अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-July
उपासना तक ही सीमित नहीं रखती प्रत्युत उसे प्राणिमात्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों का उचित रीति से पालन करना भी सिखाती है। अपनी व्यक्तिगत सामर्थ्यों को विकसित करने की शिक्षा देती है। (1)उपासना (1)आत्मशोधन और (3)परमार्थ इन तीन श्रेणियों में विभक्त होकर जो ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हैं ब्रह्म-विद्या उनके जीवन को भव्य बना देती है। उन्हें स्वर्ग और मुक्ति का उत्तराधिकार प्रदान करती है।
उपासना को इतना परिपक्व एवं प्रखर बनाने में अपना ध्यान केन्द्रित करना है, जिससे वे स्वयं एक अनुकरणीय उदाहरण बनकर दूसरों को साधना मार्ग पर आकर्षित एवं प्रोत्साहित कर सकें। साधारण कठिनाइयों को हल करने में हम अब तक सामने आये। व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ सहयोग करते रहे हैं, आगे थोड़े लोगों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे ताकि वे स्थायी रूप से अपनी समस्याओं का समाधान करके इस स्थिति में पहुँच सकें कि दूसरों की समस्याऐं हल करने में उसी प्रकार सहयोग दे सकने की क्षमता प्राप्त कर लें, जैसी कि अब तक हमारी गतिविधि रही है। अपना काम समाप्त करते हुए आखिर कुछ लोग तो पीछे छोड़ने ही हैं जो इस महान परम्परा को आगे भी गर्व और गौरव के साथ जारी रख सकें। इनका निर्माण अब भी न किया गया तो आखिर फिर वह समय आवेगा भी कब?
उपासना के महान लाभ प्राप्त कर सकें किन्तु कर्म के क्षेत्र में सबको एक स्थान पर बाँध दिया है। इस जगत में मनुष्य से लेकर छोटे से छोटे कीटाणु तक जितने भी प्राणी हैं उन सबसे हमारा सम्बन्ध है, उन सबका हमारे ऊपर ऋण है। उन सबके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग से ही हमारा कल्याण हो रहा है अतः उनके प्रति भी हमारा कुछ न कुछ कर्त्तव्य है। हम उन्हें भले ही न पहचान सकें पर परमात्मा तो सर्वज्ञ है वह तो यह सब कुछ देख ही रहा है। फिर यदि हम कोई ऐसा कार्य करेंगे जिससे दूसरों को नुकसान होता हो तो वह चाहे जैसा कर्म होगा परमात्मा हमारे ऊपर अप्रसन्न हो जायगा।
उपासना अथवा तपश्चर्या में भी नहीं प्राप्त हुआ। यह यथार्थ तथा व्यक्तिगत अनुभव कोई भी बड़ा-छोटा व्यक्ति स्वयं ही करके निर्णय कर सकता है कि परोपकार तथा सेवा सत्कार्य सद्य फल-दाता होते हैं। तब ऐसे सद्य-फल-दाता सेवा तप को छोड़कर मनः-मार्गीय उस तपश्चर्या में समय क्यों दिया जाये, जिसका कि प्रतिफल निश्चित नहीं होता।
उपासना में लग जाय तो उन्हें अपने ऊपर परमात्मा की कृपा समझनी चाहिये पर साथ ही अपने दुर्गुणों और दुष्प्रवृत्तियों के निवारण के लिये भी प्रयत्नशील होना आवश्यक है। अपने आस-पास सभी प्रकार का ऐसा वातावरण रखना चाहिये जिसमें गुणों को विकसित करने वाली सब चीजें हों। इसमें यदि किसी प्रकार की साँसारिक हानि होती हो तो उसे भी ईश्वर का आदेश मानकर पूरा करना चाहिये। सद्गुणों के विकास में किया हुआ कोई भी त्याग कभी भी व्यर्थ नहीं जाता।
उपासना का प्रभाव मनुष्य के जीवन निर्माण में किस प्रकार होता है इसको समझने के लिये आत्मा के स्वरूप और उसका परमात्मा के साथ क्या सम्बन्ध है यह जानना बहुत जरूरी है। जब मनुष्य अपने आप को शरीर तथा इन्द्रियों से पृथक देखता है और आत्मिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयत्न करता है तो उसकी बुद्धि में एक नये ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है। वह समझता है कि यह इन्द्रियाँ, यह शरीर आत्मोत्थान के महत्वपूर्ण साधन मात्र हैं अतः इनका सदुपयोग भी करना चाहिये। पर इनके विषयों में आसक्त न होना चाहिये। इस प्रकार धारणा जब तक पक नहीं जाती तब तक मनुष्य को विचार-विभ्रम होता रहता है, पर जैसे ही इस प्रकार की निश्चयात्मक बुद्धि बनी कि यह शरीर तो कोई नष्ट हो जाने वाली वस्तु है वहीं मृत्यु का भय छूट जाता है।
उपासना करने वाले अक्सर चाहते रहते हैं। पूजा-कक्ष और ज्ञान-मंदिर दोनों का समन्वय एक दूसरे के पूरक ही सिद्ध होंगे।
उपासना को मनुष्य जीवन का अत्यन्त आवश्यक अंग बनाया है और प्रकारान्तर से उसकी अनेक सिद्धियों, सामर्थ्यों का वर्णन भी किया है। अनेक तरह के साधन और विधानों को भी इसी दृष्टि से निकाला गया है कि हर स्थिति हर अवस्था तथा देश, काल और परिस्थितियों में भी लोग ईश्वर-उपासना के महान लाभ प्राप्त कर सकें किन्तु कर्म के क्षेत्र में सबको एक स्थान पर बाँध दिया है। इस जगत में मनुष्य से लेकर छोटे से छोटे कीटाणु तक जितने भी प्राणी हैं उन सबसे हमारा सम्बन्ध है, उन सबका हमारे ऊपर ऋण है। उन सबके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग से ही हमारा कल्याण हो रहा है अतः उनके प्रति भी हमारा कुछ न कुछ कर्त्तव्य है। हम उन्हें भले ही न पहचान सकें पर परमात्मा तो सर्वज्ञ है वह तो यह सब कुछ देख ही रहा है।
उपासना का भी क्या महत्व रहेगा जो ईश्वर को प्रसन्न करने के लिये की जाती है।
उपासना है। एक उपासक तो केवल एक ईश्वर की कल्पना करके उसकी पूजा किया करता है, उसे प्रसन्न करने का प्रयत्न किया करता है, किन्तु एक नम्र एवं शिष्ट व्यक्ति न जाने कितने मनुष्यों की आत्मा प्रसन्न किया करता है जो कि ईश्वर का ही अंश होती है। उपासक एक देव की पूजा करता है और शिष्ट व्यक्ति अपने शालीन व्यवहार से सार्वजनिक विराट भगवान की पूजा किया करता है शिष्ट व्यवहार को केवल व्यवहार नहीं पूजा के भाव से ही देखना चाहिये।
उपासना (1)आत्मशोधन और (3)परमार्थ इन तीन श्रेणियों में विभक्त होकर जो ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हैं ब्रह्म-विद्या उनके जीवन को भव्य बना देती है। उन्हें स्वर्ग और मुक्ति का उत्तराधिकार प्रदान करती है।
उपासना आदि आवश्यक हैं किन्तु जहाँ भक्ति हो वहाँ श्रद्धा, प्रेम, विश्वास, दया, करुणा, उदारता, त्याग, सहयोग, सहानुभूति, क्षमा आदि दैवी गुण भी अवश्य होने चाहिये। कर्म चाहे जैसे करो, ईश्वर सब क्षमा करेगा—इस मान्यता ने व्यक्ति और समाज दोनों का बड़ा अहित किया है। ईश्वर को मानने का दावा करने वाले लोग दैवी गुणों की परवाह न करके इस भ्रम में पड़ गये हैं कि गुणों का विकास चाहे हो या न हो ईश्वर भक्ति से हमारा सब कुछ ठीक हो जायगा। इस संकीर्ण दृष्टिकोण ने ब्रह्म-विद्या के सच्चे स्वरूप की आस्थाओं को भी नष्ट कर दिया है और बुद्धि प्रधान लोग उसे संदेह की दृष्टि से देखने लगे हैं।
उपासना चरित्र निर्माण का अत्यन्त आवश्यक अंग है, यह बात यह सब स्वीकार करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-September
उपासना में उसे किसी न किसी रूप में प्रकट होना आवश्यक है। इसके बिना उपासना अधूरी है, सच्ची भक्ति तो प्रेम ही है, प्रेम ही परमात्मा का प्रकट स्वरूप है।
उपासना करने, उन्हें पढ़ने से सहजरूप में ही प्राप्त हो सकता है।
उपासना के लिये उसे साकार रूप में ही प्रतिष्ठापित करना पड़ता है। यदि ऐसा न किया जाय तो ध्यान जैसी उपासना की प्रमुख प्रक्रिया का द्वार ही बन्द हो जायगा। इसलिये गायत्री माता के साकार स्वरूप की उपयोगिता आवश्यकता मानते हुये भी हमें यह जानना होगा कि ब्राह्मी महाशक्ति वस्तुतः एक विश्वव्यापी चेतन तत्व है जो प्राणियों के प्राण के रूप में देखा जा सकता है। गायत्री उपासना द्वारा हम अपने सामान्य प्राण को महाप्राण में परिणित-विकसित करते हैं।
उपासनात्मक कर्मकाँड उन्हें जीवन-लक्ष्य प्रदान कर सकता है तो जीवन-निर्माण के लिये कष्ट-साध्य एवं त्याग-बलिदान भरी प्रक्रियाएं अपनाने की क्या आवश्यकता?” ऐसे लोगों को हम कृषक, श्रमिक, विद्वान्, धनी एवं अन्य सफल मनोरथ व्यक्तियों के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए इतना ही कह सकते हैं कि वे उनके दैनिक-जीवन की कठिन श्रम-व्यवस्था को ध्यानपूर्वक देखें और समझें कि इस संसार में हर चीज का उचित मूल्य चुकाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग है ही नहीं । ईश्वर-भक्त, धर्मनिष्ठ एवं श्रेय-साधक बनने के लिए व्यावहारिक जीवन में तनिक भी कष्टसाध्य हेर-फेर न करना पड़े, थोड़ी सी पूजा-पत्री उस प्रयोजन में सिद्ध कर दे, ऐसा कभी भी.... कभी भी.... कभी भी.... नहीं हो सकता। ईश्वर की विधि-व्यवस्था में हर कार्य वैज्ञानिक नियमों के आधार पर चल रहा है। आत्म-कल्याण के पथ का पथिक तृष्णा और वासना के कीचड़ में ही फँसता रहे, जीवन-शोध और परमार्थ की कष्टसाध्य प्रक्रिया से अछूता बना रहे, यह न तो भूतकाल में कभी हुआ है, न आगे हो सकता है।
उपासना द्वारा हम अपने सामान्य प्राण को महाप्राण में परिणित-विकसित करते हैं।
उपासना की शास्त्रोक पद्धति एक ऐसी ही वैज्ञानिक प्रणाली है जो जीव को ब्राह्मी सत्ता के साथ जोड़कर वैसा ही लाभ उठाने का अवसर प्रस्तुत करती है जैसा कि खाली तालाब भरे तालाब के साथ नाली द्वारा जोड़ दिया जाय तो कुछ ही देर में जल से भर जाने का लाभ ले लेता है।
उपासना का विधान प्रस्तुत करता है। विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक आविष्कार एवं उपकरण सावित्री शक्ति की अनुकम्पा के ही प्रतीक हैं। गायत्री वह शक्ति है जो प्राणियों के भीतर विभिन्न प्रकार की प्रतिभाओं, विशेषताओं और महत्ताओं के रूप में परिलक्षित होती है। जो इस शक्ति के उपयोग का विधान—विज्ञान ठीक तरह जानता है वह उससे वैसा ही लाभ भी उठाता है जैसा कि भौतिक जगत के वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं, मशीनों तथा कारखानों के माध्यम से उपार्जित करते हैं।
उपासना हमने की है पर उसमें भी अधिक कष्ट-साध्य आत्मशोधन और त्याग-बलिदान के लिये अपने को जीवन के हर कदम पर प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि कुछ कहने लायक उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने का अवसर आया। अगले पंच वर्ष जिन, साधारण लोगों को सुनने मात्र से विचलित करने वाली कष्टसाध्य तपश्चर्या का क्रम निर्धारित है, उसके पीछे भी स्वर्ग, मुक्ति का वैयक्तिक स्वार्थ नहीं वरन् विशुद्ध लोक-हित कर्म ही लक्ष्य है। यह एक प्रकट रहस्य है कि अरविन्द, रमण जैसे तपस्वियों ने भारत के राजनैतिक क्षेत्रों में जो चेतना उत्पन्न की थी उसमें गान्धी, नेहरू, पटेल, सुभाष, मालवीय आदि को शक्ति एवं सफलता मिली । आज वह बिजलीघर ठंडे हो गये तो एक-से -एक अधिक योग्यता वाले नेताओं के रहते हुए भी हमारे राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक आर्थिक, वैज्ञानिक क्षेत्रों में सन्नाटा पड़ा हुआ है।
उपासना बन पड़ती है। आत्मा के उत्थान की यह प्रारम्भिक अवस्था है। अन्त में जीव और ब्रह्म का प्रणय-संस्कार होता है तो दोनों एक दूसरे में आत्मसात् हो जाते हैं। न जीव रहता है और न परमात्मा, केवल प्रेम ही शेष रह जाता है, जो ब्रह्म के समान सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान दिखाई देता है।”
उपासना-पद्धतियों में सर्वोत्तम गायत्री ही है। उसे अनादि माना गया है। देवता, ऋषि, मनीषी उसका अवलम्बन लेकर आत्मिक प्रगति के पथ पर आगे बढ़े हैं और इसी आधार पर उन्होंने समृद्धियाँ, सिद्धियाँ एवं विभूतियाँ उपलब्ध की हैं। हमारा प्राचीन इतिहास बड़ा गौरवपूर्ण है। इस गौरव-गरिमा का श्रेय हमारे पूर्व पुरुषों द्वारा उपार्जित आत्म-शक्ति को ही है।
उपासना क्रम में गायत्री को एक देवी के रूप में चित्रित, अंकित किया गया है। त्रिकाल संध्या में ब्राह्मी, वैष्णवी, शाँभावी आकार-प्रकार में उसका ध्यान भजन किया जाता है। माता के रूप में उसकी भावना करते हैं और नारी आकृति की प्रतिमा में उसका पूजन, वन्दन सम्पन्न करते हैं। पर यह तो ध्यान की एकाग्रता और भक्ति भावना के जागरण का एक तरीका मात्र है। उपासना के लिये मानवीय मनोभूमि की रचना के अनुरूप शब्द रूप एवं भावों का निर्धारण करना पड़ता है।
उपासना प्राणशक्ति के क्षरण को रोकती है उसकी रक्षा करती है और इस संरक्षण से लाभान्वित उपासक दिन-दिन प्रगति पथ पर अग्रसर होता है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए उस महती शक्ति का नाम—गुण के अनुरूप —तत्वदर्शी मनीषियों ने ‘गायत्री’ रखा। शास्त्रों में ऐसा ही उल्लेख मिलता है—
उपासना अधूरी है, सच्ची भक्ति तो प्रेम ही है, प्रेम ही परमात्मा का प्रकट स्वरूप है।
उपासना और पुस्तकालयों की स्थापना आज के युग में दो बड़े पुण्य-कार्य हैं। परमार्थ द्वारा आत्म-कल्याण की कामना रखने वाले लोगों को इन दोनों कार्यों को अपने जीवन-क्रम का एक भाग बना लेना चाहिये। घरों में व्यक्तिगत रूप से छोटे-छोटे पुस्तकालय ज्ञानमन्दिर के नाम से स्थापित किये जा सकते हैं। ग्राम-क्षेत्र अथवा नगर के अनेक लोग पारस्परिक सहयोग-सहायता एवं अनुदान देकर सामूहिक रूप से सार्वजनिक ज्ञान-मन्दिर की स्थापना करके पुण्य-लाभ के भागी बन सकते हैं। धन, भूमि, उपकरण, सुविधाएँ, सामग्री तथा पुस्तकें देने के साथ-साथ लोग अपनी स्थिति के अनुसार श्रम एवं समय-दान देकर भी पुण्य के भागी बन सकते हैं।
उपासना की और उसी के फलस्वरूप वे वेद-ज्ञान निष्णान्त बने। वेद की रचना का मूल आधार गायत्री है और वही विधाता की कृतियों का उद्गम प्रेरक भी है। गायत्री से बढ़कर इस संसार में और कुछ है भी तो नहीं।
उपासना की प्रमुख प्रक्रिया का द्वार ही बन्द हो जायगा। इसलिये गायत्री माता के साकार स्वरूप की उपयोगिता आवश्यकता मानते हुये भी हमें यह जानना होगा कि ब्राह्मी महाशक्ति वस्तुतः एक विश्वव्यापी चेतन तत्व है जो प्राणियों के प्राण के रूप में देखा जा सकता है। गायत्री उपासना द्वारा हम अपने सामान्य प्राण को महाप्राण में परिणित-विकसित करते हैं।
उपासना के लिये मानवीय मनोभूमि की रचना के अनुरूप शब्द रूप एवं भावों का निर्धारण करना पड़ता है। विद्युत महाशक्ति के विश्वव्यापी सूक्ष्म रूप को वैज्ञानिक जानते हैं। साधारण लोग उसे बत्ती—पंखा, आदि के रूप में कार्य करते हुए ही देखते हैं। उनकी दृष्टि में ये उपकरण ही विद्युत महाशक्ति के प्रत्यक्ष रूप हैं। ठीक इसी प्रकार उपासना प्रकरण में गायत्री की माता के रूप में पूजा अर्चा की जाती है और उसके साथ वैसा ही सम्बन्ध जोड़ा जाता है जैसा कि साँसारिक माँ-बेटे का होता है।
उपासना करने से लाभ होता है और मनुष्य उन जैसे आदर्शों का अनुयायी बन जाता है।
उपासना जैसी आस्तिकता की प्रथम शर्त को पूरी करना। प्रसन्नता की बात है कि पाठक इन प्राथमिक कक्षा के दो पाठों को ठीक तरह पढ़ते चले आ रहे हैं।
उपासना में ऐसा प्रेम जागृत करने के लिए इष्टदेव से मिलने के लिये तीव्र और अदम्य इच्छा जागृत करनी चाहिये। साधारण मनुष्य के प्रेम में जब लोग इतने विभोर हो जाते हैं तो ईश्वर के प्रेम में ऐसा क्यों न होना चाहिये। पर इसके लिये भी हमें त्याग और बलिदान के लिये उसी भावना से तैयार रहना चाहिये जिस प्रकार अपने प्रेमास्पद का सुख देखने को तरसते हैं और उसके सामने अपनी विद्या-बुद्धि, धन-सम्पति, पद-यश सबको तुच्छ मान लेते हैं।
उपासना में इस उद्दात्त भावना का दर्शन संसार के सभी धर्मों में पाया जाता है। भगवान को प्रेममय समझकर प्रेम मार्ग द्वारा उसकी साधना सभी देशों के भक्तों एवं साधकों में देखी जाती है। उपनिषद् में भगवान को “मधु ब्रह्म” कहा है यह उसका विशुद्ध प्रेममय स्वरूप ही है। परमात्मा प्रेम द्वारा ही मधुर होता है—’मधुक्षरन्तितद्ब्रह्म’ जिससे मधु अर्थात् प्रेम प्रकीर्ण होता है वही ब्रह्म है। अपने इसी रूप में वे भक्त के लिये, आराधक के लिये पुत्र, धन आत्मीय स्वजन—इन सबसे बढ़कर प्रियतम हो जाते हैं।
उपासना है। इस पुण्य प्रक्रिया द्वारा पुरुषार्थी साधक अपनी आन्तरिक स्थिति इतनी विकसित कर लेते हैं कि इस निखिल महदाकाश में संव्याप्त उस ब्राह्मी-महाशक्ति—गायत्री—से अपना संबन्ध स्थापित कर सकें। यह सम्बन्ध जितना स्पष्ट और जितना प्रौढ़ होता है, उतनी ही उच्चस्तरीय विभूतियाँ मनन-क्षेत्र में अवतरित होती है। यह अवतरण ही मनुष्य को महापुरुष, सिद्ध-पुरुष एवं अतिमानव के रूप में विकसित करता है।
उपासना करने वाले के प्राण को निर्मल एवं समर्थ बनाती है, इसलिये गायत्री कहते हैं।”
उपासना की जाती है महाशक्ति ने अपनी जिन विभूतियों का वर्णन उपरोक्त श्लोकों में आत्म-परिचय देते हुए किया है, वे सभी उसमें प्रचुर परिमाण में विद्यमान हैं। आवश्यकता केवल उतनी भर रह जाती है कि व्यक्ति अपने में पात्रता उत्पन्न करे और उन लाभों से लाभान्वित हो, उन विभूतियों को धारण करके दैवी-जीवन जी सकने की स्थिति तक पहुँचे।
उपासना का प्रथम सोपान यही है कि साधक के साहस और धैर्य की परीक्षा कर ली जाय। डरपोक प्रकृति के व्यक्ति तन्त्र-शक्ति को धारण नहीं कर सकते। इसलिए उस साधना-क्रम में प्रवेश करने वाले को आरम्भ में ही भय और प्रलोभन-भरी कितनी ही विभीषिकाओं का सामना करना पड़ता है। जो उनमें असफल हुआ उसे तन्त्र-शक्ति के अवतरण से वंचित रहना पड़ा।
उपासना ही है, जिसका पुण्य मनुष्य को आध्यात्मिक भावों से ओत−प्रोत कर दिया करता है।
उपासना से जीवन प्राणवान बनता है। जो उपासक का परित्राण करती है, त्रिविधि तापों से बचाती है, वह गायत्री है।”
उपासना प्रकरण में गायत्री की माता के रूप में पूजा अर्चा की जाती है और उसके साथ वैसा ही सम्बन्ध जोड़ा जाता है जैसा कि साँसारिक माँ-बेटे का होता है। यह प्रक्रिया आवश्यक है। क्योंकि निराकार तत्व के साथ पंचभौतिक मन अपना सम्बन्ध जोड़ ही नहीं सकता। निराकार का ध्यान सम्भव नहीं, और न उसके साथ किसी प्रकार आत्मीयता की भावना उठ सकती है। इसलिये ब्राह्मी शक्ति के निराकार होते हुए भी उपासना के लिये उसे साकार रूप में ही प्रतिष्ठापित करना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-April
उपासना में निष्ठा प्रदर्शित की है जो फिर दो कदम और भी आगे बढ़ाने चाहियें। जीवन-शोधन और परमार्थ के लिये भी उसे उतना ही मन, उतना ही अपना ध्यान, समय और श्रम संलग्न करना चाहिये। जहाँ वह त्रिविध समन्वय हुआ कि अध्यात्म का आशाजनक, आश्चर्यमय एवं उत्साहवर्धक परिणाम सामने आना आरम्भ हो जायगा।
उपासना यदि वह भावपूर्वक की गई है तो आत्मा में पर्याप्त बल एवं प्रकाश उत्पन्न कर सकती है।
उपासना का प्राण भाग, हृदय संस्थान यह जीवन साधना ही है। इसमें जिसकी जितनी निष्ठा एवं तत्परता होगी, उसे उतने ही बड़े स्तर का अध्यात्म लाभ होगा, और इस लाभ से वह उतना आनन्द प्राप्त कर रहा होगा।
उपासना के अविच्छिन्न अंग हैं। इन अंगों को हटा दिया जाय और चौबीस घण्टे केवल भजन करते रहा जाय तो वह भजन ऐसा ही अपूर्ण होगा जैसा सिर और पैर काट देने के उपरान्त पड़ा हुआ बीच वाला धड़। उस धड़ से वह आशा नहीं की जा सकती जो सर्वांगपूर्ण शरीर से। सर्वांगपूर्ण साधना के तीनों ही अंग समान रूप से उपयोगी हैं। इन तीनों का सम्मिश्रित स्वरूप ही समाज साधना कहलाता है और उसी से सर्वांगपूर्ण आध्यात्मिक प्रगति होती है।
उपासना का महत्व देखा, समझा और अनुभव किया है। इसलिए उसकी विवेचना के साथ साथ प्रेरणा करते रहते हैं। पर साथ ही यह भी कहते हैं कि जितना ध्यान उपासना में दिया जाय, जितना माहात्म्य उपासना का समझा जाय उससे कहीं अधिक ध्यान जीवन-साधना पर दिया जाय और कहीं अधिक माहात्म्य उस आत्म-निर्माण के प्रयास का समझा जाय। अखण्ड-ज्योति इसी दिशा में अपने परिवार का पथ-प्रदर्शन करती है। हम पत्रिका एवं पुस्तकों से विचार-क्षेत्र को परिष्कृत करने का प्रयत्न करते हैं।
उपासना की विधियाँ अन्य अनेक लोग भी अपने-अपने ढंग से बताते हैं। हमने गायत्री उपासना का महत्व देखा, समझा और अनुभव किया है। इसलिए उसकी विवेचना के साथ साथ प्रेरणा करते रहते हैं। पर साथ ही यह भी कहते हैं कि जितना ध्यान उपासना में दिया जाय, जितना माहात्म्य उपासना का समझा जाय उससे कहीं अधिक ध्यान जीवन-साधना पर दिया जाय और कहीं अधिक माहात्म्य उस आत्म-निर्माण के प्रयास का समझा जाय। अखण्ड-ज्योति इसी दिशा में अपने परिवार का पथ-प्रदर्शन करती है।
उपासना की टंट-घंट करके आत्म-कल्याण की आशा लगाये रहते हैं, फलतः उन्हें सर्वथा निराश एवं असफल ही रहना पड़ता है। हमें जानना चाहिए कि अध्यात्म-लाभ बड़ा लाभ है, अतएव उसकी कीमत भी बड़ी है। आत्म-शोधन, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के लिए प्रयत्न करने से कम मूल्य पर उस लाभ को प्राप्त नहीं किया जा सकता। सोना सस्ता नहीं बिकता और न हीरा कम दाम में खरीदा जाता है। अध्यात्म भी सोना और हीरा है, जो जीवन निर्माण के मूल्य पर ही किसी को उपलब्ध हो सकता है।
उपासना में दिया जाय, जितना माहात्म्य उपासना का समझा जाय उससे कहीं अधिक ध्यान जीवन-साधना पर दिया जाय और कहीं अधिक माहात्म्य उस आत्म-निर्माण के प्रयास का समझा जाय। अखण्ड-ज्योति इसी दिशा में अपने परिवार का पथ-प्रदर्शन करती है। हम पत्रिका एवं पुस्तकों से विचार-क्षेत्र को परिष्कृत करने का प्रयत्न करते हैं। पर साथ ही यह भी सुझाया जा रहा है कि आत्म-निर्माण का अभ्यास तत्परतापूर्वक जारी रखें। इसे न तो गौण समझें और न महत्वहीन वरन् सच तो यह है कि उपासना का प्राण भाग, हृदय संस्थान यह जीवन साधना ही है।
उपासना का अविच्छिन्न अंग मानना चाहिये और यह विश्वास रखना चाहिये कि भजन से ईश्वर जितना प्रसन्न होता है, भजन से जितना आत्म-बल बढ़ता है—ठीक उतना ही इस लोक मंगल में भावनापूर्वक संलग्न रहने से भी होता है। अतएव यह उपेक्षणीय नहीं, वरन् साधना की अविच्छिन्न शर्त के रूप में अनिवार्य रूप से आवश्यक है।
उपासना (2) जीवन-साधना (3) परमार्थ-तीनों ही साधना क्रमों को अपनाया है और उस समग्र साधना का वैसा ही लाभ देखा है, जैसा कि प्राचीनकाल के साधकों को मिलता था, अथवा शास्त्रों में जैसा लिखा है। हमने केवल भजन ही नहीं किया है, वरन् अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करने में कम श्रम नहीं किया है। इसके लिये लोक-मंगल के लिये सेवा संलग्न रहने की प्रवृत्तियों में तनिक भी कमी नहीं आने दी है। जीवनोत्कर्ष की प्रेरणा भर देने वाले साहित्य का सृजन, संगठन, प्रशिक्षण एवं व्यक्तिगत रूप से भी जो जिसकी जितनी सेवा सहायता बन पड़े उसके लिए अपना तप पूँजी का अनुदान, यह प्रक्रिया सदा से ही हमने चलाई है और यह माना है कि जीवन-शोधन एवं लोक सेवा के यह दोनों कार्य भी उपासना के अविच्छिन्न अंग हैं। इन अंगों को हटा दिया जाय और चौबीस घण्टे केवल भजन करते रहा जाय तो वह भजन ऐसा ही अपूर्ण होगा जैसा सिर और पैर काट देने के उपरान्त पड़ा हुआ बीच वाला धड़।
उपासना, आत्म-कल्याण में तभी सहायक हो सकती है, जब उसके साथ-साथ जीवन को उत्कृष्ट बनाने का साधना-क्रम भी जुड़ा हुआ हो। जीवन-साधना के बिना उपासना अधूरी है। आज लाखों धर्म-जीवी केवल कुछ थोड़ा-सी उपासना की टंट-घंट करके आत्म-कल्याण की आशा लगाये रहते हैं, फलतः उन्हें सर्वथा निराश एवं असफल ही रहना पड़ता है। हमें जानना चाहिए कि अध्यात्म-लाभ बड़ा लाभ है, अतएव उसकी कीमत भी बड़ी है। आत्म-शोधन, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के लिए प्रयत्न करने से कम मूल्य पर उस लाभ को प्राप्त नहीं किया जा सकता।
उपासना आवश्यक है। एक घण्टा भी यदि वह ठीक तरह हो सके तो पर्याप्त है। एक घण्टे का व्यायाम किसी भी शरीर को परिपुष्ट रख सकता है। एक घंटे की उपासना यदि वह भावपूर्वक की गई है तो आत्मा में पर्याप्त बल एवं प्रकाश उत्पन्न कर सकती है।
उपासना अधूरी है। आज लाखों धर्म-जीवी केवल कुछ थोड़ा-सी उपासना की टंट-घंट करके आत्म-कल्याण की आशा लगाये रहते हैं, फलतः उन्हें सर्वथा निराश एवं असफल ही रहना पड़ता है। हमें जानना चाहिए कि अध्यात्म-लाभ बड़ा लाभ है, अतएव उसकी कीमत भी बड़ी है। आत्म-शोधन, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के लिए प्रयत्न करने से कम मूल्य पर उस लाभ को प्राप्त नहीं किया जा सकता। सोना सस्ता नहीं बिकता और न हीरा कम दाम में खरीदा जाता है।
उपासना का समझा जाय उससे कहीं अधिक ध्यान जीवन-साधना पर दिया जाय और कहीं अधिक माहात्म्य उस आत्म-निर्माण के प्रयास का समझा जाय। अखण्ड-ज्योति इसी दिशा में अपने परिवार का पथ-प्रदर्शन करती है। हम पत्रिका एवं पुस्तकों से विचार-क्षेत्र को परिष्कृत करने का प्रयत्न करते हैं। पर साथ ही यह भी सुझाया जा रहा है कि आत्म-निर्माण का अभ्यास तत्परतापूर्वक जारी रखें। इसे न तो गौण समझें और न महत्वहीन वरन् सच तो यह है कि उपासना का प्राण भाग, हृदय संस्थान यह जीवन साधना ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-November
उपासना क्षेत्र में भी ऐसा ही विधान है। उपासक को पूजापाठ के नियम जानकर ही सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए वरन् उसके सिद्धान्त, आदर्श, तथ्य एवं स्वरूप को भी समझना चाहिए। जो आवश्यकता को अनुभव करते हैं और उसे पूरा करने में संलग्न रहते हैं उनकी साधना असंदिग्ध रूप से सफल होती है। किन्तु जो केवल कर्मकाँड सीखकर ही सन्तुष्ट हो बैठते हैं उनके हाथ यदि कुछ पड़े भी तो वह बहुत ही स्वल्प होता है।
उपासना से मानव के शरीर में सन्निहित अगणित संस्थानों में से कितने ही जागृत एवं प्रखर हो चलते हैं। इस जागृति का प्रभाव मनुष्य के व्यक्तित्व को समान रूप से विकसित होने में सहायक सिद्ध होता है।
उपासना में बरती गई तपश्चर्या से द्रवित होकर गायत्री माता ने अमुक सिद्धि या सफलता प्रदान की—यह भावुक भक्त का दृष्टिकोण है। इसी तथ्य का वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि कठोर नियम, प्रतिबन्धों का पालन करने में जो प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ी, उसने मनोबल का विकास किया। उसने अंतर्मन के प्रसुप्त शक्ति-केन्द्रों का चुम्बकत्व जगाया और उसी जागरण ने अभीष्ट सफलतायें खींचकर सामने ला खड़ी कर दीं। मनुष्य अपने आप में एक देवता है। उसके भीतर वे समस्त दैवी शक्तियाँ बीज रूप विद्यमान रहती हैं जो इस विश्व में अन्यत्र कहीं भी हो सकती हैं।
उपासना गौरक्षा के नियमित आरम्भ कर दें और उसके द्वारा होने वाले महान पुण्य एवं सत्परिणाम के भागी बनें। जो सज्जन इस पुरश्चरण में सम्मिलित हों वे इसकी सूचना युग-निर्माण योजना मथुरा के पते पर हमें देदें ताकि संख्या की सही गणना हो सके।
उपासना की पद्धति चलाई। जन मानस में अखण्ड आस्तिकता का प्रभाव बढ़ाने के लिए धर्म मार्ग की खोज की और उसका प्रचार किया। उपासना पद्धति से इसी धर्म मार्ग पर चल कर न जाने कितने जीव परम प्रभु को पाकर तद्रुप हो चुके हैं और आगे भी होते रहेंगे।
उपासनाओं में सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोपरि एकमात्र गायत्री महामन्त्र की उपासना ही है।
उपासना है। उसका प्रभाव और परिणाम असंदिग्ध एवं संतुलित है। अन्य उपासना-पद्धतियाँ अपने लक्ष्य को प्राप्त करा सकने में असमर्थ हो सकती हैं पर गायत्री-उपासना में ऐसी अड़चन नहीं आती।
उपासना-पद्धतियाँ अपने लक्ष्य को प्राप्त करा सकने में असमर्थ हो सकती हैं पर गायत्री-उपासना में ऐसी अड़चन नहीं आती।
उपासना में लगाया जाता तो अपेक्षाकृत असंख्य गुना लाभ उठाया जा सकता है।
उपासना करते हैं। यही चारों वेदों की माता है।
उपासना का लाभ अद्भुत, आश्चर्यजनक एवं अलौकिक कहे जाने जितना ही होता है।
उपासना ही सर्वोत्तम ठहरती है। सन्ध्या-वन्दन की कोई भी प्रणाली क्यों न हो, गायत्री-उपासना का उसमें अनिवार्य स्थान है। वेद भारतीय धर्म के मूल आधार हैं और उनका बीज मन्त्र एकमात्र गायत्री है। गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप चार वेद बने हैं। गुरुमन्त्र के रूप में प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी का एक ही अवलम्बन है— गायत्री मन्त्र।
उपासना का उसमें अनिवार्य स्थान है। वेद भारतीय धर्म के मूल आधार हैं और उनका बीज मन्त्र एकमात्र गायत्री है। गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप चार वेद बने हैं। गुरुमन्त्र के रूप में प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी का एक ही अवलम्बन है— गायत्री मन्त्र। इस सुनिश्चित तथ्य को ध्यान में रखते हुए कोई वेद-धर्म अनुयायी और कोई मार्ग अपना भी नहीं सकता।
उपासना न करे उससे बढ़कर पापी और कौन हो सकता है जबकि व्यस्त जीवन में से भी समय निकाल कर प्रभु की याद न करने वाले आत्मधारी तक आलोचना एवं निन्दा के पात्र बनते हैं।
उपासना की वैज्ञानिक प्रक्रिया अचूक साधना है और कहना न होगा कि उपासनाओं में सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोपरि एकमात्र गायत्री महामन्त्र की उपासना ही है।
उपासना से प्रभु प्राप्ति-
उपासना किया करता है। उसमें जो कुछ लगन, तीव्रता और तन्मयता होती है उसका हेतु कामनाओं की लिप्सा ही हुआ करती है, प्रभु-प्रेम नहीं! तब भला ऐसा वंचक उस परम विज्ञानमय प्रभू को किस प्रकार प्रसन्न कर सकता है?
उपासना की अनेक विधियाँ हैं किन्तु इन सबका मूल मन्तव्य एक ही है—वह है अपने जीवन की रीति नीति ऐसी बनाना है जो परमात्मा के अंश मनुष्य के अनुरूप हो! परमात्मा से स्वीकृत, मन, वचन, कर्म से जीवन पद्धति अपनाने वाला सहज ही परमात्मा का कृपापात्र बन जाता है और तब उस पर इस परमपिता की कृपा की अजस्र धारा अनेक उन्नतियों के रूप में बरसती रहती है। परमात्मा आनन्द रूप में अपने युक्त उपासक को अपना मंगलमय सान्निध्य का अनुग्रह करता है। परमात्मा के सच्चे भक्तों को संसार में किसी भी प्रकार की सुख शाँति की कमी नहीं रहती।
उपासना करनी होगी। मनुष्य का कल्याण इसी में है कि वह परमात्मा के कृपालु रूप के साथ उसके ‘रुद्र’ रूप को भी याद रक्खे, उससे डरे और सत्पथ पर शुद्ध एवं सात्विक भावना से चलकर उसे अप्रसन्न होने का अवसर न दे। हम सबको परमात्मा का प्रकोप नहीं उसकी प्रसन्नता पाने का ही प्रयत्न करना चाहिए। यही मनुष्यरूप परमात्मा के अंश हम सबके लिए योग्य एवं शोभनीय है। पुरस्कार एवं दण्ड का भागी बनना न तो मनुष्यता के अनुरूप है और न विवेकसंगत!
उपासना मानव जीवन का सर्वोत्कृष्ट व्यवसाय है। अन्य व्यवसायों में जितना मनोयोग, जितना श्रम, जितना समय और जितना साधन लगाया जाता है, उतना ही यदि उपासना में लगाया जाता तो अपेक्षाकृत असंख्य गुना लाभ उठाया जा सकता है।
उपासना, भजन-कीर्तन का नियमित आयोजन कहाँ निभा सकता है? दोपहर तक सोते रहने, दिन में खाकर पड़े रहने और कष्टपूर्वक कोई आवश्यक कार्य कर सकने वाला प्रमाद उन्मादी भगवत्-भक्ति करता अथवा कर सकता है, ऐसा सम्भव नहीं। नियमित रूप से, भक्ति-भावना से भरी उपासना न करना उस अनुग्राहक ईश्वर के प्रति कृतघ्नता है। कृतघ्नता का पाप जघन्यता की कोटि का पाप है जिसका सबसे पहले अपराधी आलसी ही होता है। जिसके पास समय ही समय रहता हो वह परमात्मा की उपासना न करे उससे बढ़कर पापी और कौन हो सकता है जबकि व्यस्त जीवन में से भी समय निकाल कर प्रभु की याद न करने वाले आत्मधारी तक आलोचना एवं निन्दा के पात्र बनते हैं।
उपासना-अन्वेषण की से देखा जाता है तो उसमें गायत्री-उपासना ही सर्वोत्तम ठहरती है। सन्ध्या-वन्दन की कोई भी प्रणाली क्यों न हो, गायत्री-उपासना का उसमें अनिवार्य स्थान है। वेद भारतीय धर्म के मूल आधार हैं और उनका बीज मन्त्र एकमात्र गायत्री है। गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप चार वेद बने हैं। गुरुमन्त्र के रूप में प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी का एक ही अवलम्बन है— गायत्री मन्त्र।
उपासना भी (1) सिद्धाँत और (2) व्यवहार इन दो भागों में विभक्त है । यह दोनों ही पहलू एक दूसरे से अन्योन्याश्रय सम्बद्ध हैं। एक के बिना दूसरा पहलू अधूरा है। डॉक्टर आपरेशन करने की कला सीखता है—फोड़ा कहाँ से, कैसे, किस औजार से, कितना चीरा जाना चाहिए और उसके बाद उस पर क्या लगाना चाहिए—यह समझता है। पर इतने मात्र से ही वह अपने व्यवसाय में कुशल नहीं हो जाता।
उपासना परमात्मा की प्रसन्नता प्राप्त करने का ही एक उपाय है। किन्तु यह उपाय केवल पूजा-पाठ, भजन, कीर्तन अथवा स्मरण जाप से ही सफल नहीं हो सकता!
उपासना करने वाले की भी गायत्री माता कामना पूर्ण करती है, फिर विधिवत साधना करने के सत्परिणामों का तो कहना ही क्या है।
उपासना सर्वश्रेष्ठ, सर्वोपरि और अनादि उपासना है। उसका प्रभाव और परिणाम असंदिग्ध एवं संतुलित है। अन्य उपासना-पद्धतियाँ अपने लक्ष्य को प्राप्त करा सकने में असमर्थ हो सकती हैं पर गायत्री-उपासना में ऐसी अड़चन नहीं आती।
उपासना में ऐसी अड़चन नहीं आती।
उपासना द्वारा अन्तरंग जीवन में प्रसुप्त पड़ी हुई अत्यन्त ही महत्वपूर्ण शक्तियाँ सजग हो उठती हैं और उस जागृति का प्रकाश मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक विशिष्टता का रूप धारण करके प्रकट करती हुआ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है। गायत्री-उपासक में तेजस्विता की अभिवृद्धि स्वाभाविक है। तेजस्वी एवं मनस्वी व्यक्ति स्वभावतः हर दिशा में सहज सफलता प्राप्त करता चलता है।
उपासना पद्धति से इसी धर्म मार्ग पर चल कर न जाने कितने जीव परम प्रभु को पाकर तद्रुप हो चुके हैं और आगे भी होते रहेंगे।
उपासना के द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को प्राप्त करने से चूकते हैं वे मन्दबुद्धि हैं। जो द्विज गायत्री मन्त्र के होते हुए भी अन्य मन्त्रों की साधना करते हैं वे ऐसे ही हतभागी हैं जैसे कि चिन्तामणि को फेंककर छोटे-छोटे चमकीले पत्थर ढूँढ़ते फिरने वाले।
उपासना के द्वारा उपासक में ऐसे ही मानसिक चुम्बक तत्व सक्रिय हो उठते हैं। मनोबल बढ़ने से ऐसी विद्युत धारा अंतर्मन के प्रसुप्त क्षेत्रों में गतिशील हो जाती है कि अब तक अपने प्रयोजन में आया हुआ मस्तिष्कीय चुम्बक सक्रिय हो उठता है और वे उपलब्धियाँ सामने लाकर खड़ी कर देता है जिन्हें आमतौर से सिद्धियाँ, विभूतियों का वरदान एवं दैवी सहायता कहा जा सके।
उपासना-संसार में यह सबसे अधिक लाभदायक प्रक्रिया है। साँसारिक सुख-सुविधाओं के उपार्जन की दृष्टि से स्वास्थ्य, शिक्षा, कुशलता, सम्पत्ति, मित्रता आदि की उपयोगितायें लोगों ने समझ ली हैं और उनके उपार्जन का प्रयत्न भी करते हैं, पर ऐसे कम ही लोग हैं जिन्होंने आत्मबल द्वारा प्राप्त हो सकने वाली विभूतियों का मूल्याँकन किया हो और उनको उपार्जन करने के लिए उपासना की पद्धति को व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध रूप से अपनाया हो।
उपासना की पद्धति को व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध रूप से अपनाया हो।
उपासना मनुष्य-जीवन को बहिरंग एवं अन्तरंग दोनों ही दृष्टियों में समृद्ध और समुन्नत बनाने का राजमार्ग है। बाह्य उपचार से बाह्य जीवन की प्रगति होती है, पर अन्तरंग विकास के बिना उसमें पूर्णता नहीं आ पाती। बाहरी जीवन की विशेषताएँ छोटा-सा शोक, सन्ताप, रोग, कष्ट, अवरोध एवं दुर्दिन सामने आते ही अस्त-व्यस्त हो जाती हैं, पर जिस व्यक्ति के पास आन्तरिक दृढ़ता, समृद्धि एवं क्षमता है वह बाहर के जीवन में बड़े से बड़ा अवरोध आने पर भी सुस्थिर बना रहता है और भयानक भँवरों को चीरता हुआ अपनी नाव पार ले जाता है। भौतिक समृद्धि और आत्मिक शाँति के लिए उपासना की वैज्ञानिक प्रक्रिया अचूक साधना है और कहना न होगा कि उपासनाओं में सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोपरि एकमात्र गायत्री महामन्त्र की उपासना ही है।
उपासना न करना उस अनुग्राहक ईश्वर के प्रति कृतघ्नता है। कृतघ्नता का पाप जघन्यता की कोटि का पाप है जिसका सबसे पहले अपराधी आलसी ही होता है। जिसके पास समय ही समय रहता हो वह परमात्मा की उपासना न करे उससे बढ़कर पापी और कौन हो सकता है जबकि व्यस्त जीवन में से भी समय निकाल कर प्रभु की याद न करने वाले आत्मधारी तक आलोचना एवं निन्दा के पात्र बनते हैं।
उपासना ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-October
उपासना पद्धति अपनाये रही कुछ पता नहीं चलता। बाल्मीकि तो सीधा राम नाम भी न ले सके उन्हें ‘मरा’ ‘मरा’ का उलटा नाम जप कर ही आगे बढ़ना पड़ा। ऐसे उदाहरण साधन इतिहास के पन्ने-पन्ने पर भरे पड़े हैं। और आज भी ऐसे अनेक साधक मिलते हैं जिनकी शिक्षा एवं साधना पद्धति उपहासास्पद है। फिर भी उनने काफी ऊँचाई तक आत्मिक प्रगति कर ली।
उपासना का लाभ तो अन्तरात्मा को अनन्त सामर्थ्य से भर देता और चन्दन वृक्ष की तरह स्वयं ही सुगन्धित होने के साथ-साथ समीपवर्त्ती झाड़-झंखाड़ों को भी अपने ही समान सुरभित कर देता है। ऐसा उच्चस्तरीय लाभ प्राप्त करने के लिए मनुष्य को ब्राह्मणत्व के अनुरूप गुण-कर्म, स्वभाव अपने में उत्पन्न करने पड़ते हैं। तभी वह खजाना मिलता है, जिसके लिए ब्रह्मविद्या ने ब्राह्मण का उद्बोधन करते हुए उसे उस महान भांडागार को हस्तगत कर लेने की प्रेरणा की है। गायत्री महामंत्र में जिन देवशक्तियों का समावेश है वे सत्पात्र पर ही अवतरित होती हैं। स्वर्ग से उतर कर गंगा पृथ्वी पर उतरने का वरदान तो दिया था पर साथ ही यह भी कह दिया था कि यदि मेरी धारा को संभालने वाली भूमिका न बनी तो धारा पृथ्वी में छेद करती हुई पाताल को चली जायगी, उसका लाभ भूलोक वासियों को न मिल सकेगा।
उपासना का लाभ उठा सकते हैं उसकी चर्चा शास्त्रों में जगह-जगह उपलब्ध होती है। यथा—
उपासना से ही प्राप्त कर लिया तथा दूसरी सृष्टि रच डालने की भी शक्ति प्राप्त की थी। भली प्रकार साधना की हुई गायत्री भला कौन सा ऐसा अभीष्ट लाभ है जिसे प्राप्त नहीं करा सकती?
उपासनाएं, बीज मन्त्रों का प्रभाव, अनुष्ठान एवं पुरश्चरणों की शृंखला अपने ढंग के लाभ प्रदान करती रहती है, उनके द्वारा साधक के छुट-पुट कष्ट दूर होने एवं अभीष्ट सफलताऐं प्राप्त होने का क्रम चलता रहता है। ऐसे लाभ और चमत्कार आये दिन देखने को मिलते रहते हैं, पर यह सब हैं छोटे स्तर की वस्तुऐं। अमुक कष्ट को दूर कर लेना या अमुक सफलता को प्राप्त कर लेना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। ऐसा लाभ तो भौतिक प्रयत्नों से भी प्राप्त किया जा सकता है। उपासना का लाभ तो अन्तरात्मा को अनन्त सामर्थ्य से भर देता और चन्दन वृक्ष की तरह स्वयं ही सुगन्धित होने के साथ-साथ समीपवर्त्ती झाड़-झंखाड़ों को भी अपने ही समान सुरभित कर देता है।
उपासना करने और उसके आधार पर परम सिद्धियाँ प्राप्त करने का वर्णन है। इससे स्पष्ट है कि जातिगत बंधन लगाने का शास्त्रों में कोई उल्लेख नहीं है। केवल इतना ही कहा गया है कि जो इस महाशक्ति का वास्तविक लाभ उठाना चाहें वे अपने आन्तरिक एवं व्यावहारिक जीवन में ब्राह्मणत्व की विशेषताऐं उत्पन्न करें जो इस दिशा में प्रयत्नशील रहे हैं उन्होंने इतना कुछ पाया है कि स्वयं धन्य हुए हैं और दूसरों को धन्य बनाया है। जिन्होंने जप-ध्यान तक ही अपने को सीमित रखा वे लौकिक जीवन की छुट-पुट समृद्धियाँ प्राप्त कर सकने के स्वल्प लाभों से आगे बढ़कर कोई अधिक महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त न कर सके। कारण स्पष्ट है।
उपासना में लगाया गया उनमें से सभी 1 माला प्रतिदिन और अनेक अधिक संख्या में जप करने लगे। मथुरा में सम्पन्न हुए सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ के अतिरिक्त 23 हजार कुण्डों के गायत्री यज्ञ देश भर में कराए गए थे। उसमें बहुत जन-शक्ति और धन-शक्ति लगनी थी। वह भी इन सदस्यों ने जुटायी। दस हजार शाखाओं में वह संगठन संगठित भी हो गया और साप्ताहिक हवन सत्संग आदि के छोटे-छोटे कार्य उन्हें सौंपे गए थे वे भी होने लगे।
उपासनास्थल झाड़ा-बुहारा, लीपा-पोता या धोया हुआ नहीं है, नीराजना के उपकरण साफ-सुथरे नहीं है। दीपक में चीकट है, बत्ती गन्दगी से भरी है, आसन पर धूल जमी है, प्रतिमा मलीन है, निर्माल्य अथवा बासी फूलों का अंश पड़ा हुआ है तो निश्चय ही देव-प्रतिमा सहित उसका पूजा-स्थल अपवित्र है। ऐसी मलीन स्थिति में किया हुआ कोई भी धर्म-कर्म आध्यात्मिक विकास में सहायक नहीं हो सकता। आध्यात्मिक उन्नति के लिये स्वच्छता एवं शुचिता नितान्त आवश्यक हैं।
उपासना-क्रम का अधूरापन ही है। साधारण साधना का विधि-विधान शास्त्रों में सार-रूप में लिखा हुआ है, उसमें कोई बड़ी पेचीदगी नहीं है। विधि-विधानों की मामूली जानकारी किन्हीं प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर की जा सकती है। उन्हें कर सकना भी कुछ विशेष कठिन नहीं है। लोग करते भी हैं, कर भी रहे हैं, पर साधारण कठिनाइयों या मामूली-सी कामनाओं की पूर्ति के अतिरिक्त वस्तुतः कोई इतना बड़ा प्रभाव उन्हें नहीं दीखता, जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि गायत्री महामन्त्र के माध्यम से वेदों में वर्णित आत्म-विद्या के असंख्य चमत्कारी लाभों में से—ऋूद्धि-सिद्धियों में से—कुछ की उपलब्धि वे कर सकेंगे।
उपासना की वैज्ञानिक विधि व्यवस्था अपनाकर आत्मोन्नति के पथ पर क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ते चला जाना यही हमें अपने स्वजन परिजनों से आशा थी, पर वे उस कठिन दीखने वाले काम को झंझट समझ कर कतराते रहे। ऐसे लोगों से हमारा क्या प्रयोजन पूरा होता?
उपासनाओं के पथ पर गतिशील होने के आकाँक्षी साधक को अपने व्यक्तित्व की उत्कृष्टता बढ़ाना तथा स्थिर रखना नितान्त आवश्यक है। आत्मिक प्रगति की यह एक अनिवार्य शर्त है।
उपासना के अधिकार से वंचित किया गया है। ईश्वरीय ज्ञान, वेद—और उसकी उपासना के अधिकार से किसी भी मनुष्य को वंचित नहीं किया जा सकता। इन शास्त्र वचनों से तो इस तथ्य का प्रकटीकरण किया गया है कि जो अपने मानसिक बौद्धिक एवं भावनात्मक स्तर को निर्मल बनाकर जितना ब्रह्मवर्चस प्राप्त कर लेगा उसे उतनी ही अधिक उतनी ही शीघ्र, उतनी ही उच्चस्तर की सिद्ध सफलता मिलेगी। गायत्री उपासना का अवलम्बन ग्रहण करने वाले को जप-अनुष्ठानों के भाँति ही अपनी मनोभूमि को परिष्कृत करने की साधना में संलग्न होना चाहिए।
उपासना का प्रतिफल भी सन्तोषजनक न होगा। यदि कोई चरित्रवान, इन्द्रिय संयमी, तपस्वी, उदारमना एवं देव-स्वभाव का मनुष्य उसी मन्त्र को जपेगा, उसी उपासना को करेगा तो निकृष्ट स्तर के व्यक्ति की तुलना में इसका परिणाम सैकड़ों गुना अधिक होगा। मन्त्र वही, विधान वही, फिर भी सफलता में इतना अन्तर? इस विषय में किसी को शंकाशील नहीं होना चाहिए। गायत्री जादू नहीं, एक सर्वांगपूर्ण विधान है।
उपासना प्रमुख है, एक प्रकार की वैज्ञानिक कृषि है। उसके लिये उपयुक्त साधन आवश्यक हैं। इस संदर्भ में सबसे अधिक आवश्यकता साधक के उत्कृष्ट व्यक्तित्व की है। उसकी मनोभूमि बढ़िया किस्म की होनी चाहिए। यह बढ़ियापन जितना बढ़ा-चढ़ा होगा, उतनी ही साधना की सफलता सुनिश्चित रहेगी।
उपासना को करेगा तो निकृष्ट स्तर के व्यक्ति की तुलना में इसका परिणाम सैकड़ों गुना अधिक होगा। मन्त्र वही, विधान वही, फिर भी सफलता में इतना अन्तर? इस विषय में किसी को शंकाशील नहीं होना चाहिए। गायत्री जादू नहीं, एक सर्वांगपूर्ण विधान है। घटिया रेडियो खड़खड़ करती हुई जरा सी आवाज में बोलते हैं, जबकि बढ़िया, कीमती रेडियो बहुत साफ और बुलन्द आवाज में बोलता है।
उपासना का छुट-पुट लाभ कोई भी उठा सकता है। सकाम उपासनाएं, बीज मन्त्रों का प्रभाव, अनुष्ठान एवं पुरश्चरणों की शृंखला अपने ढंग के लाभ प्रदान करती रहती है, उनके द्वारा साधक के छुट-पुट कष्ट दूर होने एवं अभीष्ट सफलताऐं प्राप्त होने का क्रम चलता रहता है। ऐसे लाभ और चमत्कार आये दिन देखने को मिलते रहते हैं, पर यह सब हैं छोटे स्तर की वस्तुऐं। अमुक कष्ट को दूर कर लेना या अमुक सफलता को प्राप्त कर लेना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। ऐसा लाभ तो भौतिक प्रयत्नों से भी प्राप्त किया जा सकता है।
उपासना का विधि-विधान दक्षिण मार्गी, वाममार्गी साधना विधान अपना-अपना विशिष्ट प्रतिफल उत्पन्न करते हैं पर इसके लिए उनकी समुचित जानकारी इस महाविद्या के प्रयोगकर्ताओं को ठीक तरह अनुभव और अभ्यास में लानी चाहिए। इसके लिए अनुभवी मार्गदर्शक और ऋषि परम्परा की शास्त्रीय पद्धति का अवलम्बन ग्रहण करना चाहिए। साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिए कि आध्यात्मिक उपासनाओं के पथ पर गतिशील होने के आकाँक्षी साधक को अपने व्यक्तित्व की उत्कृष्टता बढ़ाना तथा स्थिर रखना नितान्त आवश्यक है। आत्मिक प्रगति की यह एक अनिवार्य शर्त है।
उपासना करते हैं और उसके फलस्वरूप ज्ञान एवं विज्ञान की उपलब्धि चाहते हैं किन्तु कुछ कहने लायक सफलता नहीं मिलती। इसका कारण उनके उपासना-क्रम का अधूरापन ही है। साधारण साधना का विधि-विधान शास्त्रों में सार-रूप में लिखा हुआ है, उसमें कोई बड़ी पेचीदगी नहीं है। विधि-विधानों की मामूली जानकारी किन्हीं प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर की जा सकती है। उन्हें कर सकना भी कुछ विशेष कठिन नहीं है।
उपासना के छुटपुट लाभ साधारण रीति से जप, अनुष्ठान करने वालों को भी मिल सकते हैं। गमलों में छोटे से फूल-पौधे उगाये जा सकते हैं, पर यदि कोई विशाल वृक्ष लगाना हो तो यह आवश्यक है कि उसके लिये ऐसी जमीन ढूँढ़ी जाय जिसमें होकर जड़ें नीचे गहराई तक प्रवेश कर सकें। बरगद और पीपल के वृक्ष गमलों में उग तो सकते हैं पर फलने-फूलने की स्थिति तक नहीं पहुँच सकते। गायत्री जैसा महामन्त्र जिसकी सामर्थ्य की कोई तुलना नहीं, पूरी तरह अपना प्रभाव तभी प्रकट कर सकता है जब साधक की मनोभूमि काफी परिष्कृत एवं सुसंस्कृत बनाई गई हो। उपासना का विधि-विधान दक्षिण मार्गी, वाममार्गी साधना विधान अपना-अपना विशिष्ट प्रतिफल उत्पन्न करते हैं पर इसके लिए उनकी समुचित जानकारी इस महाविद्या के प्रयोगकर्ताओं को ठीक तरह अनुभव और अभ्यास में लानी चाहिए।
उपासना के अधिकार से किसी भी मनुष्य को वंचित नहीं किया जा सकता। इन शास्त्र वचनों से तो इस तथ्य का प्रकटीकरण किया गया है कि जो अपने मानसिक बौद्धिक एवं भावनात्मक स्तर को निर्मल बनाकर जितना ब्रह्मवर्चस प्राप्त कर लेगा उसे उतनी ही अधिक उतनी ही शीघ्र, उतनी ही उच्चस्तर की सिद्ध सफलता मिलेगी। गायत्री उपासना का अवलम्बन ग्रहण करने वाले को जप-अनुष्ठानों के भाँति ही अपनी मनोभूमि को परिष्कृत करने की साधना में संलग्न होना चाहिए।
उपासना का शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक प्रकरण भली प्रकार जानते हुए भी साधक कुछ आशाजनक लाभ प्राप्त न कर सके। रावण, कुम्भकरण, मेघनाद, मारीच, भस्मासुर, वृकासुर, हिरण्यकश्यपु, मधुकैटभ आदि अगरिफ्त व्यक्ति उच्च कुलों में उत्पन्न हुए थे, उनके गुरु भी शुक्राचार्य जैसे पारंगत थे। उन्होंने कठिन तपश्चर्यायें भी कीं और वरदान भी पाए, फिर भी इन सुविधाओं का कोई विशेष लाभ उन्हें नहीं मिला। उनकी आत्मिक प्रगति नगण्य रही। जो साधना तपश्चरण उनने की वह उनकी आत्मा का, उनके परिवार का सारे समाज का कुछ भी हित साधन न कर सकी।
उपासना का अवलम्बन ग्रहण करने वाले को जप-अनुष्ठानों के भाँति ही अपनी मनोभूमि को परिष्कृत करने की साधना में संलग्न होना चाहिए।
उपासना अनादिकाल से है, ऐसा वेदों में कहा गया है। इसके बिना ब्राह्मण की दुर्गति होती है।
उपासना को सरल जानकर उसे तो अपनाया पर जीवन शोधन की कठिन प्रक्रिया से कतराते-कतराते रहे। ऐसे लोगों को आत्म-बल और उसके आधार पर मिलने वाली महान उपलब्धियाँ भला मिलें भी तो कैसे? और वे अपने आशीर्वाद से किसी का भला कर सकें तो कैसे?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-May
उपासना से प्राप्त होने वाले महान् आध्यात्मिक लाभों को ईश्वरीय गुणों के रूप में दिखाया गया है। यह गुण अग्नि की उष्णता या जल की शीतलता के ही समान है और जो व्यक्ति उनकी जितनी अधिक समीपता में पहुँचता, इन गुणों का उसी अनुपात में उसके जीवन में आविर्भाव होता चला जाता है और में उसी में लीन होकर जीव-भाव से मुक्त हो जाता है।
उपासना के फलस्वरूप उनका कवि-गुण- भावनायें जागृत हुई। इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि बाल्मीकि, अजामिल और सदन जैसे कठोर और दुष्ट प्रकृति के व्यक्तियों ने जब ईश्वर की शरण ग्रहण की तो वे इतने सदय हृदय हुये कि मानवता की सेवा में ही अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया।
उपासना की। धन, बहुत धन, अथाह और अपार धन की लिप्सा ने उन्हें इस तरह जकड़ा कि बेचारे आधी उम्र भी न गुजार पाये थे कि उनका शरीर हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया था।
उपासना है। हमारे पूर्वज कहते हैं परमात्मा बड़ा मंगल कारक है उसकी सृष्टि भी बड़ी मंगलमय है। यहाँ कष्ट और दुःख की कोई बात ही नहीं है, पर लोग अज्ञान वश कष्ट भोगते और परमात्मा को दोषी ठहराते हैं। इसलिये इन मूढ़जनों से आत्मज्ञानी ही श्रेष्ठ है, जो परमात्मा की कलाकृति का अपने गुण कर्म और स्वभाव के द्वारा अनुमोदन करता है। आत्मज्ञानी ईश्वर के गुणानुवाद न गाये तो भी वह सच्चा ईश-भक्त ही माना जायेगा और परमात्मा भी उसे अपना प्यार दुलार अजस्र रूप से प्रदान करेगा।
उपासना तथा लोक सेवा की साधना में निरत रहकर अपना तथा दूसरों का कल्याण करेंगे। इस मार्ग पर चलते हुए वे अपना भावी यौवन—मरणोत्तर जीवन तो आनन्दमय बनायेंगे ही, इस लोक में भी यश तथा पुण्य से सम्मिश्रित आत्म संतोष प्राप्त करेंगे।
उपासना का तो कर्मकाण्ड-कलेवर है उसका प्राण तो भावनात्मक उत्कर्ष के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
उपासनात्मक मार्ग-दर्शन से मिल सकने वाले प्रलोभन के कारण वे किसी प्रकार आज हमारे साथ हैं। कल उन्हें उपयोगिता कम दिखाई पड़ी, अपना प्रयोजन कम सधता दीखा तो वे साथ छोड़ देंगे। परिवार की सदस्यता त्यागते उन्हें देर न लगेगी। इस श्रेणी के लोगों को सहचर मात्र कहा जा सकता है। रास्ता चलते कितने ही लोगों का साथ हो जाता है।
उपासना की वैज्ञानिक प्रक्रिया को न समझने वाले भी ईश्वर से प्राप्त होने वाले आध्यात्मिक लाभों द्वारा अपने लौकिक एवं पारलौकिक उद्देश्य प्राप्त कर लेते हैं इसमें जरा भी सन्देह नहीं है।
उपासनात्मक जीवन बिताने के कारण उस क्षेत्र में हमारी जो अनुभूतियाँ और उपलब्धियाँ हैं उन्हें हस्तान्तरित करने की अब हमें उतावली हो रही है। पर दिया उन्हें ही जा सकता है जो सत्पात्र हैं। सत्पात्र उत्तराधिकारियों के हाथ में हम बहुत कुछ सौंपना चाहते हैं। उन्हीं सौंपी जाने वाली वस्तुओं में से एक युग-निर्माण योजना की जाज्वल्यमान मशाल भी है। जीवन को धन्य बनाने के महत्वाकाँक्षियों को हम सादर आमंत्रित करते हैं, हमारा महान् उत्तराधिकार संभालने के लिए।
उपासना से जीवात्मा का उत्थान इसी कक्षा से प्रारम्भ होता है। जब तक मनुष्य अपने जीव भाव में था। तब तक वह अज्ञान-ग्रस्त था, उसे संसार की वस्तुस्थिति का कुछ भी ज्ञान न था। थोड़े से क्षणिक सुखों की पूर्ति को ही उसने अपने जीवन का उद्देश्य समझा था वह भोग में लिप्त था। इस कारण उसका जीवन दीन भी था।
उपासना में मार्ग पर बढ़ते हुए जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उनका समाधान जितनी अच्छी तरह यहाँ रहने वाले का हो सकता है, उतना और कहीं नहीं। किस साधक के लिए किस प्रकार की साधना उपयुक्त है? इसका निश्चय यहाँ रहने पर बहुत ही उत्तमता से हो सकता है। जिन्हें गायत्री साधना का कुछ वास्तविक लाभ देखना हो, उन्हें एक वर्ष उधर रहकर अपनी तपश्चर्या पूर्ण करने की बात सोचनी चाहिए।
उपासना से विमुख, अवगुणी, अबुद्धि कामी तथा वेद का उपहास करने वाले व्यक्ति ही निंदनीय हैं। इसके कार्यों की सदैव निंदा की जानी चाहिए।
उपासना के सत्परिणाम भी मनुष्य को तुरन्त देखने को मिलते हैं। जो लोग उसके वैज्ञानिक अस्तित्व का ज्ञान नहीं रखते वे भी उस लाभ से वंचित नहीं रहते। दियासलाई जान में जलाई जाय या अनजान में, उससे आग अवश्य पैदा होगी। उपासना की वैज्ञानिक प्रक्रिया को न समझने वाले भी ईश्वर से प्राप्त होने वाले आध्यात्मिक लाभों द्वारा अपने लौकिक एवं पारलौकिक उद्देश्य प्राप्त कर लेते हैं इसमें जरा भी सन्देह नहीं है।
उपासना के माध्यम से, अपनी कतिपय कठिनाइयों के समाधान की आशा करते हैं, उनका मूल प्रयोजन उतना मात्र ही है। इस दृष्टि से वे संपर्क में आते हैं, संपर्क में आने पर किसी प्रकार संकोचवश ही सही, अखण्ड-ज्योति या अन्य पुस्तकें भी पढ़ने लगते हैं। वैसे उनकी इस सम्बन्ध में कोई निजी दिलचस्पी नहीं है।
उपासना का अर्थ है, ईश्वर के समीप बैठना। जल, अग्नि अथवा वायु की समीपता से जिस तरह मनुष्य तुरन्त उनके गुणों का प्रभाव अनुभव करने लगता ही ठीक उसी तरह से परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त होते ही जीव का आपा विस्तीर्ण होने लगता है, उसकी शक्तियाँ प्रकीर्ण होने लगती हैं। उस प्रकाश में मनुष्य न केवल अपना मार्ग दर्शन करता है अपितु अनेकों औरों को भी सन्मार्ग की प्रेरणा देता है। एक ईश साधक की शक्ति इसीलिये बहुत बड़ी और जाज्वल्यमान समझी जाती है क्योंकि वह सर्व शक्ति मान ज्योति में अन्तर्हित होकर स्वयं भी उनका उत्तराधिकार अनुभव करने लगता है। यजुर्वेद में इस सम्बन्ध में प्रकाश डालते हुये कहा गया है।
उपासना उसे प्राप्त करने की वैज्ञानिक पद्धति। ईश्वर-उपासना का अर्थ है, ईश्वर के समीप बैठना। जल, अग्नि अथवा वायु की समीपता से जिस तरह मनुष्य तुरन्त उनके गुणों का प्रभाव अनुभव करने लगता ही ठीक उसी तरह से परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त होते ही जीव का आपा विस्तीर्ण होने लगता है, उसकी शक्तियाँ प्रकीर्ण होने लगती हैं। उस प्रकाश में मनुष्य न केवल अपना मार्ग दर्शन करता है अपितु अनेकों औरों को भी सन्मार्ग की प्रेरणा देता है। एक ईश साधक की शक्ति इसीलिये बहुत बड़ी और जाज्वल्यमान समझी जाती है क्योंकि वह सर्व शक्ति मान ज्योति में अन्तर्हित होकर स्वयं भी उनका उत्तराधिकार अनुभव करने लगता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-December
उपासना में किया कर्तव्य ही मानता और ऐसा ही अनुभव करता है। प्राणीमात्र से इस प्रकार की एकात्मता अध्यात्म योग की वह कोटि है जो बड़े-बड़े जप, तप तथा साधना-उपासना से भी कठिनता पूर्वक पाई जा सकती है।”
उपासना से भी कठिनता पूर्वक पाई जा सकती है।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-March
उपासना कर सकते हैं? अर्थात् हमको उसी महाशक्ति-रुपणी देवता की पूजा करनी चाहिये।
उपासना आरम्भ न की हो वे अब से शुरू कर दें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-February
उपासना का अर्थ एकाँगी लाभ उठाना रहा होता तो इन महापुरुषों ने भी या तो किसी एक स्थान में बैठकर समाधि ले ली होती या भौतिक सुखों के लिये बड़े से बड़े साधन एकत्र कर शेष जीवन सुखोपभोग में बिताते। पर उनमें से किसी ने भी ऐसा नहीं किया। उन्होंने अन्त में महामानव की ही उपासना की। सिद्धि से उन्हें सन्तोष नहीं हुआ तो लौटकर वे फिर समाज में आये और प्राणियों की सेवा को अपनी उपासना का आधार बनाया।
उपासना की। सिद्धि से उन्हें सन्तोष नहीं हुआ तो लौटकर वे फिर समाज में आये और प्राणियों की सेवा को अपनी उपासना का आधार बनाया।
उपासना से आत्म-सन्तोष होना असम्भव है।
उपासना का आधार बनाया।
उपासना है। इसमें भी परमात्मा के सौंदर्य गुण की ही उपासना का भाव छिपा है। जो पदार्थ जीवों के दुर्गुण और दुष्कर्मों को बढ़ाने वाले हैं उनके घटाने और नष्ट करने के लिए भी हमारे प्रयत्न बिना किसी कामना या द्वेष भावना से चलते रहने चाहिए। हानिकारक पदार्थों के न रहने में जीवों का हित है और विश्व के हित व कल्याण की निष्काम कामना रखना ही विश्व-प्रेम है।
उपासना क्यों की जाय?
उपासना की जाय पर अपने अन्य भाइयों को भी असहाय अवस्था से ऊपर उठाया जाय। भगवान के स्वरूप को याद करते हुये प्रेमपूर्वक उनके नाम का जप और कीर्तन, ध्यान और भजन तो किया जाय, पर उनके समाज शरीर की भी उपेक्षा न की जाय। सम्पूर्ण जीवों में भगवान का अंश विराजमान है, सब लोग उसी की विविध मूर्तियाँ हैं। सब उनके अंग हैं। सब उसके साधन हैं।
उपासना का स्वरूप बहुमुखी हो। आत्मोद्धार के लिये एकान्त में बैठकर करुण-भाव से ईश्वर की उपासना की जाय पर अपने अन्य भाइयों को भी असहाय अवस्था से ऊपर उठाया जाय। भगवान के स्वरूप को याद करते हुये प्रेमपूर्वक उनके नाम का जप और कीर्तन, ध्यान और भजन तो किया जाय, पर उनके समाज शरीर की भी उपेक्षा न की जाय। सम्पूर्ण जीवों में भगवान का अंश विराजमान है, सब लोग उसी की विविध मूर्तियाँ हैं। सब उनके अंग हैं।
उपासना के साथ-साथ लोक मंगल की प्रक्रिया को भी अविच्छिन्न रूप में जोड़ ले।
उपासना कहीं अधिक बड़ी है। काम करते हुये छोटे-बड़े काम का ध्यान न कर उसे विशुद्ध कर्त्तव्य पालन की दृष्टि से करना चाहिए। काम की धुन हमारे भीतर होनी चाहिए। आप अध्यापक हैं तो यह समझें कि इस समय आप ब्राह्मणत्व का पालन कर रहे हैं। प्रत्येक विद्यार्थी को आप शिष्य भावना से देखें और यह प्रयत्न करें कि आपका प्रत्येक शिष्य आदर्श चरित्र, अटल निष्ठा लेकर विद्यालय से निकले।
उपासना करे। आज का दिन एक परिपूर्ण जीवन है, यह मानकर परमात्मा से सच्चाई, ईमानदारी और नेक निष्ठा की ओर प्रेरित रखने के लिए बल की माँग की जाय। भावना के अनुसार, धूप, दीप, अक्षत, रोली आदि से देव प्रतिमा का अभिषेक किया जाय। प्रातःकाल का नाश्ता सदस्य इसी स्थान के प्रसाद रूप में ग्रहण करें तो वह और भी मंगल दायक हो सकता है।
उपासना से यह उपासना कहीं अधिक बड़ी है। काम करते हुये छोटे-बड़े काम का ध्यान न कर उसे विशुद्ध कर्त्तव्य पालन की दृष्टि से करना चाहिए। काम की धुन हमारे भीतर होनी चाहिए। आप अध्यापक हैं तो यह समझें कि इस समय आप ब्राह्मणत्व का पालन कर रहे हैं। प्रत्येक विद्यार्थी को आप शिष्य भावना से देखें और यह प्रयत्न करें कि आपका प्रत्येक शिष्य आदर्श चरित्र, अटल निष्ठा लेकर विद्यालय से निकले।
उपासना में उनके रूप गुण और ऐश्वर्य का कीर्तन करते हैं वैसे ही हमें उसके पुत्रों का भी कीर्तन-भजन करना चाहिये। जो पदार्थ जीवों के लिए उपयोगी हैं और सद्गुणों तथा सत्कर्मों की वृद्धि में सहायक हैं उन पदार्थों की उन्नति, वृद्धि और रक्षा करने की चेष्टा करना भी आवश्यक है। परमात्मा अपनी प्रत्येक सुन्दर वस्तु की साज-सँवार देखकर उतना प्रसन्न होगा जितना शायद वह अपने गुणों की प्रशंसा-मात्र से न होगा।
उपासना एक अच्छा अवलम्बन है पर उसके साथ जीवन की दिशा परिवर्तन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इसके बिना कोई भी साधना—चाहे वह कितनी भी क्यों न हो, कदापि लक्ष्य प्राप्त करा सकने में समर्थ नहीं हो सकती।
उपासना समाप्त करके जिसे जिस कार्य में जाना हो उसमें चले जाना चाहिए। स्त्रियाँ गृह-कार्यों में लग जायँ, विद्यार्थी पाठशाला की ओर चले जायें और पुरुष वर्ग जो जिस कार्य में नियत हो उसमें चला जाय।
उपासना की जाय और अन्यों की बिलकुल उपेक्षा की जाय तो परमात्मा उस भक्त से कैसे सन्तुष्ट हो सकता है। भक्ति का स्वरूप सर्वांगीण होना चाहिये। मुँह से भोजन कराया जाय और पाँवों को बाँधकर एक ओर पटक दिया जाय तो वह परमात्मा अपने उपासक की भावनाओं से कैसे सन्तुष्ट हो सकेगा। ईश्वर के पारलौकिक और अदृश्य जगत को यदि प्राण माना जाय और सम्पूर्ण संसार को उसकी देह, तो देह से भी उतना प्यार होना चाहिये जितना प्राण से। देह की उपेक्षा से प्राणों का अस्तित्व भी भला कहीं सम्भव हो सका है?
उपासना और प्रार्थना से प्रभावित होकर मनुष्य रूप धारण कर कदाचित वह ईश्वर अपनी अनुभूतियों सहित भक्त के समक्ष उपस्थित हो जाता और वह अपना सर्वस्व अर्पण कर देता तो संभव था उस स्थिति से आत्म-सन्तोष हो जाता। पर परमात्मा के संसार में ऐसी व्यवस्था नहीं है। वह यदि अपने आराधक की मनोवृत्ति को देखना चाहेगा तो अपने किसी बालक को ही परीक्षा के लिये भेजेगा। हम अपने बच्चे, धर्म, परिवार, गाँव-मुहल्ले वाले, समाज और राष्ट्र तथा सम्पूर्ण विश्व के लिये आत्म-त्याग की भावना का परिष्कार करके ही तो सर्वात्मा की कृपा का पुण्य फल प्राप्त कर सकते हैं और यह तभी सम्भव है जब हम सबके साथ प्यार से रहें। सबके साथ आत्मीयता रखें, सबके साथ सहानुभूति बरतें, सबकी उन्नति में सहयोग दें।
उपासना का भाव छिपा है। जो पदार्थ जीवों के दुर्गुण और दुष्कर्मों को बढ़ाने वाले हैं उनके घटाने और नष्ट करने के लिए भी हमारे प्रयत्न बिना किसी कामना या द्वेष भावना से चलते रहने चाहिए। हानिकारक पदार्थों के न रहने में जीवों का हित है और विश्व के हित व कल्याण की निष्काम कामना रखना ही विश्व-प्रेम है।
उपासना, जप, तप, कथा, वार्ता, सत्संग, स्वाध्याय, विधि निषेध एवं कर्म-काण्डों का विस्तृत विधि-विधान केवल इसी प्रयोजन के लिए है कि इस अवलम्बन को अपनाकर व्यक्ति निरन्तर सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनता चला जाय। कषाय-कल्मषों का परिशोधन ही हो। स्वर्ग, मुक्ति एवं ईश्वर-साक्षात्कार का यह एक मात्र साधन हो सकता है। हमारा सारा धार्मिक कलेवर इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए है।
उपासना का क्षेत्र विकसित कर अपना अहंकार बढ़ाने वाले व्यक्ति , ईश्वर के सच्चे भक्त नहीं कहे जा सकते। परमात्मा सर्व न्यायकारी है। वह, ऐसे भक्त को जो अपना सुख, अपना ही स्वार्थ सिद्ध करना चाहता हो, कभी प्यार नहीं कर सकता। संसार के और भी जितने प्राणी हैं वह सब भी उसी परमात्मा के प्यारे बच्चे हैं। किसी के पास शक्ति कम है, किसी के पास गुण कम हैं, तो इससे क्या?
उपासना करता हूँ।
उपासना के साथ-साथ जन-जागरण के नव-निर्माण के साधना क्रम को जोड़ देना भी आवश्यक हो गया। इसलिए हर अध्यात्म प्रेमी की यही युग-साधना हो सकती है कि वह अपने भौतिक जीवन में जिस तरह आजीविका उपार्जन को अनिवार्य कर्त्तव्य मानता है, उसी प्रकार साधना क्षेत्र में उपासना के साथ-साथ लोक मंगल की प्रक्रिया को भी अविच्छिन्न रूप में जोड़ ले।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-January
उपासना करनी चाहिए।
उपासनाओं के बावजूद भी जब वे मन को अनुकूल नहीं कर पाते तो हताश होकर यह विश्वास बना लेते हैं कि मनुष्य का मन बहुत प्रबल होता है उसको वश में कर लेना असम्भव नहीं तो दुरूह अवश्य है और कभी-कभी तो मन की प्रतिकूलता को भाग्य का दोष मानकर संतोष कर लेते हैं। यह कहकर बुराइयों एवं असफलताओं के प्रति आत्म-समर्पण कर देते हैं कि अच्छाइयाँ और असफलताएँ उनके भाग्य में ही नहीं हैं।
उपासना एवं लोक मंगल के कार्यों के लिये भी समुचित भावना रहे। डायरी लिखना आरम्भ कर दें। प्रातः अपनी शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों की दिनचर्या बनावें। समय और पैसे का बजट बनाकर खर्च करें। अपने भीतर जो दोष-दुर्गुण दिखाई दें, उन्हें क्रमशः घटावें और सद्गुणों का क्रमिक विकास करने के लिये सचेष्ट रहें।
उपासना का ही एक आवश्यक अंग जीवन साधना भी है। भजन के साथ ही हमें जीवन शोधन की प्रक्रिया भी अनिवार्य रूप से जोड़ लेनी चाहिये। दोनों पहिये की गाड़ी ही आध्यात्मिक प्रगति का प्रयोजन पूरा करेगी। अस्त-व्यस्त जीवन रखते हुये, केवल भजन के सहारे आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकती, इस तथ्य को हमें भली प्रकार हृदयंगम कर लेना चाहिए और आत्म-कल्याण का लक्ष प्राप्त करने के लिए आत्म-निर्माण एवं जीवन-निर्माण की साधना पूरी श्रद्धा एवं तत्परता के साथ चलानी चाहिए। हमारा जीवन क्रम दूसरों के लिए आदर्श एवं अनुकरणीय ही होना चाहिए।
उपासना भाव रखता होगा। उसको जीवन का ध्येय मानता होगा, और धन जिसका ध्येय है उपास्य देव है वह उसका यापन दिल खोलकर परहित में नहीं कर सकता। अस्तु, इस प्रकार के उत्तर देने वाले धनाकाँक्षी झूठे ही कहे जायेंगे।
उपासना, जप, यज्ञ आदि भी आध्यात्म की मुख्य प्रक्रियाओं में से हैं, किन्तु यह सर्वांगपूर्ण नहीं हैं, यह भी साधन का ही एक अंग है। साधना एक प्रकार की परीक्षा है। यह साधनाशील जीवन का कठोर किंतु कल्याणकारी प्रसंग है। परीक्षा पर परीक्षा ली जाती है, तब कहीं उत्तीर्ण होने का सौभाग्य मिलता है। साधना पथ से विचलित हो जाने वाले इन परीक्षाओं को पार नहीं कर पाते, बीच में ही फेल हो जाते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-August
उपासना में लगा देना, 24000 कुण्डों में गायत्री यज्ञ की 24 अरब आहुतियों का आयोजन, मथुरा में एक हजार कुण्डों का इस युग का अनुपम यज्ञ, गायत्री तपोभूमि की स्थापना, चारों वेदों का भाष्य तथा प्रसार, 108 उपनिषदों, छहों दर्शन 20 स्मृतियों और अब 18 पुराणों का भाष्य, युगनिर्माण योजना का बीजारोपण आदि अनेकों ऐसे कार्य हैं जिनके सम्बन्ध में सर्वसाधारण को बहुत कुछ जानकारी है। ऐसे भी बहुत कार्य हुए हैं जिनकी न तो किसी को जानकारी है और न उन्हें जानने की किसी को आवश्यकता ही है। इतने थोड़े दिनों में—अपने नगण्य व्यक्तित्व के द्वारा—इतने महान कार्य सम्पन्न हो सके इसके मूल में आरम्भिक जीवन के 24 वर्षों के गायत्री पुरश्चरणों की शक्ति ही एकमात्र निमित्त थी। यदि वह तपश्चर्या न हुई होती तो निश्चय ही हमारे जैसा अयोग्य व्यक्ति उपरोक्त अद्भुत कार्यों में से एक को भी ठीक तरह पूरा न कर सका होता। महता व्यक्ति की नहीं शक्ति की है।
उपासना से आगे बढ़ाकर जीवन-साधना के क्षेत्र में संलग्न करना चाहते हैं ताकि वे आध्यात्मिकता के सच्चे और चिरस्थायी लाभों से लाभान्वित हो सके। अपने प्रियजनों को सुखी बनाने के लिए हर कुलपति प्रयत्न करता है, हम भी इसी दृष्टि से इन दिनों अपना प्रयत्न तीव्र कर रहे हैं। यदि कुछ ठोस लाभ दिये बिना हमें विदा होना पड़ा, तो अपने प्रिय परिवार के प्रति हमारा उत्तरदायित्व पूरा न हो सकेगा और उसकी लज्जा एवं वेदना हमें देर तक कष्ट देती रहेगी। इस व्यथा से छुटकारा पाने के लिए वर्तमान छटनी पर बहुत जोर दे रहे हैं। जो हमारी बात तो सुन सकते हैं पर बताये मार्ग पर चलने के लिए तनिक भी तैयार नहीं,उनके साथ उलझे रहने की अपेक्षा अब हमें ऐसे लोगों को साथ रखना है जो कुछ काम कर सकने लायक श्रद्धा और आत्मीयता हमारे प्रति उत्पन्न कर चुके हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-June
उपासना की प्रेरणा देते हुए साथ ही सेवाधर्म अपनाने का भी पूरे जोर से प्रतिपादन किया है, युग-निर्माण योजना ऐसी ही एक सेवा साधना है। जिसका उद्देश्य समाज का नवनिर्माण ही नहीं उस कार्यक्रम में संलग्न व्यक्तियों का अध्यात्म लक्ष्य पूरा करना भी है। हमने स्वयं भी यही रीति-नीति अपनाई है, और अपने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को भी अपने जीवन का वैसा ही अंग बनावें जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्य कर्म करने में प्रयत्नशील रहते हैं।
उपासना तथा दूसरी पूजा पद्धतियाँ भी लोगों को सिखाई हैं और साथ ही यह भी कहा है कि इनका पूरा लाभ उन्हीं को मिलेगा जो अपने व्यक्तित्व को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने की साधना भी साथ ही करेंगे। मंत्र चाहे कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो उसका फल केवल परिष्कृत व्यक्तित्व वालों को ही मिलता है। औषधि सेवन के साथ-साथ आहार-विहार का पथ्य भी ठीक रखें तभी रोगी अच्छा होगा। दवा कीमती खायें किन्तु परहेज बिगाड़े तो बीमारी कैसे जायगी? कारतूस बढ़िया हों पर बन्दूक बाँस की बनी हुई नकली हो तो उससे निशाना कहाँ सधेगा?
उपासना के साथ-साथ ही जीवन साधना को भी गाड़ी के दो पहियों की तरह अन्योन्याश्रित माना है। कोई भी धर्मात्मा व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ-कोई भी ईश्वर भक्त ऐसा नहीं रहा-जिसने मानव सेवा का व्रत न लिया हो। जिसने इस ओर उपेक्षा बरती वह भले ही कितनी ही माला घुमाता रहा हो, कितना ही व्रत उपवास करता रहा हो, आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्ति में सर्वथा असफल ही रहेगा।
उपासना से जो लाभ मिलते हैं वे संसार के अन्य किसी भी पुरुषार्थ से संभव नहीं। पर यह मिलते उन्हीं को हैं जो अपना अन्तःकरण अधिक पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। कहना न होगा कि व्यक्तिगत जीवन में महानता उत्पन्न करने के लिए सेवा धर्म अपनाया जाना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। गुण कर्म स्वभाव में उत्कृष्टता बढ़ाने का अभ्यास परमार्थ, परोपकार की प्रक्रिया अपनाने से ही संभव है। इसलिए प्रत्येक आंतरिक सफल अध्यात्मवादी ने ईश्वर उपासना के साथ-साथ ही जीवन साधना को भी गाड़ी के दो पहियों की तरह अन्योन्याश्रित माना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-December
उपासना करने से ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों की सम्मिलित उपासना हो जाती है। वे तीनों नाद-ब्रह्म के साथ बंधे हुए है।
उपासना हो जाती है। वे तीनों नाद-ब्रह्म के साथ बंधे हुए है।
उपासना, तपश्चर्या, योग-परायणता वैराग्य, संन्यास, दान-पुण्य स्वाध्याय सत्संग एवं विविध-विधि धर्म-कृत्यों का एक मात्र प्रयोजन यही है कि आत्मा पर चढ़े हुए संकीर्ण-स्वार्थपरता के वे कषाय कल्मष हट जाएँ तो वासना-तृष्णा के-लोभ-मोह के भव-बन्धनों में जकड़े रहते हैं। नरक कोई स्थान नहीं, संकीर्ण स्वार्थपरता की निकृष्ट दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया मात्र है। उदारता एवं सेवा-साधना के जल-साबुन से ही मनःक्षेत्र पर छाई हुई मलिनताएँ धोई जाती हैं। यह समस्त प्रयोजन समाज-सेवा का व्रत धारण किये बिना सम्भव नहीं हो सकते। सेवा-धर्म को अंगीकार किये बिना कोई व्यक्ति मात्र पूजा-पाठ की टण्टघण्ट अपनाये रहकर सच्चा अध्यात्मवादी नहीं बन सकता और न उसे आत्मिक प्रगति का लाभ मिल सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-June
उपासनारूपी चिकित्सा और साधनारूपी परिचर्या को जीवनक्रम का अविछिन्न अंग बनाया जाए। इसके लिए आरंभिक आयु में ब्रह्मचर्य, विद्याध्ययन, यौवन में उपार्जन, गृहस्थपालन करते हुए भी सरलतापूर्वक ऐसी रीति-नीति अपनाई जा सकती है, जिसके आधार पर लोक और परलोक की भौतिक और आत्मिक क्षेत्र की उभयपक्षीय प्रगति का संतुलित आधार बन सके। सामान्य जीवनक्रम में ऐसे संतुलन की स्थापना संभव तो है ही, सहज भी है।
उपासना करके दैवी मार्ग पर अग्रसर हों और जीवन को उच्चतर बनाते हुए अपने महान लक्ष्य को प्राप्त करें। दैवी मार्ग को अपनाने और जीवन को शुद्ध, पवित्र, परोपकारमय बनाने में ऐसी कोई बात नहीं है, जो हमारी प्रगति में बाधास्वरूप सिद्ध हो। गरीब-से-गरीब और सांसारिक साधनों से रहित व्यक्ति भी इसको अपना सकता है और गायत्री उपासना तथा सेवामय जीवन के द्वारा निरंतर ऊपर की सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ उच्चतम शिखर तक पहुँच सकता है। इसके लिए मुख्य आवश्यकता श्रद्धा, लगन व दृढ़ आत्मविश्वास की ही है, जिसको मनुष्य अभ्यास द्वारा प्राप्त कर सकता है।
उपासना एवं साधना के दो पहियों पर चलने वाली आत्मिक-प्रगति यात्रा कह सकते हैं। जिस प्रकार इंद्रियजन्य वासनाओं और मनोवांछाओं की, तृष्णाओं की पूर्ति भौतिक साधन-सामग्री के आधार पर होती है, इसी प्रकार आंतरिक समाधान, संतोष, आनंद-उल्लास की असीम शांति भरी स्थिति अध्यात्म विज्ञान के आधार पर उपार्जित संपदाओं से होती है। नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, लघु से महान, आत्मा से परमात्मा बनने का अवसर इसी पथ पर चलने से मिलता है। पशु को देवता बनाने की स्थिति इसी प्रयास द्वारा संभव होती है। अगणित ऋद्धि-सिद्धियों की राह यही है।
उपासनात्मक तपश्चर्या और साधनात्मक सेवा-साधना में समय और शक्ति को पूरी तरह नियोजित करना है।
उपासना के पश्चात 7 से 7.45 तक सोऽहम्-साधना की प्राणयोग-प्रक्रिया है। इन दोनों में कमर को सीधी रखकर, पालथी मारकर सुखासन में बैठना पड़ता है। ध्यान-साधनाओं से शरीर को ढीला और मन को खाली करना पड़ता है, इसलिए उनमें आराम-कुर्सी, दीवार, पेड़ का सहारा लेकर बैठने अथवा चित्त लेटने की आवश्यकता पड़ती है। गायत्री उपासना और सोऽहम्-साधना जपात्मक प्रक्रियाएँ हैं। सोऽहम्-साधना को अजपा गायत्री भी कहते हैं।
उपासना करता हूँ। प्रतिध्वनि में निहित पुरुष को ब्रह्म मानकर उपासना करता हूँ। गमनशील पुरुष के पीछे जो ध्वनिमुक्त पदचाप सुनाई पड़ती है, उसमें जो ब्रह्म है, उसी की मैं उपासना न करता हूँ।"
उपासना में तो पूजा-पाठ, स्तवन, जप आदि का पूरा उपक्रम ही बहुमुखी चिंतन के साथ जुड़ा हुआ है। जहाँ क्रिया होगी वहाँ भावविस्तार भी रहेगा ही। समग्र एकाग्रता तो पूर्ण निष्क्रियता वाली स्थिति में ही संभव है। ऐसी स्थिति समाधि स्थिति की पूर्ण भूमिका में ही उत्पन्न होती है।
उपासना तथा सेवामय जीवन के द्वारा निरंतर ऊपर की सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ उच्चतम शिखर तक पहुँच सकता है। इसके लिए मुख्य आवश्यकता श्रद्धा, लगन व दृढ़ आत्मविश्वास की ही है, जिसको मनुष्य अभ्यास द्वारा प्राप्त कर सकता है।
उपासना के पीछे जो प्रेरणाएँ भरी पड़ी हैं, उनसे प्रभावित होकर उपयुक्त चिंतन और कर्तृत्व अपनाते हए दिव्य जीवन की रीति-नीति अपनाई जा सके तो ही इन पूजापरक कर्मकांडों का महत्त्व है। आत्मबोध की विचारधाराओं से अंतःकरण को भरने में सहायता करना ही दर्पण उपकरण का उद्देश्य है, उसी प्रकार पूजा का उपयोग यही है कि वह जीवन निर्माण की प्रेरणाओं को उभारे और उन्हें सक्रिय बनाए। लकीर पीटने जैसी चिह्नपूजा से न तो आत्मकल्याण हो सकता है और न दर्पण का मनुहार करने से आत्मलाभ का प्रयोजन पूरा हो सकता है।
उपासना में गंदे बच्चे को गोद में न लिए जाने वाले स्पष्टीकरण की, लघुप्राण को महाप्राण में परिवर्तन करने वाली सोहम्-साधना की, अंधकार का निराकरण करके दिव्य प्रकाश से रोम-रोम भर देने वाले बिंदुयोग की दिव्य संकेतों पर थिरकने की, भावभरी मनःस्थिति उत्पन्न करने वाले नादयोग की, आत्मबोध और तत्त्वबोध के आधार पर अपनी मान्यताओं में क्रांतिकारी परिवर्तन करने की प्रेरणाऐं भरी पड़ी हैं।
उपासना की दिशा में उठाए गए कदम प्रायः लँगड़े-लूले, अधूरे-असफल रह जाते हैं। यदि आत्मशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया पहले अपना ली जाए तो कपड़े को धोने के बाद रँगने की तरह साधना का प्रतिफल भी संतोषजनक होता है।
उपासना और सोऽहम्-साधना जपात्मक प्रक्रियाएँ हैं। सोऽहम्-साधना को अजपा गायत्री भी कहते हैं। प्राण निरंतर उसका बीजरूप में जप करता रहता है। अस्तु उसके लिए भी मेरुदंड को सीधा रखकर ही एवं पालथी मारकर ही बैठना पड़ता है।
उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिंगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र हैं, जो दिशा निर्देश भर करते हैं। काम तो सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने और पुण्यकर्म करने से चलता है। पाप भी तो दुष्कर्मों से घटनाक्रम एवं क्रियाकलाप से ही बने थे। पुण्य-प्रायश्चित भी उसी स्तर का घटनाक्रम एवं क्रियाकलाप अपनाने से पूरा हो सकता है। यदि पूजा स्तर के पाप हुए होते तो वे पूजा स्तर के पुण्य से कट सकते थे।
उपासना के संदर्भ में भी लागू होती है। उपासना का उद्देश्य अंतःकरण पर चढ़े हुए कषाय-कल्मषों का निराकरणमात्र है। भगवान या किसी देवता को रिझाना नहीं। गुण, कर्म, स्वभाव में जिन विकृतियों का, दुर्भावनाओं एवं दुष्प्रवृत्तियों का समावेश हो गया है, उन्हीं का निराकरण करना — यही है साधना का उद्देश्य। ऐसी साधना-विधि तो कहीं कदाचित ही दीख पड़ती है।
उपासना के दो पक्ष हैं— सामान्य और असामान्य। सामान्य उपासनाओं में सर्वसाधारण के लिए सुगम पड़ने वाले दैनिक नित्यकर्म में प्रयुक्त होने वाले तथा नवरात्रि आदि पर्वों पर किए जाने वाले छोटे-बड़े अनुष्ठान आते हैं। उच्चस्तरीय असामान्य साधनाओं में वे उपक्रम आते हैं, जिन्हें गायत्री महाविज्ञान के तृतीय खंड में गायत्री योग-साधना संदर्भ में बताया— समझाया गया है।
उपासना और साधना का प्रयोजन इसी स्थिति को प्राप्त कराना है।
उपासना पर बैठना चाहिए। इस एक घंटे के तीन भाग किए जा सकते हैं—(1) पंद्रह मिनट खेचरी मुद्रा (2) पंद्रह मिनट बिंदुयोग (ज्योति अवतरण), प्राणयोग (सोऽहम्-साधना) (3) आधा घंटा गायत्री जप— सूर्यार्घदान।
उपासना करता हूँ। यह जो पुरुष शरीर में निवास करता है, मैं उसे ब्रह्म मानकर उपासना करता हूँ।
उपासना भी प्रायः बहिर्मुखी होती है। उसमें भगवान को अपने से बाहर मानकर स्तवन-पूजन किया जाता है और उसे किसी तीर्थ या लोक में मानकर वहाँ तक पहुँचाने का ताना-बाना बुनना पड़ता है। स्तवन-पूजन की मनुहार से उसे द्रवित, प्रसन्न करने की बात सोची जाती है। यह बालकक्षा विस्मृति को स्मृति में इसी की समीपता में लाने की दृष्टि से ही कुछ उपयोगी होती है, अन्यथा भगवान को प्राप्त तो भीतर ही करना पड़ता है। मिलन के लिए यही एकमात्र स्थान है।
उपासना का एक घंटा पूरा हो जाता है।
उपासना-साधना अज्ञानग्रस्त लोगों जैसी भ्रम-धारणाओं पर निर्धारित नहीं होती। वह ईश्वर अनुकंपा, बहुमूल्य उपलब्धियाँ पाने के लिए पूरी कीमत चुकाने पर विश्वास करता है और उसके लिए महामानवों जैसी स्थिति प्राप्त करने की प्रेरणा उपासना-उपक्रमों के माध्यम से प्राप्त करता है।
उपासना में मन नहीं लगने देता, साधनाक्रम में विघ्न बनकर खड़ा होता है, चित्त का उच्चाटन करता है— श्रद्धा नहीं जमने देता। इस प्रकार उपासना की दिशा में उठाए गए कदम प्रायः लँगड़े-लूले, अधूरे-असफल रह जाते हैं। यदि आत्मशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया पहले अपना ली जाए तो कपड़े को धोने के बाद रँगने की तरह साधना का प्रतिफल भी संतोषजनक होता है।
उपासना से लंबी-चौड़ी मनोकामनाओं की पूर्ति, किसी देव-दानव के दर्शन, कोई रोशनी चमकाना, शब्द सुनना, शरीर काँपना, भावावेशी उद्वेगों का आना जैसे कौतुक-कौतूहलों की आशा करते हैं और यदि कुछ ऐसा अजूबा दीख सके तो समझते हैं कि साधना सफल हुई। वस्तुतः बालबुद्धि प्रबुद्ध साधकों के लिए नितांत उपेक्षणीय और उपहास्यपद है। ऐसे अजूबे कोई मैस्मरिज्म विज्ञान का ज्ञाता किसी को भी क्षण भर में दिखा सकता है अथवा हिप्नोटिज्म का जानकार संवेदनाओं के आधार पर इस तरह के कौतूक-कौतुहल स्वयं भी देख सकता है। कई योगज्ञाता नौसिखिये साधकों को ऐसे ही कुछ अजूबे दिखाकर उनमें बाल उत्साह पैदा कर देते हैं, पर उनसे बनता कुछ नहीं। मैस्मरिज्म के प्रभाव मे कोई अनुभव करने लगे कि वह सिंह पर सवारी किए घूम रहा है तो इससे वस्तुतः कुछ भी लाभ न होगा; वरन उलटी एक नई भ्रांति बढ़ जाएगी।
उपासना एवं साधना मिश्रित क्रियापद्धति, जिसे प्रत्यावर्तन सत्र में सम्मिलित होने वालों को घर जाकर निरंतरर अपनाए रहने के लिए कहा जाता है, इसमें प्रत्यावर्तन सत्र के दिनों की समस्त साधनापद्धति का परिपूर्ण, किंतु संक्षिप्त समावेश है।
उपासना के लिए एक घंटे का समय भी पर्याप्त है। साधना अहर्निश होनी चाहिए, एक क्षण भी साधना विरत नहीं जाना चाहिए। प्रमाद जहाँ भी, जब भी आएगा शैतान को चढ़ बैठने का अवसर मिल जाएगा। चौकीदार थोड़े समय के लिए सो जाए तो चोरों को घात लगाने में देर नहीं लगती। हम तनिक भी प्रमाद बरतें तो मस्तिष्क पर दुर्भावनाओं का और शरीर पर दुष्प्रवृत्तियों का आक्रमण होते देर नहीं लगेगी।
उपासना करता हूँ। गमनशील पुरुष के पीछे जो ध्वनिमुक्त पदचाप सुनाई पड़ती है, उसमें जो ब्रह्म है, उसी की मैं उपासना न करता हूँ।"
उपासना के अनेकों विधि-विधान प्रचलित हैं, पर उनका एकमात्र उदेश्य यही है। कर्मकांडो, साधना उपक्रमों की बालपोथी के साथ भावनात्मक उत्कर्ष की उच्चस्तरीय शिक्षा-व्यवस्था की जाती है। सीढ़ियों के सहारे ऊपर चढ़ते हैं, केवल मुगदरों के सहारे पहलवान बनते हैं, पुस्तकों के सहारे विद्या प्राप्त करते हैं। ठीक इसी प्रकार साधना-विधानों के सहारे भावनात्मक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा किया जाता है। जिन साधनाओं में भावोत्कर्ष का तथ्य अछूता छोड़ दिया जाता है और शारीरिक क्रियाकलाप अथवा वस्तुओं का हेर-फेर भर जुड़ा रहता है, वे प्राय: बालक्रीड़ा बनकर ही रह जाती हैं।
उपासनाओं में सर्वसाधारण के लिए सुगम पड़ने वाले दैनिक नित्यकर्म में प्रयुक्त होने वाले तथा नवरात्रि आदि पर्वों पर किए जाने वाले छोटे-बड़े अनुष्ठान आते हैं। उच्चस्तरीय असामान्य साधनाओं में वे उपक्रम आते हैं, जिन्हें गायत्री महाविज्ञान के तृतीय खंड में गायत्री योग-साधना संदर्भ में बताया— समझाया गया है।
उपासना एवं साधना-उपक्रम को अपनाकर पूर्णता की दिशा में क्रमिक यात्रा जारी रखी जा सकती है और जीवन लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। चार दिन जितनी छोटी अवधि में इतना बड़ा प्रयोजन पूरा हो सकना असंभव है। एम.ए. पास करने में सोलह वर्ष लगते हैं और हर दिन छह-छह घंटे मनोयोगपूर्वक घोर परिश्रम करना पड़ता है। बगीचा लगाकर उसे फला-फूला देखने तक माली को कई वर्षों तक धैर्यपूर्वक कठिन परिश्रम करना पड़ता है। पहलवानी की साधना भी इसी प्रकार समयसाध्य है।
उपासना करता हूँ।
उपासना न करता हूँ।"
उपासना को प्राथमिक कक्षा कह सकते हैं। प्रत्यावर्तन-साधना का हाईस्कूल कक्षा, मंत्रदीक्षा और प्राणदीक्षा इन्हीं दो स्तरों का नाम है। इस साधना के साधक अपने को प्राणदीक्षा से दीक्षित अनुभव कर सकते हैं। कॉलेज-कक्षा, अग्निदीक्षा कहलाती है। उसमें साधक ब्रह्मभूत होता है, अपने को स्थितिप्रज्ञ की, जीवनमुक्त की, ब्रह्मसायुज्य की स्थिति में अनुभव करता है।
उपासना के छुट-पुट कर्मकांड पूरे कर देने मात्र से ईश्वर की प्रसन्नता या आत्मकल्याण की आवश्यकता पूरी हो सकती है। ईश्वर न खुशामदी है, न रिश्वतखोर। उसे स्तोत्र पाठ के वाक् छल से भ्रमाया या पुष्पप्रसाद के लालच से लुभाया नहीं जा सकता। जीभ का उच्चारण और वस्तुओं की हेराफेरी जैसी बालक्रीड़ा आत्मकल्याण की। जीवनोद्देश्य की पूर्ति की, ईश्वर प्राप्ति की आवश्यकता किसी भी प्रकार पूरी नहीं कर सकती।
उपासना-उपक्रमों के माध्यम से प्राप्त करता है।
उपासना का उद्देश्य अंतःकरण पर चढ़े हुए कषाय-कल्मषों का निराकरणमात्र है। भगवान या किसी देवता को रिझाना नहीं। गुण, कर्म, स्वभाव में जिन विकृतियों का, दुर्भावनाओं एवं दुष्प्रवृत्तियों का समावेश हो गया है, उन्हीं का निराकरण करना — यही है साधना का उद्देश्य। ऐसी साधना-विधि तो कहीं कदाचित ही दीख पड़ती है। आमतौर से लोग भजन के लिए नामोच्चार की तोतारट लगाए रहते हैं।
उपासना के सूत्रों का समावेश है, उससे मनुष्य तेजस्वी, मनस्वी एवं प्रचंड ब्रह्मतेज संपन्न बन सकता है।
उपासना करो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-January
उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही संभव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका माहात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया गया है।
उपासना का लाभ उठा सकेगा। वाणी के अशुद्ध रहते उपासना की सफलता संदिग्ध ही रहेगी इस तथ्य को ध्यान में रखा जा सके तो जप अनुष्ठान आदि की प्रक्रिया के साथ -साथ वाणी के परिष्कार की बात भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण समझनी होगी और उसको भी साधना का एक अनिवार्य अंग मानकर चलना होगा। मंत्र शक्ति की महत्ता का शास्त्रों ने इस प्रकार वर्णन किया है -
उपासना का क्रम निर्धारण उन्होंने सदा बसन्त पंचमी को किया है और ठीक एक वर्श में उस पूर्व निश्चित योजना को पूर्ण कर लिया। उस दिन वे अपने ऊपर दिव्य प्रेरणा की प्रकाश किरणों का अवतरण होना स्वीकार करते हैं और कहा करते हैं कि यह दिन हर वर्श एक नया सन्देश देकर नव प्रभात की तरह उनके अन्तरंग अन्तरिक्ष में आविर्भूत होता है। इसी प्रकाश को वे ईश्वरीय मार्ग-दर्शन के रूप में अंगीकार करते हैं और तदनुसार एक वर्श के लिए उठाये जाने वाले कदमों का निर्धारण करते हैं।
उपासना की सफलता संदिग्ध ही रहेगी इस तथ्य को ध्यान में रखा जा सके तो जप अनुष्ठान आदि की प्रक्रिया के साथ -साथ वाणी के परिष्कार की बात भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण समझनी होगी और उसको भी साधना का एक अनिवार्य अंग मानकर चलना होगा। मंत्र शक्ति की महत्ता का शास्त्रों ने इस प्रकार वर्णन किया है -
उपासना की सुगम पद्धति यही है कि मन को स्थिर करने के लिये ईश्वर की धारणा किसी मूर्ति रूप में की जाये।’
उपासना ही फलवती होगी।
उपासना करता है उसकी वाणी की गति इच्छित क्षेत्र तक हो जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-February
उपासना का अभ्यासी होगा, वह मस्तिष्क पर नियंत्रण रखेगा और ध्यान रखेगा कि जब कभी जो कुछ भी सोचा जाए, वह ईश्वर स्तर का हो, जो किया जाए उसमें ईश्वरीय गौरव-गरिमा की झाँकी मिलती हो। आत्मबोध का तात्पर्य ही यह है कि अपने 'अहं' का सच्चिदाऽनंद आत्मा के रूप में हर घड़ी अनुभव किया जाए और शरीर तथा मन को परिधान, कलेवर, उपकरण, वाहनमात्र माना जाए। शरीरगत लोभ और मोह से जुड़े हुए दृष्टिकोण को अज्ञानांधकार माना जाए और उससे छूटने का प्रयास किया जाए। जो अपने को आत्मा मानेगा, वह स्वभावतः शरीरगत लोभ और मनोगत मोह की अपेक्षा आत्मा का हितसाधन करने वाली उत्कृष्टता और आदर्शवादिता को प्राथमिकता देगा। जिसने कायकलेवर के साथ पक्षपात करते रहने की, मोह-प्रवृत्ति को निरस्त करने और आत्मा के साथ न्याय करने का निश्चय किया होगा।
उपासना का फल प्राप्त करता है। ऐसे अभिवचन उच्चारणकर्त्ता का भी कल्याण करते हैं, लोक-मंगल का प्रयोजन भी उनसे बड़ी मात्रा में पूरा होता है।
उपासना पर प्रकाश डालते हुए कहा था— “ .......... मेरा बोलना जप के लिए है, प्रचार के लिए नहीं। जिन विचारों को बोलता हूँ, वे दृढ़ होते चले जाते हैं। .... जो किया है आप लोगों ने किया है, मैंने तो जप किया है; भूदान का जप किया तो भूदान मिला। संपत्तिदान का जप किया तो संपत्तिदान मिला। न तो मैं यज्ञ करता हूँ, न दान करता हूँ, न तप करता हूँ; मैं तो केवल जप ही करता हूँ और जप से मेरे सारे काम बन जाते हैं।
उपासना का अर्थ याचना नहीं है। भूलना नहीं चाहिए कि जो कुछ आत्मिक विभूतियाँ मिलने वाली हैं, उनका उद्गम अपना ही अंतरंग है। भीतर की महानता ही बाहर सिद्धियों, समृद्धियों और विभूतियों के रूप में पल्लवित होती है। स्वर्ग और मुक्ति से लेकर देव-अनुग्रह के विविध अनुदान-वरदान केवल अपनी पात्रता के ही प्रतिफल हैं। आत्मचिंतन, आत्मशोधन, आत्मनिर्माण और आत्मविकास के उपक्रम ही तप-साधना के, उपासना-अर्चा के मूल मर्म हैं।
उपासना-अर्चा के मूल मर्म हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के अमर फल आत्मदेवरूप कल्पवृक्ष को सींचने-संजोने से ही प्राप्त किए जा सकते हैं। जिसने ब्रह्मविद्या के इस मर्म को समझ लिया, उसी के हाथ आत्मिक विभूतियाँ लगने की आशा की जानी चाहिए।
उपासना, साधना, तपश्चर्या के विविध विधि-विधानों से लेकर धर्मानुष्ठानों के अगणित कर्मकांडों तक के सारे क्रिया-कृत्य इसलिए हैं कि उनके माध्यम से भौतिकतापरायण पशु-प्रवृत्तियों को आत्मवादी आस्थाओं में परिणत किया जा सके। मनीषी और तत्त्वदर्शी इस रहस्य का समय-समय पर उद्घाटन करते रहे हैं। उपनिषदों की ब्रह्मविद्या इसी मर्म चर्चा से भरी पड़ी है। देवाराधन के विधान प्रकारांतर से अपने ही श्रद्धातत्त्व के विकास की भाव विज्ञान समर्थित पद्धति है। देवता वस्तुतः मनुष्य का अपना अस्तित्व ही है।
उपासना, तपस्या आदि आत्मिक उपार्जनों पर ही ध्यान केंद्रित न किया जाए; वरन यह भी देखा जाए कि उस भावनात्मक उत्पादन का प्रयोग-उपयोग किस प्रयोजन के लिए किया जा रहा है।
उपासनात्मक कर्मकांडों का अपना महत्त्व है, पर सर्वजनीन सारस्वत मंत्र वह शब्दोच्चार है, जिसे सत्प्रयोजन के लिए, सद्भावना, विवेकशीलता और मधुरासम्मिश्रित करके बोला गया हो। इस स्तर का भाषण, चाहे वह स्वल्प शब्दों का ही क्यों न हो, सब कल्याण की परम श्रेयस्कर प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।
उपासना का सार है— सर्वसंपन्न ईश्वर को अपना घनिष्टतम जीवन सहचर अनुभव किया जाना और अपने शरीर, मन तथा अंतःकरण को ईश्वर-अर्पण करके उस पर दिव्यसत्ता का अधिकार स्वीकार करना। जो इस स्तर की उपासना का अभ्यासी होगा, वह मस्तिष्क पर नियंत्रण रखेगा और ध्यान रखेगा कि जब कभी जो कुछ भी सोचा जाए, वह ईश्वर स्तर का हो, जो किया जाए उसमें ईश्वरीय गौरव-गरिमा की झाँकी मिलती हो। आत्मबोध का तात्पर्य ही यह है कि अपने 'अहं' का सच्चिदाऽनंद आत्मा के रूप में हर घड़ी अनुभव किया जाए और शरीर तथा मन को परिधान, कलेवर, उपकरण, वाहनमात्र माना जाए। शरीरगत लोभ और मोह से जुड़े हुए दृष्टिकोण को अज्ञानांधकार माना जाए और उससे छूटने का प्रयास किया जाए। जो अपने को आत्मा मानेगा, वह स्वभावतः शरीरगत लोभ और मनोगत मोह की अपेक्षा आत्मा का हितसाधन करने वाली उत्कृष्टता और आदर्शवादिता को प्राथमिकता देगा।
उपासना, साहित्य- सृजन, व्यायाम आदि के लिए यदि समय निर्धारित हो तो देखा जाएगा कि सारा कार्य बड़ी सुंदरता और सफलतापूर्वक संपन्न होता चला जाता है। इसके विपरीत, यदि आए दिन दिनचर्या में उलट-पुलट की जाती रहे तो अंतरंग की स्वसंचालित प्रक्रिया अस्त-व्यस्त एवं अनभ्यस्त हो जाएगी और हर कार्य शरीर से बलात्कारपूर्वक ही कराया जा सकेगा और वह औंधा-सीधा ही होगा, उसकी सर्वांगपूर्णता की संभावना आधी-अधूरी ही रह जाएगी।
उपासना जितनी अच्छी तरह हो सकती है, उतनी अन्य किसी समय नहीं। देर तक सोते रहने वाले मंदबुद्धि, आलसी, रुग्ण और दरिद्र बनते चले जाते हैं। यह तथ्य सर्वथा माननीय है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-August
उपासना का प्रतिफल आत्म विस्तार के रूप में ही उपलब्ध होता है। संकीर्ण स्वार्थपरता के बन्धनों को तोड़ फोड़ कर फेंक देने और विराट् के साथ अपनी आत्मीयता जोड़ लेने का ही नाम मुक्ति है। स्वर्ग के दो पक्ष है उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व। जिसके अन्त करण में इन दोनों की प्रतिष्ठापना हो गई समझना चाहिए उसने मनुष्य शरीर में रहते हुए ही देवयोनि प्राप्त कर ली।
उपासना का प्रयोजन आत्मा को परमात्मा के स्तर तक पहुंचाने वाली उत्कृष्ट प्रेरणा को अंतःकरण के गहन-तप स्तर में प्रतिष्ठापित करना ही है। अन्यथा ईश्वर की किसी निन्दा- प्रशंसा से अथवा कर्मकाण्ड परक क्रिया-प्रक्रिया से क्यों कर प्रभावित कर सकना सम्भव हो सकता है?
उपासना से आत्म-सन्तोष होना सर्वथा असंभव है।
उपासना साधना द्वारा उसी प्रेरणा को हृदयंगम किया जाता है। आस्तिकता और धार्मिकता का समस्त कलेवर इसी प्रयोजन के निमित्त खड़ा किया गया है। ईश्वर की प्रसन्नता और अनुकम्पा का प्रत्यक्ष संबन्ध व्यक्ति के भाव संस्थान से है। उत्कृष्टता की भाव भूमिका में ही ईश्वर की दिव्य चेतना का अवतरण संभव हो सकता है। साधना उपक्रम का एक मात्र उद्देश्य अन्तः भूमिका का परिष्कार ही है।
उपासना का तथ्य यदि न समझा जाय तो उस दिशा में किये गये प्रयत्न काल-क्षेप मात्र बन कर रह जायेंगे। हमें हजार बार जानना चाहिए और लाख बार समझना चाहिए कि अध्यात्म का एक मात्र अर्थ परिष्कृत दृष्टिकोण का अवलम्बन ही है। उपासना का प्रयोजन आत्मा को परमात्मा के स्तर तक पहुंचाने वाली उत्कृष्ट प्रेरणा को अंतःकरण के गहन-तप स्तर में प्रतिष्ठापित करना ही है। अन्यथा ईश्वर की किसी निन्दा- प्रशंसा से अथवा कर्मकाण्ड परक क्रिया-प्रक्रिया से क्यों कर प्रभावित कर सकना सम्भव हो सकता है?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-September
उपासना सेवा को ही प्रमुख मानते थे और आत्मा को इन्हीं उपचारों से पोषण प्राप्त होने की बात कहते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-November
उपासना का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया गया है।
उपासना के लिए कुछ न कुछ स्थान होना ही चाहिए। किसी उपयुक्त स्थान पर गायत्री माता का चित्र टाँगा जाय और यह नियम बनाया जाय कि दैनिक कार्य आरम्भ करने से पूर्व उस प्रतिमा का अभिनन्दन करके- कम से कम पाँच मंत्र जाप करके तब आगे बढ़ा जाय। बच्चे स्कूल जाते समय, स्त्रियाँ चूल्हा जलाते समय, पुरुष दफ्तर, दुकान पर जाते समय यह नमन अभिनन्दन चित्र के सामने खड़े होकर कर सकते हैं। इसमें दो मिनट का समय लगता है। उससे आस्तिकता के संस्कार जमते और बढ़ते हैं।
उपासना करने लगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-October
उपासनारकी सरलता देखकर उतने भर से जीवन लक्ष्य की प्राप्ति और भगवत् कृपा उपलब्ध हो जाने की बात सूझती है उन्हें भी बताया जाता है कि आराधना बीजारोपण के समान है, उसे अंकुरित, पल्लवित, और फलित, विकसित बनाने के लिए साधना का खादपानी लागाने की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। साधना का संगम महा-मानवों जैसी उदात्त जीवनचर्या एवं लोक मंगल के निमित्त किये गये त्याग बलिदान के समन्वय से बनता है। जो केवल भजन-पूजन भर को सब कुछ मान लेते हैं वे कमान वाले तीर को घूमाते तो फिरते हैं पर वे उससे लक्ष्य बेध का प्रयोजन पूरा नहीं कर पाते।
उपासना में अधिकाधिक निष्ठा का समावेश, युग साधकों की साधना प्रखरता बनाने के लिए अनिवार्य समझा जाना चाहिए। निष्ठा का जितना ही समावेश हो सकेगा, नैष्ठिक उपासकों द्वारा चलायें जाने वाले युग सन्धि महापुरश्चरण के सत्परिणाम उसी अनुपात में फलित होंगे।
उपासना के अखाड़े में बलिष्ठता का-निष्ठा का-अभ्यास करना होता है, पर उस उपार्जित सामर्थ्य को इतने छोटे क्षेत्र में कैद नहीं रखा जाता। पहलवान दंगल पछाड़ते और दूसरे प्रकार के पराक्रम प्रस्तुत करते हैं। ठीक यही बात नैष्ठिक साधकों के सम्बन्ध में भी हैं। वे निर्धारण, जप संख्या एवं व्रतशीलता का उपक्रम चलाते हुए उपासना क्षेत्र के प्रयोगकर्त्ता तो समझे जा सकते हैं। पर बात इतने भर से बनती नहीं।
उपासना और साधना का सज्जनता और उदारता का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। उपासनात्मक उपचारों में दान-पुण्य की प्रक्रिया इसीलिए सम्मिलित रखी गई है कि दोनों के मिलने से ज्ञान और कर्म का-भावना और तत्परता का समावेश रहने से अभीष्ट परिणाम उपलब्ध हो सकें।
उपासना-आत्म साधना और लोक सेवा को गंगा यमुना सरस्वती माना गया है। और उनके त्रिवेणी संगम को तीर्थराज कहकर कायाकल्प जैसा पुण्य फलदायक बताया गया है।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों को कलेवर और निष्ठा को उसके अन्तरंग को प्राण शक्ति कहा जाता है। साधना की सिद्धि इसी एक तथ्य पर निर्भर है कि उसे कितनी गहन निष्ठा के साथ अपनाया गया। यों जब तब, ज्यों-त्यों करके कुछ न कुछ भजन-पूजन करते रहने में भी हर्ज नहीं, उतने से भी रुचि बदलती है और प्रवाह बनता है, पर इस तथ्य को भुलाया नहीं जाना चाहिए कि वाण की बेधक शक्ति इस बातपर निर्भर रहती हैं कि धनुष्य की प्रत्यंचा को कितना खींचा जा सका और लक्ष्य बेध में कितने एकाग्र मनोयोग का उपयोग किया गया। आत्मिक सफलताओं का रहस्य एक ही है कि ‘निष्ठा’ का महत्व कितना समझा गया और उसे कितनी गम्भीरतापूर्वक अपनाया गया। कर्मकाण्ड तो उपचार भर है।
उपासना के अभ्यस्त नहीं हैं और यदा-कदा ही कभी कुछ पूजा पाठ करते हैं ऐसे लोगों पर भी जोर दिया जाता है कि वे कम से कम उन दिनों तो कुछ नियम निवाहें और निश्चित साधना की बात सोंचे। इन अभ्यासो के लिए भी कई प्रकार की सरल साधनाओं की विशेष व्यवस्थ की जाती है ताकि बोझ लगने और मन उचटने की कठिनाई का सामना न करना पड़े। मन्त्र लेखन गायत्री चालीसा पाठ, पंचाक्षरी जप आदि की सरल व्यवस्थाएँ उसी आधार पर बनी हैं। और 24 हजार वाली संख्या को घआ कर 10 हजार तक हलका कर दिया गा है। नौ दिन में दस हजार जप करने का तात्पर्य मात्र हर रोज एक घण्टा समय लगाना भर होता है।
उपासना अधिक फलवती होती और संध्या के नाम से पुकारी जाती है। उसी प्रकार नवरात्रियों का समय भी दोनों सन्ध्याओं के समतुल्य माना गया है।
उपासना की ओर अग्रसर किया जा सकता है। अस्तु, आरम्भ में जिन्हें अभ्यास नहीं है और जो नये-नये ही गायत्री उपसना में संलग्न हो रहे है उनके लिए ऐसा सरल मार्ग प्रस्तुत किया गया है जिन्हें वे एकाकी प्रयासों से अस्तु किन्हीं भी परिस्थितियों में करते रह सकते हैं।
उपासना के अतिरिक्त “एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य” ज्ञानयज्ञ के निमित्त निकालते रहने की सदस्यता शर्त देव परिवार के परिजनों के लिए आरम्भ से ही निर्धारित की गई है। अपने समय में अग्निहोत्र को प्रतीक और ज्ञानयज्ञ को युग धर्म के रूप में मान्यता मिली थी। कभी सब लोग देवमानव थे और सभी ज्ञान सम्पन्न, इसलिए ज्ञानयज्ञ को उतना महत्व नहीं दिया गया, जितना कि वह महत्वूपर्ण है। आज इसलिए महत्वपूर्ण है कि इन दिनों चारों और अज्ञानान्धकार की ओर तमिस्त्रा ने सर्वत्र अपना साम्राज्य जमा लिया है इस स्थिति में ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल जलानी पड़ेगी और उसी को युग यज्ञ की मान्यता देनी पड़ेगी।
उपासना क्रम में सरलता उत्पन्न करने तरह व्रत अनुशासनों में भी ढील देकर उन्हं मनीषियों ने बाल सुलभ बना दिया हैं। भूमिशयन, स्वयं सेवा, उनके लिए अनिवार्य नहीं। ब्रह्मचर्य तो आवश्यक है। पर उपवास में भी ढील की काफी गुँजायश बना दी गई है। रोटी-शाक, दाल-चावल जैसे दो वस्तओं के युग्म अपना कर नौ दिन काट लेने में मात्र पदार्थों का सीमा बन्धन ही हैं भूखा रहने जैसी कोई कठिनाई नहीं है।
उपासना का शुभारम्भ कर सकेंगे और निजी परिवार में सृजनात्मक वृत्तियों का सूत्र संचालन करते हुए वही प्रक्रिया आरम्भ कर सकेंगे जो बड़े रूप शाखा संगठन एवं प्रज्ञापीठों के माध्यम से किया जाना है।
उपासनाएं चलाते हुए यह ध्यान रखन होगा कि उपासना की पूर्णता के लिए जीवन साधना की ओर साधना को समर्थ बनाने के लिए सेवा परायणता की आवयकता है। भगवत् उपासना-आत्म साधना और लोक सेवा को गंगा यमुना सरस्वती माना गया है। और उनके त्रिवेणी संगम को तीर्थराज कहकर कायाकल्प जैसा पुण्य फलदायक बताया गया है।
उपासना पाँच मिनट की भी हो सकती है। स्नान की असुविधा हो तो मौन मानसिक जप किसी भी स्थिति में एवं किसी भी समय किया जा सकता है। जप के साथ ध्यान आवश्यक है। युग पुरश्चरण में शक्ति संचार की उच्चस्तरीय ध्यान धारणा का समावेश है। पाँच मिनट की न्यूनतम गायत्री जप उपासना में प्रकाश मंडल के अंतर्गत महाप्रज्ञा का गायत्री माता का-ध्यान किया जाना चाहिए।
उपासना उपचार करने के अतिरिक्त लोकमंगल की साधना को भी सम्मिलित करना और उसके लिए साहस जुटाना आवश्यक समझा जाता है। जो इनमें से एक के लिए अपनाते और दूसरे को छोड़ते हैं वे एक पंख के सहारे उड़ने का प्रयास करने वाले पक्षी की तरह निराश ही रहते हैं। एक पहिये की गाड़ी कहाँ चल पाती है ? एक पैर के लम्बी यात्रा कर सकने में सफलता कहाँ मिलती है ? लंगड़े व्यक्ति भी लकड़ी का सहारा लेकर ही खड़े होते और आगे चलने में समर्थ हो पाते हैं।
उपासना में अभिरुचि रखने वाले इन दिनों की प्रतीक्षा करते रहते हैं और उस अवसर पर कुछ न कुछ व्रत पालन निश्चित रूप से करते हैं।
उपासना के अमुक विधि-विधान पूरे करने से ही कराया गया है, पर उन्हें उतने छोटे दायरे तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। मात्र वातावरण संशोधन का उपक्रम ही पर्याप्त नहीं, युग सृजन में हमारा प्रत्यक्ष योगदान भी सम्मिलित रहना चाहिए। नवनिर्माण की प्रस्तुत गतिविधियों को विशुद्ध रूप से सृष्टा की इच्छा आवश्यकता समझा जाना चाहिए और पराक्रम भरे अनुदान की माँग को थोड़ी-सी पूजा-पत्री को पर्याप्त मानकर अनसुनी नहीं करना चाहिए। युग पुरश्चरण के नैष्ठिक उपासकों को यह भी समझने की आवश्यकता है कि महाप्रज्ञा की आराधना में इन दिनों नव-सृजन के निमित्त भाव भरे अनुदानों को भी सम्मिलित रखने की आवश्यकता है।
उपासना का माध्यम बने और रात्रि को सोते समय अस्त होते हुए सूर्य को मानसिक नमन किया जाये। यह पाँच-पाँच मिनट का उभयकालीन सविता वन्दना करने का क्रम चल पड़े तो इससे न समय संबंधी कठिनाई पड़ेगी और न आस्तिकता-नास्तिकता के जंजला बाधक बनेंगे। प्रकाशपुँज के ध्यान में तेजस् का साथ संपर्क जुड़ता है और उससे प्रकाश की दिशा में प्रगति देने वाला साहस भी जगता है।
उपासना को ही उस स्थिति में फलवती होने का अवसर कैसे मिल सकता है ?
उपासना को पू कर लेने की सुविधा भी है। पर निष्ठा के अभाव में लड़खड़ानें वाले अन्तराल में तो नियमित पूजा-पाठ तक नहीं बन पड़ता। फिर व्यक्तित् के उच्चस्तरीय बनाने वाले जिस आन्तरिक पराक्रम की आवश्यकता है वह तो बनेगा ही केसे ? ऐसी मनोभूमि के लोग ही असफलता का रोना रोते और उसका कारण यहाँ-वहाँ-ढूँढ़ते रहते हैं। जब कि निष्ठा का अभाव ही अशक्तता के रूप में असफलता का एकमात्र निमित्त कारण हैं।
उपासना-
उपासना को बीज और साधना को खाद, पानी की उपमा दी जाती है ओर कहा जाता है कि फसल का फलित होना इस समन्वय पर ही निर्भर है।
उपासनात्मक उपचारों में दान-पुण्य की प्रक्रिया इसीलिए सम्मिलित रखी गई है कि दोनों के मिलने से ज्ञान और कर्म का-भावना और तत्परता का समावेश रहने से अभीष्ट परिणाम उपलब्ध हो सकें।
उपासना की पूर्णता के लिए जीवन साधना की ओर साधना को समर्थ बनाने के लिए सेवा परायणता की आवयकता है। भगवत् उपासना-आत्म साधना और लोक सेवा को गंगा यमुना सरस्वती माना गया है। और उनके त्रिवेणी संगम को तीर्थराज कहकर कायाकल्प जैसा पुण्य फलदायक बताया गया है।
उपासना में अधिक प्रखरता का वह समावेश हो सकें जो सुविधा, सरलता के वातावरण में उपलब्ध नहीं होता।
उपासना कर लेने से भी उच्चस्तरीय परिणाम प्राप्त कर सकने में सफल हुए हैं। विवेकानन्द, गाँधी, विनाबा आदि के उदाहरण ऐसे ही हैं जिनमें सेवा साधना ही प्रधान है। पूजा अर्चा तो वे थोड़ी सी ही करते रहे हैं सो भी एकान्तिकनहीं सामूहिक। भगवान बुद्ध और महावीर ने भी आरम्भिक दिनों में ही तपश्चर्या अपनाई थी उसके उपरान्त वे धर्म चक्र प्रवृत्तियों को विश्वव्रुपी बनाने, उसके लिए परिव्राजक प्रशिक्षित करने तथा साधन जुटाने, में ही निरत रहे। गुरु गोविन्दसिंह, समर्थ रामदा, चाणक्य, आदि की गणना भी ऐसे ही कर्मयोगियों में की जाती है।
उपासना की चिन्ह पूजा भी बीजारोपण की दृष्टि से उपयोगी मानी गई है और उसे किसी भी रूप में किसी भी मनःस्थिति में अपनाये रहने पर जोर दिया गया है। फिर भीउसे निष्ठापूर्वक अपनाने की प्रौढ़ता का स्तर सदा ऊँचा ही रहता है। उच्चस्तरीय कर की जाने वाली साधाना के साथ अविच्छिन्न रूप से सम्बन्धित हैं।
उपासना ही एक मार्ग नहीं है। उसके अतिरिक्त परमार्थ में प्रयोजनों रत रहने वालों ने भी अध्यात्म क्षेत्र की अभीष्ट सफलताएँ पाई है। लोक-सेवा भी किसी भजन-पूजन से कम महत्व की साधना नहीं है। ऐसे व्यक्ति नित्य नियम तिजनी थोड़ी उपासना कर लेने से भी उच्चस्तरीय परिणाम प्राप्त कर सकने में सफल हुए हैं। विवेकानन्द, गाँधी, विनाबा आदि के उदाहरण ऐसे ही हैं जिनमें सेवा साधना ही प्रधान है।
उपासना और साधना के उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। प्रातः काल सामूहिक जप, हवन-पूजन का औ सायं काल संगीत प्रवचन के ज्ञान यज्ञ की व्यवस्था रहती हैं। उपासना से आत्म कल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही हैं। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ बानर, कृष्ण काल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रामाणित करते हैं कि महान दित किये बिना और कोई चारा नहीं।
उपासना का भी नियमित उपक्रम बन नहीं पड़ रहा है। इस समुदाय के लिए एक अति सरल पंचसूत्री कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया है और उसको अपनाने के लिए नवरात्रि पर्व को ही शुभारम्भ के मुहूर्त के रूप में मनाने के लिए अनुरोध किया गया है।
उपासना से आत्म कल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही हैं। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ बानर, कृष्ण काल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रामाणित करते हैं कि महान दित किये बिना और कोई चारा नहीं। देवताओं की संयुक्त शक्ति दुर्गा ने ही उन्हें असुरों के त्रास से छुड़ाया था। ऋषियों का संचित रक्त घट ही सीमा को जन्म देने और दानवी विभीषिकाओं को निरस्त करने में आधारभूत कारण बना था।
उपासना का उपक्रम बने और उसे एक उत्साह आयोजन का स्वरूप मिले। ऐसी व्यवस्था बनाने में उत्साही लोगों को स्वयं आगे रहने, थोड़ी दौड़ धूप करने साधन जुटानें एवं जन-संपर्क साधकर उत्साह दिलाने जैसे प्रयत्न करने होते हैं। ऐसा कुछ कर पाने वाले उत्साही जहाँ एक दो भी हों वहाँ नवरात्रि आयोजन की व्यवस्था सहज ही बन जाती हैं। वह न तो महंगी है और न कठिन कष्ट साध्य। जो इसके लिए आगे बढ़कर साहस दिखाते हैं उन्हं अनुभव से इस निष्कर्ष पर पहूँचना होता है कि भारत जैसे धर्म प्रकृति वाले देश में नवरात्रि आयोजनों को साधना सत्रों के रूप में विकसित और व्यापक बना सकने में अनुत्साह के अतिरिक्त और कोई भी कठिनाई नहीं हैं जो हँसते-हँसातें हल न की जा सकं।
उपासना की जाय, पर उसमें ढ़ील-पोल नहीं चलनी चाहिए।
उपासना और उसके साथ सम्मिलित रहने वाले आदर्शवादी अनुबन्धों को साधना कहते हैं। उपासना को बीज और साधना को खाद, पानी की उपमा दी जाती है ओर कहा जाता है कि फसल का फलित होना इस समन्वय पर ही निर्भर है।
उपासना में जिनकी रुचि नहीं हैं वे सबेरे सोकर जागने और रात्रि को बिस्तर पकड़ने के बाद पाँच मिनट को महाप्रज्ञा का प्रकाशपुँज के रूप में ध्यान कर लिया करें। प्रज्ञा का अधिष्ठाता सविर्ता को माना गया है। सविता अर्थात् प्रकाशपंज सूर्य। प्रभात काल का उदीयमान सूर्य अपनी प्रभातकालीन उपासना का माध्यम बने और रात्रि को सोते समय अस्त होते हुए सूर्य को मानसिक नमन किया जाये। यह पाँच-पाँच मिनट का उभयकालीन सविता वन्दना करने का क्रम चल पड़े तो इससे न समय संबंधी कठिनाई पड़ेगी और न आस्तिकता-नास्तिकता के जंजला बाधक बनेंगे।
उपासना में प्रवृत्त कने का उत्तरदायित्व भी युग साधकों को सौंपा गया है। सामान्य उपासक एकदम तो युग पुरश्चरण जैसी निष्ठ प्रधान साधनाओं में संलग्न नहीं हो सकते। उन्हं क्रमशः ही नैष्ठिक उपासना की ओर अग्रसर किया जा सकता है। अस्तु, आरम्भ में जिन्हें अभ्यास नहीं है और जो नये-नये ही गायत्री उपसना में संलग्न हो रहे है उनके लिए ऐसा सरल मार्ग प्रस्तुत किया गया है जिन्हें वे एकाकी प्रयासों से अस्तु किन्हीं भी परिस्थितियों में करते रह सकते हैं।
उपासना में प्रकाश मंडल के अंतर्गत महाप्रज्ञा का गायत्री माता का-ध्यान किया जाना चाहिए। प्रातःकाल का स्वर्णिम सूर्य-उसकी दिव्य किरणों का साधक की काया में प्रवेश-स्थूल शरीर काय कलेवर में सत्पुरुषार्थ-सूख्म शरीर-ज्ञान संस्थान में सद्भाव-कारण शरीर-अन्तःकरण में सद्भाव के रूप में सविता प्रकाश में अनुभूति। यही है वह सरलतम ध्यान जो पाँच मिनट की नितय जप साधना करने के रूप में चलता रह सकता है।
उपासना क्षेत्र के प्रयोगकर्त्ता तो समझे जा सकते हैं। पर बात इतने भर से बनती नहीं। बढ़ना और आगे पड़ता है। गाड़ी एक पहिये नहीं दो से चलती है। ताली एकनही दो हाथ से बजती है।
उपासना का दूसरा पक्ष है- साधना। एक पख् से पक्षी नहीं उड़ता, इसी प्रकार लोक-कल्याण के लिए तत्पर हुए बिना किसी को भी आत्मकल्याण का लाभ मिल नहीं सकता। इस सच्व्चाई को जितनी जल्दी समझा जा सके उतना ही श्रेयस्कर रहेगा।
उपासना उठते समय अरुणोदय और सोते समय सूर्यास्त का ध्यान करने की प्रक्रिया का शुभारम्भा इन्हीं दिनों कर देना चाहिए।
उपासना तत्वज्ञान में सन्निहित संकेत सभी ऐसे हैं जिन्हें साधना अवधि में प्रयुक्त करने के बहाने अभ्यास में उतारा जाए और उसका निर्वाह भविष्य में भी यथासम्भव करते रहा जाए। ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ की अध्यात्म मान्यता का प्राणि वध से उपलब्ध साधनों का उपयोग करने से बढ़ती नहीं वरन् घटती और बुझती ही चली जाती हैं। अस्तु नवरात्रि में चर्मत्याग की लकीर पीट लेने से ही नहीं प्राणियों के प्रति करुणा बरतने, यहाँ तक कि अत्यधिक भार से लदे घायल पशुओं के श्रम का उपयोग करते समय भी उसी करुणा को अपना कर कुछ निर्णय करना होगा। प्रकारान्तर से नवरात्रि में चर्मत्या के पीछे अहिसाँ वृत्ति के विकास का तत्वज्ञान जुड़ा हुआ समझा जाना चाहिए।
उपासनात्मक अभ्यास सौंपा जाय। तद्नुसार एक लाख साधकों द्वारा प्रतिदिन 4 करोड़ गायत्री जप के युग पुरश्चरण की योजना बनाई गई है। यहाँ यह स्मरणीय है कि इसमें मात्र उनहीं को लिया गया है जो निष्ठा को परिपक्व करने वाले अनुबन्धों का कड़ाई से पाल कर सकें। यही कारण है इस युग साधना के साध “नैष्टिक” कहलाते हैं। निष्ठा से उत्पन्न ऊर्जा ही आत्मकल्याण और लोकनिर्माण के उीय पक्षीय प्रयोजन पूरी कर पाती है।
उपासना की दृष्टि से युग-सन्धि पुरश्चरण की भागीदारी पर्याप्त है। उसमें सन्निहित जप, अर्चन, व्रत अनुशासन एवं विशिष्ट ध्यान के त्रिवेणी संगम को इतना पर्याप्त न मान लेना चाहिए कि उतने भर से आत्मशोधन का प्रयोजन भली प्रकार पूरा होता रहेगा। प्रयास पुरुषार्थ का नियोजन उस युग-सृजन प्रक्रिया में किया जाना चाहिए जिसमें स्वार्थ और परमार्थ का आत्म कल्याण और लोक-मंगल का उभयपक्षीय प्रयोजन पूर्ण होता है।
उपासना का अवलम्बन आवश्यक है। समय का अभाव य अन्य कोई कारण हो तो न्यूनतम उपासना पाँच मिनट की भी हो सकती है। स्नान की असुविधा हो तो मौन मानसिक जप किसी भी स्थिति में एवं किसी भी समय किया जा सकता है। जप के साथ ध्यान आवश्यक है। युग पुरश्चरण में शक्ति संचार की उच्चस्तरीय ध्यान धारणा का समावेश है।
उपासना’ में समय एवं संख्या का बन्धन तो नहीं है, पर नियमितता को जीवन्त रखने के लिए इतना तो करना ही होगा कि जो भी करना हो उसे संकल्पपूर्वक तथा नियमित रूप से किया जाय। अस्त-व्यस्तता अश्रद्धा की परिचायक है। निष्ठा में अनुशासन जुड़ा हुआ है। भले ही न्यूनतम मात्रा में उपासना की जाय, पर उसमें ढ़ील-पोल नहीं चलनी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-March
उपासना में मनोरंजक-चित्त को एक नियत विधि व्यवस्था में लगाये रहने वाली विधियाँ उपयुक्त रहती है। शंकर जी पर बेलपत्र चढ़ाना परि-क्रम करना, धूप, दीप आदि से देव प्रतिमा का पंचोपचार पूजन’ स्तवन, पाठ, जप आदि शारीरिक हलचलों के साथ की जाने वाली साधनायें इसी स्तर की होती हैं, उनमें रुचि उत्पन्न करने, स्वभाव का रुझान ढालने का लक्ष्य जुड़ा रहता है। आरम्भ में इस लाभ का भी महत्त्व करना होता है। तो शरीरगत हलचलें बन्द करके निश्चेष्ट होने की आवश्यकता पड़ती है। माँस पेशियों और नाड़ी संस्थान को जितना अधिक तनाव रहित शान्त रखा जा सके उतना ही लाभ मिलता है।
उपासना के साथ ईश्वर का प्रगाढ़ अनुग्रह भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है, जो आत्म बोध के रूप में ही हो सकता है।
उपासना, साधना, तपस्या, देव अनुग्रह, वरदान, स्वर्ग मुक्ति आदि आत्मिक उत्पादनों के पीछे जो तथ्य काम करता है उस श्रद्धा का परिपाक ही समझा जाना चाहिए। यदि श्रद्धा न हो तो यह समस्त क्रिया-कलाप मात्र कर्म-काण्ड बनकर ही रह जायेंगे और उनका परिणाम नगण्य जितना ही दिखाई देगा।
उपासना का जो स्वरूप समझ सका है उसी को मृत्युंजय बनने का सौभाग्य मिला है और किसी के साथ भी मखौल किया जा सकता है पर महाकाल के साथ नहीं। सिंह के दाँत गिनने की धृष्टता किसी को नहीं करनी चाहिए। समय के दुरुपयोग की भूल अपने भाग्य और भविष्य को ठुकराने, लतियाने की तरह है। जो समय गँवाता है वह प्रकारान्तर से अपने उत्कर्ष और आनन्द का द्वार ही बन्द करता है। मरण की दिशा में हम द्रुत गति प्रमादियों के पल्ले बँधता है पर जो जीवन सम्पदा से लाभान्वित होने के लिए जागरूक है उसे साँसों के बहुमूल्य मणि मुक्तकों का ध्यान रहता है और वे एक घड़ी भी निरर्थक नहीं गँवाते योजनाबद्ध दिनचर्या बनाते हैं और उस पर आरुढ रहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-April
उपासना साधना को भी चिकित्सा एवं मानसोपचार की तरह ही सर्वोपयोगी मान कर उन्हें विधिवत् उपयोग में लाने की आवश्यकता स्वीकार की जायेगी।
उपासना (5) विवेक की प्रधानता (6) आत्मीयता करुणा एवं ममता का विकास कहा भी हैं।
उपासना का अर्थ है अपने गुण कर्म स्वभाव का परिष्कार। मनुष्य में अकूत शक्तियाँ भरी पड़ी है। उनका जागरण थोड़े ही प्रयास से हो सकता है शर्त एक ही है कि वैसी उत्कृष्ट अभिलाषा जागृत हो और आत्म परिष्कार के उत्कृष्ट अभिलाषा जागृत हो और आत्म परिष्कार के उत्कृष्ट प्रयास में जुट पड़ने की तत्परता सक्रिय की जाय। मनुष्य में इतना विशेषताएँ बीच रूप में विद्यमान् हैं कि उनका जागरण सहज ही प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँचा देने में समर्थ हो सकता है। महामानवों के जीवन क्रम में पग-पग पर यही तथ्य जगमगाता दीखता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-May
उपासना से बड़ी सहायता मिलती है।
उपासना का बीजारोपण जीवन साधना की उर्वर भूमि पर ही उगता और फैलता है। इस तथ्य को जिनने भी जाना है उनने लिप्साओं पर अंकुश लगाया आर परमार्थ पथ पर चल पड़ने का साहस दिखाया है। कल्पना-जल्पना करते रहने में तो आत्म प्रवंचना ही बन पड़ती है। मन मोदक खाते रहने से पेट भरता है ?
उपासना तो उत्कृष्टता के रूप में विद्यमान अन्तःचेतना की जाती है। भ्रम ग्रसित एक जंजाल से निकल कर दूसरे में फँसते है। आत्मकल्याण के निमित्त जीवन साधना करने की आवश्यकता वे भी नहीं समझते और जिस तिस मंत्र-तंत्र का सहारा लेकर आत्मकल्याण और ईश्वरीय अनुग्रह का दिवा स्वप्न देखते है।
उपासना की आवश्यक जानकारी देने वाली 20 पैसे वाली पुस्तिका अधिक संख्या में गायत्री तपोभूमि से मँगा लें और उसे पढ़ाने सुनाने का प्रयत्न करें। इस प्रयत्न से नैष्ठिक उपासकों की संख्या बढ़ने में प्रयत्न की तुलना में सफलता ही अधिक मिलेगी। अन्तरिक्ष में प्रवाहित युगान्तरीय चेतना इस सफलता में विशेष रूप से सहायक सिद्ध होगी। साथ ही छोटे प्रज्ञामन्डलों की स्थापना के लिये भी श्रद्धालुओं के संयुक्त प्रयास को प्रोत्साहित किया जाये, तो हर क्षेत्र में इन्हीं दिनों अनेकों प्रज्ञामन्डल बन सकेंगे और उनका अनुकरण अन्य गाँवों में भी चल पड़ेगा सभी जागृत आत्माओं से गायत्री जयन्ती तक की अवधि इस प्रयोजन के लिए समयदान करने के लिए इन पंक्तियों द्वारा विशेष अनुरोध किया जा रहा हैं।
उपासना जीवन साधना का पथ प्रशस्त करती है। अर्थात् व्यक्तित्व सम्पन्न बनने का मनोविज्ञान और क्रियापरक आधार खड़ा करती है। यह प्रगति जिस स्तर की होती है। उसी अनुपात से परिष्कृत पुरुषार्थ निखरता है। यही है साधना से सिद्धि की सीधी सादी, सरल एवं सुनिश्चित प्रक्रिया साधक की यथार्थता और सफलता उसकी व्यक्तित्व सम्पन्नता के आधार पर ही आँकी जाती है।
उपासना का तत्व दर्शन जीवन साधना की आस्था एवं प्रेरणा उभारने के निमित्त हुआ है। भगवान खुशामद और रिश्वत की पकड़ से बहुत ऊँचा है। उपासना तो उत्कृष्टता के रूप में विद्यमान अन्तःचेतना की जाती है। भ्रम ग्रसित एक जंजाल से निकल कर दूसरे में फँसते है। आत्मकल्याण के निमित्त जीवन साधना करने की आवश्यकता वे भी नहीं समझते और जिस तिस मंत्र-तंत्र का सहारा लेकर आत्मकल्याण और ईश्वरीय अनुग्रह का दिवा स्वप्न देखते है।
उपासना प्रारम्भ की। वर्षों तक अन्न जल आदि का परित्याग कर उन्होंने विधि का अर्चन किया। उनकी तपश्चर्या से अभिभूत ब्रह्मा प्रकट हुए और पूछा-वत्स तुमने आह्वान किस हेतु किया ?
उपासना तो मात्र सुरुचि उत्पन्न करने भर का थोड़ा-सा प्रयोजन पूरा करती है अस्तु जिसे आत्म-शक्ति का बिन्दु संचय युग शक्ति बनने जा रहा है, उसको प्रचुर परिणाम में उत्पन्न करने के लिए प्रस्तुत युग पुरश्चरण का अभूत पूर्व आयोजन किया गया है और इसके लिये एक लाख नैष्ठिक साधक नया संकल्प देकर इन्हीं दिनों बनाये जा रहे है। यह देखने में छोटा किन्तु परिणाम में अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य है। इसे सम्पन्न करने में सहायता करने की अपेक्षा सभी जागृत आत्माओं से की गई है।
उपासना में मनुष्य का लोक-परलोक बनता है।
उपासना भी करते थे ओर साधना भी। दोनों की सचाई और गहराई उनके प्रखर जीवनदर्शन में प्रकट परिलक्षित होती थी, वे निर्वाह भी करते थे, कुटुम्ब भी सम्भालते थे साथ ही परमार्थ प्रयोजनों के लिए इतना कुछ करते थे, जिसके सहारे उन का व्यक्तित्व देवोपम स्तर की भूमिकाएँ निभाने में सफल रह सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-July
उपासना की दृष्टि में यह उत्तम पूजा-पद्धति है। जप-ध्यान के उपरान्त सूर्यार्घ चढ़ाया जाय और भावना की जाय वह जल मेरे व्यक्तित्व का प्रतीक है। जिसे सूक्ष्मात्मा- सविता के चरणों में समर्पित किया जा रहा है। भगवान इसे स्वीकार करे और भाप, वर्षा, ओस, बूंदें, बनाकर इसे विश्व की सुख साधना के लिए उन्मुक्त आकाश में छितराते। यज्ञ में जो उद्देश्य वसोधरा का है वही दैनिक जप में सूर्यार्घ का है।
उपासना तथा स्वाध्याय रुचि का अब तक का प्रयास एवं परिणाम (14) गायन एवं भाषण की वर्तमान क्षमता (15) वानप्रस्थ जीवन में प्रवेश करने के उपरान्त भी क्या कुछ समय घर-परिवार को सम्भालना पड़ेगा, यदि हो तो किसे समय तक और किस कारण? (16) अब तक के उल्लेखनीय ऐसे कार्यों का विवरण जिन्हें प्रशंसनीय अथवा निन्दनीय कहा जा सके (17) किसी राजनैतिक या धर्म-सम्प्रदाय के प्रति अपना विशेष रुझान-लगाव (18) किस भाषा पर किस स्तर का अधिकार है। (19) आपकी पत्नी का इस कदम में क्या रोल होगा? आप के परिवार वालों का इस कदम के सम्बन्ध में क्या रुख रहेगा। (20) आप किस सत्र में कितने समय शिक्षण प्राप्त करेंगे।
उपासना के अतिरिक्त स्वाध्याय और आत्म-चिन्तन का अवसर रहना ही चाहिए।
उपासना क्षेत्र में घुसी सट्टेबाजी की प्रवृत्ति हटाई जानी चाहिए और बताया जाना चाहिए- धन से लेकर ईश्वर तक हर घड़ी उपलब्धि के लिए प्रचण्ड पुरुषार्थ से कम में कुछ कहने लायक सफलता नहीं मिल सकती।
उपासना परक योगाभ्यास और तप साधना की दृष्टि से पंचकोशों का अनावरण और षटचक्रों का वेधन बहुत ही उपयुक्त प्रयोग, इसमें मनोविज्ञान और साधना विज्ञान के अत्यन्त महत्वपूर्ण रहस्यों का समावेश है सिद्धियों और विभूतियों की आशाजनक सम्भावना उस क्षेत्र में समाविष्ट है। कौन साधक क्या साधना करे, इसका निर्णय इस साधनाक्रम में से कौन किस प्रकार किस प्रक्रिया का आरम्भ, अभिवर्धन करे इसका निर्णय करने के पूर्व साधक का आन्तरिक स्तर देखना पड़ता है। हर रोगी के लिए एक ही दवा फिट नहीं पड़ती, प्रकृति के अनुरूप चिकित्सा क्रम में परिवर्तन करना पड़ता है इसी प्रकार उपासना पद्धति निर्धारण करते समय व्यक्ति विशेष की प्रकृति और स्थिति का ध्यान रखना होता है।
उपासना और साधना का-विशाल काय-कलेवर मनुष्य की आन्तरिक महानता में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि का लक्ष्य रखकर ही खड़ा किया गया है। नीति-निष्ठ, कर्तव्य परायण और समाजसेवी व्यक्तित्वों का विकास ही धर्म धारणा का- अध्यात्म-दर्शन का एकमात्र प्रयोजन है। ईश्वर की समीपता और प्रसन्नता प्राप्त करने का आधार लेकर चलने वाले मनुष्य को आत्म-परिष्कार और उदार ममता विस्तार का अवलम्बन स्वीकार करना पड़ता है। इस तरह प्रकारान्तर से आस्तिकता और ईश्वर भक्ति-धर्म धारणा और तपश्चर्या का चरम प्रयोजन मनुष्य में देवत्व का अवतरण ही बनता है। ब्राह्मण वर्ग इसी प्रयोजन की पूर्ति में अपने को खपाता था।
उपासना आदि में संलग्न होवे। लोक सो में तत्पर होता हुआ अपनी इंद्रियों का नियन्त्रण करे।
उपासना के समय पूजन, जप, ध्यान, सूर्यार्घ आदि भजन कृत्यों को इसी उद्देश्य से किया जाना चाहिए। संक्षिप्त योगाभ्यास की पूर्ति यह दैनिक पूजा-प्रक्रिया किसी हद तक कर देती है। व्यस्त जीवन में भी इतना क्रम तो चलना ही चाहिए।
उपासना प्रेमी को यह समझ ही लेना चाहिए कि मात्र मन्त्र-जप या पूजा-परक कर्मकांड आत्म-कल्याण की साधना का बहुत छोटा अंग हैं। उतने भर को पूर्णता मानकर बैठे रहना घातक है। भजन करना हो तो उसके साथ स्वाध्याय का- जीवन-शोधन का और सेवा-साधना का अनिवार्य समावेश उसी प्रकार होना चाहिए जिस तरह कि पूजा में अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, जल आदि के उपकरणों को एकत्रित करना आवश्यक माना जाता है। भजन एक जीवन नीति है- कुछ क्षणों में पूरी हो जाने वाली हलचल नहीं। इस सत्य को अध्यात्मिक जगत में जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है।
उपासना के क्रिया-योग से प्रायः सभी परिजन परिचित हैं। उसकी साधना भी दैनिक और सामयिक-क्रम पद्धति के अनुसार करते-कराते रहे हैं। अब अगली कक्षा में प्रवेश करना होगा ओर भाव-भूमिका’ यथा शक्ति भूमिका के उच्चतर और उच्चतम साधना-विधानों का अवगाहन करना होगा।
उपासना की पूर्ति। वस्तुतः दोनों का लक्ष्य एक ही है-शरीर की स्थिति के अनुरूप कष्ट साध्य एवं सरलतम कार्यों का विभाजन किया गया है।
उपासना और साधना के चरित्र और परमार्थ के पुण्य प्रयोजनों का समन्वय करते हुए लोक-निर्माण में प्रवृत्त होने की पुण्य परम्परा इन दिनों युग-निमार्ण परिवार ने ही आरम्भ अथवा पुनर्जीवित की है सृजन सेना में संलग्न हजारों लाखों कर्मयोगी सके प्रत्यक्ष प्रमाण है। अब तो कदम और भी आगे बढ़ाया जाना आवश्यक हो गया है। तो उसकी पूर्ति भी हमें ही करनी पड़ेगी। अधिकाधिक समय लोक-मंगल के लिए समर्पण करने वाले सुयोग्य एवं अवैतनिक परमार्थ परायण व्यक्तियों की न दिनों जो महती आवश्यकता अनुभव की जा रही हैं उसकी पूर्ति भी हमें करनी होगी। महानता का पथ अपनाया है तो एक के बाद एक बड़ी और कड़ी कसौटी पर अपने को सही सिद्ध करने के लिए हमें ही आगे आना होगा।
उपासना की, उथली परिभाषा में यदि लोग न उलझाये गये होते, इन्हें यथार्थता का बोध कराया गया होता और परमार्थ जीवन के साथ जुड़े हुए परम पुरुषार्थ है के लिए अभीष्ट उत्साह उत्पन्न किया गया होता तो हमारे देश के 80 लाख, भजन को घोषित व्यवसाय बताने वाले भजनानन्दी, अपने में और अपने समाज में प्रचंड प्रखरता प्रस्तुत कर रहे होते। उससे भजन और भजनानंदी दोनों ही धन्य हो जाते हैं। जिस धर्म और अध्यात्म में भजन का गौरव गाया है उसके चरणों पर भी संसार मस्तक झुकाता है, पर ऐसा हुआ कहाँ-एक अंग की पूर्णता मान बैठने से उपहासास्पद स्थिति उत्पन्न होती है, वहीं हमारे भजनानन्दी वर्ग की हो रही है।
उपासना करने का क्रम बनाया है उन्हें भी इस सिद्धान्त को ध्यान में रखकर चलना चाहिये। भगवान का भजन-ध्यान उनकी संक्षिप्त योगाभ्यास प्रक्रिया है। गायत्री-जप के साथ ही सविता देवता की ज्ञान-ज्योति का अवतरण अपने रोम-रोम में होने का ध्यान करने के लिए सर्वसाधारण को कहा जाता रहा है। सामान्य उपासना की दृष्टि में यह उत्तम पूजा-पद्धति है। जप-ध्यान के उपरान्त सूर्यार्घ चढ़ाया जाय और भावना की जाय वह जल मेरे व्यक्तित्व का प्रतीक है।
उपासना केवल पूजा की कोठरी तक सीमित नहीं रह सकती, उसे लोक सेवा के रूप में विकसित होना पड़ता है। यदि यह तथ्य भजन करने वालों को विदित रहा होता तो वे बेचारे निष्क्रिय दिनचर्या अपना कर ऐसे ही कुछ शब्दों की तोता रटन्त से सन्तुष्ट होकर एक कौने में बैठे मौत के दिन गिनने में न लगे रहते। उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व से समाज सर्वथा वंचित होकर न रह जाता है। भजन की उपासना की, उथली परिभाषा में यदि लोग न उलझाये गये होते, इन्हें यथार्थता का बोध कराया गया होता और परमार्थ जीवन के साथ जुड़े हुए परम पुरुषार्थ है के लिए अभीष्ट उत्साह उत्पन्न किया गया होता तो हमारे देश के 80 लाख, भजन को घोषित व्यवसाय बताने वाले भजनानन्दी, अपने में और अपने समाज में प्रचंड प्रखरता प्रस्तुत कर रहे होते। उससे भजन और भजनानंदी दोनों ही धन्य हो जाते हैं।
उपासना का उत्साह एवं वातावरण उत्पन्न करती है।
उपासना में ध्यान प्रक्रिया ही मुख्य रह जाती है।
उपासना परायण और ज्ञान-यज्ञ के विस्तार में अपना योगदान देना चाहिए और सेवा धर्म का पालन करते हुए आत्म-विस्तार के चरम-लक्ष्य तक पहुँचना चाहिए।
उपासना में इस महामंत्र का जप और परम तेजस्वी सविता-देवता का ध्यान-रोम-रोम में ज्योति किरणों का अवतरण, समावेश की अनुभूति के साथ किया जाता रहे तो उससे भी आत्मिक प्रगति में बड़ी सहायता मिलती है।
उपासना की उच्चस्तरीय भूमिका में वानप्रस्थी साधकों का प्रवेश कराया जायगा। जप, अनुष्ठान-परक, गायत्री-उपासना के क्रिया-योग से प्रायः सभी परिजन परिचित हैं। उसकी साधना भी दैनिक और सामयिक-क्रम पद्धति के अनुसार करते-कराते रहे हैं। अब अगली कक्षा में प्रवेश करना होगा ओर भाव-भूमिका’ यथा शक्ति भूमिका के उच्चतर और उच्चतम साधना-विधानों का अवगाहन करना होगा।
उपासना पद्धति निर्धारण करते समय व्यक्ति विशेष की प्रकृति और स्थिति का ध्यान रखना होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-September
उपासना इसी की व्यावहारिक प्रणाली है।
उपासना प्रज्ञायोग के रूप में करनी चाहिए। इसके पाँच अंग हैं (1) आत्म शोधन (2) देव पूजन (3) जप (4) ध्यान (5) विसर्जन।
उपासना में और अधिक प्रखरता का समावेश तथा इस शक्ति साधना वर्ष में अनुदान पाने हेतु अपनी पात्रता को निखारने का प्रयास पुरुषार्थ। इसके लिए युगसाधना के उद्गम स्रोत शाँतिकुँज युगतीर्थ से निरंतर संपर्क बनाए रहना व वहाँ सम्पन्न होने वाले शक्ति साधना सत्रों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना अनिवार्य है। परम पूज्य गुरुदेव की शक्ति का संवहन माता भगवती देवी कर रही है। उनकी साधना की प्रचण्डता से ही प्रतिपल अगणित व्यक्ति अनुदानों से लाभांवित हो रहे हैं।
उपासना करें) इसी से द्विजत्व-दूसरा देव जन्म भी प्राप्त होता है।
उपासना है। साधना हमने जीवन भर की है। साधना अर्थात् माला जपना नहीं, साधक का जीवन जीना। हमने अपनी
उपासना से साक्षी बुद्धि-ऋतम्भरा प्रज्ञा का उदय होता है। यही वेदों का सार है। पापों से निवृत्ति और पवित्रता की सिद्धि इसी से मिलती है। ब्रह्म तत्व की उपासना करने वाले के लिए यही साक्षात् ब्रह्म है। यह शिरोमणि मंत्र है।
उपासना करके ही काश्यप, गौतम, भृगु, अंगिरा, अत्रि, भारद्वाज, बृहस्पति, शुक्राचार्य, अगस्त्य, वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि ने ब्रह्मर्षि पद पाया और इन्द्र, वसु आदि देवताओं ने असुरों पर विजय पाई।
उपासना करने का निर्देश देते हुए कहा गया है ‘ब्रह्मत्वस्य स्थापनार्थं’ प्रविष्टा गायत्रीयं तावतास्य द्विजत्वम्। (ब्राह्मणत्व की स्थापना के लिए गायत्री की उपासना करें) इसी से द्विजत्व-दूसरा देव जन्म भी प्राप्त होता है।
उपासना है। ऐसे भावनाशील संसार को भगवान का उद्यान मानकर स्वयं कर्तव्य पारायण माली की तरह उसके उत्कर्ष अभ्युदय में अपना समय, श्रम, मनोयोग एवं साधन लगाते रहे हैं। यह कर्मयोग भी है। गीता में इसी का प्रधानतः प्रतिपादन है।
उपासना दिन-रात कभी भी की जा सकती है, पर प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त्त में किये गए उपचार विशेष शक्ति प्रदान करते हैं।
उपासनात्मक उपचार उसे ही अपने भाव-जगत में करना है किन्तु वातावरण तथा परिस्थितियों की भी इन उपचारों में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, यह तथ्य नहीं बिसराया जाना चाहिए।
उपासना मार्ग में इसी कारण प्रतीकों को स्वीकारा गया है। इन्हें मुख्यतः तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। प्रथम शब्द प्रतीक जैसे ओम् आदि, द्वितीय विभिन्न आकृतियाँ जैसे स्वास्तिक, क्रॉस, तालाब में स्थिर कमल तीसरे प्रकार के प्रतीक विभिन्न मानवीय मूर्तियों के रूप में होते हैं।
उपासना की है तथा उसका परिणाम हमारे सामने है। यही आप अपने जीवन में देखना चाहे तो आप भी प्रयोग कर सकते हैं। फिर आप हमें बताइए कि आपकी साधना सिद्धि की दिशा में फैली कि नहीं। हमारी बात समाप्त। ॐ शाँतिः।
उपासना की साकार विधि बाहर मूर्ति के रूप में होती है। कारण कि अनुराग के लिए बाहरी प्रतीक की जरूरत है। विभिन्न देशों के झण्डे महापुरुषों के चित्र इसी मानवीय स्वभाव के द्योतक हैं। बिना प्रतीक के भावाभिव्यक्ति किस आधार पर हो।
उपासना विशेषाँक” के रूप में प्रकाशित होगा। इसमें अपनी स्थूल सूक्ष्म व कारण शरीर की सत्ता को निखारने व इस विशिष्ट संक्रातिकाल में विशिष्ट साधना
उपासना, साधना, आराधना इन तीन सूत्रों पर चला है। ये तीनों क्या है? ये है जमीन, खाद और पानी। भगवान के चरणों में हमने अपने आपको समर्पित किया है व भगवान जितने शक्तिशाली है, उतने ही हम हो गए। ईंधन को आग में डाल देते हैं, वह भी उतना ही गरम और आग जैसा हो जाता है।
उपासना तक सीमित न रह कर गुप्त और रहस्यमयी गायत्री साधना के क्षेत्र में प्रवेश करने का अधिकार मिलता है। ऐसे लोग योग और तप में संलग्न होकर उसका तत्वज्ञान हृदयंगम कर जीवन शोधन कर उसे ऊँचा उठा पाने में सफल होते हैं।
उपासना के लिए बैठने के साथ कुछ सनातन नियम जुड़े हुए हैं जिनमें से एक यह है कि शरीर, वस्त्र, स्थान, पात्र, उपकरण सभी को शुद्ध करके बैठा जाय। देवता स्वयं स्वच्छ हैं। स्वच्छता का वातावरण चाहते हैं। साधक स्वच्छ होगा, ऐसी आशा करते है। यह स्वच्छता बहिरंग भी होनी चाहिए और अन्तरंग भी।
उपासनात्मक प्रयास ही अत्यन्त प्रभावोत्पादक परिणाम सामने लाने वाला सिद्ध होता है। उपासना दिन-रात कभी भी की जा सकती है, पर प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त्त में किये गए उपचार विशेष शक्ति प्रदान करते हैं।
उपासना करनी चाहिए।
उपासना करे। जिसे अन्य कामनाओं की ललक हो वह अन्य देवताओं को पूजे।
उपासना से मिल सकती हैं।
उपासना-साधना पर भी यही तथ्य लागू होता है। साधक का अपना पुरुषार्थ प्रमुख है, उपासनात्मक उपचार उसे ही अपने भाव-जगत में करना है किन्तु वातावरण तथा परिस्थितियों की भी इन उपचारों में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, यह तथ्य नहीं बिसराया जाना चाहिए।
उपासना करने वाले के लिए यही साक्षात् ब्रह्म है। यह शिरोमणि मंत्र है। इससे बढ़कर तंत्र या पुराण में कोई भी मंत्र नहीं है। इसी ग्रंथ में आगे कहा गया है-
उपासना पराक्रम महाकाल की सत्ता ने निर्धारित किया है, तत्संबंधी मार्गदर्शन देने हेतु आगामी मास की अखण्ड-ज्योति पत्रिका का अंक “उपासना विशेषाँक” के रूप में प्रकाशित होगा। इसमें अपनी स्थूल सूक्ष्म व कारण शरीर की सत्ता को निखारने व इस विशिष्ट संक्रातिकाल में विशिष्ट साधना
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-August
उपासना का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि हम अपनी इच्छाओं-कामनाओं से अपने आपको खाली कर दें। उसी की इच्छा व प्रेरणा के आधार पर चलते रहने की बात सोचें तो यह समर्पण भाव हमें सतत शाश्वत आनन्द की अनुभूति कराता रहेगा। ऐसा दर्शन हमें हो सके तो वस्तुतः हम धन्य हो जायँ।
उपासना का सुविस्तृत उल्लेख मिलता है। उस मान्यता के अनुसार ‘मनुष्य के उच्छृंखलतापूर्ण व्यवहार से कुपित होकर भूकंप देवता अपना ध्वंसात्मक स्वरूप प्रकट करते और मनुष्य सहित समूचे प्राणि समुदाय को दंडित करते-त्रास देते हैं। विश्व के भिन्न-भिन्न राष्ट्रों में भी इस संबंध में अलग-अलग तरह की मान्यतायें एवं धारणायें प्रचलित हैं, लेकिन उनके वैज्ञानिक कारण उपलब्ध न होने से उन्हें प्रामाणिक नहीं माना गया। प्रख्यात ग्रीक दार्शनिक अरस्तू का कहना है कि प्रकृति के साथ जब कभी मनुष्य का व्यवहार असहनीय हो जाता है, तो वह पृथ्वी के भीतर भरी वाष्प को बाहर निकालकर दुर्बल स्थानों पर विस्फोट कर देती है।
उपासना के समस्त कर्मकाण्डों का उद्देश्य इसी आन्तरिक वरिष्ठता का सम्पादन और अभिवर्धन करना है।
उपासना प्रत्येक भारतीय परिवार में परम पुनीत कर्तव्य की भाँति करने का इस मिशन ने परम पूज्य गुरुदेव को आश्वासन दिया है, उसे सम्पूर्ण श्रद्धा के साथ सम्पन्न किया और कराया जाये।
उपासना-साधना, आराधना का अवलम्बन ही है।
उपासना का, प्रार्थना एवं ध्यान साधना आदि का भी समावेश रखा गया।
उपासना, साधना, प्रार्थना-अभ्यर्थना के साथ ही आराधना का भी उनके दैनिक कृत्यों में अनिवार्य रूप से समावेश था।
उपासनात्मक समस्त कर्मकाण्डों की संरचना इसी एक प्रयोजन के लिए हुई है, कि व्यक्ति की पशु-प्रवृत्तियों के घटने और दैवी सम्पदाओं के बढ़ने का सिलसिला क्रमबद्ध रूप से चलता रहे। यदि उद्देश्य का विस्मरण कर दिया जाय और मात्रा पूजा परक क्रिया-कृत्यों को ही सब कुछ मान लिया जाय, तो यह चिन्ह-पूजा का निर्जीव उपक्रम ही माना जायगा और उतने से बढ़ी-चढ़ी उपलब्धियों की आशा करने वालों को निराश ही रहना पड़ेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-March
उपासना-अनुष्ठानों में तो अग्निहोत्र को अनिवार्य रूप से जोड़ा गया है और कहा जाता है कि जप की दशाँश या परिस्थितिवश शताँश आहुतियाँ तो निश्चित रूप से दी ही जानी चाहिए। इसके प्रभाव से अन्नमय कोश को भेदकर ताप और मंत्र शक्ति को अंतराल में प्रविष्ट होकर प्राण शरीर और कारण शरीर के संशोधन को ऐसा सुयोग मिलता है जो पकड़ में न जाने वाले विषाणुओं और जन्म जन्मान्तरों के कुसंस्कारों को भी सुधारने लगता है। यह एक सफलतम चिकित्सकीय सिद्धान्त है।
उपासना, दूसरा जीवन को उत्कृष्ट-अनुकरणीय बनाने की साधना। आत्म शोधन कर इन दोनों के लिए यदि स्थिर मति और प्रगाढ़ निष्ठ के साथ प्रयास किया जाय तो निःसन्देह आत्मिक प्रगति भी उसी तरह मिल सकती है, जैसी कि भौतिक प्रगति।
उपासना के बाद बाहर वाले कमरे में टहल रहे थे। टहलते-टहलते कभी-कभार खिड़की से बाहर की ओर झाँक लेते।
उपासना और साधना का अवलम्बन लेना चाहिए।
उपासना घर में बाहर से दौड़ी-दौड़ी दुग्धोवा आयी। प्रमुख पर्व की वजह से भीड़ भी ज्यादा थी। लेकिन वह सभी के बीच से गुजरते प्रधान पुजारी का लबादा थामकर कहने लगी “मैंने उसके लिए ‘आहुर मज्द’ से प्रार्थना की है। आप भी उसके लिए प्रार्थना करें।”
उपासना की सफलता के लिए आत्मशोधन की यह प्रक्रिया कभी बन्द नहीं करनी चाहिए।
उपासना सहज स्वरूप है व्याहृतियों वाली त्रिपदा गायत्री का जप। “ॐ भूर्भुवः स्वः” -यह शीर्ष भाग है, जिसका तात्पर्य यह है कि आकाश, पाताल और धरातल के रूप में जाने-जाने वाले तीनों लोकों में उस दिव्य सत्ता को समाविष्ट अनुभव करना। जिस प्रकार न्यायधीश की, पुलिस अधीक्षक की उपस्थिति में अपराध करने का कोई साहस नहीं करता, उसी प्रकार सर्वदा सर्वव्यापी, न्यायकारी सत्ता की उपस्थिति अपने सब और सदा सर्वदा अनुभव करना और किसी भी स्तर की अनीति का आचरण न होने देना। “ॐ” अर्थात् परमात्मा। उसे विराट् विश्व ब्रह्माण्ड के रूप में व्यापक भी समझा जा सकता है।
उपासना और जीवन-साधना यदि सच्चे अर्थों में की गयी हो, तो उसकी दोनों आत्मिक ऋद्धि-सिद्धियों, स्वर्ग और मुक्ति के रूप में निरन्तर अनुभव में उभरती रहती हैं और उनके रसास्वादन से हर घड़ी कृत-कृत्य हो चलने का अनुभव होता है।
उपासना द्वारा अनेकों भौतिक सिद्धियों, उपलब्धियों के मिलने का भी इतिहास पुराणों में वर्णन है। वशिष्ठ के आश्रम में विद्यमान नन्दिनी रूपी गायत्री ने राजा विश्वमित्र की सहस्रों सैनिकों वाली सेना का कुछ ही पलों में भोजन व्यवस्था बनाकर, उन सबको चकित कर दिया था। गौतम मुनि को माता गायत्री ने अक्षय-पात्र प्रदान किया था, जिसके माध्यम से उन दिनों की दुर्भिक्ष−पीड़ित जनता को आहार प्राप्त हुआ था। दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न कराने वाले शृंगी को गायत्री का अनुग्रह ही प्राप्त था। जिसके सहारे चार देव पुत्र उन्हें प्राप्त हुए।
उपासना घर के प्रधान पुजारी। किन्तु कल की बात और थी। ‘किप्पूर’ का दिन साल में रोज-रोज तो आता नहीं। आज जब लोगों को यह खबर मिलेगी तब समाज की सारी परम्पराएँ एक साथ उनके छोटे से परिवार पर टूट पड़ेंगी। माँगियो के प्रधान देवता क्रोध पता नहीं कौन सी विपत्ति ढहाए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-November
उपासना का वास्तविक स्वरूप तो जप ध्यान जैसे मानसिक अभ्यासों में और योग-तप जैसे शारीरिक पुरुषार्थों के साथ जुड़ा रहता है। जप ध्यान को व्यायाम और योग तप को आहार की संज्ञा दी जाती है। ईश्वर की मनुहार वस्तुतः प्रकारान्तर से आत्म परिष्कार का ही एक मनोवैज्ञानिक स्वरूप समझा जाय तो इससे हम वस्तुस्थिति को समझने में अधिक अच्छी तरह समर्थ हो सकते हैं।
उपासना ही वास्तविक पंचोपचार है। कठोपनिषद् के यम नचिकेता संवाद में इसे ही पंचाग्नि विधा कहा गया है।
उपासना और धर्मचर्चा के अतिरिक्त जितना भी समय बचता उसे दीन दुखियों की सेवा में ही लगाये रहते। जन मानस में धर्मधारणा भरने का कार्यक्रम बनाया और मण्डली समेत दूर-दूर क्षेत्रों में भ्रमण करते हुए वह कार्य जीवन भर करते रहे। उनने हजारों गीत लिखे जो धार्मिक जगत की अमूल्य निधि है।
उपासना में भी प्रगति होती है और दैनन्दिन जीवन में भी सहज प्रसन्नता समाई रहती है। प्रारंभ में शिथिलीकरण का अभ्यास 10-15 मिनट तक करना चाहिए, बाद में इसे आधे घंटे तक बढ़ा सकते हैं। आध्यात्मिक विकास के इच्छुक प्रत्येक साधक को यह अभ्यास बहुत सहायक सिद्ध होता है। अन्यथा तनावग्रस्तता एवं चित्त विक्षेप की स्थिति में मन कभी भी एकाग्र नहीं हो पाता और चित्त की तन्मयता-प्रसन्नता के बिना जप और उपासना-साधना से समुचित लाभ नहीं मिल सकता, पर्याप्त प्रगति नहीं हो पाती।
उपासना-साधना से समुचित लाभ नहीं मिल सकता, पर्याप्त प्रगति नहीं हो पाती।
उपासना से विमल हुई बुद्धि में विद्वता की तीव्रधार चढ़ती चली गयी जिससे अध्यात्म विद्या के गूढ़ रहस्य एक के बाद एक परतों की तरह खुलते चले गये। प्रतिफल यह हुआ कि बड़ी संख्या में लोग उनसे दीक्षा ग्रहण करने लगे। उन्होंने लोगों को बताया कि महाकाली गायत्री की ही एक शक्ति धारा है जिसका अर्थ पशु प्रवृत्तियों का उन्मूलन होता है-पशुवध नहीं, फलतः गोंडवाना प्रदेश का यह कलंक छूटा और लोग गायत्री महाशक्ति की सात्विक दक्षिणमार्गी उपासना में प्रवृत्त हो सके। चतुर्भुज ने सर्वत्र घूम-घूमकर गायत्री उपासना की दीक्षा दी और इस अन्धकार के युग में भी इस महाविद्या को विनष्ट होने, विलुप्त होने से बचा लिया। जिस समय यह सभा चल रही थी, श्रोताओं में चोरी के माल सहित एक चोर भी उत्कण्ठावश आ बैठा।
उपासना अवधि में साधक गायत्री महामंत्र के जप के साथ ही अपने ‘आज्ञाचक्र’ संस्थान में वैसे ही स्वर्णिम सविता का ध्यान करता है। अगले चरण के इस ध्यान में यह प्रगाढ़ भावना करनी पड़ती है कि ईश्वरीय दिव्य प्रकाश की प्रेरणापूर्ण किरणें जो अपने ऊपर बरस रही हैं उनसे सम्पूर्ण स्थूल,सूक्ष्म एवं कारण शरीर जगमग हो गया है। आज्ञाचक्र स्थित आत्म-ज्योति जाग्रत हो गयी है। वहाँ एक्स-रेज जैसी प्रचण्ड किरणें निकल रही है जो वस्तुओं, व्यक्तियों को ही नहीं,विचारों भावनाओं, शास्त्रों और सैद्धान्तिक प्रतिपादनों तक के मर्म-वेधन में समर्थ हैं। जो अन्तर्निहित दिव्य दृष्टि को प्रखर बना रही है।
उपासना से और अन्त निराकार उपासना में होता है। साकार और निराकार उपासनायें दो कक्षाओं की भाँति हैं जिसमें आरंभ में बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है और बाद में वही कागज स्याही और पेन से लिखने लगता है। दोनों स्थितियों में अन्तर है, पर इसमें कोई विरोध नहीं है। साकार का अवलम्बन लेकर ही निराकार में प्रवेश किया जाता है।
उपासना की दीक्षा दी और इस अन्धकार के युग में भी इस महाविद्या को विनष्ट होने, विलुप्त होने से बचा लिया। जिस समय यह सभा चल रही थी, श्रोताओं में चोरी के माल सहित एक चोर भी उत्कण्ठावश आ बैठा। उसी सभा में वह व्यक्ति भी उपस्थित था जिसके यहाँ चोरी हुई थी। संत ने कहा-गायत्री सद्बुद्धि की, सद्-विवेक की, ऋतंभरा प्रज्ञा की देवी है। इसका अवलम्बन लेने वालों का मन पाप पंक में कभी नहीं लिपटता।
उपासना प्रारंभ की। गायत्री उपासना से उन्हें न केवल आत्मबोध हुआ, वरन् वह शक्ति भी मिली जिससे दूसरों को प्रभावित कर पाते। उनकी वाणी में वह शक्ति उभरी जिससे सुनने वाले ठगे से रह जाते। गायत्री उपासना से विमल हुई बुद्धि में विद्वता की तीव्रधार चढ़ती चली गयी जिससे अध्यात्म विद्या के गूढ़ रहस्य एक के बाद एक परतों की तरह खुलते चले गये। प्रतिफल यह हुआ कि बड़ी संख्या में लोग उनसे दीक्षा ग्रहण करने लगे।
उपासना के क्षणों में भी वह तनावग्रस्त बना रहता है और उसमें वह तल्लीनता नहीं आ पाती जो साधना की सफलता के लिए अनिवार्य है। मानसिक प्रतिक्रियाओं की यह परस्पर विरोधी खींचातानी तनाव को और बढ़ा देती है। उपासना में बैठने के लिए आसन की स्थिरता भी आवश्यक है व उसके लिए शैथिल्य का अभ्यास आवश्यक है।
उपासनारत हो जाना चाहिए, क्योंकि उस समय सम्पूर्ण प्राण संस्थान में एकरूपता होती है। जब सुषुम्ना कार्य नहीं करती, तब प्रयत्न के बाद भी एकाग्रता नहीं आती। साधना की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि इड़ा-पिंगला के प्राण प्रवाह में एकरूपता लायी जाय। जब यह संभव होगा तभी सुषुम्ना क्रियाशील बनेगी।
उपासना जैसे दक्षिण मार्ग में आत्मा की उच्चस्तरीय शक्तियों का उपयोग किया जाता है और इसके लिए तप संयम का मार्ग अपनाया जाता है, इसका प्रतिफल आत्मशान्ति और दूसरों को सद्गति प्रदान करने में होता है।
उपासना से जुड़े अन्य व्रत सभी का अपना महत्व है। इन सबके अनुशीलन से ही साधक का व्यक्तित्व मंत्र जप से उत्पन्न दिव्य चेतन ऊर्जा के धारण और उपयोग में समर्थ होता है।
उपासना में होता है। साकार और निराकार उपासनायें दो कक्षाओं की भाँति हैं जिसमें आरंभ में बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है और बाद में वही कागज स्याही और पेन से लिखने लगता है। दोनों स्थितियों में अन्तर है, पर इसमें कोई विरोध नहीं है। साकार का अवलम्बन लेकर ही निराकार में प्रवेश किया जाता है।
उपासना में बैठने के लिए आसन की स्थिरता भी आवश्यक है व उसके लिए शैथिल्य का अभ्यास आवश्यक है।
उपासना, जीवन जीने की कला, ब्रह्मवर्चस् शोध तथा भविष्य विज्ञान पर अति महत्वपूर्ण सामग्री और दी जाय। उसी कड़ी में इस वर्ष एक विशेषाँक गायत्री उपासना पर तथा पूज्य गुरुदेव के जीवन के लीला प्रसंगों पर एक अंक निकाला गया था। यदि यह सामग्री यथावत देते रहना है तो कागज का संकट सामने आ खड़ा होता है व वर्तमान दरों पर ही अखण्ड-ज्योति के साथ पृष्ठ कम करने की बात कहता है। दूसरा विकल्प यह है कि सामग्री दी जाती रहे, परिजनों को इस महत्वपूर्ण लाभ से वंचित न किया जाय एवं चन्दा इतना बढ़ा दिया जाय कि लागत मूल्य पर पत्रिका सब तक पहुँचती रहे। कोई भी परिजन सामग्री में घटोत्तरी के लिए तैयार नहीं है।
उपासना का अर्थ है उस अदृश्य सत्ता के अस्तित्व और विधान की अनुभूति और तदनुसार मर्यादा पालन के लिए अपनी मनोभूमि का प्रशिक्षण।
उपासना के समय, वरन् किसी भी समय तनाव से पिंड छुड़ाने का यह उत्तम उपचार है। इस अभ्यास के लिए शवासन सर्वाधिक उपयोगी होता है। इसमें शरीर को ऐसी स्थिति में रखना सुविधा जनक होता है जब उसमें किसी भी प्रकार का दबाव न पड़े। शवासन का अर्थ है मुर्दे की तरह निश्चेष्ट पड़े रहना। यह बिस्तर पर पड़े-पड़े भी संभव है और आराम कुर्सी पर बैठकर या दीवार अथवा मसनद का सहारा लेकर भी किया जा सकता है।
उपासना का फल उस क्षेत्र की उन्नति के रूप में उभरा। सारे प्रदेश की जनता ने अपना दूसरा जन्म हुआ अनुभव किया। लोगों को जीव-हिंसा से विरत करने और उनका कायाकल्प करने का संत का संकल्प पूरा हुआ।
उपासना से शुरू होती है और धीरे-धीरे विकसित होकर वह निराकार तक जा पहुँचती है। मन किसी रूप पर ही जमता है। निराकार का ध्यान पूर्ण परिपक्व मन ही कर सकता है, आरंभिक अभ्यास के लिए वह सर्वथा कठिन है। इसलिए साधना का आरम्भ साकार उपासना से और अन्त निराकार उपासना में होता है। साकार और निराकार उपासनायें दो कक्षाओं की भाँति हैं जिसमें आरंभ में बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है और बाद में वही कागज स्याही और पेन से लिखने लगता है।
उपासना से उन्हें न केवल आत्मबोध हुआ, वरन् वह शक्ति भी मिली जिससे दूसरों को प्रभावित कर पाते। उनकी वाणी में वह शक्ति उभरी जिससे सुनने वाले ठगे से रह जाते। गायत्री उपासना से विमल हुई बुद्धि में विद्वता की तीव्रधार चढ़ती चली गयी जिससे अध्यात्म विद्या के गूढ़ रहस्य एक के बाद एक परतों की तरह खुलते चले गये। प्रतिफल यह हुआ कि बड़ी संख्या में लोग उनसे दीक्षा ग्रहण करने लगे। उन्होंने लोगों को बताया कि महाकाली गायत्री की ही एक शक्ति धारा है जिसका अर्थ पशु प्रवृत्तियों का उन्मूलन होता है-पशुवध नहीं, फलतः गोंडवाना प्रदेश का यह कलंक छूटा और लोग गायत्री महाशक्ति की सात्विक दक्षिणमार्गी उपासना में प्रवृत्त हो सके।
उपासना के सर्वथा उपयुक्त मनोभूमि है। यदि मस्तिष्क में तनाव हो तो उस स्थिति में उपासना के लिए बैठने के पूर्व शिथिलीकरण की प्रक्रिया द्वारा तनाव मुक्त हो लेना चाहिए, तदुपरान्त उपासना करनी चाहिए।
उपासना की दूसरी भूमिका में जप तो चलता रहता है, पर ध्यान की सीमा सीमित हो जाती है। साधना के उच्च सोपानों पर आगे बढ़ने के लिए मन को एकाग्र करने की परिधि को आत्मिक विकास के
उपासना की जाए तो वे सभी वरदान उपलब्ध हो सकते हैं जो ईश्वर के अनुग्रह से किसी को कभी मिल सके हैं। यह प्रत्यक्ष देवता है। हमारे इतना समीप है कि मिलन से उत्पन्न असीम आनन्द की अनुभूति अहर्निशि की जा सके।
उपासना के बारे में कहा गया है-
उपासना के नाम पर होने वाली ऐसी निर्दय जीव हिंसा देखकर द्रवित हो गये। उन्होंने लोगों को बहुतेरा समझाने का प्रयत्न किया, किन्तु समर्थ को मानने और प्रभावशील व्यक्तित्व का आदेश स्वीकारने की अनादि काल से चली आ रही परम्परा झूठी कैसे होती? प्रभावशाली व्यक्तित्व और प्राणपूर्ण वाणी ही जन दिशा मोड़ती है। उसके अभाव में अत्यन्त करुणार्द्र चतुर्भुज का भी कोई प्रभाव पड़ा नहीं।
उपासना पर तथा पूज्य गुरुदेव के जीवन के लीला प्रसंगों पर एक अंक निकाला गया था। यदि यह सामग्री यथावत देते रहना है तो कागज का संकट सामने आ खड़ा होता है व वर्तमान दरों पर ही अखण्ड-ज्योति के साथ पृष्ठ कम करने की बात कहता है। दूसरा विकल्प यह है कि सामग्री दी जाती रहे, परिजनों को इस महत्वपूर्ण लाभ से वंचित न किया जाय एवं चन्दा इतना बढ़ा दिया जाय कि लागत मूल्य पर पत्रिका सब तक पहुँचती रहे। कोई भी परिजन सामग्री में घटोत्तरी के लिए तैयार नहीं है। मन सबका यही है कि युग संधि के इन महत्वपूर्ण वर्षों में मिल रहे इस बहुमूल्य मार्गदर्शन से हमें वंचित न किया जाय।
उपासना की दीक्षा ग्रहण की और मांसाहार जैसी दुष्प्रवृत्ति का परित्याग किया।
उपासना के लिए बैठने के पूर्व शिथिलीकरण की प्रक्रिया द्वारा तनाव मुक्त हो लेना चाहिए, तदुपरान्त उपासना करनी चाहिए।
उपासना का व्रत लिया था। धर्म सभा का आयोजन उन्हीं के उद्बोधन के लिए हुआ था।
उपासना का विधि-विधान भक्तियोग के अंतर्गत आता है। भक्ति ईश्वर की ही की जाती है। इसलिए सर्वत्र “ईश्वर भक्ति” शब्द ही प्रयोग में आता है। अपनी भुलक्कड़ चेतना को झकझोरने और उसे विकासोन्मुख बनाकर मनोकामना पूर्ति का वरदान दे सकने योग्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसी अनुनय-विनय का नाम ईश्वर प्रार्थना है।
उपासना का क्रम निराकार हो अथवा साकार, दोनों ही परिस्थितियों में जप के साथ ध्यान अनिवार्य है। ध्यान से चित्त में स्थिरता आती और अन्तः चेतना की प्रखरता बढ़ती है। प्रेम भाव का विकास होता है। श्रद्धासिक्त भावनाओं की प्रगाढ़ता जितना अधिक बढ़ती और उच्चस्तरीय बनती जाती है, साधना की सफलता भी उतनी ही तीव्रगति से अपना सत्परिणाम प्रस्तुत करती और साधक को धन्य बनाती है।
उपासना में प्रवृत्त हो सके। चतुर्भुज ने सर्वत्र घूम-घूमकर गायत्री उपासना की दीक्षा दी और इस अन्धकार के युग में भी इस महाविद्या को विनष्ट होने, विलुप्त होने से बचा लिया। जिस समय यह सभा चल रही थी, श्रोताओं में चोरी के माल सहित एक चोर भी उत्कण्ठावश आ बैठा। उसी सभा में वह व्यक्ति भी उपस्थित था जिसके यहाँ चोरी हुई थी। संत ने कहा-गायत्री सद्बुद्धि की, सद्-विवेक की, ऋतंभरा प्रज्ञा की देवी है।
उपासना से विकसित संत की तेजस्विता देखकर वे पराभूत हो उठे और उनने स्वीकार किया कि लोगों का हृदय परिवर्तन राजतंत्र से नहीं आध्यात्मिक धरातल पर ही संभव है। सो उनने भी विधिवत् गायत्री उपासना की दीक्षा ग्रहण की और मांसाहार जैसी दुष्प्रवृत्ति का परित्याग किया।
उपासनायें दो कक्षाओं की भाँति हैं जिसमें आरंभ में बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है और बाद में वही कागज स्याही और पेन से लिखने लगता है। दोनों स्थितियों में अन्तर है, पर इसमें कोई विरोध नहीं है। साकार का अवलम्बन लेकर ही निराकार में प्रवेश किया जाता है।
उपासना करनी चाहिए।
उपासना की प्रथम भूमिका में आवश्यक है। जप के साथ श्रद्धा भाव की मात्रा भी पर्याप्त होनी चाहिए। इस ध्यान को कल्पना न समझा जाय, वरन् साधक अपने को वस्तुतः उसी स्थिति में अनुभव करे और माता के प्रति अनन्य प्रेम-भाव के साथ तन्मयता अनुभव करे, यह अनिवार्य है। तभी इस अनुभूति की प्रकटता में अलौकिक आनन्द का रसास्वादन होता है और मन निरन्तर इसी में लगे रहने की इच्छा करता है। इस प्रकार मन को वश में करने और एक ही लक्ष्य में रहने की एक बड़ी आवश्यकता सहज ही पूरी हो जाती है।
उपासना करना उचित है। गायत्री महामंत्र के जप के साथ माता का एक सुन्दर नारी के रूप में ध्यान करना होता है। सुन्दर से सुन्दर आकृति की कल्पना करके उसे अपनी सगी माता से भी बढ़कर माना और जप करते समय अपने ध्यान क्षेत्र में प्रतिष्ठित करना होता है। साथ ही साथ अपने को एक साल के छोटे बच्चे की स्थिति में अनुभव किया जाता है। छोटे बालक का हृदय सर्वथा शुद्ध, निर्मल और निश्चिन्त, निश्छल होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-January
उपासना को सार्वभौम, सर्वजनीन कहा गया है। सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा हर किसी को मिले, हर व्यक्ति श्रेष्ठता का वरण करे, इसमें किसी प्रकार का मत वैभिन्य नहीं हो सकता। इसीलिए कहा जाता है कि सब धर्म, जाति, लिंग व वर्ण के व्यक्ति बिना किसी भेद के इस उपासना के मार्ग को अपना सकते हैं।
उपासना के माध्यम से संवेदनशील बनाया जाता है। साधना में शालीनता और सुसंस्कारिता की अवधारणा है। चरित्र निष्ठा भी इसी को कहते हैं। आराधना में परमार्थ परायणता अपनाने, सेवा साधना में संलग्न होने, उदारता अपनाने से लोक मंगल के कृत्य तथा समय बन पड़ते रहा करते हैं। तीनों का सम्मिश्रण गंगा, यमुना, सरस्वती के मिलने पर तीर्थराज त्रिवेणी संगम जैसा आधार बन पड़ता है।
उपासना करने के आदेश को ब्राह्मणत्व की ब्रह्मतेजस् की प्राप्ति के लिए मनुष्य मात्र का कर्तव्य बताया है और अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण कार्यों में गायत्री उपासना को प्रथम स्थान दिया है। जो इस धर्म-कर्तव्य का पालन नहीं करते उनकी स्थान-स्थान पर तीव्र भर्त्सना की गई है और उन्हें चाण्डाल तक कहा गया है। भले ही उन ने ब्राह्मण कुल में ही क्यों न जन्म लिया हो।
उपासना से होती है, इस तथ्य को समझा और समझाया जाना चाहिए।
उपासना अगले दिनों की जाएगी।
उपासना की दिव्य उपलब्धियाँ अधिक अच्छी तरह हो सकती हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म। दूसरे जन्म से तात्पर्य है पशु प्रवृत्तियों से जकड़े हुए सामान्य प्राणि जीवन से ऊँचा उठकर मानवी उत्तरदायित्वों की विशिष्टता भरी भूमिका को अपनाया जाना। नर पशु की रीति-नीति छोड़ कर देव जीवन की महानता अपनाया जाना। इसके लिए व्रत लेना पड़ता है कि वासना-तृष्णा की क्षुद्रता में कृमि कीटकों की तरह निरत नहीं रहा जायगा, वरन् मानवी उत्कृष्टता को जीवनक्रम में ओत-प्रोत करते हुए उच्चस्तरीय सिद्धान्तों को अपनाकर चला जायगा।
उपासना का अधिकार हर किसी को है। जो भी इस महाशक्ति का परिपूर्ण लाभ उठाना चाहें उन्हें जप, तप ही नहीं अपने व्यवहारिक जीवन में ब्रह्मणत्व का, द्विजत्व का अवतरण भी करना चाहिए। चरित्र जितना शुद्ध होगा यह महामंत्र उतना ही प्रखर लाभ पहुँचायेगा। चरित्रवान व्यक्ति की थोड़ी सी उपासना भी इतना अद्भुत लाभ दिखाती है, जितना कि दुश्चरित्र व्यक्ति के आजीवन क्रियाकृत्य भी नहीं कर सकते। ब्राह्मणत्व यदि अपने भीतर अर्जित कर लिया जाय तो गायत्री महाशक्ति की उपासना के जो भी लाभ शास्त्रकारों ने बताये है उनकी सत्यता प्रत्येक साधक अक्षरशः अपने जीवन में देख सकता है।
उपासना से तथा आत्म-निर्माण की कठोर जीवन-साधना में अमर शक्ति प्राप्त करता है।
उपासना का अधिकारी तथा अमुक को अनधिकारी ठहराया जाता रहा है। जबकि वास्तविकता इससे सर्वथा भिन्न है। तत्वदर्शी-मानवतावादी ऋषि इतने संकीर्ण हो ही नहीं सकते थे कि वे किसी अमुक जाति-वंश को आत्मिक प्रगति के साधनों को अपनाने का अधिकारी ठहरायें और अन्यों को उससे वंचित कर दें। ऐसा पक्षपात तो बहुत ही ओछे स्तर के संकीर्ण बुद्धि, पक्षपाती और विद्वेषी लोग ही कर सकते हैं। भारतीय धर्मशास्त्रों और उनके प्रस्तुतकर्ता ऋषियों पर ऐसे आक्षेप लगने लगेंगे तो यह उस महान संस्कृति का अपमान ही होगा जिसके कारण समस्त विश्व ने इस देशवासियों को देवमानव माना था और जगद्गुरु कहकर अपना मस्तक नवाया था।
उपासना गाड़ी का एक पहिया है और आदर्शवादिता अपनाने वाली जीवन साधना दूसरा। इन दोनों के सम्मिलन से ही सर्वतोमुखी प्रगति का रथ अग्रसर होता है। मात्र कुछ पूजा पाठ कर लेने से भी यों तो कुछ लाभ होता ही है, पर पूरा सत्यपरिणाम देखना हो तो पवित्र एवं प्रखरता भरा जीवनक्रम अपनाने की साधना के साथ उपासना करनी चाहिए। पवित्र जीवन उर्वर भूमि है और भजन उपजाऊ बीज। दोनों की व्यवस्था पर समुचित ध्यान रखा जाना चाहिए।
उपासना का अधिकारी कहा जायगा, तब तो निश्चित रूप से अर्थ का अनर्थ हो ही जायगा। दुर्भाग्य से पिछले दिनों कुछ ऐसी ही भूल होती रही है और अमुक जाति-वंश के लोगों को इस महाशक्ति की उपासना का अधिकारी तथा अमुक को अनधिकारी ठहराया जाता रहा है। जबकि वास्तविकता इससे सर्वथा भिन्न है। तत्वदर्शी-मानवतावादी ऋषि इतने संकीर्ण हो ही नहीं सकते थे कि वे किसी अमुक जाति-वंश को आत्मिक प्रगति के साधनों को अपनाने का अधिकारी ठहरायें और अन्यों को उससे वंचित कर दें। ऐसा पक्षपात तो बहुत ही ओछे स्तर के संकीर्ण बुद्धि, पक्षपाती और विद्वेषी लोग ही कर सकते हैं।
उपासना के जो भी लाभ शास्त्रकारों ने बताये है उनकी सत्यता प्रत्येक साधक अक्षरशः अपने जीवन में देख सकता है।
उपासना, साधना और आराधना की समन्वित क्रिया पद्धति अपनाने से वह अध्यात्म उपक्रम बन पड़ता है जिसके असफल होने की कोई आशंका नहीं रहती। लक्ष्य तक पहुँचने का सत्परिणाम सुरक्षित रहता है।
उपासना को प्रथम स्थान दिया है। जो इस धर्म-कर्तव्य का पालन नहीं करते उनकी स्थान-स्थान पर तीव्र भर्त्सना की गई है और उन्हें चाण्डाल तक कहा गया है। भले ही उन ने ब्राह्मण कुल में ही क्यों न जन्म लिया हो।
उपासना आराधना करने का निर्देश आर्षग्रंथों में दिया गया है। महाभारत में कहा गया है- “सूर्योदय के समय जो सविता देवता की भली प्रकार उपासना करता है वह धृति, मेधा, और प्रज्ञा को प्रचुर परिणाम में प्राप्त करता है। इसी तरह सूर्य पुराण, तैत्तरीय आरण्यक, एवं श्रीमद्भागवत् में भी उदय होते हुए, अस्त होते हुए सूर्य का ध्यान करने और सब प्रकार से कल्याण का भागी बनने- पवित्र बनने की बात कही गई है।
उपासना कोई भी कर सकता है, पर अधिक लाभ उसी को होगा जो प्रभु समर्पित आदर्शवादी जीवन प्रक्रिया भी अपनाने का प्रयत्न करेगा। ईश्वर उपासना गाड़ी का एक पहिया है और आदर्शवादिता अपनाने वाली जीवन साधना दूसरा। इन दोनों के सम्मिलन से ही सर्वतोमुखी प्रगति का रथ अग्रसर होता है। मात्र कुछ पूजा पाठ कर लेने से भी यों तो कुछ लाभ होता ही है, पर पूरा सत्यपरिणाम देखना हो तो पवित्र एवं प्रखरता भरा जीवनक्रम अपनाने की साधना के साथ उपासना करनी चाहिए। पवित्र जीवन उर्वर भूमि है और भजन उपजाऊ बीज।
उपासना में उत्कृष्टता को भगवान मान कर उस पर अनन्य निष्ठ जमाई जाती है। साधना में जीवनचर्या को परिष्कृत एवं सुसंस्कारों से ओतप्रोत बनाया जाता है। आराधना का तात्पर्य है सत्प्रवृत्ति संवर्धन परमार्थ परायणता। इन तीनों को ही मिला देने से एक समूची बात बनती है। सर्वतोमुखी प्रगति की पृष्ठभूमि बनती है।
उपासना करनी चाहिए। पवित्र जीवन उर्वर भूमि है और भजन उपजाऊ बीज। दोनों की व्यवस्था पर समुचित ध्यान रखा जाना चाहिए। इसी का प्रतिपादन गायत्री और द्विजत्व का समन्वय करने की संगति बिठाकर किया गया है और उससे लाभान्वित होने का तथ्य शास्त्रों में समझाया गया है।
उपासना (2) साधना (3) आराधना। उपासना में उत्कृष्टता को भगवान मान कर उस पर अनन्य निष्ठ जमाई जाती है। साधना में जीवनचर्या को परिष्कृत एवं सुसंस्कारों से ओतप्रोत बनाया जाता है। आराधना का तात्पर्य है सत्प्रवृत्ति संवर्धन परमार्थ परायणता। इन तीनों को ही मिला देने से एक समूची बात बनती है।
उपासना से जहाँ भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है, वहीं उनसे सतत् सत्कर्म करते रहने की भी प्रेरणा मिलती है। वह कर्मठता क्रियाशीलता एवं प्रखरता के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। उस तथ्य को उद्घटित करते हुए ऐतरेय ब्राह्मण 33/3/5 में देवराज इन्द्र ने रोहित को कर्म कोशल का उपदेश देते हुए कहा कि “सूर्य की श्रेष्ठता इसलिए है कि वे लोकमंगल के लिए सतत् गतिशील रहते हुए तनिक भी आलस्य नहीं करते हैं। अतः सूर्योपासक को भी चाहिए कि वह अपने इष्ट की भाँति पथ पर निरन्तर चलता ही रहे।
उपासना आराधना करने वाले के लिए आदर्शवादी रीति-नीति अपनाना और लोकोपयोगी कार्यों में निरत रहने की योजना बनाकर चलना आवश्यक होता है। ऐसे कार्यों में तीन प्रमुख हैं (1) अज्ञान का निवारण (2) अनीति का उन्मूलन (3) अभावों का समापन। व्यक्तिगत रुचि, योग्यता एवं परिस्थिति के अनुसार इनमें से कोई भी लक्ष्य चुना जा सकता है। संसार के समस्त कष्टों और संकटों के यह तीन ही कारण हैं। इन्हें जितना निरस्त किया जा सकेगा, उतनी ही सुख-शान्ति स्थिर रह सकेगी और प्रगति की संभावना बढ़ेगी।
उपासना भी इतना अद्भुत लाभ दिखाती है, जितना कि दुश्चरित्र व्यक्ति के आजीवन क्रियाकृत्य भी नहीं कर सकते। ब्राह्मणत्व यदि अपने भीतर अर्जित कर लिया जाय तो गायत्री महाशक्ति की उपासना के जो भी लाभ शास्त्रकारों ने बताये है उनकी सत्यता प्रत्येक साधक अक्षरशः अपने जीवन में देख सकता है।
उपासना कर सकती है। इस सामान्य बुद्धि संगत तथ्य के समर्थन में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं, तो भी इस संदर्भ में शास्त्रों में पग-पग पर भरे पड़े प्रमाणों का अवलोकन किया जा सकता है। महाभारत में उल्लेख है,
उपासना के मार्ग को अपना सकते हैं।
उपासना करता है वह धृति, मेधा, और प्रज्ञा को प्रचुर परिणाम में प्राप्त करता है। इसी तरह सूर्य पुराण, तैत्तरीय आरण्यक, एवं श्रीमद्भागवत् में भी उदय होते हुए, अस्त होते हुए सूर्य का ध्यान करने और सब प्रकार से कल्याण का भागी बनने- पवित्र बनने की बात कही गई है।
उपासना पूर्ण कर ली थी। मुड़ने पर एकाएक वह अपनी आँखों पर विश्वास न कर सका दो-चार बार पलकें झपकीं। तो क्या बापू स्वयं? दिल की धड़कने तेज हो गई?
उपासना का अधिकार हर किसी को है। इस तथ्य को सुस्पष्ट करते हुए ‘पारस्कर ग्रह सूत्र” 2/3/10 में कहा गया है “सर्वेषाँ वा गायत्री मनु ब्रूयात्।” अर्थात् गायत्री का उपदेश सब करें। तात्पर्य यह कि सम्पूर्ण मानव जाति बिना किसी भेद-भाव के गायत्री उपासना कर सकती है। इस सामान्य बुद्धि संगत तथ्य के समर्थन में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं, तो भी इस संदर्भ में शास्त्रों में पग-पग पर भरे पड़े प्रमाणों का अवलोकन किया जा सकता है।
उपासना को आत्मबल प्राप्ति का प्रथम चरण माना जाता है। उसकी समूची क्रिया-प्रक्रिया आत्म परिष्कार के उपाय उपचारों से ओत प्रोत है। उस के स्वरूप दिखाई तो ऐसा पड़ता है कि मनुहार उपकार के बदले दिव्य अनुकम्पा प्राप्त करने जैसा कुछ उपचार किया जा रहा है पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं। पूजा अर्चा के कृत्यों से आगे चल कर जब गहराई में उतरा जाता है तो उसका एक ही अभिप्राय सामने आता है कि कृत्यों को प्रतीक माना जाय और उनके सहारे साधना और आराधना के लिए अपने स्वभाव को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढाला जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-February
उपासना का आरम्भ कहाँ से किया जाय? इसका उदाहरण किसी स्कूल में जाकर देखा जा सकता है। वहाँ नये छात्रों का वर्णमाला, गिनती, सही उच्चारण, सही लेखन आदि से शिक्षण आरम्भ किया जाता है और पीछे प्रगति के अनुसार ऊँची कक्षाओं में चढ़ाया जाता है। स्नातक बनने के उपरान्त ही अफसर बनने की प्रतियोगिता में प्रवेश मिलता है और जो उस कसौटी पर खरे उतरते हैं उन्हें प्रतिभा के अनुरूप ऊँचे दर्जे के दायित्व सौंपे जाते हैं।
उपासना है। पूजाकृत्य ऐसी ही मनोभावना विकसित करने के लिए अपनाये जाते हैं।
उपासना समझने की भूल की जा रही है।
उपासना का, ईश्वर के पास बैठने का परिणाम दीख न पड़ने का कारण यही हो सकता है कि कहीं गड़बड़ी का अवरोध अड़ रहा है।
उपासना का प्रयोजन इतना ही है कि हम जिसके पास बैठते हैं उसकी विशिष्टता का समावेश अभिवर्धन अपने में होने दें। चंदन वृक्ष के समीप उगे हुए सामान्य झाड़ झंखाड़ भी सुगन्धित हो जाते हैं। सीप के मुख में स्वाति बूँदों का प्रवेश होने से मोती बन जाता है। पारस को छूकर लोहा सोना हो जाता है। भगवान के सान्निध्य संपर्क की बात करने वाले यदि अपने भीतर निरन्तर उत्कृष्टता की वृद्धि होती अनुभव नहीं करते और जीवनचर्या में आदर्शवादी परिवर्तन नहीं होता तो समझना चाहिए कि विडंबना को ही उपासना समझने की भूल की जा रही है।
उपासना को अपनाते रहे हैं तो आश्चर्य लगता है कि आज क्यों इनकी इतनी अवज्ञा हो रही है? सद्बुद्धि और सत्कर्म की अवहेलना सर्वत्र क्यों होती दिखाई देती है? लोग अपने आध्यात्मिक माता-पिता तक को क्यों भूलते जा रहे हैं? जो माता-पिता का स्वरूप, व्यवहार और नमन तक भुला दे, उसे अपने समाज में बुरा कहा जाता है। सद्ज्ञान रूपी गायत्री और सत्कर्म रूपी यज्ञ की अवहेलना करने का ही परिणाम है कि सर्वत्र ‘आस्था संकट’ जैसा दुर्भिक्ष फैल रहा है।
उपासना करते हैं, उनकी भौतिक और आत्मिक स्थिति में कोई उत्साहवर्धक परिवर्तन होता दिखाई नहीं पड़ता। उलटे भाग्यवादी, परावलम्बी, आलसी, प्रमादी जैसे बन जाते हैं। इस प्रत्यक्ष को देखना ही संशय उपजाता है कि जब इतने लोगों को कोई कहने लायक लाभ नहीं मिले तो हमें ही क्या हाथ लगने वाला है। यह असमंजस और अविश्वास ही बड़ा कारण है जिससे उस पुरातन परम्परा का लोप जैसा होता चला जाता है।
उपासना है, साहस भरा पुरुषार्थ इस परम देव की साधना और मौत की मनहूसियत से मरते जा रहे विश्व वसुधा में जीवन चेतना का प्रसार विस्तार इसकी आराधना है।”
उपासना की और उसी के कारण उपलब्ध सामर्थ्य से सृष्टि का विकास और संचालन करने लगे। वह क्रम अब तक चला आता है। जब कभी जिस किसी को कोई महत्वपूर्ण कदम उठाना पड़ता है तब तब मनीषी-मुनि, ऋषिगण आवश्यक क्षमता की उपलब्धि लेते और अपने मनोरथ पूरे करते हैं।
उपासना का, यज्ञों के आयोजन का जब प्रसंग आता है तक नाक-भौं सिकोड़ते उसकी उपेक्षा, अवज्ञा करते देखे जाते हैं। बहु प्रचलन आज ऐसा ही दृष्टिगोचर होता है। विचारणीय है कि हीरों को टूटे काँच में फेंक देने जैसी दुर्गति आज किस कारण हुई।
उपासना पद्धति के अलावा और क्या है?
उपासना कर मुझे प्रसन्न करता है- जाग्रत करता है, उसे ही मैं प्रखर बनाती हूँ। ब्राह्मण, ऋषि तथा मेधावी बनाती हूँ।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-May
उपासना पतियों में सूर्य मंडल में ईश्वर की इष्ट की भावना करना सबसे महत्वपूर्ण एवं सर्वाधिक फलदायी बतायी गई है। आत्म ज्योति को प्रखर-प्रचण्ड बनाने एवं ओजस्वी-तेजस्वी बनाने के लिए सविता की ध्यान साधना को अध्यात्मवेत्ताओं ने शीघ्र परिणाम प्रस्तुत करने वाला पाया है। बृहद्योगी याज्ञवलक्य ने सविता की ज्योति साधना को सर्वश्रेष्ठ माना है और कहा है कि गायत्री मंत्र का जप करते हुए सूर्य के दिव्य तेज को अपने में धारण करना चाहिए। ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ में वस्तुतः सविता ही ध्येय है। सूर्योपनिषद् चाक्षुषोपनिषद, अक्ष्युपनिषद् आदि आर्ष ग्रन्थों में इसी तेजपुँज की उपासना करने को कहा गया है।
उपासना में सविता की प्रमुखता रही है। उससे प्राप्त ज्ञान के आधार पर उनने अनेकानेक भौतिक एवं आध्यात्मिक अनुसंधान किये। प्रकृति पर विजय पाई। एडिंगटन, जीन्स फाउलर, एडवर्ड आर्थर, मिलेन, रसेल आदि प्रख्यात वैज्ञानिक मनीषियों ने सूर्य-शक्ति के सम्बन्ध में गहन खोजें की हैं और वैदिक ऋषियों से प्रतिपादित सविता की सत्ता, महत्ता, गति आदि के सिद्धान्तों की पुष्टि की है।
उपासना करते और सद्बुद्धि प्राप्ति के लिए अभ्यर्थना करते हैं। महाभारत वन पर्व 3/36-38 में इसकी महिता महता का वर्णन करते हुए ऋषि ने उन्हें ही साँख्य योगियों के प्राप्तव्य स्थल, कर्मयोगियों के आश्रय-दाता एवं मुमुक्षुओं के मुक्ति प्रदाता बताया है। समस्त प्राणियों के उत्पादक, पालक, पोषणकर्ता वही हैं। सकाम या निष्काम भाव से साकार या निराकार प्रकाश पुँज के रूप में जो इन्हें जैसा मानते और उपासना करते हैं, तदनुरूप उसकी पूर्ति सविता देवता अवश्य करते हैं। श्रद्धा-विश्वास की प्रगाढ़ता ही इस फलितार्थ में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करती है।
उपासना भूल कर रोगियों की सेवा करने में जुट गये। उन्होंने अपने सारे शिष्य और साथियों को सेवा कार्य में लगा दिया। एक साधारण व्यक्ति की भाँति व्यग्र और व्याकुल देख कर अनेक लोगों ने कहा “आप तो एक वीतराग योगी हैं। फिर इस तरह साधारण मनुष्यों की तरह व्याकुल क्यों हैं?”
उपासना का विधान इसी की पूर्ति के लिए अध्यात्मवेत्ताओं द्वारा सुझाया गया है। यदि दैनन्दिन जीवन में पाँच मिनट का भी समय इस निमित्त निकाला जा सके तो उतने भर से उन दुष्वृत्तियों से पीछा छुड़ाया जा सकता है जो आये दिन सिर पर सवार होकर अनेकानेक प्रकार से त्रास देती रहती हैं। उनने प्रार्थना को प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ सूत्र बताये हैं।
उपासना करते हैं, तदनुरूप उसकी पूर्ति सविता देवता अवश्य करते हैं। श्रद्धा-विश्वास की प्रगाढ़ता ही इस फलितार्थ में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करती है।
उपासना करता हूँ।”
उपासना करें। उनकी शक्ति उपलब्ध करने पर आप महाबली असुर समुदाय पर भी विजय प्राप्त कर सकेंगे। वैसा ही उनने किया भी और शत्रुओं को सहज ही परास्त किया।
उपासना न तो वहम है और न ही शब्द या कानों का व्यायाम, वरन् हमारे खाने-पीने चलने फिरने जैसे आवश्यक क्रिया-कृत्यों से भी अधिक सत्य है।
उपासना करने को कहा गया है। बृहत्पराशर स्मृति में सूर्य मंडल में स्थित भगवान विष्णु का ध्यान करने का विधान है। यथा- “ध्येयः सदा सवितृमण्डल मध्यवर्ती नारायण”। यजुर्वेद वा. सं. 40/17 का मंत्र भी आदित्य मण्डल मध्यस्थ परमात्मा की ध्यान-धारणा करने की और संकेत करता है। शिव उपासक इन्हें ही ज्योतिर्लिंग के रूप में ध्यान करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-October
उपासना आधार से मिल सके। इस मंत्रोच्चारण से जुड़े शब्द प्रवाह से उद्भव सामर्थ्य अदृश्य जगत में अन्तरिक्ष में भरी विषाक्तता का निराकरण करने की अद्भुत क्षमता रखता है।
उपासना में नर और नारी की दोनों ही आकृतियों में परब्रह्म की प्रतिमा बनाई जाती रही है। दोनों में पवित्रता, कोमलता, उदारता, सेवा, समर्पण, स्नेह, वात्सल्य जैसी भावनाओं के आधार पर देखना हो तो नारी की गरिमा अधिक बैठती है। नारी दानी है और नर उपकृत। ईश्वर की प्रतिमा को किस रूप में माना जाय? इस दृष्टि से विवेक का झुकाव नारी पक्ष में जाता है।
उपासना के क्षेत्र में भी दोनों को स्वभावतः समान अधिकार प्राप्त हैं। इस प्रकार की भेद-भाव भरी मान्यता मध्यकाल के अन्धकार युग की देन है, जिसमें स्त्रियों को हेय,नीच कह कर उनके अधिकार उनसे छीन लिये गये। आज की विवेकशीलता की माँग है कि उन्हें उनके अधिकार वापस दिलाये जाएँ, मंत्र जप, गायत्री यज्ञ करना-कराने का उन्हें नर के समान ही अधिकार है व यह प्रयत्नपूर्वक दिलवाने का प्रयास पुरुषार्थ शाँतिकुँज ने किया है।
उपासना है। विज्ञान पक्ष के सहारे इस तरह भौतिक प्रगति के अनेकों आधार खड़े होते हैं। आज के युग की सामयिक प्रयोजनों की पूर्ति के लिए वही युग शक्ति के रूप में भूमिका निभाने जा रही है।
उपासना की चरम स्थिति हैं।
उपासना फलीभूत तब होती है, जब इष्ट निर्धारण स्पष्ट होता है। प्रगति के किस बिन्दु तक पहुँचना है, इसका सुदृढ़ निश्चय होना आवश्यक है। भव्य भवन बनाने के लिए एक श्रेष्ठ आर्चीटेक्ट से अभीष्ट निर्माण का नक्शा बनवाया जाता है। वस्तुतः इष्ट निर्धारण से मन को एक निश्चित दिशा में आगे बढ़ने और तदनुरूप प्रयास करने हेतु साधन जुटाने का मार्ग मिल जाता है। जिस स्तर का तादात्म्य इष्ट के साथ है, उसी स्तर की अन्तःक्षेत्र की प्रसुप्त शक्तियाँ जागने लगती हैं।
उपासना करने के लिए समय निकाल ही लेना चाहिए। प्रयत्न यह करना चाहिए कि आधा घण्टे से लेकर एक घण्टे तक का समय उपासना के लिए मिल सके। निःसंदेह इस प्रयोजन में लगा हुआ समय हर दृष्टि से सार्थक उपासना से होता है, आत्मिक प्रगति उसके फलस्वरूप व्यक्ति का समग्र विकास, उसके द्वारा सर्वतोमुखी समृद्धि की संभावना, यह चक्र ऐसा है, जिससे इस कृत्य में लगाया गया समय सार्थक ही सिद्ध होता है।
उपासना का अवलम्बन लेना पड़ा है। आत्म समर्पण का साहस जुटाना पड़ता है। पत्नी पति को आत्म समर्पण करती है अर्थात् उसकी मर्जी पर चलने के लिए अपनी मनोभूमि एवं क्रिया पद्धति को मोड़ती चली जाती है व उसी अनुपात में वह पति के मानव वैभव की वंश, गोत्र, यश की उत्तराधिकारिणी ही नहीं, अर्द्धांगिनी भी बन जाती है। भक्त जब भगवान के अनुरूप बनता चला जाता है तो अन्ततः नर-नारायण की एकरूपता का स्वयं प्रमाण बनता है। दादू, मीरा, रैदास, कबीर, शबरी, तुलसी, नामदेव, रामकृष्ण एवं हनुमान ये सभी उदाहरण हैं भक्त के निष्काम समर्पण के, परमात्मसत्ता के प्रति।
उपासना सावित्री साधना ही हमारा जीवन लक्ष्य हो सकता है, होना चाहिए।
उपासना वस्तुतः प्राणशक्ति की ही उपासना है। जिसे जितना प्राण-बल उपलब्ध हो गया हो, समझना चाहिए कि उसकी उपासना उतने ही अंशों में सफल हो गयी है। सामर्थ्यवान गुरु अपने शिष्यों को इसी प्राण सम्पदा से सुसम्पन्न बनाकर उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाते हैं। शिष्य की गायत्री साधना के बदले गुरु माध्यम बनकर आरुणि के लिए महर्षि धौम्य, जाबालि के लिए गौतम, अर्जुन के लिए इन्द्र, नचिकेता के लिये यम तथा कच के लिए शुक्राचार्य रूप में एवं विवेकानंद के लिए रामकृष्ण परमहंस रूप लेकर प्राणशक्ति में शिष्यों को ओतप्रोत कर देते हैं।
उपासना में ईश्वरीय सान्निध्य की कल्पना ही नहीं अनुभूति भी अपेक्षित होती है। भावनिष्ठ को कार्यान्वित होते देखकर ही ऐसी मनःस्थिति बनती हैं। इसलिए यह सोचना होता है कि परमेश्वर प्रत्यक्ष ही सचमुच ही सामने विराजमान है और उनकी किसी
उपासना को जीवन में स्थान दें। इसके चमत्कारी परिणामों से लेकर जीवन के ऊँचा उठने तक की बातें उनने पत्रिका,किताबों व व्यक्तिगत पत्र से सब तक पहुँचायी। जिनने सही अर्थों में गायत्री को समझा व जीवन में उसकी साधना को उतारा उसका जीवन ही बदल गया। कोई अभाव था, वह दूर होता चला गया, घर में साधन समृद्धि आ गयी व प्रतिकूलताएं मिटती चली गयीं। जीवन साधना के फलस्वरूप नीरोग, दीर्घ जीवन अनुदान रूप में मिला व सद्ज्ञान मिलते चलने से जीवन के भावी स्वरूप के प्रति दृष्टि मिली।
उपासना द्वारा हम उन सभी प्रयोजनों की सिद्धि कर सकते हैं, जो अलग-अलग कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न मंत्रों की उपासना द्वारा हस्तगत की जाती हैं। इसे गायत्री मंत्र का विशिष्ट शब्द-सामर्थ्य ही कहनी चाहिए कि एक ही मंत्र के प्रयोग द्वारा भौतिक अथवा आध्यात्मिक सभी प्रयोजन पूरे हो जाते हैं।
उपासना को निरस्त करने के लिए ऐसा प्रपंच रचा होगा और उसे शापित-कीलित होने के कारण निष्फल होने की बात कह कर उसकी सर्वमान्य महत्ता को धूमिल करने एवं लोगों में निराशा, अश्रद्धा उत्पन्न करने का प्रयत्न किया होगा।
उपासना में भी गायत्री माता का ध्यान सदा सूर्य मंडल के मध्य में विराजमान महाशक्ति के रूप में किया जाता है। साथ ही गायत्री माता के नारी स्वरूप को सूर्य मंडल के बीच प्रतिष्ठित-चित्रित किया जाता है। निराकार उपासना करने वाले चिदाकाश एवं महदाकाश में प्रतिष्ठित तेज मंडल के रूप में उसका ध्यान करते है, दोनों ही स्थितियों में सूर्यमंडल की स्थापना अनिवार्य रूप से रहेगी। प्रकाश के तेजोवलय को समन्वित किये बिना गायत्री महाशक्ति का ध्यान हो ही नहीं सकता। गायत्री उपासना के अन्त में सूर्यार्घ्यदान के रूप में जप की पूर्णाहुति की जाती है।
उपासना में इष्ट के समीप अति समीप होने और उनके साथ लिपट जाने, उच्च स्तरीय प्रेम के आदान-प्रदान की गहरी कल्पना की जाती है। इसमें भगवान और जीव के बीच माता-पुत्र, पति-पत्नि, सखा-सहोदर, स्वामी-सेवक जैसा कोई भी सम्बन्ध स्वीकार किया जाता है। इससे आत्मीयता को अधिकाधिक घनिष्ठ बनाने में सहायता मिलती है। नवधा भक्ति में ऐसे ही आदान-प्रदान की वस्तुपरक अथवा क्रियापरक कल्पना की गई हैं। मूलतः लक्ष्य एक ही है कि भक्त और भगवान के बीच सघन आत्मीयता की अनुभूति करने वाला आदान-प्रदान चलना चाहिए।
उपासना करते रहने पर भी समुचित सत्परिणाम प्राप्त न कर सका।
उपासना है।
उपासना करते हो न?”
उपासना का अवलम्बन लिया, उनने भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में उच्चस्तरीय सफलतायें प्राप्त कीं और आप्तकाम बने।
उपासना को आत्मा और परमात्मा के बीच सद्गुणों, सद्भावों और चित शक्ति के संवहन की अंतःक्रिया समझा जा सकता है। थियोलॅजियन अपटॉन सिक्लेयर के ग्रन्थ “साइकोलॉजी ऑफ रिलीजन” के अनुसार एक मात्र परम पुरुष ही है जिससे सर्वाधिक प्रगाढ़ और चिरस्थाई सम्बन्धों की स्थापना सम्भव है। इस कथन के पीछे उनका तर्क यह है कि परमात्मा का व्यक्तित्व अनन्त आयामी है। उसी से मानवी व्यक्तित्व के सभी आयामों के बीच ठीक-ठीक सामंजस्य सम्भव है। फिर यह मात्र व्यक्तित्व और व्यक्तित्व के बीच सामंजस्य स्थापना भर नहीं है बल्कि व्यक्ति का परम व्यक्ति से मिलन है।
उपासना के निमित्त जो भी पूजा उपचार किए जाते हैं, उनसे तात्पर्य, मात्र इतना है कि चेतना संस्थान को उत्कृष्टता के ढांचे में ढालने का व्यापक प्रशिक्षण दिया जाय। जो भी साधक बिना किसी उपचार के अथवा कर्मकाण्डों के सहारे अपने चेतना क्षेत्र को जितना समुन्नत बनाने का प्रयास करता है, वह उतना ही ऊँचा उठता, आगे बढ़ता व देवत्व के क्षेत्र में प्रवेश पाने का अधिकारी बनता है।
उपासना का यही क्रम रहा। लौकिक कामनायें क्षीण हो गयीं और आध्यात्मिक चिन्तन में ही चित्त निरत रहने लगा। कहते हैं गायत्री सिद्ध होने के बाद ऐसा कुछ भी नहीं था जो उन्हें प्राप्त न हो। लौकिक कामनायें क्षीण होने के बाद उन्होंने संन्यास धारण कर लिया और केवल एक काठ की लँगोटी पहनने लगे। आप्तकाम हो के बाद उन्हें कई दिव्य शक्तियाँ-अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त हो गयीं।
उपासना के समय दीपक की, अगरबत्ती की, अग्नि स्थापना की आवश्यकता भी सूर्य शक्ति का प्रतिनिधित्व रखने के रूप में ही जाती है। यज्ञाग्नि में आहुति देने का विधान भी गायत्री पुरश्चरणों का अंग है। इसमें भी दूरस्थ सूर्य की निकटस्थ प्रतिनिधि के रूप में प्रतिष्ठ करने की भावना है।
उपासना के कारण उनमें इतना ब्रह्मतेज उत्पन्न हो गया है कि उसकी प्रखरता को न सहन पाने के कारण वे स्वयं सामने नहीं आ सकते। उनकी शंका का समाधान करने के लिए भैरव ने उन्हें पूर्व के चौदह जन्मों के एक भयंकर दृश्य दिखाए व कहा कि “आपकी तेरह वर्ष की साधना पिछले 13 जन्मों के पापों का शमन करने में लग गयी। दुष्कर्मों से उत्पन्न कुसंस्कार मिटने पर अब आप जो गायत्री साधना करेंगे वह फलदायी होगी। “ प्रसन्न मन लौटे माधवाचार्य ने वृन्दावन में जो उपासना की उसका आश्चर्यजनक प्रतिफल उन्हें मिला।
उपासना करें न करें, केवल गायत्री के जप से ही द्विज अक्षय मोक्ष को प्राप्त होता है।
उपासना एक महत्वपूर्ण विज्ञान है। इसके लिए अनुभवी और निष्णात् मार्गदर्शक चाहिए। सिर्फ पुस्तकों को पढ़ कर उपासना सफल नहीं हो सकती। सामर्थ्यवान गुरु शिष्य को अपने आत्मबल का सामर्थ्यवान अनुदान भी देता है। इसलिए समर्थ गुरु की नियुक्ति इस क्षेत्र में आवश्यक बतायी गई है।
उपासना से इन सभी क्षेत्रों में आनन्द-उल्लास की परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं।
उपासना का ही अवलम्बन लिया जाना चाहिए।
उपासना का प्रतिफल। साधक को भी ऐसा ही भाव समर्पण करके ईश्वरीय अनुशासन के साथ अपने आपको एक रूप बनाना पड़ता है। चन्दन वृक्ष के समीप उगे झाड़ झंखाड़ भी सुगन्धित हो जाते हैं। पारस को छूकर अनगढ़ सा लौह खण्ड भी सुवर्ण बन जाता है। चुम्बक से कुछ समय लोहा सटा रहे, तो वह भी चुम्बक की विशेषताओं से युक्त हो जाता है।
उपासना की थी और सृष्टि सृजन का सामर्थ्य प्राप्त किया था। त्रिदेवों की उपास्य गायत्री ही रही है।
उपासना हेतु उचित वातावरण की सबको तलाश है, शाँतिकुँज का सभी साधक स्तर की मनोभूमि वाले व्यक्तियों से फलदायी सिद्धिदात्री साधना करने हेतु सहर्ष आमंत्रण है। वर्ष भर चलने वाले नौ दिवसीय अथवा एक माह के युगशिल्पी सत्रों में शाँतिकुँज हरिद्वार 249411 (उ.प्र.) के पते पर पत्र व्यवहार कर भागीदारी हेतु अनुमति प्राप्त की जा सकती है।
उपासना के माहात्म्य के विषय में जो कुछ कहा गया है, वह सच हो सकता है क्योंकि प्रमाण सामने है। यह नमूना यह मॉडल है स्वयं परम पूज्य गुरुदेव का जीवन। अस्सी वर्षों तक उनने जो जीवन जिया, वह एक खुली किताब की तरह है। जो भी जब चाहे,तब इसमें से, जो अध्याय चाहे खोलकर देख सकता है व साधना से सिद्धि संबंधी मार्गदर्शन प्राप्त कर सकता है। अपनी जीवन यात्रा को परम पूज्य गुरुदेव एक ब्रह्म कमल की जीवन यात्रा की उपमा देते थे।
उपासना में ही रुचि लेते थे। एक बार मन में इच्छा होने पर कि योग्य गुरु मिल जाते तो ठीक रहता, इनके गुरु उनके समक्ष साधना की अवधि में प्रकट हुए व उनके सिर पर स्पर्श कर उन्हें उनके पूर्व जन्मों की उनने जानकारी करायी। पूर्व जन्म में गुरु के द्वारा दिया नाम उद्धड़ साधना, उपासना, उस जन्म की अनुभूतियाँ अब उन्हें याद आती चली गयी। यह भी याद आया कि कैसे एक सुन्दरी, रूपवती युवती के रूप जाल में उलझ कर वे साधना मार्ग से विरत हो गए थे व उन्हें विष देकर मार दिया गया था।
उपासना पद्धति में इस महामंत्र को सबसे अधिक महत्व दिया गया है। इतिहास पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि यहाँ इसी महाविज्ञान के आधार पर आत्मकल्याण के महान अभियान किये जाते रहे हैं। प्रायः सभी ऋषि-महर्षियों में जो विशेषतायें थीं, उनमें उनकी तपस्या ही एक मात्र कारण थी। विश्वामित्र, वसिष्ठ, याज्ञवलक्य, अत्रि, भारद्वाज, गौतम, कपिल, कणाद, पतंजलि, व्यास, वाल्मीकि, च्यवन, शुकदेव, नारद, दुर्वासा आदि ऋषियों के जीवन वृत्तांत पर विहंगावलोकन किया जाय, तो सहज ही पता चल जाता है कि उनकी महानता का, उनके अद्भुत एवं महान कार्यों का कारण उनका गायत्री तप ही था।
उपासना से व्यक्ति कितनी विलक्षण क्षमताओं का स्वामी बन जाता है।
उपासनाएँ चलती हैं। रामभक्त उन दिनों रामायण का अखण्ड पाठ करते हैं व कृष्ण भक्त गीता का पारायण करते हैं। तंत्र विज्ञान के अधिकाँश कौलकर्म इन्हीं दिनों संपन्न होते हैं, वाममार्गी साधक अभीष्ट मंत्र सिद्धि के लिए इसी अवसर की प्रतीक्षा करते हैं। तंत्र साधना में कुमारी पूजन, शव साधन तथा गायत्री की कुण्डलिनी जागरण, षट्चक्र वेधन, आदि की साधनाएँ विशेष रूप से इन्हीं दिनों संपन्न की जाती हैं। देवी उपासकों द्वारा दुर्गा सप्तशती का पाठ इन्हीं दिनों विशिष्ट उद्देश्यों के लिए किया जाता है।
उपासना की तो देवात्मा बन गए व परमात्मा स्तर की क्षमताएँ उनमें आ गयीं। इन्हीं को तो ऋद्धि-सिद्धियाँ कहते हैं।
उपासना काल में हर घड़ी यही अनुभूति रहनी चाहिए कि हम भगवान के अति निकट बैठे है और साधक तथा साध्य के बीच सघन आदान-प्रदान हो रहा है। साधक अपने समग्र व्यक्तित्व को होम रहा है और वे उसे अपने समतुल्य बनाने की अनुकम्पा प्रदान कर रहे है।
उपासना यदि ठीक प्रकार से की जाय,तो उपासक में प्राणशक्ति की अभिवृद्धि शीघ्र ही होने लगती है और वह इस अभिवर्धन के आधार पर कई तरह की सफलताएँ प्राप्त करता है। कहने वाले इसे गायत्री माता का अनुग्रह आशीर्वाद कहा करें पर वस्तुतः होता यह है कि इस उपासना से साधक में प्राणशक्ति, आत्मबल विकसित होता चला जाता है। व्यक्तित्व में कई प्रकार के परिष्कार-परिवर्तन देखें जाते है, कठिनाइयों के अवरोध मार्ग से हटते हैं तथा सफलताओं का पथ प्रशस्त होता है। गायत्री की उपासना वस्तुतः प्राणशक्ति की ही उपासना है। जिसे जितना प्राण-बल उपलब्ध हो गया हो, समझना चाहिए कि उसकी उपासना उतने ही अंशों में सफल हो गयी है।
उपासना का ही प्रभाव कहा जाएगा कि जो उनके समक्ष जाता था, श्रद्धा से झुक जाता था। जीवन भर वे गायत्री के माहात्म्य व इनके कामधेनु का पयपान कर जीवन का सौभाग्य उदय करने का संदेश जन जन को देते रहे। जिनके मन कभी संशय उठता हो कि कहीं मंत्र जप से प्रत्यक्ष सिद्धि मिलती है, उनके लिए काठिया बाबा जैसे संत का जीवन जीता जागता प्रमाण है।
उपासना किनकी व किस पद्धति से की जाय, इस पर मतभेद से तो विग्रह बढ़ेंगे व संकट उठ खड़े होंगे। अगला युग एकता का है। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को बनाए रखने के लिए विश्व की सभी प्रचलित उपासनाओं के सारतत्व जो बीज रूप में गायत्री मंत्र के रूप में विद्यमान हैं, को ही अंगीकार किया जाना चाहिए। इस मंत्र के चौबीस अक्षरों में नवयुग का संविधान, समग्र धर्म शास्त्र समाया हुआ है। व्यक्ति के सर्वांगीण उत्कर्ष और समाज की व्यापक सुव्यवस्था के लिए इससे श्रेष्ठ आचार संहिता कोई नहीं।
उपासना” का पूरा भाव प्रकाशित नहीं होता वस्तुतः भावार्थ है किसी के पास बैठकर उससे तादात्म्यता संबंध स्थापित कर लेना। किसके साथ बैठकर? अपने उपास्य देव-श्रेष्ठता से अभिपूरित परमात्मसत्ता के समीप बैठकर उनके श्रेष्ठ गुणों को अपने अंदर ले लेना परमात्मा की अनुकम्पा का भागीदार, शेयर होल्डर, साझीदार बन जाना। तैत्तिरीय उपनिषद् में ऋषि कहते हैं यानि अस्माकं सुचरितानि। तानि त्वा उपास्यानि नो इतराणि (1/11/2) अर्थात् हे स्नातक तुमने हमारे अंदर जो उत्तम गुण देखे हैं, उन्हीं की उपासना करो, दूसरों की नहीं।
उपासना संपन्न करना।” चौबीस हजार जप की संकल्पित गायत्री साधना ही नवरात्रि के लिए सर्वश्रेष्ठ है। लम्बे समय तक व्रत पालन करने, कड़ी पुरश्चरण साधनाएँ करने के लिए तो सुदृढ़ मनोबल चाहिए। संकल्प किसी बहाने टूटे या मात्र चिह्न−पूजा ही हो इससे अच्छा तो यह है कि छोटा ही सही पर संकल्प नियमपूर्वक निभाया जाय। इस दृष्टि से नौ दिन की चौबीस हजार जप की साधना सुगम भी है व तप की न्यूनतम आवश्यकताओं को भी पूरा करती है।
उपासना के अभ्यस्त नहीं हैं व कभी-कभी ही कुछ पूजा पाठ करते हैं उनसे भी जोर देकर कहा जाता है कि इन नौ विशिष्ट दिनों में कम से कम कुछ नियम निबाहें व निश्चित साधना करें। मंत्र, लेखन, गायत्री चालीसा पाठ, पंचाक्षरी जप आदि की सरल व्यवस्थाएँ उनके लिए ही हैं। अच्छा हो, जहाँ व्यवस्था हो वहाँ सामूहिक उपासना का क्रम चले। इससे विशिष्ट ऊर्जा का उद्भव होता है।
उपासना वस्तुतः एक मंगलमय सुयोग है जिसके द्वारा छोटा पक्ष बड़े पक्ष का सहारा लेकर लाभाँवित हो सकता है। एक समर्थ वृक्ष का आश्रय पाकर बेल उससे लिपट कर आसमान चूमने लगती है।
उपासना की प्रेरणा दी।
उपासना से तीन जगह बँधा हुआ यह महामंत्र रूपी बैल जब दहाड़ता है- उच्चारण करता है तो देवत्व भरी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं और सान्निध्य में रहने वाला व्यक्ति सब कुछ पा लेता है।
उपासना प्रयोजन में प्रयुक्त होने वाले शब्द-गुच्छक की नहीं। सृष्टि की श्रेष्ठतम विभूति है गायत्री आद्यशक्ति, उसका शब्द गुँथन इस प्रकार हुआ है जो भावार्थ और
उपासना वस्तुतः भावनाओं को परिष्कृत कर जीव को ब्रह्म से मिलाने की दिशा में अग्रसर करने वाली, अपनी सत्ता का अस्तित्व भुलाकर महत्सत्ता से एकाकार करने वाली भक्तियोग की प्रक्रिया है, जिसे भगवान कृष्ण ने गीता में सर्वश्रेष्ठ योग कहा है। परमात्मा के साथ आत्मा का संबंध इस माध्यम से जितना निकटवर्ती एवं सुचारु होगा, उसी अनुपात से पारस्परिक आदान-प्रदान का सिलसिला चलेगा और छोटे पक्ष, आत्मा को, जीव को, उसका लाभ मिलेगा। दो तालाबों के बीच नाली खोद दी जाए व उनका संबंध जोड़ दिया जाए तो नीचे वाले तालाब में ऊंचे तालाब का पानी दौड़ने लगता है और देखते-देखते दोनों की ऊपरी सतह समान हो जाती है। छोटे-छोटे उपकरण बिजली घरों के साथ तार से जुड़ जाने पर अपनी महत्वपूर्ण हलचलें दिखाने में समर्थ हो जाते हैं। बल्ब व पंखे चलने लगते हैं एवं बड़े-बड़े काम उस विद्युत के माध्यम से संपन्न होने लगते हैं, जो मध्यवर्ती तारों से उपकरणों में आती है।
उपासना को तुम मत छोड़ना, निरंतर प्रगति करते जाना। ‘
उपासना है। इसकी पहचान इतनी ही है कि उन क्षणों में मन के ऊपर आत्मिक स्तर का चिन्तन छाया रहा या भौतिक स्तर का। यदि साँसारिक मनोकामनाओं की भीड़ उथल-पुथल मचाए रही तो समझना चाहिए यह कृत्य भी विशुद्ध रूप से भौतिक ही हैं। इसमें आत्मिक प्रगति जैसे किसी लाभ की कोई सम्भावना नहीं। यदि उतने समय में शरीर रहित भौतिक प्रभावों से मुक्त ज्योतिर्मय आत्मा ही ध्यान में है और उस महाज्योति के साथ समन्वित हो जाते ही दीप-पतंग जैसी आकाँक्षा उमड़ रही है तो समझना चाहिए कि उपासना का सच्चा स्वरूप अपना लिया गया।
उपासना आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ने की महायात्रा पूरी करने के निमित्त नित्य की जाती है। आत्मा अर्थात् अन्तःकरण, भाव संस्थान जिसके साथ मान्यताएं आकांक्षाएं लिपटी पड़ी हैं। परमात्मा अर्थात् उत्कृष्ट आदर्शवादिता-श्रेष्ठताओं का समुच्चय। परमात्मा कोई व्यक्ति विशेष नहीं, वरन् सृष्टि में जितना भी देव पक्ष है, उसी का समुच्चय है। व्यापक क्षेत्र की सत्प्रवृत्तियों में समग्र रूप को आदर्शवादिता एवं सद्गुणों से भरी पूरी सत्ता को ही परमेश्वर माना जाना चाहिए।
उपासना में प्रवृत्त करने के बाद भी उन्होंने विधिवत् किसी को शिष्य नहीं बनाया। इस संबंध में उनका यही कहना था कि सबका गुरु परम पिता परमात्मा है, उस का प्रतिनिधि अपने भीतर ही छिपा बैठा है। उसी की शरण में जाने से कल्याण है। व्यक्ति तो माध्यम भर हो सकता है। वस्तुतः गायत्री महाशक्ति की महिमा अपरम्पार है, जो इसे निष्ठापूर्वक अपनाता है सिद्धियाँ स्वतः उस पर बरसने लगती हैं।
उपासना कृत्य करने की स्थिति न हो तो आत्म शुद्धि, देवपूजन तथा जप, ध्यान आदि सारे कृत्य मानसिक उपासना के रूप में ध्यान प्रक्रिया के सहारे उन कृत्यों को करने की कल्पना करते हुए भी किये जा सकते हैं, उपासना में नागा करने की अपेक्षा इस प्रकार की मानसिक पूजा कर लेना भी उत्तम है। इससे संकल्पित साधना प्रक्रिया को किसी रूप में अनवरत चलती हुई तो रखा ही जा सकता है।
उपासना से जाग्रत हो जाते हैं। किसी मशीन में यदि छः इंजन हों और वे सभी बन्द हो, तो पूरी मशीन ही ठप्प हो जायेगी किन्तु एक-एक कर यदि वे सभी चलने लगें तो मशीन अपनी पूरी रफ्तार से चलने लगेगी। सावित्री के षट्कुक्षि का यही आशय है। इससे शरीर के छहों चक्र जाग्रत हो जाते हैं। इसलिए उसे छः कुक्षि वाली, छः साधनाओं वाली बताया गया है।
उपासना का मर्म रहस्य समझाया और कहा-’यदि तुम सवालक्ष गायत्री का जप कर लो तो तुम्हें गायत्री मंत्र सिद्ध हो जायगा।’
उपासना एवं ज्ञान ज्योति दिव्य ज्योति की उपासना सार्वभौमिक हो सकती है, निराकारवादी अन्तर्मुख होकर दिव्य-ज्योति के रूप में परमात्म सत्ता का दर्शन करते हैं और इसे सूर्य का प्रतीक मानते हैं। आध्यात्म साधना में अग्निपिंड सूर्य की प्रतिमा भर माना गया है। उसकी मूल सत्ता दिव्य ज्ञान कही गई है। निराकार प्रज्ञा तत्व का साकार रूप सविता है अर्थात् सद्ज्ञान को अन्तःकरण में आलोकित करने वाला प्रकाशवान परब्रह्म। सूर्य की उपासना करते हुए यह अनुभूति विकसित की जाती है कि वह आलोक साधक के शरीर मन और अन्तरात्मा में स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीरों में सक्रियता सद्ज्ञान एवं सद्भाव बनकर प्रकाशवान हो रहा है।
उपासना, जप, व्रत, अनुष्ठान जैसे साधनात्मक विधानों की ओर न करने पर परिणाम हानिकारक भी होता है। अपराधवृत्तियों का बाहुल्य इन्हीं दिनों देखा जाता है। देव संस्कृति में नवरात्रि पर्व के दौरान किये जानें वाले विभिन्न क्रिया कृत्यों का विधान अंतः की शक्ति को सुनियोजन देने के लिए ही है, उदाहरण के लिए गुजरात में दोनों नवरात्रियों में गरबा नृत्य संपन्न किया जाता है। भक्ति भावना की पराकाष्ठा व अंदर के उल्लास की क्रिया रूप में परिणति इस माध्यम से संपन्न होती है। महालय, दुर्गाष्टमी, पोंगल आदि पर्व ऐसी विशिष्टताओं से भरे हुए हैं।
उपासना में प्रवृत्त किया।
उपासना कहलाता है। उपासना के निमित्त जो भी पूजा उपचार किए जाते हैं, उनसे तात्पर्य, मात्र इतना है कि चेतना संस्थान को उत्कृष्टता के ढांचे में ढालने का व्यापक प्रशिक्षण दिया जाय। जो भी साधक बिना किसी उपचार के अथवा कर्मकाण्डों के सहारे अपने चेतना क्षेत्र को जितना समुन्नत बनाने का प्रयास करता है, वह उतना ही ऊँचा उठता, आगे बढ़ता व देवत्व के क्षेत्र में प्रवेश पाने का अधिकारी बनता है।
उपासना में उसकी अभिरुचि तो बचपन से ही थी, पर यहाँ आकर माता में ऐसी लगन लगी कि उन्हीं की आराधना में वह निमग्न हो गया। यहीं पर उनने कई पुरश्चरण किये और गायत्री की सिद्धि प्राप्त की। किशोरी रमण कालेज के पास स्थित, जिस टीले पर वह रहे, वह स्थान आज ‘गायत्री टीला’ के नाम से जाना जाता है। इसी टीले पर आज एक पंचमुखी कमलासन गायत्री माता की प्रतिमा भी प्रतिष्ठापित है।
उपासना से मिल सकती हैं। इस संदर्भ में देवताओं, ऋषि-महर्षियों, सिद्ध संतों, महापुरुषों ने भी अपने अनुभवों की चर्चा की है जिससे गायत्री की सर्वोपरि महत्ता का प्रतिपादन होता है और इस तथ्य का समर्थन होता कि जिन्होंने भी गायत्री उपासना का अवलम्बन लिया, उनने भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में उच्चस्तरीय सफलतायें प्राप्त कीं और आप्तकाम बने।
उपासना करो, दूसरों की नहीं। यह वस्तुतः उपासना है, जिस में उपास्य देव में गुणों का ही बार बार ध्यान किया जाता है व वैसा ही बनने का प्रयास किया जाता है।
उपासना द्वारा ब्रह्मा जी ने बाद में सृष्टि की रचना की।
उपासना है। उपास्य, लक्ष्य, इष्ट इसी को बनाना पड़ता है। प्राचीन काल में इस संबंध में तत्वज्ञानियों ने एकमत हो स्वीकार किया था कि आत्मिक प्रगति की साधना के लिए इष्ट रूप में गायत्री का ही वरण होना चाहिए। सृष्टि के आदि में ब्रह्माजी ने कमल पुष्प पर बैठ कर आकाशवाणी द्वारा निर्देशित गायत्री उपासना की थी और सृष्टि सृजन का सामर्थ्य प्राप्त किया था। त्रिदेवों की उपास्य गायत्री ही रही है।
उपासना का प्राण है। इस महाविद्या में निष्णात् होने के लिए अनिवार्य शुल्क, जिसको चुकाए बिना इसमें प्रवेश मिलना सम्भव नहीं। योगदर्शन के सूत्रकार महर्षि पतंजलि ने इन्हीं को यम-नियम का नाम दिया है। गाँधी जी के एकादश व्रतों का तात्पर्य यही है। बुद्ध के आर्य अष्टांगिक मार्ग और भगवान महावीर के पंच महाव्रतों का रहस्य यही है।
उपासना का अर्थ है समीपता। भौतिक अर्थों में समीपता का तात्पर्य इतना ही है- किसी के पास जा बैठना, उसकी निकटता हासिल कर लेना। पर कोई भी वस्तु, घटना, परिस्थिति नितान्त भौतिक नहीं होती। भौतिक तो सिर्फ ऊपर से दिखने वाला खाँचा-ढांचा है। इसके पीछे विद्यमान क्रियाशील स्पन्दनों के रूप में ऐसा बहुत कुछ विद्यमान है, जिसे हमारी आंखें भले न देख पाएँ पर संवेदनशील अन्तःकरण उसे पल-पल अनुभव करता रहता है।
उपासना से साधक में प्राणशक्ति, आत्मबल विकसित होता चला जाता है। व्यक्तित्व में कई प्रकार के परिष्कार-परिवर्तन देखें जाते है, कठिनाइयों के अवरोध मार्ग से हटते हैं तथा सफलताओं का पथ प्रशस्त होता है। गायत्री की उपासना वस्तुतः प्राणशक्ति की ही उपासना है। जिसे जितना प्राण-बल उपलब्ध हो गया हो, समझना चाहिए कि उसकी उपासना उतने ही अंशों में सफल हो गयी है। सामर्थ्यवान गुरु अपने शिष्यों को इसी प्राण सम्पदा से सुसम्पन्न बनाकर उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाते हैं।
उपासना के लिए ईश्वर की समीपता पाने के लिए तैयार करते है। ये तैयारियाँ महत्वपूर्ण है और अनिवार्य भी। जब किसी उच्च पदस्थ अधिकारी अथवा किसी अन्य अति विशिष्ट व्यक्ति से मिलने के लिए हमें अपने को तैयार करना पड़ता है, आवश्यक मनोभूमि बनानी पड़ती हैं। अनेकों सावधानियाँ बरतनी पड़ती है। तब विश्व संरचना के सर्वोच्च अधिकारी, समस्त जीवन व्यापार के केन्द्र बिन्दु से घनिष्ठता पाने के लिए यदि सावधानी बरतनी पड़े तो आश्चर्य क्या?
उपासना करते रहना चाहिए।
उपासना वस्तुतः एक ऐसी तपश्चर्या है जिसे गृहस्थ, विरागी, स्त्री और पुरुष, बालक तथा वृद्ध समान सुविधा से कर सकते हैं। तप ही एक मात्र साधन है जो नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए मनुष्य को बचाता, पाप कर्मों से उबारता और आत्मशक्ति बढ़ाता है। यह आत्मशक्ति ही संसार की सर्वोपरि वस्तु है जिसके द्वारा मनुष्य इच्छानुकूल पदार्थ, मनोवाँछित परिस्थिति और अक्षय शान्ति प्राप्त कर सकता है। दिव्य शक्तियों की सहायता और ईश्वरी कृपा को उपलब्ध करना भी गायत्री तप द्वारा उपार्जित आत्म शक्ति पर ही निर्भर है।
उपासना का अर्थ है समीप बैठना। “उप” उपसर्ग के साथ “आस्” धातु से उपासना शब्द बना है। पर “पास बैठना” इस शाब्दिक अर्थ से ही “उपासना” का पूरा भाव प्रकाशित नहीं होता वस्तुतः भावार्थ है किसी के पास बैठकर उससे तादात्म्यता संबंध स्थापित कर लेना। किसके साथ बैठकर? अपने उपास्य देव-श्रेष्ठता से अभिपूरित परमात्मसत्ता के समीप बैठकर उनके श्रेष्ठ गुणों को अपने अंदर ले लेना परमात्मा की अनुकम्पा का भागीदार, शेयर होल्डर, साझीदार बन जाना।
उपासना के लिए मिल सके। निःसंदेह इस प्रयोजन में लगा हुआ समय हर दृष्टि से सार्थक उपासना से होता है, आत्मिक प्रगति उसके फलस्वरूप व्यक्ति का समग्र विकास, उसके द्वारा सर्वतोमुखी समृद्धि की संभावना, यह चक्र ऐसा है, जिससे इस कृत्य में लगाया गया समय सार्थक ही सिद्ध होता है।
उपासना के लिए पूजा स्थली की स्थापना आवश्यक है। इसके लिए स्थान ऐसा हो, जहाँ अपेक्षाकृत अधिक एकान्त हो, आवागमन और कोलाहल कम हो। ऐसे स्थान पर एक छोटी चौकी को पीत वस्त्र से सुसज्जित कर उस पर माँ गायत्री का सुन्दर चित्र स्थापित किया जाय। गायत्री सब देवी देवताओं की शक्ति धाराएँ अपने में समाहित किए आद्यशक्ति-महाशक्ति है। अन्यान्य देवी देवताओं के चित्र भी पूजा स्थली में रखे जा सकते हैं पर वस्तुतः इनकी किसी की जरूरत है नहीं।
उपासना कैसे की जाय? यह शंका भी आज के लोगों में समय-समय पर उठती रहती है। इस संबंध में आर्षग्रन्थों ने जो समाधान सुझाया है, वह इस प्रकार है। उनके अनुसार गायत्री उपासना के दो मार्ग है एक दक्षिण मार्ग दूसरा वाम मार्ग। एक को वैदिकी, दूसरे को ताँत्रिकी कहते हैं।
उपासना में नागा करने की अपेक्षा इस प्रकार की मानसिक पूजा कर लेना भी उत्तम है। इससे संकल्पित साधना प्रक्रिया को किसी रूप में अनवरत चलती हुई तो रखा ही जा सकता है।
उपासना के दो मार्ग है एक दक्षिण मार्ग दूसरा वाम मार्ग। एक को वैदिकी, दूसरे को ताँत्रिकी कहते हैं। तंत्र शास्त्र का हर मंत्र कीलित है अर्थात् प्रतिबन्धित है। इस प्रतिबंध को हटाये बिना वे मंत्र काम नहीं करते। बन्दूक का घोड़ा जाम कर दिया जाता है तो उसे दबाने पर भी कारतूस नहीं चलता।
उपासना के लाभ असंदिग्ध है किन्तु कई बार वाँछित परिणाम में देरी होती है। वस्तुतः साधना का एक अंश पूर्वजन्मों के पाप निवारण में लग जाने से ही यह विलम्ब होता है, अतः किसी को अधीर नहीं होना चाहिए।
उपासना करने वाले चिदाकाश एवं महदाकाश में प्रतिष्ठित तेज मंडल के रूप में उसका ध्यान करते है, दोनों ही स्थितियों में सूर्यमंडल की स्थापना अनिवार्य रूप से रहेगी। प्रकाश के तेजोवलय को समन्वित किये बिना गायत्री महाशक्ति का ध्यान हो ही नहीं सकता। गायत्री उपासना के अन्त में सूर्यार्घ्यदान के रूप में जप की पूर्णाहुति की जाती है। उपासना के समय दीपक की, अगरबत्ती की, अग्नि स्थापना की आवश्यकता भी सूर्य शक्ति का प्रतिनिधित्व रखने के रूप में ही जाती है। यज्ञाग्नि में आहुति देने का विधान भी गायत्री पुरश्चरणों का अंग है।
उपासना कहा जाता है।
उपासना कृत्यों में इसे स्थान देना चाहिए।
उपासना के रूप में ध्यान प्रक्रिया के सहारे उन कृत्यों को करने की कल्पना करते हुए भी किये जा सकते हैं, उपासना में नागा करने की अपेक्षा इस प्रकार की मानसिक पूजा कर लेना भी उत्तम है। इससे संकल्पित साधना प्रक्रिया को किसी रूप में अनवरत चलती हुई तो रखा ही जा सकता है।
उपासना उतने ही अंशों में सफल हो गयी है। सामर्थ्यवान गुरु अपने शिष्यों को इसी प्राण सम्पदा से सुसम्पन्न बनाकर उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाते हैं। शिष्य की गायत्री साधना के बदले गुरु माध्यम बनकर आरुणि के लिए महर्षि धौम्य, जाबालि के लिए गौतम, अर्जुन के लिए इन्द्र, नचिकेता के लिये यम तथा कच के लिए शुक्राचार्य रूप में एवं विवेकानंद के लिए रामकृष्ण परमहंस रूप लेकर प्राणशक्ति में शिष्यों को ओतप्रोत कर देते हैं।
उपासना की क्या आवश्यकता थी? गायत्री सूर्य की आत्मा-सविता शक्ति के साथ साधक को जोड़ती है, जिसके द्वारा वह परब्रह्म महाप्राण को अपने करके लौकिक सुख एवं आत्मिक शान्ति को अनुभव करता हुआ जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
उपासना में प्रवृत्त किया। मौन रहने पर भी वे आध्यात्मिक उत्कर्ष के आकाँक्षी व्यक्तियों को लिखकर देते थे, लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि हजारों लोगों को गायत्री उपासना में प्रवृत्त करने के बाद भी उन्होंने विधिवत् किसी को शिष्य नहीं बनाया। इस संबंध में उनका यही कहना था कि सबका गुरु परम पिता परमात्मा है, उस का प्रतिनिधि अपने भीतर ही छिपा बैठा है। उसी की शरण में जाने से कल्याण है। व्यक्ति तो माध्यम भर हो सकता है।
उपासना उपचार में प्रयुक्त होने पर भी उसे इतनी ही परिधि में सीमित नहीं किया जा सकता। उसका कार्य क्षेत्र और विस्तार असीम है, अत्यधिक है।
उपासनाओं के सारतत्व जो बीज रूप में गायत्री मंत्र के रूप में विद्यमान हैं, को ही अंगीकार किया जाना चाहिए। इस मंत्र के चौबीस अक्षरों में नवयुग का संविधान, समग्र धर्म शास्त्र समाया हुआ है। व्यक्ति के सर्वांगीण उत्कर्ष और समाज की व्यापक सुव्यवस्था के लिए इससे श्रेष्ठ आचार संहिता कोई नहीं।
उपासना करके हम वह लाभ ले सकते है, जिसके लिए यह मानव शरीर उपलब्ध हुआ है। वस्तुतः गायत्री उपासना सावित्री साधना ही हमारा जीवन लक्ष्य हो सकता है, होना चाहिए।
उपासना करता है, वह प्रस्तुत पकवान को छोड़कर भिक्षा के लिए घूमने वाले के समान मूर्ख है। मनु भगवान ने स्वयं कहा है कि अन्य देवताओं की उपासना करें न करें, केवल गायत्री के जप से ही द्विज अक्षय मोक्ष को प्राप्त होता है।
उपासना
उपासना है। जिसे जितना प्राण-बल उपलब्ध हो गया हो, समझना चाहिए कि उसकी उपासना उतने ही अंशों में सफल हो गयी है। सामर्थ्यवान गुरु अपने शिष्यों को इसी प्राण सम्पदा से सुसम्पन्न बनाकर उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाते हैं। शिष्य की गायत्री साधना के बदले गुरु माध्यम बनकर आरुणि के लिए महर्षि धौम्य, जाबालि के लिए गौतम, अर्जुन के लिए इन्द्र, नचिकेता के लिये यम तथा कच के लिए शुक्राचार्य रूप में एवं विवेकानंद के लिए रामकृष्ण परमहंस रूप लेकर प्राणशक्ति में शिष्यों को ओतप्रोत कर देते हैं।
उपासना क्रम व मंत्रों आदि का विवरण विस्तार से जानना हो, उन्हें शांतिकुंज हरिद्वार एवं युगनिर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित गायत्री संबंधी साहित्य पढ़ना चाहिए। गायत्री उपासना इस कलियुग में एक संजीवनी, महौषधि के समान है। आसन्न विभीषिकाओं से बचने के लिए यह श्रेष्ठतम न्यूनतम आध्यात्मिक उपचार है।
उपासना के अन्त में सूर्यार्घ्यदान के रूप में जप की पूर्णाहुति की जाती है। उपासना के समय दीपक की, अगरबत्ती की, अग्नि स्थापना की आवश्यकता भी सूर्य शक्ति का प्रतिनिधित्व रखने के रूप में ही जाती है। यज्ञाग्नि में आहुति देने का विधान भी गायत्री पुरश्चरणों का अंग है। इसमें भी दूरस्थ सूर्य की निकटस्थ प्रतिनिधि के रूप में प्रतिष्ठ करने की भावना है।
उपासना में पंचकोशों के जागरण-अनावरण की साधना का महत्वपूर्ण स्थान है। पाँचकोश वस्तुतः तिजोरी के भीतर पाँच तालों में बंद बहुमूल्य रत्न भण्डार के समान हैं।
उपासना के दौरान माला, स्थान, उपकरण, उपचार आदि में प्रयुक्त हुए पदार्थों की शुद्धता का भी ध्यान रखना पड़ता है। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है मंत्र के प्रति अटूट विश्वास। यह सभी बातें जहाँ भली-भाँति प्रयुक्त होती हैं, वहाँ मंत्रोपासना का प्रतिफल भी निश्चित रूप से दृष्टिगोचर होता है।
उपासना शब्द बना है। पर “पास बैठना” इस शाब्दिक अर्थ से ही “उपासना” का पूरा भाव प्रकाशित नहीं होता वस्तुतः भावार्थ है किसी के पास बैठकर उससे तादात्म्यता संबंध स्थापित कर लेना। किसके साथ बैठकर? अपने उपास्य देव-श्रेष्ठता से अभिपूरित परमात्मसत्ता के समीप बैठकर उनके श्रेष्ठ गुणों को अपने अंदर ले लेना परमात्मा की अनुकम्पा का भागीदार, शेयर होल्डर, साझीदार बन जाना। तैत्तिरीय उपनिषद् में ऋषि कहते हैं यानि अस्माकं सुचरितानि।
उपासना का सच्चा स्वरूप अपना लिया गया।
उपासना में गायत्री का मातृसत्ता के दिव्य शक्ति के रूप में नारी कलेवर रूप में निर्धारण हुआ है। मानवी आकृति में उसे देवी की प्रतीक-प्रतिमा के रूप में प्रतिष्ठापित किया गया है। यह उचित भी है। इसमें पवित्रता, सहृदयता, उत्कृष्टता, सद्भावना, सेवा-साधना जैसे मातृशक्ति में विशिष्ट रूप से पाये जाने वाले गुणों का साधक को अनुदान मिलता है। इस प्रतीक पूजा से नारी तत्व के प्रति पूज्य भाव की सहज श्रद्धा उत्पन्न होती है।
उपासना सार्वभौमिक हो सकती है, निराकारवादी अन्तर्मुख होकर दिव्य-ज्योति के रूप में परमात्म सत्ता का दर्शन करते हैं और इसे सूर्य का प्रतीक मानते हैं। आध्यात्म साधना में अग्निपिंड सूर्य की प्रतिमा भर माना गया है। उसकी मूल सत्ता दिव्य ज्ञान कही गई है। निराकार प्रज्ञा तत्व का साकार रूप सविता है अर्थात् सद्ज्ञान को अन्तःकरण में आलोकित करने वाला प्रकाशवान परब्रह्म। सूर्य की उपासना करते हुए यह अनुभूति विकसित की जाती है कि वह आलोक साधक के शरीर मन और अन्तरात्मा में स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीरों में सक्रियता सद्ज्ञान एवं सद्भाव बनकर प्रकाशवान हो रहा है।
उपासना के दौरान कक्ष में सूक्ष्म छाया रूप में आए व विस्मित अपने शिष्य को पूर्वजन्मों की झाँकी तथा भविष्य के अनेकों कार्यक्रम का भार सौंप कर चले गए। पूर्वजन्मों की झाँकी इसलिए कि महाकाल की अवतारी सत्ता को आत्मबोध हो सके कि उनके अवतरण का कितना महान प्रयोजन है। हर गुरु ने अपने-अपने समय में अपने शिष्य को इसी तरह ज्ञानचक्षु दिए हैं। निर्देश साथ में यह दिए गए कि वे तुरंत चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण आरंभ कर दें। ये चौबीस वर्ष से सत्ताईस वर्ष में संपन्न किये जायँ।
उपासना के दो भिन्न नाम हैं, इसे भली भाँति हृदयंगम कर लिया जाना चाहिए।
उपासना करते हुए यह अनुभूति विकसित की जाती है कि वह आलोक साधक के शरीर मन और अन्तरात्मा में स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीरों में सक्रियता सद्ज्ञान एवं सद्भाव बनकर प्रकाशवान हो रहा है। इस प्रकार सूर्य को न केवल आलोक दर्शन की दिव्य प्रक्रिया मात्र मानकर बात समाप्त कर दी जाती है। वरन् उसकी आभा से आत्मसत्ता को पूरी तरह प्रकाशित एवं प्रभावित भी देखा जाता है। निराकार उपासक के लिए भी भगवान व्यक्ति बन जाता है और उसे स्थान विशेष पर प्रतिष्ठित नहीं वरन् व्यापकता के सहित अनुभूति में उतारा जाता है।
उपासना किए जाने की आवश्यकता है ताकि उस त्रिपदा गायत्री की तीनों धाराएँ व्यक्ति का अज्ञान, अभाव, अशक्ति मिटाएँ व नवयुग का सूत्रपात करें। दुखों के कारणों में भी प्रधान दो ही हैं अज्ञान और अशक्ति। अभाव तो इनकी परिणति मात्र है। गायत्री की तीनों शक्ति धाराएँ ह्रीं, श्रीं और क्लीं-सरस्वती, लक्ष्मी और काली सद्ज्ञान, वैभव एवं शक्ति की प्रतीक हैं तथा मानव मात्र के दुखों के निवारण हेतु ऋषि मुनियों के श्रमसाध्य शोध अनुसंधान का परिणाम हैं।
उपासना में प्रयुक्त होने वाला हिन्दू धर्म में प्रचलित एक मंत्र मात्र प्रतीत होता है। मोटी दृष्टि से उसकी आकृति और परिधि छोटी मालूम पड़ती है। किन्तु वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है। गायत्री मंत्र शक्ति से ओतप्रोत है। उसका प्रत्यक्ष रूप चौबीस अक्षरों के गुँथनों में देखा जा सकता है।
उपासना में प्रवृत्त किया और उन्हें सफलता की मंजिल तक पहुँचाया। उनसे दीक्षा प्राप्त करने के बाद उनके शिष्यों पर कदाचित कोई संकट आता तो व उन्हें अनायास ही दूर कर देते थे। उनकी वाक्सिद्धि बड़ी विलक्षण थी, जो कह देते वह होकर रहता।
उपासना। साकार परमेश्वर यह विश्व ब्रह्मांड है। शिवलिंग और शालिग्राम की गोलमटोल प्रतिमाएँ इसी के प्रतीक रूप में गढ़ी गई हैं। भगवान राम ने कौशल्या और काकभुशुंडि को-भगवान कृष्ण ने अर्जुन और यशोदा को यही अपना विराट रूप दिखाया था। साकार ईश्वर की उपासना लोकमंगल के सत्प्रयोजनों में संलग्न रह कर की जा सकती है।
उपासना पर दृढ़ विश्वास था एवं इसी कारण वे पढ़ न पा सकने के बावजूद अध्यात्म ग्रन्थों के मर्म को गहराई तक जानते थे। उनने ही प्रेरणा देकर भटक रहे दयानन्द को पास बुलाकर शक्तिपात किया था। महर्षि दयानन्द अपने गुरु से गायत्री का ब्रह्मवर्चस् प्राप्त कर ही सारे भारत वर्ष में एक धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिक क्राँति का वातावरण बनाने में सक्षम हुए। स्वयं स्वामी जी अपने अनुभव के आधार पर लिखते हैं कि इस महामंत्र द्वारा परमात्मा के तेज का ध्यान करने से बुद्धि की मलिनता दूर हो जाती है। दूसरे किसी मंत्र में ऐसी गहराई और सच्चाई नहीं है।
उपासना के माहात्म्य से अनेकानेक ग्रन्थ भरे पड़े हैं। वस्तुतः वे सभी लाभ साधक को मिल सकते हैं, यदि बिना भटके राजमार्ग का अपनाया जाय तो आत्मोत्कर्ष की चरम परिस्थिति पूर्णता तक पहुँचाती है। साकार व निराकार उपासना जब भी सारा तत्व ज्ञान व पृष्ठभूमि समझते हुए की जाती है, तो साधना से सिद्धि के सिद्धाँत में फिर कहीं भी किसी सन्देह की गुँजाइश नहीं रह जाती।
उपासना माना गया है। जप के लिए माला का प्रयोग किया जाता है। प्रश्न पूछा जा सकता है कि माला में 108 दाने ही क्यों होते है? न्यूनाधिक क्यों नहीं?
उपासना की उसका आश्चर्यजनक प्रतिफल उन्हें मिला।
उपासना का तात्पर्य ब्रह्मतेज की अवतरण प्रक्रिया आत्मचेतना की पृष्ठभूमि पर सम्पन्न कराना है। आत्मा को पृथ्वी और ब्रह्मतेज को सूर्य की उपमा दी जा सकती है। पृथ्वी पर जो जीवन दृष्टिगोचर होता है, वह सूर्य का ही अनुदान है। सूर्य को जगत की आत्मा बताया गया है। पृथ्वी पर जिस तरह सूर्य केन्द्र से जीवन बरसता है, उसी प्रकार आत्मा रूपी पृथ्वी पर ब्रह्मसत्ता के प्राण तेज की वर्षा होती है।
उपासना में रुचि हो गयी थी। अपने गाँव के एक वटवृक्ष के नीचे बैठकर वे नियमित रूप से गायत्री जप करते थे। एक दिन कोई महात्मा उनके गाँव आये। बालक रामदास को उन्होंने वटवृक्ष के नीचे ध्यान मुद्रा में बैठे देखा तो देखते ही रहे। ध्यान जब पुरा हुआ तो उन महात्मा ने रामदास से अकस्मात ही कहा-”बेटा तुम गायत्री उपासना करते हो न?
उपासना लोकमंगल के सत्प्रयोजनों में संलग्न रह कर की जा सकती है।
उपासना जब भी सारा तत्व ज्ञान व पृष्ठभूमि समझते हुए की जाती है, तो साधना से सिद्धि के सिद्धाँत में फिर कहीं भी किसी सन्देह की गुँजाइश नहीं रह जाती।
उपासना घर में आस्तिकता का वातावरण बनाती है। अनुदान रूप में पारिवारिक सौहार्द्र, भावनात्मक विकास, बौद्धिक प्रगति व सघन-समृद्धि जो भी कुछ अभीष्ट है,सभी देती है। इसका महत्व युग संधि की बेला में तो अत्यधिक है। इसे भली भाँति समझकर हर धर्मनिष्ठ परिजन को इस दैनंदिन जीवन का एक अंग बनाना चाहिए। जिन्हें उपासना क्रम व मंत्रों आदि का विवरण विस्तार से जानना हो, उन्हें शांतिकुंज हरिद्वार एवं युगनिर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित गायत्री संबंधी साहित्य पढ़ना चाहिए।
उपासना के संबंध में गीता में भगवान कहते हैं कि यह मार्ग किसी भी स्थिति में नुकसान पहुँचाने वाला नहीं।
उपासना है। यह तथ्य सर्वविदित है कि उपासक का स्तर ऊँचा होगा और उपास्य का स्वरूप वास्तविक होगा तो दोनों की घनिष्ठता का प्रभाव इसी रूप में प्रकट होगा कि उपासक उपास्य के तद्रूप बनता चला जाय। तद्रूप बनना, एकाकार हो जाना तादात्म्य हो जाना ही उपासना की चरम स्थिति हैं।
उपासना करने पर उन्हें गायत्री मंत्र के लिए निषिद्ध कर देते थे।
उपासना की सर्वोच्च स्थिति में श्रेष्ठ संवेदनाएँ आत्मीयता, करुणा, उदारता, सेवा सद्भावना के रूप में आगे बढ़कर व्यावहारिक जगत विकसित होती हैं। इस स्थिति में निरन्तर ईश्वर दर्शन की अनुभूति होती है। भगवान सूक्ष्म है। उनका साक्षात्कार सदैव भावानुभूति के रूप में होता है। ईश्वर दर्शन सदैव अन्तःकरण में दिव्यता की झाँकी के रूप में होता है।
उपासना का स्वरूप अपना लिया गया और उससे अभीष्ट उद्देश्य पूरा हो सकने की सम्भावना बन रही है।
उपासना क्रम को सम्मिलित रखना चाहिए। उपासना किनकी व किस पद्धति से की जाय, इस पर मतभेद से तो विग्रह बढ़ेंगे व संकट उठ खड़े होंगे। अगला युग एकता का है। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को बनाए रखने के लिए विश्व की सभी प्रचलित उपासनाओं के सारतत्व जो बीज रूप में गायत्री मंत्र के रूप में विद्यमान हैं, को ही अंगीकार किया जाना चाहिए। इस मंत्र के चौबीस अक्षरों में नवयुग का संविधान, समग्र धर्म शास्त्र समाया हुआ है।
उपासना का विधान वर्णन करते हुए उसकी महत्ता, विशेषता एवं उपलब्धियों का संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित शब्दों में इस प्रकार उल्लेख किया है-
उपासना द्वारा हस्तगत की जाती हैं। इसे गायत्री मंत्र का विशिष्ट शब्द-सामर्थ्य ही कहनी चाहिए कि एक ही मंत्र के प्रयोग द्वारा भौतिक अथवा आध्यात्मिक सभी प्रयोजन पूरे हो जाते हैं।
उपासना वह आकर्षण एवं वह चुम्बकत्व है जो ईश्वरीय विभूतियों ऋद्धि-सिद्धियों दैवी गुणों एवं महानता को खींच ले आती है। उपासना
उपासना इस कलियुग में एक संजीवनी, महौषधि के समान है। आसन्न विभीषिकाओं से बचने के लिए यह श्रेष्ठतम न्यूनतम आध्यात्मिक उपचार है।
उपासना जिस परमात्मा की जाती है, वह आत्मा का ही परिष्कृत रूप हैं। वेदान्तदर्शन में उसे सोऽहम् शिवोऽहम्, तत्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म आदि शब्दों में अन्तःचेतना के उच्चस्तरीय विशिष्टताओं से भरे पूरे उत्कृष्टताओं के समुच्चय के रूप में परमात्मा कहकर संबोधित किया गया है। उसके साथ मिलन का, तादात्म्य का स्वरूप तभी बनता है, जब दोनों के मध्य एकता, एकात्मता सामीप्य सघनतम हो। इसके लिए साधक अपने आपको कठपुतली की स्थिति में रखता है और अपने अवयवों में बँधें धागों को बाजीगर के हाथों सौंप देता है। दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर देने वाला खेल इस स्थापना के बिना बनता ही नहीं।
उपासना का अगला चरण “ध्यान” जो जप के साथ चलना चाहिए, शरीर के अंग अवयव जपकृत्य करते चलें। मन को खाली न छोड़े। ध्यान वस्तुतः परम तत्व में नियोजित रखे रहने के लिए जप के साथ किया जाता है। साकार ध्यान में गायत्री माता के अंचल की छाया में बैठने तथा उसका सुधार भरा प्यार अनवरत रूप से पाने की भावना की जाती है। निराकार ध्यान में प्रभाव कालीन स्वर्णिम सूर्य की किरणें द्वारा शरीर में श्रद्धा, मस्तिष्क में प्रज्ञा, काया में निष्ठ के दिव्य अनुदान उतरने की मान्यता परिपक्व की जाती है।
उपासना रूपी उस राजमार्ग की है, जिसमें ईश्वर के साथ एकाकार हो जाने, समुद्र में बूँद का अस्तित्व मिला देने एवं पतंगे की तरह दीपक की लौ में प्राण न्यौछावर करने की आकुलता एवं श्रेष्ठ बनने का विश्वास मुख्य होता है। दृढ़ विश्वास एवं आकुलता तड़पन वह आकर्षण है जो हमें इष्ट तक ले जाने एवं तद्रूप बना देने में समर्थ है। कहा जाता है कि भृंग नाम का कीड़ा झींगुर पकड़ लाता है और उसके सामने निरन्तर गुँजन करता रहता है। उस गुँजन को सुनने और छवि देखते रहने में झींगुर की मन स्थिति भृंग जैसी हो जाती है, वह अपने को भृंग समझने लगता है। अस्तु धीरे-धीरे उसका शरीर ही भृंग रूप में बदल जाता है।
उपासना ही ईश्वर की उपासना है। उपास्य, लक्ष्य, इष्ट इसी को बनाना पड़ता है। प्राचीन काल में इस संबंध में तत्वज्ञानियों ने एकमत हो स्वीकार किया था कि आत्मिक प्रगति की साधना के लिए इष्ट रूप में गायत्री का ही वरण होना चाहिए। सृष्टि के आदि में ब्रह्माजी ने कमल पुष्प पर बैठ कर आकाशवाणी द्वारा निर्देशित गायत्री उपासना की थी और सृष्टि सृजन का सामर्थ्य प्राप्त किया था। त्रिदेवों की उपास्य गायत्री ही रही है।
उपासना की गरिमा का दोष नहीं। साधक का ओछा व्यक्तित्व अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करने योग्य न होने से ही निराशा हाथ लगती है।
उपासना की ओर महाप्रतापी पुत्र रत्न पाया। योगिराज मत्स्येन्द्रनाथ की भस्म विभूति के द्वारा महायोगी गोरखनाथ का जन्म हुआ था। अंजनी ने कठिन तप करके बजरंगी हनुमान का प्रसव किया था। कर्ण को गायत्री की सविता साधना के कारण ही नित्य सौ मन स्वर्ण प्राप्त होने का वरदान था, जिसे वह दान कर देते थे। परशुराम अकेले होते हुए भी पृथ्वी के समस्त राजाओं को सेना समेत संहार करने में सफल हुए थे।
उपासना करो। उसी से तुम्हारा उद्धार होगा। पूर्वजन्म के संबंधी भी तुम्हें अमुक गाँव में मिलेंगे। अगले दिन रिश्तेदारी में जाने पर सब बातें सच निकली। मथुरा आकर परमपूज्य गुरुदेव से (जिन्हें उनने स्वप्न में देखा था) गायत्री मंत्र की विधिवत् दीक्षा ली और दस वर्ष तक अनवरत साधना पुरश्चरण कर माँ का साक्षात्कार किया।
उपासना सार्वभौम सार्वजनीन बन सके इसके लिए आवश्यक है निराकार उपासना को भी मान्यता मिले। इस दृष्टिकोण से सविता देवता की उपासना एवं ज्ञान ज्योति दिव्य ज्योति की उपासना सार्वभौमिक हो सकती है, निराकारवादी अन्तर्मुख होकर दिव्य-ज्योति के रूप में परमात्म सत्ता का दर्शन करते हैं और इसे सूर्य का प्रतीक मानते हैं। आध्यात्म साधना में अग्निपिंड सूर्य की प्रतिमा भर माना गया है। उसकी मूल सत्ता दिव्य ज्ञान कही गई है। निराकार प्रज्ञा तत्व का साकार रूप सविता है अर्थात् सद्ज्ञान को अन्तःकरण में आलोकित करने वाला प्रकाशवान परब्रह्म।
उपासना में बाधक हैं। ये सारी बाधाएँ कहीं बाहर न होकर हमारे स्वयं के व्यक्तित्व में है। इनके निवारण का नाम ही तप है। बाह्य परिस्थितियाँ हमारी इन तैयारियों में साथ दें इसी की पूर्ति के लिए कर्मकाण्ड हैं। व्यक्तित्व की संरचना भेद, समय और परिस्थितियों के बदले रूप के अनुसार इनके प्रकार अनेक हो सकते हैं, पर प्रत्येक धर्म, सम्प्रदाय आचार्य इस तथ्य से सहमत हैं कि इन सबके पीछे एक ही मूल तत्व है, स्वयं के अस्तित्व को परम अस्तित्व से जोड़ने, मिलाने, समीप ले जाने के लिए तैयार करना।
उपासना के माध्यम से आत्मबल संवर्धन और भावनात्मक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा करते रहे हैं। मंत्र साधना से भौतिक किंवा आध्यात्मिक सिद्धि के क्षेत्र में गायत्री मंत्र की गरिमा सर्वोपरि है। किसी भी भारतीय संस्कृति के अनुयायी को इस महामंत्र की उत्कृष्टता के संबंध में किसी प्रकार का संदेह न रख भावनापूर्वक दैनन्दिन उपासना कृत्यों में इसे स्थान देना चाहिए।
उपासना है, जिस में उपास्य देव में गुणों का ही बार बार ध्यान किया जाता है व वैसा ही बनने का प्रयास किया जाता है।
उपासना करने वालों की संख्या बड़ी है।
उपासना के सर्वाधिक प्रचार-प्रसार का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है।
उपासना को गतिशील कर सकता है।
उपासना, उस जन्म की अनुभूतियाँ अब उन्हें याद आती चली गयी। यह भी याद आया कि कैसे एक सुन्दरी, रूपवती युवती के रूप जाल में उलझ कर वे साधना मार्ग से विरत हो गए थे व उन्हें विष देकर मार दिया गया था।
उपासना करने और उससे लाभान्वित होने का पूरा-पूरा अधिकार है। इस संबंध में अधकचरे ज्ञान के आधार पर उठायी गयी प्रतिगामी टिप्पणियों से अप्रभावित हो, जिन्हें भी आत्मिक प्रगति में तनिक भी रुचि हो, बिना किसी आशंका-असमंजस के श्रद्धापूर्वक गायत्री उपासना करते रहना चाहिए।
उपासना।
उपासना का क्रम चले। इससे विशिष्ट ऊर्जा का उद्भव होता है।
उपासना करके किस प्रकार दिव्य शक्तियाँ अर्जित की थी और उसके द्वारा वे कितनी महान सफलतायें उपलब्ध कर सके थे, इतिहासवेत्ताओं से इनके चरित्र छिपे नहीं है।
उपासना को अपनाते और धर्म, अर्थ काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को प्राप्त करते हैं।
उपासना को भी मान्यता मिले। इस दृष्टिकोण से सविता देवता की उपासना एवं ज्ञान ज्योति दिव्य ज्योति की उपासना सार्वभौमिक हो सकती है, निराकारवादी अन्तर्मुख होकर दिव्य-ज्योति के रूप में परमात्म सत्ता का दर्शन करते हैं और इसे सूर्य का प्रतीक मानते हैं। आध्यात्म साधना में अग्निपिंड सूर्य की प्रतिमा भर माना गया है। उसकी मूल सत्ता दिव्य ज्ञान कही गई है। निराकार प्रज्ञा तत्व का साकार रूप सविता है अर्थात् सद्ज्ञान को अन्तःकरण में आलोकित करने वाला प्रकाशवान परब्रह्म।
उपासना सफल नहीं हो सकती। सामर्थ्यवान गुरु शिष्य को अपने आत्मबल का सामर्थ्यवान अनुदान भी देता है। इसलिए समर्थ गुरु की नियुक्ति इस क्षेत्र में आवश्यक बतायी गई है।
उपासना व साधना की अनेकों प्रथाओं पद्धतियों के रूप में बिखरा पड़ा है। मोटे रूप से तो यह ऐसा लगता है मानों किसी देवी-देवता की अभ्यर्थना कर मनोकामना की मनुहार इसमें की जा रही हैं। किन्तु वास्तविकता ऐसी है नहीं। मानवी सत्ता के अन्तराल में इतनी महान संभावनाएँ और क्षमताएँ प्रसुप्त भरी पड़ी हैं कि उन्हें प्रकारान्तर से ब्रह्म चेतना की “ट्रू कॉपी” कहा जा सकता है। अंतराल का सोया पड़ा रहना ही दरिद्रता है और उसकी जाग्रति में सम्पन्नता का महासागर लहलहाता देखा जा सकता है।
उपासना की दृष्टि से उसके दोनों ही प्रभाव प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं। साधक के स्थूल, सूक्ष्म व कारण शरीर का परिशोधन, परिष्कार कर सकने की व्यक्तिगत सामर्थ्य जितनी उसमें है, उतनी कदाचित ही किसी अन्य उपासना आधार से मिल सके। इस मंत्रोच्चारण से जुड़े शब्द प्रवाह से उद्भव सामर्थ्य अदृश्य जगत में अन्तरिक्ष में भरी विषाक्तता का निराकरण करने की अद्भुत क्षमता रखता है।
उपासना का उपक्रम अपनाना पड़ता है। यह समूची अन्तः संरचना को बदल डालने वाला महान-प्रयोग है, जिसे पूरा करने के लिए समय श्रम और मनोयोग के साथ अटूट धैर्य की आवश्यकता पड़ती है। जो इसे कर्मकाण्ड के कुछ कृत्यों के रूप में समझते हैं और उन्हें उल्टे-सीधे ढंग से पूरा करके लाभ बटोरना चाहते हैं, उन्हें परिणाम में निराशा मिलनी सहज है।
उपासना बताया था। युद्धोन्माद से बढ़ते विश्वव्यापी तनाव को देखते हुए उनने कहा था कि गायत्री मंत्र जिस देश से उत्पन्न हुआ है, वह राष्ट्र यदि नेतृत्व अपने हाथ में ले एवं करोड़ों भारतवासी एक साथ गायत्री का उच्चारण आरम्भ कर दें तो इससे उद्भूत ऊर्जा किसी भी आणविक विभीषिका को टाल सकती है। ब्लिट्ज के सम्पादक श्री करंजिया से साक्षात्कार के दौरान उनने यह कहा था, जिसे अगस्त 1982 के नवनीत में प्रकाशित भी किया गया था।
उपासना से होता है, आत्मिक प्रगति उसके फलस्वरूप व्यक्ति का समग्र विकास, उसके द्वारा सर्वतोमुखी समृद्धि की संभावना, यह चक्र ऐसा है, जिससे इस कृत्य में लगाया गया समय सार्थक ही सिद्ध होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-June
उपासना मनुष्य की भावनाओं, आकाँक्षाओं, उमंगों, प्रतिभा तथा प्रज्ञा को उभारती है और सावित्री आयु, प्रजा , कीर्ति धन आदि लौकिक सम्पदाओं को प्रदान करती है, क्योंकि वे सम्पदायें पदार्थ जगत से सम्बन्धित हैं। गायत्री को एकमुखी और सावित्री को पंचमुखी कहा गया है। सावित्री भौतिकी है और गायत्री आत्मिकी। दोनों का अपना-अपना महत्व है। मनुष्य अपने पुरुषार्थ से सम्पदाएँ अर्जित कर लेता है।
उपासना कठिन है। उसमें प्राण विद्युत को उस स्तर तक उभारना पड़ता है कि आकाश में कड़कती बिजली को तरह वह इन्द्र वज्र की भूमिका निभा सके। आत्मिकी के क्षेत्र में सावित्री महाशक्ति का आह्वान सूर्य शक्ति के रूप में करना पड़ता है और इस योग्य बनाना पड़ता है कि अन्तराल में छिपी हुई ऋद्धि-सिद्धियाँ इसी काया में प्रकट-हो सकें और साधक को ऋषिकल्प ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी और तपस्वी स्तर का बना सकें।
उपासना के लिए प्रेरित करें, उन्हें मार्गदर्शन देते रहें। वे लिखते हैं “आपकी धर्मपत्नी इतिहास में अमर रहने वाली महापुरुषों की माताओं से एक होंगी। उसके अनुरूप ही उन्हें बनना है।” यह कितनी सशक्त प्रेरणा है, जिसके माध्यम से परम पूज्य गुरुदेव ने गृहस्थ संस्था में एक अभूतपूर्व क्रान्ति कर दी। उन्हें समय के अनुरूप संन्यासियों की नहीं, सही जीवन जीने वाले सद्गृहस्थों की आवश्यकता थी।
उपासना की, आध्यात्मिकता की भाषा में रखा गया -गायत्री विद्या, ब्रह्म विद्या। आज उसी महान शक्ति का जन्म दिन है। वह महान शक्ति मनुष्य की तमाम शक्तियों को उभारने वाली है।
उपासना भी करता रहा, पूजा-प्रार्थना भी करता रहा। लेकिन अपने अन्तरंग में गायत्री की उन तीन धाराओं को, जिन्हें मैं सूक्ष्म धाराएँ कहता हूँ, उनको भी अपने जीवन में धारण करने की कोशिश मैं करता रहा। अब जब कि मथुरा के मेरे जीवन का अन्तिम गायत्री जयन्ती का अवसर है, तब मैं आपको अपने जीवन के अनुभव न सुनाऊँ तो यह उचित न होगा। इस अन्तिम अवसर पर अपने सारे जीवन, साठ वर्ष के निष्कर्ष जिसको आप चाहें तो गायत्री चमत्कार का मूल आधार कह सकते हैं, बता रहा हूँ। मेरे व्यक्तित्व में महानता आप समझते हों, गायत्री मंत्र की महत्ता के द्वारा आदमी को कुछ परिणाम मिल सकते हैं अगर ऐसी आपकी मान्यता हो तो उस मान्यता के साथ एक और मान्यता जोड़ लेने की मेरी प्रार्थना है कि गायत्री ध्यान करने के लिए वास्तव में कोई महिला नहीं, विवेकशीलता और विचारशीलता की धारा के प्रवाह का नाम है जो इस विश्व में प्रवाहित है, जो मनुष्य के मस्तिष्क को, क्रियाकलाप को और अन्तरात्मा को छूता है।
उपासना की, जप किया और जप के साथ भावनाओं को हृदयंगम किया।
उपासना-प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती। जन्म जन्मान्तरों के संस्कार प्रबल होने के कारण उनकी वाणी या भविष्य कथन पूरी तरह सत्य सिद्ध होते हैं। ऐसे जातक स्वयं आत्मबल संपन्न होते हैं व दैवी कृपा के कारण संपर्क में आने वालों में भी संचार कर देते हैं। पूज्य गुरुदेव के जीवन में सतत् उतरती रही भगवत्कृपा व उनके माध्यम से औरों को वितरित अनुदान उसके परिचायक हैं।
उपासना का विधान है। त्रिकाल संध्या न बन पड़े तो उसे एक बार प्रातःकाल तो किसी न किसी रूप में अनिवार्य रूप से करना ही चाहिए।
उपासना उसकी जिस तरीके से की जाती है, उस तरीके से न की जाय तो उससे न तो भीतर से सिद्धियाँ उपजती हैं, न विभूतियाँ। स्वरूप क्या? स्वरूप यह कि मनुष्य का जो विवेक सो गया है, उसे जाग्रत किया जाय।
उपासना इन्हीं प्रभावों को पुरुषार्थ द्वारा सहयोगी बना लेने से सिद्धिदायक बनती देखी गयी।
उपासना को ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में समझने की कोशिश की और समझाने की भी। लेकिन लोगों ने उसके बाह्य कलेवर को जो सुगम था और ऐसा मालूम पड़ता था कि हमारी कामनाओं और इच्छाओं को पूरा करने में सहायक है, उतने वाले हिस्से को पकड़ लिया और बाकी वाले हिस्से को भूल गया। असंयमी रोगी के लिए अच्छा हकीम कौन? वह जो मनमर्जी का भोजन करने दे। सबसे अच्छी देवी कौन?
