तित्व के मूल में घुली-मिली है जिसके बिना एक क्षण भी नहीं रहा जा सकता ।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व । जिसके अन्तःकरण में इन दोनों की प्रतिष्ठापना हो गई, समझाना चाहिए उसने मनुष्य शरीर में रहते हुए ही ‘देवयोनि’ प्राप्त कर ली ।
चिन्तन से न केवल अपने देश को समृद्ध, समर्थ और सुसंस्कृत बनाया वरन् अपने अनुदानों से विश्व के कोने काने में बसे मनुष्यों को भी नव-जीवन प्रदान किया । प्राचीनकाल की सुखद परिस्थितियों का कारण उस समय के लोगों की उत्कृष्ट मनःस्थिति ही कही जानी चाहिए ।
चिन्तन का जल लगता रहे तो उसके सभी पत्र-पल्लव हरे-भरे बने रहेंगे और उसे फला-फूला सुरम्य सुविकसित देखा जा सकेगा । इसी सर्वागीण सुख-शान्ति को मानव जीवन की सार्थकता कहा जा सकता है । इसकी उपलब्धि पूर्णतया अपने हाथ में है । आत्म चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास को अपनी नीति-निष्ठा में परिणित कर लिया जाय तो हमारा जीवन प्रवाह उस दिशा में सहज ही वह निकलेगा जिसमें अक्षय सुख-शान्ति के आनन्द उल्लास के अनुदान पग-पग पर भरे पड़े हैं । यदि कोई उनसे वंचित है तो उसका कारण यह नहीं है कि इनमें कोई अवरोध नहीं है ।
चिन्तन एवं श्रेष्ठ विचार मानव विकास के लिए अति उपयोगी हैं किन्तु दार्शनिक प्रवृत्ति की सन्तुष्टि इतने मात्र से नहीं हो जाती । मनुष्य की इस जिज्ञासा की तृप्ति तो सत्य-सत्ता के दर्शन से ही होती है । इसके बिना जीवन अपूर्ण तथा अशान्त बना रहता है । दर्शन के साथ जुड़ी भावना का लक्ष्य है-परमात्म सत्ता का साक्षात्कार ।
चिन्तन भी अपने प्रियजनों को क्षुद्रता से उबरने के प्रयासों में इस प्रकार अड़चन उत्पन्न न करेंगे जैसे कि पिछले दिनों करते रहे हैं और इन दिनों करते हैं । गुरुकुलों के ऋषि आश्रमों में अपने बालकों को भेजते समय अभिभावकों को संकोच नहीं होता था । आज तो विलासिता और अहंता उभारना ही बच्चों के प्रति अभिभावकों का अनुग्रह माना जाता है । यह परिवर्तन जैसे-जैसे आवेगा । कीचड़ में से कमल उगेंगे और महामानवों की-युग पुरुषों की आवश्यकता इसी समाज में से पूरी होती चलेगी ।
चिन्तन की दिशाधारा को प्रभावित करने वाला अदृश्य वातावरण ही कुछ विचित्र है और उसी से निष्कृष्टता को बहुत कुछ परिपोषण मिल रहा है ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-August
चिन्तन और चरित्र अपनाने के लिए बाधित करती हैं इसी को अन्तः प्रेरणा या ईश्वर की वाणी कहते है। कर्मफल के दण्ड पुरस्कार की विधि व्यवस्था परब्रहमा के द्वारा संचालित होती है किनतु मानवी गरिमा विशुद्ध रुप से आस्तिकता के तत्वज्ञान से जुड़ी हुई है। आस्तिकता के अनेक स्वरुप है। उनमे से एक ईश्वर उपासना का अवलम्बन लेकर चेतना के दिव्य परतों को सुविकसित और सशक्त बनाना भी है।
चिन्तन के सन्तुलन पर। यह तथ्य भले ही आज न सही हजार वर्ष बाद समझा जाए किन्तु समाधान सही निर्ष्कष पर पहुँचने और सही उपाय अपनाने पर ही सम्भव हो सकेगा।
चिन्तन में लगा समझों कि वह ब्याज सहित लौटाने वाली बैंक में जमा हो गया।
चिन्तन और चरित्र के अनुरुप उत्थान और पतन का अवसर प्रस्तुत करते हुए दोकर यथार्थता परख सकता है वर्तमान की विभीषिकाओं को निरस्त करने और भविष्य को उज्जवल सम्भावनाओं से भरा-पूरा देखने का जो सपना संजोया गया है उसके मूल में इसी प्रतिष्ठा को आधार भूत माना गया है उसके मूल में इसी प्रतिष्ठा को आधार भूत माना गया है कि जन-जन को उत्कृष्टता अपनाने के लिए सहमत किया जायेगा, फलतः शालीनता और सद्भावना का वातावरण बनेगा। इतना बन पड़ने पर सामान्य सुविधर साधनों के सहारे भी शान्ति और प्रगति की परिस्थितियाँ विनिर्मित होती चली जायेगी। नव सृजन का, युग परिवर्तन का, उज्जवल भविष्य का आधार खड़ा करने वाले तत्व इस तथ्य से पूर्णतया आश्वास्त है कि मनुष्य की अन्तरात्मा को जगाया जा कसे तो वह सहज ही शलीनता अंगीकार करेगी। इतनी बात बन सकी तो फिर सुख्या शान्ति की समग्रता में कही कोई कमी न रहेगी।
चिन्तन को नई दिशा मिली है। पिछले दिनों पेट भरना ही प्रमुख रहा हैं। लोभ को प्रमुखता मिली है और विलास एवं संचय को ही सौभाग्य का चिन्ह समझा जाता रहा है। पिछले दिनों लोभ की ही तरह मोह भी मनुष्य को निर्विवाद बन्धनों में बाँधने के लिए वेदी की भूमिका निभाता रहा है। दोनों अभिन्न मित्र जो है।
चिन्तन और चरित्र उठता नहीं गिरता है। इस प्रकार यह हराम में मिला उत्तराधिकार उनके लिए भी अभिशाप ही सिद्ध होता है जिन्हे इच्छा या अनिच्छा से देना पड़ा।
चिन्तन की विकृति के कारण वह असायिक वृद्धावस्था का आवरण स्वतः ओढ़ लेता है।
चिन्तन के फलस्वरुप कोई बड़ा कदम उठाते नहीं बनता। त्याग, बलिदान से भरे लोकसेवा के कार्य में प्रत्यक्ष और तुरन्त का लाभ मिलते देखकर अधिकाँश व्यक्तियों का युवाकाल यों ही पेट और प्रजनन जैसे सामान्य प्रयोजनों को पूरा करने में चला जाता हैं जबकि अधिक महत्वपूर्ण कार्यो के लिए साहस भरे कदम उठाने की यही आयु होती है। यो तो श्रेष्ठ लोक-कल्याण के कार्यों के लिए आयु का कोई बन्धन, नहीं है। न ही यहाँ इसका प्रतिपादन किया जा रहा है, वरन् जीवन का वास्तविक सत्यों का उद्घाटन किया जा रहा है जो सैद्धान्तिक कम व्याहारिक अधिक हैं
चिन्तन एवं चरित्र का अविच्छिन्न अंग बनाकर तादात्म्य स्थापित करना ही होता है।
चिन्तन के कारण तिल जैसी होते हुए भी ताड जितनी भयानक प्रतीत होती है। लोग परिस्थितियाँ बदलना चाहते है, पर जिस अनुपयुक्त दृष्टिकोण के कारण व उत्पन्न होती है उसने बदलने की बात तक नहीं सोचते। झरना झरता रहे और बहाव को मेंड बाँधकर रोकने में श्रम किया जाता रहे तो थकान और निराशा के अतिरिक्त और कुछ पल्ले पड़ने वाला नहीं है। स्वस्थता की तरह प्रसन्नता भी आवश्यक है, पर उस परिष्कृत दृष्टिकोण के मूल्य पर ही खरीदा जा सकता है। शरीर सुख संयम पर निर्भर है और मानसिक सन्तोष चिन्तन के सन्तुलन पर।
चिन्तन और आचरण बन पड़ना सम्भव नहीं हो सकता। क्रोध सहज है, स्नेह कठिन। क्रोध बिना किसी प्रशिक्षण के आरम्भ से ही प्रकट होने लगता है; पर प्रेम को स्वभाव का अंग बनाने के लिए सुसंस्कारी वातावरण और तद्नुरुप अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है। ईर्ष्या और अपहरण, अहंता और आक्रमण, वासना और आधिपत्य का आचरण करते हुए सभी प्राणी पाये जाते है, मनुष्य भी। किन्तु संयम और सद्भाव को जीवनक्रम में सम्मिलित करने के लिये सभ्यता और संस्कृति को, धर्म और अध्यात्म को गले उतारना कितना कठिन पड़ता है, यह किसी से छिपा नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-September
चिन्तन को नियत प्रयोजन के लिए तत्पर कर सकने- उसे बिखरने न देने में समर्थ रह सकें। इतनी सिद्धी जिसे प्राप्त हो सके वह अपने विषय में गहराई तक उतर सकता है। उथले मन से सोचने पर आधी-अधूरी बातें ही हाथ लगती हैं।, पर तन्मयतापूर्वक सोचने से मस्तिष्कीय शक्तियाँ केन्द्रीभूत होने के कारण प्रखर बन जाती हैं और ऐसे आधार ढूँढ़ निकालती हैं। जिन्हें सूझ-बूझ, दूरदर्शिता एवं विशेषता सम्पन्न कहा जा सके।
चिन्तन का प्रवाह वर्तमान स्तर का ही बना रहा और पहल जीवनशास्त्रियों के हाथ में रही तो वे नये सिरे से जीव कोषों को ढ़ालना आरम्भ कर देंगे और ऐसा मनुष्य पैदा करेंगे जो अन्ग्रही परिस्थितियों में भी अपना निर्वाह कर सकें। इस आधार पर वर्तमान मनुष्यों की शारीरिक और मानसिक स्थितियों को ऐसे मोड़ सकते हैं जो भावी परिस्थितियों के साथ सुविधापूर्वक तालमल बिठाये रह सकते हैं उनका शरीर ही नहीं मन भी बदला जा सके। विज्ञान के हाथों में इन दिनों जितनी शक्ति केन्द्रित हो गई है, उसे देखते हुए यह असम्भव नहीं कहा जा सकता। यह भी हो सकता है कि विज्ञान की इस शक्ति का उपयोग सत्ताधीशों की सहायता से, उनकी मनमर्जी के अनुकूल मनुष्य को टालने के लिए किया जाय और वर्तमान स्तर के मनुष्यों को हटाकर उसकी स्थानापन्न नई मनुष्य जाति बनायी जाये।
चिन्तन को-किसी कदर समझते रहते हैं। यही कारण है कि अपराधियों के कुचक्र में फँसने से अधिकाँश व्यक्ति बचते रहते हैं। यह सहज बुद्धि न होती तो अनाचारी छझ व्यक्ति अधिकाँश लोगों को अपने चंगुल में फँसा लेते ।
चिन्तन और आचरण करने पर सहज प्रवृति में ऐसा अन्तर पड़ता है जिसे विचित्र कहा जा सके। सामान्य बुद्धि को भी इसका आभास मिल जाता है। सूक्ष्मदर्शी बुद्धि तो उसे और भी आसानी से पकड़ लेती है। अब तो ऐसे यंत्र भी बन गये है। जो मनुष्य को अस्वाभाविक हरकतों को देखकर यह पता लगा सके कि यह अनौचित्य के अपराधी प्रवाह में बह रहा है।
चिन्तन और भावनायें। ये तीनों क्रियायें क्रमशः प्रभावशाली, महत्वपूर्ण और जटिल होती है। आलोच्च विषय का सम्बन्ध भावनाओं से है जो सभी मनुष्यों मस्तिष्क में जन्मती है। स्मृति और विचार की दृष्टि से कोई व्यक्ति कमजोर और बलवान होते हुए भी भावना क्षेत्र में कम ज्यादा नहीं होता। वे सभी व्यक्तियों के मस्तिष्क में जन्मती है।
चिन्तन और कृर्तत्व से विरत नहीं हो सकता। जैसे ही अवाँछनीय चिन्तन मनःक्षेत्र में उभरता है। वैसे ही प्रतिरोधी देव तत्व उसके परिणाम के सम्बन्ध में सचेत करता है और भीतर ही भीतर अन्तर्द्वन्द्व उभरता है। यदि अन्तःचेतना को कुचल-कुचल कर मूर्छित न बनाया गया हो तो वह इतनी प्रखर होती है कि वह अचिन्त्य चिन्तन के प्रति विद्रोह खड़ा कर देती है और उन अवाँछनीयताओं के पैर उखाड़ कर ही दम लेती है। इसके विपरित यदि अपने अन्तःकरण को निरन्तर कुचलते रहा जाय, उसकी पुकार अनसुनी की जाती रहे तो स्वभाविक है उससे आत्मा की आवाज मन्द पड़ती है और पग-पग पर आवश्यक प्रकाया देने का उसका क्रम शिथिल हो जाता है।
चिन्तन को, संस्कृति को, अध्यात्म एवं उदार सहकारिता को, सद्व्यवहार को निजी उपार्जन है-दैवी अनुदान नहीं। इस तथ्य को वन्य क्षेत्र में रहने वाले पशु परम्परा अपनाये हुए मनुष्य की पिछड़ी स्थिति का देखते हुए आज भी जाना जा सकता है। सदाश्यता की वह विशेषता है जिसने चिन्तन और चरित्र को ऊँचा उठाने और प्रगति के उच्च शिखर पर जा पहुँचने के वरदान उपलब्ध कराये हैं।
चिन्तन को तन्मयतापूर्वक नियोजित रखा जा सके। साहित्यकार, कलाकार, वैज्ञानिक, योगसाधक तथा दूसरे महत्वपूर्ण व्यक्ति मन की इतनी ही साधना कर पाते हैं कि चिन्तन को नियत प्रयोजन के लिए तत्पर कर सकने- उसे बिखरने न देने में समर्थ रह सकें। इतनी सिद्धी जिसे प्राप्त हो सके वह अपने विषय में गहराई तक उतर सकता है। उथले मन से सोचने पर आधी-अधूरी बातें ही हाथ लगती हैं।, पर तन्मयतापूर्वक सोचने से मस्तिष्कीय शक्तियाँ केन्द्रीभूत होने के कारण प्रखर बन जाती हैं और ऐसे आधार ढूँढ़ निकालती हैं।
चिन्तन और चरित्र को प्रभावित, परिष्कृत कर सकने में समर्थ पा्रणवान धर्मतन्त्र के सहारे ही सम्भव हो सकती है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए युग धर्म का वह ढाँचा खड़ा किया गया है जो शाश्वत सिद्धान्तों का परिपूर्ण पालन करते हुए-विकृतियों से जूझने और सत्प्रयोतनों का समावेश करने के लिए कटिवद्ध, समर्थ एवं सफल हो सके। समर्थ धर्मतन्त्र के सहारे ही लोकशिक्षण और लोकनिर्माण के उभय-पक्षीय प्रयोजन सही रीति से-सही रुप से सम्पन्न हो सकते हैं।
चिन्तन, आत्म-ज्योति की निरन्तर धारणा के प्रयास का नाम अभ्यास है। अभ्यास वैराग्य की विविध साधनाप्रणाली ही आत्म-शुद्धि की सामर्थ्य प्रदान करती है। यह सामर्थ्य उपार्जित करना और दोषों, दुष्प्रवृतियों को समाप्त कर शुद्ध विवेक को जागृत रखना ही परम पुरुषार्थ है।
चिन्तन मनःक्षेत्र में उभरता है। वैसे ही प्रतिरोधी देव तत्व उसके परिणाम के सम्बन्ध में सचेत करता है और भीतर ही भीतर अन्तर्द्वन्द्व उभरता है। यदि अन्तःचेतना को कुचल-कुचल कर मूर्छित न बनाया गया हो तो वह इतनी प्रखर होती है कि वह अचिन्त्य चिन्तन के प्रति विद्रोह खड़ा कर देती है और उन अवाँछनीयताओं के पैर उखाड़ कर ही दम लेती है। इसके विपरित यदि अपने अन्तःकरण को निरन्तर कुचलते रहा जाय, उसकी पुकार अनसुनी की जाती रहे तो स्वभाविक है उससे आत्मा की आवाज मन्द पड़ती है और पग-पग पर आवश्यक प्रकाया देने का उसका क्रम शिथिल हो जाता है। आत्मा की अवज्ञा करते रहने वालों को ही दुर्बुद्विग्रस्त और कुकर्मों में लिप्त पाया जाता है, अन्यथा जीवन्त आत्मा की प्रेरणा सामान्य स्थिति में इतनी प्रखर होती है कि उस स्थिति में मनुष्य के लिए कुमार्ग का अनुसरण कर पाना सम्भव ही नहीं होता।
चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश। यह कार्य धर्म तन्त्र का तत्व दर्शन एवं प्रचलन प्रवाह ही सम्पन्न कर सकता है। युग परिवर्तन के लिए यही अभीष्ट था सो सृष्टा की सन्तुलन व्यवस्था के अर्न्तगत यही सुनियोजित रीति से हो भी रहा है।
चिन्तन क्षेत्र पर उत्कृष्टता का आरोपण और अभिवर्धन करने वाला आधार है। उसे शान्ति और प्रगति का मुरुदण्ड ही माना पड़ेगा। नीतिसत्ता, उदारता और कर्मनिष्ठा का परिपोषक धर्म यदि लोकचेतना पर से अपने अंकुश हटाने लगा तो समझना चाहिए कि बिना दैवी प्रकोप के ही पारस्परिक विग्रह से इस धरती पर महाप्रलय की सर्वनाशी विभीष्काएँ उठ खड़ी होंगी।
चिन्तन के प्रति विद्रोह खड़ा कर देती है और उन अवाँछनीयताओं के पैर उखाड़ कर ही दम लेती है। इसके विपरित यदि अपने अन्तःकरण को निरन्तर कुचलते रहा जाय, उसकी पुकार अनसुनी की जाती रहे तो स्वभाविक है उससे आत्मा की आवाज मन्द पड़ती है और पग-पग पर आवश्यक प्रकाया देने का उसका क्रम शिथिल हो जाता है। आत्मा की अवज्ञा करते रहने वालों को ही दुर्बुद्विग्रस्त और कुकर्मों में लिप्त पाया जाता है, अन्यथा जीवन्त आत्मा की प्रेरणा सामान्य स्थिति में इतनी प्रखर होती है कि उस स्थिति में मनुष्य के लिए कुमार्ग का अनुसरण कर पाना सम्भव ही नहीं होता। यह आत्मिक प्रखरता ही वस्तुतः सद्गुरु है। गुरु भक्ति इसी का नमन, पूजन और परिपोषण करने का नाम है।
चिन्तन पद्धति का अभ्यास होने के बाद स्वभाव में सम्मिलित सुखद भावनायें सब ओर से सुख-शान्ति की वर्षा करती हैं। आशा, उत्साह, प्रफुल्लता और प्रेम के समय ये सुखी ग्रन्थियाँ कुछ दूसरे ही प्रकार के हारमोन्स निकालती है परिणामस्वरुप उन क्षणों में शरीर को एक सुखद आभास की अनुभूति होती है। दुःखद भावनाओं के प्रभाव को प्रत्यक्ष देखना हो तो एक क्रोधित मनुष्य के चेहरे के हावभाव से देखा जा सकता है। मनुष्य जब क्रुद्ध होता है तो उसका चेहरा लाल हो जाता है, आँखों के पलक चौडे पड़ जाते हैं, नेत्रों की सफेद पुतलियाँ सुर्ख हो उठती हैं, होंठ भिंच जाते हैं, जबड़ा जकड़ जाता है, हाथों की मुट्ठियाँ भिंच जाती हैं और शरीर काँपने लगता है। किसी हद तक उसकी आवाज भी अस्वाभाविक होने और लड़खड़ाने लगती है।
चिन्तन और व्यवहार में भी भारी उथल-पुथल हुई हैऔर उनने व्यक्ति तथा समाज को आर्श्चयजनक रुप से प्रभावित किया है। इन नई उपलब्धियों को धर्मतंत्र में भी जगह मिलनी चाहिए। अब परमार्थ प्रयोजनों को ब्रह्मभोज, गौदान, तीर्थ स्थान, कथा-प्रवचन, एवं धर्मनुष्ठानों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उसमें पीड़ा और पतन निवारण कर सकने वाले अनेक तथ्यों का समावेश करना होगा। कुरितियों का उन्मूलन भी अब परमार्थ में ही माना जायगा।
चिन्तन होता है। अपनी आपातकालीन जरुरत के लिए व्यक्ति बचत का उपयोग कर सकता है। शादी-ब्याह, बच्चों की ऊँची पढ़ाई या किसी अप्रत्याशित कारण से कोई खर्चे आ ही पड़े तो समझदार व्यक्ति संचित भंडार से ही व्यवस्था बनाता है। बचत की नीति अन्ततः लाभकारी ही सिद्ध होती है।
चिन्तन की सही रीति-नीति से अपरिचित रहने के कारण ही तरह-तरह के विक्षोभ धरते हैं। अन्यथा संसार में ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं हैं जो अनेकों समस्याओं और कठिनाइयों से घिरे रहने के बावजूद भी अपनी मनःस्थिति को विक्षुब्ध नहीं होने देते और हंसते-हंसाते सामने आई उलझनों को सुलझानें के लिए धैर्य और साहसपूर्वक जुटे रहते हैं। उसके विपरित ऐसे लोगों की भी कमी नहीं हैं जो राई बराबर कठिनाई को भी पहाड़ के बराबर मान लेते है और तिल का ताड़ बना कर निरन्तर उद्विग्न बने रहते हैं।
चिन्तन और चरित्र को ऊँचा उठाने और प्रगति के उच्च शिखर पर जा पहुँचने के वरदान उपलब्ध कराये हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-April
चिन्तनएवं व्यवहार में जितनी उतकृष्टा घूली रहेगी उसी अनुपात में वहाँ का वातावरण उच्चस्तरीय बनेगा। प्रेरणाएँ उसी से मिलती है। उतकृष्टता की दिशा में चलना, धकेलना एवं उछलना उसी आधार पर सम्भव होता है।
चिन्तन में उत्कृष्टता का महत्व कम नहीं पर तथ्य यह भी है कि यदि किसी को असामान्य बनना या बनाना हो तो त्दनुरुप वातावरण उपलब्ध करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसी अभाव की यह दुखद परिणित है कि परिजन सामान्य स्तर के बने और सामान्य स्थिति में पडे हुए हैं। यदि स्थिति ऐसी न होती, अवसर मिलता तो यह पूछने बताने की आवश्यकता प पड़ती कि परिजनों के इतने बडे सूदाय में मात्र सज्जन ही क्यों दिखाई पड़ते हैं। इनमें प्रभावित करने वाले नेतृत्व की क्षमता क्यों नहीं है ? यों सृजन शिल्पियों का एक बड़ा समुदाय भी इसी परिवार में से निकला है तो भी परिजनों की संख्या और उसमें से उभरी हुई उच्चस्तरीय प्रतिभाओं की संगति मिलाई जाती है जो स्थिति निराशाजनक ही दीखती है।
चिन्तन, स्वभाव एवं क्रिया-कलाप में ऐसा परिवर्तन आना है कि वे सर्म्पक क्षेत्रों में अन्यान्यों का ढाल सकने काले साँचे की भुमिका निभा सकें। ‘डाई’ से पुर्जे पेन्ट्रल बनते चले जाते हैं। उसे कुशल कारीगरों के अभ्यस्त हाथ तथा अनुभवी मस्तिष्क ही सही रुप में बना पातें है। जो शिक्षार्थी गायत्री नगर में आयेगे उन्हें प्रवक्ता अध्यापक बनाना होता तो चिश्चय ही यह बहुत सरल था। कला सीखना सिखाना कठिन नहीं है, पर व्यक्तित्वों को ढालना, बदलना, हीरा तराशने और खरादने जैसा कठिन है।
चिन्तन और चरित्र में परिवतन होता चला जाय।
चिन्तन उलटती है तो अपने बुने जाले के धागो को समेटती, निगलती चली जाती है। निविड़ दीखने वाले बन्धन देखते-देखते साँझ के रंगीन बादलों की तरह अदृश्य होने लगते हैं।
चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता। इस मूल तत्व की अवज्ञा करके किसी को भी उस प्रखरता का लाभा नहीं मिल सकता जिसके साथ अगणित निभूतियाँ, विशेषताएँ, एवं समर्थताएँ जुडी रहती हैं।
चिन्तन उपलब्ध होने से जीवन क्रम बदलेगे और प्रतिभा उभरने का लाभ नहीं मिलता ? इसके उत्तर में बीज, फसल और खाद पानी का उदाहरण देना होगा। उत्कृष्ट चिन्तन बीज है। उसकी आवश्यकता अपरिहार्य है। वह न हो तो अंकुर उगने से लेकर फल लगने तक का आधार ही नहीं बनता।
चिन्तन, जीवन-दर्शन की यथार्थत के साथ जुड़ सके तो काम चले। सोचा जाय कि अन्य प्राणीयों की तुलना में मनुष्य को जो ‘विशेष’ मिला है वह शौक-मौज भर के लिए है ? विचारा जाय कि चौरासी चक्र से छूटने के-पूर्णता तक पहुँचने के ईश्वर के साथ अनन्य होने के इस र्स्वण सुयोग को आगे भी इसी तरह नष्ट करते रहना उचित है जैसा कि अब तक किया जाता रहा ? लोग कहते और क्या करते हैं इसे देखने, सुनने और उन्हीं का अनुकरण करने से तो एक के पीछे एक एक करके गर्त में गिरने वानी भेड़ों की तरह अपनी भी दुर्गति ही होनी है। क्या इस दुर्भाग्य से बचा नहीं जा सकता।
चिन्तन, विज्ञान वगैरा चाहे जिन निमितों से उत्पन्न हो, वही सत्याग्रही का ईश्वर या आत्मा है। यह बल उसे बाहर के साधनों या समाज में से नहीं मिलता। वह अपने भीतर ही इसका अनुभव करता है।
चिन्तन की कसौटी पर उनकी वह मनगढन्त नितान्त बनावटी लगती है जिसका आश्रय लेकर वे अपनी जागरुकता को कर्त्तव्य पाि पर चलने से रोके रहते है।
चिन्तन को ऊँचाई देकर समाप्त हो गया।
चिन्तन-भविष्य के लिए नीति निर्धारण और उस अपनाने के लिए अभीष्ट उपायों का सुनियोजन। इन चारा आधारों के समन्वय से ही जीवन आत्मोर्त्कष के लक्ष्य तक पहुँचते और महती सफलता का आनन्द लाभ करते है। गायत्री नगर में बसने वालों को इसी स्तर की साधना पद्धति अपनानी पड़ती है। यही है मनोनिग्रह-आत्मविजय- स्वनिर्माण। इसी के साथ ऋद्धियों और सिद्धियों का भौतिक और आत्मिक सफलताओं का श्रेय साधन जुड़ा हुआ है।
चिन्तन चरित्र में नहीं उतरा और देव चिन्तन के रहते हुए भी देवत्व का प्रत्यक्ष अस्तिव दृष्टिगोचर नहीं हुआ। इस कमी का एक ही करण है। बीजोरोपण के उपरान्त उपयुक्त खाद पानी का न मिलना।
चिन्तन, चरित्र एवं लक्ष्य हो वह आधार है, जिस पर व्यक्तित्व की गरिमा टिकी हुई है। यदि इस केन्द्र बिन्दु पर निकृष्टता आधिपत्य करले तो समस्त उपलब्धियाँ हेय प्रयोजनों के लिए ही प्रयुक्त होती रहेंगी और फलतः पाल, पतन और त्रास विनाश का संकट ही उत्पन्न होता रहेगा। वह प्रगति कैसी जिसमें जलने और जलाने का- गिरने और गिराने का ही उपक्रम चलता रहे।
चिन्तन का स्तर उठाने तक सीमित बनकर रह गया। घर, गाँव और मुहल्ले का - सम्बन्धियों और कुटुम्बियों का समुदाय भी ऐसा नहीं रहा जिसमें सुसंस्कारिता गहराई तक भरी होती । ऐसी दशा में उपयोगी अध्ययन अपने जीवन्त होने का प्रमाण चिन्तन को ऊँचाई देकर समाप्त हो गया।
चिन्तन और लक्ष्य को ऊँचा रखा जाये और उत्साहपूर्वक उसके लिए निरन्तर कर्त्तव्यरता रहा जाये। कर्मनिष्ठा पर प्रसन्नता-अप्रसन्नता को आधारित कर लेना सदा प्रसन्न रहने का रहस्यमयी आधार है। दूरदर्शिता, पूर्ण योजना बनाना और परिस्थितियों को देख्रते हुए उनमें हेर-फेर करना उचित है। इतने पर भी आवश्यक नहीं है कि पुरुषार्थ का प्रतिफल अनुकूल ही हो। ऐसी दशा में मनुष्य के हाथ में इतना ही है कि वह स्थिति के साथ ताल-मेल बिठाये और कर्त्तव्य पालन पर अपने को गौरवान्वित अनुभव करने और प्रसन्न रहने का प्रयत्न करे।
चिन्तन और आचरण जैसा होता है उसकी तुलना में जागृतों के सोने और करने में भारी अन्तर रहता है। जागृतों का मोह ग्रस्तों की तरह नहीं सोचना चाहिए, उन्हें सुख में ही लिप्त नहीं रहना चाहिए। सन्तोष भी उपार्जित करना चाहिए। बड़प्पन ही पर्याप्त नहीं महानता भी अभीष्ट है। वावाही लूटने के लिए उद्धत प्रदर्शन का सरंजाम जुटाने में सार नहीं, महत्व उस लोक श्रद्धा का है जो उत्कृष्टता और उदारता अपनाने पर प्रयुर परिमाण में उपलब्ध होती और अन्तरात्मा को आनन्द भीर पुलकन से परितृप्त करती है।
चिन्तन और क्रिया कलाप की सुनियोजित दिशा धारा। आमतौर से लोग अनढंग, उच्छ खल, अव्यवस्थित और अस्तव्यस्त जीवन जीते है। बन्दरों की तरह मचकते और कुत्तों की तरह भटकते हुए मन योग और श्रम समय की बर्बादी होती रहती है। कुसंस्कार मनुष्य को जहाँ तहाँ घसटते फिरते है। पशु प्रवृत्तियों हावी रहती है।
चिन्तन कर रहे ह।
चिन्तन बीज है। उसकी आवश्यकता अपरिहार्य है। वह न हो तो अंकुर उगने से लेकर फल लगने तक का आधार ही नहीं बनता। इस अभाव में तो पूर्ण अवरोध ही बना रहेगा। इतने पर भी यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि इस प्रसंग में बोया हुआ बीज, अंकुर भर बन सकता है।
चिन्तन भ का है। न किसी के लिए पेट भारी पड़ता है और न परिवार। बोझिल तो वह मूर्खता है जो लिप्सा तृष्णा के रुप में जोंक की तरह शिराओं में दाँत गढाये रहती है। आवश्यकता हर किसी की पूरी हो सकती है पर तृष्णा की आग को बुझा सकना कितने ही प्रचुर वैभव से नहीं हो सकता। ईंधन पड़ने पर वह शान्त कहाँ होती, दूनीं-चौगुनी भड़कती है।
चिन्तन और चरित्र का अभ्यस्त .... जहाँ तक सुसंस्कारिता की उपलब्धि का सम्बन्ध है वह सत्प्रवृतियों के सम्बन्घ में निस्वार्थ भाव से निरत हुए बिना और किसी प्रकार सम्भव ही नहीं हो सकती। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए गायत्री नगर के निवासियों में से प्रत्येक के लिए उसकी योग्यता एवं स्थिति के अनुरुप सेवा कार्य करने में नियोजित किया जाता है। इसके लिए न्यूनतम चार घन्टे निर्धारित है। जिन्हें परमार्थ परायणता की देव साधना में सेवा संलग्नता में अधिक रस आने लगे उनके लिए अधिक अवसर भी उपलब्ध हो सकता है किन्तु चार घन्टे तो इसके लिए अनिवार्य ही रखे गये है। इससे छूट्टी रुग्णता जैसे अरिहार्य कारणों से मिल सकती है।
चिन्तन के रहते हुए भी देवत्व का प्रत्यक्ष अस्तिव दृष्टिगोचर नहीं हुआ। इस कमी का एक ही करण है। बीजोरोपण के उपरान्त उपयुक्त खाद पानी का न मिलना।
चिन्तन का प्रवाह मोड़ने में उस प्रयास को उत्साहवर्धक ही नहीं आशातीत कही जाने वाली सफलता भी मिली है। इतने पर भी उसका प्रत्यक्ष प्रतिफल दृष्टिगोचर नहीं हो सका। चिन्तन चरित्र में नहीं उतरा और देव चिन्तन के रहते हुए भी देवत्व का प्रत्यक्ष अस्तिव दृष्टिगोचर नहीं हुआ। इस कमी का एक ही करण है। बीजोरोपण के उपरान्त उपयुक्त खाद पानी का न मिलना।
चिन्तन ने- समय के इसी दबाव ने गायत्री नगर बनाने को प्रेरणा दी और इस इमारत का काम चलाऊ अशं बनकर तैयार भी हो गया हैं। अब उसमें इतनी जगह हो गई है कि मन मसोस कर न बैठा जाय। जो करना है उसके लिए कुछ कर सकने के लिए कदम बढ़या जाय। देवालय, धर्मशाला बनाने की बात न कभी सोची गई और न सोची जा रही है। धनी मानी यश लिप्सा या पुण्य लूटने की दृष्टि से उस उस प्रकार के भवन बनाते रहते हैं।
चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता। इस मूल तत्व की अवज्ञा करके किसी को भी उव प्रखरता का लाभ नहीं मिल सकता जिसके साथ अगणित विभूतियाँ, विशेषताएँ, एवं समर्थताएँ जुडी रहती हैं।
चिन्तन को अर्न्तमुखी बनाना है। बहिर्मुखी मनःपरिस्थितियों की अनुकूलता में सुखी और प्रतिकूलताओं में दुःखी रहता है। विश्व व्यवस्थ में इस प्रकार के परिवर्तन आते रहना नितान्त स्वाभाविक है। सदा दिन ही रहे रात न आवे ऐसी अपेक्षा करना र्व्यथ है। सफलता एवं अनुकूलता की सदा हस्तगत रहे यह भी सम्भव नहीं।
चिन्तन तथा व्यवस्थित पुरुषार्थ के सहारे अपनाई गई गतिविधियाँ ही प्रतिकूलताओं को मोडती-मरोडती तथा उन्हें अनुकूलता में बदलती देखी जाती है। परोक्ष को न समझ पाने वाले ही परिस्थितियों के गुण गाते है। जो तथ्यों तक पहुँचते है उन्हे यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होती कि प्रगति का आधार प्रतिभावान वयक्तित्व ही होता है।
चिन्तन अपनाना चाहिए और ढर्रें में ऐसा परिवर्तन करना चाहिए जिससे इस विषम वेला में आपतित धर्म का निर्वाह कर सकना सम्भव हो सके। ढूँढने से हर कसी को राह मिलती है। यदि आकाँक्षा सच्ची हो तो एक न सही दूसरे ढंग से सही कोई हलनिश्चित रुप से ऐसा निकल सकता है जिसमें निर्वाह भी कठिन न पड़े और जीवन लक्ष्य पाने तथा युग धर्म निभाने का अवसर भी मिलता रहे।
चिन्तन, उपदेश एवं सत्परामश्द्वारा वे समाज को नयी दिशा देते है।
चिन्तन के रुप में प्रकाश किरणें आती है और अन्धकार के साम्राज्य को मिटा देती है।
चिन्तन को प्रभावित और चरित्र को परिष्कृत करने में भी उस वातावरण का प्रयोग हो सकता है जो अवाँछनीय स्तर का होने पर र्म्पक में आने वालों को पतन और पराभव के गर्त में धकेल सकता ह।
चिन्तन और स्वाध्याय में रस आते है। जिनके स्वभाव में कटुता नहीं, जो निन्दा करने के स्थान पर सुझाव या सुधार के आधार प्रस्तुत कर सकतें हैं, ऐसीरचनात्मक प्रवृति ही यहाँ उपयोगी सिद्ध हो सकती है। जिन्हे छिद्रन्वेषण आक्षेप निन्दा भर्त्सना में ही रस आता है, ऐसे निषधात्मक प्रकुति के व्यक्ति यहाँ खप नहीं सकेंगे। अपना लक्ष्य सृजन है- विग्रह एवं विगठन नहीं। निषेधात्मक प्रवृति को तोड़ना भष्ट आता है बनाना नहीं, ऐसे यदि सुणर सकेंगे तो ही उनके पैर यहाँ जम सकेगें।
चिन्तन क्षेत्र तक घुमड़ कर रह गई, उसे कर्म के रुप में परिणित होने का अवसर नहीं मिला। पूर्ण असफलता इसलिए स्वीकार नहीं की जा सकती है कि अखण्ड-ज्योति परिजनों की आस्था, अभिरुचि एवं आकाँक्षा जन साधारण की तुलना में कहीं अधिक उत्कृष्ट पाई जाती है। यदि कोई प्रभाव न पड़ा होता तो मनःस्थिति में इतना असाधारण अन्तर कैसे आया ?
चिन्तन एवं मार्ग दर्शन की आवश्यकता पूरी करते है। यह प्रस्तुतीकरण ही युग बोध कहलाता है। इसी स्तर के प्रतिपादन का स्वाध्याय सार्थक होता है।
चिन्तन प्रतिगामी ढर्रा ही बसधक है। यदि आदर्शवादी आधार अपनाकर नये ढंग से सोचना और गतिविधियों का नये सिरे से निर्धारण कर सकना सम्भव हो सके तो प्रती होगा कि समस्त गुत्थ्याँ सुलझ गई। ऐसा मार्ग निकल आया जिस पर चलते हुए लोक और परलोक का सुव्यवस्थित रीति से सध सकना सम्भव ही नहीं सरल भी है। इस आन्तरिक परिवर्तन के लिए गतिविधियों के अमिट निर्धारण के लिए जो साहस जुटा लेते है वे देखते हैं प्रगति पथ पर बढ चलने की कितनी सहज सुविधा उपलब्ध थी। अदूरदर्शी आदतों ने ही उस सौभाग्य से मुँह मोड़ा था जो ईश्वर ने हर किसी को जीवन लक्ष्य पूरा कर सकने के निमित उदारता पूर्वक प्रदान की है।
चिन्तन आदि के जाल में फँसे रहने वालों को अनेकानेक शारीरिक, मानसिक अधिव्याधियों में फँस जाने और निकृष्ट स्वभाव आचरण के कारण व्यावहारिक जीवन में पग-पग पर ठोकरें खाने और कष्ट सहने की बात कही गई है। कर्म फल में कुछ तो शासकीय और सामान्य व्यवस्था भी सहायक सिद्ध होती है।
चिन्तन किस स्तर का होगा, उसकी झाँकी करने और उसे लोकमानस में जमाने के लिए अखण्ड-ज्योति ने लम्बे समय से प्रयास किया है। प्रतिपादनों के पीछे जुड़े हुए तथ्य और सत्य ने हर विचारवान् को प्रभावित और प्रेरित किया है। चिन्तन का प्रवाह मोड़ने में उस प्रयास को उत्साहवर्धक ही नहीं आशातीत कही जाने वाली सफलता भी मिली है। इतने पर भी उसका प्रत्यक्ष प्रतिफल दृष्टिगोचर नहीं हो सका। चिन्तन चरित्र में नहीं उतरा और देव चिन्तन के रहते हुए भी देवत्व का प्रत्यक्ष अस्तिव दृष्टिगोचर नहीं हुआ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-May
चिन्तन में आत-प्रोत थाँ गति विधियों में आर्दशवादी अनुप्राणित थ। चिन्तन और चरित्र के समन्वय का संस्कृति कहते है। द्रष्ट्रिकोण को दर्शन कहते है। कतृत्व की दिशा धारा धर्म कहलाती है। संस्कृति, दर्शन और धर्म का समन्वय ही अध्यात्म के नाम से जाना जाता है।
चिन्तन और साहसिक निर्धारण ही वह विशिष्टता है जिसके सहारे किन्ही भाग्यवानों को सामान्य स्थिति में रहते हूए भी महा मानव बनने और असाधरण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
चिन्तन एवं रुझान ऐसा चलता रहता है जिसे लिंग भेद की प्रतिक्रिया से विपरीत कहा जा सके। इस प्रकार के लक्षण यह बताते है कि आत्मा अपने कलेवर से असन्तुष्ट है और अगले दिनों अपना लिंग परिवर्तन करने के लिए भीतर ही भीतर बदलता और ढलता जा रहा है। संकल्प बल में परिस्थितियों के बदल डालने की परिपूर्ण क्षमता है उसके प्रमाणों में एक लिंग परिवर्तन को भी सम्मिलित किया जा सकता है।
चिन्तन तथा शरीर को अनय आचरण करने की छूट नहीं मिल सकती। बुद्धिमान भविष्य का निर्माण करते है और उसके लिए मन की ललक लिप्सा पर नियन्त्रण कर सकने में समर्थ भी रहते है और सफल भी होते है।
चिन्तन की कभी रहने से उन्हे मुहावरे में अँधी कहते हैं। अंधी इसलिए कि झुण्ड जिधर भी चलता है, वे सभी बिना सोचे समझे उधर ही चलती जाती हैं। अगर उनके मार्ग में कोई कुआँ, खाई आवे तो एक के पीछे एक उसी में गिरती चली जाती है। स्वतन्त्र चिन्तन का आलस उन्हें यह देखने सोचने तक का अवसर नहीं देता कि ढर्रे पर चलने वाले समुदाय को किस विपत्ति का सामना करना पड़ रहा है।
चिन्तन और कर्म को इसी प्रयोजन में लगाये रहना ही ‘अक्लमन्दी’ की सीमा है। चतुरता यही सिखाती है। वह अपने खेत्र में जब उच्छृंखल होने लगती है तो कृपणता, धूर्तता और दृष्टता के रुप में बढ़ती और ऐसे अनाचारी कृत्य करती है, जिससे कर्त्ता को पतन, तिरस्कार, प्रतिशोध एवं प्रताड़ना का भाजन बनना पड़ता है। उपलब्धियों की मात्रा तो चतुरता के सहारे बढ़ जाती है, पर वह विग्रह और संकट ही खडे़ करती है।
चिन्तन की यही स्थिति जब बनी रहेगी विपतियों ओर विपन्नताओं का ताँता टूटने नहीं है। प्राचनी काल में अन्तःक्षेत्र की सुव्यवस्था ध्यान दिया गया था। फलतः भौतिक द्रष्ट्रि से सुखी, आत्मिक द्रष्ट्रि से समुन्नत बनने का दुहरा लाभ उनने लगा था। स्वंय धन्य बने और संसार को धन्य बनाया। आज संकीर्ण स्वार्थपरता खाये जा रही है।
चिन्तन और साहसिक निर्धारण के सहारे अपना मार्ग स्वयं बना सके।
चिन्तन और चरित्र के समन्वय का संस्कृति कहते है। द्रष्ट्रिकोण को दर्शन कहते है। कतृत्व की दिशा धारा धर्म कहलाती है। संस्कृति, दर्शन और धर्म का समन्वय ही अध्यात्म के नाम से जाना जाता है। भारत की आस्था अध्यात्म पर केन्द्रीभूत थी फलतः व्यक्तियों में महानता भरी रही।
चिन्तन के लिए सर्वोपरि समस्या है जीवन का सदुपयाग। यह अलभ्य अपहार कुचक्र से निकल कर पूणर्पता तक पहुँचने के लिए समस्त सुविधाओं से भरा पूरा है। उसने बडा स्वार्थ साधन दूसरा क्या हो सकता है कि वाहय जीवन में बन्धन मुक्ति की अनुभूतिका आनन्द उठाते हुए इस सुअवसर का लाभ उठाया जायै इसी समस्या का दूसरा पक्ष है प्रगति पथ पर अग्रगमन, अभिनव उपलब्धियों का रसास्वादन। यह सफलता भी आत्मिक क्षेत्र की ही है। भौतिक प्रगति की निर्वाह भरके लिए आवश्यकता है।
चिन्तन का अभ्यास न होने से इस सर्न्दभ में दूर तक जाने में अनख लगता है। प्रचलित ढर्रा स्वभाव का अंग बन जाता है, तो उस का अनुकरण ही सरल लगता है।
चिन्तन ही अगणित समस्याएँ उत्पन्न करता है।
चिन्तन के कारण उद्धिग्न हुआ मस्तिष्क अपनी कार्यक्षमता गँवा बैठता है क्योंकि उस स्थिति में मस्तिष्क की सारी शक्तियाँ कुन्द पड़ जाती है और जड़ हो जाती है। जब इन भावनाओं का आधिपत्य रहता है तो मस्तिष्क कि कर्त्तव्य विपूढ़ होकर यह भूल जाता है कि इन ध्वंसकारी भावनाओं से किस प्रकार उबरा जाए ? उस स्थिति में प्रायः उलटे विचार ही सामने आते है जिन्हें अपनाने पर और नई उलझनें पैदा ही जाती हैं। मकन में आग लगने पर या कोई खतरा अनायास सामने प्रस्तुत होने पर लोग जिस प्रकार अपना सन्तुलन खो बैठते हैं तथा यह नहीं समझ पात कि क्या किया जाए ? न उनमें कुछ सोचने, विवारने और उपाय ढूँढने की ही कोई सामर्थ्य आती है, उसी प्रकार की स्थिति मस्तिष्क की उस समय होती है जब ध्वंसात्मक चिन्ताएँ विचारणएँ भभक उठती हैं।
चिन्तन और चरित्र को साथ सम्बद्ध व्यक्तित्व को परिष्कृत करने को भी समझा जाना चाहिए ही अनुभव किया जाना चाहिए कि जीवन दर्शन ही वह बीज है, जिसकी परिणित, परिस्थितियों का वृक्ष बनती है। दार्शनिक क्रान्ति के सहारे ही मनुष्य की आस्थाओं को ऊँचा उठाया जा सकेगा। उस क्षेत्र का उर्त्कष ही चिन्तन और चरित्र में शालीनता का समावेश करेगा, उस अभिवृद्धि के आधार पर ही समृद्धि से लेकर शालीनता तक के सभी उपयोगी क्षेत्र हरे-भरे होते चले जायेगे।
चिन्तन अपना कर उज्जवल भविष्य की संरचना के लिए उठ खडे़ होना, यह ही है वह निर्धारण जिसका गुरु कृपा, ईश्वरीय अनुकम्पा साधना की सिद्धि आदि नामों से अतंकारिक वर्णन किया जाता है।
चिन्तन और चरित्रा पर भी होती है। पुनर्जन्म, कर्मफल, परलोक और पाप-पुण्य में आस्था जिस प्रकार व्यक्ति को दुष्कर्मो से बचाये रहती है उसी प्रकार शरीर को ही सत्य और आत्मा को मिथ्या मान लिया जाय तो लगता है कि पाप-पुण्य के पचड़े में पड़ने से क्या लाभ? चतुरता के बल पर जितना भी सम्भव हो सके स्वार्थ सिद्ध किया जाना चाहिए।
चिन्तन का आलस उन्हें यह देखने सोचने तक का अवसर नहीं देता कि ढर्रे पर चलने वाले समुदाय को किस विपत्ति का सामना करना पड़ रहा है।
चिन्तन प्रादुर्भूत होता है प्रभावित करती है। अतएव पृथ्वी में व्याप्त चुम्बकत्व से जैव चुम्बकत्व में कोई न कोई साम्य अवश्य होना चाहिये।
चिन्तन और चरित्र में शालीनता का समावेश करेगा, उस अभिवृद्धि के आधार पर ही समृद्धि से लेकर शालीनता तक के सभी उपयोगी क्षेत्र हरे-भरे होते चले जायेगे।
चिन्तन, निर्धारण, स्तर एवं भविष्य इसी स्तर का रहता है। वे दुःख देते ओर दुःख पाते अपना समय बिताते, गंवाते, अंधकार में गिरते मरते है। यह दैत्य परम्परा है।
चिन्तन अपनाया जाता है। कर्तव्य पालन की बात भुला कर जब व्यामोह की अवाँछनीयता अपनाई जाती है, तो परिजन दुर्गुणी और लोभी विलासी बनते जाते हैं। ऐसी दशा में उन्हे सन्तुष्ट करने के लिए किये गए पक्षपात पूर्ण प्रयास भी कारगर सिद्ध नहीं होते, वरन् उल्टे पड़ते जाते है। हेय द्रष्ट्रिकोण के रहते प्रजनन बढ़ता ओर समस्याओं का बोझ सिर पर लदता जाता है। स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाने की अपेक्षा जब परिजनोंको सुविधाओं से लादने की द्रष्ट्रि रहती है तो फिर उस विष सिचन से मात्र नरक का ही उत्पादन हो सकता है।
चिन्तन एवं विशिष्ट साहस के दोनों पंख खोलकर लम्बी उडान भरते हैं। ईश्वरीय अनुग्रहों में महा मानव ऋषि कल्प, देवदूत अवतार जैसी कितनी ही ऐसी विभूतियाँ है। जिन्हें पाने वाला धन्य होकर रहता है। इन्हें पाने के लिए परमार्थ अपनाना पडता हैं।
चिन्तन और पराक्रम की द्रष्ट्रि से अपंग ओर प्रति जैसा बनकर रह जाता है। उससे ऐसा कुछ सोचते नहीं बन पड़ता जिससे आत्मिक प्रगति, शान्ति शक्ति उपर्जित कर सकना सम्भव हो सके।
चिन्तन की दिशा मोड़ने के लिए साहस जुटाना पड़ेगा। भले ही कितना ही कष्ट साध्य समय साध्य ओर श्रम साध्य क्यों न हो। युग समस्याओं के समाधान में यही नीति अपनानी होगी। सही निदान चिकित्सा बन पड़ती है और सही उपचार होने रोग निवृति का सही आधार बनना है। आवश्यकता जीवन दर्शन में घुसे हुए विभ्रम को निरस्त करने की है।
चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टावादी जीवन दर्शन ओत-प्रोत था। फलतः साधनों की कमी रहने पर भी उन दिनों देवत्व उभरा-उभरा फिरता था। आज सुविधाओं की कमी नहीं। शिक्षा ओर परम्परा का आर्श्चयजनक उर्त्कष हुआ है। विज्ञान औ व्यवसाय में ही नहीं कला ओर शिल्प में भी अभ्युदय के उच्च् शिखर तक पहुँचने में सफलता पाई है।
चिन्तन क्षेत्र पर पूरी तरह आधिपत्य कर लिया है। फलतः मनुष्य शरीरचर्या के अतिरिक्त कुछ सोचता ही नहीं। आत्म सत्ता को उसकी आवश्यकता का एक प्रकार से भुला ही बैठा है। उपभोग संचय औश्र ममत्व के परिपोषण में ही सामर्थ्य का सारा स्त्रोत चुक जाता है। भीतर से खोखला बाहर से ढकोसला बना आज का मनुष्य अपने ओर दूसरों के लिए समस्या बन कर रह रहा है।
चिन्तन शरीरी पर उत्साहवर्धक अनुकल प्रभाव डालता है और इसके विपरीत ध्वंसत्माक चिन्तन के कारण उद्धिग्न हुआ मस्तिष्क अपनी कार्यक्षमता गँवा बैठता है क्योंकि उस स्थिति में मस्तिष्क की सारी शक्तियाँ कुन्द पड़ जाती है और जड़ हो जाती है। जब इन भावनाओं का आधिपत्य रहता है तो मस्तिष्क कि कर्त्तव्य विपूढ़ होकर यह भूल जाता है कि इन ध्वंसकारी भावनाओं से किस प्रकार उबरा जाए ? उस स्थिति में प्रायः उलटे विचार ही सामने आते है जिन्हें अपनाने पर और नई उलझनें पैदा ही जाती हैं। मकन में आग लगने पर या कोई खतरा अनायास सामने प्रस्तुत होने पर लोग जिस प्रकार अपना सन्तुलन खो बैठते हैं तथा यह नहीं समझ पात कि क्या किया जाए ? न उनमें कुछ सोचने, विवारने और उपाय ढूँढने की ही कोई सामर्थ्य आती है, उसी प्रकार की स्थिति मस्तिष्क की उस समय होती है जब ध्वंसात्मक चिन्ताएँ विचारणएँ भभक उठती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-March
चिन्तन, दृष्टिकोण एवं सम्मान में आदर्शवादिता और उत्कृष्टता का समावेश करते हों, स्वार्थपरता को घटाते और लोक निष्ठा को बढ़ाते हों। धर्म और अध्यात्म का सारा ढाँचा मात्र इसी प्रयोजन के लिए तत्वदर्शियों ने खड़ा किया है।
चिन्तन कहेगा-नहीं-नहीं-नहीं। आत्मा इतना हेय और हीन नहीं हो सकता। वह इतना अपंग और असमर्थ-पराश्रित और दुर्बल कैसे होगा? यह तो प्रकृति के पराधीन पेड़-पौधों जैसा-मक्खी, मच्छरों जैसा जीवन हुआ। क्या इसी को लेकर-मात्र जीने के लिए मैं जन्मा।
चिन्तन से मिश्रित कल्पना भौतिक अन्वेषणकर्ता का सर्वाधिक शक्तिशाली यन्त्र है।
चिन्तन और आदर्शवादी कर्तृत्व को जन साधारण के दृष्टिकोण, स्वभाव एवं अभ्यास में ध्यान दिलाने के लिए घनघोर प्रयास करने होंगे। इसके लिए प्रत्येक धर्म प्रेमी को सामयिक कर्त्तव्य समझकर सर्वतोभावेन संलग्न होना चाहिए। धर्म शिक्षा का, आत्म विद्या का प्रशिक्षण इन दिनों इसी केन्द्र पर केन्द्रित रहना चाहिए- इसी प्रयास को आत्म-कल्याण-स्वर्ग-मुक्ति एवं ईश्वर प्राप्ति की सर्वोत्तम युग साधना बनाया जाना चाहिए। धर्म और ईश्वर के नाम पर खर्च होने वाला प्रत्येक पैसा और समय का प्रत्येक क्षण इसी केन्द्र पर केन्द्रित किया जाना चाहिए।
चिन्तन न कर सके। अँग्रेजों के समय से चले आ रह ढर्रे को ही चलाते रहे। स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी हम आगे बढ़ नहीं पाये, इसका कम से कम आधा दोष तो वर्तमान निरुद्देश्य शिक्षा पद्धति को दिया ही जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है शिक्षा प्रक्रिया में क्रान्तिकारी सुधार होना चाहिए। सरकार इस आवश्यकता को अनुभव न करे तो जनता को-बुद्धिजीवियों को इसके लिए ऐसे प्रबल प्रयत्न करने चाहिएं जिससे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो सके ।
चिन्तन का प्रकाश मिल सके तो सचमुच उनका प्रयास शिक्षा परिवर्तन की प्रेरणा उत्पन्न करने की दृष्टि से अतीव उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
चिन्तन किया जाय उतना ही स्पष्ट होता जायगा कि उसमें लाभ की तुलना में हानि अधिक है।
चिन्तन, ध्यान आदि मनोयोग सम्बन्धित कार्यों में लगती है, पर जननेन्द्रिय विद्युत तो स्पर्श के माध्यम से बहिर्गमन के लिए व्याकुल रहती है। यही कामोत्तेजना का वैज्ञानिक स्वरूप है।
चिन्तन कर रहे थे और सोच रहे थे-क्या जिस प्रकार रेडियो एक निश्चित फ्रीक्वेंसी पर लगाये जाने पर केवल उसी फ्रीक्वेंसी पर प्रसारित रेडियो स्टेशन की खबरें ग्रहण करता है-ठीक उसी प्रकार मनुष्य के मस्तिष्क को भी मानसिक शक्तियों द्वारा विचार और सन्देश भेजे जा सकते हैं? अभी यहीं समाधान नहीं हो पा रहा था कि साधु के हाथ का एक विलक्षण झटका सा लगा और ऐसा लगा कि शरीर में बिजली की सी एक कोई शक्ति भरने लगी। शरीर धीरे-धीरे कोमल हो चला, तन्द्रायें जाग उठीं, मन का अन्धकार घुलने लगा, ऋतम्भरा प्रज्ञायें जागने लगीं। सब कुछ अलौकिक था। उससे भी अलौकिक थीं वह अनुभूतियाँ जो उस सम्मोहित अवस्था में स्वप्न की नाईं मस्तिष्क में स्पष्ट उभरने लगीं।
चिन्तन और कर्तृत्व में अवाँछनीयता न बढ़ने देने के लिए एक अति प्रभावशाली अंकुश है। अध्यात्म की मान्यता व्यक्ति को सदाचरण और आदर्शवादी कर्तव्य पालन के लिए घाटा उठाने तक के लिए प्रोत्साहित करती है। यही वे प्रवृत्तियां हैं जिन पर व्यक्ति का स्तर और समाज का गठन सुव्यवस्थित और समुन्नत रखा जा सकता है।
चिन्तन परिधि बढ़ती जा रही है। उसकी क्षमताओं का विकास हो रहा है। संपर्क, संबंध, अपनत्व और उत्तरदायित्व भी इसी प्रकार बढ़ रहा है। हमें उसे समझना चाहिए और अपने मनः क्षेत्र को उस विस्तार को स्वीकार कर सकने योग्य उदात्त दृष्टिकोण से युक्त करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-December
चिन्तन धारा प्रस्तुत करने वाले अनेक मनीषी एक ही समय में उत्पन्न हुए। भले ही वे विभिन्न देशों में जन्में हों। भले ही उनका परस्पर परिचय न रहा हो पर प्रतीत होता है कि एक ही प्रपात से उठने वाले बुद्बुदों की तरह वे ही समय की आवश्यकता पूरी करने में जुटे हुए थे।
चिन्तन की धारायें किसी प्रकार परिष्कृत की जा सकती हैं। प्रकृति की क्षमतायें उपयोग में लाकर अनेक सुविधायें पाई जा सकती हैं पर उन सुविधाओं का समुचित उपभोग करने के लिए मनुष्य की चिन्तन प्रक्रिया का आधार क्या हो यह बताना दर्शन का काम है। दर्शन वृक्ष है और विज्ञान उसकी एक टहनी। विज्ञान वेत्ता की तुलना में दार्शनिक का कार्यक्षेत्र और उत्तरदायित्व अति विस्तृत है।
चिन्तन और मनन ही काफी नहीं अभिरुचि की प्रगाढ़ता से आस्था बलवती होती है। उसी बलिष्ठता के बलबूते मनुष्य महान बनता है। पर अभिरुचि का आकर्षण आमतौर से इन्द्रिय लिप्सा और मानसिक समर्थता में से एक को प्रधान बनाना होता है। इनमें से जिस पर अभिरुचि केन्द्रित रहेगी प्रगति उसी दिशा में होगी।
चिन्तन प्रक्रिया का आधार क्या हो यह बताना दर्शन का काम है। दर्शन वृक्ष है और विज्ञान उसकी एक टहनी। विज्ञान वेत्ता की तुलना में दार्शनिक का कार्यक्षेत्र और उत्तरदायित्व अति विस्तृत है।
चिन्तन एवं अनुभव के आधार पर विकसित होता है। अन्तःकरण की अभिव्यंजना परावाक् को स्वस्थ, शुद्ध समुन्नत एवं सशक्त बनाने के लिए साधना करनी पड़ती है। साधना शारीरिक बलवर्धन के लिए भी होती है और मस्तिष्क को विकसित करने के लिए भी। व्यायाम, अध्ययन आदि को शरीर एवं मन की साधना कह सकते हैं। यदि इनका अवलम्बन न लिया जाय तो वे दोनों अविकसित पड़े रहेंगे।
चिन्तन को अपर्याप्त एकाँगी मानना होगा तथा ज्ञान और कर्म के समन्वय सन्तुलन पर जोर देना पड़ेगा।
चिन्तन एवं भावनात्मक प्रसंग में श्रद्धा की आत्मानुभूति को मान्यता दी जाय।
चिन्तन के द्वार अवरुद्ध कर दिये हैं। ऐसी दिशा में सूझ नहीं पड़ता कि बुद्धिमत्ता की कमी किस प्रकार पूरी की जाय?
चिन्तन तथा अनुभूति उनमें नहीं है। पर मानवी विद्युत जिसे ‘प्राण’ कहा जाता है, जड़ अणुओं के समूह में चेतना, विचारणा और अनुभूति उत्पन्न कर देती है और सजीव जीवन आरम्भ कर देती है। निर्जीव, अनुभूति रहित जीवन तो पत्थर चट्टानों में भी रहता है।
चिन्तन की भी उपयोगिता है। वह कार्य दार्शनिक रीति-नीति से ही सम्भव हो सकता है। कहना न होगा कि यह प्रयोजन भारतीय दर्शन जितनी अच्छी तरह पूरा करता है उतना संसार का अन्य कोई दर्शन नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-May
चिन्तन में कोई स्थान न होगा, हर व्यक्ति यही सोचेगा कि जिस समाज के अनुदान से उसका व्यक्तित्व विनिर्मित और विकसित हुआ है उसे सुविकसित समुन्नत बनाने के लिए अधिक से अधिक योगदान करना चाहिए। ऐसी मनःस्थिति में हर मनुष्य स्नेह और सौजन्य का प्रतीक होकर रहेगा। शालीनता और सज्जनता उसकी नीति होगी। अपने लिए कम दूसरों के लिए अधिक की प्रतिस्पर्द्धा में लोग अधिकार के लिए नहीं लड़ेंगे वरन् कर्त्तव्य पालन में कौन अग्रणी रहा इसकी प्रतिस्पर्द्धा करेंगे। तब मनुष्य मनुष्य का शत्रु नहीं मित्र बनकर रहेगा।
चिन्तन की दिशा मोड़ी जा सकती है। भ्रष्ट साधनों से लोक मानस को दूषित करने में संलग्न दुष्प्रवृत्तियों से झगड़ना ही काफी नहीं वरन् उनकी तुलना में हर क्षेत्र में उत्कृष्टता विकसित करने वाले साधन खड़े करने होंगे। श्रेष्ठता के अभाव में लोग निकृष्टता अपनाते हैं। निकृष्टता की निन्दा करना ही काफी नहीं वरन् उसका सही विधायक तरीका यह है कि उत्कृष्ट आधारों को विकसित करने में सृजनात्मक शक्तियाँ इस प्रकार जुट जायें कि जनता को भले-बुरे का अन्तर पहचानने- दोनों में से किसी एक का वरण करने का अवसर मिल सके। जब तक भ्रष्टता ही स्वच्छन्द विचरण करती है, जन मानस को प्रभावित करने की सारी क्षमता उसी के हाथ है तब तक अपकर्ष ही जीतता रहेगा।
चिन्तन माना जाना चाहिए। इसे आत्म-बोध या आत्म-जागरण साधना भी कह सकते हैं।
चिन्तन और समापन की गतिविधि उपासना पद्धति गुरु देव के प्रत्येक परिचित और संपर्क में रहने वाले को आरम्भ कर देनी चाहिए। इस प्रकार जोती हुई भूमि में उनके लिए उन विभूति वृक्षों का आरोपण सम्भव होगा जिनकी कि इन दिनों वे पौध तैयार कर रहे हैं।
चिन्तन और कर्त्तव्य इसी दिशा में नियोजित रहना चाहिए। यही है आत्मबोध यही है आत्मिक जीवन क्रम। इसी को अपनाकर हम अपने अवतरण की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं।
चिन्तन तो नियोजित किया ही गया होता जितना कायिक मानसिक उपलब्धियों के लिए किया जाता है।
चिन्तन के बिना आ ही नहीं सकती। यदि यह अभाव दूर न हो सके तो कोई व्यक्ति सम्मान और श्रद्धा का भाजन न बन सकेगा। सच्चा सहयोग और स्नेह किसी का भी उपलब्ध न कर सकेगा। इन जटिलताओं से ग्रसित व्यक्ति किसी भी दिशा में ठोस उन्नति नहीं कर सकता। तब या तो उसे अविकसित पशु-जीवन जीना पड़ता है या महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति उद्धत आचरण से करनी पड़ती है।
चिन्तन और शारीरिक कर्तृत्व पर पर्यवेक्षक अफसर-अधिकारी की तरह निरीक्षण, नियन्त्रण तथा अव्यवस्था का तत्काल निराकरण।
चिन्तन प्रवाह का पूरक है। अपनी मानसिक गति-विधियों और शारीरिक क्रिया कलापों का शवच्छेद विश्लेषण करना चाहिए और देखना चाहिए कि मनुष्यता के आदर्शों में से कितना अंश गुण, कर्म, स्वभाव में सम्मिलित हो गया। उपलब्धियों पर सन्तोष व्यक्त करना चाहिए और जो कमी दिखाई पड़े उन्हें पूरा करने के लिये क्या किया जाय? कैसे किया जाया? कब किया जाय?
चिन्तन, मनन आदि से शुद्ध कर दिया जाय तो समाधान होने के बाद भी वह सदा उसी स्थिति में बना रहेगा ऐसी आशा नहीं की जानी चाहिए।
चिन्तन तो नहीं चल रहा- शरीर असुर कर्म तो नहीं कर रहा। ऑटोमेटिक मशीनें अपने आप चलती रहती हैं और उनके निरीक्षक मशीन की गति विधियों को सतर्कता पूर्वक बैठे देखते रहते हैं। जहाँ तनिक सी भी कोई गड़बड़ी दिखाई पड़ती है तुरन्त सुधारते हैं। अपनी जिम्मेदारी समझते हैं कि यदि मशीनों ने गड़बड़ की तो उस निरीक्षक के कान खींचे जायेंगे। ठीक यही दृष्टि जागृति के प्रत्येक क्षण में बनाये रखनी चाहिये और असुर चिन्तन अथवा अशुभ कर्म का आरम्भ होते ही उसे प्रचण्ड विरोध करके निरस्त करना चाहिए।
चिन्तन किसी भी देश धर्म या वर्ग के व्यक्ति को उसी स्थान पर पहुँचा देगा जिसके लिए भारतीय अध्यात्म अनादि काल से अंगुलि निर्देश करता रहा है।
चिन्तन स्पष्ट है, उसकी रूप-रेखा उनके सामने है पर चूँकि वह अभियान नारियों द्वारा ही चलाया जाना है—इसके लिए संगठन, प्रचार, आन्दोलन आदि को अपने हाथ में उन्हें ही लेना है। और वह कार्य लदे हुए बोझ को पूरा करने में ही चरमराने लगने वाली मैं उठा नहीं सकती थी अवसर और अवकाश भी नहीं था, इसलिए वह पिछले दिनों हो भी नहीं सका। सम्भवतः आगे उस योजना की रूप-रेखा स्पष्ट हो और नारी जागरण का—उसकी प्रतिभा को युग परिवर्तन में प्रयुक्त करने का—कोई सुनिश्चित अभियान खड़ा हो सकेगा। जब शाँतिकुञ्ज को नारी जागरण का केन्द्र ही बनना है तो वहीं से देशव्यापी-विश्वव्यापी, नारी उत्कर्ष का सर्वांग पूर्ण आन्दोलन भी सुसंचालित किया जा सकेगा।
चिन्तन की इस परिष्कृत प्रक्रिया को जल मानस में प्रतिष्ठापित करना पड़ेगा जो मानवीय गरिमा के अनुरूप है। किसी धर्म सम्प्रदाय, सन्त या ग्रन्थ को बुद्धि बेच कर किसी का भी अन्धानुकरण न करने की बात हर किसी के मन में घुसती चली जायेगी और जो न्याय, विवेक, सत्य एवं तथ्य की कसौटियों पर खरा सिद्ध होगा उसी को स्वीकारने की प्रवृत्ति बढ़ेगी। इस आधार के प्रबल होते ही न अनैतिकताओं के लिए कोई स्थान रह जायेगा और न झूठी मान्यताओं के लिए। निर्मल और निष्पक्ष चिन्तन किसी भी देश धर्म या वर्ग के व्यक्ति को उसी स्थान पर पहुँचा देगा जिसके लिए भारतीय अध्यात्म अनादि काल से अंगुलि निर्देश करता रहा है।
चिन्तन-मनन की प्रक्रिया चलाई जा सकती है। कम से कम पन्द्रह मिनट तो इसमें भी लगाने चाहियें। चिन्तन करना चाहिये कि अपना आपा-ईश्वर का अंश पुत्र और प्रतिनिधि, शुद्ध, निर्विकल्प दिव्य चेतना एवं दिव्य क्षमताओं से परिपूर्ण है। अपना शुद्ध स्वरूप यही है, शरीर और मन अपने दो औजार-वाहन हैं। इन्हें अपने से पृथक रखकर दो सेवकों के रूप में देखने समझने की मान्यता विकसित करनी चाहिए।
चिन्तन में शालीनता, व्यवहार में सहृदयता और गतिविधियों में प्रखरता उच्चस्तरीय चिन्तन के बिना आ ही नहीं सकती। यदि यह अभाव दूर न हो सके तो कोई व्यक्ति सम्मान और श्रद्धा का भाजन न बन सकेगा। सच्चा सहयोग और स्नेह किसी का भी उपलब्ध न कर सकेगा। इन जटिलताओं से ग्रसित व्यक्ति किसी भी दिशा में ठोस उन्नति नहीं कर सकता। तब या तो उसे अविकसित पशु-जीवन जीना पड़ता है या महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति उद्धत आचरण से करनी पड़ती है।
चिन्तन एवं परिष्कृत वातावरण का पोषण न मिलेगा तो निश्चय ही मानवीय उत्कृष्टता समाप्त होती चलेगी और उस समाज की भी जड़ें खोखली करेगी।
चिन्तन और कर्तृत्व का अधिकाँश भाग उपरोक्त दो प्रयोजनों की पूर्ति में ही नियोजित है। आदमी जो सोचता है जो करता है उसके पीछे शारीरिक और मानसिक लाभ ही प्रधान होते हैं। सामाजिक कर्तृत्व उन दिनों की सुविधा के लिए ही वहन किये जाते हैं। गृहस्थ जीवन में प्रवेश, विवाह, संतानोत्पादन, परिवार व्यवस्था, आजीविका, मैत्री, यशोपार्जन, पद, नेतृत्व आदि जनसंपर्क एवं समाज सम्बन्ध के लिए मनुष्य शरीर और मन की सुविधा को ध्यान में रख कर ही प्रवृत्त होता है। यही सब तो हम अपने चारों ओर होता हुआ देखते हैं।
चिन्तन ही होता है। यदि यह घटिया और ओछा रहा तो तात्कालिक प्रगति के लक्षण भले ही चकाचौंध पैदा कर दें। भावनात्मक खोखला पन रहने पर तथा-कथित प्रगति बालू के महल की तरह तनिक-सा आघात लगने पर ढह जायेगी।
चिन्तन उत्कृष्ट बनेगा और न कर्तृत्व श्रेष्ठ बनेगा। यह न हो सका तो व्यक्ति ओछा-निकृष्ट ही बना रहेगा। ऐसी दशा में उसका आन्तरिक पिछड़ापन-असीम सुख-साधनों के रहते हुए भी उसे शोक-संताप ग्रस्त बनाये रहेगा। न वह स्वयं चैन से रहेगा न दूसरों को चैन से रहने देगा। दूध पीने पर सर्प का विष बढ़ने की तरह आन्तरिक दुष्टता साधनों की वृद्धि के साथ-साथ और भी अधिक भयंकर बनेगी।
चिन्तन और कुछ प्रयत्न निरन्तर करते रहना चाहिए।
चिन्तन एवं प्रयोग किये जा रहे हैं। सो उचित भी है। क्योंकि व्यक्ति की तरह समाज भी बहुमुखी है और उसकी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेक साधनों को जुटाना ही पड़ेगा। शासन सैन्य उद्योग, व्यवसाय, नियन्त्रण, शिक्षा, कला, विज्ञान, कृषि, पशु पालन, चिकित्सा, विनोद प्रभृति अगणित आवश्यकतायें समाज की हैं और उनकी पूर्ति यथावत की ही जानी चाहिए। पर साथ ही यह भूल नहीं जाना चाहिए कि किसी भी समाज या राष्ट्र की समर्थता का-प्रगति का-प्रधान कारण उसका चरित्र एवं चिन्तन ही होता है।
चिन्तन तथा कर्तृत्व भी उन तक पहुँचाना मेरा काम है। आखिर मुझे सन्देश वाहक ही तो नियुक्त किया गया है। इधर की बात उधर और उधर की बातें इधर पहुँचाने के लिए ही यह शाँति कुञ्ज का माध्यम बनाया गया है। सामान्यतया हर परिजन से यह आशा करूंगी कि वे इस अंक में व्यक्त विचारों और निर्देशों के सम्बन्ध में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें और उसे पत्र द्वारा मुझे लिख दें। वह समस्त अभिलेख जब वे इधर आयेंगे तब उनके सामने प्रस्तुत कर दूँगी।
चिन्तन का अर्थ है अपने स्वरूप का-लक्ष्य तथा कर्त्तव्य का स्पष्ट चित्र मनोभूमि में प्रखर करना।
चिन्तन, मनन और समापन इन चार भागों में हमें अपनी उपासना पद्धति को विभाजित कर लेना चाहिए।
चिन्तन अथवा अशुभ कर्म का आरम्भ होते ही उसे प्रचण्ड विरोध करके निरस्त करना चाहिए।
चिन्तन के आधार पर विनिर्मित किया गया है उसे जो कोई गम्भीरता पूर्वक समझने की चेष्टा करेगा उसे यह सर्वांग सुन्दर और शक्य संभव ही दिखाई देगी।
चिन्तन में प्रखरता लाने के आवश्यकता पूरी करेंगे।
चिन्तन इसी दिशा में चल रहा है। जिनकी चेतना में दिव्यता का तनिक भी प्रकाश उगा है उन सब महामानवों के भीतर एक ही स्तर की विचार तरंगें उमड़ रही हैं। घटायें घुमड़ रही हैं, बिजली चमक रही है अब घनघोर वर्षा में अधिक विलम्ब नहीं है। विश्व मानव का उत्कृष्ट चिंतन जब सक्रिय रूप धारण करेगा- सृजन मेघ बनकर बरसेगा तो आज की तपन कल जल थल को एक करने वाले सुषमा-शीतलता और हरीतिमा का दृश्य ही चारों को बिखरा दिखाई देगा। इस परिवर्तन के लिए अब अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।
चिन्तन और मनन की एक ही प्रक्रिया समझी जा सकती है। उसे दो खण्डों में विभक्त माना जा सकता है। इसके लिए सर्वोत्तम समय वह है जब प्रातःकाल आँख खुल जाती है और शैया त्यागने की तैयारी में थोड़ी देर करवटें बदली जाती हैं। आमतौर से लोग आँख खुलते ही शैया त्याग नहीं कर देते वरन् कुछ समय ऐसे ही उनींदे पड़े रहते हैं। यह समय सुविधा का है।
चिन्तन संस्थान मस्तिष्क गह्वर के कलेवर में आबद्ध है यों उसका नियन्त्रण और क्रिया कलाप समस्त शरीर के अंग प्रत्यंगों में देखा जा सकता है।
चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व में संलग्न रहेंगे तो कोई कारण नहीं कि कल्पित स्वर्ग से बढ़कर सुख-शान्ति भरी परिस्थितियाँ इस धरती पर दृष्टिगोचर न होने लगें।
चिन्तन करना चाहिये कि अपना आपा-ईश्वर का अंश पुत्र और प्रतिनिधि, शुद्ध, निर्विकल्प दिव्य चेतना एवं दिव्य क्षमताओं से परिपूर्ण है। अपना शुद्ध स्वरूप यही है, शरीर और मन अपने दो औजार-वाहन हैं। इन्हें अपने से पृथक रखकर दो सेवकों के रूप में देखने समझने की मान्यता विकसित करनी चाहिए। चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ सुर-दुर्लभ कलेवर प्रदान करने का ईश्वरीय प्रयोजन, एक आदर्श मनुष्य का उदाहरण प्रस्तुत करना समझा जाना चाहिए कि ईश्वर ने अपनी सृष्टि को सुन्दर सुविकसित, समुन्नत एवं सुव्यवस्थित करने के लिए उसे अपने सहायक प्रतिनिधि के रूप में इस संसार में भेजा है। जीवन की सार्थकता, आत्मिक पवित्रता और लोक मंगल में तत्परता बढ़ाते रहने से ही सम्भव हो सकती है।
चिन्तन में, मिशन में जिन्हें दिलचस्पी है उन्हें इन पृष्ठों को बहुत ध्यान पूर्वक पढ़ना चाहिए और यह प्रयत्न करना चाहिए कि उनके परामर्श निर्देश को यथा सम्भव अधिक से अधिक अपनाया जा सके।
चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण, आत्म-विकास। यही आत्म देव का सच्चा पंचोपचार पूजन है। जो उसे कर सकता है उसी की पूजा उपासना सफल होती है। निराकार निर्विकार परमेश्वर की साकार प्रतिमा उपासना को व्यावहारिक रूप देने के लिए बनाई जाती है। इसी प्रकार जल, दीप, नैवेद्य, पुष्प, चन्दन के पंच विधि पूजा उपकरण प्रयुक्त किये जाते हैं।
चिन्तन और क्रिया कलाप में भी असाधारण अन्तर प्रस्तुत होगा। यह अन्तर विनाशात्मक नहीं सृजनात्मक आने वाला है। उससे निकृष्टता घटने और उत्कृष्टता बढ़ने की पूरी-पूरी संभावना है। सूक्ष्मदर्शी-तत्वज्ञानी-इन दिनों परा प्रकृति और अपरा प्रकृति में हो रहे सूक्ष्म परिवर्तनों को बारीकी से देख रहे हैं और सुनिश्चित पूर्व सूचना दे रहे हैं कि युग परिवर्तन का समय अब अति निकट आ गया।
चिन्तन में प्रखरता आती है। इसी पृष्ठ भूमि में गुण-कर्म और स्वभाव की परिष्कृत परिपक्वता का समावेश होता है। संयमी, सदाचारी, संतुष्ट, कर्मठ, कर्तव्य परायण व्यक्ति अध्यात्म विचारणा के आधार पर ही विनिर्मित और विकसित होता है। आन्तरिक परिपक्वता ही जीवन-क्रम को सरल और सुखद बनाती है। उसी स्तर का व्यक्ति चैन से रहने और संबंधित व्यक्तियों को चैन से रहने देने की स्थिति में होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-November
चिन्तन इसी दिशा में चल रहा है क्योंकि प्रकाशन में जिनका पैसा लगता है वे तुरन्त और अच्छा लाभ चाहते हैं। यह तभी संभव है जब लोगों की माँग का शोषण किया जाय। कहना न होगा कि प्रचलित वातावरण में कुरुचि का बढ़ना स्वाभाविक है। कुरुचि को शोषण ही पसन्द किया जा सकता है। उसी की माँग और ख्याति हो सकती है।
चिन्तन क्षमता बढ़ाते हैं। यह अच्छी बात है यदि दृष्टिकोण सुलझा हुआ रहे और विचार करने की कला के अनुरूप वह विकसित व्यक्तित्व की प्रक्रिया चलती रहे, तब तो निस्संदेह एक बड़े सौभाग्य के जीवन को सुख शान्ति से भर देने वाली उपलब्धि है पर यदि कहीं उनका अशुभ और अशुद्ध चिन्तन चल पड़े तो अंतर्द्वंद्व जन्य विपत्ति में भी वे ही अधिक फँसते हैं। अविकसित लोगों की न बुद्धि विकसित होती है न भावना। वे परिस्थितियों को बहुत हलकी दृष्टि से देखते हैं और भोजन वस्त्र प्राथमिक आवश्यकताओं के पूरा होते रहने पर संतुष्ट रहते हैं। उन्हें मान, अपमान, प्रतिहिंसा, प्रतिशोध, आशा, महत्वाकाँक्षा, वासना, तृष्णा, लोभ, मोह, यश, सम्मान आदि की अनेक बातें प्रभावित करती हैं।
चिन्तन और व्यवहार में इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि इस विश्व में जहाँ देव सत्ता का वर्चस्व है वहाँ असुर सत्ता भी हर जगह मौजूद है। न कोई व्यक्ति या पदार्थ पूर्ण शुद्ध है न अशुद्ध। गुण, दोष की मात्रा सर्वत्र मौजूद है। हमें गुणों को देखना, समझना, ढूंढ़ना और बढ़ाना चाहिए क्योंकि वे ही स्थिर और सत् हैं। असुरत्व भी हर जगह मौजूद है, उससे सतर्क रहें, बचें।
चिन्तन को सही दिशा नहीं मिलती और अविकसित मस्तिष्क बाल क्रीड़ाओं की तरह ऐसा कुछ सोचता और ऐसा कुछ करता रहता है जिसे उपहासास्पद ही कहा जाए।
चिन्तन आदि सामान्य दैनिक कार्यों में वह औचित्य और मनुष्यत्व को बनाये रखता है। फलस्वरूप यही रोजमर्रा के काम एक प्रकार से योग साधना बन जाते हैं। इसका प्रभाव मानसिक स्थिति पर पड़ता है। यह विहार क्रम जिसे सात्विक मिला है उसका मन न कुमार्गगामी होगा न उच्छृंखल। वह उद्धत आचरण नहीं करता।
चिन्तन करते रहने से अंतर्द्वंद्व खड़ा हो जाता है और अपने भीतर ही एक देवासुर संग्राम खड़ा हो जाता है। दो हाथी जिस क्षेत्र में लड़ते हैं उसे कुचल कर रख देते हैं। दुष्प्रवृत्तियों के उठने पर शाश्वत सत्प्रवृत्तियाँ उनसे लड़ने खड़ी होती हैं और फिर उनमें मल्लयुद्ध आरम्भ हो जाता है। इससे सामान्य चेतना क्रम लड़खड़ाने लगता है और उसका प्रभाव, परिणाम शारीरिक रोगों के रूप में बाहर उभरकर आता है। यदि सीधा सरल, निर्मल और निश्चिन्त जीवन जिया जाय तो उन मानसिक रोगों से बचा जा सकता है जो शारीरिक रोगों से भी अधिक कष्टकारक होते हैं।
चिन्तन चल पड़े तो अंतर्द्वंद्व जन्य विपत्ति में भी वे ही अधिक फँसते हैं। अविकसित लोगों की न बुद्धि विकसित होती है न भावना। वे परिस्थितियों को बहुत हलकी दृष्टि से देखते हैं और भोजन वस्त्र प्राथमिक आवश्यकताओं के पूरा होते रहने पर संतुष्ट रहते हैं। उन्हें मान, अपमान, प्रतिहिंसा, प्रतिशोध, आशा, महत्वाकाँक्षा, वासना, तृष्णा, लोभ, मोह, यश, सम्मान आदि की अनेक बातें प्रभावित करती हैं। इनमें जहाँ-जहाँ अवरोध रहते हैं वहीं उन्हें मानसिक उद्वेग आ घेरते हैं और उसका समाधान न ढूंढ़ सकने के कारण आरोग्य संतुलन खो बैठते हैं।
चिन्तन और स्वभाव में सज्जनता एवं शालीनता की मात्रा बढ़ाकर चित्त को हलका और उल्लसित रखा जाय।
चिन्तन का स्तर गिरता चला जा रहा है, सोचने की दिशा विकृत होती चली जा रही है। चारित्रिक स्तर गिर रहा है-गतिविधियों में तेजी से अवांछनीयता प्रवेश कर रही है। पाप पुण्य का जैसा विश्लेषण हमारे साहित्यकार कर रहे हैं इसके आधार पर यह समझा जाने लगा है कि उचित अनुचित का भेद करना निरर्थक है। अपनी सुविधा और रुचि स्वतन्त्रता के आधार पर जो ठीक लगे सो कर गुजरना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-July
चिन्तन की व्यस्तता में काम सेवन की न तो इच्छा होती है और न आवश्यकता प्रतीत होती है। सेनानायक, नाविक, पर्वतारोही, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, अध्ययन परायण व्यक्तियों की कामेच्छा बहुत स्वल्प होती है और वह भी तब तक जाग्रत नहीं होती जब तक कि वातावरण, संवाद अथवा स्वचिन्तन से ही उस तरह की अतिरिक्त उत्तेजना न मिले।
चिन्तन से दूर रहा जाये तो वह प्रवृत्ति स्वयमेव शिथिल या समाप्त हो जाती है। द्वितीय महायुद्ध में पकड़े गये बन्दी सैनिकों तथा साइबेरिया के श्रम शिविरों में बन्द लोगों का पर्यवेक्षण करने पर निष्कर्ष है कि उनकी न केवल रति क्षमता वरन् वह इच्छा भी घट गई अथवा समाप्त हो गई। इसी प्रकार उन्होंने किन्हीं महत्वपूर्ण कार्यों में मनोयोगपूर्वक लगे हुए व्यक्तियों के उदाहरण देते हुए बताया है कि उन्हें अपने चिन्तन की व्यस्तता में काम सेवन की न तो इच्छा होती है और न आवश्यकता प्रतीत होती है। सेनानायक, नाविक, पर्वतारोही, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, अध्ययन परायण व्यक्तियों की कामेच्छा बहुत स्वल्प होती है और वह भी तब तक जाग्रत नहीं होती जब तक कि वातावरण, संवाद अथवा स्वचिन्तन से ही उस तरह की अतिरिक्त उत्तेजना न मिले।
चिन्तनीय है।
चिन्तन नहीं करने देता। कुसंग में अरुचि उत्पन्न करता है। कुत्सित विचारों और भ्रष्ट व्यक्तियों के संपर्क से अरुचि ही नहीं होती वरन् घृणा भी बढ़ती है। शक्तियों के निरर्थक कामों में अपव्यय करने वाला हास-परिहास का मनमौजी सिलसिला रुक जाता है। समय का एक-एक क्षण बहुमूल्य प्रतीत होता है और उसके सदुपयोग की निरन्तर तत्परता बनी रहती है।
चिन्तन द्वारा आत्म कल्याण और विश्व कल्याण के महान उत्तर दायित्व को भी अपनी गतिविधियों में सम्मिलित किया जा रहा है।
चिन्तन न कर सकेंगे। किसी महापुरुष के पीछे चलने पर हम उसकी पीठ भर देख सकेंगे। मुँह नहीं। इससे उसके चले जाने के बाद दिशा भूल जाने का खतरा रहेगा। साथ चलने से उसके चले जाने के बाद भी अपने को सहाय एवं अपंग अनुभव न करेंगे क्योंकि तब सत्य हमारा अपना सत्य भी बन चुका होगा।
चिन्तन और कर्तृत्व में प्यार बिखरा पड़ता है ईश्वर का प्यार केवल उसी को मिलेगा; जो दीपक की तरह जल कर प्रकाश उत्पन्न करने को तैयार है, प्रभु की ज्योति का अवतरण उसी पर होगा।
चिन्तन परिष्कार को अध्यात्म ‘निष्ठा’ पक्ष में लिया जायगा। संयम, नियम, व्रत, तप, साधन प्रभृति क्रियाकलापों को साधना माना जायगा। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरी अपूर्ण रह जायगी। ज्ञान कर्म के समन्वय से ही उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं।
चिन्तन जिसे न जाने क्यों विचारशील लोगों ने आँखें बन्द करके स्वीकार कर लिया है।
चिन्तन से ही उस तरह की अतिरिक्त उत्तेजना न मिले।
चिन्तन अप्रिय और भयानक लग सकता है। पर यही वह वास्तविकता है जिसे समय रहते समझ लिया जाय तो वह अवसर ही न आवेगा जिसमें अप्रियता और भयानकता अनुभव करनी पड़े।
चिन्तन। इन्हें अपनाया जा सके तो जीवन का स्वरूप बदलेगा और अवसाद उत्कर्ष में परिणत होगा।
चिन्तन, धन खर्च किया जाता है कम से कम उतना तो युग साधना के लिये करना ही चाहिये। होना तो इससे भी बढ़कर चाहिये पर बढ़े हुए काम इस स्तर के तो हों कि कुटुम्ब के एक सदस्य जितना समय, स्नेह और साधन तो उस पर लगता ही रहे। यह आग्रह यों हर सदस्य के लिये चिरकाल से किये जाते रहे हैं पर अब वह समय आ ही पहुँचा जिसमें अग्रगामी दल की उस रीति-नीति को अपनाने के लिये विवश किया जाय। गुरु देव को उसी प्रकार विवश किया गया और उनने बिना आगा-पीछा सोचे-बिना बहाने बाजी किये अपने मार्ग दर्शक के संकेतों पर चलना आरम्भ कर दिया। प्रत्यावर्तन की पृष्ठभूमि यही है।
चिन्तन इसी लक्ष्य पर नियोजित करें और कार्यक्रम का पुनर्निर्धारण इस दृष्टि से करें कि यह जीवन परमेश्वर का है। परमेश्वर के लिए है और वही कार्य किये जायेंगे जो परमेश्वर द्वारा अपने लिये नियत निर्धारित किये गये है। पदार्थों में सुख खोजने की अपेक्षा प्रवृत्तियों में उत्कृष्टता आनन्द तलाश करना पड़ेगा। यह परिवर्तन जितना स्पष्ट होता जायगा ईश्वर उसी अनुपात में अपने समीप प्रस्तुत दिखाई देगा।
चिन्तन और स्वतन्त्र कर्तृत्व अपनाने में समर्थ हुआ या नहीं। अपना रास्ता आप बनाने की तपस्या- अपनी राह पर आप चलने की साधना को कर सका- बहिर्मुखी दृष्टि को अन्तर्मुखी बना सका- भीतर के आकर्षण प्रलोभन और बाहर के उपहास प्रतिरोध का जो सामना कर सका- इस उत्कृष्टता पर आरुढ़ योद्धा की सर्वत्र विजय है। जिसने अपने को जीत लिया समझना चाहिए उसने ईश्वर को जीत लिया यह सरलतम है और कठिनतम भी।
चिन्तन में निरत रहने वाले शारीरिक, मानसिक सम्भोग से क्षति उठाते रहते हैं।
चिन्तन से वह कुछ समय को हट जाती है पर अवसर पाते ही वह फिर जमा हो जाती है। एक बार के ज्ञानोदय को पर्याप्त नहीं मान लेना चाहिए।
चिन्तन और जीवन क्रम का स्वरूप जिस आधार पर बदला जा सके वही युग साधना हो सकती है। जिस कर्म-काण्ड में पूजा पत्री का तो लम्बा-चौड़ा समावेश हो पर आन्तरिक स्तर तनिक भी ऊँचा न उठे—आत्म परिष्कार और लोक-कल्याण के लिये उमंग न उठे उसे विडम्बना मात्र ही कहना चाहिये। ऐसे जाल जंजाल में ईश्वर को फँसाकर उसे पकड़ सकना किसी के लिये भी सम्भव न हो सकेगा। गुरु देव इसी निष्कर्ष पर पहुँचे और अपनी अनुभूतियों का ही सार निष्कर्ष परिजनों को बताते रहे। प्रत्यावर्तन और कुछ नहीं उसी मार्ग पर दूसरों को चलाने की पुनरावृत्ति है जिस पर वे स्वयं चले हैं, जो इस दिशा में चलने जितना साहस कर सकें, उन्हें उतनी ही प्रगति एवं उपलब्धि की आशा करनी चाहिये।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-January
चिन्तन और चेतन शिथिल रहता है इसका लाभ उनके अचेतन को मिलता है और वे योगियों जैसे कितने ही अद्भुत कार्य कर सकते हैं। कुत्तों की घ्राण शक्ति अति सूक्ष्म होती है। वे व्यक्तियों की शारीरिक गंध में रहने वाली भिन्नता को पहचान लेते है और जन-संकुल भीड़ में उसी गंध के आधार पर खोजते हुए अपने मालिक को तलाश लेते हैं। चोरों का पता लगाने में प्रशिक्षित कुत्ते अब बहुत कारगर सिद्ध हो रहे हैं। वे जिस आधार पर चोरी का, चोरी के माल का पता लगाते हैं वह उनके अधिक विकसित अचेतन मस्तिष्क से संबंधित घ्राण शक्ति ही है।
चिन्तन प्रक्रिया है जिसे भारतीय संस्कृति के नाम से जाना पहचाना जाता है।
चिन्तन है तो अस्त-व्यस्तता में बिखरती रहने वाली चेतना केन्द्रित होने लगती है। छोटे से आतिशी शीशे पर पड़ने वाली सूर्य किरणें जब एक बिन्दु पर एकत्रित करली जाती हैं तो वहाँ आग जला सकने वाला ताप उत्पन्न हो जाता है। विचारों का एकत्रीकरण भी ऐसी ही मानसिक क्षमता उत्पन्न करता है। एकाग्रता एक अद्भुत मानसिक समर्थता है। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म इसी एकाग्रता इच्छा शक्ति और चक्षु तेजस सम्मेलन का छोटा किन्तु प्रत्यक्ष चमत्कार है।
चिन्तन, मनन और साधना समाधि तक के अगणित प्रयोग किये जाते रहते हैं। इस व्यावहारिक क्षेत्र को गायत्री उपासना-परा प्रकृति की साधना ही कहना चाहिए।
चिन्तन प्रक्रिया एवं कार्यपद्धति भी कह सकते है। इस स्वरूप के कारण ही उसे भूतकाल में समस्त संसार ने देखा, सराहा और स्वीकार किया था। भविष्य में भी जब इस अनैतिक भगदड़ से दुखी होकर मानव जाति को किसी असन्तुलित दर्शन की आवश्यकता पड़ेगी तो उस आवश्यकता की पूर्ति केवल भारतीय संस्कृति ही कर सकेगी।
चिन्तन और संकल्प क्षमता को शिथिल करके वहाँ लगे हुए तेजस् को जब अचेतन के साथ जोड़ दिया जाता है तो उसकी वे दिव्यताएं जो अद्भुत और अनुपम हैं सजग और सक्षम होना शुरू कर देती हैं। इस दिशा में जो जितनी सफलता प्राप्त करता चलता है उसे उतना ही समर्थ सिद्ध पुरुष कहा जाता है।
चिन्तन की अपेक्षा एक सीमित परिधि में चिन्तन है तो अस्त-व्यस्तता में बिखरती रहने वाली चेतना केन्द्रित होने लगती है। छोटे से आतिशी शीशे पर पड़ने वाली सूर्य किरणें जब एक बिन्दु पर एकत्रित करली जाती हैं तो वहाँ आग जला सकने वाला ताप उत्पन्न हो जाता है। विचारों का एकत्रीकरण भी ऐसी ही मानसिक क्षमता उत्पन्न करता है। एकाग्रता एक अद्भुत मानसिक समर्थता है। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म इसी एकाग्रता इच्छा शक्ति और चक्षु तेजस सम्मेलन का छोटा किन्तु प्रत्यक्ष चमत्कार है।
चिन्तन तथा कर्तव्य में से अलग हटाते हैं। इस प्रकार की दुर्बलता आज व्यापक हो गई है कि उचित की उपेक्षा और अनुचित से सहमति का अवाँछनीय ढर्रा चलता रहता है और उसे बदलने की हिम्मत इकट्ठी नहीं की जाती। यदि सच्चाई को अपनाने के लिए बहादुरी और हिम्मत इकट्ठी की जाने लगे तो हर किसी को अपने जीवन-क्रम में भारी परिवर्तन लाने की गुंजाइश दिखाई पड़ेगी। यदि उस गुंजाइश को पूरी करने के लिए साहसपूर्वक कदम उठाये जायें तो आज नगण्य जैसा दिखने वाला व्यक्ति कल ही अति प्रभावशाली प्रतिष्ठित और प्रशंसित सज्जनों की श्रेणी में बैठ सकता है और उसके इस प्रयास से अगणितों को आत्म-सुधार की प्रेरणा मिल सकती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-October
चिन्तन, आकर्षण, विग्रह, उद्वेग, अवरोध, भ्रम, भय, भरे पड़े हैं। उसमें परस्पर विरोधी प्रचण्ड धारायें बहती हैं जो एक दूसरे से टकराती भी हैं और एक दूसरे को उदरस्थ भी करती हैं। विस्फोट कम्प और तूफान भी आते हैं और कई बार ऐसे अप्रत्याशित शक्ति चक्र उफन पड़ते हैं जिनसे सागर ही नहीं धरती भी प्रभावित होती है। इस प्रकार का दूसरा समुद्र ही जीवन है। इसकी तुच्छता इतनी नहीं है जितनी कि आमतौर से समझी जाती है।
चिन्तन की शैली, आकाँक्षा और दिशा नहीं बदल सकते हैं। अखाड़े के पहलवान शागिर्दों की माँस-पेशियाँ मजबूत कर सकते हैं उनमें मनोबल उत्पन्न नहीं कर सकते। अखाड़े में जाकर कोई संयमी, सदाचारी, मनस्वी साहसी बन जाय यह आवश्यक नहीं, क्योंकि पहलवानी की शिक्षा उथले स्तर पर ही समाप्त हो जाती है वह अन्तरंग की गहराई में नहीं उतरती है।
चिन्तन एवं वातावरण का इस पर प्रभाव पड़ता है। तर्क, विवेक विचार विनिमय, भावोत्तेजना जैसे उपायों से इसे विकसित किया जाता है। नशीले तथा दूसरे प्रकार के रसायन भी इसे प्रभावित करते हैं। आहार का एवं क्रिया-कलाप का भी इस पर असर पड़ता है। मनोविज्ञान, परामनोविज्ञान, मस्तिष्कीय विद्या आदि के माध्यम से इसे परिष्कृत, संतुलित किया जाता है।
चिन्तनशील प्राणियों की तरह कष्टानुभूति न होने से उन्हें विकसित प्राणियों द्वारा खाया जाता है। हिंसा की बात तो वहाँ आरम्भ होती है जहाँ किसी सचेतन प्राणियों को अपने स्वाद के लिए हम हनन करते हैं। वनस्पति प्राणधारियों का स्वाभाविक आहार होते हुए भी वह भी सजीव वर्ग में ही है।
चिन्तन, व्यभिचार को जीवन का लक्ष्य मानकर चल रही आज की उच्छृंखलता तत्काल तो अच्छी लगती है। उस समय सुखद भी प्रतीत होती है पर इस असंयम का परिणाम हृदय रोग जैसी कितनी ही विभीषिकाओं के रूप में सामने आता है।
चिन्तन का विकास किये बिना और किसी तरह हो ही नहीं सकता। जब तक यथार्थता को समझा और अपनाया न जायगा तब तक मानव-जीवन की विश्व वसुधा की कुरूपता को हटाया ही नहीं जा सकता। यह संसार, मानव जीवन सुन्दर और सुखद बनाया गया है पर दुर्बुद्धि ही है जिसने सब कुछ विकृत और दुखद बनाकर रख दिया, इस विडम्बना से मुक्ति दिला सकने की क्षमता केवल स्वतन्त्र चिन्तन में ही है। शिक्षा वही है जो विवेक को जागृत कर सके। ढर्रे में घुसे हुए अनौचित्य को हिम्मत और निर्भयता के साथ स्वीकार कर सके।
चिन्तन में ही है। शिक्षा वही है जो विवेक को जागृत कर सके। ढर्रे में घुसे हुए अनौचित्य को हिम्मत और निर्भयता के साथ स्वीकार कर सके।
चिन्तन की गरिमा स्वीकार न की जाय और जो अवाँछनीय है उससे इनकार करने का साहस उत्पन्न न किया जाय।
चिन्तन की क्षमता प्राप्त करने और जीवन तथा विश्व का यथार्थ स्वरूप समझ सकने के योग्य तीक्ष्ण दृष्टि प्राप्त करना इसी का नाम मुक्ति है। तत्व दर्शियों के कथानुसार इसी ‘मुक्ति’ को करतल गत बनाना शिक्षा का मूलभूत प्रयोजन है।
चिन्तन केन्द्र पर भारी दबाव पड़ता है।
चिन्तन की जिसमें क्षमता हो और हर प्रकार के अवाँछनीय दबावों को निर्भयता पूर्वक अस्वीकार कर सके, ऐसा जीवन ही उस विस्तार और आनन्द का उपभोग कर सकता है जो उसे सम्पदा के रूप में उपलब्ध हुआ है।
चिन्तन में यथार्थता की मात्रा घटती और भ्रान्तियों का घटाटोप बढ़ता चला जा रहा है। भौतिक सुख को प्राथमिकता दी गई है और आत्मिक उल्लास को उस पर निछावर कर दिया गया है। कुमार्गगामिता पथ प्रदर्शन कर रही है सत्पथ पर चल सकने का साहस कुण्ठित होता चला जा रहा है। मूढ़ता की परम्परा और धूर्तता की रीति-नीति अब बेहिचक स्वीकार की जाने लगी है। उस अवाँछनीय ढर्रे के विरुद्ध सोच सकने की, बदलने का साहस कर सकने की, क्षमता मानो समाप्त हो ही गई हो।
चिन्तन की दिशा के आधार पर विकसित होता है। अविकसित और विकसित प्राणियों का यों मानसिक अन्तर कुछ तो बुद्धि के आधार पर भी होता है पर मुख्य अन्तर यह भावात्मक ही है। भावनाओं के आवेश में ही मस्तिष्क उत्तेजित होता है और मस्तिष्क सक्रिय होता है। इन दोनों की बिखरी हुई दिशाओं को एक केन्द्र पर एकत्रित करने और क्रियाशील बनाने का श्रेय इस भावात्मक मस्तिष्क केन्द्र को ही है।
चिन्तन शैली पर भी उसका दाँत है और आश्चर्य नहीं कि वह भी उसकी पकड़ में आ जाय। ऐसी विषम घड़ियों में इस बात की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ जाती है कि आत्म सत्ता का पक्ष इतना प्रबल हो कि उसके द्वारा संसार की भाव चेतना को उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर किया जा सके। ऐसा हो सका तो भौतिक विज्ञान और उसकी समस्त उपलब्धियों को विश्व कल्याण में नियोजित किया जा सकेगा। यदि ऐसा न हो सका तो भौतिक विज्ञान के बढ़ते हुये चरण मनुष्य को एक मशीन मात्र बनाकर छोड़ेंगे और कुछ सत्ताधारियों की कठपुतली बनकर समस्त मनुष्य समाज को सबसे बुरी पराधीनता-मस्तिष्कीय गुलामी के निविड़ बंधनों में बंध कर दयनीय स्थिति में जीना पड़ेगा। ऐसे विषम समय में आत्म विज्ञान पक्ष को अधिक समर्थ और अधिक सक्रिय होने की आवश्यकता है।
चिन्तन और सत्कर्मों की सम्पदा मनुष्य को स्वर्गीय विभूतियों से सुसज्जित कर देती है और क्रमशः व्यक्तित्व में देव मानव के अधिक स्पष्ट दर्शन होते चले जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-April
चिन्तन तक सीमित बुद्धि के लिए एक प्रकार से सदा रहस्यमय ही बने रहेंगे।
चिन्तन में नियोजित किया जाता है जिससे आत्मकल्याण हो और शरीर से वह कार्य कराये जाते हैं जो आत्मा का गौरव बढ़ाते हों उसका भविष्य उज्ज्वल बनाते हों।
चिन्तन का समय और स्तर यदि बढ़ा-चढ़ा हो तो उसके लिए अन्न से उत्पन्न होने वाला रक्त ही पर्याप्त नहीं उसे दूसरे किस्म की अतिरिक्त खुराक चाहिए जो मस्तिष्कीय सचेतन केन्द्रों की आवश्यकता पूरी करते रह सकें। यह इसलिए भी आवश्यक होगी कि शारीरिक श्रम घट जाने के कारण पाचन अंग शिथिल होंगे। खुराक थोड़ी खाई जा सकेगी फलस्वरूप उससे किसी स्वल्प मात्रा में बनेगा। वह मुश्किल से उतना होगा जिससे शरीर के दैनिक क्रिया कलाप चल सकें। मस्तिष्कीय कार्यों के लिए इस प्रकार एक और कठिनाई उत्पन्न हो जायगी।
चिन्तन सक्रिय रहता है वैसी ही सक्रियता यदि जन साधारण के लिये विकसित हो चले तो समझना चाहिए कि आत्मा ने महात्मा का रूप धारण कर लिया। परायों में जब अपनापन प्रतिभाषित होने लगे तो समझना चाहिए कि दिव्य नेत्र खुल गये। जिसकी अहंता ग्रीष्म की हिम बन कर पिघल जाय, जो पवन जैसा सक्रिय और आकाश जैसा शान्त दिखाई पड़े समझना चाहिये यह महात्मा का ही विग्रह है।
चिन्तन करना चाहिए। उसके मधुर कल्पना चित्र बनाने चाहिए और इस मार्ग पर चलते हुए लक्ष्य तक पहुँचने पर जो उपलब्धियाँ मिल सकती हैं उनका लाभ कल्पना क्षेत्र में भली प्रकार जमाना चाहिए। सामान्य जीवन क्रम और उस असामान्य आदर्शवादी लक्ष्य की पूर्ति के परिणामों को अलग-अलग देखना-समझना और फिर उनकी तुलनात्मक समीक्षा करना यह सिद्ध कर देता है कि नर-पशु जैसे लोभ-मोहग्रस्त जीवन और आदर्शवादी मार्ग पर चलने पर प्राप्त स्थिति में कितना अधिक अन्तर है। यह कल्पना क्षेत्र जितने प्रखर होंगे-यह तुलनात्मक निष्कर्ष जितना प्रखर होगा, उतना ही महानता का लक्ष्य अपनाने की गरिमा स्पष्ट होती जायगी। तब मन पूरी उत्सुकता और उत्कण्ठा के साथ उस दिशा में लगेगा यह निर्णयात्मक निष्कर्ष जिस आकर्षण को उत्पन्न करता है वही स्थायी होता है और फिर उस दिशा में चलता हुआ मन भागने या भटकने के लिए रस्सी नहीं तुड़ाता।
चिन्तन की अवाँछनीयता को समझा जाय और अपनी अब तक की ढर्रे पर लुढ़कती हुई मान्यताओं के औचित्य
चिन्तन में लगाये रहती है जिसे तात्विक दृष्टि से पूर्णतया निरर्थक कहा जा सके। किसी ने-कुछ देर के लिए-हमें साधन सम्पन्न-अमीर-बड़ा आदमी जान या मान भी लिया तो इससे क्या तो अपना प्रयोजन सधा, और क्या उसे लाभ हुआ?