उपासना की प्रक्रिया इसी प्रकार चलती हुई चली गयी। लम्बे जीवन भर में गायत्री मंत्र का जप करता रहा, स्थूल उपासना भी करता रहा, पूजा-प्रार्थना भी करता रहा। लेकिन अपने अन्तरंग में गायत्री की उन तीन धाराओं को, जिन्हें मैं सूक्ष्म धाराएँ कहता हूँ, उनको भी अपने जीवन में धारण करने की कोशिश मैं करता रहा। अब जब कि मथुरा के मेरे जीवन का अन्तिम गायत्री जयन्ती का अवसर है, तब मैं आपको अपने जीवन के अनुभव न सुनाऊँ तो यह उचित न होगा। इस अन्तिम अवसर पर अपने सारे जीवन, साठ वर्ष के निष्कर्ष जिसको आप चाहें तो गायत्री चमत्कार का मूल आधार कह सकते हैं, बता रहा हूँ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-December
उपासना में अरुचि रखने वाले अध्यात्म सिद्धाँतों से असहमत लोगों के लिए भी उपयोगी रहेगी। आस्तिक प्रवृत्ति के लोग भी उनसे समुचित लाभ उठा सकते हैं। प्रक्रिया इस प्रकार है। -
उपासना का प्रतिफल था जो उनने अपने जीवन में कर दिखाया और अमर बन गये।
उपासना द्वारा ही हुआ था।
उपासना की एकाग्रता तभी सध सकती है जब विचारतंत्र को- मानसिक हलचलों के बिखराव से बचाकर एक सीमित परिधि में सीमाबद्ध किया जाय। मन को एक सीमित परिधि में ही चिंतन करते रहने के लिए प्रशिक्षित किया जाय। इसके लिए सर्वोत्तम उपाय उपचार ध्यान साधना है, इसका स्वरूप यह है कि विचारों को केन्द्रीभूत करके किसी एक लक्ष्य पर नियोजित किया जाय। इसमें सफलता तभी मिलती है जब चेतना का मस्तिष्कीय हलचलों पर नियंत्रण सध जाय। गायत्री माता-के इष्टदेव के अथवा स्वर्णिम सविता के प्रकाश मण्डल के या अन्य किसी केन्द्र पर मन मस्तिष्क को सीमाबद्ध किये रहा जाय।
उपासना के भावना क्षेत्र में भी लागू होती है। माता का नारी रूप ध्यान भूमिका में जब प्रवेश करता है तो उससे प्राण की एक बड़ी अपूर्णता पूरी होती है।
उपासना आराधना करने से वह प्रसन्न होते हैं और साधक का मनोरथ पूर्ण करते है। गायत्री का प्रज्ञा योग सविता शक्ति के साथ जुड़ा हुआ है। गायत्री उपासना इस रहस्य को समझाते हुए सूर्योपस्थान सूर्यार्घ्यदान आदि क्रिया-कृत्य संपन्न करते हैं और बदले में सद्बुद्धि का अनुदान प्राप्त करते हैं। प्रकाश पुँज सविता की ध्यान-धारणा साधक को प्रखर प्रज्ञा का, महापुराण का दिव्य वरदान प्रदान करती है, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
उपासना पूर्व प्रायश्चित विधान का मूलभूत उद्देश्य है।
उपासना आराधना करेगा, उसकी इच्छा पूर्ति होगी, इसमें कोई संशय नहीं।
उपासना करते हैं।
उपासना जीवन में सुख, वैभव, शाँति, आत्मसंतुष्टि, यश, कीर्ति तथा आत्मबल जैसे सभी अनुदानों को बरसाने का निमित्त कारण बनती है।
उपासना में इस महाशक्ति को नारी रूप देकर एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आवश्यकता की पूर्ति का प्रयत्न किया गया है।
उपासना, तपस्या आदि आत्मिक उपार्जनों पर ही ध्यान केन्द्रित न किया जाय, वरन् यह भी देखा जाय कि उस भावनात्मक उत्पादन का प्रयोग उपयोग लोक मंगल के लिए अथवा किस प्रयोजन के लिए किया जा रहा है।
उपासना पक्ष इनकी अलंकारिक प्रतिमा बना लेता है। निराकार इन्हें दिव्य तरंगों के रूप में पकड़ता है। इस प्रकार ब्रह्म चेतना की किस दिव्य तरंग का प्रयोग किया जाय इसके लिए विभिन्न विधान आधारित हैं। किस के लिए देव संपर्क का क्या तरीका ठीक रहेगा यह निश्चय करके मंत्र साधक को अपने साधना पथ पर बढ़ना होता है।
उपासना की है, क्योंकि यह खुला रहस्य है कि शक्ति बिना मुक्ति नहीं। सरस्वती, लक्ष्मी, काली, माया, प्रकृति, राधा, सीता, सावित्री, पार्वती आदि के रूप में गायत्री की पूजा की जाती है। पिता से संबंध होने का कारण माता ही है। इसीलिए पिता से माता का दर्जा ऊँचा है। ईश्वर की असीम आनन्द राशि का आस्वादन
उपासनाओं का सुविस्तृत उल्लेख किया गया है। उनमें उद्गीथ विद्या के अंतर्गत अंतरादित्य विद्या का वर्णन है जिसमें सूर्य मण्डल में ध्यान करने का विधान है। सूर्यमण्डल मध्यस्थ महाप्रज्ञा गायत्री की आराधना साधक को परम पवित्र बनाती है और मनोरथों को पूर्ण करती है। महाभारत वन पर्व में स्पष्ट उल्लेख है कि सूर्य से ही समस्त जगत प्रकाश पाता है। वही जीवों की उत्पत्ति का कारण भी है।
उपासना के साथ जोड़कर रखा गया है। देवाराधना एवं योगाभ्यास का प्रयोग ही उसमें सम्मिलित रहता है। यह उचित भी है क्योंकि इसका दोहरा लाभ है- जीवन सम्पदा के सदुपयोग के लिए मनोविग्रह जैसी महान उपलब्धि के साथ ही उपासनात्मक लाभ। किन्तु ऐसा नहीं समझा जाना चाहिए कि देवाराधना या योगाभ्यास के अतिरिक्त और कोई उपाय ध्यान साधना का है ही नहीं। ऐसी भी साधनायें हैं जो अनीश्वरवादी उपासना में अरुचि रखने वाले अध्यात्म सिद्धाँतों से असहमत लोगों के लिए भी उपयोगी रहेगी।
उपासना करें तो उसकी प्रतिक्रिया भगवान की ओर से भी वैसी ही वात्सल्यमय होगी जैसी कि माता की अपने बच्चों के प्रति होती है।
उपासना का प्रथम चरण है- आत्मशोधन। आत्मशोधन के बिना उच्चकोटि की साधनायें भी निष्फल चली जाती हैं। अतएव सर्वप्रथम वर्तमान और भावी जीवन को पवित्र परिष्कृत बनाने की योजना बनायी जाती है एवं पिछले पापों एवं कुसंस्कारों के कारण आत्मिक प्रगति के पथ पर अवरोधों की तरह अड़े रहने वाले दुष्कृतों का निवारण परिमार्जन प्रायश्चित प्रक्रिया द्वारा किया जाता है। प्रायश्चित का अर्थ गिड़गिड़ाना या सस्ते मोल में विधि-विधान से बच निकलना नहीं, वरन् क्षतिपूर्ति करना है। दुष्कर्मों से अपने अंतःकरण को विचार संस्थान को तथा कार्यक्रमों को जिस प्रकार दुष्प्रवृत्तियों से भर दिया गया था, उसी साहस और प्रयास के साथ इन तीनों संस्थानों के परिमार्जन, परिशोधन एवं परिष्कार की प्रक्रिया को प्रायश्चित कहा गया है।
उपासना में साधक सर्वप्रथम इसी क्षेत्र पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है और मन को परिष्कृत परिमार्जित करते हुए लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ता है।
उपासना के पीछे जो प्रेरणायें भरी पड़ी हैं उनसे प्रभावित होकर उपयुक्त चिंतन और कर्त्तव्य अपनाते हुए दिव्यजीवन की रीति-नीति अपनाई जा सके तो ही इन पूजा परक कर्मकाण्डों का महत्व है। आत्म बोध की विचार धाराओं से अंतःकरण को भरने में सहायता करना ही दर्पण उपकरण का उद्देश्य है। उसी प्रकार पूजा का उपयोग यही है कि जीवन निमार्ण की प्रेरणाओं को उभारे और उन्हें सक्रिय बनायें। लकीर पीटने जैसी चिन्ह पूजा से न तो आत्म कल्याण हो सकता है और न दर्पण की मनुहार करने से आत्म लाभ का प्रयोजन पूरा हो सकता है।
उपासना आरंभ कर दी। उनकी यह तपस्या पूरे चौबीस महापुरश्चरणों तक चलती रही। उसकी पूर्णाहुति करने के उपरान्त भी जीवनमुक्ति स्थिति में रहकर वे संसार का कल्याण करते रहे तथा जीवनपर्यन्त पीड़ा-पतन निवारण के कार्यों में संलग्न रहें।
उपासना कितनी गहरी और सार्थक रही, इसका प्रमाण परिचय एक ही बात से मिलता है कि आन्तरिक सुसंस्कारिता और बाह्य सज्जनता का कितना विकास संभव हो सका। साधना का वास्तविक स्वरूप एक ही है-अंतरंग में विद्यमान देव शक्तियों को जाग्रत, प्रखर और समर्थ बनाने की आकुलता भरी चेष्टा। यही है अध्यात्म का मर्म यथार्थ स्वरूप।
उपासना कभी भी निष्फल नहीं जाती। जो व्यक्ति कोई मन को संयमित एवं चित्त को एकाग्र कर सूर्य की उपासना आराधना करेगा, उसकी इच्छा पूर्ति होगी, इसमें कोई संशय नहीं।
उपासना से तुम्हारा कल्याण संभव है, अतः एकाग्र मन से उन्हीं का जप करो।” इतना कहकर उनने उन्हें क्षमा कर दिया।
उपासना इस रहस्य को समझाते हुए सूर्योपस्थान सूर्यार्घ्यदान आदि क्रिया-कृत्य संपन्न करते हैं और बदले में सद्बुद्धि का अनुदान प्राप्त करते हैं। प्रकाश पुँज सविता की ध्यान-धारणा साधक को प्रखर प्रज्ञा का, महापुराण का दिव्य वरदान प्रदान करती है, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
उपासना एवं साधना है। इसे दो पहियों पर चलने वाली आत्मिक प्रगति की आत्म कल्याण की यात्रा कह सकते हैं। नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, लघु से महान-आत्मा से परमात्मा बनने का अवसर इसी पथ पर चलने से मिलता है। नर पशु को देवता बनाने की स्थिति इसी प्रयास द्वारा संभव होती है। अगणित ऋद्धि-सिद्धियों का राज मार्ग यही है।
उपासना के माध्यम से इसी सविता शक्ति का अवतरण होता है। शाकानन्द तरंगिणी 3/4/1 में भी कहा है-
उपासना की यही विशेषता है।
उपासनात्मक लाभ। किन्तु ऐसा नहीं समझा जाना चाहिए कि देवाराधना या योगाभ्यास के अतिरिक्त और कोई उपाय ध्यान साधना का है ही नहीं। ऐसी भी साधनायें हैं जो अनीश्वरवादी उपासना में अरुचि रखने वाले अध्यात्म सिद्धाँतों से असहमत लोगों के लिए भी उपयोगी रहेगी। आस्तिक प्रवृत्ति के लोग भी उनसे समुचित लाभ उठा सकते हैं। प्रक्रिया इस प्रकार है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-July
उपासना करते एवं व्याख्यान देते समय भूमि जल से ऊपर शून्य में उठ जाते थे। उपस्थित हजारों व्यक्तियों ने इस घटना को देखा था।
उपासना कराने की ललक उस पर ऐसी कैसी चढ़ बैठी कि तनिक से उपहार एवं चाटुकारों द्वारा की जाती रहने वाली मनुहार के पीछे छिपे छद्म को भी वह नहीं समझ सका? पूजा अर्चा करने वालों के प्रपंच में फँस कर कैसे उन पर वरदान बरसाने लगा? कैसे उन्हें भक्तजन मानकर पापों के परिणामों से छुड़ा देने का आश्वासन देने लगा? इन विडम्बनाओं से विमोहित होकर क्यों उसने इन छद्म वेशधारियों के लिए स्वर्ग-मुक्ति के द्वार खोल दिए? प्रतिमा पूजन भर को कैसे वह अपनी भक्ति समझने लगा?
उपासना करनी चाहिए।
उपासना एवं तप-तितिक्षा के विविध सोपानों का सृजन प्राचीन ऋषि-मनीषियों ने किया था और स्वयं अपनी कायिक प्रयोगशाला में अनेकानेक शक्तियों, क्षमताओं, दिव्य विभूतियों को उद्भूत किया था। पंच भौतिक काया तो माध्यम मात्र है। उसकी समस्त हलचलों के पीछे प्राणचेतना सक्रिय रहती है। निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त समष्टिगत प्राण चेतना के लहलहाते महासागर में से आकर्षित अवधारित करके साधक अपनी प्राण ऊर्जा को विकसित करता हुआ क्रमशः प्रगति पथ पर बढ़ता जाता है। दूरदर्शन, दिव्य दर्शन, दूर श्रवण, आकाश गमन, परकाया प्रवेश जैसी अतीन्द्रिय क्षमताएँ पराशक्तियाँ प्राणोत्थान की देन है।
उपासना करने वाले के प्राण को निर्मल एवं समर्थ बनाती है, इसलिए गायत्री कहते हैं।”
उपासना का ढोंग रचने वाले दीन-हीन ही देखे जाते हैं व अंततः किये गये कृत्यों का दुष्परिणाम भी भुगतते हैं।
उपासना प्राणशक्ति के क्षरण को रोकती है, उसकी रक्षा करती है और इस संरक्षण से लाभान्वित उपासक दिनों दिन प्रगति पथ पर अग्रसर होता चला जाता है। इस महाशक्ति का आँचल थाम कर हर कोई अपने सामान्य प्राण को महाप्राण में परिणत-विकसित कर सकता है।
उपासना द्वारा जो अपना जितना अधिक आन्तरिक परिष्कार कर लेता है, इसी आधार पर वह महाशक्ति अवतरित होती है। पात्रता के अनुरूप ही उसके अनुग्रह का दिव्य वरदान हस्तगत होता है जिसे पाकर-साधक सर्वतोभावेन धन्य हो जाता है।
उपासना कृत्य चलते-फिरते भी हो सकता है या अधिक से अधिक एक घंटा उसमें सुनियोजित ढंग से लगाने में उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है। शेष समय को सेवाधर्म के निर्वाह में लगाया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-April
उपासना में भी कोई जाति-भेद, लिंगभेद व्यवधान नहीं डालता। ऐसी दशा में एक वर्ण को गायत्री का अधिकार होना और दूसरों को न होना यह न तो बुद्धि संगत है और न न्याय संगत और न भारतीय संविधान के अनुकूल। हिन्दू धर्म की वर्ण-व्यवस्था गुण, कर्म, स्वभाव पर आधारित है। स्तर बदलते ही वर्ण बदल जाते हैं। इसलिए यहाँ किसी को इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए कि शास्त्रकारों का मन्तव्य ब्राह्मण शब्द से किसी जाति विशेष के संबंध में है।
उपासना से जहाँ आत्मशोधन और आत्म परिष्कार का प्रयोजन सधता है, वहीं सेवा-साधना में रत रहकर पुण्य अर्जित किया जा सकता है। इन आचारों को जो जितनी दृढ़ता और तत्परता के साथ अपनाता है, वह अपनी पात्रता बढ़ाते हुए परमेश्वर का प्राणप्रिय बनता और जीवन को धन्य बनाता है।
उपासना का यदि वास्तविक प्रतिफल देखना हो तो व्यक्ति को इतनी सुनिश्चित आदर्शवादी जीवनचर्या अपनानी पड़ेगी कि उसे ब्राह्मण या तपस्वी कहने में किसी को संकोच न करना पड़े। यदि सही अर्थों में ब्राह्मणोपम जीवन जिया जा सके तो गायत्री साधना का सम्पुट मिलकर जीवन में चमत्कारी परिवर्तन लाता व ब्राह्मणत्व को सार्थक बना देता है।
उपासना के क्षेत्र में हिचकिचाहट क्यों? प्रशिक्षित मन ही आत्मा की अनन्त भाव रश्मियों को जीवन में बिखेरता है और उसका प्रशिक्षण प्रतीकों के अभाव में सम्भव नहीं भले ही वे प्रकाश और ज्योति शिखा जैसे अन्तर प्रतीक क्यों न हों?
उपासना करने का विधान बताया गया है। महाप्रज्ञा की ब्रह्म वर्चस् परक ध्यान-धारणा में भी प्रभातकालीन स्वर्णिम सूर्य प्रभा को आकर्षित अवधारित करने का उपक्रम अपनाया जाता है। सविता ब्रह्म का प्रतीक प्रतिनिधि भी है। उपनिषदों में आदित्योब्रह्म कहकर इस तथ्य की पुष्टि की है। सूर्य ही प्रत्यक्ष ब्रह्म है।
उपासना व सतत् स्वाध्याय अनिवार्य शर्त के रूप में इन स्थापना के साथ जुड़े हुए तीन महत्वपूर्ण कार्यक्रम हैं। ब्रह्मकुण्ड के जल-रज के रूप में प्रतिष्ठित की साकार प्रतिमा प्रतिदिन उपासना का स्मरण करायेगी और ब्रह्मवर्चस् ब्रह्म तेजस्विता प्रदान करेगी। उपासना परिवार के प्रत्येक सदस्य, महिलाओं, बालकों तक के लिए इस देवा स्थापना का अनिवार्य कृत्य है भले ही वह स्थापित प्रतीकों के नमन वंदन जितना संक्षिप्त ही क्यों न हो। देवात्मायें अपनी ब्राह्मी शक्ति को समीप पाकर बिगड़े संसार को सम्हालने आने के अपने लक्ष्य को निरंतर स्मरण रखेंगे।
उपासना लक्ष्य प्राप्ति के साधन मात्र हैं, तो वह साधन कर्तव्य कर्म की साधना क्यों नहीं बन सकती है? निश्चय ही वह बन सकती है, पर कठिनाई आड़े वहाँ आ जाती हैं, जहाँ हम अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में ईमानदार बने नहीं रह पाते, जबकि होना यह चाहिए था कि ऐसे कार्यों में भी हम उसी कर्मनिष्ठ और ईमानदारी का परिचय देते, जो अन्य मार्गों के लिए भी अभीष्ट आवश्यक होता है किन्तु अंतस् की उत्कृष्टता के अभाव में ऐसा बन नहीं पड़ता और लक्ष्य प्राप्ति में यह रास्ता विघ्न प्रतीत होने लगता है, जबकि बात ऐसी है नहीं। सच्चाई तो यह है कि अन्य मार्गों में सफलता के लिए साधक को जो आत्मिक स्तर अभीष्ट है, उसी स्तर के त्याग, सेवा, संयम और सहिष्णुता जैसे उपक्रम इस मार्ग में भी अपनाने पड़ते हैं, तभी वह कार्य योग स्तर का बन पड़ता और सही अर्थों में कर्मयोग कहलाता है। इससे कम में सफलता यहाँ भी संदिग्ध ही बनी रहती है।
उपासना, शास्त्र श्रवण, पूजापाठ, कथा कीर्तन, व्रत-उपवास, संयम, नियम, सत्संग, तीर्थयात्रा, पर्व-संस्कार आदि समस्त प्रक्रियायें धर्म भावना को परिपक्व करने के उद्देश्य से विनिर्मित हुई हैं, ताकि मनुष्य अपने जीवन के महारिपुओं-वासना-तृष्णा, लोभ, मोह तथा आकर्षण एवं प्रलोभनों से मुक्त होकर अपने कर्तव्य पथ पर अवाधगति से अग्रसर हो सके। किन्तु आज तो इन सबकी उपेक्षा करके मात्र पूजा-पाठ के क्रिया कृत्यों में निरत रहना ही धर्म परायणता का चिन्ह बन गया है। धर्म के प्रति अनास्था इसी विकृति के कारण उत्पन्न हुई है।
उपासना का स्मरण करायेगी और ब्रह्मवर्चस् ब्रह्म तेजस्विता प्रदान करेगी। उपासना परिवार के प्रत्येक सदस्य, महिलाओं, बालकों तक के लिए इस देवा स्थापना का अनिवार्य कृत्य है भले ही वह स्थापित प्रतीकों के नमन वंदन जितना संक्षिप्त ही क्यों न हो। देवात्मायें अपनी ब्राह्मी शक्ति को समीप पाकर बिगड़े संसार को सम्हालने आने के अपने लक्ष्य को निरंतर स्मरण रखेंगे।
उपासना को मन की प्रशिक्षण पद्धति तो मानते हो? जवाब में सुनने वाले ने हाँ कहने के साथ कुछ और कहने के लिए पैंतरा बदला।
उपासना की हलकी-फुलकी अल्पावधि साधनाएँ कर लेने में भी कोई हर्ज नहीं, किन्तु जहाँ सुगमता और रोचकता की बात आती है, वहाँ कर्मयोग को ही प्रमुखता देनी पड़ेगी। इसके द्वारा भी हम उस लक्ष्य की प्राप्ति कर सकते हैं, जो अन्य मार्गों द्वारा सुनिश्चित बतायी गई है। वंचित प्रायः वही रहते हैं, जो अपने कर्तव्य धर्म को भूल जाते हैं। इसी बात को समझाने के लिए रामकृष्ण परमहंस एक उदाहरण दिया करते थे। वे कहते थे तालाब में बहुतेरी मछलियाँ हुआ करती हैं।
उपासना को आत्मसात करने की जुगाली है। ज्ञान ही भौतिक जीवन की सर्वोपयोगी शक्ति है, जल-रज उस पवित्रता का, गति का निरंतर बोध कराएँगे। युग साहित्य का न्यूनतम अखण्ड ज्योति-युगनिर्माण योजना या युगशक्ति गायत्री का सतत स्वाध्याय तीसरी अनिवार्यता है। जहाँ-जहाँ भी यह कार्यक्रम चल रहे होंगे, देवशक्तियाँ वातावरण बना देख स्वतः पहुँच जाएँगी। वन्य जीवों को सघन वन में देखना हो तो चुपचाप वहाँ किसी जलाशय के निकट बैठ जाना चाहिए।
उपासना परिवार के प्रत्येक सदस्य, महिलाओं, बालकों तक के लिए इस देवा स्थापना का अनिवार्य कृत्य है भले ही वह स्थापित प्रतीकों के नमन वंदन जितना संक्षिप्त ही क्यों न हो। देवात्मायें अपनी ब्राह्मी शक्ति को समीप पाकर बिगड़े संसार को सम्हालने आने के अपने लक्ष्य को निरंतर स्मरण रखेंगे।
उपासना से ब्राह्मणत्व होता है, अन्यथा वह द्विज नहीं रहता है।
उपासना में सविता की ही प्रकारान्तर से आराधना की जाती है और उस दिव्य प्रकाश से स्वयं को ही नहीं सृष्टि के हर प्राणी को जीवन चेतना, सत्प्रेरणा प्रदान किये जाने की प्रार्थना की जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-September
उपासना की तरह एक ऐसा समय भी निश्चित रखना चाहिए जिसमें मृत्यु का स्मरण किया जाए और इस बात का विश्लेषण किया जाय कि जो क्रम चल रहा है वह अर्थपूर्ण है या निरुद्देश्य पेट प्रजनन के लिए ही चलाया जा रहा है।
उपासना के क्रिया-कृत्यों से प्रकाश एवं प्रेरणा प्राप्त करके अपनी चेतना को दिशा और सम्पदा को धारा देने का प्रयत्न करता है। भगवान और भक्त की अन्तः स्थिति और गतिविधियों में जितनी समस्वरता जितनी एकता दिखाई पड़े उसी आधार पर यह जाना जा सकता है कि भक्ति कितनी प्राणवान् है। प्राणवान् भक्ति के सत्परिणाम सुनिश्चित है।
उपासना गहरी, जीवन्त, सरस, और सफल हो सके इसकी एक ही शर्त है कि उसे प्राणवान् बनाया जाय। उसके साथ सघन संपर्क मिलाने पर ही आशाजनक अनुदानों की अपेक्षा की जा सकती है। यह सघन संपर्क कैसे हो इसका ‘तत्व-दर्शन’ पूजा उपासना के क्रिया-कृत्यों से-भजन-पूजन के निर्धारित कर्मकाण्डों से सीखा जा सकता है। अर्चा आराधना के विधि-विधान, हमें उन तथ्यों से परिचित कराते है, जिनके सहारे ईश्वर तक पहुँचना-उसके साथ घनिष्ठता स्थापित करना और अनुग्रह का लाभ ले सकना सम्भव होता है। धन का स्पर्श करके दूध दुहा जाता है, यह बात सही है, पर इसमें इतना और जोड़ना चाहिए कि स्पर्श मात्र से ही, दूध की धार नहीं छूटती।
उपासना पद्धति और संस्कृति आचार संहिता निर्धारित करेंगे। उन्हीं परिस्थितियों में गायत्री शक्ति पीठों का स्वरूप सार्वभौम होगा। आज तो सार्वभौम दर्शन अपना कर चलना ही सम्भव है। गायत्री शक्ति पीठें भारतीय संस्कृति के अनुरूप बन रही है। इतने पर भी उसमें विश्व संस्कृति के समस्त बीजांकुर और प्रगति प्रयास विद्यमान देखे जा सकते है और उस सुदिन की सम्भावना झाँकती मिल सकती है, जिसमें सब कुछ सार्वभौम ही होगा।
उपासना उसी मार्ग पर जीवन प्रक्रिया को धकेलने वाली एक शास्त्रानुमोदित और अनुभव प्रतिपादित पद्धति है। इतना समझने पर प्रकाश की ओर चल सकना बन पड़ता है। जो ऐसा साहस जुटाते है, उन्हें निश्चित रूप से ईश्वर मिलता है। अपने को ईश्वर के हाथ बेच देने वाला व्यक्ति ही ईश्वर को खरीद सकने में समर्थ होता है। ईश्वर के संकेतों पर चलने वाले में ही इतनी सामर्थ्य उत्पन्न होती है कि ईश्वर को अपने संकेतों पर चला सके।
उपासना का विशालकाय कलेवर खड़ा है। हम इस तथ्य को समझें। अपने को ईश्वर का बनावें ताकि यह हमारा बन सके। प्रगति का-सुख-शांति का-सच्चा मार्ग यही है।
उपासना के क्रिया-कृत्यों से-भजन-पूजन के निर्धारित कर्मकाण्डों से सीखा जा सकता है। अर्चा आराधना के विधि-विधान, हमें उन तथ्यों से परिचित कराते है, जिनके सहारे ईश्वर तक पहुँचना-उसके साथ घनिष्ठता स्थापित करना और अनुग्रह का लाभ ले सकना सम्भव होता है। धन का स्पर्श करके दूध दुहा जाता है, यह बात सही है, पर इसमें इतना और जोड़ना चाहिए कि स्पर्श मात्र से ही, दूध की धार नहीं छूटती। थनों को हाथों से सुहलाने की एक ऐसी विशेष क्रिया भी, करनी होती है जो बछड़े द्वारा मुँह से थन चूसने के समतुल्य हो। ईश्वर भक्ति की सफलता इस बात पर निर्भर है कि भक्त ने भगवान से कितनी वास्तविक सघनता स्थापित की।
उपासना कोई क्रिया-कृत्य नहीं है। उसे जादू नहीं समझा जाना चाहिए। आत्म-परिष्कार और आत्म-विकास का तत्व-दर्शन ही अध्यात्म है। उपासना उसी मार्ग पर जीवन प्रक्रिया को धकेलने वाली एक शास्त्रानुमोदित और अनुभव प्रतिपादित पद्धति है। इतना समझने पर प्रकाश की ओर चल सकना बन पड़ता है।
उपासना का मर्म और उद्देश्य यही है कि मनुष्य अपने लक्ष्य को-इष्ट को समझे और उसे प्राप्त करने के लिए प्रबल प्रयास करे। उपासना कोई क्रिया-कृत्य नहीं है। उसे जादू नहीं समझा जाना चाहिए। आत्म-परिष्कार और आत्म-विकास का तत्व-दर्शन ही अध्यात्म है। उपासना उसी मार्ग पर जीवन प्रक्रिया को धकेलने वाली एक शास्त्रानुमोदित और अनुभव प्रतिपादित पद्धति है।
उपासना कृत्य का स्वरूप फुसलाने के लिए रची गई विडम्बना बनकर रह जाता है। भक्त प्रेमी होता है। प्रेम का परिचय-उदार सहयोग के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। हमें ईश्वर से कुछ माँगने की आवश्यकता नहीं है। पात्रता बढ़ने के साथ-साथ पिता सहज ही अपने साधन और अधिकार स्वयं ही हस्तांतरित करता जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-April
उपासना और साधना का सहारा लेकर चाहे तो इतना ही ऊँचा उठ सकता है जहाँ पहुँचने पर उसे सिद्ध पुरुष एवं देवात्मा कहा जा सकता हैं।
उपासना के साथ जीवन साधना को अपनाना होगा। उसकी दयालुता के साथ ही रुद्र रूप को भी याद रखें तथा सत्पथ शुद्ध एवं सात्विक भावना से चलकर उसे अप्रसन्न होने का अवसर न दे, मनुष्य का कल्याण इसी में है। यही परमात्मा के अंश मनुष्य के लिए योग्य एवं शोभनीय है।
उपासना में मन न लगने की, तरह-तरह के विचार उठने की,अजनबी कल्पनाएँ आने की, स्थिरता न होने की-शिकायत इसी आत्म-विस्मृति का चिन्ह है। ऐसे दुर्बल मन वालों को एकान्त की ध्यान साधना अनुकूल नहीं पड़ती। उन्हें कथा, कीर्तन, यज्ञ, तीर्थयात्रा, आरती, प्रार्थना जैसे सामूहिक धर्मानुष्ठान ठीक पड़ते है। बहिर्मुखी गतिविधियों का समावेश रहने से इस स्तर के लोगों का मन लग जाता है। ऐसे लोग दैनिक जीवन में भी भीड़ के साथ ही काम कर सकते है।
उपासना, महाशक्ति की अब करनी है,
नई शक्ति, अभिव्यक्ति, प्रेरणा, जगती के मरु में भरनी है!!
उपासना साधना द्वारा इस प्रकार की सिद्धियाँ अनायास ही मिल जाने के उल्लेख भी मिलते है। निस्सन्देह साधना तपस्या से कोई भी व्यक्ति इस प्रकार की असाधारण शक्ति प्राप्त कर सकता है। परन्तु इस बात के कोई कारण नहीं मिल सकें हैं कि किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में ये विशेषतायें अनायास ही क्यों उत्पन्न हो जाती हैं?
उपासना परमात्मा की प्रसन्नता प्राप्त करने का ही एक उपाय है। किन्तु यह प्रसन्नता केवल पूजा-पाठ, भजन, कीर्तन अथवा स्मरण जाप से ही नहीं प्राप्त की जा सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-January
उपासना के प्रति जन आस्था का भी अभाव नहीं है। पिछले दिनों कुछ स्वार्थी तत्वों ने इस महाविद्या को अपनी जन्मजात विरासत और अपने वंशधरों की सम्पत्ति समझ कर इस तरह की भ्रान्तियाँ गढ़ी जिनसे लोगों में आस्था तो बनी रहे पर उसकी व्यक्तिगत स्तर पर कोई न तो शोध कर सके न उससे लाभान्वित हो सके। इससे उनने स्वयं तो गंवाया ही राष्ट्र का बड़ा भारी अहित किया। प्राण चेतना से परिपूर्ण राष्ट्र अपनी गरिमा अपना ओज अपनी तेजस्विता खोता चला गया। बात-बात में दूसरों का परावलम्बन देख कर विश्वास नहीं होता क्या यह वही पराक्रमी देश है जिसने साधनों के अभाव में भी हिमालय की छाती फाड़ करके गंगाजी को निकाल लाने का महान् तप सम्पन्न कर दिखाया था।
उपासना द्वारा असत् से सत् अन्धकार में प्रकाश और अज्ञान में ज्ञान की स्थापना की विलक्षण शक्ति है। एकाकी साधना द्वारा वह साधक को लाभान्वित करती है तो सामूहिक अनुष्ठानों द्वारा उससे सारा समाज, राष्ट्र और युग प्रभावित होता है इस अकाट्य सत्य से कोई इनकार नहीं कर सकता।
उपासना समुदाय में ढाला जा सके। इससे जो वातावरण विनिर्मित होगा, जो अन्तर्क्रान्ति उठ खड़ी होगी वह अन्तःकरणों में छाये हुये अज्ञान, अन्धकार, अशक्ति और दरिद्रता को नष्ट भ्रष्ट कर डालेगी। जब तक यह मूढ़तायें रहती हैं, मानवीय संवेदना का मार्ग प्रशस्त नहीं हो पायेगा अतएव सृजन प्रक्रिया के पूर्व की यह विचार मंथन प्रक्रिया आवश्यक मानी गयी है।
उपासना चिरकाल से इस देश को शक्ति सामर्थ्य प्रदान करती रही है, इस युग के लिए तो वह संजीवनी बूटी की तरह है। इसलिए उसके अवतरण का जोरदार स्वागत किया जाना चाहिए एक बार यदि वातावरण को संस्कारित कर लिया गया तो उससे राष्ट्र और विश्व को संयत स्वस्थ, समर्थ देवभावनाओं से ओत-प्रोत रखने का गति चक्र अप ही चल पड़ेगा। यह जिम्मेदारी उन जागृत आत्माओं पर आती है, जिनकी विवेक बुद्धि वस्तु स्थिति को पहचान सकने में समर्थ है, जिनमें अन्ध विश्वास रूढ़िवादी मान्यताओं और परम्पराओं से लड़ पड़ने का साहस है। एक बार उस कारागृह से मुक्ति मिल गई तो फिर सर्वशक्तिमान माता के अनुग्रह अनुदानों से लाभान्वित होते रहने की परम्परा चिरकाल तक चलती रहेगी। राष्ट्र को हराभरा सुखी समुन्नत बनाने वाले सभी तत्व गायत्री में विद्यमान है।
उपासना से व्यक्ति का अपना वाह्याभ्यंतर प्रभावित हो सकता है, अधिक से अधिक परिवार वालों, पड़ौसियों तक भी प्रेरणायें प्रवाहित की जा सकती हैं, पर व्यापक रूप से जनशक्ति को दिशा और प्रकाश देना होता है तो उन्हें सामूहिक रूप देना पड़ता है। गायत्री मंत्र में “योनः” शब्द आता है उसका अर्थ होता है हम अकेले नहीं हम सब। इसकी संगति भी सामूहिक अनुष्ठान से ही बैठती है। सामूहिक रूप से आधे और सम्पन्न किये गये गायत्री अनुष्ठानों में सारे वातावरण को आन्दोलित कर देने और एक इच्छित दिशा में बदल डालने की शक्ति होती है। यह एक तथ्य है कि वातावरण में मनुष्य ढलता और बनता है, पर झूठ यह भी नहीं हैं कि मनुष्य द्वारा भी वातावरण ढाले और बनाये जाते है।
उपासना से इस भ्रम जाल, माया मय संसार के सत्य को पहचाना था। विज्ञान भी अब उसी बिन्दु की ओर प्राप्त करने के लिए सच्ची लगन और जिज्ञासा से किसी भी क्षेत्र में प्रयास किया जाय अन्ततः पहुँचना एक ही बिन्दु पर होता है।
उपासना से अन्तरंग गतिवान होता है, उसमें छायी मलीनता, अन्धकार, अविवेक दूर भागते है। सृष्टि का यथार्थ अभिव्यक्त होने से मनुष्य करने योग्य करता है और सोचने योग्य सोचता है। भावनाओं में देवत्व का विकास और कर्तृत्व में शुचिता व पवित्रता का, दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। जहाँ लोगों की भावनायें शुद्ध और पवित्र होगी वहाँ के समाज में सर्वत्र शान्ति, सुव्यवस्था, प्रसन्नता और सन्तोष भरे जीवन की निर्झरिणी प्रवाहित हो रही होगी। गायत्री को देवताओं की माता, वेद माता इसलिये कहते हैं।
उपासना पद्धतियों में ध्यान को किसी न किसी रूप में अपनाया है। भारतीय धर्म में ‘ध्यान’ ईसाई धर्म में ‘होर्सचाज्म’ यहूदी धर्म में ‘कब्बालह’ इस्लाम मत में ‘तसब्बुफ’ जापान के जैन धर्म में, जो भारतीय धर्म की ही एक प्रशाखा है ‘जानने’ आदि उपासना विधानों का एक ही अर्थ है। ध्यान की परिभाषा करते हुए गीताकार ने कहा है -’योगी को चाहिए कि वह एकान्त स्थान पर बैठकर, सब इच्छाओं, आकाँक्षाओं को त्याग कर किसी भी परिग्रह की कामना न करते हुए अपने मन को परमात्मा में एकाग्र करें।’
उपासना, दर्शन, कर्मकाण्ड, नियमोपनियमों, विज्ञान आदि सभी पक्षों पर विभिन्न प्रकार की पुस्तकों पत्रिकाओं द्वारा प्रचुर मात्रा में प्रकाश डाला गया, डाला जा रहा है। लोगों को उसके संपर्क में लाने भर को बात है। यह कार्य कोई भी थोड़ा-सा समय लगा कर भी पूरा कर सकता है।
उपासना के व्यापक विस्तार की जैसी सम्भावनाएँ इन दिनों विकसित हुई हैं उन पर कोई भी संतोष ही अनुभव कर सकता है।
उपासना विधानों का एक ही अर्थ है। ध्यान की परिभाषा करते हुए गीताकार ने कहा है -’योगी को चाहिए कि वह एकान्त स्थान पर बैठकर, सब इच्छाओं, आकाँक्षाओं को त्याग कर किसी भी परिग्रह की कामना न करते हुए अपने मन को परमात्मा में एकाग्र करें।’
उपासना और यज्ञों के विस्तार द्वारा गायत्री मय बनाया जा सके तो युग शक्ति का यह अवतरण सफल और सार्थक हो कर रहेगा। उससे इस देश और विश्व को चिरकाल तक स्वस्थ, स्वच्छ और समर्थ बनाये रखने वाली ऊष्मा का प्रस्फुटन सम्भव होगा। इसे अपना पुनीत कर्त्तव्य मानकर प्रत्येक उस व्यक्ति को, जिसे युग शक्ति गायत्री का संपर्क सान्निध्य मिला है, दूसरों तक पहुँचने के लिए हृदय अन्तःकरण से कटिबद्ध होना पड़ेगा। इतना किया जा सका तो इस महान् सत्ता का अवतरण सफल और सार्थक होकर ही रहेगा।
उपासना में प्रचलित एक प्रार्थना जैसा लगता है जिसमें परमात्मा से सद् बुद्धि की प्रार्थना की गई है किन्तु शब्द शक्ति के ज्ञाता जानते हैं कि इस महामंत्र के 24 अक्षर 24 महान शक्तियों के ऐसे मर्म स्थल बीज और शक्ति कोष हैं जो सारे ब्रह्माण्ड में हलचल मचा देने की शक्ति से ओत-प्रोत है। गायत्री उपासना के प्रति जन आस्था का भी अभाव नहीं है। पिछले दिनों कुछ स्वार्थी तत्वों ने इस महाविद्या को अपनी जन्मजात विरासत और अपने वंशधरों की सम्पत्ति समझ कर इस तरह की भ्रान्तियाँ गढ़ी जिनसे लोगों में आस्था तो बनी रहे पर उसकी व्यक्तिगत स्तर पर कोई न तो शोध कर सके न उससे लाभान्वित हो सके। इससे उनने स्वयं तो गंवाया ही राष्ट्र का बड़ा भारी अहित किया। प्राण चेतना से परिपूर्ण राष्ट्र अपनी गरिमा अपना ओज अपनी तेजस्विता खोता चला गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-October
उपासना से किसी का यह उद्देश्य पूरा होता है अथवा नहीं, क्योंकि यह उद्देश्य विशुद्ध रूप से लौकिक और भौतिक है और साधना उपासना आत्मिक आध्यात्मिक प्रयास हैं मनोकामनाओं की पूर्ति में इस तरह के प्रयास शायद ही पूरे होते हों। कुछ लोगों के हो भी जाते होंगे पर निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि आध्यात्मिक प्रयोगों द्वारा अनिवार्य रूप से भौतिक मनोकामनाओं की पूर्ति हो ही जाती है।
उपासना आत्मिक आध्यात्मिक प्रयास हैं मनोकामनाओं की पूर्ति में इस तरह के प्रयास शायद ही पूरे होते हों। कुछ लोगों के हो भी जाते होंगे पर निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि आध्यात्मिक प्रयोगों द्वारा अनिवार्य रूप से भौतिक मनोकामनाओं की पूर्ति हो ही जाती है।
उपासना प्रायः तीन प्रयोजनों के लिए की जाती है। पहली लौकिक सफलताओं के लिए, जिनमें कोई मनोकामना की पूर्ति, अवरोध हटने-मिटने और अभीष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त करने का उद्देश्य रहता है। पता नहीं साधना उपासना से किसी का यह उद्देश्य पूरा होता है अथवा नहीं, क्योंकि यह उद्देश्य विशुद्ध रूप से लौकिक और भौतिक है और साधना उपासना आत्मिक आध्यात्मिक प्रयास हैं मनोकामनाओं की पूर्ति में इस तरह के प्रयास शायद ही पूरे होते हों। कुछ लोगों के हो भी जाते होंगे पर निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि आध्यात्मिक प्रयोगों द्वारा अनिवार्य रूप से भौतिक मनोकामनाओं की पूर्ति हो ही जाती है।
उपासना करते हैं क्योंकि वे इसके सत्परिणामों को जानते हैं। श्रद्धा अपनी चरम परिणिति ईश्वर साक्षात्कार के रूप में प्रकट करती है।
उपासना या प्रार्थना करते है वह सर्वात्मा है और पवित्रात्मा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-June
उपासना के अनेक उपचार, विधान एवं प्रयोग है। इनमें गायत्री महाशक्ति की सामर्थ्य तथा परिणिति असाधारण है। उसे ऋषियों ने सर्वोच्च स्थान दिया है। महान साधकों में से अधिकाँश ने उसी का अवलम्बन लिया है और आत्मिक प्रगति के उच्चस्तर तक पहुँचे हैं। अनजानों से लेकर साधना विधान के निष्णातों तक के लिए यह पुस्तक समान रूप से उपयोगी है।
उपासना पर बल दिया। शक्ति तो रावण, कंस, हिरण्यकश्यप को भी प्राप्त थी किन्तु अत्याचार, हिंसा, अनैतिकता को बढ़ावा देने में प्रयुक्त उनकी सामर्थ्य का तिरस्कार किया गया। उनके पुतले जलाये गये। हिटलर, नेपोलियन, सिकन्दर, मुसोलिनी, की सामर्थ्य कितनी बढ़ी-चढ़ी था, उसे हर कोई जानता है। किन्तु उन्होंने विश्व में कितना कहर ढाया, इसे भी सभी जानते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-November
उपासना को चेतना क्षेत्र का नित्य कर्म माना गया है और उसकी उपेक्षा करने वालों की शास्त्रकारों द्वारा भर्त्सना की गई है।
उपासना का भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। नित्य कर्मों में ग्रहण और विसर्जन की दो प्रक्रियायें सम्मिलित हैं। अन्न, जल, वायु आदि शरीर ग्रहण करता है और मल, मूत्र, पसीना, साँस आदि विसर्जित करता है। इनके प्रबन्ध को नित्य कर्म कहते हैं। शरीर यात्रा के लिए यह सब अनिवार्य रूप से आवश्यक है।
उपासना का लाभ मिले बिना नहीं रहता। अग्नि, बर्फ, सुगन्ध आदि की समीपता का प्रभाव तत्काल देखा जा सकता है। कुसंग-सत्संग का प्रभाव सर्वविदित है। ईश्वर की समीपता प्राप्त करने के लिए की गई उपासना यदि सच्चे मन और सही उद्देश्य के लिए की गई है तो उसका प्रभाव लोह पारस के स्पर्श से स्वर्ण बनने जैसा सत्परिणाम सामने लाता है। उपासक को उपास्य की विशेषताओं और विभूतियों का लाभ मिलता है और वह क्रमशः अधिकाधिक समुन्नत होता चला जाता है।
उपासना यदि सच्चे मन और सही उद्देश्य के लिए की गई है तो उसका प्रभाव लोह पारस के स्पर्श से स्वर्ण बनने जैसा सत्परिणाम सामने लाता है। उपासक को उपास्य की विशेषताओं और विभूतियों का लाभ मिलता है और वह क्रमशः अधिकाधिक समुन्नत होता चला जाता है। दो तालाबों को नाली खोद कर आपस में मिला दिया जाय तो कम पानी वाले तालाब की सतह उठने लगती है और उतनी बड़े तालाब के बराबर जा पहुँचती है। उपासक के अन्तराल का स्तर ऊँचा उठाने में असाधारण सहायता करती है। ऐसे-ऐसे अनेकानेक सत्परिणामों को ध्यान में रखते हुए उपासना को चेतना क्षेत्र का नित्य कर्म माना गया है और उसकी उपेक्षा करने वालों की शास्त्रकारों द्वारा भर्त्सना की गई है।
उपासना से उनका नित्य-नियमित परिमार्जन होता है और विघातक विकृतियों के कारण होने वाला पतन और पराभव रुक जाता है। उपासना का लाभ मिले बिना नहीं रहता। अग्नि, बर्फ, सुगन्ध आदि की समीपता का प्रभाव तत्काल देखा जा सकता है। कुसंग-सत्संग का प्रभाव सर्वविदित है। ईश्वर की समीपता प्राप्त करने के लिए की गई उपासना यदि सच्चे मन और सही उद्देश्य के लिए की गई है तो उसका प्रभाव लोह पारस के स्पर्श से स्वर्ण बनने जैसा सत्परिणाम सामने लाता है।
उपासना इसी आदान-प्रदान का द्वार खोलती है। रिजर्व बैंक में जारी की गई नोट मुद्रा ही सर्वत्र फैली पड़ी है। यों लोगों के पास अपना-अपना धन भी होता है पर यदि उसका सम्बन्ध रिजर्व बैंक से न रह जाय तो बड़े नोट भी कानी-कौड़ी मोल के रह जाते हैं। जाली नोटों की नहीं, उन्हें रखने वाले की भी दुर्गति होती है। ईश्वरीय सत्ता के साथ जीवसत्ता की सघनता जोड़ने और आदान-प्रदान का द्वार खोलने के लिए उपासना को प्रमुख माध्यम माना गया है।
उपासना न करने से ईश्वर का तो कुछ बनता-बिगड़ता नहीं पर मनुष्य को वैसे ही लाभ से वंचित रहना पड़ता है जैसा कि शुद्ध वायु प्राप्त न कराने पर शरीर को। पानी न पीने पर वरुण देवता की कोई क्षति नहीं। धूप सेवन न करने से सूर्य का कोई हर्ज नहीं। बिजली का उपयोग न करने से इन्द्र को कोई नाराजी नहीं। प्रयोक्ता को ही उनके लाभ अनुदानों से वंचित रहना पड़ता है।
उपासना को प्रमुख माध्यम माना गया है। उपासना न करने से ईश्वर का तो कुछ बनता-बिगड़ता नहीं पर मनुष्य को वैसे ही लाभ से वंचित रहना पड़ता है जैसा कि शुद्ध वायु प्राप्त न कराने पर शरीर को। पानी न पीने पर वरुण देवता की कोई क्षति नहीं। धूप सेवन न करने से सूर्य का कोई हर्ज नहीं। बिजली का उपयोग न करने से इन्द्र को कोई नाराजी नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-July
उपासना, जप, तप, सेवा, सदाचार, दया, करुणा उदारता में लग रहा है। इसलिये मैं अपने को 4 वर्ष का ही मानता हूँ। नौशेरवाँ वृद्ध का उत्तर सुन-कर अति सन्तुष्ट हुये और प्रसन्नतापूर्वक अपने राजमहल लौटकर सादगी सेवा और सज्जनता का जीवन जीने लगे।
उपासना व्यक्ति एवं वातावरण को परिष्कृत करने में जितनी उपयोगी सिद्ध होती है उसकी तुलना में एक संकल्प सूत्र में आबद्ध होकर एक तत्त्वावधान की गई साधना का प्रभाव कहीं अधिक होता है। सामूहिक प्रयास, सत्संग, कथा, कीर्तन, यज्ञानुष्ठान, परिक्रमा, तीर्थ यात्रा आदि की क्षमता सामान्य गणना की तुलना में कहीं अधिक होती है।
उपासना-सेवा क पथ अपनाकर भी क्या होगा, अब तो थोड़े दिनों का खेल है, चाहे जैसे दिन काटने हैं, यह भावना पुनर्जन्म पर सच्ची आस्था रखने वाले में नहीं आ सकती। उसके लिये तो जीवन का प्रत्येक क्षण और प्रत्येक कार्य महत्वपूर्ण है। क्योंकि उसका परिणाम अवश्यम्भावी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-August
उपासना का विधान रहेगा। व्यक्ति, विशेष की स्थिति के अनुरूप साधनाक्रम बनाया जाया करेगा। यह नया क्रम कार्तिकी पूर्णिमा ता. 4 नवम्बर से प्रारम्भ होगा। तब तक के सभी स्थान पूर्ण हो चुके हैं।
उपासना कृत्यों के लिए सुरक्षित रखा जाता है। अन्य समय अन्य कामों के लिए होते है पर प्रातःकाल तो आलस्य त्यागने, शौच शुद्धि में लगने एवं आत्म चिन्तन करने के लिए नियत रहता है। नव जागरण की पुण्य-बेला ऐसे ही विशेष कर्तव्य और उत्तरदायित्वों के निर्वाह के परिपालन की प्रेरणा देता है। जागृत आत्माएं तो उसके लिए एक प्रकार से महाकाल द्वारा बलात् प्रेरित की जाती है। इन दिनों भी ठीक वैसा ही हो रहा है।
उपासनात्मक, विधि-विधानों, कथा, प्रसंगों, धर्मानुष्ठानों के बाह्य स्वरूप का सीधा महत्व समझने समझाने में कठिनाई होती है किन्तु जब उनमें सन्निहित प्रेरणाओं का भाव भरे वातावरण में हृदयंगम होने और चमत्कारी सत्परिणाम उत्पन्न करने की प्रतिक्रिया सामने आती हैं तब पता चलता हैं कि यह निरर्थक जैसी लगने वाली प्रक्रिया किन्तु मर्मस्पर्शी और कितनी प्रभावोत्पादक है।
उपासना द्वारा दिव्य सत्ता के साथ घनिष्ठता और आदान-प्रदान का उपक्रम-योगाभ्यास और तप साधना द्वारा अति मानवी क्षमताओं का उन्नयन षोड्श संस्कारों के साथ सम्पन्न होने वाली ज्ञान गोष्ठियाँ द्वारा पारिवारिक वातावरण शालीनता का संवर्धन पर्व त्यौहारों में सन्निहित सामाजिक सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण जैसे अनेकानेक उच्चस्तरीय उद्देश्य धार्मिक किया-कृत्यों के सहारे भाव भरे वातावरण में सरलता पूर्वक सम्पन्न होते रह सकते हैं। कथा पुराणों में रोचक संस्मरणों के सहारे संस्कृति की महान् परम्पराओं को बाल वृद्ध, नर-नारी जिस प्रकार सुनते, समझते और अपनाते हैं उसे देखते हुए प्रतीत होता हैं। प्रत्यक्ष निर्देशन की अपेक्षा यह देव इतिहासों का कथन श्रवण अन्तरंग की गहराई तक अधिक अच्छी तरह प्रविष्ट हो सकता हैं। आदर्शवादी अनुकरण प्रत्यक्ष न मिल सकें तो उस अभाव की पूर्ति ऐतिहासिक महापुरुषों के द्वारा अपनाई गई देव परम्पराओं के दृश्य मनःक्षेत्र में विचरते रहने पर भी एक बड़ा काम हो सकता है। अनुकरण का उत्साह उठ सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-March
उपासना कर सकने में समर्थ होंगे जैसी कि युग निर्माण मिशन के संस्थापन ने की है।
उपासना की परिधि तक सीमित नहीं रहेगा। उसे सतयुग के आधारभूत आलोक की भूमिका निभाते हुए देखा जायेगा। इन्हीं तथ्यों के आधार पर आद्यशक्ति गायत्री की सामयिक भूमिका को ‘.... शक्ति’ कहा गया है। उसका संचरण ‘विश्व माता’ के रूप में होगा। जन-जन पर पड़ने वाली इसकी छाया को ‘देवमाता’ कहा जायेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-December
उपासनात्मक उपक्रम को साधना-विधान की आधारशिला इसी पृष्ठभूमि पर रखी जानी
चाहिए।
उपासनात्मक उपचार
अपनाने पड़ते है। दिव्य जीवन की चरम परिणिति ही पूर्णता है। इसी स्थिति का
स्वर्गसिद्धि एवं मुक्ति की प्राप्ति कहते है। आत्मसाक्षात्कार एवं
ईश्वरदर्शन भी वही है। इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जो पुरुषार्थ करना
पड़ता है, उसे साधना-विधान के रूप में अपनाना होता है।
उपासना की थी और सृष्टिसृजन की सामर्थ्य प्राप्त की थी।
इसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। त्रिदेवों की उपासना गायत्री रही है।
देवगुरु बृहस्पति ने दक्षिणमार्गी और दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने
वाममार्गी-साधनाएँ गायत्री के ही आत्मिक और भौतिक पक्षों को लेकर प्रचलित
की थी। आदिमानव देवों से सप्तऋषियों का नाम आता है।
उपासना के महात्म्य वर्णन में
आकर्षक एवं अलंकारिक ढंग से बताए गए हैं। “नहि ज्ञानेन सद्दश्यं पवित्रमिह
विद्यते।” आत्मा वारे ज्ञातव्य श्रोतव्य निदिध्यासितव्यं” जैसे उद्बोधन
वाक्यों में जिस आत्मज्ञान की गरिमा बताई गई है—जिसे प्राप्त करके भगवान बुद्ध की तरह अनेकानेक श्रेयसाधक धन्य बनते रहे हैं, वही महाप्रज्ञा—आद्या
शक्ति गायत्री है। उसी को हमें लक्ष्य एवं इष्ट वरण करना चाहिए।
उपासनात्मक उपक्रम को साधना-विधान की आधारशिला इसी पृष्ठभूमि पर रखी जानी
चाहिए।
उपासनाविधि संध्या हे। संध्या में गायत्री का समावेश
अनिवार्य है। इस तथ्यों का पर्यवेक्षण करने से स्पष्ट हो जाता है कि
गायत्री ही अनादि धर्मपरंपरा एवं अध्यात्म-प्रक्रिया का आधारभूत तथ्य है।
उपासना में उसी का उपयोग सर्वोत्तम है।
उपासना ही ईश्वर की उपासना है। यही उपास्य
है, लक्ष्य भी इसी को बनाना पड़ता है। इष्टदेव का निर्धारण किस रूप में
किया जाए, आज इस संदर्भ में अनेकों विकल्पों के जंजाल बने खड़े हैं।
प्राचीनकाल में ऐसा न था। तत्वज्ञानी एक निश्चय पर पहुँचे थे और उन्होंने
उसी निष्कर्ष को उपयोगी बताकर समस्त साधकों को उसे अपनाने का परामर्श दिया
था।
उपासना-उपक्रम इस
निर्धारण के बिना बन ही नहीं पाता। समस्त देव प्रतिमाओं का निर्धारण इसी
आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया गया। श्रद्धा का आरोपण और संवर्द्धन इस
प्रतिमा-प्रतिष्ठापन के सहारे ही सहज-सुलभ रीति से अग्रगामी बनता है।
वस्तुतः समस्त देवालयों का अस्तित्व मनुष्य की श्रद्धा-समुच्चय पर ही
आधारित होता है। एक के लिए वह शक्ति-स्त्रोत बनता है।
उपासना है। यही उपास्य
है, लक्ष्य भी इसी को बनाना पड़ता है। इष्टदेव का निर्धारण किस रूप में
किया जाए, आज इस संदर्भ में अनेकों विकल्पों के जंजाल बने खड़े हैं।
प्राचीनकाल में ऐसा न था। तत्वज्ञानी एक निश्चय पर पहुँचे थे और उन्होंने
उसी निष्कर्ष को उपयोगी बताकर समस्त साधकों को उसे अपनाने का परामर्श दिया
था।
उपासनात्मक उपचारों के सहारे ही बनती है। दिव्य जीवन की कल्पना करते रहने
भर से तो कोई काम नहीं बनता, पहलवान बनने के लिए व्यायाम की, विद्वान् बनने
के लिए स्वाध्याय की, धनी बनने के लिए व्यवसाय की आवश्यकता पड़ती है। इसी
प्रकार आत्मिक प्रगति का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उपासनात्मक उपचार
अपनाने पड़ते है। दिव्य जीवन की चरम परिणिति ही पूर्णता है। इसी स्थिति का
स्वर्गसिद्धि एवं मुक्ति की प्राप्ति कहते है।
उपासना में उसी का उपयोग सर्वोत्तम है।
उपासना गायत्री रही है।
देवगुरु बृहस्पति ने दक्षिणमार्गी और दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने
वाममार्गी-साधनाएँ गायत्री के ही आत्मिक और भौतिक पक्षों को लेकर प्रचलित
की थी। आदिमानव देवों से सप्तऋषियों का नाम आता है। वे सभी गायत्री की सप्त
व्याहृतियों के प्रतीक माने जाते हैं। राम-कृष्ण आदि अवतारों की इष्ट
गायत्री रही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-May
उपासना क्षेत्र में फैली हुई अराजकता का यह एक प्रकार से सार्वभौम अनुबंध होगा कि मनुष्य मात्र को आत्मिक प्रगति के लिए आस्थापरक एवं साधनात्मक अवलम्बन, ग्रहण करने के लिए उपयुक्त मार्ग क्या हो सकता है। बिखराव का केंद्रीकरण करने की दिशा में यह एक अति महत्वपूर्ण शुभारम्भ है। उपासना से आगे चलकर जीवन क्षेत्र की अन्यान्य मान्यताओं एवं गतिविधियों का भी सार्वभौम स्वरूप बन सकेगा, इस पर विश्वास करने के लिए पर्याप्त कारण एवं तथ्य मौजूद है।
उपासना, देव प्रतिमाओं का नमन-वंदन-षोड्श-संस्कार, पर्व-त्यौहार, व्रत-उपवास, कथा-कीर्तन, स्वाध्याय, सत्संग, अग्निहोत्र, बलिवैश्व, जप-ध्यान, श्राद्ध-तर्पण, दान-पुण्य, योगाभ्यास, तप-साधन, ब्रह्मभोज, सन्त-सत्कार, सदावर्त, जलाशय, धर्मशाला, स्मारक आदि के अनेकानेक धर्मकृत्यों का वाह्य स्वरूप भिन्न भले ही हो पर उनका मूल प्रयोजन व्यक्ति को अधिक पवित्रता एवं अधिक उदारता अपनाने की प्रेरणा प्रदान करना ही है। इन क्रिया-कुकृत्यों की सार्थकता उतनी ही आँकी जा सकती है; जितने से कि मूल उद्देश्य के पूर्ण होने में सहायता मिलती है। आत्मा की, परमात्मा की प्रसन्नता इसी तथ्य पर निर्भर है कि अपनाये गये धर्म-कुकृत्यों के सहारे आत्म-परिष्कार का लक्ष्य पूरा कर सकना किस परिणाम में सम्भव हुआ। देवता के वरदान इसी एक कसौटी पर कसकर सत्पात्रों को दिये जाते हैं कि उनने धर्म-कुकृत्यों को अपना कर अपनी आन्तरिक उत्कृष्टता का कितना विकास किया। देव अनुग्रह की मात्रा और प्रतिक्रिया इसी आधार पर उपलब्ध होती है।
उपासना क्षेत्र में 24 की तरह ही महत्वपूर्ण माना जाता है। तीर्थ स्थापना की संख्या भी क्रमशः बढ़ती ही जायगी।
उपासना से लेकर उच्चस्तरीय योगाभ्यासों और तप साधनों तक अनेकानेक क्रिया-प्रक्रिया मनुष्य को एक ही लक्ष्य पर ले जाती है कि वह भावनात्मक दृष्टि से अधिकाधिक परिष्कृत होता चल जाय और ऐसी आचार पद्धति अपनाये जो अपने स्वयं के लिए तथा समूचे संसार के लिए श्रेयस्कर सिद्ध हो। धर्मानुष्ठानों के स्वरूप कितने ही प्रकार के क्यों ने हो उनका लक्ष्य एक ही है जीवन क्रम में अधिकाधिक उदात्त उत्कृष्टता का समावेश करते हुए पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचाना और उस स्थिति का व्यक्ति तथा समाज को परिपूर्ण लाभ प्रदान करना। आज धर्मानुष्ठान भले ही देवता को फुसलाकर मनोकामनाएँ पूर्ण करने के लिए किये जाते हों पर इस उद्देश्य से उन्हें बनाया नहीं गया था। परिष्कृत अन्तःकरण अपने आप में एक परिपूर्ण देवता है, उसके अन्तराल से जो कुछ उद्भूत होता है उसे ऋद्धि-सिद्धियों की रत्न-राशि समझा जा सकता है। प्रगति और शांति स्वर्ग और मुक्ति उसी के प्रतिफल है।
उपासना में संध्या वन्दन के समय गायत्री की ध्यान धारणा का विधान है। त्रिकाल संध्या में प्रातः ब्राह्मी, मध्याह्न वैष्णवी और सायंकाल शाँभवी गायत्री की अभ्यर्थना करने का अनुशासन है। प्रत्यक्षतः शिवलिंग या शालिग्राम के गोलाकार प्रतीकों की अर्चना और परोक्ष प्रक्रिया में गायत्री के तीन रूपों की ध्यान धारणा है। यह क्रम चिरकाल तक चलता रहा। इतिहास पर दृष्टि डालने से प्रतीत होता है कि महत्वाकाँक्षी धर्माध्यक्षों ने अपनी-अपनी विशिष्टता सिद्ध करने और अपने अनुयायियों का संगठन बनाने की दृष्टि से सम्प्रदायों की स्थापना की और उनके समर्थक देवता तथा ग्रंथि बनाये।
उपासना विज्ञान, यज्ञ-प्रक्रिया, पर्व एवं त्यौहार एवं षोड्श संस्कार करने, देव पूजा की शास्त्रीय पद्धति समीपवर्ती क्षेत्रों में धर्म चेतना बढ़ाने की विधि व्यवस्था युग समस्याओं के समाधानों की जानकारी-रचनात्मक प्रवृत्तियों का अभिवर्धन -अवांछनियताओं के विरुद्ध संघर्ष परिव्राजकों के लिए निर्धारित पंचशील का परिपालन जैसे अनेक विषयों का परिव्राजकों को नियमित अध्ययन कराया जायगा और समय-समय पर उन्हें सामयिक आवश्यकताओं के अनुरूप परामर्श निर्देश के लिए शांतिकुंज बुलाया भी जाता रहेगा।
उपासना गृहों की तरह प्रतीत होने वाले इन देवालयों ने मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की भूमिका किस शानदार ढंग से निभाई। यह निर्माण ऐतिहासिक स्मृतियों में सम्मिलित रहेंगे और उनके निर्माताओं को वैसा ही श्रेय मिलेगा जैसा चार धामों के बनाने में अग्रिम भूमिका निभाने वाले मान्धाता को मिला था। इतने साधन वे अकेले नहीं जुटा सके थे, पर उन्होंने अपने निजी साधनों के उपरान्त जो कमी पड़ती थी उसे अपने स्नेही, सम्बन्धियों, मित्र, पड़ौसियों को प्रोत्साहित करके पूरा कर दिया था। देने वाले की तरह ही दिलाने वाले भी यशस्वी होते है।
उपासना से आगे चलकर जीवन क्षेत्र की अन्यान्य मान्यताओं एवं गतिविधियों का भी सार्वभौम स्वरूप बन सकेगा, इस पर विश्वास करने के लिए पर्याप्त कारण एवं तथ्य मौजूद है।
उपासना पद्धति एवं धर्म-कृत्य करा सकने की शास्त्रीय जानकारी होनी चाहिए। वे अपने विषय में प्रवीण एवं अनुभवी सिद्ध हो सकेंगे तभी उन्हें इन तीर्थों में भेजा जायगा। कोई सीधी नियुक्ति कहीं भी नहीं होगी और न उपयुक्त शिक्षण में प्रवीणता प्राप्त किये बिना किसी को तीर्थ संचालन का काम सौंपा जायगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-February
उपासना के निकला लाभ बताये गये है। प्रत्यक्षतः लाभ दृष्टिगोचर होते हैं उसमें प्रमुख है बुद्धि की तीक्ष्णता और उसका परिष्कार तथा हर कार्य को सही ढंग से करने की शक्ति। यही नहीं उसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति जिन आध्यात्मिक गुणों का विकास करता है उससे एक अनिवर्चनीय आनंद प्राप्त होता है।
उपासना को ईश्वर और जीव के, परमात्मा और आत्मा के सम्बन्ध जोड़ने वाली प्रक्रिया कहा गया है। वह ठीक से सम्पन्न हो इसके लिए आवश्यक है कि चित्त स्थिर रहे। भगवान कृष्ण ने भी कहा है-
उपासना से ही विश्व उद्यान को सौंदर्य युक्त बनाया जा सका है। भौतिक समृद्धि का जो आज बढ़ा-चढ़ा स्वरूप दिखायी दे रहा है उसका मूल आधार है, श्रम की साधना। जन मानस में श्रम रूपी देवता के प्रति निष्ठा की प्रतिष्ठा से ही सामाजिक उन्नति एवं भौतिक समृद्धि सम्भव है।
उपासना करना ही नहीं जानते, अधिकाँश लोगों को प्रार्थना का रहस्य ही मालूम नहीं होता। परिणाम स्वरूप वे उपासना के बाद भी कोई संवेदना या शक्ति का उठान अनुभव नहीं करते।
उपासना स्वाध्याय, लोक-साधना जैसे उच्चस्तरीय कार्यों में मस्तिष्क के रहने से उन चिन्ताओं का दबाव सहज ही घट जाता है जो बुढ़ापे को आवश्यकता से अधिक कष्टकारण बना देती हैं।
उपासना बिना आत्मीयता के सम्भव नहीं। शास्त्र में कहा है- “शिवो भूत्वा शिवं यजेत्’। अर्थात्-स्वयं शिव रूप बनकर ही शिव की उपासना, भजन, सेवा करनी चाहिए। अतः सच्ची श्रद्धा उसी के प्रति मानी जा सकती है, जिससे अभिन्न आत्मीयता की अनुभूति हो और जिसके जैसा स्वयं बनने की उत्कट इच्छा एवं प्रयास हो।
उपासना ही क्यों जीवन व्यवहार के किसी भी क्षेत्र में चित्त की एकाग्रता अत्यन्त आवश्यक है। व्यवहार ही .... परमार्थ चित्त की एकाग्रता के बिना उसमें सफलता मिलना कठिन ही है।
उपासना पृष्ठ उलटने की क्रिया कहीं जा सकती है, जिससे पढ़ने का शुभारम्भ होता है। उन क्षणों में जब व्यक्ति उपासना करता है तो नये अध्याय का पहला पृष्ठ उलटता है और उसे पढ़ता जाता है।
उपासना द्वारा अपनी मलीनताओं तथा विकृतियां का शोधन करके भी इस प्रकार की आत्मिक प्रखरता उत्पन्न करते है और स्वप्नों के माध्यम से, ऐसे संकेत प्राप्त करते है जो आत्मतत्व की खोज में सहायक होते है अथवा आत्मसत्ता के अस्तित्व की पुष्टि करते है।
उपासना या ध्यान की इसी स्थिति में आत्मा परमात्मा की सिद्धि प्राप्त करता है। अगले ही श्लोक में कहा गया है-
उपासना या प्रार्थना को इन कार्यों को बीज कहा जा सकता है।
उपासना, भजन, सेवा करनी चाहिए। अतः सच्ची श्रद्धा उसी के प्रति मानी जा सकती है, जिससे अभिन्न आत्मीयता की अनुभूति हो और जिसके जैसा स्वयं बनने की उत्कट इच्छा एवं प्रयास हो।
उपासना के बाद भी कोई संवेदना या शक्ति का उठान अनुभव नहीं करते।
उपासना बैंक से धन बैंक से धन निकालने की प्रक्रिया के समान है। उस समय प्राप्त राशि का उपयोग जीवन व्यवसाय चलाने के लिए किया जाता है। लेकिन बहुत से व्यक्ति ठीक से उपासना करना ही नहीं जानते, अधिकाँश लोगों को प्रार्थना का रहस्य ही मालूम नहीं होता। परिणाम स्वरूप वे उपासना के बाद भी कोई संवेदना या शक्ति का उठान अनुभव नहीं करते।
उपासना द्वारा अपनी चेतना का परिष्कार, मलीनताओं का निवारण तथा आत्मशोधन के द्वारा अपने व्यक्तित्व का परिपाक करना पड़ता है जिस समय चेतना पूर्णतः निर्मल, शुद्ध हो जाती है उस समय आत्मसत्ता-परमात्मसत्ता का उसी प्रकार अनुभव किया जा सकता है, जिस प्रकार कि सामने बैठे हुए व्यक्ति या रखी हुई वस्तु का।
उपासना के स्तर का कहा गया है, प्रार्थना या उपासना का अर्थ केवल ईश्वर के समीप बैठने की अनुभूति करते हुए कुछ क्षणों तक नाम विशेष का जप या स्तवन पाठ ही नहीं है। वे सभी अच्छे कार्य जो आत्मसन्तोष, धन्यता का बोध और आत्मगौरव बढ़ाते हैं, इसी वर्ग में आ जाते है। उपासना या प्रार्थना को इन कार्यों को बीज कहा जा सकता है।
उपासना, जप, ध्यान के साथ उनकी दिनचर्या आरंभ होती। इसके बाद वे अपने राज्य के दीन-दुखियों और अभावग्रस्तों को प्रतिदिन एक स्वर्णमुद्रा बांटते थे, जिनकी भीड़ रोज प्रातः से ही लग जाया करती थी।
उपासना करता है तो नये अध्याय का पहला पृष्ठ उलटता है और उसे पढ़ता जाता है।
उपासना का अर्थ केवल ईश्वर के समीप बैठने की अनुभूति करते हुए कुछ क्षणों तक नाम विशेष का जप या स्तवन पाठ ही नहीं है। वे सभी अच्छे कार्य जो आत्मसन्तोष, धन्यता का बोध और आत्मगौरव बढ़ाते हैं, इसी वर्ग में आ जाते है। उपासना या प्रार्थना को इन कार्यों को बीज कहा जा सकता है।
उपासना को चमत्कारी बनाने के साथ जीवन व्यापार के समग्र क्षेत्रों में भी सफलता प्रदान करती है।
उपासना की शान्ति और जल में दूषण का प्रच्छालन प्रकृति की प्रेरणा यही तो है कि सृष्टि में जो मंगल है उसका अभिसिंचन परिवर्धन और विस्तार हो जो अमंगल है उसका शुचि-संस्कार, यदि तुम इसमें जुट पड़ो तो अशान्ति का प्रश्न ही शेष न रहे, श्रुतिधर को यथार्थ का बोध हुआ वे घर लौट आये और मंगल की साधना में जीवन बिताने लगे।
उपासना उस विभेद को दूर करने के लिए ही की जाती है। चित्त की एकाग्रता के महत्व को समझाते हुए आचार्य बिनोवा भावे ने लिखा है कि-”उपासना ही क्यों जीवन व्यवहार के किसी भी क्षेत्र में चित्त की एकाग्रता अत्यन्त आवश्यक है। व्यवहार ही .... परमार्थ चित्त की एकाग्रता के बिना उसमें सफलता मिलना कठिन ही है।
उपासना को प्रभावशाली और फलवती बनाता है तथा एकाग्रता और तन्मयता से किये गये कार्य ही सफलता तक पहुँचाते है। उनसे उत्पन्न हुई धनात्मक शक्ति व्यक्ति की बढ़ा यह है आत्मविश्वास, आत्मगौरव और आत्मबल को बढ़ाती है जीवन के सभी क्षेत्रों में साधी गई एकाग्रता ईश्वर प्राप्ति की साधना को भी प्रखरतम बनाती है तथा व्यक्ति का स्तर दिनों-दिन उच्च से उच्चतर और उच्चतम की और बढ़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-June
उपासना और साधना का तात्विक पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि अध्यात्म विज्ञान का सारा ढाँचा ही यह प्रेरणा देता है कि प्रगति के लिए आवश्यक ऊर्जा उत्पन्न की जाय। ऊपर उठने के लिए, आगे बढ़ने के लिए सर्वत्र ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। वायुयान को या राकेट को आकाश में फेंकना हो या पानी को नीचे से ऊपर की ओर खींचना हो तो साधन और सामर्थ्य दोनों को ही जुटाना पड़ता है। जीवन को ऊँचा उठाना हो, आगे बढ़ाना हो तो भी समर्थता उत्पन्न करनी होगी और यह ऊर्जा तपश्चर्या के बिना उत्पन्न नहीं हो सकती। तपश्चर्या के बिना उत्पन्न नहीं हो सकती।
उपासना को सफल बनाने वाली पाँच तपश्चर्याएँ-(1) उपवास, (2) ब्रह्मचर्य, (3) मौन, (4) तितीक्षा और (5) अनुदान-इन पाँच नामों से प्रसिद्ध हैं। साधना के साथ-साथ इनका समन्वय जितना हो सकेगा, उसी अनुपात से उसकी कार्य-क्षमता बढ़ती चली जाएगी।
उपासना की सफलता सुनिश्चित होती है।
उपासना को सर्वमान्य स्वीकृति थी। इस समय यहाँ 40 हजार आवास अवस्थित थे। धूमकेतु के उदय के समय से मोहनजोदड़ो को अपनी विकास की चरमसीमा प्राप्त करने के लिए तकरीबन सौ सालों का सफर तय करना पड़ा।
उपासना को सार्थक बनाने के लिए जिह्वा शुद्धि की प्रक्रिया पर पूरा ध्यान देना चाहिए। जिह्वा शुद्धि आहार से भी जुड़ी है एवं वाणी से भी।
उपासना में सफलता प्राप्त करने के लिए आत्मशोधन की प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। इसके बिना धन की सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी। जिस तरह भौतिक प्रगति में सफलता के लिए अभीष्ट श्रम, साहस, प्रयत्न-पुरुषार्थ करना पड़ता है, उसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए तपश्चर्या का पुरुषार्थ करना पड़ता है। अध्यात्म क्षेत्र की प्रगति पूरी तरह इस तथ्य पर निर्भर है कि साधक में तपश्चर्या की साहसिकता किस मात्रा एक प्रचण्ड हो सकी। उपासना और साधना का तात्विक पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि अध्यात्म विज्ञान का सारा ढाँचा ही यह प्रेरणा देता है कि प्रगति के लिए आवश्यक ऊर्जा उत्पन्न की जाय।
उपासना की पद्धति अपनायी जाती थी। यहाँ के लोग भगवान शिव की आराध्य देवता के रूप में पूजा करते थे। धूमकेतु के अनिष्टकारी प्रभावों से बचने के लिए इस उपासना को सर्वमान्य स्वीकृति थी। इस समय यहाँ 40 हजार आवास अवस्थित थे। धूमकेतु के उदय के समय से मोहनजोदड़ो को अपनी विकास की चरमसीमा प्राप्त करने के लिए तकरीबन सौ सालों का सफर तय करना पड़ा।
उपासना के प्रचलन ने अपना विश्वव्यापी आधार बनाया।
उपासना के समय तो मौन रहने की परम्परा भी है। इसके लिए जिस समय कम जन-संपर्क रहता है उस समय एक दो घण्टे का मौन रखने का नियम बनाना चाहिए। सप्ताह में यह महीने में एक दिन पूरा मौन रखना भी जिह्वा की अवाँछनीय गतिविधियों पर रोक लगाने, पुरानी आदतें भुलाने का एक अच्छा उपाय है।
उपासना में चंचल-चित्त को एक नियत विधि-व्यवस्था में लगाए रहने वाली मनोरंजन विधियाँ उपयुक्त रहती हैं। शंकरजी पर विल्वपत्र चढ़ाना, अभिषेक करना, परिक्रमा करना, धूप-दीप से गायत्री माता की मूर्ति अथवा चित्र का पंचोपचार, षोडशोपचार पूजन करना आदि क्रियाएँ इसी स्तर की हैं। विभिन्न धर्मग्रन्थों-बाइबिल, रामायण, गीता का पाठ, देवी-देवताओं के स्तवन, मंत्रजप आदि शारीरिक हलचलों के साथ की जाने वाली साधनाएँ इसी स्तर की होती है। उनमें रुचि उत्पन्न करने, स्वभाव का रुझान ढालने का लक्ष्य जुड़ा रहता है। आरम्भ में इस लाभ का भी अपना महत्व है, किन्तु जब ध्यानयोग की उच्च भूमिका में प्रवेश करना होता है, तो शरीरगत हलचलें बन्द करके निःचेष्ट होने की आवश्यकता पड़ती है।
उपासना करते हैं। उसका चित्र युवा नारी का है। उसमें पवित्रता भरी मातृ-बुद्धि की श्रद्धा जमाने का एक उद्देश्य यह भी है कि नारी यौवन पर दृष्टि जाते ही उत्कृष्ट चिन्तन उभरने का अभ्यास होता रहे। सरस्वती, लक्ष्मी, काली आदि अन्य देवियों की प्रतिमाओं में भी यौवन के साथ भावभरी श्रद्धा संजोये रहने की मान्यता है इसी प्रकार देवताओं को रूप-यौवन संपन्न बनाकर नारी को यह अभ्यास करने का अवसर नारी को यह अभ्यास करने का अवसर दिया गया है कि वे पर यौवन से कामुक उत्तेजना ग्रहण न करें, वरन् ईश्वर तुल्य पवित्र मान्यताओं का अभ्यास करें। मीरा आदि की आराधना इसी स्तर की थी।
उपासना के वास्तविक सत्परिणाम देखने का अवसर प्राप्त करना चाहिए, यह मानकर चलना चाहिए कि तप के बाद ही योग परमात्मा का मिलन-संयोग, श्रेष्ठ तपस्वी ही समर्पित योगी बन सकता है। हम जीवन-शैली में पर्याप्त संतुलन, समत्व स्थापित कर योगी बनना सीखें व अनुदानों के अधिकारी बनें।
उपासना, तपश्चर्या एवं आवश्यकता समझते हुए इसी में सर्वतोभावेन संलग्न होंगी। साथ ही सामान्य स्तर के व्यक्तियों में इतना विवेक तो अनायास ही जाग्रत होगा कि वे अन्धकार और प्रकाश का अन्तर समझ सकें। अनुचित के लिए दुराग्रह छोड़कर इन आंदोलनों द्वारा प्रतिपादित न्याय और विवेक के उचित पक्ष को स्वीकार कर सके। इस प्रकार उभयपक्षीय सुयोग-संयोग उस प्रयोजन को अग्रगामी बनाता चला जाएगा, जो युगपरिवर्तन का मूलभूत आधार है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-September
उपासना फलदायी मानी जाती है। तुलसी को शुद्धि की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, अतः कोई भी भोग तुलसी के बिना पूरा नहीं माना जाता। आम, जामुन, असन, लोध्र, शाल, कटहल, अंकोल, सुन्दर, तिनिश, बेल,तेंदू, बाँस, काशमरी, वरण, महुआ, तिलक, बेर, आँवला, कदम्ब, बेंत, अनार आदि फूलों-फलों और छायादार वृक्षों की महत्ता को दर्शाने वाली अनेकों परम्पराएँ अपने देश के विभिन्न भागों में प्रचलित हैं।
उपासना’ अभियान व संगठन को सशक्त बनाने की प्रक्रिया जोरों से चली एवं तत्पश्चात् विराट संस्कार महोत्सवों की शृंखला अक्टूबर 1996 से अल्मोड़ा से आरम्भ कर दी गयी, जिसके प्रथम सोपान की समाप्ति 25 कार्यक्रम के बाद अभी लंदन में में सम्पन्न हुए (9, 10 अगस्त 1997) विराट संस्कार महोत्सव-मल्टी प्रदर्शन के साथ हुई । अब अगला सोपान आरम्भ हो रहा है-अक्टूबर में एक साथ चार स्थानों पर सम्पन्न हो रहे विराट संस्कार महोत्सवों के रूप में, जो सतत् मई-जून 1998 तक चलते रहेंगे एवं सम्भावना है कि ऐसे 150 आयोजन छोटे-बड़े रूपों में तब तक सम्पन्न हो जाएँगे।
उपासना करते थे। यही कारण है कि ऋषिप्रणीत हमारी संस्कृति अरण्य संस्कृति के रूप में विख्यात हुई और अपने देश की परम्पराओं में इस तत्व को गहराई से आत्मसात किया गया यही नहीं बाद के दिनों में ये परम्पराएँ जहाँ जिस ओर-जिस किसी देश में गईं वहीं उन्होंने अपने अमिट चिन्ह छोड़े।
उपासना के साथ सघन यज्ञायोजनों का आन्दोलन भी चलाया। गाँव-गाँव, गली-गली यज्ञ हुए इससे पर्यावरण में कितना सुधार हुआ होगा इसकी कल्पना दो वर्ष पूर्व सूरत में अचानक फैली प्लेग की तरह की महामारी से लगाया जा सकता है। उस समय सूरत में अकेला गायत्री परिवार था जिसने घूम-घूम कर मुहल्ले-मुहल्ले एक-एक दिन में बीस-बीस यज्ञ तक सम्पन्न कराए। इन यज्ञों में औषधि-युक्त हवन सामग्री प्रयुक्त की गई। समाचार पत्रों में यह खबरें विस्तार से छपीं तो दिल्ली में भी घर-घर लोगों ने अपने-अपने बचाव के लिए हवन किए।
उपासना-साधना के रूप में जाना जाता है। जिसमें व्यक्ति स्वयं को अनगढ़ से सुगढ़ व ईश्वर का सामीप्य पाने योग्य बनाता है।
उपासना करने का विधान है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-November
उपासना करने वालों के सब साँसारिक कष्ट दूर हो जाते हैं तथा उसे लोक परलोक में सुख शान्ति तथा सद्गति मुक्ति प्राप्त होती है पर आपने यह नहीं बताया कि इस प्रकार की महान सामर्थ्य वाली सत्ता कौन है?
उपासना समस्त सिद्धियों का आधारभूत है। गायत्री उपासक अन्य कोई अनुष्ठान या साधना न करे, तो भी सबसे मित्रवत आचरण करता हुआ वह
ब्रह्मं को प्राप्त करता है, क्योंकि इस महामंत्र के जप से उसका चित ब्राह्मीचेतना की तरह शुद्ध व पवित्र हो जाता है।” निश्चय ही जहाँ इस स्तर की आन्तरिक सम्पन्नता होगी, वहाँ कहने की आवश्यकता नहीं कि आत्मिक सम्पन्नता की अनुचरी भौतिक सम्पन्नता भी अनिवार्य रूप से होगी ही। आत्मिक दृष्टि से सुसम्पन्न और सुविकसित व्यक्ति इन भौतिक विभूतियों का उद्धत प्रदर्शन नहीं करते, उन्हें श्रेष्ठ सत्कार्यों में ही लगाते हैं। इसलिए वे साँसारिक दृष्टि से अन्य मनुष्यों की अपेक्षा साधारण स्तर के ही दिखाई देते हैं।
उपासना का रहस्योद्घाटन करते हुए इसी महाशक्ति को अपना इष्टदेव प्रतिपादित किया जाता रहा है। शक्तियों का केन्द्र वस्तुतः यही महामंत्र है। इसकी महत्ता का प्रतिपादन करते हुए शास्त्र कहते हैं-
उपासना करना पर्याप्त नहीं, उसे ‘वाक्’ बनाकर ही इस योग्य बनाया जा सकता है कि अध्यात्म पथ पर बढ़ते हुए साधक को कुछ कहने लायक सफलता मिल सके। आयुर्वेद में सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा, अभ्रक, पारद आदि की भस्म बनाकर उनके सेवन का विधान है। विषों का भी बड़ा लाभ बताया गया है, पर वह सम्भव तभी होता है, जब उन विषों को विधानपूर्वक शुद्ध किया जाए। वाणी एक मूल पदार्थ है। शोधित होने पर वह अमृत बन जाति ह और विकृत होने पर विष का काम करती है।
उपासना में गायत्री महामंत्र के जप व ध्यान द्वारा मन का सम्बन्ध सविता लोक से स्थापित किया जाता है तथा उसकी चमत्कारी क्षमताओं क्षमताओं का लाभ उठाया जाता है ध्यान की अवस्था में जब सविता के प्राण-प्रवाह से अपने मस्तिष्क मध्य स्थित ब्रह्मरंध्र का सम्बन्ध जुड़ जाता है तो उसकी शक्ति शरीर के कण कण में प्रविष्ट होती हुई चली जाती है और अपना प्राण शरीर विकसित होता हुआ सूर्य प्रकाश के समान हल्का दिव्य तेजस्वी होता चला जाता है यदि इस तथ्य को समझा और अपनाया जा सके तो हर कोई दिव्य क्षमताओं का स्वामी बन सकता है।
उपासना प्रयोग में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ उपकरणों की भौतिक किन्तु सूक्ष्म शक्ति, (4) भावना-प्रवाह श्रद्धा, विश्वास एवं उच्चस्तरीय लक्ष्य, दृष्टिकोण। इन चारों का जहाँ जितने अंश में समावेश होगा वहाँ उतने ही अनुपात से मन्त्र शक्ति का प्रतिफल एवं चमत्कार दिखाई पड़ेगा। इन तथ्यों की जहाँ उपेक्षा की जा रही होगी और ऐसे ही अन्धाधुन्ध गाड़ी धकेली ही जा रही होगी, जल्दी-जल्दी वरदान पाने की धक लग रही होगी, वहाँ निराशा एवं असफलता ही हाथ लगेगी।
उपासना से मिल सकती है।
उपासना। इस तत्व को आकर्षित कर साधक परब्रह्म की विशिष्ट अनुकम्पा, दूरदर्शी विवेकशीलता और सन्मार्ग अपना सकने वाली प्रखरता प्राप्त करता है। यह अनुदान प्राप्त कर वह तो स्वयं धन्य बन ही जाता है, अपने आस-पास के समूचे वातावरण में भी वैसी ही विशेषताएँ उत्पन्न करता ह है। उसके ऊर्जा सम्पन्न व्यक्तित्व से आस-पास का, उसके सम्पर्क क्षेत्र का समूचा वातावरण प्रभावित होता रहता है और सुखद सम्भावनाओं का क्रम चल पड़ता है। इस सम्बन्ध में मानवी महाशक्ति का, उसकी उपलब्धियों का, उसकी उपासना का परिचय देते हुए तत्त्वदर्शियों ने बहुत कुछ कहा है।
उपासना तक के सभी प्रतिपादनों में घोर मतभेद है। प्रथा परम्पराओं के सम्बन्ध में कोई तालमेल नहीं। ऐसी दशा में किस शास्त्र को किस अवतार को सही माना जाय यह निर्णय नहीं हो सकता।
उपासना द्वारा सविता देवता से सूर्य की सूक्ष्म शक्ति से मानसिक सम्बन्ध स्थापित करते हैं और वे ऋद्धि सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं जा लोगों को चमत्कार जैसी प्रतीत होती है लेकिन उनका आधार वैज्ञानिक ही होता है । जिस तरह अब दैनिक सौर ऊर्जा का दोहन फोटो वोल्टिक यंत्र उपकरणों के माध्यम से ऊर्जा आपूर्ति में करने लगे है ठीक उसी तरह गायत्री उपासक व योगीजन सविता देवता की शक्ति का अवशोषण व उपयोग आत्मोत्कर्ष एवं जनकल्याण में करते हैं यद्यपि यह प्रक्रिया से भिन्न है। इसे कुण्डलिनी जागरण कहा जाता है। गायत्री उपासना द्वारा सविता शक्ति का काया में अवगाहन धारण और विकास कर यह प्रयोजन पूरा किया जाता है इससे आरोग्य ओजस तेजस का और बुद्धि का विकास तो होता ही है उन अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास भी होता है जिन्हें लोग आश्चर्य अथवा ईश्वरीय अनुकम्पा मानते हैं गायत्री उपासना में गायत्री महामंत्र के जप व ध्यान द्वारा मन का सम्बन्ध सविता लोक से स्थापित किया जाता है तथा उसकी चमत्कारी क्षमताओं क्षमताओं का लाभ उठाया जाता है ध्यान की अवस्था में जब सविता के प्राण-प्रवाह से अपने मस्तिष्क मध्य स्थित ब्रह्मरंध्र का सम्बन्ध जुड़ जाता है तो उसकी शक्ति शरीर के कण कण में प्रविष्ट होती हुई चली जाती है और अपना प्राण शरीर विकसित होता हुआ सूर्य प्रकाश के समान हल्का दिव्य तेजस्वी होता चला जाता है यदि इस तथ्य को समझा और अपनाया जा सके तो हर कोई दिव्य क्षमताओं का स्वामी बन सकता है।
उपासना करते हैं।
उपासना द्वारा प्रसन्न कर लिया जाए तो मनुष्य मनचाही वर्षा कराने में सफल हो सकता है। गंगा की देवी आत्मा को प्रसन्न करके भगीरथ पृथ्वी पर गंगा नदी को लाये और उसी जलधारा को इच्छित मार्ग से समुद्र तक ले गये। प्राचीनकाल में हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि इसी प्रकार आत्म साधना, उपासना, तपश्चर्या, मंत्र, योगाभ्यास, यज्ञ आदि क्रियाओं से देव तत्वों की सूक्ष्म आत्मा से अपना सम्बन्ध स्थापित करके उनकी महान शक्तियों का भरपूर लाभ उठाते थे।
उपासना को प्रधानता दी जाती है। शास्त्र-इतिहास में ऐसा ही विवरण मिलता है और देवताओं, अवतारी देवदूतों द्वारा अपनी उपासना का रहस्योद्घाटन करते हुए इसी महाशक्ति को अपना इष्टदेव प्रतिपादित किया जाता रहा है। शक्तियों का केन्द्र वस्तुतः यही महामंत्र है। इसकी महत्ता का प्रतिपादन करते हुए शास्त्र कहते हैं-
उपासना के द्वारा साधक में प्रज्ञा शक्ति का अभिवर्द्धन होने के साथ वे विशिष्ट क्षमताएँ सिद्धियाँ भी प्राप्त होती है। जिनका वर्णन विद्या के अवगहन तथा योग, तप आदि के के साधन विधान के साथ जुड़ा हुआ है। गायत्री उपासक की आत्मिक पूँजी निरंतर बढ़ती चली जाती है और यदि वह धैर्य तथा साहसपूर्वक आत्मपरिष्कार करता हुआ अपने मार्ग पर, साधनापथ पर बढ़ता चलता है, तो वह एक दिन नर से नारायण के स्तर तक पहुँचकर सिद्ध पुरुषों की-सी स्थिति में जा पहुँचता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसी तथ्य को उद्घाटित करते हुए कहा गया है-
उपासना करते रहते हैं। इस स्थान को लाँघने के बाद तुम्हें मेघ के समान एक नीला वन मिलेगा। उस स्थान पर एक वृद्धा तपस्विनी रहती है। तुम उसके दर्शन करके लौट आना। मैं उसी क्षण तुम्हें अयमात्मा ब्रता का तत्त्वबोध कराऊँगा।
उपासना करता है, उसका संसार में कभी पतन नहीं होता।
उपासनाओं में गायत्री को सर्वश्रेष्ठ माना है।
उपासना नहीं है। इसलिए गायत्री को सर्वोपरि साक्षात् सर्व देवता स्वरूप, सर्व शक्तिमान, सबको प्रकाश देने वाला और परमात्मा के सर्वात्मा-स्वरूप का ज्ञान कराने वाला है। आत्मोत्कर्ष के लिए हमें इसका आश्रय लेना ही चाहिए।
उपासना पद्धति से ही प्राप्त हो सकते हैं।
उपासना, तपश्चर्या, मंत्र, योगाभ्यास, यज्ञ आदि क्रियाओं से देव तत्वों की सूक्ष्म आत्मा से अपना सम्बन्ध स्थापित करके उनकी महान शक्तियों का भरपूर लाभ उठाते थे।
उपासना का परिचय देते हुए तत्त्वदर्शियों ने बहुत कुछ कहा है। शास्त्रवचनों में इस तथ्य का उल्लेख स्थान-स्थान पर हुआ है।
उपासना द्वारा सविता शक्ति का काया में अवगाहन धारण और विकास कर यह प्रयोजन पूरा किया जाता है इससे आरोग्य ओजस तेजस का और बुद्धि का विकास तो होता ही है उन अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास भी होता है जिन्हें लोग आश्चर्य अथवा ईश्वरीय अनुकम्पा मानते हैं गायत्री उपासना में गायत्री महामंत्र के जप व ध्यान द्वारा मन का सम्बन्ध सविता लोक से स्थापित किया जाता है तथा उसकी चमत्कारी क्षमताओं क्षमताओं का लाभ उठाया जाता है ध्यान की अवस्था में जब सविता के प्राण-प्रवाह से अपने मस्तिष्क मध्य स्थित ब्रह्मरंध्र का सम्बन्ध जुड़ जाता है तो उसकी शक्ति शरीर के कण कण में प्रविष्ट होती हुई चली जाती है और अपना प्राण शरीर विकसित होता हुआ सूर्य प्रकाश के समान हल्का दिव्य तेजस्वी होता चला जाता है यदि इस तथ्य को समझा और अपनाया जा सके तो हर कोई दिव्य क्षमताओं का स्वामी बन सकता है।
उपासना का प्रतिफल प्रज्ञा के रूप में-दूरदर्शी विवेकशीलता और आत्मबल के रूप में प्राप्त होता है और उसके बल पर साधक अपने को आत्मिक दृष्टि से सुविकसित एवं सुसम्पन्न बनाता है। परिणामस्वरूप उसके आत्मिक जीवन का स्तर ऊँचा उठता है और वह व्यक्ति सामान्य न रहकर देवात्मा, महात्मा तथा परमात्मा के स्तर तक जा पहुँचता है। इस संदर्भ में मनुस्मृति 2/87 में उल्लेख है- “गायत्री उपासना समस्त सिद्धियों का आधारभूत है। गायत्री उपासक अन्य कोई अनुष्ठान या साधना न करे, तो भी सबसे मित्रवत आचरण करता हुआ वह
ब्रह्मं को प्राप्त करता है, क्योंकि इस महामंत्र के जप से उसका चित ब्राह्मीचेतना की तरह शुद्ध व पवित्र हो जाता है।” निश्चय ही जहाँ इस स्तर की आन्तरिक सम्पन्नता होगी, वहाँ कहने की आवश्यकता नहीं कि आत्मिक सम्पन्नता की अनुचरी भौतिक सम्पन्नता भी अनिवार्य रूप से होगी ही।
उपासना से मनुष्यों से लेकर त्रिदेवों तथा अन्य देवताओं तक का कल्याण होना सिद्ध होता रहा है। प्रज्ञातत्व की अधिष्ठात्री गायत्री ही है।
उपासना से उठने पर शरीर में स्फूर्ति और मन में सरसता लगे तो समझना चाहिए कि परिपक्वता आ गई और इसका श्रेयस्कर सत्परिणाम अत्यन्त सन्निकट है।
उपासना से यह दूरदर्शी विवेकशीलता और आत्मिक प्रगति के लिए अभीष्ट साहसिकता पर्याप्त मात्रा में उत्पन्न होती है। इसलिए मनीषियों ने आत्मिक प्रगति के लिए की जाने वाली समस्त साधना-उपासनाओं में गायत्री को सर्वश्रेष्ठ माना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-July
उपासना कक्ष तक सीमित कर देंगे, बल्कि वह प्राणऊर्जा हमारे अन्दर भर देंगे हो कि हम भगवान जैसे कार्य, दिल-दिमाग बदलने जैसा कार्य सहज में कर सकें। हम भगवान के ‘टूल्स’ हैं, आप हमें भगवान कहें तो हमें आपत्ति हो सकती है। टूल्स कहने पर नहीं। आप बुद्ध को और गाँधी को चाहें तो भगवान कह सकते हैं।
उपासना के सामूहिक आयोजन किये जाने लगे। यज्ञ विद्या पर सर्वांगीण शोध के उद्देश्य से सन् 1955 की वसन्त पंचमी से 15 महीनों तक चलने वाले विशद् गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया गया। इसके अंतर्गत (1) चारों वेदों का परायण, (2) महामृत्युँजय यज्ञ (3) रुद्र यज्ञ (4) विष्णु यज्ञ (5) शत चण्डी यज्ञ (6) नवग्रह यज्ञ (7) गणपति यज्ञ (8) सरस्वती यज्ञ (9) ज्योतिष्टोम (10) अग्निष्टोम आदि अनेक यज्ञों की प्रतिक्रियाएं सम्मिलित थीं। यह विश्वहित के लिए सम्पन्न हुआ आध्यात्मिक प्रयोग था। गुरुदेव के शब्दों “इस यज्ञ का यजमान, संयोजक, पूर्णफल प्राप्तकर्ता कोई एक व्यक्ति नहीं है।
उपासना नियमित करते थे। गायत्री मन्त्र की उनकी सिद्धि का स्रोत था-तप की पूँजी का विराट भण्डागार-24 लक्ष के 24 महापुरश्चरणों के रूप में। इसके बावजूद उनकी नित्य की यह साधना कभी भी न छूटी। आखिरी श्वास तक चलती रही।नित्य वे कमाते थे-सोते समय तक खाली हो जाते थे।
उपासना गृह में एक दिव्य प्रकाशवान देखा, जो बाहर से घनीभूत होता हुआ उनके शरीर, मन और अन्तःकरण में समा गया। उन्हें आत्मबोध, अन्तःस्फुरणा, दिव्य अनुग्रह, गुरुदर्शन, आन्तरिक दिव्यता या जो कुछ कहा जाए प्राप्त हुआ।
उपासना चल रही थी। वसन्त पर्व का दिन था। उस दिन ब्रह्ममुहूर्त में कोठरी में सामने प्रकाशपुँज के दर्शन हुए। आँखें मलकर देखा कि कहीं कोई भ्रम तो नहीं है। प्रकाश प्रत्यक्ष था।
उपासना स्वाध्याय, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन की सेवा-साधना जैसे अनिवार्य अनुबंधों में जो प्रमाद और उपेक्षा बरतेगा उसके विषय में पूज्य गुरुदेव का कहना है कि “उसे शाँतिकुँज की संचालक शक्ति झकझोरेगी। उसके कान उमेठेगी और बाधित करती रहेगी। हर व्यक्ति जुड़कर एवं सक्रिय रहकर ही चैन से बैठ सकेगा ।” क्या हम प्रस्तुत व्यास पूर्णिमा पर्व पर संबंधों की सघनता एवं सक्रियता का अनुपात बढ़ा सकते हैं- यह प्रश्न सभी के लिये है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यही हमारी गुरुभक्ति का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-January
उपासना करूंगा, तब दूसरा वरदान माँगूँगा। आज तो बस इतना ही माँगना है।” भैरवने कहा-”हम आपकी दर्शन तो नहीं दे पायेंगे, आपकी पीठ पीछे खड़े होकर बात कर सकते हैं।” माधवाचार्य ने संदेह से पूछा कि “दर्शन क्यों नहीं दे पायेंगे?” उन्होंने कहा-”तेरे चेहरे पर गायत्री का तेजस्व चमचमा रह है और आंखों से निकल रहा है।
उपासना के मार्ग में, आत्मिक के मार्ग में पग-पग पर जो रुकावटें आती है, उनके आने का सिलसिला बन्द हो जाएगा। रुकावटें आप पार कर लेंगे, तो उन्नति आपकी कोई कठिन नहीं है, भगवान बनना आपके लिए कठिन नहीं है। शर्त एक ही है कि आपने आने पिछले पाप और गुनाहों की जो खाई इकट्ठी कर ली है, पर्वत इकट्ठे कर लिए है, उसको घाटें पाटें। लेविल एक ही करें और फिर आप रास्ता चलते चले जाएँ। यह करना बहुत आवश्यक है।
उपासना को ही देते हैं। जैन धर्म के दोनों सम्प्रदायों श्वेताम्बर और दिगम्बर में शक्ति की उपासना का प्रचलन है। उनकी मान्यताओं में भिन्नताएँ हो सकती है किन्तु भाव में भिन्नता नहीं है।
उपासना को श्रद्धापूर्वक अपनाया। जैन धर्म में 24 तीर्थकर माने जाते हैं। उनके बायीं ओर शासन देवी का निवास है। इन शासन देवियों की संख्या भी 24 ही है। इनमें से चक्रेष्वरी, अम्बिका, पद्यावती 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की शासन देवी है।
उपासना के महत्त्व को स्वीकारा है। मत्स्येन्द्र नापथ के ‘कौल ज्ञान निर्णय’ ग्रन्थ में इस सत्य के पर्याप्त संकेत मिलते हैं। इसके अतिरिक्त ‘सिद्ध सिद्धान्त पद्धति’ में पाँच शिव और पाँच उनकी शक्तियों का नाम आता है- अपरशिव परमशिव, शून्यशिव, निरन्जनशिव और परमात्मशिव की क्रमशः शक्तियाँ है, विजाशक्ति, पराशक्ति, अपराशक्ति, सूक्ष्माशक्ति और कुण्डलिनीशक्ति। नाथ पंथ में परमात्मा के मातृस्वरूप की कुण्डलिनी शक्ति के रूप में उपासना करने का विशेष प्रावधान है।
उपासना करने का विशेष प्रावधान है।
उपासना करता है। जैन कवियों ने शक्ति सम्प्रदाय के ‘सारस्ववतकल्प’ को माना है। सिद्ध सारस्वताचार्य श्री बालचन्द्र सूरि ने अपने महाकाव्य बसन्त विलास के आरम्भ में शक्ति पद्धति को स्वीकार किया है। वह अपनी दिव्य कवित्व शक्ति का श्रेय सरस्वती देवी की उपासना को ही देते हैं। जैन धर्म के दोनों सम्प्रदायों श्वेताम्बर और दिगम्बर में शक्ति की उपासना का प्रचलन है।
उपासना की स्वीकारोक्ति बौद्धों में भी है। सेक्कोपदेश टीका में वाराही, नारायणी ब्राह्मी, परमेश्वरी आदि का नाम आता है। वज्रयान साहित्य को पढ़ने से लगता है कि इन देवियों की उपासना मंत्रों और मूर्ति सहित प्रचलित हो गयी थी। हृनसाँग ने लिखा ने लिखा है कि नालन्दा में तारा और हारीति की उपासना होती थी। बौद्ध धर्म में शाक्त तत्त्वों के प्रवेश का श्रेय ‘गह्मसमाज तन्त्र ग्रन्थ’ को है।
उपासना करते रहे। लेकिन उसका कोई परिणाम नहीं निकला, हम बहुत खिन्न है और यह सोचते हैं कि उपासना से कोई लाभ नहीं हैं खासतौर से गायत्री का कोई फल नहीं हो सकता, ऐसे हमारे विचार है। महात्माजी हँसने लगे। उन्होंने कहा-अच्छा एक काम कीजिए, गायत्री के बारे में तो हमारी कोई जानकारी नहीं है, हम तो ताँत्रिक और कापालिक विद्याओं को जानते हैं, तू ताँत्रिक और कापालिक विद्या को सीख ले, एक साल के अन्दर तुझे कुछ चमत्कार दीखने लगेंगे, अनुभव हो जाएगा तथा चमत्कार दीखने पर तेरा विश्वास बढ़ जाएगा। इसलिए चमत्कार दिखाने की की दृष्टि से तुझे हम एक साल की ताँत्रिक उपासना करने की सलाह देते हैं।
उपासना करने की सलाह देते हैं। स्वामी माधवाचार्य जी ने मान लिया। फिर उनको मणिकर्णिका घाट पर तंत्र सम्बन्धी आवश्यक ज्ञातव्य बताया और यह कहा-एक साल तक तुमको इसी मर्यादा से रहना पड़ेगा। इससे बाहर जाना मना है। इसी में नहाना है, इसी में टट्टी जाना है, इसी में खाना पकाना है, इसी में सोना, उठना, बैठना, किसी भी कीमत पर मरघट की सीमा से बाहर मत जाना।
उपासना मंत्रों और मूर्ति सहित प्रचलित हो गयी थी। हृनसाँग ने लिखा ने लिखा है कि नालन्दा में तारा और हारीति की उपासना होती थी। बौद्ध धर्म में शाक्त तत्त्वों के प्रवेश का श्रेय ‘गह्मसमाज तन्त्र ग्रन्थ’ को है। जिसमें पाँच ध्यानी बुद्धों और उनकी शक्तियों का उल्लेख है। बौद्धों ने आदि शक्ति को ‘प्रज्ञा पारमिता’ का नाम दिया।
उपासना से कोई लाभ नहीं हैं खासतौर से गायत्री का कोई फल नहीं हो सकता, ऐसे हमारे विचार है। महात्माजी हँसने लगे। उन्होंने कहा-अच्छा एक काम कीजिए, गायत्री के बारे में तो हमारी कोई जानकारी नहीं है, हम तो ताँत्रिक और कापालिक विद्याओं को जानते हैं, तू ताँत्रिक और कापालिक विद्या को सीख ले, एक साल के अन्दर तुझे कुछ चमत्कार दीखने लगेंगे, अनुभव हो जाएगा तथा चमत्कार दीखने पर तेरा विश्वास बढ़ जाएगा। इसलिए चमत्कार दिखाने की की दृष्टि से तुझे हम एक साल की ताँत्रिक उपासना करने की सलाह देते हैं। स्वामी माधवाचार्य जी ने मान लिया।
उपासना का वृहदारण्यकोपनिषद में स्वतन्त्र रूप वर्णन करके इस भावना को बल दिया। इसे पौराणिक शक्ति उपासना की पृष्ठभूमि में भी स्वीकार किया जा सकता है, जहाँ देवी को सर्वस्व माना गया है। उदाहरण के लिए,सीतोपनिषद में सीता के सम्बन्ध में कहा गया है कि सीता ही विश्व का कल्याण करने वाली है। वे ही सब प्राणियों की उत्पत्ति एवं विनाश का कारण है। वे सर्वदेव स्वरूपा, सर्वलोकमयी, सर्व आश्रयभूता, सर्वकीर्ति सम्पन्न, सर्वधर्म सम्पन्न, सभी पदार्थों और जीवों की आत्मा, सर्वदेव गंधर्व, मनुष्य आदि प्राणियों की स्वरूपभूता है।
उपासना करने का प्रचलन था। इन मनीषियों के मत से भारतवर्ष में शक्ति उपासना का प्रचलन तान्त्रिक पूजा-पद्धतियों समय से शुरू हुआ। तान्त्रिक प्रणाली में बहुतायत से प्रचलित शाक्तमत को वे अपने प्रमाण के रूप में उद्धृत करते हैं।
उपासना का पर्याप्त निरूपण किया गया है। देवी भागवत, मार्कण्डेय और कलिका पुराण में नारी तत्त्व का माहात्म्य एवं उसकी दैवी सम्पदाओं का विवरण भरा पड़ा है। ब्रह्मवैवर्त में भी राधा का सृष्टि की आहृादिनी शक्ति के रूप में चित्रण किया गया है। वैदिक युग से पुराण युग तक परमात्मा के मातृ स्वरूप को पहुँचाने के लिए उपनिषदों का कम योगदान नहीं रहा। केनोपनिषद में उमा को वैदिक प्रधान देवता इन्द्र को ‘ब्रह्म’ का उपदेश देने का श्रेय दिया गया और गायत्री-सावित्री, सरस्वती आदि की उपासना का वृहदारण्यकोपनिषद में स्वतन्त्र रूप वर्णन करके इस भावना को बल दिया।
उपासना चौदहवाँ वर्ष जो उन्होंने किया, उसका परिणाम मिला, गायत्री का साक्षात्कार हुआ। गायत्री महाशक्ति ने पूछा क्या वरदान चाहते हो? तो माधवाचार्य ने कहा-मैं कोई अजर-अमर ऐसा काम करके दिखा दूँ, जिससे दुनिया मुझे याद करती रहे। उन्होंने फिर ‘माधवनिदान’ नाम का प्रख्यात ग्रन्थ लिखा। इसे गायत्री ने माधवाचार्य के सिर पर अदृश्य रूप में प्रकट हो कर लिखवाया।
उपासनागृह के एकान्त में अनुभव किया जा सकता है, तो कोई कारण नहीं कि मरुस्थल के नितान्त निर्जन में उसका साक्षात्कार न किया जा सके। वह देश-काल के बन्धन से सर्वथा परे है। उसे कहीं भी, कभी भी उपलब्ध करने में कोई अड़चन नहीं। अवरोध है, तो सिर्फ निजी सत्ता की गुणवत्ता के संदर्भ में। उसे यदि हटाया और मिटाया जा सके, तो परमेश्वर का सहयोग तत्काल और तत्क्षण अर्जित करने में कोई विलम्ब नहीं।
उपासना की बात से इन्कार नहीं किया जा सकता परन्तु तन्त्र के जन्मदाता वेद ही हैं। तन्त्र ने अपनी शक्ति उपासना वेदों से ही विरासत में पायी है। ऋषियों की मातृ भक्ति की परिचय इसी से हो जाता है कि उन्होंने समस्त ज्ञान के मूल कारण को वेदमाता के रूप में स्वीकारा। वेदों की अनेक ऋचाओं में इस बात का स्पष्ट विवरण मिलता है कि वैदिक संस्कृति में इन्द्र, अग्नि, वरुण, पूषा आदि पुरुष प्रधान नामों के साथ परमेश्वर की श्रद्धा, नद्य, राका, मही, ऊषा, सूर्या, सरस्वती आदि नारी प्रधान नाम, नामों से भी स्तुति की गई है। जहाँ तक प्रधानता और प्रमुखता का सवाल है, उसके उत्तर में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि प्राचीन ऋषिगण परमेश्वर के नारी रूप के प्रति सतत् श्रद्धा अर्पण करते रहे है।
उपासना की बात को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार ऋग्वेद के 24 वे अध्याय में दी गई घोषा, गोधा, विश्ववारा आदि ऋषिकाओं की सूची सही हो सकती है, किन्तु इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि वैदिक भारत में परमात्मा की नारी रूप में उपासना करने का प्रचलन था। इन मनीषियों के मत से भारतवर्ष में शक्ति उपासना का प्रचलन तान्त्रिक पूजा-पद्धतियों समय से शुरू हुआ। तान्त्रिक प्रणाली में बहुतायत से प्रचलित शाक्तमत को वे अपने प्रमाण के रूप में उद्धृत करते हैं।
उपासना की पृष्ठभूमि में भी स्वीकार किया जा सकता है, जहाँ देवी को सर्वस्व माना गया है। उदाहरण के लिए,सीतोपनिषद में सीता के सम्बन्ध में कहा गया है कि सीता ही विश्व का कल्याण करने वाली है। वे ही सब प्राणियों की उत्पत्ति एवं विनाश का कारण है। वे सर्वदेव स्वरूपा, सर्वलोकमयी, सर्व आश्रयभूता, सर्वकीर्ति सम्पन्न, सर्वधर्म सम्पन्न, सभी पदार्थों और जीवों की आत्मा, सर्वदेव गंधर्व, मनुष्य आदि प्राणियों की स्वरूपभूता है। वे सभी प्राणियों की देहरूपा और विश्वरूपा है।
उपासना और साधना भी साथ-साथ चलती थी। बीच-बीच में सामूहिक धर्मानुष्ठान भी होते थे इससे वहाँ का स्थापत्व पुरुष जाग्रत हो उठता और भूमि में आकर तीर्थ सेवी शुद्ध अन्तः करण से कोई सात्विक कामना करें, तो वह पूरी हुए बिना नहीं रहती। इसीलिए उन दिनों प्रायश्चित प्रक्रिया ऐसे ही तीर्थों में आकर करने का विधान था, ताकि वहाँ के जीवन्त तीर्थदेव के सम्मुख दोष प्रकटीकरण और दण्ड स्वरूप स्वेच्छया तितीक्षा ग्रहण कर क्षमा याचना की जा के। तीर्थ चेतना से काफी माँगना प्रकारान्तर से भगवद् चेतना से ही क्षमा माँगने के समान है। निष्कपट अन्तरात्मा से जब अपने किये पर वास्तविक पश्चाताप उभरता है, तो वह उसे सुनती स्वीकारती और उसमें रियायत भी करती है।
उपासना व्यापक रूप से की जाने लगी। मातृ उपासना का निरूपण अधिकाँशतः इसके भयनिवारिणी व शत्रुविनाशिनी गुणों से हुआ है। वैदिक युग में जो स्थान अदिति को प्राप्त था, पौराणिक युग में वही स्थान आदि को मिला। देवों के सम्मिलित तेजाँश को धारण करने वाली दुर्गा को भी इसी का रूप माना गया। जिस शक्ति में समस्त देवताओं का तेज सम्मिलित हो, उसकी कल्पना करना भी सम्भव नहीं है।
उपासना होती है। बौद्धों के वज्रयान सम्प्रदाय से विकसित हुए नाथ सम्प्रदाय ने भी शक्ति उपासना के महत्त्व को स्वीकारा है। मत्स्येन्द्र नापथ के ‘कौल ज्ञान निर्णय’ ग्रन्थ में इस सत्य के पर्याप्त संकेत मिलते हैं। इसके अतिरिक्त ‘सिद्ध सिद्धान्त पद्धति’ में पाँच शिव और पाँच उनकी शक्तियों का नाम आता है- अपरशिव परमशिव, शून्यशिव, निरन्जनशिव और परमात्मशिव की क्रमशः शक्तियाँ है, विजाशक्ति, पराशक्ति, अपराशक्ति, सूक्ष्माशक्ति और कुण्डलिनीशक्ति। नाथ पंथ में परमात्मा के मातृस्वरूप की कुण्डलिनी शक्ति के रूप में उपासना करने का विशेष प्रावधान है।
उपासना वेदों से ही विरासत में पायी है। ऋषियों की मातृ भक्ति की परिचय इसी से हो जाता है कि उन्होंने समस्त ज्ञान के मूल कारण को वेदमाता के रूप में स्वीकारा। वेदों की अनेक ऋचाओं में इस बात का स्पष्ट विवरण मिलता है कि वैदिक संस्कृति में इन्द्र, अग्नि, वरुण, पूषा आदि पुरुष प्रधान नामों के साथ परमेश्वर की श्रद्धा, नद्य, राका, मही, ऊषा, सूर्या, सरस्वती आदि नारी प्रधान नाम, नामों से भी स्तुति की गई है। जहाँ तक प्रधानता और प्रमुखता का सवाल है, उसके उत्तर में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि प्राचीन ऋषिगण परमेश्वर के नारी रूप के प्रति सतत् श्रद्धा अर्पण करते रहे है।
उपासना का प्रचलन है। उनकी मान्यताओं में भिन्नताएँ हो सकती है किन्तु भाव में भिन्नता नहीं है।
उपासना का निरूपण अधिकाँशतः इसके भयनिवारिणी व शत्रुविनाशिनी गुणों से हुआ है। वैदिक युग में जो स्थान अदिति को प्राप्त था, पौराणिक युग में वही स्थान आदि को मिला। देवों के सम्मिलित तेजाँश को धारण करने वाली दुर्गा को भी इसी का रूप माना गया। जिस शक्ति में समस्त देवताओं का तेज सम्मिलित हो, उसकी कल्पना करना भी सम्भव नहीं है। अतः देवी को देवताओं की अपेक्षा अधिक सम्मानित स्थान दिया गया है।
उपासना सफल हो सकती है, न आपका मन लग सकता है, न ध्यान लग सकता है। क्यों? क्योंकि आपको दण्ड मिल रहे है। दण्ड नहीं मिलेंगे तो आपका ध्यान पुनः उस ओर जाएगा, फिर पाप का दण्ड कहाँ जाएगा? इसीलिए समस्त आसुरी शक्तियाँ बराबर शुभ कर्मों में विघ्न उपस्थित करती रहती है।
उपासना होती थी। बौद्ध धर्म में शाक्त तत्त्वों के प्रवेश का श्रेय ‘गह्मसमाज तन्त्र ग्रन्थ’ को है। जिसमें पाँच ध्यानी बुद्धों और उनकी शक्तियों का उल्लेख है। बौद्धों ने आदि शक्ति को ‘प्रज्ञा पारमिता’ का नाम दिया। ये ज्ञान और बुद्धि प्रदान करने वाली है।
उपासना पद्धति पौराणिक काल में फली-फूली। बौद्ध और जैन धर्मों ने भी इसे अपनाया। नाथ व सिद्ध सम्प्रदायों पर भी इसका प्रभाव पड़ा और जब समूचा युग संकटापन्न हो जीवन-मरण के संघर्ष को झेल रहा, तब ऐसे में अनन्त करुणामय परमेश्वर माँ की ममता लेकर युग शक्ति गायत्री के रूप में अवतरित हुआ है। वेदमाता गायत्री अपनी सभी सन्तानों में मातृ शक्ति के प्रति श्रद्धा जाग्रत करने, नवयुग को नारी युग में बदलने के लिए संकल्पित हो उठी हैं उनके इस संकल्प में भागीदार बनने वाले ही उनके अनुदानों का मनचाहा लाभ उठा सकेंगे।
उपासना भी प्रचलित हुई। ये मातृकाएँ थी, ब्रह्माणी, महेष्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी और चामुण्डा। इस युग में यह विश्वास प्रचलित हो चुका था कि पुरुष देवताओं की क्षमता का मूल स्त्रोत उनकी शक्ति है, जो देवी तत्त्व या मातृतत्त्व से अभिन्न है। पुरुष का देवत्व पूर्णतः महाशक्ति की कृपा पर आधारित है।
उपासना का प्रचलन तान्त्रिक पूजा-पद्धतियों समय से शुरू हुआ। तान्त्रिक प्रणाली में बहुतायत से प्रचलित शाक्तमत को वे अपने प्रमाण के रूप में उद्धृत करते हैं।
उपासनाएँ एवं यज्ञादि प्रक्रियाएँ सम्पन्न की जाये तो उनसे सूर्य देव की आध्यात्मिक शक्तियों को विशेष रूप से प्रभावित एवं केवल अपने लिए वरन् सम्पूर्ण समाज, राष्ट्र और विश्व के लिये सुख-समृद्धि और शाँति का अनुदान उपलब्ध किया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-August
उपासना, तपश्चर्या का समुचित लाभ उठा सकता है और देव-शक्तियों के अनुग्रह का अधिकारी बन सकता है। जब तक यह पात्रता न हो, तब तक उत्कृष्ट वरदान माँगने की दूरदर्शिता ही उत्पन्न न होगी। ऐसी दशा में साधना के पुरुषार्थ से कुछ भौतिक लाभ भले ही मिल जाये, देवत्व का एक कण भी उसे प्राप्त न होगा। आसुरी भूमिका पर कहीं कोई सिद्धि मिल भी पायी तो अन्ततः उसी के लिए घातक सिद्ध होगी। अध्यात्म विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिए साधक का अन्तःकरण एवं व्यक्तित्व जितना निर्मल होगा, उतना ही उसकी उपासना सफल होगी।
उपासना एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान है। आध्यात्मिक विद्या अपने आप में एक उच्चस्तरीय साइंस है, जिसमें नियम एवं प्रयोजनों को समझ कर तदनुकूल चलने से लाभान्वित हुआ जा सकता है। यदि यह तथ्य लोगों ने समझा होता तो अध्यात्म मार्ग की देहरी पर पैर रखते ही पहला प्रयोग अपने अन्तरंग में मूर्छित, पददलित, बुभुक्षित, मलिन पड़े हुए अपने अन्तर्यामी इष्टदेव को संभालने-संजोने का प्रयत्न किया होता। उन्हें समर्थ एवं बलवान बनाया होता। इस प्रथम प्रयोजन को पूरा करने के बाद ही मन्त्र, जप, उपासना, पूजा, स्तोत्र आदि के चमत्कार देखने का दूसरा कदम उठाया गया होता तो निश्चित रूप से हर किसी को उपासना में आश्चर्यजनक सफलताएँ मिली होती और तब किसी को निराश होने अविश्वासी बनने या असमंजस में पड़ने का अवसर न आता।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों की लकीर पीट लेना इस संदर्भ में सर्वथा अपर्याप्त है। तेज धार वाली तलवार से सिर काटने की क्षमता है, इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन वह क्षमता सही सिद्ध हो सके इसके लिए चलाने वाले का बाहुबल, साहस एवं कौशल भी आवश्यक है। बिजली में सामर्थ्य की कमी नहीं, पर उससे लाभान्वित होने के लिए उसी प्रकार के यंत्र चाहिए। यंत्र-उपकरणों के जमाव में बिजली का उपयोग व्यर्थ ही नहीं होता अनर्थ मूलक भी बन जाता है।
उपासना अन्धविश्वास है तो फिर इससे कितने ही लाभान्वित क्यों होते हैं ? यदि सत्य है तो उससे कितनों को ही निराश क्यों होना पड़ता है ? जल हर किसी की प्यास बुझाता है, सूरज हर किसी को गर्मी, रोशनी देता है फिर देवता और उनकी उपासना क्रम में परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएँ क्यों ?
उपासनाएँ सफल क्यों नहीं होती ? यह सवाल हर किसी के मन में चक्रवात की तरह घूमता रहता है। सालों-साल पूजा की घण्टी बजाने, माला घुमाने, नाक दबाने, भोग-प्रसाद का लालच देने तथा ऐसी ही अनेक चित्र-विचित्र क्रियाएँ करते रहने वालों को अन्ततः निराशा ही हाथ लगती है। बड़े ही हताश स्वर में वह यह कहते फिरते हैं कि अब तो घोर कलियुग है। इस कलिकाल में भी भला भगवान किसी को दर्शन देते हैं।
उपासनाएँ करके अद्भुत शक्तियाँ, विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं। स्वयं में वे इतने समर्थ हुए कि दूसरों को अपनी साधना का एक अंश देकर वरदान-आशीर्वाद से लाभान्वित कर सकें। भारत ही नहीं संसार भर का पुराण-साहित्य ऐसी ही घटनाओं से भरा पड़ा है जिनमें चर्चा के प्रमुख पात्रों में से अधिकाँश की सामर्थ्य और विशेषताएँ देवप्रदत्त थीं। ऋषियों, तपस्वियों, संतों के जीवन चरित्रों में अधिकाँश में ऐसे वर्णन मौजूद हैं जिनसे प्रतीत होता है कि उनमें कितनी ही अलौकिक विशेषताएँ थीं और उन्हें उन्होंने तप-साधना के द्वारा देवताओं से अथवा सीधे भगवान से पाया था।
उपासना में आश्चर्यजनक सफलताएँ मिली होती और तब किसी को निराश होने अविश्वासी बनने या असमंजस में पड़ने का अवसर न आता।
उपासना फिर देव-उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती है। लोग उतावली में मंत्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं। इससे पहली आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान नहीं देते हैं। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाए उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है उसे उतना ही मिलेगा। निरन्तर वर्षा होते रहने पर भी आँगन में रखे हुए पात्रों में उतनी ही जल रह पाता है, जितनी उनमें जगह होती है।
उपासना सफल होगी। धुले हुए कपड़ों पर रंग आसानी से चढ़ता है, मैले पर नहीं। स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी पूजा-उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही पा लेते हैं।
उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती है। लोग उतावली में मंत्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं। इससे पहली आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान नहीं देते हैं। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाए उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है उसे उतना ही मिलेगा। निरन्तर वर्षा होते रहने पर भी आँगन में रखे हुए पात्रों में उतनी ही जल रह पाता है, जितनी उनमें जगह होती है।
उपासना क्रम में परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएँ क्यों ?
उपासना है।
उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही पा लेते हैं।
उपासना के सम्बन्ध में लागू होती हैं। घृत सेवन का लाभ वही उठा सकता है, जिसकी पाचन-क्रिया ठीक हो। देवता और मंत्रों का लाभ वे ही उठा पाते हैं, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व के भीतर और बाहर से विचार और आचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है।
उपासना के विधि-विधानों तक ही सीमित न रहकर उसमें निहित दर्शन एवं प्रेरणाओं को भी हृदयंगम किया जाय और तद्नुरूप अपने व्यक्तित्व को ढाला जाय। पूरी श्रद्धा के साथ मन्त्र का अवलम्बन किया जा सके तो आज भी वह पुरातनकाल की ही तरह चमत्कारी सामर्थ्यदायी सिद्ध हो सकता है।
उपासनात्मक प्रक्रिया अपनाई, पीछे उनकी स्थिति हर प्रकार बिगड़ती ही चली गयी। भौतिक सुख-सम्पत्ति ना सही, आत्मिक शान्ति और विभूति का प्रकाश मिला होता, तो भी संतोष किया जा सकता था, पर वैसा भी वे कुछ ना प्राप्त कर सके।
उपासना, पूजा, स्तोत्र आदि के चमत्कार देखने का दूसरा कदम उठाया गया होता तो निश्चित रूप से हर किसी को उपासना में आश्चर्यजनक सफलताएँ मिली होती और तब किसी को निराश होने अविश्वासी बनने या असमंजस में पड़ने का अवसर न आता।
उपासना की जादूगरी, बाजीगरी जैसी कोई चीज मानकर चलते हैं, उनकी कल्पना किन्हीं ऐसे देवताओं की होती है, जो स्तुति, “पूजा” प्रसाद के तनिक से प्रलोभन से ललचाए जा सकते हैं और उनसे इन नगण्य उपहारों के बदले मनचाहे लाभ उठाए जा सकते हैं। ज्यादातर पूजा-उपासना करने वालों मनोभूमि इसी स्तर की होती है। वे विधि-विधानों कर्मकाण्डों या उपहारों का ताना-बाना बुनते रहते हैं और उसी खुराफात से अपना उल्लू सीधा करने की तरकीबें भिड़ते रहते हैं। तथाकथित भक्तों की मण्डली इसी स्तर की होती है। वे तिलक छापे लगाकर अपनी भक्ति का प्रमाण भगवान के सामने प्रस्तुत करते हैं या कुछ और खेल खड. करके भगवान की आँखों में धूल झोंक कर अपने असली स्वरूप को छिपाते हुए भक्त को मिलने वाले लाभ प्राप्त करना चाहते हैं।
उपासना करने वालों मनोभूमि इसी स्तर की होती है। वे विधि-विधानों कर्मकाण्डों या उपहारों का ताना-बाना बुनते रहते हैं और उसी खुराफात से अपना उल्लू सीधा करने की तरकीबें भिड़ते रहते हैं। तथाकथित भक्तों की मण्डली इसी स्तर की होती है। वे तिलक छापे लगाकर अपनी भक्ति का प्रमाण भगवान के सामने प्रस्तुत करते हैं या कुछ और खेल खड. करके भगवान की आँखों में धूल झोंक कर अपने असली स्वरूप को छिपाते हुए भक्त को मिलने वाले लाभ प्राप्त करना चाहते हैं।
उपासना फलित, एक की निष्फल, इसका क्या कारण ? यदि भगवान या देवता और उनकी उपासना अन्धविश्वास है तो फिर इससे कितने ही लाभान्वित क्यों होते हैं ? यदि सत्य है तो उससे कितनों को ही निराश क्यों होना पड़ता है ? जल हर किसी की प्यास बुझाता है, सूरज हर किसी को गर्मी, रोशनी देता है फिर देवता और उनकी उपासना क्रम में परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएँ क्यों ?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-December
उपासना में संलग्न रहते हैं, भगवान की अनुकम्पा उन्हीं पर बरसती है। निर्जीव पत्थर के विग्रह की चिह्न-पूजा मात्र कर आज तक किसने क्या पाया है? यदि किसी को सचमुच कुछ मिला है तो इसे उपासना मात्र ही नहीं, चेतना सम्पन्न मनुष्य की उस पूरा की फलश्रुति मानी जानी चाहिये, जिसे ‘सेवा’ कहते हैं।
उपासना कहा जाए, तो भगवान के साकार स्वरूप विराट ब्रह्म की सेवा को क्या कहना चाहिये? आये दिन इस प्रकार के तर्क-वितर्क होते रहते हैं और यह विवाद छिड़ा ही रहता है कि कौन सही और कौन गलत है? किसे अपनाया, किसे छोड़ा जाये? लोकसेवियों के जीवनक्रम और उसकी फलश्रुति को देखकर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि लोकमंगल से बढ़कर दूसरा ऐसा कुछ नहीं, जो सर्वोत्तम ईश्वराधना कहा जा सके। समय-समय पर प्रकाश में आने वाले प्रसंगों से इस तथ्य की पुष्टि होती रहती है।
उपासना द्वारा इन केन्द्रों में छिपी बीजशक्ति को उभारना और उच्चस्तरीय बनाना सम्भव हो सके, तो सामान्य-सा दिखने वाला मनुष्य असामान्य बन सकता है।
उपासना मात्र ही नहीं, चेतना सम्पन्न मनुष्य की उस पूरा की फलश्रुति मानी जानी चाहिये, जिसे ‘सेवा’ कहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-October
उपासना है। यह मात्र समृद्धि का सूचक ही नहीं वरन् इसमें बाह्य एवं आन्तरिक सौंदर्य का भाव भी अभिव्यंजित होता है। बाह्य सौंदर्य शारीरिक स्वस्थता का परिचायक है, तो आन्तरिक सौंदर्य ओजस्-तेजस् और वर्चस् से परिपूर्ण रहता है। श्री सम्पन्न व्यक्तित्व के चारों ओर एक विशिष्ट प्रभामण्डल दृष्टिगोचर होता है। ऐसे व्यक्ति सदा भौतिक सम्पन्नता व आन्तरिक शान्ति से ओत-प्रोत रहते हैं।
उपासना गायत्री मंत्र है- “ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्।” हम बुद्धि के उपासक हैं, हम विवेक के उपासक हैं, हम विचारों के उपासक हैं, हम तर्क के उपासक हैं। हम दलील के उपासक हैं, हम सच्चाई के उपासक हैं। हम किसी ‘फालोवर’ नहीं हैं- हम केवल सच्चाई के फालोवर हैं। ये सारी की सारी प्रेरणा कहाँ से मिल सकती है ?
उपासना सच्चे एवं पवित्र हृदय से करनी चाहिए। सच्चे आत्मिक सम्बन्ध से ही भगवत्कृपा का स्पर्श होता है। ऐसी पुकार कभी अनसुनी नहीं होती। बोण्डी की मान्यता है कि वैयक्तिक, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन को ऊँचा उठाने हेतु ईश्वर-प्रार्थना को अनिवार्य कर देना चाहिए।
उपासना करता रहा है। इन्हें एक प्रकार से व्यावहारिक जीवन की मूर्तिमान् उपलब्धियाँ कहना चाहिए। उसे जीवनक्रम में इतना सरल और सुबोधगम्य बना देने में भारतीय ऋषि- मुनियों अध्यात्मवेत्ताओं की सूक्ष्म बुद्धि का उपकार ही मानना चाहिए, जिन्होंने बहुत थोड़े में सत्य और जीवन - लक्ष्य की उन्मुक्त अवस्थाओं का ज्ञान उपलब्ध करा दिया है।
उपासना की जा रही है। सारी दुनिया इसी श्यामा श्री के पीछे भागती नजर आ रही है। इसे प्राप्त करने के लिए मानव, मानवीयता की हर सीमा का अतिक्रमण कर चुका है। लोग तिकड़मबाज़ी, चोरबाजारी, शोषण व असत्य के सर्वव्यापी रूपों में ऐश्वर्य की कामना करते हैं। इसकी स्थापना मिथ्या भाषण, वासना, दीनता, विश्वासघात, कृतघ्नता, सुरापान, लोभ व अश्लीलता के साम्राज्य में की गयी है।
उपासना कक्ष या कोलाहल रहित स्थान में ध्यानमुद्रा में बैठें। ध्यानमुद्रा अर्थात् स्थिर शरीर, शान्तचित्त, सुखासन (पालथी मारकर )कमर सीधी, हाथ गोदी में, आँखें बन्द।
उपासना होती है। ‘श्री’ में इन तीनों भावों का अपूर्व समायोजन मिलता है। “श्रिंसर्वेयाम्” से निष्पन्न यह शब्द आश्रय-स्वभाव को समेटे हुए है। यह सुख-शान्ति और आनन्द का स्रोत बहा देता है। व्यक्तित्व के नैतिक भाव, मांगलिक भाव एवं सौंदर्य को उजागर करने का नाम ही श्री की उपासना है।
उपासना करते हैं। यहाँ पर तेज आवाज के साथ भगवान को पुकारे जाने की परम्परा है। हर धर्म-सम्प्रदाय के लोग अपने-अपने ढंग से उस परमात्मा की प्रार्थना करते हैं। हिन्दू मन्दिर में, मुसलमान मस्जिद में, सिख गुरुद्वारे में तथा ईसाई गिरिजाघरों में प्रार्थना करते हैं। पर सभी का एक ही मत है कि सच्चे अंतःकरण से की गयी प्रार्थना ही सफल होती है।
उपासना करते रहें। शिव की उपासना का मंत्र यही है। सूर्यवंशी राजा और चन्द्रवंशी राजा जितने भी हुए सबकी उपासना का मंत्र यही एक है और हमारी नमाज वही एक है। हमारी संध्या गायत्री के बिना सम्भव नहीं है। सम गायत्री के बिना संध्या कैसे कर सकते हैं ?
उपासना का मंत्र यही है। सूर्यवंशी राजा और चन्द्रवंशी राजा जितने भी हुए सबकी उपासना का मंत्र यही एक है और हमारी नमाज वही एक है। हमारी संध्या गायत्री के बिना सम्भव नहीं है। सम गायत्री के बिना संध्या कैसे कर सकते हैं ? ये हमारा प्रतीक है और हम इस प्रतीक का-सिम्बोल को हर जगह जमाएँगे और इसलिए जमाएँगे कि सारे हिन्दू समाज को यह मालूम हो जाये कि हमारी मूल जड़ कहाँ है और उद्गम कहाँ है ?
उपासना व इनकी कृपा से मिलने वाली अनेकानेक सिद्धि- सम्पदाओं का सविस्तार वर्णन है। इनके कथा - उपाख्यानों के बड़े - बड़े रोचक प्रसंग पुराणों में भरे पड़े हैं। इतने पर भी वस्तुस्थिति को न जान सकने के कारण उपासक उन विभूतियों से वंचित रह जाते हैं, जा इष्ट- आराध्य में सन्निहित हैं। ऐसा क्यों होता है ? इसका उत्तर पाने के लिए हमें उस मूल भावना को समझना होगा, जिसमें देवताओं की विचित्र कल्पनाएँ की गयी हैं।
उपासना नहीं कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में भी आपको जरूर करनी चाहिए उपासना।
उपासना को मानने वाले हैं तो आप गायत्री माता की तस्वीर रख लीजिए और सुबह शाम संध्या वंदन का क्रम आरम्भ कीजिए। कोई भी व्यक्ति या स्कूल जाने वाले बच्चों सबसे पहले अपनी चप्पल उतार दे, अपनी टोपी उतार दे और अपने सिर को नीचा झुकाए। हाथ जोड़ करके प्रणाम करे, भारतीय परम्पराओं की अनुभूति करे और पाँच बार गायत्री मंत्र मन ही मन बोले और नमस्कार करके स्कूल चला जाए पढ़ने के लिए। स्त्रियाँ खाना पकाने से पहने स्नान कर लिया है तो ठीक, नहीं भी कर लिया है तो भी ठीक है, वे सिर को उघाड़ करके और पैरों से चप्पल उतार करके खड़ी हो जाये और पाँच बार मन ही मन गायत्री मंत्र का जप करें और उसके बाद में खाना पकाने के लिए चली जाएँ । दुकानदार अपनी दुकान को चला जाए।
उपासना को अपनाया था। आप भागवत् में पढ़ लीजिए, आप बाल्मीकि रामायण में पढ़ लीजिए। दोनों को जो दीक्षाएँ दी गयी थी, वह गायत्री मंत्र की दीक्षा दी थी और जब तक दोनों जिन्दा रहें तब तक वे गायत्री मंत्र की उपासना करते रहें। शिव की उपासना का मंत्र यही है। सूर्यवंशी राजा और चन्द्रवंशी राजा जितने भी हुए सबकी उपासना का मंत्र यही एक है और हमारी नमाज वही एक है।
उपासना करनी चाहिए, उसकी का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। साँसारिक रूप , सौंदर्य और विविधता में घसीटकर उस मौलिक सौंदर्य को तिरोहित नहीं करना चाहिए।
उपासना-समर्पण योग
उपासना का मंत्र यही एक है और हमारी नमाज वही एक है। हमारी संध्या गायत्री के बिना सम्भव नहीं है। सम गायत्री के बिना संध्या कैसे कर सकते हैं ? ये हमारा प्रतीक है और हम इस प्रतीक का-सिम्बोल को हर जगह जमाएँगे और इसलिए जमाएँगे कि सारे हिन्दू समाज को यह मालूम हो जाये कि हमारी मूल जड़ कहाँ है और उद्गम कहाँ है ? ताकि हम सारे समाज को एक सूत्र में पिरो सकें और सारे समाज को हम विवेकशीलता का अनुयायी बना सकें।
उपासना है। श्रीविद्या राजराजेश्वरी पंचदेवासन पर विराजमान् हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव ये पंच महादेव हैं। श्रीविद्या का ही नामान्तर त्रिपुरा है। वही आत्मशक्तिरूपिणी श्रीविद्या जब लीला से शरीर धारण करती हैं जब वेद शास्त्र उनका निरूपण करने लगते हैं।
उपासना का सीधा प्रभाव मेरुदण्ड से होकर मलमूत्र छिद्रों के मध्य स्थित मूलाधार चक्र तक विशेष रूप से होता है। अनन्त अन्तरिक्ष से उतरने वाला सविता का प्राण - प्रवाह मस्तिष्क मध्य स्थित ब्रह्मरंध्र से होकर पहले यहीं पहुँचता है और चक्रों एवं उपत्यिकाओं के माध्यम से सारे शरीर में संचित होता रहता है। जितना अधिक साधना द्वारा विकास होता है उतना ही अधिक प्राणशक्ति का अभिवर्द्धन और उसी अनुपात से कुण्डलिनी का जागरण होता है। यह प्रकाश धीरे - धीरे नेत्र , वाणी, मुख और ललाट आदि सम्पूर्ण शरीर में ओजस्-तेजस् के रूप में चमकने लगता है। त्वचा में यही कोमलता और बुद्धि में सात्विकता एवं पवित्रता की अभिवृद्धि करता है यह क्रिया धीरे - धीरे होती है, इसलिए हानि की भी आशंका नहीं रहती।
उपासना क्रम के अतिरिक्त प्रातःकाल के लिए यह शक्ति-संचार साधना है। यह सूर्योदय से एक घण्टा पूर्व से लेकर सूर्योदय तक की अवधि में किसी भी समय 15 मिनट तक की जा सकती है। प्रक्रिया इस प्रकार है :-
उपासना रही है हमारी। ब्रह्माजी को आकाशवाणी के रूप में वह मिली थी। वह था- ‘गायत्री मंत्र’ और जिसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश ही नहीं राम और कृष्ण जो हमारे हिन्दू धर्म के सूर्य और चन्द्रमा माने जाते हैं, उन्होंने भी इस उपासना को अपनाया था। आप भागवत् में पढ़ लीजिए, आप बाल्मीकि रामायण में पढ़ लीजिए। दोनों को जो दीक्षाएँ दी गयी थी, वह गायत्री मंत्र की दीक्षा दी थी और जब तक दोनों जिन्दा रहें तब तक वे गायत्री मंत्र की उपासना करते रहें।
उपासना।
उपासना को सस्ती बनाएँगे और हर बच्चों-बच्चों को उपासना करने के लिए कहेंगे। हम यह कहेंगे कि गायत्री मंत्र का एक फोटो अपनी घर में पूजा स्थली पर रखिए। यदि आप निराकार को मानने वाले हैं तो गायत्री मंत्र टाँग लीजिए। हमें कोई ऐतराज नहीं है। साकार उपासना को मानने वाले हैं तो आप गायत्री माता की तस्वीर रख लीजिए और सुबह शाम संध्या वंदन का क्रम आरम्भ कीजिए।
उपासना करने के लिए कहेंगे। हम यह कहेंगे कि गायत्री मंत्र का एक फोटो अपनी घर में पूजा स्थली पर रखिए। यदि आप निराकार को मानने वाले हैं तो गायत्री मंत्र टाँग लीजिए। हमें कोई ऐतराज नहीं है। साकार उपासना को मानने वाले हैं तो आप गायत्री माता की तस्वीर रख लीजिए और सुबह शाम संध्या वंदन का क्रम आरम्भ कीजिए।
उपासना का अर्थ अपने आपको बुरे कर्मों से बचाये रखने के लिए प्रकाश बनाये रखना होता है। इस तरह की जीवन -व्यवस्था व्यक्ति को असाधारण बनाती है। वह शक्ति शिव में पायी जाती है, अतः शिव के उपासकों में भी वह वृत्तियाँ घुली होनी चाहिए।
उपासना पद्धति से उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करें। आधे घण्टे की इस प्रक्रिया में वे द्वीप प्रज्वलित कर सकते हैं, मोमबत्ती जला सकते हैं अथवा लोबान जला सकते हैं। अपने-अपने घरों में एक साथ, एक दिन जब इतने अधिक व्यक्ति यह साधना उपक्रम मौन साधना-’ भविष्य उज्ज्वल बने विभीषिकाएँ मिटे' ऐसी प्रार्थना तथा दीपयज्ञ संक्षिप्त उपक्रम करेंगे तो इससे एक समष्टिगत मन-कास्मिक माइण्ड’ का निर्माण होगा, जिसका प्रभाव निश्चित ही चारों ओर वातावरण पर, सूक्ष्म जगत पर पड़ेगा। आशा की जानी चाहिए कि उत्साहपूर्वक यह उपक्रम सभी स्थानों पर चल पड़ेगा व सन् 2000 के आने तक गति पकड़ लेगा। अब यही तो एक मात्र आशा की केन्द्र रह गया है।
उपासना की जाती है। भारतवर्ष के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित बारह शिवलिंग ‘द्वादश ज्योतिर्लिंग ‘ के नाम से विख्यात हैं।
उपासना तो और कोई नहीं हो सकती। मित्रों! इसमें तो शिकायत की बात भी नहीं है कि हमको समय नहीं मिलता और देखिए स्नान नहीं हुआ और ये नहीं हुआ और जनेऊ तो था ही नहीं। फिर कैसे करेंगे गायत्री जप। जनेऊ पहनना हो तो जरूर पहनना, हमें कोई शिकायत नहीं है और आपको स्नान करना हो तो जरूर करना। हम किसे मना करते हैं लेकिन यदि आप बीमार हो गये हैं और आप नहीं नहा सकते हैं तो आपको यह कहने की आवश्यकता नहीं होगी कि चूँकि हम नहाए नहीं थे, इसलिए हम गायत्री मंत्र की उपासना नहीं कर सकते हैं।
उपासना जीवन में सुख, समृद्धि एवं सौंदर्य की निरन्तर अभिवृद्धि करने वाली हो।
उपासना थी ? बताइए न आप।
उपासना से लौकिक और पारलौकिक सुख, ऐश्वर्य व आनन्द प्राप्त होता है। यों तो इसकी नित्य अर्चना शुभ फलदायी है। पर ज्योतिपर्व दीपावली तो जैसे इसका महोत्सव है। यह इसके तत्त्वज्ञान को समझने एवं रहस्यमय उपलब्धियों को पाने का पर्व है। इस अवसर पर श्रद्धा, निष्ठा एवं विश्वासपूर्वक की गयी श्री उपासना जीवन में सुख, समृद्धि एवं सौंदर्य की निरन्तर अभिवृद्धि करने वाली हो।
उपासना करले और अपनी दुकानदारी को चलाए। अध्यापक या बच्चों स्कूल को चले जाएँ । इससे सस्ती उपासना तो और कोई नहीं हो सकती। मित्रों! इसमें तो शिकायत की बात भी नहीं है कि हमको समय नहीं मिलता और देखिए स्नान नहीं हुआ और ये नहीं हुआ और जनेऊ तो था ही नहीं। फिर कैसे करेंगे गायत्री जप।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-April
उपासना का एक अभिनव उपक्रम आरम्भ किया गया है, जिसे प्रज्ञा परिवार के समस्त परिजनों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। उनके संपर्क में जा भी जीवन्त-आत्मचेतना सम्पन्न व्यक्ति आयें, उन्हें भी अपनाने के लिए कहा जाना चाहिए।
उपासना विधि, भाषा, वेशभूषा, रीतिरिवाज, धार्मिक विश्वास भले ही आपस में न मिलते हों, परन्तु सभी अपना सम्मिलित परिचय एक सस्वर में गाते हुए यही देते हैं, सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा। हो भी क्यों न, हिन्दू और हिन्दुस्तान इन सभी जातियों, प्रजातियों एवं उपजातियों की मातृभूमि है। जहाँ सभी को रहने का समान अधिकार है।
उपासना में न्यूनतम गायत्री महामंत्र की तीन माला का जप अथवा 24 मंत्र लेखन अथवा पाँच गायत्री चालीस पाठ। नैष्ठिक साधक इतना तो करें ही, अधिक बन पड़े तो और भी उत्तम है।
उपासना के व्यावहारिक पहलुओं पर नियमित आता रहे, इसका ध्यान रखेंगे।
उपासनागृह धर्मलाभ के इच्छुकों के लिए पूरी करते हैं। इससे आगे की प्रगति के लिए हमें दृढ़ इच्छाशक्ति पैदा करनी पड़ेगी और पुरुषार्थ करना पड़ेगा। यह असंभव भी नहीं, कारण कि धर्म के नाम पर संसार ने खून की जो नदियाँ बहायीं, मानव-हृदय की और किसी प्रेरणा ने वैसा नहीं किया। धर्म के नाम पर मनुष्यों ने जितने चिकित्सालय, धर्मशाला, अन्न-क्षेत्र, कुआँ, तालाब, स्कूल बनाये उतने और किसी प्रेरणा से नहीं। मनुष्य-हृदय की और कोई वृत्ति उसे सेवा कार्य के लिए प्रेरित नहीं कर पाती।
उपासना-कक्ष या कोलाहल रहित स्थान में ध्यानमुद्रा में बैठें। ध्यानमुद्रा अर्थात् स्थिर शरीर, शान्तचित्त-सुखासन (पालथी मारकर), कमर सीधी-हाथ गोदी में-आँखें बन्द।
उपासना की अनूठी विधि भी है। ईसा, सन्त पाल, सन्त आइन्स्टाइन सभी प्रार्थना के बल पर ही सिद्ध महापुरुष बने थे। दादू, रज्जब, नानक, कबीर, रैदास जैसे सन्तों का तो जैसे यह जीवन का आधार ही था। वे इसी प्राण वायु के बल पर ही जीते थे। ध्यान रहे प्रार्थना किसी जीते थे।
उपासना-क्रम के अतिरिक्त प्रातःकाल की शक्ति-संचार साधना है। यह सूर्योदय से एक घण्टा पूर्व से लेकर सूर्योदय तक की अवधि में किसी भी समय 15 मिनट तक की जा सकती है। प्रक्रिया इस प्रकार है। उपासना-कक्ष या कोलाहल रहित स्थान में ध्यानमुद्रा में बैठें। ध्यानमुद्रा अर्थात् स्थिर शरीर, शान्तचित्त-सुखासन (पालथी मारकर), कमर सीधी-हाथ गोदी में-आँखें बन्द।
उपासना से अदृश्य देवताओं के वरदान की तुलना में अधिक अनुदान पाया है।
उपासना गृहों के सृजन के बाद भी सच्चे धार्मिक इक्के-दुक्के ही पैदा हो पाते हैं। अधिकाँश तो उन्हीं के झमेले में उलझ कर रह जाते हैं और निर्माण के पीछे का उद्देश्य ज्यों-का -त्यों धरा रह जाता है, इसका निराकरण एक ही प्रकार से हो सकता है कि मन्दिर-मस्जिद धरित्री पर ईंट-गारे के नहीं, हृदय-भूमि में भाव-संवेदनाओं के उपादान से विनिर्मित हो सकें और उनमें आस्था तथा श्रद्धा की देवी की प्रतिष्ठापना की जा सके। यथार्थ धर्म तभी विकसित हो सकेगा और ऐसे ही लोग वस्तुतः सच्चे धर्मप्राण कहला सकेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-February
उपासना कार्य में वे निरत रहते थे। उत्खनन कार्य में इन्हीं की समाधियाँ पायी गयी हैं, जिसमें ईसाइयों की मान्यताओं से विपरीत उनके शवों के पैर दक्षिण की ओर पाये गये हैं। अन्यत्र अग्निदाह संस्कार करने के प्रमाण भी उपलब्ध हुए हैं। कई सदियों से ड्रयूईड धर्मावलम्बी प्रतिवर्ष उत्तरायण और दक्षिणायन के दो सौर पर्व मनाते आये हैं। प्रतिवर्ष हजारों ड्रयूईड यात्री इन पर्वों पर स्टोन हेन्ज आदि स्थानों में एकत्र होते हैं और साइकिक हीलिंग जैसे चमत्कारिक उपचार करते देखे जाते हैं।
उपासना के शंखनाद के साथ संस्कार रूपी बीज के अंकुरित-पल्लवित होने योग्य पृष्ठभूमि बनाने के निमित्त नियोजित कर दें। बहुत कुछ स्थानों पर ऐसा हो भी रहा है। किंतु कही-कहीं बड़े आयोजनों का, विराट भव्य समारोहों का आग्रह उभरकर आ जाता है, बिना किसी प्रकार की तैयारी के। अभी तक जो संस्कार महोत्सव संपन्न हुए है, उनसे बड़ा ही विलक्षण वातावरण उन स्थानों पर बना है एवं गायत्री यज्ञ व एक प्रकार से देव संस्कृति के प्रति रुझान अत्यधिक परिणाम में बढ़ा है। ये संस्कार महोत्सव मूलतः उन स्थानों पर किये गये, जहाँ मिशन का आलोक इतनी तीव्र गति से नहीं पहुँच पाया था।
उपासना केन्द्र रहे होंगे, जहाँ से वे ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से सीधे संपर्क साधते रहे होंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-March
उपासना के पाँच चरण है । सर्वजनीन, सार्वभौम उपासना में इन्हें ही प्रस्तुत किया जाता है । गायत्री उपासना के यह पाँच चरण है - (1) आत्म शोधन, (2) देवपूजन (3) जप (4) ध्यान (5) सूर्यार्घदान आदि एक मुखी उपासना के समय काम आने वाले यही वे सूत्र हैं जिनके रहस्य एवं मर्मों को यदि समझते हुए क्रियाकृत्य किये जाये तो सुनिश्चित रूप से यह सत्परिणाम सामने आयेगा जिसका उल्लेख वेद, शास्त्रों, पुराणों में किया गया है ।
उपासना के समय काम आने वाले यही वे सूत्र हैं जिनके रहस्य एवं मर्मों को यदि समझते हुए क्रियाकृत्य किये जाये तो सुनिश्चित रूप से यह सत्परिणाम सामने आयेगा जिसका उल्लेख वेद, शास्त्रों, पुराणों में किया गया है ।
उपासना में लगे रहिए, जीवन भर ब्रह्ममंत्र एवं ब्राह्मी बूटी का सेवन करते रहिए लेकिन स्वाध्याय किसी दिन भी न करिये और देखिये कि सरस्वती की सिद्धि तो दूर पास की पढ़ी हुई विद्या भी विलुप्त हो जायेगी। सरस्वती स्वाध्याय का अनुगमन करती है, इस सत्य का सम्मान करता हुआ जो साधक उनकी उपासना किया करता है वह अवश्य उनकी कृपा का भागी बन जाता है।
उपासना करने का अर्थ है कि पृथ्वी को हरा भरा रखना । इसके लिए हरीतिमा संवर्द्धन किया जाये और वृक्ष वनस्पतियों के विनाश को रोका जाये । इसी को सस्य संवर्द्धन रूपी महापुण्य कहा गया है ।
उपासना के माध्यम से उन्हें राहत पहुँचाने का कार्य किया है। एक म.प्र. की प्रधानाध्यापिका आती थीं। उन्हें नींद नहीं आती थी और हमेशा रोती रहती थीं। हमने उन्हें ठीक किया, अब उनको नींद आती है। एक बार हमारे पास एक सेठ जी आये, उनका इनकम टैक्स का घोटाला था।
उपासना साधना में न तो रस मिलेगा और न सफलता का सुयोग बनेगा। सामान्यता मन का चिंतन बहुमुखी है और भौतिकता का ही तान बान बुनता रहता है। अंतःक्षेत्र की दिव्य विभूतियों को समझना और उन्हें प्राप्त करने का उपाय खोजना ध्यान साधना से ही संभव हो सकता है।
उपासना की इस प्रारम्भिक कक्षा को भली भाँति हृदयंगम करने के उपरान्त ही उच्चस्तरीय साधना बन पाती है ।
उपासना की पद्धति है जो मनुष्य को तृप्त करती है। जिस प्रकार मनुष्य के शरीर में प्राण का महत्व है, उसी प्रकार आत्मा में तो ईश्वर है। परमात्मा से रहित आत्मा शरीर का आवरण ओढ़े पशु के समान है।
उपासना सर्वश्रेष्ठ है। इसमें बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करने के लिए प्रार्थना है। मनुष्य की सद्बुद्धि आ जाये तो उसे भौतिक एवं अध्यात्मिक दोनों लाभ प्राप्त होता है। उपासना का अर्थ होता है पास बैठना। अगर बछड़ा गाय के पास न बैठे तो उसे दूध कहाँ से मिलेगा?
उपासना’ की जो शृंखला चल पड़ी है, वह यही प्रमाणित करती है कि देवसंस्कृति -----------------------------------दो आधार स्तम्भों के अंतर्गत आता है। कोई भी संस्कार हमारे यहाँ बिना मंत्र शक्ति एवं यज्ञ ऊर्जा के समन्वित किये पूर्ण नहीं होता। देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत विगत पाँच वर्षों में अनगिनत संस्कार अब तक संपन्न हुए। 27 अश्वमेध महायज्ञों एवं युगसंधि महापुरश्चरण की पूर्णाहुति आँवलखेड़ा में संपन्न हुई। हमारी ऋषि संस्कृति की एक आध्यात्मिक विरासत संस्कार प्रक्रिया को पूज्यवर ने जिस प्रकार विज्ञान सम्मत एवं प्रामाणिक बनाकर रख दिया एवं जीवन के व्यवहारिक सूत्रों के साथ गूँथ दिया, यह इस युग में अपने आप में एक अभिनव प्रयोग है।
उपासना में इन्हें ही प्रस्तुत किया जाता है । गायत्री उपासना के यह पाँच चरण है - (1) आत्म शोधन, (2) देवपूजन (3) जप (4) ध्यान (5) सूर्यार्घदान आदि एक मुखी उपासना के समय काम आने वाले यही वे सूत्र हैं जिनके रहस्य एवं मर्मों को यदि समझते हुए क्रियाकृत्य किये जाये तो सुनिश्चित रूप से यह सत्परिणाम सामने आयेगा जिसका उल्लेख वेद, शास्त्रों, पुराणों में किया गया है ।
उपासना करना निरर्थक है, बेकार है। इसमें कोई भी फायदा नहीं हो सकता है। मनुष्य के अन्दर राग द्वेष, अहंकार, कटुता आदि भरा हुआ है, इसके रहते गायत्री मंत्र का लाभ नहीं मिल सकता। यह निकालने का कार्य गुरु करता है। गुरु यानि प्रकाश।
उपासना को आरम्भ किया जाता है। इसमें प्रथम है- आत्मशोधन । आत्मशोधन के लिए पाँच कृत्य किये जाते है-(1) पवित्रीकरण (2) आचमन (3) प्राणायाम (4) न्यास (5) शिखाबंधन ।
उपासना किया करता है वह अवश्य उनकी कृपा का भागी बन जाता है।
उपासना के यह पाँच चरण है - (1) आत्म शोधन, (2) देवपूजन (3) जप (4) ध्यान (5) सूर्यार्घदान आदि एक मुखी उपासना के समय काम आने वाले यही वे सूत्र हैं जिनके रहस्य एवं मर्मों को यदि समझते हुए क्रियाकृत्य किये जाये तो सुनिश्चित रूप से यह सत्परिणाम सामने आयेगा जिसका उल्लेख वेद, शास्त्रों, पुराणों में किया गया है ।
उपासना की अनिवार्यता है, अन्यथा उपलब्धियाँ एवं अनुभूतियाँ भी अन्नमय कोश तक ही सिमट कर रह जायेंगी। 30 दिनों में सवालक्ष का अनुष्ठान पूरा करने के लिए प्रतिदिन बयालीस माला का जप करना होता है। जप साधना की शुरुआत का क्रम उसी तरह का है जिस तरह अपने परिजन नौ दिवसीय या चालीस दिवसीय अनुष्ठानों में करते थे। बस इतना ध्यान रखें कि इस क्रम में 42 माला का जप अनिवार्य है इसमें किसी भी छूट की कोई गुँजाइश नहीं है। षट्कर्म, गुरुदेव एवं गायत्री माता के चित्र का पंचोपचार पूजन के पश्चात् जप प्रारम्भ कर देना चाहिए।
उपासना का अर्थ होता है पास बैठना। अगर बछड़ा गाय के पास न बैठे तो उसे दूध कहाँ से मिलेगा? माँ की छाती से बच्चा न लिपटे तो उसे दूध कहाँ से मिलेगा? पारस को छुए बिना सोना लोहा कैसे बनेगा? उसी प्रकार ईश्वर के समीप गये बिना आत्मा की भूख कैसे मिटेगी यह उपासना की पद्धति है जो मनुष्य को तृप्त करती है।
उपासना करनी चाहिए । जो उसे इस प्रकार जानता है, उसे सभी भूत अच्छी तरह चाहने लगते हैं । वन की उपासना करने का अर्थ है कि पृथ्वी को हरा भरा रखना । इसके लिए हरीतिमा संवर्द्धन किया जाये और वृक्ष वनस्पतियों के विनाश को रोका जाये । इसी को सस्य संवर्द्धन रूपी महापुण्य कहा गया है ।
उपासना आसानी से पूर्ण हो जाती है।
उपासना की चर्चा ही अभीष्ट है ।
उपासना का अंतिम चरण है - सूर्यार्घदान । इस प्रक्रिया में पूजा के समय जल पात्र के प्रतिष्ठित छोटे से पवित्र जल कलश को सूर्य भगवान के सम्मुख अथवा उनकी दिशा में अर्घ्य किया जाता है । यह जप रूपी यज्ञ की पूर्णाहुति है इसे श्रद्धांजलि, जलांजलि कह सकते हैं । जल चढ़ाते समय यह भाव रहना चाहिए कि सूर्य परब्रह्म परमात्मा की प्रतिमा है और कलश अपने अस्तित्व का प्रतिनिधि है । कलश में भरा हुआ जल जीवन सम्पदा माना जाये तो सविता देवता के विराट ब्रह्म के चरणों में समर्पित किया जाये ।
उपासना का फल बताते हुए कहा गया है कि यह ब्रह्म ही वन है, उसकी वन नाम से उपासना करनी चाहिए । जो उसे इस प्रकार जानता है, उसे सभी भूत अच्छी तरह चाहने लगते हैं । वन की उपासना करने का अर्थ है कि पृथ्वी को हरा भरा रखना । इसके लिए हरीतिमा संवर्द्धन किया जाये और वृक्ष वनस्पतियों के विनाश को रोका जाये । इसी को सस्य संवर्द्धन रूपी महापुण्य कहा गया है ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-May
उपासना-साधना करनी है, तो आपको सीमित ब्रह्मचर्य का पालन कर संयमशील बनना चाहिए, तभी मन की चंचलता थमेगी और आपका मन उपवास में लगेगा।
उपासना का महत्व, जो दो-दो कौड़ी के आदमी को महान बना देता है।
उपासना से पूरा करता है।
उपासना के लिए अपने को पवित्र बनाना परम आवश्यक है। इसी कारण से कबीर ने कहा है-
उपासना में तन्मय बने रह, अपने लौकिक पुरुषार्थ में कोई कमी नहीं आने देते । यह समस्त विक्रमी संवत्सर हमें प्रेरित करने आया है कि यदि हम अशुभ से बचना चाहते हैं, तो गायत्री उपासना करने वालों की संख्या में न केवल वृद्धि करें, युगसंधि महापुरश्चरण में भागीदारी कर देवत्व को संगठित करने का भी प्रयास करें। श्रुति कहती है कि दैव-दैव कहना मात्र आलसी-प्रमादियों को शोभा देता है जो ब्रह्ममुहूर्त में जागकर औरों को भी सारे राष्ट्र को विश्व समुदाय को जाग्रत बनाए रखने का पुरुषार्थ करते हैं, इनके लिए ‘विकृति संवत्सर‘ के प्रतिफल शुभ भी बन सकते हैं।
उपासना-समर्पण योग
उपासना करने वालों की संख्या में न केवल वृद्धि करें, युगसंधि महापुरश्चरण में भागीदारी कर देवत्व को संगठित करने का भी प्रयास करें। श्रुति कहती है कि दैव-दैव कहना मात्र आलसी-प्रमादियों को शोभा देता है जो ब्रह्ममुहूर्त में जागकर औरों को भी सारे राष्ट्र को विश्व समुदाय को जाग्रत बनाए रखने का पुरुषार्थ करते हैं, इनके लिए ‘विकृति संवत्सर‘ के प्रतिफल शुभ भी बन सकते हैं।
उपासना में सामर्थ्य एवं बल की प्राप्ति होगी। हमने चौबीस साल तक जौ की रोटी तथा छाछ खायी हैं अपने को परिष्कृत -परिमार्जन किया है। वास्तव में उपासना के लिए अपने को पवित्र बनाना परम आवश्यक है। इसी कारण से कबीर ने कहा है-
उपासना कैसे ठीक ढंग से संचालित होगी।
उपासना है। इसके रहस्य को जान लिया जाय तो यह स्वयं परमेश्वर है। जो प्रेमी को पवित्रता, सजलता, शान्ति, एकात्मता और अनन्तता का वरदान देने से नहीं चूकता। प्रेम के रहस्य जानने वाला प्रेमी ‘रसो वै सः’ के तत्व को समझ कर स्वयं रसमय-परमेश्वरमय हो जाता है।
उपासना करना ही नहीं जानते, वरन् आर्थिक, औद्योगिक व वैज्ञानिक क्षेत्र में आगे बढ़कर सर्वशक्तिमत्ता की अभिव्यक्ति करना भी अच्छी तरह जानते हैं।
उपासना करते हैं। उनका नियम है कि प्रातःकाल यदि कोई मनुष्य नया एवं सुन्दर श्लोक सुनाए तो उसे वे दस स्वर्ण मुद्राएँ भेंट करते हैं। हाँ इतना जरूर है कि प्रातःकाल शीघ्र वहाँ जाना पड़ता है। बोलो कल जाओगे ?” चन्द्रकला ने कपिल से पूछा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-July
उपासना-साधना करने से होता है। गंगा तट पर तपस्या-साधना की गति तीव्रगामी हो जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-November
उपासना फलवती होती है।”
उपासना करते है वह गायत्री मंत्र सात करोड़ महामंत्रों में सर्वश्रेष्ठ है।
उपासना के क्षेत्र में इसीलिए सभी मंत्रों में इस गायत्री मंत्र की श्रेष्ठता बताई गई है। इसे महामंत्र माना गया है। देवता भी इसी गायत्री मंत्र की उपासना करते है :-
उपासना से लोग विवेकशीलता प्राप्त करते रहे, तब तक वे जीवन के हर क्षेत्र में सफल रहे, देवमानव की कोटि में गिने जाते रहें।
उपासना किसी भी व्यक्ति को सिद्धि संपन्न बना सकती है।
उपासना की है। इसलिए थाल का अधिकारी मैं हूँ।” राजा ने थाल पुजारी को दिया। हाथ में लेते ही सोने का थाल पीतल का हो गया। पुजारी ग्लानि से भर उठे और एक किनारे हट गए।
उपासना द्वारा सहज ही प्राप्त हो जाती है इसमें संदेह नहीं।
उपासना मैं करूंगा, ऐसा भाव प्रत्येक शिष्य को रखना चाहिए॥ 55॥ जिनके अनुग्रह मात्र से महान् अज्ञान का नाश होता है। वे गुरुदेव सभी अभीष्ट की सिद्धि देने वाले हैं। उन्हें नमन करना शिष्य का कर्त्तव्य है॥ 56॥
उपासना क्यों बन्द कर दी?” संत मधुर वाणी में बोले, “वत्स! भगवान की इच्छा है कि उनके संसार में कोई दुखी न रहे। उनकी इच्छा की पूर्ति आवश्यक है। दूसरों की सेवा से ही उपासना फलवती होती है।”
उपासना द्वारा पापों से तो विनिवृत्ति होती ही है साथ ही उपासक में श्रेष्ठता, सद्बुद्धि व सद्विचारणा का भी विकास होता है, जिससे उनका व्यक्तित्व परिष्कृत और प्रखर होता जाता है। उसे भौतिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियाँ प्राप्त होती जाती है :-
उपासना करते है :-
उपासना में मुझे श्रम न मालूम पड़े। यदि जप में मुझसे त्रुटि हो जाए तो अपनी कृपा से उसे सत्य में परिणत करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-August
उपासना के प्रथम चरण के रूप में पहले परिवार की प्रारंभिक भूमिका से होकर गुजरना पड़ता है। इसके पूरा होने के उपराँत उसे दूसरी भूमिका-समाज-साधना में प्रवेश करना पड़ता है। इसके पश्चात राष्ट्र-साधना की तीसरी अवस्था आती है। अंतिम भूमिका विश्व-साधना की है, जिसे ठीक प्रकार पूरा कर लेने के बाद व्यक्ति की अवस्था योगसिद्ध योगी स्तर की हो जाती है। इस दशा में योग-साधना की वह समस्त विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, जिसका अधिकारी एक यती ही है।
उपासना मार्ग बतलाये गये हैं। भक्ति भावना के प्रबल होने से शिष्य के अन्दर पशुत्व विकार शनैः-शनैः हटते हैं। भक्ति मार्ग की नौ अवस्थाओं से गुजरने के बाद पशु शिष्य में आत्मनिवेदन की स्थिति आती है और तब वह वीर भाव को प्राप्त होता है। पशु शिष्य के लिए कर्म मार्ग या सेवा का मार्ग भी है। कठोर श्रम एवं परमार्थ भाव से किये कर्म उसके आलस-प्रमाद एवं संकीर्णता के भाव को कम करने में सहायक होते हैँ।
उपासना भी अज्ञान में भटकने के अलावा और कुछ नहीं हो सकती है। अगर आपने यह ख्याल करके रखा है कि इस कर्मकांड के माध्यम से, क्रियायोग के माध्यम से आप लक्ष्य को पूरा कर सकते हैं तो यह लक्ष्य पूर नहीं हो सकता। लक्ष्य कैसे पूरा हो सकता है? लक्ष्य को पूरा कौन करता है? आत्मा को भगवान की शक्तियां कहाँ से मिलती हैं?
उपासना के क्रियाकृत्य, कर्मकाँड जब मिल जाते हैं तो एक समूची बात बन जाती है। मित्रो! हम एक समूचे आदमी हैं। बोलते हैं, चलते हैं, लेकिन अगर प्राण शरीर में से निकल जाए तो हवा में घूमने वाला प्राण आपके किसी काम का नहीं हो सकता। फिर आप कहें कि गुरुजी! जरा व्याख्यान दीजिए। अरे बेटे, हम तो भूत हैं और भूत कैसे व्याख्यान दे सकते हैं?
उपासना बेकार चली गई, हमारा अनुष्ठान बेकार चला गया। यही एक भूल है, जिसकी चट्टान से टक्कर खाकर बहुत सारे जहाज डूब गए। और संन्यास डूब गए। उपासनाएँ डूब गई और सब कुछ डूब गया। लेकिन जिन्होंने टक्कर खाकर यह समझ लिया कि कर्मकाँड काफी नहीं है, वे भवसागर से पार हो गए।
उपासना का भी अधिकारी नहीं है। मेरुतंत्र के अनुसार, जो परद्रव्य के प्रति अंधा है, परस्त्री के प्रति नपुँसक है, परनिंदा के लिए मूक है और इन्द्रियों को सदा वश में रखता है, ऐसा ब्रह्मपरायण व्यक्ति ही वाममार्गी तंत्र साधना का अधिकारी होता है। यह अधिकार प्राप्त करने के लिए ताँत्रिक सिद्धान्तों का गम्भीर अनुशीलन और साधना मार्ग का निष्ठापूर्ण अनुगमन आवश्यक है।
उपासना से पूर्वाभास, सुखद स्वप्नों में भविष्य ज्ञान, माता के दर्शन, अंतः करण से दिव्य भावनाओं की स्फुरणा इस साधना की सफलता के संकेत होते हैं, किंतु आत्मसाक्षात्कार की भूमिका वह होती है, जिसमें सालोक्य, सारूप्य तथा सायुज्य की अनुभूति होती है। यह स्थिति भगवती गायत्री के तेजपुंज में अपने आपको घुलाने, मेल-मिलाप कराने के अभ्यास से प्रारंभ होती है और उस तेज पुँज में समाधिस्थ हो जाने की प्रगाढ़ अवस्था में उसकी परिणति। उस स्तर का साधक अपने आप को सविता के तेजपुँज की स्थिति में अनुभव करता और विराट आत्मा की अनुभूति करता है। इस दृष्टि से तेजपुँज ज्योति अवतरण की साधना का अभ्यास आवश्यक हो जाता है।
उपासना करते हैं, वे अंध तमस् में प्रवेश करते हैं और उससे भी अधिक अंधकार में वे प्रवेश करते है, जो केवल ब्रह्मचर्चा में निरत रहते हैं। अन्यत्र कहा गया है-विद्या और अविद्या दोनों को ही जो एकत्र करके जानते हैं, वे अविद्या के द्वारा मृत्यु से उत्तीर्ण होकर विद्या अमृत को प्राप्त करते हैं।
उपासनाएँ डूब गई और सब कुछ डूब गया। लेकिन जिन्होंने टक्कर खाकर यह समझ लिया कि कर्मकाँड काफी नहीं है, वे भवसागर से पार हो गए। कर्मकाँड आवश्यक तो हैं महत्वपूर्ण तो तो हैं, पर काफी नहीं है। वे एकाँगी और अपूर्ण हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-December
उपासना प्रारंभ करते ही साधक की अंतः प्रक्रिया में तेजी से परिवर्तन प्रारंभ होते हैं। आग पर चढ़े कड़ाहे में, जब तक आँच नहीं लगती, तब तक उसमें भरे जल में कोई हलचल दिखाई नहीं देती, किंतु जैसे-जैसे आग तेज होती है, जल में हलचल, उबलना, खौलना, भाप बनना सब प्रारंभ हो जाता है। साधना की आँच से भी वैसा ही विचारमंथन और आत्मिक जगत में हल-चल प्रारंभ होती है। यह स्थिति तब तक चलती रहती है, जब तक पिछले संस्कारों का परिमार्जन नहीं हो जाता। उसके बाद शनैः-शनैः ऐसे लक्षण प्रकट होने प्रारंभ हो जाते हैं, जिन्हें साधना की सफलता और सिद्धि प्राप्ति के लक्षण कह सकते हैं।
उपासना, पूजा-पाठ, जप-तप को भी साँसारिक प्रलोभनों का ही साधन बना लिया है। उनका उद्देश्य किसी प्रकार धन प्राप्त करना होता है। ऐसे लोगों को प्रथम तो उपासनाजनित शक्ति ही प्राप्त नहीं होती और किसी कारणवश थोड़ी-बहुत सफलता प्राप्त हो गई तो वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है और आगे के लिए रास्ता बंद हो जाता है। दैवी शक्तियाँ कभी किसी अयोग्य व्यक्ति को ऐसी सामर्थ्य प्रदान नहीं कर सकतीं, जिससे वह दूसरों का अनिष्ट करने लग जाए।
उपासना के माध्यम से उसी बालक को वापस लौटाया गया है, जो अकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ था। गायत्री “सर्वकामधुक्” समस्त कामनाओं की पूर्ति कराने वाली शक्ति है-सब कुछ इसके माध्यम से संभव है, पर उसके लिए स्वयं की साधना व पात्रता भी चाहिए तथा एक समर्थ गुरु का अवलंबन भी। गायत्री का सिद्ध महापुरुष भी हर किसी को यह नहीं दे देता, न ही सृष्टि के विधान में वह कोई हस्तक्षेप करना चाहता है, परन्तु जहाँ शिष्य का हित हो, शिष्य स्वयं पूरा समर्पण भाव रख वह सब कुछ करने को तैयार हो, जो गुरु कह रहे हैं, तब समर्थ गुरु अपने अनन्य प्रेम के कारण उसके लिए ऐसा भी कर देते हैं। लिखा भी है पूज्यवर ने-”माता ने आपकी श्रद्धा-भक्ति के अनुरूप ही आपको लौटाया है।” यही समझना जरूरी है।
उपासनाजनित शक्ति ही प्राप्त नहीं होती और किसी कारणवश थोड़ी-बहुत सफलता प्राप्त हो गई तो वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है और आगे के लिए रास्ता बंद हो जाता है। दैवी शक्तियाँ कभी किसी अयोग्य व्यक्ति को ऐसी सामर्थ्य प्रदान नहीं कर सकतीं, जिससे वह दूसरों का अनिष्ट करने लग जाए।
उपासना करने में तल्लीन रहना प्रत्येक शिष्य का कर्त्तृत्व है, क्योंकि उनके अनुग्रह से महान् अज्ञान का नाश होता है। गुरुदेव भगवान् सभी तरह की अभीष्ट सिद्धि देने वाले हैं। उन्हें नमन करना शिष्यों का परम धर्म है। इसका थोड़ा सा भी पालन संसार के महाभय से त्राण करने वाला है। सभी तरह की पीड़ायें गुरु कृपा से स्वयं ही शान्त हो जाती हैं।
उपासना, कभी भी, किसी के लिए श्रेयस्कर सिद्ध नहीं हुई है। भारतीय परम्परा में अर्थ एवं काम प्रधान भोगवादी संस्कृति को कभी मानव के लिए कल्याणकारी नहीं माना गया है। जबकि औद्योगीकरण एवं वैज्ञानिक प्रगति से उपजी संस्कृति में इन्हीं तत्त्वों की प्रधानता रही है। इनसे उपजी अद्भुत उपलब्धियाँ एवं भौतिकवादी चकाचौंध आम मानव के लिए दुर्निवार आकर्षण वाली सिद्ध हुई, क्योंकि एक ओर इसने मनुष्य की शक्ति को इतना बढ़ा दिया कि वह यथार्थ ही प्रकृति का स्वामी प्रतीत होने लगा और दूसरी ओर संख्यातीत योग्य वस्तुओं का विपुल उत्पादन कर सामान्यातीत सामान्य व्यक्ति के भी जीवन को पहले की तुलना में अधिक सुविधा सम्पन्न बना दिया।
उपासना कर लेने के बाद और उसके परिणामों से अच्छी तरह से परिचित हो जाने के बाद अब यह निश्चय करने का समय आ गया है कि स्वतंत्र भारत धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप मनुष्य के सर्वांगीण विकास पर बल देने वाली अपनी समन्वयात्मिका प्राचीन संस्कृति को अपनाये या फिर केवल जीवन के भौतिक पक्ष को ही एकान्त सत्य मानने वाली व्यक्तिवादी पाश्चात्य संस्कृति को अंगीकार करे। अपने प्रति राग और पराये के प्रति द्वेष के भाव को त्यागकर केवल आत्म-कल्याण का अनुसंधान करते हुए, हमें अपनी दिशा निश्चित करनी चाहिए। विश्ववंद्य कविकुलगुरु कालिदास ने एक प्रसंग में कहा है, पुरानी होने से ही हर कोई वस्तु अच्छी नहीं हो जाती और न ही नई होने मात्र से ही कोई बुरी। केवल मूढ़ भेड़चाल को अपनाते हैं, जबकि बुद्धिमान विवेक का आश्रय लेते हुए गुण-दोष की परीक्षा करते हुए स्वयं चुनाव करते हैं। इस संदर्भ में यह भी स्मरणीय है कि जो राष्ट्र केवल अपने समय में वर्तमान में ही जीता है, वह सदा दीन होता है; यथार्थ में समुन्नत वही होता है, जो अपने आपको अतीत की उपलब्धियों तथा भविष्यत् की सम्भावनाओं के साथ जोड़कर रखता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-January
उपासना एवं जीवनदेवता की साधना को हम अपनी समष्टि की आराधना द्वारा पकाएँ। अपनी उपासना स्वार्थप्रधान न हो। परमार्थ में ही सच्चा स्वार्थ मान सारे समाज−राष्ट्र के उत्थान की, मूल्यों के उत्थान की, गायत्री चेतना के विस्तार की बात हम सोचें। तब ही युगनिर्माण योजना अपने लक्ष्य पर पहुँच सकेगी।
उपासना करने लगे तो उनके क्रोध की वृद्धि हो गई। विश्वामित्र जब तक अपने आप को संशोधित करने की पूरी प्रक्रिया नहीं कर सके थे और तपस्या करने लगे। उस तप में, भजन में लगने का परिणाम यह हुआ कि उनकी कामवासना ज्यादा लगने का उद्दीप्त हो गई। उसके फलस्वरूप फिर क्या हुआ? बेटे उनके यहाँ अप्सरा से एक लड़की पैदा हुई थी, तुझे मालूम नहीं है।
उपासना या कर्म नहीं करता। वह यह कर्म सहज रूप में करता हुआ अपनी वर्तमान वासनाओं का क्षय कर लेता है। संसार में संव्याप्त परमात्मसत्ता की सेवा करते करते वह मन, बुद्धि, इंद्रियों को शाँत व स्थिर कर लेता है और उस भावावस्था में पहुँच जाता है, जहाँ वह ध्यानस्थ हो जाता है, उसके हृदय की शुद्धि हो जाती है एवं इस शुद्ध अंतःकरण के साथ उसे अनंत शाँति की उपलब्धि है, जो निष्काम कर्म करते−करते एक दिव्यकर्मी लोकसेवी को प्राप्त होती है।
उपासनाओं की जरूरत है। ध्यान करते समय आपको यह ध्यान रखना चाहिए कि अगर आप प्रारंभिक उपासक हों, तो आपको गायत्री माता का ध्यान करना चाहिए। ध्यान करना चाहिए कि सद्बुद्धि रूपी माता, सद्विवेक की माता, सद्ज्ञान रूपी माता, करुणा रूपी माता, प्रेम रूपी माता अपना अमृत−सा दूध हमको पिला देती है। उस दूध को पीकर हमारी नसें और हमारी नाड़ियाँ शुद्ध−पवित्र होती हुई चली जाती हैं। हम स्नेह से भर रहे हैं, करुणा से भर रहे हैं, भावना से भर रहे हैं, कोमलता से भर रहे हैं।
उपासना स्वार्थप्रधान न हो। परमार्थ में ही सच्चा स्वार्थ मान सारे समाज−राष्ट्र के उत्थान की, मूल्यों के उत्थान की, गायत्री चेतना के विस्तार की बात हम सोचें। तब ही युगनिर्माण योजना अपने लक्ष्य पर पहुँच सकेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-February
उपासना करते हुए जो चमत्कार और सिद्धियाँ मिली, उसके आधार पर रहस्य को क्यों छिपाया जाए? यह रहस्य बताकर मैं अपनी बात समाप्त करूंगा। आपको मैं फिर यह कहता हूँ कि उपासना से लाभ उठाने के लिए अटूट श्रद्धा का होना निताँत आवश्यक है। श्रद्धा अर्थात् भगवान के आदेशों पर चलने के लिए विश्वास। जैसे कि मैंने आपको एक किसान का किस्सा बताया था कि किस तरह वह अन्य किसानों को तारता चला गया।
उपासना के संबंध में अभी भी वह हमारी किताब है, उसे तो कोई खरीदता नहीं है और यह कहता है कि महाराज जी! वह किताब बताइए जिससे लक्ष्मी आने लगे। ठीक है बेटे, वह पच्चीस पैसे की आती है, खरीद ले जा। हाँ महाराज जी! वह चार−पाँच कापी खरीद ले जाऊँगा। खरीद ले जा बेटे, सबको लक्ष्मी जा जाएगी। उस विधि वाली किताब को तो लोग खरीद लेते हैं, पर उसे कोई नहीं खरीदता।
उपासना करने के लिए यहाँ आएँ, जिन्होंने सारी जिंदगी भर उपासना की है, पर प्राप्त कुछ नहीं हुआ, पर अब थोड़े समय में प्राप्त कर सकते हैं।
उपासना बताई थी, उसका एक विशेषाँक निकाला था। उस विशेषाँक में हरेक को बताया था कि जब आप जप किया करें, तो ये वाला जप किया करें। पूजा−उपासना के संबंध में अभी भी वह हमारी किताब है, उसे तो कोई खरीदता नहीं है और यह कहता है कि महाराज जी! वह किताब बताइए जिससे लक्ष्मी आने लगे। ठीक है बेटे, वह पच्चीस पैसे की आती है, खरीद ले जा। हाँ महाराज जी! वह चार−पाँच कापी खरीद ले जाऊँगा।
उपासना करने वाले के होने चाहिए। अगर आप थोड़े−बहुत कदम उठाने के लिए तैयार हैं, तो यह आपको सौभाग्य है। लोग तो तलाश करते फिरते हैं कि कोई ऐसी शक्ति हमें मिले, जो इस विषय में पारंगत हो। बेटे, हम अपनी बात तो नहीं कहते, किंतु हमारे गुरु पारंगत हैं। आप भी कह सकते हैं कि वे पारंगत हैं।
उपासनाएँ करना अपने लिए नहीं। अगर आप ये तीन काम कर सकते हों, तो ऋषियों की परंपरा से लेकर हमारी परंपरा तक, सब में एक ही बात चली आई कि भगवान का अनुग्रह आपको मिलेगा, भगवान का प्यार आपको मिलेगा, अगर आपने लोभ और मोह पर अंकुश रखना सीख लिया। आपको यदि लोभ और मोह से ही प्यार है, तो फिर दोनों चीजें आपको नहीं मिल सकतीं। अगर आप एक चीज लेंगे, तो दूसरी आ जाएगी। प्रकाश की ओर चलेंगे, तो छाया पीछे आ जाएगी।
उपासना करते हैं, पूजा करते हैं, भजन करते हैं, हनुमान चालीसा पढ़ते हैं, जो भी पढ़ते हैं, उसमें एक काम तो यह करें कि उसमें अपने विचारों का समन्वय करें। जितने समय तक आपका जप चलता रहे, उतने समय तक प्रत्येक क्रिया के साथ−साथ, जप के साथ−साथ में जो भावनाएँ जुड़ी हुई हैं, विचारणाएँ जुड़ी हुई हैं, उसमें अपने मस्तिष्क को पूरी तरीके से लगाए रखें। दूसरा विचार उसमें न आने दें। दूसरे विचारों को रोकिए मत, उसकी दिशा बदल दीजिए, जप में लगा दीजिए। वह अपने आप रुक जाएगा।
उपासना के साथ−साथ में जितने भी कर्मकाँड हैं, उन कर्मकाँडों के साथ में जो शिक्षाएं भरी पड़ी हैं, प्रेरणाएं भरी पड़ी हैं, दिशाएँ भरी पड़ी हैं, उनको बता दीजिए। बेटे, हमने किताबों में बेशक छापा है, हमने पैंतालीस मिनट की जो उपासना बताई थी, उसका एक विशेषाँक निकाला था। उस विशेषाँक में हरेक को बताया था कि जब आप जप किया करें, तो ये वाला जप किया करें। पूजा−उपासना के संबंध में अभी भी वह हमारी किताब है, उसे तो कोई खरीदता नहीं है और यह कहता है कि महाराज जी! वह किताब बताइए जिससे लक्ष्मी आने लगे। ठीक है बेटे, वह पच्चीस पैसे की आती है, खरीद ले जा।
उपासना अभ्यर्थना की है। सरस्वती ज्ञान के अनन्त आयाम के साथ-साथ कला की सूक्ष्मताओं एवं वाणी की मधुरता में भी समाहित हुई है। पद्मपुराण इसका इस तरह से उल्लेख करता है-
उपासना की है, पर प्राप्त कुछ नहीं हुआ, पर अब थोड़े समय में प्राप्त कर सकते हैं।
उपासना के समय कर्मकाँडों के साथ−साथ किस तरह से हमारे विचारों का चिंतन चलना चाहिए।
उपासना-आराधना वैदिक धर्मावलम्बियों तक ही सीमित नहीं है। जैन मतावलम्बी भी इनकी उपासना करते हैं। बौद्ध धर्म सरस्वती पूजन की मान्यता प्रदान की है। बौद्ध ग्रन्थ साधनमाला के अनुसार सरस्वती अपने भक्तों को ज्ञान और समृद्धि देती है। तिब्बत में सरस्वती को महासरस्वती, वज्रशारदा और वज्रसरस्वती आदि रूपों में देखा जा सकता है।
उपासना में लग गए। सवेरे छह बजे परिवार के सभी सदस्यों को बुलाकर उनके दुःख−दर्द का हाल पूछा। सभी को आशीर्वाद प्रदान किया।
उपासना में हम भावना बताते हैं, देवपूजन में हम भावना बताते हैं। उसके साथ मन को जोड़ दे।
उपासना की और प्राप्त किया, उसको विवेकानंद ने थोड़े दिनों में प्राप्त कर लिया। आप भी थोड़ी देर में प्राप्त कर सकते हैं, जो हमने मुद्दतों से पाया। गाय ने चौबीस घंटे घास खाकर के और उसको हजम करके जो दूध पेट में जमा किया है, उसको आप पाँच मिनट में पी सकते हैं। आपका सौभाग्य है। आप बच्चे हैं, दूध पी लीजिए, गाय ने उसे चौबीस घंटे में तैयार किया है, बेचारी दिन भर घूमती रही और घास खाती रही है, तब दूध जमा किया है उसने।
उपासना वसन्त के उल्लास के साथ त्याग तप और आनन्द का परिचायक है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार वसन्त के अग्रदूत श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम सरस्वती पूजन कर विधान किया था। इसके अनुसार-
उपासना वाली को, जिसमें यह बताया गया है कि उपासना के समय कर्मकाँडों के साथ−साथ किस तरह से हमारे विचारों का चिंतन चलना चाहिए।
उपासना से लाभ उठाने के लिए अटूट श्रद्धा का होना निताँत आवश्यक है। श्रद्धा अर्थात् भगवान के आदेशों पर चलने के लिए विश्वास। जैसे कि मैंने आपको एक किसान का किस्सा बताया था कि किस तरह वह अन्य किसानों को तारता चला गया। भगवान पर उसका अटूट विश्वास था। भगवान पर विश्वास के आधार पर यदि आप श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए, आदर्शवादी जीवन जीने के लिए तैयार होते हैं, तो आप अपनी नाव उस पार तो ले जाएँगे ही, अन्य असंख्यों को भी तार देंगे, अपनी नाव पर बिठाकर ले जाएँगे।
उपासना जो वैयक्तिक हुआ करती थी, क्या जीवनसाधना में बदली एवं यदि बदली तो क्या हमने व औरों ने उसकी अनुभूति की? यही जीवनसाधना जब सामूहिक स्तर पर होती है एवं विराट् ब्राह्मीसत्ता की सेवा−साधना में नियोजित होती है तो आराधना बन जाती है। संगठन इसी आधार पर सशक्त एवं परिणाम देने वाले बनते चले जाते हैं।
उपासना करते हैं। बौद्ध धर्म सरस्वती पूजन की मान्यता प्रदान की है। बौद्ध ग्रन्थ साधनमाला के अनुसार सरस्वती अपने भक्तों को ज्ञान और समृद्धि देती है। तिब्बत में सरस्वती को महासरस्वती, वज्रशारदा और वज्रसरस्वती आदि रूपों में देखा जा सकता है। तिब्बत वासी इन्हें वीणासरस्वती तथा चीन निवासी ‘नीलासरस्वती’ के रूप में मानते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-September
उपासना साधक की अंतश्चेतना में, उसके मन, अंतःकरण, मस्तिष्क, विचारों और भावनाओं में सन्मार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा भरती है। साधक जब इस महामंत्र के अर्थ पर विचार करता है तो वह समझ जाता है कि संसार की सर्वोपरि समृद्धि और जीवन की सबसे बड़ी सफलता सद्बुद्धि को प्राप्त करना है।
उपासना और आराधना करता है, वह प्रतिक्षण माता का अमृतोपम दुग्धपान करने का आनंद लेता है और समस्त अज्ञानों, अशक्तियों और अभावों के कारण उत्पन्न होने वाले कष्टों से छुटकारा पाकर मनोवाँछित फल प्राप्त करता है। योग्य गुरु के पथ प्रदर्शन में की गई गायत्री साधना अभीष्ट लाभ पहुँचाती है। इन साधनाओं में फलता प्राप्त करने के लिए भले ही थोड़ा-बहुत अधिक समय व श्रम लगाना पड़े पर अन्य कष्टपूर्ण साधनाओं की अपेक्षा उन साधनाओं में जल्दी ही सफलता मिलती है। योगीजनों का कष्टसाध्य लंबा मार्ग गायत्री द्वारा बहुत सरल हो जाता है और घर में रहते हुए गृहस्थ व्यक्ति भी वनवासी तपस्वियों जैसी सफलता प्राप्त कर लेता है।
उपासना का परिणाम है। एकाँकी दुष्टता को निरस्त करने के लिए आक्रमण अस्त्र के रूप में त्रिपदा के सावित्री पक्ष का प्रयोग होता है। इस प्रकार के प्रयोग-उपचार को ब्रह्मास्त्र कहते है।
उपासना करते थे और भौतिक लाभों के लिए लालायित को वाममार्गी साधना करनी पड़ती थी। देवपक्ष के आचार्य वृहस्पति थे। दैत्य पक्ष का प्रशिक्षण शुक्राचार्य करते थे। तप-साधना दोनों को ही करनी पड़ती थी, ऋषि और देवताओं का सात्विक तप होता था, दैत्यों का तामसिक। कुँभकरण, मेघनाद, मारीच, हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, भस्मासुर, वृत्रासुर, सहस्रबाहु, महिषासुर आदि अनेक दुर्दांत दैत्यों के वैभव और पराक्रमों का वर्णन पुराणों में मिलता हैं।
उपासना एवं जीवन साधना जिसकी जितनी गहरी होगी, उतना ही वह गुरुसत्ता के उच्चस्तरीय अनुदानों का भागीदार बनेगा। व्यक्तित्व में जब जीवन-साधना फलीभूत होने लगेगी तब हम आराधना प्रधान विभिन्न आँदोलनों को गति दे सकेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-May
उपासना शुरू की तो हनुमान की तरह व्यवहार करने लगे। राम−रघुवीर कहते हुए वे वृक्षों पर चढ़ जाते, फल तोड़ते, दाँत से काटते और चखकर फेंक देते। प्राणिमात्र में और कण−कण में राम के दर्शन की अवस्था में पहुँच जाने के बाद साधना को विराम दिया। एक बार सखीभाव से श्रीकृष्ण की आराधना करने लगे। इस भाव से साधना करने वाले साधक अपने आपको श्रीकृष्ण की सहेलियाँ, गोपियाँ मानते हैं और स्त्रियों की तरह ही रहते हैं।
उपासना का मार्ग भी अपनाया। सब धर्मों और साधना−परंपराओं का मर्म जान−समझ लेने के बाद वे अपने स्वभाव में स्थिर हो गए। मुक्त और सिद्ध आत्माओं को वैसे अपना कोई स्वतंत्र स्वभाव नहीं होता। वे परमात्मचेतना से इस तरह ओत−प्रोत हो जाते हैं कि उनकी अपनी स्वतंत्र सत्ता कहीं दिखाई ही नहीं देती। जिस स्थिति और स्तर का साधक आता है, उसी के अनुरूप वे दिखाई देने लगते हैं।
उपासना, यज्ञ-संस्कार, वर्णाश्रम व्यवस्था व अन्य ऋषि परम्परायें किसी न किसी रूप में हमारे जीवन का अंग बनी हुई हैं। इस तरह काल प्रवाह के विभिन्न उतार-चढ़ाव के बावजूद हमारी संस्कृति जीवन्त है, जबकि विश्व की अन्य प्राचीन संस्कृतियों जैसे मिस्र, बेबीलोन, रोम-यूनान आदि के ध्वंसावशेष ही बाकी बचे हुए हैं। उर्दू-शायर इकबाल के शब्दों में -
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-March
उपासना के आसन पर बैठते समय होती है। यानि कि हाथ-पाँव धोकर पवित्र भावदशा में बिछौने पर लेटे। आराम से लेटकर गायत्री महामंत्र का मन ही मन उच्चारण करते हुए कम से कम दस बार गहरी श्वाँस लें। फिर मन ही मन अपने गुरु अथवा ईष्ट की छवि को सम्पूर्ण प्रगाढ़ता से चिंतन करें। अपने मन को धीरे-धीरे किन्तु सम्पूर्ण संकल्प के साथ सद्गुरुदेव अथवा ईष्ट की छवि से भर दें।
उपासना द्वारा व्यक्ति को जीवन की रिक्तता एवं अपूर्णता को भरने वाला सशक्त एवं पूर्ण आलम्बन मिल जाता है और अस्तित्व की गहनतम जिज्ञासा एवं पिपासा को संतुष्ट एवं तृप्त करने वाला आधार भी मिल जाता है।
उपासना के समय ही कोई कष्टपीड़ित रोगी आ पहुँचा। गुरु ने पूजा कर रहे शिष्यों को बुला भेजा तो शिष्यों ने कहा, “अभी थोड़ी पूजा बाकी है, पूजा समाप्त होते ही आ जाएँगे।” गुरुजी ने दुबारा फिर आदमी भेजा। इस बार शिष्य आ गए, पर उन्होंने अकस्मात् बुलाए जाने पर अधैय व्यक्त किया। गुरु ने कहा, “मैंने तुम्हें इस व्यक्ति की सेवा के लिए बुलाया था, प्रार्थनाएँ तो देवता भी कर सकते हैं, किंतु अकिंचनों की सहायता तो मनुष्य ही कर सकते हैं।
उपासना के प्रमुख देव हुए। द्वापर में मुख्य रूप से विष्णु भगवान की पूजा की प्रधानता थी। इसी प्रकार कलियुग के प्रधान देव भगवान महादेव−महाकाल हैं।
उपासना में मन नहीं लगता। भगवान की ओर चित्त दृढ़ नहीं होता।” गुरु ने गंभीर दृष्टि डालकर शिष्य को देखा और जैसे कोई बात समझ में आ गई हो, बोले, “सच ही कहते हो वत्स, यहाँ ध्यान लगेगा भी नहीं। अन्यत्र चलकर साधना करेंगे, वहाँ ध्यान लगेगा। आज सायंकाल ही यहाँ से प्रस्थान करेंगे।
उपासना की ऐसी चमत्कृति पर प्रकाश डालते हैं। अपने ईष्ट से तादात्मीकरण के विशेष क्षणों में, कैथरीन अपने शरीर के विभिन्न भागों में वैसे ही पीड़ा अनुभव करती थी, जिस प्रकार हजरत ईसा को कभी हुई थी। ऐसी अवस्था में चिकित्सक उसकी देखभाल करते थे। उन्होंने कैथरीन की पीड़ा को वास्तविक अनुभूत पाया। इसी तरह कृष्ण दीवानी मीरा अपने प्रभु के प्रेम में इतना डूब जाती थी कि वह श्रीकृष्ण रूप ही बन जाती थी और अन्त में द्वारिकाधीश में ही समा गयी।
उपासना जितनी हम अपनी जीवात्मा की मलीनता को दूर करने के लिए करेंगे, उतनी ही हमारी जीवात्मा की सफाई होगी और उसी अनुपात से हमें अनुदान मिलता चलेगा। जैसे कि भेड़ के ऊपर ऊन जमी रहती है, उसे जितना काटते हैं, ऊन उतनी ही मिलती चली जाती है। इसी प्रकार भगवान का जो अनुदान है, वह स्वतः ही हमको मिलता चला जाएगा, माँगना नहीं पड़ेगा। मनुष्य भिखारी नहीं है, वह तो भगवान का बेटा है। वह तो स्वयं ही अधिकारी है भगवान की उस दौलत का।
उपासना (भक्तियोग), साधना (ज्ञानयोग) एवं आराधना (कर्मयोग) द्वारा हमारी गुरुसत्ता ने जन−जन को अपनी ऋतंभरा−प्रज्ञा विकसित करने को प्रेरित किया। सभी की जीवनसाधना निखरी, दृष्टिकोण बदले, मुग्धता की स्थिति से निकलकर वे जंतु से दिव्यकर्मी बने एवं सद्बुद्धि का आश्रय ले वे आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ते रहे। अपने आप का ज्ञान उन्हें स्वाध्याय से होने लगा। श्रेष्ठ विचारों में स्नान उनके स्वभाव को उच्चस्तरीय भाव में प्रतिष्ठित करता चला गया। जीवनोद्देश्य की जानकारी उस ध्यान से हुई, जिसमें उनने जाना कि वे कौन हैं−एक सामान्य जीव नहीं−विशिष्ट प्रयोजन के लिए जन्मे प्रज्ञा परिजन, जिन्हें उलटे को उलटकर सीधा करना हैं, विचार−क्राँति करनी है।
उपासना
उपासना का और ध्यान का सही स्वरूप आप समझ गए होंगे। आप सभी इसी ओर कदम बढ़ाएँगे, ऐसी मुझे आशा है। ॥ ॐ॥
उपासना रूपी लालिमा से लाल। उस भगवान की गोदी में जब हम बैठ जाएँगे और भगवान से जब हम लिपट जाएँगे तो हम क्यों न वैसे हो जाएँगे! मनुष्य अपनी संकीर्णता को छोड़ दे और भगवान की शरण में चला जाए तो फिर वैसा ही हो जाएगा, जैसा कि अभी मैंने कबीर के दोहे से बताया।
उपासना के बाद वे आश्रम में आए रोगियों की चिकित्सा में गुरु की सहायता किया करते थे। एक दिन उपासना के समय ही कोई कष्टपीड़ित रोगी आ पहुँचा। गुरु ने पूजा कर रहे शिष्यों को बुला भेजा तो शिष्यों ने कहा, “अभी थोड़ी पूजा बाकी है, पूजा समाप्त होते ही आ जाएँगे।” गुरुजी ने दुबारा फिर आदमी भेजा। इस बार शिष्य आ गए, पर उन्होंने अकस्मात् बुलाए जाने पर अधैय व्यक्त किया।
उपासना का अवलम्बन भी साधक को जीवन की जटिल चुनौतियों से जूझने का बल देता है और मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में एक गहन एवं प्रभावी उपचार के रूप में सिद्ध होता है।
उपासना रूपी दूध को पियो, लेकिन वह अभागा बछड़ा ठुकराता चला जाता है और गाय रँभाती रहती है। गाय का जो दूध है, वह इधर−उधर फैल जाता है और बछड़ा भूखा रह जाता है। बछड़ा माने है आत्मा−जीवात्मा और गाय, वह है हमारा भगवान। भगवान चिल्लाता रहता है और हमारे कानों में सुनाई नहीं पड़ता। हम हैं निर्जीव, हम हैं, आँखों से गूँगे, अपंग हैं, जो कहते हैं कि रास्ता दिखाई ही नहीं पड़ता।
उपासना शुरू की तो अर्घ के लिए बाहर जाना जरूरी हो गया। जिस सावधानी से स्थान का चुनाव किया, वैसी ही सावधानी समय के निर्धारण में भी बरती। उसे पूरी तरह निभाने का प्रयत्न किया। प्रातः−संध्या सुनहरा सूर्य उदय होने से पहले आरंभ हो जानी चाहिए और सायंकाल की संध्या सूर्यास्त से पहले।
उपासना है। पादरी ने कहा, मैं धन्य हो गया, आज मैंने भगवान को आपके ही रूप में पा लिया। अभी तक मैं अंधकार में था।
उपासना का मर्म
उपासना−अजान−प्रेयर−अरदास थोड़ी देर की, कुछ पल से कुछ घंटों की हो सकती है, पर साधना तो हर श्वास में जी जानी चाहिए। साधना का अर्थ है−अपने आप पर अपना स्वयं का नियंत्रण, अपने आपे को खुद साधना, क्षरित हो रही वृत्तियों पर कठोरता से अंकुश लगाना। इसी को संयम कहा गया है एवं संयम−साधना शब्द एक साथ प्रयुक्त होता है। समय, अर्थ, इंद्रिय एवं विचारों का−चार संयम किए जाते हैं, तब जीवन देवता प्रसन्न होते हैं एवं कल्पवृक्ष की तरह मनोकामना पूर्ण करते हैं। अपने पर कड़ी दृष्टि, स्वयं को जिम्मेदार नागरिक मानकर हर त्रुटि की (अपनी स्वयं की) समीक्षा, अवलोकन, सुधार एवं नई आदतों का, अच्छी आदतों का निर्माण−यह हम सबका, जिन्हें युग−नेतृत्व सँभालना है, अब अनिवार्य दायित्व है।
उपासनात्मक उपचार इसी को सम्पन्न करने का सशक्त विज्ञान सम्मत उपाय है, जिसमें मनुष्य के आध्यात्मिक ज्ञान की प्रगति बाहर से भीतर की ओर होती है। इसमें अन्तरात्मा की पूर्णता का प्रक्षेपण (प्रोजेक्षन) चयनित उपास्य देव, महापुरुष या आदर्श में होता है और इससे भाव-संवाद एवं तादात्मीयकरण की प्रक्रिया के साथ आन्तरिक जागरण रूपांतरण एवं विकास की प्रक्रिया शुरू होती है। साथ ही उपासना द्वारा व्यक्ति को जीवन की रिक्तता एवं अपूर्णता को भरने वाला सशक्त एवं पूर्ण आलम्बन मिल जाता है और अस्तित्व की गहनतम जिज्ञासा एवं पिपासा को संतुष्ट एवं तृप्त करने वाला आधार भी मिल जाता है।
उपासना माने है भगवान की समीपता। भगवान की समीपता के लिए गाय और बछड़े का उदाहरण मैं अभी आपको सुना रही थी। दूसरा उदाहरण है पतंग और डोरी का। आप अपनी बागडोर को जरा उस भगवान के हाथों में सौंपकर तो देखिए। फिर देखिए कि पतंग कहाँ तक जाती है।
उपासना पद्धति कराती है। इसके अपने ठोस आधार हैं।
उपासना आत्मा की भूख है। आत्मा की भूख जब तक नहीं मिटती, तब तक आत्मा को तृप्ति नहीं होती। दिमाग की भूख बौद्धिक होती है और आत्मा की जो भूख होती है, वह उपासना होती है। उपासना माने भगवान के पास बैठना। समीपता।
उपासना में हम श्रेष्ठता एवं दिव्यता के पुञ्ज ईष्ट पर ध्यान करते हैं तो हमारा मन भी इनके श्रेष्ठ एवं दिव्य भावों को ग्रहण करने लगता है और हम ऊर्ध्वगति को प्राप्त होने लगते हैं तथा पतन-पराभव के मार्ग में गिरने से बचते हैं।
उपासना कीजिए। हम नहीं जानते कि रामकृष्ण परमहंस ने कितनी उपासना की थी और हनुमान ने कितनी माला जपी थी, लेकिन जब तक रामायण रहेगी, भगवान राम का नाम रहेगा, तब तक हनुमान का नाम भी रहेगा, उनके कलेजे से चिपका रहेगा। साधारण वानर होते हुए भी हनुमान का नाम भी रहेगा, उनके कलेजे से चिपका रहेगा। साधारण वानर होते हुए भी हनुमान ने भगवान राम का काम किया था और उनने भाइयों से ज्यादा बेटे समान दरजा ले लिया था। कैसे ले लिया?
उपासनात्मक धार्मिक क्रियाओं को मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यक्तित्व विकास के लिए नितान्त आवश्यक माना है। उनका कहना था कि विश्व के सभी मानसिक चिकित्सक मिलकर उतने मानसिक रोगियों को आरोग्य प्रदान नहीं करा पाते, जितना कि विश्व का निम्न से निम्न स्तर की उपासना पद्धति कराती है। इसके अपने ठोस आधार हैं।
उपासना का स्थान सर्वोपरि है। इसमें अपनी आस्था, अभिरुचि एवं श्रद्धा के अनुरूप ईष्ट का चयन किया जाता है और उसके साथ घनिष्ठ आत्मीयपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। घनिष्ठता की गहराई के अनुरूप उपासक अपने अन्दर वाँछित परिवर्तन को पाता है। उपासना के ये गम्भीर प्रभाव कोई चमत्कार या रहस्यमय नहीं है बल्कि गूढ़ मनोवैज्ञानिक आधार पर प्रतिष्ठित है।
उपासनात्मक अवलम्बन से हीन है वहाँ भी ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है। मानव की गहनतम आत्मिक पिपासा को उपासनात्मक उपचार ही शान्त कर सकते हैं।
उपासना जीवन की बहुमूल्य निधि है। उस निधि से यदि दूर हट जाते हैं तो हम खोखले रह जाते हैं, निर्जीव हो जाते हैं। उपासना आत्मा की भूख है। आत्मा की भूख जब तक नहीं मिटती, तब तक आत्मा को तृप्ति नहीं होती। दिमाग की भूख बौद्धिक होती है और आत्मा की जो भूख होती है, वह उपासना होती है।
उपासना।
उपासना की जाती है, वह इसी तरीके से की जाती है। उपासना का और ध्यान का सही स्वरूप आप समझ गए होंगे। आप सभी इसी ओर कदम बढ़ाएँगे, ऐसी मुझे आशा है। ॥ ॐ॥
उपासना के बारे में अभी मैं कह रही थी, सच्चे अर्थों में जो उपासना की जाती है, वह इसी तरीके से की जाती है। उपासना का और ध्यान का सही स्वरूप आप समझ गए होंगे। आप सभी इसी ओर कदम बढ़ाएँगे, ऐसी मुझे आशा है। ॥ ॐ॥
उपासना इसी प्रयोजन को सिद्ध करने वाली सशक्त प्रक्रिया है।
उपासना में उपास्य का चुनाव एवं उपासक के व्यक्तित्व का गठन एवं रूपांतरण भी मनोवैज्ञानिक रीति से सम्पन्न होता है। योग सूत्र में कहा गया है कि मनुष्य जो कुछ भी सोचता है, वह वैसा ही बनने लगता है। गीताकार ने इसी तथ्य को सुन्दर रूप से विवेचित किया है-
उपासना करने वाले पर देवाधिदेव महाकाल की कृपा बरसती है। भगवान् भूतभावन उस पर प्रसन्न होते हैं। सदाशिव-महामृत्युञ्जय उसका कल्याण करते हैं। इस महापर्व के बारे में शास्त्रों में कहा गया है कि एक बार कैलास शिखर पर माता पार्वती ने भोलेनाथ से पूछा-
उपासना एक विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है, जिसका अपना ठोस एवं सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक आधार है। अपनी चरम परिणति में यह अपने ईष्ट उपास्य से एकात्मयता के लक्ष्य को सिद्ध करती हैं और व्यक्तित्व के गहनतम स्तर से रूपांतरण एवं गठन के मार्ग को प्रशस्त करती है। सामान्य रूप में लिया गया उपासना का अवलम्बन भी साधक को जीवन की जटिल चुनौतियों से जूझने का बल देता है और मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में एक गहन एवं प्रभावी उपचार के रूप में सिद्ध होता है।
उपासनात्मक उपचार ही शान्त कर सकते हैं।
उपासना के चमत्कारिक फलश्रुतियाँ प्रतिफलित होती हैं।
उपासना की थी और हनुमान ने कितनी माला जपी थी, लेकिन जब तक रामायण रहेगी, भगवान राम का नाम रहेगा, तब तक हनुमान का नाम भी रहेगा, उनके कलेजे से चिपका रहेगा। साधारण वानर होते हुए भी हनुमान का नाम भी रहेगा, उनके कलेजे से चिपका रहेगा। साधारण वानर होते हुए भी हनुमान ने भगवान राम का काम किया था और उनने भाइयों से ज्यादा बेटे समान दरजा ले लिया था। कैसे ले लिया? अपनी अहंता को मिटा करके ले लिया था।
उपासना के ये गम्भीर प्रभाव कोई चमत्कार या रहस्यमय नहीं है बल्कि गूढ़ मनोवैज्ञानिक आधार पर प्रतिष्ठित है।
उपासना होती है। उपासना माने भगवान के पास बैठना। समीपता। बड़े व्यक्ति के समीप बैठते हैं तो वही छाया हमारे ऊपर पड़ती है और हमारा भी उतना ही महत्त्व हो जाता है, जितना कि बड़े व्यक्ति का होता है। जिस तरह प्रधानमंत्री का सम्मान होता है और राष्ट्रपति का सम्मान होता है और जो उस समय उनके समीप होते हैं, उन्हें भी उतना ही सम्मान उस समय मिलता है, उससे कम नहीं मिलता।
उपासना माने भगवान के पास बैठना। समीपता। बड़े व्यक्ति के समीप बैठते हैं तो वही छाया हमारे ऊपर पड़ती है और हमारा भी उतना ही महत्त्व हो जाता है, जितना कि बड़े व्यक्ति का होता है। जिस तरह प्रधानमंत्री का सम्मान होता है और राष्ट्रपति का सम्मान होता है और जो उस समय उनके समीप होते हैं, उन्हें भी उतना ही सम्मान उस समय मिलता है, उससे कम नहीं मिलता। हमारा भगवान उससे भी ऊँची सत्ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-June
उपासना, साधना एवं सेवा की वृत्ति को जन्म देता है। जिसे अपनाकर वह अपने कषाय-कल्मषों को नित्य स्वच्छ करता है। और दिव्य अनुदान-वरदान का अधिकारी बनता है। आज परिवार में गायत्री माता का चित्र या अन्य महापुरुषों को ईश्वरीय सत्ता का, मानवीय आदर्शवादिता का प्रतीक मानकर रखना चाहिए जिससे आस्तिकता का वातावरण बना रहे।
उपासना एक ही दिन में पूरा जाने वाला अध्याय है तो महापुरश्चरण एक विराट ग्रंथ के अखंड पाठ की तरह है, जिसमें कितने ही अध्याय होते हैं। उन सबके अवगाहन में लंबा समय चाहिए। जब तक वह पूरा नहीं हो जाता, देवशक्तियों की अर्चना अभ्यर्थना चलती रही रहती है। उनकी उपस्थिति का सम्मान किया जाता है। अपना आचरण, चिंतन और स्तर उनकी गरिमा के अनुरूप रखने की सावधानी रखी जाती है।
उपासना का जो क्रम निर्धारित हुआ, वह कम-से-कम छह घंटे चलने वाला था। मार्गदर्शक सत्ता ने जिस दिन साधना में नियोजित किया, उस दिन वसंत पंचमी थी। निर्धारित उपासना संपन्न हो चुकी थी। जप निवेदन के बाद विसर्जन और समर्पण का विधान ही शेष रह गया था। श्रीराम ने उस उपचार को स्थगित किया और निर्दिष्ट क्रम के अनुसार आगे का जप आरंभ किया।
उपासना, प्रार्थना, अभ्यर्थना के संपूर्ण उपचारों का प्रयोग वह भाव-संवेदनाओं के विकास में करता है। दर्शन के रूखेपन में उसे रस नहीं आता। तर्क एवं बुद्धि को साधनामार्ग का, सत्य प्राप्ति का अवरोध मानने के कारण वह उनका अवलंबन नहीं चाहता। परिणामस्वरूप तत्त्वदर्शन की बौद्धिक गवेषणाओं में वह अपना समय और श्रम नहीं गंवाता। उसकी समस्त चेष्टाएं भाव-समुद्र में इष्ट से भावनात्मक तादात्म्य स्थापित करने और उसी भाव-समुद्र में डूबने रहने में नियोजित रहती हैं।
उपासना संपन्न हो चुकी थी। जप निवेदन के बाद विसर्जन और समर्पण का विधान ही शेष रह गया था। श्रीराम ने उस उपचार को स्थगित किया और निर्दिष्ट क्रम के अनुसार आगे का जप आरंभ किया। एक वर्ष में 24 लाख जप का अनुष्ठान संपन्न करने के लिए छियासठ मालाओं का जप (लगभग सात हजार बार गायत्री मंत्र का उच्चारण) आवश्यक है। उस दिन सूर्योदय के बाद करीब पाँच घंटे तक बैठे रहे, साधना करते रहे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-October
उपासना की है, वही दशम की पूर्णता का अधिकारी होता है। वही अपनी आत्मशक्ति के प्रभाव से दस इन्द्रियों का नियंत्रण करने में समर्थ होता है। धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य एवं अक्रोध के रूप में धर्म के दस लक्षण उसकी आत्म चेतना में प्रकाशित होते हैं।
उपासना करने से समस्त संसार का स्पष्ट ज्ञान हो जाता है। सूर्य कालचक्र के महाप्रणेता हैं। सूर्य से ही दिन-रात्रि, मास, अयन एवं संवत्सर का निर्माण होता है। भारतीय संस्कृति में किसी वार का प्रारम्भ सूर्योदय से ही होता है। भारतीय सूर्योपासना के मूल में आध्यात्मिक लाभ के अलावा शारीरिक स्वास्थ्य एवं भौतिक लाभ का भाव भी निहित मिलता है।
उपासना से शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शान्ति एवं आध्यात्मिक अनुदान-वरदान की उपलब्धि होती है। सूर्योपासना के लिए निर्धारित तिथि को सूर्यषष्ठी के रूप में जाना जाता है। कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि सूर्यषष्ठी कहलाती है। सूर्यषष्ठी व्रत मुख्यतः रोगमुक्ति, पुत्र प्राप्ति और दीर्घायु की कामना के लिए किया जाता है। श्रद्धा और भावना के संग किया गया छठ या सूर्यषष्ठी व्रत अत्यन्त लाभदायक एवं फलदायक होता है।
उपासना को सार्थक बनाने के लिए जिह्वा शुद्धि की प्रक्रिया पर पूरा ध्यान देना चाहिए।
उपासना का वास्तव में यही मकसद है। छैनी और हथौड़े को जिस तरह से हम दीवार गिराने के लिए इस्तेमाल करते हैं, उसी तरीके से अपनी सफाई करने के लिए पूजा पाठ के , भजन के कर्मकांड का, क्रियाकृत्य का उपयोग करते है। भजन उसी का उद्देश्य पूरा करता है। यह मैं आपको फिलॉसफी समझना चाहता था। अगर आप अध्यात्म की फिलॉसफी समझ जाए, इस थ्योरी को समझ जाए तो आपको प्रेक्टिस से फायदा हो सकता है।
उपासना से ही रोगमुक्त हुए थे। कृष्ण यजुर्वेदीय ‘चाक्षुषोपनिषद्’ में सभी प्रकार के नेत्ररोगों से मुक्ति का उपाय बताया गया है। तंत्रशास्त्र की मान्यता है कि नित्य सूर्य नमस्कार करने पर सात पीढ़ियों से चली आ रही महादरिद्रता दूर हो जाती है। सूर्य नमस्कार स्वयं में सूर्य आराधना भी है और स्वास्थ्य का व्यायाम भी। इससे अनेक प्रकार की बीमारी एवं विकृतियों का निराकरण एवं शमन होता है।
उपासना का शिक्षण भी इसी में आता है। श्रद्धा प्रज्ञा निष्ठा का तत्वदर्शन भी इसी में है। पंचकोशों का आध्यात्मिक परिचय, इनमें निहित दिव्य संभावनाएं, इनके जागरण की विधियाँ, षटचक्रों एवं कुंडलिनी का परिचय, जागरण का विज्ञान तथा आध्यात्मिक जीवन के लक्षण एवं मापन इसमें सिखाए जाएंगे।
उपासना को सफल बनाने वाली पाँच तपश्चर्याएं (1)उपवास (2)मौन (3)ब्रह्मचर्य (4)तितिक्षा (5)अनुदान इन पांचों नामों से प्रसिद्ध है। साधना के साथ साथ इनका समन्वय जितना हो सकेगा उसी अनुपात से उसकी कार्यक्षमता बढ़ती चली जाएगी।
उपासना की विशिष्ट व विशेष तिथि है। सूर्योपासना को सूर्योपस्थान भी कहते हैं, इसमें सूर्य भगवान् को भाव भरा अर्घ्य चढ़ाया जाता है। इस अर्घ्यदान में वैज्ञानिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का गहन-गम्भीर रहस्य भी भरा पड़ा है, जिसे वेद, उपनिषदों एवं पुराणों में विस्तार से उल्लेख किया गया है। वैदिक साहित्य में सूर्यदेव की महिमा-गरिमा का भावभरा गायन किया गया है। इनमें सर्वसुलभ सूर्यदेव के सूक्ष्म एवं दिव्य आध्यात्मिक स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए ‘सविता’ को सूर्य की आत्मा कहा गया है।
उपासना का अविच्छिन्न अंग है। विराट ब्रह्म की, विशाल विश्व की सेवा आराधना से विरत रहकर पूजा अर्चा मात्र से कोई भी जीवनलक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता। सेवा साधना में निरत व्यक्तियों को कितने ही प्रकार के कष्ट सहने पड़ते है। परिव्राजक जीवन की कठिनाइयाँ तो सर्वविदित ही है। वानप्रस्थ संन्यास में भी कष्टसाध्य जीवनयापन ही करना पड़ता है।
उपासना के सारे कर्मकाँड, सारे के सारे क्रिया कृत्य आत्मसंशोधन की प्रक्रिया की ओर इशारा करते है। मैंने आपको जो समझना था, वह सूत्र बता दिया। हमारा अध्यात्म यही से शुरू होता है। इसलिए यह जप नहीं हो सकता, भजन नहीं हो सकता, कुछ नहीं हो सकता। केवल यही से अर्थात् आत्म संशोधन से हमारा अध्यात्म शुरू होता है।
उपासना के समय तो मौन रहने की परंपरा भी है। इसके लिए जिस समय कम जनसंपर्क रहता है उस समय एक दो घंटे का मौन रखने का नियम बनाना चाहिए। सप्ताह में या महीने में एक दिन पूरा मौन रखना भी जिह्वा की अवाँछनीय गतिविधियों पर रोक लगाने, पुरानी आदतें भुलाने का एक अच्छा उपाय है।
उपासना-आराधना से होने वाला प्रभाव सर्वथा वैज्ञानिक एवं तथ्यपूर्ण है।
उपासना सार्वभौमिक है।
उपासना का वास्तविक सत्परिणाम देखने का अवसर प्राप्त करना चाहिए।
उपासना अनुष्ठान में प्रवृत्त हुए। उठने और स्नानादि के समय से मन हिलोरे ले रहा था। वस्तुतः पूर्व संध्या से ही मन में संकल्प विकल्प आ रहे थे। लग रहा था कि सुबह कुछ नया आरंभ करना है। क्या आरंभ करना है, यह आभास नहीं हो रहा था।
उपासना की सामान्य प्रक्रिया हम आपको पहले से बताते रहे है। उसमें सबसे पहला प्रयोग चाहे वह उपासना के पंचवर्षीय साधनाक्रम में शामिल हो, चाहे हवन में, चाहे अनुष्ठान में, पाँच कृत्य आपको अवश्य करने पड़ते है- यह आत्मशोधन की प्रक्रिया पाँच है-(1) पवित्रीकरण करना (2) आचमन करना (3)शिखाबंधन (4)प्राणायाम और (5) न्यास। इन चीजों के माध्यम से मैंने आपको एक दिशा दी है, एक संकेत दिया है। हमने यह नियम बनाया है कि आपको स्नान करना चाहिए, प्राणायाम करना चाहिए न्यास करना चाहिए। इन माध्यमों से आपको अपनी प्रत्येक इंद्रिय का परिशोधन करना चाहिए।
उपासना के पंचवर्षीय साधनाक्रम में शामिल हो, चाहे हवन में, चाहे अनुष्ठान में, पाँच कृत्य आपको अवश्य करने पड़ते है- यह आत्मशोधन की प्रक्रिया पाँच है-(1) पवित्रीकरण करना (2) आचमन करना (3)शिखाबंधन (4)प्राणायाम और (5) न्यास। इन चीजों के माध्यम से मैंने आपको एक दिशा दी है, एक संकेत दिया है। हमने यह नियम बनाया है कि आपको स्नान करना चाहिए, प्राणायाम करना चाहिए न्यास करना चाहिए। इन माध्यमों से आपको अपनी प्रत्येक इंद्रिय का परिशोधन करना चाहिए।
उपासना के लाभ तो इसी जीवन में ही मिलते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-April
उपासना का प्रमाण मात्देवी की मूर्तियों से मिलता है। मौर्यकालीन मातृदेवी की मृण्मूर्तियाँ प्रागैतिहासिक मूर्तियों की अपेक्षा अधिक विकसित हैं। मौर्यकालीन मौजूदा नमूनों में दीदारगंज की यक्षिणी सुँदरतम की यक्षिणी सुँदरतम कही जा सकती है। कौशाँबी की शुँगकालीन मृण्मृर्तियों में जो कला सौष्ठव है, वह दर्शनीय है। इन मूर्तियों से प्रमाणित होता है कि मौर्य एवं शुँगकाल में शक्ति −उपासना प्रचलित थी।
उपासना की यह प्रवहमान कालसरिता सैंधव−सभ्यता के पश्चात भी प्रवाहित हुई और वैदिककाल में तो अपने पूरे उफान में बहने लगी। ऋग्वेद में उषा और अदिति देवियों को महत्त्वपूर्ण स्थान मिले हैं। वेदों में बहुवर्णित देवी उषा हैं। ऋग्वेद में उषा के लिए 20 सूक्त मिलते हैं और उनके नाम का 300 बार से अधिक उल्लेख हुआ है। यह ऋग्वैदिक ऋषियों की सर्वाधिक मनोरम कल्पना है।
उपासना की विभिन्न प्रकृतियों का अधिक विकसित रूप मिलता है। मातृदेवी को लगभग सभी पुराणों में शिव की शक्ति माना गया है। सौर पुराण में देवी−तत्त्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वह शिव की ज्ञानमयी शक्ति है, जिसके द्वारा शिव सृष्टि का निर्माण और संहार करते हैं। शक्ति त्रिगुणात्मिका है। एक अन्य स्थान पर उसे परा अथवा परमशक्ति कहा गया है, जो सर्वत्र व्याप्त है।
उपासना के उदय के इतिहास में सूत्रग्रंथों का महत्त्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि शाक्त मत एक स्वतंत्र मत के रूप में इन ग्रंथों के युग में उदित हुआ है। सूत्र−साहित्य में अनेक प्राचीन तथा नवीन देवियों एवं उनकी उपासना का वर्णन हुआ है। सूत्र−साहित्य में सरस्वती का जिक्र है। अंबिका की भी देवी के रूप में विवेचना हुई है। शाँख्यायन गृह्यसूत्र में श्री एवं भद्रकाली का विश्वदेव संबंधी आहुति के प्रसंग में उल्लेख है।
उपासना को, शक्ति वाद को व्यापक लोकप्रियता मिली। अन्य देशों में भी शक्ति वाद का प्रमाण मिलता है, जो भारत के शक्ति वाद से मिलता प्रतीत होता है। इतिहासकार आर. पी. चंद्रा की मान्यता है कि भारतीय शक्ति−उपासना एवं सामीजनों की अस्तार्त, मिस्रियों की आइसिस और फ्रीगियनों की साइबिल की परिकल्पना में गहरी समानता है।
उपासना को, इस बहुमूल्य साँस्कृतिक निधि को अपनाकर ही देश समर्थ, सशक्त व शक्ति शाली हो सकता है। आदिशक्ति के प्रति जन−जन के मन में जाग्रत आस्था ही हमें हमारा पुरातन वैभव लौटा सकती है। प्रस्तुत नवरात्रि (चैत्र) पर्व पर इन्हीं संकल्पों के साथ शक्ति की आराधना करें।
उपासना करने लगे।
उपासना का प्रमाण ढूँढ़ निकाला है। प्राचीन भारत में मातृदेवी की उपासना के प्राचीनतम पुरातात्त्विक प्रमाण इन्हीं संस्कृतियों से मिले हैं। हड़प्पा में कुछ ऐसी मूर्तियाँ भी उपलब्ध हुई हैं, जिनके पैर नहीं हैं। ये मूर्तियाँ खिलौने नहीं हो सकतीं। सर आरियल स्टाइन ने इन मूर्तियों को बौद्ध तथा यूनानी मूर्तियों के आधार पर ‘पृथ्वीमाता’ की मूर्तियाँ बताया है।
उपासना का घनिष्ठ संबंध शिवोपासना के साथ दिखाई देता है। शिव की अवधारणा के साथ महाभारत में देवी की अवधारणा जुड़ी थी। इसमें शक्ति −उपासना से संबंधित अनेक कथाएँ मिलती हैं और कुछ शाक्त कथाओं का पूर्ण रूप तथा उनके भिन्न−भिन्न संस्करण मिलते हैं, परंतु महाभारतकाल तक शक्ति −उपासना शैव धर्म का एक अंग बन गई थी। एक स्थान पर शिव की सहचरी के रूप में उसको स्पष्ट रूप से शिव की शक्ति कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि इस समय तक उसका शिव की शक्ति अथवा माया माना जाने लगा था, जिसका उपनिषदों में उल्लेख किया गया है।
उपासना प्रायः एक पुरुष देवता के साथ की जाती थी। अफ्रीका में हव अपने पुत्र तनित के साथ, मिस्र में आइसिस के रूप में होसस के साथ, फिनीशिया में अस्थारोथ के रूप में तामुज के साथ, एशिया माइनर में साइबिल के रूप में जियस के साथ पूजी जाती थी। इस प्रकार आर्येतर जातियों का समाज मातृसत्तात्मक था, इसलिए उनके धर्म में माता की प्रधानता प्रतिष्ठित हुई।
उपासना प्रचलित थी।
उपासना की नवरात्रि, मनसा पूजा, हरितालिका, काली पूजा, सरस्वती पूजा, दीपावली, षष्ठीपूजा, कुमारी पूजा, तुलसी पूजन, सावित्री पूजन, गौ, गंगा पूजन आदि का प्रचलन प्रारंभ हुआ, जिसमें शक्ति की उपासना की जाती है। हमारे पूर्वज महर्षियों द्वारा सौंपी गई यह ऐतिहासिक व साँस्कृतिक धरोहर आज भी समीचीन एवं महत्वपूर्ण है। शक्ति −उपासना को, इस बहुमूल्य साँस्कृतिक निधि को अपनाकर ही देश समर्थ, सशक्त व शक्ति शाली हो सकता है। आदिशक्ति के प्रति जन−जन के मन में जाग्रत आस्था ही हमें हमारा पुरातन वैभव लौटा सकती है। प्रस्तुत नवरात्रि (चैत्र) पर्व पर इन्हीं संकल्पों के साथ शक्ति की आराधना करें।
उपासना के संकेत मिलते हैं। इतिहासविदों के अनुसार नवपाषाणकाल में कृषि−क्राँति के साथ न केवल साँस्कृतिक प्रगति हुई, वरन् समाज में नारियों का स्थान और धर्म में शक्ति −सिद्धाँत का महत्त्व बढ़ा, परंतु काँस्य−काल में सभ्यता के उदय के साथ ही प्राचीन भारत में शक्ति −उपासना को, शक्ति वाद को व्यापक लोकप्रियता मिली। अन्य देशों में भी शक्ति वाद का प्रमाण मिलता है, जो भारत के शक्ति वाद से मिलता प्रतीत होता है। इतिहासकार आर. पी. चंद्रा की मान्यता है कि भारतीय शक्ति−उपासना एवं सामीजनों की अस्तार्त, मिस्रियों की आइसिस और फ्रीगियनों की साइबिल की परिकल्पना में गहरी समानता है।
उपासना संबंधी अनेक सूचनाएँ मिलती हैं। इस काल में शक्ति −उपासना में नवीन आयामों की प्रतिष्ठा हुई।
उपासना से संबंधित अनेक कथाएँ मिलती हैं और कुछ शाक्त कथाओं का पूर्ण रूप तथा उनके भिन्न−भिन्न संस्करण मिलते हैं, परंतु महाभारतकाल तक शक्ति −उपासना शैव धर्म का एक अंग बन गई थी। एक स्थान पर शिव की सहचरी के रूप में उसको स्पष्ट रूप से शिव की शक्ति कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि इस समय तक उसका शिव की शक्ति अथवा माया माना जाने लगा था, जिसका उपनिषदों में उल्लेख किया गया है। महाभारत के भीष्मपर्व के प्रारंभ में दुर्गा पूजा का वर्णन है। यहाँ पर दुर्गा को सिंहों की सेनानेत्री, कालशक्ति , कपालधारिणी, कौमारी, काली, कपालिनी, कपिला, कृष्णपिंगला, भद्रकाली, महाकाली, चंडी, तारिणी, सौम्या तथा सुँदर रूप वाली, कात्यायनी, कराली, विजया, जया आदि कहा गया है।
उपासना में नवीन आयामों की प्रतिष्ठा हुई।
उपासना एवं सामीजनों की अस्तार्त, मिस्रियों की आइसिस और फ्रीगियनों की साइबिल की परिकल्पना में गहरी समानता है।
उपासना प्रारंभ हुई। इसका प्रमाण मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की मूर्तियों से मिलता है।
उपासना का स्वरूप सारभाव से पौराणिक ही रहा। गुप्तोत्तरयुगीन मंदिर में भुवनेश्वर 05 स्थित बैताल देउल का मंदिर उल्लेखनीय है। इस मंदिर में स्थित चतुर्भुजी पार्वती, अष्टभुजी महिषमर्दिनी, अर्द्धनारीश्वर तथा अप्सराओं आदि की मूर्तियाँ उल्लेखनीय हैं। खजुराहो में शाक्त संप्रदाय से संबंधित चौंसठ योगिनी मंदिर विशेष महत्त्वपूर्ण है। इस काल में अधिकतर शाक्त मतावलंबी दक्षिणमार्गी हो गए।
उपासना के साथ साधना और आराधना के कठोर अनुशासन जुड़े हों। उपासना-साधना के इस क्रम का भक्तिभाव और पूर्ण श्रद्धा के साथ निर्वाह करना होता है। मंत्र तभी फलित होते हैं। इसके प्रभाव एवं परिणाम नियम-अनुशासन के अनुपालन में सन्निहित होते हैं। अतः चैत्र नवरात्रि के इस असाधारण समय में इन अनुशासनों का पालन करना चाहिए जिनसे मंत्र की सिद्धि होती है।
उपासना गृहदेवी के रूप में आलों में रखकर की जाती थी। पिगट के शब्दों में ये मूर्तियाँ मातृदेवी की हैं, जो भयानक तथा रौद्र रूप को प्रकट करती हैं। मार्शल ने भी इन्हें पृथ्वीमाता की मूर्ति माना है। मानव पृथ्वी पर ही उत्पन्न होता है और मृत्यु के बाद इसी में समाहित हो जाता है। इस क्रिया ने मनुष्य का ध्यान प्राचीनकाल में ही आकर्षित किया था।
उपासना की जाती है। हमारे पूर्वज महर्षियों द्वारा सौंपी गई यह ऐतिहासिक व साँस्कृतिक धरोहर आज भी समीचीन एवं महत्वपूर्ण है। शक्ति −उपासना को, इस बहुमूल्य साँस्कृतिक निधि को अपनाकर ही देश समर्थ, सशक्त व शक्ति शाली हो सकता है। आदिशक्ति के प्रति जन−जन के मन में जाग्रत आस्था ही हमें हमारा पुरातन वैभव लौटा सकती है। प्रस्तुत नवरात्रि (चैत्र) पर्व पर इन्हीं संकल्पों के साथ शक्ति की आराधना करें।
उपासना का आविर्भाव भक्ति वाद के साथ−साथ हुआ। उत्तरकाँड में इसका आख्यान मिलता है। कमलासीन देवी के रूप में लक्ष्मी की कल्पना की गई है। रामायण में सिम्हिका देवी का भी उल्लेख मिलता है। इसके एक स्थान पर सीता का चित्रण ‘कालरात्रि’ के रूप में किया गया है।
उपासना शिव−पत्नी के रूप में नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप से होने लगी। यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण में कुछ इसी प्रकार का संकेत मिलता है। उपनिषदों में शक्ति तत्त्व के दार्शनिक पक्ष का विकास मिलता है। सर्वप्रथम बृहदारण्यक उपनिषद् में शक्ति तत्त्व का द्वैतभाव प्रकाश में आया। अद्वय के अंतर्गत छिपे द्वैतभाव की यह कल्पना शक्ति −तंत्रों में विकसित रूप से उपलब्ध होती है।
उपासना शैव धर्म का एक अंग बन गई थी। एक स्थान पर शिव की सहचरी के रूप में उसको स्पष्ट रूप से शिव की शक्ति कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि इस समय तक उसका शिव की शक्ति अथवा माया माना जाने लगा था, जिसका उपनिषदों में उल्लेख किया गया है। महाभारत के भीष्मपर्व के प्रारंभ में दुर्गा पूजा का वर्णन है। यहाँ पर दुर्गा को सिंहों की सेनानेत्री, कालशक्ति , कपालधारिणी, कौमारी, काली, कपालिनी, कपिला, कृष्णपिंगला, भद्रकाली, महाकाली, चंडी, तारिणी, सौम्या तथा सुँदर रूप वाली, कात्यायनी, कराली, विजया, जया आदि कहा गया है।
उपासना से संबंधित चक्र अथवा मंडलाकार चक्रिकाएँ मथुरा, कौशाँबी, राजघाट, बसाढ़, पटना तथा तक्षशिला आदि अनेक स्थानों से प्राप्त हुई हैं। मौर्यकाल में शक्ति −उपासना का प्रमाण मात्देवी की मूर्तियों से मिलता है। मौर्यकालीन मातृदेवी की मृण्मूर्तियाँ प्रागैतिहासिक मूर्तियों की अपेक्षा अधिक विकसित हैं। मौर्यकालीन मौजूदा नमूनों में दीदारगंज की यक्षिणी सुँदरतम की यक्षिणी सुँदरतम कही जा सकती है। कौशाँबी की शुँगकालीन मृण्मृर्तियों में जो कला सौष्ठव है, वह दर्शनीय है।
उपासना का वर्णन हुआ है। सूत्र−साहित्य में सरस्वती का जिक्र है। अंबिका की भी देवी के रूप में विवेचना हुई है। शाँख्यायन गृह्यसूत्र में श्री एवं भद्रकाली का विश्वदेव संबंधी आहुति के प्रसंग में उल्लेख है।
उपासना काफी प्रचलित थी। अन्य देशों में भी इसके विभिन्न स्वरूप मिलते हैं। एशिया माइनर तथा भूमध्यसागरीय प्रदेशों में शक्ति की उपासना प्रायः एक पुरुष देवता के साथ की जाती थी। अफ्रीका में हव अपने पुत्र तनित के साथ, मिस्र में आइसिस के रूप में होसस के साथ, फिनीशिया में अस्थारोथ के रूप में तामुज के साथ, एशिया माइनर में साइबिल के रूप में जियस के साथ पूजी जाती थी। इस प्रकार आर्येतर जातियों का समाज मातृसत्तात्मक था, इसलिए उनके धर्म में माता की प्रधानता प्रतिष्ठित हुई।
उपासना-साधना के इस क्रम का भक्तिभाव और पूर्ण श्रद्धा के साथ निर्वाह करना होता है। मंत्र तभी फलित होते हैं। इसके प्रभाव एवं परिणाम नियम-अनुशासन के अनुपालन में सन्निहित होते हैं। अतः चैत्र नवरात्रि के इस असाधारण समय में इन अनुशासनों का पालन करना चाहिए जिनसे मंत्र की सिद्धि होती है।
उपासना की लोकप्रियता बढ़ी। स्वतंत्र मत के रूप में इस उपास्य देवी का उग्र रूप अधिक उभरा। अपने उग्र रूप में वे महिषासुर, शुँभ, निशुँभ, धूम्रलोचन, रक्त बीज, चंड, मुँड आदि का वध करती है। ब्रह्मवैवर्त्त पुराण के दुर्गाकाँड में देवी के दोनों सौम्य एवं उग्र रूपों का एकत्व स्पष्ट है। वाराह पुराण में उग्र रूप में देवी के सामान्य नाम चंडिका, काली तथा दुर्गा हैं।
उपासना की महत्ता तथा इसके दार्शनिक स्वरूप की महत्ता के रूप में मिलता है।
उपासना के प्राचीनतम पुरातात्त्विक प्रमाण इन्हीं संस्कृतियों से मिले हैं। हड़प्पा में कुछ ऐसी मूर्तियाँ भी उपलब्ध हुई हैं, जिनके पैर नहीं हैं। ये मूर्तियाँ खिलौने नहीं हो सकतीं। सर आरियल स्टाइन ने इन मूर्तियों को बौद्ध तथा यूनानी मूर्तियों के आधार पर ‘पृथ्वीमाता’ की मूर्तियाँ बताया है। मैके के विचार से इन मूर्तियों की उपासना गृहदेवी के रूप में आलों में रखकर की जाती थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-November
उपासना कीजिये, आपकी इच्छा शीघ्र ही पूर्ण होगी।
उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन।
उपासना करने से मनुष्य की प्रत्येक इच्छा पूरी होगी।
उपासना की आवश्यकता पर कभी विचार तक नहीं किया था ऐसे लाखों व्यक्ति इस एक कार्य के अन्दर नैष्ठिक साधक बने हैं, तथा अपने विचार दृष्टिकोण, लक्ष, चरित्र, गुण, कर्म स्वभाव में उन्होंने आश्चर्य जनक परिवर्तन किया है। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के अंतर्गत जो 24 करोड़ जप प्रतिदिन होने का संकल्प था अब ऐसा निश्चय है कि वह संकल्प चिरस्थायी हो गया। इतना जप तो गायत्री परिवार के सदस्यों के द्वारा नियमित रूप से चलता रहेगा। आगे इसमें बराबर वृद्धि भी होती चलेगी। भारी संख्या में जनता का दृष्टिकोण भौतिकता से बदल कर आध्यात्मिकता की ओर जो इस योजना द्वारा मुड़ना आरम्भ हुआ है यह प्रवाह भी दिन-दूनी रात-चौगुनी गति से बढ़ता रहेगा यह भी निश्चय है इस भारतभूमि में ऋषि-युग की पुनः स्थापना करने का स्वप्न साकार होकर रहे तो इसमें कल आश्चर्य न मानना चाहिये।
उपासना कीजिए। यश अवश्य प्राप्त होगा। आपके अपराधों को क्षमा करने वाले केवल भगवान ही हैं। अतः आप उऋणी बनने के लिए, ऋण से मुक्त करने वाली गायत्री माता की आराधना कीजिए। दीनों की मदद करो, अतिथि का सत्कार करो।
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, प्रत्येक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगाये जाने वाले बीज-मंत्रों का साधना विधान आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन।
उपासना करते हुये हृदय की धारण शक्ति और भाव-भक्ति को बढ़ाते जाना चाहिये।
उपासना में संलग्न करना भी है। इन उद्देश्यों की पूर्ति में इस एक वर्ष में बहुत भारी काम हुआ है इतना अधिक कार्य— जितना छुटपुट प्रयत्नों से सैंकड़ों वर्षों में भी संभव न था। इस दृष्टि से इस महान् धर्मानुष्ठान को आशाजनक सफलता प्राप्त हुई है।
उपासना करो।
उपासना करके कर सकते हैं। कर्म करने से क्या नहीं हो सकता? कहा जाता है कि “मनुष्य अगर कर्म करे तो नर का नारायण बन जावे” सर्वस्व कर्म पर ही निर्भर है। यदि आप अच्छे कर्म करोगे तो उसका फल भी आपको अच्छा मिलेगा। भाग्य भी अपने-अपने कर्मों से ही बनता है।
उपासना की पूर्णाहुतियाँ हों जो मथुरा न आ सकें। जो होता यजमान मथुरा न आवें उन्हें आश्वासन दिया जाय कि आप दुख न मानें अगले वर्ष हमारे क्षेत्र में एक बड़ा यज्ञ अवश्य होगा और उसमें आचार्य जी स्वयं आकर पूर्णाहुति करावेंगे। इस आश्वासन से उनकी खिन्नता दूर हो सकती है। जो लोग अधिक उत्साही है उन्हें प्रतिबन्ध के रूप में रोका न जाय। ऐसे लोगों के लिए किसी ने किसी प्रकार ठहराने भोजन आदि की व्यवस्था हो ही जायगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-May
उपासना के अर्थ में आता है तो उसका यह भी अभिप्राय होता है कि मनुष्य अन्य प्राणियों के साथ अपने व्यवहार में ईश्वर को न भूले, ईश्वर आदेशों का ध्यान रखकर ही सबके साथ उचित संपर्क रखे।
उपासना करें। मन्त्र-लेखन की कापियाँ भी यहाँ रखी रहें। चारों और आदर्श वाक्य एवं महापुरुषों के चित्र टंगे हों। यदि यह कोठरी अलग से स्वतंत्र हो तो अधिक उत्तम है, अन्यथा ऐसे कमरे में यह पूजा स्थान बनाना चाहिये जहाँ कम से कम खटपट या आवागमन रहता हो। इस पूजा गृह को जहाँ तक हो सके अधिक सुन्दर सुसज्जित एवं आकर्षक बनाने में उदार एवं कलात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिये।
उपासना के लिए भी उसके आश्रय स्वरूप जड़ प्रकृति की पूजा करनी पड़ती है। हम वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, प्रकाश आदि की उपासना से प्रचुर लाभ उठाते हैं, तब मूर्ति-पूजा से क्यों घबड़ाना चाहिए? उसके द्वारा तो आप अणु-अणु में व्यापक चेतन (सच्चिदानन्द) की पूजा कर रहे होते हैं। आप जिस बुद्धि को या मन को आधारीभूत करके परमात्मा का अध्ययन कर रहे होते हैं क्या वे जड़ नहीं हैं? परमात्मा भी जड़ प्रकृति के बिना कुछ नहीं कर सकता, सृष्टि भी नहीं रच सकता।
उपासना करनी चाहिये। साधना के बल पर ही हम जो चाहें प्राप्त कर सकेंगे।
उपासना से प्रचुर लाभ उठाते हैं, तब मूर्ति-पूजा से क्यों घबड़ाना चाहिए? उसके द्वारा तो आप अणु-अणु में व्यापक चेतन (सच्चिदानन्द) की पूजा कर रहे होते हैं। आप जिस बुद्धि को या मन को आधारीभूत करके परमात्मा का अध्ययन कर रहे होते हैं क्या वे जड़ नहीं हैं? परमात्मा भी जड़ प्रकृति के बिना कुछ नहीं कर सकता, सृष्टि भी नहीं रच सकता। तब सिद्ध हुआ कि जड़ और चेतन का परस्पर सम्बन्ध है।
उपासना भी अविच्छिन्न रूप में जुड़ी हुई है।
उपासना का वातावरण बना रहने से सतोगुण बढ़ता है और अनेकों बुराइयों से बचे रहने का अवसर रहता है। जिस घर में माता की सच्ची मन से उपासना हो, उनकी स्थापना हो, वहाँ सुख शान्ति की, समृद्धि की, सफलता सम्पन्नता की कमी नहीं रहती।
उपासना द्वारा सम्बन्ध स्थापित करना और इस प्रकार जो गति तथा प्रकाश प्राप्त हो उससे अपने कर्म, ज्ञान को प्रकाशित करना, क्रियात्मक जीवन बन जाता है। इसलिए हमें तीनों बातें ध्यान में रखनी चाहिए कि ईश्वर उत्पादन केन्द्र है, हमारे ज्ञान का आदि स्रोत है और आनन्द का आधार है। यदि हम चरित्रवान और सदाचारी होकर अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं तो अपनी बुद्धि का प्रयोग करते समय ईश्वर के आदि स्रोत या मूल आधार होने का ध्यान रखना अनिवार्य हैं।
उपासना के बुद्धि पवित्र नहीं हो सकती, मानसिक मलीनता दूर नहीं हो सकती और इस सफाई के बिना माता का सच्चा प्रकाश कोई उपासक अपने अन्तःकरण से अनुभव नहीं कर सकता। जिसे स्वाध्याय से प्रेम नहीं, उसे गायत्री उपासना से प्रेम है यह नहीं माना जा सकता। बुद्धि की देवी गायत्री का सच्चा भोजन स्वाध्याय ही है। ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं। इसलिये गायत्री उपासना के साथ ज्ञान की उपासना भी अविच्छिन्न रूप में जुड़ी हुई है।
उपासना-प्रार्थना कामना रहित हो
उपासना के अतिरिक्त सद्ज्ञान का प्रसार एवं धर्म सेवा कार्यों का चलते रहना नितान्त आवश्यक है। इसी प्रकार इन छोटे पारिवारिक गायत्री ज्ञान मन्दिरों में भी वे दोनों प्रवृत्तियां चलती रहनी चाहियें। परिवार के लोगों की विवेक बुद्धि सुविकसित होती रहे इसके लिये पूजा की तरह स्वाध्याय को भी घर के हर सदस्य के लिये एक आवश्यक धर्म कार्य बना दिया जाय। स्वाध्याय की आवश्यकता अमुक देवता, अमुक अवतार के चरित्र या अमुक प्राचीन ग्रन्थ को रोज-रोज दुहराते रहने से ही काम नहीं चल सकता। मनुष्य के व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में आती रहने वाली अनेक समस्याओं तथा गुत्थियों को तर्क, विवेक एवं कारण, प्रमाण के आधार पर सुलझाने वाला साहित्य ही स्वाध्याय के लिये लाभदायक एवं उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
उपासनाक्रम, कथावार्ता, सामूहिक संगीत, भजन कीर्तन, शंका समाधान, पञ्चायत, न्याय-व्यवस्था, प्रायश्चित्य, उपनयन आदि संस्कारों एवं पर्व, उत्सवों के सामूहिक आयोजन, धर्म प्रचारक अतिथियों के स्वागत, विश्राम आदि की अगणित धर्म प्रवृत्तियाँ इन मन्दिरों के द्वारा चलती थीं। नियत समय की पूजा के अतिरिक्त सुयोग्य पूजा अधिकारी अपना सारा समय इन प्रवृत्तियों में लगाकर उस मन्दिर को एक प्रकार का प्रकाश स्तम्भ बनाये रहते थे जहाँ से दूर-दूर तक धर्म-भावनाओं की दिव्य लहरें प्रसारित होती रहें।
उपासना स्वाध्याय एवं फेरी के जरूरी कार्यक्रमों को पूर्ण करना चाहिये। 10 पड़ोसियों को पूरा गायत्री ही साहित्य पढ़वाने का कार्य धर्मफेरी में सम्मिलित है। इसे पूरा करने वाले धर्म प्रचारक-ब्रह्मविद्यालय के उपाध्याय माने जायेंगे और महायज्ञ के अवसर पर इनका सार्वजनिक सम्मान किया जायेगा।
उपासना) एवं लोक सेवा के महान कार्य को आगे बढ़ाता है। यह तीन कार्य बड़े विशाल सामूहिक सार्वजनिक देव मन्दिरों के हैं। इन्हें ही बड़े पैमाने पर अधिक विस्तृत क्षेत्र में पूरा समय लगाने वाले पुजारियों को करना होता है। चूँकि पारिवारिक गायत्री ज्ञान मन्दिर छोटे हैं इसीलिये इनके द्वारा उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति छोटे पैमाने पर की जा सकती है। गायत्री परिवार के सदस्य स्वयं ही इन मन्दिरों के संस्थापक, संचालक का पुजारी की जिम्मेदारी पूरा कर सकते हैं।
उपासना करना, (2) ज्ञान मन्दिर साहित्य खरीद कर अपने घर में ज्ञान-मन्दिर स्थापित करना (3) लोगों के घरों पर जाकर धर्मफेरी द्वारा गायत्री का संदेश पहुँचाना। यह त्रिसूत्री कार्यक्रम एक प्रकार से घर-घर में देव मन्दिर स्थापित करने और उनके साथ संलग्न स्वाध्याय (ज्ञान उपासना) एवं लोक सेवा के महान कार्य को आगे बढ़ाता है। यह तीन कार्य बड़े विशाल सामूहिक सार्वजनिक देव मन्दिरों के हैं। इन्हें ही बड़े पैमाने पर अधिक विस्तृत क्षेत्र में पूरा समय लगाने वाले पुजारियों को करना होता है। चूँकि पारिवारिक गायत्री ज्ञान मन्दिर छोटे हैं इसीलिये इनके द्वारा उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति छोटे पैमाने पर की जा सकती है।
उपासना से प्रेम है यह नहीं माना जा सकता। बुद्धि की देवी गायत्री का सच्चा भोजन स्वाध्याय ही है। ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं। इसलिये गायत्री उपासना के साथ ज्ञान की उपासना भी अविच्छिन्न रूप में जुड़ी हुई है।
उपासना के उपरोक्त दो कार्यों के अतिरिक्त प्रत्येक ज्ञान मन्दिर को एक तीसरा कार्य भी करना है वह है-धर्म सेवा, लोक सेवा, जन कल्याण। इसके लिये गायत्री परिवार के सदस्यों को अपने समय में से कुछ समय नित्य नियमित रूप से निकालना चाहिये। ज्ञान प्रसार के लिये ‘धर्मफेरी’ का कार्यक्रम इसके लिये सर्वोत्तम है। लोगों को अन्य कोई भी कीमती चीज देकर भी हम उनकी उतनी सेवा नहीं कर सकते जितनी ज्ञान देकर कर सकते हैं। ज्ञान ही वह पारस है जिसे छूकर लोहे जैसे कलुषित मन स्वर्ग जैसे सुहावने बन सकते हैं।
उपासना में बड़ी सहायता मिलती है। मानस चिन्तन और एकाग्रता की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रतीक रूप में मूर्ति-पूजा की योजना बनी है। साधक अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान की कोई भी मूर्ति चुन लेता है और साधना करने लगता है। उस मूर्ति को देखकर हमारी अन्तः चेतना ऐसा अनुभव करती है मानो साक्षात् भगवान से हमारा मिलन हो रहा है।
उपासना सबसे महत्व की है। क्योंकि गायत्री माता ही शुद्ध बुद्धि की प्रदाता हैं। अगर मनुष्य उसके आदेशानुसार कर्म करे तो उसकी कृपा से ज्ञान-विज्ञान के बड़े से बड़े पद पर अवश्य पहुँच सकता है।
उपासना के उद्देश्य थे वहाँ यह बात भी पूरी गहराई तक जमी हुई थी कि सारे राष्ट्र को, सारे समाज को धर्म प्रेरणा देते रहने के लिए कुछ ऐसे धर्म-सेवियों की आवश्यकता है जो अपनी आजीविका की ओर से निश्चित रहकर सारा मस्तिष्क और सारा समय निर्धारित लक्ष के लिए ही लगाते रह सकें। भगवान को उत्तम पौष्टिक भोजन का नित्य भोग लगने के पीछे यही प्रवृत्ति काम करती है, ताकि पूजा करने वाले धर्म-सेवी लोग अपनी सहज त्याग बुद्धि के कारण रूखा-सूखा खाकर अपने कीमती शरीर को ही क्षीण न करने लगें। यों भगवान तो विदुर के साग, शबरी के बेर, सुदामा के तंदुल एवं तुलसी-पत्र का भोग लगने से भी पूर्ण तृप्त हो सकते हैं, पर भगवान के बहाने इन धर्म-सेवियों के आहार का समुचित ध्यान रखना था। इसलिए दूध, घी, शक्कर, उत्तम अन्न, शाक आदि की व्यवस्था भोग में रखनी आवश्यक समझी गई। भगवान की प्रतिमा स्थापित करने के लिए हर मन्दिर में एक छोटी कोठरी ही रखी जाती है।
उपासना हो, उनकी स्थापना हो, वहाँ सुख शान्ति की, समृद्धि की, सफलता सम्पन्नता की कमी नहीं रहती।
उपासना के साथ ज्ञान की उपासना भी अविच्छिन्न रूप में जुड़ी हुई है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-August
उपासना से वंचित रखा गया होगा। उसी जमाने में गायत्री और यज्ञ भी स्त्रियों को रोका गया होगा। पर किसी थोड़े समय का बुरा इतिहास कभी भी सत्य का या आदर्श का स्थान ग्रहण नहीं कर सकता। भारत में नारियों का दर्जा नर से भी ऊँचा रहा है। उसके नाम के आगे देवी शब्द लगाया जाता है।
उपासना के एक विधान का संकेत तो है, पर यह कहना गलत है कि अब गायत्री को शाप लग चुका और बेकार हो गई। सूर्य और चन्द्रमा की तरह हमारे उपासना आकाश में गायत्री और यज्ञ जो प्रकाशवान एवं प्रधान पिंड है उनकी शाश्वत सत्ता को कोई चुनौती नहीं दे सकता, इनको किसी भी पर्दे में छिपाया नहीं जा सकता। देश काल की परिधि से ये बाहर हैं। सूर्य जो त्रेता में चमकता था वह ही आज भी चमक रहा है, बदला नहीं। सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय आदि के जो धर्म-तत्व द्वापर में थे ये ही आज भी हैं।
उपासना की दुर्गति होना स्वाभाविक ही था।
उपासना करना उचित है। तान्त्रिक साधनाओं में कवच, कीलक, अर्गल का उपयोग करना पड़ता है। जब गायत्री की ताँत्रिक उपासना की जाती है तब कवच, न्यास, शाप, मोचन, कीलक, अर्गल- 24 मुद्राएं करनी होती हैं। यह एक प्रक्रिया विशेष का संकेत है। चारों वेदों की जननी को, ज्ञान विज्ञान की आदि गंगोत्री को कोई ऋषि शाप देगा और वह भी गायत्री के मन्त्र दृष्टा विश्वामित्र द्वारा शाप दिया जायगा यह बातें समझ से बाहर की हैं।
उपासना पुरुष कर सकता है वह नारी भी कर सकती है। भगवान की दृष्टि में नर और नारी, कन्या और पुत्र दोनों समान हैं। हम लड़के को बढ़िया और लड़की को घटिया मानते हैं तो यह भी सोचते हैं कि ईश्वर भी हमारी ही भाँति लड़कियों को बेकार की चीज समझता होगा और उन्हें अपनी गोदी में चढ़ने का, उपासना करने का अवसर न देता होगा, उसे केवल लड़के ही प्यारे होंगे। पर हमारी यह मान्यता नितान्त अस्वाभाविक है। ईश्वर ने, ऋषियों एवं शास्त्रों ने ऐसा भेद-भाव नहीं किया है, स्त्रियाँ गायत्री न जपें इसके प्रतिबन्ध के पीछे विवेक का एक कण भी नहीं है।
उपासना को छोड़कर उस नवीन मत को क्यों ग्रहण करती? रामानन्दी, वैष्णव, शैव और शक्त, साधारण चार सम्प्रदाय अधिक पुराने थे। राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को मानकर चलने वाले लोग कुछ अधिक समय से अपने सम्प्रदाय चला रहे थे। पर पिछले समय में तो इन चारों में से भी प्रत्येक में सैकड़ों शाखाएं, उपशाखाएं फूट पड़ी। इतने बवंडर को देखकर जनता दिग्भ्राँत हो गई, खण्ड-खण्ड में बँट गई, एक भावना, एक उपासना का महत्व नष्ट हो गया, अपनी ढपली अपना राग की तूती बोलने लगी।
उपासना गायत्री को परोक्ष रूप से व्यर्थ सिद्ध करने की कोशिश की, इसके बिना जनता इस अनादि उपासना को छोड़कर उस नवीन मत को क्यों ग्रहण करती? रामानन्दी, वैष्णव, शैव और शक्त, साधारण चार सम्प्रदाय अधिक पुराने थे। राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को मानकर चलने वाले लोग कुछ अधिक समय से अपने सम्प्रदाय चला रहे थे। पर पिछले समय में तो इन चारों में से भी प्रत्येक में सैकड़ों शाखाएं, उपशाखाएं फूट पड़ी। इतने बवंडर को देखकर जनता दिग्भ्राँत हो गई, खण्ड-खण्ड में बँट गई, एक भावना, एक उपासना का महत्व नष्ट हो गया, अपनी ढपली अपना राग की तूती बोलने लगी।
उपासना अधिक है, वहाँ नकद धर्म बहुत है। हमारे यहाँ इस बात में बड़ाई है कि औरों से न मिलें, अपने ही हाथ से पका कर खायें और सबसे अलग रहें वहाँ पर जितना औरों से मिलें उतनी ही बड़ाई है। यहाँ पर अन्य देशों की भाषा पढ़ना दोष-पूर्ण समझा जाता है। वहाँ जितना अन्य देशों की भाषा का ज्ञान प्राप्त किया जाता है, उतना ही अधिक सम्मान होता है।
उपासना सफल हो सकती है। जो जरा बहकाने में डर जाएं उन्हें गायत्री से, न किसी अन्य मन्त्र से कभी सिद्धि मिल सकती है। दृढ़ता, निष्ठा और श्रद्धा हम में कितनी है, इस बात की परीक्षा यह बहकाने वाले लोग लेते रहते हैं। इस प्रकार खरे और खोटे की परख माता करती रहती है। जिनका विश्वास इतना दुर्बल है कि किसी भी औंधे-सीधे आदमी के बहकाने से अपना संकल्प छोड़ बैठें, ऐसे लोगों से पीछा छुड़ाने में माता को प्रसन्नता ही हो सकती है।
उपासना जैसे महान सत्य को भी अपने प्रतिबन्ध में रखना चाहता है। इस दुराग्रह के सामने विचारशीलता नतमस्तक हो जाय और सचाई को तिलाँजलि देकर ‘बावा वाक्यं प्रमाणम्’ के आगे आत्म समर्पण कर दे, यह कठिन है।
उपासना की जाती थी। ये देवता इसी उद्देश्य से पूजे जाते थे कि वे मनुष्यों का कल्याण करें, वे मनुष्यों की उनकी मनोवाँछित वस्तुयें देते थे, उनकी अभिलाषाओं की पूर्ति करते थे, इसी से वे देवता कहलाते थे। इसके विपरीत जो अन्य मनुष्यों के स्वत्वों का, अधिकारों का, सम्पत्ति का अपहरण, शोषण करता था, वह राक्षस माना जाता था। आज की दुनिया ने इस शिक्षा को भुला दिया है और दूसरों को कुछ देने की अपेक्षा उनसे कुछ लेते रहने को ही अपना लक्ष बना लिया है। जब सब कोई, या अधिकाँश भाग ऐसी मनोवृत्ति रखेगा तो सुख, शाँति, सन्तोष की आशा कहाँ से की जा सकती है?
उपासना करने का अवसर न देता होगा, उसे केवल लड़के ही प्यारे होंगे। पर हमारी यह मान्यता नितान्त अस्वाभाविक है। ईश्वर ने, ऋषियों एवं शास्त्रों ने ऐसा भेद-भाव नहीं किया है, स्त्रियाँ गायत्री न जपें इसके प्रतिबन्ध के पीछे विवेक का एक कण भी नहीं है।
उपासना पर से हटाने और उसके स्थान पर अपने सम्प्रदाय के मंत्र एवं पूजा विधान पर लोगों की आस्था जमाने का प्रयत्न किया गया। पिछले दो हजार वर्षों में दो हजार से अधिक मत-मताँतर उपजे, हर प्रभावशाली पंडित ने, हर प्रभावशाली साधू ने यह प्रयत्न किया कि उसके नाम का एक सम्प्रदाय चल पड़े और ईश्वर के स्थान पर उसी की पूजा होने लगे। लोकेषणा की इस दुर्बलता ने उनके द्वारा नये-नये सम्प्रदाय उत्पन्न करवाये, सभी ने वेदोक्त सनातन उपासना गायत्री को परोक्ष रूप से व्यर्थ सिद्ध करने की कोशिश की, इसके बिना जनता इस अनादि उपासना को छोड़कर उस नवीन मत को क्यों ग्रहण करती? रामानन्दी, वैष्णव, शैव और शक्त, साधारण चार सम्प्रदाय अधिक पुराने थे। राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को मानकर चलने वाले लोग कुछ अधिक समय से अपने सम्प्रदाय चला रहे थे।
उपासना आकाश में गायत्री और यज्ञ जो प्रकाशवान एवं प्रधान पिंड है उनकी शाश्वत सत्ता को कोई चुनौती नहीं दे सकता, इनको किसी भी पर्दे में छिपाया नहीं जा सकता। देश काल की परिधि से ये बाहर हैं। सूर्य जो त्रेता में चमकता था वह ही आज भी चमक रहा है, बदला नहीं। सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय आदि के जो धर्म-तत्व द्वापर में थे ये ही आज भी हैं। सतयुग में भी लोग मुँह से खाते और मल-छिद्र से शौच जाते थे आज भी वही प्रक्रिया चल रही है।
उपासना को भी उसका स्थान प्राप्त कराने का प्रयत्न हो रहा है। पर एक बार जो पिछड़ जाता है उसे पुनः अपना स्थान प्राप्त करने में भारी कठिनाई उठानी पड़ती है। पाण्डवों को 12 वर्ष का वनवास हुआ था। वनवास से लौटने के बाद न्याय से राज्य उन्हें मिलना चाहिए था, पर कौरवों के हाथ में सत्ता आ गई थी, सत्ता का लोभ उनसे छूटता नहीं था, वे सुई के बराबर भी जमीन पाँडवों को देने को तैयार न हुए। अन्त में संघर्ष होकर रहा, तब कहीं न्याय की प्रतिष्ठा रह सकी।
उपासना का नियमित क्रम चालू कर दिया जाय। ज्ञान मन्दिर की 52 पुस्तकों का 14) वाला सैट मँगाकर गायत्री पुस्तकालय स्थापित कर लेना चाहिए, वे पुस्तकें 10 व्यक्तियों को पढ़ाकर ‘उपाध्याय’ पद का सम्मान महायज्ञ के समय प्राप्त करने की हर उपासक को तैयारी करनी चाहिए। जिन्हें ज्ञान मन्दिर सैट मँगाने में असुविधा है वहाँ कई साधक मिलकर एक सैट मंगाएं। इस श्रावण मास में अधिकाधिक गायत्री ज्ञान मन्दिर स्थापित हों, इसका पूरा प्रयत्न करना चाहिए।
उपासना का प्रतिपादन करते हैं। मुसलमान अपने किसी भी धार्मिक चिन्ह का अपमान सहन नहीं कर सकता। यदि उनके दिल में आकृति के प्रति श्रद्धा नहीं है तो अपमान के प्रति विरोध भावना कहाँ से प्रगट होती है? किसी धार्मिक कृत्य पर सुगंध करना, स्वच्छ या नवीन वस्त्र पहनना, नियमित रूप से नमाज पढ़ना, रोजे रखना आदि कृत्य सब मूर्ति पूजा के ही तो परोक्ष अंग हैं।
उपासना की जाती है तब कवच, न्यास, शाप, मोचन, कीलक, अर्गल- 24 मुद्राएं करनी होती हैं। यह एक प्रक्रिया विशेष का संकेत है। चारों वेदों की जननी को, ज्ञान विज्ञान की आदि गंगोत्री को कोई ऋषि शाप देगा और वह भी गायत्री के मन्त्र दृष्टा विश्वामित्र द्वारा शाप दिया जायगा यह बातें समझ से बाहर की हैं। संस्कृत की किसी पुस्तक में कोई बात कहीं लिखी मिले तो उसे वेद-वाक्य ही नहीं मान लेना चाहिए। जिस प्रकार आज राष्ट्र भाषा हिन्दी है और हिन्दी में भली-बुरी झूठी-सच्ची सभी तरह की बातें छपी मिलती हैं उसी प्रकार किसी जमाने में संस्कृत राष्ट्र भाषा थी उसमें सभी प्रकार के विचार के लोगों ने सभी तरह की बातें लिखी हैं।
उपासना का महत्व नष्ट हो गया, अपनी ढपली अपना राग की तूती बोलने लगी। इस दुरवस्था में गायत्री-उपासना की दुर्गति होना स्वाभाविक ही था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-February
उपासना को ऋषियों ने प्रत्येक भारतीय का आवश्यक धर्म कर्तव्य घोषित किया है। हाड़-माँस का शरीर माता-पिता के रज-वीर्य से बनता है। पर हमारा आध्यात्मिक जीवन, जिसे ‘द्विजत्व’ कहते हैं। गायत्री माता और यज्ञ पिता के संयोग से ही बनता है। गायत्री सनातन एवं अनादि मन्त्र है।
उपासना से सैकिंड डिवीजन में पास हो गया। दूसरी बात मेरे छोटे भाई रामेश्वरप्रसाद गुप्ता के डिपार्टमेंटल इम्तहान के सम्बन्ध में थी। वह भी उत्तीर्ण हो गया और वेतन वृद्धि भी हो गई। तीसरी बात मेरे एक मित्र ब्रज पतिनारायण की पुत्री के विवाह के सम्बन्ध में था। यह कार्य भी बहुत अच्छी तरह हो गया और रुपये की व्यवस्था बिना किसी कठिनाई के सहज में हो गई।
उपासना के अतिरिक्त सेवा और दया की सत्प्रवृत्तियों को विकसित कराना भी है। धर्म संस्थाओं के कार्यकर्ता दयालुता और सेवा आनन्द से अपने सद्गुणों को निरन्तर विकसित करते रहें, साथ ही जन साधारण के कष्टों में कमी होती रहे इस दृष्टि से धर्म संस्थाओं में चिकित्सा एवं आरोग्य शिक्षा को भी प्रमुख स्थान दिया जाता रहा है। बौद्ध धर्म के प्रायः सभी ‘विहारों’ में बड़े-बड़े आरोग्याश्रम एवं चिकित्सालय स्थापित थे, जिनमें बौद्ध भिक्षु उपासना के साथ ही पीड़ितों की सेवा करके अपनी साधना को सर्वांग पूर्ण बनाते थे। महर्षि अश्विनीकुमार, चरक, सुश्रुत, वागभट्ट, शार्गंधर, माधव प्रभृति असंख्य ऋषियों ने अपना सम्पूर्ण जीवन ही मानव जाति की आरोग्य सेवा में लगाया था।
उपासना के साथ ही पीड़ितों की सेवा करके अपनी साधना को सर्वांग पूर्ण बनाते थे। महर्षि अश्विनीकुमार, चरक, सुश्रुत, वागभट्ट, शार्गंधर, माधव प्रभृति असंख्य ऋषियों ने अपना सम्पूर्ण जीवन ही मानव जाति की आरोग्य सेवा में लगाया था।
उपासना के लिए गोरेगाँव (बम्बई) से श्री आचार्य जी के पास तपोभूमि मथुरा में आ गये हैं। इसलिए जो सज्जन उनसे पत्र व्यवहार करे वे अब “गायत्री तपोभूमि, मथुरा” के पतेदार पत्र भेजें।
उपासना परायण व्रती को यही अनोखा लाभ मिलता है। इस प्रकार व्रतानुष्ठान द्वारा आधिभौतिक, आधिदैविक आध्यात्मिक, त्रिविधि कल्याण प्राप्त होते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-January
उपासना का उतना अधिक महत्व नहीं है, जितना कि सामाजिक रीति-रिवाजों का। क्योंकि दूसरे के धर्म के देवता की उपासना करने के ऊपर किसी को बुरा-भला नहीं कहा जाता, न कोई दण्ड दिया जाता है, पर सामाजिक रीति-रिवाजों और रूढ़ियों को भंग करने से जाति-बहिष्कार का भयंकर अस्त्र तुरन्त काम में लाया जाता है।
उपासना आरम्भ कर दी और एक दिन-रात के सात बजे हजार आहुति का हवन करने भी बैठ गये। जिस समय रात के 12 बजे तो सफेद साड़ी पहिने एक काली सी स्त्री खिड़की के पास प्रकट हुई और बोली “मैं जाती हूँ, मुझे स्थान बतलाओ अब यहाँ मैं पल भर भी नहीं ठहर सकती।” पर वे हवन करते ही रहे और नतीजा यह हुआ कि घण्टे भर बाद वह प्रेत छाया अदृश्य हो गई। तब से उस घर में शाँति है।
उपासना करने के ऊपर किसी को बुरा-भला नहीं कहा जाता, न कोई दण्ड दिया जाता है, पर सामाजिक रीति-रिवाजों और रूढ़ियों को भंग करने से जाति-बहिष्कार का भयंकर अस्त्र तुरन्त काम में लाया जाता है।
उपासना भी करते हैं। इससे यह जान पड़ता है कि हिन्दु-समाज में देवता की उपासना का उतना अधिक महत्व नहीं है, जितना कि सामाजिक रीति-रिवाजों का। क्योंकि दूसरे के धर्म के देवता की उपासना करने के ऊपर किसी को बुरा-भला नहीं कहा जाता, न कोई दण्ड दिया जाता है, पर सामाजिक रीति-रिवाजों और रूढ़ियों को भंग करने से जाति-बहिष्कार का भयंकर अस्त्र तुरन्त काम में लाया जाता है।
उपासना करने से निःसंदेह सबका कल्याण ही होता है।
उपासना में संलग्न हुये थे। 1955 चैत्र की नवरात्रियों में आप तपोभूमि मथुरा भी गये थे और वहाँ आचार्य जी से अपनी मनोकामना कह सुनाई। उन्होंने साधना में लगे रहने को कहा। माता की कृपा से इसी 14 अगस्त को इनके घर में 18 वर्ष के बाद पुत्र का जन्म हुआ, जिससे सबको बड़ा आश्चर्य और प्रसन्नता हुई।
उपासना और भक्ति करने वाले सम्प्रदाय प्राचीनकाल में ही उन्नत दशा को पहुँच चुके थे। उसके साथ-साथ ही गन्ध, माला, वेश आदि खास तरह के सम्प्रदाय व्यवहार के नियम भी अस्तित्व में आये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-June
उपासना के उपकरण रहें वहाँ गायत्री साहित्य भी अवश्य रहे और वह साहित्य मँगाकर रख ही न लिया जाय वरन् संस्थापकों का कर्तव्य है कि जिस प्रकार बीमा कम्पनी के एजेन्ट अपना ग्राहक बनाने के लिए कई-कई चक्कर लोगों के घरों पर लगाते हैं, और बीमा का महत्व समझाते हैं उसी प्रकार गायत्री साहित्य को पढ़वाने के लिए उसके सम्बन्ध से आवश्यक बातें समझाने के लिए धार्मिक अभिरुचि के लोगों के यहाँ कई-कई बार चक्कर लगाने चाहिएं। जिस प्रकार चुनाव जीतने के लिए वोटरों को घर-घर जाकर समझाना और अपने पक्ष में प्रभावित करना पड़ता है, उसी प्रकार गायत्री परिवार के सदस्यों का भी कर्त्तव्य है कि वे सद्ज्ञान की देवी गायत्री और सत्कर्म के देवता यज्ञ का सन्देश घर-घर पहुँचाने में शक्ति भर प्रयत्न करें, उसमें कोई कमी न रहने दें।
उपासना करनी हो तो आकृति के भीतर लाल के बदले पीला रंग भरना चाहिए और ध्यान के समय “ॐ क्लीं नमः” का जप करते रहना चाहिए। इस अभ्यास के पूरा होने पर लक्ष्मी की प्राप्ति में वृद्धि होती है।
उपासना के लिए ग्रहण कर सकते हो, इतना ही नहीं, तुम उसे सभी अवतारों में श्रेष्ठ स्थान भी दे सकते हो इसमें कोई हानि नहीं, क्योंकि तुम्हारे धर्म-साधन का मूल आधार तो सनातन तत्व समूह ही रहेगा। इस बात पर विशेष विचार करने से जान पड़ेगा कि चाहे कोई अवतार क्यों न हो, वैदिक सनातन तत्वों का जीता-जागता नमूना होने के कारण ही वह हमारे लिए मान्य होता है। श्रीकृष्ण की यही महानता है कि वे इस तत्वात्मक सनातन धर्म के श्रेष्ठ प्रचारक और वेदान्त के सब से बढ़कर व्याख्याता हैं।
उपासना करके किसी प्रकार की सिद्धि प्राप्त कर सकना अत्यन्त कठिन हो गया है।
उपासना को छोड़ दिया है अगर वे फिर से स्वयं को और अपनी सन्तान को गायत्री-उपासक बना दें, तो उनका हर तरह से कल्याण होगा और हमारा देश भी सब प्रकार उन्नति-शील बनकर अपने प्राचीन वैभव और शक्ति को प्राप्त कर सकेगा।
उपासना नित्य प्रति की जाती है वह सम्पन्नता की ओर अग्रसर होने लगता है। जिन लोगों ने विदेशी शिक्षा के प्रभाव से इन दिनों गायत्री-उपासना को छोड़ दिया है अगर वे फिर से स्वयं को और अपनी सन्तान को गायत्री-उपासक बना दें, तो उनका हर तरह से कल्याण होगा और हमारा देश भी सब प्रकार उन्नति-शील बनकर अपने प्राचीन वैभव और शक्ति को प्राप्त कर सकेगा।
उपासना, एवं उसके तत्वज्ञान संबंधी सभी बातें आई हैं शेष 26 पुस्तकों में गायत्री की व्याहृतियों समेत एक-एक अक्षर की व्याख्या की गई है और उसमें सन्निहित धार्मिक, नैतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक शिक्षाओं का बहुत ही उत्तम विवेचन किया गया है। चार-चार आना मूल्य की यह 52 पुस्तकें ग्लेज कागज पर छपी, आर्ट पेपर पर तिरंगे टाइटल लगने से और भी सुन्दर बन गई हैं। उच्च कोटि का साहित्य, यह भी अच्छा नयनाभिराम एवं अत्यन्त सस्ता होने के कारण उस उद्देश्य की पूर्ति में बहुत सहायक हो सकता है जिनको लेकर गायत्री परिवार की स्थापना की गई है। सद्ज्ञान से मानव समाज की आत्मा में धर्म का प्रकाश उत्पन्न करना एक महान् लोक सेवा है। इस लोक सेवा साधन रूप में यह ज्ञान मन्दिर साहित्य बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-March
उपासना के तीन अंग होते हैं। अंगन, नामकरण और भजन। वे लोग शंख, चक्र आदि की गर्म मुद्राओं से अपना शरीर दाग देते हैं। यही अंकन कहलाता है। अपनी संतानों का नाम विष्णु पर्यायवाची शब्दों पर रखना नामकरण कहा जाता है।
उपासना में अपना जीवन यापन करती थी।
उपासना बतलाई। उस पुराण में श्रीकृष्ण को पूर्ण ईश्वरत्व मानकर बताया है कि वे ही मायातीत, गुणातीत, निमय और सत्य हैं। वे पूर्ण जीवन सम्पन्न नाना रत्न विभूषित, पीताम्बरधारी और मुरलीधर रूप में सर्वदा गोलोक में निवास करते हैं। इसके अतिरिक्त उस पुराण में श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का भी अद्भुत और अलौकिक वर्णन किया गया है। बल्लभचार्य जी ने श्रीकृष्ण के इसी रूप की पूजा करने का उपदेश दिया है।
उपासना, आस्तिकता, ईश्वर भक्ति, धर्म भावना, आध्यात्मिकता का वातावरण उत्पन्न करना इस यज्ञ का प्रधान उद्देश्य है। जप, तप, व्रत, उपवास करके आने वाले नैष्ठिक याज्ञिकों के द्वारा इतने विशाल परिमाण में गायत्री महामंत्र की आहुतियाँ दी जायेंगी। उनका प्रचण्ड आध्यात्मिक प्रभाव उत्पन्न होगा। यज्ञ में सम्मिलित होने वाले याज्ञिकों भागीदारों को तो उसका विशेष लाभ मिलेगा ही साथ ही विश्वव्यापी धर्म प्रवाह की शक्ति तरंगें भी इसके द्वारा प्रचुर परिमाण में उत्पन्न होंगी। यज्ञ लौकिक और पारलौकिक सुख शान्ति की श्रेष्ठ साधना है।
उपासना ही करता रहता और कभी-कभी माता से अपने स्थानान्तर की प्रार्थना भी कर बैठता था। माता ने आदेश दिया कि दो मास में हो जायेगा। भरोसा न होते हुए मैंने अर्जी भेज दी और वास्तव में डेढ़ मास बाद ही मेरा तबादला जबलपुर क्षेत्र में हो गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-July
उपासना करने में इसका हमेशा अनुभव होता है। उपासना में भ्रम का कुछ आधार लेना पड़ता है। आखिर में वह आधार उड़ जाता है। फिर वह उपासना आदत में रहे या छूट जाय, दोनों बातें हो सकती हैं। परन्तु जब तक उसकी जरूरत है, तब तक उसके मूल में जैसे विचार होता है, वैसे भ्रम भी होता है।
उपासना नहीं टिकेगी। जहाँ विचार और भ्रम दोनों होते हैं, वहीं उपासना होती है। यही दृष्टान्त हृदय-परिवर्तन की प्रक्रिया के लिए लागू होता है।
उपासना में अपूर्व परमानन्द प्राप्त होता है, उसकी अपूर्व महिमा से भी मैं भली प्रकार परिचित हूँ। परन्तु भाइयों! इस समय हमको रोने-धोने का समय नहीं है। हम लोग काफी रो धो चुके हैं। अब हम लोगों को कोमल भावों के ग्रहण करने का समय नहीं है। इस तरह की कोमलता की सिद्धि करते-करते हम लोग इस समय मुर्दे सरीखे हो रहे हैं, हम लोग रुई की तरह कोमल हो गये हैं।
उपासना होती है। यही दृष्टान्त हृदय-परिवर्तन की प्रक्रिया के लिए लागू होता है।
उपासना और मन्त्र शक्ति में काफी पिछड़ा हुआ है। यद्यपि जामनगर, राजकोट, गाँडल, भावनगर, जूनागढ़ आदि कुछ इने गिने शहरों में महान् विद्वान् पंडित पाये जाते हैं, तो भी अन्य स्थानों में उनकी कमी है। पर इसके साथ ही वहाँ की जनता बड़ी धर्म जिज्ञासु और सत्पुरुषों का आदर सत्कार करने वाली है।
उपासना टिकेगी ही नहीं और केवल भ्रम में भी उपासना नहीं टिकेगी। जहाँ विचार और भ्रम दोनों होते हैं, वहीं उपासना होती है। यही दृष्टान्त हृदय-परिवर्तन की प्रक्रिया के लिए लागू होता है।
उपासना करते हैं।
उपासना काण्ड के अंतर्गत हैं।
उपासना आदत में रहे या छूट जाय, दोनों बातें हो सकती हैं। परन्तु जब तक उसकी जरूरत है, तब तक उसके मूल में जैसे विचार होता है, वैसे भ्रम भी होता है। शुद्ध विचार में उपासना टिकेगी ही नहीं और केवल भ्रम में भी उपासना नहीं टिकेगी। जहाँ विचार और भ्रम दोनों होते हैं, वहीं उपासना होती है। यही दृष्टान्त हृदय-परिवर्तन की प्रक्रिया के लिए लागू होता है।
उपासना में भ्रम का कुछ आधार लेना पड़ता है। आखिर में वह आधार उड़ जाता है। फिर वह उपासना आदत में रहे या छूट जाय, दोनों बातें हो सकती हैं। परन्तु जब तक उसकी जरूरत है, तब तक उसके मूल में जैसे विचार होता है, वैसे भ्रम भी होता है। शुद्ध विचार में उपासना टिकेगी ही नहीं और केवल भ्रम में भी उपासना नहीं टिकेगी।
उपासना बताई जायगी। मैं उन्नतिशील भारत से सचाई के साथ पूछता हूँ कि क्या यह धार्मिक शिक्षा का, हजारों वर्ष पहले जमाने का ‘शिक्षा-क्रम’ जीर्ण-शीर्ण नहीं हो गया है? हम चाहते हैं कि भारत के भावी निर्माता आधुनिक आचार्यों के ग्रन्थों का अध्ययन करें, वे संसार भर के परम बुद्धिमान लोगों से ज्ञान सीखें, वे धर्म की ओर तर्क सिद्ध मत और व्यक्तित्व के आधुनिक ढंग से बढ़ें और इस तरह अपने लिए दृढ़ तथा मौलिक आधार स्थिर करें। उनके भीतर अवैज्ञानिक विचारों के ठूँसने से फायदा ही क्या? सत्य के स्थान पर उन्हें झूठ और सच की खिचड़ी बेतुकी और परस्पर विरोधी बातें बतलाने में भलाई ही क्या?
उपासना करते हैं और वह उनमें भी घोर अंधकार में जाते हैं जो विकृति की उपासना करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-September
उपासना को धता बता देंगे।
उपासना तथा आत्म निर्माण के पथ पर अग्रसर करने का संकल्प ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का ब्रह्म-भोज है। इस कार्य-क्रम को महायज्ञ के होता यजमानों ने बड़े उत्साह और साधकोचित श्रद्धा से सम्पन्न किया है। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान साहित्य का बड़ी संख्या में वितरण किया जा रहा है तथा ज्ञान मन्दिरों की स्थापना प्रत्येक गायत्री प्रेमी के घर पर की जा रही है। ज्ञान मन्दिर सैट को 10 व्यक्तियों को पढ़ाकर धर्म प्रचारक या उपाध्याय बनने के लिए सभी सच्चे साधक प्रयत्नशील हैं। यही परम्परा आगे भारत भूमि में ऋषि-युग लाने का प्रधान आधार बनेगी।
उपासना तीन विषय हैं। कर्म का अभिप्राय-कर्म -काण्ड से है कर्मकाण्ड यज्ञ को कहते हैं। वेदों का है। यों तो सभी वेदमंत्र ऐसे हैं जिनकी शक्ति को प्रस्फुरित करने के लिए उनका उच्चारण करते हुए यज्ञ करने की आवश्यकता होती है।
उपासना करने से दर्पण के प्रतिबिम्ब एवं कुएं की आवाज की तरह वे भी हमारे लिए उसी प्रकार प्रत्युत्तर देते हैं। संसार में सबसे अधिक स्नेह- मूर्ति माता होती है। भगवान की माता से रूप में उपासना करने से प्रत्युत्तर में उनका अपार वात्सल्य प्राप्त होता है। मातृ पूजा से नारी जाति के प्रति पवित्रता सदाचार एवं आदर के भाव बढ़ते हैं जिनकी मानव जाति को आज अत्यधिक आवश्यकता है।
उपासनाएं या धर्म प्रक्रियाएं ऐसी हैं जो अकेला कर या करा सकता है। पर यज्ञ ऐसा कार्य है जिसमें अधिक जनता के सहयोग की जरूरत है होली आदि बड़े यज्ञ तो सदा सामूहिक ही होते हैं। यज्ञ आयोजनों में सामूहिकता, सहकारिता और एकता की भावनाएं विकसित होती हैं।
उपासना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है।
उपासना है। बीच के अन्धकार युग में अनेक मतमतान्तर उपज पड़े और विघटनात्मक भारी मतभेद खड़े हो जाने से हिन्दू जाति विशृंखलित हो गई। धार्मिक एकता एवं भावनात्मक एकता को लाने के लिये यज्ञ आयोजनों की सर्वमान्य साधना का आश्रय लेना सब प्रकार दूरदर्शितापूर्ण है।
उपासना से मनुष्य की अनेक कठिनाइयाँ हल होती हैं। ऐसे अनेकों उदाहरण मौजूद हैं कि जो लोग आरम्भ में दरिद्रता का अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करते थे, अपने मामूली गुजारे की भी व्यवस्था जिनके पास न थी, कर्ज के बोझ से दबे हुए थे, उपासना की और अर्थ संकट को पार करके ऐसी स्थिति पर पहुँच गए कि जिससे अनेकों को ईर्ष्या होती है। कम पढ़े और छोटी नौकरियों पर काम करने वालों को ऊंचे पद पर पहुँचने के उदाहरण मौजूद हैं। जिनकी बुद्धि बड़ी ही भौंड़ी और मन्द थी वे चतुर तीक्ष्ण बुद्धि और विद्वान बने हैं। जिनकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की कोई आशा नहीं करता था, ऐसे विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास हुए हैं।
उपासना कर सकती हैं। विधवाएं आत्म-संयम इन्द्रिय निरोध, मनोनिग्रह, एवं सात्विकता की वृद्धि करने में गायत्री की सहायता से सफल होती हैं। वे घर में रहकर इस तपस्या द्वारा आत्मकल्याण, प्रभु प्राप्ति एवं जीवन मुक्ति प्राप्त कर सकती हैं। कुमारी कन्याओं की गायत्री साधना उनको अच्छे घर वर तथा अनन्त सौभाग्य प्राप्त करने में सहायक होती है। सधवाएं गायत्री साधना द्वारा दाम्पत्य जीवन में प्रेम, घर में सुख शान्ति एवं समृद्धि, बालकों का कुशलक्षेम प्राप्त करती हैं।
उपासना एक प्रकार का आध्यात्मिक व्यायाम है, जिसका परिणाम जीवन और शरीर को पुष्ट बलवान एवं सुव्यवस्थित बनाना है। सकाम कामना के लिए की हुई गायत्री साधना से अभीष्ट परिणाम प्राप्त न भी हों तो भी उसका शुभ परिणाम अन्य मार्ग से अवश्य प्राप्त हो जाता है। कोई बड़ी कुश्ती पछाड़ने के लिए कोई व्यक्ति अखाड़े में आया करे तो उसका शरीर दिनोंदिन अवश्य मजबूत होगा। वह मनोवाँछित कुश्ती पछाड़ने में सफल न भी हो तो यह नहीं सोचना चाहिए कि उसका व्यायाम तथा पौष्टिक आहार व्यर्थ चला गया। कुश्ती वह भले ही हार जाय पर निरोगिता, स्फूर्ति, जीवनशक्ति, दीर्घजीवन, कमाने की क्षमता, बलवान सन्तान, शत्रुओं से निबट लेने की सामर्थ्य आदि अनेकों लाभ प्राप्त होते हैं, जिन्हें पछाड़ने से कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए।
उपासना के साथ-साथ उसे यज्ञ शक्ति से भी समन्वित करना है। गायत्री और यज्ञ की सम्मिलित शक्ति से उत्पन्न सूक्ष्म तरंगें संसार के लिए भारी कल्याण कारक अवसर उत्पन्न करती हैं। यज्ञ की शक्ति का कुछ परिचय आगे के लेख में दिया जा रहा है।
उपासना कभी भी असफल नहीं होती अटल प्रारब्ध का कोई सुनिश्चय न टल सके तो भी अन्य अनेकों रीतियों से उपासना साधक के लिए शुभ परिणामों का आयोजन करती है।
उपासना भगवान को अन्य सब साधनाओं की अपेक्षा अधिक प्रिय है।
उपासना में तभी सफलता मिलती है जब पहले गायत्री द्वारा उस मन्त्र या देवता को जागृत कर लिया जाय। कहा भी है—
उपासना और भूली हुई यज्ञ प्रक्रिया के महान लाभों से प्रत्येक भारतीय को परिचित करा देना और इन मानव जीवन की अत्यंत उपयोगी आवश्यकताओं को घर-घर में प्रचलित करके इस भारतभूमि को पुनः ऋषि भूमि बना देने का स्वप्न साकार करना भी इस पूर्णाहुति का उद्देश्य है।
उपासना प्रत्यक्ष तपश्चर्या है। इससे तुरन्त आत्मबल बढ़ता है। गायत्री साधना एक बहुमूल्य दिव्य सम्पत्ति है। इस सम्पत्ति को इकट्ठी करके साधन उसके बदले में साँसारिक सुख एवं आत्मिक आनन्द भली प्रकार प्राप्त कर सकता है।
उपासना साधक के लिए शुभ परिणामों का आयोजन करती है।
उपासना करते रहने में कोई हानि नहीं। सच तो यह है कि अन्य किसी भी मन्त्र का जप करने में या देवता की उपासना में तभी सफलता मिलती है जब पहले गायत्री द्वारा उस मन्त्र या देवता को जागृत कर लिया जाय। कहा भी है—
उपासना करके स्वस्थ, तेजस्वी, बुद्धिमान, दीर्घजीवी एवं भाग्यवान बालक प्राप्त करती हैं।
उपासना के साथ-साथ अन्य कोई उपासना करते रहने में कोई हानि नहीं। सच तो यह है कि अन्य किसी भी मन्त्र का जप करने में या देवता की उपासना में तभी सफलता मिलती है जब पहले गायत्री द्वारा उस मन्त्र या देवता को जागृत कर लिया जाय। कहा भी है—
उपासना के जप,ध्यान के साथ-साथ यह ब्रह्मभोज भी जिन साधकों के जीवन में चलता है वस्तुतः वो ही सच्चे साधक हैं, उन्हीं की साधना धन्य है, वो ही लोक-परलोक में सच्ची सुख-शान्ति की स्थापना करेंगे।
उपासना करने से प्रत्युत्तर में उनका अपार वात्सल्य प्राप्त होता है। मातृ पूजा से नारी जाति के प्रति पवित्रता सदाचार एवं आदर के भाव बढ़ते हैं जिनकी मानव जाति को आज अत्यधिक आवश्यकता है।
उपासना के प्रभाव से सुसन्तति निर्माण का महत्वपूर्ण लाभ होता है। प्राचीन काल में अवतारी महापुरुषों के जन्म दाताओं को कठोर तप करने पड़े हैं। भगवान कृष्ण को जन्म देने वाले देवकी वासुदेव ने, भगवान राम को जन्म देने वाले कौशल्या दशरथ ने पूर्व जन्मों में इसी प्रकार के तप किये थे। पाँच पाँडव और छठे कर्ण जैसे असाधारण महापुरुषों को जन्म देने का श्रेय कुन्ती के तप को ही है। हनुमान जी को जन्म देने वाली अंजनी की तपस्या प्रसिद्ध है।
उपासना की और अर्थ संकट को पार करके ऐसी स्थिति पर पहुँच गए कि जिससे अनेकों को ईर्ष्या होती है। कम पढ़े और छोटी नौकरियों पर काम करने वालों को ऊंचे पद पर पहुँचने के उदाहरण मौजूद हैं। जिनकी बुद्धि बड़ी ही भौंड़ी और मन्द थी वे चतुर तीक्ष्ण बुद्धि और विद्वान बने हैं। जिनकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की कोई आशा नहीं करता था, ऐसे विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास हुए हैं। झगड़ालू, चिड़चिड़े, क्रोधी, व्यसनी, बुरी आदतों में फँसे हुए, आलसी एवं मूढ़मति लोगों के स्वभाव में ऐसा परिवर्तन हुआ है कि लोग दाँतों तले उँगली दबाए रह गए।
उपासना के लिए बचाने चाहिएं। यदि दो पैसे रोज भी बचाये जाएं तो एक वर्ष में बारह रुपया होते हैं। इससे प्रति सप्ताह चार आने मूल्य की एक पुस्तक खरीदी जा सकती है। यह ज्ञान प्रसार का ‘ब्रह्म-विद्यालय’ हर धर्मप्रेमी आसानी से चला सकता है। दो पैसा रोज सच्चे ब्रह्मदान के लिए खर्च करते रहना किसी गरीब आदमी के लिए भी मुश्किल बात नहीं है।
उपासना हो या कौल एवं ताँत्रिक प्रयोग का जाप, बिना गायत्री के वे सब निष्फल होते हैं। इसलिए गायत्री उपासना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है।
उपासना से हजारों गुना महत्वपूर्ण समझ कर अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। उसी का फल है कि बौद्ध धर्म आज भी ईसाई धर्म के बाद दूसरे नम्बर पर है, और संसार के एक बड़े भाग की जनता बौद्ध धर्म की अनुयायी है।
उपासना की जाय, कोई कामनापूर्ति की शर्त न लगाई जाय क्योंकि मनुष्य अपने वास्तविक लाभ हानि और आवश्यकता को स्वयं उतना नहीं समझता जितना घट-घट वासिनी सर्वं शक्तिमान माता समझती है। वह हमारी वास्तविक आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करती है। प्रारब्धवश कोई अटल दुर्भाग्य न भी टल सके तो भी साधना निष्फल नहीं जाती। वह किसी न किसी अन्य मार्ग से साधक को उसके श्रम की अपेक्षा अनेक गुना लाभ अवश्य पहुँचा देती है। सबसे बड़ा लाभ आत्म कल्याण है।
उपासना आरम्भ करते ही साधक को ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे आत्मिक क्षेत्र में एक नई हलचल एवं रद्दोबदल आरम्भ हो गई है। सतोगुणी तत्वों की अभिवृद्धि होने से दुर्गुण, कुविचार, दुःस्वभाव एवं दुर्भाव घटने आरम्भ हो जाते हैं और प्रेम, नम्रता, पवित्रता, उत्साह, स्फूर्ति, श्रमशीलता, मधुरता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, उदारता प्रेम, सन्तोष शाँति, सेवा भाव, आत्मीयता, आदि सद्गुणों की मात्रा दिन दिन बड़ी तेजी से बढ़ती जाती है। फलस्वरूप लोग उसके स्वभाव एवं आचरण से सन्तुष्ट होकर बदले में प्रशंसा, कृतज्ञता, श्रद्धा एवं सम्मान के भाव रखते हैं और समय-समय पर उसकी अनेक प्रकार से सहायता करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त सद्गुण स्वयं इतने मधुर होते हैं कि जिस हृदय में इनका निवास होता है वहीं आत्मसन्तोष की परम शान्तिदायक शीतल निर्झरणी सदा बहती रहती है। ऐसे लोग सदा स्वर्गीय सुख का आस्वादन करते हैं।
उपासना की ओर बढ़े थे कि दस-पाँच मिनट औंधा-सीधा जप महीना पन्द्रह दिन करके सारी ऋद्धि-सिद्धियों के सम्पत्ति समृद्धियों के स्वामी बन जायेंगे और अपना मतलब पूरा होते ही उपासना को धता बता देंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-October
उपासना, हवन, कीर्तन विचार विनिमय, श्रमदान आदि कार्यों की, अपने बच्चों को जीवनोपयोगी शिक्षा देने की, अपने विचार के लोगों में विवाह शादी करने की, योजनाएं बनाई जा रही हैं। हममें से कोई व्यक्ति अपने पीछे अनाथ परिवार छोड़ जाय तो उसके परिवार के भरण पोषण की सम्मिलित जिम्मेदारियाँ रखने का विचार किया जा रहा है। इन आदर्शों और उद्देश्यों पर अनेकों गायत्री-नगर ऋषि-नगर, स्थान-स्थान पर बसें इसकी तैयारियाँ हो रही हैं। यह कार्यक्रम जैसे-2 आगे बढ़ेगा वैसे-2 जन साधारण को एक नया प्रकाश, एक नई प्रेरणा, एक नया वातावरण प्राप्त होगा और उससे प्रभावित होकर लोग अपने व्यक्ति गत जीवन को मानवता के श्रेष्ठ आदर्श से परिपूर्ण बनाने की ओर, आत्म संयम और लोकहित की ओर अग्रसर करेंगे।
उपासना काण्ड में जो स्वतन्त्रता है वह मानों स्वतन्त्र विचार करने का स्पष्ट आदेश है। अहिन्दू धर्म में जो उपासना-कर्म में स्वतंत्रता नहीं है वह मानो स्वतन्त्र विचार करने का निषेध है। साराँश यह कि हिन्दू धर्म स्वतन्त्र विचारों का पक्षपाती और समर्थक है तथा अहिन्दू धर्म स्वतन्त्र विचारों का विरोधी और बाधक है। विद्वान व दूरदर्शी लोग भली भाँति जानते हैं कि साँसारिक उन्नति और आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति के लिए स्वतन्त्र विचारों की कितनी बड़ी आवश्यकता रहती है। इस दृष्टि से देखिये कि संसार के लिए हिन्दू धर्म अधिक उपयोगी है अथवा सेमिटिक (पैगम्बरी) मजहब?
उपासना के लिए समय नहीं निकाल पाते, वे इन दिनों साँसारिक कामों से अवकाश लेकर साधना रत होते हैं, अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य इस पर्व पर अपनी सुविधा के अनुरूप कुछ न कुछ समय नवरात्रि में विशेष गायत्री साधना के लिए निकालते हैं। इस बार भी सभी परिजनों को वैसा करना चाहिए।
उपासना केन्द्र से लिखा हुआ आना चाहिए। साथ ही यह भी उल्लेख रहना चाहिए कि उस आक्रमण से अपनी सेना के कितने साथी घायल हो गये, कितने पीठ दिखाकर भाग गये तथा कितनों ने उनका मुकाबला किया। नृसिंह का कार्य किन-किन वीर पुरुषों ने कितनी सीमा तक पूर्ण किया।
उपासना और (2) स्वाध्याय का चस्का लगाया जा रहा है। वे उपासना और स्वाध्याय के आवश्यक धर्म कर्तव्यों को न छोड़ने पायें इसके लिये विशिष्ट सदस्य बार-बार प्रेरणा देते रहते हैं। दूसरी श्रेणी में वरिष्ठ सक्रिय सदस्य हैं। उनको अपनी नियमित (1) उपासना तथा (2) स्वाध्याय करने के अतिरिक्त जन-सेवा के दो कार्य भी करने होते हैं 1-ब्रह्मदान 2-धर्मफेरी। उनके मस्तिष्क में यह विचार गहराई तक जमाये जाते हैं कि प्रत्येक सच्चे धर्म सेवक का यह एक आवश्यक कर्तव्य है कि भले ही स्वयं एक रोटी खा भूखा सो जावे पर एक मुट्ठी अन्न या एक दो पैसा रोज संसार में सद्ज्ञान फैलाने के लिये—ज्ञान यज्ञ के लिये—दान अवश्य करे।
उपासना विधि की भिन्नता के कारण किसी को पापी कहना या मानना अनुचित है। हिन्दूधर्म में धर्मात्मा वही है जो अपने विश्वासानुसार पूजा व उपासना करता हुआ (और यदि ईश्वर या किसी देवता पर विश्वास न रखता हो तो भजन-पूजन न करता हुआ) सदाचार व सद्व्यवहार में स्थिर रहे और पापी वही है जो दुराचार व दुर्व्यवहार में लगा रहे? कोई मनुष्य देवताओं का भजन-पूजन या ईश्वराराधन करता हो परन्तु दुष्कर्मों में लिप्त हो तो हिन्दू धर्म उसे पापी ही कहता और मानता है। हिन्दू धर्म में अद्वैश्वरवादी, बहुदेववादी, मूर्तिपूजक और मूर्ति पूजा न करने वाले इन सबके लिए पूरा स्थान और पूर्ण सम्मान है। ऐसी उदारता किसी भी पैगम्बरी मजहब में नहीं है।
उपासना की आदत डालना भले ही एक छोटा कार्य लगे, पर इसका प्रभाव घर के वातावरण पर पड़ कर रहेगा। परिवार के सदस्यों की मनोभूमि को सुसंस्कारी बनाने के लिए यह एक ठोस मनोवैज्ञानिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक उपचार है। जिन घरों में इस बहाने कुछ पूजा प्रक्रिया चल पड़ेगी वहाँ विश्वासपूर्वक समझिए, धार्मिक और नैतिक वातावरण की अवश्य ही वृद्धि होगी। यह उपासना क्रम जहाँ चल पड़ेगा वहाँ इस कार्य के लिए घिरा हुआ स्थान या लगाया हुआ समय कभी भी निष्फल या घाटे का कार्य सिद्ध न होगा। इस तथ्य पर यदि विश्वास न हो तो कुछ दिनों प्रयोग या परीक्षण के रूप में यह क्रम चला कर देखा जा सकता है।
उपासना की पद्धति हजारों प्रकार की प्रचलित हैं। मुख्य-मुख्य सब मतों में बड़े-बड़े विद्वान् मौजूद हैं। परन्तु उनका मन अपनी ही भावना के अनुकूल देवता को मानने व पूजने में सन्तुष्ट रहता है। उनको दूसरे मनुष्य की रुचि के अनुसार पूजा या उपासना करने में तनिक भी तुष्टि या प्रसन्नता नहीं होती। ईश्वर का स्वरूप कैसा है, इस विषय में भिन्न-भिन्न मत के विद्वानों के भिन्न-भिन्न विचार या सिद्धान्त हैं।
उपासना के सारे विधि-विधान को जानने, अपने क्षेत्र में गायत्री-प्रचार करने की विधि व्यवस्था को समझने, अपने जीवन को यज्ञ रूप बनाने, युग निर्माण एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान की योजना को पूर्ण करने के सम्बन्ध में तो शिक्षा प्राप्त करेंगे ही, साथ-साथ उन्हें महायज्ञ का कार्यक्रम भी अपने श्रमदान से करने में कटिबद्ध होना होगा। कुण्ड खोदने, यज्ञशालाएँ निर्माण करने, यज्ञशालाओं का हवन कार्य संचालन करने, भोजन एवं ठहराने की व्यवस्था सँभालने, रात को पहरा लगाने, आस-पास क्षेत्र में यज्ञ का प्रचार करने आदि कार्य भी उन्हें ही अपने शारीरिक और मानसिक श्रम से पूरे करने होंगे।
उपासना तथा (2) स्वाध्याय करने के अतिरिक्त जन-सेवा के दो कार्य भी करने होते हैं 1-ब्रह्मदान 2-धर्मफेरी। उनके मस्तिष्क में यह विचार गहराई तक जमाये जाते हैं कि प्रत्येक सच्चे धर्म सेवक का यह एक आवश्यक कर्तव्य है कि भले ही स्वयं एक रोटी खा भूखा सो जावे पर एक मुट्ठी अन्न या एक दो पैसा रोज संसार में सद्ज्ञान फैलाने के लिये—ज्ञान यज्ञ के लिये—दान अवश्य करे। दूसरी बात जो इन वरिष्ठ श्रेणी की अन्तरात्मा में जमाई जाती है वह यह है कि जिस प्रकार नित्य कुछ न कुछ दान ब्रह्मदान के लिये करना आवश्यक है उसी प्रकार थोड़ा बहुत समय भी धर्म प्रचार में लगाया जाना चाहिये। घर बैठे बड़े-बड़े मनसूबे बाँधते रहने से, योजनाएं बनाते रहने से कुछ काम चलने वाला नहीं है। धर्म प्रचार के लिए परिश्रम की, प्रदक्षिणा की, धर्मफेरी की सच्ची तीर्थ यात्रा आवश्यक है।
उपासना के विषय में पूर्ण स्वतन्त्रता देता है वह बड़ा ही उत्तम, उदात्त और श्रेयस्कर है। हिन्दूधर्म का यह सिद्धान्त सर्वोपयोगी और सार्वभौम है।
उपासनात्मक प्रक्रिया तक ही सीमित नहीं है वरन् इसके द्वारा युग निर्माण का ऐतिहासिक कार्य सम्पन्न किया जाता है। प्रश्न केवल हमारी पात्रता का है। सत्पात्र ही ईश्वरीय अनुग्रह के सफलता के अधिकारी होते हैं। हम सब अपनी पात्रता बढ़ाने की प्रतिज्ञा करके इस महायज्ञ की पूर्णाहुति में सम्मिलित होने आवें तभी इस यज्ञ की और याज्ञिकों के व्रत की सच्ची सार्थकता है।
उपासना के सम्बन्ध में ही यही बात चरितार्थ होती है। आप प्रत्यक्ष देखिये, संसार में सैकड़ों प्रकार के मत या सम्प्रदाय हैं और पूजा व उपासना की पद्धति हजारों प्रकार की प्रचलित हैं। मुख्य-मुख्य सब मतों में बड़े-बड़े विद्वान् मौजूद हैं। परन्तु उनका मन अपनी ही भावना के अनुकूल देवता को मानने व पूजने में सन्तुष्ट रहता है। उनको दूसरे मनुष्य की रुचि के अनुसार पूजा या उपासना करने में तनिक भी तुष्टि या प्रसन्नता नहीं होती।
उपासना और स्वाध्याय के अतिरिक्त ब्रह्मदान और धर्मफेरी के कर्तव्य को भी पालन करने वाले वरिष्ठ सक्रिय धर्म सेवकों की अब एक विशेष श्रेणी बनाई जा रही है जो “उपाध्याय” के नाम से पुकारी जायगी। प्राचीन काल में धर्म शिक्षक लोग ही उपाध्याय कहलाते थे। “उपाध्याय” गोत्र इसी श्रेणी के लोगों का प्रतीक है। पर अब तो इस गोत्र वाले भी नाम मात्र के ही उपाध्याय हैं। धर्म प्रचार का कर्तव्य छोड़ बैठे।
उपासना और स्वाध्याय के आवश्यक धर्म कर्तव्यों को न छोड़ने पायें इसके लिये विशिष्ट सदस्य बार-बार प्रेरणा देते रहते हैं। दूसरी श्रेणी में वरिष्ठ सक्रिय सदस्य हैं। उनको अपनी नियमित (1) उपासना तथा (2) स्वाध्याय करने के अतिरिक्त जन-सेवा के दो कार्य भी करने होते हैं 1-ब्रह्मदान 2-धर्मफेरी। उनके मस्तिष्क में यह विचार गहराई तक जमाये जाते हैं कि प्रत्येक सच्चे धर्म सेवक का यह एक आवश्यक कर्तव्य है कि भले ही स्वयं एक रोटी खा भूखा सो जावे पर एक मुट्ठी अन्न या एक दो पैसा रोज संसार में सद्ज्ञान फैलाने के लिये—ज्ञान यज्ञ के लिये—दान अवश्य करे। दूसरी बात जो इन वरिष्ठ श्रेणी की अन्तरात्मा में जमाई जाती है वह यह है कि जिस प्रकार नित्य कुछ न कुछ दान ब्रह्मदान के लिये करना आवश्यक है उसी प्रकार थोड़ा बहुत समय भी धर्म प्रचार में लगाया जाना चाहिये।
उपासना करता हुआ (और यदि ईश्वर या किसी देवता पर विश्वास न रखता हो तो भजन-पूजन न करता हुआ) सदाचार व सद्व्यवहार में स्थिर रहे और पापी वही है जो दुराचार व दुर्व्यवहार में लगा रहे? कोई मनुष्य देवताओं का भजन-पूजन या ईश्वराराधन करता हो परन्तु दुष्कर्मों में लिप्त हो तो हिन्दू धर्म उसे पापी ही कहता और मानता है। हिन्दू धर्म में अद्वैश्वरवादी, बहुदेववादी, मूर्तिपूजक और मूर्ति पूजा न करने वाले इन सबके लिए पूरा स्थान और पूर्ण सम्मान है। ऐसी उदारता किसी भी पैगम्बरी मजहब में नहीं है। जिस दिन ऐसी उदारता उसमें आ जायगी उसी दिन वह मजहब सार्वभौम धर्म के योग्य होगा।
उपासना क्रम जहाँ चल पड़ेगा वहाँ इस कार्य के लिए घिरा हुआ स्थान या लगाया हुआ समय कभी भी निष्फल या घाटे का कार्य सिद्ध न होगा। इस तथ्य पर यदि विश्वास न हो तो कुछ दिनों प्रयोग या परीक्षण के रूप में यह क्रम चला कर देखा जा सकता है। यह व्यर्थ सिद्ध हो तो पूजा की चौकी उठा कर रख देने में कोई बड़ा जोखिम नहीं है।
उपासना, दिन रात में अन्य किसी भी समय की अपेक्षा अधिक फलवती होती है। इसी प्रकार ग्रीष्म और शीत ऋतुओं की मिलन बेला 9-9 दिन के लिए आश्विन और चैत्र की नवरात्रि में आती हैं। यह समय साधना के लिए अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। वर्ष के अन्य महीनों में जो साधना बहुत दिन करने पर भी सफल नहीं होती वह इन नवरात्रियों के 9 दिनों में पूर्ण हो जाती है।
उपासना का फल हुआ करती है। जब मनुष्य ईश्वर अजर है, अमर है, अभय है, इत्यादि, तो इससे उसके भीतर भी निर्गुणता आती है, और वह भी, निमित्त से ही क्यों न हो, अजर, अमर, अभय हो जाया करता है। और जब वह ईश्वर की सगुणता का चिन्तन करता है, कि ईश्वर सच्चिदानन्द है, न्यायकारी है, दयालु है, इत्यादि—तो उसके भीतर नैमित्तिक रीति से ही क्यों न हो, सच्चिदानन्द आदि गुणों का संयोग-सम्बन्धवत समावेश हो जाया करता है। और इस प्रकार मनुष्य को मोक्ष के दोनों पहलू प्राप्त हो जाते हैं। यह तो जीवनोद्देश्य का स्थूल ढाँचा हुआ।
उपासना करने में तनिक भी तुष्टि या प्रसन्नता नहीं होती। ईश्वर का स्वरूप कैसा है, इस विषय में भिन्न-भिन्न मत के विद्वानों के भिन्न-भिन्न विचार या सिद्धान्त हैं। जब कि ईश्वर को मानने वाले बड़े-बड़े फिलॉसफर भी ईश्वर के विषय में मतभेद रखते हैं तब संसार के सब लोगों से ईश्वर के सम्बन्ध में एक ही सिद्धान्त को मानने की आशा रखना व्यर्थ है और प्रत्यक्ष देखिये बहुत से विद्वान् ईश्वरास्तित्व को अस्वीकार करने में ही अति प्रसन्न और परम सन्तुष्ट रहते हैं। इस प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध है कि हिन्दूधर्म जो पूजा व उपासना के विषय में पूर्ण स्वतन्त्रता देता है वह बड़ा ही उत्तम, उदात्त और श्रेयस्कर है। हिन्दूधर्म का यह सिद्धान्त सर्वोपयोगी और सार्वभौम है।
उपासना करने की पूर्ण स्वतन्त्रता है परन्तु सदाचार व सद्व्यवहार का बन्धन है। हिन्दूधर्म लोगों को निज विश्वासानुसार ईश्वर व देवी-देवताओं को मानने व पूजने की और यदि विश्वास न हो तो न मानने व न पूजने की पूर्ण स्वतन्त्रता देता है। अहिन्दू-धर्म में ऐसी स्वतन्त्रता नहीं है। अहिन्दू-धर्म (पैगम्बरी मजहब) मनु अपने अनुयायियों को किसी विशेष व्यक्ति और विशेष पुस्तक पर विश्वास लाने के लिए बाध्य या विवश करता है। उसे निज विश्वासानुसार देवता को मानने व उपासना करने की स्वतन्त्रता नहीं है।
उपासना के फलस्वरूप साधकों में जो सद्बुद्धि उत्पन्न हुई है, उसका उपयोग वे परमार्थ मार्ग में कर रहे हैं। स्वार्थी लोग जन्त्र मन्त्र की उधेड़बुन में इसलिए लगते हैं कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से भौतिक लाभ हों, पर जिन पर माता का सच्चा अनुग्रह हो जाता है वे व्यक्तिगत सुख सुविधा पर विशेष ध्यान न देकर परमार्थ में अपना जीवन लगाने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। गायत्री-परिवार के अधिकाँश साधकों को माता की सच्ची कृपा प्राप्त हुई है और वे धर्म सेवा के मार्ग पर एक दूसरे से आगे बढ़कर निकलने की बाजी लगाये हुए हैं।
उपासना भेद के कारण किसी को पापी या नरकगामी नहीं मानता, किन्तु उसी को पापी मानता है जो सदाचार व सद्व्यवहार से रहित हो! इसके विपरित अहिन्दू धर्म (पैगम्बरी मजहब) निज विश्वासानुसार देवी-देवता को मानने या पूजने की स्वतन्त्रता नहीं देता। वह तो व्यक्ति-विशेष व पुस्तक विशेष पर विश्वास लाने को ही धर्म और स्वर्गप्रद मानता है। अहिन्दूधर्म कहता है कि जो मनुष्य अमुक पैगम्बर व अमुक पुस्तक पर ईमान नहीं लावेगा वह ज्ञानी व सदाचारी व परोपकारी होने पर भी पापी और नरकगामी है। मूल हिन्दूधर्म कहता है कि भिन्न देवोपासना या उपासना विधि की भिन्नता के कारण किसी को पापी कहना या मानना अनुचित है। हिन्दूधर्म में धर्मात्मा वही है जो अपने विश्वासानुसार पूजा व उपासना करता हुआ (और यदि ईश्वर या किसी देवता पर विश्वास न रखता हो तो भजन-पूजन न करता हुआ) सदाचार व सद्व्यवहार में स्थिर रहे और पापी वही है जो दुराचार व दुर्व्यवहार में लगा रहे?
उपासना करने की स्वतन्त्रता नहीं है।
उपासना-कर्म में स्वतंत्रता नहीं है वह मानो स्वतन्त्र विचार करने का निषेध है। साराँश यह कि हिन्दू धर्म स्वतन्त्र विचारों का पक्षपाती और समर्थक है तथा अहिन्दू धर्म स्वतन्त्र विचारों का विरोधी और बाधक है। विद्वान व दूरदर्शी लोग भली भाँति जानते हैं कि साँसारिक उन्नति और आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति के लिए स्वतन्त्र विचारों की कितनी बड़ी आवश्यकता रहती है। इस दृष्टि से देखिये कि संसार के लिए हिन्दू धर्म अधिक उपयोगी है अथवा सेमिटिक (पैगम्बरी) मजहब? इस पर भी ध्यान दीजिए कि संसार में शुभ कर्मों के द्वारा अधिक सुख व शान्ति फैल सकती है अथवा किसी दूत व पुस्तक पर विश्वास लाने मात्र से?
उपासना के तत्वज्ञान पर विश्वास रखने वाले धर्मप्रेमियों के लिए नवरात्रि का पुनीत पर्व बहुत ही महत्वपूर्ण है। समय पर बोया हुआ बीज जिस प्रकार भली प्रकार अंकुरित होता है, उसी प्रकार नवरात्रि जैसे पर्वों पर की हुई साधना भी विशेष फलदायक होती है। सूर्य उदय और सूर्य अस्त के समय जिस प्रकार दिन और रात का मिलन काल ‘संध्या समय’ माना जाता है, उस समय की हुई उपासना, दिन रात में अन्य किसी भी समय की अपेक्षा अधिक फलवती होती है। इसी प्रकार ग्रीष्म और शीत ऋतुओं की मिलन बेला 9-9 दिन के लिए आश्विन और चैत्र की नवरात्रि में आती हैं। यह समय साधना के लिए अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-April
उपासना पद्धति है। विश्व आत्मा की उपासना के लिए उसके समय विभाग में कोई एक समय निश्चित नहीं है। उपासना देश और काल में विभाजित नहीं है। उसका तो प्रत्येक क्षण उपासनामय है। वे अपने विश्व चैतन्य को एक क्षण के लिए भी भूलना नहीं चाहते, बल्कि गतिविधि का प्रत्येक भाग इन चैतन्यदेव के लिए ही लगाना चाहते हैं।
उपासना गृह के साथ सत्साहित्य की एक अलमारी या सन्दूक भी अवश्य रखनी चाहिए। स्वाध्याय के लिये विचारोत्तेजक एवं जीवन की, समाज की गुत्थियों पर प्रकाश डालने वाला साहित्य होना चाहिये। बुद्धि विकास के लिये यह व्यवस्था आवश्यक है। अमुक महापुरुष, अवतार या देवता के चरित्रों को रोज-रोज पढ़ते रहना ही आजकल स्वाध्याय माना जाता है, पर वस्तुतः सच्चा स्वाध्याय वही माना जायगा जो हमारी व्यक्तिगत एवं सामूहिक गुत्थियों के सुलझाने में सहायक हो सके। इस कसौटी पर खरी उतरने वाली चुनी हुई पुस्तकें ही इन ज्ञान मन्दिरों में रहें, जिनसे बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री, पुरुष सभी उन्नति एवं कठिनाई निवारण में व्यावहारिक सफलता प्राप्त कर सकें।
उपासना होती रहे इतना ही नहीं, वरन् अपने समीपवर्ती क्षेत्र में यह ज्ञान मन्दिर सद्बुद्धि का प्रकाश भी करते रहेंगे और इन्हीं के आधार पर लाखों करोड़ों जनता को सद्विचारों की, सत्कार्यों की, सत्मार्ग की, आत्म कल्याण की, नैतिकता एवं मानवता की एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान की शिक्षा दे सकना संभव होगा। यह बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक क्रान्ति का महान् आयोजन है। ज्ञान-मंदिर योजना के अंतर्गत हजारों उपाध्याय जब अपने-अपने विद्यालयों को चलाने के लिए समय दान करने लगेंगे तो कोटि-कोटि भारतीयों को धर्म भावनाओं से प्रगति करके प्राचीन काल जैसे गौरवपूर्ण शुभ युग की प्रतिष्ठापना का स्वप्न अवश्य ही सार्थक हो सकेगा।
उपासना होती है, इसके लिये नियत कक्ष बने होते हैं वहाँ अपेक्षाकृत बुराइयां घटती और अच्छाइयाँ बढ़ती जाती हैं। पाप, द्वेष, दुराचार, रोना शोक, दुख दारिद्रय घटते हैं और श्री, समृद्धि, उन्नति, सफलता एवं प्रसन्नता के कारण बढ़ते हैं। उपासना से उत्पन्न होने वाले शक्ति कम्पनों से ऐसा परिणाम होना सहज एवं स्वाभाविक है।
उपासना की ओर आकृष्ट किया।
उपासना का स्थान नहीं है, वे भी देव-मंदिर में जाने का अवसर आने पर भगवान का स्मरण करते हैं, उन्हें मस्तक झुकाते हैं, इस प्रकार इस बहाने उन्हें उपासना का थोड़ा बहुत अवसर मिलता है।
उपासना से उत्पन्न होने वाले शक्ति कम्पनों से ऐसा परिणाम होना सहज एवं स्वाभाविक है।
उपासना किया करें। प्रातः सायं दोनों समय आरती हुआ करे, जहाँ अलग स्वतन्त्र कोठरी की व्यवस्था न हो वहाँ ऐसे कमरे की अलमारी में या कोने में उपासना चौकी स्थापित करनी चाहिये जिनमें बहुत सामान न भरा हुआ हो और जहाँ अधिक आवागमन या कोलाहल न होता हो।
उपासना के नियत समय के अतिरिक्त यहाँ के निवासियों का पूरा समय जनहित के, धर्म सेवा के कार्यों में लगता है। अनेकों सत्प्रवृत्तियों का संचालन यहाँ से होता रहता है। जो एक बार इस मन्दिर को ध्यानपूर्वक देख लेता है उसे मन्दिरों की उपयोगिता समझने में देर नहीं लगती और वह सोचने को विवश होता हैं कि- “काश, ऐसे ही प्रेरणाप्रद अन्य मन्दिर भी होते।”
उपासना के फलस्वरूप परीक्षा में सफलता प्राप्त कर चुके हैं और गायत्री द्वारा धर्म प्रचार में संलग्न हैं।
उपासना की दृष्टि से विराट पुरुष चार भागों में विभक्त हैं और समय भेद से भी उनके चार भाग कर दिये गए हैं। ये दोनों प्रकार के चार भाग हिन्दू संस्कृति में वर्ण एवं आश्रमों के नाम से पुकारे जाते हैं। यों समस्त ब्रह्माण्ड में वर्ण धर्म और आश्रम पाये जाते हैं, लेकिन हिन्दू संस्कृति उन्हें पृथक नहीं रहने देना चाहती। उसकी दृष्टि में उनका अस्तित्व तब तक ही है, जब तक कि विराट पुरुष की रक्षा के लिए उनकी गतिविधि है। दूसरे शब्दों में विश्व चैतन्य की सामंजस्य स्थापना में अपने को लगाये हुए है।
उपासना गृह को सुव्यवस्थित करके अपना ज्ञान मन्दिर स्थापित कर लेना चाहिए। गायत्री जयन्ती जेष्ठ सुदी 10 तक यह कार्य सभी सदस्य पूरा कर लेंगे ऐसी आशा है। 13 रु. की पुस्तक 1 रु. के वाक्य यह 14 रु. का देव मन्दिर किसी सद्गृहस्थ को भार रूप न होना चाहिये। इसके द्वारा उत्पन्न होने वाले सत्परिणाम और प्राप्त होने वाले पुण्य की तुलना में यह खर्च ऐसा नहीं जिसे बहुत भारी माना जाय। जहाँ यह कठिन दिखाई पड़े वहाँ कई व्यक्ति मिलकर एक ज्ञान मन्दिर की स्थापना कर सकते हैं।
उपासना करता आ रहा हूँ कुछ समय पहले मुझ पर यक्ष्मा जैसे भयंकर रोग का आक्रमण हुआ। मैंने चिकित्सा के लिये प्रार्थना पत्र भेजा, जिसके फलस्वरूप मुझे हिमालय के अतुलनीय रम्य प्रदेश में बिना किसी प्रकार के व्यय के स्थान प्राप्त हो गया। सैनीटोरियम में भर्ती होने पर मालूम हुआ कि मेरे दायें फेफड़े में तीन कैबिटीज और बाँये में एक बड़ी कैबिटी हो गई है, अर्थात् मेरे दोनों फेफड़े अत्यधिक खराब हो चुके हैं। मैं बिस्तरे पर पड़े-पड़े गायत्री का मानसिक जप बड़ी श्रद्धा से करने लगा। तीन ही महीने में मेरे स्वास्थ्य में बहुत सुधार हो गया और केवल बायें फेफड़े में थोड़ी सी शिकायत शेष रह गई।
उपासना गृह बनाना चाहिए। दीवारों पर आदर्श वाक्य एवं महापुरुषों के चित्र लगे हों। चौकी पर गायत्री माता एवं यज्ञ पिता के चित्र शरीर में मढ़े हुये रखे हों। स्थापना की चौकी, पीले वस्त्र से ढकी हो, उस पर पूजा उपकरण शंख, पंच पात्र, आरती, धूपदानी, गंगाजली आदि सजी हुई हों। कुशाओं के आसन बिछे हों।
उपासना गृहों में स्वाध्याय की व्यवस्था अनिवार्य हैं। गायत्री सद्बुद्धि की देवी हैं। सद्बुद्धि का प्रधान मार्ग स्वाध्याय है। जप, ध्यान, पूजा, वन्दन के अतिरिक्त हर धर्म प्रेमी को नियमित रूप से स्वाध्याय भी करना चाहिये। बुद्धि की देवी केवल रोली, अक्षत, धूप, दीप से प्रसन्न नहीं हो सकती, उसे प्रसन्न करने के लिए स्वाध्याय आवश्यक है।
उपासना गृह देखा जा सकता है। नया मन्दिर बनाने में भी श्रमदान से, मामूली कच्चे मन्दिर बनाये जा सकते हैं जो कम खर्च में बन जाएं। बहुत बड़ी, अत्यन्त विशाल काय इमारत बनाने की अब जरूरत नहीं, वह धन तो धर्म जागृति के कार्यों में व्यय किया जाना चाहिए। धनीमानी लोग अपने पैसे का सदुपयोग इस प्रकार के मन्दिरों की स्थापना में करें तो कम खर्च में अधिक कीर्ति और अधिक पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। गायत्री परिवार की हर शाखा को यह प्रयत्न करना चाहिये कि उसका एक गायत्री मन्दिर भी अवश्य हो।
उपासना की, ध्यान की, चिन्तन की- अर्थात् मन की शक्तियों को एकाग्र करने और उनका विकास करने की प्रेरणा मिली थी। उसे ‘मिस्टिस्ज्मि’ अथवा भक्ति का युग कहा जा सकता है। उस समय कई संत पुरुष पैदा हुए। सिर्फ भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि दुनिया के बहुत से देशों में- जैसे मिश्र और इटली में भी- पैदा हुये। हर जगह उसी तरह का ध्यान, वही चिन्तन, भजन दिखाई देता है।
उपासना के लिए उसके समय विभाग में कोई एक समय निश्चित नहीं है। उपासना देश और काल में विभाजित नहीं है। उसका तो प्रत्येक क्षण उपासनामय है। वे अपने विश्व चैतन्य को एक क्षण के लिए भी भूलना नहीं चाहते, बल्कि गतिविधि का प्रत्येक भाग इन चैतन्यदेव के लिए ही लगाना चाहते हैं।
उपासना की और फिर प्राण-त्याग के उद्देश्य से जहर खा लिया। जहर के प्रभाव से वे बेहोश हो गये। उसी दशा में स्वप्न में उनको एक कन्या दिखलाई पड़ी, जो उनसे कह रही थी कि तुम घर जाओ तुम्हारी अभी मृत्यु नहीं है। कुछ देर बाद होश में आने पर वे घर चले आये।
उपासना का थोड़ा बहुत अवसर मिलता है।
उपासना केवल उपासना मात्र तक ही सीमित नहीं है। ज्ञान वृद्धि उसका महत्वपूर्ण अंग है, इसलिए गायत्री मन्दिरों को केवल मन्दिर न कहकर इन्हें गायत्री ज्ञान-मन्दिर कहना चाहिए। अब समय आ गया है कि सामूहिक और व्यक्तिगत गायत्री ज्ञान-मन्दिरों की सर्वत्र स्थापना की जाय। गायत्री-परिवार की प्रत्येक शाखा अपनी प्रवृत्तियों का केन्द्र सामूहिक गायत्री ज्ञान-मन्दिर के रूप से स्थापित करें, इसी प्रकार गायत्री-परिवार के प्रत्येक सदस्य के घर में एक घरेलू गायत्री ज्ञान-मन्दिर हो। यह ज्ञान-मन्दिरों के शृंखला सर्वत्र फैले और वर्तमान बड़े मन्दिरों की इमारत तथा साधनों का सदुपयोग हो तो निश्चय ही भारत के साँस्कृतिक पुनरुत्थान में बड़ा योग मिल सकता है।
उपासना करते रहते हैं। एक समय वे किसी मरीज की चिकित्सा करने गये तो मालूम हुआ कि मोती नाम का एक स्याना (ओझा) 50 रु. लेकर मरीज को अच्छा करने को कहता है। बालकरामजी ने उसके घर वालों से कहा कि इसे चिकित्सा द्वारा ही आराम हो जायेगा, तुम रुपया मत देना। जब इस बात की खबर मोती को लगी तो वह बहुत बिगड़ा और उसने बालकरामजी पर घात का प्रयोग किया। वैध जी को स्वप्न में ऐसा मालूम हुआ कि एक काला भयंकर पुरुष उन्हें मारने को आ रहा है।
उपासना देश और काल में विभाजित नहीं है। उसका तो प्रत्येक क्षण उपासनामय है। वे अपने विश्व चैतन्य को एक क्षण के लिए भी भूलना नहीं चाहते, बल्कि गतिविधि का प्रत्येक भाग इन चैतन्यदेव के लिए ही लगाना चाहते हैं।
उपासना करने लगे हैं।
उपासना में उत्कीलन और शाप मोचन का जो उल्लेख मिलता है उसमें गुरुदीक्षा की आवश्यकता का प्रतिपादन है और कहा गया है कि यदि अधिकारी गुरु द्वारा दीक्षा प्राप्त हो जावे तो साधना सफल होने में कोई सन्देह नहीं रहता। प्राचीन काल में यज्ञोपवीत संस्कार कराने और गुरुदीक्षा देने के लिए अधिकारी आचार्य बड़ी खोज के साथ ढूँढ़े जाते थे। आज तो कोई भी अधिकारी-अनाधिकारी, योग्य-अयोग्य पंडित यज्ञोपवीत संस्कार जैसे उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य को कराने का दुस्साहस कर बैठते हैं, और इस जीवन परिवर्तन करने जैसी महान प्रक्रिया को एक खिलवाड़ जैसा बना देते हैं। देखा जाता है कि यज्ञोपवीत संस्कार या गुरु दीक्षा करने वाले पंडितों को दान-दक्षिणा खूब मिल जाती है और उधर जिनके बच्चे का संस्कार हुआ हैं उनका खर्च भी बहुत पड़ जाता है। इतना होने पर भी जिसने यज्ञोपवीत धारण किया उसके जीवन में कोई परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं होता।
उपासनामय है। वे अपने विश्व चैतन्य को एक क्षण के लिए भी भूलना नहीं चाहते, बल्कि गतिविधि का प्रत्येक भाग इन चैतन्यदेव के लिए ही लगाना चाहते हैं।
उपासना मात्र तक ही सीमित नहीं है। ज्ञान वृद्धि उसका महत्वपूर्ण अंग है, इसलिए गायत्री मन्दिरों को केवल मन्दिर न कहकर इन्हें गायत्री ज्ञान-मन्दिर कहना चाहिए। अब समय आ गया है कि सामूहिक और व्यक्तिगत गायत्री ज्ञान-मन्दिरों की सर्वत्र स्थापना की जाय। गायत्री-परिवार की प्रत्येक शाखा अपनी प्रवृत्तियों का केन्द्र सामूहिक गायत्री ज्ञान-मन्दिर के रूप से स्थापित करें, इसी प्रकार गायत्री-परिवार के प्रत्येक सदस्य के घर में एक घरेलू गायत्री ज्ञान-मन्दिर हो। यह ज्ञान-मन्दिरों के शृंखला सर्वत्र फैले और वर्तमान बड़े मन्दिरों की इमारत तथा साधनों का सदुपयोग हो तो निश्चय ही भारत के साँस्कृतिक पुनरुत्थान में बड़ा योग मिल सकता है।
उपासना चौकी स्थापित करनी चाहिये जिनमें बहुत सामान न भरा हुआ हो और जहाँ अधिक आवागमन या कोलाहल न होता हो।
उपासना से ध्यान, मनन, चिन्तन से काम चला सकती है, पर जिनकी वह भूमिका जागृत नहीं है, उस कोटि-कोटि जन समूह के लिये दृश्य आकर्षण युक्त देव-मंदिरों की आवश्यकता रहती है। लोग उन देवस्थानों की शोभा, विशालता, विचित्रता, विशेषता तथा समय-समय पर होते रहने वाले उत्सव आयोजनों को देखने कौतूहलवश जाते हैं, पर अन्ततः धर्म-बुद्धि के विकास का, भगवत् स्मरण का न्यूनाधिक अवसर वहाँ मिल ही जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-December
उपासना के लिए प्रेरित किया। नित्य-प्रति दंगतर से घर लौटते ही भोजन करने के पश्चात ये और इनकी पत्नी प्रचार कार्य में लग जाते थे। इनका यह संकल्प था कि जब तक कम से कम एक नया गायत्री-उपासक न बना लेंगे तब तक सोयेंगे भी नहीं। इस प्रकार इनको कई बार रात-रात भर जागरण करना पड़ा है। इस प्रकार इन्होंने केवल बरेली शहर में 1300 गायत्री-परिवार के सदस्य बनाये और बीसियों स्थानों पर यज्ञ कराये।
उपासना को करे। नियत अवधि में जब साधना पूरी हो जाय तो उन उपासकों या उनके परिवार वालों के द्वारा ही हवन कार्य सम्पन्न किया जाय। 24 लक्ष जप के लिए 24 हजार आहुतियों का और सवा करोड़ साधना के लिए सवा लाख आहुतियों के हवन पर्याप्त है। 24 हजार आहुतियों के लिए 5 कुण्डों का, सवा लाख आहुतियों के लिए 9 कुण्डों का यज्ञ पर्याप्त है। तीन दिन का कार्यक्रम रखा जाय नित्य-प्रातः हवन तथा तीसरे पहर एवं रात के प्रवचनों की व्यवस्था रहे।
उपासना का महत्व असंख्य गुना अधिक है।
उपासना बन्द न करो। जहाँ यज्ञ बन्द हो जाते हैं वहाँ से सुख-शाँति चली जाती है।
उपासना के साथ-साथ धर्मफेरी करके जनता में धार्मिक भावनाओं को जागृत करना चाहिये। गायत्री महायज्ञ के एक लाख भागीदार बनाने के लिये हजारों सदस्यों ने दिन-रात एक कर दिया। अपने तन-मन को गायत्री माता व यज्ञ पिता के चरणों में न्यौछावर कर दिया। वह बिना वेतन के महीनों का अवकाश लेकर ग्राम-ग्राम व शहर -शहर की खाक छानते फिरे, असुरता के प्रकोप सहते रहे। यह उनके अथक निःस्वार्थ परिश्रम का ही परिणाम है कि लाखों की संख्या में जनता, होता, यजमान व दर्शक के रूप में आई।
उपासना भक्ति करने का अधिकार है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-July
उपासना का मतलब ही है जुड़ जायें। मैं आपको कुछ थोड़े से उदाहरण बताऊँगा। जुड़ना किसे कहते हैं ? आपने आग में लकड़ी को गिरते हुए देखा है न। उस लकड़ी की क्या कीमत है- दो कौड़ी की-जिसे आप पैर के नीचे फेंक दीजिए तो क्या , या तोड़कर फेंक दीजिए तो क्या -इधर से उधर करते रहिए।
उपासना करते हैं, भजन करते हैं, उसका मतलब यह है कि आप इन उपायों के माध्यम से अपना रिश्ता भगवान से जोड़ लें। एक गरीब घर की लड़की की यदि किसी मालदार पति के साथ में शादी हो जाये तो वह दूसरे ही दिन से उसकी मालकिन हो जाती है, क्योंकि उसने उससे रिश्ता मिला लिया।
उपासना का तत्वज्ञान इसी पर टिका हुआ है कि आप भगवान के अनुयायी होते हैं कि नहीं , उसका अनुशासन मानते हैं कि नहीं । आप भगवान की इच्छानुसार चलते हैं कि नहीं , उसके बताये हुए इशारे एवं संकेत पर चलते हैं कि नहीं । उपासना के साथ जुड़ा हुआ एक मात्र यही प्रश्न है और कोई दूसरा नहीं।
उपासना , साधना और आराधना के साथ जुड़ा हुआ है। संचित पशु-प्रवृत्तियों के उन्मूलन के लिए अपने दोष-दुर्गुणों की बारीकी से परीक्षा करनी पड़ती है और जहाँ जो जितनी मात्रा में खोट दिखाई दे उसे बुहार फेंकने के लिए उसी प्रकार उद्यत रहना पड़ता है जैसा कि शरीर की, कपड़ों की, घर के वस्तुओं की सफाई पर निरंतर ध्यान देते रहने और तत्पर रहने के संबंध में सतर्कता बरती जाती है। सुसंस्कारिता का अभिवर्धन दूसरा पक्ष है। इसके लिए चिंतन, चरित्र और व्यवहार को मानवी गरिमा के अनुरूप बनाना पड़ता है। सेवा-साधना को भी नित्यकर्म में सम्मिलित करना पड़ता है।
उपासना कहते हैं। उपासना का मतलब ही है जुड़ जायें। मैं आपको कुछ थोड़े से उदाहरण बताऊँगा। जुड़ना किसे कहते हैं ? आपने आग में लकड़ी को गिरते हुए देखा है न।
उपासना के साथ जुड़ा हुआ एक मात्र यही प्रश्न है और कोई दूसरा नहीं।
उपासना कर सकते हैं तो आप यह ख्याल छोड़ दीजिए । तब क्या करना पड़ेगा ? जब एक ही काम करना पड़ेगा कि आप अपने आपको उनके हाथ की कठपुतली बना लीजिए , फिर देखिए भगवान क्या से क्या करवाते हैं । पानी दूध में मिल जाता है और उसकी हैसियत दूध के बराबर हो जाती है। छोटी सी ना चीज बूँद समुद्र में गिरती है और अपनी हस्ती को उसी में विसर्जित कर देती है और समुद्र की कीमत की हो जाती है ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-September
उपासना कम पड़ती होगी तो उसकी पूर्ति शाँतिकुँज हरिद्वार से उसी प्रकार होती रहेगी जैसा कि गुरुदेव के सूक्ष्म-कारण सत्ता में चले जाने के उपराँत होती रही है।
उपासना चेतनात्मक नियंत्रण रख सकता तथा उसमें समय-समय पर परिवर्तन ला सकता है। प्राणायाम प्रक्रिया द्वारा इस एक तंत्र का नियंत्रण सीखकर शरीर के अन्य तंत्रों पर भी नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है जिसमें मस्तिष्कीय तरंग तंत्र, हारमोन्स स्राव, चयापचय क्रियायें आदि मुख्य है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-June
उपासना लौकिक कामनाओं के लिए नहीं, बल्कि भगवान की साझेदारी के लिए, भगवान को स्मरण रखने के लिए, भगवान के आज्ञानुवर्ती होने के लिए और भगवान को अपना समर्पण करने के उद्देश्य से उपासना करेंगे, तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपकी उपासना सफल होगी। आपको आँतरिक संतोष मिलेगा। न केवल आँतरिक संतोष मिलेगा, बल्कि आपके व्यक्तित्व का विकास होगा और व्यक्तित्व के विकास का निश्चित परिणाम यह होता है कि आदमी भौतिक और आत्मिक दोनों तरह की सफलताएँ भरपूर मात्रा में प्राप्त करता है।
उपासना सफल होगी। आपको आँतरिक संतोष मिलेगा। न केवल आँतरिक संतोष मिलेगा, बल्कि आपके व्यक्तित्व का विकास होगा और व्यक्तित्व के विकास का निश्चित परिणाम यह होता है कि आदमी भौतिक और आत्मिक दोनों तरह की सफलताएँ भरपूर मात्रा में प्राप्त करता है।
उपासना, सद्व्यवहार, सहृदयता, उदारता, निष्कपटता, ये कौन-से वजनदार पत्थर हैं जो उठाये नहीं उठते । मनुष्य इन सद्गुणों को अपने जीवन में विकसित करने का साहस करे तो ऐसी कोई भी बाधा नहीं जो उसे सुख प्राप्ति से रोक सके । मनुष्य जीवन की सरल समुचित और सात्विकता की त्रिशक्ति के आधार पर ही उसके भौतिक भावनात्मक और पारलौकिक सुख विकसित होते हैं ।
उपासना व साधना-आराधना के रूप में जाना जा सकता है ।
उपासना करेंगे, तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपकी उपासना सफल होगी। आपको आँतरिक संतोष मिलेगा। न केवल आँतरिक संतोष मिलेगा, बल्कि आपके व्यक्तित्व का विकास होगा और व्यक्तित्व के विकास का निश्चित परिणाम यह होता है कि आदमी भौतिक और आत्मिक दोनों तरह की सफलताएँ भरपूर मात्रा में प्राप्त करता है।
उपासना में लग जाना चाहिए ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-August
उपासना की जाय। इस प्रकार वह पहली को छोड़ कर दूसरी को अपना लेता है, किंतु मन सर्वथा संशयहीन यहाँ भी बना नहीं रहा पाता और यह असमंजस खाये जाता है कि पता नहीं यह भी जल्दी फलित हो पायेगी या नहीं। इस मध्य यदि कोई तीसरा व्यक्ति उसकी उपासना पद्धति में खोट बताकर किसी अन्य पद्धति को अपना लेने की सलाह देता है, तो वह सद्य ऐसा करने के लिए तैयार हो जाता है। इस प्रकार उपासक वेश्या की तरह किसी एक के प्रति निष्ठावान न रह कर अनेकों को आजमाने और तुर्त−फुर्त में लाभ पा लेने के चक्कर में अपना बहुमूल्य जीवन गँवा देता है और अंत में निताँत खाली हाथ रह कर विभूतिहीन स्थिति में इस संसार से अलविदा कर जाता है।
उपासना को सफलता का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है।
उपासना में फल-प्राप्ति की उतावली न करने का शास्त्रकारों ने परामर्श दिया है। ऐसे कई उदाहरण देखने में आते हैं, जिसमें लंबे काल की साधना के पश्चात् भी फल न प्राप्त होने के कारण साधक उपासना छोड़ बैठने की अधीरता बरतते हैं कि ऐसा क्यों व किस कारण हुआ। ऐसा ही एक प्रसंग महान गायत्री उपासक विद्यारण्य स्वामी का है। उन्होंने लंबे समय तक निष्ठापूर्वक गायत्री के 23 पुरश्चरण किये, किंतु लाभ नगण्य जितना दिखाई पड़ा। इससे क्षुब्ध होकर उन्होंने गायत्री-उपासना छोड़ दी।
उपासना का सत्परिणाम बस इतना ही दिखाई पड़ा कि उनके मन में तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो गया। इससे उनने ग्रह-त्याग कर यायावरी अपना ली और दुखियों-पीड़ितों का दुःख कम करने में उनकी सहायता करने लगे। उनके इस परोपकार वृत्ति युक्त जीवन आरंभ होने के कुछ माह उपराँत एक दिन माँ गायत्री उनके सम्मुख प्रकट हुई वर माँगने को कहा। विद्यारण्य मुनि बड़े अचकचाये। असमंजस में पड़ कर उन्होंने पूछा “माते।
उपासना करके चार दिन आराम करने की बात सोचते हैं। इसके उपासना निष्फल जाती है। उसे नित्य-नैमित्तिक क्रिया की तरह प्रतिदिन आस्था पूर्वक किया जाना चाहिए। (3) सत्कारासेवित् अर्थात् चित्त की एकाग्रता। उपासना के दौरान मन के भटकाव को रोककर ध्यान आराध्य देव पर लगाये रहना और संपूर्ण उपासना काल में उसी का चिंतन-मनन करना-इसे उपासना को सफलता का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है।
उपासना-पद्धति को हर किसी के सामने नहीं प्रकट करने का शास्त्रों में विधान है। एक सच्चाई यह भी है कि पौधा लगाते ही वृक्ष फल नहीं देने लग जाता, दोनों के मध्य कुछ अंतराल होता है। किसान बीज बोता है, पर फसल काटने और धन्यों से कठोर भरने में महीनों का समय लग जाता है। पहलवान दैनिक कसरत के अभ्यास से वर्षों बाद ही अपना शरीर बलिष्ठ और मजबूत बना पाता है और फिर दंगल जीतने में सफल होता है। विद्यार्थी कठिन परिश्रम के उपराँत एक वर्ष बाद ही उसका सुफल अच्छे अंकों के रूप में प्राप्त करता है।
उपासना काल में उसी का चिंतन-मनन करना-इसे उपासना को सफलता का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है।
उपासना छोड़ बैठने की अधीरता बरतते हैं कि ऐसा क्यों व किस कारण हुआ। ऐसा ही एक प्रसंग महान गायत्री उपासक विद्यारण्य स्वामी का है। उन्होंने लंबे समय तक निष्ठापूर्वक गायत्री के 23 पुरश्चरण किये, किंतु लाभ नगण्य जितना दिखाई पड़ा। इससे क्षुब्ध होकर उन्होंने गायत्री-उपासना छोड़ दी। उपासना का सत्परिणाम बस इतना ही दिखाई पड़ा कि उनके मन में तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो गया।
उपासना के क्षणों में ईश्वर का गुणानुवाद तो अभीष्ट था ही, इसके अतिरिक्त दिनचर्या के अन्य कामों में भी दिव्य सत्ता का सतत् स्मरण और समीपता का अनुभव किया जाता । इस प्रकार हर कार्य में ब्रह्मसत्ता के बराबर मनन के कारण ही यह मार्ग ब्रह्मचर्य कहलाया।
उपासना का परिमाण भी सामने आने लगता है। अस्तु अध्यात्म मार्ग के पथिकों की उपासना में फल-प्राप्ति की उतावली न करने का शास्त्रकारों ने परामर्श दिया है। ऐसे कई उदाहरण देखने में आते हैं, जिसमें लंबे काल की साधना के पश्चात् भी फल न प्राप्त होने के कारण साधक उपासना छोड़ बैठने की अधीरता बरतते हैं कि ऐसा क्यों व किस कारण हुआ। ऐसा ही एक प्रसंग महान गायत्री उपासक विद्यारण्य स्वामी का है। उन्होंने लंबे समय तक निष्ठापूर्वक गायत्री के 23 पुरश्चरण किये, किंतु लाभ नगण्य जितना दिखाई पड़ा।
उपासना क्रम निरंतर जारी रखा जाय, तो कोई कारण नहीं, कि सामान्यजन भी उस विभूति से वंचित रह जायें, जिसे सिद्ध संत इसके माध्यम से अब तक हस्तगत करते आयें हैं।
उपासना बिलकुल छोड़ दी है, तब आपने दर्शन क्यों दिये ? यह मेरी समझ में नहीं आया।” “माँ आद्यशक्ति की वाणी फूट पड़ी तुम्हारे 24 महापातक थे। 23 पुरश्चरण से तुम्हारे 23 जन्मों के पाप धुल गये ओर जब तुमने सेवा जैसा पुण्य कार्य आरंभ कर 24 वें जन्म के पाप को भी धो लिया, तो अब में तुम्हारे समक्ष हूँ। तुमने तनिक उतावली कर दी।
उपासना के दौरान मन के भटकाव को रोककर ध्यान आराध्य देव पर लगाये रहना और संपूर्ण उपासना काल में उसी का चिंतन-मनन करना-इसे उपासना को सफलता का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है।
उपासना उतनी ही जल्दी फलवती होती है, किंतु जिसका अंतः कारण कषाय-कल्मषों से भरा, अनुर्वर, ऊबड़-खाबड़ पथरीला होता है, उसकी उपासना आरंभ में होती है। बाद में जब वह धवल और निरभ्र आकाश की तरह साफ हो जाता है, तो उपासना का परिमाण भी सामने आने लगता है। अस्तु अध्यात्म मार्ग के पथिकों की उपासना में फल-प्राप्ति की उतावली न करने का शास्त्रकारों ने परामर्श दिया है। ऐसे कई उदाहरण देखने में आते हैं, जिसमें लंबे काल की साधना के पश्चात् भी फल न प्राप्त होने के कारण साधक उपासना छोड़ बैठने की अधीरता बरतते हैं कि ऐसा क्यों व किस कारण हुआ। ऐसा ही एक प्रसंग महान गायत्री उपासक विद्यारण्य स्वामी का है।
उपासना छोड़ दी। उपासना का सत्परिणाम बस इतना ही दिखाई पड़ा कि उनके मन में तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो गया। इससे उनने ग्रह-त्याग कर यायावरी अपना ली और दुखियों-पीड़ितों का दुःख कम करने में उनकी सहायता करने लगे। उनके इस परोपकार वृत्ति युक्त जीवन आरंभ होने के कुछ माह उपराँत एक दिन माँ गायत्री उनके सम्मुख प्रकट हुई वर माँगने को कहा। विद्यारण्य मुनि बड़े अचकचाये।
उपासना की सफलता में कितने ही ऐसे सत्य हैं, जिन्हें उसकी परिपक्वता के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। पातंजलि योगदर्शन के ‘अभ्यास-वैराग्य’ प्रकरण में सफलता के तीन सोपान गिनाये गये हैं - (1) - दीर्घकाल अर्थात् जब तक साधना से सिद्धि न मिल जाय, तब तक उसे निष्ठापूर्वक करते रहना चाहिए। (2) नैरन्तर्येण या नित्य-नैमित्तिकत्ता। इसके अंतर्गत उस प्रमाद से बचने को सलाह दी गई है, जिसमें उपासक दस दिन उपासना करके चार दिन आराम करने की बात सोचते हैं। इसके उपासना निष्फल जाती है।
उपासना फलवती क्यों नहीं हो पाती ? इसका एक सबसे प्रमुख कारण है श्रद्धा का अभाव। गीता (4/39) का इस संबंध में स्पष्ट निर्देश है- “श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं” अर्थात् इष्ट के प्रति जिसकी श्रद्धा होती है, वही ज्ञान-प्राप्ति कर पाता है। दूसरा प्रधान कारक है-एक निष्ठा भाव की कमी। यह सुविदित तथ्य है कि कोई भी मंत्र स्वयं में चमत्कारी नहीं होता, साधक की निष्ठा और आस्था ही, उसे वैसा बना देने में प्रमुख भूमिका निभाती है।
उपासना आरंभ में होती है। बाद में जब वह धवल और निरभ्र आकाश की तरह साफ हो जाता है, तो उपासना का परिमाण भी सामने आने लगता है। अस्तु अध्यात्म मार्ग के पथिकों की उपासना में फल-प्राप्ति की उतावली न करने का शास्त्रकारों ने परामर्श दिया है। ऐसे कई उदाहरण देखने में आते हैं, जिसमें लंबे काल की साधना के पश्चात् भी फल न प्राप्त होने के कारण साधक उपासना छोड़ बैठने की अधीरता बरतते हैं कि ऐसा क्यों व किस कारण हुआ। ऐसा ही एक प्रसंग महान गायत्री उपासक विद्यारण्य स्वामी का है।
उपासना निष्फल जाती है। उसे नित्य-नैमित्तिक क्रिया की तरह प्रतिदिन आस्था पूर्वक किया जाना चाहिए। (3) सत्कारासेवित् अर्थात् चित्त की एकाग्रता। उपासना के दौरान मन के भटकाव को रोककर ध्यान आराध्य देव पर लगाये रहना और संपूर्ण उपासना काल में उसी का चिंतन-मनन करना-इसे उपासना को सफलता का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है।
उपासना साल भर में सिद्धि प्रदान करने की क्षमता रखती है, तो सामने वाला व्यक्ति तुरंत यह सोचने लगता है कि यदि ऐसी बात है, तो क्यों न उसी की उपासना की जाय। इस प्रकार वह पहली को छोड़ कर दूसरी को अपना लेता है, किंतु मन सर्वथा संशयहीन यहाँ भी बना नहीं रहा पाता और यह असमंजस खाये जाता है कि पता नहीं यह भी जल्दी फलित हो पायेगी या नहीं। इस मध्य यदि कोई तीसरा व्यक्ति उसकी उपासना पद्धति में खोट बताकर किसी अन्य पद्धति को अपना लेने की सलाह देता है, तो वह सद्य ऐसा करने के लिए तैयार हो जाता है। इस प्रकार उपासक वेश्या की तरह किसी एक के प्रति निष्ठावान न रह कर अनेकों को आजमाने और तुर्त−फुर्त में लाभ पा लेने के चक्कर में अपना बहुमूल्य जीवन गँवा देता है और अंत में निताँत खाली हाथ रह कर विभूतिहीन स्थिति में इस संसार से अलविदा कर जाता है।
उपासना पद्धति में खोट बताकर किसी अन्य पद्धति को अपना लेने की सलाह देता है, तो वह सद्य ऐसा करने के लिए तैयार हो जाता है। इस प्रकार उपासक वेश्या की तरह किसी एक के प्रति निष्ठावान न रह कर अनेकों को आजमाने और तुर्त−फुर्त में लाभ पा लेने के चक्कर में अपना बहुमूल्य जीवन गँवा देता है और अंत में निताँत खाली हाथ रह कर विभूतिहीन स्थिति में इस संसार से अलविदा कर जाता है।
उपासना निष्फल क्यों चली गई अब जबकि मैंने उपासना बिलकुल छोड़ दी है, तब आपने दर्शन क्यों दिये ? यह मेरी समझ में नहीं आया।” “माँ आद्यशक्ति की वाणी फूट पड़ी तुम्हारे 24 महापातक थे। 23 पुरश्चरण से तुम्हारे 23 जन्मों के पाप धुल गये ओर जब तुमने सेवा जैसा पुण्य कार्य आरंभ कर 24 वें जन्म के पाप को भी धो लिया, तो अब में तुम्हारे समक्ष हूँ। तुमने तनिक उतावली कर दी।
उपासना करने ? उपासक बना बैठा है तू इस अरण्य में। नेत्रों से अश्रुधारा चल रही है। मुख लाल लाल हो गया है, किंतु विक्षिप्त हो उठा है, वह तो।
उपासना फलदायी नहीं हो पा रही है कोई चमत्कार उत्पन्न नहीं कर पा रही है। ऐसे में यदि कोई यह कह दे कि अमुक देवता की उपासना साल भर में सिद्धि प्रदान करने की क्षमता रखती है, तो सामने वाला व्यक्ति तुरंत यह सोचने लगता है कि यदि ऐसी बात है, तो क्यों न उसी की उपासना की जाय। इस प्रकार वह पहली को छोड़ कर दूसरी को अपना लेता है, किंतु मन सर्वथा संशयहीन यहाँ भी बना नहीं रहा पाता और यह असमंजस खाये जाता है कि पता नहीं यह भी जल्दी फलित हो पायेगी या नहीं। इस मध्य यदि कोई तीसरा व्यक्ति उसकी उपासना पद्धति में खोट बताकर किसी अन्य पद्धति को अपना लेने की सलाह देता है, तो वह सद्य ऐसा करने के लिए तैयार हो जाता है। इस प्रकार उपासक वेश्या की तरह किसी एक के प्रति निष्ठावान न रह कर अनेकों को आजमाने और तुर्त−फुर्त में लाभ पा लेने के चक्कर में अपना बहुमूल्य जीवन गँवा देता है और अंत में निताँत खाली हाथ रह कर विभूतिहीन स्थिति में इस संसार से अलविदा कर जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-May
उपासना करने पर हमको फल मिले न मिले कह नहीं सकते, लेकिन जीवन की साधना करने का परिणाम निश्चित रूप से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवनों में लाभ के रूप में देखा जा सकता है। यह साधना के बारे में निवेदन किया गया है।
उपासना और साधना-इन दोनों को मिलाकर एक पूरी चीज बनती है। उपासना का अर्थ है-भगवान पर विश्वास, भगवान की समीपता। उपासना माने भगवान के पास बैठना-नजदीक बैठना। इसका मतलब यह हुआ कि उसकी विशेषताएँ हम अपने जीवन में धारण करें-जैसे आग के पास हम बैठते हैं, तो आग की गर्मी से हमारे कपड़े गरम हो जाते हैं, हाथ गरम हो जाते हैं, शरीर गरम हो जाता है। पास बैठने का यही लाभ होना चाहिए।
उपासना-भजन इसलिए किया जाता है।
उपासना में आत्मसत्ता को परमतत्व से एकाकार करने की भावना कषाय कल्मषों का परिशोधन, साधना में विचार, अर्थ, समय व इंद्रिय-संयम व उसके लिए सत्त स्वाध्याय तथा आराधना में सारे समाज का अपने को एक अंग मानते हुए समाज सेवा के निमित्त समय व अंशदान नियमित रूप से देते रहने का विधान जो उनने बनाया, वह प्रज्ञापरिजनों के लिए योगत्रयी बनाया। यह त्रिवेणी जिसमें करोड़ों व्यक्ति स्नान कर अपने आप को महाकाल की धारा के साथ जोड़ चुके हैं, आज अपने सरल-सुगम रूप में योग साधना में प्रवेश का, मानव मात्र को कुँडलिनी के जागरण का एक द्वारा हो नहीं खोलती है वरन् जन जन की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है। यही वह विशेषता है जिससे गायत्री परिवार अपने अधिष्ठाता के मार्गदर्शन में साधना प्रणाली को जन-जन तक पहुँचा सका है। दीपयज्ञों, संस्कारों के द्वारा अब हर व्यक्ति अध्यात्म को उल्लासमय महोत्सव बनाकर अपने जीवन से झरता देख सकता है। युगसाधना का कायाकल्प कर प्रत्येक के लिए मुक्ति का पथ प्रशस्त करने वाले उस युगऋषि को महाकाल की सत्ता को बारंबार प्रणाम है।
उपासना माने भगवान के पास बैठना-नजदीक बैठना। इसका मतलब यह हुआ कि उसकी विशेषताएँ हम अपने जीवन में धारण करें-जैसे आग के पास हम बैठते हैं, तो आग की गर्मी से हमारे कपड़े गरम हो जाते हैं, हाथ गरम हो जाते हैं, शरीर गरम हो जाता है। पास बैठने का यही लाभ होना चाहिए। बर्फ के पास बैठते हैं, ठंडक में बैठते हैं तो हमारे हाथ ठंडे हो जाते है। पानी में बर्फ डालते हैं तो पानी ठंडा हो जाता है।
उपासना का अर्थ यह है कि हम भगवान का भजन करें, नाम लें, जप करें, ध्यान करें, पर साथ-साथ हम इस बात के लिए कोशिश करें कि हम भगवान के नजदीक आते जायें। भगवान हमारे से समाविष्ट होता जाये और हम भगवान में समाविष्ट होते जायें अर्थात् दोनों एक हो जायें। एक होने से मतलब यह है कि दोनों कि इच्छाएँ, दोनों की गतिविधियाँ, दोनों की क्रिया पद्धति, दोनों के दृष्टिकोण एक जैसे रहें। हम को ईश्वर जैसा बनने का प्रयत्न करना चाहिए। ईश्वर जैसे बनें न कि ईश्वर पर हुकुम चलायें और उनको यह आदेश दें कि आपको ऐसा करना चाहिए।
उपासना मनोकामना की पूर्ति अथवा स्वर्ग मुक्ति, ऋषि, सिद्धि के निमित्त होती रही है। उसके पीछे विशुद्ध व्यक्तिगत लाभ था। उसी में से हिस्सा बंटने के लिए भावुक भक्तजन इन पुजारियों की झोली भेंट पूजा से भरा करते थे। किंतु धर्मचक्र प्रवर्तन ने सर्व साधारण का दृष्टिकोण ही बदल दिया। वह विघटनकारी परिवर्तन था, जिसमें लोकोपयोगी धर्म-संस्थानों को मात्र देवताओं को कतिपय विडंबनाओं के सहारे वशवर्ती करने का प्रयत्न किया जाने लगा।
उपासना, साधना, स्वाध्याय के सतत् अभ्यास और उसके अनुसार कार्यक्षेत्र में उतरने पर सफल और स्निग्ध जीवन की सुवास मिलने लगती हैं।
उपासना परम सत्ता की , साधना अपने आपकी तथा आराधना विराट विश्व ब्रह्मांड की , इस समाज की यह एक निराली त्रिधा साधना प्रक्रिया पूज्यवर के द्वारा ही निर्धारित है। उपासना में आत्मसत्ता को परमतत्व से एकाकार करने की भावना कषाय कल्मषों का परिशोधन, साधना में विचार, अर्थ, समय व इंद्रिय-संयम व उसके लिए सत्त स्वाध्याय तथा आराधना में सारे समाज का अपने को एक अंग मानते हुए समाज सेवा के निमित्त समय व अंशदान नियमित रूप से देते रहने का विधान जो उनने बनाया, वह प्रज्ञापरिजनों के लिए योगत्रयी बनाया। यह त्रिवेणी जिसमें करोड़ों व्यक्ति स्नान कर अपने आप को महाकाल की धारा के साथ जोड़ चुके हैं, आज अपने सरल-सुगम रूप में योग साधना में प्रवेश का, मानव मात्र को कुँडलिनी के जागरण का एक द्वारा हो नहीं खोलती है वरन् जन जन की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है। यही वह विशेषता है जिससे गायत्री परिवार अपने अधिष्ठाता के मार्गदर्शन में साधना प्रणाली को जन-जन तक पहुँचा सका है। दीपयज्ञों, संस्कारों के द्वारा अब हर व्यक्ति अध्यात्म को उल्लासमय महोत्सव बनाकर अपने जीवन से झरता देख सकता है।
उपासना से वंचित क्यों रहेगी ?
उपासना प्लस साधना। उपासना और साधना-इन दोनों को मिलाकर एक पूरी चीज बनती है। उपासना का अर्थ है-भगवान पर विश्वास, भगवान की समीपता। उपासना माने भगवान के पास बैठना-नजदीक बैठना। इसका मतलब यह हुआ कि उसकी विशेषताएँ हम अपने जीवन में धारण करें-जैसे आग के पास हम बैठते हैं, तो आग की गर्मी से हमारे कपड़े गरम हो जाते हैं, हाथ गरम हो जाते हैं, शरीर गरम हो जाता है।
उपासना का अर्थ है-भगवान पर विश्वास, भगवान की समीपता। उपासना माने भगवान के पास बैठना-नजदीक बैठना। इसका मतलब यह हुआ कि उसकी विशेषताएँ हम अपने जीवन में धारण करें-जैसे आग के पास हम बैठते हैं, तो आग की गर्मी से हमारे कपड़े गरम हो जाते हैं, हाथ गरम हो जाते हैं, शरीर गरम हो जाता है। पास बैठने का यही लाभ होना चाहिए। बर्फ के पास बैठते हैं, ठंडक में बैठते हैं तो हमारे हाथ ठंडे हो जाते है।
उपासना, साधना, आराधना की आवश्यकता है। इतने पर भी आत्म परिष्कार और लोक मंगल में संलग्न रहने की आवश्यकता बनी ही रहती है। इसकी पूर्ति के लिए अधिकाधिक समय दान और अंशदान नियोजित करते रहना चाहिए। इस निर्धारण को कार्यान्वित करने का नाम वानप्रस्थ है। उसी मनः स्थिति में ऐसा कुछ बन पड़ना संभव है जिसमें आत्म संतोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह के विविध लाभों से लाभान्वित हो सकना बन पड़ा।
उपासना का लक्ष्य प्रज्ञा को बनाना ही समीचीन है। यों गायत्री महामंत्र के रूप में उसकी अभ्यर्थना आदि काल से होती आयी है।
उपासना का तात्पर्य अपनी मनोभूमि को इस लायक बनाना है कि हम भगवान के आज्ञानुवर्ती बन सकें। उनके संकेतों के इशारे पर अपनी विचारणा और क्रियापद्धति को ढाल सकें। उपासना-भजन इसलिए किया जाता है।
उपासना करने लगी। शीघ्र ही उसका भय जाता रहा। मन में उत्साह और हलकापन आ गया। आँखों में प्रसन्नता की ज्योति झलकने लगी। समूचा जीवन प्रसन्नता की हिलोर बनने लगा।
उपासना और खोज यहाँ भक्ति पर जोर है पर ज्ञान भी गौण नहीं है। उसमें एक नई जान आ जाती है, कृतार्थ हो जाता है। फिर भी कर्मों का यज्ञ जारी रहता है। द्विविध धाराएँ यहाँ ज्ञान, कर्म, भक्ति की त्रिवेणी में परिवर्तित हो जाती है और यज्ञ का फल प्राप्त हो जाता है अर्थात् परम् सत्ता के साथ योग और परा भागवती प्रकृति के साथ एकत्व प्राप्त हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-March
उपासना क्रम में उसे प्रमुख स्थान दिया। गायत्री मंत्र का निरंतर जप रोगियों को अच्छा करने में और आत्मा की उन्नति के लिए उपयोगी । गायत्री महामंत्र का स्थिर चित्त और शाँत हृदय से किया हुआ जप आपत्ति काल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है यह कहते हुए महात्मा गांधी ने स्वीकार किया है। कि “उपासना एवं प्रार्थना में कैसे गायत्री महामंत्र को प्रथम स्थान दिया है।” रामकृष्ण परमहंस का कथन है कि लोगों को लंबी एवं क्लिष्ट साधना की जरूरत नहीं।
उपासना कर रहे है। हमें सूक्ष्मीकरण के लिए कहा गया था उस साधना में हम मुस्तैदी से लगे हुए हैं इस बारे में इतना की कहना काफी है कि हमारे बारे में आपको कोई चिंता करने की बात नहीं है। चिंता तो आपकी हमको करनी है आप क्यों करेंगे? बच्चे माँ बाप की चिंता क्यों नहीं करेंगे कि पिता जी का यह काम कैसे होगा? वह काम कैसे होगा?
उपासना करते हैं वे आत्म लाभ प्राप्त करते हैं। योग का मूल आधार गायत्री है। गायत्री से ही संपूर्ण योगों की साधना होती है। उपरोक्त अभिमतों से मिलते जुलते विचार प्रायः सभी ऋषियों के है। ऋषि प्रचर भारद्वाज , चरक, नारद, वशिष्ठ, गौतम , उद्दोलक, देवगुरु बृहस्पति, शृंगी ऋषि , वैशम्पायन, दुर्वासा, परशुराम, दत्तात्रेय, अगस्त अनत्कुमार, कण्व शैतिक जैसे ऋषियों के जीवन वृत्तांतों से स्पष्ट है कि उनकी महान सफलताओं का मूल हेतु गायत्री उपासना ही था कोई भी ऋषि अन्य विषयों में चाहे परस्पर विचारों की भिन्नता रखते रहे हों पर गायत्री के बारे में उन सबमें समान श्रद्धा भी और सभी ने उपासना क्रम में उसे प्रमुख स्थान दिया।
उपासनाएं कर सभा कक्ष में जुड़ने लगे। थोड़ी देर में सभा भवन पूरी तरह भर गया। सम्राट महात्मा बुद्ध के समीप बैठे। एक भिक्षु ने सूचना दी आनन्द पाटलिपुत्र से आ गए है, नगर बिंदुमती उसके साथ ही है। सम्राट चौंके पर इससे पूर्व वे कुछ पूछें, भिक्षु भगवान बुद्ध का संकेत पाकर बाहर निकल गया।
उपासना से व्यक्ति जीवन मुक्त हो जाता है। गायत्री उपासना आत्मा का परम शोधन करने वाली है। उसके प्रभाव से कठिन दोष और दुर्गुण का परिमार्जन हो जाता है। जो मनुष्य गायत्री तत्व को भली प्रकार समझ लेता है। उसके लिए संसार में कोई सुख शेष नहीं रह जाता।
उपासना में निमग्न साधकों ने अनुभव किया है। अथर्ववेद 1'-17- ' द्गह्यड्ड गायत्री है स्तुति करते हुए कहा गया है कि वह आयु , प्राण , प्रजा, पशु, कीर्ति, करने वाली है। “संपूर्ण वेद, यज्ञ, दान , तप गायत्री मंत्र की एक कला के समान है ये भव्य गायत्री के उद्गाता महर्षि विश्वमित्र के हैं महर्षि याज्ञवल्क्य तो गायत्री को वेद वाङ्मय की सर्व श्रेष्ठ उपलब्धि मानते हैं गायत्री और समस्त वेदों को तराजू में तोला गया तो उन्हें गायत्री वाला पलड़ा भारी लगा। उन्हीं के विचार से “वेदों का सार उपनिषद् एवं उपनिषदों एवं उपनिषदों का सार व्याहृतियों समेत गायत्री है। गायत्री वेदों की जननी है, पापों का नाश करने वाली है, इससे अधिक पवित्र करने वाला अन्य कोई मंत्र पृथ्वी पर नहीं है।
उपासना से लिया जाता है, पर जानने योग्य तथ्य यह है कि अध्यात्म क्षेत्र में जितनी इसकी महत्ता उपयोगिता है उससे कोई कम भौतिक क्षेत्र में नहीं है। भौतिक जीवन की समृद्ध बनाने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है, कारण कि किसी व्यक्ति की सफलता-विफलता का मुख्य हेतु अस्थिर और अव्यवस्थित चित वृत्तियाँ होती है। जो इन्हें संयमित कर लेता अथवा शुभ अशुभ भाव संकल्पों के आधार पर अच्छों को सुरक्षित रख बुरी को निकाल बाहर करता है जीवन में वही सफल ही पाता है। सामान्य जीवन में उपयोग यही कार्य संपन्न करता है। वह अनावश्यक संकल्पों को शमित और शुभ संकल्पों को पोषण देकर सुदृढ़ बनाता और अंततः उसकी सिद्धि में सहयोग करता है।
उपासना के द्वारा शुद्ध कर लेने वाले व्यक्ति के लिए साँसारिक जीवन में सब आरे से सब प्रकार की सफलताओं का द्वार खुल जाता है उत्तम स्वभाव अच्छी आदतें, स्वस्थ मस्तिष्क, दर दृष्टि , प्रफुल्ल मन, उच्च चरित्र , कर्तव्य निष्ठा की प्रकृति को प्राप्त करने के पश्चात् गायत्री साधक के लिए संसार में कोई दुःख कष्टकर नहीं रह जाता, उसके लिए सामान्य परिस्थितियों में भी सुख ही सुख उपस्थित रहता है इन रहस्यों को गायत्री उपासना में निमग्न साधकों ने अनुभव किया है। अथर्ववेद 1'-17- ' द्गह्यड्ड गायत्री है स्तुति करते हुए कहा गया है कि वह आयु , प्राण , प्रजा, पशु, कीर्ति, करने वाली है। “संपूर्ण वेद, यज्ञ, दान , तप गायत्री मंत्र की एक कला के समान है ये भव्य गायत्री के उद्गाता महर्षि विश्वमित्र के हैं महर्षि याज्ञवल्क्य तो गायत्री को वेद वाङ्मय की सर्व श्रेष्ठ उपलब्धि मानते हैं गायत्री और समस्त वेदों को तराजू में तोला गया तो उन्हें गायत्री वाला पलड़ा भारी लगा। उन्हीं के विचार से “वेदों का सार उपनिषद् एवं उपनिषदों एवं उपनिषदों का सार व्याहृतियों समेत गायत्री है। गायत्री वेदों की जननी है, पापों का नाश करने वाली है, इससे अधिक पवित्र करने वाला अन्य कोई मंत्र पृथ्वी पर नहीं है।
उपासनाएं करें चाहे न करें, केवल गायत्री उपासना से व्यक्ति जीवन मुक्त हो जाता है। गायत्री उपासना आत्मा का परम शोधन करने वाली है। उसके प्रभाव से कठिन दोष और दुर्गुण का परिमार्जन हो जाता है। जो मनुष्य गायत्री तत्व को भली प्रकार समझ लेता है। उसके लिए संसार में कोई सुख शेष नहीं रह जाता।
उपासना की और उपार्जित शक्ति का उपयोग असुरता से लड़ने के लिए किया । अपने भक्तों को भी गायत्री की ही शरण में आने का संदेश उन्होंने दिया। काम्य सफलता, तथा तप की सिद्धि के लिए गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है। गायत्री ब्रह्म साक्षात्कार कराने वाली है। अनुचित काम करने वाली के दुर्गुण गायत्री के कारण छूट जाते हैं जो ब्रह्मचर्य पूर्वक गायत्री की उपासना करता है।
उपासना एवं प्रार्थना में कैसे गायत्री महामंत्र को प्रथम स्थान दिया है।” रामकृष्ण परमहंस का कथन है कि लोगों को लंबी एवं क्लिष्ट साधना की जरूरत नहीं। इस छोटी सी गायत्री की साधना करके देखें। गायत्री की उपासना से बड़ी से बड़ी सिद्धियां मिल जाती है। यह मंत्र छोटा है किंतु इसकी शक्ति भारी है।
उपासना से बड़ी से बड़ी सिद्धियां मिल जाती है। यह मंत्र छोटा है किंतु इसकी शक्ति भारी है।
उपासनाएं करता है। वह पकवान् छोड़कर भिक्षा माँगने वाले के समान हैं राम कृष्ण, हनुमान, भगवान शंकर, गणेश, कार्तिकेय , जैसी अवतारी सत्ताओं ने स्वयं गायत्री महाशक्ति की उपासना की और उपार्जित शक्ति का उपयोग असुरता से लड़ने के लिए किया । अपने भक्तों को भी गायत्री की ही शरण में आने का संदेश उन्होंने दिया। काम्य सफलता, तथा तप की सिद्धि के लिए गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है। गायत्री ब्रह्म साक्षात्कार कराने वाली है।
उपासना ही था कोई भी ऋषि अन्य विषयों में चाहे परस्पर विचारों की भिन्नता रखते रहे हों पर गायत्री के बारे में उन सबमें समान श्रद्धा भी और सभी ने उपासना क्रम में उसे प्रमुख स्थान दिया। गायत्री मंत्र का निरंतर जप रोगियों को अच्छा करने में और आत्मा की उन्नति के लिए उपयोगी । गायत्री महामंत्र का स्थिर चित्त और शाँत हृदय से किया हुआ जप आपत्ति काल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है यह कहते हुए महात्मा गांधी ने स्वीकार किया है। कि “उपासना एवं प्रार्थना में कैसे गायत्री महामंत्र को प्रथम स्थान दिया है।” रामकृष्ण परमहंस का कथन है कि लोगों को लंबी एवं क्लिष्ट साधना की जरूरत नहीं।
उपासना संबंधी अनुभूतियों को इसी रूप में उपरोक्त पंक्तियों के माध्यम को दर्शाया है। महर्षि व्यास तो इनसे भी आगे अपने गूढ़तम साधना के परिणामों को दर्शाते हुए कहते हैं”जिस प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री हैं।” गायत्री काम धेनु के समान है। गंगा शरीर के पाप कामों निर्मल करती है , गायत्री 3पों ब्रह्म गंगा से आत्मा पवित्र होती है जो साधक गायत्री महामंत्र को छोड़कर अन्य उपासनाएं करता है। वह पकवान् छोड़कर भिक्षा माँगने वाले के समान हैं राम कृष्ण, हनुमान, भगवान शंकर, गणेश, कार्तिकेय , जैसी अवतारी सत्ताओं ने स्वयं गायत्री महाशक्ति की उपासना की और उपार्जित शक्ति का उपयोग असुरता से लड़ने के लिए किया ।
उपासना आत्मा का परम शोधन करने वाली है। उसके प्रभाव से कठिन दोष और दुर्गुण का परिमार्जन हो जाता है। जो मनुष्य गायत्री तत्व को भली प्रकार समझ लेता है। उसके लिए संसार में कोई सुख शेष नहीं रह जाता। कुषि अन्नि, शैनिक , शंख पाराशर एवं भगवान मनु जैसे गायत्री के परम उपासकों ने अपने जीवन की उपासना संबंधी अनुभूतियों को इसी रूप में उपरोक्त पंक्तियों के माध्यम को दर्शाया है।
उपासना करता है। और आहार में ताजे आँवले के फलों को सेवन करता है। वह दीर्घ जीवी होता है । ऐसा कहा गया है। मंदमति, कुमार्गगामी और अस्थिर भांति भी गायत्री के प्रभाव से उच्च पद को प्राप्त करते हैं जो पवित्रता और स्थिरता -पूर्वक गायत्री की उपासना करते हैं वे आत्म लाभ प्राप्त करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-April
उपासना के सहारे उच्च पदासीन हुए हैं। ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्’ के रूप में निखिल ब्रह्माँड में यही महाशक्ति संव्याप्त है। छोटे से छोटा चौबीस अक्षर का कलेवर किंतु उसमें ज्ञान और विज्ञान का भंडागार है। सृष्टि में ऐसी कुछ भी नहीं जो गायत्री में न हो। उसकी उच्चस्तरीय साधनाएं कठिन और विशिष्ट भी हैं, पर साथ ही सरल भी इतनी हैं कि उन्हें हर कोई हर स्थिति में बड़ी सरलता और सुविधा के साथ सम्पन्न कर सकता है।
उपासना में सन्निहित हैं।
उपासना से पूर्ण न हो। भगवान व्यास के अनुसार- जिस प्रकार पुष्पों का सार शहद, दूध का सार घृत है उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री है। सिद्ध की हुई गायत्री कामधेनु के समान है। गंगा शरीर के पापों को निर्मल करती है। गायत्री रूपी ब्रह्मगंगा में आत्मा पवित्र होती है।
उपासनायें। नाम और रूप के बिना उपासनायें नहीं हो सकतीं। यह दो यूनिवर्सल उपासनायें हैं। किसी भी मजहब में चले जाइए, व्यक्ति नाम जरूर ले रहा होगा। मुसलिम तसबीह पर नाम ले रहा होगा।
उपासना वरदान की तरह सिद्ध होती है। आद्य शक्ति गायत्री माता का आँचल पकड़ने वाला कभी निराश नहीं हुआ।
उपासना-आराधना के सहारे ही प्राचीन भारत के महान नागरिक देवोपम बने थे, अतः गायत्री को देवमाता भी कहा गया। गायत्री को ही आत्मशक्ति, ब्रह्मविद्या कहा गया है और उसकी अमृत कलश से उपमा दी गयी है। आत्मकल्याण और ईश्वर-दर्शन का अवलम्बन और मार्गदर्शन गायत्री में मंत्र में ओत-प्रोत है। उसे अपनाने वाले साधक अमृतपान करते हैं और देवताओं की तरह सच्चे अर्थों में अजर-अमर हो जाते हैं। गायत्री को अमृतकलश इसीलिए कहा गया है।
उपासना में इन्हीं पाँचों को मूर्धन्य माना गया है।
उपासना करते हैं। वे आत्मलाभ करते हैं। नारद जी ने गायत्री को भक्ति का ही स्वरूप माना है और कहा है कि जहाँ भक्ति रूपी गायत्री रहती है वहीं श्रीनारायण का निवास होने में कोई संदेह नहीं करना चाहिए।
उपासनायें नहीं हो सकतीं। यह दो यूनिवर्सल उपासनायें हैं। किसी भी मजहब में चले जाइए, व्यक्ति नाम जरूर ले रहा होगा। मुसलिम तसबीह पर नाम ले रहा होगा। ईसाई पादरियों को आप माला जपते हुए देखेंगे।
उपासना के साथ-साथ विशेष रूप से जो शिक्षण देते हैं वह ध्यान का शिक्षण है। उपासनायें दो हैं-नाम और रूप की उपासनायें। नाम और रूप के बिना उपासनायें नहीं हो सकतीं। यह दो यूनिवर्सल उपासनायें हैं। किसी भी मजहब में चले जाइए, व्यक्ति नाम जरूर ले रहा होगा।
उपासनायें हैं। किसी भी मजहब में चले जाइए, व्यक्ति नाम जरूर ले रहा होगा। मुसलिम तसबीह पर नाम ले रहा होगा। ईसाई पादरियों को आप माला जपते हुए देखेंगे। आर्य समाजी प्रकाश का ध्यान कर रहे होंगे।
उपासना का विधान ‘ संध्यावंदन ‘ कहलाता है। संध्या विधान में गायत्री का स्थान वैसा ही है जैसा कि शरीर में मेरुदण्ड का। भारतीय धर्म के दो प्रतीक चिन्ह हैं- एक शिखा दूसरा सूत्र (यज्ञोपवीत)। दोनों ही गायत्री की प्रतिमाएं हैं। सिर के सर्वोच्च शिखर पर गायत्री की ज्ञान ध्वजा फहराने और कंधे पर गायत्री के नौ शब्द, नौ धागे बनाकर, तीन व्याहृतियों को तीन ग्रंथियों का रूप देकर यज्ञोपवीत के रूप में कंधे पर धारण करने का अनुशासन है।
उपासना में उसका प्रथम स्थान रखते थे। मध्यकाल के संतों एवं वर्तमान शताब्दी के आध्यात्मिक महापुरुषों ने भी गायत्री के महत्व को उसी प्रकार स्वीकार किया है जैसा कि प्राचीन काल के तत्वदर्शी ऋषि-मनीषियों ने किया था। आज का युग बुद्धि और तर्क का, प्रत्यक्षवाद का है।
उपासना करें चाहे न करें, केवल गायत्री जप से द्विज जीवन मुक्त हो जाता है। साँसारिक और पारलौकिक समस्त सुखों को पाता है। संकट के समय भावनापूर्वक दस हजार मंत्र जप करने से विपत्ति का निवारण होता है। इतना ही नहीं अत्रि ऋषि के अनुसार तो गायत्री आत्मा का परमशोधन करने वाली है। उसके प्रभाव से कठिन दोष और दुर्गुणों का परिमार्जन हो जाता है।
उपासनायें दो हैं-नाम और रूप की उपासनायें। नाम और रूप के बिना उपासनायें नहीं हो सकतीं। यह दो यूनिवर्सल उपासनायें हैं। किसी भी मजहब में चले जाइए, व्यक्ति नाम जरूर ले रहा होगा। मुसलिम तसबीह पर नाम ले रहा होगा।
उपासनात्मक अनुष्ठानों में भी सम्मिलित रखा गया है और उसका प्रयोग सृष्टि और समाज के असंतुलन को संभालने में एक सामर्थ्य विशेष के रूप में भी हुआ है।
उपासनाएं करता है वह पकवान छोड़कर भिक्षा माँगने वाले के समान मूर्ख है। काम्य सफलता तथा तप की सिद्धि के लिए गायत्री से श्रेष्ठ कुछ नहीं है।
उपासना नहीं करता, वह निन्दा का पात्र है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-November
उपासना के महिमा बखान से शास्त्र भरे पड़े है। इससे भौतिक और आत्मियता सफलताएँ जिस प्रकार साथ साथ अर्जित की जा सकती हैं, वैसा सुयोग अन्य मंत्रों के साथ कदाचित् ही देखने को मिलता है यह इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू है। इसी के साथ इसमें एक कड़ी यह भी जुड़नी चाहिए कि जितनी सामर्थ्य महापुरुषों की अहैतुकी कृपा को आकर्षित करने की इसमें है उतनी शायद किसी अन्य में नहीं।
उपासना करना फिर कचहरी जाना और वहाँ से लौटने के उपरोक्त लोकसेवा में जुट पड़ना यह उनको नियमित दिनचर्या थी। पिछले इस वर्षों से अप्रतिहत उसका उक्त क्रम सुना आ रहा था। समय ज्यों गुजरता जा रहा था, वैसे ही वैसे उसमें इष्ट दर्श की अभीप्सा भी जीव में तीव्रतर होती जा रही थीं एक प्रातः जब वे उपासना की तैयारी करने में जुटे थे, तो उन्होंने अपने पूजा कक्ष की खिड़की से एक छायामूर्ति को अन्दर आते देखा वह छायामूर्ति उनसे करीब छः फूट की दूरी पर आकर सामने खड़ी हो गई। दरवाजा अन्दर से बंद था और कक्ष के दोनों खिड़कियों में लोहे की छड़ें लगी हुई थी, इसलिए निकट खड़ी मानव मूर्ति के स्थूल देहधारी होने की संभावना समाप्त हो गई। उनके मन में विचार उठा कि यह कोई दिव्य देहधारी महापुरुष हैं और निश्चय ही किसी विशेष प्रयोजन के लिये यहाँ उपस्थित हुए हैं यह बात मानव में उठते ही छाया पुरुष ने एक स्निग्ध मुसकान बिखेर दी, स्वीकृति में सिर हिलाया और कही” तुम्हारी उपासना और अकुलाहट ने मुझे यहाँ आने के लिए विवश कर दिया।
उपासना और अकुलाहट ने मुझे यहाँ आने के लिए विवश कर दिया। शायद न भी आता पर जहाँ स्वयं आद्यशक्ति विराजमान हों, वहाँ मेरा नहीं आना, विश्वमाता के अपमान के समान होता इसलिए उपस्थित होना पड़ा। चलो चले। इतना कहकर मुण्डित मस्तक, गौर वर्ण काषाय वस्त्र धारी महात्मा ने अपना एक हाथ आगे बढ़ाया, किंतु फणीन्द्रनाथ ने यह कहते हुए असमंजस दर्शाया कि आप तो सूक्ष्म शरीर धारी हैं, इस प्रकार की दिव्य देह धारण कर सकने की क्षमता मुझमें नहीं। फिर भला मैं आपके साथ कैसे चल सकता हूँ?
उपासनात्मक जीवन भरा पड़ा हैं। जो निष्ठापूर्वक वेदमाता का आँचल पकड़ते हैं, वे निहाल हुए बिना नहीं रहते। उन पर देवपुरुषों का अनुग्रह बरसता रहता है और समय समय पर आपत्तियों में कठिनाइयों में अथवा साधनात्मक जीवन में उनकी समर्थ साधनात्मक जीवन में उनकी समर्थ सहायता एवं मार्गदर्शन मिलते रहते हैं। जिनका साधनात्मक जीवन एकांगी बना हुआ है और जो मात्र जप तक स्वयं को सीमाबद्ध रखते हैं, संभव उन्हें गायत्री के वास्तविक फलितार्थ और महापुरुषों के अपूर्व सहयोग से वंचित रहना पड़े, पर जा उपासना साधना और आराधना रूपी त्रिपदा के त्रिविध आधार को अपनाये हुए है, वे कृतकृत्य होकर रहते हैं, इसमें दो मत नहीं।
उपासना साधना और आराधना रूपी त्रिपदा के त्रिविध आधार को अपनाये हुए है, वे कृतकृत्य होकर रहते हैं, इसमें दो मत नहीं।
उपासना की तैयारी करने में जुटे थे, तो उन्होंने अपने पूजा कक्ष की खिड़की से एक छायामूर्ति को अन्दर आते देखा वह छायामूर्ति उनसे करीब छः फूट की दूरी पर आकर सामने खड़ी हो गई। दरवाजा अन्दर से बंद था और कक्ष के दोनों खिड़कियों में लोहे की छड़ें लगी हुई थी, इसलिए निकट खड़ी मानव मूर्ति के स्थूल देहधारी होने की संभावना समाप्त हो गई। उनके मन में विचार उठा कि यह कोई दिव्य देहधारी महापुरुष हैं और निश्चय ही किसी विशेष प्रयोजन के लिये यहाँ उपस्थित हुए हैं यह बात मानव में उठते ही छाया पुरुष ने एक स्निग्ध मुसकान बिखेर दी, स्वीकृति में सिर हिलाया और कही” तुम्हारी उपासना और अकुलाहट ने मुझे यहाँ आने के लिए विवश कर दिया। शायद न भी आता पर जहाँ स्वयं आद्यशक्ति विराजमान हों, वहाँ मेरा नहीं आना, विश्वमाता के अपमान के समान होता इसलिए उपस्थित होना पड़ा। चलो चले।
उपासना के समय उस पर हमारी दृष्टि गड़ी रहती है तो हमारी चित्र स्पंदित होने लगता है शाँत और गंभीर मुद्रा में महान तत्व के चिंतन में लीग बुद्ध के चित्र को हम एकाग्रतापूर्वक देखें तो हमारे चित्त में गंभीर शाँति की प्रेरणा उठने लगती है। किसी वीर योद्धा का चित्र देखने पर वैसे ही साहस और वैसे ही शौर्य के भाव उदित होने लगते हैं। गाँधी की प्रतिमा देखे तो उनके चेहरे से छलकने वाली करुणा दया और अहिंसा के भाव हमारे अंतःकरण में रिस रिस कर आने लगते हैं किसी लोकसेवी परमार्थपरायण शहीद की चित्राकृति देखकर देश और समाज के लिए हममें भी मिटने का भाव उदित होने लगता है। किसी देवी देव या अवतारी पुरुष की छवि देखकर किसी मंदिर मस्जिद या गिरजाघर में जाने पर ईश्वर तथा उसके दिव्य गुणों का अनायास ही स्मरण आने लगता है। कहने का अर्थ यह है कि देखे गये चित्रों का भाव और उनकी भाषा हमारी चेतना को अनायास ही आँदोलित कर उठती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-December
उपासना का विस्तार आज की अनिवार्यता है। यित्र स्थापना, देव स्थापनाएं, घर मंदिर कार्यक्रम उसी की पूर्ति में किए जा रहे प्रयास हैं, पर आज के उलटे समय को उलट कर सीधा करने की आवश्यकता है, वह एकाकी उपासना मात्र से पूरा नहीं होगा उसके लिए बड़े सामूहिक अनुष्ठानों की आवश्यकता है। दोनों नवरात्रियों पर देश भर में किए जाने वाले अनुष्ठान इस तथ्य के प्रमाण हैं। प्राचीनकाल से ही बड़े और सामूहिक अनुष्ठानों का प्रचलन रहा है संभव है तब परिस्थितियाँ गंभीर न होने के कारण है। छोटे-छोटे हों पर पुराणों में जिस दुर्गावतरण का उल्लेख है वह देवताओं-देव प्रवृत्ति के लोगों की सामूहिक शक्ति उपासना ही रही है।
उपासना ही रही है। सतयुग में मधुकैटभ द्वापर में शुंभ निशुंभ और त्रेता में महिषासुर का नाष जिस शक्ति द्वारा वर्णित है वह और कुछ नहीं अपितु पराशक्ति का अनुष्ठान प्रधान उपार्जन ही है महिषासुर अर्थात् पार्थिव-प्रवृत्ति-लोभ लालच, लिप्सा नारी जीवन के प्रति आत्मा की भावना उसी से अपराध अवाँछनीयताएँ बढ़ती हैं अराजकता बढ़ती है। दुर्गावतरण ज्ञान साधना ज्योति बोध शक्ति संचय का प्रतीक है वही पराशक्ति है वही गायत्री है।
उपासना का ही एक अंग मानते थे। अपनी वैयक्तिक समस्याओं के लिए उन्होंने कभी पराश्रय नहीं लिया।
उपासना के प्रथम चरण के रूप में पहले परिवार की प्रारंभिक भूमिका से होकर गुजरना पड़ता है। इसके पूरा होने के उपराँत उसे दूसरी भूमिका-समाज-साधना में प्रवेश करना पड़ता है। इसके पश्चात् राष्ट्र-साधना की तीसरी अवस्था में अवस्थान करना होता है। अंतिम भूमिका विश्व-साधना की है, जिसे ठीक-ठीक ढंग से पूरा कर लेने के बाद व्यक्ति की अवस्था योग-सिद्ध योगी स्तर की हो जाती है। इस दशा में वह योग साधना की वह सारी विभूतियाँ हस्तगत कर सकता है, जिसका अधिकारी एक यती है।
उपासना को मिला। यह कहने वाली बात नहीं कि इस देश को जग गुरु और सोने की चिड़िया होने का गौरव भी कारण मिला। अथर्ववेद ने इसी पराशक्ति की अभ्यर्थना में ॐ स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्ताम् पावमानी द्विजानाम् आयुः प्राणं प्रज्ञाँ पषुँ कीर्ति द्रविणम् ब्रह्मवर्चसम् ब्रह्मलोकम्” अर्थात् वेदों की जननी माँ गायत्री की उपासना करने वाले आयु (नीरोग) प्राण, यश, धन संपत्ति का सुखोपभोग करते हुए ब्रह्मवर्चस् की प्राप्ति करते ही भगवान तक जा पहुँचते हैं
उपासना करने वाले आयु (नीरोग) प्राण, यश, धन संपत्ति का सुखोपभोग करते हुए ब्रह्मवर्चस् की प्राप्ति करते ही भगवान तक जा पहुँचते हैं
उपासना का सहारा लिया। शरीर को कष्ट एवं यातनाओं से उसने उनके मूल स्वभाव को तोड़ना, मरोड़ना चाहा। इसके सुख की अनुभूति के स्रोतों को हमेशा के लिये कठोरता पूर्वक दमन करना चाहा। लेकिन इस शारीरिक उपेक्षा एवं कठोरता के कारण, शारीरिक सुख की कामना गिरी नहीं-मरी नहीं-और तब यह सोचा जाने लगा कि जीवात्मा की मौलिक कामना आनन्द प्राप्ति है और इसी केन्द्र के चारों ओर हमारे जीवन के क्रियाकलाप, प्रयत्न, उद्योग चक्कर काटते रहते हैं और जब तक उसको यह कामना सही रूप से प्राप्त नहीं होती वह अतृप्त, अधीर एवं निरन्तर असंतुष्ट रहता है।
उपासना अनुष्ठान से व्यक्तिगत जीवन समुन्नत होता है। व्यक्ति से परिवार, समाज और राष्ट्र बनते हैं इस दृष्टि से गायत्री उपासना का विस्तार आज की अनिवार्यता है। यित्र स्थापना, देव स्थापनाएं, घर मंदिर कार्यक्रम उसी की पूर्ति में किए जा रहे प्रयास हैं, पर आज के उलटे समय को उलट कर सीधा करने की आवश्यकता है, वह एकाकी उपासना मात्र से पूरा नहीं होगा उसके लिए बड़े सामूहिक अनुष्ठानों की आवश्यकता है। दोनों नवरात्रियों पर देश भर में किए जाने वाले अनुष्ठान इस तथ्य के प्रमाण हैं। प्राचीनकाल से ही बड़े और सामूहिक अनुष्ठानों का प्रचलन रहा है संभव है तब परिस्थितियाँ गंभीर न होने के कारण है।
उपासना मात्र से पूरा नहीं होगा उसके लिए बड़े सामूहिक अनुष्ठानों की आवश्यकता है। दोनों नवरात्रियों पर देश भर में किए जाने वाले अनुष्ठान इस तथ्य के प्रमाण हैं। प्राचीनकाल से ही बड़े और सामूहिक अनुष्ठानों का प्रचलन रहा है संभव है तब परिस्थितियाँ गंभीर न होने के कारण है। छोटे-छोटे हों पर पुराणों में जिस दुर्गावतरण का उल्लेख है वह देवताओं-देव प्रवृत्ति के लोगों की सामूहिक शक्ति उपासना ही रही है। सतयुग में मधुकैटभ द्वापर में शुंभ निशुंभ और त्रेता में महिषासुर का नाष जिस शक्ति द्वारा वर्णित है वह और कुछ नहीं अपितु पराशक्ति का अनुष्ठान प्रधान उपार्जन ही है महिषासुर अर्थात् पार्थिव-प्रवृत्ति-लोभ लालच, लिप्सा नारी जीवन के प्रति आत्मा की भावना उसी से अपराध अवाँछनीयताएँ बढ़ती हैं अराजकता बढ़ती है।
उपासना करत हैं, वे अंध तमस् में प्रवेश करते हैं और उससे भी अधिक अंधकार में वे प्रवेश करते हैं, जो केवल ब्रह्मचर्चा में रित रहते हैं। अन्यत्र कहा गया है-विद्याञ्चाविद्याञ्चा यस्तद्धेदोभयं सह अविद्याया मृत्यं तीर्त्वाविद्ययामृतमष्नुते।
उपासना करने वाले के प्रसुप्त संस्कार स्वयं जाग उठते हैं, दैवीसत्ता का मार्गदर्शन उसे मिलता है तथा लौकिक एवं अन्यान्य समस्याएँ स्वतः सुलझ जाती हैं। यदि शांतिकुंज को दिव्यशक्ति धारा का गोमुख कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी। इक्कीसवीं सदी का गंगावतरण भी यहीं हुआ है एवं उज्ज्वल भविष्य का उद्घोष भी महाकाल द्वारा यहीं से किया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-October
उपासना और जप तो करते हैं, पर उसमें सन्निहित मर्म और आदर्श की अवहेलना कर देते हैं। आज की दुर्गति का यही प्रमुख कारण है। इसी से उबारने के लिए हमारे संस्कृति-विधायकों ने शब्द और सूत्र रूप में गागर में सागर उड़ेल कर रख दिया है, ताकि जब कभी अपने कर्तव्यों, दायित्वों और आदर्शों की उपेक्षा हो, तभी यह सूत्र-संकेत सामने आकर हमें अपनी विस्मृति और भूल का एहसास कराये इस त्रुटि-परिमार्जन के द्वारा ही हम ‘ॐ’ के सच्चे उपासक कहला सकते हैं, इससे कम में नहीं।
उपासना के समय या शादी के मौके पर जब-जब दृष्टि इस पवित्र वर्ण पर पड़ती है, तो मन अनायास ही परमसत्ता के प्रति श्रद्धासिक्त हो उठता है। ऐसी पवित्र मनोदशा में संपन्न होने वाले अनुष्ठान और आयोजन के हर प्रकार से सफल और सिद्ध होने में फिर कोई संदेह रह नहीं जाता। यह घटना जब सभी उपस्थित जनों के मनों में घटती है, तो अंतःकरण में एक उदात्त भाव पैदा होता है। इस सामूहिक भाव, उत्कृष्टता से एक उच्चस्तरीय वातावरण का निर्माण होता है। देवता ऐसे ही दिव्य वातावरण में पधारते और प्रार्थी को अपने अनुदान-वरदानों से निहाल करते हैं।
उपासना क्या कर लेगी आपको जप और अनुष्ठान चमत्कार कैसे दिखा पायेंगे? जादू-चमत्कार जैसा अध्यात्म नहीं है। अध्यात्म तो मानसिक पुरुषार्थ को कहते हैं। मानसिक पुरुषार्थ का यह एक काम तो आपको करना ही पड़ेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-January
उपासना की तरह अपनाया है। तप ने मेरे चिंतन में प्राण भरे हैं।” एक अन्य स्थान पर उनके शब्द हैं, अपनी रचनाओं में मैंने अपना प्राण सँजोया है। उनमें कितनी आभा है, कितनी रोशनी है, कितनी मौलिकता है, और कितनी शक्ति है यह कहने की नहीं अनुभव करने की बात है। जिसने इन्हें पढ़ा तड़पकर रह गये।
उपासना करते हैं, वह सिर्फ उस आदमी के गले में माला पहनी जा सकती है जो सत्यवान है। सत्यवान और सावित्री की कथा आपने सुनी होगी कि उसने सत्यवान का वरण किया था और कहा था कि हमने अपनी मनमर्जी से ब्याह किया है। यह सावित्री और गायत्री एक ही शक्ति का नाम है। गायत्री और सावित्री वरण कर सकती हैं? वरदान दे सकती है?
उपासना के योग्य उपयुक्त स्थल नहीं मिलते, मंदिर के संस्कारित वातावरण में कोई भी जाकर उपासना कर सकता है। नैतिकता, सदाचार और श्रद्धा के निर्झरों के रूप में देवालय अत्यंत उपयोगी हैं। जन-साधारण के लिए यह आवश्यक है।”
उपासना के समय का बोध कराया जाता है। घर-घर उपासना के योग्य उपयुक्त स्थल नहीं मिलते, मंदिर के संस्कारित वातावरण में कोई भी जाकर उपासना कर सकता है। नैतिकता, सदाचार और श्रद्धा के निर्झरों के रूप में देवालय अत्यंत उपयोगी हैं। जन-साधारण के लिए यह आवश्यक है।”
उपासना और अनुष्ठन कराते हैं, उसकी फिलॉसफी, उसका तत्वज्ञान, उसका सार, प्रकाश और मूल बताना चाहते हैं। मैं समझता हूँ के अब आप इस लायक हो गये हैं कि खुले दिल से, खुले मन से, आपको हम असलियत समझा सकते हैं कि आखिर गायत्री माता क्या हो सकती है जिसका हमें जप करना चाहिए और जप करने का उद्देश्य क्या हो सकता है जिसके लिए हम आपको बार-बार कहते हैं। जो सिद्धियों की-चमत्कारों की देवी है, जो शाँति की वरदान की देवी है, जो ऐसी देवी है जिसको प्राप्त करने के बाद में और कुछ प्राप्त करना बाकी नहीं रह जाता। वह गायत्री मंत्र जो गुरु विशिष्ठ के पास था, जो विश्वामित्र के पास था जिन्होंने अपना सारा राजपाट छोड़कर जंगल में तप करने के बाद गायत्री माता का साक्षात्कार किया था और जिसने कहा था- धिकवलं क्षत्रिय बलं ब्रह्म तेजो बलंवलम्। मैं आपको उसी गायत्री मंत्र को बताना चाहता हूँ जो आपको निहाल कर सकता है-धन्य कर सकता है और आपको चमत्कारी बना सकता है और भगवान बना सकता है।
उपासना के समस्त क्रिया-कलाप, विधि-विधान इस उद्देश्य के लिए विनिर्मित हुए हैं कि उनमें निर्दिष्ट संकेतों का अनुसरण करते हुए मनुष्य अपने व्यक्तित्व को अधिकाधिक परिष्कृत एवं उदात्त तथा स्वयं को पवित्र बनाता चले। आत्म परिष्कार की इस प्रक्रिया में जिसने जितनी सफलता पायी वह उसी स्तर का संत, ऋषि, महामानव, देवता एवं अवतारी कहा गया। सामान्य मनुष्यों की तुलना में इन महामानवों को ब्रह्मलोक के निवासी कहा और उन्हें चमत्कारी माना जाता है। लौकिक सफलताओं को समृद्धि कहते हैं, किंतु आत्मोत्कर्ष की अलौकिक उपलब्धियाँ ‘विभूतियाँ’ एवं ‘सिद्धियाँ’ कहलाती हैं। सिद्धपुरुषों के चमत्कारी कर्तृत्व ही संसार भर के महामानवों को ऐतिहासिक श्रेय-सम्मान प्रदान करते हैं।
उपासना गृह में बराबर ईश्वर से प्रार्थना करते रहे।
उपासना से आपकी आँखों के अंदर दिव्यता, पवित्रता आनी चाहिए जिससे आपको प्रत्येक के भीतर देवत्व दिखता हुआ चला जाय। काँचन और कामिनी के प्रति अपना दृष्टिकोण साफ करके देखें, ताकि आपकी आँखों में अर्जुन और शिवाजी की तरीके से वह तेज आ जाये। अर्जुन को गाँडीव मिला था-आँखों का संयम कर लेने से और उर्वशी के प्रति अपनी मातृ बुद्धि रखने की वजह से और छत्रपति शिवाजी को देवी से तलवार मिली थी। तलवार और गाँडीव देवी-देवता देते हैं या नहीं, लेकिन वे साहसिक रूप में, आदर्शवादिता के रूप में चरित्रनिष्ठ के रूप में अवतरित अवश्य होते हैं और उसमें हजार हाथी के बराबर बल हो जाता है। अगर गाँडीव में तथा शिवाजी की तलवार में हजार हाथी के बराबर ताकत रही होगी तो मैं इसको अचंभा नहीं मानता, सब सही है।
उपासना कराते हैं, अनुष्ठन कराते हैं, उसकी भक्ति के अगर आप इच्छुक है तो यहाँ से जाने से पूर्व कम से कम उसका सही स्वरूप अपनी अंतरात्मा में अवश्य निर्धारित कर लीजिए। इससे आपका फायदा तो होगा ही, साथ ही अध्यात्म के ऊपर जो एक कलंक आ गया है कि इसका कोई महात्म्य नहीं है कोई फल नहीं है, वह दूर हो जायेगा। प्राचीनकाल में केवल सात ऋषि थे और उन सात ऋषियों की वजह से सारी दुनिया में अध्यात्म जिंदा था। अगर दुनिया में सात आदमी भी अध्यात्मवादी रह जाय तो भी अध्यात्म जिंदा रहेगा। वही आदमी अध्यात्म के स्वरूप को जिंदा रखेंगे और उनकी वजह से ढेरों आदमी आ जायेंगे।
उपासना कर रहे हैं। अपने से भी बड़े भक्त को देखने को व्यग्र नारद वापस लोट पड़े। कितने ही दिन वे खोये-खोये घूमते रहे।
उपासना के द्वारा, अपनी जीवात्मा को उस स्थिति पर ले जाना पड़ता है जिसमें कि रीकाग्नीशन की स्थिति पैदा हो जाती है।
उपासना की श्रेष्ठता का रहस्य ?”
उपासना का वैज्ञानिक आधार क्या है? मनःशक्तियों के विकास में साधना उपचार किस प्रकार सहायक सिद्ध होते हैं? ऋषिकालीन आयुर्विज्ञान का पुनर्जीवन शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को कैसे अक्षुण्ण बनाया जा सकता है? गायत्री की शब्द शक्ति एवं यज्ञाग्नि की ऊर्जा कैसे व्यक्तित्व को सामर्थ्यवान एवं पवित्र तथा काया को जीवनी शक्ति संपन्न बनाकर प्रतिकूलताओं से जूझने में समर्थ बना सकती है। ऐसे अनेकानेक पक्षों की शोध हमने अथर्ववेदीय ऋषि परंपरा के अंतर्गत है सम्पन्न की है।
उपासना के उद्देश्यों को समझना चाहिए।
उपासना इसी के लिए की जाती है।
उपासना का फल इनके पास है। इसलिए एक आदमी काफी है और सबके सब नास्तिक हो जायँ तो इससे कोई बनता बिगड़ता नहीं है उस एक आदमी की वजह से ही ढेरों आदमी अध्यात्मवादी बन जायेंगे। इसलिए मैं चाहता था कि अध्यात्म का गायत्री माता का असली स्वरूप आप समझ करके जायँ, तब काम चले। तब फायदा हो। तब उद्देश्य की पूर्ति हो।
उपासना के द्वारा बार-बार रगड़ बना करके अपनी अन्तःचेतना के ऊपर निष्ठाएं जमानी पड़ती है। इसलिए हम आपको जप कराते हैं इस तथ्य को आप लोग ध्यान रखना। आप जप करने का स्वरूप समझिये-कारण समझिये। अगर आप समझ जायेंगे तो ठीक है, फिर आपको जप करना हो तो करना और न करना हो तो मत करना, पर कम से कम आपकी मान्यता तो सही होनी चाहिए। मान्यताएं सही हो जायँ-जानकारी सही हो जाय तो ठीक है।
उपासना कर सकता है। नैतिकता, सदाचार और श्रद्धा के निर्झरों के रूप में देवालय अत्यंत उपयोगी हैं। जन-साधारण के लिए यह आवश्यक है।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-January
उपासना करते रहोगे तो लाभ होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-July
उपासनाओं में पारंगत हो चुका था, राजा ने उसे प्रसन्न करके इस बात के लिए रजामन्द कर लिया कि अनुष्ठान द्वारा उसे सौ पुत्र प्राप्त करा देगा। उस अनुष्ठान में वर्तमान पुत्र को बलिदान करने की शर्त थी, राजा खुशी-खुशी इसके लिए तैयार हो गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-September
उपासना नहीं की है इसलिए हानि का दुख क्यों होगा? ममता ही की दुःख जननी है, निस्वार्थ को शोक संताप हो नहीं सकता।
उपासना नहीं हो सकती। कर्त्तव्य का पथ संघर्षमय है, उसमें हर क्षण पर बाधाएं आती हैं और उन्हें हटाने के लिए निरन्तर युद्ध करते रहना पड़ता है। आप एक बहादुर सिपाही की तरह विघ्न बाधाओं को कुचलते हुए आगे बढ़ते चलिए, जीवन को खेल समझिए, परिस्थितियों के प्रभाव से मस्तिष्क को बेकाबू मत होने दीजिए, धैर्य रखिए, भली बुरी परिस्थितियों में एक समान हंसते रहिए, मानसिक संतुलन नष्ट मत होने दीजिए, कर्मयोग का आनन्द दायक सूत्र यह है कि सदा प्रसन्न रहिए और ईश्वर को स्मरण रखिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-October
उपासना, योग समाधि अपनी श्रद्धा के माफिक करते जाइये, यही साकार भक्ति हमें ज्ञान, विवेक, दर्शन, चरित्र बल स्वयं देती चली जायेगी।
उपासना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-February
उपासना, आस्तिकता, नास्तिकता आदि के सम्पूर्ण मर्म भली भाँति समझ में आ जाते हैं। मूल्य 1 रु.
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-August
उपासना है यही विक्षेप दूर करने का एक मात्र उपाय है। अब मल और विक्षेप के कम होने से प्रभु भक्ति की इच्छा उत्तरोत्तर बढ़ेगी। ऐसी अवस्था आने पर जिज्ञासु उत्तम अधिकारी होकर स्वयं अपने पुरुषार्थ से अज्ञान आवरण को दूर करने में करने लग जाता है, और कृतार्थ हो जाता है- ऐसे उत्तमाश्य महाशयों का जीवन प्राणी मात्र के हितार्थ होता है। जब सबके सुख में अपना सुख प्रतीत होने लगा और सारी सत्ता एक ही मान ली तो फिर वहाँ अनिष्ट चिन्ता नहीं रहती और निर्वाण पद प्राप्त हो जाता है।
उपासना, दान करते हैं और सब सेवाओं का एक मात्र फल ‘आपके चरणों में प्रेम’ मात्र चाहते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, मान, कपट, दम्भ जिन्हें छू तक नहीं गया। जो सबके प्रिय और हितकारी है, दुःख सुख जिन्हें समान प्राप्त होता है, जो सर्वदा अपने को आपकी शरण मानते हैं, ऐसे नर श्रेष्ठों का हृदय ही आपके योग्य निवास है।
उपासना’ बिना ईमानदारी को अपनाये मानवजाति का कल्याण नहीं हो सकता।
उपासना करने लगता है। सच्चाई, ईमानदारी, भलाई और भ्रातृभाव के स्थान पर झूठा प्रचार बेईमानी, धोखाधड़ी, शोषण, दमन और अहमन्यता को प्रधानता दी जाने लगी है। जब से मानव जाति ने असत्य के दुर्भाग्य पूर्ण पथ पर कदम बढ़ाना आरंभ किया है, उसी दिन से अशान्ति और कलह के बीजाँकुर बढ़ने शुरू हो गये हैं। कई शताब्दियों से संगठित और व्यापक अनीति को दौर-दौरा रहा है। उसके कडुए फल आज भयंकर परिणाम उपस्थित कर रहे हैं।
उपासना अपना बल बढ़ाना प्रारंभ करती है। इच्छा की बहुतायत से विक्षेप बढ़ता है। मन का राजा होता है। इस कारण मन में चंचलता बढ़ती है- इसलिए मनुष्य को कम से कम 1 घंटा चित्तवृत्ति निरोध का अनुष्ठान अभ्यास द्वारा मन को एकाग्र करने का यत्न करना चाहिए। इसी का नाम उपासना है यही विक्षेप दूर करने का एक मात्र उपाय है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-November
उपासना का तथा जन्म, पालन एवं मृत्यु का आभास यज्ञोपवीत से मिलता है। तीनों देवताओं के त्रिविधि कर्मों से नौ सूत का यज्ञोपवीत बना है।
उपासना काण्ड गृहस्थों ब्रह्मचारियों के लिए तथा ज्ञान काण्ड संन्यासियों के लिए है। कर्मकाण्ड की 80 हजार और उपासना की 16 हजार मिला कर 96 हजार होती है। एक चप्पे में एक हजार श्रुतियों का प्रतिनिधित्व लिया गया है। और 96 चप्पे का यज्ञोपवीत बनाया गया है। इसका तात्पर्य इतनी श्रुतियों को धारण करना है।
उपासना करने पर ‘अमित’ को ‘भर्ता’ द्वारा पाया जा सकता है।
उपासना और ज्ञान तीनों काण्डों से तिगुना किया और शिवजी के गायत्री से अभिमंत्रित करके ब्रह्म गाँठ दी। इस प्रकार यज्ञोपवीत नौ तार का बन गया।
उपासना काण्ड और शेष 4 हजार ज्ञान काण्ड की है। इनमें से कर्मकाण्ड और उपासना काण्ड गृहस्थों ब्रह्मचारियों के लिए तथा ज्ञान काण्ड संन्यासियों के लिए है। कर्मकाण्ड की 80 हजार और उपासना की 16 हजार मिला कर 96 हजार होती है। एक चप्पे में एक हजार श्रुतियों का प्रतिनिधित्व लिया गया है। और 96 चप्पे का यज्ञोपवीत बनाया गया है।
उपासना की 16 हजार मिला कर 96 हजार होती है। एक चप्पे में एक हजार श्रुतियों का प्रतिनिधित्व लिया गया है। और 96 चप्पे का यज्ञोपवीत बनाया गया है। इसका तात्पर्य इतनी श्रुतियों को धारण करना है। संन्यासी यदि यज्ञोपवीत पहनते तो उनका 100 चोपे का होता पर शास्त्र में संन्यासी को उपवीत त्यागने का आदेश है इसलिए वे नहीं धारण करते।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-December
उपासना क्यों न करो वह ईश्वरोपासना ही होगी वैसे ही जिसको विश्व पति का ज्ञान हो गया है और जो उसमें अपनी आत्मा को अभिन्न करने का ज्ञान हो गया है और जो उसमें अपनी आत्मा को अभिन्न करने के प्रयत्न में पूर्ण शक्ति से लगी हुई हैं वह किसी तरह भी अपने इस महान कार्य को क्यों न पूरा करे सतियों में उसकी गणना होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-April
उपासना करता है तब देवताओं को प्रसन्न करता है। वह दोनों प्रकार की वस्तुएं क्या हैं इसका भगवान् शंकराचार्य ने स्पष्ट शब्दों में विवेचन कर दिया है। वे कहते हैं कि देवताओं के अनुग्रह के तीन हेतु हैं 1. मनुष्यत्व 2. मुमुक्षत्व 3. सत्संग। इन तीन तत्वों में ही देवता ओत-प्रोत हो रहे हैं। इनका प्राप्त होना और देवताओं का प्राप्त होना बिलकुल एक ही बात है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-June
उपासना के लिए अपनी वस्तुओं का त्याग-समर्पण होम करने से परमार्थ, त्याग, उदारता एवं पवित्रता की मनोभावनाएं उत्पन्न होती हैं ऐसी भावनाओं का उदय होना अनेक प्रकार के मानसिक रोगों को निर्मूल करने के लिए सर्वश्रेष्ठ उपचार है। कार्बन डाई आक्साइड गैस बढ़ने से वर्षा की अधिकता द्वारा संसार की समृद्धि बढ़ती और आवो-हवा शुद्ध होती है। स्वस्थता प्रदान करने वाला और रोग नाशक औषधियाँ अग्नि की सहायता से सूक्ष्म रूप धारण करके शरीर में व्याप्त हो जाती हैं और निरोगता की स्थापना में बड़ा महत्वपूर्ण कार्य करती हैं। फेफड़े और मस्तिष्क के रोगों के लिये तो हवन द्वारा पहुँची हुई औषधि मिश्रित वायु बहुत ही हितकर सिद्ध होती है। होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के आविष्कारक डाक्टर हनीमैन ने अपनी पुस्तक आर्गेनन आफ दी मेडीसन्स की 190 वीं धारा में औषधियों सूँघने की महत्ता को स्वीकार किया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-December
उपासना के अंतर्गत आते हैं और साधक को सतोगुण प्रधान, रजोगुण प्रधान, तमोगुण प्रधान प्रकृति का पता चलने के उपरान्त निर्धारित किये जाते हैं। नित्य क्रम की साधना तो थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ सभी के लिए एक जैसी है, किन्तु विशेष साधनाएं उसी प्रकार की है जैसा की पहलवानी को अखाड़े का आश्रम लेकर उस्तादी के देख-रेख में विशेष प्रकार की कसरतों के माध्यम से करनी पड़ती है। दंगल में कुश्ती पछाड़ने के लिए यही प्रक्रिया अपनाना पड़ती है। इस स्तर तक पहुँचने के लिए मात्र टहलने जैसी हलकी-फुलकी कसरतों से काम नहीं चलता।
उपासना है।
उपासना इसी उद्देश्य को पूरा करती हैं, जिसमें जन्म-जन्मान्तरों से संचित कुसंस्कारों का निराकरण किया जाता है एवं देव शक्तियों के अभिवर्धन का पथ-प्रशस्त होता है। इस सब दिव्य सामर्थ्यों से युक्त परमसत्ता बीज रूप में मनुष्य में विद्यमान है। दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति रूपी व्यामोह ही उन्हें मूर्छित बनाये हुये हैं। वे हट जायें तो मनुष्य में अनायास ही ईश्वर की झाँकी हो सकती है। वह अपने आपको लघु से महान, आत्मा से परमात्मा, नर से नारायण के रूप में विकसित हुआ प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है।
उपासना का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि आत्म-शोधन की प्रक्रिया पूर्ण की जाय। यह प्रक्रिया प्रायश्चित्त विधान से ही पूर्ण होती है। हठयोग में शरीर शोधन के लिए नेति-धोति, वस्ति, न्यौली, वज्रोली, कपाल भाँति की क्रियाएं करने का विधान है। राजयोग में यह शोधन कार्य यम, नियमों के रूप में करना पड़ता है। भोजन बनाने से पूर्व चौका, चूल्हा, बर्तन आदि की सफाई कर ली जाती है।
उपासना उपचारों में कर्मकाण्ड परक विधि-विधान पूरे करने भर से काम नहीं चलता। उसके लिए तद्नुरूप श्रद्धा भी उभरनी चाहिए। अन्यथा कर्मकाण्ड अनुष्ठान मात्र श्रम उपचार भर रह जायेंगे और उनका उतना ही प्रतिफल मिलेगा जितना कि उस स्तर के ‘परिश्रम’ का मिलना चाहिए। चमत्कार तो तब उत्पन्न होते हैं जब साधना विधि के साथ सघन श्रद्धा का भी समावेश होता है। इसलिए अध्यात्मिक क्षेत्र के सर्वोपरि-सर्वसमर्थ-श्रद्धा शास्त्र को अधिकाधिक सक्षम बनाने की आवश्यकता पड़ती है।
उपासनात्मक नित्य कर्म भी करने होते हैं। विशिष्ट साधना इसके अतिरिक्त है। आत्मोन्नति के लिए उसी की अतिरिक्त तैयारी करनी पड़ती है।
उपासना है। निखिल ब्रह्माण्ड में जिस महाप्राण का भण्डार भरा पड़ा है। उसे अभीष्ट परिणाम में ग्रहण धारण करने की आवश्यकता पड़ती है यह कार्य अनुभवी तपस्वियों द्वारा निर्धारित गायत्री उपासना की पुण्य प्रक्रिया अपनाने से सम्भव हो जाता है। इस संदर्भ में जप, ध्यान और प्राणायाम की तीन पद्धतियाँ काम में लानी पड़ती हैं। किस को किस प्रयोजन के लिए इन दिनों में से किसे, किस परिणाम में, किस क्रम से अपनानी चाहिए, इसका निर्धारण अनुभवी मार्गदर्शक साधक की मनःस्थिति का पर्यवेक्षण गम्भीरतापूर्वक करने के उपरान्त ही निश्चित करते हैं।
उपासना की पुण्य प्रक्रिया अपनाने से सम्भव हो जाता है। इस संदर्भ में जप, ध्यान और प्राणायाम की तीन पद्धतियाँ काम में लानी पड़ती हैं। किस को किस प्रयोजन के लिए इन दिनों में से किसे, किस परिणाम में, किस क्रम से अपनानी चाहिए, इसका निर्धारण अनुभवी मार्गदर्शक साधक की मनःस्थिति का पर्यवेक्षण गम्भीरतापूर्वक करने के उपरान्त ही निश्चित करते हैं। सबके लिए एक जैसा विधान तो नित्य कर्म के रूप में ही प्रयुक्त होता है। साधना का नित्य कर्म, हर दिन आक्रमण करने वाले कुसंस्कारों का-वातावरण के प्रभाव का निरस्त करने के लिए किया जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-November
उपासना करते हैं वे वस्तुतः उस एक परम तत्व की ही पूजा अर्चना करते हैं। मनुष्य भिन्न-भिन्न पथों का अवलंबन लेते हुए अन्ततः उसी परमात्म तत्व का साक्षात्कार करते हैं।”
उपासना कर ली तो सब कुछ पाया जा सकता है- इस तथ्य को जितनी गहराई से समझा जा सके- उत्तम है। जो इस सनातन सत्य को जितना जल्दी अंगीकार कर सके, उन्हें उतना ही बड़भागी माना जायेगा। मनुष्य जनम से जुड़े हुये अनेकानेक उपहारों से लाभान्वित हो सकने का अवसर मात्र ऐसे ही लोगों को मिलता रहा है। भविष्य में भी उन्हीं के लिये सुनिश्चित रहेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-April
उपासनात्मक क्रियाकृत्यों में जप, ध्यान, नाद, एकाग्रता, तन्मयता, स्वाध्याय, सत्संग आदि साधनों का आश्रय लिया जाता है ताकि चेतना को दिशा एवं प्रेरणा दी जा सके और उसे अपनी जीव ससीमता को ब्रह्म असीमता में घुला देने के लिए आवश्यक प्रकाश एवं प्रशिक्षण मिल सके।
उपासना, आराधना करने से साधक वह सब कुछ पा लेता है जो इस विश्व के राजकुमार के रूप में उसके लिये अभीष्ट है। इन्हीं तथ्यों के संकेत शास्त्रकार इस तरह देते हैं।
उपासना आत्म-शक्ति अभिवर्धन का सरल और श्रेष्ठतम उपाय है। जो इसके लिए प्रयत्न करते हैं वे समर्थ, सफल और सार्थक जीवन जीते हैं।
उपासना पर ही नहीं साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिए। जीवन को पवित्र और परिष्कृत, संयत और सुसंतुलित, उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रयत्न का नाम ही जीवन साधना अथवा साधना है। उपासना पूजा तो निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है।
उपासना और साधना का अलग अस्तित्व है, यह सोचना गलत है। एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जायेगी यह सोचना भी अनुचित है। अस्तु, गायत्री की भावात्मक, क्रियाकाण्ड परक पूजा की जानी चाहिए। हम निष्पाप बनें इतना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् यह भी आवश्यक है कि अपने कर्म एवं स्वभाव में सद्गुणों का समुचित समावेश करके दिव्य जीवन बनावें तथा उसके द्वारा अपना और समस्त समाज का कल्याण करें। व्यक्तित्व को परिष्कृत और विकसित रखते हुए ही हम आत्मिक प्रगति के मार्ग पर बढ़ सकते हैं तथा उसमें पूर्णता प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं।
उपासना का है उतना ही साधना का भी है। हमें उपासना पर ही नहीं साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिए। जीवन को पवित्र और परिष्कृत, संयत और सुसंतुलित, उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रयत्न का नाम ही जीवन साधना अथवा साधना है। उपासना पूजा तो निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है।
उपासना पूजा तो निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है। जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरन्त सुधारा, जहाँ विकार पाया कि तुरन्त उसकी चिकित्सा की, जहाँ पाप देखा कि तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है। जिस प्रकार सीमारक्षक प्रहरियों को हर घड़ी शत्रु की चालों और बातों का पता लगाने और जूझने के लिए लैस रहना पड़ता है, वैसे ही जीवन संग्राम के हर मोर्चे पर हमें सतर्क और तत्पर करने की आवश्यकता पड़ती है।
उपासना और साधना के समन्वित उपक्रम को योग भी कहा जा सकता है। योग का सामान्य अर्थ होता है जोड़ना। आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ देने की प्रक्रिया योग कहलाती है। इसमें उपासना और साधना दोनों का समान महत्व है। योग साधना में कई प्रकार के उपासनात्मक क्रियाकृत्य अपनाने पड़ते हैं।
उपासना करके सिद्ध पाई है। तुम्हें बार-बार नमस्कार है।
उपासना और साधना आध्यात्मिक प्रगति के दो अविच्छिन्न पहलू हैं, एक दूसरे के पूरक हैं तथा एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। जिस प्रकार अन्न और जल, रात और दिन, शीत और ग्रीष्म, स्त्री और पुरुष का जोड़ा है उसी प्रकार उपासना और साधना भी अन्योन्याश्रित हैं। एक के बिना दूसरा अकेला, असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा, इसलिए दोनों को साथ लेकर अध्यात्म मार्ग पर आरूढ़ होना ही उचित है।
उपासना और साधना भी अन्योन्याश्रित हैं। एक के बिना दूसरा अकेला, असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा, इसलिए दोनों को साथ लेकर अध्यात्म मार्ग पर आरूढ़ होना ही उचित है।
उपासना का बीज झाड़ झंकार, बाढ़ में पड़े बीज की तरह होगा जो या तो स्वयं सड़-गलकर नष्ट हो जाता है या जिसे चिड़िया, चूहे और जंगली जीव चुन ले जाते हैं।
उपासना और साधना के दोनों पैरों के सहारे चलना पड़ता है।
उपासनात्मक क्रियाकृत्य अपनाने पड़ते हैं। इनका उद्देश्य आत्म चेतना को परमात्म चेतना से जोड़ने वाली मनःस्थिति उत्पन्न करना है। इस तथ्य को ध्यान में रख कर चला जाय तभी लक्ष्य की पूर्ति होनी संभव है। यदि चेतना के परिष्कार का प्रयत्न न किया जाय और मात्र उन क्रियाकृत्यों को ही योगाभ्यास मान लिया जाय तो उस भ्रान्ति के कारण घोर परिश्रम करते रहने पर भी कोल्हू के बैल की तरह जहाँ के तहाँ बने रहना पड़ेगा। उपासनात्मक क्रियाकृत्यों में जप, ध्यान, नाद, एकाग्रता, तन्मयता, स्वाध्याय, सत्संग आदि साधनों का आश्रय लिया जाता है ताकि चेतना को दिशा एवं प्रेरणा दी जा सके और उसे अपनी जीव ससीमता को ब्रह्म असीमता में घुला देने के लिए आवश्यक प्रकाश एवं प्रशिक्षण मिल सके।
उपासना और गायत्री साधना ये दोनों माध्यम अपनाने पड़ते हैं। इससे बच निकलने और सरल पगडंडियाँ ढूंढ़ निकालने के प्रयासों में सिवा आत्म-प्रवंचना के और कुछ हाथ नहीं लगता। सस्ते मोल से ईश्वर की प्राप्ति करा देने से लेकर कुण्डलिनी जगा देने तक के प्रलोभन देने वालों की कमी नहीं है। किन्तु स्पष्ट है कि उस प्रवंचना में भ्रम जंजाल के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। हमें अपनी रोटी आप खानी और पचानी पड़ती है।
उपासना तथा उनसे महत्वपूर्ण वरदानों, अनुदानों की उपलब्धि की यथार्थ प्रक्रिया है।
उपासना और साधना दोनों का समान महत्व है। योग साधना में कई प्रकार के उपासनात्मक क्रियाकृत्य अपनाने पड़ते हैं। इनका उद्देश्य आत्म चेतना को परमात्म चेतना से जोड़ने वाली मनःस्थिति उत्पन्न करना है। इस तथ्य को ध्यान में रख कर चला जाय तभी लक्ष्य की पूर्ति होनी संभव है। यदि चेतना के परिष्कार का प्रयत्न न किया जाय और मात्र उन क्रियाकृत्यों को ही योगाभ्यास मान लिया जाय तो उस भ्रान्ति के कारण घोर परिश्रम करते रहने पर भी कोल्हू के बैल की तरह जहाँ के तहाँ बने रहना पड़ेगा।
उपासना मनोभूमि में उगने वाला बीज है उसके फलने-फूलने की आशा तभी की जा सकती है जब मनोभूमि का उसी प्रकार परिष्कार किया जाय जिस प्रकार कृषक अपने खेतों का करता है- मनोभूमि को शुद्ध किए बिना डाला गया उपासना का बीज झाड़ झंकार, बाढ़ में पड़े बीज की तरह होगा जो या तो स्वयं सड़-गलकर नष्ट हो जाता है या जिसे चिड़िया, चूहे और जंगली जीव चुन ले जाते हैं।
उपासना के साथ साधना का उपक्रम भी अनिवार्य रूप से जोड़े रखना चाहिए अर्थात् उसमें आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास की परिपूर्ण प्रक्रिया जुड़ी ही रहनी चाहिए। उपासना और साधना का अलग अस्तित्व है, यह सोचना गलत है। एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जायेगी यह सोचना भी अनुचित है। अस्तु, गायत्री की भावात्मक, क्रियाकाण्ड परक पूजा की जानी चाहिए। हम निष्पाप बनें इतना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् यह भी आवश्यक है कि अपने कर्म एवं स्वभाव में सद्गुणों का समुचित समावेश करके दिव्य जीवन बनावें तथा उसके द्वारा अपना और समस्त समाज का कल्याण करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-February
उपासना साधना का विशाल कलेवर अन्तरंग को ही परिष्कृत करने तथा सम्वेदनाओं को विकसित करने के लिए खड़ा किया गया है।
उपासना साधना सर्वोत्तम मानी गयी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-March
उपासना न की होती तो छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष, दम्भ, हिंसा, पाशविकता, युद्ध को प्रश्रय न देते। स्वर्ग और है भी क्या, जहाँ यह बुराइयाँ न हों वहीं तो स्वर्ग है। माँ की उपासना से स्वर्गीय आनन्द की अनुभूति इसीलिए यहीं प्रत्यक्ष रूप से अभी मिलती है। इसलिए मैं कहता हूँ कि कुछ दिन और सब उपासना पद्धति बन्द कर केवल “माँ” की “मातृ-भावना” की उपासना करनी चाहिए।
उपासनात्मक प्रयोजन के लिए शिव और शक्ति भी कहा जाता है। इन दोनों का समन्वय जिस सूत्र द्वारा होता है उसे ही कुण्डलिनी समझना चाहिए।
उपासना करनी चाहिए।
उपासना गृह का निर्माण। इन बातों में से पहली बात तो 14 मई 1948 को पूरी हो गई। दूसरी बात यरुशलम पर निर्बाध अधिकार से लगभग पूरी हो ही चुकी है। जुलाई 1980 में इसराइल की संसद ने अविभाजित यरुशलम को अपने देश की स्थाई राजधानी बनाने का प्रस्ताव पारित कर दिया।
उपासना से स्वर्गीय आनन्द की अनुभूति इसीलिए यहीं प्रत्यक्ष रूप से अभी मिलती है। इसलिए मैं कहता हूँ कि कुछ दिन और सब उपासना पद्धति बन्द कर केवल “माँ” की “मातृ-भावना” की उपासना करनी चाहिए।
उपासना पद्धति बन्द कर केवल “माँ” की “मातृ-भावना” की उपासना करनी चाहिए।
उपासना करें। संसार भर के प्राणी उसकी सन्तान-हमारे भाई हैं। यदि हमने माँ की उपासना न की होती तो छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष, दम्भ, हिंसा, पाशविकता, युद्ध को प्रश्रय न देते। स्वर्ग और है भी क्या, जहाँ यह बुराइयाँ न हों वहीं तो स्वर्ग है। माँ की उपासना से स्वर्गीय आनन्द की अनुभूति इसीलिए यहीं प्रत्यक्ष रूप से अभी मिलती है।
उपासना को सर्वश्रेष्ठ अवलम्बन माना। जो एकाग्रता का एकाकी लक्ष्य ही नहीं सही दिशा में नियोजन का उद्देश्य भी पूरा करता है। मन उस परम सत्ता से जुड़कर ही टिका रह सकता तथा दृढ बन सकता है। एकाग्रता प्राप्ति के अन्यान्य माध्यम भी हो सकते हैं। सतत् अभ्यास से संकल्प शक्ति भी विकसित हो सकती है।
उपासना, आराधना करने से साधक वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है जो इस विश्व में पाने योग्य है। इन्हीं तथ्यों के निम्नांकित संकेत ध्यान देने योग्य है-
उपासना करने में भूल करने पर कोई भक्त कभी भी विपरीत फल को नहीं प्राप्त होता।
उपासना पद्धति का प्रचलन करना चाहिए जिसमें केवल “माँ” की ही पूजा हो, माँ को ही भेंट चढ़ाई जाये?
उपासना गृह निर्माण की बात पूरी होना अभी शेष है। डेनियल के अनुसार पुराने स्थान पर प्राचीन मंदिर का निर्माण नवयुग आगमन के साढ़े तीन वर्ष पूर्व संभव होगा जबकि पूरा संक्रमण काल या आर्मेगैडन सात वर्ष की अवधि वाला है। इस युद्ध के संबंध में कहा गया है, ‘उस समय सूरज, चाँद और तारों में चिन्ह दिखाई देंगे। पृथ्वी पर देश-देश के लोगों पर तरह-तरह के संकट आयेंगे। संसार पर आने वाली विपत्तियों के कारण लोग इतने भयभीत होंगे कि उनके जी में जी न रहेगा क्योंकि तब आकाश की शक्तियाँ हिलाई जायेंगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-July
उपासना करता हूँ।
उपासना करते हैं, उतना ही अपना लाभ होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-October
उपासना को दिया जाय और असफलताओं का दोष अपने प्रारम्भ पुरुषार्थ में कमी रहना मानकर अपने ऊपर ओढ़ा जाय। इस मापदण्ड को अपनाकर ही श्रद्धा को जीवन्त रखा जा सकता है और आत्मिक प्रगति का द्वार खुला रह सकता है।
उपासना के मार्ग पर बढ़ने वाला यही सोचता है कि क्यों इस व्यर्थ झंझट में फँसे। भविष्य के लिए वह इस जंजाल से किसी प्रकार पिण्ड छुड़ाने भर की बात ही सोचता है।
उपासना क्षेत्र के अधिष्ठाता बन गये तब उस व्यापक अनाचार को निरस्त करने के लिए भगवान बुद्ध का अवतरण हुआ और उन्होंने उस अनाचार की धज्जियाँ उड़ाईं। उन्हीं दिनों की बात है कि पुरोहित वर्ग ने अपनी विशिष्टता सिद्ध करने तथा अर्थ उपार्जन का नया स्त्रोत उभारने के लिए उस मान्यता का परिपूर्ण समर्थन किया कि विधि-विधान में राई-रत्ती भूल जाने पर भी देवता रुष्ट हो जाते हैं और फिर कर्ता से उलट कर बदला लेते हैं। यह मान्यता योजना बद्ध ढंग से फैलाई गई। उसके समर्थन में बहुत कुछ कहा एवं लिखा गया।
उपासना से अन्तःक्षेत्र की सत्प्रवृत्तियाँ को उभारने और व्यक्तित्व में सुसंस्कारिता के समावेश का अवसर मिलता है। कुशलता प्रतिभा पर साँसारिक सफलता सुविधा की न्यूनाधिकता निर्भर है। जबकि उपासना मनुष्य के दृष्टिकोण, चरित्र, रुझान एवं कार्यक्षेत्र में उत्कृष्टता का समावेश करती है। ऐसी दशा में एक-दूसरे की जोड़ने की बात सर्वथा अनुपयुक्त है। फिर भी प्रचलित भ्रम मान्यताओं के अनुरूप यदि उपासना से भौतिक लाभ हानि की संगति जोड़े बिना काम न चले तो फिर दो दृष्टिकोण अपनाने चाहिए।
उपासना मनुष्य के दृष्टिकोण, चरित्र, रुझान एवं कार्यक्षेत्र में उत्कृष्टता का समावेश करती है। ऐसी दशा में एक-दूसरे की जोड़ने की बात सर्वथा अनुपयुक्त है। फिर भी प्रचलित भ्रम मान्यताओं के अनुरूप यदि उपासना से भौतिक लाभ हानि की संगति जोड़े बिना काम न चले तो फिर दो दृष्टिकोण अपनाने चाहिए। सफलताओं का श्रेय उपासना को दिया जाय और असफलताओं का दोष अपने प्रारम्भ पुरुषार्थ में कमी रहना मानकर अपने ऊपर ओढ़ा जाय। इस मापदण्ड को अपनाकर ही श्रद्धा को जीवन्त रखा जा सकता है और आत्मिक प्रगति का द्वार खुला रह सकता है।
उपासना जैसे नित्य कर्मों के सम्बन्ध में भी यह शंका की जाने लगी कि कहीं भूल होने पर अनर्थ न होने लगे और इष्टदेव उस भूल से रुष्ट होकर उलटे आक्रमण पर न उतर आयें।
उपासना की सफलता में कर्मकाण्ड का महत्व दस प्रतिशत और सघन श्रद्धा की भूमिका नब्बे प्रतिशत होती है। यदि श्रद्धा डगमगाने लगे तो समझना चाहिए कि कर्मकाण्ड की लकीर पीटते रहने से कोई लाभ नहीं। आगत कठिनाइयों का कारण यदि उपासना को सोचा माना जाने लगा तो समझना चाहिए अब यह श्रद्धा के पैर जमने जैसी कोई सम्भावना रह नहीं गई। जो तन्त्र विनय वंदन का प्रतिफल अनिष्ट उत्पन्न कर सकता है वह निश्चय ही निकृष्ट स्तर का घिनौना होना चाहिए। उसका आश्रय लेने पर आयेदिन ऐसे ही उपद्रव खड़े होने का भय बना रहेगा।
उपासना के मत्थे मढ़ देना सर्वथा अनुचित है।
उपासना को सोचा माना जाने लगा तो समझना चाहिए अब यह श्रद्धा के पैर जमने जैसी कोई सम्भावना रह नहीं गई। जो तन्त्र विनय वंदन का प्रतिफल अनिष्ट उत्पन्न कर सकता है वह निश्चय ही निकृष्ट स्तर का घिनौना होना चाहिए। उसका आश्रय लेने पर आयेदिन ऐसे ही उपद्रव खड़े होने का भय बना रहेगा। प्रत्यक्ष है कि भय, अनिश्चितता और दुष्टता की आशंका मन में उठने लगे तो फिर उस केन्द्र पर श्रद्धा विश्वास का भक्ति भावना का स्नेह समर्पण का कोई आधार बन ही नहीं सकता। यदि आस्था सुदृढ़ न हुई तो फिर कोई श्रेष्ठ कर्मकाण्डों वाली उपासना भी किसी के लिए कभी भी परिणाम में फलप्रद नहीं हो सकती।
उपासना मार्ग के साधक और साहस में इसी प्रकार के भावभरे आदान-प्रदान चलते हैं। उनमें कर्मकाण्डों का अधूरापन या व्यतिक्रम कोई खास बाधा नहीं डालता। यों उचित तो यही है कि हर वर्ग स्तर के लोग नियम मर्यादाओं के परिपालन में सतर्कता बरतें और सही तरीका ही अपनायें।
उपासना की संगति बिठाने का तत्वतः आवश्यकता है नहीं, क्योंकि दोनों के क्षेत्र सर्वथा भिन्न हैं। प्रतिकूलता आमतौर से व्यक्ति की कुशलता पर निर्भर रहती है। जबकि उपासना से अन्तःक्षेत्र की सत्प्रवृत्तियाँ को उभारने और व्यक्तित्व में सुसंस्कारिता के समावेश का अवसर मिलता है। कुशलता प्रतिभा पर साँसारिक सफलता सुविधा की न्यूनाधिकता निर्भर है। जबकि उपासना मनुष्य के दृष्टिकोण, चरित्र, रुझान एवं कार्यक्षेत्र में उत्कृष्टता का समावेश करती है।
उपासना का उपक्रम एक ही परिणाम उत्पन्न कर सकता है और वह है कषाय−कल्मषों के कारण उत्पन्न होने वालों से परित्राण, उलटा उपद्रव खड़ा करने की उसकी प्रकृति ही नहीं है। उसके कारण किसी प्रकार का संकट उत्पन्न होने की आशंका तो करनी ही नहीं चाहिए। माता कभी अहित न तो कर सकती है न वैसा सोच ही सकती है। धरती माता, गौ माता, प्रकृति माता की सहज प्रकृति स्नेह करने, सहायता करने एवं सुविधा साधन उपलब्ध कराने की है। वे छेड़खानी करने पर अधिक से अधिक इतना ही कर सकती हैं कि सहयोग से हाथ खींच लें।
उपासना से भौतिक लाभ हानि की संगति जोड़े बिना काम न चले तो फिर दो दृष्टिकोण अपनाने चाहिए। सफलताओं का श्रेय उपासना को दिया जाय और असफलताओं का दोष अपने प्रारम्भ पुरुषार्थ में कमी रहना मानकर अपने ऊपर ओढ़ा जाय। इस मापदण्ड को अपनाकर ही श्रद्धा को जीवन्त रखा जा सकता है और आत्मिक प्रगति का द्वार खुला रह सकता है।
उपासना करनी हो तो उसके प्रयोजन परिणाम की आशा इतनी ही करनी चाहिए कि इससे अपने आत्म परिष्कार में सहायता मिलेगी। आगत संकट एक किलो भारी हो तो उपासना के आधार पर उपलब्ध हुए मनोबल के कारण आधा तिहाई ही रह जायेगी।
उपासना कहते हैं।
उपासना की भक्ति माता भी ऐसी ही हैं। उसका आश्रय लेने पर कष्ट घटते हैं, बढ़ते नहीं।
उपासना करते ही नहीं। उन्हें कम से कम असन्तोष, आक्रोश एवं नास्तिकता के गर्त में जा गिरने का अनर्थ तो नहीं अपनाना पड़ता। इस प्रकार वे नफा भले ही न कमाये, अकारण घाटा देने का संकट नहीं सहते।
उपासना के आधार पर उपलब्ध हुए मनोबल के कारण आधा तिहाई ही रह जायेगी।
उपासना के क्षेत्र पर आक्रमण बोल दिया। इतना ही नहीं उसे भी बेतरह अपने चंगुल में फँसा लिया। दैनिक उपासना जैसे नित्य कर्मों के सम्बन्ध में भी यह शंका की जाने लगी कि कहीं भूल होने पर अनर्थ न होने लगे और इष्टदेव उस भूल से रुष्ट होकर उलटे आक्रमण पर न उतर आयें।
उपासना भी किसी के लिए कभी भी परिणाम में फलप्रद नहीं हो सकती। उसमें लगाया हुआ श्रम निष्फल ही नहीं जायेगा वरन् असफलताजन्य आक्रोश के कारण नास्तिकता में परिणित होता चला जायेगा। ऐसे लोगों से तो वे लोग कहीं अच्छे जो उपासना करते ही नहीं। उन्हें कम से कम असन्तोष, आक्रोश एवं नास्तिकता के गर्त में जा गिरने का अनर्थ तो नहीं अपनाना पड़ता। इस प्रकार वे नफा भले ही न कमाये, अकारण घाटा देने का संकट नहीं सहते।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-August
उपासना, अभ्यर्थना है। इस राजमार्ग द्वारा परमात्मा की अनुभूति कहीं अधिक सुगम है।
उपासना गृह की तरह प्रयुक्त करने में जन-साधारण का उत्साह भी बहुत रहा। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि मध्यकाल के अन्धकार युग में जहाँ सांस्कृतिक निर्धारणों का बेहिसाब अवमूल्यन हुआ वहां देवालय भी दुर्दशाग्रस्त हुए बिना न रहे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-September
उपासना एवं जीवन साधना में उन विशिष्ट तत्वों का समावेश करें जो इन्हीं दिनों नितान्त आवश्यक है। इन पंक्तियों द्वारा इस स्तर के सभी वरिष्ठ परिजनों से इसी का अनुरोध किया जा रहा है।
उपासना करे और साधना किस प्रकार चलाये इसके निर्धारण सभी के लिये एक जैसे नहीं होंगे वरन् हर व्यक्ति की मनःस्थिति, परिस्थिति, परम्परा एवं पूर्व प्रगति को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग होंगे। किसे, किस प्रयोजन के लिये किस स्तर की आत्मशक्ति चाहिए, कौन कितना कर सकने में समर्थ है, इन सब बातों का तालमेल बिठाकर ही साधना विधि का पृथक-पृथक निर्धारण किया जायेगा।
उपासना करते हैं, तब मैं आपकी किया करता हूँ।
उपासना को, भक्ति के गीले नयन दो।
दो न आँसू की दुहाई, साधनाओं के सुमन दो॥
उपासना सम्बन्धी- दूसरा उतने ही आकार का जीवन साधना सम्बन्धी रहा करेगा। इस प्रकार दस बार में दोनों प्रकार के मिलाकर 20 पाठ्यक्रम पत्रक पहुँच जायेंगे।
उपासना की प्रकारान्तर से आदि शक्ति गायत्री की प्रवाह धारा में ही सम्मिलित होती जाती है।
उपासना का तत्वज्ञान भारतीय अध्यात्म शक्ति का अविच्छिन्न अंग है। गायत्री को आद्य शंकित कहा जाता है। उसकी शाखाएं प्रशाखाएं अन्य देवी देवताओं में प्रकट होती चली गई हैं। ब्राह्मी, वैष्णवी, शाँभवी के त्रिवर्ग में विभाजित होने के उपरान्त गायत्री अनेक नामों से जानी जाने वाली देवियों के रूप में विस्तृत होती चली गई है। अन्याय देवशक्तियाँ की उपासना की प्रकारान्तर से आदि शक्ति गायत्री की प्रवाह धारा में ही सम्मिलित होती जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-January
उपासना में भी संगीत को हृदय की वाणी का नाम दिया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-August
उपासना साधना, तपश्चर्या से लेकर-साहित्य सृजन और प्रचार संगठन से लेकर विविधविध रचनात्मक कार्यों तक इसी प्रयोजन के लिये होते चले आये हैं कि मनुष्य में मनुष्यता की और समाज में देवत्व की मात्रा जो अति न्यून मात्रा में शेष रह गई है उसका अधिकाधिक संवर्धन कर सकने के लिए हर संभव पुरुषार्थ किया जाय।
उपासना, नेतृत्व विज्ञान, सुधारक किसी भी दिशा में हो- यदि उसमें उसका और समाज का हित होता है तो उस भाव को पनपने में पूरा-पूरा सहयोग देना चाहिए उसके इस विकास में सहयोग देने के लिए उसकी पूरी बातें सुनना चाहिए, डाँटना या झिड़कना नहीं चाहिए। उसी की आयु का बनकर, उस जैसी ही टूटी-फूटी भाषा में बात करनी चाहिए ताकि वह निःसंकोच अपने को प्रकट कर सके। जो बच्चे प्रारम्भ में दब्बू हो जाते हैं, वे बाद में बुराइयों की ओर अधिक आकर्षित होते हैं।
उपासना के आधार और सावित्री महाविद्या की उपलब्धियों में लोग विलक्षण सत्यतायें पायेंगे। सूर्य हमारी आत्मा है, जैसा कि पैंगलोपनिषद् में कहा है-हमारे ज्ञान में, अनुभूति आ जाये तो हमारे लिये शरीरों को बदल डालने वाले अनेक सत्यों को वैज्ञानिक ढंग से प्रमाणित कर सकना सम्भव हो जायेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-June
उपासना पद्धति में प्रयुक्त एक गम्भीरतम ध्यान विज्ञान है, जिसके आधार पर कभी भारतीय न केवल दूरदर्शन, दूरश्रवण, दूसरों के मन की बात जान लेना, ईशत्व, वशित्व आदि सिद्धियाँ प्राप्त किया करते थे, बल्कि अपनी लघुतम चेतना को सृष्टि की किसी भी प्रचण्ड प्रक्रिया के साथ संयोग करके कुछ भी विलक्षण परिणाम उपस्थित कर सकने में समर्थ होते थे। विराट ईश्वरीय चेतना में घुलाकर अपने को मोक्ष, परमानन्द और भगवान बना देने का महानतम लाभ भी इस विज्ञान द्वारा ही प्राप्त किया करते थे।
उपासना का माध्यम बनाकर विशृंखलित समाज का केन्द्रीयकरण किया जा सकता है आत्म-दल बढ़ाने की दिशा मिल सकती है और विचार क्रान्ति की महान आधुनिक आवश्यकता को प्राचीनतम आधार के सहारे भली-भाँति पूरा किया जा सकता है इसी प्रकार यज्ञीय कर्मकाण्ड से चिर-परिचित, चिर अभ्यस्त भारतीय जनता यज्ञीय जीवन, यज्ञीय परम्पराओं का प्रकाश ग्रहण कर सकती है और व्यक्ति वाद को समूहवाद में- स्वार्थ को परमार्थ में बदलने की व्यापक भूमिका बन सकती है।
उपासना-
उपासना, व्यवहार-व्यापार, धर्म और दर्शन, भाषा और शासन व्यवस्था आदि की दृष्टि से भारतीय संविधान से जुड़ी रहीं। ईसा से 1500 वर्ष पूर्व मध्य एशिया में “मिटानी” और “हिटाइट” नामक दो पड़ौसी राज्य थे। मिटानी का शासक “मलिउजाजा” था और हिटाइट में “शिविलुलिउमा” राज्य करता था। प्राचीन काल में जब दो राजाओं के मध्य सन्धि या किसी प्रस्ताव पर बातचीत होती थी तो अदालतों में जिस प्रकार भगवान की शपथ ली जाती है, उसी प्रकार देवताओं को साक्षी बनाया जाता था। इन दो राजाओं के मध्य हुई सन्धि का एक शिलालेख मिला है।
उपासना होने लगी। जो लोग श्रद्धापूर्वक संगीत में लीन हो जाते हैं उनकी देवता रक्षा करते हैं।
उपासना से आनन्द की यह आकांक्षापूर्ण होगी। बाहर संसार
में कुछ भी नहीं है। जो भी सुख, आनन्द और रूप स्वरूप है, वह सब अपने अन्दर
और अपनी आत्मा में ही है। बाह्य संसार में जो भी रसानुभूति होती है, वह सब
अपने अन्तर की ही छाया मात्र होती है। जिसका आत्मा जितना-जितना स्पष्ट और
व्यापक होता जाता है, उसकी छाया भी उतनी ही गहरी और स्थायी होती जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-March
उपासना में त्यागे अपने सारे श्रेयों के लिये पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त न होगा।
उपासना तक के सारे कर्तव्य अभोगी वृति से करता हुआ भविष्य के स्वर्ग का निर्माण करता चलता है। वह न तो इतना लोलुप होता है ओर न अधैर्यवान् कि तुरन्त के छोटे-छोटे लाभों तथा सुखों का भोग लिये बिना चैन से न रह सके।
उपासना के साथ सूर्य का ध्यान भी करना पड़ता है। ध्यान की अवस्था में सूर्य के विद्युत-चुम्बकीय प्रवाह से अपने मस्तिष्क की चोटी वाले स्थान से नलिका विहीन ग्रन्थियों का सम्बन्ध जुड़ जाता है और सूर्य तेज के कण हमारे शरीर में प्रवेश करते हुये चले जाते हैं, इस तरह अपना प्राण शरीर विकसित होता हुआ सूर्य प्रकाश के समान हलका दिव्य तेजस्वी होता चला जाता है। जिस दिन शरीर के सभी प्रकाश अणु बदल जाते हैं, उसी दिन साधक गायत्री सिद्ध या सूर्य की सी गति वाला हो जाता है। जब तक शरीर में एक भी विजातीय अणु रहेगा, तब तक साधक के चित्त में कोई न कोई अस्थिरता बनी रहेगी पर सिद्धि के बाद सभी आशंकायें और अस्थिरतायें मिट जाती हैं।
उपासना में मन नहीं लगता। भगवान की ओर चित्त दृढ़ नहीं होता।
उपासना इसी रूप में की। जप, तप, हवन, व्रत, उपवास आदि तप और तितीक्षाओं के द्वारा उन्होंने अपना अन्तःकरण नितान्त शुद्ध कर लिया। शास्त्र अनुशीलन और वेदों की शोध में अपने जीवन का एक-एक क्षण घुला दिया। शेष संसार से सम्बन्ध टूट गया। अपाला ने आत्म-साक्षात्कार की साधना में दिन-रात एक कर दिये।
उपासना की दृष्टि से अतीव उपयुक्त स्थान है। यहाँ कुछ समय के लिए यदाकदा हम भी आते रहेंगे और जो प्रकाश संग्रह करेंगे उसको जनसाधारण में फैलाने के उपयुक्त जितना अंश होगा माता जी के पास छोड़ जाया करेंगे। वे इस प्रकाश को जनसाधारण तक बखेरती रहेंगी। इस उद्यान का नाम शाँति कुण्ड रखा है। इसे वेदमाता गायत्री ट्रस्ट के अंतर्गत देवोत्तर सम्पत्ति बना दिया गया है।
उपासना करते हैं तो हमारे भीतर के दूषित प्रकाश अणुओं को हटाने और उनके स्थान पर दिव्य प्रकाश अणु भर देने का माध्यम “गायत्री का देवता सविता” अर्थात् सूर्य होता है।
उपासना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें हम अपने भीतर के काले, मटमैले और पापाचरण को प्रोत्साहन देने वाले प्रकाश-अणुओं को दिव्य तेजस्वी, सदाचरण और शाँति एवं प्रसन्नता की वृद्धि करने वाले मानव अणुओं में परिवर्तित करते हैं। विकास की इस प्रक्रिया में किसी नैसर्गिक तत्त्व, पिण्ड या ग्रह-नक्षत्र की साझेदारी होती है। उदाहरण के लिये जब हम गायत्री की उपासना करते हैं तो हमारे भीतर के दूषित प्रकाश अणुओं को हटाने और उनके स्थान पर दिव्य प्रकाश अणु भर देने का माध्यम “गायत्री का देवता सविता” अर्थात् सूर्य होता है।
उपासना उसी का नाम है।
उपासना करता है, मैं वैसा ही फल देती हूँ- सिन्धुराज की इच्छा चक्रवर्ती बनने की थी सो वह आज चक्रवर्ती है और तुम्हारे पति की इच्छा थी, आत्मोद्धार सो उनका उद्धार हो गया, यह तुम देख ही रही हो?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-January
उपासना में लगे रहते हैं, वे अपनी बड़ी भारी हानि करते हैं। ऐसे अबोध लोगों को ही शास्त्रों में अज्ञानी एवं प्रमादी कहा गया है।
उपासना प्रचलित थी) पर इस बार भी अन्तिम निर्णय वही लिया गया, जो एक समर्थ जाति को लेना चाहिये था।
उपासना की संज्ञा दे दी जाए, तब भी अनुचित न होगा। जो लोग उपासना करते हैं, उन्हें अनुभव होगा कि जब वे अपना ध्यान परमात्मा में लगाते हैं तो अपने अन्दर एक विशेष प्रकार का प्रकाश और पुलक पाते हैं। उन्हें ऐसा लगता है, मानो परमात्मा की करुणा उनकी ओर आकर्षित हो रही है। यह कल्याणकारी अनुभव उस उपासना, उस चिन्तन अथवा उन विचारों का ही फल होता है, जिनके अन्तर्गत कल्याण का विश्वास प्रवाहित होता रहता है।
उपासना का सारा आधार यही है। धार्मिकता का कलेवर कितना ही बड़ा क्यों न हो उसकी शाखायें कितनी ही क्यों न हों, बीज मूल की तरह तथ्य इतना ही है कि व्यक्ति अपनी महान महत्ता को समझे, उसी के अनुरूप सोचे और गतिविधियाँ अपनाये। व्यक्ति और समाज की प्रगति एवं सुख-शाँति का आधार इतना ही है। उत्थान और पतन का सौभाग्य, दुर्भाग्य इन्हीं तथ्यों पर पूर्णतया निर्भर है। सद्गुणी, सदाचारी, उदार और जन-कल्याण की भावनाओं से ओत-प्रोत मनुष्य ही सच्चा मनुष्य है, देवता उसी को कहते हैं और वह जहाँ भी रहता है, वहाँ स्वर अनायास ही अवतरित होकर रहता है।
उपासना करता है, उसी प्रकार के तत्त्व उसकी जीवन परिधि में सजग और सक्रिय हो उठते हैं। अतएव मनुष्य को सदैव ही कल्याणकारी चिन्तन ही करना चाहिए। निराशापूर्ण चिन्तन जीवन के उत्थान और विश्वास के लिए अच्छा नहीं होता।
उपासना, कथा, वार्ता, तीर्थ, मंदिर, व्रत, अनुष्ठान, जप-तप तथा नियम-संयम, स्नान-ध्यान, दान-पुण्य आदि की अध्यात्मिक प्रक्रियाओं के आधार पर यदि बारीकी से दृष्टिपात किया जाय तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि इन मनोवैज्ञानिक क्रिया-कलापों का प्रयोजन व्यक्ति की अन्तरंग उत्कृष्टता का अभिवर्धन करना है। आस्तिकता का अर्थ है, ईश्वर विश्वास। ईश्वर विश्वास का अर्थ है—एक ऐसी न्यायकारी सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करना, जो सर्व-व्यापी है और कर्मफल के अनुरूप हमें गिरने एवं उठने का अवसर प्रस्तुत करती है। यदि यह विश्वास कोई सच्चे मन से कर ले तो उसकी विवेक-बुद्धि कुकर्म करने की दिशा में एक कदम भी न बढ़ने देगी। हम आग नहीं छूते, जहर नहीं खाते तो कोई कारण नहीं कि सर्व-व्यापी कर्मफल के अनुरूप सुख-दुख देने वाली ईश्वरीय सत्ता विधि-व्यवस्था तोड़ने और अनाचार अपनाने का दुस्साहस करें।
उपासना करना अनुचित है।
उपासना, उस चिन्तन अथवा उन विचारों का ही फल होता है, जिनके अन्तर्गत कल्याण का विश्वास प्रवाहित होता रहता है।
उपासना करते हैं, उन्हें अनुभव होगा कि जब वे अपना ध्यान परमात्मा में लगाते हैं तो अपने अन्दर एक विशेष प्रकार का प्रकाश और पुलक पाते हैं। उन्हें ऐसा लगता है, मानो परमात्मा की करुणा उनकी ओर आकर्षित हो रही है। यह कल्याणकारी अनुभव उस उपासना, उस चिन्तन अथवा उन विचारों का ही फल होता है, जिनके अन्तर्गत कल्याण का विश्वास प्रवाहित होता रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-April
उपासना से मनुष्य के अन्तःकरण में प्रकाश आता है, वह मैं जानती हूँ पर मुझे यह समझ में नहीं आता कि उसके लिये क्या घर छोड़ना आवश्यक ही है। ऐसा न होता तो ये (अपने पति का संकेत सम्बोधन) यों कहकर धमकाते नहीं- “मैं घर छोड़कर सन्त पुनीत के आश्रम में चला जाऊँगा और संन्यासी हो जाऊँगा?” क्या ईश्वर को प्राप्त करने के लिए संन्यासी होना ही आवश्यक है।”
उपासना से जो भी लाभ यथा आरोग्य, प्राण, धन-संपत्ति पुत्र और अपनी महत्वाकाँक्षायें आदि पूर्ण होती हैं, उसकी शक्ति अथवा प्रेरणा सूर्य लोक से आती है। किसी भी मंत्र का जब उच्चारण किया जाता है, तब वह एक विशेष गति से आकाश के परमाणुओं के बीच बढ़ता हुआ, उस देवता (शक्ति-केन्द्र) तक पहुँचता है, जिसका उस मन्त्र से सम्बन्ध होता है। मन्त्र-जप के समय ऊर्जा मन को शक्ति के द्वारा प्राप्त होती है, इस शक्ति के द्वारा जप के समय की ध्वनि तरंगों को विद्युत तरंगों के रूप में प्रेक्षित किया जाता है। वह तेजी से बढ़ती हुई कुछ ही क्षणों में देव शक्ति से टकराती हैं, उससे अदृश्य सूक्ष्म-परमाणु मन्दगति से परावर्तित होने लगते हैं, उनकी दिशा ठीक उल्टी होती है। सूक्ष्म और स्थूल दोनों तरह के परमाणु दौड़ पड़ते हैं और साधक को शारीरिक लाभ और मानसिक प्रेरणायें देने लगते हैं।
उपासना करने वाले लोग आनन्द और सुख के कल्याणकारी परिणाम से वंचित ही रहते हैं।
उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता। (128) हम ईश्वर से विमुख न हों। (129) गृहस्थ एक योग साधना।(130) आत्मा की पुकार अनसुनी न करें। (131) हम सशक्त और साहसी बनें।
उपासना अथवा पूजा-पाठ वाले बाध्य हैं कि वे हर मूल्य और हर प्रयत्न पर निर्विकार बनें, शुद्ध और प्रबुद्ध बनें। किन्तु खेद है कि पूजा-पाठ का नियम निभाने वाले इस आवश्यकता की ओर ध्यान नहीं देते। बल्कि अहंकार के वशीभूत होकर ऐसा समझ बैठते हैं कि वे तो भगवान् के भक्त हैं। उसकी पूजा उपासना करते हैं। इसके उपलक्ष में उनके विकार क्षमा कर दिए जायेंगे।
उपासना करते हैं। इसके उपलक्ष में उनके विकार क्षमा कर दिए जायेंगे। विकारों के रहते हुए उन पर भगवान् की कृपा होगी और उनकी साधना में सुख शाँति के मनोवाँछित फल लगेंगे। किन्तु उनकी यह धारणा कभी सत्य सिद्ध नहीं हो सकती। अध्यात्म में सफल होने, पूजा-पाठ का उचित फल पाने और परमात्मा से सच्चा सम्बन्ध स्थापित करने के लिए विकारों का त्याग और गुणों का ग्रहण करना आवश्यक है।
उपासना का अवलम्बन लेकर कोई कितना समर्थ बन सकता है। इस चर्चा से लोगों का आकर्षण और झुकाव आध्यात्मिकता की दिशा में होगा। अतएव आचार्य जी के न रहने पर उनकी पीठ पीछे प्रतिबन्ध को समाप्त हुआ ही समझा जायेगा।
उपासना व्यर्थ वस्तु है, ऐसा वह सोचती पर बोलती कुछ नहीं, क्योंकि उस बेचारी को ईश्वर की नहीं, पति की आवश्यकता थी।
उपासना तभी पूर्ण होगी, तभी फलवती होगी और तभी आनन्द-दायिनी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-November
उपासना करनी पड़ेगी। उसे अपने आपसे परिवार, पत्नी और बच्चों से पड़ोसी देश और विश्व से सृष्टि के प्राणिमात्र से उतना ही घनिष्ठ प्रेम करना पड़ेगा जितना वह परमात्मा को प्रेमास्पद मानता है। भगवान प्रेम में जीवित हैं और प्रेम में ही विराजते हैं प्रेम की साधना किये बिना कोई उन्हें पा नहीं सकता।
उपासना में गहन तल्लीनता के कारण उसमें इसी उम्र में आत्मिक और बौद्धिक प्रतिभा का विलक्षण विकास भी हो गया है। केवल भट्ट भला दूसरे की प्रशंसा कैसे सुनते, वे सीधे गौराँग के पास जाकर बोले-मुझसे शास्त्रार्थ करो।
उपासना-साधना आदि की आध्यात्मिक गतिविधि बंधन की हेतु नहीं बनती।
उपासना साधना आदि की धार्मिक अथवा आध्यात्मिक स्वभाव की क्रियाओं को शुभ और मुक्ति प्रदायिका माना जाता है। निश्चय ही यह है भी। किन्तु कब? जब इनको इन्हीं की स्थिति में रखा जाए। इनको निःस्वार्थ, निष्काम तथा निर्लोभ भाव से किया जाय।
उपासना अथवा धार्मिक गतिविधि से हमें तन-मन की पवित्रता मिले। हमारी आत्मा में दिव्य प्रकाश प्रस्फुटित हो। हमारी विषय वासनायें शाँत हों। हम अहंकार से निकलकर प्रकाश की ओर बढ़ें। इस प्रकार की पवित्र एवं निष्कलुष कामनायें आध्यात्मिक अथवा धर्माचार की क्रियाओं के अनुरूप हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-September
उपासना करते-करते, उसकी गति योगियों की सी हो चली। माँ के दिए अक्षर ज्ञान को साधना की कसौटी पर कस-कस कर और भगवती प्रकृति के व्यवहार को देख-देख कर उसने ज्ञान का अद्वितीय भाण्डागार अर्जित कर लिया। इतरा के पुत्र का यश संसार में चन्द्रमा की कला के समान विकसित होने लगा।
उपासना के महत्व को समझने लगेंगे।”
उपासना तक करने लगते हैं। इस विरोधी प्रतिक्रिया को देखते हुए यही मानना होगा कि वे कठिनाइयाँ वास्तव में बड़ी महत्वपूर्ण तथा उपयोगी हैं जो मनुष्य को शुद्ध-बुद्ध और आस्तिक बनने में सहायक होती हैं। पावनता मानवता की विशेष शोभा है, जिसकी प्राप्ति कठिनाइयों की प्रेरणा से ही होती है। यह बात मानव-जीवन में कठिनाइयों के महत्व का ही प्रतिपादन करती है।
उपासनाओं से प्राप्त करते रहे हैं।
उपासना प्रारम्भ कर। मेरा आशीर्वाद तेरे साथ है। भगवान सब मंगल करेंगे। बालक वहाँ से चल पड़ा। भगवती प्रकृति का अध्ययन और आत्मदेव की उपासना करते-करते, उसकी गति योगियों की सी हो चली।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-February
उपासना और शक्ति है।
उपासना से भी गायत्री के बिना द्विजत्व नहीं मिल सकता। चाहे कोई शैव हो या वैष्णव हो, दोनों देवों में से किसी भी एक की उपासना करने वाला क्यों न हो उसकी वेदमाता की दीक्षा से ही गणना की योग्यता होती है। वेदमान्य ब्रह्मता तो माता गायत्री के द्वारा ही प्राप्त होती है। ।।
उपासना करनी है तो समर्थ एवं सनातन उपासना पद्धति-गायत्री-मंत्र का आश्रय लें। सही मार्ग पर चलने से ही सही परिणाम निकल सकते हैं। अन्यान्य देवताओं का आराधन कुछ क्षणिक प्रयोजन भले ही सिद्ध करे जीवन लक्ष्य को प्राप्त करा सकने में समर्थ नहीं हो सकता। देवी भागवत में इस तथ्य पर यों प्रकाश डाला गया है-
उपासना ही प्रधान है। हर आस्तिक को अपने में ब्रह्म तेज उत्पन्न करना चाहिए। जिसमें जितना ब्रह्म-तत्व अवतरित होगा, वह उतने ही अंशों में ब्राह्मणत्व का अधिकारी होता जाएगा। जिसने आदर्शमय जीवन का व्रत लिया है, व्रतबंध, यज्ञोपवीत धारण किया है, वे सभी व्रतधारी ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य अपनी आत्मा में प्रकाश उत्पन्न करने के लिए गायत्री उपासना निरन्तर करते रहें, यही उचित है। जो इस कर्त्तव्य से च्युत होकर इधर-उधर भटकते हैं।
उपासना से देव-तत्वों की मानव शरीर में निरंतर वृद्धि होती है और शक्तिशाली व्यक्ति देवत्व की अहिंसा, महत्ताओं को उसी जीवन में उपलब्ध कर लेता है। ‘कर्म देवी विशेषताएँ’ प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगती हैं।
उपासना का ही निर्देश किया गया है। उसमें वे अपना ब्रह्मवर्चस आशाजनक मात्रा में बढ़ा सकते हैं और उस आधार पर विपन्नता एवं आपत्तियों से बचते हुए, सुख-शाँति के मार्ग पर सुनिश्चित गति से बढ़ते रह सकते हैं। द्विजत्व का व्रत-बंध स्वीकार करते समय हर व्यक्ति को गायत्री मंत्र की दीक्षा लेनी पड़ती है, इसलिए उसे ही गुरुमंत्र कहा जाता रहा है। पीछे से अंधकार युग में चले सम्प्रदायवाद ने अनेक देवी-देवता, मन्त्र और उनके उपासना विधान गढ़ डाले और लोगों को निर्दिष्ट मार्ग से भटकाकर भ्रम-जंजालों में उलझा दिया। फलतः अनादि काल से प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी की निर्दिष्ट उपासना पद्धति हाथ से छूट गई और आधार रहित पतंग की तरह हम इधर-उधर टकराते हुए अधःपतित स्थिति में जा पहुँचे।
उपासना मात्र) से ही कृतकृत्यता हो जाती है, क्योंकि द्विज को और किसी की अपेक्षा नहीं रहती। गायत्री-उपासना मात्र से निष्णात द्विज सचमुच मोक्ष प्राप्त कर सकता है, चाहे वह और कुछ करे या न करे ऐसा स्वयं मनु जी ने कहा है। उस गायत्री को छोड़कर विष्णु-उपासना में तत्पर अथवा शिवोपासक ब्राह्मण सर्वथा नरक को प्राप्त करता है।
उपासना विधान गढ़ डाले और लोगों को निर्दिष्ट मार्ग से भटकाकर भ्रम-जंजालों में उलझा दिया। फलतः अनादि काल से प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी की निर्दिष्ट उपासना पद्धति हाथ से छूट गई और आधार रहित पतंग की तरह हम इधर-उधर टकराते हुए अधःपतित स्थिति में जा पहुँचे।
उपासना पद्धति-गायत्री-मंत्र का आश्रय लें। सही मार्ग पर चलने से ही सही परिणाम निकल सकते हैं। अन्यान्य देवताओं का आराधन कुछ क्षणिक प्रयोजन भले ही सिद्ध करे जीवन लक्ष्य को प्राप्त करा सकने में समर्थ नहीं हो सकता। देवी भागवत में इस तथ्य पर यों प्रकाश डाला गया है-
उपासना किया करते हैं। यदि गायत्री के अर्थ का ज्ञान हो जाए तो फिर सब तरह के विवादों की शाँति हो जाया करती है। गायत्री मन्त्र का जो गायन करता है, उसका मोक्ष प्राप्त कर लेना तो फिर उसी के हाथ में रहा करता है।
उपासना करने वाला है, उसके लिए यह साक्षात ब्रह्म ही है। गायत्री के समान तन्त्र और पुराण में अन्य कोई भी मंत्र नहीं है। गायत्री मंत्र ही सर्व शिरोमणि मन्त्र है। ॥13॥
उपासना में तत्पर अथवा शिवोपासक ब्राह्मण सर्वथा नरक को प्राप्त करता है।
उपासना केन्द्र-बिन्दु गायत्री महामंत्र पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करे और उसी से लौकिक एवं पारलौकिक सुख-शाँति का पथ प्रशस्त करे।
उपासना करो। अपने चरणों में प्रवृत्ति करने से ही हार्दिक कामना का ज्ञान हो जाता है। जो तृप्तिहीन होता है, उसी को प्रवृत्ति होती है। इसमें कोई भी वाद नहीं है।
उपासना पद्धति हाथ से छूट गई और आधार रहित पतंग की तरह हम इधर-उधर टकराते हुए अधःपतित स्थिति में जा पहुँचे।
उपासना के साथ स्वावलम्बी जीवन का अभ्यास भी प्रारंभ कर दिया।
उपासना से ही उपलब्ध होता है। इस उपासना से देव-तत्वों की मानव शरीर में निरंतर वृद्धि होती है और शक्तिशाली व्यक्ति देवत्व की अहिंसा, महत्ताओं को उसी जीवन में उपलब्ध कर लेता है। ‘कर्म देवी विशेषताएँ’ प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगती हैं।
उपासना मात्र से निष्णात द्विज सचमुच मोक्ष प्राप्त कर सकता है, चाहे वह और कुछ करे या न करे ऐसा स्वयं मनु जी ने कहा है। उस गायत्री को छोड़कर विष्णु-उपासना में तत्पर अथवा शिवोपासक ब्राह्मण सर्वथा नरक को प्राप्त करता है।
उपासना गायत्री ही है। जब देवता उसी की उपासना करके शक्ति प्राप्त करते हैं तो मूल का तिरस्कार कर पत्तों पर भटकने की भूल क्यों की जाय? ऐसी भूल करने वालों की भर्त्सना भी की गई है।
उपासना के आधार पर अपनी शक्ति, सामर्थ्य प्राप्त करने बढ़ाने तथा अक्षुण्य रखने में समर्थ हुए हैं-
उपासना करने वाला क्यों न हो उसकी वेदमाता की दीक्षा से ही गणना की योग्यता होती है। वेदमान्य ब्रह्मता तो माता गायत्री के द्वारा ही प्राप्त होती है। ।।10।
उपासना निरन्तर करते रहें, यही उचित है। जो इस कर्त्तव्य से च्युत होकर इधर-उधर भटकते हैं। जड़ को सींचना छोड़कर पत्ते धोते फिरते हैं, उन्हें अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त करने में विलंब ही नहीं, असफलता का भी सामना करना पड़ता है।
उपासना का नियमित रूप से विधान नहीं किया है, न विष्णु-दीक्षा ही नियमित है, वैसे ही शिव की भी। गायत्री उपासना तो सब वेदों ने नियमित रूप से प्रतिपादित की है। जिसके बिना ब्राह्मण का भी सर्वथा अधःपतन हो जाता है। उतने से (गायत्री-उपासना मात्र) से ही कृतकृत्यता हो जाती है, क्योंकि द्विज को और किसी की अपेक्षा नहीं रहती। गायत्री-उपासना मात्र से निष्णात द्विज सचमुच मोक्ष प्राप्त कर सकता है, चाहे वह और कुछ करे या न करे ऐसा स्वयं मनु जी ने कहा है।
उपासना करनी चाहिए। यदि किसी लोक विशेष के प्राप्त करने की इच्छ हो तो अन्य देवी की उपासना करो। अपने चरणों में प्रवृत्ति करने से ही हार्दिक कामना का ज्ञान हो जाता है। जो तृप्तिहीन होता है, उसी को प्रवृत्ति होती है। इसमें कोई भी वाद नहीं है।
उपासना, चैतन्य के विकास की साधना, ध्यान, जप, स्वाध्याय, मनन, चिन्तन आदि के द्वारा मस्तिष्क में यह संकल्प सुदृढ़ कर लेता है कि साँसारिक आवश्यकतायें यथा इन्द्रियसुख, पद-यश, वित्त, पुत्र यह सब चेतना के ऊपर चढ़ी झिल्ली की खुजलाहट, क्रियाशीलता अथवा माँग उसकी निज की नहीं, तब उसका दृष्टिकोण ही बदल जाता है। आसक्ति नष्ट होकर वह शुद्ध चैतन्य की प्राप्ति का प्रयत्न करने लगता है। तब वह बार-बार अनेक तरह के शरीर धारण करने की चिंता से भी मुक्त हो जाता है।
उपासना को साधना शास्त्र में निरर्थक ही नहीं, हानिकारक भी बताया गया है। और कहा गया है कि सनातन उपासना गायत्री ही है। जब देवता उसी की उपासना करके शक्ति प्राप्त करते हैं तो मूल का तिरस्कार कर पत्तों पर भटकने की भूल क्यों की जाय? ऐसी भूल करने वालों की भर्त्सना भी की गई है।
उपासना आवश्यक है। यों सभी के भीतर सत तत्व बीज रूप में विद्यमान है पर उसका जागरण जिन तपश्चर्याओं द्वारा संभव होता है, उनमें गायत्री उपासना ही प्रधान है। हर आस्तिक को अपने में ब्रह्म तेज उत्पन्न करना चाहिए। जिसमें जितना ब्रह्म-तत्व अवतरित होगा, वह उतने ही अंशों में ब्राह्मणत्व का अधिकारी होता जाएगा। जिसने आदर्शमय जीवन का व्रत लिया है, व्रतबंध, यज्ञोपवीत धारण किया है, वे सभी व्रतधारी ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य अपनी आत्मा में प्रकाश उत्पन्न करने के लिए गायत्री उपासना निरन्तर करते रहें, यही उचित है।
उपासना तो सब वेदों ने नियमित रूप से प्रतिपादित की है। जिसके बिना ब्राह्मण का भी सर्वथा अधःपतन हो जाता है। उतने से (गायत्री-उपासना मात्र) से ही कृतकृत्यता हो जाती है, क्योंकि द्विज को और किसी की अपेक्षा नहीं रहती। गायत्री-उपासना मात्र से निष्णात द्विज सचमुच मोक्ष प्राप्त कर सकता है, चाहे वह और कुछ करे या न करे ऐसा स्वयं मनु जी ने कहा है। उस गायत्री को छोड़कर विष्णु-उपासना में तत्पर अथवा शिवोपासक ब्राह्मण सर्वथा नरक को प्राप्त करता है।
उपासना करके शक्ति प्राप्त करते हैं तो मूल का तिरस्कार कर पत्तों पर भटकने की भूल क्यों की जाय? ऐसी भूल करने वालों की भर्त्सना भी की गई है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-May
उपासना, गीता के पाठ, गाय के दूध और गायत्री मंत्र के जप के समान किसी भी अवस्था में हानि की कोई भी आशंका नहीं रहती। संगीत के अभ्यास से इसीलिये कभी किसी को हानि नहीं होती, किसी भी अवस्था में लाभ ही होता है।
उपासना जैसी पारमार्थिक तथा क्रीड़ा, मनोरंजन, विलास, एवं भोग जैसी राजस भावनाओं का भी विकास कर लिया है। निश्चय ही उसने वैचारिक लोक की इन पारमार्थिक प्रवृत्तियों के बल पर ही संसार संज्ञा का महत कार्य सम्पादन किया है। पारमार्थिक विचार ही वे सृजनात्मक विचार हैं जिनकी सक्रियता की पहुँच स्वर्गोपम संसार तक हो सकती है।
उपासना और (2) यज्ञ, यही दो आधार युग-निर्माण योजना के भी हैं। उपासना के दो भाग हैं- (1) धर्म या अध्यात्म अर्थात् अपने आपको तत्त्व-दर्शन (धार्मिक विज्ञान) के द्वारा सृष्टि के मूल, परमात्मा, जगत-नियन्ता या विश्व-व्यवस्था के साथ जोड़ना, (2) संस्कृति अर्थात् मानवीय जीवन के अज्ञान और आसक्ति को कम करते हुए प्रक्षालित करते हुए स्वर्ग और मुक्ति की और अग्रसर होना। प्रथम में जप, तप, योग आदि आते हैं, दूसरे में स्वाध्याय, सत्संग संस्कार, सामाजिक सभ्यता और शिष्टाचार की वह सब बातें आती है जो अपनी प्रसन्नता के लिये हम औरों से चाहते हैं।
उपासना के दो भाग हैं- (1) धर्म या अध्यात्म अर्थात् अपने आपको तत्त्व-दर्शन (धार्मिक विज्ञान) के द्वारा सृष्टि के मूल, परमात्मा, जगत-नियन्ता या विश्व-व्यवस्था के साथ जोड़ना, (2) संस्कृति अर्थात् मानवीय जीवन के अज्ञान और आसक्ति को कम करते हुए प्रक्षालित करते हुए स्वर्ग और मुक्ति की और अग्रसर होना। प्रथम में जप, तप, योग आदि आते हैं, दूसरे में स्वाध्याय, सत्संग संस्कार, सामाजिक सभ्यता और शिष्टाचार की वह सब बातें आती है जो अपनी प्रसन्नता के लिये हम औरों से चाहते हैं।
उपासना की शिक्षा देते हैं। कल्कि भगवान् इसी गायत्री तत्व और संस्कारों द्वारा जनमानस को संशोधित करते और उन्हें यथार्थ में ईश्वर-बोध कराने की प्रतिज्ञा करते हैं। इसलिये यह कहा जा सकता है कि गायत्री-उपासना और समाज में ब्राह्मणत्व के सच्चे आविर्भाव के लिए जो लोग प्रयत्न व परिश्रम करेंगे वह कल्कि की इच्छा की पूर्ति वाले उनके सहायक गण वह देवात्मायें ही होती हैं, जो एक निश्चित संकल्प लेकर अवतार के साथ जुड़ी हुई जन्म लेती हैं।
उपासना और स्वाध्याय को सम्मिलित करने के लिये कहा गया है। अपने परिवार के सभी लोग यदि इस प्रक्रिया को दृढ़ता पूर्वक अपना लें तो उनके आत्म-बल में महत्वपूर्ण अभिवृद्धि होगी और उस निष्ठा का दूसरों पर भी प्रभाव पड़ेगा। ज्ञान यज्ञ वर्ष में इस साधनात्मक अनुक्रम को नियमितता पूर्वक चलाया जाने लगे तो यह बहुत बड़ी बात होगी और अपने परिजनों का व्यक्तित्व बहुत निखरेगा। जो उच्च स्तर की साधनायें करना चाहेंगे उनके लिये साधना-विधान की एक व्यवस्थित संहिता भी हम तैयार कर रहे हैं ताकि हमारे यहाँ न होने पर भी उसका लाभ साहसी साधकों को मिलता रहे और साधना सुचारु रूप से चलती रहे।
उपासना की नियमितता, व्यवस्थित स्वाध्याय का क्रम व्यक्ति निर्माण के लिए एक अमोघ साधन सिद्ध हो सकता है। छुट-पुट एवं अस्त-व्यस्त क्रम से कभी बहुत, कभी कुछ नहीं वाली बात चलाते रहने से कोई आशाजनक परिणाम नहीं निकलता पर यदि निरन्तर नियमित और क्रमबद्ध रूप से उसी प्रक्रिया को चलाया जाय तो थोड़ा सा प्रयत्न भी कहने लायक सफलता उत्पन्न कर सकता है। इसलिए जो नियमित रूप से दोनों साधनायें चलाते हैं उन्हें अधिक गहरी निष्ठा का समावेश करने और घरेलू ज्ञान मन्दिर और चल पुस्तकालयों की स्थापना के लिये व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रयत्नों को इस वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्य माना जाना चाहिए। एक घंटा समय और दस पैसा रोज देने वाली प्रक्रिया अपने परिवार की सदस्यता की एक अनिवार्य शर्त बना दी गई है। जिनके द्वारा युग-निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्य में भूमिका सम्पादन करने की आशा की जाय उनका कर्तव्य न्यूनतम इतना तो होना ही चाहिए, जो भावी कार्यक्रम की रूप-रेखा नियोजित करेंगे।
उपासना, आदि का नाश करने लगे।”
उपासना खण्डित कर दी।’
उपासना देवार्चन, यज्ञ, ध्यान, परलोक, पुनर्जन्म आदि को कोई नहीं मानता। खाना, पीना, प्रजनन और पैसा जुटाना यही लोगों के लक्ष्य रह गये हैं। शील, सच्चरित्रता नष्ट होते जा रहे हैं। इन बुद्धिवादियों को ठिकाने लगाने का एक महत्वपूर्ण कार्य युग-निर्माण प्रक्रिया का अंग है और वह धर्म के प्रबुद्ध स्वरूप के विस्तार द्वारा ही सम्भव है। लोहे को लोहा काटता है, विष को विष मारता है।
उपासना और समाज में ब्राह्मणत्व के सच्चे आविर्भाव के लिए जो लोग प्रयत्न व परिश्रम करेंगे वह कल्कि की इच्छा की पूर्ति वाले उनके सहायक गण वह देवात्मायें ही होती हैं, जो एक निश्चित संकल्प लेकर अवतार के साथ जुड़ी हुई जन्म लेती हैं।
उपासना, सामाजिक नियमोपनियम, जातीय संगठन और राज्य संचालन आदि का निर्धारण भारतवर्ष से होता रहा है। भारत में जन्म होने के कारण उसे भारतीय संस्कृति कहते हैं किन्तु वह सारे विश्व की संस्कृति रही है दुनिया भर की जातियाँ यहाँ के मार्गदर्शन पर काम करती थीं, संस्कृति का अपरिवर्तनीय पहलू जिसे धर्म या तत्वदर्शन कहना चाहिये वह तो मूल रूप से यहीं से विकसित हुआ है सामाजिक व्यवस्थायें और आचार संहिताओं में परिवर्तन कर लेने के कारण वे पृथक से दिखाई देने लगे हों यह एक अलग बात हैं अन्यथा भारतीय वाङ्मय में आये नाम-शक, आन्ध्र, चंदन, असुर राक्षस, कपि, महिष दैत्य, दानव नाग, कैवर्त्त, निषाद, किरात, पुलिंद पारद, पल्लव, दस्यु, खस, द्रविड़ पौण्ड्र, औण्ड्र, कम्भोज दरद, शबर आदि नाम इस बात के प्रमाण हैं कि उनका सम्बन्ध यहाँ से सदैव जुड़ा रहा है वे या तो साधनों की खोज में बाहर गई और बस गई या बाहर बसी हुई जातियों से विकसित होती रहीं पर उन्होंने धार्मिक दृष्टि से अपना सम्बन्ध भारतीय संस्कृति से सदैव जोड़ कर रखा था और जब भी उनमें से कोई विदेश से चलकर भारत आ जाता था तो यहाँ उन्हें पहले की ही तरह सम्मानित किया जाता था। थोड़े दिन उनके आचार-विचार आदि की-परीक्षा की जाती थी और तब फिर उन्हें गुण, कर्म, स्वभाव के अनुरूप ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्यों के रूप में स्वीकार कर लिया जाता था। धीरे-धीर वे हिन्दुओं में ही पूरी तरह घुल मिल जाते थे। उन्हीं में अनेक विवाह आदि सम्बन्ध भी होने लगते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-December
उपासना करते समय मुँह के बल लेट जाते हैं, कैथोलिक ईसाई घुटनों के बल झुकते हैं, प्रोटेस्टेंट ईसाई कुर्सी पर बैठ कर प्रार्थना करते हैं, मुसलमानों की नमाज में कई बार उठना-बैठना पड़ता है और हिन्दुओं की सर्वोच्च प्रार्थना वह है जिसमें साधक, ध्यान मगन होकर अचल हो जाय। यदि यह कहा जाय कि इन सब में एक ही उपासना-विधि ठीक है, दूसरी सब निकम्मी हैं, तो भी काम नहीं बनता। अन्य में भी अनेक व्यक्ति बड़े सन्त, त्यागी महात्मा हो गये हैं। धार्मिक-क्षेत्र के इसी घोर वैषम्य को देखकर ‘ओरिजन एण्ड डेवलपमेंट आफ रिलीजस विलीफ’ (धार्मिक विश्वास की उत्पत्ति और विकास) नामक ग्रन्थ के लेखक एस. बैरिंग-गाल्ड ने लिखा है-
उपासना की एक भिन्न विधि निकालकर एक पृथक सम्प्रदाय
स्थापित कर देते हैं, उनका एक नवीन मन्दिर बन जाता है। इस प्रकार के हजारों
नये-नये मत और धार्मिक फिर्के जंगली कहे जाने वाले प्रदेशों में ही नहीं
वरन् योरोप, अमरीका, एशिया के साक और सुसंस्कृत देशों में भी पाये जाते
हैं। ऐसी कोई पूजा-पद्धति नहीं है जिसका आविष्कार और प्रचलन संसार में कहीं
न कहीं न हो चुका हो। आप कैसी भी विचित्र अथवा असंगत उपासना पद्धति की
कल्पना क्यों न करें, वह इस विस्तृत पृथ्वी पर किसी जगह अवश्य ही क्रिया
रूप में होती मिल जायगी।
उपासना-विधि ठीक है, दूसरी सब निकम्मी हैं, तो भी काम नहीं बनता। अन्य में भी अनेक व्यक्ति बड़े सन्त, त्यागी महात्मा हो गये हैं। धार्मिक-क्षेत्र के इसी घोर वैषम्य को देखकर ‘ओरिजन एण्ड डेवलपमेंट आफ रिलीजस विलीफ’ (धार्मिक विश्वास की उत्पत्ति और विकास) नामक ग्रन्थ के लेखक एस. बैरिंग-गाल्ड ने लिखा है-
उपासना पद्धति की
कल्पना क्यों न करें, वह इस विस्तृत पृथ्वी पर किसी जगह अवश्य ही क्रिया
रूप में होती मिल जायगी।
उपासना द्वारा सूर्य के अंतराल का वेधन करके वहाँ के परमाणुओं में हलचल उत्पन्न होना इसी सिद्धान्त के अंतर्गत है जैसा कि चमगादड़ के उदाहरणों से स्पष्ट है। एक बार इटली के जीव विशेषज्ञ स्पालानजानी ने चमगादड़ को अन्धा करके उड़ाया। चमगादड़ में एक अलौकिक क्षमता यह होती है कि कितने ही तीव्र अन्धकार में बारीक से बारीक धागों की सैकड़ों बाधाओं को पार करता हुआ बराबर एक ही गति से उड़ता रहता है। किसी भी डोरे से टकराता नहीं। स्पालानजानी ने चमगादड़ के मुँह, तथा नाक बन्द करके परीक्षण किये तो एक बात स्पष्ट हो गई कि चमगादड़ बाधाओं को पार करने में कर्णातीत ध्वनि का उपयोग करता है पीछे इस बारे में नये तथ्य प्रकाश में आये और पता चला कि चमगादड़ भागते समय हलकी चीख निकालता है वह वस्तु से प्रतिध्वनित होकर लौटती है और चमगादड़ के “रेटीक्युलर फार्मेशन” (मस्तिष्क का वह भाग जहाँ हिन्दू चोटी रखते हैं) की संवेदनशील नाड़ियों द्वारा उसको यह सूचना दे देते हैं कि वस्तु कैसी है।
उपासना करो।
उपासना पद्धति में बहुत अधिक संवेदनशील बनाने का इसीलिये अनिवार्य विधान रखा गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-July
उपासना को कलंकित न करो महाराज। भगवान् का ध्यान कर रहे हो या ‘मूर एण्ड कम्पनी’ कलकत्ता की दुकान से चमड़े के जूते खरीद रहे हो?
उपासना की थी उन्होंने। इसीलिये प्राणवान् पुत्र ने उनकी कोख से जन्म लिया था।
उपासना की जाती रहे तो भी मानवीय लक्ष्य दूर से दूरतर होता चला जायेगा। दोनों का समुचित समन्वय ही उद्देश्य-पूर्ति का कारण बन सकता है, जिसका अनुपात कम-से-कम पच्चीस और पचहत्तर का ही होना चाहिए। इससे कम अनुपात में लक्ष्य-प्राप्ति के लिए अनेक जन्म-जन्मान्तरों तक प्रयत्न एवं प्रतीक्षा करनी होगी।
उपासना में विघ्न डालते तुझे लाज नहीं आती?
उपासना को अपना जीवन-लक्ष्य निर्धारित कर लिया।
उपासना और ऋचा गान किया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-October
उपासना, इष्ट-ध्यान, बोली-भाषा, उपरोक्त दोनों आवश्यकताओं को पूर्ण करें वही सच्ची संस्कृति का निर्माण करते हैं, जब इस परिभाषा में रखकर देखते हैं तो हम पाते हैं कि भारतीय संस्कृति ने इस संतुलन को बनाये रखने में सफलता प्राप्त की है। उसमें जाति-आयु लिंग और वर्ण का कोई भेद-भाव नहीं है। सब देशों के लिये संपूर्ण प्राणियों के लिये हितकारक होने के कारण ही वह विश्व-संस्कृति कही जाती है। भारत में जन्म लेने के कारण उसे भारतीय संस्कृति या हिन्दू-संस्कृति भी कहते हैं। पर उसमें किसी एक समुदाय, सम्प्रदाय या देशवासियों के ही कल्याण की सीमा संकीर्णता नहीं है।
उपासना रही हो अथवा वणिक-विपणन उसमें ब्राह्मी भाव, परमार्थ शुद्धता और पवित्रता बनाये रखना रहा है। इसीलिये भारतीय संस्कृति सदैव ही निरालोच्य रही है। उसने दूसरे धर्मों के आदर्शों को भी अपने में मिलाया पर तो भी उसने अपने तत्वदर्शन की वैज्ञानिकता को आँच नहीं आने दी।
उपासना करते हैं?’
उपासना का मर्म-सच्चा स्वरूप अब उनकी समझ में आ गया था।
उपासना पद्धति से मनुष्य आत्म-कल्याण का लक्ष्य पूरा करे, संस्कृति इस मामले में तो व्यक्ति को स्वतंत्र कर देती है। किन्तु साथ ही वह यह भी देखती है कि ऐसी किसी भी साधना या अभ्यास से पराये का हित नष्ट नहीं होना चाहिये, भले ही उससे आत्म-कल्याण की आवश्यकता पूरी न हो। तंत्र भाग में ऐसी क्रियाएं हैं। इसीलिये भारतीय आचार्यों ने उसे गोपनीय रखा। उनका उद्देश्य प्रत्येक कर्म को चाहे वह उपासना रही हो अथवा वणिक-विपणन उसमें ब्राह्मी भाव, परमार्थ शुद्धता और पवित्रता बनाये रखना रहा है।
उपासना, कीर्तन, भक्ति आदि ही मानते हैं। इसीलिये जीवन के अन्य कार्यक्रमों के साथ एक छोटा-सा धार्मिक कार्यक्रम और जोड़ कर समझते हैं कि दुनियादारी के साथ-साथ धर्म का भी निर्वाह करते है। पूजा-पाठ आदिक कार्यक्रम को धर्म मानने वाले यह नहीं समझ पाते कि संसार का हर काम का एक धर्म होता है। उसके कुछ आदर्श और नियम होते हैं। पूजा-पाठ के कार्यक्रमों के साथ जीवनक्रम के हर काम के आदर्श और नियम निर्वाह करने वाले को ही सच्चा धार्मिक कहा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-August
उपासनाओं के संबंध में।
उपासना के साथ मिला दी जाय तो उसके ठीक परिणाम होना संभव है। अगर यह तीनों चीजें नहीं मिलायी जायेगी तब फिर यही कहना पड़ेगा कि इसमें सफलता की आशा कम है।
उपासना से पूर्व अथवा किसी भी शुभ कार्य धर्मकृत्य के आरंभ में इन्हें कर लेने का विधान है।
उपासना करते हैं, अनुष्ठान करते हैं। भगवान की प्रार्थना करते हैं। भगवान को देखा कि किस नियत से यह आदमी कर रहा हैं। भागीरथी की नियत को देख कर के गंगा जो स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हो गयी थी और शंकर भगवान उनकी सहायता करने के लिए तैयार हो गये थे। हमारे संबंध में भी ऐसा हुआ।
उपासना में संलग्न रहता है। तो उसकी अनास्था में परिवर्तन होने लगता है। जब साधनों में अग्रसर होकर वह अपने चारों आरे परमात्मा शक्ति की क्रीड़ा अनुभव करता है और वह समझने लगता है कि संसार में जो कुछ हो रहा हैं वह उस प्रभू की प्रेरणा और इच्छा का फल हैं तथा वह जो कुछ करता है उसका अंतिम परिणाम जीव के लिए शुभ होता है, चाहे वह तत्काल उसे न समझ सके, तब उसकी व्याकुलता और अशाँति दूर होने लगती हैं और उसे ऐसा अनुभव होता है मानो ग्रीष्म ऋतु में व्यथित श्राँत क्लाँत व्यक्ति को शीतल और शाँति दायक वर्षा ऋतु प्राप्त हो गयी। मनुष्यों को अपनी भिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए तरह तरह की साधनाएँ निकाली हैं। धन, संतान, वैभव, सम्मान, प्रभाव, विद्या, बुद्धि आदि की प्राप्ति के लिए लोग भाँति भाँति के उपायों का सहारा लेते हैं, जिससे उनकी योग्यतानुसार कम या अधिक परिणाम में सफलता भी प्राप्त होती है।
उपासना) करता है तव उसे स्वयमेव ईश्वरीय तेज के दर्शन होने लगते हैं और परमात्मा की कृपा अपने चारों तरफ से मेह की तरह बरसती जान पड़ती है संसार में जीवन निर्वाह करते हुए एक साधारण मनुष्य को अनेक विघ्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है विपरीत परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है विरोधियों के साथ संघर्ष करना पड़ता है और लोगों की भली बुरी सब प्रकार की आलोचना को सहन करना पड़ता है इससे उसके जीवन में स्वभावतः उद्वेग अशाँति भय क्रोध आदि के अवसर आते हैं ऐसा मनुष्य अपने कष्टों के निवारणार्थ और मन और आत्मा की शाँति के लिए परमात्मा का आश्रय ग्रहण करता है। मन, वचन और कर्म से उसकी उपासना में संलग्न रहता है। तो उसकी अनास्था में परिवर्तन होने लगता है। जब साधनों में अग्रसर होकर वह अपने चारों आरे परमात्मा शक्ति की क्रीड़ा अनुभव करता है और वह समझने लगता है कि संसार में जो कुछ हो रहा हैं वह उस प्रभू की प्रेरणा और इच्छा का फल हैं तथा वह जो कुछ करता है उसका अंतिम परिणाम जीव के लिए शुभ होता है, चाहे वह तत्काल उसे न समझ सके, तब उसकी व्याकुलता और अशाँति दूर होने लगती हैं और उसे ऐसा अनुभव होता है मानो ग्रीष्म ऋतु में व्यथित श्राँत क्लाँत व्यक्ति को शीतल और शाँति दायक वर्षा ऋतु प्राप्त हो गयी। मनुष्यों को अपनी भिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए तरह तरह की साधनाएँ निकाली हैं।
उपासना को सफल बनाने के लिए परिष्कृत व्यक्तित्व का होना निताँत आवश्यक है। परिष्कृत व्यक्तित्व का मतलब हैं कि आदमी चरित्र वान हों, लोकसेवी हो, सदाचारी हो, संयमी हो अपने व्यक्तिगत जीवन को श्रेष्ठ और समुन्नत बनाने वाला हों। अब तक ऐसे ही लोगों को सफलतायें मिली हैं। अध्यात्म का लाभ स्वयं पाने और दूसरों को दें सकने में केवल वही साधक सफल हुए है जिन्होंने जप, उपासना के कर्मकाण्डों के सिवाय अपने व्यक्तिगत जीवन को शालीन समुन्नत, श्रेष्ठ और परिष्कृत बनाने का प्रयत्न किया है। संयमी व्यक्ति, सदाचारी व्यक्ति जो भी जप करता है, उपासना करते हैं उनकी प्रत्येक उपासना सफल हो जाती है।
उपासना करेगा, निश्चयपूर्वक और विश्वासपूर्वक हम कह सकते हैं अध्यात्मिकता के तत्वज्ञान का जो कुछ भी महात्म्य बताया गया है - कि आदमी स्वयँ लाभान्वित होता है, सामर्थ्य बनता है, शक्तिशाली बनता है, शाँति पाता है। , स्वर्ग मुक्ति जैसा लाभ प्राप्त करता है और दूसरों की सेवा सहायता करने में समर्थ होता है सही है। गायत्री मंत्र के संबंध में हम आजीवन यही प्रयोग और परीक्षण करते रहें और पाया कि गायत्री मंत्र सही है, शक्ति मान है। सबकुछ उसके भीतर है, लेकिन यह तभी जब गायत्री मंत्र के बीज को तीनों चीजों से समन्वित किया जाय। उच्चस्तरीय दृष्टिकोण, अटूट श्रद्धा विश्वास ओर परिष्कृत व्यक्तित्व यह जो करेगा पूरी सफलता पायेगा।
उपासनायें तब सफल होती हैं जब कि आदमी का दृष्टिकोण और महत्वाकांक्षाएं भी ऊंची हो। घटिया उद्देश्य लेकर के निकृष्ट कामनायें और वासनायें लेकर के अगर भगवान की उपासना की जाय तो देवता सबसे पहले कर्मकाण्डों की विधि एवं विधानों को देखने की अपेक्षा यह मालूम करने की कोशिश करते हैं कि उनकी उपासना का उद्देश्य क्या हैं? किस काम के लिए करना चाहता है? यदि उन्हीं कामों के लिए जिसमें आदमी को अपनी मेहनत और परिश्रम के द्वारा कमाई करनी चाहिए, उसको सरल और सस्ते तरीके से पूरा करने के लिए देवताओं का पल्ला खटखटाया हैं तो वे उसके व्यक्तित्व के बारे में समझ जाते हैं यह कोई घटिया आदमी हैं और घटिया काम के लिए हमारी सहायता चाहता है। देवता भी बहुत व्यस्त हैं।
उपासना को सार्थक बनाना है तो उन्हें इन तीन बातों का बराबर ध्यान में रखना चाहिए।
उपासना कृत्यों के आरंभ में षट्कर्म पूरे करने का विधान है
उपासना, यह ही सच्ची पूजा है।
उसके गुण धारण करने से, हटकर मार्ग न दजा है॥
उसकी कला ओर लीला में, भी रखें पूरा विश्वास॥
उपासना से प्रेरणा पाकर मनुष्य दिव्य गुण संपन्न बन सके, ऋषिगणों का यही उद्देश्य इस पुण्य प्रयोजन के पीछे रहा है।
उपासना का साँसारिक कामनाओं से कोई संबंध नहीं, ठीक नहीं है। वेद में कहा गया हैं कि
उपासना का पूरा पूरा लाभ देना चाहिए। यह एक पक्ष हुआ।
उपासना का दूसरा पहलू है। गायत्री उपासना के संबंध में अथवा अन्याय उपासनाओं के संबंध में।
उपासना के संबंध में अथवा अन्याय उपासनाओं के संबंध में।
उपासना का प्राण है। उपासना के साथ एक तथ्य यह जुड़ हुआ हैं कि अटूट श्रद्धा होनी चाहिए। श्रद्धा की एक अपने आप में शक्ति हैं। बहुत सारी शक्तियाँ हैं - जैसे बिजली की शक्ति, भाप की शक्ति हैं, आग की शक्ति हैं, उसी तरह श्रद्धा की एक शक्ति है। पत्थर में से देवता पैदा हो जाते हैं।
उपासना में प्राण संचार होता चला गया। प्राण संचार अगर होता तो हर चीज प्राणवान और चमत्कारी होती चली जाती है और सफल होती जाती है। हमने अपने व्यक्तिगत जीवन में चौबीस लाख के चौबीस साल में चौबीस महापुरश्चरण किये। जप और अनुष्ठानों कि विधियों को संपन्न किया। सभी के साथ जो नियमोपनियम थे, उनका पालन किया यह भी सही हैं, लेकिन हर एक को यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारी उपासना में कर्मकाण्डों का विधि विधानों का जितना ज्यादा स्थान हैं उससे कही ज्यादा स्थान इस बात के ऊपर हैं कि हमने उन तीन बातों को जो अध्यात्मिकता की प्राण समझी जाती हैं उन्हें पूरा करने की कोशिश की है।
उपासनाएँ की हैं, श्रद्धा से रहित मात्र कर्मकाण्ड सम्पन्न किये हैं, केवल जीभ की नोक से जप किये हैं और अँगुलियों की सहायता से मालायें घुमाई हैं, लेकिन मन में वह श्रद्धा न उत्पन्न कर सकें, विश्वास उत्पन्न न कर सकें, ऐसे लोग खाली रहेंगे। बहुत सारा जप करते हुए भी अगर अटूट श्रद्धा और विश्वास के साथ उपासनायें की जाय तो यह एक ही पहलू ऐसा हैं जिसके आधार पर हम सह आशा कर सकते हैं हमारे अच्छे परिणाम निकलने चाहिए, और उपासना का पूरा पूरा लाभ देना चाहिए। यह एक पक्ष हुआ।
उपासना के संबंध में अपनी मान्यता और भावना रख करके प्रयत्न किया हैं और उसका परिणाम पाया हैं। व्यक्तित्व को भी जहाँ तक संभव हुआ हैं परिष्कृत करने की पूरी कोशिश की हैं। एक ब्राह्मण को और एक भगवान के भक्त को जैसा जीवन जीना चाहिए हमने भरसक प्रयत्न किया है कि उनमें किसी तरह की कमी न आने पायें। उनमें पूरी पूरी सावधानी हम बरतते रहें है। अपने आप को धोबी की तरह धोने और धुनिये की तरह धुनने में हमने आगा पीछा नहीं किया है।
उपासना में कर्मकाण्डों का विधि विधानों का जितना ज्यादा स्थान हैं उससे कही ज्यादा स्थान इस बात के ऊपर हैं कि हमने उन तीन बातों को जो अध्यात्मिकता की प्राण समझी जाती हैं उन्हें पूरा करने की कोशिश की है। अटूट श्रद्धा और अडिग विश्वास गायत्री माता के प्रति रख करके और उसकी उपासना के संबंध में अपनी मान्यता और भावना रख करके प्रयत्न किया हैं और उसका परिणाम पाया हैं। व्यक्तित्व को भी जहाँ तक संभव हुआ हैं परिष्कृत करने की पूरी कोशिश की हैं। एक ब्राह्मण को और एक भगवान के भक्त को जैसा जीवन जीना चाहिए हमने भरसक प्रयत्न किया है कि उनमें किसी तरह की कमी न आने पायें। उनमें पूरी पूरी सावधानी हम बरतते रहें है।
उपासना के सत्य होने की कसौटी है। जो कोई भी एकाग्र चित्त से और तल्लीन होकर परमात्मा का ध्यान करेगा उसे कुछ समय उपराँत उसके तेज का अनुभव होना अवश्यम्भावी है। यह तेज ही साधक अंतर को प्रकाशित करके उसकी भ्रान्तियों को दूर कर देता है और उसे जीवन के सच्चे मार्ग को दिखलाता है। इसी प्रकार मनुष्य सच्चे ज्ञान का अधिकारी बनता है और सब प्रकार की भव बाधाओं को सहज में पार करने की सामर्थ्य प्राप्त करता हैं॥
उपासना कि विधि में बहुत भारी भूल रह गयी। और नाम के साथ काम करने वाली बात को भुला दिया गया। परिष्कृत व्यक्तित्व उपासना का दूसरा पहलू है। गायत्री उपासना के संबंध में अथवा अन्याय उपासनाओं के संबंध में।
उपासना की जाय तो देवता सबसे पहले कर्मकाण्डों की विधि एवं विधानों को देखने की अपेक्षा यह मालूम करने की कोशिश करते हैं कि उनकी उपासना का उद्देश्य क्या हैं? किस काम के लिए करना चाहता है? यदि उन्हीं कामों के लिए जिसमें आदमी को अपनी मेहनत और परिश्रम के द्वारा कमाई करनी चाहिए, उसको सरल और सस्ते तरीके से पूरा करने के लिए देवताओं का पल्ला खटखटाया हैं तो वे उसके व्यक्तित्व के बारे में समझ जाते हैं यह कोई घटिया आदमी हैं और घटिया काम के लिए हमारी सहायता चाहता है। देवता भी बहुत व्यस्त हैं। देवता सहायता तो करना चाहते हैं, लेकिन सहायता करने से पहले यह तलाश करना चाहते हैं कि हमारा उपयोग कहाँ किया जायेगा?
उपासना के चमत्कार अगर किन्हीं को देखने हैं, उपासना की सार्थकता की परख करनी हो तो इन तीनों बातों को ध्यान में रखना पड़ेगा। जो हमने अभी निवेदन किया उच्चस्तरीय दृष्टिकोण, परिष्कृत व्यक्तित्व और अटूट श्रद्धा विश्वास। इन तीनों को मिला करके जो आदमी उपासना करेगा, निश्चयपूर्वक और विश्वासपूर्वक हम कह सकते हैं अध्यात्मिकता के तत्वज्ञान का जो कुछ भी महात्म्य बताया गया है - कि आदमी स्वयँ लाभान्वित होता है, सामर्थ्य बनता है, शक्तिशाली बनता है, शाँति पाता है। , स्वर्ग मुक्ति जैसा लाभ प्राप्त करता है और दूसरों की सेवा सहायता करने में समर्थ होता है सही है। गायत्री मंत्र के संबंध में हम आजीवन यही प्रयोग और परीक्षण करते रहें और पाया कि गायत्री मंत्र सही है, शक्ति मान है।
उपासना करते हैं उनकी प्रत्येक उपासना सफल हो जाती है। दुराचारी आदमी, दुष्ट आदमी, नीच पापी और पत्ति आदमी भगवान का नाम लेकर यदि चाहे तो पार नहीं हो सकते। भगवान का नाम लेने का परिणाम यह होना चाहिए कि आदमी का व्यक्तित्व सही हो और वह शुद्ध बनें। अगर व्यक्ति को शुद्ध और समुन्नत बनने में राम नाम सफल नहीं हुआ तो तो जानना चाहिए कि उपासना कि विधि में बहुत भारी भूल रह गयी। और नाम के साथ काम करने वाली बात को भुला दिया गया।
उपासना और साधन तो तभी सच्ची मानी जा सकती है जब कि मनुष्य उस समय समस्त सांसारिक विषयों और आस पास की बातों को भूलकर प्रभु को के ध्यान में निमग्न हो जाए जब मनुष्य इस प्रकार की संलग्नता और एकाग्रता में अपने इष्टदेव की उपासना करता है तभी वह अध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर हो सकता है और तभी वह दैवी कृपा का लाभ प्राप्त कर सकता है इसी तथ्य को समझने के लिए वेदों में बतलाया गया है की जब मनुष्य हृदय और आत्मा से सोम का अभिसव (परमात्मा की उपासना) करता है तव उसे स्वयमेव ईश्वरीय तेज के दर्शन होने लगते हैं और परमात्मा की कृपा अपने चारों तरफ से मेह की तरह बरसती जान पड़ती है संसार में जीवन निर्वाह करते हुए एक साधारण मनुष्य को अनेक विघ्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है विपरीत परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है विरोधियों के साथ संघर्ष करना पड़ता है और लोगों की भली बुरी सब प्रकार की आलोचना को सहन करना पड़ता है इससे उसके जीवन में स्वभावतः उद्वेग अशाँति भय क्रोध आदि के अवसर आते हैं ऐसा मनुष्य अपने कष्टों के निवारणार्थ और मन और आत्मा की शाँति के लिए परमात्मा का आश्रय ग्रहण करता है। मन, वचन और कर्म से उसकी उपासना में संलग्न रहता है। तो उसकी अनास्था में परिवर्तन होने लगता है। जब साधनों में अग्रसर होकर वह अपने चारों आरे परमात्मा शक्ति की क्रीड़ा अनुभव करता है और वह समझने लगता है कि संसार में जो कुछ हो रहा हैं वह उस प्रभू की प्रेरणा और इच्छा का फल हैं तथा वह जो कुछ करता है उसका अंतिम परिणाम जीव के लिए शुभ होता है, चाहे वह तत्काल उसे न समझ सके, तब उसकी व्याकुलता और अशाँति दूर होने लगती हैं और उसे ऐसा अनुभव होता है मानो ग्रीष्म ऋतु में व्यथित श्राँत क्लाँत व्यक्ति को शीतल और शाँति दायक वर्षा ऋतु प्राप्त हो गयी। मनुष्यों को अपनी भिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए तरह तरह की साधनाएँ निकाली हैं।
उपासना हम किस काम के लिए करते हैं, हमेशा यह ध्यान बना रहा। पीड़ित मानव के ऊंचा उठने के लिए, देश धर्म, समाज और संस्कृति को समुन्नत बनाने के लिए हम उपासना करते हैं, अनुष्ठान करते हैं। भगवान की प्रार्थना करते हैं। भगवान को देखा कि किस नियत से यह आदमी कर रहा हैं। भागीरथी की नियत को देख कर के गंगा जो स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हो गयी थी और शंकर भगवान उनकी सहायता करने के लिए तैयार हो गये थे।
उपासना के संबंध में हमारा लम्बे समय का जो अनुभव हैं कि जप करने की विधियाँ और कर्मकाण्ड तो वही हैं जो सामान्य पुस्तकों में लिखें है।
उपासना से साधक सूर्य के अंतराल का वेधन करके वहाँ के परमाणुओं में हलचल उत्पन्न कर देता है फलस्वरूप प्रकाश ऊर्जा -प्राण चेतना एवं प्रेरणाओं की सघन तरंगें साधक पर बरसने लगती हैं। प्रारंभ में आदान प्रदान की आवर्तन परावर्तन की प्रक्रिया थोड़ी धीमी होती है पर जैसे-जैसे मानसिक एकाग्रता बढ़ती जाती है। प्रतिक्रिया भी तीव्र होती जाती है और सूक्ष्म आत्मसत्ता भी तेजी से प्रकाश परमाणुओं से सुसज्जित होने लगती हैं जो देवशक्ति से आकर्षित होते हैं। यह प्रकाश परमाणु, उपासक में जितने अधिक विकसित होते जाते हैं वह उतना ही अधिक स्पष्ट भविष्य दर्शी, सार्थक स्वप्न, दृष्ट और चमत्कारिक प्रेरणाओं को प्राप्त करने वाला होता जाता है। श्रद्धा और विश्वास प्रगाढ़ होने पर लाभ की द्रुतगामी होती है।
उपासना करता है तभी वह अध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर हो सकता है और तभी वह दैवी कृपा का लाभ प्राप्त कर सकता है इसी तथ्य को समझने के लिए वेदों में बतलाया गया है की जब मनुष्य हृदय और आत्मा से सोम का अभिसव (परमात्मा की उपासना) करता है तव उसे स्वयमेव ईश्वरीय तेज के दर्शन होने लगते हैं और परमात्मा की कृपा अपने चारों तरफ से मेह की तरह बरसती जान पड़ती है संसार में जीवन निर्वाह करते हुए एक साधारण मनुष्य को अनेक विघ्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है विपरीत परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है विरोधियों के साथ संघर्ष करना पड़ता है और लोगों की भली बुरी सब प्रकार की आलोचना को सहन करना पड़ता है इससे उसके जीवन में स्वभावतः उद्वेग अशाँति भय क्रोध आदि के अवसर आते हैं ऐसा मनुष्य अपने कष्टों के निवारणार्थ और मन और आत्मा की शाँति के लिए परमात्मा का आश्रय ग्रहण करता है। मन, वचन और कर्म से उसकी उपासना में संलग्न रहता है। तो उसकी अनास्था में परिवर्तन होने लगता है। जब साधनों में अग्रसर होकर वह अपने चारों आरे परमात्मा शक्ति की क्रीड़ा अनुभव करता है और वह समझने लगता है कि संसार में जो कुछ हो रहा हैं वह उस प्रभू की प्रेरणा और इच्छा का फल हैं तथा वह जो कुछ करता है उसका अंतिम परिणाम जीव के लिए शुभ होता है, चाहे वह तत्काल उसे न समझ सके, तब उसकी व्याकुलता और अशाँति दूर होने लगती हैं और उसे ऐसा अनुभव होता है मानो ग्रीष्म ऋतु में व्यथित श्राँत क्लाँत व्यक्ति को शीतल और शाँति दायक वर्षा ऋतु प्राप्त हो गयी। मनुष्यों को अपनी भिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए तरह तरह की साधनाएँ निकाली हैं।
उपासना और ध्यान करने से उसके जो महत्व बताये गये है कि इससे बह लाभ होता है, अमुक लाभ होते हैं, अमुक कामनायें पूरी होती है। अब यह देखा जाय कि कैसे पूरी होती है और कैसे पूरी नहीं होती। कब तक सफलता मिलती हैं और कब नहीं मिलती। किसी भी बीज को पैदा करने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है -भूमि उसके पास होनी चाहिए। भूमि के अलावा खाद पानी का इंतजाम होना चाहिए।
उपासना का उद्देश्य क्या हैं? किस काम के लिए करना चाहता है? यदि उन्हीं कामों के लिए जिसमें आदमी को अपनी मेहनत और परिश्रम के द्वारा कमाई करनी चाहिए, उसको सरल और सस्ते तरीके से पूरा करने के लिए देवताओं का पल्ला खटखटाया हैं तो वे उसके व्यक्तित्व के बारे में समझ जाते हैं यह कोई घटिया आदमी हैं और घटिया काम के लिए हमारी सहायता चाहता है। देवता भी बहुत व्यस्त हैं। देवता सहायता तो करना चाहते हैं, लेकिन सहायता करने से पहले यह तलाश करना चाहते हैं कि हमारा उपयोग कहाँ किया जायेगा?
उपासना क्षेत्र में संघर्ष के निर्मित कुछ विशेष उपक्रम अपनाने की आवश्यकता पड़ती है। सूक्ष्म शरीर को प्राण शक्ति के आधार पर समुन्नत किया जाता है। उसकी समस्त विधियाँ प्राणायाम परक है। प्राणायामों की अनेक सरल कठिन प्रक्रियायें और उनके प्रायोजन प्रतिफल भी अनेकानेक है, किन्तु चिकित्सा क्षेत्र में प्राणायाम का उद्देश्य फेफड़ों की निष्क्रियता समाप्त करके सक्रियता को जीवन शक्ति की मात्रा को बढ़ा देना होता है। देखा गया है कि विभिन्न प्रकार के प्राणायामों द्वारा एलविओलर वेन्टीलेशन की मात्रा दूनी से भी अधिक हो जाती है।
उपासना करने वालों को किसी साँसारिक संपदा का अभाव नहीं रहता।
उपासना को चमत्कृत बनाने का एक बहुत बड़ा कारण है। उद्देश्य हमेशा से ऊंचा रहे। उपासना हम किस काम के लिए करते हैं, हमेशा यह ध्यान बना रहा। पीड़ित मानव के ऊंचा उठने के लिए, देश धर्म, समाज और संस्कृति को समुन्नत बनाने के लिए हम उपासना करते हैं, अनुष्ठान करते हैं। भगवान की प्रार्थना करते हैं।
उपासना का अर्थ हैं - जैसा ईश्वर महान है वैसे ही महान बनने की हम कोशिश करें। हम अपने आप को भगवान में मिलाये। यह विराट विश्व भगवान का ही रूप है, हम उसकी सेवा करें, सहायता करें और इस विश्व उद्यान को समुन्नत बनाने की कोशिश करें, क्योंकि हर जगह भगवान समाया हुआ है। सर्वत्र भगवान विद्यमान है। यह भावना रखने से ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु ‘ की भावना मन में पैदा होती है।
उपासना के लिए एक अनिवार्य शर्त यह है सच्चे भाव से चित लगाकर कि जाय 1 आजकल जिस जिस प्रकार बहुसंख्यक कहलाने वाले व्यक्ति दुनिया का दिखाने के लिए अथवा एक रस्म पूरी करने के लिए मंदिर में जाकर पूरी कर लेते हैं और नियम को पुरा करने के लिए एकाध माला भी जप लेते हैं उससे किसी बड़े सुफल कि आशा नहीं की जा सकती उपासना और साधन तो तभी सच्ची मानी जा सकती है जब कि मनुष्य उस समय समस्त सांसारिक विषयों और आस पास की बातों को भूलकर प्रभु को के ध्यान में निमग्न हो जाए जब मनुष्य इस प्रकार की संलग्नता और एकाग्रता में अपने इष्टदेव की उपासना करता है तभी वह अध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर हो सकता है और तभी वह दैवी कृपा का लाभ प्राप्त कर सकता है इसी तथ्य को समझने के लिए वेदों में बतलाया गया है की जब मनुष्य हृदय और आत्मा से सोम का अभिसव (परमात्मा की उपासना) करता है तव उसे स्वयमेव ईश्वरीय तेज के दर्शन होने लगते हैं और परमात्मा की कृपा अपने चारों तरफ से मेह की तरह बरसती जान पड़ती है संसार में जीवन निर्वाह करते हुए एक साधारण मनुष्य को अनेक विघ्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है विपरीत परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है विरोधियों के साथ संघर्ष करना पड़ता है और लोगों की भली बुरी सब प्रकार की आलोचना को सहन करना पड़ता है इससे उसके जीवन में स्वभावतः उद्वेग अशाँति भय क्रोध आदि के अवसर आते हैं ऐसा मनुष्य अपने कष्टों के निवारणार्थ और मन और आत्मा की शाँति के लिए परमात्मा का आश्रय ग्रहण करता है। मन, वचन और कर्म से उसकी उपासना में संलग्न रहता है। तो उसकी अनास्था में परिवर्तन होने लगता है। जब साधनों में अग्रसर होकर वह अपने चारों आरे परमात्मा शक्ति की क्रीड़ा अनुभव करता है और वह समझने लगता है कि संसार में जो कुछ हो रहा हैं वह उस प्रभू की प्रेरणा और इच्छा का फल हैं तथा वह जो कुछ करता है उसका अंतिम परिणाम जीव के लिए शुभ होता है, चाहे वह तत्काल उसे न समझ सके, तब उसकी व्याकुलता और अशाँति दूर होने लगती हैं और उसे ऐसा अनुभव होता है मानो ग्रीष्म ऋतु में व्यथित श्राँत क्लाँत व्यक्ति को शीतल और शाँति दायक वर्षा ऋतु प्राप्त हो गयी। मनुष्यों को अपनी भिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए तरह तरह की साधनाएँ निकाली हैं।
उपासना अनुभव यही हैं कि गायत्री मंत्र के बारे में जो तीन बातें कही जाती है पूर्णतः सही है। गायत्री को कामधेनु कहा जाता है यह सही है। गायत्री को कल्पवृक्ष कहा जाता है यह सही है। , गायत्री को पारस कहा जाता है, इसको छूकर के लोहा सोना बन जाता है यह सही है। गायत्री को अमृत कहा जाता है, जिसको पीकर के अजर अमर हो जाते हैं, यह भी सही है।
उपासना से जो भी लाभ यथा आरोग्य, प्राण बल, धन-संपत्ति, पुत्र और अपनी महत्वाकाँक्षाएँ आदि पूर्ण होती है। उसकी शक्ति अथवा प्रेरणा सूर्यमण्डल से आती है। किसी भी मंत्र का जब उच्चारण किया जाता है तब वह विशेष गति से आकाश के परमाणुओं ईथर आदि के बीच बढ़ता हुआ उस देवता या शक्ति केन्द्र तक पहुँचता है। जिसका संबंध उस मंत्र से होता है। मंत्र जप के समय आवश्यक ऊर्जा मनकी शक्ति के द्वारा प्राप्त होती है।
उपासना के ऊपर अटूट विश्वास हैं प्रगाढ़ निष्ठ और श्रद्धा हैं तो मेरा अब तक का अनुभव यह है कि उसको चमत्कार मिलना चाहिए ओर उसके लाभ सामने आने चाहिए। जिन लोगों ने श्रद्धा से विहीन उपासनाएँ की हैं, श्रद्धा से रहित मात्र कर्मकाण्ड सम्पन्न किये हैं, केवल जीभ की नोक से जप किये हैं और अँगुलियों की सहायता से मालायें घुमाई हैं, लेकिन मन में वह श्रद्धा न उत्पन्न कर सकें, विश्वास उत्पन्न न कर सकें, ऐसे लोग खाली रहेंगे। बहुत सारा जप करते हुए भी अगर अटूट श्रद्धा और विश्वास के साथ उपासनायें की जाय तो यह एक ही पहलू ऐसा हैं जिसके आधार पर हम सह आशा कर सकते हैं हमारे अच्छे परिणाम निकलने चाहिए, और उपासना का पूरा पूरा लाभ देना चाहिए। यह एक पक्ष हुआ।
उपासना की सार्थकता की परख करनी हो तो इन तीनों बातों को ध्यान में रखना पड़ेगा। जो हमने अभी निवेदन किया उच्चस्तरीय दृष्टिकोण, परिष्कृत व्यक्तित्व और अटूट श्रद्धा विश्वास। इन तीनों को मिला करके जो आदमी उपासना करेगा, निश्चयपूर्वक और विश्वासपूर्वक हम कह सकते हैं अध्यात्मिकता के तत्वज्ञान का जो कुछ भी महात्म्य बताया गया है - कि आदमी स्वयँ लाभान्वित होता है, सामर्थ्य बनता है, शक्तिशाली बनता है, शाँति पाता है। , स्वर्ग मुक्ति जैसा लाभ प्राप्त करता है और दूसरों की सेवा सहायता करने में समर्थ होता है सही है। गायत्री मंत्र के संबंध में हम आजीवन यही प्रयोग और परीक्षण करते रहें और पाया कि गायत्री मंत्र सही है, शक्ति मान है।
उपासना के कर्मकाण्डों के सिवाय अपने व्यक्तिगत जीवन को शालीन समुन्नत, श्रेष्ठ और परिष्कृत बनाने का प्रयत्न किया है। संयमी व्यक्ति, सदाचारी व्यक्ति जो भी जप करता है, उपासना करते हैं उनकी प्रत्येक उपासना सफल हो जाती है। दुराचारी आदमी, दुष्ट आदमी, नीच पापी और पत्ति आदमी भगवान का नाम लेकर यदि चाहे तो पार नहीं हो सकते। भगवान का नाम लेने का परिणाम यह होना चाहिए कि आदमी का व्यक्तित्व सही हो और वह शुद्ध बनें। अगर व्यक्ति को शुद्ध और समुन्नत बनने में राम नाम सफल नहीं हुआ तो तो जानना चाहिए कि उपासना कि विधि में बहुत भारी भूल रह गयी।
उपासना के साथ एक तथ्य यह जुड़ हुआ हैं कि अटूट श्रद्धा होनी चाहिए। श्रद्धा की एक अपने आप में शक्ति हैं। बहुत सारी शक्तियाँ हैं - जैसे बिजली की शक्ति, भाप की शक्ति हैं, आग की शक्ति हैं, उसी तरह श्रद्धा की एक शक्ति है। पत्थर में से देवता पैदा हो जाते हैं। झाड़ी में से भूत पैदा हो जाता है, रस्सी में से साँप हो जाता है।
उपासना का अगला चरण है-देवपूजन। देवत्व की प्रतीक कोई भी स्थापना की जा सकती है। गायत्री को माता के रूप में मान्यता देने वाले आद्यशक्ति की हंसारूढ़ छवियों का प्रयोग करते हैं। निराकारवादी सूर्य शक्ति में गायत्री मंत्र प्रतिध्वनित होने की भावना कर सकते हैं। जलती अगरबत्ती या दीपक की अग्नि को भी सूर्य का अग्निहोत्र का, प्रतीक माना जा सकता है।
उपासना सफल हो जाती है। दुराचारी आदमी, दुष्ट आदमी, नीच पापी और पत्ति आदमी भगवान का नाम लेकर यदि चाहे तो पार नहीं हो सकते। भगवान का नाम लेने का परिणाम यह होना चाहिए कि आदमी का व्यक्तित्व सही हो और वह शुद्ध बनें। अगर व्यक्ति को शुद्ध और समुन्नत बनने में राम नाम सफल नहीं हुआ तो तो जानना चाहिए कि उपासना कि विधि में बहुत भारी भूल रह गयी। और नाम के साथ काम करने वाली बात को भुला दिया गया।
उपासनायें की जाय तो यह एक ही पहलू ऐसा हैं जिसके आधार पर हम सह आशा कर सकते हैं हमारे अच्छे परिणाम निकलने चाहिए, और उपासना का पूरा पूरा लाभ देना चाहिए। यह एक पक्ष हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-December
उपासना या योग द्वारा आत्मा और परमात्मा का मिलन होने पर गुँथ जाने पर जीव में दैवी गुणों की तीव्रगति से अभिवृद्धि होने लगती है।
उपासना दोनों का ही अर्थ है, आत्मा को परमात्मा से जोड़ देना। इससे परमात्मा की विशेषतायें मनुष्य में प्रवाहित होने लगती हैं, किंतु दोनों के बीच में यदि कोई व्यवधान रख दिया जाय तो प्रवाह रुक जायगा और मनुष्य को श्रेष्ठता प्राप्त नहीं होगी। जिस प्रकार आग के पास आने पर ठंडा लोहा ऊष्मा प्राप्त करता है, पर यदि आग और उसके बीच लकड़ी का एक पटला रख दिया जाय तो लोहा आग की गरमी से वंचित रह जायगा। उसी प्रकार जब उपासना की विधि में आत्मा और परमात्मा के बीच कामनाओं का व्यवधान डाल दिया जाता है तो साधक परमात्मा को ग्रहण करने से वंचित रह जाता है। जिन उपासकों में परमात्मा के लक्षण संकलित होते दिखाई न दें, समझ लेना चाहिए कि उसकी आत्मा और परमात्मा के बीच कामनाओं, वाँछनाओं का व्यवधान पड़ा हुआ है और जब तक यह व्यवधान हटाया नहीं जायगा, उपासना का वास्तविक फल प्राप्त होना संभव नहीं।
उपासना का वास्तविक फल प्राप्त होना संभव नहीं। अधिकांश पूजा पाठ तथा चंदन-वंदन करने वाले उपासना नहीं उपासना का आडंबर ही किया करते हैं। या तो उसके आधार पर उन्हें अपना महत्व प्रदर्शन करने का भाव घेरे रहता है अथवा उनकी उपासना का लक्ष्य किसी कामना की पूर्ति रहता है, परमात्मतत्त्व की प्राप्ति नहीं। यही कारण है कि एक पुजारी आजीवन तक मंदिर में पूजा आरती करता रहता है, किंतु उसे वह फल नहीं मिलता जो उपासना के परिणाम स्वरूप मिलना चाहिए।
उपासना से असीम शाँति मिलती है। कूड़े से जीवन में मणि-मुक्ता की-सी ज्योति झिलमिलाने लगती है, मन-वाणी-चित्त अलौकिक स्फूर्ति से भर जाते हैं। साधक को रस मिलने लगता है। तो मेघ भी अधिकांश समय उसी में लगाते। किंतु भगवान् बुद्ध की दृष्टि अत्यंत तीखी थी।
उपासना या योग साधना करने वाले में यही विशेषतायें अवतरित होती हैं। अपने भाई-बहिनों के प्रति-प्राणिमात्र के प्रति अनंत करुणा और आत्मीयता की भावनायें उपासक के अंतःकरण में उद्भूत होती हैं। संपूर्ण विश्व ही उसे अपने आत्म स्वरूप में दिखाई देने लगता है। उनको चरितार्थ करके वह अपने जीवन को यशस्वी बनाता है और अपने अंतःकरण में धारण किये रहकर अनंत शाँति का अनुभव करता है। ऋद्धि-सिद्धियाँ भी उसकी अनुगामिनी बन कर रहती हैं।
उपासना में रस स्वाभाविक है,किंतु यदि आत्मोत्कर्ष की निष्ठा न रही, तो मेघ का मन उचट जायेगा, अतएव उसकी निष्ठा को सुदृढ़ कराने वाले तप की आवश्यकता है। सो वे मेघ को बार-बार उधर धकेलने लगे।
उपासना के परिणाम स्वरूप मिलना चाहिए।
उपासना का प्रतिफल है-श्रेष्ठताओं की वृद्धि। चूँकि परमात्मा समस्त श्रेष्ठताओं का केन्द्र है, उसका सान्निध्य आत्मा को दिन-दिन उत्कृष्ट बनाता चलता है। भक्त को अपना भगवान सब में दिखाई पड़ता है, इसलिए वह हर किसी की अच्छाइयाँ देखता है और उनकी चर्चा एवं विचारणा करते हुए अपने आनंद और दूसरों के सद्भाव को बढ़ाता है। निंदा और ईर्ष्या असुरता के दो प्रधान अस्त्र हैं। इनका प्रयोग उसी पर किया जा सकता है जिसके प्रति परायेपन का शत्रुता का भाव रहे।
उपासना और योग के नाम से जाना जाता है। इस उपचार, उपक्रम द्वारा परमात्मा के जितने ही समीप हम पहुँचते हैं उतनी ही श्रेष्ठतायें हमारे अंतःकरण में उपजती तथा बढ़ती हैं। उसी अनुपात से आँतरिक शाँति की भी उपलब्धि होती चलती है। जिस तरह हिमालय की ठंडी-हवायें उन लोगों को अधिक शीतलता प्रदान करती हैं जो उस क्षेत्र में रहते हैं। इसी प्रकार आग की भट्टियों के समीप काम करने वालों को अधिक गर्मी अनुभव होती है।
उपासना का आडंबर ही किया करते हैं। या तो उसके आधार पर उन्हें अपना महत्व प्रदर्शन करने का भाव घेरे रहता है अथवा उनकी उपासना का लक्ष्य किसी कामना की पूर्ति रहता है, परमात्मतत्त्व की प्राप्ति नहीं। यही कारण है कि एक पुजारी आजीवन तक मंदिर में पूजा आरती करता रहता है, किंतु उसे वह फल नहीं मिलता जो उपासना के परिणाम स्वरूप मिलना चाहिए।
उपासना और यज्ञ हमारा आध्यात्मिक नित्य कर्म है और होना ही चाहिए। बड़े यज्ञ कभी-कभी होते थे। उनमें बड़ी समस्याओं का समाधान करने के लिए राजनीतिक समस्याओं का समाधान करने के लिए, बड़ी जन-गोष्ठियाँ होती थीं। इनमें राजनीतिज्ञ, समाज विज्ञानी, तथा समाज पर अधिकार प्रभाव रखने वाले श्रेष्ठजन जमा होते थे और सामाजिक समस्याओं, आर्थिक समस्याओं एवं अन्यान्य समस्याओं का मिलजुल कर समाधान खोजते थे। इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता था, वरन् उसे कहा जाता था कि आपको ऐसा मानना चाहिए और कानून बनाना चाहिए।
उपासना हो सकती है। साधारण वस्तुयें तक अपनी विशेषताओं की छाप दूसरों पर छोड़ती हैं, तो परमात्मा के समीप बैठने वालों पर उन दैवी विशेषताओं का प्रभाव क्यों न पड़ेगा ? जब पुष्पवाटिका में जाते ही फूलों की सुगंध से चित्त प्रसन्न हो उठता है। चंदन के वृक्ष अपने समीपवर्ती वृक्षों को सुगंधित बनाते हैं। सज्जनों के सत्संग से साधारण व्यक्तियों की मनोभावनाएँ सुधरती हैं, फिर परमात्मा अपनी महत्ता की छाप उन लोगों पर क्यों न छोड़ेगा जो उसकी समीपता के लिए प्रयत्नशील हैं।
उपासना नहीं उपासना का आडंबर ही किया करते हैं। या तो उसके आधार पर उन्हें अपना महत्व प्रदर्शन करने का भाव घेरे रहता है अथवा उनकी उपासना का लक्ष्य किसी कामना की पूर्ति रहता है, परमात्मतत्त्व की प्राप्ति नहीं। यही कारण है कि एक पुजारी आजीवन तक मंदिर में पूजा आरती करता रहता है, किंतु उसे वह फल नहीं मिलता जो उपासना के परिणाम स्वरूप मिलना चाहिए।
उपासना तो उसका एक अंग मात्र है।” मेघ की आँखें खुल गई और वे एक सच्चे योद्धा की भाँति मन से लड़ने को चल पड़े।
उपासना का लक्ष्य किसी कामना की पूर्ति रहता है, परमात्मतत्त्व की प्राप्ति नहीं। यही कारण है कि एक पुजारी आजीवन तक मंदिर में पूजा आरती करता रहता है, किंतु उसे वह फल नहीं मिलता जो उपासना के परिणाम स्वरूप मिलना चाहिए।
उपासना की विधि में आत्मा और परमात्मा के बीच कामनाओं का व्यवधान डाल दिया जाता है तो साधक परमात्मा को ग्रहण करने से वंचित रह जाता है। जिन उपासकों में परमात्मा के लक्षण संकलित होते दिखाई न दें, समझ लेना चाहिए कि उसकी आत्मा और परमात्मा के बीच कामनाओं, वाँछनाओं का व्यवधान पड़ा हुआ है और जब तक यह व्यवधान हटाया नहीं जायगा, उपासना का वास्तविक फल प्राप्त होना संभव नहीं। अधिकांश पूजा पाठ तथा चंदन-वंदन करने वाले उपासना नहीं उपासना का आडंबर ही किया करते हैं। या तो उसके आधार पर उन्हें अपना महत्व प्रदर्शन करने का भाव घेरे रहता है अथवा उनकी उपासना का लक्ष्य किसी कामना की पूर्ति रहता है, परमात्मतत्त्व की प्राप्ति नहीं। यही कारण है कि एक पुजारी आजीवन तक मंदिर में पूजा आरती करता रहता है, किंतु उसे वह फल नहीं मिलता जो उपासना के परिणाम स्वरूप मिलना चाहिए।
उपासना का अर्थ है-पास बैठना निकट होना (उप=निकट, अस=होना, रहना) परमात्मा के पास बैठने से ही उपासना हो सकती है। साधारण वस्तुयें तक अपनी विशेषताओं की छाप दूसरों पर छोड़ती हैं, तो परमात्मा के समीप बैठने वालों पर उन दैवी विशेषताओं का प्रभाव क्यों न पड़ेगा ? जब पुष्पवाटिका में जाते ही फूलों की सुगंध से चित्त प्रसन्न हो उठता है। चंदन के वृक्ष अपने समीपवर्ती वृक्षों को सुगंधित बनाते हैं। सज्जनों के सत्संग से साधारण व्यक्तियों की मनोभावनाएँ सुधरती हैं, फिर परमात्मा अपनी महत्ता की छाप उन लोगों पर क्यों न छोड़ेगा जो उसकी समीपता के लिए प्रयत्नशील हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-April
उपासना करते हैं, लेकिन ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ किसी के पास नहीं आती। जप कर लेते हैं और लोगों से बता देते हैं कि हमने गायत्री का जप कर लिया है, लेकिन न ऋद्धि न सिद्धि। हम तो तुम्हें इस तरह की गायत्री बताना चाहते हैं जिसमें ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ भी मिलें और इस जप से ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होने का लाभ भी मिले। हमने कहा-यह तो बड़े सौभाग्य की बात है। आप इतनी अच्छी बात बतायेंगे-इससे अधिक अच्छा और सौभाग्य हमारे लिए क्या हो सकता है?
उपासना के जब 24 साल से भी अधिक हो गये, उसके बाद भी बोने और काटने का यह सिलसिला बराबर चलता रहा। आप लोग भी अगर बोये तो आप भी सिद्धियाँ पायेंगे-ऋद्धियाँ पायेंगे जैसे कि मैंने पा ली। भगवान के नियम सबके लिए समान हैं। सूरज के लिए सब आदमी एक समान हैं। जो नियम हमारे ऊपर लागू हुए हैं वही आपके ऊपर भी लागू हो सकते हैं।
उपासना करने लगे। इसी पर्वत पर एक और महात्मा रहा करते थे।
उपासना, जप, ध्यान के साथ उनकी दिनचर्या आरंभ होती। इसके बाद वे अपने राज्य के दीन-दुखियों और अभाव ग्रस्तों को प्रतिदिन एक-एक स्वर्णमुद्रा बाँटते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-November
उपासना की परंपरा आरंभ कीजिए। सारे के सारे घरों का वातावरण बनाने के लिए, ताकि कोई देवात्मा यदि जन्म लेने के इच्छुक होँ तो मौका मिल सके।
उपासना पद्धति है जिसे मैं फिर कभी समझा दूँगा कि दोनोँ उपासनायें एक प्रातःकाल की और दूसरी रात्रि को सोते समय कैसे करनी चाहिए?
उपासना स्वर विज्ञान के हिसाब से अद्भुत सामर्थ्य उत्पन्न करती है। इसलिये हम कहते रहते हैं कि गायत्री मंत्र एक साथ बोलिये। मंत्र एक साथ बोले जाते हैं। स्वर एक साथ होने चाहिए। हवन में भी हम साथ बोलने पर जोर देते रहते हैं।
उपासना में बड़ी शक्ति है। एक समय पर एक मन से एकाग्र होकर की गयी उपासना स्वर विज्ञान के हिसाब से अद्भुत सामर्थ्य उत्पन्न करती है। इसलिये हम कहते रहते हैं कि गायत्री मंत्र एक साथ बोलिये। मंत्र एक साथ बोले जाते हैं। स्वर एक साथ होने चाहिए।
उपासना है और दूसरी सामूहिक। यह हमारे पंचवर्षीय योजना के आध्यात्मिक प्रयोग है। भौतिक और रचनात्मक प्रयोग अलग है जो अपने स्थान पर चलते रहेंगे।
उपासना, देवसत्ता एवं क्रियाकृत्य पर अटूट श्रद्धा और अडिग विश्वास हो, उसका प्रतिफल भी चमत्कारी होगा। किंतु यदि अन्यमनस्कता, उपेक्षापूर्वक, बेगार भुगतने, लकीर पीटने की तरह उसे किसी तरह निबाहते रहा जाये तो वही मंत्र एक प्रकार से निष्फल, निरर्थक जैसा बन जाएगा नाम मात्र का प्रतिफल ही उससे दृष्टिगोचर होगा।
उपासना कौन सी है?मुझे बहुत भला लगा। यह बात औरों की भी जानने की है। जो दूसरों की भलाई में निरत रहता है। वह भगवान की ही भक्ति करता है।
उपासना नहीं है। यह सरल है, उत्तम है और सुखदायक भी। परोपकार करने में आत्मा की प्रसन्नता इतनी बढ़ जाती है कि रोमाँच हो जाता है तो फिर उसका फल तो और भी स्वर्गीय सुखों से भरा हुआ होगा। भलाई साक्षात् परमात्मा का निराकार रूप है। -समर्थ गुरु रामदास
उपासना, साधना, और आराधना का उपक्रम भी बिठाती चली गयी। फलतः आरोग्य लाभ भी हस्तगत हुआ।
उपासनायें एक प्रातःकाल की और दूसरी रात्रि को सोते समय कैसे करनी चाहिए?
उपासना की, आरतियों की, पंचयज्ञों की, गायत्री माता को प्रणाम करने की न्यूनतम उपासना की परंपरा आरंभ कीजिए। सारे के सारे घरों का वातावरण बनाने के लिए, ताकि कोई देवात्मा यदि जन्म लेने के इच्छुक होँ तो मौका मिल सके।
उपासना का वह फल होता है, जैसे कि लोहे के बड़े पुलों पर से होकर जब कभी सिपाही चलते हैं तो कदम मिलाकर लेफ्ट-राइट चलने से उन्हें मनाकर दिया जाता है, क्योंकि उससे पुल टूटने का खतरा रहता है। आप लोग सामूहिक रूप से साथ एक ही समय एक सी ध्वनि, एक ताल-लय एक नाद का उपयोग कर सकें तो स्वर विद्युत का एक बहुत बड़ा आधार विनिर्मित होगा और वातावरण के संशोधन का प्रयोजन पूरा करेगा। इस तरह एक व्यक्तिगत उपासना है और दूसरी सामूहिक। यह हमारे पंचवर्षीय योजना के आध्यात्मिक प्रयोग है। भौतिक और रचनात्मक प्रयोग अलग है जो अपने स्थान पर चलते रहेंगे।
उपासना पूरी हो जाती है। मंत्र उपचार में जहाँ शक्ति का महत्व है, वहाँ उसके प्रयोक्ता का स्तर भी आवश्यक है। बारूद, गोली, कारतूस अपनी जगह अपना काम करते हैं, इस पर भी बन्दूक का अपना स्तर है। बढ़िया बन्दूकें सही और लंबा निशाना लगाती हैं, जबकि गाँव के लुहारों द्वारा बनाये हुए तमंचे उतना काम नहीं कर पाते। इसलिए मंत्र का उपयुक्त चुनाव करना तो आवश्यक है ही, पर इससे भी अधिक आवश्यकता इस बात की है कि प्रयोक्ता ने अपना स्तर पवित्र और प्रखर बना लिया हो।
उपासना मुख्य है। सामूहिक उपासना में बड़ी शक्ति है। एक समय पर एक मन से एकाग्र होकर की गयी उपासना स्वर विज्ञान के हिसाब से अद्भुत सामर्थ्य उत्पन्न करती है। इसलिये हम कहते रहते हैं कि गायत्री मंत्र एक साथ बोलिये। मंत्र एक साथ बोले जाते हैं।
उपासना की समग्रता समझ बैठते हैं और जब कोई सत्परिणाम हाथ नहीं लगता तो उसकी निरर्थकता की शिकायत करते हैं। इन दिनों आस्तिकता पर दुहरी मार पड़ रही हैं। एक ओर विज्ञान और बुद्धिवाद ईश्वरीय सत्ता को प्रत्यक्ष न देख पाने से उसकी सत्ता को अस्वीकार करता है। अधिक से अधिक यह मानता है कि प्रकृति या ‘इकॉलाजी’ संदर्भ किसी प्रकार पदार्थ और प्राणी समुदाय का व्यवस्था - परक संतुलन बिठाये हुए है। इसमें भक्ति, करुणा, अनुकंपा जैसा कोई तत्व नहीं है और न कर्म फल सिद्धान्त कसौटी पर खरा उतरता है।
उपासना के फलस्वरूप अनेक प्रकार के कष्टों से छुटकारा पाते और अनेक सुविधायें उपलब्ध करते हुए देखकर हमें यही अनुमान लगाना चाहिए कि उस मंत्र जप में ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों का समावेश अवश्य है जिनके कारण उपासक की अंतः भूमि में आवश्यक हेरफेर होते हैं और वह असफलताओं एवं शोक -संतापों पर विजय प्राप्त करते हुए तेजी से समुन्नत समर्थ एवं सफल जीवन की ओर अग्रसर होता है।
उपासना जो बहुत सरल है, आन पहली जनवरी से चाहे तो कर सकते हैं। इसके लिए आपको नित्य प्रातःकाल साढ़े चार बजे साँस के रूप में उस प्राण को खींचना है। हम भी प्रातःकाल उस प्राण रूपी माँ के दूध को पीते हैं, शक्तियाँ आ जाती है। दिन भर हम उछलते रहते हैं, फुदकते रहते हैं। आप लोगों को जाग्रत आत्माओं को दूध को जो प्रातःकाल प्राणाधार के रूप में आता है, ग्रहण करना चाहिए और रात्रि को सोते समय वातावरण में उसे तीर कमान की तरह इस तरीके से छोड़ना चाहिए कि इस वातावरण को संशोधित करने में मदद कर सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-May
उपासना की कि आपको लाभ मिला या नहीं, परन्तु हमारी नीयत दूसरी ही रही है। हमने पाने का कभी विचार ही नहीं किया। शुरू के दिन से आखिरी दिन तक हमने केवल देने का ही विचार किया है। आपने किस स्तर की उपासना की है? हमने दधिचि जैसे स्तर की उपासना की है।
उपासना एक है-समर्पण की, श्रद्धा की, हमने नाले की तरीके से अपने आपको नदी के साथ में मिला दिया है और उसमें मिल जाने की वजह से हमारी हैसियत, हमारी औकात, हमारी शक्ति और हमारा स्वरूप नदी जैसा बन गया है। आप भी अपने आपको मिलाइये न और भगवान से कहिए न कि आप हुकुम कीजिए-आज्ञा कीजिए और हम चलेंगे। हमारी उपासना हमारे ऊपर इसी रूप में छायी रही है। उपासना की निष्ठा को जीवन में हमने उसी तरीके से घोलकर रखा है जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति निष्ठावान रहती है और कहती है-”सपनेहु आप पुरुष जग नाही।” आपके पूजा की चौकी पर तो कितने बैठे हुए हैं।
उपासना मैंने इसी ढंग से की है। हमने सिर्फ एक काम किया है-अपने आपको धोया है, अपने आपके ऊपर पॉलिश की है और अपने आपको रगड़ करके तेज चाकू की तरीके से बना दिया है कि जहाँ कहीं भी मारेंगे चीरता हुआ चला जायेगा। यह है हमारा व्यक्तित्व और आप तो उलटा चलते हैं। पूजा उपासना को जीवन से दूर रखना चाहते हैं। बिजली के पॉजिटिव और निगेटिव दोनों तारों को अलग-अलग रखना चाहते हैं तो उनके अंदर करेण्ट कैसे आयेगा।
उपासना कहते हैं नजदीक आने को। लकड़ी और आग जब नजदीक आ जाते हैं तब लकड़ी आग हो जाती है। हमने अपने आपको भगवान् के लिए समर्पित किया है और कहा है कि हमारी शक्तियाँ आपकी हैं। हमारा धन आपका है। हमारी अकल आपकी है।
उपासना इसी चीज का नाम है और कोई उपासना नहीं होती यह विशुद्ध रूप से विचारपरक है, भावनापरक है, आस्थापरक है, निष्ठापरक है और श्रद्धा परक है। हमारी उपासना एक है-समर्पण की, श्रद्धा की, हमने नाले की तरीके से अपने आपको नदी के साथ में मिला दिया है और उसमें मिल जाने की वजह से हमारी हैसियत, हमारी औकात, हमारी शक्ति और हमारा स्वरूप नदी जैसा बन गया है। आप भी अपने आपको मिलाइये न और भगवान से कहिए न कि आप हुकुम कीजिए-आज्ञा कीजिए और हम चलेंगे। हमारी उपासना हमारे ऊपर इसी रूप में छायी रही है। उपासना की निष्ठा को जीवन में हमने उसी तरीके से घोलकर रखा है जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति निष्ठावान रहती है और कहती है-”सपनेहु आप पुरुष जग नाही।
उपासना भी बड़ी उपयोगी है क्योंकि उसमें कहा गया है कि हम इस ब्रह्मांड का सृजन करने वाले परम्-तत्व का ध्यान करते हैं, वह हमारे मन को-अन्तःकरण को प्रकाशित करें।” पवित्रता, ओज, गहनता, माधुर्य, हृदयंगमता, प्रसाद पूर्णता की दृष्टि से वेद की ऋचाएँ अद्वितीय है। उनमें गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ है इस मंत्र के जप से मनुष्य का मन शान्त ही नहीं होता वरन् उसके महान तेज से उसका हृदय भी प्रकाशित होता है। यह एक जीवित मंत्र है।
उपासना की है? हमने दधिचि जैसे स्तर की उपासना की है। हमने कमाया तो था, लेकिन देवताओं से कहा-’कुछ हमारे पास है। आप दुनिया को देते हैं तो कुछ हमसे भी लेते जाइये।’ ऐसे इनसान होते भी रहे हैं और हर अध्यात्मवेत्ता का स्तर यही होना चाहिए।
उपासना का दूसरा स्वरूप है-साधना। साधना अपने आपको करने को कहते है। हमने अपने आपको कितना कसा है, शरीर को, इन्द्रियों को कितना कसा है। अपने व्यवहार को कितना कसा है। अपनी इच्छा-आकाँक्षाओं और महत्वाकाँक्षाओं को चूरा करके फेंक दिया है।
उपासना करता रहा और सिर्फ जौ की रोटी और छाछ खाता रहा अपनी जीभ को धोते रहने के लिए। इसलिए कि जिस जीभ से मुझे मंत्रों का उच्चारण करना है, आशीर्वाद देने है, उपदेश देने है, लोगों को सलाह देनी है उस जीभ को जरा पैनी तो कर लूँ, फौलाद की तो बना लूँ। इसलिए मैंने अपनी जीभ से जद्दोजेहद की है। हमने प्रत्येक के ऊपर संयम किया है हमने समय के ऊपर, विचारों के ऊपर और अपने पैसे के ऊपर संयम किया है। हमने किसी का खाया नहीं-खिलाया है।
उपासना से बचे समय में धर्मग्रन्थों का स्वाध्याय, चिन्तन मनन यह साधना की प्रारंभिक आवश्यकताएँ हैं, शिखिध्वज! आज तुम्हारी मंत्र दीक्षा संपन्न हुई। पूजन की सामग्री उपयुक्त पात्र, कुश आसन यह अपने पास रखने होंगे। पंचोपचार पूजन सहित मंत्र जप करते हुए शुभ ज्योति स्वरूप निराकार गायत्री का ध्यान करना। जब तुम इस प्रारंभिक साधना को सफलतापूर्वक पूरा कर लोगे, तो आगे उच्चस्तरीय साधना के लिए तुम्हें अग्नि दीक्षा भी देंगे।’ यह कहते हुए महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए।
उपासना के लिए अपने हर एक साँस को, हर एक चप्पे को, योग्यता के हर एक कण को मैंने नियोजित कर दिया। हमने भगवान की महत्ता को समझने की कोशिश की और उसने हमको गायत्री के नजदीक ला दिया। आप तो लाखों मील दूर हैं इसलिए कि आपने केवल सुना है और कृत्यों को किया है, अतः निराश नहीं रहेंगे तो क्या करेंगे। लेकिन हमको-पूरी तरीके से सच्चे मन से हजार बार कहने की हिम्मत पड़ती है कि गायत्री शक्तिवान है, सामर्थ्यवान है और चमत्कारी है। गायत्री में वह सब कुछ है जिसके बारे में बताया गया है।
उपासना है हमारी जिसने हमारी अन्तरात्मा को भक्ति से भर दिया है। भक्ति कहते हैं समर्पण को। इसी को ‘अद्वैत’ कहते हैं, ‘एकत्व’ कहते हैं।
उपासना हमारे ऊपर इसी रूप में छायी रही है। उपासना की निष्ठा को जीवन में हमने उसी तरीके से घोलकर रखा है जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति निष्ठावान रहती है और कहती है-”सपनेहु आप पुरुष जग नाही।” आपके पूजा की चौकी पर तो कितने बैठे हुए हैं। ऐसी निष्ठा होती है कोई? एक से श्रद्धा नहीं बनेगी क्या?
उपासना इसी को कहते हैं जिसमें समर्पण की भावना हो-माँगने की नहीं देने की भावना हो। जवान औरत आती है और अपना ईमान, अपना मन, अपनी भावना, अपना शरीर, अपना गोत्र, वंश सब पति के हाथ पर रख देती है। हमने भी सब कुछ रख दिया है अपने पति के हाथ पर और कहा है कि हम आपके हैं और आपके होकर के रहेंगे। आपके अलावा हमारा कौन है और हम किसके-नजदीक जायेंगे। किसका पल्ला पकड़ेंगे।
उपासना इसी रूप में की। जप-तप, हवन-व्रत उपवास आदि तप-तितिक्षाओं के द्वारा उन्होंने अपना अन्तःकरण निताँत शुद्ध कर लिया। शास्त्र अनुशीलन और वेदों की शोध में अपने जीवन का एक-एक क्षण घुला दिया। शेष संसार से संबंध टूट गया। आत्मसाक्षात्कार की इस साधना में उसने रात-दिन एक कर दिए।
उपासना में लगा दिया है। यह है चमत्कारों के स्रोत। आप इसको सुनना, नोट करके रखना और जहाँ तक संभव हो सके वहाँ तक चलना। भागना नहीं आता दौड़ना नहीं आता तो छोटे बच्चे की तरीके से दीवाल पकड़ कर गाड़ी के सहारे चलना सीखिये-एक कदम आगे बढ़िये। लोभ, मोह की हथकड़ी और बेड़ी को-जिसने आपको मजबूती से जकड़ रखा है-छोड़िये-थोड़ा ढीला करिये फिर देखिये आपको आगे बढ़ने का मौका मिलता है कि नहीं श्रेष्ठता की दिशा में, शालीनता की दृष्टि में, महानता की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाइये।
उपासना की निष्ठा को जीवन में हमने उसी तरीके से घोलकर रखा है जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति निष्ठावान रहती है और कहती है-”सपनेहु आप पुरुष जग नाही।” आपके पूजा की चौकी पर तो कितने बैठे हुए हैं। ऐसी निष्ठा होती है कोई? एक से श्रद्धा नहीं बनेगी क्या? मित्रों! हमारे भीतर श्रद्धा है।
उपासना में त्याग की बात सिखाई जाती है और आप भोग की बात कहते हैं। योग भावनात्मक है, क्रियापरक नहीं। योग में जहाँ लोभ और मोह के ऊपर अंकुश लगाना पड़ता है वहाँ आप उसी की पूर्ति करना चाहते हैं। आप उलटा चलते हैं। मैं आपके विचारों में क्राँति लाना चाहता हूँ न केवल आध्यात्मिक क्षेत्र में, वरन् सामाजिक क्षेत्र में व्यवस्था के क्षेत्र एवं भावनात्मक क्षेत्र में, वरन् सामाजिक क्षेत्र में, व्यवस्था के क्षेत्र एवं भावात्मक क्षेत्र में भी क्राँति लाना चाहता हूँ।
उपासना को जीवन से दूर रखना चाहते हैं। बिजली के पॉजिटिव और निगेटिव दोनों तारों को अलग-अलग रखना चाहते हैं तो उनके अंदर करेण्ट कैसे आयेगा। उपासना में त्याग की बात सिखाई जाती है और आप भोग की बात कहते हैं। योग भावनात्मक है, क्रियापरक नहीं। योग में जहाँ लोभ और मोह के ऊपर अंकुश लगाना पड़ता है वहाँ आप उसी की पूर्ति करना चाहते हैं।
उपासना की है, मस्तिष्क से साधना और शरीर से आराधना की है।
उपासना है, तप है और सेवा है। आपकी अन्तरात्मा को उछाल देने के लिए ही हमारी वाणी चलती है। जनता–जनार्दन को ऊँचा उछाल देने के लिए हमारी लेखनी चलती रहती है। हमारी गतिविधियों का चप्पा-चप्पा इसी के लिए चलता रहता है लोकहित के लिए जनता जनार्दन के लिए, सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन के लिए हम बराबर 12 घण्टे काम करते हैं। यह हमारी आराधना है, मसक्कत है।
उपासना नहीं होती यह विशुद्ध रूप से विचारपरक है, भावनापरक है, आस्थापरक है, निष्ठापरक है और श्रद्धा परक है। हमारी उपासना एक है-समर्पण की, श्रद्धा की, हमने नाले की तरीके से अपने आपको नदी के साथ में मिला दिया है और उसमें मिल जाने की वजह से हमारी हैसियत, हमारी औकात, हमारी शक्ति और हमारा स्वरूप नदी जैसा बन गया है। आप भी अपने आपको मिलाइये न और भगवान से कहिए न कि आप हुकुम कीजिए-आज्ञा कीजिए और हम चलेंगे। हमारी उपासना हमारे ऊपर इसी रूप में छायी रही है। उपासना की निष्ठा को जीवन में हमने उसी तरीके से घोलकर रखा है जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति निष्ठावान रहती है और कहती है-”सपनेहु आप पुरुष जग नाही।
उपासना की है। हमने कमाया तो था, लेकिन देवताओं से कहा-’कुछ हमारे पास है। आप दुनिया को देते हैं तो कुछ हमसे भी लेते जाइये।’ ऐसे इनसान होते भी रहे हैं और हर अध्यात्मवेत्ता का स्तर यही होना चाहिए। देवता केवल दिया ही नहीं करते, उन्हें भी जरूरत होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-July
उपासना करते हो? उन्होंने बताया “हाँ” हम तीनों की रक्षा करो।
उपासना-साधना शुरू की थी तब अपने घर से तप करने के लिए हिमालय पर गये थे। तप ओर पूजा-उपासना के साथ-साथ में कड़े नियम और व्रतों का पालन किया था। तब वे बहुत मेधावी थे लेकिन समय और परिस्थितियों के भटकाव में वे कहीं के मारे कहीं चले गये। भस्मासुर का क्या हो गया? मारीचि का क्या हो गया?
उपासना सामूहिक धर्मानुष्ठानों की अत्यधिक महत्ता बतायी जाती रही है। आश्वमेधिक पराक्रम इन दिनों अत्यधिक फलदायी व मानव मात्र के लिए हितकारी होते हैं। संधिवेला में यदि अनायास आ पड़ें इन सुयोगों का हम सभी लाभ उठा सकें तो निश्चित ही सौभाग्यशाली कहलाये जायेंगे।
उपासना के साथ-साथ में कड़े नियम और व्रतों का पालन किया था। तब वे बहुत मेधावी थे लेकिन समय और परिस्थितियों के भटकाव में वे कहीं के मारे कहीं चले गये। भस्मासुर का क्या हो गया? मारीचि का क्या हो गया? जिसके प्रलोभन सताते हैं वे भटक जाते हैं और कही के मारे कही चले जाते हैं।
उपासना करें तो इसके द्वारा हम और भी उत्तम एवं महत्वपूर्ण वस्तुयें प्राप्त कर सकते है।
उपासना का अभ्यास किया था, अष्टाँग योग की गम्भीरताओं में निमग्न हुए थे। पर लोकोपकार और आत्मतत्व की शोध में निरंतर व्यस्त रहने के कारण लौकिक संपत्ति न जुटा पाए थे। इसी कारण लोपामुद्रा की आकाँक्षा को पूरा करना उनके लिए चिन्ता का ही विषय था।
उपासना एवं प्राणायाम द्वारा भी उक्त उद्देश्य की पूर्ति काफी अंशों में की जा सकती है, पर संयम के अभाव और प्रमाद के प्रभाव में ये उपचार भी निराशाजनक ही सिद्ध होंगे और लकीर पीटने की परम्परा बन कर रद्द जायेंगे। रासायनिक प्रतिक्रियाओं में उत्प्रेरकों के प्रयोजन इसी स्तर के होते हैं। आयुर्वेद में यदि पथ्य-कुपथ्य का ध्यान न रक्षा गया, तो उपयुक्त औषधि भी कुछ करने में असमर्थ ही साबित होती है। अतः ध्यान-धारणा, उपासना जैसी आध्यात्मिक क्रियाओं की समग्रता तब बन पड़ती है, जब उनके साथ संयम का अनुपान भी संयुक्त हो। यदि उक्त प्रक्रिया का निष्ठापूर्वक परिपालन किया जाय, तो न हम सिर्फ स्वस्थ, सबल रह सकेंगे, वरन् उन लक्षणों के लिए भी प्रबल प्रतिरोध प्रमाणित होंगे, जिन्हें इन दिनों बुढ़ापा अथवा वार्धक्य के रूप में देखा-समझा जाता है।
उपासना करने में सदैव संलग्न रहता था। योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है, यह निर्विवाद है।
उपासना विधान के अनुसार की उपयोग किया जाय, तो शरीर और मन में भरी हुई अलौकिक शक्तियाँ अपने-अपने ढंग से अपने-अपने समय पर स्वयमेव उद्भूत होती जाती है। आध्यात्मिक गुणों की तेजी से अभिवृद्धि होती है, बुद्धि तीव्र होती है तथा ऐसी दूरदर्शिता का विकास होता है, जिसके आधार पर जीवन की समस्या की अनेक गुत्थियों को सरल किया जा सके।
उपासना जैसी आध्यात्मिक क्रियाओं की समग्रता तब बन पड़ती है, जब उनके साथ संयम का अनुपान भी संयुक्त हो। यदि उक्त प्रक्रिया का निष्ठापूर्वक परिपालन किया जाय, तो न हम सिर्फ स्वस्थ, सबल रह सकेंगे, वरन् उन लक्षणों के लिए भी प्रबल प्रतिरोध प्रमाणित होंगे, जिन्हें इन दिनों बुढ़ापा अथवा वार्धक्य के रूप में देखा-समझा जाता है।
उपासना है। हमारे पूर्वज कहते हैं परमात्मा बड़ा मंगल कारक है उसकी दृष्टि भी बड़ी मंगलमय है। यहाँ कष्ट और दुःख की कोई बात ही नहीं है, पर लोग अज्ञान-वश कष्ट भोगते और परमात्मा को दोषी ठहराते हैं। इसलिये इन मूढ़जनों से आत्मज्ञानी ही श्रेष्ठ है, जो परमात्मा की कलाकृति का अपने गुण कर्म और स्वभाव के द्वारा अनुमोदन करता है। आत्मज्ञानी ईश्वर के गुणानुवाद न गाये तो भी वह सच्चा ईश्वर भक्त ही माना जायेगा और परमात्मा भी उसे अपना प्यार दुलार अजस्र रूप में प्रदान करेगा।
उपासना, साधन यज्ञ के साथ ही होता है। प्रसूति गृह में अखंड अग्नि की स्थापना के साथ हिन्दू बालक का जन्म होता है और जीवन लीला समाप्त होने पर यज्ञ भगवान को अन्त्येष्टि के साथ शरीर सौंप दिया जाता है। यज्ञ को इतना महत्व ऋषियों ने इसलिये दिया था कि वह न केवल अनेकों भौतिक शक्तियों को देने वाला है, वरन् आत्मा का कल्याण करने वाला शरीर और मन को निर्मल, निर्विकार बनाकर शान्तिदायक परिस्थितियाँ उत्पन्न करने वाला भी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-January
उपासना हो सकती है? इस प्रश्न चिह्न के उत्तर में यही कह सकते है कि यज्ञोपवीत पहनना और गायत्री मंत्र जपना अधिक प्रशंसनीय है। इसे सोने में सुहागा मिलने पर अधिक चमक आने की तरह अच्छा मान जायगा। पर सुहागे के बिना सोने का कोई उपयोग ही नहीं है, ऐसी बात नहीं है। शिखा और सूत्र-दोनों भारतीय-संस्कृति के प्रतीक चिह्न हैं।
उपासना तो आदि शक्ति की ही उपासना है। फिर इसमें शक्ति स्वरूपा नारियों को वंचित रखना-किस प्रकार सम्भव है? माता और बेटी के बीच किसी प्रकार के प्रतिबन्ध हो ही नहीं सकते।
उपासना, साधना और आराधना कहते हैं। उपासना ईश्वर की, साधना अपनी और आराधना समाज की। इन्हीं तीनों का मिलन गंगा, यमुना, सरस्वती का मिलन त्रिवेणी संगम कहलाता है और उसका अवगाहन करने वाला हर दृष्टि से कृतकृत्य बनता है।
उपासना की गयी है। इतिहास-वेत्ताओं के अनुसार अकबर स्वयं सूर्य उपासक था। वह नित्य सूर्याभिमुख होकर सूर्य सहस्रनाम का पाठ करता और पूजन करता था। उसने एक आदेश निकाला था कि उसके राज्य में प्रातः, मध्याह्न, साँय एवं अर्धरात्रि को अर्थात् चार बार सूर्य की पूजा-आराधना होनी चाहिए। यूनान का सम्राट सिकन्दर भी सूर्य का उपासक था।
उपासना के सम्बन्ध में कई प्रकार की शंका-कुशंकाओं की, विधि-निषेधों की चर्चा होती रहती है। अक्सर यह सोचा जाता है कि उसके विधि-विधान में कोई गलती हो गई तो उससे अनिष्ट होगा। इसलिए लोग डरते हैं और यह जानना चाहते हैं कि कहीं कोई ऐसी चूक न हो जाय जिससे उन्हें लाभ के स्थान पर हानि उठानी पड़े। सही विधि के साथ हर काम करना उत्तम है। इसमें शोभा और सफलता दोनों की ही सम्भावना रहती है।
उपासना से जीवन पवित्र बनता, आत्मोन्नति होती और अमृतत्व की प्राप्ति होती है।
उपासना इसी को कहते हैं। उपासना का अर्थ यही होता है कि आप सिद्धान्तों के लिए अपने आपको समर्पित कर दें। श्रद्धा इसी का नाम है। समर्पण इसी का नाम है। गीता ने बार-बार यही कहा है- ”मरुयेव मन आधत्रुस्व मयि बुद्धिं निवेशय।
उपासना की प्रेरणा देने का कार्य करने वालों को यह प्रशस्ति पत्र दिया जायेगा।
उपासना इसी का नाम है। अनुष्ठन इसी का नाम है। जप इसी का नाम है, भगवान के ऊपर डोरे डालने का नाम नहीं है; खुशामदें करने का नाम नहीं है।
उपासना या आराधना करने वाले मनुष्य जो कुछ सामग्री सूर्य के लिए अर्पित करते हैं, भगवान भास्कर उन्हें लाख गुना करके वापस लौटा देते है। सौर सम्प्रदाय के अनुयायी एवं गायत्री महाशक्ति के उपासक अभी भी सूर्य की आराधना उसके तीन रूपों में करते हैं। सूर्योदय के समय ब्रह्म और उसकी शक्ति के रूप में, मध्याह्न में महेश्वर रूप में एवं सूर्यास्त के समय विष्णु-रूप में उपासना करते हैं। सूर्य अनुपम कल्पना शक्ति वाले, सिद्धि के प्रेरक, सबको कर्म की प्रेरणा देने वाले एवं बुद्धि प्रदाता है। उनके इस स्वरूप का वर्णन यजुर्वेद में बहुत से सुँदर ढंग से किया गया है।
उपासना से अभीष्ट की पूर्ति होती है। शास्त्रों में इसके अनेकों प्रमाण मिलते हैं। भगवान राम द्वारा रावण पर विजय एवं साम्ब का कुष्ठ रोग से मुक्त होना सूर्योपासना की इतिहास प्रसिद्ध घटनायें हैं। सूर्य आराधना से पुत्र प्राप्ति का उल्लेख करते हुए महाभारत में कहा गया है कि महारथी कर्ण का कवच कुण्डल सहित जन्म माता कुँती के गर्भ से उनके द्वारा की गयी सूर्य आराधना का ही प्रतिफल था। महाराजा अश्वपति ने सूर्य की उपासना करके सती सावित्री को अपनी कन्या के रूप में पाया था।
उपासनाओं के लिए अन्य इष्टदेवों का भी निर्धारण हो सकता है, पर उन सब प्रक्रियाओं में अग्नि को इष्ट मान लेना कहीं अधिक श्रेयस्कर है। उपासना कृत्यों की अनेकानेक विधि-व्यवस्थाओं में ‘अग्नि पूजन’ को अधिक वरिष्ठता इसलिए भी प्रदान की गयी है कि उसके अवलम्बन से मानवी गरिमा को बढ़ाने वाले देवत्व और वर्चस्व की उपलब्धि सहज एवं शीघ्र होती है।
उपासना के बारे में बता रहा था, मित्रों! उपासना के अलावा एक और काम आपको पात्रता विकास के लिए करना पड़ेगा, उसका नाम है- साधना।
उपासना करने के बाद भी नहीं पा सकते थे, पर इन दिनों अनुदान से पा सकते हैं। कल हमने आपको अनुदानों की एक किश्त के बारे में जानकारी करायी थी, कि प्राणधारा का संचार प्राप्त करने के लिए दैवी शक्तियाँ आपकी क्या सहायता कर सकती हैं। उसके तीन लाभ हैं-एक लाभ है उसका-जीवन शक्ति, दूसरा लाभ है उसका-साहसिकता, तीसरा लाभ है उसका-प्रतिभा। ये तीन प्रत्यक्ष सिद्धियाँ हैं। चमत्कारी सिद्धियों की बात आप मत पूछिये।
उपासना किसे कहते हैं? भगवान के नजदीक बैठना। भगवान के नजदीक बैठने का अर्थ होता है उसकी विशेषताओं को ग्रहण करना, मसलन आग के आप नजदीक बैठते हैं, तो आग की विशेषताओं को ग्रहण करते हैं। अपनी ठंडक और नमी दोनों को मिटा लेते हैं। गर्मी आपके अन्दर चली जाती और ठंडक दूर हो जाती है।
उपासना कहते हैं-भगवान के समीप बैठने को। महान तत्वों की समीपता भी असाधारण लाभ प्रस्तुत करती है। स्वाति बूँद सीपी में पड़कर मोती बनती है और बाँस के संयोग से वंशलोचन। चंदन के निकट उगे हुए झाड़-झंखाड़ भी महकने लगते हैं। फूलों पर बैठने वाली मधुमक्खी ढेरों शहद एकत्रित कर लेती है।
उपासना के अलावा एक और काम आपको पात्रता विकास के लिए करना पड़ेगा, उसका नाम है- साधना।
उपासना का एक बहुत छोटा अंग है- भजन। उपासना समग्र फिलॉसफी है। उपासना किसे कहते हैं? भगवान के नजदीक बैठना। भगवान के नजदीक बैठने का अर्थ होता है उसकी विशेषताओं को ग्रहण करना, मसलन आग के आप नजदीक बैठते हैं, तो आग की विशेषताओं को ग्रहण करते हैं।
उपासना समग्र फिलॉसफी है। उपासना किसे कहते हैं? भगवान के नजदीक बैठना। भगवान के नजदीक बैठने का अर्थ होता है उसकी विशेषताओं को ग्रहण करना, मसलन आग के आप नजदीक बैठते हैं, तो आग की विशेषताओं को ग्रहण करते हैं। अपनी ठंडक और नमी दोनों को मिटा लेते हैं।
उपासना है। फिर इसमें शक्ति स्वरूपा नारियों को वंचित रखना-किस प्रकार सम्भव है? माता और बेटी के बीच किसी प्रकार के प्रतिबन्ध हो ही नहीं सकते।
उपासना भली प्रकार सम्भव है।
उपासना कैसे हो? इसका उपाय है उसके साथ अपने आप को जोड़ देना। इसमें अपनी हस्ती, अपनी इच्छा मिटाकर ईश्वर को, निज को समर्पित करना पड़ता है। नाला नदी में मिलता है, बेल पेड़ पर चढ़ती है, ईंधन आग में जलता है और तद्रूप बन जाता है। पत्नी अपना व्यक्तित्व अलग न रखकर पति में घुला देती है।
उपासना भले ही थोड़ी हो पर नियत, समय पूर्वक, नियम पूर्वक और भाव भरी होनी चाहिए। वह हमारी आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ने में बहुत हद तक सफल रहेगी। बिजली के ट्राँसफार्मर के साथ तार जोड़ लेने पर पंखे, बल्ब, हीटर, कूलर आदि यंत्र गतिशील हो उठते है। पानी की टंकी या लाइन के साथ जुड़े हुए नल यथेष्ट पानी देते रहते है। छोटे बैंक बड़े बैंक के साथ जुड़कर सम्पन्न हो जाते हैं।
उपासना, साधना, आराधना के उपरोक्त तीन माध्यमों को अपनाकर हम अपनी पात्रता को इस स्तर तक विस्तृत कर सकते हैं जिसमें देवताओं के अनुग्रह आकाश से होने वाली पुष्प-वर्षा की तरह हम पर बरसें।
उपासना करने से प्राप्त होते है। ऋग्वेद में सूर्योपासना के अनेकों प्रसंग है जिनमें सूर्य से पाप, मुक्ति, रोगनाश, दीर्घायुष्य, सुख प्राप्ति, शत्रुनाश, दरिद्रता, निवारण आदि के लिए प्रार्थना की गयी है। ऋग्वेद के ही 1/115/6 एवं 10/37/4 तथा यजुर्वेद 20/16 आदि मंत्रों में सूर्य की आधि-व्याधि निवारण एवं पाप कर्मों, आसन्न संकटों, अपकीर्ति से बचाने वाला तथा तथा प्रगति एवं अभिवृद्धि प्रदान करने वाला बताया गया है। यजुर्वेद के ही 5/33 एवं 8/40 मंत्रों में सविता को देवयान मार्ग पर ले जाने वाला तथा आराधक को सर्वश्रेष्ठ तेजस्वी बनाने वाला कहा गया है।
उपासना से पूर्व स्नान करने की सुविधा नहीं रहती, वे भी गायत्री साधना कर सकते हैं। यों तो स्नान और वस्त्र शुद्धि की प्रशंसा ही की जायगी। पर हाथ-पैर और मुँह धोकर, पसीने वाले वस्त्र बदलकर भी उपासना हो सकती है। यहाँ तक कि रास्ता चलते, शारीरिक श्रम करते समय भी मंत्र जप चलता रह सकता है। ऐसी स्थिति में मुँह बन्द कर, मन ही मन मानसिक जप करने का विधान है।
उपासना के आधार पर ही असाधारण बन कर रहा है। शास्त्रों और ऋषियों ने गायत्री को देव माता, वेद माता और विश्व माता कहा है। उसे आद्यशक्ति और उपासना विज्ञान का सार तत्व बताया है। हम उसी का जप और प्रकाश पुँज सविता का ध्यान करें, पर यह भी निताँत अनिवार्य नहीं है। जिन्हें यह न रुचे वे अपनी मर्जी के अनुरूप अन्य साधनायें कर सकते है, पर होना चाहिए उन सब में समर्पण भाव की प्रधानता।
उपासना के जो-जो भी लाभ अध्यात्म तत्व दर्शन, शास्त्र निर्धारण, आप्त वचन एवं योगी-तपस्वियों के अनुभव बताते हैं, उन सबको ब्रह्मविद्या के महामनीषी यज्ञाग्नि के माध्यम से भली प्रकार उपलब्ध होने की बात कहते हैं। उपासनाओं के लिए अन्य इष्टदेवों का भी निर्धारण हो सकता है, पर उन सब प्रक्रियाओं में अग्नि को इष्ट मान लेना कहीं अधिक श्रेयस्कर है। उपासना कृत्यों की अनेकानेक विधि-व्यवस्थाओं में ‘अग्नि पूजन’ को अधिक वरिष्ठता इसलिए भी प्रदान की गयी है कि उसके अवलम्बन से मानवी गरिमा को बढ़ाने वाले देवत्व और वर्चस्व की उपलब्धि सहज एवं शीघ्र होती है।
उपासना कृत्यों की अनेकानेक विधि-व्यवस्थाओं में ‘अग्नि पूजन’ को अधिक वरिष्ठता इसलिए भी प्रदान की गयी है कि उसके अवलम्बन से मानवी गरिमा को बढ़ाने वाले देवत्व और वर्चस्व की उपलब्धि सहज एवं शीघ्र होती है।
उपासना के अंग माने जाते है। जप, तप, भजन, पूजन का मतलब ईश्वर को रिझाना नहीं, वरन् ये है कि मानवीय गरिमा का निर्वाह सतर्कता पूर्वक करें और उसे कलंकित न होने दें। ये स्मरण नाम रट के आधार पर बारम्बार किया जाता रहे। अपने आप को राम नाम का साबुन रगड़ कर शुद्ध-स्वच्छ बनाया जाय।
उपासना करने का विधान है। यजुर्वेद अध्याय 13, मंत्र 43 में कहा गया है कि सूर्य की सविता की आराधना इसलिए भी की जानी चाहिए कि वह मानव मात्र के समस्त शुभ और अशुभ कर्मों के साक्षी हैं। उनसे हमारा कोई भी कार्य या व्यवहार छिपा नहीं रह सकता है। सूर्य की दृश्य व अदृश्य किरणें समस्त विधाओं-दीवारों को बींधती हुई सृष्टि के कण-कण की सूचनायें एकत्रित करती रहती हैं। यह एक वैज्ञानिक तथ्य भी है।
उपासना के उपराँत दूसरा चरण साधना का है। साधना अर्थात् अपने अंतरंग और बहिरंग जीवन को पवित्र, प्रखर एवं प्रमाणित बना लेना। मनुष्य वस्तुतः एक प्रकार का पशु है। जन्म जन्माँतरों से उसके संचित संस्कार इस जन्म में भी चिपके रहते है और हमारे अधिकाँश आचरण नर पशुओं जैसे होते है। अनगढ़ उच्छृंखल, असभ्य और मानवीय गरिमा की दृष्टि से गये बीते।
उपासना, साधना स्वयं के लिए और भगवान को प्रभावित करने के लिए अंतिम चरण रह जाता है-आराधना। आराधना का अर्थ है- लोक सेवा, जनहित, जनकल्याण, समाजसेवा। अपने समय में से, अपने श्रम में से, अपनी मेहनत में से और पैसों में से भगवान का काम कीजिए। भगवान का क्या काम है? भगवान का एक काम है-उसकी दुनिया को सुसंस्कृत और समुन्नत बनाना, उसकी सभ्यता और संस्कृति और समुन्नत बनाना, उसकी सभ्यता और संस्कृति को बढ़ाना।
उपासनात्मक उपचार होते है। अग्निपूजा ही यज्ञ का प्रधान विषय है। न्यायदर्शन 4/1/62, मनुस्मृति-1-22, सिद्धाँत शिरोमणि (गणिताध्याय), गोपथ ब्राह्मण (1/4/24), गीता (4/22), ऋग्वेद (1/1/1), अनेकानेक आप्त वचनों में उपासनात्मक एवं अध्यात्म प्रयोजनों में अग्नि को प्रमुख माध्यम माना गया हैं। उसके प्रकटीकरण एवं क्रियान्वयन की पद्धति को अग्निहोत्र कहते हैं। भौतिक अग्नि में जब तक मनुष्य का परिचय नहीं था, तब की पिछड़ेपन और आज उस महाशक्ति के सहारे संभव हुई प्रगति वाली स्थिति की तुलना करते हैं तो दोनों के मध्य जमीन-आसमान जैसा अंतर दिखायी पड़ता है।
उपासना। उपासना का एक बहुत छोटा अंग है- भजन। उपासना समग्र फिलॉसफी है। उपासना किसे कहते हैं? भगवान के नजदीक बैठना।
उपासना विज्ञान का सार तत्व बताया है। हम उसी का जप और प्रकाश पुँज सविता का ध्यान करें, पर यह भी निताँत अनिवार्य नहीं है। जिन्हें यह न रुचे वे अपनी मर्जी के अनुरूप अन्य साधनायें कर सकते है, पर होना चाहिए उन सब में समर्पण भाव की प्रधानता। भिक्षुक या दरिद्र बनकर हम परमात्मा के दरबार में सम्मान नहीं प्राप्त कर सकते। कुछ छुट-पुट अनुग्रह पाकर खाली हाथ न आने का मिथ्या संतोष भर भले ही प्राप्त कर सकें।
उपासनात्मक एवं अध्यात्म प्रयोजनों में अग्नि को प्रमुख माध्यम माना गया हैं। उसके प्रकटीकरण एवं क्रियान्वयन की पद्धति को अग्निहोत्र कहते हैं। भौतिक अग्नि में जब तक मनुष्य का परिचय नहीं था, तब की पिछड़ेपन और आज उस महाशक्ति के सहारे संभव हुई प्रगति वाली स्थिति की तुलना करते हैं तो दोनों के मध्य जमीन-आसमान जैसा अंतर दिखायी पड़ता है। यही बात दैवी अग्नि के संपर्क के बिना और उसकी सहायता से संभव आत्मिक प्रगति के बारे में भी कही जा सकती है। दैवी शक्तियों के साथ संपर्क बनाने और अनुग्रह पाने में अग्नि का सहयोग असाधारण है।
उपासना ईश्वर की, साधना अपनी और आराधना समाज की। इन्हीं तीनों का मिलन गंगा, यमुना, सरस्वती का मिलन त्रिवेणी संगम कहलाता है और उसका अवगाहन करने वाला हर दृष्टि से कृतकृत्य बनता है।
उपासना के लिए प्रतिबन्धित रखा जाय तो फिर उपासना के लिए कोई समय न बचेगा। पूज्य गुरुदेव के जीवन के पृष्ठो से स्पष्ट है कि उनके 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरणों का जप रात्रि एक डेढ़ बजे से आरम्भ होता रहा है।
उपासना किसी भी जाति, धर्म, देश का व्यक्ति कर सकता है।
उपासना में करत रहना चाहिए। परम पूज्य गुरुदेव का जीवन-क्रम समस्त वैदिक वाङ्मय का जीवन्त भाष्य है और गायत्री महाविज्ञान उसकी साधनात्मक अनुभूतियों का रसामृत। इसका श्रद्धाभाव से अवगाहन उपासकों की समस्त शंकाओं को निर्मूल करता रहेगा। इसके अतिरिक्त अखण्ड ज्योति के पृष्ठो में प्रकाशित उनकी विचार चेतना की रश्मियाँ-हृदयगत संशय,अन्धकार को दूर भागने के लिए सर्व-समर्थ हैं। फिर भी जिनके मन में शंका उठे, वह शान्ति-कुंज से निःसंकोच पत्र-व्यवहार करके मार्गदर्शन प्राप्त करते रह सकते हैं।
उपासना को किसी जाति-वंश विशेष तक सीमित करना नहीं वरन् यह कि श्रेष्ठ आचरण वाले परमार्थ-परायण ब्रह्मवृत्ति के व्यक्ति उस उपासना का समुचित लाभ उठा सकते है। उसमें सत्पात्रता को, व्यक्तित्व की उत्कृष्टता को बढ़ो का प्रोत्साहन भर है। यही बात स्त्री-पुरुष के भेदभाव के सम्बन्ध में भी है। भारतीय संस्कृति की अन्तरात्मा में आदि से अन्त तक मानवीय समानता का ही प्रतिपादन भरा पड़ा है। आर्षवाङ्मय के अनुसार स्त्रियाँ भी पुरुषों की भाँति सदा से धर्म कृत्यों में प्रवेश पाती रही हैं।
उपासना कोई दुष्कर्म नहीं है। जान-बूझकर या अनजाने भी सत्कर्म करते रहने का थोड़ा-बहुत लाभ ही होता है। यह बात किसी के भी मन में नहीं आनी चाहिए कि किसी के विधि-विधान में कमी रह जाने से किसी प्रकार का अनिष्ट हो सकता है। वाल्मीकि ने उलटा नाम जपा था, उसके विधि-विधान में यह स्पष्ट त्रुटि थी। इतने पर भी भक्ति भावना और चरित्र दृष्टिकोण बदल देने के कारण उनकी उस विधान त्रुटि के कारण कोई हानि नहीं पहुँची बल्कि वे सफलता के साथ चरम लक्ष्य तक पहुँचने में सफल हो सके।
उपासना-कक्ष में पाया।
उपासना का अर्थ यही होता है कि आप सिद्धान्तों के लिए अपने आपको समर्पित कर दें। श्रद्धा इसी का नाम है। समर्पण इसी का नाम है। गीता ने बार-बार यही कहा है- ”मरुयेव मन आधत्रुस्व मयि बुद्धिं निवेशय।” अरे अभागे! अपनी अक्ल को हमारे पास ला-अपनी बुद्धि को-मनोकामनाओं को हमारे पास ला।
उपासना के लिए कोई समय न बचेगा। पूज्य गुरुदेव के जीवन के पृष्ठो से स्पष्ट है कि उनके 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरणों का जप रात्रि एक डेढ़ बजे से आरम्भ होता रहा है।
उपासना सच्ची किसकी झूठी है। इसकी एक ही परख है। अपनी मर्जी के अनुरूप इष्ट देव को चलाना या उसकी मर्जी के अनुरूप स्वयं चलकर अपनी स्वामी भक्ति और वफादारी का परिचय देना। कठपुतली की तरह हम अपने आप को बाजीगर की उँगलियों में बँधा लेते हैं और उसके इशारों पर नाचना आरम्भ कर देते हैं। तमाशा इतना मजेदार होता है कि दर्शकों की तालियाँ बजने लगती हैं।
उपासना भी क्यों करें? जिस औचित्य को नहीं अपनाया गया है-उसे अपनाने की बात सोचनी चाहिए। जनेऊ के साथ-साथ गायत्री भी छोड़ देना तो दुहरी गलती है। बिना जनेऊ पहने भी गायत्री उपासना भली प्रकार सम्भव है।
उपासना हो सकती है। यहाँ तक कि रास्ता चलते, शारीरिक श्रम करते समय भी मंत्र जप चलता रह सकता है। ऐसी स्थिति में मुँह बन्द कर, मन ही मन मानसिक जप करने का विधान है।
उपासना के लिए यही करना चाहिए। हमने भी यही किया और आपको भी यही करना चाहिए। हमने भी यही किया और आपको भी यही करना चाहिए। हमने अपनी कठपुतली के सारे धागे अपने बाँस की हथेलियों में बाँध दिये हैं और वही वहाँ से नचाते रहते हैं। हमारी भक्ति इसी बात पर है कि हमने हर चीज को धागा से बाँध दिया है और ये कहा है कि आप हुक्म दीजिये।
उपासना करके हम अहंता खोते हैं बदले में उतने ही समर्थ हो जाते है जितना कि ईश्वर स्वयं है।
उपासना विधान के सम्बन्ध में एक मार्गदर्शक नियुक्त होना चाहिए। इस नियुक्त होना चाहिए। इस नियुक्ति से पूर्व यह बात भली प्रकार जान ली जाय कि मार्गदर्शक का ज्ञान-अनुभव परिपक्व है या नहीं और उसके परामर्श को प्रामाणिक माना जा सकता है या नहीं? इस खोज-बिन में जल्दी भी न की जाय। अपना समाधान हर दृष्टि से भली प्रकार कर लिया जाय।
उपासना का समुचित लाभ उठा सकते है। उसमें सत्पात्रता को, व्यक्तित्व की उत्कृष्टता को बढ़ो का प्रोत्साहन भर है। यही बात स्त्री-पुरुष के भेदभाव के सम्बन्ध में भी है। भारतीय संस्कृति की अन्तरात्मा में आदि से अन्त तक मानवीय समानता का ही प्रतिपादन भरा पड़ा है। आर्षवाङ्मय के अनुसार स्त्रियाँ भी पुरुषों की भाँति सदा से धर्म कृत्यों में प्रवेश पाती रही हैं।
उपासना के लिए गायत्री माता के चित्र की एक सौ घरों में देव-स्थापना एवं अश्वमेध घट स्थापित कराने वाले श्रद्धा-भूषण होंगे। जहाँ चित्र स्थापना होगी उन्हें नियमित गायत्री उपासना, गायत्री चालीसा अथवा प्रातःकाल देव-चित्र को नमन वंदन करने का संकल्प भी कराया जाना चाहिए।
उपासना को अधिक फलदायी माना जाता है। महान दार्शनिक थियोडोसियन ने तो रविवार के दिन नृत्य, वाद्य, संगीत, थियेटर, सरकस आदि सभी मनोरंजन के कार्यों एवं द्यूतकर्म, मुकदमेबाजी आदि सभी का निषेध किया है।
उपासना इसमें बहुत सहायक होती है।
उपासना करके सती सावित्री को अपनी कन्या के रूप में पाया था। यही कन्या सत्यवान को ब्याही गयी थी जिसने अपने तपोबल से उसकी मृत्यु हो जाने पर भी यमराज से उसे वापस ले लिया था। महाकवि कालीदास ने अपनी अनुपम कृति ‘रघुवंश’ में वनवास काल के समय सीता द्वारा सूर्य पर त्राटक करने का उल्लेख किया है। उसमें कहा गया है कि सीता ने राम को संदेश भेजा था कि वह गर्भस्थ शिशुओं को जन्म देने के पश्चात सूर्य पर दृष्टि निबद्ध कर अनन्य भाव से तपस्या करेंगी जिससे अगले जन्म में भी वह राम को पति रूप में प्राप्त कर सकें।
उपासना, गायत्री चालीसा अथवा प्रातःकाल देव-चित्र को नमन वंदन करने का संकल्प भी कराया जाना चाहिए।
उपासना के लिए इस धर्म के अनुयायियों के लिए विशेष महत्व रखता है। सेंटपाल का कथन है कि सूर्य के द्वारा पवित्र किया गया यह दिन दान की अपेक्षा रखता है। ईसाई लोग इस दिन को ईसा का पवित्र दिन भी मानते हैं।
उपासना का कर्मकाण्ड सरल पड़ता है। उसे अपनी पूर्व मान्यताओं के अनुरूप बहुत या थोड़ी देर अपनी रुचि या सुविधा के अनुरूप किया जाता है। ऋषियों तथा महापुरुषों का निजी जीवन गायत्री उपासना के आधार पर ही असाधारण बन कर रहा है। शास्त्रों और ऋषियों ने गायत्री को देव माता, वेद माता और विश्व माता कहा है। उसे आद्यशक्ति और उपासना विज्ञान का सार तत्व बताया है।
उपासना करते हैं। सूर्य अनुपम कल्पना शक्ति वाले, सिद्धि के प्रेरक, सबको कर्म की प्रेरणा देने वाले एवं बुद्धि प्रदाता है। उनके इस स्वरूप का वर्णन यजुर्वेद में बहुत से सुँदर ढंग से किया गया है। ऋषियों ने इसे अनुभूति के स्तर तक उतारा और उनसे मिलने वाले लाभों का वर्णन किया है। पातंजलि योग दर्शन में उल्लेख है कि सूर्य पर संयम करने से विश्व ब्रह्मांड का ज्ञान होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-June
उपासनात्मक आधार को बढ़ाना और मजबूत करना चाहिए। अगले दिनों सौर ग्रहणों की संख्या में बढ़ोत्तरी होने जा रही है चूँकि यह संधिकाल है। इस अवधि में की गयी साधना निश्चित रूप से भगवान भुवन-भास्कर की अनुकम्पाओं की निमित्त कारण बनेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।
उपासना सभी संकटों से त्राण दिलाने वाली इस लोक में यश-वैभव की प्राप्ति कराकर मोक्ष प्रदाता है। धर्मराज युधिष्ठिर सपरिवार सूर्य आराधना में तल्लीन हो गये। भगवान सूर्य युधिष्ठिर की इस आराधना से प्रसन्न होकर सामने प्रकट हरे गए और उनके मनोगत भाव को समझकर बोले-
उपासना पद्धति के मूल आधार बने। इस उपासना क्रम में सूर्योपासना का देव-संस्कृति में एक विशिष्ट व अति महत्वपूर्ण स्थान है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि सौर-मण्डल में सूर्य, चंद्रादि नवग्रह, मरुतगण, सप्तर्षि च तैंतीस कोटि देवताओं का निवास बताया गया है। इन सब देवशक्तियों का प्रतिनिधित्व हमारे ऋषि, मनीषियों के अनुसार भानु भास्कर सूर्यनारायण ही आदि काल से करते आये है। इसलिए “सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च” कहकर ऋग्वेद का ऋषि शाकल संहिता 1-115-1 में यह कहता है कि “जंगम तथा स्थावर सभी प्राणियों की आत्मा भगवान सूर्य ही हैं।
उपासना क्रम में सूर्योपासना का देव-संस्कृति में एक विशिष्ट व अति महत्वपूर्ण स्थान है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि सौर-मण्डल में सूर्य, चंद्रादि नवग्रह, मरुतगण, सप्तर्षि च तैंतीस कोटि देवताओं का निवास बताया गया है। इन सब देवशक्तियों का प्रतिनिधित्व हमारे ऋषि, मनीषियों के अनुसार भानु भास्कर सूर्यनारायण ही आदि काल से करते आये है। इसलिए “सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च” कहकर ऋग्वेद का ऋषि शाकल संहिता 1-115-1 में यह कहता है कि “जंगम तथा स्थावर सभी प्राणियों की आत्मा भगवान सूर्य ही हैं। “
उपासना से मानव मात्र के सन्मार्ग पर चलने की बात कहता है तथा इसे ब्रह्मविद्या बताता है। (शुक्लयुग 3-35-22-9 एवं ऋग्वेद संहिता 3-62-10) । “आकृष्णेन रजसा” के माध्यम से ऋग्वेद शाकल संहिता 1-35-2 में वेदों में सूर्योपासना का प्रथम संकेत मिलता है। कृष्ण यजुर्वेद में तद्भास्कराय विद्महे प्रभाकराय धीमहि। तन्नोः भानु प्रचोदयात् (2-9-9) में सूर्योपासना की महत्ता बतायी गयी है।
उपासना की। फलस्वरूप उन्हें विपुल सत्परिणाम प्राप्त हुए। प्राण स्वयमेव ऋषि है। मंत्र द्रष्टा ऋषियों का ऋषित्व उनके शरीर पर नहीं वरन् प्राण पर अवलंबित है। इसलिए विभिन्न ऋषियों के नाम से उसका ही उल्लेख हुआ है।
उपासना का अलौकिक विज्ञान छुपा है।
उपासनाधिकार अर्थात् इष्टदेव का निर्णय करें। कौन-कान हो सकते हैं-आकाश के अधिपति विष्णु, अग्नि की अधिष्ठात्री महेश्वरी, वायु तत्व के स्वामी सूर्य, पृथ्वी के नायक शिव एवं जल के अधिपति भगवान गणेश, इनमें से कोई भी इष्ट हो सकता है, ऐसा श्रुति कहती है।
उपासना भारतीय संस्कृत के अध्यात्म पक्ष का मूल मर्म है। आदित्य हृदय का रहस्य जानकर ही भगवान श्रीराम द्वारा रावण वध संभव हो सका। युधिष्ठिरादि पाँचों भाई मुनि धौम्य द्वारा सूर्योपासना की दीक्षा द्वारा ही उस शक्ति को प्राप्त कर सके जिसने उन्हें अजेय बनाया। सूर्य की स्तुति से हमारा आर्ष-वाङ्मय भरा पड़ा है। ऋग्वेद के पाँचवे मंडल के 71वें सूक्त के पहले श्लोक में आता है “मही देवस्य सवितुः परिष्तुतिः” अर्थात् “महान है सविता देवता की व्यापक स्तुति”
उपासना उनके दैनंदिन जीवन का अंग बन गयी। कई प्रकार की सूर्य गाथाएँ हवाई द्वीप, जापान, दक्षिण अमेरिका तथा कैरेबियन द्वीपों में प्रचलित हैं जो बताती है कि सूर्य सबका उपास्य रहा है। चीन के विद्वानों ने तो सूर्य को आधार मानकर अपना समग्र खगोलशास्त्र तथा ज्योतिर्विज्ञान स्थापित किया है। वहाँ सूर्य को “याँग“ तथा चंद्रमा को “यिन” मानते हैं तथा इनकी प्रतिनिधि धाराएँ इड़ा-पिंगला के रूप में शरीर में संव्याप्त मानते हैं। जापान सूर्यपूजक राष्ट्र है तथा दिनमान का आगमन सूर्य प्रथम उसी देश से हुआ माना जाता है।
उपासना से शूद्र इतरा का बेटा ब्रह्मर्षि ऐतरेय हो गया था। इनके आत्मबोध के स्वरों को अपने में समाहित करने वाली उपनिषद् ऐतरेय उपनिषद् कहलाई। भगवान सूर्य की उपासना से कोई भी मनुष्य ब्रह्मर्षि पद पाने में समर्थ हो सकता है। “
उपासना की प्रक्रिया बतला रहा हूँ उसे धारण करो।
उपासना से की जाती है। यह प्रक्रिया सूर्य की आत्मा सविता शक्ति के साथ उपासक के साथ संबंधित करती है। जिसके द्वारा वह परब्रह्म महाप्रयाण को अपने शरीर और अन्तःकरण में आवश्यक मात्रा में धारण करके लौकिक सुख एवं आत्मिक शाँति को अनुभव करता हुआ जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।
उपासना मात्र से सभी रोगों से मुक्ति मिल जाती हैं। सूर्य उपासना द्वारा रोगनिवारण का चमत्कारी रहस्य इसके द्वारा ब्रह्माण्ड के ऊर्जा प्रवाहों के संतुलन तथा अन्तर्ग्रही दुष्प्रभावों के निवारण में समाहित है। रोगों की उत्पत्ति में प्रत्यक्ष स्थूल कारणों को महत्व दिया जाता है। अदृश्य किन्तु महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सौरमण्डल के देवीय ज्ञान को भी चिकित्सा अनुसंधान की कड़ी में जोड़ा जा सके तो रोगों के कारण और निवारण के आश्चर्यकारी सूत्र हाथ लग सकते हैं।
उपासना करते थे। पश्चिमी चिकित्साशास्त्र का प्रणेता हिपोक्रेट्स भी इसी विधि से रोगियों को ठीक करता था। इसे अपने देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि इसने आविष्कार तो बहुत किए, परन्तु बौद्धिक दासता ने सभी प्रयोगों का दबा दिया। मौर्य-गुप्त राजाओं के समय से यूनानी चिकित्सा आयी। अँग्रेजों के साथ एलोपैथी आयी।
उपासना की रहस्य रश्मियाँ एकत्रित होकर यहाँ प्रकाशित है। इस उपनिषद् के प्रथम खण्ड के प्रथम बारह श्लोकों में मधुविद्या एवं सविता साधना को मनोरम ढंग से समझाया गया है। इसके अनुसार आदित्य देवताओं का मधु है-
उपासना द्वारा रोगनिवारण का चमत्कारी रहस्य इसके द्वारा ब्रह्माण्ड के ऊर्जा प्रवाहों के संतुलन तथा अन्तर्ग्रही दुष्प्रभावों के निवारण में समाहित है। रोगों की उत्पत्ति में प्रत्यक्ष स्थूल कारणों को महत्व दिया जाता है। अदृश्य किन्तु महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सौरमण्डल के देवीय ज्ञान को भी चिकित्सा अनुसंधान की कड़ी में जोड़ा जा सके तो रोगों के कारण और निवारण के आश्चर्यकारी सूत्र हाथ लग सकते हैं।
उपासना करो। जब तक प्राण है, तभी तक जीवन है। इस लोक में अमृतत्व प्राप्ति का आधार प्राण ही है।”
उपासना, सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया द्वारा सारे ब्रह्मांड में संव्याप्त हो गयी है। तुम देखना, यही सत्ता सूक्ष्मशरीर में जाने के बाद कैसे अपना प्रभाव दिखाती है। हम तो अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते है। ऐसे संदेश जो सहज ही हर किसी को नहीं मिलते युगों-युगों तक जिन्हें पाने को दैवी आत्माएँ तरसती रहती हैं, तुम सबको यहाँ मिल गए। तुम सब यहाँ आ भी गए उनके काम में भी लग गए।
उपासनात्मक संपर्क मानवी व्यक्तित्व को अनंत अलौकिक शक्तियों का अधिपति बनाता है।
उपासना के रूप में अगरबत्ती जलाई जा सकती है। स्वच्छ स्थान में शरीर, वस्त्र से ध्यान मुद्रा में बैठे। ध्यानमुद्रा की पंचसूत्री विधि है। (1) शाँत चित्त (2)स्थिर शरीर (3) कमर सीधी (4) हाथ गोद में (5) आंखें बंद। यह है ध्यान मुद्रा, जिसे प्रत्येक प्रकार के ध्यान में आवश्यक एवं उपयोगी माना गया है।
उपासना करते रहें, तब तक भारत ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी, स्वस्थ-प्रसन्न एवं सर्वांगपूर्ण प्रगति के पथ पर अग्रगामी रहा। जब-जब अनीति व असुरता बढ़ी है तब-तब अवतारी लताओं ने सूर्य का ही आश्रय लेकर मानवी प्रकृति में व्यापक स्तर पर परिवर्तन किया है। -सूर्य में प्रखरता है, गति हैं, ऊर्ध्वगामी चिन्तन को गतिशील करने की सामर्थ्य है तथा विचारों को विकार मुक्त की भाव संवेदनाओं की परिष्कृति कर पाने की ताकत है। यही कारण है कि गुरुसत्ता, परिवर्तनकारी सत्ताएँ तत्कालीन परिस्थितियों में इष्ट का निर्धारण मानव मात्र के लिए करती रही है। कपिल तंत्र में एक उल्लेख आता है।
उपासना किसी भी व्यक्ति की बौद्धिक क्षमताओं में चमत्कारी परिवर्तन ला सकती है।
उपासना एवं तपश्चर्या वस्तुतः एक ऐसे उच्चस्तरीय विज्ञान का ही प्रतिपादन करती है। जिसके लिए मशीनों की नहीं वरन् पवित्रता और सात्विकता से निर्मल बने व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। सूर्य देवाधि देव है। उनसे उपासनात्मक संपर्क मानवी व्यक्तित्व को अनंत अलौकिक शक्तियों का अधिपति बनाता है।
उपासना मनुष्य में इन सभी अन्तरिक्षीय प्रवाहों को सन्तुलित करती और ग्रहों के दुष्प्रभावों को समाप्त करती हैं। अथर्व वेद में कहा गया है-
उपासना श्रद्धा और भक्ति आदि का रहस्य भी प्रकट हो जायेगा और सिद्धियों सामर्थ्यों की बात भी सत्य साबित हो जायेगी। सूर्य भगवान का दृश्य और अदृश्य क्रिया क्षेत्र पृथ्वी ही नहीं अनेक ग्रह नक्षत्रों तक व्याप्त है। मनुष्य की दृश्य शक्ति उसकी आँखें ऐसी नहीं हैं कि वह उतने व्यापक क्षेत्र को देख सके। किंतु जब वह अपना संबंध सूर्यदेव के साथ जोड़ लेता है, तो वह भी उसी तरह ने केवल पृथ्वी की हलचलों और परिवर्तनों का जानकार हो जाता है वरन् उसे ब्रह्मांडों के भी रहस्य ज्ञात होने लगते है। यही नहीं वह एक अंश तक उन परिवर्तनों के साथ अपनी सम्पत्ति जोड़कर उन्हें कुछ कम या ज्यादा कर सकता है।
उपासना वैदिक ऋषियों ने की। जो आज भी गुह्य विद्या के मर्मज्ञों का उपास्य है अथवा यह स्वयं सर्वव्यापी परमात्मा है। गायत्री महाविद्या के साधक जिससे एकत्व की अनुभूति करते हैं। पहेली विचित्र है, जो एक है वह तीन कैसे हो सकता है? तीनों एक में किस तरह समाहित हो सकते हैं?