चिन्तन, आत्म सुधार, आत्म निर्माण, आत्म विकास के लिए अन्तरंग जीवन को समर्थ, सशक्त बनाने के लिए, अन्तर्मुखी होना अत्यन्त आवश्यक है। अपने स्वरूप, लक्ष्य, कर्त्तव्य और उपलब्ध जीवन विभूतियों के श्रेष्ठतम सदुपयोग की बात निरन्तर सोचते रहना चाहिए। अधिक मिले के प्रयास के साथ साथ जो मिला है उसके उत्कृष्ट उपयोग की बात पर अधिक ध्यान देना चाहिए। यही हैं वे उपदेश जो परिजनों के प्रति सन्देश रूप में देकर गुरुदेव चले गये हैं। इन्हें श्रद्धा और तत्परता के साथ पालन करना अब हमारा कार्य और कर्त्तव्य है।
चिन्तन में सहायता करता था। उससे प्रभावित हर नागरिक को सही दिशा मिलती थी। आज सब कुछ उल्टा है; यदि आज वस्तुस्थिति समझने के लिए लोग क्या कहते हैं और क्या करते हैं इसे आधार बनाया जाय तो निश्चित रूप से हमें अवाँछनीय निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा और अनुचित रीति-नीति अपनाने के लिए विवश होना पड़ेगा।
चिन्तन तक सीमित न रह कर और आगे बढ़ गया। लगा कि शरीर और प्राण ही अब विलग होने जा रहे हैं।
चिन्तन-जीवन को प्रभावित न कर सके उसे मनोविनोद के अतिरिक्त और क्या कहा समझा जा सकता है।
चिन्तन करना पड़ेगा और आश्रित, असमर्थ परिजनों की उचित व्यवस्था के अतिरिक्त जो कुछ उसके पास बच जाता है उसे लोक-मंगल के लिए नियोजित करने का ही निर्णय करना पड़ता है। आत्म-बोध के साथ यदि इस स्तर का दुस्साहस जुड़ा हुआ न हो तो उसे बकवादियों का बाल-विनोद ही कहा जायगा। असंख्यों व्यक्ति स्वाध्याय सत्संग के नाम पर धर्म और अध्यात्म की लम्बी-चौड़ी बकवास करते और सुनते रहते हैं। जो चिन्तन-जीवन को प्रभावित न कर सके उसे मनोविनोद के अतिरिक्त और क्या कहा समझा जा सकता है।
चिन्तन पहाड़ भर। जिसमें हर्ष स्वल्प और विषाद अपरिमित हो ऐसी जिन्दगी जीकर कौन अपने आपको सौभाग्यशाली मानेगा?
चिन्तन के आधार पर देना चाहिए। दूसरे लोग क्या कहते हैं-क्या सोचते हैं और क्या करते हैं-इससे भी हमें प्रभावित नहीं होना चाहिए। निस्संदेह वातावरण अन्धकार भरा है। प्राचीन काल में सतयुगी व्यक्तित्व, कर्तृत्व और वातावरण-शुद्ध चिन्तन में सहायता करता था। उससे प्रभावित हर नागरिक को सही दिशा मिलती थी।
चिन्तन, आत्मा और परमात्मा का मिलन प्रधान रूप से सम्मिलित रहना चाहिए। जप, ध्यान, पूजन वन्दन की क्रिया नियमित रूप से चलनी चाहिए, पर उसमें भावनाओं का गहरा पुट रहना चाहिए। लकीर पीटने की चिह्न पूजा अभीष्ट प्रतिफल उत्पन्न नहीं कर सकती। भौतिक महत्वाकाँक्षाओं से जितनी विरक्ति होगी उतनी ही आत्मिक विभूतियों के सम्पादन में अभिरुचि एवं तत्परता बढ़ेगी। इस तथ्य को भली-भाँति समझ लिया जाना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-February
चिन्तन स्नायु संस्थान को संतप्त करके मनुष्य को दुर्बल बनाता है और पूरी आयु भोगने से वंचित रखता है। इस अवाँछनीय ताप से बचा जा सकता है। ग्रीष्म ऋतु के प्रभाव से बचने का मार्ग खोजा जा सकता है। निवास के स्थान यदि शीत प्रवेश में न हों तो उन्हें ठण्डा रखने के लिए सम्भव प्रयत्न किया जा सकता है।
चिन्तन में निरत रहना, मानसिक विक्षोभ और उद्वेग का अवसर न आना यह ऐसे आधार हैं जिनका मूल्य पौष्टिक आहार से हजार गुना ज्यादा है। तपस्वी लोग सुविधा साधनों का, आहार का अभाव रहने पर भी दीर्घजीवी, पुष्ट और सशक्त रहते हैं उसका कारण उपरोक्त है जिसका महत्व आमतौर से नहीं समझा जाता।
चिन्तन को ढालने, मोड़ने का मानसिक लोच बना रहे तो आवेश, उद्वेग और शोक-सन्ताप भी सहन न करने पड़े। संग्रह और स्वामित्व का अहंकार अमीरी और आतंक की अभिलाषा न हो तो न असंतोष की आग में जलना पड़े और न पाप, अपराध करने की आवश्यकता पड़े। वासनाओं और तृष्णाओं को काबू में रखा जा सके तो इस सुन्दर से भगवान के संसार-उद्यान में हँसते खेलते दिन बिताये जा सकते हैं। मनुष्य का जीवन अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक सुविधा सम्पन्न है उसे पाकर आदमी को भलमनसाहत आती हो तो सन्तोष और शान्ति के साथ स्वयं जी सकता है और दूसरों को जीवित रहने दे सकता है।
चिन्तन परिधि से-कल्पना शक्ति से बाहर की चीज है। इसलिए उस कल्पना की तुक बिठाने के लिए सूर्य को एक मध्यवर्ती आधार मानकर चलो, उस तुलना के करने में थोड़ी सहायता मिलेगी, यद्यपि ब्रह्माण्ड में करोड़ों सूर्य अपने ग्रह-उपग्रह के साथ अपना-अपना सौर मण्डल बनाकर भ्रमण करते रहते हैं और किसी महा केन्द्र की परिक्रमा में संलग्न रहते हैं। तो भी अपने सौर मण्डल के केन्द्र सूर्य का ही ऊहापोह इतना विशाल हो जाता है कि उसकी कल्पना करने से ही मानवीय बुद्धि एक प्रकार से हताश होकर बैठ जाती है। फिर करोड़ों सूर्यों की सम्मिलित शक्ति एवं विशालता की कल्पना किस तरह की जाय?
चिन्तन और कर्तृत्व को अमर्यादित न होने देने-अवाँछनीयता न अपनाने के लिए आवश्यक विवेक और साहस उत्पन्न करता है। मनुष्य अपने अस्तित्व को, लक्ष्य को, व्यवहार को सही तरह समझे। सही मार्ग को अपनाकर सही परिणाम उपलब्ध करते हुए, प्रगति के पथ पर निरन्तर आगे बढ़ता चले। अपूर्णता से पूर्णता में विकसित हो। यही मार्गदर्शक करना-इसका व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करना आत्मविद्या का मूल प्रयोजन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-August
चिन्तन, मनन हमें नित्य ही एकान्त में करना चाहिए। मन के साथ वार्तालाप करने का नाम ही मनन चिन्तन है। उसी को स्वाध्याय सत्संग की उच्च भूमिका भी कहते हैं।
चिन्तन, धन, मनोयोग, प्रभाव, वैभव आदि का आधा भाग शरीर और मन की तुष्टि के लिये लगाया जाय और शेष आत्म कल्याण के लिये नियोजित रखा जाय। यह बँटवारा यदि सिद्धान्त के रूप में कर लिया जाय अपना वास्तविक स्वार्थ उच्च स्तरीय उद्देश्य की पूर्ति को मान लिया जाय तो फिर फुरसत न मिलने आदि के बहानों के लिये कोई गुंजाइश न रहेगी। तृष्णाएं भले ही पूरी न हों पर आवश्यकताएं सहज पूरी होती रहेंगी साथ ही युग साधना के परमार्थ प्रयोजन में लगाने के लिये बहुत कुछ प्रस्तुत रह सकेगा।
चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व के विकास का मार्ग अपनाना पड़ेगा। सस्ते मोल में बहुमूल्य उपलब्धियों के लिए ललचाने वाले जुआरियों की भीड़ निस्सन्देह छूट जायेगी पर गहरे समुद्र में गोते लगाकर मोती समेटने वाले साहसी लोग आगे भी आयेंगे। कीमत चुकाकर बहुमूल्य उपलब्धियाँ खरीदने वाले ही सच्चे व्यापारी होते हैं। यदि उनका अभाव हो जाय तो फिर संसार में व्यापार की पद्धति ही न चले। आत्मिक क्षेत्र में भी साहूकार, सौदागर होंगे ही- सभी तो उचक्के, गठकटे नहीं होते।
चिन्तन उत्कर्ष का ही कारण बनता है। भारतीय धर्म में देवियों की प्रतिमाएं युवा और अति सुन्दर नारियों के रूप में ही बनाई गई हैं। लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती, गायत्री, सावित्री आदि की मूर्तियाँ, तस्वीरें जहाँ कहीं भी मिलेगी अति सुन्दर और सुसज्जित युवती के कलेवर में ही विनिर्मित हुई होंगी। उनके अंगों में उभार ही रखे गये हैं। इसलिये कि साधक नारी के इस स्तर के रूप में श्रद्धा और पवित्रता का समुचित समावेश कर सके।
चिन्तन से बिल्कुल भिन्न प्रकार की होती हैं। कुछ रसायन ऐसे हैं जो मस्तिष्कीय कणों को वर्तमान परिस्थिति एवं उपस्थिति से सर्वथा भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ सामने उपस्थित करते हैं। मस्तिष्कीय कणों की चिन्तनधारा को सामने प्रस्तुत पदार्थों से सर्वथा असम्बद्ध करके किसी ऐसे कल्पना लोक में उड़ा ले जाते हैं जिनका वास्तविकता से दूर का सम्बन्ध भी नहीं है। पुराने नशे वर्तमान स्थिति से तारतम्य तो मिलते रहते थे, पर इन अभी नये प्रकाश में आये पदार्थों का प्रभाव तो ऐसा होता है कि वर्तमान के साथ मस्तिष्क का तारतम्य बिल्कुल टूट गया और आँखें वह देखने लगीं जो सामने प्रस्तुत यथार्थता से सर्वथा भिन्न था।
चिन्तन, मनन से ही नहीं-आहार के साथ घुले हुए सूक्ष्म तत्वों का सन्तुलन बनाकर मनुष्य के सोचने का तरीका भी समुन्नत किया जा सकता है। इतना ही नहीं भावनाओं की दिशा भी बदल सकती है। अवाँछनीय दिशा में चल रही भाव विकृति को आहार शुद्धि के आधार पर मोड़ा और सुधारा जा सकता है। दुष्प्रवृत्तियों में लगे हुये दुर्भावना युक्त मनुष्य के अन्तःकरण को छुपाया जा सकता है और उनकी प्रवृत्ति-मनोवृत्ति में अभीष्ट परिवर्तन किया जा सकता है।
चिन्तन और उत्कृष्ट कर्तृत्व को गहन आस्था स्तर पर अपना लेना ही आत्मबल सम्पादन का एकमात्र आधार है। जिसने इस अवलम्बन को अपना लिया उसके लिए दिव्य अनुदान करतलगत रहेंगे। वह अपने को ईश्वरीय सत्ता का उत्तराधिकारी अनुभव करेगा अन्तःकरण पर से अहंता और लिप्सा के कषाय कल्मष हटते ही अन्तरंग में छिपा पड़ा ब्रह्मवर्चस ज्योतिर्मय हो उठेगा और व्यक्ति अपने को ईश्वर में और ईश्वर को अपने में ओत-प्रोत अनुभव करेगा।
चिन्तन है। उसी को स्वाध्याय सत्संग की उच्च भूमिका भी कहते हैं।
चिन्तनधारा को सामने प्रस्तुत पदार्थों से सर्वथा असम्बद्ध करके किसी ऐसे कल्पना लोक में उड़ा ले जाते हैं जिनका वास्तविकता से दूर का सम्बन्ध भी नहीं है। पुराने नशे वर्तमान स्थिति से तारतम्य तो मिलते रहते थे, पर इन अभी नये प्रकाश में आये पदार्थों का प्रभाव तो ऐसा होता है कि वर्तमान के साथ मस्तिष्क का तारतम्य बिल्कुल टूट गया और आँखें वह देखने लगीं जो सामने प्रस्तुत यथार्थता से सर्वथा भिन्न था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-April
चिन्तन और कर्त्तव्य से विरत नहीं हो सकता जैसे ही निकृष्ट चिन्तन मनःक्षेत्र में उभरता है वैसे ही प्रतिरोधी देवतत्व उसके दुष्परिणामों के सम्बन्ध में सचेत करता है। फलस्वरूप भीतर ही भीतर एक अन्तर्द्वन्द्व उभरता है। रक्त के श्वेत कण शरीर में रोग विषाणुओं के प्रविष्ट करते ही उनसे लड़ने के लिए एकत्रित हो जाते तथा उन्हें बाहर खदेड़ने के लिए प्रबल संघर्ष करते हैं। ठीक इसी प्रकार चेतना के क्षेत्र में अन्त करण यही भूमिका सम्पादित करता है। अनैतिक और निकृष्ट स्तर के विचार कभी भी उस मस्तिष्क में देर तक नहीं टिकने पाते जहाँ कि अन्तःकरण रूपी सद्गुरु सजग और तत्पर है।
चिन्तन एवं ध्यान में एकाग्रता प्रगाढ़ होने लगी।
चिन्तन मनःक्षेत्र में उभरता है वैसे ही प्रतिरोधी देवतत्व उसके दुष्परिणामों के सम्बन्ध में सचेत करता है। फलस्वरूप भीतर ही भीतर एक अन्तर्द्वन्द्व उभरता है। रक्त के श्वेत कण शरीर में रोग विषाणुओं के प्रविष्ट करते ही उनसे लड़ने के लिए एकत्रित हो जाते तथा उन्हें बाहर खदेड़ने के लिए प्रबल संघर्ष करते हैं। ठीक इसी प्रकार चेतना के क्षेत्र में अन्त करण यही भूमिका सम्पादित करता है। अनैतिक और निकृष्ट स्तर के विचार कभी भी उस मस्तिष्क में देर तक नहीं टिकने पाते जहाँ कि अन्तःकरण रूपी सद्गुरु सजग और तत्पर है।
चिन्तन और चरित्र के सम्मिश्रण से ही स्वभाव और संस्कार बनते हैं और वे ही जीवनक्रम में परिवर्तित होते है। यदि यह प्रवाह उत्कृष्टता की दिशा में व रहा होगा तो समझना चाहिए कि महामानव बनने−बनाने वाली परिस्थितियां अनायास हो बनती चली जायेंगी। इसके विपरीत यदि रुझान पर निकृष्टता चढ़ रही होगी, रुझान और चिन्तन पशु−प्रवृत्तियों में रम रहा होगा। तो स्वभावतः गतिविधियाँ उसी स्तर की बनेंगी। गतिविधियाँ हेय और परिणाम में श्रेय−लोग चाहते तो कुछ ऐसा ही है, पर विधि के विधान को उल्टा कैसे किया जाय।
चिन्तन की उपयुक्त दिशाधारा ही व्यवहार में उत्कृष्ट दिशाधारा में बदलती है और इसके परिणाम उस स्तर की सफलता बनकर सामने आते हैं जिसे सामान्यतया वरदान या चमत्कार की संज्ञा दी जाती है।
चिन्तन−मनन के चारों प्रयोग उपचार इसी एक आवश्यकता की पूर्ति में नियोजित किये जाते हैं।
चिन्तन का समुद्र−मन्थन साधना अवधि में चलते रहने पर जिस सर्वोपरि उपहार अनुदान की उपलब्धि होती है उसे ‘अमृत’ कहते हैं। अमृत अर्थात् आत्मबोध। आत्मबोध अर्थात् जीवन सम्पदा की उच्चस्तरीय ईश्वरीय अनुदान के रूप में मान्यता। इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे बन पड़े इसी चिंतन, मन्थन और निर्धारण को ब्रह्मविद्या का सार तत्व समझना चाहिये। इसी से आध्यात्मिक काया−कल्प रूपी सिद्धि अनुदान की प्राप्ति होती है।
चिन्तन की दृष्टि से स्वयं को उत्कृष्टता से, सुसम्पन्न कर ले तो वे अपनी कषाय−कल्मषों की कालिमा मिटाकर अपने अन्तःकरण को शुद्ध, पवित्र व स्वच्छ बना सकते हैं। ऐसे निर्मल अन्तःकरण में भगवद् कृपा स्वतः बरसती है। ऐसे साधक मन्त्र,उपासना एवं तपश्चर्या का समुचित लाभ उठाते हैं और दैवी अनुग्रह के अधिकारी बनते हैं। आसुरी भूमिका पर कोई भौतिक सिद्धि मिल भी जाय तो अंततः वह घातक ही सिद्ध होगी। रावण, हिरण्यकश्यपु, भस्मासुर, बाणासुर, हिरण्याक्ष जैसे कितनों को चमत्कारी सिद्धियों प्राप्त थीं, पर पात्रता न होने से उन्होंने उनका दुरुपयोग ही किया।
चिन्तन और रुझान में आदर्शों के प्रति रसानुभूति। जहाँ इतना शुभारम्भ हुआ वहाँ जीवनचर्या का स्वरूप भी अनायास ही तद्नुरूप बनने ढलने लगेगा। चिन्तन और चरित्र के सम्मिश्रण से ही स्वभाव और संस्कार बनते हैं और वे ही जीवनक्रम में परिवर्तित होते है। यदि यह प्रवाह उत्कृष्टता की दिशा में व रहा होगा तो समझना चाहिए कि महामानव बनने−बनाने वाली परिस्थितियां अनायास हो बनती चली जायेंगी। इसके विपरीत यदि रुझान पर निकृष्टता चढ़ रही होगी, रुझान और चिन्तन पशु−प्रवृत्तियों में रम रहा होगा।
चिन्तन पशु−प्रवृत्तियों में रम रहा होगा। तो स्वभावतः गतिविधियाँ उसी स्तर की बनेंगी। गतिविधियाँ हेय और परिणाम में श्रेय−लोग चाहते तो कुछ ऐसा ही है, पर विधि के विधान को उल्टा कैसे किया जाय। नीचे गिरने में निरत को ऊँचा उठा देने की असम्भव प्रक्रिया सम्भव कैसे बने?
चिन्तन को बुरी तरह उलझाया और कष्ट कारक भूल भुलैयों में भटकाया है। श्रद्धा दोहन हेतु अनगिनत आडम्बरधारी गुरु व स्वनाम धन्य भगवान धर्म क्षेत्र में अवतरित हो गये हैं। ऐसे धूर्त भोले भावुक लोगों को अन्ध श्रद्धा के रस्से में बाँध कर विकृत मान्यताओं के गड्ढे में ढकेलते हैं। संसार अन्ध−श्रद्धा की अन्धेर नगरी बन गया है व निहित स्वार्थों का व्यवसाय भली प्रकार चल रहा है। एक तरफ भीरुता है तो दूसरी और बौद्धिक कुटिलता।
चिन्तन–परिष्कृत चरित्र और लोक मंगल के लिए उदार अनुदान यह तीनों ही लक्ष्य ऐसे हैं जो मिलकर त्रिवेणी संगम की तरह तीर्थराज बनते हैं और अवगाहन करने वालों को तुरन्त काया−कल्प करने जैसा प्रतिफल प्रदान करते हैं।
चिन्तन के रूप में समाज संपर्क में प्रतिभासित होता है। वरदान मिलते है तो इसी दिव्य आत्म सत्ता के माध्यम से तथा शाप मिलते हैं तो आत्म−प्रताड़ना के रूप में इसी आत्मदेव से। इस मूलभूत तथ्य को समझना बहुत जरूरी है।
चिन्तन उत्कृष्ट बनता है तथा कर्मों में आदर्शवादिता का समावेश होता है। मूलाधार की जागृति मनुष्य में उच्चस्तरीय आनन्द, शौर्य, और कर्मनिष्ठा की भावना विकसित करती है तो स्वाधिष्ठान के जागरण से मनुष्य अपने में नव शक्ति का संचार होते, बलिष्ठता बढ़ते, उत्साह और स्फूर्ति में क्रमिक अभिवृद्धि होते अनुभव करता है। मणिपूर के स्फुरित होने से संकल्पों में दृढ़ता व पराक्रम की भावना का विकास होता है। मानसिक विकास घटते चले जाते हैं व परमार्थ प्रयोजनों में रस आने लगता है।
चिन्तन की शालीनता है और पीड़ित के प्रति ममता। वह सेवा और सहायता का पात्र है उसे वह मिलनी भी चाहिए। मिलती भी है। जब तक वरिष्ठों में अन्तरात्मा जीवित रहेगी तब तक यह क्रम चलता भी रहेगा।
चिन्तन में ब्रह्मविद्या का तथा व्यवहार में आध्यात्म धारणा का आश्रय लेना होगा। अध्यात्म ही वह एक उपकरण है जिसकी पहुँच आत्म क्षेत्र तक है। धन, बल, बुद्धि का ही चमत्कार आज सर्वत्र दिखाई पड़ता है, पर फिर भी धनिक, बलिष्ठ, बुद्धिमान उच्च अन्तःकरण से रहित पाये जाते हैं–वहाँ मात्र मलीनता व कालिमा ही दिखाई देती है। विडम्बना यह है कि धर्म आध्यात्म के क्षेत्र में भी अनास्था ने व्यापक स्तर पर घुसपैठ कर ली है। यदि व्यक्ति का अन्तराल गुण, कर्म, स्वभाव न बदले तो अध्यात्म कहाँ रहा?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-September
चिन्तन का-अकरणीय कृत्यों का बाहुल्य रहा है। जहाँ उत्पीड़न शोषण अन्याय आतंक का दौर चला है वहाँ ऐसी विभीषिकाएँ जम जाती हैं जिनके संपर्क में आने वालों का अहित अनिष्ट होने लगता है। ऐसे स्थान अभिशप्त कहलाते। भुतहे मकान, मरघट आदि में डेरा डालने पर जिस प्रकार भय, आतंक की अनुभूति होती है उसी प्रकार अभिशप्त मकान या पदार्थ
चिन्तन में मौलिक भूल यह होती रही है कि विकासवाद के उन सिद्धान्तों को भुला दिया गया जिन्हें अपनाकर एक कोशीय स्थिति से आगे बढ़ते-बढ़ते उस स्थिति तक पहुँचा जिसमें आज है। इस बीच जहाँ उसने अपनी काय संरचना में आश्चर्यजनक परिवर्तन किए वहाँ पुरानी आदतों, प्रवृत्तियों को भी सुधारता, समुन्नत बनाता चला गया। यदि यह क्रम भूतकाल में अपनाया जाता रहा है तो मनुष्य जीवन में प्रवेश पाने के उपरान्त वह प्रक्रिया क्यों समाप्त हो जायगी? और क्यों तथाकथित मूल प्रवृत्तियाँ जड़वत् जहाँ की तहाँ बनी रहेंगी? क्या मनुष्य शरीर प्राप्त करते ही अब तक की प्रवृत्ति परिष्कार प्रक्रिया समाप्त हो जायगी?
चिन्तन परस्पर सम्बद्ध है। उसी प्रकार ताप और गति को भी अन्योऽन्याश्रित माना जा सकता है।
चिन्तन में उत्कृष्टता और चरित्र में आदर्शवादिता का जितना समावेश कर सका, समझना चाहिए उसकी समर्थता, सम्पन्नता और प्रगतिशीलता उसी अनुपात से सुनिश्चित हो गई।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-June
चिन्तन एवं व्यवहार को भी उसी में ठूंसा जा सकता है। कुछ समय में उसके लिए भी जगह बन जाती है और बिना किसी कठिनाई के वह नया ढर्रा भी अपने ढंग से −अपनी धुरी पर घूमने लगता है। हमें इसी तरह सोचना चाहिए और जो सुधार परिवर्तन आवश्यक हो गया है उसे कर गुजरने का रास्ता निकालना चाहिए।
चिन्तन। इन दिनों की— विशेषतया आज की अपनी स्थिति का पर्यवेक्षण मनन हो और भूलों को सुधारने अभीष्ट को अपनाने के लिए अगले दिन का कार्यक्रम बनाना—चिन्तन। संक्षेप उसे सामयिक आत्म समीक्षा और प्रगति चेतना का ताना− बाना बुनना कहा जा सकता है। इतना करते हुए निद्रा की—प्रज्ञा की गोद में सो जाने का नित्य नियम अपनाना चाहिए। यह न्यूनतम है।
चिन्तन में निरत रहने वाले पाते तो कुछ नहीं अपनी एकाग्रता, और चिन्तन की शालीनता गिराते−गिराते, घटाते−घटाते खोखला बनाने वाली दुश्चरित्र के मानसिक मरीज बन जाते हैं। ऐसे लोग बौद्धिक दृष्टि से तो दुर्बल होते ही जाते हैं। शरीरबल, मनोबल और चरित्र बल की दृष्टि से भी गई−गुजरी स्थिति में जा पहुँचते हैं। इन्द्रिय संयम, समय संयम, धन संयम, विचार संयम के महत्व को न समझने वाले, महत्वपूर्ण क्षेत्रों की बर्बादी अपने पैरों कुचल मारने की तरह करते हैं। आरम्भ की उच्छृंखलता कुछ ही दिनों में पहले सिरे की मूर्खता सिद्ध होने लगती है।
चिन्तन का अभ्यास कराना चाहिए। अवाँछनीय कल्पना करते रहने पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए। बुरे विचार मस्तिष्क में प्रवेश करते ही उनमें मल्ल युद्ध करने के लिए प्रतिपक्षी सद्विचारों को जुटा देना चाहिए। काँटे से काँटा निकाला जाता है और अवाँछनीय विचारों को उत्कृष्टता आदर्शवादिता की मान्यताओं को उभार कर निरस्त करना चाहिए। चिन्तन के लिए विषयों का पूर्व निर्धारण हो।
चिन्तन और व्यवहार में घुसी हुई अवाँछनीयता का निरीक्षण उठाना होगा। दूसरा पूरक का दम यह है कि जो नहीं है उसे किस प्रकार उपार्जित उपलब्ध किया जाय। यही है परिशोधन और परिष्कार की उभयपक्षीय प्रक्रिया जिसे अपनाकर लैफ्ट राइट करते हुए सर्वतो मुखी प्रगति एवं सुख−शांति के लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। अध्यात्म नगद धर्म है। इसका प्रतिफल पाने के लिए मरणोत्तर जीवन की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती,वह उस हाथ दे इस हाथ ले की उक्ति के अनुरूप क्रिया की प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।
चिन्तन, स्वभाव और व्यवहार में ढूँढ़ते रहा जाय साथ ही उन्हें संक्रामक बीमारी मानकर समय रहते उन्मूलन का उपाय उपचार किया जाता रहे तो यह अपने आपे से स्वयं लड़ते रहने की शूरता, किसी सफल सेनापति को विजयश्री मिलने जैसी मानी जायगी। जो अपने को जीतता है वह विश्व विजयी बनता है” इस उक्ति को सर्वथा सारगर्भित समझा जाना चाहिए। गीता में ऐसे ही धर्मक्षेत्र, कर्मक्षेत्र में अर्जुन को लड़ने का उपदेश भगवान ने दिया था। वह हर विचारशील के लिए सदा सर्वदा अनुकरणीय है।
चिन्तन। संक्षेप उसे सामयिक आत्म समीक्षा और प्रगति चेतना का ताना− बाना बुनना कहा जा सकता है। इतना करते हुए निद्रा की—प्रज्ञा की गोद में सो जाने का नित्य नियम अपनाना चाहिए। यह न्यूनतम है। इसमें स्नान का, समय का, उपचार सामग्री का कोई बन्धन नहीं है।
चिन्तन और चरित्र में आदर्शों का अनुपात घट जाना। आस्था संकट ही आज की अगणित कठिनाइयों का एक मात्र कारण है। पारस्परिक स्नेह,सहयोग अपनाने की अपेक्षा जब लोग स्वार्थान्ध होकर अनीति और आक्रमण को अपनाते हैं, तो उसकी प्रतिक्रिया अपने तथा दूसरों के लिए घातक होती है। यही बात है वह विग्रह जो असंख्य चिनगारियों के रूप में उभरता और स्थान स्थान पर विस्फोटों का हाहाकार करता दीखता है।
चिन्तन और व्यवहार में अवाँछनीयताओं ने कहाँ−कहाँ अपने घोंसले बना रखे हैं। इन मक्कड़ जंजालों को सफा करना ही चाहिए। भोजन बनाने से पूर्व रसोई घर की−पात्र उपकरणों की सफाई आवश्यक होती है अन्यथा गन्दगी घुस पड़ने से खाद्य सामग्री विषैली हो जायगी और पोषण के स्थान पर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करेगी
चिन्तन और चरित्र में बढ़ती हुई निकृष्टता ने महामरण का प्रलय काल जैसा संकट उपस्थित कर दिया हैं। अणु, युद्ध, प्रदूषण, अर्थ वैषम्य, दुर्व्यसन, स्वार्थान्धता, बहु प्रजनन, अवाँछनीय प्रचलन जैसे कारण ऐसे हैं जो मिल जुलकर मानवी सभ्यता के सर्वनाश की तैयारी में जुटें है। ऐसे अवसरों पर सृष्टा ने बागडोर अपने हाथ में समय समय पर सम्भाली है। अयोग्य विधान सभाएँ जब शासनतन्त्र को ठीक तरह संभाल नहीं पातीं तो उन्हें निलम्बित या निरस्त किया जाता है और राष्ट्रपति शासन लागू होता है। विश्व व्यवस्था का उत्तरदायित्व सृष्टा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र−युवराज− मनुष्य के हाथों सौंपा है।
चिन्तन की ही तरह अर्थ साधनों का भी संयम बरता जाना चाहिए। स्मरण रहे संयम तप है। व्यावहारिक जीवन में उपरोक्त चार सम्पदाओं का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए उन्हें अपव्यय दुरुपयोग से बचाने की सावधानी बरती जानी चाहिए।
चिन्तन की आदत डालनी होगी।
चिन्तन की निकृष्टता उलट देने वाले प्रयासों को अपनाया जाय। अन्धकार से लड़कर नहीं जीता जा सकता। प्रकाश का प्रज्ज्वलन और वितरण ही वह आधार है जिसमें तमिस्राजन्य भटकाव, एवं आतंक को परास्त कर सकना सम्भव हो सकता है। तथ्य तो सनातन है, पर आज तो उसे प्रस्तुत विभीषिकाओं का सामाजिक समाधान भी माना जा सकता है। आत्मघात पर उतारू जन समुदाय को विनाश के गर्त से बचाने का एक ही उपाय है कि हर किसी को नये सिरे से सोचने के लिए वातावरण एवं आधार दिया जाय।
चिन्तन की शालीनता गिराते−गिराते, घटाते−घटाते खोखला बनाने वाली दुश्चरित्र के मानसिक मरीज बन जाते हैं। ऐसे लोग बौद्धिक दृष्टि से तो दुर्बल होते ही जाते हैं। शरीरबल, मनोबल और चरित्र बल की दृष्टि से भी गई−गुजरी स्थिति में जा पहुँचते हैं। इन्द्रिय संयम, समय संयम, धन संयम, विचार संयम के महत्व को न समझने वाले, महत्वपूर्ण क्षेत्रों की बर्बादी अपने पैरों कुचल मारने की तरह करते हैं। आरम्भ की उच्छृंखलता कुछ ही दिनों में पहले सिरे की मूर्खता सिद्ध होने लगती है।
चिन्तन हो सकेगा। घिनौना चिन्तन, कमीना आचरण यदि यथा स्थान बना रहा तो फिर समझना चाहिए कि प्रगति और शान्ति की कल्पना, बिना पंख की उड़ान ही बनी रहेगी।
चिन्तन और व्यवहार में विकृतियाँ भरते−भरते संकटों के पहाड़ सामने ला खड़े करती हैं। मनःस्थिति सुधरे तो परिस्थिति सुधारने में तनिक भी देर न लगे। विचारणा यदि कुपथ गामिनी हो तो सोने की लंका जैसा वैभव, दस शिरे जितना ज्ञान, और कुम्भकर्ण जैसा बलिष्ठ रहते हुए भी वह समूचा परिकर कुकर्म करेगा और बेमौत मरेगा। तथ्यों को देखते हुए आधारभूत परमार्थ एक ही ठहरता है—सद्ज्ञान सम्वर्धन। लोक−मानस का परिष्कार यदि बन पड़े तो सीमित साधनों से ही स्वर्गीय सुख−शान्ति का रसास्वादन करते जिया जा सकता है।
चिन्तन और पराक्रम की चार सम्पदाएँ हर किसी को जन्म के साथ ही उपलब्ध हुई हैं। यह विभूतियां ही कामधेनु गौ है। इनका दूध जो छेद वोल बर्तन में दुहते और उसे जमीन पर गिराते,कपड़ों पर टपकाते हैं और खाली हाथ रहने का रोना रोते हैं उन अभागों को यही समझना पड़ेगा कि इसमें परिस्थितियों की प्रतिकूलता नहीं अपनी कुमार्ग गामिता, मति भ्रष्टता ही निमित्त कारण है। इसे उलटेपन को उलट कर सीधा किया जा सके तो दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलते देर न लगे।
चिन्तन निरन्तर अभीष्ट प्रयोजनों के लिए सीमित एवं सुनिश्चित रहना चाहिए।
चिन्तन तथा व्यवहार को उत्कृष्टता के साथ जोड़ना ही जीवन साधना के निमित्त किया गया सच्चा पराक्रम एवं तप साधन है।
चिन्तन, कमीना आचरण यदि यथा स्थान बना रहा तो फिर समझना चाहिए कि प्रगति और शान्ति की कल्पना, बिना पंख की उड़ान ही बनी रहेगी।
चिन्तन और चरित्र की गिरावट समस्त उपलब्धियों को नष्ट निरस्त करके रखे दे रही है।
चिन्तन तक सीमित न रखकर उसे व्यवहार में −तनाव में− प्रवेश होने दिया जाय। आदर्शवादिता पढ़ने, सुनने मात्र से नहीं निभती उसका चमत्कार तभी देखा जा सकता है जब उसे आचरण में उतारा जाय−जीवनचर्या का अंग बनाया जाय।
चिन्तन की निदिध्यासन को आवश्यक माना गया है। हर दिन सूर्योदय से पूर्व या सूर्यास्त के बाद—जब चित्त शान्त एकान्त हो तब अपने अन्तरंग बहिरंग स्थिति का लेखा−जोखा लेना चाहिए, और भूलों को सुधारने, कमियों को पूरा करने तथा भावी प्रगति के लिए जो कदम उठाने आवश्यक हैं उनका दूरगामी एवं सामयिक निर्धारण करना चाहिए। निर्धारण ऐसा होना चाहिए जो वर्तमान स्थिति बिना समय गँवाये कार्यान्वित हो सके।
चिन्तन में उत्कृष्टता और आचरण में आदर्शवादिता भरनी पड़ेगी। व्यक्तित्व को पवित्र और प्रखर बनाना पड़ेगा। उसकी निजी सत्ता इतनी समर्थ होगी कि अपनी नाव स्वयं खे सकें और दूसरे अनेकों को बिठाकर पार कर सकें। इसके लिए अन्तराल में श्रद्धा—मस्तिष्क में प्रज्ञा और आचरण में निष्ठा का अधिकाधिक समावेश करना होगा। इस प्रयोजन के प्रज्ञा परिजनों के सम्मुख प्रस्तुत सप्त सूत्री योजना के अंतर्गत प्रथम तीन का महत्व आँका जा सकता है।
चिन्तन(4) पराक्रम। इन चारों को अपव्यय से रोककर सदुद्देश्यों की पूर्ति में नियोजित करने का नाम ही साधना है। जो इसे कर सके वे धन्य हो गये। जिसने इस उत्तरदायित्व की अवहेलना की वे सौभाग्य में बदलने वाली अवाँछनीयता अपनाकर शोक−सन्तापों को सहते असन्तोष तिरस्कार की भट्टी में झुलसते, अपनी और साथियों की दुर्गति कराते, रोते−कलपते, हाथ−मलते इस दुनिया से चले गये। बुद्धिमत्ता का एक ही प्रधान चिन्ह है कि जो हस्तगत है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे किया गया?
चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश करने में प्रयत्नरत रहना। मनुष्य की संरचना ऐसी नहीं है कि उसे दुःखी दरिद्र रहना पड़े। यह तो मात्र दृष्टिकोण की विकृति मात्र है जो रुझान, चिन्तन और व्यवहार में विकृतियाँ भरते−भरते संकटों के पहाड़ सामने ला खड़े करती हैं। मनःस्थिति सुधरे तो परिस्थिति सुधारने में तनिक भी देर न लगे। विचारणा यदि कुपथ गामिनी हो तो सोने की लंका जैसा वैभव, दस शिरे जितना ज्ञान, और कुम्भकर्ण जैसा बलिष्ठ रहते हुए भी वह समूचा परिकर कुकर्म करेगा और बेमौत मरेगा।
चिन्तन। शरीर काम करता है किन्तु उसमें रस न लिया जाय। बेगार भूणतों जाय तो उसमें मनोयोग न लगेगा। मात्र शरीर काम करता रहेगा। ऐसी दशा में खाली दिमाग शैतान की दुकान बने बिना न रहेगा।
चिन्तन और चरित्र में शालीनता की− महाप्रज्ञा का समावेश करने की− जीवन साधना का समन्वय ही प्रकारान्तर से आत्म−निर्माण है। अग्रगामी सूर्य प्रथम इन शाश्वत लक्ष्यों को निजी जीवन में प्रतिष्ठापित करके सर्वसाधारण को यह विश्वास दिला सकने में समर्थ होंगे कि यह प्रयोग ने केवल सरल और सरस है वरन् हाथों−हाथों सत्यपरिणाम प्रदान करने वाला भी है। व्यक्तित्व में गरिमा का संवर्धन इतना बड़ा उपार्जन है जिसकी तुलना हजार मन रत्नराशि एकत्रित करने से भी भारी सिद्ध होती है।
चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश करने वाली विद्या का पुनरुत्थान। यह दानों काम साथ−साथ चलने चाहिए।
चिन्तन के लिए विषयों का पूर्व निर्धारण हो। वैज्ञानिकों, दार्शनिकों एवं महापुरुषों की तरह अपना चिन्तन निरन्तर अभीष्ट प्रयोजनों के लिए सीमित एवं सुनिश्चित रहना चाहिए।
चिन्तन और चरित्र को आदर्शवादिता के ढाँचे में ढाल लेना यही है जीवन साधना का उपक्रम। इसमें अपनी अनगढ़ आदतों से जूझना पड़ता है। पतनोन्मुख चिन्तन प्रवाह को उलटना पड़ता है। लोक प्रचलन की अपेक्षा करने आत्मावलंबन के सहारे नये सिरे से नई रीति−नीति अपनाने और उसे हठपूर्वक अभ्यास में उतारने वाले संकल्प साहस को प्रखर करना पड़ता है, जो इतना कर सके उन्हें सुनिश्चित रूप से सर्वतोमुखी प्रगति का अवसर मिला है। आत्म सन्तोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह की त्रिविधि सिद्धियाँ उन्हें सुनिश्चित रूप से उपलब्ध हुई हैं।
चिन्तन के ईश्वरीय सम्पदा के बदले खरीदी हुई विभूति मानना चाहिए। नीति पूर्वक कमाया जाय और सत्प्रयोजनों में खर्च किया जाय यही है सच्ची और समझदारी की अर्थ नीति। धन को अपनी परिवार की एवं समाज की सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने में खर्च करना चाहिए। दुर्व्यसनों में एक छटाँक भी खर्च न होने देने का नियन्त्रण बरता जा सके तो असंख्यों दुर्व्यसनों और अनाचारों से सहज ही छुटकारा मिल सकता है। बजट बनाकर खर्च किया जाय।
चिन्तन प्रवाह को उलटना पड़ता है। लोक प्रचलन की अपेक्षा करने आत्मावलंबन के सहारे नये सिरे से नई रीति−नीति अपनाने और उसे हठपूर्वक अभ्यास में उतारने वाले संकल्प साहस को प्रखर करना पड़ता है, जो इतना कर सके उन्हें सुनिश्चित रूप से सर्वतोमुखी प्रगति का अवसर मिला है। आत्म सन्तोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह की त्रिविधि सिद्धियाँ उन्हें सुनिश्चित रूप से उपलब्ध हुई हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-December
चिन्तन कहा जा सकता है। इन्हें त्रिपदा गायत्री के भावपक्ष के तीनचरण कहा जा सकता है।
चिन्तन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए तथा उपासनात्मक कर्मकाण्ड के साथ−साथ इस भाव साधना को भी चलाना चाहिए। गायत्री महामन्त्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही सम्भव होती है और इसी के परिणाम स्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका महात्म्युत वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया गया है।
चिन्तन। यहाँ तथाकथित शब्द का उपयोग इसलिए किया गया है कि जिन साधनों को तृप्ति का कारण समझा जाता है वे वस्तुतः वैसे होते नहीं। यहाँ मृगतृष्णा और कस्तूरी भ्रान्ति वाला भटकाव ही आड़े आ जाता है। जो हो चेतना की प्रक्रिया ‘चिन्तन’ माननी पड़ेगी। और उसके द्वारा अन्तराल की उमंगों को परितृप्त करने वाली दिशाधारा अपनाते रहने की बात माननी पड़ेगी।
चिन्तन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समग्र साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अंग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाय तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार जीवन के लिए भजन, मनन और चिन्तन का सूक्ष्म आहार, प्रस्तुत करना पड़ता है।
चिन्तन का सूक्ष्म आहार, प्रस्तुत करना पड़ता है। अन्तःकरण की स्वस्थता, प्रखरता, परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीन आधारों पर ही निर्भर है। गायत्री महामन्त्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को कहा जा सकता है।
चिन्तनशील उसके लिये विरोधी विचारों की सेना सदा लड़ने और अड़ने के लिये तैयार रखता है। कभी कामुकता के विचार मन में उठें तो उसे निरस्त करने के लिये व्यभिचार से उत्पन्न होने वाले असंख्य अनर्थों का, संयम ब्रह्मचर्य से उपलब्ध होने वाले सत्परिणामों की लम्बी सूची तैयार रखता है और जैसे ही उस स्तर के दुष्ट विचार उठे कि प्रतिरोधी सदाचार परायण विचार शृंखला पर गम्भीरतापूर्वक ऊहापोह आरम्भ कर देता है। जहाँ यह प्रक्रिया आरम्भ हुई वहाँ कुविचारों के निराकरण में तनिक भी देर नहीं लगती।
चिन्तन को दृश्य में बदल लेती हैं। यह सपने लाक्षणिक होते हैं। उनमें मनःसंस्थान की स्थिति का पहेली बुझो डाल जैसा संकेत रहता है। विज्ञजन उसका अर्थ लगाते हैं। चिकित्सा शास्त्री सपनों के आधार पर शारीरिक एवं मानसिक रोगों का कारण स्वरूप खोजते हैं।
चिन्तन है। तृप्ति, तुष्टि और शान्ति के तथाकथित साधन जुटाने वाला चिन्तन। यहाँ तथाकथित शब्द का उपयोग इसलिए किया गया है कि जिन साधनों को तृप्ति का कारण समझा जाता है वे वस्तुतः वैसे होते नहीं। यहाँ मृगतृष्णा और कस्तूरी भ्रान्ति वाला भटकाव ही आड़े आ जाता है। जो हो चेतना की प्रक्रिया ‘चिन्तन’ माननी पड़ेगी।
चिन्तन को उभारते थे—स्वाध्याय सत्संग की योजना बनाते और जन−मानस के परिष्कार को ध्यान में रखते हुए लोक−शिक्षण में लगे रहते थे। ऋषि उन्हें कहा जाता था जो काय सत्ता को चेतना क्षेत्र की एक सर्व सम्पन्न प्रयोगशाला मानते थे और उसमें मूर्धन्य वैज्ञानिकों की तरह शोध अनुसन्धान—प्रयोग परीक्षण में लगे रहते थे। वे व्यक्तित्व की प्रसुप्त क्षमताओं को जगाने के क्षेत्र में गहरी डुबकी लगाते और बहुमूल्य मणि मुक्तक बीन कर लाते थे। जबकि मुनियों का प्रयास दूरदर्शी विवेकशीलता—सभ्य सुसंस्कारिता को लोक प्रचलन में समाविष्ट किये रहने के प्रयत्नों में निरत रहना होता था। लेखनी और वाणी की शक्ति वे इसी निमित्त करते थे।
चिन्तन शैली से की गई परिवार सेवा−गृहस्थयोग साधना बन जाती है। माता−पिता, भाई−बहन आदि का भरा−पूरा कुटुम्ब किसी भावनाशील व्यक्ति के लिए अपने सद्गुणों के विकास के लिए विनिर्मित प्रयोगशाला ही सिद्ध होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए परिवार के लिये उपार्जन एवं सुविधा व्यवस्था में लगन वाला अधिकाँश समय तथा मनोयोग नियोजित किया जाय तो घर ही तपोवन बन सकता है। ऐसे लोगों को तपोवन में घर बनाने की आवश्यकता नहीं है।
चिन्तन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का, आदर्शवादिता का और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसन्तुलित निर्धारण। इसके लिए प्रातःकाल उठते ही “हर दिन नया जन्म−हर रात नई मौत” का तथ्य सामने रखकर आज की−समय परक और भाव परक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। एक ही दिन के लिए यह जन्म है। आज ही रात की मृत्यु, निद्रा की गोदी में जाना है इसलिए ईश्वर दत्त समय सम्पदा और भाव वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए—जीवन लाभ लेने के लिये साहसपूर्वक तत्पर होना चाहिए। किसी भी व्यवधान को इस निर्धारण में बाधक नहीं होने देना चाहिए।
चिन्तन’ माननी पड़ेगी। और उसके द्वारा अन्तराल की उमंगों को परितृप्त करने वाली दिशाधारा अपनाते रहने की बात माननी पड़ेगी। इस संदर्भ में सही निर्णय तक पहुँचाने में मात्र विवेक ही कारण होता है और उसे भी चेतना की उच्चस्तरीय क्षमता में सम्मिलित रखा गया है। प्रज्ञा की सराहना इसी संदर्भ में होती है।
चिन्तन का स्वरूप शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के खाँचे में इस तरह कस देना है कि असावधानी के कारण पनपने वाली दुष्प्रवृत्तियों के पनपने की कोई गुंजाइश न रहे। ढीली–पोली जीवनचर्या पर ही विकृतियां सवार होती है यदि जागरूकता और सतर्कता बनी रहे तो दुष्ट दुर्भावों को सेंध लगाने का अवसर नहीं मिले। यदि वे कदाचित् आक्रमण करें भी तो चिन्तनशील उसके लिये विरोधी विचारों की सेना सदा लड़ने और अड़ने के लिये तैयार रखता है। कभी कामुकता के विचार मन में उठें तो उसे निरस्त करने के लिये व्यभिचार से उत्पन्न होने वाले असंख्य अनर्थों का, संयम ब्रह्मचर्य से उपलब्ध होने वाले सत्परिणामों की लम्बी सूची तैयार रखता है और जैसे ही उस स्तर के दुष्ट विचार उठे कि प्रतिरोधी सदाचार परायण विचार शृंखला पर गम्भीरतापूर्वक ऊहापोह आरम्भ कर देता है। जहाँ यह प्रक्रिया आरम्भ हुई वहाँ कुविचारों के निराकरण में तनिक भी देर नहीं लगती।
चिन्तन की उत्कृष्टता को कहा जाता है। इन दोनों से आगे चलकर—ऊँचा उठकर—अध्यात्म का विभूति क्षेत्र आता है। उसे खोदने, कुरेदने, बीनने बटोरने के लिए एक वरिष्ठ तन्त्र खड़ा करना पड़ता है जिसे एक शब्द में साधना कहा जा सकता है। साधना के अंतर्गत वे सभी प्रयास आते हैं जिनमें अन्तरंग के विशिष्ट शक्ति केन्द्रों को समझा, झकझोरा और सशक्त सक्रिय बनाया जाता है। इस दिशा में मिलने वाली सफलताएँ उच्चस्तरीय व्यक्तित्व की संरचना करती हैं।
चिन्तन। चिन्तन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का, आदर्शवादिता का और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसन्तुलित निर्धारण। इसके लिए प्रातःकाल उठते ही “हर दिन नया जन्म−हर रात नई मौत” का तथ्य सामने रखकर आज की−समय परक और भाव परक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। एक ही दिन के लिए यह जन्म है। आज ही रात की मृत्यु, निद्रा की गोदी में जाना है इसलिए ईश्वर दत्त समय सम्पदा और भाव वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए—जीवन लाभ लेने के लिये साहसपूर्वक तत्पर होना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-July
चिन्तन’ और उसे आज की स्थिति में क्रियान्वित करने को आकाँक्षा उभारना—योजना बनाना—मनन कहलाता है। योगाभ्यास की ध्यान योजना के अंतर्गत आत्म−समीक्षा, आत्म−परिष्कार, आत्म−निर्माण, आत्म−विकास की सुविस्तृत रूपरेखा खड़ी करना तथा उसे सफल बनाने के लिए कटिबद्ध होना प्रमुख कार्य है। इसी के निमित्त साधना, स्वाध्याय, चिन्तन, मनन के चार आधार अपनाने पड़ते हैं। एकाग्रता, मेडीटेशन, ध्यान योग के अंतर्गत यह प्रयोजन भी जुड़े रहते हैं अन्यथा मन को एक कल्पना तक देर तक रोके रहने से योगाभ्यास का वह उद्देश्य पूरा न हो सकेगा जिसके आधार पर आत्म−सत्ता की आत्मिकी को प्रयोगशाला के रूप में परिणित करने की सम्भावनाओं को साकार किया जाना है।
चिन्तन, कर्तृत्व एवं जीवनयापन के क्रम में भी परिवर्तन स्वाभाविक ही हुये होंगे।
चिन्तन में उत्कृष्टता और चरित्र में आदर्शवादिता का अधिकाधिक समावेश करना होता हैं।
चिन्तन चलने लगे तो व्यक्तित्व की पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करना सुगम बन जाता है। अन्तरात्मा अपनी निश्छल तथा श्रेष्ठ विशेषताओं के रूप में व्यक्तित्व में परिलक्षित होने लगे, यही पूर्णता की स्थिति है।
चिन्तन के हर क्षेत्र को प्रभावित करने वाला युग साहित्य लिखे जाने और उसे प्रभावित करने वाला युग साहित्य लिखे जाने और उसे जन−जन तक पहुँचाने का व्यापक प्रयास करना होगा। जिनके कन्धों में सूत्र संचालन का उत्तरदायित्व है, वे उस प्रयास में प्राणपण से निरत भी हैं। इस क्षेत्र की उज्ज्वल सम्भावनाओं के सम्बन्ध में विज्ञ समुदाय पूरी तरह आशावान है।
चिन्तन—करना चाहिए।
चिन्तन करते है तो ज्ञात होता है कि वह स्थान जहाँ जिह्वा को हल्के−हल्के स्पर्श किया जाता है सीधे पिट्यूटरी से जुड़ा है। विचित्र बात यह है कि यहाँ पर (नेजोफेरिक्स) पिट्यूटरी ग्रन्थि की संरचना का ही पदार्थ माँस पेशियों में—स्नायु तन्तु के जाल में उलझा बैठा होता है। इसका कारण यह है कि गर्भ काल में पिट्यूटरी का जन्म तालु मूर्धा में ही होता है—यही से ‘राथके पाऊच’ नामक स्थित होने पहुँच जाता है। दोनों स्थानों को जोड़ने वाली नलिका जन्म के बाद बन्द हो जाती है पर बहुसंख्य महिलाओं−पुरुषों में इसका अस्तित्व तालु मूर्धा में होता है। इसे इलेक्ट्रोडों से उत्तेजित कर हारमोन्स का उत्सर्जन उन व्यक्तियों में वैज्ञानिक करने में सफल हुए है जिनका मस्तिष्क स्थित पिट्यूटरी काम करना बन्द कर देता है।
चिन्तन क्षेत्र में लेखनी और वाणी के माध्यम से अनुकूलता उत्पन्न करती है। वही किया भी जा रहा है। प्रज्ञा अभियान में प्राथमिकता धर्मतन्त्र से लोकशिक्षण को दी गई है। उसी का दूसरा पक्ष रचनात्मक कार्यक्रमों का स्वरूप बनाना और गति देना है। जिन्हें मिशन की गतिविधियों से निकट का संपर्क है वे जानते है कि युग परिवर्तन के सूत्र संचालक किस प्रकार लेखनी की गंगा, वाणी की यमुना और कार्यक्रमों की सरस्वती का त्रिवेणी संगम बनाने के लिए भागीरथी और दधिचि जैसा पुरुषार्थ करने में संलग्न है।
चिन्तन शारीरिक और मानसिक शक्तियों को भीतर ही भीतर क्षीण करता रहता है। भावातिरेक का यह भी एक विकृत पक्ष है। जो अन्य प्रकार का भी हो सकता है तथा अपनी दुःखद प्रतिक्रिया छोड़ सकता है।
चिन्तन, स्वभाव, कौशल, स्वर चातुर्य आदि पर एक विशेष अवतरण चढ़ा पाया जाता है। यों सुधार प्रयत्नों का कुछ लाभ तो होता ही है,पर जन्मजात विशेषता में उतना परिवर्तन नहीं होता जितना कि होना चाहिए।
चिन्तन मनन को न केवल मस्तिष्क ही प्रभावित करता है वरन् इससे भी आगे एक शक्ति की सम्पूर्ण जानकारी तो नहीं मिल पायी है लेकिन यह निश्चित है कि मृत्यु के बाद भी उस चेतना का अस्तित्व तना रहता है।”
चिन्तन, मनन के चार आधार अपनाने पड़ते हैं। एकाग्रता, मेडीटेशन, ध्यान योग के अंतर्गत यह प्रयोजन भी जुड़े रहते हैं अन्यथा मन को एक कल्पना तक देर तक रोके रहने से योगाभ्यास का वह उद्देश्य पूरा न हो सकेगा जिसके आधार पर आत्म−सत्ता की आत्मिकी को प्रयोगशाला के रूप में परिणित करने की सम्भावनाओं को साकार किया जाना है।
चिन्तन से जुड़ा न होकर मात्र विचारों को खुला छोड़ देने तक सीमित माना गया। इन शोध कर्त्ताओं ने पूरे अध्यात्म उपचारों को इन तीन प्रयोगों के बहिरंग सीमित कर ही उनके अति फलदायी परिणाम बताये हैं। तनाव निवारण से लेकर शरीर की स्थूल जीवनी शक्ति में वृद्धि तक लाभों को गिनाते हुए उन्होंने यह प्रामाणित करने का प्रयास किया कि आयुष्य वृद्धि तथा रोग प्रतिरोधी सामर्थ्य वृद्धि में अध्यात्म उपचार काफी सीमा तक सहायक सिद्ध होते हैं।
चिन्तन में ‘शालीनता’ भरने की सुविस्तृत योजना के साथ किया गया है। वही अगले दिनों आदर्श चरित्र बनकर उभरेगी। चिन्तन और चरित्र के समन्वय से ही भली बुरी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनसे प्रभावित होकर लोग पतन−पराभव गर्त्त में गिरते, रोते–कल्पते मौत के दिन पूरे करते है अथवा उमंगों से उछलते, सुख−सन्तोष व्यक्त करते प्रगति पथ पर द्रुतगति से अग्रसर होते है। अगले दिन प्रज्ञा युग के होंगे। सृष्टा की युगान्तरीय चेतना ‘महाप्रज्ञा’ बनकर अवतारी प्रयोजन पूर्ण करेगी।
चिन्तन और चरित्र के समन्वय से ही भली बुरी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनसे प्रभावित होकर लोग पतन−पराभव गर्त्त में गिरते, रोते–कल्पते मौत के दिन पूरे करते है अथवा उमंगों से उछलते, सुख−सन्तोष व्यक्त करते प्रगति पथ पर द्रुतगति से अग्रसर होते है। अगले दिन प्रज्ञा युग के होंगे। सृष्टा की युगान्तरीय चेतना ‘महाप्रज्ञा’ बनकर अवतारी प्रयोजन पूर्ण करेगी। परिवर्तन की आधारभूत पृष्ठभूमि यही है।
चिन्तन की अनेकानेक धाराएं है। समस्याओं और के अगणित स्वरूप है इन सभी में घुसी हुई विकृतियों का समाधान अभीष्ट है। अतएव युग चेतना भी बहुमुखी होगी और चिन्तन के हर क्षेत्र को प्रभावित करने वाला युग साहित्य लिखे जाने और उसे प्रभावित करने वाला युग साहित्य लिखे जाने और उसे जन−जन तक पहुँचाने का व्यापक प्रयास करना होगा। जिनके कन्धों में सूत्र संचालन का उत्तरदायित्व है, वे उस प्रयास में प्राणपण से निरत भी हैं। इस क्षेत्र की उज्ज्वल सम्भावनाओं के सम्बन्ध में विज्ञ समुदाय पूरी तरह आशावान है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-January
चिन्तन अकारण सिर पर लादे रहेंगे। इसलिए उचित यही है कि कुछ समय के लिए अपने को अभ्यस्त ढर्रे से विरक्त, वैरागी, संन्यासी बना लिया जाय। यह समय उसी स्तर का जीवनयापन करने में व्यतीत किया जाय। चान्द्रायण की सारी दिनचर्या एवं विधिव्यवस्था योगी−तपस्वी स्तर की है, फिर उसके साथ उसी स्तर का मनोयोग भी क्यों न जोड़ा जाय। शरीर कहीं मन कहीं की विसंगति बनी रही तो उस लक्ष्य की उपलब्धि कैसे हो सकेगी जिसकी आशा अपेक्षा की गई है।
चिन्तन और दुष्ट कर्त्तृत्व के द्वारा मिलने वाले लाभों के क्यों छोड़े?
चिन्तन से उत्पन्न होती है।
चिन्तन से ऊपर की स्थिति है। ढर्रे का चिन्तन ‘कण्डीशण्ड’, यथास्थिति चिन्तन कहलाता है। इसे ही जागृत मन ‘चेतन मन’ कह सकते हैं। इसे भारतीय अध्यात्म शाँत अतिचेतन मन तथा “न्यूटेस्टामेण्ट” स्वर्ग का साम्राज्य कहता है। यही हमारा वास्तविक ‘स्व’ है।
चिन्तन अपनी निर्धारित दिशाधारा में सीमित रहता है। इतने भर से एकाग्रता का प्रयोजन पूरा हो जाता है। जबकि इस प्रकार के बौद्धिक पुरुषार्थों में मन और बुद्धि को असाधारण रूप से गतिशील रखना पड़ता है ओर कल्पनाओं को अत्यधिक सक्रिय करना पड़ता है। तो भी उसे चंचलता नहीं कहा जाता। अपनी निर्धारित परिधि में कितना ही द्रुतगामी चिन्तन क्यों न किया जाय−कितनी ही कल्पनाएँ−कितनी ही स्मृतियाँ−कितनी ही विवेचना क्यों न उभर रही हों, वे एकाग्रता की स्थिति में तनिक भी विक्षेप नहीं उत्पन्न करेंगी।
चिन्तन, प्रयास एवं व्यवहार का ताना−बाना बुनती है। दूसरी वह है जो ईश्वरीय नियम मर्यादाओं में रस लेती है। क्षुद्र को महान के साथ एकीभूत बनाने के लिए उत्कृष्टता अपनाती और उच्चस्तरीय प्रगति के लिए साहस सँजोती है इसे ‘प्रज्ञा’ कहते है। बुद्धि दैत्य का–वैभव का समर्थन करती रहे और प्रज्ञा देव का समर्थन करती है। दिव्य के साथ तादात्म्य होने की उमंगों से भरी रहती है।
चिन्तन ‘कण्डीशण्ड’, यथास्थिति चिन्तन कहलाता है। इसे ही जागृत मन ‘चेतन मन’ कह सकते हैं। इसे भारतीय अध्यात्म शाँत अतिचेतन मन तथा “न्यूटेस्टामेण्ट” स्वर्ग का साम्राज्य कहता है। यही हमारा वास्तविक ‘स्व’ है।
चिन्तन। दृष्टिकोण परिमार्जित होकर उदात्त बन जाय। उच्चस्तरीय आदर्शों एवं सिद्धान्तों को उसमें समावेश हो। व्यक्तिवादी निकृष्टता से विरति एवं अरुचि हो जाय। भक्ति योग का अर्थ है अन्तःकरण की भाव सम्वेदनाएँ।
चिन्तन के द्वारा अंतःप्रेरणा उभारने और तद्नुरूप जीवन की दिशा−धारा बदलने का भावनात्मक। दूसरा है साधन तपश्चर्या के दबाव देकर संचित कुसंस्कारों को गलाने और उन्हें सुसंस्कारिता के ढाँचे में ढालने का इन दोनों ही उपायों को साथ−साथ लेकर चलना पड़ता है। प्रगति पथ पर इन दो पहियों के सही होने से ही गाड़ी अग्रगमन की दिशा में गतिशील होती है। चिन्तन को परिष्कृत करने की प्रक्रिया योग कहलाती है और चरित्र को निखारने वाले उपक्रम तप कहलाते हैं।
चिन्तन विचित्र और विलक्षण होता है। कितने ही दुष्टता की भाषा में सोचते है और हर किसी पर दोषारोपण करते हुए शत्रुता की परिधि में लपेटते हैं। कितने आशंकाओं, सन्देहों, आक्षेपों के इतने अभ्यस्त होते हैं कि उन्हें अपनी पत्नी, बेटी, बहिन आदि तक के सामान्य कार्यो पर अकारण सन्देह बना रहता है। सम्बन्धी और पड़ौसी को अपने विरुद्ध कुचक्र रचते हुए दीखते हैं। दुर्भाग्य और ग्रह−नक्षत्रों के प्रकोप से कितने ही हर घड़ी काँपते रहते हैं और विपत्ति का पहाड़ अपने ऊपर टूटता हुआ अनुभव करते रहते हैं।
चिन्तन क्षेत्र को इतना खाली नहीं छोड़ती कि वहाँ आदर्शवादी जीवन पद्धति पर विचार कर सकना और वैसा वातावरण बनाने के जिए ठोस कदम उठा सकना सम्भव हो सके।
चिन्तन का भटकाव ही अधिक बाधक होता है। प्रज्ञा को वरण कर लेने से वह विवेक बुद्धि विकसित होती है जिसके कारण भटकाव रुकता है।
चिन्तन एवं रुझान जब विराट् चेतना से जुड़ जाता है तो वह ज्ञानयोग हो जाता है। ज्ञानयोग अर्थात् परिष्कृत चिन्तन। दृष्टिकोण परिमार्जित होकर उदात्त बन जाय। उच्चस्तरीय आदर्शों एवं सिद्धान्तों को उसमें समावेश हो। व्यक्तिवादी निकृष्टता से विरति एवं अरुचि हो जाय।
चिन्तन में सुविधा रहेगी। जिनका मन परिवार व्यवसाय में ही पड़ा रहेगा, वे दूर रहने के कारण कुछ कर तो सकेंगे नहीं, उल्टे चान्द्रायण काल में विकसित होने वाली पवित्रता−प्रखरता की दोनों उपलब्धियों से वंचित रखने वाले दुर्भाग्य−दुश्चिन्तन अकारण सिर पर लादे रहेंगे। इसलिए उचित यही है कि कुछ समय के लिए अपने को अभ्यस्त ढर्रे से विरक्त, वैरागी, संन्यासी बना लिया जाय। यह समय उसी स्तर का जीवनयापन करने में व्यतीत किया जाय। चान्द्रायण की सारी दिनचर्या एवं विधिव्यवस्था योगी−तपस्वी स्तर की है, फिर उसके साथ उसी स्तर का मनोयोग भी क्यों न जोड़ा जाय।
चिन्तन क्यों न किया जाय−कितनी ही कल्पनाएँ−कितनी ही स्मृतियाँ−कितनी ही विवेचना क्यों न उभर रही हों, वे एकाग्रता की स्थिति में तनिक भी विक्षेप नहीं उत्पन्न करेंगी। गड़बड़ी तो अप्रासंगिक चिन्तन से उत्पन्न होती है।
चिन्तन की दिशाधारा है। ध्यान के समय चिन्तन आत्मा के स्वरूप, क्षेत्र एवं लक्ष्य को समझने में लगना चाहिए और भाव क्षेत्र में यह प्रतिष्ठापना करनी चाहिए कि ब्राह्मी चेतना के गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर आत्मा को बहुमूल्य रत्नराशि संग्रह करने का अवसर मिल सके।
चिन्तन की एक−एक लहर को रचनात्मक दिशाधारा में प्रवाहित करने का जी तोड़ परिश्रम किया जाय। कुविचारों को सद्विचारों से काटने का महाभारत अहिर्निश जारी रखा जाय। विचारों के लिए उपयोगी मर्यादा एवं दिशाधारा निर्धारित की जाय जिनमें अभीष्ट प्रयोजन अथवा मनोरंजन के लिए परिभ्रमण करते रहने की छूट रहे। चिड़ियाघरों में जानवरों के लिए बाड़ा हाता है उन्हें घूमने−फिरने की छूट तो रहती है, पर उस बाड़े से बाहर नहीं जाने दिया जाय। ठीक यही नीति विचार वैभव के बारे में भी बरती जाय।
चिन्तन कहलाता है। इसे ही जागृत मन ‘चेतन मन’ कह सकते हैं। इसे भारतीय अध्यात्म शाँत अतिचेतन मन तथा “न्यूटेस्टामेण्ट” स्वर्ग का साम्राज्य कहता है। यही हमारा वास्तविक ‘स्व’ है।
चिन्तन सिमटकर स्थिरता की स्थिति में उत्पन्न हो जाना। जिस एकाग्रता की आवश्यकता ध्यान की सफलता के लिए बताई गई है वह मन की स्थिरता नहीं, चिन्तन की दिशाधारा है। ध्यान के समय चिन्तन आत्मा के स्वरूप, क्षेत्र एवं लक्ष्य को समझने में लगना चाहिए और भाव क्षेत्र में यह प्रतिष्ठापना करनी चाहिए कि ब्राह्मी चेतना के गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर आत्मा को बहुमूल्य रत्नराशि संग्रह करने का अवसर मिल सके।
चिन्तन तन्त्र को गम्भीरतापूर्वक सोचने एवं आत्मनिर्माण के सरंजाम इकट्ठे करने का अवकाश चाहिए। न केवल चिन्तन वरन् प्रयास परिश्रम की दृष्टि से भी बहुत कुछ करना होता है। इसकी सुविधा उन्हें ही मिल सकती हैं; जिनने अपनी बड़प्पन परक आकाँक्षाओं को सीमित करके, निर्वाह की आवश्यकताओं को पूरा करते रहना ही पर्याप्त माना है। अमीरी और गरिमा को एक साथ प्राप्त कर सकना कदाचित ही कभी किसी के लिए सम्भव हुआ है।
चिन्तन आत्मा के स्वरूप, क्षेत्र एवं लक्ष्य को समझने में लगना चाहिए और भाव क्षेत्र में यह प्रतिष्ठापना करनी चाहिए कि ब्राह्मी चेतना के गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर आत्मा को बहुमूल्य रत्नराशि संग्रह करने का अवसर मिल सके।
चिन्तन से रोका जाता है। दोनों के मध्य स्वाभाविक स्नेह सहयोग को नीति मर्यादा के बन्धनों में जकड़ा जाता है। बहिन−भाई–माता−पुत्र–पुत्री−पिता का सम्बन्ध निभाता रहे तो दोनों के मध्य सहज सौजन्य बना रहेगा तो शरीरगत जीवनी शक्ति तथा मनोगत प्रतिभा शक्ति का क्षरण होने से बच जायेगा। यह पूँजी व्यक्तित्व के भौतिक और आत्मिक पथ को समान रूप से सुविकसित बनाने में असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होती है।
चिन्तन वरन् प्रयास परिश्रम की दृष्टि से भी बहुत कुछ करना होता है। इसकी सुविधा उन्हें ही मिल सकती हैं; जिनने अपनी बड़प्पन परक आकाँक्षाओं को सीमित करके, निर्वाह की आवश्यकताओं को पूरा करते रहना ही पर्याप्त माना है। अमीरी और गरिमा को एक साथ प्राप्त कर सकना कदाचित ही कभी किसी के लिए सम्भव हुआ है।
चिन्तन को परिष्कृत करने−उदात्त बनाने के लिए आवश्यक है।
चिन्तन करना और अपनी समूची चेतना को उसी में सराबोर कर देना।
चिन्तन की सुखद प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए ही उसे स्वर्ग कहा गया है। ललक और लिप्सा, निकृष्टता एवं कुसंस्कारिता के भव बन्धनों को तोड़ फेंकने की स्थिति मुक्ति कहलाती है। स्वर्ग, मुक्ति,के विस्तृत अलंकारिक आख्यायिकाओं में तथ्य इतना भर है कि परिष्कृत दृष्टिकोण अपनाने वाला स्वर्गीय सुख सन्तोष पाता है और आत्मीयता के विस्तार के साथ सम्बद्ध सेवा उदारता की नीति अपनाते हुए लोभ−मोह के पाश से मुक्त हो जाता है। इस योग दृष्टि का विकास परमात्मा से जुड़ने से ही सम्भव हो पाता है।
चिन्तन के क्षेत्र में समाविष्ट पशु−प्रवृत्तियों के पक्ष को मल्ल−युद्ध के लिए मोर्चे पर खड़ा कर दिया जाता है और योग साधना के अंतर्गत ऐसा सरंजाम जुटाया जाता है जिसमें अनास्थाओं को हटाने और देवत्व को जीतने का मूलभूत प्रयोजन पूरा हो सके। योग में निकृष्टता से पीछा छुड़ाना और उत्कृष्टता के साथ सघन सम्बन्ध जोड़ देना यह दोनों ही कदम उठाने पड़ते हैं। मात्र निकृष्टता से पीछा छूटना भर पर्याप्त नहीं, उत्कृष्टता का सम्वर्धन क्रम भी चलना चाहिए। रोग से पीछा छूटना आवश्यक तो है किन्तु पर्याप्त नहीं। चिकित्सा उपचार की ही तरह व्यायाम, पौष्टिक आहार, उपयुक्त जलवायु का प्रबन्ध भी स्वास्थ्य सम्वर्धन के लिए करना पड़ता है।
चिन्तन एवं प्रयास को दिशा देने में अन्तःकरण ही मार्ग दर्शक होता है। अन्तःकरण को यों कई भागों में बाँटा जाता रहा है, पर उसे संक्षेप में अचेतन की यह परत कह सकते हैं, जिसमें स्वभाव, एवं अभ्यास कहा जा सकता है। यह आदतें इतनी प्रबल होती हैं कि उसके सामने न बुद्धि के निर्णय ठहरते हैं और न परिस्थितियों के दबाव। इसलिए मानवी सत्ता का सबसे प्रबल पक्ष यह अचेतन या अन्तःकरण ही माना जाता रहा है।
चिन्तन प्रक्रिया को इन दिनों नियोजित रखा जाना चाहिए। यह प्रयास विशुद्ध ध्यान−धारणा भर है। वास्तविक ध्यान−धारणा निर्धारित विषय पर वैज्ञानिकों की तरह तन्मय हो जाने को कहते हैं। तन्मयता अर्थात् रुचिपूर्वक अभीष्ट प्रसंग पर समूचा मनोयोग केन्द्रीभूत रखे रहना। उसी क्षेत्र की अगणित समस्याओं को समझने, समाधान करने में अत्यधिक व्यस्त रहना।
चिन्तन, प्रतिभा, सम्पदा जैसे ईश्वर प्रदत्त अनुदानों का सीमित अंश ही निर्वाह−परिवार के लिए खर्च किया जाय। अनिवार्य की पूर्ति ही दृष्टि में रहे तो उपरोक्त सम्पदाओं में से प्रत्येक को उत्साहवर्धक मात्रा में बचाया जा सकता है। इस बचत को उच्चस्तरीय प्रयोजनों में लगाने पर ही ईश्वर के खेत में पुण्य−परमार्थ बोने और उससे हीरे−मोतियों की फसल उगाने का अवसर मिल सकता है। अनुपयुक्त में कटौती और उपयुक्त के लिए श्रद्धांजलि का एक ही उपक्रम है जिसे अपनाकर महानता की दिशा में बढ़ सकना किसी के लिए सम्भव हुआ है। पूजापाठ से देवताओं को रिझाने और उनकी टोपी, चप्पल उतार लेने का जाल बुनते रहने वाले दिग्भ्रान्तों की पंक्ति में चान्द्रायण के विवेकवान साधकों में से किसी को भी नहीं बैठना है।
चिन्तन का जन प्रचलित ढर्रा ही इस रेखा की एनोटॉमी है। यदि इस बैरियर को तोड़ दिया जाये तो प्रकाश को पाना शक्य है जो अतिमन की जागृति का प्रथम चिन्ह है।
चिन्तन से हटाकर उपयोग में नियोजित करने के लिए प्रयास करना पड़ा है। इसके बिना चंचलता की वानर वृत्ति से ग्रसित व्यक्ति न किसी प्रसंग पर गहराई के साथ सोच सकता है और न किसी कार्यक्रम पर देर तक स्थिर रह सकता है। शिल्प, कला, शिक्षा विज्ञान आदि महत्वपूर्ण सभी प्रयोजनों के सफलता में एकाग्रता की शक्ति की ही प्रधान भूमिका होती है। चंचलता को असफलता की सगी बहिन माना जाता है।
चिन्तन पक्ष भी ध्यान में रखना होता है। रूप–यौवन, हास–विलास एवं रति कर्म के कल्पना चित्र भी मानसिक उद्विग्नता उत्पन्न करने में असाधारण बाधक पहुँचाते हैं। इसलिए नर को नारी के प्रति और नारी को नर के लिए अश्लील चिन्तन से रोका जाता है। दोनों के मध्य स्वाभाविक स्नेह सहयोग को नीति मर्यादा के बन्धनों में जकड़ा जाता है। बहिन−भाई–माता−पुत्र–पुत्री−पिता का सम्बन्ध निभाता रहे तो दोनों के मध्य सहज सौजन्य बना रहेगा तो शरीरगत जीवनी शक्ति तथा मनोगत प्रतिभा शक्ति का क्षरण होने से बच जायेगा।
चिन्तन को कोई स्थान नहीं इसमें भय, ऐषणा, शंका की कोई जगह नहीं है। यह सदैव प्रसन्नता से युक्त है तथा आत्मिक एवं भौतिक दृष्टि से सबल सम्पन्न जीवन के यह सपने देखता है।
चिन्तन की सामग्री देने से बदलती रहती है। महत्वाकाँक्षाओं को आवश्यक, उपयोगी एवं शक्ति शाली माना गया है, पर यह बात तभी सच बैठती है जब उन्हें आदर्शवादिता के साथ नियोजित किया जाय। निष्कृष्टता के साथ जुड़ जाने पर भी पतन और पराभव का ही पथ-प्रशस्त करती हैं।
चिन्तन को परिष्कृत करने की प्रक्रिया योग कहलाती है और चरित्र को निखारने वाले उपक्रम तप कहलाते हैं।
चिन्तन का प्रकाश उनकी आँखें चौंधिया देता हैं और औचित्य को समझने, स्वीकार करने जैसा साहस उनके जुटाये जुट ही नहीं पाता। इस वर्ग के लोगों को मानसिक दृष्टि से अविकसित नर−पशुओं की ही श्रेणी में रखा जा सकता है।
चिन्तन इस केन्द्र बिन्दु पर नियोजित करना चाहिए कि अन्तःक्षेत्र को परिष्कृत करने के लिए क्या सोचना चाहिए क्या बदलना चाहिए और क्या कर गुजरने के लिए साहस जुटाना चाहिए। इस निर्धारण में निश्चय ही उपवास−अनुष्ठान एवं तप−साधना के कारण बढ़ी हुई सात्विकता–सही निर्णय तक पहुँचाने में बहुत कुछ सहायक सिद्ध हो सकती है।
चिन्तन को उत्कृष्टता के साथ जोड़ने की प्रक्रिया योग से और आदतों को निकृष्टता से विरत कर उत्कृष्टता के क्षेत्र में उछाल देने की आवश्यकता ‘तप’ के सहारे सम्पन्न की जाती है। प्रवाह को मोड़ने−मरोड़ने के लिए इससे कम में बात बनती ही नहीं। मान्यताएँ और आदतें बड़ी ढीठ होती हैं। समझाने−बुझाने से वे औचित्य के सामने हतप्रभ तो हो जाती हैं पर अपनी स्थिति बदलने को तैयार नहीं होतीं। तर्क में हार जाने पर ऊपरी मन से स्वीकार करना एक बात है और इस आधार पर अपने स्वभाव−व्यवहार में परिवर्तन कर लेना दूसरी।
चिन्तन को उत्कृष्टता की और मोड़ने के लिए प्रतीक आधार चाहिए। कथा, उपन्यासों में ऐसी बातों का समावेश होता है जो मनोरंजन के लिए आवश्यक हैं किन्तु फिर भी मनुष्य सिनेमा, नाटक, सर्कस देखने जाता है और उसके माध्यम से भले−बुरे प्रभावों को ग्रहण करता है। विचार कथाएँ और सम्बद्ध सिद्धान्तों का समावेश होते हुए भी उपन्यासों, कथाओं की पुस्तकों की तुलना में सिनेमा के चलचित्र कही अधिक लोकप्रिय बने हुए हैं। कारण एक ही है−−प्रतीकों के माध्यम से मनोरंजन अधिक हो जाता है। आरम्भ में निराकार विराट् चेतना से संपर्क साधने और प्रेम भावना उत्पन्न करने में मन को कठिनाई होती है।
चिन्तन, मन के चार व्यावहारिक और जप,ध्यान,प्राणायाम, मुद्रा बन्ध, नाद, लय आदि कितनी ही प्रक्रियाएँ बताई, अपनायी जाती हैं। तप में अस्वाद, उपवास, ब्रह्मचर्य, शरीर सेवा में आत्म−निर्भर, भूमि शयन, ऋतु प्रभावों का सहन, मौन आदि ऐसे क्रिया−कृत्य आते हैं जिनमें शरीर को यह अनुभव करना पड़े कि उसे उच्चस्तरीय प्रगति का अभ्यास करना पड़ रहा है। आदतों का–आकाँक्षाओं का प्रतिरोध करने में स्वभावतः अनख लगता और कष्ट होता है। इसके अतिरिक्त आदर्शवादिता अपनाते ही अवाँछनीयता व्यंग्य, उपहास, असहयोग, विरोध करने पर उतरती है और चिढ़कर हानि भी पहुँचती हैं। महानता के मार्ग पर चलने वालों को कदम बढ़ाने से पूर्व इस सम्भावना को ध्यान में रखना चाहिए और उसकी पूर्व जानकारी एवं तैयारी रहने के रूप में विभिन्न प्रकार की तितिक्षाएं करते रहने की विधि व्यवस्था अपनानी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-August
चिन्तन एवं स्वभाव पर असर पड़ता है इसलिए शिक्षा तथा परम्परा के क्षेत्र में कुछ ऐसा समावेश होना चाहिए जिसके प्रभाव से आज का मनुष्य कल अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान, साहसी और सद्गुणी हो सके।
चिन्तन एवं कर्म चेष्टाओं को उस ‘एक’ में घुला दे तो किसी प्रकार की बाधा हमें अधीर नहीं बना सकती, कोई विघ्न निराश नहीं कर सकता है। किसी मनुष्य से क्षोभ उत्पन्न नहीं हो सकता। जब अपना स्वरूप ही सबमें है तो कौन मित्र तथा कौन शत्रु है। शक्ति का अहंकार, बुद्धि का दम्भ एवं ऐश्वर्य का गर्व इस भावना के उदय होते ही स्वतः नष्ट हो जाएगा । मनुष्यों के बीच पाई जाने वाली पृथकता की प्रवृत्ति का अन्त होते ही देवोपम मनःस्थिति स्वर्णिम परिस्थिति का वर्णन होने लगेगा।
चिन्तन मन्थन कर लिया जाता है इसके उपरान्त ही सरंजाम जुटाये कर लिया है इसके उपरान्त ही सरंजाम जुटाये ओर कदम उठाये जाते हैं। हाट बाज़ार में खरीद के लिए जाने वाले पहले लिस्ट बनाते हैं। समझदार आदमी आय-व्यय का बजट बनाते और अर्थ सन्तुलन बिठाते हैं। मूढ़ मति ओर बाल-बुद्धि लोगों के अतिरिक्त हर छोटे-बड़े कामों में पूर्व निर्धारण की नीति अपनाई जाती है। बी. गिसेलीन ने ‘दि क्रिएटिव प्राँसेस’ को इस यथार्थवादी दृष्टिकोण को महत्व देते हुए कहा हैं—

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-March
चिन्तन अभी इस विषय में और भी सम्भावनाओं को लेकर गतिशील है और अध्यात्म विज्ञान तो इन मान्यताओं को पहले से ही प्रतिपादित करता आया है कि ओजस् का संग्रह किया जाता है व यही मनःशक्ति –संकल्पबल को बढ़ाकर मनुष्य के तेजोवलय को प्रभावशाली बना देता है। यह ‘आँरा’ और प्रकृति नहीं त्वचा से, आँखों से, वाणी से सतत् प्रवाहित होते रहने वाला विद्युत्प्रवाह ही है।
चिन्तन ही नहीं, कर्म भी ऐसी दिशा विशेष में बढ़ने लगते हैं जिसकी किसी को कभी सम्भावना नहीं होती। युग सन्धि की बेला और उस पर भी नवरात्रि एक अप्रत्याशित अवसर–अपवाद के रूप में ही मानी जानी चाहिये। जो अवसर को पहचानते हैं, वे कभी चूकते नहीं। आत्मिक प्रगति की व्यवस्था बनाने व अन्तः की प्रगति हेतु आत्मिक पुरुषार्थ के लिए इस वर्ष की नवरात्रियाँ एक असामान्य अवसर के रूप में आयी हैं। इन दिनों वस्तुतः अदृश्य से अप्रत्याशित अनुदान बरसने व उससे व्यापक जन समूह के उससे लाभान्वित होने की आशा की जा सकती है, आवश्यकता मात्र यही है कि इस पुरुषार्थ से कोई भी नैष्ठिक साधक छूटने न पाये।
चिन्तनपरक ब्रह्म विद्या तथा साधनापरक तपश्चर्या दोनों ही तथ्यपूर्ण हैं। एक ज्ञानपक्ष है तो दूसरा विज्ञान पक्ष। एक को ब्रह्मवर्चस् का ब्रह्म पक्ष व दूसरे को वर्चस् पक्ष कह सकते हैं। दोनों मिलकर ही सम्पूर्ण बनते हैं। ब्रह्मवर्चस् विज्ञान की इन दोनों ही विधाओं का सारे साधना उपक्रमों में समावेश रहता है।
चिन्तन भी उत्कृष्टता की दिशा में चलने लगता है। कितनी बार तो अप्रत्याशित परिवर्तन होते देख जाते हैं। दुष्ट, दुराचारी भी उनकी डडडड प्राप्त करके बदलते, दुष्प्रवृत्ति को छोड़ते और सद्मार्ग पर चलने को विवश हो जाते हैं। यह प्राण ऊर्जा का ही प्रभाव है जो उन्हें जबरन श्रेष्ठता के मार्ग पा घसीट ले चलती है।
चिन्तन−भाव सम्वेदनापरक −ध्यान योग। इन्हीं दो में सारे साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
चिन्तन की धारा को सृजनात्मक दिशा में नियोजित कर लेने की विशेषता प्राप्त कर ले तो समझना चाहिए अपने स्वयं के भव बन्धनों को काटने का एक सशक्त आधार बन गया। सभी जानते है कि सफलताओं में साधनों की कमी अथवा परिस्थितियों की प्रतिकूलता उतनी बाधक नहीं होती जितनी कि चित्त की चंचलता और मन की अस्त−व्यस्तता। इन दोनों अवरोधों को दूर करने में ध्यानयोग की प्रक्रिया विशेष रूप से सहायक सिद्ध होती है। ध्यान का लक्ष्य होता है चंचल चित्त को मजबूत रस्सों से कसकर नियत प्रयोजन में लगा देने की क्षमता प्राप्त कर लेना इसी आध्यात्मिक भाषा में मनोनिग्रह के रूप में सम्बोधित किया गया है। योग शास्त्रों में मनोनिग्रह का असाधारण महत्व बताया गया है।
चिन्तन से विरत किये जाने के लिये अध्यात्म की वैज्ञानिकता सिद्ध करने की अनिवार्यता और भी बढ़ गयी है।
चिन्तन को इधर−उधर भटकने से रोक कर उत्कृष्ट प्रवाह के साथ जोड़ देना उसी प्रकार है जैसे अपने अन्दर के क्रिस्टल को ईथर में संव्याप्त तरंगों को ग्रहण करने योग्य बना लेना व आदान−प्रदान का क्रम आरम्भ कर देना। सद्भाव सम्वर्धन –श्रद्धा अभिवर्धन हेतु ध्यानयोग से श्रेष्ठ कोई साधना नहीं। सोऽहं की– हंसयोग साधना, नादयोग, त्राटक, बिन्दु, अवतरण एवं चक्र भेदन इत्यादि साधनायें मूलतः ध्यानपरक हैं। इन सभी में अपने चिन्तन को ध्यान प्रक्रिया द्वारा उत्कृष्टता से जोड़ने व उस महत्तत्व से प्राप्त प्राणशक्ति से प्रसुप्त को जगाने−उभारने का पुरुषार्थ किया जाता है। इन्हीं साधनाओं के विस्तार का स्पष्ट विवेचन अगले पृष्ठों में किया गया है
चिन्तन में भाव सम्वेदनाओं की उत्कृष्टता उभारे तप साधना के प्रयास अधूरे व एकाँगी ही बने रहेंगे। इस मूल तथ्य को सबसे पहले समझा जाना चाहिए कि उच्चस्तरीय आस्थाओं की वरीयता स्वीकार करके ही साधना पथ पर आगे बढ़ा जा सकता है।
चिन्तन और भावना के रूप में अविच्छिन्न रूप में जुड़े हुए हैं। यदि उन पर ध्यान न दिया जाय और केवल शरीरचर्या वाली प्रक्रिया चलती रहे तो समझना चाहिए कि शास्त्र निर्धारण का एक बहुत छोटा ही अंश पूरा हुआ।
चिन्तन-सद्बुद्धि प्राप्त होने तथा आप्तकाम होने का सौभाग्य अनुदान) के माध्यम इसकी महिमा शास्त्रों में गायी है। राम, कृष्ण आदि अवतारों की–देवताओं की–ऋषि-ऋषिकाओं का उपासना पद्धति भी गायत्री ही रही है। इस सर्वसाधारण का उपासना अनुशासन मानकर इसकी उपेक्षा करने वालों की कटु भर्त्सना की गयी है। सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिये की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप में महत्व मिला है। गायत्री, गंगा, गीता, गौ और गोविंद हिन्दू धर्म के पाँच आधार माने गये हैं।
चिन्तन में प्रौढ़ता-प्रखरता के समावेश एवं युग देवता के सृजन प्रयोजनों में सहयोग कर हम सभी विभीषिका निवारण तथा नव सृजन में हाथ बँटा सकते हैं।
चिन्तन प्रधान, कामुक–लम्पटों के चेहरे–शरीर से एक अलग प्रकार का विकर्षण करने वाला (रिपेलिग) प्रवाह निस्सृत होता है। ऐसे व्यक्तियों से दूर रहने को ही मन करता है, साथ ही आस-पास का वातावरण तक वे अभिशप्त बना डालते हैं–यह सारी मानवी विद्युत–चुम्बकत्व-प्राण प्रवाह से युग्म की न्यूनाधिकता की ही परिणति है।
चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश करने वाले प्रतिपादन को ब्रह्मविद्या कहते हैं। इसमें ईश्वरीय निर्देशों एवं ऋषि अनुभवों को इस प्रकार गूँथा गया है कि मानवी अन्तःकरण उसे स्वीकार कर ले। शास्त्र वचनों का स्वाध्याय, चिन्तन, मनन एवं शास्त्रज्ञों का सत्संग इसी निमित्त किया जाता है। यह अध्यात्म विद्या का तत्वदर्शन वाला पक्ष हुआ जिसमें मान्यताओं की श्रद्धा−तर्क के आधार पर मान्यताओं से काट की जाती है।
चिन्तन-मनन को सूक्ष्म ज्ञानयोग तथा व्रतोपवास के अनुशासन को कर्मयोग कहा जाता है। इस समन्वय में तीनों शरीरों को परिष्कृत करने वाली तीन प्रकार की विधि-व्यवस्था के अंतर्गत समूचे
चिन्तन व आदर्श कर्तृत्व के रूप में प्रकट होता है व यही शाश्वत सिद्धि उपलब्धि है जो महामानव अर्जित करते हैं जिसके लिए पुरुषार्थरत रहते हैं।
चिन्तन के रूप में आत्मतत्व रूपी सद्गुरु अथवा आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति काया में विद्यमान प्रत्यक्ष गुरु की सहायता ली जाती है। गुरु उस सद्गुरु से दिशा निर्देश प्राप्ति में सहायता करता है व पात्रता के अनुरूप अपनी शक्ति का एक अंश भी साधक को देता है। परन्तु वास्तविक सहायता उसी आत्मतत्व से मिलती है जिसे अपने अतः में जगाया जाता है। यदि आत्मतत्व परिष्कृत– जागा हुआ न हो तो गुरु कृपा भी सूखी चट्टान पर बरसे वर्षा जल की तरह निरर्थक चली जाती है।
चिन्तन एवं क्रिया का सुनियोजन। इस लक्ष्य की पूर्ति में आप्त वचनों के अतिरिक्त सुनियोजित मार्गदर्शन की समय−समय पर आवश्यकता पड़ती है। इसीलिये तत्वदर्शन व चिन्तन के रूप में आत्मतत्व रूपी सद्गुरु अथवा आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति काया में विद्यमान प्रत्यक्ष गुरु की सहायता ली जाती है। गुरु उस सद्गुरु से दिशा निर्देश प्राप्ति में सहायता करता है व पात्रता के अनुरूप अपनी शक्ति का एक अंश भी साधक को देता है। परन्तु वास्तविक सहायता उसी आत्मतत्व से मिलती है जिसे अपने अतः में जगाया जाता है।
चिन्तन परक तथा संवेदनात्मक गतिविधियों का उभार एवं अवसाद इसी प्राण शक्ति पर निर्भर है जो अपने सूक्ष्म रूप में प्राण प्रवाह का स्वरूप लेकर जीवकोषों–ऊतकों से लेकर मस्तिष्क–सुषुम्ना के स्नायु सिनेप्सों तक तथा एन्जाइम केमीकल्स के रूप में ग्रन्थि उपत्यिकाओं तक इसी प्रकार संव्याप्त हैं, जैसे समुद्र में घुला नमक। इस प्राण शक्ति की प्रखरता ही शरीर में चारों ओर वितरित-विस्तारित होकर मनुष्य को ओजस्वी बनाती है। मनःसंस्थान में गतिमान होने पर उसे मनस्वी तथा अन्तःकरण में सक्रिय होने पर मनुष्य को तेजस्वी बनाती है।
चिन्तन−चरित्र व्यवहार में परिलक्षित होता दीख नहीं पड़ता। लगता है या तो वह आधार गलत है जिस पर उपासना की गयी अथवा उपासना फलदायी होती ही नहीं। असफलता मिलने पर बहुतायत ऐसों की ही होती है जो अपने को नहीं, दोष दैव को−भाग्य को−देते देखे जाते हैं। प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के अभाव में तथा श्रुतियों के भ्रम−जंजालों के कारण भोले साधना पारायण व्यक्ति भी इस विडंबना से ग्रस्त दुःखी होते देखे जाते हैं।
चिन्तन के दुर्दिन चले गये। सर्वत्र उल्लास एवं आनन्द आलोकित हो रहा है। ईश्वरीय बनकर शरीर में सत्प्रवृत्ति और मन की सद्भावना बनकर ज्योतिर्मय हो चला। अँधेरे में भटकाने वाली काली निशा का अन्त हो गया। भगवान की दिव्य ज्योति ने समूची जीव सत्ता पर अपना आधिपत्य जमा लिया–अपनी दिव्यता से अन्तरात्मा को अनुप्राणित कर दिया।
चिन्तन में निमग्न होने की प्रेरणा देती हैं– यह समझना–अनुभव करना− व उस स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास करना हर किसी से नहीं बन पाता। अस्तु यह अछूत ही पड़ा रह जाता है। स्वभाव बदलता नहीं, आदतें सुधरती नहीं, पशुवृत्तियों से मोर्चा लेते बनता नहीं व जीवन−संकट जैसे− तैसे खिंचता रहता है। ऐसे व्यक्ति भोंडे, असभ्य कहलाते हैं। वह अस्तु−व्यस्त असफल जीवन जीकर, बहुसंख्य जीवों की तरह मृत्यु की शरण लेते हैं।
चिन्तन को ध्यान प्रक्रिया द्वारा उत्कृष्टता से जोड़ने व उस महत्तत्व से प्राप्त प्राणशक्ति से प्रसुप्त को जगाने−उभारने का पुरुषार्थ किया जाता है। इन्हीं साधनाओं के विस्तार का स्पष्ट विवेचन अगले पृष्ठों में किया गया है
चिन्तन व्यवहार में इससे कम में हो ही नहीं सकता। आग के समीप बैठे बिना गर्मी आये कैसे?
चिन्तन, मनन एवं शास्त्रज्ञों का सत्संग इसी निमित्त किया जाता है। यह अध्यात्म विद्या का तत्वदर्शन वाला पक्ष हुआ जिसमें मान्यताओं की श्रद्धा−तर्क के आधार पर मान्यताओं से काट की जाती है।
चिन्तन एवं आदर्श कर्तव्य, दूरदर्शी दृष्टिकोण एवं व्यवहार में सज्जनता–परमार्थ परायणता प्रक्रिया भी प्रभावित होती है। सूर्य स्वर के समय शरीर में दिन तथा चन्द्र स्वर के समय शरीर में रात्रि होती है। दिन रात्रि में मनुष्य शरीर में 21600 बार श्वास का आवागमन स्वाभाविकतः होता है अर्थात् 1 मिनट में 15 या 16 बार। इस प्रकार प्रत्येक जीवधारी का पूर्ण आयु प्राप्त करना, दीर्घजीवी होना उसकी श्वास क्रिया पर आश्रित है। जो इस सम्पदा का अपव्यय करता है अर्थात् 1 मिनट में अधिक बार श्वास लेता है वह आयु उतनी ही कम करता जाता है−व्यसनी, भोगी, रोगी इसी श्रेणी में आते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-May
चिन्तन एवं कृत्य को श्रेष्ठ बनाये रखने वाले मरणोपरान्त शान्ति एवं सन्तोष की अनुभूति करते हैं जबकि दुष्कृत्यों के सूक्ष्म संस्कार मरने के बाद भी उस व्यक्ति को चैन से नहीं बैठने देते और स्थान तथा वातावरण को विक्षुब्ध बनाये रखते हैं
चिन्तन शैली–कार्य पद्धति−ने ही अधिकाँश उलझनें पैदा की हैं। उन्हें सुधारा जा सके तो समाधान का मार्ग सहज ही हस्तगत हो जायेगा।
चिन्तन। मानव शरीर, मन, वनस्पति जगत, प्राणी जगत एवं इकॉलाजिकल सन्तुलन पर ग्रहों के छोटे से परिवर्तनों के बड़े महत्वपूर्ण प्रभाव होते से परिवर्तनों के बड़े महत्वपूर्ण प्रभाव होते देखे गए हैं। पृथ्वी का मौसम पूरी तरह ग्रहों के सन्तुलन पर निर्भर है। थोड़ा-सा भी व्यतिरेक भूकम्पों, अनावृष्टि जैसे विनाशकारी परिवर्तनों के रूप में निकलता है। इसके विपरित ज्योतिर्विज्ञान की विद्या अपने गणितीय अनुमान तथा तथ्यों के आधार पर ऐसे कदम उठाने की दिशा निर्देश देती है जिससे वातावरण में वाँछित मोड़ लाया जा सके, प्रतिकूल को पलटा जा सके।
चिन्तन एवं चरित्र में ऐसी उत्कृष्टता का समावेश करना होगा जो दूसरों को प्रशंसक, समर्थक ही नहीं, सच्चे अर्थों में मित्र सहयोगी भी बना सकने में सफल हो सके। इन दो निर्धारणों को क्रियान्वित होने की व्यवस्था बनते ही प्रगति की आकाँक्षा को पूरा कर सकने वाले अनेकों आधार खड़े होते तथा सफल बनते दृष्टिगोचर होने लगते हैं।
चिन्तन की निर्धारित दिशाधारा में विक्षेप न पड़े।
चिन्तन के जंजाल में फँसे रहने के अतिरिक्त उससे एक कदम आगे बढ़ना ही नहीं बन पड़ता। यदि उच्च चेतना से भरे−पूरे आस्था संस्थान के साथ संपर्क साधा जा सके और उसे अनुकूल बनाया जा सके तो हर कोई यह अनुभव कर सकता है कि अपनी गरिमा को ऊँचा उठाने के कितने आधार उसके पास मौजूद हैं, प्रशंसा पाने के लिये तरह−तरह के आडम्बर रखने वालों को यह प्रतीत नहीं होता कि वे अन्तःकरण को भारी भरकम बना सके तो असंख्यों द्वारा सम्मान पाने और श्रद्धास्पद बनने का अवसर उन्हें सहज ही मिल सका है।”
चिन्तन प्रवाह को उत्कृष्टता की सुगढ़ता के साथ जोड़ना पड़ता है। इसी को समर्पण, शरणागति, अद्वैत, एकत्व आदि के नाम से पुकारते हैं। इसी स्थिति को उत्पन्न करने के लिये ध्यानयोग या भक्तियोग का आश्रय लिया जाता है।
चिन्तन और तपश्चर्या व्रतशीलता के सहारे चरित्र में, स्वभाव, अभ्यास में अन्तर लाने का प्रयत्न किया जाता है। जो इस घुड़दौड़ में जितना आगे निकल जाता है वह उतना ही वरिष्ठ कहा जाता है। जो इस प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गया वही पतित पराजित की दयनीय स्थिति में पड़ा खीजाता किसी प्रकार जिन्दगी के दिन पूरे करता है।
चिन्तन से यह तर्क मजबूत मालूम पड़ता है, पर थोड़ी-सी गहराई में प्रवेश करते ही उसका खोखलापन सिद्ध हो जाता है। मनुष्य में सामर्थ्यों तो अनेक हैं पर खाने, सोने को छोड़कर और कोई उपलब्धि ऐसी नहीं है जो दूसरों के सहयोग बिना हस्तगत हो सके। इसलिए सहयोग मिलने की आवश्यकता तो पग−पग पर रहेगी ही। यह कैसे मिले? न मिले तो काम कैसे चले?