उपासना से कोई भी मनुष्य ब्रह्मर्षि पद पाने में समर्थ हो सकता है। “
उपासना से पवित्रता-प्रखरता, वर्चस्, तेजस जैसी सिद्धियाँ पायी जा सकती है। ब्रह्मांड के रहस्य जाने जा सकते है। लोक-लोकाँतर के रहस्यों को प्रत्यक्ष किया जा सकता है।
उपासना में सुन सकते हैं।
उपासना का सामान्य क्रम ग्रह है कि उषा बेला में उगते सूर्य को अधखुली आँखों से देखकर पलक बंद कर लिया जाय। भावना यही प्रगाढ़ रहे कि वह दिव्यसत्ता अपने किरण जाल समेत संपूर्ण शरीर में संव्याप्त हो गई। इस शुरुआत में जलाशय का निकट होना शक्ति आकर्षण की दृष्टि से अधिक लाभदायक है। इसी कारण बहुतेरे जलाशय में खड़े होकर सूर्याभिमुख स्थिति में जप तथा ध्यान करते है। कई उतने समय तक गीले कपड़े पहने रहते हैं।
उपासना साधक के जीवन में प्राण भरती-मन में उल्लास तरंगित करती और आत्मा को उसके अमृत स्वरूप का बोध करा देती है। इसकी ओर से साधक का ध्यान हट न जाय ऐसी सतर्कता रखते हुए अध्यात्म विद्या के अन्वेषक मनीषियों ने जगह-जगह पर उसके अर्थ, गुण, कर्म एवं स्वरूप को प्रतिपादित किया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-September
उपासना एवं अभ्यर्थना। विश्व व्यवस्था में निरन्तर संलग्न परमेश्वर को इतनी फुरसत नहीं कि वह इतने भक्तजनों की मनुहार सुने और चित्र-विचित्र उपहारों को ग्रहण करे। यह सब तो मात्र अभ्यर्थना के माध्यम से अपने आपको उत्कृष्टता के मार्ग पर चल पड़ने के लिए स्वसंकेतों के रूप में रचा और किया जाता है। ईश्वर पर न किसी की प्रशंसा का कोई असर पड़ता है और न निंदा का। पुजारी नित्य प्रशंसा के पुल बाँधते और निन्दक हजारों गालियाँ सुनाते हैं।
उपासना का उद्देश्य है। इसी के फलित होने पर मनुष्य को मनीषी, क्षुद्र को महान, नर को नारायण बनने का अवसर मिलता है। ऐसे व्यक्ति जब समाज में बढ़ने लगते हैं तो युग परिवर्तन का सरंजाम जुट जाता है।
उपासना योग्य ईश्वरीय सत्ता है। यों यह समस्त विश्व-ब्रह्मांड में तो एक नियामक सूत्र संचालक के रूप में जानी मानी जा सकती है। उसे अनुशासन, संतुलन, सुनियोजन आदि के रूप में ही वैज्ञानिक दृष्टि से समझा जा सकता है। उसकी अनुभूति भाव श्रद्धा के रूप में ही हो सकती है। तन्मय और तद्रूप होकर ही उसे पाया जा सकता है।
उपासनात्मक कर्मकाण्ड इसी एक सुनिश्चित व्यवस्था को जानने-मानने के लिए किये और अपनाये जाते हैं। यदि कर्मकाण्ड भर लकीर पीटने की तरह पूरे किये जायँ और परमात्मा के आदेश-अनुशासन की अवज्ञा की जाती रहे, तो समझना चाहिए कि यह बालक्रीड़ा मात्र खेल-खिलवाड़ है। उतने भर से क्या
उपासना किसी न किसी रूप में प्रचलित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-March
उपासना की शान्ति और जल में प्रदूषण का प्रच्छालन-प्रकृति की प्रेरणा यही तो है। सृष्टि में जो मंगल है उसका अभिसिंचन परिवर्द्धन विस्तार हो। जो अमंगल है उसका शेचि -संस्कार किया जाय। यदि तुम इसमें जुट पड़ो तो अशान्ति का सवाल ही शेष न रहेगा। श्रुतिधर को यथार्थ का बोध हुआ वे घर लौट गए और मंगल की साधना में जीवन बिताने लगे।
उपासना करता रहा, एक शक्तिपुँज है। इसके बराबर उपासना करते हुए जो लाभ उठाया जा सकता है कोई दूसरा व्यापार, दूसरा लाभ और दूसरा परमार्थ नहीं। आप लोगों ने अनेक तरह के व्यापार और कार्य किये हैं। मेरा व्यापार से कितना लाभ उठाया जा सकता है कितना लाभ उठाया गया। मैं चाहता हूँ कि मेरे तरीके से आप लोग भी लाभ उठायें और उसी तरीके से लाभान्वित हो जैसे कि आपके पूर्व पुरुष लाभान्वित होते रहे हैं।
उपासना, साधना, तपस्या, देव−अनुग्रह, वरदान, स्वर्ग−मुक्ति आदि आत्मिक उत्पादनों के पीछे जो तथ्य काम करता है उसे श्रद्धा का ही परिपाक समझा जाना चाहिए। यदि श्रद्धा न हो तो यह समस्त क्रिया−कलाप मात्र कर्मकाण्ड बनकर ही रह जायेगा और उनका परिणाम नगण्य जितना ही दिखायी देगा।
उपासना करते हैं और मैं उपासना करता रहा, एक शक्तिपुँज है। इसके बराबर उपासना करते हुए जो लाभ उठाया जा सकता है कोई दूसरा व्यापार, दूसरा लाभ और दूसरा परमार्थ नहीं। आप लोगों ने अनेक तरह के व्यापार और कार्य किये हैं। मेरा व्यापार से कितना लाभ उठाया जा सकता है कितना लाभ उठाया गया। मैं चाहता हूँ कि मेरे तरीके से आप लोग भी लाभ उठायें और उसी तरीके से लाभान्वित हो जैसे कि आपके पूर्व पुरुष लाभान्वित होते रहे हैं।
उपासना करते है। आज की परिस्थितियों में यज्ञ की बहुत जरूरत है जिसका कि आप लोग आयोजन कर रहे है इसे मानव समाज की बड़ी सेवा होने वाली है। इससे लोगों की मानसिक दुख दूर हो सकते हैं। आप प्रयोग करके देखिए। जो लोगों हवन में सम्मिलित हो उनके शरीर के बिमारियों के बारे में इम्तहान लेकर करके देखिये हवन पर बैठने वाले की बीमारियां दूर हुई कि नहीं।
उपासना संबंधी मार्गदर्शन हेतु परम पूज्य गुरुदेव द्वारा केन्या की राजधानी नैराबी में 11 दिसम्बर 1972 को दिया गया प्रवचन इस अंक में प्रस्तुत है।
उपासना द्वारा स्वयं को आस्तिक बनाया जाता हैँ उस सत्ता के क्रिया−कलापों को आगे बढ़ना, सृष्टि के उद्यान को सुरम्य बनाना और उसके ऐश्वर्य में सतत् निरन्तर वृद्धि करते रहना ही आस्तिकता है−ईश्वर की आराधना है।
उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र है, जो दिशा–निर्देश भर देते है। काम तो सत्प्रवृत्ति भी उसी स्तर का घटनाक्रम-क्रिया−कलाप अपनाने से पूरा हो सकता है। कर्म की काट कर्म से ही हो सकती है। इसलिए प्रायश्चित्त द्वारा आत्मशोधन का आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करना पड़ता है वैसा ही सत्साहस दिखाने की जरूरत पड़ती है, जैसा कि दुष्कर्म करते समय किसी भी न सुनने का दुस्साहस किया गया था।” (पृष्ठ 61−62)
उपासना करते हैं उनको सत्यवान बनना ही चाहिए, ताकि वह सावित्री जो गायत्री का ही दूसरा नाम है, आपके गले में विजय माला पहना सके। यह गायत्री शक्तियों का पुँज है, देवत्व की देवी है। ब्रह्मवर्चस्। यह सब कुछ है। कोई भी ऐसी चीज नहीं जो इसके पास न हो।
उपासना करते थे जिसकी की आराधना करने के लिए आप लोग हजार कुण्डों का दीपक जला करके आरती उतारने चल रहे है। उस ब्रह्म शक्ति की जिस शक्ति से हम जगमगाते थे किसी जमाने में राष्ट्रों का नियंत्रण करते थे, शासकों को उत्पन्न करते−पैदा करते थे। शासकों को उतारते थे और चढ़ाते थे विभूतियाँ हमारे चरणों के अंतर्गत रहती थी, क्योंकि ब्रह्मतेजस् हमारे पास था।
उपासना के प्रति कदम बढ़ाये हैं उनको दूसरा कदम यह बढ़ाना चाहिए कि उत्तम बनायें उज्ज्वल बनाये बनाये। सदाचारी, विवेकवान्, शिष्ट, पवित्र और परोपकारी बनायें। जैसे-जैसे अपने आपको साफ करते चले जायेंगे। जीवन पवित्र और शुद्ध होता चला जायेगा वैसे-वैसे ही भगवान के नाम का रंग, गायत्री माता का रंग आप पर चढ़ता हुआ चला जायेगा। यह रहस्य है−चाबी है गायत्री मंत्र की और अन्य सारे अध्यात्म की।
उपासना करते हुए जो लाभ उठाया जा सकता है कोई दूसरा व्यापार, दूसरा लाभ और दूसरा परमार्थ नहीं। आप लोगों ने अनेक तरह के व्यापार और कार्य किये हैं। मेरा व्यापार से कितना लाभ उठाया जा सकता है कितना लाभ उठाया गया। मैं चाहता हूँ कि मेरे तरीके से आप लोग भी लाभ उठायें और उसी तरीके से लाभान्वित हो जैसे कि आपके पूर्व पुरुष लाभान्वित होते रहे हैं।
उपासना किसी आस्तिक द्वारा सच्चे मायनों में संपन्न की गयी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-February
उपासना के समय मन को इष्ट पर केन्द्रित रखने की आवश्यकता पूरी करने के पहले से ही मन को प्रशिक्षित करना चाहिए। गायत्री महाशक्ति के सम्बन्ध में सूर्य तत्व के संदर्भ में जितना अधिक ज्ञान विज्ञान संग्रह किया जा सके मनोयोगपूर्वक करना चाहिए। विज्ञ व्यक्तियों के साथ उसकी चर्चा करनी चाहिए। जिनने लाभ उठाए हों उनके अनुभव सुनना चाहिए। यह कार्य तद् विषयक स्वाध्याय एवं मनन चिन्तन के एकाकी प्रयत्न से भी सम्भव हो सकता है।
उपासना भी सामूहिक हो तो उसमें हानि नहीं लाभ ही है। मस्जिदों में नमाज-गिरजा घरों में प्रेयर-मन्दिरों में आरती सामूहिक रूप से करने का रिवाज है। इसमें न तो एकान्त की अखरती है और न एकाग्रता में कोई बाधा पड़ती है।
उपासना है।
उपासना, जप-यज्ञ, भजन-कीर्तन, भारतीय पद्धति के संगीत का आनंद लेने आने लगेंगे। यूरोपवासियों व सुदूर पश्चिम में अमेरिका-कनाडा में घरों में देवी-देवताओं के चित्र तक लगें, मैंने पूर्वाभास के समय देखे है।” यह सारा जूलवर्न का तब का कथन है।
उपासना में लगे तो स्वभावतः वहाँ उसकी रुचि नहीं होगी, मन जहाँ-तहाँ उड़ता फिरेगा। मन लगने के लिए आवश्यक है कि उस कार्य में समुचित आकर्षण उत्पन्न किया जाय। व्यवसाय उपार्जन में, इन्द्रिय भागों में, विनोद मनोरंजनों में, सुखद कल्पनाओं में, प्रियजनों के संपर्क सान्निध्य में मन सहज ही लग जाता है।
उपासना के समय उनका मन भजन में एकाग्र-स्थिर नहीं रहता। ऐसे लोग एकाग्रता और स्थिरता का अन्तर न समझ पाने के कारण ही इस प्रकार की शिकायत करते हैं। मन की स्थिरता सर्वथा भिन्न बात है। उसे एकाग्रता से मिलती-जुलती स्थिति तो कहा जा सकता है, पर दोनों का सीधा सम्बन्ध नहीं है। जिसका मन स्थिर हो उसे एकाग्रता का लाभ मिल सके या जिसे एकाग्रता की सिद्धि है-उसे स्थिरता की स्थिति प्राप्त हो ही जाय यह आवश्यक नहीं है।
उपासना के सामान्य संदर्भ में एकान्त ढूंढ़ते फिरने की कोई खास आवश्यकता नहीं है। सामूहिकता के वातावरण में ध्यान-धारणा और भी अच्छी तरह बन पड़ती है। सेना का सामूहिक कार्य साथ-साथ कदम मिलाकर चलना-सैनिकों में से किसी का ध्यान नहीं बंटाता वरन् साथ-साथ चलने की पग ध्वनि के प्रवाह में हरेक के पैर और भी अच्छी तरह अपने आप नियतक्रम से उठने चले जाते हैं। सहगमन से पगक्रम को ठीक रखने में बाधा नहीं पड़ती वरन् सहायता ही मिलती है। सहगान की तरह सहध्यान तथा सहभजन भी अधिक सफल और तरह सहध्यान प्रखर बनता है।
उपासना, व्यापार, धर्म और दर्शन, भाषा और शासन व्यवस्था आदि की दृष्टि से भारतीय संविधान से जुड़ी रहीं। ईसा से 1500 वर्ष पूर्व मध्य एशिया में ‘मिटानी’ और हिटाइट’ नामक दो पड़ोसी राज्य थे। मिटानी का शासक ‘मालिउजाला’ था। और हिटज्ञइट में ‘शाविलुउिमा’ राज्य करता था। प्राचीनकाल में जब दो राजाओं के मध्य सन्धि या किसी प्रस्ताव पर बातचीत होती थी तो अदालतों में जिस प्रकार भगवान की शपथ ली जाती है, उसी प्रकार देवताओं को साक्षी बनाया जाता था।
उपासना परमात्मा की उपासना है।
उपासना के लिए जिस एकाग्रता का प्रतिपादन है उसका लक्ष्य है-भौतिक जगत की कल्पनाओं से मन को विरत करना और उसे अंतर्जगत की क्रिया-प्रक्रिया में नियोजित कर देना। उपासना के समय यदि मन साँसारिक प्रयोजनों में न भटके और आत्मिक क्षेत्र की परिधि में परिभ्रमण करता रहे तो समझाना चाहिए कि एकाग्रता का प्रयोजन पूरा हो रहा है। विज्ञान के शोध कार्यों में-साहित्य के सृजन प्रयोजनों में वैज्ञानिक या मनीषी का चिन्तन अपनी निर्धारित दिशा धारा में ही सीमित रहता है। इतने भर में एकाग्रता का प्रयोजन पूरा हो जाता है। यद्यपि इस प्रकार के बौद्धिक पुरुषार्थों में मन और बुद्धि को असाधारण रूप से गतिशील रहना पड़ता है और कल्पनाओं को अत्यधिक सक्रिय करना पड़ता है तो भी उसे चंचलता नहीं कहा जा सकता।
उपासना केन्द्रों में एकता का संदेश दे रही है। उसके हाथ में एक नयी आध्यात्मिक क्राँति आगामी सात वर्षों में होती मैं देख रहा हूँ।” दल के नेता प्रणवपाण्डया से हुई उनकी भेंट टोरोंटो के पत्रकारों व परिजनों के लिए अविस्मरणीय बन गयी। दोनों गले मिले व मिलते ही श्री राइट ने कहा कि “आप उसी क्राइस्ट के संदेशवाहक है जिसे मैंने स्वप्न में पूर्वाभास के रूप में देखा था।”
उपासना और सत्य की उपासना परमात्मा की उपासना है।
उपासना विज्ञान की प्रामाणिकता का, अधिकाधिक अध्ययन अवगाहन करने पर सम्पन्न होता है। आशंकाग्रस्त अविश्वासी मन, उपेक्षा भाव से आधे-अधूरे मन से उपासना में लगे तो स्वभावतः वहाँ उसकी रुचि नहीं होगी, मन जहाँ-तहाँ उड़ता फिरेगा। मन लगने के लिए आवश्यक है कि उस कार्य में समुचित आकर्षण उत्पन्न किया जाय। व्यवसाय उपार्जन में, इन्द्रिय भागों में, विनोद मनोरंजनों में, सुखद कल्पनाओं में, प्रियजनों के संपर्क सान्निध्य में मन सहज ही लग जाता है।
उपासना गृहों, ध्यानकक्षों या मन्दिरों में बदला जा रहा है। अपने चहाँ गिरती उपस्थिति (7 प्रतिशत) को देख कर चर्चों के कर्ताधर्ता भी नये विषयों का चयन कर उन लेक्चर आयोजित करने अथवा उनका अस्पताल-विद्यालय आदि रूपों में उपयोग किये जाने की वकालत करने लगे है। यह वही परिवर्तन की लहर है, जो मनीषी-दृष्टा-भविष्यवक्ताओं के अनुसार सन् 2000 तक एक नये ‘एरा’ के सूत्रपात के रूप में बदल जाएगी।
उपासना में ही संलग्न होना चाहिए।
उपासना सत्य की उपासना और सत्य की उपासना परमात्मा की उपासना है।
उपासना के समय यदि मन साँसारिक प्रयोजनों में न भटके और आत्मिक क्षेत्र की परिधि में परिभ्रमण करता रहे तो समझाना चाहिए कि एकाग्रता का प्रयोजन पूरा हो रहा है। विज्ञान के शोध कार्यों में-साहित्य के सृजन प्रयोजनों में वैज्ञानिक या मनीषी का चिन्तन अपनी निर्धारित दिशा धारा में ही सीमित रहता है। इतने भर में एकाग्रता का प्रयोजन पूरा हो जाता है। यद्यपि इस प्रकार के बौद्धिक पुरुषार्थों में मन और बुद्धि को असाधारण रूप से गतिशील रहना पड़ता है और कल्पनाओं को अत्यधिक सक्रिय करना पड़ता है तो भी उसे चंचलता नहीं कहा जा सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-March
उपासनात्मक विधि-विधान महत्त्वपूर्ण है, पर तुलनात्मक अध्ययन करने के उपरान्त जिन ब्रह्म-वेत्ताओं ने वरिष्ठता के निष्कर्ष निकाले है, उन्होंने गायत्री को ‘परम’ कहा है और बताया है कि इसकी सार्थकता एवं समर्थता पर सन्देह करने की आवश्यकता नहीं है। शास्त्रकार कहते हैं -
उपासना, ध्यान करते हैं।”
उपासना की कमाई इन्हीं कुसंस्कारों और कुकर्मों के गर्त में गिर कर नष्ट हो जाती है।
उपासना । इसी से उसकी उच्च स्तरीय साधन प्रक्रिया को ‘ब्रह्म वर्चस्’ विद्या कहा जाता है। इस उपार्जन में संलग्न व्यक्ति को सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर अग्रसर होने का अवसर मिलता है। श्रुति कहती है -
उपासना करता है, वह विज्ञान वाले और ज्ञान वाले लोकों को सिद्ध कर लेता है।
उपासना जप, ध्यान, खेचरी मुद्रा की चतुर्विधि उपासना की जो पद्धति गत वर्श काम में लाई जाती रही है। वह तो यथावत् रहेगी ही। साथ ही त्राटक और प्राणायाम के दो प्रयोग अतिरिक्त रूप से सम्मिलित रहेंगे। पंचकोशों को प्रकाशवान् बनाने के लिए घृत दीप के माध्यम से त्राटक को और कुण्डलिनी जागरण के सन्दर्भ में अनुलोम-विलोम सूर्य वेधन प्राणायाम की क्रिया कराई जायेगी। एक घण्टे का विशेष ध्यान, विशेष निर्देशनों के साथ-साधक और शिक्षक साथ-साथ सम्पन्न करेंगे।
उपासना कपड़े को रंगने के समान है। इससे पूर्व धुलाई होनी चाहिए। मैले कपड़े पर रंग कहाँ चढ़ता है। दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति अपनाये रहने पर साधना फलवती नहीं होती। साधक को जितना श्रम उपासनात्मक उपचारों में करना पड़ता है उससे अधिक प्रयत्न आत्म परिष्कार के लिए आत्मशोधन के लिए करना पड़ता है।
उपासना करता है वह विद्वान्, प्राणवान्, दीर्घ-जीवी यशस्वी, सुसम्पन्न, उदार और महा मनस्वी बनता है।
उपासना की जो पद्धति गत वर्श काम में लाई जाती रही है। वह तो यथावत् रहेगी ही। साथ ही त्राटक और प्राणायाम के दो प्रयोग अतिरिक्त रूप से सम्मिलित रहेंगे। पंचकोशों को प्रकाशवान् बनाने के लिए घृत दीप के माध्यम से त्राटक को और कुण्डलिनी जागरण के सन्दर्भ में अनुलोम-विलोम सूर्य वेधन प्राणायाम की क्रिया कराई जायेगी। एक घण्टे का विशेष ध्यान, विशेष निर्देशनों के साथ-साधक और शिक्षक साथ-साथ सम्पन्न करेंगे।
उपासना प्रकरण दोनों ही इस आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। भौतिक विज्ञान के सहारे भौतिक साधन बढ़ते हैं। आत्म विज्ञान के सहारे आत्मिक विशिष्टताओं को उभारा और सुदृढ़ किया जा सकता है। आत्मिक क्षेत्र में प्राण शक्ति भर देने की विद्या को गायत्री कहा गया है।
उपासना को व्यायाम और साधना को आहार-विहार की सुव्यवस्था के समतुल्य माना गया है। अन्तःशक्ति के सहारे व्यक्तित्व को परिष्कृत बनाया जाता है और उस आधार पर अनेकानेक सिद्धियाँ, सरलताएँ प्राप्त करने का पथ-प्रशस्त होता चला जाता है।
उपासना करें - आत्म-बल सम्पादित करने में जुट जाएँ, इसी में दूरदर्शिता है।
उपासना करता है-उसके अन्तःकरण पर से केले के तने जैसी-कषाय कल्मषों की परतें उतरती चली जाती है। उसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है और सारे तत्त्व आत्मा की उपलब्धि संभव होती है।
उपासनात्मक उपचारों में करना पड़ता है उससे अधिक प्रयत्न आत्म परिष्कार के लिए आत्मशोधन के लिए करना पड़ता है।
उपासना करो। प्राण ही जीवन है। इस लोक में अमृत की प्राप्ति का आधार प्राण ही है।
उपासना करते हैं, वे श्रेष्ठ सन्तान उत्पन्न करते हैं उनकी बार-बार मृत्यु नहीं होती।
उपासना करते रहे हैं अथवा अन्य प्रकार से अपनी आत्मिक स्थिति को ऊँची उठा चुके है। गायत्री विद्या का योग पक्ष और ब्रह्म तेज का तपश्चर्या पक्ष दोनों ही समन्वित है। सविता का भर्ग तत्त्व ब्रह्म तेज है और धियः तत्त्व की प्रेरणा ब्रह्म विद्या कहलाती है। इन दोनों का समन्वय ब्रह्म वर्चस् है।
उपासना साधना के नाम से जाना जात है। भक्ति-भावना के साथ अध्यात्म साधनाओं में निरत रहने की प्रक्रिया अभिनव और उपयोगी आस्थाओं की प्रतिष्ठापना अन्तःकरण के मर्मस्थल में कर सकना सम्भव हो जाता है। स्पष्ट है यह स्थापना पुरानी अनुपयुक्तता का उन्मूलन भी करती है। सुसंस्कारों की अभिवृद्धि से कुसंस्कारों का निरस्त होते जाना स्वाभाविक है। मात्र अवांछनीयता के उन्मूलन का प्रयास सफल नहीं हो सकता उस स्थान पर परिष्कृत स्थापना की नितान्त आवश्यकता रहती है।
उपासना करता है वह ब्रह्म भूत ही हो जाता है।
उपासना भी सार्थक बन पड़ेगी।
उपासना के समय भगाना चाहता है। यह कैसे हो सकता है। जो विचार और भावबोध तुझे अभीष्ट तथा श्रेष्ठ प्रतीत होते हैं, उनका दिन भर स्मरण रख। उसी पात-भूमिका के साथ सभी काम कर। यही साधना है।
उपासनात्मक और साधनात्मक अवलम्बन ग्रहण करने से उपलब्ध हो सकती है। उपासना को व्यायाम और साधना को आहार-विहार की सुव्यवस्था के समतुल्य माना गया है। अन्तःशक्ति के सहारे व्यक्तित्व को परिष्कृत बनाया जाता है और उस आधार पर अनेकानेक सिद्धियाँ, सरलताएँ प्राप्त करने का पथ-प्रशस्त होता चला जाता है।
उपासना में इसे दशम द्वार माना गया है। नौ द्वार तो इन्द्रिय छिद्र हैं ही। उन्हें दो नथुने, दो कान, दो आँखें , एक मुख , दो मल-मूत्र छिद्र इस प्रकार उनकी गणना सर्वविदित है। दसवाँ द्वार यह ब्रह्मरंध्र है, इसी झरोखे में होकर आत्मा और परमात्मा की मिलन झाँकी -प्रणय केलि एवं समर्पण पाणिग्रहण का सरस शृंगारिक वर्णन मिलता है। योगी लोग इसी केन्द्र में प्राण को अवस्थित करके ब्रह्माण्ड का विचरण एवं नियन्त्रण करने जैसी सफलताएँ प्राप्त करते हैं।
उपासना की जाती है। सर्व वेद सारभूता गाय«यास्तु समर्थना। ब्रह्मादयोपि संध्या या ता ध्यायन्ति जपन्ति च।
उपासना का प्रयोजन यह है कि मानवी कलेवर के तीनों स्तर स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर-इस योग्य बन सकें कि उन पर दिव्य अवतरण सम्भव हो सके और स्थिर रह सके। तथ्य को ध्यान में रखते हुए गायत्री को ब्राह्मी कहा गया है। उसे ब्रह्म तत्त्व माना गया है। ब्रह्म और गायत्री की एकता के अनेकों प्रतिपादन शास्त्रों में मिलते हैं-
उपासना में गायत्री को मातृ सत्ता के दिव्य शक्ति के रूप में नारी कलेवर का निर्धारण हुआ है। मानवी आकृति में उसे देवी की प्रतीक प्रतिमा के रूप में प्रतिष्ठापित किया गया है। यह उचित भी है। इसमें पवित्रता, सहृदयता, उत्कृष्टता, सद्भावना, सेवा साधना जैसे मातृ शक्ति में विशिष्ट रूप से पाये जाने वाले गुणों का साधक को अनुदान मिलता है। इस प्रतीक पूजा से नारी तत्त्व के प्रति पूज्य भाव की सहज श्रद्धा उत्पन्न होती है।
उपासना के अन्त में ‘सूर्यार्घदान’ के रूप में जप की पूर्णाहुति की जाती है। अनुष्ठान काल में दीपक की-अगरबत्ती की अग्नि स्थापना की आवश्यकता भी सूर्य शक्ति का प्रतिनिधित्व रखने के रूप में ही की जाती है। यज्ञाग्नि में आहुति देने का विधान पुरश्चरणों का अंग है। इसमें भी दूरस्थ सूर्य की निकटस्थ प्रतिनिधि अग्नि की प्रतिष्ठा करने की भावना है। सूर्य को गायत्री का देव-प्राण-मान कर “यन्मंडलं दीप्ति करं विशालं ..................” पुनात माँ तत्सवितुर्वरेण्यम्।
उपासना करने से साधक तेजस्वी बनता है। जो तेजवान है वस्तुतः वही बलवान है। मोटी काया बना लेने भर से कोई तेज रहित दुर्बल मनः स्थिति का व्यक्ति बलवान नहीं कहला सकता ह।
उपासनात्मक कर्मकाण्ड भी कब सफल होते हैं। ब्राह्मण की दुर्दशा का -असफलता का एकमात्र कारण उसकी उत्कृष्टता का स्तर गया-गुजरा होना ही है, साधना विधानों में अन्तर रहने की बात इस सन्दर्भ में कोई बड़ा व्यवधान प्रस्तुत नहीं करती । कहा भी है-
उपासना की तरह बल की उपासना भी आवश्यक है। शास्त्रकार ने ‘बल उपास्व’ का निर्देश दिया है और कहा है कि आत्मोत्कर्ष का लाभ बल हीनों को नहीं मिल सकता “नायमात्मा बल हीनेन लभ्यः” सच है बल हीनों को न आत्मा मिल सकेगा और न परमात्मा। भौतिक जीवन में भी उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ता । इस संसार के बाज़ार में सम्पदाएँ-विभूतियाँ और उपलब्धियाँ, समर्थता के मूल्य पर ही खरीदी जाती है।
उपासना माना गया है। उसका तत्त्व दर्शन और उपासना प्रकरण दोनों ही इस आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। भौतिक विज्ञान के सहारे भौतिक साधन बढ़ते हैं। आत्म विज्ञान के सहारे आत्मिक विशिष्टताओं को उभारा और सुदृढ़ किया जा सकता है। आत्मिक क्षेत्र में प्राण शक्ति भर देने की विद्या को गायत्री कहा गया है।
उपासना का मुझे प्रसन्न करता है, उसे ही मैं प्रखर बनती हूँ। ब्राह्मण, ऋषि तथा मेधावी बनाती हूँ।
उपासना करनी चाहिए। अन्य कामनाओं के लिए अन्य देवताओं को पूजें।
उपासना करने वाले विद्वान् और श्रद्धावान होते हैं।
उपासनात्मक इष्ट देव सविता रखा गया है। कलेवर की प्रतीक पूजा नारी रूप में करने के साथ ही उच्च स्तरीय ध्यान में स्थापना भी प्राण की करनी पड़ेगी। गायत्री का प्राण सविता है। शरीर को देख लेने के बाद किसी भी वस्तु स्थिति उसके आन्तरिक स्तर को समझने में ही विदित होती है। सविता सम्पर्क के लिये अग्रिम कदम बढ़ाने के पीछे भी यही कारण है।
उपासना-आराधना करके अभीष्ट वरदान प्राप्त करने की आकांक्षा तभी पूरी हो पाती है जब अन्तरंग में अवस्थित दिव्य शक्तियों, वृत्तियों और प्रवृत्तियों को परिष्कृत करने की साधना की जाय। वस्तुतः इन्हीं अन्तः क्षमताओं को अलंकार रूप से दिव्य लोक में निवास करने वाली सत्ता कहा गया है। यह दिव्य लोक अपना ही अन्तः प्रदेश समझा जाना चाहिए और देवी देवताओं के रूप में अंतः क्षमताओं को मान्यता देनी चाहिए।
उपासना करो। उसकी कृपा से परम शान्ति, परम पद मिलता है।
उपासना का तात्पर्य ब्रह्म तेज का अवतरण आत्म चेतना की पृष्ठ भूमि पर सम्पन्न कराना है। आत्मा को पृथ्वी और ब्रह्म तेज को सूर्य की उपमा दी जा सकती है। पृथ्वी पर जो जीवन दृष्टिगोचर होता है वह सूर्य का ही अनुदान है। सूर्य आत्मा जगतस्थुश्च’ सूर्य को जगत् की आत्मा बताया गया है। पृथ्वी पर जिस तरह सूर्य केन्द्र से जीवन बरसता है उसी प्रकार आत्मा रूपी पृथ्वी पर ब्रह्म सत्ता के प्राण तेज की वर्षा होती है।
उपासना अवधि पूरी करनी पड़ी है। ब्रह्म वर्चस् साधकों को भी इस प्रकार की तपश्चर्या के लिए तैयार होकर आना चाहिए। एक दिन दाल-चावल शाक-दूसरे दिन दलिया, दाल-चावल आँवला, शंख-पुष्पी ब्राह्मी, गोरखमुण्डी, तच, शतावरी की चटनी दोनों समय। यही सामान्य आहार रहेगा। प्रातःकाल पंचगव्य।
उपासना के बल पर ही प्राप्त किया। दूसरी नई सृष्टि रच डालने की शक्ति भी प्राप्त की थी। भली प्रकार साधना की हुई गायत्री से भला कौन-सा लाभ प्राप्त नहीं किया जा सकता ।
उपासना करते हैं।”
उपासना करता है वही ब्राह्मण है।
उपासना वेदों का सारभूत तत्त्व है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सभी देव संध्या सहित गायत्री की आराधना करते हैं।
उपासना भी आवश्यक है। शास्त्रकार ने ‘बल उपास्व’ का निर्देश दिया है और कहा है कि आत्मोत्कर्ष का लाभ बल हीनों को नहीं मिल सकता “नायमात्मा बल हीनेन लभ्यः” सच है बल हीनों को न आत्मा मिल सकेगा और न परमात्मा। भौतिक जीवन में भी उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ता । इस संसार के बाज़ार में सम्पदाएँ-विभूतियाँ और उपलब्धियाँ, समर्थता के मूल्य पर ही खरीदी जाती है।
उपासना करने वाले के लिए यही साक्षात् ब्रह्म है। यह शिरोमणि मन्त्र है। इससे बढ़कर और कोई मन्त्र-तन्त्र आदि नहीं है।
उपासना तत्त्व (परिच्छेद तीन) के अनुसार आदित्य, गणेश, देवी रुद्र और विष्णु ये पंचदेव ही समस्त कर्मों में पूजनीय है। जो इन पाँचों का बुद्धिपूर्वक भजन-स्मरण करते हैं, वे कभी भी मलिन नहीं होते-
उपासना के विधि-विधान भले ही गायत्री की उच्चस्तरीय साधना जैसे ही क्यों न हो। भले ही पंच कोशों को ज्योतिर्मय बनाने की- कुण्डलिनी जागरण की -महान् साधनाओं का सुअवसर मिल रहा हो- हर हालत में व्यावहारिक जीवन का परिष्कार-परिशोधन तो अनिवार्य रहेगा ही।
उपासनाकाल में भी अभीष्ट भावभूमि बनी रह सकती है। जीवन-साधना के अभाव में उपासना भी सार्थक बन पड़ेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-August
उपासना विधियाँ स्पष्टतः गुण,कर्म, स्वभाव में घुसे हुए दोष-गुणों को उखाड़ने और सुसंस्कारी सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बना लेने की प्रेरणा देने के लिए ही विनिर्मित हुई। संकेतों को जो जिस सीमा तक व्यवहार में उतार सके समझना चाहिए कि उसकी साधना उसी सीमा तक सार्थक हो गई।
उपासना करते हैं। यदि सचमुच भगवान् है तो वह क्या है?
उपासना पद्धति की तत्व विवेचना में जितनी गहराई तक उतर जाय यही तथ्य उभरता चलेगा कि यह समस्या विधि-विधान पशु प्रवृत्तियों से छुटकारा पाने और देव संस्कृति के अनुरूप सद्भावना, सज्जनता, सहृदयता विकसित करने के लिए ही इन प्रयोगों का आविर्भाव हुआ है। पवित्रीकरण,आचमन प्राणायाम, न्यास आदि की आरम्भिक उपासना विधियाँ स्पष्टतः गुण,कर्म, स्वभाव में घुसे हुए दोष-गुणों को उखाड़ने और सुसंस्कारी सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बना लेने की प्रेरणा देने के लिए ही विनिर्मित हुई। संकेतों को जो जिस सीमा तक व्यवहार में उतार सके समझना चाहिए कि उसकी साधना उसी सीमा तक सार्थक हो गई।
उपासना समस्त क्रिया-कलाप, विध-विधान,इस उद्देश्य के लिए विनिर्मित हुए हैं कि उनमें निदिष्ट संकेतों का अनुसरण मनुष्य अपने व्यक्तित्व को अधिकाधिक पवित्र परिष्कृत बनाने चलें और उदारता की अभिवृद्धि के लिए लोक-मंगल के लिए बढ़े-चढ़े अनुदान प्रस्तुत करें। पात्रता के अनुरूप ही समाज का सम्मान सहयोग मिलता है। उसी के अनुरूप आत्म-सन्तोष एवं ईश्वरीय अनुग्रह का अनुदान उपलब्ध होता है। स्वर्ग परिष्कृत दृष्टिकोण का नाम है। वह जिसके पास भी होगा वह गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से धरती का देवता बनता चला जायगा और अपनी गरिमा से संपर्क क्षेत्र को प्रभावित करके स्वर्गीय वातावरण का सृजन करेगा।
उपासना एवं जीवन साधना के अति महत्वपूर्ण अंग बन जाते हैं। जीवन की सार्थकता का प्रथम सूत्र यह कर्मयोग ही है।
उपासना का बीज सद्भावना-सम्वेदना, सहानुभूति, सहिष्णुता जैसी कोमलताओं से अन्तःकरण को निरन्तर दैवी सरसता से ओत-प्रोत किए रहता है।
उपासना के विधि विधान एवं कर्मकाण्डों को ही सब कुछ मान बैठना पर्याप्त नहीं। जप, ध्यान आदि के क्रिया कलाप अति सरल है। उनमें न शारीरिक कष्ट उठाने पड़ते हैं और न मनोनिग्रह की आवश्यकता पड़ती है। मुख से कुछ शब्दों का उच्चारण और कर्मकाण्ड में प्रयुक्त होने वाले सस्ते उपकरणों के साथ साथ हाथों की थोड़ी सी हेरा फेरा इतनी महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली नहीं हो सकती कि उतने भर से दिव्य शक्तियों का अनुदान वरदान प्राप्त कर सकना सम्भव हो सके। इसके साथ साथ चेतना को गरम करने वाली तपश्चर्या का जुड़ा रहना नितान्त आवश्यक है।
उपासना लोक सेवा के सभी पक्षों का समावेश रखा जाय। उपार्जन में ही पूरा समय न खपा दिया जाय।
उपासना प्रक्रिया का सुविस्तृत आधार खड़ा किया है। श्रद्धा का तात्पर्य है-श्रेष्ठता से असीम प्यार। भक्ति कहते हैं-करुणा, उदारता एवं सेवा को। श्रद्धा और भक्ति की इन्हीं सत्प्रवृत्तियों के सहारे आत्म-चेतना में ईश्वर का अवतरण होता है। भगवान दो उद्देश्य लेकर अवतरित होते हैं।
उपासना के साथ जुड़े हुए क्रिया-कलापों का उद्देश्य जीवन देवता की आराधना करना और अधिपति अन्तरात्मा को प्रसन्न करके अभीष्ट वरदान प्राप्त करना ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-October
उपासना करता है उसकी वाणी की गति इच्छित क्षेत्र तक हो जाती है।
उपासना की उच्च कक्षा कहा गया है। नामोच्चार से बढ़कर वाक्, वाक् से भी बड़ा मन, मन से अधिक महत्त्वपूर्ण संकल्प और संकल्प से बलवत्तर चित्त को कहा गया है चित्त से भी बढ़कर ध्यान का बताया गया है। नाम, जप, वाक्-संयम, मनोनिग्रह, संकल्पोद्भव, चित्त निरोध, ये सब उपासना की क्रमिक भूमिकाएँ हैं ध्यान इन सबसे ऊपर है।
उपासना की क्रमिक भूमिकाएँ हैं ध्यान इन सबसे ऊपर है।
उपासना के लिए दूर-दूर से भक्त जना जाते हैं। अग्नि ज्वाला को दैवी शक्ति मानने के पीछे यह कुण्डलिनी अग्नि का ही तारतम्य है। यज्ञाग्नि में अग्निहोत्र करने, धृत धारा चढ़ाने के पीछे भी अग्नि एवं सोम के संयोग की आवश्यकता का प्रतिपादन है। ब्रह्माग्नि और आत्माग्नि के संयोग को कुण्डलिनी साधना कहा गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-November
उपासना आदि प्रयास करते हुए मनुष्य अधिकाधिक चरित्र निष्ठ और समाज-निष्ठ बनने का प्रयत्न करता है समाज-निष्ठा को धार्मिकता और सभ्यता कहते हैं। चरित्र-निष्ठा को धार्मिकता और सभ्यता कहते हैं। चरित्र-निष्ठा का दर्शन अध्यात्म कहलाता है उसी का दूसरा नाम संस्कृति भी है। इन्हीं के आधार पर मनुष्य प्रामाणिक और पराक्रमी बनता है। प्रगति के यही दो चरण है जिनके सहारे लोग भौतिक एवं आत्मिक क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं।
उपासना कहा जा सकता।’
उपासना को भी धर्म के अंगों में महत्त्वपूर्ण स्थान देते हैं जैसा कि देना चाहिए उन्हें इस परम धर्म योग की शरण में आना चाहिए।
उपासना की जाती हैं।
उपासना करो, जब तक प्राण है तभी तक जीवन है। इस लोक में अमृतत्व प्राप्ति का आधार प्राण ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-February
उपासना, हवन आदि के क्रम में साथ-साथ प्रतिदिन दो बार इन साधनाओं का अभ्यास कराया जाता है। दस दिवसीय शिविरों में तीन-तीन दिन तक एक-एक साधना का क्रम चलता है। प्रातः 45 मि0 ध्यान साधना एवं सायंकाल क्रियायोग सहित साधना का प्रशिक्षणात्मक अभ्यास कराया जाता है। साधक दिये जाने वाले निर्देशों का अनुसरण करते हुए साधना की गहराइयों में उतरते और दिव्य अनुभूतियाँ प्राप्त करते हैं।
उपासना में सघन श्रद्धा, उसके लिए नित्य समय लगाने का निश्चय (2) जीवन साधना के पंचशीलों का पालन (3) दिसम्बर अखण्ड ज्योति के आह्वान आमन्त्रण एवं अपनों से अपनी बात को अपने लिए व्यक्तिगत सब मानकर कुछ करने का साहस (4) अपने संपर्क क्षेत्र में इस प्रेरणा का विस्तार। उपेक्षा को उत्साह में परिवर्तन करने के लिए जन-संपर्क का कार्य क्रम (5) महिला जागरण शाखा संगठन का आरम्भ और उसे अग्रगामी बनना। यह पाँचों कार्य करने के लिए इस बसन्त पर्व पर हमारा विशेष आग्रह हैं इस दिशा में जो जितना कर सकें उसकी सूचना शान्ति-कुँज पहुँचा दें।
उपासना-क्रम सम्पन्न करने की तत्परता बरतने के पीछे संकल्प-क्रम सम्पन्न करने की तत्परता बरतने के पीछे संकल्प-बल के अभिवर्धन की प्रक्रिया जुड़ी हुई है। अस्त व्यस्तता और अव्यवस्था को इसी कठोरता के आधार पर निरस्त किया जाता है। बाल चंचलता को हटाकर दृढ़ निशित प्रौढ़ता उत्पन्नं करने में प्रचण्ड मनोबल की ही प्रधान भूमिका रहती है। व्रत, उपवास, तप, तितीक्षा, मौन, ब्रह्मचर्य आदि के अनेकों विधि निषेध अनुशासन साधना में पालन करते हैं साधना विधि में ढील-पोल नहीं चलने दी जाती, वरन् निर्धारित क्रिया-कृत्यों को राई−रत्ती पूरा करना पड़ता है। इस फौजी अनुशासन को ठीक तरह निभाते चलने पर मनोनिग्रह की सफलता मिलती है और उस आत्म-विजय पर गर्व गौरव अनुभव करता हुआ साधक जीवन -संग्राम में बढ़े-बढ़े आदर्शवादी पुरुषार्थ, पराक्रम, कर सकने में समर्थ होता है।
उपासना का जो क्रम अपनाया गया था उसकी पूर्णाहुति आज हो जायेगी। अग्निहोत्र तथा मिलन सम्मेलन कार्यक्रमों के साथ वह साधनाक्रम आज समाप्त हो जायेगा। जो लोग उसे आगे भी जारी रखना चाहें, रखे रहे। वह साधन प्रक्रिया अपने आप में बहुत ही सारगर्भित है और इस योग्य है कि उसे आजीवन अपनाये रहा जाय। सूर्योदय से पूर्व 45 मिनट का समय बन्धन इसलिए था कि उस समय शक्ति संचार का विशेष लाभ मिल सके वैसी व्यवस्था की गई थी।
उपासना में मात्र जीवन-क्रम के निर्धारण के संकेत सूत्र सन्निहित रहते हैं। वास्तविक साधना तो जीवन की दिशा धारा को आदर्शवादी प्रयोजनों के साथ जोड़ने से सम्बन्ध रखती है। चमत्कार उसी से मिलते हैं। सिद्धियों का स्रोत इसी केन्द्र के साथ जुड़ा हुआ है। संसार भर के महामानवों को अपनी जीवन प्रक्रिया को ऐसी बनाकर चलना पड़ा हैं जिसमें उनके व्यक्तित्व में उत्कृष्टता भरी रहे साथ ही लोक-मंगल के लिए किये जाने वाले प्रयासों का उत्साहवर्धक बाहुल्य जुड़ा रहे।
उपासनाओं का अभ्यास कराने के साथ-साथ इन पंचशीलों को अपनाने पर भी जोर दिया जायेगा और व्यक्तिगत स्थिति को देखते हुए यह बताया जायेगा और व्यक्तिगत स्थिति को देखते हुए यह बताया जायेगा और व्यक्तिगत स्थिति को देखते हुए यह बताया जायेगा कि इस मार्ग में किसे क्या कठिनाई आ सकती है और उसका निराकरण किस प्रकार सम्भव हो सकता है?
उपासना की कर्मकाण्ड परक-प्रक्रिया को ‘जादुई’ मानकर चलने की भूल किसी को भी नहीं करनी चाहिए। उपासना में मात्र जीवन-क्रम के निर्धारण के संकेत सूत्र सन्निहित रहते हैं। वास्तविक साधना तो जीवन की दिशा धारा को आदर्शवादी प्रयोजनों के साथ जोड़ने से सम्बन्ध रखती है। चमत्कार उसी से मिलते हैं। सिद्धियों का स्रोत इसी केन्द्र के साथ जुड़ा हुआ है।
उपासना पर बैठना-सुखासन लगाना मेरु दण्ड का सीधा होना जैसा शारीरिक अनुशासन नियत स्थान ,नियत समय, नियत मात्रा में नियम विधान से उपासना-क्रम सम्पन्न करने की तत्परता बरतने के पीछे संकल्प-क्रम सम्पन्न करने की तत्परता बरतने के पीछे संकल्प-बल के अभिवर्धन की प्रक्रिया जुड़ी हुई है। अस्त व्यस्तता और अव्यवस्था को इसी कठोरता के आधार पर निरस्त किया जाता है। बाल चंचलता को हटाकर दृढ़ निशित प्रौढ़ता उत्पन्नं करने में प्रचण्ड मनोबल की ही प्रधान भूमिका रहती है। व्रत, उपवास, तप, तितीक्षा, मौन, ब्रह्मचर्य आदि के अनेकों विधि निषेध अनुशासन साधना में पालन करते हैं साधना विधि में ढील-पोल नहीं चलने दी जाती, वरन् निर्धारित क्रिया-कृत्यों को राई−रत्ती पूरा करना पड़ता है। इस फौजी अनुशासन को ठीक तरह निभाते चलने पर मनोनिग्रह की सफलता मिलती है और उस आत्म-विजय पर गर्व गौरव अनुभव करता हुआ साधक जीवन -संग्राम में बढ़े-बढ़े आदर्शवादी पुरुषार्थ, पराक्रम, कर सकने में समर्थ होता है।
उपासना को निरानन्द और उपेक्षणीय कदापि अनुभव न करता। साधना के सत्परिणामों पर हमारा पक्का विश्वास रहा होता तो अन्य लाभदायक उद्योगों में जितनी तत्परता रहती है उससे भी अधिक इस दिशा में रही होती। उपेक्षा और अन्य मनस्कता के कारण ही हम उखड़ी-उखड़ी साधना करते रहते हैं और विश्वास की परिपक्वता के अभाव में सत्परिणामों से वंचित रहते हैं। विश्वास के फलस्वरूप झाड़ी का भूत, रस्सी का साँप ओर आशंका का आतंक रोमांचकारी भय संचार कर सकता है। तो उसकी उच्चस्तरीय प्रतिष्ठापना से पत्थर में से देवता भी प्रकट हो सकता है।
उपासना के समय पर निर्धारित विधिविधान का पालन आत्मानुशासन का प्रथम चरण है उसे व्यायामशाला में होने वाले अभ्यास एवं प्रयोगशाला में किये गये प्रयोग के समतुल्य माना जा सकता है। उसकी प्रौढ़ता , प्रखरता गुण, कर्म, स्वभाव में घुसी हुई अव्यवस्था को सुसंतुलन में बदलने से ही सम्भव होती है। संयम शब्द इसी के लिए प्रयुक्त होता है। इन्द्रियाँ अपने विषयों में अतिवाद बरतने के लिये मचलती है और खुली टूट चाहती है। उस पा अंकुश न लगाया जाय तो फिर वासनाओं के उच्छृंखलता, शरीर, मन, धन और सम्मान में आग लगाते चली जाएगी और जो कुछ हाथ में है उस सब को जलाकर स्वाहा कर देगी।
उपासना का भी इससे ही साम्य पाया जाता है।
उपासना प्रक्रिया पर, लक्ष्य पर, मार्ग दर्शक पर जितनी गहन श्रद्धा होगी उसी अनुपात से आत्म साक्षात्कार का- ईश्वर प्राप्ति का- उद्देश्य पूरा होगा। श्रद्धा ओर विश्वास अन्तरात्मा की वे दिव्य स्थितियाँ है जिन पर आत्मिक प्रगति की समस्त सम्भावनाओं का आधार खड़ा होता है। लोक शरीर बल, मनोबल, बुद्धि बल और धन बल के आधार पर मिलने वाली लौकिक सफलताओं से ही परिचित है। यदि किसी प्रकार यह जाना जा सके। कि व्यक्तित्व का स्वरूप एवं भविष्य निर्धारण करने में आकांक्षाओं एवं संवेदनाओं की ही सर्वोपरि भूमिका होती हैं तो यह भी समझ में आ जाएगा कि जो बनना है उसके अनुरूप श्रद्धा को ढालने की अनिवार्य आवश्यकता होगी।
उपासना का कर्मकाण्डों में पूरी तरह समावेश किया गया है। प्रातः काल जल्दी उठना, तत्परतापूर्वक नित्यकर्म से निवृत्त होना-नियम स्थान पर-नियत मर्यादाओं का पालन करते हुए-उपासना पर बैठना-सुखासन लगाना मेरु दण्ड का सीधा होना जैसा शारीरिक अनुशासन नियत स्थान ,नियत समय, नियत मात्रा में नियम विधान से उपासना-क्रम सम्पन्न करने की तत्परता बरतने के पीछे संकल्प-क्रम सम्पन्न करने की तत्परता बरतने के पीछे संकल्प-बल के अभिवर्धन की प्रक्रिया जुड़ी हुई है। अस्त व्यस्तता और अव्यवस्था को इसी कठोरता के आधार पर निरस्त किया जाता है। बाल चंचलता को हटाकर दृढ़ निशित प्रौढ़ता उत्पन्नं करने में प्रचण्ड मनोबल की ही प्रधान भूमिका रहती है। व्रत, उपवास, तप, तितीक्षा, मौन, ब्रह्मचर्य आदि के अनेकों विधि निषेध अनुशासन साधना में पालन करते हैं साधना विधि में ढील-पोल नहीं चलने दी जाती, वरन् निर्धारित क्रिया-कृत्यों को राई−रत्ती पूरा करना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-September
उपासना काल में भी तरह तरह की भौतिक कामनाएँ करते रहते हैं और उनकी पूर्ति के लिए देवी देवताओं के सामने गिड़गिड़ाते रहते हैं। ऐसी पूजा पत्री में भी ध्यान योग की मौलिकता में सर्वथा दूर एवं भिन्न ही समझना चाहिए। अन्तःकरण को पशु प्रवृत्तियों से छुड़ाना मानव कहलाने योग्य बनाना और अन्ततः देवोपम स्थिति तक उतनी ही अंतःक्षेत्र की खदान में छिपी हुई रत्न राशि करतलगत होती जाती है। जन साधारण में यह भ्रम है कि साधना की विलक्षणता से जादुई सिद्धि मिलती है। इसमें से एक मध्यवर्ती आधार बिन्दु भुला या हटा दिया जाता है कि सच्ची साधना का प्रत्यक्ष प्रतिफल अतिमानव स्तर का उपलब्ध होता है।
उपासना, जप, तन आदि के विधि-विधान बनाने गये हैं। आत्म-निमार्ण ही ईश्वर प्राप्ति का एक मात्र उपाय है। परिष्कृत आत्मा ही परमात्मा बनकर सामने आ खड़ा होता है। भगवान को लुभाने-फुसलाने की सारी तिकड़म निरर्थक सिद्ध होती हैं। आत्म-शोध नहीं ईश्वर प्राप्ति की महान उपलब्धि का प्रतिफल उत्पन्न करता है।
उपासना में या अन्य परामर्शों के कारण ही संपर्क बनाना, बढ़ाना और ढोला करना पड़ता है उन्हें न तो घनिष्ठ माना गया है और न अपनी किसी योजना में उनके सहयोग की जाना हर दृष्टि से आशा से -अधिक सफल रहा है। व्यक्ति निर्माण , परिवार निर्माण और समाज निर्माण के व्यापक अभियान का शुभारम्भ इन्हीं आत्मीय जनों से आरम्भ हुआ और चिनगारी के दावानल बनने की तरह सुविस्तृत होता चला गया है।
उपासना की महत्ता और विधि व्यवस्था (4) जीवन साधना प्रयोग और सिद्धियाँ (5) आत्मोत्कर्ष का सम्बल स्वाध्याय (6) शक्ति संचय का स्त्रोत संयम (7) सेवा साधना और उसके सिद्धान्त (8) सेवा, धर्म और उसका स्वरूप (9) धर्म तन्त्र की शक्ति और सामर्थ्य (10) युग परिवर्तन की पृष्ठ भूमि और रूपरेखा ।
उपासना के पंचकोश अनावरण एवं कुण्डलिनी जागरण की साधना पद्धति की ही प्रधानता रहेगी, पर साथ-साथ बीस हजार टोली नायकों को भी नवयुग के अग्रदूत बनने के लिए आवश्यक चेतना और क्षमता देने के लिए दस दस दिवसीय शिक्षण सूत्रों को भी क्रम चलता रहेगा। पुनर्गठन के समुद्र मन्थन से जो रत्न उभर कर आवेंगे उन्हें साधना सत्रों में बनाकर युग निर्माताओं की अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो सकने योग्य बनाना भी तो एक काम है। आगामी सत्र योजना में इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखा जाना है।
उपासना के क्रिया कृत्य में यही रहस्यमय संकेत सन्देश सन्निहित है कि हम अपने व्यक्तित्व को किस प्रकार समुन्नत करें और जो प्रसुप्त पड़ा है, उसे जागृत करने के लिए क्या कदम उठाये । सच्ची साधना वही हैं जिसमें देवता की मनुहार करने के माध्यम से आत्म निर्माण की दूरगामी योजना तैयार की जाती और सुव्यवस्था बनाई जाती है।
उपासना करता है। उसकी गति इच्छित क्षेत्र तक हो जाती है।
उपासना किसी को भी विश्वस्त और प्रगतिशील बनाने का वरदान देती है।
उपासना में लगता है न सत्कर्मों में। इस काँटे को निकालना ही चाहिए। भोजन के साथ मक्खी पेट में चली गई हो तो उलटी कर देना ही एकमात्र उपाय है। भूतकाल में बने पड़ें पापों का प्रायश्चित करके ही उनका शमन समाधान किया जा सकता है।
उपासना है तो क्रिया साधना। सद्भाव और सत्कर्म को जब तक धन ऋण विद्युत के समान सम्बद्ध नहीं करेंगे, तब तक प्रकाश सम्भव नहीं। ज्ञान, कर्म, के अभाव में अपूर्ण है और कर्म ज्ञान के अभाव में अधूरा। एतदर्थ इन दोनों में समन्वय से ही धर्माचरण में पूर्णता आती है। किसी व्यक्ति की दीन हीन, असहाय स्थिति को देखकर यदि हमारे मन में सहानुभूति एवं सम्वेदना के भाव को उत्पन्न होते हैं किन्तु उसकी सेवा एवं सहायता के पर्याप्त उपक्रम एवं उपचार नहीं किये गये तो धर्म का अपूर्ण आचरण माना जाएगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-December
उपासना, समग्र उत्कर्ष जीवन-लक्ष्य सर्वतोमुखी विकास उल्लास के समस्त तत्वों का समावेश है। कहा गया है-
उपासना में ध्यान धारण पर जोर देने के अनेक लाभों आध्यात्मिक लाभों के अतिरिक्त एक अतिरिक्त लाभ यह भी है कि उसे करते रहने पर विस्मृति की शिकायत पनपने नहीं पाती।
उपासना की सुखद प्रतिक्रिया का सृजन इस तीसरी भाव भूमिका में ही होता है।
उपासना में आरम्भिक और उच्चस्तरीय साधकों के लिए हर अंग में पृथक-पृथक परामर्श रहेगा। मार्ग में आने वाली कठिनाइयों के कारण एवं निराकरण भी छपते रहेंगे। इसके अतिरिक्त शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक सामाजिक एवं आध्यात्मिक प्रगति के लिए किसको, किस प्रकार क्या करना चाहिए यह भी सुझाया जाता रहेगा। इस प्रकार साप्ताहिक पत्रिका में भविष्य में गुरुदेव का प्रत्यक्ष और व्यावहारिक मार्गदर्शन समझा जा सकेगा। इसके अतिरिक्त परिवार के अन्य वरिष्ठ साधकों के अनुभव परामर्श एवं विचार भी इस पत्रिका में छपते रहेंगे।
उपासना, पवित्र और प्राकृतिक जीवन, आत्मा को जानने और प्रकाश का ध्यान करने, जीवों का वध न करने, माँस न खाने आदि मानवतावादी शिक्षाएँ देती है। इसके आदर्श सिद्धान्तों से प्रभावित होकर अब तक वहाँ हजारों लोग उसकी सदस्यता ग्रहण कर चुके हैं।
उपासना करती है। इन्हीं सन्त को उसने गुरु मान लिया। एक बार जब यह भारतवर्ष गई तो इसने अपने गुरु से ज्योतिष सम्बन्धी अपनी जिज्ञासा प्रकट की और अपनी हथेली उन्हें दिखाते हुए पूछा- ‘आप मेरे बारे में कोई चमत्कारिक बात बताइये जो मेरे जीवन में निश्चित रूप से घटित होने वाली हो?”
उपासना से जो प्रतिफल मिलने बताये गये हैं उन्हें भी सात ऋषियों के वरदान समझना चाहिए जो अपने आत्मसत्ता के रूप में हिमालय में निरन्तर निवास और तप करते हैं। इन्हीं शक्ति धाराओं को साधना विज्ञान में सात चक्र कहा गया है, प्रत्येक चक्र प्रत्येक ऋषि का एक एक वरदान एक एक सद्गुण के रूप में प्राप्त होता है। वे ही ऋद्धि-सिद्धियों साथ में जीवन को देवमय बनाते हैं और स्वर्गीय उपलब्धियों से सुसम्पन्न करते हैं।
उपासना के फलस्वरूप सीधी सम्पदाएँ मिलती हैं। सच्ची साधना के फलस्वरूप अन्तरंग में उत्कृष्टता उभरती है और सज्जनोचित सद्भावों का विस्तार होता है। बहिरंग के सत्प्रवृत्तियाँ सक्रिय होती हैं और क्रिया-कलापों में महामानवों जैसी प्रतिभा व्यवस्था एवं शालीनता की मात्रा बढ़ती है। जहाँ आत्मविकास का यह स्वरूप दृष्टिगोचर हो समझना चाहिए कि यहाँ सच्ची साधना की गई और उसके फलस्वरूप व्यक्तित्व निखरने के स्वरूप ही भौतिक और आत्मिक सफलताओं के-ऋद्धि-सिद्धि के रूप में वे प्रतिफल प्राप्त होते हैं जिनका माहात्म्य साधनाओं की सफलता के रूप में वर्णन किया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-May
उपासना का भी यही उद्देश्य है।
उपासना के बढ़िया कारतूस भी समुचित प्रतिफल उत्पन्न नहीं कर सकते।
उपासना करो- गायत्री महामन्त्र का आश्रय लो और आत्म कल्याण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ चलो।
उपासना करता है सो काम रूप हो जाता है। उसकी कामनाएँ फलवती होती है।
उपासना करने आग्रह किया गया है यह प्राण आखिर है क्या? यह विचारणीय है।
उपासना का आनन्द देने भर के लिए नहीं, वरन् मनः स्थिति परिस्थिति एवं अस्तित्व स्थिति में इस विकास परिवर्तन का आश्चर्यजनक परिणाम दृष्टिगोचर हो सकता है। उससे कुसंस्कारों की वे कीलें उखड़ सकती है, जो साधारणतया बहुत गहरी और मजबूत मालूम पड़ती है।
उपासना काल में प्रकाश अनुभूतियाँ प्रायः होती रहती है। आग की उड़ती हुई चिनगारियों से लेकर ज्योति ज्वालाओं तक प्रकाश गोलकों से लेकर तन्तु धाराओं तक की अनुभूतियाँ ध्यानावस्था में होती है। आरम्भ में यह कौतुक कौतूहल जैसा ही प्रतीत होता है किन्तु पीछे इस प्रकाश के आलोक में आत्म बोध ब्रह्म बोध से लेकर अदृश्य दर्शन तक के कितने ही ऐसे आधार सामने आते हैं, जिनसे आत्म कल्याण का पथ प्रशस्त हो सके और जीवन को समुन्नत एवं सर्वोपयोगी बनाने का सौभाग्य मिल सके।
उपासना करते हैं।
उपासना उसके इस एक पक्ष की ही की जाती है। जो मनुष्य को सत्प्रयोजनों की स्थिति में अग्रसर करने ने लिए प्रयुक्त होती है। चेतना की सामर्थ्य तो उभय पक्षीय है। वह दुष्टता के क्षेत्र में दुस्साहस बनकर भी काम करती है। इस निषिद्ध पक्ष को नहीं जीवन को उत्कृष्टता की और अग्रसर करने वाले सत्संकल्पों को उपास्य प्राण माना गया है।
उपासना में मनुष्याकृति की देव छवियों को इष्टदेव मानने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उस प्रयोजन के लिए प्रकाश ज्योति की स्थापना की जाती है। रूप की दृष्टि से छवि-श्रवण की दृष्टि से नाद और श्वसन प्रक्रिया की दृष्टि से प्राणायाम का उपाय काम में लाया जाता है। निराकार साधना के यह तीनों ही उपाय एकाग्रता और भाव कल्पना को प्रखर परिपक्व बनाने के उद्देश्य से की जाती है। साकार उपासना का भी यही उद्देश्य है।
उपासना करो। जब तक प्राण है, अभी तक जीवन है। इस लोक में अमृतत्व प्राप्ति का आधार प्राण ही है।
उपासना साधना का लक्ष्य पूरा न हो सकेगा। आत्म-परिष्कार कपड़े की धुलाई और साधना रंगाई हैं बिना धुले कपड़े पर ठीक तरह रंग कहाँ चढ़ता है? आत्म -शोधन के बिना उच्चकोटि की साधनाएँ भी निष्फल चली जाती है। अतएव सर्वप्रथम वर्तमान और भावी जीवन को पवित्र परिष्कृत बनाने की योजना बनानी चाहिए और पिछले पापों के कारण आत्मिक प्रगति पथ पर अवरोधों की तरह अड़े रहने वाले दुष्कृतों का परिमार्जन प्रायश्चित प्रक्रिया द्वारा करना चाहिए।
उपासना करने के लिए अभिवर्धन के लिए तत्त्वदर्शियों ने निर्देश दिये है। प्रज्ञोपनिषद ने प्राण की व्याख्या संकल्प रूप में की है।
उपासना करनी चाहिए।
उपासनाओं में पंचकोशों के अनावरण तथा कुण्डलिनी जागरण मुख्य है। इनकी तैयारी करते समय सर्वप्रथम पाप परिमार्जन और आत्म शोधन के लिए साहसपूर्वक कदम बढ़ाने चाहिए। इस आधार पर खड़ी की गई साधना तपश्चर्या के सफल होने में कोई अड़चन शेष नहीं रह जाती।
उपासना का प्रथम चरण है- आत्म शोधन कोई भी धर्म-कृत्य करने से पूर्व पवित्रीकरण, आचमन, प्राणायाम न्यास आदि कृत्य करने होते हैं। इनका उद्देश्य आत्मिक पवित्रता की आवश्यकता को प्राथमिकता देने के तथ्य पर ध्यान आकर्षित करना हैं। गन्दे नाले में थोड़ा सा गंगा जल डाल देने पर उसकी शुद्धि नहीं होती हैं। अन्तरंग और बहिरंग जीवन में निकृष्टता भरी रहे तो उपासना साधना का लक्ष्य पूरा न हो सकेगा। आत्म-परिष्कार कपड़े की धुलाई और साधना रंगाई हैं बिना धुले कपड़े पर ठीक तरह रंग कहाँ चढ़ता है?
उपासना कही जा रही है। यह नादोपासना शास्त्रों के जानने वाले एवं मूढ़ दोनों लोगों के लिए उपयोगी हैं।
उपासना एक सर्व सुलभ एवं सर्वजनीन नित्य कर्म है। उसे साँस लेने, जल पीने, भोजन करने, टहलने आदि के समतुल्य माना जा सकता है। उसे सहज भाव बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के भी किया जा सकता है। पर उच्चस्तरीय साधनाओं में उतनी सरलता नहीं है। उन्हें विशेष व्यायामों एवं चिकित्सा उपचारों के समान समझना चाहिए।
उपासनात्मक उपक्रमों को अपनाना भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। आहार-विहार से स्वास्थ्य वृद्धि होती है साथ ही दुर्बलता और रुग्णता को निरस्त करने के लिए विशेष चिकित्सा उपचार एवं व्यायाम आदि भी अपनाने की आवश्यकता पड़ती है। प्राण शक्ति के अभिवर्धन में -कुण्डलिनी जागरण में सूर्य वेधन जैसे प्राणायामों की भी आवश्यकता होती है। योगशास्त्र में व्यक्ति-प्राण और ब्रह्म-प्राण के सम्बन्ध और समन्वय की चर्चा इस प्रकार की है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-June
उपासना की जाती है उतने समय तक लोगों का आवागमन न रहें। उपासना में कई व्यक्ति एक साथ बैठ सकते हैं, पर वे सभी रहने आत्म तल्लीन ही चाहिए। एक की हलचलें दूसरों का ध्यान न उचटावें, तभी साथ बैठने की सार्थकता है।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों का उतना ही फल मिलेगा जितना कि उतने समय तक किये गये हलके फुलके शारीरिक परिश्रम का। उसी साधना को करते हुए एक व्यक्ति चमत्कारी फल प्राप्त करता है। पर दूसरे को असफल रहना पड़ता है। इसमें श्रद्धा की मात्रा में न्यूनाधिकता होना ही प्रधान कारण होता है।
उपासना में संध्या वन्दन नित्य कर्म है। वह गायत्री के बिना सम्पन्न नहीं होता। चारों वेद भारतीय धर्म और संस्कृति के मूल आधार है और उन चारों की जन्म दात्री वेदमाता गायत्री है। वेदों की व्याख्या अन्यान्य शास्त्र पुराणों में हुई है इस प्रकार आर्ष वांग्मय के सारे कलेवर को ही गायत्रीमय कहा जा सकता है। गायत्री और भारतीय धर्म संस्कृति को बीज और वृक्ष की उपमा दी जा सकती है।
उपासना का प्रचलन विश्व-व्यापी है। पाश्चात्य विद्वानों तथा साधकों ने उसके वर्णन के लिए इन शब्दों का प्रयोग किया है-वर्ड लोगोस, हिस्पर्स फ्राम द अननोन, इनर हृयस, द लेग्वेज आफ सोल, प्रिमार्डियल साउन्ड, द व्हायस फ्राम हैवन, द व्हायस आफ सोल आदि।
उपासना, स्वाध्याय, आदि के क्रिया कलापों का समुचित समन्वय करते हुए इस प्रकार निर्धारण करना चाहिए जिसमें आलस्य प्रमाद के लिए कोई गुँजाइश न रहे। विश्राम के लिए रात्रि का समय ही पर्याप्त है। जल्दी सोने और जल्दी उठने की आदत डाली जानी चाहिए। समय का एक क्षण भी बर्बाद न जाने पावे और उसका उपयोग निरर्थक कामों में नहीं वरन् जीवन को सार्थक बनाने वाले निर्वाह की उचित आवश्यकता पूरी करने वाले कार्यों की ही प्रमुखता रहे। मनोरंजन के लिए-थकान दूर करने के लिए-बीच-बीच में थोड़ा-थोड़ा उचित अवकाश देने के लिए गुँजाइश रखी जा सकती है।
उपासना दो पक्ष है। एक सावित्री दूसरी कुण्डलिनी। सावित्री की प्रतिमाओं में पाँच मुख चित्रित किये गये है। यह मानवी चेतना के पाँच आवरण है। इन्हें पाँच आवरण कह सकते हैं।
उपासना की जाय। आसन के नाम पर सिद्धासन, सर्वांगासन, पद्मासन आदि पंरो को मोड़ने-तोड़ने के विधि विशेष को शोभित नहीं किया जाना चाहिए, वरन् उस समूचे वातावरण का संकेत सन्निहित समझा जाना चाहिए। जहाँ कि उपासना की जा रहीं है या की जानी है।
उपासना के फलस्वरूप यहाँ के साधक इन्द्रियातीत क्षमताओं के अधिपति और स्वर्ग सम्पदा के अधिकारी देव मानव कहलाते रहे है।
उपासनाओं के अभ्यास की क्या आवश्यकता? प्राणवायु को सावधानीपूर्वक संयमित रखकर ‘केवल कुम्भक’ प्राणायाम का अभ्यास करते हुए सिद्धासन में दृढ़ रहकर साधना करने से उन्मनी कला स्वयमेव सिद्ध होती है और तीनों ड़ड़ड़ड़ भी इस अभ्यास से स्वतः ही सिद्ध हो जाते हैं।
उपासना का प्रचारात्मक और साधनात्मक प्रयोग और भी एक बड़ा प्रयास सामूहिक रूप से करने की दृष्टि से ही गत वर्ष साधना धर्मानुष्ठानों के इतिहास में अभूत पूर्व ही समझा जाना चाहिए। एक लाख नैष्ठिक साधकों द्वारा पूरे एक वर्ष तक नियमित एवं अनुशासित रूप से जो सामूहिक गायत्री जप हुआ। इस वर्ष उसका उत्तरार्ध सम्पन्न किया जा रहा हैं। छोटे-छोटे हजारों गायत्री यज्ञों के साथ बड़े-बड़े युग निर्माण सम्मेलनों को जोड़कर नवयुग का सन्देह सुनाने तथा उपयुक्त वातावरण बनाने की दृष्टि से इसे अपने ढंग की अनोखी प्रक्रिया ही समझा जाना चाहिए।
उपासना तो घर पर भी चलती रह सकती है, पर यदि कुछ विशेष करना हो तो उसके लिए विशेष स्थान, वातावरण, सान्निध्य एवं मार्ग दर्शन भी चाहिए। यह सब प्राप्त करने के लिए उसके लिए उपयुक्त स्थान का प्रबंध करना वह आधार है जिस पर सफलता बहुत कुछ निर्भर रहती है।
उपासना के प्रति उत्साह उत्पन्न करने-उसके कारण और आधार समझाने तथा व्यावहारिक मार्ग दर्शन ड़ड़ड़ड़ की अपनी आकांक्षा बहुत समय से हो रही हैं जब कि जीवन का कार्यकाल बहुत ही स्वल्प रह गया है तब तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि इस आकांक्षा को पूरा करने के लिए कुछ आधार जल्दी ही खड़ा कर दिया जाय। अन्यथा एक अत्यन्त उपयोगी विज्ञान का परिचय और प्रयोग जानने से लोगों को वंचित ही रह जाना पड़ेगा। ड़ड़ड़ड़ साधनाक्रम का शुभारम्भ, ब्रह्मवर्चस आरण्यक का निर्माण इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया हैं साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष की इसे महानतम स्मृति एवं उपलब्धि कहा जाय तो उसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।
उपासना से चेतना पंचक और पदार्थ पंचक के दोनों ही क्षेत्रों को समर्थ परिष्कृत बनाने का अवसर मिलता है। सावित्री साधना यही है। इसका देवता सविता है। सावित्री और सविता का युग्म है। इस उपासना में सूर्य को प्रतीक और तेजस्वी परब्रह्म को ड़ड़ड़ड़ सर्वोपरि शक्ति है।
उपासना का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि आत्म शोधन की प्रक्रिया पूर्ण की जाय। यह प्रक्रिया प्रायश्चित विधान से ही पूर्ण होती है। हठयोग में शरीर शोधन के लिए नेति-धोति वस्ति, न्यौली, वज्रोली, कपाल भाँति क्रियाएँ करने का विधान करना पड़ता है। भोजन बनाने से पूर्व चौका, चूल्हा, बर्तन आदि की सफाई कर ली जाती है। आत्मिक प्रगति के लिए भी आवश्यक है कि अपनी गतिविधियों का परिमार्जन किया जाय।
उपासना की दूसरी प्रक्रिया है कुण्डली। इसे जड़ और चेतन को परस्पर बाँधे रहने वाली सूत्र ड़ड़ड़ड़ प्रकारान्तर से यह प्राण प्रवाह है ड़ड़ड़ड़ की समस्त हलचलों का संचालन करता ड़ड़ड़ड़ और नर नारी अपनी जगह पर अपनी स्थिति में ड़ड़ड़ड़ भी अपूर्ण हैं। इन दोनों को समीप लाने और ड़ड़ड़ड़ में एक अविज्ञात चुम्बकीय शक्ति काम करती रहती है। इसी के दबाव से युग्मों का बनना और प्रजनन क्रम चलना सम्भव होता है। उदाहरण के लिए इस नर और नारी के बीच घनिष्ठता उत्पन्न करने वाले चुम्बकीय धारा प्रवाह को कुण्डलिनी की एक चिनगारी कह सकते हैं।
उपासना की जा रहीं है या की जानी है।
उपासना के तीन चरण है-(1) नित्य कर्म, सन्ध्या वंदन (2) संकल्पित अनुष्ठान पुरश्चरण (3) उच्चस्तरीय योग साधना। नित्य कर्म को अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है। आये दिन अन्तःचेतना पूरे वातावरण के प्रभाव से चढ़ते रहने वाले ड़ड़ड़ड़ अंकुश लगता है।
उपासनाएँ अभीष्ट हों तो शारीरिक अवयवों पर अनावश्यक दबाव न डालकर सारी प्रक्रिया को ध्यान परक-भावना मूलक ही रखना होगा।
उपासना में कई व्यक्ति एक साथ बैठ सकते हैं, पर वे सभी रहने आत्म तल्लीन ही चाहिए। एक की हलचलें दूसरों का ध्यान न उचटावें, तभी साथ बैठने की सार्थकता है।
उपासना में सूर्य को प्रतीक और तेजस्वी परब्रह्म को ड़ड़ड़ड़ सर्वोपरि शक्ति है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-January
उपासना कर रहा था। नित्य कर्म की तरह उसे अपनाये हुए था। पर कभी ऐसा अनुभव न हुआ कि इसके फलस्वरूप कोई विशेष अनुभूति होती हो। इसका कारण साधना विधि की कोई कमी ही सोचता था, जिसके कारण माता का अनुग्रह प्राप्त नहीं होता। ब्रह्म वर्चस् सत्र से लौटने के बाद स्थिति बदल गई।
उपासना में सूर्य, दीपक अथवा किसी अन्य वर्ण आकार के प्रकाश का ध्यान किया जाता है। वह प्रकाश सुदूर अन्तरिक्ष में उदय हो रहा है और साधक एक छोटे बालक की तरह उसका दिव्य दर्शन कर रहा है। उसकी धूप सेंक कर शरीर को गरम कर रहा है। इष्ट देव की की ऊष्मा और तेजस्विता साधक के शरीर में भीतर प्रवेश करके स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों में नव चेतना का संचार कर रही है, ऐसी भावना की जाती है। प्रकाश ऊर्जा के साधक में प्रवेश करने के साथ-साथ उसके स्थूल शरीर में ओजस्विता, सूक्ष्म शरीर में मनस्विता, कारण शरीर में तेजस्विता, सूक्ष्म शरीर में मनस्विता, कारण शरीर में तेजस्विता की वृद्धि होती अनुभव की जाती है।
उपासना की ध्यान प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है। इससे एकाग्रता का लाभ ही नहीं विश्वव्यापी दिव्य सत्ता के साथ घनिष्ठता बना लेने और उसके साथ संपर्क साध सकने वाले आत्मिक चुम्बकत्व का भी विकास होता है। इस मार्ग पर चलने चलते मनोनिग्रह और मनोमय की स्थिति प्राप्त हो सकती है। समाधि का, आत्म-साक्षात्कार एवं ईश्वर साक्षात्कार का लाभ मिल सकता है।
उपासना से अभिनव आनन्द-कई वर्ष से गायत्री उपासना कर रहा था। नित्य कर्म की तरह उसे अपनाये हुए था। पर कभी ऐसा अनुभव न हुआ कि इसके फलस्वरूप कोई विशेष अनुभूति होती हो। इसका कारण साधना विधि की कोई कमी ही सोचता था, जिसके कारण माता का अनुग्रह प्राप्त नहीं होता। ब्रह्म वर्चस् सत्र से लौटने के बाद स्थिति बदल गई।
उपासना परक कितने की चित्र विचित्र कर्मकाण्डों की भरमार की जाती रहती है। साधन का स्वरूप क्रिया कृत्यों तक सीमित रहता है। उतने को ही पर्याप्त मानकर सिद्धि चमत्कार की, स्वर्ग मुक्ति की, आत्म-साक्षात्कार ईश्वर दर्शन की अपेक्षा की जाती रहती है। यहाँ भी साधना परक साधनों को ही सब कुछ मान लिया गया है। साध्य आत्मा है।
उपासना के समय ऐसा अनुभव होता है, मानो भगवान की प्रत्यक्ष समीपता से मिलने कला आनन्द और माता का पय-पान करने जैसा सन्तोष मिल रहा है। अब यह विश्वास दृढ़ हो गया है कि जीवन का परम लक्ष्य पाने का सही आधार मिल गया और अभीष्ट सफलता मिल कर रहेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-July
उपासना, शास्त्र श्रवण, पूजा पाठ, कथा कीर्तन, सत्संग, प्रवचन, व्रत, उपवास, नियम, संयम, तीर्थयात्रा, पर्व एवं संस्कार आदि समस्त प्रक्रियाएँ धर्म भावना को परिपक्व करने के उद्देश्य से विनिर्मित हुई हैं। ताकि मनुष्य अपने जीवन के महारिपुओं-वासना एवं तृष्णा, लोभ, मोह तथा आकर्षणों एवं प्रलोभनों से मुक्त होकर अपने कर्तव्य पथ पर अबाध गति से अग्रसर हो सके। साथ ही यदि वह इन धर्म के साधनों को साध्य मान बैठने की-गलती कर लेता है तो उसके समस्त धार्मिक कर्मकाण्ड जो धर्म के कलेवर मात्र है-धर्म के प्राण से कोसों दूर ले जाते हैं। कलेवर अपने आप में पूर्ण नहीं है, कलेवर का महत्व प्राण से है और प्राण का कलेवर से। सुस्पष्ट है दोनों एक दूसरे के परस्पर पूरक है।
उपासनात्मक व्यायाम है-ध्यान यह भी अन्तःचेतना को एक विशेष वातावरण में रखने की शिक्षा प्रक्रिया है। इसके कई चरण और कई प्रकार है जिन्हें साधक की मनःस्थिति एवं परिस्थिति के अनुरूप बताया और कराया जाता है। इसमें अनुभवी मार्ग दर्शन की आवश्यकता पड़ती है।
उपासना का विवरण................
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-April
उपासनात्मक विधि-विधान बताये जाते हैं। उन बीजांकुरों में खाद पानी भी चरित्र निष्ठा और समाज निष्ठा का ही देना पड़ेगा। कोई साधना कितनी ही शास्त्र सम्मत एवं अनुभूत क्यों न हो अन्तः करण का स्तर निकृष्ट बने रहने पर विकसित न हो सकेगी। मरुस्थल में लगाये हुए बहुमूल्य पौधे भी उद्यान कब बन पाते है? ताप तापोँ की जलन साधना को भी उसी तरह जला देती है।
उपासना का स्वरूप है- समन्वय। भक्ति का चरम लक्ष्य है- समन्वय-एकीकरण-समर्पण द्वैत को मिटा कर अद्वैत की स्थापना। यह नाले का नदी में समर्पण हुआ। इसे कठपुतली का बाजीगर की उँगलियों के साथ गठबंधन कहा जा सकता है। इसे पत्नी का पति का वरण समझा जा सकता है-अनुशासन की स्थापना यही है।
उपासना की यही सर्वोच्च स्थिति है। इसमें निरन्तर ईश्वर दर्शन की अनुभूति होती है। भगवान सूक्ष्म है, उसका साक्षात्कार भावानुभूति के रूप में ही होता है। आँखों से खिलौने की तरह ईश्वर को देखने की इच्छा करना बाल-बुद्धि के अतिरिक्त और कुछ नहीं। जब हवा, सर्दी, मैत्री, क्रोध, सुख, दुख जैसे प्रत्यक्ष आँख से नहीं देखे जा सकते तो ईश्वर जैसे अचिन्त्य, अप्रमेय को इन चर्म-चक्षुओं से देखा जा सकना कैसे सम्भव हो सकता है?
उपासना से जीव किस स्थिति तक जा पहुँचता है इसकी चर्चा पौराणिक कथा-गाथाओं में अलंकारिक रूप से विस्तारपूर्वक होती रही है। वह वस्तु स्थिति है। बुद्धिवाद और अनुभव न कर सके फिर भी संवेदनाओं ओर अनुभूतियों के क्षेत्र की विशिष्टता अस्वीकार नहीं की जा सकती। नर-पशुओं और नर-नारायणों के बीच देखा जाने वाला अन्तर भी अकारण नहीं होता। उसमें पंचम आयाम की विशेषताएँ ही काम कर रही होती है।
उपासना तक के किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय स्तर पाने के लिए अपने अन्नमय कोश को ऐसी ही सुसंस्कृत, सुयोग्य, सक्षम स्थिति में लाना आवश्यक होता है। उसके लिए उसकी मूल इकाइयों को विशेष रूप से गढ़ना-ढालना पड़ता है इसे ही अन्नमय कोश के परिष्कार विकास की साधना कहा जाता है।
उपासना श्रद्धा ओर भक्ति के आधार पर ही सम्भव होती है।पूजा उपचार तो उन सम्वेदनाओं को उभारने वाले प्रयोग अभ्यास भर है। ईश्वर परायणता की परख श्रद्धा और भक्ति की कसौटी पर ही होती है।
उपासना भाव पक्ष को समुन्नत करती है। कुण्डलिनी जागरण से शक्ति पक्ष उभरता है। उससे मानवी अस्तित्व में ईश्वरीय वर्चस्व की प्रचण्डता प्रकट होती है। आनन्दमय कोश की कुण्डलिनी साधना में भक्ति और शक्ति दोनों का समन्वय है।
उपासना के सहारे ही अन्तःचेतना का विकास होता है।
उपासना तक के अनेक माध्यम अपनाने होते हैं। उन सबके संयोग से ही अन्नमय कोश की प्रभावशाली साधना का स्वरूप बनता है।
उपासना के बिना नहीं हो सकता। इसके उपरान्त आगे की विशेष साधनाएँ अपनाई जाती। एक अनुष्ठान दूसरा पुरश्चरण।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-December
उपासना, प्रार्थना अन्ध-विश्वास नहीं, बल्कि उतनी ही अथवा उससे भी अधिक सच्च बातें है, जितना कि हम खाते हैं, पीते हैं, चलते हैं, बैठते हैं ये सच है। बल्कि यों कहने में अत्युक्ति नहीं कि यही एक मात्र सच है, दूसरी सब बातें झूठ हैं, मिथ्या हैं।”
उपासना के साथ साधना का समन्वय करना पड़ता हैं। तपश्चर्या हर प्रगतिशील और महत्वाकाँक्षी के लिए अनिवार्यतः आवश्यक हैं। इससे बचकर सरलतापूर्वक किसी के वरदान, आदर्शवाद स्वयं से कुछ महत्वपूर्ण कहीं जा सकने वाली उपलब्धि मिल सकना असम्भव हैं। यह तथ्य हमें किशोरावस्था के आरम्भ में ही समझा दिया गया था और बिना भटके- बिना समय गँवायें- अपने पथ प्रदर्शक के संरक्षण में गायत्री महामन्त्र के साथ अभीष्ट तपश्चर्या को सम्मिलित परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं। कार्यों की गणना और उनकी व्यापकता एवं सफलता का उल्लेख करना यहाँ निरर्थक हैं।
उपासना की और उसके फलस्वरूप प्राप्त अनुभवों के आधार पर अपने भाव व्यक्त करते हुए स्तवन किया-
उपासना के द्वारा उन्होंने प्राण-शक्ति पर विजव बाई भी दृश्यों को देख लेना इनके लिये सहज बात के भी मन की बात कम्प्यूटर को भाँति खान लिया करते थे, ऐसी घटनायें उनके जीवन काज में कई बार घटों जिनसे इस बात का प्रमाण मिलता था।
उपासना वेदों का सारभूत तत्व हैं, ब्रह्म, विष्णु महेश आदि सभी देव सन्ध्या सहित गायत्री की आराधना करते हैं।
उपासना की। मनु इक्ष्वाकु की श्रद्धा से द्रवीभूत होकर उनके पास आये और पूछा- “राजन्! कहो मैं तुम्हारी क्या सहायता कर सकता हूँ?” इक्ष्वाकु ने भगवान् मनु को सादर प्रणाम करते हुए निवेदन किया-”प्रभु! आत्म-कल्याण की इच्छा से मैंने गुरु वशिष्ठ से दीक्षा ली, उन्होंने मुझे तप करने की प्रेरणा दी। मैंने उपासना तो प्रारम्भ कर दी पर तप का स्वरूप अभी तक मेरी समझ में नहीं आया।”
उपासना एवं स्तुति करते हैं और उसी महाभण्डार से जो उपलब्ध करते हैं, उसका अनुदान अपने क्षेत्र में वितरित करते रहते हैं। इस संदर्भ में उपलब्ध अनेक विवरणों में से कुछ नीचे प्रस्तुत किये जाते हैं-
उपासना, यम-नियम, प्राणायाम, उपवास आदि के द्वारा शुद्ध होकर दिव्य-शक्तियों के संपर्क में आने लगता है, यह अनुभूतियाँ भी स्पष्ट होने लगती हैं।”
उपासनायें कर सभा-कक्ष में जुड़ने लगे। थोड़ी देर में सभा-भवन पूरी तरह भर गया। सम्राट् अशोक भगवान् बुद्ध के समीप बैठे।
उपासना का सर्वसाधारण के लिए जितना प्रयोग सरल और उपयुक्त था, उसे हम गत 20 वर्षों कसे सिखाते, समझाते चले आ रहे हैं। जिन विद्या की उच्च स्तरीय साधना के दो पक्ष हैं-(1) योग, (2) तन्त्र योग-मार्ग में उच्च-स्तरीय गायत्री साधना पंच-कोशों के अनावरण की हैं, जिसकी ‘घोड़ी’ चर्चा गायत्री महाविज्ञान के तृतीय खंड में हैं और थोड़ा-सा मिश्रण अखण्ड-ज्योति के माध्यम से तीन वर्ष तक कर चुके हैं। अभी इस विद्या को सांक्तोपांक्त बताया जाना शेष हैं। उसी प्रकार तन्त्र मार्ग की गायत्री कुण्डलिनी कहलाती हैं। इसकी छुट-पुट चर्चा इन दिनों हम कर रहें हैं।
उपासना, आस्तिकता, नेकनीयती, प्राणियों को न सताने, माँस आदि अभक्ष न खाने की शिक्षा दिया करता। सामाजिक जीवन में साधु को बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त थी। उनका सभी लोग हृदय से आदर करते और उनके निर्णयों को स्वीकार करते। मृत्यु के बाद उन्हें भावनापूर्वक एक कब्र में दफना दिया गया पर तब भी लोग उनके नाम पर न्याय और सत्कर्म की प्रेरणा प्राण करते रहते। विशेष अवसरों पर उनके लिए लोग उनकी कब्र के पास जाकर प्रार्थना भी किया करते।
उपासना के प्रारम्भिक दिन से ही प्रारम्भ हो जाती है, सिद्धावस्था में तो जानने के लिये कुछ शेष रहता ही नहीं। साध दृष्टा-सर्वदर्शी बन जाता हैं।
उपासना तो प्रारम्भ कर दी पर तप का स्वरूप अभी तक मेरी समझ में नहीं आया।”
उपासना का है। गायत्री मूल है। देव शक्तियाँ उसकी शाखा-उपशाखा मात्र है। वे शक्तियाँ भी अपनी समर्थता मूल-केन्द्र से ही उपलब्ध करके इस योग्य बनती है कि अपना क्रिया-कलाप विधिवत जारी रख सकें, किसी साधक को अभीष्ट वरदान दे सकें।
उपासना, स्त्रियों के गायत्री अधिकार, जाति पाति के शास्त्रीय विधान एवं माँसाहार के विरुद्ध दिये गये उनके भाषणों ने रूढ़िवादी लोगों में हलचल मचा दी थी। सम्प्रदायवाद और सामाजिक बुराइयों के विरोध में स्वामी जी को समर्थन देने बड़ी संख्या में लोग आते रहते थे।
उपासना पथ का मार्ग-दर्शन करने वाले इस महान् संगठन का जन्म दिन भी यही हैं। 4. धर्म और अध्यात्म की अभिनव चेतना प्रवाहित करने वाली ज्ञान गंगोत्री-गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास इसी दिन हुआ। 5. 4 लाख नैष्ठिक गायत्री उपासकों के सान्निध्य में सम्पन्न हुए इस युग के महानतम सहस्र कुण्डों गायत्री महायज्ञ का संकल्प इसी दिन लिया गया। 6. वेद उपनिषद्, दर्शन, स्मृति, पुराण, ब्राह्मण आरण्यकों की, आर्ष ग्रन्थ अनुवाद, प्रकाशन एवं प्रसार की योजना तथा गतिविधियों का श्रीगणेश इसी दिन से हुआ। 7. युग-निर्माण आन्दोलन के उद्घोष तथा युग-निर्माण पत्रिका के अवतरण का दिन बसन्त-पंचमी ही हैं।
उपासना का सामान्य क्रम अभी भी जारी हैं पर उस 24 वर्ष की विशिष्ट तपश्चर्या का ही प्रभाव था कि लोक-यंक्तल के, नव-निर्माण के महान प्रयोजन में अपना कुछ महत्वपूर्ण योगदान सम्भव हो सका। पिछले बीस वर्षों में जितना रचनात्मक कार्य आध्यात्मिकता के आधार पर जनजागरण की दिशा में सम्भव हो सका, उसे अद्भुत और अनुपम ही कहा जा सकता हैं। आज उसका मूल्यांकन कठिन हैं। कुछ दिन रात जब अपने मिशन के कार्य और परिणाम का लेखा-जोखा तैयार किया जायेगा तो यह एक चमत्कार ही लगेगा कि एक साधन-हीन व्यक्ति के प्रयास इतने स्वल्पकाल में इतने व्यापक और इतने विशाल
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-September
उपासना और आत्म-शोधन की तपश्चर्या के लिए समय निकालना चाहिये और लोक-मंगल की साधना में नियमित रूप से कम-से-कम चार घण्टा समय देना चाहिए प्रातः और सायंकाल का समय व्यक्तिगत साधना के लिए और दिन का बचा समय लोक-मंगल की सेवा प्रक्रिया में लगाने के लिए नियुक्त रहना चाहिये। कहना न होगा कि समय की आवश्यकता को देखते हुए, आज की सबसे बड़ी लोक सेवा विचार परिवर्तन की दृष्टि से किये गये, प्रयत्नों पर ही निर्भर है। आर्थिक, शारीरिक या बौद्धिक सुविधाएँ बढ़ाने वाले कार्य भी यों सेवा क्षेत्र में आते हैं पर उनका भी
उपासना की होती तो छल-कपट ईर्ष्या-द्वेष दम्भ, हिंसा, पाशविकता, युद्ध को प्रश्रय न देते। स्वर्ग और है भी क्या, जहाँ यह बुराइयाँ न हों वहीं तो स्वर्ग है। माँ की उपासना से स्वर्गीय आनंद की अनुभूति इसीलिये यहीं प्रत्यक्ष रूप से अभी मिलती है। इसलिये मैं कहता हूँ कि कुछ दिन और सब उपासना पद्धति बंद कर केवल “माँ” की मातृ-भूमि की उपासना करनी चाहिये।
उपासना का सारा कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। मंदिरों की स्थापना के भूल में मनीषियों का एक मात्र प्रयोजन यही था कि इन धर्म केन्द्रों के द्वारा आस्तिकता के आदर्शों का जन-मानस में व्यापक प्रकाश पहुँचाया जाय।
उपासना का प्रयोजन पूरी तरह प्राप्त किया जा सकता है। विशालकाय मन्दिरों का निर्माण करने की प्रक्रिया भारतीय मनीषियों ने अति महत्त्वपूर्ण प्रयोजन की पूर्ति के लिए विनिर्मित की है।
उपासना से स्वर्गीय आनंद की अनुभूति इसीलिये यहीं प्रत्यक्ष रूप से अभी मिलती है। इसलिये मैं कहता हूँ कि कुछ दिन और सब उपासना पद्धति बंद कर केवल “माँ” की मातृ-भूमि की उपासना करनी चाहिये।
उपासना कर, बुद्धि को पूजा, संकल्पवान् बन और चरित्र की दृढ़ता को अपने जीवन में उतार, यही तेरी ईश्वर-भक्ति है। भारतवर्ष में बढ़ रहे पाप, हिंसा, अनैतिकता और अनादर के यवनी-कुचक्र से लोहा लेने और भगवान् की सृष्टि को सुन्दर बनाने के लिये इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है।” समर्थ गुरु रामदास ने समझाया।
उपासना पद्धति का प्रचलन करना चाहिए जिसमें केवल “माँ” की ही पूजा हो, माँ को ही भेंट चढ़ाई जाये?
उपासना करनी चाहिये।
उपासना, संयम, सेवा, सदाचार का पालन करता हुआ अपने भौतिक कर्तव्य पूरे करे, ताकि आत्म-शक्तियों का ह्रास न हो। शक्ति को विघटित कर देने से मनुष्य इस जीवन में भी दुःखी होता है और यह निम्नगामी योनियों की ओर आकर्षित हो जाता है। बढ़ी हुई शक्ति चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक, बौद्धिक अथवा आत्मिक उससे यह जीवन तो सफल होता ही है, उस परम स्थिति को प्राप्त करने से मूल लाभ मिलता है। इस विज्ञता का ही परिणाम है कि भारतीय जीवन शैली आज भी अपने ही ढंग की है। उसमें पाश्चात्य ढंग के विकारों के लिये कोई स्थान नहीं है।
उपासना पद्धति बंद कर केवल “माँ” की मातृ-भूमि की उपासना करनी चाहिये।
उपासना करें। अहंकारियों ने, दुष्ट-दुराचारियों स्वार्थी और इन्द्रिय लोलुप जनों ने मातृ-भू को कितना कलंकित किया है इस पर भावनापूर्वक विचार करते समय आंखें भर आती है। हमने अप्रत्यक्ष देवताओं को तो पूजा की पर प्रत्यक्ष देवी धरती माता के भजन का कभी ध्यान ही नहीं आया। आया होता तो आज हम अधिकार के प्रश्न पर रक्त न बहाते, स्वार्थ के लिये दूसरे भाई का खून न करते, तिजोरियाँ भरने के लिये मिलावट न करते, मिथ्या सम्मान के लिये अहंकार का प्रदर्शन न करते। संसार भर के प्राणी उसकी सन्तान-हमारे भाई हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-January
उपासना का भी कोई फल न मिले। देवताओं का वरदान वस्तुतः इतना सस्ता नहीं होता, जितना कि लोगों ने समझ रखा हे। वे मन्दिर में जाकर हाथ जोड़ जाने या अक्षत-पुष्प जैसी तुच्छ वस्तुएँ चढ़ा देने से प्रसन्न हो जायेंगे और अपने वरदान लुटाने लगेंगे-ऐसा सोचना अज्ञान के सिवाय और कुछ नहीं है। सामान्य पूजा-पाठ का अपना जो पुरस्कार है, मिलेगा वही, उससे अधिक कुछ नहीं।
उपासना का चरम लक्ष्य किसी मनुष्य आकृति या प्रकृति के देवता विशेष भगवान के साथ रिश्तेदारी या आदान प्रदान की प्रक्रिया जोड़ना नहीं वरन् अन्तःकरण के गहन मर्म स्थलों में सत्य, साम्य और ऐक्य के महान् सत्यों में प्रगाढ़ निष्ठा उत्पन्न करना है। शास्त्र विवेचन का यही निष्कर्ष है।
उपासना करता है, वह देवयान मार्ग द्वारा प्रथम अग्निलोक को प्राप्त होता है। फिर वायु-लोक में पहुँचता है, वहाँ से सूर्य-लोक में गमन करता, फिर वरुण-लोक में जाकर इन्द्र -लोक में पहुँचता है। इन्द्र-लोक से प्रजापति-लोक से ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। इस ब्रह्म-लोक में प्रविष्ट होने वाले मार्ग पर ‘आर’ नामक एक बृहद् जलाशय है। उससे पार होने पर काम क्रोध आदि की उत्पत्ति द्वारा ब्रह्म-लोक प्राप्ति की साधना और यज्ञादि पुण्य कर्मों को नष्ट करने वाले ‘येष्टिह’ नामक मुहूर्ताभिमानी देवता निवास करते है, उनसे छुटकारा मिलने पर विरजा नाम की नदी मिलती है, जिसके दर्शन मात्र से वृद्धावस्था नष्ट हो जाती है।
उपासना मात्र नहीं है। उसका क्षेत्र आत्मा के सूक्ष्म संस्थानों की साधना है। उन शक्तियों के प्रबोधन की प्रक्रिया है, जो मनुष्य के अन्तःकरण में बीज रूप में सन्निहित रहती है। आत्मिक अध्यात्म के उस क्षेत्र में एक से एक बढ़कर सिद्धियाँ एवं समृद्धियाँ भरी पड़ी है। किन्तु उनकी प्राप्ति तभी सम्भव है, जब मन, बुद्धि, चित, अहंकार से निर्मित अन्तःकरण पंचकोशों, छहों चक्रों, मस्तिष्कीय ब्रह्म-रन्ध्र में अवस्थित कमल, हृदय स्थित सूर्यचक्र, नाभि की ब्रह्म-ग्रन्थि और मूलाधार वासिनी कुण्डलिनी आदि के शक्ति संस्थानों और कोश-केन्द्रों को प्रबुद्ध, प्रयुक्त और अनुकूलता पूर्वक निर्धारित दिशा में सक्रिय बनाया जा सके।
उपासना क्यों बन्द कर दी?” सन्त मधुर वाणी में बोले-वत्स-भगवान की इच्छा है कि उनके संसार में कोई दीन दुःखी न रहे। उनकी इच्छा पूर्ति का महत्व अधिक है, सेवा सज्जनता भी उनकी भक्ति ही है।” इस उत्तर से राजा का पूर्ण समाधान हो गया।
उपासना करनी ही चाहिये।
उपासना करना व्यर्थ है। ऐसे अन्यायी और क्रूर परमात्मा का तो बहिष्कार हो जाना चाहिये। हीन-मना व्यक्ति इस प्रकार निराश होकर जीवन का एक बहुत बड़ा सम्बल और धैर्य का एक बहुत बड़ा आधार खो देता है। वह नास्तिक बनकर परमात्मा का विरोधी बन जाता है। ऐसा करके वह उस सर्वशक्तिमान का तो कुछ बिगाड़ नहीं पाता, केवल अपना ही आत्मिक विनाश कर लेता है।
उपासना सर्वोपरि है। अन्यान्य उपासनाओं की तुलना में यह प्रयोग निस्सन्देह अति सामर्थ्यवान् है। आपत्तियों के निवारण में लोक व्यवहार में प्रचलित उपाय करते हुए, यदि आत्म शक्ति को उत्पन्न एवं प्रयुक्त किया जा सके तो उसके आश्चर्यचकित करने वाले परिणाम होते देखे गये हैं।
उपासना नहीं वह सरल भी है,उत्तम भी है और सुखदायक भी। परोपकार करने में आत्मा की प्रसन्नता इतनी बढ़ जाती है कि रोमांच हो आता तो फिर उनका फल तो और भी स्वर्गीय सुखों से भरा हुआ होगा। भलाई साक्षात परमात्मा का निराकार स्वरूप है।
उपासना से ठीक होते देखे गये हैं, वह इस वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर ही हैं। सूर्य भगवान् का ध्यान करते हुए, धूप लेने में मानसिक शुद्धि और आत्मिक पवित्रता भी बढ़ती है, इसलिये ही सूर्य को लोक एवं परलोक दोनों प्रकार के सुखों का दाता कहा गया है।
उपासना करके जो जीवन में अलौकिक ऋद्धि-सिद्धि पाने की लालसा रखते है, वे किसी जुआरी की तरह नगण्य सा धन लगाकर बहुत अधिक लाभ उठाना चाहते है। बिना श्रम के मालामाल होना चाहते हैं। लोभी उपासकों की यह अनुचित आशा कभी भी पूरी नहीं हो सकती और हो वह भी सकता है कि इस लोभ के कारण उनकी अपनी उस सामान्य उपासना का भी कोई फल न मिले। देवताओं का वरदान वस्तुतः इतना सस्ता नहीं होता, जितना कि लोगों ने समझ रखा हे। वे मन्दिर में जाकर हाथ जोड़ जाने या अक्षत-पुष्प जैसी तुच्छ वस्तुएँ चढ़ा देने से प्रसन्न हो जायेंगे और अपने वरदान लुटाने लगेंगे-ऐसा सोचना अज्ञान के सिवाय और कुछ नहीं है।
उपासना अपेक्षित हो उसे करते रहा जाये। लौकिक जीवन को सुविकसित एवं सुसंस्कृत बना लेने के बाद ही आत्मिक अथवा अलौकिक जीवन में प्रवेश किया जाय-उल्लंघन करने वाले कभी सफलता के अधिकारी नहीं बन सकते। लौकिक जीवन की निकृष्टता आत्मिक जीवन के मार्ग में पर्वत के समान अवरोध सिद्ध होती है।
उपासना से जिन स्थूल लाभों की चर्चा की जाती है, वह सूर्यदेव की प्रकाश शक्ति का ही चमत्कार है। जिसे तरह मन में जब काम वासना के विचार उठते हैं, उसकी शारीरिक इन्द्रियों पर उत्तेजना परिलक्षित होती है, उसी प्रकार मन का ध्यान जब सूर्य लोक में करते हैं तो सूर्य की सबसे समीप वाली किरणों में मन का स्नान होता है और उसकी वह शक्तियाँ भी निश्चित रूप से शरीर में परिलक्षित होती हैं। भयंकर रोग, गायत्री उपासना से ठीक होते देखे गये हैं, वह इस वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर ही हैं। सूर्य भगवान् का ध्यान करते हुए, धूप लेने में मानसिक शुद्धि और आत्मिक पवित्रता भी बढ़ती है, इसलिये ही सूर्य को लोक एवं परलोक दोनों प्रकार के सुखों का दाता कहा गया है।
उपासना करने पर भी जब इच्छापूर्ति के कोई लक्षण दिखाई न दिये तो मुकुंद ने निराश होकर आत्म हत्या कर ली। मृत्यु के समय भी उसकी सम्राट बनने वाली इच्छा बनी रही। कहते है उसी के फलस्वरूप उसको दूसरे जन्म में सम्राट होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
उपासनाओं की तुलना में यह प्रयोग निस्सन्देह अति सामर्थ्यवान् है। आपत्तियों के निवारण में लोक व्यवहार में प्रचलित उपाय करते हुए, यदि आत्म शक्ति को उत्पन्न एवं प्रयुक्त किया जा सके तो उसके आश्चर्यचकित करने वाले परिणाम होते देखे गये हैं।
उपासना का सीधा प्रभाव मेरुदण्ड से होकर इस गुदा क्षेत्र में ही होता है। ऊपर से उतरने वाला प्राण प्रवाह पहले यहीं पहुँचता है और फिर गुच्छकों के द्वारा सारे शरीर में संचित होता रहता है। जितना अधिक साधन का विकास होता है उतना ही प्राणशक्ति का अभिवर्द्धन और उसी अनुपात से कुण्डलिनी जागृत होती चलती है। यह प्रकाश धीरे-धीरे नेत्र, वाणी, मुख और ललाट आदि सम्पूर्ण शरीर में चमकने लगता है। त्वचा में यही कोमलता और बुद्धि में सात्विकता एवं पवित्रता की अभिवृद्धि करता है।
उपासना करो।” इतना कह कर मूल प्रकृति ईश्वरी महादेवी अन्तर्ध्यान ही गई। देवगण के द्वारा भक्तिभाव से उसकी स्तुति की थी। इसके अनन्तर समस्त देवों ने अपने गर्व का त्याग करके परस्पर भगवती के चरण कमल की आराधना की थी। सब लोग सर्वदा तीनों कालों में गायत्री के जप करने में तत्पर हो गये थे।
उपासनात्मक क्रिया कलाप उन तीन महा-सत्यों के प्रतिपादन के लिये विनिर्मित हुआ है। धर्म ग्रन्थों का समस्त कलेवर विभिन्न आधार लेकर इन्हीं तथ्यों के इर्द गिर्द परिक्रमा करता है। आस्तिकता और उपासना का चरम लक्ष्य किसी मनुष्य आकृति या प्रकृति के देवता विशेष भगवान के साथ रिश्तेदारी या आदान प्रदान की प्रक्रिया जोड़ना नहीं वरन् अन्तःकरण के गहन मर्म स्थलों में सत्य, साम्य और ऐक्य के महान् सत्यों में प्रगाढ़ निष्ठा उत्पन्न करना है। शास्त्र विवेचन का यही निष्कर्ष है।
उपासना कौन सी है, मुझे बहुत प्यारा लगा। यह बात सबके जानने की है। जो दूसरों की भलाई में निरत रहता है,वह भगवान को ही भक्ति करता है। परोपकार से बढ़कर और कोई उपासना नहीं वह सरल भी है,उत्तम भी है और सुखदायक भी। परोपकार करने में आत्मा की प्रसन्नता इतनी बढ़ जाती है कि रोमांच हो आता तो फिर उनका फल तो और भी स्वर्गीय सुखों से भरा हुआ होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-June
उपासना के प्रति भ्रान्ति बनी रहेगी।
उपासना से अधिक फलदायक होती है, जो केवल समय पूरा करने के लिए की जाती है।
उपासना क्षेत्र को क्राँतिकारी ढंग से प्रभावित करेंगे।
उपासना, पूजा, पुरश्चरण में लग गये। भक्त कूरेश पुत्र पाराशर भट्ट ने भी सदा की भाँति गृह मन्दिर को खूब सजाया और उस दिन नवरात्रि की विशेष उपासना का श्री गणेश अपने ही हाथों सम्पन्न किया, ज्योति स्वरूपा भगवती गायत्री की प्रतिमा, ज्योति कलश की स्थापना, पंचोपचार और जप में कोई अधिक समय नहीं लगाया। उन्होंने स्तोत्र पाठ भी नहीं किया थोड़े ही समय में प्रसन्न मुद्रा में पूजा गृह से बाहर निकल आये।
उपासना में लगना चाहिए उतना ही लगाया, किन्तु अभी वह पूजागृह से बाहर निकले ही थे कि पाराशर भट्ट ने टोका- पण्डित जी आज भी आपने यथेष्ट पूजा नहीं की?
उपासना का श्री गणेश अपने ही हाथों सम्पन्न किया, ज्योति स्वरूपा भगवती गायत्री की प्रतिमा, ज्योति कलश की स्थापना, पंचोपचार और जप में कोई अधिक समय नहीं लगाया। उन्होंने स्तोत्र पाठ भी नहीं किया थोड़े ही समय में प्रसन्न मुद्रा में पूजा गृह से बाहर निकल आये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-May
उपासना क्रम जिसे आमतौर से हमने अपनी उपासना प्रक्रिया में सम्मिलित रखा है, अप्रैल 68 की अखण्ड ज्योति के पूरे अंक में विस्तार पूर्वक लिख चुके हैं। वह हमारे लिये जैसा उपयोगी सिद्ध हुआ,वैसा ही हर साधक के लिए फलप्रद हो सकता है। सर्वसाधारण के लिए गायत्री उपासना की उससे अच्छी पद्धति और कुछ नहीं हो सकती। गायत्री की उच्च-स्तरीय साधना प्राण तत्व की उत्खनन एवं अभिवर्धन प्रक्रिया है। पंच-कोशों का जागरण उसी पर निर्भर है।
उपासना की दृष्टि से शरीर क्षेत्र में पूजन व्रत, यात्रा, समय, सदाचरण, दान, पुण्य, तप, साधना आदि कर्मकाण्डों का-मनः क्षेत्र में ध्यान, चिन्तन, स्वाध्याय, सत्संग आदि का और अन्तःकरण क्षेत्र में भाव तन्मयता, दृष्टि परिष्कार, समक्ष, समाधि तय, वैराग्य आदि निष्ठाओं का अपना महत्व है। इन प्रकरण को भी वाधि विषानपूर्वक अनुभव मार्ग-दर्शन में अग्रसर किया जाना चाहिये। आस्मिक प्रगति के लिये इनकी भी आवश्यकता है और उनके लिये समुचित प्रयत्न परिश्रम होना चाहिये, किन्तु यह नहीं मान बैठना चाहिये किम उपासना पद्धतियों का डडडड ही आत्मा कल्याण एवं देव अनुग्रह प्राप्त कर लेने के लिये पर्याप्त है। तथ्य यह है कि उपासना के साथ साधना जुड़ी हुई होनी चाहिये। उपासना शरीर है और साधना प्राप्त।
उपासना के साथ साधना जुड़ी हुई होनी चाहिये। उपासना शरीर है और साधना प्राप्त। दोनों एक दूसरे के पूरक है। बिजली के दो तारों के मिलने पर किया उत्पन्न होती है, दोनों पहिये ठीक होने पर ही गाड़ी चलती है। इसी प्रकार आत्मिक प्रगति कि लिये जीवन के तीनों स्तर पर स्थूल, सूक्ष्म, और कारण-देह-मन और आत्मा-तब विकसित होती है जब उपासना और साधना, की द्वितीय डडडड पर समुचित ध्यान दिया जाय।
उपासना सरल बन जाती है। प्रातः 2 बजे हम उठते है और शौच, स्नान के नित्य कर्म से नि+वृत् होकर उपासना कक्ष में चले जाते है। अब तक मथुरा रहते हैं यही निवास स्थान है, जो इस घर में जब से ओ है, तब से नियत है। उपासना का समय तथा जप की संख्या भी निर्धारित है। यह तीनों नियभ्तायें सबके अचेतन मन को इस बात के लिए प्रशिक्षित कर देती है कि यथासम्भव यथावत अपने काम पर लग जाये।
उपासना आवश्यक है, उसे पुरी तत्परता के साथ अपनाया जाय, किन्तु यह भली भाँति समझ लिया जाय कि इस क्षेत्र की सफलताओं का स्रोत भावनात्मक विकास की जीवन साधना पर ही अवसम्मित है। यदि साधना की उपेक्षा की गई और पूजा-पद्धति के सहारे लम्बे-चौड़े सपने देखे गये तो अन्य असंख्य जाल-जंजालों में भटकने वालों की तरह हमें भी खाली हाथ रहना पड़ेगा “हमने इस शिक्षा को गाँठ बाँध लिया और जिस दिन से उस क्षेत्र में प्रवेश किया, दोनों ही प्रक्रियाओं पर समान रूप से ध्यान दिया। चिकित्सा और पथ्य रोगी के लिए-खाद और पानी पौधे के लिए-पढ़ना और लिखना छात्र के लिए-पूँजी और बुद्धि व्यापार के लिए आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मिक प्रगति कि लिए उपासना और साधना का जोड़ा अविच्छिन्न रूप से आवश्यक है। इसमें न तो ढील की गुँजाइश है, न उपेक्षा की। शास्त्रकारों से लेकर तपोनिष्ठ ऋषियों और सफल आराधकों ने सदा इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है।
उपासना, स्वाध्याय और मार्ग दर्शन के जितने अच्छे साधन यहाँ है, उतने अच्छे साधन बन में कहाँ मिल सकते हैं?
उपासना और साधना का जोड़ा अविच्छिन्न रूप से आवश्यक है। इसमें न तो ढील की गुँजाइश है, न उपेक्षा की। शास्त्रकारों से लेकर तपोनिष्ठ ऋषियों और सफल आराधकों ने सदा इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है। सस्ते बेचने वाले कुँजड़े केवल ग्राहकों को भ्रम में डाल सकते है पर आवश्यकता किसी की पूरी नहीं करा सकते। धन्यवाद है भगवान् का जिसने हमें एक घंटे में ईश्वर दर्शन कराने वाले और चेला मूड़ने वाले, जादुई मन्त्र बताने वाले करामाती जंजालियों के चंगुल में फँसने से बचा लिया।
उपासना का सर्वश्रेष्ठ समय ब्रह्म मुहूर्त-सूर्योदय से पूर्व का है। हम आमतौर से 8-8.30 बजे तक सो जाते है। प्रायः 6 घण्टे में नींद पूरी हो जाती है और प्रातःकाल उठने में कठिनाई नहीं होती स्वतः ही नींद खुल जाती है और अगला क्रम निर्धारित ढर्रे पर चलने लगता है अपने उपासना स्थल की एक विशेषता है, यहाँ होते ड़ड़ड़ड़ अखण्ड यज्ञ। गत 42 वर्ष से हमारा अखण्ड व्रत दीप जलता है। साथ ही अमर पंक्तियों एवं पूणत्तियों के रूप में हवन सामग्री भी यहाँ यथा क्रम जलती रहती है।
उपासना क्षेत्र में गायत्री महामन्त्र की साधना अनन्य श्रद्धा और विश्वास के साथ करने की शिक्षा हमें मिली थी, उसमें लम्बे-चौड़े विधि-विधान जुड़े हुए नहीं है। कितने ही व्यक्ति विधि-विधानों के अन्तर और कर्मकाण्डों के जोड़-तोड़ से साधना की सफलता, असफलता का कारण मानते है और इस ढूँढ़ खोज में रहते है कि कोई रहस्यमय ऐसी पद्धति हाथ लग जाय जिससे देखते-देखते जादुई चमत्कार का प्रतिफल सामने आ जाय। हमारी मान्यता वैसी नहीं रही। मंत्र शास्त्र का विशाल अध्ययन और अन्वेषण हमने किया है। महामंत्रिकों से हमारे सम्पर्क है और साधना पद्धतियों के सूक्ष्म अन्तर प्रत्यन्तरों को हम इतना अधिक जानते है, जितना बुद्धिमान पीढ़ी के मंत्र ज्ञाताओं से शायद ही कोई जानता हो।
उपासना पद्धतियों के सुट-बुट प्रयोग बनाकर लम्बे-चौड़े आश्वासन दिये और उन वचन प्रयत्नों से ऋद्धि-सिद्धियाँ मिलने एवं मनोकामनायें पूरी होने के सब्जबाग दिखाये। लोग उस मार्ग पर चलें पर
उपासना जितने समय चले उतने समय जिनके लिये सम्भव हो धूप, दीप एवं अगरबत्ती जलाने की व्यवस्था बना लेना उत्तम है। यज्ञीय वातावरण में गायत्री उपासना अधिक फलवती होती है। अनुदान काल में यथा सम्भव जप समय तक दीपक और धूप-बत्ती जलाने की व्यवस्था बनानी ही चाहिये।
उपासना में ही है या वह इतने भर काम के लिये अवतरित हुई है। वस्तुतः इस महाशक्ति के प्रभाव एवं प्रकाश में सारा ब्रह्माण्ड गतिशील हो रहा है। प्राणियों की प्राण-शक्ति जो बीच रूप में सुषुप्तावस्था में-पड़ी रहती है, उसका जागरण, पोषण और अभिवर्धन इसी महत्व के प्रभाव से होता है। जड़ जगत् में जो अणु हलचल दृष्टिगोचर होती है और प्रत्येक पदार्थ गतिशील दिखाई देता है, उसके मूल में भी वहीं महाशक्ति काम कर रही है। आकर्षण-विकर्षण के ऋण बन-द्वन्द्वात्मक जितने भी विधान एवं संचरण प्रकृति के अन्तराल में काम कर रहे हैं उनके पीछे एक अति प्रचण्ड शक्ति काम कर रही है।
उपासना ऐसी सरस बन जाती है कि उसे छोड़ने को जी नहीं चाहता।
उपासना का न्यूनाधिक यही क्रम हमारा इसी प्रकार चलता रहा है। 24 अनुमानों के उपरान्त प्राण विद्या के उच्च स्तरीय प्रयोग एक विशिष्ट योग साधना के रूप में चलते चले है। जिनका चक्र वेधन ओर कुण्डलिनी जागरण से सीमा सम्बन्ध है। वे भावनायें सर्वोपयोगी नहीं ओर हमारे सामान्य साधन कम का कण भी नहीं, वे अतिरिक्त प्रयोजन के लिए है, इसलिए उनकी चर्चा यहाँ अनावश्यक समझी गई और उतना ही, उल्लेख किया गया जो सर्वसाधारण के लिए उपयुक्त था। यह लेख माला लिखी ही इस उद्देश्य से जा रही है कि हमारे अनुभवों के साथ अपने क्रिया-कलाप का ताल -मेल बिठाते हुए परिजन अपनी आत्मिक प्रगति का पथ -प्रशस्त कर सकें और उसी स्तर की सफलता प्राप्त कर सकें,जैसी कि हम कर सके है।
उपासना के माध्यम से हम अपना संपर्क बना देते हैं तो संपर्कजनय लाभ उठाने का सुअवसर प्राप्त करते हैं। उपासना में जितना समय लगता है, उसकी तुलना में कहीं अधिक लाभ हम अपने भीतर उस संपर्क की ऊष्मा एवं शक्ति के संपर्क से ज्ञान और धनवानों के संपर्क से धन प्राप्त करने के सुअवसर सहज ही मिलते रहते हैं फिर सर्वशक्तियों की उद्भूत गायत्री माता के संपर्क से हमें कुछ भी लाभ न मिले, ऐसा नहीं हो सकता।
उपासना ही हमें अपनी मनोभूमि ड़ड़ड़ड़ रखने और उस स्थिति के महत्त्वपूर्ण साथ लेने में सुविधा मिलती है।
उपासना कक्ष में चले जाते है। अब तक मथुरा रहते हैं यही निवास स्थान है, जो इस घर में जब से ओ है, तब से नियत है। उपासना का समय तथा जप की संख्या भी निर्धारित है। यह तीनों नियभ्तायें सबके अचेतन मन को इस बात के लिए प्रशिक्षित कर देती है कि यथासम्भव यथावत अपने काम पर लग जाये। अन्तरमन की यह विशेषता है कि यह किसी प्रक्रिया को देर में पकड़ता है पर जब एक बार पकड़ लेता है तो नियत समय पर उसी की माँग करता है और सरलतापूर्वक उसी में प्रवृत्त रहता है।
उपासना के आरम्भ में अपनी एक दो वर्ष जितने निश्चिन्त, निर्मल, निष्काम, निर्भय बालक जैसी मनोभूमि बनाने की भावना करनी चाहिये ओर संसार में नीचे नील जल और ऊपर ड़ड़ड़ड़ आकाश के अतिरिक्त अन्य किसी पदार्थ एवं इष्टदेव के अतिरिक्त और किसी व्यक्ति के न होने की साम्यता जमानी चाहिए, बालक और माता, प्रेमी और प्रेमिका,सखा और सखा जिस प्रकार पुलकित हृदय परस्पर मिलते, आलिंगन करते है, वैसी ही अनुभूति इष्टदेव की समीपता की होनी चाहिये। चकोर जैसे चन्द्रमा को प्रेमपूर्वक नितान्त है ओर पतग जैसे दीपक पर अपना सर्वस्व समर्पण करते हुए तदनुरूप हो जाता है, ऐसे ही भावोद्रेक इष्टदेव की समीपता के उस ध्यान साधना में जुड़े रहने चाहिये। इससे भाव -विभोरता की स्थिति प्राप्त होती हैं। और उपासना ऐसी सरस बन जाती है कि उसे छोड़ने को जी नहीं चाहता।
उपासना का समय तथा जप की संख्या भी निर्धारित है। यह तीनों नियभ्तायें सबके अचेतन मन को इस बात के लिए प्रशिक्षित कर देती है कि यथासम्भव यथावत अपने काम पर लग जाये। अन्तरमन की यह विशेषता है कि यह किसी प्रक्रिया को देर में पकड़ता है पर जब एक बार पकड़ लेता है तो नियत समय पर उसी की माँग करता है और सरलतापूर्वक उसी में प्रवृत्त रहता है। शौच, भूख, प्यास, नींद आदि की आदतें नियत समय पर प्रबल होती है। कोई स्थान विशेष भी किसी के लिए ऐसा बन जाता है, जहाँ अमुक मानसिक प्रक्रिया स्वयमेव गतिशील होने लगे।
उपासना करु में वशीष वातावरण उत्पन्न करता है। अतएव यह केवल अखण्ड दीपक मात्र ही नहीं रहता वरन अखण्ड यज्ञ बन जाता है। ऐसे संयोग, सम्भालने में सतर्कता बहुत रखनी पड़ती है, और व्यय भी काफी आता है। फिर भी इसका प्रतिफल बहुत है। लम्बी अवधि से इस कक्ष में होते रहने वाले जप पुरभ्ररणा के साथ अखण्ड यज्ञ की इस प्रक्रिया में यहाँ का वातावरण अलौकिक बना रहता है।
उपासना की उससे अच्छी पद्धति और कुछ नहीं हो सकती। गायत्री की उच्च-स्तरीय साधना प्राण तत्व की उत्खनन एवं अभिवर्धन प्रक्रिया है। पंच-कोशों का जागरण उसी पर निर्भर है। कई वर्ष पूर्व हमने अत्र भय कोश,मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश,ओर आनन्दमय कोश,के जागरण की पंच-कोसी उच्च-स्तरीय गायत्री साधना पाठको को सिखानी आरम्भ की थी अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों में उसका क्रम तीन वर्ष तक चला भी था पर अनुभव यह हुआ कि वह सर्वसाधारण का है। समस्त सत्प्रवृत्तियाँ उसी की सहचरी हैं।
उपासना और साधना, की द्वितीय डडडड पर समुचित ध्यान दिया जाय।
उपासना में प्रेम भावना का समावेश करते ही यह नीरस न रहकर अति सरल और मनोरम हो उठती है। कठोर जैसे चन्द्रमा को निहारते हुए सारी रात बिताता भ्रमर जैसे कमल की शोभा ओर सुगन्ध पर मुग्ध बना मंडराता रहता है। तितली जैसे पुष्प को नहीं छोड़ती, चींटी शक्कर पर से हटाये नहीं हटती, पतंगा दीपक की चारों ओर जीवन संकट के मूल्य पर भी खरीदता है, लोहा जैसे ड़ड़ड़ड़ से निपट जाने को सिसकता चलता है, नदी ड़ड़ड़ड़ के लिए आतुरता प्रकट करती है, उसी प्रकार ड़ड़ड़ड़ की दशा भगवान की ड़ड़ड़ड़ वाले के लिये आतुर जैसी होने लगती है। प्रेमिका को अपने प्रेमी की चर्चा और कल्पना में जैसे सुख मिलता है, उसी प्रकार भगवान की सरस कल्पना और ड़ड़ड़ड़ होता है। मीरा, सूर, कबीर, तुलसी, ड़ड़ड़ड़ आदि की ऐसी ही मनोदशा थी।
उपासना अधिक फलवती होती है। अनुदान काल में यथा सम्भव जप समय तक दीपक और धूप-बत्ती जलाने की व्यवस्था बनानी ही चाहिये।
उपासना का स्थान, समय और क्रम निर्धारित करना पड़ता है। आरम्भ में मन कुछ गड़बड़ करता है पर पीछे जब अभ्यस्त हो जाता है, तब सारी प्रक्रिया बड़ी शांति और सुविधा से होने लगती है। हमने पुराण काल में तथा सामान्य समय में इन तीनों ही बातों का समुचित ध्यान रखा है, अतएव उसमें स्थिरता बनी रही। मन उचटने जैसी अड़चन नहीं आई। समय स्थान और संख्या की समस्वरता का महत्व हम सभी को बताते रहते और जो उसे अपना लेते है, उन्हें मन उचटने की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता।
उपासना के ड़ड़ड़ड़ शायद ही अन्यत्र कहीं दीखें।
उपासना शरीर है और साधना प्राप्त। दोनों एक दूसरे के पूरक है। बिजली के दो तारों के मिलने पर किया उत्पन्न होती है, दोनों पहिये ठीक होने पर ही गाड़ी चलती है। इसी प्रकार आत्मिक प्रगति कि लिये जीवन के तीनों स्तर पर स्थूल, सूक्ष्म, और कारण-देह-मन और आत्मा-तब विकसित होती है जब उपासना और साधना, की द्वितीय डडडड पर समुचित ध्यान दिया जाय।
उपासना में जितना समय लगता है, उसकी तुलना में कहीं अधिक लाभ हम अपने भीतर उस संपर्क की ऊष्मा एवं शक्ति के संपर्क से ज्ञान और धनवानों के संपर्क से धन प्राप्त करने के सुअवसर सहज ही मिलते रहते हैं फिर सर्वशक्तियों की उद्भूत गायत्री माता के संपर्क से हमें कुछ भी लाभ न मिले, ऐसा नहीं हो सकता।
उपासना अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए किया करते हैं।
उपासना क्रम हमारा भी है, जिसे प्रायः सभी गायत्री उपासक प्रयुक्त करते हैं।
उपासना, साधना की दिशा से ही मार्ग दर्शन किया- न केवल अपना तन और बल ही हमें दिया वरन उतना वात्सल्य, स्नेह और अपना मन दिया जितना इस संसार में किसी भी प्रसिद्ध के ड़ड़ड़ड़ रिश्ते के प्रिय पात्र एक दूसरे को दे सकते है। हमने भी प्रयत्न किया कि समर्पण कि जितनी सर्वांगपूर्ण भावना और क्रिया चरितार्थ हो सकती हो, उसमें ड़ड़ड़ड़ की जाय। उनका हर आदर्श और हर संकेत ड़डड़ड़ की तरह शिरोधार्य रहा है। माँगना कुछ नहीं, देना सब कुछ’ प्रेम के इस अविच्छिन्न सिद्धान्त को दोनों ने ही चरम सीमा तक निबाहा है। दूसरी ओर से क्या किया गया, इसकी चर्चा हमारी वर्णन शक्ति से बाहर है।
उपासना पद्धतियों का डडडड ही आत्मा कल्याण एवं देव अनुग्रह प्राप्त कर लेने के लिये पर्याप्त है। तथ्य यह है कि उपासना के साथ साधना जुड़ी हुई होनी चाहिये। उपासना शरीर है और साधना प्राप्त। दोनों एक दूसरे के पूरक है। बिजली के दो तारों के मिलने पर किया उत्पन्न होती है, दोनों पहिये ठीक होने पर ही गाड़ी चलती है।
उपासना स्थल की एक विशेषता है, यहाँ होते ड़ड़ड़ड़ अखण्ड यज्ञ। गत 42 वर्ष से हमारा अखण्ड व्रत दीप जलता है। साथ ही अमर पंक्तियों एवं पूणत्तियों के रूप में हवन सामग्री भी यहाँ यथा क्रम जलती रहती है। दीपक का भी और बत्तियों की कामियों निरन्तर बढ़ने से दोनों का समिधित धूम्र, बचंस, तेज तथा प्रभाव उपासना करु में वशीष वातावरण उत्पन्न करता है। अतएव यह केवल अखण्ड दीपक मात्र ही नहीं रहता वरन अखण्ड यज्ञ बन जाता है।
उपासना प्रक्रिया में सम्मिलित रखा है, अप्रैल 68 की अखण्ड ज्योति के पूरे अंक में विस्तार पूर्वक लिख चुके हैं। वह हमारे लिये जैसा उपयोगी सिद्ध हुआ,वैसा ही हर साधक के लिए फलप्रद हो सकता है। सर्वसाधारण के लिए गायत्री उपासना की उससे अच्छी पद्धति और कुछ नहीं हो सकती। गायत्री की उच्च-स्तरीय साधना प्राण तत्व की उत्खनन एवं अभिवर्धन प्रक्रिया है। पंच-कोशों का जागरण उसी पर निर्भर है।
उपासना का -जप करने का-छोटा-सा मंत्र मात्र नहीं है। वह इस विश्व ब्रह्माण्ड की एक सर्वोपरि शक्ति है। उस शक्ति के साथ उपासना के माध्यम से हम अपना संपर्क बना देते हैं तो संपर्कजनय लाभ उठाने का सुअवसर प्राप्त करते हैं। उपासना में जितना समय लगता है, उसकी तुलना में कहीं अधिक लाभ हम अपने भीतर उस संपर्क की ऊष्मा एवं शक्ति के संपर्क से ज्ञान और धनवानों के संपर्क से धन प्राप्त करने के सुअवसर सहज ही मिलते रहते हैं फिर सर्वशक्तियों की उद्भूत गायत्री माता के संपर्क से हमें कुछ भी लाभ न मिले, ऐसा नहीं हो सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-March
उपासना के आधार पर एक सीमा तक विकसित किया है और उनसे पाँच स्वतन्त्र व्यक्तियों की तरह काम लिया है। फिर भी यह स्थिति उतनी पक्की नहीं कि उसका सदा सार्वजनिक परीक्षण कराके एक अभिनव सिद्धान्त की पुष्टि का आधार प्रस्तुत किया जा सके। सम्भव है कुछ समय में- शायद इसी जीवन में वह स्थिति आ जाय कि हम अपने को संसार के सामने परीक्षण के लिए प्रस्तुत करें कि एक ही शरीर के भीतर पाँच सत्तायें एक ही समय में पाँच व्यक्तियों का काम कैसे निपटा सकता है।
उपासना में बिताई। यह 18 वर्ष ही ऐसे रहे हैं, जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश कर कुछ काम किया है। इस थोड़ी अवधि में हमारे पाँच प्रमुख कार्य हुए हैं- (1) भारतीय धर्म के आर्ष साहित्य का आदि से अन्त तक सरलीकरण एवं संसार भर में प्रसार, (2) गायत्री महाविद्या का अन्वेषण उसका विश्वव्यापी विस्तार, 50 लाख व्यक्तियों को नैष्ठिक उपासना की शिक्षा-दीक्षा चार हजार शाखाओं वाले गायत्री परिवार संगठन का सृजन, गायत्री तपोभूमि जैसी अनुपम संस्था का निर्माण, (3) गायत्री यज्ञ के माध्यम से धर्म भावनाओं का व्यापक उभार, देशभर में हजारों विशालकाय सम्मेलन, मथुरा का वह सहस्र कुण्ड गायत्री यज्ञ जिसमें 4 लाख व्यक्ति एकत्रित हुए थे। उस शृंखला का अभी भी अति उत्साह के साथ प्रचलन। (4) युग-निर्माण योजना का जन-मानस परिवर्तन एवं विचार-क्राँति का विश्व-व्यापी अभियान, इस सन्दर्भ में लगभग 500 पुस्तकों का लेखन, दो पत्रिकाओं का मथुरा से प्रकाशन, 7 हजार झोला पुस्तकालयों का प्रचलन, नव-निर्माण के विशाल साहित्य का संसार की प्रमुख भाषाओं में अनुवाद प्रकाशन।
उपासना जीवन-साधना नव-निर्माण आदि की कई शिक्षायें परिजनों को देते चले आ रहे हैं, अब विचार है अगले दो-ढाई वर्षों में प्रेम को अन्तरंग में उगाने और उसे विकसित करने की अपनी अनुभूतियाँ भी लोगों को बतायें और इस अमृत को उपलब्ध करने की शिक्षा देते चलें। यह साहित्य का नहीं समीपता का विषय है, सो सोचते हैं कि जितने अधिक परिजनों से, जितने अधिक समय तक सान्निध्य और सामीप्य सम्भव हो प्राप्त करें और अपनी छूत दूसरों को भी लगाते चलें। लोग प्यार करना सीखें। हममें, अपने आपमें, अपनी आत्मा और जीवन में, परिवार में, समाज में, कर्तव्य में और ईश्वर में - दसों-दिशाओं में प्रेम बिखेरना और उसकी लौटती हुई प्रतिध्वनि का भाव भरा अमृत पीकर धन्य हो जाना, यही जीवन की सफलता है।
उपासना भी आत्मिक उन्नति अथवा आत्म-जागरण कर सकने में सर्वथा असमर्थ ही होती है।
उपासना अथवा अनुष्ठान किया करते हैं। यद्यपि पूजा, उपासना अथवा अनुष्ठान आदि आध्यात्मिक साधना के स्वरूप हैं। तथापि इनका उद्देश्य भौतिक लाभ बना लेने से वे भी उसी श्रेणी में पहुँच जाती हैं, जिसमें तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र आदि की साधना होती है। तन्त्र साधना और सकाम उपासना में स्वरूप भेद होते हुए भी वे परिणाम रूप में एक जैसी ही होती हैं। सकाम उपासना भी आत्मिक उन्नति अथवा आत्म-जागरण कर सकने में सर्वथा असमर्थ ही होती है।
उपासना में लग गया। उसी में अपनत्व और अहंकार को केन्द्रित करके बैठ गया। परिणामस्वरूप शेष बाग वीरान हो गया। माली की निन्दा और उसकी अकर्मण्यता की भर्त्सना हुई और अन्ततः वह अशान्ति, असंतोष और असफलता का भागी बना। यही अकुशलता है, कर्म-भोग है।
उपासना किया करता है, वह अवश्य उसकी कृपा का भागी बन जाता है।
उपासना के फलस्वरूप यहाँ के साधक इन्द्रियातीत असीम सुख का रसास्वादन करते थे, यही नहीं उस शक्ति को पाकर वे जहाँ चाहते थे, वहीं मनोवाँछित वस्तुएँ पैदा करते थे।
उपासना अनुष्ठान, जप, ज्ञान, साधना, चिन्तन आदि कुछ भी हो सकता है। हम सब का परम कर्तव्य है कि अपनी योग्यता, स्थिति और परिस्थिति के अनुसार इनमें से किसी भी साधना को ग्रहण कर उसमें नियमित रूप से लगे रहें। धीरे-धीरे साधना संचित होती रहेगी और एक दिन किसी न किसी जन्म में पूर्ण होकर अपना सम्पूर्ण फन प्रदान करेगी।
उपासना अथवा अनुष्ठान आदि आध्यात्मिक साधना के स्वरूप हैं। तथापि इनका उद्देश्य भौतिक लाभ बना लेने से वे भी उसी श्रेणी में पहुँच जाती हैं, जिसमें तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र आदि की साधना होती है। तन्त्र साधना और सकाम उपासना में स्वरूप भेद होते हुए भी वे परिणाम रूप में एक जैसी ही होती हैं। सकाम उपासना भी आत्मिक उन्नति अथवा आत्म-जागरण कर सकने में सर्वथा असमर्थ ही होती है।
उपासना और तपश्चर्या द्वारा पहले इस मनोराज्य पर ही विजय प्राप्त की थी। मनोजयी, सर्वजयी होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं।
उपासना में स्वरूप भेद होते हुए भी वे परिणाम रूप में एक जैसी ही होती हैं। सकाम उपासना भी आत्मिक उन्नति अथवा आत्म-जागरण कर सकने में सर्वथा असमर्थ ही होती है।
उपासना की शिक्षा-दीक्षा चार हजार शाखाओं वाले गायत्री परिवार संगठन का सृजन, गायत्री तपोभूमि जैसी अनुपम संस्था का निर्माण, (3) गायत्री यज्ञ के माध्यम से धर्म भावनाओं का व्यापक उभार, देशभर में हजारों विशालकाय सम्मेलन, मथुरा का वह सहस्र कुण्ड गायत्री यज्ञ जिसमें 4 लाख व्यक्ति एकत्रित हुए थे। उस शृंखला का अभी भी अति उत्साह के साथ प्रचलन। (4) युग-निर्माण योजना का जन-मानस परिवर्तन एवं विचार-क्राँति का विश्व-व्यापी अभियान, इस सन्दर्भ में लगभग 500 पुस्तकों का लेखन, दो पत्रिकाओं का मथुरा से प्रकाशन, 7 हजार झोला पुस्तकालयों का प्रचलन, नव-निर्माण के विशाल साहित्य का संसार की प्रमुख भाषाओं में अनुवाद प्रकाशन। इस प्रयोजन में हजारों कार्यकर्ताओं का समावेश। (5) सतत तप-साधना द्वारा उपार्जित शक्ति का सत्पात्रों की भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति के लिए अनुदान की व्यवस्था।
उपासना करिये, स्वयं विराट् बन कर जीवन की संकीर्ण काल कोठरी से छूटकर मुक्त हो जाइये।
उपासना में लगे रहिये, जीवन भर ब्राह्मी मंत्र एवं ब्राह्मी बूटी का सेवन करते रहिये, किन्तु स्वाध्याय किसी दिन भी न करिये और देखिये कि सरस्वती सिद्धि तो दूर पास की पढ़ी हुई विद्या भी विलुप्त हो जायेगी। सरस्वती स्वाध्याय का अनुगमन करती है, इस सत्य का सम्मान करता हुआ जो साधक उसकी उपासना किया करता है, वह अवश्य उसकी कृपा का भागी बन जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-April
उपासना के फलस्वरूप भौतिक सम्पदाओं की स्थूल उपलब्धि की कामना करना असंगत है, उसके लिये शक्ति और क्षमता की याचना ही उचित है। ईश्वर की कृपा सूक्ष्म शक्तियों के ही रूप में होती है। स्थूल पदार्थों के रूप में नहीं।
उपासना के आगे-पीछे उपस्थित रहता है। उपासना में महत्व क्रिया-विधि उसकी सामग्री अथवा उसके स्थान आदि से नहीं है। उसका तात्पर्य उस मनोभाव से है, जो उपासना के आगे-पीछे उपस्थित रहता है। उपासना में महत्व क्रिया-विधि अथवा साधन सामग्री का नहीं है। महत्व है-भावना का।
उपासना में महत्व क्रिया-विधि उसकी सामग्री अथवा उसके स्थान आदि से नहीं है। उसका तात्पर्य उस मनोभाव से है, जो उपासना के आगे-पीछे उपस्थित रहता है। उपासना में महत्व क्रिया-विधि अथवा साधन सामग्री का नहीं है। महत्व है-भावना का। यदि उपासक की भावना ठीक उपासना के अनुरूप है तो निश्चय ही वह फलवती होगी।
उपासना में महत्व क्रिया-विधि अथवा साधन सामग्री का नहीं है। महत्व है-भावना का। यदि उपासक की भावना ठीक उपासना के अनुरूप है तो निश्चय ही वह फलवती होगी। फल भावना के अधीन है, उपक्रम अथवा उपकरण के अधीन नहीं मन्दिर का एक पुजारी दोनों समय जीवन भर आरती-पूजा करता रहता है पर उसका उसे कोई प्रतिफल नहीं मिलता। उसके जीवन का स्तर वही बना रहता है।
उपासना की जाये और आन्तरिक विकास न हो, आत्म-सुख आत्म-शांति और आत्म-संतोष में वृद्धि न हो यह सम्भव नहीं यदि ऐसा नहीं होता तो मानना होगा कि उसमें निहित भावना अनुरूपिनी नहीं, विरूपिनी है। अवश्य ही ऐसा असफल उपासक ईश्वर के सामीप्य अथवा उसके निहित फल की भावना नहीं रखता। उसके हृदय में कोई अन्यथा भावना ही चलती रहती है।
उपासना की भावना नहीं होती। उसकी भावना मन्दिर के अधिकारियों की नौकरी करने की होती है। अस्तु वह नौकर मात्र ही रह जाता है। उपासक नहीं हो पाता।
उपासना करते चलिये। एक-एक करके अपनी कामनाओं को गिराते और वासनाओं को छोड़ते चलिये। साधना पूरी होगी और सिद्धि स्वयं आ उपस्थित होगी। इस जन्म में नहीं अगले में और अगले में नहीं तो उसके बाद में। साधना की न तो कोई अवधि है और इतनी बड़ी उपलब्धि के लिये कोई भी कालावधि अधिक नहीं है।
उपासना करते हैं और तपस्या द्वारा अपने जीवन को आत्म-शक्ति सम्पन्न बनाते हैं, उन्हें नरक की पीड़ा सहन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
उपासना क्रम को चलाया जाता रहा, समयानुसार इसकी भी चर्चा करेंगे। इस समय तो तथ्य की उस आधार शिला पर ही प्रकाश डाल रहे हैं, जिसके बिना कोई पूजा पद्धति सफल नहीं होती। अन्तःकरण की मूल स्थिति वह पृष्ठभूमि है, जिसको सहज बनाकर ही कोई उपासना लंबी हो सकती है। उपासना बीज बोना और अन्तःभूमि की परिष्कृत जमीन ठीक करना है। बीज बोने से फसल उगती है, यह बात सही है पर यह और भी सही है कि अच्छी जमीन जिसमें खाद, पानी, जुताई, गुड़ाई, निराई, रखवाली आदि की समुचित व्यवस्था की गई हो, किसी बीज को अंकुरित और फलित करने में समर्थ हो सकती है।
उपासना पद्धति में गायत्री पुरश्चरणों
उपासना लंबी हो सकती है। उपासना बीज बोना और अन्तःभूमि की परिष्कृत जमीन ठीक करना है। बीज बोने से फसल उगती है, यह बात सही है पर यह और भी सही है कि अच्छी जमीन जिसमें खाद, पानी, जुताई, गुड़ाई, निराई, रखवाली आदि की समुचित व्यवस्था की गई हो, किसी बीज को अंकुरित और फलित करने में समर्थ हो सकती है। इन दिनों लोग यह भूल करते है, वे उपासना विधानों और कर्मकाण्डों को ही सब कुछ समझ लेते है और अपनी मनोभूमि परिष्कृत करने की ओर ध्यान नहीं देते।
उपासना विधान में रही त्रुटियों से कुछ बहुत बिगड़ने वाला नहीं है पर यदि भावनात्मक स्तर को ऊँचा न उठाया गया तो सारा श्रम निष्फल चला जायेगा गन्दी और संकीर्ण मनोभूमि वाले साधक बहुत हाथ-पैर पीटते रहने पर भी खाली हाथ रहते है और असफलता ही पाते है, किन्तु जो अन्तःकरण को परिष्कृत करते चलते है, उनकी साधना लहलहाती फसल की तरह उगती, बढ़ती और फलवती होती है, इसलिये हमें उस ओर पूरी सतर्कता और अभिरुचि के साथ प्रयत्नशील रहना होगा वैसा ही हमने किया भी।
उपासनाओं की सफलता तभी सम्भव है, जब इष्टदेव के साथ प्रेम भाव की भी चरम परिणित होती हो। केवल शारीरिक क्रिया की तरह मशीन जैसे कर्मकाण्ड कुछ बहुत फल दे सकते हैं। परमात्मा प्रेममय है और वह प्रेम से ही प्रभावित होता है। कर्मकाण्ड तो उस प्रेम को बढ़ाने, उगाने के साधन भर का काम करते हैं। हमने उपासना के नियमोपनियम और विधि-विधानों पर समुचित ध्यान दिया है, साथ ही अन्तःचेतना को भाव भरी बनाये रखा है और निरन्तर यही भावना बनाये रहे हैं कि प्राणप्रिय इष्टदेव के साथ भाव भरी तन्मयता अनवरत रूप में बनी रहे।
उपासना पद्धति के अन्तराल में सन्निहित यह प्रेम साधना ही थी, जो सामान्य की असामान्य में-तुच्छता को महानता में-परिणित करने का चमत्कार दिखा सकी।
उपासना करने वाले है, उनके तो नाम से उन के कर्म-बन्ध को काट दिया करता है। अब वे ब्रह्मलोक का लंघन कर लोक को जाते है तो चित्रगुप्त उनके लिये बारम्बार मधुपर्क आदि का उपचार किया करता है। उनके स्पर्शमात्र से ही पापों का नाश हो जाता है। ऐसे पुरुष महान् भाग्यशाली है और सहस्र कुल का उद्धार करने वाले होते है।
उपासना किया करता है और भेद की बुद्धि से मुझे वह पामर अपने से अन्य ही समझता है। हे नागाधिराज! उसकी भक्ति और आराधना में रजोगुण की प्रधानता विद्यमान् रहा करती है। क्योंकि सर्वदा अपने सुखोपभोग प्राप्त करने की ही भावना इस उपासना का एक मात्र लक्ष्य होता है। जो कर्म परात्पर के निर्मित किया जाता है, अर्थात् उसका कोई भी फल अपने लिये न चाहकर जो कुछ भी हो वह सब अपने आराध्य के ही चरणों में समर्पित कर दिया जाये और केवल पापों के प्रक्षालन होने से अपनी आत्मशुद्धि की भावना रहे और उपासना करने वाले के हृदय में ऐसी निष्ठा बनी रहे कि यह वेदोक्त विधान का करना मेरा परम कर्तव्य है, अतएव मुझे यह अनवरत करना ही चाहिए - ऐसी बुद्धि के द्वारा भेद बुद्धि का उपाश्रय करके देव भक्ति को सात्विक कहा जाता है, क्योंकि इसमें सतोगुण की प्रधानता रहती है और केवल अपने समाराध्य की प्रीति के लिए ही यह कर्तव्य कर्म समझ कर की जाती है और इसके द्वारा अपनी आत्म-शुद्धि इष्ट देव की कृपा से हो जाने की भावना सुदृढ़ रहती है।
उपासना के स्वरूप से उपासना की विधि, उसकी सामग्री अथवा उसके स्थान आदि से नहीं है। उसका तारतम्य उस मनोभाव से है, जो उपासना के आगे-पीछे उपस्थित रहता है। उपासना में महत्व क्रिया-विधि उसकी सामग्री अथवा उसके स्थान आदि से नहीं है। उसका तात्पर्य उस मनोभाव से है, जो उपासना के आगे-पीछे उपस्थित रहता है। उपासना में महत्व क्रिया-विधि अथवा साधन सामग्री का नहीं है।
उपासना, द्वारा मुक्त करना ही है और जो प्रयत्न द्वारा एक दिन मुक्त की भी जा सकती है।
उपासना एवं साधना के शुष्क एवं नव-निर्माण के कठिन कष्टकर कार्यों में इतना विशाल जनसमूह लगा हुआ है, उसके पीछे शिक्षा, उपदेश या लेख, प्रवचन ही काम नहीं कर रहें, असली प्रेम सम्बन्धों की है, जिसके दबाव से अनिच्छा और असुविधा के होते हुए, लोगों का उस दिशा में चेतना पड़ता है, जो हमें अभीष्ट है। इस प्रयोग में लोगों का जीवन सुधरे है, समाज का हित हुआ है और हमें सम्मान, सद्भाव मिला है। परिवार को प्रेम देकर-उनके दुःख-दर्द में हिस्सा बंटाकर जितना दिया है, उससे असंख्य गुना पाया है। नये युग का नया निर्माण कर सकने जैसा साहस और विश्वास जिस आधार पर किया जा सका वे केवल लक्ष-लक्ष परिजनों की अनन्य आत्मीयता, श्रद्धा और सद्भावना ही है। इसे हम अपने जीवन की अनमोल उपलब्धि मानते हैं।
उपासना के परिणाम स्वरूप मिलना चाहिये। इसका एक ही कारण है, वह यह कि उसकी उस क्रिया में वास्तविक उपासना की भावना नहीं होती। उसकी भावना मन्दिर के अधिकारियों की नौकरी करने की होती है। अस्तु वह नौकर मात्र ही रह जाता है। उपासक नहीं हो पाता।
उपासना का प्रतिफल तभी मिल सकता है, जब मनोभूमि का विकास तदनुरूप हो। रामकृष्ण परमहंस को काली की प्रतिमा अपने अस्तित्व का पग-पग पर परिचय देती थी पर उसी मन्दिर के अन्य पुजारी जो दिन रात सेवा-पूजा में लगे रहते हैं, कुछ भी अनुभव नहीं पाते। मीरा के ‘गिरधर गोपाल उनके साथ नाचते थे पर वह प्रतिमा आज भी उसी तरह विद्यमान् होने पर भी कोई अलौकिकता प्रकट नहीं करती। उसमें महत्व प्रतिमा या उपासना का नहीं, गरिमा साधक की मनोभूमि की है। सो लोग उसी की उपेक्षा कर बैठे, फिर शास्त्रोक्त परिणाम कैसे मिले?
उपासना के फल से वंचित रहा करते है, अपने मन में धन-सम्पत्ति आदि भौतिक लाभों की ही भावना रखते हैं। जिन उपलब्धियों का आधार बन्द प्रकार के भौतिक पुरुषार्थ हैं, उनको आध्यात्मिक आधार पर पाने की आशा उसी प्रकार से उपहासास्पद है, जिस प्रकार कोई आम के बीज बो कर संतरे की कामना करता है अथवा बम्बई की दशा में चलकर कलकत्ते पहुँचना चाहता है। भौतिक साधना का फल भौतिक और आध्यात्मिक साधना का फल आध्यात्मिक होगा, यह तो एक बड़ा ही स्थूल और निर्विवाद सत्य है।
उपासना साधना में सतत मग्न रहने का प्रयत्न करते है। पूजा तो हमारी कुछ घण्टे की ही होती है पर लगन सोते-जागते यही लगी रहती है कि प्रेम का अमृत चखाने और चलने का कोई अवसर हाथ से जाने न पाये। यह वह उपक्रम है जो क्रमशः हमें प्रगति पथ पर एक सीमा तक बढ़ाते चलने से सफलता प्रदान कर सका।
उपासना के ब्रह्म कलेवर को उखाड़ कर उसके अन्तरंग को देखा जाना जाय तो उसके गहन में प्रेम तत्त्व की साधना का विशाल विस्तार परिलक्षित होगा। मातृत्व की साकार प्रतिमूर्ति को हमने गायत्री माता के रूप में देखा और उसे वैसे ही प्यार किया जैसा एक छोटा बालक अपनी सगी माता को कर सकता हैं लोग सिर फोड़ी करते रहते है कि गायत्री साकार नहीं निराकार है। हम इस बहस में नहीं पड़ते कि वह क्या है? वस्तुतः वह सब कुछ है-- जो सब कुछ है वह क्या नहीं है? वस्तुतः वह सब कुछ है उसे किसी आकृति में देखने से क्या गर्ज?
उपासना के अनुरूप है तो निश्चय ही वह फलवती होगी। फल भावना के अधीन है, उपक्रम अथवा उपकरण के अधीन नहीं मन्दिर का एक पुजारी दोनों समय जीवन भर आरती-पूजा करता रहता है पर उसका उसे कोई प्रतिफल नहीं मिलता। उसके जीवन का स्तर वही बना रहता है। उसके मानसिक विकास में कोई प्रगति नहीं होती। उसकी अशान्ति, असंतोष और आत्मिक अभाव ज्यों-का-त्यों बना रहता है, जैसा कि वह पूजन-क्रिया में आने से पूर्व था।
उपासना करता है, वह देव यान मार्ग द्वारा प्रथम अग्नि-लोक में पहुँचता है फिर वायु-लोक में, वहाँ से सूर्य-लोक वरुण और इन्द्र-लोक को गमन करता है। इन्द्र-लोक से प्रजापति लोक और वहाँ से ब्रह्म-लोक को पहुँचता है। इस यात्रा-पथ पर अनेक आश्चर्यजनक संस्थान हैं, वहाँ पहुँचकर जीवात्मा को विचित्र अनुभूतियाँ होती हैं।
उपासना के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
उपासना बीज बोना और अन्तःभूमि की परिष्कृत जमीन ठीक करना है। बीज बोने से फसल उगती है, यह बात सही है पर यह और भी सही है कि अच्छी जमीन जिसमें खाद, पानी, जुताई, गुड़ाई, निराई, रखवाली आदि की समुचित व्यवस्था की गई हो, किसी बीज को अंकुरित और फलित करने में समर्थ हो सकती है। इन दिनों लोग यह भूल करते है, वे उपासना विधानों और कर्मकाण्डों को ही सब कुछ समझ लेते है और अपनी मनोभूमि परिष्कृत करने की ओर ध्यान नहीं देते।
उपासना द्वारा सर्वथा सम्भव है। किन्तु इसके लिये समय और धैर्य के साथ सतत साधना की आवश्यकता है। थोड़ी-थोड़ी उपासना करते चलिये। एक-एक करके अपनी कामनाओं को गिराते और वासनाओं को छोड़ते चलिये। साधना पूरी होगी और सिद्धि स्वयं आ उपस्थित होगी।
उपासना क्यों कर फलवती होगी? यह सही नहीं कि केवल भजन मात्र से मनोभूमि शुद्ध हो जाती है। यदि यह मान्यता सही रही होती तो भारत 56 लाख सन्त-महन्त आज प्राचीनकाल के सात ऋषियों की तुलना में 8 लाख गुना प्रकाश उत्पन्न कर सकते में समर्थ हो गये होते। देखा यह जाता है कि बहुत भजन करने पर भी वे सामान्य किसान मंजूर की तुलना में भी आत्मिक दृष्टि से पिछड़े हुए है। इन उदाहरणों को देखते हुए यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि उपासना का प्रतिफल तभी मिल सकता है, जब मनोभूमि का विकास तदनुरूप हो।
उपासना के स्वरूप में कोई कमी चल रही है।
उपासना असफल चली जायेगी। अस्तु, उपासना की सफलता को मूर्तिमान् रूप में देखने में लिये भावनाओं के सम्बन्ध में बहुत ही सतर्क, सावधान तथा यथार्थपूर्ण रहना ही होगा।
उपासना विधानों और कर्मकाण्डों को ही सब कुछ समझ लेते है और अपनी मनोभूमि परिष्कृत करने की ओर ध्यान नहीं देते।
उपासना के नियमोपनियम और विधि-विधानों पर समुचित ध्यान दिया है, साथ ही अन्तःचेतना को भाव भरी बनाये रखा है और निरन्तर यही भावना बनाये रहे हैं कि प्राणप्रिय इष्टदेव के साथ भाव भरी तन्मयता अनवरत रूप में बनी रहे। उनका प्रकाश अपने रोम-रोम में प्रवेश कर वह प्रेरणा दे जिससे मानव लक्ष्य की पूर्ति सम्भव हो सके।
उपासना करने के तीन मार्ग सुविख्यात है। हे नगाधिप! इन तीनों मार्गों से मेरी आराधनोपासना करने पर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। हे सत्तम! वे तीन मार्ग कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग इन तीन नामों से प्रसिद्ध है। गुणों के भेद होने से वह मनुष्य के द्वारा की हुई भक्ति भी तीन प्रकार की होती है। दूसरे को पीड़ा पहुँचाने के उद्देश्य से दम्भपूर्वक मात्सर्य और क्रोध से युक्त होकर जो कोई मनुष्य मेरी भक्ति किया करता है, वह उसकी भक्ति तामसी कही जाती है, क्योंकि उसमें तमोगुण की प्रधानता रहती है।
उपासना से आत्मा न केवल परमात्मा तत्त्व के आनन्द की अधिकारी बनती है, बल्कि परमात्म रूप ही हो जाती है। आत्मा तो यों भी परमात्मा का ही रूप है। केवल जीव ने अपनी भौतिक वितृष्णाओं का आवरण डालकर उसे अपना स्वरूप भुला दिया है। वह असंगत आवरण हटाइये, आत्मा परमात्मा रूप हो जायेगी जो स्वयं आनन्द रूप परमात्म स्वरूप है, उस आत्मा के लिये परमात्मा की अनुकम्पा की याचना भी क्या। उपासना द्वारा आत्मा को उसका सत्य स्मरण कराइए, परमात्मा के समीप जाइये अर्थात् आत्मा में उस तत्त्व की अनुभूति कीजिये और देखिये कि आत्मा अपना स्वरूप पहचानने लगती है या नहीं।
उपासना और तपस्या वस्तुतः एक ऐसे उच्चस्तरीय विज्ञान का ही प्रतिपादन करती है, जिसके लिये मशीनों की नहीं वरन् पवित्रता और सात्विकता के निर्मल बने व्यक्तित्वों की आवश्यकता होती है। देव-शक्तियों को भौतिक विज्ञान धीरे-धीरे यन्त्र-बद्ध करता चला जा रहा है। अध्यात्म विद्या के आचार्यों ने इन्हें मन्त्र-बद्ध किया था, जो अपेक्षाकृत अधिक सरल और अधिक उपादेय है।
उपासना द्वारा वह शक्ति, बड़ा आत्मविश्वास और वह बुद्धि मिले, जिसके बल पर हम न्याय नीति और सदाचार द्वारा अपने भौतिक उद्योगों में सफल हो सकें। उपासना के फलस्वरूप भौतिक सम्पदाओं की स्थूल उपलब्धि की कामना करना असंगत है, उसके लिये शक्ति और क्षमता की याचना ही उचित है। ईश्वर की कृपा सूक्ष्म शक्तियों के ही रूप में होती है। स्थूल पदार्थों के रूप में नहीं।
उपासना करने वाले के हृदय में ऐसी निष्ठा बनी रहे कि यह वेदोक्त विधान का करना मेरा परम कर्तव्य है, अतएव मुझे यह अनवरत करना ही चाहिए - ऐसी बुद्धि के द्वारा भेद बुद्धि का उपाश्रय करके देव भक्ति को सात्विक कहा जाता है, क्योंकि इसमें सतोगुण की प्रधानता रहती है और केवल अपने समाराध्य की प्रीति के लिए ही यह कर्तव्य कर्म समझ कर की जाती है और इसके द्वारा अपनी आत्म-शुद्धि इष्ट देव की कृपा से हो जाने की भावना सुदृढ़ रहती है।
उपासना से आकर्षित होकर आई हुई वह पावन धार बीच में अवस्थित कामनाओं के व्यवधान से टकरा कर इधर-उधर वह जायेगी और आत्मा उससे वंचित ही रह जायेगी।
उपासना द्वारा आत्मा को उसका सत्य स्मरण कराइए, परमात्मा के समीप जाइये अर्थात् आत्मा में उस तत्त्व की अनुभूति कीजिये और देखिये कि आत्मा अपना स्वरूप पहचानने लगती है या नहीं।
उपासना जैसे साधन और परमात्मा जैसे साध्य के बीच में किसी प्रकार की कामना जैसे व्यवधान को नहीं ही लाना होगा। यदि हमें सूर्य के दर्शन अपेक्षित है, दीपक का प्रकाश देखना है तो बीच के आवरण को हटाना ही होगा। यदि हम चाहते है कि परमात्मतत्त्व की आनन्दमयी धारा हमारी आत्मा में निर्झरित हो तो सारी कामनाओं का व्यवधान हटाना होगा अन्यथा उपासना से आकर्षित होकर आई हुई वह पावन धार बीच में अवस्थित कामनाओं के व्यवधान से टकरा कर इधर-उधर वह जायेगी और आत्मा उससे वंचित ही रह जायेगी।
उपासना द्वारा भौतिक सफलताओं के लिये शक्ति सम्बल के रूप में ईश्वरीय अनुकम्पा की याचना करना असंगत ही उठेगी और आपकी यह उपासना असफल चली जायेगी। अस्तु, उपासना की सफलता को मूर्तिमान् रूप में देखने में लिये भावनाओं के सम्बन्ध में बहुत ही सतर्क, सावधान तथा यथार्थपूर्ण रहना ही होगा।
उपासना के साथ इन सब बातों को जोड़ना, घटना, उलझन और असमंजस से भरी मानसिक क्रियायें हैं। यदि उपासना जैसे पवित्र तथा पुनीत बात को इन सब बातों से सर्वथा पृथक ही रखा जाये तो अधिक मांगलिक होगा। उपासना का प्रयोजन तो मात्र आत्मा को परमात्मा के सान्निध्य में लाना ही है। जिस बात का लक्ष्य परमात्मा के सान्निध्य जैसी ऊँची वस्तुएँ हो उसके बीच में साँसारिक कामनाओं जैसी निम्न स्तर की बात को लाना अपनी अनधिकारिक पात्रता को सिद्ध करना ही है। यदि हम अपनी साँसारिक वितृष्णाओं, इन्द्रिय लिप्साओं और भौतिक कामनाओं को अमहत्व नहीं दे सकते और इन भवपाशों को धारण किये हुये ही परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त करना चाहेंगे तो यह किसी प्रकार समृद्ध हो सकता है, यह तो बड़े ही साधारण विचार की बात है।
उपासना जिस सीमा तक सुलभ हो सकी, उसमें प्रधान कारण यह था कि अपने मार्ग दर्शक ने गायत्री पुरश्चरणों का विधान बताने ओर आरम्भ कराने से पूर्व मनोभूमि के परिष्कार की बात बहुत जोर देकर समझाई और कहा उपासना विधान में रही त्रुटियों से कुछ बहुत बिगड़ने वाला नहीं है पर यदि भावनात्मक स्तर को ऊँचा न उठाया गया तो सारा श्रम निष्फल चला जायेगा गन्दी और संकीर्ण मनोभूमि वाले साधक बहुत हाथ-पैर पीटते रहने पर भी खाली हाथ रहते है और असफलता ही पाते है, किन्तु जो अन्तःकरण को परिष्कृत करते चलते है, उनकी साधना लहलहाती फसल की तरह उगती, बढ़ती और फलवती होती है, इसलिये हमें उस ओर पूरी सतर्कता और अभिरुचि के साथ प्रयत्नशील रहना होगा वैसा ही हमने किया भी।
उपासना की सफलता को मूर्तिमान् रूप में देखने में लिये भावनाओं के सम्बन्ध में बहुत ही सतर्क, सावधान तथा यथार्थपूर्ण रहना ही होगा।
उपासना, आध्यात्मिक पुरुषार्थ चाहिये। इन दोनों भिन्न क्षेत्रों को एक दूसरे से मिलाना नहीं चाहिये। हाँ! इन दोनों को एक दूसरे का सहायक अवश्य बनाया जा सकता है।
उपासना तो तभी होगी, जब हम सर्वथा निष्काम और निष्प्रयोजन ही रहें यहाँ तक कि परमात्मा की कृपा की भी कामना करें, इतनी उन्नत निष्काम उपासना से आत्मा न केवल परमात्मा तत्त्व के आनन्द की अधिकारी बनती है, बल्कि परमात्म रूप ही हो जाती है। आत्मा तो यों भी परमात्मा का ही रूप है। केवल जीव ने अपनी भौतिक वितृष्णाओं का आवरण डालकर उसे अपना स्वरूप भुला दिया है। वह असंगत आवरण हटाइये, आत्मा परमात्मा रूप हो जायेगी जो स्वयं आनन्द रूप परमात्म स्वरूप है, उस आत्मा के लिये परमात्मा की अनुकम्पा की याचना भी क्या। उपासना द्वारा आत्मा को उसका सत्य स्मरण कराइए, परमात्मा के समीप जाइये अर्थात् आत्मा में उस तत्त्व की अनुभूति कीजिये और देखिये कि आत्मा अपना स्वरूप पहचानने लगती है या नहीं।
उपासना एवं साधना के द्वारा यह प्रयोजन सिद्ध किया जाता है। शारीरिक ओर मानसिक तपस्या मनुष्य को इस योग्य बनाती है कि वह आत्मिक विभूतियों के क्षेत्र में प्रवेश करके वह सामर्थ्य प्राप्त कर सके, जिसके आधार पर कि आत्म-बल एवं अनुग्रह उपलब्ध हो सके।
उपासना जैसे पवित्र तथा पुनीत बात को इन सब बातों से सर्वथा पृथक ही रखा जाये तो अधिक मांगलिक होगा। उपासना का प्रयोजन तो मात्र आत्मा को परमात्मा के सान्निध्य में लाना ही है। जिस बात का लक्ष्य परमात्मा के सान्निध्य जैसी ऊँची वस्तुएँ हो उसके बीच में साँसारिक कामनाओं जैसी निम्न स्तर की बात को लाना अपनी अनधिकारिक पात्रता को सिद्ध करना ही है। यदि हम अपनी साँसारिक वितृष्णाओं, इन्द्रिय लिप्साओं और भौतिक कामनाओं को अमहत्व नहीं दे सकते और इन भवपाशों को धारण किये हुये ही परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त करना चाहेंगे तो यह किसी प्रकार समृद्ध हो सकता है, यह तो बड़े ही साधारण विचार की बात है।
उपासना की विधि, उसकी सामग्री अथवा उसके स्थान आदि से नहीं है। उसका तारतम्य उस मनोभाव से है, जो उपासना के आगे-पीछे उपस्थित रहता है। उपासना में महत्व क्रिया-विधि उसकी सामग्री अथवा उसके स्थान आदि से नहीं है। उसका तात्पर्य उस मनोभाव से है, जो उपासना के आगे-पीछे उपस्थित रहता है। उपासना में महत्व क्रिया-विधि अथवा साधन सामग्री का नहीं है।
उपासना के आगे-पीछे उपस्थित रहता है। उपासना में महत्व क्रिया-विधि अथवा साधन सामग्री का नहीं है। महत्व है-भावना का। यदि उपासक की भावना ठीक उपासना के अनुरूप है तो निश्चय ही वह फलवती होगी। फल भावना के अधीन है, उपक्रम अथवा उपकरण के अधीन नहीं मन्दिर का एक पुजारी दोनों समय जीवन भर आरती-पूजा करता रहता है पर उसका उसे कोई प्रतिफल नहीं मिलता।
उपासना की जाती है। तेजस्वी परमात्मा हमें ब्रह्म तेज प्रदान करेंगे तो फिर और कमी किस बात की रह जायेगी स्वर्ण मुद्रा के बदले संसार भर में कहीं भी, कोई भी, वस्तु खरीदी जा सकती है। आत्म तेज के बदले में भी हर क्षेत्र में प्रगति का पथ प्रशस्त किया जा सकता है। जिसे यह दैवीय वरदान मिल गया, वह धन्य हो गया और जिसे इससे वंचित रहना पड़ा उसके लिए प्रचुर सुविधा सामग्री होते हुए भी पग पग पर भय, चिन्ता, निराशा, आशंका, बेचैनी के दृश्य ही दृष्टिगोचर होते रहेंगे। कभी चैन की नींद सोने का अवसर ना मिलेगा।
उपासना का वास्तविक प्रतिफल अन्तर में स्थायी सुख, शांति और संतोष की वृद्धि होना माना गया है। यदि ऐसा नहीं होता तो मानना होगा कि उपासना के स्वरूप में कोई कमी चल रही है।
उपासना का प्रयोजन तो मात्र आत्मा को परमात्मा के सान्निध्य में लाना ही है। जिस बात का लक्ष्य परमात्मा के सान्निध्य जैसी ऊँची वस्तुएँ हो उसके बीच में साँसारिक कामनाओं जैसी निम्न स्तर की बात को लाना अपनी अनधिकारिक पात्रता को सिद्ध करना ही है। यदि हम अपनी साँसारिक वितृष्णाओं, इन्द्रिय लिप्साओं और भौतिक कामनाओं को अमहत्व नहीं दे सकते और इन भवपाशों को धारण किये हुये ही परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त करना चाहेंगे तो यह किसी प्रकार समृद्ध हो सकता है, यह तो बड़े ही साधारण विचार की बात है।
उपासना का नहीं, गरिमा साधक की मनोभूमि की है। सो लोग उसी की उपेक्षा कर बैठे, फिर शास्त्रोक्त परिणाम कैसे मिले?
उपासना में प्रवृत्त हुए तो सारे दोष - दुर्गुणों से छुटकारा पाकर ऋषि जीवन बिताने लगे और जीवन की पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकने में समर्थ हुये।
उपासना का एक मात्र लक्ष्य होता है। जो कर्म परात्पर के निर्मित किया जाता है, अर्थात् उसका कोई भी फल अपने लिये न चाहकर जो कुछ भी हो वह सब अपने आराध्य के ही चरणों में समर्पित कर दिया जाये और केवल पापों के प्रक्षालन होने से अपनी आत्मशुद्धि की भावना रहे और उपासना करने वाले के हृदय में ऐसी निष्ठा बनी रहे कि यह वेदोक्त विधान का करना मेरा परम कर्तव्य है, अतएव मुझे यह अनवरत करना ही चाहिए - ऐसी बुद्धि के द्वारा भेद बुद्धि का उपाश्रय करके देव भक्ति को सात्विक कहा जाता है, क्योंकि इसमें सतोगुण की प्रधानता रहती है और केवल अपने समाराध्य की प्रीति के लिए ही यह कर्तव्य कर्म समझ कर की जाती है और इसके द्वारा अपनी आत्म-शुद्धि इष्ट देव की कृपा से हो जाने की भावना सुदृढ़ रहती है।
उपासना में यह भाव रखने में कोई हर्ज नहीं कि-हमें इस उपासना द्वारा वह शक्ति, बड़ा आत्मविश्वास और वह बुद्धि मिले, जिसके बल पर हम न्याय नीति और सदाचार द्वारा अपने भौतिक उद्योगों में सफल हो सकें। उपासना के फलस्वरूप भौतिक सम्पदाओं की स्थूल उपलब्धि की कामना करना असंगत है, उसके लिये शक्ति और क्षमता की याचना ही उचित है। ईश्वर की कृपा सूक्ष्म शक्तियों के ही रूप में होती है। स्थूल पदार्थों के रूप में नहीं।
उपासना स्नान-ध्यान तीर्थ-पूजन कथा-कीर्तन करने में घण्टों लगाते रहे हों।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-February
उपासना के सत्परिणामों की चर्चा सदा सर्वदा सुनाई पड़ती रहती है। जिनने भी इस महामंत्र का आश्रय लिया है, उसी ने आशाजनक और उत्साह वर्धक फल पाया है।
उपासना सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वोपरि है-
उपासना साधारण से साधारण और असाधारण से असाधारण समस्याओं को सुलझाने में एक चमत्कारी उपाय को तरह सत्परिणाम उत्पन्न करती रही है।
उपासना न की थी। उनकी स्थिति देखने वाले सभी समीपवर्ती लोगों ने जो अधिकाँश सभी शिक्षित और प्रतिष्ठित व्यक्ति रहे है, यह माना कि उनकी मृत्यु प्रेत बाधा से ही हुई। उनके निधन और दाह कर्म की सूचना रेडियो से बड़े दुःख के साथ दी गई थी।
उपासना से आरम्भ होती है और प्राणी मात्र को अपनी ही आत्मा के समान अनुभव करने और अपने ही शरीर के अंग अवयवों की तरह अपने पन की भावना रखते हुए अनन्य श्रद्धा चरितार्थ करने तक व्यापक होती चली जाती है। ऐसी दशा में कहीं दूर चले जाने पर भी हमारे लिये यह संभव न हो सकेगा कि जिनके साथ इसी जीवन में घनिष्ठता रहीं है, जिनका स्नेह, सद्भाव, सहयोग अनुग्रह अपने ऊपर रहा है, उनकी ओर से तनिक भी मुख मोड़ा जाय, उनके प्रति उदासीनता और उपेक्षा अपनाई जाय। कोई कृतघ्न ही ऐसा सोच सकता है।
उपासना में तथा जीवन साधना में उन तत्वों का समावेश करे, जिनका प्रतिपादन गायत्री तत्व ज्ञान के अंतर्गत किया गया है।
उपासना के साथ सुख, समृद्धि तथा ज्ञान परक विचारों की साधना की जाती है। मनुष्य जीवन में जो कुछ पाता या खोता है, उसका हेतु मान भले ही किन्हीं और कारणों को लिया आये, किन्तु उसका वास्तविक कारण मनुष्य के अपने विचार ही होते है, जिन्हें धारण कर वह जान अथवा अनजान दशा में प्रत्यक्ष से लेकर गुप्त मन तक चिन्तन तथा मनन करता रहता है।
उपासना करनी चाहिये। जिसने आत्मा को देख लिया, उसने सब कुछ देख लिया और जिसने आत्मा को प्राप्त कर लिया, उसने निश्चय ही सारे सुख, सारे सौख्य और सारे रस, आनन्द एक साथ एक स्थान पर सदा के लिये पा लिये।
उपासना है। सो बाकी दिनों अब अपनों में अपनी बातें ही नहीं कहेंगे-अपनी सारी ममता भी उन पर उड़ेलते रहेंगे। शायद इससे परिजन को भी यत्किंचित् सुखद अनुभूति मिलें प्रतिफल और प्रतिदान की आशा किये बिना हमारा भावना प्रवाह तो अविरल जारी ही रहेगा। परिजनों से परिपूर्ण स्नेह-यही इन पिछले दिनों का हमारा उपहार है, जिसे कोई भुला सके तो भुला दे। हम तो जब तक मस्तिष्क में स्मृति और हृदय में भावना का स्पंदन विद्यमान् है आजीवन उसे याद ही रखेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-August
उपासना और आत्म-शोधन की तपश्चर्या के लिए समय निकालना चाहिये और लोक-मंगल की साधना में नियमित रूप से कम-से-कम चार घण्टा समय देना चाहिए प्रातः और सायंकाल का समय व्यक्तिगत साधना के लिए और दिन का बचा समय लोक-मंगल की सेवा प्रक्रिया में लगाने के लिए नियुक्त रहना चाहिये। कहना न होगा कि समय की आवश्यकता को देखते हुए, आज की सबसे बड़ी लोक सेवा विचार परिवर्तन की दृष्टि से किये गये, प्रयत्नों पर ही निर्भर है। आर्थिक, शारीरिक या बौद्धिक सुविधाएँ बढ़ाने वाले कार्य भी यों सेवा क्षेत्र में आते हैं पर उनका भी
उपासना कर, बुद्धि को पूज, संकल्पवान् बन और चरित्र की दृढ़ता को अपने जीवन में उतार, यही तेरी ईश्वर-भक्ति है। भारतवर्ष में बढ़ रहे पाप, हिंसा, अनैतिकता और अनादर के यवनी-कुचक्र से लोहा लेने और भगवान् की सृष्टि को सुन्दर बनाने के लिये इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है।” समर्थ गुरु रामदास ने समझाया।
उपासना की होती तो छल-कपट ईर्ष्या-द्वेष दम्भ, हिंसा, पाशविकता, युद्ध को प्रश्रय न देते। स्वर्ग और है भी क्या, जहाँ यह बुराइयाँ न हों वहीं तो स्वर्ग है। माँ की उपासना से स्वर्गीय आनंद की अनुभूति इसीलिये यहीं प्रत्यक्ष रूप से अभी मिलती है। इसलिये मैं कहता हूँ कि कुछ दिन और सब उपासना पद्धति बंद कर केवल “माँ” की मातृ-भूमि की उपासना करनी चाहिये।
उपासना का सारा कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। मंदिरों की स्थापना के भूल में मनीषियों का एक मात्र प्रयोजन यही था कि इन धर्म केन्द्रों के द्वारा आस्तिकता के आदर्शों का जन-मानस में व्यापक प्रकाश पहुँचाया जाय।
उपासना का प्रयोजन पूरी तरह प्राप्त किया जा सकता है। विशालकाय मन्दिरों का निर्माण करने की प्रक्रिया भारतीय मनीषियों ने अति महत्त्वपूर्ण प्रयोजन की पूर्ति के लिए विनिर्मित की है।
उपासना से स्वर्गीय आनंद की अनुभूति इसीलिये यहीं प्रत्यक्ष रूप से अभी मिलती है। इसलिये मैं कहता हूँ कि कुछ दिन और सब उपासना पद्धति बंद कर केवल “माँ” की मातृ-भूमि की उपासना करनी चाहिये।
उपासना पद्धति का प्रचलन करना चाहिए जिसमें केवल “माँ” की ही पूजा हो, माँ को ही भेंट चढ़ाई जाये?
उपासना करनी चाहिये।
उपासना, संयम, सेवा, सदाचार का पालन करता हुआ अपने भौतिक कर्तव्य पूरे करे, ताकि आत्म-शक्तियों का ह्रास न हो। शक्ति को विघटित कर देने से मनुष्य इस जीवन में भी दुःखी होता है और यह निम्नगामी योनियों की ओर आकर्षित हो जाता है। बढ़ी हुई शक्ति चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक, बौद्धिक अथवा आत्मिक उससे यह जीवन तो सफल होता ही है, उस परम स्थिति को प्राप्त करने से मूल लाभ मिलता है। इस विज्ञता का ही परिणाम है कि भारतीय जीवन शैली आज भी अपने ही ढंग की है। उसमें पाश्चात्य ढंग के विकारों के लिये कोई स्थान नहीं है।
उपासना पद्धति बंद कर केवल “माँ” की मातृ-भूमि की उपासना करनी चाहिये।
उपासना करें। अहंकारियों ने, दुष्ट-दुराचारियों स्वार्थी और इन्द्रिय लोलुप जनों ने मातृ-भू को कितना कलंकित किया है इस पर भावनापूर्वक विचार करते समय आंखें भर आती है। हमने अप्रत्यक्ष देवताओं को तो पूजा की पर प्रत्यक्ष देवी धरती माता के भजन का कभी ध्यान ही नहीं आया। आया होता तो आज हम अधिकार के प्रश्न पर रक्त न बहाते, स्वार्थ के लिये दूसरे भाई का खून न करते, तिजोरियाँ भरने के लिये मिलावट न करते, मिथ्या सम्मान के लिये अहंकार का प्रदर्शन न करते। संसार भर के प्राणी उसकी सन्तान-हमारे भाई हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-July
उपासना करते हैं। भगवान् कोई मनुष्य नहीं हैं, वह तो सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान् क्रियाशील है, इसलिये उपासना का अभाव रहने पर भी उसके कर्म करने वाला मनुष्य उसे बहुत शीघ्र आत्मज्ञान कर लेता है। लकड़ी काटना, सड़क के पत्थर फोड़ना, मकान की सफाई, सजावट और खलिहान में अन्न निकालना, वर्तन धोना और भोजन पकाना यह भी भगवान् की ही स्तुति हैं यदि हम यह सारे कर्म इस आशय से करें कि उससे विश्वात्मा का कल्याण हो। कर्त्तव्य भावना से किये गये कर्म परोपकार से भगवान् उतना ही प्रसन्न होता है जितना कीर्तन और भजन से। स्वार्थ के लिये नहीं आत्म-सन्तोष के लिये किये गये कर्म से बढ़कर फलदायक ईश्वर की भक्ति और उपासना पद्धति और कोई दूसरी नहीं हो सकती।
उपासना है।
उपासना कर ली? यज्ञ की समिधाएँ और हविव्पात्र यज्ञ स्थल पर पहुँचा दिया? कहो-कहो आज कुछ बेचैन से दिखाई दे रहे हो कोई बात हुई है क्या?
उपासना, यज्ञ आदि भारतीय दर्शन की मान्यताओं को अब अन्ध-विश्वास कहा जाता है किन्तु यदि बुरा न लगे तो विज्ञान को भी अन्ध-विश्वास मानना और उसके पद-चिह्नों पर चलने वालों को वैज्ञानिक अन्ध-विश्वासी कहना अनुपयुक्त नहीं होगा। आज फैशन के नाम पर तरह-तरह के प्रयोग हो रहे हैं। महिलायें बाल साफ करने के लिये शैम्पू का प्रयोग करती हैं किन्तु उन्हें यह पता नहीं होता कि यही शैम्पू जिन कारखानों में तैयार किया जाता है वहाँ छोटे-छोटे खरगोश, गिलहरी आदि जीव पाले गये होते है। शैम्पू तैयार होता है तो यह देखने के लिये कि वह ठीक है या नहीं उसे खरगोश की आँखों में डाला जाता है यदि खरगोश की आँख फूट जाये तो यह माना जाता है कि वह तेज है। जब तक उसके अच्छे होने का उत्पादकों को विश्वास नहीं हो जाता ऐसे प्रयोग होते हैं और उनमें बेचारे निरीह जीवों की हत्या और उत्पीड़न होता रहता है।
उपासना पद्धति और कोई दूसरी नहीं हो सकती।
उपासना का जीवन के विकास से अद्वितीय सम्बन्ध है।
उपासना का अभाव रहने पर भी उसके कर्म करने वाला मनुष्य उसे बहुत शीघ्र आत्मज्ञान कर लेता है। लकड़ी काटना, सड़क के पत्थर फोड़ना, मकान की सफाई, सजावट और खलिहान में अन्न निकालना, वर्तन धोना और भोजन पकाना यह भी भगवान् की ही स्तुति हैं यदि हम यह सारे कर्म इस आशय से करें कि उससे विश्वात्मा का कल्याण हो। कर्त्तव्य भावना से किये गये कर्म परोपकार से भगवान् उतना ही प्रसन्न होता है जितना कीर्तन और भजन से। स्वार्थ के लिये नहीं आत्म-सन्तोष के लिये किये गये कर्म से बढ़कर फलदायक ईश्वर की भक्ति और उपासना पद्धति और कोई दूसरी नहीं हो सकती।
उपासना स्थल में नहीं गये। एक वृक्ष की चौपालिका पर तने का आश्रय लिए शुक तब तक एक सी स्थिति में बैठे रहे जब तक पिता श्री अपने साधना भवन से बाहर नहीं निकले। शुक ने उन्हें सादर प्रणाम किया। विवर्ण मुख मुद्रा देखते ही भगवान् व्यास ने पूछा- शुक तुमने उपासना कर ली? यज्ञ की समिधाएँ और हविव्पात्र यज्ञ स्थल पर पहुँचा दिया?
उपासना अनुष्ठानों में तो उसका महत्व और भी अधिक है वह बौद्धिक क्षमताओं को विकसित करने वाला और आरोग्यवर्धक भी माना गया है। प्रातःकाल उगते हुए पीतवर्ण सूर्य का दर्शन और ध्यान करने से बुद्धि और मेधा विकसित होती है। विवाह-शादियों ओर उपासना पुरश्चरणों पर पीत वस्त्र धारण करने की भारतीय परम्परा भी इसीलिये विकसित हुई कि इस रंग के प्रभाव से प्रेम और विवेक का उदय हो यह दोनों भाव मनुष्य-जीवन के कल्याण में बड़े सहायक होते हे इसीलिये पीले रंग का भी अपना विशिष्ट महत्व है।
उपासना पुरश्चरणों पर पीत वस्त्र धारण करने की भारतीय परम्परा भी इसीलिये विकसित हुई कि इस रंग के प्रभाव से प्रेम और विवेक का उदय हो यह दोनों भाव मनुष्य-जीवन के कल्याण में बड़े सहायक होते हे इसीलिये पीले रंग का भी अपना विशिष्ट महत्व है।
उपासना प्रतिदिन करनी चाहिये। जिसने सूरज, चाँद बनाये, फूल-फल और पौधे उगायें, कई वर्ण, कई जाति के प्राणी बनाये उसके समीप बैठेंगे नहीं तो विश्व की यथार्थता का पता कैसे चलेगा? शुद्ध हृदय से कीर्तन-भजन प्रवचन में भाग लेना प्रभु की स्तुति है उससे अपने देह, मन और बुद्धि के वह सूक्ष्म संस्थान जागृत होते है, जो मनुष्य को सफल, सद्गुणी और दूरदर्शी बनाते हैं, उपासना का जीवन के विकास से अद्वितीय सम्बन्ध है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-October
उपासना करने लगे।
उपासना के द्वारा पुरुष और स्त्री शरीरों में ऐसी शक्तियों का आवाहन धारण और प्रजनन आज भी सम्भव है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-November
उपासना के साथ-साथ अपने सद्गुण सद्विचारों को अधिक से अधिक सत्कर्मों में लगाने लगता हे तो उसकी साधना की सफलता और भी सत्वर हो उठती है।
उपासना ईश्वर पुनीति। सम्पूर्ण आत्म-समर्पण के साथ परमात्मा की उपासना करते करते जब व्यक्ति के हृदय में उसका प्रकाश आ विराजेंगे, तब उसे सारा जड़-चेतन संसार परमात्मा रूप ही दीखने और अनुभव होने लगेगा। उसका ‘स्व’ सार्वभौम हो जायेगा। ऐसी स्थिति में उसे किसी से पृथकता का अनुभव ही न होगा। स्वयं सहायक, समानार्थी, सहायता और परिणाम सबका सब ईश्वर रूप ही दिखाई देगा।
उपासना एवं यज्ञादि प्रक्रियायें संपन्न की जाये तो उनसे सूर्य देव की आध्यात्मिक शक्तियों को विशेष रूप से प्रभावित एवं आकर्षित किया जा सकता है। उनसे न केवल अपने लिये वरन सम्पूर्ण समाज, राष्ट्र और विश्व के लिये सुख समृद्धि ओर शाँति अनुदान उपलब्ध किया जा सकता है।
उपासना करते करते जब व्यक्ति के हृदय में उसका प्रकाश आ विराजेंगे, तब उसे सारा जड़-चेतन संसार परमात्मा रूप ही दीखने और अनुभव होने लगेगा। उसका ‘स्व’ सार्वभौम हो जायेगा। ऐसी स्थिति में उसे किसी से पृथकता का अनुभव ही न होगा। स्वयं सहायक, समानार्थी, सहायता और परिणाम सबका सब ईश्वर रूप ही दिखाई देगा। ऐसी दशा में उसे न तो यह पता चलेगा कि वह किसी की सहायता कर रहा है या कोई उससे सहायता पा रहा है।
उपासना के प्रसार का एक व्यापक अभियान चलाकर उससे आधिदैविक लाभ प्राप्त करने का अवसर सारे देश को देना आवश्यक है, इस पुण्य में सभी गायत्री ड़ को भग लेना चाहिये।
उपासना से बचे समय में धर्म ग्रन्थों का स्वाध्याय, चिन्तन और मनन यह साधना की प्रारम्भिक आवश्यकतायें है, शिखिध्वज! आज तुम्हारी मन्त्र-दीक्षा सम्पन्न हुई। पूजन की सामग्री, उपयुक्त पात्र, कुश-आसन यह अपने पास रखने होंगे। पंचोपचार पूजन सहित मंत्र जप करना चाहिये और शुभ्र ज्योति स्वरूप निराकार भगवती गायत्री का ध्यान करना चाहिये। जब तुम इस प्रारम्भिक साधना को सफलतापूर्वक पूरा कर लोगे तो आगे उच्चस्तरीय साधना के लिये, तुम्हें अग्नि-दीक्षा भी देंगे।” यह कहकर महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-October
उपासना की। अपना नाम ‘ईस ना बदल लिया। उन्हें प्यार में ईसा कहा जाता था। वे भक्ति का प्रचार करने अपने देश लौट गये। जहाँ उन्हें शूली का दण्ड मिला।
उपासना की क्रिया−प्रक्रिया नहीं है उसके पीछे एक प्रबल दर्शन भी जुड़ा हुआ है जो मनुष्य की आकाँक्षा, चिन्तन प्रक्रिया और कर्म−पद्धति को प्रभावित करता है। समाज, संस्कृति, चरित्र, संयम, सेवा, पुण्य परमार्थ आदि सद्वृत्तियों को अपनाने से व्यक्ति की भौतिक सुख−सुविधाओं में निश्चित रूप से कमी आती है, भले ही उस बचत का उपयोग लोक−कल्याण में कितनी ही अच्छाई के साथ क्यों न होता हो। आदर्शवादिता के मार्ग पर चलते हुए जो प्रत्यक्ष क्षति होती है उसकी पूर्ति ईश्वरवादी स्वर्ग, मुक्ति, ईश्वरीय प्रसन्नता आदि विश्वासों के आधार पर कर लेता है। इसी प्रकार अनैतिक कार्य करने के आकर्षण सामने आने पर वह ईश्वर के दण्ड से डरता है। नास्तिकवादी के लिए न तो पाप के दण्ड से डरने की जरूरत रह जाती और न पुण्य परमार्थ का कुछ आकर्षण रहता है।
उपासना से भक्त को अथवा भगवान को क्या लाभ होता है यह प्रश्न पीछे का है। प्रदान तथ्य यह है कि आत्मा और परमात्मा की मान्यता मनुष्य के चिन्तन और कर्तृत्व की एक नीति नियम के अंतर्गत बहुत हद तक जकड़े रहने में सफल होती है। इन दार्शनिक बन्धनों को उठा लिया जाय तो मनुष्य की पशुता कितनी उद्धत हो सकती है और उसका दुष्परिणाम किस प्रकार समस्त संसार को भुगतना पड़ सकता है इसकी कल्पना भी कँपा देने वाली है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-November
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज मन्त्रों का साधन−विधान, आत्म−साक्षात्कार एवं ऋद्धि−सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना, विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू. 6)
उपासनात्मक कर्मकाण्डों और विधि−विधानों के पीछे छिपी हुई साँकेतिक प्रेरणा यही है कि जीवन का अन्तरंग और बहिरंग स्वरूप निखारा जाय। उस पर चढ़े कषाय कल्मषों का आवरण उतारा जाय। यह प्रक्रिया पूजा−पाठ से या जिस भी उपाय से पूरी हे सकेगी उसी से आत्मोत्कर्ष का—आत्म−साक्षात्कार का—अपूर्णता को पूर्णता में परिवर्तित करने का प्रतिफल प्राप्त होगा। उसी से वे लाभ प्राप्त होंगे जो विभिन्न उपासनाओं के फल महात्म्य रूप में गाये बताये गये हैं। वस्तुतः योग और तप का प्रयोजन व्यक्ति की आस्था, आकाँक्षा, भावना, दृष्टि, मान्यता एवं तत्परता को उत्कृष्टता के स्तर तक पहुँचाता है।
उपासना की प्रक्रिया आस्थाओं के अभिनव निर्माण के लिए नियोजित की जाय। योग और तप जैसी साधनाएँ आदतों में घुसी विकृतियों को निरस्त करके परिष्कृत व्यक्तित्व के अनुरूप गुण, कर्म स्वभाव ढालने की मनोविज्ञान सम्मत शैली के अनुरूप विकसित की जायें। इसमें नवीन कुछ नहीं है। लक्ष्य वही है जो उस धर्म कलेवर को खड़ा करने वालों का था, नवीनता केवल समय की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उसे युग के अनुरूप बना देने भर की है। इस परिवर्तन के बिना यथा स्थिति में खड़ा पड़ा रहने वाला हमारा “घोड़ा अड़ेगा—पान सड़ेगा।
उपासना, विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू. 6)
उपासनाओं के फल महात्म्य रूप में गाये बताये गये हैं। वस्तुतः योग और तप का प्रयोजन व्यक्ति की आस्था, आकाँक्षा, भावना, दृष्टि, मान्यता एवं तत्परता को उत्कृष्टता के स्तर तक पहुँचाता है। इस स्थिति पर पहुँचते हुए मनुष्य का आत्मा ही परमात्मा की पदवी प्राप्त करता है और वही आत्मपरिष्कार का—युग सन्तुलन का महान् प्रयोजन पूरा करता है।
उपासनाएँ—जीवन−साधना की प्रेरणायें—उच्चस्तरीय प्रगति के लिए तेजस्वी प्रकाश—शोक−संताप से घिरी परिस्थितियों का समाधान आदि न जाने कितने अनुदान हैं जो शान्ति कुँज में आने वाले अनायास ही प्राप्त करते रहते हैं। वे सब उपलब्धियाँ
उपासना क्षेत्र को दयनीय दुर्गति का शिकार बनना पड़े। इन विडम्बनाओं को निरस्त करने के लिए आवश्यक समझा गया कि अध्यात्म के शाश्वत सत्य और तथ्य को जन साधारण के सम्मुख रखा जाय और उसके प्रयोग परीक्षण को कसौटी पर कस कर खरा खोटा सिद्ध होने दिया जाय।
उपासना में संलग्न होते थे तो लोक−मंगल क्षेत्र पर्याप्त मात्रा में समाज के सुयोग्य निर्माताओं से भरा पूरा रहता था। उनके नेतृत्व में अनेकानेक प्रचारात्मक, रचनात्मक, संघर्षात्मक प्रवृत्तियाँ चलती थीं। जिनका लाभ देश और विश्व की जनता को पूरी तरह मिलता था। जहाँ बहुत बड़ी संख्या में सुयोग्य, परिष्कृत और परमार्थ परायण, लोक−सेवी अपना पूरा जीवन अनन्य निष्ठा के साथ खपाये हुए हैं वहाँ सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन में कोई कमी न रहेगी। निश्चित है कि ऐसी स्थिति में ज्ञान−विज्ञान वैभव की−सुख−शांति की−प्रगति और समृद्धि की परिस्थितियाँ ही उमगती रही हैं, रहेंगी।
उपासना में स्थूल सूक्ष्म कारण शरीरों को संलग्न करके उसे जपयोग के रूप में परिणत करना—सूर्यार्ध्य दान के माध्यम से समर्पण योग की धारणा—प्रभात कालीन सूर्य की स्वर्णिम किरणों का तीनों शरीरों में प्रवेश और उनसे समग्र व्यक्तित्व का ज्योतिर्मय होना—खेचरी मुद्रा के माध्यम से उलटी जिह्वा को तालु से लगाकर सोमरस का पान करना—कामधेनु गौर का स्तन पान करते हुए आनन्द अमृत को चूसना—मस्तिष्क में कैलाश, मानसरोवर अवस्थित शिव की अथवा क्षीर सागर में शेषशायी विष्णु की भावना करना यह लय योग की अनुभूति है। अजपा जाप सोऽहम् साधना प्राणयोग में आती है। आत्मबोध और तत्त्वबोध की द्विविधि ध्यान धारणा से ब्रह्मयोग की साधना बनती है। यह सब कैसे किया जाय यह पाँच घण्टे प्रतिदिन की भाव साधना में प्रत्यावर्तन सत्र के छात्रों को सिखाया और कराया जाता रहा है। साथ ही प्रवचनों के माध्यम से चिन्तन एवं कर्तृत्व को अध्यात्म दर्शन के अनुरूप कैसे ढाला जाय—व्यावहारिक जीवन में उत्कृष्टता एवं आदर्शवाद का समन्वय कैसे किया जाय इसकी विशद् एवं सुबोध चर्चा की जाती रही है।
उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मू. 50 पैसा—15 पुस्तकों के सैट का मू. 7) 50। ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं—
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-December
उपासना, साधना की पद्धतियाँ जीवन के अंतरंग और बहिरंग दोनों पक्षों के विकास में उपयोगी हैं और सहायक भी।
उपासना की थी, जब उन्होंने यह देखा कि मेरी सम्पदा जा रही है, वेदना से तड़फड़ा कह वे लक्ष्मी के चरणों में लोट गये और फूट−फूटकर रोने लगे। लक्ष्मी को उन पर दया आ गई। उनने कहा—’पुत्र मेरा जाना तो निश्चय है, पर तेरी भक्ति को देखकर एक वरदान तुझे दे सकती हूँ। मुझे छोड़कर अन्य जो वस्तु चाहे सो तू माँग ले।
उपासना ही कह सकते हैं। बसन्त ऋतु इसी पुण्य वेला में अवतरित होकर प्रकृति गत सौंदर्य और मानवी चेतना गत उल्लास को प्रफुल्लित करती है। यों बसन्तोत्सव भारत भर में मनाया जाता है पर अपने लिए तो वह जीवन प्राण है। उस दिन अखण्ड−ज्योति परिवार के सदस्य भाव−विभोर मनः स्थिति में रहते हैं। पिछले वर्ष का कार्यक्रम निर्धारण करने में संलग्न रहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-June
उपासनात्मक क्रिया−कलाप,(5) आत्म−सुधार के लिए किये गए प्रयत्न,(6) नव−निर्माण अभियान की दिशा में उठाये गये कदम,(7) शान्ति−कुञ्ज की गतिविधियों में ली गई दिलचस्पी, (8) शिक्षण के बाद घटित हुई कोई उल्लेखनीय घटनाएँ, (9) भावी योजनाएँ तथा उनके लिए तैयारियाँ, (10) गुरु पूर्णिमा मनाये जाने का विवरण, 4 जुलाई के एक दो दिन बाद ही शान्ति−कुञ्ज, सप्त सरोवर, हरिद्वार के पते पर भेज देना जाना चाहिए।
उपासना का उसके साथ आत्मसात् होने का − अधिकाधिक प्रकाश प्रेरणा ग्रहण करने का है। जप,हवन,ध्यान, उपवास के अतिरिक्त हमें आत्मोत्कर्ष के लिए वृक्ष पर लिपटने वाली बेल की तरह अपनी मार्ग−दर्शक सत्ता के साथ सघन आत्मीयता को परिपक्व करना चाहिए और प्रेरक दिव्य सत्ता के अनुरूप ही ऊँचा उठने का प्रयत्न करना चाहिए। बसन्त पर्व की भाँति ही गुरु पूर्णिमा भी हमारे लिए आराध्य है। उस दिन हमें नर से नारायण बनने के लिए भाव भरी उमंगों से ओज−प्रोत रहना चाहिए और भव−बन्धनों को काटने की — अपूर्णता से पूर्णता तक बढ़ने की योजनाबद्ध तैयारी करनी चाहिए। गुरु पर्व इन्हीं प्रकाश भरी प्रेरणाओं को साथ लेकर हर वर्ष आता है।
उपासना करते हैं। जिसका प्रयोजन है ईश्वरीय दिव्य तत्व को अपनी चेतना में पूरी तरह भर लेना। प्रेम की—भक्ति की—प्रक्रिया इस प्रयोजन को भली प्रकार पूरी करती है। ईश्वर प्रेम में सराबोर होकर हम उस चेतना को अधिक होने का परिणाम तद्रूप होना ही होता है। जो जिसके संपर्क में जितनी गहराई तक रहेगा—जो जिसे जितना अधिक चाहेगा वह उसी जैसा बनता चला जायगा।
उपासना करनी होगी साथ ही चिन्तन और कर्त्तव्य को प्रेरणा देने वाली सार्वभौम यथार्थता के निकट पहुँचना होगा। भटकाव और विलगाव पर विजय प्राप्त करके स्नेह, सौहार्द्र बढ़ाने के लिए यदि आगे बढ़ना हो तो उसका एक ही तरीका है—सत्य शोधक—पक्षपात रहित दृष्टिकोण का विकास और उसके आधार पर उपयुक्त सिद्ध होने वाले तथ्यों को अपना सकने योग्य साहस का संचय सम्पादन और अभिवर्धन।
उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू. 4)
उपासना पद्धति से सविता देवता की शक्ति को आकर्षित करके अपने अन्तराल में धारण करने की विधि जानते रहे है। इस आधार पर तुच्छ से मनुष्य जीवन को देवोपम विभूतियों से सुसम्पन्न बनाने में असाधारण सफलता प्राप्त की जाती रही है। अब भौतिक क्षेत्र में भी सौर ऊर्जा क विशिष्ट उपयोग करके अतिरिक्त लाभ उठाने की बात सोची गई है—इसे सही दिशा में उठाया गया, कदम ही कहना चाहिए।
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज मन्त्रों का साधन−विधान, आत्म−साक्षात्कार एवं ऋद्धि−सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू. 4)
उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मूल्य 50 पैसा—15 पुस्तकों के सैट का मूल्य 7) 50। ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं—
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-March
उपासना साधक में भौतिक सफलतायें सम्भव करने वाली सिद्धियों और आत्मिक प्रगति का द्वार खोलने वाली विभूतियों से परिपूर्ण बना सकती है।
उपासना करता है वह श्री सम्पन्न हो जाता है।
उपासना अत्यन्त महत्व पूर्ण भूमिका प्रस्तुत कर सकती है।
उपासना करने वाला इन समस्त शक्तियों के साथ अपना सम्बन्ध मिलाकर सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त कर सकता है। समस्त विश्व को ब्रह्ममय देखने की दिव्य दृष्टि से स्पष्टतः गायत्री के तत्व−ज्ञान में समाविष्ट है।
उपासना उपक्रम की मान्यताएँ भी अध्यात्म समर्थक हो सकती है पर उन्हीं को सर्व अध्यात्म मान बैठना भूल है। अध्यात्म का यथार्थ स्वरूप इस समग्र सृष्टि के बीच जुड़ी हुई अविछिन्न आत्मसत्ता की, एकता की, अनुभूति को ही समझा जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में इसे अभिन्नता भी कह सकते हैं। आत्मवत् सर्वभूतेषु के सूत्र को अध्यात्म की यथार्थ व्याख्या समझा जाना चाहिये। इसी मूल प्रवृत्ति की प्रेरणा से इस संसार में परस्पर सहयोग एवं सद्भाव की प्रवृत्ति उमड़ती है और व्यक्ति गत उत्कृष्टता एवं सामाजिक प्रगति तथा सुव्यवस्था की नींव पड़ती है।
उपासना करे तो उसे वह सब कुछ उपलब्ध हो सकता है जिसकी जीवन को सफल बनाने के लिए आवश्यकता है।
उपासना, तपश्चर्या और योगसाधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश, परामर्श इस प्रकार है—
उपासना को दैनिक अनिवार्य धर्म कर्त्तव्यों में सम्मिलित किया है।
उपासना उपक्रम के साथ जुड़े हुए विधि−विधान एवं प्रतिपादन को ही अध्यात्म कहना मूल तथ्य के साथ बलात्कार करना है। धर्म सम्प्रदायों के साथ उपासना उपक्रम की मान्यताएँ भी अध्यात्म समर्थक हो सकती है पर उन्हीं को सर्व अध्यात्म मान बैठना भूल है। अध्यात्म का यथार्थ स्वरूप इस समग्र सृष्टि के बीच जुड़ी हुई अविछिन्न आत्मसत्ता की, एकता की, अनुभूति को ही समझा जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में इसे अभिन्नता भी कह सकते हैं। आत्मवत् सर्वभूतेषु के सूत्र को अध्यात्म की यथार्थ व्याख्या समझा जाना चाहिये।
उपासना को साधना विज्ञान का सबसे शक्ति शाली पक्ष कह सकते हैं 24 अक्षरों का गुँथन इस प्रकार हुआ है कि उनकी पुनरावृत्ति करते रहने से प्रसुप्त गुह्य शक्तियों का जागरण हो सकता है और निष्कृष्टता को उत्कृष्टता में परिणत करने का पथ प्रशस्त हो सकता है। विषवत् की गई गायत्री उपासना साधक में भौतिक सफलतायें सम्भव करने वाली सिद्धियों और आत्मिक प्रगति का द्वार खोलने वाली विभूतियों से परिपूर्ण बना सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-February
उपासना−ग्रन्थों में इन दोनों ही ब्रह्म लिंगों के लिए लगभग समान विशेषणों का प्रयोग हुआ है। शिर, वक्ष, हस्तपादादि विहीन−चक्षु, कर्णदि सर्वेन्द्रिय विवर्जित, निर्विशेष दण्डाकृति के रूप में उन्हें मान्यता दी गई है।
उपासना का निर्देश करते हुए कहा—’ध्यानमुपास्थिति’ अर्थात् तुम ध्यान की उपासना में लग जाओ।
उपासना करता है कि ‘ध्यान ही ब्रह्म है।’ उसके ध्यान की गति इतनी विस्तृत हो जाती है जितनी कि ब्रह्म की।
उपासना का सारा तत्व−ज्ञान भरा पड़ा है।
उपासना की क्रमिक भूमिकाएँ हैं और इन सबसे ऊपर ध्यान है। ध्यान की शक्ति और सामर्थ्य का और भी अधिक स्पष्टीकरण करते हुए महर्षि सनत्कुमार जिज्ञासु नारद को फिर समझाते हैं।
उपासना में लग जाओ।
उपासना की उच्च कक्षा बताया गया है। महर्षि सनत्कुमार जिज्ञासु नारद का समाधान करते हुए कहते हैं—
उपासना और साधना के सारे रहस्य सन्निहित हैं और उन्हें अपनाने वाला सच्चे अर्थों में ईश्वर भक्त एवं सिद्ध पुरुष बन सकता है।
उपासना क्षेत्र में ध्यान साधना को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-September
उपासना, ईश्वर भक्ति, योगाभ्यास, तप साधना, तीर्थयात्रा, कथा−कीर्तन, देव−दर्शन, दान−पुण्य, व्रत−अनुष्ठान, षोडश संस्कार, पर्व, आयोजन आदि धर्म कृत्यों के साधन विधान इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखकर विनिर्मित किये गये थे इन क्रिया कृत्यों के साथ जुड़े हुए प्रेरणा प्रकाश से जन−मानस को आलोकित करते हुए उस उच्चस्तरीय चिन्तन एवं कर्तव्य को निरत रखा जा सकेगा। संक्षेप में भारतीय धर्म, संस्कृति और सभ्यता का आधार मूल उद्देश्य एक ही था कि व्यक्ति को नर−पशु से ऊँचा उठाकर नर−नारायण के रूप में विकसित करने के लिए अगणित स्तर के प्रेरणा प्रयोजन खड़े किये जाँय और सुसंस्कृत जीवन जीने की गरिमा के प्रति आस्थावान बनाया जाय।
उपासना एवं साधना की पुनीत प्रक्रियाएँ जीवनचर्या में सम्मिलित की जा सकें तो वह प्रखर विद्युत प्रवाह उत्पन्न होगा, जिसे अध्यात्म की भाषा में ब्रह्मवर्चस् और विज्ञान की भाषा में प्राण−तेजस् कहा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-January
उपासनात्मक, साँस्कृतिक, शैक्षणिक, कर्मकाण्डात्मक विविध−विधि प्रयोग इस एक उद्देश्य के लिए ही होते थे कि मानवी−चेतना की पशु−प्रवृत्तियों से अस्त−व्यस्त होने से बचा कर उन्हें महान् प्रयोजनों में नियोजित किया जाय।
उपासना आदि की तपश्चर्या तो अनिवार्य रूप से करनी पड़ती थी। इस प्रकार वह अवधि इन यात्रियों के लिए साधु−संस्था के सदस्यों को मिलने वाला प्रत्येक सुअवसर प्रदान करती रहती थी।
उपासना के शास्त्रीय प्रतिफल और यज्ञानुष्ठान के धार्मिक लाभ के यदि छोड़ भी दें तो भी इन दोनों माध्यमों में इतनी अधिक प्रेरणाप्रद आधार भरे पड़े हैं कि उनके सहारे व्यक्ति और समाज को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने की प्रेरणा भली प्रकार दी जा सकती हे। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर पन्द्रह दिवसीय−शिविर में मध्य के चार दिन गायत्री यज्ञ आयोजन के लिए भी रखे गये हैं।
उपासना में निरत हर किसी का सौंदर्य देखते ही बनता था। जहाँ कषाय और कल्मष नहीं, वहाँ कुरूपता कैसे पैर जमा सकेगी? जिधर भी दृष्टि पड़े, उधर ही बसन्ती सौंदर्य बिखर पड़े, ऐसा था−उन दिनों का वातावरण।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-April
उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मूल्य 50 पैसा—15 पुस्तकों के सैट का मूल्य 7) 50। ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं—
उपासना प्रकृति की उपेक्षा करके पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकेगी।
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज मन्त्रों का साधन−विधान, आत्म−साक्षात्कार एवं ऋद्धि−सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू. 4)
उपासना के उपसंहार तक नहीं रुक सकते? उसे थोड़ा समय और दीजिये फिर आपकी जो इच्छा हो वैसा कीजिये।’
उपासना कर चुके हों। आशा की जानी चाहिए। इस साधना—क्रम, परामर्श एवं आत्मिक अनुदान ने त्रिविध प्रक्रिया के साथ सम्पन्न प्रशिक्षण के आधार पर आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ चढ़ने के जिज्ञासु समुचित लाभ प्राप्त कर सकेंगे।
उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू. 4)
उपासना के अभ्यस्त रहे हैं उन्हीं के लिए यह उपयुक्त रहेगा। सर्वथा प्रारम्भिक उपासना आरम्भ करने वालों को यह सब हजम न होगा इसलिए इस वर्ष में उन्हें को भाग लेना चाहिए जो कम से कम एक वर्ष नियमित रूप से गायत्री उपासना कर चुके हों। आशा की जानी चाहिए। इस साधना—क्रम, परामर्श एवं आत्मिक अनुदान ने त्रिविध प्रक्रिया के साथ सम्पन्न प्रशिक्षण के आधार पर आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ चढ़ने के जिज्ञासु समुचित लाभ प्राप्त कर सकेंगे।
उपासना की बात सोची और ब्रह्मवर्चस् उपलब्ध करके आत्मा को परमात्मा के सिंहासन पर बिठाने की तैयारी की। इसकी योजना और भी सुविस्तृत थी। इसके लिए विशालकाय यज्ञानुष्ठानों का आयोजन करना था। तप−साधना और योगाभ्यास की वैसी प्रक्रिया बननी थी जो चेतना के समुद्र को मथकर रख दे। पौराणिक समुद्र मंथन में चौदह रत्न निकले थे योगी ने ब्रह्म मंथन करके न जाने कितने रत्न पाने का स्वप्न देखा था।
उपासना पुरुष तक पहुँचे बिना पूर्ण न हो सकेगी और न पुरुष की उपासना प्रकृति की उपेक्षा करके पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकेगी।
उपासना आरम्भ करने वालों को यह सब हजम न होगा इसलिए इस वर्ष में उन्हें को भाग लेना चाहिए जो कम से कम एक वर्ष नियमित रूप से गायत्री उपासना कर चुके हों। आशा की जानी चाहिए। इस साधना—क्रम, परामर्श एवं आत्मिक अनुदान ने त्रिविध प्रक्रिया के साथ सम्पन्न प्रशिक्षण के आधार पर आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ चढ़ने के जिज्ञासु समुचित लाभ प्राप्त कर सकेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-August
उपासना के लिए लोग मन्दिर में जाते हैं। वहाँ हवा भी नहीं होती हैं। पेड़ों पर से फूल निकालकर मूर्ति पर चढ़ाते हैं—उसे उपासना कहते हैं। बहने वट सावित्री के दिन वट वृक्ष की जो पूजा करती हैं, वह अच्छी उपासना है। पेड़ में तो पूजा सजी हुई है।
उपासना एवं साधना में सुस्थिर उत्साह है उन्हें क्रमिक विकास के लिए नियमित मार्ग−दर्शन करने की व्यवस्था बनाई गई है। गत दो अंकों में इस संदर्भ में कुछ लिखा जाता रहा है। साधना मार्ग में समुचित अभिरुचि रखने वालों की अलग से सूची बनाई जा रही है। वर्ष में दो बार उनके कार्या का लेखा−जोखा लेने और तदनुरूप भविष्य के लिए आवश्यक परामर्श देते रहने का निश्चय किया गया है।
उपासना करें। शरीर को बलवान बनाने की योजना बनायें और मन में जमे हुए भीरुता के समस्त आधारों को निरस्त कर दें। प्रगति का आरम्भ भीतर से करें ताकि उस अन्तः भूमि में उगाये अंकुर को समुन्नत व्यक्तित्व एवं वैभव के रूप में सुविकसित देखा जा सके।
उपासना एवं साधना प्रक्रिया किस प्रकार चल रही है? भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन−क्रम किस स्थिति में रह रहा है? यह पूछा गया है और जुलाई के अंग में ऐसे दस सूखकर निर्देश दिये गये हैं जिनके आधार पर वैयक्तिक, पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों का उच्चस्तरीय निर्वाह कर सकने की दिशा में अधिक तेजी से कदम बढ़ाये जा सकें।
उपासनात्मक क्रिया−प्रक्रिया और जीवन निर्माण साधना पर भी उसकी उपेक्षा नहीं की है और उनमें से अधिकाँश ने अपने आत्मिक जीवन को समुन्नत बनाने के लिए यथासम्भव प्रयत्न किया है। अपनी प्रेरणा परक चेष्टा भी निरन्तर चलती रही है और स्वजनों को इस संदर्भ में समय−समय पर आवश्यक उत्साह एवं प्रकाश दिया जाता रहा है।
उपासना चाहिये। यह मनुष्य की आध्यात्मिक और भौतिक आवश्यकता है।
उपासना जारी रखी और निभा लिया।
उपासना के साधन हैं। उपासना के लिए लोग मन्दिर में जाते हैं। वहाँ हवा भी नहीं होती हैं। पेड़ों पर से फूल निकालकर मूर्ति पर चढ़ाते हैं—उसे उपासना कहते हैं। बहने वट सावित्री के दिन वट वृक्ष की जो पूजा करती हैं, वह अच्छी उपासना है।
उपासना है। पेड़ में तो पूजा सजी हुई है। वहाँ भगवान् का दर्शन करना चाहिए। पेड़ को हमने पानी दिया, अर्थात् पेड़ की पूजा हुई। अब पेड़ पर सुन्दर फूल आये यानी पेड़ की पूर्ण यथायोग्य पूजा हुई।
उपासना कहते हैं। बहने वट सावित्री के दिन वट वृक्ष की जो पूजा करती हैं, वह अच्छी उपासना है। पेड़ में तो पूजा सजी हुई है। वहाँ भगवान् का दर्शन करना चाहिए। पेड़ को हमने पानी दिया, अर्थात् पेड़ की पूजा हुई।
उपासना बुद्धि से देखती थी। सीता के वहाँ से जाने के बाद वहाँ के ऋषियों ने उन पेड़ों की उपासना जारी रखी और निभा लिया।
उपासना करने के बाद ही अन्य देवताओं की आराधना में सफलता मिल सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-July
उपासना क्रम को कर सकते हैं।
उपासना का वातावरण बनाया जाय। घर में गायत्री का एक चित्र किसी उपयुक्त स्थान पर लगाया जाय। अपना दैनिक कार्य आरम्भ करने से पूर्व घर का हर सदस्य उसके सम्मुख खड़े होकर प्रणाम किया करे और कम से कम पाँच पत्र मन ही मन जप किया करे। इसके बाद दफ्तर जाने, स्कूल जाने,भोजन बनाने आदि के कार्य घर के लोग किया करें। दैनिक कार्य आरम्भ करने से पूर्व यह धार्मिक श्रीगणेश करने की आदत पड़ जाने से उसके दूरगामी परिणाम होंगे।
उपासना,स्वाध्याय,नित्य कहानियाँ कहना—घर की तथा समाज की समस्याओं पर विचार विनियम, खेल, विनोद, मनोरंजन,शाक−वाटिका, टूटी−फूटी वस्तुओं की मरम्मत, गृह−शिल्प, पढ़ाना आदि कार्यों के लिए घर वालों के साथ स्वयं जुटाना चाहिए ताकि उनमें सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन करके सच्चा पारिवारिक उत्तरदायित्व निवाहा जा सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-February
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज-मन्त्रों का साधना विधान आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्व पूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
उपासना में बाधक न बनकर साधक बन सकती हैं। जैन-आगमों में कहा गया है कि- “जे आसवा ते परिसवा” अर्थात् जो कर्म बंधन के कारण हैं वे मुक्ति के कारण भी बन सकते हैं। अपनी इन्द्रियों के सदुपयोग करने की कला यदि हम सीख लें तो इस शरीर और इन्द्रिय के द्वारा हम आत्मोत्थान कर सकते हैं। कानों का विषय है सुनना अतः यदि हम विषय विकार-वर्धक और मन को चंचल करने वाली क्रोधादि काषाय-रागद्वेष उत्पन्न करने वाली बातों को न सुनकर सत्पुरुषों की वाणी को सुनें तो हमारा उद्धार सहज ही हो सकता है। इसी तरह अन्य इन्द्रियों का भी हम सदुपयोग करके अपनी उपासना को आगे बढ़ा सकते हैं।
उपासना था। इसे उन्होंने पृथ्वी की सबसे बड़ी शक्ति कहा है। वह अखण्ड अग्नि अर्थात् यज्ञ भगवान के समक्ष अपनी साधना का उनके जीवन में विशेष स्थान था। इनके द्वारा प्राप्त शक्ति के द्वारा ही त्रिशूल अथवा त्रितापों को दूर करने की सामर्थ्य रखते थे। यदि हम भी सुखी रहना चाहते हैं तो हमें उनका अनुकरण करना चाहिए।
उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
उपासना में तल्लीनता आयेगी कैसे?
उपासना और वासना में विरोध है अतः जहाँ तक तुम्हारा मन वासनाओं में भटकता है वहाँ तक सच्ची उपासना हो नहीं पाती बाहरी दिखावा तो ढोंग है उपासना नहीं।
उपासना’ में उपास्य के साथ तल्लीन हो जाने की परमावश्यकता है। जब तक वह स्थिति प्राप्त नहीं होती, साधक का चरम विकास नहीं हो सकता और उस स्थिति को प्राप्त करने के लिए इन्द्रिय निग्रह की अत्यंत आवश्यकता है। जब तक इन्द्रिय के विषय भोगों में हमारा मन लगा रहता है तन जुड़ा रहता है-तब तक उपासना में तल्लीनता नहीं आ सकती। इसीलिये सभी धर्मों में इन्द्रिय दमन को महत्व दिया गया है। इन्द्रियों के बहिर्मुखी होने से हमारा मन चंचल रहता है।
उपासना का अर्थ है समीप बैठना। उपासक देव के गुणों का चिन्तन मनन, उन्हें ग्रहण करने का प्रयत्न करना, उस पर अग्रसर होने की चेष्टा करना। सच्चे शिव के उपासक वही हैं जो अपने मन में स्वार्थ भावना त्याग कर परोपकार की मनोवृत्ति को अपनाते हैं जब हमारे मन में यह विचार उत्पन्न होने लगते हैं तो हम अपने आत्मीयजनों के साथ झूठ, छल,कपट, धोखा, बेईमानी, ईर्ष्या, द्वेष आदि से मुक्त हो जायेंगे। यदि शिवरात्रि व्रत के दिन हम इस महा पथ का अवलम्बन नहीं लेते तो शिव का व्रत और पूजन केवल लकीर पीटना मात्र रह जाता है। उसका कोई विशेष लाभ नहीं होता ।
उपासना एक ही है।
उपासना करेंगे तो सच्ची उपासना होगी और वैसी उपासना से ही हमारा कल्याण हो सकेगा। परमात्मा और आत्मा की दूरी को कम कर उसके साथ एकरूप हो जाना ही उपासना का उद्देश्य है। उपास्य और उपासक के अभिन्न हो जाने में ही उसकी सफलता है।
उपासना का उद्देश्य है। उपास्य और उपासक के अभिन्न हो जाने में ही उसकी सफलता है।
उपासनाएं हैं। उनमें एक-व्रत की साधना भी है। व्रत से शारीरिक, मानसिक व आत्मिक सब प्रकार की उन्नति होती है। विश्राम से शारीरिक क्षेत्रों में नवजीवन आ जाता है। पाचन प्रणाली को भी विश्राम लेने की आवश्यकता पड़ती है जिससे पेट में पड़ा हुआ अन्न हजम हो जाता है और पेट आगामी कार्य के लिए तैयार हो जाता है और शक्ति आने से इसके बाद खाया हुआ अन्न स्वाभाविक रूप से पच जाता है।
उपासना को आगे बढ़ा सकते हैं।
उपासना से ही हमारा कल्याण हो सकेगा। परमात्मा और आत्मा की दूरी को कम कर उसके साथ एकरूप हो जाना ही उपासना का उद्देश्य है। उपास्य और उपासक के अभिन्न हो जाने में ही उसकी सफलता है।
उपासना करते हैं, यह कह ही कैसे सकते हैं? आत्मा से भी हम बहुत दूर हैं। उसके दर्शन एवं अनुभव का प्रयत्न नहीं करते। शरीर में ही आत्म बुद्धि की हुई है। इसलिए आत्मा की उपासना हम नहीं कर रहे हैं यह निश्चित है।
उपासना हो नहीं पाती बाहरी दिखावा तो ढोंग है उपासना नहीं।
उपासना का अर्थ है समीप बैठना, रहना और वह दो तरह से होता है (1) परमात्मा या सद्गुरु के पास बैठना और (2) आत्मा या आत्मीय गुणों के पास बैठना। वास्तव में हम इन दोनों तत्वों से बहुत दूर बैठे हुए हैं। परमात्मा को तो हम भूल से गये हैं, कभी दुःख-दर्द के समय ही उसका स्मरण आता है। यदि उसके नाम की माला भी फेरते हैं तो हमारा मन इधर उधर भटकता रहता है इसलिए हम परमात्मा के समीप नहीं पहुँच पाते। इसी प्रकार सद्गुरुओं के पास पहले तो हम अधिक समय बैठते ही नहीं हैं, और बैठते हैं तो भी मन घर और बाहर के कामों में लगा रहता है।
उपासना होगी और वैसी उपासना से ही हमारा कल्याण हो सकेगा। परमात्मा और आत्मा की दूरी को कम कर उसके साथ एकरूप हो जाना ही उपासना का उद्देश्य है। उपास्य और उपासक के अभिन्न हो जाने में ही उसकी सफलता है।
उपासना में तल्लीनता नहीं आ सकती। इसीलिये सभी धर्मों में इन्द्रिय दमन को महत्व दिया गया है। इन्द्रियों के बहिर्मुखी होने से हमारा मन चंचल रहता है। कभी सुन्दर पदार्थों या रूप के दर्शन में मन ललचाता है, कभी मधुर गायन को सुनने के लिए हम बड़े उत्सुक हो जाते हैं, कभी विविध रसों का आस्वादन करने को जिह्वा की लोलुपता नजर आती हैं। कभी सुगन्धित पदार्थों के प्रति आशक्ति देखी जाती है और कभी कोमल वस्तुओं के स्पर्श के लिए मन ललचा उठता है।
उपासना से सद्गुणों का विकास होता है और यावत् परमात्मा-दशा प्राप्त होती है। सद्गुणों के विकास का सबसे प्रधान साधन है-गुणी व्यक्तियों की आदर, भक्ति, पूजा, सेवा और गुणों की आराधना। आराधना और उपासना एक ही है।
उपासना हम नहीं कर रहे हैं यह निश्चित है।
उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्व पूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
उपासना नहीं।
उपासना (20) सावधानी और सुरक्षा
उपासना है।”
उपासना का बड़ा महत्व है। उपासना से सद्गुणों का विकास होता है और यावत् परमात्मा-दशा प्राप्त होती है। सद्गुणों के विकास का सबसे प्रधान साधन है-गुणी व्यक्तियों की आदर, भक्ति, पूजा, सेवा और गुणों की आराधना। आराधना और उपासना एक ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-April
उपासना व प्रसार को भी न भूलें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-May
उपासना के लिए दस-पाँच मिनट की भी फुरसत नहीं मिलती। स्वाध्याय और सत्संग के लिए कभी इच्छा नहीं होती। किसी दीन दुखी की सहायता या दान पुण्य की आवश्यकता दिखाई दे तो भी कंजूसी करता है। इसके विपरीत शरीर से संबंधित लाभों में सारा समय लगाने, अधिक से अधिक धन खर्च करने में तनिक भी संकोच नहीं होता। शान शौकत बढ़ाने वाले प्रीतिभोज, विवाह-शादी आदि प्रयोजनों में लोग ढेरों पैसा फूँकते रहते हैं, इससे उन्हें तनिक भी झिझक नहीं होती, पर जब आत्मकल्याण से संबंधित कोई परमार्थिक कार्य ऐसा सामने आता है जिसमें कुछ खर्च करना पड़े तो सारी कंजूसी इकट्ठी हो जाती है और लोग अपनी गरीबी तथा आर्थिक कठिनाई का रोना-रोने लगते हैं।
उपासना करने वाला स्वर्ग लोक को प्राप्त होता है और उसके कुल में वीर पुत्र या शिष्य उत्पन्न होता है
उपासना का मुख यह है कि उपास्य के बारे में आवश्यक ज्ञान प्राप्त किया जाय? यह ज्ञान ग्रन्थों के स्वाध्याय द्वारा एवं उस विद्या के विशेषज्ञों के सत्संग से जाना जा सकता है। यह दोनों ही माध्यम प्रत्येक सच्चे जिज्ञासु को अनिवार्यतः अपनाने चाहिए।
उपासना में लीन हो गए।
उपासना के लिए पर्याप्त समय प्राप्त कर लेता है, मन भी उन कार्यों में लगता है और आवश्यक साधन भी उपलब्ध हो जाते हैं संसार में जितने धर्मात्मा, लोकसेवी, परोपकारी, विद्वान, ईश्वर भक्त एवं महापुरुष हुए हैं, उन्हें आरंभ से ही इसके लिए कोई बनी बनाई पृष्ठभूमि नहीं मिली थी। वरन् उनकी अभिरुचि की तीव्रता ने विपरीत परिस्थितियों में भी मार्ग निकाला, साधन जुटाये और सफलता प्राप्त की। मनुष्य अपनी अभिरुचि को भौतिक आकर्षणों से बचाकर अध्यात्मिक दूरदर्शिता के मार्ग पर लगा दे, तो निश्चय ही वह इस सुरदुर्लभ मानव जीवन की प्राप्ति का पूरा लाभ उठा सकता है। भव बन्धनों से मुक्त होकर शाश्वत शक्ति का भागी बन सकता है। यह एक विचारणीय प्रश्न है कि हम जीवन का क्या उपयोग करें।
उपासना में कुछ भी समय लगाते हुए झिझकते हैं। इसे बुद्धिमत्ता नहीं कहा जा सकता।
उपासना करते रहने पर भी समुचित परिणाम प्राप्त न कर सका। आख्यायिका इस प्रकार है :-
उपासना को प्रधानता देते हैं। स्वाध्याय और सत्संग के द्वारा अपने ज्ञान नेत्रों को खोलकर अन्धकार से प्रकाश की ओर चलने का प्रयत्न करते हैं।
उपासना की जाती है वह निराकार रूप में संभव नहीं इसलिये उसके रूप की कल्पना करनी पड़ती है।
उपासना का समुचित सत्परिणाम प्राप्त करने के लिए इस विज्ञान के रहस्यों को समझना और उनका अनुशीलन करना आवश्यक है। मनुष्य की आत्मा पर चढ़े हुए मल, विक्षेप आवरणों को हटाने के लिए जैसी तीव्र साधना एवं गहन निष्ठा की आवश्यकता है उसको उपलब्ध करने के गायत्री के तत्वज्ञान को समझना चाहिए।
उपासना से आत्मा में सन्निहित दिव्य तत्वों का विकास होता है और इस जीवन तथा संसार में जो कुछ प्राप्त होने योग्य है वह सभी कुछ उसे प्राप्त हो जाता है।
उपासना में लग गए।
उपासना वास्तविक रूप में होना संभव है। उसके मर्म विज्ञान को समझो बिना साधारण रीति से जो उपासना क्रम चलाया जाता है, उसका परिणाम तो होता है पर उसकी मात्रा स्वल्प ही होती है। उपासना का समुचित सत्परिणाम प्राप्त करने के लिए इस विज्ञान के रहस्यों को समझना और उनका अनुशीलन करना आवश्यक है। मनुष्य की आत्मा पर चढ़े हुए मल, विक्षेप आवरणों को हटाने के लिए जैसी तीव्र साधना एवं गहन निष्ठा की आवश्यकता है उसको उपलब्ध करने के गायत्री के तत्वज्ञान को समझना चाहिए।
उपासना और प्रार्थना के द्वारा हम उस परम प्रभु के निकट तक जा पहुँचते हैं जिसकी कृपा की एक किरण से ही हमारी सारी उलझी हुई गुत्थियां सुलझ सकती हैं। ऐसे अमूल्य साधन को यदि हम आलस्य एवं उपेक्षा के कारण तिरष्कृत करते हैं तो वह हमारी भारी भूल ही कही जा सकती है। ऊंचे अफसरों और महापुरुषों का परिचय अनुग्रह और सान्निध्य प्राप्त करने के लिए हमें कितना धन और समय खर्चे करते हुए प्रसन्न करते हैं, पर परमात्मा की मित्रता प्राप्त करने के लिए उपासना में कुछ भी समय लगाते हुए झिझकते हैं। इसे बुद्धिमत्ता नहीं कहा जा सकता।
उपासना द्वारा जागृत आत्मा इन अविज्ञात शक्ति केन्द्रों को झकझोरता है तो वे भी जागृत हो जाती हैं और उनके भीतर जो आश्चर्यजनक तत्व भरे पड़े हैं वे स्पष्ट हो जाते हैं जिस प्रकार वैज्ञानिक लोग, इस ब्रह्माण्ड में बाह्य जगत में व्याप्त अनेक शक्तियों को ढूँढ़ते और उनका उपयोग करते हैं उसी प्रकार आत्म विज्ञानी साधक पिण्ड में देह में अंतर्जगत में सन्निहित तत्वों का साक्षात्कार करके उनकी दिव्य शक्तियों से लाभान्वित होते हैं। आत्म-दर्शन ब्रह्म साक्षात्कार एवं स्वर्ग लोक की प्राप्ति उनके लिए सरल हो जाती है। इस मार्ग में सफलता प्राप्त करने वाले अपनी परम्परा को आगे जारी रखने वाले कोई तेजस्वी उत्तराधिकारी भी अपने पीछे के लिए छोड़ जाते हैं।
उपासना से तुम्हारा कल्याण संभव है। अतः एकाग्र मन से उन्हीं का जप करो।’
उपासना से नारी मात्र के प्रति पवित्र भाव बढ़ते हैं और उसके प्रति श्रेष्ठ व्यवहार करने की इच्छा स्वभावतः होती है। ऐसी भावना वाले व्यक्ति नारी सम्मान के-नारी पूजा के-प्रबल समर्थक होते हैं। यह समर्थन समाज में सुख शान्ति एवं प्रगति के लिए नितान्त आवश्यक है। शास्त्रों में भी इसका समर्थन है :-
उपासना माता की गोद का सेवन करने और उसकी पयपान करने के समान सब प्रकार मंगलमय ही है।
उपासना क्रम चलाया जाता है, उसका परिणाम तो होता है पर उसकी मात्रा स्वल्प ही होती है। उपासना का समुचित सत्परिणाम प्राप्त करने के लिए इस विज्ञान के रहस्यों को समझना और उनका अनुशीलन करना आवश्यक है। मनुष्य की आत्मा पर चढ़े हुए मल, विक्षेप आवरणों को हटाने के लिए जैसी तीव्र साधना एवं गहन निष्ठा की आवश्यकता है उसको उपलब्ध करने के गायत्री के तत्वज्ञान को समझना चाहिए।
उपासना से होता है। इन रत्न भण्डार सरीखे चक्र उपचक्रों में से प्रत्येक में ये शक्तियाँ और सिद्धियाँ भरी हुई हैं जिन्हें प्राचीन काल में ऋषि मुनि प्राप्त करके अपने को ईश्वरीय तत्वों का अधिकारी-उत्तराधिकारी बनाये हुए थे। इसका प्रमाण इस प्रकार मिलता है :-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-January
उपासना, सम्पन्नता कीर्ति चाहना आदि से सुख चाहता है। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति सुख प्राप्ति के लिए भिन्न भिन्न मार्गों का अवलम्बन करता है। किन्तु इस विभिन्नता के दलदल में वास्तविक सुख के मार्ग को अपनाकर उस पर चलना ही उक्त उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है।
उपासना करता है, और मन में ऐसा विचार करता है कि इसे किसी को बतलाना ही चाहिये। ऐसा व्यक्ति न तो अपना भला कर सकता है और न दूसरों का। क्योंकि ऐसे व्यवहार से मन में ईर्ष्या का भाव उत्पन्न होता है और इसके कारण मंत्र का गौरव और प्रभाव अपने आप समाप्त हो जाता है। यह सत्य है कि बिना अधिकार के मंत्र नहीं दिया जा सकता, पर अधिकारी जान कर भी वर्षा वश मंत्र देने में आनाकानी करना ठीक नहीं। मंत्र का साधन करने वाला और दूसरे से साधन कराने वाला उदार चित्त का, पूर्ण श्रद्धा वाला होना चाहिये।
उपासना, भजन, तप आदि विधियों का तो साधारण श्रेणी के मनुष्य भी पालन कर सकते हैं, पर योग की आरम्भिक साधना भी काफी कठिन मानी जाती है। उसे वे ही लोग कर सकते हैं जिनमें आध्यात्मिकता का कुछ अंश है और त्याग और तपस्या में जिनको अनुराग है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-October
उपासना से अंतःकरण की दुष्टता-सज्जनता में परिणित होने लगती है और जिस प्रकार अजामिल आदि अनेकों पापी भगवान की शरण में आ कर साधु सज्जन बन गए। उसी प्रकार गायत्री की प्रकाश किरणें जिन अन्तःकरणों पर पड़ती हैं उनके भीतर काम करने वाली असुरता की मात्रा घटनी आरंभ हो जाती है और वे सज्जन देवता बनने लगते हैं। इसके अतिरिक्त गायत्री अभिचार की ताँत्रिक प्रक्रिया में वह शक्ति भी है कि असुर को जड़मूल से भी नष्ट कर सके उसके कुकृत्य का समुचित दण्ड भी दे सके।
उपासना से मनुष्य के स्वभाव में आवश्यक परिवर्तन तुरन्त ही आरंभ हो जाते हैं। उसके गुणों में, कार्यों में, स्वभाव में ऐसा हेर-फेर होता है कि प्रतिकूलताएं भी अनुकूलता में बदलने लगती हैं। आलस्य के स्थान पर उत्साह, योग्यता सम्पादन करने को तत्परता, परिस्थितियों को सुलझाने में योग्य सूझ-बूझ स्वभाव में स्नेह सौजन्य एवं माधुर्य बढ़ने से मित्रों की संख्या तथा उनके सहयोग की मात्रा में वृद्धि के साधन जुटने लगते हैं। मितव्ययिता का स्वभाव बनता है और जितना उपलब्ध है उतने से काम चलाने एवं सन्तुष्ट रहने की प्रवृत्ति विकसित होती है। दैवी अनुग्रह के आकस्मिक अवसर भी ऐसे मिलते हैं जिससे दरिद्रता जन्य दुखों से छुटकारा मिलता है।
उपासना से आश्चर्यचकित होकर विश्वामित्र ने राजपाट छोड़कर तप द्वारा गायत्री को सिद्ध करके विश्व का सर्वोपरि बल उपलब्ध करने का प्रयत्न किया और उसी की सिद्धि से वे एक अलग दुनिया की स्वतंत्र रचना करने तक में सफल हुए। अकेले विश्वामित्र ही नहीं, जिसने भी गायत्री का प्रत्यक्ष किया है उन्होंने उसे सर्वोपरि एवं अजिता ही पाया है।
उपासना कहते हैं। उपासना कोई भावुकता, काल्पनिकता या भ्रान्ति नहीं है वरन् एक सुनिश्चित वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिस के आधार पर अतीत काल में बहुत से उपासक बहुत कुछ प्राप्त कर चुके हैं और अब भी बहुत कुछ प्राप्त कर रहे हैं।
उपासना कोई भावुकता, काल्पनिकता या भ्रान्ति नहीं है वरन् एक सुनिश्चित वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिस के आधार पर अतीत काल में बहुत से उपासक बहुत कुछ प्राप्त कर चुके हैं और अब भी बहुत कुछ प्राप्त कर रहे हैं।
उपासना की अनिवार्य आवश्यकता के रूप में अन्य सभी साधनाओं की भाँति गायत्री का भी नाम और रूप व्यक्त करना पड़ा है। उच्चारण की दृष्टि से 24 अक्षरों में उसे स्वरबद्ध किया गया है और ध्यान का एकमात्र आधार रूप भी प्रस्तुत करके गायत्री माता की छवि में अंकित किया गया है पर यह ध्यान करना चाहिए कि यह नाम रूप पर आधारित माता का विग्रह केवल उपासना की अनिवार्य आवश्यकता के लिए ही है। वस्तुतः गायत्री मनुष्यों के समान शरीरधारी नहीं है वरन् वह अव्यक्त व्यापक शक्ति प्रवाह के रूप में उसी प्रकार फैली हुई है जैसे गर्मी, सर्दी विद्युत, ईथर आदि सूक्ष्म एवं अदृश्य रूप से सर्वत्र फैले रहते हैं। इस दृष्टि से उसे निराकार भी कहा जा सकता है।
उपासना की दृष्टि से तो है ही पर उसमें लिखे हुए गायत्री के एक हजार नाम केवल नाममात्र ही नहीं है, वरन् प्रत्येक नाम में गायत्री तत्व में सन्निहित तत्वों, तथ्यों, गुणों, प्रभावों और विशेषताओं का विश्लेषण है। उन एक हजार में से प्रत्येक नाम पर यदि हम ध्यान दें तो यह पता चलेगा कि गायत्री की कितनी बड़ी महत्ता है और उसके अंतर्गत तथ्यों का उपयोग हम अपनी किन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कर सकते हैं।
उपासना की अनिवार्य आवश्यकता के लिए ही है। वस्तुतः गायत्री मनुष्यों के समान शरीरधारी नहीं है वरन् वह अव्यक्त व्यापक शक्ति प्रवाह के रूप में उसी प्रकार फैली हुई है जैसे गर्मी, सर्दी विद्युत, ईथर आदि सूक्ष्म एवं अदृश्य रूप से सर्वत्र फैले रहते हैं। इस दृष्टि से उसे निराकार भी कहा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-November
उपासना से भी हर किसी को यह कल-कंठ प्राप्त होता है। उसका स्वर कैसा ही रहे, स्नेह सौजन्य की समुचित मात्रा वचन में रहने से वह संगीत के समान हर किसी को मधुर लगता है, सभी उसकी इस वचन सज्जनता से प्रभावित होकर उसके प्रति प्रेम और आदर का व्यवहार करते हैं। यही वशीकरण मन्त्र भी है।
उपासना के समुचित अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
उपासना के अनुपात से ही फल-प्रद है। अनायास हर कोई बिना प्रयत्न के ही लाभ प्राप्त कर सके ऐसी छूट इस साधना में नहीं है।
उपासना के लिए जितना समय लगाना निश्चित किया हो उतना नियमित रूप से लगाना, जितने समय में वह सफल होती है उतने समय तक धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करना, यह सफलता के लिए आवश्यक शर्त है। काल के, समय के आधार पर गायत्री की सफलता निर्भर रहने के कारण उसे काल-रूपिणी कहा गया है। वह विकराल भी है। साधक के भीतरी दोष दुर्गुणों का ऐसे संहार करती है जैसे असुर निकन्दना दुर्गा ने महिषासुर आदि राक्षसों का किया था। वह साधक के सम्मुख उपस्थित कष्टों, विघ्नों एवं अनिष्टों को भी काल-रूपिणी बन कर मटियामेट करती है।
उपासना का ही अवलम्बन स्वीकार किया जाता रहा है, उसे ही निर्भ्रान्त माना गया है। ऋजु मार्ग की सीधी सड़क को गायत्री ही कहते हैं।
उपासना में मनुष्य को यह सद्बुद्धि प्राप्त होती है कि वह अपनी आमदनी और मर्यादा से अधिक खर्च नहीं करता चाहे उसे इसमें कष्ट ही क्यों न उठाना पड़े। ऐसे लोग एक तो ऋण-ग्रस्त होते ही नहीं। यदि हो भी जाएं तो आवश्यक खर्चों से कमी करके उऋण होने का प्रयत्न करते हैं। सन्मार्गगामी साधक पर सदय होकर कभी-कभी माता ऐसा अनुग्रह भी करती है कि ऋण मुक्त होने के कोई आकस्मिक सुयोग सामने आ जावें। धार्मिक दृष्टि से देवऋण, ऋषिऋण, पितृऋण यह तीन ऋण प्रत्येक व्यक्ति पर होते हैं और इन्हें चुका कर ही वह भव-बन्धनों से छूट सकता है।
उपासना के परिमाण के अनुसार फल देती है। बछड़ा जब दूध पीने का उपक्रम करता है तभी उसे गाय दूध पिलाती है, यदि वह न पीना चाहे तो उसे दूध नहीं मिल सकता। फिर जितनी देर, जितनी तीव्र या मन्द गति से वह दूध पीता है उसी मात्रा में उसे उपलब्ध होता है। गाय बछड़े को दूध पिलाना चाहती है, पिलाती भी है पर उसकी मर्यादा उतनी ही होती है जितना बछड़े का प्रयत्न। ठीक यही बात गायत्री के सम्बन्ध में भी है, वह उपासना के अनुपात से ही फल-प्रद है।
उपासना विज्ञान की दृष्टि से यह आवश्यक भी है। पर ऐसा न समझना चाहिए कि वह इसी स्थिति तक सीमित है। या कहीं किसी लोक विशेष के स्थान विशेष में निवास करती है। उसकी सत्ता सर्वत्र समाई हुई है। प्रत्येक पदार्थ में तथा प्रत्येक व्यक्ति के अन्तःकरण में वह ओतप्रोत है।
उपासना करता है, साथ ही उपासना के परिमाण के अनुसार फल देती है। बछड़ा जब दूध पीने का उपक्रम करता है तभी उसे गाय दूध पिलाती है, यदि वह न पीना चाहे तो उसे दूध नहीं मिल सकता। फिर जितनी देर, जितनी तीव्र या मन्द गति से वह दूध पीता है उसी मात्रा में उसे उपलब्ध होता है। गाय बछड़े को दूध पिलाना चाहती है, पिलाती भी है पर उसकी मर्यादा उतनी ही होती है जितना बछड़े का प्रयत्न। ठीक यही बात गायत्री के सम्बन्ध में भी है, वह उपासना के अनुपात से ही फल-प्रद है।
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री संबंधी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगाये जाने वाले बीज-मंत्रों का साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों के लिये विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-June
उपासना से मनुष्य का बहुत सा उपकार हो सकता है तो 24 अक्षर 24 देवता हैं। जब एक देवता की उपासना से मनुष्य का बहुत सा उपकार हो सकता है तो 24 देवताओं की शक्ति से सम्पन्न गायत्री मंत्र से कितना उपकार नहीं हो सकता?
उपासना की उपेक्षा करके छुटपुट साधनाओं में समय लगाना उपरोक्त शास्त्र वचन में व्यर्थ बताया गया है।
उपासना एवं साधना का मार्ग सरल एवं उपयुक्त भी है। ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग यह तीनों ही योग इस उपासना मार्ग के अंतर्गत आते हैं। तपश्चर्या का मार्ग उससे ऊपर का तथा अधिक शक्तिशाली है। आत्मा के सूक्ष्म अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत अनेकों शक्ति केन्द्र सन्निहित हैं। इनमें कुण्डलिनी योग के अंतर्गत षट्चक्र तो प्रसिद्ध ही है।
उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
उपासना हो सकती है-तपस्या नहीं।
उपासना वस्तुतः तेज की उपासना है। इससे आत्मा सब प्रकार के अन्धकार आवरणों से मुक्त होकर तेजस्वी-प्रकाश हो जाता है। आत्मा रूपी सूर्य जब अपने दिव्य प्रकाश से प्रकाशवान् होता है तो उसकी किरणें अपने को ही नहीं विश्व ब्रह्मांड के एक बहुत बड़े भाग को प्रकाश में तेजस्विता से परिपूर्ण बना देते हैं। इस अलौकिक अध्यात्म सूर्य का महत्व शास्त्रों में इस प्रकार बताया गया है।
उपासना मार्ग के अंतर्गत आते हैं। तपश्चर्या का मार्ग उससे ऊपर का तथा अधिक शक्तिशाली है। आत्मा के सूक्ष्म अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत अनेकों शक्ति केन्द्र सन्निहित हैं। इनमें कुण्डलिनी योग के अंतर्गत षट्चक्र तो प्रसिद्ध ही है। पर बात वहीं तक सीमित नहीं है, इन षट्चक्रों से भी सूक्ष्म अन्य अगणित शक्ति ग्रंथियाँ मनुष्य के स्थूल और सूक्ष्म शरीरों में मौजूद है और उनमें अपने ढंग की अनेकों विशेषताएं छिपी हुई हैं।
उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्व पूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन । मूल्य 3॥)
उपासना करते है। प्राण ही सूर्य और चन्द्रमा है। प्राण को प्रजापति कहा जाता है।
उपासना
उपासना का कार्यक्रम तो चलता रह सकता है पर तप में विक्षेप उत्पन्न होता है। तप के लिए हर किसी को नीरव निर्बाध एकान्त वातावरण में जाना पड़ता है। अब तक का साधनात्मक इतिहास इस बात का साक्षी है। देवताओं, मनुष्यों और असुरों ने विभिन्न उद्देश्यों के लिए अब तक अगणित बार तप किये हैं और उसके फलस्वरूप प्रकृति माता एवं परमपिता के सम्मुख अपने उन आध्यात्मिक पुरुषार्थों के बदले में अभीष्ट प्रतिफल-वरदान भी प्राप्त किये हैं पर हुआ यह सब घर से बाहर वन, पर्वत आदि एकान्त स्थानों में ही है। घर रह कर उपासना हो सकती है-तपस्या नहीं।
उपासना करते हैं वे ऐसे ही मूर्ख हैं जैसे हाथ में आई चिन्तामणि को फेंककर छोटे रत्नों को ढूंढ़ने फिरने वाला मूर्ख होता है।
उपासना और तपस्या का अन्तर
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज-मन्त्रों को साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्व पूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन । मूल्य 3॥)
उपासना से मनुष्य का बहुत सा उपकार हो सकता है तो 24 देवताओं की शक्ति से सम्पन्न गायत्री मंत्र से कितना उपकार नहीं हो सकता?
उपासना प्राणी मात्र का स्वाभाविक धर्म है। इसके बिना जीवन का आस्तित्व कायम नहीं रहता ।
उपासना को जड़ सींचने के समान बताया गया है जबकि अन्य साधना पत्तों पर चन्दन लगाने के समान हैं।
उपासना सूर्य के समान सर्व प्रमुख मानी गई है। अनेक छोटे मोटे प्रयोजनों के लिए अनेकों मंत्र साधनों के विधान उपलब्ध हैं, इसी प्रकार किन्हीं विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अनेकों देवी देवताओं की। उपासनाओं के विधान भी मौजूद हैं पर सर्वांगीण, लौकिक और पारलौकिक लक्षों को एक ही बाण से लक्ष बेध करने वाली गायत्री ही है। चारों वेदों की जननी होने के कारण सभी वेद विद्यायें इसमें बीज रूप में अवस्थित है। इसलिए सभी सिद्धियों की जननी भी इसे कहा जाता है।
उपासना से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को प्राप्त नहीं करते वे अन्धा बुद्धि वाले हैं। जो द्विज गायत्री मंत्र के होते हुए भी अन्य मंत्रों की उपासना करते हैं वे ऐसे ही मूर्ख हैं जैसे हाथ में आई चिन्तामणि को फेंककर छोटे रत्नों को ढूंढ़ने फिरने वाला मूर्ख होता है।
उपासना है। इससे आत्मा सब प्रकार के अन्धकार आवरणों से मुक्त होकर तेजस्वी-प्रकाश हो जाता है। आत्मा रूपी सूर्य जब अपने दिव्य प्रकाश से प्रकाशवान् होता है तो उसकी किरणें अपने को ही नहीं विश्व ब्रह्मांड के एक बहुत बड़े भाग को प्रकाश में तेजस्विता से परिपूर्ण बना देते हैं। इस अलौकिक अध्यात्म सूर्य का महत्व शास्त्रों में इस प्रकार बताया गया है।
उपासना से साधक उस शक्ति का भंडार अपने भीतर जमा करता है जो विश्व के समस्त पदार्थों एवं गतिविधियों पर अपना नियंत्रण रखती है। उस शक्ति के साथ जब साधक का संबोध हो जाता है तो वह भी संसार के सभी पदार्थों एवं गतिविधियाँ के साथ अपना सीधा सम्बन्ध स्थापित कर लेता है और उनका नियन्त्रण करने लगता है।
उपासना करनी चाहिए।
उपासना और साधना जो सामूहिक जीवन में रह कर की जा सकती है उसके द्वारा अन्नमय कोष और मनोमय कोष को विजय करके अपने व्यक्तिगत जीवन में अनेकों सतोगुणी विशेषताएं उत्पन्न करके जीवन लक्ष को पूर्ण करने के लिए प्रगति की जा सकती है और धीरे-धीरे इस मार्ग पर चलते हुए ईश्वर प्राप्ति भी हो सकती है। सर्व साधारण के लिए सद्गृहस्थों के लिए यही उपासना एवं साधना का मार्ग सरल एवं उपयुक्त भी है। ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग यह तीनों ही योग इस उपासना मार्ग के अंतर्गत आते हैं। तपश्चर्या का मार्ग उससे ऊपर का तथा अधिक शक्तिशाली है। आत्मा के सूक्ष्म अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत अनेकों शक्ति केन्द्र सन्निहित हैं।
उपासना के लिए हृदय शुद्धि भी अत्यावश्यक है। अपने विकारों को समझकर यथावत् उन्हें दूर करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए। इसके अतिरिक्त दूसरों के लिए अपना हृदय सदैव खुला रखना चाहिए। दुराव छिपाव प्रेम साधना में बाधक है। हृदय द्वारा ही दूसरों के हृदयों पर आधिपत्य किया जा सकता है।
उपासना का विधान है।
उपासना करते हुए साधक मनुष्य योनि में रहते हुए भी देवता बन सकता है।
उपासना का क्रम आनन्दपूर्वक चल सकता है, पर तप एक विशेष प्रकार की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसके लिए नीरव एवं निर्बाध वातावरण की आवश्यकता होती है। सामूहिक जीवन में निरन्तर नाना प्रकार के विचार, भाव और प्रभाव उत्पन्न होते रहते हैं उससे मन पर जो प्रतिक्रिया होती है उससे उपासना का कार्यक्रम तो चलता रह सकता है पर तप में विक्षेप उत्पन्न होता है। तप के लिए हर किसी को नीरव निर्बाध एकान्त वातावरण में जाना पड़ता है। अब तक का साधनात्मक इतिहास इस बात का साक्षी है।
उपासना करो।
उपासनाओं के विधान भी मौजूद हैं पर सर्वांगीण, लौकिक और पारलौकिक लक्षों को एक ही बाण से लक्ष बेध करने वाली गायत्री ही है। चारों वेदों की जननी होने के कारण सभी वेद विद्यायें इसमें बीज रूप में अवस्थित है। इसलिए सभी सिद्धियों की जननी भी इसे कहा जाता है। कोई सिद्धि ऐसी नहीं जो गायत्री साधना से प्राप्त न हो सकती हो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-July
उपासना आदि उपाय भी बताये गए हैं। इन साधनों के करते रहने से हमारी सात्विक वृत्तियाँ जागृत हो जाती हैं और उनके बल में असंख्य गुनी वृद्धि होती है जिससे आत्म दर्शन सुलभ हो जाता है।
उपासना। ईश्वर से कठिनाइयों का मुकाबला करने की शक्ति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। इससे हृदय में अपूर्व शक्ति प्राप्त होती है और चिन्ताओं से छुटकारा मिलता है।
उपासना से खुल जाते हैं उसे गायत्री कहते हैं।
उपासना से संभव हैं। कहा गया है कि :-
उपासना करो। वही तुम्हारा कल्याण करेंगे।’
उपासना से मिल सकती हैं।
उपासना आदि इसी केन्द्र पर केन्द्रित हैं।
उपासना द्वारा ही इन षट् चक्रों का जागरण किया जाता है। मूलाधार चक्र में निवास करने वाली कुण्डलिनी महाशक्ति का इन छहों चक्रों पर अधिकार है। इस कुण्डलिनी का गायत्री का ही स्वरूप माना गया है। मनुष्य के अंतर्जगत को प्रकाशवान् बनाने वाले जो दश प्राण अवस्थित हैं तथा उनके कारण जिन सूक्ष्म दश महा विद्याओं का ज्ञान होता है, वह सभी विज्ञान भी गायत्री पर ही निर्भर हैं।
उपासना के आधार पर तप किया तभी उन्हें सृष्टि निर्माण एवं ज्ञान विज्ञान के उत्पादन की शक्ति उपलब्ध हुई। मानव धर्म के आविष्कर्ता भगवान मनु ने अपनी रानी शतरूपा के साथ प्रचण्ड तप करने के पश्चात् ही अपना महत्व पूर्ण उत्तरदायित्व पूर्ण किया था। भगवान शंकर स्वयं तप रूप हैं। उनका प्रधान कार्यक्रम सदा से तप साधना ही रहा। शेष जी तप के बल पर ही इस पृथ्वी को अपने शीश पर धारण किये हुए हैं।
उपासना करना चाहिए तथा भूत भविष्य की चिन्ता न कर वर्तमान पर अपना ध्यान केन्द्रित रखते हुए अपने दैनिक कार्य ईमानदारी से करते रहना चाहिए। अपने कर्म ईमानदारी से करते रहना भी ईश्वर की पूजा ही कही जाती है। गीता में कहा है कि “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः। अर्थात् मनुष्य कर्म द्वारा ईश्वर की पूजा करके परम सिद्धि को प्राप्त होता है। जिसने इस प्रकार जीवन बना लिया है वस्तुतः वह ही सच्चे अर्थों में आत्मविश्वासी कहलाने का अधिकारी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-September
उपासना करता है।
उपासना करने वाले को भी अणु वैज्ञानिक की भाँति अपने स्वभाव में उन गुणों को लाना पड़ेगा जिससे परिस्थितियों से पली हुई दुनिया—अन्धे गाँव में आने पर ऊँट के पीछे जिस प्रकार लोग हाथ धो कर पड़ते हैं उसी प्रकार इसके पीछे भी पड़े तो वह अपनी सज्जनता, सहनशीलता, धैर्य और स्वल्प आवश्यकता वाले स्वभाव के कारण उस प्रतिरोध को सहन कर सके। बिजली घर का मिस्त्री जिस प्रकार खराब तारों को संभालते समय लकड़ी पर खड़ा होता है, रबड़ के दस्ताने हाथों में पहनता है और औजारों की मूँठ काठ की बनाता है उसी प्रकार सत्यसेवी को अपने अन्दर साधुता के अन्य गुण उत्पन्न करने पड़ते हैं। इसके बिना वह थोड़े ही दिनों में दुनिया के व्यवहार से इतना परेशान हो जाता है कि उसे अपना व्रत तोड़ने में ही कुशल दीखती है।
उपासना ब्रह्माजी द्वारा की गई वह भी गायत्री का ही अंग है। इनसे बढ़कर तीनों लोकों में और कोई जप संसार में नहीं है।
उपासना की जाती है उसी प्रकार ही सत्य की भी आराधना है। सिद्ध हुआ सत्य भी साधक को वैसे ही वरदान दे सकता है जैसे कोई अन्य देवता या साक्षात् परमात्मा प्रसन्न होने पर अपने आराधक को प्रदान करते हैं।
उपासना ही है। महाभारत में सत्य की प्रतिष्ठा के सम्बन्ध में अनेकों अभिवचन आते हैं—
उपासना करने वाले साधक बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं। गायत्री का महात्म्य बताते हुए साधना ग्रंथों में कहा गया है—
उपासना की जाए। गायत्री की मन्त्र संज्ञा तभी होती है जब उसमें विधिविधान की पूर्णता है। मन्त्र की शक्ति के बारे में कहा है कि :-
उपासना में कोई नियम बन्धन नहीं है। जैसे साधारण कथा में भगवान् से प्रार्थना की जाती है। उसी प्रकार गायत्री के द्वारा भी भगवान से सद्बुद्धि माँगी जा सकती है। किंतु यदि आध्यात्म विज्ञान सम्मत प्रक्रिया द्वारा इस ऋतम्भरा तत्व को सूक्ष्म प्रकृति के अन्तराल में से आकर्षित करके अपने लिए समुचित मात्रा में प्राप्त करना हो तो गायत्री का उपयोग मन्त्र रूप में करना पड़ेगा। मन्त्र में विशेष शक्ति सम्मिलित रहती है पर साथ ही इससे शास्त्रीय नियम विधानों का बन्धन भी है।
उपासना करने वाले खिन्न होकर विरक्त बन जाते हैं और ऐसे निर्जन स्थानों में रहने लगते हैं जहाँ लोक व्यवहार की न तो आवश्यकता रहे और न असत्य अपनाना पड़े।
उपासना की जाए तो वह मंत्र रूप होकर चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करती है। जिस प्रकार प्रार्थना में भावना प्रधान है उसी प्रकार मंत्र में साधना विधान की प्रधानता है। भावना विहीन प्रार्थना निष्फल जाती है उसी प्रकार साधना विधान उपेक्षा करने पर मंत्र का समुचित परिणाम नहीं होता।
उपासना करने वाला वेद विद्या के समस्त लाभों को प्राप्त कर सकता है।
उपासना करने के लाभ का तो कहना ही क्या है?’
उपासना से दुष्कृतों का शमन
उपासना करना, सत्कर्मों में प्रवृत्त रहना, दया, उपकार को धारण करना ही श्रेष्ठ साधन हैं! ज्यों-ज्यों तू परमात्मा की तरफ चलेगा। त्यों-त्यों वह भी बढ़ता दिखाई पड़ेगा। जैसे बालक को आता हुआ देखकर माता स्वयं दौड़कर उसे गोद में ले लेती है कि कहीं इसे चोट न लग जावे, इसी प्रकार जब साधक प्रभु की तलाश में निकलता है—तो जगत पिता भी उसको अपनी वात्सल्यमयी गोद में खिलाने के लिये लालायित हो उठता है। अत्यन्त प्रीति से उसे अपनाना है और तभी मानव का जीवन सार्थक हो पाता है।
उपासना से उत्पन्न आध्यात्मिक शक्ति से मनुष्य के लौकिक जीवन पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है और उसकी अनेकों आपत्तियों तथा कठिनाइयों का समाधान होकर सुख, समृद्धि, सौभाग्य, सफलता एवं उन्नति के अवसर प्राप्त होते हैं। उपासकों के अनुभवों से भी यह प्रत्यक्ष है और शास्त्र वचनों से भी इसकी पुष्टि होती है।
उपासना का प्रभाव सबसे प्रथम मनुष्य के मनः क्षेत्र पर पड़ता है। उसके कुविचार दूर होते हैं, दुष्कर्मों में घृणा उत्पन्न होती है, आत्म निरीक्षण में अभिरुचि होती है और अपने अन्दर जो जो दोष दुर्गुण हैं उसे उपासक ढूँढ़-2 कर तलाश करता है। उनकी हानियों को समझता है और उन्हें त्यागने को तत्पर हो जाता है। इस प्रक्रिया के कारण उसका वर्तमान जीवन पापमुक्त होता है और जैसे जैसे यह पवित्रता बढ़ती है उसी अनुमान से पूर्व जन्मों के दुष्कृत संस्कार भी घटने और नष्ट होने लगते हैं। इसीलिये गायत्री को पाप-नाशिनी, मोक्ष-दायिनी, कल्याण-कारिणी कहा गया है।
उपासना पूर्ण करें। आध्यात्म विज्ञान के महत्व पूर्ण सिद्धान्त के आधार पर नियमित साधना विधान की उपेक्षा न करे।
उपासना घर गृहस्थी में रहते हुए भी कर लेने पर जब यह माना जाता है कि भगवान् थोड़े ही जप तप से पूजा-पाठ से प्रसन्न हो जाते हैं और स्वर्ग मुक्ति प्रदान कर देते हैं तो इतना कष्ट उठाने का इन्हें क्या प्रयोजन था? और लोगों की तरह यह भी क्यों नहीं दोनों हाथों में लड्डू रखे रहे? जिससे संसार का आनन्द भी मिलता रहता और पुण्य परलोक भी सधता रहता।
उपासना को प्रेम पूर्वक करता है किन्तु उसका मन असत्याचरण में अभिप्रेत है तो उसकी साधना अपूर्ण एवं अधूरी ही मानी जाएगी। उसे बहुत श्रम करने पर भी वह लाभ न मिल सकेगा जो सत्य निष्ठ-शुद्ध आचरण और सद्विचारों वाला व्यक्ति थोड़ी सी ही साधना से प्राप्त कर सकता है।
उपासना करने से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। मंत्र के अर्थ का अध्ययन भी करना चाहिये और उसके रहस्य को भी समझना चाहिये तभी मंत्र होता है। जो कर्म करना है उससे अधिकाधिक जानना चाहिये, पूरी जानकारी पर आधारित कर्म में ही सफलता मिलती है। ज्ञान और कर्म को मिलाकर अध्ययन और श्रवण के आधार पर जो किया जाता है वही उत्तम है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-March
उपासना नहीं करता, ऐसा नाम मात्र का ब्राह्मण ‘वृषल’ शब्द से निन्दित होता है।
उपासना, भक्ति, पूजा आदि की आवश्यकता ही जाती रहती है और मनुष्य में झूँठा अभिमान घुस जाता है कि हम तो ब्रह्म हैं, इसको साँसारिक नियमों और लौकिक प्रथाओं के मानने की क्या जरूरत है। इससे लोगों में उच्छृंखलता और कर्त्तव्य हीनता की प्रवृत्ति बढ़ती है। नीचे के पद में उन्होंने अपने ढंग से ऐसे ब्रह्म ज्ञानियों का खण्डन किया है-
उपासना के द्वारा मानव जीवन की सफलता का सर्वोच्च प्रतीक ‘ब्रह्मर्षि’ पद पाया। इतना ही नहीं देवताओं ने भी इसी महामन्त्र की शक्ति से असुरों को परास्त कर अपना देवत्व स्थिर रखा।
उपासना दो प्रकार की होती है। एक बन्दर के बच्चे की सी, जो स्वयं ही अपनी माता को पकड़े रहता है। उसी प्रकार ऐसा व्यक्ति भी नाना प्रकार के शास्त्रों से विचार करके और असत्व सिद्धान्तों का खण्डन करके स्वयं ही अपने उपास्यदेव को प्राप्त करता है। दूसरी उपासना बिल्ली के बच्चे की सी होती है, जो सब से नाता तोड़ कर केवल अपनी माता की आशा लगाये रहता है। वह बिल्ली जहाँ ठीक स्थान देखती है वहीं अपने बच्चे को उठा कर ले जाती है।
उपासना करता है वह चिरकाल में भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।
उपासना करता है तो उसे उस सर्वव्यापी सत्ता का बोध होने लगता है कि वह अन्तर्यामी प्रभु सारे जड़, चेतन पदार्थों में रमा हुआ है और हमारे अच्छे बुरे कर्मों का निरीक्षण कर रहा है। इस प्रकार उसकी सत्ता पर विश्वास होने लगता है कि वह सहस्रों नेत्रों से हमारे प्रत्येक के पाप पुण्य को देख रहा है। उसके विशाल नेत्रों से कोई बात छिपाई नहीं जा सकती है। जैसे कोतवाल के समक्ष चोर चोरी करने का साहस नहीं कर सकता उसी प्रकार सर्वव्यापी परमात्मा को सर्वत्र देखकर पूजा उपासना करने वाला भी कोई पाप कर्म नहीं कर पाता। वह बुराइयों से बचने लगता है और अच्छाइयों को ग्रहण करने लगता है।
उपासना बिल्ली के बच्चे की सी होती है, जो सब से नाता तोड़ कर केवल अपनी माता की आशा लगाये रहता है। वह बिल्ली जहाँ ठीक स्थान देखती है वहीं अपने बच्चे को उठा कर ले जाती है। उसी प्रकार जो जीव वेद, शास्त्र सबको छोड़ कर और किसी के खण्डन -मंडन में ध्यान न देकर केवल यह निश्चय कर लेता है कि मैं भगवान् का हूँ वे ही मेरा कल्याण करेंगे, उसको भगवान ही हंस रूप बना कर अपने लोक में ले जाते हैं।
उपासना द्वारा अपना विकास महात्मा, विश्वात्मा और परमात्मा बन जाता है। इस स्थिति तक पहुँचने के लिए उस प्यारे प्रभु के गुणों का चिन्तन और मनन निरंतर चलते रहना आवश्यक है। ‘भृंग कीट’ के उदाहरण में जब कीड़ा निरन्तर भृंग का ध्यान करता है तो वह शरीर समेत भृंग ही बन जाता है, इसी प्रकार मनुष्य भी भगवान के स्वरूप और गुणों की चिन्तन करता हुआ उसी जैसा बन जाता है।
उपासना में रत है वह नरक को जाता है।
उपासना पर निर्भर रहता है क्योंकि जो सद्गुण सामान्य लौकिक प्रयत्न करने पर बहुत कठिनाई से प्राप्त होते हैं वे इस उपासना के माध्यम से स्वयमेव विकसित होने लगते हैं और उन अन्तः स्फुरणाओं के जागरण से उसका ब्रह्मणत्व दिन-दिन सुदृढ़ होता जाता है। आत्मा में पवित्रता का अंश दिन-दिन बढ़ता जाता है।
उपासना द्वारा कृतज्ञता न प्रकट करने पर हम कर्त्तव्यच्युत एवं कृतघ्न बन जाते हैं।
उपासना से अन्तरात्मा में एक दिव्य घर्षण होता है। इस घर्षण की वैज्ञानिक प्रक्रिया से अन्तःकरण में एक आध्यात्मिक विद्युत उत्पन्न होती है जिसमें एक चैतन्य चुम्बकत्व सन्निहित रहता है। कुतुबनुमा की सुई पर चुम्बक होने से उत्तरी ध्रुव की तरफ की धाराएँ उस सुई को अपनी ओर आकर्षित करती रहती हैं। जब तक यह चुम्बक उस सुई पर रहता है तब तक ही उत्तरी धारा उसे अपनी ओर खींचती रहती है। इसी प्रकार जीवात्मा में परमात्मा के पूजन, भजन से उत्पन्न होता रहता है उससे प्रभावित व्यक्ति को वह परमात्मा भी अपनी ओर आकर्षित करता है अपनी गोद में बिठाता है और अपने दिव्य गुणों से उसे भर देता है।
उपासना प्रथम है - करने ही चाहिए। जो उन्हें न करके साधारण साँसारिक झंझटों में अपना जीवन नष्ट करता रहता है भारी भूल करता है। यों मनुष्य जन्म ही दुर्लभ है पर ब्राह्मण होना तो और भी बड़ा सौभाग्य है। जिन्हें यह सौभाग्य प्राप्त है वे अपनी इस देह को क्षुद्र कार्यों में न लगाकर आत्म कल्याण का मार्ग अपनावें। उपासना द्वारा आत्म बल प्राप्त करें और संसार में धर्म वृद्धि के लिए कटिबद्ध रहें।
उपासना करने वाला ब्राह्मण पवित्र हो जाता है।
उपासना करके यदि उसका थोड़ा सा भी अनुग्रह प्राप्त किया जा सके तो साधक उस परम गति को प्राप्त कर लेता है जिसके कारण लोक में सुख और परलोक में अभीष्ट शान्ति प्राप्त होती है। कहा भी है :--
उपासना करने से द्विज निर्भय हो जाते हैं।
उपासना न करने से ब्राह्मण की सब प्रकार अधोगति होती है।
उपासना को प्रथम स्थान देना चाहिए। जो इस धर्म कर्त्तव्य का पालन नहीं करते, उनकी जगह-जगह तीव्र भर्त्सना की गई है और उन्हें शूद्र चाण्डाल आदि कहा गया है। देखिए :-
उपासना नहीं करता, वह जीवित रहते शूद्र है और मृत्यु के उपरान्त श्वान बनता है।
उपासना पहले किस-2 ने की थी।”
उपासना न करने से भी जीवात्मा की शुभ करने की प्रेरक शक्ति कुँठित हो जाती है और अपने पूर्ण विकास की स्थिति परमात्मा की प्राप्ति से वंचित रह जाती है।
उपासना में तत्पर होना प्रत्येक आत्म कल्याण के इच्छुक के लिए आवश्यक है। परन्तु ब्राह्मण कुल में उत्पन्न अथवा ब्राह्मणत्व की आकाँक्षा करने वाले लोगों के लिए तो वह नितान्त आवश्यक है। शास्त्र कारों ने गायत्री उपासना को ब्राह्मण का अनिवार्य कर्त्तव्य बताया है और आदेश दिया है कि जीवन के अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण कार्यों में गायत्री उपासना को प्रथम स्थान देना चाहिए। जो इस धर्म कर्त्तव्य का पालन नहीं करते, उनकी जगह-जगह तीव्र भर्त्सना की गई है और उन्हें शूद्र चाण्डाल आदि कहा गया है। देखिए :-
उपासना करता है, उसके कार्य करने के लिए हनुमान की तरह, अर्जुन, प्रहलाद की तरह तत्पर रहता है।
उपासना नहीं करते, उन्हें ऐसे धर्म कार्यों में सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए।
उपासना के करने से पाँचों दैनिक यज्ञों का फल प्राप्त होता है।
उपासना क्यों करेगा? उसके तो साथ रहने वाला भी पतित और निन्दित हो जायेगा। इसलिए उसका अन्न भी नहीं खाना चाहिए। जो ब्राह्मण गायत्री रहित है उन्हें इस जन्म के चाण्डाल और पूर्व जन्म के श्वान समझो। ऐसे को जप पूजन कैसा?
उपासना को देकर तब अन्य उपासनाएं करे।
उपासना है। इस ईश्वर की वाणी को हृदयंगम करना और उसकी उपासना में तत्पर होना प्रत्येक आत्म कल्याण के इच्छुक के लिए आवश्यक है। परन्तु ब्राह्मण कुल में उत्पन्न अथवा ब्राह्मणत्व की आकाँक्षा करने वाले लोगों के लिए तो वह नितान्त आवश्यक है। शास्त्र कारों ने गायत्री उपासना को ब्राह्मण का अनिवार्य कर्त्तव्य बताया है और आदेश दिया है कि जीवन के अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण कार्यों में गायत्री उपासना को प्रथम स्थान देना चाहिए। जो इस धर्म कर्त्तव्य का पालन नहीं करते, उनकी जगह-जगह तीव्र भर्त्सना की गई है और उन्हें शूद्र चाण्डाल आदि कहा गया है।
उपासना मानव मात्र की उपासना है। इस ईश्वर की वाणी को हृदयंगम करना और उसकी उपासना में तत्पर होना प्रत्येक आत्म कल्याण के इच्छुक के लिए आवश्यक है। परन्तु ब्राह्मण कुल में उत्पन्न अथवा ब्राह्मणत्व की आकाँक्षा करने वाले लोगों के लिए तो वह नितान्त आवश्यक है। शास्त्र कारों ने गायत्री उपासना को ब्राह्मण का अनिवार्य कर्त्तव्य बताया है और आदेश दिया है कि जीवन के अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण कार्यों में गायत्री उपासना को प्रथम स्थान देना चाहिए। जो इस धर्म कर्त्तव्य का पालन नहीं करते, उनकी जगह-जगह तीव्र भर्त्सना की गई है और उन्हें शूद्र चाण्डाल आदि कहा गया है।
उपासना करके अपनी आत्मा में दिव्यतत्वों का विकास करना ही इस मानव जीवन का लक्ष्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आत्मा का भोजन - भजन करने के पश्चात् ही शरीर का भोजन करना सार्थक है। इसीलिए तत्व दर्शियों की एक महत्वपूर्ण उक्ति ध्यान रखने ही योग्य है कि - “भोजन उसी को करना चाहिए जो भजन करता है।”
उपासना का प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन में स्थान होना आवश्यक है।
उपासना नहीं करता उसे सर्व द्विजोचित कर्मों से बहिष्कृत कर देना चाहिए।
उपासना नियमित रूप से करके अपने ब्राह्मणत्व को जीवित रखे हुए हैं। जिनने अपने इस कर्त्तव्य का त्याग कर दिया, जो गायत्री उपासना नहीं करते, उन्हें ऐसे धर्म कार्यों में सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए।
उपासना करे या न करे वह केवल गायत्री मन्त्र से ही सिद्धि प्राप्त कर सकता है।
उपासनाएं करे।
उपासनाएं साँसारिक लाभों सकाम प्रयोजनों, या सीमित लाभों के लिए होती हैं। पर आत्मबल प्राप्त करने के लिए तो गायत्री का ही आश्रय लेना पड़ता है। गायत्री को त्याग कर अन्य उपासनाओं में लगा रहा जाय तो अन्य प्रकार के लाभ मिल सकते हैं पर आत्म बल के लाभ से वंचित ही रहना पड़ेगा। इसलिए शास्त्रकारों ने ब्राह्मण के लिए यह आवश्यक बताया है कि गायत्री उपासना करने के अतिरिक्त यदि अन्य साधनाएं करना चाहे तो कर सकता है, पर इस महामंत्र को त्याग कर यदि उसने अन्य मंत्रों या अन्य देवताओं का सहारा लिया है तो यह उसकी भूल है। इस भूल के फलस्वरूप उसे ब्रह्मतेज का अभाव ही रहेगा।
उपासना से उत्पन्न होने लगते हैं। इसके लिए भी पूजा उपासना का जीवन में स्थान होना आवश्यक है।
उपासना करने का आदेश है। गायत्री उपासना न करने से ब्राह्मण की सब प्रकार अधोगति होती है।
उपासनाएं करनी ही हो तो प्रथम स्थान गायत्री उपासना को देकर तब अन्य उपासनाएं करे।
उपासना द्वारा आत्म बल प्राप्त करें और संसार में धर्म वृद्धि के लिए कटिबद्ध रहें।
उपासना करके वृद्ध काश्यप्, गौतम, भृगु, अंगिरा, अत्रि भारद्वाज बृहस्पति, शुक्राचार्य, अगस्त, वशिष्ठ आदि ने ब्रह्मर्षि पद पाया और इन्द्र, वसु आदि देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की।
उपासनाओं में लगा रहा जाय तो अन्य प्रकार के लाभ मिल सकते हैं पर आत्म बल के लाभ से वंचित ही रहना पड़ेगा। इसलिए शास्त्रकारों ने ब्राह्मण के लिए यह आवश्यक बताया है कि गायत्री उपासना करने के अतिरिक्त यदि अन्य साधनाएं करना चाहे तो कर सकता है, पर इस महामंत्र को त्याग कर यदि उसने अन्य मंत्रों या अन्य देवताओं का सहारा लिया है तो यह उसकी भूल है। इस भूल के फलस्वरूप उसे ब्रह्मतेज का अभाव ही रहेगा।
उपासना का जीवन में स्थान होना आवश्यक है।
उपासना को ब्राह्मण का अनिवार्य कर्त्तव्य बताया है और आदेश दिया है कि जीवन के अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण कार्यों में गायत्री उपासना को प्रथम स्थान देना चाहिए। जो इस धर्म कर्त्तव्य का पालन नहीं करते, उनकी जगह-जगह तीव्र भर्त्सना की गई है और उन्हें शूद्र चाण्डाल आदि कहा गया है। देखिए :-
उपासना करने पर मनुष्य का सीमित कल्याण करती हैं। किन्तु गायत्री के लिए ऐसा कोई सीमा बन्ध नहीं है, उसके गर्भ में समस्त शक्तियाँ सन्निहित होने से परम देवी कही जाती है। सच्चे मन से उपासना करके यदि उसका थोड़ा सा भी अनुग्रह प्राप्त किया जा सके तो साधक उस परम गति को प्राप्त कर लेता है जिसके कारण लोक में सुख और परलोक में अभीष्ट शान्ति प्राप्त होती है। कहा भी है :--
उपासना करने के अतिरिक्त यदि अन्य साधनाएं करना चाहे तो कर सकता है, पर इस महामंत्र को त्याग कर यदि उसने अन्य मंत्रों या अन्य देवताओं का सहारा लिया है तो यह उसकी भूल है। इस भूल के फलस्वरूप उसे ब्रह्मतेज का अभाव ही रहेगा।
उपासनाओं के लिए गायत्री का त्याग करना उचित नहीं। यदि अन्य उपासनाएं करनी ही हो तो प्रथम स्थान गायत्री उपासना को देकर तब अन्य उपासनाएं करे।
उपासना के माध्यम से स्वयमेव विकसित होने लगते हैं और उन अन्तः स्फुरणाओं के जागरण से उसका ब्रह्मणत्व दिन-दिन सुदृढ़ होता जाता है। आत्मा में पवित्रता का अंश दिन-दिन बढ़ता जाता है।
उपासना प्रचलित होगी।
उपासना करने वाला भी कोई पाप कर्म नहीं कर पाता। वह बुराइयों से बचने लगता है और अच्छाइयों को ग्रहण करने लगता है। ऐसे अच्छे गुणों के ग्रहण करते रहने से वह व्यक्ति समाजोपयोगी बन जाता है। समाज में ऐसे उत्तम नागरिक ही उसकी व्यवस्था ठीक रख पाते हैं। समाज की व्यवस्था बनाये रखने के लिए उत्तम व्यक्ति आवश्यक है और उनके निर्माण के लिए परमात्मा की पूजा, उपासना का प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन में स्थान होना आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-August
उपासना तपस्या भी गायत्री द्वारा होती थी।
उपासना एक बहुत ही सुव्यवस्थित विज्ञान है। विज्ञान की शिक्षा को कोई शिक्षार्थी बिना किसी मार्ग दर्शक के अपने आप पूर्ण नहीं कर सकता। जब डाक्टरी, इंजीनियरिंग, रसायन, साइंस आदि साधारण कार्य बिना शिक्षक के नहीं सीखे जा सकते तो फिर आध्यात्म विद्या जैसे महान विज्ञान को अपने आप किसी सक्रिय मार्ग दर्शन के सफलता पूर्वक प्राप्त कर सकना कैसे सम्भव हो सकता है?
उपासना में तो यह आवश्यकता विशेष रूप में है। क्योंकि इस साधना का प्रधान आधार प्राण तत्व है। गायत्री शब्द के अक्षरों में स्पष्ट है कि- गय=प्राण, त्री=त्राण करने वाली अर्थात् प्राणों की रक्षा शक्ति ही गायत्री उपासक को अपने में विशेष प्राण बीज धारण करके आगे बढ़ना होता है और यह प्राण किसी प्राणवान साधना निष्णात गुरु से ही प्राप्त हो सकता है। जिस प्रकार गन्ने के, गुलाब के बीज नहीं होते, उसकी लकड़ी काट कर दूसरी जगह बोई जाती है, उसी प्रकार जिसने कम से कम सवा करोड़ जप किया हो ऐसे परिपक्व साधन वाले अनुभवी गुरु के प्राणों का एक अंश अपनी प्राण भूमिका में बोने से ही नवीन साधक का साधना वृक्ष बढ़ता और फल−फूलों से सुशोभित होता है। दीक्षा गायत्री उपासना का महत्वपूर्ण अंग है।
उपासना करता हूँ।
उपासना करने वाले के दिन में किए हुए पाप नष्ट होते हैं। प्रातः उपासना करने वाले के रात्रि में किए पाप नष्ट होते हैं। दोनों समय उपासना करने वाला सर्वथा निष्पाप होता है। मध्य रात्रि में तुरीय संध्या करने से वाक् सिद्धि होती है। नई प्रतिमा से देव सान्निध्य प्राप्त होता है।
उपासना करने वाला सर्वथा निष्पाप होता है। मध्य रात्रि में तुरीय संध्या करने से वाक् सिद्धि होती है। नई प्रतिमा से देव सान्निध्य प्राप्त होता है। भौमाश्विनी योग में जप करने से महामृत्यु से तर जाता है। जो इस विद्या को जानता है वह मृत्यु से पार होता है।
उपासना करने वाले के रात्रि में किए पाप नष्ट होते हैं। दोनों समय उपासना करने वाला सर्वथा निष्पाप होता है। मध्य रात्रि में तुरीय संध्या करने से वाक् सिद्धि होती है। नई प्रतिमा से देव सान्निध्य प्राप्त होता है। भौमाश्विनी योग में जप करने से महामृत्यु से तर जाता है।
उपासना करें, उसके आदेशों का यथार्थ रूप में पालन करें और अपने जीवन को उसके बनाये नियमों के अनुकूल बनावें। ऐसा करने से ही हम आत्मा और प्रकृति के रहस्य को जानकर अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ हो सकते हैं। वास्तव में परमात्मा ही इस संसार का धारक है और वहीं इसमें ओत-प्रोत है। वही सब का स्वामी और सच्चा पिता है। जो कोई बालकोचित सरलता से उस भगवान की गोद में बैठने की अभिलाषा करेगा- उसकी शरण में जायेगा, वही सच्चे ज्ञान का अधिकारी बन सकेगा।
उपासना करते हैं और इसी के बल पर अपना देवत्व सुरक्षित रखते हैं। यदि मनुष्य श्रद्धा पूर्वक वेद माता की शरण को अपनाये रहे तो भी अपनी मनुष्यता सुरक्षित रख सकता है।
उपासना में कोई त्रुटि रह जाने से कोई अनिष्ट होने की सम्भावना स्वप्न में भी नहीं रहती। अधिक से अधिक इतनी ही हानि हो सकती है कि लाभ कम मिले। माता अपने पुत्रों का कभी किसी प्रकार का अनिष्ट नहीं करती।
उपासना का डंका पीटेंगे, पर जिनका उद्देश्य निजी स्वार्थ-साधन ही होगा। सच्चे धर्म का लोप होगा और मिथ्या तथा बनावटी धर्म प्रचलित किये जायेंगे।
उपासना करते हैं। वही चारों वेदों की माता हैं।
उपासना का महत्वपूर्ण अंग है। साधना की सफलता चाहने वाले और शास्त्र की महत्ता को स्वीकार करने वालों के लिए तो वह अनिवार्य ही है। देखिए :-
उपासना से बढ़कर और कोई तप, योग, साधन, ध्यान नहीं हैं। समस्त प्रकार की योग साधनाओं का आधार गायत्री ही मानी गई है।
उपासना करता रहे तो भी प्रशंसनीय सफलता प्राप्त कर लेता है।
उपासना है। धर्म-शास्त्रों में जप, तप, ध्यान, भजन की जो विधियाँ बतलाई गई हैं उनका तात्पर्य भी यही है कि उनके द्वारा मनुष्य में भौतिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का भाव भी उत्पन्न होता रहे और वह धर्म के मुख्य अंगों का पालन करने में समर्थ हो सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-December
उपासना करने में ही है।
उपासना क्षेत्र इधर ही बनाये थे। कतिपय देवताओं ने भी तप यहीं किया था। करते भी क्यों न? धरती का स्वर्ग और हिमालय का हृदय तो यहीं से समीप पड़ता है।
उपासना का ही एक अंग है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-February
उपासना करने लगा। पाप के भार से पृथ्वी, की पीठ टूटने लगी।
उपासना करना मनुष्य का सबसे प्रथम कर्त्तव्य है। शक्ति प्राप्त किये बिना तो हम मनुष्य भी नहीं कहला सकते। अवतार-प्रेमियों को चाहिए कि सबसे प्रथम शक्ति की आराधना करें और बल को बढ़ावें।
उपासना कर, इस त्रिवेणी में जब हम आत्मा को स्नान करावेंगे, तब पुण्य-पूत दृष्टि द्वारा परमेश्वर की सन्निकटता प्रत्यक्ष दिखाई देगी।
उपासना करता है, तो उसका प्रतिफल मिलना आवश्यक हो जाता है। बढ़े हुए पापों को नष्ट करने के लिए जो निष्ठुर प्रतिकार करना पड़ता है, उसमें सदोषों के साथ निर्दोष भी पिसते हैं। इस विनाशलीला से बचने के लिए हमें उसी की छाया में अपना डेरा डालना होगा जो इस विभीषिका से हम सब को बचाने की पूरी-पूरी क्षमता रखता है और जिसकी दृष्टि मात्र से विपत्तियों के बड़े-बड़े बादल सहज में ही उड़ जाते हैं।
उपासना करके बलवान बनने में न्याय की महत्ता छिपी हुई है। इस प्रकार सत्य, प्रेम और न्याय की त्रिगुण सृष्टि के अंतर्गत संपूर्ण सुधार आ जाते हैं, जिनकी आज संसार को आवश्यकता है। इन तीनों की पृष्ठ भूमि पर खड़े होकर हम सत्य का दर्शन कर और करा सकते हैं।
उपासना में प्रवृत्त हो जाना चाहिए। सच्चे हृदय से शरण में आये हुए जनों का भगवान तिरस्कार नहीं करते और उनके पिछले पापों पर ध्यान न देकर तुरन्त ही गोद में उठा लेते हैं। ऐसे निष्काम शरणागतों की रक्षा और योगक्षेम की जिम्मेदारी उन प्रभु के ही कंधों पर ही पड़ जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-December
उपासना मन्दिर में जाकर परमात्मा का नाम ले सके। इतना ही नहीं, बल्कि प्रत्येक सम्प्रदाय लोग केवल अपने ही उपासना मन्दिर को ईश्वर की उपासना का स्थान समझते हैं और दूसरे सम्प्रदाय के उपासना गृहों का उनकी नजरों में कोई आदर नहीं। यहाँ तक कि लोग धर्म के नाम पर दूसरों के उपासना गृहों को नष्ट तक कर डालते हैं। कुरान कहता है इससे बढ़कर अन्याय मनुष्य और क्या कर सकता है कि खुदा के बन्दों को उसकी पूजा करने से रोके और केवल इसलिए कि वे किसी दूसरे सम्प्रदाय में शामिल हैं या किसी उपासनागृह को केवल इसलिए गिरा दे कि वह हमारा नहीं, बल्कि दूसरे संप्रदाय वालों का बनवाया हुआ है।
उपासना गृहों का उनकी नजरों में कोई आदर नहीं। यहाँ तक कि लोग धर्म के नाम पर दूसरों के उपासना गृहों को नष्ट तक कर डालते हैं। कुरान कहता है इससे बढ़कर अन्याय मनुष्य और क्या कर सकता है कि खुदा के बन्दों को उसकी पूजा करने से रोके और केवल इसलिए कि वे किसी दूसरे सम्प्रदाय में शामिल हैं या किसी उपासनागृह को केवल इसलिए गिरा दे कि वह हमारा नहीं, बल्कि दूसरे संप्रदाय वालों का बनवाया हुआ है।
उपासना मन्दिर तक अलग हो गये। यद्यपि धर्मों के अनुयायी एक ही परमात्मा के मानने वाले हैं, तथापि यह संभव नहीं कि एक धर्म का अनुयायी दूसरे धर्म वालों के बनाये हुए उपासना मन्दिर में जाकर परमात्मा का नाम ले सके। इतना ही नहीं, बल्कि प्रत्येक सम्प्रदाय लोग केवल अपने ही उपासना मन्दिर को ईश्वर की उपासना का स्थान समझते हैं और दूसरे सम्प्रदाय के उपासना गृहों का उनकी नजरों में कोई आदर नहीं। यहाँ तक कि लोग धर्म के नाम पर दूसरों के उपासना गृहों को नष्ट तक कर डालते हैं। कुरान कहता है इससे बढ़कर अन्याय मनुष्य और क्या कर सकता है कि खुदा के बन्दों को उसकी पूजा करने से रोके और केवल इसलिए कि वे किसी दूसरे सम्प्रदाय में शामिल हैं या किसी उपासनागृह को केवल इसलिए गिरा दे कि वह हमारा नहीं, बल्कि दूसरे संप्रदाय वालों का बनवाया हुआ है।
उपासना मन्दिर को ईश्वर की उपासना का स्थान समझते हैं और दूसरे सम्प्रदाय के उपासना गृहों का उनकी नजरों में कोई आदर नहीं। यहाँ तक कि लोग धर्म के नाम पर दूसरों के उपासना गृहों को नष्ट तक कर डालते हैं। कुरान कहता है इससे बढ़कर अन्याय मनुष्य और क्या कर सकता है कि खुदा के बन्दों को उसकी पूजा करने से रोके और केवल इसलिए कि वे किसी दूसरे सम्प्रदाय में शामिल हैं या किसी उपासनागृह को केवल इसलिए गिरा दे कि वह हमारा नहीं, बल्कि दूसरे संप्रदाय वालों का बनवाया हुआ है।
उपासना का स्थान समझते हैं और दूसरे सम्प्रदाय के उपासना गृहों का उनकी नजरों में कोई आदर नहीं। यहाँ तक कि लोग धर्म के नाम पर दूसरों के उपासना गृहों को नष्ट तक कर डालते हैं। कुरान कहता है इससे बढ़कर अन्याय मनुष्य और क्या कर सकता है कि खुदा के बन्दों को उसकी पूजा करने से रोके और केवल इसलिए कि वे किसी दूसरे सम्प्रदाय में शामिल हैं या किसी उपासनागृह को केवल इसलिए गिरा दे कि वह हमारा नहीं, बल्कि दूसरे संप्रदाय वालों का बनवाया हुआ है।
उपासनागृह को केवल इसलिए गिरा दे कि वह हमारा नहीं, बल्कि दूसरे संप्रदाय वालों का बनवाया हुआ है।
उपासना गृहों को नष्ट तक कर डालते हैं। कुरान कहता है इससे बढ़कर अन्याय मनुष्य और क्या कर सकता है कि खुदा के बन्दों को उसकी पूजा करने से रोके और केवल इसलिए कि वे किसी दूसरे सम्प्रदाय में शामिल हैं या किसी उपासनागृह को केवल इसलिए गिरा दे कि वह हमारा नहीं, बल्कि दूसरे संप्रदाय वालों का बनवाया हुआ है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-September
उपासना उसकी चलती फिरती प्रतिमाओं से प्रेम करने में है। परमार्थ की वेदी पर अपने निजी तुच्छ स्वार्थों को बलिदान करना धर्म हैं। धर्म और ईश्वर की सच्चे अर्थों में पूजा करने वाले व्यक्तियों का कार्य-क्रम वर्तमान परिस्थितियों में अपने आस-पास छाये हुए अज्ञान और दारिद्र के घोर अन्धकार को दूर हटाना होगा। अविद्या के कारण हमारी कौम अंधेरे में टकराती फिर रही है, दरिद्रता के कारण हमारा देश पशुओं से भी गया बीता दयनीय जीवन बिता रहा है। जिसके हृदय में धर्म हैं, उसके हृदय में दया करुणा और प्रेम के लिये स्थान अवश्य होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-June
उपासना की।)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-March
उपासना में तल्लीन रहूँगा। आपकी आज्ञा को मानूँगा। आपके नियमों को स्वीकार करूंगा। मैं जानता हूँ कि पवित्र कर्मों से ही आपकी उपासना हो सकती है। मैं जानता हूँ कि धर्म का आचरण करते देखकर ही आप प्रसन्न होते हैं।
उपासना हो सकती है। मैं जानता हूँ कि धर्म का आचरण करते देखकर ही आप प्रसन्न होते हैं। प्रभो! आपके मन्दिर को, इस शरीर को, सब प्रकार भीतर-बाहर से पवित्र रखने का मैं प्रयत्न करूंगा। कुकर्म रूपी चाण्डालों से आपके इस मन्दिर की रक्षा करूंगा। आप साक्षी रूप से देखते रहिए, मैं ऐसे काम न करूंगा जिससे मेरे अन्दर बैठे हुए, हे परमात्मन्, आपको लज्जित होना पड़े।
उपासना के लिए एक घन्टा उसी में बने रहो। बाहर का एक भी विचार इस समय मन में नहीं आना चाहिए। शरीर को ढीला करके किसी मुलायम बिछौने या आराम कुर्सी पर शान्तिपूर्वक बैठ जाओ। नेत्र बन्द करके अपने अन्तर हृदय का ही ध्यान करो, बाहरी बातों को इस समय बिल्कुल भुला देना चाहिए। शरीर और मन को स्थिर करके मन ही मन परमात्मा से प्रार्थना करो कि ‘हे प्रभो! मुझे ऐसी दिव्यदृष्टि प्रदान कीजिए जिससे मैं सर्वत्र आपके सत् चित् आनन्द स्वरूप का दर्शन कर सकूँ।
उपासना करूंगा। आत्मा के रूप में जब आप हर घड़ी मेरे साथ हैं, तो हे नाथ! हर घड़ी आपकी पूजा करूंगा। हर क्षण आपकी उपासना में तल्लीन रहूँगा। आपकी आज्ञा को मानूँगा। आपके नियमों को स्वीकार करूंगा।
उपासना करो।
उपासना करता है, उन्हें यह सब सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। मैंने जब यह वरदान पाये तो अपनी घर फूँक तमाशा देखने की नीति पर होश आया। बार-बार विचार करने लगा कि पैसा और समय बर्बाद करके इस घातक आदत से पुजारी मैं क्यों बना हुआ हूँ। आप्त पुरुषों के वचनों का अध्ययन किया तब तो गफलत से बेदार होने लगा। बड़ों को तम्बाकू पीते देखकर छोटे बच्चे या छोटी बुद्धि वाले इस आदत को सीखते हैं और यह दुर्गुण छूत की बीमारी की तरह एक से दूसरों में फैलता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-October
उपासना) उपासना (कर्तव्या) करनी चाहिए (यतोहि) क्योंकि (आराधनाँ) आराधना के (बिना) बिना (जीवनं) जीवन (पतनं) पतनावस्था को (याति) प्राप्त होता है।
उपासना को आवश्यक बताया है। यहाँ प्रारम्भ में ही अनेक सन्देह उठ खड़े होते हैं। गणना की जाय, तो संसार में इस समय एक तिहाई से भी अधिक जन-संख्या ऐसी होगी, जो ईश्वर का आस्तित्व मानने से ही इन्कार करती है। विज्ञान कहता हैं कि-”कसौटी पर वर्तमान ईश्वर का ढाँचा खरा नहीं उतरा। विभिन्न सम्प्रदायों, पैगम्बरों और भक्त-जनों ने ईश्वर का जैसा वर्णन किया है, वह परीक्षा के समय अवास्तविक प्रमाणित हुआ।
उपासना का आदेश मनुष्य मात्र के लिए है। मनुष्य मात्र में अनीश्वरवादी भी आ जाते हैं, फिर सार्वभौम व्यवस्था तो वहीं हो सकती है, जिसे दोनों पक्ष स्वीकार करें। इसलिए हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस श्लोक की विवेचना करनी होगी, जिसे अनीश्वरवादी भी स्वीकार करते हों। असंख्य में तो यह आदेश उन्हीं लोगों के लिए है, जो उपासना नहीं करते। करने वाले तो करते ही हैं, उनके लिए तो कहना ही कुछ नहीं हैं ‘पढ़ने जाना चाहिए’ यह उपदेश उन्हीं बालकों के लिए हैं, जो पढ़ने नहीं जाते, जो परिश्रम से पढ़ रहे हैं, उनके लिए तो यह शिक्षा कुछ विशेष महत्व नहीं रखती, क्योंकि वे तो पहले से ही उस पर अमल कर रहे हैं।
उपासना मनुष्य करने लगता है, उसकी मानसिक चेतना उसी साँचे में ढलती चली जाती है। गीता का भी यही मत है-’प्रेतों को भजने वाले प्रेतों को, देवताओं को भजने वाले देवताओं को और मुझे भजने वाले मुझे प्राप्त होते है। यह कथन भी उसी भाव का द्योतक है।
उपासना की बात कहना किस प्रकार युक्ति संगत हो सकता है।
उपासना की उपयोगिता बताना यहाँ अधिक उपयुक्त होगा।
उपासना करता है।
उपासना का मानसिक विश्लेषण करते हुए, मनःशास्त्र के विशेषज्ञ डॉ. एटकिसन ने लिखा है कि “भक्त के मन में भगवान् के सम्बन्ध में अपनी मनोभूमि के अनुसार एक दिव्य कल्पना चित्र होता है, उस चित्र में तन्मय होने के प्रयत्न को उपासना कहते हैं।” यह कल्पना चित्र हर व्यक्ति के पृथक होते हैं, इसीलिए श्री विवेकानंद जी कहा करते थे, हर व्यक्ति का एक अलग ईश्वर है। जो आधुनिक विद्वान देवताओं का अर्थ सन्त पुरुष नहीं करते, उनका कहना है कि पुराने समय में भारत की आबादी जब तेतीस करोड़ थी, हर व्यक्ति के मन में ईश्वर सम्बन्धी धारणा एक दूसरे से कुछ न कुछ भिन्नता लिये हुए होती है, इसलिए किसी कवि ने तैंतीस करोड़ स्वतंत्र देवताओं की बात कह कर हर, इसी आधार पर उनका अलंकारपूर्ण विस्तृत वर्णन कर दिया था, तभी से हिन्दू जाति में तैंतीस करोड़ देवताओं की मान्यता को आश्रम मिला।
उपासना से विरक्त दिखाई न पड़ेगा। इस तरह जब हम गम्भीर दृष्टि से मनुष्य के स्वभावजन्य मूलभूत धर्म की खोज करते हैं, तो ‘सच्चिदानन्द की उपासना’ इसी तत्व को प्राप्त करते हैं।
उपासना (कर्तव्या) करनी चाहिए (यतोहि) क्योंकि (आराधनाँ) आराधना के (बिना) बिना (जीवनं) जीवन (पतनं) पतनावस्था को (याति) प्राप्त होता है।
उपासना से किस प्रकार आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त कर सकते हैं, इसकी चर्चा हम अगले अंक में करेंगे।
उपासना में मानव प्राणी हर घड़ी लगा रहता है, एक पल के लिए भी इसे नहीं छोड़ता और न इसके अतिरिक्त और कुछ काम करता है, पाठक अधीर न हों कि सच्चिदानन्द की उपासना तो बिरले ही करते हैं, यदि बिरले ही करते तो वह बात स्वाभाविक धर्म न रह जाती, फिर उसे मनुष्यकृत मानना पड़ता है। अगली पंक्तियों में यही बताया जा रहा है कि किस प्रकार प्रत्येक मनुष्य सच्चिदानन्द की उपासना करता हुआ अपने धर्म कर्तव्य को पालन करने में लगा हुआ है।
उपासना’ इसी तत्व को प्राप्त करते हैं।
उपासना को आवश्यक क्यों बताती है। जब एक वस्तु के होने में ही सन्देह है, तो उसकी उपासना की बात कहना किस प्रकार युक्ति संगत हो सकता है।
उपासना करता हुआ अपने धर्म कर्तव्य को पालन करने में लगा हुआ है।
उपासना नहीं करते। करने वाले तो करते ही हैं, उनके लिए तो कहना ही कुछ नहीं हैं ‘पढ़ने जाना चाहिए’ यह उपदेश उन्हीं बालकों के लिए हैं, जो पढ़ने नहीं जाते, जो परिश्रम से पढ़ रहे हैं, उनके लिए तो यह शिक्षा कुछ विशेष महत्व नहीं रखती, क्योंकि वे तो पहले से ही उस पर अमल कर रहे हैं। अनीश्वर वादियों को उन्हीं के दृष्टिकोण से उपासना की उपयोगिता बताना यहाँ अधिक उपयुक्त होगा।
उपासना तो बिरले ही करते हैं, यदि बिरले ही करते तो वह बात स्वाभाविक धर्म न रह जाती, फिर उसे मनुष्यकृत मानना पड़ता है। अगली पंक्तियों में यही बताया जा रहा है कि किस प्रकार प्रत्येक मनुष्य सच्चिदानन्द की उपासना करता हुआ अपने धर्म कर्तव्य को पालन करने में लगा हुआ है।
उपासना कहते हैं।” यह कल्पना चित्र हर व्यक्ति के पृथक होते हैं, इसीलिए श्री विवेकानंद जी कहा करते थे, हर व्यक्ति का एक अलग ईश्वर है। जो आधुनिक विद्वान देवताओं का अर्थ सन्त पुरुष नहीं करते, उनका कहना है कि पुराने समय में भारत की आबादी जब तेतीस करोड़ थी, हर व्यक्ति के मन में ईश्वर सम्बन्धी धारणा एक दूसरे से कुछ न कुछ भिन्नता लिये हुए होती है, इसलिए किसी कवि ने तैंतीस करोड़ स्वतंत्र देवताओं की बात कह कर हर, इसी आधार पर उनका अलंकारपूर्ण विस्तृत वर्णन कर दिया था, तभी से हिन्दू जाति में तैंतीस करोड़ देवताओं की मान्यता को आश्रम मिला।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-April
उपासना का आडम्बर रखने से मुक्ति नहीं मिल सकती। अपने को सदाचारी बनाने में ही सारी योग-साधना छिपी हुई है। चोर ने उसी दिन से बुरे कर्म करना छोड़ दिया और सत् कर्म करने लगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-August
उपासना करो- धर्म की उपासना करो!
उपासना करो!
उपासना से अपने विचारों के अनुसार अपने कष्टों से छूटना चाहता है, पर वे धर्मध्वजी ऐसा करना धर्म विरुद्ध समझते हैं। इसी बात के लिए यह गाली-गलौज और मार-पीट हो रही है। हम लोगों ने जैसे-तैसे उस दुखिया को छुड़ाया, वह रोता कलपता अपने घर चला गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-January
उपासना करें। सत्य धर्म मनुष्य को ईश्वरोन्मुख बनाता है, दूसरे शब्दों में सत्य ही भक्ति और मुक्ति है। अतः सत्य के धारण और सेवन द्वारा मनुष्य पहले अपने को अधिकारी और पात्र बनावें- तब कृतयुग कल्पना का सत्य कार्य के परिणत होना दुःसह और दुष्कर नहीं है। ईश्वर कृतयुग वादियों की कृतयुग कल्पना सफल करें, जिससे आज का दुख रूप संसार सुख रूप हो जावे। एवमस्तु।
उपासना करेंगे, झूठ और पाखण्ड देख कर मन ही मन चिढ़ेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-July
उपासना कीजिए!
उपासना करनी पड़ेगी। निस्संदेह शक्ति के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती अशक्त मनुष्य तो दुख द्वंद्वों में ही पड़े-पड़े बिलबिलाते रहेंगे और कभी भाग्य को, कभी ईश्वर को, कभी दुनिया को दोष देते हुए झूठी विडंबना करते रहेंगे। जो व्यक्ति किसी भी दशा में महत्व प्राप्त करना चाहते है, उन्हें चाहिये कि अपने इच्छित मार्ग के लिये शक्ति संपादन करे।
उपासना में लग जाइए। ईश्वर आपको सर्वतोमुखी उन्नति प्रदान करेगा और उसके तेज से अन्याय रूपी अन्धकार दूर भाग जायगा।
उपासना करेंगे।
उपासना की थी। उस समय के रिवाज के अनुसार दोनों में वाद हुआ और देश में कोई बड़ा विद्वान न होने से कल्याणी देवी मध्यस्था बनाई गई। कल्याणी देवी को यह बात जंची कि महर्षि का पक्ष ही सच्चा सिद्ध हुआ है। एक तरफ पति प्रेम था, दूसरी तरफ सत्य था, पर सत्य न्याय में बाधक न हुआ, इसलिए कल्याणी देवी ने महर्षि की ही विजय घोषित की।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-December
उपासना में दो परिकल्पनाएँ करनी होती हैं। एक यह कि प्रस्तुत प्रतिमा धातु या पाषाण नहीं, वरन उच्च आदर्शों की संगठना है। उसके प्रत्येक अवयव में अपने-अपने स्तर की उत्कृष्टता छलकती है। इस प्रकार की मान्यता ‘विश्वास’ कहलाती है। इस स्थापना पर श्रद्धा का, आत्मीयता का आरोपण किया जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-October
उपासना का तात्पर्य है श्रद्धा, निष्ठा, प्रज्ञा की त्रिधा-सद्भावनाओं का संगम। इस समागम को जिसने अन्तरात्मा में धारण कर लिया समझना चाहिए कि उसने ब्राह्मी स्थिति उपलब्ध करली।
उपासना का विधान है, वहाँ हर भागीदार को न्यूनतम दो घंटे समयदान के रूप में अपने क्षेत्र में अनुदान प्रस्तुत करते रहने का भी विधान हैं यह पुण्य और परमार्थ का समन्वय ऐसा है जिसके फलस्वरूप भागीदारों की प्रतिभा का परिष्कार वातावरण में सृजन चेतना के समावेश और नव निर्माण में पुरुषार्थपरक योगदान के तीनों पक्ष जुड़े हुए हैं और त्रिवेणी संगम की समता करते हैं। अभियान की भागीदारी को एक शब्द में उदीयमान सौभाग्य कह सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-May
उपासना जीवन साधना के लिए अग्रसर करती है और सुसंस्कारों से साधा गया जीवन अपनी उपयोगिता आराधना में-लोकसेवा में निरत रहना अनुभव करता है। यही वह त्रिवेणी है जिसे तीर्थराज की संज्ञा दी गई है। ईश्वर आराधना का अर्थ है दिव्यता के साथ अपनी संवेदनाओं को घनीभूत कर लेना। जीवन के विचार क्षेत्र में भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण को बहिष्कृत कर देना। अपनी कौशल और साधना को पुण्य परमार्थ में उत्सर्ग करते रहना।
उपासना सूर्य सेवन और आध्यात्मिक उपासना तेजस का ध्यान करते हुए की जाती है। भारतीय तत्वदर्शियों ने सविता को सहस्र किरणों वाला माना है और उनकी प्रधान एवं सुपरिचित किरणों को ‘सात रश्मि’ कहा है। वायु पुराण में उल्लेख है कि सूर्य की सहस्र रश्मियाँ हैं उनमें से सात प्रधान हैं। ऋग्वेद 10/139/1 में, कौशीतकि ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में भी सात रंग की रश्मियों का वर्णन है। उनके नाम - (1) सुषुम्णा (2) हरिकेशः (3) विश्वकर्मा (4) संपहंसु (5) अर्वावसु (6) विश्वश्रवः और (7) स्वराट्- गिनाये गये हैं।
उपासनात्मक अनेकों क्रिया-कलापों में ध्यान--धारणा ऐसी है, जिसे उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए। ध्यान भी कई प्रकार के हैं। उनमें से अधिकाँश में ईश्वर की छवि की कल्पना की जाती है, साथ ही उसके सान्निध्य भी अपेक्षा भी। इस सही प्रक्रिया के साथ इतना और जोड़ना चाहिए कि परमात्मा और आत्मा के विच्छिन्न सम्बन्ध को स्मरण रखा जाय। उसे सर्वव्यापी व न्यायकारी माना जाय।
उपासना करनी होती है। उसकी यथार्थता इसी में है कि आदर्शों के परिपालन तथा कर्तव्यों के निर्वाह में कहीं चूक न होने पाए। इसका ध्यान उपयुक्त समय पर किया जाय। उसमें चूक न होने दी जाय। जब हर दिन कमरे में बुहारी लगती है।
उपासना का पहला चरण दूसरे चरण जीवन साधना का आधार बनता है। सार्थकता उसी उपासना की है जो आत्म परिष्कार की प्रेरणा दे सके। संयम साधना के रूप में तपश्चर्या इसी हेतु की जाती है। इन्द्रिय-संयम अर्थ-संयम-समय संयम, विचार-संयम यह उपासना की सार्थकता के चार प्रतिफल हैं। आत्मशोधन के लिए इन्हें अपनाना ही पड़ता है।
उपासना का भी यही प्रयोजन है। साधक अपनी आवश्यकता और आकाँक्षा के अनुरूप उनमें से समय-समय पर इन देवताओं का अंचल पकड़ता है और छोड़ता रहता है।
उपासना परमात्मा के एक रूप विशेष की ही पूजा है। उसके विभिन्न गुणों शक्तियों का प्रतिनिधित्व देवगण करते हैं अन्यथा तो इस सृष्टि का उत्पादक, पोषक, संहारक, कर्ता-हर्ता एक परमात्मा ही है। उसे ही अनेक नामों से पुकारते हैं।
उपासना द्वारा अभीष्ट काम्य-प्रयोजनों की भी पूर्ति करते रहें। क्रमशः आगे अध्यात्म मार्ग पर चलते हुए ब्रह्म प्राप्ति के परम श्रेयस्कर लक्ष्य की ओर अभिमुख हो जायँ, ऐसा अभिमत ऋषियों का रहा है।
उपासना को निष्फल ही मानना चाहिए जो जीवन के मौलिक स्वरूप में सभ्य आचरण एवं आत्मिक पक्ष को सुसंस्कारिता से सम्पन्न न करे। उस बीज की क्या महिमा जो उर्वर भूमि में भी अंकुर उत्पन्न न करे। उपासना बीज है और उसका अंकुर संयम। तपश्चर्या भी यही है। उपासना और साधना का खाद पानी पाकर मनुष्य क्षुद्र से महान बनता हैं छोटा अंकुर विशाल वृक्ष का रूप धारण करता है।
उपासना के प्रतिफल विस्तारपूर्वक बताये गये है। उच्च मनोभूमि के साधक वेदान्त की अद्वैत साधना में संलग्न रहें एवं उससे कुछ नीची श्रेणी के साधक देव-उपासना द्वारा अभीष्ट काम्य-प्रयोजनों की भी पूर्ति करते रहें। क्रमशः आगे अध्यात्म मार्ग पर चलते हुए ब्रह्म प्राप्ति के परम श्रेयस्कर लक्ष्य की ओर अभिमुख हो जायँ, ऐसा अभिमत ऋषियों का रहा है।
उपासना और सात्विक साधनाओं में प्रायः पीले अथवा श्वेत रंग का प्रयोग किया जाता है, जो साधक की सात्विक विचारधारा को उस काल में उद्दीप्त करते रहता है।
उपासना का तात्पर्य परमात्मा की उस शक्ति से सम्बन्ध स्थापिताकरण है जो साधक के अभीष्ट प्रयोजन से सम्बन्धित है। जैसे समस्त प्रजा एक ही राजा के राज्य में रहती है तो भी उसे अलग-अलग प्रयोजनों के लिए अलग-अलग विभागों के कर्मचारियों के पास जाना पड़ता है। देव उपासना का भी यही प्रयोजन है। साधक अपनी आवश्यकता और आकाँक्षा के अनुरूप उनमें से समय-समय पर इन देवताओं का अंचल पकड़ता है और छोड़ता रहता है।
उपासना का प्रधान अंग है। नाम के आधार पर ही किसी सत्ता का बोध और स्मरण हमें होता है। ईश्वर को स्मृति पटल पर बिठाने के लिए प्रतिष्ठापित करने के लिए उसके नाम का सहारा लेना पड़ता है। शरीर पर नित्य मैल चढ़ता है और उसे साफ करने के लिए रोज नहाना पड़ता है। इसी तरह मन पर भी नित्य वातावरण में उड़ती फिरने वाली दुष्प्रवृत्तियों की छाप पड़ती है।
उपासना साधना और आराधना यह तीन प्रयोग प्रकरण है जिनके सहारे ईश्वर प्रदत्त प्रसुप्त दिव्य क्षमताओं को जगाया और अपने समर्थ शक्तिवान बनाया जा सकता है। हर क्षेत्र में प्रगति के लिए प्रबल पुरुषार्थ करने पड़ते हैं। शरीर को बलवान पहलवान बनाने के लिए कितनों को कितने दिन कितनी तत्परता व कठोर व्यायाम करने पड़ते हैं यह किसी से छिपा नहीं। धनी बनने के लिए कृषि व्यवसाय कल शिल्प आदि का आश्रय लेने वाले कितने लम्बे समय तक कितनी तत्परता के साथ कितना कठोर श्रम करते है वह किसी से छिपा नहीं। उच्च शिक्षा प्राप्त करके उच्च अधिकारी बनने की आकाँक्षा रखने वाले प्रायः चौथाई जीवन जितना समय और इतना धन खर्च करते हैं जिसके ब्याज से ही जिन्दगी भर बैठे गुजारा होता रह सकता था।
उपासना करने से अभीष्ट की पूर्ति होती हैं। परन्तु जिसे कोई इच्छा न हो अथवा मोक्ष का आकाँक्षी साधक परमात्मा की उपासना करें।
उपासना, साधना, आराधना के अवलम्बनों को ध्यानपूर्वक अपनाया ही जाना चाहिए।
उपासना के भी विधि-विधानों एवं महत्वों की चर्चा हुई है। कई उपनिषद् देवताओं के नाम पर ही हैं। उसमें प्रतिपादित देवता के गुण, धर्म एवं उपासना के प्रतिफल विस्तारपूर्वक बताये गये है। उच्च मनोभूमि के साधक वेदान्त की अद्वैत साधना में संलग्न रहें एवं उससे कुछ नीची श्रेणी के साधक देव-उपासना द्वारा अभीष्ट काम्य-प्रयोजनों की भी पूर्ति करते रहें। क्रमशः आगे अध्यात्म मार्ग पर चलते हुए ब्रह्म प्राप्ति के परम श्रेयस्कर लक्ष्य की ओर अभिमुख हो जायँ, ऐसा अभिमत ऋषियों का रहा है।
उपासना और साधना का खाद पानी पाकर मनुष्य क्षुद्र से महान बनता हैं छोटा अंकुर विशाल वृक्ष का रूप धारण करता है। शक्तियों से आत्मसत्ता का भण्डार भरता है।
उपासनायें भी विभिन्न सम्प्रदायों में अपने- अपने ढंग से प्रचलित हैं। पर उसमें शब्द और भाव का नियोजन निश्चित रूप से होता है। इन उपचारों के बिना देवता के साथ चेतना को जोड़ सकना प्रायः बन नहीं पाता। उन थोड़े मनीषियों की बात अलग है जो पूजा उपचार के बिना भी अपने कर्मों में आदर्शों की भगवद्बुद्धि को सुस्पष्ट रख साधना का प्रयोजन अपनी विशेष शैली में उपलब्ध कर लेते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि आत्मिक प्रगति में उपासना के बिना भी काम चल सकता है।
उपासनात्मक-क्रिया- कृत्यों-कर्मकाण्ड के विविध विधि-विधानों में भिन्न-भिन्न रंगों का निर्धारण है। तंत्र साधना में प्रायः लाल वर्ण को इसलिए महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि उसमें इष्टदेव को बल और आक्रोशपूर्वक वशवर्ती करना होता है। यह विचार यदि ठण्डे पड़ जायँ और साधक को बीच में ही साधना छोड़नी पड़े, तो न सिर्फ उसके अब तक के समय - श्रम बर्बाद होंगे, वरन प्राण - संकट भी उठ खड़े होंगे। इसीलिए ऐसी साधनाओं में लाल रंग के प्रयोग से निकलने वाली लाल प्रकाश तरंगें साधक की भावनाओं को वैसी ही उग्र बनाये रखने में मदद करती हैं, ताकि साधना निरुत्साह के कारण न टूटे। इसी प्रकार पूजा उपासना और सात्विक साधनाओं में प्रायः पीले अथवा श्वेत रंग का प्रयोग किया जाता है, जो साधक की सात्विक विचारधारा को उस काल में उद्दीप्त करते रहता है।
उपासना की सार्थकता के चार प्रतिफल हैं। आत्मशोधन के लिए इन्हें अपनाना ही पड़ता है। जीवन साधना इन्हीं के सहारे बन पड़ती है। उस उपासना को निष्फल ही मानना चाहिए जो जीवन के मौलिक स्वरूप में सभ्य आचरण एवं आत्मिक पक्ष को सुसंस्कारिता से सम्पन्न न करे। उस बीज की क्या महिमा जो उर्वर भूमि में भी अंकुर उत्पन्न न करे।
उपासना करनी पड़ती हैं यह कार्य जप से आसानी से पूर्ण हो जाता है। स्मरण से आह्वान, आह्वान से स्थापन और स्थापना से उपलब्धि का क्रम चल पड़ता शास्त्र समस्त ही नहीं विज्ञान सम्मत भी हैं।
उपासना- क्रम चलाने का निर्देश शास्त्रकार देते हैं।
उपासना के बिना भी काम चल सकता है। यह राजमार्ग है कोई पुल पर चलने की अपेक्षा नहीं तैरकर गन्तव्य तक जा पहुँचे तो उसे कीर्तिमान भले ही कहा जाय पर वह सर्वसाधारण के लिए सुलभ नहीं है।
उपासना तेजस का ध्यान करते हुए की जाती है। भारतीय तत्वदर्शियों ने सविता को सहस्र किरणों वाला माना है और उनकी प्रधान एवं सुपरिचित किरणों को ‘सात रश्मि’ कहा है। वायु पुराण में उल्लेख है कि सूर्य की सहस्र रश्मियाँ हैं उनमें से सात प्रधान हैं। ऋग्वेद 10/139/1 में, कौशीतकि ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में भी सात रंग की रश्मियों का वर्णन है। उनके नाम - (1) सुषुम्णा (2) हरिकेशः (3) विश्वकर्मा (4) संपहंसु (5) अर्वावसु (6) विश्वश्रवः और (7) स्वराट्- गिनाये गये हैं।
उपासना में जहाँ विधि विधान और कर्मकाण्डों का महत्व है वहाँ श्रद्धा और विश्वास की सुदृढ़ भावना का होना भी आवश्यक है। उथली श्रद्धा के साथ केवल कौतुक, कौतूहल समझकर, मन्त्र या देवता की परीक्षा के लिए कुछ आधी अधूरी साधना कर लेने से वमुचित परिणाम प्राप्त नहीं हो सकता। उसके लिए गहरी श्रद्धा और पूर्ण विश्वास का होना अपरिहार्य है। इस श्रद्धा विश्वास को ही “अमृत” कहते हैं। इसी को पीकर देवता तृप्त होते और प्रसन्न होते हैं।
उपासना बीज है और उसका अंकुर संयम। तपश्चर्या भी यही है। उपासना और साधना का खाद पानी पाकर मनुष्य क्षुद्र से महान बनता हैं छोटा अंकुर विशाल वृक्ष का रूप धारण करता है। शक्तियों से आत्मसत्ता का भण्डार भरता है।
उपासना करें।
उपासना, साधना और आराधना के तीन वर्ग। इनसे आत्मा सत्ता के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर तीनों ही कृतकृत्य होते हैं। आध्यात्म तत्वज्ञान और योग साधना के विधि विधान का यह परम प्रयोजन है। प्रचलित समस्त कर्मकाण्ड इन्हीं तीन प्रयोजनों के इर्द गिर्द परिभ्रमण करते हैं। उस कर्मकाण्ड की कोई उपयोगिता नहीं, जो जीवनक्रम को प्रभावित न करे, मात्र पूजा-उपचारों की लकीर तो पीटे, पर व्यक्तित्व के किसी क्षेत्र को प्रभावित न करें।
उपासना की है जो आत्म परिष्कार की प्रेरणा दे सके। संयम साधना के रूप में तपश्चर्या इसी हेतु की जाती है। इन्द्रिय-संयम अर्थ-संयम-समय संयम, विचार-संयम यह उपासना की सार्थकता के चार प्रतिफल हैं। आत्मशोधन के लिए इन्हें अपनाना ही पड़ता है। जीवन साधना इन्हीं के सहारे बन पड़ती है।
उपासना का महत्वपूर्ण स्थान हैं अध्यात्म शासकों में जहाँ आत्म चिन्तन, ब्रह्मध्यान, मनोनिग्रह, विवेक, वैराग्य आदि का विस्तृत विवेचन हुआ हैं वहाँ अनेक देवताओं की उपासना के भी विधि-विधानों एवं महत्वों की चर्चा हुई है। कई उपनिषद् देवताओं के नाम पर ही हैं। उसमें प्रतिपादित देवता के गुण, धर्म एवं उपासना के प्रतिफल विस्तारपूर्वक बताये गये है। उच्च मनोभूमि के साधक वेदान्त की अद्वैत साधना में संलग्न रहें एवं उससे कुछ नीची श्रेणी के साधक देव-उपासना द्वारा अभीष्ट काम्य-प्रयोजनों की भी पूर्ति करते रहें। क्रमशः आगे अध्यात्म मार्ग पर चलते हुए ब्रह्म प्राप्ति के परम श्रेयस्कर लक्ष्य की ओर अभिमुख हो जायँ, ऐसा अभिमत ऋषियों का रहा है।
उपासना व उसके प्रति किया गया समर्पण साधक के जीवन व कायाकल्प कर देता है।
उपासना का प्रयोजन भली प्रकार पूरा हो जाता है। सृष्टि में इतने जीवधारी हैं पर कोई पूजा पाठ नहीं करता। इन दिनों आधी आबादी नास्तिक वर्ग की है। उन्हें न ईश्वर की मान्यता के प्रति विश्वास है और न पूजा पाठ से सम्बन्ध। फिर भी ईश्वर उन सब का भरण पोषण और अनुदान सहयोग करता रहता है।
उपासना, संध्यावन्दन आदि नामों से जाना जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-February
उपासना आदि उपचारों से इनका दुष्प्रभाव मनुष्य के ऊपर नहीं पड़ता।
उपासना साधना और आराधना कहते हैं। आत्मिक प्रगति का लक्षण है मनुष्य में देवत्व का अभिवर्धन। देवता देने वाले को कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसे धर्म धारणा या सेवा साधना भी कह सकते हैं। व्यक्तित्व में शालीनता उभरेगी तो निश्चित रूप से सेवा की ललक उठेगी।
उपासनाएं भी शिक्षण क्रम के साथ ही पूरी करते रहते हैं जप ध्यान प्राणायाम की प्रक्रिया साथ साथ चलती रहती है। प्रभावी वातावरण में सम्पन्न किये जाने के कारण वह फलित भी अधिक होती है। यह अतिरिक्त लाभ ऐसा है जो शिविर सत्रों के साथ दीख पड़ने वाले प्रयोजनों से सीधी प्रकार कम नहीं है।
उपासना इसी रूप में की। जप तप, हवन, व्रत, उपवास आदि तप और तितीक्षाओं के द्वारा उन्होंने अपना अन्तः करण नितान्त शुद्ध कर लिया। शास्त्र अनुशीलन और वेदों की शोध में अपने जीवन का एक-एक क्षण घुला दिया। शेष संसार से सम्बन्ध टूट गया। अपाला ने आत्म-साक्षात्कार की साधना में दिन-रात एक कर दिये।
उपासना से भावना जीवन साधना से व्यक्तित्व का और आराधना से क्रियाशीलता का परिष्कार और विकास होता है। आराधना उदार सेव्य साधना से ही सधती है। सेवा कार्यों में सामान्यतः वे सेवायें है जिनसे लोगों को सुविधाएं मिलती है। श्रेष्ठतर सेवा वह है जिससे किसी को पीड़ा का अभावों का निवारण होता है। श्रेष्ठतम सेवा वह है जिससे व्यक्ति पतन से हटकर उन्नति की ओर मोड़ा जा सके।
उपासना साधना के लिए उपयुक्त बताया है। ओर परिश्रम के लिए उपार्जन के लिए लोक आराधना के लिए पुरे दिन को रखा है।
उपासनाएँ, प्रार्थनाएँ, धर्मानुष्ठान इसी आधार पर सफल होते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-September
उपासना-गृहों में भक्त देर तक बैठे रहकर साधना-आराधना इसलिए करते रह पाते हैं कि वे खुशबूदार और उत्फुल्लतादायक स्थान होते हैं। प्रकृति का सान्निध्य आनन्ददायक माना जाता है, क्योंकि वहाँ का वातावरण वृक्ष-वनस्पतियों और फूलों के सुवास से ओत-प्रोत रहता है। यह खुशबू के प्रभाव-परिणाम हैं, पर यह सिर्फ मन तक ही सीमित होता है, ऐसी बात नहीं है। शरीर पर भी इसका असर स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इसकी इसी सामर्थ्य को देखते हुए अब चिकित्सा विज्ञान की एक अभिनव शाखा (गंध चिकित्सा) के रूप में इसे विकसित किया जा रहा है।
उपासनात्मक, उपचारों से भी अधिक महत्व साधक के चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश होने का है। साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती। इसके विपरीत जिनके जीवनक्रम में निकृष्टता और दुष्टता भरी पड़ी है, जिन्हें छल छद्म ही रुचते हैं, जिन्हें लोभ मोह से आगे की कोई बात सूझती ही नहीं, जिनके लिये वासना और तृष्णा ही सब कुछ हैं-इन्हीं प्रयोजनों के लिए अपना श्रम, समय और मनोयोग लगाये रहते हैं, इन्हीं के लिए पूजा-पाठ का ढोंग रचते हैं ऐसे व्यक्ति निष्प्राण उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त समझने वाले जानते हैं कि आस्तिकता की सफलता के साथ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश होने की शर्त भी जुड़ी हुई है।
उपासना ज्ञान है-साधना- कर्म। उपासना उपकरण है-साधना कौशल। उपासना बाण है-साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
उपासना के क्षेत्र में गायत्री की महत्ता अनुपम-अद्भुत और अद्वितीय है। उसके महात्म्य से शास्त्रों का पन्ना पन्ना भरा पड़ा है। ऋषियों ने अपने अनुभव से उसकी महिमा को ऐसा बताया है जिसकी तुलना में अन्य सभी उपार्जन हलके बैठते हैं। जिन ने इस कल्पवृक्ष के नीचे आश्रय लिया है जिनने इस कामधेनु का दूध पिया है उन सभी ने अपना अनुभव यही बतलाया है कि इस अवलम्बन को पकड़ने से बढ़कर श्रेय-सौभाग्य का और कोई आधार नहीं हो सकता।
उपासना का कोई चमत्कार दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। इसलिये अनुष्ठान उपचार का महत्व स्वीकार करते हुये भी इस आवश्यकता को भी समझा जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिये उपासनात्मक, उपचारों से भी अधिक महत्व साधक के चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश होने का है। साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती। इसके विपरीत जिनके जीवनक्रम में निकृष्टता और दुष्टता भरी पड़ी है, जिन्हें छल छद्म ही रुचते हैं, जिन्हें लोभ मोह से आगे की कोई बात सूझती ही नहीं, जिनके लिये वासना और तृष्णा ही सब कुछ हैं-इन्हीं प्रयोजनों के लिए अपना श्रम, समय और मनोयोग लगाये रहते हैं, इन्हीं के लिए पूजा-पाठ का ढोंग रचते हैं ऐसे व्यक्ति निष्प्राण उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं।
उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती। इसके विपरीत जिनके जीवनक्रम में निकृष्टता और दुष्टता भरी पड़ी है, जिन्हें छल छद्म ही रुचते हैं, जिन्हें लोभ मोह से आगे की कोई बात सूझती ही नहीं, जिनके लिये वासना और तृष्णा ही सब कुछ हैं-इन्हीं प्रयोजनों के लिए अपना श्रम, समय और मनोयोग लगाये रहते हैं, इन्हीं के लिए पूजा-पाठ का ढोंग रचते हैं ऐसे व्यक्ति निष्प्राण उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त समझने वाले जानते हैं कि आस्तिकता की सफलता के साथ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश होने की शर्त भी जुड़ी हुई है।
उपासना शरीर है-साधन प्राण। उपासना चिनगारी है-साधना ईंधन। उपासना संकल्प है-साधना साहस। उपासना ज्ञान है-साधना- कर्म। उपासना उपकरण है-साधना कौशल।
उपासना, साधना और आराधना का त्रिविध प्रयास करना पड़ता है। योग और तप का बहुमुखी आधार इसी निमित्त जाना और किया जाता है। मैले दर्पण में अपनी छवि दिखाई नहीं पड़ती। मैले पानी में सूर्य का प्रतिबिम्ब नहीं चमकता। इसी प्रकार दुश्चिन्तन और कुकर्मों से सड़े गले जीवन से अन्तःकरण ऐसा दूषित हो जाता है कि उसमें ईश्वर सत्ता विद्यमान होते हुए भी आभास मिल नहीं पाता।
उपासना संकल्प है-साधना साहस। उपासना ज्ञान है-साधना- कर्म। उपासना उपकरण है-साधना कौशल। उपासना बाण है-साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
उपासना का साधना के साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध है। साधना के बिना उपासना का कोई चमत्कार दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। इसलिये अनुष्ठान उपचार का महत्व स्वीकार करते हुये भी इस आवश्यकता को भी समझा जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिये उपासनात्मक, उपचारों से भी अधिक महत्व साधक के चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश होने का है। साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती।
उपासनाओं का विधान और प्रकार भिन्न-भिन्न रहने पर भी सभी साधकों को अपने चिंतन को उदात्त और चरित्र को उदार बनाना पड़ा है। व्यक्तित्व के परिष्कार और उदार लोक मंगल को अपनी प्रधान आकाँक्षा मानकर चलने वाले और इसके लिये प्रबल पुरुषार्थ करने वाले ही अपनी पात्रता उस स्तर तक पहुँचा सके हैं, जिस पर अंतरिक्ष से अनायास ही दिव्य अनुदान बरसते हैं।
उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त समझने वाले जानते हैं कि आस्तिकता की सफलता के साथ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश होने की शर्त भी जुड़ी हुई है।
उपासना चिनगारी है-साधना ईंधन। उपासना संकल्प है-साधना साहस। उपासना ज्ञान है-साधना- कर्म। उपासना उपकरण है-साधना कौशल। उपासना बाण है-साधना धनुष।
उपासना बाण है-साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
उपासना थोड़े श्रम और थोड़े समय में सम्पन्न हो जाती है, किन्तु साधना के लिए चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में घुसी हुई दुष्प्रवृत्तियों से जूझने और हटाने का एक काम ही नहीं करना पड़ता, उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों का जगाने का उससे भी अधिक कष्टसाध्य कार्य भी करना पड़ता है। इस उन्मूलन और आरोपण के दुहरे प्रयोजन को पूरा करना प्रायः वैसा ही है जैसा भगवान परशुराम के फरसा और फावड़ा चलाने के दुहरे पराक्रम का का परिचय देना। उन्होंने झंखाड़ काटे और उद्यान लगाये थे। इसी पराक्रम का परिचय हर साधक को अपने जीवन क्षेत्र में देना पड़ता है। इससे कम में काम चलता नहीं और इससे अधिक और कुछ करने की आवश्यकता नहीं।
उपासना उपकरण है-साधना कौशल। उपासना बाण है-साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-August
उपासना से लेकर उसकी समीपता तक की विशेषताओं का भरपूर लाभ उठाने के लिए कहा गया है। ऋषि युग के व्यक्ति कटिवस्त्र और उत्तरीय जैसे हलके और न्यूनतम वस्त्र धारण करते थे और शरीर को अधिकतर खुली हवा एवं सौर ऊर्जा का लाभ लेने के लिए खुला रखते थे। रोग निवारण में सूर्योपचार से कैसे लाभ उठाया जा सकता है, इसकी विधि-व्यवस्था भी उन दिनों सर्वविदित थी। उनके दीर्घ जीवन एवं सुदृढ़ आरोग्य के कारणों में सूर्य सेवन भी अति महत्वपूर्ण रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-March
उपासना करते है। भगवान् कोई मनुष्य नहीं है, वह तो सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान क्रियाशील सत्ता है, इसलिये उपासना का अभाव रहने पर भी उसके निमित्त कर्म करने वाला मनुष्य बहुत शीघ्र आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है। लकड़ी काटना, सड़क के पत्थर फोड़ना, मकान की सफाई, सजावट और खलिहान में अन्न निकालना, आदि भी भगवान् की ही स्तुति हैं, यदि हम यह सारे कार्य कर्म इस आशय से करें कि इससे विश्वात्मा का कल्याण होगा। कर्तव्य भावना से किये गये कर्म, परोपकारों से भगवान जितना प्रसन्न होता है, उतना कीर्तन और भजन से नहीं। स्वार्थ के लिये नहीं आत्म-सन्तोष के लिये किये गये कर्म से बढ़कर फलदायक ईश्वर की भक्ति और उपासना पद्धति और कोई दूसरी नहीं हो सकती।
उपासना प्रतिदिन करनी चाहिये। जिसने सूरज, चाँद बनाये, फूल-फल और पौधे उगाये, कई वर्ण, कई जाति के प्राणी बनाये, उसके समीप बैठेंगे नहीं तो विश्व की यथार्थता का पता कैसे चलेगा? शुद्ध हृदय से कीर्तन-भजन, प्रवचन में भाग लेना प्रभु की स्तुति है उससे अपने देह, मन और बुद्धि के वह सूक्ष्म संस्थान जागृत होते है। जो मनुष्य को सफल, सद्गुणी और दूरदर्शी बनाते है, उपासना का जीवन के विकास से अद्वितीय सम्बन्ध है।
उपासना पद्धति और कोई दूसरी नहीं हो सकती।
उपासना का जीवन के विकास से अद्वितीय सम्बन्ध है।
उपासना के क्षेत्र में समर्पण का महत्व असाधारण है। निज के पुरुषार्थ के सहारे एक सीमा तक ही बढ़ना सम्भव है। निज के पुरुषार्थ के साथ अनुदानों का भी महत्व है। व्यवहारिक जगत में भी प्रगति हेतु जितना प्रयत्न स्वयं को करना पड़ता है उससे कहीं अधिक अनुकूलताएँ सुविधाएं सृष्टा ने प्रदत्त की हैं। यदि ये भी बनाये रखना कठिन ही नहीं, अपितु असंभव भी था।
उपासना के विविध अध्यात्म उपचारों में अगरबत्ती, धूपबत्ती, कपूर, चन्दन, लोबान, दीपक तथा हवन-अग्निहोत्र एवं वनौषधियों की धूनी धूम आदि सुगंध उत्पन्न करने वाले कृत्यों को सम्मिलित किया गया है। जिनके सहारे मानसिक परिष्कार और वातावरण परिशोधन का उभय पक्षीय प्रयोजन पूरा होता रहे। अग्निहोत्र में जलाये गये सुगंधित पदार्थ वायुभूत होने के पश्चात् समूचे वातावरण में सुगंध फैलाते है साथ ही मानवी मन को भी सकारात्मक दिशा धारा प्रदान करते है अतः गंध ज्ञान को विकसित करके प्रवृत्तियों के परिशोधन का नया ढाँचा खड़ा किया जा सकता है, गंध से संबंधित मस्तिष्कीय केन्द्र भी सीधे भाव संवेदनाओं के केन्द्र हाइपोथैलेमस एवं लिम्बित सिस्टम से जुड़े होते है। जो गंध मन को अच्छी लगती है, वह प्रसन्नता दायक न्यूरो हारमोन्स स्रवित करती है। इस प्रकार गंध साधना द्वारा भी ध्यान योग की प्रक्रिया पूरी कर तनाव मुक्त होना तथा उच्च स्तरीय आनंद को प्राप्त करना सींव है।
उपासना का अभाव रहने पर भी उसके निमित्त कर्म करने वाला मनुष्य बहुत शीघ्र आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है। लकड़ी काटना, सड़क के पत्थर फोड़ना, मकान की सफाई, सजावट और खलिहान में अन्न निकालना, आदि भी भगवान् की ही स्तुति हैं, यदि हम यह सारे कार्य कर्म इस आशय से करें कि इससे विश्वात्मा का कल्याण होगा। कर्तव्य भावना से किये गये कर्म, परोपकारों से भगवान जितना प्रसन्न होता है, उतना कीर्तन और भजन से नहीं। स्वार्थ के लिये नहीं आत्म-सन्तोष के लिये किये गये कर्म से बढ़कर फलदायक ईश्वर की भक्ति और उपासना पद्धति और कोई दूसरी नहीं हो सकती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-June
उपासना करो। शक्ति के अभाव में ही पाप पनपते हैं, इसलिये यदि आप शक्तिशाली नहीं हैं तो कितना ही ईश्वर भक्त क्यों न हों, पाप की वृद्धि के आप भी भागीदार हैं।
उपासना पद्धति बाह्य रूप में भले ही भिन्न दिखाई देती हों, परन्तु उसका मूल “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” में निहित है। यह एक ऐसे गुलदस्ते के समान है, जिसमें अनेक पुष्प सुशोभित हो रहे है। यह उस इन्द्र धनुष के समान है, जिसमें सात रंगों की चमक स्पष्टतः दृष्टिगोचर होने पर भी वह रहता एक ही है।
उपासना का विधि-विधान कारतूस समझा जा सकता है। उसके उपयुक्त प्रतिफल प्रस्तुत कर सकने की संभावना तभी बनती है जब साधक का व्यक्तित्व परिष्कृत स्तर का हो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-January
उपासना से अधिक सत्परिणाम प्रस्तुत होता है।"
उपासना खरी उतरी या नहीं।
उपासना-पक्ष के चार चरणों की चर्चा पिछले अंक में की जा चुकी है— (1) प्रातःकाल आँख खुलते ही नया जन्म, (2) रात्रि को सोते समय नित्यमरण, (3) नित्यकर्म से निवृत्त होने के बाद जप-ध्यान वाला भजन, (4) मध्याह्न के मनन के क्रम में अपनी स्थिति का विवेचन और उदात्तीकरण। कुछ दिन के अभ्यास से इन चारों को दिनचर्या का अविच्छिन्न अंग बना लेना सरल संभव हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-April
उपासनात्मक कर्मकाण्डों का उतना ही फल मिलेगा जितना कि उतने समय तक किये गये हल्के-फुलके-शारीरिक परिश्रम का। उसी साधन को करते हुए एक व्यक्ति चमत्कारी फल प्राप्त करता है और दूसरे को असफल रहना पड़ता है। इसमें श्रद्धा की मात्रा में न्यूनाधिकता का होना ही प्रधान कारण होता है। नारद पुराण-पूर्व भाग प्रथम पाद 4/1 में कहा गया है “श्रद्धा से सब कुछ सिद्ध होता है और श्रद्धा से ही भगवान-सन्तुष्ट होते है”।
उपासनाचर्या में प्रयुक्त करते आये हैं, उभारा और प्रतिपादित किया जा सके तो उपलब्ध अनेकानेक सुगन्धियों से मानव जाति को अभूतपूर्व लाभ दिया जा सकता है। मूल प्रवृत्तियों के आदिम रूप को देवत्व परक मोड़ मिलने पर घ्राणेन्द्रियों की उपलब्धि की सार्थकता भी सिद्ध होगी।
उपासनात्मक कर्म-काण्ड ढेरों समय लगाकर करते रहने पर भी कहने लायक प्रतिफल नहीं होता।
उपासना-जैसे धर्मानुष्ठानों से लेकर वातावरण परिशोधन के विविध उपक्रमों में सुगंधित द्रव्यों को रखने या जलाने का अनिवार्य प्रचलन रखा। पूजा में सुवासित पुष्प इसी की पूर्ति करते है।
उपासना को भी अपने निर्धारण में सम्मिलित रखने से बीच में जो अनुत्साह की गिरावट आने लगती है, उसका निराकरण होता रहता है। इनके आधार पर जो विशेष शक्ति उपार्जित होती है उससे शिथिलता आने का अवसाद निबटता रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-November
उपासना की विधि व्यवस्था का उपक्रम बिठाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनका कोई धार्मिक संगठन तो नहीं बना है, पर ईश्वरीय सत्ता के अस्तित्व के संबंध में वे पूर्णतः सहमत है। आस्ट्रेलिया के आदिवासी लोगों का कहना है कि ईश्वर बहुत समय पूर्व धरती पर रह चुका है और बाद में अपने स्थान पर चला गया। वहीं बैठ कर भूलोक के निवासियों के कर्मों का निरीक्षण करता और तदनुरूप प्रतिफल प्रदान करने की योजना भी क्रियान्वित करता रहता है। ‘अतनाम’ नाम ईश्वर का ही है।
उपासना के उपरान्त साधना का ही नम्बर आता है। साधना का तात्पर्य अपने आपके कुसंस्कारों दोष-दुर्गुणों का परिशोधन परिमार्जन और उसके स्थान पर सज्जनता सदाशयता का संस्थापन। आमतौर से अपने दोष-दुर्गुण सूझ नहीं पड़ते आँखें बाहर की वस्तुऐं ही देख पाती हैं। भीतरी क्षेत्र को देख सकने की उसमें क्षमता नहीं है। यह कार्य विवेक बुद्धि को अन्तर्मुखी होकर करना पड़ता है।
उपासना कर उपक्रम बिठाते हे। उनकी मान्यताओं के अनुसार देवी की सेवा-सहायता के लिए पाँच देवता सदैव तत्पर बने रहते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-December
उपासना की तरह यज्ञ आयोजनों का भी व्यापक प्रचलन किया जाना चाहिए। गायत्री साधना में जिस प्रकार सामूहिक जप का अभिनव प्रयोग है उसी प्रकार यज्ञ आयोजनों में भी सामूहिक सहयोग की, सामूहिकता की नीति अपनायी जानी चाहिए।
उपासनात्मक क्षेत्र में वरन् जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण तथा उद्देश्य को भी प्रभावित करती है।
उपासना करने का दर्शन इसी श्रद्धा तत्व पर आधारित है। अपने इष्ट के प्रति अटूट श्रद्धा आरोपित करके ही उपासक, उसके साथ अनन्य एकता स्थापित कर लेते हैं। ईश्वर, कर्मफल, जीवनोद्देश्य कर्तव्यपालन, आत्मा की गरिमा जैसे सत्य तथ्यों पर सघन श्रद्धा रखने वाले लोग ही सामान्य जीवन से उठकर महामानवों, देवदूतों की पंक्ति में बैठ सके हैं।
उपासना के तो और भी सात्विक परिणाम उपलब्ध किये जा सकते हैं।
उपासना का अर्थ है संयमित जीवन क्रम अपना कर अपनी शारीरिक शक्ति के अनावश्यक क्षरण को रोकना। जहाँ जीवनी शक्ति का अपव्यय होता रहेगा वहाँ पौष्टिक आहार और स्वास्थ्यप्रद वायु का भी सत्परिणाम प्राप्त नहीं हो सकेगा। जर्मनी के स्वास्थ्य विज्ञानी डॉ0 ग्रेफ का कहना है कि दुर्बलता उपयुक्त शक्ति के अपव्यय का परिणाम है इसी कारण से व्यक्ति आहार के पोषक तत्वों को पूर्णतया समीकृत नहीं कर पाते। दुबला पतला व्यक्ति जितना अधिक प्रोटीन खायेगा उसकी श्वसन क्रिया भी उतनी ही शीघ्रता से होने लगेगी।
उपासना के अनेक पक्ष हैं, जिनमें ध्यान प्रक्रिया अतीव शक्तिशाली मानी जाती है। प्रत्याहार से लेकर समाधि तक के अनेक स्तर ध्यान योग के अन्तर्गत ही आते हैं शरीर के समस्त अवयवों पर जिस प्राण चेतना का नियन्त्रण है उसे प्राणायाम द्वारा इस योग्य बनाया जा सकता है कि किस प्रकार शरीर के सूक्ष्म संस्थानों के उससे प्रभावित एवं परिवर्तित किया जाय। मस्तिष्क की जादुई पिटारी में इतने अद्भुत क्षेत्र हैं, जिन्हें अच्छा, खासा ‘तिलस्म’ कह सकते हैं। मानसिक शक्तियों के विकसित करने में ध्यान योग की असाधारण भूमिका है। व्यक्तित्व में अनेक निकृष्टताएं एवं उत्कृष्टताएं उत्पन्न करने वाले कोष्टक हैं।
उपासना से चाहे जितने लाभ ले लें।
उपासना में निरत रहकर भूत बन चुका या बनने जा रहा है। पंच तत्वों को पंच भूत कहते हैं। भौतिक पदार्थों को भूत की करतूत तब कहा जाता है। जब उसका उपयोग शरीर निर्वाह से आगे बढ़कर आत्मा के क्षेत्र में प्रवेश करने और स्थान पाने लगते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-May
उपासना कारतूस है और साधना बन्दूक। दोनों के समन्वय से ही आत्मोत्कर्ष की दिशा में अभीष्ट प्रगति हो सकती है।
उपासना का विज्ञान और सत्परिणाम समझने के लिए अधिक गम्भीरतापूर्वक प्रयत्न करने की बात कही जा चुकी है। इस दिशा में अधिक चिन्तन करने से, बहुत दिन तक लगातार इस संदर्भ में प्रशिक्षित करते रहने से, स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिन्तन के सहारे मन की अभिरुचि बदलती है और वह उस संदर्भ में भी रुचि लेने लगता है। इस संदर्भ में थोड़ी−थोड़ी धीरे−धीरे सफलता मिले तो भी उसे उत्साहवर्धक एवं आशाजनक समझना चाहिए।
उपासना का कल्पवृक्ष पल्लवित, पुष्पित और फलित होता है।
उपासना पूजा उपक्रम को कहते हैं और साधना—जीवन को परिष्कृत स्तर पर जीने की प्रक्रिया को उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य की नीति अपना कर सज्जनता और परमार्थ परायणता के समन्वय को जीवन साधना कहा जा सकता है। उपासना व्यायाम है और साधना आहार। उपासना बीज है और साधना उपजाऊ भूमि। उपासना पौधा है और साधना सिंचाई। उपासना कारतूस है और साधना बन्दूक।
उपासना व्यायाम है और साधना आहार। उपासना बीज है और साधना उपजाऊ भूमि। उपासना पौधा है और साधना सिंचाई। उपासना कारतूस है और साधना बन्दूक। दोनों के समन्वय से ही आत्मोत्कर्ष की दिशा में अभीष्ट प्रगति हो सकती है।
उपासना और स्वाध्याय हमारे जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण अपेक्षायें हैं, इनके बिना विवेक जागृत ही नहीं होता। स्थूल पदार्थों को ही देखते और उन्हीं में उलझे रहते हैं, सूक्ष्म तत्वों की अनुभूति के लिए हमारी उस तरह की तैयारी भी होनी चाहिए। हमारी पहुँच मन को नियन्त्रित रखने और उसे यथार्थ लक्ष्य की ओर नियोजित रखने की स्थिरता भी चाहिये।
उपासना, दूसरा साधना। उपासना पूजा उपक्रम को कहते हैं और साधना—जीवन को परिष्कृत स्तर पर जीने की प्रक्रिया को उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य की नीति अपना कर सज्जनता और परमार्थ परायणता के समन्वय को जीवन साधना कहा जा सकता है। उपासना व्यायाम है और साधना आहार। उपासना बीज है और साधना उपजाऊ भूमि। उपासना पौधा है और साधना सिंचाई।
उपासना पौधा है और साधना सिंचाई। उपासना कारतूस है और साधना बन्दूक। दोनों के समन्वय से ही आत्मोत्कर्ष की दिशा में अभीष्ट प्रगति हो सकती है।
उपासना बीज है और साधना उपजाऊ भूमि। उपासना पौधा है और साधना सिंचाई। उपासना कारतूस है और साधना बन्दूक। दोनों के समन्वय से ही आत्मोत्कर्ष की दिशा में अभीष्ट प्रगति हो सकती है।
उपासना में कोई साकार दृश्य निर्धारित करना होता है। इष्टदेव की प्रतिमा—प्रभात कालीन सूर्य, दीपशिखा, विराट् ब्रह्माण्ड आदि कुछ भी प्रतीक बनाया जा सकता है पर होना उसका आकार चाहिए। ध्यान में प्रधानतया किसी आकृति का ही निर्माण करना होता है। पंचतत्वों में अग्नि तत्व प्रधान है। उसकी तन्मात्रा रूप है।
उपासना अभ्यास में, सबसे बड़ा अवरोध इस अनगढ़ मन द्वारा ही उत्पन्न किया जाता है। उसी की रोक−थाम और शिक्षा−दीक्षा के लिए अनेकानेक साधना विधानों का आविष्कार किया गया है यदि धैर्य, साहस और संकल्प पूर्वक उन्हें अपनाये रहा जाय तो समयानुसार सफलता मिल जाना निश्चित है। आतुर और अधीर ही हथेली पर सरसों जमने की अपेक्षा करते हैं और वे ही कुछ दिन बहुत अभ्यास करके, मन न लगने का बहाना बना कर अपने प्रयास से मुँह मोड़ लेते हैं। पानी के बुलबुले जैसा क्षणिक उत्साह कभी−कभी महत्वपूर्ण सफलता को प्राप्त करने का आधार नहीं बन सकता। ऐसे अस्थिर चित्त व्यक्ति उपासना के महान प्रयोजन को भी पूरा नहीं कर पाते।
उपासना जैसे नीरस दीखने वाले प्रसंग पर उसे सहज ही जमाया जा सकना सरल नहीं है। इसके लिए एड़ी−चोटी पसीना एक करना पड़ता है। जो लोग आरम्भ में ही ऐसा सोचते हैं कि आसन पर बैठते ही मन लग जाना चाहिए है वे उस अबोध बालक की तरह हैं जो बीज बोते ही पेड़ खड़ा हो जाने की कल्पना करते हैं। मन की एकाग्रता तो आरम्भ में नहीं साधना की सफलता की स्थिति आने तक मिल पाती है। उपासना का तीन चौथाई परिश्रम तो मन की एकाग्रता साधने में ही लग जाता है।
उपासना के महान प्रयोजन को भी पूरा नहीं कर पाते।
उपासना का तीन चौथाई परिश्रम तो मन की एकाग्रता साधने में ही लग जाता है। ईश्वर के साथ आदान−प्रदान तो इसके बाद अति सरल रह जाता है। इसके उपरान्त एक चौथाई श्रम प्रयास में ही ईश्वर सान्निध्य का आनन्द मिलने लगता है।
उपासना के साथ जीवन साधना के लिए भी प्रयत्नशील रहना है। अपने दृष्टिकोण को अपेक्षाकृत अधिक उत्कृष्ट और क्रिया−कलाप को अधिकाधिक आदर्श बनाने के लिए निरन्तर जागरूकता बरतें और सचेष्ट रहें।
उपासना उसी रूप में करें जिससे हमारी श्रद्धा अपने पिता के प्रति भी अभिव्यक्त होती रहे। जीवन की समस्वरता और आनन्द के लिये एक नहीं दोनों सत्तायें आवश्यक और अनिवार्य हैं, इनमें से उपेक्षा एक की भी नहीं करनी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-August
उपासना को एक प्रकार से अनिवार्य आधार ही माना जाता रहा है। यह तीसरा आधार भक्ति योग है। ज्ञान कर्म और भक्ति का समन्वय होने से त्रिवेणी संगम बनता है। यही त्रिपदा गायत्री का स्वरूप एवं उद्देश्य है।
उपासना द्वारा स्वच्छता व्यवस्था रखी जाती है और अन्तरात्मा का प्रवाह, परमशक्ति की समीपता तक पहुँचने की दिशा में बहता रहता है। ईश्वर के साथ गहरी घनिष्ठता उत्पन्न करने और उस सम्पर्क से सब प्रकार सुसम्पन्न बनने का अवसर मिलता है। समर्थ तत्वों में सर्वोपरि ईश्वर है। उपासना के आधार पर उसके साथ घनिष्ठता उत्पन्न कर लेना परम पुरुषार्थ है। इससे अधिक महत्वपूर्ण एवं लाभदायक दूसरा और कोई प्रयास हो ही नहीं सकता।
उपासना को मनुष्य की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है। इस आधार पर उस अनन्त जीवन−कर्म फल, उत्कृष्टता की सर्वोपरि सत्ता मर्यादा और अनुशासन की सृष्टि व्यवस्था समग्र पवित्रता जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों पर आस्था बनी रहती है आत्मा को परमात्मा बनने के लिए उपासना से प्रेरणा मिलती है। ऐसे ही अनेक सत्परिणाम उपासना प्रक्रिया के साथ जुड़े हुए हैं और उसे आवश्यक धर्म कृत्य माना गया है।
उपासना से प्रेरणा मिलती है। ऐसे ही अनेक सत्परिणाम उपासना प्रक्रिया के साथ जुड़े हुए हैं और उसे आवश्यक धर्म कृत्य माना गया है।
उपासना चलती रही और चमत्कारी ख्याति बढ़ती रही। उसकी विशेषताओं में प्रार्थना के अवसरों पर हवा में तैरने लगने की प्रसिद्धि सर्वत्र फैली हुई थी।
उपासना का अवलम्ब न लेना पड़ता है। स्थूल शरीर की साधना कर्मयोग से सूक्ष्म शरीर की ज्ञान योग से सम्भव होती है। इसके लिए क्रिया कलाप और दृष्टिकोण में उत्कृष्टता का समावेश करना पड़ता है। जीवात्मा का तीसरा कलेवर ‘कारण’ शरीर है। उसका परिष्कार श्रद्धा के बीजारोपण एवं अभिवर्धन से ही हो सकता है।
उपासना में रत रहता है तो उसमें अपूर्व साहस, शक्ति, आत्मशक्ति, आत्मबल का संचार होने लगता है। परन्तु जब मनुष्य अपना तादात्म्य परमात्मा से न रख अपने स्वयं के अहं तक ही सीमित रहता है तो क्षुद्र ही बना रहता है। अपने को बड़ी शक्ति में जोड़ देने से मनुष्य स्वयं भी एक बड़ी शक्ति बन जाता है।
उपासना की जाय।
उपासना को द्रुत किया जा सकता है।
उपासना को बीज कहा जाय तो साधना को भूमि मानना पड़ेगा। उपासना के क्रिया कृत्यों में संकेत रूप में जीवन साधना का ही मार्गदर्शन है। उपासना को व्यायाम कहा जाय तो साधना को आहार-विहार की उपमा दी जायगी। उपासना उसी की फलित होती है जो उसे साधना के खाद पानी से सींचता है। उपासना को मनुष्य की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है।
उपासना को नित्य कर्म में सम्मिलित रखने की शास्त्र मर्यादा है। ऋषियों ने इसे आवश्यक धर्म कर्तव्य माना है। वातावरण में घुमड़ती रहने वाली विकृतियों के अवांछनीय प्रभाव का परिशोधन करने के लिए उपासना द्वारा स्वच्छता व्यवस्था रखी जाती है और अन्तरात्मा का प्रवाह, परमशक्ति की समीपता तक पहुँचने की दिशा में बहता रहता है। ईश्वर के साथ गहरी घनिष्ठता उत्पन्न करने और उस सम्पर्क से सब प्रकार सुसम्पन्न बनने का अवसर मिलता है। समर्थ तत्वों में सर्वोपरि ईश्वर है।
उपासना को व्यायाम कहा जाय तो साधना को आहार-विहार की उपमा दी जायगी। उपासना उसी की फलित होती है जो उसे साधना के खाद पानी से सींचता है। उपासना को मनुष्य की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है। इस आधार पर उस अनन्त जीवन−कर्म फल, उत्कृष्टता की सर्वोपरि सत्ता मर्यादा और अनुशासन की सृष्टि व्यवस्था समग्र पवित्रता जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों पर आस्था बनी रहती है आत्मा को परमात्मा बनने के लिए उपासना से प्रेरणा मिलती है। ऐसे ही अनेक सत्परिणाम उपासना प्रक्रिया के साथ जुड़े हुए हैं और उसे आवश्यक धर्म कृत्य माना गया है।
उपासना की प्रक्रिया अपनाई जाती है। ईश्वर और जीव को परस्पर जोड़ने का कार्य श्रद्धा के सहारे ही सम्भव होता है। आत्मिक पवित्रता एवं प्रखरता बढ़ाने के लिए उपासना को एक प्रकार से अनिवार्य आधार ही माना जाता रहा है। यह तीसरा आधार भक्ति योग है। ज्ञान कर्म और भक्ति का समन्वय होने से त्रिवेणी संगम बनता है।
उपासना के आधार पर उसके साथ घनिष्ठता उत्पन्न कर लेना परम पुरुषार्थ है। इससे अधिक महत्वपूर्ण एवं लाभदायक दूसरा और कोई प्रयास हो ही नहीं सकता। जीवन को हर दृष्टि से समृद्ध, सशक्त एवं समुन्नत बनाने में ईश्वरीय अनुग्रह की जितनी उपयोगिता है उसकी तुलना और किसी सिद्धि एवं उपलब्धि के साथ हो नहीं सकती।
उपासना उसी की फलित होती है जो उसे साधना के खाद पानी से सींचता है। उपासना को मनुष्य की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है। इस आधार पर उस अनन्त जीवन−कर्म फल, उत्कृष्टता की सर्वोपरि सत्ता मर्यादा और अनुशासन की सृष्टि व्यवस्था समग्र पवित्रता जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों पर आस्था बनी रहती है आत्मा को परमात्मा बनने के लिए उपासना से प्रेरणा मिलती है। ऐसे ही अनेक सत्परिणाम उपासना प्रक्रिया के साथ जुड़े हुए हैं और उसे आवश्यक धर्म कृत्य माना गया है।
उपासना प्रक्रिया के साथ जुड़े हुए हैं और उसे आवश्यक धर्म कृत्य माना गया है।
उपासना के क्रिया कृत्यों में संकेत रूप में जीवन साधना का ही मार्गदर्शन है। उपासना को व्यायाम कहा जाय तो साधना को आहार-विहार की उपमा दी जायगी। उपासना उसी की फलित होती है जो उसे साधना के खाद पानी से सींचता है। उपासना को मनुष्य की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है। इस आधार पर उस अनन्त जीवन−कर्म फल, उत्कृष्टता की सर्वोपरि सत्ता मर्यादा और अनुशासन की सृष्टि व्यवस्था समग्र पवित्रता जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों पर आस्था बनी रहती है आत्मा को परमात्मा बनने के लिए उपासना से प्रेरणा मिलती है।
उपासना आत्मचेतना की प्रस्तुत क्षमताओं को उभारने का वैज्ञानिक प्रयोग है। रसायन शास्त्री विषैले पारे को अमृतोपम मकरध्वज बना देते हैं। वैज्ञानिक सामान्य रेत से प्रचण्ड अणुशक्ति का उद्भव करते हैं। सामान्य पानी और डिसिल्ड वाटर की उद्भव करते हैं। सामान्य पानी और डिसिल्ड वाटर की क्वालिटी में बड़ा अन्तर होता है।
उपासना। साधना का तात्पर्य है अपना चिन्तन उत्कृष्टता के और कर्तृत्व आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालना। अनगढ़ जीवन को सुगढ़ बनाना। बैल, घोड़ा, रीछ, बानर, सर्प, सिंह जैसे पशुओं को सधा लेने से वे कितने उपयोगी सिद्ध होते हैं और पालने वालों का कितना हित साधन करते हैं यह स्पष्ट देखा जाता है। कुम्हार साधारण मिट्टी से कितने सुन्दर खिलौने बना देता है।
उपासना की प्रेरणा से अथवा स्वतन्त्र रूप से आध्यात्मिक प्रगति के पथिक को आत्म−शोधन एवं आत्म निर्माण की प्रचण्ड संकल्प शक्ति के साथ प्रखर चेष्टा करनी पड़ती है। अभ्यास न होने के कारण उस परिवर्तन में जो कठिनाई अनुभव होती है उसे प्रसन्नता और साहसिकता के साथ स्वीकार करना पड़ता है। इस प्रयत्नशीलता को शास्त्रकारों ने तपश्चर्या नाम दिया है। इसमें शरीर और मन की दिशा धाराओं को उत्कृष्टताओं के साथ जोड़ना पड़ता है। आत्म परिष्कार एवं आत्म विकास के लिए योग साधना की तरह, चिन्तन में उत्कृष्टता के समन्वय की तरह ही कर्म क्षेत्र में आदर्शवादिता को भी अविच्छिन्न बनना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-July
उपासनाएँ कराई जाती हैं। (1) त्राटक (2) सूर्यवेधन (3) खेचरी (4) बंध मुद्रा (5) सोऽहम्। इनसे पाँच तत्वों का, पाँच प्राणों का, पाँच तन्मात्राओं का परिष्कार जागरण एवं उन्नयन सुनियोजित रीति से सम्पन्न होता है। सुव्यवस्थित साधना का सदा सत्परिणाम प्रस्तुत करना सुनिश्चित है।
उपासना में जप और ध्यान पर्याप्त समझा जाता है। ध्यान आन्तरिक न बन पड़े तो प्रतिमा के सहारे प्रत्यक्ष दर्शन से भी वह काम किसी प्रकार चला जाता है। धीरे-धीरे जब स्तर बढ़ता है तो अनुष्ठानों और पुरश्चरणों के माध्यम से साधक को अधिक कठोर अनुशासनों में कसना आरम्भ कर दिया जाता है। सभी जानते हैं कि पुरश्चरणों में जप की संख्या का नियत होना ही पर्याप्त नहीं वरन् उसके साथ-साथ उपवास, ब्रह्मचर्य, भूमि शयन, अपनी सेवा आप करना जैसे प्रतिबन्ध लगते हैं। और नियत समय, नियत संख्या, अन्त में अग्नि-होत्र ब्रह्म-भोज आदि के कितने ही उपक्रम जुड़ जाते हैं।
उपासना विधानों का प्रचलन इन दिनों तेजी पर है। बताने वाले ऐसे गुरुओं की बाढ़-सी आई हुई है जो बहुत ही सरल पूजा प्रक्रिया बताकर लम्बे-चौड़े लाभ मिलने का आश्वासन देकर पहली ही बार अनेक को आकर्षित कर लेते हैं। उनका आरम्भ कर देने वाले लोगों की भी कमी नहीं रहती। क्योंकि वे बहुत ही सरल होते हैं। इतने सरल जिससे शारीरिक-मानसिक या अन्य किसी प्रकार का दबाव नहीं पड़ता।
उपासना उपचार किये थे। गंगा की आराधना और शिव की अभ्यर्थना की साधना वे लम्बे समय तक करते रहे और अपने उद्देश्य में सफल होकर रहे। पर यह सफलता हाथ तभी लगी जब उपासना उपचार के साथ तपश्चर्या को अग्नि शक्ति का समावेश हो सका। यदि वे मात्र पूजा आराधना ही करते रहते और तप के कष्टसाध्य झंझट से बचकर रहना चाहते तो उन्हें उससे अधिक कुछ भी न मिलता जो शिव मन्दिरों और गंगा मन्दिरों के पुजारियों को नगण्य-सा प्रतिफल उपलब्ध होता है।
उपासना को पंचकोशों की अनावरण साधना कहते हैं। इस योगाभ्यास की हठयोग की पद्धति के अन्तर्गत चक्रवेधन एवं कुण्डलिनी जागरण साधना कहते हैं। षटचक्रों का नाम सभी ने सुना है। भू-मध्य भाग से मस्तिष्क प्रारम्भ होता है और वह मेरुदण्ड में होकर जननेन्द्रिय क्षेत्र तक चला जाता है। यह समूचा परिधि ब्रह्मलोक या ब्रह्मरंध्र कहलाता है।
उपासना कहते हैं। उपासना क्षेत्र में वे सभी क्रिया-कलाप किये जाते हैं, जो जप, ध्यान आदि के पूजा पद्धतियों के रूप में अनेक परम्पराओं के अनुसार अनेक क्षेत्रों में अनेक क्रिया-प्रक्रियाओं के साथ प्रचलित देखे जाते हैं। इन दिनों साधना शब्द से अभिप्राय इसी क्षेत्र की गतिविधियों तक सीमित होता है। जबकि ज्ञानयोग और कर्म को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी और भक्तियोग को उच्चस्तरीय प्रयोजन समझते हुए उसे सीमित परिमाण में ही प्रयुक्त किया जाना चाहिए था।
उपासना का नित्य नियम बनाना दूसरी बात है। इसे उच्चस्तरीय साधना क्रम में सम्मिलित नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार शौच, स्नान, दंतमंजन, कपड़े धोना, कमरा बुहारना, फर्नीचर झाड़ना, बर्तन माँजना, स्वच्छता बनाये रहने और गन्दगी न जमने से होने वाली हानि से बचने के लिए आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार मनःक्षेत्र में भीतर से उठने वाली गन्दगी और अनुपयुक्त वातावरण से अवांछनीय छाप को निरन्तर हटाते रहने के लिए इतनी उपासना तो हर किसी के लिए आवश्यक है जिसे नित्य नियम कहा गया है और संध्या-वन्दन नाम दिया गया है। इसका इतना ही लाभ है कि मलीनताएं जमते रहने से जिस अशुभ की आशंका थी उससे बचा जा सकता है। आत्मिक प्रगति के लिए जो विशिष्ट पुरुषार्थ करने पड़ते हैं वे साधना कहे जाते हैं।
उपासना पद्धति के लिए, साधक के लिए, लोक-मान्यता के लिए, अहित कर ही सिद्ध होता है।
उपासना तो हर किसी के लिए आवश्यक है जिसे नित्य नियम कहा गया है और संध्या-वन्दन नाम दिया गया है। इसका इतना ही लाभ है कि मलीनताएं जमते रहने से जिस अशुभ की आशंका थी उससे बचा जा सकता है। आत्मिक प्रगति के लिए जो विशिष्ट पुरुषार्थ करने पड़ते हैं वे साधना कहे जाते हैं। उनमें प्रौढ़ता रहती है। प्रखरता की आवश्यकता पड़ती है।
उपासनाओं के साथ कई प्रकार की छोटी-बड़ी तप साधनाओं की शृंखला जोड़ी गई है। उसकी आधारशिला चान्द्रायण व्रत पर रखी गई समझी जा सकती है। यह संचित कुसंस्कारों के परिशोधन और प्रसुप्त दिव्य-शक्तियों के जागरण के लिए शरीर और मन के सुविस्तृत क्षेत्र में अनुकूल वातावरण उत्पन्न करता है। भागीरथ ने गंगा अवतरण के लिए कई प्रकार के उपासना उपचार किये थे। गंगा की आराधना और शिव की अभ्यर्थना की साधना वे लम्बे समय तक करते रहे और अपने उद्देश्य में सफल होकर रहे।
उपासना एवं योग साधना का नाम दिया गया है। ब्रह्मवर्चस् साधना में चान्द्रायण तप के साथ इसी प्रयोजन के लिए पाँच प्रकार की उपासनाएँ कराई जाती हैं। (1) त्राटक (2) सूर्यवेधन (3) खेचरी (4) बंध मुद्रा (5) सोऽहम्। इनसे पाँच तत्वों का, पाँच प्राणों का, पाँच तन्मात्राओं का परिष्कार जागरण एवं उन्नयन सुनियोजित रीति से सम्पन्न होता है। सुव्यवस्थित साधना का सदा सत्परिणाम प्रस्तुत करना सुनिश्चित है।
उपासना का महत्व कृषि कर्म करने-उद्यान लगाने जैसा है जिसके लिए बीजारोपण से भी पूर्व भूमि शोधन की आवश्यकता है। अच्छी तरह जोतना भूमि के कंकड़, पत्थर हटाना, खर पतवार उखाड़ना, नमी रखना, खाद देना जैसे कई काम करके भूमि को इस योग्य बनाया जाता है, कि उसमें बोया हुआ बीज ठीक तरह उग सके। अंकुरों को बढ़ने और फलने-फूलने की स्थिति तक पहुँचने के लिए उपयुक्त भूमि की आवश्यकता होती है। यदि उसके बनाने में आनाकानी की गई है और जल्दी फसल कमाने के लोभ में भूमि साधना का श्रम निरर्थक समझा गया है तो उसे भूल ही कहा जायगा। जो आरम्भ में तो श्रम बचाने की बचाने की बुद्धिमत्ता समझा गया था, पर पीछे उसमें बीज भी गँवा बैठने की निराशा ही हाथ लगती है।
उपासना का उपक्रम चल ही पड़े। गायत्री माता के चित्र को नमन वन्दन करके तब भोजन करने की परम्परा चल पड़े तो उस छोटे बीजारोपण में भी आस्तिकता का कल्पवृक्ष कभी प्रौढ़ बन जाने की आशा बनी रहेगी।
उपासना पद्धति का अनुमान होता है और लगता है इसमें कोई गड़बड़ी पड़ने से किसी विपत्ति की आशंका रहेगी। यह आशंका तभी सच हो सकती है जब सर्वथा मनमानी बरती जाय और साधक की शक्ति तथा स्थिति को जाने बिना चाहे जिससे चाहे जिस साधना को कराने लग जायें। ब्रह्मवर्चस् सत्र में सभी आरम्भिक साधनाएँ शिशु स्तर की करायी जाती हैं और ऐसी हैं जिनमें प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की तनिक भी आशंका नहीं है। चान्द्रायण तप ‘यति’ स्तर का कठोर भी होता है और शिशु स्तर का सरल भी। ब्रह्मवर्चस् साधना में अनभ्यस्त और दुर्बल मनःस्थिति को ही ध्यान में रखकर सारी योजना बनाई गई है।
उपासना के विज्ञान में इसे अजपा गायत्री कहते हैं।
उपासना को योग पक्ष कहते हैं। उसकी विधि व्यवस्था में जप, ध्यान, प्राणायाम, नाद, मुद्रा, बन्ध, प्रत्याहार, समाधि आदि प्रौढ़ स्तर का और पूजा-पाठ, स्नान, देवदर्शन, कथा, कीर्तन जैसे बाल स्तर को अनेकानेक उपचारों का समावेश है। आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाली क्षुद्रता को महानता के साथ सम्बद्ध करने वाली, व्यवहार में आदर्श भर देने वाली और जीवात्मा को परमात्मा बना देने वाली यह समस्त गतिविधियाँ योग कहलाती हैं। योग का अर्थ है-जोड़ना। अपूर्ण को पूर्ण के साथ जोड़ना।
उपासना और साधना का समावेश है। इन्हें योग और तप भी कह सकते हैं। योग धारा में मस्तिष्कीय क्षेत्र में होने वाले प्रयोगों की गणना है। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के चिन्तन परक चारों ही उपचार योग है। तप में वे सभी क्रियाएँ आती हैं, उनमें अभ्यस्त अवांछनीयताओं के विरुद्ध विद्रोह किया जाता है और उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए संघर्ष किया जाता है।
उपासना बिलकुल दूसरी बात है। साधना तो चेतना शक्ति को प्रखर बनाने का एक उच्चस्तरीय विज्ञान है। उसमें आत्म-शोधन और आत्म-परिष्कार की ही सांगोपांग विधि व्यवस्था है। उस ओर से आँखें बन्द करके मात्र मनोकामनाएँ पूरी करने और संकट हटाने के लिए उनका मनुहार करते हैं जो भाग्य बदलने में समर्थ हैं। जिनके सहारे अपवाद पद्धति से मनोरथ पूरे हो सकते हैं।
उपासना का समन्वय किया गया है। चान्द्रायण व्रत को तपश्चर्या का और पंचकोषों के अनावरण और कुण्डलिनी जागरण को योग साधना का इसमें समान रूप से समावेश है। फलतः उससे परिशोधन और अभिवर्धन के दोनों ही उद्देश्य पूरे होते हैं। शरीर और मन को समर्थ सुव्यवस्थित रखने में परिस्थितियों को सुधारने में, प्रतिकूलता को अनुकूलता बनाने में, समग्र परिवर्तन परिष्कार में जो अदृश्य तथ्य काम करते हैं। उन सबका समुचित समावेश इस एक महीने के साधना क्रम में मौजूद है जो व्यक्तित्व को प्रखर और भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए आवश्यक हैं।
उपासना को करें। संचित प्रारब्ध की निवृत्ति हो जाने से आपको अब के प्रयास में सफलता मिलेगी।
उपासना करने वाले, तन्त्र-मन्त्र जानने वाले को आखिर इतना विचारशील तो होता ही चाहिए किसी को अकारण क्षति न पहुँचाये। गाड़ी यहाँ अटक जाती है तो दूसरा अनुमान लगाते हैं। किसी ने लोभ देकर उनसे ऐसा कराया होगा वे डराकर कुछ प्राप्त करना चाहते होंगे। दुर्भाग्य जैसी आकस्मिक दुर्घटनाओं के सम्बन्ध में प्रायः इसी स्तर के अनुमान लगाये जाते रहते हैं। इतने पर भी तथ्यतः निरर्थक होने के कारण उनसे किसी का वास्तविक समाधान नहीं होता।
उपासना करने वालों की तुलना में तपश्चर्या की रीति-नीति अपनाकर भजन प्रयोजनों में लगने वाले व्यक्ति अपने लक्ष्य तक अधिक अच्छी तरह जा पहुँचते हैं।
उपासना क्षेत्र में वे सभी क्रिया-कलाप किये जाते हैं, जो जप, ध्यान आदि के पूजा पद्धतियों के रूप में अनेक परम्पराओं के अनुसार अनेक क्षेत्रों में अनेक क्रिया-प्रक्रियाओं के साथ प्रचलित देखे जाते हैं। इन दिनों साधना शब्द से अभिप्राय इसी क्षेत्र की गतिविधियों तक सीमित होता है। जबकि ज्ञानयोग और कर्म को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी और भक्तियोग को उच्चस्तरीय प्रयोजन समझते हुए उसे सीमित परिमाण में ही प्रयुक्त किया जाना चाहिए था।
उपासना में लगे हुए लोगों का बहुत बड़ा समुदाय इसी प्रकार का होता है जो ऐहिक समृद्धियों और सफलताओं के लिए जन्त्र-मन्त्रों का, देवी-देवताओं का, सिद्ध योगियों का आश्रय लेता और आशा-निराशा के झूले में झूलता रहता है। इस विडम्बना का पर्यवेक्षण करने पर यही प्रतीत होता है कि यह जन-समुदाय अपवादों को प्रधानता देता और भाग्य को फेरने वाली किन्हीं पगडंडियों की तलाश में फिरते रहने वाले लोगों का परिष्कार है। उपासना बिलकुल दूसरी बात है। साधना तो चेतना शक्ति को प्रखर बनाने का एक उच्चस्तरीय विज्ञान है। उसमें आत्म-शोधन और आत्म-परिष्कार की ही सांगोपांग विधि व्यवस्था है।
उपासना निष्फल कैसे हो गई ? इतना समाधान करा देना भी आपका वरदान पर्याप्त होगा। जब आप गायत्री तेज के सम्मुख होने तक का साहस नहीं कर सकते तो फिर आपसे अन्य वरदान क्या माँगू।
उपासना और तपश्चर्या उसके दोनों ही पक्ष हैं। अध्यात्म विद्या में योग और तप दोनों का ही समावेश है। योग अपनी सामर्थ्यों के साथ दैवी शक्तियों का सहयोग बनाकर अधिक सक्षमता प्राप्त करता है। तप का तात्पर्य अवांछनीयताओं को हटाना और दुर्बलताओं को निरस्त करना है। दोनों क्रिया-प्रक्रियाएँ मिलकर ही समग्र अदृश्य शास्त्र एवं अध्यात्म शास्त्र का निर्माण हुआ है।
उपासनात्मक प्रक्रिया अपनाने के साथ या उससे भी पहले आत्मशोधन की महत्ता और आवश्यकता समझी जाय। प्रगति के प्रयासों में उसे अनिवार्य रूप में सम्मिलित रखा जाय। योग और तप दोनों एक दूसरे के पूरक और अन्योन्याश्रित हैं। इन्हें धुलाई और योग को रंगाई कहा जा सकता है। मैले, कुचैले, चिकनाई और गन्दगी से सने कपड़े पर कोई भी रंग नहीं चढ़ता और रंग का पैसा एवं रंगाई का श्रम निरर्थक चला जाता है।
उपासना को इतनी तेजस्वी पाते हैं तो कृपा कर यह बता दें कि मेरी इतनी लम्बी और इतनी निष्ठा भरी उपासना निष्फल कैसे हो गई ? इतना समाधान करा देना भी आपका वरदान पर्याप्त होगा। जब आप गायत्री तेज के सम्मुख होने तक का साहस नहीं कर सकते तो फिर आपसे अन्य वरदान क्या माँगू।
उपासना उपचार के साथ तपश्चर्या को अग्नि शक्ति का समावेश हो सका। यदि वे मात्र पूजा आराधना ही करते रहते और तप के कष्टसाध्य झंझट से बचकर रहना चाहते तो उन्हें उससे अधिक कुछ भी न मिलता जो शिव मन्दिरों और गंगा मन्दिरों के पुजारियों को नगण्य-सा प्रतिफल उपलब्ध होता है।
उपासनाएं आत्म-विकास का प्रयोजन पूरा करती हैं। इसके लिए योगाभ्यास वर्ग के अनेकानेक विधि-विधानों का प्रचलन है। अपनी रुचि, आवश्यकता और परम्परा के अनुसार उनमें साधक चुनाव करते हैं और प्रगति का उपक्रम आरम्भ करते हैं, यह उत्तरार्ध है। यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि उत्तरार्ध से लाभ पाने के नये आधार और दृश्य सामने आते हैं और कुछ पाने की आशा तो बंधती है, पर पूर्वार्ध की उपेक्षा करके यह छलांग प्रायः असफल ही होती देखी गई है। पूर्ण असफल न भी हो तो भी उसका प्रतिफल इतना स्वल्प दिखाई देता है जो आरम्भ में सोचे या बताये गये माहात्म्य की तुलना में बहुत ही कम होता है और साधक का मन उदास कर देता है।
उपासना के योगाभ्यास पक्ष से सम्बन्धित उत्तरार्ध का भी परिपूर्ण समावेश है। उसका परिचय गत वर्ष मार्च, अप्रैल, मई, जून की अखण्ड-ज्योति अंकों में प्रस्तुत किया गया है। विषय की गम्भीरता उसके विस्तार व्यवहार को देखते हुए उसे संक्षिप्त एवं सांकेतिक ही कहा जा सकता है। सर्वसाधारण को प्राथमिकता जानकारी देने की दृष्टि से इतना ही पर्याप्त समझा गया। जिन्हें विशेष रुचि है उनकी विशेषता बढ़ाने एवं विशेष मार्ग-दर्शन प्रस्तुत करने के लिए आवश्यकतानुसार मौखिक अथवा लेखनीबद्ध मार्ग दर्शन उपलब्ध होता रहेगा।
उपासना में लगा रहे। उसमें परिशोधन होता है।
उपासना प्रक्रिया को, आत्मिक प्रगति का उत्तरार्ध कहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-October
उपासना-अभ्यास मन की प्रवृत्ति को पदार्थपरकता से चेतना की ओर मोड़ते हैं। विश्वव्यापी चेतना के स्मरण और सान्निध्य की अनुभूति की आकांक्षा जागृत हो जाने पर मनोवृत्तियों का वासना और तृष्णा की दिशा में भटकाव, समय, शक्ति और पुरुषार्थ का भयानक दुरुपयोग प्रतीत होने लगता है। तब मनःशक्ति को संयमित कर परमार्थ में नियोजित करने की प्रवृत्ति दृढ़ होती जाती है। यही साधना है। उपासना दिन के एक छोटे से अंश में, निश्चित समय तक की जाती है, साधना एक अविच्छिन्न प्रक्रिया है।
उपासना। भजन-पूजन, जप-ध्यान, व्रत-उपवास आदि उपासना-अभ्यास मन की प्रवृत्ति को पदार्थपरकता से चेतना की ओर मोड़ते हैं। विश्वव्यापी चेतना के स्मरण और सान्निध्य की अनुभूति की आकांक्षा जागृत हो जाने पर मनोवृत्तियों का वासना और तृष्णा की दिशा में भटकाव, समय, शक्ति और पुरुषार्थ का भयानक दुरुपयोग प्रतीत होने लगता है। तब मनःशक्ति को संयमित कर परमार्थ में नियोजित करने की प्रवृत्ति दृढ़ होती जाती है। यही साधना है।
उपासना और साधना इसी स्थिति को प्राप्त करने के लिए है।
उपासना दिन के एक छोटे से अंश में, निश्चित समय तक की जाती है, साधना एक अविच्छिन्न प्रक्रिया है। वह पूरे जीवन का ही नाम है। साधनामय जीवन आन्तरिक पवित्रता को निखरता जाता है और ईश्वरीय प्रकाश का दिव्य दर्शन कराता है। मानवीय व्यक्तित्व में देवत्व के अवतरण की यह प्रक्रिया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-February
उपासना करता रहता है। यही भक्त का स्वावलम्बन है जिनमें न कोई आशा है न अपेक्षा। इसमें कभी कोई बाधा, व्यवधान भी नहीं आ सकता। तथाकथित प्रेम पात्र के लिए ऐसा नहीं कहा सकता। जब देव मन्दिर में प्रतिष्ठापित प्रतिमा निष्ठुरता धारण किये रह सकती है तो घर बाजार में रहने वाले सामान्य व्यक्ति यदि उतार−चढ़ाव का परिचय दे−कभी पतंग की तरह आसमान पर चढ़ते और कभी जमीन पर गिरते दिखाई पड़े तो उसमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है।
उपासना की ओर ले जायेगा। उपासना और कुछ नहीं दो चुम्बकीय शक्तियों के योग का ही नाम है। गायत्री उपासना से यह तथ्य और भी स्पष्ट हो जाता है।
उपासना के रूप में प्रयुक्त होने वाले कर्मकाण्डों के पीछे सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्तियों को अपनाने की ही प्रेरणा है। साधना में अपने ही कुसंस्कारों का अनगढ़पन दूर करने का प्रयोजन सन्निहित है। जीवन क्रम से लोक व्यवहार की सभ्यता और व्यक्तित्व के परिष्कार की संस्कृति की समाविष्टि के लिए किये जाने वाले प्रयत्न ही आत्मोत्कर्ष का प्रयोजन पूरा करते हैं। योगाभ्यास, तपश्चर्या एवं साधनात्मक धर्मानुष्ठानों के साथ उच्चस्तरीय चरित्र−निष्ठा नितान्त आवश्यक है। इस समावेश के बिना मात्र पूजा−पाठ भर से कोई वास्तविक आत्मिक प्रगति का लाभ नहीं ले सकता।
उपासना के समकक्ष ही स्वाध्याय को भी महत्व दिया जाय। आत्म कल्याण की समस्याओं को युग के अनुरूप समाधान प्रस्तुत करने वाला सत्साहित्य ही स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी कर सकता है। आज की स्थिति में सत्संग का श्रेष्ठ एवं सुगम रूप यही है। पढ़े लोग युग साहित्य पढ़ें, उसे सुनें।
उपासना बिना भोजन या शयन न करने का व्रत धारण किया जाय।
उपासना का अच्छा अवसर मिल जाता है। यदि मैं प्रसिद्ध हो जाऊँ तो मेरे पास भीड़ सी एकत्रित हो जाय व मैं फिर प्रभु चिंतन में अधिक समय न लगा पाऊँगा।
उपासनात्मक सुविधा एवं ध्यान धारणा के लिए−जीवन लक्ष्य निर्धारण के लिए−प्रतीक स्थापना का उद्देश्य पूरा होता है। वस्तुतः उसका कोई रूप है नहीं। यदि रूप हो सकता है तो उसमें इतनी छूट और जोड़कर रखनी होगी कि हर व्यक्ति अपनी श्रद्धा के अनुरूप किसी भी आकृति प्रकृति की प्रतिमा गढ़ सके। हाँ उसमें इतना ध्यान अवश्य रखना होगा कि इस प्रतीक के साथ उत्कृष्ट आदर्शवादिता जुड़ी हुई हो, निकृष्टता एवं दुष्टता को परमेश्वर के स्वभाव एवं चरित्र में सम्मिलित नहीं किया जा सकता। भ्रष्ट परिकल्पना का समन्वय करते ही ईश्वर के ईश्वरत्व का अन्त हो जाता है।
उपासना और कुछ नहीं दो चुम्बकीय शक्तियों के योग का ही नाम है। गायत्री उपासना से यह तथ्य और भी स्पष्ट हो जाता है।
उपासना, आराधना द्वारा भक्ति योग के माध्यम से किया जाता है। यह व्यायामशाला में किया गया उपार्जन है। प्रयोगशाला पाठशाला, पाठशाला में ही ऐसी ही उपलब्धि उपार्जित की जाती है फिर उस उपार्जन का व्यापक क्षेत्र में उपयोग होगा। पाठशाला में सम्पादित किया गया ज्ञान छात्र द्वारा जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रयुक्त होता है। प्रयोगशाला की उपलब्धियों से असंख्य व्यक्ति लाभ उठाते हैं।
उपासना की भोजन, शयन जैसे नित्य कर्मों में सम्मिलित रखा जाय। उसकी उपेक्षा न की जाय। निर्धारण भले ही न्यूनतम हो, पर उसका पालन दृढ़ता पूर्वक किया जाय। उपासना बिना भोजन या शयन न करने का व्रत धारण किया जाय।
उपासना कक्ष रहे। परिवार का हर सदस्य वहाँ दो मिनट प्रणाम अभिवादन के साथ जप, ध्यान सम्पन्न करके तब भोजन ग्रहण करें। सम्भव हो तो सामूहिक प्रार्थना, आरती की परम्परा चलाई जाय। चौके में पहली रोटी के पाँच छोटे ग्रास अग्नि पर गायत्री मन्त्र के साथ होम कर तब भोजन किया जाय। इस प्रकार भारतीय संस्कृति की जननी गायत्री और भारतीय धर्म के पिता, यज्ञ के साथ पूरे परिवार का किसी न किसी रूप में सम्बन्ध सूत्र जुड़ा रहेगा।
उपासना से यह तथ्य और भी स्पष्ट हो जाता है।
उपासना से भक्ति योग का परम लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-September
उपासना के कृत्य भी अपने−अपने ढंग से काम ही हैं। इन्हें करने की प्रक्रिया और दृष्टि समुन्नत होनी चाहिए। यह समावेश हो जाने से छोटे काम भी कर्मयोग की संज्ञा से गिने जाने योग्य बन जाते हैं।
उपासना में आत्मा का पुजारी विविध−विधि उपचार करता और साधन जुटाता रहता है।
उपासना कितनी गहरी और कितनी सार्थक रही, इसका प्रमाण परिचय एक ही बात से मिलता है कि आन्तरिक सुसंस्कारिता और बाह्य सज्जनता का कितना विकास सम्भव हो सका। साधना यों कहने को तो ईश्वर की अभ्यर्थना भी कही जा सकती है। किन्तु उसका वास्तविक स्वरूप एक ही है अन्तरंग में अवस्थित देव मानव को जागृत, प्रखर और समर्थ बनाने की आकुलता भरी चेष्टा। साधना का केन्द्र बिन्दु यही है अस्तु सिद्धियों का आधार भी इस उद्देश्य के लिए किये गये पुरुषार्थ को समझा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-March
उपासना, साधनात्मक नियमों के अतिरिक्त ब्रह्म विज्ञान एवं सेवा साधना के अभ्यास क्रम की व्यवस्था एवं रूपरेखा आदर्श वानप्रस्थ के अनुरूप ही बनायी गयी है। जीवन की अगणित धाराओं को माया के भूल भटकाव से बचाकर बनाने के लिए किसे कब किन परिस्थितियों में क्या करना चाहिए यह जाने बिना वानप्रस्थ स्तर के उत्तरदायित्व पूरे नहीं किये जा सकते। सेवा साधना के सूत्रों को जीवन में उतारने का व्यवस्थित अभ्यास भी उसी के अनुरूप होना आवश्यक है, अन्यथा इच्छा और ज्ञान होते हुए भी कुछ करना सम्भव नहीं होगा।
उपासना तो उसका एक अंग मात्र है।
उपासना पंचकोष अनावरण एवं कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया योग की इन्हीं धाराओं के विभिन्न प्रकार के संयोगों प्रयोगों से सम्भव है।
उपासना से असीम शान्ति मिलती है। कूड़े से जीवन में मणि−मुक्ता की−सी ज्योति झलझलाने लगती है, मन वाणी चित्त अलौकिक स्फूर्ति से भर जाते हैं, साधक को रस मिलने लगता है सो मेघ भी अधिकांश समय उसी में लगाते। किन्तु आर्य श्रेष्ठ महावीर की दृष्टि अत्यन्त तीखी थी वह जानते थे रस−रस सब एक हैं−चाहे वह भौतिक हों या आध्यात्मिक। रस की आशा चिर नवीनता से बँधी है इसीलिये जब तक नयापन है तब तक उपासना में रस स्वाभाविक है किन्तु यदि आत्मोत्कर्ष की निष्ठा न रही तो मेघ का मन उचट जायेगा, अतएव उसकी निष्ठा को सुदृढ़ कराने वाले तप की आवश्यकता है। सो वे मेघ को बार−बार उधर धकेलने लगे।
उपासना में रस स्वाभाविक है किन्तु यदि आत्मोत्कर्ष की निष्ठा न रही तो मेघ का मन उचट जायेगा, अतएव उसकी निष्ठा को सुदृढ़ कराने वाले तप की आवश्यकता है। सो वे मेघ को बार−बार उधर धकेलने लगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-April
उपासना करने वाला ब्रह्मतेज सम्पन्न हो जाता है। इन तथ्य को शतपथ ब्राह्मण में इस प्रकार कहा गया है—
उपासना−आराधना प्रख्यात है। पाँच कोशों के जागरण की विधि गायत्री मंत्र के पाँच मुख चित्रित करते हुए समझाई गई है। मंत्रशक्ति को जागृत करने के लिए उपरोक्त पाँच आधारों को उसके विनियोग में समाविष्ट किया गया है।
उपासना पद्धति, पूजा पद्धति, कर्मकाण्डों के प्रकार आदि की विविधता के कारण—इन सम्प्रदायों को ही धर्म मान लिया है। वास्तव में ‘धर्म’ तो एक ही है। ‘धर्म’ के लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए जो अलग-अलग पद्धतियाँ प्रचलित हैं वे ‘धर्म’ नहीं वरन् सम्प्रदाय हैं। धर्म मानो महासागर है और सम्प्रदाय नदियाँ हैं जो विभिन्न स्थानों और दिशाओं से आकर इस महासागर में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विलीन हो जाती हैं। यदि इन नदियों को ही भ्रमवश कोई सागर समझ ले व अपने सागर की महत्ता का ही ढिंढोरा पीटने लगे तो पीटने पर नदी सागर तो बन नहीं सकती।
उपासना करते हैं और इस महामन्त्र की सार्वभौमिक प्रतिष्ठा सिद्ध करते हैं जबकि अपने देश में उसे प्रतिबन्धित तथा न जाने क्या-क्या कहा जाता है।
उपासना अपने प्रतिफल उत्पन्न करती है। साथ ही एक तथ्य और भी है कि सद्विचारों को अपनी चेतना ने ओत−प्रोत करके तदनुरूप व्यक्तित्व को ढाल लिया जाय तो यह भी प्रत्यक्ष क्रम में उतरने वाला मन्त्राराधन ही है। सत्प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त की गई—सद्भावना युक्त वाणी भी मन्त्र शक्ति के समान ही फलवती होती है।
उपासना, अनुष्ठान आदि की व्यवस्था विभिन्न सम्प्रदायों में प्रचलित रहती हैं। इनमें से किसी सम्प्रदाय में कोई पद्धति विशेष अधिक प्रभावशाली प्रतीत होती है किसी में कम। इसी से हम इन पद्धतियों के प्रभावी होने न होने की यह मान लेते हैं मानो अमुक धर्म अमुक से श्रेष्ठ अथवा निम्नतर है। वास्तव में धर्म तो अपने स्थान पर स्थिर, अटल, शाश्वत है उस तक पहुँचने के मार्ग अपेक्षाकृत सुविधाजनक अथवा कष्टप्रद हो सकते हैं, परन्तु उनके कारण ‘धर्म’ प्रभावित नहीं होता।
उपासना कृत्य में नियोजित रखे। माला, आसन, मात्र, प्रतीक, उपचार, उपकरण आदि में प्रयुक्त हुए पदार्थों में शुद्धता का ध्यान रखा जाय। मन्त्र−साधना के प्रति श्रद्धा−विश्वास की कमी न हो। यह सभी बातें जहाँ ठीक प्रकार प्रयुक्त हुई होंगी। वहाँ आराधना का प्रतिफल निश्चित रूप से दृष्टिगोचर हो रहा होगा।
उपासना की गरिमा का दोष नहीं। साधक को ओछा व्यक्तित्व अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करने योग्य न होने से ही निराशा हाथ लगती है। खिलौना बन्दूक में रखकर बढ़िया कारतूस चलाने पर भी लक्ष्य बेध में सफलता न मिलेगी। उपयुक्त परिणाम उत्पन्न करने में कारतूस ही सब कुछ नहीं होता, बढ़िया बन्दूक की भी आवश्यकता पड़ती है। दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का पौरोहित्य करने के लिये अखण्ड व्रतधारी शृंगीऋषि का सहयोग लेना पड़ा था।
उपासना पर प्रकाश डालते हुए कहा था—मेरा बोलना जप के लिए है। जिन विचारों को बोलता हूँ वे दृढ़ होते चले जाते हैं।........ जो किया है, आप लोगों ने किया है। मैंने तो जप किया है। भूदान का जप किया तो भूदान मिला।
उपासना रह गई पर इन देशों में आज भी इन देवों के आदर्शों को समझा और स्वीकार जाता है। जर्मनी प्लूटार्च का कथन है। “सूर्य पूजा रोम में 67 ई. पूर्व में पहुँची। यह मित्र पूजा शीघ्र सारे संसार में फैल गई” जर्मनी में “सूर्य” की प्रतिमा वही है जो भारतीय संस्कृति में है वहाँ सूर्य क उपासना को वैज्ञानिक अर्थ में लिखा जाता है जब कि इस देश के पढ़े लिखे ही उसे रूढ़िवाद मानते हैं।
उपासना, प्रातः उठते ही उत्कृष्ट दिनचर्या का निर्धारण, रात्रि को सोते समय दिनभर के कार्यों का पर्यवेक्षण, जीवन के आदि और अन्त का तत्व चिन्तन, दैनिक गतिविधियों पर कड़ी दृष्टि रखना और उनमें अव्यवस्था और अवांछनीयता का समावेश न होने देना। यही छोटा सूत्र आत्म−निर्माण का आधारभूत सिद्धान्त है। इसका आरम्भ कितने ही छोटे रूप में क्यों न किया जाय, पर उस निर्धारण को कार्यान्वित अवश्य किया जाना चाहिए।
उपासना’ का आज भी विपुल सम्मान है। तिब्बत में तो “गायत्री मन्त्र” लिखे सद्वाक्यों का वितरण सर्वाधिक शुभ माना जाता है। मंगोलियन विधिवत गायत्री उपासना करते हैं और इस महामन्त्र की सार्वभौमिक प्रतिष्ठा सिद्ध करते हैं जबकि अपने देश में उसे प्रतिबन्धित तथा न जाने क्या-क्या कहा जाता है।
उपासना के आधारों का स्तर गिर जाने से ही उसकी सफलता संदिग्ध होती चली जाती है।
उपासना एवं ज्ञान−साधना के लिए जितने तत्पर रहे, उतना ही उन्होंने लोक सेवा में भी रस लिया है। सत्परम्पराओं की स्थापना ने पीड़ितों सहायता एवं छोटों को बड़ा बनाने में भी भरपूर प्रयास किया है।
उपासना को वैज्ञानिक अर्थ में लिखा जाता है जब कि इस देश के पढ़े लिखे ही उसे रूढ़िवाद मानते हैं।
उपासना नहीं करता, आत्मनिरिक्षण आत्म-सुधार की आवश्यकता और उपयोगिता भी उसने नहीं समझी। उसकी परमार्थ-परायणता सक्रिय तो क्या होती अब तक भी स्वार्थ के बन्दीगृह से मुक्त नहीं हो पाई थी। यदि कुछ था तो बस इतना ही कि वह नियमित संघगोष्ठी में सम्मिलित अवश्य होता। वहाँ भी उसकी सांसारिक बुद्धि ही मुखर रहती। भगवान् बुद्ध के प्रवचनों में भी उसकी अभिरुचि नहीं थी, वहाँ भी वह बुद्धदेव के सौन्दर्य की ही चर्चा करता रहता।
उपासना एक महत्वपूर्ण विज्ञान है। उसे एक विशेष शिल्प कह सकते हैं। इसके लिए अनुभवी एवं निष्णात मार्गदर्शक चाहिए। यह मात्र पुस्तक प्रशिक्षण से सम्भव नहीं हो सकता है। ग्रन्थों में हर रोग का निदान एवं उपचार लिखा है तो भी अनुभवी चिकित्सक की आवश्यकता बनी ही रहती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-January
उपासनाएं बताई जाती हैं। ज्ञान भूमिका में पहुँचने पर स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन, ध्यान, धारणा जैसी चिन्तन प्रधान साधनाओं में नियोजित किया जाता है। सबसे ऊँची स्थिति भाव सम्वेदनाओं के उभार उल्लास की है। इसी में भक्तियोग बन पड़ता है। आत्मवत् सर्व भूतेषु-वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता इसी आत्म विश्वास की स्थिति में हृदयंगम हो पाती है।
उपासना द्वारा ईश्वर को आत्म समर्पण करके इसी अहं को मिटाया जाता है। तप साधना द्वारा कुसंस्कारों का उन्मूलन और सुसंस्कारों का संस्थापन किया जाता है। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन द्वारा विवेक बुद्धि परिष्कृत होती है और इन्द्रियनिग्रह द्वारा मन चले मन को सत्संकल्प करने वाले उपयोगी चित्र गढ़ने वाला बनाया जाता है। यही है आत्म-साधना की पृष्ठभूमि और संक्षिप्त रूप रेखा।
उपासना में ‘उप’ और ‘आसना’ यह दो शब्द हैं। ‘उप’ उपसर्गपूर्वक ‘आस’ उपवेशने’ धातु से ‘युत्र’ प्रत्यय करने पर ‘टाप् प्रत्यान्त’ ‘उपासना’ शब्द बना। ‘उप’ का अर्थ हुआ ‘समीप’, ‘आसना’ का अर्थ है स्थिति। उपास्य, आराध्य की स्थिति से जितनी ही अधिक समीप अपनी स्थिति विनिर्मित कर ली जाये उसके जितना अधिक अनुकूल-समतुल्य बना जाये उसकी क्षमताएं, शक्तियाँ, सामर्थ्य उसी अनुपात में अपने अंदर आती और अपने चेतन व भौतिक गुणों से लाभान्वित करती चली जायेंगी। भले ही वह वस्तु काल्पनिक ही क्यों न हो?
उपासना का, ध्यान का अर्थ इस प्रक्रिया को ही अत्यधिक प्रगाढ़ बनाकर उन शक्तियों से लाभान्वित होना है।
उपासना के लिए यही बात, यही सिद्धाँत लागू होता है।
उपासना का सुनिश्चित वैज्ञानिक आधार न होता तब तो उपरोक्त मान्यता में कुछ सार भी हो सकता था, किन्तु जब हम उसे अंतरंग जीवन की अपरिहार्य आवश्यकता के रूप में पाते हैं तब उसे बुर्जुआ संस्कार कह कर उपेक्षा करना व्यक्ति, समाज और विश्व समुदाय किसी के लिए भी हितकारक नहीं।
उपासना’ शब्द बना। ‘उप’ का अर्थ हुआ ‘समीप’, ‘आसना’ का अर्थ है स्थिति। उपास्य, आराध्य की स्थिति से जितनी ही अधिक समीप अपनी स्थिति विनिर्मित कर ली जाये उसके जितना अधिक अनुकूल-समतुल्य बना जाये उसकी क्षमताएं, शक्तियाँ, सामर्थ्य उसी अनुपात में अपने अंदर आती और अपने चेतन व भौतिक गुणों से लाभान्वित करती चली जायेंगी। भले ही वह वस्तु काल्पनिक ही क्यों न हो? भूत का कोई अस्तित्व नहीं किन्तु उसकी मान्यता और विश्वास के आधार पर अंधकार से साकार भूत आ धमकता है और उसे व्यक्ति को कितना भयभीत कर देता है यह हर कोई जानता है- कल्पना का यह भूत यदि किसी को विक्षिप्त, पागल और मार सकता है तो दिव्य गुणों से, दिव्य क्षमताओं से ओत-प्रोत आराध्य हमारे जीवन को दिव्य न बनाये ऐसा कैसे हो सकता है?
उपासना की विधियाँ विकसित की थीं और उनके अभ्यास द्वारा अपनी क्षमताओं को विकसित कर प्रचुर भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष उपलब्ध किया था आज तो उन्हें मनगढ़न्त-सा माना जाने लगा है, पर अध्ययन यह निष्कर्ष देते हैं कि वह कल्पनाएँ नहीं यथार्थ हैं आज वैज्ञानिक उनकी पुष्टि करते हैं।
उपासना के समय सूर्य के ध्यान की व्यवस्था है। उसका अर्थ सूर्य की अदृश्य शक्तियों किरणों को उपरोक्त वैज्ञानिकों, सिद्धांतों के आधार पर शरीर में धारण करना और उसके आत्मिक व वैज्ञानिक लाभों से लाभान्वित होना है। हमारी प्रगाढ़तम ध्यानावस्था हमारी मनश्चेतना को ‘सूर्य’ बना देती है उस शक्ति, सामर्थ्य और अनुभूति की कल्पना की जा सके तो सहज ही अनुभव किया जा सकता है कि गायत्री सिद्धि के क्या चमत्कार हो सकते हैं? प्रत्येक उपासना के लिए यही बात, यही सिद्धाँत लागू होता है।
उपासना को समय की बर्बादी कहकर उसे बुर्जुआ संस्कार बताते और उसके लिए जन-जीवन में अथवा अश्रद्धा उत्पन्न करते हैं। उनका तर्क यह होता है कि यदि इतने समय का उपयोग पुरुषार्थ और परिश्रम में किया जाये तो उससे औद्योगिक विकास और राष्ट्रीय सम्पत्ति बढ़ती है और प्रकारान्तर से उसका लाभ सारे देश और समाज को ही मिलता है।
उपासना की जा सके तो वे सभी वरदान उपलब्ध हो सकते हैं जो ईश्वर के अनुग्रह से किसी को कभी मिल सके हैं। यह प्रत्यक्ष देवता है। हमारे इतना समीप है कि मिलन से उत्पन्न असीम आनन्द की अनुभूति अहर्निशि की जा सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-November
उपासना को इतना स्पष्ट किया गया जिससे वह शिक्षित-अशिक्षित, आस्तिक-नास्तिक, स्त्री-पुरुष स्वस्थ, बीमार सभी की श्रद्धा का पात्र बनी। शास्त्रीय प्रतिपादनों का संकलन करना उन्हें, सामान्य हिन्दी भाषा में जन सुलभ बनाना, प्रकाशित करना, उस विधान का मार्गदर्शन स्वयं चलकर और संरक्षण देकर दूसरों को भी अग्रसर करने का दायित्व बहुत बड़ा था, पर उसे पूरा किया गया। गायत्री महाविज्ञान के अब तक बीसियों संस्करण निकल चुके हैं और वह गायत्री महाविद्या के “एनसाइक्लोपीडिया” बन गये हैं। छोटे-छोटे ट्रैक्टों के माध्यम से भी इस ब्रह्मविद्या का उद्घाटन और प्रसार जन-जन तक किया गया। इस तरह युग शक्ति गायत्री के अवतरण का एक महान कार्य पूरा हुआ, एक ऐसा सुव्यवस्थित आधार तैयार है जिस पर चलते हुए मानवता चिरकाल तक जीवित रहने की आशा कर सकती है, देवत्व धरती पर उतरने और स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करने को समुद्यत हो सकता है।
उपासना में तप-साधना के वह सभी तत्व विद्यमान है। जिनके आधार पर लोगों की आस्थायें बदलती है जनमानस का परिष्कार होता है। जीवन को सचेतन बनाने वाली प्राण ऊर्जा विकसित होती है और मानवीय सुख शान्ति की परिस्थितियाँ मुखरित होती हैं। गायत्री को त्रिपदा भी कहा गया है। जिसका एक अर्थ यह भी होता है कि इस उपासना से मनुष्य अभाव, अशक्ति और अज्ञान से मुक्ति पाता है।
उपासना का साहस ही नहीं कर सकता है। गायत्री केवल ब्राह्मणों के लिए, स्त्रियाँ प्रतिबन्धित हैं, यह कान में कहा जाने वाला मन्त्र है, गायत्री शापग्रस्त है ऐसी न जाने कितनी मूढ़मान्यताओं ने उपयोगी हीरे को जंग लगा दिया था। पिछले तीस वर्षों से अथक परिश्रम अनवरत लगन और कठोर साहस के साथ उस अन्धकार को काटा गया। गायत्री उपासना को इतना स्पष्ट किया गया जिससे वह शिक्षित-अशिक्षित, आस्तिक-नास्तिक, स्त्री-पुरुष स्वस्थ, बीमार सभी की श्रद्धा का पात्र बनी। शास्त्रीय प्रतिपादनों का संकलन करना उन्हें, सामान्य हिन्दी भाषा में जन सुलभ बनाना, प्रकाशित करना, उस विधान का मार्गदर्शन स्वयं चलकर और संरक्षण देकर दूसरों को भी अग्रसर करने का दायित्व बहुत बड़ा था, पर उसे पूरा किया गया।
उपासना को राष्ट्रीय उपासना के रूप में स्वीकार किया था। अन्य किसी उपासना के बारे में मतभेद रहे होंगे पर गायत्री उपासना और तत्वज्ञान का निर्विवाद स्वरूप लोग आज भी स्वीकारते हैं यदि कहीं कोई मतभेद झलकता है तो वह मात्र प्रयुक्तीकरण में हो सकता है, उसकी महत्ता उपयोगिता के बारे में कहीं कोई विवाद नहीं।
उपासना के बारे में मतभेद रहे होंगे पर गायत्री उपासना और तत्वज्ञान का निर्विवाद स्वरूप लोग आज भी स्वीकारते हैं यदि कहीं कोई मतभेद झलकता है तो वह मात्र प्रयुक्तीकरण में हो सकता है, उसकी महत्ता उपयोगिता के बारे में कहीं कोई विवाद नहीं।
उपासना के रूप में स्वीकार किया था। अन्य किसी उपासना के बारे में मतभेद रहे होंगे पर गायत्री उपासना और तत्वज्ञान का निर्विवाद स्वरूप लोग आज भी स्वीकारते हैं यदि कहीं कोई मतभेद झलकता है तो वह मात्र प्रयुक्तीकरण में हो सकता है, उसकी महत्ता उपयोगिता के बारे में कहीं कोई विवाद नहीं।
उपासना के रूप में आद्यशक्ति भगवती गायत्री को ही इष्टदेव चुना है। उसके पीछे इस दर्शन का प्रतिपादन ही रहा हैं कि मनुष्य जाति की समस्याओं का निराकरण एक मात्र विवेक और सद्ज्ञान से ही सम्भव है। इस युग में जबकि असुरता ने मानवीय बुद्धि को ही पूरी तरह आच्छादित कर रखा है तब तो उसकी आवश्यकता और भी अधिक हो जाती है। इसी कारण युग परिवर्तन के लिए गायत्री अभियान को चुना गया। युग शक्ति गायत्री के अवतरण का अभीष्ट भी यही है।
उपासना भी कहा जाता है। गायत्री महामन्त्र के 24 अक्षरों में बीज रूप से वह सभी तत्व ओत-प्रोत हैं जो उपासक के हृदय अन्तःकरण में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को स्वस्थ समर्थ और विवेकपूर्ण बनाने वाला प्रकाश जागृत करते है। अनेक तरह की दार्शनिक मान्यताओं के रहते हुए भी गायत्री उपासना, तत्वज्ञान के प्रति आदिकाल से ही ऋषि मनीषी सभी एक मत रहे हैं जितने भी अवतार हुए हैं उन सब ने उपासना के रूप में आद्यशक्ति भगवती गायत्री को ही इष्टदेव चुना है। उसके पीछे इस दर्शन का प्रतिपादन ही रहा हैं कि मनुष्य जाति की समस्याओं का निराकरण एक मात्र विवेक और सद्ज्ञान से ही सम्भव है। इस युग में जबकि असुरता ने मानवीय बुद्धि को ही पूरी तरह आच्छादित कर रखा है तब तो उसकी आवश्यकता और भी अधिक हो जाती है।
उपासना एवं स्वाध्याय में अधिक समय लगाना प्रारम्भ कर दिया। न्यूजर्सी के अपने मकान को उसने साधना केन्द्र ही बना डाला। कुछ वर्षों बाद उसने क्रम प्रारम्भ किया। उसकी पुस्तकें बाजार में तेजी से बिकने लगीं। इनमें से ‘गोल्डन लाइट ऑफ ए न्यू एरा’ तथा ‘फाल ऑफ द सेन्सेशनल कल्चर’ अधिक प्रसिद्ध हुईं।
उपासना जिसने भी की है उसे उसी अनुपात से अनुग्रह का लाभ मिला है। भौतिक सिद्धियाँ और आत्मिक ऋद्धियाँ अभीष्ट परिमाण में प्राप्त करने के लिए आत्म देव से बढ़कर और कोई सुनिश्चित उपास्य है नहीं।
उपासना और साधना के द्वारा ही अन्तःकरण में उच्चस्तरीय श्रद्धा का आरोपण, परिपोषण और अभिवर्धन करके मनुष्य जीवन की ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों को सृजन प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जा सकता है। अन्तःकरण परिवर्तित किया जा सके तो सामान्य जीवन के क्रिया-कलाप स्वतः बदल जाते हैं।
उपासना, तत्वज्ञान के प्रति आदिकाल से ही ऋषि मनीषी सभी एक मत रहे हैं जितने भी अवतार हुए हैं उन सब ने उपासना के रूप में आद्यशक्ति भगवती गायत्री को ही इष्टदेव चुना है। उसके पीछे इस दर्शन का प्रतिपादन ही रहा हैं कि मनुष्य जाति की समस्याओं का निराकरण एक मात्र विवेक और सद्ज्ञान से ही सम्भव है। इस युग में जबकि असुरता ने मानवीय बुद्धि को ही पूरी तरह आच्छादित कर रखा है तब तो उसकी आवश्यकता और भी अधिक हो जाती है। इसी कारण युग परिवर्तन के लिए गायत्री अभियान को चुना गया। युग शक्ति गायत्री के अवतरण का अभीष्ट भी यही है।
उपासना से मनुष्य अभाव, अशक्ति और अज्ञान से मुक्ति पाता है। शरीर, समाज और लोक-व्यवहार में क्या उचित है क्या अनुचित इस बात को सीखता है, तद्नुसार, अपना जीवनक्रम निर्धारित करता है। दुःख के यही तीन कारण हैं, इन्हीं तीनों चरणों की भ्रष्टता ही मनुष्य को पतित करती है यदि वह व्यवस्थित हो जाते हैं तो फिर उस कोलाहल, अशान्ति और सर्वनाश की विभीषिका से स्वतः ही बचा जा सकता है। इस प्रयोग को प्राचीनकाल में सर्वाधिक सफलता मिली थी इसलिए मनीषियों ने एक मत से गायत्री उपासना को राष्ट्रीय उपासना के रूप में स्वीकार किया था। अन्य किसी उपासना के बारे में मतभेद रहे होंगे पर गायत्री उपासना और तत्वज्ञान का निर्विवाद स्वरूप लोग आज भी स्वीकारते हैं यदि कहीं कोई मतभेद झलकता है तो वह मात्र प्रयुक्तीकरण में हो सकता है, उसकी महत्ता उपयोगिता के बारे में कहीं कोई विवाद नहीं।
उपासना और तत्वज्ञान का निर्विवाद स्वरूप लोग आज भी स्वीकारते हैं यदि कहीं कोई मतभेद झलकता है तो वह मात्र प्रयुक्तीकरण में हो सकता है, उसकी महत्ता उपयोगिता के बारे में कहीं कोई विवाद नहीं।
उपासना को सद्ज्ञान, सद्-विवेक की उपासना भी कहा जाता है। गायत्री महामन्त्र के 24 अक्षरों में बीज रूप से वह सभी तत्व ओत-प्रोत हैं जो उपासक के हृदय अन्तःकरण में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को स्वस्थ समर्थ और विवेकपूर्ण बनाने वाला प्रकाश जागृत करते है। अनेक तरह की दार्शनिक मान्यताओं के रहते हुए भी गायत्री उपासना, तत्वज्ञान के प्रति आदिकाल से ही ऋषि मनीषी सभी एक मत रहे हैं जितने भी अवतार हुए हैं उन सब ने उपासना के रूप में आद्यशक्ति भगवती गायत्री को ही इष्टदेव चुना है। उसके पीछे इस दर्शन का प्रतिपादन ही रहा हैं कि मनुष्य जाति की समस्याओं का निराकरण एक मात्र विवेक और सद्ज्ञान से ही सम्भव है। इस युग में जबकि असुरता ने मानवीय बुद्धि को ही पूरी तरह आच्छादित कर रखा है तब तो उसकी आवश्यकता और भी अधिक हो जाती है।
उपासना वर्ग के सभी कलेवर वस्तुतः इस तप के ही उपादान हैं, पर इस पद्धति में शरीर को अनेक कष्ट पूर्ण तितीक्षाओं से, मन को विरोधी परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। इस तरह मनुष्य का दृष्टिकोण उदार, उदात्त और विशाल बनता है। शोषण, उत्पीड़न और भ्रष्टता की प्रतिक्रियाओं को स्वतः अनुभूति इसी से होती है और उस स्थिति में मनुष्य स्वयं ही उनसे दूर भागता है। स्पष्ट है कि ऐसे समाज बुराइयों से बचे हुए होंगे, साधन सुविधाओं की सार्थकता भी ऐसे ही समाज में सिद्ध होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-June
उपासना के सामूहिक प्रयोगों से ही उत्पन्न होगी। युग निर्माण योजना के विविध क्रिया-कलापों में सामूहिक गायत्री उपासना जोड़कर रखा गया है और समय-समय पर उसके आयोजन होते रहते हैं। गायत्री जयन्ती ज्येष्ठ शुक्ल दशमी वेदमाता महाशक्ति के अवतरण का पुण्यपर्व है , यही गंगा जयन्ती भी है। वस्तुतः एक ही प्रखर पवित्रता का स्थूलरूप गंगा रूप गायत्री है। एक का अवतरण भागीरथ ने दूसरी का विश्वामित्र ने अपनी प्रचण्ड तपसाधना से सम्पन्न किया था।
उपासना को आरोग्य – रक्षा के लिए प्रयुक्त करना आरम्भ किया | एक छोटे से किराये के मकान में उनने कार्य आरम्भ किया |रोगियोंको लाभ मिला, तो ख्यति भी फैली ओंर श्रध्या भी बढ़ी ; फलत: उस आश्रम का बिस्तार बढ़ता चला गया | इन दिनों उसका विस्तार 12oo एकड़ भूमि में है| हजारों की संख्या में रोगी निरन्तर निवास करते ओंर आरोग्य लाभ लेते है| सात सौ कर्मचारी काम करते है | दो साप्ताहिकों और सात मासिक – पत्रों की 20 लाख प्रतियों यहाँ से हर महीने प्रकाशित होती है | प्रतिदिन 6 हजार पत्र आते है | यहाँ से छपने वाले प्रार्थना – साहित्य का अनुवाद संसार की 140 प्रमुख भाषाओं में होता है | वह यूनिटी संस्था अमेरिका का एेसा धर्म –संस्थान है,जिसकी आधारशिला भर ईसाई मतावलम्बी है |लाभ पाने की द्रष्टि से सभी धर्मो और वर्गो को समान सुविधा है |
उपासना करने वालों को प्रसन्न होकर वरदान देने वाला समझा जाता था। अब गहन अन्वेषण ने उसे पृथ्वी की जड़ -चेतना- सत्ता में विविध-विधि -स्पन्दन उत्पन्न करने वाला शक्ति - स्रोत माना जाता है और स्वीकार किया जाता है कि धरती पर जितना कुछ जीवन- तत्व है, जितनी भी हलचलें हैं, उसका उद्गम केन्द्र सूर्य सत्ता में ही सन्निहित है।
उपासना की भाव भूमिका बन ही नहीं सकेगी। अशान्त मन से आत्म-चिन्तन, भक्ति साधन जैसे प्रयोजन सध ही नहीं पाते। किसी प्रकार कर्मकाण्डों की चिन्ह पूजा भर करते रहने की बात कुछ बनती नहीं है।
उपासना की साधनतपश्चर्या में निरत है। उसे विश्वव्यापी विश्वमाता बनाने का अपना संकल्प है।
उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मू. 50 पैसा (15 पुस्तकों के सैट का मू. 7) ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं -
उपासना करने वाले उसकी प्रतिक्रिया को देखते हुए उसे अमृत, पारस और कल्पवृक्ष कहते हैं। उसे धरती की कामधेनु कहते हैं। इस अलंकारिक प्रतिपादन में तथ्य तथा सत्य दोनों का समावेश है।
उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मु. 6)
उपासना 'तेजस्' का ध्यान करते हुए की जा सकती है। उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर आशाजनक प्रभाव पड़ता है।
उपासना जोड़कर रखा गया है और समय-समय पर उसके आयोजन होते रहते हैं। गायत्री जयन्ती ज्येष्ठ शुक्ल दशमी वेदमाता महाशक्ति के अवतरण का पुण्यपर्व है , यही गंगा जयन्ती भी है। वस्तुतः एक ही प्रखर पवित्रता का स्थूलरूप गंगा रूप गायत्री है। एक का अवतरण भागीरथ ने दूसरी का विश्वामित्र ने अपनी प्रचण्ड तपसाधना से सम्पन्न किया था। अब उसे ओंर सूक्ष्म रुप युगशक्ति के रूप में उभारने के लिए अपना परिवार नये सिरे से प्रयोगों के साथ सामूहिक उपासना की साधनतपश्चर्या में निरत है।
उपासना सूर्य सेवन से ,आध्यात्मिक उपासना 'तेजस्' का ध्यान करते हुए की जा सकती है। उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर आशाजनक प्रभाव पड़ता है।
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगाये जाने वाले बीज मन्त्रों का साधन विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मु. 6)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-April
उपासना के विधि-विधानों तक ही सीमित न रहकर उसने निहित दर्शन एवं प्रेरणाओं को भी हृदयंगम किया जाय और तद्नुरूप अपने व्यक्तित्व को ढाला जाय। पूरी श्रद्धा के साथ मन्त्र का अवलम्बन लिया जा सके तो आज भी वह पुरातन काल की ही तरह चमत्कारी सामर्थ्यदायी सिद्ध हो सकता है।
उपासना के फलस्वरूप ही ललितकलाओं आविर्भाव हुआ। अजन्ता-एलोरा जैसी अद्भुत कलाकृतियाँ माइकेल एन्जेलो एवं पिकासों के चित्रांकन इस शाश्वत सौन्दर्य साधना की ही परिणति हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-October
उपासना का तत्वदर्शन है जिसे अपनाकर साधना क्षेत्र के राज मार्ग पर बढ़ पाना अधिक सरल हो जाता है।
उपासना के परिणाम प्रकट होते हैं।
उपासना पद्धति में जप को अनिवार्य रूप से जोड़ रखा है।
उपासना क्रमों का प्रचलन था। संकट की अवधि में प्रायः ऐसा किया जाता था और सुरक्षा व्यवस्था बना ली जाती थी। इसका वैज्ञानिक रहस्य यह है कि व्यक्ति समष्टिगत मानसिक एकाग्रता, जो उपासना का प्रधान लक्ष्य है, के आधार पर ब्रह्मांडीय चेतना से सम्बन्ध बनाता है तथा अपने चिन्तन के अनुरूप उसे प्रभावित करता है।
उपासना के प्रतिफलों में अन्तःश्रद्धा का होना न होना ही महत्वपूर्ण है। अपनी निष्काम सघन श्रद्धा के अनुरूप ही साकार उपासना के परिणाम प्रकट होते हैं।
उपासना का प्रधान लक्ष्य है, के आधार पर ब्रह्मांडीय चेतना से सम्बन्ध बनाता है तथा अपने चिन्तन के अनुरूप उसे प्रभावित करता है।
उपासना से तुलसीदास महान बने, जिस कृष्ण की आराधना से सूर ने अपने जीवन को सफल बनाया, उन राम और कृष्ण की मूर्तियाँ- चित्र आज भी विद्यमान हैं पर तथाकथित उपासकों, भक्तों के लिए वे कुछ विशेष करामाती नहीं सिद्ध हो पाती। इस विरोधाभास से उन्हें असमंजस हो सकता है जो स्थूल तक ही सीमित रहते हैं। तत्वदर्शी यह जानते हैं कि एक ही तरह की उपासना के प्रतिफलों में अन्तःश्रद्धा का होना न होना ही महत्वपूर्ण है। अपनी निष्काम सघन श्रद्धा के अनुरूप ही साकार उपासना के परिणाम प्रकट होते हैं।
उपासना विज्ञान में जीव-ब्रह्म के मिलन में सहायक “बफर” की भूमिका निभाने के रूप में प्रतीकों की चर्चा की जाती है। साकारोपासना को महत्व देने वाले अपनी श्रद्धा को दृढ़ आधार देने के लिए किसी न किसी प्रतीक को, चित्र अथवा मूर्ति को एक अनिवार्य माध्यम मानते हैं। जबकि एक दूसरा वर्ग ऐसा है जो स्वयं को किसी सीमा से, प्रतीक की परिधि से आबद्ध नहीं रखना चाहता। वह बिना किसी माध्यम के व्यष्टि एवं समष्टि चेतना का एकीकरण चाहता है। इन्हें निकारोपासना का समर्थक कहा जाता है।
उपासना करने में उसी स्तर के देवताओं के दर्शन होने लगते हैं। किन्तु वह झाँकी मात्र ही होती है। उनमें सामर्थ्य उसी स्तर की होती है। जितना की साधक का व्यक्तित्व होता है। झलक झाँकी देखने से कौतूहल का समाधान भर होता है पर उसे देव दर्शन से कुछ काम नहीं बनता।
उपासना है।
उपासना में मन कभी भी स्थिर नहीं हो सकता, क्योंकि मन प्रतीक के अंग अवयवों में घूमता रहता है।” पर यह आक्षेप विवेकपूर्ण नहीं है। एक सीमित परिधि में घूमने से एकाग्रता समाप्त नहीं हो जाती। एकाग्रता का अर्थ स्थिरता नहीं है। निश्चित दायरे में मन का घूमते रहना उसी में तल्लीन होना भी एकाग्रता है।
उपासना के प्रारम्भिक स्तर के साधक को मन्त्र जप का मनोवैज्ञानिक आधार समझ में आ जाये तो मन न लगने ध्यान उखड़-उखड़ जाने वाली कठिनाई आधा निराकरण तत्काल हो जाता है शेष मंजिल वह कुछ ही समय में पूर्ण कर सकता है।
उपासना के आविष्कारक बने। शक्तियों के प्रतीक विभिन्न देवी-देवताओं का आविर्भाव इसी कारण हुआ। साकार माध्यमों की उपयोगिता इसलिए भी है कि चंचल मन न तो निराकार ब्रह्म की कल्पना कर सकता है, न ही एकाग्र चित्त ही हो सकता है। उसे दृश्य अवलम्बन देना आवश्यक है। साकार प्रतिमा में इष्ट की छवि देखने तथा उसमें अपनी श्रद्धा को सतत् आरोपित करते रहने पर वह और भी परिपुष्ट होती है।
उपासना फलवती होती है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र की क्यों न हो? भौतिक क्षेत्र में सफलता प्राप्त व्यक्तियों से पूछा जाए तो उसके मूल में उनके कुछ गिने-चुने आदर्शवादी सिद्धान्तों से लगाव को ही धुरी के रूप में देखा जा सकता है। आत्मिक जगत तो और भी अनूठा परब्रह्म की परोक्ष सत्ता का एक अभिव्यक्त रूप है। मनुष्य को जब कार्य-कलेवर का चोला ओढ़कर जन्मना पड़ा तो उसे दैवी चेतना से तादात्म्य स्थापित करने के लिए कोई न कोई माध्यम तो बनाना ही होगा।
उपासनाऐं बिना जोखिम की होती हैं। किन्तु विज्ञान के प्रयोगों में प्रयोक्ता के लिए भी जान जोखिम बन जाती है। अणु संयन्त्र बनाने- बिगाड़ने में तनिक भी अस्त-व्यस्तता बन पड़े तो उसमें अपने लिए तथा दूसरों के लिए खतरा ही खतरा है।
उपासना करने एवं पारसियों द्वारा अग्नि पूजा के पीछे यही मनोवैज्ञानिक महत्व है।
उपासना विशेष के विज्ञान का आश्रय लेकर अपने छाया पुरुष उपार्जित करले तो उनकी सामर्थ्य उतनी ही स्वल्प होगी। वे दूसरों पर उतना ही सीमित प्रभाव छोड़ सकेंगे।
उपासना का समर्थन करते हैं, उन्हें भी साकार माध्यमों को किसी न किसी रूप में अपनाना पड़ता है। हमारे अपने ही आर्य समाजी बन्धु स्वर्णिम सविता को, वेद भगवान को मानते हैं, जो प्रकारान्तर से एक माध्यम प्रतीक ही तो हैं। ईसाई क्रूस का, मुसलमान काबा का, एवं पारसी बन्धु अग्नि का ध्यान करते देखे जाते हैं। यह भी वस्तुतः साकार ध्यान का ही प्रतीक है। नास्तिक समझे जाने वाले, धर्म को अफीम की गोली कहने वाले साम्यवादी भी मार्क्स, लेनिन की कब्रों पर पुष्प चढ़ाते एवं अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति करते हैं।
उपासना अनिवार्य है। बिना श्रद्धा-विश्वास के उपासना का आधार नहीं बन पाता। श्रद्धा अर्थात् सिद्धान्त निष्ठा- श्रेष्ठता से असीम एकात्मता। इस मूल आधार को लेकर की जाने वाली उपासना फलवती होती है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र की क्यों न हो? भौतिक क्षेत्र में सफलता प्राप्त व्यक्तियों से पूछा जाए तो उसके मूल में उनके कुछ गिने-चुने आदर्शवादी सिद्धान्तों से लगाव को ही धुरी के रूप में देखा जा सकता है।
उपासना का आधार नहीं बन पाता। श्रद्धा अर्थात् सिद्धान्त निष्ठा- श्रेष्ठता से असीम एकात्मता। इस मूल आधार को लेकर की जाने वाली उपासना फलवती होती है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र की क्यों न हो? भौतिक क्षेत्र में सफलता प्राप्त व्यक्तियों से पूछा जाए तो उसके मूल में उनके कुछ गिने-चुने आदर्शवादी सिद्धान्तों से लगाव को ही धुरी के रूप में देखा जा सकता है। आत्मिक जगत तो और भी अनूठा परब्रह्म की परोक्ष सत्ता का एक अभिव्यक्त रूप है।
उपासना कृत्य के रूप में सुझाया था। इसके लिए प्राचीन काल में सामूहिक धर्मानुष्ठानों- उपासना क्रमों का प्रचलन था। संकट की अवधि में प्रायः ऐसा किया जाता था और सुरक्षा व्यवस्था बना ली जाती थी। इसका वैज्ञानिक रहस्य यह है कि व्यक्ति समष्टिगत मानसिक एकाग्रता, जो उपासना का प्रधान लक्ष्य है, के आधार पर ब्रह्मांडीय चेतना से सम्बन्ध बनाता है तथा अपने चिन्तन के अनुरूप उसे प्रभावित करता है।
उपासना, साकार उपासना के आविष्कारक बने। शक्तियों के प्रतीक विभिन्न देवी-देवताओं का आविर्भाव इसी कारण हुआ। साकार माध्यमों की उपयोगिता इसलिए भी है कि चंचल मन न तो निराकार ब्रह्म की कल्पना कर सकता है, न ही एकाग्र चित्त ही हो सकता है। उसे दृश्य अवलम्बन देना आवश्यक है। साकार प्रतिमा में इष्ट की छवि देखने तथा उसमें अपनी श्रद्धा को सतत् आरोपित करते रहने पर वह और भी परिपुष्ट होती है।
उपासना क्षेत्र में प्रतीक आधारों का लगभग यही मनोविज्ञान है। ईश्वरीय सत्ता निराकार है पर हर साकार घटक में वह समायी हुई है। जीवात्मा की अभिव्यक्ति शरीर से होती है। परमात्मा की जड़ चेतन घटकों से युक्त इस विशाल ब्रह्मांड के रूप में सतत् अभिव्यक्ति होती रहती है। उसकी अनुभूति के लिए साकार घटकों से जुड़ना तथा अपना भाव परक सम्बन्ध स्थापित कर उसे सशक्त बनाना आवश्यक है।
उपासना का स्वरूप क्या हो, उस निराकार ब्रह्म से संपर्क स्थापित करने का माध्यम क्या बने, यह स्पष्ट नहीं हो पाता। हिन्दू धर्म में अनेकानेक मत प्रचलित हैं। कोई देवी की शक्ति के रूप में, देवता की चित्र अथवा मूर्ति के रूप में, परब्रह्म को वेदान्त के निर्धारणानुसार सोऽहम् के रूप में, कोई सविता के तेज के रूप में, अग्नि आदि देवता उनके प्रतीकों के रूप में देखता व अपने भाव चित्र तद्नुसार बनाता है। अन्यान्य धर्मावलम्बी भी किसी न किसी अवलम्बन का आश्रय लेते देखे जाते हैं। वस्तुतः ये सभी जो निराकार की उपासना का समर्थन करते हैं, उन्हें भी साकार माध्यमों को किसी न किसी रूप में अपनाना पड़ता है।
उपासना के लिए किसे आधार बनाया गया? ये प्रश्न उतने महत्वपूर्ण नहीं, जितना यह कि किस स्तर की श्रद्धा भावना का अभिसिंचन किया गया।
उपासना मात्र पर्याप्त नहीं। साधक को अपना निजी व्यक्तित्व सबल समर्थ बनाना होता है। क्योंकि शक्ति भीतर से उगती है। बाहर की वस्तुएं- जिनमें देवता भी सम्मिलित हैं, झलक झाँकी दिखाकर तिरोहित हो जाती हैं। छाया पुरुष के सम्बन्ध में यह बात नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-September
उपासना-सेवा को ही प्रमुख मानते थे और आत्मा को इन्हीं उपचारों से पोषण प्राप्त होने की बात कहते थे।
उपासना करते हैं। प्राण ही सूर्य, चन्द्र और प्रजापति है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-March
उपासना की है- स्वयं को धोया है- बदले में दैवी अनुकम्पा पाकर उससे अनेकों को अनुदान दिये हैं। अब लगभग अपने पूर्व में सम्पन्न गायत्री महापुरश्चरणों के समकक्ष प्रचण्ड साधना वे जीवन की शेषावधि में पूरी करना चाहते हैं। इसे परोक्षतः महाकाल की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण सोपान समझा जा सकता है। सूक्ष्मीकृत हो तप साधना से न केवल प्रस्तुत परिकर को, अपितु समस्त मानव समुदाय को युगसन्धि की इस बेला में मथ देने एवं समय की आवश्यकता को पूरा करने के लिए यह अनिवार्य भी था।
उपासना विशेषाँक
वार्षिक चंदा :- भारत में 40/- आजीवन -550/- विदेश में 350/
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-May
उपासना न करने देने एवं नागरिक अधिकार देने में व्यवहारतः अभी भी रूढ़िवादियों का एक बड़ा वर्ग अपनी हठधर्मी को उचित ठहराने में चित्र-विचित्र तर्क प्रस्तुत करता देखा जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-June
उपासना का तत्वदर्शन और स्वरूप समझाया। कह- “भगवान तुम्हारी मर्जी पर नहीं नाचेगा। तुम्हें भी भगवान का भक्त बनना और उसके संकेतों पर चलना पड़ेगा। ऐसा कर सकोगे तो तद्रूप होने का लाभ प्राप्त करोगे।”
उपासना क्षेत्र में निराशा छाई और अध्यात्म की उपहासास्पद बनने- बदनाम होने का लाँछन लगा। हमारे क्रिया-कृत्य सामान्य हैं। पर उसके पीछे उस पृष्ठ भूमि का समावेश है जो ब्रह्म तेजस् को उभारती और उसे कुछ महत्वपूर्ण कर सकने की समर्थता तक ले जाती है।
उपासना गायत्री माता की जप और सविता पिता का ध्यान करते हुए करते रहे। भावना एक ही रखी है कि श्रवणकुमार की तरह आप दोनों को तीर्थ यात्रा कराने के आदर्श का परिपालन करेंगे। आपसे कुछ माँगेंगे नहीं। आपके सच्चे पुत्र कहला सकें, ऐसा व्यक्तित्व ढालेंगे। आपकी निकृष्ट सन्तान जैसी बदनामी न होने देंगे।
उपासना क्रम को कड़ाई के साथ निबाहना है। संकल्प इसी बात का लिया जाता है। इसका प्रत्यक्ष प्रतिफल मनोबल की परिपक्वता है। इसी को आत्मशक्ति सम्पादन प्रक्रिया का प्राण कहना चाहिए।
उपासना के ऐसे हैं जैसे नशा पीने, ताड़ी खाने में जाने का, जो पिया है, उसकी खुमारी तो चौबीस घन्टे बनी रहती है। अपने को भगवान में और भगवान को अपने में अनुभव करते हुए क्षण गुजरते रहते हैं।
उपासना क्रिया प्रधान नहीं, श्रद्धा प्रधान रही है। निर्धारित जप संख्या को पूरा करने का अनुशासन कठोरतापूर्वक पाला गया है। प्रातः एक बजे उठ बैठने और निर्धारित संकल्प को पूरा करने में कभी कदाचित ही आपत्तिकाल में भूल हुई हो। जो कमी पड़ी है उसकी अगले दिनों पूर्ति कर ली गई। उपेक्षा में नहीं डाला गया इतने पर भी उस अवधि में भावनाओं से ओत-प्रोत रहने की मनःस्थिति बनाये रहने का अभ्यास किया गा है ओर वह सफल भी होता रहा है।
उपासना- चरित्र में साधना और व्यवहार में आराधना का समावेश करने में पूरी-पूरी सतर्कता और तत्परता बरती जाय। उस निर्देशन का अद्यावधि यथासम्भव ठीक तरह ही परिपालन हुआ है। उसी के कारण अध्यात्म अवलम्बन का प्रतिफल इस रूप में सामने आया है कि उसका सहज उपहास नहीं उड़ाया जा सकता।
उपासना के फलस्वरूप सही दिशाधारा मिलती है, वही मुझे भी मिली। दिशा एक ऋषि कल्प जीवन। देव मानव जैसा दृष्टिकोण। इसके लिए मात्र आदर्शवादी महामानवों के जीवनक्रम पर दृष्टि रखना और उसी से प्रेरणा लेनी पड़ती है। इन महाभागों में समीपवर्ती, संपर्क क्षेत्र को बहुत कम मिलते हैं।
उपासना नित्यकर्म में सम्मिलित रही। उसका लेखा-जोखा व्यर्थ है। शौच, स्नान, शयन, भोजन जैसे कार्य सभी की दिनचर्या में सम्मिलित रहते हैं। न उसका कोई लेखा-जोखा रखता है और न निन्दा परक मूल्यांकन करते हुए कोई उन पर ध्यान देता है। हमने अपनी उपासना को नित्य कर्म में सम्मिलित रखा है।
उपासना उतने तक ही सीमित समझी जाती है। जो इस विडंबना में से जितना अंश पूरा कर लेते हैं। वे अपने को भक्तजन समझने का नखरा करते हैं और बदले में भगवान ने उनकी मनोकामनाओं की पूर्ति नहीं की तो हजार गालियाँ सुनाते हैं। कई इससे भी सस्ता नुस्खा ढूँढ़ते हैं। वे प्रतिमाओं की सन्तों की दर्शक झाँकी करने भर से ही यह मानने लगते हैं कि इस अहसान के बदले यह लोग झकमार कर अपना मनोरथ पूरा करेंगे।
उपासना साधना और आराधना की वे तीनों ही शर्तें पूरी करें जो आध्यात्मिक विभूतियाँ उपार्जित करने के लिए आवश्यक हैं। ऐसे लोगों की औसत भारतीय-स्तर के निर्वाह से अपनी जीवनचर्या का नया अध्याय आरम्भ करना चाहिए और कटिबद्ध होना चाहिए कि जो क्षमता बचती है उसी भगवान के खेत में बोने का साहस जुटायेंगे। निश्चय ही यह साहस सौ गुना हजार गुना होकर फलित होता है।
उपासना साधना, आराधना का जो क्रम बताया था वे तीनों ही एक-से-एक बढ़कर थे। लोग उन अनुशासनों में से मात्र एक अत्यन्त प्रत्यक्ष को ही स्मरण रखे हुए हैं- 24 लक्ष पुरश्चरण को। वस्तुतः हमें जो मिला वह मात्र जप संख्या की परिणति नहीं है, वरन् समग्र जीवन में आध्यात्मिक आदर्शों का पूरी तरह समन्वय किये रहने का ही प्रतिफल है। इसके लिए आवश्यक परामर्श और दबाव देकर गुरुदेव ने हमारा कितना बड़ा उपकार किया इसका अनुमान वे लोग नहीं लगा सकते जिन्हें धन और पद के अतिरिक्त और कुछ चाहिए ही नहीं। जो इतनी ही मर्यादा में वरदान को सीमित रखते हैं।
उपासना का एकमात्र तत्वदर्शन। जो भगवान के समीप बैठना चाहे, वह उसी का निर्देशन अनुशासन स्वीकार करे। उसी का अनुयायी सहयोगी बने।”
उपासना, साधन और आराधना इन दोनों के समान समन्वय की आवश्यकता पड़ती है। इनमें से किसी अकेले के सहारे लक्ष्य तक नहीं पहुँचा जा सकता। कोई एक भी ऐसा नहीं है जिसे छोड़ा जा सके।
उपासना, जीवन साधना एवं समष्टि आराधना सम्बन्धी संदर्भ अपनी लेखनी से लिखे हैं। उनका जीवन क्रम बहुमुखी रहा है, तो भी उसमें से जितना भी सम्भव था, सर्वसाधारण हेतु हृदयंगम करने योग्य गायत्री-महाप्रज्ञा विषयक प्रेरणा प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।
उपासना, साधना, आराधना के रूप में भली प्रकार बता दिया था। नियमित जप-ध्यान करने का अनुबंधों समेत पालन करने के निर्देशन के अतिरिक्त यह भी बताया था कि चिन्तन में उपासना- चरित्र में साधना और व्यवहार में आराधना का समावेश करने में पूरी-पूरी सतर्कता और तत्परता बरती जाय। उस निर्देशन का अद्यावधि यथासम्भव ठीक तरह ही परिपालन हुआ है। उसी के कारण अध्यात्म अवलम्बन का प्रतिफल इस रूप में सामने आया है कि उसका सहज उपहास नहीं उड़ाया जा सकता।
उपासना का अर्थ है पास बैठना। यह वैसा नहीं है जैसा कि रेलगाड़ी के मुसाफिर एक-दूसरे पर चढ़ बैठते हैं। वरन् वैसा है जो कि दो घनिष्ठ मित्रों को दो शरीर एक प्राण होकर रहना पड़ता है। सही समीपता ऐसे ही गम्भीर अर्थों में ली जानी चाहिए। समझा जाना चाहिए कि इसमें किसी को किसी के लिए समर्पण करना होगा।
उपासना (3) स्वतन्त्रता संग्राम (4) धर्मतन्त्र से लोकशिक्षण। इन चार भागों में बाँटा जा सकता है। इनमें से प्रत्येक के साथ कितनी ही रोचक, आकर्षक और शिक्षाप्रद घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। उसमें से यदि कुछ का भी विवेचन वर्णन किया जाय तो विस्तार बहुत बड़ा हो जायेगा। इनमें से जहाँ-तहाँ के प्रसंग भी रोचक हैं और उन्हें औपन्यासिक ढंग से लिखने पर तो वे सरस और पढ़ने योग्य भी बन सकते हैं।
उपासनात्मक धारणा की परख है।
उपासना की परिणतियाँ फलश्रुति पढ़ी-सुनी गई थी। उसमें से कोई कसौटी पर खरी नहीं उतरी तो विश्वास टिकता भी कैसे ?
उपासना को नित्य कर्म में सम्मिलित रखा है। सूर्योदय से पूर्व उसे निपटा दिया है। क्योंकि उसे आत्मा का स्वच्छ और समर्थ रखने का आवश्यक दैनिक क्रिया-कलाप माना है। उसकी अतिरिक्त गणना क्या रखी जाय, उसकी शेखी क्या बघारी जाय?
उपासना का उपक्रम। यह समय ऐसी अच्छी तरह कटता रहा है, मानों आधे घण्टे में ही समाप्त हो गया, कभी न ऊब आई, न थकान, न जम्हाई। हर घड़ी नसों में आनन्द का संचार होता रहा और ब्रह्म सान्निध्य का अनुभव होता रहा। यह सहज सरल स्वाभाविक प्रक्रिया चलती रही है। न कहीं गणना करनी पड़ी, न कभी गर्व हुआ, न प्रमाण की अपेक्षा मन में उठी।
उपासना मान लिया गया और उतने पर ही आदि अन्त कर लिया गया। पूजा का अर्थ है हाथों तथा वस्तुओं द्वारा की गई मनुहार, दिये गये छुटपुट उपचार उपहार। पाठ का अर्थ है- प्रशंसा परक ऐसे गुणगान जिसमें अत्युक्तियाँ ही भरी पड़ी है। समझा जाता है कि ईश्वर या देवता कोई बहुत छोटे स्तर के हैं, उन्हें प्रसाद, नैवेद्य, नारियल, इलायची जैसी वस्तुएँ कभी मिलती नहीं। पावेंगे तो फूलकर कुप्पा हो जायेंगे।
उपासना, ध्यान धारणा फलवती हो चली है। मान्यता का गुण, कर्म, स्वभाव में परिवर्तित होना यही तो उपासनात्मक धारणा की परख है।
उपासना काल में इन्हीं कृत्यों को अपनाते हुए जप ओर ध्यान की प्रक्रिया पूरी करते रहा गया है।
उपासना साधना और आराधना के समन्वय से बनती है। यह तीनों कोई क्रियाकाण्ड नहीं है, जिन्हें इतने समय में, इस विधि से इस प्रकार बैठकर सम्पन्न करते रहा जा सके। यह चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में होने वाले उच्च स्तरीय परिवर्तन हैं। जिनके लिए अपनी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों पर निरन्तर ध्यान देना पड़ता है। दुरितों के संशोधन में प्रखरता का उपयोग करना पड़ता है और नई दिशाधारा में अपने गुण कर्म, स्वभाव को इस प्रकार अभ्यस्त करना पड़ता है जैसे अनगढ़ पशु−पक्षियों को सरकस के करतब दिखाने के लिए जिस-तिस प्रकार प्रशिक्षित किया जाता है।
उपासना के साथ उसका अनन्य एवं घनिष्ठ सम्बन्ध है। बिजली धातु में दौड़ती है, लकड़ी में नहीं। आग सूखे को जलाती है गीले को नहीं। माता बच्चे को गोदी तब लेती है जब वह साफ सुथरा हो। मल, मूत्र से सना हो तो पहले उसे धोएगी, पोंछेगी।
उपासना भी उन्हीं बारह घण्टों में भली प्रकार सम्पन्न होती रही है। बारह घण्टे इन तीनों कर्मों के लिए पर्याप्त रहे हैं। चार घंटा प्रातःकाल का भजन इसी अवधि में होता रहा है। शेष आठ घन्टे में नित्य कर्म और शयन- इसमें समय की कोताही कहीं नहीं पड़ी। आलस्य-प्रमाद बरतने पर तो पूरा समय ही ऐंड-बेंड में चला जाता है पर एक-एक मिनट पर घोड़े की तरह सवार रहा जाय तो प्रतीत होता है कि जागरुक व्यक्तियों ने इसी में तत्परता बरतते हुए वे कार्य कर लिये होते जितने के लिए साथियों को आश्चर्यचकित रहना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-February
उपासना के लिए सूर्य को ही प्रमुख आधार माना जाता रहा है।
उपासना होती रही है। अब कोई-कोई इस शब्द का अर्थ हनुमानजी से भी लगाते हैं।
उपासना है।
उपासना में हर घर परिवार के चौबीस बड़े सदस्य भाग लेने लगे हैं। खड़े-खड़े दस मिनट चौबीस गायत्री मन्त्रों का मानसिक उच्चारण और उदीयमान सूर्य का ध्यान किसी को भी न भारी पड़ा है न अखरा है। स्नान की- समय की अनिवार्यता न रहने से सुविधापूर्वक इतना कर लेने में किसी को भी आपत्ति नहीं हुई है। महाप्रज्ञा के चित्रों की घर-घर स्थापना का क्रम भी तेजी से चल पड़ा है।
उपासना की प्रमुखता प्राप्त थी। मन्दिर भी उन्हीं के बनते थे। पाँच सौ से पुराने मन्दिरों में उन्हीं की बहुलता है।
उपासना में सूर्योपस्थान और सूर्यार्घ दान की विशेष महत्ता है। हाथ ऊँचे करके सूर्योपस्थान में भी गायत्री जप किया जाता है और सूर्यार्घ के रूप में भी गायत्री मन्त्र का प्रयोग होता है। स्कन्द पुराण 4।9।46 में कहा गया है- “गायत्री मन्त्र द्वारा अभिमन्त्रित जल को जिसने तीन बार सूर्य के समक्ष अर्घ प्रदान किया उसने तीनों लोकों की भलाई के लिए बहुत कुछ किया।
उपासना का मन्त्र है। उसका देवता सविता है। सविता के भर्ग की याचना की गई है। उस भर्ग को प्रगतिशील प्रेरणा में नियोजित करने का अनुरोध आग्रह है।
उपासना को माना गया है। उसका नामकरण इसी आधार पर हुआ है।
उपासना करता है वह जीवन मुक्त होकर सूर्य लोक से परम पद प्राप्त करता है। यथा-
उपासना में सविता को ही प्रकारान्तर से आराधना की जाती है एवं उस दिव्य प्रकाश से स्वयं को ही नहीं- सृष्टि के हर प्राणधारी को जीवन, चेतना, सत्प्रेरणा प्रदान किये जाने की प्रार्थना की जाती है। चिन्तन को बहिरंग से मोड़कर अन्तर्मुखी बनाकर हर कोई सूर्य की दिव्य सामर्थ्य का लाभ उठाता रहा रह सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-August
उपासना के लिए सभी स्थान सभी समय शुभ हैं। भगवान का नाम लेने में कहीं कोई दोष नहीं है। फिर भी स्थान और काल की विशिष्टता से इन्कार नहीं किया जा सकता। फसल समय पर बोई जाय तो उसका परिणाम अलग होगा और कुसमय बोने पर उतना ही श्रम करने पर भी प्रतिफल स्वल्प रहेगा। यही बात समय या क्षेत्र के सम्बन्ध में भी है।
उपासना के माध्यम से आत्मा का परमात्मा के साथ ऐसा सघन सम्बन्ध सूत्र जुड़ता है जिससे दोनों के बीच आदान-प्रदान का तारतम्य जुड़ सके। यह वस्तुतः भावना क्षेत्र है। इसमें भक्ति की- रस सम्वेदना की उमंगें काम करती हैं। एकता और एकात्मता के लिए आत्मीयता आवश्यक है। एकता और आत्मीयता दोनों एक साथ रहती हैं।
उपासना में की जाती है। इसके लिए नाम जप या रूप ध्यान का आश्रय लिया जाता है। भगवान यों सर्वव्यापी होने के कारण निराकार हैं। इसलिए उनका नाम रूप तो नहीं हो सकता पर हमारे मन की बनावट ऐसी है जिसके अनुसार बिना नाम रूप से परिकल्पना एवं ध्यान धारणा नहीं हो सकती। इसके बिना उपासना का योगाभ्यास नहीं बन पड़ता।
उपासना के लिए चिन्तन-मनन के लिए बैठना पड़ता है। एकबार (1) आत्म समीक्षा (2) आत्म-सुधार (3) आत्म-निर्माण और (4) आत्म-विकास के सम्बन्ध में अपनी जाँच पड़ताल करने के लिए। दूसरी बात अपने गुण, कर्म, स्वभाव में संयम शीलता का कितना समावेश हो रहा है वह परखने के लिए। चार संयम ही, चार तप कहलाते हैं। इन्हें अपने में बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए।
उपासना स्थली पर ध्यान की स्थिति में उन्हें पाते थे। उनका कार्यक्षेत्र अब सारा विश्व है एवं अन्यान्य धर्म सम्प्रदायों के अनुयायियों के लक्ष्य, राष्ट्राध्यक्षों- मनीषियों के मध्य सूक्ष्म रूप में विचरण कर उन्हें सतत् सत्प्रेरणाएँ दे रहे हैं ताकि युग विभीषिकाएँ- देवी विपत्तियाँ टाली जा सकें एवं प्रज्ञायुग का स्वप्न साकार हो सके।
उपासना अर्थात्- चिन्तन। साधना अर्थात्-चरित्र। इन दो की चर्चा हो चुकी। अब तीसरी अध्यात्म परिष्कार प्रक्रिया है- आराधना। आराधना किसकी?
उपासना के सम्बन्ध में भी रहता है।
उपासना का अवलम्बन लिया जाता है।
उपासना के सम्बन्ध में रोक कभी भी नहीं है, पर आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में उसके लिए विशेष महत्व माना गया है। शास्त्रकारों ने उसका सौ गुना फल माना है। इसलिए विचारशील उपासक इस समय को चूकते नहीं और नौ दिन का अनुष्ठान कितना ही काम हर्ज होने पर भी करते हैं। साथ ही इसके लिए उपयुक्त स्थान तलाश करते हैं। जिन स्थानों में कुसंस्कार चिपके हैं वहाँ बैठ कर की गई साधना भी स्वल्प फलदायक होती है।
उपासना की जाती है। क्षुद्र को महान में- जीव को ब्रह्म में- परिवर्तित करने का यही उपाय है। उपासना करने से साधक तद्रूप बनता है। भगवान के गुण, भक्त में बढ़ना आरम्भ हो जाते हैं। समर्पण भावना से एकात्मता स्थापित होती है और अद्वैत स्थिति बनती है।
उपासना करनी चाहिए। स्नान बन पड़े तो प्रातःकाल नियम से बैठकर न्यूनतम पन्द्रह मिनट आद्य शक्ति युग शक्ति गायत्री की उपासना करनी चाहिए। जिनसे इतना न बन पड़े वे आँख खुलते ही बिस्तर ही पर बैठे गायत्री का जप एवं सविता का ध्यान करते रह सकते हैं।
उपासना, आराधना का त्रिविधि उपक्रम अपना कर प्रज्ञा परिजन पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना, जो युग धर्म की माँग पूरी करने हेतु उन्होंने प्रचण्ड तप पुरुषों के रूप में आरम्भ की है, के अंग बन सहज की श्रेयाधिकारी बन सकते हैं।
उपासना, जीवन साधना अथवा समाज सेवा की आराधना में से कोई भी मार्ग ऐसा हो सकता है, जिसे अपनाता हुआ मनुष्य आत्मिक विकास के सोपानों पर क्रमशः आगे बढ़ता चला जाए। जो भी क्रिया-कृत्यों अपनी अन्तःप्रेरणा को साधना उपादानों द्वारा सशक्त बनाने के लिए किये जाते हैं, वे ही सच्चे कर्मकाण्ड हैं एवं आध्यात्मिक विकासवाद की प्रक्रिया में उन्हें ऋषि मनीषियों ने गरिमापूर्ण स्थान भी दिया है।
उपासना, साधना और आराधना की त्रिधा अपनानी पड़ती है।
उपासना से दैवी अनुग्रह बरसता है और अदृश्य जगत की अतीन्द्रिय क्षमताओं का लाभ मिलता है।
उपासना (2) साधना (3) आराधना। उपासना के भाव क्षेत्र को साधना से चरित्र को और आराधना से व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश किया जाता है। यह तीनों साथ-साथ चलती हैं। जिस प्रकार अन्न, जल और वायु का साथ-साथ सेवन क्रम चलता रहता है उसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए हर किसी को अपने-अपने ढंग से उपासना, साधना और आराधना की त्रिधा अपनानी पड़ती है।
उपासना के भाव क्षेत्र को साधना से चरित्र को और आराधना से व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश किया जाता है। यह तीनों साथ-साथ चलती हैं। जिस प्रकार अन्न, जल और वायु का साथ-साथ सेवन क्रम चलता रहता है उसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए हर किसी को अपने-अपने ढंग से उपासना, साधना और आराधना की त्रिधा अपनानी पड़ती है।
उपासना का- भी वैसा ही प्रतिफल होना चाहिए। दो सरोवरों के बीच में यदि एक नाली बना दी जाय तो पानी ऊँची का नीची में चलने लगेगा और तब तक बहेगा जब तक दोनों का जल लेवल एक नहीं हो जाता। उपासना यदि सच्चे मन से की जाय तो उसका भी ऐसा ही प्रतिफल होना चाहिए। भक्त में भगवान की विशेषताएँ छलकनी चाहिए। हमने अपने उपासना क्रम में सदैव इन भाव तरंगों को अपने मानस पर आरोपित कर ऐसी ही अनुभूति की है एवं स्वयं को समग्र रूपेण इष्ट से घुला देने का प्रयास किया है।
उपासना का योगाभ्यास नहीं बन पड़ता। इसलिए अध्यात्म विज्ञान के मनीषियों ने भगवान के साथ तादात्म्य स्थापित करने के लिए कोई नाम रूप वाला ‘इष्टदेव’ स्थापित करने का निर्देशन दिया है। इस प्रतिमा के साथ समर्पण की एकात्म भावना स्थापित की जाती है और द्विधा का भेद मिटाकर एकात्म स्थिति का ध्यान किया जाता है। नाम भी बार-बार इसीलिए लिया जाता है कि इष्टदेव की स्मृति निरन्तर बनी रहे।
उपासना, साधना की सफलता एवं चेतना को परमसत्ता के समीप पहुँचाकर उसके दिव्य अनुदानों का रसास्वादन करा सकने में ये चारों आधार प्रमुख भूमिका संपादित करते हैं। इनका अवलम्बन लेकर कोई भी साधक प्रगति के उच्चतम शिखर पर पहुँच सकता है।
उपासना यदि सच्चे मन से की जाय तो उसका भी ऐसा ही प्रतिफल होना चाहिए। भक्त में भगवान की विशेषताएँ छलकनी चाहिए। हमने अपने उपासना क्रम में सदैव इन भाव तरंगों को अपने मानस पर आरोपित कर ऐसी ही अनुभूति की है एवं स्वयं को समग्र रूपेण इष्ट से घुला देने का प्रयास किया है।
उपासना का अर्थ है- समीप बैठना। समीप बैठने से अधिक प्रभावशाली के गुण, कम प्रभावशाली में आना आरम्भ कर देते हैं। चन्दन के समीप उगी हुई झाड़ियों में भी सुगन्ध आने लगती है। स्वाति बूँद पड़ने से सीप में मोती, बाँस में बंसलोचन, केला में कपूर उत्पन्न होने की किम्वदंती है। पारस छूने से लोहा सोना बनता है।
उपासना, साधना के बीच पुष्पित, पल्लवित हो ही नहीं सकते। इस दृष्टि से प्रेम तत्व के विकास के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। यह पर पीड़ा निवारण, समाज में संव्याप्त दुःख-क्लेशों की निवृत्ति के लिए किया जाने वाले प्रयोग द्वारा ही संभव है।
उपासना, साधना और आराधना की कसौटी पर कस कर यह जाना जा सकता है कि किसकी भक्ति सच्ची है किसकी झूठी?
उपासना, साधना और आराधना की जीवनचर्या में नित्यकर्म की तरह स्थान देना चाहिए। आत्मशोधन और आत्म परिष्कार के दोनों प्रयोजन इसी आधार पर बन पड़ते हैं।
उपासना क्रम में सदैव इन भाव तरंगों को अपने मानस पर आरोपित कर ऐसी ही अनुभूति की है एवं स्वयं को समग्र रूपेण इष्ट से घुला देने का प्रयास किया है।
उपासना करने से साधक तद्रूप बनता है। भगवान के गुण, भक्त में बढ़ना आरम्भ हो जाते हैं। समर्पण भावना से एकात्मता स्थापित होती है और अद्वैत स्थिति बनती है। इसके लिए बिन्दु सिन्धु जैसा ईंधन आग जैसा, पतंगे दीपक जैसा- बेल पेड़ जैसा- पतंग उड़ाने वाले जैसा ध्यान करने में, नदी सरोवर के मिलन में यही भाव है। सीमित ‘स्व’ के विराट् ‘त्वम्’ में विसर्जित करने से क्षुद्रता मिटती और महानता प्रकट होती है।
उपासना, साधना के चरण पूरे हुए, अब आराधना का- समाज सेवा का समय आ गया। उन्होंने जल्दी ही अनिवार्य सेवा निवृत्ति ले युग देवता के चरणों में अपनी श्रद्धाँजलि चढ़ाने का संकल्प लिया है।
उपासना करनी चाहिए। जिनसे इतना न बन पड़े वे आँख खुलते ही बिस्तर ही पर बैठे गायत्री का जप एवं सविता का ध्यान करते रह सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-July
उपासना, साधना, आराधना की विधा जिसे जीवन चर्या के साथ गूँथने पर जीवन त्रिवेणी संगम जैसा पवित्र, प्रखर, और प्रामाणिक बनता है और फिर काक के पिक एवं बगुले के हंस बनने में कोई बाधा मार्ग में नहीं आती।
उपासना का वैज्ञानिक आधार क्या है? मनःशक्तियों के विकास में साधना उपचार किस प्रकार सहायक सिद्ध होते हैं? ऋषिकालीन आयुर्विज्ञान का पुनर्जीवन कर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को कैसे अक्षुण्ण बनाया जा सकता है, गायत्री की शब्द शक्ति एवं यज्ञाग्नि की ऊर्जा कैसे व्यक्तित्व को सामर्थ्यवान एवं पवित्र तथा काया को जीवनी शक्ति सम्पन्न बनाकर प्रतिकूलताओं से जूझने में समर्थ बना सकती है, ज्योतिर्विज्ञान के चिर पुरातन प्रयोगों के माध्यम से आज के परिप्रेक्ष्य में मानव समुदाय को कैसे लाभान्वित किया जा सकता है, ऐसे अनेकानेक पक्षों को हमने अथर्ववेदीय ऋषि परम्परा के अंतर्गत अपने शोध प्रयासों में अभिनव रूप में प्रस्तुत कर दिये हैं। हमने उनका शुभारम्भ कर बुद्धिजीवी समुदाय को एक दिशा दी है, आधार खड़ा किया है। परोक्ष रूप में हम उसे सतत् पोषण देते रहेंगे।
उपासना, साधना, आराधना के निमित्त सुनिश्चित रूप से निकालना चाहिए।
उपासना, जीवन साधना एवं तपश्चर्या की सहायता से भी हो सकता है। ऋषिकल्प- महामानवों का सान्निध्य, सद्भाव और अनुदान तो इस प्रयोजन के लिए सर्वोपरि रहेगा ही।
उपासना- आराधना के क्रम से जो प्रत्यक्ष भूमिका बनायी है, उसके कई अध्याय पूरे हो चुके। अब उपसंहार भर शेष है। यही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होगा जो वर्तमान को आमूल-चूक बदल डालेगा। आत्मसत्ता के सूक्ष्मीकृत रूप में प्रकटीकरण की क्या चमत्कारी परिणतियां हो सकती हैं इसे अगले दिनों स्पष्टतः देखा जा सकेगा।
उपासना द्वारा अध्यात्म चेतना की सर्वोच्च स्थिति को प्राप्त कर लिया होता है, वे जन्मते हैं। ये दिव्यात्माएं ऋषि आत्माएं कहलाती हैं एवं आत्म सत्ता को ऊंचा उठाने वाले धर्म के मर्म का परिचय जन-साधारण को देती हैं। समय-समय पर परिस्थिति विशेषानुसार उनका प्राकट्य होता रहता है एवं उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान-सत्पथ के माध्यम से उस काल के सामान्य पुरुष, जिनका वर्णन प्रारम्भ में जागृतावस्था में समय व्यतीत करने वालों के नाम से किया गया, आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ते एवं जीवनमुक्त होते जाते हैं। सृष्टि की कल्प- मन्वन्तर व्यवस्था कुछ ऐसी है कि हर समय ऐसी दिव्यात्माएं सूक्ष्म जगत में अपने क्रिया-कलापों में संलग्न रहती हैं। इसी कारण धर्म का- श्रेष्ठता का- आदर्श निष्ठा का सर्वथा लोप नहीं हो पाता।
उपासना के लिए सदैव महामानव अवतरित हुए हैं। उसी कड़ी में यदि मुझे एकाकी पुरुषार्थ हेतु नियोजित होना पड़े तो यह मेरा परम सौभाग्य होगा।”
उपासना छोड़ दी, शक्ति ने हमें छोड़ दिया। माँ न अब हमारे दिल में है, मस्तिष्क में है, भुजाओं में है।....... इस विशाल राष्ट्र के पुनर्गठन के कितने प्रयत्न किए गए, जाने कितने आन्दोलन हुए- धर्म, समाज, राजनीति सभी क्षेत्रों में, लेकिन सदैव दुर्भाग्य साथ रहा। हमारी शुरुआतें महान होती हैं। पर न तो उनसे नतीजे निकलते हैं, न कोई तात्कालिक फल ही हाथ लगता है।
उपासना उन सब से कराने का संकल्प पूरा करें। लगन और उत्साह जहाँ भी होगा वहाँ इतना बन पड़ना कुछ कठिन नहीं है।
उपासना :- प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर एक माला गायत्री जप आत्मोत्कर्ष के लिए एवं एक माला वातावरण परिवर्तन के लिए करना चाहिए। साथ ही आत्मा को परमात्मा के साथ लिपट जाने का भाव भी करना चाहिए। ईंधन आग की तरह, नाले नदी की तरह, बिन्दु सिन्धु की तरह, पतंगे दीपक की तरह। आदर्शों के समुच्चय विराट् ब्रह्म के साथ अपनी सत्ता इसी प्रकार विसर्जित करनी चाहिए। बांसुरी वादक की तरह, पतंग उड़ाने वाले की तरह उसी के संकेतों पर चलने का निश्चय करना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-November
उपासना का क्रम निराकार हो अथवा साकार दोनों ही स्थितियों में सूर्यमण्डल की स्थापना अनिवार्य रूप से रहेगी। प्रकाश के तेजोवलय को समन्वित किये बिना ही गायत्री महाशक्ति का ध्यान हो ही नहीं सकता इसलिए शास्त्रों में कहा गया है।
उपासना से मोक्ष लाभ अर्थात् वासना एवं तृष्णा के बन्धनों से छुटकारा मिलना प्रसिद्ध है।
उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मू. 80 पैसा मात्र 15 पुस्तकों के सैट का मूल्य 12 रु. ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं।
उपासना करने वाले पुस्तक, पुष्प, कमण्डल, मालाएं धारण किये हुए मातृशक्ति का सूर्य मण्डल के मध्य में विराजमान ध्यान करते हैं। निराकार उपासना करने वाले चिदाकाश एवं महदाकाश में प्रतिष्ठित तेज मण्डल के रूप में उस का ध्यान करते हैं। उपासना का क्रम निराकार हो अथवा साकार दोनों ही स्थितियों में सूर्यमण्डल की स्थापना अनिवार्य रूप से रहेगी। प्रकाश के तेजोवलय को समन्वित किये बिना ही गायत्री महाशक्ति का ध्यान हो ही नहीं सकता इसलिए शास्त्रों में कहा गया है।
उपासना करने वाले चिदाकाश एवं महदाकाश में प्रतिष्ठित तेज मण्डल के रूप में उस का ध्यान करते हैं। उपासना का क्रम निराकार हो अथवा साकार दोनों ही स्थितियों में सूर्यमण्डल की स्थापना अनिवार्य रूप से रहेगी। प्रकाश के तेजोवलय को समन्वित किये बिना ही गायत्री महाशक्ति का ध्यान हो ही नहीं सकता इसलिए शास्त्रों में कहा गया है।
उपासना में आदेश मिला कि वहाँ वे भाई के यहाँ ही ठहरें। लन्दन पहुँचे तो आई का तार मिला कि वहाँ बर्फ गिर रही है, अतः वहाँ न आकर वे बहिन के यहाँ जाएं। उन्होंने जो आदेश सुना था उसी के अनुसार वे सीधे भाई के घर ही पहुँचे 5 सदस्यों का काफिला साथ था। भाई ने उन्हें आश्चर्य से बताया कि वे प्रातः से यही कामना कर रहे थे कि वे सीधे यहीं आएं, बहिन के यहाँ न जाएं क्योंकि उनके तार देने के बाद उनके यहाँ बर्फ गिरना बन्द हो गयी व बहन के यहाँ इतनी जल्दी व इतनी अधिक बर्फ गिरी कि रास्ता, सड़कें सब बन्द हो गयीं। भाई व बहन के बीच 3500 किलोमीटर की दूरी है।
उपासना कर के कोई भी व्यक्ति वह लाभ ले सकता है, जिसके लिए यह मानव शरीर उपलब्ध हुआ है।
उपासना करो, साधना का समय हो गया है।” वे तब से नियमित रूप से प्रातः जल्दी उठने लगे, देखते-देखते वातावरण बदल गया। सारा घर उपासना करने लगा है। अब वे कार्यकर्ता के रूप में भी सक्रिय होने का प्रयास कर रहे हैं।
उपासना करने लगा है। अब वे कार्यकर्ता के रूप में भी सक्रिय होने का प्रयास कर रहे हैं।
उपासना में बैठ गया। 24 अगस्त को शाम को उन्हें गुरुदेव के सूक्ष्म रूप में दर्शन हुए। सन्देश मिला कि आज रात्रि को वह व सारे विमान यात्री सकुशल लौट आएंगे वे दिल्ली पहुँचे व विमान तल पर इसी सूचना को उद्घोषक के मुंह से सुना। भिलाई के श्री रामकुमार श्रीवास 22 अगस्त को पूजा स्थली पर निराश मनःस्थिति में आकर बैठे ही थे कि एक लम्बा काला करैत सर्प उनके सामने आकर बैठ गया। देखकर वे भयभीत तो हुए पर गुरुदेव का ध्यान करते ही उनका भय भाग गया।
उपासना ही इन्हें सिखायी नहीं गयी है, वरन् उनके चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उन उत्कृष्टताओं का समावेश किया गया है, जो व्यक्तित्व को वरिष्ठता की दिशा में उभारती उछालती है। इनकी गतिविधियों में कुछ नवीनताएँ आयी हैं। ऐसी नवीनता जो देश, धर्म, समाज और संस्कृति के बारे में लगनशील विचार कर सके। न केवल विचार वरन् उसके लिए कुछ कहने लायक पराक्रम भी दिखा सके। ऐसा पराक्रम जो दूसरों को भी अपनी ओर आकर्षित कर सके, जो अन्यान्यों को भी कुछ ऐसा करने की प्रेरणा दे सके।
उपासना के किये गये उपचार इसी हेतु हैं कि धूप, द्वीप, नैवेध अक्षत, चन्दन, पुष्प आदि उपादेय पवित्र वस्तुएं भगवान को समर्पित करने का प्राथमिक समर्पण करने का अभ्यास करके अपने सद्गुणों की माला ईश्वर के गले में पहनावें और सत्कर्म करते हुए सच्चे अर्थों में ईश्वर को प्रसन्न करने का प्रयत्न करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-December
उपासना विशेषाँक
वार्षिक चंदा :- भारत में 40/- आजीवन -550/- विदेश में 350/
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-January
उपासना का इष्ट भगवान है। इसलिए उतने समय तक उसी पर चित्त को बाँधकर रखा जाये तो भविष्य में ऐसा मानस बनता है जिसे यथा समय आत्म शिक्षण के लिए नियोजित उपक्रमों में संलग्न किया जा सके।
उपासना के आधार पर ही बन पड़ती है। भक्त और भगवान दो के बीच ही उस स्थिति में आदान प्रदान चलता है। कथा पाठ के आधार पर दिव्य और चरित्रों का दिव्य गुणों का चित्रण मानस पटल पर बनता है। इसके लिये संसारी घटनाक्रम के साथ सम्बन्ध जोड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती वरन् दिव्य लोक में चलते रहने वाले दैवी प्रवाहों के साथ सम्बन्ध जोड़ लेने से काम चल जाता है। भगवान को सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय माना गया है।
उपासना और साधना का तात्विक पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि अध्यात्म विज्ञान का सारा ढाँचा ही प्रगति के लिए आवश्यक ऊर्जा उत्पन्न करने की प्रेरणा देता है। यह ऊर्जा तपश्चर्या के माध्यम से ही उत्पन्न होती है।
उपासना भी करता रहा और स्वावलम्बी बनकर सम्मान पूर्वक दिन गुजारने लगा।
उपासना हो सकती है और उसका भोजन करने से पूर्व कोई भी निर्वाह कर सकता है। इसमें तो स्नान जैसा बंधन भी नहीं है।
उपासना का मूल प्रयोजन पूरा ही नहीं होता।
उपासना करने वालों के आत्मिक विभूतियों को प्राप्त करने के लिए उपयुक्त पुरुषार्थ करने का सिद्धान्त सहज ही समझ में आ सकता है, यदि वे यह समझ सकें कि आत्मिक पुरुषार्थ का नाम तपश्चर्या है। इसी मार्ग पर चलते हुए प्राचीन काल में महान आत्मवेत्ता उच्चस्तरीय सफलतायें प्राप्त कर सकने में सफल हुए हैं। भागीरथ का गंगावतरण- पार्वती का शिव वरण तप साधना से ही सम्भव हो सका था। तपस्वी दधीचि की अस्थियों से ही व्यापक असुर साम्राज्य को ध्वस्त करने वाला वज्र बना। ध्रुव को परम पद तप से ही मिला।
उपासना यह हो सकती है कि सिर झुकाकर हाथ जोड़कर आँखें बन्द करके चौबीस बार मन ही मन गायत्री मंच का मानसिक जप कर लिया जाय और साथ ही प्रातःकालीन अरुणोदय के रूप में स्वर्णिम सविता का ध्यान करते रहा जाय। ध्यान का अर्थ छवि दर्शन ही नहीं उसकी प्राण ऊर्जा का व्यक्तित्व के कण-कण में समावेश की भावना करनी भी है। चौबीस मंत्र जपने में तीन मिनट लगते हैं। इतनी ही देर साथ-साथ सविता का ध्यान और दिव्य प्रकाश का अन्तः चेतना में अवतरण की भावना भी करते रहा जाय। इतने भर से न्यूनतम उपासना हो सकती है और उसका भोजन करने से पूर्व कोई भी निर्वाह कर सकता है।
उपासना एवं आराधना की गाड़ी चलती है। बुद्धि के परिष्कृत स्वरूप विवेक का सम्बल मिल जाने से श्रद्धा एक ऐसी प्राणवान शक्ति बन जाती है जो साधक को सतत् आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। उसकी सामर्थ्य की महिमा के गुणगान से शास्त्रों के पन्ने भरे पड़े हैं। “भवानी शंकरौ वन्दे, श्रद्धा विश्वास रूपिणी”, के रूप में अपना आन्तरिक उद्गार व्यक्त करते हुए मानसकार ने श्रद्धा को साक्षात् भवानी और विश्वास को शंकर मानकर अभ्यर्थना की है। इसी सत्य को इस प्रकार भी व्यक्त किया गया है।
उपासना आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है।
उपासना की भी एक मर्यादा बन चले। यह प्रज्ञा युग की अवतरण बेला है। गायत्री महामन्त्र में युग प्रज्ञा के समस्त तत्वों का समावेश है। किसी उपयुक्त स्थान पर महाप्रज्ञा गायत्री का एक चित्र स्थापित किया जाय। पूजा स्थल रहे उस पर चित्र प्रतिमा सजे तो और भी अच्छा अन्यथा दीवार पर चित्र इस प्रकार लगाया जाय कि उसका दर्शन और नमन-वन्दन हर किसी के लिए सम्भव हो सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-June
उपासना को दिया गया है, क्योंकि यही सही अर्थों में मनोवैज्ञानिक एवं व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का आधार है। गंगा की गोद एवं देवात्मा हिमालय की छत्रछाया में इस प्रशिक्षण का महत्व और भी बढ़ जाता है। इसकी व्यावहारिक प्रक्रियाओं को जानकर प्रवासीजन सही मायने में भारतीयता एवं भारतीय-संस्कृति के मूलतत्त्व को आत्मसात् कर सकेंगे।
उपासना का व्यावहारिक मार्गदर्शन, 2. संस्कृति शिक्षण, 3. परिवार समाज एवं विश्वमानवता के प्रति उनका दायित्व-बोध
उपासना के साथ स्वावलम्बी जीवन का अभ्यास भी प्रारम्भ कर दिया।”
उपासना है। आदिशक्ति की महिमा-महत्ता से परिचित होने पर चित्त की वह हीनग्रन्थि सहज में खुल जाती है, जिसकी वजह से वे तरह-तरह से ठगे जाते रहे, जो धन और भावनाएँ अभी तक इस कुचक्र में खपती रही, उन्हें लोकमंगल में नियोजित करने पर पुण्यलाभ तो होगा ही, साथ में परमात्मा की सहज कृपा मिलने से जीवन की अगणित समस्याएँ अपने आप सुलझ जाएँगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-November
उपासना में पिरामिडीय टोप का उपयोग करते थे। इसके द्वारा उनका उद्देश्य सूर्य की विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा को मस्तिष्क में केंद्रित कर ग्रहण करना था।
उपासना आदि का नाश करने लगे।”
उपासना और यज्ञ, यही दो आधार युगनिर्माण योजना के भी है। उपासना के दो भाग हैं-१ धर्म या अध्यात्म अर्थात् अपने आपको तत्त्वदर्शन धार्मिक विज्ञान) के द्वारा सृष्टि के मूल परमात्मा, जगतनियंता या विश्व-व्यवस्था के साथ जोड़ना, (२) संस्कृति अर्थात् मानवीय जीवन के अज्ञान और आसक्ति को कम करते हुए, प्रक्षालित करते हुए स्वर्ग और मुक्ति की ओर अग्रसर होना। प्रथम में जप, तप, योग आदि आते हैं, दूसरे में स्वाध्याय, सत्संग, संस्कार, सामाजिक सभ्यता और शिष्टाचार की वह सब बातें आती हैं, जो अपनी प्रसन्नता के लिए हम औरों से चाहते है।
उपासना कर रहा हो। उसका यह क्रम भीषण धूप और लू में भी सायं चार बजे तक चलता रहता हैं। सायंकाल घर में घुसने से पहले वह अपने अगले पैरों से घर का कुंडा खटखटाता हैं घर में घुसने के बाद दो फीट ऊँचे नल को खेल कर स्वयं पानी पी लेता है।
उपासना के दो भाग हैं-१ धर्म या अध्यात्म अर्थात् अपने आपको तत्त्वदर्शन धार्मिक विज्ञान) के द्वारा सृष्टि के मूल परमात्मा, जगतनियंता या विश्व-व्यवस्था के साथ जोड़ना, (२) संस्कृति अर्थात् मानवीय जीवन के अज्ञान और आसक्ति को कम करते हुए, प्रक्षालित करते हुए स्वर्ग और मुक्ति की ओर अग्रसर होना। प्रथम में जप, तप, योग आदि आते हैं, दूसरे में स्वाध्याय, सत्संग, संस्कार, सामाजिक सभ्यता और शिष्टाचार की वह सब बातें आती हैं, जो अपनी प्रसन्नता के लिए हम औरों से चाहते है।
उपासना देवार्चन यज्ञ ध्यान परलोक पुनर्जन्म आदि को कोई नहीं मानता। खाना पीना प्रजनन और पैसा जुटाना यही लोगों के लक्ष्य रह गये है। शील सच्चरित्रता नष्ट होते जा रहे है। इन बुद्धिवादियों को ठिकाने लगाने का एक महत्वपूर्ण कार्य युग-निर्माण प्रक्रिया का अंग है और वह धर्म के प्रबुद्ध स्वरूप के विस्तार द्वारा ही संभव है। लोहे को लोहा काटता है।
उपासना शुरू करें, साधन-सम्पदा मिलते चले जायेंगे। श्रम का लक्ष्मी से अटूट रिश्ता है। दरिद्र और कंगाल बने रहे या लक्ष्मी का आवाहन कर अपने कोठा भरे? फैसला हमें करना है, निर्णय हमें लेना है।
उपासना आदि) तो मात्र रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल-सड़क पर लगे संकेत-पट मात्र है जो दिशा-निर्देश भर करते है। इन्हें ही हमें सब कुछ नहीं मान लेना चाहिए। संदर्भ है साधना के क्षेत्र में प्रवेश करने वालों के मार्ग में आने वाले विघ्नों का। जब ये विघ्न आते है। तो उन्हें अधिकांश पहचान नहीं पाते एवं कभी-कभी अपनी अनुभूति के प्रतीक रूप में मानकर भ्रमित भी हो जाते है।
उपासना फिर देव-उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मंत्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते है इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान नहीं देते।
उपासना-साधना-जप-प्राणायाम के दौरान होने वाले इन अनुभवों के मूल कारण को समझ उसने उपचार के विषय में अच्छी तरह जान लेना चाहिए। नहीं तो बार-बार साधना की सफलता न मिलने पर निराशा का सामना या मतिभ्रम के कारण व्यवधानों को अनुभूति का एक हिस्सा मान लेने की विडम्बना झेलनी पड़ेगी।
उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मंत्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते है इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान नहीं देते।
उपासना जब तक पूरी न कर लेंगे, खाएँगे नहीं। यह क्या है? यह व्रतशीलता के साथ में जुड़ा हुआ थोड़ा-सा अनुशासन है।
उपासना की शिक्षा देते है। कल्कि भगवान इसी गायत्री तत्व और संस्कारों द्वारा जनमानस को संशोधित करने और उन्हें यथार्थ में ईश्वर-बोध कराने की प्रतिज्ञा करते है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि गायत्री उपासना और समाज में ब्राह्मणत्व के सच्चे आविर्भाव के लिए जो लोग प्रयत्न व परिश्रम करेंगे वह कल्कि की इच्छा की पूर्ति वाले उनके सहायकगण वह देवात्माएँ ही होती है जो एक निश्चित संकल्प लेकर अवतार के साथ जुड़ी हुई जन्म लेती है।
उपासनाएँ सफल क्यों नहीं होती? (मार्च १९८२) में लिखा है-घृत सेवर का लाभ वही उठा सकता है जिसकी पाचनक्रिया ठीक हो। देवता और मंत्रों का लाभ वे ही उठा पाते है जिनने अपने व्यक्तित्व की भीतर और बाहर से विचार और आचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है। जो बताए हुए अनुपात और पथ्य का भी ठीक तरह से प्रयोग करते है। अतः पहले आत्म-उपासना फिर देव-उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है।
उपासना और समाज में ब्राह्मणत्व के सच्चे आविर्भाव के लिए जो लोग प्रयत्न व परिश्रम करेंगे वह कल्कि की इच्छा की पूर्ति वाले उनके सहायकगण वह देवात्माएँ ही होती है जो एक निश्चित संकल्प लेकर अवतार के साथ जुड़ी हुई जन्म लेती है।
उपासना तपस्या आदि आत्मिक उपार्जनों पर ही ध्यान केंद्रित न कर ऋषिगणों ने यह भी देखा है कि इस भावनात्मक उत्पादन का प्रयोग-उपयोग कि प्रयोजन के लिए किया जा रहा है। इसीलिए भारतीय दर्शन इतना व्यावहारिक व हर देश-काल परिस्थिति के लिए उपादेय माना जाता रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-February
उपासना का प्राण है-समर्पण। बस समर्पण कर लीजिए, फिर देखिए ऐसे ही मारा-मारी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। मैं पहले ही कहे देता हूँ कि माला मत फिरा, समर्पण करना सीख। बेटा ऐसा कर, इसमें बाँस के बाँसुरी की तरह अपने को खाली कर दें। फिर देख मजा आ जायेगा।
उपासना का, स्वाध्याय-सत्संग का एकमात्र प्रयोजन इस आत्मकाल को उत्पन्न करने की, मनः स्थिति बनाना ही है। अवांछनीयताओं के अभिवर्धन का शौर्य साहस प्रदर्शन करने से आत्मबल बढ़ता है। बढ़ा हुआ आत्मबल ही वह शक्ति है,
उपासना में भी यही अभ्यास काम दे जाता है। यदि हर काम आधे मन से करने की आदत होगी तो फिर पूजा ही तन्मयतापूर्वक कैसे सम्भव होगी।
उपासना के लिए एक घण्टे का समय भी पर्याप्त हैं साधना अहर्निश होनी चाहिए एक क्षण भी साधना अहर्निश होनी चाहिए एक क्षण भी साधना विरत नहीं किया जाना चाहिए। प्रमाद जहां भी जब भी आएगा, शैतान को चढ़ दौड़ने का अवसर मिल जाएगा। चौकीदार थोड़े समय कि लिए सो जाए, तो चोरों को घात लगाने में देर नहीं लगती। हम तनिक भी प्रमाद बरतेंगे, तो मस्तिष्क पर दुर्भावनाओं का और शरीर तो मस्तिष्क पर दुष्प्रवृत्तियों का आक्रमण होते देर नहीं लगेगी। युगपरिवर्तन की अवधि में अपनायी जानें वाली साधना पद्धति इसी तथ्य को ध्यान में रखकर साधकों को दी जा रही है, ताकि वे अध्यात्म एवं युगान्तरकारी गतिविधियों के ध्रुवकेंद्र देवात्मा हिमालय एवं वहां निवास करने वाली विभूतियों से जुड़े रहे और निरंतर हो रहे आसुरी आक्रमणों से सुरक्षित रह सकें।
उपासना पर बैठना चाहिए। इस एक घण्टे के तीन भाग किये जा सकते है। (1) पन्द्रह मिनट खेचरीमुद्रा (2) पन्द्रह मिनट-ज्योति अवतरण प्राणयोग (सोऽहम्) साधना (3) आधा घण्टा गायत्री जप-सूर्यार्घ्यदान।
उपासना का युग्म कहा जाता है। दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन साधना है। और सत्प्रवृत्तियों का संस्थापन उपासना। असुरता का उन्मूलन और देवत्व का पोषण, यही धर्म-धारणा है और यही ईश्वर-आराधना। यह तथ्य यदि गहराई से समझ लिया जाए तो तत्वदर्शन के उस मूल प्रयोजन को समझा जा सकता हैं जिसके लिए आस्तिकता और धार्मिकता का विशालकाय कलेवर दूरदर्शी ऋषियों ने खड़ा किया है।
उपासना। असुरता का उन्मूलन और देवत्व का पोषण, यही धर्म-धारणा है और यही ईश्वर-आराधना। यह तथ्य यदि गहराई से समझ लिया जाए तो तत्वदर्शन के उस मूल प्रयोजन को समझा जा सकता हैं जिसके लिए आस्तिकता और धार्मिकता का विशालकाय कलेवर दूरदर्शी ऋषियों ने खड़ा किया है। आत्मिकप्रगति की दिशा में इन्हीं दो कदमों को क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ाते हुए सभी अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सकते है। यह तो हुआ सनातन और शाश्वत सत्य।
उपासना एवं साधनामिश्रित क्रियापद्धति के साथ युगसाधकों को वर्ष में दो नवरात्रि साधनाएं तथा सप्ताह में एक दिन गुरुवार का एक समय का अस्वादव्रत एवं रविवार का उपवास अनिवार्य रूप से करना चाहिए। सूर्य तत्व ही युगपरिवर्तन को हलचलें अहर्निश उत्पन्न कर रहा है इस सत्य से सभी दिव्यद्रष्टा एवं सूक्ष्मवेत्ता सहमत हैं युगपरिवर्तन की अवधि के इन वर्षों में सौरचेतना का महत्व असाधारण है गायत्री सूर्य की ही दिव्यचेतना शक्ति है रविवार का साप्ताहिक उपवास इससे अपने आपको एकात्म करने के लिए समर्थ एवं सार्थक उपाय है साधना के इस क्रम को आन्तरिक श्रद्धा एवं गहन निष्ठापूर्वक अपनाने वाले अनुभव करेंगे कि उसकी प्रखर उपलब्धियां विश्वात्मा के चरणों में समर्पित होने के लिए उमड़ी पड़ रही है। उनकी स्फूर्ति प्रतिभा एवं समर्थता फूटी पड़ रही है। यही नहीं अपने समर्थ व्यक्तित्व के बल पर महापरिवर्तन की इस अवधि में वे ऐसा कुछ कर दिखायेंगे जिसे युगों तक याद किया जा सकें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-August
उपासना कहते हैं। इसी आधार से पूर्णता प्राप्त होती है।
उपासना है।
उपासना करनी चाहिए।
उपासना कैसे होती है? प्रजापति ने कहा-उचित जिज्ञासा करते हुए उसका श्रद्धापूर्वक सही समाधान खोजने की चेष्टा को उपासना कहते हैं। इसी आधार से पूर्णता प्राप्त होती है।
उपासना सिखायेंगे और निष्ठा कना सिखायेंगे। अगर आपकी देखा-देखी यही ढीलम-पोल कार्यकर्ताओं में भी चालू हो गई हो तो फिर सब काम बिगड़ जाएगा। अतः आप उपासना निष्ठापूर्वक करना, चाहे आप आधा घंटा ही करना, पर नियमपूर्वक जरूर करना। भूलना मत कभी अगर कभी आपने ऐसा करना शुरू कर दिया कि आप साढ़े आठ बजे उठे और बहाना बना दिया कि साहब आज तो रात को देर हो गयी थी और साहब आपके यहाँ तो जगह भी नहीं है। आपके यहाँ हवा अच्छी नहीं है, यहाँ तो कोई बैठने को स्थान मिला नहीं, हम तो एकांत में भजन करते हैं, गुफा में करते हैं।
उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भावसमन्वय से ही सम्भव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका माहात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म-प्रसंगों में किया गया है।
उपासना और साधना के सारे रहस्य सन्निहित हैं और उन्हें अपनाने वाला सच्चे अर्थों में ईश्वर भक्त और सिद्ध पुरुष बन सकता है।
उपासना की महिमा का बोध हो रहा था।
उपासना का सारा तत्त्वज्ञान भरा पड़ा है।
उपासना ग्रंथों में इन दोनों की ब्रह्म लिंगों के लिए लगभग सामान्य विशेषणों का प्रयोग हुआ है। शिर, वक्ष हस्तपादादि विहीन चक्षु कर्णादि सर्वेन्द्रिय विवर्जित, निर्विशेष दण्डाकृति के रूप में उन्हें मान्यता दी गयी है।
उपासना के साथ आगे-पीछे किया जा सकता है। यही बात भजन साधना पर लागू होती है। उसे भजन के साथ या आग-पीछे किया जा सकता है। वातावरण शान्त और स्थान एकान्त होना चाहिए। आँखें बन्द करके आराम कुर्सी पर पड़े हुए होना चाहिए।
उपासना कर।
उपासना निष्ठापूर्वक करना, चाहे आप आधा घंटा ही करना, पर नियमपूर्वक जरूर करना। भूलना मत कभी अगर कभी आपने ऐसा करना शुरू कर दिया कि आप साढ़े आठ बजे उठे और बहाना बना दिया कि साहब आज तो रात को देर हो गयी थी और साहब आपके यहाँ तो जगह भी नहीं है। आपके यहाँ हवा अच्छी नहीं है, यहाँ तो कोई बैठने को स्थान मिला नहीं, हम तो एकांत में भजन करते हैं, गुफा में करते हैं। आपके यहाँ तो गुफा भी नहीं, एकांत भी नहीं, तो हम यहाँ कहाँ भजन करेंगे। यह गलती मत करना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-December
उपासना शुरुआती शिक्षा है और साधना उच्चस्तरीय प्रशिक्षण। भजन-पूजन से मन की प्रवृत्ति माया से ब्रह्म की ओर मुड़ जाती है। ईश्वर के स्मरण और सान्निध्य की उपयोगिता प्रतीत होती है। आत्मकल्याण का मार्ग मिलता है। इससे आगे का प्रयोजन साधना के द्वारा पूर्ण होता है।
उपासना वर्ग में आते हैं।
उपासना के माध्यम से उच्चस्तरीय अनुदान वितरण ऋतम्भरा-प्रज्ञा द्वारा किया जा रहा है। जिस प्रकार दुर्भिक्ष आदि संकटकालीन परिस्थितियों में सरकार कुआँ खोदने, उद्योग खड़ा करने, नहर बनाने जैसे कामों के लिए विशेष रूप से धन-राशि देती है, उसी प्रकार इन दिनों ऐसे असंख्य संस्कारवान आत्माओं को दिव्य अनुदान मिलने वाला है, किसी जमाने में राम, कृष्ण, बुद्ध, गाँधी के सहयोगियों को प्राप्त हुआ था।
उपासना करता है। बाह्य परिस्थिति जैसी भी बने, जिसकी वृत्ति में चंचलता नहीं है, वही कुछ कर्तव्यपालन कर सकते हैं।
उपासना के द्वारा ही हमने सारा चमत्कार पाया है। हम देखना चाहते हैं कि आप लोग इसमें कितनी श्रद्धा-निष्ठा के साथ काम करते हैं। हमें विश्वास है कि यह कार्य बहुत व्यापक स्तर पर बढ़ने वाला है। हमें यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि यह कार्य बढ़ेगा। अनेक कार्यक्रम होंगे।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों का उद्देश्य भावनात्मक स्तर को प्रयत्नपूर्वक ऊँचा उठाना है यदि आस्थाओं का स्तर न बदला जा सके और मात्र चित्र-विचित्र शारीरिक क्रियाओं को करते रहा जाय तो इतने भर का प्रभाव केवल शरीर तक ही सीमित रह जाएगा। चेतना का परिष्कार सम्भव न बन पड़ेगा। जो साधना का मूलभूत उद्देश्य है। साधना के तत्त्वदर्शन को और भी अधिक बारीकी से समझना हो तो इसे चार बिन्दुओं में स्पष्ट करना पड़ेगा- (१) आत्मज्ञान (२) ब्रह्मज्ञान (३) तत्त्वज्ञान, (४) सद्ज्ञान। आत्मज्ञान वह है जिस में जीव का, जीवन का, अन्तः चेतना के उत्थान-पतन का निरूपण किया जाता है और आत्मा-चिन्तन आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास का सूक्ष्मदृष्टि से प्रकाश-युक्त मार्गदर्शन किया जाता है।
उपासना की धुरी पर ही गायत्री परिवार के समस्त क्रिया-कलाप केन्द्रित है। गायत्री एक समग्र योग-शास्त्र है। योग ही तो कर्म को कौशलता का निखार देकर व्यक्तित्व को विभूतियों से सजाता है। योग ही है तो आत्मा व परमात्मा के मिलन की रसानुभूति को इसी जीवन में साकार करके उसका आनंद प्रदान करता देखा जाता है। योग ही है जो जीवन को समत्व से अभिपूरित कर स्थितप्रज्ञ बनने की कला सिखाता है।
उपासनास्थली पर महावतार बाबा प्रकट हुए-सूक्ष्मशरीर से संकेत किया कि-आत्मविकास करना है, तो दूसरों को सुधारों, अपने प्रगतिपथ को अवरुद्ध क्यों करते हो।” यह संदेश हम सबके लिए है। श्रीरामकृष्ण कहा करते थे-दोषे गुणे मानुस।” एक-दूसरे के गुणों को देखें-दोषों को नहीं, क्योंकि दोष-गुण तो हर मनुष्य में होते हैं। यही दृष्टि हर भक्त की होनी चाहिए।
उपासना का विधान है, वहाँ हर भागीदार को न्यूनतम दो घण्टे समयदान के रूप में अपने क्षेत्र में अनुदान प्रस्तुत करते रहने का विधान है। यह पुण्य और परमार्थ का समन्वय ऐसा है, जिसके फलस्वरूप भागीदारों की प्रतिभा का परिष्कार, वातावरण में सृजन-चेतना का समावेश और नवनिर्माण में पुरुषार्थपरक योगदान तीनों ही पक्ष जुड़े हुए हैं और त्रिवेणी संगम की समता करते हैं। अभियान की इस भागीदारी को एक शब्द में उदीयमान सौभाग्य कह सकते हैं।
उपासना साधक में उन्हीं दुर्गुणों का आविर्भाव करेगी। कुछ दिनों में उसकी प्रकृति में उन्हीं के दुर्गुणों की भरमार होने लगेगी।
उपासना यदि ध्यानपूर्वक कुछ आत्मशोधन की तपश्चर्या के साथ कर सकें, तो जप का प्रभाव निश्चित ही फलदायी परिणाम के रूप में मिलता है। मंत्र का जप उसकी भावना को अनुसार उसके देवता पद प्रगाढ़ विश्वास रखकर किया जाना चाहिए मंत्रजप फलदायी हो इसके लिए तीन बातें विशेष ध्यान देने योग्य हैं। पहली मंत्र की सामर्थ्य पर विश्वास। मंत्र में अतुलनीय सामर्थ्य हैं, हमें इससे सब कुछ मिल सकता हैं, यह है दृढ़ विश्वास। दूसरी जिस गुरु ने मंत्र दिया है, उसकी सत्ता पर पूरा पक्का भरोसा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-May
उपासना का भी रखा जाना चाहिए। जन-साधारण को सदाचारी और सुनियंत्रित, समाजोपयोगी रखने के विचार से सरकार जन-मानस पर कठोर नियंत्रण कायम करने के लिए विभिन्न प्रयत्न करती है। अनेकों कानून, अध्यादेश एवं नियंत्रण द्वारा लोगों को उचित दिशा में चलाने के लिए अपने दृष्टिकोण के अनुसार कुछ करने के लगी हुई है, पर सफलता बहुत ही स्वल्प-सक्रिय दृष्टिगोचर होती है। सरकारें इन दिनों व्यक्ति पर भारी नियंत्रण करने लगी हैं। अधिनायकवादी, एकत्रित सरकारें मनुष्य की भौतिक और लौकिक समस्त शक्तियों पर काबू पाने और लोगों को अपनी मनमर्जी का बनाने और चलाने का प्रयत्न करती रही है।
उपासना करने के कार्यक्रम को ठीक तरह निबाहते रहा जाए। घर के लोगों से जरा जोर देकर भी उनकी ढील पोल को दूर किया जा सकता है। आमतौर से अच्छी बातें पसन्द नहीं की जाती और उन्हें उपहास-उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता हैं। यही वातावरण अपने घर में भी घुसा हुआ हो सकता है। पर उसे हटाया तो जाना ही चाहिए।
उपासना से वंचित रखा है संभव है। ऐसा उन्होंने प्यारवश किया हो, पर वस्तुतः वह परिणाम में शत्रुता के समान ही अहितकर सिद्ध होता है।
उपासना को दैनिक कार्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, आहार, विश्राम, सफाई, गृहस्थपालन, विद्याध्ययन, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है वैसा ही ध्यान उपासना का भी रखा जाना चाहिए। जन-साधारण को सदाचारी और सुनियंत्रित, समाजोपयोगी रखने के विचार से सरकार जन-मानस पर कठोर नियंत्रण कायम करने के लिए विभिन्न प्रयत्न करती है। अनेकों कानून, अध्यादेश एवं नियंत्रण द्वारा लोगों को उचित दिशा में चलाने के लिए अपने दृष्टिकोण के अनुसार कुछ करने के लगी हुई है, पर सफलता बहुत ही स्वल्प-सक्रिय दृष्टिगोचर होती है। सरकारें इन दिनों व्यक्ति पर भारी नियंत्रण करने लगी हैं।
उपासना की हमारी परम्परा पुरखों से चली आ रही है।”
उपासना द्वारा दिव्यसत्ता के साथ घनिष्ठता और आदान-प्रदान का उपक्रम-योगाभ्यास और तप-साधना द्वारा अतिमानवी क्षमताओं का उन्नयन, षोडश संस्कारों के साथ सम्पन्न होने वाली ज्ञान गोष्ठियों द्वारा पारिवारिक वातावरण में शालीनता का सम्वर्द्धन, पर्व-त्यौहारों में सन्निहित-सामाजिक सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण जैसे अनेकानेक उच्चस्तरीय उद्देश्य धार्मिक क्रियाकृत्यों के सहारे भावभरे वातावरण में सरलतापूर्वक सम्पन्न होते रह सकते हैं। कथा-पुराणों में रोचक-संस्मरणों के सहारे संस्कृति की महान परम्पराओं को बाल-वृद्ध नर-नारी जिस प्रकार सुनते, समझते और अपनाते हैं, उसे देखते हुए प्रतीत होता है-प्रत्यक्ष निर्देशन की अपेक्षा यह देव इतिहासों का कथन-श्रवण अन्तरंग की गहराई तक अधिक अच्छी तरह प्रविष्ट हो सकता है। आदर्शवादी अनुकरण महापुरुषों के द्वारा अपनाई गई देव-परम्पराओं के दृश्य मनःक्षेत्र में विचरते रहने पर भी एक बड़ा काम हो सकता है।अनुकरण का उत्साह उठ सकता है। जन-जागरण को घर-घर पहुँचाना और जन-जन से संपर्क साधना आवश्यक है।
उपासना की शिक्षा दी है, उन्होंने उसका भविष्य आनन्दमय बनाने के लिए सबसे बड़ी सम्पत्ति वसीयत कर दी है। इसके विपरीत जिन लड़कियों की उच्छृंखलता, नास्तिकता, विलासिता और असहिष्णुता के वातावरण में पलने दिया है, वे जहाँ कहीं भी रहेगी, नरक उत्पन्न करेंगी उसमें भी जलेगी और सारे परिवार को भी जलाती रहेंगी। ऐसी आदतों की अभ्यस्त लड़कियों का अहित उन अभिभावकों ने ही किया होता है, जिन्होंने बचपन से उन्हें धार्मिक मान्यताओं से, पूजा-उपासना से वंचित रखा है संभव है। ऐसा उन्होंने प्यारवश किया हो, पर वस्तुतः वह परिणाम में शत्रुता के समान ही अहितकर सिद्ध होता है।
उपासना में निष्ठा एवं अभिरुचि बनी रहे। इसके लिए समझाने-बुझाने का तरीका सबसे अच्छा है। गृहपति का अनुकरण भी परिवार के लोग करते है, इसलिए स्वयं नित्य नियमपूर्वक नियत समय पर उपासना करने के कार्यक्रम को ठीक तरह निबाहते रहा जाए। घर के लोगों से जरा जोर देकर भी उनकी ढील पोल को दूर किया जा सकता है। आमतौर से अच्छी बातें पसन्द नहीं की जाती और उन्हें उपहास-उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता हैं।
उपासना तंत्र का ऋषियों ने आविष्कार किया, भौतिक सुख-साधन बाहुल्य और बुद्धिबल के आधार पर कमाये जा सकते है, पर गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता पर निर्धारित समस्त विभूतियाँ हमारे आंतरिक स्तर पर ही निर्भर रहती है। इस स्तर को सुदृढ़ और समुन्नत बनाने में उपासना का भारी योग रहता है। इसलिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों की भाँति ही उपासना को दैनिक कार्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, आहार, विश्राम, सफाई, गृहस्थपालन, विद्याध्ययन, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है वैसा ही ध्यान उपासना का भी रखा जाना चाहिए। जन-साधारण को सदाचारी और सुनियंत्रित, समाजोपयोगी रखने के विचार से सरकार जन-मानस पर कठोर नियंत्रण कायम करने के लिए विभिन्न प्रयत्न करती है।
उपासना मानव-जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। आत्मिक स्तर को सुविकसित, सुरक्षित एवं व्यवस्थित रखने के लिए हमारी मनोभूमि में ईश्वर के लिए समुचित स्थान रहना चाहिए और यह तभी संभव है जब उसका अधिक चिंतन-मनन अधिक सामीप्य व सान्निध्य प्राप्त करने का प्रयास किया जाए। भोजन के बिना शरीर का काम नहीं चलता। साँस लिए बिना रक्ताभिषरण की प्रक्रिया बिगड़ जाती है। इसी प्रकार ईश्वर की उपेक्षा करने के उपरान्त आन्तरिक स्तर भी नीरस, चिंताग्रस्त, अनिश्चित, अनैतिक, अव्यवस्थित एवं आशंकित बना रहता है।
उपासना को ही इष्ट मानकर पूरी निष्ठा, श्रम और आत्मिक पवित्रता के साथ यह साधना की थी। उसी का परिणाम था कि वे संगीत की ऊँचाइयों तक पहुँच सके थे।
उपासना से विकसित होती है और अन्त में जीवन को महान बना देती है, इसलिए यह भाव निर्मूल नहीं।”
उपासना का भारी योग रहता है। इसलिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों की भाँति ही उपासना को दैनिक कार्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, आहार, विश्राम, सफाई, गृहस्थपालन, विद्याध्ययन, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है वैसा ही ध्यान उपासना का भी रखा जाना चाहिए। जन-साधारण को सदाचारी और सुनियंत्रित, समाजोपयोगी रखने के विचार से सरकार जन-मानस पर कठोर नियंत्रण कायम करने के लिए विभिन्न प्रयत्न करती है। अनेकों कानून, अध्यादेश एवं नियंत्रण द्वारा लोगों को उचित दिशा में चलाने के लिए अपने दृष्टिकोण के अनुसार कुछ करने के लगी हुई है, पर सफलता बहुत ही स्वल्प-सक्रिय दृष्टिगोचर होती है।
उपासनात्मक विधि-विधानों कथा-प्रसंगों धर्मानुष्ठानों के ब्रह्मस्वरूप का सीधा महत्व समझने-समझाने में कठिनाई होती है, किन्तु जब उनमें सन्निहित प्रेरणाओं का भावभरे वातावरण में हृदयंगम होने और चमत्कारी सत्परिणाम उत्पन्न करने की प्रतिक्रिया सामने आती है, तब पता चलता है कि यह निरर्थक जैसी लगने वाली प्रक्रिया, कितनी मर्मस्पर्शी और कितनी प्रभावोत्पादक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-September
उपासना क्रम में परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएँ क्यों?
उपासना सफल होगी। धुले हुए कपड़े पर रंग आसानी से चढ़ता है, मैले पर नहीं। स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी पूजा उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है।
उपासना रूपी बाल्टी में दूध दुहने की बात बनती है।
उपासनादि से निवृत्त होकर हरिपद वह बाँट लेकर वृद्धा के घर गया। वहाँ ज्ञात हुआ कि वह एक दिन पूर्व ही वृन्दावन के लिए प्रस्थान कर चुकी हैं। हार कर उसने उसे वहाँ से मीलों दूर बह रही गंगा में प्रवाहित कर दिया। विसर्जित करते समय भी उसका मन कचोट रहा था।
उपासना का मध्यवर्ती मार्ग है - प्राणशक्ति का संरक्षण - संवर्द्धन। इससे वह समर्थता आती है, जिसके बल पर ध्यान-धारणा में सफलता प्राप्त की जा सके। प्राणशक्ति के मूल्य पर ही संसार की विभिन्न भौतिक सम्पदाएँ देव आध्यात्मिक विभूतियाँ प्राप्त की जा सकती है। इसी के द्वारा आत्मकल्याण का, आत्मोत्कर्ष का जीवनोद्देश्य प्राप्त होता है। उसी के द्वारा बन्धन से मुक्ति का मोक्ष का परम पुरुषार्थ सफलतापूर्वक सम्पन्न होता है।
उपासना द्वारा ही हमारी प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील होते हैं, वे यथार्थ में समयक्षेप करते और खाली हाथ रहते हैं। भोजन-भोजन रटते रहने से पेट थोड़े ही भर जाता है। उसके साथ प्रयास और पुरुषार्थ भी जुड़े होने चाहिए। वास्तविक परिणाम तभी सामने आता है। जो सचमुच हमारी अनुकम्पा के आकांक्षी हैं, उन्हें इस विश्व वाटिका को सुन्दर, समुन्नत और सुव्यवस्थित बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
उपासना फिर देव - उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मंत्र और देवता के, भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं, इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाए, उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है, उसे उतना ही मिलेगा। निरंतर वर्षा होते रहने पर भी आँगन में रखे हुए पात्रों में उतना ही जल रह पाता है, जितनी उनमें जगह होती है। अपने भीतर जगह को बढ़ाये बिना कोई बरतन बादलों से बड़ी मात्रा में जल प्राप्त करने की आशा नहीं कर सकता, देवता और मंत्रों से लाभ उठाने के लिए भी पात्रता नितान्त आवश्यक है।
उपासना, तपश्चर्या का समुचित लाभ उठा सकता है और देवताओं के अनुग्रह का अधिकारी बन सकता है। जब तक यह पात्रता न हो तब तक उत्कृष्ट वरदान माँगने की दूरदर्शिता ही उत्पन्न होगी और साधना के पुरुषार्थ से कुछ भौतिक लाभ भले ही मिल जाएँ, देवत्व का एक कण भी उसे प्राप्त न होगा और आसुरी भूमिका पर कोई सिद्धि मिल भी जाए, तो अन्ततः उसके लिए घातक ही सिद्ध होगी। असुरों की साधना और उसके आधार पर मिली हुई सिद्धियों से उनका अन्ततः सर्वनाश ही उत्पन्न हुआ। अध्यात्म−विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिए साधक का अन्तःकरण एवं व्यक्तित्व कितना निर्मल होगा, उतनी ही उसकी उपासना सफल होगी। धुले हुए कपड़े पर रंग आसानी से चढ़ता है, मैले पर नहीं।
उपासना की सार्थकता सेवा में है। उपासक यदि लोकसेवी न हुआ तो उसकी उपासना चिन्ह - पूजा मात्र बनकर रह जाती है कदाचित ही फलीभूत होती हो। उपासना और सेवा का समन्वित स्वरूप साधना से ही सार्थक है। जो इन्हें ठीक-ठीक अपनाते, वे इसी जन्म में स्वर्ग-मुक्ति का आनन्द-लाभ करते और परमपद पाते हैं।
उपासना के नित्य-कर्मों में इसी पद्धति का प्रयोग होता है, पर इतने मात्र से ही प्राणायाम को सीमाबद्ध नहीं मान लेना चाहिए। उसके प्रख्यात चौरासी प्रकार हैं। इसके अतिरिक्त भी अन्य ऐसे प्राण विधान हैं, जिनके माध्यम से शरीर के सूक्ष्म प्राणसंस्थानों, षट्चक्रों का जागरण होता है, वे विश्वव्यापी प्राणशक्ति के साथ जोड़ने और उस संपर्क से अपने को अत्याधिक दिव्यसामर्थ्य सम्पन्न बनाने में समर्थ होते हैं।
उपासनाएँ करके अभिभूत शक्तियाँ-विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। स्वयं भी इतने समर्थ हुए कि दूसरों को अपनी साधना का अंश देकर वरदान-आशीर्वाद से लाभान्वित कर सके। भारत ही नहीं, संसार भर का पुराण-साहित्य ऐसी ही घटनाओं से भरा पड़ा है, जिनमें चर्चा के प्रमुख पात्रों में से अधिकांश की सामर्थ्य और विशेषताएँ देवप्रदत्त थी। ऋषियों, तपस्वियों, सन्तों के जीवन चरित्रों में अधिकांश में ऐसे वर्णन मौजूद हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि उनमें कितनी ही अलौकिक विशेषताएँ थीं और उनने तप-साधना के द्वारा देवताओं से अथवा सीधे भगवान से पाया था। प्रामाणिक इतिहास में भी ऐसे अगणित प्रमाण विद्यमान हैं, जिनसे साधना के फलस्वरूप अनेक व्यक्तियों ने अपने व्यक्तित्वों में ऐसी विशेषताएँ उत्पन्न कीं जो सर्वसाधारण के लिए सम्भव या सुगम नहीं होतीं।
उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है।
उपासनात्मक कर्म-काण्डों का अपना महत्व हैं, पर सर्वजनीन सारस्वत मन्त्र वह शब्दोच्चार है, जिसे सत्प्रयोजन के लिए सद्भावना विवेकशीलता और मधुरता सम्मिश्रित करके बोला गया हो। इस स्तर का भाषण चाहे वह स्वल्प शब्दों का ही क्यों न हो, सबके कल्याण की परम श्रेयस्कर प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।
उपासना और सेवा का समन्वित स्वरूप साधना से ही सार्थक है। जो इन्हें ठीक-ठीक अपनाते, वे इसी जन्म में स्वर्ग-मुक्ति का आनन्द-लाभ करते और परमपद पाते हैं।
उपासना का माहात्म्य बताते हुए शास्त्र कहते हैं - जपता जुह्नता चैव विनिपाते न विद्यते।” अर्थात् गायत्री जप और हवन करते रहने वाले का कभी पतन नहीं होता।
उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मंत्र और देवता के, भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं, इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाए, उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है, उसे उतना ही मिलेगा। निरंतर वर्षा होते रहने पर भी आँगन में रखे हुए पात्रों में उतना ही जल रह पाता है, जितनी उनमें जगह होती है। अपने भीतर जगह को बढ़ाये बिना कोई बरतन बादलों से बड़ी मात्रा में जल प्राप्त करने की आशा नहीं कर सकता, देवता और मंत्रों से लाभ उठाने के लिए भी पात्रता नितान्त आवश्यक है।
उपासना के लिए प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक छोटा-सा प्रतिनिधि उनका मौजूद है। साधक और तपस्वी अपनी निष्ठा के अनुरूप उसका पोषण करते, समर्थ बनाते और लाभ उठाते हैं। एक ग्वाले की गाय स्वस्थ-सुन्दर और बहुत दूध देती है। दूसरे की ठीक वैसी ही होने पर भी दुबली, रुग्ण है और कम दूध देती है। इसका कारण उन दोनों ग्वालों की गौ-सेवा में न्यूनाधिकता का होना ही है।
उपासना चिन्ह - पूजा मात्र बनकर रह जाती है कदाचित ही फलीभूत होती हो। उपासना और सेवा का समन्वित स्वरूप साधना से ही सार्थक है। जो इन्हें ठीक-ठीक अपनाते, वे इसी जन्म में स्वर्ग-मुक्ति का आनन्द-लाभ करते और परमपद पाते हैं।
उपासनात्मक प्रक्रिया अपनाई, पीछे उनकी स्थिति पर प्रकार बिगड़ती ही चली गई। भौतिक सुख-सम्पत्ति न सही, आत्मिक शान्ति और विभूति का प्रकाश मिला होता तो भी सन्तोष किया जा सकता था, पर वैसा भी कुछ वे प्राप्त न कर सके।
उपासना में संलग्न लोगों की मनोभूमि इसी बच्चों जैसे स्तर की होती है। वे विधि-विधानों कर्मकाण्डों या उपहारों का ताना-बाना बुनते रहते हैं और उसी टंट घंट में अपना उल्लू सीधा करने की तरकीबें भिड़ाते रहते हैं तथाकथित भक्तों की मण्डली इसी स्तर की होती है। वे तिलक - छापे लगाकर अपनी शक्ति का प्रमाण भगवान के सामने प्रस्तुत करते हैं या प्रमाण भगवान के सामने प्रस्तुत करते हैं या कुछ और खेल खड़ा करके भगवान की आँखों में धूल झोंककर अपने असली स्वरूप को छिपाते हुए भक्त को मिलने वाले लाभ प्राप्त करना चाहते हैं। वस्तुतः न भगवान इतने भोले हैं न कोई देवता इतना सरल है, न कोई मंत्र ऐसा है जिसे कुछ बार जप-रटकर मनचाहा लाभ उठाया जा सके। उपासना का एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान है।
उपासना का एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान है। अध्यात्म विद्या को एक समग्र साइंस ही कहना चाहिए। उसके नियम और प्रयोजनों को समझ कर तदनुकूल चलने से ही लाभान्वित हुआ जा सकता है। यदि यह तथ्य लोगों ने समझा होता तो अध्यात्म मार्ग की देहरी पर पैर रखते ही पहला प्रयोग अपने अन्तरंग में मूर्छित, पददलित, विभुक्षित, मलिन पड़े हुए इष्टदेव को सँभालने - सँजोने का प्रयत्न किया होता। उन्हें समर्थ और बलवान बनाया होता।
उपासना का आश्रय लेते हैं, तो इन विपत्तियों से सहज ही छुटकारा मिल जाता है। डूबने वाली स्थिति बदल जाती है और हम तैरकर पार होने लगते हैं।
उपासना के सम्बन्ध में लागू होती है। घृत-सेवन का लाभ वही उठा सकता है, जिसकी पाचनक्रिया ठीक हो, देवता और मंत्रों का लाभ वे ही उठा पाते हैं, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को भीतर और बाहर से विचार और आचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है। औषधि का लाभ उन्हें ही मिलता है, जो बताये हुए अनुपात और पथ्य का भी ठीक तरह प्रयोग करते हैं। अतः पहले आत्म-उपासना फिर देव - उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मंत्र और देवता के, भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं, इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है।
उपासना का फल प्राप्त करता है। ऐसे अभिवचन उच्चारणकर्ता का भी कल्याण करते हैं, लोकमंगल का प्रयोजन भी उनसे बड़ी मात्रा में पूरा होता है।
उपासना सम्भव नहीं। उपासना के लिए प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक छोटा-सा प्रतिनिधि उनका मौजूद है। साधक और तपस्वी अपनी निष्ठा के अनुरूप उसका पोषण करते, समर्थ बनाते और लाभ उठाते हैं। एक ग्वाले की गाय स्वस्थ-सुन्दर और बहुत दूध देती है। दूसरे की ठीक वैसी ही होने पर भी दुबली, रुग्ण है और कम दूध देती है।
उपासना को जादूगरी, बाजीगरी जैसी कोई चीज मानकर चलते हैं। उनकी कल्पना किन्हीं ऐसे देवताओं की होती हैं जो स्तुति, जप, पूजा, प्रसाद के तनिक से प्रलोभन पर ललचाए जा सकते हैं। और उनसे इन नगण्य उपहारों के बदले मनचाहे लाभ उठाये जा सकते हैं। अधिकांश पूजा, उपासना में संलग्न लोगों की मनोभूमि इसी बच्चों जैसे स्तर की होती है। वे विधि-विधानों कर्मकाण्डों या उपहारों का ताना-बाना बुनते रहते हैं और उसी टंट घंट में अपना उल्लू सीधा करने की तरकीबें भिड़ाते रहते हैं तथाकथित भक्तों की मण्डली इसी स्तर की होती है।
उपासना, पूजा स्तोत्र आदि का चमत्कार देखने का दूसरा कदम उठाया गया होता तो निस्सन्देह हर उपासक को आशाजनक सफलता मिली होती और किसी को भी निराश होने, अविश्वासी बनने या असमंजस में पड़ने का अवसर न आता।
उपासना से होता है। गायत्री का सविता देवता उस प्राण का प्रचण्ड पुँज अपने में धारण किये हुए है। जिन्होंने इस महाशक्ति का आश्रय-सान्निध्य लाभ किया है, उनमें प्राणशक्ति की मात्रा दिन-दिन बढ़ती चली गयी है और वे इतना आत्मबल सम्पादित कर सके हैं। जिसके आधार पर बाह्य और आन्तरिक जीवन की समस्त आवश्यकताओं का समाधान किया जा सके।
उपासना अंध-विश्वास है, तो फिर इससे कितने ही लाभान्वित क्यों होते हैं? यदि सत्य है तो उससे कितनों को ही निराश क्यों होना पड़ता है। जल हर किसी की प्यास बुझाता है, सूरज हर किसी को गर्मी-रोशनी देता है, फिर देवता और उनके उपासना क्रम में परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएँ क्यों?
उपासना देवी - देवताओं की की जाती है। स्वयं भगवान अथवा उनके समाज-परिवार के देवी-देवता ही आमतौर से जनसाधारण की उपासना के केन्द्र होते हैं विश्वास यह किया जाता है कि पूजा, अर्चा, जप, स्तुति दर्शन, प्रसाद आदि धर्मकृत्यों के माध्यम से भगवान अथवा देवताओं को प्रसन्न किया जा सकता है और जब वे प्रसन्न हो जाते हैं, तो उनसे इच्छानुसार वरदान प्राप्त करके अभीष्ट सुख-सुविधाओं से लाभान्वित हुआ जा सकता है।
उपासना के केन्द्र होते हैं विश्वास यह किया जाता है कि पूजा, अर्चा, जप, स्तुति दर्शन, प्रसाद आदि धर्मकृत्यों के माध्यम से भगवान अथवा देवताओं को प्रसन्न किया जा सकता है और जब वे प्रसन्न हो जाते हैं, तो उनसे इच्छानुसार वरदान प्राप्त करके अभीष्ट सुख-सुविधाओं से लाभान्वित हुआ जा सकता है।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों की लकीर पीट लेना इस संदर्भ में सर्वथा अपर्याप्त हैं। तेज धार की तलवार में सिर काटने की क्षमता है, इसमें सन्देह नहीं, पर वह क्षमता सही सिद्ध हो, इसके लिए चलाने वाले का भुजबल, साहस एवं कौशल भी आवश्यक है। बिजली में सामर्थ्य की कमी नहीं, पर उससे लाभान्वित होने के लिए उसी प्रकार के यन्त्र चाहिए। यन्त्र - उपकरणों के अभाव में बिजली का उपयोग व्यर्थ ही नहीं होता, अनर्थ-मूलक भी बन जाता है।
उपासना पर प्रकाश डालते हुए कहा था ................ मेरा बोलना जप के लिए है, प्रचार के लिए नहीं। जिन विचारों को बोलता हूँ, वे दृढ़ होते चले जाते हैं। .............जो किया है आप लोगों ने किया हैं, मैंने तो जप किया है। भूदान का जय किया तो भूदान मिला। सम्पत्ति दान का जप किया तो सम्पत्ति दान मिला।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-April
उपासना निर्देशित की थी और सृष्टि-सृजन की सामर्थ्य प्राप्त की थी। इसका उल्लेख पुराणों में मिलता हैं त्रिदेवों उपासना गायत्री रही है। देवगुरु बृहस्पति ने दक्षिणमार्गी और दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने वाममार्गी साधनाएँ गायत्री के ही आत्मिक और भौतिक पक्षों को लेकर प्रचलित की थी। आदि मानव-देवों में सप्तऋषियों का नाम आता हैं वे सभी गायत्री का सप्त व्याहृतियों के प्रतीक माने जाते हैं राम कृष्ण आदि अवतारों की इष्ट गायत्री रही है। इसी महामन्त्र की व्याख्या में चारों वेद तथा अन्यान्य धर्म-शास्त्र रचे गये हैं दत्तात्रेय के चौबीस गुरु योग और चौबीस तप प्रसिद्ध हैं यह सभी गायत्री के तत्त्वज्ञान और साधना-विधान का विस्तार हैं।
उपासना विधि ‘सन्ध्या’ है। सन्ध्या में गायत्री का समावेश अनिवार्य हैं इन तथ्यों का पर्यवेक्षण करने से स्पष्ट हो जाता है कि गायत्री ही अनादि धर्म-परम्परा एवं अध्यात्म-प्रक्रिया का आधारभूत तथ्य हैं उपासना में उसी का उपयोग सर्वोत्तम है।
उपासनात्मक उपचार अपनाने पड़ते है। दिव्य -जीवन की चरम परिस्थिति ही पूर्णता है। इसी स्थिति को स्वर्ग, सिद्धि एवं मुक्ति की प्राप्ति कहते है। आत्मसाक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन भी यही है। इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जो पुरुषार्थ करना पड़ता है उसे साधना विधान के रूप में अपनाना होता हैं साधना में शिक्षा और प्रेरणा का समावेश होता है फलतः उसकी प्रतिक्रिया जीवनोत्कर्ष के रूप में प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगती है।
उपासना उपक्रम इस निर्धारण के बिना बन ही नहीं पाता।
उपासना ही ईश्वर की उपासना हैं वही उपाय है। लक्ष्य इसी को बनाना पड़ता है। इष्टदेव का निर्धारण किस रूप में किया जाए आज इस संदर्भ में अनेकों विकल्पों के जंजाल बने खड़े है। प्राचीनकाल में ऐसा न था तत्त्वज्ञानी एक निश्चय पर पहुँचे थे और उन्होंने उसी निष्कर्ष को उपयोगी बताकर समस्त साधकों को उसे अपनाने का परामर्श दिया था। भारतीय-संस्कृति जिसे वस्तुतः विश्व-संस्कृति जिसे चाहिए साधना-संदर्भ कहा में एक ही निश्चय पर पहुँची है कि आत्मिक-प्रगति की साधना के लिए इष्ट रूप गायत्री का ही वरण होना चाहिए।
उपासना हैं वही उपाय है। लक्ष्य इसी को बनाना पड़ता है। इष्टदेव का निर्धारण किस रूप में किया जाए आज इस संदर्भ में अनेकों विकल्पों के जंजाल बने खड़े है। प्राचीनकाल में ऐसा न था तत्त्वज्ञानी एक निश्चय पर पहुँचे थे और उन्होंने उसी निष्कर्ष को उपयोगी बताकर समस्त साधकों को उसे अपनाने का परामर्श दिया था। भारतीय-संस्कृति जिसे वस्तुतः विश्व-संस्कृति जिसे चाहिए साधना-संदर्भ कहा में एक ही निश्चय पर पहुँची है कि आत्मिक-प्रगति की साधना के लिए इष्ट रूप गायत्री का ही वरण होना चाहिए।
उपासना में उसी का उपयोग सर्वोत्तम है।
उपासनात्मक उपचारों के सहारे ही बनती है। दिव्य -जीवन की कल्पना करते रहने भर से तो कोई काम नहीं बनता,पहलवान बनने के लिए व्यायाम की, विद्वान बनने के लिए स्वाध्याय की, धनी बनने के लिए व्यवसाय की आवश्यकता पड़ती है, इसी प्रकार आत्मिक - प्रगति का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उपासनात्मक उपचार अपनाने पड़ते है। दिव्य -जीवन की चरम परिस्थिति ही पूर्णता है। इसी स्थिति को स्वर्ग, सिद्धि एवं मुक्ति की प्राप्ति कहते है। आत्मसाक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन भी यही है।
उपासना गायत्री रही है। देवगुरु बृहस्पति ने दक्षिणमार्गी और दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने वाममार्गी साधनाएँ गायत्री के ही आत्मिक और भौतिक पक्षों को लेकर प्रचलित की थी। आदि मानव-देवों में सप्तऋषियों का नाम आता हैं वे सभी गायत्री का सप्त व्याहृतियों के प्रतीक माने जाते हैं राम कृष्ण आदि अवतारों की इष्ट गायत्री रही है। इसी महामन्त्र की व्याख्या में चारों वेद तथा अन्यान्य धर्म-शास्त्र रचे गये हैं दत्तात्रेय के चौबीस गुरु योग और चौबीस तप प्रसिद्ध हैं यह सभी गायत्री के तत्त्वज्ञान और साधना-विधान का विस्तार हैं। गायत्री गुरुमन्त्र है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-July
उपासना का समग्र स्वरूप ऋषियों ने गहन अनुसंधान के उपरान्त खड़ा किया, वह मात्र चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए नहीं हो सकता। पर इसे विडम्बना ही कहा जाना चाहिए कि साधना-क्षेत्र में प्रवेश करने वालों की रुचि जितनी सिद्धियाँ प्राप्त करने की होती है, उतनी आत्मोत्कर्ष की नहीं। ऐसी आकांक्षा क्यों की जाती है? गहराई से विचार करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि मात्र इसलिए कि कठोर जीवन-संघर्ष के झंझावातों से न जूझना पड़े और सब कुछ सहज-सरल ढंग से प्राप्त हो जाए। यह परमात्मा के व्यवस्था नियमों को तोड़ने की आकांक्षा ही कही जाएगी, अन्यथा परमात्मा ने प्रत्येक मनुष्य को इतने साधन और इतनी शक्तियाँ प्रदान कर रखी हैं कि उनका यदि भली-भाँति उपयोग किया जाए तो विशेष कुछ आवश्यकता रह ही नहीं जाती।
उपासना-कक्ष प्रकाश से पूर्ण हो गया। उनके सम्मुख दिव्याम्बर धारी, रत्नकिरीटी, वज्रधर इन्द्र प्रकट हो गए थे।
उपासना है। उसकी लौकिक इच्छा भी अपनी माँ को सन्तुष्ट करने, उन्हें प्रसन्न करने के लिए है। उसकी इच्छापूर्ति करके उसकी माँ को प्रसन्नता होती है। कामना ही हो उसकी-वह उस कामना को लेकर भटकता कहाँ है। वह कामना भी तो उसे जगतमाता के समीप ही ले जाती है।
उपासना के क्षेत्र में इसलिए प्रवेश करते हैं कि उन्हें इससे वे सिद्धियाँ मिल जायेंगी, जिसके आधार पर सब कुछ प्राप्त कर लेने का दावा शास्त्र करते हैं। जिस आत्मकल्याण के उद्देश्य को पूरा करने के लिए साधना-उपासना का समग्र स्वरूप ऋषियों ने गहन अनुसंधान के उपरान्त खड़ा किया, वह मात्र चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए नहीं हो सकता। पर इसे विडम्बना ही कहा जाना चाहिए कि साधना-क्षेत्र में प्रवेश करने वालों की रुचि जितनी सिद्धियाँ प्राप्त करने की होती है, उतनी आत्मोत्कर्ष की नहीं। ऐसी आकांक्षा क्यों की जाती है? गहराई से विचार करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि मात्र इसलिए कि कठोर जीवन-संघर्ष के झंझावातों से न जूझना पड़े और सब कुछ सहज-सरल ढंग से प्राप्त हो जाए।
उपासना ही महाशक्ति की, की जाए, ऐसा भी कोई प्रयत्न उस साधक में नहीं है। कैसा है यह साधक? क्या होना है उसका?
उपासना के कर्मकाण्ड इसी समर्पण की पृष्ठभूमि पर उगे पनपे और फले-फूले हैं। यह पृष्ठभूमि न हो तो जीवन भर घण्टा, घण्टी, माला सटकाते रहने का भी कुछ आशाजनक परिणाम प्रस्तुत नहीं हो सकता। स्तुत नहीं हो सकता।”
उपासना कीजिए, फिर देखिये उसमें चमत्कार होता है या नहीं।
उपासना इसलिए असफल रही है कि उसमें निष्ठा का समावेश नहीं हुआ है। आप तपस्यायुक्त उपासना कीजिए, फिर देखिये उसमें चमत्कार होता है या नहीं।
उपासनात्मक प्रतीक का कार्य करने लगता है। पूजा-उपासना के पीछे जो प्रेरणाएँ भरी पड़ी हैं, उनसे प्रभावित होकर उपयुक्त
उपासनात्मक कर्मकाण्डों का महत्व है। आत्मबोध की विचारधाराओं से अन्तःकरण को भरने में सहायता करना ही दर्पण-उपकरण का उद्देश्य है। उसी प्रकार पूजा का उपयोग यही है कि वह जीवन-निर्माण की प्रेरणाओं को उभारें और उन्हें सक्रिय बनाये।
उपासना एवं साधना है। इसे दो पहियों पर चलने वाली आत्मिक प्रगति की यात्रा कह सकते हैं। जिस प्रकार इन्द्रियजन्य वासनाओं और तृष्णाओं की पूर्ति भौतिक साधन-सामग्री के आधार पर होती है, उसी प्रकार आन्तरिक समाधान, संतोष, आनन्द की-उल्लास की असीम शान्ति भरी स्थिति अध्यात्म विज्ञान के आधार पर उपार्जित सम्पदाओं से होती है। नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, लघु से महान, आत्मा से परमात्मा बनने का अवसर इसी पथ पर चलने से मिलता है। नर-पशु को देवता बनाने की स्थिति इसी प्रयास द्वारा संभव होती है।
उपासना की थी, कितनी कुण्डलिनियाँ जगायी थीं? यह हम नहीं कर सकते हैं, परन्तु उन्होंने भगवान का काम किया था। नल-नील ने जामवन्त ने, अर्जुन ने कितनी पूजा एवं तीर्थयात्रा की थी? पर उन्होंने भगवान के कंधे-से-कंधा मिलाकर काम किया था। इस कारण से भगवान ने भी उनके कार्यों में कंधे-से-कंधा मिलाया था।
उपासना में विश्वास करते हैं, उन्हें यह तपस्या अवश्य करनी चाहिए। आपकी उपासना इसलिए असफल रही है कि उसमें निष्ठा का समावेश नहीं हुआ है। आप तपस्यायुक्त उपासना कीजिए, फिर देखिये उसमें चमत्कार होता है या नहीं।
उपासना को प्रारम्भ न करे। यह वातावरण के संशोधन तथा साधकों के आत्मबल के अभिवर्द्धन हेतु प्रारम्भ किया गया है।
उपासना के पीछे जो प्रेरणाएँ भरी पड़ी हैं, उनसे प्रभावित होकर उपयुक्त
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-October
उपासना। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव बनाने के लिये सामूहिक महासाधना का नियोजन। यह दिव्य पुरश्चरण सन्निकट की आश्विन नवरात्रि से शाँतिकुँज से आरम्भ किया गया है। नाम है युगसंधि महापुरश्चरण। शाँतिकुँज हरिद्वार में यह पुण्य आयोजन सन् 2000 तक चलता रहेगा।
उपासना साधना एवं ईश्वर
उपासना समर्पण योग
उपासनारत को अपने दिव्य अनुग्रह से ओत प्रोत कर देता है।
उपासना की गरिमा पर विश्वास है उन सभी का आवाहन किया गया है कि इस अवधि में एक अनुष्ठान यहीं सम्पन्न करें और विराट सामूहिक जप यज्ञ के भागीदार बनने का श्रेय प्राप्त करें। आशा की जाती है कि निर्धारित अवधि में लाखों व्यक्ति इसके सहगामी बन सकेंगे। उद्देश्य तो युगपरिवर्तन के दोनों पक्षों को सम्पन्न कर सकने वाला दिव्य वातावरण बनाना है पर साथ ही यह बात भी है कि दूसरों के लिये मेंहदी पीसने वाले के अपने हाथ उससे पहले ही रच जाते है। साधक अपने लिये सुरक्षा कवच प्राप्त करने में प्रतीक परिष्कार से लाभान्वित होने से सफल हो सकते है। यदि उनके निष्ठा बीच में ही न डगमगा गई तो लक्ष्य तक पहुँचने के ले अनवरत प्रयत्न करने वालों का सेनापतियों जैसा श्रेय मिलेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-March
उपासना, साधना और आराधना के द्वारा मिला है। अगर आप इन तीन चीजों का समन्वय अपने जीवन में करेंगे, तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपको साधना से सिद्धि अवश्य मिलेगी।
उपासना माने भगवान के नजदीक बैठना। नजदीक बैठने का भी एक असर होता है। चन्दन के समीप जो पेड़ पौधे होते हैं, वह भी सुगन्धित हो जाते हैं। हमारी भी स्थिति वैसी ही हुई। चन्दन का एक बड़ा से पेड़, जो हिमालय में उगा हुआ है, उससे हमने सम्बन्ध जोड़ लिया और खुशबूदार हो गये।
उपासना करने में भूल करने पर कोई भी साधक कभी भी विपरीत फल को प्राप्त नहीं होता। अतः जैसे भी बने वैसे जप करने पर भी परमपावनी गायत्री कल्याण ही करती हैं। फिर विधि पूर्वक उपासना करने के लाभ का कहना ही क्या है?
उपासना, आराधना, अभ्यर्थना करता है वह प्रतिक्षण माता का अमृतोपम दुग्धपान करने का आनन्द लेता है और समस्त अज्ञानों, अभावों, आसक्तियों के कारण उत्पन्न होने वाले कष्ट कठिनाइयों से क्लेशों, दुखों से छुटकारा पाकर मनोवांछित फल प्राप्त करता है। योग्य एवं तपस्वी गुरु के संरक्षण में की गयी गायत्री साधना अभीष्ट लाभ पहुँचाती है। वृहत्पारासर स्मृति 8-60 में कहा भी गया है “रोग, शोक, द्वेष तथा अभाव की स्थिति में गायत्री महाशक्ति की उपासना करने से इन कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। अग्निपुराण में भी उल्लेख है-
उपासना, साधना और आराधना। उपासना के नाम पर आपने अगरबत्ती जलाकर और नमस्कार करके उसे समाप्त कर दिया होगा, परन्तु हमने ऐसा नहीं किया। हमने अगरबत्ती जलाकर प्रारम्भ तो अवश्य किया है, परन्तु समाप्त नहीं किया। हमने अपने जीवन में अध्यात्म के जो भी सिद्धान्त हैं, उन्हें अवश्य धारण करने का प्रयास किया है। त्रिवेणी में स्नान करने की बात आपने सुनी होगी कि उसके बाद कौआ कोयल बन जाता है।
उपासना है और उपासना छोड़ी नहीं सकती। किसी भी स्थिति में शाकाहार ही इन्हें प्रिय हैं चावल-दाल-रोटी उबले आलू, उबली पत्तियाँ, थोड़ा-सा अंजीर बस इतना ही पर्याप्त है उनके लिये।
उपासना कहलाती है। हमने अपने जीवन में इसी प्रकार की उपासना की है, आपको भी इसी प्रकार की उपासना करनी चाहिये।
उपासना करने के लाभ का कहना ही क्या है?
उपासना करना, जो आटे की गोली और चावल के दाने फेंककर उन्हें फंसा लेते और पकड़ लेते हैं तथा कबाब बना लेते हैं। आप ऐसे उपासक मत बनना, जो भगवान को फंसाने के लिये तरह-तरह के प्रलोभन फेंकता है। बिजली का तार लगा हो, परन्तु उसका सम्बन्ध जनरेटर से न हो तो करेण्ट कहाँ से आयेगा? उसी तरह हमारे अंदर अहंकार, लोभ, मोह भरा हो, तो वे चीजें हम नहीं पा सकते हैं, तो भगवान के पास हैं। अपने पिता की सम्पत्ति के अधिकारी आप तभी हो सकते हैं,जब आप उनका ध्यान रखते हों, उनके आदर्शों पर चलते हों, सिद्धान्तों पर चलते हों।
उपासना हुई नजदीक बैठना हुआ नजदीक बैठना यानी चिपक जाना अर्थात् समर्पण कर देना। चिपकने की यह विद्या हमारे गुरु ने हमें सिखा दी और हम चिपकते हुये चले गये। गाँव के गंवार महिला की शादी किसी सेठ के साथ होने पर वह सेठानी, पंडित के साथ होने पर पंडितानी बन जाती है। यह सब समर्पण का चमत्कार है।
उपासना में लगा देना कुछ विशेष कठिन बात नहीं है। सूतक काल, यात्रा में, बीमारी आदि के दिनों में बिना माला के मानसिक जप चालू रखना चाहिये। किसी दिन साधना छूट जाने पर उसकी पूर्ति अगले दिन की जा सकती है।
उपासना का मतलब समर्पण है। आपको भी अगर शक्तिशाली या महत्वपूर्ण व्यक्ति बनना है, बड़ा काम करना है, तो आपको भी बड़े आदमी के साथ, महान गुरु के साथ चिपकना होगा। आप अगर शेर के बच्चे हैं, तो आपको भी शेर होना चाहिये, आप अगर घोड़े के बच्चे हैं तो घोड़ा होना चाहिये। अगर आप संत के बच्चे हैं तो संत होना चाहिये। हमने इस बात का बराबर ख्याल रखा है कि हम भगवान के बच्चे हैं, तो हमें भगवान की तरह बनना चाहिये।
उपासना साधक की अन्तश्चेतना को उसके मन मस्तिष्क को अन्तःकरण को विचारों और भावनाओं को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करती है। गायत्री भूलोक की प्रत्यक्ष कामधेनु हैं। जो व्यक्ति उसकी पूजा, उपासना, आराधना, अभ्यर्थना करता है वह प्रतिक्षण माता का अमृतोपम दुग्धपान करने का आनन्द लेता है और समस्त अज्ञानों, अभावों, आसक्तियों के कारण उत्पन्न होने वाले कष्ट कठिनाइयों से क्लेशों, दुखों से छुटकारा पाकर मनोवांछित फल प्राप्त करता है। योग्य एवं तपस्वी गुरु के संरक्षण में की गयी गायत्री साधना अभीष्ट लाभ पहुँचाती है। वृहत्पारासर स्मृति 8-60 में कहा भी गया है “रोग, शोक, द्वेष तथा अभाव की स्थिति में गायत्री महाशक्ति की उपासना करने से इन कष्टों से छुटकारा मिल जाता है।
उपासना में बन लगाइये और वह लाभ प्राप्त कीजिये जो हमने प्राप्त किये हैं। यही है उपासना।
उपासना एवं साधना हो गयी। हमारे ब्राह्मण-जीवन का यही चमत्कार है। यही मेरी पूजा है।
उपासना छोड़ी नहीं सकती। किसी भी स्थिति में शाकाहार ही इन्हें प्रिय हैं चावल-दाल-रोटी उबले आलू, उबली पत्तियाँ, थोड़ा-सा अंजीर बस इतना ही पर्याप्त है उनके लिये।
उपासना में कैसे लगेगा? आप इस दिशा में आगे कैसे बढ़ेंगे? गोली चलाने वाला यदि निशाना न साधे तो उसका काम कैसे चलेगा? वह कभी इधर को भटके, कभी उधर को भटके तो उससे निशाना कैसे साधा जायेगा? बीस जगह ध्यान रहा तो आप विजेता नहीं बन सकते।
उपासना करना सीखा है और अब हम हंस बन गये हैं। आपको भी यही चीज अपनानी होगी। इससे कम में उपासना नहीं हो सकती है। आप पूरे मन से, पूरी शक्ति से उपासना में बन लगाइये और वह लाभ प्राप्त कीजिये जो हमने प्राप्त किये हैं। यही है उपासना।
उपासना करनी चाहिये।
उपासना नहीं हो सकती है। आप पूरे मन से, पूरी शक्ति से उपासना में बन लगाइये और वह लाभ प्राप्त कीजिये जो हमने प्राप्त किये हैं। यही है उपासना।
उपासना और साधना ऐसी है कि हमने सारी जिन्दगी भर धोबी के तरीके से अपने जीवन को धोया है और अपनी कमियों को चुन-चुनकर निकालने का प्रयत्न किया है। आराधना हमने समाज को ऊंचा उठाने के लिये की है। आप यहाँ आइये और देखिये, अपने मुख से अपने बारे में कहना ठीक बात नहीं है। आप यहाँ आइये और दूसरे के मुख से सुनिये। हम सामान्य व्यक्ति नहीं हैं, असामान्य व्यक्ति हैं।
उपासना से व्यक्ति के बाहरी और भीतरी अर्थात् लौकिक एवं आत्मिक दोनों ही उन्नति के द्वार खुल जाते हैं माता का आँचल पकड़ने वाले व्यक्ति के ममतामयी गायत्री महाशक्ति न केवल मनोरथ को पूर्ण करती हैं वरन् मातृत्व संरक्षण भी प्रदान करती हैं। गायत्री संहिता में कहा गया है-
उपासना सब कुछ अपूर्ण है। मोक्ष तो नितान्त असम्भव है।
उपासना की है, आपको भी इसी प्रकार की उपासना करनी चाहिये।
उपासना।
उपासना के नाम पर आपने अगरबत्ती जलाकर और नमस्कार करके उसे समाप्त कर दिया होगा, परन्तु हमने ऐसा नहीं किया। हमने अगरबत्ती जलाकर प्रारम्भ तो अवश्य किया है, परन्तु समाप्त नहीं किया। हमने अपने जीवन में अध्यात्म के जो भी सिद्धान्त हैं, उन्हें अवश्य धारण करने का प्रयास किया है। त्रिवेणी में स्नान करने की बात आपने सुनी होगी कि उसके बाद कौआ कोयल बन जाता है। हमने भी उस त्रिवेणी संगम में स्नान किया है, जिसे उपासना, साधना और आराधना कहते हैं।
उपासना, साधना और आराधना कहते हैं। वास्तव में यहीं अध्यात्म की असली शिक्षा है।
उपासना कहलाती है। भगवान माने उच्च आदर्शों, उच्च सिद्धान्तों का समुच्चय। उच्च आदर्शों, उच्च सिद्धान्तों को अपने साथ मिला लेना ही उपासना कहलाती है। हमने अपने जीवन में इसी प्रकार की उपासना की है, आपको भी इसी प्रकार की उपासना करनी चाहिये।
उपासना करने से इन कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। अग्निपुराण में भी उल्लेख है-
उपासना में अधिक समय लगाना चाहिये, इससे संध्या के समय कम समय में जप सम्पन्न हो जाता है। जप के समय मस्तक के मध्य भाग अथवा हृदय में प्रकाश पुँज ज्योतिस्वरूप गायत्री का ध्यान करते रहना चाहिये।
उपासना साधना की अनेकों विधियाँ हैं सामान्य साधकों के लिये 9 दिन में 24000 का लघु अनुष्ठान तथा 40 दिन में सवा लक्ष का अनुष्ठान निर्धारित है। जिसे प्रायः लोग आसानी से कर लेते है, परन्तु गायत्री का पूर्ण पुरश्चरण 24 लाख का होता है। जो लोगों को कठिन पड़ता है। जिसमें लगभग 6 घंटे साधना में लगने पड़ते हैं। इतना समय सामान्य रूप से निकाल पाना कठिन होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-January
उपासना गृह की इस छोटी-सी कोठरी में हिमालय का संचार कर रहा था। एक अलौकिक सुगन्ध और अद्भुत आभा अभी भी वहाँ बिखर रही थी। साधक ने उस सिद्ध ज्योति को अपने समर्थ गुरु की प्रत्यक्ष मूर्ति मान बड़ी भक्तिभाव से प्रणाम किया और उठ खड़ा हुआ। आखिर अब उसे अपनी हिमालय-यात्रा की तैयारी जो करनी थी। हिमालय-यात्रा के लिए अपने गुरुदेव का आदेश पाकर साधक का मन अतिशय पुलकित और प्रफुल्लित था।
उपासना का संबल सदैव मंगलमय रहता है। जिनके बच्चे रोगी, कुबुद्धिग्रस्त, आलसी, चिड़चिड़े, अस्वस्थ रहते हों, उनकी माताएँ बच्चे को गोद में लेकर हंवाहिनी, गुलाबी पुष्पों से लदी हुई शंख-चक्र हाथ में लिए गायत्री का धन करें और मन ही मन गायत्री मंत्र का जप करें। माता के जप का प्रभाव गोदी में चढ़े बालक पर होता है ओर उसके शरीर तथा मस्तिष्क में आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ता है। छोटा बच्चा हो तो इस साधना के समय माता उसे दूध पिलाती रहे। बड़ा हो तो उसके सिर पर और शरीर पर हाथ फिराती रहे।
उपासना-गायत्री साधना के क्रियापरक कर्मकाण्ड की तुलना शरीर के कलेवर से की जा सकती है। शरीर और चेतना दो भिन्न चीजें हैं। इससे शरीर का लाभ है क्या? शरीर का भी लाभ है। हम क्या सेवा कर सकते हैं, हाथ से?
उपासना करते रहे हैं, जिसको मुख से उच्चारण करना पड़ता था, जीभ से उच्चारण करना पड़ता था, वह किस चीज की बनी है? चमड़े की। चमड़े की जीभ क्या बोलती थी? गायत्री मंत्र बोलती थी, ॐ नमः शिवाय बोलती थी, राम-राम बोलती थी। अभी तक जो उपासना धूपबत्ती के माध्यम से, चन्दन के माध्यम से, अगरबत्ती के माध्यम से, चावल के माध्यम से आप पूजा-उपासना जो करते रहे हैं, सब भजन था।
उपासना विशेष रूप से पतिकुल कुल के लिए ही लाभदायक सिद्ध होती है।
उपासना का शरीर मात्र है, जिसे अभी हमने आपको बताया।
उपासना सब के लिए सब प्रकार मंगलमयी है।
उपासना आप बहुत दिनों से करते रहे हैं फिर क्या लाभ हुआ होगा? अपनी दिशाएँ अस्वस्थ हो तो प्रगति रुक गी होगी उससे। और क्या लाभ हुआ होगा- और कोई खास लाभ तो नहीं हुआ होगा, क्योंकि आपकी उपासना क्रिया-कलाप तक सीमित थी, कलेवर तक सीमित थी। यह भजन था उसका, कलेवर था, शरीर था जो कि बहुत दिनों से आपको हम सिखाते हुए चले आ रहे थे। उसमें क्रियाएँ करनी होती थीं।
उपासना धूपबत्ती के माध्यम से, चन्दन के माध्यम से, अगरबत्ती के माध्यम से, चावल के माध्यम से आप पूजा-उपासना जो करते रहे हैं, सब भजन था। उस भजन-उपासना का लाभ उतना ही बन सकता है, जितना कि हमारे शरीर और हमारे कान के बीच अन्तर है, वही अन्तर भजन और उपासना में है।
उपासना के लिए बैठना चाहिए। केशर डालकर चंदन अपने हाथ से घिसें और मस्तक, हृदय तथा कंठ पर तिलक छाप के रूप में लगावें। तिलक छोटे-से-छोटा भी लगाया जा सकता है। गायत्री मूर्ति या चित्र की स्थापना करके उसकी विधिवत पूजा करनी चाहिए। पूजन के सभी कार्यों में पीले रंग की सामग्री ही प्रयुक्त करनी चाहिए।
उपासना-आराधना करते रहे हैं और उन्होंने प्रत्येक धर्मावलम्बी मनुष्य को इसी सुख्य-माध्य एवं शीघ्र सफल होने वाली साधना-प्रणाली को अपनाने का आदेश दिया है।
उपासना-समारोह करके मानते रहे हैं। पाश्चात्य अंधानुकरण शैली ने आज के दौर में प्राचीनता के गौरव को विस्मृत- सा दिया गया है। 31 दिसम्बर की रात्रि को यह विस्मृति अपने चरम तक जा पहुँचती है। इस अवसर को भारतीय परंपराओं के नवोन्मेष के रूप यदि मनाया जाने लगे, तो यह नववर्ष के उल्लास की सार्थक अभिव्यक्ति होगी।
उपासना करता है, उसे किसी प्रकार का कोई भी अभाव नहीं रहता और न कोई किसी प्रकार कष्ट सहता। वह सदा आनन्दित रहता है तथा भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही प्रकार की सम्पदाओं से परिपूर्ण रहता है। इसीलिए गायत्री को सर्वकामधुक अर्थात् समस्त कामनाओं को पूरा करने वाली कहा गया है। यह महाशक्ति मनुष्य के सभी कष्टों का समाधान कर देती है। गायत्री मंजरी में कहा भी गया है-
उपासना क्रिया-कलाप तक सीमित थी, कलेवर तक सीमित थी। यह भजन था उसका, कलेवर था, शरीर था जो कि बहुत दिनों से आपको हम सिखाते हुए चले आ रहे थे। उसमें क्रियाएँ करनी होती थीं। किससे? शरीर से अब तक अपने कलेवर सीखा होगा।
उपासना और साधना के रहस्य समझाऊँगा। यह सारे के सारे रहस्य इस शिविर में बताते हुए चला जाऊंगा, जिसके लिए मैंने आपको बुलाया है।
उपासना की प्रेरणा दी गयी है। पुरुषों की भाँति नारियाँ भी गायत्री उपासना की समान अधिकारिणी हैं। साधना क्षेत्र में पुरुष-स्त्री का भेद नहीं, दोनों ही वर्ग ईश्वर की आँखों के तारे हैं, इस क्षेत्र में सभी आत्माएँ समान हैं। अतः गायत्री महाशक्ति की आराधना का अधिकार सभी को है, चाहे वे नर हों या नारी। जो लोग यह कहते हैं कि गायत्री वेदमंत्र होने से उसका अधिकार नारी को नहीं है, वे भारी भूल करते हैं।
उपासना की थी। वनदुर्गाओं में आस्तिक कन्याएँ भगवती की आराधना करती हैं। गायत्री उपासना सब के लिए सब प्रकार मंगलमयी है।
उपासना में कुछ असुविधा नहीं हो सकती। साधारण दैनिक साधना में कोई विशेष नियमोपनियम पालन करने की आवश्यकता नहीं है। दाम्पत्य जीवन के साधारण धर्म-पालन करने में उसमें कोई बाधा नहीं। यदि कोई विशेष साधना या अनुष्ठान करना हो तो उतनी अवधि के लिए ब्रह्मचर्य पालन करना आवश्यक होता है।
उपासना जो करते रहे हैं, सब भजन था। उस भजन-उपासना का लाभ उतना ही बन सकता है, जितना कि हमारे शरीर और हमारे कान के बीच अन्तर है, वही अन्तर भजन और उपासना में है।
उपासना है, मानव-शरीर में स्थित ईश्वर की उपासना। यह भाव पूरे भारत में नहीं, सम्पूर्ण पृथ्वी पर फैल जाएगा।
उपासना का कर्मकाण्ड एवं क्रिया-कलाप समझाते रहे हैं कि पावन गायत्री मंत्र क्या होता है ओर गायत्री उपासना कैसे की जा सकती है? कर्मकाण्ड तो कलेवर मात्र है। यह उपासना का शरीर मात्र है, जिसे अभी हमने आपको बताया।
उपासना-गृह में अखण्ड दीप प्रज्ज्वलित था। वर्षा से निरन्तर जल रहे इस दीपक की ज्योति इस साधक को आत्म ज्योति बन चुकी थी, जो ब्रह्ममुहूर्त के इन क्षणों में इस सिद्ध ज्योति के सम्मुख ध्यानस्थ। उसके चैतन्य में सर्वमयता स्थिर हो गयी थी। अहम् इदं के मध्य जो आच्छादित था, दूर हो गया। साधक के कण-प्रतिकण में अणु गैस परमाणु में व्याप्त अव्यक्त सुनाई पड़ने लगा।
उपासना जो आदमी को समर्थ बना सकती है, वह उपासना जो आदमी को शक्तिवान बना सकती है, वह उपासना जो आदमी को सिद्धपुरुष बना सकती है, वह उपासना जो इस भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवनों में आदमी को उठाकर कहीं से कहीं ले जा सकती हैं। उसका मूल उसका प्राण हम आपको सिखाएँ, यही उद्देश्य है इस शिविर का। यह गायत्री का प्राण, साधना का प्राण है। चलिए हमारे साथ-साथ गहराई में डुबकी लगाइए, ताकि आपको गायत्री की बाबत अब तक जो जानकारी है, उसकी अपेक्षा अधिक जानकारी मिलें।
उपासना कर सकती हैं। पार्वती ने मनचाहा वर पाने के लिए नारद जी के आदेशानुसार विशेष पुरश्चरण किये थे और वे अन्त में सफल मनोरथ भी हुई थी। सीता जी ने मनोवाँछित पति पाने के लिए गौरी-पार्वती की उपासना की थी। वनदुर्गाओं में आस्तिक कन्याएँ भगवती की आराधना करती हैं। गायत्री उपासना सब के लिए सब प्रकार मंगलमयी है।
उपासना कैसे की जा सकती है? कर्मकाण्ड तो कलेवर मात्र है। यह उपासना का शरीर मात्र है, जिसे अभी हमने आपको बताया।
उपासना का विशिष्ट पर्व माना है। इस अवसर पर भगवान सूर्य की गायत्री महामंत्र के साथ पूजा-उपासना, यज्ञ-हवन का अलौकिक महत्व है। मकर संक्रान्ति पर्व के देवता सूर्य को देवों में विश्व की आत्मा कहकर अलंकृत किया गया है। आयुर्वेद के मर्मज्ञों का मानना है, शीतकालीन ठण्डी हवा शरीर में अनेक व्याधियों को उत्पन्न करती है। इसीलिए तिल-गुड़ आदि वस्तुओं का इस अवसर पर प्रयोग करने का विशेष विधान है।
उपासना जो आदमी को सिद्धपुरुष बना सकती है, वह उपासना जो इस भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवनों में आदमी को उठाकर कहीं से कहीं ले जा सकती हैं। उसका मूल उसका प्राण हम आपको सिखाएँ, यही उद्देश्य है इस शिविर का। यह गायत्री का प्राण, साधना का प्राण है। चलिए हमारे साथ-साथ गहराई में डुबकी लगाइए, ताकि आपको गायत्री की बाबत अब तक जो जानकारी है, उसकी अपेक्षा अधिक जानकारी मिलें।
उपासना, यज्ञ-हवन का अलौकिक महत्व है। मकर संक्रान्ति पर्व के देवता सूर्य को देवों में विश्व की आत्मा कहकर अलंकृत किया गया है। आयुर्वेद के मर्मज्ञों का मानना है, शीतकालीन ठण्डी हवा शरीर में अनेक व्याधियों को उत्पन्न करती है। इसीलिए तिल-गुड़ आदि वस्तुओं का इस अवसर पर प्रयोग करने का विशेष विधान है। चरक संहिता स्पष्ट करती है-’शीते शीतानिलर्स्पषसंरुद्धो बलिनाँ बली।
उपासना के साथ यज्ञ हवन एवं दान को पुण्य-फलदायक बताया है।
उपासना का लाभ उतना ही बन सकता है, जितना कि हमारे शरीर और हमारे कान के बीच अन्तर है, वही अन्तर भजन और उपासना में है।
उपासना जो इस भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवनों में आदमी को उठाकर कहीं से कहीं ले जा सकती हैं। उसका मूल उसका प्राण हम आपको सिखाएँ, यही उद्देश्य है इस शिविर का। यह गायत्री का प्राण, साधना का प्राण है। चलिए हमारे साथ-साथ गहराई में डुबकी लगाइए, ताकि आपको गायत्री की बाबत अब तक जो जानकारी है, उसकी अपेक्षा अधिक जानकारी मिलें।
उपासना जो आदमी को शक्तिवान बना सकती है, वह उपासना जो आदमी को सिद्धपुरुष बना सकती है, वह उपासना जो इस भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवनों में आदमी को उठाकर कहीं से कहीं ले जा सकती हैं। उसका मूल उसका प्राण हम आपको सिखाएँ, यही उद्देश्य है इस शिविर का। यह गायत्री का प्राण, साधना का प्राण है। चलिए हमारे साथ-साथ गहराई में डुबकी लगाइए, ताकि आपको गायत्री की बाबत अब तक जो जानकारी है, उसकी अपेक्षा अधिक जानकारी मिलें।
उपासना में ईश्वर को माता मानकर उसकी आराधना की जाती हैं। संसार में जितने भी रिश्ते हैं, उन सब में माता का रिश्ता अधिक प्रेमपूर्ण तथा अत्याधिक घनिष्ठ है। ईश्वर को जिस दृष्टि से देखा जाता है, वह उसी तरह प्रत्युत्तर देता है। स्नेह, वात्सल्य, करुणा, ममता, दया, उदारता, कोमलता आदि तत्व नारी में नर की अपेक्षा स्वभावतः अधिक होते हैं। ब्रह्म का अर्द्धवामाँग ब्राही तत्व अधिक कोमल, अधिक आकर्षक तथा शीघ्र द्रवीभूत होने वाला है।
उपासना के द्वारा महिलाएँ अपने घर-परिवार के सदस्यों, बच्चों पर धार्मिक संस्कार अधिक अच्छी तरह से डाल सकती हैं और परिवार में स्वर्गीय वातावरण का निर्माण कर सकती हैं। यहाँ कुछ ऐसी साधनाएँ दी जा रही हैं जो हर आयु-वर्ग के लिए उपयुक्त हैं। गायत्री मंत्र वही है, परन्तु अन्तर भाव-क्षेत्र का है। माता को प्रसन्न करने के लिए उपासना के साथ-साथ आवश्यकता के अनुरूप भाव-साधना भी करनी पड़ती है। नौ दिन का पूर्ण अनुष्ठान होता है।
उपासना का पर्व भी कहते हैं। इस अवसर पर उमड़ने वाले सात्विक भव देश की सांस्कृतिक चेतना को पुष्ट करते हैं।
उपासना के साथ-साथ आवश्यकता के अनुरूप भाव-साधना भी करनी पड़ती है। नौ दिन का पूर्ण अनुष्ठान होता है। तत्कालीन आवश्यकता के लिए इन्हें ही प्रयुक्त किया जाता है। इसके अतिरिक्त एक वर्ष का गायत्री उद्यापन सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। महिलाओं के लिए इसकी विशेष महिमा हैं।
उपासना की समान अधिकारिणी हैं। साधना क्षेत्र में पुरुष-स्त्री का भेद नहीं, दोनों ही वर्ग ईश्वर की आँखों के तारे हैं, इस क्षेत्र में सभी आत्माएँ समान हैं। अतः गायत्री महाशक्ति की आराधना का अधिकार सभी को है, चाहे वे नर हों या नारी। जो लोग यह कहते हैं कि गायत्री वेदमंत्र होने से उसका अधिकार नारी को नहीं है, वे भारी भूल करते हैं। प्राचीनकाल में स्त्रियाँ मंत्रदृष्टा रही हैं।
उपासना का कर्मकाण्ड परक क्रियाकृत्य भी है। आप लोगों ने बहुत समय से सीखा है ओर जाना है। एक खस बात मैं समझता हूँ कि इतना लाभ तो जरूर हुआ होगा कि मन की एकाग्रता हुई होगी। गायत्री उपासना आप बहुत दिनों से करते रहे हैं फिर क्या लाभ हुआ होगा? अपनी दिशाएँ अस्वस्थ हो तो प्रगति रुक गी होगी उससे।
उपासना में आगे बढ़ेंगे वे ही युग-संक्रान्ति की उपलब्धियों को बटोर सकेंगे।
उपासना मातृ उपासना है। इस उपासना में ईश्वर को माता मानकर उसकी आराधना की जाती हैं। संसार में जितने भी रिश्ते हैं, उन सब में माता का रिश्ता अधिक प्रेमपूर्ण तथा अत्याधिक घनिष्ठ है। ईश्वर को जिस दृष्टि से देखा जाता है, वह उसी तरह प्रत्युत्तर देता है। स्नेह, वात्सल्य, करुणा, ममता, दया, उदारता, कोमलता आदि तत्व नारी में नर की अपेक्षा स्वभावतः अधिक होते हैं।
उपासना की जिसको हम भजन कहते हैं, कलेवर कहते हैं। अब तक जो आप उपासना करते रहे हैं, जिसको मुख से उच्चारण करना पड़ता था, जीभ से उच्चारण करना पड़ता था, वह किस चीज की बनी है? चमड़े की। चमड़े की जीभ क्या बोलती थी? गायत्री मंत्र बोलती थी, ॐ नमः शिवाय बोलती थी, राम-राम बोलती थी।
उपासना के लिए बैठना चाहिए। पास में जल से भरा हुआ पात्र रहे। जप के लिए तुलसी की माला और बिछाने के लिए आसन या चटाई-कुशासन सबसे उपयुक्त रहता है। वृषभारूड़, श्वेत वस्त्रधारी चतुर्भुजी प्रत्येक हाथ में, माला, कमण्डल, पुस्तक और कमल पुष्प लिए प्रसन्नमुख प्रौढ़ावस्था गायत्री महाशक्ति का ध्यान करना चाहिए। ध्यान चित्त की चंचलता को दूर करने तथा सद्गुणों की वृद्धि के लिए बड़ा लाभदायक सिद्ध होता है।
उपासना। यह भाव पूरे भारत में नहीं, सम्पूर्ण पृथ्वी पर फैल जाएगा।
उपासना है। इस उपासना में ईश्वर को माता मानकर उसकी आराधना की जाती हैं। संसार में जितने भी रिश्ते हैं, उन सब में माता का रिश्ता अधिक प्रेमपूर्ण तथा अत्याधिक घनिष्ठ है। ईश्वर को जिस दृष्टि से देखा जाता है, वह उसी तरह प्रत्युत्तर देता है। स्नेह, वात्सल्य, करुणा, ममता, दया, उदारता, कोमलता आदि तत्व नारी में नर की अपेक्षा स्वभावतः अधिक होते हैं।
उपासना में है।
उपासना करनी चाहिए। पिता के कुल एवं पतिकुल दोनों ही पक्षों के लिए यह साधना उपयोगी है, पर सधवाओं की मंगलमय गायत्री उपासना विशेष रूप से पतिकुल कुल के लिए ही लाभदायक सिद्ध होती है।
उपासना-साधना पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों के लिए अधिक सरल और अधिक फलदायिनी है।
उपासना कर लेनी चाहिए। जब तक साधना न हो तब तक भोजन नहीं करना चाहिए- हाँ जल पिया जा सकता है। शुद्ध शरीर, शुद्ध मन और शुद्ध वस्त्र से तैयार होकर पूर्व की ओर मुँह करके उपासना के लिए बैठना चाहिए। केशर डालकर चंदन अपने हाथ से घिसें और मस्तक, हृदय तथा कंठ पर तिलक छाप के रूप में लगावें। तिलक छोटे-से-छोटा भी लगाया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-July
उपासना की और अर्थ संकट को पार करके ऐसी स्थिति पर पहुँच गये कि जिनको अनेकों के लिए ईर्ष्या होती है। कम पढ़े और छोटी नौकरियों पर काम करने वालों को ऊंचे पद पर पहुँचने के उदाहरण मौजूद हैं। जिनकी बुद्धि बड़ी ही भौंड़ी और मंद थी वे चतुर, तीक्ष्णबुद्धि और विद्वान बने हैं। जिनकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की कोई आशा नहीं करता था, ऐसे विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास हुए हैं। झगड़ालू, चिड़चिड़े, क्रोधी, व्यसनी, बुरी आदतों में फंसे हुए, आलसी एवं मूढ मति लोगों के स्वभाव में ऐसे परिवर्तन हुए हैं कि लोग दाँतों तले उंगली दबाते रह गये।
उपासना द्वारा जो लाभ हुए हैं उनका उल्लेख न करना ही शिष्टाचार की दृष्टि से उचित है, माता मेरी अन्तःभूमि को जिस प्रकार निर्मल करती जा रही है उस प्रगति को देखते हुए यह आशा करना भी अनुचित नहीं कि अपना मनुष्य जन्म निष्फल जायगा।
उपासना में बढ़ी। मैंने उसे गायत्री उपासना की सलाह दी और उसने मनोयोग पूर्वक नित्य नियमित जप आरम्भ कर दिया। उसका स्वास्थ्य बहुधा खराब रहता था, पर जब से उसने गायत्री की पूजा आरम्भ की है तब से उसका स्वास्थ बहुत सुधरा है। बहुत दामों की दवाएं जितना लाभ नहीं पहुँचा सकती थीं, उससे अधिक निरोगता उसे पूजा द्वारा प्राप्त हुई है।
उपासना करते हैं वे इस प्रचण्ड ब्राह्मी शक्ति की महिमा को नहीं जानते। चक्रवर्ती राजा से कोई यह माँगे कि मुझे एक रोटी दिला दीजिए तो उस याचक को मूर्ख ही कहेंगे। रोटी तो थोड़े परिश्रम से कमाई जा सकती है या अन्य तरीकों से भी उसे प्राप्त किया जा सकता है। राजा से माँगनी हो तो ऐसी मूल्यवान वस्तु माँगनी चाहिए जो अपने प्रयत्न से या साधारण साधनों से प्राप्त न हो सकती हो। साँसारिक वस्तुएं मनुष्य स्वयं उपार्जित कर सकता है, दूसरों से ले सकता है या उनके अभाव में भी काम चला सकता है, परन्तु एक ऐसी वस्तु है जो कठिनाई से प्राप्त होती है वह वस्तु है सुसंस्कार, सत्पात्रता और सात्विक दृष्टि, यही गायत्री माता से माँगने योग्य है।
उपासना की शिक्षा मुझे 11 वर्ष की आयु में उस समय मिली जब मेरा यज्ञोपवीत हुआ था। जिस दिन से यह महामन्त्र मुझे मिला उस दिन से लेकर आज पर्यंत मैं पूर्ण श्रद्धा और लग्न के साथ नियमित रूप से इस साधन को करता हुआ चला आ रहा हूँ।
उपासना पर बैठा हुआ था, जप पूरा पुरा भी न हो पाया था कि दरवाजे पर बड़ी घबराहट भरी आर्त पुकार सुनाई पड़ी। पुकारने वाला व्यक्ति मेरे पास दौड़ता हुआ सीधा आया और बोला-भैया अनर्थ हो गया, मेरी इकलौती लड़की को काले विष धर साँप ने काट लिया, उसको किसी प्रकार बचाओ, तुम्हारा पूजा पाठ मेरे फिर किस काम आयेगा। चलो, तुरन्त उठो और उसके प्राण बचाओ।
उपासना में बहुत समय से निष्ठावान रही थीं।
उपासना के फलस्वरूप उस हानि की पूर्ति भी हो गई।
उपासना करने से आत्म-बल बढ़ता है। धीरे-धीरे जन्म बन्धन रहित परमात्मा की समीपता प्राप्त होती है।
उपासना की जाय कोई कामना पूर्ति की शर्त न लगाई जाय। क्योंकि मनुष्य अपने वास्तविक लाभ या हानि और आवश्यकता को स्वयं उतना नहीं समझता है। वह हमारी वास्तविक आवश्यकता को स्वयं पूरा करता है। प्रारब्ध वश कोई अटल दुर्भाग्य न भी टल सके तो भी साधना निष्फल नहीं जाती। वह किसी न किसी अन्य मार्ग से साधक को उसके श्रम की अपेक्षा अनेक गुना लाभ अवश्य पहुँचा देती है।
उपासना पर इतना भरोसा नहीं था। मेरे अन्तःकरण में शंकाएं बनी ही रहती थीं कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ वह सही है या त्रुटिपूर्ण। साधना काल के अनुभवों का अर्थ भी नहीं समझ पाता था। बड़ी दुविधा में पड़ा हुआ था। में बहुत दिनों से योग्य महात्मा, पथप्रदर्शक की तलाश में था।
उपासना करता हूँ। रोग निवारण के लिए जितनी उपयोगी दवाएं सिद्ध नहीं होती उससे अधिक गायत्री के उपचार सिद्ध होते हैं। कितने ही कष्ट साध्य रोगियों पर मैं गायत्री मन्त्र का उपयोग करके आश्चर्यजनक लाभ देख चुका हूँ। उनमें से कुछ का संक्षिप्त विवरण नीचे प्रस्तुत कर रहा हूँ।
उपासना की थी। श्री. स्वामी दयानन्द ने जीवन भर स्वयं गायत्री उपासना की तथा अनेकों अपने अनुयायियों को इसके लिए प्रेरणा देते रहे। तथा श्री वासीराम जी कृत महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र पुस्तकों से नीचे श्री महायानन्द प्रकाश नामक स्वामी जी के जीवन चरित्र ग्रन्थ से कुछ उदाहरण उपस्थिति कर रहे हैं जिससे पाठक श्री स्वामी दयानन्द की गायत्री निष्ठा का अनुमान लगा सकें।
उपासना करके स्वस्थ, तेजस्वी, बुद्धिमान दीर्घजीवी एवं भाग्यवान बालक प्राप्त करती हैं।
उपासना कर सकती हैं। विधवाएं आत्मसंयम इन्द्रिय निरोध, मनोनिग्रह एवं सात्विकता की वृद्धि करने में गायत्री की सहायता से सफल होती हैं। वे घर में रह कर इस तपस्या द्वारा आत्म-कल्याण एवं प्रभु प्राप्ति एवं जीवन मुक्ति प्राप्त कर सकती हैं। कुमारी कन्याओं की गायत्री साधना उनको अच्छे घर पर तथा अत्यन्त सौभाग्य प्रदान करने में सहायक होती है। सधवाएं गायत्री साधना द्वारा दाम्पत्ति जीवन में प्रेम, घर में सुख शान्ति एवं समृद्धि, बालकों का कुशल क्षेम प्राप्त करती हैं।
उपासना में बहुत ही सन्तोषजनक प्रगति करने का आनन्द प्राप्त हो रहा है। दिन पर दिन स्वभाव और प्रकृति में भी सन्तोषजनक परिवर्तन हो रहा है। आत्मबल की आशाजनक वृद्धि हुई है। हृदय में बड़ा ही सन्तोष हो रहा है। कुछ यौगिक षट्चक्रों का भी अप्रत्यक्ष रूप में अनुभव होने लगा है, कुछ ही दिनों में वेदमाता के प्रति इतनी श्रद्धा और सन्तोषजनक प्रगति का होना भगवती की कृपा का प्रत्यक्ष प्रमाण मालूम देता है।
उपासना आराधना करके गायत्री महाशक्ति की सहायता प्राप्त करनी चाहिये। दूसरों के तप से स्वयं लाभ उठाना एक गलत तरीका है जिसे चालाक आदमी, भोले भाले साधकों को खुशामद या दीनता दिखाकर प्रयुक्त करते हैं। साधकों को किसी प्रपंच में फंसकर अपनी शक्ति बरबाद नहीं करनी चाहिए वरन् उसे आत्म कल्याण के लिए सुरक्षित करना चाहिए।
उपासना तथा मन्त्र लेखन की साधना में संलग्न हूँ। यों मेरी साधना निष्काम रही है, पर देखता हूँ कि उसके साँसारिक परिणाम भी बहुत कल्याण कारक हो रहे हैं।
उपासना काल में बहुत से अनुभव हुए हैं। इन अनुभवों का जिक्र गुरु आज्ञा के बिना करना निषेध है। अतः इस विषय में विशेष बातें नहीं लिखी जा सकतीं।
उपासना की तथा अनेकों अपने अनुयायियों को इसके लिए प्रेरणा देते रहे। तथा श्री वासीराम जी कृत महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र पुस्तकों से नीचे श्री महायानन्द प्रकाश नामक स्वामी जी के जीवन चरित्र ग्रन्थ से कुछ उदाहरण उपस्थिति कर रहे हैं जिससे पाठक श्री स्वामी दयानन्द की गायत्री निष्ठा का अनुमान लगा सकें।
उपासना से इस भावना को प्रोत्साहन मिलता है।
उपासना के फलस्वरूप कितनी ही आश्चर्यजनक घटनाएं घटित हुई हैं। एक बार सम्वत् 70 में वे अपनी माता के साथ पुष्कर से जयपुर जा रहे थे। रास्ते में अचानक भारी वर्षा हुई और पहाड़ों का पानी एकत्रित होकर तालाब में जाने लगा। जिस रास्ते वे चल रहे थे उसमें इतना पानी आ गया कि माताजी समेत वे डूबने लगे। ऐसे समय में गायत्री स्मरण के अतिरिक्त और कोई उपाय उनसे न बन पड़ा वे कहते हैं कि हमें ऐसा अनुभव हुआ मानों किसी ने पकड़कर उठा लिया हो और पार लेगा दिया हो।
उपासना की सलाह प्राप्त करके जाते हैं जिससे बहुधा उनका कल्याण ही होता है। साँसारिक नौकरी छूट गई अब हम दोनों माता की नौकरी में लगे हुए हैं। रोटी कपड़ा लेकर परम सन्तोषपूर्वक जीवन यापन करते हैं।
उपासना की महिमा जितनी कही जाय उतनी कम है। माता की कृपा से कोई भी सच्चा साधक वंचित नहीं रहता, उसे उसके परिश्रम की अपेक्षा कई गुना लाभ निश्चित रूप से मिल जाता है। परन्तु बुद्धिमानी इसमें नहीं है कि छोटे छोटे साँसारिक प्रयोजनों में साधना की महान आध्यात्मिक शक्ति को खर्च किया जाय। तप से बड़ा और कोई धन नहीं है। तप के बदले से ही सुख मिलता है।
उपासना की सलाह दी और उसने मनोयोग पूर्वक नित्य नियमित जप आरम्भ कर दिया। उसका स्वास्थ्य बहुधा खराब रहता था, पर जब से उसने गायत्री की पूजा आरम्भ की है तब से उसका स्वास्थ बहुत सुधरा है। बहुत दामों की दवाएं जितना लाभ नहीं पहुँचा सकती थीं, उससे अधिक निरोगता उसे पूजा द्वारा प्राप्त हुई है।
उपासना करते थे और इसी महामन्त्र का उपदेश अपने अनुयायियों को करते थे। यह परम्परा अनादि काल से लेकर अब तक चली आ रही है। आधुनिक काल के भी सन्त महात्मा इसी मार्ग पर चल रहे हैं।
उपासना के परिणामों को देखते हुए यह कहना पड़ता है कि गायत्री माता समुचित कल्पवृक्ष का काम करती है। अपने पुत्रों की रक्षा एवं उन्नति के लिए वह बड़ी सहायता देती है। शत्रु चाहे आन्तरिक हो चाहे बाहरी उनसे रक्षा सहज ही हो जाती है। भयभीतों को माता की शरण में अभयदान मिलता है। सकाम साधना की अपेक्षा निष्काम भावना अधिक श्रेष्ठ है।
उपासना करके देखे, तो उनका अविश्वास विश्वास में परिणित होकर रहता है।
उपासना का कष्ट नहीं उठाना चाहते और किसी तपस्वी के तप का अवस्थित लाभ अपना प्रारब्ध बदलने में खर्च कराना चाहते हैं। खुदगर्ज लोगों से गायत्री साधकों को सावधान रहना चाहिए। अनेक साधक संसार में आये दिन घटित होती रहने वाली दुख सुख की घटनाओं में अपनी टाँग अड़ाकर किसी का प्रारब्ध बदलने के झंझट में लग जाते हैं, यह मूर्खता का मार्ग किसी भी दूरदर्शी गायत्री उपासक को नहीं अपनाना चाहिए।
उपासना कर रहा हूँ। हमारे घर में गायत्री माता के प्रति सभी की श्रद्धा है। गायत्री सम्बन्धी पुस्तकें पढ़ने के बाद यह विश्वास बहुत गहरा हो गया है कि मनुष्य के लौकिक और पारलौकिक कल्याण के लिए उस महामन्त्र का साधन करना बहुत आवश्यक है।
उपासना में लग जाते थे। 8 बजे सबको पंच गव्य दिया जाता था। साढ़े 11 बजे तक विविध कार्यक्रम चलते रहते। मध्याह्न को फलाहार दिया जाता। दो घण्टे का विश्राम देकर 2 बजे से फिर सब कार्यक्रम आरम्भ हो जाते और सायंकाल 5 बजे तक चलते रहते।
उपासना से धीरे-धीरे मनुष्य के सब संकट दूर होते हैं पर कई बार ऐसा भी होता है कि तत्काल भारी संकट से निवृत्ति हो जाती है। यों तो भगवान भक्तों का कल्याण सदैव ही करते हैं पर आपत्ति पड़ने पर वे ग्राह के मुख से गज को छुड़ाने के लिये जिस प्रकार दौड़े आये थे उसी प्रकार गायत्री माता भी आपत्ति के समय रक्षा करती है, इसके अनेक उदाहरण हमने देखे हैं उनमें से एक उदाहरण नीचे लिखा है।
उपासना से मनुष्य की अनेक कठिनाइयाँ हल होती हैं। ऐसे अनेकों उदाहरण मौजूद हैं कि जो लोग आरम्भ में दरिद्रता का अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करते थे, अपने मामूली गुजारे की भी व्यवस्था जिनके पास न थी, कर्ज के बोझ से दबे हुए थे, व्यापार में घाटा जा रहा था, उन्होंने गायत्री की उपासना की और अर्थ संकट को पार करके ऐसी स्थिति पर पहुँच गये कि जिनको अनेकों के लिए ईर्ष्या होती है। कम पढ़े और छोटी नौकरियों पर काम करने वालों को ऊंचे पद पर पहुँचने के उदाहरण मौजूद हैं। जिनकी बुद्धि बड़ी ही भौंड़ी और मंद थी वे चतुर, तीक्ष्णबुद्धि और विद्वान बने हैं। जिनकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की कोई आशा नहीं करता था, ऐसे विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास हुए हैं।
उपासना का ही चमत्कार है। अन्यथा कुछ ही समय पहले जब औषधालय खोलने लायक पूँजी, सहायता एवं सुविधा की कोई व्यवस्था न थी कौन यह आशा करता था कि साधनों के अभाव में भी इस प्रकार की उन्नति सम्भव है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-August
उपासना करके संसार को ज्ञान-विज्ञान की भाषा से आलोकित किया था। प्राचीन भारत की जो महानता थी उसके मूल में उसकी आत्म शक्ति ही प्रधान थी। भौतिक सम्पन्नता भी उसे जो कुछ उपलब्ध थी वह भी आत्मिक योग्यताओं के आधार पर थी। आजकल छल, बनावट शोषण, अपहरण एवं अन्याय के आधार पर सुख सम्पदाएं एकत्रित की जाती हैं। प्राचीन काल में ऐसी कोई आवश्यकता न होती थी।
उपासना के महत्व को समझाना एवं उपासना के मार्ग पर लगा देना अधिक महत्वपूर्ण है। थोड़े से व्यक्ति आत्म लाभ कर लें या मुक्ति प्राप्त कर लें इसमें केवल उन थोड़े से व्यक्तियों का ही लाभ है पर यदि अनेक व्यक्ति सन्मार्ग गामी हों तो संसार के गन्दे वातावरण को ही बदल सकते हैं। इसलिए गायत्री प्रेमियों को अपनी साधना के साथ साथ गायत्री प्रचार के लिए भी विशेष रूप से प्रयत्न करना चाहिये। जिसके प्रयत्न से लोग सन्मार्ग गामी होते हैं उस प्रयत्नकर्ता को भी विशेष पुण्य-फल प्राप्त होता है। इस प्रकार अनेक व्यक्तियों को सन्मार्ग पर लगाने का पुण्य फल, अपनी थोड़ी सी एकान्त साधना की अपेक्षा कहीं अधिक मिल जाता है।
उपासना करता है तो उसमें परमेश्वर की व्यापकता का निषेध नहीं है।
उपासना के बिना ऋषित्व प्राप्त किया है। तप का निश्चित आधार गायत्री है। यह उस आत्म बल को गर्मी तथा प्रकाश को उत्पन्न करती है जिससे तपस्वी में प्रभाव, तेज, ब्रह्मचर्य-तड़ित द्युति एवं आवृत्ति का संचार होता है। तपस्वी ही किसी राष्ट्र की सच्ची सम्पत्ति होते हैं। करोड़ मन धोने की अपेक्षा एक तपस्वी का मूल अधिक है।
उपासना का अधिकाधिक विस्तार करने का जो आयोजन है, उससे राष्ट्र में एक तपोमयी भूमिका का सूक्ष्म वायुमण्डल बनेगा और उस वातावरण में अनेक मनोरथ पुष्प प्रस्फुटित होंगे।
उपासना करने से मनुष्य धीरे-धीरे निरहंकार बनता है।
उपासना के मार्ग पर लगा देना अधिक महत्वपूर्ण है। थोड़े से व्यक्ति आत्म लाभ कर लें या मुक्ति प्राप्त कर लें इसमें केवल उन थोड़े से व्यक्तियों का ही लाभ है पर यदि अनेक व्यक्ति सन्मार्ग गामी हों तो संसार के गन्दे वातावरण को ही बदल सकते हैं। इसलिए गायत्री प्रेमियों को अपनी साधना के साथ साथ गायत्री प्रचार के लिए भी विशेष रूप से प्रयत्न करना चाहिये। जिसके प्रयत्न से लोग सन्मार्ग गामी होते हैं उस प्रयत्नकर्ता को भी विशेष पुण्य-फल प्राप्त होता है। इस प्रकार अनेक व्यक्तियों को सन्मार्ग पर लगाने का पुण्य फल, अपनी थोड़ी सी एकान्त साधना की अपेक्षा कहीं अधिक मिल जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-June
उपासना का प्रकारान्तर से परिणाम बड़ा कल्याण कारक होता है।
उपासना करनी चाहिए।
उपासना का सबसे बड़ा लाभ यह है कि उपासक किसी गफलत में नहीं रहता, वह प्रभु को भूलता नहीं, उसकी सर्व व्यापकता तथा न्यायशीलता का विस्मरण नहीं करता, फलस्वरूप वह कुमार्गगामी होने से बच जाता है और सन्मार्ग का अवलम्बन करके परम आनन्ददायक सत्परिणामों को प्राप्त करता है। इस प्रकार ईश्वर उपासना का प्रकारान्तर से परिणाम बड़ा कल्याण कारक होता है।
उपासना के मूल हेतु को भूल गये हैं और उसे खुशामद पसंद चापलूस राजा नवाब की भाँति तथा रिश्वतखोर अफसर की तरह समझकर प्रशंसा के छंद सुनाकर या पैसा पाई की पूजा पत्री चढ़ाकर लुभा लेना चाहते हैं। इस बालक्रीड़ा का वस्तुतः ईश्वर पर कोई प्रभाव नहीं होता। सच्ची उपासना का तात्पर्य जो भली प्रकार समझता है वास्तव में वही सच्चा भक्त है। और उसी की भक्ति फलदायिनी होती है।
उपासना के विविध कर्मकाण्ड एक प्रकार के आध्यात्मिक व्यायाम हैं, जिनके द्वारा आत्म बल बढ़ता है और उस आत्मबल द्वारा नाना प्रकार के भौतिक सुख एवं आत्मिक आनन्द प्राप्त होते हैं। उन आनन्दों को ही ईश्वरीय कृपा भी कहा जाता है उसने हमें जीवन तथा जीवन यापन के अनेक साधन दिए हैं, जिनके कारण वह दयामय, दानी और परम पिता कहलाता है। कृतज्ञता और उपकारी के प्रति श्रद्धा की महान् भावना को अन्तःकरण में स्थिर और प्रबल रखना प्रार्थना का मुख्य उद्देश्य है।
उपासना करता है उसके योगक्षेम का बोझ मैं अपने ऊपर ले लेता हूँ।
उपासना की अनेक प्रक्रिया प्रचलित हैं। सभी धर्मों में ईश्वर आराधना के विधान मौजूद हैं। इसका मूल उद्देश्य यही है कि मनुष्य के चित्त में ईश्वर के सर्वव्यापक और न्यायकारी होने के संस्कार जमे और वह बुराइयों से बचे। निश्चय ही पुलिस कप्तान को सामने खड़ा देखकर जेबकट की यह हिम्मत नहीं पड़ती कि वह उस अधिकारी की जानकारी में जेब काटे। क्योंकि वह जानता है कि ऐसा करने पर उसका अपराध छिप न सकेगा।
उपासना अखण्ड जारी रखी।
उपासना करनी चाहिए पर साथ ही ध्यान रखना चाहिए कि वह न्यायकारी एवं नियम रूप है। जैसे अग्नि, बिजली आदि का नियमानुकूल व्यवहार करने से वे बहुत उपयोगी सिद्ध होती हैं किन्तु यदि उनके नियमों को थोड़ा भी तोड़ा जाय तो वे प्राणघातक बन जाती है इसी प्रकार ईश्वरीय नियमों का पालन करना ही उससे लाभ उठाने का सर्वोत्तम मार्ग है।
उपासना उन्हीं दैवी सम्पत्तियों का एक केन्द्र बिन्दू है। इस संस्था की भावी गतिविधि इसी कार्यक्रम को पूर्ण करने की होगी।
उपासना उनने अपने ब्राह्मण अनुयायियों में जारी की। पृथ्वी निःक्षत्रिय करने का यह प्रयोग उनने इक्कीस बार किया। लेकिन पुराने क्षत्रियों को जान-बूझकर खोज-खोज कर मारने और उनकी जगह अनजाने नये-नये क्षत्रियों का निर्माण करने की प्रक्रिया का फलित भला क्या हो सकता था? आखिर रामचन्द्र ने उनकी आंखों में अंजन डाला। तब से उनकी दृष्टि कुछ सुधरी।
उपासना का तात्पर्य जो भली प्रकार समझता है वास्तव में वही सच्चा भक्त है। और उसी की भक्ति फलदायिनी होती है।
उपासना के सम्बन्ध में चरितार्थ होती है। जो उस परम शक्ति को सर्वत्र व्यापक देखेगा उसकी न्यायशीलता पर विश्वास करेगा, वह इस बात को नहीं भूलेगा कि कोई पाप चाहे कितने ही गुप्त रूप से किया जाय ईश्वर की जानकारी से छिपा नहीं रहता और न्यायशील परमात्मा किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। उसकी न्याय तुला सबके लिए एक समान है। ‘पुण्यात्मा का पुण्यफल और पापी को दारुण दुःख’ यह उस परमात्मा की न्यायशीलता अविच्छिन्न है, इसमें कभी कोई अन्तर नहीं आ सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-February
उपासना करने से आत्म-बल बढ़ता है। धीरे-धीरे जन्म बन्धन रहित परमात्मा की समीपता प्राप्त होती है।
उपासना में स्वीकार किये हैं।
उपासना करते हैं। यह तो एक भाव हुआ। दूसरा भाव यह है कि ईश्वर ही हम लोगों के जीवन का लक्ष्य-स्वरूप है। ईश्वर से अधिक श्रेष्ठ और कुछ नहीं है, और इन्द्रिय सुख भोग को छोड़कर उच्चतर वस्तु की प्राप्ति के लिये अग्रसर होना चाहिये। केवल यही नहीं, बल्कि इन्द्रिय सुख को छोड़कर संसार में और कुछ नहीं होता तो संसार बड़ा ही भयानक होता।
उपासना भी इसीलिये करते हैं कि खूब सुख मिले। उनके लिये ईश्वर इस उद्देश्य-लाभ के लिये उपाय स्वरूप है। उनके जीवन का लक्ष्य विषय-सम्भोग है, वे केवल किसी से इस बात को जान गये हैं कि एक पुरुष है जो इन सब सुख भोगों को दे सकता है, इसीलिये वे ईश्वर की उपासना करते हैं। यह तो एक भाव हुआ। दूसरा भाव यह है कि ईश्वर ही हम लोगों के जीवन का लक्ष्य-स्वरूप है।
उपासना करने में गलतियाँ करता हुआ भी कोई भक्त कभी भी विपरीत फल को नहीं प्राप्त होता।
उपासना में प्रभु को माता के रूप में मानने की साधना भी विषना प्रवृत्ति पर भारी अंकुश लगाती है। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन एवं मनोविकारों से लड़ने की तत्परता के आधार पर भी इन्द्रिय लिप्सा पर विजय प्राप्त करना सुगम हो जाता है। इन्द्रियों के चटोरेपन को कभी महत्व न दिया जाय, उनकी पूर्ति करने की सफलता को कभी पुरुषार्थ या सफलता न माना जाय। जब कभी इन्द्रियाँ प्रबल हो रही हों तो उनके समाधान के लिए उस सर्वशक्तिमान सत्ता में सच्चे हृदय से प्रार्थना करनी चाहिए और जब कभी बुद्धि को इन्द्रियाँ हरा दें तब अपने को धिक्कारते हुए उसका पश्चाताप और प्रायश्चित करना चाहिए।
उपासना करनी चाहिये।
उपासना नहीं करते वे अपने कर्त्तव्य से च्युत हो जाते हैं।
उपासना आरम्भ करनी चाहिए।
उपासना को विद्वानों ने द्विजों के लिए अनिवार्य, किसी भी दिन न छोड़ने योग्य, नित्यकर्म बताया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-April
उपासना में पावें, उन्हें गायत्री मंत्र लेखन यज्ञ में सम्मिलित करें। चाहे कम से कम 240 मंत्र ही लिखें जाय पर लिखने वालों की संख्या बढ़ाने का अधिक प्रयत्न करना चाहिए। अभी यज्ञ में सवा करोड़ मंत्रों की स्थापना की ही सम्भावना है, पर यदि आप सब लोग इस दिशा में थोड़ा अधिक उत्साह दिखावें तो 24 करोड़ मंत्रों की स्थापना करके गायत्री तपोभूमि को और भी अधिक शक्ति सम्पन्न बनाया जा सकता है। आप इसके लिए प्रयत्न कीजिए।
उपासना के लिए प्रेरणा दी जा सके एवं आशीर्वाद प्राप्त किये जा सकें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-January
उपासना में संलग्न है। स्वर्गीय सेठ जी के सुपुत्र श्री हरिदास जी तथा श्री करन दास जी ने अपने पिता जी के स्मरणार्थ गायत्री मन्दिर में ठहरने के कमरे बनवाने के लिए 2000) रुपये दान दिए हैं। साधन सम्पन्न लोगों के लिए यह दान अनुकरणीय है।
उपासना से मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल होता है और आत्म बल बढ़ने से आत्मा सच्चे सुख एवं शान्ति की ओर अग्रसर होता हे। आज धर्म एवं उपासना के नाम पर केवल कुछ रूढ़ियां प्रचलित रह गई हैं। इसमें सुधार होना मनुष्यता की रक्षा के लिए अत्यन्त आवश्यक है। धार्मिक विश्वास हमारे प्रत्येक कार्य और विचार ओत प्रोत होना चाहिए। जीवन की गतिविधि साधनामय होनी चाहिए।
उपासना से लेकर दैनिक जीवन के सामान्य कार्य तक साधनामय हों तभी हम सच्चे साधक एवं ईश्वर विश्वासी बन सकते हैं।
उपासना के नाम पर केवल कुछ रूढ़ियां प्रचलित रह गई हैं। इसमें सुधार होना मनुष्यता की रक्षा के लिए अत्यन्त आवश्यक है। धार्मिक विश्वास हमारे प्रत्येक कार्य और विचार ओत प्रोत होना चाहिए। जीवन की गतिविधि साधनामय होनी चाहिए। पूजा उपासना से लेकर दैनिक जीवन के सामान्य कार्य तक साधनामय हों तभी हम सच्चे साधक एवं ईश्वर विश्वासी बन सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-October
उपासना के लिये बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व है। पिछले दिनों समय-समय पर नवरात्रि की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए यह बताया जाता रहा है कि जैसे रात्रि और दिन के मिलन का समय ‘सन्ध्या’ काल कहलाता है और सन्ध्या काल की उपासना, साधारण समय की अपेक्षा अधिक फलवती होती है उसी प्रकार सर्दी और गर्मी की ऋतुओं का मिलन काल भी आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष फलप्रद है। यह ऋतु सन्ध्या नवरात्रि ही है।
उपासना, साधारण समय की अपेक्षा अधिक फलवती होती है उसी प्रकार सर्दी और गर्मी की ऋतुओं का मिलन काल भी आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष फलप्रद है। यह ऋतु सन्ध्या नवरात्रि ही है।
उपासना भी अधिक फलवती होती है। मिठाई बनाने के लिए चासनी पकाकर तार उठने के समय का जो महत्व है, वही महत्व नवरात्रि काल का है।
उपासना करने का जोर दिया जाता रहा है।
उपासना में पहले से ही रुचि रखते हैं उन्हें उचित है कि इन दिनों 24 हजार लघु अनुष्ठान करने का प्रयत्न करें। जो केवल श्रद्धालु हैं जिन्होंने अभी तक कोई उपासना नहीं की हैं और आगे भी कोई निश्चय साधना क्रम बनने में कठिनाई दिखाई पड़ती है उन्हें भी ऐसा करना चाहिए कि कम से कम इन 9 दिनों में तो थोड़ी बहुत साधना करने के लिये समय निकालें। परीक्षा रूप में इस समय थोड़ी बहुत साधना की जाय तो वह भी निष्फल नहीं जायगी, उसका परिणाम भी किसी न किसी दृष्टि से उत्तम ही सिद्ध होगा।
उपासना नहीं की हैं और आगे भी कोई निश्चय साधना क्रम बनने में कठिनाई दिखाई पड़ती है उन्हें भी ऐसा करना चाहिए कि कम से कम इन 9 दिनों में तो थोड़ी बहुत साधना करने के लिये समय निकालें। परीक्षा रूप में इस समय थोड़ी बहुत साधना की जाय तो वह भी निष्फल नहीं जायगी, उसका परिणाम भी किसी न किसी दृष्टि से उत्तम ही सिद्ध होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-March
उपासना विशेष रूप से श्रेयष्कर होती है। इसलिए श्रद्धापूर्वक अथवा परीक्षा एवं प्रयोग रूप में ही सही-उसे अपनाने के लिए हम प्रेमी पाठकों से अनुरोध करते रहते हैं। गायत्री साधना के सत्य परिणामों पर हमारा अटूट विश्वास है। जिन व्यक्तियों ने भी यदि श्रद्धापूर्वक माता का अंचल पकड़ा है उन्हें हमारी ही भाँति अटूट विश्वास प्राप्त होता है।
उपासना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में उसका फल विशेष होता है। गायत्री को भू-लोक की कामधेनु कहा गया है। यह आत्मा की समस्त क्षुधा पिपासाओं को शान्त करती है। जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ाने की सामर्थ्य से परिपूर्ण होने के कारण उसे अमृत भी कहते हैं। गायत्री का स्पर्श करने वाला व्यक्ति कुछ से कुछ हो जाता है इसलिए उसे पारसमणि भी कहते हैं।
उपासना में विश्वास रखते हैं वे गायत्री का चित्र सामने रख उसका धूप, दीप, गंध, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य आदि से पूजन कर सकते हैं। इसी प्रकार अपनी अपनी भावना और मान्यता के अनुसार गुरु पूजन के लिए परमात्मा या किसी महापुरुष को मानसिक प्रणाम किया जा सकता है अथवा नारियल या चित्र का प्रतीक मानकर गुरु पूजन किया जा सकता है। जप पूरा होने पर विसर्जन कर देना चाहिए। जिस प्रकार जप के आरम्भ में पूजन करते समय मंत्र द्वारा या भावना द्वारा गायत्री महाशक्ति का आह्वान किया जाता है वैसे ही जप समाप्त होने पर मंत्र द्वारा-यदि मंत्र याद न हो तो भावना द्वारा-विसर्जन कर देना चाहिए। दीपक का घी समाप्त होने पर अपने आप बुझ जाने के लिए छोड़ देना चाहिए और जल को सूर्य के सम्मुख अर्घ्य चढ़ा देना चाहिए।
उपासना से आपको कोई आध्यात्मिक या साँसारिक ऐसा विशेष लाभ हुआ हो जिससे दूसरे लोग भी उसे पुण्य मार्ग पर आकर्षित हों तो उन अनुभवों को विस्तारपूर्वक लिखते हुए अपने आधे शरीर के फोटो समेत छपने को भेज दें। इसी प्रकार किन्हीं अन्य जीवित या स्वर्गीय गायत्री उपासकों के उत्साहवर्धक अनुभव आपको मालूम हों तो उनके वर्णन तथा फोटो भी प्रकाशनार्थ भेजने की कृपा करें।
उपासना करने वाले हैं वे अग्नि को गायत्री के तेज का प्रतीक मानकर उस पर घृत एवं सुवासित सामग्री चढ़ाकर पूजन कर लें। जो लोग साकार उपासना में विश्वास रखते हैं वे गायत्री का चित्र सामने रख उसका धूप, दीप, गंध, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य आदि से पूजन कर सकते हैं। इसी प्रकार अपनी अपनी भावना और मान्यता के अनुसार गुरु पूजन के लिए परमात्मा या किसी महापुरुष को मानसिक प्रणाम किया जा सकता है अथवा नारियल या चित्र का प्रतीक मानकर गुरु पूजन किया जा सकता है। जप पूरा होने पर विसर्जन कर देना चाहिए। जिस प्रकार जप के आरम्भ में पूजन करते समय मंत्र द्वारा या भावना द्वारा गायत्री महाशक्ति का आह्वान किया जाता है वैसे ही जप समाप्त होने पर मंत्र द्वारा-यदि मंत्र याद न हो तो भावना द्वारा-विसर्जन कर देना चाहिए।
उपासना सफल हो तो हो कैसे?