चिन्तनात्मक एवं भावनात्मक संवेदना उत्पन्न करती हो सो बात नहीं। जड़ समझे जाने वाले वृक्ष वनस्पति से लेकर रासायनिक एवं खनिज पदार्थों में भी उसका न्यूनाधिक प्रभाव रहता है। चेतना तत्व के सम्बन्ध में जो शोध संशोधन चल रहे हैं उन्होंने वृक्ष−वनस्पतियों को भी प्राणि जगत का असंदिग्ध सदस्य बना दिया है। मनुष्य से लेकर वनस्पति तक की विभिन्न प्राण योनियों में संवेदनाओं का स्तर विभिन्न प्रकार का पाया जाता है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि इन सभी में चेतन सत्ता आत्मा का अस्तित्व विद्यमान है इससे आगे जल, खनिज, मृतिका आदि–रासायनिक वर्ग में आते हैं।
चिन्तन और चरित्र (2) सृजन शिल्पियों की योजनाबद्ध कार्य पद्धति (3) जड़ी बूटीयों द्वारा स्वास्थ्य संरक्षण (4) आसन प्राणायाम से आधि व्याधि निवारण (5) गायत्री यज्ञ और षोडश संस्कार। प्रज्ञा पुराण इसके अतिरिक्त है।
चिन्तन एवं आचरण से व्यक्ति ही नहीं वस्तुएँ एवं वातावरण भी प्रामाणित होते हैं। यह प्रभाव इस जीवन तक ही नहीं मरणोपरान्त भी बना रहता है। उस वातावरण के संपर्क में आने वालों के ऊपर तो प्रभाव पड़ता ही है। इस सत्य में एक कड़ी और भी जुड़ी हुई है कि जो जैसा आचरण करता है उसके सूक्ष्म संस्कार मरणोपरान्त भी बने रहते हैं और वैसे ही कृत्यों के लिए प्रेरित करते हैं। जीवन में अपने चिन्तन एवं कृत्य को श्रेष्ठ बनाये रखने वाले मरणोपरान्त शान्ति एवं सन्तोष की अनुभूति करते हैं जबकि दुष्कृत्यों के सूक्ष्म संस्कार मरने के बाद भी उस व्यक्ति को चैन से नहीं बैठने देते और स्थान तथा वातावरण को विक्षुब्ध बनाये रखते हैं
चिन्तन क्षमता का कोई समाधान नहीं मिलता। अब वैज्ञानिक निष्कर्ष आणविक हलचलों के ऊपर शासन करने वाली एक अज्ञात चेतन सत्ता को समझने का प्रयास गम्भीरतापूर्वक कर रहे हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-November
चिन्तन है।
चिन्तन, संयम तपश्चर्या आदि से किसकी शारीरिक, मानसिक स्थिति में क्या अन्तर पड़ा। पिछले साधना सत्रों में अधिकाधिक साधक सात्विक आहार की फलश्रुति अपने जीवन क्रम में प्रत्यक्ष देखकर गये। उनकी इन्द्रिय चेतना, स्फूर्ति और मस्तिष्कीय क्षमता में असाधारण वृद्धि हुई।
चिन्तन क्षेत्र की जुताई कह सकते हैं। खेत को बार-बार जोतने से ही उसकी उर्वरा शक्ति बढ़ती है, फसल लहलहाती है। नाम जप का आशय यही है कि जब तक आदर्शों के प्रति अगाध निष्ठा और व्यवहार में उतारने की परिपक्वता न उत्पन्न हो, अपने चिन्तन को सतत् उस दिशा में क्रियाशील रखा जाय।
चिन्तन, मनन को परिष्कृत प्रखर और प्रगाढ़ बनाना भी आवश्यक है। कल्प साधना की अवधि में तीन दृश्य आँखों के सामने घूमते रहने चाहिए। इनमें एक है-भवसागर में डूबना, मगरमच्छों द्वारा निगलकर उदरस्थ किए जाने से पूर्व नौका पर अवस्थित महाप्रज्ञा द्वारा उबार लिया जाना। दूसरा है-हाथ में हथकड़ी, पैरों में बेड़ी, गले में लौह जंजीर की जकड़न, बढ़ने और करने में असमर्थता, दिव्य लोक से चक्र सुदर्शन का उतरना और उन बन्धनों को काटकर भव-बन्धनों से मुक्त कर देना। तीसरा है-सघन अन्धकार को छोड़कर उत्कृष्टता के चरम लक्ष्य प्रकाश केन्द्र तक पहुँचने वाली सीढ़ी पर एक− एक कदम उठाते हुए ऊपर उठना, आगे बढ़ना।
चिन्तन
चिन्तन-मनन में उपयोग। यही है-त्रिविधि सोपानों वाला प्रज्ञायोग। यह संक्षिप्त होते हुए भी अति प्रभावशाली एवं समग्र है। अपने अस्त-व्यस्त बिखराव वाले साधना क्रम को समेटकर इसी केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित करना चाहिए। महान के साथ अपने क्षुद्र को जोड़ने के लिए योगाभ्यास का विधान है।
चिन्तन को सतत् उस दिशा में क्रियाशील रखा जाय।
चिन्तन की आवश्यकता है उसे तत्परतापूर्वक अपनाये । मन उचटता हो तो उसके लिए छुट्टा घूमने के अभ्यस्त किसी वन्य पशु को प्रशिक्षित करने का कौशल अपनाया जाय। विचारों को भी विचारों से काटा जाय। लोहे से लोहा कटता है, विष को विष मारता है, काँटे से काँटा निकलता है। अनगढ़ एवं अनावश्यक विचारों के अभ्यस्त मनः संस्थान को यदि उच्चस्तरीय अनुशासन में ढालना है तो वैसा ही प्रयत्न करना होगा जैसा कि बछड़े को हल में जोतने के लिए करना होता है।
चिन्तन, आदत और विश्वास अन्तराल के यह तीन अंग है। इन्हें क्रमशः मन, बुद्धि, चित्त कहते हैं। मनःक्षेत्र की यह तीन परतें हैं। इन्हीं को तीन शरीर स्थूल, सूक्ष्म, कारण भी कहते हैं। पंच भौतिक काया तो इन तीनों की आज्ञा एवं इच्छा का परिवहन मात्र करती रहती हैं।
चिन्तन और व्यवहार की दृष्टि से तेजी से बदलते हुए शालीनता की दिशा में चलते हुए दृष्टिगोचर होंगे। मनोविनोद के लिए पढ़े गये उथले साहित्य की बात दूसरी हैं। उसकी तुलना जाज्वल्यमान प्राण प्रेरणा से भरे पूरे प्रज्ञा साहित्य के साथ नहीं हो सकती।
चिन्तनीय स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन के आधार पर किया जाता है और प्रयोग पक्ष के लिए योगाभ्यास एवं तपश्चर्या के विधि-विधानों का आश्रय लेना पड़ता है। कल्प साधना की प्रक्रिया में जहाँ संयम साधने विवेक अपनाने की शिक्षा दी जाती है वहाँ श्रद्धा उभारने वाली साधनाओं का भी समुचित समावेश रखा गया है। इन्हीं तत्वों का सुनियोजित समावेश रखा गया है। इन्हीं तत्वों का सुनियोजित समावेश कल्प साधना की प्रशिक्षण प्रक्रिया में किया गया है।
चिन्तन का अर्थ यह ढूँढ़ना है कि परमात्मा की दी हुई विभूतियों और अमानतों का कितने अंश में सही उपयोग हुआ। हर श्रेष्ठ मनुष्य को दिनचर्या में सुव्यवस्थित श्रम की दृष्टि से कुशल चिन्तन की दृष्टि से दूरदर्शी विवेकवान। आत्मानुशासन की दृष्टि से प्रखर व्यक्तित्व की दृष्टि से आत्मावलम्बी व आत्म सम्मानी होना चाहिये। ऐसा तभी सम्भव है जब आन्तरिक विभूतियों का और बाह्य साधनों का सदुपयोग हो। आत्म चिन्तन में अपने गुण स्वभाव और कर्म की कड़ाई के साथ परीक्षा करनी पड़ती है उसमें आत्मा को दीन-दलित बनाने वाले तत्व तो नहीं आ घुसे।
चिन्तन में अपने गुण स्वभाव और कर्म की कड़ाई के साथ परीक्षा करनी पड़ती है उसमें आत्मा को दीन-दलित बनाने वाले तत्व तो नहीं आ घुसे। उन्हें एक-एक करके खोज निकालना और मार भगाने का उपक्रम बनाना ही चिन्तन है।
चिन्तन में अपने को आत्मा और शरीर को वाहन उपकरण भर मानने के उपरान्त ही वास्तविक हानि-लाभ का लेखा-जोखा ले सकना सम्भव होता है। सोचना यह होता है कि सृष्टा ने जिस प्रयोजन के लिए यह बहुमूल्य अमानत सौंपी उसका अभीष्ट उद्देश्य के निमित्त कितना, कब, किस प्रकार उपयोग हुआ? यदि पेट-प्रजनन की पशु-प्रवृत्तियों में ही वह अवसर चला गया तो तत्त्वतः बड़ी भूल हुई। मध्याह्न काल के विश्राम वाले दो घण्टे इसी ऊहापोह में व्यतीत होने चाहिए। अधिकाँश समय भविष्य के योजनाबद्ध निर्धारण का ताना-बाना बुनने में व्यतीत होना चाहिए।
चिन्तन करते हुए प्राप्त के पर्यवेक्षण की एक रिहर्सल की जाती है। भावी निर्धारण व आने वाले डडडडकी अपनी दिनचर्या की भूमिका बनाते हुए साधक निद्रा की गोद में चले जाते हैं। इन लोगों का समन्वय ही ‘प्रज्ञायोग‘ है। उपासना के प्रथम चरण में जहाँ कृत्यों के साथ जुड़े भावनात्मक संकल्पों की प्रधान भूमिका है वहाँ आत्म-बोध-तत्व-बोध की साधना में चिन्तन-मनन का प्राधान्य है। कल्प साधकों को इन तीनों ही उपक्रमों को समान महत्व देते हुए नियमित रूप से भावनापूर्वक सम्पन्न करने के लिये कहा जाता है।
चिन्तन का समर्थ तन्त्र खड़ा करके संचित कषाय-कल्मषों का निष्कासन एवं उच्चस्तरीय आस्थाओं का प्रतिष्ठापन किया जाता है। इस प्रकार इस आरम्भिक सोपान को भी निर्धारण की दृष्टि से पूर्णता युक्त कहा जा सकता है।
चिन्तन का अर्थ है-आत्म-समीक्षा अपना शवच्छेद। प्रयोगशालाओं में पदार्थों का विश्लेषण वर्गीकरण करके देखा जाता है इसमें कौन-कौन से तत्व मिले हैं, पोस्ट मार्टम में यह देखा जाता है आखिर मृत्यु शरीर के किस अंग में चोट और अवरोध उत्पन्न होने के कारण हुई। आत्म-चिन्तन का अर्थ यह ढूँढ़ना है कि परमात्मा की दी हुई विभूतियों और अमानतों का कितने अंश में सही उपयोग हुआ। हर श्रेष्ठ मनुष्य को दिनचर्या में सुव्यवस्थित श्रम की दृष्टि से कुशल चिन्तन की दृष्टि से दूरदर्शी विवेकवान। आत्मानुशासन की दृष्टि से प्रखर व्यक्तित्व की दृष्टि से आत्मावलम्बी व आत्म सम्मानी होना चाहिये।
चिन्तन, मनन में दूसरे के साथ रहने से किसी प्रकार का विक्षेप हो प्रातःकाल की नादयोग साधना और अपने ही कमरे में मार्गदर्शक का नियमित प्रवचन-उद्बोधन सुनने का लाभ भी एकान्त में, एकाग्र होने पर ही मिलता है। इसलिए ही साधकों को एक कमरा दिया जाता है। भले ही वह साइज में 10&10 का ही क्यों न हो।
चिन्तन-प्रवाह को किस तरह मोड़ना-मरोड़ना है उसका दिग्दर्शन गत अंक में यथासम्भव प्रतिपादित हुआ है। वह यदि उचित उपयुक्त है तो उसे मान्यता तक सीमित न रहने दिया जाना चाहिए। प्रचलन, प्रवाह एवं परम्परा के स्तर तक पहुँचाया जाना चाहिए। यह आवश्यक भी है और कष्टसाध्य भी। इस क्रियान्वयन के लिए भागीरथी उमंगें चाहिए।
चिन्तन-मनन का प्राधान्य है। कल्प साधकों को इन तीनों ही उपक्रमों को समान महत्व देते हुए नियमित रूप से भावनापूर्वक सम्पन्न करने के लिये कहा जाता है। परिणति स्वरूप इनसे उन विभूतियों का प्रत्यक्ष रसास्वादन होने लगता है जो अध्यात्म मार्ग पर सही रूप से संकल्पपूर्वक चलने वालों को मिलना चाहिए।
चिन्तन, आदर्श चरित्र और सुसंस्कृत लोक-व्यवहार की दिव्य विभूतियों में अभिवृद्घि करने के लिए कोई भी भावनाशील इन्हें सहज ही उपलब्ध कर सकते है इस दैवी अनुग्रह को जो जितना समेट सकेंगे वे अपना व्यक्ति त्व विकसित करेंगे और आन्तरिक पवित्रता के अतिरिक्त प्रतिभा एवं प्रखरता भी विकसित करेंगे। स्मरण रहे यह अनुदान मात्र उच्चस्तरीय उद्देश्यों के लिए ही है, संकीर्ण स्वार्थपरता की मनोकामना तथा लोभ, मोह, विलास एवं अहंकार की लिप्सा तृष्णा पूरी करने के लिए इन दिव्य अनुदानों का उपयोग न हो सकेगा।
चिन्तन मनन में लग सके तो और भी अच्छा। इस सुयोग से हिमालय की शक्ति धारा को साधक की आत्म सत्ता में गहराई तक प्रवेश करने और रोम-रोम में रम जाने का अवसर मिलता है। यह साधना एकाकी भी हो सकती है और टेप रिकार्डर की सहायता से सामूहिक भी।
चिन्तन भूतकाल का और मनन भविष्य का होता है पिछले दिनों स्तर का समय बीता? कितना खाया पाया? इसका पर्यवेक्षण अपने को आत्मा मानकर करना चाहिए। शरीर मानकर इस प्रकार का विहंगावलोकन सम्भव नहीं। शरीर तो मात्र साधनों की न्यूनाधिकताओं, व्यक्ति यों की भली-बुरी गतिविधियों का और प्रभाव छोड़ने वाली घटनाओं के ऊहापोह में ही उलझा रहता है।
चिन्तन और प्रयास को ऐसा अभिनव उत्साह अवलम्बन मिल सके तो समझना चाहिए कि वातावरण का काया-कल्प होने में, सतयुग के-प्रज्ञायुग के अवतरण में अब न विलम्ब लगेगा, न अवरोध अड़ेगा।
चिन्तन और आत्म-निर्धारण के सत्साहस का समावेश करने से सम्भव हुआ है। इस प्रयोजन में सर्वप्रथम अपनी संचित मान्यताओं और आदतों से ही जूझना पड़ता है। इस धुलाई के बाद ही मनमोक्ष्य रंगाई का कार्य आरम्भ होता है। आत्म-शोधन-ब्रेन वाशिंग की प्रक्रिया में संचित गल्तियों का एक बारगी निराकरण करना पड़ता है और इसके लिए यथार्थता पर अवलम्बित विवेकशीलता की कुल्हाड़ी को निर्दयता के साथ चलाना पड़ता है। पूर्वाग्रहों का ऊबड़-खाबड़ पन समदड डडड करने में संचित आदमी और मान्यताओं की अग्नि परीक्षा करनी पड़ती है।
चिन्तन कहा गया है।
चिन्तन पद्धति, अभिरुचि और आदत उसी अभ्यस्त ढर्रे में अनायास ही घूमती रहती है। विचारों तक की रोकथाम और मोड़-मरोड़ जब कठिन पड़ती है, तब अचेतन के साथ जुड़े रहने वाले स्वभाव-अभ्यास को कैसे बदला जाय? इसके लिए स्थान बदलने की आवश्यकता पड़ती है। परिस्थितियों का भी मनःस्थिति पर प्रभाव पड़ता है। स्थान बदलने में वहाँ के पदार्थ और व्यक्ति यों के साथ सम्बन्ध भी झीने पड़ते हैं।
चिन्तन तो दो चार दिन का ही पर्याप्त हो सकता है। शेष 26 दिन एक ही योजना बनानी चाहिए कि जिन आदर्शवादी प्रेरणाओं का यहाँ माहौल है। उनका अवधारण-कार्यान्वयन कैसे सम्भव हो। उसके लिए किस क्रम में क्या कदम उठाये जाने चाहिए और उस निर्धारण में जो आन्तरिक प्रमाद तथा बाह्य व्यवधान आड़े आने वाला है उससे कैसे निपटा जाना चाहिए। असल में यही है कल्प साधना के दिनों की महानतम उपलब्धि।
चिन्तन, मनन के आधार पर किया जाता है और प्रयोग पक्ष के लिए योगाभ्यास एवं तपश्चर्या के विधि-विधानों का आश्रय लेना पड़ता है। कल्प साधना की प्रक्रिया में जहाँ संयम साधने विवेक अपनाने की शिक्षा दी जाती है वहाँ श्रद्धा उभारने वाली साधनाओं का भी समुचित समावेश रखा गया है। इन्हीं तत्वों का सुनियोजित समावेश रखा गया है। इन्हीं तत्वों का सुनियोजित समावेश कल्प साधना की प्रशिक्षण प्रक्रिया में किया गया है।
चिन्तन दूसरा मनन। इन चारों को चारपाई के चार पाये कहा जात सकता है। हाथ, पैर, धड़, सिर-इन चार भागों में शरीर विभक्त है। इसी प्रकार आत्म-निर्माण के लिए भी इन चारों का मनोयोग के साथ अवलम्बन करना पड़ता है। एकान्त एक कमरे की व्यवस्था इसी के लिए बनी है कि साधकों को उपयुक्त वातावरण में उपयुक्त अभ्यास करने में सुविधा रहे।
चिन्तन प्रवाह को अवांछित दिशा से हटाकर सुनियोजित कर देना। स्थिरता नहीं लक्ष्य के साथ तल्लीनता ध्यान है। भटकाव का स्वेच्छाचार रोककर मन को नियत निर्धारित दिशा में-इष्ट की ओर लगाना होता है। इसका लाभ आत्मिक एवं भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से मिलता है। पूरी तन्मयता-तत्परता नियोजित होने पर कार्य का स्तर ऊँचा उठता है, सफलता का पथ प्रशस्त होता है।
चिन्तन की दृष्टि से दूरदर्शी विवेकवान। आत्मानुशासन की दृष्टि से प्रखर व्यक्तित्व की दृष्टि से आत्मावलम्बी व आत्म सम्मानी होना चाहिये। ऐसा तभी सम्भव है जब आन्तरिक विभूतियों का और बाह्य साधनों का सदुपयोग हो। आत्म चिन्तन में अपने गुण स्वभाव और कर्म की कड़ाई के साथ परीक्षा करनी पड़ती है उसमें आत्मा को दीन-दलित बनाने वाले तत्व तो नहीं आ घुसे। उन्हें एक-एक करके खोज निकालना और मार भगाने का उपक्रम बनाना ही चिन्तन है।
चिन्तन तेजस्वी स्तर पर उभरा होगा और उससे पश्चात्ताप जैसा कुछ मरोड़ने वाला दर्द हुआ होगा तो फिर उसका समाधान एक ही हो सकता है-भविष्य का शानदार निर्धारण। मनन तभी सार्थक है जब उससे विगत के प्रमाद की भरपाई करने के लिए चौगुने, सौगुने पराक्रम की उमंगें उभरें। इस एक मास की अवधि में चिन्तन तो दो चार दिन का ही पर्याप्त हो सकता है। शेष 26 दिन एक ही योजना बनानी चाहिए कि जिन आदर्शवादी प्रेरणाओं का यहाँ माहौल है। उनका अवधारण-कार्यान्वयन कैसे सम्भव हो।
चिन्तन का परिमार्जन और चरित्र व्यवहार में नये सिरे से शालीनता को प्रतिष्ठापित करना है। इस बहुमुखी सृजन प्रयोजन के लिए अगणित भावभरे युग शिल्पी चाहिए। उन्हीं को उगाने, सींचने और पकाने के लिए प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत स्वाध्याय मण्डलों को इन दिनों प्रमुखता दी जा रही हैं। कल्प साधना के साधकों को अपना चरम पुरुषार्थ इस केन्द्र बिन्दु पर नियोजित करना चाहिए। अपने प्रभाव क्षेत्र में इन्हें अधिकाधिक संख्या में बनाने-उन्हें सुनियोजित ढंग से चलाने एवं इस निमित्त जिन साधकों की आवश्यकता है उन्हें जुटाने के लिए भरपूर प्रयत्न करना चाहिए।
चिन्तन और चरित्र में-स्वभाव और दृष्टिकोण में ऐसा उत्साहवर्धक परिवर्तन करेंगे जिससे प्रज्ञा साहित्य की प्रखरता सिद्ध हो सके। यह पठन ऐसा है जो अन्तराल के मर्मस्थल तक पहुँचने के उपरान्त-कर्म क्षेत्र में उतरने की तड़पन उत्पन्न करता है। युग सन्धि जैसे ऐतिहासिक अवसर पर तो समय की चुनौती स्वीकार करने में जागृत आत्माओं का पौरुष उन्हें दबा-दबोच कर अग्रिम पंक्ति में खड़ा होने के लिए विवश करेगा। ऐसी उमंगें जिस भी अन्तःकरण में उठती हैं उसे सत्प्रयोजनों के लिए उदार अनुदान प्रस्तुत करने के लिए विवश करती हैं। आदर्शों से अनुप्राणित व्यक्ति मूक दर्शक बन कर नहीं बैठ सकते उन्हें पठन-पाठन से एक कदम आगे बढ़ाकर समयदान और अंशदान की श्रद्धांजलि से युग देवता की झोली भरनी पड़ती है।
चिन्तन को निरस्त कर सकना सम्भव हो सके। संयम, अनुशासन और सृजन की कसौटी पर खरे सिद्ध होने वाले विचार ही इन दिनों अपनाएँ जाएँ। शेष को विजातीय तत्व मानकर उन्हें दूर ही रखा जाय।
चिन्तन किया जाता है। आत्म-विश्लेषण व निरीक्षण की इस साधना का प्रज्ञायोग का प्राण कहा जा सकता है। (3)तत्त्वबोध की सायंकालीन साधना जिसमें दिन भर का लेखा-जोखा लिया जाता है तथा पूरे दिन को एक पूरा जीवन मानकर मृत्यु की गोद में जाने का चिन्तन करते हुए प्राप्त के पर्यवेक्षण की एक रिहर्सल की जाती है। भावी निर्धारण व आने वाले डडडडकी अपनी दिनचर्या की भूमिका बनाते हुए साधक निद्रा की गोद में चले जाते हैं। इन लोगों का समन्वय ही ‘प्रज्ञायोग‘ है।
चिन्तन आत्म-सुधार (3)आत्म निर्माण तथा आत्म-विकास के नाम से पुकारा जाता है। इन चारों में से किसी एक को भी छोड़कर आगे नहीं बड़ा जा सकता। भोजन के साथ जल की आवश्यक है शाक और फल भी, अकेले धोती या कुर्ता वेषभूषा परिपूर्ण नहीं बनाते उनके साथ टोपी और बनियान हो तो पूर्णता आती है इन चारों में से एक भी ऐसा नहीं जिसकी उपेक्षा कर के आत्मिक प्रगति के पथ पर आगे बड़ा जा सके।
चिन्तन और मनन में नियोजित रखना चाहिए। चिन्तन भूतकाल का और मनन भविष्य का होता है पिछले दिनों स्तर का समय बीता? कितना खाया पाया? इसका पर्यवेक्षण अपने को आत्मा मानकर करना चाहिए। शरीर मानकर इस प्रकार का विहंगावलोकन सम्भव नहीं।
चिन्तन, ध्यान, धारणा आदि का स्वरूप एवं प्रयोग भी तो इसके बिना बन नहीं पड़ता। इसलिए गुरु ज्ञान द्वारा उच्चस्तर की प्रेरणाएँ उपलब्ध करनी होती हैं। इसके लिए समर्थ साहित्य का स्वाध्याय इतना अधिक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है कि उसे शास्त्रकारों ने भजन पूजन से भी अधिक आवश्यक माना है और सर्वोपरि प्रमुखता देने योग्य ठहराया है। ब्रह्मदान, ज्ञानदान से बढ़कर और कोई पुण्य परमार्थ इस संसार में है नहीं इसलिए पुरातन काल के देव मानव साधु ब्राह्मण इस प्रयोजन में अहर्निश निरत रहते थे।
चिन्तन-मनन का समय कहना चाहिए। यह बिस्तर पर पड़े-पड़े भी हो सकता है। हर साधक का निवास स्वतन्त्र कमरे में रहता है। पति-पत्नी साथ हैं तो भी उन्हें पृथक्-पृथक् कमरों में रहना पड़ता है। यह व्यवस्था इसीलिए बनी है कि साधना, स्वाध्याय, चिन्तन, मनन में दूसरे के साथ रहने से किसी प्रकार का विक्षेप हो प्रातःकाल की नादयोग साधना और अपने ही कमरे में मार्गदर्शक का नियमित प्रवचन-उद्बोधन सुनने का लाभ भी एकान्त में, एकाग्र होने पर ही मिलता है।
चिन्तन कीजिए कि प्राण का सार तत्व हमारे अंग-प्रत्यंगों द्वारा पूरी तरह सोख लिया गया। थोड़ी देर तक बिना साँस के रहें व भावना करें कि जो दोष बाहर निकाले गए हैं, वे हमसे बहुत दूर चले जा रहे हैं व उन्हें अब अन्दर प्रवेश नहीं होने देना है। इस पूरी प्रक्रिया को पाँच प्राणायामों तक ही सीमित रखा जाय।
चिन्तन के साथ भाव-सम्वेदनाएँ जितनी प्रगाढ़ होंगी उतनी ही क्रिया प्राणवान बनेंगी। कृत्य को ही सब कुछ मानने वालों को इस मूलभूत तथ्य को सर्वप्रथम हृदयंगम कर लेना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-March
चिन्तन हवा के साथ उड़ रहा है और वास्तविकता से जन-जन को अवगत कर रहा है। वह समय बहुत पीछे रह गया जब लोक चिन्तन का कोई महत्व न था। जब समर्थों की मनमानी चलती थी। अब लोक मानस अपने आप में एक शक्ति बनकर उभरा है और अपनी सामर्थ्य को इस सीमा तक विकसित परिपुष्ट कर रहा है कि आज के सामर्थ्यवानों को कल अपना सिर नीचे झुकाना पड़ेगा दुनिया में इतने साधन मौजूद हैं कि वर्तमान जन समुदाय का उससे भली-भाँति निर्वाह हो सके और सभी सुख पूर्वक जी सकें। महत्वाकांक्षाऐं अगले दिनों आपा-धापी में नहीं लगेंगी, वरन् उनकी दिशा धारा होगी- न्याय और विवेक का कार्यान्वयन।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार परिष्कृत होता है। इसलिए उसे देव माता भी कहा गया है। सावित्री विश्वमाता है उसका प्रभाव व्यक्ति विशेष तक सीमित न रहकर विश्वव्यापी पड़ता है। जनमानस का परिष्कार, लोककल्याण, वायुमण्डल की शुद्धि, वातावरण की परिष्कृति यह सब सावित्री शक्ति के प्रतिफल हैं। उसमें “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना सन्निहित है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार उत्कृष्टता की कसौटी पर खरा सिद्ध कर सकेंगे या नहीं? बीच में कोई पक्ष अनुत्तीर्ण होता है तो उसके लिए यह छूट रहनी चाहिये कि वापस जाने या भेजने का उपाय अपना लिया जाय। जीवनदान बहुत बड़ी बात है। यदि वह दूसरों के सम्मुख आदर्श प्रस्तुत कर सकने की स्थिति में बना रह सकता हो तो ही उस अनुदान का गौरव है, अन्यथा मिथ्या वचन देने और उसे वापस लौटाने में किसी का भी गौरव नहीं है।
चिन्तन, आदर्श चरित्र और शालीन व्यवहार यह तीन ही ऐसे त्रिभुज हैं जो मिलकर महानता की समग्र आकृति बनाते हैं। इन्हीं का समन्वय त्रिवेणी संगम बनाता है।
चिन्तन की विकृति भी ऐसे असमंजस का कारण बन जाती है, जिसमें व्यक्ति कर्त्तव्य, अकर्तव्य को भूल जाता है।
चिन्तन पर बुरा पड़ता है। हमारे जाने-अनजाने असंख्य विद्वेषों, प्रतिशोधों का अंकन नित्य चेतना पर होता है। हिप्नोटिज्म से या ध्यान द्वारा मस्तिष्क को उत्तेजित करके इन्हें ज्ञात किया जा सकता है। इससे मन का मस्तिष्क से कितना घनिष्ठ सम्बन्ध होता है, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
चिन्तन के अनुरूप बदलता रहता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में सुधार परिवर्तन लाने वालों का। व्यक्तित्व का इस प्रकार निर्माण करने की आवश्यकता है, जिसमें कोई लुंज-पुंज, दीन-हीन, समर्थता और तेजस्विता के ढांचे में ढल जाय। यह कार्य केवल वही कर सकता है जो अपनी कला की प्रवीणता के लिए अपने आप पर सफल प्रयोग कर चुका हो। ऐसे ही लोगों को प्रवीण पारंगत कहा जा सकता है। ऐसे ही लोग सड़े गोबर को पुष्प उद्यान में परिणत करके दिखाते हैं।
चिन्तन अटपटा रहता है।
चिन्तन तन्त्र को गुजरना पड़ता है। जो अपनी क्षमता और परिस्थितियों के साथ प्रयोजन का जितना तालमेल बिठा सकता है, उसकी बुद्धिमत्ता उतने ही ऊँचे स्तर की मानी जाती है। जो कल्पना तो करता है पर उसके साथ परिस्थितियों का तालमेल नहीं बिठाता, वह उतना ही मन्द मति या मूर्ख कहा जाता है।
चिन्तन का कोई महत्व न था। जब समर्थों की मनमानी चलती थी। अब लोक मानस अपने आप में एक शक्ति बनकर उभरा है और अपनी सामर्थ्य को इस सीमा तक विकसित परिपुष्ट कर रहा है कि आज के सामर्थ्यवानों को कल अपना सिर नीचे झुकाना पड़ेगा दुनिया में इतने साधन मौजूद हैं कि वर्तमान जन समुदाय का उससे भली-भाँति निर्वाह हो सके और सभी सुख पूर्वक जी सकें। महत्वाकांक्षाऐं अगले दिनों आपा-धापी में नहीं लगेंगी, वरन् उनकी दिशा धारा होगी- न्याय और विवेक का कार्यान्वयन। प्रकारान्तर में यही आदर्शवादिता है इसी के साथ मानवी गरिमा भी जुड़ी हुई है।
चिन्तन और प्रयास का ही परिणाम है कि आदिम युग से अब तक कछुए की चाल चलता हुआ वन्य मनुष्यों जैसा जीवन जिया जा रहा था, धरती पर थोड़े से साधन थे और थोड़े से मनुष्य, परन्तु अब इन शताब्दियों में यह वैभव विस्तार इतना बढ़ गया है , मानो आसमान से उतरा हो। क्या यह प्रगतिक्रम भविष्य में रुक जायेगा? क्या इस प्रगति क्रम की परिणति दुर्भाग्यपूर्ण होगी? क्या रुदन ही मनुष्य के भाग्य में बदा है?
चिन्तन और चरित्र की एकता होने पर ही दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता उपलब्ध होती है। एक नशेबाज अपने जीवन में दूसरे नये नशेबाज उत्पन्न कर लेता है और एक वेश्या कितने ही अनजानों को व्यभिचार के मार्ग पर घसीट लेती है। इसका कारण यही है यह लोग जैसा सोचते हैं वैसा ही करते भी हैं। कथनी और करनी के बीच का अन्तर हट जाय तो व्यक्ति निश्चित रूप से प्रभावशाली हो जाता है। भलाई सिखाई जाय या बुराई यह आगे की बात है।
चिन्तन-शक्ति पर पड़ता है। मन्द मति, अर्ध विक्षिप्त, सनकी, बेसिर-पैर की कल्पनाएँ करने वाले निराश, भयभीत आदि स्तर के लोग ऐसे ही होते हैं, जिनके मस्तिष्क के किसी क्षेत्र विशेष में विद्युत प्रवाह कम पड़ता है। आलसी और प्रमादी भी ऐसे ही होते हैं। उनका मन, श्रम करने को तथा आगा-पीछा सोचने को ही नहीं होता। यथास्थिति को सहन करते हुए वे किसी प्रकार दिन काटते रहते हैं।
चिन्तन और चरित्र की एकता तो नितान्त आवश्यक है। विशेषतया कुसंस्कारों से घिरे हुए लोगों को सुसंस्कारी बनाने के लिए।
चिन्तन सवार रहता है। इसी प्रकार चित्त ही बुद्धि को भी अपने प्रभाव में समेट लेता है। यदि अवसर ही नहीं और कार्यान्वयन भी असम्भव दीखता हो, किसी बड़े जोखिम की आशंका हो तो ही बुद्धि अपनी दिशाधारा में परिवर्तन करती है अन्यथा वह भी अन्धी दौड़ में दुस्साहसपूर्वक लग जाती है। यहाँ चित्त का प्रभाव स्पष्ट है। इसी को परिष्कृत बनाने के लिए मनुष्य को अनेक साधनाएँ करनी पड़ती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-February
चिन्तन, रक्त प्रवाह, हृदय की धड़कन, श्वास गति आदि में यकायक परिवर्तन पाया जाता है। ये सभी निष्कर्ष बताते हैं कि देर सबेर विज्ञान जगत को टेलीपैथी को एक विधा के रूप में स्वीकार करना ही होगा। “मेण्टल वार”, ”मेण्टल पावर” नामक ग्रन्थों के रचयिता वैज्ञानिक एल्विन टॉफलर का कहना है कि रूस ने अतीन्द्रिय क्षमता के द्वारा वैचारिक युद्ध में महारत हासिल कर ली है। वहाँ अतीन्द्रिय सामर्थ्य के इस पक्ष को विकसित कर शत्रु पक्ष के महत्वपूर्ण व्यक्तियों के चिन्तन को प्रभावित करने के सफल प्रयोग किए गये हैं। अच्छा हो इस दैवी विभूति का सुनियोजन श्रेष्ठ कार्यों हेतु, सद्भावना विस्तार हेतु, वैचारिक प्रदूषण निवारण एवं समष्टिगत कल्याण हेतु प्रयुक्त हो न कि व्यक्तिगत स्वार्थ या किसी के अहित के लिए।
चिन्तन और कर्तृत्व में प्यार बिखरा पड़ा है ईश्वर का प्यार केवल उसी को मिलेगा, जो दीपक की तरह जलकर प्रकाश उत्पन्न करने को तैयार है, प्रभु की ज्योति का अवतरण उसी पर होगा।”
चिन्तन करने में अपने को अयोग्य मानकर उसने ईश्वर का मानवीकरण कर लिया है। उसने ईश्वर के मानवाकारी काल्पनिक रूप की सृष्टि कर ली है ताकि उसकी शरण में पहुंचकर वह अनश्वर बना रह सके। उसने एक ऐसे स्वर्ग की भी कल्पना की है जहाँ कि उसकी आत्मा विश्राम करने के अतिरिक्त उसे देवदूतों सन्तों और मित्रों का साहचर्य भी प्राप्त होगा। उसने एक काल्पनिक नरक लोक की भी सृष्टि की है जहाँ कि बुरे कर्मों के लिये यथायोग्य यातनाओं की व्यवस्था भी होगी।
चिन्तन से आरम्भ होता है। जिन्हें अपना जीवन लाखों करोड़ों वर्ष जितना लगता है, उन्हीं को वासना, तृष्णा और अहन्ता दबोचती है। वे ही हर्ष से इतराते और लिप्साओं के साथ गुड़ के साथ चींटे की तरह चिपकते हैं। पीछे भले ही उन्हें सिकन्दर की तरह पछताना और दौलत साथ जाने का कोई संयोग न बनते देखकर मृत शरीर के हाथ ताबूत से बाहर निकालने पड़ें।
चिन्तन करते समय, तल्लीनता, एकाग्रता की स्थिति में, श्रद्धासिक्त भाव सम्वेदनाओं की चरमावस्था में मस्तिष्क की विद्युतीय स्थिति में क्या परिवर्तन होते हैं, चयापचय दर में क्या परिवर्तन होते हैं, स्नायु रसों का स्राव किस सीमा तक प्रभावित होता है, समग्र शरीर की वायोकेमीस्ट्री व बायोइलेक्ट्रीजीवी में क्या अन्तर आता है, यह जानने का प्रयास यदि किया जा सके तो ध्यान-योग सम्बन्धी अनेकानेक नये आयाम मनुष्य के हाथ लगेंगे। ध्यानयोग उच्चस्तरीय हो व अल्पावधि का ही हो तो वह हर प्रकार की सामर्थ्यवान तनाव शामक, मस्तिष्कीय सामर्थ्यों को बढ़ाने वाली औषधि का काम कर सकता है। आज के इक्कीसवीं सदी की ओर बढ़ रहे बल्कि तेजी से भाग रहे युग में ऐसी औषधि की आवश्यकता भी है। साथ ही उस अनुसन्धान की भी उपादेयता है जो उसे कसौटी पर खरा सिद्ध कर सके।
चिन्तन और चरित्र को अभीष्ट ढाँचे में ढालता है। इसके उपरान्त उसी स्तर के लोगों के साथ परिचय, संपर्क एवं घनिष्ठ भाव बढ़ाता जाता है। तद्नुरूप एक समुदाय बन जाता है और विचार विनिमय, खोज-बीन, समर्थन-सहयोग से वे साधन भी जुटने लगते हैं जो निर्धारित प्रयोजन के लिए अभीष्ट एवं आवश्यक हैं। पहले धीमे कदम उठते हैं पीछे अनुभव, अभ्यास एवं संपर्क से उन कदमों में तेजी आने लगती है और प्रगति की प्रक्रिया तेजी पकड़ लेती है।
चिन्तन के कारण जो श्रेष्ठ है वह भी निकृष्ट प्रतीत होगा। रंगी काँच का चश्मा पहन लेने पर सभी वस्तुएँ उसी रंग की रंगी हुई दिखाई पड़ती हैं।
चिन्तन, आदर्श कर्त्तव्य और शालीन व्यवहार की रीति-नीति अभ्यास में उतर जाने के उपरान्त व्यक्तित्व निखरना और प्रतिभाओं, विभूतियों के चमकने में देर नहीं लगती। पवित्रता और प्रखरता का उदय होते ही व्यक्ति सामान्य से असामान्य स्थिति में पहुँच जाता है। उसे गई गुजरी में डाले रखने का अनाचार तो दुर्गुणों और दुष्प्रवृत्तियों का ही होता है। पर साथ ही यह बात भी है कि अनात्म तत्व से सम्बन्धित होने के कारण उन्हें धोया और हटाया जाता है।
चिन्तन में अपनी बुद्धि लगाई जाती है, उसी प्रकार यह भी देखा जाना चाहिए कि जीवन सम्पदा का उपयोग मानवोचित रीति से हुआ या नहीं? मनुष्य को अतिरिक्त बुद्धिमत्ता, अतिरिक्त क्षमता और प्रतिभाओं से भरा-पूरा जीवन दिया गया है। वह शरीर यात्रा भर के लिए खर्च नहीं हो जाना चाहिए जिस प्रकार कीड़े-मकोड़ों का होता है। अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए मोर नाचता है, जुगनूँ चमकता है, भौंरा गूँजता है, पर इस विडंबना से क्या तो उन्हें मिलता है और क्या कोई और कुछ पता या सीखता है। वैभव बढ़ाकर ठाठ-बाट रोपने में हमें भी मिथ्या अभिमान के अतिरिक्त और क्या मिल पाता है।
चिन्तन महामानवों को विश्ववंद्य स्तुत्य बनाते हैं। उनके प्रसंग पढ़कर जन साधारण को भी वैसा ही बनने, अहंकार मुक्त होने की प्रेरणा मिलती है।
चिन्तन पक्ष में प्रशिक्षित करने के लिए उसे संयम के अनुबन्ध अपनाने के लिए प्रशिक्षित करना पड़ेगा। इन अनुबंधों को संयम कहते हैं। संयम के चारों पक्षों को गत अंक में अवगत कराया जा चुका है। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, और विचार संयम सीख लें तो समझना चाहिए कि अबोध मन वयस्क हो गया और उसने नहाने, कपड़ा धोने, दाँत माँजने, बिस्तर उठाने, बुहारी लगाने जैसे उपक्रम अपनाकर साफ-सुथरा रहना सीख लिया। उन्हें न अपनाने पर कल्पनाएँ और इच्छाएँ ऐसा नटखटपन करती रहेंगी जैसा अबोध बालक करते हैं।
चिन्तन, आदर्श चरित्र और सौम्य व्यवहार का प्रभाव एक दूसरे पर न पड़े और आज की अवाँछनीय परिस्थितियाँ बदली हुई मनःस्थिति के आधार पर उलट न सकें।
चिन्तन को प्रभावित करने के सफल प्रयोग किए गये हैं। अच्छा हो इस दैवी विभूति का सुनियोजन श्रेष्ठ कार्यों हेतु, सद्भावना विस्तार हेतु, वैचारिक प्रदूषण निवारण एवं समष्टिगत कल्याण हेतु प्रयुक्त हो न कि व्यक्तिगत स्वार्थ या किसी के अहित के लिए।
चिन्तन और किसी भी अभ्यास द्वारा यदि मन को विचारणाओं के सामान्य धरातल से ऊपर उठाकर आकाश में घुमाया जा सके तो वह भूत ओर भविष्य की अनेक घटनाओं को बेतार के तार के सन्देश की तरह प्राप्त कर सकता है। “न्यू फ्रान्टियर्स आफ माइन्ड” नामक पुस्तक में उन्होंने ऐसी अनेक घटनाओं का विवरण भी दिया है, जो उक्त कथन की सत्यता प्रतिपादित करती है। यह एक विज्ञानसम्मत प्रक्रिया है, अंधविश्वास नहीं।
चिन्तन की उत्कृष्टता, चरित्र की आदर्शवादिता और व्यवहार की शालीनता अपनाकर मनुष्य ऊँचा उठ सकता है, आगे बढ़ सकता है।
चिन्तन पर अंकुश लगाने, इच्छाओं पर अंकुश लगाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग मिलेगा नहीं।
चिन्तन के उपरान्त मनुष्य की बड़ी शक्ति है- प्रयास श्रम एवं समय का सुनियोजन। जीवन का तात्पर्य वर्षों की लम्बाई नहीं, वरन् यह है कि उसके समय घटकों का किस प्रकार, किस निमित्त उपयोग किया गया। अनेकों थोड़े दिन जीते हैं, किन्तु अभिमन्यु और भगतसिंह की तरह, विवेकानन्द और रामतीर्थ की तरह अल्प आयु में ही अपने को, अपने समाज को कृत्य-कृत्य कर जाते हैं। कितने ही ऐसे होते हैं जो परम अवधि सौ वर्ष तक जी लेते हैं, पर रहते दूसरों पर भार बनकर ही हैं। ऐसे दीर्घ जीवन से क्या अपना और क्या दूसरों का लाभ?
चिन्तन को मात्र अप्रिय निषेधात्मक पक्ष के साथ जोड़ा जाये तो दुःखदायी घटनाएँ ही स्मरण रहेंगी और उन्हीं का स्मरण बाद में भी बना रहेगा। जो प्रिय एवं अनुकूल है वह सरसरी नजर से देखने पर आँखों के आगे से निकल जायेगा। उसकी विशेषता और स्थिति भी अनुभव में न आ सकेगी। निषेधात्मक चिन्तन के कारण जो श्रेष्ठ है वह भी निकृष्ट प्रतीत होगा। रंगी काँच का चश्मा पहन लेने पर सभी वस्तुएँ उसी रंग की रंगी हुई दिखाई पड़ती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-December
चिन्तन निरन्तर जनमानस को झकझोरता रहे, चाहे लेखनी किन्हीं भी हाथों में हो। पाठकों को सामयिक मार्ग दर्शन भी समय-समय पर हमारी अनुपस्थिति में मिलता रहेगा। अब साधना क्षेत्र का वह पक्ष आरंभ होता है जिसे युग के अनुरूप एक उपलब्धि माना जा सके और असंख्यों अध्यात्मवादी उच्चस्तरीय लाभ उठा सकें।
चिन्तनशील, मनीषी, चरित्रवान एवं व्यवहारकुशल बनाया जा सकता है। इसलिए मनुष्य को वनस्पति व जीव-जंतुओं से भिन्न मानकर उसके निषेचन पर उतना ध्यान नहीं देना चाहिए जितना कि शालीनता के पक्षधर वातावरण पर।
चिन्तन-चरित्र भी उच्चस्तरीय होना चाहिए। उनका आहार-विहार ऐसा होना चाहिए जिसे ऋषि कल्प कहा जा सके। अभक्ष्य खाने वाले, मादक द्रव्य पीने वाले, लम्पट व्यसनी प्रकृति के व्यक्ति वेद मंत्रों के उच्चारण में प्राण नहीं भर सकते। इन दिनों ऐसे ब्रह्म परायण मनःस्थिति और परिस्थिति को अपनाने वाले मिलते नहीं। सभी पर असंयम सवार रहता है।
चिन्तन के आधार पर अनेक योजनायें बनतीं और कार्यान्वित होती हैं, तो भी प्रबुद्धों में पाई जाने वाली शक्ति समस्त क्षमता का एक बहुत छोटा अंश होती है। यदि उस सब को एकत्रित किया जा सके तो उससे कोई व्यक्ति देव दानव स्तर का बन सकता है। अपने शरीर की अपने संसार की और समस्त ब्रह्मांड की स्थिति के सम्बन्ध में ऐसी जानकारियाँ प्राप्त कर सकता है जिन्हें अलौकिक एवं अद्भुत कहा जा सके। ऋद्धि-सिद्धियों का वर्णन कपोल कल्पना नहीं है। उन्हें किसी अन्य का दिया हुआ अनुदान-वरदान भी नहीं कहा जा सकता।
चिन्तन हो उसे स्थूल और जिसमें तेजोमय ब्रह्म या शक्ति की भावना हो उसे ज्योतिर्ध्यान कहते हैं। जिस ध्यान के द्वारा बिन्दुमय ब्रह्म कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान हो उसे सूक्ष्म ध्यान कहते हैं।
चिन्तन एवं आस्था की विकृतियों से जन्मे रोग बाह्योपचार से ठीक नहीं हो सकते।
चिन्तन, दूसरा मनन। अपनी समस्याओं का कारण एवं निदान तलाश करने पर अपने आप भी मिल सकता है। सत्य तो यह है कि अपनी समस्याओं के संबंध में दूसरा कोई इतनी अच्छी तरह जान नहीं सकता जितना कि हम स्वयं जानते हैं। पर पक्षपात, पूर्वाग्रह की एक परत मन-मस्तिष्क पर ऐसी जमी होती है जो अपने को सदा निर्दोष बताती रहती है। जो विग्रह या संकट हैं, उनके दोष दूसरों पर मढ़ती रहती है।
चिन्तन की शिकार होने से उन्हें बचाया जाय। समानता का वास्तविक तात्पर्य यह है कि मान्यता और भावना की दृष्टि से नर नारी- भाई भाई की- बहिन बहिन की- या भाई बहिन की दृष्टि से पारस्परिक संबंधों को देखें। प्रेत पिशाच की तरह कामुकता को सिर पर न चढ़ी रहने दें। आंखों में शैतान की कुदृष्टि न घुसी रहे। भोग्या और उपभोक्ता का रिश्ता न रहे।
चिन्तन की अस्त-व्यस्तता के परिणाम स्वरूप जन्मते हैं। यदि आत्म निरीक्षण की आटोसजेशन पद्धति अपनायी जाय तो न केवल रोग से मुक्ति मिल सकती है अपितु विद्यमान क्षमताओं का परिपूर्ण सदुपयोग भी हो सकता है।
चिन्तन के लिए गुंजाइश ही नहीं छोड़तीं। बलात्कार, व्यभिचार, अपहरण आदि की जो दुर्घटनाएं आये दिन होती रहती हैं उनकी कोई संभावना या गुंजाइश ही न रहे।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की उत्कृष्टता के रूप में प्रतिष्ठित देखी जा सके और व्यक्तित्व में देवोपम सत्प्रवृत्तियों का समावेश हो।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की श्रेष्ठता अपने आप में इतनी महत्वपूर्ण है कि हर स्थिति में हर्षोल्लास की बहुलता खींचकर निकट ले आती है। इस प्रकार स्वर्ग जाना नहीं पड़ता, उसे अपने आकर्षक व्यक्तित्व की चुम्बकीय शक्ति से घसीट बुलाया जाता है। भगवान की तरह, देवताओं की भाँति स्वर्गलोक, ब्रह्मलोक आदि भी मनुष्य के निकट तक रहने के लिए लालायित रहते हैं। अपने व्यक्तित्व का सिग्नल देकर उन्हें अपना सहचर-अनुचर बनाया जा सकता है। योगीराज अरविन्द ने सुपरचेतन के अवतरण के माध्यम से इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को गर्हित बनाती हैं। प्रकाश की ओर पीठ करके चलने वाला मात्र अपनी काली परछाई ही देखता है। आदर्शों से विमुख होकर कोई व्यक्ति न तो गरिमा अर्जित करता है और न ओछे उपायों से प्राप्त की गई ख्याति को बनाये रह सकता है। छद्म में देर तक पैर जमाये रहने की सामर्थ्य नहीं है।”
चिन्तन, मनन और आप्त जनों के परामर्श से यह निष्कर्ष निकाला, कि जीवनचर्या में आदर्शों का समावेश और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन की सेवा साधना ही सच्चे आध्यात्म का प्रयोजन पूरा करती है। वे सीमित उपासना का क्रम बनाकर शेष समय लोक साधना में लगाने लगे।
चिन्तन रूप में लिया जा सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन गुणों का ध्यान किया जा रहा है वे साधक को कितना अनुप्राणित कर पाए, उसके जीवन में किस सीमा तक उतरे। ध्यान से सिद्धि बाद की बात है, पहले सविता के ध्यान द्वारा प्राण शक्ति के अपने अन्दर होने की धारणा की जाय वही उत्तम है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-November
चिन्तन की पवित्रता से दृष्टिकोण का परिमार्जन। संयमशीलता का यथा विधि परिपालन। इतना किये बिना गाड़ी नहीं बढ़ती। उसका ढाँचा कितना ही सुन्दर क्यों न हो पर दो पहिए तो सही स्थिति में रहने ही चाहिए।
चिन्तन करने से जो जीवनी-शक्ति का ह्रास होता है, जिससे मृत्यु का भय स्थायी रूप से सूक्ष्म में बस जाया करता है। ऐसी भय पूर्ण स्थिति में कर्त्तव्यों का पालन यथाविधि नहीं हो पाता जो स्वयं एका बड़ा दुःखद प्रसंग होता है। मनुष्य जब ठीक प्रकार से अपने कर्त्तव्यों में लगा रहता है, मृत्यु का भय उसके पास नहीं फटकने पाता। कर्त्तव्यों की आपूर्ति इस विचार के साथ मृत्यु का भय लाती है कि यह नहीं कर पाया, वह करने को रह गया है। सारा जीवन बेकार जा रहा है।
चिन्तन और सूक्ष्म विज्ञान पर आधारित एक ही उपाय है- अग्निहोत्र। यदि उसे समुचित मात्रा में करते रहा जाय, तो हम इस प्रस्तुत विपत्ति से बच सकते हैं।
चिन्तन का विवेक पक्ष उसके साथ जुड़ नहीं पाया है। मात्र बुद्धि कौशल ने आविष्कार गढ़े हैं और इच्छित सुविधायें देने में मनुष्य का हाथ बंटाया है। यह सुविधायें कौन प्रयुक्त करता है? किसलिए प्रयुक्त करता है? और उसका अन्तिम परिणाम क्या होता है?
चिन्तन चरित्र और व्यवहार को आदर्शवादी बनाने की सामर्थ्य है। अध्यात्म तत्वज्ञान का विज्ञान, तर्क, तथ्य समेह ऐसा प्रतिपादन अन्यत्र कदाचित ही देखने को मिलते। आत्मा को समर्थता देने वाले इस अमृतोपम आहार को उपलब्ध किया ही जाना चाहिए।
चिन्तन क्षेत्र की अनेक गुत्थियां हैं। परस्पर विरोधी प्रतिपादनों से मनुष्य दिग्भ्रान्त जैसी स्थिति में जा पहुंचता है। किंकर्तव्य विमूढ़ जैसी स्थिति में वह सोचने लगता है कि इनमें से किस मार्ग को चुना और किस मार्ग को छोड़ा जाय।
चिन्तन को उसी क्षेत्र में कल्पनाएं करने की छूट देते हैं जिनसे कोई कारगर प्रयोजन सधता हो।
चिन्तन चंचल होता है और अश्लीलता का खुमार चढ़ता है। उनके अश्लील अवयवों की छवि मानस पटल पर जमाने और उनके साथ खिलवाड़ करने की कल्पना ही उत्तेजना उत्पन्न करती है। यह स्वनिर्मित उन्माद है जिससे मद्यपान की तरह बचा भी जा सकता है।
चिन्तन की निकृष्टता ही कालान्तर में विपत्ति बन जाती है। छल छद्म चल पड़ता है। बड़प्पन का अहंकार सवार होता है तो उनकी पूर्ति का ताना-बाना बुनता चलता है और लुकछिप कर छद्म को चरितार्थ करने वाली रीति-नीति चुपके-चुपके स्वभाव में सम्मिलित हो जाती है।”
चिन्तन क्या करना? वह अपने समय पर आयेगी, आती रहेगी। उसका विचार छोड़कर मनुष्य को जीवन की आराधना में लगा रहना चाहिये। चिन्तन का विषय जीवन है, मृत्यु नहीं। मृत्यु का चिन्तन करने से जो जीवनी-शक्ति का ह्रास होता है, जिससे मृत्यु का भय स्थायी रूप से सूक्ष्म में बस जाया करता है।
चिन्तन बदल दें और व्यवहार में थोड़ा अन्तर करें तो इतने भर से विपत्ति की रोकथाम हो सकती है।
चिन्तन और मनन यह चार संस्कार मन पर रगड़ाई करने एवं कलई चढ़ाने के काम में लाये जाते हैं। प्रत्याहार वस्तुतः अवाँछनीयता विरोधी है, जिसके लिए सद्विचारों का सत्प्रवृत्तियों का- नीति मर्यादाओं का- अवगाहन करना पड़ता है।
चिन्तन का विषय जीवन है, मृत्यु नहीं। मृत्यु का चिन्तन करने से जो जीवनी-शक्ति का ह्रास होता है, जिससे मृत्यु का भय स्थायी रूप से सूक्ष्म में बस जाया करता है। ऐसी भय पूर्ण स्थिति में कर्त्तव्यों का पालन यथाविधि नहीं हो पाता जो स्वयं एक बड़ा दुःखद प्रसंग होता है। मनुष्य जब ठीक प्रकार से अपने कर्त्तव्यों में लगा रहता है, मृत्यु का भय उसके पास नहीं फटकने पाता। कर्त्तव्यों की आपूर्ति इस विचार के साथ मृत्यु का भय लाती है कि यह नहीं कर पाया, वह करने को रह गया है।
चिन्तन की गहराई में उतरने वालों के ही हाथ लगा है कि मानवी चेतना को सुगठित, सुनियोजित एवं समुन्नत बना लेने पर व्यक्तित्व में चार चाँद लगते हैं। वह प्रतिभावान बनता है एवं सज्जनता के चुम्बकत्व से अनेकों का स्नेह-सहयोग अपनी ओर आकर्षित करता है। लोक व्यवहार में प्रामाणिकता को ही सबसे बड़ी पूँजी माना गया है। जिसे सज्जनोचित व्यवहार आ गया- तत्परता तन्मयता का अभ्यास कर लिया, समझना चाहिए कि उसने सर्वतोमुखी उत्कर्ष का द्वार खोल लिया।
चिन्तन का समुद्र मंथन करने पर ही हस्तगत हो सकती हैं। वैभव की तृष्णा एक लुभावनी चमक मात्र है। पर आन्तरिक सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण रत्नों को खोद निकालने के समान है।
चिन्तन-धारा जितनी अधिक जीवन के समीप रहेगी वह उतना ही कम मृत्यु से डरेगा और जिसके विचार जितना अधिक मृत्यु का चिन्तन करेंगे वह उतना ही उससे भयभीत रहेगा। मृत्यू का चिन्तन क्या करना? वह अपने समय पर आयेगी, आती रहेगी। उसका विचार छोड़कर मनुष्य को जीवन की आराधना में लगा रहना चाहिये। चिन्तन का विषय जीवन है, मृत्यु नहीं।
चिन्तन, मांग रहा तप, युग का क्रन्दन,
चिन्तन का विषय जीवन है, मृत्यु नहीं। मृत्यु का चिन्तन करने से जो जीवनी-शक्ति का ह्रास होता है, जिससे मृत्यु का भय स्थायी रूप से सूक्ष्म में बस जाया करता है। ऐसी भय पूर्ण स्थिति में कर्त्तव्यों का पालन यथाविधि नहीं हो पाता जो स्वयं एका बड़ा दुःखद प्रसंग होता है। मनुष्य जब ठीक प्रकार से अपने कर्त्तव्यों में लगा रहता है, मृत्यु का भय उसके पास नहीं फटकने पाता। कर्त्तव्यों की आपूर्ति इस विचार के साथ मृत्यु का भय लाती है कि यह नहीं कर पाया, वह करने को रह गया है।
चिन्तन करेंगे वह उतना ही उससे भयभीत रहेगा। मृत्यु का चिन्तन क्या करना? वह अपने समय पर आयेगी, आती रहेगी। उसका विचार छोड़कर मनुष्य को जीवन की आराधना में लगा रहना चाहिये। चिन्तन का विषय जीवन है, मृत्यु नहीं।
चिन्तन करने से जो जीवनी-शक्ति का ह्रास होता है, जिससे मृत्यु का भय स्थायी रूप से सूक्ष्म में बस जाया करता है। ऐसी भय पूर्ण स्थिति में कर्त्तव्यों का पालन यथाविधि नहीं हो पाता जो स्वयं एक बड़ा दुःखद प्रसंग होता है। मनुष्य जब ठीक प्रकार से अपने कर्त्तव्यों में लगा रहता है, मृत्यु का भय उसके पास नहीं फटकने पाता। कर्त्तव्यों की आपूर्ति इस विचार के साथ मृत्यु का भय लाती है कि यह नहीं कर पाया, वह करने को रह गया है। सारा जीवन बेकार जा रहा है।
चिन्तन-धारा जितनी अधिक जीवन के समीप रहेगी वह उतना ही कम मृत्यु से डरेगा और जिसके विचार जितना अधिक मृत्यु का चिन्तन करेंगे वह उतना ही उससे भयभीत रहेगा। मृत्यु का चिन्तन क्या करना? वह अपने समय पर आयेगी, आती रहेगी। उसका विचार छोड़कर मनुष्य को जीवन की आराधना में लगा रहना चाहिये। चिन्तन का विषय जीवन है, मृत्यु नहीं।
चिन्तन करेंगे वह उतना ही उससे भयभीत रहेगा। मृत्यू का चिन्तन क्या करना? वह अपने समय पर आयेगी, आती रहेगी। उसका विचार छोड़कर मनुष्य को जीवन की आराधना में लगा रहना चाहिये। चिन्तन का विषय जीवन है, मृत्यु नहीं।
चिन्तन को विषय विशेष में तन्मय करने के फलस्वरूप हस्तगत होती है। चाकू, उस्तरा जैसे औजारों को पत्थर पर घिस देने से वे चमकने लगते हैं और पैनी धार के बन जाते हैं। बुद्धि के संबंध में भी यही बात है। उसे तन्मयता की खराद पर खराद कर हीरे जैसा चमकीला बनाना पड़ता है। जिनका मन एक काम पर न लगेगा, जो शारीरिक, मानसिक दृष्टि से उचकते मचकते रहेंगे, वे अपना समय, श्रम बर्बाद करने के अतिरिक्त उपहासास्पद भी बनकर रहेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-May
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार का स्तर ऊँचा उठाते हैं। ऐसी पुस्तकें युग मनीषियों द्वारा लिखी हुई हो सकती हैं। उसके लिए उन पुराने इतिहास पुराणों या निर्धारणों को पढ़ते रहने से उल्टा भ्रम जंजाल गले बंधता है, जो अब असामयिक हो गये। समय के साथ बहुत कुछ बदलता है, इसमें समाधानकारक विचारधारा भी सम्मिलित है।
चिन्तन, हितैषी, कुटुम्बी, मित्र कहलाने वाले भी यही करते हैं जो उनने समझा, अपनाया और किया है उसके अतिरिक्त अन्य प्रकार की शिक्षा वे दें तो दें भी कैसे? जिनने आदर्शों की मात्र चर्चा सुनी है। उस मार्ग पर प्रत्यक्षतः एक कदम भी नहीं उठाया, उनसे यह आशा करना कि वे सच्चे मन से किसी को श्रेष्ठता के उस मार्ग पर चलने का प्रयत्न करेंगे या सफल होंगे, आशा नहीं ही की जा सकती। वे स्वयं जिस प्रकार घिनौनेपन को अन्तरंग और बहिरंग में धारण किये रहे हैं। उनसे भिन्न प्रकार के परामर्श या सहयोग की आशा करना भी व्यर्थ है।
चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार। इस संदर्भ में बहुत अधिक मतभेद की गुँजा नहीं है। देश, क्षेत्र जाति, वर्ण, सम्प्रदाय के कारण शालीनता का स्तर नहीं गिरता। संयम, सज्जनता, उदारता, नम्रता जैसे शब्दों में उसका विवेचन किया जा सकता है। दूसरों से हम अपने लिए जैसे व्यवहार की आशा करते हैं वैसा ही यदि दूसरे के साथ करने लगें तो समझना चाहिए कि संस्कृति का पूर्वार्ध हुआ।
चिन्तन, आदर्श चरित्र और शालीन व्यवहार से बन पड़ता है। आत्मपरिष्कार और लोक-मंगल ईश्वर भक्ति की दिशा में उठाये हुए सही कदम हैं।
चिन्तन का समावेश रहने से मनुष्य अपने लिये सर्वश्रेष्ठ दिशाधारा का संकेत उपलब्ध करता है। इतना ही नहीं गायत्री की शब्द शक्ति से चिन्तन और चरित्र को अपने दिव्य प्रवाह के साथ घसीट ले जाता है।
चिन्तन, आदर्श कर्तृत्व एवं शालीन व्यवहार के लिए निर्देश है। इस विधा को व्यावहारिक रूप देने हेतु, सादा जीवन उच्च विचार का व्यवहार करना पड़ता है। यह ऋषियों, ब्राह्मणों और संत सज्जनों की परिपाटी रही है। इसी को गान्धी, विनोबा जैसे महामानव अपनाते और सर्व साधारण को अपने प्रवचनों से ही नहीं, जीवनयापन के विधि-विधानों से परिचय देते रहते रहे हैं।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार- प्रथा प्रचलन के संदर्भ में किस देवता को क्या पसन्द है और क्या नापसन्द। अपने भक्तों को कुछ भी करने की छूट मिली और साथ ही यह आश्वासन उपलब्ध हुआ कि विपक्षी के प्रति चाहे जैसा दुर्व्यवहार किया जाय अपने द्वारा समर्पित देवता उसका हिमायत करेगा। मनौतियाँ मनाने में दोनों ही तथ्य सम्मिलित हुए अपने प्रति अभीष्ट मनोकामनाओं की पूर्ति और जिसके साथ अपना द्वेष है उनके प्रति कुछ भी करने की मनमाने उत्पीड़न की छूट। कहीं-कहीं तो ऐसा भी सोचा गया कि देवता के नाम पर कुछ भी कर गुजरने से मनुष्य पाप का भागी नहीं बनता या उसे लोक परलोक में किसी प्रकार का दण्ड नहीं मिलता। तथाकथित धर्मशास्त्रों की विविधता में यही सब भरा पड़ा है।
चिन्तन का सही तरीका समझने का अभ्यासी है। परिस्थितियों की प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने के लिए जितनी बड़ी भूमिका उत्साही मन की होती है, उतनी और किसी की नहीं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को उच्च स्तरीय बनाने की व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त करते थे। उसे हृदयंगम करते और जीवनचर्या में गहराई तक सुसम्बद्ध करने की स्थिति तक पहुँचते थे, वैसा ही प्रबन्ध शान्ति कुँज में नये सिरे से किया गया है।
चिन्तन को एक दिशा देते हैं, और सोचने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं।
चिन्तन की उत्कृष्टता, चरित्र की आदर्शवादिता और व्यवहार की शालीनता जिनने व्यवहार में अपनाई हो उन्हें खोजने के लिए हमें इतिहास के पृष्ठ पढ़ने और महामानवों के जीवन क्रम ढूँढ़ने पड़ेंगे। आज की स्थिति में भी वे कहीं-कहीं हो सकते हैं पर उन्हें इतनी सूक्ष्म बुद्धि और गहन तत्परता से ढूँढ़ना होगा जैसे पर्वत शिखरों पर उगे हुए ब्रह्म कमलों को असाधारण प्रयत्नपूर्वक ढूँढ़ना पड़ता है। अनुसरण ऐसों का ही किया जाता है। उन्हें खोज निकालना भी किसी शोध प्रबन्ध के लेखन में अनुसन्धान भरी सफलता प्राप्त करने के ही समतुल्य है।
चिन्तन और चरित्र को अपने दिव्य प्रवाह के साथ घसीट ले जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-July
चिन्तन करने पर वह जान लेता है कि बाह्य दुनिया में होने वाली समस्त घटनाएँ अंतर्जगत में बहुत पहले ही घट चुकी हैं। अतः वह अपना पूर्ण ध्यान अन्तःकरण के विकास में ही लगाता है। समस्त कार्य मनुष्य के जीवन में उसके विचारों की ही फलश्रुति होते हैं। अतः उसे अपनी चिंतन-प्रक्रिया को स्वस्थ रखना आवश्यक है। मन ससीम है और वह स्थान, समय एवं कारण की परिधि के बाहर नहीं जा सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-September
चिन्तन में शालीनता और व्यवहार में उदारता बढ़ाओ। जड़ कटने पर शरीर में बीमारियों की पौदें सहज ही सूख जायेंगी।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की दृष्टि से परिष्कृत एवं प्रामाणिक होना चाहिए। उसकी चादर पर ऐसे दाग-धब्बे लगे न हों, जिस पर हर किसी की आँख जाय और उँगली उठे। दूसरा यह कि उसके क्रिया-कलाप में सेवा भावना गुँथी होनी चाहिए। उसे प्रचार कार्य के अतिरिक्त ऐसे पुण्य-परमार्थ भी अपनाने चाहिए, जिसके सहारे उदारता, सज्जनता एवं आदर्शवादिता प्रकट होती हो। जिनके पास न चरित्र की पूँजी है और न जिनकी सेवा-साधना का कोई इतिहास, वे तो खेतों में खड़े हुए काग भगौओं की तरह हैं, जो दूर से देखने पर रखवाले जैसे प्रतीत होते हैं, पर निकट जाने पर प्रतीत होता है कि यह तो लकड़ी के ढाँचे पर घड़े का सिर और फटे कपड़े की पोशाक पहने हुए है।
चिन्तन एवं दुष्ट आचरण का निराकरण। इसी को दूसरे शब्दों में नैतिक, धार्मिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान कहा जा सकता है। यही करने योग्य है। यही होना चाहिए। मनुष्य ने अपने को भीतर और बाहर की सड़ी कीचड़ से लपेट लिया है।
चिन्तन और दुष्ट चरित्र का उन्मूलन करना था। दूसरा वह जिससे मानवी गरिमा के अनुरूप वातावरण बने और हँसती-हँसाती सुख चैन की जिन्दगी जीने का अवसर मिले। इसे सतयुग की वापसी, रामराज्य संस्थापन अथवा युग सृजन कह सकते हैं। काम दोनों ही एक से बढ़कर एक महत्वपूर्ण थे। किये दोनों ही जाने थे।
चिन्तन बदले तो क्रियाकृत्य में भी अन्तर पड़े। नेतृत्व सर्वप्रथम अपने मन का करना चाहिए और उसे इस तथ्य को समझना चाहिए कि ईश्वर प्रदत्त इस अमानत को आत्म परिष्कार एवं लोक मंगल में ही लगाया जाना चाहिए। बार-बार कहते रहने और इस परिवर्तन के दूरगामी परिणाम सुझाते रहने पर वह परामर्श भी मान सकता है और दबाव डालने, तपस्वी जैसा संकल्प कर बैठने की धमकी देकर विवश भी किया जा सकता है। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह और परिवार के लिए “एक आँख प्यार की- दूसरी सुधार की” रखते हुए उसको सदस्यों के लिए सहमत ही नहीं बाधित भी किया जाय तो इस सफलता की परिणति अपनी प्रतिभा में चार चाँद लगाने जैसी होगी। उसका प्रयोग मित्र-परिचित पड़ौसी संबंधी पर ही नहीं, अपरिचित लोगों के साथ संपर्क साधते हुये किया और मनाया-झुकाया उन्हें भी जा सकता है।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार में उत्कृष्टता, आदर्शवादिता का समावेश हो। यह विषय ऐसे हैं भी नहीं जिन्हें किसी पुस्तक या पाठ को याद कर रटाने के साथ-साथ हृदयंगम भी कराया जा सके, व्यक्ति को किसी उच्चस्तरीय ढाँचे में ढाला जा सके। अतएव वर्तमान शिक्षा संस्थाओं तथा शिक्षकों से भी आशा नहीं की जाती कि वे अपने छात्रों को महापुरुष या देवपुरुष की पंक्ति में बिठा सकने की योग्यता प्रदर्शित कर सकेंगे। अधिक से अधिक इस प्रकार की आशा की जा सकती है कि यह पुस्तकी पढ़ाई अपने प्रमाण पत्रों के आधार पर कहीं नौकरी लगवा सके अथवा शार्टहैण्ड, टाइप, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कृषि, उद्योग, व्यवस्था, बावर्ची आदि के जो शिल्प सीखे हैं उन्हें व्यवसाय रूप में अपनाते हुए रोजी रोटी का साधन जुटा सके। हमारी आज की स्कूली शिक्षा का आदि अंत यही हो जाता है।
चिन्तन के पक्षपाती थे। ईसाई, मुसलमान धर्मों का तथा तन्त्र-विज्ञान का भी उनने अवगाहन किया था। निराकारी वेदान्त दर्शन और साकारी प्रतीकोपासना की खाई उन्होंने पाटी और दार्शनिक दृष्टि से वेदान्ती और व्यवहारतः प्रतिमा पुजारी रहकर उन्होंने विग्रह को समन्वय में बदलकर दिखाया। दीन दुखियों की सेवा-सहायता में उनका अधिकांश समय बीतता था। चिकित्सा उपदेश तथा आशीर्वाद से उनने असंख्यों के कष्ट मिटाये।
चिन्तन को यदि विशेष रूप से उभारा न जाय तो वह परम्परागत रीति-नीति अपनाता है और कोल्हू के बैल की तरह ऊपरी धुरी के इर्द-गिर्द घूमता है। सामान्य-जन इसी प्रकार मौत के दिन पूरा करते हैं। उन्हें न नया सोचने का कष्ट उठाना पड़ता है और न नया करने के लिए मार्ग ढूँढ़ना और नया सरंजाम जुटाने के झंझट में बिखरना पड़ता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को संभालने सुधारने के साथ ही उस समुदाय को संभालने का कदम बढ़ता है जिसके साथ हम बंधे हुए हैं। परिवार अपना निकटवर्ती समुदाय है। इसकी इच्छानुकूल विलास सुविधा जुटाने का कार्य तो कठिन है क्योंकि एक की देखा देखी दूसरों का मन चलता है और घर में उपलब्ध सुविधाओं की तुलना में उनकी माँगे बढ़ती ही जाती हैं। जिसे रोका-टोका जाय, वही विरोधी बनता है और सहयोग के स्थान पर बिगाड़ने वाले कदम उठाता है इसलिए नीति पहले से ही निश्चित रखनी चाहिए कि उत्तराधिकारी में सम्पदा पाने की कोई भी परिजन आशा न करे। गरिमा बढ़ाने और भविष्य चमकाने वाले सद्गुणों का परिवार संस्था की छत्र छाया में अभ्यास करे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-August
चिन्तन तन्त्र के परोक्ष होने के कारण उसका आधारभूत कारण समझाने से वंचित ही रखती है।
चिन्तन मनन में डूब गये?”
चिन्तन जो विचारशील मनुष्य को डराता और असमंजस में डालता है।
चिन्तन अन्तिम दिनों किया जाता है उतना ही यदि समय रहते किया जा सके तो कितना अच्छा हो। यदि समय रहते चेता जा सके तो उसके लिए कुछ किया भी जा सकता है। मृत्यु को सुखद भी बनाया जा सकता है। उसकी शर्त यही है कि जीवनचर्या को ऐसे ढांचे में ढाला जाये जिसमें आत्मसन्तोष बना रहे। पवित्रता की जीवनचर्या साथ रहे।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार सुधारते हुए व्यक्तित्व को खरे सोने जैसा बनाना पड़ता है, जिसका मूल्याँकन कहीं भी हो सके। अपनी गरिमा को गिरा कर जो स्वार्थ साधा गया है यह तो वस्तुतः अनर्थ है। अनर्थ को स्वार्थ समझने की भूल अदूरदर्शी ही करते हैं।
चिन्तन और चरित्र असाधारण प्रभाव छोड़ते हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार शालीनता युक्त बनाये। समाज में ऐसे प्रचलन चलाने के लिए जन संपर्क साधे, जिससे सुधरे समाज की झाँकी विनिर्मित हो सके। ऐसी झाँकी जिसे धरती पर स्वर्ग का अवतरण कहा जा सके। यह संत वर्ग स्कूली शिक्षा के स्थान पर सामाजिक शिक्षा का नैतिक शिक्षा का वातावरण बनाये। परिव्राजकों की तरह बादल बन कर उन पिछड़े क्षेत्रों में पहुँचे जहाँ नव सृजन की चेतना जगाने की आवश्यकता है।
चिन्तन करने वाला व्यक्ति आहार-विहार सही रखने पर भी बीमारियों में फँसता चला जाता है। कनाडा के सर्जन डॉ. नॉरमन हॉपकिन्स ने अपने दीर्घकालीन अनुभवों को व्यक्त करते हुए कहा है कि औषधियों की अपेक्षा उत्साहवर्धक आशा जनक विचार देकर रोगी को अपेक्षाकृत जल्दी अच्छा किया जा सकता है।
चिन्तन, दृष्टिकोण भी अपनी प्रतिक्रिया - सम्मिलित करता है। भौतिक क्षेत्र की इतनी विशेषताएँ मिलकर तब वह रसायन विनिर्मित होता है, जिससे व्यक्तित्व की समग्र रूप रेखा गढ़ी जाती है।
चिन्तन के रूप में देखी जाती है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “दि फिनोमिना ऑफ मेन” में अनेक संभाव्यताओं के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मानवी विकास की अगली पद-यात्रा चेतना की ओर होगी और समाज अध्यात्मजीवी बनेगा। जिसमें न तो पारस्परिक विद्वेष होगा, न आपसी वैमनस्य। वह अपनी समस्त विपत्तियों, समस्त समस्याओं-संघर्षों से मुक्त होकर रहेगा। किन्तु टेलहार्ड का विश्वास है कि यह सब कुछ विज्ञान ही सम्पन्न करेगा, जबकि श्री अरविन्द इसका प्रतिवाद करते हैं।
चिन्तन की दृष्टि से, उत्कृष्ट चरित्र की दृष्टि से, आदर्श और व्यवहार की दृष्टि से अनुकरणीय-अभिनन्दनीय कहे जा सकें, उन्हें महामानव ही कहा जा सकता है। जिस युग में देव मानवों का बाहुल्य होता है उसे सराहा जाता और सतयुग कहा जाता है। प्रज्ञा अभियान की बढ़ती, उफनती, उछलती गतिविधियों को देखकर यदि उसका मूल्याँकन सतयुग की वापसी के रूप में किया जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी। हम प्रमाणों सहित इस तथ्य और सत्य का दर्शन इन्हीं आँखों से प्रत्यक्ष कर रहें हैं। इसे देव दर्शन या दिव्य दर्शन का सुयोग ही माना जा सकता है।
चिन्तन व अवाँछनीय कर्तृत्व से विरत करना होगा। अन्यथा एक के कषाय-कल्मष दूसरे पर आच्छादित हुए बिना न रहेंगे। सूखी लकड़ी के साथ-साथ गीली लकड़ी भी जल जाती है। छूत की महामारी शुद्ध रक्त वालों को भी चपेट में ले लेती है तात्पर्य यह है कि कुछ ही मनुष्य सन्त बनकर मुक्ति के अधिकारी बन जाएं- यह नहीं हो सकेगा।
चिन्तन का नाम है और मुक्ति आन्तरिक दुर्बलताओं से छूटना। यह विभूतियाँ समस्त मानव-समाज को उपलब्ध हो सकें, तभी व्यक्ति विशेष का कल्याण होगा।
चिन्तन के बहते प्रवाह को हम अपने सशक्त विचारों से सुधार या परिवर्तन का सन्देश दें।
चिन्तन और संवेदना को ऐसे तत्वज्ञान में ढाला जाता था जिससे बालक वंशपरंपरा में चले आ रहे कुसंस्कारों का परिमार्जन कर सकें और गुरु-परम्परा की विशेषताओं को आत्मसात कर सकें। इस संदर्भ में अभिभावकों का उत्कृष्ट चिन्तन और उदाहरण जैसा आदर्श चरित्र भी एक बड़ी भूमिका निभा सकता है।
चिन्तन करना संयम ही तुम्हारा साथी और हितैषी है।
चिन्तन के विक्षिप्तों जैसे उन्माद को समूचे ब्रह्माण्ड के लिए संकट मानते हैं और बर्बादी से पूर्व स्थिति का जायजा लेकर उस पर नियंत्रण स्थापित करने का उपाय सोच खोज रहे हों।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करना। इसके बिना वे अपने नागरिक सामाजिक कर्तव्यों से अपरिचित ही बने रहेंगे और उस राह को प्राप्त न कर सकेंगे जिसमें प्रगतिशील प्रज्ञायुग में उन्हें पहुँचना है। पिछड़ा हुआ व्यक्ति हर दृष्टि से घाटे में रहता है।
चिन्तन और उदाहरण जैसा आदर्श चरित्र भी एक बड़ी भूमिका निभा सकता है।
चिन्तन उसी प्रकार नंगा करके देखा जा सकता है जैसे कि कपड़ा उतार देने पर शरीर को।
चिन्तन की परिधि तक ही उन्हें सीमित न रहने देकर संचार सम्प्रेषण प्रयोजन में भी उन्हें काम ला सकते हैं या नहीं? मस्तिष्क हमारा टेलीफोन है उसका निचला हिस्सा वाणी के रूप में बोलता है और कान सुनने का। ये ग्रहण करके मस्तिष्क तक विचारों को पहुँचाने का काम करते हैं। इस सर्वविदित प्रक्रिया के अतिरिक्त ऐसा भी होता है कि विचार स्वयं एक शक्ति के रूप में अभीष्ट स्थान तक पहुँचें और वाणी की तरह निर्धारित केन्द्र तक अपना कथन पहुँचायें। पहुँचाये ही नहीं, ग्रहण भी करें।
चिन्तन और निर्धारण उसी का है। वही योजनाएँ बनाता है और व्यवस्थाएँ करता है। मनुष्य का मानस उसी की छत्रछाया में विकसित होता है। लोकाचार क्षेत्र को मन की उथली परत संभालती है, किन्तु अन्तःकरण की- अन्तरात्मा की- सुपरचेतना की गहन परतें इस दिव्य ब्रह्मचेतना की परिधि में ही आती हैं और वहीं से उसका सूत्र-संचालन होता रहता है। मस्तिष्क के मध्य भाग में अवस्थित सहस्रार कमल-ब्रह्मरंध्र, इसी चेतना के मनुष्य में अवतरित होने का केन्द्र बिन्दु है।
चिन्तन का समावेश करना होगा। आदर्शों और सिद्धान्तों को यदि चेतना की गहरी परतों तक प्रविष्ट कराया जा सके तो उस भावनात्मक विशेषता का समावेश उनमें करके नई पीढ़ियों में अभीष्ट विशिष्टताएं पैदा की जा सकती हैं। प्राचीन काल के गुरुकुलों में महामानवों की ढलाई होती थी। वहाँ मात्र शिक्षा का ही प्रबन्ध न था वरन् उनके रहन-सहन, चिन्तन और संवेदना को ऐसे तत्वज्ञान में ढाला जाता था जिससे बालक वंशपरंपरा में चले आ रहे कुसंस्कारों का परिमार्जन कर सकें और गुरु-परम्परा की विशेषताओं को आत्मसात कर सकें। इस संदर्भ में अभिभावकों का उत्कृष्ट चिन्तन और उदाहरण जैसा आदर्श चरित्र भी एक बड़ी भूमिका निभा सकता है।
चिन्तन एक दिशा से दूसरी दिशा में घुमाया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-June
चिन्तन में उत्कृष्टता, चरित्र में आदर्शवादिता और व्यवहार में न्याय निष्ठा का समावेश- यह तीनों मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखती हैं। गायत्री के तीन चरणों में इन तीनों को अपनायें जाने का निर्देश है।
चिन्तन असीम चाहता है। सृष्टि-व्यवस्था में सबको सीमित ही मिलता है। इस कारण अपने लिए, अपनों के लिए जिस असीम की चाहना होती है, उसकी आँशिक पूर्ति भी अनीति अपनाये बिना, दूसरों के हितों पर कुठाराघात किये बिना बन पड़ना सम्भव नहीं। अनीति अपनाने पर, आत्मिक एवं सामाजिक संकट उत्पन्न होते हैं। ऐसी दशा में वह तथाकथित हित-साधन भी प्रत्यक्ष या परोक्ष संकटों से भरा होता है।
चिन्तन के उपरान्त इस प्रकार क्रमबद्ध प्रशिक्षित बना लेना चाहिए कि बिगुल बजते ही मोर्चे पर आ डटे और शत्रु को परास्त करके रहे।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार सब मिलकर एक ऐसा घोटाला बनते जा रहे हैं कि उनकी परिणति के सम्बन्ध में कुछ ठीक से कह सकना कठिन है। फिर भी हमें मनुष्य से आशा करनी चाहिए कि अनेकों संकटों के बीच गुजरते हुए उसने वर्तमान स्थिति तक पहुँच पाने में सफलता प्राप्त की है तो यह आशा भी करनी चाहिए कि वह भविष्य की डरावनी विभीषिकाओं को भी पार करके रहेगा।
चिन्तन में स्वस्थ अध्यात्मवादी दृष्टिकोण का भी समावेश होता है जो व्यक्ति, समाज और संसार सभी के लिए उज्ज्वल सम्भावनाओं का अध्याय है। संसार की शान्ति और प्रगति इसी दृष्टिकोण पर आधारित है यह सुनिश्चित मानना चाहिए।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार अपनाने के लिए बाधित करती है। किन्तु यदि उसे साधनों की अहंमन्यता से उपेक्षित तिरस्कृत किया जाने लगे तो फिर उद्दण्डता ही हाथ रह जाती है। व्यक्ति वर्जनाओं को तोड़ता-मरोड़ता वह करने पर उतारू होता है जिससे उसकी गरिमा और महिमा का दिवाला ही निकल जाय।
चिन्तन एवं चरित्र में महानता का समावेश हुआ या नहीं?
चिन्तन से चरित्र, चरित्र से व्यवहार- व्यवहार से वातावरण बनने की बात स्पष्ट है। अस्तु लोकचिन्तन में सदाशयता का अनुपात अधिकाधिक भरने के लिए विचार क्रान्ति का- प्रज्ञा विस्तार का कार्यक्रम हाथ में लेना चाहिए। समस्त समस्याओं का यह एक ही हल है। यज्ञों के अनेक स्वरूप हैं। इनमें से इन दिनों हमें ज्ञानयज्ञ को ही प्राथमिकता देनी चाहिए और इसके लिए जितना कुछ न्यूनाधिक बन पड़े उसे करना चाहिए।
चिन्तन में आदर्शों का समुचित समावेश हो। चरित्र में उत्कृष्टता और व्यवहार में शालीनता की अभीष्ट मात्रा बनी रहे। यह एक चेतना की उत्कृष्टता की परिणतियाँ हैं। दया और करुणा का निर्झर इसी स्रोत से बहते हैं। अहंमन्यता पर अंकुश लगने का यही आधार है, सौम्य, सज्जन, सहिष्णुता और मृदुला और उद्धार बना अन्तःकरण की गरिमा में ही असम्भव है।
चिन्तन-मनन की भी। अनौचित्य की हानियों को जितने विस्तार सहित सोचा जा सके। उन्हें अपनाने पर जिन्हें जो संकट सहना पड़ा है। उसका चित्र इतना स्पष्ट होना चाहिए कि उस दिशा में कदम बढ़ाना आग से खेलने के समान भयावह प्रतीत होने लगे। ठीक यही बात औचित्य के समर्थन के लिए भी है।
चिन्तन, लेखन में तल्लीन रहने लगे।
चिन्तन में सदाशयता का अनुपात अधिकाधिक भरने के लिए विचार क्रान्ति का- प्रज्ञा विस्तार का कार्यक्रम हाथ में लेना चाहिए। समस्त समस्याओं का यह एक ही हल है। यज्ञों के अनेक स्वरूप हैं। इनमें से इन दिनों हमें ज्ञानयज्ञ को ही प्राथमिकता देनी चाहिए और इसके लिए जितना कुछ न्यूनाधिक बन पड़े उसे करना चाहिए। इस संदर्भ में झोला पुस्तकालय के निमित्त प्रयास करना ऐसा है जिसे युग धर्म एवं आपत्तिकालीन अनिवार्य सेवा कार्य कहा जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-April
चिन्तन का कोई महत्वपूर्ण विषय उसमें छूटने नहीं पाया है।
चिन्तन और मनन भी ऊंचे स्तर का कर सकेगा। उसके द्वारा अन्यान्यों को भी ऊंचे स्तर का परामर्श एवं सहयोग मिलेगा। इन्हीं कसौटियों पर कसकर यह देखा जा सकता है कि किसका व्यक्तित्व किस स्तर का है।
चिन्तन तक सीमित न रखकर कार्यरूप में, परमार्थ परक कार्यों में ही परिणत करना होता है। यही सच्चे अर्थों में श्राद्ध है। उपकारी के प्रति कृतज्ञता का प्रत्युपकार का भाव रखना भावना क्षेत्र की पवित्रता एवं उत्कृष्टता का प्राणवान चिन्ह है। इसके लिए धनदान आवश्यक नहीं, समय, धन, श्रम दान, भाव दान भी असमर्थता की स्थिति में इसी प्रयोजन की पूर्ति करते हैं। उन्हीं सब बातों पर विचार करते हुए भारतीय धर्म परम्परा में श्राद्ध कर्म की महत्ता बताई गई है।
चिन्तन के कितने ही उत्कृष्ट आधार प्रदान करती है। आज हिन्दू, भारतीय एवं पुरुष हैं। कल के जन्म में ईसाई, योरोपीयन या स्त्री भी हो सकते हैं। आज का सत्ताधीश, कुलीन मनुष्य सोचता है कल प्रजाजन, अछूत एवं पशु बनना पड़ सकता है। मृत्यु की विभीषिका से बचने का यह सहज और सरल तरीका है।
चिन्तन का नाम है। यह तीनों ही उपलब्धियां सरल हैं और विवेकपूर्ण जीवन नीति अपनाने वाले हर किसी को अक्षय आनन्द प्रदान करती रह सकती हैं।
चिन्तन को नुकीला बनाता है। मोटे तार से कपड़ों को नहीं सिया जा सकता। पर जब इसकी पैनी नोंक निकाल दी जाती है तो कपड़े की सिलाई का प्रयोजन भली-भाँति पूरा हो सकता है। बिखराव में शक्तियों की अस्त व्यस्तता रहती है। पर जब उन्हें बटोरकर एक केंद्र के साथ बाँध दिया जाता है तो अच्छी बुहारने वाली झाडू बन जाती है।
चिन्तन में डूबे रहने वालों को स्वप्नदोष होने लगते हैं। टहलने के साथ स्वास्थ्य सुधार की भावना करने वाले तगड़े होते जाते हैं पर दिन भर घूमने वाले पोस्ट मैन या उसी कार्य को भारभूत मानने वाले उस अवसर का कोई लाभ नहीं उठ पाते। पहलवान की भुजायें मजबूत हो जाती हैं किन्तु दिन भर लोहा पीटने वाले लुहार को कोई लाभ नहीं होता। इस अन्तर का एक ही कारण है भावनाओं का सम्मिश्रण होना और दूसरे का वैसा न कर पाना।
चिन्तन की दिशाधारा डगमगाती है। उससे व्यक्तित्व का स्तर भी गिरता है। साथी सहयोगियों पर भार पड़ता है। जीवन में ऐसा रस नहीं रह जाता जो स्थिरता एवं प्रगति का पोषण करता रहे।
चिन्तन, अन्तःक्षेत्र के अनुसन्धान के लिए ऐसा वातावरण अधिक उपयोगी माना जाता था। तब उसमें स्थान-स्थान पर अनेक योगी-यती रहते थे। उनका आत्म-बल ऐसा होता था कि शरीर निर्वाह के साधन भी अनायास ही मिल जाते थे और सुरक्षा संकट उत्पन्न नहीं होता था।
चिन्तन या कल्पना का नाम नहीं है। उसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी होना चाहिए। यह उदारता, सेवा, सहायता, करुणा आदि के रूप में ही हो सकती है। इन्हें चिन्तन तक सीमित न रखकर कार्यरूप में, परमार्थ परक कार्यों में ही परिणत करना होता है। यही सच्चे अर्थों में श्राद्ध है।
चिन्तन और कर्तृत्व अभी इतना विकसित नहीं हुआ कि प्रकाश की गति से अधिक चलने वाले किसी वाहन के निर्माण की कल्पना की जा सके।
चिन्तन वाणी में प्रकट होता है। ठग आदर्शवादी वार्त्तालाप कर सकने में देर तक सफल नहीं हो सकते। वे किसी को जाल में फँसाने के लिए ऐसी बातें करते हैं मानों उसके हितैषी हों और उसे अनायास ही कृपा पूर्वक कोई बड़ा लाभ कराना चाहते हैं। नीतिवान ऐसी बातें नहीं करते वे अनायास ही उदारता नहीं दिखाते और न अनुकम्पा करते हैं। न ऐसा रास्ता बताते हैं जिसमें नीति गँवाकर कमाई करने का दाँव बताया जा रहा है।
चिन्तन और लक्ष्य में जमीन आसमान जितना अन्तर रहते हुए भी असली और नकली की एक जैसी स्थिति कैसे हो सकती है? यदि गुफा में रहने से ही सिद्धियाँ मिली होतीं तो सभी चूहे सिद्ध पुरुष हो गये होते। शीत आतप का जहाँ अधिक दबाव होता है, या दृष्टि से बचने की आवश्यकता होती है, वहाँ वन्य पशु प्रायः गुफाओं में रहते हैं या उसे अपने पंजों से खोदकर बना लेते हैं। नेवला, गोह, साँप आदि का अधिकांश जीवन गुफाओं में ही समय काटते हुए बीतता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-May
चिन्तन किया तुम्हारा, तुमसे इतना प्यार हो गया। तजकर अपना रूप, तुम्हारा मैं पावन आकार हो गया॥
चिन्तन तंत्र को सूक्ष्म शरीर कहते हैं। यह दोनों एक दूसरे के साथ बहुत अंशों में घुले मिले हैं। काय कष्टों से पीड़ित होने पर मस्तिष्क मूर्छित हो जाता है। मस्तिष्क को नींद आ जाने या क्लोरोफार्म आदि सुँघा देने पर शरीर निश्चेष्ट हो जाता है। मस्तिष्क की दुर्भावनाएँ शरीर को प्रभावित करती हैं और उसे रुग्ण, अशक्त बनाती हैं।
चिन्तन की आवश्यकता नहीं पड़ती। समस्याओं की पेचीदगी में नहीं उतरना पड़ता। गुत्थियों को सुलझाना नहीं पड़ता और न कोई महत्वाकाँक्षाएँ ही उनके सामने रहती हैं, जिनकी पूर्ति के लिए असाधारण दौड़ धूप करनी पड़े। मनुष्य ही है जो आकाश, पाताल के कुलावे मिलाता, दलदलों में फँसता और उनसे उबरने के लिए अनेक स्तर के प्रयत्न करता देखा जाता है॥
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्ट आदर्शवादिता बनकर छलकता है। उसी के परिपोषण हेतु व्रत नियमों का निर्धारण, परिपालन आध्यात्मिक अग्नि क्षेत्र कहा जाता है।
चिन्तन वाला सोचता है कि कौन सर्वथा निरोग है? हर किसी को कुछ न कुछ खटपट लगी रहती है। इतने बड़े शरीर में राई रत्ती बीमारी भी किसी कोने पर पड़ी रहे तो उनसे क्या बनता बिगड़ता है? मौत का तो समय निश्चित है। उससे पहले कोई नहीं मर सकता।
चिन्तन। शरीर और मन दोनों के मिलने से ही समग्रता बनती है। तत्परता और तन्मयता का संयोग ही ऐसी उपलब्धियाँ हस्तगत कराता है, जिसके आधार पर सुविधाएँ बढ़ती, प्रसन्नतायें फलती और प्रगति की संभावनाएँ मूर्तिमान होती हैं। मानवी प्रगति के इतिहास में मूल तत्व यही सन्निहित है। पशु और मनुष्य के बीच में यही अन्तर है।
चिन्तन भी बहने लगता है। बारीकी में प्रवेश करने के झंझट से बचने की आदत होती है। उथली दृष्टि से देखकर काम चला लिया जाता है। घटना-क्रम जिस दृश्य के रूप में सामने प्रस्तुत है, उसी को पर्याप्त मान लिया जाता है। यथार्थता क्या है?
चिन्तन में सहायता करने के लिए कम्प्यूटर स्तर के यंत्र बन गये हैं। पुस्तकों और परामर्शों के आधार पर भी इन प्रयोजनों में सहायता मिलती है।
चिन्तन की वह उत्कृष्टता, जिसके आधार पर उसने शास्त्र का, दर्शन का, व्यवहार का ढाँचा खड़ा किया है और अनेक दिशाओं में कल्पनाओं की उड़ानों ने उनके लिए रंगीले पंख प्राप्त किये हैं।
चिन्तन की इतनी अधिक दिशाधाराएँ सामने आई हैं कि उनकी विचित्रता और भिन्नता आश्चर्यचकित कर देती हैं। धर्म सम्प्रदायों का कलेवर इतना बड़ा है, जिसने सभ्य असभ्य सभी को अपने अंचल में ढक लिया है। ईश्वर से लेकर देवताओं तक की सृष्टि इसी ज्ञान उद्यान की उपज है। धर्म, दर्शन, अध्यात्म, साधना, सिद्धि जैसे अनेकानेक प्रकरण इसी क्षेत्र में जन्मे हैं। राजनैतिक, सामाजिक, नैतिक, बौद्धिक क्षेत्र की अनेकानेक पद्धतियाँ, प्रणालियाँ, दिशाधाराएँ यद्यपि एक दूसरे के विपरीत चलती हैं।
चिन्तन एवं चरित्र का अविच्छिन्न अंग बनाया जाय। निर्वाह भर से संतोष किया जाय और अपनी प्रतिभा को आत्म-परिष्कार के लिए नियोजित किया जाय।
चिन्तन का अधिक अवसर मिला। सोचते रहे जितनी स्वतंत्रता प्राप्ति की आवश्यकता है, उतनी ही जन जीवन को समुन्नत बनाने की भी। उन्होंने गाँधी जी की नीति अपनाई और मात्र स्वतंत्रता सैनिक न बने रहकर जन जागृति की विधा भी अपनाई।
चिन्तन, मनन, के उपायों को अन्तःचेतना के अभिवर्धन में सहायक माना गया है। पर यह बाह्य प्रयोग ही पर्याप्त नहीं है। उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने वाले जिस आन्तरिक उल्लास की आवश्यकता है उसमें सूर्याराधना विशेष रूप से सहायक होती है।
चिन्तन इसका निमित्त कारण होते हैं। नशेबाजी की लत भी इसका बड़ा कारण है। इसके अतिरिक्त कामुक उत्तेजना का सिर पर सवार रहना ऐसा निमित्त कारण है, जिसके आधार पर समस्त स्नायु संस्थान आवेशग्रस्त होता है और उससे नाड़ियों का माँस पेशियों का आकुँचन-प्रकुँचन अस्त-व्यस्त होता है। स्थिति मानसिक तनाव बढ़ने से लेकर हृदय की धड़कन अव्यवस्थित हो जाने के रूप में सामने आती है। यह व्याधि ऐसी है कि सीमा से अधिक बढ़ जाने पर पक्षाघात, हृदयाघात जैसे संकट खड़े हो सकते हैं।
चिन्तन उसका प्रधान गुण है। मन की भाग दौड़ सर्वविदित है। वह अनेकों उचित अनुचित कल्पना जल्पना करता रहता है। बालू के महल बनाता है। इच्छाएँ, आकाँक्षाएँ उभारता है और फिर उनके पीछे-पीछे भागता फिरता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-March
चिन्तन न करें। अनीति के सामने सिर न झुकायें। न्याय के समर्थन में तन कर खड़े रहें, उत्कृष्ट रहें और उसी रीति-नीति को अपनाने की जनसाधारण को प्रेरणा दें।
चिन्तन, अभ्यास को ढालते हैं। उन्हें दुष्ट दुरात्मा बनने में भी देर नहीं लगती है। दूसरों को कष्ट-पीड़ित देखकर उन्हें मजा आता है और तड़पते हुओं का हृदय विदारक दृश्य उन्हें अपने मनोरंजन या पुरुषार्थ का कारण प्रतीत होता है। कसाइयों की प्रकृति उसी ढाँचे में ढल जाती है। आत्मा के मर जाने से वे ऐसे कृत्य निरन्तर करते रहते हैं।
चिन्तन, चरित्र व्यवहार के क्षेत्र में भी सन्तोषजनक सुधार परिवर्तन प्रस्तुत करेगी। इससे प्रचलित अवाँछनीयताओं, अनैतिकताओं में भी अनायास ही सुधार होगा। जो कार्य कष्टसाध्य आध्यात्मिक साधनाओं से भी नहीं बन पड़ता वह इस सतोगुण अन्न ब्रह्म को अपनाने भर से सहज सम्भव हो सकेगा।
चिन्तन भी सदा ऊँचा रहे परिस्थितियाँ प्रतिकूल होने पर भी निकृष्ट चिन्तन न करें। अनीति के सामने सिर न झुकायें। न्याय के समर्थन में तन कर खड़े रहें, उत्कृष्ट रहें और उसी रीति-नीति को अपनाने की जनसाधारण को प्रेरणा दें।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार, स्वभाव एवं व्यक्तित्व में निखार लाने की है, जो अपने को अधिक प्रतिभाशाली लोकप्रिय एवं सम्मानित देखना चाहते हैं।
चिन्तन, और साधन निकालता है। इससे वह अवकाश बच जाता है, जिसे परमार्थ प्रयोजनों में लगाया जा सके। व्यक्ति और समाज को दुष्प्रवृत्तियों ने बर्बाद किया है। उसे यदि फिर से सुधारना संभालना है तो उसका एक ही उपाय हैं सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में जुटा जाय। अन्धकार में लाठी लेकर नहीं लड़ा जा सकता।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-June
चिन्तन चरित्र और व्यवहार में जो भूलें होती रही हैं, उन्हें यज्ञाग्नि में होम देना चाहिए। अपने आप को अग्नि में तपे सोने की तरह खरा बनाना चाहिए। यज्ञ में ऋषित्व और देवत्व प्राप्त करने की प्रक्रिया इसी आधार पर सम्पन्न होती है। स्वर्ग और मुक्ति मिलने का देवताओं का अनुग्रह बरसने का जो माहात्म्य शास्त्रों में बताया गया है, उसमें ज्ञान और कर्म के समन्वय का तत्वज्ञान छिपा हुआ है। यज्ञ एक कृत्य है।
चिन्तन। विचार पद्धति का सुसंतुलन। सर्वविदित है कि क्रिया-कलापों के मूल में विचारणा ही काम करती है। विचार प्रवाह यदि अनुपयुक्त दिशा में बह रहा है, तो उसके सूत्र संचालन पर निर्भर क्रिया-कलाप भी हेय स्तर के ही बन पड़ेंगे, हेय कृत्यों का प्रतिफल दुःखद, संकटापन्न एवं अपयश, विरोध विग्रह के रूप में ही सामने आना चाहिए। उस कुचक्र में फँसे मनुष्य खिन्न, विपन्न से बने रहते हैं और वर्जनाओं का उल्लंघन नहीं करते।
चिन्तन निकृष्टताएँ अपनाता है, चरित्र दुष्ट-दुर्जनों जैसा हो जाता है और व्यवहार में हिंस्र पशुओं जैसी आक्रामकता भर जाती है। इसका संशोधन हुए बिना मनुष्य छोटी-छोटी बातों का लेकर विग्रह पर उतारू हो जाते हैं और अपना, पराया सभी का सर्वनाश करते हैं।
चिन्तन एवं प्रयास में लगाया जा सकता है, उससे मनचाहा लाभ उठाया जा सकता है। किन्तु यदि मनःक्षेत्र में अराजकता, अनुशासनहीनता चल रही हो, स्वेच्छाचार का बोल-बाला हो तो किसी उपयोगी योजनाबद्ध कार्य में उसे लगा सकने की संभावना ही नहीं बनती।
चिन्तन बीज है, उसमें चरित्र और व्यवहार का खाद पानी लगाने से जीवन कल्पवृक्ष जैसा फलता है। चन्दन जैसा महकता है। चिन्तन आमतौर से अचिन्त्य चिन्तन की रँगीली उड़ानें उड़ता और आवारागर्दी में भटकता देखा गया है। पर जब उसे आदर्शवादिता का अवलम्बन मिलता है, तो सही मार्ग पर चलने लगता है। उच्छृंखलता अवरुद्ध होती है और निर्धारित उद्देश्यों के लिए वह एकनिष्ठ, तन्मयता अपनाता है।
चिन्तन और मनन की प्रक्रिया में अधिकाधिक समय लगाना चाहिए। चिन्तन का प्रयोजन होना चाहिए परिशोधन और मनन का उद्देश्य रहे-भावी गतिविधियों को सत्प्रवृत्तियों में सुनियोजित करने की उमंग भरी विचारणा रहनी चाहिए।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के सभी स्तर आदर्शों से भरे पूरे रहते हैं।
चिन्तन की उत्कृष्टता, चरित्र की श्रेष्ठता एवं अन्तराल की विशालता के रूप में विकसित व्यक्तित्व की ही परिणति है। जिसे भी इस दिशा में आगे बढ़ना हो, इसके लिए यही एक मात्र राजमार्ग है। इसके लिये किसी शार्टकट का किसी रूप में प्रावधान नहीं है। यह एक शाश्वत निर्धारित सिद्धान्त है, जिसे हर स्थिति में स्वीकार किया जाना चाहिए।
चिन्तन का परिणाम है। चिन्तन बीज है, उसमें चरित्र और व्यवहार का खाद पानी लगाने से जीवन कल्पवृक्ष जैसा फलता है। चन्दन जैसा महकता है। चिन्तन आमतौर से अचिन्त्य चिन्तन की रँगीली उड़ानें उड़ता और आवारागर्दी में भटकता देखा गया है। पर जब उसे आदर्शवादिता का अवलम्बन मिलता है, तो सही मार्ग पर चलने लगता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में शालीनता का अधिकाधिक समावेश करने की विधि-व्यवस्था सिखाना है। आत्म-निर्माण, परिवार-निर्माण और समाज निर्माण के लिए भिन्न परिस्थितियों में किन्हें क्या करना चाहिए? इसके सभी पहलुओं को ऐसी शैली में समझाया जाता है कि मात्र सिद्धान्तवाद की दार्शनिक व्याख्या विवेचना ही न होती रहे, वरन् उसे वर्तमान विषम परिस्थितियों में भी कार्यान्वित किया जा सके।
चिन्तन पद्धति, चरित्र-निष्ठा और पारस्परिक संबंधों में आदर्शवादिता का समावेश किया जाय। प्रत्यक्ष जीवन में आदर्श ही अध्यात्म है। जीवनचर्या के प्रत्येक पक्ष में मानवी गरिमा से संबंधित सभी अनुबंधों का सतर्कतापूर्वक पालन किया जाय। इसके लिए परिशोधन और उत्कर्ष की उभय-पक्षीय क्रिया-प्रक्रिया अपनायी जाय। अपना स्तर ऐसा बनाया जाय जो आत्म संतोष प्रदान कर सके।
चिन्तन में, परमार्थ साधनाओं में संलग्न रहते थे तो भी उनको अष्ट सिद्धि, नवनिद्धि सरीखी लोकोत्तर शक्तियाँ उपलब्ध रहती थी। भारत प्राचीन काल में बुद्धिमान बनने के लिये ज्ञान की और बलवान बनने के लिये विज्ञान की उपासना करने में सदैव संलग्न रहता योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है। यह निर्विवाद है।
चिन्तन आमतौर से अचिन्त्य चिन्तन की रँगीली उड़ानें उड़ता और आवारागर्दी में भटकता देखा गया है। पर जब उसे आदर्शवादिता का अवलम्बन मिलता है, तो सही मार्ग पर चलने लगता है। उच्छृंखलता अवरुद्ध होती है और निर्धारित उद्देश्यों के लिए वह एकनिष्ठ, तन्मयता अपनाता है। ऐसों की एक भी विचार तरंग अनगढ़ नहीं होती। न उनमें भटकाव देखा जाता है और न ही असंयमी स्वच्छंदता का दौर उभरता है।
चिन्तन के उपरान्त संकीर्तन की शैली अपनाई गई। अधिकाँश सन्तों ने अपनी भजन मण्डलियाँ गठित की। भक्ति संकीर्तन की पद्धति निर्धारित की। उनका विषय मात्र भक्ति ही नहीं वरन् ज्ञान और कर्म की उत्कृष्टता का समावेश रखना भी था। मीरा, सूर, कबीर, रैदास, नामदेव, तुकाराम, चैतन्य आदि की धर्म प्रचार शैली में संकीर्तन प्रक्रिया को प्रमुखता दी गई थी।
चिन्तन करे, तो सहज ही वह परमात्मा के अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
चिन्तन यंत्र काया-कलेवर में ही इतना उलझा रहता है कि आत्मा के लिए कुछ करना तो, दूर, सोचते भी नहीं बन पड़ता।
चिन्तन की रँगीली उड़ानें उड़ता और आवारागर्दी में भटकता देखा गया है। पर जब उसे आदर्शवादिता का अवलम्बन मिलता है, तो सही मार्ग पर चलने लगता है। उच्छृंखलता अवरुद्ध होती है और निर्धारित उद्देश्यों के लिए वह एकनिष्ठ, तन्मयता अपनाता है। ऐसों की एक भी विचार तरंग अनगढ़ नहीं होती। न उनमें भटकाव देखा जाता है और न ही असंयमी स्वच्छंदता का दौर उभरता है।
चिन्तन को विकृत ही करती रहती है, व्यक्तित्व को अनगढ़ और आचरण को ऐसा जिससे आत्म प्रवंचना एवं लोक भर्त्सना के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगे। यह स्थिति घाटे की है। यह बनी रहे तो मनुष्य को भीतर से खोखला और बाहर से ढकोसला बनाकर छोड़ता है।
चिन्तन का प्रयोजन होना चाहिए परिशोधन और मनन का उद्देश्य रहे-भावी गतिविधियों को सत्प्रवृत्तियों में सुनियोजित करने की उमंग भरी विचारणा रहनी चाहिए।
चिन्तन निरन्तर उन्हीं का चलता रहता है। धन आदमी को इतना चाहिए, जितने में औसत भारतीय स्तर का गुजारा होता चले। उसे न तो अधिक मात्रा में एक जगह जमा होना चाहिए और न उसका अपव्यय होना चाहिए। संग्रह और अपव्यय से अनेकानेक समस्यायें उत्पन्न होती हैं। श्रम-उपार्जन से न्याय और ईमानदारी की कसौटी पर खरा उतरने वाला धन सीमित ही कमाया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-August
चिन्तन तंत्र काम करना बन्द कर देता है, कल्पना शक्ति कमजोर पड़ जाती है व दिमाग की रचनात्मक सामर्थ्य क्षीण हो जाती है; पर वस्तुतः ऐसी बात है नहीं। संसार में अनेक महत्वपूर्ण कार्य लोगों ने ढलती आयु में ही सम्पन्न किये हैं। कई लोगों ने जीवन की इस ढलान में अनेक ऐसी रचनाएँ कीं, जो उन्हें अमर बना गयी। कइयों ने इस अवस्था में ऐसी प्रतिभा का परिचय दिया, जिसे अद्भुत ही कहा जा सकता है। अनेकों ने इसी उम्र में अपने जीवन को सही-सही समझा और उसका सदुपयोग किया, जबकि अन्य अनेक ऐसे भी हुए हैं, जिनने जीवन के इसी दौर में कुछ ऐसे कार्य कर दिखाये, जिन्हें शेष जीवन की तुलना में श्रेष्ठ व मूल्यवान कहा जा सके।
चिन्तन भी विकसित है। उसे सरसता चाहिए और सुन्दरता, सम्पन्नता, प्रशंसा भी। अतएव उसका विचार क्षेत्र विस्तृत हो जाता है। उसकी व्यावसायिक बुद्धि अनेक प्रकार के नीच ऊँच सोचती है, मोड़ मरोड़ों में होकर गुजरती है। इसलिए उसे विचारशील ही नहीं बुद्धिमान भी माना जाता है।
चिन्तन करना चाहिए। ‘हम’ वस्तुतः अहम् का ही संक्षिप्त रूप है। अहम् अर्थात् अहंकार। स्वार्थ लोभ, मोह आदि के काषाय कल्मष। यही हैं जो जीवात्मा के साथ लिपट कर उसे भव बंधनों के पाश में जकड़ते हैं।
चिन्तन, निर्धारण एवं क्रिया, कलाप उचित था कि सामाजिक जीवन में कोई अस्त-व्यस्तता न रहने पर आत्म-कल्याण की आत्मोत्कर्ष की बात सोची जाय। स्वर्ग की, मुक्ति की, सिद्धि की सुखद कल्पनाओं एवं चेष्टाओं में निरत रहा जाय।
चिन्तन से न पूरी रूप−रेखा समक्ष में आती है और न उसका क्रम बनाने का तारतम्य ठीक से बनता है। दिलचस्पी जितनी जिस काम में रहेगी। कार्य ठीक तरह बन पड़ेगा। साधनों का नियोजन भी तभी होता है, जब पूरा मन उसमें लग पा रहा है अन्यथा उपयुक्त साधन होते हुए भी उनका उपयोग ठीक तरह नहीं हो पाता। ......... अधूरे मन से किये हुए काम सदा अधूरे रहे हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में अधिकाधिक उत्कृष्टता का समावेश किया जाता था। इस उत्कर्ष का प्रतिफल मनुष्य में देवत्व के-उद्भव के-रूप में दृष्टिगोचर होता था।
चिन्तन या तो भौतिक वैभव बटोरता है या फिर स्वर्ग मोक्ष जैसी महत्वाकाँक्षाओं को संजोता है। सतयुग की यही विशेषता थी कि तब न तो सामूहिकता इस सीमा तक विकसित हुई थी कि किन्हीं समस्याओं को सुलझाने की आवश्यकता पड़े और न व्यक्ति ही स्तर के थे कि जिनके पास सज्जनता, सम्पन्नता की कमी हो। ऐसी दशा में उन दिनों पशु वर्ग के लिए आवश्यक सेवा सहायता के संबंध में भी विचार नहीं करना पड़ता था और न मनुष्यों में कोई पिशाच वर्ग के ऐसे दुष्ट, भ्रष्ट ही होते थे, जो मर्यादाओं की उपेक्षा, वर्जनाओं की अवहेलना करें। ऐसी दशा में प्रतिरोध, संघर्ष करने और प्रताड़ना देने प्रतिबंध लगाने की भी योजना नहीं बनानी पड़ती थी। दोनों ही प्रकार के आपत्तिकाल सामने नहीं आते थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-February
चिन्तन का उद्यान उगाया जा सकता है और शरीर द्वारा ऐसी जीवनचर्या का निर्धारण किया जा सकता है। जिसमें गुण कर्म, स्वभाव की आदर्शवादिता पग-पग पर दृष्टिगोचर होने लगे। गुलाब खिलता है तो उसकी महक चारों और फैलती है। चन्दन अपने समीपवर्ती झाड़-झंखाड़ को भी सुगंधित बना लेता है। इन तथ्यों को जो भी समझ सके वह अपने को सुधारे-समीपवर्ती तो अनायास ही सुधरता चला जाएगा।
चिन्तन और वातावरण है। इन दिनों में ही मानवी गरिमा का प्रवेश होगा और लोभ लिप्सा का, अमीरी ठाट बाट का वर्तमान रवैया उपहासास्पद बन जायेगा और निन्दनीय भी। तब कोई इस जोखिम भरे झंझट में हाथ डालकर आग में झुलस मरने जैसी हरकत क्यों करेगा? जब वसुधैव कुटुम्बकम् और आत्मवत् सर्वभूतेषु का दर्शन अन्तःकरणों में गहराई तक प्रवेश करेगा तो कोई कारण नहीं कि स्वार्थों का टकराव समाप्त न हो और मिलजुल कर सुख से रहने और चैन से रहने की नीति हर किसी के द्वारा न अपनाई जाय।
चिन्तन का अविच्छिन्न युग्म है। यह दोनों जब साथ-साथ रहेंगे तभी प्रसन्नता का वातावरण बनेगा। जैसे एक हाथ से ताली नहीं बजती। एक पहिए की गाड़ी दूर तक नहीं चलती, उसी प्रकार इन दोनों में से किसी एक को लेकर चल पड़ने पर अभीष्ट की उपलब्धि नहीं हो सकती और न उज्ज्वल भविष्य का आधार खड़ा किया जा सकता हैं।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार को परिष्कृत कर सके होंगे तो उनका दूसरों पर प्रभाव भी पड़ेगा और अपनी बढ़ी हुई आत्म शक्ति के सहारे ऐसा कुछ भी कर सकेंगे जिनसे विकृतियों का निराकरण और सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन संभव हो सके। यदि वे निजी स्वार्थ साधन के दलदल में पैरों से लेकर सिर तक डूबे होंगे तो फिर यह कठिन होगा कि वे उच्चस्तरीय कार्यों को कर सकने में उनके लिए आवश्यक समर्थन सहयोग जुटाने में सफल हो सके। पवित्र, प्रामाणिक, प्रखर प्रतिमाएं ही सामान्य कार्यों में सफल होती हैं और उन्हीं के लिए यह भी संभव है कि सार्वजनिक पारमार्थिक कार्यों को पूरा कर दिखायें। ओछे और घटिया व्यक्ति तो पग-पग पर असफल ही होते हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार से अवगत अभ्यस्त होने के लिए बाधित करता है।
चिन्तनतंत्र की विकृति कर लेते हैं। जिन पर फैशन का प्रदर्शन का ठाट बाट का सजधज का भूत सवार है उनका अहंकार समय और धन ही बर्बाद नहीं करता वरन् समझदारों की दृष्टि में ओछा बचकाना भी सिद्ध होता है। अपव्यय के लिए धन लुटाते रहने वाले के चरित्र पर भी अपव्यय के लिए धन लुटाते रहने वाले के चरित्र पर भी संदेह किया जाता है। मेहनत की कमाई सोच समझ कर खर्च की जाती है। एक-एक पाई को सदुपयोग की कसौटी पर कसकर खर्चा जाता है।
चिन्तन का प्रभाव चरित्र पर पड़ता है। चरित्रनिष्ठा ही नैतिकता है। नीतिवान और चरित्रवान एक ही स्थिति के दो नाम है। कर्तव्य उत्तरदायित्व का निर्वाह, सज्जनता का अवधारण, शिष्टाचार अनुशासन का परिपालन है। उसके निर्मल निष्कलंक होने पर व्यक्तित्व प्रामाणिक परिष्कृत होता है।
चिन्तन की अवाँछनीयताओं का उन्मूलन आता है। मनोविकारों की सुविस्तृत श्रृंखला इसी स्तर की होती है। जिसमें से प्रत्येक को खोजा जाना चाहिए और एक एक करके निकाल फैंकने में जुट जाना चाहिए। भय, चिन्ता, कृपणता, भीरुता, अनगढ़ महत्वाकांक्षा, ईर्ष्या, निराशा आदि ऐसी ही मानसिक विकृतियाँ हैं, जिनके रहते कोई चैन से नहीं बैठ सकता। श्मशान में प्रेम पिशाच की तरह स्वयं डरता और दूसरों को भी डराता रहता है।
चिन्तन रचनात्मक होता है। जो अपने पुरुषार्थ और प्रयत्न पर दृष्टि डालते हैं और सत्य की जीत होने के सिद्धान्त पर विश्वास करते हैं, उनके लिए यह स्वाभाविक है कि सुधरे हुए दृष्टिकोण से सोचें और सत्प्रयत्नों का सुखद परिणाम होने की बात का अनुमान लगाएं।
चिन्तन से बचते हैं और कुकर्म करने के लिए कदम नहीं बढ़ाते। हमें उस समस्त प्रचार तंत्र को एक दिशा अपनाने के लिए सहमत करना होगा, जिससे कि सभी एक स्वर वाद्य यंत्र एक लय-ताल में जबते है, जब सभी वाद्य यंत्र एक लय-ताल में रस तभी बरसता है, जब सभी वाद्य यंत्र एक लय-ताल में बजते हैं। जब सभी कंठ एक साथ उभरते है तो संगीत की सरसता बनती है। धर्म सम्प्रदाय अपने-अपने पुरातन दर्शन एवं कर्मकाण्ड अपनाये रहें पर उनमें पारस्परिक सम्मान और सद्भाव की कमी नहीं पड़नी चाहिए। उनमें से कोई न तो ईश्वर का ठेकेदार बने और न अपनी मान्यताओं को ही सच मानने का आग्रह करे।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार को आदर्शवादिता के रंग में रंगों जा रहा है या नहीं? उपार्जन और चिन्तन का अविच्छिन्न युग्म है। यह दोनों जब साथ-साथ रहेंगे तभी प्रसन्नता का वातावरण बनेगा। जैसे एक हाथ से ताली नहीं बजती। एक पहिए की गाड़ी दूर तक नहीं चलती, उसी प्रकार इन दोनों में से किसी एक को लेकर चल पड़ने पर अभीष्ट की उपलब्धि नहीं हो सकती और न उज्ज्वल भविष्य का आधार खड़ा किया जा सकता हैं।
चिन्तन होना और भविष्य के लिए कठिनाइयों के बढ़ने की आशंका करना स्वाभाविक है। जो छोटी मोटी असफलताएं भी व्यवधान उत्पन्न करती हैं, वे अदूरदर्शियों को बढ़ी बढ़ चढ़ कर प्रतीत होती हैं और उतने भर से उनकी स्थिति घबरा जाने जैसी बन जाया करती है।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार में आदर्शवादिता का समन्वय होना चाहिए। जन-जन की प्रमाणिकता प्रखरता, प्रतिभा निखरनी चाहिए। समाज में सहकारिता, उदारता और एकता समता की रीति-नीति चलनी चाहिए। सर्वत्र समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी का माहौल बनना चाहिए। सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन और दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन समग्र तत्परता और तन्मयता के साथ होना चाहिए।
चिन्तन, चरित्र ओर व्यवहार को परिष्कृत, सुव्यवस्थित करते हैं। इस दृष्टि से धर्मोपदेशक ही नहीं वरन् वे साहित्यकार, कलाकार, लोकसेवी भी पुरोहित कहे जा सकते हैं जो आदर्शवादी आस्थाओं को उभारने में अपने अपने ढंग से योगदान देते हैं।
चिन्तन एकाग्र करें। अगली शताब्दी में मनुष्य भावनाओं का धनी होगा, भले ही उसकी सम्पन्नता कम ही क्यों न हो? मिल−बांट कर खाने वाले थोड़े साधनों में भी प्रसन्नता और प्रगतिशीलता का आधार खड़ा कर लेते हैं। जबकि विपुल विभूतियाँ रहने पर भी कृपणता से घिरे हुए लोग बेचैन रहते और बेचैन करते रहते हैं। अगले दिनों सद्गुण सत्कर्म और सत्स्वभाव में अभिवृद्धि होगी।
चिन्तन की गरिमा भी साथ दे। यदि वह भटकती रही तो मात्र धन से फुलझड़ी जलाने का तमाशा भर देखा जा सकता है। कोई उपयोगी प्रयोजन सिद्ध नहीं किया जा सकता। इतना ही नहीं, दूरदर्शिता के अभाव में उसकी सुरक्षा तक कठिन है। चारे मसखरे उसका अपहरण करेंगे या ऐसे ठाट बाट का सुझाव सुझायेंगे जिसे अपनाते ही अपकीर्ति मिले ओर कंगाली चढ़ दौड़े।
चिन्तन नए विशेष ढाँचे में ढल गया है, कि प्रगति के लिए सम्पन्नता बढ़ाने भर से काम चल जायगा। वे यह भूल जाते हैं कि बढ़ी हुई सम्पन्नता का उपयोग यदि अनर्थ कृत्यों में होने लगा तो वह दरिद्रता से भी महंगी पड़ेगी। इसलिए घोड़ा खरीदते समय उसकी लगाम और जीन का भी प्रबंध करना चाहिए अन्यथा वह उच्छृंखल होकर किसी भी दिशा में धर दौड़ेगा और किसी भी खाई खड्ड में सवार को ले गिरेगा।
चिन्तन का वातावरण वे समझाकर बदल सकते हैं या प्रताड़ना देकर अथवा दोनों के समन्वय से बात बनती है। उपाय जो भी कार्यान्वित किये जायँ, पर उनका लक्ष्य यह होना चाहिए कि मानवी आदर्शवादिता को नष्ट-भ्रष्ट होने से बचाया जाय, और उसे फलने फूलने का अवसर मिलने दिया जाय। यह जिस अनुपात में बन पड़ेगा, उसी के अनुरूप प्रतिकूलताएँ अनुकूलता में बदल जायेगी। संकट के शीतकालीन हिमखण्ड गलेंगे और उसके उपरान्त बसंत का ऐसा आगमन होगा जिसमें सर्वत्र वृक्ष वनस्पतियाँ फूलती, फलती और अपनी शोभा सुषमा का प्रदर्शन परिचय प्रस्तुत करती हुई, दृष्टिगोचर होने लगे।
चिन्तन प्रवाह बनेगा। इसी के साथ चरित्र की उत्कृष्टता और व्यवहार की सज्जनता का प्रमाण परिचय मिलता है। व्यक्ति बदलेगा और समाज का स्वरूप भी ऐसा गंदला न रहेगा जैसा कि इन दिनों हैं जो परिस्थितियाँ इन दिनों कठोर बनी हुई हैं और विपन्न दीखती हैं वे तात्विक आधार बदलने पर अपना चोला साँप की केंचुली की भाँति बदल देंगी।
चिन्तन क्षेत्र को अनगढ़ता को- अवाँछनीयता को उखाड़ फेंकना बौद्धिक क्रान्ति के नाम से जाना जाता है। इन्हें सम्पन्न करना धर्मतंत्र का काम है। शासन इसके लिए कानून की छोटी मर्यादाओं में ही आँशिक रूप से किसी को प्रतिबंधित कर सकता है। अन्यथा मौलिक नागरिक अधिकारों की दुहाई देकर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में कुछ भी करते रह सकता है। इनका निराकरण आस्थाओं में आदर्शवादिता का समावेश करने से मान्यताओं की उच्चस्तरीय दार्शनिकता का समन्वय करने से ही संभव हो सकता है।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार की दृष्टि से व्यक्ति दिन-दिन गिरता और छोटा होता जा रहा है। भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों में उसे संकटों का सामना करना पड़ रहा है।
चिन्तन हैं। एक ऊपर से थोपने के दूसरे भीतर से उगाने के। दोनों में से पहला बे जड़ का है और दूसरा चिर-स्थायी।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की उत्कृष्टता का जहाँ तक संबंध है वहाँ तक वह एकता, एकरूपता, समता और सद्भावना का प्रतीक प्रतिनिधि ही होना चाहिए।
चिन्तन और समर्थ पराक्रम का प्रतिफल है। इजराइल का उदाहरण सामने है। बेतुके रेगिस्तान में रहकर भी चारों और से विरोधियों के बीच रहता हुआ भी अपने अस्तित्व की रक्षा कर रहा हैं इसे उसकी आन्तरिक दृढ़ता ही कहना चाहिए।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश होगा और जीवनचर्या के साथ सादगी सहकारिता का अंश बढ़ता चला जायगा। यही वास्तविकता है। भविष्य कथन वे ही सार्थक माने जायेंगे जो आविष्कारों और सुविधा साधनों की बात करें और मानवी सज्जनता और सुव्यवस्था की संभावना पर अधिक चिन्तन एकाग्र करें। अगली शताब्दी में मनुष्य भावनाओं का धनी होगा, भले ही उसकी सम्पन्नता कम ही क्यों न हो? मिल−बांट कर खाने वाले थोड़े साधनों में भी प्रसन्नता और प्रगतिशीलता का आधार खड़ा कर लेते हैं।
चिन्तन बहुत करके धर्म सम्प्रदाय से प्रभावित पाया जाता है। इसलिए उस उद्गम को सही और स्वच्छ ही रखा जाना चाहिए। जिससे कि प्यास बुझाने वाले निर्झर निसृत होते हैं। उद्गम में कहीं से विषैलापन घुस पड़े तो समूची जल धारा दूषित पड़ने लगेगी उसका उपयोग करने वाले गंदगी एवं रुग्णता से घिरेंगे। धर्मों के बीच खाई नहीं पड़नी चाहिए उन्हें अपने पृथक् पहचान बनाये हरते हुए भी इस संदर्भ में एक ही रीति - नीति अपनानी चाहिए कि वे अपने प्रभाव क्षेत्र में उन सिद्धान्तों को सर्वोपरि स्थान देंगे जो मानवी मर्यादाओं के अनुरूप है उसे चरित्रवान एवं समाजनिष्ठ बनाने की दृष्टि से कारगर सिद्ध होते हैं।
चिन्तन को नये सिरे से सोचने की सामग्री दी। यह दोनों ही उत्साहवर्धक रहे और आश्चर्यचकित करने वाले भी। किन्तु जिस प्रकार दीपक तले अँधेरा और उसके धुएँ में कालिख पाई जाती है, उसी प्रकार आधुनिक उपलब्धियों के साथ-साथ कुछ ऐसा भी घुला रहा जिसे अवाँछनीय एवं अनुपयुक्त भी कहा जा सकें।
चिन्तन क्षमता उत्कृष्ट स्तर की होनी चाहिए। समाज का ढाँचा सुसम्पन्नता और सुसंस्कारिता से भरा पूरा तभी हो सकता है कि उसके प्रचलन नीतिमत्ता पर अवलम्बित हों। यह मूर्धन्यों का काम है कि चिन्तन का वातावरण वे समझाकर बदल सकते हैं या प्रताड़ना देकर अथवा दोनों के समन्वय से बात बनती है। उपाय जो भी कार्यान्वित किये जायँ, पर उनका लक्ष्य यह होना चाहिए कि मानवी आदर्शवादिता को नष्ट-भ्रष्ट होने से बचाया जाय, और उसे फलने फूलने का अवसर मिलने दिया जाय। यह जिस अनुपात में बन पड़ेगा, उसी के अनुरूप प्रतिकूलताएँ अनुकूलता में बदल जायेगी।
चिन्तन प्रधान है। चरित्र उसी आधार पर बनता है। व्यक्तित्व का गया गुजरा स्तर ही ऐसी रीति नीति अपनाता है, जिसमें बोये हुए विषवृक्ष के कड़ुवे फल खाने पड़ें, उगाई हुई नागफनी के काँटे पैरों में गड़ने लगें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-November
चिन्तन एवं स्वभाव पर असर पड़ता है। इसलिए शिक्षा तथा परम्परा के क्षेत्र में कुछ ऐसा समावेश होना चाहिए जिसके प्रभाव से आज का मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक बुद्धि, साहसी और सद्गुणी हो सके।
चिन्तन किया जाय तो यह तथ्य सामने आता है कि इन्द्रियों के द्वारा संसार की जो प्रतीति हो रही है, यथार्थता उससे अलग है। इन्द्रियों के द्वारा मस्तिष्क को होने वाली अनुभूतियाँ तभी सही हो सकती हैं, जबकि इन्द्रियों में यथार्थ स्वरूप के बोध कराने क्षमता हो।
चिन्तन करते रहने की योजनाएँ बनाते रहने की और क्रियान्वित करने के लिये कोई अवसर हाथ से न जाने देने की चेष्टा करनी पड़ती है। यह तत्परता ही फलवती होती है।
चिन्तन क्षेत्र में एक नए आयाम का विकास हो रहा है। अब यह अधिक स्पष्ट होता जा रहा है कि पदार्थ और अंतरिक्षीय ऊर्जा वास्तव में एक ही तत्व हैं इनका उद्गम स्रोत एक ही है।
चिन्तन की प्रगति धीरे-धीरे होती है। वृक्ष धीरे-धीरे बढ़ते हैं। पर यदि उन्हें काटना हो तो कुछ घंटों के प्रयास से ही उन्हें धराशायी किया जा सकता है। कुविचार कुकुरमुत्तों की तरह कहीं भी कूड़े करकट के ढेर में उग आते हैं, किन्तु फलदार वृक्ष उगाने के लिये खाद पानी देने और निराई गुड़ाई से लेकर रखवाली तक का प्रबन्ध करना पड़ता है। सद्विचारों की स्थिति भी ऐसी ही है।
चिन्तन में इतना खोए रहते थे कि आस पास की उन्हें खबर ही नहीं रहती थी। एक बार घूम कर आए तो छड़ी को कमरे के कोने में रखकर स्वयं लेटने के स्थान पर छड़ी को बिस्तर पर लिटा दिया व विचारों में खोये स्वयं छड़ी के स्थान पर कोने में खड़े हो गए। उन्हें यहाँ पागल नहीं कहा जा रहा। विचार शृंखला की जटिलता का परिचय दिया जा रहा है। हो सकता है, इंग्लैण्ड क इन तीनों पागलों में मैनुहिन जैसा वयलिन वादक, पिकासो जैसा चित्रकार या रामानुजन् जैसा गणितज्ञ छिपा पड़ा हो।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के बहुमुखी पक्षों में आदर्शवादिता का प्रवेश। यह कार्य अति कठिन है। अन्तराल का कायाकल्प करने एवं सर्जरी के समान है। इसमें भावनाओं मान्यताओं, संवेदनाओं, आकांक्षाओं के अनेकानेक पक्षों स्तरों में नव चेतना का संचार एवं इसी हेतु उसमें कितने ही तर्कों, प्रमाणों और उदाहरणों का समावेश करना होता है। इस संग्रह के लिए मनन और अध्ययन-अवगाहन के मानसरोवर में उतर कर हंसों की तरह मोती बीनने पड़ते हैं।
चिन्तन मनन और अध्ययन अवगाहन में संलग्न व्यक्ति बहिरंग व्यवस्था बना सकने में अवकाश उपलब्ध करते हैं और उससे प्रचार तंत्र संभाल सकना संभव ही होता है। फिर पाँच सौ से आरम्भ होने वाला तंत्र अढ़ाई लाख ग्राहकों और पच्चीस लाख पाठकों समेत लगभग सत्ताईस लाख जितना कैसे बन गया? उसकी प्रेरणाओं ने वंशवृद्धि की तरह किस प्रकार लाखों करोड़ों की विचारणा और दिशाधारा में किस प्रकार कायाकल्प जैसा चमत्कार उत्पन्न किया? इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक ही है- इस सोमपान की रसास्वादन जिनने किया, उनने उस महाप्रसाद से अन्यान्यों को भी उपलब्ध कराने का प्राणपण से प्रयत्न किया। यही है मिशन के विकास में महती भूमिका संपन्न करने वाली प्रक्रिया।
चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश एवं चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के बहुमुखी पक्षों में आदर्शवादिता का प्रवेश। यह कार्य अति कठिन है। अन्तराल का कायाकल्प करने एवं सर्जरी के समान है। इसमें भावनाओं मान्यताओं, संवेदनाओं, आकांक्षाओं के अनेकानेक पक्षों स्तरों में नव चेतना का संचार एवं इसी हेतु उसमें कितने ही तर्कों, प्रमाणों और उदाहरणों का समावेश करना होता है। इस संग्रह के लिए मनन और अध्ययन-अवगाहन के मानसरोवर में उतर कर हंसों की तरह मोती बीनने पड़ते हैं।
चिन्तन और दुष्ट आचरण का ही बाहुल्य दीखता है। प्रथम अतिक्रमण करने वाले नफे में रहता है। इस नीति के अनुसार अनाचारी जिन्हें प्रचुर मात्रा में और जल्दी सफलता मिलती है, अधिक आकर्षित करते हैं। उस प्रभाव से प्रभावित साधारण लोग भी वही नीति अपनाने लगते हैं। इस प्रकार अनाचारियों का समुदाय बढ़ता ही जाता है।
चिन्तन करते है। और जो पढ़ा समझा है, उसे जीवनचर्या में उतारने का सामर्थ्य भर प्रयत्न करते हैं।
चिन्तन के लिए प्रामाणिक समाधान प्रस्तुत किये जायँ, अन्यथा नास्तिकता, अनैतिकता के क्षेत्र में अराजकता उत्पन्न होने का भय है। यदि इतना न बन पड़ा तो नैतिक मूल्यों का तेजी से ह्रास होगा। मानवी मर्यादाओं का निर्बाध उल्लंघन होगा। वह अनुशासन बुरी तरह टूट रहा है। उच्छृंखलता, पतन पराभव के शिखर पर चढ़ दौड़ने के लिए आतुर हो रही है फिर जब उसे कोई तत्वदर्शन अनुशासन में बाँधने के लिए सुधारने के लिए विद्यमान न रहेगा, तो जो स्थिति उत्पन्न होगी उससे ईश्वर ही रक्षा कर सकता है।
चिन्तन और मनन भी है। विशुद्ध तक और तथ्य के आधार पर भी यह सिद्ध किया जा सकता है कि पवित्रता और प्रखरता यह दो अवलंबन ऐसे है, जिनसे प्रामाणिकता उभरती है।
चिन्तन करने पर पता चलता है कि पारस्परिक स्नेह सहयोग सहलाकर की अमृत वर्षों से सिंचित होने के कारण ही मानव जाति का यह उत्कर्ष सम्भव हो सका।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-October
चिन्तन चरित्र और व्यवहार विकसित करता है जिसे महामानव स्तर का देवात्माओं जैसा कहा जा सकें।
चिन्तन के दौरान कई ऐसे नये विचार और तथ्य अपने आप सूझ पड़ते हैं, जिनकी आशा भी नहीं की थी, पर अनायास मस्तिष्क में कौंध जाते हैं। वस्तुतः यह विचार तरंगें सूक्ष्म जगत से ही अवतरित होती है, स्थूल विश्व से इनका कोई सम्बन्ध नहीं होता, ऐसी सूक्ष्म तरंगें अदृश्य लोक में निरन्तर प्रवाहित होती रहती है। आवश्यकता उन्हें प्रकरण करने की है। पर यह उन्हीं की पकड़ में आती है जो अपने जीवनक्रम को शुद्ध, सात्विक बनाकर अपने चरित्र चिन्तन व्यवहार को परिष्कृत कर लेते हैं। ऐसे ही लोग इनका स्वयं लाभ उठाते और दूसरों को भी लाभान्वित करते देखे जाते हैं।
चिन्तन और कार्य के घिनौनेपन का समावेश होने दो। आत्माओं के समूह का ही परमात्मा-कहते हैं। भजन का अर्थ-सेवा है। पूजा अर्चा भी सेवा को ही कहते हैं और आराधना भी वही है समष्टि की सेवा में संलग्न रहना ही ईश्वर भक्ति का परमात्मा की आराधन का वास्तविक स्वरूप है। यहाँ यह और भी समझ लेना चाहिए कि सुख साधन की वृद्धि ही वैभव, को अनाचार से भी कमाया जा सकता है और उससे कुटुम्बियों मित्रों के सुख साधन भी बढ़ाये जा सकते हैं।
चिन्तन की उत्कृष्टता, चरित्र की आदर्शवादिता और व्यवहार की परमार्थ परायणता का समावेश करना पड़ता है। अन्न, जल और वायु बिना जिस प्रकार जीवन संभव नहीं उसी प्रकार इन तीनों के बिना महानता सधती नहीं और जिसे महानता का अवलम्बन न मिले उसे आत्म संतोष, लोक सम्मान और देवी अनुग्रह की प्राप्ति नहीं होती। इसलिए उपरोक्त त्रिविध समन्वय को आधार मान कर चलना चाहिए। उत्कर्ष की आकांशा सभी को होती है। साँसारिक वैभव कमाने वालों को जिस प्रकार कृषि व्यापार आदि उद्योग अपनाने होते हैं, उसी प्रकार आत्मोत्कर्ष के लिए उस प्रक्रिया को जीवन में धारण करना पड़ता है जिसे हर दृष्टि से सही पाया जा सके।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ऊँचे दर्जे का होता है। जिनकी प्राण-विद्युत साधना प्रयोगों द्वारा बढ़ाकर ऊँची स्थिति में पहुँचायी गयी होती है।
चिन्तन करना चाहिए, जिसमें कहा गया है कि मनुष्य को परमात्मा में आत्म सता को समर्पित करके अपनी स्थिति अद्वैतवत् बनानी चाहिए। अपने गुण, कर्म, स्वभाव में से दोष दुर्गुणों का पूरी तरह निष्कासन करना चाहिएं परमेश्वर श्रेष्ठताओं का समुच्चय है। हमें वैसा ही बनना चाहिए। भीतर से भी और बाहर से भी।
चिन्तन व्यवहार को परिष्कृत कर लेते हैं। ऐसे ही लोग इनका स्वयं लाभ उठाते और दूसरों को भी लाभान्वित करते देखे जाते हैं।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में जिन लोगों ने अनैतिकता भर रखी है, उनका प्रभाव भोजन पकाने और परोसने के माध्यम से भी ग्रहण करने वालों को प्रभावित कर सकता है। जिन होटलों में एक का प्रभाव दूसरे तक न पहुंचने देने के लिए उपयुक्त सावधानी नहीं बरती जाती, समुचित स्वच्छता नहीं रखी जाती, वहाँ का आहार भी साधना मार्ग पर चलने वालों के लिए विघ्न ही सिद्ध होता है। इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए आहार ही सिद्ध होता है। इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए आहार शुद्धि के सम्बन्ध में सर्वप्रथम ध्यान दिया जाना चाहिए।
चिन्तन भी परिष्कृत स्तर पर होना चाहिए। अभक्ष्य खाने वाले, बहुभक्षी, नशे वाले, व्यभिचारी, दुराचारी स्तर के व्यक्ति प्रायः उपयुक्त साधना विधान अपनाने पर भी असफल रहते देखे गये हैं। उनकी विद्रूप मानसिकता एवं उच्छृंखलता क्रियाशीलता यदि रुके नहीं तो मलीनता की मात्रा एवं इतनी अधिक संचित होती जाती है, जो साधना के स्वल्प प्रयास को भी अपने तूफानी झोंके में उड़ा ले जाय। इसलिए मंत्र योगी को आहार विहार की सात्विकता संयमशीलता बनाये रहने के लिए विज्ञजन दबाव या निर्देश करते रहे हैं विशेषतया आहार की सात्विकता बढ़ाने और मात्रा घटाने के के पलिए। भूख से कुछ कम और नियत समय पर सात्विक आहार करने से भी उपवास का काम चलाऊ उद्देश्य पूरा हो जाता है।
चिन्तन किया हो, आचरणों में भावनाओं में उत्कृष्टताओं का भरपूर समावेश रखा हो साथ ही साधना विधान के हर पक्ष को भली भाँति समझा हो। ऐसे मार्गदर्शकों के अभाव में साधक के सामने यह कठिनाई आती है कि वह स्थूल शरीर के परिमार्जन हेतु मंत्र साधना का उपयोग किस प्रकार करे? द्विविधा से किस प्रकार मुक्ति पाये? सरल और सीधे मार्ग पर किस प्रकार चल सकें?
चिन्तन लगा हो तो आँख के आगे से कोई चीज गुजर जाने पर भी वह दिखाई नहीं देती। बहुत सूक्ष्म वस्तुएँ भी कहाँ दिखाई देती है? परमाणु या रोग के कीटाणु बिना सूक्ष्मदर्शी यंत्र के दीखते नहीं। किसी पर्दे की आड़ में रखी हुई, सन्दूक आदि में बंद की हुई, जमीन में गढ़ी हुई वस्तुओं को भी आंखें कहाँ देख पाती है? सूर्य के प्रकाश के कारण दिन में तारे नहीं दिखते।
चिन्तन-तंत्र और जीवन क्रम बदलने का अभियान आरम्भ किया, जिसमें उसे काफी सफलता मिली तथा देश की स्थिति में भी उत्तरोत्तर सुधार होता चला गया।
चिन्तन चरित्र और व्यवहारों को आदर्शों से घुला, मिला रखता है तो आत्म निर्माण से संसार का उतना नव निर्माण अनायास ही हो जाता है। परिवार व्यक्तियों का समुदाय ही तो समाज है।, जितने व्यक्ति चरित्र व निष्ठा की कसौटी पर खरे उतरते हैं, समझना चाहिए उतने अंश में इस धरती पर स्वर्ग उतरने का ठेस सफल प्रयत्न किया गया।
चिन्तन से दूर रहने का एक ही उपाय है कि मनुष्य हर समय मृत्यु सामने खड़ी होने का विचार करता रहे, और जीवन के एक एक क्षण का सदुपयोग करने की बात सोचे।
चिन्तन भी उपयुक्त स्थिति में रहे और अनुकूलता उत्पन्न करने में योगदान करें।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालने की जिम्मेदारी उसकी की है। संयम बरतने और बचत को परमार्थ प्रयोजन में लगाने की शिक्षा, प्रेरणा उसी के तत्व दर्शन से उपलब्ध होती है। अन्तराल को परिष्कृत करना धर्म का काम है और भौतिक क्षेत्र की सुविधाएँ जुटाना, वैभव परक प्रगति का सरंजाम जुटाना राजतंत्र का। दोनों मिलकर ही एक दूसरे के पूरक बनते हैं। इस संयोग सुयोग से ही समग्रता बनती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-January
चिन्तन और चरित्र पर आश्रित व्यक्तित्व उज्ज्वल न हो उसमें वीभत्स स्तर की निकृष्टता भरी हो तो रहस्यमयी शक्तियों के उपार्जन कर लेने पर मनुष्य मदोन्मत्त हो जाता है और ऐसे कुकृत्य करने लगता है जिससे उसकी गणना राक्षस, असुर दैत्य वर्ग होती है। धन, बल, वैभव पराक्रम आदि शक्तियों का यदि सदुपयोग न हो तो वे संचित नहीं रह सकती, कुमार्ग में चल पड़ती है। अंगूर सड़ने पर मदिरा बन सकता है। इसी प्रकार रहस्यमयी आन्तरिक शक्तियों का विकास हो तो किन्तु सत्प्रयोजनों में न लग सके तो फिर दूसरा विकल्प दुरुपयोग ही रह जाता है। अध्यात्म का योगपरक दक्षिणमार्गी।
चिन्तन के स्तर में निखार इसी शक्ति पर निर्भर है। कुण्डलिनी योग इसी सुयोग संयोग की व्यवस्था के निमित्त की जाने वाली साधना है।
चिन्तन कोशिकाएं ज्ञान तन्तुओं के लिए संवेदनशील बनती है। प्रतिभा पराक्रम एवं विवेक का जागरण इन्हीं कोशिकाएँ की स्फुरणा का परिणाम है।
चिन्तन और कर्तृत्व विराट के लिए ही हो सकता है। उसकी अभिरुचि विश्व वाटिका को फला-फूला देखने की ही ओर केन्द्रित हो जाती हैं
चिन्तन आकाश पाताल चूमता रहता है और क्रिया में भी अतिवाद अपनाने की ललक छाई रहती है। व्यभिचारी की मानसिक तृप्ति नहीं होती, शरीर थक जाता है, पर मन विभिन्नता और अतिवाद की रट लगाये ही रहता है। यह बात अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में भी है। मन ग्यारहवीं इन्द्रिय है। उसके तीन स्वाद है।
चिन्तन को ही दिशा देनी पड़ती है। प्रत्यक्ष में क्रियायोग जैसी शारीरिक हलचलों की आवश्यकता नहीं पड़ती।
चिन्तन को उत्कृष्टता के साथ जोड़ना पड़ता है। ध्यान के अनेक पक्ष है। वे सभी अन्तरंगयोग के अंतर्गत आते हैं।
चिन्तन और चरित्र को भी परिमार्जित करना होता है। यह प्रारम्भिक शर्त है जिसे पूरा किया जाना चाहिए।
चिन्तन के आत्म निर्माण करने वाले तरीके भी हो सकते हैं मनःस्थिति भी परिस्थिति बनाती हैं पर आध्यात्मिक उपचारों में ऐसी प्रतिभा प्राप्त करने के लिए प्राणायाम प्राणाकर्षण जैसे उपचार भी है। उन उपचारों में सबसे ऊँची प्रक्रिया कुण्डलिनी जागरण की है। इस सूर्योपासना के माध्यम से भी संपन्न किया जा सकता है। सूर्य को भौतिक ऊर्जा का स्रोत मानना अपर्याप्त होगा आत्मिकी के सिद्धान्त उसे परब्रह्म का दृश्यमान स्वरूप भी मानते हैं और उसे गर्मी रोशनी का ग्रह गोलक भर न मानकर अन्तरात्मा में अंतःकरण में और उसके प्रत्येक स्फुल्लिंग में जीवट का अभिनव संचारकर्ता भी मानते हैं। वस्तुतः वह है भी ऐसा ही सविता की तेजस्विता यदि साधना तपश्चर्या सघन श्रद्धा एवं प्रबल इच्छा शक्ति के सहारे धारण की जाय तो साधक को निराश न होना पड़ेगा।
चिन्तन एवं जीवन्मुक्ति हेतु साधना पुरुषार्थ गायत्री साधना की फल श्रुतियाँ है। कुण्डलिनी जागरण से शरीरगत प्राण ऊर्जा की प्रसुप्ति उपक्रम सावित्री साधना के अंतर्गत आता है। बिजली के ऋण व धन दोनों ही धाराएँ होती है। दोनों के मिलने पर ही शक्ति प्रवाह बहता है। गायत्री व सावित्री के समन्वय से ही साधना की समग्र आवश्यकता पूरी होती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-September
चिन्तन का अवसर मिलता है वही दूसरी और वे नये आविष्कारों के श्रेयाधिकारी बनते हैं। वस्तुतः अविज्ञात का भण्डार अत्यन्त विराट एवं अपरिमित है। इसमें डुबकी लगा कर अन्तर्मुखी होकर बहुमूल्य मणिमुक्तक खोज निकाले जा सकते हैं महत्वपूर्ण आविष्कारों का इतिहास इन्हीं संभावनाओं को उजागर करता है।
चिन्तन को सद्गुणों में बदलते हैं और सद्गुणों के लिए चिरस्थायी सम्मान एवं सहयोग सुरक्षित रहता है। सही निर्णय सही स्वभाव, सही आचरण यही शृंखला अनेकानेक सफलताओं का आधारभूत कारण बनती है। जो इस तथ्य को नहीं समझते वे विचार तंत्र को उच्छृंखलता के खाई खन्दकों में भटकने देते हैं। फलस्वरूप उनका व्यक्तित्व अवाँछनीय हेय स्तर का बन जाता है। पग-पग पर ठोकरें लगती हैं।
चिन्तन और आदर्श चरित्र की महती आवश्यकता रहती है। अधकचरे विज्ञान की मान्यताएँ उस उत्कृष्टता की जड़ें काटती है, जिनके सहारे मनुष्य श्रेष्ठ बनता और दूसरों को श्रेष्ठ बनाता है, स्वयं उठता और दूसरों को उठाता है।
चिन्तन में, चरित्र में, व्यवहार में आदर्शवादी उत्कृष्टता का समावेश। जीवन-क्रम में जितनी शालीनता भर चले तो समझना चाहिए कि उससे उतनी ही सार्थक भक्ति भावना सध नहीं है।
चिन्तन-चरित्र और व्यवहार में इस प्रकार जड़ें जमा लेती हैं जिन्हें सहज ही छुड़ा सकना कठिन पड़ता है। चिपकी हुई जोंक पेट भर कर खून पी लेने पर ही छूटती है। भले ही खींचने पर वह टूट क्यों न जाय। दुष्प्रवृत्तियों का बुरी आदतों का स्वरूप भी प्रायः ऐसा ही है। समझाने बुझाने से तो वे मानती भी नहीं उनके लिए तब तितीक्षा स्तर का कदम उठाने की आवश्यकता पड़ती है और अपने अन्दर वाले भगवान और शैतान के बीच खड़े किये गये इस महाभारत में स्वयं दर्शक मात्र न रहकर अर्जुन की तरह गाण्डीव सधाने की और हस्त की प्रकृष्टता अपनानी पड़ती है जिसे सारा मैदान तीरों से तापे दिया जाय।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार रखने वाले सर्वत्र सम्मान और स्नेह-सहयोग अर्जित करते तथा अन्तरंग-बहिरंग दोनों ही दृष्टि से समुन्नत स्थिति प्राप्त करते हैं। यह व्यवस्था पूरे समाज में गतिशील होते हुए यह स्पष्ट मानना पड़ता है कि चेतना के स्तर के साथ ही जीवन के उत्थान-पतन के अनेकों सूत्र जुड़े हुए हैं।
चिन्तन और चरित्र के शालीनता से समन्वित करना, आत्मा परिशोधन में निरत रहना आध्यात्मिकता और कर्तव्यों के परिपालन में कटिबद्ध रहना, धार्मिकता इन तीनों को अपनाये रहने वाला ही सच्चा आध्यात्मवादी और सफल साधक होता है।
चिन्तन चलता रहे तो स्वभाव में ऐसी आदतें सम्मिलित नहीं हो पातीं जो स्वास्थ्य बिगाड़े, मस्तिष्क को तनावग्रस्त रखें। बेतुके आचरण अपनाने और व्यवहार कुशलता के अभाव में जिसे असह्य विग्रह का सामना करना पड़ता है, उस प्रकार का त्रास सहना पड़े।
चिन्तन के उपरान्त उनने निष्कर्ष निकाला कि पृथ्वी में निश्चित रूप से किसी न किसी प्रकार की आकर्षण शक्ति है जो वस्तुओं को अपनी और खींचती है। कालान्तर में यही शक्ति पृथ्वी की “गुरुत्वाकर्षण शक्ति” कहलायी और यह प्रसिद्ध सिद्धान्त “गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त” के नाम से जाना गया अब इसी सिद्धान्त का प्रयोग कर बड़ी-बड़ी भौतिक एक खगोलीय गणनाएं की जाती है।
चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश करे। वाणी को सरस्वती का प्रतीक माना गया है, उसकी गरिमा इसी में है कि भटकाव को रोके और उत्कर्ष मार्ग पर चलने की प्रेरणा भरे। पर देखा जाता है कि यह कर्तव्य भी उससे निभ नहीं पा रहा है। वाचालता अब मिथ्याचार की प्रतिनिधि बन गई है। छल, प्रपंच में फँसाने, दुर्व्यसनों की ओर धकेलने और भ्रान्तियाँ फैलाने का मिथ्याचार ही उससे बन पड़ता है, देखा जाता है जो जितना मुखर है वह उतना ही अधिक लोगों को बरगलाता, फुसलाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-June
चिन्तन में रस प्राप्त होने लगता है। उसके हृदय में दैवी विचारों का राज्य हो जाता है। “सब देवों का देव मेरे हृदय में विराजमान है” यह भाव जमते ही वह जगत की तुच्छता को समझ जाता है।
चिन्तन और मनन करके तथा अपने मस्तिष्क को उसी दिशा में लगाये रहने से भी आत्म सत्संग होता है जो आत्मोन्नति के लिए अति आवश्यक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-November
चिन्तन की आवश्यकता है।
चिन्तन होता है। मरते समय मनुष्य दूर रहने वाले अपने प्रियजन का बड़ी एकाग्रता से चिंतन करता है। देखा गया है कि जिस व्यक्ति के बारे में मनुष्य ऐसा सोचता है वह उद्विग्नमन हो गया है। या तो उसे जाग्रत अवस्था में ही उसका स्मरण आने लगता अथवा वह उसके विषय में स्वप्न देखने लगता है। इस प्रकार के कितने ही स्वप्न सत्य होते पाये गये हैं।
चिन्तन करे और जो विचार उस समय उसके मन में उठें उन्हें ध्यान में रखे। यह देखना कि विचार उस व्यक्ति की धारणाओं को व्यक्त करते हैं। जो व्यक्ति हमसे वास्तविक प्रेम करता है उसके विषय में चिन्तन करते ही हमारे हृदय में प्रेमोदगार उदय होने लगता है और जो व्यक्ति हमें नहीं चाहता उसके विषय में सोचते ही मन में क्षोभ उत्पन्न होने लगता है। इस प्रेमोदगार और क्षोभ को भली भाँति समझने से दूसरे व्यक्ति के हृदय की स्थिति तथा उसकी अपने प्रति धारणा का पता चल सकता है।
चिन्तन करने से बदल जाते हैं। उसके आत्म भर्त्सना के भाव भी विनष्ट हो जाते है और आशा का संचार हो जाता है। मन के आशान्वित होने पर रोग का नष्ट होना अनिवार्य है।
चिन्तन करना और उसकी सेवा करना लाभदायक होता है। निःस्वार्थ सेवा करने से रोगी के हृदय पर चिकित्सक का अधिकार हो जाता है और उसके विचार फिर बदल देना सरल हो जाता है।
चिन्तन उत्पन्न करने वाली वृत्ति तमोगुणी है। आसुरी वृत्ति का निष्कासन प्रारम्भ कीजिए। ईर्ष्या, द्वेष तथा क्रोध को अन्तःकरण से बहिर्गत कर दीजिए। मनुष्य जब तक अपने आपको पार्थिव शरीर मानता है, तभी तक वह सात्विकता और पवित्रता से दूर रहता है। आसुरी वृत्ति की प्रधानता से दूसरों के प्रति पवित्रता से दूर रहता है।
चिन्तन करते ही हमारे हृदय में प्रेमोदगार उदय होने लगता है और जो व्यक्ति हमें नहीं चाहता उसके विषय में सोचते ही मन में क्षोभ उत्पन्न होने लगता है। इस प्रेमोदगार और क्षोभ को भली भाँति समझने से दूसरे व्यक्ति के हृदय की स्थिति तथा उसकी अपने प्रति धारणा का पता चल सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-May
चिन्तन किया जाय।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-September
चिन्तन या भक्ति के द्वारा हटा दो तो आपको ईश्वर का दर्शन हो जायगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-August
चिन्तन करता है तो वह सचाई का मार्ग ग्रहण करता है। जो मनुष्य अपने आपके प्रति सतर्क है, वह जब भी सच्चे मार्ग से विचलित होता है तो वह अपनी त्रुटि को तुरन्त समझ जाता है और उसे उस भूल को सुधारे बिना चैन नहीं मिलता। प्रत्येक मनुष्य संसार को धोखा भले ही देता हो वह अपने आपको धोखा नहीं दे सकता, दुराचारी का आत्मा उसे सदा कोसता रहता है। यदि दुराचारी मनुष्य अपने दुराचार को नहीं छोड़ता तो धीरे-धीरे वह एक ऐसी स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ से मुक्त होना असम्भव हो जाता है। उसका एक-न-एक दिन विनाश निश्चित है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-October
चिन्तनीय स्थलों में सहायता की है। अनेक बार हम गहराई से न सोचने के कारण या दूरदृष्टि के अभाव में ऐसी बातों की चिन्ता में फस जाते है, जिन्हें हम भूलना चाहते हैं और जिनसे हम घृणा करते हैं। हम इस संसार में तीस-चालीस वर्ष और मजा लूटेंगे। हमारी ये छोटी-छोटी क्षुद्र चिंताएं काल के प्रवाह में स्वयं विलुप्त हो जायेंगी। हम क्यों जीवन के बहुमूल्य क्षण छोटे-छोटे चिन्ता उत्पन्न करने वाले कार्यों की बातें सोच-सोच कर क्यों बरबाद करें?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-April
चिन्तन और व्यवहार करने से जगत् आनन्दमय दीखने लगता है। निर्लिप्तावस्था में ही मनः शान्ति स्थिर रह सकती है। उठिए, अपनी आत्मा के बन्धनों को काट डालिये।
चिन्तन करता हूँ, जिन्होंने आज से 25 शताब्दी पहले हिन्दुस्तान के लोगों को वह महान् संदेश—’द्वेष को सहानुभूति और निःस्वार्थता से जीतो’—दिया था।
चिन्तन के लिये जपादि नित्य धर्मों का अक्षरशः पालन करते हुए, आप अपने जीवन के सभी कार्यों को यथोचित-रीत्या करते रहें और किसी को दुःख और क्लेश न दें तो आप सहसा एक दिन अनुभव करेंगे कि सदाचार आपके जीवन का अभिन्न अंग हो गया है और आपके आचरण में व्याप्त हो गया है, जिसके अतिरिक्त आप किसी प्रकार के अन्य भौतिक आचरण को श्रेयस्कर नहीं समझते। जिस तरह फिटकिरी धीरे-धीरे आश्चर्यपूर्ण आचरण से जल में मिल जाती है, उसी प्रकार आपका जीवन भी जप और कीर्तन और ईश्वर-प्रेम में धीरे-धीरे आश्चर्यपूर्ण आचरण द्वारा समाधिस्थ होता जायगा और आप काम करते हुए, भोजन करते हुये तथा संसार के प्रापचिक कार्यों को करते हुए भी अपने सदाचरण से विचलित नहीं हो पायेंगे। परन्तु ईश्वर भावना का परित्याग कर, यदि केवल मात्र लौकिक-सामाजिक व्यवहारों का पालन करोगे तो यह सीमित और अस्थायी ही रह जायगा और आप उसमें शाश्वत-जीवन संचरित कर ही नहीं पायेंगे। कभी-कभी तो आप उकता कर, अपनी सदाचरण की निष्ठा को तिलाँजलि भी दे देंगे। यह कोई असम्भव नहीं इसके कई उदाहरण आपको मिलते रहते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-March
चिन्तन करने से मुक्त करना ही उसे कमजोरी से छुटाने का पहला उपाय है। अतएव मित्र ने उसकी सिगरेट की आदत पर कोई बातचीत नहीं की। कुछ दिनों बाद उसने एक लड़के की उसकी अभिभावकता में रख दिया। इस लड़के को सिगरेट पीने की आदत थी। मित्र ने इसकी आदत के विषय में कुछ भी चर्चा नहीं की थी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-January
चिन्तन और विचार की धारा को बल मिलता है। बड़े बड़े उपदेश, व्याख्यान, भाषण आदि का समाज पर प्रभाव अवश्य पड़ता है, किन्तु वह क्षणिक होता है। किसी भी भावी क्रान्ति सुधार रचनात्मक कार्यक्रम के लिये प्रारम्भ में विचार ही देने पड़ते हैं। किन्तु सक्रियता और व्यवहार का संस्पर्श पाये बिना उनका स्थायी और मूर्तरूप नहीं देखा जा सकता। प्रचार और विज्ञापन का भी अपना महत्व है किन्तु जब कर्तव्य और प्रयत्नों से दूर रहकर मनुष्य इन्हीं में उलझ जाता है तो वह लक्ष्य से दूर हटकर आत्म प्रवंचना की ओर अग्रसर होता है, पतन के मार्ग पर चलने लगता है।
चिन्तन करने वाले, सबको सन्मार्ग दिखाने वाले लोकसेवी अधिक पूजनीय माने गये हैं। क्योंकि त्याग की व्यापक भावना रख कर श्रम करना, साधना करना ही तप कहलाता है। दूसरे लोगों के हितार्थ, दूसरों की सेवा के लिए अपने शरीर पर कष्ट सहना, समष्टि के लाभ की चिन्ता रख कर कोई भी दृढ़ प्रयत्न करना तप है। किन्तु शरीर को व्यर्थ कष्ट देकर आत्म कल्याण और दूसरों का हित चाहने वाले इस अमूल्य साधन को क्षीण करते हैं और वह तप नहीं कहला सकता। केवल शरीर के भरण-पोषण, आराम सुख के लिए ही सदैव प्रयत्न करना भी तप नहीं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-February
चिन्तन या जैसे भी सम्भव हो मन में केवल उत्कृष्ट कोटि की विचारधारा एवं भावना को स्थान मिले। इसी प्रकार अपने कार्यों को ऐसा निर्मल बनाया जाना चाहिए कि उनमें अनीति, छल, असत्य, पाप एवं अकर्म के लिए कोई स्थान न रहे।
चिन्तन न करके अपने कर्तव्य में दत्तचित्त लगे रहना चाहिए इससे अभिमान की वृद्धि नहीं होगी। व्यक्ति, जीवन में अनासक्त और निरपेक्ष होकर अपनी जीवन यात्रा पूरी करेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-August
चिन्तनपूर्वक व्यवहार में लाने का प्रयत्न करना ही सच्चा स्वाध्याय कहा जा सकता है। इससे हम उन भूलों से भी बच सकते हैं जो संसार की उलझनों के कारण समय-समय पर पैदा होती है और जिनमें फंसकर मनुष्य मार्गच्युत हो जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-June
चिन्तन और सत्संकल्प

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-April
चिन्तन के लिए कोई तो समय चाहिए ही। दूसरों को प्रेरणा देने के लिए उनके पास जाना, बैठना, चर्चा करना समय लगाने पर ही संभव होगा। इसलिए शरीर के लिए, कमाने-खाने की ही तरह ही आत्मा के लिए ज्ञान यज्ञ में कुछ समय लगाना भी हमें आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य समझना चाहिए।
चिन्तन और मनन करते-करते अपनी मनोभूमि को प्रलोभन और कठिनाइयों से टक्कर लेने की क्षमता से सुसम्पन्न बना लिया हो। बाह्य आवेश से नहीं वरन् अन्तरात्मा की सुस्थिर प्रेरणा के आधार पर जो लोग श्रेष्ठता के सन्मार्ग पर आरुढ़ होते हैं उन्हीं के लिए अन्त तक उस पर चलते रहना संभव होता है।
चिन्तन करना आत्म कल्याण की दृष्टि से आवश्यक है। सद्भावनाओं की शिक्षा दूसरों को देना परोपकार की सबसे पुनीत प्रक्रिया है। इन दोनों का समावेश ज्ञान यज्ञ में होता है। प्रेरणाप्रद सद् विचारों की सम्पत्ति अपने लिए जमा करना और उस श्रेय-साधन से दूसरों को लाभान्वित बनाना इतना श्रेष्ठ सत्कर्म है कि उसकी तुलना और किसी शुभ कार्य से नहीं हो सकती। ज्ञान यज्ञ की तुलना में अन्य सब यज्ञ तुच्छ ही माने जा सकते हैं।
चिन्तन करना चाहिए, आलस्य हट जायगा। जब कामुकता जग रही हो तो ब्रह्मचर्य, मातृ-भावना एवं चारित्रिक पवित्रता की विचारधारा को मन में स्थान देना चाहिए वासना शाँत हो जायगी।
चिन्तन द्वारा आत्म-निर्माण के लिए सद्विचारों को व्यवहारिक जीवन में उतारें, अपने परिवार के हर सदस्य को इस लाभ से लाभान्वित होने के लिए प्रेरित करें। साथ ही यह भी प्रयत्न करें कि अपने समीपवर्ती क्षेत्र, में सभी प्रिय परिचित जनों में उस विचारधारा का विस्तार हो। जिन पर भी अपना प्रभाव हो, उन्हें ऐसी प्रेरणा देनी चाहिए कि वे सद्विचारों को नियमित रूप से अपनाने की अभिरुचि उत्पन्न करें। प्रभाव वही सराहनीय है जिससे प्रभावित व्यक्तियों को उत्कर्ष की प्रेरणा मिले। जिस में भी सुसंस्कारों का बीजाँकुर दिखाई पड़े उसे सींचने के लिए हमें अवसर और अवकाश निकाल ही लेना चाहिए।
चिन्तन की दृष्टि से आवश्यक है।
चिन्तन से जैसे भी बन पड़े वैसे यह प्रश्न करना चाहिए कि हमारा मस्तिष्क उच्च विचारधारा में निर्मग्न रहे। यदि इस प्रकार के विचारों में मन लगने लगे, उनके आनन्द का अनुभव होने लगे तो समझना चाहिए कि आधी मंजिल पार कर ली गई।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-September
चिन्तन, मनन धारणा, ध्यान, समाधि का आयोजन ईश्वरीय सत्ता से एकीभूत होने के लिए, शक्ति प्रेरणा पाने के लिए, मानसिक सन्तुलन प्राप्त करने के लिए हुआ। मन के अन्तर्द्वन्द्व शान्त होने पर मनुष्य को क्लेश पहुँचाने वाले अनेकों मनोभावों का सहज ही निवारण हो जाता है।
चिन्तन, मनन करते रहने से अन्तःकरण में सत् तत्व की अभिवृद्धि होती हैं। इसलिये अन्तःकरण में आवश्यक सत्प्रेरणाएँ भी उद्भूत होने लगती हैं।
चिन्तन का व्रत लिया और साधुओं की तरह न जन्मने और न मरने वाले ईश्वर की उपासना करने के लिए प्रचार करने लगा।
चिन्तन न करता हो, दुखियों को देख दया से व्यथित हो उठता हो, सरलता और सज्जनता जिसमें कूट-कूट कर भरी हो वह मेरी भी माला ले सकता है।” पुरोहित ने अपने को वैसे ही बताया और वह तीसरी माला भी लेली।
चिन्तन मनन पूर्ण होकर सही सही निष्कर्ष निकला तभी उस विचार को लोक कल्याणार्थ रखा। एक बार न्यूटन से किसी ने कहा था “आपने तो पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया है।” इस पर उस निरभिमानी वैज्ञानिक ने कहा “मेरे सामने ज्ञान का अथाह समुद्र फैला पड़ा है जिसके किनारे के कुछ ही रज कण मैं उठा पाया हूँ।” एक ओर ऐसे व्यक्तियों की स्थिति पर तरस आता है जो बेचारे कही से कुछ पढ़ सुनकर, थोड़ा बहुत अध्ययन कर अभिमानवश अपने आपको विद्या का धनी, पण्डित विद्वान मान बैठते हैं। अपनी विद्वता, पाण्डित्य की दुहाई देने वालों की स्थिति एक खोखले पोले ढोल की तरह ही होती है।
चिन्तन प्रधान भाव अर्जन करने की प्रेरणा देता है, और भक्तियोग में हृदय की शुद्धि, आत्म समर्पण की उत्कट भावना, अनन्य प्रेम को आवश्यक बताया गया है। किन्तु कर्मयोग का समावेश भी इन दोनों के साथ अनिवार्य माना गया है।
चिन्तन, मनन द्वारा अपने लिये जो प्रकाश प्राप्त किया गया है, उसे दूसरों को भी देने का क्रम बनाना चाहिये। जो पढ़ा समझा है उसे लिखने सुनने से परिपक्वता आती है, इसे सभी छात्र और शिक्षक जानते हैं। जो कुछ हम समझते और सोचते हैं उसे दूसरों को ध्यान अध्यापक या परीक्षक मान कर सुनाने, समझाने लगें तो उससे अपना अभ्यास परिपक्व होगा और वह विचार गहराई तक मनोभूमि में प्रवेश करके संस्कार के रूप में सुदृढ़ भी होते चलेंगे। ज्ञान दान का पुण्य इस संसार के सबसे बड़े दान धर्मों में गिना गया है। उसे एकत्रित करते रहने से दैवी सम्पदाओं की पूँजी बढ़ती है और मनुष्य सच्चे अर्थों में अमीर बनता चला जाता है।
चिन्तन होता है वैसा ही उसके लिए यह संसार दिखाई देता है। मनुष्य दूसरों से प्रेम करता है तो दूसरे भी उसे प्रेम करते हैं। उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं। संसार कुंए की आवाज है। मनुष्य संसार के प्रति जैसा आचरण करेगा संसार से उसे वैसा ही प्रत्युत्तर मिलेगा।
चिन्तन करें। कुविचारों के अशुभ चिंतन के विरुद्ध तो निरन्तर संघर्ष ही जारी रखना चाहिए।
चिन्तन किया करें। यह विचार करें कि इन तथ्यों में से हमारे जीवन में कौन-कौन कितनी मात्रा में प्रयुक्त होता है। जो कमी रहती हो उसे कैसे पूरा किया जाय उसका उपाय सोचते रहना चाहिए। मनोभूमि को विधेयात्मक और परिष्कृत बनाने में यह दोनों ही साधन असाधारण रूप से उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
चिन्तन, दुर्भावनाओं का परिणाम सदैव दुःखदायी ही होता है।” क्योंकि ये सब विश्व विधान के विरोधी, अनैतिक तत्व हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-September
चिन्तन, श्रवण, कीर्तन आदि सभी आध्यात्मिक उपकरण मायिक है। सतोगुणी माया, एवं चित् शक्ति के द्वारा ही जीव और ईश्वर का मिलन हो सकता है। यह आत्मा और परमात्मा का मिलाप कराने वाली शक्ति गायत्री ही है। ऋषियों ने इसी की उपासना की है क्यों कि यह खुला रहस्य है कि, शक्ति बिना मुक्ति नहीं। सरस्वती, लक्ष्मी, काली, माया, प्रकृति, राधा, सीता, सावित्री, पार्वती, आदि के रूप में गायत्री की ही पूजा की जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-June
चिन्तन करना, श्रेष्ठ विचारना और श्रेष्ठ कार्य करना, इस प्रकार मनुष्य श्रेष्ठता को प्राप्त होता है।
चिन्तन को छोड़ कर ‘शुभ चिन्तन’ को अपनाया जाय। हर वस्तु की, हर परिस्थिति की, हर व्यक्ति की श्रेष्ठता, उत्तमता, उपयोगिता, अच्छाई को तलाश किया जाय। यदि शुभ दृष्टि से संसार के विविध अंगों पर दृष्टिपात किया जाय तो उनमें से सुन्दरता, मनोहरता, उपयोगिता का निर्झर झरता हुआ दृष्टिगोचर होगा और आनन्द से चित्त प्रफुल्लित हो जायगा। कवि लोग नदी, तालाब, पर्वत, आकाश, चाँद, तारे, घास, ओस, पुष्प, लता, वृक्ष, संध्या, ऊषा, बादल, बिजली आदि प्रकृति की साधारण सी कृतियों को देख कर आनन्द विभोर हो जाते हैं और उनका वर्णन करते हुए रस की धारा प्रवाहित कर देते हैं। अशुभ दृष्टि से इन्हीं चीजों को देखा जाय तो यह निर्जीव-उपेक्षणीय और डरावनी प्रतीत होंगी।
चिन्तन की दृष्टि से अपनी सुविधाओं पर विस्तार-पूर्वक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि भगवान ने अपरिमित सुसाधन हमें दे रखे हैं। अन्धे, लूले, लंगड़े, कोढ़ी, अनाथ, असहाय, दरिद्र, अशिक्षित, रोगी, अछूत, वृद्ध, कैदी, ऋण ग्रस्त, पराधीन आदि कितने ही प्रकार के व्यक्तियों की अपेक्षा हम कहीं साधन सम्पन्न हैं। हमारी स्थिति में पहुँचने के लिए भी हजारों लाखों प्राणी आतुर हैं, पशु-पक्षियों, कीट पतंगों को हमारी स्थिति मिल जाय तो वे अपना कितना बड़ा सौभाग्य समझेंगे इसकी यदि ठीक प्रकार कल्पना की जा सके तो पता चलेगा कि अपना वर्तमान सौभाग्य कितना उच्च कोटि का है, और प्रसन्न होने के कितने अधिक अवसर अपने को उपलब्ध हैं।
चिन्तन’ को अपनाया जाय। हर वस्तु की, हर परिस्थिति की, हर व्यक्ति की श्रेष्ठता, उत्तमता, उपयोगिता, अच्छाई को तलाश किया जाय। यदि शुभ दृष्टि से संसार के विविध अंगों पर दृष्टिपात किया जाय तो उनमें से सुन्दरता, मनोहरता, उपयोगिता का निर्झर झरता हुआ दृष्टिगोचर होगा और आनन्द से चित्त प्रफुल्लित हो जायगा। कवि लोग नदी, तालाब, पर्वत, आकाश, चाँद, तारे, घास, ओस, पुष्प, लता, वृक्ष, संध्या, ऊषा, बादल, बिजली आदि प्रकृति की साधारण सी कृतियों को देख कर आनन्द विभोर हो जाते हैं और उनका वर्णन करते हुए रस की धारा प्रवाहित कर देते हैं। अशुभ दृष्टि से इन्हीं चीजों को देखा जाय तो यह निर्जीव-उपेक्षणीय और डरावनी प्रतीत होंगी।
चिन्तन वृत्ति के कारण मनुष्य जितना दुखी रहता है उसका सौवाँ भाग भी वास्तविक कष्ट उसे प्राप्त नहीं होता।
चिन्तन ही है। हरा ऐनक आँख पर चढ़ा लेने से हर चीज हरी दिखलाई पड़ती है, अशुभ दृष्टिकोण को अनिष्ट चिन्तन को अपना लेना एक ऐसी ही रंगीन ऐनक चढ़ा लेना है जिसके कारण सारे संबद्ध पदार्थ और मनुष्य पुरे अनुपयुक्त और कष्ट दायक दीखने लगते हैं। इस मानसिक कष्ट से छुटकारा उन्हें मिल नहीं सकता क्योंकि जिन पदार्थों परिस्थितियों और मनुष्यों से उन्हें काम पड़ता है उन्हें बदल दिया जाय, उनके स्थान पर नवीनता उपस्थित कर दी जाय तो भी संतोष नहीं हो सकता, कारण कि संसार का कोई भी पदार्थ, स्थिति अथवा मनुष्य ऐसा नहीं है जो पूर्णतया निर्दोष हो, नाक भौं सिकोड़ने के लिए उसको भी कुछ न कुछ कारण निकल ही आवेगा।
चिन्तन के परिणाम होते हैं। बहुत ही साधारण सी कठिनाइयाँ पहाड़ सी दुर्गम दिखाई पड़ती हैं। भविष्य में किसी कष्ट के आने और उसके असह्य होने की कल्पना करके कितने ही मनुष्य आत्म हत्या तक कर लेते हैं। जो लोग जेल की बड़ी भारी यंत्रणा समझ कर उसके डर से थर थर काँपते थे वे जब जेल गये तो उन्होंने देखा कि वहाँ भी साधारण दैनिक जैसी ही गतिविधि रहती है और बड़ी आसानी से समय गुजर जाता है। आरम्भ में अनाथों, विधवाओं, आपदाग्रस्तों को ऐसा लगता है कि न जाने हमारे ऊपर अब क्या बीतेगी पर ईश्वर की ऐसी लीला है कि सभी को अपनी जीवन यात्रा चलाने का कोई न कोई मार्ग मिल जाता है और यों ही हंसते-खेलते वे बुरे दिनों को निकाल देते हैं।
चिन्तन को अपना लेना एक ऐसी ही रंगीन ऐनक चढ़ा लेना है जिसके कारण सारे संबद्ध पदार्थ और मनुष्य पुरे अनुपयुक्त और कष्ट दायक दीखने लगते हैं। इस मानसिक कष्ट से छुटकारा उन्हें मिल नहीं सकता क्योंकि जिन पदार्थों परिस्थितियों और मनुष्यों से उन्हें काम पड़ता है उन्हें बदल दिया जाय, उनके स्थान पर नवीनता उपस्थित कर दी जाय तो भी संतोष नहीं हो सकता, कारण कि संसार का कोई भी पदार्थ, स्थिति अथवा मनुष्य ऐसा नहीं है जो पूर्णतया निर्दोष हो, नाक भौं सिकोड़ने के लिए उसको भी कुछ न कुछ कारण निकल ही आवेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-November
चिन्तन करते-करते जब मनुष्य को संसार के समस्त पदार्थों की असारता का ज्ञान होता है, तब वह इस संसार के मूल में जो आत्म-तत्व है उसे जानने के लिए व्याकुल होता है, और नेति-2 (यह भी ब्रह्म नहीं, वह भी ब्रह्म नहीं) इस प्रकार विचार करते-करते एक सत्ता मात्र उपलब्धि करता है, और उसे जानकर उसमें ही मग्न हो जाता है। उस सत्ता को ही श्रुति ने ब्रह्म कहा है। वह ब्रह्म ही सत् है, चित् है और आनन्द स्वरूप है।
चिन्तन किया है। विश्व का कोई भी प्राणी दुख नहीं चाहता, पर वह मिलता अवश्य है। इसी तरह सभी प्राणी सूख चाहते हैं और निरन्तर उसे पाने के लिए प्रयत्नशील नजर आते हैं, फिर भी सच्चे सुख की अनुभूति विरले महापुरुषों के अतिरिक्त किसी को हो नहीं पाती, यह विश्व का सबसे महान आश्चर्य है। हमारे विचारक महापुरुषों ने इसी पर तल स्पर्शी गवेषणा की कि सुख एवं दुख हैं क्या बला? और उसकी प्राप्ति का, अनुभूति का, कारण क्या है?
चिन्तन करें तो हमारे सामने कई विशेषताएं आती हैं जो एक धार्मिक क्षेत्र में पाई जाती हैं। धर्म की उन्नति व्यक्तियों का ही काम नहीं यह समाज का काम भी है और समाज इस की उन्नति के लिए विशेष साधन एकत्रित करता है। उपनिषद् वाक्य में, जिस से यह लेख आरंभ होता है, सामाजिक धर्म का वर्णन किया गया है अर्थात् उन साधनों का जिन्हें एक समाज की उन्नति के लिए प्रयोग करता है। समाज प्राकृतिक तौर पर कई भागों में बंटा हुआ होता है। जन्म के हम सब शूद्र होते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-March
चिन्तन की सघनता के कारण वह साधक स्वयं ही माँग पदार्थों का भोग पदार्थ बन जाता है। इसलिए उनके चक्कर से मुक्ति पाने की अपेक्षा वह उनमें अधिक से अधिक फंसता हुआ चला जाता है। इसलिए गुलामी से मुक्ति न मिलकर उसकी जंजीरें अधिक कस जाती हैं।
चिन्तन करता है उस समय उसके सामने भोग पदार्थों का ही विचार रहता है और उसमें भोग भावना ही काम करती रहती है। इसलिए भोग भावनायुक्त होकर जब वह उसकी भक्ति में तल्लीन होता है तो मनुष्य के लिए वही लक्ष्य बन जाता है। लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए चिन्तन की सघनता के कारण वह साधक स्वयं ही माँग पदार्थों का भोग पदार्थ बन जाता है। इसलिए उनके चक्कर से मुक्ति पाने की अपेक्षा वह उनमें अधिक से अधिक फंसता हुआ चला जाता है। इसलिए गुलामी से मुक्ति न मिलकर उसकी जंजीरें अधिक कस जाती हैं।
चिन्तन है।
चिन्तन करता है। जिस समय वह भौतिक पदार्थों का चिन्तन करता है उस समय उसके सामने भोग पदार्थों का ही विचार रहता है और उसमें भोग भावना ही काम करती रहती है। इसलिए भोग भावनायुक्त होकर जब वह उसकी भक्ति में तल्लीन होता है तो मनुष्य के लिए वही लक्ष्य बन जाता है। लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए चिन्तन की सघनता के कारण वह साधक स्वयं ही माँग पदार्थों का भोग पदार्थ बन जाता है। इसलिए उनके चक्कर से मुक्ति पाने की अपेक्षा वह उनमें अधिक से अधिक फंसता हुआ चला जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-October
चिन्तन करते रहो, अनित्य धन की चिन्ता छोड़ दो। क्षण भर के साधु संग को भी भवसागर से तारने के लिये नौका स्वरूप समझे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-February
चिन्तन करते हुए ऐसा अनुभव करना चाहिए कि वह गायत्री- ब्रह्म शक्ति हमारे हृदय में निवास करने वाली भावना तथा मस्तिष्क में रहने वाली बुद्धि को पकड़ कर सात्विकता के, धर्म के, कर्तव्य के, सेवा के, सत्पथ पर घसीटे लिये जा रही है। बुद्धि और भावना को इसी दिशा में चलने का अभ्यास तथा प्रेम उत्पन्न कर रही है। तथा वे दोनों बड़े आनन्द, उत्साह तथा संतोष का अनुभव करते हुए माता गायत्री के साथ साथ चल रही हैं।
चिन्तन की स्वतन्त्रता भी नष्ट हो जाती है।
चिन्तन करने से गायत्री मंत्र का अर्थ भली प्रकार हृदयंगम हो जाता है और उसकी प्रत्येक भावना मन पर अपनी छाप जमा लेती है। जिससे यह परिणाम कुछ ही दिनों में दिखाई देने लगता है कि मन कुविचारों और कुकर्मों की ओर से हट गया है और मनुष्योचित सद्विचारों एवं सत्कर्मों में उत्साह पूर्वक रस लेने लगा है। यह प्रवृत्ति आरम्भ में चाहे कितनी ही मन्द क्यों न हो पर यह निश्चित है कि यदि वह बनी रहे, बुझने न पावे तो निश्चय ही आत्मा दिन दिन समुन्नत होती जाती है।
चिन्तन करते हुए अपने हृदय को भगवान का सिंहासन अनुभव करना चाहिए और उस परम तेजस्वी, सर्वश्रेष्ठ, निर्विकार, दिव्य गुणों वाले परमात्मा को विराजमान देखना चाहिए। भगवान की झाँकी तीन रूप में की जा सकती है। (1) विराट पुरुष के रूप में (2) राम कृष्ण, विष्णु, गायत्री सरस्वती आदि के रूप में (3) दीपक की ज्योति के रूप में। यह अपनी भावना इच्छा और रुचि के ऊपर है। परमात्मा को पुरुष रूप में या गायत्री के मातृ रूप में अपनी रुचि के अनुसार ध्यान किया जा सकता है।
चिन्तन बीज रूप से अपनी अन्तरात्मा को तीनों योगों की त्रिवेणी में स्नान कराने के समान है।
चिन्तन करने से अन्तःकरण में उन तत्वों की वृद्धि होती है जो मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाते हैं। वह भाव बड़े ही शान्तिदायक उत्साहप्रद सतोगुणी, उन्नायक एवं आत्मबल बढ़ाने वाले हैं। इन भावों का नित्य प्रति कुछ समय मनन करना चाहिए।
चिन्तन-संकल्प पर धीरे-धीरे मनन करना चाहिए। एक एक शब्द पर कुछ क्षण रुकना चाहिए और उस शब्द का कल्पना-चित्र मन में बनाना चाहिए।
चिन्तन की शक्ति होने पर कोई भी धर्मनिष्ठ ब्राह्मण क्या ऐसा करता? कदापि नहीं, द्रोणाचार्य ने युद्ध के आरम्भ में ही इस अन्यायाचरण के सम्बन्ध में अपना मत प्रकट किया था कि मनुष्य धन का दास है, धन मनुष्य का नहीं, कौरवों ने हमें धन से खरीद लिया है इसलिये हमें उन्हीं की ओर से लड़ना है। यदि धन से वे खरीदे गये न होते तो इन समस्त अधर्म एवं अन्यायाचरण के विरुद्ध हुँकार मारते, इन्हें क्या देर लगती। भीष्म पितामह का भी यही हाल था। उन्होंने भी इन्हीं शब्दों में जवाब दिया था।
चिन्तन करें , मनन करें, ध्यान करें , गुणगान करें , और उसे अपना जीवन सहचर बनावें , यही उचित है।
चिन्तन की स्वतन्त्र दिशा का लोप हो जाता है। यहाँ तक कि चिन्तन की स्वतन्त्रता भी नष्ट हो जाती है।
चिन्तन की स्वतन्त्रता का भय का वातावरण जिस प्रकार शत्रु है वैसे ही धन भी अन्तराय है। ज्यादातर लोग गरीबी में रहकर अपना जीवन चला नहीं पाते। गरीबी में रहना तो एक प्रकार की तपस्या है, संयम है इसलिये धन के लिये उन्हें कहीं न कहीं अपना पल्ला फैलाना ही पड़ता है। पारिश्रमिक रूप से, प्रतिग्रह रूप से, किसी भी रूप से, धन जिससे मिलता है, मनुष्य उस धनी के प्रति कृतज्ञ हो जाता है, और वह अपनी सारी चिन्तन शक्ति उसके लिए सौंप देता है। इसलिए धन के गलत रास्ते जाने पर भी उसमें इतना नैतिक बल नहीं रहता कि उसके खिलाफ आवाज उठा सके बल्कि कभी कभी तो उसी के गुण गाते हुए पाया जाता है।
चिन्तन शक्ति उसके लिए सौंप देता है। इसलिए धन के गलत रास्ते जाने पर भी उसमें इतना नैतिक बल नहीं रहता कि उसके खिलाफ आवाज उठा सके बल्कि कभी कभी तो उसी के गुण गाते हुए पाया जाता है।
चिन्तन में निमग्न रहना चाहिए क्योंकि वही वह दुर्ग हैं जिसमें प्रवेश करने पर विषय विकारों के, पाप तापों के विषैले बाणों से रक्षा हो सकती है। भवबन्धन को तरने के लिए प्रभु का स्मरण ही नौका हैं। आत्मकल्याण का आत्म लाभ सर्वोपरि स्वार्थ साधन केवल प्रभु चरणों की शरणागति से ही हो सकता है। इसलिए हम ईश्वर का चिन्तन करें , मनन करें, ध्यान करें , गुणगान करें , और उसे अपना जीवन सहचर बनावें , यही उचित है।
चिन्तन और मनन करते हुए मन भी उसी साँचे में ढल जाता है। परिणाम यह होता है कि चिन्तन की स्वतन्त्र दिशा का लोप हो जाता है। यहाँ तक कि चिन्तन की स्वतन्त्रता भी नष्ट हो जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-April
चिन्तन मन्थन ने सत्य शिव एवं अद्वैत के नवनीत प्रतीक के रूप विश्व को प्रदान किया है। दशरथी महामानव राम को हमें अपने जीवन में अवतीर्ण करना है हमारे जीवन व्यवहार का आदर्श वह निस्पृह। दशरथ-सुवन क्यों न बने, जिसने कर्तव्य सम्मुख राज का परित्याग कर दिया? और हमारे जीवन का तत्वज्ञान उस राम के रस अभिषिक्त क्यों न हो, जिसके स्मरण मात्र पदार्थवाद के मिथ्याज्ञान आडम्बर का सिरोधारण हो जाता है? समझ लीजिये मुख्य रूप में ये ही समस्याएं हमारे सम्मुख हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-December
चिन्तन, आत्म-विश्वास, आत्म-गौरव, आत्म-निष्ठा, आत्म-साधन, आत्म-उन्नति, आत्म-निर्माण यह वह कार्य है। जिनमें हमारी इच्छा शक्ति, कल्पना शक्ति एवं क्रिया शक्ति का उपयोग होना चाहिए। क्योंकि अन्दर का मूल केन्द्र, उद्गम स्रोत, आत्मा ही है। जिसने आत्मा के साथ रमण करना सीख लिया उसे स्वर्ग की अप्सराएं भी चुड़ैलों जैसी तुच्छ एवं कुरूप दिखाई देने लगती हैं। क्योंकि आत्मा ही अनन्त यौवन और अनन्त सौंदर्य है।
चिन्तन करके उसके मन से अपने मन का सम्बन्ध जोड़ सकते हैं। ऐसा करने पर हम उससे वही विचार करवा सकते हैं जो कराना चाहते हैं। किसी व्यक्ति के प्रति नित्यप्रति हमारे हृदय में आने वाले विचार उस व्यक्ति को प्रभावित करते हैं। वह हमारे विषय में भी वैसा सोचने लगता है जैसा कि हम उसके विषय में सोचते हैं। जितना ही हम इस सिद्धान्त पर विश्वास करते हैं कि रेडियो की लहरों की भाँति विचारों की लहरें दूर-दूर के लोगों का प्रभावित करती हैं उतना ही हम प्रत्यक्ष रूप से अपने विचारों द्वारा दूसरे लोगों को प्रभावित करने में समर्थ होते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-May
चिन्तन किया करता है, वह भी उन कर्मों को किये बिना रह नहीं सकता ऐसे कार्य उसकी एक प्रकार की नशा जैसे व्यसन हो जाते हैं, वह व्यक्ति अनायास ही दूसरों की निंदा और अकल्याण सोचने में लग जाता है। दूसरों की स्तुति सुनकर उसे बुखार जैसा आ जाता है।
चिन्तन करने लगता है फिर इस प्रकार के विचार उसके मन को नहीं छोड़ते। अब यदि वह चाहे कि अमुक अशुभ विचार को हम छोड़ दें तो भी अब वह उसे छोड़ने में असमर्थ होता है। वहीं मनुष्य अपने विचारों पर नियन्त्रण कर सकता है जिसकी आत्मा बलवान और विवेकी है। जिस साँप को हम दूसरों के काटने के लिये पाले हैं, वहीं साँप किसी असावधानी की अवस्था में अपने आपको काट सकता है। दूसरों को दुःख देने के विचार साँप के सदृश है।
चिन्तन करता है और जो परोक्ष रूप से भी यह जानता है कि मनुष्य का मन ही दुख और दुखों का कारण है। ऐसे ही मनुष्य में भले ओर बुरे विचारों के पहचानने की शक्ति उत्पन्न होती है।
चिन्तन भला लगता है, वह अपनी बुराई का भी चिन्तन करने लगता है फिर इस प्रकार के विचार उसके मन को नहीं छोड़ते। अब यदि वह चाहे कि अमुक अशुभ विचार को हम छोड़ दें तो भी अब वह उसे छोड़ने में असमर्थ होता है। वहीं मनुष्य अपने विचारों पर नियन्त्रण कर सकता है जिसकी आत्मा बलवान और विवेकी है। जिस साँप को हम दूसरों के काटने के लिये पाले हैं, वहीं साँप किसी असावधानी की अवस्था में अपने आपको काट सकता है। दूसरों को दुःख देने के विचार साँप के सदृश है।
चिन्तन में बिताओ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-June
चिन्तन करना ही हमारी जिज्ञासा का चरम बिन्दु है। यही ज्ञान की पराकाष्ठा है। आत्मा को पहचानना ही परमात्मपन को उपलब्ध करना है, जहाँ से संसार के बदलते हुए भावों को अवलोकन किया जा सके। आत्म-स्वरूप को न पहिचानने के कारण ही आज संसार में इतना अज्ञानान्धकार व दुख छाया हुआ है।
चिन्तना की जाय कि ‘मैं कौन हूँ?’ इस ‘मैं’ की अनुभूति का उद्गम कहाँ से होता है? मेरा क्या स्वरूप है? मेरी गति और प्रगति की दिशा क्या है?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-April
चिन्तन में हमारी संस्कृति का जन्म हुआ है। यही कारण है कि आत्मदर्शन हमारा चरम लक्ष्य है।
चिन्तन के लिए रूढ़िवाद में ही फँसे रहने से कोई तात्पर्य न निकलेगा। केवल रूढ़िवाद के ही ग्रहण करने से और उन्हीं में फँसे रहने से हम लक्ष्य से दूर हो जावेंगे तथा गुत्थी कभी सुलझ न पावेगी।
चिन्तन किया, इस प्रवृत्ति से प्राणविद्या की उन्नति ब्रह्मवर्चस्काम, ऊध्व रेतस् स्थिति एवं अमृतत्व प्राप्ति कदापि सम्भव नहीं! इसी विधि का चित्रण पशुबन्ध यज्ञ है।
चिन्तन एवं निदिध्यासन करते हुए एक दिन बुद्धत्व की उपलब्धि की।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-May
चिन्तन का समय नहीं मिलता, परिवार वालों की ही मोटरी ढोते ढोते जान जाती है। मंदिर में भी जाकर केवल लड़के को ही प्रणाम कराने और चरणामृत पिलाने में लगा रहता है। ऊँट काँटे खाता है काँटे उसके मुँह में चुभते हैं, और उसे कष्ट देते हैं, लेकिन वह काँटे खाना नहीं छोड़ता। इसी प्रकार बद्ध जीव संसार यातनाएँ सहकर भी संसार में लिप्त रहता है। स्त्री मर जाती है तो फिर विवाह करते हैं, पुत्र के मरने के दुःख से व्याकुल हो उठते हैं, किंतु फिर भी साँसारिक जाल में ही रत होते हैं।
चिन्तन तथा मनन करना, और जीवन को उसके अनुसार बनाना।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-March
चिन्तन मनन के कारण अन्तःकरण पर एक अभीष्ट छाप छोड़ती है। महापुरुषों और देवताओं की जन्म जयन्तियाँ उन महान आत्माओं के कार्यों, चरित्रों और उपदेशों को हमारे सम्मुख रखने के लिए सचमुच ही बहुत भारी प्रेरणा अपने अन्दर छिपाये रहती हैं। यदि इन संस्कारों, त्यौहारों, पर्वों, व्रतों, जयन्तियों को लकीर पीटना मात्र न रख कर प्रेरणाप्रद उत्सवों का प्राचीनकाल जैसा रूप दे दिया जाय। प्रभावशाली, चरित्रवान और निस्वार्थ पुरोहित यदि इन कार्यक्रमों को पूरी दिलचस्पी के साथ लोकमानस निर्माण की दृष्टि से कराने लगे तो यह निश्चित है कि जितना कार्य अनेकों सभा सोसाइटियों, अखबार, पर्चे, लाउडस्पीकर, विद्यालय, शिविर नहीं कर सकते वह सब अनायास ही बहुत सुगम रीति से हो सकता है। जीवन के महान आदर्शों की शिक्षा देने के लिए वह संस्कार, त्यौहार आदि के अवसर सर्वोत्तम माध्यम सिद्ध हो सकते हैं।
चिन्तन नहीं है तो वह उतना बड़ा विशाल पठन-अध्ययन भी उसके व्यक्ति त्व का, उसकी सत्ता के महत्व को स्थापित करने में असमर्थ ही रहता है, जब कि एक स्वतन्त्र चिंतन और मननशील व्यक्ति अपने थोड़े से अध्ययन के सहाप्य से भी समाज और राष्ट्र में अपना एक विशिष्ट व्यक्तित्व निर्मित कर लेते हैं।
चिन्तन और मनन है अन्यथा वह सत्वहीन है—कागज का फूल मात्र है।
चिन्तन और मनन करके विचार-दिशा प्रदान करें और मैं चुपचाप हाकें जाने वाले पशु की भाँति केवल उस पथ का अनुसरण करता चलूँ। उस पथ के अच्छे और बुरे होने का उत्तरदायित्व मेरे ऊपर नहीं हो, कोई इसे बुरा होने का दोष मेरे शिर नहीं डाल सके, पर ऐसा करते समय उसे यह पता नहीं होता, कि आखिर अनेकों पथों में से इसी राह को अपने चलने के लिए चयन कर लेने में तो उसी का ही एकमात्र उत्तरदायित्व हो जाता है। इसीलिए वे सभी भाँति अपने को निर्दोष सिद्ध करने में सफल नहीं हो सकते। फिर भी ऐसों जनों का मानसिक और बौद्धिक आलस्य दूर नहीं हो पाता। ऐसे मनुष्यों की, उन भेड़ों से बहुत कुछ समता की जा सकती है, जो एक भेड़ के पीछे चलने की वृत्ति रख कर कुएँ में भी गिर सकती हैं।
चिन्तन करना छोड़ देना चाहिये। मानो इस तरह हमने खेत में बीज बो दिया है। बीज बो देने के बाद खेत में पानी खींचने की आवश्यकता है। आशा रूपी-जल, विचार रूपी-बीज को उगने के लिये डाला जाता है। अपने आप से हमें यही कहते रहना चाहिये—कहना चाहिये कि हमारा अमुक संकल्प है, वह अपने आप फलित होगा, जब उसके लिये उपयुक्त समय आ जायगा।
चिन्तन और मनन करना चाहिये। हम कैसा बनना चाहते हैं, यह भी गम्भीर चिन्तन और मनन के फल स्वरूप अपने अन्तर से ही उत्पन्न होता है, दूसरा इसे नहीं दे सकता। हाँ सद्गुरु इस चेतना को निर्मल और ग्रहण शक्ति सम्पन्न बना सकते हैं।
चिन्तन और मनन के फल स्वरूप अपने अन्तर से ही उत्पन्न होता है, दूसरा इसे नहीं दे सकता। हाँ सद्गुरु इस चेतना को निर्मल और ग्रहण शक्ति सम्पन्न बना सकते हैं।
चिन्तन और मनन करना चाहिए। इन्हें कार्य रूप में परिणत करना चाहिए। उपरोक्त चारों संकल्पों में सन्निहित 13 तथ्य तथा 1 इन्हें कार्य रूप में परिणत करने की जिम्मेदारी, इस प्रकार कुल 14 रत्न अध्यात्म समुद्र- मंथन से निकलने वाले यह 14 रत्न हैं। इन्हें ही 9 लड़े 4 गांठें 1 ब्रह्मग्रन्थि इस प्रकार के यज्ञोपवीत के 4 भाग माने गये हैं। स्त्रियाँ अनन्त चतुर्दशी को 14 गाँठ का अनन्त धारण करती हैं, यह भी एक प्रकार का यज्ञोपवीत ही है।
चिन्तन करते हैं, फलतः उसका उन्हें ज्ञान होता है और उस ज्ञान के अनुसार आचरण कर सुखी या दुःखी बनते हैं—वैसा बनते हैं।
चिन्तन-मनन का परिणाम।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-August
चिन्तन में लगा रहता है, उसे भी ठोस ज्ञान लाभ नहीं होता। सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान वह है जो कि अनुभव की भित्ति पर खड़ा हो। यह अनुभव संसार में अनेक प्रकार की परिस्थितियों में पड़ने से, अनेक प्रकार के लोगों के संपर्क में आने से और अनेक तरह के आचरण-व्यवहार में से चलकर पार होने से आता है। जो मनुष्य जान बूझकर अपने मन को कर्म में नहीं लगाता, उसे बाध्य होकर अपने आपको कर्म में लगाना पड़ता है।
चिन्तन से उसे वास्तविक सुख और शान्ति प्राप्त हो सकती है, तभी वह अपने वैयक्तिक स्वार्थ को छोड़कर अपने मन को दूसरों के कल्याण के कार्य में लगा सकता है। इसके लिये प्रतिदिन आध्यात्मिक चिन्तन करना नितान्त आवश्यक है। जब तक मनुष्य को यह ज्ञान नहीं होता कि दूसरों का लाभ करके न केवल उसे लौकिक लाभ होता है, वरं उसे आन्तरिक पूर्णता भी प्राप्त होती है, तब तक वह पूरे मन से कभी भी दूसरों के कल्याण के कार्य में नहीं लग सकता।
चिन्तन से विमुख होकर केवल लोकोपकारी कार्य में लगे रहते हैं, वे अपनी ही सफलता पर अथवा सद्गुणों पर मोहित हो जाते हैं। वे अपने आपको लोक सेवक के रूप में देखने लगते हैं। ऐसी अवस्था में वे आशा करते हैं कि सब लोग उनके कार्यों की प्रशंसा करें और उनका कहा मानें। अपनी बात को सच्ची मानने की प्रवृत्ति ऐसे लोगों में उत्पन्न हो जाती है। फिर उनका बढ़ा हुआ अभिमान उन्हें अनेक लोगों का शत्रु बना देता है।
चिन्तन मनुष्य को नित्य तत्व की ओर ले जाता है। मनुष्य की शक्ति के ह्रास का प्रधान कारण उसका व्यक्तिगत स्वार्थों के विषय में अत्यधिक चिन्ता करना होता है। जब मनुष्य अपने कार्यों का लक्ष्य अपने व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति न बनाकर किसी महान् आदर्श की प्राप्ति बना लेता है तो उसका मन डावाँडोल अवस्था से मुक्त हो जाता है। वह क्षणिक सफलता और विफलता से न तो उल्लसित होता है और न उद्विग्न। जिस मनुष्य के कार्यों का लक्ष्य सभी का कल्याण करना होता है, उसकी कार्य क्षमता अपार होती है।
चिन्तन की क्षमता को खो देते हैं। ऐसे मनुष्य अपने जीवन की सफलता को बाहरी परिणामों के द्वारा मापने लगते हैं। जैसे-जैसे उन्हें वाह्य संसार में सफलता मिलती जाती है वे आगे बढ़ते जाते हैं। बाहरी सफलता को अपने जीवन की प्रगति का माप-दण्ड बना लेने पर मनुष्य में अहंकार की वृद्धि हो जाती है। फिर वह अपनी सफलता के आध्यात्मिक कारण को भूल जाता है।
चिन्तन दोनों को प्रगतिशील जीवन के लिये नितान्त आवश्यक बताया है। अरस्तू महाशय के अनुसार सच्चा सद्गुणी मनुष्य बाहरी सफलता से अपने जीवन की मौलिकता को नहीं मापता, वह किसी कार्य की सफलता इस विचार से देखता है कि उसे कहाँ तक मौलिक ज्ञान प्राप्त हुआ। हमारे पुराने ग्रन्थ योगवासिष्ठ में वसिष्ठ जी ने कर्म और ज्ञान को जीव रूपी पक्षी के दो पंख माने हैं। मनुष्य न तो केवल कर्म से और न केवल ज्ञान से ही अपने जीवन को प्रगतिशील अथवा सफल बना सकता है। अच्छा ज्ञान वह है जो कर्म का सच्चा पथ प्रदर्शक बने, जो मनुष्य की विशुद्ध कार्य क्षमता को बढ़ावे।
चिन्तन करने से जितना अपनी मानसिक शक्ति को खोता है, उतना अपनी मानसिक शक्ति को काम में खर्च करने से नहीं खोता। मनुष्य की अत्यधिक मानसिक शक्ति अपने में भय उसके जीवन में उन्हीं घटनाओं को घटा देते हैं, जिनसे वह डरता रहता है। इन भयों की उत्पत्ति का कारण वर्तमान कर्त्तव्य को छोड़कर भविष्य के विषय में अत्यधिक चिन्ता करना है। आध्यात्मिक चिन्तन से मनुष्य वर्तमान में रहना सीखता है और इस प्रकार वह अकारण भयों से अपने आपको मुक्त कर लेता है।
चिन्तन से मनुष्य वर्तमान में रहना सीखता है और इस प्रकार वह अकारण भयों से अपने आपको मुक्त कर लेता है।
चिन्तन किया जाता है। वह स्वयं तो पहिचानने में आता नहीं प्रत्युत उसी के द्वारा सब कुछ पहिचाना जाता है।
चिन्तन से मनुष्य अपने आप में निहित मूल शक्तियों का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। मनुष्य की कर्म में सफलता उसके अपने आपके विषय में अर्थात् अपनी मानसिक शक्तियों के विषय में समुचित ज्ञान प्राप्त करने पर निर्भर करती है। जो व्यक्ति अपनी मानसिक शक्तियों के विषय में जितना ही अधिक सोचता है, वह उतना ही अधिक उन शक्तियों के बारे में ज्ञान प्राप्त करता है। विचार की शक्ति कितनी अधिक है, इसका अनुमान लगाना कठिन है। जब मनुष्य अपने विचार की शक्ति को केवल अपनी बाहरी सफलता से मापता है तो वह एक भारी भूल करता है।
चिन्तन को देता है। इसके कारण ये घटनाएँ उसके मन को उद्विग्न नहीं करतीं। जब मनुष्य शान्त रहता है तो वह मन की अशान्त अवस्था की अपेक्षा कहीं अधिक काम कर सकता है। मनुष्य भावी अप्रिय घटनाओं के चिन्तन करने से जितना अपनी मानसिक शक्ति को खोता है, उतना अपनी मानसिक शक्ति को काम में खर्च करने से नहीं खोता। मनुष्य की अत्यधिक मानसिक शक्ति अपने में भय उसके जीवन में उन्हीं घटनाओं को घटा देते हैं, जिनसे वह डरता रहता है।
चिन्तन चिन्ताओं के निवारण का सर्वोत्तम उपाय है। जब मनुष्य का मन नित्य तत्व की पहिचान में लग जाता है तो वह अपने जीवन की आने जाने वाली घटनाओं को उतना महत्व नहीं देता जितना कि वह आध्यात्मिक चिन्तन को देता है। इसके कारण ये घटनाएँ उसके मन को उद्विग्न नहीं करतीं। जब मनुष्य शान्त रहता है तो वह मन की अशान्त अवस्था की अपेक्षा कहीं अधिक काम कर सकता है। मनुष्य भावी अप्रिय घटनाओं के चिन्तन करने से जितना अपनी मानसिक शक्ति को खोता है, उतना अपनी मानसिक शक्ति को काम में खर्च करने से नहीं खोता।
चिन्तन करना नितान्त आवश्यक है। जब तक मनुष्य को यह ज्ञान नहीं होता कि दूसरों का लाभ करके न केवल उसे लौकिक लाभ होता है, वरं उसे आन्तरिक पूर्णता भी प्राप्त होती है, तब तक वह पूरे मन से कभी भी दूसरों के कल्याण के कार्य में नहीं लग सकता।
चिन्तन में लगाता है, उसका आत्म विश्वास कभी विनष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति प्रत्येक काम के सम्बन्ध में आगे पीछे की बात बहुत कुछ सोचता रहता है, जो भविष्य के बारे में अत्यधिक चिन्तित रहता है, वह अपनी बहुत सी शक्ति व्यर्थ की चिंता में खो देता है। ऐसे व्यक्ति का आत्म विश्वास नष्ट हो जाता है। फिर उसकी कार्य क्षमता भी जाती रहती है और उससे अनेक प्रकार की भूलें होती रहती हैं। ये भूलें बिगड़े हुए मानसिक साम्य की प्रतीक हैं।
चिन्तन के बिना मनुष्य में विनीत भाव नहीं आता और न उसमें अपने आपको सुधारने की क्षमता रह जाती है। वह भूलों-पर-भूल करता चला जाता है और इस प्रकार अपने जीवन को विफल बना लेता है।
चिन्तन निराशावादी, नकारात्मक और अन्धकारमय हो जाता है। उसकी बुद्धि उसे किसी एक निश्चय के ऊपर नहीं ले जाती। उसे सभी दृष्टि-बिन्दु दोष पूर्ण दिखाई देने लगते हैं। वह सभी वादों में झूठ ही झूठ को देखता है। किसी भी सिद्धान्त से उसे संतोष नहीं होता।
चिन्तन का परिणाम होता है। जो मनुष्य वर्तमानकाल के कर्तव्य पर ही अपने ध्यान को केन्द्रित करता है और बची हुई शक्ति को आध्यात्मिक चिन्तन में लगाता है, उसका आत्म विश्वास कभी विनष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति प्रत्येक काम के सम्बन्ध में आगे पीछे की बात बहुत कुछ सोचता रहता है, जो भविष्य के बारे में अत्यधिक चिन्तित रहता है, वह अपनी बहुत सी शक्ति व्यर्थ की चिंता में खो देता है। ऐसे व्यक्ति का आत्म विश्वास नष्ट हो जाता है। फिर उसकी कार्य क्षमता भी जाती रहती है और उससे अनेक प्रकार की भूलें होती रहती हैं।
चिन्तन से मनुष्य अपने भीतर रहने वाली अमित शक्ति का ज्ञान प्राप्त करता है, इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। उसके मन में नयी सूझ उत्पन्न होती है, इसके कारण वह अपनी भूलों को सुधार सकता है और अपने काम को नये ढंग से कर सकता है। इंगलिस्तान के प्रसिद्ध साहित्यकार बेकन महाशय ने क्रिया और चिन्तन दोनों को प्रगतिशील जीवन के लिये नितान्त आवश्यक बताया है। अरस्तू महाशय के अनुसार सच्चा सद्गुणी मनुष्य बाहरी सफलता से अपने जीवन की मौलिकता को नहीं मापता, वह किसी कार्य की सफलता इस विचार से देखता है कि उसे कहाँ तक मौलिक ज्ञान प्राप्त हुआ। हमारे पुराने ग्रन्थ योगवासिष्ठ में वसिष्ठ जी ने कर्म और ज्ञान को जीव रूपी पक्षी के दो पंख माने हैं।
चिन्तन में आता नहीं है लेकिन उसी के द्वारा सब कुछ मनन, चिन्तन किया जाता है। वह स्वयं तो पहिचानने में आता नहीं प्रत्युत उसी के द्वारा सब कुछ पहिचाना जाता है।
चिन्तन से उदासीन होना पड़ता है। जिस प्रकार कर्म की अवहेलना करके जो व्यक्ति सर्वदा आध्यात्मिक चिन्तन में लगा रहता है, उसे भी ठोस ज्ञान लाभ नहीं होता। सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान वह है जो कि अनुभव की भित्ति पर खड़ा हो। यह अनुभव संसार में अनेक प्रकार की परिस्थितियों में पड़ने से, अनेक प्रकार के लोगों के संपर्क में आने से और अनेक तरह के आचरण-व्यवहार में से चलकर पार होने से आता है। जो मनुष्य जान बूझकर अपने मन को कर्म में नहीं लगाता, उसे बाध्य होकर अपने आपको कर्म में लगाना पड़ता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-February
चिन्तन और साधु-सेवा, यही दो विमल व्रत सदा के लिए उनके अविच्छेद्य अंग बन गए थे। जीविका जितने कष्ट से चलती उतना ही रैदास का अपार सुख होता। पर रैदास एक दिन भी भूखे रहे हों, इसका प्रमाण अब तक नहीं मिला। हाँ, गरीबी की जलती आग में से रैदास को खरा सोना होकर निकलना अवश्य पड़ा। एक दिन की बात है, एक साधु ने रैदास का आतिथ्य स्वीकार किया।
चिन्तन और मनन करना।
चिन्तन-मनन से सभी वैसे अवश्य ही हो सकते हैं।
चिन्तन या पश्चाताप छोड़ दो। स्वयं अपने मस्तिष्क के स्वामी बनो। संसार और व्यक्तियों को अपनी राह जाने दो।
चिन्तन करता-करता अन्त में भृंगी ही बन जाता है। अतः आदर्श के सदैव चिन्तन-मनन से सभी वैसे अवश्य ही हो सकते हैं।
चिन्तन करता है तब तक वह अपने में असीम शक्ति पाता है, परन्तु जब वह इस शक्ति का उपयोग व्यक्तिगत स्वार्थ साधन के लिये करने लगता है तो वह अपना विनाश कर लेता है।......... अपने आपको भुलाने से मनुष्य अपना परमात्मा से ऐक्य कर देता है। तब वह शक्तिवान हो जाता है।”
चिन्तन, ॐ का ध्यान और भक्ति तृष्णा की जमी हुई जड़ को उखाड़ फेंकेगी। तुम्हें उनको जड़ मूल से उखाड़ कर दग्ध कर देना होगा जिससे उनका पुनरुज्जीवन न हो सके। तभी तुम्हें अपने प्रयत्न से निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति होगी।
चिन्तन और मनन।
चिन्तन करते हुए शान्ति प्राप्त करनी चाहिए।
चिन्तन करता है वह उतना ही अधिक मानसिक शक्ति को बढ़ा लेता है।”
चिन्तन करना कि यह संसार एक असार वस्तु है। इस महान् जगत् में असंख्य पिता, माता, पति, स्त्री, बच्चे तथा पितामह चले गये हैं। तुम्हें अपनी मित्र-मण्डली का विद्युत की क्षणिक छटा के समान समझना चाहिए और इसका अपने मन में पुनः पुनः चिन्तन करते हुए शान्ति प्राप्त करनी चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-November
चिन्तन का त्याग करके परमात्मा का चिन्तन करता रहता है एवं बुद्धि भी जड़ पदार्थों में ही तन्मय न रहकर परमात्मज्ञान में अधिकाधिक सूक्ष्मदर्शी होकर दिव्य हो जाती है और इसी प्रकार की विशुद्ध-बुद्धि के द्वारा मायाबद्ध अह की परमगति अथवा मुक्ति होती है। ऐसे मुक्त जीवात्मा, परमगति को प्राप्त व्यक्ति ही सार्वभौम-सेवा-साधना में सफलता प्राप्त कर संसार में शुद्धि के स्रोत चिरस्थायी बनाये रखने में सफल हो सके हैं।
चिन्तन करता रहता है एवं बुद्धि भी जड़ पदार्थों में ही तन्मय न रहकर परमात्मज्ञान में अधिकाधिक सूक्ष्मदर्शी होकर दिव्य हो जाती है और इसी प्रकार की विशुद्ध-बुद्धि के द्वारा मायाबद्ध अह की परमगति अथवा मुक्ति होती है। ऐसे मुक्त जीवात्मा, परमगति को प्राप्त व्यक्ति ही सार्वभौम-सेवा-साधना में सफलता प्राप्त कर संसार में शुद्धि के स्रोत चिरस्थायी बनाये रखने में सफल हो सके हैं।
चिन्तन शक्ति की ओर बुद्धि को क्रियाशील बनाया और हमें शक्ति दी परन्तु उसका परिणाम तो यही हुआ कि हम अधिक स्वार्थी, दम्भी और अत्याचारी बन गए। विज्ञान ने हमारे मन का परिष्कार नहीं किया। कल कारखानों के बनने से जीवनोपयोगी वस्तुओं का उत्पादन कई गुना बढ़ा परन्तु संसार पहले से कहीं अधिक अभावग्रस्त है। वैज्ञानिक अस्त्रों के आविष्कार ने हर प्रकार से मानव जाति को विनाश के संकट में डाल रक्खा है। फिर तो विज्ञान भी बुरा है और धर्म तो बुरा था ही।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-January
चिन्तन करते हुए भी इधर-उधर, दौड़ने का प्रयत्न करता है, ऐसे अस्थिर मन को अनेक क्रियाकलापों से युक्त यज्ञकर्म में जो कि अध्यात्म रूपी फल का देने वाला पुष्प है फँसा दिया जाता है, मंत्रोच्चारण से, तदर्थ भावना से व अग्नि की प्रदीप्त ज्वाला से कुछ सोचने विचारने की प्रेरणा मिलती है। यज्ञमय प्रभु की सृष्टि को देख कर कुछ परोपकार करने की सुध आती है, मन को शान्ति मिलती है, हृदय में आनन्द का सञ्चार होता है, स्वार्थ भावना मिटकर परमार्थ में, दीन दुखियों-अनाथों के त्राण में कल्याण प्रतीत होता है। अरोग्य-सुख-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है अथर्ववेद में एक मन्त्र आता है
चिन्तन करना भी आवश्यक है। गायत्री उपासना में गायत्री ज्ञान का, साहित्य का भी प्रमुख स्थान है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-July
चिन्तन करने वाले पुरुष को उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है, आशक्ति से कामना होती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।
चिन्तन करना और उनके प्रति करुणा भाव का अभ्यास करना ही है। अपने से अधिक गरीब लोगों की धन के द्वारा सेवा करने से अपनी गरीबी का भाव नष्ट हो जाता है। फिर मनुष्य अपने अभाव को न कोसकर अपने आपको भाग्यवान मानने लगता है। उसकी भविष्य की व्यर्थ चिन्ताऐं नष्ट हो जाती हैं। उसमें आत्मविश्वास बढ़ जाता है।
चिन्तन करने वाला व्यक्ति परम-पावन कल्याणकारी लक्ष्मी को प्राप्त कर भुक्ति और मुक्ति का अधिकारी बन जाता है। उसके अन्तर में शेष-भगवान का स्वरूप प्रगट हो जाता है, उसका जीवन कृतार्थ हो जाता है तथा वह लक्ष्मी के परम धाम को प्राप्त होकर धन्य हो जाता है।
चिन्तन किया है। विश्व का कोई भी प्राणी दुःख नहीं चाहता, पर वह मिलता अवश्य है। इसी तरह सभी प्राणी सुख चाहते हैं और निरन्तर उसे पाने के लिए प्रयत्नशील नजर आते हैं, फिर भी सच्चे सुख की अनुभूति विरले महा-पुरुषों के अतिरिक्त और किसी को नहीं आती। यह विश्व का सबसे महान् आश्चर्य है। हमारे विचारक महापुरुषों ने इसी पर तलस्पर्शी गवेषणा की कि सुख एवं दुःख हैं क्या बला और उसकी प्राप्ति-अनुभूति का करण क्या है?