उपासना करते रहने के लिए हम अपने पाठकों को सदा ही प्रेरणा देते रहते हैं। कारण यह है कि हम अपने तथा साधकों के प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि जितना लाभ अन्य समयों में लम्बी अवधि तक साधना करने का भी नहीं हो पाता वह इन 6 दिनों की साधना से होता देखा जाता है। ऐसे अगणित अनुभवों का हमें भली प्रकार ज्ञान है और उसी आधार पर हम विशेष उत्साह एवं साहस के साथ नवरात्रि में गायत्री उपासना करने के लिए अध्यात्म मार्ग में रुचि रखने वाले सज्जनों से आग्रह एवं अनुग्रह करते हैं।
उपासना के लिए उनकी सच्ची अभिरुचि ही उत्पन्न नहीं हो पाती। किसी देवी देवता से मुफ्त में माल झटक लेने के लिए पूजा पत्री का चालाकी भरा फंदा वे फेंकते हैं तो वह भी प्रायः सफल नहीं होता। क्योंकि आर्थिक पवित्रता से रहित, अर्थ सिद्धान्तों का स्वच्छता पूर्वक पालन न करने वाला मनुष्य अपनी अर्थ मलीनता के कारण सच्ची उपासना की स्थिति में ही नहीं होता। फिर उसकी उपासना सफल हो तो हो कैसे?
उपासना की स्थिति में ही नहीं होता। फिर उसकी उपासना सफल हो तो हो कैसे?
उपासना करने के लिए अध्यात्म मार्ग में रुचि रखने वाले सज्जनों से आग्रह एवं अनुग्रह करते हैं।
उपासना के अनुभव भेजिए
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-September
उपासना, कला, उत्सव आदि में किसी न किसी रूप में यज्ञ का समावेश अवश्य रहता है। विशेष अवसरों के लिये ही नहीं ऋषियों ने नित्य के लिए यज्ञ को आवश्यक बताया है। पंच महायज्ञों को नित्यकर्म बताया गया है। आज यज्ञ की शास्त्रोक्त प्रणाली घूमिल हो गई है फिर भी देखा जाता है कि किसी न किसी रूप में प्रत्येक आस्तिक परिवार में उसकी चिन्ह पूजा होती रहती है। ‘अग्यारी’ या ऐसे ही किसी नाम से अग्नि को घी में प्रज्वलित करके उस पर पूड़ी-पकवान के लघु ग्रास लौंग, धूप आदि चढ़ाये जाते हैं।
उपासना का एक आवश्यक भाग हवन है। प्राचीनकाल में तो जप के दशांश हवन होते थे। अर्थात् जो दस वाला यज्ञ करता था वह एक माला (108 मन्त्रों) का हवन भी करता था। साधन सामग्री की असुविधा तथा समय को देखते हुए यह विधान शसाँश का रहा। अर्थात् जो 10000 मंत्र जपे वह 100 आहुतियों का हवन भी करें।
उपासना का एक आवश्यक अंग है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-May
उपासना की थी और आजन्म उन्हीं की सेवा में रहकर अप्रतिहत शक्ति के साथ परमपद प्राप्त किया था। आष्टाँग-योग के सिद्ध होने से जो शक्ति और सिद्धि बहुत समय में पुरुषों को प्राप्त होती है, उसी शक्ति को स्त्री पतिव्रत-योग के बल से थोड़े समय में ही प्राप्त कर सकती है, यह सर्वथा निर्विवाद है।
उपासना करके, पुरुषों के समान स्वतन्त्र रीति से, आत्म-साक्षात्कार किया था, किन्तु इन सबका ज्ञान और भक्ति पर असाधारण अधिकार था। ये स्त्रियाँ साधारण कोटि की नहीं थी। इनमें कोई तो श्रुति, कोई देवियाँ और कोई ऋषि के समान थीं और किसी विशेष कारणवश इन्होंने संसार में अवतीर्ण होकर लोकोपकार किया था।
उपासना ही वेदों का शास्त्रों में वर्णित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-December
उपासना द्वारा सहज भी सम्भव हो सकता है। इसी लिए गायत्री उपासना का इतना अधिक महत्व माना गया है। वह सद्बुद्धि की देवी है। आत्मा में सद्प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाय तो जीवन में उपस्थित सभी अमंगलों का शोक सन्तापों का, सरलतापूर्वक निवारण हो सकता है। मानव का वास्तविक, ठोस, चिरस्थायी लाभ उपार्जन, स्वार्थ साधन जितना गायत्री द्वारा हो सकता है, उतना और किसी उपाय द्वारा नहीं हो सकता।
उपासना एक ऐसा विज्ञान सम्मत अनुभूत, परीक्षित, रामबाण उपाय है जो मनुष्य के अत्यन्त ही सूक्ष्म एवं गहन अन्तस्तल पर प्रभाव डालता है, केंची काटकर जीवन दिशा बदलता है, दृष्टिकोण में, भावना में, लक्ष्य में, इच्छा में, अभिरुचि में परिवर्तन उपस्थित करता है। जो कार्य सैकड़ों उपदेश सुनने और हजारों लेख पढ़ने से भी सम्भव नहीं है वह इस ऋषियों द्वारा निरन्तर परीक्षित गायत्री उपासना द्वारा सहज भी सम्भव हो सकता है। इसी लिए गायत्री उपासना का इतना अधिक महत्व माना गया है। वह सद्बुद्धि की देवी है। आत्मा में सद्प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाय तो जीवन में उपस्थित सभी अमंगलों का शोक सन्तापों का, सरलतापूर्वक निवारण हो सकता है।
उपासना का इतना अधिक महत्व माना गया है। वह सद्बुद्धि की देवी है। आत्मा में सद्प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाय तो जीवन में उपस्थित सभी अमंगलों का शोक सन्तापों का, सरलतापूर्वक निवारण हो सकता है। मानव का वास्तविक, ठोस, चिरस्थायी लाभ उपार्जन, स्वार्थ साधन जितना गायत्री द्वारा हो सकता है, उतना और किसी उपाय द्वारा नहीं हो सकता। इस सुदृढ़ तथ्य के कारण ही गायत्री उपासना पर इतना अधिक जोर दिया जाता है।
उपासना पर इतना अधिक जोर दिया जाता है।
उपासना द्वारा थोड़ा लाभ भले हो उठालें पर उन्हें माता का सच्चे प्रेम, वात्सल्य एवं अनुग्रह प्राप्त नहीं हो सकता। जो अपने भौतिक लाभों को नहीं माता की महिमा बढ़ाने के लिए श्रम करते हैं वस्तुतः वे ही सच्चे त्यागी मातृभक्त हैं। हम अपने को ऐसा ही मातृभक्त सिद्ध करना चाहते हैं और गायत्री प्रचार की पुनीत साधना में संलग्न हैं।
उपासना के लिए कहा जाय तो उसकी समझ में इसकी उपयोगिता न आवेगी, कुछ टूटा फूटा करने भी लगा तो उसका मन न लगेगा। पर यदि उसे इस विद्या की पूरी जानकारी हो जाय उसके लाभ, महत्व, विज्ञान, विधान, रहस्य, अर्थ, प्रयोजन एवं तत्व ज्ञान का पूरा पता चल जाय, तो वह बिना किसी की प्रेरणा के स्वयं ही इस सन्मार्ग पर श्रद्धा और दृढ़तापूर्वक प्रवृत्त होता है। अपना आत्म कल्याण करता है और जिसने उसे ज्ञान दान किया या दिलाया था उसके लिए पुण्य रूप बनता है। इसलिए हम लोगों की गायत्री साधना की प्रधान श्रद्धाँजलि “गायत्री प्रचार” है। इन गुलदस्ते को पाकर माता अन्य किसी की साधना की अपेक्षा अधिक प्रसन्न होती है।
उपासना रूप स्कन्धत्रयी ने देश विदेशों में हिन्दू जाति का मस्तक ऊँचा कर दिया। रामतीर्थ के वेदान्त ने लोगों को शेर नर बना देने में बड़ी सहायता दी। नामदेव-ज्ञानेश्वर, दयानन्द, नारायण, दाढू, गुरुनानक, गौराँग आदि सन्तों ने समय समय पर लोगों का जो उपकार किया है उसको न्यूनाधिक रूप से प्रायः सब लोग जानते हैं। कहाँ तक कहें साधू समाज ने हिन्दू जाति के विशाल वृक्ष को समय समय पर अपनी तपश्चर्या, त्याग, ज्ञान तथा उपदेश प्रभृति जल, खाद आदि से सिंचन आदि संस्कृत करने में कोई बात उठा नहीं रखी।
उपासना कैसे करें, (7) गायत्री का अर्थ सन्देश (8) गायत्री से यज्ञ का सम्बन्ध। यह आठ पुस्तकें छापी गई हैं। पुस्तक साइज के 16 पृष्ठ तिरंगे चित्ताकर्षक मुखपृष्ठ इन सबके हैं। पाँच पैसा मूल्य लगभग लागत मात्र है। केवल दस आने का यह सैट साधारणतः गायत्री विद्या का आवश्यक ज्ञान, विधान, महत्व, लाभ, विज्ञान, रहस्य, अर्थ, प्रयोजन, तत्वज्ञान एवं साधन की बहुत कुछ जानकारी करा देता है।
उपासना को तभी अपना सकते हैं जब जानकारी हो। पूरे परिचय के अभाव में तो हीरा भी काँच जैसा तिरस्कृत होता है, नेत्र विहीन के लिए चन्द्रमा की कोई महत्ता नहीं। यदि अनायास ही किसी को गायत्री उपासना के लिए कहा जाय तो उसकी समझ में इसकी उपयोगिता न आवेगी, कुछ टूटा फूटा करने भी लगा तो उसका मन न लगेगा। पर यदि उसे इस विद्या की पूरी जानकारी हो जाय उसके लाभ, महत्व, विज्ञान, विधान, रहस्य, अर्थ, प्रयोजन एवं तत्व ज्ञान का पूरा पता चल जाय, तो वह बिना किसी की प्रेरणा के स्वयं ही इस सन्मार्ग पर श्रद्धा और दृढ़तापूर्वक प्रवृत्त होता है। अपना आत्म कल्याण करता है और जिसने उसे ज्ञान दान किया या दिलाया था उसके लिए पुण्य रूप बनता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-December
उपासना से यह उद्देश्य सिद्ध न होता हो, वह व्यर्थ है। जिस उपाय से भी “पाप से बचने और पुण्य में प्रवृत्त होने” का भाव उठें वह उपाय ईश्वर भक्ति की साधना ही है।
उपासना करता है उसे जगत-पिता की सर्व व्यापकता पर आस्था जरूर होनी चाहिए। यदि वह विश्वास दृढ़ हो जाय कि भगवान जर्रे-जर्रे में समाया हुआ है, हर जगह मौजूद है तो पाप कर्म करने का साहस ही नहीं हो सकता। ऐसा कौन सा चोर है जो सावधान खड़ी हुई सशस्त्र पुलिस के सामने चोरी करने का साहस करे, चोरी, व्यभिचार, ठगी, धूर्तता, दंभ, असत्य, हिंसा आदि के लिए आड़ की, पर्दे की, दुराव की जरूरत पड़ती है। जहाँ मौका होता है इन बुरे कामों को पकड़ने वाला नहीं होता, वहीं इनका किया जाना संभव है। जहाँ धूर्तता की भली प्रकार समझने वालों देखने वाले और पकड़ने वाले लोगों की मजबूत ताकत सामने खड़ी होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-June
उपासना के वरदान से उसके लिए कोई भी आवश्यकता अपूर्ण नहीं रह जाती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-September
उपासना पूर्ति का उपकरण न समझो, किन्तु वे एक दैवी शक्ति हैं जो ईश्वर की सृष्टि को सुन्दर और मनोरम बनाने वाली और तुम्हारे मस्तिष्क व हृदय को बल पहुँचाने वाली है। स्त्रियों पर विशेषता रखने का यदि कोई कुसंस्कार तुम्हारे मस्तिष्क में बसाया हुआ है, तो उसे निकाल दो, तुम्हें कोई विशेषता उन पर नहीं है।
उपासना करनी चाहिए। सकाम उपासना का भी बहुत अच्छा प्रभाव होता है और मनोबल की वृद्धि द्वारा इच्छित कामनाएं पूरी होने में आश्चर्यजनक सहायता मिलती है। परन्तु यह भी ध्यान रखना चाहिए कि प्रयत्न और पुरुषार्थ ही सफलता के निर्माता हैं। भाग्य और प्रारब्ध भी कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं, वह भी पुराना पुरुषार्थ ही है। जो कुछ मिलता है पुरुषार्थ से मिलता है।
उपासना-आराधना करने पर भी अभीष्ट वस्तु प्राप्त नहीं होती। इन असमानताओं को देखकर कोई ईश्वर को, कोई साधना विधि को, कोई साधक को, कोई भाग्य को और कोई किसी को दोष देते हैं। जिन्हें सुगमतापूर्वक अधिक समृद्धि मिल गई वे अतिशय विश्वासी हो जाते हैं और जिन्हें कठिन प्रयत्न करने पर भी निराश रहना पड़ा वे अविश्वासी हो जाते हैं।
उपासना का भी बहुत अच्छा प्रभाव होता है और मनोबल की वृद्धि द्वारा इच्छित कामनाएं पूरी होने में आश्चर्यजनक सहायता मिलती है। परन्तु यह भी ध्यान रखना चाहिए कि प्रयत्न और पुरुषार्थ ही सफलता के निर्माता हैं। भाग्य और प्रारब्ध भी कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं, वह भी पुराना पुरुषार्थ ही है। जो कुछ मिलता है पुरुषार्थ से मिलता है। प्रार्थना भी एक प्रकार का पुरुषार्थ ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-January
उपासना कर, दीनों पर दया करने वाले वे हरि तेरे मनोरथ पूर्ण करेंगे। भगवान की भक्ति अमोघ है। इसके समान अन्य कोई भी साधन नहीं है ऐसी मेरी निश्चित बुद्धि है।
उपासना से जिसने आत्म शक्ति एकत्रित की है, उसे चाहिये कि अपनी बुद्धि को शुद्ध पवित्र और सात्विक बनाता हुआ जीवन को आदर्श बनावे। क्योंकि सबसे बड़ी सम्पत्ति इस दुनिया में यह है कि किसी मनुष्य को आदर्श व्यक्ति या महापुरुष कहा जाय। जिसके विचार और कार्यों की नकल करते हुए लोग अपने को भाग्यवान समझें वह महापुरुष धन्य है। अपनी स्वार्थ भावना, लिप्सा और भोगेच्छाओं पर संयम करता हुआ परोपकार परमार्थ और सत्कार्यों में लगा रहे। स्वयं ऊँचा उठे और दूसरों को भी ऊँचा उठावे।
उपासना सवालक्ष जप करने पर बन्द कर देनी चाहिए। ऐसी कोई बात नहीं है। वरन् यह है कि जितनी अधिक हो सके करते रहना चाहिए, अधिक का अधिक फल है। इच्छा शक्ति, श्रद्धा, निष्ठा और व्यवस्था की कमी के कारण अनुष्ठान का पूरा फल दृष्टिगोचर नहीं होता किन्तु यदि अधिक काल तक निरन्तर साधना को जारी रखा जाय तो धीरे-धीरे साधक का ब्रह्मतेज बढ़ता जाता है। यह ब्रह्मतेज आत्मिक उन्नति का मूल है, स्वर्ग मुक्ति और आत्म शान्ति का पथ निर्माण करता है, इसके अतिरिक्त लौकिक कार्यों की कठिनाइयों का भी समाधान करता है, विपत्ति निवारण और अभीष्ट प्राप्ति में इस ब्रह्मतेज द्वारा असाधारण सहायता मिलती है।
उपासना और फलाहार चिकित्सा
उपासना करने से गायत्री माता प्रसन्न होती है। जब अवकाश हो मानसिक जप करते रहना चाहिए, इससे एकाग्रता होती है, चित्त में स्थिरता आती हैं मन में से विषय विकार और कषाय कल्मष कम होते हैं, जैसे जलती हुई अग्नि के निकट जाने से जंगली जानवर डरते हैं वैसे ही गायत्री का निवास जिस अन्तःकरण में है उसके भीतर घुसते हुए पाप एवं दुर्भाव भी डरते हैं। अधिक समय तक चन्दन के साथ रहने से साधारण लकड़ी भी चन्दन जैसी सुगन्धित हो जाती है वैसे ही गायत्री का सहवास करते हुए मनुष्य अन्तःकरण भी शुद्धता और सात्विकता से मुक्त होने लगता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-March
उपासना के लिए बना ‘सूर्य-मन्दिर’ तो बहुत प्रसिद्ध था। 2000 वर्ष पूर्व यूनान का प्रसिद्ध वैद्य हिपोक्रेटीज सूर्य की किरणों द्वारा भयंकर रोगों की चिकित्सा किया करता था। अब तो विदेशों में सूर्य की किरणों से चिकित्सा का कार्य खूब चलने लगा है। सूर्य की रंग-बिरंगी किरणों का असाध्य रोगों के निवारण के लिए भरपूर प्रयोग किया जा रहा है। पाचनेन्द्रिय के रोग चर्म रोग, मज्जातंतु के रोग तो सूर्य की किरणों से अच्छे किये ही जाते हैं, क्षय जैसे भयंकर रोग के भी उससे दूर होने के उदाहरण मिले हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-May
उपासना करते हैं और जनसाधारण के मन में यह झूठी धारणा पैदा करते हैं कि वैरागी वही है जो घरबार छोड़ कर निरुद्देश्य मारा मारा फिरे और भजन की झूठी आत्मवंचना करता हुआ स्वार्थी जीवन बितावे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-July
उपासना करनी चाहिए। आत्मा से परमात्मा से प्रेम करना चाहिए। अपने को मनुष्यता की आदर्श प्रतिमा बनाने के लिए निरंतर विचार और कार्य करना चाहिए। यही स्वार्थ और यही परमार्थ है। प्रेम का सच्चा आध्यात्मिक स्वरूप भी यही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-November
उपासना करें और योग से स्वाध्याय का अभ्यास करें। स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
उपासना आदि-आदि मार्ग सभी आनन्द स्वरूप ‘स्व’ की ओर लक्ष्य करते हैं। सबसे नवीन और सरल, आनन्द का मार्ग भक्ति माना गया है। भक्ति उस क्रिया का नाम है जो आत्मा के महान गुण आनन्द का प्रत्यक्ष अनुभव करा दे। घर में कितना ही खजाना गढ़ा हुआ रखा रहे, जब तक घर वाले को उसका ज्ञान न हो, तब तक वह उस धन का धनी नहीं बन सकता। इसी भाँति हमारी आत्मारूपी आनन्द-निधि स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीर रूपी घर में गुप्त-अज्ञात रखी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-July
उपासना आरंभ हुई ऊर्जा के अनेकानेक रूप है, पर जिस शक्ति समुच्चय ने उसे सर्वाधिक प्रभावित किया, आदिमकालीन स्थिति से वर्तमान में ला बिठाया, वह थी प्रकाश की शक्ति। अग्नि पिण्ड को देखकर उसने पहला आविष्कार अग्नि प्रज्ज्वलन के रूप में किया एवं अपनी प्रारंभिक आवश्यकताएँ जुटाई। प्रकाश व ताप की शक्ति को मनुष्य भूला नहीं है व आज भी ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के पर्याय के रूप में इन्हीं दो शक्तियों को वह प्रमुख मानता आया है। ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्राण शक्ति प्रकाश रश्मियों के रूप में जीव जगत को सतत् प्रभावित करती रहती है। क्रमशः परिष्कृत होते-होते वह “लेसर” के रूप में अब मनुष्य के पास विद्यमान है, जिसकी शक्ति सामर्थ्य अपरिमित कूती जाती है।
उपासना, साधना और आराधना का खाद पानी चाहता है। तीसरा कार्य यही है कि वातावरण परिशोधन के लिए, उसमें अध्यात्म तत्वों का अभिवर्धन करने के लिए साधना को अनिवार्य कर्तव्य मानें। स्वयं करे और अपने प्रभाव क्षेत्र में अन्यान्यों को उसके लिए प्रोत्साहित करे। एक माला गायत्री जप का भी यदि नियमित क्रम चल पड़े तो अपने चौबीस लाख सदस्य हर दिन चौबीस करोड़ जप का दैनिक अनुष्ठान करते रह सकते है। इससे वातावरण में देव-तत्वों की समर्थता बढ़ेगी और नवयुग के अनुरूप वातावरण बनेगा।
उपासना करता है, काया से निस्सृत प्राण विद्युत का अदृश्य कंपन वहाँ स्थित जड़ पदार्थों के परमाणुओं में तीव्र प्रकंपन पैदा कर देता है। मनुष्य शरीर से निकली विद्युत तरंगें आस-पास के वातावरण में छा जाती हैं और जड़ चेतन दोनों को प्रभावित आकर्षित करती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-May
उपासना के विविध विधि उपचारों का सृजन इसीलिए हुआ है। दूसरी प्रक्रिया इवोल्यूशन-अवरोह में अतिमानव विकास के लिए योग मार्ग का आश्रय लेकर भागवत् करुणा का आह्वान करना पड़ता है। सच्चे अर्थों में अध्यात्म जीवी-नास्टिक बीइंग होने का यही राजमार्ग हैं इस अध्यात्म जीविता को प्राप्त करना ही व्यक्तित्व की पूर्णता है, वही उसका पूर्ण विकास भी है। यही मनुष्य में देवत्व की कल्पना है।
उपासना है।
उपासना सहायक होती है। इसे ही योग कहते है। विराट् ब्रह्म से अपने आप को जोड़ने ही योग है। क्षुद्र स्वार्थपरता के-संकीर्ण बन्धनों को शिथिल करने का अभ्यास करना ही योग है। ऐसे साधक का दृष्टिकोण समता और क्रिया कल्याण सर्वजनीन ति साधन का होता है इसके लिए कर्म-ज्ञान-भक्ति किसी भी मार्ग अथवा इनके समन्वय का अभ्यास प्रारम्भ किया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-November
उपासना का क्रम चलाते है।
उपासनात्मक प्रविधियों की असफलता का एकमात्र यही कारण है कि उनमें मात्र कर्मकाण्ड तक सीमित कर दिया है। इस तरह उनका प्रभाव कान, आँख, मस्तिष्क तक ही पहुँच पाता है। इन यन्त्रों की बनावट ही कुछ ऐसी है कि किसी प्रभाव से देर तक प्रभावित नहीं रहते। इसलिए इनकी असफलता का रोना-रोना व्यर्थ है। अन्तः परिष्कार के लिए आवश्यक है कि अन्तःचेतना की गहरी परतों का स्पर्श और परिवर्तन कर सकने योग्य उपाय ढूँढ़ा जाय।
उपासना की गरिमा पर विश्वास है उन सभी का आह्वान किया गया है कि इस अवधि में एक अनुष्ठान यहाँ सम्पन्न करें और विराट् सामूहिक जप यज्ञ के भागीदार बनने का श्रेय प्राप्त करें। आशा की जाती है कि निर्धारित अवधि में लाखों व्यक्ति इसके सहगामी बन सकेंगे। उद्देश्य तो युग परिवर्तन के दोनों पक्षों को सम्पन्न कर सकने वाला दिव्य वातावरण बनाना है। पर साथ ही यह बात दिव्य वातावरण बनाना है। पर साथ ही यह बात भी है कि दूसरों के लिए मेंहदी पीसने वाले के अपने लिए सुरक्षा कवच प्राप्त करने में प्रतीत परिष्कार से लाभान्वित होने में सफल हो सकते है।
उपासना को सब कुछ माना जाता है और उसी के सहारे मनोकामनाओं की पूर्ति से लेकर स्वर्ग मुक्ति तक देवताओं और भगवानों से अपनी मान्यताओं के अनुरूप छवि बनाकर दर्शन देने की अपेक्षा की जाती है। ऋद्धि सिद्धियों की आशा की कितने ही लोग लगाए रहते है। और सफलता की कसौटी यह मानते है कि उन्हें चित्र विचित्र कौतुक कौतूहल दृष्टिगोचर होते है। चमत्कार देखने और चमत्कार दिखाने तक ही उनकी सफलता सीमित रहती है। पर बात वस्तुतः ऐसी है नहीं।
उपासनारत को अपने दिव्य अनुग्रह से ओत-प्रोत कर देता है।
उपासना। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का आवरण संभव बनाने के लिए सामूहिक महासाधना का नियोजन। यह दिव्य पुरश्चरण सन्निकट की आश्विन नवरात्रि से शांतिकुंज हरिद्वार में यह पुण्य आयोजन सन् 1000 तक चलता रहेगा। इक्कीसवीं सदी के आरंभ के साथ ही इसकी पूर्णाहुति होगी। जिसे साधना के अनुरूप ही इतना बड़ा कहा जा सकेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-April
उपासना को जीवन की अनिवार्य आवश्यकता के रूप में स्वीकार करते हैं-उनके अनुसार “सभी धर्मों में प्रचलित उपासनाएँ मानव के स्वास्थ्य एवं सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक हैं।” उनकी मान्यता के अनुसार “संसार के सभी मानसिक चिकित्सक मिलकर भी जितने रोगियों को आरोग्य नहीं प्रदान कर पाते जितना कि छोटी से छोटी धार्मिक उपासनाएँ कर देती हैं।”
उपासना विधियों पर गायत्री की उपेक्षा अवज्ञा किसी में भी नहीं है। भले ही वे उसे प्रयोग में न लाते हों। ऐसी दशा में गायत्री उपासना को उसकी व्याख्याओं और प्रेरणाओं का ध्यान में रखते हुए सर्वजनीन उपासना कहा जाये तो कोई अत्युक्ति न होगी
उपासनाएँ मानव के स्वास्थ्य एवं सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक हैं।” उनकी मान्यता के अनुसार “संसार के सभी मानसिक चिकित्सक मिलकर भी जितने रोगियों को आरोग्य नहीं प्रदान कर पाते जितना कि छोटी से छोटी धार्मिक उपासनाएँ कर देती हैं।”
उपासनाएँ कर देती हैं।”
उपासना द्वारा निर्माण की यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया चलती रहती है। इसमें तन्मयता की पराकाष्ठा उपास्य और उपासक के बीच विभेद का समाप्त कर देती है। द्वैत से उठकर अद्वैत की स्थिति हो जाती हैं। परमहंस रामकृष्ण देव का सर्वत्र काली का दर्शन करना, महाप्रभु चैतन्य का कृष्ण से एकाकार हो जाना, स्वामी रामतीर्थ का ब्रह्मभाव में प्रतिष्ठित हो अपने अस्तित्व को भूल जाना, उपासना की तन्मयता एवं उसकी प्रतिक्रियाओं का प्रभाव हैं। यह असामान्य स्थिति न भी हो तो भी उपासक के विचारों का परिशोधन, परिष्कृतीकरण होता जाता है।
उपासना निराकार की करें या साकार की। इष्ट निर्धारण क्या हो? यह व्यक्तिगत अभिरुचि एवं मनः स्थिति के ऊपर निर्भर करता है। चिन्तन को लक्ष्य की ओर नियोजित किए रखने के लिए साकार अथवा निराकार कोई भी अवलम्बन लिया जा सकता है। यह आवश्यक है और उपयोगी भी।
उपासना को उसकी व्याख्याओं और प्रेरणाओं का ध्यान में रखते हुए सर्वजनीन उपासना कहा जाये तो कोई अत्युक्ति न होगी
उपासना समझते है और उतने भर से भगवत् प्रसन्नता की आशा करते है। बदले में ऐसों को कुछ नहीं मिलता।
उपासना की समग्रता एवं उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों को भली भाँति समझा जा सके तो व्यक्तित्व निर्माण का सबल आधार मिल सकता है। उपासना का लक्ष्य है व्यक्तित्व का परिष्कार। इसके निर्धारण से उससे जुड़े आदर्शों एवं उच्चस्तरीय सिद्धान्तों द्वारा उपासक को श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। उपास्य में तन्मय होने का अभिप्राय है उच्चस्तरीय आदर्शों एवं सिद्धान्तों में लीन हो जाना और उसके अनुरूप आचरण करना। उपासना द्वारा निर्माण की यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया चलती रहती है।
उपासना की आवश्यकता ही नहीं अनिवार्यता भी है। पुरातन काल के ऋषियों तथा आधुनिक काल के सन्तों ने इसका अवलम्बन कर स्वयं के व्यक्तित्व को सुघड़ बनाने के साथ ही समूची मानव जाति के समक्ष प्रकाश संकेतक के रूप में स्वयं को उभारा। आज भी भावनात्मक एवं सामाजिक समंजन सर्वतोमुखी परिष्कार एवं समग्र प्रगति के सभी आधार इसमें विद्यमान हैं। समस्याओं की जटिलता से उबरने तथा अपने व्यक्तित्व को गढ़ने के लिए यह राजमार्ग ही सर्वाधिक उपयुक्त है। *
उपासना के क्षेत्र में आमतौर से ऐसा होता है। कुछ दिन उत्साह चलता है। नवीनता जैसे-जैसे घटती जाती है, वैसे-वैसे उत्साह में भी कमी आने लगती है। प्रयास घटता है और कुछ समय में वह समाप्त प्रायः हो जाता हैं। एक पकड़ा दूसरा छोड़ा।
उपासना का अपना विशिष्ट स्थान है। वह सीधे भावना क्षेत्र को स्पर्श करती है भावनाएँ, विचारणाओं और कल्पनाओं को इच्छानुसार मोड़ती हैं। यह प्रक्रिया, क्रिया-कलाप के रूप में फलित होती है। यही है उत्कर्ष और अपकर्ष का केन्द्र बिन्दु जिसे उपासना साधना के आधार पर प्रभावित किया जाता है। भली या बुरी उपासनाएँ अपने-अपने विकास और विनाश के आधार खड़े करती हैं।
उपासना है।
उपासना कहा गया है। सथा-’शील’ सरस्वभावः दुर्जन सहवास परित्याग इति उपासा’। अर्थात् शील, सदाचार, स्वाध्याय का परिपालन और दुर्जनों कुकर्मों का परित्याग उपासना है।
उपासना का प्रमुख आधार श्रद्धा है। श्रद्धा के साथ आत्म-क्षेत्र की विशिष्टताएँ, विभूतियाँ जुड़ती हैं। अश्रद्धा रहने पर कोई भी पूजा, पाठ, विधि विधान, जप, तप एक खिलवाड़ बन कर रह जाता है। कौतुक कौतूहल की तरह कई व्यक्ति उपासना, साधना करते तो है, पर उनका कोई कहने लायक परिणाम न मिलने पर और भी अधिक अश्रद्धालु बन जाते हैं। यहाँ भूल विधि-विधान के किसी भी क्रम में नहीं खोजी जानी चाहिए, वरन् देखा यह जाना चाहिए कि उस प्रयोग में श्रद्धा का समावेश कितना रहा?
उपासनाओं का विधान और प्रचलन है। परम्परावादी उन्हें संपर्क क्षेत्र के वातावरण से अपना लेते है। किन्तु विचारशीलों के सामने एक कठिनाई यह आती है कि अनेकानेक प्रचलनों में से किसे अपनाएँ किसे न अपनाएँ। इस असमंजस को दूर करने के लिए उन्हें तर्क, तथ्य और प्रमाण की कसौटी लगानी पड़ती है और जानना पड़ता है कि अनेकानेक प्रचलनों में से समाधानकारक क्या है? किसे छोड़ा और किसे अपनाया जाये?
उपासना अर्थात् “पास बैठना”। भक्त और भगवान के बीच जितने रिश्ते हैं, उनमें यही सब से श्रेष्ठ है। पिता, माता, सहायक, स्वामी आदि में दाता की महिमा का भाव तो है, पर साथ ही भक्त स्वयं को दीन, दरिद्र, याचक, क्षुद्र असहाय जैसा मानता प्रतीत होता है। भगवान की महत्ता तो स्वयमेव है। उसका वर्णन आवश्यक नहीं।
उपासना’ कहते हैं।
उपासना का लक्ष्य है व्यक्तित्व का परिष्कार। इसके निर्धारण से उससे जुड़े आदर्शों एवं उच्चस्तरीय सिद्धान्तों द्वारा उपासक को श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। उपास्य में तन्मय होने का अभिप्राय है उच्चस्तरीय आदर्शों एवं सिद्धान्तों में लीन हो जाना और उसके अनुरूप आचरण करना। उपासना द्वारा निर्माण की यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया चलती रहती है। इसमें तन्मयता की पराकाष्ठा उपास्य और उपासक के बीच विभेद का समाप्त कर देती है।
उपासना साधना के आधार पर प्रभावित किया जाता है। भली या बुरी उपासनाएँ अपने-अपने विकास और विनाश के आधार खड़े करती हैं।
उपासना से जुड़ी आदर्शवादी मान्यताएँ एवं प्रेरणाएं ही चिन्तन को श्रेष्ठ एवं व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बना सकने में समर्थ हो सकती हैं। उपासना की समग्रता एवं उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों को भली भाँति समझा जा सके तो व्यक्तित्व निर्माण का सबल आधार मिल सकता है। उपासना का लक्ष्य है व्यक्तित्व का परिष्कार। इसके निर्धारण से उससे जुड़े आदर्शों एवं उच्चस्तरीय सिद्धान्तों द्वारा उपासक को श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। उपास्य में तन्मय होने का अभिप्राय है उच्चस्तरीय आदर्शों एवं सिद्धान्तों में लीन हो जाना और उसके अनुरूप आचरण करना।
उपासना करने का संकेत है।”
उपासना की तन्मयता एवं उसकी प्रतिक्रियाओं का प्रभाव हैं। यह असामान्य स्थिति न भी हो तो भी उपासक के विचारों का परिशोधन, परिष्कृतीकरण होता जाता है। भाव-संवेदनाओं में आदर्शवादिता जुड़ने लगती है।
उपासना परक कर्मकाण्डों में अनुबंधित हो ऐसी बात नहीं है। एक अति सरल और व्यावहारिक योग भी है-सेवायोग। इसे पुण्य परमार्थ का संचय भी कह सकते हैं। इस निमित्त भी आत्मसंयम बरतना पड़ता है। शक्तियों को अनावश्यक कार्यों में क्षरित होने से रोकना पड़ता है।
उपासना कहा जाये तो कोई अत्युक्ति न होगी
उपासना श्रेष्ठ चिन्तन एवं उत्कृष्ट व्यक्तित्व के निर्माण का सशक्त माध्यम है। मन की बनावट कुछ ऐसी है, वह चिन्तन के लिए आधार ढूँढ़ता है। जैसा माध्यम होगा उसी स्तर का चिन्तन चल पड़ेगा। तदनुरूप क्रिया कलाप होंगे। निम्न स्तरीय चिन्तन वाले व्यक्ति के क्रिया-कलाप भी घटिया होना स्वाभाविक हैं।
उपासना करके देखे तो उसे अनुभव होगा कि श्रम और समय निरर्थक नहीं गया। उसने अपना प्रभाव उत्पन्न किया। भाव संवेदनाओं में उत्कृष्टता की मात्रा बढ़ी। बुद्धि में आदर्शवादिता का पक्षधर रुझान आरम्भ हुआ। क्रिया-कलाप में सात्विकता का अनुपात बढ़ा और प्रतिभा तथा प्रखरता का अनुपात पहले की अपेक्षा अधिक समुन्नत हो चला।
उपासना का वास्तविक प्रयोजन तभी पूरा होता है। हेय जीवन जीने और आत्म परिष्कार तथा लोकमंगल के कार्यों की उपेक्षा करने से उन लोगों का श्रम निरर्थक ही चला जाता है जो पूजा-पाठ को ही उपासना समझते है और उतने भर से भगवत् प्रसन्नता की आशा करते है। बदले में ऐसों को कुछ नहीं मिलता।
उपासना को सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया बताया है। इसकी तुलना में और सब गौण है।
उपासना का अवलम्बन’।
उपासना का निषेध नहीं है। वह भी करने योग्य है किन्तु व्यक्तिगत जीवन को पवित्र, प्रखर बनाना साथ ही लोकमंगल की सेवा साधना में संलग्न रहना भी आवश्यक है और उपासना का वास्तविक प्रयोजन तभी पूरा होता है। हेय जीवन जीने और आत्म परिष्कार तथा लोकमंगल के कार्यों की उपेक्षा करने से उन लोगों का श्रम निरर्थक ही चला जाता है जो पूजा-पाठ को ही उपासना समझते है और उतने भर से भगवत् प्रसन्नता की आशा करते है। बदले में ऐसों को कुछ नहीं मिलता।
उपासना करनी चाहिए इस श्रुति में इस विराट् ब्रह्मनाम को -समस्त संसार को-अपनी सेवा साधना से उपासना करने का संकेत है।”
उपासना में इष्ट निर्धारण परोक्ष रूप से श्रेष्ठ आदर्शों की प्रतिष्ठापना है। जिसके निकट आने तादात्म्य स्थापित करने वाला भी उसी के अनुरूप ढलता-बनता चला जाता है।
उपासना को अनुसंधान के रूप में प्रयोग, परीक्षण की तरह कसौटी पर कस सकता है। अनेकों का अनुभव सत्परिणाम का साक्षी हैं।
उपासनाएँ अपने-अपने विकास और विनाश के आधार खड़े करती हैं।
उपासना व्यक्तित्व निर्माण की एक समग्र प्रक्रिया है, जिसका अवलम्बन लेने वाला स्वयं श्रेष्ठ बनता तथा अन्यों को भी प्रभावित करता है। वह अपने विचारों का प्रसारण अभौतिक माध्यमों से अन्य लोगों तक कर सकता है। इसमें व्यक्ति एवं वातावरण को अनुवर्ती बनाने के सभी तत्व विद्यमान हैं।
उपासना, साधना करते तो है, पर उनका कोई कहने लायक परिणाम न मिलने पर और भी अधिक अश्रद्धालु बन जाते हैं। यहाँ भूल विधि-विधान के किसी भी क्रम में नहीं खोजी जानी चाहिए, वरन् देखा यह जाना चाहिए कि उस प्रयोग में श्रद्धा का समावेश कितना रहा? श्रद्धालु को देव प्रतिमाएँ रामकृष्ण परमहंस की तरह, मीरा की तरह, एकलव्य की तरह शक्ति और यथार्थता परिलक्षित होती है; जबकि अश्रद्धालु प्रतिमाओं का उपहास उड़ाते रहते हैं। मूर्तिकारों के देव प्रतिमाएँ विक्रयार्थ रखी गई वस्तु मात्र होती हैं, जबकि भावनाशील उनके सहारे अपनी श्रद्धा को परिपक्व करते और भाव संवेदनाओं को परिष्कृत करते हैं। यहाँ श्रद्धा विश्वास की शक्ति ही प्रधान रूप से काम करती है।
उपासना, साधना और आराधना के प्रति निष्ठावान ही होकर जीवन-यापन करते है।
उपासना शब्द में प्रकारांतर से अपने लिए प्रेरणा एवं जिम्मेदारी है कि उस महान सम्मान को उपलब्ध करने का गौरव प्राप्त करने के लिए जिन विशेषताओं की आवश्यकता है उसका निर्वाह करें और परीक्षा में उत्तीर्ण हो।
उपासना शब्द में संकेत किया गया है। मनुहार करने की उतनी अधिक आवश्यकता इस शब्द में नहीं है। मेंहदी पीसने वाले के हाथ अनायास ही लाल होते है। पुष्प-उद्यान में भ्रमण करने पर नाक को सुगंध और आँखों को सुन्दरता अनायास ही उपलब्ध होती है। समीपता का यही लाभ हैं कुसंग का प्रतिफल सभी जानते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-December
उपासना की आध्यात्मिकता जुड़ी रहने से श्रद्धा संवर्धन का पुट भी लगता रहता है। किसी को ऊब नहीं आती और सभी अगले सत्संग का दिन पहले से ही सोचते रहते है। सत्संग यों तो प्रायः किसी स्थिर सुविधाजनक स्थान पर होते रहते है। पर यदि किन्हीं सदस्यों का आग्रह हो तो उनके घरों पर भी आयोजन किये जाते है। आतिथ्य के रूप में किसी को किसी प्रकार का खर्च करने का प्रतिबन्ध है ताकि सभी गरीब अमीर समान रूप से उस सुविधा का लाभ उठा सकें।
उपासना पक्ष की प्रतीक पूजा का तात्पर्य है- क्रिया एवं साधनों के सहारे आत्म शिक्षण की आवश्यकता पूरी करना। कोई भी कर्मकाण्ड उसकी भावनाओं को हृदयंगम किये बिना पूर्ण नहीं हो सकता।
उपासना में ध्यान धारण स्तर के सभी कर्मकांडों आ जाते है। इसके साथ ही जीन के हर क्षेत्र में मानवी गरिमा को उभारने और रुकावटें हटाने जैसे सभी पक्षों को जोड़कर रखा गया है। शरीरसंयम, समयसंयम, अर्थसंयम, विचारसंयम, इस धरा के अलग न हो सकने वाले अंग हैं। दुर्गुणों के, कुसंस्कारों के निराकरण पर जहाँ जोर दिया गया है वहाँ यह भी अनिवार्य माना गया है कि अब की अपेक्षा अगले दिनों अधिक विवेकवान्, चरित्रवान और पुरुषार्थ परायण बनने के लिए चिंतन तथा अभ्यास जारी रखा जाये। वास्तव में यह समग्रता ही जीवन साधना की विशेषता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-March
उपासना न तो ठीक तरह बन पड़ती है, न उसका कोई स्वरूप ही स्पष्ट होता है न मन लगता है न रस आता है न आनंद। जिस ईश्वर की भक्ति करने का रिवाज है, वह मनोकामना पूरी करने की मशीन है। लाटरी खरीदने की तरह लोग हजार मनोकामनाएं लेकर उल्टी-पुल्टी माला घुमाते है। पुष्य अक्षत चढ़ाते है पर जो चाहा गया है वह इतना सस्ता कहाँ है? यदि इतनी सरलतापूर्वक ईश्वर तथाकथित भक्तजनों की इच्छाएं पूरी कर दिया करे तो फिर किसी को योग्यता प्राप्त करने की, पुरुषार्थ की, साधन जुटाने की तनिक भी आवश्यकता न पड़ा करें।
उपासना पर लंगड़ी उपासना न तो ठीक तरह बन पड़ती है, न उसका कोई स्वरूप ही स्पष्ट होता है न मन लगता है न रस आता है न आनंद। जिस ईश्वर की भक्ति करने का रिवाज है, वह मनोकामना पूरी करने की मशीन है। लाटरी खरीदने की तरह लोग हजार मनोकामनाएं लेकर उल्टी-पुल्टी माला घुमाते है। पुष्य अक्षत चढ़ाते है पर जो चाहा गया है वह इतना सस्ता कहाँ है? यदि इतनी सरलतापूर्वक ईश्वर तथाकथित भक्तजनों की इच्छाएं पूरी कर दिया करे तो फिर किसी को योग्यता प्राप्त करने की, पुरुषार्थ की, साधन जुटाने की तनिक भी आवश्यकता न पड़ा करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-August
उपासना, समग्र उत्कर्ष, जीवन लक्ष्य, सर्वतो मुखी प्रगति विकास उल्लास की समस्त तत्वों का समावेश हैं।
उपासना से सहस्रार सहित सभी चक्रों और पंकरघ्शों की साधना एक साथ सम्पन्न होती है। इसी में देव साधना, ऋषि उपासना, समग्र उत्कर्ष, जीवन लक्ष्य, सर्वतो मुखी प्रगति विकास उल्लास की समस्त तत्वों का समावेश हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-January
उपासना कृत्य से निवृत्त होने पर भोजन से पूर्व बौद्धिक प्रशिक्षण का क्रम चलता है। आरम्भ में संगीत, तत्पश्चात प्रवचन। इसमें प्रायः दो घण्टे लगते है। इन बौद्धिक कक्षाओं का विषय होता है- जीवन-साधना।
उपासना क्रम को पूरा करने के अतिरिक्त चार घण्टा नित्य युग साहित्य के सृजन में लगाता रहा। इसी का परिणाम है कि कछुआ खरगोश से आगे पहुँचा। चीलों ने गरुड़ों से पहले मंजिल पूरी कर ली।
उपासना में अधिक-तत्परता संजोनी चाहिए। जिनकी साधना नियमित नहीं चल रहीं है, वे उसे सुनियोजित कर लें। जो नियमित रूप से कर रहें है वे उसमें कुछ और वृद्धि कर लें। सूर्योदय का समय न चूकें। भले ही स्नानादि न कर पाने के कारण मौन मानसिक रूप से ही क्यों न करना पड़े?
उपासना में।
प्रार्थनायें याचना का गीत बन कर, रो रही है।
भावनायें गिड़गिड़ाती, दीनतायें दो रही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-February
उपासना का सर्वोत्कृष्ट स्वरूप बन सकता है। छोटी-छोटी क्रियाएं भी भावना और विवेक के संयोजन से महत्वपूर्ण बन जाती है। इस प्रकार की उपासना करने के लिए न तो कही पलायन की आवश्यकता है न भागने की। संसार एक रंग-मंच की तरह है। इसमें अपनी भूमिका का निर्वाह भली प्रकार करें।
उपासना अभी भी विश्व के अनेक भागों में की जाती है।
उपासना का आश्रय लेना होता है। विचारवान अपने चारों और घिरे हुए वातावरण का कोई कर्ता ढूँढ़ते हैं और वह ईश्वर ही दृष्टिगोचर होता है। कइयों को इस चमत्कारी सृष्टि रचना का निमित्त कारण ईश्वर ही दीखता है और उसकी मनुहार करने - भेंट पूजा का आश्रय लेने में ही अपनी भलाई दीखती है। शास्त्रकारों और आप्तजनों ने सृष्टा की प्रशंसा में - उसकी सत्ता प्रतिपादन में - बहुत कुछ कहा है। इसके अतिरिक्त भजनानंदियों का भी एक बड़ा समुदाय है।
उपासना एवं यज्ञ आयोजनों आदि का बाहुल्य था। परिशोधित वातावरण के कारण जन-जीवन उत्कृष्टता की चरम सीमा पर था। सभी का जीवन आनन्दमय था। उस काल में धार्मिकता ही नैतिकता की पर्यायवाचक थी। अब परिस्थितियाँ बदल गई है।
उपासना करने के लिए न तो कही पलायन की आवश्यकता है न भागने की। संसार एक रंग-मंच की तरह है। इसमें अपनी भूमिका का निर्वाह भली प्रकार करें। यही सही ज्ञान है।
उपासना करने का विधान आदि काल से चला आ रहा है। सूर्य की पूजा करने वालों को लोग उत्कृष्ट श्रेणी का समझते थे। प्रकाशमान स्वर्णिम सूर्य की उपासना अभी भी विश्व के अनेक भागों में की जाती है।
उपासना निश्चित ही फलीभूत होती है।
उपासना, साधना महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्राचीन काल में सामूहिक प्रार्थना, उपासना एवं यज्ञ आयोजनों आदि का बाहुल्य था। परिशोधित वातावरण के कारण जन-जीवन उत्कृष्टता की चरम सीमा पर था। सभी का जीवन आनन्दमय था। उस काल में धार्मिकता ही नैतिकता की पर्यायवाचक थी।
उपासना का दर्शन है। ईश्वर को हम साकार न मानते हों तो निराकार प्रकाश पुँज के रूप में सविता के रूप में मानें, उसके तमोनाशक-पापनाशक, आनन्दकारक सद्गुणों को जीवन में उतारने का प्रयास करें तो ईश उपासना निश्चित ही फलीभूत होती है।
उपासना मनुष्य जीवन की एक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है। संसार की विषमताओं और जीवन की विपन्नताओं के बीच वह अपने आपको असहाय अनुभव करता है। प्रतिकूलताओं से अपने बलबूते निपट न पाने पर उसे किसी ऐसे समर्थ साथी की आवश्यकता है जो उसका साथ दे सके, हाथ बंटा सके। भले ही दूरवर्ती या अदृश्य ही क्यों न हो?
उपासना से प्राप्त अंतर्दृष्टि से निहारें तो स्पष्ट होगा कि सारा का सारा भ्रमण जंजाल मिटता जा रहा है और यथार्थता वास्तविकता सामने आ रही है। इस वास्तविकता के बोध होने पर तो परम सत्ता ही कण-कण में व्याप्त तथा अपना अन्तःकरण भी उसे से ओत-प्रोत दिखाई देगा और सर्वत्र आनन्द का साम्राज्य ही होगा और उसके मध्य में होंगे भली भाँति आनन्दामृत से परितृप्त हम। अच्छा हो ऐसी वास्तविक बोध की दुनिया में जिया जाय। अपनी अंतर्दृष्टि का जाग्रत कर यथार्थता वस्तुस्थिति से समझने पाने में प्रयत्नशील हुआ जाय। इसीलिए ऋषि कहते आए हैं - “अविद्या से निकलकर ज्ञान की ओर प्रकाश और बढ़ो”।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-September
उपासना का उपदेश दिया और एक सर्द्धम का पथ दिखाया। उन्होंने पुरा जीवन ही इस उपकार में लगा दिया और उसके लिये जो भी कष्ट सहने पड़े, सहे।
उपासना, साधना और आराधना का समन्वित स्वरूप है। यही वह साधना है जिसके आधार पर सिद्धियां और सफलताएं सुनिश्चित बनती हैं। दूसरे के सामने हाथ पसारने गिड़गिड़ाने भर से पात्रता के अभाव में कुछ प्राप्त नहीं होता। भले कही वह दानी परमेश्वर ही क्यों न हों। कहा गया हैं कि ईश्वर केवल उनकी सहायता करते हैं, जो अपनी सहायता करने को तत्पर है।
उपासना, सामूहिक स्वाध्याय परामर्श का क्रम चलायेंगे। इस साप्ताहिक सत्संग कहा जाय। सप्ताह में सुविधानुसार एक दिन का समय इसके लिए पूर्व- निर्धारित रहे। यह सत्संग किसी एक स्थान पर अथवा सदस्यों के घरों पर बदल-बदल कर चलाए जाते रह सकते हैं। इन सत्संगों के लिए पाँच क्रम निर्धारित हैं (1) सामूहिक उपासना- दीपयज्ञ, (2) सहगान- युग संगीत, (3) सामूहिक स्वाध्याय समीक्षा, (4) युग साहित्य विस्तार प्रक्रिया, (5) सामूहिक सूर्यार्घ्य दान।
उपासना के माध्यम से भक्ति भावना को अंकुरित एवं परिपक्व करने के लिये की गई है। वस्तुतः स्रष्टा शरीरधारी नहीं हो सकता। यदि वह एक जगह रहने लगे तो अन्यत्र उसकी उपस्थिति कैसे बन पड़ेगी? यही बात उसकी प्रसन्नता अप्रसन्नता के संबंध में हैं। यदि पूजा प्रार्थना वालों से यह प्रसन्न होता है तो नास्तिक समुदाय के लोगों के साथ उसका द्वेष भी होना चाहिये।
उपासना अर्थात् दिव्य सत्ता के लिए बैठना, उसके साथ गुँथ जाना, आग ईंधन की तरह, सूर्यार्घ के समय अर्पित किये गये जल की तरह। कर्मकाण्ड के रूप में गायत्री जैसे मंत्र का अर्थ सहित ध्यान एवं जप और उदीयमान सूर्य का ध्यान किया जा सकता है। यह नियमित होना चाहिए। उपासना से आत्मबल बढ़ता है प्राण ऊर्जा का रोम-रोम में संचार होता है। इस कृत्य को दैनिक जीवन में किसी न किसी प्रकार गुँथा ही रखना चाहिए।
उपासना- दीपयज्ञ, (2) सहगान- युग संगीत, (3) सामूहिक स्वाध्याय समीक्षा, (4) युग साहित्य विस्तार प्रक्रिया, (5) सामूहिक सूर्यार्घ्य दान।
उपासना से आत्मबल बढ़ता है प्राण ऊर्जा का रोम-रोम में संचार होता है। इस कृत्य को दैनिक जीवन में किसी न किसी प्रकार गुँथा ही रखना चाहिए।
उपासना साधक में उन्हीं दुर्गुणों का आविर्भाव करेगी। कुछ दिन में उसकी प्रकृति में उन्हीं दुर्गुणों की भरमार होने लगती है। तंत्र साधना में यही होता है और उस आधार पर मिले अनुदानों को मारण, उच्चाटन, वशीकरण, स्तंभन जैसे हेय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। कर्म अपना प्रतिफल निश्चित रूप से देते हैं और लौट आते है। किसी का अनिष्ट करने वाले स्वयं भी उस कुकृत्य के दुष्परिणाम से बचे नहीं रह सकते।
उपासना के अनेकानेक अभ्यास हैं। अनेकों योग सिद्धांत हैं। उनका निर्माण साधकों के निजी अनुभव अभ्यास के आधार पर बना हैं। उनके पीछे शास्त्रकारों की दूरदर्शी वेधक दृष्टि भी हैं। योगों की संख्या 74 बताई गई हैं।
उपासना, (2) साधना, (3) आराधना। यह तीनों दैनिक जीवन में, आहार परिश्रम-विश्राम, अन्न, जल, और वायु की तरह गुँथे रहने चाहिए। युग साहित्य के नियमित स्वाध्याय को इस प्रयास के लिए मुख्य आधार माना जाय।
उपासना दीप यज्ञ के माध्यम से की जाय। देव मंच के पास थाली में दीपक और अगरबत्तियाँ सजाकर रखें। सब का सिंचन, सर्वदेव नमस्कार, स्वस्तिवाचन के क्रम पूर्ण कर के दीपक और अगरबत्तियाँ प्रज्वलित करें। भावना करें कि युग शक्ति महाप्रज्ञा हमारे अंदर संघ शक्ति का जागरण कर रही है। युग साधना के सामूहिक प्रयोग करने की क्षमता हम सब में बढ़ रही है।
उपासना, स्वाध्याय का क्रम चलाने के साथ-साथ सप्ताह में एक बार सामूहिक उपासना, सामूहिक स्वाध्याय परामर्श का क्रम चलायेंगे। इस साप्ताहिक सत्संग कहा जाय। सप्ताह में सुविधानुसार एक दिन का समय इसके लिए पूर्व- निर्धारित रहे। यह सत्संग किसी एक स्थान पर अथवा सदस्यों के घरों पर बदल-बदल कर चलाए जाते रह सकते हैं। इन सत्संगों के लिए पाँच क्रम निर्धारित हैं (1) सामूहिक उपासना- दीपयज्ञ, (2) सहगान- युग संगीत, (3) सामूहिक स्वाध्याय समीक्षा, (4) युग साहित्य विस्तार प्रक्रिया, (5) सामूहिक सूर्यार्घ्य दान।
उपासना, साधना, आराधना के आधार पर आत्म परिष्कार करेंगे। धार को पैनी करेंगे और इतनी अन्तः क्षमता अर्जित करेंगे जिसके आधार पर उनसे कुछ महत्वपूर्ण कार्य करते बन पड़ें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-June
उपासना को असुरता का पर्याय-गुण धर्म बताती हुई घोर विनाश और सर्वनाश का द्वार घोषित करती है। देहपरायण मनुष्य को आत्म नियंत्रण करने आदर्शवादी विधान को स्वीकारने तथा विकास यात्रा पर चल पड़ने का संकेत देती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-April
उपासना के सम्बन्ध में भी है।
उपासना के प्रयोग मानव मात्र के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के निमित्त एक ही संयम किये जाने का प्रयोग पूरे भारत के महानगरों कस्बों देहातों में प्रयोग स्तर पर आँवलखेड़ा की प्रथम पूर्णाहुति तक बारबार सम्पन्न किये जाने की योजना बनी है ताकि युग परिवर्तन का माहौल बन सके। किसी को अपना धर्म बदलने उपासना पद्धति में परिवर्तन करने की जरूरत नहीं है धियो यो नः प्रचोदयात् की भावना से सब एक साथ सन्मार्ग पर चले इस संज्ञा व सूक्त की भाव श्रद्धा के साथ उज्ज्वल भविष्य का पथ सभी के लिए एक साथ प्रशस्त हो इसी चिंतन चेतना के उदात्तीकरण के साथ यह सामूहिक प्रयोग जप उपासना दीपयज्ञों अनुष्ठानों आदि रूप में सम्पन्न किये जाते रहेंगे एवं देखते देखते सारा वातावरण गायत्रीमय विवेक श्रद्धा से परिपूरित होता देखा जा सकेगा। गायत्री महामंत्र की प्रेरणा सभी को समान रूप से अनुष्ठान के पूर्व के आगामी सात माहों में यह भी प्रयोग किया जा रहा है कि इसके विभिन्न भाषाओं में अनुवादों का मंत्र व भावार्थ का सीमित ही सही बड़े व्यापक पैमाने पर लेखन का क्रम चल पड़े जो मंत्र जप सके वे जपे किन्तु जो लिख सके वे पाँच ही सही पर अपनी अपनी भाषा में उसी भावचेतना से अनुप्राणित हो मंत्र? के भावार्थ का भी लेखन करें। वे उर्दू गुरु अंग्रेजी तमिल तेलगू असमी बंगाली कन्नड़ मलयालम मलयाली गुजराती किसी भी भाषा में हो सकता है बच्चों से लेकर बूढ़ों तक इस अभियान में सम्मिलित हो प्रसुप्त संस्कारों को जगाने की प्रक्रिया को साकार कर सकते है यह प्रयोग सारे भारत व विश्व में एक साथ चल पड़े तो देखते देखते वातावरण के बदलने युग शक्ति के व्यापक होने की सुखद कल्पना सहज की जा सकती है।
उपासना में प्रतिमा पूजन की चित्र स्थापन की क्या आवश्यकता है। ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि उपासना का महत्त्वपूर्ण अंग ध्यान-धारणा है और ध्यान के लिए नाम रूप की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। भावनाओं को परिष्कृत करने के लिए हर वर्ग के लोगों को भावना और प्रतीक का समन्वय करना पड़ता है। सभी देशों के अपने अपने झंडे होते है। उस देश के नागरिक उसका सम्मान करते है।
उपासना से देवत्व की सतोगुण की मात्रा निरंतर बढ़ती है इसलिए वह देव माता है। उसका अंतिम लक्ष्य वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को कार्यान्वित करना है। आत्मवत् सर्वभूतेषु की पारिवारिक भावना जगाना है। एक देश एक भाषा एक धर्म एक संस्कृति बनाते हुये हर प्रकार की विषमताओं को मिटा कर समता, ममता एकता का प्रचलन करना है, इसलिए वह विश्व माता है।
उपासनारत रहने से दूरदर्शी विवेक बुद्धि का उदय होना निश्चित है। यह एक ही कारण ऐसा है जो जीवन प्रक्रिया को सन्मार्ग पर चला कर अनायास ही शोक संतोष का कष्ट कठिनाइयों का निराकरण करता है। जो टल नहीं सकता उसे सहन करने योग्य धैर्य प्रदान करता है। प्रगति पथ पर बढ़ने का साहस उत्पन्न होने से कितनी ही साँसारिक सफलतायें भी सरलतापूर्वक मिलने लगती है।
उपासना पद्धति में परिवर्तन करने की जरूरत नहीं है धियो यो नः प्रचोदयात् की भावना से सब एक साथ सन्मार्ग पर चले इस संज्ञा व सूक्त की भाव श्रद्धा के साथ उज्ज्वल भविष्य का पथ सभी के लिए एक साथ प्रशस्त हो इसी चिंतन चेतना के उदात्तीकरण के साथ यह सामूहिक प्रयोग जप उपासना दीपयज्ञों अनुष्ठानों आदि रूप में सम्पन्न किये जाते रहेंगे एवं देखते देखते सारा वातावरण गायत्रीमय विवेक श्रद्धा से परिपूरित होता देखा जा सकेगा। गायत्री महामंत्र की प्रेरणा सभी को समान रूप से अनुष्ठान के पूर्व के आगामी सात माहों में यह भी प्रयोग किया जा रहा है कि इसके विभिन्न भाषाओं में अनुवादों का मंत्र व भावार्थ का सीमित ही सही बड़े व्यापक पैमाने पर लेखन का क्रम चल पड़े जो मंत्र जप सके वे जपे किन्तु जो लिख सके वे पाँच ही सही पर अपनी अपनी भाषा में उसी भावचेतना से अनुप्राणित हो मंत्र? के भावार्थ का भी लेखन करें। वे उर्दू गुरु अंग्रेजी तमिल तेलगू असमी बंगाली कन्नड़ मलयालम मलयाली गुजराती किसी भी भाषा में हो सकता है बच्चों से लेकर बूढ़ों तक इस अभियान में सम्मिलित हो प्रसुप्त संस्कारों को जगाने की प्रक्रिया को साकार कर सकते है यह प्रयोग सारे भारत व विश्व में एक साथ चल पड़े तो देखते देखते वातावरण के बदलने युग शक्ति के व्यापक होने की सुखद कल्पना सहज की जा सकती है।
उपासना से भक्ति को अथवा भगवान को क्या लाभ होता है यह सवाल पीछे का है। प्रधान तथ्य यह है कि आत्मा ओर परमात्मा की मान्यता मनुष्य के चिन्तन और कर्तृत्व की एक रीति नियम के अंतर्गत बहुत हद तक जकड़े रहने में सफल होती है। इन दार्शनिक बंधनों को उठा लिया जाय तो मनुष्य की पशुता कितनी उद्धत हो सकती है और उसका दुष्परिणाम किस प्रकार समस्त संसार को भुगतना पड़ सकता है। इसकी कल्पना भी कँपा देने वाली है।
उपासना की क्रिया-प्रक्रिया नहीं हैं। उसके पूछे एक प्रबल दर्शन भी जुड़ा हुआ है जो मनुष्य की आकांक्षा, चिन्तन, प्रक्रिया और कर्म पद्धति को प्रभावित करता है। समाज संस्कृति, चरित्र, संयम, सेवा, पुण्य, परमार्थ आदि सत्प्रवृत्तियों को अपनाने से व्यक्ति की भौतिक सुख सुविधाओं में निश्चित रूप से कमी आती हैं। भले ही उस बचत का उपयोग लोक कल्याण में कितनी ही अच्छाई के साथ क्यों न होता हो। आदर्शवादिता के मार्ग पर चलते हुए जो प्रत्यक्ष क्षति होती है उसकी पूर्ति ईश्वरवादी स्वर्ग, मुक्ति, ईश्वरीय प्रसन्नता आदि विश्वासों के आधार कार्य करने के आकर्षण सामने आने पर वह ईश्वर के दण्ड से डरता है।
उपासना, प्रार्थना में सारे वातावरण को हिला देने की शक्ति होती है इसी आधार पर अगले दिनों सभी धर्म सम्प्रदायों के व्यक्तियों द्वारा सामूहिक स्तर पर अपनी अपनी उपासना के प्रयोग मानव मात्र के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के निमित्त एक ही संयम किये जाने का प्रयोग पूरे भारत के महानगरों कस्बों देहातों में प्रयोग स्तर पर आँवलखेड़ा की प्रथम पूर्णाहुति तक बारबार सम्पन्न किये जाने की योजना बनी है ताकि युग परिवर्तन का माहौल बन सके। किसी को अपना धर्म बदलने उपासना पद्धति में परिवर्तन करने की जरूरत नहीं है धियो यो नः प्रचोदयात् की भावना से सब एक साथ सन्मार्ग पर चले इस संज्ञा व सूक्त की भाव श्रद्धा के साथ उज्ज्वल भविष्य का पथ सभी के लिए एक साथ प्रशस्त हो इसी चिंतन चेतना के उदात्तीकरण के साथ यह सामूहिक प्रयोग जप उपासना दीपयज्ञों अनुष्ठानों आदि रूप में सम्पन्न किये जाते रहेंगे एवं देखते देखते सारा वातावरण गायत्रीमय विवेक श्रद्धा से परिपूरित होता देखा जा सकेगा। गायत्री महामंत्र की प्रेरणा सभी को समान रूप से अनुष्ठान के पूर्व के आगामी सात माहों में यह भी प्रयोग किया जा रहा है कि इसके विभिन्न भाषाओं में अनुवादों का मंत्र व भावार्थ का सीमित ही सही बड़े व्यापक पैमाने पर लेखन का क्रम चल पड़े जो मंत्र जप सके वे जपे किन्तु जो लिख सके वे पाँच ही सही पर अपनी अपनी भाषा में उसी भावचेतना से अनुप्राणित हो मंत्र? के भावार्थ का भी लेखन करें। वे उर्दू गुरु अंग्रेजी तमिल तेलगू असमी बंगाली कन्नड़ मलयालम मलयाली गुजराती किसी भी भाषा में हो सकता है बच्चों से लेकर बूढ़ों तक इस अभियान में सम्मिलित हो प्रसुप्त संस्कारों को जगाने की प्रक्रिया को साकार कर सकते है यह प्रयोग सारे भारत व विश्व में एक साथ चल पड़े तो देखते देखते वातावरण के बदलने युग शक्ति के व्यापक होने की सुखद कल्पना सहज की जा सकती है।
उपासना दीपयज्ञों अनुष्ठानों आदि रूप में सम्पन्न किये जाते रहेंगे एवं देखते देखते सारा वातावरण गायत्रीमय विवेक श्रद्धा से परिपूरित होता देखा जा सकेगा। गायत्री महामंत्र की प्रेरणा सभी को समान रूप से अनुष्ठान के पूर्व के आगामी सात माहों में यह भी प्रयोग किया जा रहा है कि इसके विभिन्न भाषाओं में अनुवादों का मंत्र व भावार्थ का सीमित ही सही बड़े व्यापक पैमाने पर लेखन का क्रम चल पड़े जो मंत्र जप सके वे जपे किन्तु जो लिख सके वे पाँच ही सही पर अपनी अपनी भाषा में उसी भावचेतना से अनुप्राणित हो मंत्र? के भावार्थ का भी लेखन करें। वे उर्दू गुरु अंग्रेजी तमिल तेलगू असमी बंगाली कन्नड़ मलयालम मलयाली गुजराती किसी भी भाषा में हो सकता है बच्चों से लेकर बूढ़ों तक इस अभियान में सम्मिलित हो प्रसुप्त संस्कारों को जगाने की प्रक्रिया को साकार कर सकते है यह प्रयोग सारे भारत व विश्व में एक साथ चल पड़े तो देखते देखते वातावरण के बदलने युग शक्ति के व्यापक होने की सुखद कल्पना सहज की जा सकती है।
उपासना व यज्ञों संस्कारों के विस्तार द्वारा गायत्रीमय बनाया जा सके तो युगशक्ति का यह अवतरण सम्ल सार्थक होकर रहेगा उससे अपने राष्ट्र एवं विश्व को चिरकाल तक समृद्ध सशक्त एवं सुसंस्कारित सुगठित बनाये रखने वाली ऊष्मा का उत्पादन भी संभव हो सकेगा। जितने अधिक व्यक्ति जोड़े जा सकेंगे अंतः करण से कटिबद्ध हो सकेंगे उतना ही युगशक्ति का अवतरण तथा सही समय पर इस धरती पर ऋषि युग्म का आने का सुयोग्य सौभाग्य व सबका उससे जुड़ना सार्थक माना जाएगा
उपासना का महत्त्वपूर्ण अंग ध्यान-धारणा है और ध्यान के लिए नाम रूप की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। भावनाओं को परिष्कृत करने के लिए हर वर्ग के लोगों को भावना और प्रतीक का समन्वय करना पड़ता है। सभी देशों के अपने अपने झंडे होते है। उस देश के नागरिक उसका सम्मान करते है। नास्तिक कहे जाने वाले कम्युनिस्ट भी लाल झंडे को सलाम करते है और
रूस जाने पर लेनिनग्राड में अवस्थात लेनिन के शरीर को सुरक्षित रख कर बनाये हुये प्रतीक का दर्शन करने जाते है।
उपासना भी स्वयं ही करनी चाहिए। तपश्चर्या स्वयं ही की जाती हैं। मित्रता स्वयं ही निभाई जाती है। कसरत स्वयं ही करानी पड़ती है। यही बात उपासना के सम्बन्ध में भी है।
उपासना के व्यापक विस्तार से वह प्रयोजन पूर्ण हुआ माना जाना चाहिए, जिससे की सतयुगी सम्भावना ही साकार की ही जा सके।
उपासना वाले उसकी स्थापना माता के रूप में करें तथा निराकार वाले प्रकाश पुँज के रूप में। उदीयमान स्वर्णिम सूर्य या दीपक की लौ को सविता का प्रतीक मानें। एक प्रश्न यह सब में आता है कि जप के साथ अर्थ का भी चिन्तन करना चाहिए क्या? जप के साथ वस्तुतः ध्यान करना चाहिए। अर्थ चिन्तन के साथ जप करने में व्यवहारिक कठिनाई यह है कि शब्दार्थ के कल्पना चित्र मस्तिष्क में बनाते हुये देर लगती है इतनी देर जप को रोका नहीं जा सकता।
उपासना करने वालों की साधना किसी कारणवश किसी दिन छूट जाय तो उसका विकल्प यह है कि अगले दिनों थोड़ा थोड़ा जप बढ़ा कर उस छूटी गई साधना की संख्या पूर्ति कर लेनी चाहिए। स्त्रियों के अनुष्ठान के दिनों मासिक धर्म का व्यवधान पड़ जाय तो चार दिन बाद उसकी पूर्ति उतने दिन आगे बढ़ा कर या जप संख्या बढ़ा कर उसकी पूर्ति कर लेनी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-January
उपासना पद्धतियाँ, साधनायें व सिद्धाँत प्रचलित हैं वे धर्म से दूर का भी रिश्ता न रखते हों। हो सकता है वे विरोधी भी हों। पर वे प्रचलन में आ गई हैं इसलिये धर्म बन गयीं हैं। ऐसी स्थिति में धर्म की कोई उपयोगिता नहीं रह जायेगी।
उपासना-साधना महत्वपूर्ण भूमिका संपन्न करती है।
उपासना एवं ध्यान की अवस्था में इन रस स्रावों का बनना पूर्णतः बंद हो जाता है। जिससे साधक स्वस्थ अनुभव करता है। महिलायें स्वभावतः धार्मिक प्रवृत्ति की होने के कारण उनमें यह रोग कम ही पाया जाता है।
उपासना में तल्लीन साधक पर किये गये कुछ वैज्ञानिक अनुसंधान भी इन तथ्यों का आश्चर्यजनक प्रतिपादन करते हैं। उपासना की तल्लीनता के साथ कुछ शारीरिक परिवर्तन होते हैं। उपासना की अवस्था में कम आक्सीजन में भी शरीर का काम चलता है। हृदय व नाड़ियों की गति मंद पड़ने से रक्त विकार कम होते हैं। शयनकाल के बाद शरीर में जो ताजगी आती है वह उपासना काल में ही उपलब्ध होती है।
उपासना, ईसाई धर्म में’ होर्सचाज्म’ यहूदी धर्म में ‘कव्यालह’ इस्लाम मत में ‘तसव्युफ’ जापान के जैन धर्म में ‘जानेन’ आदि उपासना विधानों का एक ही अर्थ है। अनन्य और सर्वभाव से किया गया ईश चिंतन उपासना को प्रभावशाली और फलवती बनाता है। उनसे उत्पन्न हुई धनात्मक शक्ति व्यक्ति के आत्मविश्वास, आत्मगौरव और आत्मबल को बढ़ाती है। इसके साथ यदि गायत्री महामंत्र का जप एवं सविता देवता का ध्यान जुड़ जाय तो अनेकानेक आधि-व्याधियों से सहज ही मुक्ति मिल सकती है।
उपासना के समय सूर्य के ध्यान की व्यवस्था है। उसका अर्थ है सूर्य की अदृश्य शक्तियों-किरणों को उपरोक्त वैज्ञानिक सिद्धाँतों के आधार पर शरीर में धारण करना और उसके आत्मिक व वैज्ञानिक लाभों से लाभान्वित होना। हमारी प्रगाढ़तम, उपासना हमारी मनश्चेतना को ‘सूर्य’ बना देती हैं। उस शक्ति, सामर्थ्य और अनुभूति की कल्पना की जा सके तो सहज ही अनुभव किया जा सकता है कि गायत्री सिद्धि के क्या चमत्कार हो सकते हैं?
उपासना पद्धति को अपनाया है। भारतीय धर्म में गायत्री उपासना, ईसाई धर्म में’ होर्सचाज्म’ यहूदी धर्म में ‘कव्यालह’ इस्लाम मत में ‘तसव्युफ’ जापान के जैन धर्म में ‘जानेन’ आदि उपासना विधानों का एक ही अर्थ है। अनन्य और सर्वभाव से किया गया ईश चिंतन उपासना को प्रभावशाली और फलवती बनाता है। उनसे उत्पन्न हुई धनात्मक शक्ति व्यक्ति के आत्मविश्वास, आत्मगौरव और आत्मबल को बढ़ाती है। इसके साथ यदि गायत्री महामंत्र का जप एवं सविता देवता का ध्यान जुड़ जाय तो अनेकानेक आधि-व्याधियों से सहज ही मुक्ति मिल सकती है।
उपासनायें एवं तपश्चर्या का आश्रय लेना पड़ता है। इनमें भावनाओं का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यही वह सूक्ष्म उपाय-उपचार है जिसकी पहुँच गुप्त मन तक होती है सही भावनायें हमारे गुप्त मन का नव निर्माण करती हैं और हमारे चारों ओर का संसार वैसा ही बनता चला जाता है। भाव प्रवणता से अचेतन मन परिष्कृत होता जाता है और प्रसुप्त पड़ी अतीन्द्रिय क्षमतायें जाग्रत होने लगती हैं। अंदर से बाहर की ओर एक आध्यात्मिक प्रवाह चलने लगता है, परिणाम स्वरूप शक्तियों का नवसृजन होता है, बिखरी शक्तियाँ एकाग्र होकर दिव्यताओं एवं महानताओं का नवनिर्माण करती हैं जिनसे इच्छानुसार भौतिक सिद्धियों एवं आध्यात्मिक विभूतियों के लाभ प्राप्त होते हैं।
उपासना है।
उपासना की अवस्था में कम आक्सीजन में भी शरीर का काम चलता है। हृदय व नाड़ियों की गति मंद पड़ने से रक्त विकार कम होते हैं। शयनकाल के बाद शरीर में जो ताजगी आती है वह उपासना काल में ही उपलब्ध होती है।
उपासना का भी अधिकारी नहीं है। मेरु तंत्र के अनुसार जो पर द्रव्य के लिए अंधा है, पर-स्त्री के लिए नपुँसक है, पर निंदा के लिए मूक है और इन्द्रियों को सदा वश में रखता है, ऐसा ब्रह्मपरायण व्यक्ति ही वाममार्गी तंत्र साधना का अधिकारी होता है। यह अधिकार प्राप्त करने के लिए ताँत्रिक सिद्धाँतों का गंभीर अनुशीलन और साधना मार्ग का निष्ठापूर्वक अनुगमन आवश्यक है, तभी दिव्य शक्तियों का वरद् हस्त प्राप्त हो सकता है।
उपासना की महत्ता बताते हुए लिखा है कि मानवीय मनोभावों को सर्वव्यापी सत्ता किसी देवपुरुष, अदृश्य देवदूत, सिंहपुरुष, महान सद्गुरु यहाँ तक कि लौकिक दृष्टि से किसी प्रेमी के मनोभावों से जोड़कर उनकी विचारणाओं अनुभूतियों को आत्मसात कर न केवल उनकी भावनाएँ समझने की बात स्वीकार की है अपितु यह भी माना है कि इष्ट की भौतिक परमाणु या शारीरिक अनुभूतियाँ भी उस स्थिति में विलक्षण रूप में आकर्षित होती हैं। जब यीशु मसीह क्रास पर कील से ठोके गये थे, उस समय सेन्ट कैथराइन अपने शरीर के विभिन्न स्थलों में वैसी ही पीड़ा अनुभव करती थीं। यह उपास्य से उपासक के गहरे तादात्म्य का ही परिणाम है। न केवल चेतन परमाणु अपितु जड़, पिण्ड और वह भी काल ब्रह्माण्ड की सीमा के परे इस तादात्म्य में जोड़े जा सकते हैं और भूत, भविष्य की घटनाओं की जानकारी ली जा सकती है।
उपासना की अवस्था में विकीर्ण होने वाली तरंगें अपना गुण बदल देती हैं और वे शरीर के विष शोधन एवं नई संरचना में जुट जाती है। गायत्री का देवता सविता अर्थात् गायत्री उपासना के समय सूर्य के ध्यान की व्यवस्था है। उसका अर्थ है सूर्य की अदृश्य शक्तियों-किरणों को उपरोक्त वैज्ञानिक सिद्धाँतों के आधार पर शरीर में धारण करना और उसके आत्मिक व वैज्ञानिक लाभों से लाभान्वित होना। हमारी प्रगाढ़तम, उपासना हमारी मनश्चेतना को ‘सूर्य’ बना देती हैं। उस शक्ति, सामर्थ्य और अनुभूति की कल्पना की जा सके तो सहज ही अनुभव किया जा सकता है कि गायत्री सिद्धि के क्या चमत्कार हो सकते हैं?
उपासना की सफलता का मूल आधार भावना ही है। इसके अभाव में सारे कर्मकाँड भारभूत ही सिद्ध होते हैं।
उपासना करते समय गहरे ध्यान की अवस्था में मटर के दाने जैसी ‘पिट्यूटरी’ नामक ग्रंथि से बारह प्रकार के ‘हार्मोन्स’ स्रावित होते हैं जो मिल−जुलकर शरीर को स्वस्थ संतुलित रखने हेतु सक्रिय होते हैं।
उपासना और ज्ञान के तीन विषय प्रसिद्ध हैं, किंतु इनमें यह विषय संक्षिप्त और गुँथे हुए रूप में वर्णित हैं। इन्हें ही सरल रूप में युगानुसार विस्तारपूर्वक तंत्रों में पाये जाते हैं। तंत्रों की महत्ता प्रकट करते हुए ‘मत्स्य-सूक्त में लिखा है कि जिस तरह वर्णों में ब्राह्मण, देवियों में दुर्गा, देवताओं में इन्द्र, वृक्षों में पीपल, पर्वतों में हिमालय, नदियों में गंगा और अवतारों में विष्णु हैं। उसी तरह शास्त्रों में तंत्र श्रेष्ठ हैं।’
उपासना करने वालों में त्वचा की विद्युत रोथकता दूसरों की अपेक्षा ज्यादा विद्यमान रहती है। यही नहीं उनकी तरंगों की आकृतियाँ भी दूसरे लोगों की अपेक्षा सरल होती है।
उपासना, सेवा-साधना इसी की होनी चाहिए, पर साथ ही ध्यान इस बात का भी रखा जाना चाहिए क भोग-विलास में डूब कर मूल प्रयोजन को ही हम भूल न जायें। त्यागपूर्वक रहते हुए विराट् ब्रह्म की सेवा करें और अंततः उसे प्राप्त कर जीवन-मुक्तों जैसा आनंद लाभ करें। मिथ्या के रूप में संसार का यही तात्पर्य हो सकता है, पर जहाँ मूल को छोड़ कर पत्र-पल्लवों जैसे बाह्य अवयवों में उलझा जायेगा, वहाँ इससे पलायनवाद को ही प्रश्रय मिलेगा। इसमें दोष दर्शन का नहीं, उस बुद्धि का है, जो अपने अंदर सत्य को समझने वाला विज्ञान पैदा न कर सकी और शब्दों में उलझ कर यथार्थ से दूर हटती गई।
उपासना के फलीभूत होने का तात्पर्य शक्तियों का गतिमान होना ही है।
उपासना का सुनिश्चित वैज्ञानिक आधार है जो सही अर्थों में संपन्न होने पर शरीर, मन, बुद्धि में आवश्यक परिवर्तन के रूप में परिलक्षित होता है।
उपासना को प्रभावशाली और फलवती बनाता है। उनसे उत्पन्न हुई धनात्मक शक्ति व्यक्ति के आत्मविश्वास, आत्मगौरव और आत्मबल को बढ़ाती है। इसके साथ यदि गायत्री महामंत्र का जप एवं सविता देवता का ध्यान जुड़ जाय तो अनेकानेक आधि-व्याधियों से सहज ही मुक्ति मिल सकती है।
उपासना विधानों का एक ही अर्थ है। अनन्य और सर्वभाव से किया गया ईश चिंतन उपासना को प्रभावशाली और फलवती बनाता है। उनसे उत्पन्न हुई धनात्मक शक्ति व्यक्ति के आत्मविश्वास, आत्मगौरव और आत्मबल को बढ़ाती है। इसके साथ यदि गायत्री महामंत्र का जप एवं सविता देवता का ध्यान जुड़ जाय तो अनेकानेक आधि-व्याधियों से सहज ही मुक्ति मिल सकती है।
उपासना एवं ध्यान में निमग्न साधक का परीक्षण करने पर पाया गया कि रक्तचाप को नियंत्रित करने में उपासना-साधना महत्वपूर्ण भूमिका संपन्न करती है।
उपासनात्मक उपचारों का लंबे काल तक आश्रय लेना पड़ता है। कारण कि चेतना और मन को प्रभावित करने की जितनी सामर्थ्य शब्द और संकल्प में है उतना सरल और समर्थ उपाय शायद और कोई नहीं। मंत्र ध्वनि के बार-बार के आघात से चेतना-केन्द्र परिष्कृत होने लगते हैं और मन विगलित होकर विकसित होता जाता है। फिर एक शून्य जैसी स्थिति पैदा होती है। इसीसे नाद का स्फुरण होता है।
उपासना है। जब सारी मलिनताएँ निकल जाती हैं तो आत्मा का उज्ज्वल, साफ और सुँदर स्वरूप परिलक्षित होने लगता है। फिर बहिरंग में सभी कुछ अच्छा-सत्, चित्, आनंदमय नजर आने लगता है।
उपासना की विधियाँ विकसित की थीं। साथ ही साथ उनके अभ्यास द्वारा अपनी क्षमताओं को विकसित कर प्रचुर भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष किया था।
उपासना हमारी मनश्चेतना को ‘सूर्य’ बना देती हैं। उस शक्ति, सामर्थ्य और अनुभूति की कल्पना की जा सके तो सहज ही अनुभव किया जा सकता है कि गायत्री सिद्धि के क्या चमत्कार हो सकते हैं?
उपासना का रहता है। सबेरे से लेकर दोपहर तक हम अपना लेख लिखते हैं ताकि अखण्ड-ज्योति बीस साल तक बराबर निकलती रहे। बीस साल के लिए लेख और जो पुस्तकें लिखनी हैं, वह सब हम लिखकर रख जायेंगे। जब यह युगसंधि समाप्त होगी और सन् 2000 आयेगा, उस वक्त तक आप यह अनुभव करेंगे कि गुरुजी जो लिखकर रख गये थे, उनकी लेखनी में कोई फर्क नहीं आया, उनके अक्षरों में कोई फर्क नहीं आया। उनकी पुस्तकों में, पत्रिकाओं में कोई फर्क नहीं आया है।
उपासना भी करते हैं, फिर भी उसके अधिष्ठाता महाकाल और तत्वदर्शन से अनभिज्ञ बने हुए हैं। जिस दिन हम सब ‘काल’ अर्थात् समय को पहचान कर जीवन में उसका समुचित उपयोग कर सकेंगे, समझना चाहिए महाकाल और महाकाली की यथार्थ अभ्यर्थना हमारी उसी दिन से प्रारंभ हुई।
उपासना की तल्लीनता के साथ कुछ शारीरिक परिवर्तन होते हैं। उपासना की अवस्था में कम आक्सीजन में भी शरीर का काम चलता है। हृदय व नाड़ियों की गति मंद पड़ने से रक्त विकार कम होते हैं। शयनकाल के बाद शरीर में जो ताजगी आती है वह उपासना काल में ही उपलब्ध होती है।
उपासना का अर्थ है-ईश्वर के आदर्शों के समीप बैठना। उपास्य, आराध्य की स्थिति से जितनी ही अधिक समीप अपनी स्थिति विनिर्मित कर ली जाये, उसके जितना अधिक अनुकूल-समतुल्य बना जाये उसकी क्षमताएँ, शक्तियां,सामर्थ्य उसी अनुपात में अपने अंदर आती और अपने चेतन व भौतिक गुणों से लाभान्वित करती चली जाती हैं। ईश-उपासना का सुनिश्चित वैज्ञानिक आधार है जो सही अर्थों में संपन्न होने पर शरीर, मन, बुद्धि में आवश्यक परिवर्तन के रूप में परिलक्षित होता है।
उपासना में भावना का होना निताँत आवश्यक माना गया है, अन्यथा पूर्ण लाभ की आशा-अपेक्षा नहीं की जा सकती। भावना को शास्त्रकारों ने पारसमणि कहा है। पारस-पत्थर लोहे को सोना बना देता है, भावना भी मनुष्य को तदनुरूप ही ढाल देती है। कहा भी गया है-”यादृषी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृषी।” अर्थात् जिसकी जैसी भावना होती है उसे वैसी ही सिद्धि मिला करती है।
उपासना काल में ही उपलब्ध होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-November
उपासना के समय मन को इष्ट पर केन्द्रित रखने की आवश्यकता पूरी करने के लिए पहले से ही मस्तिष्क को प्रशिक्षित करना चाहिए। गायत्री महाशक्ति के संदर्भ में जितना अधिक ज्ञान-विज्ञान संग्रह किया जा सके मनोयोग पूर्वक करना चाहिए। विज्ञ व्यक्तियों के साथ उसकी चर्चा करनी चाहिए। इस संदर्भ में होने वाले सत्संगों में नियमित रूप से जाना चाहिए। जिनने लाभ जुटाये हों उनके अनुभव सुनने चाहिए।
उपासना के लिए जिस एकाग्रता का प्रतिपादन है उसका लक्ष्य है-भौतिक जगत की कल्पनाओं से मन को विरत करना और उसे अंतर्जगत् की क्रिया-प्रक्रिया में नियोजित कर देना। उपासना के समय यदि मन साँसारिक प्रयोग आत्मिक क्षेत्र की परिधि में परिभ्रमण करता रहे तो समझना चाहिए कि एकाग्रता का उद्देश्य ठीक तरह पूरा हो रहा है। विज्ञान के शोध कार्यों में-साहित्य के सृजन प्रयोजनों में वैज्ञानिक या लेखक का चिन्तन अपनी निर्धारित दिशा धारा में ही सीमित रहता है। इतने भर में एकाग्रता का प्रयोजन पूरा हो जाता है। यद्यपि इस प्रकार के बौद्धिक पुरुषार्थों में मन और बुद्धि को असाधारण रूप में गतिशील रहना पड़ता है।
उपासना में लगे तो स्वभावतः वहाँ उसकी रुचि नहीं होगी ओर मन जहाँ-जहाँ उड़ता फिरेगा। मन लगाने के लिए आवश्यक है कि उस कार्य में समुचित आकर्षण उत्पन्न किया जाय। व्यवसाय उपार्जन में, इन्द्रिय भोगों में, विनोद मनोरंजनों के संपर्क सान्निध्य में मन सहज ही लग जाता है। इसका कारण यह है कि इन प्रसंगों के द्वारा मिलने वाले सुख, लाभ एवं अनुभव के सम्बन्ध में पहले से ही विश्वास जमा होता है। प्रश्न यह नहीं कि वे आकर्षण दूरदर्शिता की दृष्टि से लाभदायक है या नहीं।
उपासना में एकाग्रता पर बहुत जोर दिया गया है। ध्यान-धारणा का अभ्यास इसीलिए किया जाता है कि मन की अनियन्त्रित भगदड़ करने की आदत पर नियन्त्रण स्थापित किया जाय और उसे तथ्य विशेष पर केन्द्रित होने के लिए प्रशिक्षित किया जाय।
उपासना-साधना के नाम पर आप जादूगरी बन्द कीजिये। देवता को गुमराह करने वाली, मनोकामना सिद्ध करने वाली पूजा बन्द कीजिये।
उपासना के समय उनका मन भजन में स्थिर नहीं रहता। ऐसे लोग एकाग्रता और स्थिरता का अन्तर न समझने के कारण ही इस प्रकार की शिकायत करते हैं। मन की स्थिरता सर्वथा भिन्न बात है। उसे एकाग्रता से मिलती-जुलती स्थिति तो कहा जा सकता है पर दोनों का सीधा सम्बन्ध नहीं हैं जिसका मन स्थिर हो उसे एकाग्रता का लाभ मिल सके या जिसे एकाग्रता की सिद्धि है उसे स्थिरता की स्थिति प्राप्त हो ही जाय यह आवश्यक नहीं है।
उपासना का लक्ष्य स्थिर हो जाने पर उस समय जो विचार प्रवाह अपनाया जाना आवश्यक है उसे पकड़ सकना कुछ कठिन न रह जाएगा।
उपासना के लिए श्रम करने की सार्थकता पर श्रद्धा और विश्वास गहरा होता चला जाय।
उपासना के सामान्य संदर्भ में एकान्त ढूँढ़ते फिरने की ही कोई खास आवश्यकता नहीं है। सामूहिकता के वातावरण में ध्यान धारणा और भी अच्छी तरह बन पड़ती है। सेना का सामूहिक कार्य-साथ-साथ कदम मिलाकर चलना-सैनिकों में से किसी भी ध्यान नहीं बटाना वरन् साथ-साथ चलने की पग ध्वनि के प्रवाह में हर एक के पैर ओर भी अच्छी तरह अपने आप नियत क्रम से उठते चले जाते हैं। सहगमन से पग क्रम को ठीक रखने में बाधा नहीं पड़ती वरन् सहायता ही मिलती है। सहगान की तरह सहध्यान तथा सहभजन भी अधिक सफल और अधिक प्रखर बनता है।
उपासना विज्ञान की प्रामाणिकता का, अधिकाधिक अध्ययन अवगाहन करने पर सम्पन्न होता है। आशंका ग्रस्त, अविश्वासी मन, उपेक्षा भाव से आधे-अधूरे मन से उपासना में लगे तो स्वभावतः वहाँ उसकी रुचि नहीं होगी ओर मन जहाँ-जहाँ उड़ता फिरेगा। मन लगाने के लिए आवश्यक है कि उस कार्य में समुचित आकर्षण उत्पन्न किया जाय। व्यवसाय उपार्जन में, इन्द्रिय भोगों में, विनोद मनोरंजनों के संपर्क सान्निध्य में मन सहज ही लग जाता है। इसका कारण यह है कि इन प्रसंगों के द्वारा मिलने वाले सुख, लाभ एवं अनुभव के सम्बन्ध में पहले से ही विश्वास जमा होता है।
उपासना करिये, जप करिये ताकि आपको उस समय परा एवं पश्यन्ती वाणी से दिशा दे सकूँ। अन्यथा मैं अपने मौन की शक्ति प्रेषित करूँगा तो तो आपको नुकसान होगा।
उपासना करते है। “ उन ऋषियों को तनिक क्रोध आ गया व्यर्थ ही भोजन को विलम्ब हो रहा था। पेट की जठराग्नि भी उधर को हीनम की रास मोड़ रही थी। झुझलाहट में दोनों बोल पड़े “तू बड़ा असभ्य मालूम होता हो। समय कुसमय कुछ नहीं देखते।
उपासना करते हैं तो ठीक यह आपकी मर्जी है, पर यह न तो कोई मंत्र जप है, न भजन है यह मात्र धूर्तगीरी है। पूजा के नाम पर यदि आप ऐसी बदमाशी करते हैं तो आपकी मर्जी पर इससे कुछ होने वाला नहीं है। पहले आप समर्पण करना सीखिये, यह मोटी-मोटी बातें थी, जो हमने किसी तरह से आपसे कह दिया।
उपासना करते-करते उसकी गति योगियों सी हो चली। मो के लिए अक्षर न को साधना की कसौटी पर कस-कस कर और भगवती प्रकृति के व्यवहार को देख-देखकर उसने न का अद्वितीय भण्डार अर्जित कर लिया। इतरा के पुत्र का यश संसार में चन्द्रमा की कला के समान विकसित होने लगा।
उपासना में यह प्रयोजन तन्मयता से पूरा होता है। तन्मयता का अर्थ है-इष्ट के साथ
भाव-सम्वेदनाओं को केन्द्रीभूत कर देना। यह स्थिति तभी आ सकती है जब इष्ट के प्रति असीम श्रद्धा हो। श्रद्धा तब उत्पन्न होती है जब किसी की गरिमा पर परिपूर्ण विश्वास हो। साधक को अपनी मनोभूमि ऐसी बनानी चाहिए जिसमें गायत्री महाशक्ति की चरम उत्कृष्टता पर, असीम शक्ति सामर्थ्य पर, संपर्क में आने वाले के उत्कर्ष होने पर, गहरा विश्वास जमता चला जाय।
उपासना भी सामूहिक हों तो उसमें हानि नहीं लाभ ही है। मसजिदों में नमाज, गिरजा घरों में प्रेयर, मंदिरों में आरती सामूहिक रूप से ही करने का रिवाज हैं इसमें न तो एकांत की कमी अखरती है और न एकाग्रता में कोई बाधा पड़ी है। एक दिशाधारा का चिन्तन हो रहा हो तो अनेक व्यक्तियों का समुदाय भी एक साथ मिल बैठकर एकाग्रता का अभ्यास भली प्रकार कर सकता है। नितान्त एकान्त में बैठना वैज्ञानिक, तात्त्विक शोध अन्वेषण के लिए आवश्यक हो सकता है, उपासना के सामान्य संदर्भ में एकान्त ढूँढ़ते फिरने की ही कोई खास आवश्यकता नहीं है। सामूहिकता के वातावरण में ध्यान धारणा और भी अच्छी तरह बन पड़ती है।
उपासना के समय यदि मन साँसारिक प्रयोग आत्मिक क्षेत्र की परिधि में परिभ्रमण करता रहे तो समझना चाहिए कि एकाग्रता का उद्देश्य ठीक तरह पूरा हो रहा है। विज्ञान के शोध कार्यों में-साहित्य के सृजन प्रयोजनों में वैज्ञानिक या लेखक का चिन्तन अपनी निर्धारित दिशा धारा में ही सीमित रहता है। इतने भर में एकाग्रता का प्रयोजन पूरा हो जाता है। यद्यपि इस प्रकार के बौद्धिक पुरुषार्थों में मन और बुद्धि को असाधारण रूप में गतिशील रहना पड़ता है। और कल्पनाओं को अत्यधिक सक्रिय करना पड़ता है तो भी उसे चंचलता नहीं कहा जाता है।
उपासना का मर्म सच्चा स्वरूप अब उनकी समझ में आ गया था।
उपासना प्रारम्भ कर मेरा आशीर्वाद तेरे साथ है भगवान सब मंगल करेंगे। बालक वहां से चल पड़ा भगवती प्रकृति का अध्ययन और आत्मदेव की उपासना करते-करते उसकी गति योगियों सी हो चली। मो के लिए अक्षर न को साधना की कसौटी पर कस-कस कर और भगवती प्रकृति के व्यवहार को देख-देखकर उसने न का अद्वितीय भण्डार अर्जित कर लिया। इतरा के पुत्र का यश संसार में चन्द्रमा की कला के समान विकसित होने लगा।
उपासना के समय सारा चिन्तन आत्मा का स्वरूप, क्षेत्र, लक्ष्य समझाने में लगना चाहिए और यह प्रयास रहना चाहिए कि ब्राह्मी चेतना के गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर आत्मा की बहुमूल्य रत्नराशि संग्रह करने का अवसर मिले। उपासना का लक्ष्य स्थिर हो जाने पर उस समय जो विचार प्रवाह अपनाया जाना आवश्यक है उसे पकड़ सकना कुछ कठिन न रह जाएगा।
उपासना कृत्य में मनोयोग पर लगाया जाना नितान्त आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-July
उपासना के द्वारा पुरुष और स्त्री शरीरों में ऐसी शक्तियों का आवाहन, धारण और प्रजनन आज भी संभव है।
उपासनायें करते थे। वे कहाँ रहते थे बुद्ध के पास? नहीं बुद्ध के पास नहीं रहते थे। कुछ कहीं तो कुछ कही। बुद्ध की परम्परा को भी हमने कायम रखा है।
उपासना करें तो किस तरीके से नागपुर के संतरे, बम्बई के केले फलदायक होते है, ठीक उसी तरीके फलदायक आप अपने को पायेंगे यह शान्तिकुञ्ज तीर्थ हमने बनाया है तो समझना चाहिये कि यह आपके लिये बनाया है हिमालय बना होगा तो हमारे गुरु ने हमें यहाँ खींच कर के हिमालय बुलाया और हमको वहाँ पर रखा हम आपको खींच कर के यहाँ बुलाएँगे कि आप यहाँ शान्तिकुञ्ज में आया करे। यहाँ के आने जाने में जो आपका पैसा लगा है, जो कुछ भी चीजें लगी है वे सब सार्थक सिद्ध होंगे। निरर्थक सिद्ध नहीं होगी। आप शान्तिकुञ्ज आकर करके यह ख्याल नहीं करेंगे कि हम निरर्थक आये है और हमने बेकार में समय और पैसा गँवाया। बस और तो कुछ कहना नहीं आज की बात समाप्त।
उपासना करते हैं, तब मैं आपकी किया करता हूँ। घाट का पत्थर गदगद हो उठा और दुगुने उत्साह से लोगों का मैल धोने लगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-December
उपासना में इन्हीं सब प्रयोजनों को पूरा करना पड़ता है। यह चारों ही परतें छेड़नी होती है। भगवान की समीपता अनुभव कराने वाली प्रतीक पूजा ‘रिटेन्शन’ है। ईश्वर के साथ आत्मा के अति प्राचीन सम्बन्धों को भूल जाने के कारण ही जीवन में भटकाव होता है। पतंग उड़ाने वाले के हाथ से डोरी छूट जाती है तभी वह इधर-उधर छितराती फिरती है।
उपासना से लेकर आस्तिकता संवर्धन के अनेकानेक प्रयोगों यथा मंत्रलेखन, नियमित स्वाध्याय, परिवार गोष्ठी एवं युगसंधि महापुरश्चरण की द्वितीय चरण में भागीदारी से सम्बन्धित हैं यह सभी के लिए अनिवार्यतः अपनाने योग्य है। इस प्रक्रिया को जितने घरों तक पहुँचा जा सके, घर मन्दिर, संस्कार मन्दिर, ज्ञान मन्दिर राष्ट्र सेवा मन्दिर स्थापना क्रम द्वारा फैलाया जा सके उतना ही पुण्य व श्रेय के अधिकारी हम बनेंगे।
उपासना और सोऽहम् साधना को अजपा गायत्री भी कहते हैं। प्राण निरन्तर उसका बीज रूप में जप करता रहता है। अस्तु उसके लिए भी मेरुदण्ड को सीधा रख कर ही एवं पालथी मार कर ही बैठना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-September
उपासना स्थूल शरीर से सम्बन्धित है। साधना चिन्तन से सूक्ष्म शरीर से और आराधना के कारण शरीर अन्तःकरण से सम्बन्धित है।
उपासनागृहों -देवालयों, तीर्थों तथा रोटरी लायन्स क्लब भारत विकास परिषद जैसे समाजसेवी संगठनों से संपर्क, अपने परिजनों को अभी से आरंभ करना होगा। इसमें हमें जन-जन तक पहुँचने, सबसे सद्भाव स्थापित करने का मौका मिलेगा, साथ ही महापूर्णाहुति का एक पूर्वाभ्यास भी संपन्न हो जाएगा, जिसमें संभवतः इन सभी संगठनों की हम पुनः भागीदारी करा सकेंगे।
उपासना अर्थात् गंगा, साधना अर्थात् यमुना, सरस्वती अर्थात् आराधना। यही है वह समन्वय का महातीर्थ जिसका अवगाहन करने से आध्यात्मिक कायाकल्प होता है और कौआ, कोयल तथा बगुला हंस बन जाता है। रामायण के प्रतिपादनानुसार मात्र स्थान विशेष में जाकर पानी में डुबकी लगाने भर से वह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता।
उपासनाएँ ऐसी ही घटिया वेश्यावृत्ति जैसी है जिसमें अपने स्वार्थों की मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये छुट पुट कर्मकाण्ड किये जाते है। और उनमें व्यवधान पड़ने पर पूजा पाठ छोड़ बैठने से लेकर खीजने और गालियाँ देते तक का सिलसिला चल पड़ता हैं ऐसी कामनाओं से भरी हुयी पूजा-पत्री एक प्रकार से उपासना का उपहास है।
उपासना साधना और आराधना के समन्वय को तीर्थराज प्रयाग का त्रिवेणी-संगम कहा गया है। उपासना अर्थात् गंगा, साधना अर्थात् यमुना, सरस्वती अर्थात् आराधना। यही है वह समन्वय का महातीर्थ जिसका अवगाहन करने से आध्यात्मिक कायाकल्प होता है और कौआ, कोयल तथा बगुला हंस बन जाता है। रामायण के प्रतिपादनानुसार मात्र स्थान विशेष में जाकर पानी में डुबकी लगाने भर से वह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता।
उपासना प्रयोजन के लिये पूछताछ करने, मार्गदर्शन लेने आये उन सबको यह बताना पड़ा कि मात्र जप संख्या पूरी करने से बात नहीं बनेगी। ऐसे तो कर्मकाण्ड की पूर्ति असंख्यों करते रहते और उसका अभ्यास पड़ जाने से ढर्रा भी स्वभाव का अंग बन जाता है। और कृत्य यथाक्रम चलता रहता है पर वह लाभ हस्तगत नहीं होता जिसकी आशा की गई थी।
उपासना कहते है ओर उसके लाभ भी प्रत्यक्ष मिलते है।
उपासना सार्थक होगी, यह तभी सम्भव है जब उपासक का स्वयं का स्तर ऊँचा हो और उपास्य के सम्बन्ध में वास्तविक बोध बना रहे, किसी प्रकार की भ्रान्ति न हो।
उपासना के कर्मकाण्ड इसी कारण बाह्योपचार मात्र बनकर रह गए हैं। समयक्षेप तो इसमें होना ही था, असन्तोष एवं ग्लानि और साथ लग जाती है। देवात्मा बनना तभी सम्भव है, जब परमात्मा के समकक्ष विशेषताएँ उत्पन्न करने योग्य पात्रता विकसित कर ली गयी हो। भावना विचारणा और क्रिया प्रक्रिया में जितना अधिक उत्कृष्टता आदर्शवादिता का समावेश हो सकेगा, उपासना उतनी ही सफल होगी। यही है श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा का तत्त्वदर्शन।
उपासना के तत्त्वज्ञान में अपनी कामनाओं की भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं की तिलाञ्जलि देनी पड़ती है। और ईश्वर की इच्छाओं को ही अपनी इच्छा बनानी पड़ती है। भगवान मनुष्य से दो ही अपेक्षा करते है एक आत्मशोधन, दूसरा लोकमंगल। जो इन दो कामों को जितनी मात्रा में जितनी तन्मयता और तत्परता से करते है समझना चाहिये कि वे ईश्वर की इच्छा के अनुरूप अपने को ढाल रहे हैं। ऐसे भक्त जन ही भगवत् स्वरूप हो जाते हैं और वे नर में नारायण प्रकट कर सकने की समर्थता से सम्पन्न हो जाते हैं।
उपासना यदि भक्तियोग है तो साधना ज्ञानयोग एवं आराधना-कर्मयोग है। कारण, सूक्ष्म, स्थूल शरीर के रूप में इनके कार्यक्षेत्र हैं। आत्म सत्ता को महानता के पथ पर पहुँचाने के लिए इन्हीं त्रिविधि सोपानों को अपनाना पड़ता है।
उपासना को सार्थक बनाती है।” वस्तुतः का भाव नियोजित किए बिना सारे पूजा उपचार के क्रम अधूरे, खोखले हैं।
उपासना से ईश्वरीय गुणों को जीवन में उतारने का अभ्यास किया जाता है, साधना से मन को दुष्प्रवृत्तियों से जूझने योग्य सशक्त बनाया जाता है एवं आराधना द्वारा अपने क्रिया-कलापों को सोद्देश्य बनाकर ईश्वरी उद्यान को और भी सुन्दर-सुव्यवस्थित बनाने आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना का विकास किया जाता है। सतत् हर क्षण इनका अभ्यास जीवन में अनिवार्य है।
उपासना उतनी ही सफल होगी। यही है श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा का तत्त्वदर्शन।
उपासना की प्रक्रिया को पूरा करते समय में ये दो आधार बहुत आवश्यक हैं कौन-कौन से? आपको दस स्नान करने चाहिए। इसका क्या मतलब है? हमारे पास इन्द्रियाँ हैं-दस और प्रत्येक इन्द्रिय अपने-अपने ढंग से मलीनतायें पैदा करती हैं। जिससे हमारा स्वरूप, हमारे जीवन की श्रेष्ठता और शालीनता मलीन होती चली जाती है।
उपासना अर्थात् आत्मा को परमात्मा से जोड़ देना। भाव संस्थान जो मान्यताओं, आकांक्षाओं से लिपटा होता है-वही अपनी आत्मा ही तो है। परमात्मा तत्व उत्कृष्ट आदर्शवादिता का ही दूसरा नाम है। अपने ढर्रे में चली आ रही, लोभ-मोह के बँधनों में जकड़ी आत्मा को परिष्कृत, शोधित कर उसे उत्कृष्टता की ओर मोड़ देना ही सच्ची उपासना है। उपासना से तात्पर्य है जिसके समीप बैठे हैं, तद्रूप हो जाना।
उपासना से तात्पर्य है जिसके समीप बैठे हैं, तद्रूप हो जाना। यह समर्पण घनिष्ठता जितनी निश्छल सार्थक उच्चस्तरीय होगी, उतनी ही उपासना सार्थक होगी, यह तभी सम्भव है जब उपासक का स्वयं का स्तर ऊँचा हो और उपास्य के सम्बन्ध में वास्तविक बोध बना रहे, किसी प्रकार की भ्रान्ति न हो।
उपासनागृहों में एक साथ संपन्न इस दीपयज्ञ के माध्यम से महापूर्णाहुति वर्ष में किए जानेवाले संकल्पों की, राष्ट्रनिर्माण की प्रतिज्ञाओं की घोषणा की जाएगी। हर परिजन अपनी भूमिका-भागीदारी का स्वरूप एवं अपने प्रभाव क्षेत्र का तब तक अध्ययन कर चुका होगा। ये सभी घोषणाएँ इस वेला में होंगी।
उपासना की दृष्टि से विभिन्न विश्वासों मतों, पथों व संप्रदायों के विचारशील व्यक्तियों तथा उस वर्ग के प्रमुखों से संपर्क करके सार्वजनिक स्थानों पर यह सामूहिक प्रार्थना एवं ध्यान प्रयोग अलग से भी सम्पन्न किये कराये जायें।
उपासना का तत्व दर्शन समझने के उपरान्त शेष इतना ही रह जाता है कि प्रारम्भिक प्रयासों में उसे भावनात्मक व्यायामों की तरह प्रयुक्त कर धीरे-धीरे आगे बढ़ा जाय। कर्मकाण्ड यदि कायकलेवर है तो तादात्म्य वाला पक्ष उसका प्राण है। एक प्रत्यक्ष है, दूसरा परोक्ष। जप, ध्यान, प्राणायाम का क्रिया पक्ष महत्त्वहीन है, यदि भाव-पक्ष को प्रधानता नहीं दी गयी है। पौरुष हीन के हाथ में तलवार सौंप दी जाय तो पराक्रम के बिना वह मात्र लोहे का एक टुकड़ा भर सिद्ध होती है।
उपासना में आत्मा को परमात्मा के साथ एकाकार करने का अभ्यास करना होता है। भावना बनानी पड़ती है कि आत्मा को परमात्मा के प्रति समर्पित किया गया और उसी के आदेशानुसार चलन के लिये सच्चे मन से सहमत हुआ गया।
उपासना को सार्थक बनाती है, कर्मकाण्ड के क्रिया−कलाप नहीं।
उपासना, साधना और आराधना का समन्वय करना चाहिये। स्मरण रहे, त्रिपदा गायत्री के तीन चरणों में इन तीनों विशिष्टताओं को मनोभूमि में ओत प्रोत कर लेने की आवश्यकता है।
उपासना, साधना व आराधना के इन तीन उपायों से ही ईश्वर जीवसत्ता में प्रवेश करता है तथा मनुष्य को देवोपम चिन्तन चरित्र विनिर्मित करने की प्रेरणा देता है। साहसी मनस्वी इस पथ पर चलकर असीम सामर्थ्य प्राप्त करते हैं, स्वयं को ऊँचा उठाते हैं और दैवी अनुकम्पा उन पर सतत् बरसती रहती है। योगाभ्यास एक पराक्रम है, अपनी अन्तः की दुष्प्रवृत्तियों, से संघर्ष है। जो इस देवासुर संग्राम में जितना अधिक सफल होता है वह बहिरंग जगत में सुसंस्कृत एवं अन्तरंग की दृष्टि से महान बनता चला जाता है।
उपासना का उपहास है।
उपासना, साधना और आराधना। यदि विधान के साथ तत्त्वज्ञान का सम्मिश्रण रखा गया। तो उसका समुचित लाभ प्राप्त होगा। अपने अनुभव की साक्षी देकर जब यह प्रतिपादन समझाया तो सम्पर्क में आने वालों में अधिकाँश ने उस मार्ग पर चलना अंगीकार किया। यही कारण है जहाँ मात्र पूजा पाठ करने वाले सर्वथा खाली हाथ रहते और प्रपंच रचते देखे गये है वहाँ हमारे द्वारा प्रशिक्षित गायत्री साधकों में से अधिकाँश ने अपने व्यक्तित्व का कायाकल्प किया और लोकसेवा के क्षेत्र में बढ़ चढ़ कर भूमिका निबाही।
उपासना है। उपासना से तात्पर्य है जिसके समीप बैठे हैं, तद्रूप हो जाना। यह समर्पण घनिष्ठता जितनी निश्छल सार्थक उच्चस्तरीय होगी, उतनी ही उपासना सार्थक होगी, यह तभी सम्भव है जब उपासक का स्वयं का स्तर ऊँचा हो और उपास्य के सम्बन्ध में वास्तविक बोध बना रहे, किसी प्रकार की भ्रान्ति न हो।
उपासना सम्पन्न कर ली। दिन में अपने प्रति कठोरता और दूसरों के प्रति उदारता का व्यवहार करते रहे। आत्मशोधन ओर लोकमंगल की साधना का यही सुनिश्चित स्वरूप चलता रहा।
उपासना में परब्रह्म को नहीं, भगवान को साकार या निराकार रूप में स्मरण किया जाता है। यह भगवान कोई व्यक्ति नहीं, सद्भावना-सद्विचारणा सत्प्रवृत्तियों का समुदाय है जिसकी समस्त विशेषताओं का स्मरण कर उन्हें आत्मसात् करने का प्रयास किया जाता है।
उपासना साधना के अतिरिक्त तीसरा चरण आराधना का कार्यान्वित करना होता है। आराधना का अर्थ है। लोकमंगल की पुण्य-परमार्थ की सेवा साधना। सेवा धर्म का परिपालन भी ईश्वर भक्ति का ही एक चरण है।
उपासना में अन्तः करण को- भावनाओं को उच्चस्तरीय उद्देश्यों के अनुरूप गतिशील बनाना पड़ता है। साधना व आराधना भी इसी के साथ स्मरण किये जाने वाले कृत्य हैं जिनमें क्रमशः विचारणा व गतिविधियों को उत्कृष्टता के साथ जोड़ा जाता है। उपासना यदि भक्तियोग है तो साधना ज्ञानयोग एवं आराधना-कर्मयोग है। कारण, सूक्ष्म, स्थूल शरीर के रूप में इनके कार्यक्षेत्र हैं। आत्म सत्ता को महानता के पथ पर पहुँचाने के लिए इन्हीं त्रिविधि सोपानों को अपनाना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-February
उपासना है। सो बाकी दिनों अब अपनों से अपनी बातें ही नहीं कहेंगे, अपनी सारी ममता भी उन पर उड़ेलते रहेंगे। शायद इससे हमारे बच्चों को यत्किंचित् सुखद अनुभूति मिले। प्रतिफल और प्रतिदान की आशा किए बिना हमारा भावना प्रवाह तो अविरल जारी रहेगा। अपने बच्चों को भरपूर स्नेह-यही इन बीते दिनों का हमारा उपहार है।
उपासना करती हूँ-जब भी गाती हूँ वे साक्षात उपस्थित हो जाते हैं-मुस्कुराते हैं-प्रसन्न होते हैं उतनी देर उनकी स्थूल उपस्थिति का लाभ मिल जाता है जिसके आधार पर उनके विछोह में परेशान नहीं होती इस शरीर को उनके बिना टिकाये रखने का आधार मिलता है। यही मेरी उपासना है, भक्ति है, जो संगीत के माध्यम से संपन्न होती है।’
उपासना का क्रम और कुछ नहीं प्राचीन का नवीनीकरण था। नारी शक्ति को महाशक्ति बनाने का उपक्रम था। गायत्री साधना से आत्मबल प्राप्त करके महिलाएँ समाज में अपना बहुमुखी विकास कर सकें। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर शाँतिकुँज की स्थापना हुई। इस भाव पूर्ण प्रयास को गुरुदेव के शब्दों में कहें तो-’शांतिकुंज की स्थापना का मूल प्रयोजन माताजी के मार्गदर्शन में महिला जागरण अभियान का आरंभ करके उसे नारी के समग्र उत्कर्ष को अनेकानेक गतिविधियों को विश्वव्यापी बनाना है।
उपासना का मंत्र है। विभिन्न संप्रदायों में इसकी उपासना की अनेक-पद्धतियाँ-विधियाँ देखने को मिलती हैं। परंतु गुरुदेव-माताजी को तो वह उपासना विधि प्रचलित करनी थी जिसे मातृ शक्ति के प्रति जन भक्ति जाग्रत हो। इसी को लक्ष्य करके गायत्री माता की साधना का प्रचार हुआ। ऋषि युग्म के तप प्रभाव से गायत्री शक्ति युग शक्ति बनकर अवतरित हुई।
उपासना विधि प्रचलित करनी थी जिसे मातृ शक्ति के प्रति जन भक्ति जाग्रत हो। इसी को लक्ष्य करके गायत्री माता की साधना का प्रचार हुआ। ऋषि युग्म के तप प्रभाव से गायत्री शक्ति युग शक्ति बनकर अवतरित हुई। इस काम में संकट कम नहीं आए पंडे, पुजारियों, धर्माचार्यों ने कम विरोध नहीं किया। विरोध का यह क्रम अपमान-तिरस्कार तक ही सीमित नहीं रहा।
उपासना है, भक्ति है, जो संगीत के माध्यम से संपन्न होती है।’
उपासना की अनेक-पद्धतियाँ-विधियाँ देखने को मिलती हैं। परंतु गुरुदेव-माताजी को तो वह उपासना विधि प्रचलित करनी थी जिसे मातृ शक्ति के प्रति जन भक्ति जाग्रत हो। इसी को लक्ष्य करके गायत्री माता की साधना का प्रचार हुआ। ऋषि युग्म के तप प्रभाव से गायत्री शक्ति युग शक्ति बनकर अवतरित हुई। इस काम में संकट कम नहीं आए पंडे, पुजारियों, धर्माचार्यों ने कम विरोध नहीं किया।
उपासना का मौलिक रहस्य इसी तत्वज्ञान में छिपा है कि हम उन्हें एक दूसरे का पूरक मानें तथा ‘सा च ब्रह्म स्वरूपा च नित्या सा च सनातनी’ के मर्म को समझते हुए अपनी श्रद्धा अपना हृदय से समर्पण उसके प्रति अभिव्यक्त कर उससे एक ही प्रार्थना करें कि माँ! विद्या की ओर सद्बुद्धि की ओर ले चल। हमारी तेरे प्रति सच्ची श्रद्धाँजलि यही हो कि हम अधिकाधिक को तेरे सच्चे स्वरूप का भान कराकर सुपथ पर चलने को प्रेरित करें। इसी भावना के साथ यह अंक मात्र मातृसत्ता के युगल चरणों में समर्पित है।
उपासना का महत्व दिया, समाज सेवा को दिया उससे कम मुझे नहीं दिया मैं ऐसा समझती हूँ अपने मन में, मेरा मान और सम्मान किया, इतना कि मैं योग्य नहीं हूँ जितना कि उनके हृदय में मेरा सम्मान है। हाँ अपार सम्मान है दुःख का दर्द का इतना ध्यान रखते हैं कि शायद ही कोई खुशनसीब उन महिलाओं को भी जिनका पति ख्याल रखता होगा। मेरा तो पति नहीं, परमेश्वर ही है, परमेश्वर ही है, यही कहूँगी। हाँ तो मैं नहीं मानी, मैं चली गई, जाकर के ठहर गई जब कि मुझे मालूम नहीं था कि कहाँ हैं पर ढूँढ़ा व पहुँच गयी। मैं जाकर के जब ठहरी तो देखा कि कुछ पत्तियाँ उबली हुई रक्खी हैं।
उपासना किसी न किसी रूप में प्रचलित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-August
उपासना करेंगे-प्रज्ञा की-महाप्रज्ञा की-आदि -शक्ति की जिससे इस समय का जो आस्था संकट है और जिसने सारे के सारे इस विश्व को अस्त्र -व्यस्त कर रखा है, उसका निवारण किया जा सकना संभव हो सके। कैसे करना चाहिये? क्या करना पड़ेगा इसके लिए इसका नाम प्रज्ञा-योग रखा है हमने क्योंकि इसमें कई चीजें शुमार है। इसलिए प्रज्ञा-योग योग की साधना, हम सब लोगों को करनी चाहिये। प्रज्ञा-योग क्या है?
उपासना करने के पीछे, यह भावना करनी चाहिये। क्या करना चाहिये? पूजा उपासना के बाद में आप जल चढ़ायें और साथ-साथ में यह भावना करें कि भगवान को अर्थात् भगवान के संसार को, हम अपने सुखों को बाँटेंगे और संसार में अर्थात् भगवान का विराट रूप है, विराट विश्व है, इसमें जो दुख फैले हुये है, उनको घटाने के लिए हम कोशिश करेंगे। सूर्य अर्घ्य देते समय यही भावनाएँ होनी चाहिए। हमारे पास जो भावनाएँ होनी चाहिए।
उपासना करने लग गया। काफी दिनों तक उपासना करने के बाद भगवती लक्ष्मी प्रसन्न हुई और वर माँगने को कहने लगी। धन सम्पत्ति की आकांक्षा करने पर वह बोली-वत्स! घर जा कुछ काम कर उद्यम उद्योग जुटा, तो मैं। स्वतः मेरे पास आ जाऊँगी। किन्तु भोग वृत्ति में आसक्त अनुराग के पास इतना समय कहाँ था।
उपासना द्वारा ही इन छहों चक्रों पर अधिकार है। इस कुण्डलिनी को गायत्री का ही स्वरूप माना गया है। मनुष्य के अन्तः जगत को प्रकाशवान् बनाने वाले दस प्राण अवस्थित है। तथा जिनके कारण जिन सूक्ष्म दस महाविद्याओं का ज्ञान होता है वह सभी विज्ञान भी गायत्री पर निर्भर है।
उपासना की शुरुआत हुई और यदि आपका मन गन्दा है, आपका शरीर भी गन्दा है, आपकी कमाई भी गन्दी है, आपके विचार भी गन्दे है तो आप समझिये कि आप जो पूजा कर रहे है उसका परिणाम नहीं मिलेगा। इसलिए शुद्धता पहला काम है। शुद्धता के लिए कुछ विधियाँ बताई गयी है। कौन-कौन सी विधियाँ है? पवित्रीकरण है, आचमन है, प्राणायाम है, न्यास है।
उपासना के माध्यम से सम्पन्न किये जा सकते है यह कहा गया है कि ‘6 गायत्री द्वारा योग साधना के पिपीलिका मार्ग दादरा मार्ग, विहंगम मार्ग यह तीन मार्ग है। इन पर चलने से परा पश्यन्ती, मध्यमा वैखरी चारों वाणियाँ प्रस्फुटित होती है। अविद्या होती है। अविद्या अस्मिता राम, द्वेग अभिनिवेश यह पाँचों क्लेश दूर होते है। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय यह चारों अवस्थायें परिमार्जित होती है।
उपासना में इसी का समावेश करे।
उपासना, साधना, संयम, सेवा, सदाचार का पालन करता हुआ अपने भौतिक कर्तव्य पूरे करें। इस प्रकार आध्यात्मिक जीवन द्वारा अपनी आत्मशक्ति संवर्धित करता हुआ अन्ततः उस भूमिका में पहुँचें, जहाँ समस्त लौकिक बन्धन ढीले पड़ जाते है। इस विज्ञता का ही परिणाम है कि भारतीय जीवन शैली आज भी अपने ही ढंग की है। उसमें पाश्चात्य ढंग के विचारों के लिए कोई स्थान नहीं।
उपासना के बाद में आप जल चढ़ायें और साथ-साथ में यह भावना करें कि भगवान को अर्थात् भगवान के संसार को, हम अपने सुखों को बाँटेंगे और संसार में अर्थात् भगवान का विराट रूप है, विराट विश्व है, इसमें जो दुख फैले हुये है, उनको घटाने के लिए हम कोशिश करेंगे। सूर्य अर्घ्य देते समय यही भावनाएँ होनी चाहिए। हमारे पास जो भावनाएँ होनी चाहिए। हमारे पास जो सम्पदा है, वह जल के रूप में भगवान के चरणों पर गिरे और वह फैल जाये। यह भावना सूर्य अर्घ्य की है।
उपासना से खुल जाते है उसे गायत्री कहते है।
उपासना समर्पण योग (4) साधना पद्धतियों का ज्ञान एवं विज्ञान (5) गायत्री महाविद्या का तत्त्वदर्शन (6) गायत्री साधना का गुह्य विवेचन (7) गायत्री साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार (8) गायत्री की दैनिक एवं विशिष्ट अनुष्ठान परक साधना (9) गायत्री की पंचकोशी साधना व उपलब्धियाँ (10) गायत्री साधना की वैधानिक पृष्ठभूमि (11) सावित्री, कुण्डलिनी एवं तंत्र (12) मरणोत्तर जीवन तथ्य एवं सत्य (13) विलक्षण अद्भुत यह मानव शरीर (14) चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवी मस्तिष्क (15) शब्दब्रह्म-नादब्रह्म (16) व्यक्तित्व विकास का मनोविज्ञान (17) अपरिमित संभावनाएँ का आगार मानवी व्यक्तित्व (18) चेतन, अचेतन व सुपरचेतन मन (19) विज्ञान और अध्यात्म, परस्पर पूरक (20) भविष्य का धर्मः वैज्ञानिक धर्म (21) यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान (22) यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया (23) युगपरिवर्तन कैसे व कब? (24) सतयुग की वापसी (25) सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण (26) मर्यादा पुरुषोत्तम राम (27) संस्कृति संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता (28) रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाएँ (29) षोडश संस्कार विवेचन (30) भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व (31) अमृतवाणी-1 (32) अमृतवाणी -2 (33) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (34) धर्म तत्व का दर्शन व मर्म (35) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (36) निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र (37) जीवेम शरदः शतम् (38) इक्कीसवीं सदी नारी सदी (39) समाज का मेरुदण्ड ‘सशक्त परिवार तंत्र (40) अमर हो गए मरकर भी जो। (41) हमारी संस्कृति-इतिहास के कीर्ति स्तम्भ (42) महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग (43) विचार सार एवं शक्तियाँ भाग 1 (44) विचार-सार एवं शक्तियाँ भाग-2(45) शिक्षा एवं विद्या। ये सभी इन दिनों प्रेस छपाई पर है तथा शेष 15 भी इस माह के अंत तक प्रेस में पहुँच जाएँगे। निश्चित ही यह संग्रह जो युग व्यास की लेखनी से निस्सृत चिंतन चेतना का है, हर किसी के लिए प्राणों से भी बढ़कर निधि हैं।
उपासना करने के बाद भगवती लक्ष्मी प्रसन्न हुई और वर माँगने को कहने लगी। धन सम्पत्ति की आकांक्षा करने पर वह बोली-वत्स! घर जा कुछ काम कर उद्यम उद्योग जुटा, तो मैं। स्वतः मेरे पास आ जाऊँगी। किन्तु भोग वृत्ति में आसक्त अनुराग के पास इतना समय कहाँ था। वह लक्ष्मी जी से हठ करता रहा।
उपासना करो तो उनसे तुम्हें अवश्य ही धन प्राप्त हो सकता है।
उपासना में निरत हो सच्चिन्तन करते दिखाई देते है। यही गायत्री महाशक्ति निराकार रूप में लोगों के चिंतन को मनःस्थिति को परिष्कृत कर उन्हें आमूलचूल बदलने के लिए धरती पर अवतरित हुई है व ज्ञान गंगा को इस तरह लाने का भागीरथी पुरुषार्थ करने का श्रेय जाता है उस सत्ता को जिसने आँवलखेड़ा गाँव में जन्म लेकर लघु से विराट बन एक विश्वव्यापी गायत्री परिवार की स्थापना कर डाली, लाखों सद्गृहस्थ पैदा कर दिए व संस्कारों के बीजारोपण की प्रक्रिया आरम्भ करवा दी।
उपासना की आवश्यकता होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-October
उपासना साधना का फल नहीं, वरन् उसके पीछे दिया अनुदान ही काम करता रहा। अब हमें भी यह चिन्ता लगने लगी है कि इस जीवन का अन्त करते हुए वे प्रतिभायें कहाँ से पायें, जो हमारी अपेक्षा हजारों गुना काम जो करने के लिए पड़ा है, उसे सम्पन्न कर सकें और हमारी ही तरह दैवी अनुग्रह का अनुदान पाकर अपने को धन्य कर सकें।
उपासना व्यक्ति एवं वातावरण को परिष्कृत करने में जितनी उपयोगी सिद्ध होती हैं उसकी तुलना में एक संकल्प सूत्र में आबद्ध होकर एक तत्त्वावधान में ही गई साधना का प्रभाव कहीं अधिक होता है। सामूहिक प्रयास,सत्संग, कथा, कीर्तन, यज्ञानुष्ठान, परिक्रमा, तीर्थ यात्रा आदि की क्षमता सामान्य गणना में कहीं अधिक होती है।
उपासना के विधि-विधानों तक ही सीमित न रहकर उसमें निहित दर्शन एवं प्रेरणाओं को भी हृदयंगम किया जाये और तद्नुरूप अपने व्यक्तित्व को ढाला जाय। पूरी श्रद्धा के साथ मंत्र का अवलम्बन किया जा सके तो आज भी वह पुरातन काल की ही तरह चमत्कारी सामर्थ्यशाली सिद्ध हो सकता है।
उपासना पक्ष देवताओं की अलंकारिक प्रतिमा भी बना लेता है और निराकार पक्ष प्रकाश किरणों के रूप में उसको पकड़ता है। सूर्य की सात रंग की किरणों में से हम जिसे चाहें उसे रंगीन शीशे के माध्यम से उपलब्ध कर सकते हैं। एक्सरे मशीन अल्ट्रा वायलेट उपकरण आकाश में से अपनी अभीष्ट किरणों को ही प्रयुक्त करते हैं। हंस दूध पीता है पानी छोड़ देता है। इसी प्रकार किस मंत्र के लिए ब्रह्म चेतना की किस दिव्य तरंग का प्रयोग किया जाये इसके लिए विधान निर्धारित है।
उपासना और ध्यान से साधक उसी मात्रा में प्रत्यावर्तित प्राण और आत्मबल सम्पन्न होता चलता है। गायत्री उपासना में जप के साथ सविता देवता के ध्यान के पीछे यही महाविज्ञान काम करता है। जिसे न जानने वाला भी लाभान्वित होता है और जानने वाला तो लाभान्वित होता ही है।
उपासना में जप के साथ सविता देवता के ध्यान के पीछे यही महाविज्ञान काम करता है। जिसे न जानने वाला भी लाभान्वित होता है और जानने वाला तो लाभान्वित होता ही है।
उपासना का अर्थ मात्र देवालय बना देना नहीं है। वैसा जीवन भी जीना होता है, तभी वह सफल है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-June
उपासना एवं साधना का क्रम भी शामिल है। आज की बात समाप्त ॐ शान्ति।
उपासना तक के लिए अपने अन्नमय कोष की ऐसी ही सुसंस्कृत, सुयोग्य, सक्षम स्थिति में लाना आवश्यक होता है। उसके लिए उसकी मूल इकाइयों को विशेष रूप से गढ़ना-ढालना पड़ता है। इसे ही अन्नमय कोष का परिष्कार-विकास की साधना कहा जाता है।
उपासना करते हो? उन्होंने बताया “हाँ” हम तीनों ऊपर हाथ उठाकर कहते हैं, हम तीन हैं, तुम तीन हो। तुम तीनों हम तीनों की रक्षा करो।
उपासना के लिए तैयार करेंगे। नहीं गुरुजी, आप तो ऐसे ही अपनी ऋद्धि-सिद्धि हमें दे दीजिए ऐसे कैसे दे देंगे? तेरे पास उससे लड़ने का माद्दा है कि नहीं। हमारे गुरु ने चौबीस साल तक हमारा इम्तहान लिया। चौबीस साल तक जौ की रोटी और छाछ खाने का आदेश दिया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-March
उपासना पर प्रकाश डाल सकने वाले मुख व्यक्तियों से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे इसे युगधर्म आपर्द्धम समझकर न्यूनतम दो माह अधिकतम जितना संभव हो समय दे। उन्हें एक एक सप्ताह का प्रशिक्षण देकर इन कार्यक्रमों में भेजने की व्यवस्था की जा रही है। जिनकी भावनाएँ पूरी तरह मर चुकी है। उनसे तो कुछ कहना व्यर्थ है पर अपनी देवसंस्कृति के लिए जिनके मन में रत्ती भर भी अनुराग हो वे तत्काल शान्तिकुञ्ज पत्र लिखकर यथासंभव यहाँ पहुँचने की तैयारी करें। कम समय दे सकने वाले हो।
उपासना के माध्यम से उपार्जित प्राण सत्ता को परिपक्व किया जा सके।
उपासना की प्रारम्भिक कक्षा का बोध समझा जाना चाहिए।
उपासना कथा, वार्ता तीर्थ मंदिर, व्रत, अनुष्ठान जप-तप तथा नियम-संयम आदि की आध्यात्मिक क्रियाओं के आधार पर यदि बारीकी से नजर डाली जाय तो एक ही
निष्कर्ष पर पहुँचना कि इन मनोवैज्ञानिक क्रिया–कलापों का प्रयोग व्यक्ति की अंतरंग उत्कृष्टता का अभिवर्धन करना है। आस्तिकता का मतलब है, ईश्वर विश्वास। ईश्वर विश्वास का अर्थ है-एक ऐसी न्यायकारी सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करना जो सर्वव्यापी है और कर्मफल के अनुरूप हमें गिरने एवं उठने का अवसर प्रस्तुत करती है। यदि यह विश्वास कोई सच्चे मन से कर ले तो उसकी विवेक बुद्धि कुकर्म की दिशा में एक कदम भी न बढ़ने देगी। हम आग नहीं छूते, जहर नहीं खाते तो कोई कारण नहीं कि सर्वव्यापी कर्मफल के अनुरूप सुख-दुःख देने वाली ईश्वरीय विधि व्यवस्था तोड़ने और अनाचार अपनाने का दुस्साहस करें।
उपासना
उपासना भी श्रद्धा के आधार पर फलवती होती है। वाल्मीकि के बारे में कहा जाता है
कि वे राम नाम का शुद्ध उच्चारण न कर सकने पर उलटा नाम ‘मरा-मरा’ जपने लगे और उतने भ्रम से ब्रह्म समान हो गये। दक्षिण मार्गी साधनाओं में विधानों का कम और भावनाओं का अधिक महत्त्व है। गायत्री उपासना विधि में कोई भूल रह जाने पर भी किसी का अनर्थ नहीं हुआ। फिर भी भय हो तो किसी सिद्ध पुरुष को साधना का संरक्षण करते रहने के लिये उत्तरदायित्व सौंपा जा सकता है।
उपासना के विस्तार का क्रम अपनाएँ। भावनाओं व विचारणाओं के परिष्कार के क्रम में तत्परता से जुटे रहे।
उपासना जब आरोग्य प्रदान कर सकती है दीर्घजीवन देती है तब असामान्य युग संधि महापुरश्चरण साधना की फलश्रुति की तो कल्पना भी कठिन हैं। समूचे राष्ट्र की कुण्डलिनी का जागरण तो एक प्रकार से भव्यतम अभियान है जिसका सूत्रपात परम पूज्य गुरुदेव ने इस उसकी प्रथम पूर्णाहुति 4,5,6,7,नवम्बर 1995 में परम पूज्य गुरुदेव की पावन जन्मभूमि आँवलखेड़ा (आगरा) में सुनिश्चित की गई है विगत 1 नवम्बर को उसका कलश स्थापना समारोह संपन्न हुआ अब इस अनुक्रम को आगे बढ़ाने के लिए अनुष्ठान को षट्चक्रवेधन साधना में प्रवेश कराने के लिए परम पूज्य गुरुदेव एवं शक्तिस्वरूपा माता जी की कारण सत्ता मचल रही है। महाभारत जैसा यह पुरुषार्थ गायत्री परिवार के पाँडवों द्वारा ही संभव होगा।
उपासना का प्रशिक्षण सत्रों एवं यज्ञों का क्रम चल पड़ा।
उपासना का सारा आधार यही है। धार्मिकता का कलेवर कितना ही बड़ा क्यों न हो, बीज मूल की तरह तथ्य इतना ही है कि व्यक्ति अपनी महान् महत्ता को समझे उसी के अनुरूप सोच और गतिविधियाँ अपनाए। व्यक्ति और समाज की प्रगति एवं सुख शांति का आधार इतना ही है। उत्थान और पतन का सौभाग्य दुर्भाग्य इन्हीं तथ्यों पर पूर्णतया निर्भर है। सद्गुणी, सदाचारी, उदार और जनकल्याण की भावनाओं से ओत-प्रोत मनुष्य ही सच्चा मनुष्य है।
उपासना तो कर ही लिया करें।
उपासना करने के लिये रचा गया भ्रम जंजाल मात्र है। कदाचित दूसरा अर्थ सुयोग्य गुरु का वरण भी तो हो सकता है अन्यथा प्रतिबंध जैसी कोई बात नहीं है।
उपासना के लिए बैठे तो उनका ध्यान नीलाभ आकाश की निस्पन्दता में ऐसा खो गया, जैसे उनकी आत्मचेतना का कोई पृथक् अस्तित्व ही न रहा हो। करोड़ों सूर्य सम प्रभा वाले ग्रह नक्षत्रों के बीच उन्होंने दिव्य आभा वाले कुछ पुरुषों के दर्शन किए। श्यावाश्व ने आराध्य मरुद्गण को पहचाना और उनकी प्रार्थना ऋचा बन गयी।
उपासना का विधान इसलिए भी है कि जिस आदर्श को जीवन का अभिन्न अंग बनाये रखने का संकल्प किया गया और जिंदगी आदर्शहीन श्रीहीन होकर न रह जाय उस निमित्त भी लक्ष्मी की आराधना की जाती है, किंतु इन दिनों तो इस पूजा का अर्थ देवी की उपासना से मालामाल हो जाना लगाया जाता है। यही सबसे बड़ी विडंबना है यदि ऐसी बात रही होती, तो लक्ष्मीनारायण मंदिर के पुजारी अब तक विपुल वैभव के स्वामी बन गये हो तो पर वर्षों की पूजा के बाद भी उनके जीवन में ऐसा कुछ घटित होते कहाँ देखा जाता है? इससे स्पष्ट है कि लक्ष्मी अर्थ तंत्र के श्रेष्ठतम सदुपयोग और सुनियोजन की देवी है। गाँवों में कन्या को प्रायः लक्ष्मी कहा जाता है। यहाँ इसका भाव उसकी उपस्थिति से पिता के धनपति बनने जैसा नहीं वरन् इतना है कि वह अपने व्यवस्था कौशल से घर को एक सुखद-सुन्दर वातावरण प्रदान करती है।
उपासना विधि में कोई भूल रह जाने पर भी किसी का अनर्थ नहीं हुआ। फिर भी भय हो तो किसी सिद्ध पुरुष को साधना का संरक्षण करते रहने के लिये उत्तरदायित्व सौंपा जा सकता है।
उपासना का छोटा-सा सकता है कि महिलाएँ उपासना तो कर ही लिया करें।
उपासना मातृशक्ति के रूपों में नहीं। बच्चे के लिए ममतामयी माता से बढ़कर भला इस संसार में दूसरा और कौन हो सकता है? वे सच्चे भक्त की तुलना उस नन्हे शिशु से करते है जो अपने को माता की गोदी में समर्पित कर निर्द्वन्द्व निश्चिन्त हो जाता है और तब उसके लिए सारे संसार का ऐसा कौन-सा सुख और आराम है जो शेष रह जाता हो? आँधी हो वर्षा हो या तूफान भूकंप हो उसका बाल बाँका नहीं होता कारण सारे झंझावातों को माता स्वयं झेल जाती है। हमारा इष्ट अनंत ज्ञान, अनंत शक्ति एवं अनंत शांति का अक्षय भंडार है।
उपासना पर प्रवचन करे और विचार गोष्ठी करके वहाँ एक प्रज्ञा मंडल की स्थापना करके आगे बढ़ जाएँ।
उपासना करने पर मनुष्य के दोष-दुर्गुण अनायास ही घटने लगते है। जिस प्रकार गंगा में नहाने पर हर स्तर का प्राणी पवित्र ही होता है। उसमें घुसने से किसी को भी नहीं रोका जा सकता। गाय, भैंस, गधा, घोड़ा तक रुक नहीं सकते है। इसी प्रकार गायत्री मंत्र की साधना हर स्थिति का हर स्तर का, मनुष्य कर सकता है।
उपासना के लिए सघन संपर्क गायत्री साहित्य का पठन पाठन साप्ताहिक या मासिक गायत्री यज्ञों और उसी के साथ साथ संस्कारों का प्रचलन दोनों नवरात्रियों एवं प्रमुख पर्वों पर सामूहिक जप और सामूहिक यज्ञ तथा बन पड़े तो कुछ अन्य रचनात्मक न्यूनतम घरों में तुलसी की स्थापना जैसे कार्यक्रमों का विस्तार करना चाहिए।
उपासना करने वालों को शुद्धतापूर्वक रहना चाहिए यज्ञोपवीत पहनना चाहिए और मद्य माँस आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। नशा आदि न करना अच्छी बात है। जितनी शुद्धता रखी जा सके उतनी ही अच्छी है। पर इसका अर्थ यह नहीं है कि मलिनता की स्थिति में रहने वाले को औषधि ही नहीं देनी चाहिए। गायत्री मंत्र की यह विशेषता है कि इसकी उपासना करने पर मनुष्य के दोष-दुर्गुण अनायास ही घटने लगते है।
उपासना की भाँति यज्ञ भी कर सकती है। इसके लिए उनकी व्यस्तता और सुविधा का ध्यान रखते हुए यज्ञ समेत गायत्री उपासना का छोटा-सा सकता है कि महिलाएँ उपासना तो कर ही लिया करें।
उपासना से मालामाल हो जाना लगाया जाता है। यही सबसे बड़ी विडंबना है यदि ऐसी बात रही होती, तो लक्ष्मीनारायण मंदिर के पुजारी अब तक विपुल वैभव के स्वामी बन गये हो तो पर वर्षों की पूजा के बाद भी उनके जीवन में ऐसा कुछ घटित होते कहाँ देखा जाता है? इससे स्पष्ट है कि लक्ष्मी अर्थ तंत्र के श्रेष्ठतम सदुपयोग और सुनियोजन की देवी है। गाँवों में कन्या को प्रायः लक्ष्मी कहा जाता है। यहाँ इसका भाव उसकी उपस्थिति से पिता के धनपति बनने जैसा नहीं वरन् इतना है कि वह अपने व्यवस्था कौशल से घर को एक सुखद-सुन्दर वातावरण प्रदान करती है।
उपासना, आराधना करने वाला साधक दीर्घजीवी होता है तेजस्वी होता है सुंदर गृहस्थ साँसारिक साधनों का स्वामी यशस्वी संपन्न श्रीमतं एवं ब्रह्मबल संपन्न होकर जीवन जीता है और अंत में अपने जीवन लक्ष्य को ब्रह्मलोक को प्राप्त करता हैं। तुलनात्मक दृष्टि से यह दोनों ही उपलब्धियाँ एक ही बिंदु पर आ टिकती है स्पष्ट है गायत्री महाविद्या ही
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-May
उपासना की शक्ति भी कह सकते हैं, इसको साधना की शक्ति भी कह सकते हैं। बस, वहाँ से इशारा चला मेरा उसी क्रम से मेरे लिये वह भी उतना ही महत्वपूर्ण था कार्य कौन-सा जो कि 24 वर्षों की उपासना प्रारंभ की थी मेरे लिए वह श्रद्धा का विषय था। वह श्रद्धा ज्यों की त्यों बनी रही, बल्कि ज्यादा ही बढ़ी। बस, सहस्र कुण्ड यज्ञ हो गया।
उपासना उस स्तर की हो जैसा की रामकृष्ण नामक पुजारी की थी जो काली की उपासना कर उनसे चर्चा कर उनके हाथों भोजन पाकर परमहंस पद को प्राप्त कर गया। हमारी लगन परमसत्ता के प्रति मीरा के स्तर की हो जो बिना कोई कर्मकाण्ड या मंत्र के श्रीकृष्ण की दीवानी बनकर उन्हीं में समाकर उनका प्रतिरूप बन गई। यही तत्त्वज्ञान पूजा अवधि में अतः करण में से स्वयं ही उद्भूत होता रहे व लगता रहे कि महाप्रज्ञा-आद्यशक्ति अन्तरात्मा में बैठकर हमें अंतर्जगत् व ब्राह्मीसत्ता सत्यों और तथ्यों से अनायास ही परिचित करा रही है, तो उपासना सफल होती चली जाती है। ऐसी साधना से परमसत्ता का प्यार भरा यथार्थवादी शिक्षण अनायास ही अमृतपान की तरह उपलब्ध होता चला जाता है। यही साधना से सिद्धि का मूलभूत तत्त्वदर्शन है।
उपासना प्रारंभ की थी मेरे लिए वह श्रद्धा का विषय था। वह श्रद्धा ज्यों की त्यों बनी रही, बल्कि ज्यादा ही बढ़ी। बस, सहस्र कुण्ड यज्ञ हो गया।
उपासना सफल होती चली जाती है। ऐसी साधना से परमसत्ता का प्यार भरा यथार्थवादी शिक्षण अनायास ही अमृतपान की तरह उपलब्ध होता चला जाता है। यही साधना से सिद्धि का मूलभूत तत्त्वदर्शन है। इसी को समझकर इस क्षेत्र में उतरा जाना चाहिए।
उपासना फलीभूत नहीं होती, उसका मूल कारण यही है कि उतावलापन बरता गया। बहिरंग कर्मकाण्ड को ही सबकुछ समझ कर उसी से सब कुछ प्राप्त कर लेने-सिद्ध पुरुष बन जाने की, शेखचिल्ली जैसी कल्पना कर ली गयी। निरन्तरता, गहन श्रद्धा एवं सतत् अभ्यास द्वारा जब साधना उपक्रमों के मर्म को समझते हुए उन्हें जीवन में उतारा जाता है तो वह सिद्धियों को फलीभूत करता चला जाता है। यह उस हर सफल व्यक्ति का इतिहास है जिसने जीवन समर में आतुरता, तुरन्त सफलता मिलने की जल्दबाजी न दिखाकर, धैर्य व निष्ठापूर्वक साधना की है, आत्मशोधन किया है वह अपने को निखार कर गुणों की खेती आत्मसत्ता रूपी खेत पर की है। गीताकार ने ऐसे ही व्यक्ति को 'क्षेत्रज्ञ' कहा है व उसी को सफलता सदैव मिलेगी, यह भी बताया है।
उपासना कर उनसे चर्चा कर उनके हाथों भोजन पाकर परमहंस पद को प्राप्त कर गया। हमारी लगन परमसत्ता के प्रति मीरा के स्तर की हो जो बिना कोई कर्मकाण्ड या मंत्र के श्रीकृष्ण की दीवानी बनकर उन्हीं में समाकर उनका प्रतिरूप बन गई। यही तत्त्वज्ञान पूजा अवधि में अतः करण में से स्वयं ही उद्भूत होता रहे व लगता रहे कि महाप्रज्ञा-आद्यशक्ति अन्तरात्मा में बैठकर हमें अंतर्जगत् व ब्राह्मीसत्ता सत्यों और तथ्यों से अनायास ही परिचित करा रही है, तो उपासना सफल होती चली जाती है। ऐसी साधना से परमसत्ता का प्यार भरा यथार्थवादी शिक्षण अनायास ही अमृतपान की तरह उपलब्ध होता चला जाता है। यही साधना से सिद्धि का मूलभूत तत्त्वदर्शन है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-June
उपासना होती रहती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-April
उपासना करने वाले मूर्ख! अपने अन्त को देख! संसार में मृत्यु ही यही सत्य है। यह शरीर नाशवान है। मनुष्यों! भूलो मत- यह शरीर नाशवान है। इस मल मूत्र की गठरी को ईश्वर मत मानो। स्वार्थ से कुछ ऊँची दृष्टि उठा कर परमार्थ की ओर भी देखो।
उपासना का मर्म भेद। कीमत 1)
उपासना से प्रसन्न होकर अपना डेरा हमारे शिर के ऊपर डाल लेंगी और हर वक्त अपना प्रतिबन्ध डालती रहेंगी। हम अपने मानस क्षेत्र में जैसा बीज बोते हैं, ठीक वैसे ही पौधे उगा लेते हैं। दुख, द्रोह, कलह और निराशा के बीज बोएंगे तो अवश्य ही इनकी कँटीली बेलें उग कर चारों और फैल जावेंगी।
उपासना करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-January
उपासना करते हैं। मैं धर्माचार्य हूँ और संसार के प्राणियों को धर्म के मार्ग पर लाने का कार्य करता हूं। मैंने सोचा कि आप प्रभु के भक्त हैं इसलिये आपके पास जा कर जो बन सके सहायता करूं और जो जानता हूँ समझाऊं।’ तीनों वृद्ध पुरुषों ने उनका आभार माना और उपकार के लिये कृतज्ञता प्रकट की।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-August
उपासना देव या ॐ का मन में उच्चारण करते रहना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-May
उपासना अवश्य करनी चाहिये, क्योंकि प्रातःकाल की सन्ध्या से रात्रि भर के और सायंकाल की सन्ध्या से दिन भर के मलों (दुर्वासनाओं) तथा पापों का नाश हो जाता है दिन- रात्रि की सन्धि में गृहस्थी का कोई कार्य नहीं करना चाहिये। यदि भूल से कोई कार्य किया जाएगा तो उससे अनर्थ होगा जिसे आयुर्वेद कहता है, यथा सन्ध्या समय भोजन करने में रोगोत्पत्ति, मैथुन करने से कुरूप तथा राक्षसी प्रकृति की सन्तान का जन्म लेना, निद्रा से सुस्ती तथा आलस्य, पठन-पाठन से बुद्धि नाश इत्यादि। यह समय तो केवल परमात्मा के भजन, उपासना ही के लिये नियत किया गया है। इसी नियम को पालते हुए इस्लामी भाई मस्जिदों में, ईसाई गिरजाघरों में, आर्य—समाजी आर्य मन्दिरों में, सनातन धर्मी देवालयों में जाते हैं। प्रायः देखा गया है कि सन्ध्या समय मनुष्य की चित्त-वृत्ति सतोगुणी हो ही जाती है, साँसारिक कार्यों से चित्त को उपराम हो जाता है।
उपासना ही के लिये नियत किया गया है। इसी नियम को पालते हुए इस्लामी भाई मस्जिदों में, ईसाई गिरजाघरों में, आर्य—समाजी आर्य मन्दिरों में, सनातन धर्मी देवालयों में जाते हैं। प्रायः देखा गया है कि सन्ध्या समय मनुष्य की चित्त-वृत्ति सतोगुणी हो ही जाती है, साँसारिक कार्यों से चित्त को उपराम हो जाता है। एकान्त स्थान, जलाशय व बागों में जाने को चित्त चलायमान होता है।
उपासना के शाँति सुख नहीं मिल सकता।
उपासना में सब लोग अपनी इच्छानुसार कुछ न कुछ माँगते हैं। फिर क्या कारण है कि हम अपनी जरूरत की वस्तुओं को उससे न माँगें?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-July
उपासना और भक्तिरस से पूर्ण एक महा काव्य की रचना करें। तदनुसार व्यास जी ने श्रीमद्भागवत् महापुराण की रचना कर डाली।
उपासना करनी चाहिए और यह ध्यान कर कि वह प्राणिमात्र में व्याप्त है हमें प्राणी मात्र से प्रेम करना चाहिए।
उपासना की थी, जब उन्होंने यह देखा कि मेरी संपदा जा रही है, वेदना से तड़फड़ा कर वे लक्ष्मी के चरणों में लोट गये और फूट-फूट कर रोने लगे। लक्ष्मी को उन पर दया आ गई। उसने कहा-पुत्र, मेरा जाना तो निश्चित है, पर तेरी भक्ति को देख कर एक वरदान तुझे दे सकती हूँ। मुझे छोड़ कर अन्य जो वस्तु चाहे सो तू माँग ले।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-December
उपासना करो।
उपासना करो, क्योंकि निर्बलों का जगत में कहीं ठिकाना नहीं। विश्व में अमित ऐश्वर्य भरा हुआ है, पर उनके भोगने का अधिकार केवल बलवानों को ही है। मनुष्य सुख की इच्छा करते हैं, परन्तु वे नहीं जानते कि बिलकुल समीप होने पर भी निर्बल व्यक्ति सुख सामग्री को भोग नहीं सकता। सुख एक साझेदारी का सौदा है, जिसे हम बल की सहायता से भोगते हैं। न तो केवल वस्तुओं में सुख है और न केवल इच्छा में।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-February
उपासना की जरूरत हुई। दूरी तीन प्रकार की होती है । स्थान सम्बन्धी जैसे सूर्य हम से करोड़ों कोस दूर हैं। दूसरी -(काल सम्बन्धी) जैसे महाभारत हम से पाँच सहस्र वर्ष पहिले हुआ। तीसरी-(ज्ञान सम्बन्धी) जैसे बहुत बार हम अपने को भूल जाते हैं या समीप की वस्तुओं को भ्रान्ति के कारण नहीं देख सकते ।
उपासना करते हैं, जो हमारे कष्ट को आनन्द से बदल देती है । अब यह बात साफ हो गई कि उपासना दुःख से बचने और सुख को प्राप्त करने की गरज भी आती है । पाठक गण अब यह विचारने की आवश्यकता हुई कि हमें दुःख किस वस्तु से मिलता है। संसार में हम दो शक्तियों को काम करते देखते है एक ज्ञात दूसरी अज्ञात जो वस्तुएं हमें इंद्रियों द्वारा अनुभव होती हैं वह सबकी सब अज्ञात हैं।
उपासना करता है और जब गर्मी की अधिकता से प्यास कष्ट देती है, तो जल की उपासना करता है। इससे यह स्पष्ट विदित हो गया कि जब हमें किसी वस्तु की उपासना से कष्ट मालूम होता है, तो हम दूसरी प्रतिकूल वस्तु जो हमारे अनुकूल होती है की उपासना करते हैं, जो हमारे कष्ट को आनन्द से बदल देती है । अब यह बात साफ हो गई कि उपासना दुःख से बचने और सुख को प्राप्त करने की गरज भी आती है । पाठक गण अब यह विचारने की आवश्यकता हुई कि हमें दुःख किस वस्तु से मिलता है। संसार में हम दो शक्तियों को काम करते देखते है एक ज्ञात दूसरी अज्ञात जो वस्तुएं हमें इंद्रियों द्वारा अनुभव होती हैं वह सबकी सब अज्ञात हैं।
उपासना शब्द का क्या अर्थ है, उपासना का अर्थ है पास बैठना, ईश्वर शब्द का अर्थ सर्वेश्वर या ऐसी शक्ति जो सत्-चित्-आनन्द हो। अब यह प्रश्न होता है कि क्या ईश्वर हम से दूर है, जिससे हमें पास बैठने यानी उपासना की जरूरत हुई। दूरी तीन प्रकार की होती है । स्थान सम्बन्धी जैसे सूर्य हम से करोड़ों कोस दूर हैं। दूसरी -(काल सम्बन्धी) जैसे महाभारत हम से पाँच सहस्र वर्ष पहिले हुआ।
उपासना से दुख से छूट सकता है, इस कारण परमात्मा की उपासना करने योग्य है जब परमात्मा के ज्ञान को जान लेंगे, तब हमें पापों से घृणा हो जाएगी । यह जो दलील होती हैं जब ईश्वर उपासना से किए हुए कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, तो क्या लाभ । परन्तु यह सत्य है कि ईश्वर उपासना से पाप का फल भोगते हुए भी कष्ट नहीं होता, क्योंकि दुःख को अनुभव करने वाला मन परमात्मा की उपासना में लगा होता है।
उपासना में लगा होता है।
उपासना से कष्ट मालूम होता है, तो हम दूसरी प्रतिकूल वस्तु जो हमारे अनुकूल होती है की उपासना करते हैं, जो हमारे कष्ट को आनन्द से बदल देती है । अब यह बात साफ हो गई कि उपासना दुःख से बचने और सुख को प्राप्त करने की गरज भी आती है । पाठक गण अब यह विचारने की आवश्यकता हुई कि हमें दुःख किस वस्तु से मिलता है। संसार में हम दो शक्तियों को काम करते देखते है एक ज्ञात दूसरी अज्ञात जो वस्तुएं हमें इंद्रियों द्वारा अनुभव होती हैं वह सबकी सब अज्ञात हैं।
उपासना से पाप का फल भोगते हुए भी कष्ट नहीं होता, क्योंकि दुःख को अनुभव करने वाला मन परमात्मा की उपासना में लगा होता है।
उपासना से किए हुए कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, तो क्या लाभ । परन्तु यह सत्य है कि ईश्वर उपासना से पाप का फल भोगते हुए भी कष्ट नहीं होता, क्योंकि दुःख को अनुभव करने वाला मन परमात्मा की उपासना में लगा होता है।
उपासना में समय लगाया जाए? उपरोक्त दलील को देखकर जब हम संसार में देखते है कि एक मूर्ख भी बिना प्रयोजन किसी कार्य में हाथ नहीं डालता और बुद्धिमान की सदैव खोज कर करते हैं, तो यह आवश्यक है कि इस रहस्य पर कुछ विचार किया जाए। ‘ज्योति’ के पाठकों को इससे पूर्व कि इस विषय पर विचार किया जाय, यह जान लेना अति आवश्यक होगा कि उपासना शब्द का क्या अर्थ है, उपासना का अर्थ है पास बैठना, ईश्वर शब्द का अर्थ सर्वेश्वर या ऐसी शक्ति जो सत्-चित्-आनन्द हो। अब यह प्रश्न होता है कि क्या ईश्वर हम से दूर है, जिससे हमें पास बैठने यानी उपासना की जरूरत हुई। दूरी तीन प्रकार की होती है ।
उपासना करने योग्य है जब परमात्मा के ज्ञान को जान लेंगे, तब हमें पापों से घृणा हो जाएगी । यह जो दलील होती हैं जब ईश्वर उपासना से किए हुए कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, तो क्या लाभ । परन्तु यह सत्य है कि ईश्वर उपासना से पाप का फल भोगते हुए भी कष्ट नहीं होता, क्योंकि दुःख को अनुभव करने वाला मन परमात्मा की उपासना में लगा होता है।
उपासना की अनेक विधियाँ सम्प्रदायों या देश काल के अनुसार प्रचलित हैं। बाह्य दृष्टि से देखने पर इनमें विरोधाभास होता है। कई विधियाँ तो बहुत टेढ़ी मेढ़ी, कष्ट साध्य और बहुत देर में लक्ष तक पहुँचाने वाली होती हैं। कई स्थलों पर उनमें ऐसी पेचीदगियाँ भी होती हैं, जिनमें भटक जाने पर साधना भ्रष्ट तान्त्रिकों की तरह बड़े भारी खतरे का सामना करना पड़ता है। कई साधना, बहुत समय, श्रम और धन चाहती हैं।
उपासना की जरूरत है। अब यह ध्यानपूर्वक देखिये कि संसार में हम कब किसी की उपासना करते हैं। जब किसी व्यक्ति को सर्दी लगती है, तो वह गर्मी के लिए तथा उससे बचने के लिए अग्नि आर वस्त्र की उपासना करता है और जब गर्मी की अधिकता से प्यास कष्ट देती है, तो जल की उपासना करता है। इससे यह स्पष्ट विदित हो गया कि जब हमें किसी वस्तु की उपासना से कष्ट मालूम होता है, तो हम दूसरी प्रतिकूल वस्तु जो हमारे अनुकूल होती है की उपासना करते हैं, जो हमारे कष्ट को आनन्द से बदल देती है । अब यह बात साफ हो गई कि उपासना दुःख से बचने और सुख को प्राप्त करने की गरज भी आती है ।
उपासना की विधि का उद्घाटन किया था। यह विधि थी ‘मानसी पूजा।’ मानसी पूजा का अर्थ है, मन में ही आराधना करना। इसके लिये किसी बाहरी वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ती। प्रतिमा पुस्तक, पुष्प, धूप, दीप, चन्दन अक्षत आदि किसी की कुछ आवश्यकता नहीं होती।
उपासना करें, जिसे प्रकृति का पूर्ण ज्ञान हो और इसके प्रतिकूल गुण वाली हो।
उपासना का अर्थ है पास बैठना, ईश्वर शब्द का अर्थ सर्वेश्वर या ऐसी शक्ति जो सत्-चित्-आनन्द हो। अब यह प्रश्न होता है कि क्या ईश्वर हम से दूर है, जिससे हमें पास बैठने यानी उपासना की जरूरत हुई। दूरी तीन प्रकार की होती है । स्थान सम्बन्धी जैसे सूर्य हम से करोड़ों कोस दूर हैं। दूसरी -(काल सम्बन्धी) जैसे महाभारत हम से पाँच सहस्र वर्ष पहिले हुआ।
उपासना बहुत ही आरम्भ की है। जैसा बालक पहले अ, आ, इ, ई, लिखते हैं। जब मन अधिक गहरा उतरता है और सूक्ष्म लोक में प्रवेश करता है, तब तो यह वस्तुएं उलटी ध्यान बटाने की बाधा उपस्थित करती हैं। इसी लिये योगाभ्यासी किसी बाह्याचार में नहीं पड़ते और प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि के मानसी आचारों का अभ्यास करते हैं।
उपासना शब्द को सिद्ध करने के लिये अब हमें विचारना चाहिये कि ईश्वर में और हम में कौन सी दूरी है, चूँकि ईश्वर सर्व व्यापक और अपरिमित है, इसलिए-स्थान दूरी नहीं हो सकती, वह नित्य है, अतएव काल दूरी भी उसमें नहीं है। अब रही ज्ञान दूरी-सो यह प्रत्येक मनुष्य को मानना पड़ता है, क्योंकि हर मनुष्य को ईश्वर का पूर्ण परिचय नहीं है,अब हम यह जान गये कि ज्ञान दूरी है, तो हमें ईश्वर के ज्ञान को प्राप्त करने के लिए ही उपासना की जरूरत है। अब यह ध्यानपूर्वक देखिये कि संसार में हम कब किसी की उपासना करते हैं। जब किसी व्यक्ति को सर्दी लगती है, तो वह गर्मी के लिए तथा उससे बचने के लिए अग्नि आर वस्त्र की उपासना करता है और जब गर्मी की अधिकता से प्यास कष्ट देती है, तो जल की उपासना करता है। इससे यह स्पष्ट विदित हो गया कि जब हमें किसी वस्तु की उपासना से कष्ट मालूम होता है, तो हम दूसरी प्रतिकूल वस्तु जो हमारे अनुकूल होती है की उपासना करते हैं, जो हमारे कष्ट को आनन्द से बदल देती है ।
उपासना करते हैं। जब किसी व्यक्ति को सर्दी लगती है, तो वह गर्मी के लिए तथा उससे बचने के लिए अग्नि आर वस्त्र की उपासना करता है और जब गर्मी की अधिकता से प्यास कष्ट देती है, तो जल की उपासना करता है। इससे यह स्पष्ट विदित हो गया कि जब हमें किसी वस्तु की उपासना से कष्ट मालूम होता है, तो हम दूसरी प्रतिकूल वस्तु जो हमारे अनुकूल होती है की उपासना करते हैं, जो हमारे कष्ट को आनन्द से बदल देती है । अब यह बात साफ हो गई कि उपासना दुःख से बचने और सुख को प्राप्त करने की गरज भी आती है । पाठक गण अब यह विचारने की आवश्यकता हुई कि हमें दुःख किस वस्तु से मिलता है।
उपासना है, इसी, को अद्वैत साधन कहते हैं।
उपासना करता है। इससे यह स्पष्ट विदित हो गया कि जब हमें किसी वस्तु की उपासना से कष्ट मालूम होता है, तो हम दूसरी प्रतिकूल वस्तु जो हमारे अनुकूल होती है की उपासना करते हैं, जो हमारे कष्ट को आनन्द से बदल देती है । अब यह बात साफ हो गई कि उपासना दुःख से बचने और सुख को प्राप्त करने की गरज भी आती है । पाठक गण अब यह विचारने की आवश्यकता हुई कि हमें दुःख किस वस्तु से मिलता है। संसार में हम दो शक्तियों को काम करते देखते है एक ज्ञात दूसरी अज्ञात जो वस्तुएं हमें इंद्रियों द्वारा अनुभव होती हैं वह सबकी सब अज्ञात हैं।
उपासना दुःख से बचने और सुख को प्राप्त करने की गरज भी आती है । पाठक गण अब यह विचारने की आवश्यकता हुई कि हमें दुःख किस वस्तु से मिलता है। संसार में हम दो शक्तियों को काम करते देखते है एक ज्ञात दूसरी अज्ञात जो वस्तुएं हमें इंद्रियों द्वारा अनुभव होती हैं वह सबकी सब अज्ञात हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-October
उपासना पर प्रसन्न होने की अपेक्षा ऐसा भयंकर रूप धारण करके विनाश के मुँह में हमें क्यों ढकेले दे रही हैं? पाठकों। शान्त मन से जरा इस प्रश्न पर विचार करो। आपने बहुत सा समय फूटे हुए मकानों पर सफेदी कराने और टूटे हुए किवाड़ों पर रंग कराने में लगाया है। अब थोड़ा समय इस बात के चिन्तन में भी लगाइये कि हमारी आराधना से सन्तुष्ट होने के स्थान पर नाश का वज्र दंड क्यों उठाया जा रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-March
उपासना गृह नहीं बनवाया है तो मुझे लगा कि आपका मुँह ही थूक देने योग्य स्थान है। अस्तु मैंने थूक दिया।
उपासना नहीं होती, ब्रह्मविद् ब्राह्मण ही सगुण ब्रह्म स्वरूप हैं, अतएव ऐसे ब्राह्मण ही मानव के पूज्य भूदेव हैं। ब्राह्मण का उच्च आदर्श अनुसरण कर के ब्रह्म के समीप गमन करते हैं। जब भारत में ब्राह्मण थे तब यही विधि प्रचलित थी। ब्राह्मणों का अभाव होने पर ही प्रतिमा पूजा का नियम प्रचलित हुआ। हाय हिन्दू समाज! तुमने ब्राह्मणों का तत्त्व न समझ कर, ब्राह्मण का ध्वंस साधन करके, यह काल और प्रकाल दोनों ही गँवा दिये।
उपासना गृह की आवश्यकता प्रतीत न हुई थी, धन वैभव से चौंधिया जाने वाले अन्य अनेक नर-कीटों की तरह वे भी मनुष्य के असली अस्तित्व से अपरिचित थे। जब धन है तो ईश्वर से क्या प्रयोजन? जब सुख है तो आत्म चिन्तन से क्या लाभ? जब स्वस्थ हैं तो भविष्य की क्या चिन्ता! शक्ति के अहंकार में मनुष्य अन्धा हो जाता है। धन के मद में सेठजी की भी वैसी ही दशा थी।
उपासना गृह कहाँ है? आप जहाँ बैठ कर आत्म चिन्तन करते हैं, वह स्थान मेरे देखने में नहीं आया, कृपया उस स्थान को भी दिखाइये, उसे देखने के लिये मैं विशेष उत्सुक हूं।”
उपासना की भी कोई जरूरत है? इस प्रश्न पर कुछ सोचने की उन्हें कभी फुरसत नहीं मिली थी। साधु के प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने लापरवाही से कहा-’वह तो मैंने नहीं बनवाया है।’
उपासना)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-September
उपासना किसी बात का नियम कर लेने के बतौर एक नियम बन जाती है। ऐसी हालत में मन से श्रद्धा हटती जाती है और फिर उपासना जल्दी से जल्दी खत्म करने का ख्याल बना रहता है। ऐसी पूजा को मैं ‘नित्य नेम’ समझता हूँ।
उपासना करते समय मन में सिवाय भगवत् चिन्तन के और कुछ ख्याल ही न पैदा हो अथवा पैदा हो भी तो वह चिन्तन के समक्ष तुच्छ प्रतीत हो।
उपासना करना शुरू करता है। कुछ दिन ठीक तौर पर करने के उपरान्त मन में इसके प्रति फिर आलस्य आ जाता है, तथा उपासना छोड़ने की भी इच्छा हो जाती है, परन्तु फिर किसी कारण उसको न छोड़ किसी रूप में निभाते चलना मन में स्थिर करता है ऐसी हालत में मन में वास्तविक श्रद्धा नहीं रहती और वह उपासना किसी बात का नियम कर लेने के बतौर एक नियम बन जाती है। ऐसी हालत में मन से श्रद्धा हटती जाती है और फिर उपासना जल्दी से जल्दी खत्म करने का ख्याल बना रहता है। ऐसी पूजा को मैं ‘नित्य नेम’ समझता हूँ।
उपासना छोड़ने की भी इच्छा हो जाती है, परन्तु फिर किसी कारण उसको न छोड़ किसी रूप में निभाते चलना मन में स्थिर करता है ऐसी हालत में मन में वास्तविक श्रद्धा नहीं रहती और वह उपासना किसी बात का नियम कर लेने के बतौर एक नियम बन जाती है। ऐसी हालत में मन से श्रद्धा हटती जाती है और फिर उपासना जल्दी से जल्दी खत्म करने का ख्याल बना रहता है। ऐसी पूजा को मैं ‘नित्य नेम’ समझता हूँ।
उपासना जल्दी से जल्दी खत्म करने का ख्याल बना रहता है। ऐसी पूजा को मैं ‘नित्य नेम’ समझता हूँ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-March
उपासना ही करते रहे हैं। यही हमारी एक मात्र जातीय आराधना रही है। इसी मन्त्र की शक्ति से इस देश का अध्यात्म बल बढ़ा है और हमारा इतिहास गौरवपूर्ण बना है। अभी भी ऐसे अनेक गायत्री उपासक मौजूद हैं जिनका आत्मबल इस गये बीते युग में भी आश्चर्यजनक कहा जा सकता है। इन तथ्यों पर विचार करने से प्रतीत होता है कि उस महामन्त्र के बारे में ऋषियों और शास्त्रों ने जो कुछ कहा है वह असत्य नहीं है।
उपासना में कर्मकाण्ड नहीं आन्तरिक शुद्धि की प्रधानता मानी जाती है। इन तथ्यों को यदि भली प्रकार समझा जा सके तो परलोक बनाने के इच्छुक, सद्गति पाने के अभिलाषी भ्रम जंजालों से निकल कर उस मार्ग पर चलें जिस पर चलने से वस्तुतः आध्यात्मिक प्रगति का आनन्द मिल सकता है। ऐसा सद्ज्ञान ही किसी को अध्यात्म के प्रत्यक्ष सत्परिणामों से समुचित रीति से लाभान्वित कर पायेगा। इस अभाव की पूर्ति के लिये शास्त्रों और ऋषियों की आदि परम्पराएं जिस विद्यालय में सिखाई जायें उसी से आध्यात्मवाद की सच्ची सेवा बन पड़ेगी।
उपासना में लगाया हुआ समय कभी किसी का व्यर्थ नहीं जाता।
उपासना का अपना लाभ तो होता ही है। उसका परिणाम तो होना ही ठहरा। पर किस व्यक्ति को कितना लाभ मिलेगा उसका अनुमान लगाना हो तो यही जानना पड़ेगा कि उसने किस भावना से, किस श्रद्धा और तन्मयता से साधना की। यदि यह सब घटिया रहा होगा तो उसके अनुसार घटिया परिणामों की ही आशा की जा सकती है। गायत्री उपासना को महात्म्यों का शास्त्रकारों ने विशद वर्णन किया है।
उपासना न की जाय इससे साधक ईश्वर की दृष्टि में लालची भिखमँगा ठहरता है और उसका मूल्य स्वयं अपनी भी आँखों में घट जाता है। कामना पूर्ण होने पर अहंकार बढ़ता हैं कि हमने अपने जादू-मन्त्र से इतना लाभ प्राप्त कर लिया और असफलता मिलने पर नास्तिकता एवं विक्षोभ की भावना उत्पन्न होती है। सकाम उपासना से लाभ सीमित और हानि अधिक है। आध्यात्मिक प्रगति की सम्भावना तो उससे बनती ही नहीं, क्योंकि जब आत्म कल्याण की बात सोची ही नहीं गई थी, सकाम प्रयोजन को ही ध्यान में रखा गया था तो आत्मिक लाभ मिलता भी कैसे? यह हानि निष्काम उपासना में बिलकुल नहीं वरन् दुहरा लाभ है।
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगाये जाने वाले बीज-मंत्रों का साधना विधान, आत्म साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ, गायत्री द्वारा वाममार्गी ताँत्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन उच्चाटन, वशीकरण, गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री संहिता, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री हृदय, गायत्री पंजर, गायत्री लहरी, गायत्री सहस्रनाम आदि का संग्रह, गायत्री महामंत्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों का साधना विधान। जप-योग, ऋजु-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठ-योग, कुण्डलिनी-योग, षट्चक्र वेधन की साधनाएं तथा अन्नमय-कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग का दिग्दर्शन। हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री-उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
उपासना में क्या दृष्टि रहे और किन गुणों का समावेश अपनी मनोभूमि में होना चाहिए, जिसे सब बातों का ध्यान रहेगा उसकी थोड़ी भी साधना बहुत फलदायक होगी।
उपासना की शिक्षा सर्व साधारण को देते रहे हैं। इस महामंत्र की महत्ता जन-मानस में प्रवेश कराने के लिए व्यापक आन्दोलन गठित करके लाखों व्यक्तियों को इस मार्ग पर लगाया है। इन पर हुए प्रयोग का अनुभव कि गायत्री उपासना निष्फल तो किसी की नहीं जाती, पर सच्चा लाभ वे ही उठाते हैं जिनने उच्चस्तरीय उपासना का अवलम्बन किया है। इस प्रकार के व्यक्तियों में से एक को भी असफलता की शिकायत करते नहीं सुना। उतावले, श्रम की तुलना से अधिक लाभ प्राप्त करने के लोभी, अश्रद्धालु और केवल कौतुक एवं परीक्षण की दृष्टि से थोड़ा भी प्रयोग करने वाले लोग भी निराशा व्यक्त करते देखे जाते हैं और उन्हीं का उत्साह स्वल्प-साधना के पश्चात शिथिल एवं समाप्त होते देखा जाता है।
उपासना से नहीं भी दूर होती। बड़े भगोने में पानी गरम करना चाहे और उसमें भी जल्दी करे तो उसे निराश होना ही पड़ेगा। ऐसे ही लोग उस आराधना को निरर्थक बताते और गाली देते सुने जाते हैं।
उपासना में बिलकुल नहीं वरन् दुहरा लाभ है। आत्मिक प्रगति-सद्बुद्धि की उपलब्धि तो उसमें निश्चित रूप से होती है और जितना लाभ सकाम उपासना से मिलना चाहिए उतना लौकिक लाभ भी मिल ही जाता है। निराश या क्षुब्ध होने की गुँजाइश इसलिए नहीं रहती कि जब तुच्छ स्वार्थ के लिए किया ही नहीं गया था तो असफलता मिलने पर भी खिन्नता क्यों आवेगी?
उपासना का अवलम्बन किया है। इस प्रकार के व्यक्तियों में से एक को भी असफलता की शिकायत करते नहीं सुना। उतावले, श्रम की तुलना से अधिक लाभ प्राप्त करने के लोभी, अश्रद्धालु और केवल कौतुक एवं परीक्षण की दृष्टि से थोड़ा भी प्रयोग करने वाले लोग भी निराशा व्यक्त करते देखे जाते हैं और उन्हीं का उत्साह स्वल्प-साधना के पश्चात शिथिल एवं समाप्त होते देखा जाता है।
उपासना करने वाले गायत्री माता के चित्र को और निराकार मानने वाले अगरबत्ती या दीप में जलती हुई अग्नि को प्रतीक मान कर उसके आगे नमन पूजन करने के उपरान्त 108 मन्त्र जप सकते है। माला हो तो ठीक नहीं तो उँगलियों के सहारे या घड़ी के माध्यम से उतनी संख्या पूरी की जा सकती हैं। प्रायः छह मिनट में एक माला, 108 मंत्रों का जप हो जाता है। इनके साथ पुनः नमन प्रणाम, आरती, सूर्यार्घदान आदि जो भी कर्मकाण्ड बन पड़े उसके साथ पूजा पूर्ण की जा सकती है। इस प्रकार नित्य की विधिवत् पूजा आराधना को कोई मनुष्य चलाना चाहे और दृढ़तापूर्वक उस क्रम को निबाहना चाहे तो इतना विधान भी बड़ी आसानी से चलता रह सकता है।
उपासना ही करनी पड़ेगी। यही रास्ता सर्वसुलभ है और सरल भी।
उपासना वह है जो आत्म-कल्याण के लिए जीवनस्तर को उत्कृष्ट बनाने के लिए दुर्बुद्धि हटा कर मनोभूमि में सद्बुद्धि की स्थापना के लिये श्रद्धा और भावना पूर्वक की जाती है। किसी लौकिक प्रयोजन को लक्ष्य रख कर कई व्यक्ति जप-तप करते हैं और यह हिसाब लगाते रहते हैं कि इतना जप हो जाने पर यह प्रयोजन पूरा हो जाना चाहिए, यह सिद्धि मिल जानी चाहिये। यदि वह प्रयोजन पूर्ण हो गया तो भी उसे छोड़ देते हैं और नहीं हुआ तो भी उसको त्याग ही देते हैं। वैद्य के पास रोगी तभी तक जाता है जब तक कि उसे कष्ट रहता है। कष्ट दूर हुआ कि रोगी ने वैद्य से रिश्ता तोड़ा।
उपासना के द्वारा ही हटाये जाते हैं। इसलिए हमारे नित्य कर्म में उपासना के लिए कोई नियत समय अवश्य ही रहना चाहिए। कार्यव्यस्त व्यक्ति भी इतना तो कर ही सकते हैं कि नींद खुलने पर शैया त्यागने तक का जो समय आलस्य जैसी स्थिति में बिताना पड़ता है उसे ईश्वर उपासना में लगा दें। मानसिक ध्यान और मानसिक जप तो बिना स्नान किये भी चारपाई पर बैठे या पड़े भी हो सकता है। इसके लिए किसी सामान या विधि-विधान की भी जरूरत नहीं है।
उपासनाओं से भी हल होती देखी गई हैं। पर कई बार ऐसा भी होता है कि पर्वत समान कठिन प्रारब्ध और पुण्य पूँजी की समाप्ति के कारण उत्पन्न हुई दरिद्रता थोड़ी-सी उपासना से नहीं भी दूर होती। बड़े भगोने में पानी गरम करना चाहे और उसमें भी जल्दी करे तो उसे निराश होना ही पड़ेगा। ऐसे ही लोग उस आराधना को निरर्थक बताते और गाली देते सुने जाते हैं।
उपासना से मिलना चाहिए उतना लौकिक लाभ भी मिल ही जाता है। निराश या क्षुब्ध होने की गुँजाइश इसलिए नहीं रहती कि जब तुच्छ स्वार्थ के लिए किया ही नहीं गया था तो असफलता मिलने पर भी खिन्नता क्यों आवेगी?
उपासना एक समान दिखाई पड़ती है। तीन पतिव्रताओं और चार भक्तों की बाह्य स्थिति में कोई अन्तर नहीं होता, आचरण इन सबका समान होता है पर अन्तःस्थिति के कारण उनकी श्रेष्ठता एवं निकृष्टता का स्वरूप अलग-अलग ही रहता है और उन्हें लाभ भी उसी आधार पर न्यूनाधिक प्राप्त होता है। वेश्या और पत्नी का शारीरिक आचरण एक-सा होने पर भी उनकी भावना के कारण प्रतिफल में भारी अन्तर रहना स्वाभाविक ही है।
उपासना अन्तःकरण की शुद्धि के लिए आवश्यक है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार पर चढ़े हुए मल, आवरण, विक्षेप उपासना के द्वारा ही हटाये जाते हैं। इसलिए हमारे नित्य कर्म में उपासना के लिए कोई नियत समय अवश्य ही रहना चाहिए। कार्यव्यस्त व्यक्ति भी इतना तो कर ही सकते हैं कि नींद खुलने पर शैया त्यागने तक का जो समय आलस्य जैसी स्थिति में बिताना पड़ता है उसे ईश्वर उपासना में लगा दें। मानसिक ध्यान और मानसिक जप तो बिना स्नान किये भी चारपाई पर बैठे या पड़े भी हो सकता है।
उपासना-विज्ञान तीनों को ही भरपूर कोसते हैं और जो थोड़ा समय साधना में लग गया उस पर पश्चाताप प्रकट करते हैं। ऐसे निम्नस्तरीय साधक अपनी घटिया मनोभूमि के कारण कोई बड़ा लाभ प्राप्त नहीं कर सकते। क्योंकि घट-घट वासिनी महाशक्ति आखिर भावना स्तर को भी तो देखना जानती है। बाहरी कर्मकाँड ही तो उसके लिए सब कुछ नहीं हैं। प्रभु की प्रसन्नता उच्च-स्तरीय भावनाओं द्वारा ही सम्भव है।
उपासना का तत्व-ज्ञान है। भक्ति पूर्वक परम प्रभु से इसी की याचना हमें करते रहना चाहिए।
उपासना को महात्म्यों का शास्त्रकारों ने विशद वर्णन किया है। उसे देखते हुए प्रतीत होता है कि यह साधना पारस, कल्पवृक्ष, कामधेनु और अमृत के समान उपयोगी है। कितने साधकों को वैसे ही लाभ मिले भी हैं। उनके चरित्र और उदाहरण सामने आते हैं तो विश्वास और भी बढ़ता है। प्राचीनकाल में समस्त ऋषि मुनि, राम कृष्ण और अवतार, महापुरुष ज्ञानी मनस्वी और विचारशील व्यक्ति गायत्री उपासना ही करते रहे हैं।
उपासना के लिए कोई नियत समय अवश्य ही रहना चाहिए। कार्यव्यस्त व्यक्ति भी इतना तो कर ही सकते हैं कि नींद खुलने पर शैया त्यागने तक का जो समय आलस्य जैसी स्थिति में बिताना पड़ता है उसे ईश्वर उपासना में लगा दें। मानसिक ध्यान और मानसिक जप तो बिना स्नान किये भी चारपाई पर बैठे या पड़े भी हो सकता है। इसके लिए किसी सामान या विधि-विधान की भी जरूरत नहीं है। यदि श्रद्धा हो और उपयोगिता समझी जाय तो व्यस्त से व्यस्त मनुष्य भी इस प्रकार आधा, चौथाई घण्टा भजन के लिए निकाल सकता है जिन्हें इस ओर रुचि न हो और न करने का बहाना ही ढूँढ़ना हो उनके लिए तो निठल्ले समय बर्बाद करते रहने पर भी फुरसत न मिलने का रोना बना ही रहेगा।
उपासना कहा है।
उपासना करने वाले का आत्मबल दूर से ही चमकता और वे स्वभावतः दूसरे लोगों की अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट दृष्टिगोचर होते। पर वे वैसे होते नहीं इससे यही सिद्ध होता है कि उनकी आस्तिकता असली नहीं नकली है। असली आस्तिकता का स्वरूप और साधन सीखा जा सके, ऐसी शिक्षा को जिस विद्यालय में सिखाया जा सके वह निश्चय ही बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है।
उपासना को आध्यात्मिक नहीं कह सकते। वह भौतिक उद्देश्य के लिए भौतिक प्रयत्न मात्र सिद्ध होती है और उसका प्रतिफल भी छोटा-सा ही बनकर रह जाता है। इसलिए इस प्रक्रिया को तत्वदर्शियों ने निम्नस्तरीय उपासना कहा है।
उपासना में भी इसी प्रकार के स्तर हैं। निम्न स्तर के साधक विपत्ति के समय माता को पुकारते हैं या कोई भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिये दरवाजा खटखटाते हैं। उनको इच्छित समय में, इच्छित मात्रा का लाभ मिला तो अपने श्रम की सार्थकता मानकर अपनी सफलता और चतुरता पर गर्व कर लेते हैं पर यदि अभीष्टित लाभ न मिला तो इष्टदेव, मार्गदर्शक तथा उपासना-विज्ञान तीनों को ही भरपूर कोसते हैं और जो थोड़ा समय साधना में लग गया उस पर पश्चाताप प्रकट करते हैं। ऐसे निम्नस्तरीय साधक अपनी घटिया मनोभूमि के कारण कोई बड़ा लाभ प्राप्त नहीं कर सकते। क्योंकि घट-घट वासिनी महाशक्ति आखिर भावना स्तर को भी तो देखना जानती है।
उपासना के लिए भी निकाला जा सकता है। साकार उपासना करने वाले गायत्री माता के चित्र को और निराकार मानने वाले अगरबत्ती या दीप में जलती हुई अग्नि को प्रतीक मान कर उसके आगे नमन पूजन करने के उपरान्त 108 मन्त्र जप सकते है। माला हो तो ठीक नहीं तो उँगलियों के सहारे या घड़ी के माध्यम से उतनी संख्या पूरी की जा सकती हैं। प्रायः छह मिनट में एक माला, 108 मंत्रों का जप हो जाता है। इनके साथ पुनः नमन प्रणाम, आरती, सूर्यार्घदान आदि जो भी कर्मकाण्ड बन पड़े उसके साथ पूजा पूर्ण की जा सकती है।
उपासना भी आवश्यक है। शरीर को स्नान न कराया जाय तो दुर्गन्ध आने लगेगी और अनेक बीमारियाँ पैदा होंगी। वस्त्रों को न धोने से भी ऐसी गन्दगी और कुरूपता उत्पन्न होगी जिसके कारण दूसरे लोग घृणा करने लगेंगे और शरीर एवं मन की मलीनता बढ़ेगी। इसी प्रकार यदि मन को स्वाध्याय के साबुन और सत्संग के जल में न धोया जायगा तो गंदे वातावरण का प्रभाव निरन्तर पड़ते रहने के कारण दिन-दिन उसका स्तर नीचा ही गिरता चला जायगा। आत्म-चिन्तन और आत्म-शोधन का प्रयत्न जो नहीं करते वे आत्मिक दृष्टि से ऊँचे उठ ही नहीं सकते।
उपासना हमारा धर्म कर्तव्य है। प्रातः काल उठते और रात को सोते समय मन ही मन उसका जप करना चाहिए और परमात्मा के दिव्य प्रकाश का ज्योतिर्मय ध्यान करते हुए भावना करनी चाहिए कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अन्धकार हटे और सद्ज्ञान रूप धर्म, कर्तव्य, ज्ञान एवं आदर्श प्रकाश दीप्तिमान होता रहे। गायत्री सद्बुद्धि की देवी है, हमें परमात्मा से एक ही प्रार्थना करनी चाहिए कि दुर्बुद्धि के कारण हमारा जीवन क्रम अस्त-व्यस्त और तमसाच्छन्न बना पड़ा है इसमें परिवर्तन केवल सद्बुद्धि से ही सम्भव होगा। ऋतम्भरा प्रजा प्राप्त हुए बिना हमारा कल्याण कहाँ? इसलिये हे सर्वशक्तिमान प्रभु आप हमें जीवन को सार्थक बनाने वाली सद्बुद्धि दीजिए, सत्प्रवृत्तियों का हमारे अन्तःकरण में प्रेरित कीजिए, सद्भावनाओं से हमारी मनोभूमि का कण-कण भर दीजिए।
उपासना निश्चय ही अधिक फल देती हैं पर जिन्हें अवकाश की कमी है वे मानसिक साधना बिना किसी नियम प्रतिबन्ध का पालन किये भी कर सकते हैं।
उपासना करें तो थोड़ा-सा भी विधि-विधान हमारे लिए सब प्रकार श्रेयस्कर सिद्ध हो सकता है।
उपासना, प्राकृतिक चिकित्सा विधि से अपने शरीर शोधन का विशेष लाभ भी मिला करेगा। यह क्रम हर महीने चले तो एक वर्ष में 600 परिजन शिक्षण प्राप्त कर लिया करें। आने वाले पूर्व पत्र व्यवहार करके यह स्वीकृति प्राप्त कर लिया करें कि उन्हें किस महीने आना है। यह निश्चय न किया जाय और चाहे जिस महीने चाहे जितने लोग आते चलें तो एक महीने तक उनके निवास एवं शिक्षण की उचित व्यवस्था न हो सकेगी। स्थान एवं शिक्षकों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए ही तो ठीक क्रम बन सकेगा।
उपासना की एक-सी ही साधना पद्धति अपनाने वाले व्यक्तियों में से सब को एक-सा परिणाम नहीं मिलता। कोई स्वल्प काल में ही आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त करते हैं और कुछ तो बहुत समय बीत जाने पर भी कोई प्रकाश दृष्टिगोचर नहीं होता।
उपासना में लगा दें। मानसिक ध्यान और मानसिक जप तो बिना स्नान किये भी चारपाई पर बैठे या पड़े भी हो सकता है। इसके लिए किसी सामान या विधि-विधान की भी जरूरत नहीं है। यदि श्रद्धा हो और उपयोगिता समझी जाय तो व्यस्त से व्यस्त मनुष्य भी इस प्रकार आधा, चौथाई घण्टा भजन के लिए निकाल सकता है जिन्हें इस ओर रुचि न हो और न करने का बहाना ही ढूँढ़ना हो उनके लिए तो निठल्ले समय बर्बाद करते रहने पर भी फुरसत न मिलने का रोना बना ही रहेगा।
उपासना, जीवन शोधन और परमार्थ की विशिष्ट कार्य-पद्धति अपनानी पड़ती है तब जीवन लक्ष्य की प्राप्ति होती है। भौतिक प्रगति के लिए ज्ञान, शस्त्र और धन की आवश्यकता रहती है। इन्हीं के माध्यम से अज्ञान, अशक्ति और अभावों का निराकरण होता हैं। एक वर्ग इनमें से एक लक्ष्य को लेकर कार्य-संलग्न रहे तो उसमें विशेष योग्यता प्राप्त होने और अधिक सफलता मिलने की संभावना रहती है। इस तथ्य को समझते हुए ऋषियों ने चार वर्ण बनाकर सुन्दर ढंग से श्रम विभाजन कर दिया।
उपासना वालों का स्तर भी यही रहता है। किसी जप, तप से अभीष्ट लाभ हो गया फिर उसे करने की जरूरत नहीं रहती और चाही हुई अवधि में मनोकामना पूर्ण न हुई तो भी उसे व्यर्थ समझ कर छोड़ दिया जाता है। ऐसी पूजा को साधना कहना ही नहीं चाहिए, वह तो किसी लौकिक प्रयोजन को पूरा करने के लिए एक लौकिक माध्यम मात्र थी, साधना आत्म-कल्याण के लिए लौकिक कामनाओं से रहित होकर की जाती है।
उपासना विधियाँ, गायत्री द्वारा वाममार्गी ताँत्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन उच्चाटन, वशीकरण, गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री संहिता, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री हृदय, गायत्री पंजर, गायत्री लहरी, गायत्री सहस्रनाम आदि का संग्रह, गायत्री महामंत्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों का साधना विधान। जप-योग, ऋजु-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठ-योग, कुण्डलिनी-योग, षट्चक्र वेधन की साधनाएं तथा अन्नमय-कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग का दिग्दर्शन। हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री-उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
उपासना करनी चाहिये। जीवन का आनन्द भी इसी में है कि हम अपने आपको औरों के लिये घुला दें। दूसरों के कुछ काम आयें।
उपासना उनका कोई भी रूप मानकर की जा सकती है। पौधों में तुलसी, वृक्षों में पीपल, नारियों में गंगा, पत्थरों में शालिग्राम भगवान का प्रतीक मानकर पूजे जाते हैं, मन्दिर में देव प्रतिमायें पाषाण एवं धातुओं की होती हैं उनमें श्रद्धा विश्वास का आरोपण कर जब यह आस्था जमा ली जाती है कि यह भगवान है तो उसकी भावना की प्रतिध्वनि उन्हीं मान्य स्वरूपों से टकरा कर लौटती है और वही फल मिल जाता है जो साक्षात् भगवान की भक्ति करने पर उनके प्रत्यक्ष अनुग्रह द्वारा प्राप्त होता है। पतिव्रत धर्म को पालन करने में भी यही प्रयोजन सिद्ध होता है। पति को भगवान मानकर साधना करने में कोई अड़चन नहीं। जब पत्थर, नदी, वृक्ष, पौधों को भगवान माना जा सकता है और उनकी पूजा की जा सकती है तो मनुष्य शरीर धारी आत्मा के प्रति वैसी मान्यता बनाने में क्या कठिनाई हो सकती है?
उपासना।
उपासना की श्रेष्ठता निकृष्टता नापी जाती है, यद्यपि बाहर से सभी भक्तों की पूजा उपासना एक समान दिखाई पड़ती है। तीन पतिव्रताओं और चार भक्तों की बाह्य स्थिति में कोई अन्तर नहीं होता, आचरण इन सबका समान होता है पर अन्तःस्थिति के कारण उनकी श्रेष्ठता एवं निकृष्टता का स्वरूप अलग-अलग ही रहता है और उन्हें लाभ भी उसी आधार पर न्यूनाधिक प्राप्त होता है। वेश्या और पत्नी का शारीरिक आचरण एक-सा होने पर भी उनकी भावना के कारण प्रतिफल में भारी अन्तर रहना स्वाभाविक ही है।
उपासना की श्रेणी में नहीं आती वरन् लालची का एक भौतिक उद्योग मात्र ही उसे माना जाता है। ऐसे उद्योगों का भी कुछ तो फल होता ही है, कई बार तो इतने से भी आश्चर्यजनक परिणाम होते देखे गये हैं। असंभव दीखने वाले काम बनते और पर्वत के समान आपत्तियों के पहाड़ रज राई होते देखे गये हैं। आर्थिक तंगी, सन्तान का अभाव, बीमारी, पारिवारिक कलह, शत्रुओं का प्रकोप, प्रगति पथ में बाधा आदि अनेकों अड़चनें छोटी-मोटी उपासनाओं से भी हल होती देखी गई हैं। पर कई बार ऐसा भी होता है कि पर्वत समान कठिन प्रारब्ध और पुण्य पूँजी की समाप्ति के कारण उत्पन्न हुई दरिद्रता थोड़ी-सी उपासना से नहीं भी दूर होती।
उपासना वाले को भौतिक लाभ नहीं मिलता ऐसी बात नहीं। उसका स्तर ऊँचा रहने से कामनाशील की अपेक्षा कहीं अधिक लाभ मिलता है। गायत्री के द्वारा जहाँ आत्मिक प्रगति होती है वहाँ भौतिक सफलताओं का पथ भी प्रशस्त होता है। अग्नि, जल, सूर्य, चन्द्र, नदी, समुद्र आदि जड़ पदार्थ जब अपना गुण नहीं छोड़ते तो सर्वशक्तिमान अनादि महा शक्ति गायत्री की भक्तवत्सलता और अहैतुकी कृपा करने की विशेषता कहाँ चली जायगी? माता का पुत्रों के प्रति स्वाभाविक स्नेह होता है, गायत्री माता भी अपने पुत्रों पर शरीर को जन्म देने वाली जननी से भी कहाँ अधिक कृपा और करुणा का भाव रखती हैं फिर वे अपनी कृपा शरणागत पर क्यों न कटेंगी?
उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
उपासना निष्फल तो किसी की नहीं जाती, पर सच्चा लाभ वे ही उठाते हैं जिनने उच्चस्तरीय उपासना का अवलम्बन किया है। इस प्रकार के व्यक्तियों में से एक को भी असफलता की शिकायत करते नहीं सुना। उतावले, श्रम की तुलना से अधिक लाभ प्राप्त करने के लोभी, अश्रद्धालु और केवल कौतुक एवं परीक्षण की दृष्टि से थोड़ा भी प्रयोग करने वाले लोग भी निराशा व्यक्त करते देखे जाते हैं और उन्हीं का उत्साह स्वल्प-साधना के पश्चात शिथिल एवं समाप्त होते देखा जाता है।
उपासना बहुत थोड़ी फल देती है। उच्चस्तरीय साधना से ही वह परिणाम होता है जिसके आधार पर शास्त्रों में वर्णित गायत्री महात्म्य का सत्य माना जा सके। विगत 24 वर्षों से हम गायत्री उपासना की शिक्षा सर्व साधारण को देते रहे हैं। इस महामंत्र की महत्ता जन-मानस में प्रवेश कराने के लिए व्यापक आन्दोलन गठित करके लाखों व्यक्तियों को इस मार्ग पर लगाया है। इन पर हुए प्रयोग का अनुभव कि गायत्री उपासना निष्फल तो किसी की नहीं जाती, पर सच्चा लाभ वे ही उठाते हैं जिनने उच्चस्तरीय उपासना का अवलम्बन किया है।
उपासना से लाभ सीमित और हानि अधिक है। आध्यात्मिक प्रगति की सम्भावना तो उससे बनती ही नहीं, क्योंकि जब आत्म कल्याण की बात सोची ही नहीं गई थी, सकाम प्रयोजन को ही ध्यान में रखा गया था तो आत्मिक लाभ मिलता भी कैसे? यह हानि निष्काम उपासना में बिलकुल नहीं वरन् दुहरा लाभ है। आत्मिक प्रगति-सद्बुद्धि की उपलब्धि तो उसमें निश्चित रूप से होती है और जितना लाभ सकाम उपासना से मिलना चाहिए उतना लौकिक लाभ भी मिल ही जाता है। निराश या क्षुब्ध होने की गुँजाइश इसलिए नहीं रहती कि जब तुच्छ स्वार्थ के लिए किया ही नहीं गया था तो असफलता मिलने पर भी खिन्नता क्यों आवेगी?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-April
उपासना का क्रम बनाया। पड़ोस वालों ने देखा तो लगे उपहास करने। बस उसका उत्साह ढीला पड़ गया। ऐसी अवस्था में सत्य की खोज करना एवं अपनी दुर्बलताओं से जूझना कहाँ बन पड़ेगा? पर दूसरे वे होते हैं जो यह मानते हैं कि उपहास करने वाले व्यक्ति हमें बुराइयों से सावधान रखने वाले पहरुये हैं।
उपासना का महत्व कम करने की बात किसी को सोचनी भी न चाहिए। यहाँ ऐसा कुछ नहीं कहा जा रहा है कि नियमित विधिवत् साधना बन्द करके केवल ध्यान प्रार्थना ही करते रहा जाय यह तो घाटे की बात होगी। नियमित साधना का अपने स्थान पर अपना महत्व है। उससे एक प्रकार का योगाभ्यास होता है। सूक्ष्म शरीर के चक्रों और उपत्यकावडडडडडडडडड का जागरण होता है और संस्कारों में दृढ़ता आती है।
उपासना की जा सके तो सर्वोत्तम है। पर यदि किसी कारणवश वैसा न बन पड़े तो प्रातः नींद खुलने से लेकर शैया त्याग तक का जो समय मिलता है, उसमें पूर्व-संध्या और रात को सोते समय शैया पर जाने से पहले निद्रामग्न होने तक का जो समय मिलता है उसमें उत्तर-संध्या की जा सकती है। यह दोनों समय हर व्यक्ति के पास सुविधा के रहते ही हैं। व्यस्तता का बहाना इन क्षणों के लिए तो बनाया भी नहीं जा सकता। प्रार्थना के लिए यह समय सर्वोत्तम है।
उपासना जिनसे बन पड़े वे उसे भी किया ही करें।
उपासना करने वालों की भाव प्रार्थना तो इस समय भी होनी चाहिए। मानसिक उपासना बिना किसी पूजा उपकरण एवं शुद्धि के भी चारपाई पर पड़े-पड़े भी मनोभाव, श्रद्धा, विश्वास एवं ध्यान धारणा के आधार पर भी हो सकती है। इसे तो अनिवार्य ही मानना चाहिए। विधिवत उपासना जिनसे बन पड़े वे उसे भी किया ही करें।
उपासना बिना किसी पूजा उपकरण एवं शुद्धि के भी चारपाई पर पड़े-पड़े भी मनोभाव, श्रद्धा, विश्वास एवं ध्यान धारणा के आधार पर भी हो सकती है। इसे तो अनिवार्य ही मानना चाहिए। विधिवत उपासना जिनसे बन पड़े वे उसे भी किया ही करें।
उपासना, परमार्थ कला आदि की साधना में उपयोग किया है, और इतना लाभ उठाया है जितना सामान्य व्यक्ति पूरे समय उसी कार्य में लगे रहने पर उठा सकते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-November
उपासनाओं से प्राप्त होता है वह मनुष्य को सेवा के द्वारा सहज ही मिल जाता है। स्व. वल्लभ भाई पटेल ने कहा है “गरीबों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।” गौतम बुद्ध ने यही कहा है- “जिसे मेरी सेवा करनी है वह पीड़ितों की सेवा करे।” सेवा के महान् व्रती बापू ने कहा था “लाखों गूँगों के हृदय में ईश्वर विराजमान हैं, मैं इन लाखों की सेवा के द्वारा ही ईश्वर की पूजा करता हूँ।” सेवा से मनुष्य का तन, मन, धन सब कुछ पवित्र बन जाता है।
उपासना की यह त्रिवेणी भी कल्पवास के उपयुक्त ही है। आन्तरिक कायाकल्प और दूध-कल्प, छाछ-कल्प, शाक-कल्प, अन्न-कल्प आदि की योजनायें इस अवसर को सच्चे अर्थों में कल्पवास बना देंगी। इसी बीच में माता सरस्वती का जन्म दिन बसन्त पंचमी पर्व भी पड़ता है। अखण्ड-ज्योति की, हमारी साधना जीवन की जयन्ती भी उसी दिन है। इन कारणों से भी यह माघ मास अधिक शुभ अवसर बन जाता है।
उपासना का वह अभ्यास करने लगा। आहार-विहार में उसने कठोरता और संयम प्रारम्भ किया। देह-दमन और तरह-तरह की यातनाएँ सहन करके देखीं, किंतु सुखों की कल्पना का वह सर्वथा त्याग नहीं कर सकता। कठोर तपश्चर्या के कारण भी उसकी वह इच्छा समाप्त न हुई तो लगा जैसे जीवात्मा मौलिक रूप से आनन्द प्राप्ति की कामना से ही इस संसार में अवतरित हुई है और जब तक उसकी यह आकाँक्षा सही रूप से तृप्त नहीं होती है तब तक उसके जीवन में हलचल, उद्यम और उद्योग बने ही रहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-December
उपासनाओं की सफलता वैसे ही अधिक संभावित हो जाती है जैसे खेत को भली प्रकार जोतने के बाद बोये गये बीज के उगने का विश्वास रहता है। जो लोग लम्बे समय में अपनी उपासना करते रहे हैं और आवश्यक लाभ न मिलने की शिकायत करते रहते हैं उन्हें चान्द्रायणव्रत के साथ वह साधना करने के उपराँत वैसी निराशा का कोई कारण नहीं रहता। गायत्री तपोभूमि जैसे पुण्य तीर्थ में रहकर की हुई गायत्री उपासना सोने में सुगन्ध का काम करती है फिर उसके साथ चान्द्रायणव्रत का समन्वय हो जाने पर तो उसे शुद्ध स्वर्ण के रत्नजटित आभूषण की तुलना दी जा सकती है। ऐसी साधना किसी के लिए भी सन्तोष-जनक सिद्ध हो सकती है।
उपासना आदि भजन साधनाओं को सफलता में सबसे बड़ी बाधा आत्मिक मलीनता की ही होती है। चान्द्रायणव्रत का आश्रय लेने पर अन्य उपासनाओं की सफलता वैसे ही अधिक संभावित हो जाती है जैसे खेत को भली प्रकार जोतने के बाद बोये गये बीज के उगने का विश्वास रहता है। जो लोग लम्बे समय में अपनी उपासना करते रहे हैं और आवश्यक लाभ न मिलने की शिकायत करते रहते हैं उन्हें चान्द्रायणव्रत के साथ वह साधना करने के उपराँत वैसी निराशा का कोई कारण नहीं रहता। गायत्री तपोभूमि जैसे पुण्य तीर्थ में रहकर की हुई गायत्री उपासना सोने में सुगन्ध का काम करती है फिर उसके साथ चान्द्रायणव्रत का समन्वय हो जाने पर तो उसे शुद्ध स्वर्ण के रत्नजटित आभूषण की तुलना दी जा सकती है। ऐसी साधना किसी के लिए भी सन्तोष-जनक सिद्ध हो सकती है।
उपासनाओं और व्रत तप साधनों के माहात्म्य धर्म ग्रन्थों में लिखे मिलते हैं। इनकी ओर हमारा उतना ध्यान नहीं जा पाता था पर अज्ञात वास से लौटने के बाद तपोभूमि में आने वाले साधकों की शारीरिक चिकित्सा में थोड़ी अभिरुचि लेनी जब शुरू की और प्राकृतिक चिकित्सा के संदर्भ में कुछ रोगियों को चान्द्रायणव्रत कराये तो उसके प्रतिफल को देखकर यह विश्वास बहुत बढ़ा कि यह तपश्चर्या आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं शारीरिक दृष्टि से भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आध्यात्मिक लोगों के विषय में तो अप्रत्यक्ष होने के कारण उन्हें संदेहास्पद भी कहा जा सकता है पर शारीरिक लाभ तो पूर्ण प्रत्यक्ष होने के कारण उनमें किसी प्रकार के सन्देह की भी गुंजाइश नहीं है। शरीर-शोधन की उसे एक अनुपम पद्धति कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी।
उपासना, कर्म-काण्ड यहाँ तक कि लोगों ने स्वयं भगवान के नाम को भी पैसा कमाने का साधन बना लिया है। जगद्गुरु आजकल कौन हैं? जिनके पास बड़े-बड़े मठ हैं, जो सोने, चाँदी के बर्तनों का उपयोग करते हैं, बहुत से नौकर हैं, रेशम पहनते हैं, बड़े ठाट-बाट के साथ जिनकी हाथी, मोटरों पर सवारियाँ निकलती हैं। समाज में बड़ा किसको माना जाता है? जिसके पास पैसा है।
उपासना की कुछ प्रक्रिया कुछ विशेष व्यक्तियों को आरम्भ कराने जा रहे हैं। इसमें हमारा व्यक्तिगत सहयोग और अनुदान भी उन साधकों को मिलेगा। यों साधारण साधना सभी उपासक करते हैं। पंचकोशी उपासना भी कितने ही लोग कर रहे हैं। यह शास्त्रीय विधान है जिसे बताना हमारे लिए आवश्यक ही था।
उपासना कर लो या धन की।” घर में बढ़ा हुआ धन मनुष्य को उसी तरह नष्ट कर सकता है, जैसे नाव में बढ़ा हुआ जल, इसीलिए सन्त कबीरदास जी ने कहा है—
उपासना को बढ़ाते हुए उसी प्रकार आध्यात्मिक मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ने का अवसर प्राप्त करेंगे जैसा कि हमें प्राप्त करने का सौभाग्य मिलता रहा है।
उपासना सोने में सुगन्ध का काम करती है फिर उसके साथ चान्द्रायणव्रत का समन्वय हो जाने पर तो उसे शुद्ध स्वर्ण के रत्नजटित आभूषण की तुलना दी जा सकती है। ऐसी साधना किसी के लिए भी सन्तोष-जनक सिद्ध हो सकती है।
उपासना करते हुए चञ्चलता एवं असंयम का पूर्णतया त्याग करके एक दिन गृहस्थ-जीवन को विशुद्ध बनाने की स्थिति में भी पहुँच जाना ही आवश्यक होता है।
उपासना की भाँति ही उन्हें लोकसेवा में भी अभिरुचि हो। एकाँगी अभिरुचि वाले व्यक्ति हमारी दृष्टि से आधे अध्यात्मवादी हैं उन्हें एक टाँग का, एक हाथ का, एक आँख का, अर्धांग, बात पीड़ित ही कहा जायगा। फौज में डाक्टरी मुआयने में ‘फिट’ युवक ही भर्ती होते हैं। हमारा उत्तराधिकार उन्हें मिलेगा, हमारे प्रतिनिधि वे होंगे जो साधना में ही नहीं लोक सेवा में भी समुचित अभिरुचि लेंगे। युग-निर्माण योजना इसी प्राथमिक परीक्षा के रूप में हमने अपने परिजनों के सम्मुख प्रस्तुत की है।
उपासना करते रहे हैं और आवश्यक लाभ न मिलने की शिकायत करते रहते हैं उन्हें चान्द्रायणव्रत के साथ वह साधना करने के उपराँत वैसी निराशा का कोई कारण नहीं रहता। गायत्री तपोभूमि जैसे पुण्य तीर्थ में रहकर की हुई गायत्री उपासना सोने में सुगन्ध का काम करती है फिर उसके साथ चान्द्रायणव्रत का समन्वय हो जाने पर तो उसे शुद्ध स्वर्ण के रत्नजटित आभूषण की तुलना दी जा सकती है। ऐसी साधना किसी के लिए भी सन्तोष-जनक सिद्ध हो सकती है।
उपासना के क्षेत्र में अनेक व्यक्ति अपने आपको अध्यात्म-वादी कहते मानते रहते हैं पर उनकी सीमा अपने आप तक ही सीमित है। इसलिए तत्वतः वे भी संकीर्ण व्यक्ति वादी ही कहे जा सकते हैं।
उपासना भी करते हैं किन्तु मन विषयों से हटता नहीं। बुराइयाँ हर क्षण मस्तिष्क में आती रहती हैं। जब ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं तो लगता है मन ही सब कुछ है, वही जीवन की सम्पूर्ण गतिविधियों का सञ्चालन करता है।
उपासना भी कितने ही लोग कर रहे हैं। यह शास्त्रीय विधान है जिसे बताना हमारे लिए आवश्यक ही था। कुछ विशेष उपलब्धियाँ इस क्षेत्र में ऐसी भी हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए साधकों को स्वयं तो प्रयत्न करना ही होगा, साथ ही हमारा प्रयास भी कम न होगा। दोनों मिलकर ही उसे सफलता एवं पूर्णता की मंजिल तक पहुँचा सकेंगे। इस साधना प्रयास में लगे हुए व्यक्ति हमारे आध्यात्मिक प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी कहे जा सकेंगे।
उपासना की अवश्य है पर व्यक्ति बाद की नहीं। अध्यात्म को हमने सदा उदारता, सेवा और प्रस्ताव की कसौटी से कसा है और स्वार्थी को खोटा एवं परमार्थी को खरा कहा है। अखण्ड-ज्योति परिवार में दोनों ही प्रकार के खरे-खोटे लोग मौजूद हैं। अब इनमें से उन खरे लोगों की तलाश की जा रही है जो हमारे हाथ में लगी हुई मशाल को जलाये रखने में अपना हाथ लगा सकें, हमारे कंधे पर लदे हुए बोझ को हलका करने में अपना कंधा लगा सकें। ऐसे ही लोग हमारे प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी होंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-January
उपासना अभीष्ट है उतनी करते रहा जाय पर अधिक जोर बाह्य जीवन को सुसंगत बनाने के लिए ही दिया जाय। लौकिक-जीवन को सुविकसित एवं सुसंस्कृत बना लेना भी एक आध्यात्मिक साधना ही है। उसका प्रतिफल भी लौकिक सफलताओं एवं सुसंबद्धताओं के रूप में ही उपलब्ध होता है। इस सफलता के बाद उच्च स्तरीय आध्यात्मिक साधनाएँ सरल हो जाती हैं और उनकी सफलता में भी कठिनाई नहीं आती। जो साधक जप-तप तो बहुत करते है किन्तु लौकिक जीवन निकृष्ट बनाये रहते हैं उनको प्रायः निराश ही रहना पड़ता है।
उपासना का प्रशिक्षण गत तीन वर्षों से किया जा रहा है। इस आधार पर अनेकों साधकों ने आशाजनक प्रगति की है। उन्हें घर में रहते हुए एक-दो घण्टा नित्य लगाकर की जा सकने वाली इस साधना से ऐसे उत्साहवर्धक अनुभव हुए हैं जैसे गिरि गुफाओं में दीर्घकाल से रहने वाले योगीजनों को भी नहीं हो पाते। किन्तु साथ ही ऐसे भी अनेक साधक हैं जिन्हें मन को एकाग्र करने की समस्या का हल भी अभी तक नहीं मिला है। लकीर पीटने की तरह वे कुछ करते तो रहते हैं पर न तो उन्हें प्रकाश मिलता है और न आनन्द ही आता है।
उपासना का भी एक नियमित कार्यक्रम बना लेना चाहिये। तीस दिनों में सवालक्ष गायत्री का जप अनुष्ठान करने के लिए प्रतिदिन 42 माला जप करना पड़ता है। उसमें प्रायः 4 घण्टे लगते हैं। प्रातः ढाई-तीन घण्टे सायंकाल एक-डेढ़ घण्टा लगाने से यह उपासना आसानी से पूर्ण हो जाती है।
उपासना, जीवन-शोधन एवं युग-निर्माण के लिए कुछ रचनात्मक कार्य करने का उद्देश्य लेकर ही हम लोग मिलते-जुलते हैं और इसी आधार पर विचार विनिमय भी होता है।
उपासना का स्थान प्रत्येक हिन्दू के जीवन में हो, ऐसा निरन्तर प्रयास करूंगा। अन्य धर्मावलम्बी अपने ढंग से ईश्वर का नाम ले पर उपासना को दैनिक जीवन का अंग ही माना करें ऐसी आस्था जमाने के लिए जो संभव होगा सो सब कुछ करूंगा। जीवन-शोधन और परमार्थ की दिशा में उत्साह पैदा करने के जो प्रयत्न करने पड़ेंगे उनमें कमी न रहने दूँगा। सर्वांगपूर्ण अध्यात्म अपनाने से इसी जीवन में स्वर्गीय आनन्द और सन्तोष का अनुभव हो सकता है यह समझाने के लिये घर-घर भ्रमण करूंगा।
उपासना विधि एक-सी रहने पर भी प्रगति में बहुत भारी अन्तर पाया जाता है।
उपासना में संलग्न रहते हुए शास्त्र की आज्ञानुसार परिव्राजक रूप में घूमता रहता हूँ। तीन दिन से अधिक एक स्थान पर नहीं ठहरता। धर्म-शिक्षा संन्यासी के लिए एक धर्म कर्त्तव्य मानी गई है इसलिए जब से कषाय वस्त्र धारण किये हैं तब से इसी गतिविधि को अपनाये हुए हूँ। हिन्दी भाषी चारों ही प्रान्त उत्तर-प्रदेश, बिहार, मध्य-प्रदेश और राजस्थान मेरे भ्रमण क्षेत्र हैं। ‘अखण्ड-ज्योति’ का गत बीस वर्ष से पाठक हूँ।
उपासना आसानी से पूर्ण हो जाती है।
उपासना को दैनिक जीवन का अंग ही माना करें ऐसी आस्था जमाने के लिए जो संभव होगा सो सब कुछ करूंगा। जीवन-शोधन और परमार्थ की दिशा में उत्साह पैदा करने के जो प्रयत्न करने पड़ेंगे उनमें कमी न रहने दूँगा। सर्वांगपूर्ण अध्यात्म अपनाने से इसी जीवन में स्वर्गीय आनन्द और सन्तोष का अनुभव हो सकता है यह समझाने के लिये घर-घर भ्रमण करूंगा।
उपासना के लिए अनुरोध करूंगा। समय चाहे कम ही लगे, भले ही अविधिपूर्वक मानसिक जप और ध्यान कर लिया जाय, पर गायत्री उपासना का स्थान प्रत्येक हिन्दू के जीवन में हो, ऐसा निरन्तर प्रयास करूंगा। अन्य धर्मावलम्बी अपने ढंग से ईश्वर का नाम ले पर उपासना को दैनिक जीवन का अंग ही माना करें ऐसी आस्था जमाने के लिए जो संभव होगा सो सब कुछ करूंगा। जीवन-शोधन और परमार्थ की दिशा में उत्साह पैदा करने के जो प्रयत्न करने पड़ेंगे उनमें कमी न रहने दूँगा। सर्वांगपूर्ण अध्यात्म अपनाने से इसी जीवन में स्वर्गीय आनन्द और सन्तोष का अनुभव हो सकता है यह समझाने के लिये घर-घर भ्रमण करूंगा।
उपासना का आवश्यक लाभ उठाने के लिये अधिक नहीं तो एक चान्द्रायण व्रत करने का अवसर निकालना चाहिए। यों उसे पूरी जानकारी के उपरान्त अपने घरों पर भी किया जा सकता है। पर अच्छा यही है कि अपने स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर की समग्र परिशुद्धि की दृष्टि से किसी अनुभवी व्यक्ति के सान्निध्य में ही उसे किया जाय। अखण्ड-ज्योति के अगले अंकों में चान्द्रायणव्रत सम्बन्धी पेचीदगियों का वर्णन किया जायगा जिसे पूरी तरह समझ लेने के उपरान्त ही किसी को अपने आप करने की बात सोचनी चाहिए। लाभ की बात सोचकर अविधिपूर्वक कदम उठाने लगने की जल्दबाजी कई बार अहितकर भी सिद्ध होती है।
उपासना, अर्चना है। “यद्यत् कर्म प्रकुर्वीत तद् ब्रह्माँणि समर्पयेत्।” हम जो कुछ भी करें, हमारा जो कुछ भी है, सब कुछ परमात्मा को, परम प्रभु को समर्पण करें। विश्व भुवन की समस्त चेष्टाओं के प्रेरक परम प्रभु को अपनी सकल चेष्टाओं का समर्पण करके स्वयं को मुक्त बन्धनरहित, आनन्दमय बना सकेंगे तभी जीवन की चिरसाध पूरी होगी?
उपासना के साथ-साथ स्वाध्याय रूप में सर्वत्र होने लगे उसके लिए शक्तिभर प्रयत्न करूंगा। 25 हजार संकल्प पुस्तकों के बेचने तथा वितरण कराने का कार्य अगले वर्ष में अकेला पूरा करूंगा। सत्संकल्प के प्रत्येक वाक्य की व्याख्या स्वरूप आचार्यजी एक-एक सर्वांग सुन्दर सस्ता ट्रैक्ट तैयार कर रहे हैं। इन ट्रैक्टों को युग-निर्माण की पाठ्य पुस्तक की तरह पढ़ा समझा और मनन किया जाय इसके लिये हर जगह पूर्व सूचना एवं प्रेरणा देकर लोगों में उसकी प्रतीक्षा करने की उत्सुकता पैदा करूंगा।
उपासना विधानों की तरह व्यवहारिक जीवन को उत्कृष्ट एवं परिष्कृत बनाना भी आवश्यक है। इसके बिना कठोर साधना भी निरर्थक सिद्ध होती है।
उपासना के क्षेत्र में उस प्रयोग की प्रथा आजकल प्रचलित है। प्रकाश जिस चीज पर भी पड़ेगा वही चमकने लगेगी। आग के संपर्क में जो भी चीज आवेगी वही गरम हो जायगी। बर्फ का स्पर्श जिससे भी कराया जायगा वही ठण्डा होगा। रंग से जो भी चीज रंगी जायगी उसका वर्ण उसी प्रकार का दीखने लगेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-June
उपासना करने वाला इस महामंत्र के देवता सविता का उचित विनियोग कर सकता है।
उपासनाएं देर में फल देती हैं। बरगद की तरह वे धीरे-धीरे बढ़ती है- समय पर परिपक्व होकर साधक का कल्याण करती हैं और चिरस्थायी फल देती हैं। इसमें धैर्यवान साधक ही सफल होते हैं। पर ताँत्रिक साधना में यह बात नहीं है। उससे लाभ तो निम्न स्तर का ही मिलता है और वह ठहरता भी थोड़े दिन है।
उपासना का समुचित लाभ मिल सके। कपड़े पर रंग तभी ठीक चढ़ता है जब उसे पहले अच्छी तरह धो लिया जाय। मैला कुचैला कपड़ा रंग के महत्व को भी नष्ट कर देता है। अपनी दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों को शोधन करते हुए जो साधना की जाती है उसका समुचित लाभ मिलता ही है। यह धैर्यपूर्वक साधना करने वालों के लिए ही संभव है।
उपासना को आरंभ कीजिए। सफलता मिलेगी। प्रसन्न मन माधवाचार्य पुनः वृन्दावन लौट आये। उन्होंने पुनः गायत्री उपासना आरंभ की और फलस्वरूप उन्हें आशाजनक प्रतिफल प्राप्त हुआ।
उपासना में वे नित्य ही बहुत समय लगाते पर साथ ही यह भी विचार करते थे कि देश में अनेकों मत-मतान्तरों के कूड़े-करकट ने वेद-धर्म को पूरी तरह पराजित कर रखा है उसका भी तो उद्धार किया जाना चाहिए। ब्राह्मण का धर्म और संस्कृति की सुरक्षा के लिए जागरुक प्रहरी की तरह जो कर्त्तव्य पालन करना आवश्यक है, वह भी तो करना चाहिए। उन्होंने समग्र अध्यात्म को अपने जीवन में उतारा। भावनापूर्वक उपासना की, जीवन को अधिकाधिक पवित्र और निस्पृह बनाया, साथ ही लोक सेवा के लिए सामर्थ्य भर प्रयत्न करने का भी निश्चय किया। आर्ष अध्यात्म का स्वरूप भी यही है।
उपासना के कारण आपको इतना ब्रह्म-तेज उत्पन्न हो गया है कि उसकी प्रखरता में सहन नहीं कर सकता और आपके सामने नहीं आ सकता। जो कहूँगा पीछे से ही कहूँगा। इस पर माधवाचार्य को भारी आश्चर्य हुआ और उनने प्रश्न किया-यदि गायत्री उपासना का ऐसा ही महत्व है तो कृपया बताइयेगा कि 13 वर्ष तक कठोर तप करते रहने पर भी मुझे कोई अनुकूल अनुभव क्यों नहीं हुआ? आप इसका रहस्य बता सकें तो मेरे लिए इतना ही पर्याप्त होगा। जब आप गायत्री तेज के सामने प्रकट होने में भी असमर्थ हैं तो आपके द्वारा दिये हुए छोटे-मोटे उपहारों से मेरा काम भी क्या चलेगा?
उपासना करने वाले को सचमुच सब कुछ प्रदान करती है। कोई वस्तु ऐसी नहीं जो इस कामधेनु की सम्यक् सेवा करने वाले की उपलब्ध न हो सकती हो।
उपासना करनी चाहिए जो हमें सत्प्रवृत्तियों की ओर प्रेरणा देता है।
उपासना की, जीवन को अधिकाधिक पवित्र और निस्पृह बनाया, साथ ही लोक सेवा के लिए सामर्थ्य भर प्रयत्न करने का भी निश्चय किया। आर्ष अध्यात्म का स्वरूप भी यही है। इस त्रिविध कार्यक्रम को अपनाये बिना न कोई अध्यात्मवादी बन सकता है और न साधु संन्यासी कहला सकता है। शंकराचार्य न तो आलसी थे, न अविवेकी, न आडम्बरी फिर उन्हें सत्य को अपनाने में अड़चन ही क्या हो सकती थी?
उपासना करते हैं।
उपासना द्वारा तेजस्वी कर्ण को जन्म दिया था। गायत्री जप करते समय सूर्योन्मुख रहने का विधान है। प्रातः पूर्व की ओर सायं पश्चिम की ओर, मध्याह्न उत्तर की ओर मुख करके जप करने का जो विधान है उसमें सूर्योन्मुख रहना ही कारण है। जहाँ गायत्री का प्रतिमा-विग्रह स्थापित नहीं होता वहाँ सूर्य को ही गायत्री का प्रतीक मानकर उसके सम्मुख जप करने का विधान बना हुआ है। जप के साथ सूर्योपस्थान, सूर्य अर्घ्यदान, सूर्य-स्तवन की प्रक्रिया इसी से जुड़ी है कि गायत्री के देवता सविता का अर्चन भी यथोचित रूप से होता रहे।
उपासना के लिए कुछ अधिक भावनाशील हो, उन सब स्वजनों को यह कहा जा रहा है कि वे अपने व्यक्तित्व और अपने परिवार तक ही सीमित न रहें वरन् इससे आगे बढ़ कर जन-जीवन को सुविकसित करने के लिए कुछ बड़े क्षेत्र में काम करें। कम से कम अपनी विचारधारा के व्यक्तियों से संपर्क बनाने उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए कुछ समय देते रहने को तैयार हो ही जायें। ऐसा सेवा कार्य ईश्वर उपासना या आत्मकल्याण की साधना में किसी भी प्रकार कम नहीं है। जिसने यह आदर्श स्वीकार कर लिया है और जो लोक-सेवा का परमार्थ करने के लिए घर से बाहर भी कुछ समय देने लगे हैं उन्हें अखण्ड-ज्योति परिवार का ‘शाखा संचालक’ कहा जाता है।
उपासना, उसे गायत्री कहा जाता है। शास्त्रकारों ने इसे ही, सबसे बड़ा तीर्थ बताया है। ‘जनाः सैस्तरन्ति तानि तीर्थानि’ अर्थात् मनुष्य जिसके सहारे पार होते हैं वही तीर्थ है। त्राण करने की, पार करने या उद्धार करने की क्षमता से सम्पन्न होने के कारण गायत्री को तीर्थ कहा जाता है। ‘ग‘ से गंगा, ‘य’ से यमुना, ‘त्र’ से त्रवेणी।
उपासना और धर्म परायणता का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने वाली माता टैरीजा के सत्प्रयत्नों के लिए किस अभागे का श्रद्धा से मस्तक झुक न जायेगा। मनीला की ‘रैमोन मैग्सासे पुरस्कार समिति’ ने अपना 10 हजार डालर का विश्वबन्धुत्व पुरस्कार दो वर्ष पूर्व ही उन्हें प्रदान किया है और भारतीय गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति ने उन्हें ‘पद्मश्री’ पदक देकर भारत की सराहनीय सेवा के लिए उनका सम्मान प्रदर्शित किया।
उपासना करनी चाहिए पर साथ ही जीवन शोधन और परमार्थ कार्यक्रमों को अपनाये रहने का भी पूरा ध्यान रखना चाहिए। सन्मार्ग पर चलना ही आत्म-बल बढ़ाने का अमोघ साधन है।
उपासना करने वाले की मनोभूमि पवित्र हो। इस ओर उपेक्षा बरती गई तो फिर उन लाभों की आशा नहीं करनी चाहिए जो अध्यात्म-मार्ग पर चलने वाले को मिलते हैं। ईश्वर-प्राप्ति और आत्म-कल्याण की साधना में सफलता उसी को मिलती है जो अपना आत्मशोधन करने के लिए प्रायः प्रारंभ से प्रयत्न करता है। ऐसे साधकों की थोड़ी-सी उपासना भी उन्हें उसके लक्ष्य तक पहुँचा देती हैं। इसके विपरीत यदि अन्तःकरण पाप अंक में डूबा रहा तो भजन से भी कुछ काम न चलेगा।
उपासना की तरह ही लोकहित के आयोजनों में समय लगाना भी आवश्यक है। यह उभय विधि प्रशिक्षण एक वर्ष की अवधि में जो प्राप्त किया जायेगा उसे भावी जीवन में निष्ठापूर्वक करते रहने से मानव शरीर को सार्थक बनाने और लक्ष्य को प्राप्त करने का भी सहयोग बन सकता है।
उपासना का विधान और कर्म-काण्ड सर्व विदित है। गायत्री महाविज्ञान ग्रंथ में उसका साँगोपाँग वर्णन हो चुका है। प्रायः सभी साधक उस ऋषि प्रणीत शास्त्र सम्मत परम्परा को अपनाते हुए जप तप करते हैं पर देखा जाता है कि किसी को आशाजनक लाभ होता है और किसी की प्रगति अवरुद्ध पड़ी रहती। एक ही विधान को अपनाते हुए एक समान काम करने वाले व्यक्तियों में से जब किसी को स्वल्प, किसी को अधिक लाभ मिलता है तो इसके अन्तर का कारण ढूंढ़ते हुए एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना होता है कि सत् तत्व की- सात्विकता की न्यूनता ही इस अन्तर का एकमात्र कारण रहता है। सत्यवान को सावित्री कभी त्याग नहीं सकती।
उपासना करने में संलग्न रहते थे। लगातार 13 वर्ष उन्हें विधि-पूर्वक पुरश्चरण करते हुए बीत गये पर कोई विशेषता उन्हें अपने में दिखाई न पड़ी। तप का कोई फल दृष्टिगोचर न हुआ तो वे खिन्न रहने लगे और अपनी असफलता से खीज कर वे वृन्दावन छोड़ काशी के लिए चल दिये।
उपासना में संलग्न महर्षि गौतम की शरण में गई। दयार्द्र गौतम ने जन कल्याण के लिए विशेष तप किया जिससे प्रसन्न होकर भगवती अन्नपूर्णा गायत्री ने उन्हें एक ‘पूर्ण पात्र’ प्रदान किया और उस पूर्णपात्र- के माध्यम से उपलब्ध अन्न से क्षुधार्त जनता की व्यथा दूर हो गई।
उपासना करने वाले दीपक की लौ या सूर्य के समान प्रकाशवान तेज बिन्दु का ध्यान करते हुए गायत्री जप करते हैं। अपने भीतर उस महातेज को ओत-प्रोत करने के संबंध में ए.ड. 1। 2 में सूर्यः चक्षुः भूत्वा अक्षिणी प्रावशित्। की भावना अपनाने का निर्देश किया गया है। नेत्रों के माध्यम से सूर्य मुझ में प्रकाश रूप प्रवेश करता हुआ रोम-रोम को प्रकाशवान कर रहा है।
उपासना का सभी शास्त्रों और ऋषियों ने एक स्वर से महत्व स्वीकार किया है। इस महाशक्ति की आराधना करने वाले को अपनी मनोभूमि अधिक पवित्र रखनी चाहिए। जिस प्रकार शुद्ध स्थान, शुद्ध शरीर, शुद्ध वस्त्र एवं शुद्ध पूजा उपकरणों की साधना में आवश्यकता है उसी प्रकार उपासक को अपनी मनोभूमि शुद्ध रखने का भी प्रयत्न करना चाहिए। कहा भी है-
उपासना आरंभ की और फलस्वरूप उन्हें आशाजनक प्रतिफल प्राप्त हुआ।
उपासना करें।
उपासना का ऐसा ही महत्व है तो कृपया बताइयेगा कि 13 वर्ष तक कठोर तप करते रहने पर भी मुझे कोई अनुकूल अनुभव क्यों नहीं हुआ? आप इसका रहस्य बता सकें तो मेरे लिए इतना ही पर्याप्त होगा। जब आप गायत्री तेज के सामने प्रकट होने में भी असमर्थ हैं तो आपके द्वारा दिये हुए छोटे-मोटे उपहारों से मेरा काम भी क्या चलेगा?
उपासना या आत्मकल्याण की साधना में किसी भी प्रकार कम नहीं है। जिसने यह आदर्श स्वीकार कर लिया है और जो लोक-सेवा का परमार्थ करने के लिए घर से बाहर भी कुछ समय देने लगे हैं उन्हें अखण्ड-ज्योति परिवार का ‘शाखा संचालक’ कहा जाता है।
उपासना भी उन्हें उसके लक्ष्य तक पहुँचा देती हैं। इसके विपरीत यदि अन्तःकरण पाप अंक में डूबा रहा तो भजन से भी कुछ काम न चलेगा।
उपासना भगवती गायत्री की है। इसके बिना जीव का उद्धार नहीं हो सकता।
उपासना की सर्वश्रेष्ठ पद्धति जनसेवा में अपने जीवन का उत्सर्ग करके आत्म-कल्याण का पथ अपनाया और अपने निश्चित लक्ष्य में बालकपन समाप्त कर जीवन का उदयकाल आरंभ होते ही वे जुट गई।
उपासना के लिए विश्व मानव को सत्यं शिवं सुन्दर से समलंकृत करने की आराधना के लिए अहिर्निशि निष्ठापूर्वक कार्य किया। ऋषि ऐसे ही लोगों को तो कहते हैं-वेश में नहीं कर्म में उनका ऋषि-तत्व देखा और परखा जा सकता था। ऐसी ही विभूतियों से इस महान देश का मस्तक ऊंचा होता चला आया है और आगे होता रहेगा।
उपासना के लिए मन्दिरों और मूर्तियों का होना अच्छा है किन्तु जगह-जगह पत्थर इकट्ठे कर उन्हें सिन्दूर से रंग कर असंख्य देवी देवताओं पर सिर रगड़ने में हमारा कितना समय बर्बाद होता है? घास बाबा, प्रेत बाबा, पीर, भैरव, भवानी, भूत प्रेत के नाम पर न जाने कितने पत्थरों के सामने हम नाक रगड़ते फिरते हैं, उनसे दुआएं माँगते हैं, पर पीठ फेरने पर चाहे उन पर कुत्ते ही पेशाब क्यों न करें। यह है हमारे अंध-विश्वास का नाटक। स्वामी विवेकानन्द ने एक बार हमें चेतावनी देते हुए कहा था-’जो समाज चौके, चूल्हे तथा बर्तनों को पूजता रहेगा पत्थर-पत्थर पर सिर रखता फिरेगा वह कभी ऊंचा नहीं उठ सकता।’ किसी के बताने पर कि अमुक स्थान पर अमुक देवता ने लीला की थी, या कोई घटना हुई थी तो लोग वहाँ की मिट्टी लेते-लेते गड्ढा कर देते हैं।
उपासना उसी की सफाई में खर्च होती रहती है। आपकी विगत गायत्री साधना ने पूर्व संचित पापों का समाधान कर दिया। अब आप नये सिरे से पुनः उसी उपासना को आरंभ कीजिए। सफलता मिलेगी। प्रसन्न मन माधवाचार्य पुनः वृन्दावन लौट आये।
उपासना की ही भाँति साधना का एक आवश्यक अंग है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-September
उपासना पद्धति, खान-पान, जीवनचर्या भिन्न भिन्न हो सकती है किन्तु भारतीय संस्कृति का प्रवाह सरलता से देखा जा सकता है, अनुभव किया जा सकता है। क्योंकि वैदिक काल से लेकर अब तक यह प्रवाहमान धारा की तरह हमारे जीवन को स्पर्श करती आ रही है, हमें प्रेरणा देती रही है।
उपासना में प्रेम का अभ्यास एक प्रमुख आधार है। ईश्वर की भक्ति करने का अर्थ है - आदर्शवाद। प्रेम के विकास का आधार भी यही है। सच्चे और ईमानदार मनुष्यों के बीच ही दोस्ती बढ़ती और निभती है। धूर्त और स्वार्थी लोगों के बीच तो मतलब की दोस्ती होती है वह जरा- सा आघात लगते ही काँच के गिलास की तरह टूट -फूट कर नष्ट हो जाती है।
उपासना का मूल आधार प्रेम है। जो अपने सजातियों से प्रेम करता है, वही सच्चा ईश्वर भक्त है।
उपासना से बड़े सुख मिलते हैं। यह सुख प्रेम का ही प्रसाद है। प्रेम की पूजा ही परमात्मा की पूजा है। फिर हम भी प्रेमी ही क्यों न बनें?
उपासनाएं शिथिल या बन्द हो गई थीं, उनने उसे इसी गुरु पर्व से पुनः आरम्भ कर दिया है। अपने स्त्री बच्चों से भी किसी-न-किसी रूप में उसे शुरू कराया है। हर घर में, हर परिवार में, हर व्यक्ति में, आस्तिकता का बीजाँकुर पनपने, ईश्वर विश्वास को सुदृढ़ रखने के लिए उपासना में निष्ठा होना आवश्यक है। चरित्र-निर्माण का-आधार आस्तिकता ही हो सकती है। इसलिए अपनी प्रेरणा पद्धति का यह एक आवश्यक अंग रहा है कि किसी-न-किसी रूप में उपासना के लिए अन्य आवश्यक नित्य कर्मों की तरह स्थान रहना चाहिये।
उपासना में निष्ठा होना आवश्यक है। चरित्र-निर्माण का-आधार आस्तिकता ही हो सकती है। इसलिए अपनी प्रेरणा पद्धति का यह एक आवश्यक अंग रहा है कि किसी-न-किसी रूप में उपासना के लिए अन्य आवश्यक नित्य कर्मों की तरह स्थान रहना चाहिये। अस्तु इस गुरु पर्व पर परिवार में जो उपासना करने वाले लोग थे अब उनकी संख्या दूनी से अधिक हो गई है।
उपासना से स्वर्ग की प्राप्ति का जो महात्म्य बताया गया है उनका आधार यही है कि उपासना करने वाले को भक्ति का मार्ग अपनाना पड़ता है। परमात्मा को, आत्मा को, आदर्शवाद को जो भी प्यार करना सीख लेगा उसे अनिवार्यतः प्राणिमात्र से प्रेम का अभ्यास होगा और इस कारण के रहते हुए उसका निवास स्थान एवं समीपवर्ती वातावरण स्वर्गीय अनुभूतियों से ही भरापूरा रहेगा। उपनिषद् का वचन है -- “रसो वैस” अर्थात् प्रेम ही परमात्मा है। बाइबिल में भी इसी तथ्य की पुष्टि की है और मनुष्य को प्रेमी स्वभाव का बनने पर जोर देते हुए कहा है कि जो प्रेमी है वही ईश्वर का सच्चा भक्त कहलायेगा। भक्ति की महिमा से आध्यात्म - शास्त्र का पन्ना - पन्ना भरा पड़ा है।
उपासना निरर्थक नहीं गई। उन्हें परमहंस तक पहुँचा सकने में ही समर्थ हुई।
उपासना के लिए-कहा था, उन्होंने बड़े ही मार्मिक शब्दों में भारतीयों की कमजोरी के बारे में कहा था--”हमारे शस्त्र कितने ही बड़े क्यों न हों, हमारे पूर्वज कितने ही महान् क्यों न हों, लेकिन मैं आपसे स्पष्ट भाषा में कह देना चाहता हूँ कि हम बड़े ही दुर्बल हैं। प्रथमतः हम शरीर से दुर्बल हैं फिर मस्तिष्क से। हम एक साथ मिल नहीं सकते। एक दूसरे से प्रेम नहीं करते। हम तीन मनुष्य एकत्र होते ही एक दूसरे से घृणा करते हैं।
उपासना करने वाले को भक्ति का मार्ग अपनाना पड़ता है। परमात्मा को, आत्मा को, आदर्शवाद को जो भी प्यार करना सीख लेगा उसे अनिवार्यतः प्राणिमात्र से प्रेम का अभ्यास होगा और इस कारण के रहते हुए उसका निवास स्थान एवं समीपवर्ती वातावरण स्वर्गीय अनुभूतियों से ही भरापूरा रहेगा। उपनिषद् का वचन है -- “रसो वैस” अर्थात् प्रेम ही परमात्मा है। बाइबिल में भी इसी तथ्य की पुष्टि की है और मनुष्य को प्रेमी स्वभाव का बनने पर जोर देते हुए कहा है कि जो प्रेमी है वही ईश्वर का सच्चा भक्त कहलायेगा। भक्ति की महिमा से आध्यात्म - शास्त्र का पन्ना - पन्ना भरा पड़ा है।
उपासना के लिए अन्य आवश्यक नित्य कर्मों की तरह स्थान रहना चाहिये। अस्तु इस गुरु पर्व पर परिवार में जो उपासना करने वाले लोग थे अब उनकी संख्या दूनी से अधिक हो गई है।
उपासना करने की अपेक्षा गायत्री-तपोभूमि जैसे पवित्र वातावरण में रहकर इस प्रकार की तपश्चर्या के साथ साधना करने का प्रतिफल कुछ दूसरी ही तरह का होगा। आत्म-बल बढ़ने और अन्तःकरण पर चढ़े हुए, कषाय कल्मषो का शमन करने के लिए यह एक महीना किसी के लिए भी बहुत मूल्यवान सिद्ध हो सकता है।
उपासना करने वाले अगणित भक्तजन जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकने में सफल हुये है। मीरा, सूर, तुलसी, रामकृष्ण परमहंस आदि की साकार उपासना निरर्थक नहीं गई। उन्हें परमहंस तक पहुँचा सकने में ही समर्थ हुई।
उपासना करने वाले लोग थे अब उनकी संख्या दूनी से अधिक हो गई है।
उपासना जिन्हें कठिन पड़ती है वे साकार प्रतिमा बनाकर अपनी भावनाओं को किसी पूजा प्रतीक पर केन्द्रित करते हैं, फलस्वरूप निर्जीव होते हुए भी वह माध्यम सजीव हो उठता है। मूर्ति - पूजा का तत्वज्ञान यही है। यह बात हर कोई जानता है कि देव प्रतिमायें पत्थर या धातु की बनी निर्जीव होती हैं। उनके सजीव होने की बात कोई सोचता तक नहीं। पर यह आध्यात्मिक तथ्य मूर्ति पूजा के माध्यम से प्रकाश में लाया जाता है कि जिस किसी से सच्चा प्रेम किया जायेगा जिसके लिए भी आस्था और श्रद्धा का प्रयोग किया जायेगा वह वस्तु चाहे निर्जीव हो या सजीव, भक्त की भावना के अनुरूप फल देने लगेगी।
उपासना, चान्द्रायण व्रत के साथ करने पर कितनी प्रभावशाली होती है, यह बात कहने की नहीं, वरन् अनुभव करने की ही है। साधारण रीति से -घर के झंझट-भरे वातावरण में उपासना करने की अपेक्षा गायत्री-तपोभूमि जैसे पवित्र वातावरण में रहकर इस प्रकार की तपश्चर्या के साथ साधना करने का प्रतिफल कुछ दूसरी ही तरह का होगा। आत्म-बल बढ़ने और अन्तःकरण पर चढ़े हुए, कषाय कल्मषो का शमन करने के लिए यह एक महीना किसी के लिए भी बहुत मूल्यवान सिद्ध हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-October
उपासना सहायक होती है।
उपासना से नया प्रकाश मिलता है। अभावग्रस्त व्यक्ति दारिद्रय से और रुग्ण मनुष्य पीड़ाओं से छुटकारा प्राप्त करते देखे गये हैं। कामनाओं की जलती हुई आग तृप्ति और शान्ति में परिणत होते देखी गई है। इस अवलम्बन का सहारा लेकर गिरे हुए लोग ऊपर उठते हैं। इस प्रकार के प्रतिफल कि सी जादू से नहीं, वरन् एक वैज्ञानिक पद्धति से उपलब्ध होते हैं।
उपासना की प्रतिमा के रूप में देखें। यह मातृशक्ति सर्वत्र व्याप्त है, नारी तो केवल उसकी मूर्तिमान प्रतिमा ही है। हमारे यहाँ इसी मातृशक्ति की पूजा के रूप में अनेक देवियों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी, काली, षोडश मातृकायें, राधा, सीता, गौरी कितने ही रूपों में आज भी नारी के मातृ रूप की पूजा हम कर रहे हैं।
उपासना के द्वारा आत्मा पर उच्च संस्कार डालने की विधि-व्यवस्था यदि ठीक प्रकार बनी रहे तो उसकी पवित्रता, महानता, एवं उत्कृष्टता भी निरन्तर बढ़ती चली जाती है। यह प्रगति धीरे-धीरे उन्नति के उच्च शिखर तक ले पहुँचती है और आत्मा की स्थिति भी परमात्मा के समान बन जाती है। उसमें वे सब विशेषताएँ और शक्तियाँ अवतरित होती हैं जो उसके उद्गम केन्द्र परमात्मा में मौजूद हैं।
उपासना का ही एक अंग मानना चाहिए। यह प्रक्रिया आत्म-शोधन के लिए एक अनिवार्य पद्धति है, जिसे प्रत्येक साधक को बिना चूक एवं बिना नागा अपनाये ही रहना चाहिए। भजन में स्थान, साधक एवं परिस्थिति अन्य कठिनाई से कभी चूक भी हो सकती है, पर उठते और सोते समय अपने उत्थान पतन का विचार विश्लेषण करना तो ऐसा सरल एवं स्वाभाविक है कि उसमें नागा होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
उपासना की जाती है और उसके लघु-मध्यम एवं पूर्ण पुरश्चरण भी होते हैं। उनका उल्लेख यहाँ किया जाना अनावश्यक है। वह सब कुछ हम अपने गायत्री ग्रन्थों में लिख चुके हैं और समयानुसार अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर उसका विस्तृत विवेचन आगे चलकर फिर करेंगे। अभी तो हमें गायत्री उपासना के उस उच्चस्तरीय-आत्मोन्नति के प्रयोजन से किये जाने वाले पञ्चकोशी साधना क्रम की ही चर्चा करनी है। गत तीन वर्षों से हर अक्टूबर मास की अखण्ड-ज्योति में एक वर्ष का साधना क्रम छापते रहे हैं।
उपासना का भावनात्मक और वैज्ञानिकता दोनों ही दृष्टियों से बड़ा महत्व है। भावना की दृष्टि से विचार किया जाय तो मानव-जीवन के चरित्र उत्कर्ष का बीज- मन्त्र उसे कहा जा सकता है। सामान्यता मनुष्य सबसे अधिक अपेक्षा ‘सद्बुद्धि’ की ही करता है। जिस औजार से उसे निर्माण कार्य करना है उसे ही टूटा-फूटा भौंथरा और अनगढ़ रखता है । इस भूल के फलस्वरूप ही उसे जीवन लक्ष्य से वंचित रहना पड़ता है।
उपासना प्रत्येक हिन्दू के लिए आवश्यक धर्म कर्तव्य बताया है। क्यों? किस लिए? यह गायत्री की मूल भावना से अपने आप स्पष्ट हो जाता है, जिसमें उस शक्ति शाली, तेजस्वी, सर्वव्यापी, दिव्य तत्व का ध्यान करके, उससे बुद्धि की निर्मलता, शुद्धि, पवित्रता की प्रार्थना की गई है। स्पष्ट है कि गायत्री ज्ञान का, बुद्धि का, शोध, अभिवृद्धि का साधना मात्र है।
उपासना में इतना भी पर्याप्त है कि नित्य शुद्धतापूर्वक आसन पर बैठ कर गायत्री माता का ज्योतिर्मय ध्यान करते हुए कम से कम एक माला का जप नित्य कर लिया जाय। उसका विस्तृत विधान गायत्री महाविज्ञान ग्रन्थ के तीन भागों में बताया जा चुका है। जिन्हें जिस प्रयोजन के लिए जिस प्रकार की- जिस स्तर की साधना अनुकूल हो वे उसी को कर सकते हैं। ताँत्रिक विधान तथा योगाभ्यास पद्धति से भी विशिष्ट गायत्री उपासना की जाती है और उसके लघु-मध्यम एवं पूर्ण पुरश्चरण भी होते हैं। उनका उल्लेख यहाँ किया जाना अनावश्यक है।
उपासना करने के लिए बैठते समय प्रथम संध्या वन्दन के बाद कर्म (पवित्री करण, आचमन, शिखा बन्धन, सामान्य प्राणायाम, न्यास, पृथ्वी पूजन)करने चाहिएं। इसके बाद आह्वान, पूजन। इतना प्रारम्भिक कृत्य करने के पश्चात् सामान्यतः गायत्री जप आरम्भ कर दिया जाता है। पर पंचकोशी साधना के साधकों को जप से पूर्व पन्द्रह मिनट प्राणमय कोश की साधना भी आवश्यक होती है। पिछले वर्षों एक-एक ही प्रकार के प्राणायामों का अभ्यास करना होता था।
उपासना करने वाले को भी पाँच कोशों के अनावरण की साधना करनी पड़ती है। जिन लोगों की उपासना नित्य कर्म तक सीमित है, वे थोड़ा जप नित्य करके भी काम चला सकते हैं, पर जिन्हें आत्म-साक्षात्कार की पूर्ण कक्षा तक पहुँचना है, उन्हें गायत्री योग के अंतर्गत पञ्चकोशी उपासना को भी अपनाना ही पड़ता है। गायत्री माता की पाँच मुख वाली आकृति कल्पना के पीछे भी पञ्चकोशों की साधना द्वारा ही पूर्णता तक पहुँचने का अलंकारिक संकेत छिपा हुआ है।
उपासना आरम्भ करें और देखें कि उनके उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना उत्पन्न करने में कैसे आश्चर्यजनक ढंग से यह महान् उपासना सहायक होती है।
उपासना हमारे हित में ही है। उस माध्यम से मनुष्य निश्चय ही अपनी बहुत आत्मोन्नति कर सकता है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों की गत पच्चीस वर्षों से यह प्रेरणा निरन्तर दी जाती रही है और प्रसन्नता की बात है कि उनमें से अधिकाँश इस सम्बल को अपने जीवन का आधार बना भी चुके हैं। जिन्होंने अभी इस मार्ग पर चलना आरम्भ नहीं किया है, उन्हें चाहिए कि अवलम्बन के एक परीक्षण के रूप में गायत्री उपासना आरम्भ करें और देखें कि उनके उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना उत्पन्न करने में कैसे आश्चर्यजनक ढंग से यह महान् उपासना सहायक होती है।
उपासना-और उससे नई खोज नई शोध प्रस्तुत करना। इस कार्यक्रम को हम जितना जल्दी शुरू करेंगे उतना ही अपने पूर्वजों के प्रति अपने कर्तव्य का पालन कर सकेंगे।
उपासना का भावनात्मक महत्व भी है और वैज्ञानिक भी। इस महाशक्ति को अमृत, पारस, कल्पवृक्ष और कामधेनु के नाम से पुकारा जाता है। जो इसका आश्रय लेता है तर जाता है। उसके लिए यह धरती ही स्वर्ग बनती है और अपना अन्तःकरण ही आनन्द का निर्झर प्रतीत होता है। आरंभ में जब तक यह उपासना जप, ध्यान और पूजन तक सीमित रहती है, तब तक उसे बाल स्थिति कहते हैं पर जब अन्तःकरण के स्तरों को सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाने की कठिन साधना भी चल पड़ती है तब उसमें प्रौढ़ता आती है और तदनुरूप वह आत्म-बल भी प्राप्त होता है जिसे पाकर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता।
उपासना कीजिए।
उपासना के उस उच्चस्तरीय-आत्मोन्नति के प्रयोजन से किये जाने वाले पञ्चकोशी साधना क्रम की ही चर्चा करनी है। गत तीन वर्षों से हर अक्टूबर मास की अखण्ड-ज्योति में एक वर्ष का साधना क्रम छापते रहे हैं। साधकों ने इस मार्ग पर चलते हुए आशातीत लाभ भी उठाया हैं। तीन वर्ष से चलते हुए उस साधना क्रम का यह चौथा वर्ष इस अक्टूबर मास से आरम्भ होना है। अस्तु अगले वर्ष का पाठ्यक्रम ही इन पंक्तियों में प्रस्तुत किया जायगा।
उपासना और आराधना आत्मा पर चढ़े हुए मल-आवरण और विक्षोभों के हटाने के निमित्त ही की जाती है। बर्तन माँजने से वे पुनः चमकने लगते हैं, धो डालने से कपड़े पुनः स्वच्छ हो जाते हैं, स्नान करने से शरीर में पुनः ताजगी आ जाती है। उपासना के द्वारा आत्मा पर उच्च संस्कार डालने की विधि-व्यवस्था यदि ठीक प्रकार बनी रहे तो उसकी पवित्रता, महानता, एवं उत्कृष्टता भी निरन्तर बढ़ती चली जाती है। यह प्रगति धीरे-धीरे उन्नति के उच्च शिखर तक ले पहुँचती है और आत्मा की स्थिति भी परमात्मा के समान बन जाती है। उसमें वे सब विशेषताएँ और शक्तियाँ अवतरित होती हैं जो उसके उद्गम केन्द्र परमात्मा में मौजूद हैं।
उपासना के फलस्वरूप अनेक प्रकार के कष्टों से छुटकारा पाते और अनेक सुविधाएं उपलब्ध करते हुए देखकर हमें यही अनुमान लगाना चाहिए कि इस साधन पद्धति में ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों का समावेश है, जिनके कारण साधक की अन्त :-भूमि में आवश्यक हेर-फेर उपस्थित होते हैं और वह असफलताओं एवं शोक सन्तापों पर विजय प्राप्त करते हुए तेजी से समुन्नत, समर्थ एवं सफल जीवन की ओर अग्रसर होता है।
उपासना को भी अपनाना ही पड़ता है। गायत्री माता की पाँच मुख वाली आकृति कल्पना के पीछे भी पञ्चकोशों की साधना द्वारा ही पूर्णता तक पहुँचने का अलंकारिक संकेत छिपा हुआ है।
उपासना तथा आयोजन
उपासना का आदर्श शरीर को वज्र के समान, बनाने की प्रेरणा देता है तो उसे वायु के सदृश्य वेगवान भी। हनुमान का शरीर ऐसा ही था। वे चट्टानों को चूर-चूर कर देते थे तो दस कोस भी चले जाते थे। वे वायु जैसे गतिवान थे।
उपासना मनुष्य के विचारों और कार्यों में एक नया मोड़, एक नया परिवर्तन प्रस्तुत करती है। जिसका अंतर्जगत बदले तो उसके बाह्य जीवन में परिवर्तन प्रस्तुत होना ही चाहिए। होता भी है। इसे ही लोग गायत्री माता का अनुग्रह एवं वरदान भी मानते हैं।
उपासना न करने वाले को उन्होंने चाण्डाल तक कहा है।
उपासना बढ़ा ही देनी चाहिए। जो बिलकुल न करते हों, वे इन 9 दिनों प्रतिदिन 12 माला तो जपने का प्रयत्न कर ही देखें। प्रयोग की दृष्टि से भी यदि इतना किया जा सके तो उससे भी आत्मिक प्रगति में योग दान मिलेगा। अनुष्ठान से रहने वाली त्रुटियों का दोष परिमार्जन और संरक्षण किया जाता रहेगा जो अपने संकल्प की सूचना समय पर भेज देंगे।
उपासना के लिए यह समय बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिनसे बन पड़े, वे इन दिनों 24 हजार का लघु अनुष्ठान करने का प्रयत्न करें। अन्यथा कुछ तो उपासना बढ़ा ही देनी चाहिए। जो बिलकुल न करते हों, वे इन 9 दिनों प्रतिदिन 12 माला तो जपने का प्रयत्न कर ही देखें। प्रयोग की दृष्टि से भी यदि इतना किया जा सके तो उससे भी आत्मिक प्रगति में योग दान मिलेगा।
उपासना के अगणित भौतिक लाभ भी हैं। कष्टों और आपत्तियों में पड़े हुए, विपत्तियों में फंसे हुए, अभाव और दरिद्र से पीड़ित, असफलता की ठोकरों से विक्षुब्ध व्यक्ति यदि इस महामन्त्र का आश्रय लेते हैं तो उन्हें आशा की किरणें दृष्टिगोचर होती हैं। जिन्हें अपना भविष्य अन्धकारमय दीख रहा था और आपत्तियों के कुचक्र में पिस जाने का भय सता रहा था, उन्हें उस उपासना से नया प्रकाश मिलता है। अभावग्रस्त व्यक्ति दारिद्रय से और रुग्ण मनुष्य पीड़ाओं से छुटकारा प्राप्त करते देखे गये हैं। कामनाओं की जलती हुई आग तृप्ति और शान्ति में परिणत होते देखी गई है।
उपासना नित्य कर्म तक सीमित है, वे थोड़ा जप नित्य करके भी काम चला सकते हैं, पर जिन्हें आत्म-साक्षात्कार की पूर्ण कक्षा तक पहुँचना है, उन्हें गायत्री योग के अंतर्गत पञ्चकोशी उपासना को भी अपनाना ही पड़ता है। गायत्री माता की पाँच मुख वाली आकृति कल्पना के पीछे भी पञ्चकोशों की साधना द्वारा ही पूर्णता तक पहुँचने का अलंकारिक संकेत छिपा हुआ है।
उपासना की प्रथम कक्षा मानव देह है। शरीर को स्वस्थ, बलवान, तरोताजा, स्फूर्तिवान, तेजस्वी बनाना आवश्यक है। यही वह आधार है जिससे जीवन में अन्य शक्ति स्रोत खुलने की सम्भावना हो सकती है। स्मरण रहे स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है। बलवान शरीर ही आत्मा का तेज गुण धारण करने में समर्थ होता है।
उपासना करने के लिए जोर दिया है और जो उस उपयोगी व्यवस्था का लाभ नहीं उठाना चाहते, उनकी भूल को उन्होंने कटु भर्त्सना के साथ निन्दनीय भी ठहराया है। गायत्री उपासना न करने वाले को उन्होंने चाण्डाल तक कहा है।
उपासना को करते हैं, वे उसका अनिर्वचनीय लाभ प्राप्त भी कर लेते हैं। वे इस अमृत को पाकर अमर बन जाते हैं और इस मृत्यु-लोक में रहते हुए भी दिव्य-लोक में निवास करने का स्वर्गीय आनन्द पग-पग पर अनुभव करने लगते हैं।
उपासना जप, ध्यान और पूजन तक सीमित रहती है, तब तक उसे बाल स्थिति कहते हैं पर जब अन्तःकरण के स्तरों को सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाने की कठिन साधना भी चल पड़ती है तब उसमें प्रौढ़ता आती है और तदनुरूप वह आत्म-बल भी प्राप्त होता है जिसे पाकर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। पंचकोशी साधना इसी स्तर की विभूति है, जो इसे अपनाता है, वह धन्य हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-August
उपासना द्वारा आत्म-बल और गीता द्वारा कर्तव्य-दर्शन प्राप्त करके हम आज की सभी समस्याओं को हल कर सकते हैं। गायत्री और गीता हमारे ज्ञान-योग और कर्मयोग को परिपूर्ण कर सकती हैं ताकि ईश्वर प्राप्ति की पुण्य प्रक्रिया भक्ति का सच्चा मार्ग हमें मिल सके।
उपासना को आध्यात्म मार्ग का प्रथम सोपान इसीलिए माना गया है कि उसके आधार पर मनुष्य सब प्रकार के भय और संशयों से छुटकारा पाकर अभीष्ट लक्ष्य की ओर अपनी मानसिक शक्तियों को लगा सकने में समर्थ होता है। वह अज्ञानी जिसे अनेक प्रकार के भय सताते रहते हैं अपनी मानसिक क्षमता का अधिकाँश भाग उसी गोरख-धन्धे में खो बैठता है फिर आत्म-कल्याण जैसे श्रेष्ठ कार्य के लिए उसके पास मनोबल बचेगा ही कैसे?
उपासना के साथ-साथ सच्चरित्रता एवं परमार्थ की प्रेरणा भी देती हो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-July
उपासना कभी भी व्यर्थ नहीं जाती। इसकी सार्थकता के प्रमाणस्वरूप तत्काल आत्मसन्तोष मिलता है। श्रेय की भावनाओं से ओत-प्रोत उदार हृदय ही स्वर्ग है। जिसे स्वर्ग अभीष्ट हो उसे अपना अन्तःकरण प्रेम और सेवा धर्म से परिपूर्ण बना लेना चाहिए।
उपासना का निश्चय ही बहुत महत्व है पर जब तक जीवन-निर्माण की साधना के लिए भी समुचित प्रयत्न न किया जायगा तब तक उपासना एकाँगी एवं अपूर्ण रहेगी और उसका समुचित लाभ उपलब्ध न हो सकेगा। इसलिए जिन्हें वस्तुतः आत्मिक प्रगति करनी हो उन्हें उच्च आदर्शों को अपने दैनिक व्यवहार में समाविष्ट करना चाहिए। इस तथ्य को इन शिविरों में ऐसी अच्छी तरह प्रतिपादित किया गया कि आगन्तुकों में से प्रत्येक ने अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत एवं सुसंस्कृत बनाने की प्रतिज्ञा की और इसके लिए आरम्भिक शुभारम्भ उसी समय से आरम्भ कर दिया। स्थिति को देखते हुए यह विश्वास किया जा सकता है कि जो भी सज्जन इन शिविरों में आये वे उत्कृष्ट एवं आदर्श जीवन-यापन के लिए अपने प्रयत्नों को और भी तीव्र करेंगे। यदि यह प्रयत्न जारी रहे तो यह निश्चित है कि इन शिक्षार्थियों में से अनेकों प्रकाशवान् उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह चमकते हुए दृष्टिगोचर होंगे।
उपासना, आत्म-चिन्तन, स्वाध्याय को अपने नित्य-नियम मं स्थान दे रखा है न?