चिन्तन करता रहता है उसका हृदय और वैर भाव से पूरित रहता है। इसलिये यदि कोई तुम्हारे साथ बुराई करे भी तो उसे भूल जाओ, क्योंकि वैर का भाव दूसरे का नहीं अपना ही नाश करने वाला है।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-September
चिन्तन करे और जो विचार उसके मन में उस समय उठें उन्हें ध्यान में रक्खे। वह देखेगा कि वे विचार उस व्यक्ति की भावनाओं को व्यक्त करते हैं। जो व्यक्ति हमसे वास्तविक प्रेम करता है उसके विषय में चिन्तन करते ही हमारे हृदय में प्रेमोदगार उदय होता है और जो व्यक्ति हमसे द्वेष करता है उसके विषय में सोचते ही मन में क्षोभ उत्पन्न होता है। इस प्रेमोदगार और क्षोभ को भली प्रकार से समझने से दूसरे व्यक्ति के हृदय की स्थिति तथा उसकी अपने प्रति धारणा का पता चल सकता है।
चिन्तन करते ही हमारे हृदय में प्रेमोदगार उदय होता है और जो व्यक्ति हमसे द्वेष करता है उसके विषय में सोचते ही मन में क्षोभ उत्पन्न होता है। इस प्रेमोदगार और क्षोभ को भली प्रकार से समझने से दूसरे व्यक्ति के हृदय की स्थिति तथा उसकी अपने प्रति धारणा का पता चल सकता है।
चिन्तन करना आवश्यक है।
चिन्तन करने से बदल जाते हैं। उसमें आत्मभर्त्सना के भाव नष्ट हो जाते हैं और आशा का संचार हो जाता है। मन के आशातीत होने पर रोग का नष्ट होना अनिवार्य है।
चिन्तन से बचकर उसी ओर चलिए। सद्मार्ग पर चलकर ही मन को शान्त रखा जा सकता है। हो सकता है कि प्रारम्भ में मन उधर एकाग्र न हो, पर आत्मा प्रबल तत्त्व है। अतः धीरे-धीरे वह स्वयं उसमें तन्मय होने लगेगा। दुःख का बोझ हलका होगा और हृदय को शान्ति मिलेगी।
चिन्तन या मनन द्वारा सिद्ध होती है। जिस व्यक्ति के जीवन में चिन्तन ने प्रवेश नहीं किया, वह तम्थुष की भाँति स्थिर रह सकता है, चरकी तरह गतिशील नहीं बन सकता। जो गतिशील नहीं है वह विकसित भी नहीं है। आर्य-संस्कृति में ‘जन्मना जायते शूद्रः’ का भी यही अर्थ है। निश्चिन्त, मनन रहित सभी बालकों की संज्ञा शूद्र है।
चिन्तन और मनन से भी ऊपर की है।
चिन्तनशील तो होता ही है, इससे भी ऊपर वह प्रकाश-सम्पन्न बनता है। ब्रह्मतेज से युक्त होकर वह अपनी गतिशील स्थिति से चारों ओर की परिस्थितियों को प्रभावित करता है। उसके संपर्क में आने वाले व्यक्ति इस प्रकाश का अनुभव करते हैं और उधर चलने के लिये उन्मुख होते हैं। दिव्यता का आविर्भाव और उसका प्रभाव ऐसा ही होता है।
चिन्तन से छूट कर ऊँचा उठता है।
चिन्तन करते हुए उसकी प्राप्ति की दिशा में प्रयत्न करता है वही सच्चा-पुरुषार्थी है।
चिन्तन की जननी है। मानव की सार्थकता इसी चिन्तन या मनन द्वारा सिद्ध होती है। जिस व्यक्ति के जीवन में चिन्तन ने प्रवेश नहीं किया, वह तम्थुष की भाँति स्थिर रह सकता है, चरकी तरह गतिशील नहीं बन सकता। जो गतिशील नहीं है वह विकसित भी नहीं है। आर्य-संस्कृति में ‘जन्मना जायते शूद्रः’ का भी यही अर्थ है।
चिन्तन-प्रणाली धन, समृद्धि, वैभव आदि की वृद्धि में अनुभूत होती है। वाणिज्य-व्यवसाय तथा उससे सम्बद्ध अन्य जोखिम से भरे कार्य करने वाले व्यक्तियों की गणना इसी वर्ग में होती है। मनु ने इस वर्ग को सत्यानृत का सम्मिलित वर्ग माना है।
चिन्तन करना और उसकी सेवा करना लाभदायक होता है। निःस्वार्थ सेवा करने से रोगी के हृदय पर चिकित्सक का अधिकार हो जाता है और फिर उसके विचारों को बदल देना सरल हो जाता है।
चिन्तन ने प्रवेश नहीं किया, वह तम्थुष की भाँति स्थिर रह सकता है, चरकी तरह गतिशील नहीं बन सकता। जो गतिशील नहीं है वह विकसित भी नहीं है। आर्य-संस्कृति में ‘जन्मना जायते शूद्रः’ का भी यही अर्थ है। निश्चिन्त, मनन रहित सभी बालकों की संज्ञा शूद्र है। संस्कार सम्पन्न होकर ही वे द्विज कहलाने के अधिकारी बनते हैं।
चिन्तन में संलग्न है, जिसको अध्यात्मविद्या प्राप्त है, जो धर्म पालन के लिये कष्ट सहता है, जिसकी भगवान् के कृपा पात्र के रूप में कीर्ति है, वह तीर्थ के फल को प्राप्त होता है।
चिन्तन करने का व्रत लेता हूँ। बीच में कमी छूट होगी तो उसकी पूर्ति आगे कर लिया करूंगा। नवरात्रियों में सामूहिक जप तथा हवन का भी प्रयत्न करूंगा।
चिन्तन करते हुए मलिनता-खिन्नता रूपी दोष को भगा देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-October
चिन्तनम्। वितथामि निवेशश्च त्रिविधंकर्ममानसम्॥
चिन्तन करो। यह महान् साधना है। गीता के दिव्य विचारों को मन में जमाओ। उपनिषद् और योग वशिष्ठ के उन्नत विचारों का ध्यान करो। आत्मा में अन्दर ही अन्दर बहस करो, ध्यान करो, विचार करो, तर्क करो।
चिन्तन मन का साधारण स्वभाव है। ईश-स्मरण के बजाय वह गन्दे विचारों में तत्काल फंस जाता है। नित्य प्रयत्न और त्याग द्वारा ही परमात्मा की ओर उसे मोड़ना चाहिए। स्वभाव के खिलाफ होने पर भी उसे इस ओर शिक्षित करना होगा। सांसारिक दुख-दर्दों से बचने के लिए और कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
चिन्तन करना, नास्तिकता यह तीन मानसिक पाप हैं॥ 5॥
चिन्तन करके अपना कार्य करता है और भोगी की सारी क्रियायें निज हित के लिये होती हैं। विश्व का कोई भी व्यक्ति त्यागी बने बिना सच्चे यश का अधिकारी नहीं बन सकता।
चिन्तन और ध्यान है। ऐसे योग लाभ के लिये उत्कंठित, उल्लसित भाव से सतत् सावधान रहते हुए सेवा के लिये उद्यत रहना सेवक का प्रथम-कर्तव्य है।
चिन्तन को नहीं समझती उनकी मानसिक भूतियाँ बिखरी हुई होती हैं। केवल विचारक, दार्शनिक एवं योगियों की मानसिक कल्पनाएँ सुव्यवस्थित एवं स्पष्ट होती हैं। एकाग्रता और ध्यान के अभ्यासियों की भावनाएं दृढ़ एवं सुघड़ होती हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-December
चिन्तन करना चाहिये जब तक कि हमें ईश्वरीय सत्ता का कुछ बोध न हो। ईश्वर सर्वत्र समभाव से विराजमान है। इस तरह जब हम उसे पुकारते हैं, तो वह स्वयं हमें अपना परिचय देना प्रारम्भ कर देता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-January
चिन्तन से भरे रखने में और सज्जनोचित आचरण करने में न तो कोई व्यक्ति बाधक हो सकता है और न कारणं आनन्द, उल्लास की स्वर्गीय परिस्थितियाँ यदि हमें सचमुच अभीष्ट हों तो थोड़ा साहस जुटायें और अपने अन्तरंग, बहिरंग जीवनक्रम का परिष्कृत परिवर्तन कर डालें। तब स्वर्ग जैसी आनन्दमयी रसानुभूति हमें हर घड़ी उपलब्ध होती रहेगी।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व से उत्पन्न समर्थता का ही संचय करना पड़ता है।
चिन्तन और आदर्श कर्तव्य के लिए सक्षम बनाने वाले तत्व चिन्तन की आवश्यकता है। विषाक्त अन्न-जल से शरीर, दुर्बल, रुग्ण होता है और अकाल में ही काल कवलित हो जाता है विकृत दृष्टिकोण से मनुष्य में दुर्भावनायें बढ़ती हैं-दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती हैं। वह अनेक आधि−व्याधियों से ग्रसित होकर अपने और अपने समाज के लिए भार बन जाता है। इस विपन्नता से मानवी चेतना को उबारना अपने स्थान पर अति महत्वपूर्ण है। इसे अन्न-जल जुटाने से भी अधिक आवश्यक माना जा सकता है।
चिन्तन में बैठे अज्ञानी बालक के ज्वार से प्रसन्न और भाटा से अप्रसन्न होने की तरह हमें उद्विग्न बनाये रहता है।
चिन्तन और कर्तृत्व से बचें, जो विद्रोह उत्पन्न करता है तो अपना शारीरिक ही नहीं मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य भी अक्षुण्ण बना रह सकता है।
चिन्तन और हर प्रयास सही या सफल ही होगा। सफलता के लिए क्रिया ही काफी नहीं-सतर्कता भी आवश्यक है। भूल न होने पाये इस पक्ष को ध्यान में रखकर फूँक-फूँक कदम बढ़ाने की नीति यदि छोड़ दी जाय और जल्दीबाजी में कुछ भी कर गुजरा जाय तो ऐसे ही दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं जैसे कि जल शोधन सम्बन्धी प्रयास की त्रुटि के संदर्भ में सामने आ रहे हैं।
चिन्तन की आवश्यकता है। विषाक्त अन्न-जल से शरीर, दुर्बल, रुग्ण होता है और अकाल में ही काल कवलित हो जाता है विकृत दृष्टिकोण से मनुष्य में दुर्भावनायें बढ़ती हैं-दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती हैं। वह अनेक आधि−व्याधियों से ग्रसित होकर अपने और अपने समाज के लिए भार बन जाता है। इस विपन्नता से मानवी चेतना को उबारना अपने स्थान पर अति महत्वपूर्ण है। इसे अन्न-जल जुटाने से भी अधिक आवश्यक माना जा सकता है।
चिन्तन का अवसर देने वाली परिस्थितियाँ ही होनी चाहिए स्वर्ग में जिस प्रकार के आनन्द का वर्णन किया जाता है उस प्रकार का ता नहीं पर उच्च लोक में ऐसा वातावरण हो सकता है जहाँ उच्च दृष्टिकोण बनाये रहने की स्थिति हो और वहाँ निरन्तर आनन्द मग्न वाली अनुभूति मिलती रहें।
चिन्तन के चेतन तत्वों से बना होता है उसे यदि कुछ सुखद अनुभूति हो सकती है तो उसका आधार उत्कृष्ट चिन्तन का अवसर देने वाली परिस्थितियाँ ही होनी चाहिए स्वर्ग में जिस प्रकार के आनन्द का वर्णन किया जाता है उस प्रकार का ता नहीं पर उच्च लोक में ऐसा वातावरण हो सकता है जहाँ उच्च दृष्टिकोण बनाये रहने की स्थिति हो और वहाँ निरन्तर आनन्द मग्न वाली अनुभूति मिलती रहें।
चिन्तन और हेय क्रिया-कलाप से व्यक्तित्व को सुसज्जित-सुसंस्कृत बनाया जा सके तो उस सफलता के साथ जुड़ी हुई सरस अनुभूतियों का रसास्वादन निरन्तर होता रहेगा। यही वास्तविक स्वर्ग है।
चिन्तन, व्यवहार को कलात्मक बनायें। व्यवस्था का प्रत्येक क्रिया-कलाप में समावेश करें। सौंदर्यवान अपने प्रत्येक संबद्ध पदार्थ को स्वच्छ बनाये। अपने वचन और व्यवहार जीवन जिया जा सकता है। कलाकारिता का यह अति महत्वपूर्ण क्षेत्र हर किसी के सामने खुला पड़ा है-इस मार्ग पर कदम बढ़ाते हुए हममें से कोई भी सर्वोत्कृष्ट कलाकारिता की उपलब्धि का रसास्वादन कर सकता है।
चिन्तन और कर्तव्य अत्यन्त उच्च कोटि का होता ऐसे नर को नारायण कहा जाता और उसके चरण जहाँ भी पड़ते वहाँ धरती धन्य हो जाती। पर अज्ञान के आवरण को क्या कहा जाय जिसने हमें नर पशु के स्तर पर देखने ओर उसी प्रकार की रीति नीति अपनाने के लिए निष्कृष्टता के गर्त में धकेल दिया है। माया का वही आवरण हमें नारकीय यातनाएँ सहन करते हुए रोता कलपता जीवन व्यतीत करने के लिए विवश करता है।
चिन्तन से समझना होगा और वह काम विज्ञान की मदद से ही कुशलता पूर्वक हो सकता है।
चिन्तनात्मक अभ्यस्त प्रवृत्तियों की सम्पदा से सुसज्जित होना अब मान लिया जायगा तो इस प्रश्न का समाधान होगा कि हारमोन ग्रन्थियों से निकलने वाले अत्यन्त स्वल्प किन्तु अत्यंत शक्तिशाली स्रावों की न्यूनाधिकता जो विभिन्न व्यक्तियों में पाई जाती है उसका कारण क्या है? और उनमें कुछ परिवर्तन करना हो तो उसके लिए ताला खोलने की चाबी कहाँ मिलेगी। जीवन का स्वतन्त्र अस्तित्व शरीर में ऊपर भी विद्यमान है। और उसकी अपनी उपार्जित विभूतियाँ भी रहती है यह मान लेने पर हारमोन अन्वेषण में जो गतिरोध इन दिनों उत्पन्न हो गया है इस प्रश्नवाचक चिन्ह का सहज समाधान निकल जावेगा।
चिन्तन और अपना स्तर ही पर्याप्त होता है। पुष्प की कोमलता, सुषमा ओर सुगन्ध ही उसे हँसते-खिलते रहने के लिए पर्याप्त हैं। उस पर किसी दूसरे द्वारा रंग पोता जाना या सुगन्ध छिड़का जाना अभीष्ट नहीं आदर्शवादी व्यक्तित्व खिले हुए सुगन्धित पुष्प की तरह है जो स्वयं भी धन्य होता है और संपर्क में आने वालों को भी आनन्द प्रदान करता है। ऐसे व्यक्तियों को देव कहा जा सकता है और उनके निवास क्षेत्र को बिना संकोच स्वर्ग घोषित किया जा सकता है। प्रखर विचारों में वह क्षमता होती ही है जिसके आधार पर संपर्क क्षेत्र को स्वर्गीय वातावरण से ओत-प्रोत किया जा सके।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-June
चिन्तन की बालक्रीड़ा में ही न उलझा रहे वरन् वर्तमान के श्रेष्ठतम सदुपयोग की प्रौढ़ बुद्धिमत्ता का परिचय देना स्वीकार करे।
चिन्तन एवं प्रयास जुड़ते हुए वह आधार बन सका था जिसके सहारे उसे अन्तिम रूप से उद्घोषित किया गया। धर्म, दर्शन, अध्यात्म जैसी उच्चस्तरीय भावनात्मक चेतनाएँ किसी एक व्यक्ति की कृति नहीं है। इनके क्रमिक विकास में अनेकानेक पीढ़ियों की सहस्राब्दियां नियोजित हुई है। यह सब सहयोग का ही परिणाम है।
चिन्तन को भूल से सतर्कता पूर्वक बचायें।
चिन्तन और तात्विक सर्वेक्षण की आवश्यकता पड़ती है।
चिन्तन का अभ्यासी बनाया गया है तो या तो परिस्थिति पैदा कर लेगा या फिर सामान्य स्थिति में ही विपरीतता का आरोपण करके विक्षुब्ध रहने लगेगा। इस विक्षुब्धता को ही मानसिक रुग्णता कहा जाता है।
चिन्तन का एवं शरीर संचालन का ही उत्तरदायित्व निभाने तक सीमित नहीं है। उसकी परिधि इतनी व्यापक है कि अतीन्द्रिय अनुभूतियों को भी तथ्य स्वीकार कर लिया जाय।
चिन्तन के क्षेत्र में कितना रस विभोर रह सकने का अवसर प्राप्त किया है यह उसकी भावनात्मक विकास प्रक्रिया का परिचय है। अन्य प्राणी इस दृष्टि से कितने अधिक पिछड़े हुए है उनके साथ तुलना करते हुए प्रतीत होता है कि मनुष्य को वैसा ही श्रेय सौभाग्य मिला है जैसा कि हम अपनी तुलना में देवताओं के बारे में सोचते हैं।
चिन्तन की ही दो चमत्कारी दिशाएँ हैं। इनमें से किसी को भी अपनाया जा सकता है और सन्तुलन को बनाये रह सकना या गँवा बैठना सम्भव हो सकता है।
चिन्तन का उपयुक्त तालमेल न बिठा सकने के कारण अब असंख्य व्यक्ति मानसिक रोगों से ग्रसित होते चले जा रहे हैं। यह अवाँछनीयता महामारी की तरह-आँधी, तूफान की तरह बढ़ रही है और लगता है कि स्वस्थ और सन्तुलित मस्तिष्क वाले व्यक्ति अगले दिनों ढूंढ़ पाना कठिन हो जायगा।
चिन्तन से निकृष्ट कर्म बनते हैं और निकृष्ट गति विधियाँ ही अनेकानेक संकटों का सृजन करती हैं इस तथ्य को जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है। व्यक्ति और समाज की उलझी हुई अगणित समस्याओं का एक ही समाधान है- लोक मानस में गहराई तक घुस पड़ी चिन्तन विकृतियों का निराकरण। इस एक ही शस्त्र हाथ में लेकर हम असुरता की चतुरंगिणी सेना को निरस्त कर सकते हैं। हमें इसी केन्द्र पर केन्द्रित होना है। अपनी गतिविधियों को, अपनी प्रतिभाओं और साधनों को जितना संभव हो इसी महायज्ञ के लिए प्रस्तुत करना है।
चिन्तन की व्याख्या है। इससे भी गहरे अन्तराल में उतरने पर प्रतीत होता है कि उसमें वे दिव्य चेतनाएँ भी भरी हैं जिन्हें अलौकिक और अतींद्रिय कहा जा सकता है। जिनकी व्याख्या सामान्य मस्तिष्कीय गतिविधियों के आधार पर नहीं की जा सकती।
चिन्तन विकृतियों का निराकरण। इस एक ही शस्त्र हाथ में लेकर हम असुरता की चतुरंगिणी सेना को निरस्त कर सकते हैं। हमें इसी केन्द्र पर केन्द्रित होना है। अपनी गतिविधियों को, अपनी प्रतिभाओं और साधनों को जितना संभव हो इसी महायज्ञ के लिए प्रस्तुत करना है।
चिन्तन की धारा बदलने और नये किस्म का कुछ भी सोचने के लिए विवश किया जा सकेगा। अब मस्तिष्क व्यक्तिगत सम्पत्ति न रहकर सार्वजनिक प्रयोग परीक्षण का-क्रीड़ा विनोद का क्षेत्र बनता जा रहा है। पार्क में सैर करने की तरह किसी के मस्तिष्क में भी अनिच्छित विचार प्रवेश कर सकते हैं और उन्हें स्थान देने के लिए किसी भी व्यक्ति को बाध्य किया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-October
चिन्तन और क्रिया क्षेत्र में उच्चस्तरीय आदर्शवादिता का समावेश किया जाय। हमारा कार्य क्षेत्र यही है। धर्म और अध्यात्म की परिधि यही है। इस मर्मस्थल में उत्कृष्टता का समावेश हो सके तो शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में संव्याप्त अनेकानेक उलझनों और कठिनाइयों का सहज समाधान मिल सकता है। अपनी गतिविधियों का निर्माण इसी मान्यता पर आधारित है।
चिन्तन की शृंखला की जा सकती है।
चिन्तन करते रहते हैं और बहुमूल्य मोती ढूँढ़ कर लाते हैं। चिन्तन के सत्परिणामों एवं सम्भावनाओं पर विचार करते रहने में दिलचस्पी बढ़ती है और उसके साथ सुदृढ़ संकल्प एवं नियमित प्रयत्न जुड़ जाने पर एकाग्रता सरल सम्भव होती है और क्रमशः अधिक लम्बी एवं गहरी बनती जाती है।
चिन्तन में अपने आपको खो देने का प्रयत्न किया जाय तो जल्दी ही सफलता मिलने लगती हैं।
चिन्तन का नाम ही नरक है। बाहर वालों को स्पष्ट न दीख पड़ने पर भी सनकी व्यक्ति अपने भीतर बेतरह जलते−कुढ़ते रहते हैं और अपनी बहुमूल्य बौद्धिक क्षमताएँ लाभदायक मार्ग पर नियोजित करने की अपेक्षा अपने और दूसरों के विनाश में नष्ट करते रहते हैं। उलटी चाल का परिणाम उलटा होना निश्चित है। ऊँचा उठने के साधन जुटाने की अपेक्षा यदि कोई नीचे गिरने पर उतारू बना रहे तो वही श्रम परिस्थितियों में जमीन आसमान जितना अन्तर उत्पन्न कर देगा।
चिन्तन में निमग्न हो जाते हैं। इसका अर्थ मस्तिष्क को ठप्प करके किसी नियत बात को ही निरन्तर सोचते रहना नहीं वरन् यह है कि उस प्रसंग की सीमाओं में रह कर जितना अधिक विवेचन विश्लेषण किया जा सकता हो किया जाय। विषय की निर्धारित सीमा से बाहर न भागना ही ध्यान का प्रधान उद्देश्य है। यह सोचना मूर्खता पूर्ण है कि ध्यान में मस्तिष्क जड़ हो जाता है और किसी एक ही प्रतिमा अथवा विचार में डूबा रहता है। ऐसा मस्तिष्कीय संरचना को देखते हुए किसी सामान्य व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं हो सकता।
चिन्तन के बिखराव को एकत्रित करने का अवसर मिलता है। इष्ट देव के वाहन, आयुध, अलंकार, उपकरण आदि की विविधता यह मन को एक सीमित क्षेत्र में चाहे जितनी दौड़ लगाते रहने का अवसर देती है। भाव निष्ठा जुड़ी होने से वह लाभ और भी अधिक बढ़ा−चढ़ा बन जाता है। उसके सत्परिणाम कई प्रकार की चमत्कारी अतीन्द्रिय सिद्धियों के रूप में दृष्टिगोचर होती है।
चिन्तन की इस विशेष शैली को अपनाकर मनुष्य अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी अविच्छिन्न सुख−शान्ति का रसास्वादन करता रहता है।
चिन्तन के विषय को उपयोगी, लाभदायक एवं आवश्यक मान लिया जाय तो मन उसमें जरूर लगेगा। इतने समय तक पूरी तन्मयता रखी ही जानी है यह संकल्प यदि पूरी दृढ़ता के साथ प्रयोग से पूर्व कई बार दुहरा लिया जाय और उसी उत्साह से चिन्तन में अपने आपको खो देने का प्रयत्न किया जाय तो जल्दी ही सफलता मिलने लगती हैं।
चिन्तन और चरित्र को परिष्कृत रखे बिना, मानसिक स्वास्थ्य का सही रह सकना सम्भव नहीं। विकृत दृष्टिकोण अपनाने से, तनिक-तनिक से सामान्य जीवन में अनायास ही आते रहने वाले अवरोध, पर्वत के समान कठिन मालूम पड़ते हैं। असहिष्णु व्यक्ति विचार भिन्नता सहन नहीं कर सकता।
चिन्तन का ही नाम है। ऐसे व्यक्ति कुछ संग्रह तो कर सकते हैं, पर साथ ही बढ़ती हुई तृष्णा के कारण उस सुख से वंचित ही रहते हैं जो उदार रहने पर उन्हें अनवरत रूप से मिलता रह सकता था।
चिन्तन के सत्परिणामों एवं सम्भावनाओं पर विचार करते रहने में दिलचस्पी बढ़ती है और उसके साथ सुदृढ़ संकल्प एवं नियमित प्रयत्न जुड़ जाने पर एकाग्रता सरल सम्भव होती है और क्रमशः अधिक लम्बी एवं गहरी बनती जाती है।
चिन्तन कीजिए।
चिन्तन द्वारा किये गये आत्म निरीक्षण और आत्म निर्माण में सन्निहित है। सद्गुणों की सम्पदा वह स्वर्ण भण्डार है जिसके छोटे−छोटे टुकड़ों के बदले प्रचुर मात्रा में मनोरंजक सामग्री खरीदी जा सकती है।
चिन्तन एवं दृष्टिकोण पर अवलम्बित है। भौतिक और आत्मिक क्षेत्रों में इसी आधार पर प्रगति होती है और इसी कारण अवनति। संसार की सबसे बड़ी सेवा यही है कि आदमी में चिन्तन और क्रिया क्षेत्र में उच्चस्तरीय आदर्शवादिता का समावेश किया जाय। हमारा कार्य क्षेत्र यही है। धर्म और अध्यात्म की परिधि यही है।
चिन्तन और चरित्र की विकृति का निराकरण करके ही गहरी निद्रा का आनन्द ले सकना और शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रहना सम्भव हो सकता है।
चिन्तन की धारा में जो छोटे−मोटे मोड़ या विभाजन लाये जा सकते हों, उनमें तन्मयता को विभक्त कर लिया जाय। किसी विषय के कई पक्ष होते हैं। उनका पहले से ही वर्गीकरण कर लिया जाय और एकाग्र साधना के लिए जितना समय निर्धारित किया है उसे उन खण्डों के विभाजित क्रम के अनुसार काम में लाया जाय। स्वास्थ्य संवर्धन के प्रश्न पर विचार करना हो तो बिगड़ने के कारण, सुधार के लिए परिवर्तन—परिवर्तन के साधन आदि वर्गों में उसे बाँटा जा सकता है और निर्धारित क्रम से उन बातों पर विचार करते हुए, चिन्तन की शृंखला की जा सकती है।
चिन्तन और कर्तृत्व की तीन धाराएँ, जहाँ समन्वित होती हैं वहाँ मनुष्य तीर की तरह सनसनाता हुआ निकलता है और किसी भी लक्ष्य को बेध कर रख देता है। वैज्ञानिकों से लेकर तत्व दर्शियों तक की उपलब्धियों में मात्र एकाग्रता के अनुदान उपहार हैं।
चिन्तन सही और संतुलित हो तो सामान्य स्तर का मस्तिष्क भी पग−पग पर सफलताएँ उत्पन्न करता है और सामान्य परिस्थितियों में रहने पर भी सुव्यवस्थित और सुखी जीवन जिया जा सकता है। इसके विपरित छोटी−छोटी मानसिक विकृतियाँ भी सुविकसित सुशिक्षित मस्तिष्क की क्षमताओं को चौपट करके रख देती हैं। उलझा व्यक्ति स्वयं सनकता रहता है और सम्बंधित लोगों को हैरान करता रहता है। विकृत चिन्तन का नाम ही नरक है। बाहर वालों को स्पष्ट न दीख पड़ने पर भी सनकी व्यक्ति अपने भीतर बेतरह जलते−कुढ़ते रहते हैं और अपनी बहुमूल्य बौद्धिक क्षमताएँ लाभदायक मार्ग पर नियोजित करने की अपेक्षा अपने और दूसरों के विनाश में नष्ट करते रहते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-December
चिन्तन क्षेत्र में जो उच्छृंखलता प्रवेश करेंगी उसके दुष्परिणाम वैसे ही प्रस्तुत होंगे जैसे कि पुराणकाल की कथा गाथाओं में असुरों के नृशंस क्रिया-कलाप का वर्णन पढ़ने-सुनने को मिलता है।
चिन्तन का घटिया स्वरूप है। वस्तुतः दान एक सत्प्रवृत्ति है जो मात्र धन देकर ही नहीं, श्रम, समय, प्रोत्साहन, स्नेह, सत्परामर्श, सहानुभूति आदि के माध्यम से भी उसे चरितार्थ किया जा सकता है। दानी के लिए धनी होना आवश्यक नहीं। निर्धन भी अपने उदार चित के आधार पर धन कुबेरों से भी बढ़ी चढ़ी सेवा सहायता कर सकते हैं। सद्भावना की कमी न हो, स्वभाव में उदारता सम्मिलित हो, दूसरों के दुख में सहायता करने की कसक उठती हो, किसी को सुखी बनाने में रस आता हो तो समझना चाहिए दानशीलता के अनेकानेक आचरण स्वयमेव होते चले जायेंगे और उसके लिए व्यस्त एवं त्रस्त स्थिति में भी पग - पग पर सुअवसर मिलते रहेंगे।
चिन्तन स्वच्छ हो- और आदर्श स्पष्ट हो तो साँसारिक जीवनयापन करते हुए भी इस भव सागर से पार हमारा जीवन जहाज आसानी से तैरते हुए पूर्णता के नियत लक्ष्य तक सरलता पूर्वक पहुँच सकता है।
चिन्तन कई बार ऐसी स्थिति में फंसा देता है जिसमें जीवन को नष्ट कर डालने जैसे जोखिम सामने आ खड़े होते हैं।
चिन्तन विशेष रूप से किया जाना चाहिए और भविष्य के लिए आत्म सुधार की-आत्म निर्माण की सुनिश्चित योजना बनाई जानी चाहिए। लोक-मंगल के लिए समय दान और साधन दान का परिणाम भी अगले वर्ष बढ़ना चाहिए। भौतिक प्रगति की तरह ही आत्मिक प्रगति के लिए भी हमारे अन्तःकरणों में प्रबल उत्कण्ठा उठनी चाहिए। बसन्त पर्व से आदर्शवादी नव-जीवन की उपलब्धि के लिए गत अंक में दिये गये परामर्श को अपने व्यावहारिक जीवन में समाविष्ट करने के लिए समूची साहसिकता और तत्परता को प्रदीप्त करना चाहिए। हर वर्ष बसन्त पर्व नई प्रेरणा और नई चेतना देने के लिए आया करे तभी तो अखण्ड-ज्योति परिवार को सार्थक हुआ होना माना जा सकता है।
चिन्तन एवं दृष्टिकोण की प्रखरता पर निर्भर रहता है। आध्यात्मिक न सही-भौतिक ही सही-किसी भी क्षेत्र में दूसरों को प्रभावित कर सकने वाला व्यक्ति ही सफल हो पाता है। यह आकर्षण वेश विन्यास का नहीं गुण सम्पदा का ही होता है। दुर्गुणी व्यक्ति अपने निकटतम व्यक्तियों को भी रुष्ट रखता है और उनके सहज सहयोग तक से वंचित बना रहता है। इसके विपरीत सद्गुणी अपनी सुगन्ध से रास्ता चलने वालों तक को आकर्षित करता है और उन्हें अपना प्रशंसक मित्र और सहयोगी बना लेता है।
चिन्तन का जो प्रवाह मस्तिष्क में चल पड़ा है उससे भिन्न भी कुछ हो सकता है यह सोचने के लिए अवकाश ही नहीं रहता।
चिन्तन और कर्तृत्व तभी संभव होता है जब भीतरी लिप्सा का खिंचाव, दबाव और तनाव कम हो सके। महामानव को हम सुविकसित व्यक्तित्व की विभूतियों से युक्त देखते हैं यह उनके आन्तरिक परिष्कार विस्तार पर ही निर्भर होता है।
चिन्तन को तिलांजलि देनी पड़ेगी। इस प्रयोजन को जितनी जल्दी पूरा कर सकें उतना ही व्यक्ति और समाज का कल्याण है।
चिन्तन को अपनाने के लिए तत्पर होते हैं, तो अपना आपा ही इतना सर्वांग सुन्दर बन जाता है कि बाहर भटकने की अपेक्षा अन्तरात्मा के आलोक में निरन्तर आनन्द मग्न रहा जा सके। यह आत्मबोध ही यथार्थ ज्ञान है जो इंद्रियानुभूति से नहीं परिष्कृत आत्मचेतना से ही उपलब्ध हो सकता है।
चिन्तन की विवेक दृष्टि उसे कदाचित ही मिल पाती है। यदि वह मिली होती तो निश्चय ही औचित्य को प्रश्रय दिया गया होता और तथाकथित मित्र, परिचित क्या कहते हैं ? इसकी पूर्णतया उपेक्षा करके विवेक के प्रकाश में कदम बढ़ाने का साहस सँजोया होता। महामानव इसी सत्साहस के बल पर स्वयं धन्य बनें हैं और अपने युग को - क्षेत्र को धन्य बनाया है। जीवन-मुक्त पुरुष अवाँछनीय चिन्तन से मुक्त होते हैं और आत्मिक स्वतन्त्रता का आनन्द लेते हैं।
चिन्तन एवं स्वभाव की दृष्टि से भी सुसम्पन्न बनाया जाय। जहाँ यह मान्यता काम कर रही होगी और इसके लिए प्रयत्न चल रहें होगे वहाँ सुसंस्कारिता बढ़ेगी और उसकी बहुमूल्य फसल के घर के लोग यथासमय लाभान्वित होंगे। परिवार के प्रति मोह, ममता तो सभी रखते हैं, पर जहाँ यह दूरदर्शी आकाँक्षा जग रही हो समझना चाहिए कि परिवार के प्रति उत्तरदायित्व निबाहने की बात यहीं बन पड़ रही है।
चिन्तन दिशा परिष्कृत करने के लिए बहुत सरल, सरस और सफल माध्यम है। इसे हर परिवार में आरम्भ किया जाना चाहिए।
चिन्तन की हवा भरी रहे तो हम डूबेंगें नहीं पर यदि भीतर ही हवा के स्थान पर लिप्सा पानी की तरह भरने लगी तो फिर डूबना निश्चित है। तैरना तभी तक संभव है जब तक पानी से हलके परमाणुओं वाली हवा जहाज में भरी रहे। हमारा चिन्तन स्वच्छ हो- और आदर्श स्पष्ट हो तो साँसारिक जीवनयापन करते हुए भी इस भव सागर से पार हमारा जीवन जहाज आसानी से तैरते हुए पूर्णता के नियत लक्ष्य तक सरलता पूर्वक पहुँच सकता है।
चिन्तन की प्रतिक्रिया नारकीय दुख दारिद्रय से भरी हुई होती है और उत्कृष्टता भरी विचारणाओं का प्रतिफल स्वर्ग जैसी सुख शान्ति प्रस्तुत करता रहता है। ईश्वर विश्वास की राह पर चलता हुआ मनुष्य स्वर्गीय वातावरण प्रस्तुत करता है, उसमें स्वयं रहते हुए आनन्द अनुभव करता है और समीपवर्ती क्षेत्र को उसी प्रकाश से दीप्तिवान बनाता है।
चिन्तन में प्रगतिशीलता का समावेश किया ही जाना चाहिए।
चिन्तन का दृष्टिकोण का, अन्तःकरण का, भाव सम्वेदनाओं का कोई मूल्य नहीं समझते जिनके लिए धन और विलास ही सब कुछ है, उन्हें ज्ञान सम्पदा का महत्व बताया, समझाया जा सकना कठिन है। पर जिन्होंने यह समझ लिया है कि मानवी सता चिंतन और चेतना के स्तर पर ही समुन्नत और पतित होती है सम्पन्न और दरिद्र बनती है उन्हें यह स्मरण भर दिलाना पर्याप्त होगा कि शरीर की तरह आत्मिक चेतना की भी कुछ भूख होती है और उसका साधन जुटाना पेट भरने की सामग्री जुटाने से कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही आवश्यकता है। घरेलू पुस्तकालय की स्थापना इसी अभाव की पूर्ति करती है।
चिन्तन से मुक्त होते हैं और आत्मिक स्वतन्त्रता का आनन्द लेते हैं। स्पष्ट है कि ईश्वर भक्तों को संयमी, स्वार्थपरता से रहित, लोकोपयोगी ब्राह्मण और साधु स्तर का जीवन जीना पड़ता है। इसी में मनुष्य जीवन की सार्थकता है। ईश्वर विश्वास अपनाकर हम जीवन लक्ष्य प्राप्त करने की ओर अग्रसर होते हैं और उसे पाकर रहते हैं।
चिन्तन के क्रम और क्रिया-कलापों में बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन चाहता है। सामयिक परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए चिन्तन में प्रगतिशीलता का समावेश किया ही जाना चाहिए।
चिन्तन के इस अपव्यय से बचा जा सके तो उस बचत से बहुत कुछ किया जा सकता है। झगड़ना आसान है पर सृजन के लिए प्रतिभा और परिपक्वता चाहिए। अच्छा यही है कि अपना ध्यान प्रौढ़ता के संग्रह में एकाग्र रखा जाय। प्रामाणिक व्यक्ति यही करते हैं।
चिन्तन इन दोनों अनुदानों की सहज प्राप्ति में अवरोध ही उत्पन्न करता है। यदि प्रार्थना ही करनी है तो क्यों न आनन्द को-उल्लास को अपनायें और उसी के साथ एकाग्र तन्मयता के सूत्र बाँधे।
चिन्तन का निर्वाह उसी स्थिति में सम्भव है और तभी कुछ ऐसा प्रयास सम्भव है जैसा कि जीवन मुक्त महामानवों से बन पड़ता है। ‘मुक्ति’ को जीवन लक्ष्य माना गया है। इसका तात्पर्य इतना ही है कि अमुक वस्तुओं तथा अमुक व्यक्तियों के साथ मनःस्थिति जकड़ी हुई नहीं है। उनकी पकड़ से ऊँची उठ गई और सुविस्तृत क्षेत्र को देख सकने में समर्थ हो गई। उन्मुक्त आकाश में विचरण करते हुए जहाज पर सवार होकर बहुत दूर तक देखा जा सकता है।
चिन्तन करते हुए निर्वाध मैत्री सम्बन्ध बनाये रह सकना सम्भव हो सका।
चिन्तन से भी काम चल सकता है। मित्र की उपस्थिति की अपेक्षा मैत्री की उपस्थिति कितनी अधिक सरस होती है, इसे कोई प्रेमी ही जानता है।
चिन्तन और कर्तव्य को यथार्थता की कसौटी पर कसना चाहिए और अपने गुण, कर्म, स्वभाव को- अभिरुचि एवं आकाँक्षा को सत्य के अधिकतम निकट पहुँचाने का प्रयत्न करना चाहिए। मूढ मान्यताओं से अपना मस्तिष्क घिरा हो सकता है और अपनी आदतों, अभिरुचियों एवं आकाँक्षाओं में गहरी अवाँछनीयता घुसी हो सकती है। इसे समीक्षात्मक बुद्धि से ही जाना परखा जा सकता है। अन्यथा हर मूर्खता और दृष्टता का भी समर्थन करने के लिए कुछ न कुछ तर्क मस्तिष्क में गढ़े ही जाते रहेंगे। हमारा व्यक्तित्व कभी भी परिष्कृत न हो सकेगा।
चिन्तन कर सकने योग्य सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता है। सत्य को प्राप्त कर सकना इसके बिना संभव हो ही नहीं सकता। विकृत बुद्धि तो सत् को असत् आर असत् को सत् ही बताती रहेगी। उसके आधार पर यथार्थता का निर्णय हो ही नहीं सकेगा। तराजू का-विवेक बुद्धि का-भार मुक्त होना वस्तु स्थिति समझने के लिए नितान्त आवश्यक है।
चिन्तन। लोग क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं ? इस बात की ओर उसका ध्यान नहीं होता, वह सदा तथ्यों को ढूंढ़ता है और उचित को अपनाता है; भले ही इस दृष्टि से वह अकेला पड़ता हो और दूसरे उसका उपहास करते हों। स्पष्ट है कि यथार्थता को समझने की और उचित को अपनाने की शक्ति किन्हीं विरले लोगों में ही होती है। ऐसी दशा में उच्चस्तरीय रीति-नीति अपनाने वालों को दूसरों का समर्थन कदाचित ही मिल पाता है, उसे अपनी लम्बी मंजिल अकेले चलकर ही पर करनी पड़ती है।
चिन्तन तथा कर्तव्य का निर्धारण करना चाहिए। अपनी विशेषताओं का उपयोग इसी महान प्रयोजन के लिए करना चाहिए।
चिन्तन अधूरा और अनुपयुक्त होता है। उसमें गलत निर्णय करने- अवास्तविक निष्कर्ष पर पहुँचने ओर अवाँछनीय कार्य कर बैठने का पूरा-पूरा खतरा रहता है। यह एकाँगी चिन्तन कई बार ऐसी स्थिति में फंसा देता है जिसमें जीवन को नष्ट कर डालने जैसे जोखिम सामने आ खड़े होते हैं।
चिन्तन और श्रेष्ठ कर्तव्य तभी संभव है जब मनःस्थिति स्वार्थ और संकीर्णता के वजन से कम लदी हो। स्वतंत्र चिन्तन का निर्वाह उसी स्थिति में सम्भव है और तभी कुछ ऐसा प्रयास सम्भव है जैसा कि जीवन मुक्त महामानवों से बन पड़ता है। ‘मुक्ति’ को जीवन लक्ष्य माना गया है। इसका तात्पर्य इतना ही है कि अमुक वस्तुओं तथा अमुक व्यक्तियों के साथ मनःस्थिति जकड़ी हुई नहीं है। उनकी पकड़ से ऊँची उठ गई और सुविस्तृत क्षेत्र को देख सकने में समर्थ हो गई।
चिन्तन पैर निर्भर रहती है। सामान्य लोगों की दृष्टि में जो परिस्थितियाँ आपत्ति की श्रेणी में गिनी जा सकती है। उनमें कोई मनस्वी व्यक्ति पूर्ण सन्तुष्ट और प्रफुल्लित रह सकता है। इसके विपरीत सर्वजनीन मान्यता जिन साधनों को वैभव मानती है उनके प्रचुर मात्रा में रहते हुए भी कोई व्यक्ति मानसिक विसंगतियों में ग्रसित होकर अत्यन्त दुःखी और उद्विग्न रहता देखा जा सकता है।
चिन्तन के आधार पर बड़े आदमी वे हैं जिनने अपने लोभजन्य परिग्रह का अधिकाधिक भार अपने ऊपर लाद कर रख लिया है। इस दृष्टि से संयम शीलता और परमार्थ परायणता को मूर्खता ही ठहराया जा सकता है। तात्विक विश्लेषण के लिए यथार्थ चिन्तन कर सकने योग्य सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता है। सत्य को प्राप्त कर सकना इसके बिना संभव हो ही नहीं सकता। विकृत बुद्धि तो सत् को असत् आर असत् को सत् ही बताती रहेगी।
चिन्तन और कर्तृत्व के लिए प्रेरणा प्रवाह उत्पन्न करने वाले उद्गम के रूप में युग निर्माण अभियान को देखा समझा जा सकता है। बसन्त पर्व के दिन ही इस युगान्तरीय चेतना का श्रीगणेश हुआ-इस घटना को भगवती सरस्वती के जन्म दिन के साथ संगति मिलाने पर हम लोगों के लिए यह और भी अधिक उत्साहवर्धक बन जाता है।
चिन्तन तो बड़प्पन पाने के साधन संग्रह करने और इस तरह का ठाट बाट रोपने में ही खर्च होता रहता है। पेट की भूख और यौन लिप्सा के बाद सबसे प्रबल आकाँक्षा बड़प्पन पाने की है कई बार तो वह इतनी उग्र होती है कि आदमी उसके लिए भयंकर खतरे उठाने को भी तैयार हो जाता है।
चिन्तन के शिकार रहेंगे और यदि सत्य उन मान्यताओं से भिन्न पड़ता होगा तो उस सत्य को भी असत्य ठहराने में न चूकेंगे। इससे आत्मतुष्टि भले ही हो जाय सत्य की पुष्टि नहीं हो सकती। आवश्यक नहीं कि अपने अभ्यास या संपर्क की मान्यताएं ही सही हों। हो सकता कि वे भी उतनी ही असत्य हो जितना कि आज हम प्रतिपक्षी विचारों को अमान्य ठहराते हैं।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाना पड़ता है। यह सभी आधार आस्तिकतावादी दर्शन में कूट-कूटकर भरे हैं। आज का विकृत अध्यात्म-दर्शन तो मनुष्य को उलटे भ्रम जंजालों में फँसाकर सामान्य व्यक्तियों से भी गई गुजरी स्थिति में धकेलता है, पर यदि उसका यथार्थ स्वरूप विदित हो तो उसे अपनाने का साहस बन पड़े तो निश्चित रूप से परिष्कृत व्यक्तित्व का लाभ मिलेगा। जहाँ यह सफलता मिली वहाँ अन्य सफलताएं हाथ बाँधकर सामने खड़ी दिखाई पड़ेंगीं। महामानवों द्वारा प्रस्तुत किये गये चमत्कारी क्रिया कलाप इसी तथ्य की साक्षी देते हैं।
चिन्तन से क्षोभ बढ़ता है और उपयोगी शक्तियाँ उसी जंजाल में उलझ कर नष्ट हो जाती हैं। यदि चिन्तन के इस अपव्यय से बचा जा सके तो उस बचत से बहुत कुछ किया जा सकता है। झगड़ना आसान है पर सृजन के लिए प्रतिभा और परिपक्वता चाहिए। अच्छा यही है कि अपना ध्यान प्रौढ़ता के संग्रह में एकाग्र रखा जाय। प्रामाणिक व्यक्ति यही करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-March
चिन्तन द्वारा साधन को सींचा जाता है। उसके उपरान्त उसे सस्ती प्रशंसा लूटने के लिए दिखाये जाने वाले चमत्कारों से बचाया जाता है। सिद्धियों को लोभ, मोह के उथले प्रयोजन पूरा करने में भी खर्च किया जा सकता है और अपने को तथा दूसरों को आत्म-कल्याण की दिशा में प्रेरित करने के लिए भी उसका उपयोग हो सकता है। स्वल्प श्रम में अधिक भौतिक सफलताएँ पाना कर्म विज्ञान के विपरीत है। उसके लिए यदि मन्त्र शक्ति का प्रयोग किया जायेगा तो वह देर तक टिक न सकेगी और उसी खिलवाड़ में नष्ट हो जायेगी।
चिन्तन ही है। चेतना इसी प्रभाव में ऊंची उठती या नीचे गिरती है। जो यह विश्लेषण विवेचन कर सकते हैं वे समय विकृतियों को दूर करने के लिए- समस्याओं को सुलझाने के लिए-तत्कालीन दर्शन भ्रष्टता का सूक्ष्मदर्शी निरीक्षण करते हैं और जहाँ कई विकृतियाँ दिखती है वहाँ करारी चोट करके अवाँछनीयता को औचित्य की दिशा में मोड़ते-मरोड़ते हैं। सन्तों, सुधारकों और अवतारों को बार-बार इसी एक प्रयोजन के लिए अपनी असाधारण भूमिका निभानी पड़ती है। अखण्ड ज्योति को यही सब करना पड़ा।
चिन्तन के कन्धों पर समय ने यह गुरुतम भार डाला कि वह बुद्धिवाद और दर्शन का समन्वय करे-भौतिक और आत्मिक तथ्यों को परस्पर संबद्ध करे और द्वैत को मिटा कर अद्वैत की जनमानस की प्रतिष्ठानों करे। कार्य अत्यधिक जटिल है। उसे कुत्ते और बिल्ली का विवाह कराने के समान अशक्य और उपहासास्पद समझा जा सकता है। इतना सब होते इस भी युग की चुनौती स्वीकार की ही जानी चाहिए तर्क, तथ्य एवं प्रमाणों के बुद्धिवादी, विज्ञान-वादी आधारों को लेकर उत्कृष्टता के दर्शन का इस प्रकार प्रतिपादन किया जाना चाहिए कि उसे उपयुक्त ही नहीं, व्यावहारिक एवं उपयोगी भी माना जा सके। समय की विकृतियों-समस्याओं के समाधान में क्या चिन्तन की उत्कृष्टता का भी कोई योगदान हो सकता है जब इस बात को बुद्धि संगत ढंग से खोजा जायगा तो विचारशील वर्ग यह स्वीकार करेगा कि यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है, जिस बुद्धिवाद से आस्तिकता को निरस्त करके भौतिकता को प्रतिष्ठापित किया था वही बुद्धिवाद अब नई धार चढ़ जाने के कारण-नई दिशा मिल जाने के कारण, नास्तिकता को आस्तिकता में, निकृष्टता को उत्कृष्टता में बदल सकने में पूरी तरह समर्थ हो सकता है।
चिन्तन के साथ लिपटी हुई न रहेगी तब तक उसका विकास उस दिशा में न हो सकेगा जिससे कि व्यक्ति और समाज की सुख-शान्ति जुड़ी हुई है। उत्कृष्ट अन्तःस्थिति के बिना किया गया भौतिक उपार्जन विपत्ति का कारण ही बनेगा उससे सौभाग्य का उदय नहीं होगा वरन् दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही उत्पन्न होगी।
चिन्तन और कर्तव्य महान है वस्तुतः उसी भावना शिव की जटाओं की तरह स्तर की मानी जा सकती है कि उस पर मन्त्र शक्ति रूपी अध्यात्म गंगा का अवतरण सम्भव हो सके।
चिन्तन की उत्कृष्टता का भी कोई योगदान हो सकता है जब इस बात को बुद्धि संगत ढंग से खोजा जायगा तो विचारशील वर्ग यह स्वीकार करेगा कि यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है, जिस बुद्धिवाद से आस्तिकता को निरस्त करके भौतिकता को प्रतिष्ठापित किया था वही बुद्धिवाद अब नई धार चढ़ जाने के कारण-नई दिशा मिल जाने के कारण, नास्तिकता को आस्तिकता में, निकृष्टता को उत्कृष्टता में बदल सकने में पूरी तरह समर्थ हो सकता है। इस युग की यह एक बहुत बड़ी दैन है जिस पर अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य गर्व कर सकता है।
चिन्तन में-स्वभाव में, क्रिया-कलाप में जो अवाँछनीय तत्व घुस पड़े हो उन्हें ढूंढ़ने और हटाने में तत्परता पूर्वक जुट जाया जाय। परिष्कृत व्यक्तित्व में जिन गुणों की आवश्यकता पड़ती है उन्हें बढ़ाने का परिपूर्ण प्रयत्न किया जाय।
चिन्तन में लगावें तो जीवन सार्थक हो सकता है। फुरसत की घड़ियों में भी हम व्यस्तता का रंग भर सकें तो जीवन, चित्र की भाँति सुन्दर हो जायेगा।
चिन्तन करने वाले को अपने रंग में रंगकर उसी स्तर की गतिविधियाँ अपनाने के लिए बाध्य कर देते हैं, उनमें शक्ति रहती है। यही शक्ति कल्पनाओं को सफलता के रूप में परिणत करने के साधन जुटाती है और इसी प्रखरता के आधार पर समीपवर्ती क्षेत्र, वातावरण एवं व्यक्तियों को प्रभावित करने वाला आधार बनता है। विचारों की शक्ति का प्रभाव तभी अनुभव किया जा सकता है जब वे प्रौढ़, प्रचण्ड एवं क्षमता सम्पन्न हों।
चिन्तन के क्षेत्र में दर्शन का है। व्यक्ति और समाज की सर्वांगीण प्रगति दोनों को मिलाकर ही हो सकती है। बहिरंग और अंतरंग जीवन को पृथक नहीं किये जा सकते। उभय पक्षीय प्रगति ही सर्वांगीण हो सकती है और उस समन्वय से ही सुख शाँति की स्थिरता रखी जा सकती है।
चिन्तन की अनेकों धाराओं का सम्मिलित प्रयास ही भविष्य सम्भावनाओं को सही रूप में प्रस्तुत कर सकता है। उपरोक्त प्रयत्नों में यह सभी धाराएं समन्वित रखी गई हैं।
चिन्तन के उच्च-स्तरीय आधार टूट चुके। निकृष्ट आकाँक्षाएँ निकृष्ट परिस्थितियों का सृजन कर रही हैं। प्रगति की बात सोचने वाला मनुष्य दिन-दिन सर्वतोमुखी पतन के गर्त में गिरता जाता है। विलासी खिलौनों से खेलने की थोड़ी सुविधा बढ़ जाने पर भी सर्वत्र घुटन, आशंका और निराशा की घटाएँ ही घुमड़ रही हैं। लगता है यह संसार कुछ समय में ऐसा बन जायगा जिसमें शांति से रह सकने की स्थिति किसी को भी उपलब्ध न हो सकेगी।
चिन्तन को विकृत करके हम मानसिक रोगों को बुलाते हैं और आहार-बिहार को भ्रष्ट करके स्वाभाविक शरीर यात्रा को अवरुद्ध करते हैं और बीमारियों को आमन्त्रित करते हैं।
चिन्तन और तज्जनित दुष्ट कर्तव्य। इसका मूल्योच्छेदन किये बिना अन्याय उपायों से सुधार की-प्रगति की बाल-क्रीड़ा ही होती रहेगी पर बनेगा कुछ नहीं।
चिन्तन में दूरदर्शिता का समन्वय, सौम्य शिष्ट व्यवहार हंसी-खुशी का हलका-फुलका वातावरण स्वच्छता एवं सुसज्जा, सद्गुणों का संवर्धन, कलह का समाधान, सफल संयुक्त परिवार के आधार भूत तथ्य, कुरीतियों के दुष्परिणाम, जीवन कला का सामान्य ज्ञान, पग-पग पर विवेकशीलता का उपयोग जैसी अनेकों महत्वपूर्ण जीवन क्रम में कायाकल्प प्रस्तुत कर सकने वाली शिक्षाओं का आवश्यक समावेश करने का प्रयत्न किया गया है और आशा की गई है कि तीन महीने में उत्साहवर्धक तत्वों का समावेश करके घर वापस लौटेंगी।
चिन्तन की चिनगारी का उत्पन्न किया परिवार है। अपनी निज की, अपने परिवार की, देश, समाज, विश्व-मानव की प्राणि मात्र की कुछ ठोस सेवा करने की इच्छा हो तो व्यापक रूप से मनःक्षेत्र में भरी हुई उस गन्दगी को साफ करना चाहिए। जिसकी सडांद से विभिन्न जातियों के विषाणु उत्पन्न होते और एक से एक भयंकर महामारियों का सृजन करते हैं। हर विषाणु को मारने की अपेक्षा-हर रोगी का अलग इलाज करने की योजना बनाने से पहले हमें स्वच्छता अभियान चलाना चाहिए ताकि महामारी के उद्गम स्रोत पर नियन्त्रण प्राप्त किया जा सके।
चिन्तन, दृष्टिकोण अतिमानवों जैसा है। वे अपने सुविकसित सद्गुणों के कारण सामान्य परिस्थितियों में भी असामान्य उपार्जन कर लेते हैं। जो कमाते हैं उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करना जानते हैं। फलतः उतने में ही वे लोग स्वयं भरपूर सुविधा साधनों से भरे लदे रहते हैं। साथ ही अपनी सहज उदारता से अपनी विभूतियों को बादलों की तरह अन्यत्र बिखेरते हुए, अपने कर्तव्य के सत्परिणाम देखते हुए, मुदित रहते हैं, प्रमुदित करते हैं।
चिन्तन की प्रत्येक धारा का योगदान लिया जा रहा है। दर्शन, मनोविज्ञान, इतिहास, समाज शास्त्र, नीतिशास्त्र राजनीति, भू-भौतिकी आदि चिन्तन की अनेकों धाराओं का सम्मिलित प्रयास ही भविष्य सम्भावनाओं को सही रूप में प्रस्तुत कर सकता है। उपरोक्त प्रयत्नों में यह सभी धाराएं समन्वित रखी गई हैं।
चिन्तन में उत्कृष्टता और कर्तव्य में आदर्शवादिता का समुचित समावेश कर सकने बाल अध्यात्म धर्म को पुनर्जीवित किया जाय? जन-मानस के भावनात्मक परिष्कार का प्रबन्ध किया जाय? विविध आकार-प्रकार की प्रस्तुत अगणित समस्याओं का एक ही समाधान है-भावनात्मक उत्कर्ष। दूसरे शब्दों में इस उसे अध्यात्म धर्म का पुनरुत्थान भी कह सकते हैं जिसे इस देश के नागरिकों ने कभी अपने अन्तःकरण के गहन मर्मस्थलों में कूट-कूट कर भरा था, जिसे अपनी गौरव गरिमा का आधार बनाया और जिसे संसार भर में बिखेर कर मानव जाति को अजस्र सुख-शान्ति का अनुदान प्रदान किया था।
चिन्तन स्तर तक घसीट ले जाना” कहा जा सकता है। श्रेष्ठता का आधार सनातन है-शाश्वत है-निकृष्टता की दिशाएं भी गिनी-चुनी हैं। उतार -चढ़ाव उसी झूले में झूलते रहते हैं, पर पुरानी सुधार प्रक्रिया हर बार नई बदलनी पड़ती है क्योंकि मूल-तथ्य यथा-स्थान रहने पर भी सामयिक परिस्थितियों के साथ जुड़ी हुई विकृतियों का स्वरूप पहले की अपेक्षा सर्वथा भिन्न होता है। भगवान बुद्ध के समय यज्ञीय हिंसा की वाममार्गी असुरता अट्टहास कर रही थी तो स्वामी दयानन्द के समय में पाखण्डी अनाचार गगनचुंबी बना हुआ था। विवेकानन्द ने भारतीय संस्कृति की की अनास्था के दुष्परिणाम देखे और गान्धी ने जनमानस में घुसी हुई पराधीनता प्रिय निराशा को जड़ जमाये पाया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-September
चिन्तन-मन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनि का अवलम्बन लिया जाता है और सरलतापूर्वक लक्ष्य पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ा जाता है।
चिन्तन की भ्रष्टता दृष्टकोण की निकृष्टता अपनाकर हँसी-खुशी का हलका-फुलका जीवन जी सकना असम्भव हो जाता है।
चिन्तन की गहराई में उतरने का अवसर नहीं मिलता अस्तु किसी विषय में प्रवीणता और पारंगतता भी हाथ नहीं लगती। संसार में विशेषज्ञों का स्वागत होता है, यहाँ हर क्षेत्र में ‘ए-वन’ की माँग है और यह उपलब्धि कुशाग्र बुद्धि पर नहीं सघन मनोयोग के साथ सम्बद्ध है। यह मनोयोग का वरदान प्राप्त करने के लिए जो प्रयास व्यायाम करने पड़ते हैं उन्हें ही मनोमय कोश की साधना कहते हैं।
चिन्तन की धारा उसी दिशा में बहेगी। मन को दिशा देने वाली मूल सत्ता का नाम ‘आत्मा’ है।
चिन्तन, कर्तृव्य शरीर और कुटुम्ब के भौतिक लाभों तक सीमित रखने वाला भव-बन्धनों में जकड़ा जीव है। मुक्त उसे कहा जायगा जिसने अपनेपन की, आत्म-भाव की परिधि को अधिकाधिक विस्तृत बना लिया है। जिसके लिए समस्त विश्व अपना परिवार है। समस्त प्राणी जिसके अपने कुटुम्बी है। औरों के दुख को अपना दुख मानकर जो उसके निराकरण का प्रयास करता है।
चिन्तन, मनन जैसी सेवा साधना के आधार पर प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय। हर कुविचार की काट कर देना और कुकर्म में प्रतिरोध कर सकना सद्गुरु का ब्रह्म तेजस है जिसके कारण उसे ब्रह्मानि की उपमा दी गई हैं। सत्पवृत्तियों को उभार सकना-सद्भावनाओं को समर्थ बना सकना-सद्गुरु का अनुदान वरदान है। जब अपना अन्तःकरण ज्ञान भक्ति की विविध साधना से सम्पन्न होकर शिष्य के व्यक्तित्व का छा जाने योग्य बन जाय तो समझना चाहिए कि सच्चे सद्गुरु के मिलन का सौभाग्य प्राप्त हो गया। शिष्यत्व के साथ जो दीक्षा संकल्प जुड़ा रहता है वह यही है कि सद्गुरु के निर्देश को शिरोधार्य किया जायगा उसकी प्रेरणा का सच्चे हृदय से अनुगमन किया जायगा।
चिन्तन से उत्पन्न तनाव को सहज सरलता की जादुई छड़ी से देखते-देखते गायब किया जा सकता है।
चिन्तन क्षेत्र का कोलाहल मनुष्य को एक प्रकार से विक्षिप्त ही बनाकर रख देता है। ऐसा जीवन जीकर भला क्या कोई सुखी रह सकता है।
चिन्तन प्रक्रिया का मनोमय कोश की उपलब्धि कह सकते हैं।
चिन्तन को, आकाँक्षाओं को, क्रिया को उन मर्यादाओं की परिधि में बाँधकर रखता है जिसमें व्यक्ति का चरित्र और समाज का व्यवस्था क्रम अक्षुण्ण बना रह सके। अस्तु दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में समान रुप से उपयोगी है।
चिन्तन को अनुपयोगी प्रवाह में बहने से बचा कर उपयुक्त मार्ग पर सुनियोजित करना मनस्वी होने का प्रधान चिन्ह है। मनोनिग्रह-मनोजय इसी का नाम है। जंगली हाथी को पकड़ कर अनुशासित बनाने का काम तो कठिन है, पर इसकी उपयोगिता अत्यधिक है। जंगली हाथी फसलें उजाड़ते और झोंपड़ियों तोड़ते हैं और भूखे प्यासे अनिश्चित स्थिति में भटकते हैं। किन्तु पालतू बन जाने पर उनकी जीवन चर्या भी सुनिश्चित हो जाती है और साथ ही वे अपने मालिक का भी बहुत हित साधन करते हैं।
चिन्तन और कर्तृत्व इतना असंगत हो सकता है कि फलस्वरुप जीवन भर पश्चाताप करना पड़े और असीम हानि उठानी पड़े। किन्तु आवेगों के प्रवाह में बुद्धि पर पर्दा पड़ जाता है और कुछ सूझ नहीं पड़ता। उन्मत्तों की तरह दूसरों की हत्या, आत्म हत्या न सही ऐसे काम तो सहज ही बन पड़ते हैं जिन पर शान्त मनःस्थिति में विचार करने पर स्वयं ही अपने पर क्रोध आता है। असंख्य मनुष्य ऐसे ही उद्धत कर्म करते हैं अथवा मरे हुए मन से अकर्मण्य बने हुए जीवन की लाश ढोते हैं। स्थिति से उबरने का कोई प्रकाश भी उन्हें नहीं मिलता।
चिन्तन प्रक्रिया को ठप्प कर देना, एक ही ध्यान में निमग्न रहना, नहीं वरन् यह है कि विचारों का प्रवाह नियत निर्धारित प्रयोजन से ही रुचि पूर्वक लगा रहे। यह कुशलता जिनकी करतल गत हो जाती है वे जो भी लक्ष्य निश्चित करते हैं उसमें प्रायः अभीष्ट सफलता ही प्राप्त करके रहते हैं। बिखराव की दशा में चिन्तन की गहराई में उतरने का अवसर नहीं मिलता अस्तु किसी विषय में प्रवीणता और पारंगतता भी हाथ नहीं लगती। संसार में विशेषज्ञों का स्वागत होता है, यहाँ हर क्षेत्र में ‘ए-वन’ की माँग है और यह उपलब्धि कुशाग्र बुद्धि पर नहीं सघन मनोयोग के साथ सम्बद्ध है। यह मनोयोग का वरदान प्राप्त करने के लिए जो प्रयास व्यायाम करने पड़ते हैं उन्हें ही मनोमय कोश की साधना कहते हैं।
चिन्तन में रुचिपूर्वक संलग्न रहता है वह बात भी न बन पाती। अन्तरात्मा की पुकार को निरस्त करने में नशे ने शैतान के प्रमुख शस्त्र का काम किया है।
चिन्तन की अवज्ञा करके किन्हीं पूर्वांग्रहों के साथ ही चिपटे रहने पर बल दिया जा रहा हो। हम यह भूल जाते हैं कि प्रगति की ओर हम क्रमशः ही बढ़े हैं और यह अनादि काल से चला आ रहा क्रम अनन्त काल तक चलता रहेगा। जो पिछले लोगो ने सोचा या किया था वह अन्तिम था उसमें सुधार की गुँजाइश नहीं यह मान बैठने से प्रगति पथ अवरुद्ध हो जाता है और सत्य की खोज के लिए बढ़ते चलने वाले हमारे कदम रुक जाते हैं। विज्ञान ने अपने को भूत पूजा से मुक्त रखा है और पिछली जानकारियों से लाभ उठा कर आगे की उपलब्धियों के लिए प्रयास जारी रखा है। अस्तु वह क्रमशः अधिकाधिक सफल समुन्नत होता चला गया।
चिन्तन का चल पड़ना। आशंकाएँ प्रायः इसी स्तर की होती हैं। दूसरे व्यक्तियों का व्यवहार, परिस्थितियों का प्रवाह निकट भविष्य में हमारे प्रतिकूल चलेगा और उससे भयंकर विपत्ति आवेगी ऐसा चिन्तन कितने ही व्यक्ति करते और अत्यधिक उद्विग्न रहते हैं। जब कि वैसा व्यवहार एवं घटनाक्रम कदाचित ही सामने आता है। अधिकाँश आशंकाएँ निर्मूल होती हैं।
चिन्तन एवं कतृव्य का निर्धारण। लोग अपने को मरण धर्मा मानते हैं, तात्कालिक लाभों को अवाँछनीय होते हुए भी उन्हें ही सब कुछ समझ कर टूट पड़ते हैं और भविष्य को भूलकर उसे अन्धकारमय बनाते हैं। खाओ, पिओ मौज उड़ाओं। कर्ज लेकर मद्यपान करते रहो की नीति अपना कर लोभ, मोह में ग्रसित वासना, तृष्णा के लिए आतुर मनुष्यों का दृष्टिकोण मरण-धर्मा है। उसे अपनाने वाले जीवित मृतक है।
चिन्तन की दिशा और अवाँछनीय परिस्थितियों को बदलने में संलगन होना, जैसे उपाय अपना कर इस घातक मनोविकार से पीछा छुड़ाया जा सकता है जा देखने में छोटा दीखता है, किन्तु जीवन की सरसता और सफलता को नष्ट भ्रष्ट करके रख देता है।
चिन्तन में समर्थ होता तो उसकी दिशा एक ही रहती। सबका सोचना एक ही तरह होता, सदा सर्वदा एक ही तरह का चिंतन बन पड़ता पर लगता है पतंग की तरह मन का उड़ाने वाला भी कोई और है, उसकी आकाँक्षा बदलते ही मस्तिष्क की सारी चिन्तन प्रक्रिया उलट जाती है। मन एक पराधीन उपकरण है-वह किसी दिशा में स्वेच्छा पूर्वक दौड़ नहीं सकता। उसके दौड़ने वाली सत्ता जिस स्थिति में रह रही होगी, चिन्तन की धारा उसी दिशा में बहेगी। मन को दिशा देने वाली मूल सत्ता का नाम ‘आत्मा’ है।
चिन्तन और कतृत्व से विरत नहीं हो सकता। जैसे ही अचिन्त्य चिन्तन मनःक्षेत्र में उभरता है वैसे ही प्रतिरोधी देवतत्व उसके दुष्परिणामों के सम्बन्ध में सचेत करता है और भीतर ही भीतर एक अन्तर्द्वन्द उभरता है। यदि अन्तःचेतना को कुचल-कुचलकर मूर्च्छित न बनाया गया तो वह इतनी प्रखर होती है कि अचिन्त्य चिन्तन के साथ विद्रोह खड़ा कर देती है और उस अवाँछनीय विजातीय तत्व के पैर उखाड़ कर ही दम लेती है।
चिन्तनात्मक दुर्बलता के कारण ऐसे मानसिक रोगों से अपना बचाव कर सकें जो उनके जीवन क्रम को एक प्रकार से अस्तव्यस्त और निरर्थक बना कर रख देते हैं।
चिन्तन का, महत्वाकाँक्षाओं का, कुछ कर सकने का, परिस्थिति का प्रधान योगदान होता है। वह न मिले तो खाद, पानी न मिलने वाले पौधे की तरह ज्वलंत सम्भावनाएँ भी नष्ट हो जाती है। ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा कितनी ही क्यों न हो-पालने वालों की मर्जी के बिना उसका उपयोग कर सकने का नारी के लिए कोई अवसर नहीं। इच्छा तो आखिर हर किसी की कुछ न कुछ होती ही है। उन्हें फलवती करने का जब अधिकार ही नहीं तो आकाँक्षाओं की चिता और राख मनः क्षेत्र में घुटन की दुर्गन्ध ही भरे रहेगी।
चिन्तन सर्वागीण होना चाहिए न कि एकाँकी। रोटी के बिना संन्यासी भी नहीं जी सकता। वह संसार को असार-माया मिथ्या कहता भले ही रहे पर उन पदार्थों के बिना एक दिन का भी गुजारा नहीं जो ‘माया’ के अर्न्तगत आते हैं। पिछले दिनों हम ब्रह्मावाद के बढ़े-चढ़े प्रतिपादन करते रहे है और भौतिक क्षमताओं को उपेक्षित बनाये रहे हैं। फलतः उस एक पक्षीय प्रगति ने हमें भौतिक दृष्टि से दुर्बल बना दिया इस दुर्बलता का लाभ विदेशी आक्रमणकारियों ने उठाया और हमें लम्बे समय तक गुलामी के सिकंजे में कसकर रखा।
चिन्तन की धारा शैतान की आँख की तरह कहीं से कहीं जा पहुँचती है। प्रिय स्वप्न दर्शी भी कई होते हैं जो सुखद कल्पनाओं एवं संभावनाओं के लोग बिना पर लगाये ही उड़ते रहते हैंः उसके ठीक विपरीत खीज ग्रस्त लोगों की मनःस्थिति होती है। छिन्द्रान्वेषण, दोषारोपण, अशुभ भविष्य, अनिष्ट संभाव्य के कुरुप-कई बार तो भयावह तक चित्र सामने आते हैं और आँतक करके आस-पास ही लुके-छिपे आँख मिचौनी करते रहते हैं।
चिन्तन मनःक्षेत्र में उभरता है वैसे ही प्रतिरोधी देवतत्व उसके दुष्परिणामों के सम्बन्ध में सचेत करता है और भीतर ही भीतर एक अन्तर्द्वन्द उभरता है। यदि अन्तःचेतना को कुचल-कुचलकर मूर्च्छित न बनाया गया तो वह इतनी प्रखर होती है कि अचिन्त्य चिन्तन के साथ विद्रोह खड़ा कर देती है और उस अवाँछनीय विजातीय तत्व के पैर उखाड़ कर ही दम लेती है।
चिन्तन में आवेश ग्रस्तता घुस पड़ने पर ही विनिर्मित होती है। यह स्थिति न सुधारी जायगी तो कीट नाशक दवाएँ कोई बड़ा प्रयोजन पूरा न कर सकेंगी।
चिन्तन, प्रभाव एवं धन की मात्रा उन्हें न्यूनतम स्तर तक ले जानी पड़ती है ताकि दूसरों के लिए अधिक से अधिक कर गुजरने के लिए कुछ कहने लायक बचत हो सके। संयम इसी का नाम है। इन्द्रिय संयम तो इस दिशा में चलने की प्रथम सीड़ी है। वस्तुतः वासना और तृष्णा पर संयम करके सादगी भरी मितव्यायी जीवन चर्या बनाना और अपनी उपलब्धियों से संसार में संव्याप्त पीड़ा और पतन का भार हटाने के लिए तत्पर रहना यही है भाव प्रवाह की सत्पथ गामिनी अन्तः चेतना का स्पष्ट परिचय। किसका विज्ञानमय कोश किस स्तर का है इसका पता लगाने के लिए इसी कसौटी को सक्रिय करना पड़ता है।
चिन्तन कितने ही व्यक्ति करते और अत्यधिक उद्विग्न रहते हैं। जब कि वैसा व्यवहार एवं घटनाक्रम कदाचित ही सामने आता है। अधिकाँश आशंकाएँ निर्मूल होती हैं। वे कल्पना लोक की काली घटाएँ बरसती नहीं केवल गर्जन तर्जन करके चली जाती हैं। पर इससे क्या, जिसने आशंकाओं की भयभीत करने वाली कल्पनाओं का जाल बुना था उसके लिए तो वही असह्य पीड़ा देने के लिए बहुत बड़ा कारण बन गया।
चिन्तन के साथ विद्रोह खड़ा कर देती है और उस अवाँछनीय विजातीय तत्व के पैर उखाड़ कर ही दम लेती है।
चिन्तन में अभिरुचि, उत्कृष्ट क्रिया-कलाप में उत्साह, उज्ज्वल भविष्य की आशा, निर्भीक तेजस्विता का उदय, अन्तरंग और बहिरंग क्षेत्र में संव्याप्त अनौचित्य से संघर्ष जैसी अनेक विभूतियाँ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती हैं। शान्ति-कुञ्ज के शिक्षण सत्रों में सम्मिलित होने वाले शिक्षार्थियों ने ऐसी विभूतियाँ क्या कुछ कम पाई? इस दिशा में सूक्ष्म अन्वेषण से जो जाना गया है, उससे यही पता चला है कि वे अपने प्रयास एवं साहस की तुलना में अनेक गुना लाभ प्राप्त कर सकने में सफल हुए हैं। वे अनुभव करते हैं कि इन सत्रों में सम्मिलित होने में जितना समय लगा वह सच्चे अर्थों में सार्थक हुआ और अविस्मरणीय बना। किराये भाड़े में जो पैसा लगा उससे बढ़कर सन्तोष देने वाला खर्च जीवन भर में कभी किसी दान पुण्य में उनसे नहीं बन पड़ा।
चिन्तन भुला देना चाहिए और उज्जवल भविष्य की संभावनाओं के आशा भरे चित्र बनाने चाहिए। जो बीता सो गया। अब उसे लौटाया नहीं जा सकता। अतीत में जो दुखद घटनाएँ घटित हो चुकी उनको बदलना किसी भी प्रकार संभव नहीं। जो लौटाया नहीं जा सकता उसके बारे में सोचना भी निरर्थक है।
चिन्तन और परिष्कृत व्यक्तित्व के राजमार्ग पर चलकर ही उस परम प्रभु तक पहुँचा जा सकता है, जिसे पाना हमारा जीवन-लक्ष्य है।
चिन्तन सम्भव होता आत्मा को परिष्कृत बनाने के लिए अध्यात्म को शरीर को, और समाज को परिपुष्ट करने के लिए समर्थता की आवश्यकता अनुभव करते और तदनुरुप साधन जुटाते। वैज्ञानिक दृष्टि का अर्थ है-मान्यताओं, आग्रहों, आस्थाओं की गुलामी से छुटकारा पाकर यथार्थता को समझ सकने योगय विवेक का अवलम्बन। उसमें अन्ध-विश्वासों और परम्पराओं के लिए कोई स्थान नहीं। तथ्यों और प्रमाणों की कसौटी पर जो खरा उतरे उसी को अपनाना वस्तुतः सत्य की खोज है। इसे हटा देने पर अध्यात्म निष्प्राण ही नहीं, भ्रमोत्पादक और भय संवर्धक बन जाता है।
चिन्तन प्रक्रिया उलट जाती है। मन एक पराधीन उपकरण है-वह किसी दिशा में स्वेच्छा पूर्वक दौड़ नहीं सकता। उसके दौड़ने वाली सत्ता जिस स्थिति में रह रही होगी, चिन्तन की धारा उसी दिशा में बहेगी। मन को दिशा देने वाली मूल सत्ता का नाम ‘आत्मा’ है।
चिन्तन को सुनियोजित करने में सफलता प्रखर-तर्क बुद्धि से उत्पन्न होती है और आत्म-दमन कर सकने की साहसिकता से मनोनिग्रह बन पड़ता है। एकाग्रता का, चित्त-वृत्ति-निरोध का बहुत माहात्म्य योगशास्त्रों में बताया गया है। इसका अर्थ चिन्तन प्रक्रिया को ठप्प कर देना, एक ही ध्यान में निमग्न रहना, नहीं वरन् यह है कि विचारों का प्रवाह नियत निर्धारित प्रयोजन से ही रुचि पूर्वक लगा रहे। यह कुशलता जिनकी करतल गत हो जाती है वे जो भी लक्ष्य निश्चित करते हैं उसमें प्रायः अभीष्ट सफलता ही प्राप्त करके रहते हैं। बिखराव की दशा में चिन्तन की गहराई में उतरने का अवसर नहीं मिलता अस्तु किसी विषय में प्रवीणता और पारंगतता भी हाथ नहीं लगती।
चिन्तन और कतृत्व को विकसित करना विज्ञान है। जिसे अध्यात्म की ही तरह आवश्यक माना जाना चाहिए।
चिन्तन सीमित रखती है। वे शरीर की जीवनी शक्ति मात्र से जीवित रहते हैं। संकल्प बल उनके जीवन-मरण में सहायक नहीं होता। मनुष्य की जिजीविषा इस शरीर के अशक्त-असमर्थ होने पर भी जीवित रख सकती है, पर निम्न वर्ग के प्राणी मात्र सर्दी गर्मी बढ़ने जैसे ऋतु प्रभावों से प्रभावित होकर अपना प्राण त्याग देते हैं उन्हें जीवन संघर्ष के अवरोध में पड़ने की इच्छा नहीं होती। पेट और प्रजनन मात्र के लिए जीवित रहने वाले, जीवन और मरण के संबंध में उदास रहने वाले किसी प्रकार दिन गुजारने भर की बात सोचने तक सीमित रहने वाले निम्न स्तरीय प्राणी अन्न मय कोश तक ही विकसित हो पाये वह नहीं कहा जा सकता है।
चिन्तन एवं आदर्श कतृत्व मात्र से सन्तुष्ट तथा प्रसन्न बनी रहता है। उसे आनन्दित रहने के लिए किसी बाहरी वस्तु-व्यक्ति या परिस्थिति की आवश्यकता नहीं पड़ती। कोई घटना-क्रम-कोई परिवर्तन उसकी स्थिर आनंदानुभूति में व्यवधान डाल सकने में समर्थ नहीं होता। उसे अनुकूल प्रतिकूल हर स्थिति में हँसता, मुसकुराता-हलका फुलका-देखा जा सकता है। नाट के पात्रों की तरह वह अपनी भूमिका भर निवाहता रहता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-November
चिन्तन की निकृष्टता और कर्तृत्व की भ्रष्टता के कारण अन्तःकरण कलुष-कषायों से लद जाता है और फिर भूल−भुलैया में-कंटकाकीर्ण कुपंथ में भटकने के कारण पग-पग पर ठोकरें खानी पड़ती हैं और चुभन सहनी पड़ती हैं।
चिन्तन कुछ भी नहीं। भावनाओं का प्रवाह ही अभीष्ट दिशा में मन बुद्धि चित्त अहंकार को धकेलता घसीटता है। शरीर जड़ पदार्थों का बना है उसमें जड़ता के गुण है। देह में जितनी भी जिस स्तर की भी सक्रियता है उसे चेतन की प्रेरणा ही समझा जाना चाहिए। जल की मानवी चेतना से तुलना करें तो उसे विचारणा और भावना का समन्वय कह सकते हैं।
चिन्तन, समय, श्रम, ज्ञान, कौशल सब कुछ इन दो के इर्द-गिर्द ही मंडराता रहता है। व्यक्तित्व प्रायः कोल्हू का बैल बनकर इसी प्रयोजन में चक्कर काटता रहता है। कहते हैं कि तेल तिल में से निकलता है, पर जीवन का सारा रस जिस कोल्हू में पिलकर बूँद-बूँद निचुड़ जाता है, उन्हें लोभ और मोह के दो दबाव आधार ही कह सकते हैं। पैसा आवश्यक भी है और उपयोगी भी, पर शर्त एक ही है कि उसे विलासिता एवं जमाखोरी के लिए न रखा जाय। उसको उद्देश्यपूर्ण कार्यों में व्यय किया जाय।
चिन्तन अपनाये जाने की आवश्यकता है। जीवन नीति निर्धारण के सम्बन्ध में अपना दृष्टिकोण क्या हो? क्रिया-कलाप किस दिशा में गतिशील हों? इन दो प्रश्नों पर मौलिक रूप से सोचना होगा और अपनी रीति-नीति ऐसे परिष्कृत चिन्तन के आधार पर निर्धारित करनी होगी जो मानव जीवन को सार्थक बनाने की मूलभूत समस्या का विवेकपूर्ण समाधान प्रस्तुत करती हो।
चिन्तन धारायें मिल जुलकर एक ही घेराबन्दी करती है कि मनुष्य पारस्परिक सहयोग की दिशा में अधिक उत्साह के साथ अग्रसर हो और इस मार्ग में जितने भी व्यवधान आते हैं, उन्हें हटाने के लिए पूरी तरह सचेष्ट रहें।
चिन्तन के आधार पर निर्धारित करनी होगी जो मानव जीवन को सार्थक बनाने की मूलभूत समस्या का विवेकपूर्ण समाधान प्रस्तुत करती हो।
चिन्तन की ही भूल है। इच्छित परिस्थितियों का मिलना इतना सुगम नहीं है कि चाहने भर से अनुकूलताएँ उत्पन्न होती चली जाय। अनेक कारणों के मिलने और अभीष्ट साधन जुटाने से ही सफलता मिलती है उसमें भी प्रयत्न साधनों और परिस्थितियों का अनुपात ही होता है। अभिलाषाएँ गढ़ते समय यह ध्यान नहीं रखा जाता है कि साधनों और आकाँक्षाओं में तालमेल है या नहीं। यदि है तो उसके लिए कितने श्रम साधन जुटाने पड़ेंगे कितने अवरोधों से संघर्ष करना होगा और कितनी प्रतीक्षा के उपरान्त चाहना ही पूर्ति होगी।
चिन्तन को ही पर्याप्त मान लेना, फूहड़ और अधूरे काम करने की अस्तव्यस्तता जैसी ही बुराई हैं।
चिन्तन भी शामिल है। इसमें दिवास्वप्न सबसे अधिक देखे जाते हैं विद्वान, वक्ता, लेखक, धनी, पहलवान, जादूगर, योगी, नेता, अभिनेता, महापुरुष आदि रचनात्मक और डाकू, हत्यारा, व्यभिचारी आतंक वादी, आदि बनने के विध्वंसात्मक स्वप्नों में ऐसे लोग उलझे रहते हैं। वैसा बन जाने में सफल होने पर जो आनन्द एवं गौरव मिल सकता है स्वप्नों का केन्द्र बिन्दु वहीं पर अड़ा रहता है। यह सब कैसे हो सकेगा? इसके लिए किस प्रकार की क्षमता परिस्थिति एवं साधन सामग्री जुटानी पड़ेगी इस तथ्य पर सोचने की आवश्यकता ही उन्हें प्रतीत नहीं होती।
चिन्तन से भरे रहते हैं। यह खारी जल निरर्थक ह। उसमें से सार्थकता उतने ही अंश की है जो भाप बर्फ अथवा नदी सरोवरों में मीठे जल की तरह बहता और भरा रहता है। कितने दुर्भाग्य की बात है कि उत्कृष्ट चिन्तन की सरलता मनुष्य जीवन में बहुत स्वल्प देखी जाती हैं यदि उसकी मात्रा बढ़ी चढ़ी होती तो यह संसार न जाने कितना सुखी सन्तुष्ट होता और कितनी अधिक प्रगति कर सकने में सफल हुआ होता।
चिन्तन के फलस्वरूप आनन्द की प्राप्ति का जो माहात्म्य बताया गया है उसका आधार यही है कि वस्तु स्थिति को नये सिरे से समझे और जीवन नीति का नये सिरे से निर्धारण करें।
चिन्तन प्रक्रिया एवं कर्म व्यवस्था के दोनों पक्ष मनुष्य को अधिकाधिक उदात्त एवं परिष्कृत बनने की प्रेरणा देते हैं।
चिन्तन से अहित ही अहित है। उत्साह और विनोद की परिस्थितियाँ न मिलने पर-मित्रता, सहानुभूति, प्रशंसा और प्रोत्साहन न मिलने पर भी मन उदास होता है और थकान अनुभव करता चला जाता है। नीरस जिन्दगी कोल्हू के बैल की तरह चलने वाला ढर्रा मनुष्य की विकासोन्मुख प्रवृत्तियों को कुचल कर रख देता है। ऐसे मनुष्य रोते चीखते मौत के दिन पूरे करते रहते हैं, न उनमें आनन्द होता न उल्लास। भविष्य की अच्छी आशायें गवाँ कर फिर हाथ में रहता ही क्या हैं?
चिन्तन बना रहने पर अभावग्रस्त व्यक्ति भी अपने कर्त्तव्य को महामानवों जैसा प्रस्तुत करता है। व्यक्ति और समाज के सामने आज अगणित शोक-सन्ताप खड़े हैं- गुत्थियां और समस्याएं हल होने में नहीं आतीं-कठिनाइयाँ और विपत्तियाँ बढ़ती ही जाती हैं। न बाहर चैन है और न भीतर सन्तोष। इस सद्भाव दुर्भिक्ष से निपटने के लिए हमें युद्ध स्तर प्रयत्न करने चाहिए।
चिन्तन भी आवश्यक है। इसके लिए मानसिक आलस्य को हटाकर वैज्ञानिकों जैसी गहराई में उतरने की आदत को अभ्यास में सम्मिलित करना होगा। शरीर के आलस्य से काम खराब होते हैं। मन का आलस्य प्रमाद कहलाता है। बात को गंभीरता से पूरी तरह न सोचना, अधूरे चिन्तन को ही पर्याप्त मान लेना, फूहड़ और अधूरे काम करने की अस्तव्यस्तता जैसी ही बुराई हैं।
चिन्तन को लोकोपयोगी प्रयोजनों में लगाने की आकाँक्षा हिलोरें लेने लगें तो समझना चाहिए आत्म विस्तार का आत्मविकास का, आत्म साक्षात्कार का लक्ष्य समीप आ गया।
चिन्तन में समाविष्ट उदारता व्यस्त मनुष्य से भी परमार्थ प्रयोजनों के लिए ढेरों अवकाश निकलवा लेती है और साधन रहित दीखने वाला भी आश्चर्यचकित कर देने वाली श्रद्धाँजलियाँ प्रस्तुत कर सकता है। बड़प्पन की तृष्णा में जितनी घटोत्तरी होगी महानता उसी अनुपात से बढ़ती चली जायेगी।
चिन्तन, दृष्टिकोण किस प्रकार परिष्कृत किया जाय, उनमें गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता का विकास कैसे किया जाय ऐसे तथ्य नहीं ही दिखाई पड़ते हैं। सुसज्जित घर में रहने का आनन्द तो अच्छे होटलों में रहकर भी उठाया जा सकता है। अमीर लोग वैसी सुविधा उपयुक्त सामग्री खरीद कर, प्रशिक्षित नौकर रखकर भी उपलब्ध कर सकते हैं। परिवार का बाह्य अंग ही उस सुव्यवस्था और सुसज्जा को माना जा सकता है, जो गृह-विज्ञान की पुस्तकें लिखी मिलती हैं और स्कूलों में पढ़ाई जाती हैं। यहाँ अभाव उस तन्त्र का बताया जा रहा है जो परिवार के वातावरण को सुसंस्कृत बनाता और जिसमें पले हुए लोग संस्कारवान बनकर निकलते।
चिन्तन तथा कर्तव्य को अधिकाधिक उदात्त बनाया जाय।
चिन्तन तन्त्र का सही उपयोग कर सकने की क्षमता भी सर्व साधारण में उत्पन्न की जाय, इसके लिए मानसिक प्रशिक्षण की एक समर्थ प्रक्रिया खड़ी की जानी चाहिए इसके बिना आत्महत्या जैसे संकट उत्पन्न करने वाले मनोरोगों का भड़कता हुआ दावानल रोका न जा सकेगा।
चिन्तन नहीं कर सकता, जिसे लोगों का अनुकरण करने में ही सन्तोष मिल जाता है, उसे सड़ी जिन्दगी ही जीनी पड़ेगी। विवेक का अनुरोध है कि आज की स्थिति में प्रत्येक जागृत आत्मा को जीवन समस्या पर नये सिरे से विचार करना चाहिए और (1) आत्मा (2) परमात्मा (3) आदर्शवादी परम्परा के तीन सलाहकारों से पूछकर नीति निर्धारण का साहस जुटाना चाहिए। लाख लोग एक पलड़े पर और उपरोक्त तीन परामर्शदाता दूसरे पलड़े पर रखे जायं तो इन तीन का परामर्श ही अधिक श्रेयस्कर सिद्ध होगा।
चिन्तन का निष्कर्ष यही होता है कि कोई न कोई आत्मिक सद्गुण ही उसके मस्तिष्क समेत अनेक क्षमताओं को विकसित करने का आधार हो सकता है। महत्वपूर्ण प्रगति न तो शरीर की संरचना के आधार पर सम्भव होती है और न मस्तिष्कीय तीक्ष्णता पर अवलंबित रहती है। उसका प्रधान कारण अन्तःकरण के कुछ भावनात्मक तत्व ही होते हैं। उन निष्ठाओं की प्रेरणा से इच्छा शक्ति जगती है, सक्रियता एवं तत्परता उत्पन्न होती है। मस्तिष्क तथा शरीर के कलपुर्जे एकजुट होकर काम करते हैं और निष्ठा के अनुरूप दिशा में कदम तेजी से बढ़ाते चले जाते हैं।
चिन्तन का पात्र चुन लेते हैं। वस्तुतः वे व्यक्ति या वे परिस्थिति विक्षोभ कारक उतने नहीं होते जितना कि उन्हें गढ़ लिया गया है।
चिन्तन की आदत उसे बुद्धिमान बनाती चली जाती है। कुशाग्र बुद्धि, सूक्ष्म दृष्टि, वस्तुतः समग्र एवं सर्वतोमुखी चिन्तन की आदत की परिपक्वावस्था ही है। पूरा चिन्तन करने के अभ्यास को ही दूसरे शब्दों में दूरदर्शिता, प्रतिभा सम्पन्नता, कुशाग्र बुद्धि आदि नामों से पुकारा जा सकता है। पूरा काम और पूरा विचार करना उस सतर्कता का परिणाम है जो गहरी दिलचस्पी होने पर ही विकसित होती है। जिसे अपने कामों को पूरा मनोयोग लगाकर करने की आदत है, उसकी प्रगति और सफलता असंदिग्ध बनकर ही रहेगी।
चिन्तन इसके लिए प्रेरणा देता है लक्ष्य तक पहुँचने के लिए चलना तो पैरों को ही पड़ेगा। भावनाओं में प्राणों की प्रतिष्ठापना कर्मनिष्ठा ही करती है। सत्कर्मों में निरत हुए बिना आनन्द की अनुभूति आज तक किसी को भी नहीं हो सकी है।
चिन्तन को नष्ट कर अपराधी प्रवृत्तियाँ को पनपाया जा रहा है इस लिप्सा में पाया कम और खोया अधिक जायगा। जल को दूषित करके हम अपना मरण अपने हाथों आमन्त्रित करते हैं विकृत विचारों को हृदयंगम करके भी व्यक्ति और समाज का सर्वनाश उत्पन्न होगा।
चिन्तन की दैनिक आवश्यकता रहती है। दैनिक कार्यक्रम में शारीरिक और मानसिक गतिविधियों में आवश्यक उलट-फेर करना होता है। अपने आप से लड़ना और अपने आपको प्रशिक्षित करना, इस दुहरी कर्मनिष्ठा का नाम ही शास्त्रकारों ने योग और तप बताया है। इसके लिए अनेकानेक उपासनात्मक कर्मकाण्ड बताये हैं। ईश्वर भक्ति का प्रमुख प्रयोजन यही है।
चिन्तन करने वाले लोगों को मिलता है दूसरों के सुख-दुख में भागीदार होना, उनकी कठिनाइयों को समझना एवं सहायता करना ऐसा गुण है जिसके कारण व्यक्ति लोक प्रिय बनता है। स्नेह, सम्मान एवं श्रद्धा सौजन्य अर्जित करने वाला व्यक्ति वैभव सम्पादित करने में संलग्न, संकीर्ण, स्वार्थपरायण व्यक्तियों की तुलना में कहीं अधिक प्रसन्न रहता है। उसका मनोबल अनायास ही बढ़ता जाता हैं
चिन्तन जैसी काल्पनिकता के आधार पर नहीं हो सकती और न बूढ़ों की तरह उसे अतीत की स्मृतियों की चर्चा करते रहकर पाया जा सकता है।उसके लिए कर्मनिष्ठ तरुणों की तरह वर्तमान से जूझना पड़ेगा। आनन्द गहरे कुँए का जल है जिसे ऊपर लाने के लिए देर तक प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। मोती लाने वाले गहराई में उतरते और जोखिम उठाते हैं। आनन्द पाने के लिए गोताखोरों जैसा साहस और कुँआ खोदने वालों जैसा संकल्प होना चाहिए।
चिन्तन किया जा रहा है उसी आधार पर वह प्रिय अप्रिय लगने लगेगी।
चिन्तन बुरा नहीं पर उसे बीज की तरह गलना और उगना चाहिए अन्यथा नयनाभिराम वटवृक्ष की छाया में बैठकर सरसता का आस्वादन सम्भव न हो सकेगा। ध्यान और योग की अपनी उपयोगिता है।पर उतने भर से सच्चिदानन्द का सान्निध्य सम्भव नहीं। भगवान का कोई स्थिर रूप नहीं वे सक्रियता के रूप में गतिशील हो रहे है। इस विश्व की शोभा स्वच्छता जिस दिव्य गतिशीलता पर निर्भर है।
चिन्तन है जिसे अक्सर सहानुभूति एवं सहायता के लिए अपनाया जाता है। किसी स्वजन के कष्ट निवारक के लिए अपने आप की बलि किसी देवी-देवता पर चढ़ा देना अथवा विवाह योग्य कन्याओं का इसलिए आत्मघात कर बैठना कि इससे उनके अभिभावकों को अर्थ चिन्ता से छुटकारा मिल जायगा- ऐसे ही दुस्साहस भरे कदम हैं। इनमें आदर्शवाद, उदारता, सहानुभूति जैसे तत्वों का पुट तो होता है, पर यह स्मरण नहीं रहता कि इस कदम से अपना बहुमूल्य जीवन ही नष्ट नहीं होगा वरन् जिनके लिए यह सब किया जा रहा है उनकी कठिनाई, चिन्ता एवं विपत्ति और अधिक बढ़ जायगी।
चिन्तन भी प्रेरक बना। आत्मघात का साहस न कर सकने पर अपनी सन्तान की अथवा पशु-पक्षियों की बलि चढ़ा देने की प्रथा तो एक प्रकार से किसी काल में मान्यता प्राप्त धर्म कृत्य बन गई थी और कहीं-कहीं अभी तक उसका प्रचलन मौजूद है।
चिन्तन बताता है कि दुख नग्न सत्य है सुख तो उसका सुसज्जित करने वाला परिधान अलंकार मात्र है।
चिन्तन की सरलता मनुष्य जीवन में बहुत स्वल्प देखी जाती हैं यदि उसकी मात्रा बढ़ी चढ़ी होती तो यह संसार न जाने कितना सुखी सन्तुष्ट होता और कितनी अधिक प्रगति कर सकने में सफल हुआ होता।
चिन्तन और कर्त्तव्य को संजोया जाय। इसके लिए अपने आपको नये सिरे से सुधारा और सजाना पड़ता है। बहुत कुछ भूलना और बहुत कुछ अपनाना पड़ता है इस दुहरे मोर्चे पर धैर्य और साहसपूर्वक अनवरत प्रयास करते रहने का नाम ही साधना है। जीवन-साधना ही वस्तुतः योग, तप, धर्म और अध्यात्म का केन्द्रबिंदु है। जीवन परिष्कार और आत्म साक्षात्कार में शब्दों का ही अन्तर है।
चिन्तन और कर्तृत्व में समाई हुई अवाँछनीयता को पहचानने का प्रयत्न किया जाय और उसे उखाड़ फेंकने के लिए साहस जुटाया जाय। अनुपयुक्त को अपने भीतर से ढूंढ़-ढूंढ़कर बाहर हटाते चलने और उस स्थान पर सत्प्रवृत्तियों का प्रतिष्ठित करने के लिए जिस शौर्य, साहस की आवश्यकता पड़ती है, अध्यात्म भाषा में उसी का नाम आत्मबल एवं ब्रह्मवर्चस् है। योग और तप की साधना इसी प्राप्ति के लिए की जाती है। जिसे जितनी मात्रा में यह दिव्य वरदान मिलता जाता है, वह अन्तरंग विभूतियों और बहिरंग सम्पत्तियों से उसी अनुपात में सुसम्पन्न बनता जाता है। ऋद्धि और सिद्धि उन्हीं आत्मिक और भौतिक सफलताओं का नाम है।
चिन्तन की आदत की परिपक्वावस्था ही है। पूरा चिन्तन करने के अभ्यास को ही दूसरे शब्दों में दूरदर्शिता, प्रतिभा सम्पन्नता, कुशाग्र बुद्धि आदि नामों से पुकारा जा सकता है। पूरा काम और पूरा विचार करना उस सतर्कता का परिणाम है जो गहरी दिलचस्पी होने पर ही विकसित होती है। जिसे अपने कामों को पूरा मनोयोग लगाकर करने की आदत है, उसकी प्रगति और सफलता असंदिग्ध बनकर ही रहेगी।
चिन्तन से सद्विचारों के रूप में और कारण शरीर-अन्तः निष्ठा से-सद्भावनाओं के रूप में ईश्वर का दर्शन स्पर्श किया जा सकता है।
चिन्तन की सही पद्धति यदि समझी और समझाई गई होती तो स्थिति को सहन या सुधारने की अभीष्ट विधि-व्यवस्था अपनाने की आदत डाली गई होती और इन आत्महत्या करने वालों में से अधिकाँश के प्राण बच सकते थे क्योंकि वस्तुतः जीवन सम्पदा को कूड़े-करकट के ढेर में फेंक देने को विवश करने वाली कोई भी विपत्ति इस संसार में है ही नहीं।
चिन्तन का ही काम है। जल का एक महत्वपूर्ण काम विविध विधि मलों को बहाने हटाने और उसके स्थान पर स्वच्छता उत्पन्न करना भी है। विवेक दृष्टि की तरलता पल पल पर उत्पन्न होने वाले विक्षोभों का समाधान करके हमें स्वच्छ संतुलन प्रदान करती है।
चिन्तन करने वाले पति को मिलता है। पत्नी के रूप या गुण प्रसन्नता अप्रसन्नता के कारण समझे जाते हैं पर यह व्याख्या गलत है। वस्तुतः गुणों अथवा दोषों में से किस का किस मात्रा में चिन्तन किया जा रहा है उसी आधार पर वह प्रिय अप्रिय लगने लगेगी।
चिन्तन शास्त्र का विशालकाय कलेवर खड़ा किया है।
चिन्तन करने के अभ्यास को ही दूसरे शब्दों में दूरदर्शिता, प्रतिभा सम्पन्नता, कुशाग्र बुद्धि आदि नामों से पुकारा जा सकता है। पूरा काम और पूरा विचार करना उस सतर्कता का परिणाम है जो गहरी दिलचस्पी होने पर ही विकसित होती है। जिसे अपने कामों को पूरा मनोयोग लगाकर करने की आदत है, उसकी प्रगति और सफलता असंदिग्ध बनकर ही रहेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-May
चिन्तन स्तर के अनुरूप कितनी ही प्रकार की अल्फाबीटा, डेल्टा आदि किरणें निकलती हैं। उनके आयाम और दैर्ध्य चिन्तन का− स्थिति का विवरण प्रस्तुत करते हैं।
चिन्तन अपूर्ण और असन्तुलित रहता है। तत्वदर्शी महामनीषियों ने भगवान राम और भगवान कृष्ण के चरित्र को इन्हीं दोनों तत्वों के व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत किया है। यों उन दिव्य चरित्रों में क्षेपकों का भी दुखद सम्मिश्रण भी कम नहीं हुआ और उनकी प्रखरता धूमिल भी कम नहीं हुई है। तो भी उनके उज्ज्वल पक्ष इतने तेजस्वी हैं कि इतने से भी भारत की धर्म रुचि वाली विकसित जनता को बहुत कुछ सिखाया जा सकता है। संस्कृति के आकाश में चमकने वाले इन सूर्य चन्द्र के धवल चरित्र पर लगाये गये ग्रहण को हटाये जाने और यथार्थता सम्मुख रखकर डगमगाती लोकश्रद्धा को यथा स्थान रखना भी आवश्यक हो गया था।
चिन्तन का प्रवाह वर्तमान स्तर का ही बना रहा और पहल जीवशास्त्रियों के हाथ रही तो नये सिरे से जीवकोषों का ढालना आरम्भ करेंगे और ऐसा मनुष्य पैदा करेंगे जो अन्तर्ग्रही परिस्थितियों में भी अपना निर्वाह कर सके। वर्तमान मनुष्यों की शारीरिक और मानसिक स्थिति को विज्ञान के आधार पर ऐसे मोड़ दिये जा सकते हैं जो भावी परिस्थितियों के साथ सुविधापूर्वक ताल−मेल बिठाये रह सके। उसका शरीर ही नहीं मन भी बदला जा सके, अब इतनी शक्ति विज्ञान के हाथों आ गई है और वह उसका उपयोग समस्त मानव जाति के साथ सत्ताधीशों की सहायता से बलपूर्वक भी कर सकता है। वर्तमान स्तर के मनुष्यों को हटाकर उस स्थान पर नई जाति का मनुष्य भी बनाया जा सकता है।
चिन्तन क्षेत्र में अज्ञान की स्थिति कितनी कष्टकर और कितनी लज्जास्पद परिस्थितियों में मनुष्य को डाले रही हैं।
चिन्तन आध्यात्मिक बन गया है। डॉ. फैंक्ल के अनुसार भोग तृप्ति तथा शक्ति संचय मानसिक स्थिरता नहीं प्रदान करते। मनुष्य के लिए जीवन के लक्ष्य और उनकी सिद्धि आवश्यक है। फैंक्ल की पद्धति के अनुसार मानसिक रोगी से प्रिय−अप्रिय सभी विषयों पर चर्चा करके उसे जीवन का अर्थ ढूँढ़ने की ओर चला देना आवश्यक है। ऐसा रोगी आने अस्तित्व को समझेगा तो उसका मन स्फूर्ति से भर जायगा।
चिन्तन का− स्थिति का विवरण प्रस्तुत करते हैं।
चिन्तन से क्या लाभ? जो कठिनाई आज है उसके सम्बन्ध में इतना सोचना ही पर्याप्त है कि उसे हटाने या घटाने के लिये इस समय अपने हाथ में क्या उपाय है और इस प्रयोजन के लिए निकट भविष्य में क्या साधन जुटाये जा सकते हैं।
चिन्तन और अवकाश की चर्चा का विषय ही शायद उसकी मान्यता में धर्म था। तो महाभिक्षु की ख्याति और प्रभाव सुनकर उन्हें आश्चर्य भी हुआ और औत्सुक्य भी जागा।
चिन्तन करने का अवसर नहीं दिया जाता। बँधी हुई व्यवस्था में व्यक्ति छटपटाता है। मनुष्य में उत्सुकता होती है, उसको जानने को मन बढ़ता है। रोके जाने पर विद्रोह करने की उसकी आतुरता बढ़ जाती है। मन को रोकना पर्याप्त नहीं, उसे दिशा मिलनी चाहिये, जिससे उसे आनन्द मिले।
चिन्तन और स्वभाव में दुर्गन्ध आ रही होगी उसका न तो कोई मित्र होगा और न कोई सहयोगी। शत्रुता और निन्दा का वातावरण ही उसे अपने चारों और घिरा हुआ दिखाई पड़ेगा। भीतर की स्थिति यदि सद्भाव सम्पन्न और शालीनता युक्त है तो उसका चुम्बकत्व सज्जनों का सहयोग अपने इर्द−गिर्द जमा कर देगा।
चिन्तन नष्ट होता रहता है उसकी सहज ही बचत हो सकती है और उस क्षमता को शान-वान की, बड़प्पन प्रदर्शन की मूर्खता से बचाकर किसी उपयोगी काम में लगाया जा सकता है।
चिन्तन नहीं करने देते। मानव में ‘हम’ और ‘वे’ का अन्तर समाज ने उत्पन्न कर दिया। जिसने व्यक्ति का विवेक और व्यक्तित्व नष्ट कर दिया। वह समूह का दास हो गया।
चिन्तन का ज्ञान, स्मृति, बुद्धि, विवेचना एवं इच्छा आदि का कार्यभार सम्भालने वाला अत्यन्त विकसित भाग “सेरिब्रल कार्टेक्स” कहलाता है। मस्तिष्कीय द्रव्य से बनी हुई यह झुर्रीकार परत मस्तिष्क के अग्रभाग और पार्श्वों में लिपटी हुई है। इसकी मोटाई प्रायः एक मिली मीटर है। सूचनाओं का ग्रहण और निर्देशों का प्रसारण करने में इस पट्टी की महत्वपूर्ण भूमिका है।
चिन्तन की परवाह भी क्यों की जाय? सभ्यता के बचने न बचने की चिन्ता क्यों हो? जब कृमिकीटकों से लेकर नर पशुओं की मूल सत्ता वृक्ष वनस्पति स्तर की जड़ मानी जाने लगी तो उसके नष्ट होने में दुख क्यों माना मनाया जाय। घास तो ढेरों कटती हैं-लकड़ी तो ढेरों जलती हैं- जब उसके कटने, जलने में दुख नहीं तो मनुष्यों का कतर-व्योंत कर डालने में, उन्हें जलाने-भूनने में संकोच की आवश्यकता क्या रही?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-August
चिन्तन एवं कर्तृत्व का निर्धारण। लोग अपने का मरणधर्मा मानते हैं, तात्कालिक लाभों को अवाँछनीय होते हुए भी उन्हें ही सब कुछ समझ कर टूट पड़ते हैं और भविष्य को भूलकर उसे अन्धकारमय बनाते हैं। खाओ, पियो मौज उड़ाओ। कर्ज लेकर मद्यपान करते रहो की नीति अपना कर लोभ, मोह में ग्रसित वासना, तृष्णा के लिए आतुर मनुष्यों का दृष्टिकोण मरणधर्मा है। उसे अपनाने वाले जीवित मृतक है।
चिन्तन में समर्थ होता तो उसकी दिशा एक ही रहती। सबका सोचना एक ही तरह होता, सदा सर्वदा एक ही तरह का चिंतन बन पड़ता; पर लगता है पतंग ही तरह मन का उड़ाने वाला भी कोई और है, उसकी आकाँक्षा बदलते ही मस्तिष्क की सारी चिन्तन प्रक्रिया उलट जाती है। मन एक पराधीन उपकरण है- वह किसी दिशा में स्वेच्छा पूर्वक दौड़ नहीं सकता। उसके दौड़ने वाली सत्ता जिस स्थिति में रह रही होगी, चिन्तन की धारा उसी दिशा में बहेगी। मन को दिशा देने वाली मूल सत्ता का नाम ‘आत्मा’ है।
चिन्तन की भ्रष्टता दृष्टिकोण की निकृष्टता अपनाकर हंसी-खुशी का हलका-फुलका जीवन जी सकना असम्भव हो जाता है।
चिन्तन की गहराई में उतरने का अवसर नहीं मिलता अस्तु किसी विषय में प्रवीणता और पारंगतता भी हाथ नहीं लगती। संसार में विशेषज्ञों का स्वागत होता है, यहाँ हर क्षेत्र में ‘ए-वन’ की माँग है और यह उपलब्धि कुशाग्र बुद्धि पर नहीं सघन मनोयोग के साथ सम्बद्ध है। यह मनोयोग का वरदान प्राप्त करने के लिए जो प्रयास व्यायाम करने पड़ते हैं उन्हें ही मनोमय कोश की साधना करते हैं।
चिन्तन मनःक्षेत्र में उभरता है वैसे ही प्रतिरोधी देवतत्व उसके दुष्परिणाम के सम्बन्ध में संचेत करता है और भीतर ही भीतर एक अंतर्द्वंद्व उभरता है। यदि अन्तःचेतना को कुचल-कुचलकर मूर्च्छित न बनाया गया हो तो वह इतनी प्रखर होती है कि अचिन्त्य चिन्तन के साथ विद्रोह खड़ा कर देती है और उस अवाँछनीय विजातीय तत्व के पैर उखाड़ कर ही दम लेती है।
चिन्तन और कर्तृत्व से विरत नहीं हो सकता। जैसे ही अचिन्त्य चिन्तन मनःक्षेत्र में उभरता है वैसे ही प्रतिरोधी देवतत्व उसके दुष्परिणाम के सम्बन्ध में संचेत करता है और भीतर ही भीतर एक अंतर्द्वंद्व उभरता है। यदि अन्तःचेतना को कुचल-कुचलकर मूर्च्छित न बनाया गया हो तो वह इतनी प्रखर होती है कि अचिन्त्य चिन्तन के साथ विद्रोह खड़ा कर देती है और उस अवाँछनीय विजातीय तत्व के पैर उखाड़ कर ही दम लेती है।
चिन्तन की धारा उसी दिशा में बहेगी। मन को दिशा देने वाली मूल सत्ता का नाम ‘आत्मा’ है।
चिन्तन प्रक्रिया को मनोमय कोश की उपलब्धि कह सकते हैं।
चिन्तन, मनन जैसी सेवा साधना के आधार पर प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय। हर कुविचार की काट कर देना और कुकर्म में प्रतिरोध कर सकना सद्गुरु का ब्रह्मा तेजस है जिसके कारण उसे ब्रह्माग्नि की उपमा दी गई है। सत्प्रवृत्तियों को उभार सकना- सद्भावनाओं को समर्थ बना सकना- सद्गुरु का अनुदान वरदान है। जब अपना अन्तःकरण ज्ञान भक्ति की विविध साधना से सम्पन्न होकर शिष्य के व्यक्तित्व पर छा जाने योग्य बन जाय तो समझना चाहिए कि सच्चे सद्गुरु के मिलन का सौभाग्य प्राप्त हो गया। शिष्यत्व के साथ जो दीक्षा संकल्प जुड़ा रहता है वह यही है कि सद्गुरु के निर्देश को शिरोधार्य किया जायगा उसकी प्रेरणा का सच्चे हृदय के अनुगमन किया जायगा।
चिन्तन, प्रभाव एवं धन की मात्रा उन्हें न्यूनतम स्तर तक ले जानी पड़ती है ताकि दूसरों के लिए अधिक से अधिक कर गुजरने के लिए कुछ कहने लायक बचत हो सके। संयम इसी का नाम है। इन्द्रिय संयम तो इस दिशा में चलने की प्रथम सीढ़ी है। वस्तुतः वासना और तृष्णा पर संयम करके सादगी भरी मितव्ययी जीवन चर्या बनाना और अपनी उपलब्धियों से संसार में संव्याप्त पीड़ा और पतन का भार हटाने के लिए तत्पर रहना यही है भाव प्रवाह की सत्पथ गामिनी अन्तःचेतना का स्पष्ट परिचय। किसका विज्ञानमय कोश किस स्तर का है इसका पता लगाने के लिए इसी कसौटी को सक्रिय करना पड़ता है।
चिन्तन सीमित रखती है। वे शरीर की जीवनी शक्ति मात्र से जीवित रहते हैं संकल्प बल उनके जीवन-मरण में सहायक नहीं होता। मनुष्य की जिजीविषा इस शरीर के अशक्त-असमर्थ होने पर भी जीवित रख सकती है, पर निम्न वर्ग के प्राणी मात्र सर्दी गर्मी बढ़ने जैसे ऋतु प्रभावों से प्रभावित होकर अपना प्राण त्याग देते हैं उन्हें जीवन संपर्क के अवरोध में पड़ने की इच्छा नहीं होती। पेट और प्रजनन मात्र के लिए जीवित रहने वाले, जीवन और मरण के संबंध में उदास रहने वाले किसी प्रकार दिन गुजारने मर की बात सोचने तक सीमित रहने वाले निम्न स्तरीय प्राणि अन्न मय कोश तक ही विकसित हो पाये यह नहीं कहा जा सकता है। मनुष्यों में भी कितने ही इसी स्तर के पाये जाते हैं।
चिन्तन में रुचिपूर्वक संलग्न रहता है वह बात भी न बन पाती। अन्तरात्मा की पुकार को निरस्त करने में नशे ने शैतान के प्रमुख शस्त्र का काम किया है।
चिन्तन कितने ही व्यक्ति करते और अत्यधिक उद्विग्न रहते हैं। जब कि वैसा व्यवहार एवं घटनाक्रम कदाचित ही सामने आता है। अधिकाँश आशंकाएं निर्मूल होती हैं। वे कल्पना लोक की काली घटाएं बरसती नहीं केवल गर्जन तर्जन करके चली जाती है। पर इससे क्या, जिसने आशंकाओं की भयभीत करने वाली कल्पनाओं का जल बुना था उसके लिए तो वही असह्य पीड़ा देने के लिए बहुत बड़ा कारण बन गया।
चिन्तन और परिष्कृत व्यक्तित्व के राजमार्ग पर चलकर ही उस परम प्रभु तक पहुँचा जा सकता है; जिसे पाना हमारा जीवन-लक्ष्य है।
चिन्तन भुला देना चाहिए और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं के आशा भरे चित्र बनाने चाहिएं जो बीता सो गया। अब उसे लौटाया नहीं जा सकता। अतीत में जो दुखद घटनाएं घटित हो चुकी उनको बदलना किसी भी प्रकार संभव नहीं। जो लौटाया नहीं जा सकता उसके बारे में सोचना भी निरर्थक है। भविष्य को उज्ज्वल बनाना अपने हाथ में है और उसी की तैयारी में लगा जा सकता है।
चिन्तन और कर्तव्य इतना असंगत हो सकता है कि फलस्वरूप जीवन भर पश्चाताप करना पड़े और असीम हानि उठानी पड़े। किन्तु आवेगों के प्रवाह में बुद्धि पर पर्दा पड़ जाता है और कुछ सूझ नहीं पड़ता। उन्मत्तों की तरह दूसरों की हत्या, आत्महत्या न सही ऐसे काम तो सहज ही बन पड़ते हैं जिन पर शान्त मन स्थिति में विचार करने पर स्वयं ही अपने पर क्रोध आता है। असंख्य मनुष्य ऐसे ही उद्धत कर्म करते हैं अथवा मरे हुए मन से अकर्मण्य बने हुए जीवन की लाश ढोते हैं। स्थिति से उबरने का कोई प्रकाश भी उन्हें नहीं मिलता।
चिन्तन से उत्पन्न तनाव को सहज सरलता की जादुई छड़ी से देखते देखते गायब किया जा सकता है।
चिन्तन प्रक्रिया उलट जाती है। मन एक पराधीन उपकरण है- वह किसी दिशा में स्वेच्छा पूर्वक दौड़ नहीं सकता। उसके दौड़ने वाली सत्ता जिस स्थिति में रह रही होगी, चिन्तन की धारा उसी दिशा में बहेगी। मन को दिशा देने वाली मूल सत्ता का नाम ‘आत्मा’ है।
चिन्तन-मनन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लिया जाता है और सरलतापूर्वक लक्ष्यपूर्ति की दिशा में आगे बढ़ा जाता है।
चिन्तन की अवज्ञा करके किन्हीं पूर्वाग्रहों को साथ ही चिपटे रहने पर बल दिया जा रहा हो। हम यह भूल जाते हैं कि प्रगति की ओर हम क्रमशः ही बढ़े है और यह अनादि काल से चला आ रहा क्रम अनन्त काल तक चलता रहेगा। जो पिछले लोगों ने सोचा था किया था वह अन्तिम था उसमें सुधार की गुँजाइश नहीं यह मान बैठने से प्रगति पथ अवरुद्ध हो जाता है। और सत्य की खोज के लिए बढ़ते चलने वाले हमारे कदम रुक जाते हैं। विज्ञान ने अपने को भूत पूजा से मुक्त रखा है और पिछली जानकारियों से लाभ उठा कर आगे की उपलब्धियों के लिए प्रयास जारी रखा हैं।
चिन्तन सर्वांगीण होना चाहिए न कि एकाँकी। रोटी के बिना संन्यासी भी नहीं जी सकता। वह संसार को असार- माया मिथ्या कहता भले ही रहे पर उन पदार्थों के बिना एक दिन का भी गुजारा नहीं जो ‘माया’ के अंतर्गत आते हैं। पिछले दिनों हम ब्रह्मवाद के बढ़े-चढ़े प्रतिपादन करते रहें। और भौतिक क्षमताओं को उपेक्षित बनाये रहे हैं फलतः उस एक पक्षीय प्रगति ने हमें भौतिक दृष्टि से दुर्बल बना दिया इस दुर्बलता का लाभ विदेशी आक्रमणकारियों ने उठाया और हमें लंबे समय तक गुलामी के शिकंजे में कसकर रखा।
चिन्तन की धारा शैतान की आँख की तरह कही से कही जा पहुँचती है। प्रिय स्वप्न दर्शी भी कई होते हैं। जो सुखद कल्पनाओं एवं संभावनाओं के लोग बिना पर लगाये ही उड़ते रहते हैं। उसके ठीक विपरीत खीज ग्रस्त लोगों की मनःस्थिति होती हैं छिद्रान्वेषण, दोषारोपण अशुभ भविष्य अनिष्ट संभाव्य के कुरूप - कई बार तो भयावह तक चित्र समाने आते हैं और आतंक करके आस-पास ही लुके-छिपे आँख मिचौली करते रहते हैं।
चिन्तन में आवेश ग्रस्तता घुस पड़ने पर ही विनिर्मित होती है। यह स्थिति न सुधारी जायेगी तो कीटनाशक दवाएं कोई बड़ा प्रयोजन पूरा न कर सकेगी।
चिन्तन के साथ विद्रोह खड़ा कर देती है और उस अवाँछनीय विजातीय तत्व के पैर उखाड़ कर ही दम लेती है।
चिन्तन को अनुपयोगी प्रवाह में बहने से बचा कर उपर्युक्त मार्ग पर सुनियोजित करना मनस्वी होने का प्रधान चिन्ह हैं। मनोनिग्रह-मनोजय इसी का नाम है। जंगली हाथी को पकड़ कर अनुशासित बनाने का काम तो कठिन हैं, पर इसकी उपयोगिता अत्यधिक हैं। जंगली हाथी फसलें उजाड़ते और झोपड़ियाँ तोड़ते हैं और भूखे प्यासे अनिश्चित स्थिति में भटकते हैं। किन्तु पालतू बन जाने पर उनकी जीवन चर्या भी सुनिश्चित हो जाती हैं और साथ ही वे अपने मालिक का भी बहुत हित साधन करते हैं।
चिन्तनात्मक दुर्बलता के कारण ऐसे मानसिक रोगों से अपना बचाव कर सकें तो उनके जीवन क्रम को एक प्रकार से अस्त−व्यस्त और निरर्थक बनाकर रख देते हैं।
चिन्तन को सुनियोजित करने में सफलता प्रखर-तर्क बुद्धि से उत्पन्न होती है और आत्म-दमन कर सकने की साहसिकता से मनोनिग्रह वन पड़ता है। एकाग्रता का, चित-वृत्ति-निरोध का बहुत माहात्म्य योगशास्त्रों में बताया गया है। इसका अर्थ चिंतन प्रक्रिया को ठप्प कर देना, एक ही ध्यान में निमग्न रहना, नहीं वरन् यह है कि विचारों का प्रवाह नियत निर्धारित प्रयोजन से ही रुचि पूर्वक लगा रहे। यह कुशलता जिनकी करतल गत हो जाती है वे जो भी लक्ष्य निश्चित करते हैं उसमें प्रायः अभीष्ट सफलता ही प्राप्त करके होते हैं। बिखराव की दशा में चिन्तन की गहराई में उतरने का अवसर नहीं मिलता अस्तु किसी विषय में प्रवीणता और पारंगतता भी हाथ नहीं लगती।
चिन्तन का, महत्वाकांक्षाओं का, कुछ कर सकने का, परिस्थिति का प्रधान योगदान होता है। वह न मिले तो खाद, पानी न मिलने वाले पौधे की तरह ज्वलंत संभावनाएं भी नष्ट हो जाती है। ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा कितनी ही क्यों न हो-पालने वालों की मर्जी के बिना उसका उपयोग कर सकने का नारी के लिए कोई अवसर नहीं। इच्छा तो आखिर हर किसी को कुछ न कुछ होती ही है। उन्हें फलवती करने का जब अधिकार ही नहीं तो आकांक्षाओं की चिता और राख मनः क्षेत्र में घुटने की दुर्गन्ध ही भरे रहेगी।
चिन्तन का चल पड़ना। आशंकाएं प्रायः इसी स्तर की होती है। दूसरे व्यक्तियों का व्यवहार, परिस्थितियों का प्रवाह निकट भविष्य में हमारे प्रतिकूल चलेगा और उससे भयंकर विपत्ति आवेगी ऐसा चिन्तन कितने ही व्यक्ति करते और अत्यधिक उद्विग्न रहते हैं। जब कि वैसा व्यवहार एवं घटनाक्रम कदाचित ही सामने आता है। अधिकाँश आशंकाएं निर्मूल होती हैं।
चिन्तन में अभिरुचि, उत्कृष्ट क्रियाकलाप में उत्साह, उज्ज्वल भविष्य की आशा, निर्भीक तेजस्विता का उदय, अन्तरंग और बहिरंग क्षेत्र में संव्याप्त अनौचित्य से संघर्ष जैसी अनेक विभूतियाँ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है। शान्ति-कुंज के शिक्षण सत्रों में सम्मिलित होने वाले शिक्षार्थियों ने ऐसी विभूतियाँ क्या कुछ कम पाई ? इस दिशा में सूक्ष्म अन्वेषण से जो जाना गया है, उससे यही पता चलता है कि वे अपने प्रयास एवं साहस की तुलना में अनेक गुना लाभ प्राप्त कर सकने में सफल हुए है। वे अनुभव करते हैं कि इन सत्रों में सम्मिलित होने में जितना समय लगा वह सच्चे अर्थों में सार्थक हुआ और अविस्मरणीय बना। किराये भाड़े में जो पैसा लगा उससे बढ़कर सन्तोष देने वाला खर्च जीवन भर में कमी किसी दान पुण्य में उनसे नहीं वन पड़ा।
चिन्तन को, आकांक्षाओं को, क्रिया को उन मर्यादाओं की परिधि में बाँधकर रखता है जिसमें व्यक्ति का चरित्र और समाज का व्यवस्था क्रम अक्षुण्ण बना रह सकें। अस्तु दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में समान रूप से उपयोगी हैं।
चिन्तन, कर्तृत्व शरीर और कुटुम्ब के भौतिक लाभों तक सीमित रखने वाला भव-बन्धनों में जकड़ा जीव है। मुक्त उसे कहा जायगा जिसने अपनेपन की, आत्म-भाव की परिधि को अधिकाधिक विस्तृत बना लिया है। जिसके लिए समस्त विश्व अपना परिवार है। समस्त प्राणी जिसके अपने कुटुम्बी है। औरों के सुख को अपना दुख मानकर जो उसके निराकरण का प्रयास करता है।
चिन्तन एवं आदर्श कर्त्तृत्व मात्र से सन्तुष्ट तथा प्रसन्न बना रहता है। उसे आनन्दित रहने के लिए किसी बाहरी वस्तु-व्यक्ति या परिस्थिति की आवश्यकता नहीं पड़ती। कोई घटना-क्रम-कोई परिवर्तन उसकी स्थिर आनंदानुभूति में व्यवधान डाल सकने में समर्थ नहीं होता। उसे अनुकूल प्रतिकूल हर स्थिति में हँसता, मुसकराता-हल्का फुलका-देखा जा सकता है। नाटक के पात्रों की तरह वह अपनी भूमिका भर निबाहता रहता है।
चिन्तन और कर्तृत्व को विकसित करना विज्ञान है। जिसे अध्यात्म की ही तरह आवश्यक माना जाना चाहिए।
चिन्तन सम्भव होता आत्मा को परिष्कृत बनाने के लिए अध्यात्मिक को शरीर को, और समाज को परिपुष्ट करने के लिए समर्थता की आवश्यकता अनुभव करते और तद्नुरूप साधन जुटाते। वैज्ञानिक दृष्टि का अर्थ है- मान्यताओं आग्रहों, आस्थाओं की गुलामी से छुटकारा पाकर यथार्थता को समझ सकने योग्य विवेक का अवलम्बन। उसमें अन्धविश्वासों और परम्पराओं के लिए कोई स्थान नहीं। तथ्यों और प्रमाणों की कसौटी पर जो खरा उतरे उसी को अपनाना वस्तुतः सत्य की खोज है। इसे हटा देने पर अध्यात्म निष्प्राण ही नहीं, भ्रमोत्पादक और भय संवर्धक बन जाता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-February
चिन्तन और श्रेष्ठ कर्तृत्व अपना सकता है। इन्हीं दो साधनों के सहारे अपूर्णता को पूर्णता में परिणत करने का अवसर मिलता है और जीवन लक्ष्य पूरा होता है। लम्बी यात्रा इसी सफलता की प्राप्ति के लिए करनी पड़ती है जब तक गन्तव्य स्थान तक नहीं पहुँच जाते तब तक अशान्ति में ही भटकना पड़ेगा।
चिन्तन और आदर्श कर्तव्यों की दो टाँगें ही इस यात्रा को पूरी करा सकती हैं। उन्हें लोभ और मोह के आक्रमण से बचाना चाहिए अन्यथा घायल होने पर वे चरण आगे बढ़ ही न सकेंगे और वह बहुमूल्य अवसर हाथ से चला जायेगा जिसे गँवा देने पर मात्र पश्चाताप से हाथ मलते रहने के सिवाय और कुछ शेष न रहे।
चिन्तन और अकर्म करण को अपनाने का दुस्साहस भी किया गया, पर सृष्टि व्यवस्था ने उसे भी कहाँ पूरा होने दिया। तृप्ति के क्षण आने से हपले इतनी आत्म-प्रताड़ना सहनी पड़ी कि उपभोग की सारी सरसता ही नष्ट होकर रह गई। जो मिला वह इतना अधिक दुष्परिणाम साथ लाया कि कामना पूर्ति के सुख की अपेक्षा व्यथा वेदना भरा पश्चाताप अपेक्षाकृत कष्टसाध्य ही सिद्ध हुआ।
चिन्तन और आदर्श कर्तव्य के साथ एकाकार हो गया है और उसकी पूजा श्रेष्ठ व्यक्तित्व एवं समाज के लिए प्रस्तुत किये गये अनुकरणीय अनुदानों के रूप में ही मानी जानी जा रही है। यह ईश्वर का मनुष्य जाति के साथ-साथ प्रगति पथ पर बढ़ता हुआ साहसिक चरण है।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की प्रेरणा देने वाले उपनिषद् प्रतिपादित उस अध्यात्म दर्शन में है जिसे प्राचीन काल में ब्रह्मविद्या कहा जाता था - जिसके आधार पर व्यक्ति अपनी सता का समष्टि में - समर्पण करता था। आत्मा को परमात्मा स्तर तक पहुँचाना - नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम, अणु को विभु - लघु को महान बनाना जिसका लक्ष्य था। चिन्तन स्तर की अन्तरंग उमंगें ही बहिरंग जीवन पर आच्छादित होती हैं। उन्हीं से परिस्थितियाँ बनती हैं, घटनाएं घटती हैं और दिशाएं मुड़ती हैं। अध्यात्म शिक्षा का उद्देश्य इसी भावनात्मक मानवी मर्मस्थल को परिष्कृत और सन्तुलित करना होना चाहिए।
चिन्तन और स्वतन्त्र पुरुषार्थ में चाहे खतरा ही क्यों न हो वह कठोर परावलम्बन की अपेक्षा कहीं अधिक उत्तम होता है। मोहग्रस्त अभिभावक अपने प्रियजनों के प्रति कभी न्याय नहीं कर सकते और न उनके स्वस्थ विकास में कोई महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
चिन्तन, भावनाएं और कर्म ही स्वर्ग और नरक का निर्माण करती है। अपने लिए-समस्त संसार के लिए हम स्वर्ग का सृजन करें अथवा नरक का निर्माण करें यह हमारी इच्छा और चेष्टा पर पूर्णतया निर्भर हैं।
चिन्तन के स्वरूप को - ऊँचा उठाना है। अपनी सता और दिशा को परिष्कृत करना है। पदार्थों और व्यक्तियों के प्रति दृष्टिकोण का परिमार्जन करना है। वस्तुतः योग एक दर्शन है। सर्वत्र आत्म-सत्ता की अनुभूति से विश्व मानव की - विश्व परिवार की भावना विकसित होती है और स्नेह-सौजन्य का उभार आता है।
चिन्तन स्तर की अन्तरंग उमंगें ही बहिरंग जीवन पर आच्छादित होती हैं। उन्हीं से परिस्थितियाँ बनती हैं, घटनाएं घटती हैं और दिशाएं मुड़ती हैं। अध्यात्म शिक्षा का उद्देश्य इसी भावनात्मक मानवी मर्मस्थल को परिष्कृत और सन्तुलित करना होना चाहिए। योग की - सार्थकता इसी प्रयास की सफलता के साथ जोड़ी आँकी जानी चाहिए।
चिन्तन परिजनों को उस दिशा में धकेल सके तो समझना चाहिए कि इस वर्ष का बसन्तोत्सव सच्चे अर्थों में सार्थक हो गया। अध्यात्म का स्वरूप समझाने में अखण्ड-ज्योति को सफलता मिली यदि वह कुछ ऐसे व्यक्ति विनिर्मित कर सके जो अपने जीवन को अध्यात्म आदर्शों के अनुरूप प्रस्तुत करे तो समझना चाहिए अखण्ड-ज्योति का अब तक का जीवन श्रम सार्थक हो गया। 38 वें जन्म दिन पर इसी सफलता के लिए प्रबुद्ध परिजनों से साहसिक कदम बढ़ाने की अपेक्षा है।
चिन्तन अपनाते हैं और एक पक्षीय दुराग्रह के लिए अड़े बैठे रहते हैं।
चिन्तन करने पर अध्यात्म की शरण में जाने का ही एकमात्र उपाय सूझता है। भूतकाल के ऋषि युग की सुख-शान्ति का उज्ज्वल इतिहास उन्हें समाधान के लिए अपनी ओर आने के लिए आकर्षित आमन्त्रित करता है। अस्तु भारतीय अध्यात्म की ओर उनकी प्रवृत्ति छाई हुई विपत्ति के अनुपात से तीव्रगति से उभर रही हो तो आश्चर्य की बात नहीं।
चिन्तन के साथ-साथ कदम से कदम मिलाकर चलता आया है। भय और लोभ की व्यक्तिवादी आकाँक्षाओं से आगे बढ़कर मनुष्य अधिकाधिक समाज पर निर्भर होते चलने की स्थिति में यह समझने के लिए बाध्य हुआ कि समूहगत हलचलें मनुष्य को अत्यधिक प्रभावित करती हैं। पारस्परिक सहयोग असहयोग के, नीति पालन और उल्लंघन के क्रिया-कलाप अधिकारिक सुविधा-असुविधा उत्पन्न करते हैं। सुख और दुख यही परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं। अतएव व्यक्ति और समाज की नीति-मर्यादाओं को अधिक सबल अधिक परिष्कृत बनाया जाय।
चिन्तन करना चाहिए और यदि कुछ अन्तः प्रकाश उत्पन्न हो तो अगले वर्ष अपने समय, श्रम, मनोयोग एवं मन का कोई महत्वपूर्ण अंश युग की पुकार को पूरा करने के लिए नियत करना चाहिए। जितना स्वार्थ पर अंकुश लगाया जा सकेगा उतने अनुपात में परमार्थ बन पड़ेगा। सादगी, संयम, अपरिग्रह और स्वल्प संतोष की आध्यात्मिक आस्थाएँ बढ़ाई जा सके तो अपने पास इतना अधिक वैभव दृष्टिगोचर होगा कि उसे युग देवता के चरणों पर समर्पित करके अध्यात्म को अपने को सच्चे अर्थों में प्रकाश पुँज सिद्ध किया जा सके।
चिन्तन को भवानी शंकर की उपमा दे सकें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-July
चिन्तन कर सकने की आदत बढ़ जाय तो इस संदर्भ में आशातीत और आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ हस्तगत होती है।
चिन्तनरत रहता है। कई बार तो यह चिन्तन अत्यंत व्यस्त और उद्विग्न होता है। ऐसी स्थिति में वहाँ उत्तेजना और तनाव की मात्रा बढ़ी रहना स्वाभाविक है। इस उद्विग्नता के तूफान में उन विशिष्ठ केन्द्रों की स्थिति दयनीय हो जाती है जो अतीन्द्रिय चेतना को विकसित करके उसे ‘दिव्य’ बना सकते हैं।
चिन्तन के आधार पर ऐसे उपाय सामने आ सकते हैं जिनसे वर्तमान परिस्थिति के रहते हुए भी कुटुम्ब के लोग अधिक उन्नति कर सके अधिक सुख पा सकें।
चिन्तन का अभ्यास करे सद्व्यवहार की रीति-नीति अपनाये, अपने को दूसरों के साथ और दूसरों को अपने साथ घुला मिला कर देखे। आत्म विस्तार का यही रास्ता है।
चिन्तन के घोड़े दौड़ाते हुए उसे आये दिन देखा जा सकता है। कभी कुछ कभी कुछ खब्त सवार रहता है।
चिन्तन एवं आकाँक्षाओं को केन्द्रीकरण किसी विशेष बिन्दु पर हो जाता तो मनुष्य उसी उधेड़−बुन में लगा रहता है और हर घड़ी उसी प्रयोजन के लिये अपनी हलचलें गतिशील रखता है। इस प्रकार विचारणा, आस्था और क्रिया का जहाँ भी त्रिविध समन्वय होता है वहाँ अत्यन्त ही प्रचण्ड मस्तिष्कीय ऊर्जा विनिसृत होती है। शक्तिशाली झरने के रूप में वह धारा फूटती है और अवरोधों से टकराती हुई प्रवाहशील सरिता की नाई अपनी महत्वपूर्ण भूमिका संपादित करती हैं
चिन्तन पर टिकी हुई है यदि कम उम्र का व्यक्ति अपने आपको प्रौढ़ समझे और तद्नुरूप उत्तरदायित्व ओढ़े तो वह प्रौढ़ों की भूमिका प्रस्तुत कर सकता है। इसके विपरीत उपेक्षा और अवसाद से जवानी बुढ़ापे में बदल सकती हैं। बुढ़ापे में जवान भी रहा जा सकता है यह सब कुछ मनुष्य के साहस, उत्साह, श्रम, उत्तरदायित्व निर्वाह और दृष्टिकोण पर निर्भर है। कम आयु में परिष्कृत व्यक्तित्व का परिचय देने वाले मूर्धन्य व्यक्तियों की संख्या भी संसार में कम नहीं रही है।
चिन्तन पद्धति के साथ किया जाना चाहिए। इस पद्धति के तीन अंग हैं- (1) जीवन के स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग को समझना और उसके अनुरूप गतिविधियों का निर्माण करना, (2 “हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत” सूत्र के अनुसार जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग करने के लिए दिन भर की शारीरिक कार्य पद्धति एवं मानसिक विचार पद्धति का निर्धारण करना। (3 रात को सोते समय मृत्यु के समय आवश्यक वैराग्य का अनुभव करना। इन तीन चिन्तन क्रम में से दो को प्रातः और तीसरे को रात्रि के सोते समय प्रयुक्त करना चाहिए।
चिन्तन वस्तुतः अदृश्य रूप से किया जाने वाला कर्म ही है। क्रिया शक्ति को बर्बाद करना और विचार शक्ति को निरर्थक बखेरना वस्तुतः एक ही भूल के दो रूप है।
चिन्तन अत्यंत व्यस्त और उद्विग्न होता है। ऐसी स्थिति में वहाँ उत्तेजना और तनाव की मात्रा बढ़ी रहना स्वाभाविक है। इस उद्विग्नता के तूफान में उन विशिष्ठ केन्द्रों की स्थिति दयनीय हो जाती है जो अतीन्द्रिय चेतना को विकसित करके उसे ‘दिव्य’ बना सकते हैं।
चिन्तन एवं क्रिया कलाप में उलझनें से भय, आशंका दुराव, उमंग नियंत्रण आवेश आदि का संमिश्रण कई प्रकार के मानसिक रोग उत्पन्न कर देते हैं। जो बच्चियाँ छोटी आयु में बहुत ही सरल थी वे इस विचित्र स्थिति में पड़ कर अपना मानसिक संतुलन गँवाती और सनकी, अव्यवस्थित बनती दीखती है।
चिन्तन को एकत्रित करते हैं। छोटे से आतिशी शीशे के घेरे में बिखरी हुई सूर्य किरणों को जब एक केन्द्रबिन्दु पर एकत्रित कर लिया जाता है तो उससे प्रचण्ड गर्मी उत्पन्न होती है आग जलने लगती है। ठीक यही बात विचारों के केन्द्रीकरण के सम्बन्ध में लागू होती है यदि किसी निर्धारित लक्ष्य पर देर तक गम्भीरतापूर्वक चिन्तन कर सकने की आदत बढ़ जाय तो इस संदर्भ में आशातीत और आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ हस्तगत होती है।
चिन्तन का निवारण व जन-मानस में परिष्कृत दृष्टिकोण का प्रतिष्ठापन यही है हमारा विचार क्रान्ति अभियान- यही है इस युग का सर्वोपरि महत्वपूर्ण धर्मानुष्ठान -ज्ञान-यज्ञ। युग-निर्माण योजना इन्हीं प्रयत्नों में प्राण -प्रण से संलग्न है। उसने अपने प्रभाव क्षेत्र में एक ही बात गले उतारने का प्रयत्न किया है कि पुण्य परमार्थ की बात यदि किसी के मन में तनिक भी हो तो उसे अस्त व्यस्त दिशाओं में बखेरें नहीं केवल युग धर्म को ही प्राथमिकता दें और जनमानस के परिष्कार प्रयत्नों में विचार क्रान्ति अभियान में अपना, अपने परिवार का और समस्त मानव जाति का हित साधन देखें और इस विषम बेला में ध्यान योगी की तरह इसी एक लक्ष्य पर केन्द्रीभूत रखें।
चिन्तन के लिए कुछ उपयोगी आधारों के संकेत हैं। ऐसी अनेकों धाराएँ हैं जिन पर हमारी विचार शक्ति यदि केन्द्रित रखी जा सके तो उसके परिणाम निश्चित रूप से श्रेयष्कर होंगे। ऐसा सम्भव तभी होगा जब अस्त-व्यस्त रीति से असंबद्ध विचार करते रहने की मानसिक बर्बादी के कारण उत्पन्न होने वाली क्षति को समझें और उसे रोकने के लिए साहसपूर्ण कदम बढ़ाये।
चिन्तन तन्त्र पर पड़ने वाला एक अनावश्यक भार है।
चिन्तन क्रम में से दो को प्रातः और तीसरे को रात्रि के सोते समय प्रयुक्त करना चाहिए।
चिन्तन की संकीर्णता को ही स्वार्थपरता कहा जाता है। जो लोग आज की - अभी की ही बात सोचते हैं और भविष्य की कठिनाइयों का ध्यान नहीं रखते वे अदूरदर्शी है। जिनने अपनेपन का दायरा निज के शरीर, परिवार तक सीमित रखा है वे स्वार्थी है अदूरदर्शी और स्वार्थी लोग दूर की बात सोच नहीं पाते और प्रगति के लिए जिस विस्तृत परिधि को ध्यान में रखना पड़ता है उसे देख नहीं पाते फलतः उसकी संकीर्ण स्वार्थपरता अन्ततः घाटे के व्यवसाय की तरह हानिकार ही सिद्ध होती है।
चिन्तन शक्ति एवं साधन शक्ति जुटाने से लेकर झोंकने तक की तैयारी युद्ध स्तरीय योजना जैसी करनी पड़ेगी।
चिन्तन होता रहे। इस कार्य के लिए पन्द्रह मिनट से लेकर आधा घन्टे का समय पर्याप्त होना चाहिए। उस निर्धारित दिनचर्या को कागज पर नोट कर लेना चाहिए और समय-समय पर जाँचते रहना चाहिए कि निर्धारण के अनुरूप कार्यक्रम चल रहा है या नहीं? जहाँ भी चूक होती हो वही उसे तुरंत सुधारना चाहिए। यदि सतर्कतापूर्वक दिनचर्या के पालन का ध्यान रखा जाय, शारीरिक आलस्य और मानसिक प्रमाणिकता से पग-पग पर लड़ते रहा जाय तो प्रातःकाल की निर्धारित योजना रात को सोते समय तक ठीक ही चलती रहेगी।
चिन्तन की है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-April
चिन्तन एवं अनुभव के आधार पर जो जाना जाता है उतना ही ‘ज्ञान’ नहीं हैं वरन् चेतना का एक विलक्षण स्तर भी है जिसे अन्तर्ज्ञान कहा जा सकता है। संसार के महान आविष्कार इस अन्तर्ज्ञान प्रज्ञा के सहारे ही मस्तिष्क पर उतरे हैं। जिन बातों का कोई आधार न था उनकी सूझ अचानक कहाँ से उतरी? इसका उत्तर सहज ही नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उसका कोई संगत एवं व्यवस्थित कारण नहीं हैं। रहस्यमय अनुभूतियाँ जिस प्रजा से प्रादुर्भूत होती है उन्हें अति मानवीय मानना पड़ेगा।
चिन्तन के द्वारा वह प्रदूषित होता रहता है। इन्द्रियों का प्रेरक भी वहीं है, इसलिए उसी की शुद्धि का निरन्तर ध्यान एवं प्रयत्न करना चाहिए। योग सूत्र में ‘चित्त वृत्ति निरोध’ को योग कहा गया है, जबकि निरोध करना सहज कार्य नहीं है, अस्तु सर्वप्रथम चित्त को अशुभ से हटाकर शुभ प्रवृत्तियों में लगाना चाहिए क्योंकि चित्त को कुछ न कुछ अवलम्बन तो अपेक्षित ही है। यदि उच्चादर्श एवं ध्येय में हम लगे रहेंगे तो बुरी आदतों की ओर हमारा ध्यान नहीं जायगा और यदि कभी गया भी तो बुरा करने के लिए समय ही न मिलेगा। गीताकार ने कहा है− ‘जहाँ तक जीवन है कुछ न कुछ प्रवृत्ति तो करनी ही पड़ेगी, पर आसक्ति का परित्याग कर दें तो विष के निकल जाने से हमें नुकसान नहीं पहुँच सकेगा।
चिन्तन एवं क्रान्ति-अभियान के फलस्वरूप अन्ततः अपराधी मनोवृत्ति घटने लगती हैं। छुटपुट छिपते-भागते देवों पर दानव सदैव हावी रहे। पर उन्हीं देवों की संगठित शक्ति असुरता के विनाश में समर्थ हो गयी। पलायनवादी मानव स्वार्थ परायणता की भौतिक चिन्तन धारा में मोड़ लाकर अपने आचरण सुधारें।
चिन्तन शक्ति की तत्परता को ‘मनन’ कहते हैं। मनन के आधार पर आत्म−बोध होता है और आत्मा के अस्तित्व को−गौरव को अनुभव करते हुए उसकी क्षुधा पूरी करने की आकाँक्षा जागृत होती हैं। जबकि अविकसित प्राणी पेट और प्रजनन के साधन जुटाने की परिधि से आगे की बात सोच ही नहीं सकते। उनके भीतर मात्र प्रकृति प्रेरणा ही काम करती हैं। उन्हें मनुष्य जैसा उत्कृष्ट चिन्तन तन्त्र मिली ही नहीं जिसके आधार पर मनन कर सकना सम्भव हो सके जो अभिनव उद्देश्य की पूर्ति के लिए तड़पन उठा सके।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की परिधि में ही सम्भव होता है।
चिन्तन एवं दिशा निर्धारण की दृष्टि से भी प्रस्तुत पत्रिका से बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार जो कुछ भी नहीं कर सकते, पर अभियान में दिलचस्पी रखते हैं उनके लिए भी उसका वाचन आवश्यक है। कहना न होगा कि अब तक जिस घिसे-पिटे ढंग से महिला समस्या पर सोचा जाता रहा है- लिखा पढ़ा और किया जाता रहा है उसकी अपेक्षा अपना चिन्तन सर्वथा मौलिक और विशिष्ट स्तर का ही होगा और ऐसा होगा जिसमें हर किसी की रुचि होनी चाहिए। क्योंकि नारी समस्या हर किसी को कहीं न कहीं से निश्चय ही प्रभावित करती है। माता, पुत्री भगिनी और पत्नी के रूप में ही नहीं, मानव तत्व का आधा पक्ष होने के कारण नारी समस्त विश्व की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सता है।
चिन्तन करते−करते उसने यह मान्यता बना ली कि वह दो बार शुक्र ग्रह की यात्रा कर चुका है− वहाँ के राजकुमार को अपना मित्र बना चुका है और ऐसी एक कम्पनी बनाने में उसका सहयोग प्राप्त कर चुका है जो उसके कल्पित ‘मैगनेटिक फ्लस मोडलेटर’ सिद्धान्त के अनुसार सस्ते, सरल और सुविधाजनक अन्तरिक्षयान बनाया करेगी। उसने इस कम्पनी का नाम रखा “प्रोपल्सन रिसर्च लेवोरेटरीज” बर्नी अपने को संसार का सर्व प्रथम शुक्र ग्रह यात्री मानता था और उसने अपनी दो यात्राओं का विवरण बताने वाली पुस्तक “शुक्र ग्रह में दो सप्ताह” भी लिखी वह 118 पृष्ठ की थी। उसकी सीमित प्रतियाँ टाइप की गई थी प्रेस में नहीं छपाई गई थीं। क्योंकि विषय ‘अत्यन्त गोपनीय था’ इस आविष्कार के आधार पर ‘अरबों खरबों की सम्पत्ति कमाई” जानी थी।
चिन्तन तन्त्र मिली ही नहीं जिसके आधार पर मनन कर सकना सम्भव हो सके जो अभिनव उद्देश्य की पूर्ति के लिए तड़पन उठा सके।
चिन्तन प्रक्रिया समुद्र मंथन जैसी आन्तरिक हल−चल उत्पन्न करती है और इस नतीजे पर पहुँचाती है कि नियन्ता के अनुदान को सार्थक बनाया जाय। मानव−जीवन की गरिमा को मूर्तिमान किया जाय, ऐसा निर्णय जब गंभीरतापूर्वक किया जाता है तो उसी मार्ग पर चलने का साहस भी उत्पन्न होता है और पुराने ढर्रे की आदतें, प्रेरणाएँ छोड़ने में देर नहीं लगती। उस मार्ग पर अग्रसर होने से रोकने वाले अवरोध एवं परामर्श भी तब निस्सार प्रतीत होते हैं और उनके सामने झुकने में उतनी ही लज्जा अनुभव होती है, जितनी कि पशु स्तर के मनुष्यों को आदर्शवादी रीति−नीति अपनाने में झिझक लगती हैं।
चिन्तन करने की शैली को बदलना चाहिए। अपने में छोटे और पिछड़े हुए लोग यदि दृष्टि में रहें तो जो मिला हैं वह भी सुखद और पर्याप्त होता रहेगा और अपने को सुखी अनुभव करने की मनःस्थिति सदा ही बनी रहेगी समुन्नत लोगों को अपना गुरु मानें, उनने जिन सद्गुणों को अपनाकर प्रगति की है, उन्हें अपनाने, बढ़ाने का प्रयास करें। इस क्षेत्र में तुलना करते हुए जो बढ़ाना आवश्यक उसे बढ़ायें तो बड़ों के साथ की जाने वाली तुलना श्रेयस्कर हो सकती हैं। दुखों से स्थायी निवृत्ति और सुख की सुस्थिर उपलब्धि का यही मार्ग हैं। प्रगति के लिए प्रयास तो तत्परतापूर्वक करें पर दुखी किसी भी स्थिति न रहें यही बुद्धिमत्ता है।
चिन्तन क्षेत्र में ही वरन् कार्यान्वित भी किये जा रहे हैं। इस दिशा में कई देश बहुत आगे हैं।
चिन्तन और धन के अभाव में सम्भव ही नहीं हो पाता। जो कुछ है वह इसी गृहस्थ की भट्टी में जलता चला जाता है।
चिन्तन एवं किया−कलाप भिन्न दिशाओं में चलता है−भिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होता है। नर−पशुओं के लिए इतना ही पर्याप्त है कि इन्द्रियजन्य वासनाओं और मनोजन्य तृष्णाओं की एक सीमा तक पूर्ति कर सकें। अर्थ संग्रह एवं परिवार विस्तार में एक हद तक सफल हो सकें। पेट और प्रजनन के प्रयोजनों में निरत रहना उनकी कामनाओं को पूर्ण करने के लिए आवश्यक भी रहता है और पर्याप्त भी।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व मनन मंथन की महानतम उपलब्धि है। आत्म−बल का उदय इसी पृष्ठभूमि पर होता है और उसी के प्रकाश में ऐसा नीति निर्धारण बन पड़ता है जिसे देवोपम कहा जा सके। मनुष्य मनुष्यों के बीच पाई जाने वाली निष्कृष्टता और महानता की भिन्नता का यही है आन्तरिक विवेचन−विश्लेषण।
चिन्तन नहीं करना पड़ता।
चिन्तन और कर्तृत्व को अवरुद्ध नहीं करता वह उसका स्तर ऊँचा उठाता है। आत्म−निरीक्षण, आत्मसुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की बात सोचता है। इसका प्रयोजन केवल इतना ही है कि सोचने और करने के घटिया स्तर को ऊँचा उठाकर वैसा बनाया जाय जिससे मानवता गौरवान्वित हो− आत्मा को सन्तोष मिले और व्यक्तित्व को देव स्तर का विकसित हुआ माना जाय।
चिन्तन सर्वथा मौलिक और विशिष्ट स्तर का ही होगा और ऐसा होगा जिसमें हर किसी की रुचि होनी चाहिए। क्योंकि नारी समस्या हर किसी को कहीं न कहीं से निश्चय ही प्रभावित करती है। माता, पुत्री भगिनी और पत्नी के रूप में ही नहीं, मानव तत्व का आधा पक्ष होने के कारण नारी समस्त विश्व की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सता है। उस में दिलचस्पी रखना अपने आप में रुचि रखने का ही दूसरा नाम है।
चिन्तन का समावेश किया जाय और अपनी कार्य−पद्धति के साथ आदर्शवादी क्रिया−कलाप जोड़ कर रखा जाय। दोनों के समन्वय का नाम है परिष्कृत व्यक्तित्व। आत्मा को इसी स्तर पर पहुँचने की आकुलता रहती है। उसका निर्माण जिन तत्वों से हुआ है वे इससे कम ऊँचाई पर रहकर सन्तुष्ट ही नहीं हो सकते। मनन के फलस्वरूप जब यह विश्वास होता है कि हमारा अस्तित्व मात्र काया तक सीमित नहीं हैं वरन् उससे ऊँची उठी कोई आत्मसत्ता भी विद्यमान है, तो यह भी निश्चित करना पड़ता है कि आत्मा की क्षुधाएँ समझने और उसकी पूर्ति के लिए भी प्रयत्न किया जाना चाहिए।
चिन्तन धारा में मोड़ लाकर अपने आचरण सुधारें।
चिन्तन के आधार पर बने सुसंस्कृत व्यक्तित्व अपने आप में प्रकाश स्तम्भ जैसे महान होते हैं उनकी गतिविधियाँ दूसरे के लिए प्रेरणाप्रद एवं अनुकरणीय बनती हैं। मानव समाज को आदर्शवादिता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना इतना महान कार्य है कि उसका प्रतिफल चेतन और जड़ जगत में स्वर्गीय सुख−शान्ति और शोभा सौंदर्य के रूप में सामने आता है। यही है मानव जीवन का विशिष्ट प्रयोजन जिसे असाधारण अनुदानों के साथ नियन्ता ने असामान्य उत्तरदायित्व के रूप में उसके कन्धे पर छोड़ा हैं।
चिन्तन होता रहा और कालान्तर में ‘यज्ञ कर्म’ से ही इहलोक तथा परलोक में सुख मिलने वाली बात का ‘दर्शन−ग्रन्थ’ तथा उपनिषदों में जोरदार खण्डन हुआ। चिन्तन की प्रधानता बढ़ी ज्ञान सर्वोपरि स्वीकार किया गया।
चिन्तन, दृष्टिकोण एवं चरित्र से जुड़ा हुआ है। यह तथ्य विवाहित और अविवाहित दोनों ही पक्षों को समान रूप से प्रभावित कर सकते हैं। संयमी, सदाचारी रहने और उच्छृंखल अनाचारी बनने में विवाह न कुछ सहायक होता है न बाधक। एक क्षण के लिए यह मान भी लिया जाय कि विवाह से यौन सदाचार होता होगा तो उससे जितना लाभ है उससे अधिक वैयक्तिक और सामाजिक हानि वे है जो शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और राष्ट्रीय समस्याओं को बेतरह प्रभावित करती हैं। तुलनात्मक विवेचन करने पर− यौन सदाचार को अत्यधिक महत्व देने पर भी यह सिद्ध नहीं होता कि उतने भर से व्यक्ति अपने को, अपनी पत्नी को, अपने बच्चों को और अपने समाज को कोई अच्छी स्थिति दे सके।
चिन्तन की प्रधानता बढ़ी ज्ञान सर्वोपरि स्वीकार किया गया।
चिन्तन का स्तर ही मनुष्य के व्यक्तित्व, गौरव, अस्तित्व एवं क्रिया−कलाप के अस्तर में जमीन−आसमान जैसा अन्तर उत्पन्न करता है। बाह्य दृष्टि से मानव प्राणियों के बीच बाह्य क्रिया−कलाप का अन्तर नगण्य जितना ही होता है। सन्त−असन्त−निकृष्ट और महान−खाते−सोते एक ही तरह है, पर उनका चिन्तन एवं किया−कलाप भिन्न दिशाओं में चलता है−भिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होता है। नर−पशुओं के लिए इतना ही पर्याप्त है कि इन्द्रियजन्य वासनाओं और मनोजन्य तृष्णाओं की एक सीमा तक पूर्ति कर सकें। अर्थ संग्रह एवं परिवार विस्तार में एक हद तक सफल हो सकें।
चिन्तन की धुरी प्रायः भिन्न वर्ग के अनुरूप होती है। ऐसे व्यक्तियों के बारे में यह अनुमान लगाया जाता रहा है कि वे पिछले जन्म में दूसरे लिंग के रहे होंगे अथवा जिस दिशा में उनकी मनोभूमि चल रही हैं उसे देखते हुए वे अगले जन्म तक अपना लिंग बदल लेंगे। वैज्ञानिक विश्लेषण इस स्थिति का यह है कि हर मनुष्य में उभयलिंगी के तत्व रहते हैं। सामान्यतया स्वाभाविक रूप में जो जिस संज्ञा का है उसमें उसी प्रकार की आकृति−प्रकृति पाई जाती है पर सम्भव यह भी है कि भिन्न स्थिति जो प्रायः सुप्त स्थिति में पड़ी होती है क्रमशः जागती और प्रबल होती चली जाय। दोनों तत्वों में से जो बढ़ेगा वह दूसरे को झीना करेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-September
चिन्तन नहीं करना चाहिये और न किसी से बुराई की बात सुननी चाहिये। इतना ही नहीं संयोगवश जब कोई बुरी बात हमारे मन में आवे तो तुरन्त सावधान होकर मन को उनकी तरफ से हटा लेना चाहिये क्योंकि बुरी बातों की तरफ आकर्षित होने से हम बुरे कर्म करने में प्रवृत्त हो जाते हैं और उनसे हमारा पतन होता है। इसीलिये जैसे ही इस प्रकार का कोई हानिकारक विचार उत्पन्न हो हमको उसके विपरीत विचार द्वारा उसका खंडन कर देना चाहिये। स्मरण रखो यह बात केवल हमारी दृढ़ता पर आधार रखती है। कमजोर मन के व्यक्ति स्वयं भी और दूसरों के द्वारा बहकाये जाने पर भी बहुत जल्द बुराइयों में प्रवृत्त हो जाते हैं और अपना पतन कर लेते हैं।
चिन्तन का स्थाई प्रभाव हमारे अंतःकरण पर पड़ता है। अंतःकरण की पवित्रता पर ही हमारी सुख शान्ति निर्भर करती है।
चिन्तन द्वारा दिव्य मूर्तिमान बनाओ) इससे वे सूक्ष्म दैवी भावनाएँ भी तुम्हारी सहायता करती रहेंगी।” इसमें विशेष गूढ़ रहस्य यह है कि सूक्ष्म तथा कारण देहधारी दिव्यात्मा (देव) वायुमंडल में विचरण करते रहने पर भी अगर कोई कार्य कर सकते हैं तो किसी स्थूल देहधारी व्यक्ति के माध्यम से ही ऐसा कर सकना संभव होता है। इसीलिये यह कहावत प्रसिद्ध है कि “भावे हि विद्यते देवो” अर्थात् हमारी दिव्य भावनाओं का अवलंबन करके ही देवगण अपने संस्कारों के अनुरूप हमारा संचालन करते हैं। जिन लोगों की भावधारा विपरीत होती है उसे देवगण प्रभावित नहीं करते। इस प्रकार जो लोग उच्च आदर्शपूर्ण भारतीय संस्कृति के रहस्य को समझते हैं किसी भी हवन यज्ञ आदि के अवसर पर ऊपरी क्रियाकाण्ड को निमित्त बनाकर अपने आस-पास के अभावग्रस्त दीन-दुखी लोगों को अन्न वस्त्रादि देकर उनकी हार्दिक सहानुभूति प्राप्त करते हैं, जो एक सच्चा लाभ है।
चिन्तन करोगे, उतना ही अधिक सतायेंगे। रोग का स्मरण ही न करो, उसे अपने पास फटकने तक न दो, स्वप्न में भी उसकी ओर न देखो, उसकी कल्पनामात्र तक न करो। अगर भूल से कोई रोग हो जाय तो संकल्प द्वारा हटाओ, मन की इच्छा-शक्ति द्वारा सभी रोग हट सकते हैं।
चिन्तन रूपी असीम पुरुषार्थ के फलस्वरूप विद्या भण्डार की रक्षा करता रहे। और उसमें स्वयं भी नवीन अनुसंधान करके अपना कुछ भाग डालता रहे। हमारे देश में वेद पुराण, मीमाँसा, स्मृति, दर्शन, शास्त्र आदि के रूप में विद्या विस्तार वेद भगवान के उक्त आदेश का परिणाम है।
चिन्तन द्वारा उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन का एक अंग बना लेना चाहिए। उपवास और साधना के दिनों में किये गये मनन और चिन्तन का स्थाई प्रभाव हमारे अंतःकरण पर पड़ता है। अंतःकरण की पवित्रता पर ही हमारी सुख शान्ति निर्भर करती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-November
चिन्तन करने का अवसर मिल जाता था। हमारे यहाँ के राजा जनक अपने हाथों से हल भी चलाते थे और अपने समय के एक प्रसिद्ध आत्मज्ञानी भी थे। इसके सिवा यहाँ अनेक ऋषि, मुनि, योगी आदि भी रहते थे। वे लोग सदा से यही समझते और उपदेश करते थे कि संसार मिथ्या है और इसके लिये लड़ना-झगड़ना बेकार है। यही कारण था कि यहाँ पर तलवार चलाने का ज्ञान और शक्ति होने पर भी उसका स्थान विद्या और धर्म के नीचे रखा गया है।
चिन्तन करना चाहिये कि “शिव-शक्ति के संयोग से आनन्द स्वरूप होकर मैं ही ब्रह्म रूप में स्थित हूँ।” यह योनि मुद्रा बहुत शीघ्र सिद्धि प्रदान करने वाली है और साधक इसके द्वारा अनायास ही समाधिस्थ हो सकता है।
चिन्तन करना कि मैं स्वयं शक्तिमय होकर शिव के साथ नाना प्रकार का विहार कर रहा हूं। फिर ऐसा चिन्तन करना चाहिये कि “शिव-शक्ति के संयोग से आनन्द स्वरूप होकर मैं ही ब्रह्म रूप में स्थित हूँ।” यह योनि मुद्रा बहुत शीघ्र सिद्धि प्रदान करने वाली है और साधक इसके द्वारा अनायास ही समाधिस्थ हो सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-October
चिन्तन नहीं करोगे और मैं पति परायण होकर तुम्हारे ही साथ निर्वाह करूंगी। तुम्हारे सिवा अन्य किसी पुरुष को पुरुष ही नहीं समझूँगी।”

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-July
चिन्तन में सदैव लगे रहते हैं वे ही संत हैं।” यह भावना योगी की मान्यता और भावना होती है।
चिन्तन में तन्मय और उन्हीं की भावना से परिपूर्ण रहता है और इस प्रकार सहज ही में स्वार्थ की निकृष्ट भावनाओं से छुटकारा पा सकता है। विकास की स्वाभाविक विधि यही है कि “जिस प्रकार सूर्य के लिए अपने हृदय द्वार को खोले हुये कुसुम स्वतः ही विकसित होता है उसी प्रकार तुम भी विकास पाओ। जब तक इसके लिये प्रयत्न करने की आवश्यकता रहती है, तब दुर्बलता भी प्रकट होती है। इसलिये जिसके लिये जो कोई भी स्वाभाविक उपाय अनुकूल जान पड़े उसी के द्वारा अपने हृदय को उत्तम बातों की ओर लगा देना चाहिये। इससे आपके अवगुणों को पुष्टि नहीं मिलती और बिना पोषण के वे नष्ट हो जाते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-May
चिन्तन करें, अपने दोषों को ढूंढ़ निकालें और उनके स्थान पर स्वभाव में सात्विक तत्वों का समुचित मात्रा में समावेश करें। यह कार्य केवल विचारते रहने या पुस्तकें पढ़ते रहने से ही न हो सकेगा। कुछ सक्रिय कार्य करना पड़ेगा। सक्रिय कार्यों के करने में ही मनःभूमि पर गहरी छाप पड़ती है और उसका संस्कार बनता है। क्रिया के अभाव में सद्भावना भी केवल एक कल्पना या आकाँक्षा ही रह जाती है, उसकी न तो भीतर कोई छाप पड़ती है और न संस्कार बनता है।
चिन्तन से, देहाभिमान को आत्मज्ञान से, द्वेष को प्रेम से, क्रोध को क्षमा से, लोभ को उदारता पूर्वक दान से, अहंकार को विनम्रता से, बन्धन को असंग वृत्ति की दृढ़ता से मिटाना होगा।
चिन्तन करते हैं, तो वे आपके जीवन में प्रवेश करते हैं। प्राणी की तरह वे भी वहीं रहते हैं जहाँ उन्हें उनका अनुकूल भोजन मिलता है।”
चिन्तन द्वारा अपना निर्माण करना है। हम सबके पारस्परिक व्यवहार में जितनी अधिक उदारता अर्थात् देते रहने की आदत बढ़ेगी, जितनी अधिक सहनशीलता आयेगी, दया और क्षमा करते रहने का स्वभाव बन जायगा, निरन्तर प्रेममय तथा परमात्मामय मनोवृत्ति हो जायगी, उतनी ही शीघ्रता से हम अपने जीवन को सुन्दर, शान्तिमय, आनन्दमय बना सकेंगे।
चिन्तन एवं वर्णन कर उसकी स्तुति करना चाहिए। पुनः उन दिव्य गुणों से सम्पन्न परमेश्वर का स्वयं में ध्यान के द्वारा दर्शन करना चाहिए, क्योंकि उसका अंश रूप ही तो उसका यह युवराज है। फिर अपनी सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करना चाहिए क्योंकि उस का निवास हर जगह एवं प्रत्येक प्राणियों में है। अतः स्वयं भी उस सर्वात्म दृष्टि को रखते हुए सबकी सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। पूजा उपासनाओं का उद्देश्य इसी से सम्बन्ध रखता है।
चिन्तन करें, अपने विचार और विश्वासों को उसी के अनुरूप ढालें। साथ ही इस तैयारी में अपने समीपवर्ती और भी कुछ लोगों को साथ ले लें। यदि ऐसे साथी 7 मिल सकें तो बहुत ही प्रसन्नता एवं सफलता की बात मानी जायगी। पर यह 7 साथी से न्यूनाधिक भी हो सकते हैं।
चिन्तन को सार्थक चिन्तन से, देहाभिमान को आत्मज्ञान से, द्वेष को प्रेम से, क्रोध को क्षमा से, लोभ को उदारता पूर्वक दान से, अहंकार को विनम्रता से, बन्धन को असंग वृत्ति की दृढ़ता से मिटाना होगा।
चिन्तन करना चाहिए।
चिन्तन, सहृदयता, आशा और शुभेच्छा। यदि आप मुक्त हस्त होकर यह मानसिक भोजन वितरित करेंगे तो स्वास्थ्य, प्रसन्नता और सफलता आपका अनुगमन करेंगी। विचार भावनाओं का भोजन है। दुःख, रोग, और असफलता, भय, विषाद, दोष-दर्शन और स्वार्थपरता संबंधी विचारों के भोजन पर पलते हैं। जब आप उन्हें उनका भरपूर भोजन देते हैं अर्थात् गलत अनर्थकारी चिन्तन करते हैं, तो वे आपके जीवन में प्रवेश करते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-June
चिन्तन करेगा, जीवन की विभिन्न समस्याओं पर सही दृष्टिकोण में सोचेगा। इस सोचने में, चिन्तन में सहायता देने के लिए यह संस्था इसे उपयुक्त विचार सामग्री देती रहेगी। व्रतधारी के पास संस्था द्वारा प्रति सप्ताह एक अंक भेजने और नित्य ही चिन्तक के लिए कुछ ठोस सामग्री देने का कार्यक्रम बनाया गया है। चिन्तन आवश्यक है। उसके बिना आध्यात्मिक प्राप्ति हो नहीं सकती।
चिन्तन आवश्यक है। उसके बिना आध्यात्मिक प्राप्ति हो नहीं सकती। चिन्तन का यह दूसरा कार्यक्रम भी गायत्री और यज्ञ की उपासना के समान ही आवश्यक है।
चिन्तन, स्वाध्याय, गुण कर्म स्वभाव का लेखा जोखा यह चारों काम व्यवहारिक दृष्टि से भी बहुत सरल हैं। इन्हें कौन नहीं कर सकता है? अब तक भी हम लोग अस्त व्यस्त रूप से इन कार्यों को करते ही रहे हैं। फिर नित्य, निरन्तर, नियमित रूप से इन्हें करने की प्रतिज्ञा लेकर अपनी कार्यशैली को अत्यधिक प्रभावशाली बनाने का अवसर आने पर झिझकने की आवश्यकता ही क्या है? यह एक अव्यवस्था को व्यवस्था में, ढिलमिल नीति को तीव्र प्रयत्न में परिणत करने का प्रयत्न है।
चिन्तन पर निर्भर रहता है। स्वाध्याय और सत्संग की महिमा धर्मग्रन्थों में बहुत गायी गई है, इनका बहुत महात्म्य बताया गया है। इसका कारण इन दोनों के द्वारा सही चिन्तन प्राप्त होना ही है। आज स्वाध्याय के नाम पर किसी देवता या महापुरुष की कथा वृत्तान्त या एक ही पुस्तक को रोज रोज पढ़ते रहने की रूढ़ि प्रचलित है। एक पुस्तक का रोज-रोज पाठ करके लोग समझ लेते हैं, हम भी स्वाध्याय का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं, हम भी स्वाध्याय का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं, यह लकीर पीटना कोई उद्देश्य पूरा न करेगा, वरन् जीवन के विभिन्न प्रश्नों पर सही दृष्टिकोण देने वाली विचार शृंखला ही स्वाध्याय कहलाने की सच्ची अधिकारिणी है।
चिन्तन में सहायता देने के लिए यह संस्था इसे उपयुक्त विचार सामग्री देती रहेगी। व्रतधारी के पास संस्था द्वारा प्रति सप्ताह एक अंक भेजने और नित्य ही चिन्तक के लिए कुछ ठोस सामग्री देने का कार्यक्रम बनाया गया है। चिन्तन आवश्यक है। उसके बिना आध्यात्मिक प्राप्ति हो नहीं सकती। चिन्तन का यह दूसरा कार्यक्रम भी गायत्री और यज्ञ की उपासना के समान ही आवश्यक है।
चिन्तन का यह दूसरा कार्यक्रम भी गायत्री और यज्ञ की उपासना के समान ही आवश्यक है।
चिन्तन, अपने दोष को ढूँढ़ना और उन से छुटकारा पाने के लिए परमात्मा से आत्म-बल माँगना नहीं रहा। अब तो लोग ईश्वर या देवी देवताओं की मनौती या पूजा इसलिए करते हैं कि उन्हें अमुक भौतिक लाभ मिल जाय। देवी-देवता प्रसन्न होकर उनकी उचित अनुचित तृष्णाओं को पूरा कर दें। पूजा का यह बहुत ही निकृष्ट रूप है। यह परमार्थ नहीं है।
चिन्तन और गुण कर्म स्वभाव का लेखा जोखा रखना आवश्यक है उसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि दैनिक जीवन में—परमार्थ के लिए-परोपकार के लिए-लोक सेवा के लिए नित्य ही कुछ नियमित समय और श्रम लगाया जाता रहे। यह भी भजन का ही एक भाग है। सेवा के बिना भजन पूरा नहीं होता। भजन शब्द संस्कृत की ‘भज्-सेवयाँ’ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है सेवा। उपासना, जप, ध्यान पूजन अर्चन की भाँति ही सेवा भी प्रत्येक भजन में आस्था रखने वाले धर्म प्रेमी के लिए आवश्यक है।
चिन्तन’ का नम्बर आता है। जिस कसौटी पर आत्म और अनात्म, सत् और असत्, खरे और खोटे की परख हो सकती है वह विवेक ही है और यह विवेक हमारे सही चिन्तन पर निर्भर रहता है। स्वाध्याय और सत्संग की महिमा धर्मग्रन्थों में बहुत गायी गई है, इनका बहुत महात्म्य बताया गया है। इसका कारण इन दोनों के द्वारा सही चिन्तन प्राप्त होना ही है। आज स्वाध्याय के नाम पर किसी देवता या महापुरुष की कथा वृत्तान्त या एक ही पुस्तक को रोज रोज पढ़ते रहने की रूढ़ि प्रचलित है।
चिन्तन प्राप्त होना ही है। आज स्वाध्याय के नाम पर किसी देवता या महापुरुष की कथा वृत्तान्त या एक ही पुस्तक को रोज रोज पढ़ते रहने की रूढ़ि प्रचलित है। एक पुस्तक का रोज-रोज पाठ करके लोग समझ लेते हैं, हम भी स्वाध्याय का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं, हम भी स्वाध्याय का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं, यह लकीर पीटना कोई उद्देश्य पूरा न करेगा, वरन् जीवन के विभिन्न प्रश्नों पर सही दृष्टिकोण देने वाली विचार शृंखला ही स्वाध्याय कहलाने की सच्ची अधिकारिणी है। व्रतधारी नित्य चिन्तन करेगा, जीवन की विभिन्न समस्याओं पर सही दृष्टिकोण में सोचेगा। इस सोचने में, चिन्तन में सहायता देने के लिए यह संस्था इसे उपयुक्त विचार सामग्री देती रहेगी।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-February
चिन्तन करना चाहिए। हम एक होकर एक पवित्र मत से शुभ कार्य को प्रारंभ करें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-January
चिन्तन करना-एकमात्र उपाय है। हमको चाहिये कि विश्व-कल्याण के सर्वोच्च लक्ष्य तक न पहुँच सकें तो कम से कम अपने तुच्छ स्वार्थ भाव से मुक्ति पाने के लिये ही कम से कम 108 बार या यथासंभव जितना भी अधिक हो सके अपनी परम हितदात्री माता गायत्री का जप करना अपना परम कर्त्तव्य समझें।
चिन्तन’ उसका साहित्य, उसकी भाषा, धर्म आदि ही हो सकते हैं।
चिन्तन शब्द का अर्थ यदि व्यापक तौर पर लें तो तत्वबोध, विद्या, नागरिकता, संस्कृति, सभ्यतादि है। एक व्यक्ति का ‘चिन्तन’ उसका ज्ञान, सोची समझी बात ही हो सकता है। एक जाति का ‘चिन्तन’ उसका साहित्य, उसकी भाषा, धर्म आदि ही हो सकते हैं।
चिन्तन) ठीक है, वही ‘स्व’ का अधिकारी है, उसी की जीवन-रक्षा ठीक ढंग से होती है। जिसका शरीर निरोग है और बुद्धि शुद्ध है, वह कभी भी कष्ट में नहीं फंसता। उसको कोई धोखा नहीं दे सकता, उस पर कोई अत्याचार करने का साहस नहीं करता, सब उसका सम्मान करते हैं। जिसका बदन लगड़ा होता है और अकल ठिकाने पर होती है, वही सच्चे अर्थों में श्रीमान कहाता है।
चिन्तन की ही होती है। उससे चित्त स्थिर और शुद्ध होकर आत्मा में उच्च भाव उत्पन्न होते हैं। यही कारण है कि गीता में भगवान ने स्वयं कहा है-’यज्ञानाँ जपयज्ञोस्मि’ अर्थात् ‘यज्ञों में जप-यज्ञ मैं हूँ।’ इसमें जप-यज्ञ को अन्य यज्ञों से श्रेष्ठ बतलाया है इसका कारण यही है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए जिस चित्त शुद्धि की परम आवश्यकता है वह प्रधानता जप द्वारा ही प्राप्त होती है। इसमें विशेष द्रव्य या श्रम की भी आवश्यकता नहीं पड़ती केवल दृढ़ श्रद्धा और एक निष्ठा से निष्काम उपासना करनी पड़ती है।
चिन्तन’ का दावा करते हैं, उनका यह कथन पंगु द्वारा गिरि लाँघने के समान ही हास्यास्पद है। आत्मचिन्तन का लक्ष्य तो सर्वश्रेष्ठ है, पर उसे जबानी जमाचर्च द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। नाम-गुण कीर्तन, प्रार्थना आदि इसी ब्रह्मज्ञान की सीढ़ियों की तरह है। इनके द्वारा ही साधारण मनुष्यों की आत्म शुद्धि हो सकती है और क्रमशः वे आत्मचिन्तन के अधिकारी बन सकते हैं।
चिन्तन’ उसका ज्ञान, सोची समझी बात ही हो सकता है। एक जाति का ‘चिन्तन’ उसका साहित्य, उसकी भाषा, धर्म आदि ही हो सकते हैं।
चिन्तन करता है। इस ध्यान से सात्विक भावों का उदय होता है। श्रद्धा, प्रेम, दया, क्षमा, शाँति, समता, ज्ञान, वैराग्य, संतोष, आन्तरिक पवित्रता, निष्कामता आदि हृदय के उत्तम भाव हैं, जिनका ध्यान करने से जिन्हें दैनिक जीवन में विकसित करने से उच्च सामर्थ्य का विकास होता है। ये सब शुभ भाव मनुष्य के जीवन में सुख शाँति भर देने वाले हैं जब शुभ विचार और पवित्र क्रिया का परस्पर योग हो जाता है तो मनुष्य का उद्धार हो जाता है।
चिन्तनशील और अध्यवसायी नवयुवक अपने परिश्रम के बल पर अशिक्षित अथवा आलसी वृद्धों से बुद्धि और विवेक की दृष्टि से बढ़े-चढ़े होते हैं। ऐसी दशा में केवल आयु को बुजुर्गी का प्रमाण-पत्र मान कर बड़े बूढ़ों के चरण-चिन्हों पर चलकर, लकीर के फकीर बन कर, हम अपने आपको भले ही सम्भ्रम में डालें किन्तु इस मार्ग पर चल कर आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान नहीं पा सकते। उसके लिये तो हमें बुद्धि के प्रकाश में स्वयं परिश्रम करके मार्ग खोजना पड़ेगा।
चिन्तनम्’ चिन्तन शब्द का अर्थ यदि व्यापक तौर पर लें तो तत्वबोध, विद्या, नागरिकता, संस्कृति, सभ्यतादि है। एक व्यक्ति का ‘चिन्तन’ उसका ज्ञान, सोची समझी बात ही हो सकता है। एक जाति का ‘चिन्तन’ उसका साहित्य, उसकी भाषा, धर्म आदि ही हो सकते हैं।
चिन्तन के अधिकारी बन सकते हैं।
चिन्तन का लक्ष्य तो सर्वश्रेष्ठ है, पर उसे जबानी जमाचर्च द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। नाम-गुण कीर्तन, प्रार्थना आदि इसी ब्रह्मज्ञान की सीढ़ियों की तरह है। इनके द्वारा ही साधारण मनुष्यों की आत्म शुद्धि हो सकती है और क्रमशः वे आत्मचिन्तन के अधिकारी बन सकते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-April
चिन्तन करते हैं। दूसरों के अनुभवों से लाभ अवश्य उठाते हैं, पर अपना मार्ग स्वयं ही निर्धारित करते हैं। आजकल वह युग नहीं कि आदमी अंधगति से जैसा कहा जाय बिना समझे बुझे वैसा ही करता चला जाय। आजकल स्वयं चिन्तन और नये रूप में सोचने का युग है। नया युग है, नई परिस्थितियाँ हैं, नई समस्याएँ हैं, नए मापदण्ड हैं।
चिन्तन के पश्चात् हुआ। उसकी अच्छाई बुराई, उजला और धुँधला सब पक्ष देखे गए। अन्त में उसका निर्णय हुआ। होने के पूर्व अपनी शक्तियों को अच्छी तरह तोल लिया गया। ये उद्देश्य नाना प्रकार के थे, व्यक्तिगत उन्नति के साथ इनमें समाज, राष्ट्र और मानवता मात्र की सामूहिक उन्नति का विधान था।
चिन्तन और नये रूप में सोचने का युग है। नया युग है, नई परिस्थितियाँ हैं, नई समस्याएँ हैं, नए मापदण्ड हैं। इन सबके लिए हमें नए रूप में ही सोचना विचारना है। युग के अनुसार अपने आदर्शों को ढालना है। स्वयं ढलना है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-March
चिन्तन शक्ति आदि सभी शक्ति के व्यक्त रूप हैं।
चिन्तन में लगाया जा सकता है। इसी विचार से “योग-वशिष्ठ” में कहा गया है-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-December
चिन्तन करता है, वही जान सकता है कि उसका स्वरूप क्या है। वही यह भली प्रकार जानता है कि भगवान तरह-तरह के रूपों में दर्शन देते हैं, अनेक भावों में देख पाते हैं, वे सगुण भी हैं और निर्गुण भी। अर्थात् ईश्वर को कोई किसी खास रंग या रूप में बाँध नहीं सकता।
चिन्तन और उसी के ज्ञान का प्रचार करने में लगा दिया। ऐसे महापुरुषों ने परमात्मा और सृष्टि के गूढ़ भेदों को प्रकट करके सर्व साधारण को आध्यात्मिक जीवन का ज्ञान प्रदान किया। इनमें से अनेक संत पुरुष ऐसे भी हुये हैं जिन्होंने कहीं पढ़ने-लिखने की अथवा साहित्यिक शिक्षा प्राप्त नहीं की, पर उनके उपदेश बड़े प्रभावशाली हैं और उन्होंने बहुत साधारण शब्दों में गूढ़ आध्यात्मिक तत्वों को समझा दिया है। ऐसे संतों में कबीर साहब का स्थान बहुत ऊँचा है। शिक्षा की दृष्टि से यद्यपि वे सर्वथा निरक्षर थे और उन्होंने स्वयं कहा है कि “मसि कागद छुयों नहि कलम गहो नहिं हाथ” अर्थात् “मैंने कभी स्याही और कागज को छुआ भी नहीं और न कभी हाथ से कलम को पकड़ा।
चिन्तन करती है, उसी प्रकार जिस स्थान में गुरु का निवास हो वहीं पर जिसका मन लगा रहता है, उस दिशा में से आने वाले पवन को भी जो सम्मुख खड़ा होकर नमस्कार करता है, सच्चे प्रेम से पागल बन कर जिस दिशा में गुरु रहते हों, उस दिशा से भी वार्तालाप करता है वही सच्चा शिष्य है। जिस प्रकार बछड़ा अलग खूंटे से बँधा होने के कारण ही गाय से पृथक रहता है, पर उसका ध्यान पूर्णतया अपनी माता की तरफ लगा रहता है, उसी प्रकार सच्चा शिष्य केवल गुरु की आज्ञा के कारण ही दूरवर्ती ग्राम में रहता है, और सदा यही विचार करता है कि कब गुरु की अनुमति मिले और मैं उनसे भेंट करूं। जिसे गुरु से दूर रहने से एक-एक क्षण युग के समान भारी जान पड़ता है, अगर गुरु के ग्राम से कोई आया हो अथवा गुरु ने ही किसी को भेजा हो, तो जो ऐसा प्रसन्न हो जाता है कि मानो जीवन रहित को नवीन आयुष मिल गया हो, अथवा सूखते हुये अंकुर पर अमृत की धार पड़ गई हो, अथवा मछली किसी गड्ढ़े से निकल कर समुद्र में पहुँच गई हो, अथवा किसी कंगाल मनुष्य को धन का खजाना मिल गया हो, अथवा जन्माँध को एक दृष्टि प्राप्त हो गई हो, अथवा भिखारी को इन्द्र पद मिल गया हो। गुरु के प्रति ऐसी प्रीति रखने वाला कोई मनुष्य अगर तुमको मिले तो ऐसा समझ लेना कि उसके मन में गुरु के प्रति सचमुच सेवक की भावना मौजूद है। ऐसा व्यक्ति अन्तःकरण में अत्यन्त प्रेम युक्त होकर गुरु की मूर्ति का ध्यान करता है, अपने शुद्ध हृदय रूपी मंदिर में गुरु की स्थापना करके भावना रूपी मंदिर में गुरु की स्थापना करके भावना रूपी सामग्री से उनकी पूजा करता है, अथवा ज्ञानरूपी किले में आनंदरूपी देवा लय बनाकर उसमें श्री गुरु रूपी शिवलिंग की स्थापना करके उस पर ध्यानरूपी अमृत से अभिषेक करता है।
चिन्तन करने से बुरे विचारों का आना सर्वथा बन्द हो जायगा और आपको अपना जीवन आनन्दपूर्ण जान पड़ने लगेगा।
चिन्तन करता है, वह उसमें भी आ जाती है। प्रेम के प्रभाव से मनुष्य अपने मित्र के गुणों को ही देखता है, उन्हीं की चर्चा और प्रशंसा करता है, इसलिये उसमें भी उनका आविर्भाव हो जाता है। यह बात मनुष्य के कल्याण की दृष्टि से बड़ी महत्वपूर्ण है। प्रेम से मनुष्य का मन शुद्ध और कर्तव्य पर आरुढ़ हो जाता है। बहुत से व्यक्ति बिना प्रेम के केवल कर्तव्य बुद्धि से भी भले काम करते रहें, पर उसमें उनको वह आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता जो प्रेमयुक्त मनोभावना रहने से मिलता है।
चिन्तन करने से आपको धीरे-धीरे अपनी आत्मा और शरीर का भिन्नत्व स्पष्ट प्रतीत होने लगेगा। इस प्रकार अच्छे कल्याणकारी विचारों का चिन्तन करने से बुरे विचारों का आना सर्वथा बन्द हो जायगा और आपको अपना जीवन आनन्दपूर्ण जान पड़ने लगेगा।
चिन्तन करने वाली शक्ति को चित्त कहते हैं। योग-साधना में जो आपका अभीष्ट है उसकी चिन्ता सदैव करते रहिये। अथवा अभ्यास करने के लिए प्रतिमास कोई अच्छा विचार चुन लीजिये। जैसे “मैं आत्मा हूँ और मैं शरीर से भिन्न हूँ।” इसका सदा ध्यान अथवा चिन्तन करने से आपको धीरे-धीरे अपनी आत्मा और शरीर का भिन्नत्व स्पष्ट प्रतीत होने लगेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-August
चिन्तन से हम दिव्यताओं की अभिवृद्धि करते हैं। मनुष्य के मन की कुछ ऐसी प्रक्रिया है कि वह जिन गुणों का चिन्तन करता है, गुप्त रूप से वे ही उसके चरित्र में बढ़ते और पनपते रहते हैं। आप यदि ध्यान से आत्म-निरीक्षण करें, तो आपको अपने चरित्र के उज्ज्वल पहलू मिल जायेंगे। ये वे पहलू हैं जो दूसरों में नहीं हैं। केवल आप ही में हैं।
चिन्तन तथा कार्यों द्वारा समुन्नत किया। इसी प्रकार नेपोलियन ने अपने व्यक्तित्व की परीक्षा द्वारा जीवन को ऊँचा उठाया था। पहिले वह समझता था कि वह एक लेखक बने, पर बाद में सैनिक के रूप में उसे अपनी महानता को प्राप्त करने की ईश्वरीय प्रेरणा हुई।
चिन्तन द्वारा विकास करते?
चिन्तन करें। सद्गुणों के चिन्तन से हम दिव्यताओं की अभिवृद्धि करते हैं। मनुष्य के मन की कुछ ऐसी प्रक्रिया है कि वह जिन गुणों का चिन्तन करता है, गुप्त रूप से वे ही उसके चरित्र में बढ़ते और पनपते रहते हैं। आप यदि ध्यान से आत्म-निरीक्षण करें, तो आपको अपने चरित्र के उज्ज्वल पहलू मिल जायेंगे। ये वे पहलू हैं जो दूसरों में नहीं हैं।
चिन्तन करता है, गुप्त रूप से वे ही उसके चरित्र में बढ़ते और पनपते रहते हैं। आप यदि ध्यान से आत्म-निरीक्षण करें, तो आपको अपने चरित्र के उज्ज्वल पहलू मिल जायेंगे। ये वे पहलू हैं जो दूसरों में नहीं हैं। केवल आप ही में हैं। चरित्र के ये दिव्य गुण ईश्वर की ओर से विशेष रूप में आप ही को दिये गये हैं।
चिन्तन द्वारा समस्त मानसिक केन्द्रों से शरीर भर में रक्त प्रवाह के साथ फैल जायेंगे। ये आपको उन्नति की नई प्रेरणा देंगे।
चिन्तन तो होता नहीं, मल-मूत्र का चिन्तन होने लगता है। मलिन वस्त्र, केश और मुख से जप करना शास्त्र विरुद्ध है। जप करते समय इतने कर्म निषिद्ध हैं—आलस्य, जँभाई, नींद, छींक, थूकना, डरना, अपवित्र अंगों का स्पर्श और क्रोध। जप में बहुत जल्दबाजी न करनी चाहिये, न बहुत विलम्ब। गाकर जपना, सिर हिलाना, लिखा हुआ पढ़ना, अर्थ न जानना, बीच-बीच में भूल जाना—ये सब मन्त्रसिद्धि के प्रतिबन्धक हैं।
चिन्तन होने लगता है। मलिन वस्त्र, केश और मुख से जप करना शास्त्र विरुद्ध है। जप करते समय इतने कर्म निषिद्ध हैं—आलस्य, जँभाई, नींद, छींक, थूकना, डरना, अपवित्र अंगों का स्पर्श और क्रोध। जप में बहुत जल्दबाजी न करनी चाहिये, न बहुत विलम्ब। गाकर जपना, सिर हिलाना, लिखा हुआ पढ़ना, अर्थ न जानना, बीच-बीच में भूल जाना—ये सब मन्त्रसिद्धि के प्रतिबन्धक हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-December
चिन्तन और कर्म जिस दिशा में चलता रहता है कालान्तर में वही स्वभाव को अभ्यास में लाया जात रहता है उसी तरह के संस्कार बन जाते हैं। यह संस्कार ही परिपक्व होकर शुभ अशुभ प्रारब्ध एवं कर्मफल का रूप धारण करते रहते हैं। इस प्रकार कर्मफल प्रदान करने की स्व-संचालित प्रक्रिया भी इसी सूक्ष्म शरीर से सम्पन्न होती रहती है।
चिन्तन शैली को इसलिए प्रतिगामी मानते हैं कि वह प्रगति का पथ अवरुद्ध करती है मिथ्या सन्तोष पैदा करके आशा की ज्योति ही बुझा देती है। “स्व” को खोकर एक प्रकार से ऐसे व्यक्ति परावलम्बी हो जाते हैं, जबकि होना ठीक उलटा चाहिए था। अध्यात्म का अर्थ ही आत्म निर्भरता और आत्मिक पूर्णता है। जहाँ अपूर्णताओं से समझौता कर लिया जाये, प्रगति को अनावश्यक माना जाये और आत्मोत्कर्ष के लिए अभीष्ट पुरुषार्थ को किसी दूसरे की-भगवान की कृपा के साथ बाँध दिया जाये तो निस्सन्देह ही लक्ष्य की दिशा में बढ़ चलना अवरुद्ध ही हो जायेगा। स्थिति यही है, जिसे तथाकथित अध्यात्मवादियों के जीवन क्रम का विश्लेषण करके सहज ही जाना जा सकता है।
चिन्तन से सूक्ष्म शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता है और वह अपनी समर्थता खो बैठता है। कुमार्गगामी का अन्तःकरण सदा दुर्बल और कायर बना रहता है, फलस्वरूप अनेक मानसिक रोग उठ खड़े होते हैं। यों तो सूक्ष्म शरीर दूध में मक्खन की तरह समस्त शरीर में व्याप्त है। पर उसका मुख्य स्थान मस्तिष्क माना गया है। बुरे विचारों से मन मस्तिष्क और सूक्ष्म शरीर का सामान्य स्वास्थ्य सन्तुलन नष्ट हो जात है फलस्वरूप मनुष्य का व्यक्तित्व ही लड़खड़ाने लगता है और प्रगति के सारे मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं।
चिन्तन ही जीवन के यथार्थ लक्ष्य और ब्रह्म की विराटता की अनुभूति कर सकता है।
चिन्तन जब विचारशील वर्ग के मन में चलता है तो वे इस प्रचलित धर्म-अध्यात्म की मान्यताओं को अवाँछनीय और अनावश्यक मान लेते हैं। और उसे कल्पनाओं का जंजाल मात्र समझकर उदासीनता धारण कर लेते हैं। इस प्रकार सामान्य और उच्च दोनों ही स्तर के लोग जब महान तत्व ज्ञान के प्रति उपेक्षा बरतने लगेंगे अपने मन में उसका मूल्य गिरा लेंगे तो उससे भारी हानि होगी। उच्च दर्शन की उपेक्षा करके कोई समाज अपनी उत्कृष्टता स्थिर नहीं रख सकता और उसके अभाव में उसे दुर्बल एवं पतित ही होना पड़ेगा। वर्तमान दार्शनिक अवसाद ने कुछ ऐसी स्थिति उत्पन्न करदी है कि जिसका सुधार बिना एक क्षण गंवाये अविलम्ब आरम्भ किया जाना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-March
चिन्तन में पड़कर करोड़ों अरबों वर्षों से भी अधिक शाश्वत एवं अनन्त अन्त जीवन की अपेक्षा आत्मा के लिये कभी भी हितकारी नहीं कही जा सकती ? भूत है तो क्यों है ? उसका स्वरूप क्या है ? यदि व्हाइट हाउस के ऐसे प्रभावशील और विशिष्ट व्यक्ति मानते हैं कि मृत्यु के बाद भी जीवन का अस्तित्व बना रहता है तो यह जानना ही चाहिये कि वह क्यों बना रहता है और क्या उस स्थिति में भी आत्मा सुख-शाँति की अनुभूति कर पाती होगी जो मनुष्य जीवन का यथार्थ लक्ष्य है।
चिन्तन का विकास मनुष्य कृत किसी भी मशीन में नहीं है तो मनुष्य को भी एक रासायनिक संयोग कैसे कहा जा सकता है।
चिन्तन न करें यह किसी हद तक ठीक भी है किन्तु अधिकतम सौ वर्ष के जीवन के भौतिक सुख भौतिक चिन्तन में पड़कर करोड़ों अरबों वर्षों से भी अधिक शाश्वत एवं अनन्त अन्त जीवन की अपेक्षा आत्मा के लिये कभी भी हितकारी नहीं कही जा सकती ? भूत है तो क्यों है ? उसका स्वरूप क्या है ? यदि व्हाइट हाउस के ऐसे प्रभावशील और विशिष्ट व्यक्ति मानते हैं कि मृत्यु के बाद भी जीवन का अस्तित्व बना रहता है तो यह जानना ही चाहिये कि वह क्यों बना रहता है और क्या उस स्थिति में भी आत्मा सुख-शाँति की अनुभूति कर पाती होगी जो मनुष्य जीवन का यथार्थ लक्ष्य है।
चिन्तन की दिशाओं को बलात् एक अन्तरंग मरणोत्तर जीवन की ओर खींच ले जाते हैं। यह भी विलक्षण बात है कि सारे अमरीका में व्हाइट हाउस को मरणोत्तर अस्तित्व का प्रमाण माना जाता है जबकि वहाँ की सभ्यता से प्रभावित अन्य देशों में लोगों का विश्वास है कि मृत्यु के पश्चात् जीवन का कुछ अस्तित्व शेष नहीं रहता है।
चिन्तन, ज्ञान और अनुभूति उसी समय हो ............. है इसीलिये ध्यान और उपासना के लिये सन्ध्या ............ सबसे उपयुक्त माना गया। मृत्यु भी एक ऐसी ही ................ सन्ध्या है जिसमें जीवन के स्थूल और सूक्ष्म ......................... का ज्ञान होता है इसलिये उसकी विशेष तैयारी के .............. यहाँ पूर्व विधान बनाये गये है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-April
चिन्तन सत्य का अन्वेषण करने के लिए इतना साहस भी एकत्रित करना होगा कि अपनी अभ्यस्त बुद्धि की भी उपेक्षा करके विश्व-व्यापी सत्य का निरूपण कर सकने की भावना सही रूप से अपना काम कर सकने में समर्थ हो सके।
चिन्तन मनन स्वाध्याय सत्संग से उसे प्रभावित कर सकता है और दिशा दे सकता है। मस्तिष्क की दिशा जिधर चल पड़ती है जीवन स्वरूप वैसा ही बना जाता है और उसी आधार पर मनुष्य उन्नति अवनति सुख-दुख के परिणाम उपलब्ध करता है। मस्तिष्क मर्म स्थल कहा गया है- उसके ब्रह्म रन्ध्र में क्षीर सागर निवासी विष्णु भगवान् विराजमान हैं इस पौराणिक अलंकार में यही रहस्य छिपा पड़ा है कि समस्त दिव्य शक्तियों, सिद्धियों और विभूतियों का केन्द्र इस मस्तिष्क को ही कहा जाता है। इसे स्वस्थ एवं समुन्नत रखने के लिए विद्याध्ययन से लेकर विचार विनियम तक हमें बहुत कुछ करना होता है। तभी इस मस्तिष्क से समुचित लाभ मिल पाता है।
चिन्तन के लिए उपयुक्त दिशा मिल सकती है। अपनी मनोभूमि के पक्षपात को भी समझना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि हम जिस परम्परा में जन्में पले और बड़े हुए हैं स्वभावतः उसी के समर्थन में बुद्धि काम करेगी। इसलिए स्वतन्त्र चिन्तन सत्य का अन्वेषण करने के लिए इतना साहस भी एकत्रित करना होगा कि अपनी अभ्यस्त बुद्धि की भी उपेक्षा करके विश्व-व्यापी सत्य का निरूपण कर सकने की भावना सही रूप से अपना काम कर सकने में समर्थ हो सके।
चिन्तन प्रक्रिया का मूल और महत्व हम समझते हैं। यदि जीवन का शेष समय इसी अभ्यस्त क्रियाकलाप में लग जाता तो हमें सुविधा ही रहती और सरलता भी पड़ती। अपनी कमजोरी को छिपाते नहीं हमारा अन्त करण अति भावुक और मो, ममता से भरा पड़ है। जहाँ तनिक सा स्नेह मिलता है मिठास को तलाश करने वाली चींटी की तरह रेंगकर वही जा पहुँचता है। स्नेह, सद्भाव की प्रेम और ममता की मधुरिमा हमें इतनी अधिक भाती है कि शहद में परसनी मक्खी की तरह उस स्थिति को छोड़ने की रत्ती भर भी इच्छा नहीं होती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-October
चिन्तन तन्त्र को ही नियोजित नहीं करता वरन् शरीर वाहन को भी इसी प्रयोजन के लिए-नियोजित करता है। अन्तःकरण का आदेश मन मानता है और मन के इशारे पर चलने वाला शरीर स्वामी भक्त सेवक की भूमिका निभाने लगता है। इसमें उसे भला-बुरा सोचने या किसी प्रकार का ननुनच करने की भी इच्छा नहीं होती। संक्षेप में अन्तराल को ही मनःसंस्थान और कार्य-कलापों का सूत्राधार कह सकते हैं। जो किया या सोचा जाता है उस समूचे क्रिया तन्त्र का अधिष्ठाता अन्तःकरण को ही कहा-माना जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी यही है वह तथ्य जिसके आधार पर व्यक्तित्व का समूचा स्वरूप उसकी श्रद्धा पर अन्तःकरण की स्थिति से अविच्छिन्न-सम्बद्ध माना गया है।
चिन्तन प्रखर होने पर स्वयं को ऊँचा उठा हुआ पाता है। आत्मिक प्रगति के विभिन्न सोपानों को पार करता हुआ वह अपने लक्ष्य तक जा पहुँचता है।
चिन्तन दुःखद विरोधी परिस्थितियों से न प्रभावित होकर अति मन के भीतर में उभर कर आना चाहिए। वस्तुतः जो कुछ भी सुन्दर है, शिव हैं, शुभ है वह मानवी स्थिति में नहीं, अतिमानवी स्थिति में ही करतलगत हो सकता है। केवल एक ही परिस्थिति ऐसी हो सकती है जिसमें स्थायी सुख-शान्ति, अनिर्वचनीय आनन्द की प्राप्ति हो। वह अतिमानव के स्तर पर बनती है जिसे “कास्मिक गुडनेस” “सुपर काँशसस्टेज” कहा जा सकता है। हर धर्म, पंथ, मत ने ही यही मूल दर्शन सबको सिखाया है कि परम तत्व को पाने के लिए भौतिक मन, ‘लोअर सेल्फ’ से ऊँचे उठो।
चिन्तन-मनन द्वारा ज्ञान के उस स्त्रोत तक पहुंचा जा सकता है जिसे शास्त्रकारों से आत्म-ज्ञान, बाह्य-ज्ञान के नाम से वर्णन किया है।
चिन्तन का एवं शरीर मात्र संचालन, कार्य सम्पादन का उत्तरदायित्व ही नहीं सम्भालता है। शरीर और मस्तिष्क का कार्यक्षेत्र वहीं तक सीमित नहीं है। जितना कि समझा जाता है। बल्कि उसकी परिधि बहुत व्यापक है। परामनोविज्ञान जो काफी समय से इन शक्तियों का प्रतिपादन पुष्टीकरण करता आ रहा है, आरम्भ में भूत विद्या जैसी जादुई चर्चा कहा गया था।
चिन्तन मनन किया जा सके तो क्रमशः आत्मोत्कर्ष की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए विराट् सत्ता के निकट पहुँचा जा सकता है। जिसके निकट पहुँचने-उसके दिव्य स्वरूप का दिग्दर्शन करने के उपरान्त कोई कामना अवशेष नहीं रहती। एक अनिर्वचनीय आनन्द में साधक सदा डूबा भौतिक जगत में रहते हुए भी निर्लिप्त बना रहता है।
चिन्तन’ की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि “चिन्तन ही मनुष्य है। अध्ययन, कथन अथवा श्रवण वह नहीं हो सकता। लगातार चिन्तन के द्वारा वह किसी भी परिस्थिति को पार कर सकता है। चाहे वह गरीबी से संबंधित हो अथवा पाप से, स्वास्थ्य संबंधी हो अथवा डर-भ्रम से।”
चिन्तन और आदर्श कर्तव्य की विशिष्टता जुड़ी हुई है। उसे समझने समझाने में भी कोई बड़ी कठिनाई नहीं होती। उपदेश पग-पग पर नीति के एवं उदारता के समर्थन में सुने जाते हैं। उन्हें स्वीकारने में भी किसी को कोई आपत्ति ही होगी। किन्तु कठिनाई तब पड़ती है जब निकृष्ट परिस्थितियों से गुजरते-गुजरते जो आदतें अन्तरंग की गहराई में घुस गई हैं उन्हें सुधारने, बदलने की बात सोची जाती है।
चिन्तन के द्वारा वह किसी भी परिस्थिति को पार कर सकता है। चाहे वह गरीबी से संबंधित हो अथवा पाप से, स्वास्थ्य संबंधी हो अथवा डर-भ्रम से।”
चिन्तन एवं प्रयास को नियोजित किये रहते हैं। इसी परिधि की उपलब्धियों के अनुरूप अपने को सुखी-दुःखी, सफल-असफल मानते रहते हैं।
चिन्तन व्यवहार में भले ही बेहतर पाया हो-अर्थ-दर्शन के रूप में वह पूरी तरह लोक-समर्थन प्राप्त कर रहा है। उस मान्यता के अनुरूप अधिक संग्रही, अधिक विलासी, अधिक अपव्ययी लोग नीतिवान नहीं समझे जाते। अस्तु, उन पर ‘अनीति की कमाई-विलास की लड़ाई’- की उक्ति के अनुरूप तरह-तरह के लाँछन लगाये जाते हैं। वैभव की चकाचौंध तो अभी भी है और उसे लोग झपटना हड़पना तो अभी भी चाहते हैं किन्तु इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि वैभववानों की प्रशंसा एवं प्रभावों के दिन लद गये। उन पर हर कोई अनीति उपार्जन का लाँछन लगाता है, भले ही वह अनुचित ही क्यों न हो ?
चिन्तन के क्षेत्र में जितना रस विभोर करने का अवसर प्राप्त किया है, यह उसकी भावनात्मक क्षमता सम्भावना की प्रक्रिया का ही परिचायक है।
चिन्तन से सद्विचारों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सिद्धान्तों के प्रति-अपनी दिव्यताओं के प्रति अनास्था मनुष्य को एकाँगी, स्वार्थी एवं अहंकारी बना देती है।
चिन्तन एवं मनन द्वारा अन्तःकरण की भावनाएँ स्वतः उमड़ने लगती हैं। सही रूप से महामंत्र का अवगाहन, आराधन एवं चिन्तन मनन किया जा सके तो क्रमशः आत्मोत्कर्ष की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए विराट् सत्ता के निकट पहुँचा जा सकता है। जिसके निकट पहुँचने-उसके दिव्य स्वरूप का दिग्दर्शन करने के उपरान्त कोई कामना अवशेष नहीं रहती। एक अनिर्वचनीय आनन्द में साधक सदा डूबा भौतिक जगत में रहते हुए भी निर्लिप्त बना रहता है।
चिन्तन ही मनुष्य है। अध्ययन, कथन अथवा श्रवण वह नहीं हो सकता। लगातार चिन्तन के द्वारा वह किसी भी परिस्थिति को पार कर सकता है। चाहे वह गरीबी से संबंधित हो अथवा पाप से, स्वास्थ्य संबंधी हो अथवा डर-भ्रम से।”
चिन्तन का परिपक्व अभ्यास।
चिन्तन का खाका, व्यक्तित्व का ढाँचा इस तरह विनिर्मित होता है कि संपर्क में आया व्यक्ति भी उच्चस्तरीय जीवन की और अभिमुख हो जाता है। शहीद, समाज सुधारक, लोकसेवी, सन्त, सामान्य, परजीवट के धनी व्यक्ति इसी श्रेणी में आते हैं। वे जो जीवन जीते हैं, आदर्शों रूपी ईश्वर को समर्पित होता है। अपनी निष्ठाओं के आधार पर वे स्वयं तो उच्च प्रगतिशीलता की भूमिका को प्राप्त होते ही है, सहज श्रद्धा व जन-सम्मान के भी पात्र बनते हैं। अध्यात्म उनके भीतर से प्रस्फुटित होता रहता है।
चिन्तन-मनन काम परिष्कार का सशक्त माध्यम है। बुद्धि और भाव के क्षेत्र में काम की शक्तिधारा परिष्कृत और परिशोधित होकर प्रवाहित होने पर उनमें उत्कृष्ट विचारों और उदात्त भावों से भर देती है। शरीर के स्थूल केंद्रों की ओर उसका प्रवाह अपने-आप कम होता जाता है। फलतः कामोद्वेग नहीं रहता।
चिन्तन से अपना ही अहित होता है। क्रोध, ईर्ष्या, चिन्ता, भय, आशंका जैसे मनोविकार धारण कर्ता ही सर्वनाश करते हैं। जिनके विरुद्ध दुर्भाव रखे जाते हैं उनका अहित तो कदाचित ही स्वल्प मात्रा में हो पाता है। आपत्तियों का कारण आमतौर से मनुष्य के अब के या पिछले विभ्रम, दोष दुर्गुण या कुकृत्य ही होते हैं। दण्ड का तात्पर्य इतना ही है कि मनुष्य भविष्य में अधिक सावधानी बरतें और अधिक सही सभ्य रहें।
चिन्तन प्रक्रिया को बुद्धिमत्ता या दूरदर्शिता ही कहा जा सकता है, पर अन्तःकरण का विस्तार इतने सीमित क्षेत्र में ही समाप्त नहीं हो जाता, वरन् इसके आगे की उच्चस्तरीय स्थिति है-अन्तरात्मा। यह विशुद्ध रूप में उन्हीं आदर्शों का समर्थन करती है जो व्यक्ति और समाज के बुद्धिसंगत प्रतिपादनों से भी कहीं ऊँचे होते हैं।
चिन्तन की श्रेष्ठता को न जोड़ा जायेगा तो फिर लक्ष्य यही बन जायेगा कि भौतिक समृद्धि को किसी भी प्रकार उपार्जित किया जाय। समृद्धि के मन-चाहे उपयोग में आकर्षण की अधिकता रहती है। यदि उस पर भावनात्मक उत्कृष्टता का अंकुश न रहे, तो फिर समृद्धि की उत्कृष्टता ऐसी आतुरता उत्पन्न करेगी कि उसे धर्म-मर्यादाओं का स्मरण दिलाने से भी नियन्त्रित न किया जा सकेगा और वह कुछ भी-किसी भी उपाय से कर गुजरने-अनीति और उच्छृंखलता बरतने तक में प्रवृत्त होती दिखाई पड़ेगी। ऐसी प्रगति व्यक्ति को दुर्गुणी और समाज को अनाचारी बना देगी। कहना न होगा कि प्रकृति और चेतना के शाश्वत नियम इस प्रकार के अनुपयुक्त मार्ग से उपार्जित सम्पदा को सहन न करेंगे, फलतः सर्वत्र संकट, विग्रह और विनाश के दृश्य उपस्थित होंगे।
चिन्तन और बौद्धिक प्रगल्भता की सम्भावनाओं से भरा होने के कारण ही मानवी मस्तिष्क को जादुई पिटारा कहा जाता है। मस्तिष्क का यह परिचय उसकी विशेषताओं का यह विश्लेषण तो बहुत आधा-अधूरा है। इसके गहन अन्तराल में उतरने पर प्रतीत होता है कि इसमें वे दिव्य चेतनाएँ भरी हुई हैं जिन्हें अलौकिक और अतीन्द्रिय कहा जा सकें। इन सम्भावनाओं और विशेषताओं की व्याख्या सामान्य मस्तिष्कीय गतिविधियों के आधार पर नहीं की जा सकती। प्राचीन काल में ऋषि, मुनि योग-साधना द्वारा उस दिव्य चेतना को विकसित करने में एक बड़ी सीमा तक सफल हुए थे।
चिन्तन का अभाव एवं उत्कृष्टता के प्रति अनास्था अन्ततः उद्दंडता को जन्म देती है। विकृत चिन्तन से सद्विचारों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सिद्धान्तों के प्रति-अपनी दिव्यताओं के प्रति अनास्था मनुष्य को एकाँगी, स्वार्थी एवं अहंकारी बना देती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-August
चिन्तन मनन किया करते हैं। जो संसार की बातें एवं घटनायें अन्य व्यक्तियों के लिये नगण्य एवं सार शून्य होती है। ज्ञानार्थी के लिए वे बड़े-बड़े रहस्य रखती है। ज्ञान पाने का जिज्ञासु व्यक्ति हर घटना के पीछे छिपे, कारण कारक अथवा किसी मानव मनोविज्ञान का रहस्य खोजकर अपने ज्ञान की श्रीवृद्धि किया करते हैं। सामान्य जन जिन अपनी अनेक समस्याओं का कारण एवं निवारण स्वयं नहीं जानते, जानकार ज्ञानी लोग उनका हेतु एवं समाधान बतला देते हैं।
चिन्तन करने के लिए कहते हैं। भारत की तरफ ऐतिहासिक दृष्टि से देखे तो जहाँ ‘सत्य’ शब्द का उच्चारण होता है, वहाँ असंख्य लोगों को कृष्णा भगवान को याद आती है और जहां ‘करुणा’ शब्द का उच्चारण होता है, वहाँ गौतम बुद्ध का स्मरण होता है, राम, कृष्ण और बुद्ध ये ही तीन अवतार हिन्दुस्तान में माने गये है। लेकिन वे तो निमित्त मात्र हैं। दरअसल भगवान ने सत्य, प्रेम, करुणा के रूप में अवतार लिया था।
चिन्तन, मनन, भावानुभूति चलती रहती है उसे सविकल्प समाधि कहते हैं) लेना चाहते थे। उन्होंने अनुभव किया कि महर्षि चित्र यह रहस्य पहले से ही जानते हैं सो पिता पुत्र दोनों महर्षि चित्र के पास गये और उनके प्रश्न का उत्तर सविनय उन्हीं से बताने का आग्रह करने लगे। उनकी जिज्ञासा को समझकर महर्षि चित्र ने उन्हें मृत्यु की अवस्था और देवयान मार्ग द्वारा स्वर्ग प्राप्ति का जो ज्ञान दिया है कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् का वह सारा का सारा ही आख्यान महान् वैज्ञानिक सत्यों ओर आश्चर्यों से ओत-प्रोत है। उससे यह पता चलता है कि भारतीय तत्व-दृष्टा न केवल प्राण और जीवन के रहस्यों से विज्ञ थे वरन् उन्हें सूक्ष्म से सूक्ष्म भौगोलिक ओर खगोल विद्या के रहस्यों का भी ज्ञान था। आज जब उस ज्ञान को विज्ञान की कसौटी पर कसते हैं तो मानना पड़ता है कि भारतीय साधनायें किसी भी भौतिक विज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण हैं और जीवन से सम्बन्धित समस्त जिज्ञासाओं और समस्याओं का वही सर्वश्रेष्ठ विकल्प है।
चिन्तनीय है किंतु मनुष्य की अक्ल उतना दूरदर्शी विवेचन कर सकने की स्थिति में न हो तो उसे इतना तो जाना ही पड़ेगा कि शराब स्वास्थ्य के लिये प्रत्यक्ष विष है। मनुष्य का हृदय बहुत छोटा और कोमल होता है पर शरीर के स्वास्थ्य और जीवन की स्थिरता का केन्द्र बिन्दु वही हैं भगवान् ने उसे उपयोगिता के आधार पर ही इतना सुरक्षित बनाया है उसके लिये हड्डी का बक्स ही तैयार करना पड़ा है। कोई भी दुश्मन साधारणतः हृदय को हानि नहीं पहुँचा सकता पर मदिरा उस मित्र की तरह वार करती है जो देखने में विश्वास पात्र लगता है पर मौका पाते ही जेब उड़ा देता है। शराब दिल को बरबाद करने वाली चामुण्डा है उससे बचने में ही मनुष्य जाति का कल्याण है।
चिन्तन किया जाता रहे तब भी आत्महीनता का भाव उत्पन्न हो जाता है, मैं गरीब हूँ। मेरे घर का खर्च ही पूरा नहीं पड़ता है। मैं ज्यादा कमा ही नहीं पाता अपने पर कोई आपत्ति और उलझन आती ही रहती है- आदि-विचार मनुष्य को आत्महीन बना देते हैं। मनुष्य अपने प्रति जितने हीन और ओछे विचार रखेगा वह उतना ही आत्महीन बन जायेगा। विचारों का स्थिति पर बड़ा प्रभाव पड़ता है।
चिन्तन के द्वारा माया बन्धनों और साँसारिक अज्ञान को काट लेते हैं और विषय वश्यता से छूट जाते हैं तो हम मुक्त हो जाते हैं किन्तु ऐसी मुक्ति तब तक नहीं मिल सकती, जब तक सृष्टि के शेष प्राणी बन्धन में पड़े हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-September
चिन्तन ही समग्रता की बात सोच सकता है। इसमें कमी रहने के कारण भविष्य दृष्टाओं ने भविष्य की प्रगति के एकाँगी एवं अधूरे चित्र तैयार किए हैं।
चिन्तन को आदर्शनिष्ठ और सिद्धान्त निष्ठ बनाना। ऐसे विचार प्रवाह देना जिससे मनुष्य उत्कृष्टता की ओर चल पड़े। विश्व भर में प्रचलित समस्त आस्तिकवादी दर्शन अपने अपने ढंग से इस लक्ष्य की ही आपूर्ति करते हैं। मनुष्य श्रेष्ठ कैसे बनें आदर्शों भरा जीवनयापन कैसे अपनायें, यही है मूलभूत लक्ष्य जिसके लिए अनेकों प्रकार के दर्शन समय-समय पर बने। मानवी चिन्तन प्रवाह की श्रेष्ठता की ओर घसीट ले जाने में दर्शन की असामान्य भूमिका होती है।
चिन्तन की नई दिशा दे डाली।
चिन्तन देने वाले विचारक भावनाओं को उद्वेलित विस्तृत करने वाले कवि संगीतज्ञ, कलाकार क्या धार्मिक नहीं कहे जा सकते ?