उपासना एकाँगी एवं अपूर्ण रहेगी और उसका समुचित लाभ उपलब्ध न हो सकेगा। इसलिए जिन्हें वस्तुतः आत्मिक प्रगति करनी हो उन्हें उच्च आदर्शों को अपने दैनिक व्यवहार में समाविष्ट करना चाहिए। इस तथ्य को इन शिविरों में ऐसी अच्छी तरह प्रतिपादित किया गया कि आगन्तुकों में से प्रत्येक ने अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत एवं सुसंस्कृत बनाने की प्रतिज्ञा की और इसके लिए आरम्भिक शुभारम्भ उसी समय से आरम्भ कर दिया। स्थिति को देखते हुए यह विश्वास किया जा सकता है कि जो भी सज्जन इन शिविरों में आये वे उत्कृष्ट एवं आदर्श जीवन-यापन के लिए अपने प्रयत्नों को और भी तीव्र करेंगे। यदि यह प्रयत्न जारी रहे तो यह निश्चित है कि इन शिक्षार्थियों में से अनेकों प्रकाशवान् उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह चमकते हुए दृष्टिगोचर होंगे।
उपासना के द्वारा आत्मबल बढ़ाते हुए उसका लाभ जनता-जनार्दन के चरणों में, विश्व-मानव शोभायमान बनने में, अर्पण कर देना यही तो त्याग का सच्चा मर्म है। आध्यात्म की बकवास करने वाले यों गली कूचों के मक्खी मच्छरों की तरह हर जगह भरे पड़े हैं धर्म और ज्ञान की दुकानें भी हर बाजार में खुली पड़ी हैं पर जो अपने उज्ज्वल चरित्र और विवेकयुक्त विचारणा से जन-जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिये मर मिटें ऐसे आध्यात्मिक पुरुषों का प्रायः अभाव ही रहता है। समर्थ गुरु रामदास उसी अभाव की पूर्ति करने आये थे। भारत-माता के बन्धन काटने में इस महान् योगी का योगदान अनन्त काल तक भुलाया न जा सकेगा। पुरोहित ने विवाह के अवसर पर उन्हें सावधान किया था, वे जीवन भर भारतीय जनता को सावधान करते रहे।
उपासना की उपयोगिता भी स्वीकार करते थे पर यह नहीं मानते थे कि—उसे पूजा, प्रलोभन देकर अनुचित कार्यों में सहायता करने के लिए भी राजी किया जा सकता है। अपने विचारों को उनने तत्कालीन समाचार-पत्रों में छपाया और भाषण भी दिये। फलस्वरूप रूढ़िवादी लोग उनके विरुद्ध हो गये। इन विरोधियों में एक उनके पिता भी थे। जिन की नाराजगी के कारण युवक राममोहनराय को घर छोड़ कर भागना पड़ा।
उपासना कार्यक्रमों के साथ-साथ ही चलती रहेगी।
उपासना किस प्रकार की होनी चाहिये यह निर्णय करते देर न लगी। जब कि दूसरे संत, महात्माजन जीवन की दुर्दशा की ओर से आँख बन्द करके भजन, ध्यान में अपनी मुक्ति का प्रयोजन पूर्ण करने के लालच में लगे थे, रामदास ने दूसरा मार्ग चुना। अपनी आत्मा को अधिकाधिक बल सम्पन्न बनाने वाली तपश्चर्या करते हुए अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए जनता में साहस भरते हुए गाँव-गाँव घूमने लगे।
उपासना की आवश्यकता समझी जायगी उन्हें वह भी बता दी जायगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-May
उपासना करो। यह अन्न ही ब्रह्म है।”
उपासना, सदाचार आदि विशेषताओं के साथ उसे विद्वान् भी होना चाहिए। समुचित ज्ञान के अभाव में मनुष्य को न तो आत्म-सन्तोष होता है और न वह दूसरों को ज्ञान-दान से सन्तुष्ट कर सकता है।
उपासना का पंचकोशी साधना क्रम, चान्द्रायण व्रत और गायत्री पुरश्चरणों की सम्मिलित साधना विधि कितनी प्रभावशाली हो सकती है। फिर उसके लिये गायत्री तपोभूमि का तीर्थ तथा सुयोग्य सान्निध्य एवं मार्ग दर्शन का लाभ साधना की सफलता के लिये कितना उपयोगी प्रसिद्ध हो सकता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि स्वाध्याय और सत्संग की कितनी समर्थ सुविधा यहाँ उपलब्ध है। जीवन शोधन के अनुकूल जहाँ सारा वातावरण हो वहाँ अनायास ही अपने संस्कार भी वैसे ही ढलने लगते हैं। कोई वानप्रस्थ का सच्चा लाभ प्राप्त करने का इच्छुक व्यक्ति मथुरा आकर प्रस्तुत शिक्षण योजना का लाभ ले तो वही विश्वास करना चाहिए कि उसे खाली हाथ न लौटना पड़ेगा।
उपासना के एक ऊंचे स्तर तक पहुँचाने का, जीवन शोधन की दिशा में काफी आगे बढ़ चलने का और परमार्थ कार्यों में युग की आवश्यकता के अनुरूप समुचित अनुभव प्राप्त करने का कार्यक्रम बना लिया गया है और अखण्ड-ज्योति परिवार के उन भावनाशील एवं सुशिक्षित लोगों को इसी जेष्ठ सदी पूर्णिमा से एक वर्ष के लिए मथुरा आने का आमंत्रण गत अंक में दिया गया है।
उपासना में लगे हुए लोग यदि वर्ष में एकबार अपनी प्रगति का परिचय दे जाया करें, प्रस्तुत कठिनाइयों का हल पूछ जाया करें, तथा अगले वर्ष का क्रम क्या रहे इस संबंध में विचार विनिमय कर लिया करें तो यह हम सभी के लिए उत्तम रहेगा। नौकरी पर दूर देशों में रहने वाले लोगों को वर्ष में एक बार तो अपने कुटुम्ब से मिलने घर जाने की छुट्टी मिलती है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों का एक घर वह है जहाँ वे रहते हैं पर दूसरा उनकी भाव प्रेरणा का केन्द्र मथुरा भी है, इसलिए यह भी उनका घर है। माता-पिता के घर की भाँति ही ‘गुरु गृह’ भी अपना ही होता है, वहाँ भी वर्ष में एक बार जाया जाय तो यह ठीक ही है।
उपासना तथा आत्म-कल्याण जैसी अगणित समस्यायें हमें घेरे रहती हैं और अपना उचित हल चाहती हैं। किन्तु जीवन विद्या के आधारभूत सिद्धांतों का समुचित ज्ञान न होने से हम इन्हें सुलझा नहीं पाते वरन् कई बार तो दिन-दिन इस तरह और उलझते चले जाते हैं कि जीवन नरक बन जाता है। इस स्थिति में बचते हुए सुविकसित सुसंस्कृत जीवन जीने के लिए हमें क्या सोचना और क्या करना चाहिए, यही सब व्यावहारिक रूप से इस एक महीने के प्रशिक्षण में सिखाया जायेगा। आशा यही करनी चाहिए कि इस शिक्षण में लगाया हुआ एक महीने का समय शिक्षार्थियों के लिए प्रत्येक दृष्टि से सफल और सार्थक ही सिद्ध होगा।
उपासना करते हैं वे उसे प्राप्त कर लेते हैं।”
उपासना, जीवन शोधन और परमार्थ के त्रिविध आध्यात्मिक कार्यक्रमों में पूरी तरह लग जाने का ठीक यही समय है। यदि इस ओर से उपेक्षा बरती गई तो शरीर त्यागते समय कुसंस्कारों में घिरा हुआ जीव बहुत ही त्रास पाकर विदा होता है। उस समय की मोह ममता तथा वासना तृष्णा उसे सद्गति का अधिकारी नहीं बनने देती। फिर उन्हीं प्रियजनों की, प्रिय वस्तुओं की समीपता पाने के लिए कर्मानुसार भली-बुरी योनियों में जन्मता मरता रहता है, जिसने मोह बन्धनों से छुटकारा प्राप्त नहीं किया उसके लिए जीवन मुक्ति असम्भव ही बनी रहेगी।
उपासना में अधिक मन लगावें। (3) अपने स्वभाव और संस्कारों को परमार्थ वृत्ति से सम्पन्न करने के लिए लोक-सेवा के कार्यक्रमों को विशुद्ध अध्यात्मिक साधना मानते हुए जन-कल्याण की प्रवृत्तियों में पूरे उत्साह के साथ भाग ले। संयम, सदाचार, त्याग, उदारता, निर्लोभता और निरहंकारता का सतर्कतापूर्वक अभ्यास करें। यह तीनों बातें जिनके जीवन क्रम का अंश बन गई समझना चाहिए कि वानप्रस्थ धर्म अपनाते हुए उसने मानव-जीवन की सफलता का द्वार प्रशस्त कर लिया।
उपासना का अन्तर प्रत्यक्ष है। भगवान भावना को पहचानते हैं और उसी के आधार पर भक्त की आराधना का मूल्याँकन करते हैं। कौन खुदगर्जी से मूर्ति के लिए भजन का ढोंग बनाये बैठा है और कौन प्रभु प्रेम से विह्वल होकर आत्म समर्पण की दृष्टि से प्रभु की इच्छा के अनुसार अपनी इच्छाओं को बनाने का प्रयत्न कर रहा है, यह अन्तर भगवान से छिपा नहीं रहता। वे इसी आधार पर पात्र की पात्रता परखते हैं और उसी अनुपात से उस पर अनुग्रह भी करते हैं। शबरी, निषाद, गोपी, सुदामा, आदि साधना-विधान से अपरिचित होने पर भी प्रभु का अनुग्रह प्राप्त कर सके, जब कि विधि विधान के ज्ञाता कर्मकाण्डी ज्ञानी-ध्यानी लोग भी खाली हाथ रहते देखे गये हैं।
उपासना नारी रूप में की जाती है। गायत्री को माता की आकृति में पूजा अर्चना करने का उद्देश्य नारी मात्र के प्रति अधिक श्रद्धा एवं अधिक सम्मान उत्पन्न करना भी है। अनुष्ठानों के अन्त में तथा नवरात्रियों में कन्या पूजन, कन्या भोजन की प्रथा के मूल में भी यही उद्देश्य छिपा हुआ है। वैदिक सभ्यता में नारी को हर दृष्टि से अधिक पूज्य, अधिक पवित्र, अधिक श्रेष्ठ एवं अधिक महान माना गया है।
उपासनात्मक कर्मकाण्ड में भक्ति भावना का समन्वय होना आरंभिक आवश्यकता की दृष्टि से उपयोगी है पर उसे ही ‘पूर्णता’ मान लेना भारी भूल कही जायगी। जो लोग ईश्वर पूजा में ‘भक्त’ दिखाई पड़ते हैं पर व्यावहारिक जीवन में संकीर्णता, स्वार्थपरता, निष्ठुरता धारण किये रहते हैं उनको भक्त किसी भी प्रकार नहीं कहा जा सकता। संकीर्ण दायरे तक में ही सीमित-पूजा वन्दना के छोटे दायरे में बँधी भक्ति आरंभिक अभ्यास का एक अकिंचन साधन भले ही हो उससे वास्तविक प्रयोजन किसी भी प्रकार सिद्ध नहीं हो सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-February
उपासना ही मनुष्य जाति के भाग्य का निर्माण करने में प्रमुख आधार बन सकती है।
उपासना विधियों को काम में लाने वालों को भी गायत्री उपासना तो करनी ही चाहिए। शास्त्रकारों ने कहा है “जो गायत्री उपासना नहीं करता उसके अन्य मंत्र भी निष्फल चले जाते है” इस निर्देश के पीछे एक महत्व का तथ्य छिपा हुआ है और उसे हम सबको गंभीरतापूर्वक समझना चाहिए और श्रद्धापूर्वक अपनाना भी चाहिए।
उपासना को इतनी कठोरता के साथ सम्मिलित करने का उद्देश्य यह है कि मनुष्य नित्य ही इस बात का अनुभव करता रहे कि उसके उत्थान पतन का हेतु केवल उसकी आस्था, विचारणा एवं भावना ही है। उसे उत्कृष्ट बनाने में ही मानव-जीवन की सार्थकता है और उसे अपनाकर ही भौतिक क्षेत्र में सुख एवं आत्मिक क्षेत्र में शान्ति को प्राप्त किया जा सकता है। इसके विपरीत जिसकी मनोभूमि कुविचारों और दुर्भावनाओं से भरी रहेगी उसे दुख दारिद्र्य के शोक-सन्ताप के अधःपतन रूप गर्त में गिरकर नष्ट ही होना होगा।
उपासना है। राष्ट्रीय ही क्यों उसे सार्वभौम भी कहा जा सकता है। सद्भावनाओं में ईश्वर की स्थिति और आभा का दर्शन कराने वाला कोई मंत्र ही मानव-जाति के भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाला हो सकता है। गायत्री के 24 अक्षरों में जिस तत्वज्ञान को कूट-कूटकर भरा गया है उसे मानवीय धर्म-कर्त्तव्य की ईश्वरीय प्रेरणा ही मानना चाहिए। ऐसे तत्व-ज्ञान की उपासना ही मनुष्य जाति के भाग्य का निर्माण करने में प्रमुख आधार बन सकती है।
उपासना सबसे उत्कृष्ट प्रकार की पराभक्ति है।
उपासना में संभव नहीं। पिता से माता का स्नेह स्वभावतः अधिक होता है। इसलिये परमात्मा की अधिक उच्च-स्तरीय वात्सल्य प्राप्त करने के लिए गायत्री शक्ति का माता के रूप में ध्यान करना ही अधिक श्रेयस्कर माना गया है और ऋषियों एवं शास्त्रकारों ने वैसी ही प्रतिष्ठा एवं भावना करने का हमें आदेश किया है। गायत्री का मातृ-मूर्ति के रूप में ध्यान, स्तवन, पूजन, करने का प्रायः सभी उपासना ग्रन्थों में निर्देश मिलता है। इस स्थापना के पीछे उपरोक्त तथ्यों का तो स्पष्ट समाधान है ही और भी कितने अज्ञात एवं रहस्यमय कारण हो सकते हैं।
उपासना के बिना न मन एकाग्र होता है और न परम तत्व की उपलब्धि संभव होती है। इसलिए संसार में सर्वत्र ईश्वर को मानव रूप में, मानव गुणकर्म स्वभाव में परिकल्पित करके उसके पूजा विधान का प्रचलन किया है। इन स्वरूपों में गायत्री का ध्यान सर्वोत्तम है क्योंकि उसमें माता का स्नेह वात्सल्य, महत्व एवं पवित्रता की अनुभूति साधक को पग-पग पर होती चलती है।
उपासना, एवं कर्म-काण्ड, दर्शन, धर्म ग्रन्थ आदि की समानता भी जातीय एकता की दृष्टि से आवश्यक है। इनमें भिन्नता रहने से जातीयता की भावना दुर्बल होती है। मुसलमान और ईसाई धर्मों की शक्ति उनकी धार्मिक एकरूपता में सन्निहित है। एक पैगम्बर एक प्रकार का ईश्वर, एक धर्म-ग्रन्थ एक दर्शन, एक संहिता होने से थोड़े ही समय में इन धर्मों ने संसार में अपना भारी प्रभाव बढ़ाया है। हिन्दू धर्म की भिन्नताएं उनके अनुयायियों में भी अश्रद्धा एवं उपेक्षा की भावनाएं उत्पन्न कर रही है।
उपासना करे और योग से स्वाध्याय का अभ्यास करें। स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।”
उपासना की जाती है, उनमें से बहुसंख्यक गोरे रंग के या नखशिख से बहुत सुँदर नहीं थे। कितने हों तो इस दृष्टि से कुरूप भी कहे जा सकते हैं। पर अपनी आत्मिक सुँदरता के कारण ये लोगों को सुँदर ही लगते थे और आज तक भी इसी कारण उनको स्मरण किया जाता है।
उपासना में सुविधा हो उसी से उसका ध्यान, पूजन किया जा सकता है। इस संदर्भ में नारी के रूप में या माता के रूप में परमात्मा की उपासना अधिक श्रेयस्कर है क्योंकि नारी को निरंतर पुण्य वृत्ति में ध्यान करने पर लौकिक जीवन में भी वही प्रवृत्ति विकसित होती है और व्यक्ति सच्चे अध्यात्म की ओर द्रुत-गति से अग्रसर होता है। दूसरा लाभ यह भी है कि जिस स्वरूप में प्रभु का ध्यान किया जाता है उसी भावना के अनुरूप प्रत्युत्तर एवं प्रतिध्वनि भी लौटकर साधक को मिलती है। माता का रिश्ता सबसे अधिक उत्कृष्ट प्रेम का परिचायक है। वात्सल्य से अधिक मधुर और कोई रस नहीं।
उपासना के अनेक लाभ बताये गये है। उसका ऐसा आश्चर्यजनक महात्म्य शास्त्रों में मिलता है जिसे पढ़ सुनकर सहसा यह विश्वास नहीं होता हूँ कि थोड़े से अक्षरों को बार-बार दुहराने मात्र से जप करने मात्र से कैसे उतना बड़ा लाभ संभव हो सकता है। पर अनुभव यही बताता है कि जिसने परीक्षा के लिए भी इस मार्ग पर थोड़े से कदम बढ़ाये उसे निराश नहीं होना पड़ा वरन् आशा से अधिक ही उसने पाया।
उपासना की उपेक्षा करके धर्म अनुशासन की उपेक्षा करते थे उन्हें समाज से बहिष्कृत कर अछूत बना दिया जाता था। यह एक सामाजिक दंड विधान था और इसलिए बनाया गया था कि लोग इस प्रकार की अवज्ञा एवं उपेक्षा का साहस न करें। अब तो वह दंड-विधान अधिकार-अनाधिकार का प्रश्न बन बैठा है और इसी आधार पर यह कहा जाता है कि अमुक जाति में उत्पन्न हुए लोग उसे जप सकते हैं, अमुक जाति में जन्में नहीं। इस भेदभाव का स्वरूप आज विकृत रूप में भले ही समझा जाय प्राचीनकाल में यह अवज्ञाकारियों के लिए भर्त्सना भरी दंड व्यवस्था मात्र थी। यों प्रत्येक ईश्वरीय कृति पर उसके सभी पुत्रों का अधिकार रहता है।
उपासना अधिक श्रेयस्कर है क्योंकि नारी को निरंतर पुण्य वृत्ति में ध्यान करने पर लौकिक जीवन में भी वही प्रवृत्ति विकसित होती है और व्यक्ति सच्चे अध्यात्म की ओर द्रुत-गति से अग्रसर होता है। दूसरा लाभ यह भी है कि जिस स्वरूप में प्रभु का ध्यान किया जाता है उसी भावना के अनुरूप प्रत्युत्तर एवं प्रतिध्वनि भी लौटकर साधक को मिलती है। माता का रिश्ता सबसे अधिक उत्कृष्ट प्रेम का परिचायक है। वात्सल्य से अधिक मधुर और कोई रस नहीं। माता के रूप में प्रभु की आराधना करने से उसका प्रत्युत्तर साधक को वात्सल्य स्नेह के रूप में प्राप्त होता है और वह उस अनुभूति से कृत-कृत्य हो उठता है।
उपासना की अधिकृत विधि को ‘सन्ध्या’ कहते है। संध्या की कई विधियाँ प्रचलित हैं, पर गायत्री का जप प्रत्येक में अनिवार्य है। ऐसी कोई संध्या विधि नहीं जिसमें गायत्री की उपेक्षा की गई हो। शिखा-सूत्र धारण करने वाला-संध्या-वन्दन में विश्वास रखने वाला कोई भी भारतीय धर्मानुयायी स्वभावतः गायत्री उपासक बनता है।
उपासना इसी उद्देश्य के लिए की। कुछ समय पूर्व अपना संगठन गायत्री उपासकों तक ही सीमित था पर अब उसका क्षेत्र व्यापक बना दिया गया है। इसलिए गायत्री को प्रधान रखते हुये भी अन्य विधियों से उपासना करने को भी अपने ही कार्यक्षेत्र का एक अंग माना जाता है। इस सप्ताह में गायत्री जप तो 10 अरब के करीब ही हो सका पर अन्य मन्त्रों द्वारा ईश्वर उपासना की गणना 20 अरब से ऊपर निकल गई। इसी बहाने भगवान के भजन का इतना बड़ा आयोजन हो सका।
उपासना की। लगभग आधे व्यक्ति ऐसे रहे जिनने गायत्री जप अनुष्ठान किये और अपने परिवार तथा परिचय के लोगों से कराये। शेष आधे लोगों ने अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुरूप उपासना इसी उद्देश्य के लिए की। कुछ समय पूर्व अपना संगठन गायत्री उपासकों तक ही सीमित था पर अब उसका क्षेत्र व्यापक बना दिया गया है। इसलिए गायत्री को प्रधान रखते हुये भी अन्य विधियों से उपासना करने को भी अपने ही कार्यक्षेत्र का एक अंग माना जाता है।
उपासना का मंत्र है। ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ पद में ईश्वर से एक ही प्रार्थना की गई है कि आप हमारी बुद्धि एवं प्रवृत्ति को सन्मार्ग पर लगा दीजिए। ईश्वर के पास मनुष्य शरीर प्रदान करने के बाद एक ही महत्वपूर्ण उपहार जीव को देने के लिए यही बचा भी है। यदि यह मिल जाय तो नर से नारायण बनते देर नहीं लगती। मनुष्य शरीरधारी जीव को अन्तरात्मा जब परमात्मा को पुकारती है कि ‘हे परम पिता, आधा आनंद तूने दिया है तो शेष आधे को भी प्रदान कर और हमें पूर्णता का आनंद लेने दें।
उपासना कर सकता है। इतनी छूट होते हुए भी गायत्री को अनिवार्य उपास्य माना गया है। समस्त भारतीय समाज को एकता के भावना सूत्र में पिरोये रखने के लिये गायत्री को एक जातीय जीवन तत्व का स्थान प्राप्त है। इसे राष्ट्रीय संगठन मन्त्र भी कह सकते हैं। भिन्नताओं में एकता की अनुभूति हम गायत्री को सार्वभौम-सर्वजनीन बना कर ही कर सकते हैं।
उपासना का, उस भावना को हृदयंगम किये रहने का व्रत लिया। जो लोग इस सुसंस्कार का तिरस्कार करते थे उच्छृंखल बनकर इस आध्यात्मिक अनुशासन को अस्वीकार करते थे उन्हें सामाजिक बहिष्कार के रूप में शूद्र बनना पड़ता था।
उपासना का कोई स्वरूप ही नहीं बन पाता। उपासना के बिना न मन एकाग्र होता है और न परम तत्व की उपलब्धि संभव होती है। इसलिए संसार में सर्वत्र ईश्वर को मानव रूप में, मानव गुणकर्म स्वभाव में परिकल्पित करके उसके पूजा विधान का प्रचलन किया है। इन स्वरूपों में गायत्री का ध्यान सर्वोत्तम है क्योंकि उसमें माता का स्नेह वात्सल्य, महत्व एवं पवित्रता की अनुभूति साधक को पग-पग पर होती चलती है।
उपासना किसी प्रतीक के सहारे नहीं करनी पड़ती, वरन् तब तो यह आदर्श के रूप में ही उपासित होता है। इस प्रकार के एक सार्वभौमिक आदर्श की आदर्श-रूप से उपासना सबसे उत्कृष्ट प्रकार की पराभक्ति है।
उपासना ग्रन्थों में निर्देश मिलता है। इस स्थापना के पीछे उपरोक्त तथ्यों का तो स्पष्ट समाधान है ही और भी कितने अज्ञात एवं रहस्यमय कारण हो सकते हैं।
उपासना की गणना 20 अरब से ऊपर निकल गई। इसी बहाने भगवान के भजन का इतना बड़ा आयोजन हो सका। यह बड़ी प्रसन्नता की बात है। इससे संसार के सूक्ष्म वातावरण में अधिक सात्विकता, पवित्रता, एवं सद्भावना की सृष्टि होना सुनिश्चित है।
उपासना करने के लिये तैयार करने का प्रयत्न (2) छोटों को भी ‘तू’ न कहकर ‘तुम’ या ‘आप’ शब्दों में संबोधन (3) बड़ों के नित्य चरणस्पर्श की परम्परा का आरम्भ (4) नित्य परिवार गोष्ठी का आयोजन जिसमें अशिक्षितों को शिक्षा, शिक्षितों को उसके शिक्षण की पूछताछ तथा कहानी एवं समाचारों के आधार पर नैतिक शिक्षण। पारिवारिक समस्याओं का हल खोजने के लिए विचार विनिमय (5) घर में शिक्षितों को जीवन निर्माण साहित्य नियमित रूप से पढ़ने की अभिरुचि एवं आदत उत्पन्न करना, अशिक्षितों को सुनाने की व्यवस्था करना (6) अन्न की बर्बादी को रोकना, थाली में झूठन न छोड़ना, सप्ताह में एक दिन उपवास (7) सप्ताह में एक दिन घर की भली प्रकार सफाई और नित्य हर वस्तु को यथा स्थान स्वच्छ ढंग से रखने की आदत (8) सादगी, मितव्ययिता व्यवस्था नियमितता, सामूहिकता, सहिष्णुता, श्रमशीलता और मधुरता को स्वभाव में सम्मिलित करने का परिवार के प्रत्येक परिजन को अभ्यास रखना (9) आहार में सात्विकता की अभिवृद्धि, ब्रह्मचर्य का अधिकाधिक पालन (10) संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुष्प प्रसार के लिए अपनी आमदनी का एक अंश नियमित रूप से धर्म पेटी में जमा करना। इन दस कार्यक्रमों के आधार पर परिवार निर्माण के रचनात्मक कार्यक्रमों में जो लोग लगे हैं उनके परिवार का निश्चय ही कायाकल्प होगा। वे यदि धैर्य और प्रेमपूर्वक उत्साह के साथ इस कार्यक्रम को चलाते रहेंगे तो उनके घरों में जल्दी ही स्वर्णीय वातावरण परिलक्षित होने लगेगा।
उपासना को अनिवार्य ठहराया और उसकी उपेक्षा करने वाले की भरपेट भर्त्सना की।
उपासना नहीं करता उसके अन्य मंत्र भी निष्फल चले जाते है” इस निर्देश के पीछे एक महत्व का तथ्य छिपा हुआ है और उसे हम सबको गंभीरतापूर्वक समझना चाहिए और श्रद्धापूर्वक अपनाना भी चाहिए।
उपासना का लक्ष्य यही है। यह प्रयोजन जिसका जितनी मात्रा में जब सफल हो रहा हो तब समझना चाहिए कि हमें उतनी मात्रा में सिद्धि प्राप्त हो गई। इस सिद्धि का प्रतिफल, भौतिक जीवन में सुख और आध्यात्मिक जीवन में शान्ति बनकर सब और बिखरे-बिखरे पड़े दीखता रहता है।
उपासना का तात्पर्य साधक को इसी रहस्य से अवगत कराना है।
उपासना का अर्थ है-सत्प्रेरणा को इतनी प्रबल बनाना, जिसके कारण सन्मार्ग पर चले बिना रहा ही न जा सके। गायत्री उपासना का लक्ष्य यही है। यह प्रयोजन जिसका जितनी मात्रा में जब सफल हो रहा हो तब समझना चाहिए कि हमें उतनी मात्रा में सिद्धि प्राप्त हो गई। इस सिद्धि का प्रतिफल, भौतिक जीवन में सुख और आध्यात्मिक जीवन में शान्ति बनकर सब और बिखरे-बिखरे पड़े दीखता रहता है।
उपासना तो करनी ही चाहिए। शास्त्रकारों ने कहा है “जो गायत्री उपासना नहीं करता उसके अन्य मंत्र भी निष्फल चले जाते है” इस निर्देश के पीछे एक महत्व का तथ्य छिपा हुआ है और उसे हम सबको गंभीरतापूर्वक समझना चाहिए और श्रद्धापूर्वक अपनाना भी चाहिए।
उपासना का आयोजन पूरा करने के लिए उसे मानव-रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य, सरस्वती, दुर्गा, राम, कृष्ण आदि को ईश्वर के रूप में इसीलिए प्रतिष्ठित करना पड़ा कि नाम, रूप के बिना कल्पना एवं ध्यान की गति नहीं बनती। और इसके बिना उपासना का कोई स्वरूप ही नहीं बन पाता। उपासना के बिना न मन एकाग्र होता है और न परम तत्व की उपलब्धि संभव होती है। इसलिए संसार में सर्वत्र ईश्वर को मानव रूप में, मानव गुणकर्म स्वभाव में परिकल्पित करके उसके पूजा विधान का प्रचलन किया है।
उपासना हिन्दू-धर्म के एक अंग विशेष की नहीं वरन् वह भारत की राष्ट्रीय उपासना है। राष्ट्रीय ही क्यों उसे सार्वभौम भी कहा जा सकता है। सद्भावनाओं में ईश्वर की स्थिति और आभा का दर्शन कराने वाला कोई मंत्र ही मानव-जाति के भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाला हो सकता है। गायत्री के 24 अक्षरों में जिस तत्वज्ञान को कूट-कूटकर भरा गया है उसे मानवीय धर्म-कर्त्तव्य की ईश्वरीय प्रेरणा ही मानना चाहिए। ऐसे तत्व-ज्ञान की उपासना ही मनुष्य जाति के भाग्य का निर्माण करने में प्रमुख आधार बन सकती है।
उपासनात्मक आवश्यकता के लिए ही उसे विभिन्न रूपों में कल्पित और प्रतिष्ठित करते हैं। “त्वमेव माता च पिता त्वमेव, भ्रातश्च सखा त्वमेव” की उक्ति में उस परमात्मा को माता, पिता, भ्राता सखा आदि के रूप में मान्यता दी है।
उपासना करने को भी अपने ही कार्यक्षेत्र का एक अंग माना जाता है। इस सप्ताह में गायत्री जप तो 10 अरब के करीब ही हो सका पर अन्य मन्त्रों द्वारा ईश्वर उपासना की गणना 20 अरब से ऊपर निकल गई। इसी बहाने भगवान के भजन का इतना बड़ा आयोजन हो सका। यह बड़ी प्रसन्नता की बात है। इससे संसार के सूक्ष्म वातावरण में अधिक सात्विकता, पवित्रता, एवं सद्भावना की सृष्टि होना सुनिश्चित है।
उपासना किसी भी विधि या माध्यम से करे पर उसे तत्वदर्शन के रूप में गायत्री को तो प्रथम स्थान देना ही चाहिए। विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय, संस्थान, संगठन अपने-अपने अलग-अलग झंडे रखें तो हर्ज नहीं पर राष्ट्रीय ध्वज तो उनसे भी ऊँचा माना जाना चाहिए। इसी प्रकार भिन्न उपासना विधियों को काम में लाने वालों को भी गायत्री उपासना तो करनी ही चाहिए। शास्त्रकारों ने कहा है “जो गायत्री उपासना नहीं करता उसके अन्य मंत्र भी निष्फल चले जाते है” इस निर्देश के पीछे एक महत्व का तथ्य छिपा हुआ है और उसे हम सबको गंभीरतापूर्वक समझना चाहिए और श्रद्धापूर्वक अपनाना भी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-March
उपासना के लिए पूरी नौ रातें ही आवश्यक होती हैं। उनमें घट-बढ़ का ध्यान नहीं रखा जाता। इसलिए इन दिनों 24 हजार का अनुष्ठान करने वालों के लिए पूर्णाहुति ता. 12 सोमवार को ही होगी। प्रातः काल अपना साधन पूर्ण करके हवन करते हुए साधन समाप्त किया जायेगा।
उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ समय है। खेती में जिस प्रकार बीज बोने का एक विशेष समय होता है। ऋतु काल गर्भावान के लिए उपयुक्त होता है, उसी प्रकार गायत्री की विशेष साधना के लिए नवरात्रि का पर्व बहुत ही शुभ है। दिन और रात्रि की मिलन बेला को संध्या कहते हैं और सन्ध्याकाल में ‘सन्ध्या’ करना विशेष फलप्रद होता है उसी प्रकार शीत और ग्रीष्म ऋतुओं की मिलन बेला में आश्विन तथा चैत्र की नवरात्रि आती है। इन दिनों में किया हुआ साधन अन्य समयों की अपेक्षा अधिक उत्तम होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-July
उपासना का कुछ भी अधिकार नहीं तो फिर गायत्री माता भी तो नारी है उन बेचारी की भी पुरुषों से पूजा उपासना करने का क्या अधिकार हो सकता हैं।
उपासना और अधिक लगन से करने लगा।
उपासना के प्रति मेरी अपार श्रद्धा है और मेरे जीवन में और प्रतिदिन के कार्यक्रम में इसका विशेष स्थान है। इसके फलस्वरूप मैं अपनी साधारण परिस्थिति को बड़े ही सुन्दर ढंग से संचालन कर रहा हूँ।
उपासना करता हूँ। इसके फलस्वरूप मुझे आरोग्यता, ज्ञान, प्रतिष्ठा, और उन्नति की दशा का अनुभव हो रहा है। भविष्य में मैं क्या बन जाऊँ यह कह नहीं सकता। इतनी सरल और कष्ट रहित साधना जो नहीं करें उनके समान अभागा इस दुनिया में और कौन है। मेरे अनुभव तथा मेरा दृढ़ विश्वास इस बात का द्योतक है कि वेदमाता गायत्री की शरण में रहने वाला कभी भी दुःखी नहीं रहता है।
उपासना करते हैं, वे इस प्रचण्ड शक्ति की महिमा से अनभिज्ञ हैं। बहुत बड़े दानी से जो कि सैकड़ों अशर्फियों और मुहरें दान दे रहा है यदि कोई याचक रोटी का टुकड़ा माँगे तो उस दानी व्यक्ति का अपमान करना है। माँगने वाले को पागल या अज्ञानी ही कहा जायगा। क्योंकि रोटी को तो कोई भी थोड़े परिश्रम से प्राप्त कर सकता है। यदि कोई वस्तु माँगनी ही हो तो देने वाले की योग्यता के अनुसार होनी चाहिये और साथ ही माँगने वाले को भी स्वयं माँगने वाली वस्तु के योग्य होना चाहिये।
उपासना में लगा हुआ हूँ। मेरी साधना जिस गति से बढ़ती है उसी अनुपात से मुझे माता की कृपा के अनेकों अनुभव भी होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कोई शक्ति मेरे चारों ओर भरी हुई है और वह मुझे निरन्तर प्रेरणा एवं पथ प्रदर्शन प्रदान करती है। अनेकों व्यक्ति मुझसे अनेकों अज्ञात बातें पूछने आते हैं उन्हें ऐसा विश्वास है कि मुझे कोई विशेष सिद्धि प्राप्त है। कारण कि बताई हुई प्रायः सभी बातें सही निकलती हैं और जिसे जो कार्य बता देते हैं वह उनके लिए सफलता प्रदान करने वाला ही बन जाता है।
उपासना में लग गया।
उपासना नहीं कर सकती। पतिदेव ने कहा क्यों नहीं तुम पर तो माता की विशेष कृपा बहुत ही शीघ्र होती है। फिर मैंने कहा कि हमें संध्या के दोनों समय तो गृह कार्य अधिक रहता है फिर कैसे करूं तथा कब करूं तब उन्होंने कहा गृहस्थी पतिव्रता स्त्री को पति की सेवा के बाद, या गृहकार्य से पूर्ण निवृत्त हो जाने के बाद ही उपासना करनी चाहिए। तब से मैंने अपना नियम बना लिया है, मैं प्रातःकाल जप करने के बाद भोजन करती हूँ और सायंकाल जप करने के बाद सोती हूँ। इस प्रकार मेरा उपासना क्रम लगातार चल रहा है।
उपासना अनुभव का सार- वेदमाता की उपासना मनुष्य को कुमार्ग से सुमार्ग पर लाने में जादू का सा असर करती है, एक बार अनुभव करके देखें।
उपासना करते हैं। और कुशल उपासक हैं और अपना अधिक समय गायत्री की सेवा में व्यतीत करते हैं। मैंने प्राथमिक शिक्षा निज ग्राम में ही प्राप्त की, तथा माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिये मिडिल स्कूल मदनापुर, शाहजहाँपुर मण्डलार्न्तगत गया, और वहाँ से मिडिल कक्षा उत्तीर्ण की, तत्पश्चात दादा तथा चाचा ने इंग्लिश भाषा से मेरा अधिक प्रेम न देखकर तथा देव भाषा संस्कृत की ओर मेरी अभिरुचि देखकर मुझे एक पाठशाला संस्कृत पढ़ने के लिये प्रवेश कराया। मैं परिश्रम में लग गया शिक्षा अध्ययन करने, किन्तु दुर्भाग्य वशात् में परीक्षा से दो मास पूर्व रुग्ण हो गया। स्वस्थ होने पर ध्यान हुआ कि परीक्षा के केवल 10 दिन शेष हैं।
उपासना का काम ढांचे पर चलता रहा ही। मैं यह भी कभी अनुभव करता रहा कि बिना सद्गुरु के उपासना उतनी लाभदायक नहीं होती। तान्त्रिक शिक्षा दीक्षा की मुझे विशेष इच्छा थी। ज्यों-ज्यों समय बीता लगन भी बढ़ी। अभी जो कृष्ण पक्ष में ग्रीष्मावकाश होने के कारण हरिद्वार ऋषिकेश का विचार करके मैं तथा माता जी एक घनिष्ठ मित्र के साथ इस आशा में चल पड़े कि सम्भव है हिमालय में किन्हीं गायत्री के अनुभवी महात्मा के दर्शन हों और उनकी सहायता से कुछ सहारा मिले।
उपासना मानव जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। यह केवल श्रद्धा, शास्त्रवचन, परम्परा धार्मिक प्रथा या विश्वास पर आधारित क्रियाकाण्ड नहीं है वरन् बुद्धि संगत, विज्ञान सम्मत एवं प्रत्यक्ष व्यवहार में उपयोगी, अनुभव उपस्थित करने वाला महासत्य है। मैंने इसी रूप में गायत्री को समझा है और तदनुरूप ही उसकी उपासना में सच्चे मन से संलग्न होने का संकल्प कर रहा हूँ।
उपासना करती हैं।
उपासना करने लगे।
उपासना में जुट गया। 3-4 दिन बाद फैसले की तारीख थी। अदालत में पहुँचने पर देखा कि जज का विचार बिल्कुल बदल गया है और उसने पूर्व सूचना के बिल्कुल प्रतिकूल मेरे पक्ष में ही फैसला दिया।
उपासना मनुष्य को कुमार्ग से सुमार्ग पर लाने में जादू का सा असर करती है, एक बार अनुभव करके देखें।
उपासना में संलग्न हैं, सवा लाख के दो अनुष्ठान भी कर चुके हैं।
उपासना के अनुभवों में से कुछ यह हैं। माता का अंचल पकड़ने वाले को क्या नहीं मिल सकता? सब कुछ मिल सकता है।
उपासना और प्रचार में ही बीतता है। मैं, मेरे सहयोगी बन्धु तथा मेरे अनुभव के पाठकों से निवेदन करता हूँ कि वे वेदमाता की उपासना करें, क्योंकि पुत्र को सच्चा सुख माता की गोद में ही मिलता है।
उपासना करते थे, उनके नियमित कार्य को देखकर मेरे मन में भी प्रबल इच्छा हुई कि मैं भी लगातार उपासना करूं। लेकिन कोई सुविधा न होने के कारण तथा छोटे-2 बच्चों का लालन पालन और उनकी पूर्ण जिम्मेदारी मुझ पर होने से, मुझे समय नहीं मिलता था, न पति देव का भी मुझ पर ऐसा प्रभाव था कि वे मुझसे कह सकें कि तुम भी माता की उपासना करो। गृहकार्य की पूर्णतया जिम्मेदारी मुझ पर ही होने से उचित समय नहीं मिलता था। इससे मैं भय खाती थी इस विषय पर मैंने एक दिन पति देव से पूछा क्या मैं उपासना नहीं कर सकती। पतिदेव ने कहा क्यों नहीं तुम पर तो माता की विशेष कृपा बहुत ही शीघ्र होती है।
उपासना करनी चाहिए। तब से मैंने अपना नियम बना लिया है, मैं प्रातःकाल जप करने के बाद भोजन करती हूँ और सायंकाल जप करने के बाद सोती हूँ। इस प्रकार मेरा उपासना क्रम लगातार चल रहा है।
उपासना करने के लिये मुझे से आग्रह किया। प्राण रक्षा के लिए मनुष्य सब कुछ करने को तैयार हो जाता है। फिर गायत्री उपासना जो एक बहुत ही उत्तम और सरल काम है उसके लिए मैं प्रसन्नतापूर्वक तैयार हो गया। माले गाँव लौटकर एक साधारण इलाज चालू करा दिया और पूरी तत्परता के साथ मैं गायत्री उपासना में लग गया।
उपासना की शक्ति के आगे उसका कुछ बस न चल सका। रात्रि को सफेद प्रकाश, सफेद वस्त्र में पुरुष और पदार्थ स्वप्न में दिखाई देते थे। 40 दिन में अनुष्ठान समाप्त हो गया। आखिरी दिन अन्तिम रात्रि को चार बजे 12-14 वर्ष की बालिका का स्वप्न में दर्शन हुआ। उस बालिका ने हमें शक्कर का प्रसाद देकर चली गई।
उपासना करो। गृहकार्य की पूर्णतया जिम्मेदारी मुझ पर ही होने से उचित समय नहीं मिलता था। इससे मैं भय खाती थी इस विषय पर मैंने एक दिन पति देव से पूछा क्या मैं उपासना नहीं कर सकती। पतिदेव ने कहा क्यों नहीं तुम पर तो माता की विशेष कृपा बहुत ही शीघ्र होती है। फिर मैंने कहा कि हमें संध्या के दोनों समय तो गृह कार्य अधिक रहता है फिर कैसे करूं तथा कब करूं तब उन्होंने कहा गृहस्थी पतिव्रता स्त्री को पति की सेवा के बाद, या गृहकार्य से पूर्ण निवृत्त हो जाने के बाद ही उपासना करनी चाहिए।
उपासना में संलग्न हैं, उनके कुछ अनुभव पाठकों के लाभार्थ लिख रहे हैं राम सेवक सिंह वैद्य छितगाँव निवासी की लड़की आठ साल पूर्व आग से बुरी तरह जल गई थी, शरीर जल जाने से पीड़ा से बेचैन थी। खबर पाकर राम सेवक सिंह अपनी लड़की को देखने गये। उस समय लड़की बेहोश थी। घरवालों ने कहा कि सावधानी न की जाती तो वह जल मरती फिर भी हाल चिन्ताजनक है। रामसेवक सिंह ने जाकर देखा कि लड़की के कई अंग जल गये हैं, और वह बेहोश है।
उपासना की तो अब करीब एक साल के लगभग होने आया धीरे-धीरे रोग अपने आप स्वयं घटता गया। अब समय पाकर गत चैत्र की नवरात्रि में चैत्र सुदी 2 को रात्रि के 2 बजे शान्तिपूर्वक सन्तान का जन्म हुआ है। हम सब लोगों को गायत्री माता पर अटूट विश्वास हो गया है।
उपासना क्रम लगातार चल रहा है।
उपासना में बैठता तो पेट गुड़गुड़ाता और अधोवायु निकलने लगता, इतना ही नहीं घण्टा भर अगर एक आसन से बैठे-बैठे जप करता तो दो चार बूँद धात निकल जाता था। उपासना के समय यह तमाशा देखकर कभी-कभी हतोत्साहित हो जाता था। साधना चालू रखे तो यह लीला, न करे तो मन नहीं मानता था। जैसे तैसे चालू रक्खा छोड़ा नहीं, माँ की दयालुता पर भरोसा था। मैंने ठान लिया था, कि चाहे जो कुछ हो, उसे छोड़ नहीं सकते।
उपासना पर पूरा बल लगा दिया और नियत तारीख पर अपनी अर्जी लेकर उस प्रधान सचिव के समक्ष उपस्थित हुआ। इसे माता की कृपा ही कहना चाहिए कि जंगल काट लेने की स्वीकृति मुझे मिल गई। फलस्वरूप 500 सागौन के दो-दो फुट से अधिक मोटे वृक्ष मैंने उसी दिन बेच दिये। उनका रुपया आने से उलझी हुई सभी आर्थिक कठिनाइयों का समाधान हो गया।
उपासना के समय यह तमाशा देखकर कभी-कभी हतोत्साहित हो जाता था। साधना चालू रखे तो यह लीला, न करे तो मन नहीं मानता था। जैसे तैसे चालू रक्खा छोड़ा नहीं, माँ की दयालुता पर भरोसा था। मैंने ठान लिया था, कि चाहे जो कुछ हो, उसे छोड़ नहीं सकते। यह विकट परिस्थिति बहुत कम लोगों के आगे आयी होगी।
उपासना भी करता है।
उपासना करते थे, जोर-जोर से माता-माता चिल्लाने लगे। इसे सुनकर डाकू ने कहा, माता-माता चिल्ला रहा है मारो साले को, इतना सुनते ही दूसरे साथी ने जोर से भाले का वार किया। लेकिन धन्य है, गायत्री देवी, जोर से चलाया हुआ भाला ओठ पर जरा सा चिन्ह देते हुए निष्फल गया। पं0 रामधनी बाल-बाल बच गये।
उपासना आरम्भ की है उनका भी गृहस्थ जीवन और वर्तमान परिस्थिति बहुत अच्छी है।
उपासना के फलस्वरूप मेरी अनेकों कठिनाई हल होती गई हैं और सुविधाएँ बढ़ी हैं। शेष जीवन की कठिनाइयों को भी वे इसी प्रकार पार कर देंगी, ऐसी आशा है।
उपासना आकर्षित करने से आपका कष्ट मिट जायगा।
उपासना आरम्भ करने पर मेरे भीतर से कुछ ऐसा आत्मबल बढ़ा कि साहसपूर्वक तमाखू छोड़ने का संकल्प किया और जो बात असम्भव दीखती थी वह सम्भव हो गई। तमाखू दुष्टिनी से मेरा पीछा छूटा और स्वास्थ्य तथा पैसा की भयंकर बर्बादी से बचत हो गई।
उपासना में लगाने लगा।
उपासना करते रहे, लेकिन जिस प्रकार से अपना जीवन बनाना चाहते थे वैसा ही बना सके। अन्त में श्रवण करते करते जमदग्नि आश्रम परशुराम कुण्ड आये और वहाँ इनका एक महात्मा से परिचय हुआ और उनको इन्होंने अपनी व्यथा सुनाई, तब महात्मा जी ने कहा यदि तुम्हें शान्ति शीघ्र प्राप्त करना है तो गायत्री का जप करो। इनके ध्यान में वह बात जम गई कि ब्राह्मण को बिना गायत्री के किसी भी प्रकार सफलता नहीं मिल सकती है। ऐसा निश्चय करके ये औंकारेश्वर क्षेत्र में आये, वहाँ उन्होंने गायत्री की तपश्चर्या की। उसके आश्चर्यजनक अनुभव प्राप्त हुए और इन्हें सच्ची शान्ति प्राप्त हुई।
उपासना करें, क्योंकि पुत्र को सच्चा सुख माता की गोद में ही मिलता है।
उपासना करने का क्या अधिकार हो सकता हैं।
उपासना उतनी लाभदायक नहीं होती। तान्त्रिक शिक्षा दीक्षा की मुझे विशेष इच्छा थी। ज्यों-ज्यों समय बीता लगन भी बढ़ी। अभी जो कृष्ण पक्ष में ग्रीष्मावकाश होने के कारण हरिद्वार ऋषिकेश का विचार करके मैं तथा माता जी एक घनिष्ठ मित्र के साथ इस आशा में चल पड़े कि सम्भव है हिमालय में किन्हीं गायत्री के अनुभवी महात्मा के दर्शन हों और उनकी सहायता से कुछ सहारा मिले।
उपासना का सहारा लिया। कुछ समय पूर्व मैंने गायत्री की महिमा सन्त महात्माओं से सुनी थी। अहमदाबाद के एक सज्जन ने भी इस सम्बन्ध में मुझे बहुत कुछ बताया था। अखण्ड-ज्योति को भी देखा था और उससे प्रेरणा प्राप्त की थी। उन सब बातों की प्रतीक्षा करने का यही अवसर था।
उपासना के महत्व को मैं बहुत समय से जानता हूँ। पर जब गायत्री मन्त्र लेखन की साधना का वर्णन अखण्ड-ज्योति में पढ़ा तो उस पर विशेष मनोयोग पूर्वक विचार किया तो लगा कि यह साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण होगी।
उपासना में लगे हुए हैं। हम लोगों की जैसी कुछ टूटी फूटी साधना है उसके हिसाब से देखा जाय तो हम लोगों को माता का सहारा भी सन्तोषप्रद मिल रहा है। गत वर्ष गर्मियों में तो हम लोग एक भारी दुर्घटना तथा जान-माल की भयंकर क्षति से बाल-बाल बच गये। रक्षा में गायत्री माता की कृपा ही प्रधान कारण थी।
उपासना के सम्बन्ध में कल्पवृक्ष मासिक पत्र उज्जैन में आते थे। उनको देख देखकर मुझे अत्यन्त लाभ हुआ। मैं स्वयं पण्डित शिवदत्त जी के पास गया। उनके उपदेश के सवा सवा लक्ष के अनुष्ठान किये। पंडितजी ने कहा कि नित्य ब्रह्म मुहूर्त में 1000 जप व उसका दशाँश हवन 6 वर्ष तीन मास तक करो तो तुम्हारा गायत्री पुरश्चरण हो जायगा।
उपासना का अंकुर जग गया और उनके दर्शाये मार्ग से सब कुछ छोड़कर, तपश्चर्या करने लग गये।
उपासना कर पाया है सन् 1953 ई. में उसकी शादी अलीगढ़ से बड़ी धूमधाम से हुई और तीन चार हजार रुपया भी मिला था हमारे साथी जनकाराम जय प्रकाश शर्मा भहोरी निवासी की शादी की कोई आशा नहीं थी माता की कृपा से उनकी भी शादी बड़ी धूमधाम से हुई और योग्य पत्नी मिली।
उपासना जो एक बहुत ही उत्तम और सरल काम है उसके लिए मैं प्रसन्नतापूर्वक तैयार हो गया। माले गाँव लौटकर एक साधारण इलाज चालू करा दिया और पूरी तत्परता के साथ मैं गायत्री उपासना में लग गया।
उपासना के अवलम्बन को संभाला क्योंकि मुसीबत के समय प्राण रक्षा करने वाली एक मात्र शक्ति वही है। मेरा रोग धीरे-धीरे घटना आरम्भ हुआ और कुछ ही दिनों में स्थिति सुधर गई। अब टोकनी रखने की जरूरत नहीं रात भर पूरी नींद आती है। यों चमत्कार पूर्ण भयंकर रोग से छुटकारे का मूल कारण वहीं वेदमाता गायत्री की रहस्यमय कृपा है व प्रत्यक्ष दैवी कला है। जो श्री गायत्री माता अपने भक्त पुत्रों को सदा प्रदान करती हैं, जो पुत्र अपनी इष्ट माता गायत्री की शरण में पूर्ण विश्वास के साथ रहते हैं, उनके सभी कार्य सफल होते हैं, उन्हें चारों पदार्थ अवश्य ही प्राप्त होते हैं।
उपासना के बारे में आर्य समाज और सनातन धर्म वालों में कोई झगड़ा नहीं इसलिए संकुचित हृदय का न बनना और विशाल हृदय से खण्डन मण्डन को छोड़ते हुए सबको मिलाने और एक मंत्र पर लाने की कोशिश करना।
उपासना करने से पूर्व मुझ में कई दुर्व्यसन थे। तम्बाकू, सुपारी इतनी खाता था कि एक मिनट भी उनके बिना नहीं रह सकता था। इंजन में रहने वाले को वैसे ही सारे समय भारी गरमी का सामना करना पड़ता है। इस पर भी तम्बाकू खाने की इतनी भरमार। इसका प्रभाव स्वास्थ्य पर बुरा ही पड़ रहा था, पर आदत से मजबूरी थी।
उपासना आरम्भ कर दी और प्रतीक्षा करने लगा कि देखें किस प्रकार मुझे इस ऋण भार से मुक्ति मिलती है।
उपासना पर बहुत जोर दिया है, और त्यागने वाले की निन्दा की है। ऋषियों का अनुभव और विश्वास है, कि अगर केवल गायत्री को भी द्विज अपनाये रहेंगे तो धन, जन और आत्मबल से परिपूर्ण रहेंगे। उन्हें कुछ भी अप्राप्त न रहेगा।
उपासना करते बीत गया पर कोई चमत्कार न दीखा। निदान भीतर से ऐसी प्रेरणा हुई कि अपना जो मकान है उसे बेचकर ऋणदारों को चुका दिया जाय। माता जी की कृपा से कीमत अच्छी आई। मकान अच्छे दामों को बिका। आवश्यक कर्जे चुका कर शेष का एक छोटा मकान और खरीद लिया।
उपासना द्वारा अनेकों लाभ हुए हैं उन सबका विस्तृत वर्णन करके पाठकों अमूल्य समय लेना नहीं चाहता। उन घटनाओं के आधार पर जो निष्कर्ष निकलते हैं वे नीचे दिये जाते हैं। यह निम्नलिखित तथ्य पूर्ण सत्य हैं। प्राचीन काल के ऋषियों से लेकर आज के सामान्य गायत्री उपासकों तक को यह अनुभव समान रूप से होते रहते हैं।
उपासना करने लगे। माता ने हमें एक और पुत्र दिया उसका नाम सूर्य नारायण रखा गया। उसमें कुछ विशेषताएँ ऐसी ही हैं जिससे यह नाम रखना पड़ा।
उपासना करता आया हूँ। इसके प्रभाव से मुझे अच्छी नौकरियाँ मिली। वकील के पद से कोर्टों में मुख्तारी द्वारा प्रेक्टिस की, जागीरों में उच्च पदों पर काम किया, मामूली लिखा पढ़ा होने पर मजिस्ट्रेटी के पद पर भी पाँच वर्ष तक कार्य किया।
उपासना करूं। लेकिन कोई सुविधा न होने के कारण तथा छोटे-2 बच्चों का लालन पालन और उनकी पूर्ण जिम्मेदारी मुझ पर होने से, मुझे समय नहीं मिलता था, न पति देव का भी मुझ पर ऐसा प्रभाव था कि वे मुझसे कह सकें कि तुम भी माता की उपासना करो। गृहकार्य की पूर्णतया जिम्मेदारी मुझ पर ही होने से उचित समय नहीं मिलता था। इससे मैं भय खाती थी इस विषय पर मैंने एक दिन पति देव से पूछा क्या मैं उपासना नहीं कर सकती। पतिदेव ने कहा क्यों नहीं तुम पर तो माता की विशेष कृपा बहुत ही शीघ्र होती है।
उपासना में सच्चे मन से संलग्न होने का संकल्प कर रहा हूँ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-November
उपासना आयोजनों का कार्यक्रम जिसके सम्बन्ध में पिछले पृष्ठों पर एक लेख छपा है। (2) आगामी चैत्र की नवरात्रि में अधिक उपासकों को तपोभूमि के महापुरश्चरण में भाग लेने आने के लिए प्रोत्साहन (3) चैत्र वदी 5 ता0 13 मार्च से एक या डेढ़ महीने के लिए शास्त्रोक्त यज्ञ विधि का शिक्षण शिविर (4) आश्चर्यजनक सस्ता एवं अपनी सामर्थ्य से अधिक घाटा देकर छपने वाला जनवरी 55 का ‘गायत्री ज्ञान अंक’। इन चारों कार्य क्रमों के लिए यथासम्भव सहयोग करना और इन्हें आगे बढ़ाने के लिए उत्साहपूर्वक शक्ति भर प्रयत्न करना, हम सब का परम पुनीत कर्त्तव्य है।
उपासना के सामूहिक आयोजनों का प्रबन्ध करना अपने एकाँकी छोटे-मोटे अनुष्ठानों की अपेक्षा निश्चय ही अधिक उच्च कोटि का पुण्य है। जिन को सुविधा हो, जिनके अन्तःकरण में प्रेरणा हो उनको ऐसे शुभ प्रयत्नों के लिए अवश्य ही उत्साह प्रकट करना चाहिए। एक दो प्रभावशाली सहयोगियों के साथ कार्य आरम्भ किया जाय। नीचे कुछ ऐसे ही कार्यक्रम उपस्थित किये जाते हैं।
उपासना साधना की प्रक्रिया का प्रसार करना मानव जीवन की अनेक कठिनाईयों को सरल करने का परम पुनीत मार्ग है। आज के समय में यह सर्वोपरि आवश्यक है।
उपासना करने की अपेक्षा अधिक सफलता मिलेगी। इसलिए आगामी नवरात्रियों में मथुरा अधिक संख्या में लोगों को न आने की वैसी कड़ाई न बरती जायेगी जितनी अब तक बरती जाती रही है।
उपासना करता है। समाज का, संसार का, देश और जाति के कल्याण की बात को भुलाकर केवल अपने फायदे के लिए ही जो कार्य किए जाते हैं वे “स्वार्थ” कहलाते हैं। गायत्री मन्त्र निश्चय ही स्वार्थ नहीं-वह तो परमार्थ है-सबके कल्याण के लिए है। गायत्री साधना के साथ यज्ञ का, दान का, ब्राह्मण भोजन का सम्बन्ध इसलिए जोड़ा गया है कि केवल अकेला एक व्यक्ति चुपचाप जप करके एक कोने में न बैठा रहे वरन् संसार की वायु शुद्धि एवं शुभ वातावरण के निमित्त हवन भी करे, दान देकर समाज की कुछ भलाई भी करे। सच्चे लोक सेवकों परमार्थ प्रसारक ब्राह्मणों को भोजन आदि से तृप्त करके उनकी सामर्थ्य भी बढ़ावें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-January
उपासना की भावना ही यज्ञ का वास्तविक रहस्य है।
उपासनाओं की विधियों का अन्तर, साधना मार्ग की कठिनाई, सफलता के रहस्य आदि का बहुत विस्तृत विज्ञान है। इस यज्ञ सम्बन्धी पुस्तक मे
उपासना, तप, यज्ञ आदि में समय और धन खर्च करने की अपेक्षा भरपूर दक्षिणा हमें दो और स्वर्ग के अधिकारी बन जाओ। ऐसे अनेक श्लोक उनने पुस्तकों में सम्मिलित कर लिए और दक्षिणावाद का झण्डा गाड़ दिया। सारे धर्म कर्म की धुरी दक्षिणा बन गई।
उपासना एवं सहायता की जाय, उसी में श्रद्धा रखी जाय और अपना प्रत्येक कदम उसी दिशा में अग्रसर किया जाय। असुरता को हटाने, उससे लड़ने और उसका विरोध करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। यदि मजबूरी के कारण बुराई की परिस्थिति में रहना भी पड़े तो भी उसको मानसिक रूप से कभी स्वीकार न करना चाहिये । वरन् कम से कम उससे मानसिक घृणा तो रखनी ही चाहिए और उस परिस्थिति से छुटकारा पाने के लिए प्रभु प्रार्थना तथा प्रयत्न भी करते रहना चाहिए। असुरता का पक्ष ग्रहण करना और उसी में तल्लीन हो जाना असुर पूजा है।
उपासना करते हुए अधिकाधिक लोग सेवा करने के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़ते हैं। स्वार्थपरता को न छोड़कर कर्त्तव्य पालन एवं लोक सेवा द्वारा उऋण होने की कठिनाई या मेहनत से जी चुराकर जो आलस्य और हराम खोरी पर उतर आते हैं और कहते हैं संसार तो माया है दूसरों के लिए हम कोई प्रयत्न क्यों करें, ऐसे लोगों को साधु महात्मा या त्यागी वैरागी कहना भी इन पवित्र शब्दों को कलंकित करना है। साहु वह है, जो अपना ऋण दूसरों पर छोड़े, जो स्वयं सब का कर्जदार बैठा है और बदला चुकाने के समय कतराता है वह तो पक्का चोर है। उसे न तो साहु कह सकते और न साधु। प्रत्येक व्यक्ति को उपरोक्त तीन ऋणों से उऋण होने का प्रयत्न करना चाहिए।
उपासना की जाती है। वैसे ही अग्नि होत्र के द्वारा यज्ञ भावनाओं का विकास कर अपने आपको ब्रर्ह्मपण करते हुए स्वयं या यज्ञ रूप बनना होता है। यही यज्ञ का परम रहस्य है। यह परमार्थ प्रियता, परस्पर सहयोग, सद्भावना की वृत्ति, संयम, त्याग उदारता, धर्म प्रियता, आस्तिकता एवं ईश्वर उपासना की भावना ही यज्ञ का वास्तविक रहस्य है।
उपासना, उनकी समीपता संगति तथा अपनी समझी जाने वाली वस्तुओं को उनके अर्पण करना यह यज्ञ की आध्यात्मिक प्रक्रिया है। देव गुण सम्पन्न सत्पुरुषों की सेवा एवं संगति करना तथा उन्हें सहयोग देना भी यज्ञ है। व्यावहारिक अर्थों में इसे यों भी कह सकते हैं कि बड़ों का सम्मान बराबर वालों से संगति, मैत्री, अपने छोटों को, कम शक्ति वालों को दान सहायता करना यज्ञ है। इस प्रकार ईश्वर उपासना, सत् तत्व का अभिवर्धन एवं पारस्परिक सहयोग भी यज्ञ माने जाते हैं। यों हवन के अर्थ में यज्ञ शब्द का प्रयोग तो प्रसिद्ध ही है।
उपासना का अर्थ समीपता भी है। सत्संग द्वारा उनके विचारों एवं कार्यों से समीपता स्थापित करके, लाभ उठाना भी देव पूजा है यदि हमारे मन में सत्पुरुषों के प्रति या उनके कर्मों के प्रति श्रद्धा न हो, उनका सहयोग या अनुकरण न करें, अनुशासन न मानें तो वे इच्छा करते हुए भी हमारी कोई सेवा नहीं कर सकते, हमें कोई लाभ नहीं पहुँचा सकते। इसलिए दोनों पक्षों में पारस्परिक स्नेह सम्बन्ध सहयोग एवं सद्भावना होना आवश्यक है। इस एकता का स्थापित करना ही यज्ञ है जहाँ सदुद्देश्य के लिए सच्चे मन से दो व्यक्ति मिलते हैं वहाँ एक और एक मिलकर दो होने का नहीं वरन् एक + एक = ग्यारह (11) होने का सिद्धान्त लागू होता है। उनकी सम्मिलित शक्ति दूनी नहीं, ग्यारह गुनी हो जाती है।
उपासना द्वारा प्रसन्न कर लिया जाय तो मनुष्य मनचाही वर्षा कराने में सफल हो सकता है। गंगा की देव आत्मा को प्रसन्न करके भागीरथ पृथ्वी पर गंगा नदी को लाये और उसी जल धारा को इच्छित मार्ग से समुद्र जल ले गये। पूर्व काल में इसी प्रकार अन्य देवों को लोगों ने प्रसन्न किया है और अभीष्ट लाभ प्राप्त किये है।
उपासना में भी हवन आवश्यक है। अनुष्ठान या पुरश्चरण में जप से दसवाँ भाग हवन करने का विधान है। परिस्थितिवश दसवाँ भाग आहुतियाँ न दी जा सके तो शताँश (सौ वाँ भाग) आवश्यक है। गायत्री को माता और यज्ञ को पिता माना गया है। इन्हीं दोनों के संयोग से मनुष्य का आध्यात्मिक जन्म होता हैं जिसे ‘द्विजत्व’ कहते हैं।
उपासना करते थे और सभी द्विजों को इस कल्याण कारक मार्ग पर प्रवृत्त करके उन्हें सुख शान्ति के परमलक्ष्य तक पहुँचाने का पुण्य लाभ करते थे। इसी प्रकार स्वयं यज्ञ करते थे और अन्य अधिकारियों को प्रेरणा पूर्वक यज्ञ करके विश्व कल्याण के एक महान परमार्थ का आयोजन करते थे। उन्हें यज्ञादिक में कोई दान दक्षिणा मिलती थी तो उसके एक कण का उपयोग भी व्यक्तिगत भोग ऐश्वर्य में नहीं करते थे वरन् इस हाथ लेकर उसे यज्ञ, गुरुकुल, ग्रन्थ निर्माण, सत्संग आयोजन, चिकित्सा, आदि कार्यों में लगा देते थे। ब्राह्मण का कर्त्तव्य ही यह था (1) विद्या पढ़ना-विद्या (2) दान लेना-दान देना (3) यज्ञ करना-यज्ञ कराना। स्पष्ट है कि ब्राह्मण जीवन की गतिविधि परमार्थ मय ही होती थी।
उपासना कैसे करें? (8) गायत्री से यज्ञ का संबंध, आठों ही पुस्तकें गायत्री विद्या सम्बन्धी बहुत कुछ जानकारी उपस्थित करती है। इस पूरे सैट का मूल्य दस आना मात्र है, 14 जनवरी मकर संक्रान्ति से होकर 13 फरवरी कुम्भ संक्रान्ति तक इस साहित्य को बेचने या उपहार देने के लिए हम सब पूरा-पूरा प्रयत्न करें, प्रतिदिन 1 के हिसाब से 20 दिन में 30 सैट प्रसारित करने का प्रयत्न सफल होना बहुत सरल है। 1) की पुस्तकें बेच सकना या वितरण कर सकना कोई ऐसा कार्य नहीं हैं जिसे थोड़ी सी भी इच्छा, श्रद्धा, भावना और सामर्थ्य रखने वाला व्यक्ति न कर सके। जो इतना भी न कर सके वे 10 सैट) को तो प्रचारित कर ही सकते हैं।
उपासना की प्रेरणा के लिए एक-एक पत्र भी लिखना चाहिए।
उपासना से स्वाध्याय, व्रत, वेदज्ञान आदि का आरम्भ होता है और यज्ञ का ताश्चर्या से सम्बन्ध है। इस प्रकार गायत्री माता और यज्ञ पिता से ही ब्राह्मणत्व का जन्म होता है। माता-पिता की महिमा बढ़ाना, उनके महत्व को उज्ज्वल एवं प्रकाशवान करना सत्पुत्र का कर्त्तव्य है। पूर्व काल में ब्राह्मण लोग बड़े प्रयत्न, उत्साह, लगन एवं श्रम से स्वयं गायत्री उपासना करते थे और सभी द्विजों को इस कल्याण कारक मार्ग पर प्रवृत्त करके उन्हें सुख शान्ति के परमलक्ष्य तक पहुँचाने का पुण्य लाभ करते थे। इसी प्रकार स्वयं यज्ञ करते थे और अन्य अधिकारियों को प्रेरणा पूर्वक यज्ञ करके विश्व कल्याण के एक महान परमार्थ का आयोजन करते थे।
उपासना, सत् तत्व का अभिवर्धन एवं पारस्परिक सहयोग भी यज्ञ माने जाते हैं। यों हवन के अर्थ में यज्ञ शब्द का प्रयोग तो प्रसिद्ध ही है। हवन द्वारा भी उपरोक्त तीनों प्रयोजन पूर्ण होते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-October
उपासना का वास्तविक लाभ है।
उपासना कथा कीर्तन योगाभ्यास आदि इसी प्रयोजन के लिए किये जाते हैं कि ममता और वासना के बन्धन क्षीण हों। समस्त अध्यात्म साधनाओं का यह एक ही उद्देश्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही ऋषियों ने देश काल पात्र के अनुसार अनेक प्रकार के साधन विधानों का निर्माण किया है।
उपासना के थोड़े से प्रयत्न से उसे मनमानी मात्रा में लाभ प्राप्त होते रहें। यह इच्छा पूर्णतया सफल तभी हो सकती है जब पूर्व जन्मों के फलों की, प्रारब्धों की सनातन व्यवस्था संसार में से उठ जाय। उस उलझन को खो बैठते हैं और इस मार्ग से विमुख हो जाते हैं। गायत्री परिवार के जो सदस्य बनते हैं उनसे से कइयों की ऐसी ही स्थिति हो जाती है। अपने परिजनों के लिये हम भी यथा सम्भव सहयोग करते हैं, माता भी उन्हें सर्वथा निराश नहीं रहने देती।
उपासना तथा भक्ति आदि प्रतिदान नहीं हैं, वह तो उपास्य के प्रति उपासक की कृतज्ञता का प्रकटीकरण नाम है। यह स्नेह के प्रतिदान का स्वरूप नहीं है।
उपासना न करता तो यह कष्ट क्यों आता? दूसरे उपासकों को अधिक लाभ और अपने को स्वल्प लाभ मिलते देख कर भी कई व्यक्तियों के मन में भी कई प्रकार के भ्रम होने लगते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि कभी तो उपासना का विशेष लाभ हुआ और कभी वैसे सत्परिणाम सामने न आ सके ऐसी अवस्था में साधक के मन में अनास्था उत्पन्न होने लगती है।
उपासना की ओर अग्रसर होते हैं। मनुष्य साधारणतः अनेक कामनाओं मुसीबतों चिंताओं और अभावों से घिरा रहता है उनसे छुटकारा पाने के लिये जहाँ अनेक प्रकार के अन्य उपाय किया करता है, उन्हीं में एक उपाय उपासना को भी मान लेता है। गायत्री उपासना से संसार की अन्य समस्त उपासनाओं की अपेक्षा अधिक मात्रा में, अधिक सरलता से और अधिक शीघ्र लाभ होता है, यह एक निश्चित तथ्य है। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि प्रत्येक व्यक्ति की, प्रत्येक प्रार्थना गायत्री माता अवश्य ही पूर्ण कर देती है।
उपासना द्वारा स्वर्गीय स्नेह के ऋण से उऋण होने का दम्भयुक्त प्रयास करता है। ऐसा प्रयास उपहासास्पद है, क्योंकि उपासना तथा भक्ति आदि प्रतिदान नहीं हैं, वह तो उपास्य के प्रति उपासक की कृतज्ञता का प्रकटीकरण नाम है। यह स्नेह के प्रतिदान का स्वरूप नहीं है।
उपासना को व्यर्थ मानता है। कई बार तो वह यहाँ तक कह बैठता है कि यह 5 मन कष्ट उपासना के ही फलस्वरूप आया है, यदि उपासना न करता तो यह कष्ट क्यों आता? दूसरे उपासकों को अधिक लाभ और अपने को स्वल्प लाभ मिलते देख कर भी कई व्यक्तियों के मन में भी कई प्रकार के भ्रम होने लगते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि कभी तो उपासना का विशेष लाभ हुआ और कभी वैसे सत्परिणाम सामने न आ सके ऐसी अवस्था में साधक के मन में अनास्था उत्पन्न होने लगती है।
उपासनाओं की अपेक्षा अधिक मात्रा में, अधिक सरलता से और अधिक शीघ्र लाभ होता है, यह एक निश्चित तथ्य है। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि प्रत्येक व्यक्ति की, प्रत्येक प्रार्थना गायत्री माता अवश्य ही पूर्ण कर देती है।
उपासना भी एक आध्यात्मिक पुरुषार्थ है। जिस प्रकार अन्य पुरुषों का आवश्यक सत्परिणाम होता है, उसी प्रकार गायत्री उपासना का भी होता है। परन्तु वह परिणाम सबके लिए समान रूप से सुखकर नहीं होता। मान लीजिए एक दानी व्यक्ति प्रसन्न होकर 10 आदमियों को एक-एक हजार रुपया देता है। तो देने की रकम समान होते हुए भी सबको एक समान लाभ न होगा।
उपासना को भी मान लेता है। गायत्री उपासना से संसार की अन्य समस्त उपासनाओं की अपेक्षा अधिक मात्रा में, अधिक सरलता से और अधिक शीघ्र लाभ होता है, यह एक निश्चित तथ्य है। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि प्रत्येक व्यक्ति की, प्रत्येक प्रार्थना गायत्री माता अवश्य ही पूर्ण कर देती है।
उपासना के श्रम के मूल से कहीं अधिक लाभ ये किसी न किसी प्रकार दे ही देती हैं, पर वे लोग जो-
उपासना से यदि उसमें से 5 मन कष्ट कम किया तो उस मनुष्य के लिए यह जानना कठिन है कि मेरा 5 मन कष्ट घटा या नहीं, वह तो सामने उपस्थित 5 मन कष्ट देखकर भी बहुत दुख मानता है और अपनी उपासना को व्यर्थ मानता है। कई बार तो वह यहाँ तक कह बैठता है कि यह 5 मन कष्ट उपासना के ही फलस्वरूप आया है, यदि उपासना न करता तो यह कष्ट क्यों आता? दूसरे उपासकों को अधिक लाभ और अपने को स्वल्प लाभ मिलते देख कर भी कई व्यक्तियों के मन में भी कई प्रकार के भ्रम होने लगते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि कभी तो उपासना का विशेष लाभ हुआ और कभी वैसे सत्परिणाम सामने न आ सके ऐसी अवस्था में साधक के मन में अनास्था उत्पन्न होने लगती है।
उपासना के वास्तविक लाभ को प्राप्त नहीं कर सकते। भिखारी लोग किसी दानी के दरवाजे पर खड़े रहते हैं तो उनकी पात्रता और दानी की दया के अनुसार उन्हें यथा अवसर कुछ मिलता रहता है, पर भिखारियों की हर कामना को पूर्ण करना दानी का कर्त्तव्य नहीं है। भिखारियों की आवश्यकता का समाधान भी दान से नहीं हो सकता। प्रार्थना करने मात्र में जो लाभ प्राप्त होता है वह सीमित होता है। असीम लाभ का अधिकारी वही है जो दानी के साथ आत्म सम्बन्ध स्थापित करके अपने को उसका एक अंग बन लेता है।
उपासना जैसे विशुद्ध आत्म कल्याणकारी कर्त्तव्य को भी नैतिक लाभ के लिये ही करना चाहता है। पशु में लोभ और भय यह दो की भावना प्रधान होती है, बालबुद्धि का मनुष्य भी एक प्रकार का पशु ही है। उसे कुछ प्रलोभन देकर उपासना मार्ग पर अग्रसर करने के लिये भी ऋषियों ने प्रयत्न किया है। अनेक प्रकार के व्रत, तप, उपासना, अनुष्ठान, पूजन, स्त्रोत, पाठ, तीर्थ यात्रा, कथा श्रवण आदि के बड़े बड़े आकर्षक महात्म्य वर्णन किये हैं, बहुत बहुत लाभ बताये हैं, वो इसलिए कि लोभी मनुष्य कदाचित इसी बहाने उपासना पथ पर आकर्षित होकर आत्म कल्याण में लगे। ऋषियों को आशा थी कि थोड़ी दूर तक सकाम भावना से साधना पथ पर चलने के उपरान्त साधक वस्तुस्थिति को समझ लेगा और उपासना के भौतिक नहीं आध्यात्मिक लाभ को लेने के लिये तत्पर हो जायगा।
उपासना से केवल भौतिक लाभ प्राप्त करना चाहता है। जब तक वह लाभ रहता है तब तक प्रसन्न रहता है और जब उसमें कमी या देरी होने लगती है तो अधीर होकर पूजा पाठ छोड़ बैठता है। वह चाहता है कि कर्म फल, प्रारब्ध पूर्व जन्मों के सुकृत दुष्कृतों का परिपाक आदि के तथ्य तो एक ताक पर उठा कर रख दिये जायें और उपासना के थोड़े से प्रयत्न से उसे मनमानी मात्रा में लाभ प्राप्त होते रहें। यह इच्छा पूर्णतया सफल तभी हो सकती है जब पूर्व जन्मों के फलों की, प्रारब्धों की सनातन व्यवस्था संसार में से उठ जाय। उस उलझन को खो बैठते हैं और इस मार्ग से विमुख हो जाते हैं।
उपासना का विशेष लाभ हुआ और कभी वैसे सत्परिणाम सामने न आ सके ऐसी अवस्था में साधक के मन में अनास्था उत्पन्न होने लगती है।
उपासना का मूल एवं सुनिश्चित लाभ आत्म निर्माण, आत्म शुद्धि, एवं आत्म कल्याण है। पर मनुष्य इतना भौतिक, इतना बहिर्मुखी हो गया है कि हर काम में यहाँ तक कि उपासना जैसे विशुद्ध आत्म कल्याणकारी कर्त्तव्य को भी नैतिक लाभ के लिये ही करना चाहता है। पशु में लोभ और भय यह दो की भावना प्रधान होती है, बालबुद्धि का मनुष्य भी एक प्रकार का पशु ही है। उसे कुछ प्रलोभन देकर उपासना मार्ग पर अग्रसर करने के लिये भी ऋषियों ने प्रयत्न किया है। अनेक प्रकार के व्रत, तप, उपासना, अनुष्ठान, पूजन, स्त्रोत, पाठ, तीर्थ यात्रा, कथा श्रवण आदि के बड़े बड़े आकर्षक महात्म्य वर्णन किये हैं, बहुत बहुत लाभ बताये हैं, वो इसलिए कि लोभी मनुष्य कदाचित इसी बहाने उपासना पथ पर आकर्षित होकर आत्म कल्याण में लगे।
उपासना मार्ग पर अग्रसर करने के लिये भी ऋषियों ने प्रयत्न किया है। अनेक प्रकार के व्रत, तप, उपासना, अनुष्ठान, पूजन, स्त्रोत, पाठ, तीर्थ यात्रा, कथा श्रवण आदि के बड़े बड़े आकर्षक महात्म्य वर्णन किये हैं, बहुत बहुत लाभ बताये हैं, वो इसलिए कि लोभी मनुष्य कदाचित इसी बहाने उपासना पथ पर आकर्षित होकर आत्म कल्याण में लगे। ऋषियों को आशा थी कि थोड़ी दूर तक सकाम भावना से साधना पथ पर चलने के उपरान्त साधक वस्तुस्थिति को समझ लेगा और उपासना के भौतिक नहीं आध्यात्मिक लाभ को लेने के लिये तत्पर हो जायगा।
उपासना से आवश्यक सुधार तो अवश्य होता है पर हर व्यक्ति अपनी अल्प बुद्धि के कारण उसका अनुभव ठीक प्रकार नहीं कर सकता। जिसके आरम्भ में 10 मन कष्ट हैं उपासना से यदि उसमें से 5 मन कष्ट कम किया तो उस मनुष्य के लिए यह जानना कठिन है कि मेरा 5 मन कष्ट घटा या नहीं, वह तो सामने उपस्थित 5 मन कष्ट देखकर भी बहुत दुख मानता है और अपनी उपासना को व्यर्थ मानता है। कई बार तो वह यहाँ तक कह बैठता है कि यह 5 मन कष्ट उपासना के ही फलस्वरूप आया है, यदि उपासना न करता तो यह कष्ट क्यों आता? दूसरे उपासकों को अधिक लाभ और अपने को स्वल्प लाभ मिलते देख कर भी कई व्यक्तियों के मन में भी कई प्रकार के भ्रम होने लगते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि कभी तो उपासना का विशेष लाभ हुआ और कभी वैसे सत्परिणाम सामने न आ सके ऐसी अवस्था में साधक के मन में अनास्था उत्पन्न होने लगती है।
उपासना के ही फलस्वरूप आया है, यदि उपासना न करता तो यह कष्ट क्यों आता? दूसरे उपासकों को अधिक लाभ और अपने को स्वल्प लाभ मिलते देख कर भी कई व्यक्तियों के मन में भी कई प्रकार के भ्रम होने लगते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि कभी तो उपासना का विशेष लाभ हुआ और कभी वैसे सत्परिणाम सामने न आ सके ऐसी अवस्था में साधक के मन में अनास्था उत्पन्न होने लगती है।
उपासना पथ पर आकर्षित होकर आत्म कल्याण में लगे। ऋषियों को आशा थी कि थोड़ी दूर तक सकाम भावना से साधना पथ पर चलने के उपरान्त साधक वस्तुस्थिति को समझ लेगा और उपासना के भौतिक नहीं आध्यात्मिक लाभ को लेने के लिये तत्पर हो जायगा।
उपासना करते हैं। ऐसे सज्जनों को समय-समय पर मार्ग दर्शन कराने एवं आवश्यक सहयोग देने के लिए यथा सम्भव प्रयत्न किया जाता रहता है। इस प्रकार गायत्री परिवार के सदस्य बन कर अनेकों सुसंस्कारी महानुभाव अपनी आध्यात्मिक और भौतिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते रहते हैं।
उपासना, अनुष्ठान, पूजन, स्त्रोत, पाठ, तीर्थ यात्रा, कथा श्रवण आदि के बड़े बड़े आकर्षक महात्म्य वर्णन किये हैं, बहुत बहुत लाभ बताये हैं, वो इसलिए कि लोभी मनुष्य कदाचित इसी बहाने उपासना पथ पर आकर्षित होकर आत्म कल्याण में लगे। ऋषियों को आशा थी कि थोड़ी दूर तक सकाम भावना से साधना पथ पर चलने के उपरान्त साधक वस्तुस्थिति को समझ लेगा और उपासना के भौतिक नहीं आध्यात्मिक लाभ को लेने के लिये तत्पर हो जायगा।
उपासना से संसार की अन्य समस्त उपासनाओं की अपेक्षा अधिक मात्रा में, अधिक सरलता से और अधिक शीघ्र लाभ होता है, यह एक निश्चित तथ्य है। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि प्रत्येक व्यक्ति की, प्रत्येक प्रार्थना गायत्री माता अवश्य ही पूर्ण कर देती है।
उपासना के भौतिक नहीं आध्यात्मिक लाभ को लेने के लिये तत्पर हो जायगा।
उपासना क्षेत्र में भी होती है। मानव प्राणी के साथ उसके पूर्व जन्मों के सुकृत दुष्कृतों से उत्पन्न अनेक प्रारब्ध बंधे होते हैं। कृत कर्मों के भोग से इस संसार का कोई प्राणी बच नहीं सकता ऐसा परमात्मा का अटल नियम है। इन प्रारब्धों में उपासना से आवश्यक सुधार तो अवश्य होता है पर हर व्यक्ति अपनी अल्प बुद्धि के कारण उसका अनुभव ठीक प्रकार नहीं कर सकता। जिसके आरम्भ में 10 मन कष्ट हैं उपासना से यदि उसमें से 5 मन कष्ट कम किया तो उस मनुष्य के लिए यह जानना कठिन है कि मेरा 5 मन कष्ट घटा या नहीं, वह तो सामने उपस्थित 5 मन कष्ट देखकर भी बहुत दुख मानता है और अपनी उपासना को व्यर्थ मानता है।
उपासना की साधना में।
उपासना के द्वारा जिनकी निष्ठा स्थिर हो गई है वे इस श्रेणी में प्रविष्ट होते हैं।
उपासना का भी होता है। परन्तु वह परिणाम सबके लिए समान रूप से सुखकर नहीं होता। मान लीजिए एक दानी व्यक्ति प्रसन्न होकर 10 आदमियों को एक-एक हजार रुपया देता है। तो देने की रकम समान होते हुए भी सबको एक समान लाभ न होगा। जिस पर दस हजार रुपया कर्ज था उसे वह एक हजार जो मिला था उसे दे देने पर भी नौ हजार ऋणी ही रहा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-February
उपासना गृह में जाने की सिफारिश किया करता था। उसने बताया था कि किसी ऐसे शान्त में जाने का अभ्यास जहाँ चिन्ताशील विचार की सूचना प्राप्त होती हो मनुष्य का अपना दृष्टिकोण ठीक रखने में सहायता देती है। वह कहा करता था कि किसी सत्संग में जाने का अनुभव वैसा ही है। मानो कोई मनुष्य भीड़ में पड़ गया है, धक्कों से उसके पाँव-उखड़ गये हैं, तब वह निकटवर्ती द्वार की पैड़ी पर चढ़ जाता है और वहाँ से लोगों के सिर के ऊपर दृष्टि दौड़ाता है, और देखता है कि सामूहिक रूप से भीड़ क्या कर रही है, तब वह ऊंची पैड़ी पर से स्तर कर फिर उसी ठेल पेल में घुस जाता है और धक्का मारकर ठीक दिशा में चलने का यत्न करता है। चिन्तन के सम्बंध में भी वह इसी उपमा का प्रयोग कर सकता था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-August
उपासना कैसे करें
उपासना, सद्ज्ञान प्रसार, तपोभूमि निर्माण आदि कार्यों के लिए अब तक परिजनों का उत्साहपूर्वक सहयोग प्राप्त होता है। अब एक कदम और आगे बढ़ाया जाता है। अब हमारी इच्छा है कि अपने परिवार के सदस्यों के हर घर से कम से कम एक व्यक्ति मथुरा में साँस्कृतिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए आवे। बाहर के लोगों को तभी यह शिक्षा क्रम व्यापक रूप से अपनाने के लिए कहा जा सकेगा। जब हम अपने परिवार के व्यक्तियों में कुछ आदर्श एवं विशेषता की स्थापना कर सकें।
उपासना सम्बन्धी आवश्यक सूचनाएं विज्ञप्तियाँ तथा जानकारियाँ प्रकाशित होती रहती हैं। जुलाई में हर साल एक गायत्री अंक निकलता है। गायत्री संस्था से सम्बन्ध रखने के लिए- अखण्ड-ज्योति का ग्राहक रहना आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-December
उपासना से जिस दिव्य शक्ति का आविर्भाव होता है, उसका पोषण और विकास यज्ञ की महिमा भी ऊष्मा करती है। बीज में से प्रस्फुटित हुए अंकुर के लिए जिस प्रकार खाद और पानी की आवश्यकता है उसी प्रकार गायत्री द्वारा प्रादुर्भूत आध्यात्मिक शक्तियों को परिपुष्ट करने में यज्ञ सहायक होता है। साधारण जप में न सही पर अनुष्ठान में गायत्री जप का दशाँश नहीं तो शताँश हवन करना आवश्यक होता है। गायत्री और यज्ञ का आपस में अनन्य सम्बन्ध है।
उपासना के साथ-साथ यज्ञ की महत्ता पर सदा ही जोर देते हैं। ओर छोटे-बड़े यज्ञों का समय-समय पर प्रेरणा पूर्वक आयोजन भी कराते रहे हैं। पर अब की बार कुछ विशेष अन्तः प्रेरणा एक विशद गायत्री महायज्ञ कराने की हुई है। इसका प्रधान उद्देश्य व्यक्तिगत एवं सामूहिक जीवन में फैली हुई अनैतिकता एवं अव्यवस्था को दूर करके वातावरण में सतोगुणी तत्वों की अभिवृद्धि करना है। साथ ही अनेकों गायत्री उपासकों के आत्मबल को सरल रीति से बहुत अधिक बढ़ा कर उन्हें उस उच्च भूमिका तक पहुँचना भी अभीष्ट है जहाँ पहुँचना आशा जनक शान्ति प्राप्त न कर सकना संभव होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-April
उपासना कैसे करें), 8-गायत्री से यज्ञ का सम्बन्ध), 9-गायत्री चालीसा), 10-गायत्री का तिरंगा चित्र)
उपासना उन विधि-विधानों के साथ की जाती है जो अग्निमय वातावरण उत्पन्न करते हैं। इसके द्वारा भीतर और बाहर प्रत्यक्ष प्रकाशवान तेज झलकने लगता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-June
उपासना तथा यज्ञ में सम्मिलित होना सभी के लिए अनिवार्य रहेगा। कुछ और भी ऐसे आध्यात्मिक उपचार किये जाया करेंगे जिनसे शिक्षार्थियों के बौद्धिक विकास तथा आत्मोन्नति में सहायता मिले।
उपासना का समय भी वही है, तो हम उस समय उपासना को छोड़ सकते है और उसी भाव से उस घर की आग बुझाने के काम में लग सकते हैं। लेकिन फिर भी हम दूसरा समय ढूंढ़ेंगे और प्रार्थना कर ही लेंगे। बिना प्रार्थना किये आयेंगे नहीं। सोना तो हमारे हाथ की बात होती है। वह दिन के कार्यक्रम का आखिर का काम होता है, तो प्रार्थना करके ही हम सोयेंगे।
उपासना छोड़ना बेहतर होता है, उपासना करने की अपेक्षा। हाँ, ऐसा कोई मौका हो सकता है कि नजदीक किसी घर में आग लग गई है और हमारा उपासना का समय भी वही है, तो हम उस समय उपासना को छोड़ सकते है और उसी भाव से उस घर की आग बुझाने के काम में लग सकते हैं। लेकिन फिर भी हम दूसरा समय ढूंढ़ेंगे और प्रार्थना कर ही लेंगे। बिना प्रार्थना किये आयेंगे नहीं। सोना तो हमारे हाथ की बात होती है।
उपासना द्वारा-आज का दुखदायी युग बदल सकना सम्भव है। आज इस महाशक्ति की शक्तियाँ प्रसुप्त अवस्था में पड़ी हुई है उन्हें जागृत किया जा सके तो संसार के अगणित प्राणियों की समुद्र जैसी अथाह पीड़ा का निवारण हो सकता है। पर ऐसे ‘शक्ति जागरण’ के लिए नरमेध की आवश्यकता पड़ेगी। आत्म दानी आत्माएँ अपने आप की बलि चढ़ाकर ही उस शक्ति को प्रस्फुटित कर सकती है जो संसार के वर्तमान त्रासदायक वातावरण को बदल सके। आज अणु युद्ध के बादल गरज रहे है, पृथ्वी प्रलय की गोद में जाने के भय से काँप रही है, आज मानवता को दानवता ने ग्रस लिया है वह अपने परित्राण के लिए जुहार मना रही है।
उपासना करने की अपेक्षा। हाँ, ऐसा कोई मौका हो सकता है कि नजदीक किसी घर में आग लग गई है और हमारा उपासना का समय भी वही है, तो हम उस समय उपासना को छोड़ सकते है और उसी भाव से उस घर की आग बुझाने के काम में लग सकते हैं। लेकिन फिर भी हम दूसरा समय ढूंढ़ेंगे और प्रार्थना कर ही लेंगे। बिना प्रार्थना किये आयेंगे नहीं। सोना तो हमारे हाथ की बात होती है।
उपासना को छोड़ सकते है और उसी भाव से उस घर की आग बुझाने के काम में लग सकते हैं। लेकिन फिर भी हम दूसरा समय ढूंढ़ेंगे और प्रार्थना कर ही लेंगे। बिना प्रार्थना किये आयेंगे नहीं। सोना तो हमारे हाथ की बात होती है। वह दिन के कार्यक्रम का आखिर का काम होता है, तो प्रार्थना करके ही हम सोयेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-May
उपासना के अनुभव
उपासना से हुए भौतिक एवं अध्यात्मिक अनुभवों के दर्शन रहेंगे। जिन्हें स्वयं कोई उत्साह वर्धक अनुभव हुए हो। अथवा जिन्हें किन्हीं अन्य जीवित या स्वर्गीय महामानव की गायत्री अनुभव विदित हो वे उनका विस्तृत वर्णन लेख रूप में भेजने की कृपा करें ताकि उन्हें जुलाई के विशेषाँक में स्थान दिया जा सके।
उपासना, दूसरा विकल्प है। इन शक्तियों के अनेक साधन हमारे ग्रन्थों में उल्लिखित हैं। मानसिक शक्ति के विकास के लिए चित्तवृत्ति की एकाग्रता को प्रधानता दी गई है जिससे बिखरी हुई शक्ति इकट्ठी हो जाय। बुरे कार्यों की ओर धावित मन को उधर से खींचकर जहाँ हम लगाना चाहें, लगा सकें। मानसिक दुर्बलता कम होकर साहस का संचार हो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-September
उपासना की नवरात्रि में पूरे नौ दिन होते हैं। तिथियों के घटने बढ़ने से नवरात्रि घटती बढ़ती नहीं। इस बार दो प्रतिपदा हो जाने से एक दिन बढ़ा है पर उपासना ता. 27 सितम्बर चन्द्रवार से आरम्भ होकर 5 अक्टूबर मंगलवार तक ही रहेंगी। इन नौ दिनों में जो साधना की जाय उसकी पूर्णाहुति अन्तिम दिन की जा सकती पर यदि उतना समय न हो तो दसवें दिन 6 अक्टूबर को भी हवन कर लें।
उपासना के अतिरिक्त वे अपना अधिकाँश समय लोकहित के लिये ही लगाते थे। समय की पुकार के कारण सत्पुरुषों को अनेक बार ऐसे ही कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं। मुहल्ले में आग लगे तो सब लोग अपना आवश्यक कार्य छोड़ कर उसे बुझाने दौड़ते हैं ताकि वह आग अन्य घरों को नष्ट करती हुई उनके घर को भी स्वाहा न कर दे। अधिक विकृत समय की भी ऐसे ही अग्निकाण्ड से तुलना की जाती है। ऐसी विपन्न परिस्थितियों में ऊँची आत्माएं अपने कार्यक्रम में ईश्वर की प्रेरणा से हेर-फेर करती हैं।
उपासना आदि तप करने से मन तथा शरीर की विशेष शुद्धि होती है।
उपासना ता. 27 सितम्बर चन्द्रवार से आरम्भ होकर 5 अक्टूबर मंगलवार तक ही रहेंगी। इन नौ दिनों में जो साधना की जाय उसकी पूर्णाहुति अन्तिम दिन की जा सकती पर यदि उतना समय न हो तो दसवें दिन 6 अक्टूबर को भी हवन कर लें।
उपासना अवश्य करनी चाहिये।
उपासना का कोई न कोई विशेष कार्यक्रम बनाते हैं। आश्विन की नवरात्रि समीप है। उसके सम्बन्ध में निम्न सूचनाएं हैं-
उपासना की ओर ध्यान नहीं देते उसे अनावश्यक समझते हैं। इसी प्रकार साधनारत व्यक्ति लोकहित की भावना को तिलाँजलि देकर केवल अपनी इष्ट सिद्धि, स्वर्ग, मुक्ति आदि की बात सोचते रहते हैं। प्राचीन काल के सभी ऋषि मुनि, सत्पुरुष, महात्मा ज्ञानी इन दोनों ही कार्यों को समान रूप से महत्व देते थे। तभी वे अभीष्ट परिणाम प्राप्त करने में सफल होते थे।
उपासना पर अधिक बल देना (12) समय-समय पर ऐसे शिक्षण शिविरों का आयोजन जिनमें शिक्षार्थियों को साँस्कृतिक पुनरुत्थान के संबंध में सभी बातें भली प्रकार समझाई जावें (13) संगीत, प्रदर्शनी, एकाँकी नाटक, वार्ता, प्रदर्शन, मैजिक लालटेन, कीर्तन, कथा, प्रवचन, प्रतियोगिता, गोष्ठी सभा आदि द्वारा साँस्कृतिक सिद्धान्तों की ओर लोगों की चित्त वृत्तियाँ मोड़ना! (14) कार्यक्रमों की पूर्ति के लिए आर्थिक व्यवस्था करना इस प्रकार के कार्यों में हम सब लोग विशेष रुचि लें और अपनी परिस्थिति के अनुसार जो कार्य बन सके उसके अनुसार अपने-अपने क्षेत्र में कार्य आरम्भ करें तो निश्चय ही बहुत कार्य हो सकता है। हमारा परिवार इतना बड़ा है कि यदि सब लोग सच्चे मन से इस दिशा में कदम उठावें तो आशाजनक कार्य हो सकने में सफलता मिल सकती है।
उपासना, जप, ध्यान, पुरश्चरण आदि की साधना करनी चाहिए और आत्म सिंचन के लिए अपने- अपने क्षेत्र में ज्ञान प्रसार का कोई न कोई कार्य अवश्यमेव करते रहना चाहिए। हमें हमारे जीवन के लिए भी यही कार्यक्रम अपनाने का दैवी आदेश हुआ है तद्नुसार हम निष्ठापूर्वक एक स्थिर कार्यक्रम में संलग्न हैं। हमारे परिजनों के लिए भी यही मार्ग श्रेयस्कर हो सकता है। आज चारों और और अज्ञान फैला हुआ है, कुविचारों और कुकर्मों की बाढ़ आई हुई है। धन की तृष्णा और इन्द्रिय लिप्सा सुरसा के मुख की तरह बढ़ती जा रही है।
उपासना को साधारण सीमा तक रख कर लोक में फैली हुई बुराइयों के लिये कटिबद्ध हो जाती हैं। श्री शंकराचार्य जी ने अपना पूरा समय ज्ञान प्रसार के लिये दर-दर भटकते रहने में लगाया। भगवान शंकर ने उन्हें स्वयं यह आदेश दिया था कि तुम समाधि लगाने में नहीं संसार से अज्ञान मिटाने की साधना करो। स्वामी दयानन्द सरस्वती हिमालय की कन्दराओं में साधना करने जा रहे थे तो उनको दैवी सन्देश प्राप्त हुआ कि लोग अज्ञान में डूबे हुये हैं उनको ज्ञान देने में लगो आज के समय यही तपस्या सर्वश्रेष्ठ है। भगवान बुद्ध ने कठोर तप किया तो उन्हें अन्तः प्रेरणा हुई कि संसार में बुद्धत्व का प्रकाश करो, वे अपनी तपोभूमि छोड़ कर प्रवचन करते हुए भ्रमण करने लगे।
उपासना के साथ भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के लिये काम करने का कार्यक्रम ऐसा है जिसमें आत्मावलम्बन और आत्मसिंचन के दोनों उद्देश्य पूर्ण होते हैं और अपना तथा संसार का भला करते हुये जीवन लक्ष प्राप्त करने का मार्ग सरल होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-December
उपासना करने के लिये स्वाध्याय को एक आवश्यक धर्म कर्तव्य बना लेना चाहिये। ईश्वर की प्राथमिक पूजा, मूर्ति, चित्र आदि के ध्यान और अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, धूप, दीप आदि उपकरणों के साथ होती है। पर आगे चल कर माध्यमिक उपासना उच्च विचारधारा रूपी प्रतिमा को मन मन्दिर में उपस्थित करके ही अग्रगामी बनाई जाती है। संयम, साहस, विवेक, सेवा, दया, करुणा, मैत्री, उदारता, सौजन्य, पवित्रता आदि सद्गुण विशुद्ध रूप से ईश्वर की भावनात्मक प्रतिमा ही है। स्वाध्याय सत्संग और चिंतन मनन द्वारा जितनी देर मन मन्दिर में इन सद्गुणों का प्रकाश बना रहे और उनमें अपनी श्रद्धा जमी रहे तो समझना चाहिये कि उतनी देर उच्च-स्तरीय ईश्वर पूजन होता रहा।
उपासना उच्च विचारधारा रूपी प्रतिमा को मन मन्दिर में उपस्थित करके ही अग्रगामी बनाई जाती है। संयम, साहस, विवेक, सेवा, दया, करुणा, मैत्री, उदारता, सौजन्य, पवित्रता आदि सद्गुण विशुद्ध रूप से ईश्वर की भावनात्मक प्रतिमा ही है। स्वाध्याय सत्संग और चिंतन मनन द्वारा जितनी देर मन मन्दिर में इन सद्गुणों का प्रकाश बना रहे और उनमें अपनी श्रद्धा जमी रहे तो समझना चाहिये कि उतनी देर उच्च-स्तरीय ईश्वर पूजन होता रहा। प्रतिमायें ईश्वर की प्रतीक हैं पर उच्च-भावनायें तो प्रभु की प्रतिनिधि ही मानी गई हैं। इसलिये स्वाध्याय हमारी उपासनात्मकता को पूर्ण करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं।
उपासना, आहार, स्नान आदि की तरह ही निर्धारित कर लेना चाहिये और कितने ही आवश्यक कार्यों की उपेक्षा कर इस आत्मिक आहार के लिये समय निकालना चाहिये। यह प्रेरक विचारधारा जिन अन्तःकरणों से निकलती है वह इतने समर्थ हैं कि पाठक में अपनी ज्योति एवं प्रेरणा उत्पन्न कर सकें। यों सद्गुणों का महत्व कई अन्य पुस्तकों एवं व्यक्तियों द्वारा समय-समय पर सुना समझा गया होगा पर यह साहित्य उन सबसे भिन्न- अपने ढंग का अनोखा है। वह पाठक के मस्तिष्क तक सीमित न रह कर अन्तःकरण के गहन स्तरों तक प्रवेश और वही हलचल उत्पन्न कर सकने की सामर्थ्य से सम्पन्न है। इसका नियमित अध्ययन किसी भी व्यक्ति को देवत्व के सत्य पर चलने की प्रबल प्रेरणा दिये बिना नहीं रह सकता।
उपासनात्मकता को पूर्ण करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं।
उपासना की- व्यवस्था करते हैं। उपयुक्त अवसर पर उपयुक्त कार्य का विशेष महत्व होता है। बीज ठीक समय पर बोया जाय तो अच्छी फसल उगने की सम्भावना अधिक स्पष्ट रहती है। प्रबुद्ध आत्मायें इतनी अन्तः प्रेरणा अपने भीतर धारण किये रहती हैं-इतना प्रकाश उनके अन्दर बना रहता है कि उपयुक्त अवसर को पहचानें और विशेष प्रयोजन के लिये विशेष अवसर पर प्रस्तुत की गई ईश्वरीय पुकार को सुनें और उस दैवी निर्देश के अनुरूप अपनी गतिविधियाँ मोड़ दें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-August
उपासना-अर्थात् वह क्रिया जिसके द्वारा मनुष्य अपनी अन्तःचेतना को पराशक्ति के साथ जोड़ कर ब्रह्म वर्चस् के अनुपम लाभ का अधिकारी बनता है।
उपासना से पूर्ण गायत्री का तात्विक स्वरूप जानना आवश्यक है। वस्तुस्थिति को जाने बिना कार्य करने लगना एक प्रवंचना मात्र है, उससे अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध, नहीं होता। इसलिये साधना मार्ग पर चलने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने मार्ग की दिशा एवं तात्त्विकता को भी समझना चाहिये। अनजान रहने पर न तो पूरा विश्वास होता है और न पक्की श्रद्धा जमती है। अज्ञान एक अन्धकार है जिसमें पग−पग पर आशंका एवं अश्रद्धा की संभावना बनी रहती है।
उपासना ईश्वर की श्रेष्ठतम उपासना है। अज्ञान को माया और बन्धन कहा गया है, उसी को नरक की उपमा दी गई है। ज्ञान की आराधना करके हम वह प्रकाश प्राप्त कर सकते हैं जिससे इन बन्धनों से छुटकारा मिल सके। “ज्ञानान्मुक्ति” सूत्र में ज्ञानयोग को ही मुक्ति का सोपान बताया गया है।
उपासना करते हैं, उतना ही अपना लाभ होता है। अग्नि के जो जितने समीप पहुँचता है उसे उतनी ही अधिक गर्मी मिलती है, जो जितना दूर रहता है उसे उतना ही उस लाभ से वंचित रहना पड़ता है। इसलिये उस महाशक्ति का सान्निध्य लेकर अधिक बल प्राप्त करें यही उचित है।
उपासना का बड़ा महत्व एवं माहात्म्य है। उसे आत्म-कल्याण और बाह्य जीवन में अपरिमित विभूतियाँ प्राप्त करने का आधार बताया गया है। आत्म-शक्ति पढ़ने से मनुष्य की भौतिक प्रतिभा का बढ़ना स्वाभाविक है। आत्म-शक्ति बढ़ाने के लिये उच्चतम चरित्र और व्यवस्थित जीवन क्रम की तो आवश्यकता है ही, साथ ही गायत्री उपासना जैसी तपश्चर्याओं को भी इस संदर्भ में अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ समझना चाहिये। आत्म-बल अभिवर्धन के लिये जिन उपासनाओं का प्रतिपादन किया गया है उनमें गायत्री सर्वश्रेष्ठ है।
उपासना करते हैं। तीनों लोकों में कोई उनके समान नहीं है, उनसे बढ़ कर होने का तो प्रश्न ही नहीं है।”
उपासना क्रम का अन्तःकरण में गहरा प्रवेश नहीं हो पाता। अस्थिर मति और भक्ति रहित अन्तःस्थिति से किया हुआ पूजा-पाठ कोई विशेष फलप्रद नहीं होता, इसलिये मनीषियों ने साधन के लिये जितना बल दिया है उतना ही उसका तत्वज्ञान जानने के लिये भी कहा गया है। ज्ञान की उपेक्षा कर केवल कर्मकाण्ड करते रहने से अभीष्ट प्रयोजन पूरा नहीं होता।
उपासना करते हैं। पर उसके लिये प्रयत्न की आवश्यकता है। इसी का नाम साधना है। अर्थात् जो लोग अपने शुभ संकल्पों को बढ़ाते हैं और दुर्वासनाओं को उनकी खाद बनाकर डालते जाते हैं अन्त में उनके प्रयत्नों की कृषि सफल होती है और सविता-आत्मा उनकी बुद्धि को धारण करते हैं अर्थात् उनको अपने ही समान प्रखरता और तेजस्विता से भर देते हैं।
उपासना किया करते हैं।
उपासना करना ही पर्याप्त नहीं वरन् उसका आवश्यक विवेचन, विश्लेषण भी हृदयंगम करना आवश्यक है।
उपासना से चित्त-शुचिता, मानसिक सन्तुलन भावनाओं में शक्ति और पंचकोषों में सौमनस्य प्राप्त होता है वह बौद्धिक क्षमताओं के प्रसार से अतिरिक्त है। यह सभी गुण बुद्धि और विवेक का परिमार्जन करते हैं। दूर-दर्शन की प्रतिभा का विकास करते हैं। प्रारम्भ में वह केवल किसी वातावरण में घटित होने वाली स्थूल परिस्थितियों का ही अनुमान कर पाते हैं किन्तु जब भक्ति प्रगाढ़ होने लगती है तो उनकी बुद्धि भी इतनी सूक्ष्म और जागृत हो जाती है कि घटनाओं के सूक्ष्म से सूक्ष्म अंग उन्हें ऐसे विदित हो जाते हैं जैसे कोई व्यक्ति कानों में सब कुछ चुपचाप बता गया हो ।
उपासना’ है। गायत्री उपासना-अर्थात् वह क्रिया जिसके द्वारा मनुष्य अपनी अन्तःचेतना को पराशक्ति के साथ जोड़ कर ब्रह्म वर्चस् के अनुपम लाभ का अधिकारी बनता है।
उपासना से बौद्धिक सूक्ष्मदर्शिता की तरह अनवरत क्रिया-शीलता का भी उदय होता है। परिश्रम की आदत पड़ती है। पुरुषार्थ जगता है। इन वीरोचित गुणों के रहते हुये अभाव का नाम भी नहीं रह सकता । परमात्मा अपने भक्त को क्रियाशील बनाकर उसे संसार के अनेक सुख ऐश्वर्य और भोग प्रदान करता है।
उपासना द्वारा अपने दुःख और भव बन्धनों को काटकर सुख प्राप्त करते हैं। हमें भी परोपकारी कर्मों के द्वारा सुख प्राप्त करने और बन्धनों से छुटकारा पाने का प्रयत्न करना चाहिए।
उपासनाओं का प्रतिपादन किया गया है उनमें गायत्री सर्वश्रेष्ठ है।
उपासना करने वाले को समयानुसार योग सिद्धि स्वयं मिल जाती है।
उपासना से जो कुछ प्रयोजन सिद्ध हो सकता वह सारे का सारा देव आत्मा सान्निध्य से भी प्राप्त हो सकता है।
उपासना जैसी तपश्चर्याओं को भी इस संदर्भ में अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ समझना चाहिये। आत्म-बल अभिवर्धन के लिये जिन उपासनाओं का प्रतिपादन किया गया है उनमें गायत्री सर्वश्रेष्ठ है।
उपासना, आध्यात्मिक ज्ञान से ओत-प्रोत साहित्य के निरन्तर स्वाध्याय, मनन, चिन्तन, व्रत, उपवास आदि की आवश्यकता शिक्षा से भी अधिक है। प्राचीन काल के गुरुकुलों में शिक्षा संबन्धी विषय गौण माने जाते थे, आत्म-विद्या के विषय अनिवार्य होते थे। मनुष्य के दार्शनिक स्वरूप को यथार्थ, शाश्वत और पूर्णानन्द की प्राप्ति का पाथेय माना जाता था। इसलिये उस पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया जाता था जो व्यक्ति के आत्म गुणों का परिवर्द्धन करती थी। उसकी आवश्यकता आज भी उतनी ही नहीं बल्कि वर्तमान विकृत परिस्थितियों में तो उससे भी अधिक है।
उपासना से पूर्णता को प्राप्त कर सके पर उनका पुरोहित, जो उनसे भी अधिक पूजा-पाठ में संलग्न रहता था उसे कुछ भी फल प्राप्त न हुआ वरन् पशु की योनि में चला गया।
उपासना में भी वह अचिन्त्य शक्ति है जो उपासक को उपास्य देवता से तदाकार करा देती है। गीता के 11 वें अध्याय श्लोक 54 में भगवान कृष्ण ने स्वयं इस बात की पुष्टि करते हुये लिखा है- “अनन्य भक्ति से ही मुझे लोग प्रत्यक्ष देखते हैं। भक्ति से ही मैं बुद्धि प्रवेश करने योग्य बनता हूँ।”
उपासना है। अज्ञान को माया और बन्धन कहा गया है, उसी को नरक की उपमा दी गई है। ज्ञान की आराधना करके हम वह प्रकाश प्राप्त कर सकते हैं जिससे इन बन्धनों से छुटकारा मिल सके। “ज्ञानान्मुक्ति” सूत्र में ज्ञानयोग को ही मुक्ति का सोपान बताया गया है।
उपासना भी ऐसी ही है। मनोभूमि पर पड़े हुए पूर्व जन्मों के दुर्गुणों कुविचारों के बीज बिना प्रयत्न अपने आप उगा करते हैं। कई बार तो मन की स्थिति ऐसी असमंजस पूर्ण बन जाती है कि पता भी नहीं चलता कि जिस कुविचार की कल्पना एकाएक सूझ पड़ी वह तो कभी मेरे द्वारा हो नहीं सकती थी। किन्तु वह किसी अज्ञात जन्म, पूर्व योनि की क्रियाओं का संस्कार होती है जिसे हम प्रत्यक्ष नहीं जानते पर वह हमें विचलित करती है। ऐसे समय मनुष्य क्या करें सूक्ष्मदर्शी शास्त्रकार ने उसका उपाय भी बताया है-
उपासना, साधना के ग्राह्य और सुधरे हुए स्वरूप को समझने और प्रयत्नपूर्वक उन्हें अपने आत्म-विकास में नियोजित करने की बुद्धि जिन लोगों में आ जाती है उन्हें अपने आपको सौभाग्यशाली समझना चाहिये। आत्म-जिज्ञासा आत्म-कल्याण का मुख्य द्वार है। जो उसे पा लेता है वह अपनी जीवन-यात्रा की मंजिल भी आसानी से प्राप्त कर लेता है। गीता अध्याय 1 के 10वें लोक में भगवान् कृष्ण ने भी कहा है-
उपासनाओं का आदि है। मैं बहुभावों में अवस्थित हूँ। देवगण मेरे अनेक रूपों की उपासना किया करते हैं।
उपासना के उनकी सूक्ष्म बुद्धि का विकास हुआ था। विचार और चिंतन के कारण इनमें वह शक्ति आविर्भूत हुई थी जो बड़े-बड़े विद्यालयों के छात्रों, शिक्षकों को भी नहीं नसीब होती। कबीर अक्षर लिखना नहीं जानते थे किन्तु वह पंडितों के भी पंडित हो गये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-July
उपासना से मिल सकता है। यद्यपि बहुत थोड़े लोग इनका रहस्य समझते हैं पर पालन करने वाले व्यक्तियों की संख्या करोड़ों है। ये लोग चाहे पूजा-उपासना, जप-ध्यान आदि का पूरा लाभ न उठा पाते हों तो भी असत् कर्मों से बहुत कुछ बचे रहते हैं और अनेक धीरे-धीरे शुद्ध रूप में व्यवहार भी करने लगते हैं।
उपासना, जप-ध्यान आदि का पूरा लाभ न उठा पाते हों तो भी असत् कर्मों से बहुत कुछ बचे रहते हैं और अनेक धीरे-धीरे शुद्ध रूप में व्यवहार भी करने लगते हैं।
उपासना, पूजा भी कर सकता है। पर उस अवस्था में वह सामान्य धर्म-कृत्य किसी प्रकार के पारम्परिक संघर्ष या मतभेद का जन्मदाता न होकर मानव-जाति की एकता और कल्याण की वृद्धि करने वाला ही होगा। आने वाले धर्म-युग की यह भावना केवल हिन्दुओं और ईसाइयों में ही नहीं पाई जाती वरन् संसार में अनेक धर्मों के बहुसंख्यक विद्वान किसी बहुत बड़े महापुरुष के आगमन और नवयुग की स्थापना की बात कह रहे हैं। कुछ वर्ष पहले तिब्बत के एक लामा ने योरोप के जगत प्रसिद्ध विद्वान और चित्रकार रोरीश को बताया था कि-दुनिया की पार्थिव शक्ति के ऊपर धर्म की शक्ति की विजय चंबाला युग (सतयुग) में होगी जो जल्दी ही शुरू होने वाला है। यहूदी लोगों का भी ख्याल है कि उनके धर्मग्रन्थों में बतलाया ‘मुएर गजर’ नामक युग जल्दी ही शुरू होगा।
उपासना पद्धति पर चलेंगे, एक सी मान्यतायें होंगी और रहन-सहन, खान-पान में ही एकता पैदा हो जायगी। उस समय आपस की फूट, बैर का अन्त हो जायगा, सब सद्भावपूर्वक रहते हुये दैवी-जीवन व्यतीत करने लगेंगे। यही आदर्श आजकल संसार के समस्त अध्यात्मवादी विद्वान स्वीकार कर रहे हैं और इसी का प्रचार किया जा रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-March
उपासना आरंभ करके अपनी आत्मा से प्रेम रूपी परमात्मा की प्रतिष्ठापना आरंभ कर दी? क्या आपने सोते और उठते समय अपनी दिनचर्या में कार्य-पद्धति एवं विधि-व्यवस्था का नियमित निर्धारण क्रम आरंभ कर दिया?
उपासना का ही लाभ लेते हैं। यह आध्यात्मिक प्रयोग अपना भी कल्याण करता है और दूसरों का भी, इसलिए उसे सच्चा अध्यात्म, सच्चा भजन कहा जा सकता है। इस साधना के समय के अनुरूप श्रेष्ठतम स्तर की साधना को तपश्चर्या कहा जाये तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी। प्रिय परिजनों को इस साधना में आध्यात्मिक प्रयोजन पूर्ण करने और जीवन लक्ष्य प्राप्त करने के उद्देश्य से संलग्न होना चाहिए। साधना सरल अवश्य है पर उसका प्रतिफल किसी भी कठोर तपश्चर्या से कम नहीं है।
उपासना का अविच्छिन्न अंग है आत्म विकास। प्रातः सोकर उठते ही और सोते समय जिस विचारणा के द्वारा जीवन-क्रम व्यवस्थित किया जाता है उसे उपासना का अनिवार्य अंग माना जाए। हम जितने-जितने सुसंस्कृत, सुव्यवस्थित होते चलेंगे उतनी ही हमारी उपासना सफल होगी।
उपासना नव-निर्माण योजना में योग-दान करने के लिए परिजनों का हमने जो आह्वान किया था वह निरर्थक नहीं गया। भगोड़े भाग गये। पर जिनमें वास्तविकता थी वे अभी भी जमे हुए हैं और हमारे कंधे से कन्धा लगा कर कदम से कदम मिला कर-चल रहे हैं। विचार क्राँति के लिये ऐसे भावनाशील व्यक्तियों की आवश्यकता थी कि जो अपना थोड़ा समय इस पुण्य प्रयोजन के लिये नियमित रूप से खर्च करते रह सकें। आखिर इसके बिना इतना बड़ा प्रयोजन पूरा हो भी कैसे सकता है?
उपासना सफल होगी।
उपासनात्मक, क्रियात्मक पद्धति अपने आप में कोई लक्ष्य नहीं है। वह आत्मिक विकास की एक प्रक्रिया मात्र है। लोगों का यह समझना निताँत भ्रमपूर्ण है कि इन क्रिया-कलापों को अमुक समय तक या अमुक मात्रा में पूरा कर लेंगे तो अमुक देवता प्रसन्न होकर अमुक वरदान देगा। वस्तुस्थिति यह है कि अपना आत्मा ही सर्वोपरि देवता है और उसे जगाने, प्रसन्न करने के लिये व्यक्ति का समग्र निर्माण, गुण-कर्म स्वभाव का विकास अनिवार्य रूप से आवश्यक है। आध्यात्मिकता का प्रयोजन इसी आवश्यकता की पूर्ति करना है।
उपासना का भी साधना क्रम चलेगा। अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष इन पाँचों आवरणों के हटने से आत्म साक्षात्कार तथा ब्रह्म निर्वाण का लक्ष्य पूरा होता है। इन कोष के अनावरण से आत्मा की प्रसुप्त अन्तः कक्षायें जागृत होती हैं और ये छिपी पड़ी दिव्य विभूतियों का अनुभव होता है। इस साधना क्रम के आधार पर बढ़ी हुई आत्म शक्ति से साधक आत्मकल्याण का श्रेय प्राप्त करते हुए मानव जाति की, समस्त संसार की महती सेवा कर सकने में समर्थ हो सकता है।
उपासना की प्रेरणा दी गई है वह जितनी सरल है उतनी प्रखर भी है। उसे श्रद्धापूर्वक अपनाये रहने वाले के अन्तःकरण में प्रेम तत्व का ऐसा निर्झर उद्भूत होगा जिससे वह स्वयं भी आनन्द उल्लास से ओत-प्रोत रहे और अपने साथियों को भी स्नेह सौहार्द में द्रवित कर दे। यही सच्चा भक्तियोग है। प्रथम वर्ष में जो शिक्षण है उसे ठीक तरह कर लिया गया तो अगले वर्ष और भी अधिक प्रेरक प्रकाश प्राप्त करने का मार्ग दर्शन मिलेगा और इस प्रकार पाँच वर्ष में उपासक की मनोभूमि में आशाजनक उत्कर्ष दृष्टिगोचर होगा। इसी उपासना का अविच्छिन्न अंग है आत्म विकास।
उपासना के साथ इस आत्म-निरीक्षण की साधना को भी जोड़ लेना चाहिये। इस आधार पर जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिये आँतरिक प्रकाश एवं मार्ग-दर्शन मिलता रह सकता है।
उपासना-क्षेत्र की वे आरंभिक प्रक्रियायें हैं जिनसे मन की एकाग्रता में सहायता मिलती है। इस एकाग्रता का उपयोग संकीर्ण स्वार्थपरता से-तृष्णा एवं वासना से चित्त को विरत कर परमार्थ प्रयोजनों में संलग्न करने के निमित्त होना चाहिए। अन्तःकरण में सत्प्रवृत्तियों को जमाने, उगाने और बढ़ाने के लिए सेवा-साधना का अभ्यास करना पड़ता है। प्राचीन काल में प्रत्येक ब्रह्म-परायण व्यक्ति के जीवन में सेवा-धर्म के लिए प्रमुख स्थान रहता था। कोई ब्राह्मण, कोई साधु, कोई भक्त ऐसा न था जो ईश्वर की प्रतिकृति इस विश्व वसुधा को सुखी-समुन्नत बनाने के लिए आवश्यक योगदान न करता रहा हो।
उपासना ही है। भगवान नाम और रूप तक ही सीमित नहीं है। यह दो प्रक्रियायें तो आरंभिक हैं- भगवान का वास्तविक स्वरूप तो भावमय है। जितनी देर अन्तरात्मा में भावनायें विचरण करती रहें, समझना चाहिए उतनी देर, परमेश्वर ही विराजमान रहे। लोकमानस में सत्प्रवृत्तियों की पूर्ति होती है।
उपासना का अनिवार्य अंग माना जाए। हम जितने-जितने सुसंस्कृत, सुव्यवस्थित होते चलेंगे उतनी ही हमारी उपासना सफल होगी।
उपासना 2. भावनात्मक नव निर्माण का ज्ञान यज्ञ 3. जीवन निर्माण की सर्वांगपूर्ण शिक्षा। इन तीनों का स्वरूप हमें भली-भाँति समझ लेना चाहिए।
उपासना पद्धति बताई गई है, वह जितनी सरल है, उतनी ही प्रेरक भी है। प्रत्येक परिजन से आशा की गई है कि उसे आरंभ कर दिया जाये। आत्म-विकास में वह निश्चित रूप से बड़ी सहायक होगी।
उपासना, आत्म-निर्माण एवं परमार्थ के लिये ज्ञान-यज्ञ-यह तीन पुण्य प्रक्रियायें यदि हमारे दैनिक जीवन में समुचित रूप से प्रतिष्ठापित हो जायें तो सामान्य घर-गृहस्थ की जिन्दगी जीते हुए भी हम कर्मयोगी एवं सच्चे आध्यात्मवादी की परम शाँतिपूर्ण स्वर्गीय मनःस्थिति उपलब्ध कर सकते हैं। मानव-जीवन को सार्थक एवं धन्य बनाने के लिये इसे त्रिविधि जीवन साधना की त्रिवेणी में हमें स्नान करते रहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-May
उपासना के लिये भगवान के किसी घनिष्ठ सम्बन्धी के रूप में ही मान्यता प्रदान करनी पड़ती है। निराकार ब्रह्म का ध्यान संभव नहीं। ध्यान के बिना उपासना नहीं हो सकती। निराकारवादी भी ध्यान उपासना प्रयोजन के लिए प्रकाश का ध्यान करते हैं। प्रकाश ही आखिर पंचभूतों के अंतर्गत आता है।
उपासना में प्रगति होती है।
उपासना के भावना क्षेत्र में भी लागू होती है। माता का नारी रुप ध्यान भूमिका में जब प्रवेश करता है तो उसमें प्राण की एक बड़ी अपूर्णता पूरी होती है।
उपासना नहीं हो सकती। निराकारवादी भी ध्यान उपासना प्रयोजन के लिए प्रकाश का ध्यान करते हैं। प्रकाश ही आखिर पंचभूतों के अंतर्गत आता है। ध्यान भूमिका में प्रयुक्त किये जाने वाले प्रकाश बिन्दु एवं सूर्य मंडल का एक आकार बन ही जाता है इसलिए उपासना में कोई न कोई आकार तो निर्धारित करना ही पड़ता है। इस आकार के साथ जितनी ही आत्मीयता ममता, घनिष्ठता होगी उतना ही मन लगेगा और चित्त एकाग्र होगा और भावनात्मक तन्मयता की और दृष्टि के साथ भगवत् प्राप्ति की ओर प्रगति होती चली जाएगी।
उपासना में कोई न कोई आकार तो निर्धारित करना ही पड़ता है। इस आकार के साथ जितनी ही आत्मीयता ममता, घनिष्ठता होगी उतना ही मन लगेगा और चित्त एकाग्र होगा और भावनात्मक तन्मयता की और दृष्टि के साथ भगवत् प्राप्ति की ओर प्रगति होती चली जाएगी।
उपासना के साथ जिस भाव समन्वय का विधान बताया गया है वह आज की स्थिति में सर्वोत्तम भक्ति-योग है। एक वर्ष के छोटे बालक जैसा जिसका हृदय वासनाओं और तृष्णाओं से रहित है जिसका अन्तःकरण निर्मल एवं निश्चिन्त है वही भक्तियोग का अधिकारी है। उसे ही ईश्वर को अपना कहने और अपने को ईश्वर का बना देने का पात्रत्व मिलता है। इसी मनोभूमि पर पहुँचकर शबरी, मीरा,सूर, तुलसी, आदि भक्तों ने तथा सभी ऋषियों मुनियों ने ईश्वर दर्शन आत्म साक्षात्कार एवं ब्रह्म निर्माण का परमानन्द प्राप्त किया था। वही राज-मार्ग हमारे लिये भी खुला पड़ा है।
उपासना में गायत्री की तुलना नारी रूप में करके हम अपना ही साधनात्मक एवं भावनात्मक प्रयोजन पूर्ण करते हैं। अतएव इसमें सन्देह तथा विवाद की कोई गुंजाइश नहीं है।
उपासना ही है। यों रूढ़िवादी लकीर पीटकर कूड़े करकट जैसी किन्हीं बूढ़ी, पुरानी, किस्से कहानियों की किताबों को घोटते रहना भी आज स्वाध्याय के नाम से पुकारा जाता है पर वास्तविक स्वाध्याय वह है जिसकी एक-एक पंक्ति हमें व्यवहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने की प्रेरणा से ओत-प्रोत हो। ऐसा स्वाध्याय दैनिक-जीवन का एक अविच्छिन्न नित्य-कर्म माना जाए। व्यक्ति एवं समाज के नव-निर्माण के लिये जो प्रेरक स्वाध्याय-साहित्य विनिर्मित हो रहा है उसके लिए आहार निद्रा जैसी दैनिक आवश्यकताओं की तरह ही समय निकाला जाए तो इससे ज्ञान-योग की महती आवश्यकता पूर्ण होती चलेगी।
उपासना में इस महाशक्ति को नारी रूप देकर इस एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आवश्यकता की पूर्ति का प्रयत्न किया गया है।
उपासना प्रयोजन के लिए प्रकाश का ध्यान करते हैं। प्रकाश ही आखिर पंचभूतों के अंतर्गत आता है। ध्यान भूमिका में प्रयुक्त किये जाने वाले प्रकाश बिन्दु एवं सूर्य मंडल का एक आकार बन ही जाता है इसलिए उपासना में कोई न कोई आकार तो निर्धारित करना ही पड़ता है। इस आकार के साथ जितनी ही आत्मीयता ममता, घनिष्ठता होगी उतना ही मन लगेगा और चित्त एकाग्र होगा और भावनात्मक तन्मयता की और दृष्टि के साथ भगवत् प्राप्ति की ओर प्रगति होती चली जाएगी।
उपासना में नारी प्रतिमा को वन्दनीय मानकर मनुष्य को पवित्रतम बनाने का प्रयत्न किया गया है नारी वस्तुतः मूर्तिमान महामाया ही है। देखिये-
उपासना का अर्थ है- दैवी गुण कर्म स्वभाव से अपने आपको अलंकृत करना। इस दिशा में जो कुछ भी प्रयास किया जाएगा वह सारा का सारा साधना के अंतर्गत आ जाएगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-January
उपासना का एक व्यवस्थित कार्यक्रम हमने बना दिया है, जिसे अपनाकर पाँच वर्ष में वर्तमान साथी आशातीत प्रगति करेंगे। अगले अंक में उसे प्रस्तुत करेंगे। बसंत पंचमी से उसका आरंभ करना चाहिए और पाँच साल तक उसे चलाना चाहिए। प्रतिवर्ष इसी बसंत पंचमी को एक निरीक्षण दृष्टि डाली जाया करेगी कि किसने कितनी प्रगति की? यदि अभीष्ट प्रगति नहीं हुई तो उस कमी को पूरा किया जाये।
उपासना मानते हैं और आशा करते हैं कि इससे परमात्मा की अनुकम्पा एवं अनुकूलता प्राप्त हो जायेगी, किन्तु यह उनका भ्रममात्र है। परमात्मा की अनुकम्पा तथा अनुकूलता प्राप्त करने के लिए उसके आदर्शों पर चलना और आदेशों का पालन करना होगा। कोई पुत्र अपने पिता की प्रशंसा तो करता रहे उसकी पद-पूजा और प्रशस्ति में तो लगा रहे किन्तु न तो उसकी आज्ञा माने और न उस पथ पर चले जिसका वह निर्देश दें तो क्या वह पुत्र पिता की अनुकम्पा एवं अनुकूलता प्राप्त कर सकता है? नहीं, वह इस प्रकार अपने ध्येय में सफल नहीं हो सकता। इसके विपरीत एक पुत्र पिता की पूजा-प्रशस्ति तो नहीं करता किन्तु उसकी आज्ञायों का पालन करता और निर्दिष्ट मार्ग पर चलता है- निश्चय ही वह पिता के अनुग्रह अधिकारी बनेगा।
उपासना अथवा पूजा-पाठ करने के आयोजन के लिये ही प्रयुक्त नहीं हुआ है। वह भारतीय आचार-विचार, आहार-विहार रहन-सहन के साथ जीवन पद्धति के लिये भी प्रयुक्त हुआ है। इससे प्रकट होता है कि हमारा धर्म ही हमारी ‘संस्कृति’ है और उसी से प्रभावित कार्यक्रम ही ‘साँस्कृतिक-कार्यक्रम’ कहे जाने चाहिये। भारतीय धर्म में जिन षोडश संस्कारों का निर्देश है वे सब एक प्रकार से साँस्कृतिक कार्यक्रम ही हैं।
उपासना-पद्धति निराकार की ओर जाती है तो किसी की साकार की ओर। कोई ईश्वर, प्रकृति, जीव, जीवन, परलोक, धर्म, सृष्टि आदि के प्रति एक प्रकार की मान्यता रखता है तो दूसरा अन्य प्रकार की। कहने का तात्पर्य यह है कि संसार में मान्यताओं का कोई बारम्बार नहीं और उनके बीच मित्रता एवं विचित्रता की भी कमी नहीं है। साथ ही सबको उनके प्रति मोह और पक्षपात की दुर्बलता भी रहती है। तब भला कोई किसी की मान्यता को अपनी मान्यता से श्रेष्ठ मानने अथवा अपनी मान्यता के स्थान पर अन्य के विश्वास को किस प्रकार स्वीकार करने को तैयार हो सकता है?
उपासना क्रम सर्वसाधारण के लिए सर्वांगपूर्ण स्तर का है।
उपासना आरंभ कर देनी चाहिए। इसी प्रकार यदि ज्ञान स्थली न हो तो उसकी स्थापना कर लेनी चाहिए। कूड़ा-करकट जैसी पुस्तकें उसमें नहीं भरनी चाहिए। चाहे थोड़ी ही हों, पर हों ऐसी जो जीवन की दिशा का नव-निर्माण करने में प्रभावपूर्ण मार्गदर्शन करती हों। धर्म के नाम पर बहुत जंजाल भरी पुस्तकें छपी हैं।
उपासना का अर्थ पूजा-पाठ करना ही मानते हैं। भजन, कीर्तन, नाम, जप, भोग, आरती अथवा कुछ कर्मकाँड की व्यवस्था कर देना ही उपासना मानते हैं और आशा करते हैं कि इससे परमात्मा की अनुकम्पा एवं अनुकूलता प्राप्त हो जायेगी, किन्तु यह उनका भ्रममात्र है। परमात्मा की अनुकम्पा तथा अनुकूलता प्राप्त करने के लिए उसके आदर्शों पर चलना और आदेशों का पालन करना होगा। कोई पुत्र अपने पिता की प्रशंसा तो करता रहे उसकी पद-पूजा और प्रशस्ति में तो लगा रहे किन्तु न तो उसकी आज्ञा माने और न उस पथ पर चले जिसका वह निर्देश दें तो क्या वह पुत्र पिता की अनुकम्पा एवं अनुकूलता प्राप्त कर सकता है? नहीं, वह इस प्रकार अपने ध्येय में सफल नहीं हो सकता।
उपासना क्या है उसकी पूजा का तात्पर्य क्या है ? इसको ठीक से समझे बिना काम नहीं चल सकता। उपासना का प्रयोजन है परमात्मा की प्रसन्नता प्राप्त करना, उसे अपने अनुकूल बनाना, क्योंकि उसकी अनुकूलता एवं अनुकम्पा के अभाव में किसी भी श्रेय में सफलता मिलना सम्भव नहीं। अधिकाँश लोग उपासना का अर्थ पूजा-पाठ करना ही मानते हैं। भजन, कीर्तन, नाम, जप, भोग, आरती अथवा कुछ कर्मकाँड की व्यवस्था कर देना ही उपासना मानते हैं और आशा करते हैं कि इससे परमात्मा की अनुकम्पा एवं अनुकूलता प्राप्त हो जायेगी, किन्तु यह उनका भ्रममात्र है।
उपासना का प्रयोजन है परमात्मा की प्रसन्नता प्राप्त करना, उसे अपने अनुकूल बनाना, क्योंकि उसकी अनुकूलता एवं अनुकम्पा के अभाव में किसी भी श्रेय में सफलता मिलना सम्भव नहीं। अधिकाँश लोग उपासना का अर्थ पूजा-पाठ करना ही मानते हैं। भजन, कीर्तन, नाम, जप, भोग, आरती अथवा कुछ कर्मकाँड की व्यवस्था कर देना ही उपासना मानते हैं और आशा करते हैं कि इससे परमात्मा की अनुकम्पा एवं अनुकूलता प्राप्त हो जायेगी, किन्तु यह उनका भ्रममात्र है। परमात्मा की अनुकम्पा तथा अनुकूलता प्राप्त करने के लिए उसके आदर्शों पर चलना और आदेशों का पालन करना होगा। कोई पुत्र अपने पिता की प्रशंसा तो करता रहे उसकी पद-पूजा और प्रशस्ति में तो लगा रहे किन्तु न तो उसकी आज्ञा माने और न उस पथ पर चले जिसका वह निर्देश दें तो क्या वह पुत्र पिता की अनुकम्पा एवं अनुकूलता प्राप्त कर सकता है?
उपासना है जिससे वह प्रसन्न होता है। अपने उपासक को अनायास ही मोक्षपद का अधिकारी बना देता है। मनुष्य को अन्य प्राणियों से भिन्न तथा बढ़कर बुद्धि, विवेक तथा शक्तियों का पुञ्ज देने, उसकी आत्मा में श्रद्धा तथा जिज्ञासा को भरने तथा आत्मशक्ति का ज्ञान कराने में इस बात का प्रमाण निहित है कि परमात्मा की निश्चित इच्छा है कि ‘मनुष्य ध्येय-पथ पर आगे बढ़े संसार में बिखरे पड़े अनन्त ऐश्वर्य का अधिकारी बने। अपने स्वरूप तथा मेरे रूप को पहचाने और प्राप्त करने में सफल हो। वह अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ कर सदा-सर्वदा के लिए सन्तुष्ट तथा सम्पन्न हो जाए।
उपासना क्रम छोड़ रखा है या जिसने अभी आरंभ ही नहीं किया वे उसका आरंभिक उपचार तो चालू कर सकें।
उपासना क्रम चलना एक आवश्यक धर्म-कर्त्तव्य है। इसी प्रकार हर घर में एक अलमारी या सन्दूक ऐसा होना चाहिए जिसमें जीवन निर्माण की केवल जीवन-निर्माण की प्रेरणा भरी पुस्तकें सुसज्जित रूप से रखी जाया करें। यह ज्ञान-स्थली भी देव-स्थली की भाँति ही जरूरी है। जिन घरों में यह दोनों स्थापित नहीं, उन्हें अध्यात्मवादियों का घर नहीं कहा जा सकता। अतएव हर अखण्ड-ज्योति के परिजन को अपने घर में यह दोनों स्थापनायें कर ही लेनी चाहिए।
उपासना का आधा पाठ्यक्रम हम पूरा कर चुके हैं। जो पूरा किया गया है, उसका अभ्यास भी आगामी पाँच वर्ष तक जारी रखें। जो शेष है, उसे कोई व्यक्ति अपने बलबूते पूरा नहीं कर सकता। उसमें मार्गदर्शक की शिक्षा ही काफी नहीं वस्तु शक्ति भी सम्मिलित होनी चाहिए। उन उच्चस्तरीय अध्यापकों को हम अपनी शक्ति-सामर्थ्य पर्याप्त मात्रा में देने की स्थिति में आज नहीं हैं, पाँच वर्ष बाद होंगे तब जो शेष साधना रही है उसे बहुत शीघ्र पूरा करा देंगे।
उपासना करने का निर्देश दिया गया है। परमात्मा की उपासना क्या है उसकी पूजा का तात्पर्य क्या है ? इसको ठीक से समझे बिना काम नहीं चल सकता। उपासना का प्रयोजन है परमात्मा की प्रसन्नता प्राप्त करना, उसे अपने अनुकूल बनाना, क्योंकि उसकी अनुकूलता एवं अनुकम्पा के अभाव में किसी भी श्रेय में सफलता मिलना सम्भव नहीं। अधिकाँश लोग उपासना का अर्थ पूजा-पाठ करना ही मानते हैं।
उपासना तक ही सीमित माना जाने लगा है। अस्तु आज के साँस्कृतिक कार्यक्रम धर्म की सीमा छोड़कर अन्य परिवेश में आ गये हैं। किन्तु उनका मूल उद्देश्य तो बदल ही नहीं सकता। साँस्कृतिक कार्यक्रमों का निश्चय ही ऐसा आयोजन है जिससे मनुष्य के मन का संस्कार हो।
उपासना का कार्यक्रम अगले अंक में प्रस्तुत होगा। वह सर्व-साधारण के लिए यहाँ तक कि व्यस्त व्यवसायी से लेकर छोटे बच्चों तक के योग्य, किन्तु अत्यन्त प्रभावपूर्ण होगा। उसे बसंत पंचमी से आरंभ करने की तैयारी की जाए। इसके अतिरिक्त सेवा साधना का जो कार्यक्रम परिजनों के लिये आवश्यक है उसे चालू कर देना चाहिए।
उपासना करेगा। इसी उल्टी चाल को हमें सुधारना है।
उपासना कर सुन्दर विनिश्वयात्मक बुद्धि धारण करो जिससे जीव सत्यरूपी ब्रह्म को सिद्ध और साक्षात कर मोक्ष की ओर अग्रसर होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-October
उपासना का क्रिया-कलाप तो बहुत करके इसी स्तर का है। नर भी उन्हीं गीतों को गाकर भाव-विभोर होते हैं जिन्हें नारियाँ अपने पतियों के संदर्भ में गा सकती हैं। गोपी कृष्ण का प्रेम प्रसंग वस्तुतः नर नारी भेद से असंख्य गुना ऊंचा है उसे विशुद्ध रूप से आत्मा-परमात्मा का मिलन बिन्दु ही कहा जा सकता है। कृष्णावतार के समय सहस्रों प्रबुद्ध आत्माओं ने परमात्मा के अभीष्ट प्रयोजन में आत्म समर्पण करके जो महारास रचाया उसी से अवतार का उद्देश्य पूर्ण हो सका। साथी सहचरों के बिना अकेले कृष्ण आखिर कर भी क्या सकते थे?
उपासना करते हैं। भक्ति योग में ऐसे अनेक साधन क्रम विद्यमान हैं। कृष्ण उपासना का क्रिया-कलाप तो बहुत करके इसी स्तर का है। नर भी उन्हीं गीतों को गाकर भाव-विभोर होते हैं जिन्हें नारियाँ अपने पतियों के संदर्भ में गा सकती हैं। गोपी कृष्ण का प्रेम प्रसंग वस्तुतः नर नारी भेद से असंख्य गुना ऊंचा है उसे विशुद्ध रूप से आत्मा-परमात्मा का मिलन बिन्दु ही कहा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-April
उपासना करनी चाहिए, उसी का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। साँसारिक रूप-सौंदर्य और विविधता में घसीटकर उस मौलिक सौंदर्य को तिरोहित नहीं करना चाहिए।
उपासना में लगा रहता है। उसका शरीर डाह से झुलसकर निःशक्त हो जाता है, तब भला इस प्रकार नष्ट एवं मृत प्रायः हो जाने वाला व्यक्ति उन्नति एवं विकास के लिए पुरुषार्थ कर भी क्या सकता है?
उपासना का उपदेश देकर अपनी विचारणा शक्ति बढ़ाने के लिये विदा कर दिया। क्योंकि उनके सोचने की सीमा बाह्यतत्व की परिधि में अभी प्रवेश कर सकने योग्य, सूक्ष्म बनी न थी।
उपासना का अर्थ अपने आप को बुरे कर्मों से बचाये रखने के लिये प्रकाश बनाए रखना होता है। इस तरह की जीवन-व्यवस्था व्यक्ति को असाधारण बनाती है। वह शक्ति शिव में पाई जाती है, शिव के उपासकों में भी वह वृत्तियाँ धुली हुई होनी चाहिए।
उपासना, साधक को अनेक कठिनाइयों से छुड़ाने और सुख-शाँति का अधिकारी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान करती है।
उपासना एक ऐसी सर्वांगपूर्ण योग-साधना है जिसके द्वारा इन सभी शक्ति संस्थानों को अति सरलतापूर्वक सक्रिय बनाया जा सकता है।
उपासना करने वालों को पवित्र करती है प्रेरणा देती है, आयु, प्राण, प्रजा, पशु कीर्ति धन और ब्रह्म-वर्चस प्रदान कर के ब्रह्मलोक तक पहुँचाती है।”
उपासना करता रहा है और जाने अनजाने भी इन आध्यात्मिक लाभों से लाभान्वित होता रहा है। इन्हें एक प्रकार से व्यावहारिक जीवन की मूर्तिमान उपलब्धियाँ कहना चाहिए। उस जीवन-क्रम में इतना सरल और सुबोधगम्य बना देने में भारतीय आचार्यों की सूक्ष्म बुद्धि का उपकार ही मानना चाहिए, जिन्होंने बहुत थोड़े में सत्य और जीवन-लक्ष्य की उन्मुक्त अवस्थाओं का ज्ञान उपलब्ध करा दिया है।
उपासना कर लो, चाहे कुबेर की। -बाइबिल
उपासना से प्राप्त होने वाले सात लाभों का वर्णन करते हुए कहा गया है:-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-September
उपासना करने वाले-पुस्तक, पुष्प, कमंडलु, माला धारण किये हुये मातृ-शक्ति का सूर्य मंडल के मध्य में विराजमान ध्यान करते हैं। निराकार उपासना करने वाले चिदाकाश एवं महदाकाश में प्रतिष्ठित तेज मंडल के रूप में उसका ध्यान करते हैं। उपासना का क्रम निराकार हो अथवा साकार दोनों ही स्थितियों में सूर्य मंडल की स्थापना अनिवार्य रूप से रहेगी। प्रकाश के तेजोवलय को समन्वित किये बिना गायत्री महाशक्ति का ध्यान हो ही नहीं सकता।
उपासना कभी किसी की फलित नहीं हो सकती पर उपासना रहित गुण मनुष्य की जीवात्मा को ऊर्ध्वगामी बना सकते हैं। उसे स्वर्ग और मुक्ति के पद पर प्रतिष्ठित कर सकते हैं।
उपासना की सफलता सदा ही संदिग्ध है।
उपासना से विरत रहता है। जितना आवश्यक हो उतना लो, रक्खो और खर्च करो, बाकी को देश के अर्थतन्त्र तथा राष्ट्रीय आय के परि एवं प्रत्यावर्तन में गतिशील होने दिया जाये। इसे अपने पास रोक कर रख लेना उचित नहीं। इससे ही समाज में असंतोष का जन्म होता है। जो अमीर तथा गरीब दोनों ही वर्गों को समान रूप से प्रभावित करता है।
उपासना, तज की तरह गुणों के परिष्कार की साधना अनिवार्य रूप से करनी चाहिये। गुण रहित उपासना कभी किसी की फलित नहीं हो सकती पर उपासना रहित गुण मनुष्य की जीवात्मा को ऊर्ध्वगामी बना सकते हैं। उसे स्वर्ग और मुक्ति के पद पर प्रतिष्ठित कर सकते हैं।
उपासना का निर्देश करते हुए उसकी महान महत्ता पर भी प्रकाश डाला है और उसे आत्मिक मलीनताओं का वितरणकर्त्ता माना है।
उपासना रहित गुण मनुष्य की जीवात्मा को ऊर्ध्वगामी बना सकते हैं। उसे स्वर्ग और मुक्ति के पद पर प्रतिष्ठित कर सकते हैं।
उपासना की जाय ‘सूर्य’ का उससे अविच्छिन्न सम्बन्ध अनिवार्य रूप से रखना होगा। गायत्री का देवता ही सूर्य है तो उसका स्वरूप भी साथ में होना स्वाभाविक है।
उपासना की क्या आवश्यकता थी? गायत्री सूर्य की आत्मा- सविता शक्ति के साथ उपासक को सम्बन्धित करती है जिसके द्वारा वह परब्रह्म महाप्राण को अपने शरीर और अन्तःकरण में आवश्यक मात्रा में धारण करके लौकिक सुख एवं आत्मिक शाँति को अनुभव करता हुआ जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
उपासना का क्रम निराकार हो अथवा साकार दोनों ही स्थितियों में सूर्य मंडल की स्थापना अनिवार्य रूप से रहेगी। प्रकाश के तेजोवलय को समन्वित किये बिना गायत्री महाशक्ति का ध्यान हो ही नहीं सकता।
उपासना की जाती है।
उपासना करने वाले प्रकाश बिन्दु तथा उदीयमान सूर्य जैसे विशाल तेज मण्डल का ध्यान करते हुए जप के द्वारा उपासना क्रम चलाते हैं। गायत्री महामन्त्र की उपासना विधि यही है कहा है-
उपासना की उपयोगिता तो बताई है, पर यह भी स्पष्ट कर दिया है कि मुझे पाने के लिये श्रद्धा, विश्वास, संयम, विरति, विनयशीलता, प्रसन्नता और सरल स्वभाव आदि गुणों का आविर्भाव भी आवश्यक है।
उपासना की आवश्यकता है, किन्तु वह आवश्यकता है ईश्वरीय प्रसन्नता के लिये जिससे कि उसको और शक्ति, स्फूर्ति, साहस एवं संलग्नता मिलती रहे और हम अबाध रूप से कर्तव्य पर चलते जाये। अन्य मोक्ष उपासना की सफलता सदा ही संदिग्ध है।
उपासना क्रम चलाते हैं। गायत्री महामन्त्र की उपासना विधि यही है कहा है-
उपासना विधि यही है कहा है-
उपासना करते हैं।”
उपासना का विधान वर्णन करते हुये उसकी महत्ता,विशेषता एवं उपलब्धियों को संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित शब्दों में इस प्रकार वर्णन किया है-
उपासना में भावना का समावेश और हर दिन नया जन्म वाली साधना पद्धति आत्म-निर्माण का उद्देश्य पूरा करेगी। ज्ञान-यज्ञ अपने घर में रहने वाले तथा घर से बाहर बिखरे पड़े परिवार का अभिनव निर्माण करेगी। समाज-निर्माण के लिये यों शतसूत्री कार्यक्रम बहुत पहले घोषित किया जा चुका है पर उसका आरम्भ अपने परिवार के सदस्यों को शाखा संगठन के अंतर्गत संगठित करने और जन्मदिन मनाने की प्रक्रिया द्वारा आरम्भ किया जाना चाहिए। जहाँ यह दो कदम आगे बढ़ गये वहाँ अन्य रचनात्मक एवं संगठनात्मक कार्यक्रम की पूर्ति हो सकने की भी आशा की जा सकेगी।
उपासना करने वाला गायत्री माता को सूर्य मंडल के मध्य में अवस्थित मान कर अथवा उनके मुखारविन्द के चारों ओर तेज मंडल की भावना कर के ध्यारों का उद्देश्य पूरा करते हैं। निराकार उपासना करने वाले प्रकाश बिन्दु तथा उदीयमान सूर्य जैसे विशाल तेज मण्डल का ध्यान करते हुए जप के द्वारा उपासना क्रम चलाते हैं। गायत्री महामन्त्र की उपासना विधि यही है कहा है-
उपासना करने वाले को ज्ञान, वैभव एवं सद्गुणों की उपलब्धि होती है। इसी आधार पर एक ही पर ब्रह्म महत्व सविता को तीन प्रकार से तीन चित्रों में चित्रित किया गया है-
उपासना करने वाले चिदाकाश एवं महदाकाश में प्रतिष्ठित तेज मंडल के रूप में उसका ध्यान करते हैं। उपासना का क्रम निराकार हो अथवा साकार दोनों ही स्थितियों में सूर्य मंडल की स्थापना अनिवार्य रूप से रहेगी। प्रकाश के तेजोवलय को समन्वित किये बिना गायत्री महाशक्ति का ध्यान हो ही नहीं सकता।
उपासना में संलग्न ऋषि, मुनि योग के द्वारा अपनी आत्मा को उस तेजपुँज महाप्राण परब्रह्म में प्रविष्ट करते हैं। शुकदेवजी अपनी साधना को पूर्ण करते हुए जिस स्थिति में प्रविष्ट हुए उसका उल्लेख महाभारत में इस प्रकार मिलता है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-February
उपासना में श्रद्धा स्थिर हो जाये और मन रुचि लेने लगे तब समझना चाहिए कि आरंभिक बाल-कक्षा पूरी हो गई और अब उच्चस्तरीय प्रौढ़ साधना की कक्षा में प्रवेश करने का समय आ गया।
उपासना स्नान कर के, धुले वस्त्र पहन कर की जाए। इससे शरीर और मन हल्का रहने से मन ठीक तरह लगता है। फिर भी यदि कोई व्यक्ति अपनी शारीरिक दुर्बलता अथवा साधनों की असुविधा के कारण स्नान करने में असमर्थ हो तो इस कठिनाई के कारण उपासना भी छोड़ बैठना ठीक नहीं। हाथ पैर मुँह धोकर-यथा संभव वस्त्र आदि बदलकर भी साधना की जा सकती है। उपासना का प्रधान उपकरण शरीर नहीं मन है।
उपासना आत्मिक प्रगति में सार्थक रूप से सहायक हो ऐसा सच्चे मन से प्रयत्न करूंगा। माता मेरी इस प्रतिज्ञा को सफल बनाने में सहायता करे।’ आधा घंटा इस संकल्प को ही मनन-चिन्तन किया जाए। अन्त में 108 गायत्री मंत्र माला की सहायता से अथवा उंगलियों पर गिन कर पूरे किए जाएं। अन्त में 24 आहुतियों का हवन किया जाए।
उपासना में न गिनें।
उपासना का उच्चस्तरीय उत्तरार्ध पूरा करने वालों को उपलब्ध होती है। ऐसे लोगों में कई प्रत्यक्ष विशेषतायें देखी जाती हैं, उनका शरीर चन्दन, गुलाब जैसी सुगंधियों से गंधमान रहता है और उनकी देह स्पर्श करने से बिजली के करेंट से लगने वाले झटके जैसा स्पन्दन अनुभव होता है। गाय और सिंह एक घाट पानी पीने वाले दृश्य ऐसे ही लोगों के समीपवर्ती वातावरण में देखे जाते हैं। अंगुलिमाल और बाल्मीक जैसे दस्यु, अम्बपाली जैसी वारवनिता जैसे निम्नस्तरीय व्यक्तित्व ऐसे ही लोगों के सान्निध्य में उच्चस्तरीय बनते हैं।
उपासना को बहुत महत्व देते हैं और सांप्रदायिक आग्रह के कारण साकार उपासना से नाक भों सकोड़ते हैं। ऐसे लोगों को यह जान लेना चाहिए साकार और निराकार उपासना एक दूसरे का प्रतिकूल नहीं वरन् पूरक हैं। आरंभिक कक्षाओं में पट्टी, कलम, खड़िया का उपयोग करना पड़ता है। ऊंची कक्षाओं में फाउण्टेन पेन और कापी प्रयुक्त होती है। इन दोनों भिन्नताओं में परस्पर कोई झगड़ा झंझट नहीं वरन् स्थिति का विकास मात्र है।
उपासना के लिए उठने लगे तो समझना चाहिए कि उस क्रम व्यवस्था ने स्वभाव में स्थान प्राप्त कर लिया। नियत विधि व्यवस्था, नियत स्थान, नियत क्रम, नियत सरंजाम जुटाने के लिये जब हाथ नेत्र अभ्यस्त हो जायं तो समझना चाहिये कि प्रारंभिक कक्षा का साधना क्रम पूर्ण हो गया। जब तक ऐसी स्थिति न आये तब तक पूर्वाभ्यास ही जारी रखना होता है। अनुभवी मार्ग-दर्शन, साधकों को तब तक इस प्राथमिक उपासना में ही लगाये रहते हैं जब तक वे समय, संख्या और व्यवस्था इन तीनों क्षेत्रों में नियमित नहीं हो जाते-कर्मकाण्ड-विधि विधान-साधना क्षेत्र का प्रथम सोपान है।
उपासना करते चले आ रहे हैं पर जो अभी तक नियमित नहीं हो गये उन्हें भी गिनती भूलजाने पर नये सिरे से गिनने का क्रम आरंभ करना चाहिए। यदि लगन सच्ची है और इस मार्ग पर चलने का दृढ़ संकल्प किया गया हो तो ‘नियमितता’ का प्रारंभिक अभ्यास तीन महीनों में भी पूरा हो सकता है।
उपासना का समावेश कर लेना चाहिए, भले ही वह कितना ही स्वल्प क्यों न हो।
उपासना करूंगा। लकीर नहीं पीटूँगा वरन् साधना से भावनाओं का समावेश कर के उसे सर्वांगपूर्ण बनाऊंगा। मेरी उपासना आत्मिक प्रगति में सार्थक रूप से सहायक हो ऐसा सच्चे मन से प्रयत्न करूंगा। माता मेरी इस प्रतिज्ञा को सफल बनाने में सहायता करे।’ आधा घंटा इस संकल्प को ही मनन-चिन्तन किया जाए।
उपासना पर निष्ठा हो वे उसे आरंभ कर दें। जिन्हें गायत्री उपासना न रुचे, वे अपनी पद्धति में इन्हीं सिद्धान्तों का समावेश कर सकते हैं। हममें से प्रत्येक को पक्का आस्तिक होना चाहिए और उसका व्यावहारिक अभ्यास करने के लिए दैनिक नित्य-कर्म में उपासना का समावेश कर लेना चाहिए, भले ही वह कितना ही स्वल्प क्यों न हो।
उपासना से नाक भों सकोड़ते हैं। ऐसे लोगों को यह जान लेना चाहिए साकार और निराकार उपासना एक दूसरे का प्रतिकूल नहीं वरन् पूरक हैं। आरंभिक कक्षाओं में पट्टी, कलम, खड़िया का उपयोग करना पड़ता है। ऊंची कक्षाओं में फाउण्टेन पेन और कापी प्रयुक्त होती है। इन दोनों भिन्नताओं में परस्पर कोई झगड़ा झंझट नहीं वरन् स्थिति का विकास मात्र है।
उपासना एक सरल किन्तु अत्यन्त प्रभावपूर्ण विधान इसी अंग में दिया गया है। जिन्हें गायत्री-उपासना पर निष्ठा हो वे उसे आरंभ कर दें। जिन्हें गायत्री उपासना न रुचे, वे अपनी पद्धति में इन्हीं सिद्धान्तों का समावेश कर सकते हैं। हममें से प्रत्येक को पक्का आस्तिक होना चाहिए और उसका व्यावहारिक अभ्यास करने के लिए दैनिक नित्य-कर्म में उपासना का समावेश कर लेना चाहिए, भले ही वह कितना ही स्वल्प क्यों न हो।
उपासना के समय न जाने कहाँ-कहाँ के विचार आते हैं। यह स्थिति आत्मिक विकास में प्रथम बाधा है। पातञ्जलि योग दर्शन में चित्त वृत्ति के निरोध को ही योग कहा गया है। चित्तवृत्तियाँ चेतन रहें, मन जहाँ-तहाँ दौड़े तो योग कैसे सधे? आन्तरिक विकास कैसे हो?
उपासना का प्राण है। और यह प्रेम किसी व्यक्तित्व के माध्यम से ही विकसित होता है इसलिये उपासना क्षेत्र में इष्ट देव की कोई रूप कल्पना कर के चलना ही समीचीन माना गया है। इतने पर भी किसी को निराकार का ही आग्रह हो तो अन्य तीन प्रकार के ध्यान किए जा सकते हैं।
उपासना, आत्मा-परमात्मा, सरलता, सादगी, आदि उदात्त गुणों की निन्दा करनी शुरू कर दी है। उन्हें व्यर्थ की अलाभकारी बातें कह कर खिल्ली उड़ाना मानसिक तथा बौद्धिक मनोरंजन बना लिया है। जिसका फल यह हुआ है कि अबोध तथा अस्तित्व रहित जन-साधारण की आस्था इन कल्याण कर्मों पर उसे उठने लगी, जिसका परिणाम, दुराचार, भ्रष्टाचार तथा अनीति अन्याय के रूप में उनके सामने है जिससे वे पिसे तो जा रहे हैं किन्तु समझने तथा सुधार करने का प्रयत्न नहीं कर रहे हैं।
उपासना के समय में घंटों का हेरफेर कर देते हैं। औषधि सेवन का और व्यायाम का एक नियत समय होता है। नियत मात्रा, संख्या का भी ध्यान रखना होता है। कभी व्यायाम सवेरे, कभी दोपहर को, कभी रात को किया जाये- कभी 5 बैठक कभी 60 बैठक और कभी-कभी 200 लगाई जायें तो वह व्यायाम उपयोगी न हो सकेगा। इसी प्रकार औषधि-सेवन भी कभी रात में, कभी दिन में, कभी दो-पहर-कभी रत्ती भर, कभी तोला भर, कभी छटांक भर मात्रा खाई जाये तो उससे रोग निवृत्ति में कोई सहायता न मिलेगी।
उपासना उपर्युक्त पद्धति से आरंभ करें। हर बसंत पञ्चमी को उन्हें अगले वर्ष के लिए प्रगति के अनुरूप आवश्यक हेरफेर के लिए मार्ग-दर्शन मिलता रहेगा।
उपासना को इस बसंत पञ्चमी से नियमित और व्यवस्थित रूप से आरंभ कर दें। गायत्री उपासना एक सरल किन्तु अत्यन्त प्रभावपूर्ण विधान इसी अंग में दिया गया है। जिन्हें गायत्री-उपासना पर निष्ठा हो वे उसे आरंभ कर दें। जिन्हें गायत्री उपासना न रुचे, वे अपनी पद्धति में इन्हीं सिद्धान्तों का समावेश कर सकते हैं। हममें से प्रत्येक को पक्का आस्तिक होना चाहिए और उसका व्यावहारिक अभ्यास करने के लिए दैनिक नित्य-कर्म में उपासना का समावेश कर लेना चाहिए, भले ही वह कितना ही स्वल्प क्यों न हो।
उपासना न रुचे, वे अपनी पद्धति में इन्हीं सिद्धान्तों का समावेश कर सकते हैं। हममें से प्रत्येक को पक्का आस्तिक होना चाहिए और उसका व्यावहारिक अभ्यास करने के लिए दैनिक नित्य-कर्म में उपासना का समावेश कर लेना चाहिए, भले ही वह कितना ही स्वल्प क्यों न हो।
उपासना ही होगी, जिससे पीड़ा और उद्विग्नता की ही वृद्धि होगी, शाँति की नहीं। जबकि अध्यात्म का लक्ष्य शाँति ही है।
उपासना मार्ग पर चलते हुए कुछ समय हो गया। भले ही उनका क्रम व्यवस्थित न रहा हो, पर इस दिशा में उनके कुछ कदम जरूर उठे हैं। ऐसे लोग भावनात्मक, इस उच्चस्तरीय प्रशिक्षण के उपयुक्त होंगे। जिन्होंने एक कदम भी इस ओर नहीं उठाया है, उन्हें कुछ समय कम से कम तीन महीने अपनी उपासना प्रकृति व्यवस्थित करने में लगाने चाहिएं। इस संदेश में पिछले पृष्ठों पर आवश्यक चर्चा की जा चुकी है।
उपासना क्षेत्र में इष्ट देव की कोई रूप कल्पना कर के चलना ही समीचीन माना गया है। इतने पर भी किसी को निराकार का ही आग्रह हो तो अन्य तीन प्रकार के ध्यान किए जा सकते हैं।
उपासना के संबंध में है। तात्कालिक संकट निवृत्ति के लिए कोई बीज मंत्र अनुष्ठान, यज्ञ या क्रिया कृत्य काम दें सकता है पर जिस आधार पर मानव जीवन को समग्र रूप में कृतकृत्य बनाया जा सके, ऐसी साधना जो मंजिल दर मंजिल चलने की ही हो सकती है। दूरदर्शी साधक धैर्यपूर्वक उसी आधार का श्रद्धापूर्वक अवलम्बन करते हैं।
उपासनायें की जाती हैं उनमें व्रत, उपवास, देव-दर्शन, तीर्थयात्रा, स्नान, कथा, पाठ, हवन जप आदि हैं। कर्मकाण्डी की प्रधानता रहती है, हठयोग इसी स्तर पर है। सूक्ष्म शरीर से जो उपासना की जाती है-उनमें ध्यान धारण प्रमुख है। लय योग, ऋजु योग, प्राण योग, राज योग, भक्ति योग आदि 84 साधना इसी स्तर की हैं। कारण शरीर की साधना, समाधि, तन्मयता, एकान्त स्थिति, परम क्षेम गति, ब्रह्म निर्वाण, जीवन मुक्ति, आत्म-साक्षात्कार प्रभु-दर्शन आदि उपलब्धियाँ इस भूमिका में मिलती है।
उपासना समाप्त करनी चाहिये। आरती और सूर्य आदि के पश्चात यह साधना समाप्त हो जाती है। उत्तम तो यह है कि यह उपासना स्नान कर के, धुले वस्त्र पहन कर की जाए। इससे शरीर और मन हल्का रहने से मन ठीक तरह लगता है। फिर भी यदि कोई व्यक्ति अपनी शारीरिक दुर्बलता अथवा साधनों की असुविधा के कारण स्नान करने में असमर्थ हो तो इस कठिनाई के कारण उपासना भी छोड़ बैठना ठीक नहीं।
उपासना भी छोड़ बैठना ठीक नहीं। हाथ पैर मुँह धोकर-यथा संभव वस्त्र आदि बदलकर भी साधना की जा सकती है। उपासना का प्रधान उपकरण शरीर नहीं मन है। फिर ध्यान साधना में तो उसी को प्रमुखता है। बाहर से स्नान कर लेने पर भी भीतर तो इस देह में फिर भी गंदगी भरी रहती है।
उपासना का प्रधान उपकरण शरीर नहीं मन है। फिर ध्यान साधना में तो उसी को प्रमुखता है। बाहर से स्नान कर लेने पर भी भीतर तो इस देह में फिर भी गंदगी भरी रहती है। इसलिये शारीरिक शुद्धि की अधिकाधिक व्यवस्था तो की जाए पर उसे इतना अनिवार्य न बनाया जावे कि स्नान न हो सका तो साधना भी छोड़ दी जाए। रोगी, अपाहिज, जरा जीर्ण और असमर्थ व्यक्ति भी जिस साधना को कर सके वस्तुतः वही साधन है।
उपासना 3. युग-निर्माण परिवार के सदस्यों का जन्म दिन मनाने की सामूहिक पुण्य प्रक्रिया। ये तीनों ही कार्य हर सदस्य को उस वर्ष आरंभ में ही देने चाहिए। अगले वर्ष का कार्यक्रम अगले वर्ष इन्हीं दिनों प्रस्तुत करेंगे।
उपासना क्रम चला सकते हैं।
उपासना, आदि सभी आवश्यक विषयों पर प्रशिक्षण के अतिरिक्त शिक्षणर्थियों की व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाने के लिये महत्पवूर्ण परामर्श दिये जाते हैं। अब तक के शिविरों का परिणाम यही रहा है कि जो उनमें सम्मिलित हुआ वह एक नई स्फूर्ति, नई चेतना, नई प्रेरणा एवं नई दिशा लेकर गया। अस्त-व्यस्त जटिल व्यवस्थित बना और चिन्ता के स्थान पर मुसकान का अवसर आया। हम चाहते हैं कि प्रेमी परिजन इस शिविर के अवसर पर हमसे वर्ष में एक बार मिल लिया करें और इतनी स्फूर्ति पा लिया करें जो उनके लिये एक वर्ष तक आवश्यक मनोबल जुटा दिया करें। इस शिविर में आने के लिये भी प्रेमी परिजनों को आमंत्रित किया जा रहा है।
उपासना की जाती है-उनमें ध्यान धारण प्रमुख है। लय योग, ऋजु योग, प्राण योग, राज योग, भक्ति योग आदि 84 साधना इसी स्तर की हैं। कारण शरीर की साधना, समाधि, तन्मयता, एकान्त स्थिति, परम क्षेम गति, ब्रह्म निर्वाण, जीवन मुक्ति, आत्म-साक्षात्कार प्रभु-दर्शन आदि उपलब्धियाँ इस भूमिका में मिलती है। तीनों की कक्षायें क्रमशः अग्रगामी होती हैं। प्रथम कक्षा की स्थूल शरीर के द्वारा हो सकने वाली साधना पद्धति गायत्री महाविज्ञान के प्रथम व द्वितीय भागों में बताई जा चुकी है।
उपासना एक दूसरे का प्रतिकूल नहीं वरन् पूरक हैं। आरंभिक कक्षाओं में पट्टी, कलम, खड़िया का उपयोग करना पड़ता है। ऊंची कक्षाओं में फाउण्टेन पेन और कापी प्रयुक्त होती है। इन दोनों भिन्नताओं में परस्पर कोई झगड़ा झंझट नहीं वरन् स्थिति का विकास मात्र है। भावनात्मक विकास की साधना से भगवान को अपना कोई साँसारिक संबंधी माता-पिता भाई बहिन, सखा आदि कल्पित करना पड़ता है ताकि प्रेम भावना का, भक्ति रस का विकास हो सके।
उपासना करने वाले का समय व्यवस्थित नहीं होता। आलस और गपशप में, व्यर्थ की बातों में समय गंवाते रहते हैं और उपासना के समय में घंटों का हेरफेर कर देते हैं। औषधि सेवन का और व्यायाम का एक नियत समय होता है। नियत मात्रा, संख्या का भी ध्यान रखना होता है। कभी व्यायाम सवेरे, कभी दोपहर को, कभी रात को किया जाये- कभी 5 बैठक कभी 60 बैठक और कभी-कभी 200 लगाई जायें तो वह व्यायाम उपयोगी न हो सकेगा।
उपासना में ही लगाये रहते हैं जब तक वे समय, संख्या और व्यवस्था इन तीनों क्षेत्रों में नियमित नहीं हो जाते-कर्मकाण्ड-विधि विधान-साधना क्षेत्र का प्रथम सोपान है।
उपासना प्रकृति व्यवस्थित करने में लगाने चाहिएं। इस संदेश में पिछले पृष्ठों पर आवश्यक चर्चा की जा चुकी है। बिलकुल नए साधकों के लिये प्रारंभिक कदम उसी आधार पर उठाने चाहिये और जब ‘नियमितता’ की बात कभी उत्तीर्ण हो जाए तब फिर भावनात्मक उत्कर्ष के उच्चस्तरीय साधना क्रम में सम्मिलित हो जाना चाहिये। देर से जो लोग उपासना करते चले आ रहे हैं पर जो अभी तक नियमित नहीं हो गये उन्हें भी गिनती भूलजाने पर नये सिरे से गिनने का क्रम आरंभ करना चाहिए। यदि लगन सच्ची है और इस मार्ग पर चलने का दृढ़ संकल्प किया गया हो तो ‘नियमितता’ का प्रारंभिक अभ्यास तीन महीनों में भी पूरा हो सकता है।
उपासना करते रहे हों या नये सिरे से करने के इच्छुक हों उन्हें इस शुभ मुहूर्त से अपनी साधन व्यवस्था सुव्यवस्थित कर लेनी चाहिये। इसे आरंभ को यह मान कर करना चाहिए कि इसे पाँच वर्ष तक जारी रखेंगे। हर वस्तु समय पर अपना फल देती है। यों शुभ कार्य का प्रारंभ भी तत्काल आनंद उल्लास की एक किरण प्रदान करता है और सन्मार्ग पर चलने की प्रत्यक्ष अनुभूति नकद धर्म की तरह अविलम्ब होती है, फिर भी किसी तथ्य के समुचित विकास में कुछ समय तो लगता ही है। आम के पेड़ पाँच वर्ष में फल देते हैं।
उपासना भूमिका के वातावरण का स्वरूप है। पहले इसी पर ध्यान एकाग्र किया जाये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-June
उपासना की। राजाओं में प्रथम अश्वपति ने उपासना की।
उपासना भी करता है, ऐसे व्यक्ति का मन भी लगता है। मन लगा कर जो भी कार्य किया जाता है उनमें सफलता मिलती ही है फिर उपासना में सफलता क्यों न मिलेगी?
उपासना का अवलम्बन लिया है। उसमें उन्हें अभीष्ट आत्म-शक्ति प्राप्त हुई है और उस शक्ति-भण्डार के अधिकारी बन उनने अपने को ऐसा प्रकाशवान बनाया है जिनके प्रकाश से अभी तक संसार में सर्वतोमुखी प्रकाश आलोकित ही रहा दिखाई देता है।
उपासना के मूल में जिस अविच्छिन्न श्रद्धा की आवश्यकता है वह इस महाविद्या के तत्व ज्ञान को भली प्रकार जान लेने से ही सम्भव है। इस लिये जिस प्रकार किसी भी कार्य के करने से पूर्व उसका स्वरूप एवं प्रतिफल जानना आवश्यक होता है उसी प्रकार गायत्री विद्या के बारे में भी आवश्यक जानकारी पूरे मनोयोग के साथ प्राप्त करनी चाहिए।
उपासना की महत्ता बताते हुए कहा-
उपासना में नियमितता एवं क्रमबद्धता आवश्यक है। जो श्रद्धा विश्वास की दृढ़ता होने पर ही सम्भव हैं। जब तक कौतूहल के रूप में अधूरे मन से कोई कार्य किया जाता है तब तक तन्मयता के अभाव में वह अस्त-व्यस्त ही रहता है। श्रद्धा होने से तत्परता एवं लगन उत्पन्न होती है, तब नियमित उपासना एक स्वभाव बन जाता है। ऐसी दशा में ही अभीष्ट परिणाम भी होता है।
उपासनात्मक सम्बल गायत्री महामंत्र को ही पकड़ा था, और इसी सीढ़ी पर चढ़ते हुए वे देव पुरुषों में गिने जाने योग्य स्थिति प्राप्त कर सके थे। देवदूतों, अवतारों, गृहस्थियों, महिलाओं, साधु, ब्राह्मणों, सिद्ध पुरुषों को ही नहीं साधारण सद्गृहस्थों का उपास्य भी गायत्री ही रही है। और उस अवलम्बन के आधार पर न केवल आत्मकल्याण का श्रेय साधन किया है वरन् भौतिक सुख सम्पदाओं की साँसारिक आवश्यकताओं को भी आवश्यक मात्रा में उपलब्ध किया है। ऐसे कितने प्रमाण देखने में आते हैं।
उपासना करते हैं, यही चारों वेदों की माता है।
उपासना की।
उपासना में सफलता क्यों न मिलेगी?
उपासना एक स्वभाव बन जाता है। ऐसी दशा में ही अभीष्ट परिणाम भी होता है।
उपासना संभव हो सके। इसी स्तर की उपासना अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करती है। तभी वे सत्परिणाम उत्पन्न होते हैं जिनका वर्णन शास्त्रों एवं ऋषियों ने पग-पग पर किया है।
उपासना का अद्भुत महत्व है और उपासनाओं में सर्वोपरि सर्वसुलभ, सर्वांगीण गायत्री उपासना ही है। उसी की अनुकम्पा मानव-जीवन में विभिन्न प्रतिभाओं के रूप में प्रकाशवान होती है।
उपासना का इतिहास क्रम किस प्रकार चला? उसके उत्तर में भगवान ने उत्तर दिया-
उपासनायें बताई गई हैं वह केवल इसी बात को परिपुष्ट करने के लिये हैं कि तुम शरीर नहीं, मन और इन्द्रियाँ भी नहीं हो इनसे परे अनन्त शक्ति स्वरूप आत्मा हो-आत्मा बन्धन रहित है। अपनी इच्छा संकल्प बल से कहीं भी विचरण कर सकती है। प्रकाश खेल खेलता है न उसका कोई बन्धु है न बान्धव, पुत्र न कलत्र, सब विविध रूप आत्मायें ही अपनी-अपनी चित्तवृत्तियों के कारण भाई, पिता माता ऐसे भासते हैं, यही बंधन है। इस बन्धन से छूटकर राग, द्वेष माया, ममता छोड़कर, केवल कर्तव्य पालन का ध्यान रखता हुआ जो व्यक्ति आत्मा में ही रमण करता है। आत्मा का ही चिन्तन करता है, आत्मा के गुणों के अनुरूप आचरण करता है अन्त में वह साँसारिक, सुख ऐश्वर्य और भोगों को भोगते हुए भी आत्मा को प्राप्त कर लेता है।
उपासना करता हूँ।
उपासनाओं में सर्वोपरि सर्वसुलभ, सर्वांगीण गायत्री उपासना ही है। उसी की अनुकम्पा मानव-जीवन में विभिन्न प्रतिभाओं के रूप में प्रकाशवान होती है।
उपासना ही है। उसी की अनुकम्पा मानव-जीवन में विभिन्न प्रतिभाओं के रूप में प्रकाशवान होती है।
उपासना किया करते थे और इस प्रकार बिना श्रम संसार-समुद्र से पार उतर जाया करते थे।
उपासना का नियम विधान बताने के उपराँत भगवान ने नारद जी से कहा-
उपासना अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करती है। तभी वे सत्परिणाम उत्पन्न होते हैं जिनका वर्णन शास्त्रों एवं ऋषियों ने पग-पग पर किया है।
उपासना कर राजा ने भगवती का साक्षात्कार और वरदान प्राप्त किया।
उपासना करता हूँ। शंकर जी ही नहीं प्रत्येक प्रमुख देवता तथा भूमण्डल के सभी महापुरुषों ने अपनी साधना में गायत्री का आश्रय लिया है। भगवान कृष्ण का कथन है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-July
उपासना की विधि लोगों को संध्या और गायत्री बताते थे।”
उपासना करने से आपको किसी का भय न रहेगा। सिर पर आकाश फट पड़े या बिजली गिर पड़े तो भी आपके आनंद में कमी न होगी। साँप और शेरों से लोग भले ही डरें आप निर्भय रहेंगे, क्योंकि उन क्रूर जन्तुओं में भी आपका शान्तिमय स्वरूप आपको दीख पड़ेगा। जो ब्रह्म से एक रूप हुआ, वही वीर-वही सच्चा निर्भय है। भगवान् ईसामसीह का विश्वासघात से जिन लोगों ने वध किया, उन्हें भी उसने आशीर्वाद ही दिया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-December
उपासना उसके आज्ञा पालन द्वारा की जावे, परन्तु तुम्हारे आस पास उसके कानून को तोड़ा जा रहा है और उसकी अन्यथा व्याख्या की जा रही है। उन लाखों मनुष्यों को (जिन पर ईश्वर ने अपनी इच्छा को पूरा होने का तुम्हारे समान भरोसा किया है) मनुष्योचित अधिकारों से वंचित किया जा रहा है और तुम चुपचाप बैठे हो! क्या इस पर भी तुम यह कहने का साहस कर सकते हो कि तुम उस पर विश्वास रखते हो
उपासना और पूजा ही विशेष लक्ष्य होता है किंतु उनकी पूजा करने के पहिले गणेश आदि अन्य छोटे-छोटे अनेक देवी-देवताओं की पूजा का विधान है। आप कहेंगे भगवान विष्णु की पूजा एक दम सीधे ही क्यों नहीं कर ली जाती किंतु इसमें एक तत्व सन्निहित है और वह है स्वार्थ एवं भोग- लोलुपता का त्याग तथा अपने आश्रितों को अपने से प्रथम आदर-सत्कार और बड़प्पन दिलाने का भारतीय आदर्श। भगवान राम के जीवन में इस आदर्श का पालन आपको सर्वत्र ही मिलेगा। क्या स्त्री, क्या भाई, क्या मित्र और क्या प्रजागण सबके साथ व्यवहार करते समय आप देखेंगे कि भगवान राम का ध्यान अपनी सुख-सुविधाओं की अपेक्षा उनकी सुविधाओं की ओर ही अधिक रहती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-August
उपासना नहीं करते वे लोग अपने जीवन को दुखी बना लेते हैं। इसका यह प्रयोजन नहीं कि देव ऋण का परिशोध न करने वालों से देवतागण क्रुद्ध होकर प्रतिशोध लेते हैं। देवताओं की पूजा न करने वाले व्यक्ति सुख समृद्धि से वंचित रहते हैं इसी को बाल-बुद्धि वाले व्यक्ति प्रतिशोध कहकर पुकारते हैं। प्रतिशोध सदैव क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, वैर आदि दुर्विकारों द्वारा प्रेरित होता है परंतु देवताओं में ये दूषित मनोविकार किंचिन्मात्र भी नहीं होते। वे तो समदर्शी होते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-April
उपासना करने का आदेश किया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में त्रिदेवों का अधिष्ठान सत, रज, तम का ही प्रतीक है। वेद का, ज्ञान का, अधिष्ठाता ब्रह्मा सत का प्रतीक है। लक्ष्मी पति शाक वैकुण्ठ लोक के वासी विष्णु कहते हैं रजोगुण का प्रतिनिधित्व त्रिशूल धारी, ताण्डव नृत्य करने वाले, तीसरे नेत्र के आग उगलते हुए रुद्र तमोगुण की प्रतिमा हैं। जिन साधकों ने प्रकृति को नारी के रूप में देखा है उन्होंने सत, रज, तम को सरस्वती लक्ष्मी एवं दुर्गा की छवि के साथ देखा है।
उपासना में रुचि नहीं, तो समझिए कि आप में सतोगुण बढ़ाने की जरूरत है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-June
उपासना सिद्धि होकर अमर आनन्द की वृद्धि करेगी। और यह बात सुगमता से समझ में आ जायगी कि अनन्त शक्ति की वह कल्पना जो एक से अनेक रूप रखकर विश्व रचना का कारण बनी हुई है प्राणिमात्र में विराजमान है, उसके न्यायोचित वितरण में कोई त्रुटि नहीं है अपनी भूल ही असफलता का कारण है।
उपासना से श्री वृद्धि होने में सहायता मिलती है। यही बात गणेश, शिव, विष्णु, हनुमान, दुर्गा आदि देवताओं के संबन्ध में है।
उपासना करने से मानस लोक में धन के भाव उत्पन्न होते हैं और वे भाव ही अभीष्ट सफलता तक ले पहुँचते हैं। इस प्रकार लक्ष्मी जी की उपासना से श्री वृद्धि होने में सहायता मिलती है। यही बात गणेश, शिव, विष्णु, हनुमान, दुर्गा आदि देवताओं के संबन्ध में है।
उपासना से जब कुवासनायें हट होती हैं तो भी कनेक्शन मिल जाता है जब कोई मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना चाहता है तो शारीरिक यात्रा आरम्भ होने से पहले मानसिक यात्रा का आवागमन समाप्त हो चुका होता है-एवं जैसे एक गणितज्ञ अनेक अंकों को यथा स्थान रखकर मिनटों में सत्य उत्तर दे सकता है वैसे ही सत साधक अपने कनेक्शन के आधार पर विश्व विभ्रम को दूर रखकर न्याय कर्म करवा लेने में समर्थ हो सकता है। कनेक्शन प्राप्त कल्पना-शक्ति सत्य का इंजेक्शन लगाकर अपने प्रभाव से समस्त अभाव दूर कर सकती है-एवं मन आनन्द में अपनी पवित्र कल्पना से सारे काम निकालने लगता है- उसे कठिनाई का रूप दिखाई ही नहीं पड़ता है-साधक अपनी सत्य प्रेरणा करके छुट्टी पा जाता है। बाधकों के प्रति प्रतिहिंसक भावना उठाने की उसे जरूरत ही नहीं पड़ती है क्योंकि वह काम तो स्वयं उसके ऊपर न होकर उसे अनन्त शक्ति पर होता है जो अपने अभिनय पात्र मूर्तियों में से किसी से भी ले सकता है अथवा नई रचना कर सकता हैं। जब ऋषियों को राक्षसों ने सताया तो उन्होंने अपनी आन्तरिक शक्ति को खटखटाया जिससे श्रीरामचन्द्रजी के रूप में दुष्टों के निधन का कार्य सम्पादित हुआ-न्याय पूरित कल्पना करने वाला केवल निश्चित परिणाम को जानता है-कार्य प्रणाली से उसको कोई काम नहीं, व्यावहारिक जगत की सभी बातें आन्तरिक क्षेत्र में निपटाई जा सकती है आँतरिक जगत इतना विशाल है कि शारीरिक क्षेत्र उसके सामने नहीं के बराबर है। शक्ति साधक साधुओं की कथा संसार बराबर कहता आता है परन्तु अब उदर पोषक लोगों ने उस अध्ययनशाला को भी निष्कलंक नहीं रहने दिया है।
उपासना करते हैं। साधु संन्यासी शिवजी का इष्ट रखते हैं। गृहस्थ लोग, विष्णु (राम, कृष्ण आदि अवतार) को भजते हैं। शक्ति के इच्छुक दुर्गा को पूजते हैं। स्थूल दृष्टि से देखने में यह देवता अनेकों मालूम पड़ते हैं, उपासकों की साधना में अन्तर दिखाई देता है पर वास्तव में कोई अन्तर है नहीं।
उपासना भी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-September
उपासना का अर्थ होता है, उपास्य का सान्निध्य प्राप्त करना या उनके निकट बैठना। अतएव हम भले ही अनेकों गुणों को अपने अंदर धारण कर लें किंतु यदि हम ऐश्वर्ययुक्त न होयेंगे तो हम भगवान विष्णु के सच्चे उपासक न कहला सकेंगे। भगवान तो स्वयं कहते हैं कि जो जो भी विभूति युक्त, क्राँति-युक्ति और शक्ति युक्त वस्तु है उसे मेरे ही तेज के अंश से उत्पन्न हुई जानो। अतएव सोचिए तो सही कि क्या सकल ऐश्वर्यों से युक्त राजराजेश्वर का कोई प्रिय भक्त या पुत्र कभी कंगाल रह सकता है?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-January
उपासना की अनेकों विधियाँ काम में लाई जाती हैं। धातु या पाषाण की भगवत् प्रतिमाएं बनाकर उनकी पूजा, आराधना की जाती है। स्नान धूप, दीप, चंदन, आरती, भोग, शयन, आदि क्रियाओं के द्वारा मंदिरों में पूजन आराधन होते रहते हैं। विशेष अवसरों पर फूल बँगले बनाये जाते हैं, उनकी विशेष सजावट होती है, मथुरा वृन्दावन में सावन के महीने में झूलों के उत्सव बड़े समारोह पूर्वक होते हैं, रथ यात्रा, दीपदान, लीला अभिनय आदि के आयोजन होते हैं, रासलीला एवं रामलीला के द्वारा भगवत् चरित्रों की स्मृति जागृत की जाती है। परमात्मा के प्रतिनिधियों के अवतारों और देवताओं के चित्र स्थापित किये जाते हैं।
उपासना करते हैं और उसे शिव का अभिन्न अंग मानते हैं। दुर्गा, राधा, सीता लक्ष्मी, सरस्वती पार्वती आदि रूपों में साधक भगवती शक्ति की शरण में जाता है। शाक्त सम्प्रदाय एक आध्यात्मिक समुदाय है जो शक्ति को ही परमात्मा मान कर उसकी उपासना करता है। ईश्वर के साथ प्रकृति या माया का अनन्त संबंध है। इसी से परमात्मा को लक्ष्मी नारायण सीताराम, राधेश्याम नामों से पुकारते हैं।
उपासना करता है। ईश्वर के साथ प्रकृति या माया का अनन्त संबंध है। इसी से परमात्मा को लक्ष्मी नारायण सीताराम, राधेश्याम नामों से पुकारते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-October
उपासना, सूर्य महात्म्य आदि के संबंध में अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर पिछले वर्षों में अनेक बार चर्चा हो चुकी हैं। सूर्य शक्ति को जीवन में अधिक से अधिक व्यवहार करना यही सूर्य पूजा है, इससे आरोग्य वृद्धि होती है।
उपासना करे, चाहे जिन स्थानों को तीर्थ माने, चाहे जिन महात्माओं को पूज्य माने पर, अब उसे भारतीय बनकर रहना होगा, भारतीय परम्परा उसकी परम्परा होगी, भारतीय रहन-सहन उसका रहन-सहन होगा, भारतीय संस्कृति उसकी संस्कृति होगी, तभी वह यहाँ समान नागरिकता का अधिकारी हो सकता है।
उपासना करते हुए भी सब मनुष्य तुमको ही प्राप्त होते हैं।)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-February
उपासना के लाभ असंदिग्ध है। यदि इसे नित्य नियमित रूप से किया जाता रहे तो उपासना के सत्परिणाम सुनिश्चित दिखाई देते हैं।
उपासना का उद्देश्य परमात्मा और आत्मा की पारस्परिक एकता और आदान-प्रदान की व्यवस्था का स्मरण करना हैं । स्मरण का प्रयोजन है तथ्य को निरन्तर हृदयंगम करते रहना और जीवन के सभी पक्षों को उच्चतर बनाते चलना, सभी गतिविधियों को उत्कृष्टतम बनाकर रहना ।
उपासना के सत्परिणामों की चर्चा की गयी है और कहा गया है कि जिनने भी इस महामंत्र का आश्रय लिया उन्होंने आशाजनक और उत्साहवर्धक फल पाया है। प्राचीनकाल से लेकर अब तक ऐसी अनेकों घटनायें घटित होती रही हैं जिनसे यह प्रमाणित होता है कि कभी भी किसी भी साधक की गायत्री उपासना निष्फल नहीं जाती। वह साधारण से साधारण और असाधारण से असाधारण समस्याओं को सुलझाने से लेकर सुख-सम्पदा ऋद्धि एवं स्वर्ग-मुक्ति तक के चमत्कारी सत्परिणाम उत्पन्न करती रही है।
उपासना आरंभ कर दी थी। उनकी यह तपस्या चौबीस महापुरश्चरणों तक चलती रही। तप करते हुए दीर्घकाल बीत गया, पुरश्चरण भी पूरे हो गये, फिर भी उन्हें गायत्री माता के दर्शन-साक्षात्कार नहीं हुआ। अपनी इस असफलता से वे बड़े खिन्न हुए ओर निराश होकर संन्यास ग्रहण कर लिया।
उपासना से क्या कुछ नहीं मिलता अर्थात् सब कुछ हस्तगत हो जाता है। पर उपासना करने वाले हममें से अनेकों की स्थिति ऐसी ही होती है कि कुछ दिन साधना करने के पश्चात् पूर्व जन्मों के और इस जन्म के पाप, कुसंस्कारों की अधिकता के कारण जब आध्यात्मिक प्रकाश नहीं पाते, अभीष्ट परिणाम नहीं देखते तो निराश हो उठते हैं। यदि धैर्यपूर्वक गायत्री उपासना को श्रद्धा विश्वासपूर्वक एक निष्ठ होकर अपनाते रहा जाय, तो गायत्री साधना के लाभों से सुनिश्चित रूप से लाभान्वित होते रहा जा सकता है, इसमें कोई संशय नहीं।
उपासना का, भजन-पूजन का भी यही उद्देश्य है कि सद्गुणों में दैवी सम्पदा में अभिवृद्धि हो, सत्कर्मरत् रहा जाय और अन्ततोगत्वा शुद्र अहं का विराट सत्ता में विलीन होकर सबकुछ उसका हो जाय। जड़ चेतन में समायी परमसत्ता ही मार्गदर्शिका बन जाय। अहं विसर्जन की फलश्रुति भी यही है।
उपासना करने में संलग्न थे। लगातार तेरह वर्ष उन्हें विधिपूर्वक पुरश्चरण करते हुए बीत गये, पर कोई विशेषता उन्हें अपने में दिखाई न पड़ी। तप का कोई फल दृष्टिगोचर न हुआ तो वे खिन्न रहने लगे और अपनी असफलता से खीझकर वे वृन्दावन छोड़ काशी जा पहुँचे।
उपासना उसी की सफाई में खर्च होती रहती है। तुम्हारी विगत साधना ने पूर्व संचित पापों का समाधान किया है और अब नये सिरे से पुनः उसी पुरश्चरण साधना को आरंभ करने से सफलता मिलेगी। समाधान पाकर प्रसन्न मन श्रीमाध्वाचार्य पुनः वृन्दावन लौट आये और गायत्री उपासना आरंभ की। फलस्वरूप उन्हें आशाजनक प्रतिफल प्राप्त हुआ। भगवती का साक्षात्कार हुआ और वे कृतकृत्य हुए।
उपासना है। भव्य नगरों के खण्डहर मेरा यशगान करते हैं। मैं महेश्वर के श्रीअंग में जनपदों को श्मशान करके उनकी विभूति अर्पित करने की महती कामना हृदय में सेवित करता हूँ। वीणा की पिन-पिन और छुई-मुई लड़कियों की चें, चें, पें, पें मेरा मनोरंजन करेंगी? मेरा मनोरंजन?
उपासना करने जा रहा हूँ ।”
उपासना का ऐसा ही महत्व है तो कृपया बताइये कि तेरह वर्ष तक कठोर तप करते रहने पर भी मुझे कोई अनुकूल अनुभव क्यों नहीं हुआ। आप इसका रहस्य बता सकें तो मेरे लिए इतना ही पर्याप्त होगा।
उपासना से कम महत्व की साधना नहीं है। साधना-उपासना से जो प्रगति मनुष्य के व्यक्तित्व में होनी चाहिए वह सच्चे लोकसेवी में भी विकसित होती देखी जा सकती है। उसका भी अहंकार नष्ट होकर भावनाएँ उदात्त हो जाती हैं। उसकी अपनी कोई आकांक्षा नहीं होती। वह मात्र विश्वमानव के कल्याण की बातें सोचता और ईर्ष्या, द्वेष, ऊँच-नीच के भेदभाव से रहित जीवन जीता है।
उपासना कभी निष्फल नहीं जाती। सर्वप्रथम मैं साधक को पूर्वकृत पापों से छुटकारा दिलाती हूँ। जब तक पूर्व जन्मों के एवं इस जन्म के सब पाप नष्ट नहीं हो जाते तब तक उपासक के वे दिव्य नेत्र नहीं खुलते जिनसे मेरा दर्शन होता है। तुम्हारे पुरश्चरणों से पूर्व जन्मों के चौबीस महापातक नष्ट हुए हैं और अब तुम इस योग्य हुए हो कि मेरा दर्शन प्राप्त कर सको। मेरे अनुग्रह की बरसात तो तभी आरंभ हो गयी थी जब तुम मेरी ओर उन्मुख हुए थे, पर वात्सल्य का उभार अब आया जब तुम सच्ची भक्ति में प्रवृत्त हुए हो।
उपासना के सत्परिणाम सुनिश्चित दिखाई देते हैं।
उपासना से तुम में इतना ब्रह्मतेज उत्पन्न हो गया है कि उसकी प्रखरता मैं सहन नहीं कर सकता अतः सामने भी नहीं आ सकता। जो कहूँगा पीछे से ही कहूँगा। इस पर श्रीमाध्वाचार्य को भारी आश्चर्य हुआ और उनने प्रश्न किया कि-यदि गायत्री उपासना का ऐसा ही महत्व है तो कृपया बताइये कि तेरह वर्ष तक कठोर तप करते रहने पर भी मुझे कोई अनुकूल अनुभव क्यों नहीं हुआ। आप इसका रहस्य बता सकें तो मेरे लिए इतना ही पर्याप्त होगा।
उपासना निष्फल नहीं जाती। वह साधारण से साधारण और असाधारण से असाधारण समस्याओं को सुलझाने से लेकर सुख-सम्पदा ऋद्धि एवं स्वर्ग-मुक्ति तक के चमत्कारी सत्परिणाम उत्पन्न करती रही है।
उपासना आरंभ की। फलस्वरूप उन्हें आशाजनक प्रतिफल प्राप्त हुआ। भगवती का साक्षात्कार हुआ और वे कृतकृत्य हुए।
उपासना से जो प्रगति मनुष्य के व्यक्तित्व में होनी चाहिए वह सच्चे लोकसेवी में भी विकसित होती देखी जा सकती है। उसका भी अहंकार नष्ट होकर भावनाएँ उदात्त हो जाती हैं। उसकी अपनी कोई आकांक्षा नहीं होती। वह मात्र विश्वमानव के कल्याण की बातें सोचता और ईर्ष्या, द्वेष, ऊँच-नीच के भेदभाव से रहित जीवन जीता है। धीरे-धीरे वह प्राणि मात्र की सेवा के लिए अपने को समर्पित करता जाता है।
उपासना करने वाले हममें से अनेकों की स्थिति ऐसी ही होती है कि कुछ दिन साधना करने के पश्चात् पूर्व जन्मों के और इस जन्म के पाप, कुसंस्कारों की अधिकता के कारण जब आध्यात्मिक प्रकाश नहीं पाते, अभीष्ट परिणाम नहीं देखते तो निराश हो उठते हैं। यदि धैर्यपूर्वक गायत्री उपासना को श्रद्धा विश्वासपूर्वक एक निष्ठ होकर अपनाते रहा जाय, तो गायत्री साधना के लाभों से सुनिश्चित रूप से लाभान्वित होते रहा जा सकता है, इसमें कोई संशय नहीं।
उपासना का यह सर्वसुलभ मार्ग है । इसके अतिरिक्त भगवान के साथ आत्म संबंध को प्रगाढ़ बनाने के लिए नित्य प्रति स्मरण भी करना चाहिए । प्रातः स्मरण के अपने-अपने अनेक ढंग के अनेक विधि-विधान एवं क्रियाकलाप हैं । जिनका आशय अपनी प्रकृति के अनुरूप भिन्न-भिन्न रूपों में लिया जा सकते हैं ।
उपासना को श्रद्धा विश्वासपूर्वक एक निष्ठ होकर अपनाते रहा जाय, तो गायत्री साधना के लाभों से सुनिश्चित रूप से लाभान्वित होते रहा जा सकता है, इसमें कोई संशय नहीं।
उपासना विशेषांक (पृष्ठ 30-32) तथा गायत्री साहित्य के साथ भेजी जाने वाली विवरणिका में है । इसके पश्चात् कमर सीधी रख पालती मारकर, अधखुले नेत्रों व घुटने पर दोनों हाथ इस प्राणमुद्रा में बैठकर प्रातः के उदीयमान सूर्य का ध्यान करते हुए तीन लोम विलोम सूर्य भेदन प्राणायाम संपन्न किये जाएँ । बायें नासिका के छिद्र को बन्द कर दाहिने नासिका के छिद्र में अवस्थित पिंगला नाड़ी के प्रवाह से सूर्य की किरणों के प्रकाश व ऊष्मा के साथ दिव्य प्रवाह के अंदर प्रवेश करने की प्रक्रिया साँस खींचने के साथ संपन्न की जाय । नासिका के दोनों छिद्र बंद कर यह भावना की जाय कि सूर्यचक्र जो चिरकाल से प्रसुप्त था, इस आगत प्रकाशवान प्राणवायु से जाग रहा है व रोम रोम में, कण-कण में ऊर्जा का संचार हो रहा है । अब दाहिनी नासिका के छिद्र को बंद कर साँस को धीरे-धीरे बाएँ नथुने से बाहर निकाला जाय व ध्यान किया जाय कि अंतः के कल्मष जो सूर्यचक्र को नाभिचक्र को मूलाधार को धुँधला बनाए हुए थे , थोड़ी साँस के साथ इड़ा नाड़ी के प्रवाह के साथ बहार निकल रहे हैं ।
उपासना है । उठो ! चीन-हिंद से पश्चिमोत्तर प्रदेश तक का तुम्हारा समस्त प्रदेश तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है । तुम शक्तिशाली हो महान हो, विश्व को महेश्वर का यह पावन सन्देश दो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-September
उपासना के उस स्तर पर पहुँचने की कोशिश कीजिए जहाँ कि आपके भीतर से, व्यक्तित्व में से श्रेष्ठता का विकास होता है। भक्ति यही है। अगर आपके भीतर से श्रेष्ठता का विकास हुआ हो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपको जनता का वरदान मिलेगा, आपको अपनी आत्मा का वरदान मिलेगा-भगवान का वरदान मिलेगा। चारों ओर से इतने वरदान मिलेंगे कि जिसको पा करके आप निहाल हो जायेंगे। भक्ति का यही इतिहास है-भक्त का यही इतिहास है ।
उपासना से होता है। अन्तः चेतना जब विराट ब्रह्माण्ड से तादात्म्य करती है तो उसे सर्व शक्तिमान नियन्ता के दर्शन होते हैं। यहीं से आत्मानुशासन पैदा होता है। अपने आस-पास के वातावरण में भी श्रद्धा उपजती है। अतएव घरों में उपासना का वातावरण बनाया जाना युग-परिवर्तन की पहली आवश्यकता उसके लिए 2400 करोड़ मंत्र जप का एक ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान भी इस अश्वमेध से जुड़ा हुआ रहेगा।
उपासना करते हैं, भजन करते हैं कि देवता हमको कुछ देकर जायेंगे। क्या यह बात सही है या गलत है, आइये इस पर विचार करें।
उपासना करते हैं, अनुष्ठान करते हैं, अगर कभी कुछ देंगी तो गुणों की विशेषता देंगी। गुणों से क्या हो जायेगा ? गुणों से ही तो होता है सब कुछ। भौतिक अथवा आध्यात्मिक जहाँ कहीं भी आदमी को उन्नति मिली है, केवल गुणों के आधार पर मिली है। श्रेष्ठ गुण न हों तो न भौतिक उन्नति मिलने वाली है न आध्यात्मिक उन्नति मिलने वाली है।
उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिए की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप से महत्व मिला है। इसी कारण 24 सहस्र की संकल्पित साधना को नवरात्रि में विशिष्ट महत्ता प्राप्त है। इसमें प्रतिदिन 27 माला जप करने से नौ दिनों में पूरी हो जाती है। अनुष्ठान काल में नियत जप संख्या तो पूरी करनी पड़ती है साथ ही कुछ विशेष तपश्चर्यायें भी इन दिनों करनी पड़ती हैं। ब्रह्मचर्य व्रत-पालन, भोजन में उपवास तत्व का समावेश, तपस्वी जैसी मनःस्थिति जिसमें अपनी शरीर सेवा दूसरों से कम से कम करायी जाय, भूशयन, कम वस्त्र, नशे का, चमड़े का परित्याग जैसी तितिक्षायें और अन्त में अनुष्ठान की पूर्णाहुति ये-अनुष्ठान की सामान्य मर्यादायें हैं।
उपासना से लेकर नैष्ठिक अनुष्ठान साधना, गायत्री की उच्चस्तरीय पंचकोशी साधना कुण्डलिनी व षट्चक्र जागरण तथा प्राण प्रत्यावर्तन से लेकर चाँद्रायण कल्प साधनाएँ भी संपन्न करालीं। क्या यह एक असाधारण व असंभव मानी जाने वाली उपलब्धि नहीं है?
उपासना इसीलिए की जाती है कि वह हमारे इन्द्रिय चेतना में समाहित दुर्गुणों को नष्ट करती है। मनुष्य की पापमयी वृत्तियाँ ही महिषासुर हैं। नवरात्रियों में उन्हीं प्रवृत्तियों पर मानसिक संकल्प द्वारा अंकुश लगाया और संयम द्वारा दमन किया जाता है। संयमशील आत्मा को ही दुर्गा, महाकाली, गायत्री कहा गया है। प्राणचेतना के परिष्कृत होने पर यही शक्ति महिषासुर-मर्दिनी बन जाती है।
उपासना का वातावरण बनाया जाना युग-परिवर्तन की पहली आवश्यकता उसके लिए 2400 करोड़ मंत्र जप का एक ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान भी इस अश्वमेध से जुड़ा हुआ रहेगा। लोग उसमें भावनापूर्वक भाग लें।
उपासना की सर्वाधिक प्रचलित प्रक्रिया थी। जिसका अनुष्ठान शासक श्रोत्रिय (मनीषी) एवं जन समूह सभी मिलजुलकर करते थे। इसी के द्वारा न केवल राजनीतिक क्षितिज पर बल्कि आर्थिक बौद्धिक और सामाजिक दायरों में विकास के मापदण्ड स्थापित किए गए।
उपासना से भी जोड़कर रखा गया है। सर्वत्र दुर्गा की-महाकाली की पूजा होती है। दुर्गा कहते हैं-दोष दुर्गुणों’-कषाय-कल्मषों को नष्ट करने वाली महाशक्ति को। नौ रूपों में माँ दुर्गा की उपासना इसीलिए की जाती है कि वह हमारे इन्द्रिय चेतना में समाहित दुर्गुणों को नष्ट करती है। मनुष्य की पापमयी वृत्तियाँ ही महिषासुर हैं।
उपासना की इस पद्धति को अपना कर अपनी संगठन सामर्थ्य और चरित्रबल की वृद्धि करें। अश्वमेध आयोजनों की वर्तमान शृंखला पर विचार करके यही कहा जा सकता है कि मनीषी ब्लूमफील्ड की आकाँक्षा पूर्ति का समय आ गया । राष्ट्रीय और मानवीय भावनाओं को विकसित करने वाली यह योजना न केवल भारत वरन् समूचे विश्व को नया रंग, वातावरण , एक उच्चतर भावना, एक बड़ा उद्देश्य प्रदान करेगी। इसके परिणाम में यदि’राष्ट्र’ शब्द विश्व राष्ट्र का व्यापक बोध कराने लगे तो किसी को आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए।
उपासना।” इन नवरात्रियों में सर्वसाधारण से लेकर योगी, यती, तपस्वी सभी अपने-अपने स्तर की संयम साधना एवं संकल्पित अनुष्ठान करते हैं। इस अवधि की प्रत्येक अहोरात्रि महत्वपूर्ण मानी जाती है और उन प्रत्येक क्षणों को साधक अपनी चेतना को परिष्कृत-परिशोधित करने-उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ने में लगता है।
उपासना के लिये महत्वपूर्ण माना गया है। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के परिवर्तन के दो दिन पूर्णिमा एवं अमावस्या के नाम से जाने जाते हैं तथा अधिकाँश महत्वपूर्ण पर्व जैसे दीपावली, होली, गुरुपूर्णिमा, श्रावणी, शरदपूर्णिमा आदि प्रधान पर्व इसी संधिवेला में मनाये जाते हैं। इसी प्रकार ऋतुओं का भी संधिकाल होता है। शीत और ग्रीष्म ऋतुओं के मिलन का यह संधिकाल वर्ष में दो बार आया करता है। चैत्र में मौसम ठण्डक से बदलकर गर्मी का रूप ले लेता है और आश्विन में गर्मी से ठण्डक का।
उपासना की और भगवान का सच्चा वरदान पाया।
उपासना-क्रम यदि जिन्दा रहेगा तो एक ही चीज मिलेगी और वह है-देवत्व के गुण। देवत्व के गुण अगर आ जायँ तब आप जितनी सफलतायें चाहते हैं, उससे हजारों-लाखों गुनी सफलतायें आपके पास आ जायेंगी।
उपासना क्रम का निर्धारण कुछ ऐसा है जिसका पालन कर सकना सभी के लिए सुलभ है। इस अवधि में 24 हजार का लघु गायत्री अनुष्ठान भी सम्पन्न हो जाता है। इसमें वाममार्गी साधनाओं जैसे मंत्रोपचार के किन्हीं भी पेचीदे विधि-विधानों का झंझट भी नहीं रहता। पुरश्चरण कड़े होते हैं और उन्हीं के लिए उपयुक्त पड़ते हैं जो पूरा समय-पूरा मनोयोग उसी कार्य में नियोजित रखे रह सकते हों व कड़ी तपश्चर्या का पालन कर सकते हों। इसी तरह वाममार्गी ताँत्रिक विधान-प्रयोग भी कठिन है।
उपासना की संज्ञा दी बल्कि अपने ग्रन्थ “आइडियाज एण्ड इंस्ट्टूयशन्स् इन वैदिक इण्डिया” में यह भी कहा-क्या ही सुखद हो यदि विश्व के सभी राष्ट्र, राष्ट्र उपासना की इस पद्धति को अपना कर अपनी संगठन सामर्थ्य और चरित्रबल की वृद्धि करें। अश्वमेध आयोजनों की वर्तमान शृंखला पर विचार करके यही कहा जा सकता है कि मनीषी ब्लूमफील्ड की आकाँक्षा पूर्ति का समय आ गया । राष्ट्रीय और मानवीय भावनाओं को विकसित करने वाली यह योजना न केवल भारत वरन् समूचे विश्व को नया रंग, वातावरण , एक उच्चतर भावना, एक बड़ा उद्देश्य प्रदान करेगी। इसके परिणाम में यदि’राष्ट्र’ शब्द विश्व राष्ट्र का व्यापक बोध कराने लगे तो किसी को आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए।
उपासना-श्रद्धा सुसंस्कारिता की जननी है। उसका विकास उपासना से होता है। अन्तः चेतना जब विराट ब्रह्माण्ड से तादात्म्य करती है तो उसे सर्व शक्तिमान नियन्ता के दर्शन होते हैं। यहीं से आत्मानुशासन पैदा होता है। अपने आस-पास के वातावरण में भी श्रद्धा उपजती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-May
उपासना होती थी। पुरातत्त्ववेत्ताओं ने अनेक ऐसे साक्ष्य प्रस्तुत किये, जिसने उक्त कथन पर सच्चाई की मुहर लगा दी। इन्हीं में से एक अमेरिका के ग्रीनलैण्ड स्थित वह प्रदेश है, जहाँ कुछ वर्ष पूर्व खुदाई के दौरान सूर्य-प्रतिमा के समक्ष, उसकी फूल-फलों व सुगंधित द्रव्यों से उपासना करते हुए एक उपासक बैठा मिला था। यह सब पत्थरों पर खुदा हुआ था इसके अतिरिक्त संगोष्ठी में कितनी ही ऐसी साक्षियाँ सामने रखी गयीं, जो यह सिद्ध करती थीं कि ईसवी संवत् से छः हजार वर्ष पूर्व से 140 ईसवी तक समस्त संसार में सूर्योपासना होती थी। पर्सियन चर्चों के “मित्रा” ग्रीकों के “हेलियस,” रेड इंडियनों के “एतना” प्राचीन जापानियों के इज्ना-गी मिश्रियों के “रा” तातारियों के “फ्लोरस” पेरु के “फुलेस” चीनियों के “उ.ची.” अफ्रीकियों के “विले” नव सेण्टो ईजमके “एमिनो” “मिनाक” “नाची” आदि देवता प्रकारान्तर से सूर्य के रूप में ही पूजित-उपासित थे।
उपासना होती हो। इस प्रकार अपने देश का नाम भारत पड़ने का एक यह भी हेतु हो सकता है।
उपासना तो है ही, इसके युग्म यज्ञ द्वारा उसी क्रिया को परोक्ष रूप से सम्पन्न कर हम सविता देव की कृपा दृष्टि के भाजन बनते हैं, किन्तु प्रत्यक्षतः तो वह पर्यावरण परिशोधन का ही प्रमुख उपचार है। इस प्रकार प्राचीनकाल की दोनों क्रियाएँ वातावरण परिशोधन एवं सविता-अभिवन्दन साथ-साथ सम्पन्न होने से एक बार पुनः हम उस खोयी गौरव-गरिमा की पुनः प्राप्ति और विश्व को मार्गदर्शन करने की दिशा में दिव्य वरदान की तरह उभरते और तेजी से अग्रसर होते हुए बढ़ते चले जा रहे हैं। अस्तु अगले दिनों यदि इनके द्वारा भारत विश्व का मुकुटमणि बन जाय तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए, वरन् यही माना जाना चाहिए कि यह सब उस विस्मृत सविता-देवता की प्रसन्नता का सुखद सत्परिणाम है।
उपासना के क्षेत्र में तो कोई व्यक्ति अपनी गतिविधियाँ चलाता और आत्मिक प्रगति करता रह सकता था, पर भौतिक क्षेत्र में वैसी प्रगति कैसे संभव हो सकती थी जैसी कि रावण ने की। उन दिनों ऐसे उदाहरण भी जहाँ-तहाँ सुदूर क्षेत्रों में ही देखने को मिलते थे, जिनसे प्रेरणा और प्रकाश ग्रहण करके कोई अपने लिए विशेष मार्ग निर्धारित करता।
उपासना करने वाला। इसका दूसरा अर्थ हुआ वह देश जहाँ सविता की उपासना होती हो। इस प्रकार अपने देश का नाम भारत पड़ने का एक यह भी हेतु हो सकता है।
उपासना में भजन-पूजन के संदर्भ में किये जाने वाले जप, ध्यान, प्राणायाम, हवन, कीर्तन आदि क्रिया-कृत्यों को करते हैं । साधना जीवनयापन की चिन्तन एवं कर्मपरक पद्धति है। उपासना उच्चस्तरीय कक्ष का योगाभ्यास कहलाती है और साधना अपने परिष्कृत स्वरूप में तपश्चर्या कहलाती है दोनों के समन्वय से ही जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने का, पूर्णता तक पहुँचने का लक्ष्य पूरा होता है, यही ईश्वर प्राप्ति है।
उपासना में गायत्री मंत्र का अवलम्बन सर्वश्रेष्ठ है। इस महामंत्र में सन्निहित 24 अक्षरों में उन सभी शिक्षाओं, प्रेरणाओं एवं सिद्धान्तों का समावेश है, जिनको अपनाकर व्यक्तिगत सुख-शांति और समाजगत प्रगति समृद्धि के द्वार खुल सकते हैं। इन अक्षरों का गुन्थन ऐसी विशेषताओं के साथ हुआ है कि उनके जप पाठ से व्यक्ति के अंतराल की प्रसुप्त विशेषताएँ जाग्रत होती हैं। उनके सामान्य जप-ध्यान और असामान्य अनुष्ठान पुरश्चरण प्रक्रिया से ऐसा आत्मबल जाग्रत होता है, जिसके द्वारा आत्मिक विभूतियों और सांसारिक सफलताओं को प्रचुर परिमाण में उपलब्ध कर सकना सम्भव होता है। उपासना का विधान अन्यत्र बताया गया है।
उपासना तक के सभी प्रतिपादनों में घोर मतभेद है। प्रथा परम्पराओं के सम्बन्ध में कोई ताल-मेल नहीं। ऐसी दशा में किसको सही माना जाय, यह निर्णय नहीं हो सकता।
उपासना, साधना में भावनाओं का महत्व प्रतिपादित करने, उन्हें विकसित करने पर जोर देने के पीछे यही मनोवैज्ञानिक आधार है कि परमात्मा द्वारा दिये गये भावसूत्रों में ही मनुष्य को बाँधा जा सकता है। भावसंवेदनाओं से भरपूर व्यक्ति असंख्यों को अपना बना लेते और सहयोग करने के लिए विवश कर देते हैं। वस्तुतः यह भावनाओं का ही खेल है। मनुष्य को एकता के सूत्र में बाँधने के अन्य प्रयत्नों की सफलता तब तक संदिग्ध ही बनी रहेगी जब तक कि भव संवेदनाओं की सहृदयता को विकसित करने की उपेक्षा होती रहेगी। मनुष्य जीवन का सौभाग्य और आनन्द सहृदयता-आत्मीयता के सहारे ही उपलब्ध होता है।
उपासना सूत्र जुड़ा रह सकता है।
उपासना किसी के सामने गिड़गिड़ाना या वैभव सम्पत्ति का उपहार-अनुदान सहज ही प्राप्त करने का ताना-बाना नहीं है। देवता न चापलूसी से प्रसन्न होते हैं और न रिश्वत लेने में उन्हें कोई रुचि है। उनका अनुग्रह बादलों की तरह अनवरत बरसता है जिसके पास जितना पात्र है उसे उतना अनुदान मिलता है। आत्म परिष्कार ही साधना का उद्देश्य है। इस प्रयास में जिसे जितनी सफलता मिलती है, वह उतना ही बड़ा संत होता है।
उपासना करते हुए एक उपासक बैठा मिला था। यह सब पत्थरों पर खुदा हुआ था इसके अतिरिक्त संगोष्ठी में कितनी ही ऐसी साक्षियाँ सामने रखी गयीं, जो यह सिद्ध करती थीं कि ईसवी संवत् से छः हजार वर्ष पूर्व से 140 ईसवी तक समस्त संसार में सूर्योपासना होती थी। पर्सियन चर्चों के “मित्रा” ग्रीकों के “हेलियस,” रेड इंडियनों के “एतना” प्राचीन जापानियों के इज्ना-गी मिश्रियों के “रा” तातारियों के “फ्लोरस” पेरु के “फुलेस” चीनियों के “उ.ची.” अफ्रीकियों के “विले” नव सेण्टो ईजमके “एमिनो” “मिनाक” “नाची” आदि देवता प्रकारान्तर से सूर्य के रूप में ही पूजित-उपासित थे। भारत में मथुरा, मुल्तान, कश्मीर, कोणार्क, उज्जयिनी, गया, आदि स्थान सूर्योपासना के मुख्य केन्द्र थे, जिनमें से कुछ जगहों पर अब भी इनके भग्न पूजागृह विद्यमान देखे जा सकते हैं।
उपासना स्थल पर पूजित प्रतिष्ठित करने का आश्वासन देगा ताकि वह सेवा साधना के निमित्त ली गयी इस शपथ को पूरा करने की प्रेरणा व शक्ति देती रहे।
उपासना उच्चस्तरीय कक्ष का योगाभ्यास कहलाती है और साधना अपने परिष्कृत स्वरूप में तपश्चर्या कहलाती है दोनों के समन्वय से ही जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने का, पूर्णता तक पहुँचने का लक्ष्य पूरा होता है, यही ईश्वर प्राप्ति है।
उपासना अंतरंग को परिष्कृत करने के लिये और साधना बहिरंग को सुव्यवस्थित कर बनाने के लिये है। लक्ष्य तक पहुँचने की यात्रा इन्हीं दो कदमों को अनवरत क्रम से उठाते रहने पर सम्पन्न होती है। उपासना का प्रतिफल है सुसंस्कारिता। साधना का प्रयोजन है-शालीनता इन्हीं दोनों को संस्कृति और सभ्यता कहते हैं। जीवन सम्पदा का स्तर उठाने और उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करने से ही मनुष्य व्यक्तित्ववान बनता है।
उपासनागृहों की संख्या व उनमें जाने वालों की तादाद बढ़ते चले जाने के बावजूद नास्तिकता क्यों तेजी से बढ़ रही है? क्यों व्यक्ति परमसत्ता के अनुशासन की उपेक्षा कर कर्मकाण्डों के आडम्बरों में उलझा निजी जीवन में अनैतिक आचरण करता देखा जाता है? क्यों वह यह समझ नहीं पता कि मात्र बाह्योपचार करते चलने से न उसकी आत्मिक प्रगति ही सध पाएगी न उसकी भौतिक महत्वाकांक्षाएँ ही पूरी होगी? संभवतः इसके मूल में नासमझी हो, गहराई तक घुसा अज्ञान हो, विचार संस्थान में संव्याप्त भ्रान्तियाँ हो, जिन से वह उबरना न चाहता हो।
उपासना का प्रतिफल है सुसंस्कारिता। साधना का प्रयोजन है-शालीनता इन्हीं दोनों को संस्कृति और सभ्यता कहते हैं। जीवन सम्पदा का स्तर उठाने और उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करने से ही मनुष्य व्यक्तित्ववान बनता है। इसी विकास क्रम पर चलते हुये मनुष्य सामान्य आत्मा से अगली सीढ़ियाँ प्राप्त करता है। महामानव, ऋषि, देवदूत एवं अवतार बनने का सौभाग्य इसी मार्ग की मंजिल है।
उपासना दूसरा साधना। उपासना में भजन-पूजन के संदर्भ में किये जाने वाले जप, ध्यान, प्राणायाम, हवन, कीर्तन आदि क्रिया-कृत्यों को करते हैं । साधना जीवनयापन की चिन्तन एवं कर्मपरक पद्धति है। उपासना उच्चस्तरीय कक्ष का योगाभ्यास कहलाती है और साधना अपने परिष्कृत स्वरूप में तपश्चर्या कहलाती है दोनों के समन्वय से ही जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने का, पूर्णता तक पहुँचने का लक्ष्य पूरा होता है, यही ईश्वर प्राप्ति है।
उपासना और साधना के दोनों ही प्रयोग मिलकर इसी एक उद्देश्य की पूर्ति करते हैं। ब्रह्मविद्या का तत्त्वदर्शन और धर्मानुष्ठानों का साधना प्रकरण इसी एक उद्देश्य की पूर्ति के लिये मनीषियों द्वारा सृजा गया है।
उपासना द्वारा उसके उन्हीं सूक्ष्म किरणों को आकर्षित-अवशोषित करने का प्रयास किया जाता है जिसने हमें कभी धन धान्यों से परिपूर्ण और नैतिकता के उच्वच मानदण्डों से ओत-प्रोत बनाया था, जिसके कारण हम कभी विश्व का आध्यात्मिक मार्गदर्शन करने में सक्षम हुए थे। गायत्री प्रत्यक्षतः सूर्य की उपासना तो है ही, इसके युग्म यज्ञ द्वारा उसी क्रिया को परोक्ष रूप से सम्पन्न कर हम सविता देव की कृपा दृष्टि के भाजन बनते हैं, किन्तु प्रत्यक्षतः तो वह पर्यावरण परिशोधन का ही प्रमुख उपचार है। इस प्रकार प्राचीनकाल की दोनों क्रियाएँ वातावरण परिशोधन एवं सविता-अभिवन्दन साथ-साथ सम्पन्न होने से एक बार पुनः हम उस खोयी गौरव-गरिमा की पुनः प्राप्ति और विश्व को मार्गदर्शन करने की दिशा में दिव्य वरदान की तरह उभरते और तेजी से अग्रसर होते हुए बढ़ते चले जा रहे हैं। अस्तु अगले दिनों यदि इनके द्वारा भारत विश्व का मुकुटमणि बन जाय तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए, वरन् यही माना जाना चाहिए कि यह सब उस विस्मृत सविता-देवता की प्रसन्नता का सुखद सत्परिणाम है।
उपासना का विधान अन्यत्र बताया गया है। उतना न बन पड़े तो रास्ता चलने या बिस्तर पर पड़े हुये मौन मानसिक जप एवं ध्यान हो सकता है। न्यूनतम बीस मंत्र जप लेने से भी आद्य शक्ति गायत्री के साथ उपासना सूत्र जुड़ा रह सकता है।
उपासना सिद्धि के संबंध में छाई तमाम भ्रान्तियों का निवारण उसे विज्ञानसम्मत बना कर किया जाय । विज्ञानसम्मत से अर्थ है तर्क, तथ्य, प्रमाण लॉजिक की कसौटी पर कसते हुए । आज समाज में छाई अनास्था स्वयं को नास्तिक कहने वालों की वजह से नहीं है अपितु उन आस्तिकों की वजह से है जो स्वयं का वैसा कहते हैं, बाहर वैसा ही आडम्बर रचते हैं पर उनके जीवन में वह कहीं भी लेशमात्र भी नजर नहीं आता । प्रगतिशील अध्यात्म की जितनी आवश्यकता आज है, उतनी पहले कभी नहीं रही।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-June
उपासना का अपभ्रंश स्वरूप भी इन्हीं भारतीय साधु की देन है।
उपासना करता है, वह भगवान के रूप को प्राप्त करता है ।
उपासना द्वारा करते हैं-श्रेष्ठता का अपने अंदर अभिवर्धन करते हुए अपनी अपूर्णता को पूर्णता में बदलना। हमें यह सीखना ही होगा कि मात्र हिन्दू धर्म में ही नहीं सभी धर्मों में चाहे वह बौद्ध, मुस्लिम, पारसी, ताओ, ईसाई, शिण्टो, जैन कुछ भी क्यों न हो, सबका ईश्वर एक ही है। मत संप्रदाय बदलने से ईश्वर नहीं बदल जाते। जो इनमें से किसी के भी धर्म या ईश्वर की निन्दा करता है या हँसी उड़ाता है, वह वस्तुतः अपने ही ईश्वर का उपहास उड़ाकर पाप का भागीदार बनता है।
उपासना कर्म किए जाते हैं (किन्हीं कामनाओं की पूर्ति के लिए) वे काम्य कर्म कहलाते हैं। काम्य कर्मों को न करने पर पाप नहीं लगता। करने पर पुण्य की प्राप्ति होती है, ऐसा शास्त्र कहते हैं
उपासना, साधना, आराधना की भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग की साधना, आराधना की भक्तियोग, ज्ञानयोग कर्मयोग की साधना की चर्चा परम पूज्य गुरुदेव ने की है जो गीता में बताए योगशास्त्र का व्यावहारिक प्रतिपादन है। अपनी क्रान्तिकारी लेखनी द्वारा वे हमें बताते हैं कि “तस्मात् योगी भावार्जुन” के द्वारा श्रीकृष्ण ने आसन, प्राणायाम, नेति, धौति वाला योगी बनने को नहीं कहा वरन् अर्जुन को जीवन में उतरने वाला व्यावहारिक योग समझाया है। जीवन आदर्शों के साथ जुड़ जाय यही योग है। योगी वे होते हैं जो स्वयं तो बंधनों से मुक्त होते ही हैं, औरों को भी वह पथ दिखाते हैं।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-November
उपासनाओं में प्रयोग किए जाने वाले यंत्र-कागज अथवा धातु पत्र पर खिंची आड़ी तिरछी रेखाएँ भर नहीं है। इनकी देवशक्तियों की प्रतिकृति मानकर-तद्नुरूप शक्तियों का आकर्षित किया जाता है। उसी प्रकार कुण्ड निर्माण का आधार सौंदर्य को उत्कीर्ण करना भर नहीं हैं। इनकी विभिन्न आकृतियों के उद्देश्य अनेकानेक शक्तिधाराओं का आकर्षण समझा जाना चाहिए। इसी कारण से शास्त्रकारों ने इन्हें शिल्पियों द्वारा ठीक-ठाक तैयार करवाने का निर्देश दिया है।
उपासना के माध्यम से श्रद्धा का बीजारोपण है। अपेक्षा यह की जायेगी कि प्रत्येक गृहस्थ अपने घर में किसी पवित्र स्थान को उपासना स्थल बनावें वही सद्ज्ञान सद्विवेक की अधिष्ठात्री भगवती गायत्री का चित्र स्थापित करें। गायत्री उपासना व्यक्तिगत या सभी पारिवारिक जन सामूहिक रूप से करें। मंत्र जप करने की स्थिति न हो तो चालीसा का पाठ किया जा सकता है वह भी न बन पड़े तो हर सद्गृहस्थ स्नान के बाद उस स्थान पर अगरबत्ती लगाकर गायत्री माता का नमन वंदन भर कर लिया करें यह क्रिया प्रतिदिन घर के छोटे बच्चे देखेंगे तो उनमें श्रद्धा का बीजारोपण होगा। श्रद्धा सामाजिक सुव्यवस्था का मूलाधार है।
उपासना अंकों से प्रारम्भ हुआ था। तब प्रथम पृष्ठ पर छपने वाली गायत्री माता की छवि के नीचे एक पंक्ति छपा करती थी-”सन्देश स्वर्ग का नहीं धरा पर लाई, इस धरती को ही स्वर्ग बनाने आई।” तब शायद ही किसी का महाप्राण सत्ता की इस गर्वोक्ति पर विश्वास होता रहा हो, पर कालान्तर में महाकाल ने उस देव सत्ता को किस तरह घर-घर प्रतिष्ठित कर दिया यह सब के सामने है। गायत्री महाविज्ञान के तीन खण्डों के अब तक प्रायः तीस संस्करण छप चुके है ओर उनने इस दिव्य सत्ता के प्रति जन-जन को श्रद्धा से भर दिया है।
उपासना के दो चरण जप और ध्यान का अंग्रेजी अनुवाद “रिसाइटेशन एंड मेडीटेशन-दि टू स्टेजेज ऑफ वरशिप” तथा दि ग्रेट साइंस ऑफ गायत्री नामक पुस्तकें इस संबंध में सहायक और मार्गदर्शक सिद्ध हुई हैं उनकी भाग माँग को पूरा किया जा रहा है।
उपासना करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। अश्वमेध यज्ञ के लिए अनिवार्य देव संस्कृति दिग्विजय अभियान के क्रम में करोड़ों व्यक्ति दिव्यचेतना के अवतरण की पृष्ठभूमि बनाने के लिए गायत्री उपासना में संलग्न हो रहे हैं।
उपासना की वैदिक पद्धति के रूप में प्रचलित थी। इसे एक अनुष्ठान का रूप दिया गया था जिसे शासक श्रोत्रिय (मनीषी) और जन समूह सभी मिल-जुल कर सम्पन्न करते थे।
उपासना, कथा−कीर्तन सत्संग के प्रावधान नियत थे अपितु आरण्यक परम्परा की अन्तर्मुखी योग साधनाएँ भी कराई जाती थीं। इनका संचालन सिद्धों, समर्थों एवं विद्वान तत्वदर्शियों के हाथ हुआ करता था। “अश्वमेध” की एक परिभाषा−मानवीय बौद्धिक क्षमता को शक्तिशाली बनाए रखना भी होता है वह अध्यात्म से ही संभव है। सभी जानते हैं कि सूर, मीरा, नानकदेव, कबीर बहुत पढ़े नहीं थे। कबीर तो अनपढ़ थे पर उनके बोधात्मक साहित्य सृजन की व्याख्या करने में आज का योग्यतम बुद्धि कौशल भी समर्थ नहीं है।
उपासना के तत्व को जानने वालों ने गायत्री माता का ध्यान सदा उदय कालीन सूर्य मण्डल के मध्य में करने की सलाह दी है। शास्त्र वचनों के अनुसार-
उपासना पद्धतियों, विभिन्न भाषाओं एवं विभिन्न वेषभूषाओं के होते हुए भी भारत ‘एक राष्ट्र’ रहा है। हमारे ऋषियों ने संसार की प्रकृति प्रदत्त विविधताओं को बहुत सहज भाव से स्वीकार किया। किन्तु मनुष्य के अंतःकरण में स्थित परिष्कृत चेतना को लक्ष्य करके साँस्कृतिक एकता के भाव भरे सूत्रों को विकसित एवं प्रतिष्ठित करने में सफलता पायी।
उपासना में संलग्न हो रहे हैं।
उपासना स्थल बनावें वही सद्ज्ञान सद्विवेक की अधिष्ठात्री भगवती गायत्री का चित्र स्थापित करें। गायत्री उपासना व्यक्तिगत या सभी पारिवारिक जन सामूहिक रूप से करें। मंत्र जप करने की स्थिति न हो तो चालीसा का पाठ किया जा सकता है वह भी न बन पड़े तो हर सद्गृहस्थ स्नान के बाद उस स्थान पर अगरबत्ती लगाकर गायत्री माता का नमन वंदन भर कर लिया करें यह क्रिया प्रतिदिन घर के छोटे बच्चे देखेंगे तो उनमें श्रद्धा का बीजारोपण होगा। श्रद्धा सामाजिक सुव्यवस्था का मूलाधार है। व्यक्तित्व को दर्शन की गहराइयों तक ले जाने में भी श्रद्धा ही समर्थ है।
उपासना सविता साधना के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
उपासना की अनुकरणीय पद्धति कहा है। वेदों ने इसे महाक्रतु कहकर सराहा है। ऋग्वेद में इससे सम्बन्धित दो मंत्र है। शतपथ ब्राह्मण (13) में इसका विशद वर्णन प्राप्त होता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण (3,8,9) कात्यायनी श्रौतसूत्र (20) आपस्तम्ब (20) आश्वलायन (10,6) शाँखायन (16) तथा दूसरे सम्मान्य ग्रन्थों में इसका वर्णन मिलता है।
उपासना साधना करने वाले व्यक्ति लाखों की संख्या में तैयार हो रहे हैं।
उपासना में संलग्न है, इस अभियान से उनकी संख्या करोड़ों साधकों की एकनिष्ठ भावभरी साधना आसमान को हिला सकती है।
उपासना के साथ-साथ अपने सद्गुण सद् विचारों को अधिक सत्कर्मों में लगाने लगता है।
उपासना की व्यापक जानकारी और महत्व पर प्रकाश डालने वाली पुस्तकों के व्यापक प्रसार की व्यवस्था की जा रही है। हिंदी में प्रकाशित उपासना के दो चरण जप और ध्यान का अंग्रेजी अनुवाद “रिसाइटेशन एंड मेडीटेशन-दि टू स्टेजेज ऑफ वरशिप” तथा दि ग्रेट साइंस ऑफ गायत्री नामक पुस्तकें इस संबंध में सहायक और मार्गदर्शक सिद्ध हुई हैं उनकी भाग माँग को पूरा किया जा रहा है।
उपासना निमित्त स्वाध्याय एवं लोक मंगल आराधना के लिए अपने समय साधन प्रतिभा का एक अंश लगाते रहना−ऐसे नियम हैं जिन्हें रत्नों की खदान कहा जा सकता है। इन्हें अथवा सेवा−साधना के छोटे−छोटे लक्ष्य स्वीकार करने की नैष्ठिक घोषणा देव दक्षिणा के अंतर्गत आती है।
उपासना अनिवार्य है।
उपासना पूरे वर्ष भर तक चलती थी। उसके बाद तीन दिन तक अश्वमेध यज्ञ चलता था।
उपासना व्यक्तिगत या सभी पारिवारिक जन सामूहिक रूप से करें। मंत्र जप करने की स्थिति न हो तो चालीसा का पाठ किया जा सकता है वह भी न बन पड़े तो हर सद्गृहस्थ स्नान के बाद उस स्थान पर अगरबत्ती लगाकर गायत्री माता का नमन वंदन भर कर लिया करें यह क्रिया प्रतिदिन घर के छोटे बच्चे देखेंगे तो उनमें श्रद्धा का बीजारोपण होगा। श्रद्धा सामाजिक सुव्यवस्था का मूलाधार है। व्यक्तित्व को दर्शन की गहराइयों तक ले जाने में भी श्रद्धा ही समर्थ है। अतएव आयोजन का प्राण है।
उपासना की दृष्टि से भी सविता प्रधान है। रक्तबीज की तरह उसे जन-जन तक पहुँच कर उनके पापों को नष्ट करना है। अश्वमेध आयोजनों की समूची विधि व्यवस्था, संगठन, कर्मकाण्ड और विस्तार इस देवासुर संग्राम की परिधि में है। उसके प्रतिफल लोग प्रत्यक्ष आँखों से देख सकेंगे।
उपासनाएं और यज्ञादि प्रक्रियाएं सम्पन्न की जाये तो उनसे सूर्य देव की आध्यात्मिक शक्तियों को विशेष रूप से प्रभावित एवं आकर्षित किया जा सकता है उनसे न केवल अपने लिये वरन् समर्पण समाज राष्ट्र और विश्व के लिये सुख समृद्धि और शांति का अनुदान उपलब्ध किया जा सकता है।
उपासना और विशेष अनुष्ठानों प्रावधान किया गया है। इस निर्धारण को ध्यान में रखकर अधिकाधिक व्यक्तियों को यज्ञ के निमित्त गायत्री उपासना सविता साधना के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-August
उपासना की महान विद्या सामूहिक हितों, सामूहिक मन को सुसंस्कृत बनाने के लिए प्रयोग की जाती रही है। महर्षि दयानन्द ने आधुनिक समय में व्रात्य हो चुके समाज को आर्य बनाने के लिए इसका प्रयोग किया उनके प्रयास की परिधि भले छोटी रही हो पर उद्देश्य गगनचुम्बी था। कहने सुनने के लिए गायत्री की साधना बहुतों ने की होगी। पर उसके 24 अक्षरों में एक अक्षर नः का तत्वज्ञान कितनों सद्बुद्धि के अर्जन और उपार्जन की यह प्रक्रिया ‘मम्’ अर्थात् मेरे लिए न होकर नः अर्थात् हमारे (हम सब) के लिए है। उपदिष्ट साधना प्रक्रिया भी डालने के लिए सक्रिय हुई है।
उपासना के तत्वों को यदि विश्व के विभिन्न भू भागों में ढूंढ़ें तो विस्मय जनक हर्ष होता है कि समूचा विश्व, सूर्य उपासना के रूप में कभी एकजुट था। इसे देवसंस्कृति के प्रति एक निष्ठा ही कहेंगे। आकाश के देवता ‘एना’ और पृथ्वी के देवता ‘इया’ में निष्ठा रखने वाले बेवीलोनीयाँ निवासियों ने दिन का आरम्भ सूर्योदय से माना। मिश्र की नीलघाटी सभ्यता में सूर्य पूजा मुख्य थी। फैल्डियन लोगों की श्रद्धा भी सूर्य पर टिकी थी।
उपासना निष्फल कैसे हो गई? इतना समाधान करा देना ही आपका वरदान पर्याप्त होगा, जब आप गायत्री तेज के सम्मुख होने तक का साहस न कर सके तो आपसे अन्य वरदान क्या माँगू।
उपासना के साथ-साथ पंचदेव उपासना का प्रचलन किया। उनका आगमन व मात्र 32 वर्ष की आयु में कार्य कर सारी महत्वपूर्ण स्थापनाएँ कर जाना हमारी संस्कृति की एक ऐतिहासिक घटना है।
उपासना उपनिषदों में ब्रह्म विद्या दहरविद्या ( छा. उ. ) मधु विद्या उपकोशल विद्या, मन्थ विद्याएँ, पंचाग्नि विद्या के रूप में मिलती है। वेदों में ब्रह्म सूर्य समं ज्योतिः (यजुः 23/40) भवानों अर्वांग र्स्वणः ज्योतिः (ऋक् 4/10/3) कहकर इसे विराट पुरुष के रूप में अनुभव किया गया। ऋग्वेद में सूर्य की इस महिमा को सूचित करने वाले चौदह सूक्त हैं।
उपासना की पद्धतियों का क्षेत्र व्यापक और विस्तृत होने के साथ इनमें भ्रान्तियाँ भी पनपती गई। जो तत्व अलंकारिक विवरण में अपने किसी गुह्य उद्देश्य और रहस्य को छुपाए थे उनके शब्दशः अर्थ लिये जाने लगे। सर्वाधिक भ्रम पंच मकारों के संदर्भ में हुआ है मद्य, माँस, मौन, मुद्रा, मैथुन के रहस्य को न जानकर-इसके यथावत् उपयोग में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली गई । जबकि तन्त्र शास्त्रों के अनुसार-व्योमं पंकजानित्यत्वं-सुधापान रतो भवेत्। मद्यपानामिदं प्रोक्तामितरे मद्यपायिनः ॥ ब्रह्म रन्ध्र सहस्रदल से जो स्रवित होता है उसका पान करना ही मद्यपान है।
उपासना को इतनी तेजस्वी पाते हैं तो कृपा कर यह बता दें कि मेरी इतनी निष्ठा भरी उपासना निष्फल कैसे हो गई? इतना समाधान करा देना ही आपका वरदान पर्याप्त होगा, जब आप गायत्री तेज के सम्मुख होने तक का साहस न कर सके तो आपसे अन्य वरदान क्या माँगू।
उपासना में अग्निहोत्र को भी जुड़ा रहना चाहिए। होता भी यही है। अनुष्ठानों की पूर्णाहुति यज्ञ कृत्य के साथ ही सम्पन्न होती है। उन दिनों ज पके समय दीपक, धूपबत्ती जलाए रहते हैं। जहाँ श्रद्धा और सद्भावना है वहाँ अखण्ड अग्नि, अखण्ड धूनी; और अखण्ड दीपक की भी स्थापना रहती है।
उपासना की विधियाँ विकसित की थीं और उनके प्रचुर भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष उपलब्ध किया था। क्वांटम थ्योरी ने परिपूरक सिद्धान्त के रूप में यह स्वीकार किया है कि पदार्थ अपनी ठोस अवस्था से तरल, तरल से गैस, गैस से प्लाज्मा तथा इसी तरह के और भी उन्नत किस्म के प्रकाश-कणों में परिवर्तित हो जाता है उसी तरह उच्चस्तरीय चेतन कण क्रमशः एक स्थिति में पदार्थ के रूप में भी व्यक्त हो सकते हैं। इसी तरह का प्रतिपादन वैज्ञानिक हाइज़ेनबर्ग ने भी किया है। वे लिखते हैं कि अन्तरिक्ष में एक स्थान आता है जहाँ पदार्थ को छोड़ दिया जाये तो वह स्वतः ऊर्जा में परिणत हो जाता है जिस तरह पदार्थ सत्ता परिधि काल और रूप के ढाँचे में बंधी रहती है उसी तरह मनःसत्ता अनुभूति-स्मृति, विचार और बिंब के रूप में व्यक्त होती है इतना होने पर भी दोनों में अत्यधिक घनिष्ठता है। यह एक दूसरे को प्रभावित ही नहीं करते अपितु परस्पर आत्मसात भी होते रहते हैं।
उपासना का शुभारम्भ कर देता है। ईसाई रविवार प्रातः एकत्र होते हैं तथा चर्च में सामूहिक प्रार्थना करते हैं। मिलिट्री की ‘रिट्रीट’ जब भी होती है, जो व्यक्ति जहाँ होता है वहीं सावधान मुद्रा में खड़ा हो जाता है। ये सारे उदाहरण एक समय एवं सामूहिकता की शक्ति की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिये बताए जा रहे हैं। प्रज्ञा अभियान द्वारा प्रणीत युगसंधि महापुरश्चरण कई विशेषताएँ लिए हुए है।
उपासना को सर्व प्रचलित करने में लोक जीवन के भाव और विचारों के परिष्कार का रहस्य छुपा है। यों सूर्य उपासना के अन्य अनेक मंत्र हैं तरह-तरह की उपासना पद्धतियाँ हैं पर उनकी सीमा अधिदैवत तक सीमित है। व्यक्तिगत स्तर पर भले उनसे लाभान्वित हुआ जा सकें । सामूहिक मन में हो रहे प्रदूषण का निवारण संभव नहीं । यह सम्भावना सिर्फ गायत्री मंत्र के माध्यम से स्वीकार हो सकती है।
उपासना करें, गायत्री का ब्रह्मतेज धारण कर प्राणवान बनें, इसी में दूरदर्शिता है।
उपासना करता है, वह विद्वान-प्राणवान-दीर्घजीवी यशस्वी-सुसंपन्न-उदार और महामनस्वी बनता है। “ यह सभी महामत्य जो बताए गये हैं, अकारण नहीं हैं। वस्तुतः स्थूल काय किन्तु तेजरहित दुर्बल मनः स्थिति का व्यक्ति बलवान नहीं कहा जा सकता है, न दूसरों की। नीति वाक्य है- तेजोयस्य विराजते सबलवान, स्थूलेषु कः प्रत्ययः “ अर्थात्-जिनमें तेज है, वही बलवान है। स्थूल काया के पुष्ट होने से क्या प्रयोजन सधता है ?
उपासना में दीक्षित किया था। ध्यान रखने की बात यह है कि इसके प्रतिफल व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए न थे।
उपासना पद्धतियाँ हैं पर उनकी सीमा अधिदैवत तक सीमित है। व्यक्तिगत स्तर पर भले उनसे लाभान्वित हुआ जा सकें । सामूहिक मन में हो रहे प्रदूषण का निवारण संभव नहीं । यह सम्भावना सिर्फ गायत्री मंत्र के माध्यम से स्वीकार हो सकती है। सूर्य रहस्य का प्रकटीकरण सिर्फ इसी समर्थ विधि से सम्भव हैं।
उपासना को करें। संचित प्रारब्ध की निवृत्ति हो जाने से आपको अब के प्रयास में सफलता मिलेगी।
उपासना करो। प्राण ही जीवन है। इस लोक में अमरत्व की प्राप्ति का आधार प्राण ही है।” वस्तुतः प्राण ही प्रत्यक्ष ब्रह्म भी है गायत्री उसका प्रतिनिधित्व करने वाली शक्ति है। यदि गायत्री का तत्वदर्शन जीवन में उतर जाए, सूर्य की साधना द्वारा व्यक्ति अपने विचारों में मन को स्नान करा सके तो यह प्राण शक्ति उसके रोम-रोम में उतरकर उसे ब्रह्मवर्चस सम्पन्न बना देती है।
उपासना का पूरा ध्यान आत्म परिष्कार में नियोजित हो यही है संक्षेप में गायत्री मंत्र का अर्थ और तात्पर्य। जो उसका पालन करता है, वह उन सभी लाभों से लाभान्वित होता है, जो गायत्री उपासना के संदर्भ में शास्त्रकारों और ऋषियों ने देव संस्कृति के विधान के अंतर्गत बताये एवं समझाये हैं।
उपासना के संदर्भ में शास्त्रकारों और ऋषियों ने देव संस्कृति के विधान के अंतर्गत बताये एवं समझाये हैं।
उपासना का उद्देश्य है व्यक्तित्व का ऐसा अनुकूलन जिसमें ईश्वर के अजस्र अनुग्रह को धारण करा सकने की पात्रता हो। उपजाऊ भूमि में ही वर्षा के बादलों के अनुग्रह से हरियाली उपजती है। कठोर चट्टानों पर तो एक पत्ता भी नहीं उगता। गायत्री उपासना का पूरा ध्यान आत्म परिष्कार में नियोजित हो यही है संक्षेप में गायत्री मंत्र का अर्थ और तात्पर्य। जो उसका पालन करता है, वह उन सभी लाभों से लाभान्वित होता है, जो गायत्री उपासना के संदर्भ में शास्त्रकारों और ऋषियों ने देव संस्कृति के विधान के अंतर्गत बताये एवं समझाये हैं।
उपासना करो प्राण का संरक्षण करो। उपनिषद्कार कहता है कि -”नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” बलहीनों को -प्राणशक्ति- क्षीण व्यक्तियों को न कभी आत्मा मिलता है, न परमात्मा। बात सही है। ऐसे व्यक्तियों को भौतिक जीवन में भी कुछ नहीं मिलता। जीवट, पराक्रम,प्राणशक्ति,मनोबल,आत्मबल का अभाव होने पर तो व्यक्ति निर्जीव वस्तु के समान है।
उपासना करते हुए वरदान रूप में ब्रह्मवर्चस् को प्राप्त कर सकने वाला हर क्षेत्र में विभूतिवान बनता चला जाता है। छान्दोग्योपनिषद् का ऋषि अथर्ववेद की सूक्ति “आयुः प्राणं प्रजाँ पशुँ कीर्ति द्रविणम्- ब्रह्मवर्चसम् मह्यम् दत्वा ब्रजत ब्रह्मलोकम्” को इस रूप में कहता है- “स य एवमेतद् गायत्रं प्राणेषु प्रोक्तं वेद प्राणी भवति सर्दमायुरेति ज्योग्जीवति महान्पव्रजया पशुर्भिभवति महान्कीर्त्या महामनः स्यात्तद्द्रतम्” ( 2/10/2) अर्थात्-”यह गायत्री तत्व समस्त प्राणों में विद्यमान है। जो इसकी उपासना करता है, वह विद्वान-प्राणवान-दीर्घजीवी यशस्वी-सुसंपन्न-उदार और महामनस्वी बनता है। “ यह सभी महामत्य जो बताए गये हैं, अकारण नहीं हैं। वस्तुतः स्थूल काय किन्तु तेजरहित दुर्बल मनः स्थिति का व्यक्ति बलवान नहीं कहा जा सकता है, न दूसरों की।
उपासना के समय सूर्य के ध्यान की व्यवस्था है उसका अर्थ सूर्य की अदृश्य शक्तियों, किरणों को उपरोक्त वैज्ञानिक, सिद्धान्तों के आधार पर शरीर में धारण करना और उसके आत्मिक व वैज्ञानिक लाभों से लाभान्वित होना है। हमारी प्रगाढ़तम ध्यानावस्था हमारी मनश्चेतना को “ सूर्य” बना देती है। उस शक्ति, सामर्थ्य और अनुभूति की कल्पना की जो सके तो सहज ही अनुभव किया जा सकता है कि गायत्री की सावित्री की सिद्धि के क्या चमत्कार हो सकते हैं ?
उपासना की देवी संसर्गिया सस्पियनमा है।
उपासना करने से पूर्व सबसे प्रथम कदम इस जन्म में बन पड़े पाप कर्मों का प्रायश्चित किया जाना चाहिए। यों कुविचार भी हानिकारक हैं और कालान्तर में वे भी परिपक्व होकर दुर्गति के कारण बनते हैं। पर कुकर्म तो प्रत्यक्ष हैं, उनके तत्काल संस्कार बनते हैं और उनका ऐसा भला बुरा कर्मफल विनिर्मित होता है जिसे भुगते बिना और कोई मार्ग नहीं। कर्म की गति अति गहन है। श्रवण कुमार को तीर मारने के फलस्वरूप दशरथ को पुत्र शोक का शाप लगा था और उन्हें राम वनवास के अवसर पर बिलख-बिलख कर प्राण त्यागने पड़े थे।
उपासना बताये जाने का वर्णन है। आदित्य हृदय का रहस्य जानकर ही रावण वध सम्भव हो सका। महाभारत में महर्षि धौम्य ने युधिष्ठिर सहित अन्य भाइयों को सूर्य उपासना में दीक्षित किया था। ध्यान रखने की बात यह है कि इसके प्रतिफल व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए न थे।
उपासना के अन्य अनेक मंत्र हैं तरह-तरह की उपासना पद्धतियाँ हैं पर उनकी सीमा अधिदैवत तक सीमित है। व्यक्तिगत स्तर पर भले उनसे लाभान्वित हुआ जा सकें । सामूहिक मन में हो रहे प्रदूषण का निवारण संभव नहीं । यह सम्भावना सिर्फ गायत्री मंत्र के माध्यम से स्वीकार हो सकती है। सूर्य रहस्य का प्रकटीकरण सिर्फ इसी समर्थ विधि से सम्भव हैं।
उपासना-उपचार में दीपक, अगरबत्ती धूपबत्ती, अग्निहोत्र आदि के प्रयोग होते हैं। न केवल भारतीय धर्म में वरन् संसार भर के सभी धर्मों में अपने-अपने ढंग से यह प्रक्रिया काम में लाई जाती है। अगरबत्ती धूपबत्ती, लोबान, धूनी जैसे उपचार मन्दिर , गिरजाघर, गुरुद्वारे चैत्य आदि सभी जगह प्रयुक्त होते हैं। पारसी धर्म में तो यह मान्यता और भी अधिक है। उन्हें तो एक प्रकार से ‘अग्नि पूजक’ ही माना जाता है।
उपासना में सविता देवता का ध्यान करने की प्रक्रिया इसीलिए की जाती है कि अन्तर के कण-कण में संव्याप्त प्रकाश आभा को अधिक दीप्तिमान बनने का अवसर मिले। अपने ब्रह्म रंध्र में अवस्थित सहस्राँशु-आदित्य सहस्रदल कमल को खिलाये और उसकी प्रत्येक पंखुड़ी में सन्निहित दिव्य कलाओं के उदय का लाभ साधक को मिले।
उपासना का प्रचलन किया। उनका आगमन व मात्र 32 वर्ष की आयु में कार्य कर सारी महत्वपूर्ण स्थापनाएँ कर जाना हमारी संस्कृति की एक ऐतिहासिक घटना है।
उपासना के रूप में कभी एकजुट था। इसे देवसंस्कृति के प्रति एक निष्ठा ही कहेंगे। आकाश के देवता ‘एना’ और पृथ्वी के देवता ‘इया’ में निष्ठा रखने वाले बेवीलोनीयाँ निवासियों ने दिन का आरम्भ सूर्योदय से माना। मिश्र की नीलघाटी सभ्यता में सूर्य पूजा मुख्य थी। फैल्डियन लोगों की श्रद्धा भी सूर्य पर टिकी थी।
उपासना से जो भी लाभ यथा आरोग्य, प्राण, धन-सम्पत्ति, पुत्र और महत्वाकांक्षायें आदि पूर्ण होती हैं, उसकी शक्ति अथवा प्रेरणा सूर्य लोक से आती है। किसी भी मंत्र का जब उच्चारण किया जाता है, तब वह एक विशेष गति से आकाश के परमाणुओं के बीच बढ़ता हुआ, उस देवता (शक्ति-केन्द्र) तक पहुँचता है, जिसका उस मंत्र से संबंध होता है। मंत्र-ज पके समय आवश्यक ऊर्जा मन को शक्ति के द्वारा प्राप्त होती है, इस शक्ति के द्वारा जप के समय की ध्वनि तरंगों को विद्युत तरंगों के रूप में प्रेक्षित किया जाता है। वह तेजी से बढ़ती हुई कुछ ही क्षणों में देव-शक्ति से टकराती हैं, उससे अदृश्य सूक्ष्म-परमाणु मन्दगति से परिवर्तित होने लगते हैं, उनकी दिशा ठीक उलटी होती है। सूक्ष्म और स्थूल दोनों तरह के परमाणु दौड़ पड़ते हैं और साधक को शारीरिक लाभ और मानसिक प्रेरणायें देने लगते हैं।
उपासना के विधान सुझाए हैं। इनका परिपालन जहाँ उपासक को सभी ग्रहों को कष्ट से मुक्त करता है वहीं पवित्रता प्रखरता उपलब्धि के रूप में मिलती है।
उपासना का भी कुछ ऐसा ही विस्तार हुआ। “मिथ आँव चाइना एण्ड जापान” में लिखा है चीन देवताओं की माता चुनी थीं। जो आदिम जल राशि अपस की देवी मानी जाती है। ‘इजिन्शियन मिथ एण्ड आई एजेण्ड ‘ में लिखा है मिश्र में आकाश की देवी का नाम नटु था जो अपने शरीर से ही समस्त प्राणियों को पैदा करती थी। यूरोप की आदिम जातियों में दसु को धर्म में शिव-शक्ति का प्रतिपादन इन शब्दों में किया है कि आकाश पिता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-March
उपासना के लिए है । इस समय उन्हें कोई व्यवधान न पहुँचाएँ ।
उपासना जप-तप और ध्यान से ही नहीं होती कर्म भी उसका उत्कृष्ट माध्यम है । यह विराट जगत उन्हीं का प्रकट रूप है । जो दीन-दुःखी जन हैं उनकी सेवा करना , जो पिछड़े ओर दलित हैं उन्हें आत्मकल्याण का मार्ग दिखाया भी भगवान का ही भजन है । इस दृष्टि से मैंने जो किया वह ईश्वर की उपासना ही है अब और कुछ पूछने को शेष नहीं रह गया था।
उपासना ही है अब और कुछ पूछने को शेष नहीं रह गया था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-January
उपासना, तपश्चर्या और योगाभ्यास का मात्र एक ही प्रयोजन है अपने अन्तःकरण में प्रस्तुत अगणित सत्प्रवृत्तियों का जागरण, सद्भावनाओं का उन्नयन। दृष्टिकोण में परिष्कार। कर्तव्य में देवत्व के समावेश का अभ्यास। उपासना की उत्कृष्टता साधना की प्रखरता इसी कसौटी पर परखी जाती है। इसी से अपना भला होता है इसी से संसार का।
उपासना-साधना के द्विविध मार्ग को अपनाकर व्यक्तित्व को परिष्कृत और विकसित करते हुए ही आत्मिक प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है । पूर्णता प्राप्त करने ऋद्धि-सिद्धियों से भरापूरा सफल जीवन जीने का यही राजमार्ग है ।
उपासना-विधानों में संलग्न रहकर कम समय व श्रम में अधिक लाभ उठाने का परामर्श दिया गया है।
उपासना-पूजा को निर्धारित समय का क्रियाकलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीसों घंटे करनी पड़ती है । अपने हर विचार और कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित, अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है । जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरन्त सुधारा, जहाँ विकार पाया वहाँ तुरन्त उसकी चिकित्सा की, जहाँ अनीति देखी, तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है ।
उपासना और साधना आध्यात्मिक प्रगति के दो अविच्छिन्न पहलू हैं । जितना महत्व उपासना का है उतना ही साधना का भी है । हमें उपासना पर ही नहीं साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिए । जीवन को पवित्र और परिष्कृत, संयत और संतुलित, उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए । इस प्रयत्न का नाम ही जीवन-साधना अथवा साधना है ।
उपासना और साधना भी अन्योन्याश्रित हैं । एक के बिना दूसरा अकेला असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा । इसलिए दोनों को साथ लेकर अध्यात्ममार्ग पर प्रगतिशील होना ही उचित और आवश्यक है ।
उपासना का स्तर बढ़ा देना। निजी स्तर पर शाँतिकुँज की दैवीचेतना के ध्यान के साथ न्यूनतम आधा घण्टा गायत्री जप अब अभी संकल्पित साधकों द्वारा किया जाना चाहिए।
उपासना तत्काल फलदायी होती है। अन्य मौकों पर जिनके सुखद सत्परिणाम के लिए वर्षा और जन्मों तक इन्तजार करना पड़ता है, वे उपरोक्त अवधि में अत्यन्त सरलतापूर्वक सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं।
उपासना विशेषाँक (अक्टूबर 91) में बताए गए विधि-विज्ञान द्वारा न्यूनतम 1/2 घण्टे जप की व्यवस्था बनानी चाहिए। इस अवधि में शाँतिकुँज पहुँचने, प्रखर-प्रज्ञा-सजल श्रद्धा का दर्शन कर अखण्ड दीपक का दर्शन तथा वंदनीया माताजी के आशीर्वाद से तीनों शरीरों में शक्ति−संचार का ध्यान करना है। सप्ताह में एक बार अग्निहोत्र की भी व्यवस्था बनायी जाय। गायत्री चालीसा का पारायण जितना संभव हो सके, स्वयं भी करें व दस सहयोगी परिजनों को करायें, प्रेरित करें। आत्मशक्ति का उपार्जन हर साधक कर सके इसके लिए यह न्यूनतम उपाय-उपचार हैं कहना न होगा कि दैवी विभूतियाँ बरसने से लेकर सम्मान-सहयोग की प्राप्ति तथा मनोकामनाओं की पूर्ति से लेकर वातावरण अपनी इच्छानुकूल बनने जैसे चमत्कार इसी उपासनापरक पुरुषार्थ की ही फलश्रुति है।
उपासना के माध्यम से सम्पन्न किया जाता है। इससे साधक का शरीर-मन न सिर्फ भावना के अनुरूप बनने ढलने लगता है, वरन् उसकी आत्मिक उन्नति भी सहज संभव हो जाती है। इसी बात का समर्थन करते हुए प्राकृतिक चिकित्सा के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. हेनरी लिंडलहर अपनी पुस्तक “प्रैक्टिस ऑफ नेचुरल थेराप्यूटिक्स” में लिखते हैं कि मनोभावों में इतनी सामर्थ्य है कि उनके द्वारा कोई रोगी स्वयं को पूर्ण स्वस्थ बना सकता है, एवं कोई स्वस्थ व्यक्ति विकृत विचार आरोपण व निषेधात्मक चिन्तन द्वारा अपने को अशक्त असमर्थ तथा रुग्ण बना लेता है। वे कहते हैं कि यह सब चिन्तन व दृष्टिकोण के भले-बुरे प्रभाव की क्षमता है। इसी संदर्भ में वे आगे लिखते हैं कि संभवतः इसी कारण से भारतीय संस्कृति में प्रतीकोपासना पद्धति का विधान बनाया गया है और उसके माध्यम से श्रेष्ठ व उत्कृष्ट चिन्तन द्वारा न सिर्फ शारीरिक-मानसिक बीमारियों से मुक्ति पायी जाती है, वरन् उस काल में साधक की भावना इष्टदेव में समाये गुणों के अनुरूप उच्चस्तरीय होने के कारण उसमें कालान्तर में वैसे ही लक्षण उभरने और मूर्तिमान होने लगते हैं।
उपासना उपक्रमों द्वारा इसी कार्य की लक्ष्य-सिद्धि की जाती है। उसे अनावश्यक और अनुपयोगी धींगामुश्ती से हटा कर किसी उपयोगी कार्य में व्यस्त कर दिया जाता है। इस क्रिया को किसी मंत्र का अवलम्बन ले कर उपासना के माध्यम से सम्पन्न किया जाता है। इससे साधक का शरीर-मन न सिर्फ भावना के अनुरूप बनने ढलने लगता है, वरन् उसकी आत्मिक उन्नति भी सहज संभव हो जाती है। इसी बात का समर्थन करते हुए प्राकृतिक चिकित्सा के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. हेनरी लिंडलहर अपनी पुस्तक “प्रैक्टिस ऑफ नेचुरल थेराप्यूटिक्स” में लिखते हैं कि मनोभावों में इतनी सामर्थ्य है कि उनके द्वारा कोई रोगी स्वयं को पूर्ण स्वस्थ बना सकता है, एवं कोई स्वस्थ व्यक्ति विकृत विचार आरोपण व निषेधात्मक चिन्तन द्वारा अपने को अशक्त असमर्थ तथा रुग्ण बना लेता है।
उपासना की उत्कृष्टता साधना की प्रखरता इसी कसौटी पर परखी जाती है। इसी से अपना भला होता है इसी से संसार का।
उपासना पद्धति बदलने या एक मंत्र छोड़कर दूसरे को अपना लेने में विश्वास रखते हैं। जिन लोगों में इस प्रकार की प्रवृत्ति पायी जाती है, उनके संबंध में इतना ही कहना पर्याप्त है कि सिद्धान्तों को न समझ पाने की स्थिति में औंधे-सीधे कर्मकाँडों की विडम्बना रच कर फल की आशा करना दुराशा मात्र ही है ऐसे ही लोग सर्वथा खाली हाथ रहते और मंत्रों को मिथ्या-झूठा कह कर इन्हें भोले-भावुकों के मन का भ्रम बताने का प्रपंच करते हैं।
उपासना मनोभूमि में उगने वाला बीज है, जिसके फलने-फूलने की आशा तभी की जा सकती है जब मनोभूमि का उसी प्रकार परिष्कार किया जाय जिस प्रकार कृषक अपने खेतों का करता है । खेत में बीज डालने से पूर्व वह पहले उसे पानी से भर कर उसकी अच्छी तरह जुताई करता है । कूड़ा कचरा निकालता है । खाद डालता है तब भूमि इस योग्य हो पाती है कि उसमें बीज डालने और उसके उगने की संभावनायें सुनिश्चित होती हैं । इसी प्रकार मनोभूमि को शुद्ध किये बिना डाला गया उपासना का बीज झाड़-झंखाड़ युक्त खेत में पड़े बीज की तरह होगा, जो या तो स्वयं सड़गल कर नष्ट हो जाता है या जिसे चूहे, चिड़िया और जंगली जीव चुन ले जाते हैं
उपासना क्षेत्र में धर्म परायण साधकों द्वारा इष्टदेव की छवि का ध्यान करने के रूप में किया जाता है । इसके लिये किसी प्रतिमा को आधार बनाया जाता है । अवतारों की, देवताओं की छवियाँ, मूर्तियाँ एवं तस्वीरों के रूप में सामने रहती हैं । आरम्भ में उन्हें खुली आँखें बन्द करके सूक्ष्म नेत्रों में निहारने का अभ्यास किया जाता है । इन छवियों में देवताओं को विस्तृत कलेवर धारण किये हुए चित्रित किया जाता है ।
उपासना और साधना दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । आध्यात्मिक प्रगति के लिए दोनों अवलम्बनों को साथ-साथ लेकर चलना अनिवार्य है । अन्यथा एक के बिना दूसरा अपूर्ण है । जिस तरह अन्न और जल, रात और दिन, शीत और ग्रीष्म, स्त्री और पुरुष का जोड़ा है उसी प्रकार उपासना और साधना भी अन्योन्याश्रित हैं । एक के बिना दूसरा अकेला असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा ।
उपासना के माध्यम से शेष कोषों के परिष्कार का उपक्रम अपनाया जाय, तो प्रतिफल दिव्य वरदान की तरह सामने आता है। इसी कारण से उक्त मासों में प्रतिपदा से लेकर नवमी तक के नव दिनों को विशेष महत्व का माना गया है और आर्ष ग्रन्थों में इसकी विरुदावली नवरात्रि के धर्मानुष्ठानों के रूप में गायी गई है तथा प्रत्येक व्यक्ति से इस अवसर पर उपासना-विधानों में संलग्न रहकर कम समय व श्रम में अधिक लाभ उठाने का परामर्श दिया गया है।
उपासना की जा सकती है । हम निष्पाप बनें इतना ही पर्याप्त नहीं, वरन् यह भी आवश्यक है कि अपने गुण , कर्म , एवं स्वभाव में सात्विकता का , पवित्रता प्रखरता का समुचित विकास करके जीवन को दिव्य बनावें और उसके द्वारा अपना और समस्त समाज का कल्याण करें । अभिन्न रूप से जुड़े उपासना-साधना के द्विविध मार्ग को अपनाकर व्यक्तित्व को परिष्कृत और विकसित करते हुए ही आत्मिक प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है । पूर्णता प्राप्त करने ऋद्धि-सिद्धियों से भरापूरा सफल जीवन जीने का यही राजमार्ग है ।
उपासना उपक्रमों में भी इसकी उपादेयता स्पष्ट परिलक्षित होती है।
उपासना की सार्वभौम सत्ता को सबने एक स्वर से सादर स्वीकारा है व सामूहिक आध्यात्मिक पुरुषार्थ की दिशा में संघबद्ध प्रयास गतिशील हुए हैं। अब इस वसंतपर्व से एक कदम और इस दिशा में आगे बढ़ाया जाना चाहिए। वह है ब्राह्मीचेतना से और अधिक तादात्म्य जोड़ने-शक्ति स्रोत से स्वयं को संबंधित करने के लिए व्यक्तिगत उपासना का स्तर बढ़ा देना। निजी स्तर पर शाँतिकुँज की दैवीचेतना के ध्यान के साथ न्यूनतम आधा घण्टा गायत्री जप अब अभी संकल्पित साधकों द्वारा किया जाना चाहिए।
उपासना ही इस संधिकाल में अभीष्ट है एवं विशिष्ट अवसर पर किये गए इस साधना पराक्रम का प्रतिफल भी अति विशिष्ट होगा, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।
उपासना के साथ जीवन साधना भी अनिवार्य है । गायत्री की भावनात्मक पूजा की तरह ही सद्आचरण द्वारा भी उपासना की जा सकती है । हम निष्पाप बनें इतना ही पर्याप्त नहीं, वरन् यह भी आवश्यक है कि अपने गुण , कर्म , एवं स्वभाव में सात्विकता का , पवित्रता प्रखरता का समुचित विकास करके जीवन को दिव्य बनावें और उसके द्वारा अपना और समस्त समाज का कल्याण करें । अभिन्न रूप से जुड़े उपासना-साधना के द्विविध मार्ग को अपनाकर व्यक्तित्व को परिष्कृत और विकसित करते हुए ही आत्मिक प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है । पूर्णता प्राप्त करने ऋद्धि-सिद्धियों से भरापूरा सफल जीवन जीने का यही राजमार्ग है ।
उपासना कहलाती है । पर प्रायः लोग इस तथ्य की उपेक्षा-अवहेलना करते ओर यह मानते हैं कि भजन करने मात्र से पाप कट जायेंगे, अतएव जीवन को शुद्ध बनाने अर्थात् कुमार्गगामिता से अपने को बचाने की आवश्यकता नहीं । वस्तुतः इसी भ्रमपूर्ण मान्यता ने मनुष्य को अध्यात्म के लाभों से वंचित रखा है । यह भ्रम जितना शीघ्र हो सके दूर हटाना चाहिए । भारतीय अध्यात्म के तत्वज्ञान एवं ऋषि अनुभवों के आधार पर यही निष्कर्ष अपनाना चाहिए कि उपासना और साधना दोनों एक दूसरे के पूरक हैं ।
उपासना-साधना को वर्तमान दलदल से सुरक्षित बच निकलने का सर्वोत्तम और सर्वोपरि हल बताते हैं। उनके अनुसार हर व्यक्ति में वह तत्व विद्यमान है, जिसे यदि प्रयासपूर्वक उभारा जा सके, तो न सिर्फ कर्ता आनन्द की गंगोत्री में अहर्निशि निमज्जन करता रह सकेगा, वरन् संपर्क में आने वाले अन्य अनेकों को इससे लाभान्वित कर सकेगा।
उपासनापरक पुरुषार्थ की ही फलश्रुति है। शक्ति की उपासना ही इस संधिकाल में अभीष्ट है एवं विशिष्ट अवसर पर किये गए इस साधना पराक्रम का प्रतिफल भी अति विशिष्ट होगा, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।
उपासना भी साधक को उस विभूति-अनुभूति से निहाल कर सकती है, जिसके लिए अन्य मौकों पर उपासक चातक पक्षी की तरह स्वाति-बूँद को पा लेने की आकाँक्षा लम्बे काल तक सँजोये रह कर उसे हस्तगत कर लेने की प्रतीक्षा उत्सुकतापूर्वक करता रहता है। संधिकाल के विगत वर्षों को चावल पकाने से पूर्व पानी गर्म करने की पूर्व भूमिका सम्पन्न करने जैसा माना जाना चाहिए। जब उबलते जल में चावल के दाने डाले जाते हैं, तो आधे घंटे जितनी स्वल्प अवधि में पक कर तैयार हो जाते हैं। प्रस्तुतः समय में बीते वर्षों को विभिन्न उपाय-उपचारों के माध्यम से वातावरण को गरम करने के समतुल्य समझा जाना चाहिए। सभी जानते हैं कि स्वाधीनता के दिनों में महर्षि अरविंद और रमण ने अपनी प्रचण्ड साधना पुरुषार्थ की परोक्ष भूमिका द्वारा वातावरण को इस कदर इतना गर्म किया कि एक साथ गाँधी, विनोबा, सुभाष चन्द्र बोस, भगतसिंह, आजाद प्रभृति इतने महामानवों का अवतरण हुआ जिनने गुलामी के पाश को एक झटके में तोड़ कर देश को स्वतंत्र बना दिया।
उपासनाक्रम थोड़ी तत्परता और निष्ठापूर्वक जारी रख सकें, तो आगामी समय में वह न सिर्फ स्वयं धन्य बन सकेंगे, वरन् समय को भी अपने बहुमूल्य योगदान से ओतप्रोत कर देंगे। वैज्ञानिक जानते हैं कि सूर्य संबंधी प्रयोग-परीक्षण चाहे जब कभी नहीं किया जा सकता। जब पूर्ण सूर्यग्रहण का योग बनता है, तभी उनके यंत्र-उपकरण खनकने लगते हैं और ऐसे ही अवसर पर वे तत्संबंधी किसी सुनिश्चित निर्णय-निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। आगामी समय को ऐसा ही महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए और इसका समुचित लाभ थोड़े ही श्रम में पा लेने में साधकों को कोई कोर-कसर उठा न रखना चाहिए।
उपासना और साधना परस्पर गुँथे हुए है । दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व है एवं एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जायगी, यह सोचना उचित नहीं ।
उपासना पर ही नहीं साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिए । जीवन को पवित्र और परिष्कृत, संयत और संतुलित, उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए । इस प्रयत्न का नाम ही जीवन-साधना अथवा साधना है । उपासना-पूजा को निर्धारित समय का क्रियाकलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीसों घंटे करनी पड़ती है । अपने हर विचार और कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित, अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है ।
उपासना का बीज झाड़-झंखाड़ युक्त खेत में पड़े बीज की तरह होगा, जो या तो स्वयं सड़गल कर नष्ट हो जाता है या जिसे चूहे, चिड़िया और जंगली जीव चुन ले जाते हैं
उपासना उतनी फलदायी नहीं होती, जितनी किसी समय विशेष में की गई। यदि साधक अपनी उपासनाक्रम थोड़ी तत्परता और निष्ठापूर्वक जारी रख सकें, तो आगामी समय में वह न सिर्फ स्वयं धन्य बन सकेंगे, वरन् समय को भी अपने बहुमूल्य योगदान से ओतप्रोत कर देंगे। वैज्ञानिक जानते हैं कि सूर्य संबंधी प्रयोग-परीक्षण चाहे जब कभी नहीं किया जा सकता। जब पूर्ण सूर्यग्रहण का योग बनता है, तभी उनके यंत्र-उपकरण खनकने लगते हैं और ऐसे ही अवसर पर वे तत्संबंधी किसी सुनिश्चित निर्णय-निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। आगामी समय को ऐसा ही महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए और इसका समुचित लाभ थोड़े ही श्रम में पा लेने में साधकों को कोई कोर-कसर उठा न रखना चाहिए।
उपासना-विज्ञान के पीछे यही रहस्य छिपा है। इसके माध्यम से मन को किसी एक मंत्र के पीछे लगा कर उसे साधने और शोधने का प्रयास किया जाता है। सवाल पुनः प्रश्नचिह्न बन कर सामने आता है कि क्या ऐसा संभव है? जवाब सर्वथा “हाँ” में दिया जा सकता है। गीता भी यही कहती है-
उपासना के पीछे भी प्रयासपूर्वक उच्छृंखल मन को वशवर्ती बनाने का यही मनोविज्ञान निहित है। जो भलीभाँति इस विज्ञान को समझ कर निष्ठ और तन्मयतापूर्वक इसमें संलग्न रहते हैं, वे चतुर किसान की तरह बीज बोने और फसल पकने का उत्सुकतापूर्वक इन्तजार करते और धन-धान्यों से अपने कोठार भरते हैं, किन्तु जो उतावली मचाते और फल की आशा हथेली में सरसों जमाने की तरह तुरंत करने लगते हैं, वे इसके पीछे की प्रक्रिया और सिद्धान्त से नितान्त अनभिज्ञ होते हैं। ऐसे ही लोग उस व्यक्ति की तरह बिल्कुल छूँछ रह जाते हैं, जो छोटे-छोटे गड्ढे खोद कर पानी न निकलने पर बार-बार कुआं का स्थान परिवर्तित करने की अधीरता और नादानी बरतता है।
उपासनाक्रम साँगोपाँग होना चाहिए और उसमें आत्म निरीक्षण, आत्मसुधार , आत्मनिर्माण , एवं आत्मविकास की परिपूर्ण प्रक्रिया जुड़ी ही रहनी चाहिए । उपासना और साधना परस्पर गुँथे हुए है । दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व है एवं एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जायगी, यह सोचना उचित नहीं ।
उपासना के पीछे एक बहुत बड़ा मनोविज्ञान काम करता है। आज लोग उस विज्ञान को न समझ पाने के कारण ही उसकी उपेक्षा करते हैं अथवा सतही व्यक्ति की तरह उपासना पद्धति बदलने या एक मंत्र छोड़कर दूसरे को अपना लेने में विश्वास रखते हैं। जिन लोगों में इस प्रकार की प्रवृत्ति पायी जाती है, उनके संबंध में इतना ही कहना पर्याप्त है कि सिद्धान्तों को न समझ पाने की स्थिति में औंधे-सीधे कर्मकाँडों की विडम्बना रच कर फल की आशा करना दुराशा मात्र ही है ऐसे ही लोग सर्वथा खाली हाथ रहते और मंत्रों को मिथ्या-झूठा कह कर इन्हें भोले-भावुकों के मन का भ्रम बताने का प्रपंच करते हैं।
उपासना क्रम अनवरत जारी रख सके, तो प्रतिफल किसान के लहलहाते खेत की तरह प्राप्त किया जा सकता है।
उपासना, साधना, आराधना का अवलम्बन अपनाया जा सकता है। ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रिवेणी का अवगाहन का पुण्य फल इतना ही है कि जीवन को परिष्कृत, समुन्नत, एवं सुसंस्कृत बनाया जा सके। इतना बन पड़े तो खिले हुए फूल पर मंडराने वाले भौरों की तरह अनेक दैवी अनुग्रह और वरदान अनायास ही अपनी समीपता का परिचय देने लगते हैं।
उपासना में मन को अधिक रुचिपूर्वक लगाये रहने के लिए इष्टदेव की सामर्थ्य का माहात्म्य पहले से ही मन को समझा दिया जाता है। उनके अनुग्रह से क्या-क्या लाभ वरदान मिल सकते हैं, यह कल्पना पहले से ही रहती है। इसके अतिरिक्त इष्टदेव के प्रति गुरुजनों जैसी सघन श्रद्धा का भी आरोपण रखा जाता है। किसी घनिष्ठ सम्बन्धी के रूप में उन पर आत्मीयता का आरोपण करना आवश्यक होता है। भगवान को, इष्टदेव को किस रिश्ते में बाँध कर उनके साथ भावभरी आत्मीयता उत्पन्न की जाय यह साधक की अपनी इच्छा पर निर्भर है।
उपासना ऐसे ही अनुकूल वातावरण बनाने में रच-पच गई। अगले वर्ष से सन् 2000 तक का समय अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसे गर्भधारण और शिशु जन्म के नौ माह के मध्यान्तर के तुल्य समझा जात सकता है। इस काल में साधक यदि तनिक सा संयम-नियम का परिपालन करते हुए उपासना क्रम अनवरत जारी रख सके, तो प्रतिफल किसान के लहलहाते खेत की तरह प्राप्त किया जा सकता है।
उपासना का है उतना ही साधना का भी है । हमें उपासना पर ही नहीं साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिए । जीवन को पवित्र और परिष्कृत, संयत और संतुलित, उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए । इस प्रयत्न का नाम ही जीवन-साधना अथवा साधना है । उपासना-पूजा को निर्धारित समय का क्रियाकलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीसों घंटे करनी पड़ती है ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-April
उपासना द्वारा मनःक्षेत्र में छाये कषाए-कल्मषों का निवारण कर उसकी स्वच्छता का प्रयास नवरात्रि में कर लिया जाय तो न केवल नीरोग स्वस्थ जीवन बिता पाना शक्य है, वरन् आत्मशक्ति संवर्धन द्वारा समस्त प्रतिकूलताओं से लड़ते हुए अपना भौतिक व आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों से उत्कर्ष भी संभव है। इस दृष्टि से नवरात्रि एक असामान्य अवसर जनसाधारण के लिए लेकर आती है।
उपासना एक घण्टा व बीस पैसा प्रतिदिन अथवा एक दिन की आजीविका माह में एक बार शाँतिकुँज को देवसंस्कृति विस्तार के निमित्त देने के अनुबंध का पालन करें।
उपासना पद्धतियाँ, प्राणाग्नि-कुण्डलिनी तथा मंत्र शक्ति का विज्ञान सम्मत विवेचन इसी पक्ष के अंतर्गत आता है।
उपासना तो प्रारम्भिक और छोटा चरण है इसमें खाद पानी देकर बड़ा पौधा बनाने और उस वृक्ष पर शाखा, टहनी, पत्तियों और फूल-फलों से लदने की आशा तभी की जा सकती है जब उसके साथ साधना और परमार्थ आराधना के अपेक्षित पुरुषार्थ किये जायँ। जो इन दोनों से वंचित है, उस भक्ति को ऐसा ही समझाना चाहिए जैसे ऊसर भूमि में बीज तो उग गया, पर उसमें खाद, पानी देने की आवश्यकता न समझी गयी।
उपासना की आवश्यकता-उपयोगिता कितनी ही कुछ क्यों न हो, पर जीवन साधना और परमार्थपरक आराधना को साथ लिए बिना वह सर्वथा अपूर्ण रहेगी और कोई उत्साहवर्धक परिणाम प्रस्तुत न कर सकेगी। गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम से त्रिवेणी बनती है जिसका महात्म्य वर्णन करते-करते शास्त्रकार थकते नहीं । इनमें से किसी अकेली को तीर्थराज त्रिवेणी संगम नहीं कहा जा सकता। यही तथ्य भक्ति की समग्रता पर भी लागू होता है। अपूर्ण उपक्रम में असफलता के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।
उपासना करो। निश्चित ही सुसंतति की प्राप्ति होगी। गर्भधारण करते ही खून में लौहतत्व की अत्यधिक कमी पाने से चिकित्सकों ने औषधियाँ आरम्भ कर दीं। किन्तु शीघ्र ही डेढ़ माह के अन्दर ही एबॉर्शन हो गया। ऐसा दो बार हो जाने पर पुनः यहाँ आकर पूज्यवर से प्रत्यक्ष आशीर्वाद माँगा बताया कि डॉक्टर्स ने जीन्स में डिफेक्ट बताया है।
उपासना का त्रिविध समन्वय अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। यह ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार जीवन की स्थिरता के लिए अन्न, जल और हवा आवश्यक हैं। मात्र इनमें से एक ही मिल सके तो शेष दो का अभाव किसी को जीवित रहने की स्थिति में नहीं रहने दे सकता पूजापरक उपासना की आवश्यकता-उपयोगिता कितनी ही कुछ क्यों न हो, पर जीवन साधना और परमार्थपरक आराधना को साथ लिए बिना वह सर्वथा अपूर्ण रहेगी और कोई उत्साहवर्धक परिणाम प्रस्तुत न कर सकेगी। गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम से त्रिवेणी बनती है जिसका महात्म्य वर्णन करते-करते शास्त्रकार थकते नहीं । इनमें से किसी अकेली को तीर्थराज त्रिवेणी संगम नहीं कहा जा सकता।
उपासना के क्षेत्र में प्रवेश करने से पूर्व भटकाव से निवृत्ति प्राप्त कर लेना आवश्यक है अन्यथा कस्तूरी के हिरन जैसी मृगतृष्णा में भटकने वाली निराशा ही हाथ लगेगी और प्रयास के निरर्थक जाने की संभावना सामने ही खड़ी रहेगी।
उपासना का क्रम आरंभ कर दिया। गर्भधारण हुआ। सोनोग्राफी व बच्चे की माँ के जीन्स के विश्लेषण से जानकारी मिली कि बच्चा बिल्कुल ठीक है व प्रायः बीस सप्ताह का बालक गर्भ में स्वस्थ है। पुँसवन संस्कार कराने संबंधी निर्देश परम वंदनीया माताजी को मिला। वह भी कराया गया।
उपासनाक्रम जो नवरात्रि में चलता है, उसमें माला की गिनती पर अधिक ध्यान न देकर जप के साथ ध्यान की प्रक्रिया समय विशेष में पूरी की जाय । होता यह है कि ध्यान गिनती में या सुमेरु की गति पर ज्यादा चला जाता है। सारा उद्देश्य इससे समाप्त हो जाता है । ढाई घण्टे न्यूनतम रोज जप किया जाय व भावनापूर्वक ध्यान सविता के महातेज का गायत्री की सद्बुद्धि प्रेरणा दायिनी शक्ति का किया जाय तो निश्चित ही यह अनुष्ठान साधना भौतिक एवं अध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से अनेकों उपलब्धियाँ हस्तगत कराती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-December
उपासना थोड़े से उच्चकोटि के विचारकों तत्ववेत्ताओं और योगियों तक ही सीमित रह जाती ओर मानव जाति का आत्मिक विकास रुक जाता धार्मिक सम्प्रदायों का निर्माण न होता और धर्म के व्यापक विस्तार के बिना समाज में घोर अनास्था और अव्यवस्था फैली होती।
उपासना की दीक्षा दी जाय तो उसे उस उपासना से कोई लाभ न होगा, क्योंकि उसकी अन्तः चेतना का इतना विकास नहीं हुआ है कि ईश्वर के वास्तविक निराकार तत्व को समझ सके। यदि एक निर्बल बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति से यह कहा जाय कि ईश्वर सर्वव्यापक है परन्तु वह इन स्थूल नेत्रों से दृष्टिगोचर नहीं होता उसका कोई रंगरूप नहीं है तो निश्चित रूप से उसकी बुद्धि ईश्वर के अस्तित्व को ही मानने से इनकार कर देंगी।
उपासना दो रूपों में प्रचलित है साकार तथा निराकार। निराकारवादी प्रायः साकार उपासना या मूर्ति पूजा का विरोध करते है पर वे यह भूल जाते है कि ऋषि मनीषियों ने दोनोँ उपासना पद्धतियों का निर्माण मनुष्य के बौद्धिक स्तर की अनुकूलता के अनुरूप किया है। जिस व्यक्ति का बौद्धिक स्तर जितना ऊंचा है उसे उसी ढंग की उपासना पद्धति का निर्देश गुरुजन देते है। जिस व्यक्ति का बौद्धिक विकास मध्य श्रेणी का है शास्त्रों के स्वाध्याय से भी वह वंचित है उसे यदि निराकार उपासना की दीक्षा दी जाय तो उसे उस उपासना से कोई लाभ न होगा, क्योंकि उसकी अन्तः चेतना का इतना विकास नहीं हुआ है कि ईश्वर के वास्तविक निराकार तत्व को समझ सके। यदि एक निर्बल बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति से यह कहा जाय कि ईश्वर सर्वव्यापक है परन्तु वह इन स्थूल नेत्रों से दृष्टिगोचर नहीं होता उसका कोई रंगरूप नहीं है तो निश्चित रूप से उसकी बुद्धि ईश्वर के अस्तित्व को ही मानने से इनकार कर देंगी।
उपासना से सम्बन्धित उनमें सैकड़ों मंत्र उपलब्ध हैं। ऋग्वेद के श्लोक 1/14/4 एवं 4/45/1 में उल्लेख है कि “अग्नि से परमात्मा प्रसन्न होते हैं। अग्नि उपासना के बिना मुक्ति की प्राप्ति असंभव है।” इसी तरह अथर्ववेद 6/65 में कहा गया है-”अग्नि उपासक के हृदय में परमात्मा का तेज प्रकाशित होता है। अन्य शास्त्रों में अग्नि को ब्रह्मरूप कहा गया है, परन्तु अग्नि तो जड़ है।
उपासना के क्षेत्र में गायत्री की महत्ता अनुपम−अद्भुत और अद्वितीय है।
उपासना पद्धति का निर्देश गुरुजन देते है। जिस व्यक्ति का बौद्धिक विकास मध्य श्रेणी का है शास्त्रों के स्वाध्याय से भी वह वंचित है उसे यदि निराकार उपासना की दीक्षा दी जाय तो उसे उस उपासना से कोई लाभ न होगा, क्योंकि उसकी अन्तः चेतना का इतना विकास नहीं हुआ है कि ईश्वर के वास्तविक निराकार तत्व को समझ सके। यदि एक निर्बल बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति से यह कहा जाय कि ईश्वर सर्वव्यापक है परन्तु वह इन स्थूल नेत्रों से दृष्टिगोचर नहीं होता उसका कोई रंगरूप नहीं है तो निश्चित रूप से उसकी बुद्धि ईश्वर के अस्तित्व को ही मानने से इनकार कर देंगी।
उपासना पद्धति में बहुत अधिक संवेदनशील बनाने का इसीलिए अनिवार्य विधान रखा गया है।
उपासना में चलेंगे, तब हम गायत्री के रहस्यों को भी बतायेंगे। अभी तो आपको सामान्य बालबोध नियम भर बतायें हैं जो गायत्री महाविज्ञान में छपे हैं। बालबोध नियम जो सर्व साधारण के लिए हैं, उतना ही छापा है, लेकिन जो जप हम करते हैं, उसमें एक संकल्प भी बोलते हैं जिसका नाम है “विनियोग”। प्रत्येक बीज मंत्र के पूर्व एक विनियोग लगा रहता है। विनियोग में हम तीन बातें बोलते हैं-”गायत्री छन्दः सविता देवता विश्वामित्र ऋषि गायत्री जपे विनियोगः”।
उपासनात्मक उपचारों से भी अधिक महत्व साधक के चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश होने का है। साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती। इसके विपरीत जिनके जीवनक्रम में निकृष्टता और दृष्टता भरी पड़ी है जिन्हें छल−छद्म ही रुचते हैं, जिन्हें लोभ−मोह से आगे की कोई बात सूझती ही नहीं, जिनके लिये वासना और तृष्णा ही सब कुछ है−इन्हीं प्रयोजनों के लिए अपना श्रम, समय और मनोयोग लगाये रहते हैं, इन्हीं के लिए पूजा−पाठ का ढोंग रचते हैं−ऐसे व्यक्ति निष्प्राण उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त समझने वाले जानते हैं कि आस्तिकता की सफलता के साथ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश होने की शर्त भी जुड़ी हुई है।
उपासना करने वाला जानता है कि वह उस सर्वव्यापी ईश्वर की ही उपासना कर रहा है।
उपासना करते हैं। तुम हमारे पुत्र-पौत्रादि को चिर आयुष्य बनाओ और पशुओं से हमको सम्पन्न करो।” अथर्ववेद 2/13/4 में प्रार्थना है “है भगवान! आइये और इस पत्थर की बनी मूर्ति में अधिष्ठित होइये। आपका यह शरीर पत्थर की बनी मूर्ति हो जाये।”
उपासना या मूर्ति पूजा का विरोध करते है पर वे यह भूल जाते है कि ऋषि मनीषियों ने दोनोँ उपासना पद्धतियों का निर्माण मनुष्य के बौद्धिक स्तर की अनुकूलता के अनुरूप किया है। जिस व्यक्ति का बौद्धिक स्तर जितना ऊंचा है उसे उसी ढंग की उपासना पद्धति का निर्देश गुरुजन देते है। जिस व्यक्ति का बौद्धिक विकास मध्य श्रेणी का है शास्त्रों के स्वाध्याय से भी वह वंचित है उसे यदि निराकार उपासना की दीक्षा दी जाय तो उसे उस उपासना से कोई लाभ न होगा, क्योंकि उसकी अन्तः चेतना का इतना विकास नहीं हुआ है कि ईश्वर के वास्तविक निराकार तत्व को समझ सके। यदि एक निर्बल बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति से यह कहा जाय कि ईश्वर सर्वव्यापक है परन्तु वह इन स्थूल नेत्रों से दृष्टिगोचर नहीं होता उसका कोई रंगरूप नहीं है तो निश्चित रूप से उसकी बुद्धि ईश्वर के अस्तित्व को ही मानने से इनकार कर देंगी।
उपासना छूट जाती है और वह समस्त चलती फिरती प्रतिमाओं को अपने ईश्वर का ही रूप मानने लगता हैं। जब उपासना का स्तर स्थूल से सूक्ष्म हो जाता है तब वह निराकार तत्व की उपासना के योग्य होता है क्योंकि स्तर की अनुकूलता में ही शक्ति के विकास का रहस्य निहित है। स्तर की प्रतिकूलता में अच्छे परिणामों की आशा करना असंभव है। यह भी ठीक है कि प्रतिमा पूजा से अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचना संभव नहीं क्योंकि ईश्वर सूक्ष्म है और सूक्ष्म को प्राप्त करने के लिये उससे एकाकार होने के लिये अपनी अन्तःचेतना का उतना ही सूक्ष्म बनाना होगा जितना कि वह है अन्यथा अपने लक्ष्य में निराशा ही होगी।
उपासना की? बेटे हम यही बताने के लिए आज आपके सामने बैठे हैं कि किस विधि से किया। विधि नहीं एक और बात पूछी जाय। क्या? विधा।
उपासना करें तो इसके द्वारा कर सकते हैं ऋद्धि-सिद्धियों के स्वामी बन सकते हैं।
उपासना के लाभों का विवेचन करते हुए लिखा है कि धार्मिक प्रतीक या प्रतिमायें सीमित और अन्तरदृश्ट्यात्मक सम्बन्धों से उद्भूत की गयी है। इनसे ऐसे तथ्यों की अभिव्यक्ति होती है जो अधिक सार्वभौम और आदर्श सम्बन्धों के लिए है, जिनकी अभिव्यक्ति विस्तार अधिक होने से और आदर्शवादिता के कारण सीधे नहीं की जा सकती। अन्यान्य मनोवैज्ञानिकों ने इस तथ्य की पुष्टि करते हुए लिखा है-भारतीय मन्दिरों में शिव, विष्णु, बुद्ध, महावीर आदि की मूर्तियाँ आदर्श को स्थूल रूप देने के उद्देश्य से स्थापित की गयी है। सूक्ष्म रूप में बिना दृश्य वस्तु के, जो इनका प्रतिरूप है, कल्पना करने पर आदर्श अस्पष्ट रह जाता है। उदाहरण के लिए जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों का पूजन मूर्ति रूप में इस कारण प्रचलित नहीं है कि यह मूर्तियाँ ईश्वर के रूप में है, क्योंकि जैनधर्म में ईश्वर का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं किया है।
उपासना के बारे में ऋषियों ने-शास्त्रों ने जो कुछ कहा है, वह साबित करके दिखायें। हमने यही साबित करके दिखाने की कोशिश की और आपसे भी यही अपेक्षा करेंगे कि आप जब यहाँ से विदा हों तो वैसा ही साहस, हिम्मत और दृष्टिकोण लेकर जायँ जिससे वे तीनों आधार जो गायत्री मंत्र को-त्रिपदा को सफल और सार्थक बनाने में समर्थ रहे हैं, वही आपके जीवन में भी आयें और आप वे लाभ उठायें जो प्राचीन काल के उपासकों ने उठाया था और हमने भी। आज की बात समाप्त। (( शान्तिः
उपासना होती रही हो, सभी मनीषी-प्रतिभाशाली मिल−जुलकर जिसको अखण्ड-समर्थ-सशक्त बनाने का नियमित अनुष्ठान करते रहते हों, उसके निवासी शतपथ ब्राह्मण के “श्री वै राष्ट्रः।” “राष्ट्रं वै अष्वमेधः।” “तस्मात् राष्ट्री अष्वमेधेन यजेत्” की वर्चस्व जागरण की भावना के अनुरूप यदि अश्वमेध करने का संकल्प ले चुके हैं तो यह मान लेना चाहिए कि सतयुग की वापसी की प्रक्रिया का क्रियान्वयन अदृश्य जगत के
उपासना किसने की। वह आदमी जो कि प्रमाणिक है गायत्री के सम्बन्ध में-उसका नाम विश्वामित्र है। मेरे मन में आया कि क्या मेरे लिए ऐसा संभव नहीं कि विश्वामित्र के तरीके से प्रयास करूं। मित्रों मैं उसी काम में लग गया। पन्द्रह वर्ष की उम्र से उनतालीस तक चौबीस वर्ष बराबर एक ही काम में लगा रहा, लोग पूछते रहे कि यह आप क्या किया करते हैं हमें भी कुछ बताइये।
उपासना वैदिक है तो मूर्तिपूजा भी वैदिक माननी पड़ेगी। वेद स्वयं मूर्तिपूजा का प्रतीक दृष्टिगोचर होते हैं क्योंकि उन्हें ईश्वर प्रदत्त ज्ञान माना जाता है। अनेक वेद-मंत्र इसकी साक्षी देते है। अथर्ववेद 3/10/3 में उल्लेख है-
उपासना निर्धारित कर दी जाय तो वह अंधकार में ही टटोलता रहेगा और भटक जायेगा। क्योंकि केनोपनिषद 1/3 के अनुसार वहाँ न तो चक्षु पहुँचता है, व वाणी पहुँचती है और न मन ही पहुँच सकता है। वह ज्ञात पदार्थों से भिन्न है और अज्ञात से भी परे है। ऐसी स्थिति में तत्ववेत्ता ऋषियों ने निश्चय किया कि सीमित बुद्धि वाले साधक सीधे असीम की उपासना करने से ही असीम तक पहुँच पायेंगे। ईश्वर या देवप्रतिमायें आस्था की, श्रद्धाभावना की उन्नायक मानी गयी हैं और वे साधक की पवित्र भावनाओं को तददेव तक पहुँचाती भी है।
उपासना बाण है−साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
उपासना के योग्य होता है क्योंकि स्तर की अनुकूलता में ही शक्ति के विकास का रहस्य निहित है। स्तर की प्रतिकूलता में अच्छे परिणामों की आशा करना असंभव है। यह भी ठीक है कि प्रतिमा पूजा से अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचना संभव नहीं क्योंकि ईश्वर सूक्ष्म है और सूक्ष्म को प्राप्त करने के लिये उससे एकाकार होने के लिये अपनी अन्तःचेतना का उतना ही सूक्ष्म बनाना होगा जितना कि वह है अन्यथा अपने लक्ष्य में निराशा ही होगी।
उपासना के बताये गये हैं, उसके लिए मुझे जिन्दगी का जुआ खेलना ही पड़ेगा और खेलना ही चाहिए। मित्रो! चार-पाँच वर्ष में ही मेरी इच्छा भगवान ने पूरी कर दी। मेरे गुरु मेरे पास आये और उनने जो बातें बतायीं उससे जिन्दगी का मूल्य मेरी समझ में आ गया। जिन्दगी का मूल्य और महत्व समझकर मैं चौंक पड़ा कि चौरासी लाख योनियों में घूमने के बाद मिलने वाली यह जिन्दगी मखौल है क्या? इसके पीछे महान उद्देश्य छिपे हुए हैं।
उपासना करने से ही असीम तक पहुँच पायेंगे। ईश्वर या देवप्रतिमायें आस्था की, श्रद्धाभावना की उन्नायक मानी गयी हैं और वे साधक की पवित्र भावनाओं को तददेव तक पहुँचाती भी है। श्रद्धासिक्त भावना के उन्नयन से आत्मा का सम्बन्ध उस चैतन्य सत्ता से हो जाता है तो अणु-अणु में व्याप्त है।
उपासना ज्ञान है−साधना−कर्म। उपासना उपकरण है−साधना कौशल। उपासना बाण है−साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
उपासना नहीं कर रहा है, वरन् वह उस अनन्त शक्ति की पूजा कर रहा है जो उस मूर्ति में विद्यमान है। बाह्य दृष्टि से दिखाई देता है कि वह प्रतिमा की पूजा कर रहा है परन्तु वास्तव में तो वह उस सर्वव्यापी शक्ति की उपासना कर रहा होता है।
उपासना सिखाते रहे हैं, छोटी खुराक वालों को छोटी मात्रा देते रहे हैं, बड़ों को बड़ी मात्रा। हमने छोटे बच्चों को दूध में पानी मिले हुए से लेकर के बड़ों को घी और शक्कर मिली हुई खुराक तक विभिन्न लोगों को दी है तीस सालों में। इन तीस सालों में हमारा विश्वास अटूट होता चला गया है, श्रद्धा मजबूत होती चली गयी है। यह वह सम्बल है- वह आधार है कि अगर ठीक तरीके से कोई पकड़ सकने में समर्थ हो सकता हो तो उसके लिए नफा ही नफा है- लाभ ही लाभ है।
उपासना कर रहा है।
उपासना और साधना। उपासना के दौरान इष्ट से प्राण−ऊर्जा ग्रहण−धारण करने की प्रबल भावना और साधना के माध्यम से उन तत्वों को नष्ट−भ्रष्ट करना, जो प्राण−संचय में विघ्न−उपस्थित करते और उसके भण्डार को निरन्तर खाली करते रहते हैं। ईर्ष्या, द्वेष, असंयम आदि ऐसे ही अवाँछनीय तत्व हैं, जो हमारे शरीर चुम्बकत्व को−जीवनी शक्ति को लगातार घटाते रहते हैं। यदि इस ऊर्जा को बढ़ाया जा सके, तो कोई कारण नहीं कि हमारी शारीरिक−मानसिक स्वस्थता न बढ़ सके हम अक्षुण्ण स्वास्थ्य न प्राप्त कर सकें। इतना ही नहीं, फिर हम चाहे कितने ही न्यून भू−चुम्बकीय क्षेत्र में चले जायँ, उससे हमारा स्वास्थ्य सर्वथा अप्रभावित ही रहेगा और किसी प्रकार के अवाँछित असर उत्पन्न करने में वह एकदम विफल बन जायेगा।
उपासना का कोई चमत्कार दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। इसलिये अनुष्ठान उपचार का महत्व स्वीकार करते हुए भी इस आवश्यकता को भी समझा जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिये उपासनात्मक उपचारों से भी अधिक महत्व साधक के चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश होने का है। साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती। इसके विपरीत जिनके जीवनक्रम में निकृष्टता और दृष्टता भरी पड़ी है जिन्हें छल−छद्म ही रुचते हैं, जिन्हें लोभ−मोह से आगे की कोई बात सूझती ही नहीं, जिनके लिये वासना और तृष्णा ही सब कुछ है−इन्हीं प्रयोजनों के लिए अपना श्रम, समय और मनोयोग लगाये रहते हैं, इन्हीं के लिए पूजा−पाठ का ढोंग रचते हैं−ऐसे व्यक्ति निष्प्राण उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं।
उपासना थोड़े श्रम और समय में सम्पन्न हो जाती है, किन्तु साधना के लिये चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में घुसी हुई दुष्प्रवृत्तियों से जूझने और हटाने का एक काम ही नहीं करना पड़ता, उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों को जगाने का उससे भी अधिक कष्ट साध्य कार्य भी करना पड़ता है। इस उन्मूलन और आरोपण के दुहरे प्रयोजन को पूरा करना प्रायः वैसा ही है, जैसा भगवान परशुराम के फरसा और फावड़ा चलाने के दुहरे पराक्रम का परिचय देना। उन्होंने झंखाड़ काटे और उद्यान लगाये थे। इसी पराक्रम का परिचय हर साधक को अपने जीवन क्षेत्र में देना पड़ता है। इससे कम में काम चलता नहीं।
उपासना कर रहा होता है।
उपासना पद्धतियों का निर्माण मनुष्य के बौद्धिक स्तर की अनुकूलता के अनुरूप किया है। जिस व्यक्ति का बौद्धिक स्तर जितना ऊंचा है उसे उसी ढंग की उपासना पद्धति का निर्देश गुरुजन देते है। जिस व्यक्ति का बौद्धिक विकास मध्य श्रेणी का है शास्त्रों के स्वाध्याय से भी वह वंचित है उसे यदि निराकार उपासना की दीक्षा दी जाय तो उसे उस उपासना से कोई लाभ न होगा, क्योंकि उसकी अन्तः चेतना का इतना विकास नहीं हुआ है कि ईश्वर के वास्तविक निराकार तत्व को समझ सके। यदि एक निर्बल बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति से यह कहा जाय कि ईश्वर सर्वव्यापक है परन्तु वह इन स्थूल नेत्रों से दृष्टिगोचर नहीं होता उसका कोई रंगरूप नहीं है तो निश्चित रूप से उसकी बुद्धि ईश्वर के अस्तित्व को ही मानने से इनकार कर देंगी।
उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती। इसके विपरीत जिनके जीवनक्रम में निकृष्टता और दृष्टता भरी पड़ी है जिन्हें छल−छद्म ही रुचते हैं, जिन्हें लोभ−मोह से आगे की कोई बात सूझती ही नहीं, जिनके लिये वासना और तृष्णा ही सब कुछ है−इन्हीं प्रयोजनों के लिए अपना श्रम, समय और मनोयोग लगाये रहते हैं, इन्हीं के लिए पूजा−पाठ का ढोंग रचते हैं−ऐसे व्यक्ति निष्प्राण उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त समझने वाले जानते हैं कि आस्तिकता की सफलता के साथ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश होने की शर्त भी जुड़ी हुई है।
उपासना के दौरान इष्ट से प्राण−ऊर्जा ग्रहण−धारण करने की प्रबल भावना और साधना के माध्यम से उन तत्वों को नष्ट−भ्रष्ट करना, जो प्राण−संचय में विघ्न−उपस्थित करते और उसके भण्डार को निरन्तर खाली करते रहते हैं। ईर्ष्या, द्वेष, असंयम आदि ऐसे ही अवाँछनीय तत्व हैं, जो हमारे शरीर चुम्बकत्व को−जीवनी शक्ति को लगातार घटाते रहते हैं। यदि इस ऊर्जा को बढ़ाया जा सके, तो कोई कारण नहीं कि हमारी शारीरिक−मानसिक स्वस्थता न बढ़ सके हम अक्षुण्ण स्वास्थ्य न प्राप्त कर सकें। इतना ही नहीं, फिर हम चाहे कितने ही न्यून भू−चुम्बकीय क्षेत्र में चले जायँ, उससे हमारा स्वास्थ्य सर्वथा अप्रभावित ही रहेगा और किसी प्रकार के अवाँछित असर उत्पन्न करने में वह एकदम विफल बन जायेगा। कहावत है कि निर्बल को सभी सताते हैं, पर सबल का सामना करने से कतराते हैं।
उपासना का आरंभिक शिक्षा सत्र है। यह चित्त शुद्धि का मानसिक परिष्कार का सरल साधन है। इसमें अपने इष्टदेव का ध्यान सुविधाजनक होता है निराकार उपासना कष्टसाध्य है जैसा कि कृष्ण भगवान ने गीता 15-5-6 में निर्देश दिया है कि जो सबके मूल अचल अव्यक्त सर्वव्यापी अचिन्त्य ओर नित्य अक्षर ब्रह्म की उपासना सब इन्द्रियों को रोककर सर्वत्र सम बुद्धि रखते हुये करते है वे भी मुझे ही पाते है। परन्तु उनके चित्त अव्यक्त में आसक्त रहने के कारण उनको क्लेश अधिक होते है क्योंकि अव्यक्त उपासना का मार्ग कष्ट से सिद्ध होता है। इसका अभिप्राय यह है कि साधक सब इन्द्रियों को जीतकर और सभी प्राणियों के प्रति सम बुद्धि व्यावहारिक भावना बनाकर ही उस निराकार उपासना का अधिकारी बनता है।
उपासना चिनगारी है−साधना ईंधन। उपासना संकल्प है−साधना साहस। उपासना ज्ञान है−साधना−कर्म। उपासना उपकरण है−साधना कौशल। उपासना बाण है−साधना धनुष।
उपासना, साधना यज्ञ के साथ ही होता है। प्रसूति गृह से अखंड अग्नि की स्थापना के साथ हिन्दू बालक का जन्म होता है और जीवन लीला समाप्त होने पर यज्ञ भगवान को अन्त्येष्टि संस्कार के साथ शरीर सौंप दिया जाता है। यज्ञ को इतना महत्व ऋषियों ने इसलिये दिया था कि वह न केवल अनेकों भौतिक शक्तियों को देने वाला है, वरन् आत्मा का कल्याण करने वाला शरीर और मन को निर्मल, निर्विकार बनाकर शांतिदायक परिस्थितियाँ उत्पन्न करने वाला भी है।
उपासनाओं का विधान और प्रकार भिन्न−भिन्न रहने पर भी सभी साधकों को अपने चिंतन को उदात्त और चरित्र को उदार बनाना पड़ा है। व्यक्तित्व के परिष्कार और उदार लोकमंगल को अपनी प्रधान आकाँक्षा मानकर चलने वाले और इसके लिये प्रबल पुरुषार्थ करने वाले ही अपनी पात्रता उस स्तर तक पहुँचा सके हैं, जिस पर अंतरिक्ष से अनायास ही दिव्य अनुदान बरसते हैं।
उपासना करते हुए 55 साल में हमने यह पाया और यह किया। तो महाराज हमें भी मिल सकती है? इसीलिए तो तुम्हें बुलाया है। जो हमारे लिए संभव है वह आपके लिए भी है। गायत्री आपके ऊपर भी कृपा कर सकती है।
उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त समझने वाले जानते हैं कि आस्तिकता की सफलता के साथ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश होने की शर्त भी जुड़ी हुई है।
उपासना करते हैं। इन जड़ पदार्थों में स्वयमेव कोई शक्ति नहीं है। उस आद्यशक्ति के कारण ही इनमें प्राणप्रद गुणों का समावेश हो पाया है। ईश्वर निराकार है। वह स्थूल नेत्रों से दिखाई नहीं देता।
उपासना का प्रतिपादन करते हैं। अग्नि उपासना से सम्बन्धित उनमें सैकड़ों मंत्र उपलब्ध हैं। ऋग्वेद के श्लोक 1/14/4 एवं 4/45/1 में उल्लेख है कि “अग्नि से परमात्मा प्रसन्न होते हैं। अग्नि उपासना के बिना मुक्ति की प्राप्ति असंभव है।” इसी तरह अथर्ववेद 6/65 में कहा गया है-”अग्नि उपासक के हृदय में परमात्मा का तेज प्रकाशित होता है।
उपासना संकल्प है−साधना साहस। उपासना ज्ञान है−साधना−कर्म। उपासना उपकरण है−साधना कौशल। उपासना बाण है−साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
उपासना करने में सदैव संलग्न रहता था। योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे, वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। यह निर्विवाद है।
उपासना से कोई लाभ न होगा, क्योंकि उसकी अन्तः चेतना का इतना विकास नहीं हुआ है कि ईश्वर के वास्तविक निराकार तत्व को समझ सके। यदि एक निर्बल बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति से यह कहा जाय कि ईश्वर सर्वव्यापक है परन्तु वह इन स्थूल नेत्रों से दृष्टिगोचर नहीं होता उसका कोई रंगरूप नहीं है तो निश्चित रूप से उसकी बुद्धि ईश्वर के अस्तित्व को ही मानने से इनकार कर देंगी।
उपासना में चला गया। इस तरह एक आदमी ने पूरा का पूरा श्रम गायत्री उपासना में किया।
उपासना के बिना मुक्ति की प्राप्ति असंभव है।” इसी तरह अथर्ववेद 6/65 में कहा गया है-”अग्नि उपासक के हृदय में परमात्मा का तेज प्रकाशित होता है। अन्य शास्त्रों में अग्नि को ब्रह्मरूप कहा गया है, परन्तु अग्नि तो जड़ है। उसके माध्यम से चैतन्य की प्रसन्नता प्राप्त करने में साधक कैसे सफल हो सकता है। अग्नि स्थूल पदार्थों को सूक्ष्म बनाकर देवताओं को अर्पण करती है।
उपासना कीजिये, नहीं होगी तो मना कर देंगे।
उपासना कष्टसाध्य है जैसा कि कृष्ण भगवान ने गीता 15-5-6 में निर्देश दिया है कि जो सबके मूल अचल अव्यक्त सर्वव्यापी अचिन्त्य ओर नित्य अक्षर ब्रह्म की उपासना सब इन्द्रियों को रोककर सर्वत्र सम बुद्धि रखते हुये करते है वे भी मुझे ही पाते है। परन्तु उनके चित्त अव्यक्त में आसक्त रहने के कारण उनको क्लेश अधिक होते है क्योंकि अव्यक्त उपासना का मार्ग कष्ट से सिद्ध होता है। इसका अभिप्राय यह है कि साधक सब इन्द्रियों को जीतकर और सभी प्राणियों के प्रति सम बुद्धि व्यावहारिक भावना बनाकर ही उस निराकार उपासना का अधिकारी बनता है। यदि आरंभिक साधक के लिए सूक्ष्म और असीम की उपासना निर्धारित कर दी जाय तो वह अंधकार में ही टटोलता रहेगा और भटक जायेगा। क्योंकि केनोपनिषद 1/3 के अनुसार वहाँ न तो चक्षु पहुँचता है, व वाणी पहुँचती है और न मन ही पहुँच सकता है।
उपासना का साधना के साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध है। साधना के बिना उपासना का कोई चमत्कार दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। इसलिये अनुष्ठान उपचार का महत्व स्वीकार करते हुए भी इस आवश्यकता को भी समझा जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिये उपासनात्मक उपचारों से भी अधिक महत्व साधक के चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश होने का है। साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती।
उपासना का अधिकारी बनता है। यदि आरंभिक साधक के लिए सूक्ष्म और असीम की उपासना निर्धारित कर दी जाय तो वह अंधकार में ही टटोलता रहेगा और भटक जायेगा। क्योंकि केनोपनिषद 1/3 के अनुसार वहाँ न तो चक्षु पहुँचता है, व वाणी पहुँचती है और न मन ही पहुँच सकता है। वह ज्ञात पदार्थों से भिन्न है और अज्ञात से भी परे है। ऐसी स्थिति में तत्ववेत्ता ऋषियों ने निश्चय किया कि सीमित बुद्धि वाले साधक सीधे असीम की उपासना करने से ही असीम तक पहुँच पायेंगे।
उपासना के पीछे एक सुदृढ़ मनोविज्ञान काम करता है। मनोविज्ञानी भी मूर्ति की आवश्यकता को अनुभव करते हैं और मानते हैं कि असीम ही सीमित होकर प्रदर्शित होता है। सुविख्यात मनोविज्ञानी कार्लाइल के अनुसार वास्तविक प्रतीक में जिसे ऐसा सम्बोधन किया जाता है, सदैव स्पष्ट और प्रत्यक्ष रूप से असीम का रहस्योद्घाटन होता है। इसमें निराकार का संयोजन साकार में होता है जिससे वह दृष्टिगत हो सके और प्राप्त हो सके। विद्वान अर्बन ने भी अपनी कृति-”लैग्वेज ऐण्ड रियलिटी” में प्रतिमा उपासना के लाभों का विवेचन करते हुए लिखा है कि धार्मिक प्रतीक या प्रतिमायें सीमित और अन्तरदृश्ट्यात्मक सम्बन्धों से उद्भूत की गयी है।
उपासना में किया।
उपासना के पश्चात् संशोधन के पश्चात् तीस साल और हो गये जब से गायत्री के प्रचार का कार्य हमने लिया और जब हमको हमारी जीवात्मा ने यह आज्ञा दी कि यह काम की चीज है, उपयोगी चीज है- लाभदायक चीज है इसको लोगों को बताया जाना चाहिए और समझाया जाना चाहिए। जो जितना अधिकारी हो उसे उतनी ही खुराक दी जानी चाहिए। हम उपासना सिखाते रहे हैं, छोटी खुराक वालों को छोटी मात्रा देते रहे हैं, बड़ों को बड़ी मात्रा। हमने छोटे बच्चों को दूध में पानी मिले हुए से लेकर के बड़ों को घी और शक्कर मिली हुई खुराक तक विभिन्न लोगों को दी है तीस सालों में। इन तीस सालों में हमारा विश्वास अटूट होता चला गया है, श्रद्धा मजबूत होती चली गयी है।
उपासना विज्ञान के अनुसार उपयोग किया जाय तो शरीर और में भरी हुई अलौकिक शक्तियां अपने अपने ढंग से अपने-अपने समय पर स्वयमेव उद्भूत होती जाती हैं। आध्यात्मिक गुणों की तेजी से अभिवृद्धि होती हैं, बुद्धि तीव्र होती है तथा ऐसी दूरदर्शिता का विकास होता है जिसके आधार पर जीवन समस्या की अनेक गुत्थियों को सरल किया जा सके।
उपासना सब इन्द्रियों को रोककर सर्वत्र सम बुद्धि रखते हुये करते है वे भी मुझे ही पाते है। परन्तु उनके चित्त अव्यक्त में आसक्त रहने के कारण उनको क्लेश अधिक होते है क्योंकि अव्यक्त उपासना का मार्ग कष्ट से सिद्ध होता है। इसका अभिप्राय यह है कि साधक सब इन्द्रियों को जीतकर और सभी प्राणियों के प्रति सम बुद्धि व्यावहारिक भावना बनाकर ही उस निराकार उपासना का अधिकारी बनता है। यदि आरंभिक साधक के लिए सूक्ष्म और असीम की उपासना निर्धारित कर दी जाय तो वह अंधकार में ही टटोलता रहेगा और भटक जायेगा। क्योंकि केनोपनिषद 1/3 के अनुसार वहाँ न तो चक्षु पहुँचता है, व वाणी पहुँचती है और न मन ही पहुँच सकता है।
उपासना का मार्ग कष्ट से सिद्ध होता है। इसका अभिप्राय यह है कि साधक सब इन्द्रियों को जीतकर और सभी प्राणियों के प्रति सम बुद्धि व्यावहारिक भावना बनाकर ही उस निराकार उपासना का अधिकारी बनता है। यदि आरंभिक साधक के लिए सूक्ष्म और असीम की उपासना निर्धारित कर दी जाय तो वह अंधकार में ही टटोलता रहेगा और भटक जायेगा। क्योंकि केनोपनिषद 1/3 के अनुसार वहाँ न तो चक्षु पहुँचता है, व वाणी पहुँचती है और न मन ही पहुँच सकता है। वह ज्ञात पदार्थों से भिन्न है और अज्ञात से भी परे है।
उपासना शरीर है−साधना प्राण। उपासना चिनगारी है−साधना ईंधन। उपासना संकल्प है−साधना साहस। उपासना ज्ञान है−साधना−कर्म। उपासना उपकरण है−साधना कौशल।
उपासना उपकरण है−साधना कौशल। उपासना बाण है−साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
उपासना का स्तर स्थूल से सूक्ष्म हो जाता है तब वह निराकार तत्व की उपासना के योग्य होता है क्योंकि स्तर की अनुकूलता में ही शक्ति के विकास का रहस्य निहित है। स्तर की प्रतिकूलता में अच्छे परिणामों की आशा करना असंभव है। यह भी ठीक है कि प्रतिमा पूजा से अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचना संभव नहीं क्योंकि ईश्वर सूक्ष्म है और सूक्ष्म को प्राप्त करने के लिये उससे एकाकार होने के लिये अपनी अन्तःचेतना का उतना ही सूक्ष्म बनाना होगा जितना कि वह है अन्यथा अपने लक्ष्य में निराशा ही होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-May
उपासना और जीवन-साधना का अंतर भली प्रकार समझना होगा। उनसे कहा जाएगा कि वे भले ही उपासना, कर्मकाँड और मंत्र आदि से कोई भी अपनाएं, लेकिन उपासना की शक्ति से आत्मपरिष्कार और लोककल्याण का भाव बनाए रखें । इसके लिए साधनावर्ष के लिए निर्धारित साधनाक्रम की पुस्तिका में दिए गए मार्गदर्शन का लाभ उठाया और दिया जा सकता है। साधकों को उनकी मनः स्थिति और परिस्थिति के अनुसार उपासनाक्रम एवं शेष दिन के लिए सुझाए गए साधना के विभिन्न चरणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सृजनशिल्पियों-युग साधकों को अपनी क्षमता और कौशल में इतना विकास करना है कि किसी भी उपासनापद्धति से जुड़े नैष्ठिकों को जीवन-साधना हेतु प्रेरित करके उन्हें नवसृजन के लिए विकसित करने का चक्र चला सके।
उपासना के द्वारा आपको ढालना चाहते हैं । आपको हम तपाना चाहते हैं। इसी लिए हम आपसे हर काम स्वयं करने के लिए कहते हैं, जैसे कि अपनी थाली आप धोइये, झाडू अपने आप लगाइए। क्या मतलब है इसका ? इसका एक ही मतलब है कि आपको उसी तरह से तपाना है, जिस तरीके से आग में सोना तपता है, तो तरह-तरह के आभूषण बनते हुए चले जाते हैं।
उपासना की हमारे अंदर जल रही है और जो गुरुजी के अंदर जल रही थी, उसमें से चिंगारी का एक कण छोटा सा आप भी लेकर जाइए, ताकि आप भी धन्य होते चले जाएँ।
उपासना की भट्टी में तपते हुए चले जाएं और ऐसे कुँदन बन जाएँ जिनका कि कहना ही क्या। कहते हैं कि पारस को छूकर लोहा सोना बन जाता है। आप भी बन सकते हैं। उस मंत्र रूपी पारस को छूकर। इस गायत्री मंत्र से आप ऐसे बनते हुए चले जाएंगे जैसे कि एक संत थे।
उपासना करने को मिली, इसका महत्व क्यों नहीं समझ रहे हैं आप ? आप वहाँ से पत्र डालते हैं कि माताजी हमारा दोष परिमार्जन कर देना, हम अनुष्ठान कर रहे हैं । तो जब आप यहाँ कर रहे हैं हमारे पास तो कितने भाग्यशाली हैं आप। इसे आप क्यों नहीं समझते । आप इसको समझिए।
उपासनापद्धति से जुड़े नैष्ठिकों को जीवन-साधना हेतु प्रेरित करके उन्हें नवसृजन के लिए विकसित करने का चक्र चला सके।
उपासना करते हैं तो हमें शंकर भक्ति के साथ भूत-पलीत लोगों की अर्थात् गए-गुजरे लोगों की, गरीब एवं पिछड़े लोगों की भी हमें सेवा करने को लिए तैयार रहना चाहिए। जिनकी समझदारी कम है, उनको ऊँचा उठाना चाहिए। उनकी सेवा करनी चाहिए। शास्त्र में कहा गया है-’भज सेवायाम्’ अर्थात् हमें भजन के साथ सेवा भी करनी चाहिए। दोनों एक ही चीज हैं।
उपासना, कर्मकाँड और मंत्र आदि से कोई भी अपनाएं, लेकिन उपासना की शक्ति से आत्मपरिष्कार और लोककल्याण का भाव बनाए रखें । इसके लिए साधनावर्ष के लिए निर्धारित साधनाक्रम की पुस्तिका में दिए गए मार्गदर्शन का लाभ उठाया और दिया जा सकता है। साधकों को उनकी मनः स्थिति और परिस्थिति के अनुसार उपासनाक्रम एवं शेष दिन के लिए सुझाए गए साधना के विभिन्न चरणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सृजनशिल्पियों-युग साधकों को अपनी क्षमता और कौशल में इतना विकास करना है कि किसी भी उपासनापद्धति से जुड़े नैष्ठिकों को जीवन-साधना हेतु प्रेरित करके उन्हें नवसृजन के लिए विकसित करने का चक्र चला सके।
उपासना गायत्री-साधना के ‘भर्ग’ पर ध्यान केंद्रित कर कषाय-कल्मषों से मुक्त, पापरहित अंतःकरण वाला बना सके। इसी प्रारंभिक उपदेश में भगवान दो प्रकार की निष्ठाओं की बात करते हैं। ‘निष्ठा’ शब्द को प्रयोग यहाँ साधना की पराकाष्ठा के संदर्भ में किया गया है। निष्ठा ही आस्तिकता का प्राण है। वे कहते हैं कि निष्ठाओं में एक ज्ञानयोग से सधती है, दूसरी कर्मयोग से ।
उपासना की शक्ति से आत्मपरिष्कार और लोककल्याण का भाव बनाए रखें । इसके लिए साधनावर्ष के लिए निर्धारित साधनाक्रम की पुस्तिका में दिए गए मार्गदर्शन का लाभ उठाया और दिया जा सकता है। साधकों को उनकी मनः स्थिति और परिस्थिति के अनुसार उपासनाक्रम एवं शेष दिन के लिए सुझाए गए साधना के विभिन्न चरणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सृजनशिल्पियों-युग साधकों को अपनी क्षमता और कौशल में इतना विकास करना है कि किसी भी उपासनापद्धति से जुड़े नैष्ठिकों को जीवन-साधना हेतु प्रेरित करके उन्हें नवसृजन के लिए विकसित करने का चक्र चला सके।
उपासना से, अपनी साधना से बनाया है। इस वातावरण के लिए लोग तरसते हैं। आपको जो यहाँ नौ दिन की उपासना के लिए स्थान ही नहीं वरन् पिता और माता की छत्रछाया में आपको उपासना करने को मिली, इसका महत्व क्यों नहीं समझ रहे हैं आप ? आप वहाँ से पत्र डालते हैं कि माताजी हमारा दोष परिमार्जन कर देना, हम अनुष्ठान कर रहे हैं । तो जब आप यहाँ कर रहे हैं हमारे पास तो कितने भाग्यशाली हैं आप।
उपासना के लिए स्थान ही नहीं वरन् पिता और माता की छत्रछाया में आपको उपासना करने को मिली, इसका महत्व क्यों नहीं समझ रहे हैं आप ? आप वहाँ से पत्र डालते हैं कि माताजी हमारा दोष परिमार्जन कर देना, हम अनुष्ठान कर रहे हैं । तो जब आप यहाँ कर रहे हैं हमारे पास तो कितने भाग्यशाली हैं आप। इसे आप क्यों नहीं समझते । आप इसको समझिए।
उपासनापद्धति को मानने वाला हो,उसे युगसाधना के लिए सहमत करना जरा भी कठिन नहीं है। लेकिन इसके लिए उन्हें जप-पूजा, कर्मकाँड, उपासना और जीवन-साधना का अंतर भली प्रकार समझना होगा। उनसे कहा जाएगा कि वे भले ही उपासना, कर्मकाँड और मंत्र आदि से कोई भी अपनाएं, लेकिन उपासना की शक्ति से आत्मपरिष्कार और लोककल्याण का भाव बनाए रखें । इसके लिए साधनावर्ष के लिए निर्धारित साधनाक्रम की पुस्तिका में दिए गए मार्गदर्शन का लाभ उठाया और दिया जा सकता है। साधकों को उनकी मनः स्थिति और परिस्थिति के अनुसार उपासनाक्रम एवं शेष दिन के लिए सुझाए गए साधना के विभिन्न चरणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
उपासना सफल तभी होगी, जब आप पूरे मनोयोग से इस वातावरण का लाभ उठाएंगे। आप यहाँ कमियाँ मत देखिए। भोजन में कमियाँ मत देखिए। यह यहाँ का प्रसाद है। इस प्रसाद में आपकी माँ के हाथ का गंगाजल मिला हुआ है।
उपासनाक्रम एवं शेष दिन के लिए सुझाए गए साधना के विभिन्न चरणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सृजनशिल्पियों-युग साधकों को अपनी क्षमता और कौशल में इतना विकास करना है कि किसी भी उपासनापद्धति से जुड़े नैष्ठिकों को जीवन-साधना हेतु प्रेरित करके उन्हें नवसृजन के लिए विकसित करने का चक्र चला सके।
उपासना की संपत्ति, वो है सेवा की संपत्ति, वो है साधना की संपत्ति वही हम आपको देना चाहते हैं। आप लोगों का नवरात्रि अनुष्ठान सफल हो, इसी कामना के साथ आज ही बात समाप्त।
उपासना के समय, भक्ति के समय आपने कोई मूर्ति या चित्र रखा है तो इसमें कोई हर्ज की बात नहीं है, परंतु आप भगवान को आदर्श एवं सिद्धाँतों का समुच्चय मानिए। आपने अगर भगवान शंकर को व्यक्ति विशेष माना है, तो आप भ्रम जंजाल में पड़ जाएंगे। अगर शंकर भगवान को ऐसा माना है कि वह व्यक्ति है, जो बैल पर बैठकर इधर-उधर घूमता रहता है। बेल का पता, आक का पत्ता, धतूरे का फूल खाता रहता है। उसके माथे पर चंद्रमा है, सिर से गंगा निकल रही है तथा भूत-प्रेत उसके साथ रहते हैं।
उपासना करने के लिए, साधना करने के लिए, लेखन करने के लिए गए हैं। अगर मैं उन्हें नहीं जाने देती, तो आपे ये कहते कि माताजी बड़ी स्वार्थी हो गई हैं और उनको आगे नहीं बढ़ने दिया। नहीं ये मेरा कर्त्तव्य नहीं है।
उपासना के बारे में मुझे कहना था कि इस नवरात्रि में आप नौ दिन तक यह मानकर चलिए कि आपका न कोई घर है, न गृहस्थी है, केवल आपमी माँ की गोद है। आप उस माँ की गोदी में खेल रहे हैं एक शिशु की भाँति। अपनी कोई भी मनोकामना नहीं है। मनोकामना को आप छोड़ दीजिए।यदि आपकी कोई मदद कर सकते होंगे तो हम अवश्य करेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-January
उपासना करो, यह आभ्यंतर उपासना है और आकाश की ब्रह्मरूप से उपासना अधिदैविक है। मन आभ्यंतर प्रतीक है और आकाश ब्रह्म । इन दोनों की उपासना ब्रह्म के रूप में करनी होगी। श्री अरविंद के अनुसार प्रत्येक पदार्थ किसी उच्चतर सत्य का प्रतीक है।
उपासना है और आकाश की ब्रह्मरूप से उपासना अधिदैविक है। मन आभ्यंतर प्रतीक है और आकाश ब्रह्म । इन दोनों की उपासना ब्रह्म के रूप में करनी होगी। श्री अरविंद के अनुसार प्रत्येक पदार्थ किसी उच्चतर सत्य का प्रतीक है।
उपासना अधिदैविक है। मन आभ्यंतर प्रतीक है और आकाश ब्रह्म । इन दोनों की उपासना ब्रह्म के रूप में करनी होगी। श्री अरविंद के अनुसार प्रत्येक पदार्थ किसी उच्चतर सत्य का प्रतीक है।
उपासना के लिए प्रतीक ऐसे हों, जो ब्रह्म के स्वरूप का बोध करा सकें। उस परमसत्य की ओर इंगित कर सकें। सच तो यह है कि परमात्मा का सबसे सार्थक प्रतीक तो स्वयं विश्व ही है, जिसके द्वारा हम उसके परे विश्वात्मा को जानने , उसका बोध पाने का प्रयत्न किसी -न किसी रूप में, अपनी किसी न किसी क्रिया के माध्यम से करते रहते हैं।
उपासना के क्षेत्र में भी है। उनके अनुसार उपासना के लिए प्रतीक ऐसे हों, जो ब्रह्म के स्वरूप का बोध करा सकें। उस परमसत्य की ओर इंगित कर सकें। सच तो यह है कि परमात्मा का सबसे सार्थक प्रतीक तो स्वयं विश्व ही है, जिसके द्वारा हम उसके परे विश्वात्मा को जानने , उसका बोध पाने का प्रयत्न किसी -न किसी रूप में, अपनी किसी न किसी क्रिया के माध्यम से करते रहते हैं।
उपासना व अभ्यर्थना की जाती थी और इसीलिए निश्चित तौर पर समस्त सृष्टि में सुख-शाँति व समृद्धि का वातावरण था।
उपासना के लिए प्रयुक्त भिन्न देवी देवताओं के चित्र एवं मूर्तियों के पीछे यही तथ्य काम करता है। ऋषिगण स्थूल सीमाओं का अतिक्रमण कर गए थे तथा मन के उस पार भाव जगत् के सत्यों को उनके प्रतीकों से संबंधित करते थे। इस प्रकार जिस प्रतीक का जिस भाव से संबंध है। वह उसी भाव का नित्य प्रतीक है, क्योंकि मन में उस प्रतीक से वही भाव का नित्य प्रतीक है। नित्य प्रतीक कई प्रकार के होते हैं- चिह्न प्रतीक , शस्त्र प्रतीक, वृक्ष प्रतीक , वेश प्रतीक आदि।
उपासना के भाव वर्णित हैं। इसमें वनस्पतियों और पशुजगत तथा औषधि विज्ञान के सुँदर मंत्रों के उद्धरण हैं। सामवेद कहता है -इंद्र ! सूर्य रश्मियों और वायु से हमारे लिए औषधि की उत्पत्ति करो। हे सोम! आपने ही औषधियों, जलों और पशुओं को उत्पन्न किया है। अथर्ववेद में भी पर्यावरण संरक्षण और संवर्द्धन संबंधी चिंतन का गौरवगान हुआ है।
उपासना पद्धतियों में किया जाता है। सत, रज, तम - त्रिविध गुणों के आधार पर रंग। प्रतीक होते हैं। श्वेत रंग मतोगुणी है और यह प्रतिभा , यश शाँति सत्य व धर्म का प्रतीक है। लाल रंग रजोगुण का संकेत करता है।
उपासना कर रहे साधक श्रीराम के पिताजी की आँवलखेड़ा स्थित हवेली के कक्ष (जो एक स्मारक के रूप में आज विनिर्मित है) में दीपक के प्रकाश से एक ज्योति पुरुष प्रकट हुए व उन्होंने अपने शिष्य को सूक्ष्मशरीर से दीक्षा दी,विगत जन्मों की जानकारी कराई व भविष्य में क्या कुछ किया जाना है, इस संबंध में विस्तृत मार्गदर्शन दिया। उन्होंने तीन महत्त्वपूर्ण निर्देश दिए- 1. अखण्ड दीपक जिसमें से उनका प्रकाश शरीर प्रकटा था, निरंतर प्रज्वलित रखना, अखण्ड यज्ञ के रूप में संचालन किया जाना तथा उसके प्रकाश में ही भविष्य के सभी निर्णय लिए जाना। इसी ज्योति के ज्ञान शरीर रूप में ‘अखण्ड दीपक जिसमें से उनका प्रकाश शरीर प्रकटा था, निरंतर प्रज्वलित रखना, अखण्ड यज्ञ के रूप में उसका संचालन किया जाना तथा उसके प्रकाश में ही भविष्य के सभी निर्णय लिए जाना। इसी ज्योति के ज्ञान शरीर रूप में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को समय आने पर प्राण चेतना के संदेशवाहक के रूप में क्राँतिकारी चिंतन प्रसारित कर राष्ट्र की स्वतंत्रता की आधारशिला के रूप में प्रकाशित किया जाना।
उपासना ब्रह्म के रूप में करनी होगी। श्री अरविंद के अनुसार प्रत्येक पदार्थ किसी उच्चतर सत्य का प्रतीक है।
उपासना के यंत्र सामुद्रिक शास्त्र के त्रिभुज , चतुर्भुज अक्षर आदि आते हैं। ये प्रकृति के मूल अर्थ से संबंधित हैं। तंत्र में वज्र शक्ति को अभिव्यक्ति करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-June
उपासना में शामिल सभी साधक एक ही उद्देश्य के लिए एकत्र होते हैं। सबकी मनः स्थिति प्रायः एक ही दिशाधारा लिए होती है। आँतरिक स्तर में भले ही अंतर हो,लेकिन संकल्प चिंतन और चर्या का निर्धारण समान ही रहता है। सब मिलकर उपासनास्थली में जैसा वातावरण बनाते हैं। वह एकाँत सेवन की तुलना में कई गुना लाभकारी है।
उपासना का वह पहला स्वरूप में पाँच वक्त या तीन वक्त या दो वक्त की नमाज के लिए समय निश्चित है। पाँचों वक्त की नमाज सभी जगह निश्चित समय पर ही पढ़ी जाती है।इस तरह की सामूहिक उपासनाओं में स्थान का लोप होने पर भी काल और क्रिया का लोप नहीं होता। तीन में से दो आधार पूरे होने पर विधान का पूरा पालन हुआ मान लिया जाता है।
उपासनाओं में स्थान का लोप होने पर भी काल और क्रिया का लोप नहीं होता। तीन में से दो आधार पूरे होने पर विधान का पूरा पालन हुआ मान लिया जाता है।
उपासना का उद्देश्य है- आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ देना। आत्मा अर्थात् अंतःकरण, भाव-संस्थान जिसके साथ मान्यताएँ, आकाँक्षाएँ लिपटी रहती हैं। परमात्मा अर्थात् उत्कृष्ट आदर्शवादिता। इन दोनों के मिलन में यदि को सहायक हो समता है, तो वह सद्गुरु ही हैं। ऐसे ही सद्गुरु का मार्गदर्शन जब-जब भी गायत्री साधकों को मिला है, उनका उच्चस्तरीय विकास होता ही चला गया है।
उपासना महीने भर तक किए गए एकाँत सेवन के बराबर परिणाम उत्पन्न करती है।
उपासना के क्षेत्र में वही ग्रहण किया जाना चाहिए। आध्यात्मिक अर्थ यह है कि सामान्य मनोभूमि सामान्य संकल्प और औसत अभीप्सा के लोग एक साथ संकल्प करें तो भी भगवान की शक्तियाँ सक्रिय हो उठती है। उनके अनुग्रह अनुदान बरसने लगते हैं और सामान्य लोगों के लिए वह आच्छादन मिल जाता है। जो नहीं मिलता तो संभव है कि भारी अनर्थ हो जाता।
उपासना के क्षेत्र में नए प्रयोग भी किए है। भावातीत ध्यान आँदोलन के प्रवर्तक महर्षि महेश योगी के अनुसार एक निश्चित समय पर निश्चित लोग निश्चित पद्धति से ध्यान करने लगें तो सूक्ष्मजगत में अनुकूल परिवर्तन किए जा सकते हैं। उनके अनुसार कुल संख्या के दो प्रतिशत लोग भी इस प्रयोग के लिए तैयार हो तो नई सभ्यता के विकास की आशा की जा सकती है। पूर्ण योग के आविष्कर्त्ता श्री अरविंद ने कई बार लिखा है कि अतिमानस (दिव्यचेतना का विशिष्ट स्तर) के अवतरण कि लिए सभी लोग प्रयास करें यह जरूरी नहीं है। थोड़ी से लोग पूरी संकल्पशक्ति आकांक्षा करें और थोड़ी देर के लिए ध्यान के प्रयोग में उतरे तो अपनी सभ्यता को उच्चशिखरों पर पहुंचाया जा सकता है।
उपासना है। हमें वेद के लुप्तप्राय रहस्यों को पुनः जनता के सामने रखना है। सत्य सदा सत्य है। भारतीय संस्कृति के मूलभूत आधार को हमें अब प्रकाश में लाने का तत्परता-पूर्वक प्रयत्न करना है। ऐसे बरसाती मेढ़क उस गंगा की धारा को रोकने में तनिक भी समर्थ नहीं हो सकते।
उपासना करके संसार को ज्ञान-विज्ञान की आभा से आलोकित किया था। प्राचीन भारत में जो महानता थी, उसके मूल में साधना से उत्पन्न आत्म-शक्ति ही प्रधान थी। तब यह देश अपने आचरण और आँतरिक बल के कारण संसार का प्रकाश-स्तंभ ध्रुवतारा बना हुआ था और जगद्गुरु कहलाता था। इस रूप में इसकी भावी प्रतिष्ठा का आधार भी यही होगा।
उपासना का अपना एक विज्ञान है। बड़े यज्ञों और धर्म अनुष्ठानों में इसका विज्ञान पक्ष स्वयं सिद्ध होता है। गहन आस्था संकट के दौर में विशिष्ट प्रयासों का भी विधान है। इन प्रयासों के सहारे पूरा समाज जाति और राष्ट्र भी तर जाते हैं। यह तरना सम्मिलित प्रयत्नों से नाव बनाकर पार उतरने जैसा है।
उपासनाओं ने इन आवश्यकताओं को अनायास ही पूरा कर दिया। एकाँतसेवन विजातीय प्रभावों से मुक्त रहने के लिए किया जाता है। सामूहिक उपासना में शामिल सभी साधक एक ही उद्देश्य के लिए एकत्र होते हैं। सबकी मनः स्थिति प्रायः एक ही दिशाधारा लिए होती है। आँतरिक स्तर में भले ही अंतर हो,लेकिन संकल्प चिंतन और चर्या का निर्धारण समान ही रहता है।
उपासना का नाम दिया जा सकता है। इन दिनों मानव सभ्यता आस्था संकट के दौर से गुजर रही है। इस कारण तनाव कुंठा निराशा क्षोभ हिंसा विग्रह रोग शोक जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही है। उन्हें आसमान फट पड़ने की तरह देख जा सकता है। विनाश चारों ओर से उमड़ रहा है।
उपासना के सूक्ष्म रहस्य अलग है, लेकिन सामूहिकता की दृष्टि भी यह क्रम अपनी तरह का है। बाद में दूसरे धर्म संप्रदायों ने भी सामूहिकता का यह स्वरूप अपनाया । गिरजों में रविवार के दिन अलग अलग स्थानों पर की जाने वाली प्रार्थनाएँ इसी आवश्यकता की पूर्ति करती थी। बौद्ध धर्म मानने वाले एशियाई देशों में वहाँ के भिक्षुओं स्थविरों लामाओं और योगियों ने प्रातः सायं ध्यान पर जोर दिया। इस्लाम के अनुयायी शुक्रवार के दिन मस्जिद में इकट्ठे होकर नमाज पढ़ते हैं।
उपासनास्थली में जैसा वातावरण बनाते हैं। वह एकाँत सेवन की तुलना में कई गुना लाभकारी है। सूक्ति की तरह कहना हो तो एक घंटा की गई सामूहिक उपासना महीने भर तक किए गए एकाँत सेवन के बराबर परिणाम उत्पन्न करती है।
उपासना इन्हीं देव संपत्तियों का केंद्र बिंदु है।”
उपासनाओं में भी यही नियम काम करता है।
उपासना भी प्राणवान हो उठती है।
उपासना-साधना-आराधना का त्रिविध अवलंबन लेने की बात आदिकाल से कहते रहे हैं। उपासना का उद्देश्य है- आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ देना। आत्मा अर्थात् अंतःकरण, भाव-संस्थान जिसके साथ मान्यताएँ, आकाँक्षाएँ लिपटी रहती हैं। परमात्मा अर्थात् उत्कृष्ट आदर्शवादिता। इन दोनों के मिलन में यदि को सहायक हो समता है, तो वह सद्गुरु ही हैं।
उपासना करनी चाहिए। विचार एवं श्रद्धापूर्वक असत् पदार्थों का बोध करके केवल अविनाशी सत्य में यत्नपूर्वक परिनिष्ठित होना चाहिए।
उपासना में निजी स्तर पर चलने वाली साधना-प्रक्रिया को विलक्षण ढंग से सरल बना दिया है। साधकों के लिए एकाँत में रहने वही भजन पूजन करने और आहार में सात्विकता के समावेश के लिए अपना भोजन स्वयं तैयार करने जैसे अनुशासन अपनाये जाते हैं। इन अनुशासन नियमों का एक ही उद्देश्य है कि साधक दुनियादारी अथवा बाहरी प्रभावों से यथासंभव बच्चा रहे। बाहरी प्रभाव ध्यान में विक्षेप लाते हैं। एकाँत में रहने की बात इसलिए कही जाती है।
उपासना का एक प्रकार है। एक अन्य स्वरूप एक ही समय में असंख्य लोगों द्वारा उपासना के लिए बैठने का भी है। सूर्य के उदय और अस्त होते समय किया जाने वाला संध्यावंदन गायत्री जप इसी स्तर का है। संध्या उपासना के सूक्ष्म रहस्य अलग है, लेकिन सामूहिकता की दृष्टि भी यह क्रम अपनी तरह का है। बाद में दूसरे धर्म संप्रदायों ने भी सामूहिकता का यह स्वरूप अपनाया ।
उपासना के लिए बैठने का भी है। सूर्य के उदय और अस्त होते समय किया जाने वाला संध्यावंदन गायत्री जप इसी स्तर का है। संध्या उपासना के सूक्ष्म रहस्य अलग है, लेकिन सामूहिकता की दृष्टि भी यह क्रम अपनी तरह का है। बाद में दूसरे धर्म संप्रदायों ने भी सामूहिकता का यह स्वरूप अपनाया । गिरजों में रविवार के दिन अलग अलग स्थानों पर की जाने वाली प्रार्थनाएँ इसी आवश्यकता की पूर्ति करती थी।
उपासना में कमजोर लोग भी सहज ही विकास करने लगते हैं। कोई वाहन या चालक यह तो नहीं देखता कि अमुक यात्री कमजोर है, इसलिए उसे धीरे धीरे ले जाएँ और कोई ज्यादा समर्थ है, तो उसे जल्दी मंजिल तक पहुंचा दे। सामूहिक उपासना को जीवंत और गतिमान बनाया जा सके, तो वह अक्षम -कमजोर साधकों का विकास भी उसी तेजी से करने लगती है, जितना की समर्थ साधकों को आगे बढ़ाती है। वाहन में सवार होना पर्याप्त नहीं है, उसमें गति भी आनी चाहिए। साधना में गति और ऊर्जा लाने के आपने नियम -विधान है, उन्हें संपन्न किया जाये, तो सामूहिक उपासना भी प्राणवान हो उठती है।
उपासना को जीवंत और गतिमान बनाया जा सके, तो वह अक्षम -कमजोर साधकों का विकास भी उसी तेजी से करने लगती है, जितना की समर्थ साधकों को आगे बढ़ाती है। वाहन में सवार होना पर्याप्त नहीं है, उसमें गति भी आनी चाहिए। साधना में गति और ऊर्जा लाने के आपने नियम -विधान है, उन्हें संपन्न किया जाये, तो सामूहिक उपासना भी प्राणवान हो उठती है।
उपासना एक उपाय है, जिसे समाज पर संरक्षक चेतना का आच्छादन लाने के लिए प्रयुक्त किया जाना चाहिए । इन प्रयत्नों को ग्वाल बालों की अलग अलग शक्ति का समुच्चय और उस रूप में किया गया एक आहान समझना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-July
उपासना और ज्ञान का स्वरूप बताया गया है। इसलिए वेद-शास्त्रों को निगम कहते हैं। उस स्वरूप को व्यवहार, आचरण और जीवन में उतारने वाले उपायों का रूप जो शास्त्र बताता है वह है, ‘अगम’।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-March
उपासना करनी चाहिए ।
उपासना, ध्यान जैसे आत्मोत्थानपरक उपचार नदियों, पहाड़ों पर करने का आप्तवचन है । आजकल इसकी उपेक्षा हो रही है, अतः उस लाभ से वंचित रह जाना पड़ता है ।
उपासना का ठीक तरीके से अवलंबन ले तो। कल का यह विषय था।
उपासना करती है। उपासना के बारे में जो हम कल कह रहे थे, वास्तव में वह आपको आत्मदेव है। अपने आपकी उपासना किया कीजिए। अपने आपकी उपासना जो कर लेते हैं वह अपने आप ही अपनी साधना से ही, अपने ही दबाव से भगवान बना लेते हैं। मीरा ने अपने ही दबाव से पत्थर को गिरिधर गोपाल बना लिया ओर एकलव्य ने अपने दबाव से ही मिट्टी के पुतले को द्रोणाचार्य बना दिया था और रामकृष्ण परमहंस ने अपने ही व्यक्तित्व के दबाव से पत्थर को काली बना दिया था।
उपासना के लिए प्रेरणा देता है ।
उपासना भगवान की की जाती है। प्रेम भगवान को किया जाता है पर भगवान तक सीमित नहीं रखा जाता। अखाड़े में कसरत करते तो है पर अखाड़े तक, उसकी कसरत की जो शक्ति-संचय है, उसको खर्च थोड़े ही कर देते हैं वह तो बाजार में करना पड़ता है, कही और करना पड़ता है भगवान की भक्ति का अभ्यास करते हैं, भगवान से हम प्रेम करते हैं, उपासना करते हैं। अगर उपासना के बाद में हमारी भक्ति का विकास हुआ हो, तब प्राणियों में इसका उपयोग करना पड़ेगा, मनुष्यों में उपयोग करना पड़ेगा, सबमें उपयोग करना पड़ेगा। प्यार से अपने आप को हरेक को सराबोर कर देना पड़ेगा।
उपासना जो कर लेते हैं वह अपने आप ही अपनी साधना से ही, अपने ही दबाव से भगवान बना लेते हैं। मीरा ने अपने ही दबाव से पत्थर को गिरिधर गोपाल बना लिया ओर एकलव्य ने अपने दबाव से ही मिट्टी के पुतले को द्रोणाचार्य बना दिया था और रामकृष्ण परमहंस ने अपने ही व्यक्तित्व के दबाव से पत्थर को काली बना दिया था। अपने आपके व्यक्तित्व का उजागर होना और स्वच्छ, निर्मल होना यह बहुत बड़ी बात है। इसके लिए आपको क्या करना चाहिए? चौबीसों घंटे आपको ध्यान रखना चाहिए।
उपासना करते हैं। अगर उपासना के बाद में हमारी भक्ति का विकास हुआ हो, तब प्राणियों में इसका उपयोग करना पड़ेगा, मनुष्यों में उपयोग करना पड़ेगा, सबमें उपयोग करना पड़ेगा। प्यार से अपने आप को हरेक को सराबोर कर देना पड़ेगा। प्यार अपने शरीर से कीजिए, ताकि इसको अच्छे तरीके से सुरक्षित रख सकें। प्यार अपनी अंतरात्मा से कीजिए।
उपासना के साथ ही उदीयमान स्वर्णिम सविता का ध्यान करते हैं ।
उपासनास्थलों का जब तुलनात्मक अध्ययन किया गया, तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ा कि उनमें से हरएक में सकारात्मक ऊर्जापुँज विद्यमान था और उनका स्तर सामान्य स्थानों की तुलना में काफी बढ़ा-चढ़ा था । उदाहरणार्थ, चर्च में क्रॉस के गिर्द लगभग 10000 बोविस ऊर्जा का पता चला । चर्च के घंटे से भी करीब इतनी ही ऊर्जा निकलती है । यह ऊर्जास्तर मानव−शरीर में हृदय के आसपास ‘अनाहत चक्र’ के समीप देखा गया । मस्जिदों में इसका स्तर 11000 बोविस रिकार्ड किया गया है, जो गले में स्थित ‘विशुद्धि चक्र’ की ऊर्जा के बराबर है ।
उपासना के बारे में जो हम कल कह रहे थे, वास्तव में वह आपको आत्मदेव है। अपने आपकी उपासना किया कीजिए। अपने आपकी उपासना जो कर लेते हैं वह अपने आप ही अपनी साधना से ही, अपने ही दबाव से भगवान बना लेते हैं। मीरा ने अपने ही दबाव से पत्थर को गिरिधर गोपाल बना लिया ओर एकलव्य ने अपने दबाव से ही मिट्टी के पुतले को द्रोणाचार्य बना दिया था और रामकृष्ण परमहंस ने अपने ही व्यक्तित्व के दबाव से पत्थर को काली बना दिया था। अपने आपके व्यक्तित्व का उजागर होना और स्वच्छ, निर्मल होना यह बहुत बड़ी बात है।
उपासना करते हैं ।”
उपासना और अपने आपको पात्र बनाने के लिए साधना। साधना किसकी? अपनी। अपनी से क्या मतलब? अपनी से मतलब यह है कि जो हमारे भीतर जन्म-जन्माँतरों के कुसंस्कार जमे पड़े हैं, उनका परिशोधन करना पड़ेगा, बचकानापन दूर करना पड़ेगा।
उपासना में गायत्री मंत्र का ही उपदेश दिया गया है । क्यों ? एक मुख्य कारण, अब तक करोड़ों साधकों द्वारा किया गया जप है, उन साधकों के जप से उद्भूत प्राणशक्ति का अंश आकाश में विद्यमान् रहता है । वह सतत् जप करने वाले साधकों को अनुप्राणित करता है ।
उपासना भगवान का अनुग्रह, भगवान के हाथ की बात है; पर साधना तो आपके हाथ की बात है। आपने आपको सुसंस्कारी बनाने के लिए जो भी मुमकिन हो, आप पूरी शक्ति से और पूरी ईमानदारी से मेहनत कीजिए। आपको अनगढ़ और सुगढ़ बनाना है। हमारा जीवन अनगढ़ है; चौरासी लाख योनियाँ घूमने के बाद में न जाने कितने कुसंस्कार हमारे पास जमा है। और वे कुसंस्कार अगर इसी तरीके से जमा रहे, तो दीवार के तरीके से खड़े रहेंगे और फिर हमको आगे नहीं बढ़ने देंगे और ये हथकड़ियों और बेड़ियों के तरीके से रास्ता रोक लेंगे, न हमको ऊँचा उठने देंगे, न आगे बढ़ने देंगे।
उपासना की महत्ता अपरंपार है। भगवान के नजदीक आप बैठें, उपासना करें, तो देखेंगे कि उनके सारे गुण आप में आते चले जाते है। बिजली को जो छूता है, तो उसके अंदर करेंट आ जाता है। भवान् को जो छुएगा, भगवान् से उसमें करेंट आ जाएगा। दो तालाबों को आपस में जोड़ दें, तो नीचे वाले तालाब का लेवल बढ़ता हुआ चला जाता है और दोनों का तल एक हो जाता है।
उपासना करें, तो देखेंगे कि उनके सारे गुण आप में आते चले जाते है। बिजली को जो छूता है, तो उसके अंदर करेंट आ जाता है। भवान् को जो छुएगा, भगवान् से उसमें करेंट आ जाएगा। दो तालाबों को आपस में जोड़ दें, तो नीचे वाले तालाब का लेवल बढ़ता हुआ चला जाता है और दोनों का तल एक हो जाता है। भगवान और भक्त एक हो जाते हैं।
उपासना स्थलियों में निवास करने से मन उत्फुल्लता से ओतप्रोत रहता है । चेतना विज्ञानियों का इस संबंध में मत है कि दीर्घकालीन मानवी गतिविधियाँ स्थानीय तरंगों की प्रकृति को अपने स्वभाव के अनुरूप प्रभावित-परिवर्तित करती या यों कहें कि उन पर हावी हो जाती है, तो अत्युक्ति न होगी । इस प्रकार किसी स्थान पर लंबे काल तक चलने वाले जप, तप, ध्यान, व्रत, अनुष्ठान वहाँ की तरंगों को अपने अनुरूप मोड़ लेते हैं । इसके विपरीत जहाँ हर प्रकार की दुरभिसंधियाँ रची जाती या हत्या, व्यभिचार, अत्याचार, उत्पीड़न जैसे पाप किए जाते अथवा उनकी योजनाएँ बनाई जाती है, वहाँ की अवाँछनीय तरंगें व्यक्ति के मन-मस्तिष्क पर सवार होकर उन्हें तद्नुरूप दुरित करने के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करती है ।
उपासना की इतनी महत्ता बताई गई है, ताकि उस प्रवाह का अधिकाधिक उपयोग स्वास्थ्य संवर्द्धन और आत्मिक उन्नयन की दिशा में किया जा सकें । मानवेत्तर प्राणी इस ऊर्जा ग्रिडस् के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं । अनुसंधानों से ज्ञात हुआ है कि चींटी, दीमक, सर्प जैसे जीवधारी सदा नकारात्मक ऊर्जाक्षेत्र में रहते हैं, जबकि कुत्ते, घोड़े, गाय, बकरी जैसे पालतू जीव सदैव सकारात्मक ऊर्जाक्षेत्र को पसंद करते और उसमें सुख अनुभव करते हैं । अध्ययनों से यह भी पता चला है कि भूकंप आने से लगभग बारह घंटे पूर्व टेलुरिक ग्रिडस् पृथ्वी के अंदर की भूकंपीय हलचलों को ग्रहण कर लेते हैं, जिसके कारण उसमें स्पष्ट रूप से परिवर्तन आ जाता है । मानवेत्तर प्राणी इस सूक्ष्म परिवर्तन को पकड़ लेते हैं ।
उपासना के माध्यम से साधक में इसी सविता शक्ति का अवतरण होता है । इसी से ब्रह्मतेजस् की प्राप्ति होती है ।
उपासना किया कीजिए। अपने आपकी उपासना जो कर लेते हैं वह अपने आप ही अपनी साधना से ही, अपने ही दबाव से भगवान बना लेते हैं। मीरा ने अपने ही दबाव से पत्थर को गिरिधर गोपाल बना लिया ओर एकलव्य ने अपने दबाव से ही मिट्टी के पुतले को द्रोणाचार्य बना दिया था और रामकृष्ण परमहंस ने अपने ही व्यक्तित्व के दबाव से पत्थर को काली बना दिया था। अपने आपके व्यक्तित्व का उजागर होना और स्वच्छ, निर्मल होना यह बहुत बड़ी बात है। इसके लिए आपको क्या करना चाहिए?