चिन्तन वाणी एवं क्रिया-कलाप तीनों में एकरूपता स्थापित करनी होगी। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष व्यक्तित्वों में जिसकी भूमिका मनुष्य के विकास में सहायक हो सकती है, इसका निर्धारण कैसे हो ? क्योंकि कभी-कभी स्थिति उलटी भी हो सकती है। अप्रत्यक्ष व्यक्तित्व सुसंस्कारी हो सकता है और प्रत्यक्ष कुसंस्कारी। इस विषम स्थिति में किसकी बात मानी जाय और चिन्तन एवं अभ्यास द्वारा किसे सशक्त बनाया जाय, उसका उत्तर प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल युग ने दिया है जो प्रकारान्तर से भारतीय अध्यात्म का ही समर्थन करता है।
चिन्तन एवं अभ्यास द्वारा किसे सशक्त बनाया जाय, उसका उत्तर प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल युग ने दिया है जो प्रकारान्तर से भारतीय अध्यात्म का ही समर्थन करता है। वे कहते हैं कि “प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष से परे मनुष्य की मूल सत्ता” दी अनडिसकवर्ड सेल्फ है। जो अपनी प्रेरणाएँ उदात्त भावनाओं के रूप में सतत् संप्रेषित करता रहता है। अपने चिन्तन एवं गतिविधियों को उसकी प्रेरणा के अनुरूप ही ढाला जाय। व्यक्तित्व को पूर्ण तभी बनाया जा सकता है।
चिन्तन, चरित्र और लोक परम्पराओं को प्रभावित करे। इन क्षेत्रों में घुसी हुई भ्रान्तियों एवं अवाँछनीयताओं को उसी प्रकार निरस्त करें जिस प्रकार उसने पिछले दिनों भौतिक जगत् की वस्तुस्थिति के सम्बन्ध में यथार्थता की जानकारी रखते हुये सत्य की शोध का अधिष्ठाता कहलाने का क्षेत्र सम्मान पाया और अपना महान उत्तरदायित्व निभाया है। उसकी वह सेवा पिछली सहस्राब्दियों में प्रस्तुत किये गये अनुदानों की तुलना में अकेली ही अत्यधिक भारी-भरकम सिद्ध होगी। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि “जो धर्म वैज्ञानिक अनुशासन पर सही न ठहराया जा सके उसे नष्ट कर देना चाहिये। जितनी जल्दी ये अनावश्यक अन्ध परम्परायें व मूढ़ मान्यतायें धर्म से निकाल दी जाये, उतना ही ठीक है।
चिन्तन प्रवाह की श्रेष्ठता की ओर घसीट ले जाने में दर्शन की असामान्य भूमिका होती है।
चिन्तन और चरित्र की पक्षधर आस्थाओं को अपनाने का उद्भव कैसे हो ? ये न उपजे तो विश्व व्यवस्था का सदाशयता सम्पन्न नवनिर्माण किस प्रकार सम्भव हो ?
चिन्तन, आदर्श चरित्र और श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही - उसका आयनोस्फियर है। उसकी सहायता से ही सुरक्षा और प्रगति - शान्ति और समृद्धि के बहुमुखी उद्देश्य पूरे होते हैं।
चिन्तन एवं क्रिया प्रणाली के सूक्ष्म संस्कार जमा होते रहते हैं और अचेतन पक्ष का निर्माण करते हैं। यदि उनका स्तर निकृष्ट हुआ तो भारी विक्षोभ पैदा करेंगे। फ्रायड जैसे मनोवैज्ञानिक का कहना है कि “मनुष्य चिन्तन कुछ और करता है तथा उसका प्रत्यक्ष भूमिका भिन्न प्रकार की होती है। चिन्तन में यदि वासना, तृष्णा एवं लोभ के तत्व विद्यमान हैं तथा वाणी से वह आदर्शों की बात करता है तो व्यक्तित्व में विघटन यहीं से आरम्भ हो जाता है और द्विमुखी व्यक्तित्व का निर्माण होता है।”
चिन्तन करने पर विवश करती है। उचित यही है कि अपने ऊपर आने वाले संकटों से बेखबर न रहा जाये। संभावित प्रतिकूलताओं को पहले से ही सोच कर यह निर्धारित किया जाये कि इनसे बचाव के लिए क्या किया जा सकता है। व्यक्ति को अच्छे से अच्छे की आशा करनी चाहिए पर बुरे से बुरे के प्रति असाधारण तो रहता है, पर यह प्रयास एकांगी है, यदि वह अध्यात्म का दूसरा पक्ष अपनाने के लिए तैयार न हो।
चिन्तन के अनुरूप निष्कर्ष निकाले हैं। जिसकी दृष्टि में जिस तथ्य का अधिक महत्व है उसने उसी प्रकार की प्रगति की महत्व दिया और भविष्य का कल्पना चित्र उभारा है। समग्र चिन्तन ही समग्रता की बात सोच सकता है। इसमें कमी रहने के कारण भविष्य दृष्टाओं ने भविष्य की प्रगति के एकाँगी एवं अधूरे चित्र तैयार किए हैं।
चिन्तन एवं आदर्श कार्यों को करने की जीवट आदि विषय स्थूल मस्तिष्क के नहीं है। चेतन की परिधि में आने वाली इन विशिष्टताओं का विशद अध्ययन परामनोवैज्ञानिक कर रहे हैं। इन सबके निष्कर्ष यही है कि प्रस्तुत शक्तियों का जागरण एवं मानसिक क्षमतायें का पूर्ण उपयोग ही जीवन की समस्त सफलताओं का मूल है यही जीवन है।
चिन्तन कुछ और करता है तथा उसका प्रत्यक्ष भूमिका भिन्न प्रकार की होती है। चिन्तन में यदि वासना, तृष्णा एवं लोभ के तत्व विद्यमान हैं तथा वाणी से वह आदर्शों की बात करता है तो व्यक्तित्व में विघटन यहीं से आरम्भ हो जाता है और द्विमुखी व्यक्तित्व का निर्माण होता है।”
चिन्तन और विश्वासों के बारे में पूछा तो उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि 31 विद्वानों ने कठिनतम प्रश्न और प्रमेयों का हल स्वप्न में ही किया था। स्वामी रामतीर्थ के सम्बन्ध में तो प्रसिद्ध है कि गणित का कोई कठिन प्रश्न आने पर वे उसे हल करने की भरसक कोशिश करते। फिर भी हल नहीं होता तो वे थक कर सो जाते थे और सोते समय स्वप्न में ही उन्हें अपने प्रश्नों का हल मिल जाता था।
चिन्तन, उथले प्रयासों में बन पड़ने वाले छुटपुट क्रिया-कलापों को ही सब कुछ मान बैठते हैं। उतावले उतने होते हैं कि हाथों हाथ फल न मिले तो ऊबने लगते हैं। परिणामों की आतुरता में न कठोर परिश्रम ही करते बनता है और न तन्मयता भरा मनोयोग ही एकाग्र होता है। ऐसी दशा में वे लाभ किस प्रकार मिले जो अनवरत श्रम, उत्साह भरे मनोरोग एवं लम्बे समय तक टिके रहने वाले धैर्य की कीमत पर ही खरीदे जाते रहे हैं। इस मनोयोग को प्रकारान्तर से तल्लीनता की साधना भी कहा जा सकता है।
चिन्तन के क्षेत्र में उत्कृष्टता और व्यवहार के क्षेत्र में उदार सहकारिता जैसी सत्प्रवृत्तियाँ प्रदान की है और उसकी गौरव गरिमा को बढ़ाया है। इस विशिष्टता की जितनी उपेक्षा की जायेगी उतनी ही विपत्ति उभरेगी और विनाश की विभीषिका बढ़ेगी। इस सत्प्रवृत्ति को पुरातन भाषा में ‘आध्यात्मिकता’ कहा जाता है। यह शब्द किसी को अटपटा लगता हो तो “दूरदर्शी आदर्शवादिता” जैसा कोई शब्द देने में किसी को कोई ऐतराज नहीं होना चाहिये। यही है कि वह कसौटी जिस पर अद्यावधि प्रगति के उपयोग में हुई भूलों को सुधारना और जो उपलब्ध है, उसका सर्वहित में सदुपयोग कर सकना सम्भव हो सकता है।
चिन्तन, प्रयोग परीक्षण और संकल्पबल के सहारे ‘सेफ्टी लैंप’ के आविष्कार में अनन्तः सफलता प्राप्त कर ली। उन्होंने उसे ‘पेटेन्ट करवा कर धन कमाने के बजाय जनता में बिना किसी मूल्य के प्रचलित कर दिया। इस पर उनके मित्र ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा-”यदि इसे पेटेन्ट करवा देते, तो पाँच या दस हजार वार्षिक कमा सकते थे।” तब डेवी ने उत्तर दिया - “मेरा तो उद्देश्य मानवता की सेवा करना है न कि धन कमाना। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मेरे अपने दो हाथ पर्याप्त हैं अधिक धन मुझे पथ-भ्रष्ट कर देगा धन-सम्पत्ति से न तो मनुष्य को यश मिलता है और न ही आन्तरिक सन्तोष।
चिन्तन या आचरण अपनाये जाते हैं। नीति की पक्षधर यह चिनगारी अपना अस्तित्व पूर्णतया किसी भी स्थिति में खोती नहीं। उपेक्षित, तिरस्कृत, दुर्बल होने पर भी उसका अनीति विरोधी संघर्ष चलता ही रहता है भले ही वह परिस्थिति के अनुरूप कितना ही धीमा या धूमिल क्यों न हो।
चिन्तन, स्वभाव, कौशल,स्वर, चातुर्य आदि पर एक विशेष आवरण चढ़ा पाया जाता है। यों सुधार प्रयत्नों का कुछ लाभ तो होता ही है, पर जन्मजात विशेषता में उतना परिवर्तन नहीं होता जितना कि होना चाहिए।
चिन्तन में यदि वासना, तृष्णा एवं लोभ के तत्व विद्यमान हैं तथा वाणी से वह आदर्शों की बात करता है तो व्यक्तित्व में विघटन यहीं से आरम्भ हो जाता है और द्विमुखी व्यक्तित्व का निर्माण होता है।”
चिन्तन एवं गतिविधियों को उसकी प्रेरणा के अनुरूप ही ढाला जाय। व्यक्तित्व को पूर्ण तभी बनाया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-May
चिन्तन में अद्भुत साम्य इस बात का प्रमाण होता है । श्री विलिस ने ऐसे अनेकों जोड़े ढूंढ़े थे और उनके द्वारा इस दर्शन की पुष्टि की थी। इनका कहना है कि ईसा मसीह जो काम शेष छोड़ गये थे उन्हें उन्होंने दुबारा अपोलोनियस आफ टियाना के रूप में जन्म लेकर पूरा किया । ग्लैडस्टोन पहले जन्म में सिसरो था, श्रीमति बीसेन्ट पहले ब्रनो थी । शौपनिहार के विचार बौद्धमत से इतने मिलते हैं कि उसे बुद्ध ही कहा जा सकता है ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-July
चिन्तन ही करते रहना आवश्यक है ।
चिन्तन और अन्य परीक्षण किये तब कहीं उसका उत्तर उसकी समझ में आया। वह उत्तर उन्होंने इस घटना के माध्यम से देते हुए आगे लिखा है के एक दिन युवक ने पूछ ही लिया अपनी नव विवाहिता से- तुम्हारे शरीर में अन्तर क्यों नहीं पड़ा ?
चिन्तन करता हूँ।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-November
चिन्तन और निदिध्यासन करने लगे।
चिन्तन-मनन का फल यही है कि व्यक्ति अपने आचरण को श्रेष्ठ बनाने के लिए अग्रसर है। ज्ञान की यथार्थता चरित्र की कसौटी पर ही परखी जाती है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-June
चिन्तन करने के आगे मुझे अपना मार्ग ही भूल गया था इसीलिए तो इसे लौटाने आया हूँ।
चिन्तन करना। भावनाओं में इतना उभार पैदा कर लेना कि न अहंभाव रहे, न मृत्यु, न मान-अपमान, शोक-वियोग का विकार। सम्पूर्ण कालों में व्याप्त आत्मा ही आत्मा दिखाई। मैं अजर हूँ, अमर हूँ, अक्षय, अविनाशी परम प्रकाश हूँ इस धारणा की पूर्ण पुष्टि वैराग्य कहा जाता है। साँसारिकता का मोह नष्ट हो जाये वही वैराग्य है।
चिन्तन एवं क्रिया-कलाप को परिष्कृत किया ज सकेगा। प्रचार तंत्र द्वारा वर्तमान विनाशात्मक स्वरूप को निरस्त करने के लिये उतना ही बड़े सृजनात्मक प्रचार तंत्र को खड़ा करना पड़ेगा। इसके लिये साहित्य-निर्माण उसकी खपत, प्रवचन, संगीत, फिल्म आदि अनेक माध्यमों के विशाल रूप दिया जाना है। इसके लिए प्रचुर परिमाण में धन-शक्ति और जन शक्ति की जरूरत पड़ेगी। इसकी व्यवस्था हम लोग स्वयं बड़ी आसानी से जुटा सकते हैं यदि लोभ और मोह के जंजाल से निकल कर वासना तृष्णा को ठोकर मार कर- निर्वाह भर के लिए प्राप्त पर सन्तोष करके अपनी शारीरिक मानसिक और आर्थिक क्षमता को प्रयुक्त करने लगें।
चिन्तन से मन को विरत कर भावनाओं में लगा देना- एक कवि कहता है-
चिन्तन और उन्हें गुनगुनाते रहने से इसी मूल-भावना की दिनों दिन पुष्टि भी की जा सकती है। जीवन लक्ष्य प्राप्ति की आवश्यकता तो इससे स्वयमेव फलित होती है। “व्यास भाष्य” में बताया गया है-
चिन्तन-पद्धति का विकृति हो जाना है। इसे सुधरे बदले बिना किसी समस्या का चिरस्थायी हल न निकलेगा। वस्तु स्थिति है भी यही। भावनात्मक नवनिर्माण ही विश्वव्यापी प्रगति और शान्ति का एक मात्र हल है। इस तथ्य पर सर्वसाधारण का ध्यान जितनी गहराई तक केन्द्रित होगा उतनी ही तत्परता से बौद्धिक क्राँति के सरंजाम जुटेंगे।
चिन्तन करना चाहिए जिसकी परख से उन्हें अपनी माला में पिरोया है। युग की की पुकार, जीवनोद्देश्य की सार्थकता, ईश्वर की इच्छा और इस ऐतिहासिक अवसर की स्थिति, महामानव की भूमिका को ध्यान में रखते हुए कुछ बड़े कदम उठाने की बात सोचनी चाहिए। इस महा अभियान की अनेक दिशाएं है जिन्हें पैसे से, मस्तिष्क से, श्रम सीकरों से सींचा जाना चाहिए जिसके पास जो विभूतियां है उन्हें लेकर महाकाल के चरणों में प्रस्तुत होना चाहिए। लोभ, मोह के अज्ञान और अन्धकार की तमिस्रा को चीरते हुए हमें आगे बढ़ना चाहिए और अपने परिवार के लिए रख कर शेष को विश्व मानव के चरणों में समर्पित करना चाहिए। नव निर्माण की लाल मशाल में हमने अपने सर्वस्व का तेल टपका कर उसे प्रकाशवान रखा है अब परिजनों की जिम्मेदारी है कि वे उसे जलती रखने के लिये हमारी ही तरह अपने अस्तित्व के सार तत्व को टपकाएं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-February
चिन्तन कर सके तो आत्म-साक्षात्कार का मार्ग और भी सरल हो सकता है।
चिन्तन करे। हम भलाई की शक्ति में निमग्न रहकर उच्च स्थिति प्राप्त कर सकते हैं तो ऐसी सुन्दर जीवन व्यवस्था को छोड़कर अपने आपको दुःखी और दलित क्यों बनावे ?
चिन्तन से काटने की कला आ जाये तो मनुष्य न केवल उस दुष्प्रभाव से बच सकता है वरन् आत्म- कल्याण की दिशा में भी तेजी से अग्रसर हो सकता है।
चिन्तन से लेकर आत्म-संयम और जप ध्यान की साधना में लग गई। इसी आयु में बहुत मनोविकार प्रबल रहते हैं सो आमतौर से परमार्थ प्रयोजनों के लिए ढलती आयु के व्यक्तियों ही प्रयुक्त किया जाता है।
चिन्तन न करेंगे “ ऐसी प्रतिज्ञा आते ही बरबस बन्दर स्मृति में आकर उछल कूद मचाने लगता है। यों स्वाभाविक रूप से बंदर के बारे में कुछ न सोचा होता तो शायद वर्षों उसका स्मरण न आता। इस तथाकथित वैराग्य में नारी को पतन बताकर कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं किया गया। पर्दे के पीछे जो होता रहता है वह दयनीय है। अतिवाद कभी भी उपयोगी नहीं रहा।
चिन्तन प्रक्रिया और शारीरिक गतिविधि केन्द्रित करते रहे हैं। हमारे मार्गदर्शक का इस दिशा में पूरा-पूरा सहयोग रहा है सो अनावश्यक जाल-जंजालों में उलझे बिना सीधे रास्ते पर सही दिशा में चलते रहने की सरलता उपलब्ध होती रही है। उसी की चर्चा इन पंक्तियों में कर रहे हैं कि जिन्हें इस मार्ग पर चलने की और सुनिश्चित सफलता प्राप्त करने का प्रत्यक्ष उदाहरण ढूंढ़ने की आवश्यकता है उन्हें अनुकरण के लिए एक सामाजिक आधार मिल सके।
चिन्तन करना आत्म-विकास के लिये हितकर ही होता है। अच्छे विचार ही मनुष्य को सफलता और जीवन देते हैं।
चिन्तन सखा, सहचर और मित्र जैसा सरल स्वाभाविक होना चाहिए। उसे सामान्य मनुष्य से न अधिक माना जाय न कम। पुरुष और पुरुष, स्त्रियाँ और स्त्रियाँ जब मिलते हैं तो उनके असंख्य प्रयोजन होते हैं, काम सेवन जैसी बात वे सोचते भी नहीं । ऐसे ही नर नारी का मिलन भी स्वाभाविक सरल और सौम्य बनाना चाहिए। इसी प्रकार रूढ़िवादियों से कहा जाना चाहिए कि प्रतिबंधों से व्यभिचार रुकेगा नहीं बढ़ेगा।
चिन्तन किया करे इससे उसके अन्तःकरण से अपने आप भलाई की शक्ति जन्मती है। उसे प्रेरणा और पुलक प्रदान करती है। इस तरह निरन्तर पुलकित रहने का जिसका स्वभाव बन जाता है संसार में उसके लिए न तो कुछ अमंगल रह जाता है और न अहितकर। यह केवल अपने मन को गुण ग्रहण करने की दिशा में लगा देने का चमत्कार मात्र है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-January
चिन्तन प्रवाह को सुनियोजित करने से ही साधना के मार्ग में प्रगति मिलती है। मन का स्तर योगी के आहार पर निर्भर है। यह जितना सात्विक होगा, मन उसी अनुपात से निर्मल बनता चला जाएगा। अन्नमय कोष भी साधना के लिये अन्न की महिमा को प्रधानता देते हुए ही साधनाक्रम बिठाया जाता है। आहार शास्त्री बताते हैं कि अस्सी फीसदी रोगों के कारण आहार का व्यतिक्रम है।
चिन्तन और स्वतन्त्र कर्त्तव्य अपना कर महामानवों जैसी वरिष्ठता का मार्ग अपनाया। ऐसे ही लोग प्रकाश स्तम्भ की तरह उफनते समुद्र में भी अपना शिर उठायें-अस्तित्व बनाये रहते हैं। उधर से निकलने वाली जलयानों में डूबने से बचा सकने वाला मार्गदर्शन कर सकना इन्हीं के भाग्य में बदा होता है। मानवता ऐसे ही नर-रत्नों को जन्म देकर कृत-कृत्य होती है।
चिन्तन और अमंगलकारी आशंकाओं से ही बचा जाना चाहिए। लेकिन यह स्वभाव में सम्मिलित हो गया है और अपने आपके प्रति अविश्वास बहुत गहरे तक बैठ गया तो है उसके लिए भी प्रयत्न करना चाहिए। इस दिशा में सचेष्ट होते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि हम स्वयं ही भय की रचना करते हैं, उसे बुलाते और अपनी हत्या के लिए आमन्त्रित करते हैं। यह जान लिया गया तो यह समझ पाना भी कठिन नहीं है कि स्वयं ही भय को नष्ट भी किया जा सकता है और सन्दर्भों में यह बात लागू होती हो अथवा नहीं होती हो किन्तु मन के सम्बन्ध में यह बात शत प्रतिशत लागू होती है कि वह तभी भयभीत होने की आज्ञा दे दी जाती है। यह आज्ञा अशुभ आशंकाओं के रूप में भी हो सकती है और अतीत के कटु अनुभवों तथा दुःखद स्मृतियों के रूप में भी।
चिन्तन दिया है, वह निषेधात्मक ही रहा है। इन तीनों भविष्यविदों ने आशावादी दृष्टिकोण से कई पुस्तकें भी लिख हैं व बताया कि समृद्धि तन्त्र अपना रास्ता बदलने में पूरी तरह से समर्थ है। उसे सही चिन्तन देने वाले मनीषी भी विश्व में हैं जो तीसरी दुनिया जिसमें भारत भी शामिल है, उसे उदित होकर एक स्वर्णिम युग अगले बीस वर्षों में लाकर दिखायेंगे।
चिन्तन व अनुमान के आधार पर बताया कि विश्व का भविष्य उज्ज्वल है। “दुनिया कहाँ जा रही है” इस शीर्षक से फिल्म बना रहे अमेरिकी टेलीविजन संवाददाता केल्विन सेर्ण्डस ने डॉ. मार्गरेटमीड (अब स्वर्गीय), हरमन काँन एवं विलीयम टामसन से साक्षात्कार लिया। “स्पाँन” पत्रिका (अप्रैल 1979) में प्रकाशित इस विचार मंथन पर सारे विश्व के बुद्धिजीवियों का ध्यान गया है। वस्तुतः अभी तक जिन-जिन बुद्धिजीवियों ने अपना चिन्तन दिया है, वह निषेधात्मक ही रहा है। इन तीनों भविष्यविदों ने आशावादी दृष्टिकोण से कई पुस्तकें भी लिख हैं व बताया कि समृद्धि तन्त्र अपना रास्ता बदलने में पूरी तरह से समर्थ है।
चिन्तन वाद के लिए भी छोड़ दें और मात्र काय संरचना ओर विभिन्न अंगों की सुव्यवस्था सहकार पर विचार करें तो इस क्षेत्र में भी सब कुछ अद्भुत दिखाई पड़ सकता है। लगता है यह रचनाकार का हँसी-मजाक अथवा मात्र संयोग नहीं है। बल्कि सब कुछ सोद्देश्य ही है।
चिन्तन देने वाले मनीषी भी विश्व में हैं जो तीसरी दुनिया जिसमें भारत भी शामिल है, उसे उदित होकर एक स्वर्णिम युग अगले बीस वर्षों में लाकर दिखायेंगे।
चिन्तन कभी कामुकता में लीन नहीं हो सकता। किसी भी साधक, आत्मिक प्रगति के विद्यार्थी के लिये इसलिये इन प्राथमिक अभ्यासों को साधना में आवश्यक बताया गया है।
चिन्तन ही हताश और निराश का द्योतक है। अन्यथा मनुष्य अपने आपसे इतना सर्वांगपूर्ण है कि यदि वह ठीक ढंग से सोचना, समझना सीख जाए और समुचित रीति से प्रयत्न करने लगे तो परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हो वह आगे बढ़ने और प्रगति करने की राह निकाल ही लेता है। कठिन में कठिन और प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी यदि मनुष्य अपना आत्मविश्वास, साहस, सूझ-बूझ और मनोबल न खोये तो कोई कारण नहीं कि परिस्थितियों से हार न माननी पड़े।
चिन्तन, भविष्य के प्रति आशंकित रहने और व्यर्थ के भयों को पालने की आदत से छुटकारा प्राप्त करें।
चिन्तन की प्रखरता, तेजस्विता, मनस्विता के रूप में सामने आती है। वृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है-
चिन्तन का विकल्प सामने रहते हुए भी अशुभ चिन्तन को ही अपनाया।
चिन्तन तथा भावनाओं को उत्कृष्टता की ओर नियोजित कर स्वयं को आध्यात्मिक दृष्टि से भी ऊँचा उठा सका है।
चिन्तन किया जाता है, फ्यूजराँलाजा (भविष्य विज्ञान) नाम दिया गया है, जो पिछले एक दशक मात्र की ही उत्पत्ति है। यूटोपिया एक इसी प्रकार की विद्या है जिसमें वैज्ञानिक कल्पनाएँ करते हैं जो उपलब्ध तथ्यों को मूल आधार बनाकर की जाती है।
चिन्तन ही समस्त व्याधियों का मूल है। यह मनुष्य को अपनी अन्तःवृत्तियों का दास बनने पर विवश कर देता है। अन्नमय कोष की साधना आहार सम्बन्धी अपने दृष्टिकोण के परिष्कार की साधना है। साँसारिक जीवन में सफलता की बात हो या आत्मिक उत्कर्ष की, सुखी स्वस्थ जीवन दोनों के लिये जरूरी है। जो अपनी वृत्तियों का परिशोधन कर अपने जीवनक्रम में परिवर्तन कर लेता है वह अन्नमयकोश जागरण की साधना के इस प्रथम चरण को पार कर लेता है।
चिन्तन, एक बहुत बड़ी आबादी के लिए साक्षरता की व्यवस्था का निर्धारण एवं एक सुनियोजित तकनीकी बुद्धिजीवी समुदाय की क्षमता के उचित उपयोग की व्यवस्था का निर्माण।
चिन्तन-मनन के लिए एक खजूर के पेड़ के नीचे बैठते थे। कुछ समय बाद उन्हें वह स्थान छोड़कर अन्यत्र जाना पड़ा। तब उन्होंने उस खजूर को कटवा दिया।
चिन्तन को ही अपनाया।
चिन्तन, व्यवस्था, सम्बन्धी सुझावों का एक सुनिश्चित प्रभाव इस पीढ़ी पर पड़ ही रहा हैं। इसे हम रोक नहीं सकते। अगली पीढ़ी अमेरिकी ग्लैमर की नकलची नहीं होगी अपितु वह इन दबावों तथा तनाव के मध्य से गुजर कर-तपकर विकेंद्रीकरण एवं प्राकृतिक जीवन-व्यवहार को की अपना आदर्श बनायेगी।
चिन्तन चुनने के पीछे भी कारण है। विगत के कटु अनुभवों, असफलताओं और कठिनाइयों से पीड़ित मन वर्तमान में भी लौट-लौटकर उन्हीं स्मृतियों को दोहराता रहता है और जाने-अनजाने अशुभ कल्पनायें करता रहता है। यह कल्पनाएँ ही व्यक्ति में भय उत्पन्न करती हैं। जबकि स्मरण के लिए अतीत के सुखद अनुभव, सफलताएँ और अनुकूलताएँ भी है। यदि उन्हें याद किया जाता रहे तो भविष्य के प्रति आशंकित होने के स्थान पर सुखद सम्भावनाओं से आशान्वित भी हुआ जा सकता है।
चिन्तन क्यों नहीं करता, क्यों वह अशुभ ही अशुभ सोचता है ?
चिन्तन आशंकाएं और आशाएँ सब बन के ही खेल है। इनमें पहले वर्ग का चुनाव जहाँ व्यक्ति को आत्मघाती स्थिति में धकेलता है वही दूसरे प्रकार का चुनाव उसे उत्कर्ष तथा प्रगति के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। सर्वविदित है कि आत्मघात, व्यक्तित्व का हनन था। असफलता का चुनाव व्यक्ति किन्हीं विवशताओं के कारण ही चुनता है अन्यथा सभी अपना विकास, प्रगति और अपने अभियानों में सफलता चाहते हैं। जब सभी लोग सफलता और प्रगति की ही आकाँक्षा करते हैं तो मन में समाये भय के भूत को जगाकर क्यों असफलताओं को आमन्त्रित करता है ?

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-January
चिन्तन में नियोजित किया जाता है, जिससे आत्म-कल्याण हो और अपने को आत्मा स्वीकार कर लिया जाता है, तो मन की बलात् उस चिन्तन में नियोजित किया जाता है, जिससे आत्म-कल्याण हो और शरीर से वह कार्य कराये जाते है, जो आत्मा का गौरव बढ़ाते हों, उसका भविष्य उज्ज्वल बनाते हैं।
चिन्तन के आधार पर देना चाहिए। दूसरे लोग क्या कहते है- क्या सोचते है और क्या करते है- इससे भी हमें प्रभावित नहीं होना चाहिए। निस्संदेह वातावरण अन्धकार भरा है। प्राचीनकाल में सतयुगी व्यक्तित्व, कर्तृत्व और वातावरण-शुद्ध चिन्तन में सहायता करता था। उससे प्रभावित हर नागरिक को सही दिशा मिलती थी।
चिन्तन और भय-आशंका के कारण उत्पन्न हुए है, उनकी जड़ मनः क्षेत्र में होती है और उनके अंकुर शरीर में फूटते ही रहते है। एक से निपटने नहीं पाते कि दूसरे की उत्पत्ति एवं अभिवृद्धि अपना कमाल दिखाने लगती है। जड़ हरी रहने पर पत्तों को तोड़ते रहने से कोई काम नहीं चलता। मस्तिष्कीय विकृति शारीरिक रुग्णता से मिलकर एक-एक मिलकर ग्यारह होने का उदाहरण बनता है। संक्षेप में यही है तनाव की महाव्याधि, जिससे एक तिहाई लोग ग्रसित पाये जाते है।
चिन्तन है कि हमें भी मजबूत सहारा पकड़ना चाहिए, जिसमें कि हम भी हरे-भरे रह सकें इस तरह का सहारा हमारे लिए भगवान से बढ़कर और कोई नहीं है, जो हमें सदैव हरा-भरा रख सकता है। इसमें जिन्दगी की उन्नति का सारा-का-सारा मार्ग खुला हुआ है। यह एक अज्ञात शक्ति है, जिसके इशारे पर सारा संसार चल रहा है।
चिन्तन-जीवन को प्रभावित न कर सके उसे मनोविनोद के अतिरिक्त और क्या कहा-समझा जा सकता है।
चिन्तन के साथ जोड़ भर दिया जाय तो इसे राई का पर्वत बनाने में कितनी देर लगती है।
चिन्तन छोड़ता हूँ। तुम्हारा दिया हुआ आशावादी दृष्टिकोण अपनाता हूँ। तू सबका दाता है। मेरा पिता है। मुझे प्यार करता है।
चिन्तन करता हुआ राजा उठा और उसने अपने सेवकों द्वारा मुनि का पता लगवाया, किन्तु उनका कहीं पता नहीं लगा। अंत में राजा ने श्लोक का एक चरण बनाकर नगर में यह उद्घोषणा करवाई कि जो भी इस श्लोक के दूसरे चरण को पूरा कर देगा, उसे एक लक्ष स्वर्णमुद्राएँ दी जाएँगी।
चिन्तन पहाड़ भर। जिसमें हर्ष स्वल्प और विषाद अपरिमित हो ऐसी जिन्दगी जीकर कौन अपने आपको सौभाग्यशाली मानेगा?
चिन्तन से व्यग्र था। अपने पुत्रौ को धिक्कार रहा था। उनकी कृतघ्नता से संतप्त हो घोर पश्चाताप कर रहा था। आज की परिस्थितियों को अपने पुराने गुनाहों की सजा मानकर अशान्त था। इस पश्चाताप और अशान्ति के कारण क्लान्त मन हो बिलकुल किंकर्तव्यविमूढ़-सा निढाल पड़ा था।
चिन्तन को विराम और प्रारम्भ करें ‘निजत्व के निखार की अनूठी साधना।
चिन्तन विचार होने के कारण फिर से उसी योनि में चला गया। उसे निम्न कोटि के प्राणियों की तरह ही अब भी पेट तथा प्रजनन की बात याद है, बाकी चीजें तो वह भूल-सा ही गया। उस अभागे को यह समझ में नहीं आया कि जब भगवान ने बन्दर के लिए, अन्य प्राणियों के लिए पेट भरने की व्यवस्था की है, तो क्या उसके प्रियपुत्र मनुष्य को वह रोटी का प्रबन्ध नहीं करेगा? परन्तु हाय रे! अभागे मनुष्य-वह इसकी कीमत नहीं जान सका। वह अपने उद्देश्य को भूल गया तथा यह कहने लगा कि मैं अपनी अकल से कमाऊँगा, बहुत अर्जन करूँगा, मौज से इसी में वह खपता रहा।
चिन्तन धारा में व्यतिरेक उत्पन्न हो जाए। इससे तात्कालिक राहत भी मिलती है। पर जैसे ही नशा उतरता है, विस्मृति दूर हो जाती है और आदत के अनुसार विपत्ति भरी कल्पनाएँ सिर के इर्द-गिर्द नाचने लगती है और उनका प्रभाव शरीर के असत-व्यस्त करने वाली रोग-श्रृंखला के रूप में अपना त्रास दिखाने लगता है।
चिन्तन -चेतना को कहते है। चौथी वाणी ‘परा’ है। यह अन्तःकरण या अन्तरात्मा से निस्सृत होती और सम्पूर्ण वातावरण को सात्विकता से ओत−प्रोत रखती है। इस भाषा की अभिव्यक्ति ध्यान है और समाधि उसका चरमोत्कर्ष।
चिन्तन में निमग्न भी है, तो वह अपनी वासना पूर्ति का हिसाब-किताब उसके सामने प्रस्तुत करेगा और वही माँगेगा, जिसमें उसकी भौतिक संतुष्टि हो। उसकी यह माँग-चील के माँस के टुकड़े की तुलना में किसी भी कीमत जा सकती।
चिन्तन और कर्तृत्व को अमर्यादित न होने देने, अवांछनीयता न अपनाने के लिए आवश्यक विवेक और साहस उत्पन्न करना है। मनुष्य अपने अस्तित्व को, लक्ष्य को, व्यवहार को सही तरह समझे। सही मार्ग को अपनाकर सही परिणाम उपलब्ध करते हुए, प्रगति के पथ पर निरन्तर आगे बढ़ता चले। अपूर्णता से पूर्णता में विकसित हो। यही मार्गदर्शन करना-इसका व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करना, आत्मविद्या का मूल प्रयोजन है।
चिन्तन की आदत परिपक्व हो जाती है और अपने लिए, परिवार के लिए व्यवसाय के लिए परिवार के लिए, व्यवसाय के लिए संकट की सम्भावना चारों ओर दिखाई पड़ती है और लगता है कि मित्र सम्बन्धी दगा देने जा रहे है या अफसर द्वेष मानते है और नीचा दिखाने वाले है। कल्पना को अशुभ चिन्तन के साथ जोड़ भर दिया जाय तो इसे राई का पर्वत बनाने में कितनी देर लगती है।
चिन्तन में नियोजित किया जाता है, जिससे आत्म-कल्याण हो और शरीर से वह कार्य कराये जाते है, जो आत्मा का गौरव बढ़ाते हों, उसका भविष्य उज्ज्वल बनाते हैं।
चिन्तन में लगा दिया जाय तो आध्यात्मिक आनन्द का एक निर्झर झरने लगता है, जिसके रसास्वादन की अनुभूति भुक्तभोगी ही जानते है। अरुणाचल के महान संत महर्षि रमण के बारे में विख्यात है कि वे सदैव मौन रहते थे और मौन रहते हुए भी निकट आने वालों की शंकाओं का समाधान करते थे। उनकी सिद्धावस्था असंदिग्ध एवं अद्वितीय थी। उनके अनुसार भाषण से व्यक्तियों का बिना उनका सुधार किये कुछ घंटे मनोरंजन हो सकता है, जबकि मौन स्थायी वस्तु है तथा मानवता के लिए कल्याणकारी है। मौन एक तरह का अनन्त भाषण हैं प्राचीनकाल के ऋषि अपने शिष्यों को मौन द्वारा ही उपदेश किया करते थे।
चिन्तन में सहायता करता था। उससे प्रभावित हर नागरिक को सही दिशा मिलती थी। आज सब कुछ उल्टा है। यदि आज वस्तुस्थिति समझने के लिए लोग क्या कहते हैं और क्या करते है? इसे आधार बनाया जाय तो निश्चित रूप से हमें अवांछनीय निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा और अनुचित रीति-नीति अपनाने के लिए विवश होना पड़ेगा।
चिन्तन करता है, वरन् मन और भावनाओं के तल को भी स्पर्श करने की योग्यता रखता है। अतएव अब इसे केवल मस्तिष्क नहीं, मन, मस्तिष्क और हृदय की मानसिक क्षमता, चिंतन-चेतना एवं भाव-संवेदना की त्रिधा भूमिका निभाने वाला यंत्र कहना अधिक समीचीन होगा।
चिन्तन दृष्टिगत रख ऋषियुग्म की इच्छानुसार इसे नालन्दा तक्षशिला स्तर का, विश्व स्तर का प्रशिक्षण केन्द्र बनाए जाने की निश्चय हुआ हैं नक्शे बन रहे है- सभी शीर्ष स्तर के आर्कीटेक्टों भवन निर्माताओं से संपर्क जारी है तथा इसी फरवरी में निर्माणकार्य के द्रुतगामी रूप से आरम्भ होने की संभावनाएँ है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-March
चिन्तन प्रवाह से हटाकर अमुक दिशा में नियोजित करने की प्रक्रिया ही ध्यान कहलाती है। शुभारंभ के रूप में भटकाव के स्वेच्छाचार से मन को हटाकर एक नियत-निर्धारित दिशा में लगाने के प्रयोगों का अभ्यास किया जाय तो शीघ्र सफलता मिलती है।
चिन्तन के प्रवाह में लाने का प्रयास-पुरुषार्थ करना पड़ता है। आसान नहीं है यह, पर असंभव भी नहीं। यदि यह किया जा सका तो आत्मिक और भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से लाभ मिलते हैं। जहाँ इस वैचारिक तन्मयता की फलश्रुति आध्यात्मिक जगत में प्रसुप्त शक्तियों के जागरण से लेकर ईश्वरप्राप्ति-रसौ वै सः की आनन्दानुभूति के रूप में प्राप्त होती है, वहाँ भौतिक क्षेत्र में अभीष्ट प्रयोजनों में पूरी तन्मयता-तत्परता नियोजित होने से कार्य का स्तर ऊँचा उठता है, सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है और बढ़ी-बढ़ी उपलब्धियाँ मिलती हैं।
चिन्तन करने वाले मानव, भटकावों में ले जाने वाली गतिविधियों में संलग्न साधक के लिए एक मार्गदर्शन है, जो विराट गायत्री परिवार के संस्थापक -संरक्षक ने 1940 की अखण्ड-ज्योति पत्रिका के जून अंक में संपादकीय के रूप में लिखा था। पढ़ें व आत्मचिन्तन करें।
चिन्तन के प्रवाह को बुलाना, उन्हीं में रमण करना ध्यान होने की स्थिति ला देता है। मानवी मन वस्तुतः जंगली हाथी की तरह है, जिसे पकड़ने के लिए पालतू-प्रशिक्षित हाथी भेजने पड़ते हैं। सधी हुई बुद्धि पालतू हाथी का कार्य करती है। ध्यान के रस्से से जकड़कर उसे काबू में लाती है और फिर श्रेष्ठ प्रयोजनों में संलग्न हो सकने योग्य सुसंस्कृत बनाती है।
चिन्तन करें।
चिन्तन का प्रयोजन पूरा हो सके, इसके लिए इष्ट चाहे वे शिव-पार्वती हों, शिवलिंग हों, भगवान श्रीकृष्ण, विष्णु, माँ गायत्री, अम्बा, भवानी, दुर्गा, सरस्वती अथवा गणेश या हनुमान एवं काबा का ध्यान हो, चाहे ईसामसीह का पैगम्बर का हो अथवा अपने गुरु का-उन पर मन आरोपित कर ध्यान को प्रगाढ़ बनाना चाहिए। इष्टदेव के समीप-अति समीप होने, उनके साथ लिपट जाने, उच्चस्तरीय प्रेम के आदान-प्रदान की गहरी कल्पना करनी चाहिए। इसमें भगवान और जीव के बीच माता-पुत्र स्वामी-सेवक जैसा कोई भी सघन संबंध बनाया जा सकता है। इससे आत्मीयता को अधिकाधिक घनिष्ठ बनाने में मदद मिलती है। भक्त अपनी अहंता-संकीर्णता को भगवान के इष्ट के चरणों में अर्पित करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-February
चिन्तन, स्वभाव और क्रिया-कलाप लगभग वैसे ही होते हैं, जैसे कि उस प्रदेश में रहने वाले लोगों के। समय का प्रभाव, युग का प्रवाह इसी को कहते हैं। सर्दी-गर्मी का मौसम बदलने पर प्राणियों के, वनस्पतियों के तथा पदार्थों के रंग-ढंग ही बदल जाते हैं। इनकी गतिविधियों में ऋतु के अनुकूल बहुत कुछ परिवर्तन होते हैं।
चिन्तन से अपने विचारों को बदला जा सकता है। बुरे विचारों को बदला जा सकता है। बुरे विचारों को हटाकर उसके स्थान पर दूसरे सुन्दर विचारों को अपने मन में स्थान दीजिए। इस प्रकार पवित्र-निर्मल बनकर उस महान शक्ति को अपव्यय होने से रोकें, जो कि जीवन की एक महत्वपूर्ण शक्ति है। ब्रह्मचर्य एक महान तप है।
चिन्तन व दुष्टाचरण के साथ जूझने का प्रबल पराक्रम करना होता है। शहीद का अर्थ है- ‘स्व’ का ‘पर’ के लिये समग्र समर्पण। इसे ही समर्पण-शरणागति कहते हैं। स्वार्थ का परमार्थ में उत्सर्ग करने से तात्पर्य है-लोभ-व्यामोह और अह के बन्धनों को काट फेंकना, दायरा व्यापक बनाकर लोक प्रवाह से अलग स्वयं को धर्म-संस्कृति के पुनरुद्धार हेतु नियोजित कर देना।
चिन्तन प्रक्रिया में परिवर्तन को विचार क्रान्ति, चरित्र में बदलाव को नैतिक क्राँति एवं व्यवहारी में आए हेर-फेर को सामाजिक क्रान्ति नाम उन्होंने दिया था। जब तक इन तीन मूलभूत आधारों पर समग्र परिवर्तन की बात नहीं सोची जाती- युगपरिवर्तन संभव नहीं हो सकता। हिंसा से या रैली निकालने से यह बदलाव व्यापक स्तर पर न अब तक लाया जा सका है, न कभी भविष्य में लाया जा सकेगा। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा आरंभ किए गए सारे क्रिया-कलाप इसी आध्यात्मिक महाक्रान्ति की धुरी पर खड़े देखे जा सकते हैं। जब भी हम क्रान्ति के विषय में सोचें, हमें युगदेवता-आराध्य सत्ता के चिन्तन के साथ अपनी संगति जोड़कर बड़े व्यापक परिप्रेक्ष्य में इस पर चिन्तन कर इस साधना वर्ष में असली जामा पहनाने का प्रयास कर नवयुग के अभ्युदय की बात सोचनी चाहिए।
चिन्तन में शुचिता- पवित्रता का समावेश होना। इक्कीसवीं सदी मातृशक्ति की सदी है। इसे पुनः स्थापित करने हेतु ही इस रचनात्मक क्राँति का- युगनिर्माण योजना, अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा सूत्र-संचालन किया जा रहा है।
चिन्तन में हुई ही। इतना सब होते हुए भी आज यदि एक महाक्रान्ति की आवश्यकता अनुभव की जा रही है, तो उसे युगपरिवर्तन के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता मानते हुए भली-भाँति समझना व उसका एक अंग बनकर जीना ही सभी के लिए वरेण्य माना जाना चाहिए।
चिन्तन-मार्गदर्शन-राष्ट्रव्यापी संगठनात्मक पुनर्गठन का सूत्र-संचालन-नियमन चल रहा हो, वहाँ तो यह प्रक्रिया और अधिक गतिशील-सक्रिय-जीवन्त नजर आनी चाहिए। इस वर्ष के शिविरों में शाँतिकुँज में आने वाले परिजनों को कुछ विशिष्ट उपलब्धि होनी चाहिए एवं यह विशिष्ट साधनात्मक ऊर्जा के परिमाण में हो, यही अभी की, समय की सबसे बड़ी माँग है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की उत्कृष्टता ही इस प्रकार की सुखद परिस्थितियाँ उत्पन्न कर रही थी। हँसती-हँसाती खिलती-खिलाती उठती-उठाती जिन्दगी इसी आधार पर बितायी जा सकती है। स्वयं पार उतरना और असंख्यों को अपनी नाव पर बिठाकर पर कराना इसी आधार पर सम्भव हो सकता है। कभी इस देवभूमि में सतयुग था, तब समस्त संसार उसका लाभ उठाता था। अब इस प्रखर साधना वर्ष में किए जाने वाले महापुरुषार्थ से उस पुण्य प्रक्रिया का पुनर्जीवन सम्भव होने जा रहा है।
चिन्तन को भ्रष्ट और आचरण को दुष्ट बनाता है, तो उसकी प्रतिक्रिया अदृश्य जगत का सन्तुलन बिगाड़ती है और विपत्तियों का विक्षोभ उत्पन्न करती है। दैवी-प्रकोप प्रत्यक्ष में लगते तो ऐसे हैं मानों अदृश्य द्वारा मनमानी की जा रही है, किन्तु अदृश्य और अप्रत्यक्ष को जो जानते हैं, उनका स्पष्ट मत है कि पानी में पत्थर फेंकने और छींटे उठाने की जिम्मेदारी उन लड़कों की है, जो तालाब के एक कोने पर बैठे शरारत करते रहते हैं। जल अकारण उछलने लगे और अपने जलचर परिवार के लिए संकट उत्पन्न करे, ऐसी बात है नहीं, प्रतीत भले ही होती हो।
चिन्तन से स्पष्ट जाना जा सकता है कि कितना स्पष्ट भविष्य का नक्शा उनके समक्ष रहा होगा।
चिन्तन के साथ अपनी संगति जोड़कर बड़े व्यापक परिप्रेक्ष्य में इस पर चिन्तन कर इस साधना वर्ष में असली जामा पहनाने का प्रयास कर नवयुग के अभ्युदय की बात सोचनी चाहिए। इसमें जो भी कुछ संघर्ष है- वह सारा विचारों का विचारों से ही है। ऐसे पुरुषार्थ में सदा से ही देवत्व की विजय होती रही है, अतः हमें साधनात्मक वातावरण बनाने भर की आवश्यकता है- क्राँति के बीज ऐसी पृष्ठभूमि में सहज ही पुष्पित-पल्लवित होते चलेंगे।
चिन्तन और दुष्ट-आचरण का आश्रय लेने वाली मानवीय निकृष्टता का है। नियति उसी से रुष्ट होती है और उसी के फलस्वरूप दृश्य एवं अदृश्य विपत्तियाँ, समस्याएँ तथा विभीषिकाएँ उभरती व त्रास देती हैं।
चिन्तन, तर्क और ध्यान-धारणा के उच्च, विचित्र और विविध कीर्तिमान उपलब्ध हुए है। महादेश भारत के दक्षिण प्रान्त इस महायोगी के दिव्य चरण हैं, जिन्हें महासागर अनवरत धोता रहता है। मैं इस साधना भूमि की दुर्दशा नहीं सह सकता। गुरु गोरक्ष बोलते जा रहे थे।
चिन्तन के कारण दुर्मति-जन्य दुर्गति-नैतिक पतन, लिप्साओं की होड़ एवं क्षुद्र अहंकार रूपी विष जो समा गया है, उसे धोने के लिए गायत्री रूपी सद्ज्ञान एवं यज्ञरूपी सत्कर्म के साथ संस्कारों की पावन त्रिवेणी के विस्तार की क्रान्ति खड़ी करने की आवश्यकता इसीलिए सर्वाधिक पड़ रही है कि इससे कम में आध्यात्मिक वातावरण विनिर्मित होगा नहीं। वातावरण में प्रविष्ट की गयी श्रेष्ठ आस्थाएँ ही इस देश की नहीं, अपितु समूचे विश्व को उत्कृष्टता के प्रति निष्ठावान् बनाए रख सकेंगी। वातावरण का प्रभाव सभी भली-भाँति जानते हैं। किसी को श्मशान घाट लाकर खड़ा कर दिया जाय और बताया न जाय कि यह क्या है, तो अनायास भय उसे लगने लगता है। पशुओं को उनके मालिक दिनभर एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाते ले जाते रहते हैं, किंतु जैसे ही उन्हें वधगृह की ओर ले जाया जाता है तो उन्हें भी भय से काँपते देखा जा सकता है।
चिन्तन और चरित्र से उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रिया, जो प्रकृति की नियामक सत्ता ‘नियति’ पर प्रभाव डालती है। अनाचरण से नियति की अन्तरात्मा क्षुब्ध होती है, फलतः उसका प्रकृति कलेवर भी आक्रोश का, आवेश का परिचय देता है। दैवी-प्रकोपों के मूल में जितना दोष प्रकृति व्यवस्था को उद्धत रूप से छेड़खानी करने का है, उससे भी अधिक भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट-आचरण का आश्रय लेने वाली मानवीय निकृष्टता का है। नियति उसी से रुष्ट होती है और उसी के फलस्वरूप दृश्य एवं अदृश्य विपत्तियाँ, समस्याएँ तथा विभीषिकाएँ उभरती व त्रास देती हैं।
चिन्तन, चरित्र व व्यवहार में आमूलचूल परिवर्तनं चिन्तन प्रक्रिया में परिवर्तन को विचार क्रान्ति, चरित्र में बदलाव को नैतिक क्राँति एवं व्यवहारी में आए हेर-फेर को सामाजिक क्रान्ति नाम उन्होंने दिया था। जब तक इन तीन मूलभूत आधारों पर समग्र परिवर्तन की बात नहीं सोची जाती- युगपरिवर्तन संभव नहीं हो सकता। हिंसा से या रैली निकालने से यह बदलाव व्यापक स्तर पर न अब तक लाया जा सका है, न कभी भविष्य में लाया जा सकेगा। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा आरंभ किए गए सारे क्रिया-कलाप इसी आध्यात्मिक महाक्रान्ति की धुरी पर खड़े देखे जा सकते हैं। जब भी हम क्रान्ति के विषय में सोचें, हमें युगदेवता-आराध्य सत्ता के चिन्तन के साथ अपनी संगति जोड़कर बड़े व्यापक परिप्रेक्ष्य में इस पर चिन्तन कर इस साधना वर्ष में असली जामा पहनाने का प्रयास कर नवयुग के अभ्युदय की बात सोचनी चाहिए।
चिन्तन नष्ट होता है, क्योंकि उस प्रसंग को अविवेकपूर्ण और अतिश्योक्ति पूर्ण बनाने में ही सारी विचार-शक्ति बुद्धि लग जाती है, जबकि मौन से एक स्वाभाविक ही गम्भीरता भी होती है। अतः लोकव्यवहार में भी मौन अथवा मितभाषी व्यक्तित्व को प्रभावपूर्ण बना देता है।
चिन्तन में गोरक्ष का ज्ञान उभरा कि यह हृदय स्थल भी वात प्रधान है। यह रसानुभूति तो कराता है, राग को क्षुब्ध कर भावोर्मियाँ उठाता है और अंशतः तटस्थता और अंशतः निर्मलता से - कला रस से चैतन्य को तन्मय कर देता है यहाँ चेतना-भाव के तरंगाघात से आनन्द में किलोलती है, किन्तु इसमें भी स्थूल जीवन का अवशेष है। यहाँ रागारुणता है, अनुराग की सत्यता है, एकनिष्ठता है, किन्तु रस उच्चतर मौन है, यह ब्रह्मानंद नहीं, उसका कनिष्ठ सहोदर ही तो है। उसमें आत्मा की झलक तो है, पर भावुकता की सीलन है यहाँ। यहाँ भाववात्य चक्र में अधिक रुकने वाला नहीं हूँ।
चिन्तन को बढ़ावा मिलेगा।
चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व का धर्म शिक्षण सुलभ बनता है। साधना वर्ष के अनुशासनों की उपयोगिता का जितना माहात्म्य कहा जाय, उतना ही कम है।
चिन्तन कर इस साधना वर्ष में असली जामा पहनाने का प्रयास कर नवयुग के अभ्युदय की बात सोचनी चाहिए। इसमें जो भी कुछ संघर्ष है- वह सारा विचारों का विचारों से ही है। ऐसे पुरुषार्थ में सदा से ही देवत्व की विजय होती रही है, अतः हमें साधनात्मक वातावरण बनाने भर की आवश्यकता है- क्राँति के बीज ऐसी पृष्ठभूमि में सहज ही पुष्पित-पल्लवित होते चलेंगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-May
चिन्तन में सत्प्रवृत्तियों का इतना गहरा समावेश, जो चरित्र में आदर्शवादिता के प्रति अगाध निष्ठा उत्पन्न कर सके, उलटे को उलट कर सीधा करना इसी को कहते है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-April
चिन्तन, और चिंतन का अवलम्बन और मर्यादाओं का परिपालन करने पर खरा सिद्ध होगा। इस भावी की विचारणीय बातें हैं-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-August
चिन्तन-चेतना को जगाने में, उसे सुनिश्चित दिशा और गति प्रदान करने में जिन महामानवों ने योगदान प्रदान किया है, उनमें प्रेरक महामानव हैं-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-December
चिन्तन द्वारा भरा जा सके, तो ऐसी दुर्गति नहीं होगी। मन-ही-मन कुढ़ना, प्रकट में क्रोध करना, भयंकर गुस्से में आ जाना, ये सब बाधाएँ हैं स्थितप्रज्ञ के मार्ग की। ‘स्ट्रेस’ व मनोविकार इस कामना को दबाने से ही पैदा होते हैं। यदि हम कामना को भावना में रूपांतरित कर दें- दबाकर क्रोध में न बदलें, तो हम ‘स्ट्रेस’ तनाव से भी बच सकते हैं। अपनी ऊर्जा को नियोजित करता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-March
चिन्तन करूंगा, सद्ग्रन्थों का ही पठन-पाठन करूंगा, दिन में नहीं सोऊंगा, कुविचारों को मन में स्थान नहीं दूँगा तथा उनको उत्पन्न करने वाले व्यर्थ के वार्तालाप भी नहीं करूंगा।’

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-September
चिन्तन करेगा, तब तुझे अवश्य ही ब्रह्म का ध्यान होगा क्योंकि ब्रह्म का चिह्न ओऽम् है।
चिन्तन अथवा ज्ञान-अध्यात्म द्वारा नष्ट कर दे और ब्रह्मशक्ति द्वारा चमत्कृत हो। ब्रह्म अवस्था को पुनः प्राप्त करने की चेष्टा कर। अपने सत्-चित्त आनन्द स्वरूप में रमण कर।
चिन्तनशील मनुष्यों के लिए संगीत विशेष रूप से उपयोगी है। यों तो यह सबका मनोरंजन करती है। संगीत में ही इतनी ताकत है कि वह सर्पों और वन मृगों तक को खींच सकता है- मनुष्य तो फिर मनुष्य ही है।
चिन्तन में लीन हो जा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-November
चिन्तन करते हैं आत्म विकास के लिये। धर्म ग्रन्थ पढ़ते हैं और व्याख्यान सुनते हैं इसलिये कि अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह की जीवन में प्रतिष्ठा हो, हमारा नैतिक जीवन आदर्शमय बने। सामयिक, प्रतिक्रमण, क्षामन, क्षामना करते हैं, इसलिये समत्व भाव की वृद्धि हो, क्रोध, मान, माया एवं लोभ की कमी हो, राग-द्वेष को छोड़ें, अपने दोषों को स्मरण कर भविष्य में उनसे हटते रहें, क्षमत-क्षामना कर द्वेष को हटाकर हृदय को पवित्र-उदार और विशाल बनावें। पर ऐसा होता कहाँ है। नित्य प्रतिक्रमण और सामयिक करते रहने पर भी हमारी वृत्तियाँ पुरानी हैं एवं धर्म कार्य न करने वाले दूसरों की भाँति ही उसमें भी वे सब दोष पाये जाते हैं।
चिन्तन और मनन के द्वारा निज आत्माओं को ईश्वरीय ज्ञान से अलोकित कर उत्तम ग्रन्थों का निर्माण किया। अतएव उन्होंने संसार को अमूल्य ज्ञान निधि भेंट की। वे मानव के हित चिन्तक और विश्व धर्म के पालक थे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-October
चिन्तन करना उचित है किन्तु एक बार न्यायोचित योजना बना कर उससे पीछे सरकना उचित नहीं है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-April
चिन्तन करना, श्रेष्ठ विचारना, श्रेष्ठ कार्य करना, इस प्रकार मनुष्य श्रेष्ठता को प्राप्त होता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-December
चिन्तन, तथा धर्मकृत्य भी कम जरूरी नहीं हैं। इसी तरह से बीस वर्ष भी बीत गये।
चिन्तन तथा निष्काम कर्मयोग का आचरण करते रहने को बताया है क्योंकि यह निष्काम कर्मयोग साधन, सांख्ययोग साधन से सुगम है।
चिन्तन ही निष्काम कर्मयोग का साधन है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-August
चिन्तनशील अपना पुंसत्व तक खो बैठे हैं।
चिन्तन न करना किसी के द्रव्य तथा स्त्री पर मन न चलाना, गुरु व शास्त्र के वचनों पर श्रद्धा रखना। ये मन के सुँदर चरित्र हैं। इसी के अनुकूल भ. गी. (17/14-16) में भी आता है।
चिन्तन में लगा दी जाय तो शाँति के उस स्रोत तक पहुँच हो सकती है जो हमारी अशान्तियों को हटाकर सुखद शीतल और स्निग्ध शाँति का आस्वादन कराती है। इस प्रकार के विश्वास के उपरान्त नवीन चैतन्यता, स्फूर्ति और जीवनी शक्ति प्राप्त होती है जो कार्यक्षमता, सूक्ष्मदर्शिता और प्रतिभा को कई गुना बढ़ा देती है।
चिन्तन करना, दूसरे के द्रव्य लेने की इच्छा रखना और नास्तिकता (ईश्वर, परलोक तथा धर्म इन पर श्रद्धा न रखना) ये मानसिक पाप हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-January
चिन्तन एवं अनुभव का कोई महत्त्व ही नहीं रहा। भौतिकता के उन्माद ने इंसानियत को निगल जाने का प्रयास किया। संभवतः इससे उपजे आक्रोश ने इस भौतिकवाद को ही नकार दिया। और कहा जाने लगा कि नीत्शे के ईश्वर के समान भौतिकवाद का भी अन्त हो गया।
चिन्तन द्वारा इस असाध्य मनोरोग से मुक्ति सम्भव है।
चिन्तन होता रहे। यूँ ही जिह्वा को बन्द रखकर मन में ईर्ष्या-द्वेष का बीज बोते रहने को मौन नहीं कहा जाता। यह तो और भी खतरनाक एवं हानिकारक सिद्ध हो सकता है। मौन के साथ श्रेष्ठ चिन्तन, ईश्वर स्मरण आवश्यक है तभी मौन की सार्थकता है। इस संदर्भ में श्री अरविन्द आश्रम की श्री माँ कहती हैं कि सात दिन के गम्भीर मौन के बाद ही एक घण्टा सार्थक बोला जा सकता है।
चिन्तन एवं व्यवहार को सुधारने एवं संवारने की प्रक्रिया प्रारम्भ कर देनी चाहिए।
चिन्तन और मनन से यह पुष्ट होता है। और इसका आधार है स्वाध्याय। स्वाध्याय की प्रक्रिया में ही मन का अप्रतिम सौंदर्य छिपा पड़ा है। यह अत्यन्त सहज-सुलभ है और हर कोई इसे प्राप्त कर सकता है। मनस्वी का मन बड़ा सुन्दर होता है।
चिन्तन एवं व्यवहार को उत्कृष्ट एवं परिष्कृत करके ही ऐसे दिव्य सौंदर्य का अनुभव बोध किया जा सकता है। जब इस परम सौंदर्य का अनुभव होता है तो जीवन सौंदर्य का पर्याय बन जाता है। ऐसा सौंदर्य ही महान् है। और इसी की अभीप्सा करनी चाहिए, जो हमें परमात्मा के दिव्य सौंदर्य से तदाकार-एकाकार कर दे।
चिन्तन करेगी उसी तरह से उसके बालक का स्वभाव विनिर्मित होगा। अतः गर्भवती माता को सदैव प्रसन्नचित्त, सन्तुष्ट एवं शान्त रहना चाहिए, जिससे कि उसके गर्भ से श्रेष्ठ आत्मा का अवतरण हो सके।
चिन्तन, ईश्वर स्मरण आवश्यक है तभी मौन की सार्थकता है। इस संदर्भ में श्री अरविन्द आश्रम की श्री माँ कहती हैं कि सात दिन के गम्भीर मौन के बाद ही एक घण्टा सार्थक बोला जा सकता है। और एक वर्ष का मौन एक दिन बोलने की अनुमति प्रदान करता है। इससे मौन की महत्ता प्रतिपादित होती है।
चिन्तन के सुरम्य वातावरण में सुगन्ध बिखेरता है तथा सजल भावनाओं से पोषित होता है। इसीलिए तो दिव्य जीवन के प्रणेता एवं महान् योगी श्री अरविन्द के मन का विचार निसृत हो कह उठा-’इनर रेगुलेट आउटर बीइंग‘ अर्थात् जीवन के समस्त बाहरी क्रिया व्यापार अन्दर से नियंत्रित एवं संचालित होते हैं। निःसंदेह बाह्य व्यवहार आन्तरिक चिन्तन एवं भावनाओं के गर्भ से ही जन्म लेता है, पल्लवित एवं विकसित होता है। व्यवहार विज्ञान इसी सत्य को घोषित करता है।
चिन्तन एवं भावनाओं के गर्भ से ही जन्म लेता है, पल्लवित एवं विकसित होता है। व्यवहार विज्ञान इसी सत्य को घोषित करता है।
चिन्तन शक्ति तथा दृष्टि को थोड़ी सूक्ष्मता के साथ गहन करें तो हमें सहज ही स्पष्ट हो जाएगा कि स्वामी जी की चेतना ने सदा ही भारत देश के युवाओं के हृदय में बोध के तार झंकृत किए हैं। श्रीअरविन्द, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू ये सभी अपनी युवावस्था में स्वामी जी की वैचारिक-आध्यात्मिक चेतना से प्रेरित-प्रभावित रहे हैं। स्थिति आज भी वही है। प्रत्येक आदर्शनिष्ठ युवा के प्रेरणा स्रोत और कोई नहीं, स्वामी विवेकानन्द हैं। उनका सुन्दर मुख हमें आकर्षित भी करता है और प्रेरित भी।
चिन्तन में लीन हो गया।
चिन्तन एवं व्यवहार ही भविष्य के लिए मूल्याँकन का मापदण्ड होगा। वर्तमान में कोई भी नैतिक आदर्श उस शिखर को स्पर्श नहीं कर सकता। वह वर्तमान मनुष्य की पहुँच से परे है। परन्तु जैसे ही इसमें अतिमानव का आविर्भाव होगा वैसे ही जीवन के हर क्षेत्र में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाएंगे और प्रचलित परम्परा के मापदण्ड एवं मानदण्ड बदल जायेंगे।
चिन्तन को परिष्कृत एवं उन्नत कर सबसे सद्व्यवहार बनाए रखना चाहिए। ऐसा करके हम अपने आप ही सर्वोच्च लोक सम्मान के अधिकारी बन जायेंगे।
चिन्तन नवीन दर्शन को जन्म देता है, एवं वैज्ञानिक अपने शोध-अन्वेषण से एक नया आविष्कार करता है। ऐसा मौन ही सार्थक है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-April
चिन्तन शक्ति को विकृत एवं बर्बाद करती हैं। यदि व्यावहारिक रूप से कतिपय साधना सूत्रों को अपनाना हो तो तप के विशेष समय में शारीरिक तल पर 1. ब्रह्मचर्य, 2. अस्वाद, 3. किसी से सेवा न लेना, 4. कठोर बिछौने पर शयन करना एवं 5. दिनचर्या को पूर्णतया नियमित एवं अनुशासित रखना जैसे सूत्रों को अपनाया जा सकता है।
चिन्तन एवं दर्शन का भी विकास करें। शास्त्रों के मौलिक सत्य को अपरिवर्तित रखते हुए, उसके व्यावहारिक पक्ष में यथोचित हेर-फेर करें, नए क्षितिजों का प्रवेश सम्भव बनाएँ। जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण अपनाएँ, जो कि जीवन के त्याग में नहीं, उसे आध्यात्मिक स्तर पर उठाने में सच्ची सफलता मानता है। मानव मात्र का चेतना स्तर नए आलोक में सजाने-संवारने में पुरुषार्थ की सार्थकता समझता है।
चिन्तन भी नहीं है। यह इन सबसे कहीं गहरा है। यह तो सवाल है जीवन और मरण का।
चिन्तनधारा को विस्तृत करें, उसे ऊँची उठाएँ। अपने हृदय के द्वार खोलें, उसे विश्व प्रेम से भरपूर करें। धार्मिक तथा जातीय सीमाओं का अतिक्रमण कर मानव मात्र को आत्मा का सखा मानें। आत्मीयता के आलिंगन में सम्पूर्ण मानवता को बाँधें। खोखली मान्यताओं से बाहर आएँ, युग ऋषि द्वारा अनुभूत सत्य को अपने विचारों का आधार बनाएँ।
चिन्तन किया है। इसी तरह श्री देवी भागवत पुराण में भी उन्होंने तीसरे स्कन्ध के 28वें से 30वें अध्यायों में श्रीराम के चरित्र का बड़ी श्रद्धा और भक्ति से चित्रण किया है।
चिन्तन करता है, वही सच्चा अध्यात्मवेत्ता है। किसी प्राणी के साथ द्रोह भाव विहीन जीवनवृत्ति ही श्रेष्ठ धर्म है। गुरुकृपा से मैंने इस सत्य को जाना और समझा है। हे मुनिवर! मेरे गुरुदेव ने अपनी देह का त्याग करने से पूर्व मुझे यह निर्देश दिया था कि समस्त मनुष्यों को बिना किसी भेदभाव के मेरे ज्ञान का प्रकाश बाँटना। अपमान-तिरस्कार, उपेक्षा-अवहेलना को प्रीतिपूर्वक सहन करते हुए अपने कर्त्तव्य कर्म में निरत रहना।
चिन्तन के अप्रतिम एवं परम मर्मज्ञ आचार्य थे। उन्होंने अपने ब्रह्मज्ञान के मन्दराचल से अध्यात्म सागर का मन्थन कर भगवद् रसामृत की प्राप्ति ही नहीं की, उसका प्रीतिपूर्ण वितरण भी किया।
चिन्तन है। हाँ, यह कहीं संक्षिप्त रूप में है, तो कहीं विशद् रूप में। महाभारत के वनपर्व में भी भगवान् राम का चरित संक्षिप्त रूप में उनके द्वारा वर्णित है। महर्षि वाल्मीकि के बाद भगवान राम के कथाकार रूप में महर्षि व्यास ही सर्वोपरि हैं। अग्नि पुराण के पाँचवें से ग्यारहवें अध्याय में श्रीरामावतार के वर्णन के प्रसंग में उन्होंने सात काण्ठों में वर्णित श्री रामायण की कथा का संक्षिप्त रूप निरूपित किया है।
चिन्तन और सद्गुरु ध्यान ही समस्त साधनाओं का सार है। उनके कथन की समाप्ति के बाद सभी एक-एक करके उठे, सबको अब चरण स्पर्श का सौभाग्य मिला था।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-July
चिन्तन का परिणाम भी माना जा सकता है।
चिन्तन की ओर संकेत करती है।
चिन्तन धारा उन्हीं के श्रीचरणों की ओर मुड़ चली। मन की लहरों, उसके स्पन्दनों का संवेग थमने लगा। कुछ ऐसा ही जादू था इस भक्तिपूर्ण स्मरण में। आन्दोलित, उद्वेलित, संवेगित मन- निस्पन्द, नीरव, अचंचल होने लगा। अन्तर की हलचलें शान्त होते ही बाहर की हलचलों का श्रवण भी मन्द पड़ गया।
चिन्तन को अपनी नित्य प्रति की जाने वाली साधना का अविभाज्य अंग मानें।
चिन्तन के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी है। सादगी व संयम के ऋषि आदर्श को निभाना मेरा दायित्व है। इसलिए मुझे यही शोभा देता है। रही बात लोगों के सोचने की, सो उनमें से जो विचारशील होंगे, सो ठीक ही सोचेंगे। और विचारहीनों की कभी परवाह नहीं की जानी चाहिए।
चिन्तन है। साथ ही इनकी भक्ति का साधना विज्ञान है। इसका गुरु भक्ति में लीन साधकों के लिए विशेष महत्व है।
चिन्तन, मनन व निदिध्यासन से गुरुतत्त्व का बोध पा सकें, परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से लाभान्वित हो सके, इसलिए इस ज्ञान को धारावाहिक रीति से क्रमिक ढंग से प्रकट किया जा रहा है। अब से प्रत्येक महीने की अखण्ड ज्योति में मंत्र क्षमता वाले गुरुगीता के श्लोकों की भावपूर्ण व्याख्या की जाएगी।
चिन्तन, मनन, पाठ-पठन व निदिध्यासन से अनेकों को अपने गुरुदेव का संग-सुपास मिला है। उन्होंने दिव्य लोक में रह रहे अपने सद्गुरु की चेतना का संस्पर्श पाने में सफलता प्राप्त की गोस्वामी जी के शब्दों का माँत्रिक महत्व है। इसकी गुणवत्ता तब शत-सहस्र गुणित हो जाती है, जब अन्तर्चेतना में इसका अर्थ बोध समाहित हो जाय। गुरुचरण चरित के मंत्रदृष्टा महाकवि तुलसी इसका प्रारम्भ करते हुए कहते हैं-
चिन्तन से गुरुतत्त्व का बोध प्राप्त कर सकें। इसके पठन, अर्थ चिन्तन को अपनी नित्य प्रति की जाने वाली साधना का अविभाज्य अंग मानें।
चिन्तन के प्रचलित स्वरूप में प्रायोगिक वैज्ञानिकता का कोई स्थान नहीं है। जबकि ट्राँसपर्सनल मनोविज्ञान का सारा ढाँचा वैज्ञानिक प्रयोगों पर टिका है। वान के अनुसार यह भारी फर्क है। एक तरफ सिर्फ श्रद्धा व आस्था है, तो दूसरी ओर तर्क एवं प्रयोग। वान को इन दोनों के मिलन का कोई बिन्दु नजर नहीं आता।
चिन्तन एवं उनके कार्यों में संलग्न हो गया। किसी भी तरह के स्वार्थ का मोह छूटा, अहंता के सारे बन्धन टूटे। ऐसे में आत्मस्वरूप में अवस्थिति सहज है। इस भाव दशा में मन रूपांतरित हो जाता है। उसकी दृष्टि एवं दिशा बदल जाती है।
चिन्तन, मनन व निदिध्यासन को समर्थ साधना विधि के रूप में बताया था। इस गुरुगीता का उपदेश कैलाश शिखर पर भगवान सदाशिव ने माता पार्वती को दिया था। बाद में यह गुरुगीता नैमिषारण्य के तीर्थ स्थल में सूत जी ने ऋषिगणों को सुनायी। भगवान व्यास ने स्कन्द पुराण के उत्तरखण्ड में इस प्रसंग का बड़ी भावपूर्ण रीति से वर्णन किया है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-June
चिन्तन के साथ भविष्य का सृजन भी है। सृजन-संवेदना ही तो संस्कृति है। जो सृजन संवेदना से युक्त है, वह सुसंस्कृत है। इसके विपरीत जो कोई भी है, जहाँ भी है, उसके लिए कोई सुसंस्कृत से विपरीत शब्द ही ढूंढ़ना पड़ेगा। क्षमा याचना के साथ उसके व्यक्तित्व को विकृत ही कहना पड़ेगा।
चिन्तन में उन्होंने कुछ मौलिक सवाल उठाए हैं- क्या शिक्षा का स्मरण शक्ति के विकास तक सीमित रहना उचित है? ऐसी शिक्षा से क्या फायदा जिससे विद्यार्थी के नैतिक व सामाजिक मूल्य विकसित न हो पाते हों? संकल्प बल से विहीन, उच्च आदर्शों से विमुख व्यक्तियों का सृजन करने वाली शिक्षा की सार्थकता क्या है? इवान इलिच के ऐसे और भी अनेकों सवाल हैं। इन सभी सवालों का सटीक जवाब शिक्षण प्रक्रिया के मौलिक सृजन में है।
चिन्तन वाले निराशावादी हैं। उनके निराशावाद का गहरे से गहरा अर्थ आत्मघात के अतिरिक्त कुछ नहीं होता है। ऐसे लोग जीवन और उसके स्रष्टा के अनुदानों से सदा ही अपरिचित रहते हैं। जिनकी सोच दूसरी बात पर टिकती है, उन्हें इस सत्य का बोध होता है कि जीवन को परिवर्तित रूपांतरित करने की खोज आवश्यक है।
चिन्तन की दृष्टि के इसी उदार भाव से आज के युग प्रश्न हल होंगे। संकीर्ण, सीमाओं से आबद्ध और आग्रहों से जकड़ी हुई सोच किसी भी तरह काम आने वाली नहीं है। आज की दुनिया नयी है, एकदम बदली हुई। लेकिन हमारी सोच वही पुरानी है, अपनी सीमाओं से बंधी, अनेक आग्रहों से लिपटी। दोनों के बीच कोई ताल-मेल नहीं है।
चिन्तन के सूत्रों का है। ये निम्न है- 1. अपने चिन्तन को पवित्र एवं निष्कपट बनाए रखेंगे। 2. अपने चिन्तन को सभी तरह के मनोविकारों से रहित करने के लिए प्रयत्नशील रहेंगे। चरित्र के सूत्रों का महत्त्व अधिक है। इनके अनुसार- 1. कर्त्तव्यपालन एवं आत्म नियंत्रण पहला सूत्र है।
चिन्तन को सभी तरह के मनोविकारों से रहित करने के लिए प्रयत्नशील रहेंगे। चरित्र के सूत्रों का महत्त्व अधिक है। इनके अनुसार- 1. कर्त्तव्यपालन एवं आत्म नियंत्रण पहला सूत्र है। 2. यहाँ के सभी जन साधना एवं संयम के चारित्रिक आदर्शों का पालन करेंगे। 3. आचार्य एवं विद्यार्थी सभी सामाजिक मर्यादाओं एवं वर्जनाओं का पालन करेंगे।
चिन्तन-मन्थन किया गया है। आगे भी यह प्रक्रिया चलती रहेगी। अभी तक के निष्कर्षों के आधार पर यह सोचा गया है कि पाठ्यक्रम मनुष्य जीवन से जुड़े और गुँथे होने चाहिए। पाठ्यक्रम एवं जीवन यदि दोनों एक दूसरे के पर्याय न बन सके, तो पढ़ने वालों में हमेशा ही जीवन दृष्टि का अभाव बना रहेगा। जीवन छोटा नहीं है, इसकी व्यापकता बहुत विस्तृत है।
चिन्तन को पवित्र एवं निष्कपट बनाए रखेंगे। 2. अपने चिन्तन को सभी तरह के मनोविकारों से रहित करने के लिए प्रयत्नशील रहेंगे। चरित्र के सूत्रों का महत्त्व अधिक है। इनके अनुसार- 1. कर्त्तव्यपालन एवं आत्म नियंत्रण पहला सूत्र है। 2. यहाँ के सभी जन साधना एवं संयम के चारित्रिक आदर्शों का पालन करेंगे।
चिन्तन यही है।
चिन्तन के स्वरों में हमेशा इस सत्य की गूँज रही है कि देश के जिस बालक, किशोर, युवा अथवा प्रौढ़ के दिलों में राष्ट्रीय-भावनाएँ नहीं धड़कती, वह एक अनाथ है, सिर्फ एक अनाथ। अपनी माँ के स्वरूप से, उसके गौरव से, उसकी उपलब्धियों और विभूतियों से, सबसे बढ़कर माँ के प्रेम से अपरिचित, अनजान व्यक्ति को भला और क्या कहेंगे। माँ से अपरिचित होने का, माँ से बिछुड़ने का दर्द केवल एक मातृहीन ही समझ सकता है। इसी तरह अपनी माता के लिए जान की बाजी लगा देने वाले रणबाँकुरों के दिलों में उफनने वाले गर्व और गौरव की अनुभूति भी कोई मातृभक्त ही कर सकता है।
चिन्तन ऐसे ही अनछुए किन्तु महत्त्वपूर्ण बिन्दु हैं, जिनकी खोज के बिना आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के सारे अनुसन्धान अधूरे हैं।
चिन्तन का आधुनिक विज्ञान के प्रयोगों एवं तकनीकों के साथ समुचित सामञ्जस्य है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने वर्तमान दौर में काफी उन्नति-प्रगति की है। नए अनुसन्धान एवं नए-नए प्रयोगों के अनेकों मानदण्ड स्थापित किए हैं। इसे उपलब्धियाँ भी मिली हैं। फिर भी काफी कुछ बाकी रह गया है।
चिन्तन के साथ उनकी प्रयोगवादी परम्परा भी है। इनमें अतीत के चिन्तन के साथ भविष्य का सृजन भी है। सृजन-संवेदना ही तो संस्कृति है। जो सृजन संवेदना से युक्त है, वह सुसंस्कृत है। इसके विपरीत जो कोई भी है, जहाँ भी है, उसके लिए कोई सुसंस्कृत से विपरीत शब्द ही ढूंढ़ना पड़ेगा।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-May
चिन्तन धारा में बहने वाले अपने वर्तमान को खो देते हैं। वर्तमान का जीवित क्षण उनके हाथों से निकल जाता है। जबकि केवल वही वास्तविक है। न अतीत की कोई सत्ता है और न ही भविष्य की। एक स्मृति है तो दूसरी कल्पना।
चिन्तन करते हुए वह ध्यानस्थ हो जाते। इसी सूत्र वाक्य का वह उपदेश करते। अपने इस जीवन मंत्र के अलावा अन्य कोई बात उनको आती ही नहीं थी। हालाँकि इसे कहते हुए उनके जीवन का समाधि सुख छलक उठता था। वह एक अनोखे अहोभाव से भर उठते थे।
चिन्तन से इन केन्द्रों को और भी अधिक सक्रिय बनाये रखा जा सकता था। ये केन्द्र धनात्मक एवं ऋणात्मक दोनों प्रकार के होते हैं। एक्यूप्रेशर पद्धति के अनुसार शरीर में एक हजार ऊर्जा बिन्दु है। इनमें 160 केन्द्र ऐसे हैं जिन्हें अधिक शक्तिशाली कहा जा सकता है। सामान्यतः ये केन्द्र सुषुप्त पड़े रहते हैं इन्हें विशिष्ट साधनाओं द्वारा जगाया-उभारा जाता है ओर अनेक प्रकार के लाभ उठाए जा सकते हैं।
चिन्तन-स्मरण के माध्यम से ही जीवन में अनेकों पहेलियों एवं संयोग के घटते रहस्य को जाना जा सकता है।
चिन्तन में निमग्न वह अपनी गति से चल रहे थे। वही सबसे आगे थे। उनकी गति से सबकी गति प्रभावित होना स्वाभाविक था। इस पर उतावले नहुष ने सर्प-सर्प (जल्दी चलो, जल्दी चलो) कहते हुए उनके मस्तक पर अपने पैर से प्रहार किया। इस प्रकार प्रहार करते ही नहुष उसी क्षण तेजहीन-श्रीहीन हो भयाक्रान्त हो गया।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-December
चिन्तन करते हुए भक्ति के साथ करता था। काम के प्रति मेरा यही भाव था कि मैं आश्रम के साधारण काम नहीं बल्कि अपने सद्गुरु की व्यक्तिगत सेवा कर रहा हूँ।
चिन्तन करने से ज्ञात होता है कि पत्नी, बच्चों या अन्य किसी संकीर्ण दायरे में पनपने वाला प्रेम, प्रेम नहीं मोह होता है। इस मोह और प्रेम में विरोधाभास जैसी स्थिति है। यदि प्रेम को काया कहा जाय तो मोह को छाया कहा जाना उचित होगा। दोनों में अन्तर भी वही होता है जो काया और छाया में है। एक सजीव होती है दूसरी निष्प्राण।
चिन्तन और ध्यान है।
चिन्तन करें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-August
चिन्तन को विश्वव्यापी बना रहे हैं।
चिन्तन सही रखा जाय तो जीवन का प्रत्येक दुःख व्यक्ति को आध्यात्मिक बनाता है। दुःख की चोटों से मनुष्य की अन्तर्चेतना में निखार आता है। तो दर्द एकदम व्यर्थ नहीं है, दुःख एकदम व्यर्थ नहीं है। दुःख है बाहर, लेकिन वही चोट निहाई बनती है, हथौड़ा बन जाती है। वही चोट छेनी बन जाती है।
चिन्तन भी जरूरी है। आज की कथा कहती है कि देखो तो सही हमारी बहिनें कितने संकट में है। समाज की अनगिन कमजोरियों एवं बुराइयों ने बहिनों के जीवन को संकटग्रस्त किया हुआ है। जहाँ एक ओर हम उनकी प्रगति के लिए बढ़ते अवसरों की बात करते हैं, वहाँ क्या यह सच नहीं है कि कितनी उमंगों के साथ नए घर में जाने वाली हमारी बहिनों को दहेज प्रताड़ना का शिकार बनना पड़ता है? क्या यह सच नहीं है कि कितनी बड़ी संख्या में लिंग-भेद पर आधारित भ्रूण हत्या के कारण बहिनों को जीवन में प्रवेश करने से ही वंचित कर दिया जाता है।
चिन्तन, मनन एवं निदिध्यासन करके गोस्वामी जी द्वारा रचित रामचरित मानस के सत्य की अनुभूति की जा सकती है। रामचरित के इस अद्भुत मानस सरोवर का शीतल स्पर्श किया जा सकता है। तुलसी की भक्ति साधना एवं काव्य सौंदर्य का रसपान किया जा सकता है। इसकी कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा है-
चिन्तन-मनन व निदिध्यासन की झलक मिलती है। माता पार्वती की जिज्ञासा भी हम सब गुरुभक्तों की कल्याण कामना के उद्देश्य से उपजी थी। सर्वज्ञानमय माँ ने अपनी सन्तानों की आध्यात्मिक उन्नति के लिए देवेश्वर शिव से प्रश्न किया था।
चिन्तन करके पा सकते हैं।
चिन्तन करने की आवश्यकता है, जो इस समस्त कर्मकाण्ड प्रकरण का सार है। जिसे समझे बिना श्रावणी पर्व की यथार्थ अनुभूति नहीं हो सकती है।
चिन्तन धारा अविराम थी। पर साथ ही वह लेख की पंक्तियाँ भी सुन रहे थे।
चिन्तन के स्वर फूटने लगे। सभी ने देखा तिष्य स्थविर ने शान्त भाव वे उठकर भगवान को प्रणाम किया। उसे आशीष देते हुए तथागत की वाणी मुखरित हुई-

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-October
चिन्तन, मनन, एवं निदिध्यासन किया था। यह जाना था कि साक्षी होने के अलावा अन्य सभी अवस्थाओं में मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य हो जाता है। अब इससे अगले यानि की पाँचवे सूत्र में महर्षि पतंजलि इस तत्त्व को और अधिक सुस्पष्ट करते हैं। इस सूत्र में वह कहते हैं- ‘वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टक्लिष्टः’ (1/5)। यानि मन की वृत्तियाँ पाँच हैं।
चिन्तन श्रेष्ठ होते हैं। विचारों में दिव्यत्व की आभा झलकती है। इनका हृदय भावनाओं एवं सम्वेदनाओं का आगार होता है। ये सभी से आत्मीयतापूर्ण व्यवहार का बर्ताव करते हैं। आदि गुरु शंकराचार्य ऐसे दिव्य व्यक्तित्व के धनी थे, जिन्होंने अपने तपस्वी व्यक्तित्व के बूते जन-जन की सुप्त चेतना को झकझोरा एवं निष्प्राण हृदयों में संवेदना का संचार किया।
चिन्तन का समुचित एवं सुन्दर समावेश हो। और इसीलिए उसमें चुम्बकीय आकर्षण होता है, जादुई प्रभाव होता है।
चिन्तन प्रखर हो और भावना न हो तो जीवन नीरस एवं शुष्क हो जाता है और विवेक के अभाव में भावना अंधी हो जाती है। जीवन भटक जाता है।
चिन्तन एवं व्यवहार में बदलाव एवं परिवर्तन। इसमें श्रेष्ठता एवं उत्कृष्टता का समावेश करके ही उत्कृष्ट व्यक्तित्व से सम्पन्न बना जा सकता है।
चिन्तन तथा भावपूर्ण व्यवहार के आधार पर तैयार होता है।
चिन्तन व्यक्तित्व को प्रखर बनाता है। सरस भावनाएँ एवं संवेदनाएँ इसे भावपूर्ण बनाती हैं। जीवन साधना के सूत्रों को अपनाकर ऐसा करने से रूखा, नीरस, शुष्क व्यक्तित्व भी उस सरिता के समान प्रवाहित हो उठता है जिसमें अत्यन्त प्रभावकारी तीव्र जीवनधारा के साथ किनारों को चूमती-छूती लहरों की अटखेलियाँ भी होती हैं।
चिन्तन एवं सजल संवेदना होती है, विचारों की आलौकिक आभा इसमें झलकती है। जैसे विचार होंगे वैसा ही व्यक्तित्व होगा। उत्कृष्ट चिन्तन व्यक्तित्व को प्रखर बनाता है। सरस भावनाएँ एवं संवेदनाएँ इसे भावपूर्ण बनाती हैं। जीवन साधना के सूत्रों को अपनाकर ऐसा करने से रूखा, नीरस, शुष्क व्यक्तित्व भी उस सरिता के समान प्रवाहित हो उठता है जिसमें अत्यन्त प्रभावकारी तीव्र जीवनधारा के साथ किनारों को चूमती-छूती लहरों की अटखेलियाँ भी होती हैं।
चिन्तन उत्कृष्ट हो, भावना परिष्कृत हो। तभी कर्म भी श्रेष्ठ व निष्काम हो सकेंगे। जीवन की सार्थकता, समग्रता भी इसी में है। हम सभी को अपने विचारों, भावों एवं कर्मों से सतत् इसी श्रेष्ठता की ओर अग्रसर होते रहना चाहिए।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-March
चिन्तन एवं आत्म निरीक्षण का सुअवसर है। जीवन में श्रेष्ठ व मंगलकारी व्रतों, संकल्पों तथा विचारों को दुहराने व अपनाने की प्रेरणा देती है शिवरात्रि। आज की भौतिक एवं भोगवादी भागदौड़ की दुनिया में हमारी आत्म चेतना मुर्झाती जा रही है। उसी में चैतन्यता का संचार करने, उसमें निहित सत्य का बोध कराने ही हर साल आती है शिवरात्रि। भारतीय जीवनधारा में आत्मबोध का स्वर सदा से है और सर्वत्र मुखर रहा है।
चिन्तन व विचार निहित थे और हैं उन्हें हमने खो दिया है और खोते जा रहे हैं। शिवरात्रि में समायी आत्म निर्माण, आत्म-सुधार एवं आत्म-उत्थान की चेतना आज के दिन मच रहे धूम-धाम, उठे रहे शोर-शराबे, भाग-दौड़कर रही भीड़ के जलसे-जुलूस और कोलाहल में कहीं नजर नहीं आ रही। यह शिव के भक्त की नहीं शिव से विभक्त की पहचान है। सच्चा शिवभक्त तो वह है, जिसकी अन्तर्चेतना में आज कल्याणकारी संकल्प के स्वर मुखर हो। जो आज शिव के मिलन के लिए अपने आत्मसुधार का एक नया पग आगे बढ़ाये।
चिन्तन के साथ रहते हैं, वे समझो कि उन्हीं के साथ रहते हैं। वह यदा-कदा अपने समवयस्क मित्रों से कहा करता, कि मेरा एक अदृश्य परिवार है। जिज्ञासा करने पर वह स्पष्ट करता कि जिन लोकोत्तर व्यक्तियों के विचारों को मैं पढ़ता हूँ, वे भी मेरे परिवार के सदस्य हैं। मेरे जीवन के अभिन्न अंग हैं। अपने विचारों के रूप में सदा ही मेरे साथ रहते हैं।
चिन्तन से आते हैं। जब तक आत्मा कल्याणकारी शिवतत्त्व की ओर प्रवृत्त नहीं होती, तब तक जीवन दुःख, चिन्ता, पीड़ा और अशान्ति से छुटकारा नहीं पा सकता। वेद भी इसी विचार की पुष्टि करता है- ‘नान्यः पन्थाविद्यते अनयाय’ अन्य कोई दूसरा मार्ग नहीं है। मार्ग एक ही है, अपने को जानकर परमेश्वर के सान्निध्य को प्राप्त करना, उसकी शरण में पहुँच जाना और उसकी आज्ञा का पालन करना। उसकी सत्ता को कण-कण और अणु-अणु में अनुभव करना।
चिन्तन करते हुए वह आगन्तुक साधु के भोजन उपक्रम में व्यस्त होने लगे।
चिन्तन अच्छा लगने लगा है, अपने शिव से इस आत्मा ने मुख मोड़ लिया है। उसे अब शिव से प्यार नहीं रहा, जरूरत नहीं रही। स्थिति तो यह है कि उसने भगवान् शिव को जीवन से निकाल दिया है।
चिन्तन एवं साधना में डूबा हुआ था। हालाँकि इन दिनों भी उसके युद्धाभ्यास का सिलसिला यथावत था। और इसी कारण उसे लोग ग्रैंड मार्शल भी कहते थे। ऐसी स्थिति बनने पर सबकी निगाह अपने ग्रैंड मार्शल पर जा टिकी। नगरवासी-ग्रामवासी सभी झुण्ड के झुण्ड उसके पास पहुँचने लगे।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-November
चिन्तन, मन्थन होना जरूरी नहीं है कि स्वाधीनता प्राप्ति के बाद से हमारे देश में जिस तरह की राजनैतिक संस्कृति विकसित हुई है, उसके रहते क्या संसद और संसदीय संस्थाएँ मजबूत बनी रह सकती हैं? क्या संसद और संसदीय संस्थाओं को मजबूत बनाने के लिए नए नियम और नयी आचार संहिता को अपने राष्ट्रीय कर्त्तव्य की इतिश्री माना जा सकता है?
चिन्तन, मनन एवं निदिध्यासन करते हैं। साथ ही भाव भरी प्रतीक्षा करते हैं अगले महीने प्रकाशित होने वाली कड़ी की। जिससे कि योग साधना एवं तत्त्वदर्शन के एक नए आयाम में प्रवेश हो सके। जीवन की अनूठी अन्तर्यात्रा में एक कदम और आगे बढ़ा जा सके। साधकों की इन भावनाओं से हम सुपरिचित हैं।
चिन्तन ने मनुष्य जाति को जो सर्वश्रेष्ठ कल्पनाएँ दी हैं, उनमें श्रेष्ठतम कल्पनाएँ उपनिषदों में है। इनमें से किसी एक को भी अपनाकर हम अपने जीवन को सार्थक कर सकते हैं। सोऽहम्, अहं ब्रह्मास्मि जैसे श्रेष्ठतम महत्त्वाकाँक्षाओं को जीवन में धारण कर कल्पना शक्ति की सहायता से उस परम तत्त्व की अनुभूति पायी जा सकती है।
चिन्तन करने के लिए मेरे पास मन है। प्रभु भक्ति करने के लिए मेरे पास निर्मल हृदय है। सूरज जितनी रोशनी मुझे देता है, उतनी ही वह सम्राट को देता है। चाँद भी मुझ पर अपनी उतनी ही चाँदनी बरसाता है, जितनी की सम्राट पर। प्रकृति के आँगन में खिले खूबसूरत फूलों की सुगन्ध भी मुझे सम्राट से कम नहीं मिलती।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-September
चिन्तन करने वाले अपनी मानसिक चेतना को मेरी पराचेतना से बड़ी आसानी से जोड़ पाएँगे। मुझे पुकारने के लिए यह भी एक तरीका है। असली चीज मुझे पुकारना है। वह मेरी जीवन कथा के माध्यम से हो तो और ठीक है। कोई सिर्फ माँ! माँ!! कहकर बुलाए तो भी ठीक है।
चिन्तन से हम सबके अपराध कई हैं। और इनमें से हर एक अक्षम्य हैं। हमें यह अच्छी तरह से मालूम है कि क्रूर कर्म में प्रवीण काल देवता, निष्ठुरता में निष्णात विधि का विधान हमारे किसी भी अपराध के थोड़े से अंश को भी क्षमा न करेगा। परन्तु हमारी इनसे कोई आशा भी नहीं है। हम सबकी प्रत्येक आशा का केन्द्र बिन्दु तो आप हैं।
चिन्तन परामर्श का विशेष अवसर मिला। विश्व वसुधा के विभिन्न घटनाचक्रों एवं इसकी भावी नियति पर विशेष चर्चा हुई। भारत भूमि के संकटापन्न वर्तमान एवं इसके दीर्घकालिक उज्ज्वल भविष्य का उन्हें दर्शन कराया गया। साथ ही इस सम्बन्ध में उनकी भूमिका निर्धारित की गयी।
चिन्तन करते हुए शान्तिकुञ्ज में अपने प्रारम्भिक दिनों को गुजारने लगीं। उस समय का शान्तिकुञ्ज आज की तरह विस्तृत व्यापक न था। बस यही दो-तीन कमरे बने थे। जहाँ आज अखण्ड दीप स्थापित है।पानी के लिए एक कुआँ था।
चिन्तन एवं अवगाहन करते हुए उनकी ज्योतिर्मय चेतना से एकात्म होने की साधना करते हैं।
चिन्तन की कड़ियाँ झंकार के साथ बिखर गयीं। वह अपने भावों से उबरते हुए रामप्यारी से बोले- मुझे लगता है इस बार माता भगवती जगदम्बिका स्वयं हम पर, तुम पर, अपने पूरे परिवार पर कृपा करने के लिए अवतीर्ण हो रही हैं।
चिन्तन और चर्चा के अनेकों दौर चले। पहली पत्नी के मरने और उसके तीन बच्चों के होने की बात दीनदयाल को थोड़ा खटकी। इस पर उन्होंने अपने पिता पं. जसवन्तराव से काफी देर तक बातें की। बातों के बीच में उन्होंने यह भी पूछा- दादा, यह बताओ कि तुम्हारी ज्योतिष क्या कहती है? उत्तर में जसवन्तराव गम्भीर होकर कहने लगे- देखो, मेरी तो शुरू से मान्यता है कि अपनी लाली देवी का अंश है।
चिन्तन और चर्चा में काफी समय बीता। शान्तिकुञ्ज के क्रिया-कलापों में कई नयी कड़ियाँ भी इसी दौरान जुड़ीं। परम वन्दनीया माताजी की देख-रेख व उनके सूत्र-संचालन में पहले से सुचारु व्यवस्था और भी अधिक गतिशील हुई।
चिन्तन मुखरित होता था। मिशन के सारे काम-काज के ताने-बाने को सुलझाती-बुनती हुई माताजी इसी राष्ट्र चिन्ता में लीन रहती थी। इन चिन्तन और चर्चा में काफी समय बीता। शान्तिकुञ्ज के क्रिया-कलापों में कई नयी कड़ियाँ भी इसी दौरान जुड़ीं। परम वन्दनीया माताजी की देख-रेख व उनके सूत्र-संचालन में पहले से सुचारु व्यवस्था और भी अधिक गतिशील हुई।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-July
चिन्तन में कहीं कोई गड़बड़ी पड़ गई है। यदि ऐसी खोट को ढूँढ़ लिया जाय, तो वह कारण सहज ही समझ में आ सकता है। अगले दिनों मनुष्य अपने चिन्तन को सही करने जा रहा है और साथ ही उन सभी समस्याओं से पीछा भी छुड़ाने की तैयारी कर रहा है, जो आज हैरानी का वातावरण बनाये हुए हैं।
चिन्तन की निमग्नता टूटी। दरबान को सम्बोधित करते हुए बोले- हिज हाइनेस को सूचना दो कि मैं मिलना चाहता हूँ।
चिन्तन-चरित्र एवं आचरण में उतारने पड़ते हैं। आसन व्यायाम नहीं, वरन् आसन जमा कर बैठना है। रसोई भी आसन पर बैठकर की जाती है। बाल-चाल की भाषा में किसी कार्य के लिए दृढ़तापूर्वक आरूढ़ होना भी आसन लगाना या आसन जमाना है। प्राणायाम प्राणवान बनने के लिए किया जाता है।
चिन्तन बना रहता है और निर्विकल्प में चेतना शून्य स्थिति आ जाती है।
चिन्तन के लिए” “अहं” को समझना कठिन है फिर भी कोशिश करो” वह बताने ड़ड़ड़ड़ सुना होगा जब कोई समाधि लगा लेता तब हृदय की गति खून का प्रवाह तक बन्द हो जाता है। समाधि का अर्थ है मन के सभी कार्यालयों को बन्द कर देना। शरीर का अन्तबर्हिः संचालन मन के द्वारा ही होता है। मन के इस संचालन भाग को, जो गहरी नींद में भी सदा जागता रहता है अहंकार कहते है।”
चिन्तन-चेतना की प्रवृत्ति द्वारा स्वयं को बड़ा बनाने और कहलाने को कभी उचित नहीं ठहरायेगा। व्यक्ति बड़ा और महान बाह्याडम्बर से पहनावे-ओढ़ावे से नहीं, वरन् कर्त्तृत्व से बनता है, चिन्तन-चरित्र से बनता है और यदि यह सब ओछे और बचकाने हों, तो भले ही आडम्बर का ढकोसला वह ओढ़े रहे, पर वास्तविकता जग-जाहिर हो ही जाती है और लोग उसके तथाकथित ‘बड़प्पन’ पर उँगली उठाने लगते हैं। याद रखो महानता सदा सादगी में होती है, बड़प्पन में नहीं।”
चिन्तन करते न बन पड़ेगा। शेख चिल्ली जैसी रंगीन कल्पनाओं वाली बिना पंख की काल्पनिक उड़ाने भर भले ही उड़ता रहें।
चिन्तन आदि का समस्त परिकर वस्तुतः उस सुविस्तृत सृष्टि-संचरण प्रक्रिया एवं मानव जीवन की अतिशय महत्वपूर्ण और प्रेरक शक्ति का बहुत ही छोटा और हेय स्वरूप है। इसकी व्याख्या-विवेचना क्रीड़ा, उल्लास के रूप में ही हो सकती है। उसे उत्साह, उभार-उपचार ‘काम’ की परिधि में सम्मिलित किये जा सकते हैं, जिनसे स्नेह, सौजन्य, सहयोग, मिलन आदि की सुखद अनुभूति होती है। सहृदयता, करुणा, सेवा, सहायता उदारता, साहसिकता के रूप में इसी की परिणति होती है। सृजनात्मक सत्प्रयोजनों के लिए किये जाने वाले त्याग-बलिदान में जो भाव-संवेदना काम करती है उसे भी इसी शक्ति का ऊर्ध्वगमन कह सकते है।
चिन्तन करना। इससे मान्यता परिपक्व होती। भूली हुई बातों का स्मरण भी ध्यान के आधार पर हो आता है। अपने आदर्श का, लक्ष्य का, निश्चय का बार-बार स्मरण करने से वह आस्था के रूप में परिणत हो जाता है। यों किसी चित्र का, प्रतिमा का, व्यक्ति का, कल्पना-सपनों का इच्छानुसार ध्यान किया जाता है।
चिन्तन एक दम बदल गया है। तो उनने बुलावा भेजा। पर पंडित जी ने मना कर दिया और कहा अपने आप में संतुष्ट हूँ। कहीं जाने की आवश्यकता अनुभव नहीं होती।
चिन्तन-चरित्र से बनता है और यदि यह सब ओछे और बचकाने हों, तो भले ही आडम्बर का ढकोसला वह ओढ़े रहे, पर वास्तविकता जग-जाहिर हो ही जाती है और लोग उसके तथाकथित ‘बड़प्पन’ पर उँगली उठाने लगते हैं। याद रखो महानता सदा सादगी में होती है, बड़प्पन में नहीं।”
चिन्तन और क्षात्र तेज अर्थात् प्रखर कर्म का समन्वय किया जा सकना सम्भव है।
चिन्तन का क्रम उलटा चलता रहे, कुविचार मस्तिष्क पर छाये रहें, तो शरीर में कोई स्थानीय व्यथा न होने पर भी कल्पनाजन्य अनेकों अव्यवस्थाएँ उठ खड़ी होती हैं और दवाओं में सिर्फ वही थोड़ा-बहुत काम करती हैं, जिन पर विश्वास गहरा होता है। इससे प्रतीत होता है कि बीमारियों की जड़ तो मन के भीतर रहती है। शरीर में तो उनका आभास भर होता है। यदि सरल, सौम्य और सद्भावपूर्ण विचार बने रहें, तो बीमारियों का जो प्रकोप आये दिन बना रहता है, उनका अस्तित्व ही न रहे। यह तथ्य यदि समय रहते लोगों को पहले ही अवगत हो गया होता, तो हर कोई अपना इलाज आप कर लेता और उसके लिए जहाँ-तहाँ भटकते रहने की आवश्यकता न पड़ती।
चिन्तन और व्यवहार को उच्चस्तरीय रखना गतिविधियों को विश्वउद्यान को समुन्नत बनाने में लगाये रहना, प्रकारान्तर से समाधि अवस्था ही है। सम्यक् + धी = समाधि। बुद्धि तत्व को दूरदर्शी विवेकशीलता में नियोजित रखे रहना है, ऋतम्भरा प्रज्ञा है। इसी को भूमा या तुर्या कहते हैं। योगी-तपस्वी इसी स्थिति में अपनी चेतना को बनाये रहते हैं।
चिन्तन व श्रम। इसी के तहत उन्होंने कौटिल्य के नाम से अर्थशास्त्र व्यक्ति व समाज में नैतिक साहस जगाने के लिए चाणक्य नीति। इसको सुबोध बनाने के लिए विष्णु शर्मा के नाम से पंचतंत्र की रचना की।
चिन्तन में उलझा रहता है, पर यह आँशिक रूप से ही सही हैं सामूहिकता का एकत्रीकरण का नियम उन पर भी लागू होता है। समर्थ विचार दूसरों पर चढ़ दौड़ते हैं और जो अपने से कमजोर हैं उन्हें घसीट कर अपने शिकंजे में कस लेते हैं। समर्थ विचारक यदि मनस्वी हो, सघन श्रद्धा और प्रचण्ड विश्वास के साथ जुड़े हों तो फिर वे भी एकाकी न रहेंगे। अपनी सजातियों की उपस्थिति जहाँ भी देखेंगे, उन्हें घसीट कर अपने साथ चलने के लिए बाधित करेंगे, फिर चाहे वे उत्कृष्ट स्तर के हों या निकृष्ट स्तर के।
चिन्तन चेतना को जन-जन तक पहुँचाने जैसे कार्यों से भरा पूरा यह विराट व्यक्तित्व रहा है। उनके जीवन पर एक अविस्मरणीय श्रद्धाँजलि अंक अगले माह अगस्त-सितम्बर के संयुक्ताँक के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। हर परिजन को यह नियमित अंक के रूप में अगस्त अंत तक उपलब्ध हो जायेगा। इसका आकार वर्तमान अखण्ड-ज्योति से लगभग चार गुना होगा तथा पूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व एवं कर्त्तृत्व संबंधी दुर्लभ चित्र अनुभूतियाँ एवं लेख उसमें होंगे। परिजन उसकी प्रतीक्षा करें।
चिन्तन से हमारे,, श्रेष्ठता से पूर्ण हर वातावरण हो,
चिन्तन में डूब गया।
चिन्तन को सही करने जा रहा है और साथ ही उन सभी समस्याओं से पीछा भी छुड़ाने की तैयारी कर रहा है, जो आज हैरानी का वातावरण बनाये हुए हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-September
चिन्तन को कार्य का स्वरूप नहीं दे पायी पर बाद में शाँतिकुँज आने पर सुनियोजित ढंग से इस कार्य को चला सकीं।
चिन्तन ही इस प्रज्ञापुँज का, ऋषि सत्ताओं की पक्षधर, महाकाल की सत्ता का सर्वाधिक सबल सशक्त पक्ष हैं जिसने लाखोँ प्रज्ञा परिजनों में नये प्राण फूँक कर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया। अपनी उलटी चाल बदल कर नये सिरे से सतयुगी ब्राह्मण परम्परा वाली जिन्दगी जीने लगना एक प्रकार से नये जीवन समान ही तो कहा जायगा।
चिन्तन कर रहे थे। पता नहीं क्या सोचकर बड़ी सरलता से पास बैठे एक स्वयं सेवक से पूछा-”क्यों जी तुम्हीं कुछ बताओ, मिशन को विस्तार कैसे दिया जा सकता है?” स्वयं सेवक ने थोड़ा सोचते हुए कहा-”यदि शिक्षक और चिकित्सक इस काम में सहयोग करने लगें तो प्रगति दूनी हो जायेगी। क्योंकि इन्हीं दोनों वर्गों से समाज उपकृत रहता है। उपकार करने वाले की बात मानने में किसी को संकोच कहाँ?
चिन्तन तथा अन्य दैनिक क्रम यथावत थे। इसी बीच पता चला कि उनके गन्तव्य स्थान के कुछ व्यक्ति साथ चल रहे है। बस मन की सीखने की वृत्ति ने प्रोत्साहित किया क्यों न पहुँचने के पहले वहाँ की भाषा सीख ली जाय।
चिन्तन की गहराइयों से उबरता, तब क्या सचमुच पानी नहीं है फिर क्या है यह? इतनी देर में मन प्रकृतिस्थ हो चुका था। गिलास को ध्यान से देखा-विश्वास हुआ यह पानी नहीं है। पर क्या है, यह नहीं सूझ रहा था। स्वाद अपरिचित जो था।
चिन्तन से अनुप्राणित कर दिया, उसके लिए इससे श्रेष्ठ दिवस और क्या हो सकता था कि वह सूक्ष्मीकृत घनीभूत होने के लिए सीधा तरणतारिणी माँ गायत्री की गोद में ही जाए।
चिन्तन चेतना सभी पाठकों का दैनन्दिन जीवन में मार्गदर्शन करती रही। जनवरी 1972 में बंगला देश के मुक्ति युद्ध के समापन के बाद अल्प अवधि के लिए पूज्य गुरुदेव शाँतिकुँज अचानक आए एवं माताजी को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन देकर फिर चले गए। जून 1972 में अपनी गुरु सत्ता के मार्गदर्शन पर सप्तऋषियों की तपस्थली में रह कर ऋषि परम्परा का बीजारोपण कर देवमानवों को विनिर्मित करने हेतु अपना प्रचण्ड तपोबल संचित कर वापस लौट आए। अपनी आत्मकथा में अपनी ही लेखनी से उनने इस एक वर्ष की अवधि में गुरु सत्ता द्वारा क्या निर्देश दिए गए, इनका खुलासा स्वयं किया है।
चिन्तन के लिए उद्वेलित करते रहे। उनने कहा था-”गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है। वह अभीष्ट फल प्रदान करे इसके लिए श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा का अवलम्बन लेना जरूरी है”। बात याद तो हो गई पर दो बातें समझ में नहीं आई। एक यह कि- “ब्राह्मण बनने के लिए क्या करना होगा” क्योंकि बताया यह गया था कि गायत्री ब्राह्मण परिवार में ही जन्मे थे, फिर वे तो ब्राह्मण परिवार में ही जन्मे थे, फिर वे तो ब्राह्मणोचित नित्यकर्म भी पिता द्वारा दिये गये प्रशिक्षणानुसार बचपन से ही सीखते व करते आ रहे थे।
चिन्तन ने ही संभवतः इस ऋषि को आगे चक्कर सूक्ष्मीकरण साधना तथा उसके बाद के महाप्रयाण तक के वर्ष एकाकी बिताने की प्रेरणा एवं शक्ति दी होगी। सन् 1974 से 1990 तक वे एक ही कोठरी में रहे, उसी में तप में लीन रहे व वहीं से प्रचण्ड शक्ति में चक्रवात सारे विश्व में उत्पन्न कर सके। एकान्त सेवन को किस सीमा तक रचनात्मक बनाया जा सकता है व इसके लिए किस श्रेणी का चिन्तन होना चाहिए यह मार्गदर्शन पूज्य गुरुदेव लेखनी से ही नहीं, अपना जीवन जीकर सब को दे गए हैं।
चिन्तन का असंतुलन भी रुग्णता और अकाल मृत्यु का कारण बनता है।
चिन्तन, मनन, स्वाध्याय, लेखनी की साधना) के अतिरिक्त थी। यह सोचा जा सकता है कि 24 घंटे में 21 घंटे जब इसमें चले गए तो वे सोते कब थे। यही तो अलौकिक सिद्धि है जो किसी भी नाम से पुकारी जा सकती है पर उनके निकटवर्ती जानते हैं कि प्रातः 1 बजे से उठकर जो उनने कार्य आरंभ किया है तो उसे बिना विराम दिये सतत् रात्रि 10 बजे तक सम्पन्न किया है। यह संभव है तपोबल से अर्जित सामर्थ्य के सहारे।
चिन्तन को पास नहीं फटकने देना चाहिए।”
चिन्तन धारा ने 70 से 90 के दो दशकों में पूरे भारत व विश्व में एक व्यापक उथल पुथल मचाई एवं शोध का एक नया आयाम ही खोल दिया। साधना का वैज्ञानिक स्वरूप प्रस्तुत कर पूज्य गुरुदेव ने अनेकों बुद्धिजीवियों को प्राण प्रत्यावर्तन जीवन साधना, साधना स्वर्ण जयन्ती, कुण्डलिनी जागरण, उच्चस्तरीय गायत्री साधना सत्रों में सम्मिलित कर उनका आत्मबल बढ़ाया व इस योग्य बनाया कि वे आस्था संकट से मोर्चा ले सके॥ इस लिए सभी प्रतिपादनों का सारगर्भित पहला संकलन 1978-79 में 42 पुस्तकों के एक सेट के रूप में तथा दूसरा संकलन 1984-85 में 25 पुस्तकों के एक सेट के रूप में प्रकाशित हुआ।
चिन्तन को आमूलचूल परिष्कृत करके उठता है। इस जाल में कई विचार शील, तथाकथित प्रगतिशील पाठक भी आ गए एवं सभी पूज्य गुरुदेव की पत्रिका के पाठक बनते चले गए क्योंकि उन्हें कभी कल्पना भी नहीं थी कि एक दिग्भ्रान्त करने वाले विषय पर तत्वदर्शन की सारगर्भित पुस्तक भी लिखी जा सकती है। इन पुस्तकों के ढेरों संस्करण छपे व हाथों हाथ बिक गए। “मैं क्या हूँ” जैसे आत्मोपनिषद् से शुरुआत करने वाले मनीषी को भी पाठक रुचि को देखते हुए उन दिनों झुनझुना बाँटकर ललचाने वाली विधि का उपयोग करना पड़ा था।
चिन्तन-चेतना के साथ जुड़कर माँ सरस्वती के इस वरद पुत्र के हाथ से स्पर्श होकर स्वयं को धन्य मानती थी। पूज्य गुरुदेव को सिद्ध पुरुष, अवतारी महामानव, उदात्त अंतःकरण वाला एक विशाल परिवार का अभिभावक, एक विराट संगठन का सृजन करने वाला, गायत्री व यज्ञ को जन-जन के मन-मन में स्थापित कराने वाले से लेकर एक वैज्ञानिक मनीषी, ऋषि सब कुछ माना जाता है किन्तु एक कुशल लेखनी का शिल्पी, हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक अनूठी विधा रचने वाला अभूतपूर्व साहित्यकार वाला पक्ष ऐसा था, जो स्वयं हिन्दी जगत उनके जीवित रहते नहीं जान पाया। जब भी उनके साहित्यकार पक्ष पर शोध कार्य होगा तो यह प्रकाश में आएगा कि साहित्य की एक विलक्षण विधा का ही इस व्यक्ति के माध्यम से जन्म हो गया। हिन्दी की गरिमा गाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी संभवतः तब इस विराट व्यक्तित्व के प्रचुर परिमाण में लिखे गए साहित्य का मूल्याँकन करेंगे व पश्चाताप करेंगे कि उनके जीवित रहते उन पर यह कार्य क्यों नहीं सम्पन्न हो सका।
चिन्तन से विरत कर लोकसेवी बना दिया। यह एक क्रान्तिकारी स्तर का विचारक ही कर सकता था। धर्म के संबंध में जो भ्राँतियाँ संव्याप्त हैं एवं जनोपदेशक जो भी कुछ कहकर उन्हें पोषण देते रहे है, उनसे जूझना व योद्धा की तरह संघर्षरत रह बिना विचलित हुए लक्ष्य सिद्धि तक पहुंच जाना उनके व्यक्तित्व के एक अनूठे पक्ष को प्रस्तुत करता है।
चिन्तन बहुतों ने सिखाया हैं, पर ऐसे बहुत कम मिले। जो चिन्तन को जीवन में उतारना सिखा पाते।
चिन्तन नवनीत में उनके वही विचार उभर कर आये है जिन्हें वे व्यवहार के माध्यम से सबके समक्ष प्रकट कर रहे थे। वह था अपनी प्रसुप्त संकल्प शक्ति का जागरण और आत्मदेव की आराधना, जीवन देवता की साधना के बल पर प्रचण्ड पुरुषार्थ कर दिखाना। इस पुस्तक की कुछ पंक्तियाँ देखने योग्य हैं-
चिन्तन प्रत्यक्षवाद, बुद्धिवाद प्रधान था। कहना न होगा कि यही चिन्तन आस्था व श्रद्धा की काट अपने अस्त्रों से करता आ रहा है। पूज्य गुरुदेव ने उन्हीं अस्त्रों को प्रयोग अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु किया।
चिन्तन आस्था व श्रद्धा की काट अपने अस्त्रों से करता आ रहा है। पूज्य गुरुदेव ने उन्हीं अस्त्रों को प्रयोग अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु किया।
चिन्तन होना चाहिए यह मार्गदर्शन पूज्य गुरुदेव लेखनी से ही नहीं, अपना जीवन जीकर सब को दे गए हैं।
चिन्तन नवनीत था। यह उलटी नीति कैसी? जब युग बदलने जैसा भारी दायित्व सिर पर हो तो महाकाल पुचकार एवं दण्ड, दुलार एवं उलाहना देने की, दोनों ही नीति अपनाता है। देव अंशधारी जाग्रतात्माएँ भौतिकतावादी प्रवाह में बह कर कहीं अपने लक्ष्य से भटक न जाएँ लोकेषणा-वित्तेषणा की चपेट में आकर लोक सेवा के पथ से विरत न हो जायें इसके लिए इसी स्तर की फटकार की जरूरत भी सदा से रही है व कृष्ण द्वारा अर्जुन को, राम द्वारा हनुमान को व सुग्रीव को तथा बुद्ध द्वारा आनन्द को लगाई गई लताड़ के रूप में सामने आती रही है। इस
चिन्तन क्षेत्र में एक नया चक्रवात घूम रहा था। वह था केन्द्र में प्रशिक्षित किये जा रहे समयदानी परिव्राजकों के माध्यम से पूरे भारत में फैले सत्प्रवृत्ति संवर्धन के कार्य का, धर्मतंत्र से लोकशिक्षण रूपी महत्वपूर्ण कार्यक्रम का सुनियोजित विकेंद्रीकरण। इस के लिए बसंत पंचमी, उनके अध्यात्मिक जन्म दिवस पर एक महत्वपूर्ण संदेश आया-वह था नवचेतना के निर्झर केंद्रों के रूप में प्रज्ञा संस्थापना का। यह वर्ष था सन् 1979 का व युग निर्माण योजना को प्रारंभ हुए पच्चीस वर्ष हो चुके थे अतः उसका यह रजत जयन्ती वर्ष था। मात्र प्रतिपादन ही नहीं, अंतराल में सद्भावों को जगाने के लिए एक विशाल ज्ञानयज्ञ की आवश्यकता को समझते हुए गुरुदेव द्वारा पहले चौबीस एवं फिर आवश्यकता को देखते हुए चौबीस सौ स्थानों पर प्रज्ञा संस्थान, शक्ति पीठ या गायत्री तीर्थ स्थापित करने का निश्चय का लिया गया
चिन्तन को अखण्ड ज्योति के प्रथम कुछ वर्षों में विभिन्न लेखकों के नाम देते रहे। जब बाद में पत्रिका ने अपनी जड़ें गहराई से जमा लीं तो उनने नाम देने का क्रम बन्द कर दिया। पर यह सिलसिला पंद्रह वर्ष तक चला। कई बार अन्य सहयोगियों, अपने अनुयाइयों को श्रेय देने के लिए उनने उनके नाम दिए।
चिन्तन से उद्भूत हुआ व परिजनों को भाव भरा उद्बोधन देते हुए उनसे अपनी रीति-नीति को बदलने को जो कहा गया, वह भी उसी मनीषी का चिन्तन नवनीत था। यह उलटी नीति कैसी? जब युग बदलने जैसा भारी दायित्व सिर पर हो तो महाकाल पुचकार एवं दण्ड, दुलार एवं उलाहना देने की, दोनों ही नीति अपनाता है। देव अंशधारी जाग्रतात्माएँ भौतिकतावादी प्रवाह में बह कर कहीं अपने लक्ष्य से भटक न जाएँ लोकेषणा-वित्तेषणा की चपेट में आकर लोक सेवा के पथ से विरत न हो जायें इसके लिए इसी स्तर की फटकार की जरूरत भी सदा से रही है व कृष्ण द्वारा अर्जुन को, राम द्वारा हनुमान को व सुग्रीव को तथा बुद्ध द्वारा आनन्द को लगाई गई लताड़ के रूप में सामने आती रही है। इस
चिन्तन रखेंगे कि आपके पदचिह्नों पर चलकर अपने कर्तव्य में पूरी तरह खपकर कितना अधिक योगदान दे सकते हैं? कितना आगे रह सकते हैं?
चिन्तन प्रधान होती हैं। मान्यताओं, विचारणाओं के प्रवाह में ही सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार प्रक्रिया लोकमानस की अवांछनीयता, अनैतिकता एवं मूढ़ मान्यता को मिटाने वाली विचारक्राँति के रूप में ही इस युग की समस्याओं का समाधान कर सतयुग की वापसी कर सकती है।
चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार में उत्कृष्टता का अभिवर्धन अन्तःकरण में भाव संवेदनाएं जगाने से ही संभव हो सकता है।
चिन्तन का नवनीत है तो समग्र आर्ष वाङ्मय उसके तुरन्त बाद उत्तरकाशी में मात्र छह माह की अवधि के उस पुरुषार्थ का सार है जो उनने लेखनी के माध्यम से एक मनीषी, ऋषि तत्वदर्शी की भूमिका निभाकर संपन्न किया।
चिन्तन की वह शैली जो मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी को भटकावों एवं जंजालों की विपन्नता से छुड़ा सके।
चिन्तन की शैली का अभ्यास करना चाहिए, यह सत्संकल्प का प्रथम पाठ है एवं सही कहा जाय तो यही मर्म है। यदि इतनी व्यवस्था भी कोई जीवन में कर ले तो वह बदल जाए, साथ ही अनेकों को बदल दे।
चिन्तन के उद्गाता”-इन शब्दों में हम उस विराट व्यक्तित्व का वर्णन करते हैं जो हमारे बीच अस्सी वर्षों तक सक्रिय रह अपना अस्तित्व बनाये रहा व फिर अनेकों को रोता-बिलखता हुआ छोड़ गया। वस्तुतः यह मूल्याँकन किया जाय कि अगणित मनोव्यथा पीड़ितों, अभावग्रस्तों, शोषितों की उस करुण हृदय सम्पन्न महामानव ने कितनी सेवा की, किस सीमा तक उनके दुख में दुख बंटाया व किस तरह उन्हें पतन से उत्थान की राह दिखाई तो एक गौरव की अनुभूति होती है कि हम सौभाग्यशाली हैं जो उसके जीवनकाल में उसके साथ रहे।
चिन्तन बताता है कि सूक्ष्मीकरण साधना के दौरान वे आने वाले भविष्य का ताना बाना बुन रहे थे। अपने स्थूल शरीर के क्रिया–कलापों को सीमित कर सूक्ष्म से और अधिक व व्यापक क्षेत्र में सक्रिय होने के लिए स्वयं पीछे हट रहे थे व वंदनीया माताजी को इस भूमिका के लिए तैयार कर रहे थे, जो उन्हें उनके महाप्रयाण के बाद निभानी थी। यह सारा सुनियोजित उद्देश्यों के लिए धरती पर आयी हो, समर्पित जीवन जी चुकी हो, काया की क्षमता से सौ गुनी अधिक काम कर चुकी हो एवं निरन्तर उनके बताए सूत्रों पर चलने वालों को मार्गदर्शन देते रहने का आश्वासन देकर नवसृजन की आधारशिला रख रही हो। अवतार रूप पूज्य गुरुदेव का विभिन्न कर्तव्यों में तो प्रकट होता ही है, विविध रूपों में समय समय पर व्यक्त उनके उद्गारों में भी। झलकता है।
चिन्तन धारा की पृष्ठभूमि पर होने जा रहा है।
चिन्तन और लोलुप दृष्टिकोण मानसिक व्यभिचार है।
चिन्तन पर विवश होने के लिए उद्धृत किया गया है व यह समीक्षा करने के लिए भी कि इस सम्पादकीय का मूल मन्तव्य क्या था? क्या वे अपनी अभी वक की उपलब्धियों से निराश थे अथवा परिजनों को कसौटी पर सकने के लिए अन्तिम तैयारी के लिए चेतावनी दे रहे थे। यदि मई 1982 के अंक पर दृष्टि डालें जो इसके एक माह बाद प्रकाशित हुआ तो तथ्य समझ में आने लगता है। प्रस्तुत अंक से स्पष्ट होता है कि लाखों जनसमूहों के बीच प्राण फूँकने वाले गुरुदेव एकाएक स्तब्ध कैसे हो गए, शान्तिकुँज की सत्र श्रृंखलाओं में मुखर अपनी वाणी को मौन क्यों कर लिया, इस पर किसी को असमंजस हो तो उसे उनकी नयी जिम्मेदारियाँ समझनी चाहिए जिसमें “उन्हें आपत्ति धर्म को पालने के लिए तवे पर रोटी जलती छोड़कर बच्चे को बिच्छू पकड़ने से रोकने के लिए दौड़ पड़ने वाली माता की तरह नई रीति नीति अपनानी पड़ रही है।”
चिन्तन भी कर रहा है तो मानवी स्वभाव का व कैसे उसके संकीर्ण स्वार्थपरता को ऊर्ध्वगामी मोड़ दिया जाय, इस बात का। आगे वे पीली मक्खियों द्वारा काटे जाने पर लिखते हैं कि “वे तो नन्हे-नन्हे डंक मार कर आधा मील पीछा करके वापस लौट गई पर मनुष्य की अधिकार लिप्सा, स्वार्थपरता और अहंकार से उद्धत होकर किये जाने वाले आक्रमणों की भयंकरता जब सोचता हूँ तो बेचारी पीली मक्खियों को बुरा-भला कहने में जीभ सकुचाने लगती है।”
चिन्तन को पूज्य गुरुदेव ने भलीभाँति मथा।
चिन्तन के लिए विवश किया कि वे किस निमित्त इस महासत्ता से जुड़े थे? मात्र स्वार्थ लिप्सा की पूर्ति हेतु? अपनी क्षुद्र महत्त्वाकाँक्षाओं के लिए? अथवा कोई विवशता उन्हें दीन-दरिद्र बनाकर खींच कर लाई विवशता उन्हें दीन-दरिद्र बनाकर खींच कर लाई थी? यदि नहीं तो जो कर्तृत्व कुलपति का है, युग चिन्तक का है वह उनके जीवन में क्यों नहीं उतरता?
चिन्तन चेतना को उस सूक्ष्म शरीरधारी सत्ता ने पढ़ लिया व कहा कि “देवात्माएँ हैं, उनकी अच्छी तरह जाँच-पड़ताल करती हैं। शक्ति सम्पन्न महामानव अकारण अपनी सामर्थ्य किसी निरर्थक व्यक्ति के निमित्त नहीं गँवाते। सूक्ष्म शरीरधारी होने के नाते जो काम हम नहीं कर सकते वह स्थूल शरीर के माध्यम से तुम से कराएँगे। समय की विषमताओं को मिटाने के लिए तुम्हारा प्रयोग करेंगे। देखते में तो यों तुम्हारा दृश्य जीवन साधारण व्यक्ति के समान होगा पर कर्तृत्व सभी असाधारण होंगे।
चिन्तन से-सूक्ष्म शरीर से और आराधना समाज सेवा के लिए किये गये उदार सहकार भरे कृत्यों से-स्थूल शरीर से। पूज्य गुरुदेव ने अपने तीनों शरीरों से पूरी निष्ठा के साथ गायत्री साधना स्वयं सम्पन्न की व माँ गायत्री के वरदपुत्र बन गए। असंख्यों की सहायता करने वाला ब्रह्मवर्चस् इससे कम में संग्रहित हो भी तो नहीं सकता था। अपने व्यक्तित्व को उर्वर क्षेत्र की तरह विकसित करने में यदि इतनी सतर्कता न बरती होती तो संभवतः उनके चौबीस वर्षों के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण तथा सामान्य समय के जप-तप उतने प्रभावी न हो सके होते जितने कि देखे और पाये गये।
चिन्तन को जीवन में उतारना सिखा पाते।
चिन्तन से विनिर्मित कर देते हैं। स्त्रियों को वे नव जागरण की प्रेरणा देते हैं वह उनसे नेतृत्व कराते हैं। “कीकटपुर” अर्थात् संकीर्ण स्वार्थी मनोवृत्ति में निवास करने वाले बौद्ध अर्थात् तार्किक, घमण्डी, शिक्षित किन्तु स्वार्थपरायण बुद्धि वाले व्यक्तियों से वे युद्ध करते हैं। आस्था संकट से जूझते हुए वे ज्ञान रूपी परशु से उनका सिर काटते हैं अर्थात् विचार क्रांति द्वारा उनके विचारों को बदलकर उन्हें समर्पण अपनाने, क्षुद्र बुद्धि छोड़ सबके हित की बात सोचने के लिए बाध्य कर देते हैं।
चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। इसे न तो विरक्ति कहना चाहिए, न अशक्ति। वरन् तूफानों से आगे चलने वाला सन्नाटा कहना चाहिए”। इस अवधि की साधना को उनने छाया पुरुष की साधना कहा, जिसमें वे पाँच शरीरों से भिन्न भिन्न कार्य सूक्ष्मजगत में करना चाहते थे। वंदनीया माताजी ने इस सम्पादकीय में लिखा कि “ हम सभी अनुभव करें कि गुरुदेव न थक गये है और न पलायन ही कर रहे है, वरन् वे सूक्ष्मीकरण की जीवनचर्या अपनाकर अपनी वर्तमान क्षमता में अनेक गुनी बढ़त कर रहे है।
चिन्तन नियमित किया करते थे एवं सहयोगी कार्यकर्ताओं को बिठाकर उनके दिमाग की अच्छी कसरत करवा के उनसे संदर्भ ढूंढ़ने को कहते। इधर संदर्भों की तलाश होती, उधर इतनी चर्चा के बाद प्रातः उनकी लेखनी चल पड़ती। आश्चर्य यह होता था कि इन लेखों में बहुधा वही नाम, संदर्भ हुआ करते थे जो परिजन, शोधकार्य में सहयोगी उस समय पढ़ रहे या नोट्स ले रहे होते थे। संभवतः यह भी योग की एक सिद्धि है, जिसमें व्यक्ति विचारों को समष्टिगत प्रवाह बनाकर पढ़ लेता है व उसे युग प्रवाह का अंग बना देता है। ऐसा कई बार देखने में आया कि किसी नये विषय पर किसी कार्यकर्ता ने पुस्तक पढ़ी तो अगले दिन पूज्य गुरुदेव का लेख उसी विषय पर नकल हेतु पहुँच गया।
चिन्तन को बदल लेता है तो नारी पर अनावश्यक दबाव, शोषण स्वतः ही बन्द हो जाता है। सुखी गृहस्थ कैसे बना जाय, इसके लिए भी उनने दाम्पत्य जीवन की पवित्रता पर जोर दिया।
चिन्तन का नवनीत भावुक जनमानस के समक्ष रखा। उन दिनों रहस्य विद्या का जाल पूरे भारत व विश्व मानस पर छाया था। उसका रहस्योद्घाटन कर उनने सारे भ्रम जंजालों का नीर क्षीर विवेक से अलग अलग कर दिया।
चिन्तन का अब भी लाभ उठा सकें।
चिन्तन को भली-भाँति झकझोरा। यह क्रम नवम्बर 1975 से 1979 तक निर्बाध गति से चलता रहा, फिर शक्तिपीठों के निर्माण की घोषणा कर गुरुदेव ने क्षेत्रीय कार्यक्रमों को नई दिशा प्रदान की। देवकन्याओं के प्रशिक्षण के साथ त्रैमासिक महिला शिक्षण शांतिकुंज में सतत् चलता रहा व उसका परिवर्धित स्वरूप अब युगशिल्पी शिक्षण के रूप में चलता है जिसमें स्वावलम्बन, संगीत, कर्मकाण्ड एवं संभाषण कला का बहुमुखी शिक्षण दिया जाता है।
चिन्तन और कर्तव्यों को नियोजित रखते थे। इस देवोपम रीति नीति को अपनाकर वे आत्मिक विभूतियों से और भौतिक समृद्धि से भरे पूरे बन सके, साथ ही अपना तथा समस्त संसार का भला कर सके। यही है हमारी साँस्कृतिक पुण्य परम्परा पूर्वजों की विरासत और गौरव गरिमा की आधार शिला, जिसके माध्यम से हमें पूरे भावावेश और प्रचण्ड पुरुषार्थ के साथ अपनी नवोदित सत्ता की प्राण प्रतिष्ठा करनी है।
चिन्तन, एकाकी चलते हुए भी कभी भयभीत न हो प्रकृति से अपना साहचर्य जोड़ते रहना, यही सब शिक्षण शब्दों के माध्यम से इस खूबी से इस मनीषी ने गूँथा है कि बार-बार कलम को चूमने का मन करता है।
चिन्तन प्रक्रिया को नूतन प्राण मिले।
चिन्तन तपस्वी, मनस्वी ऋषि प्रवर के मन को सदैव मथता रहा कि समाज में जो सत्प्रवृत्तियाँ फैलानी हैं, दुष्प्रवृत्तियों के बाहुल्य से मोर्चा लेना है, उसके लिए जिस स्तर के व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ेगी उन्हें उन्हें उपयुक्त वातावरण में श्रेष्ठ स्तर का शिक्षण भी देना पड़ेगा। उनकी सुसंस्कारिता तभी अंकुरित, पल्लवित होगी जब उन्हें उर्वर भूमि में सभी अनुकूल परिस्थितियाँ मिलें।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-April
चिन्तन ही दुष्ट आचरणों की जन्मदात्री हैं और उसी के कारण समूचा वातावरण अवांछनीय विपन्नता से भर गया है। यदि प्रचलित मानसिकता को बदला जा सके तो उन अगणित समस्याओं का सहज समाधान निकल सकता हैं जो सर्वत्र हाहाकार मचाए हुए है और सर्वनाश की चुनौती दे रहा है।
चिन्तन-मनन कर लेना चाहिए एवं अपनी जिज्ञासा का समाधान करते हुए भ्रमजंजालों की मृग-मरीचिका से उबर आना चाहिए।
चिन्तन की गरिमा से एक साथ एक समय में लाभान्वित हों।
चिन्तन तो दुष्ट आचरणों को ही जन्म देगा और उस विषवृद्धि के समर्थ होने पर परिस्थितियाँ अनर्थकारी स्तर की ही बन कर रहेंगी।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार, प्रयास को देखते हुए यह मान्यता बने कि अपने देश में उच्चस्तरीय व्यक्तित्व से सम्पन्न ऐसे लाखों करोड़ों मौजूद हैं जो अपनी उपस्थिति से जनसाधारण की जनजागरण में बढ़ती जा रही अश्रद्धा से तो निपट सकें। कम से कम इतना तो सिद्ध कर सकें कि अध्यात्म के दावेदार निजी जीवन में तो इतने प्रखर और प्रामाणिक होते ही हैं उनकी साक्षी में आत्म विधा की गरिमा को तो विश्वस्त समझा जा सके।
चिन्तन ही दुष्ट आचरणों का निमित्त कारण है। उस आधार पर विनिर्मित वातावरण ही उन अनेकानेक विभीषिकाओं, विपत्तियों, कठिनाइयों और अभावों अवरोधों का प्रमुख कारण है। इस कठिनाई को साधनों के सहारे दूर नहीं किया जा सकता। अनुदानों से अभाव दूर नहीं हो सकता। कहने भर से नासमझों को उलटी चाल अपनाने से कहाँ विरत किया जा सकता हैं।
चिन्तन को इतना बदल देने का प्रयत्न किया जाता है कि उस आधार पर सामान्य को असामान्य और व्यक्ति को दिव्य स्तर का बनाया जा सके। यह प्रयोग इतना सफल हुआ है कि मिशन के कार्यकर्ता देश-विदेश के कोने-कोने में छाये देखे जा सकते हैं। यह प्रेरणा पक्ष हुआ।
चिन्तन, वातावरण एवं सहयोगियों के प्रभाव से प्रेरित होकर ऐसे परिवर्तन प्रस्तुत किये कि उन्हें कुछ से कुछ बन जाते देखा गया। सूर, तुलसी, अजामिल, अम्बपाली, अंगुलिमाल आदि जन्म से ही वैसे न थे, जैसे कि वे बाद में बन गये। गाँधी और बुद्ध तक आरंभ में अन्य बालकों या किशोरों की तरह ही पले और बढ़े। किन्तु उनकी समर्थता ने जब दिशा बदली तो उस स्थान तक जा पहुँचे जिसकी किसी ने कभी आशा न की थी और न अपेक्षा रखी थी। कुन्ती, मदालसा, सीता शकुन्तला ने अपने महान कर्तृत्व को जिस रूप में प्रस्तुत किया था वैसा कुछ आरंभ से ही दृष्टिगोचर नहीं होता था।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार अपनाने के लिए सहमत ही नहीं, बाधित भी किया जाय। दुर्बुद्धिजन्य अनीति अपनाने पर तो समग्र एवं समर्थ उत्कृष्टता की संभावना ही नहीं बनती। व्यापक लोक-मानस का परिष्कार यद्यपि बहुत बड़ा कार्य है, फिर उसे सम्पन्न किये बिना और कोई विकल्प नहीं।
चिन्तन तथा समय को उस दिशा में नियोजित किया जाय जिसके लिए कि महाकाल के संकेत निरन्तर उभर रहे हैं।
चिन्तन के अनुकूल बनने में कोई ऐसा व्यवधान सामने आये जिसे हटा सकना बन ही न पड़े।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-November
चिन्तनीय हास हुआ है।
चिन्तन परक (3) व्यवहारपरक इन तीन भागों में बँटी है। इन तीनों की समन्वयात्मक प्रगति को देख कर यह समझा जा सकता है कि व्यक्तित्व आगे बढ़ा, ऊँचा उठा और प्रगति पथ पर आगे चल पड़ा। पैर, धड़ और सिर के तीनों ही भाग मिलकर एक समूचे शरीर को समग्र बना पाते हैं।
चिन्तन” नाम फिल्म के साथ ही कार्यक्रम समाप्त हुआ।
चिन्तन चरित्र और व्यवहार बन नहीं पड़ रहा है जिससे हर क्षेत्र में फैली हुई विकृतियों का निराकरण और समाधान बन पड़े।
चिन्तन क्षेत्र में अनेकों विकृतियाँ भर लेता है और चिन्ता, निराशा, भय, उद्वेग आदि से संत्रस्त रहता है। मानसिक सन्तुलन गँवाकर उद्धत, उच्छृंखल आवेशग्रस्त रहता है। खुद कुढ़ता और सम्बन्धित लोगों को भी कुढ़ाता है।
चिन्तन और कर्म दोनों से विरति एक मात्र लक्षण है इनका। कठोर श्रम। श्रम का कुठार ही इस तमस की ड़ड़ड़ड़ को तोड़ने में सक्षम है। इस ओर प्रयत्न करने का मतलब है ब्राह्मणत्व की ओर उन्मुख होना।
चिन्तन का अवलम्बन करना चाहिए और विवेकशीलता को साहसपूर्वक अपनाना चाहिए। आदर्शों के सम्बन्ध में कौन क्या कहता है, इसे सुन तो लेना चाहिए, पर किसी के भी कथन परामर्श को अपनी स्वतंत्र विचारशीलता छोड़ कर अपनाना नहीं चाहिए।
चिन्तन जितना स्वार्थ के निमित्त लगता है उतना ही परमार्थ प्रयोजन में भी लगना चाहिए। विशेषतया अपनी विचार क्षमता का उच्चस्तरीय उपयोग करें। समझें कि मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा करता है। जैसा करता है, वैसी ही परिस्थितियाँ बन जाती हैं और तदनुरूप भला-बुरा भोगना पड़ता है। इसलिए विचार संयम को समुचित महत्व दिया जाय।
चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार को परिष्कृत बनाये रखने के महान दायित्वों के निर्वाह के लिए हम वचन देते हैं।
चिन्तन की गति थमी नहीं अविराम बढ़ती गई। दान सत्कार्य में सत्प्रयोजन के लिए स्वयं की शक्तियों का नियोजन यही न। विचारों का घुमड़न क्रिया में बदले नहीं रहता। चिन्तन की तीव्रता का मतलब है गतिशील कर्म। ऐश्वर्य लुटने लगा पत्नी सहयोगिनी थी।
चिन्तन में नहीं है, तब पश्चिम के रीते कोश में कुछ आशा करना व्यर्थ है।
चिन्तन से जूझने के लिए हर समय कटिबद्ध रहा जाय। एक जागरूक प्रहरी का उत्तरदायित्व भली प्रकार निबाहा जाय।
चिन्तन का नए सिरे से गठन। बेतरतीब उछल-कूद करने वाले मन का प्रशिक्षण। इसे किये बिना उच्चतर जीवन के लिए कदम बढ़ाना कहाँ सम्भव है? विद्यार्थी जीवन में यही तो किया था - उनने। जब सब विद्यार्थी उपन्यास, कहानियों और फिल्मी जीवन का आनन्द ले रहे होते, उस समय वह उपनिषदों का चिन्तन करते अथवा नागपुर रामकृष्ण मठ के साधुओं का सत्संग।
चिन्तन तुम्हारा, यहाँ पा सके प्रेरणामय संदेशा, हरेक राष्ट्र, हर जाति, जन-जन तुम्हारा,
चिन्तन को मधुर गन्ध से भर दिया।
चिन्तन अनुकूल परिणाम प्रस्तुत न कर सके। स्वास्थ्य संवर्द्धन के साथ व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय गति प्रदान न कर सके। इसकी पुष्टि के लिए वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के मूर्धन्य विज्ञानी निकोलस हाल ने ऑटोसजेशन का प्रयोग केंसरग्रस्त रोगियों पर किया। इसमें उन्हें आशाजनक सफलता प्राप्त हुई। देखा गया कि एन्ना जैसी मरणासन्न रोगी भी विधेयात्मक दिशा धारा अपना कर पूर्णतः स्वस्थ हो गई।
चिन्तन की तीव्रता का मतलब है गतिशील कर्म। ऐश्वर्य लुटने लगा पत्नी सहयोगिनी थी। दीन, दरिद्र, भिखारी, आर्त सभी कृतार्थ हो रहे थे। साधनों के बदले आशीष बरस रही थीं। चतुर्दिक् ख्याति फैल गई।
चिन्तन इन दोनों पैरों में एक के बिना ब्राह्मणत्व की राह पर कैसे चला जा सकेगा। इस अर्जन की अवस्था में होता है रजस का जागरण। कामनाओं, इच्छाओं का उदय, भावनाओं का अनियंत्रित बहाव, अतृप्ति की जलन का अहसास इसी अवस्था की देन है। अर्जन का सदुपयोग अपने लिए नहीं औरों के लिए हो। पनपती विचारणा धीरे-धीरे व्यक्तित्व को उस धरातल पर ला खड़ा करती है जहाँ वह अनेकों को संरक्षण देने लगता है।
चिन्तन आदि नाम से जाना जाता है, बहुत ही कारगर एवं प्रभावयुक्त सिद्ध हुई है।
चिन्तन मनन से उन्हें अपनाने और कार्यान्वित करने के प्रयास में जब भी अवसर हो समय लगाना चाहिए और उसे आत्मशोधन की साधना मानकर चलना चाहिए जो ईश्वर उपासना के ही समतुल्य है।
चिन्तन ने दुष्ट आचरण को जन्म दिया है। तदनुसार परिस्थितियाँ भी ऐसी बन गई हैं जिन्हें विकट और विपन्न ही कह सकते हैं।
चिन्तन-मनन स्वाध्याय का क्रम अपनाना तथा छोटे-छोटे दीपयज्ञों द्वारा जन-जन को युगपरिवर्तन की विचारधारा से अनुप्राणित करना, यही त्रिविध उद्देश्य इन कार्यकर्ता गोष्ठियों का था जो तीनों दिन टुकड़ों-टुकड़ों में पूरा होता चला गया। संध्याकाल में वंदनीया माताजी के उद्बोधन के पूर्व गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक पण्डित लीलापत जी शर्मा का प्रेरक उद्बोधन हुआ। अपनी ओजस्वी शैली में पं. लीलापत शर्मा ने पूज्य गुरुदेव के विद्या-विस्तार कार्यक्रम के विस्तार हेतु उनके लिखे साहित्य को उन सभी क्षेत्रों तक पहुँचाने की प्रेरणा दी, जहाँ अभी मिशन का आलोक नहीं पहुँच पाया हैं। वंदनीया माता जी के उपासना, साधना, आराधना परक त्रिविध अध्यात्म प्रधान प्रसंगों, पर उद्बोधन इसके पश्चात् हुआ। “ऋषिचिन्तन” नाम फिल्म के साथ ही कार्यक्रम समाप्त हुआ।
चिन्तनीय चिन्तन से जूझने के लिए हर समय कटिबद्ध रहा जाय। एक जागरूक प्रहरी का उत्तरदायित्व भली प्रकार निबाहा जाय।
चिन्तन शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकते हैं, व्यक्तित्व को गया गुजरा स्तर का बना सकते हैं। तो कोई कारण नहीं कि आशा एवं उत्साहवर्धक विधेयात्मक चिन्तन अनुकूल परिणाम प्रस्तुत न कर सके। स्वास्थ्य संवर्द्धन के साथ व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय गति प्रदान न कर सके। इसकी पुष्टि के लिए वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के मूर्धन्य विज्ञानी निकोलस हाल ने ऑटोसजेशन का प्रयोग केंसरग्रस्त रोगियों पर किया। इसमें उन्हें आशाजनक सफलता प्राप्त हुई।
चिन्तन की सुई यहाँ आकर अटक गई। यह निर्धारण तो युगावतार ही कर सकते हैं युगद्रष्टा से ही सम्भव है यह महान निर्णय। उन्हें स्वयं की भूल समझ में आ रही थी। सच अभी तक तो दान के नाम पर तो सिर्फ अहं का पोषण रहा। नाम को फैलाने यश को बटोरने की ओछी शुरुआत भर हुई।
चिन्तन, उत्तम चरित्र मृदुल व्यवहार कभी किसी बिरले भाग्यशाली को दिखाई पड़ जाते हैं। वहीं समाज अपना स्वरूप बदल कर ऋषियों का आरण्यक बन सकेगा। स्वयं को ऐसी पाठशाला में विकसित कर सकेगा जो आदमी को सोचना, जीना और व्यवहार करना सिखाए। योजना के ये त्रिविध चरण मानव समाज रूपी नचिकेता को महाशिव के तीन वरदान है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को मनमर्जी के अनुरूप सुधारा -उभारा जा सकता है। संकल्प-शक्ति की विवेचना करने वाले कहते हैं कि वह चट्टान को भी चटका देती है, कठोर को भी नरम बना देती है और उन साधनों को खींच बुलाती है, जिनकी आशा अभिलाषा में जहाँ-तहाँ प्यासे कस्तूरी हिरण की तरह मारा-मारा फिरना पड़ता है।
चिन्तन करते अथवा नागपुर रामकृष्ण मठ के साधुओं का सत्संग।
चिन्तन से अपने को परिपूरित करने की कला से अवगत कराया और उसे पूर्ण स्वस्थ हो जाने का विश्वास दिलाया।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में नियोजित करने के उपरान्त हम ईश्वर अनुग्रह के सहज ही अधिकारी बन जाते हैं और जीवन लक्ष्य की पूर्ति में अकारण प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। उचित यही है कि हम अपना स्तर ऊँचा उठाने और नर से नारायण बनने की सफलता प्राप्त करें।
चिन्तन, बौद्धिक विचारशील। इसके लिए स्वाध्याय सत्संग, चिन्तन और मनन चारों ही आवश्यक हैं। स्कूली शिक्षा जहाँ तक संभव हो, वहाँ तक प्राप्त करनी चाहिए पर नौकरी लक्ष्य न रखा जाय, तो ही अच्छा है क्योंकि भविष्य में हर शिक्षित को नौकरियाँ नहीं मिलने वाली हैं। उपार्जन के लिए पैतृक धन्धे को ही विकसित करने की योजना सरल पड़ती, पर यदि वैसा संभव न हो, तो दूसरे उद्योग की बात सोची जा सकती है। शिक्षा का उद्देश्य जीवनोपयोगी-समाजोपयोगी ज्ञान का संवर्धन है।
चिन्तन में उत्कृष्टता का और बुद्धि में तीक्ष्णता का समावेश संवर्धन होता है।
चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश करे और क्रिया–कलापों में सज्जनता शालीनता का बढ़-चढ़ कर समावेश करें। हमारा चिन्तन जितना स्वार्थ के निमित्त लगता है उतना ही परमार्थ प्रयोजन में भी लगना चाहिए। विशेषतया अपनी विचार क्षमता का उच्चस्तरीय उपयोग करें। समझें कि मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा करता है। जैसा करता है, वैसी ही परिस्थितियाँ बन जाती हैं और तदनुरूप भला-बुरा भोगना पड़ता है।
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार पर नये सिरे से विचार करने और उन्हें दूरदर्शी मंत्र विवेकशीलता की कसौटी पर कसने की प्रेरणा गायत्री मंत्र देता है। इसलिए उसकी महिमा गाते गाते ऋषि मुनि और शास्त्रकार थकते नहीं हैं।
चिन्तन और मनन चारों ही आवश्यक हैं। स्कूली शिक्षा जहाँ तक संभव हो, वहाँ तक प्राप्त करनी चाहिए पर नौकरी लक्ष्य न रखा जाय, तो ही अच्छा है क्योंकि भविष्य में हर शिक्षित को नौकरियाँ नहीं मिलने वाली हैं। उपार्जन के लिए पैतृक धन्धे को ही विकसित करने की योजना सरल पड़ती, पर यदि वैसा संभव न हो, तो दूसरे उद्योग की बात सोची जा सकती है। शिक्षा का उद्देश्य जीवनोपयोगी-समाजोपयोगी ज्ञान का संवर्धन है। इसके सहारे मनुष्य बुद्धिमान बनता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-October
चिन्तन को एक नई दिशा सुझाने वाली हैं। इनका निकट भविष्य में उसी तरह प्रकटीकरण होगा जैसी मनःचिकित्सक ए. एस. दलाल ने “लिविंग विद इन” व मनोवैज्ञानिक डॉ. इन्द्रसेन ने “इनटीग्रल साइकोलॉजी” में श्री अरविन्द के चिन्तन में व्याप्त मनःचिकित्सा व सैद्धान्तिक मनोविज्ञान के तत्वों को भली प्रकार स्पष्ट किया। इनसे भी कहीं अधिक व्यापक और शोधपरक संकलन अगले दिनों जिज्ञासुओं के समक्ष आएगा। जो अपनी उपादेयता मनोविज्ञान के नूतन आयाम के रूप में प्रस्तुत करने के साथ पूज्य गुरुदेव का परिचय मनोविज्ञान के दिशादर्शक के रूप में देने में समर्थ होगा।
चिन्तन के कारण होती है। ‘सतयुग की वापसी’ पुस्तक में वह कहते हैं। “विकृतियाँ दिखती भर ऊपर हैं। इनकी जड़ें गहराई में कुसंस्कारिता के रूप में छिपी हैं। भावनाओं की यह टूट-फूट कब और कैसे हुई?
चिन्तन और अनाचरण के फलस्वरूप ऐसा बोझ ही शिर पर लद जाता है जिससे वर्तमान विपन्नताओं से भरा रहता है और भविष्य के अन्धकारमय बनने का आधार खड़ा होता जाता है। यदि यह पहचान सकने का विवेक जगे और समय रहते सुधार निर्धारण बन पड़े तो समझना चाहिए कि एक महती सफलता उपलब्ध हुई।
चिन्तन को बदलने का कला को जीवन में स्थान देगा।
चिन्तन एवम् निर्णय लेने में स्वतन्त्र होते हैं। वे व्यक्तियों से अधिक सम्मान पाते हैं व्यक्ति उन्हें पसन्द करते हैं” . .। परम पूज्य गुरुदेव ऐसे ही मनोचिकित्सक थे। उनके इस रूप का परिचय, अनुभव यों दो-चार, दस, सौ, हजार नहीं बल्कि लाखों को हुआ है। पर शायद वे उन्हें इस तरह न पहचान सके हों।
चिन्तन परक क्षमताओं को देखते हुए प्रतीत होता है कि यह जादुई पिटारे से कम आश्चर्यजनक किसी भी प्रकार है नहीं। कल्पना, विचारणा, निर्धारणा, भाव संवेदना, मान्यता, आस्था जैसी अगणित परतें इस पिटारी के भीतर विद्यमान हैं। यदि वे प्रसुप्त मूर्छित स्थिति में पड़ी रहें तो बात दूसरी है, अन्यथा यदि उन्हें तनिक भी समुन्नत स्तर तक उठने का अवसर मिल जाय, तो मनुष्य अगणित सफलताएँ अर्जित कर सकने वाला सिद्ध पुरुष बन सकता है। यदि कुछ और उभार आ सके, तो उसे ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी होने में देर न लगे। ज्ञान और विज्ञान से संबंधित उसकी अनेकों विशेषताएँ उभर पड़ें तो मनीषियों दिव्यदर्शियों जैसी उच्चस्तरीय भूमिका निभाते उसे देखा जा सकता है।
चिन्तन में यत्र-तत्र बिखरे मनोवैज्ञानिक तत्वों का सुन्दर संकलन किया गया है। इन मनीषियों का कार्य प्रशंसनीय होते हुए भी प्रायोगिक कसौटी पर न कसे जाने के कारण अधूरा ही कहा जाएगा।
चिन्तन की चूलें हिला दीं।
चिन्तन में व्याप्त मनःचिकित्सा व सैद्धान्तिक मनोविज्ञान के तत्वों को भली प्रकार स्पष्ट किया। इनसे भी कहीं अधिक व्यापक और शोधपरक संकलन अगले दिनों जिज्ञासुओं के समक्ष आएगा। जो अपनी उपादेयता मनोविज्ञान के नूतन आयाम के रूप में प्रस्तुत करने के साथ पूज्य गुरुदेव का परिचय मनोविज्ञान के दिशादर्शक के रूप में देने में समर्थ होगा।
चिन्तन गहरा चल रहा था। उसके सिमट कर बिन्दु रूप हो जाने से माथे की नसें उभर उठी। पूछ ही बैठे-”तो स्वामी जी! लोग सुख-आनन्द की तलाश में बाहर क्यों भटकते हैं। पर्यटन के नाम पर, परिवर्तन के नाम पर व्यक्ति प्रकृति की गोद में जाता है तो क्या मात्र क्षणिक मनोरंजन, इन्द्रिय तृप्ति भर ही करके रह जाता है। यदि ऐसा है तो सौंदर्य, उल्लास का स्थायी स्रोत क्या है?
चिन्तन में खोए रहने वाले इस व्यक्ति की जीवन संरचना में व्यापक फेर-बदल करने का श्रेय उस पुस्तक को था जो इस समय भी उसके दाएँ हाथ में थमी थी। शायद इसी में सन्निहित किसी सूत्र के भावों ने उसे आत्मचेतना की गहराइयों में उतार दिया हो। आकेतिल दुपेरों द्वारा अनुदित इस किताब को पा उसे ऐसा लगा था जैसे जीवन निधि मिल गई।
चिन्तन की हवा में अतीत के पन्ने फड़फड़ा उठे। उसे याद आया कि विद्यालय में बिताया गया जीवन मानस पर साकार हो उठा। प्रयोगशाला का वह कक्ष जहाँ वह जन्तुओं की चीर फाड़ करते कहीं किन्हीं गहराइयों में खो जाया करता। साथी टोकते क्या सोचने लगे माधव। जीवन का सार खोज रहा हूँ डूबते मन से बुलबुलों की तरह जवाब फूट पड़ता।
चिन्तन के द्वारा अचेतन का रूपांतरण घटित होता है। इतना ही नहीं इन तीनों का समायोजन सत्ता के उस मूलभूत केन्द्र के आस पास होता है जिसे कार्लगुस्ताव जुंग ने अपनी भाषा में ‘सेन्टर’ कह कर सम्बोधित किया है। इसमें प्रयोगकर्ता साधक का चेतन मन एकाग्र और हलचल रहित होने से सम्प्रेषित किए जा रहे मंत्र के दिव्य भाव उस स्तर का पुनर्गठन करने लगते हैं जिसे मनोवैज्ञानिकों ने मनुष्य में बालकः बर्बर, दमित वासनाओं का पिटारा कहा है। यह अपने आपमें मनःचिकित्सा क्षेत्र की अभूतपूर्व उपलब्धि है।
चिन्तन और चरित्र में निकृष्टता का दौर बढ़ता चला गया। सोचा गया कि नियन्ता की प्रकृति की कोई व्यवस्था तो है नहीं फिर संकीर्ण स्वार्थ की पूर्ति के लिए कुछ भी कर गुजरने में क्या हर्ज है। इसी ढीठता के अंतर्गत पेड़ बुरी तरह कटे और प्राणियों को घासपात की तरह उदरस्थ कर जाने की प्रथा पड़ी। कृत्रिम खाद कीटनाशक, कृत्रिम प्रजनन आदि से किसी को तात्कालिक लाभ भले ही मिले पर इनके दूरगामी परिणाम हानिकारक ही हो सकते है। होते हुए देखे भी जा रहे है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-December
चिन्तन और क्रिया−कलाप में निरत रहने वाले व्यक्ति जब भी इकट्ठे होते हैं, अपने स्तर का वातावरण बनाते हैं। जब तक उनको कड़े विरोध द्वारा निरस्त न किया जाय, विरोध करके दूर न किया जाये, तब तक अवांछनीय प्रसंग अपना गहरा प्रभाव छोड़ने से रुकते नहीं। शरीर से भले ही अपना बचाव कर लिया जय पर जो लो वैसा अपना संपर्क किसी प्रकार साधना भी उन लोगों के लिए हानिकर सिद्ध होता है, जो सात्विकता बनाये रहना चाहते और साधनारत होकर आत्मकल्याण का प्रयोजन साधने के इच्छुक हैं।
चिन्तन और व्यवहार में उदात्तता और सामाजिक जीवन में सेवा-सहकार की अनिवार्यता-यह दोनों मिल कर ही सम्पूर्ण उद्देश्य की पूर्ति कर पाते हैं। चिन्तन यदि पवित्र हो और व्यवहार भी शालीन हो, किन्तु सामाजिक जीवन में निष्क्रियता बनी रहे, तो भी व्यक्ति आत्मोन्नति के क्षेत्र में-ईश्वर-साक्षात्कार के संदर्भ में वह लाभ नहीं उठा सकेगा, जो सेवा-सहकार का दूसरा और महत्वपूर्ण पक्ष साथ-साथ क्रियान्वित होने से हो सकता था। कोई मूर्तिकार मूर्ति बहुत सुन्दर, सजीव और आकर्षक बनाता हो, उसे देखते ही दर्शकों को किसी जीवन्त नारी का भ्रम हो जाता हो, पर इतने से ही तो प्रतिमा बोलने नहीं लग जाती। इतना सब होने के बावजूद भी उसमें एक कमी रह जाती है-प्राण की और यही कमी उसके लिए सबसे बड़ी कमी साबित होती है। यही बात उस साधक पर भी लागू होती है, जो ईश्वर-दर्शन की आकांक्षा तो रखता है, इसके लिए आत्म-परिष्कार की आवश्यक साधना भी करता है, पर लोक-आराधना के अभाव में वह अंकुरित बीज पौधा बनने से पूर्व ही सूख जाता है।
चिन्तन तथा क्रिया दोनों का समन्वय ही समग्र अध्यात्म साधना है। चिन्तन की उत्कृष्टता ब्रह्मविद्या या अध्यात्म-तत्त्वज्ञान का ज्ञान पक्ष है। ज्ञान एवं कर्म का समन्वय ही ब्रह्मवर्चस् है परिपोषण तथा उन्मूलन दोनों ही तथ्य इसमें समाविष्ट हैं।
चिन्तन अपनाने की भूल जब की गई है तो दुर्गति का सामना करना पड़ा है जबकि दोनों के समन्वय से सफलता और प्रगति का द्वार प्रशस्त होता है। गाँधी जी के सत्याग्रह में सत्य और अहिंसा का जितना समावेश था, अनीति के निर्भीक प्रतिकार का उतना ही प्रखर संकल्प एवं साहस भी था। यह समन्वय ही ब्रह्मवर्चस् की साधना-प्रक्रिया का पथ है।
चिन्तन श्रृंखला को झटका लगा। अन्तर में झाँकने की कोशिश कर रही दृष्टि फिर से बाहर लौट आई। प्रहरी की भाँति सीधे तने खड़े पेड़ कभी-कभी हिलडुल कर अपनी गोद में तारों को लहरों की प्यार भरी झपकियाँ देकर सुलाने का यत्न कर रही थी। रात्रि के गतिमान चरण अपनी सघनता की ओर बढ़ रहे थे।
चिन्तन, क्रिया–कलापों में असाधारण अन्तर आये ऐसी कुछ कल्पना तो की जा सकती है पर उतनी व्यापक उथल-पुथल का घटनाक्रम तो असंभव जैसा ही लगता है। आज जबकि हर दिशा में अवांछनीयता का बोलबाला है इस बात पर कौन भरोसा करेगा कि वह परिवर्तन आँखों को देखने को मिलेगा जिसके असंख्यों स्वप्न तो सँजोये पर कुछ बन न पहने के कारण निराश होकर ही चले आये।
चिन्तन की साधना करने का हर किसी के पास अवसर था। कुण्डलिनी जागरण, षट्चक्र भेदन, निदिध्यासन-धारण ध्यान समाधि स्तर के उपक्रम अब भले ही उस सीमा तक संभव न हों, पूज्य गुरुदेव स्थूल, सूक्ष्म कारण शरीर के जागरण संबंधी ऐसे विशिष्ट साधन निर्धारित कर गए हैं कि उनका आश्रम लेकर निश्चित ही लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। अखण्ड जप, नियमित यज्ञ, युगसन्धि महापुरश्चरण एवं करोड़ों गायत्री जप की ऊर्जा से अभिपूरित वातावरण इसमें सहायक भूमिका है। मनःस्थिति यदि बदलने को एवं नये प्रचलन को अपनाने को समुद्यत है तो आन्तरिक कायाकल्प सुनिश्चित हो जाता है। इन नौ दिवसीय अनुदान सत्रों में इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही विशिष्ट साधना उपक्रमों का निर्धारण किया गया है।
चिन्तन का भी मानसिक पवित्रता पर बुरा असर पड़ता है। उन दिनों नर-नारी के बीच माता, भगिनी, पुत्री जैसे पवित्र संबंधों की ही कल्पना करनी चाहिए। ऐसा साहित्य नहीं पढ़ना चाहिए, ऐसे खेल तमाशे नहीं देखने चाहिए, जो मन में कामुकता के विचार भड़काते हों।
चिन्तन यदि पवित्र हो और व्यवहार भी शालीन हो, किन्तु सामाजिक जीवन में निष्क्रियता बनी रहे, तो भी व्यक्ति आत्मोन्नति के क्षेत्र में-ईश्वर-साक्षात्कार के संदर्भ में वह लाभ नहीं उठा सकेगा, जो सेवा-सहकार का दूसरा और महत्वपूर्ण पक्ष साथ-साथ क्रियान्वित होने से हो सकता था। कोई मूर्तिकार मूर्ति बहुत सुन्दर, सजीव और आकर्षक बनाता हो, उसे देखते ही दर्शकों को किसी जीवन्त नारी का भ्रम हो जाता हो, पर इतने से ही तो प्रतिमा बोलने नहीं लग जाती। इतना सब होने के बावजूद भी उसमें एक कमी रह जाती है-प्राण की और यही कमी उसके लिए सबसे बड़ी कमी साबित होती है। यही बात उस साधक पर भी लागू होती है, जो ईश्वर-दर्शन की आकांक्षा तो रखता है, इसके लिए आत्म-परिष्कार की आवश्यक साधना भी करता है, पर लोक-आराधना के अभाव में वह अंकुरित बीज पौधा बनने से पूर्व ही सूख जाता है।
चिन्तन की उत्कृष्टता ब्रह्मविद्या या अध्यात्म-तत्त्वज्ञान का ज्ञान पक्ष है। ज्ञान एवं कर्म का समन्वय ही ब्रह्मवर्चस् है परिपोषण तथा उन्मूलन दोनों ही तथ्य इसमें समाविष्ट हैं।
चिन्तन हमारे खेर हो गए।
चिन्तन, भाव संवेदना एवं प्रज्ञा से है। यह सभी चेतना की उच्चस्तरीय परतें हैं, जो यह निरूपण करती हैं कि ऊर्ध्वगामिता का अनुगमन किस प्रकार किया जाय। पाश्चात्य मनोविज्ञानी सी.जी. जुग भी इस तथ्य की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि मानवी चेतना के चार कार्य हैं तर्क बुद्धि, अनुभव, भाव संवेदना और अन्तः प्रज्ञा। यह सभी एक से बढ़कर एक उच्चस्तरीय विभूतियाँ हैं। विज्ञानी इनमें से मात्र तर्क बुद्धि तक सीमित रहकर अधूरे सत्य की खोज में संलग्न हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-May
चिन्तन चेतना की यह एक महत्वपूर्ण शक्ति है। इस शक्ति का उपयोग करके ही विचारशील महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाते, महत्वपूर्ण कार्य करते और सफल महापुरुष कहलाते हैं। भाग्य निर्माण का आधार भी यही है। उत्कृष्ट विचारणाओं-संकल्पों का महत्व समझने और जीवन व्यवहार में उतारने की कला जिन्हें आती है, धवल चरित्र वाले वही व्यक्ति अपनी यश गाथा शरीर न रहने पर भी अक्षुण्ण बनाये रखते हैं। विविध रंग-रूपों वाले सशक्त विचार प्रवाह अदृश्य रूप में अपनी विद्यमानता से समानधर्मी व्यक्तित्वों का सतत् पोषण करते और अमर बने रहते हैं।
चिन्तन और उस प्रयोजन के लिए होने वाले अन्य कृत्य भी कामुकता की व्याख्या परिधि में आते हैं, किन्तु वास्तविकता यह है कि यह समस्त परिकर-सुविस्तृत कामशक्ति का बहुत ही छोटा और हेय स्वरूप है। वस्तुतः ‘काम’ शब्द की परिभाषा क्रीड़ा उल्लास ही हो सकती है, जिसका उभार या उमंग सृजनात्मक प्रयोजनों में निरत होने पर सामान्य से मानव को महामानव स्तर का बना देता है। इस शक्ति का उन्नयन आत्मोत्कर्ष के लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रमुख आधार खड़ा करता है। धर्म और मोक्ष जैसे आत्मिक एवं अर्थ और काम जैसे भौतिक प्रगति की चतुर्विधि महान उपलब्धियों में उसकी गरिमा के अनुरूप ही ‘काम’ को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। हमें कामशक्ति के इसी उत्कृष्टता सम्पन्न स्वरूप को समझना और इससे जुड़ती रहने वाली भ्राँतियों से बचना चाहिए।
चिन्तन करता है ऐसी स्थिति में भावनाएँ, विचारणाएँ सात्विक ढंग से निःसृत होती है और उनका आरोपण जिस किसी पर भी होगा, उसी में अपनत्व भरी तरंगों का प्रवाह प्रस्फुटित होने लगेगा। ऐसी दशा में स्वयं को प्रसन्नता होती है स्नायु मंडल को विश्राम मिलता है और विरोध आकांक्षाएँ, भावनाएँ मिटती हैं। मन एवं उसके शक्तियों का बिखराव भी रुकता है। यही शक्तियाँ मूलस्रोत पर पहुँचकर घनीभूत होती और तन, मन व स्वस्थ बनाती है।
चिन्तनशील मन, विभीषण की अपूर्व क्षमता बुद्धि के समन्वित स्वरूप का कुछ उद्देश्य जरूर होगा। कहाँ से आती है समस्त शक्तियाँ? कौन है शक्तिस्रोत? कोई न कोई अवश्य होगा!
चिन्तन से उबरते हुए उन्होंने सामने खड़े मित्र की ओर देखते हुए कहा ‘मित्र! तुम तो मेरे असमय के साथी रहे हो इस समय भी सहायक बनो।’
चिन्तन का एक ओर झटककर पति के कंधे पर हाथ रखा ‘आर्य! भोजन तैयार है’। अच्छा कहकर वह चल पड़ा।
चिन्तन प्रवाह गड़बड़ाने लगे तो स्थिति अर्धविक्षिप्त जैसी बन जाती है। अनगढ़ स्थिति में लोग मात्र इसी एक कारण में पड़े रहते हैं कि उन्हें प्रगति पथ पर चलने की आकांक्षा जगा सकने का अवसर नहीं मिलता। वे यह नहीं सोचते कि अब की अपेक्षा भविष्य में अधिक अच्छी स्थिति प्राप्त करने के लिए विचारों में क्या परिवर्तन करना चाहिए और तद्नुरूप अवसर ढूँढ़ने के लिए क्रिया–कलापों को किस दिशा में मोड़ना, मरोड़ना धकेलना चाहिए?
चिन्तन जैसी सर्वोपरि सम्पदा का सही नियोजन हो रहा है या नहीं। इन दोनों का अपव्यय उससे कहीं अधिक घातक है जितना कि वैभव को क्षति पहुँचने पर होता है। इन दोनों में भी विचारों के सदुपयोग दुरुपयोग का महत्व सर्वोपरि है। यदि चिन्तन प्रवाह गड़बड़ाने लगे तो स्थिति अर्धविक्षिप्त जैसी बन जाती है। अनगढ़ स्थिति में लोग मात्र इसी एक कारण में पड़े रहते हैं कि उन्हें प्रगति पथ पर चलने की आकांक्षा जगा सकने का अवसर नहीं मिलता।
चिन्तन को रोकती और मनोविकारों को मिटाती है। स्वर शक्ति की इस सृजनात्मक सामर्थ्य की ओर अब वैज्ञानिकों का भी ध्यान आकृष्ट हुआ है। जहाँ एक ओर अब शब्दचालित यंत्र उपकरण, बम एवं रोबोट आदि तैयार हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रदूषण निवारण, मनोविकार शमन, कायिक-रोगनिवारण में ध्वनि-तरंगों का संगीत स्पन्दन का प्रयोग हो रहा है।
चिन्तन क्षेत्र में घुमड़ते रहने वाले और मस्तिष्क को कुछ काम देते रहने वाली प्रक्रिया भर समझा जाता रहा है, किन्तु अब स्पष्ट हो गया है कि चिन्तन चेतना की यह एक महत्वपूर्ण शक्ति है। इस शक्ति का उपयोग करके ही विचारशील महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाते, महत्वपूर्ण कार्य करते और सफल महापुरुष कहलाते हैं। भाग्य निर्माण का आधार भी यही है। उत्कृष्ट विचारणाओं-संकल्पों का महत्व समझने और जीवन व्यवहार में उतारने की कला जिन्हें आती है, धवल चरित्र वाले वही व्यक्ति अपनी यश गाथा शरीर न रहने पर भी अक्षुण्ण बनाये रखते हैं। विविध रंग-रूपों वाले सशक्त विचार प्रवाह अदृश्य रूप में अपनी विद्यमानता से समानधर्मी व्यक्तित्वों का सतत् पोषण करते और अमर बने रहते हैं।
चिन्तन मनन उनके आकार को स्थायित्व प्रदान करने के साथ ही उन्हें चिरकालिक बनाता है। निरुद्देश्य एवं अस्थिर मनःस्थिति में किये गये संकल्प भी क्षणिक होते हैं। छोटे-मोटे प्रभाव छोड़कर वे थोड़े दिनों में समाप्त हो जाते हैं।
चिन्तन प्रवाह गतिशील रहता पर आने वाले की वाणी ने उसे विराम दिया गया सोच रहे थे वत्स?
चिन्तन, चरित्र और व्यवहार निकृष्ट कोटि का बना रहता है। वे उसमें सुधार नहीं करते। व्यक्तित्व को परिष्कृत करने की आवश्यकता अनुभव नहीं करते। इसी जन्म के किये हुए तथा पूर्वजन्मों के संचित कुसंस्कारों - दुष्कर्मों के परिमार्जन का प्रयत्न नहीं करते। फलतः मलीन वस्त्र पर रंग चढ़ाने की तरह, रेगिस्तान में बीज बोने की तरह पूजा कृत्यों का सत्परिणाम उत्पन्न ही नहीं हो पाता।
चिन्तन कर रहे थे। अतीत और वर्तमान की अनेकों घटनाओं स्वयं के जीवन और सामाजिक परिस्थितियों का समीकरण बनाते हुए उन्हें सूझा। क्रिया का आधार सोच ही तो है। यदि किसी तरह सोच बदला जा सके तो। चेहरा खिल उठा परिणाम की सुखद संभावना से।
चिन्तन सज्जनों का संग आदि कुछ ऐसे उपाय हैं जिनके द्वारा अपनी विचारशक्ति की प्रभावोत्पादकता को बढ़ाया और स्वयं के उज्ज्वल भविष्य की संभावना को सुनिश्चित किया जा सकता है।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-June
चिन्तन। इसका उद्गम क्षेत्र है परिष्कृत अंतराल। श्रेष्ठता की ओर बढ़ पाने योग्य मनोबल जुटाना उदात्त भावनाओं की ही देन है।
चिन्तन में वह संस्कार हैं। इनके उभरते ही हर किसी को मेरी बात की सत्यता नजर आने लगेगी।
चिन्तन के रूप में पुस्तकों की नदी में बहता है।
चिन्तन से जर्जर है, कुरीतियों की सर्पमालाएँ रूढ़ियों के वृश्चिक दंश उसे मूर्छित और विकल कर रहे हैं, अनन्तधा विदीर्ण हो उठा है। जन जीवन। क्या करूं? तुम्हीं कुछ कर्तव्य सुझाओ। एकलिंग कहकर उसने सामने प्रतिष्ठित शिवलिंग की ओर कातर भाव से ताका।
चिन्तन करने की कोई मौलिक क्षमता तो नहीं होती, पर स्वभाव अवश्य होता है जिसके सहारे अपना काम करते और निर्वाह चलाते रहते हैं। उनकी संरचना और व्यवस्था के बीच भी तालमेल है। समय का खालीपन प्रतीत न हो, इसलिए वे अपने बड़े पेट और छोटे मुँह के कारण पर्याप्त आहार खोजने और उदरस्थ करने में ही अपना सारा समय लगा देते हैं। कुछ बचता है तो प्रजनन के फेर में उसका उपयोग हो जाता है। एक दूसरे पर आक्रमण भी करते रहते हैं इसलिए आत्मरक्षा के लिए सींग, दाँत, नुकीले, पंजों, तेज चोंच का उपयोग भी उन्हें भी प्रकृति के प्राणियों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर पूरा किया है।
चिन्तन करने से उसकी यह क्षमता नष्ट होती चली जाती है। यदि वह पवित्र आचरण को अपनाये तथा अपनी बुद्धि को भटकाव से रोक कर अपनी प्रसुप्त क्षमताओं को जगाने की प्रक्रिया संपन्न कर ले तो वह भी अपनी छठी इन्द्रिय को जगा सकता है। इसके लिए आवश्यक है अंतःकरण का परिष्कार, पात्रता का विकास तथा उच्चस्तरीय तप पुरुषार्थ।
चिन्तन क्षेत्र पर बड़ा अंकुश रखने की मनुष्य की जिम्मेदारी है। जो इसे निबाहते हैं केवल वे ही लोग सुख-शाँति से रहते हैं, दूसरों को चैन से रहने देते हैं।
चिन्तनशील और संवेदनशील प्राणी के रूप में विकसित होगा, जिससे समय की अनेकानेक आवश्यकताएँ अनायास ही पूरी होती रहेंगी। यही मानवीय योग्यताओं एवं प्रतिभाओं के अधिकाधिक उपयोग तथा उसके आधार पर उज्ज्वल भविष्य को सुनिश्चित बना पायेगा।
चिन्तन भी काम करता है और मनन भी। इन सब के समन्वय से उद्देश्य लक्ष्य की एक दिशाधारा विनिर्मित होती है। संकल्प बनता है और वह गहराई में उतरकर व्यक्तित्व को एक विशेष ढाँचे में ढालता है जिसके कारण विचारणा और क्रिया का सुनिश्चित स्वरूप बनता है। यही दृष्टिकोण है। उसमें इतना बल होता है कि सैद्धान्तिक निश्चय और व्यवहारिक क्रिया−कलाप में सुनिश्चित रूप से एकीकरण हो जाता है यह एकात्मता ही व्यक्तित्व है।
चिन्तन में आदर्शवादिता का समावेश हो तो दृष्टिकोण उच्चस्तरीय बन जाता है। उसमें कच्चापन तभी तक रहता है जब तक बात सोचने-विचारने, कल्पना करते रहने तक सीमित रहती है। पर जब उसे व्यवहार में उतारना आरंभ कर दिया जाता है तो विचारणा और क्रियाशीलता का सम्मिलित स्वभाव बन जाता है। यदि उसे लगातार व्यवहृत होने दिया जाय। विक्षोभों को आड़े न आने दिया जाय।
चिन्तन में खोने लगे थे। यह उपदेशक थे आदि गुरु शंकराचार्य। लगभग डेढ़ हजार वर्ष बीज जाने पर भी जिनकी वाणी पहले से कहीं अधिक समीचीन है।
चिन्तन करने वालों की मनोदशा सदा विक्षुब्ध रहती है। जिस सही ढंग से सोचना नहीं आता। वह उलटा चलता और औंधे मुँह गिरता है। बढ़ती हुई शारीरिक व्यथाओं के कारण और निवारण में हमें इसी तथ्य को ध्यान में रखना और संकट उपजाने वाले केन्द्र का सुधार परिष्कार करना होगा।
चिन्तन ही गड़बड़ा गया है। अनीतिपूर्ण जीवन जीने और अचिन्त्य चिन्तन करने वालों की मनोदशा सदा विक्षुब्ध रहती है। जिस सही ढंग से सोचना नहीं आता। वह उलटा चलता और औंधे मुँह गिरता है। बढ़ती हुई शारीरिक व्यथाओं के कारण और निवारण में हमें इसी तथ्य को ध्यान में रखना और संकट उपजाने वाले केन्द्र का सुधार परिष्कार करना होगा।
चिन्तन और प्रत्येक कर्म भगवान के कार्य हेतु समर्पित है। जिसका मन कामनाओं के कलुष से विहीन है जिसका व्यवहार कटुता से शून्य है और एक मैं अभिमानी, ज्ञान से गर्व से चूर क्या-क्या नहीं कह गया। शास्त्रों के मर्म को न जानकर भी इनकी दुहाई देता रहा।
चिन्तन, चरित्र, व्यवहार में उत्कृष्टता की बात करता है, पर उच्चस्तरीय व्यक्तियों के उदाहरण ढूँढ़ने पर मुश्किल से ही मिलते हैं और साथ ही मशीनें भी उनकी गहराई को कहाँ माप पाती हैं। यही वह मूल कारण है जो दोनों के मध्य की खाई को गहरी बनाते हैं।
चिन्तन शक्ति इतनी ओजपूर्ण थी कि वह दार्शनिक ज्ञान के क्षेत्र में सब से आगे थे।” “न्यू लाइट आन द मोस्ट ऐशिएंट ईस्ट” नामक अपनी पुस्तक में प्रो. फ्रैकफर्ट ने लिखा है कि यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि सभ्य संसार का निर्माण करने वाली प्राचीनतम जटिल संस्कृति में यूनानियों के उत्थान से पूर्व भारतीय संस्कृति का अस्तित्व विद्यमान था। विद्वान जॉन हण्टर ने भी माना है कि पहले ग्रीक व रोमन जातियाँ मन, बुद्धि आत्म सुख, दुख कर्म एवं अकर्म आदि के संबंध में अंधकार में थी। इनके गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित करने और प्रकाश में लाने वाले भारतीय दर्शन ही हैं। मनीषी कोलबुक ने भी दार्शनिक जगत में भारत को अपना गुरु माना है और कहा है कि इस क्षेत्र में हम सब उसके विद्यार्थी हैं।
चिन्तन लोक मंगलोन्मुख है। चरित्र दिव्यता का आमुख है॥ टलने लगा आस्था-संकट। छलक उठा आशाओं का घट॥
चिन्तनों से जूझते रहा जाय तो स्थिति ऐसी बन जाती है कि उसमें परिपूर्ण दृढ़ता समाविष्ट रहे और उसे विचलित कर सकना किसी भी प्रतिकूलता के लिए संभव न रहे।
चिन्तन चलता रहा। बड़ी होने पर उसने एक उपन्यास लिखा-”द गुड अर्थ”। यह इसी पृष्ठभूमि पर लिखा गया था। इसे आगे चलकर अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। श्रेष्ठ कृति के रूप में इसे नोबुल पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया।
चिन्तन की आदत डालकर मस्तिष्क को विकृत-विक्षिप्त स्तर का बना सकता है और ऐसे निर्णय-निर्धारण करता रह सकता है, जिन्हें आचरण में उतारने पर उद्धत, असभ्य या अपराधी स्तर का बना जा सके। इस उपलब्ध स्वतंत्रता का दुरुपयोग न होने देने के लिए मानसिक संयम की, चिन्तन क्षेत्र पर बड़ा अंकुश रखने की मनुष्य की जिम्मेदारी है। जो इसे निबाहते हैं केवल वे ही लोग सुख-शाँति से रहते हैं, दूसरों को चैन से रहने देते हैं।

अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-August
चिन्तन को कार्य का स्वरूप नहीं दे पायी पर बाद में शाँतिकुँज आने पर सुनियोजित ढंग से इस कार्य को चला सकीं।
चिन्तन ही इस प्रज्ञापुँज का, ऋषि सत्ताओं की पक्षधर, महाकाल की सत्ता का सर्वाधिक सबल सशक्त पक्ष हैं जिसने लाखोँ प्रज्ञा परिजनों में नये प्राण फूँक कर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया। अपनी उलटी चाल बदल कर नये सिरे से सतयुगी ब्राह्मण परम्परा वाली जिन्दगी जीने लगना एक प्रकार से नये जीवन समान ही तो कहा जायगा।
चिन्तन कर रहे थे। पता नहीं क्या सोचकर बड़ी सरलता से पास बैठे एक स्वयं सेवक से पूछा-”क्यों जी तुम्हीं कुछ बताओ, मिशन को विस्तार कैसे दिया जा सकता है?” स्वयं सेवक ने थोड़ा सोचते हुए कहा-”यदि शिक्षक और चिकित्सक इस काम में सहयोग करने लगें तो प्रगति दूनी हो जायेगी। क्योंकि इन्हीं दोनों वर्गों से समाज उपकृत रहता है। उपकार करने वाले की बात मानने में किसी को संकोच कहाँ?
चिन्तन तथा अन्य दैनिक क्रम यथावत थे। इसी बीच पता चला कि उनके गन्तव्य स्थान के कुछ व्यक्ति साथ चल रहे है। बस मन की सीखने की वृत्ति ने प्रोत्साहित किया क्यों न पहुँचने के पहले वहाँ की भाषा सीख ली जाय।
चिन्तन की गहराइयों से उबरता, तब क्या सचमुच पानी नहीं है फिर क्या है यह? इतनी देर में मन प्रकृतिस्थ हो चुका था। गिलास को ध्यान से देखा-विश्वास हुआ यह पानी नहीं है। पर क्या है, यह नहीं सूझ रहा था। स्वाद अपरिचित जो था।
चिन्तन से अनुप्राणित कर दिया, उसके लिए इससे श्रेष्ठ दिवस और क्या हो सकता था कि वह सूक्ष्मीकृत घनीभूत होने के लिए सीधा तरणतारिणी माँ गायत्री की गोद में ही जाए।
चिन्तन चेतना सभी पाठकों का दैनन्दिन जीवन में मार्गदर्शन करती रही। जनवरी 1972 में बंगला देश के मुक्ति युद्ध के समापन के बाद अल्प अवधि के लिए पूज्य गुरुदेव शाँतिकुँज अचानक आए एवं माताजी को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन देकर फिर चले गए। जून 1972 में अपनी गुरु सत्ता के मार्गदर्शन पर सप्तऋषियों की तपस्थली में रह कर ऋषि परम्परा का बीजारोपण कर देवमानवों को विनिर्मित करने हेतु अपना प्रचण्ड तपोबल संचित कर वापस लौट आए। अपनी आत्मकथा में अपनी ही लेखनी से उनने इस एक वर्ष की अवधि में गुरु सत्ता द्वारा क्या निर्देश दिए गए, इनका खुलासा स्वयं किया है।
चिन्तन के लिए उद्वेलित करते रहे। उनने कहा था-”गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है। वह अभीष्ट फल प्रदान करे इसके लिए श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा का अवलम्बन लेना जरूरी है”। बात याद तो हो गई पर दो बातें समझ में नहीं आई। एक यह कि- “ब्राह्मण बनने के लिए क्या करना होगा” क्योंकि बताया यह गया था कि गायत्री ब्राह्मण परिवार में ही जन्मे थे, फिर वे तो ब्राह्मण परिवार में ही जन्मे थे, फिर वे तो ब्राह्मणोचित नित्यकर्म भी पिता द्वारा दिये गये प्रशिक्षणानुसार बचपन से ही सीखते व करते आ रहे थे।
चिन्तन ने ही संभवतः इस ऋषि को आगे चक्कर सूक्ष्मीकरण साधना तथा उसके बाद के महाप्रयाण तक के वर्ष एकाकी बिताने की प्रेरणा एवं शक्ति दी होगी। सन् 1974 से 1990 तक वे एक ही कोठरी में रहे, उसी में तप में लीन रहे व वहीं से प्रचण्ड शक्ति में चक्रवात सारे विश्व में उत्पन्न कर सके। एकान्त सेवन को किस सीमा तक रचनात्मक बनाया जा सकता है व इसके लिए किस श्रेणी का चिन्तन होना चाहिए यह मार्गदर्शन पूज्य गुरुदेव लेखनी से ही नहीं, अपना जीवन जीकर सब को दे गए हैं।
चिन्तन का असंतुलन भी रुग्णता और अकाल मृत्यु का कारण बनता है।
चिन्तन, मनन, स्वाध्याय, लेखनी की साधना) के अतिरिक्त थी। यह सोचा जा सकता है कि 24 घंटे में 21 घंटे जब इसमें चले गए तो वे सोते कब थे। यही तो अलौकिक सिद्धि है जो किसी भी नाम से पुकारी जा सकती है पर उनके निकटवर्ती जानते हैं कि प्रातः 1 बजे से उठकर जो उनने कार्य आरंभ किया है तो उसे बिना विराम दिये सतत् रात्रि 10 बजे तक सम्पन्न किया है। यह संभव है तपोबल से अर्जित सामर्थ्य के सहारे।
चिन्तन को पास नहीं फटकने देना चाहिए।”
चिन्तन धारा ने 70 से 90 के दो दशकों में पूरे भारत व विश्व में एक व्यापक उथल पुथल मचाई एवं शोध का एक नया आयाम ही खोल दिया। साधना का वैज्ञानिक स्वरूप प्रस्तुत कर पूज्य गुरुदेव ने अनेकों बुद्धिजीवियों को प्राण प्रत्यावर्तन जीवन साधना, साधना स्वर्ण जयन्ती, कुण्डलिनी जागरण, उच्चस्तरीय गायत्री साधना सत्रों में सम्मिलित कर उनका आत्मबल बढ़ाया व इस योग्य बनाया कि वे आस्था संकट से मोर्चा ले सके॥ इस लिए सभी प्रतिपादनों का सारगर्भित पहला संकलन 1978-79 में 42 पुस्तकों के एक सेट के रूप में तथा दूसरा संकलन 1984-85 में 25 पुस्तकों के एक सेट के रूप में प्रकाशित हुआ।
चिन्तन को आमूलचूल परिष्कृत करके उठता है। इस जाल में कई विचार शील, तथाकथित प्रगतिशील पाठक भी आ गए एवं सभी पूज्य गुरुदेव की पत्रिका के पाठक बनते चले गए क्योंकि उन्हें कभी कल्पना भी नहीं थी कि एक दिग्भ्रान्त करने वाले विषय पर तत्वदर्शन की सारगर्भित पुस्तक भी लिखी जा सकती है। इन पुस्तकों के ढेरों संस्करण छपे व हाथों हाथ बिक गए। “मैं क्या हूँ” जैसे आत्मोपनिषद् से शुरुआत करने वाले मनीषी को भी पाठक रुचि को देखते हुए उन दिनों झुनझुना बाँटकर ललचाने वाली विधि का उपयोग करना पड़ा था।
चिन्तन-चेतना के साथ जुड़कर माँ सरस्वती के इस वरद पुत्र के हाथ से स्पर्श होकर स्वयं को धन्य मानती थी। पूज्य गुरुदेव को सिद्ध पुरुष, अवतारी महामानव, उदात्त अंतःकरण वाला एक विशाल परिवार का अभिभावक, एक विराट संगठन का सृजन करने वाला, गायत्री व यज्ञ को जन-जन के मन-मन में स्थापित कराने वाले से लेकर एक वैज्ञानिक मनीषी, ऋषि सब कुछ माना जाता है किन्तु एक कुशल लेखनी का शिल्पी, हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक अनूठी विधा रचने वाला अभूतपूर्व साहित्यकार वाला पक्ष ऐसा था, जो स्वयं हिन्दी जगत उनके जीवित रहते नहीं जान पाया। जब भी उनके साहित्यकार पक्ष पर शोध कार्य होगा तो यह प्रकाश में आएगा कि साहित्य की एक विलक्षण विधा का ही इस व्यक्ति के माध्यम से जन्म हो गया। हिन्दी की गरिमा गाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी संभवतः तब इस विराट व्यक्तित्व के प्रचुर परिमाण में लिखे गए साहित्य का मूल्याँकन करेंगे व पश्चाताप करेंगे कि उनके जीवित रहते उन पर यह कार्य क्यों नहीं सम्पन्न हो सका।
चिन्तन से विरत कर लोकसेवी बना दिया। यह एक क्रान्तिकारी स्तर का विचारक ही कर सकता था। धर्म के संबंध में जो भ्राँतियाँ संव्याप्त हैं एवं जनोपदेशक जो भी कुछ कहकर उन्हें पोषण देते रहे है, उनसे जूझना व योद्धा की तरह संघर्षरत रह बिना विचलित हुए लक्ष्य सिद्धि तक पहुंच जाना उनके व्यक्तित्व के एक अनूठे पक्ष को प्रस्तुत करता है।
चिन्तन बहुतों ने सिखाया हैं, पर ऐसे बहुत कम मिले। जो चिन्तन को जीवन में उतारना सिखा पाते।
चिन्तन नवनीत में उनके वही विचार उभर कर आये है जिन्हें वे व्यवहार के माध्यम से सबके समक्ष प्रकट कर रहे थे। वह था अपनी प्रसुप्त संकल्प शक्ति का जागरण और आत्मदेव की आराधना, जीवन देवता की साधना के बल पर प्रचण्ड पुरुषार्थ कर दिखाना। इस पुस्तक की कुछ पंक्तियाँ देखने योग्य हैं-
चिन्तन प्रत्यक्षवाद, बुद्धिवाद प्रधान था। कहना न होगा कि यही चिन्तन आस्था व श्रद्धा की काट अपने अस्त्रों से करता आ रहा है। पूज्य गुरुदेव ने उन्हीं अस्त्रों को प्रयोग अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु किया।
चिन्तन आस्था व श्रद्धा की काट अपने अस्त्रों से करता आ रहा है। पूज्य गुरुदेव ने उन्हीं अस्त्रों को प्रयोग अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु किया।
चिन्तन होना चाहिए यह मार्गदर्शन पूज्य गुरुदेव लेखनी से ही नहीं, अपना जीवन जीकर सब को दे गए हैं।
चिन्तन नवनीत था। यह उलटी नीति कैसी? जब युग बदलने जैसा भारी दायित्व सिर पर हो तो महाकाल पुचकार एवं दण्ड, दुलार एवं उलाहना देने की, दोनों ही नीति अपनाता है। देव अंशधारी जाग्रतात्माएँ भौतिकतावादी प्रवाह में बह कर कहीं अपने लक्ष्य से भटक न जाएँ लोकेषणा-वित्तेषणा की चपेट में आकर लोक सेवा के पथ से विरत न हो जायें इसके लिए इसी स्तर की फटकार की जरूरत भी सदा से रही है व कृष्ण द्वारा अर्जुन को, राम द्वारा हनुमान को व सुग्रीव को तथा बुद्ध द्वारा आनन्द को लगाई गई लताड़ के रूप में सामने आती रही है। इस
चिन्तन क्षेत्र में एक नया चक्रवात घूम रहा था। वह था केन्द्र में प्रशिक्षित किये जा रहे समयदानी परिव्राजकों के माध्यम से पूरे भारत में फैले सत्प्रवृत्ति संवर्धन के कार्य का, धर्मतंत्र से लोकशिक्षण रूपी महत्वपूर्ण कार्यक्रम का सुनियोजित विकेंद्रीकरण। इस के लिए बसंत पंचमी, उनके अध्यात्मिक जन्म दिवस पर एक महत्वपूर्ण संदेश आया-वह था नवचेतना के निर्झर केंद्रों के रूप में प्रज्ञा संस्थापना का। यह वर्ष था सन् 1979 का व युग निर्माण योजना को प्रारंभ हुए पच्चीस वर्ष हो चुके थे अतः उसका यह रजत जयन्ती वर्ष था। मात्र प्रतिपादन ही नहीं, अंतराल में सद्भावों को जगाने के लिए एक विशाल ज्ञानयज्ञ की आवश्यकता को समझते हुए गुरुदेव द्वारा पहले चौबीस एवं फिर आवश्यकता को देखते हुए चौबीस सौ स्थानों पर प्रज्ञा संस्थान, शक्ति पीठ या गायत्री तीर्थ स्थापित करने का निश्चय का लिया गया
चिन्तन को अखण्ड ज्योति के प्रथम कुछ वर्षों में विभिन्न लेखकों के नाम देते रहे। जब बाद में पत्रिका ने अपनी जड़ें गहराई से जमा लीं तो उनने नाम देने का क्रम बन्द कर दिया। पर यह सिलसिला पंद्रह वर्ष तक चला। कई बार अन्य सहयोगियों, अपने अनुयाइयों को श्रेय देने के लिए उनने उनके नाम दिए।
चिन्तन से उद्भूत हुआ व परिजनों को भाव भरा उद्बोधन देते हुए उनसे अपनी रीति-नीति को बदलने को जो कहा गया, वह भी उसी मनीषी का चिन्तन नवनीत था। यह उलटी नीति कैसी? जब युग बदलने जैसा भारी दायित्व सिर पर हो तो महाकाल पुचकार एवं दण्ड, दुलार एवं उलाहना देने की, दोनों ही नीति अपनाता है। देव अंशधारी जाग्रतात्माएँ भौतिकतावादी प्रवाह में बह कर कहीं अपने लक्ष्य से भटक न जाएँ लोकेषणा-वित्तेषणा की चपेट में आकर लोक सेवा के पथ से विरत न हो जायें इसके लिए इसी स्तर की फटकार की जरूरत भी सदा से रही है व कृष्ण द्वारा अर्जुन को, राम द्वारा हनुमान को व सुग्रीव को तथा बुद्ध द्वारा आनन्द को लगाई गई लताड़ के रूप में सामने आती रही है। इस
चिन्तन रखेंगे कि आपके पदचिह्नों पर चलकर अपने कर्तव्य में पूरी तरह खपकर कितना अधिक योगदान दे सकते हैं? कितना आगे रह सकते हैं?
चिन्तन प्रधान होती हैं। मान्यताओं, विचारणाओं के प्रवाह में ही सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार प्रक्रिया लोकमानस की अवांछनीयता, अनैतिकता एवं मूढ़ मान्यता को मिटाने वाली विचारक्राँति के रूप में ही इस युग की समस्याओं का समाधान कर सतयुग की वापसी कर सकती है।
चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार में उत्कृष्टता का अभिवर्धन अन्तःकरण में भाव संवेदनाएं जगाने से ही संभव हो सकता है।
चिन्तन का नवनीत है तो समग्र आर्ष वाङ्मय उसके तुरन्त बाद उत्तरकाशी में मात्र छह माह की अवधि के उस पुरुषार्थ का सार है जो उनने लेखनी के माध्यम से एक मनीषी, ऋषि तत्वदर्शी की भूमिका निभाकर संपन्न किया।
चिन्तन की वह शैली जो मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी को भटकावों एवं जंजालों की विपन्नता से छुड़ा सके।
चिन्तन की शैली का अभ्यास करना चाहिए, यह सत्संकल्प का प्रथम पाठ है एवं सही कहा जाय तो यही मर्म है। यदि इतनी व्यवस्था भी कोई जीवन में कर ले तो वह बदल जाए, साथ ही अनेकों को बदल दे।
चिन्तन के उद्गाता”-इन शब्दों में हम उस विराट व्यक्तित्व का वर्णन करते हैं जो हमारे बीच अस्सी वर्षों तक सक्रिय रह अपना अस्तित्व बनाये रहा व फिर अनेकों को रोता-बिलखता हुआ छोड़ गया। वस्तुतः यह मूल्याँकन किया जाय कि अगणित मनोव्यथा पीड़ितों, अभावग्रस्तों, शोषितों की उस करुण हृदय सम्पन्न महामानव ने कितनी सेवा की, किस सीमा तक उनके दुख में दुख बंटाया व किस तरह उन्हें पतन से उत्थान की राह दिखाई तो एक गौरव की अनुभूति होती है कि हम सौभाग्यशाली हैं जो उसके जीवनकाल में उसके साथ रहे।
चिन्तन बताता है कि सूक्ष्मीकरण साधना के दौरान वे आने वाले भविष्य का ताना बाना बुन रहे थे। अपने स्थूल शरीर के क्रिया–कलापों को सीमित कर सूक्ष्म से और अधिक व व्यापक क्षेत्र में सक्रिय होने के लिए स्वयं पीछे हट रहे थे व वंदनीया माताजी को इस भूमिका के लिए तैयार कर रहे थे, जो उन्हें उनके महाप्रयाण के बाद निभानी थी। यह सारा सुनियोजित उद्देश्यों के लिए धरती पर आयी हो, समर्पित जीवन जी चुकी हो, काया की क्षमता से सौ गुनी अधिक काम कर चुकी हो एवं निरन्तर उनके बताए सूत्रों पर चलने वालों को मार्गदर्शन देते रहने का आश्वासन देकर नवसृजन की आधारशिला रख रही हो। अवतार रूप पूज्य गुरुदेव का विभिन्न कर्तव्यों में तो प्रकट होता ही है, विविध रूपों में समय समय पर व्यक्त उनके उद्गारों में भी। झलकता है।
चिन्तन धारा की पृष्ठभूमि पर होने जा रहा है।
चिन्तन और लोलुप दृष्टिकोण मानसिक व्यभिचार है।
चिन्तन पर विवश होने के लिए उद्धृत किया गया है व यह समीक्षा करने के लिए भी कि इस सम्पादकीय का मूल मन्तव्य क्या था? क्या वे अपनी अभी वक की उपलब्धियों से निराश थे अथवा परिजनों को कसौटी पर सकने के लिए अन्तिम तैयारी के लिए चेतावनी दे रहे थे। यदि मई 1982 के अंक पर दृष्टि डालें जो इसके एक माह बाद प्रकाशित हुआ तो तथ्य समझ में आने लगता है। प्रस्तुत अंक से स्पष्ट होता है कि लाखों जनसमूहों के बीच प्राण फूँकने वाले गुरुदेव एकाएक स्तब्ध कैसे हो गए, शान्तिकुँज की सत्र श्रृंखलाओं में मुखर अपनी वाणी को मौन क्यों कर लिया, इस पर किसी को असमंजस हो तो उसे उनकी नयी जिम्मेदारियाँ समझनी चाहिए जिसमें “उन्हें आपत्ति धर्म को पालने के लिए तवे पर रोटी जलती छोड़कर बच्चे को बिच्छू पकड़ने से रोकने के लिए दौड़ पड़ने वाली माता की तरह नई रीति नीति अपनानी पड़ रही है।”
चिन्तन भी कर रहा है तो मानवी स्वभाव का व कैसे उसके संकीर्ण स्वार्थपरता को ऊर्ध्वगामी मोड़ दिया जाय, इस बात का। आगे वे पीली मक्खियों द्वारा काटे जाने पर लिखते हैं कि “वे तो नन्हे-नन्हे डंक मार कर आधा मील पीछा करके वापस लौट गई पर मनुष्य की अधिकार लिप्सा, स्वार्थपरता और अहंकार से उद्धत होकर किये जाने वाले आक्रमणों की भयंकरता जब सोचता हूँ तो बेचारी पीली मक्खियों को बुरा-भला कहने में जीभ सकुचाने लगती है।”
चिन्तन को पूज्य गुरुदेव ने भलीभाँति मथा।
चिन्तन के लिए विवश किया कि वे किस निमित्त इस महासत्ता से जुड़े थे? मात्र स्वार्थ लिप्सा की पूर्ति हेतु? अपनी क्षुद्र महत्त्वाकाँक्षाओं के लिए? अथवा कोई विवशता उन्हें दीन-दरिद्र बनाकर खींच कर लाई विवशता उन्हें दीन-दरिद्र बनाकर खींच कर लाई थी? यदि नहीं तो जो कर्तृत्व कुलपति का है, युग चिन्तक का है वह उनके जीवन में क्यों नहीं उतरता?
चिन्तन चेतना को उस सूक्ष्म शरीरधारी सत्ता ने पढ़ लिया व कहा कि “देवात्माएँ हैं, उनकी अच्छी तरह जाँच-पड़ताल करती हैं। शक्ति सम्पन्न महामानव अकारण अपनी सामर्थ्य किसी निरर्थक व्यक्ति के निमित्त नहीं गँवाते। सूक्ष्म शरीरधारी होने के नाते जो काम हम नहीं कर सकते वह स्थूल शरीर के माध्यम से तुम से कराएँगे। समय की विषमताओं को मिटाने के लिए तुम्हारा प्रयोग करेंगे। देखते में तो यों तुम्हारा दृश्य जीवन साधारण व्यक्ति के समान होगा पर कर्तृत्व सभी असाधारण होंगे।
चिन्तन से-सूक्ष्म शरीर से और आराधना समाज सेवा के लिए किये गये उदार सहकार भरे कृत्यों से-स्थूल शरीर से। पूज्य गुरुदेव ने अपने तीनों शरीरों से पूरी निष्ठा के साथ गायत्री साधना स्वयं सम्पन्न की व माँ गायत्री के वरदपुत्र बन गए। असंख्यों की सहायता करने वाला ब्रह्मवर्चस् इससे कम में संग्रहित हो भी तो नहीं सकता था। अपने व्यक्तित्व को उर्वर क्षेत्र की तरह विकसित करने में यदि इतनी सतर्कता न बरती होती तो संभवतः उनके चौबीस वर्षों के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण तथा सामान्य समय के जप-तप उतने प्रभावी न हो सके होते जितने कि देखे और पाये गये।
चिन्तन को जीवन में उतारना सिखा पाते।
चिन्तन से विनिर्मित कर देते हैं। स्त्रियों को वे नव जागरण की प्रेरणा देते हैं वह उनसे नेतृत्व कराते हैं। “कीकटपुर” अर्थात् संकीर्ण स्वार्थी मनोवृत्ति में निवास करने वाले बौद्ध अर्थात् तार्किक, घमण्डी, शिक्षित किन्तु स्वार्थपरायण बुद्धि वाले व्यक्तियों से वे युद्ध करते हैं। आस्था संकट से जूझते हुए वे ज्ञान रूपी परशु से उनका सिर काटते हैं अर्थात् विचार क्रांति द्वारा उनके विचारों को बदलकर उन्हें समर्पण अपनाने, क्षुद्र बुद्धि छोड़ सबके हित की बात सोचने के लिए बाध्य कर देते हैं।
चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। इसे न तो विरक्ति कहना चाहिए, न अशक्ति। वरन् तूफानों से आगे चलने वाला सन्नाटा कहना चाहिए”। इस अवधि की साधना को उनने छाया पुरुष की साधना कहा, जिसमें वे पाँच शरीरों से भिन्न भिन्न कार्य सूक्ष्मजगत में करना चाहते थे। वंदनीया माताजी ने इस सम्पादकीय में लिखा कि “ हम सभी अनुभव करें कि गुरुदेव न थक गये है और न पलायन ही कर रहे है, वरन् वे सूक्ष्मीकरण की जीवनचर्या अपनाकर अपनी वर्तमान क्षमता में अनेक गुनी बढ़त कर रहे है।
चिन्तन नियमित किया करते थे एवं सहयोगी कार्यकर्ताओं को बिठाकर उनके दिमाग की अच्छी कसरत करवा के उनसे संदर्भ ढूंढ़ने को कहते। इधर संदर्भों की तलाश होती, उधर इतनी चर्चा के बाद प्रातः उनकी लेखनी चल पड़ती। आश्चर्य यह होता था कि इन लेखों में बहुधा वही नाम, संदर्भ हुआ करते थे जो परिजन, शोधकार्य में सहयोगी उस समय पढ़ रहे या नोट्स ले रहे होते थे। संभवतः यह भी योग की एक सिद्धि है, जिसमें व्यक्ति विचारों को समष्टिगत प्रवाह बनाकर पढ़ लेता है व उसे युग प्रवाह का अंग बना देता है। ऐसा कई बार देखने में आया कि किसी नये विषय पर किसी कार्यकर्ता ने पुस्तक पढ़ी तो अगले दिन पूज्य गुरुदेव का लेख उसी विषय पर नकल हेतु पहुँच गया।
चिन्तन को बदल लेता है तो नारी पर अनावश्यक दबाव, शोषण स्वतः ही बन्द हो जाता है। सुखी गृहस्थ कैसे बना जाय, इसके लिए भी उनने दाम्पत्य जीवन की पवित्रता पर जोर दिया।
चिन्तन का नवनीत भावुक जनमानस के समक्ष रखा। उन दिनों रहस्य विद्या का जाल पूरे भारत व विश्व मानस पर छाया था। उसका रहस्योद्घाटन कर उनने सारे भ्रम जंजालों का नीर क्षीर विवेक से अलग अलग कर दिया।
चिन्तन का अब भी लाभ उठा सकें।
चिन्तन को भली-भाँति झकझोरा। यह क्रम नवम्बर 1975 से 1979 तक निर्बाध गति से चलता रहा, फिर शक्तिपीठों के निर्माण की घोषणा कर गुरुदेव ने क्षेत्रीय कार्यक्रमों को नई दिशा प्रदान की। देवकन्याओं के प्रशिक्षण के साथ त्रैमासिक महिला शिक्षण शांतिकुंज में सतत् चलता रहा व उसका परिवर्धित स्वरूप अब युगशिल्पी शिक्षण के रूप में चलता है जिसमें स्वावलम्बन, संगीत, कर्मकाण्ड एवं संभाषण कला का बहुमुखी शिक्षण दिया जाता है।
चिन्तन और कर्तव्यों को नियोजित रखते थे। इस देवोपम रीति नीति को अपनाकर वे आत्मिक विभूतियों से और भौतिक समृद्धि से भरे पूरे बन सके, साथ ही अपना तथा समस्त संसार का भला कर सके। यही है हमारी साँस्कृतिक पुण्य परम्परा पूर्वजों की विरासत और गौरव गरिमा की आधार शिला, जिसके माध्यम से हमें पूरे भावावेश और प्रचण्ड पुरुषार्थ के साथ अपनी नवोदित सत्ता की प्राण प्रतिष्ठा करनी है।
चिन्तन, एकाकी चलते हुए भी कभी भयभीत न हो प्रकृति से अपना साहचर्य जोड़ते रहना, यही सब शिक्षण शब्दों के माध्यम से इस खूबी से इस मनीषी ने गूँथा है कि बार-बार कलम को चूमने का मन करता है।
चिन्तन प्रक्रिया को नूतन प्राण मिले।
चिन्तन तपस्वी, मनस्वी ऋषि प्रवर के मन को सदैव मथता रहा कि समाज में जो सत्प्रवृत्तियाँ फैलानी हैं, दुष्प्रवृत्तियों के बाहुल्य से मोर्चा लेना है, उसके लिए जिस स्तर के व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ेगी उन्हें उन्हें उपयुक्त वातावरण में श्रेष्ठ स्तर का शिक्षण भी देना पड़ेगा। उनकी सुसंस्कारिता तभी अंकुरित, पल्लवित होगी जब उन्हें उर्वर भूमि में सभी अनुकूल परिस्थितियाँ मिलें।