उपासना को बनाया है। ऋतंभरा-प्रज्ञा के अवतरण को पूज्यवर ने निष्कलंक अवतार का चेतनारूप में अंतरण बनाया है। उलटे को उलटकर सीधा करने वाली क्राँति विचारक्राँति सद्विचारों के क्राँतिधर्मी साहित्य के प्रचार-प्रसार से ही हो रही है। ढपली माध्यम बनी है। लोक गायन के माध्यम से धर्मधारणा के विस्तार में।
उपासना के बाद में हमारी भक्ति का विकास हुआ हो, तब प्राणियों में इसका उपयोग करना पड़ेगा, मनुष्यों में उपयोग करना पड़ेगा, सबमें उपयोग करना पड़ेगा। प्यार से अपने आप को हरेक को सराबोर कर देना पड़ेगा। प्यार अपने शरीर से कीजिए, ताकि इसको अच्छे तरीके से सुरक्षित रख सकें। प्यार अपनी अंतरात्मा से कीजिए। ताकि इसका कल्याण करने में आप समर्थ हो सके।
उपासना कर सकते हो, तो भगवान भी आपके बराबर हो सकते हैं। उसने बड़े भी हो सकते हैं। भगवान के गुण और आपके गुण एक बन सकते हैं आप महापुरुष हो सकते हैं, महामानव हो सकते हैं, ऋषि हो सकते हैं, देवात्मा हो सकते हैं और अवतार हो सकते हैं, अगर आप उपासना का ठीक तरीके से अवलंबन ले तो। कल का यह विषय था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-February
उपासना भेद एवं वैचारिक मतभेद के आधार पर पनपे इन अनेक मत एवं पंथों के अलावा बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म का भी अस्तित्व था। जैन धर्म के “शायद यह-शायद यह नहीं” का प्रतिपादन करने वाले स्यादवाद एवं बौद्धिमत के शून्यवाद ने और कुछ भले ही न किया हो, पर प्रचलित मतों की संख्या बढ़ाने में अपना योगदान तो किया ही था। इसमें भी जैनधर्म श्वेताँबर एवं दिगंबर के रूप में अपने को विभाजित कर चुका था। बौद्धमत में महायान, हिनयान, सहजायान एवं वज्रयान आदि अनेक नामों से बँटवारा हो गया था।
उपासना का प्रचलन महादेव तथा पशुपति के पूजन-अर्चन के रूप में रहा हैं। परंतु दूसरी सहस्राब्दी का प्रारंभ होने तक तो शैवमत भी अनेक मताँतरों में बँट गया। यही हाल शाक्तमत का भी हुआ। ये भी किसी से पीछे न रहे। कालचक्र की तेज गति के अनुरूप इसकी भी शाखा-प्रशाखाएँ होती गई।
उपासना के सामूहिक आयोजन किए जाने लगे। राष्ट्रीय आपत्तियों की शाँति के लिए विशद् महायज्ञ का आयोजन किया गया। इसके अंतर्गत 1. चारों वेदों का परायण यज्ञ 2. महामृत्युंजय यज्ञ 3. रुद्रयज्ञ 4. विष्णु यज्ञ 5. शतचंडी यज्ञ 6.नवग्रह यज्ञ 7. गणपति यज्ञ 8. सरस्वती यज्ञ 9. ज्योतिष्टोम 10. अग्निष्टोम आदि अनेक यज्ञों की प्रक्रियाएँ शामिल थीं यह समष्टि हित के लिए संपन्न हुआ एक विराट् आध्यात्मिक प्रयोग था। आचार्य जी के शब्दों में इस यज्ञ का यजमान, संयोजक, पूर्णफल प्राप्तकर्ता कोई एक व्यक्ति नहीं हैं। यह संकल्प समस्त गायत्री उपासकों की ओर से किया गया हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-September
उपासना का महत्व समझा और उसे अपनाया, लेकिन इसे कभी उचित और न्यायसंगत नहीं समझा कि दूसरों का धर्म अपना लिया जाए। उन्हें अपने धर्म में दीक्षित करने के प्रयत्न हों। हिंदू भारतीय परंपरा में धर्म-दीक्षा देने जैसा कोई संस्कार भी नहीं है। उन्नीसवीं शताब्दी में हिंदुओं को ईसाई और मुसलमान बनते देख स्वामी दयानन्द सरस्वती ने शुद्धि-संस्कार का प्रचलन अवश्य गढ़ा था। वह दीक्षा नहीं थी, बल्कि घर छोड़कर गए व्यक्ति की वापसी थी।
उपासना आदि प्रमुख हैं। इनसे मानसिक शक्ति बढ़ती, एकाग्रता सधती और उन क्षमताओं के विकास में सहायता मिलती है, जो आमतौर पर असंयम और अनाचरण की भेंट चढ़ जाती है। इन पर अंकुश लगाकर इन्हें मनःक्षेत्र? को सुविकसित करने में नियोजित कर लिया जाए, तो चिंतन-चेता का असाधारण परिष्कार हो सकता है और हम सहज ही मनोबल सम्पन्न बन सकते हैं। कहना न होगा कि मनोबल की गरिमा शरीर-बल, शिक्षा-बल, धन-बल, कौशल-बल आदि से सभी की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है।
उपासना और जीवन निर्माण विद्या के दोनों ही माध्यमों से हमारे साथ संबद्ध व्यक्तियों के विशाल जनसमूह को हम अखण्ड ज्योति परिवार के नाम से पुकारते हैं। यह सभी लोग हमें व्यक्तिगत रूप से अपने शरीर के अंगों की तरह प्रिय है और विश्वास है कि वे लोग भी हमें उसी दृष्टि से देखते हैं।”
उपासना है यह बारह वर्षीय महापुरश्चरण। इसका उद्देश्य है, मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव बनाने के लिए सामूहिक महासाधना का नियोजन। इसे नाम दिया गया है युगसंधि महापुरश्चरण। यह आयोजन शाँतिकुँज हरिद्वार के अंतर्गत बारह वर्ष तक सन् 2000 तक चलता रहेगा। इक्कीसवीं सदी के आरंभ के साथ ही इसकी महापूर्णाहुति होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-November
उपासना गृह बना रखा था। रात्रि को एक-डेढ़ बजे के आस-पास वह उठकर स्नान आदि नित्य कर्मों से निवृत्त हो जाते। इन सब कामों में उन्हें डेढ़-दो घंटा लग जाता था। तदुपराँत संध्यावन्दन के अनंतर गायत्री उपासना का क्रम चलता, जो सूर्योदय के काफी समय बाद तक चलता रहता और सूर्योपस्थान, सूर्यार्घदान के पश्चात् वह अध्ययन एवं अन्य गृह कार्यों में लग जाते। सायं संध्योपासना एवं गायत्री जप भी उनकी नित्य गतिविधियों में शामिल था।
उपासना करना, दुष्ट भावों को दूर हटाना, ज्ञान, बल, धन, कौशल इन चारों का सभी में समान वितरण, कर्म का उत्साह और कर्म-कौशल का विस्तार पुरुषमेध का वास्तविक लक्ष्य होता है। नरमेध का वैदिक आशय कितना सुँदर रहा है और मध्यकाल के कर्मकाँडियों ने किस सीमा तक गिराया, इसे भलीभाँति समझा सकता है।
उपासना, आहुति द्वारा होकर साधक सबल, समर्थ, सशक्त बनता है।
उपासना पद्धति वाले अनेक संगठन आते गए एकाकार होते चले गए। इस सामासिकता उदारता का मूल उसी बीज में छिपा है जिसे कहा गया है। “बात्मवत् सर्वभूतेषु।” अपने जैसा ही सबको मानना। किसी में भेद न मानना।
उपासना द्वारा तथा यज्ञ में आहुति देकर साधक सारस्वत बनता है। अभाव इंद्र की उपासना, उन्हें आहुति देने से मिटता है एवं साधक ऐंद्र बनता है, ऐश्वर्यशाली बनता है। अशक्ति का निवारण अश्विनी कुमारों की उपासना, आहुति द्वारा होकर साधक सबल, समर्थ, सशक्त बनता है।
उपासना इस स्तर के श्रेष्ठ उद्देश्य को लेकर की जाए, वहीं सार्थक हैं। यही विभिन्न उपासकों को मिलने वाले प्रतिफलों का कारण बनती है।
उपासना को प्राणवान् बनाने का एक सशक्त शिक्षण परमपूज्य गुरुदेव ने अपने जीवन से दिया, यह कहा जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी। भक्तियोग का यह पक्ष व्यक्तित्व में समाहित होने पर कैसे उसे परिष्कृत कर मानव को महामानव बना देता है, यह हमें पूज्यवर के माध्यम से जानने को मिलता है।
उपासना का क्रम चलता, जो सूर्योदय के काफी समय बाद तक चलता रहता और सूर्योपस्थान, सूर्यार्घदान के पश्चात् वह अध्ययन एवं अन्य गृह कार्यों में लग जाते। सायं संध्योपासना एवं गायत्री जप भी उनकी नित्य गतिविधियों में शामिल था।
उपासना पद्धति के अंतराल में सन्निहित यह प्रेम-साधना ही थी जो सामान्य को असामान्य में, तुच्छता को महानता में परिणत करने का चमत्कार दिखा सकी।” (अखण्ड ज्योति अप्रैल 1969)। वे इसी लेखमाला में लिखते है “ईश्वर भक्ति का अभ्यास हमने गुरुभक्ति की प्रयोगशाला में, व्यायामशाला में आरंभ किया और क्रमिक विकास करते हुए प्रभु-प्रेम के दंगल में जा पहुँचे।
उपासना के साथ-साथ दीन दुःखियों की सेवा में लग गए।
उपासना के केंद्र इस धरित्री के कोने-कोने में होने चाहिए। इन स्थापनाओं से आद्यशक्ति के प्रति श्रद्धा-निष्ठा का प्रवाह जाग्रत् होगा और नए युग का अवतरण संभव हो सकेगा।
उपासना गृहों, क्लबों, संगठनों एवं शक्तिपीठों में देवसंस्कृति का परिचय करवाने वाले एवं नवयुग की चेतना का अलख जगाने वाला पुरुषार्थ संपन्न हुआ। इसके अंतर्गत 3 दिसम्बर की तरह दीपयज्ञ एवं स्वच्छ-निर्मल मन के साथ स्वस्थ समाज हेतु उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना की गई। इसमें भागीदारी प्रथम चरण से बढ़ी-चढ़ी ही रही, जिससे उत्पन्न आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रभाव की कल्पना की जा सकती है।
उपासना की प्रवृत्तियाँ लंबे समय तक चलती रही हो, वहीं तर्भ-चेतना जाग्रत हो सकती है।
उपासना में संलग्न थे।
उपासना का व्यावहारिक स्वरूप बताने के साथ साधकों के लिए बाहरी वातावरण बनाने पर भी ध्यान दिया तीर्थों के विकास शक्तिपीठ प्रज्ञापीठ, चरणपीठ आदि स्थापनाओं को इन्हीं प्रयत्नों के रूप में देखा जा सकता है।
उपासना का कोई विशेष लाभ नहीं मिलेगा। महात्मा को अपनी भूल मालूम हुई कि सच्चा जप तो यह था कि डूबते हुए बच्चे को बचाया जाता। उस दिन से वे महात्मा उपासना के साथ-साथ दीन दुःखियों की सेवा में लग गए।
उपासना करते है उनकी आत्मिक शक्ति प्रबल होने लगती है। बड़े प्रयोजन सिद्ध होने लायक सामर्थ्य आरंभ में नहीं दिखाई देती, लेकिन वाणी में तेज, कही हुई बातें सच होने और आशीर्वाद-अभिशाप जैसी भावनाएँ चरितार्थ होने लगती है। दक्षिणमार्गी साधनाओं में ये विलक्षणताएँ नहीं दिखाई देती। वाममार्गी अथवा तंत्र ओर योग की उच्च कक्षाओं में पहुँचने पर वैसे प्रभाव दिखाई देते हैं।
उपासना का सर्वसाधारण के लिए जितना प्रयोग सरल और उपयुक्त था, उसे हम गत कई वर्षों से सिखाते-समझाते चले आ रहे हैं। इस विद्या की उच्चस्तरीय साधना के दो पक्ष है। (1) योग (2) तंत्र। योगमार्ग में उच्चस्तरीय साधना पंचकोशों के अनावरण की है जिसकी थोड़ी-सा शिक्षण अखण्ड ज्योति के माध्यम से कर चुके हैं अभी इस विद्या को साँगोपाँग बताया जाना शेष है। उसी प्रकार तंत्रमार्ग की गायत्री कुँडलिनी कहलाती है।
उपासना और ज्योतिष की तरह आयुर्वेद भी भारतीय विज्ञान का एक पक्ष है। आधुनिक चिकित्सा पद्धतियां शरीर में होने वाले रोगों को बाहरी विकारों का आक्रमण मानती है। उन्हें विषाणु या जीवाणु की संज्ञा देते है। शरीर में जब इनकी घुसपैठ होती है तो बीमारियाँ जन्म लेती है। उन विकारों को दबा दिया जाए, तो व्यक्ति स्वस्थ हो सकता है।
उपासना है।”
उपासना की एवं उसका परिणाम इस गायत्री परिवार रूपी विभूतियों के भाँडागार के रूप में देखा जा सकता है। समानुभूति संबंधी एक बड़ी महत्त्वपूर्ण घटना उनके जीवन की भी है। एक परिजन जो दिल्ली में जेवर आदि का व्यवसाय करते थे, गुरुदेव के पास आकर अपनी कृतज्ञता का ज्ञापन करने लगे। वे कह रहे है, “गुरुवर! सड़क पर फिसलकर गिरते ही ताँगा पैर पर से निकल गया। आपकी कृपा से कुछ भी नहीं हुआ आपका ही स्मरण करता रहा।
उपासना, उन्हें आहुति देने से मिटता है एवं साधक ऐंद्र बनता है, ऐश्वर्यशाली बनता है। अशक्ति का निवारण अश्विनी कुमारों की उपासना, आहुति द्वारा होकर साधक सबल, समर्थ, सशक्त बनता है।
उपासना इस देश को चिरकाल से शक्ति-सामर्थ्य प्रदान करती रही है। इस युग के लिए तो वह संजीवनी बूटी की तरह है। मंदिरों की स्थापना के माध्यम से वातावरण को संस्कारित कर लिया गया, तो उससे राष्ट्र और विश्व को संयम, स्वस्थ और समर्थ देवभावनाओं से ओत-प्रोत रखने वाली प्रक्रिया अपने आप चल पड़ेगी। ये मंदिर पारंपरिक नहीं, जन-जाग्रति के केंद्र बनेंगे, ज्ञानक्राँति के संवाहक होंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-August
उपासना-साधना की।
उपासना उस ईश्वरोपासना से अनेकों गुना चमत्कारिक है, जिसे हम व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए मंदिर-मस्जिद में आए दिन करे हैं। धर्मस्थलों में सिजदा करने और सिर नवाने से उनका कोई विरोध नहीं, आस्तिक होने के नाते वे भी ऐसा करते हैं, पर वे कहते हैं कि जिस प्रकार ‘परीक्षा-परीक्षा’ रटने मात्र से कोई विद्यार्थी पास नहीं हो सकता, उसी प्रकार केवल भगवान् का नाम जपकर उसे प्राप्त नहीं या जा सकता। उसके लिए उसका काम करना पड़ता है। यह काम मानवता की सेवा से बढ़कर दूसरा कोई हो नहीं सकता, ऐसा उनका मत है।
उपासना में नजदीक आते हैं और नजदीक आने के साथ-साथ सबसे पहला काम करना पड़ता है, अपनी सफाई हम कर ले, तब फिर कुछ सारी गुँजाइश मिलेगी। अगर सफाई न करें , तब फिर कुछ नहीं शीशा है, शीशे को अगर आप मैला-कुचैला रख दे, उसमें फिर अपना चेहरा देखना चाहें ,तो दिखना चाहे, बिंब देखना चाहे , तो पानी को साफ होना चाहिए। इसलिए भगवान् के नजदीक जाने के लिए सबसे पहला है। अपनी सफाई के लिए जितने भी कृत्य है, जो प्रारंभिक और धार्मिक कृत्य है, इन सबसे अपने आप की सफाई ,अपना परिष्कार करने की जरूरत पड़ती हैं । जैसे , आप सुबह पूजा करने बैठते हैं।
उपासना श्रेष्ठ है। पर यदि मूर्ति न हो तो भी पूजा की जा सकती है। मूर्ति न हो तो पूजा भी न करें, यह कोई तर्क नहीं। इसी प्रकार जनेऊ पहनना संभव न हो तो गायत्री को छोड़ने की जरूरत नहीं है। ‘
उपासना का बहुत महत्व बताया गया है।
उपासना हो गई , नजदीक बैठना हो गया । पारस के नजदीक बैठते ही, स्पर्श करते ही लोहा सोना बन जाता है। महान् शक्ति का साथ छूकर के कौन नहीं बन जाएगा, महान् । आप स्वाति की बूँद के बारे में जानते है? स्वाति की बूँद कितनी महान् होती है ?
उपासना करते हैं, वे परम लक्ष्य से भटक जाते हैं। भारतीय धर्म साधना की धारा में रहकर ही उसकी मान्यताओं को पानी पी पीकर कोसने वालों के गोस्वामी जी कट्टर विरोधी थे। कबीर, दादू आदि संतों ने साकार उपासना और वेद-शास्त्रों की जमकर निंदा की थी। जायसी , कुतुबन , मंझन और उस्मान आदि सूफी संतों ने कहानी, उपाख्यान आदि से वैसा ही प्रतिपादन किया । गोस्वामी तुलसीदास ने ऐसे संतों के निदावाद की जमकर आलोचना की ।
उपासना में क्या करना होता है ? उपासना में नजदीक आते हैं और नजदीक आने के साथ-साथ सबसे पहला काम करना पड़ता है, अपनी सफाई हम कर ले, तब फिर कुछ सारी गुँजाइश मिलेगी। अगर सफाई न करें , तब फिर कुछ नहीं शीशा है, शीशे को अगर आप मैला-कुचैला रख दे, उसमें फिर अपना चेहरा देखना चाहें ,तो दिखना चाहे, बिंब देखना चाहे , तो पानी को साफ होना चाहिए। इसलिए भगवान् के नजदीक जाने के लिए सबसे पहला है। अपनी सफाई के लिए जितने भी कृत्य है, जो प्रारंभिक और धार्मिक कृत्य है, इन सबसे अपने आप की सफाई ,अपना परिष्कार करने की जरूरत पड़ती हैं ।
उपासना की दिशा में बढ़ नहीं पाता। उदाहरण के लिए, वैष्णव मत में दीक्षित कुछ साधक दूसरों की छाया पड़ जाने से ही आहार और जल को दूषित हुआ मान लेते हैं। वे छायाविष्ट अन्न या जल को ग्रहण नहीं करते। पूजा-पाठ से पहले किसी से छू जाएँ या छाया अविष्ट हो जाएँ, तो नहाते हैं। पहने हुए वस्त्र को बदलते और फिर पूजा-पाठ करते हैं।
उपासना करना मूढ़ता है। जो साकार की उपासना करते हैं, वे परम लक्ष्य से भटक जाते हैं। भारतीय धर्म साधना की धारा में रहकर ही उसकी मान्यताओं को पानी पी पीकर कोसने वालों के गोस्वामी जी कट्टर विरोधी थे। कबीर, दादू आदि संतों ने साकार उपासना और वेद-शास्त्रों की जमकर निंदा की थी। जायसी , कुतुबन , मंझन और उस्मान आदि सूफी संतों ने कहानी, उपाख्यान आदि से वैसा ही प्रतिपादन किया ।
उपासना जो करेंगे , सफल हो सकती है, साधनाएँ सार्थक हो सकती है। अगर आपने अपनी धुलाई नहीं की, अपने कषाय-कल्मषों को धोया नहीं, तो फिर बहुत मुश्किल है, फिर आपके लिए बहुत कठिन हो जाएगा । खेत को अगर आप जाएगी ? यह खेत की जुताई , राम नाम का जप करना अथवा अन्य किसी तरीके से अपने आपका परिष्कार करना सब एक ही है जोव करके अगर आपने खेत ठीक तरीके से तैयार कर लिया है, तो बुआई में आपको कोई दिक्कत नहीं पड़ेगी , बुआई सरल हो जाएगी , खेत तो जोता हुआ है और अगर जोता हुआ न हो तब ? कंकड़-पत्थर वाला खेत हो तब ?
उपासना करना सर्वोत्तम है, इसी प्रकार जनेऊ पहनकर गायत्री उपासना श्रेष्ठ है। पर यदि मूर्ति न हो तो भी पूजा की जा सकती है। मूर्ति न हो तो पूजा भी न करें, यह कोई तर्क नहीं। इसी प्रकार जनेऊ पहनना संभव न हो तो गायत्री को छोड़ने की जरूरत नहीं है। ‘
उपासना सौर-सक्रियता के समय एक दैवी संरक्षण साधक को उपलब्ध कराती है। इस महापूर्णाहुति की वेला में सभी को अपना साधनात्मक पुरुषार्थ प्रखर करना होगा। इसके अलावा कोई और चारा है भी तो नहीं।
उपासना करती हो, उसे करती रहो। अब आगे की विशेष, अत्यंत महत्वपूर्ण और सब साधनाओं से अधिक श्रेयस्कर तपस्या यह करो कि जो गायत्री परिवार तुमने वहाँ बना लिया है, उसका मार्गदर्शन, संगठन, प्रेरणा एवं प्रकाश देने के लिए अबकी अपेक्षा और भी अधिक समय लगाना। यह तपस्या किसी भी बड़े योगाभ्यास से कम नहीं है। अभी तुम्हारे गायत्री परिवार में 65 सदस्य हैं, यह बढ़कर 108 होने चाहिए। इनकी सामूहिक उपासना, सामूहिक यज्ञ, सामूहिक प्रार्थना समय-समय पर होती रहे, तो यह एक बहुत बड़ा काम है।
उपासना -कृत्यों का रहस्य मालूम हो गया, यह समझाना चाहिए ।
उपासना, सामूहिक यज्ञ, सामूहिक प्रार्थना समय-समय पर होती रहे, तो यह एक बहुत बड़ा काम है।”
उपासना और वेद-शास्त्रों की जमकर निंदा की थी। जायसी , कुतुबन , मंझन और उस्मान आदि सूफी संतों ने कहानी, उपाख्यान आदि से वैसा ही प्रतिपादन किया । गोस्वामी तुलसीदास ने ऐसे संतों के निदावाद की जमकर आलोचना की । उन्होंने कहा है-
उपासना माने नजदीक बैठना, पास बैठना। अगर आप पास बैठ जाएँ किसी के, तो उसके गुण, उसके कर्म, उसका स्वभाव व उसकी विशेषताएँ आपके भीतर आना शुरू हो जाएँगी। आग की भट्टी के नजदीक अगर आप बैठने लगें तो, आपका शरीर गरम हो जाएगा। बरफ की फैक्टरी के भीतर अगर आप घुस जाएँ, तो आपका शरीर ठंडा होने लगेगा। ऐसी दृष्टि से आपको किसी के साथ में जुड़ना चाहिए।
उपासना करें, उन्हें कराना, जो छोड़ दें, उनकी इच्छा। “
उपासना करें, मिल−जुल करें, ताकि अन्य से आगत आसुरी घटाटोप से जूझा जा सके। इन दिनों हमारी गुरुसत्ता के निर्देश के अनुरूप ही न केवल राष्ट्र व विश्व का सघन मंथन करने वाली तीर्थयात्राएँ संपन्न हुई, गाँवों से लेकर सींगीय स्तर तक सृजन संगठन प्रधान एक लाख से अधिक समारोह भी पूरी गरिमा के साथ संपन्न हुए। 108 संभागीय दीप महायज्ञों के माध्यम से परिष्कृत प्रतिभाएं उभरकर आई है। तथा नवसृजन लिए संकल्पित हुई है। इन आयोजनों के रचनाधर्मी संयोजन को, इनकी भव्यता को जिन-जिन ने भी देखा है, सराहा है एवं अपने अंदर सभी कुछ-न-कुछ संकल्प लेकर गए है।
उपासना की जा सकती है। उन्होंने पत्र में पूछा भी, तो इसी पत्र में आगे पूज्यवर ने लिखा, “जनेऊ गायत्री माता की सूत से बनी मूर्ति मात्र है। मूर्ति के सामने पूजा-उपासना करना सर्वोत्तम है, इसी प्रकार जनेऊ पहनकर गायत्री उपासना श्रेष्ठ है। पर यदि मूर्ति न हो तो भी पूजा की जा सकती है। मूर्ति न हो तो पूजा भी न करें, यह कोई तर्क नहीं।
उपासना महामंत्री है। सूर्य के आधिभौतिक (हाइड्रोजन-हीलियम के जलते गोले वाला रूप), आधिदैविक (ग्रहों का अधिपति, चिंतन प्रेरक, जातक की आत्मा) एवं आध्यात्मिक (अतिमानसिक विराट् पुरुष की ज्योति) तीनों स्वरूपों पर प्रभाव के माध्यम से त्रिपदा गायत्री की उपासना सौर-सक्रियता के समय एक दैवी संरक्षण साधक को उपलब्ध कराती है। इस महापूर्णाहुति की वेला में सभी को अपना साधनात्मक पुरुषार्थ प्रखर करना होगा। इसके अलावा कोई और चारा है भी तो नहीं।
उपासना में लगाकर एक भारी आध्यात्मिक साधना की है। तुम जो साधारण अपनी उपासना करती हो, उसे करती रहो। अब आगे की विशेष, अत्यंत महत्वपूर्ण और सब साधनाओं से अधिक श्रेयस्कर तपस्या यह करो कि जो गायत्री परिवार तुमने वहाँ बना लिया है, उसका मार्गदर्शन, संगठन, प्रेरणा एवं प्रकाश देने के लिए अबकी अपेक्षा और भी अधिक समय लगाना। यह तपस्या किसी भी बड़े योगाभ्यास से कम नहीं है। अभी तुम्हारे गायत्री परिवार में 65 सदस्य हैं, यह बढ़कर 108 होने चाहिए।
उपासना कहा गया है। इसे हर हालत में हर एक को करनी ही चाहिए।
उपासना। उपासना माने नजदीक बैठना, पास बैठना। अगर आप पास बैठ जाएँ किसी के, तो उसके गुण, उसके कर्म, उसका स्वभाव व उसकी विशेषताएँ आपके भीतर आना शुरू हो जाएँगी। आग की भट्टी के नजदीक अगर आप बैठने लगें तो, आपका शरीर गरम हो जाएगा। बरफ की फैक्टरी के भीतर अगर आप घुस जाएँ, तो आपका शरीर ठंडा होने लगेगा।
उपासना का उद्देश्य बार-बार ध्यान रखिए, इसका एक ही उद्देश्य है कि अपने आपको पुनीत बनाएँ , स्वच्छ करें । दिवाली के दिन घर को साफ करते हैं। ताकि लक्ष्मी जी आएँ, अपने आपकी पहले धुलाई और सफाई कर देना है। बस, आप यह कर पाएँगे , तो समझिए आपकी बहुत सारी मंजिल पार हो गई । मुझे उम्मीद है, आप ऐसे ही करेंगे।
उपासना का अर्थ है, पास बैठना। आगे चलकर इसी को जुड़ जाना भी कहते हैं। पास बैठने का उदाहरण आप समझिए । चंदन के पेड़ के नजदीक जब उगते हैं बहुत सारे झाड़-झंखाड़ , तो उन झाड़ियों में भी चंदन की विशेषताएँ पैदा हो जाती है। यह उपासना हो गई , नजदीक बैठना हो गया ।
उपासना, इतना कृत्य जो आप रोज करते हैं,किस लिए किया जाता है ? यह वास्तव में अपने मन की धुलाई है, अपने मन की रँगाई है। पहले आप अपने आपको धोकर रखेंगे , तो रँगना संभव हो जाएगा, फिर आप उपासना जो करेंगे , सफल हो सकती है, साधनाएँ सार्थक हो सकती है। अगर आपने अपनी धुलाई नहीं की, अपने कषाय-कल्मषों को धोया नहीं, तो फिर बहुत मुश्किल है, फिर आपके लिए बहुत कठिन हो जाएगा । खेत को अगर आप जाएगी ?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-April
उपासना पद्धति भले ही भिन्न क्यों न हो, सभी को जीवन साधना के सूत्रों का अभ्यास करना चाहिए। यह साधना इतनी प्रखर बन जाए कि साधक का व्यक्तित्व नवसृजन के लिए ईश्वर के साथ साझेदारी में युगधर्म के निर्वाह में सक्षम हो जाए। आत्मशक्ति के निखार से ही युगशक्ति का उद्भव होगा। इसी के प्रशिक्षण समग्र रूप में जन-जन तक विस्तार हेतु देवसंस्कृति विश्वविद्यालय का एक प्रभाग भाषा एवं धर्म विद्यालय के रूप में खोला जा रहा है।
उपासना मात्र रह जाती है, अनुष्ठान नहीं कहलाती।
उपासना के लिए कह रही थी, अब मैं साधना के बारे में कहूँगी। साधना माने अपना परिष्कार और उपासना माने भगवान् के समीप बैठना। अगर हम भगवान् के समीप बैठ रहे है, तो अपनी मलिनताओं को अपने दोष-दुर्गुणों को निकाल रहे हैं। ये तो हुई उपासना और साधना हुई अपने व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए। यदि आपने साधना की है, तो अपने व्यक्तित्व को बनाया या नहीं।
उपासना से भौतिकता एवं आध्यात्मिकता दोनों ही सुलभ हैं। गायत्री महामंत्र का जप एवं सविता देव का ध्यान ही प्राण को सुपुष्ट, मन को सतेज, इंद्रियों को सचेतन, हृदय को पवित्र एवं जीवन को बलवान बनाता है। भार्गव वैदर्भी के इन स्वरों में उसके आत्मबोध की झलक थी।
उपासना में प्रवृत्त होता है, तो उस मार्ग पर आगे तक पहुँची विभूतियाँ सहायता और पथप्रदर्शन के लिए दौड़ी आती है। श्री अरविंद के संबंध में कहते हैं कि उनकी साधना से असंख्य मुमुक्षुओं को मार्ग मिलना था उनके योग का संदेश है कि साधक ही मुक्ति की कामना नहीं करता, मुक्त करने में उसका अपना पुरुषार्थ ही काम नहीं आता, दिव्य शक्तियाँ भी सहयोग करती हैं। मुक्त होने की तीव्र आकाँक्षा हो तो दिव्यचेतना भी उतरकर आती है और साथ ही पथप्रदर्शन करती है। श्री अरविंद की साधना जगत् हित के लिए भी थी, इसलिए कई दिव्य शक्तियाँ और मुक्त आत्माएं उनकी सहायता के लिए आती थी। श्री अरविंद जिन दिनों साधना कर रहे थे, उन दिनों रामकृष्ण परमहंस की ओर से संदेश आया, ‘मंदिर बनाओ,’ मंदिर बनाओ’।
उपासना करती थी और कहती थी कि भगवान् कभी तो आप सुनेंगे, कभी तो मेरे घर आएँगे। और भगवान् राम शबरी के घर पहुँचे। वे विदुर के घर भी पहुँचे। कौरवों के राजमहल में कृष्ण को दावत दी गई थी। दुर्योधन ने दावत दी कि आप हमारे यहाँ आइए, लेकिन उसके यहाँ का कुधान्य उन्होंने नहीं खाया।
उपासना के द्वारा किस तरीके से प्रखरता आती हुई चली जाती है। यदि व्यक्ति यह मानकर चले कि हम जो उपासना कर रहे हैं, वह भगवान् के लिए अंतरंग के लिए है, जिससे कि हमारे अंतरंग व अपने जीवात्मा पर जो मल विक्षेप छाए हुए है, उनको हटाने के लिए हैं। लेकिन यहाँ तो कुछ उलटा ही है। यहाँ तो उपासना माने चापलूसी, उपासना माने आशीर्वाद माना जाता है। लोग सोचते हैं कि चलो गुरुजी से, माताजी से आशीर्वाद तो ले आएँ, पर मन में यह नहीं आया कि गुरुजी और माताजी के पदचिह्नों पर भी हमें चलना है क्या ?
उपासना की है, तो आपका व्यक्तित्व बनना चाहिए और आपके द्वारा दूसरों को भी ऊँचा उठना चाहिए।
उपासना से इतना आत्मबल पैदा कर लिया कि जब राम और लक्ष्मण उनके पास गए, तो उन्होंने कहा कि इनके द्वारा कुछ बड़ा काम कराना है। श्रेय खुद नहीं लिया जाता, वरन् दूसरों को दिया जाता है। उन्होंने कहा कि सफलता का सारा श्रेय किसको देना है ? राम और लक्ष्मण को देना है। जब वे अपनी परीक्षा में पास हो गए, तो उन्होंने बला और अतिबला दोनों शक्तियाँ राम और लक्ष्मण को दे डालीं।
उपासना के द्वारा उपासना हमारा एक ऐसा संबल है। इस श्रद्धा और निष्ठा के सहारे हम आगे बढ़ते हुए चले जाते हैं और हमारे अंदर वह शाँति और वह भावना आती हुई चली जाती है, जो हमारे महापुरुषों में आती हुई चली गई।
उपासना हमको यही सिखाती है कि हमको दयावान् होना चाहिए, करुणामय होना चाहिए। हमारे अंदर संवेदना होनी चाहिए। जब तक हमारे अंदर संवेदना पैदा नहीं होती, तब तक उसका प्रतिफल क्या मिला, हम कैसे मानें कि आपने उपासना की है। मैं आपको सावित्री का एक उदाहरण देना चाहूँगी। सावित्री के लिए उसके पिता वर देख रहे थे, तो सावित्री ने अपने पिता से कहा कि पिताजी यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं स्वयं ही अपने लिए वर ढूंढ़ लूँ।
उपासना माने भगवान् के समीप बैठना। अगर हम भगवान् के समीप बैठ रहे है, तो अपनी मलिनताओं को अपने दोष-दुर्गुणों को निकाल रहे हैं। ये तो हुई उपासना और साधना हुई अपने व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए। यदि आपने साधना की है, तो अपने व्यक्तित्व को बनाया या नहीं। यदि आपने अपने उपासना की है, साधना की है कि नहीं की है।
उपासना कर रहे हैं, वह भगवान् के लिए अंतरंग के लिए है, जिससे कि हमारे अंतरंग व अपने जीवात्मा पर जो मल विक्षेप छाए हुए है, उनको हटाने के लिए हैं। लेकिन यहाँ तो कुछ उलटा ही है। यहाँ तो उपासना माने चापलूसी, उपासना माने आशीर्वाद माना जाता है। लोग सोचते हैं कि चलो गुरुजी से, माताजी से आशीर्वाद तो ले आएँ, पर मन में यह नहीं आया कि गुरुजी और माताजी के पदचिह्नों पर भी हमें चलना है क्या ? नहीं हमको बेटा दे दो, हमको पैसा दे दो, हमारी शादी करा दो।
उपासना माने चापलूसी, उपासना माने आशीर्वाद माना जाता है। लोग सोचते हैं कि चलो गुरुजी से, माताजी से आशीर्वाद तो ले आएँ, पर मन में यह नहीं आया कि गुरुजी और माताजी के पदचिह्नों पर भी हमें चलना है क्या ? नहीं हमको बेटा दे दो, हमको पैसा दे दो, हमारी शादी करा दो। धत तेरे की ... उपासना इसी का नाम है क्या ? इसका नाम उपासना नहीं है।
उपासना और साधना हुई अपने व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए। यदि आपने साधना की है, तो अपने व्यक्तित्व को बनाया या नहीं। यदि आपने अपने उपासना की है, साधना की है कि नहीं की है। उपासना की है, तो आपका व्यक्तित्व बनना चाहिए और आपके द्वारा दूसरों को भी ऊँचा उठना चाहिए।
उपासना की है एक बात, दूसरी बात मैंने अपने माता-पिता की सेवा की है। राज्य की ठुकरा करके जीवन शोधन के लिए, आत्मशोधन के लिए मैं जंगलों में घूम रहा हूँ।
उपासना फलीभूत होती है। कैसे फलीभूत होती है, इस संबंध में मैंने कई बार गुरुजी का उदाहरण दिया है कि उन्होंने पंद्रह वर्ष की आयु से उपासना करते रहे। वे 6 घंटे प्रतिदिन उपासना करते थे, लेखन करते थे, व्यक्तियों से मिलते थे। इतना बड़ा संगठन भी उन्होंने तैयार किया। आखिर इसकी स्थापना कैसे की ?
उपासना की है, साधना की है कि नहीं की है। उपासना की है, तो आपका व्यक्तित्व बनना चाहिए और आपके द्वारा दूसरों को भी ऊँचा उठना चाहिए।
उपासना के कारण तेजस् इतना घनीभूत था कि लाख प्रयत्न करते हुए भी कोई उसे नष्ट नहीं कर सका। जो पुजारी घोड़ों की टापों से कुचल दिए गए, वे युद्ध भी कर सकते थे। लेकिन किन्हीं गुह्य कारणों से उन्होंने आत्मोत्सर्ग का मार्ग चुना। उनके बलिदान से मंदिर युद्धभूमि में बदलने से बच गया।
उपासना के लिए ही है, लेकिन कोणार्क मंदिर अपने आप में विशिष्ट है। सूर्यरथ के आकार में बने इस महालय को सात अलंकृत अश्व खींचते हुए दिखाए गए हैं। ये अश्व सूर्य की सात किरणों के प्रतीक हैं। रथान के नीचे दोनों ओर बारह पहिये बने हुए हैं। प्रत्येक पहिया दस फुट ऊँचा है।
उपासनाएँ इस प्रकार हो सकती हैं-
उपासनागृह निताँत सुरक्षित बने रहे।
उपासना में दिलचस्पी है या नहीं, उसमें कैसे फर्क माना जाए। इसकी पहचान साधक की मनोभूमि और अंतःकरण के आधार पर की जायगी। अंतःकरण अर्थात् उसकी भूमि कैसी है ? बीज तो उसमें पड़ जाएगा। भगवान् की अनुकंपा, दया, उसका अनुदान, वरदान तो मिलता हुआ चला जाएगा, परंतु उसका फलित होना इस बात पर निर्भर करेगा कि हमारी अंतःभूमि कैसी है ?
उपासना करते रहे। वे 6 घंटे प्रतिदिन उपासना करते थे, लेखन करते थे, व्यक्तियों से मिलते थे। इतना बड़ा संगठन भी उन्होंने तैयार किया। आखिर इसकी स्थापना कैसे की ? केवल उपासना के द्वारा उपासना हमारा एक ऐसा संबल है।
उपासना के क्षणों में हम प्रभु से प्रेमसंबंध स्थापित कर इस संबल को पा सकते हैं।
उपासना करते थे, लेखन करते थे, व्यक्तियों से मिलते थे। इतना बड़ा संगठन भी उन्होंने तैयार किया। आखिर इसकी स्थापना कैसे की ? केवल उपासना के द्वारा उपासना हमारा एक ऐसा संबल है। इस श्रद्धा और निष्ठा के सहारे हम आगे बढ़ते हुए चले जाते हैं और हमारे अंदर वह शाँति और वह भावना आती हुई चली जाती है, जो हमारे महापुरुषों में आती हुई चली गई।
उपासना नहीं है।
उपासना के तत्वज्ञान में सन्निहित व्रतों में प्रमुख है- उपासना। इन नौ दिनों में सर्वाधिक कठिनाई भोजन के संबंध में ही रहती है। अतः जहाँ तक हो सके स्वयं पकाया हुआ सात्विक आहार ही इन दिनों लेना चाहिए। स्वयं पकाने की बात अनभ्यस्तजनों के लिए कठिन पड़ सकती है। इस दृष्टि से बिना पकाई हुई वस्तुओं पर ीहने, फलाहार उपवास आदि को महत्व मिला है, किंतु सरलता की दृष्टि से इतनी छूट भी रखी गई है कि एक लगावन के अतिरिक्त और ठोस आहार उपयोग में न लाना भी उपवास के अंतर्गत मान लिया गया है।
उपासना हमारा एक ऐसा संबल है। इस श्रद्धा और निष्ठा के सहारे हम आगे बढ़ते हुए चले जाते हैं और हमारे अंदर वह शाँति और वह भावना आती हुई चली जाती है, जो हमारे महापुरुषों में आती हुई चली गई।
उपासना माने आशीर्वाद माना जाता है। लोग सोचते हैं कि चलो गुरुजी से, माताजी से आशीर्वाद तो ले आएँ, पर मन में यह नहीं आया कि गुरुजी और माताजी के पदचिह्नों पर भी हमें चलना है क्या ? नहीं हमको बेटा दे दो, हमको पैसा दे दो, हमारी शादी करा दो। धत तेरे की ... उपासना इसी का नाम है क्या ? इसका नाम उपासना नहीं है।
उपासना की है। मैं आपको सावित्री का एक उदाहरण देना चाहूँगी। सावित्री के लिए उसके पिता वर देख रहे थे, तो सावित्री ने अपने पिता से कहा कि पिताजी यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं स्वयं ही अपने लिए वर ढूंढ़ लूँ। उन्होंने कहा बेटी तू बहुत प्रतिभाशाली बच्ची है और अपने लिए स्वयं वर देख सकती है, मैं तुझे इसकी आज्ञा देता हूँ। सावित्री गई और जगह जगह ढूंढ़ती फिरी, कहीं कोई उसे अपने योग्य वर दिखाई नहीं दिखाई नहीं पड़ा।
उपासना इतनी शक्तिशाली साधना है कि कोई भी टोना-टोटका जादू-तंत्र उसके सामने निष्प्रभावी ही रहती है। इतना संरक्षण गुरुसत्ता का मिलने के बाद शिष्य निश्चित हो जाता है। यह पत्र न केवल उन सज्जन ( श्री शिवशंकर गुप्ता नई दिल्ली व उनके भाई) के लिए एक शिक्षण के रूप में था, आज भी इतने वर्षों बाद भी हम सबके लिए जो समय-समय पर भटक जाते हैं- एक प्रकार से लोकशिक्षण का एक नमूना है।
उपासना इसी का नाम है क्या ? इसका नाम उपासना नहीं है।
उपासना। इन नौ दिनों में सर्वाधिक कठिनाई भोजन के संबंध में ही रहती है। अतः जहाँ तक हो सके स्वयं पकाया हुआ सात्विक आहार ही इन दिनों लेना चाहिए। स्वयं पकाने की बात अनभ्यस्तजनों के लिए कठिन पड़ सकती है। इस दृष्टि से बिना पकाई हुई वस्तुओं पर ीहने, फलाहार उपवास आदि को महत्व मिला है, किंतु सरलता की दृष्टि से इतनी छूट भी रखी गई है कि एक लगावन के अतिरिक्त और ठोस आहार उपयोग में न लाना भी उपवास के अंतर्गत मान लिया गया है।
उपासना की। गायत्री मंत्र की उपासना से इतना आत्मबल पैदा कर लिया कि जब राम और लक्ष्मण उनके पास गए, तो उन्होंने कहा कि इनके द्वारा कुछ बड़ा काम कराना है। श्रेय खुद नहीं लिया जाता, वरन् दूसरों को दिया जाता है। उन्होंने कहा कि सफलता का सारा श्रेय किसको देना है ? राम और लक्ष्मण को देना है।
उपासना करना सार्थक हो जाएगा। यह तप विचार-संयम है। विचारों को भटकने मत दें। विचारों की शक्ति आप समझते नहीं हैं। पैसे की शक्ति समझते हैं, विचारों को क्यों नहीं समझते ?
उपासना में नहीं लग रहा है। उपासना में दिलचस्पी है या नहीं, उसमें कैसे फर्क माना जाए। इसकी पहचान साधक की मनोभूमि और अंतःकरण के आधार पर की जायगी। अंतःकरण अर्थात् उसकी भूमि कैसी है ? बीज तो उसमें पड़ जाएगा।
उपासना क्या सिखाती है ? उपासना हमको यही सिखाती है कि हमको दयावान् होना चाहिए, करुणामय होना चाहिए। हमारे अंदर संवेदना होनी चाहिए। जब तक हमारे अंदर संवेदना पैदा नहीं होती, तब तक उसका प्रतिफल क्या मिला, हम कैसे मानें कि आपने उपासना की है। मैं आपको सावित्री का एक उदाहरण देना चाहूँगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-July
उपासना का यथा शक्ति प्रचार भी किया है जिससे बहुत लोगों ने लाभ उठाया है। कई आदमियों को गायत्री उपासना का यथा शक्ति प्रचार भी किया है जिससे बहुत लोगों ने लाभ उठाया है। कई आदमियों को गायत्री उपासना से स्वप्न द्वारा उनके प्रश्नों के साफ साफ उत्तर मिले हैं। अनेकों को गायत्री द्वारा मनोवांछित लाभ हुए हैं।
उपासना से निष्काम भक्ति करते प्राप्त हुआ वह यह है आत्म शान्ति। मेरा मन बहुत शान्त रहता हैं।
उपासना की और ईश्वर की ओर मेरी प्रवृत्ति बढ़ती गई।
उपासना से ही ब्राह्मण होता है अन्यथा वह द्विज ही रहता है।
उपासना में प्रवृत्त होना चाहिए।
उपासना से सांसारिक जीवन में जो सहायता मिलती है वह अपार है। जो किसी उपाय से नहीं हो सकती वह गायत्री मंत्र की उपासना से अवश्य मिल जाता है यह अक्षरशः सत्य है। जिसे विश्वास न हो वह करके स्वयं देख लेवे।
उपासना कर ली।
उपासना में बहुत लाभ हुआ है। गायत्री उपासना ही मेरा नित्य नियमित विधान है। मैंने गायत्री उपासना का यथा शक्ति प्रचार भी किया है जिससे बहुत लोगों ने लाभ उठाया है। कई आदमियों को गायत्री उपासना का यथा शक्ति प्रचार भी किया है जिससे बहुत लोगों ने लाभ उठाया है। कई आदमियों को गायत्री उपासना से स्वप्न द्वारा उनके प्रश्नों के साफ साफ उत्तर मिले हैं।
उपासना के मन्त्र का उपदेश दे रखा था इसलिए वह सायंकाल सूर्याभिमुख होकर उस मन्त्र का जप किया करता था यह मन्त्र गायत्री मन्त्र ही था।
उपासना करता है, वह करोड़ों जन्मों में भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है।
उपासना करते हैं वे नास्तिक हैं ऐसा वेदवेत्ताओं ने कहा है।
उपासना की गई गायत्री द्विजों के मनोरथ पूर्ण करने वाली कही गई है।
उपासना, प्रभु के आस पास हो जाता है।
उपासना के लिये मुख्य मंत्र है। मेरा तो इस पर अति अटूट विश्वास व श्रद्धा रही है मुझे बचपन की अपनी एक बात का स्मरण है अपने पास माला न होने के कारण मोटे से डोरे में 100 गाठें लगाकर मैं उसके गायत्री का जप करती थी एक दिन मेरे पिताजी ने मेरी माला देख ली और गायत्री में मेरा प्रेम समझ कर मुझे सच्चे मूंगों की माला दी थी। गायत्री जाप से मुझे ऐसा भासने लगता है मानो मैं अपने प्यारे पिता से बातें कर रही हूँ अथवा अपना कण्ठस्थ पाठ सुना रही हूँ। जब-2 मुझे आपत्तियों का सामना करना पड़ा तब-2 मैं गायत्री मंत्र द्वारा अपने प्रभु के समीप चली जाती हूँ और मुझे विश्वास होने लगता है कि अवश्य पिता मेरे दुख सुन रहें हैं और अवश्य निवारण करेंगे । एक बार नहीं अनेक बार मैं अपने पुत्र के इधर उधर फिरने और कुछ कार्य न करने से अति दुखित थी तब भी मैंने प्यारे पिता को स्मरण करके गायत्री माता की शरण ली और विधिपूर्वक इसका अनुष्ठान किया।
उपासना का यथा शक्ति प्रचार भी किया है जिससे बहुत लोगों ने लाभ उठाया है। कई आदमियों को गायत्री उपासना से स्वप्न द्वारा उनके प्रश्नों के साफ साफ उत्तर मिले हैं। अनेकों को गायत्री द्वारा मनोवांछित लाभ हुए हैं।
उपासना नित्य ही समस्त वेदों में वर्णित है। जिस गायत्री के बिना सर्व प्रकार से ब्राह्मण की अधोगति होती है।।
उपासना करता है वह दुर्बुद्धि पुरुष पकाये हुए अन्न को छोड़ कर भिक्षा के लिए घूमने वाले पुरुष के समान है।। 43।।
उपासना से स्वप्न द्वारा उनके प्रश्नों के साफ साफ उत्तर मिले हैं। अनेकों को गायत्री द्वारा मनोवांछित लाभ हुए हैं।
उपासना ही मेरा नित्य नियमित विधान है। मैंने गायत्री उपासना का यथा शक्ति प्रचार भी किया है जिससे बहुत लोगों ने लाभ उठाया है। कई आदमियों को गायत्री उपासना का यथा शक्ति प्रचार भी किया है जिससे बहुत लोगों ने लाभ उठाया है। कई आदमियों को गायत्री उपासना से स्वप्न द्वारा उनके प्रश्नों के साफ साफ उत्तर मिले हैं। अनेकों को गायत्री द्वारा मनोवांछित लाभ हुए हैं।
उपासना की इसके द्वारा इस प्रकार लाभ हुआ कि एक बार मैं एक ऐसे स्थान पर था कि जहाँ वैद्य इत्यादि कोई न था। वह स्थान ज्वर का भंडार था कोई व्यक्ति इससे न बचता था। मुझे भी भयंकर ज्वर हुआ। परन्तु ईश्वरीय शक्ति की कृपा से शीघ्र इससे छुटकारा मिला व स्वप्न में यह बताया गया कि अमुक दिवस तुम ज्वर मुक्त हो जाओगे। चाकरी में एक बार एक दुष्ट अफसर ने बहुत तंग किया तो निज गुरुजी को वह सर्व ब्यौरा बताने पर उनके आग्रह से ईश्वरीय शक्ति से संकट निवारण की प्रार्थना की गई।
उपासना से अवश्य मिल जाता है यह अक्षरशः सत्य है। जिसे विश्वास न हो वह करके स्वयं देख लेवे।
उपासना करे या न करे, केवल गायत्री के जप से द्विज अक्षय मोक्ष को प्राप्त होता है।
उपासना नहीं की अपितु सात लोकों की भी उपासना कर ली।
उपासना करना योग का सबसे प्रथम अंग है जो राजयोग में परमावश्यक है।”
उपासना करना ब्राह्मणों के लिए तो अत्यन्त आवश्यक है। जो ब्राह्मण गायत्री जप नहीं करता वह अपने धर्म कर्तव्य को छोड़ने का अपराधी होता है।”
उपासना न करने वाले द्विजों की शास्त्रकारों ने कड़ी भर्त्सना की है और उन्हें अधोगामी बताया है। इस निन्दा में इस बात की चेतावनी है कि जो आलस्य या अश्रद्धा के कारण गायत्री साधना में ढील करते हों उन्हें सावधान होकर इस श्रेष्ठ उपासना में प्रवृत्त होना चाहिए।
उपासना करने वाला द्विज कृतकृत्य हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-February
उपासना है। यों तो यम-नियम-प्राणायाम-जप-माला-तिलक सभी उपासना हैं क्योंकि चित्त की एकाग्रता तथा इन्द्रिय निग्रह द्वारा इससे हमारा व्यक्तिगत लाभ ही है। इन साधनाओं द्वारा हम ‘ईश्वर’ की समीपता प्राप्त करने में अधिक सुविधा तथा सफलता पाते हैं अतः यह भी गौण श्रेणी की उपासना है। अन्तरात्मा के आदेश को पालन करके ‘उपासना’ की सार्थकता होना और समझना चाहिये।
उपासना भाव को जाग्रत कर देता है, वासनाएं विशान्त हो जाती हैं।
उपासना हैं क्योंकि चित्त की एकाग्रता तथा इन्द्रिय निग्रह द्वारा इससे हमारा व्यक्तिगत लाभ ही है। इन साधनाओं द्वारा हम ‘ईश्वर’ की समीपता प्राप्त करने में अधिक सुविधा तथा सफलता पाते हैं अतः यह भी गौण श्रेणी की उपासना है। अन्तरात्मा के आदेश को पालन करके ‘उपासना’ की सार्थकता होना और समझना चाहिये।
उपासना कर्म और ज्ञान में मानता हूँ। ईश्वर में या ईश्वरीय व्यक्तियों में जिन गुणों की प्रधानता होती है, उन्हें ही अपना लेना, अपने को ‘ईश्वर’ बना लेना, वचन, कर्म, मन की एकता स्थापित करके अन्तरात्मा के आदेशों का पालन करना, यही सब सच्ची उपासना है। यों तो यम-नियम-प्राणायाम-जप-माला-तिलक सभी उपासना हैं क्योंकि चित्त की एकाग्रता तथा इन्द्रिय निग्रह द्वारा इससे हमारा व्यक्तिगत लाभ ही है। इन साधनाओं द्वारा हम ‘ईश्वर’ की समीपता प्राप्त करने में अधिक सुविधा तथा सफलता पाते हैं अतः यह भी गौण श्रेणी की उपासना है। अन्तरात्मा के आदेश को पालन करके ‘उपासना’ की सार्थकता होना और समझना चाहिये।
उपासना करने में भेद है केवल। मनुष्यता, सौहार्द्रता, सज्जनता आदि यही ईश्वरी भक्त के लक्षण हैं। ईश्वर भक्त के लिए प्रत्येक धर्म आदरणीय है। उसे किसी से द्वेष नहीं। जो पतितों अपराधियों तथा ठुकराये हुओं को भी अपनाता है वही ईश्वर भक्त है।
उपासना है। अन्तरात्मा के आदेश को पालन करके ‘उपासना’ की सार्थकता होना और समझना चाहिये।
उपासना करने के यों तो आठ भेद हमारे धर्म शास्त्रों ने बताये हैं। ठीक भी है वह। किन्तु मैं उत्तम उपासना कर्म और ज्ञान में मानता हूँ। ईश्वर में या ईश्वरीय व्यक्तियों में जिन गुणों की प्रधानता होती है, उन्हें ही अपना लेना, अपने को ‘ईश्वर’ बना लेना, वचन, कर्म, मन की एकता स्थापित करके अन्तरात्मा के आदेशों का पालन करना, यही सब सच्ची उपासना है। यों तो यम-नियम-प्राणायाम-जप-माला-तिलक सभी उपासना हैं क्योंकि चित्त की एकाग्रता तथा इन्द्रिय निग्रह द्वारा इससे हमारा व्यक्तिगत लाभ ही है।
उपासना’ की सार्थकता होना और समझना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-August
उपासना तीनों हैं। सद्गुणों का चिन्तन ज्ञान है, ब्रह्म की धारणा कर्म है और बुद्धि की सात्विकता अभीष्ट प्राप्त की क्रिया प्रणाली एवं उपासना है। वेदों की समस्त ऋचाएं इसी तथ्य को सविस्तार प्रकट करने के लिए प्रकट हुई हैं। वेदों में, ज्ञान कर्म और उपासना यह तीन विषय हैं, गायत्री के बीज में भी उन्हीं तीनों का व्यावहारिक संक्षिप्त, एवं सर्वांग पूर्ण है। इस तथ्य को, इस बीज को सच्चे हृदय से निष्ठा और श्रद्धा के साथ अन्तःकरण में गहरा उतारने का प्रयत्न करना ही गायत्री की उपासना है।
उपासना यह तीन विषय हैं, गायत्री के बीज में भी उन्हीं तीनों का व्यावहारिक संक्षिप्त, एवं सर्वांग पूर्ण है। इस तथ्य को, इस बीज को सच्चे हृदय से निष्ठा और श्रद्धा के साथ अन्तःकरण में गहरा उतारने का प्रयत्न करना ही गायत्री की उपासना है। इस उपासना से साधक का सब प्रकार कल्याण ही कल्याण है।
उपासना से साधक का सब प्रकार कल्याण ही कल्याण है।
उपासना है। इस उपासना से साधक का सब प्रकार कल्याण ही कल्याण है।
उपासना है। वेदों की समस्त ऋचाएं इसी तथ्य को सविस्तार प्रकट करने के लिए प्रकट हुई हैं। वेदों में, ज्ञान कर्म और उपासना यह तीन विषय हैं, गायत्री के बीज में भी उन्हीं तीनों का व्यावहारिक संक्षिप्त, एवं सर्वांग पूर्ण है। इस तथ्य को, इस बीज को सच्चे हृदय से निष्ठा और श्रद्धा के साथ अन्तःकरण में गहरा उतारने का प्रयत्न करना ही गायत्री की उपासना है। इस उपासना से साधक का सब प्रकार कल्याण ही कल्याण है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-March
उपासना का वैज्ञानिक तत्व ज्ञान।
उपासना, संस्कार, शास्त्र आदि की व्यवस्था की गई। यह सब बातें मिलकर एक ‘समाज धर्म’ बनाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-June
उपासना संध्या है। प्रातःकाल और सायंकाल की, सूर्योदय और सूर्य अस्त की दोनों संध्याओं में आध्यात्मिक उपासनाओं का विधान किया गया है। पर इन दिनों में प्रातःकाल तो अत्यधिक आवश्यक है। क्योंकि उसकी श्रेष्ठता−सायंकाल की संधि से अनेक गुनी अधिक है। यदि छोड़ना हो तो सायंकाल की संध्या छोड़ी जा सकती है पर प्रातःकाल की उपासना के लाभ से तो किसी को वंचित रहना ही न चाहिए।
उपासना में दूसरी जानने योग्य बात यह है कि− पूर्व की ओर मुँह करके साधन किया जाए। यह सर्वविदित है कि उत्तर दिशा में पृथ्वी का केन्द्र ध्रुव होने के कारण उधर से एक चुम्बक शक्ति प्रवाहित होती है। कुतुबनुमा यंत्र की सुई अपने आप उत्तर दिशा की ओर मुँह कर लेती है। उसे कितना ही घुमाइए सुई उत्तर में ही ठहरेगी। कारण यह है कि उत्तर ध्रुव का चुम्बकत्व उन सब पदार्थों को अपनी ओर खींचता रहता है जिसमें चुम्बकत्व शक्ति का अंश विद्यमान है।
उपासना के लाभ से तो किसी को वंचित रहना ही न चाहिए। उपासना में दूसरी जानने योग्य बात यह है कि− पूर्व की ओर मुँह करके साधन किया जाए। यह सर्वविदित है कि उत्तर दिशा में पृथ्वी का केन्द्र ध्रुव होने के कारण उधर से एक चुम्बक शक्ति प्रवाहित होती है। कुतुबनुमा यंत्र की सुई अपने आप उत्तर दिशा की ओर मुँह कर लेती है। उसे कितना ही घुमाइए सुई उत्तर में ही ठहरेगी।
उपासनाओं का विधान किया गया है। पर इन दिनों में प्रातःकाल तो अत्यधिक आवश्यक है। क्योंकि उसकी श्रेष्ठता−सायंकाल की संधि से अनेक गुनी अधिक है। यदि छोड़ना हो तो सायंकाल की संध्या छोड़ी जा सकती है पर प्रातःकाल की उपासना के लाभ से तो किसी को वंचित रहना ही न चाहिए। उपासना में दूसरी जानने योग्य बात यह है कि− पूर्व की ओर मुँह करके साधन किया जाए।
उपासना के लिए एक “साधना गुरु” का प्रथक से वरण किया जा सकता है। इस वरण से साधना की सफलता में बड़ी सहायता मिलती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-September
उपासना करनी है तो भगवान के ऐसे ही बल की उपासना करनी चाहिए। वैराग्य युक्त निष्काम बल की मूर्ति हनुमान जी हैं, इसीलिए हर एक व्यायाम शालाओं में उनकी मूर्ति स्थापित की जाती है। हनुमानजी वैराग्य युक्त और निष्काम बल के पुतले थे। रावण भी बलवान था लेकिन न वह निष्काम था और न वैराग्य युक्त। उसका बल भोगने के लिए था, दूसरों को दुःख देने के लिए था।
उपासना करना है। देश को ऐसे ही उपासकों की आज आवश्यकता है।
उपासना का दोष आ गया था, यही कारण था कि महर्षि होते हुए भी वह साँसारिक ऐषणाओं के वशी हो चुके थे और इसीलिए भीष्म को उत्तरायण की प्रतीक्षा करनी पड़ी क्योंकि उनकी वृत्ति योग रहित थी और शक्तियों का आत्मा में केन्द्रीकरण नहीं किया गया था। अतः उनके धराशायी होते समय आकाशवाणी गूँजी कि-
उपासना करनी चाहिए और चरित्रवान बनने का ही संकल्प । इस अकेले को लिया तो सब कुछ पा लिया समझो।
उपासना करना हनुमान जी की सच्ची उपासना करना है। देश को ऐसे ही उपासकों की आज आवश्यकता है।
उपासना करनी चाहिए। वैराग्य युक्त निष्काम बल की मूर्ति हनुमान जी हैं, इसीलिए हर एक व्यायाम शालाओं में उनकी मूर्ति स्थापित की जाती है। हनुमानजी वैराग्य युक्त और निष्काम बल के पुतले थे। रावण भी बलवान था लेकिन न वह निष्काम था और न वैराग्य युक्त। उसका बल भोगने के लिए था, दूसरों को दुःख देने के लिए था।
उपासना करने वाले में वेग चाहिए। स्फूर्ति चाहिए, सामने कार्य देखते ही आनन्द से छलाँग मारने का उत्साह होना चाहिए। मन में सेवा की भावना है, शरीर आलस्य में लोट पोट हो रहा है ऐसा शरीर किस काम का। सेवक को तो ऐसा होना चाहिए कि सेवा करने के लिए बात मन में उठे पीछे, शरीर पहले ही चल पड़े।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-October
उपासना करके जो अद्भुत लाभ प्राप्त किये हैं। इस पुस्तक के पढ़ने से गायत्री की उपयोगिता और महिमा भली प्रकार समझ में आ जाती है।
उपासना भय है यह विचार प्राचीन ग्रन्थों में होने पर भी मध्य युग में कुछ फर्क पड़ गया। क्योंकि मध्य युग में ऐसा विचार चलने लगा कि कर्म बन्धन कारक है, किन्हीं किन्हीं ने तो उन्हें मारक तक समझा लिया इसलिए कर्म का जितना त्याग किया जा सका, किया गया और केवल भिक्षा माँगकर उदर पोषण करने की बात आरम्भ हुई। मध्य युग में किसी भी सन्त की जाँच की जाय तो उसके पीछे दिखाई देगा कि उसका कपड़े सीना खेती करना आदि कार्य पेट के लिए करता रहा है। दूसरों पर बोझ डालकर पेट भरने की वृत्ति से बचने के लिए उसका प्रयत्न है। लेकिन यह विचार धारा तो बुरी है।
उपासना से होने वाले चमत्कारी लाभों की विवेचना इस पुस्तक में बड़े विस्तार से की गयी है। गायत्री संध्या-गायत्री अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ की विधियाँ भली प्रकार समझाई गयी हैं।
उपासना उसकी आज्ञा पालन द्वारा की जावे, परन्तु तुम्हारे आस पास उसके कानून को तोड़ा जा रहा है और उसकी अन्यथा व्याख्या की जा रही है। उन लाखों मनुष्यों को मनुष्योचित अधिकारों से वंचित किया जा रहा है और तुम चुपचाप बैठे हो। क्या इस पर भी तुम यह कहने का साहस कर सकते हो कि तुम उस पर विश्वास करते हो।
उपासना के लिए उसके समय विभाग में कोई एक काल में विभाजित नहीं है। उनका तो प्रत्येक क्षण उपासनामय है। वे अपने विश्व चैतन्य को एक क्षण के लिए भी भूलना नहीं चाहते, बल्कि गति विधि का प्रत्येक भाग इन चेतन देव के लिए ही लगाना चाहते हैं।
उपासना भय बनाना होगा, इसीलिए मैंने एक व्रत सूत्र बनाया है-
उपासना है, यह विचार नया नहीं है, बल्कि यह विचार तो ठेठ वेदों तक चला गया है।
उपासना करते हैं तो श्रुति रह जाती है, वर्तमान ईश्वर को लेते हैं वैदिक इन्द्र रह जाते हैं और अधुनातन प्रार्थनाओं को अपनाते हैं तो वैदिक दृष्टियाँ बच रहती हैं।
उपासना करने के लिए विशेष जोर दिया गया है। प्राचीनतम काल में ऋषियों से लेकर आधुनिक काल के महापुरुषों तक ने-स्वामी दयानन्द और महात्मा गाँधी तक ने- एक स्वर से उसकी महत्ता का प्रतिपादन किया है।
उपासना कर रहे हैं। यही जीवन की वास्तविक दृष्टि है।
उपासना की दृष्टि से विराट पुरुष चार भागों में विभक्त है और समय भेद में भी उनके चार भाग कर दिये गये हैं। ये दोनों प्रकार के चार च्र भाग हिन्दू संस्कृति में वर्ण एवं आश्रमों के नाम से पुकारे जाते हैं। यों समस्त ब्रह्मांड में वर्ण धर्म और आश्रम धर्म पाये जाते हैं। लेकिन हिन्दू संस्कृति उन्हें पृथक नहीं रहने देना चाहती। उसकी दृष्टि में उनका अस्तित्व तब ही तक है जब तक की कि विराट पुरुष की रक्षा के लिए उनकी गतिविधि है।
उपासना से बुद्धि का परिमार्जन और संशोधन होता है। साथ ही सरलता पूर्वक हो सकती है जिसके द्वारा बड़ी अद्भुत एवं आश्चर्यजनक गुप्त शक्तियों को जागृत करके जीवन सिद्धि को प्राप्त किया जा सकता है। अनेक प्रकार की सफलताएं एवं समृद्धियाँ देने तथा संकटों एवं अभावों का निवारण करने की गायत्री में असाधारण शक्ति है। इसलिए इस एक मंत्र का आश्रय लेकर भी योग की पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। इन्हीं सब बातों को देखते हुए हिन्दू धर्म ने गायत्री को सर्वोच्च प्रतिष्ठा, महत्ता एवं मान्यता प्रदान की है।
उपासनामय बनायें, जो जो व्यवहार हम करें फिर चाहे वह बाजार का हो या रसोई का चाहे चक्की पीसने का ही क्यों न हो, सबको भगवत् सेवा समझ कर करें तो हमारा काम खत्म हुआ। हमारा ध्येय होना चाहिए कि हम जीवन के प्रत्येक काम से भगवान की उपासना कर रहे हैं। यही जीवन की वास्तविक दृष्टि है।
उपासना की असंख्य पद्धतियाँ हो जाती हैं, सामाजिक रीतियों में विभिन्नता की बाढ़-सी आ जाती है, विचारसरणि के विस्तार का पारावार नहीं रहता, परन्तु यह सब जैसे हमारे लिये है ही नहीं। हमारी दृष्टि उड़कर एक ही बिन्दु पर पड़ती है-बीच का व्यवधान हमारे लिए असिद्ध ही रहता है और मनुष्य की सीमित बुद्धि में समा ही कितना सकता है? एक बात को ग्रहण करने जाते हैं तो दूसरी छूट जाती है, हिन्दुत्व को पकड़ने जाते हैं तो आर्यत्व रह जाता है, हिन्दुस्तान का पल्ला पकड़ते हैं तो भारतवर्ष और आर्यावर्त छूट जाते हैं, स्मृति की उपासना करते हैं तो श्रुति रह जाती है, वर्तमान ईश्वर को लेते हैं वैदिक इन्द्र रह जाते हैं और अधुनातन प्रार्थनाओं को अपनाते हैं तो वैदिक दृष्टियाँ बच रहती हैं।
उपासना पद्धति। विश्व आत्मा की उपासना के लिए उसके समय विभाग में कोई एक काल में विभाजित नहीं है। उनका तो प्रत्येक क्षण उपासनामय है। वे अपने विश्व चैतन्य को एक क्षण के लिए भी भूलना नहीं चाहते, बल्कि गति विधि का प्रत्येक भाग इन चेतन देव के लिए ही लगाना चाहते हैं।
उपासनामय है। वे अपने विश्व चैतन्य को एक क्षण के लिए भी भूलना नहीं चाहते, बल्कि गति विधि का प्रत्येक भाग इन चेतन देव के लिए ही लगाना चाहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-May
उपासना विधि हैं। हनुमान चालीसा पाठ से लेकर प्रतिमा पूजन तक और हठ योग से लेकर समाधि स्थापना तक असंख्यों पूजा विधान हैं। इन विधानों की प्रमाणिकता सिद्ध करने वाले प्राचीन अभिवचन पुस्तकों में उपलब्ध हो ही जाते हैं। इस प्रकार नित्यकर्म की संध्या के अनेकों रूप दृष्टि गोचर होते रहते हैं।
उपासना करनी चाहिए। यह साधारण मंत्र नहीं है जिसके लिए नियत भूमिका बाँधे बिना काम न चले। मनुष्य यदि किन्हीं छुट्टले बनचारी, प्राणियों को पकड़ना चाहे तो इसके के लिए, चतुरतापूर्ण उपायों की आवश्यकता पड़ती है, परन्तु बछड़ा अपनी माँ को पकड़ना चाहे तो उसे मातृ भावना से माँ पुकार देना मात्र काफी होता है, गौ माता खड़ी हो जाती है, वात्सल्य के साथ बछड़े को चाटने लगती है और उसे अपने पयोधरी से दुग्ध पान कराने लगती है। आइये, हम भी वेदमाता को सच्चे अन्तःकरण से भक्ति भावना के साथ पुकारें और उसके अन्तराल से निकला हुआ अमृत रस पान करें।
उपासना विशेष फलवती होती है, ऐसा शास्त्र का मत है।
उपासना करने से जो लाभ हुए हैं उनका विस्तृत वर्णन भेजने का अनुरोध है। अखंड ज्योति के पाठक इस दिशा में एक कार्य कर सकते हैं कि वे उन साधकों के पास जिन्होंने गायत्री की साधना की हो, अखंड ज्योति के प्रतिनिधि की तरह उनके पास जा कर उनसे उनके अनुभव पूछें और कहीं अन्यत्र भूत काल में किसी को इस साधना से जो लाभ हुआ हो उनका संग्रह करके भेजें। आशा है कि पाठक अपनी पत्रिका के लिए इस दिशा में सद्सेवा करके लेख भिजवाने का प्रयत्न करेंगे।
उपासना को (नित्यावश्यककर्मसु) नित्य आवश्यक कर्मों में (उक्त्वा) बतलाकर (विचक्षणौः) विद्वानों ने (द्विजातीना) द्विजों के लिए (तत्र) उसमें (अनध्यायः) अनध्याय (न उक्तः) नहीं कहा।
उपासना करते है। अग्नि में सुगंधित पदार्थ डालने से उसमें से सुगंधित धुँआ निकलता है और उसमें दुर्गंधित पदार्थ जलाने से दुर्गंधि फैलती है। मूलतः अग्नि गंध रहित है। चैतन्य तत्व भी मूलतः सतोमय है। पर धन, ऐश्वर्य एवं भोग वैभव की इच्छाओं के कारण वह लक्ष्मी बन जाती है और संघर्ष विनाश, रक्षा, आक्रमण की स्थिति में वह दुर्गा कही जाती है।
उपासना आरभ्यताँ) उपासना आरंभ करनी चाहिए।
उपासनायाँ) उपासना (मताः) स्वीकार किये हैं।
उपासना करते हैं वही तत्व हमारे अन्दर बढ़ता है, इस वृद्धि के फलस्वरूप साधक को ऐसे ज्ञात और अज्ञात प्रत्यक्ष और परोक्ष अवसर प्राप्त होते हैं जिनका सदुपयोग करने से अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति होती है।
उपासना में उसके इस मूल रूप की ही धारणा की जाती है। इसलिए उपासक के अन्तःकरण में सत् तत्वों की ही वृद्धि होती है।
उपासना से इन्हीं गुणों की प्राप्ति होती है।
उपासना करता है उससे उन्हीं तत्वों का आविर्भाव विशेष रूप से होता है। उसकी प्रकृति उसी ढाँचे में ढलती है, स्वभाव वैसा बनता है, योग्यताएं और शक्तियाँ वैसी ही बढ़ती हैं, तथा उसी के अनुरूप सफलताओं का मार्ग प्रशस्त होता है।
उपासना आवश्यक है, उसको अपने दैनिक कार्यक्रम में महत्वपूर्ण स्थान होना चाहिये। इसके अतिरिक्त किन्हीं विशेष प्रयोजनों के लिये, विशेष अवसरों पर उसका विशेष रूप से आवाहन किया जाता है। जैसे बच्चा साधारणतः दिन भर माँ को पुकारता रहता है और माँ भी उसे उत्तर देकर उसका समाधान करती रहती है। यह लाड़−दुलार यथावत् चलता रहता है और माँ बेटा दोनों प्रसन्न रहते हैं। पर किसी विशेष आपत्ति के अवसर पर, गिर पड़ने, चोट लगने पर, चींटी के काट खाने पर, बन्दर बिल्ली आदि से डर जाने पर, बच्चे विशेष रूप से माँ को पुकारता है, उसके शब्द तो वही होते हैं ‘माँ’ पर उन शब्दों के साथ भाव लहरी, उच्चारण विधि, आतुरता, असाधारण होती है, इस असाधारणता को माता तुरन्त समझ जाती है और सब काम छोड़कर बालक के पास दौड़ी जाती है।
उपासना करने में (त्रुटीः) गलतियाँ (कुर्वन् अपि) करता हुआ भी (कश्चित् ) कोई (भक्तः) भक्त (कदाचन ) कभी भी (विपरीतं) विपरीत (फलं) फल को (न) नहीं (आप्नुते) प्राप्त होता ।
उपासना के समर्थक भगवती का कोई सुन्दर या चित्र अथवा प्रतिमा को उन फूलों पर स्थापित कर सकते हैं, निराकार के उपासक निराकार भगवती की शक्ति पुँज का एक स्फुल्लिंग वहाँ प्रतिष्ठित होने की भावना कर सकते हैं। कोई कोई साधक धूपबत्ती की दीपक की अग्नि शिखा में भगवती की चैतन्य ज्वाला का दर्शन करते हैं और उस दीपक या धूपबत्ती को फूलों पर प्रतिष्ठित करके अपनी आराध्य शक्ति की उपस्थिति अनुभव करते हैं। विसर्जन के समय प्रतिमा को हटा कर शयन करा देना चाहिए पुष्पों को जलाशय या पवित्र स्थान में विसर्जित कर देना चाहिए। अधजली धूपबत्ती या रुई की बत्ती को बुझाकर उसे भी पुष्पों के साथ विसर्जित कर देना चाहिए। दूसरे दिन जली हुई बत्ती का प्रयोग फिर न होना चाहिए।
उपासना की जाती है।
उपासना आरंभ करनी चाहिए।
उपासना करनी चाहिए। किसी साँसारिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए, धन वैभव, पद, स्वास्थ्य, यश तथा अभीष्ट परिस्थिति प्राप्त करने के लिए गायत्री का रजोगुणी रूप उपासनीय है। किन्हीं अनिष्टों का विदारण, आपत्तियों, विघ्नों संकटों भीतरी और बाहरी शत्रुओं का विनाश करने के लिए तमोगुण स्वरूपा शक्ति उपासना की जाती है।
उपासना करनी चाहिए।
उपासना (मताः) स्वीकार किये हैं।
उपासना करने से (आत्म शक्तिः) आत्मबल (विवर्धते) बढ़ता है। (क्रमशः) धीरे-धीरे (अजस्य) जन्म बन्धन रहित (परमात्मनः) परमात्म की (सामीप्य) समीपता (प्राप्यते) प्राप्त होती है।
उपासना करते हैं। तमोगुणी ताँत्रिक, मारण, मोहन उच्चाटन, वशीकरण आदि अभिचारों में क्लीं तत्व का पुरश्चरण किया जाता है। ह्रीं सरस्वती के रूप में, श्रीं-लक्ष्मी के रूप में क्लीं दुर्गा के रूप में पूजी जाती है। जो साधक जिस गुण की उपासना करता है उससे उन्हीं तत्वों का आविर्भाव विशेष रूप से होता है। उसकी प्रकृति उसी ढाँचे में ढलती है, स्वभाव वैसा बनता है, योग्यताएं और शक्तियाँ वैसी ही बढ़ती हैं, तथा उसी के अनुरूप सफलताओं का मार्ग प्रशस्त होता है।
उपासना विधियों में अलग-अलग विधान है कि किन उंगलियों को काम में लाया जाय। गायत्री की ब्रह्म संध्या में अंगूठा और अनामिका उंगली का प्रयोग प्रयोजनीय ठहराया गया है। अंगूठा और अनामिका उंगली को मिलाकर विभिन्न अंगों का स्पर्श इस भावना से करना चाहिये कि मेरे यह अंग गायत्री शक्ति से पवित्र तथा बलवान हो रहा है। अंग स्पर्श के साथ निम्न प्रकार मंत्रोच्चार करना चाहिये-
उपासना को अपना नित्य नियम नित्य कर्म बनावें तो उन्हीं लाभों को प्राप्त कर सकते हैं, जिन्हें असंख्यों ने अब तक प्राप्त किया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-November
उपासना करें तो जहाँ भोजन से मन की शुद्धि और बुद्धि का विकास होता वहाँ आयु की वृद्धि और रोगों का विनाश भी होगा।
उपासना या आत्मोपलब्धि का साधन है। भोग इसी का एक अंग है। सन्तानोत्पादन के लिए ही स्त्री संभोग की प्रवृत्ति होनी चाहिए। संयम की इस पगडंडी पर चलने के लिए धर्म शास्त्रों में विभिन्न नियम उपनियमों की सृष्टि की गई है। अमावस, संक्रमित, पूर्वकाल आदि में जो स्त्री भोग की निन्दा और निषेध किया है उसमें संयम की भावना ही काम कर रही है।
उपासना करने वाला क्या कभी फलीभूत हो सकता है। हमें बाहर से धर्म के नाश का डर लगा रहता है क्योंकि हमारे अन्दर कुछ भी नहीं है। जो घड़ा अन्दर से कच्चा है उसको बाहर का हल्का सा धक्का चूर-चूर कर देगा परन्तु हवा भरे हुए ब्लेडर को भारी दबाव (सीमित) भी नष्ट नहीं कर सकता है। हमारी आन्तरिक निर्बलता भय का रूप धारण किये हुए है और हम बाहरी शक्ति से अपना बचाव करना चाहते हैं बुद्ध को प्रचार के लिए सेवा की आवश्यकता नहीं थी न महावीर शंकर या नानक को, परन्तु हमारा धर्म इतना निर्बल हो गया कि हम तहखानों में छिपकर भी आशा नहीं कर सकते। निश्चय ही हमारी धार्मिकता में कहीं त्रुटि है अन्यथा चीन में चीन में हिन्दू धर्म (बौद्ध) धर्म असहाय नहीं, वर्मा व लंका में नहीं पर भारत में बन गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-December
उपासना में संलग्न होकर आत्म सन्तोष पूर्वक सदाचारी जीवन बिताना ही वास्तव में सारस्वत योग है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-January
उपासना और साधना रहित व्यक्ति की आत्मा मलीन और पतनोन्मुख हो जाती है। स्वार्थ और भोग का नशा उसे पाप की नारकीय ज्वाला में घसीट ले जाता है। इसलिए अपने अस्तित्व का सही रूप जानने और अपने लक्ष के प्रति गतिशील रहने के लिए उसे आध्यात्म का सहारा लेना पड़ता है। आत्म−कल्याण का यही मार्ग है।
उपासनात्मक साधना एकाँगी रहेगी, अपूर्ण मानी जायगी और सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी।
उपासनात्मक कार्यक्रम बनाये जा सकते हैं। जिससे जितना बन पड़े कुछ न कुछ करना अवश्य चाहिए।
उपासना और तपश्चर्या में भी पूर्ण श्रद्धापूर्वक संलग्न रहता था। इन विशेषताओं के कारण ही उन्हें भू-सुर की उपाधि मिलती थी, उन्हें श्रेष्ठ माना जाता था, लोग उन्हें पूजते थे और उनको जीवन-निर्वाह की चिन्ताओं से मुक्त रखने के लिए आवश्यक दान-दक्षिणा भी देते थे। जनता का यह मूल्याँकन सही भी था। जो स्वयं अपना सारा जीवन परमार्थ में ही लगाये हुए हैं और दूसरों को परमार्थ की प्रेरणा देते हैं, ऐसे ही लोगों के द्वारा तो व्यक्ति और समाज की श्रेष्ठता कायम रह सकती है। इस मानवोचित श्रेष्ठता के लिए जिनका जितना समय और श्रम, मन और धन लगता है वे उतने ही अंश में ब्राह्मण हैं, पूज्य हैं, सराहनीय हैं, वन्दनीय हैं।
उपासना करने वाले भी कुछ दिन बाद उसे छोड़ बैठते हैं, उसी प्रकार क्षणिक उत्साह में की हुई प्रतिज्ञाऐं भी टूट ही जाती हैं। जड़ की मजबूती के लिए विचार मंथन का पूरा अवसर मिले तभी भावना में परिपक्वता आवेगी।
उपासना एवं पुण्य प्रवृत्तियों को बढ़ाना चाहिए। धर्म कर्मों की की अभिवृद्धि होने से वातावरण में पवित्रता उत्पन्न होती है और उसके फलस्वरूप जो दैवी अशुभ अनिष्ट आने वाले हैं वे भी शान्त होते हैं। इस दिशा में आवश्यक प्रेरणाएँ दी जा रही हैं और वैयक्तिक एवं सामूहिक धर्मानुष्ठानों में प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह प्रयत्न उत्साहपूर्वक बढ़ते रहें तो प्रकृति के अशुभ प्रयत्नों पर भी एक बड़ी सीमा तक काबू पाया जा सकता है, उनका बहुत अंशों में समाधान हो सकता है।
उपासना के माध्यम से हमारी आत्म−कल्याण प्रक्रिया निष्ठा और श्रद्धा के वातावरण में चल रही है। युग निर्माण के दूसरे कार्यक्रम पर भी अब हमें आवश्यक ध्यान देना है। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज का निर्माण ही युग निर्माण का आधार हो सकता है। इसके लिए हमें उसी उत्साह से अग्रसर होना है जिस उत्साह से कि आत्म−कल्याण की साधना में संलग्न रह रहे हैं। पक्षी दो पंखों से उड़ता है, हमारी आन्तरिक और बाह्य प्रगति मिलकर ही एक उभय-पक्षीय सर्वांगपूर्ण प्रगति सिद्ध हो सकेगी।
उपासना एवं योग साधना की आवश्यकता होती है; यह हमारी अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इसकी पूर्ति के लिए ऋषियों, शास्त्रों एवं पुरोहितों ने हमें कुछ−न−कुछ समय नित्य लगाते रहने का आदेश दिया है उपासना और साधना रहित व्यक्ति की आत्मा मलीन और पतनोन्मुख हो जाती है। स्वार्थ और भोग का नशा उसे पाप की नारकीय ज्वाला में घसीट ले जाता है। इसलिए अपने अस्तित्व का सही रूप जानने और अपने लक्ष के प्रति गतिशील रहने के लिए उसे आध्यात्म का सहारा लेना पड़ता है। आत्म−कल्याण का यही मार्ग है।
उपासना में अधिक रुचि नहीं, समाज सेवा के कार्यों तक ही जिनकी अभिरुचि है वे युगनिर्माण योजना के नाम से भी अपना संगठन रख सकते हैं। जहाँ प्रचारात्मक स्तर से आगे बढ़कर कुछ रचनात्मक कार्य करने या आन्दोलनात्मक प्रवृत्ति चलाने की स्थिति है वे वैसा भी कर सकते हैं। अपना यह बुराइयों को छोड़ने और अच्छाइयों को अपनाने का बीस-सूत्री कार्यक्रम पहले भी चलता था। जो लोग प्रभावित होते थे, वे उस प्रकार के प्रतिज्ञा पत्रों पर हस्ताक्षर करते थे, वह प्रतिज्ञाओं भी इसी योजना से संबद्ध हैं। पर प्रतिज्ञाओं से पहले उन विषयों पर पूरा विश्वास जमाने के लिए मनोभूमि में गहराई तक उन बातों के लाभ-हानि पर विश्वास जमाया जाना आवश्यक है।
उपासना का भी इस दृष्टि से अत्यधिक महत्व है। आस्तिकता एवं उपासना को अपनाने से भी मनुष्य सज्जन बनता है। ईश्वर के निष्पक्ष न्यायकारी और पापों का दण्ड देने वाला मानने से कर्मफल की अनिवार्यता पर निष्ठा जमती है और मनुष्य नरक एवं दुर्गति के भय से, पाप से बचता है। इसलिए ईश्वर−उपासना का अधिकाधिक प्रचार करना चाहिए। यों गायत्री उपासना हिन्दू धर्म में सर्वश्रेष्ठ है, यही अनादि, सनातन तथा सभ्यता एवं संस्कृति की गंगोत्री है।
उपासना करने का शक्तिभर प्रयत्न करें। प्रतिदिन तीन घंटा समय लगा देने से 27 माला प्रतिदिन करते हुए 9 दिन में 24 हजार का एक गायत्री पुरश्चरण हो सकता है। प्रातः सायं दोनों समय मिलाकर तीन घंटे रोज 9 दिन तक लगाते रहना कोई इतनी बड़ी समस्या नहीं है जिसे भावनाशील व्यक्ति हल न कर सके। यदि कार्य की उपयोगिता समझी जा सके तो इतना समय बहुत ही आसानी से निकल सकता है। नवरात्रि में नौ दिन तक अनुष्ठान करने के हम में से अनेकों अभ्यस्त हैं।
उपासना द्वारा ही प्राप्त होता है, इसलिए ब्राह्मण वर्ग उपासना और तपश्चर्या में भी पूर्ण श्रद्धापूर्वक संलग्न रहता था। इन विशेषताओं के कारण ही उन्हें भू-सुर की उपाधि मिलती थी, उन्हें श्रेष्ठ माना जाता था, लोग उन्हें पूजते थे और उनको जीवन-निर्वाह की चिन्ताओं से मुक्त रखने के लिए आवश्यक दान-दक्षिणा भी देते थे। जनता का यह मूल्याँकन सही भी था। जो स्वयं अपना सारा जीवन परमार्थ में ही लगाये हुए हैं और दूसरों को परमार्थ की प्रेरणा देते हैं, ऐसे ही लोगों के द्वारा तो व्यक्ति और समाज की श्रेष्ठता कायम रह सकती है। इस मानवोचित श्रेष्ठता के लिए जिनका जितना समय और श्रम, मन और धन लगता है वे उतने ही अंश में ब्राह्मण हैं, पूज्य हैं, सराहनीय हैं, वन्दनीय हैं।
उपासनाऐं भी उत्तम हैं। भजन, कीर्तन एवं रामायण गीता आदि के पाठ भी जिनसे बन पड़े करें। इसी प्रकार और भी उपासनात्मक कार्यक्रम बनाये जा सकते हैं। जिससे जितना बन पड़े कुछ न कुछ करना अवश्य चाहिए।
उपासना हिन्दू धर्म में सर्वश्रेष्ठ है, यही अनादि, सनातन तथा सभ्यता एवं संस्कृति की गंगोत्री है। इसको उपासना का माध्यम बनाने के लिए पूरा जोर दिया जाय। पर इसे अनिवार्य न बनाया जाय। कोई दूसरा माध्यम रखना चाहे तो वैसा भी कर सकते हैं। किसी न किसी रूप में उपासना के लिए हर व्यक्ति को समझाया जाय।
उपासना भी इसमें सम्मिलित रहने से इस कार्यक्रम से शारीरिक ही नहीं आत्मिक काया−कल्प भी होने की संभावना है। नित्य यज्ञ में सम्मिलित रहने से यज्ञ चिकित्सा का भी लाभ मिलेगा। अपने बिगड़े हुए पेट को सुधारने और आगे के लिए आहार−विहार संबंधी अच्छी आदतें डाल लेने के लिए यह दो महीने का शिक्षण काल किसी भी आरोग्याकाँक्षी के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकता है। अपने तथा अपने परिजनों के लिए इस उपयोगी पद्धति को काम में लाकर एक स्वास्थ्य रक्षक की योग्यता भी प्राप्त की जा सकती है। जिन्हें इस संबंध में अधिक जिज्ञासा हो वे गायत्री−तपोभूमि मथुरा के पते पर पत्र व्यवहार कर सकते हैं।
उपासना वाला अखंड−ज्योति का अक्टूबर अंक इसके लिए सर्वश्रेष्ठ है। उसमें अष्टग्रही योग की विवेचना का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण लेख भी है। अंक की पृष्ठ संख्या साधारण अंक से बहुत अधिक होने के कारण उसकी लागत सात आने के करीब आई है फिर भी धर्मप्रचार की दृष्टि से उसका मूल्य चार आना ही रखा गया है। प्रत्येक गायत्री उपासक के पास इसका रहना आवश्यक है। अष्टग्रही के अवसर पर व्यक्तिगत साधना करने वाले तथा सामूहिक आयोजन करने वाले सज्जन इस अक्टूबर अंक की अधिक प्रतियाँ मँगाकर धर्मप्रेमियों को दान करें।
उपासना आवश्यक है, अनिवार्य है। पर साथ ही जिस शरीर के द्वारा जिस मन के आधार पर जिस समाज में रहकर आत्मिक प्रगति की जाती है, उनका उचित स्थिति में होना भी जरूरी है। यदि इस ओर ध्यान न दिया गया तो उपासनात्मक साधना एकाँगी रहेगी, अपूर्ण मानी जायगी और सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी।
उपासना की भाँति ही स्वास्थ्य की समुन्नति की ओर भी रुचि लेनी चाहिए।
उपासना का अधिकाधिक प्रचार करना चाहिए। यों गायत्री उपासना हिन्दू धर्म में सर्वश्रेष्ठ है, यही अनादि, सनातन तथा सभ्यता एवं संस्कृति की गंगोत्री है। इसको उपासना का माध्यम बनाने के लिए पूरा जोर दिया जाय। पर इसे अनिवार्य न बनाया जाय। कोई दूसरा माध्यम रखना चाहे तो वैसा भी कर सकते हैं।
उपासना की प्रथम कक्षा को बढ़ाकर अब दूसरी कक्षा का कार्यक्रम प्रस्तुत कर दिया गया है। जप, अनुष्ठान हवन से आगे बढ़कर पंचकोशों के अनावरण के लिए उठाये गये कदम प्रगति की दृष्टि से आवश्यक थे। इसी प्रकार युग−निर्माण के लिए भी अब अगली कक्षा आरंभ होनी ही है। यह अगले कदम अधिक महत्वपूर्ण, अधिक उपयोगी, अधिक प्रभावशाली, अधिक व्यापक होंगे। छोटी कक्षाओं की तुलना में उच्च कक्षाएँ हर दृष्टि से भारी बैठती हैं, हमारे अगले कार्यक्रम भी अधिक उच्चकोटि के होने हैं।
उपासना की कक्षा ऊँची एवं तीव्र करने के लिए पंचसूत्री साधना क्रम चल रहा है। अशुभ अनिष्ट की शान्ति के लिए सामूहिक धर्मानुष्ठानों की गतिविधियाँ सक्रिय हैं। युग निर्माण की दिशा में जो कार्यक्रम पिछले पच्चीस वर्षों से किसी रूप में चल रहा था उसे भी अब सुव्यवस्थित रूप दिया जा रहा है। आत्मिक उत्कृष्टता और भौतिक श्रेष्ठता के दोनों लक्ष प्राप्त करने के लिए अब तक के चलते आ रहे अभियान को इस पुण्य पर्व पर बहुत ही सुव्यवस्थित रूप दिया गया है और इसे सुसंयत रूप से अग्रगामी बनाया जायेगा। अखण्ड ज्योति जिस मिशन को लेकर अवतीर्ण हुई थी उसे उसने अब तक बहुत शानदार ढंग से निबाहा है।
उपासना यह चार आधार मानसिक स्वच्छता के लिए हैं। छल-कपट, दंभ-पाखंड आदि कुविचारों का शमन सत्य-निष्ठा से होता है। सन्तोषी को तृष्णाऐं और वासनाऐं क्यों सतावेंगी? स्वाध्याय और मनन-चिन्तन करते रहने से मन की मलीनता हटेगी ही। ईश्वर का उपासक सर्वत्र उस अंतर्यामी को उपस्थित देखेगा तो क्यों पाप में प्रवृत्त होगा और क्यों भय, चिन्ता, शोक, निराशा आदि में डूबेगा?
उपासना को अपनाने से भी मनुष्य सज्जन बनता है। ईश्वर के निष्पक्ष न्यायकारी और पापों का दण्ड देने वाला मानने से कर्मफल की अनिवार्यता पर निष्ठा जमती है और मनुष्य नरक एवं दुर्गति के भय से, पाप से बचता है। इसलिए ईश्वर−उपासना का अधिकाधिक प्रचार करना चाहिए। यों गायत्री उपासना हिन्दू धर्म में सर्वश्रेष्ठ है, यही अनादि, सनातन तथा सभ्यता एवं संस्कृति की गंगोत्री है। इसको उपासना का माध्यम बनाने के लिए पूरा जोर दिया जाय।
उपासना के लिए हर व्यक्ति को समझाया जाय। बहुधा लोग ईश्वर और देवता को स्वार्थ, लाभ करने और सिद्धि वरदान प्राप्त करने के लिए पूजते हैं और इसी रूप को जानते हैं। अब उसका दूसरा पहलू भी समझाया जाना चाहिए कि पापों का दण्ड और अकर्मण्यता की उपेक्षा न करने में भी ईश्वर बड़ा कठोर है। इस कठोरता से भी जन−साधारण को परिचित कराया जाना चाहिए और अधूरी आस्तिकता को सर्वांगपूर्ण रूप से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। स्वच्छ मन का सम्बन्ध चूँकि हर व्यक्ति के अपने निजी आत्म−निरीक्षण एवं आत्म−सुधार से है इसलिए व्यक्तिगत रूप से विचार−विमर्श ही इस दृष्टि से उपयोगी हो सकता है।
उपासना का माध्यम बनाने के लिए पूरा जोर दिया जाय। पर इसे अनिवार्य न बनाया जाय। कोई दूसरा माध्यम रखना चाहे तो वैसा भी कर सकते हैं। किसी न किसी रूप में उपासना के लिए हर व्यक्ति को समझाया जाय। बहुधा लोग ईश्वर और देवता को स्वार्थ, लाभ करने और सिद्धि वरदान प्राप्त करने के लिए पूजते हैं और इसी रूप को जानते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-June
उपासना है। हमारा प्रातःकाल थोड़ा बहुत समय इस कार्य के लिए अवश्य लगता है। यदि अत्यन्त ही व्यस्तता है तो भी उतना तो हो ही सकता है कि प्रातःकाल आँख खुलते ही हम चारपाई पर बैठ कर कुछ देर गायत्री माता का सद्बुद्धि के रूप में ध्यान करते हुए, सत्य−वृत्तियों को जीवन में अधिकाधिक मात्रा में धारण करने की कुछ देर भावना करें। पन्द्रह मिनट इस प्रकार लगाने के लिए समय का अभाव जैसी बात नहीं कही जा सकती। अनिच्छा हो तो बहाना कुछ भी बनाया जा सकता है।
उपासना है। सद्बुद्धि ही मानव जीवन की सर्वोपरि महत्ता एवं विभूति है। ईश्वर की सद्बुद्धि के, सत्प्रवृत्ति के रूप में उपासना करना ही सच्ची उपासना हो सकती है, यही गायत्री उपासना है। हमारा प्रातःकाल थोड़ा बहुत समय इस कार्य के लिए अवश्य लगता है। यदि अत्यन्त ही व्यस्तता है तो भी उतना तो हो ही सकता है कि प्रातःकाल आँख खुलते ही हम चारपाई पर बैठ कर कुछ देर गायत्री माता का सद्बुद्धि के रूप में ध्यान करते हुए, सत्य−वृत्तियों को जीवन में अधिकाधिक मात्रा में धारण करने की कुछ देर भावना करें।
उपासना करना ही सच्ची उपासना हो सकती है, यही गायत्री उपासना है। हमारा प्रातःकाल थोड़ा बहुत समय इस कार्य के लिए अवश्य लगता है। यदि अत्यन्त ही व्यस्तता है तो भी उतना तो हो ही सकता है कि प्रातःकाल आँख खुलते ही हम चारपाई पर बैठ कर कुछ देर गायत्री माता का सद्बुद्धि के रूप में ध्यान करते हुए, सत्य−वृत्तियों को जीवन में अधिकाधिक मात्रा में धारण करने की कुछ देर भावना करें। पन्द्रह मिनट इस प्रकार लगाने के लिए समय का अभाव जैसी बात नहीं कही जा सकती। अनिच्छा हो तो बहाना कुछ भी बनाया जा सकता है।
उपासना मनुष्य जीवन में एक अत्यन्त आवश्यक धर्म-कृत्य है। इसकी उपेक्षा किसी को भी नहीं करनी चाहिए। उपासना की जो भी अपनी विधि हो करते हुए दो भावनाऐं मन में बराबर बनायें रहनी चाहिए कि परमात्मा घट−घट वासी और सर्वान्तर्यामी है। वह हमारी हर प्रवृत्ति को भली भाँति जानता है और हमारी भावनाओं के अनुरूप ही वह प्रसन्न-अप्रसन्न होता है अथवा दुख−सुख का दण्ड पुरस्कार प्रदान करता है। वह दयालु होते हुए भी न्यायकारी तथा व्यवस्थाप्रिय है।
उपासना जरूरी है। व्यक्तिगत जीवन का स्वस्थ विकास करने के लिए भी विवेकशीलता एवं विचारकता अनिवार्य है। जो अपनी परिस्थितियों पर विचार नहीं करता, अपनी दुर्बलताओं और त्रुटियों को नहीं खोजता और यह नहीं जानता कि अपने दृष्टिकोण में क्या−क्या हेर−फेर करना आवश्यक है वह जड़ प्रकृति का मनुष्य न तो अपने को बदल सकेगा और न उसकी विपन्न परिस्थितियाँ ही बदलेंगी। जिस प्रकार स्कूली शिक्षा के द्वारा भाषा, गणित भूगोल इतिहास आदि जाना जाता है। जिस प्रकार गीता, रामायण, वेद, शास्त्र आदि से आत्मज्ञान उपलब्ध होता है उसी प्रकार व्यक्तित्व का निर्माण करने के लिए गुण, कर्म स्वभाव में त्रुटियाँ होने पर उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों और उनके सुधार से उत्पन्न होने वाली विभूतियों के बारे में भी हमारी जानकारी होनी चाहिए।
उपासना के लिए कितना समय लगाया और उपासना के कर्मकाण्ड के साथ−साथ जो भावनाऐं रखनी चाहिए वे कितनी श्रद्धा के साथ कितनी गहराई तक रखीं? (2) आज हमने स्वाध्याय की दृष्टि से कौन सी पुस्तकें के कितने पृष्ठ पढ़े और उन में प्राप्त हुई महत्वपूर्ण बातों पर कितनी देर मनन-चिन्तन किया? (3) आज हमने अपने दिन भर के विचारों और कार्यों की बड़ी समीक्षा करके उनमें क्या−क्या गुण-दोष पाये और कल उन दोषों को सुधारने एवं गुणों को बढ़ाने के लिए क्या निश्चय किया? (4) आज हमने दूसरों को क्या सेवा लाभ दिया? इन चारों बातों पर यदि नित्य बारीक नजर रखी जाय, इनके महत्व को सोचते-समझते रहा जाय और दैनिक जीवन में इनके लिए स्थान दिया जाता रहे तो एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति हो सकती है।
उपासना हो सकती है, यही गायत्री उपासना है। हमारा प्रातःकाल थोड़ा बहुत समय इस कार्य के लिए अवश्य लगता है। यदि अत्यन्त ही व्यस्तता है तो भी उतना तो हो ही सकता है कि प्रातःकाल आँख खुलते ही हम चारपाई पर बैठ कर कुछ देर गायत्री माता का सद्बुद्धि के रूप में ध्यान करते हुए, सत्य−वृत्तियों को जीवन में अधिकाधिक मात्रा में धारण करने की कुछ देर भावना करें। पन्द्रह मिनट इस प्रकार लगाने के लिए समय का अभाव जैसी बात नहीं कही जा सकती। अनिच्छा हो तो बहाना कुछ भी बनाया जा सकता है।
उपासना के कर्मकाण्ड के साथ−साथ जो भावनाऐं रखनी चाहिए वे कितनी श्रद्धा के साथ कितनी गहराई तक रखीं? (2) आज हमने स्वाध्याय की दृष्टि से कौन सी पुस्तकें के कितने पृष्ठ पढ़े और उन में प्राप्त हुई महत्वपूर्ण बातों पर कितनी देर मनन-चिन्तन किया? (3) आज हमने अपने दिन भर के विचारों और कार्यों की बड़ी समीक्षा करके उनमें क्या−क्या गुण-दोष पाये और कल उन दोषों को सुधारने एवं गुणों को बढ़ाने के लिए क्या निश्चय किया? (4) आज हमने दूसरों को क्या सेवा लाभ दिया? इन चारों बातों पर यदि नित्य बारीक नजर रखी जाय, इनके महत्व को सोचते-समझते रहा जाय और दैनिक जीवन में इनके लिए स्थान दिया जाता रहे तो एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति हो सकती है।
उपासना की अनिवार्य आवश्यकता
उपासना की जो भी अपनी विधि हो करते हुए दो भावनाऐं मन में बराबर बनायें रहनी चाहिए कि परमात्मा घट−घट वासी और सर्वान्तर्यामी है। वह हमारी हर प्रवृत्ति को भली भाँति जानता है और हमारी भावनाओं के अनुरूप ही वह प्रसन्न-अप्रसन्न होता है अथवा दुख−सुख का दण्ड पुरस्कार प्रदान करता है। वह दयालु होते हुए भी न्यायकारी तथा व्यवस्थाप्रिय है। ईश्वर को हम इसलिए स्मरण रखें कि कुकर्म और कुविचारों से हमें सदा भय बना रहे और ईश्वर की प्रसन्नता के लिए उसके बताये धर्म मार्ग पर चलते हुए या उसकी दुनियाँ में सद्भावना बढ़ाते हुए उसका अनुग्रह प्राप्त कर सकें। “जो सन्मार्ग पर चल रहा है उसके साथ ईश्वर है इसलिए उसे किसी बड़े आततायी से भी डरने की आवश्यकता नहीं है।
उपासना उपासक की आत्मा में तुरन्त एवं निश्चित रूप से आत्मबल प्रदान करती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-October
उपासना जादू जैसा काम करती है।
उपासना का महत्त्व वर्णन किया, वहाँ उसकी उपेक्षा करने वालों की भर्त्सना में भी कमी नहीं रखी है। प्राचीनकाल में एक अस्पर्श और बहिष्कृत वर्ग भी होता था, जिन्हें अंत्यज कहते थे। इस वर्ग में समाज से बहिष्कृत ऐसे ही लोग रखे जाते थे, जो नैतिक एवं सामाजिक नियमों का उल्लंघन करते थे, उपासना की उपेक्षा करते थे। इस उपेक्षा के फलस्वरूप जीवन विकास का एक महत्त्वपूर्ण पहलू अविकसित ही पड़ा रहता है, इसलिए व्यक्ति को अपने सर्वांगीण विकास के संबंध में जागरुक बनाए रखने की दृष्टि से इस प्रकार के प्रतिबंधों की उपयोगिता भी है और आवश्यकता भी।
उपासना को ही उपासना क्षेत्र में उसका उचित स्थान मिलना चाहिए। विचारशीलता की प्रचंड लहरों ने आज गायत्री को उसके प्राचीन स्थान पर पहुँचा देने का प्रयत्न पुनः आरंभ कर दिया है। लगता है गायत्री भारत की 'राष्ट्रीय उपासना' बनकर रहेगी और उसका आश्रय लेकर हम अपना आध्यात्मिक, मानसिक, नैतिक और सामाजिक जीवन ही ऊँचा न बनावेंगे, वरन वैयक्तिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुख-शांति की चिरस्थायी अभिवृद्धि भी करेंगे।
उपासना का इतना अधिक महत्त्व देखकर ही प्राचीनकाल में ऋषियों ने संभवतः इसे सर्वसाधारण के लिए एक अनिवार्य धर्मकर्त्तव्य घोषित किया था।
उपासना से अनेकों प्रकार के भौतिक और आध्यात्मिक लाभ होने का जो महात्म्य शास्त्रों ने कहा है और अनुभव द्वारा जिसे पूर्णतः सही पाया गया है, उसका आधार यह सद्बुद्धि ही है, जिसे गायत्री महामंत्र के जप-अनुष्ठानों एवं विभिन्न विधि-विधानों से प्राप्त किया जाता है। सर्वसाधारण के लिए गायत्री का यह सद्बुद्धि वाला क्षेत्र ही सरल पड़ता है। आरंभ में हर साधक को इसी कक्षा में प्रवेश करना पड़ता है।
उपासना की दृष्टि से यह पाठ्य−सामग्री बहुमूल्य है। नवंबर और दिसंबर के अंक मानव जीवन की प्रत्येक समस्या और गुत्थी पर प्रकाश डालने वाले और उनका हल प्रस्तुत करने वाले होंगे। इन्हें जीवन विद्या अंक कह सकते हैं।
उपासना' बनकर रहेगी और उसका आश्रय लेकर हम अपना आध्यात्मिक, मानसिक, नैतिक और सामाजिक जीवन ही ऊँचा न बनावेंगे, वरन वैयक्तिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुख-शांति की चिरस्थायी अभिवृद्धि भी करेंगे।
उपासना की विवेचना की गई है। तंत्र का विषय गोपनीय है। केवल वह परीक्षित, विश्वस्त भूमिका के व्यक्तियों को ही कहा और बताया जाता है, ऐसे लोग ही उसकी साधना कर सकते हैं। कुपात्रों के हाथ तंत्र विज्ञान का जाना दूसरों के लिए ही नहीं, वरन उन साधकों के खुद के लिए भी संकट का कारण बनता है। इसलिए तंत्रशास्त्र की परंपरा यह है कि वस्तुस्थिति को छिपाकर रखा जाए।
उपासना, यज्ञ आयोजन, कुरीतियों और दुष्प्रवृत्तियों का प्रतिरोध आंदोलन आदि अनेक कार्यक्रम हम समय−समय पर इसी दृष्टि से बनाते और उनमें स्वजनों को प्रवृत्त करते रहे हैं। जिन कार्यों में उनका हित-साधन ही हमने समझा और सोचा है, उन्हीं की प्रेरणा दी है। अभी हमें दस वर्ष कुछ विशेष कार्य करने का आदेश प्राप्त हुआ है। तदनुसार युगनिर्माण योजना का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम हाथ में लिया गया है। इस योजना में सम्मिलित होने वाले प्रत्येक व्यक्ति का भारी हित-साधन होता हुआ हमें दीखता है।
उपासना के दो स्तर हैं— एक साधारण, दूसरा विशेष। सर्वसाधारण के लिए दैनिक नित्यकर्म के रूप में, नवरात्रि आदि किन्हीं पर्वों पर नैमित्तिक रूप से एवं किसी विशेष आवश्यकता के समय उपचार रूप से जो साधना की जाती है, उसे साधारण स्तरीय उपासना कहते हैं। गायत्री महाविज्ञान ग्रंथ के प्रथम भाग में इसी विधान और विज्ञान का वर्णन किया गया है। जिनकी अभिरुचि अध्यात्म की दिशा में बहुत गतिशील नहीं हुई है, जिनके पास अवकाश कम ही रहता है, उनके लिए अनिवार्य धर्मकर्त्तव्य की तरह वही क्रम उपयुक्त है। इस प्रथम स्तरीय साधना को ऋषियों ने ‘एकमुखी’ गायत्री कहा है।
उपासना में मन केवल उसी का लगता है, जो परमात्मा को अपना सगा, स्वजन, संबंधी, अत्यंत घनिष्ठ आत्मीयजन मानता है। मीरा को अपने ‘गिरधर गोपाल’ तभी प्राण प्रिय लगते थे, जब वह उन्हें अपना सचमुच का विवाहित पति मानती थी। रामकृष्ण परमहंस माता के प्रेम में आनंदविभोर तभी हो पाते थे, जब वह उसे अपनी सगी जननी अनुभव करते थे। उन्हीं भक्तों ने भगवान को अपने निकट देखा और साक्षात्कार किया है, जिन्होंने अगाध प्रेम के साथ घनिष्ठ आत्मीयता के बंधनों में अपने इष्टदेव को आबद्ध किया है। अभी भी ऐसे अगणित ईश्वरभक्त हैं, जिनको अपने इष्टदेव पर अगाध श्रद्धा है और वे कठिनाइयों, असफलताओं और आपत्तियों में भी भगवान की अपार करुणा अनुभव करते हैं।
उपासना को ‘स्कूल कोर्स’ कहा जा सकता है। इससे अगला शिक्षण ‘काॅलेज कोर्स’ है। इसे पंचमुखी-पंचकोशी एवं उच्चस्तरीय उपासना कह सकते हैं। जिनने कम-से-कम पाँच वर्ष साधारण श्रेणी की उपासना करके अपनी श्रद्धा को परिपक्व कर लिया हो, उन साधकों को उच्चस्तरीय साधना के लिए अग्रसर होना होता है।
उपासना बिना किसी वस्तु के भी हो सकती है। एकांत निर्जन वनों में रहकर घोर तपस्या करने वाले योगियों के लिए अन्न और वस्त्र तक उपलब्ध नहीं होता तो धूप दीप की, हवन ब्रह्मभोज की व्यवस्था कहाँ से बनेगी? सच बात यह है कि तब उन्हें इनमें से किसी भी उपकरण की आवश्यकता नहीं रह जाती। वे आत्मा की अग्नि में प्राण को हवि बनाकर निरंतर अखंड यज्ञ करते रहते हैं। गायत्री चालीसा में “हंसारूढ़ सितंबरधारी” पद में जिस हंसवाहिनी और श्वेत वस्त्रधारिणी गायत्री माता का उल्लेख हुआ है, उसका स्वरूप उच्चस्तरीय साधना में कुछ और ही हो जाता है।
उपासना के प्रभाव से जब आत्मबल बढ़ता है, सद्बुद्धि का प्रकाश अंतःकरण में उत्पन्न होता है तो कठिनाई को पार करने का उचित मार्ग सूझ पड़ता है, इतना ही नहीं, उस पर चलने का साहस भी उत्पन्न होता है। उचित मार्ग अपनाकर मनुष्य संसार की बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को पार कर सकता है, बड़ी-से-बड़ी उलझनें सुलझा सकता है, फिर छोटी-मोटी समस्याओं का हल होना तो कठिन ही क्या है
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उपासना— एक आवश्यक धर्मकर्त्तव्य
उपासना को ही ऋषियों ने, देवताओं ने, अवतारों ने और सभी विचारशील सत्पुरुषों ने अपने दैनिक जीवन में एक आवश्यक धर्मकृत्य के रूप में स्थान दिया था। जब तक मत-मतांतरों का जंजाल हिंदू धर्म में प्रविष्ट नहीं हुआ था, तब तक सर्वत्र एक ही भाषा, भेष, भाव की तरह उपासना की भी एकता बनी रही। वेदजननी गायत्री को ही ज्ञान−विज्ञान की अजस्र ज्ञानगंगा माना जाता रहा और इसी का नित्य-नैमित्तिक अवगाहन करके सब कोई कृतकृत्य होते रहे। पीछे जैसे−जैसे हिंदू धर्म में विकृतियाँ प्रवेश करती गईं, वैसे−वैसे वेद धर्म की उपेक्षा करके लोग अपनी−अपनी मरजी के सम्प्रदाय गढ़ते और अपनी−अपनी रुचि के देवताओं का प्रादुर्भाव करते चले गए। अपनी कल्पना और रचना की पुष्टि में उन्होंने अनेक ग्रंथ भी रच डाले।
उपासना जैसा ही है। इसीलिए पंचमुखी गायत्री को अलंकारिक रूप से चित्रित तो करते हैं, पर पूजा के लिए एकमुखी गायत्री की तस्वीरें तथा मूर्तियाँ ही प्रयुक्त होती हैं। इस उद्देश्य के लिए पंचमुखी गायत्री का प्रयोग नहीं होता।
उपासना का उपासक दिन−दिन महानता की ओर तीव्र गति से अग्रसर होने लगता है।
उपासना आदि आवश्यक कार्यों में हमारा समय बँटा हुआ हो और जब भी जो भी काम करें, पूरे उत्साह पूरे मनोयोग, पूरे परिश्रम और पूरी दिलचस्पी के साथ एक खेल समझकर पूरा करें। इस प्रक्रिया से कार्य की उत्कृष्टता बढ़ती है और थकान पास भी नहीं भटकने पाती।
उपासना की उच्च भूमिका में प्रवेश करने का सबसे बड़ा लाभ आत्मबल की वृद्धि है। धनबल, विद्याबल, बुद्धिबल, शस्त्रबल, संघबल का चमत्कार हम रोज ही अपने चारों ओर देखते रहते हैं। आत्मबल का अनुभव हमें नहीं है, क्योंकि उस बल के बलवान लोग आस−पास दिखाई नहीं पड़ते। पर जब कभी भी ऐसे आत्मबलसंपन्न योद्धा कहीं दृष्टिगोचर होते हैं तो उन की महत्ता संसार के समस्त भौतिक बलसंपन्न लोगों से कहीं अधिक होती है। इन्हें ही महापुरुष कहते हैं।
उपासना करने लगे, तो कुछ ही दिनों में परिस्थितियाँ ही बदल गईं। द्वेष का स्थान प्रेम ने ले लिया और सब लोग स्नेह सहयोगपूर्वक मिल−जुलकर रहने लगे। कितने ही ऐसे लोगों को हम जानते हैं जो आए दिन बीमार रहते थे, कोई-न-कोई रोग उन्हें घेरे ही रहता था। शारीरिक कष्ट, अशक्तता, उपार्जन में असमर्थता और दवादारू में बढ़ते हुए खरच के कारण उन्हें निरंतर चिंता घेरे रहती थी, पर जब उन्होंने गायत्री उपासना आरंभ की तो यह दवा उन सबसे अधिक अचूक सिद्ध हुई, जो उनने बहुत पैसा खरच करके खरीदी थीं। किसी भी अनुभवी डाॅक्टर की अपेक्षा यह उपासनाक्रम उनके लिए अधिक लाभदायक सिद्ध हुआ।
उपासना की विवेचना भी गत दस वर्षों से अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में, छोटी−मोटी दसियों पुस्तकों में, प्रवचन, सत्संगों और व्यक्तिगत वार्त्तालापों में हम समय−समय पर करते रहे हैं। लाखों मनुष्यों ने उस विज्ञान का लाभ उठाया है और अभी भी उस मार्ग पर चलते हुए असंख्यों व्यक्ति लोक एवं परलोक के कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। गायत्री उपासना से साधक के मनःक्षेत्र में तत्काल सद्बुद्धि का विकास होता है, मलीन एवं अवरुद्ध पड़े हुए अंतःकरण की सफाई होना शुरू होती है और गुण, कर्म, स्वभाव में प्रवेश हुए दुरितों का समाधान होने की प्रक्रिया तत्क्षण आरंभ हो जाती है। उसका प्रकाश जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है। स्वभाव में मधुरता, सहनशीलता और दूरदर्शिता की प्रवृत्ति का समावेश होने से साधक के विचार और आचार में आश्चर्यजनक परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है।
उपासना का सीधा प्रभाव साधक की अंतरात्मा पर सात्त्विकता की अभिवृद्धि के रूप में पड़ता है। उसके मनःक्षेत्र में समाया हुआ तमोगुण, असुरत्व, तत्क्षण घटना आरंभ हो जाता है। अपने दोष-दुर्गुण देखने और समझने की क्षमता उसमें जागृत होती है, साथ ही कुकर्मों के प्रति घृणा करने और सत्कर्मों की ओर आकर्षित होने का स्वभाव भी अनायास ही बनने लगता है। बहुत पढ़ने और सुनने से भी जिन लोगों ने अपने ऊपर कोई प्रभाव ग्रहण नहीं किया था, उनका मन इस उपासना के द्वारा स्वयं ही द्रवित हुआ है और उस आंतरिक परिवर्तन के कारण बाहरी जीवन में आश्चर्यजनक हेर−फेर दिखाई देने लगा है। आत्मसुधार की प्रक्रिया में गायत्री उपासना का इतना अधिक महत्त्व देखकर ही प्राचीनकाल में ऋषियों ने संभवतः इसे सर्वसाधारण के लिए एक अनिवार्य धर्मकर्त्तव्य घोषित किया था।
उपासना ही सद्बुद्धि की स्थापना का उद्देश्य पूरा करती है। गायत्री को बुद्धि की, ज्ञान की, विवेक की देवी कहा गया है। इस महामंत्र में तेज और ज्ञान की शक्तियों का आह्वान किया गया है और सच्चे मन से की गई इस साधना से यह दोनों वस्तुएँ मिलती भी देखी जा सकती हैं। सद्बुद्धि की विभूति जैसे−जैसे अपने भीतर बढ़ती है, वैसे ही मनुष्य के गुण, कर्म और स्वभाव में सात्विकता की मात्रा की अभिवृद्धि होती है और इसके फलस्वरूप वह परिस्थितियाँ उत्पन्न होनी आरंभ हो जाती हैं, जिनमें सफलता, सहयोग, समृद्धि, संतुष्टि और शांति की प्राप्ति हुआ करती है।
उपासना की उपेक्षा करके असंभव नहीं, तो कठिन अवश्य रहेगा।
उपासना की है, उन्हें इस वर्ष उपरोक्त क्रम से व्यवस्था करनी चाहिए, जिनने अभी आरंभ नहीं किया है, उन्हें इसी विधान से अपना आरंभ कर देना चाहिए। इस एक साल के अनुभव के आधार पर यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि यह विधान पंचकोशी साधना की अन्य समस्त साधनाओं की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसका लाभ हममें से किसी को भी छोड़ना नहीं चाहिए।
उपासना को जीवन के आवश्यक कर्त्तव्यों में से एक मानकर उसे नियमित रूप से करते हैं और साथ ही शारीरिक, मानसिक, कौटुंबिक, सामाजिक क्षेत्रों में अपने किसी भी कर्त्तव्य की उपेक्षा नहीं करते। महात्मा ही तो अपने सद्गुणों को विकसित करते−करते परमात्मा बन जाते हैं। आत्मा को उच्च आदर्शों के परिपालन में संलग्न रखकर हम परमात्मा की प्राप्ति का शास्त्रसम्मत मार्ग क्यों न अपनावें? ईश्वरप्राप्ति के लिए कर्त्तव्यों का त्याग करने वाले भ्रांत व्यक्तियों की तरह अपना समय बर्बाद करने वालों की भूलों से शिक्षा लेते हुए हम सच्चे शास्त्रसम्मत, आर्ष निर्देशित मार्ग पर ही क्यों न चलें?
उपासना विधान, देवता, मंत्र आदि आध्यात्मिक उपकरण दिन−दिन बढ़ते गए और उनमें से प्रत्येक के निर्माताओं एवं अनुयायियों ने उनका प्रसार करने के लिए भरपूर महात्म्य बताया, भरपूर ढोल पीटा। यह हंगामा इतना बढ़ा कि सनातन उपासना— गायत्री की स्थिति वही हो गई जो नक्कारखाने में तूती की होती है। लोग उसे भूलने ही नहीं लगे, उपेक्षा ही नहीं करने लगे, वरन शाप लगी हुई, कलियुग में निष्फल, केवल ब्राह्मणों को ही मौरूसी, कान में कहने की गुप्त विद्या आदि बताकर उसकी ओर से जनसाधारण में अरुचि भी उत्पन्न करने लगे।
उपासना कह सकते हैं। प्रथम कक्षा के लिए यह सब आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। इस आधार के बिना ऊपर की कक्षा में प्रवेश कर सकना उसी प्रकार संभव नहीं, जिस प्रकार सीढ़ी या जीने की सहायता के बिना छलाँग मारकर छत पर चढ़ जाना कठिन होता है। स्कूल की पढ़ाई की उपेक्षा करके सीधे कॉलेज में प्रवेश नहीं मिलता, उसी प्रकार प्रथम स्तरीय स्थूल विधि-व्यवस्था के आधार पर बनी हुई साकार उपासना के बिना उच्चस्तरीय निराकार साधना में सफलता प्राप्त कर सकना किसी के लिए संभव नहीं हो सकता।
उपासना की तरह मनोयोगपूर्वक नित्य ही पढ़ना और उस पर मनन रखना चाहिए।
उपासना के प्रभाव से बड़ी सरलतापूर्वक छूटती देखी गई हैं। चढ़ते खून के किशोर और नवयुवकों में ऐसे विचार बहुत करके देखे जाते हैं। हमारा सुनिश्चित मत है कि उसकी मानसिक स्थिति स्वच्छ करने में गायत्री उपासना जादू जैसा काम करती है।
उपासना उत्पन्न करती है, वहाँ उचित आवश्यकताओं को पूर्ण करने के योग्य आवश्यक साहस, प्रतिभा एवं सूझ-बूझ भी उसके द्वारा उत्पन्न होती है। इस प्रकार अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति कुछ कठिन नहीं रह जाती। गायत्री को कामधेनु इसीलिए कहा गया है। इसका श्रद्धापूर्वक पयपान करने के उपरांत कोई अतृप्ति शेष नहीं रह जाती।
उपासना करके अपनी श्रद्धा को परिपक्व कर लिया हो, उन साधकों को उच्चस्तरीय साधना के लिए अग्रसर होना होता है।
उपासना का प्रभाव मनःक्षेत्र के शांत, स्वस्थ और प्रगतिशील बनाने में वही काम करता है, जो वनस्पतियों के लिए वर्षा का जल किया करता है। कहते हैं कि ‘नागदमन’ बूटी की गंध पाकर वहाँ से साँप बहुत दूर भाग जाते हैं। कुविचारों और दुर्भावनाओं के साँपों को दूर भगाने के लिए गायत्री उपासना को एक उच्चकोटि की ‘नागदमन’ बूटी कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी। अनुपयुक्त कामनाओं को हटाकर चित्त को तृष्णा और वासना से रहित बना देना या संतोष उत्पन्न करने वाला वातावरण, जहाँ गायत्री उपासना उत्पन्न करती है, वहाँ उचित आवश्यकताओं को पूर्ण करने के योग्य आवश्यक साहस, प्रतिभा एवं सूझ-बूझ भी उसके द्वारा उत्पन्न होती है। इस प्रकार अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति कुछ कठिन नहीं रह जाती।
उपासना कहते हैं। गायत्री महाविज्ञान ग्रंथ के प्रथम भाग में इसी विधान और विज्ञान का वर्णन किया गया है। जिनकी अभिरुचि अध्यात्म की दिशा में बहुत गतिशील नहीं हुई है, जिनके पास अवकाश कम ही रहता है, उनके लिए अनिवार्य धर्मकर्त्तव्य की तरह वही क्रम उपयुक्त है। इस प्रथम स्तरीय साधना को ऋषियों ने ‘एकमुखी’ गायत्री कहा है। चित्रों में एक मुख और दो हाथ वाली गायत्री माता का चित्र इसी स्तर के उपासकों के लिए निर्धारित किया है।
उपासना में लगाए हुए किसी भी व्यक्ति के, कोई क्षण निष्फल नहीं जा सकते। उसका कोई-न-कोई सत्परिणाम उसे मिलता ही है और वह निश्चित रूप से उससे कहीं अधिक होता है, जितना कि उपासना में लगे हुए समय का मूल्य हो सकता है। हमारे सानिध्य और सहचरत्व में जिन लोगों ने यह उपासना की है, उनका भी ऐसा ही अनुभव है। आध्यात्मिक प्रगति की ओर हर साधक के कदम बढ़े हैं, चाहे वह कितने ही मंद क्यों न रहे हों।
उपासना का आध्यात्मिक पुरुषार्थ
उपासना स्वीकार करता रहा है, वही सदा की भाँति आज भी हमारे लिए उपयोगी हो सकती है। जिन्होंने किसी पूर्वाग्रह से अपने को बाँध नहीं लिया है, जिन्होंने विचारशीलता और सत्यान्वेषण से अपने को सर्वथा विमुख नहीं कर लिया है, उन्हें यह मानने में तनिक भी कठिनाई नहीं होती कि आध्यात्मिक प्रगति एवं भावनात्मक एकता की दृष्टि से गायत्री उपासना को ही उपासना क्षेत्र में उसका उचित स्थान मिलना चाहिए। विचारशीलता की प्रचंड लहरों ने आज गायत्री को उसके प्राचीन स्थान पर पहुँचा देने का प्रयत्न पुनः आरंभ कर दिया है। लगता है गायत्री भारत की 'राष्ट्रीय उपासना' बनकर रहेगी और उसका आश्रय लेकर हम अपना आध्यात्मिक, मानसिक, नैतिक और सामाजिक जीवन ही ऊँचा न बनावेंगे, वरन वैयक्तिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुख-शांति की चिरस्थायी अभिवृद्धि भी करेंगे।
उपासना है। उच्च कक्षा में प्रवेश करने वाले साधकों के लिए इसी आराधना का प्रयोग करना पड़ता है। प्रथम स्तरीय साधना का अधिकांश कार्यक्रम स्थूल वस्तुओं या स्थूल विधि-विधानों पर निर्भर है। माला, आसन, पंचपात्र, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, अक्षत, चित्र, मूर्ति, हवन-सामग्री, मंत्रोच्चारण, व्रत-उपवास, पाठ, कीर्त्तन, अनुष्ठान, ब्रह्मभोज, तर्पण, मार्जन आदि यह सभी कुछ स्थूल आधार हैं। इसे साकार उपासना कह सकते हैं।
उपासना की उच्चस्तरीय पंचकोशी साधन-शिक्षा प्राप्त करने वाले साधकों के लिए एक विशिष्ट आशीर्वाद का प्रेरणा-प्रवाह हम लोगों को उपलब्ध है। शक्ति-संचार साधना के नाम से गत वर्ष उसकी जानकारी साधकों को हो चुकी है। प्रत्येक रविवार को सूर्योदय से 1.5 घंटे पूर्व से लेकर आधा घंटे पूर्व तक के, एक घंटा समय में कोई उच्च-आत्माएँ अपने परिवार के लिए एक प्राण-प्रेरणा भेजती हैं। उसे हममें से कोई भी निर्बाध रूप से प्राप्त कर सकता है। गत वर्ष कुछ सीमित व्यक्तियों को इसका लाभ मिल सका था।
उपासना के द्वारा स्वयं ही द्रवित हुआ है और उस आंतरिक परिवर्तन के कारण बाहरी जीवन में आश्चर्यजनक हेर−फेर दिखाई देने लगा है। आत्मसुधार की प्रक्रिया में गायत्री उपासना का इतना अधिक महत्त्व देखकर ही प्राचीनकाल में ऋषियों ने संभवतः इसे सर्वसाधारण के लिए एक अनिवार्य धर्मकर्त्तव्य घोषित किया था।
उपासना से प्रत्यक्ष तो किसी को छप्पर फाड़कर संपदा नहीं मिलती, पर साधक के अंदर वे तत्त्व विकसित हो जाते हैं, जिनके साथ अनेकों प्रकार की सुख−संपदाएँ जुड़ी रहती हैं। वर्षा होते ही हरियाली उग आती है और कीट-पतंगों की अजस्र उत्पत्ति होने लगती है। मानवोचित सद्गुणों का विकास होने के साथ−साथ वे मंगलमयी सुख-सुविधाएँ, समृद्धियाँ और विभूतियाँ सामने आ जाती हैं, जिनके लिए आमतौर से लोग तरसते रहते हैं और जिनकी उपलब्धि को कोई दैवी वरदान या सिद्धि चमत्कार माना जाता है।
उपासना के साथ−साथ साधक को मनोमयकोश को सुव्यवस्थित बनाना पड़ता है। गायत्री माता के पाँच मुखों में से पहला अन्नमयकोश और दूसरा मनोमयकोश है। मन की गतिविधियाँ संतुलित रहें, इसके लिए यह आवश्यक है कि हमारी आस्था, मान्यता, श्रद्धा, अभिरुचि एवं आकांक्षा परिष्कृत हों।
उपासना में भारत की प्राचीनतम, सर्वोपरि एवं सर्वानुमोदित सर्वसुलभ-प्रक्रिया, 'गायत्री महाशक्ति' की ही है। सद्बुद्धि की देवी, आंतरिक पवित्रता और प्रगति की प्रतीक, इस गायत्री उपासना को ही ऋषियों ने, देवताओं ने, अवतारों ने और सभी विचारशील सत्पुरुषों ने अपने दैनिक जीवन में एक आवश्यक धर्मकृत्य के रूप में स्थान दिया था। जब तक मत-मतांतरों का जंजाल हिंदू धर्म में प्रविष्ट नहीं हुआ था, तब तक सर्वत्र एक ही भाषा, भेष, भाव की तरह उपासना की भी एकता बनी रही। वेदजननी गायत्री को ही ज्ञान−विज्ञान की अजस्र ज्ञानगंगा माना जाता रहा और इसी का नित्य-नैमित्तिक अवगाहन करके सब कोई कृतकृत्य होते रहे। पीछे जैसे−जैसे हिंदू धर्म में विकृतियाँ प्रवेश करती गईं, वैसे−वैसे वेद धर्म की उपेक्षा करके लोग अपनी−अपनी मरजी के सम्प्रदाय गढ़ते और अपनी−अपनी रुचि के देवताओं का प्रादुर्भाव करते चले गए।
उपासना मनुष्य के व्यक्तित्व, आंतरिक स्तर और आत्मबल को बढ़ाती है, जिससे उसकी सुख−शांति और समृद्धि का मार्ग हर दिशा में प्रशस्त होता है।
उपासना की उच्चस्तरीय साधना का क्रम ब्रह्मचर्य की उपेक्षा करके आगे नहीं बढ़ सकता। पाठक जानते हैं कि गायत्री के छोटे−बड़े अनुष्ठानों के समय ब्रह्मचर्य का अनिवार्य रूप से पालन करना पड़ता है। अन्नमयकोश की साधना सारे जीवन चलने वाली है, इसलिए वैसा निषेधात्मक प्रतिबंध तो इसमें नहीं है, पर इतना प्रत्येक साधक को मानकर चलना पड़ेगा कि वह अपनी कामसेवन संबंधी गतिविधियों पर आगे क्रमशः अधिक ध्यान देगा और उसे अधिक सीमाबद्ध करेगा। सृष्टि के सभी जीव-जंतु संतानोत्पादन की प्रचंड स्फुरणा होने पर ही नियत समय पर एक बार कामसेवन करते हैं और जब तक दूसरे बच्चे की आवश्यकता न हो नर-मादा का संयोग नहीं होता। मादा की प्रेरणा पर ही नर उत्तेजित होता है, अपनी ओर से वह कभी मादा से छेड़−छाड़ नहीं करता।
उपासना की उपयोगिता असाधारण है। उसका प्रथम चरण हमें सद्बुद्धि प्रदान करके जीवन की अधिकांश उलझनों को सुलझा देता है और द्वितीय चरण में प्रस्तुत आत्मशक्ति के जागरण का जो रहस्य सन्निहित है, उसके द्वारा मनुष्य नर से नारायण और पुरुष से पुरुषोत्तम बन सकता है। युग−निर्माण की दृष्टि से भी इस आर्ष विज्ञान को हमें अपने जीवन में समुचित स्थान देना ही पड़ेगा। आत्मविकास की समस्या को हल कर सकना गायत्री उपासना की उपेक्षा करके असंभव नहीं, तो कठिन अवश्य रहेगा।
उपासना से कष्ट निवारण, आत्मसाक्षात्कार और ऋद्धि−सिद्धि का मार्ग आदि अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों का प्रतिपादन किया गया है। मू.3॥)
उपासना आरंभ की तो यह दवा उन सबसे अधिक अचूक सिद्ध हुई, जो उनने बहुत पैसा खरच करके खरीदी थीं। किसी भी अनुभवी डाॅक्टर की अपेक्षा यह उपासनाक्रम उनके लिए अधिक लाभदायक सिद्ध हुआ। कारण स्पष्ट है, गायत्री की उपासना से व्यक्ति के अंतःकरण में सात्त्विकता और सद्बुद्धि का जो विकास होता है, उससे आहार-विहार, आचार-विचार, रहन-सहन, खान-पान सभी कुछ बदलता है और उस परिवर्तन का प्रभाव शरीर, मन, धन, व्यवसाय, परिवार, समाज सभी पर पड़ता है। अपना व्यवहार नम्र मधुर और सज्जनतापूर्ण हो जाने से लोगों के साथ बिगड़े हुए संबंध सुधरते हैं और शत्रुओं को मित्रों एवं सहायक के रूप में बदला हुआ पाया जाता है। अपना सुधार होने पर दूसरों का सुधरा हुआ व्यवहार उपलब्ध होना निश्चित ही रहता है।
उपासना के लिए एक छोटा समय भाग नियत रहना चाहिए। सद्बुद्धि से बढ़कर और कोई संपत्ति इस संसार में नहीं। जब कि साधारण मूल्य वाली वस्तुओं के उपार्जन के लिए हम इतना श्रम करते हैं तो क्या हमें इस धरती की सबसे श्रेष्ठ संपदा का उपार्जन करने के लिए कुछ भी समय न लगाने की हठ पर ही अड़ा रहना उचित है? गायत्री के प्रथम स्तर जिसमें जप, अनुष्ठानों, बीजमंत्रों और अमुक विधि−विधानों की आवश्यकता होती है, सर्वसाधारण के लिए सरल है। इसमें कोई भूल रहने पर भी हानि की संभावना नहीं रहती।
उपासना कह सकते हैं। जिनने कम-से-कम पाँच वर्ष साधारण श्रेणी की उपासना करके अपनी श्रद्धा को परिपक्व कर लिया हो, उन साधकों को उच्चस्तरीय साधना के लिए अग्रसर होना होता है।
उपासना की उपेक्षा करते थे। इस उपेक्षा के फलस्वरूप जीवन विकास का एक महत्त्वपूर्ण पहलू अविकसित ही पड़ा रहता है, इसलिए व्यक्ति को अपने सर्वांगीण विकास के संबंध में जागरुक बनाए रखने की दृष्टि से इस प्रकार के प्रतिबंधों की उपयोगिता भी है और आवश्यकता भी।
उपासना को एक उच्चकोटि की ‘नागदमन’ बूटी कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी। अनुपयुक्त कामनाओं को हटाकर चित्त को तृष्णा और वासना से रहित बना देना या संतोष उत्पन्न करने वाला वातावरण, जहाँ गायत्री उपासना उत्पन्न करती है, वहाँ उचित आवश्यकताओं को पूर्ण करने के योग्य आवश्यक साहस, प्रतिभा एवं सूझ-बूझ भी उसके द्वारा उत्पन्न होती है। इस प्रकार अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति कुछ कठिन नहीं रह जाती। गायत्री को कामधेनु इसीलिए कहा गया है। इसका श्रद्धापूर्वक पयपान करने के उपरांत कोई अतृप्ति शेष नहीं रह जाती।
उपासना की भी एकता बनी रही। वेदजननी गायत्री को ही ज्ञान−विज्ञान की अजस्र ज्ञानगंगा माना जाता रहा और इसी का नित्य-नैमित्तिक अवगाहन करके सब कोई कृतकृत्य होते रहे। पीछे जैसे−जैसे हिंदू धर्म में विकृतियाँ प्रवेश करती गईं, वैसे−वैसे वेद धर्म की उपेक्षा करके लोग अपनी−अपनी मरजी के सम्प्रदाय गढ़ते और अपनी−अपनी रुचि के देवताओं का प्रादुर्भाव करते चले गए। अपनी कल्पना और रचना की पुष्टि में उन्होंने अनेक ग्रंथ भी रच डाले। इस प्रकार भ्रांतियों का एक पूरा घटाटोप खड़ा हो गया।
उपासना की सलाह मान लेने के लिए यदि कभी तैयार कर लिया गया है, तो उसका परिणाम आशाजनक ही निकला है। प्रस्तुत कठिनाइयों का किसी-न-किसी मार्ग से आशाजनक समाधान हुआ है। श्रद्धा, भावना की दृष्टि से विचार करने वाले इसे मंत्र शक्तियाँ, माता की कृपा मानते हैं, पर वास्तविकता यह है कि उनके अपने विचार व्यवहार में ऐसा हेर-फेर हो गया होता है, जिसके कारण गुत्थियों के सुलझने और कठिनाइयों के हल होने का उपाय सहज ही बन पड़ता है। अशांत और उद्विग्न मन रहने पर अपने विचार और कार्य अस्त-व्यस्त रहते हैं, उत्तेजित और असंतुलित मन यह सोच नहीं पाता कि प्रस्तुत कठिनाइयों का सही हल क्या हो सकता है। गायत्री उपासना के प्रभाव से जब आत्मबल बढ़ता है, सद्बुद्धि का प्रकाश अंतःकरण में उत्पन्न होता है तो कठिनाई को पार करने का उचित मार्ग सूझ पड़ता है, इतना ही नहीं, उस पर चलने का साहस भी उत्पन्न होता है।
उपासना में लगाया है। इतने प्रयास का निचोड़ यह निकाला है कि गायत्री उपासना में लगाए हुए किसी भी व्यक्ति के, कोई क्षण निष्फल नहीं जा सकते। उसका कोई-न-कोई सत्परिणाम उसे मिलता ही है और वह निश्चित रूप से उससे कहीं अधिक होता है, जितना कि उपासना में लगे हुए समय का मूल्य हो सकता है। हमारे सानिध्य और सहचरत्व में जिन लोगों ने यह उपासना की है, उनका भी ऐसा ही अनुभव है। आध्यात्मिक प्रगति की ओर हर साधक के कदम बढ़े हैं, चाहे वह कितने ही मंद क्यों न रहे हों।
उपासना मानव जीवन-प्रगति का एक अत्यन्त आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण अंग है; इसलिए संसार के सभी धर्मों ने, सभी ऋषियों और सभी शास्त्रों ने, उपासना को मनुष्य का एक दैनिक एवं अनिवार्य धर्मकर्त्तव्य माना है। हिंदू धर्म तो इस संबंध में और भी अधिक जोर देता है। उसने स्थान−स्थान पर जहाँ उपासना का महत्त्व वर्णन किया, वहाँ उसकी उपेक्षा करने वालों की भर्त्सना में भी कमी नहीं रखी है। प्राचीनकाल में एक अस्पर्श और बहिष्कृत वर्ग भी होता था, जिन्हें अंत्यज कहते थे। इस वर्ग में समाज से बहिष्कृत ऐसे ही लोग रखे जाते थे, जो नैतिक एवं सामाजिक नियमों का उल्लंघन करते थे, उपासना की उपेक्षा करते थे।
उपासना की विशिष्ट साधना तो क्या, सामान्य भजन-साधन भी बन नहीं पड़ता, जो किया जाता है वह चिह्नपूजामात्र रह जाता है।
उपासना में शरीर और मन के विभिन्न केंद्रों में प्रस्तुत पड़ी हुई अत्यंत महत्त्वपूर्ण शक्तियों के जागरण का विधान है। दूसरे शब्दों में इसे आत्मबल विकास का विज्ञान कह सकते हैं। जिस प्रकार कीमती तिजोरी में ही मूल्यवान रत्नराशि जमा की जाती है, उसी प्रकार परमात्मा ने मानव प्राणी के भीतर बड़ी चतुरता और सावधानी के साथ यह कीमती तिजोरियों में भरकर अमूल्य रत्नराशि छिपा दी है। छिपाने में उसका प्रयोजन केवल इतना ही है कि वयस्क और परिपक्व बुद्धि होने का प्रमाण देकर ही उसका उपयोग संभव हो सके। यह ठीक भी है।
उपासना के द्वारा इस प्रकार के चमत्कारों की आशा से श्रम करना बालबुद्धि वाले ओछे स्तर के लोगों के लिए ही संभव है। बेशक अनेकों अचंभे में डालने वाले काम कर सकना तपस्वी साधकों के लिए संभव है, पर उनकी तुच्छता को समझते हुए इन पंक्तियों में उनकी उपेक्षा ही की जा रही है। उनका कोई वर्णन और विवेचन करने की हमारी इच्छा आकांक्षा इसलिए नहीं है कि उससे साधक की अभिरुचि उच्चकोटि के लाभ उठाने की अपेक्षा इन बाल-विनोदों के स्तर के अभिमुख हो सकती है, जिसका परिणाम शक्ति की बर्बादी करके सस्ती वाहवाही पाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होता।
उपासना में लगे हुए समय का मूल्य हो सकता है। हमारे सानिध्य और सहचरत्व में जिन लोगों ने यह उपासना की है, उनका भी ऐसा ही अनुभव है। आध्यात्मिक प्रगति की ओर हर साधक के कदम बढ़े हैं, चाहे वह कितने ही मंद क्यों न रहे हों।
उपासना की है, उनका भी ऐसा ही अनुभव है। आध्यात्मिक प्रगति की ओर हर साधक के कदम बढ़े हैं, चाहे वह कितने ही मंद क्यों न रहे हों।
उपासना को मनुष्य का एक दैनिक एवं अनिवार्य धर्मकर्त्तव्य माना है। हिंदू धर्म तो इस संबंध में और भी अधिक जोर देता है। उसने स्थान−स्थान पर जहाँ उपासना का महत्त्व वर्णन किया, वहाँ उसकी उपेक्षा करने वालों की भर्त्सना में भी कमी नहीं रखी है। प्राचीनकाल में एक अस्पर्श और बहिष्कृत वर्ग भी होता था, जिन्हें अंत्यज कहते थे। इस वर्ग में समाज से बहिष्कृत ऐसे ही लोग रखे जाते थे, जो नैतिक एवं सामाजिक नियमों का उल्लंघन करते थे, उपासना की उपेक्षा करते थे।
उपासना का विधानक्रम निराकार उपासना जैसा ही है। इसीलिए पंचमुखी गायत्री को अलंकारिक रूप से चित्रित तो करते हैं, पर पूजा के लिए एकमुखी गायत्री की तस्वीरें तथा मूर्तियाँ ही प्रयुक्त होती हैं। इस उद्देश्य के लिए पंचमुखी गायत्री का प्रयोग नहीं होता।
उपासना मत-मतांतरों के कोलाहल में कब तक उपेक्षित एवं तिरस्कृत पड़ी रह सकती थी? सत्य की शोध आखिर कभी तो होने ही वाली थी और तथ्यों का प्रकटीकरण किया ही जाने वाला था। हर्ष की बात है कि वह समय अब आ पहुँचा और वास्तविकता जैसे−जैसे सामने आई, वैसे−वैसे यह स्पष्ट हुआ कि लाखों वर्षों का हमारा आध्यात्मिक अनुसंधान गायत्री को ही सर्वोपरि उपासना स्वीकार करता रहा है, वही सदा की भाँति आज भी हमारे लिए उपयोगी हो सकती है। जिन्होंने किसी पूर्वाग्रह से अपने को बाँध नहीं लिया है, जिन्होंने विचारशीलता और सत्यान्वेषण से अपने को सर्वथा विमुख नहीं कर लिया है, उन्हें यह मानने में तनिक भी कठिनाई नहीं होती कि आध्यात्मिक प्रगति एवं भावनात्मक एकता की दृष्टि से गायत्री उपासना को ही उपासना क्षेत्र में उसका उचित स्थान मिलना चाहिए। विचारशीलता की प्रचंड लहरों ने आज गायत्री को उसके प्राचीन स्थान पर पहुँचा देने का प्रयत्न पुनः आरंभ कर दिया है।
उपासना में वस्तुओं, उपकरणों और विधानों का तारतम्य घटने लगता है और ध्यान, भावना एवं निष्ठा में तीव्रगति से अभिवृद्धि होने लगती है। यह उपासना बिना किसी वस्तु के भी हो सकती है। एकांत निर्जन वनों में रहकर घोर तपस्या करने वाले योगियों के लिए अन्न और वस्त्र तक उपलब्ध नहीं होता तो धूप दीप की, हवन ब्रह्मभोज की व्यवस्था कहाँ से बनेगी? सच बात यह है कि तब उन्हें इनमें से किसी भी उपकरण की आवश्यकता नहीं रह जाती। वे आत्मा की अग्नि में प्राण को हवि बनाकर निरंतर अखंड यज्ञ करते रहते हैं।
उपासना के अभाव में उस सद्बुद्धि से भी वंचित रहना पड़ता है, जो हमारे गुण, कर्म और स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए आवश्यक है। भौतिक समृद्धि और आत्मिक प्रगति के दो पहियों की गाड़ी पर ही हमारा सर्वांगपूर्ण जीवन विकास निर्भर रहता है। इसमें से एक अंग की उपेक्षा करने पर हमारी वही स्थिति हो जाती है, जो लंगड़े, काने एवं आधे शरीर में लकवा मारे हुए रोगी की होती है। मोटर का एक पहिया यदि चलते−चलते निकल पड़े तो उसके उलट जाने की दुर्घटना हो जाएगी। हमारी भौतिक समृद्धि तो बढ़ती जा रही है, पर आध्यात्मिक स्तर गिरी पड़ी स्थिति में ही बना हुआ है, ऐसी दशा में मोटर उलटने जैसी दुर्घटनाओं का दुःखद दृश्य हमें अपने जीवन में प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
उपासना के अंतर्गत अन्नमयकोश की साधना करने वालों को असंयम से लड़ना चाहिए और आलस से भी। इस मोर्चे को फतह करके ही आगे की प्रगति के द्वार खुलते हैं।
उपासना का अवलंबन ग्रहण करना पड़ता है। उपासना मानव जीवन-प्रगति का एक अत्यन्त आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण अंग है; इसलिए संसार के सभी धर्मों ने, सभी ऋषियों और सभी शास्त्रों ने, उपासना को मनुष्य का एक दैनिक एवं अनिवार्य धर्मकर्त्तव्य माना है। हिंदू धर्म तो इस संबंध में और भी अधिक जोर देता है। उसने स्थान−स्थान पर जहाँ उपासना का महत्त्व वर्णन किया, वहाँ उसकी उपेक्षा करने वालों की भर्त्सना में भी कमी नहीं रखी है। प्राचीनकाल में एक अस्पर्श और बहिष्कृत वर्ग भी होता था, जिन्हें अंत्यज कहते थे।
उपासना आरंभ करने के बाद अपने विचार और कार्यों में कायाकल्प जैसा परिवर्तन किया। जो लोग माँस खाते थे, नशेबाजी की लत जिन्हें बुरी तरह घेरे हुए थी, शराब, गाँजा, भाँग, अफीम, चरस, तमाकू के जो गुलाम बने हुए थे, उनमें से किसी ने एकबारगी, किसी ने धीरे−धीरे इन्हें बिना किसी बाहरी दबाव या उपदेश के अपने आप ही छोड़ दिया। उनके भीतर से ही कुछ ऐसी प्रेरणा और घृणा उत्पन्न हुई, जिसके कारण उन्हें इन सत्यानाशी दुर्व्यसनों को अनायास ही छोड़ देने का सुअवसर मिल गया। जुआ, सट्टा, चोरी, बेईमानी, रिश्वत, मिलावट आदि के द्वारा भारी कमाई करने वाले लोगों में से कितनों ने ही बुराइयों को सर्वांश में अथवा बहुत अंश में परित्याग कर दिया और गरीबी एवं सादगी का जीवन बिताते हुए कम खरच में मितव्ययितापूर्वक हँसी-खुशी एवं संतोष का जीवन बिताने लगे। गायत्री को माता−माता पुकारते रहने पर कितने ही व्यक्तियों की भावनाओं का ऐसा विकास हुआ कि उन्हें नारीमात्र में माता की प्रतिमा घूमती हुई दिखाई देने लगी और पहले जो व्यभिचार और दुराचार की दिशा में मन दौड़ा करता था, वह मार्ग बिलकुल ही अवरुद्ध हो गया।
उपासना को भारतीय धर्म में प्रत्येक मनुष्य का एक अत्यंत आवश्यक अनिवार्य नित्यकर्म माना गया है। जिस प्रकार शौच, स्नान, भोजन, शयन आदि नित्यकर्म न करने से शारीरिक स्वास्थ्य संतुलन नष्ट होता है, उसी प्रकार गायत्री उपासना के अभाव में उस सद्बुद्धि से भी वंचित रहना पड़ता है, जो हमारे गुण, कर्म और स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए आवश्यक है। भौतिक समृद्धि और आत्मिक प्रगति के दो पहियों की गाड़ी पर ही हमारा सर्वांगपूर्ण जीवन विकास निर्भर रहता है। इसमें से एक अंग की उपेक्षा करने पर हमारी वही स्थिति हो जाती है, जो लंगड़े, काने एवं आधे शरीर में लकवा मारे हुए रोगी की होती है। मोटर का एक पहिया यदि चलते−चलते निकल पड़े तो उसके उलट जाने की दुर्घटना हो जाएगी।
उपासनाक्रम उनके लिए अधिक लाभदायक सिद्ध हुआ। कारण स्पष्ट है, गायत्री की उपासना से व्यक्ति के अंतःकरण में सात्त्विकता और सद्बुद्धि का जो विकास होता है, उससे आहार-विहार, आचार-विचार, रहन-सहन, खान-पान सभी कुछ बदलता है और उस परिवर्तन का प्रभाव शरीर, मन, धन, व्यवसाय, परिवार, समाज सभी पर पड़ता है। अपना व्यवहार नम्र मधुर और सज्जनतापूर्ण हो जाने से लोगों के साथ बिगड़े हुए संबंध सुधरते हैं और शत्रुओं को मित्रों एवं सहायक के रूप में बदला हुआ पाया जाता है। अपना सुधार होने पर दूसरों का सुधरा हुआ व्यवहार उपलब्ध होना निश्चित ही रहता है।
उपासना— गायत्री की स्थिति वही हो गई जो नक्कारखाने में तूती की होती है। लोग उसे भूलने ही नहीं लगे, उपेक्षा ही नहीं करने लगे, वरन शाप लगी हुई, कलियुग में निष्फल, केवल ब्राह्मणों को ही मौरूसी, कान में कहने की गुप्त विद्या आदि बताकर उसकी ओर से जनसाधारण में अरुचि भी उत्पन्न करने लगे।
उपासना का एक व्यवस्थित दसवर्षीय शिक्षण क्रम बता दिया गया है। गत अक्टूबर अंक में प्रथम वर्ष का पाठ्यक्रम प्रस्तुत किया गया था, अब इस अंक के साथ द्वितीय वर्ष की साधना बताई जा रही है। अगले नौ वर्षों में यह क्रम इसी प्रकार चलता रहेगा। हर अक्टूबर में अखण्ड ज्योति का एक विशेष अंक गायत्री उपासकों के मार्गदर्शन के लिए निकलता रहेगा, शेष अंकों में युगनिर्माण योजना की विचारधारा रहा करेगी। लौकिक और पारलौकिक सुख-शांति के लिए गायत्री उपासना की उपयोगिता असाधारण है।
उपासना से साधक के मनःक्षेत्र में तत्काल सद्बुद्धि का विकास होता है, मलीन एवं अवरुद्ध पड़े हुए अंतःकरण की सफाई होना शुरू होती है और गुण, कर्म, स्वभाव में प्रवेश हुए दुरितों का समाधान होने की प्रक्रिया तत्क्षण आरंभ हो जाती है। उसका प्रकाश जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है। स्वभाव में मधुरता, सहनशीलता और दूरदर्शिता की प्रवृत्ति का समावेश होने से साधक के विचार और आचार में आश्चर्यजनक परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। फलस्वरूप अनेकों गुत्थियाँ सहज ही सुलझने लगती हैं। हमारी उलझनों के अधिकांश कारण बाहर नहीं, भीतर होते हैं।
उपासना बन पड़ती है। जिस ज्ञान से आचार शुद्ध न हो, सद्गुण न बढ़े, वह निरर्थक भारवहनमात्र है। जिस कर्म के पीछे उच्च भावनाएँ न हों, वह बंधन में बाँधने वाला ही होता है। इसलिए ज्ञान, कर्म और भक्तियोग की साधना करके आत्मा की प्राप्ति करने के इच्छुकों को सबसे पहले अपने आचार और विचार शुद्ध करने चाहिए।
उपासना में लौकिक लाभों का मार्ग प्रशस्त होता है। (1) सद्ज्ञान (2) स्वास्थ्य सुधार (3) उत्साह एवं स्फूर्ति (4) सहयोग एवं मित्रता की अभिवृद्धि (5) अभावों की पूर्ति, यह पाँच लाभ प्रथम श्रेणी के निष्ठावान साधक को मिलते हैं। ऊँची श्रेणी में यह लाभ और भी उच्चकोटि के हो जाते हैं। (1) साहस एवं निर्भीकता (2) विवेक एवं दूरदर्शिता (3) पुरुषार्थ एवं तृप्ति यह पाँच सिद्धियाँ पंचकोशी साधना की हैं। जैसे नर−नारी का जोड़ा होता है, वैसे ही दो−दो सद्गुणों का यह जोड़ा दस की संख्या में हो जाता है।
उपासना क्षेत्र में उसका उचित स्थान मिलना चाहिए। विचारशीलता की प्रचंड लहरों ने आज गायत्री को उसके प्राचीन स्थान पर पहुँचा देने का प्रयत्न पुनः आरंभ कर दिया है। लगता है गायत्री भारत की 'राष्ट्रीय उपासना' बनकर रहेगी और उसका आश्रय लेकर हम अपना आध्यात्मिक, मानसिक, नैतिक और सामाजिक जीवन ही ऊँचा न बनावेंगे, वरन वैयक्तिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुख-शांति की चिरस्थायी अभिवृद्धि भी करेंगे।
उपासना से व्यक्ति के अंतःकरण में सात्त्विकता और सद्बुद्धि का जो विकास होता है, उससे आहार-विहार, आचार-विचार, रहन-सहन, खान-पान सभी कुछ बदलता है और उस परिवर्तन का प्रभाव शरीर, मन, धन, व्यवसाय, परिवार, समाज सभी पर पड़ता है। अपना व्यवहार नम्र मधुर और सज्जनतापूर्ण हो जाने से लोगों के साथ बिगड़े हुए संबंध सुधरते हैं और शत्रुओं को मित्रों एवं सहायक के रूप में बदला हुआ पाया जाता है। अपना सुधार होने पर दूसरों का सुधरा हुआ व्यवहार उपलब्ध होना निश्चित ही रहता है।
उपासना के बिना उच्चस्तरीय निराकार साधना में सफलता प्राप्त कर सकना किसी के लिए संभव नहीं हो सकता।
उपासना के संबंध में भी है। आरंभिक श्रेणी की एकमुखी गायत्री उपासना को ‘स्कूल कोर्स’ कहा जा सकता है। इससे अगला शिक्षण ‘काॅलेज कोर्स’ है। इसे पंचमुखी-पंचकोशी एवं उच्चस्तरीय उपासना कह सकते हैं। जिनने कम-से-कम पाँच वर्ष साधारण श्रेणी की उपासना करके अपनी श्रद्धा को परिपक्व कर लिया हो, उन साधकों को उच्चस्तरीय साधना के लिए अग्रसर होना होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-December
उपासना करने तथा सितम्बर 62 की अखंड ज्योति में निर्धारित दस सूत्री कार्यक्रम को अपनाने के लिए प्रत्येक सदस्य पूरा−पूरा प्रयत्न करें इस ओर सबसे अधिक ध्यान दिया जाय।
उपासना से भी प्रसन्न हो जाते हैं जब कि आडम्बर की तरह बहुत तोता रटंत का भी कोई विशेष परिणाम नहीं निकलता। हमारी भक्ति भावना पूर्ण होनी चाहिए। भजन के साथ आत्मशोधन की प्रक्रिया भी सम्मिलित रहे। आरती के साथ अन्तर्दीप्ति भी प्रकाशित हो। नैवेद्य (प्रसाद) चढ़ाने के साथ यह भी ध्यान रहे कि मानव जीवन की सार्थकता परमार्थ में है।
उपासना, गृह सज्जा, पठन-पाठन, प्रचार-प्रसार आदि के लिए आवश्यक है।
उपासना की निस्संदेह बड़ी आवश्यकता है। उसकी उपयोगिता, महत्ता, शक्ति और संभावना बहुत है पर उस मार्ग में सफलता केवल उन्हें ही मिलती है जो परमात्मा से विमुख नहीं है, उसके बताये हुए मार्ग का उल्लंघन नहीं करते। गुलाब के बगीचे के पास रहने वाले सुगंधित वायु का रसास्वादन करते हैं और दुर्गन्धित गंदे नाले की समीपता से बदबू और बीमारी के शिकार होते हैं। वायु एक ही है पर वह सुगंधित और दुर्गन्धित पदार्थों के संसर्ग से हमारे लिए लाभदायक और हानिकारक बनती है। सद्−विचारों और सत्कर्मों को छूकर परमात्मा की जो कृपा वायु हमारे समीप आती है उसमें सुख−शान्ति का भण्डार भरा होता है, किन्तु हमारे पाप और दुर्भावों को छूकर प्रभू की दृष्टि टेढ़ी दुर्गन्धपूर्ण बन जाती है, उसमें अभिशाप, क्रोध और नरक का प्रत्यक्ष दर्शन होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-February
उपासना का मार्ग छोड़ दिया है और सचमुच हम बुरी तरह बीहड़ बन में भटकते रहे हैं। भटकते−भटकते वहाँ आ पहुँचे हैं, जहाँ से सर्वनाश अत्यन्त समीप दीखने लगा है। हमें पीछे लौटना होगा। जीवन के ध्रुवतारे की ओर दृष्टि डालनी होगी। आस्तिकता और उपासना का जनजीवन में कोई स्थान होना ही चाहिए।
उपासना की प्रवृत्ति निर्बाध गति से अग्रसर हो सके, इसके लिए हमारे जीवन में शांति और सुव्यवस्था रहनी आवश्यक है। अशांत और अव्यवस्थित परिस्थितियों में आत्मिक उन्नति तो दूर सामान्य शरीरयात्रा एवं जिंदगी के दिन पूरे करने की प्रक्रिया भी कठिन हो जाती है; इसलिए जीवन के तीनों प्रमुख आधारों को ठीक रखने के लिए भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है। इसी प्रयत्न का नाम ‘युगनिर्माण योजना’ है। इसकी एक मोटी रूपरेखा गत अंक में पाठक पढ़ चुके हैं। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज का लक्ष्य जितना पूरा हो सकेगा, उतनी ही जीवन-व्यवस्था संतुलित होती जाएगी और उसी आधार पर आत्मिक प्रगति की संभावनाएँ बढ़ती जाएँगी।
उपासना ‘गायत्री’ ही मानी गई है। ऋषियों और शास्त्रों ने जैसा कि इसे अत्याधिक आवश्यक एवं अनिवार्य माना है, वैसा ही हम भी मानते हैं और प्रत्येक विचारशील को इसे अपनाने के लिए प्रेरणा देते हैं।
उपासना का जनजीवन में कोई स्थान होना ही चाहिए। ‘अखण्ड ज्योति’ का पहला कार्यक्रम यही है। हम में से प्रत्येक व्यक्ति आस्तिक एवं उपासक बने, गायत्री आंदोलन के पीछे यही भावना सन्निहित है। भारतीय धर्म की सबसे प्राचीन, सबसे श्रेष्ठ, सबसे वैज्ञानिक, सबसे महत्त्वपूर्ण उपासना ‘गायत्री’ ही मानी गई है। ऋषियों और शास्त्रों ने जैसा कि इसे अत्याधिक आवश्यक एवं अनिवार्य माना है, वैसा ही हम भी मानते हैं और प्रत्येक विचारशील को इसे अपनाने के लिए प्रेरणा देते हैं।
उपासना से आत्मा में तुरंत बल, आनंद एवं प्रकाश का अनुभव होता है। उसी प्रकार स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य−समाज के लिए किया हुआ प्रयत्न भी हमारे व्यक्तिगत जीवन में सर्वतोमुखी प्रगति, शांति एवं महानता के अवसर प्रस्तुत करता है। सामूहिक रूप से— सामाजिक एवं राष्ट्रीय दृष्टि से तो उसका लाभ अनिर्वचनीय है। राष्ट्रीय और सामाजिक प्रगति का— विश्वमानव के सर्वतोमुखी आनंद का आधार भी इन तीन बातों पर ही पूर्णतया निर्भर रहता है। जहाँ इनके स्त्रोत सूखे, वहाँ प्रत्येक समाज दुर्बलता एवं दुर्दशा में डूबता जाता है।
उपासना का मार्ग अपनाना पड़ेगा। स्वाध्याय, सत्संग, मनन और चिंतन द्वारा आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास का आधार ग्रहण करना होगा। अंतःकरण की पवित्रता और पुष्टि के लिए इस अवलंबन को मजबूती से पकड़े रहना आवश्यक है। इसके बिना लौकिक-प्रगति भी संभव नहीं। धर्म और नीति का आधार अध्यात्म है, उसे छोड़ देने पर चतुरता और कूटनीति ही मनुष्य के पल्ले पड़ती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-April
उपासना का प्रतिफल
उपासना में संलग्न साधकों के लिए रविवार को प्रातःकाल सूर्य उदय होने से 1 घंटा पूर्व से लेकर सूर्योदय तक की अवधि में प्रति सप्ताह आत्मिक सम्पर्क स्थापित करने का एक विशेष प्रयोग हम लोग चलाते हैं। इस साधना के आधार पर पाठक मथुरा से दूर रहते हुए भी उन क्षणों में दूरी को भुलाकर समीपता अनुभव करते हैं और परस्पर विचार विनिमय का सुखद आनन्द अनुभव होता है। प्रेरणा, प्रकाश, उत्साह एवं बल भी मिलता है। जो नैष्ठिक उपासक इस प्राण संचार साधना क्रम को चला रहे हैं वे 1 अप्रैल से 1 जून तक अपना साधना समय 411 से 511 तक का कर लें। जिन्होंने आरम्भ नहीं किया है वे इस चैत्र की नवरात्रि से आरम्भ कर दें और इस सूक्ष्म सम्पर्क, प्राण संचार विधान की पीली पुस्तिका बिना मूल्य मंगालें।
उपासना कुछ भी नहीं करते, जिनकी अभिरुचि इस ओर नहीं रहती और अवकाश भी नहीं मिलता उन्हें भी एक प्रयोग एवं परीक्षण के रूप में इन 9 दिनों में कुछ न कुछ समय निकाल ही लेना चाहिए। एक घंटा समय नित्य 9 दिन तक निकालते रहना कुछ कठिन बात नहीं है। प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर गायत्री माता का आवाहन, ध्यान, प्रणाम, पूजन करके जप आरंभ करना चाहिए। माला मिले तो ठीक नहीं तो उंगलियों के आधार पर गणना करके 10 माला अथवा 1100 मंत्र जप लेने चाहिए। एक घंटे में प्रायः इतना जप आसानी से हो जाता है।
उपासना करने की छूट है, उसी प्रकार जीवन में व्यावहारिक अध्यात्म की सामयिक प्रेरणा देने वाले अखण्ड ज्योति के पृष्ठ आधा घंटा तक पढ़ते रहने के अतिरिक्त अन्य ग्रंथ भी पढ़े जा सकते हैं, पर स्वाध्याय का जो एक व्यवस्थित कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा रहा है, वह अखण्ड ज्योति के पृष्ठों से प्राप्त करते रहना ही चाहिए।
उपासना जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक यह भी है कि अपने सद्विचारों और सत्कर्मों से उस अंतर्यामी को संतुष्ट किया जाए। हमें अब बार−बार इस तथ्य पर विचार करना होगा और कुछ देर पूजा करने के बाद चाहे जो उचित-अनुचित करते रहने की मान्यता को छोड़ना पड़ेगा। ईश्वर चौकी पर बिठाकर भोग लगा देने मात्र से प्रसन्न नहीं हो सकता, इस पूजन के साथ−साथ अपनी आंतरिक उत्कृष्टता का नैवेद्य भी प्रभु के चरणों पर प्रस्तुत करना पड़ेगा, उसी से तो वे पसीजते और पिघलते हैं। भक्त को भगवान पर सच्ची अनुकंपा केवल इसी प्रकार से प्राप्त हो सकती है। आज हमें देर तक बार−बार यही सोचना होगा।
उपासना को पूरा स्थान देना होगा, पर केवल उसी तक सीमित रह जाने से लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। (1) साधना (2) स्वाध्याय (3) संयम (4) सेवा, यह चार कार्य मिलने से एक सर्वतोमुखी सर्वांगपूर्ण अध्यात्मवाद बनता है। जिस प्रकार दोनों हाथ और दोनों पैर ठीक होने से हमारी शारीरिक क्षमता ठीक कार्य करती है, उसी प्रकार इन चारों साधनों की समस्वरता से ही कोई व्यक्ति स्वस्थ अध्यात्मवादी बन सकता है। जिस व्यक्ति के दो हाथ और दो पैर के चार अंगों में से यदि एक या दो ही अवयव काम करें, शेष अपंग या नष्ट हो जाएँ तो वह अपने जीवन को सक्षम कैसे बनाएँ रख सकेगा? जिनका अध्यात्मवाद केवल थोड़े से भजन तक सीमित रह गया है, स्वाध्याय, संयम और सेवा के लिए उनके जीवन में कोई स्थान नहीं, वे वैसे ही अपंग हैं जैसे केवल एक हाथ या केवल एक पैर वाला व्यक्ति होता है।
उपासना
उपासना का व्यावहारिक रूप
उपासना को भारतीय संस्कृति के अनुयायी होने का एक अनिवार्य कर्त्तव्य मानकर इसे दैनिक जीवन में स्थान दिया ही जाना चाहिए।
उपासना की प्रथम भूमिका जप हवन है। यह कार्यक्रम शरीर द्वारा चलाया जाता है। जिनकी उपासना इस प्रकार नियमित रूप से पाँच वर्ष तक चल चुकी हो उन्हें द्वितीय उच्च स्तरीय भूमिका में प्रवेश करना चाहिए। इसके लिए मन के द्वारा ध्यान प्रधान साधनाऐं अपनानी पड़ती हैं। शरीर की साधना से मन शुद्ध होता है और मन के द्वारा आत्मा की प्राप्ति होती है।
उपासनाऐं पाँच से नियमित चल रही हैं उन्हें अब शरीर के द्वारा हो सकने वाली साधनाओं तक ही सीमित न रहकर मन द्वारा की जाने वाली ध्यानपरक उच्चस्तरीय साधना के क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए। नवीन संवत्सर के समय इस चैत्र की नवरात्रि से यह उच्च स्तर प्रवेश का शुभारंभ कर देना चाहिए। अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश के अनावरण की साधना अखण्ड−ज्योति के अक्टूबर 61 के अंक में विस्तारपूर्वक बताई जा चुकी हैं। कितने ही नैष्ठिक उपासक उसे अपना भी चुके हैं। जिनने अभी तक उसे अपनाया न हो वे उपरोक्त अंक को पढ़ लें और इसी चैत्र की नवरात्रि से वह साधना प्रारंभ कर दें।
उपासना नियमित रूप से चल रही है उन्हें नवरात्रि में 24 हजार अनुष्ठान करना चाहिए। 27 माला प्रतिदिन के हिसाब से 9 दिन में अनुष्ठान पूरा हो जाता है। इसमें प्रातः 211−3 घंटे लगते हैं। जिन्हें एक ही समय इतना समय न मिल सके वे प्रातः सायं दो बार में अपना जप पूरा कर सकते हैं। जिनका अनियमित जीवन क्रम है वे 2400 मंत्र लेखन या 240 गायत्री चालीसा पाठ का नियम बिना किसी नियम प्रतिबन्ध के पूरा कर सकते हैं।
उपासनाओं की सफलता की दृष्टि से है। इस अलभ्य अवसर को हमें व्यर्थ न जाने देना चाहिए और जिनसे जितनी अधिक बन पड़े उन्हें उतनी साधना करनी चाहिए।
उपासना पर वस्तुतः हम विश्वास करते हैं तो नियत समय पर पूजा−पाठ निपटने तक सीमित न रहकर ईश्वर को अपना जीवनसंगी बनाना पड़ेगा, हर घड़ी उसकी उपस्थिति अपने साथ अनुभव करने और अपने सद्विचारों एवं सत्कर्मों से उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करना होगा।
उपासना नवरात्रि में सर्वोत्तम है। जो पाठक नियमित उपासना कुछ भी नहीं करते, जिनकी अभिरुचि इस ओर नहीं रहती और अवकाश भी नहीं मिलता उन्हें भी एक प्रयोग एवं परीक्षण के रूप में इन 9 दिनों में कुछ न कुछ समय निकाल ही लेना चाहिए। एक घंटा समय नित्य 9 दिन तक निकालते रहना कुछ कठिन बात नहीं है। प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर गायत्री माता का आवाहन, ध्यान, प्रणाम, पूजन करके जप आरंभ करना चाहिए। माला मिले तो ठीक नहीं तो उंगलियों के आधार पर गणना करके 10 माला अथवा 1100 मंत्र जप लेने चाहिए।
उपासना के साथ−साथ अन्य मंत्र या देवता की उपासना करने की छूट है, उसी प्रकार जीवन में व्यावहारिक अध्यात्म की सामयिक प्रेरणा देने वाले अखण्ड ज्योति के पृष्ठ आधा घंटा तक पढ़ते रहने के अतिरिक्त अन्य ग्रंथ भी पढ़े जा सकते हैं, पर स्वाध्याय का जो एक व्यवस्थित कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा रहा है, वह अखण्ड ज्योति के पृष्ठों से प्राप्त करते रहना ही चाहिए।
उपासना का सारा विधान ‘साधन’ कहा जाता है— साध्य नहीं। साधन का उद्देश्य साध्य को प्राप्त करना है। साध्य है आत्मिक पवित्रता। अंतःकरण पर चढ़े हुए मल-विक्षेपों को हटाने के लिए साधन किया जाता है। आत्मिक स्वच्छता जितनी स्पष्ट होती जाती है उतनी ही समीपता हमें अपने भगवान की अनुभव होने लगती है।
उपासना में निष्ठा उत्पन्न करना स्वाध्याय एवं सत्संग का काम है। जीव की पतनोन्मुख पाशविक वृत्तियाँ उसे वासना और तृष्णा के प्रलोभनों की ओर आकर्षित करती रहती हैं। फलस्वरूप उसकी प्रवृत्तियाँ और गतिविधियाँ इंद्रियों की वासनाएँ पूरी करने में एवं मन की— संग्रह, प्रभुता, प्रशंसा, ममता आदि तृष्णाएँ पूरी करने में लगी रहती हैं। जीव की सारी शक्तियाँ, क्षमता, योग्यता, इसी दिशा में लगी रहती हैं और 84 लाख योनियों के बाद, करोड़ों वर्ष बाद प्राप्त हुआ यह सुरदुर्लभ मानव जीवन, केवल शरीर की क्षणिक प्रसन्नताएँ प्रस्तुत करते रहने में समाप्त हो जाता है। इस घातक भूल के लिए जीव को फिर 84 लाख योनियों में भ्रमण करने का भारी पश्चात्ताप भरा संकट उठाना पड़ता है।
उपासना के अधिक संख्या में अधिक विधि-विधानपूर्वक जप कर सकते हैं। उसके परिणाम भी उन्हें अधिक प्राप्त होंगे। एक व्यस्त-से-व्यस्त व्यक्ति को भी 108 मंत्र तो जप ही लेने चाहिए। किसी और देवता या मंत्र के जो उपासक हों, वे उसे भी करें, पर गायत्री उपासना को भारतीय संस्कृति के अनुयायी होने का एक अनिवार्य कर्त्तव्य मानकर इसे दैनिक जीवन में स्थान दिया ही जाना चाहिए।
उपासना इस प्रकार नियमित रूप से पाँच वर्ष तक चल चुकी हो उन्हें द्वितीय उच्च स्तरीय भूमिका में प्रवेश करना चाहिए। इसके लिए मन के द्वारा ध्यान प्रधान साधनाऐं अपनानी पड़ती हैं। शरीर की साधना से मन शुद्ध होता है और मन के द्वारा आत्मा की प्राप्ति होती है। शुद्ध आत्मा का तादात्म्य परमात्मा में हो जाता है। यही सनातन आत्म−विकास का क्रम चला आ रहा है।
उपासना से लाभ नहीं होता, ऐसी बात नहीं है। जब सभी को मजदूरी मिलती है, तो भगवान किसी भजन करने वाले की मजदूरी क्यों न देंगे? जब भौतिक पुरुषार्थों का लाभ मिलता है, तो आध्यात्मिक पुरुषार्थ क्यों निष्फल जाएगा? जितना हमारा भजन होगा, जिस श्रेणी का हमारा भाव होगा, उसके अनुरूप हिसाब चुकाने में भगवान के यहाँ अन्याय नहीं होता; पर यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि व्यापार बुद्धि से किया हुआ भजन, अपने अनुपात से ही लाभ उत्पन्न कर सकता है।
उपासना और आध्यात्मिक साधना की जा सकती है। इन दोनों मार्गों में से जिसे जो अनुकूल जँचा है, उसे उसने स्वीकार किया है। प्राचीनकाल में अनेकों ऋषि गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए साधनासंलग्न रहे और बहुतों ने एकाकी जीवन को सुविधाजनक समझकर ब्रह्मचारी या संन्यासी रहकर आत्मिक प्रगति की।
उपासना में सत्य को ही प्रारंभिक एवं आवश्यक साधन माना है।
उपासना, परमार्थ भावना आदि सद्वृत्तियों को अपनाने से किसी भी वर्ण आश्रम में रहते हुए मनुष्य लक्ष्य तक पहुँच सकता है। इनके अभाव में वेश धारण कर लेने या घर त्याग देने, अविवाहित रहने जैसी बाह्य-प्रक्रियाओं के ही आधार पर कोई लक्ष्य प्राप्त करना चाहें तो संभव नहीं।
उपासना के लिए उत्तम मानी जाती है उसी प्रकार सर्दी और गर्मी की ऋतुओं का मिलन आश्विन और चैत्र में होता है। इन महीनों के शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से नवमी तक की 9−9 दिन की दो ऋतु संधि बेलाऐं आती हैं जिन्हें नवरात्रि कहते हैं। जिस प्रकार नारी के शरीर में ऋतुकाल की उपयोगिता गर्भ धारण की दृष्टि से है वैसे ही वर्ष−शरीर में नवरात्रि का महत्व आध्यात्मिक उपासनाओं की सफलता की दृष्टि से है। इस अलभ्य अवसर को हमें व्यर्थ न जाने देना चाहिए और जिनसे जितनी अधिक बन पड़े उन्हें उतनी साधना करनी चाहिए।
उपासना भी 9 दिन तक कर लें तो उनके यह 9 घंटे उनके आत्मिक विकास में तथा किन्हीं उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाने में बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध होंगे।
उपासना एवं विचारगोष्ठी के रूप में यह सत्संग नियमित रूप से चला करे तो उसका प्रभाव सब लोगों के जीवन पर अवश्य पड़ेगा और घर में सद्भाव, सद्विचार ,सत्कर्म एवं सज्जनता की धर्मपरंपरा बनी रहेगी। सद्विचारों के अभाव में ही कुबुद्धि उपजती और पनपती है। यदि उसका उन्मूलन करने के लिए पारिवारिक सत्संग चलते रहें तो हर घर में धार्मिक वातावरण बना रहेगा और स्वर्गीय वातावरण दिखाई पड़ता रहेगा।
उपासना में दुहरा लाभ है। घट−घटवासी सर्वव्यापी भगवान यह भली प्रकार जानते हैं कि मेरे किस पुत्र को क्या कष्ट है। वे करुणा के सागर अनंत वात्सल्य से ओत-प्रोत हैं, प्राणिमात्र का निरंतर हित-साधन करते हैं, तो फिर अपने भक्तों का क्यों न करेंगे? हम स्वयं नहीं जानते कि हमारा हित किस में और अनहित किस में है? रोगी को क्या पता है कि उसके लिए क्या आहार पथ्य और क्या कुपथ्य है?
उपासना उन लोगों के लिए है जो अब तक नियमित गायत्री जप नहीं करते या व्यस्तता के कारण एक दो माला ही अनियमित रूप से कर पाते हैं। नवरात्रि में यदि ऐसे लोग एक घंटा प्रतिदिन की उपासना भी 9 दिन तक कर लें तो उनके यह 9 घंटे उनके आत्मिक विकास में तथा किन्हीं उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाने में बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध होंगे।
उपासना का मुख्य लाभ भौतिक संपदाएँ जुटाना नहीं, आत्मकल्याण ही है। भक्ति का उद्देश्य मानव अंतःकरण में प्रेमभावना की अभिवृद्धि करना है, जिससे वह महान मानव बनकर अपने चारों ओर सत्यं शिवं सुन्दरं से परिपूर्ण एक दिव्य वातावरण उत्पन्न कर सके।
उपासना का अभ्यास करना चाहे, उसके लिए उचित है कि वह किसी से वैर न रखे। सबसे प्रीति करे। सत्य बोले। मिथ्या कभी न बोले। चोरी न करे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-August
उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगाये जाने वाले बीज−मन्त्रों का साधना विधान, आत्म साक्षात्कार एवं ऋद्धि−सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
उपासना को प्रधान धर्म−कार्य स्वीकार किया है। अब पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने भी सूर्य की अद्भुत शक्ति और गुणों का पता लगाया है और वहाँ सूर्य किरणों के प्रयोग से रोग निवारण की नई ही चिकित्सा प्रणाली का प्रचार किया गया है। वहाँ मशीनों द्वारा सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों को पृथक करके सैकड़ों कठिन रोगों को सहज में ठीक किया जा रहा है। कितने ही बड़े−बड़े अस्पताल केवल सूर्य किरणों द्वारा चिकित्सा करते हैं। साथ ही सात तरह के रंगीन काँचों और बोतलों में भरे पानी द्वारा भी रोगों का निवारण किया जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-March
उपासना के लिए कोई निश्चित समय एवं निर्धारित विधान अवश्य रहे।
उपासना का आश्रय लिये बिना उज्ज्वल नहीं हो सकता।
उपासना करते हैं किसी और मन्त्र या देवी देवता को मानते हैं उन्हें भी उचित है कि उस उपासना में कम से कम 108 गायत्री मन्त्रों का जप सम्मिलित कर लें। इसमें पाँच छह मिनट ही तो लगती हैं।
उपासना नहीं करते तो आज से ही उसका शुभारम्भ किसी न किसी रूप में आरम्भ कर देना चाहिये। यह अपने तक की सीमित न रहे वरन् अपने स्वजन संबंधियों में भी इसका प्रसार होना चाहिये। हमको प्रयत्न करना चाहिये कि हमारा प्रभाव क्षेत्र जहाँ तक है वहाँ तक गायत्री उपासना को दैनिक जीवन में कोई न कोई स्थान, कोई न कोई समय अवश्य मिले। युग निर्माण की यही प्रधान एवं प्रमुख प्रक्रिया रह सकती है। हमारा भविष्य आस्तिकता एवं उपासना का आश्रय लिये बिना उज्ज्वल नहीं हो सकता।
उपासना की पूजा अर्चा द्वारा ही संभव है।
उपासना को दैनिक जीवन में नियमित एवं निश्चित रूप से निरन्तर करते रहा जाय। केवल ईश्वर है इतना मान लेने मात्र से उस मान्यता के द्वारा कुछ महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिए हममें से हर एक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि दैनिक जीवन में उपासना के लिए कोई निश्चित समय एवं निर्धारित विधान अवश्य रहे।
उपासना आरम्भ करने में भी संकल्प का विधान पूरा करने की हमारी धार्मिक परम्परा अनादि काल से चली आती है। यह संकल्प भी उसी प्रकार प्रयुक्त होना चाहिए। इसे बड़े अक्षरों में एक कार्ड बोर्ड पर लिखकर रख लेना चाहिए। सवेरे उठते ही इसे दुहराकर तब शैया का परित्याग किया जाय। पूजा, उपासना आरंभ करने से पूर्व इसे एक बार भावनापूर्वक पढ़ लिया जाय।
उपासना पर पूरा जोर देना चाहिये। हम स्वयं यदि अभी तक उपासना नहीं करते तो आज से ही उसका शुभारम्भ किसी न किसी रूप में आरम्भ कर देना चाहिये। यह अपने तक की सीमित न रहे वरन् अपने स्वजन संबंधियों में भी इसका प्रसार होना चाहिये। हमको प्रयत्न करना चाहिये कि हमारा प्रभाव क्षेत्र जहाँ तक है वहाँ तक गायत्री उपासना को दैनिक जीवन में कोई न कोई स्थान, कोई न कोई समय अवश्य मिले। युग निर्माण की यही प्रधान एवं प्रमुख प्रक्रिया रह सकती है।
उपासना बिलकुल भी नहीं करते उन्हें 108 मन्त्र गायत्री जप करने में 5−6 मिनट का समय लगाना तो आरंभ कर ही देना चाहिए। जिन्हें स्नान या समय सम्बन्धी असुविधा है वे बिना स्नान के भी गायत्री मन्त्र−लेखन या मौन मानसिक जप कर सकते हैं। प्रातः सोकर उठते समय और रात को सोने के समय पाँच−पाँच मिनट का समय लगा सकने में तो किसी को भी कुछ कठिनाई न होनी चाहिए। जो व्यक्ति सम्प्रदाय−भेद के कारण—जैसे जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि—गायत्री का जप न करे सकें वे अपने साम्प्रदायिक मन्त्र का इसी भाँति नियमित रूप से जप करते हुए सुफल प्राप्त कर सकते हैं।
उपासना की अनिवार्यतः आवश्यकता है। स्थूल वस्तुऐं हर समय आँखों के आगे उपस्थित रहती हैं और उनका अनुभव इन्द्रियों से बार−बार होता रहता है। पर जो सूक्ष्म है, अदृश्य है उसका यदि विशेष रूप से स्मरण चिन्तन न किया जाय तो उसका विस्मरण हो जाना स्वाभाविक ही है। उपयोग में आने वाली सामान्य वस्तुऐं भी यदि बहुत दिन तक व्यवहार में नहीं आती तो हम उन्हें भूल जाते हैं। मनुष्य का स्वभाव ही कुछ भुलक्कड़ ढंग का है यदि ऐसा न होता तो उसके मस्तिष्क में पुरानी स्मृतियाँ इतनी अधिक भरी रहतीं कि नई बातों को सुनने−समझने का स्थान ही न बचता।
उपासना को अपना एक प्रिय एवं आवश्यक कार्यक्रम मानते हैं। सही दिशा में चलने का यह प्राथमिक महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली कदम है। जो उपासना नहीं करता उसका मार्ग अन्धेरे से, कंटकों से भरा हुआ है। जिसका आधार सही है, अवलम्बन सच्चा है वह आज न सही कल, अब न सही फिर गन्तव्य लक्ष तक पहुँचेगा ही। पर यहाँ एक ही बात ध्यान रखने की है कि लक्ष और दिशा सही हो जाने पर भी दोनों पैरों से चलने का प्रबन्ध करना पड़ेगा।
उपासना का दैनिक जीवन में स्थान
उपासना से संबंधित हैं। पर सामाजिक एवं लौकिक दृष्टि से आस्तिकता का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह मनुष्य को कुकर्म करने से ही नहीं, कुविचार से भी दूर रहने की प्रेरणा देती है। आत्म नियंत्रण का यही उपाय ऐसा है जो हमारे नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा को जन−मानस में गहराई तक जमाये रह सकता है। अपने सुधार और दूसरों के साथ सद्व्यवहार की जिस प्रक्रिया के ऊपर विश्व शान्ति की संभावना निर्भर है उसके लिए आस्तिकता ही एक प्रेरक शक्ति का केन्द्र बन सकती है। जीव लघु से महान बने, अणु से विभु के रूप में विकसित हो, आत्मा को परमात्मा के रूप में परिणत करे यह आकाँक्षा आस्तिकता के आधार पर ही तो जागृत होगी और इस आकाँक्षा की पूर्ति के लिए उसे धर्मनिष्ठा, आत्मसंयम, परोपकार एवं सदाचार का अनिवार्यतः अवलम्बन करना पड़ेगा।
उपासना के समय एक हो जाया करें और इस संकल्प को पढ़ने के साथ−साथ थोड़ा बहुत नियमित या अनियमित (मानसिक) गायत्री जप ध्यान करें। ऐसी परम्पराऐं हर घर में आरम्भ की जानी चाहिएं। युग−निर्माण का आरम्भ इस सत्संकल्प में सन्निहित भावनाओं के साथ ही होता है।
उपासना, ध्यान, भजन, स्वाध्याय चिन्तन आदि उसके उपाय हैं। पर इतने मात्र को ही अध्यात्म का पूर्ण स्वरूप नहीं माना जा सकता यह तो उसका एक अंश मात्र है। पूर्णता तब आती है जब बाह्य वातावरण में भी वह अध्यात्म भावनाऐं साकार रूप से दिखाई देती हैं। जैसे हमारा मन अध्यात्म तत्व में डूबा रहने पर सुख प्राप्त करता है वैसे ही हमारा समाज यदि आध्यात्मिक आदर्शों को अपना कर धर्म नीति पर चले तो शान्ति की स्थापना हो सकती है। भीतर उत्पन्न होने वाली दुर्भावनाओं की बाहर फैलने वाली सडांद ही अशान्ति के रूप में प्रकट होती है।
उपासनाओं में गायत्री का स्थान सर्वोपरि है। अनादि एवं सनातन साधना वही है। अवतारों ऋषियों, महापुरुषों एवं सर्व-साधारण ने इसे युग−युगों से अपनाये रखा है। पिछले अन्धकार युग में जब अनेक मत मतान्तर और देवी देवता उपज पड़े तो उपासना विधानों का बहुसंख्यक हो जाना भी स्वाभाविक ही था। आज विविध-विधि उपासनाऐं हिन्दू धर्म में प्रचलित हैं।
उपासना आरंभ करने से पूर्व इसे एक बार भावनापूर्वक पढ़ लिया जाय। साप्ताहिक एवं सामयिक सत्संगों, गोष्ठियों में एक व्यक्ति इसे पढ़े और शेष उसे दुहरायें। सब के हाथ में एक−एक संकल्प पत्र हो तो पढ़ने और दुहराने में सुगमता रहेगी। इसी प्रकार बड़े यज्ञों में या उत्सवों में एक व्यक्ति मंच पर जाकर इसे थोड़ा−थोड़ा करके बोले और जनता उसे दुहरावे। ऐसे अवसरों पर यह पत्र अधिक संख्या में जनता में वितरण किये जा सकते हैं ताकि नये आदमियों को भी इन्हें पढ़ने-बोलने और समझने में सुगमता हो।
उपासना विधानों का बहुसंख्यक हो जाना भी स्वाभाविक ही था। आज विविध-विधि उपासनाऐं हिन्दू धर्म में प्रचलित हैं। वे चलती रहें तो भी कुछ हानि नहीं, पर गायत्री उपासना को भावात्मक एकता एवं प्राचीनतम साधन परम्परा को सजीव रखने के लिए प्रथम स्थान देना होगा। जो लोग कोई और उपासना करते हैं किसी और मन्त्र या देवी देवता को मानते हैं उन्हें भी उचित है कि उस उपासना में कम से कम 108 गायत्री मन्त्रों का जप सम्मिलित कर लें। इसमें पाँच छह मिनट ही तो लगती हैं।
उपासना को दैनिक जीवन में कोई न कोई स्थान, कोई न कोई समय अवश्य मिले। युग निर्माण की यही प्रधान एवं प्रमुख प्रक्रिया रह सकती है। हमारा भविष्य आस्तिकता एवं उपासना का आश्रय लिये बिना उज्ज्वल नहीं हो सकता।
उपासना को भावात्मक एकता एवं प्राचीनतम साधन परम्परा को सजीव रखने के लिए प्रथम स्थान देना होगा। जो लोग कोई और उपासना करते हैं किसी और मन्त्र या देवी देवता को मानते हैं उन्हें भी उचित है कि उस उपासना में कम से कम 108 गायत्री मन्त्रों का जप सम्मिलित कर लें। इसमें पाँच छह मिनट ही तो लगती हैं।
उपासना में कम से कम 108 गायत्री मन्त्रों का जप सम्मिलित कर लें। इसमें पाँच छह मिनट ही तो लगती हैं।
उपासना नहीं करता उसका मार्ग अन्धेरे से, कंटकों से भरा हुआ है। जिसका आधार सही है, अवलम्बन सच्चा है वह आज न सही कल, अब न सही फिर गन्तव्य लक्ष तक पहुँचेगा ही। पर यहाँ एक ही बात ध्यान रखने की है कि लक्ष और दिशा सही हो जाने पर भी दोनों पैरों से चलने का प्रबन्ध करना पड़ेगा। लंगड़े व्यक्ति भी लकड़ी की टाँग लगाकर या हाथों का सहारा लेकर घिसटने की व्यवस्था बनाकर आगे बढ़ते हैं। यदि ऐसी कोई सहायक व्यवस्था न बनाई जाय तो केवल एक टाँग से सही रास्ता मिल जाने पर भी उस पर चल सकना और गन्तव्य स्थान तक पहुँच सकना संभव न होगा।
उपासना के लाभ असामान्य हैं। इस महाशक्ति की विधिवत् आराधना करके मनुष्य अपने आत्मबल को आशातीत स्थिति तक ऊँचा उठा सकता है और उससे उपलब्ध हो सकने वाले भौतिक एवं आत्मिक, लौकिक एवं पारलौकिक लाभों से लाभान्वित हो सकता है। विभिन्न प्रकार की साँसारिक कठिनाइयों के समाधान एवं श्री समृद्धि और सफलता के लिए गायत्री का उपयोग किया जाता है वह विशेष विधान गायत्री ग्रन्थों में अलग से हम लिख चुके हैं। विशेष प्रयोजनों के लिए उन्हीं से मार्गदर्शन लेना पड़ेगा। पर युग निर्माण की दृष्टि से जन साधारण में आस्तिकता का प्रसार करना अनिवार्य है और इसके लिए गायत्री को ही प्रधानता मिलनी चाहिए।
उपासनाऐं हिन्दू धर्म में प्रचलित हैं। वे चलती रहें तो भी कुछ हानि नहीं, पर गायत्री उपासना को भावात्मक एकता एवं प्राचीनतम साधन परम्परा को सजीव रखने के लिए प्रथम स्थान देना होगा। जो लोग कोई और उपासना करते हैं किसी और मन्त्र या देवी देवता को मानते हैं उन्हें भी उचित है कि उस उपासना में कम से कम 108 गायत्री मन्त्रों का जप सम्मिलित कर लें। इसमें पाँच छह मिनट ही तो लगती हैं।
उपासना के बलबूते पर ही मूर्तिमान बनती है। इसलिये हमें उपासना पर पूरा जोर देना चाहिये। हम स्वयं यदि अभी तक उपासना नहीं करते तो आज से ही उसका शुभारम्भ किसी न किसी रूप में आरम्भ कर देना चाहिये। यह अपने तक की सीमित न रहे वरन् अपने स्वजन संबंधियों में भी इसका प्रसार होना चाहिये। हमको प्रयत्न करना चाहिये कि हमारा प्रभाव क्षेत्र जहाँ तक है वहाँ तक गायत्री उपासना को दैनिक जीवन में कोई न कोई स्थान, कोई न कोई समय अवश्य मिले।
उपासना’ द्वारा ही पूरा हो सकता है। जप, ध्यान, पूजन, अर्चन आदि के विधान इसीलिए बनाये गये हैं कि उस आधार पर बार−बार मनुष्य परमात्मा का मनोयोग पूर्वक स्मरण करे और उस स्मृति के आधार पर प्रभु को अपने निकटवर्ती संबंधी, कुटुँबी, साथी एवं सहचर के रूप में उपस्थित रहता हुआ सदा अनुभव करता रहे। पूजा से इसी मनोवैज्ञानिक आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है। बार−बार स्मरण करने से दो बिछुड़े हुए विरहीजन अपने प्रिय को और भी अधिक निकट हृदय में बसा हुआ अनुभव कर सकते हैं तो क्या परमात्मा को इस प्रकार स्मरण करके निकटवर्ती के रूप में अनुभव नहीं किया जा सकता? यदि हम अपने प्रियतम को निरन्तर साथ रहते अनुभव कर सकें तो पापों से बचे रहना और पुण्य प्रयत्नों में संलग्न रहना तो सहज ही हो जायेगा साथ ही हम निर्भय, निश्चिन्त, आशावादी और उत्साही भी रहेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-September
उपासना में ही नहीं, व्यवहारिक जीवन में भी हमारा दृष्टिकोण यही रहना चाहिए। नारी मात्र को हम पवित्र दृष्टि से देखें, वासना की दृष्टि से न उसे सोचें न उसे देखें न उसे छुऐं।
उपासना अनिवार्य है। हमारा पहला कदम यही होना चाहिए। इसके साथ ही ‘युग-निर्माण संकल्प’ भी उपासना का एक अंग समझकर पढ़ा जाना चाहिए।
उपासना की मानव जीवन में कितनी अधिक आवश्यकता और उपयोगिता है इसका उल्लेख मार्च की ‘अखंड−ज्योति’ में किया जा चुका है। उपासना निश्चित रूप में एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक पुरुषार्थ है। इस दिशा में लगाया हुआ थोड़ा सा समय भी किसी भी लाभदायक कार्य में किये गये श्रम की अपेक्षा कम महत्वपूर्ण एवं लाभदायक सिद्ध नहीं होता।
उपासना और मानसिक पुरुषार्थ के रूप में भावना की गणना होती है। कुविचारों से सद्विचारों की काट होती है। घड़ी−घड़ी पर निराशा के, उत्तेजना के, आवेश के, वासना के, ईर्ष्या द्वेष के, लोभ−मोह के, आलस्य और प्रमाद के विचार मन में उठते रहते हैं। इनसे लड़ने के लिए इनके प्रतिपक्षी विचारों की एक सुव्यवस्थित शृंखला पहले से ही बना रखनी चाहिए। ठंडे लोहे से गरम लोहा काटा जाता है।
उपासना निश्चित रूप में एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक पुरुषार्थ है। इस दिशा में लगाया हुआ थोड़ा सा समय भी किसी भी लाभदायक कार्य में किये गये श्रम की अपेक्षा कम महत्वपूर्ण एवं लाभदायक सिद्ध नहीं होता।
उपासना से हमारा आत्मबल बढ़ता है और कर्तव्य पालन की वह प्रेरणा अनायास ही उत्पन्न होती है जिसके आधार पर जीवन लक्ष की पूर्ति और विश्वशक्ति के दोनों ही उद्देश्य पूर्ण होते हैं।
उपासना और अध्यात्म का मार्ग
उपासना का पाठ्यक्रम छापा था, अब दूसरे वर्ष का पाठ्यक्रम आगामी अक्टूबर 62 के अंक में छपेगा। इसी प्रकार एक अंक हर साल निर्धारित पाठ्यक्रम का शिक्षण करते हुए निकलते रहेंगे और इन दस वर्षों में गायत्री का उच्च स्तरीय कोर्स पूर्ण हो जायेगा।
उपासना
उपासना का कोई न कोई रूप हम में से प्रत्येक को नियत और निश्चित कर लेना चाहिए। जो लोग क्रमबद्ध गायत्री उपासना कर रहे हैं, उन्हें निष्ठा को, श्रद्धा−विश्वास को दिन−दिन बढ़ाते चलना चाहिए। अक्टूबर अंक में हर वर्ष उन्हें एक−एक साल का पाठ्यक्रम मिलता रहेगा, उस पर चलने पर गृहस्थ में रहते हुए उच्च स्तरीय आत्मिक भूमिका तक पहुँच सकना नैष्ठिक साधकों के लिए पूर्णतया संभव हो सकेगा। जिन्होंने अभी उपासना को कोई क्रम नहीं रखा है उन्हें यह अंक पहुँचने के बाद गत पृष्ठों पर “केवल हम ही नहीं, हमारा परिवार भी” लेख के अन्तर्गत सुझाये हुए प्रकार से गायत्री उपासना आरंभ कर देनी चाहिए। आध्यात्मिक विकास के लिए उपासना अनिवार्य है।
उपासना यदि सच्चे मन से पूर्ण निष्ठा से और तन्मयतापूर्वक की जाय तो वह एक घण्टा भी, बेमन से बेगार भुगत कर किये जाने वाले छह घण्टे जप से भी अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है। घट−घट−वासी भगवान विधान को नहीं, भावना को देखते हैं। विशेष व्यक्तियों द्वारा या विशेष अवसरों पर विशेष साधनाओं के लिए विशेष समय भी उपासना में लगाया जाना चाहिए, पर साधारण परिस्थितियों के व्यक्तियों के लिए नियमित रूप से सच्चे मन से की गई एक घण्टे की उपासना भी पर्याप्त हो सकती है। परमार्थ के लिए निकाले गये छह घण्टे में से उपासना का एक घण्टा कम कर देने के बाद शेष पाँच घण्टे जो बचते हैं उनमें से एक घण्टा स्वाध्याय के लिए निश्चित रूप से रखा जाना चाहिए। यह कार्य भजन से किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं है।
उपासना भी पर्याप्त हो सकती है। परमार्थ के लिए निकाले गये छह घण्टे में से उपासना का एक घण्टा कम कर देने के बाद शेष पाँच घण्टे जो बचते हैं उनमें से एक घण्टा स्वाध्याय के लिए निश्चित रूप से रखा जाना चाहिए। यह कार्य भजन से किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं है। आत्म−निर्माण की समस्याओं को, जीवन की विभिन्न गुत्थियों को सुलझाने में सहायता करने वाला साहित्य ही स्वास्थ्य की आवश्यकता पूरी करता है। कथा पुराणों की धर्म गाथाऐं सुनना पढ़ना उचित है पर उसे स्वाध्याय नहीं मानना चाहिए क्योंकि उसके द्वारा वर्तमान काल की परिस्थितियों और समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कोई क्रमबद्ध सुझाव प्रस्तुत नहीं किये जाते हैं।
उपासना का शिक्षण गत 12 वर्षों से निरन्तर दिया जाता रहा है। अपरिचितों को इससे परिचित कराने और प्रारंभिक मार्ग दर्शन कराने का कार्य अब हमने अपने कंधे पर न रखकर पाठकों के जिम्मे छोड़ दिया है। क्योंकि उनमें से अधिकाँश ऐसे हैं जो इस संबंध में दूसरों को शिक्षण करने की योग्यता प्राप्त कर चुके हैं। गायत्री साधना की उच्च स्तरीय शिक्षा क्रमबद्ध रूप में देते चलने का कार्य−क्रम हम अगले 9 वर्षों तक निरन्तर चलाते रहेंगे। गत अक्टूबर 61 में पंचकोशी गायत्री उपासना का पाठ्यक्रम छापा था, अब दूसरे वर्ष का पाठ्यक्रम आगामी अक्टूबर 62 के अंक में छपेगा।
उपासना का एक घण्टा कम कर देने के बाद शेष पाँच घण्टे जो बचते हैं उनमें से एक घण्टा स्वाध्याय के लिए निश्चित रूप से रखा जाना चाहिए। यह कार्य भजन से किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं है। आत्म−निर्माण की समस्याओं को, जीवन की विभिन्न गुत्थियों को सुलझाने में सहायता करने वाला साहित्य ही स्वास्थ्य की आवश्यकता पूरी करता है। कथा पुराणों की धर्म गाथाऐं सुनना पढ़ना उचित है पर उसे स्वाध्याय नहीं मानना चाहिए क्योंकि उसके द्वारा वर्तमान काल की परिस्थितियों और समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कोई क्रमबद्ध सुझाव प्रस्तुत नहीं किये जाते हैं।
उपासना की अनिवार्यता
उपासना और साधन शिक्षा
उपासना में लगाया जाना चाहिए, पर साधारण परिस्थितियों के व्यक्तियों के लिए नियमित रूप से सच्चे मन से की गई एक घण्टे की उपासना भी पर्याप्त हो सकती है। परमार्थ के लिए निकाले गये छह घण्टे में से उपासना का एक घण्टा कम कर देने के बाद शेष पाँच घण्टे जो बचते हैं उनमें से एक घण्टा स्वाध्याय के लिए निश्चित रूप से रखा जाना चाहिए। यह कार्य भजन से किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं है। आत्म−निर्माण की समस्याओं को, जीवन की विभिन्न गुत्थियों को सुलझाने में सहायता करने वाला साहित्य ही स्वास्थ्य की आवश्यकता पूरी करता है। कथा पुराणों की धर्म गाथाऐं सुनना पढ़ना उचित है पर उसे स्वाध्याय नहीं मानना चाहिए क्योंकि उसके द्वारा वर्तमान काल की परिस्थितियों और समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कोई क्रमबद्ध सुझाव प्रस्तुत नहीं किये जाते हैं।
उपासना तो किया ही करें। नित्य कर्म से निवृत्त होकर विधिवत् थोड़ी पूजा बन पड़े, इसमें फुरसत का प्रश्न नहीं, अभिरुचि का प्रश्न है। थोड़ी अभिरुचि इधर बढ़ते ही इस मार्ग से आनन्द आने लगता है और फुरसत उसके लिए सहज ही मिल सकती है। आस्तिकता और उपासना की मानव जीवन में कितनी अधिक आवश्यकता और उपयोगिता है इसका उल्लेख मार्च की ‘अखंड−ज्योति’ में किया जा चुका है। उपासना निश्चित रूप में एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक पुरुषार्थ है।
उपासना को कोई क्रम नहीं रखा है उन्हें यह अंक पहुँचने के बाद गत पृष्ठों पर “केवल हम ही नहीं, हमारा परिवार भी” लेख के अन्तर्गत सुझाये हुए प्रकार से गायत्री उपासना आरंभ कर देनी चाहिए। आध्यात्मिक विकास के लिए उपासना अनिवार्य है। हमारा पहला कदम यही होना चाहिए। इसके साथ ही ‘युग-निर्माण संकल्प’ भी उपासना का एक अंग समझकर पढ़ा जाना चाहिए।
उपासना का एक अंग समझकर पढ़ा जाना चाहिए।
उपासना का क्या क्रम चलता है? आगे इसमें क्या प्रगति करेंगे?
उपासना तो एकांगी अधूरी और विडम्बना मात्र बनकर रह जाती है। ‘अखण्ड−ज्योति’ के पाठकों को साधक बनाया जा रहा है और उन्हें इसके लिए आवश्यक अस्त्र और शस्त्र, औजार और साधना, विचार और सुझाव, प्रेरणा और प्रकाश केवल मात्र स्वाध्याय के भण्डार से ही उपलब्ध हो सकते हैं। जीवन निर्माण के लिए प्रेरणाप्रद विचारों को अपनाते रहने से जिसे ज्ञान उत्पन्न न हो सका, उसका साधना पथ पर चल सकना असंभव जैसा ही है। इसलिए हम में से प्रत्येक को साधना का एक नियत क्रम स्थिर कर ही लेना चाहिए।
उपासना सरल है। घण्टा, आधा घण्टा पूजा−पाठ की विधि पूरी कर लेना कुछ कठिन नहीं है। ढर्रे पर पड़ जाने पर वह भी दैनिक जीवन का एक अंग बन जाता है और उसकी पूर्ति में कुछ कठिनाई नहीं दीखती। जिसे साधना कहा जाता है वह कार्य कठिन है। उसमें जीवन के हर पहलू को सुधारने और सँभालने का लक्ष रहता है और आन्तरिक अव्यवस्था के हर मोर्चे पर डटकर लोहा लेना पड़ता है।
उपासना का कार्यक्रम आ जाता है पर साधनाविहीन उपासना तो एकांगी अधूरी और विडम्बना मात्र बनकर रह जाती है। ‘अखण्ड−ज्योति’ के पाठकों को साधक बनाया जा रहा है और उन्हें इसके लिए आवश्यक अस्त्र और शस्त्र, औजार और साधना, विचार और सुझाव, प्रेरणा और प्रकाश केवल मात्र स्वाध्याय के भण्डार से ही उपलब्ध हो सकते हैं। जीवन निर्माण के लिए प्रेरणाप्रद विचारों को अपनाते रहने से जिसे ज्ञान उत्पन्न न हो सका, उसका साधना पथ पर चल सकना असंभव जैसा ही है। इसलिए हम में से प्रत्येक को साधना का एक नियत क्रम स्थिर कर ही लेना चाहिए।
उपासना कर रहे हैं, उन्हें निष्ठा को, श्रद्धा−विश्वास को दिन−दिन बढ़ाते चलना चाहिए। अक्टूबर अंक में हर वर्ष उन्हें एक−एक साल का पाठ्यक्रम मिलता रहेगा, उस पर चलने पर गृहस्थ में रहते हुए उच्च स्तरीय आत्मिक भूमिका तक पहुँच सकना नैष्ठिक साधकों के लिए पूर्णतया संभव हो सकेगा। जिन्होंने अभी उपासना को कोई क्रम नहीं रखा है उन्हें यह अंक पहुँचने के बाद गत पृष्ठों पर “केवल हम ही नहीं, हमारा परिवार भी” लेख के अन्तर्गत सुझाये हुए प्रकार से गायत्री उपासना आरंभ कर देनी चाहिए। आध्यात्मिक विकास के लिए उपासना अनिवार्य है। हमारा पहला कदम यही होना चाहिए।
उपासना आरंभ कर देनी चाहिए। आध्यात्मिक विकास के लिए उपासना अनिवार्य है। हमारा पहला कदम यही होना चाहिए। इसके साथ ही ‘युग-निर्माण संकल्प’ भी उपासना का एक अंग समझकर पढ़ा जाना चाहिए।
उपासना करनी चाहिए।
उपासना करते हैं उन्हें भी और जो नहीं करते हैं उन्हें भी यह क्रम आरम्भ कर देना चाहिए। चारपाई से नीचे उतरने से पूर्व 15 मिनट की यह प्रार्थना अपने परिवार के हर व्यक्ति को करनी चाहिए और अपने प्रभाव में परिवार के जो−जो सदस्य हों उनसे इसे नियमित रूप से कराना चाहिए।
उपासना के लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व है। इस अवसर पर पाठकों को 24 हजार अनुष्ठान अथवा जितना बन पड़े उतनी अपनी सामर्थ्यानुसार उपासना करनी चाहिए।
उपासना को दैनिक जीवन में से बिलकुल हटा देना किसी भी प्रकार उपयुक्त नहीं। मन न लगने पर भी किसी न किसी प्रकार आदत में इसे सम्मिलित करने के लिए साधना का कुछ न कुछ अभ्यास नित्य ही करते रहना चाहिए। आत्म शक्ति जब कभी जिस किसी को भी प्राप्त हुई है तब उसमें आस्तिकता और उपासना का कोई न कोई अंश जरूर रहा है। भले ही हम बिस्तर से उठते और सोते समय पन्द्रह−पन्द्रह मिनट भगवान सर्वव्यापक, निष्पक्ष न्यायकारी, विचार और कार्यों के अनुरूप प्रसन्न एवं अप्रसन्न होने वाले परमात्मा का ध्यान और स्मरण किया करें, पर किसी न किसी रूप से दैनिक उपासना तो किया ही करें। नित्य कर्म से निवृत्त होकर विधिवत् थोड़ी पूजा बन पड़े, इसमें फुरसत का प्रश्न नहीं, अभिरुचि का प्रश्न है।
उपासना का कोई न कोई अंश जरूर रहा है। भले ही हम बिस्तर से उठते और सोते समय पन्द्रह−पन्द्रह मिनट भगवान सर्वव्यापक, निष्पक्ष न्यायकारी, विचार और कार्यों के अनुरूप प्रसन्न एवं अप्रसन्न होने वाले परमात्मा का ध्यान और स्मरण किया करें, पर किसी न किसी रूप से दैनिक उपासना तो किया ही करें। नित्य कर्म से निवृत्त होकर विधिवत् थोड़ी पूजा बन पड़े, इसमें फुरसत का प्रश्न नहीं, अभिरुचि का प्रश्न है। थोड़ी अभिरुचि इधर बढ़ते ही इस मार्ग से आनन्द आने लगता है और फुरसत उसके लिए सहज ही मिल सकती है। आस्तिकता और उपासना की मानव जीवन में कितनी अधिक आवश्यकता और उपयोगिता है इसका उल्लेख मार्च की ‘अखंड−ज्योति’ में किया जा चुका है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-May
उपासनाओं में लगे रहते थे, पर इससे शरीर की क्रिया तो बिगड़ती थी। उन्हें इस आवश्यकता की पूर्ति आसनों द्वारा पूरी करनी पड़ती थी। 84 आसन उन लोगों ने अपनी आवश्यकता की दृष्टि से बनाये थे। उनमें से कितने ही ऐसे हैं जो सर्वसाधारण के लिए बहुत उपयोगी हैं। अब आरोग्यशास्त्र के विशेषज्ञों ने और भी आगे खोज की है और ऐसे अनेक हलके व्यायाम खोज निकाले हैं जो आसनों की ही जाति में गिने जा सकते हैं।
उपासना की सर्वोपरि सब रोग नाशक औषधि का आप नित्य सेवन करते हैं न? उपासना के लिए आपने अपने दैनिक कार्य−क्रम में कोई समय नियत रखा है न?
उपासना के लिए आपने अपने दैनिक कार्य−क्रम में कोई समय नियत रखा है न?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-September
उपासना तथा यज्ञ सम्बंधी अनुभव प्रकाशित होंगे। इसके बाद नवम्बर या दिसम्बर का अंक “यज्ञ विज्ञान अंक” होगा। जिसमें यज्ञ संबंधी साइंस तथा सूक्ष्म प्रक्रियाओं का समुचित विवेचन रहेगा। इसके कुछ ही समय बाद ‘यज्ञ विधान अंक’ निकालने की तैयारी की जायगी। जिसमें अनेक प्रकार के यज्ञों की पद्धतियों का विधान भली प्रकार समझाया जायगा।
उपासना में प्रवृत्त हो जाना चाहिये क्योंकि−
उपासना करता है वह तो—
उपासना कितनी जरूरी बतलाई है। भारद्वाज ऋषि कहते हैं कि—
उपासना यज्ञ द्वारा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी याज्ञिक जानते थे। पुरुष सूक्त में स्पष्ट ही वर्णित है कि।—
उपासनाएँ करलीं। इसका अर्थ भगवान् वेदव्यास ने इस प्रकार किया है कि:−
उपासना में लगा रहता है वह पके पकाये सुन्दर भोजन को त्यागकर, दर−दर भीख माँगने की गलती करता है।
उपासना करेंगे तो सब सिद्धियाँ हमारे सामने करबद्ध होकर उपस्थित रहेंगी। गायत्री के सिवाय जो अन्य मन्त्रों की उपासना करता है वह तो—
उपासना नहीं करते।
उपासना के त्यागने से जो दुर्गति हुई है, वह छिपी नहीं, उसे देख कर हम दुःखित तो अवश्य होते हैं, परन्तु करते कुछ नहीं। हम इतने अकर्मण्य हो गये है कि 24 घंटों में 1 घंटा तो दूर रहा, पर कुछ मिनट भी उस पतितपावनी माँ गायत्री की विधिपूर्वक उपासना नहीं करते।
उपासना करते थे जिसके प्रमाण रामायण, भागवतादि ग्रन्थों में उपलब्ध हैं तथा वसिष्ठ, गौतम, अवि, कश्यप, भरद्वाज, जमदग्नि आदि महर्षिगण गायत्री के परमोपासक थे तथा कुछ समय पहले श्री विद्यारण्य मुनि, श्री लोकमणिजी करके सिद्ध पुरुष हो गये हैं और आज भी मुझे विश्वास है कि यह वसुँधरा सिद्धि से खाली नहीं है।
उपासना की उसने सब उपासनाएँ करलीं। इसका अर्थ भगवान् वेदव्यास ने इस प्रकार किया है कि:−
उपासना करें। प्राचीन समय में इसी के प्रताप से हमने विश्व में अपने प्रभुत्व का डंका बजाया था, किन्तु आज हमारी उस उपासना के त्यागने से जो दुर्गति हुई है, वह छिपी नहीं, उसे देख कर हम दुःखित तो अवश्य होते हैं, परन्तु करते कुछ नहीं। हम इतने अकर्मण्य हो गये है कि 24 घंटों में 1 घंटा तो दूर रहा, पर कुछ मिनट भी उस पतितपावनी माँ गायत्री की विधिपूर्वक उपासना नहीं करते।
उपासना करके नया विश्व बना सके, ऐसी सिद्धि प्राप्त की थी। सिद्धि प्राप्त पुरुषों के नाम कौन गिना सकता है? तथापि मुख्य मुख्य महापुरुष इसी मंत्र के उपासक थे। साक्षात् भगवान् रामचन्द्र जी और श्री कृष्णचंद्र भगवान् भी प्रतिदिन नियमपूर्वक गायत्री की उपासना करते थे जिसके प्रमाण रामायण, भागवतादि ग्रन्थों में उपलब्ध हैं तथा वसिष्ठ, गौतम, अवि, कश्यप, भरद्वाज, जमदग्नि आदि महर्षिगण गायत्री के परमोपासक थे तथा कुछ समय पहले श्री विद्यारण्य मुनि, श्री लोकमणिजी करके सिद्ध पुरुष हो गये हैं और आज भी मुझे विश्वास है कि यह वसुँधरा सिद्धि से खाली नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-June
उपासना साँसारिक समाज और दारिद्र को मिटाने में बड़ी सहायक होती है।
उपासना की जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-May
उपासना में तथा शेष रहे हुए जप को पूर्ण करने में साधक लग जाते थे। भोजन करने के बाद भगवत् स्मरण करते हुए सब लोग शयन करते थे। तीन दिन सामूहिक तीर्थ यात्रा का कार्यक्रम रखा गया था। एक दिन रेल से सब लोग वृन्दावन गये। एक दिन मोटर द्वारा गोवर्द्धन, जतीपुरा, राधाकुँड, नन्दगाँव, बरसाना की यात्रा हुई।
उपासना के बराबर पुण्य आपको सदैव अनायास ही प्राप्त होता रहेगा। इस प्रकार यह प्रचार साधना अतीव उपयोगी, अधिक फलदायिनी और बहुत सरल सिद्ध हो सकती है। कदाचित किसी के शुभ संस्कार जागृत न भी हों, तो भी आपने जो प्रयत्न और परिश्रम किया है उसका मूल्य और महत्व अन्तर्यामी प्रभु से छिपा न होगा और वह उसका समुचित प्रतिफल देगा। ग्रीष्म ऋतु को पुनीत काल आरंभ हो गया। इन दिनों सूर्य तपता है।
उपासना करने वालों की अपेक्षा किसी भी प्रकार घाटे में नहीं रहते।
उपासना है। यदि गायत्री विज्ञान की समुचित प्रतिष्ठापना हो जाय तो सद्बुद्धि की कमी न रहे, जहाँ सद्बुद्धि समुचित मात्रा में होगी वहाँ किसी भी वस्तु की कमी न रहेगी।
उपासना में लगे तो 10 व्यक्ति यों की उपासना के बराबर पुण्य आपको सदैव अनायास ही प्राप्त होता रहेगा। इस प्रकार यह प्रचार साधना अतीव उपयोगी, अधिक फलदायिनी और बहुत सरल सिद्ध हो सकती है। कदाचित किसी के शुभ संस्कार जागृत न भी हों, तो भी आपने जो प्रयत्न और परिश्रम किया है उसका मूल्य और महत्व अन्तर्यामी प्रभु से छिपा न होगा और वह उसका समुचित प्रतिफल देगा। ग्रीष्म ऋतु को पुनीत काल आरंभ हो गया। इन दिनों सूर्य तपता है।
उपासना में किसी व्यक्ति को स्थिर बुद्धि से तभी लगाया जा सकता है जब उसे उस विषय की समुचित जानकारी करा दी जाय। इस प्रचार यात्रा का एक मात्र उद्देश्य अनेकों व्यक्ति यों को “गायत्री ज्ञान की समुचित जानकारी कराना” होना चाहिए। विशद् गायत्री महायज्ञ में जहाँ 125 करोड़ जप, 1 5 लाख आहुतियों का संकल्प है, वहाँ इसी काल में 125 हजार ( सवा लक्ष) मनुष्यों को गायत्री ज्ञान की समुचित जानकारी कराने का “ब्रह्म भोज” करना भी एक कार्यक्रम है। यज्ञ को पूर्ण करने के लिये जप हवन का क्रम यथावत् चल रहा है पर इस ब्रह्म भोज का कार्य अभी बहुत शिथिल है। भागीदारों ने जप हवन तो किये हैं पर ब्रह्मभोज की ओर बहुत ही कम ध्यान दिया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-February
उपासना के बल पर विघ्नों को पराजित कर वर्तमान को सुधारते हुए भूत−भविष्यत् का पूरा ध्यान रखते हुए—सच्ची जनसेवा में जुट जावें, अपने संकट कालीन तथा सफल जनक अनुभव संसार को बताते हुए आगे बढ़ें और शास्त्र की मर्यादानुकूल गृहस्थ जीवन में प्रविष्ट होने वाले लोग तो सबसे पहले सात्विक गुरु की खोज करें।
उपासना के द्वारा ही विश्व का, राष्ट्र का, धर्म का और मानव समाज का कल्याण हो सकता है इस संकट काल से सत्य ही हमारा पीछा छुड़ा सकता है।
उपासना करने वाले व्यक्ति किसी भी धर्म या सिद्धान्त का खण्डन न करके उनके विभिन्न दृष्टिकोणों में समन्वय उत्पन्न करते हैं। वे सभी धर्मों में सत्य का एक ही रूप पाते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-April
उपासना का आयोजन हो रहा है। इस पुण्य पर्व पर सर्वत्र 24 हजार जप के अनुष्ठान किये जा रहे है। गायत्री तपोभूमि में भी बड़ी संख्या में उपासक लोग आये हुए हैं और परम सात्विक वातावरण में अपनी तपश्चर्या कर रहे हैं। इन दिनों गायत्री तपोभूमि में प्राचीन काल के ऋषि आश्रमों का दृश्य उपस्थित है। यज्ञ धूम्र और वेद ध्वनि में यहाँ का वातावरण स्वर्गीय शान्ति प्रदान करने वाला दृष्टिगोचर होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-December
उपासना की फलस्वरूप ये गायत्री के मंत्र दृष्टा बने। कोई विशेष साधन जिस भूमि पर रहकर किया जाता है वह भूमि उस यंत्र की शक्ति से असाधारण रूप से प्रभावित हो जाती है, ऐसे स्थान तीर्थ-सिद्ध पीठ, शक्तिपीठ आदि के नाम से पुकारे जाते हैं जिस माला से, जिन पूजा पात्रों से जो मंत्र साधन किया जाता है वह पदार्थ उस तत्व से परिपूर्ण हो जाने के कारण निहित प्रयोजन की सिद्धि में विशेष रूप से सहायक होते हैं।
उपासना का क्रम जारी रखें। इसमें तनिक भी प्रमादन होने है।
उपासना करते हैं। इसी तरह नवाज में भी मंत्र है। मुसलमान कहते हैं कि कुरान की भाषा में जो स्वर हैं वे बड़े महत्वपूर्ण होते हैं गिरजाघरों में भी छन्दोगान सुनाई देता है। इस तरह छंदोवद्ध मंत्र का विज्ञान व उपयोग बड़ा व्यापक है।
उपासना आवश्यक प्रतीत होती है सो उस कार्य को विशद् गायत्री महायज्ञ के साथ आरम्भ किया गया है। चैत्र में होने वाली पूर्णाहुति उस शोध कार्य का श्रीगणेश शिलान्यास एवं उद्घाटन मात्र है। यहाँ से उस कार्य की पूर्ण तत्परता पूर्वक शोध आरम्भ करने का विचार है ताकि ऋषियों के इस रत्न भण्डार का कुछ पता चल सके।
उपासना के क्षेत्र से समीप हो। दक्षिण दिशा की और झुकी हुई गिद्ध चील आदि की विष्टा से सनी हुई शाखाएं हवन के लिए उपर्युक्त नहीं। सड़ी, धुनी, नीली, आधार से अधिक मोटी या पतली समिधाएं ठीक नहीं। समिधाओं को धोकर धूप में सुखा देना चाहिए, शुद्ध समिधाएं ही प्रयोजनीय हैं।
उपासना सनातन धर्म के अनुसार तो आवश्यक है ही। आर्य-समाज के संस्थापक महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती भी उसकी उपयोगिता को मानते थे उन्हें प्रेरणा देकर शाहपुर नरेश से अखंड अग्नि स्थापित कराई थी जो अब तक विधिवत् संपूजित हो रही है। देश में अभी अखंड अग्नि रखने वाले अग्निहोत्रियों का सर्वथा अभाव नहीं हुआ है। कुछ नैष्ठिक उसे विधिवत् रखते हैं पर इनकी संख्या उँगलियों गिनने लायक है।
उपासना करने वाले सभी अग्निहोत्री अपने यहाँ अखण्ड अग्नि की स्थापना रखते थे। जिस प्रकार मन्दिरों में भगवान् की मूर्ति स्थापित करके समय समय पर उसकी पूजा अर्चना की क्रियायें की जाती हैं और प्राण-प्रतिष्ठा के उपराँत उस मूर्ति को मन्दिर में ही स्थापित रखा जाता है उसी प्रकार यज्ञ उपासकों के लिए यज्ञशाला रूपी मन्दिर में अग्निरूपी देव प्रतिमा को निरन्तर स्थापित रखने और उसकी देव अर्चना की भाँति प्रातः, सायं अग्निहोत्रियों के यहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी यह अखण्ड अग्नि सुरक्षित रखी जाती थी। उसे बुझने न देने के लिए अग्निहोत्री परिवार के सभी लोग पूरा-2 ध्यान रखते थे। यह अग्नियाँ जिसके यहाँ जितनी पुरानी होती थी वह अपने को उतना ही साधना धन का धनी समझता है और संसार में अपनी निष्ठा के अनुरूप प्रतिष्ठा प्राप्त करता था।
उपासना की हुई अग्नि की सूक्ष्म आध्यात्मिक विशेषता दिन दिन उसी प्रकार बढ़ती रहती है जैसे पौष्टिक पदार्थों का सेवन करती हुई कलिका दिन-दिन विकसित होती हुई बलवान एवं परिपुष्ट युवती बनती जाती है उसी प्रकार यज्ञ कुँड में विराजमान अग्नि भी प्रतिदिन घी मेवा, मिष्टान्न हविष्यान्न तथा नाना प्रकार का गुणवान औषधियाँ खा-खा कर प्रचण्ड शक्ति सम्पन्न भवानी का साक्षात् आकार ही बन जाती है। उसके प्रभाव से अनेक अनिष्ट रोग, शोक, क्लेश, कलह, पाप, ताप, अनायास ही नष्ट होते हैं।
उपासना विशेष फलवती होती हैं। यों तो सामान्य अनुष्ठानों के समय भी घृत का दीपक जलता रखा जाता है पर विशेष अनुष्ठानों में तो उसे रखने की ही प्रतिष्ठा है। यह भी एक प्रकार से अखंड अग्नि की स्थापना ही है। वरन् उससे भी कुछ अधिक है। क्यों कि अखंड अग्नि तो केवल हवन के समय ही प्रज्वलित की जाती है पर दीपक तो निरंतर प्रकाशवान रहकर उस वातावरण में दिव्य प्रकाश को भरता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-August
उपासना का, आध्यात्मिक उन्नति का पुण्य काल है। इस अवसर पर यजुर्वेदीय पुरुष सूक्त से विष्णु यज्ञ होगा। इसे ब्राह्मण यज्ञ कहना चाहिए। इससे संसार का आध्यात्मिक स्तर ऊंचा उठेगा पाप मनोविकार, कुसंस्कार, स्वार्थ, तृष्णा, अनीति आदि में कमी होकर सत्य, प्रेम, न्याय, सदाचार, धर्म प्रवृत्ति की इससे वृद्धि होगी।
उपासना करते थे। जिनकी अंग क्रिया नित्य ही करने में आती है, ऐसे यज्ञों का सदा ही अनुष्ठान करते रहते थे और सभी यज्ञ कर्म के फल को भगवान् वासुदेव को समर्पित कर देते थे। यज्ञ में भाग लेने वाले सभी देवताओं को ये भगवान का ही एक अंग और विभूति मान कर सर्वभाव से यज्ञ फलादि को यज्ञ पुरुष भगवान को समर्पण कर देते थे। फलस्वरूप वे शीघ्र ही राग द्वेषादि मलों से निवृत्त होकर परिशुद्ध बन गये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-July
उपासना करता है उसका हम इस लोक और परलोक में भी पालन करते हैं।
उपासना करने वाले दीन दुखी नहीं रहते इसके अनेक प्रमाण शास्त्रों में उपलब्ध हैं:—
उपासना करता है, पापकर्मों को नष्ट कर देता है, अग्निलोकवान होता है, पूर्ण आयु को प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है तथा इसके उत्तरवर्ती पुरुष क्षीण नहीं होते। तथा जो इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, उसका हम इस लोक और परलोक में भी पालन करते हैं।
उपासना का उपाय और−फल पूछा था, उत्तर में और्व मुनि कहते हैं।
उपासना में तत्पर हुए। धर्म के द्वारा प्रजा का पालन करते हुए बहुत यज्ञों द्वारा यजन किया।
उपासना की जाय।
उपासना करता है, (वह) पापकर्म को नष्ट कर देता है, लोकवान होता है, पूर्ण आयु को प्राप्त करता है, और उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। इसके पश्चात होने वाले पुरुष क्षीण नहीं होते तथा जो इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है उसका हम इस लोक और परलोक में भी पालन करते हैं।
उपासना करें तो उन्हें अभीष्ट संतान सुख मिल सकता है। कई बार कठोर प्रारब्ध संतान न होने का प्रधान कारण होता है, वैसी दशा में भी यज्ञ द्वारा उन पूर्ण संचित प्रारब्ध का शमन हो सकता है।
उपासना करता है, उसका हम इस लोक और परलोक में भी पालन करते हैं।
उपासना करते हैं, हम इसका इस लोक और परलोक में भी पालन करते हैं।
उपासना करता है, पापकर्म को नष्ट कर देता है, लोकवान होता है, पूर्ण आयु को प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। इसके पीछे होने वाले पुरुष क्षीण नहीं होते, तथा जो इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करते हैं, हम इसका इस लोक और परलोक में भी पालन करते हैं।
उपासना करता है, उसके लिये वर्षा होती है और वह स्वयं भी वर्षा करा लेता है।”
उपासना करें। पूर्व वायु हिकार है, मेघ, यह प्रस्ताव है, बरसता है, यह उदगीथ है, चमकता और गर्जन करता है, यह प्रतिहार है, जल ग्रहण करता है, यह निधन है। इस प्रकार जानने वाला पुरुष वृष्टि में पाँच प्रकार के साम की उपासना करता है, उसके लिये वर्षा होती है और वह स्वयं भी वर्षा करा लेता है।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-March
उपासना में स्थिर निष्ठा न हो वे केवल परीक्षा के रूप में भी साधना करके देखें तो उन्हें निश्चित रूप से आगे बढ़ने का प्रोत्साहन मिलेगा। जितना समय इस साधन में लगा है उसकी अपेक्षा कहीं अधिक मूल्य का सत्परिणाम उपलब्ध होने की पूरी आशा की जा सकती है।
उपासना से दुहरा लाभ है। साधारण रीति से नवरात्रियों अथवा अन्य समयों में साधना प्रायः सभी श्रद्धालु उपासक करते हैं पर इस बार वह साधना विशद् गायत्री महायज्ञ की भागीदारी में जुड़ जाने से दुहरा लाभ उत्पन्न करती है। यों विशद् गायत्री महायज्ञ में गायत्री परिवार के सभी सदस्य उत्साह पूर्वक भाग ले रहे हैं पर जिन्हें सुविधा एवं अवकाश की कमी हो वे यज्ञ काल के सवा वर्ष में आने वाली तीन नवरात्रियों में तीन अनुष्ठान करके तीन भागीदारी तो बड़ी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। जो अधिक भागीदारी न ले सकते हों उन्हें इन तीन नवरात्रियों में तीन शेयर लेने का प्रयत्न तो अवश्य ही करना चाहिए।
उपासना के लिए कुछ समय अवश्य निकालना चाहिए। जिन्हें इन 9 दिनों प्रतिदिन एक बार सवेरे अथवा सुबह शाम दोनों वक्त, मिलकर 2॥−3 घण्टे का समय मिल सके वे 24 हजार का लघु अनुष्ठान कर लें। एक घण्टे में साधारणतः 10 मालाएँ हो जाती हैं और 9 दिन में 24 हजार जप करने के लिये 26 मालाएँ प्रतिदिन करनी पड़ती हैं जिनमें साधारणतः 3 घण्टे से अधिक समय नहीं लगता। जिन्हें इतना भी समय न मिल सके वे 1 घण्टा प्रतिदिन लगाकर 9 दिन में दस हजार जप करने का प्रयत्न तो अवश्य करें। जो समय इन दिनों साधना में लगाया जायगा वह कदापि निष्फल न जायगा।
उपासना के लिए परम पुनीत समय है। ठीक समय पर हुई वर्षा, समय पर बोई हुई कृषि, जिस प्रकार विशेष फलवती होती है, उसी प्रकार नवरात्रि के समय की हुई साधना भी अन्य समयों की अपेक्षा अधिक फलवती होती है। जैसे दिन और रात्रि का मिलन काल ‘सन्ध्या समय’ कहलाता है और उस समय अध्यात्मिक पूजा उपासना अधिक उपयुक्त रहती है उसी प्रकार शीत और ग्रीष्म ऋतु की मिलन वेला आश्विन तथा चैत्र की नवरात्रि होती है। वैद्य लोग उदर रोग रक्त विकार आदि पुराने रोगों के रोगियों को इन्हीं दिनों वमन विरेचन आदि पञ्च कर्मों द्वारा शरीर की भीतरी सफाई कराते हैं। विशेष रूप से साधना करने के लिए प्रेरणा देते हैं।
उपासना पूरी मानी जाती है। प्रत्येक शुभ कार्य के अन्त में ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। ब्रह्म परायण व्यक्ति यों को अन्नदान का प्रयोग ही “ब्राह्मण भोजन” कहलाता है। आज कल न तो ऐसे ब्राह्मण ही मिलते हैं जो ब्रह्मपरायण हों, जिन्हें भोजन कराने से वस्तुतः पुण्य फल प्राप्त हो। दूसरे अब लोगों की आर्थिक स्थिति भी दिन दिन दुर्बल होती जा रही है इसलिए जिन कार्यों में खर्च का प्रसंग आता है उनमें अभिरुचि का घटना स्वाभाविक ही है।
उपासना अधिक उपयुक्त रहती है उसी प्रकार शीत और ग्रीष्म ऋतु की मिलन वेला आश्विन तथा चैत्र की नवरात्रि होती है। वैद्य लोग उदर रोग रक्त विकार आदि पुराने रोगों के रोगियों को इन्हीं दिनों वमन विरेचन आदि पञ्च कर्मों द्वारा शरीर की भीतरी सफाई कराते हैं। विशेष रूप से साधना करने के लिए प्रेरणा देते हैं। क्योंकि इन दिनों की हुई साधना भी अन्य समयों में की हुई बहुत बड़ी साधना के समान फलवती होती है। नवरात्रि में किया हुआ 24 हजार का लघु अनुष्ठान अन्य काल में किये हुए सवालक्ष पुरश्चरण के समान प्रभावशाली होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-October
उपासना के फलस्वरूप बेकारी दूर हुई उन्हें स्थायी नौकरी मिल गयी है। निराशा के बादल कब नष्ट हो गये या उड़ गये, पता नहीं। आज उनमें अद्भुत उत्साह है, अपार प्रसन्नता। माता की कृपा से सर्वत्र सुविधा−ही सुविधा दीख पड़ती है।
उपासना में कोई रुचि नहीं थी। भगवत् कृपा से बसंत पंचमी सं. 2011 से गायत्री तपोभूमि में “विशद् गायत्री महायज्ञ” प्रारम्भ हुआ। गायत्री महायज्ञ के संबंधित पर्चे व “गायत्री ज्ञानांक” की एक प्रति मुझे एक मित्र द्वारा प्राप्त हुई। उसे मैंने आद्योपान्त पढ़ा और अपने को धन्य माना। गायत्री महिमा से प्रभावित हो मैंने महायज्ञ का भागीदार बनने का निश्चय किया।
उपासना करने से अनेक कठिन से कठिन संकट भी टल जाते हैं और अभीष्ट मनोरथों की प्राप्ति होती है। “आज अपने अनुभव के बल से मैं उपरोक्त वाक्यों की सत्यता की घोषणा करता हूँ कि वे अविकल−सम्पूर्ण सत्य हैं। मैं अभी तक अनेकों गायत्री अनुष्ठान कर चुका हूँ। अन्तर और बाहर के अनेकों अनुभव जीवन में रत्न की भाँति संरक्षित हैं। उनमें से दो−एक अनुभव, उपासकों के विश्वास को स्थिर करने की भावना से लिख रहा हूँ।
उपासना के प्रेमी थे और हमारे भ्राता जी भी संयोग से वहीं उपस्थित थे। यह दशा देख ये दोनों गायत्री माता की आराधना में लग गये। थोड़ी देर जप किया था, कि बालक पूर्ण स्वस्थ होकर उठ खड़ा हुआ और उल्लास से बारात वालों ने अपनी मंगल यात्रा आरम्भ की।
उपासना में लग गया।
उपासना है। एक दिन मैं जप कर रहा था, सहसा देखता हूँ कि “मेरा एक भाई क्षय रोग से मर गया है और हमारे मकान को नष्ट कर चचेरे भाइयों ने उस स्थान को अन्याय−पूर्वक कब्जा कर लिया है।” इसके दूसरे दिन ही पत्र आया, उसमें ध्यान में देखी सभी बातें ठीक ठीक अंकित थी। यह माता की कृपा का ही प्रसाद था कि 600 मील की घटना को मैंने प्रत्यक्ष की भाँति देखा। गायत्री उपासना के फल स्वरूप ऐसी दिव्य दृष्टि का खुलना एक चमत्कार ही है।
उपासना के कुछ अनुभव
(दिव्य ज्याति ए॰ जोशी, मालद)
उपासना मार्ग के पाठकों को आत्मकल्याण की, सुख शान्ति की दिशा में अग्रसर होने का अवसर मिलेगा।
उपासना करके मैं अपने अनुभव से कहता हूँ कि इससे घमण्ड क्रमशः नष्ट होता जाता है, मन की चंचलता घटती जाती है, शाँति का अनुभव होने लगता है और विचार में नवीन ज्ञान का प्रकाश निरन्तर बढ़ता ही चला जाता है।
उपासना वर्ष के अन्य सभी साधारण समयों की अपेक्षा कहीं अधिक फलदायक होती है।
उपासना में लग गये। नौकरी की बहाली के लिए अपील कर दी गई। माता की ऐसी कृपा हुई कि विजय पाल बिना किसी चार्ज के अपने पद पर बहाल कर दिया गया। हमारा समस्त परिवार माता की शरण में रहते हुए। आनन्दमय जीवन व्यतीत कर रहा है।
उपासना की जाय, कोई कामना पूर्ति की शर्त न लगाई जाय। क्योंकि मनुष्य अपने वास्तविक लाभ या हानि और आवश्यकता को स्वयं उतना नहीं समझता जितना घट−घट वासिनी सर्व शक्ति मान माता समझती है। वह हमारी वास्तविक आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करती है। प्रारब्ध वश कोई अटल दुर्भाग्य न भी टल सके तो भी साधना निष्फल नहीं जाती। वह किसी न किसी अन्य मार्ग से साधक को उसके श्रम की अपेक्षा अनेक गुना लाभ अवश्य पहुँचा देती है।
उपासना में तल्लीन हो गयीं। सभी ने आश्चर्य से देखा कि—मृत्यु घोषणा के दूसरे ही दिन उसके दस्तों की संख्या में काफी कमी हो गयी। उस दिन से दशा सुधरती ही चली गई। उसके चिकित्सक आज भी पूछते रहते हैं कि किस औषधि से तुम्हारी असाध्य संग्रहणी आराम हो गयी? यह सुनकर उसकी पत्नी की आंखों में, माता के प्रति कृतज्ञता के आँसू उमड़ पड़ते हैं और टप—टप कर पृथ्वी के सूखे रज—कणों को गीली करने लगते हैं।
उपासना से प्रमुखतः आध्यात्मिक उन्नति होती है। वही लाभ पुण्य है। साथ ही कुछ न कुछ साँसारिक लाभ भी होते हैं। इन लाभों का कुछ विवरण गायत्री उपासकों के द्वारा लिखा हुआ इस अंक में उपस्थित किया जा रहा है। आशा है कि इससे उपासना मार्ग के पाठकों को आत्मकल्याण की, सुख शान्ति की दिशा में अग्रसर होने का अवसर मिलेगा।
उपासना का आश्रय लिया। उपासना के थोड़े ही दिन उपासना का आश्रय लिया। उपासना के थोड़े ही दिन बाद उन्हें कैसे इलाज के लिये पर्याप्त पैसे मिल गये, इसे वे बताना पसन्द नहीं करते। इस इलाज को तथा इलाज के आवरण में दमा रोग की मुक्ति को, वे गायत्री माता का ही प्रसाद मानते हैं।
उपासना करके माता की महती कृपा के भागीदार बन सकें।
उपासना के उपरान्त अब उस अंग से काम करने लग गयी हैं। धीरे−धीरे वह अंग अपनी पूर्व दशा में आता जा रहा है।
उपासना आरम्भ कर दी। माता की कृपा से मेरे स्वभाव एवं विचारों में सात्त्विकता का संचार हुआ और मन में अत्यधिक शाँति उत्पन्न हुई छवढ़ा निवासी श्री मेरुलाल जी की पत्नी गंगाबाई भूत बाधा सताया करती थी। उसने मुझसे कहा। मैंने आचार्य जी का नाम ले गायत्री मन्त्र से उसे झाड़ा लगाया और मन्त्र से अभिमन्त्रित जल पिलाया। इस प्रकार गायत्री माता की महान अनुकम्पा से उसको भूत बाधा से छुटकारा मिल गया।
उपासना में आकर्षण भी बढ़ता गया और आज मैं माता की कृपा से पूर्ण आरोग्य लाभ कर जवानी का—का अनुभव करने लगा हूँ। ऐसी कृपा माता के सिवाय और कौन कर सकती है?
उपासना करते हुए पाता हूँ। कभी गायत्री माता, दिव्य सूर्य बनकर, जिसकी किरणें अत्यन्त सौम्य, सुखद स्पर्श वाली हैं—सपने में मेरे सामने आ जाती हैं और अपने मधुस्रावी रश्मिधारा से मेरे शरीर और प्राण के कण−कण को सींच देती है, मैं भीग उठता हूँ और मेरे शरीर से भी किरणें विकीर्णित होने लगती हैं। शरीर शिथिल हो जाते हैं एवं अवर्णनीय आनन्द की अनुभूति होती हैं। इस आनन्द का प्रभाव ऐसा चिरन्तन है कि, किसी दुःखद स्थिति में पड़ने पर भी मुझे आनन्द का वेग ऊपर ही उठाये रखता है। दुःख की पीड़ा जरा भी अनुभूत नहीं होती।
उपासना के लाभ नित प्रति प्रत्यक्ष हो रहे हैं।
उपासना के साथ साथ आरम्भ कर दिया। कुछ ही समय बाद मुझे 60) मासिक वेतन पर पेंटर की जगह मिल गई। दो माह बाद राजकीय पदाधिकारियों द्वारा ट्रेसर के पद पर नियुक्त कर दिया गया और वेतन में सन्तोषजनक वृद्धि हुई अब वेतन से हमारा खर्च आराम से चलने लगा। और कर्ज भी चुक गया। मेरा जीवन सुख से व्यतीत हो रहा है।
उपासना विधि बताई और कहा इससे तुम्हारे सारे संकट दूर हो जायेंगे।
उपासना-कक्ष में प्रवेश किया। वहाँ एक लकड़ी की चौकी पर शीशे के फ्रेम में जड़ा “अखण्ड-ज्योति “ प्रेस मथुरा से प्राप्त गायत्री की एक वात्सल्यमयी छवि अपनी ममता बिखेरती रहती है। सम्मुख में वृत का अखण्ड दीप जलता रहता है।
उपासना करो। मुझे उनकी सलाह बड़ी प्यारी लगी। तब तक कुछ प्रेम−भक्ति मेरे हृदय में जग चुकी थी। मैं नियमित गायत्री जप करने लग गया। दो चार दिन के उपराँत ही मेरी बेचैनी और दर्द घटने लगे।
उपासना में लगाने लगा। मेरे प्रयत्न से कई व्यक्ति इस पथ पर चलने लगे। आर्थिक दृष्टि से मेरी अवस्था दुर्बल है। पिछले कुछ दिनों से मेरे ऊपर कुछ कर्ज चला आ रहा है। बौहरे ने मुझ से अधिक कहा सुनी करके कम से कम सौ रुपया एक निश्चित तारीख पर देने का वायदा करा लिया।
उपासना से उन्हें भी एक अच्छी और स्थायी नौकरी मिल गयी।
उपासना प्रारम्भ कर दी। उन्हें अद्भुत शान्ति मिली। विचारों का बिखरना घटने लगा और आज माता की कृपा से उन्हें पागल कहने वाले लोग ही,एक विचारशील व्यक्ति मान कर, उनके विचारों की प्रतिष्ठा करते हैं। यह है माता की वात्सल्य भरी अनुकम्पा। आज उन्होंने एक डूबे हुए मान−वजीवन को उबार लिया।
उपासना करने का आदेश दिया। मैंने तदनुसार माता की उपासना आरम्भ कर दी। माता की कृपा से मेरे स्वभाव एवं विचारों में सात्त्विकता का संचार हुआ और मन में अत्यधिक शाँति उत्पन्न हुई छवढ़ा निवासी श्री मेरुलाल जी की पत्नी गंगाबाई भूत बाधा सताया करती थी। उसने मुझसे कहा। मैंने आचार्य जी का नाम ले गायत्री मन्त्र से उसे झाड़ा लगाया और मन्त्र से अभिमन्त्रित जल पिलाया।
उपासना के द्वारा ही नौकरी प्राप्त कर अपनी जीविका का भार सम्भाल पाया है।
उपासना में लगा रहा। आचार्य जी ने गायत्री उपासना चालू रखने व दूसरों को भी इस ओर अग्रसर करने को कहा था क्योंकि ब्राह्मण जीवन का यही सर्वश्रेष्ठ उपयोग है। मैं विशद गायत्री महायज्ञ का भी भागीदार बना। गायत्री माता की दया से मुझे नौकरी प्राप्त हुई। माता की कृपा से मैं घोर अन्धकार में से निकलकर प्रकाश में आ सका हूँ।
उपासना का ऐसा ही फल होता है। मेरा विश्वास दिन पर दिन दृढ़ हो रहा है। आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से भी मेरी उन्नति हुई है। विवेक बुद्धि का विकास हुआ है।
उपासना प्रारम्भ करदी, कुछ दिन उपासना के उपरान्त अब उस अंग से काम करने लग गयी हैं। धीरे−धीरे वह अंग अपनी पूर्व दशा में आता जा रहा है।
उपासना करने लगा, तब से हमारे संकट क्रमशः हटते ही गये और आज 150) डेढ़ सौ रुपये मासिक हमारी आय है। पत्नी, सन्तान, भाई आदि सारा परिवार सुखी और स्वस्थ है। सभी शान्ति और प्रेम से जीवन अतिवाहित कर रहे हैं।
उपासना आप लोग कभी नहीं भूलें, यही मेरे लिए सच्चा धन्यवाद है। पुजारी जी ने स्वीकृति जतायी और मैं यह सोचता घर आया—कि गुरुदेव का यह वाक्य अमोध और पूर्ण सत्य है कि “किसी की गायत्री साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती।”
उपासना में प्रवृत्त किया। फिर देखा वे सारे बुरे सपने क्रमशः लुप्त होते गये और उसके स्थान पर ज्योतिर्मय स्वप्न अवतरित होने लगे।
उपासना प्रारम्भ कर दी और एक दिन गायत्री माता की सद् प्रेरणा से वह स्वतः ही नैहर छोड़कर चली आयी और यहाँ आकर सुस्थिर हो गयी। अब उनका दाम्पत्य−जीवन बड़ा ही मधुर और आनन्दमय हो गया है। दोनों परस्पर एक दूसरे को सुखी बनाने के लिये आतुर रहते हैं। माता की कृपा के सिवाय इस कलहपूर्ण दाम्पत्य−जीवन को सुधार कर रसमय बनाने की शक्ति और किसमें है?
उपासना प्रारम्भ की। दस हजार जप पूरा होते ही मुझे श्रीचरणपादुका जूना अखाड़ा में ब्रह्मचारी जी का दर्शन हुआ। उनसे बातें भी की किन्तु मैंने अपने सद्गुरु को पहिचान नहीं पाया। इसके 15 दिन उपरान्त ही स्वप्न में मुझे सद्गुरु का परिचय कराया गया और उस समय वे जहाँ थे उसका पूरा पता भी बताया गया। तदुपरांत मैंने स्वप्न निर्दिष्ट स्थान गीरनार पर्वत की तलहटी में जाकर उनका दर्शन किया।
उपासना करने कहा। उस त्रस्त— भयभीत नारी ने उपासना प्रारम्भ कर दी और आज वह भूत बाधा से सदा के लिए मुक्त हो गयी हैं।
उपासना करने की सलाह दी, डूबने को तिनके का सहारा भी बहुत होता है। उन्होंने तुरन्त ही मेरी बात मानकर यहीं (बुलढाणा) में नौ दिन में 2400 गायत्री मन्त्र लिखने का संकल्प किया और उसमें निष्ठा पूर्वक जुट गये। लिखना समाप्त कर 240 आहुतियों का हवन किया। इसके उपरान्त अनायास बुलढाणा में ही 100) एक सौ रुपये मासिक, एक औषधि बेचने वाली दुकान में मुनीम का स्थान मिल गया। उन्होंने माता को सहस्रशः प्रणाम कर धन्यवाद दिया और आज भी नौकरी करते हुए माता के परम भक्त बने हुए हैं।
उपासना जीवन की हर दिशा में लाभकारी है।
उपासना के फल स्वरूप ऐसी दिव्य दृष्टि का खुलना एक चमत्कार ही है।
उपासना कैसे और क्यों आरम्भ की? उनकी सच्ची जिज्ञासा देखकर मैंने अपने जीवन के पृष्ठ खोलकर उनके सम्मुख रख दिया—
उपासना में उत्साह और रुचि बढ़ गई। मन भी लगने लगा। आश्चर्य! ये वर्षा के रोग, जो दवाइयों से जरा भी टस से मस नहीं हो रहे थे—दिवसों में उठ गये।
उपासना को, मानव−बुद्धि की अन्धता और मूढ़ता समझते थे। जब उनके ऊपर जीविका समाधान का भार आया तो वे भटकने लगे एक काम आता, फिर हाथ से निकल जाता। उनके सारे पुरुषार्थ और बुद्धिवादिता उसे स्थिर कर पाने में सदा असफल रहतीं। बार−बार असफल होकर वे निराशा के अन्धकार में हतोत्साह होकर पड़ा रहने लगे।
उपासना व गायत्री हवन करने का उपदेश किया। हकीम,वैद्यों से तो मैं परेशान हो चुका था। मैंने आचार्य जी के बताये मार्ग पर पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास से कार्य करना आरम्भ कर दिया। मैं विशय गायत्री यज्ञ का भागीदार भी बना। माता गायत्री की ऐसी कृपा हुई कि मेरे स्वभाव में बड़ा परिवर्तन हो गया और लगभग अस्सी फीसदी रोग नष्ट हो चुका है।
उपासना में श्रद्धा एवं विश्वास रखने पर अवश्य लाभ होता है। पाठकगण, अवश्य इस रहस्य को जानकर लाभ उठावेंगे, ऐसी मेरी आनन्दमयी माता से प्रार्थना है। उस दयामयी माता के चरणों में कोटिशः प्रणाम।
उपासना प्रारम्भ कर दी और आज वह भूत बाधा से सदा के लिए मुक्त हो गयी हैं।
उपासना से जीविका के साधन मिले
(श्री भोला राम जी, बुलढाणा)
उपासना का आश्रय लिया। उपासना के थोड़े ही दिन बाद उन्हें कैसे इलाज के लिये पर्याप्त पैसे मिल गये, इसे वे बताना पसन्द नहीं करते। इस इलाज को तथा इलाज के आवरण में दमा रोग की मुक्ति को, वे गायत्री माता का ही प्रसाद मानते हैं।
उपासना से यह प्रत्यक्षवत् अनुभव करता हूं, कि उससे मेरा अन्तःकरण वस्त्र की भाँति स्वच्छ हो गया है। मैं प्रत्येक उपासकों को जोर देकर इसकी आजमाइस करने की प्रार्थना करता हूँ।
उपासना एवं अद्वितीय महौषधि है।
उपासना का ऐसा ही फल है।
उपासना की और आज मैं तपैदिक जैसे रोगराज के कराल कवलों से बचकर माता की कृपा शक्ति प्रदर्शन का एक उपादान वन रहा हूं। मैं विश्वास दिलाता हूँ कि किसी संकट से उबार चाहते हैं, वे माता की शरण अवश्य ग्रहण करें। उधार होकर ही रहेगा।
उपासना के थोड़े ही दिन उपासना का आश्रय लिया। उपासना के थोड़े ही दिन बाद उन्हें कैसे इलाज के लिये पर्याप्त पैसे मिल गये, इसे वे बताना पसन्द नहीं करते। इस इलाज को तथा इलाज के आवरण में दमा रोग की मुक्ति को, वे गायत्री माता का ही प्रसाद मानते हैं।
उपासना किसी भी रूप से की जाये, वह न कोई अनिष्ट करती है और न कभी निष्फल ही जाती है।
उपासना के थोड़े ही दिन बाद उन्हें कैसे इलाज के लिये पर्याप्त पैसे मिल गये, इसे वे बताना पसन्द नहीं करते। इस इलाज को तथा इलाज के आवरण में दमा रोग की मुक्ति को, वे गायत्री माता का ही प्रसाद मानते हैं।
उपासना को स्वीकार करने के कुछ ही दिन बाद मुझे दक्षिण भारत का भ्रमण करने का अवसर प्राप्त हुआ, और इस पुण्य यात्रा में श्री गायत्री स्वरूपजी महाराज के दर्शन का सौभाग्य मुझे गायत्री माता ने प्रदान किया। मैंने पाया कि अपनी उत्कृष्ट कल्पना के सहारे जिस ऋषित्व को अंतर्जगत में सुचित्रित कर रक्खा था, वह जैसे साक्षात्कार हो गया हो। मैंने श्रद्धावनत हो अपने को उन पावन पद−पद्मों में डाल दिया।
उपासना करने को कहा। तथा विजय दोनों ही माता की श्रद्धा पूर्वक उपासना में लग गये। नौकरी की बहाली के लिए अपील कर दी गई। माता की ऐसी कृपा हुई कि विजय पाल बिना किसी चार्ज के अपने पद पर बहाल कर दिया गया। हमारा समस्त परिवार माता की शरण में रहते हुए।
उपासना के बल से, जिनों को हमारे घरों से सदा के लिए हटा दिया। ये जिन्न (प्रेत) सदा हमारे घरों में नाना प्रकार की भली बुरी वस्तुयें वर्षाया करते थे। इनके गायत्री अनुष्ठान करते ही सारे उपद्रव सदा के लिए बन्द हो गये। गायत्री मन्त्र का ऐसा प्रत्यक्ष प्रभाव देखकर मेरा भी मन इस और खिंचा और मैंने अपने कुटेवों को दूर करने की भावना से भ्राता जी की देख रेख में 24000 के दो अनुष्ठान किये। मैं विस्मय से भर उठा कि जिन कुभावनाओं को हटाने में मैं वर्षों से परेशान था, मेरे सारे पुरुषार्थ जिसे दूर करने में सदा असफलता की निराशा भरी घूँटे पीते रहे, उसे ये दो ही लघु अनुष्ठानों ने कैसे मुझसे सदा के लिये निकाल कर बाहर कर दिया?
उपासना प्रारम्भ कर दी और आज स्वस्थ होकर गायत्री माता की महत्ता का गुण गान कर रहे हैं।
उपासना करने से गुरु विहीनों को सद्गुरु की प्राप्ति होती है। मैंने वही पढ़कर आध्यात्मिक पथ पर चलने के लिये सद्गुरु के आवश्यकता समझी और उन्हें पाने के लिये गायत्री उपासना प्रारम्भ की। दस हजार जप पूरा होते ही मुझे श्रीचरणपादुका जूना अखाड़ा में ब्रह्मचारी जी का दर्शन हुआ। उनसे बातें भी की किन्तु मैंने अपने सद्गुरु को पहिचान नहीं पाया। इसके 15 दिन उपरान्त ही स्वप्न में मुझे सद्गुरु का परिचय कराया गया और उस समय वे जहाँ थे उसका पूरा पता भी बताया गया।
उपासना आरम्भ करते ही साधक को ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे आन्तरिक क्षेत्र में एक नई हल−चल एवं रद्दोबदल आरम्भ हो गई है। सतोगुणी तत्वों की अभिवृद्धि होने से दुर्गुण, कुविचार, दुःस्वभाव एवं दुर्भाव घटने आरम्भ हो जाते हैं और संयम, नम्रता, उत्साह, स्फूर्ति, श्रम−शीलता,मधुरता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, उदारता,प्रेम, संतोष, शान्ति, सेवा भाव,आत्मीयता आदि सद्गुणों की मात्रा दिन−दिन बड़ी तेजी से बढ़ती जाती है। फलस्वरूप लोग उसके स्वभाव, एवं आचरण से संतुष्ट होकर बदले में प्रशंसा, कृतज्ञता, श्रद्धा एवं सम्मान के भाव रखते हैं और समय−समय पर उसकी अनेक प्रकार से सहायता करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त सद्गुण स्वयं इतने मधुर होते हैं कि जिस हृदय में इनका निवास होता है वहाँ आत्मा−संतोष की परम शाँतिदायक शीतल निर्झरिणी सदा बहती रहती है। ऐसे लोग सदा स्वर्गीय सुख का आस्वादन करते रहते हैं।
उपासना करते ही उनमें एकाएक श्रद्धा उमड़ पड़ी; जैसे बहुत दिन का जल से भरा पूरा बाँध अचानक ही टूट पड़ा हो।
उपासना करते रहना। यही मेरी गुरु दक्षिणा है।
उपासना का आदेश दिया। मैंने विशेष रूप से साधना आरम्भ कर दी। इसके फल स्वरूप मैंने माता जी की सेवा करना व पूनम का व्रत भी गायत्री उपासना के साथ साथ आरम्भ कर दिया। कुछ ही समय बाद मुझे 60) मासिक वेतन पर पेंटर की जगह मिल गई। दो माह बाद राजकीय पदाधिकारियों द्वारा ट्रेसर के पद पर नियुक्त कर दिया गया और वेतन में सन्तोषजनक वृद्धि हुई अब वेतन से हमारा खर्च आराम से चलने लगा।
उपासना करते हुए उसके सारे रोग क्रमशः कैसे दूर हो गये, यह पता भी नहीं चला।
उपासना प्रारम्भ की और कुछ ही दिनों में पारिवारिक रोगों के साथ आर्थिक कष्टों से भी छुटकारा पा गये।
उपासना प्रारंभ कर दी। कुछ ही दिनों में दोनों के हृदय में रुका हुआ प्रणय—श्रोत फूट पड़ा और दो सरिताओं के संगम की भाँति वे एक घास बन कर बहने लगे। क्रोध और कलह के स्थान में सद्भावना, प्रेम और सेवा की वृत्ति संस्थापित हो गई। वे सीता राम के दाम्पत्य को आदर्श बना कर चल रहे हैं।
उपासना चालू रखने व दूसरों को भी इस ओर अग्रसर करने को कहा था क्योंकि ब्राह्मण जीवन का यही सर्वश्रेष्ठ उपयोग है। मैं विशद गायत्री महायज्ञ का भी भागीदार बना। गायत्री माता की दया से मुझे नौकरी प्राप्त हुई। माता की कृपा से मैं घोर अन्धकार में से निकलकर प्रकाश में आ सका हूँ। माता की महान अनुकम्पा एवं आचार्य जी के आशीर्वाद से मेरा जीवन सुख-शान्तिमय बनेगा।
उपासना की और माता की कृपा उस शिशु के शरीर में निर्मल−सबल स्वास्थ्य बनकर खेल रही है। हम उसे देख माता के करुणा−वात्सल्य की याद कर लिया करते हैं।
उपासना सम्बन्धी (गायत्री महाविज्ञान) पुस्तकों में पढ़ा था कि गायत्री उपासना करने से गुरु विहीनों को सद्गुरु की प्राप्ति होती है। मैंने वही पढ़कर आध्यात्मिक पथ पर चलने के लिये सद्गुरु के आवश्यकता समझी और उन्हें पाने के लिये गायत्री उपासना प्रारम्भ की। दस हजार जप पूरा होते ही मुझे श्रीचरणपादुका जूना अखाड़ा में ब्रह्मचारी जी का दर्शन हुआ। उनसे बातें भी की किन्तु मैंने अपने सद्गुरु को पहिचान नहीं पाया। इसके 15 दिन उपरान्त ही स्वप्न में मुझे सद्गुरु का परिचय कराया गया और उस समय वे जहाँ थे उसका पूरा पता भी बताया गया।
उपासना करने के लिये प्रोत्साहित किया। मरता क्या न करता? मैं तो सचमुच अपने जीवन की आशा दिनों−दिन खोता जा रहा था।
सारे विधि−विधानों के पालन सहित मैं गायत्री अनुष्ठान में लग गया। कुछ ही दिनों में मेरे अन्तर में अद्भुत साहस और शक्ति का संचार हुआ।
उपासना में प्रवृत्त कर दिया पर इसे सींचकर पुष्ट करने में जिस प्रत्यक्ष चमत्कार का हाथ है, आज मैं उसे ही वर्णन करना चाहता हूँ।
उपासना करने हुए शैशव काल से ही बच्चों को इसमें प्रवृत्त करना चाहिये। मैं तो यहाँ तक कहना चाहती हूँ कि यदि भारत की प्रत्येक नर−नारी इस परमोद्वारक मन्त्र को धारण कर ले, तो देश का उद्धार हो जाय।
उपासना में लग गये। उपासना करते ही उनमें एकाएक श्रद्धा उमड़ पड़ी; जैसे बहुत दिन का जल से भरा पूरा बाँध अचानक ही टूट पड़ा हो।
उपासना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-January
उपासना का एक अंग है। जप का शताँश हवन, हवन का शतांश ब्रह्मभोज कराया जाता है। सच्चे ब्रह्म कर्म में जीवन लगाये हुए नैष्ठिक ब्राह्मणों को भोजन कराना भी ब्रह्मभोज कहलाता है। पर वस्तुतः ब्रह्म (आत्मा) को भोज (खुराक) देना ही सच्चा ब्रह्म भोज है। गायत्री ज्ञान दान को सही अर्थों में ब्रह्म भोज कहा जा सकता है।
उपासना की और अर्थ संकट को पार करके ऐसी स्थिति पर पहुँच गये कि जिससे अनेकों को ईर्ष्या होती है। कम पढ़े और छोटी नौकरियों पर काम करने वालों को ऊँचे पद पर पहुँचने के उदाहरण मौजूद है। जिनकी बुद्धि बड़ी ही मौड़ी और मन्द थी वे चतुर तीक्ष्णबुद्धि और विद्वान बने हैं। जिनकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की कोई आशा नहीं करता था, ऐसे विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास हुए है। झगड़ालू चिड़चिड़े, क्रोधी, व्यसनी, बुरी आदतों में फँसे हुए, आलसी एवं मूढ़ मति लोगों के स्वभाव में ऐसा परिवर्तन हुआ है कि लोग दाँतों तले उँगली दबाये रह गये।
उपासना की हुई गायत्री द्विजों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों की सम्पूर्ण मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली ही है।
उपासना साधन के लिए शुभ परिणामों का आयोजन करती है।
उपासना करके स्वस्थ, तेजस्वी बुद्धिमान, दीर्घजीवी एवं भाग्यवान बालक प्राप्त करती है। सब से उत्तम यह है कि निष्काम होकर अटूट श्रद्धा और भक्ति भाव से गायत्री की उपासना की जाय, कोई कामना पूर्ति की शर्त न लगाई जाय। क्योंकि मनुष्य अपने वास्तविक लाभ या हानि और आवश्यकता को स्वयं उतना नहीं समझता जितना घट−घट वासिनी सर्व शक्ति मान माता समझती है। वह हमारी वास्तविक आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करती है प्रारब्ध वश कोई अटल दुर्भाग्य न भी टल सके तो भी साधना निष्फल नहीं जाती । वह किसी न किसी अन्य मार्ग से साधक को उसके श्रम की अपेक्षा अनेक गुना लाभ अवश्य पहुँचा देती है।
उपासना करता है वह प्रस्तुत पकवान को छोड़कर भिक्षा के लिए घूमने वाले मनुष्य के समान मूर्ख है।
उपासना एक प्रकार का आध्यात्मिक व्यायाम है जिसका परिणाम जीवन शरीर को पुष्ट बलवान एवं सुव्यवस्थित बनाना है। सकाम कामना के लिए की हुई गायत्री साधना से अभीष्ट परिणाम प्राप्त न भी हो तो भी उसका शुभ परिणाम अन्य मार्ग से अवश्य प्राप्त हो जाता है। कोई बड़ी कुश्ती पछाड़ने के लिए कोई अखाड़े में आया करे तो उसका शरीर दिन दिन अवश्य मजबूत होगा। वह मनोवांछित कुश्ती पछाड़ने में सफल न भी हो तो यह नहीं सोचना चाहिये कि उसका व्यायाम तथा पौष्टिक आहर व्यर्थ चला गया। कुश्ती वह भले ही हार जाय पर निरोगता,स्फूर्ति, जीवन शक्ति, दीर्घजीवन, कमाने की क्षमता, बलवान सन्तान शत्रुओं से निपट लेने की सामर्थ्य आदि अनेकों लाभ प्राप्त होते हैं, जिन्हें पछाड़ने से कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए।
उपासना में सहायक, लाभ दायक आवश्यक एवं मंजिल को पार करने में बड़ी सरलता उत्पन्न कर देने वाली हैं। फिर भी अनिवार्य नहीं है। इन बातों के बिना साधना न हो सकती हो या गायत्री उपासना न की जा सकती हो सो बात नहीं है। ईश्वर की वाणी, वेद ऋचा, भगवती महाशक्ति गायत्री को अपनाने में कोई प्रतिबंध नहीं हैं। शास्त्र विधान के अनुसार ब्राह्मण बालक का 10 वर्ष, क्षत्रिय का 12 वर्ष, वैश्य का 14 वर्ष की आयु में यज्ञोपवीत होना चाहिए ।
उपासना आदि किसी शुभ कार्य में लग गये है तो एक व्यक्ति की उपासना का पुण्य फल आपको स्वयमेव सदैव बिना कुछ दिये भी प्राप्त होता रहेगा। चूँकि प्रत्येक साधक किसी की प्रेरणा से साधना से प्रवृत्त होता है इसलिए उसकी दशाँश साधना उस प्रेरक के लिए कटती रहती है। उसकी पूर्ति तभी हो सकती है जब वह नये साधक बनाकर अपने लिए उतना पुण्य फल प्राप्त करे। कुछ लोग अपने आड़े वक्त के लिए कुछ जमीन जायदाद खरीद लेते हैं ताकि उसके ब्याज भाड़े से आसानी से खर्च निकलता रहे। अनेक उपासक बना देना एक प्रकार से आध्यात्मिक जायदाद खरीद लेने के समान है जिसका पुण्य फल अपने को सदा ही निरन्तर प्राप्त होता रहता है।
उपासना से मनुष्य की अनेक कठिनाइयाँ हल होती हैं। ऐसे अनेकों उदाहरण मौजूद हैं कि जो लोग आरम्भ में दरिद्रता का अभाव ग्रस्त जीवन व्यतीत करते थे, अपने मामूली गुजारे की भी व्यवस्था जिनके पास न थी, कर्ज के बोझ से दबे हुए थे व्यापार में घाटा जा रहा था, उन्होंने गायत्री की उपासना की और अर्थ संकट को पार करके ऐसी स्थिति पर पहुँच गये कि जिससे अनेकों को ईर्ष्या होती है। कम पढ़े और छोटी नौकरियों पर काम करने वालों को ऊँचे पद पर पहुँचने के उदाहरण मौजूद है। जिनकी बुद्धि बड़ी ही मौड़ी और मन्द थी वे चतुर तीक्ष्णबुद्धि और विद्वान बने हैं। जिनकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की कोई आशा नहीं करता था, ऐसे विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास हुए है।
उपासना की वृद्धि के साथ साथ आत्मबल बढ़ता है और अपने भीतर शक्ति यों और सिद्धियों का विकास होता हुआ स्पष्ट दिखाई देता है। जिस समय सिद्धियों का उत्पादन एवं विकास हो रहा हो,वह समय बड़ा ही नाजुक और बड़ी ही सावधानी का हैं। जब किशोर अवस्था का अन्त और नवयौवन का आरम्भ होता है उस समय वीर्य का शरीर में नवीन उद्भव होता है इस उद्भव काल में मन बड़ा उत्साहित काम क्रीड़ा का इच्छुक एवं चञ्चल रहता है,यदि उस मनोदशा पर नियन्त्रण न किया जाये तो कच्चे वीर्य का अपव्यय होने लगता है और वह नवयुवक थोड़े ही समय में शक्ति हीन, वीर्यहीन, यौवनहीन होकर सदा के लिए निकम्मा बन जाता है। साधना में भी सिद्धि का प्रारम्भ ऐसी ही अवस्था है जब साधक अपने अन्दर एक नवीन आत्मिक चेतना अनुभव करता है और उत्साहित होकर प्रदर्शनों द्वारा दूसरों पर अपनी महत्ता की छाप बिठाना चाहता है। यह क्रम चल पड़े तो वह कच्चा वीर्य प्रारंभिक सिद्धि तत्व−स्वरूप काल में ही अपव्यय होकर समाप्त हो जाता है और साधक को सदा के लिए छूँछ एवं निकम्मा हो जाना पड़ता है, इसलिए नवीन साधकों को उचित है कि अपनी सिद्धियों को गुप्त रखें, किसी पर प्रकट न करें, किसी के सामने प्रदर्शन न करें।
उपासना को रामबाण की तरह प्रयोग कर सकती हैं।
उपासना में जितने अधिक व्यक्ति यों का लगाना, या प्रेरणा देना संभव है उसके लिए पूरी तत्परता से प्रयत्न करना चाहिये।
उपासना का आरम्भ होना एक अमोघ अस्त्र है। अँगीठी जलाकर रख देने से जिस प्रकार कमरे की सारी हवा गरम हो जाती है और उस में बैठ हुए सभी मनुष्य सर्दी से छूट जाते हैं उसी प्रकार घर के थोड़े से व्यक्ति भी यदि सच्चे मन से माता की शरण लेते हैं तो उन्हें स्वयं तो शान्ति मिलती है, साथ ही उनकी साधना का सूक्ष्म प्रभाव घर भर पर पड़ता है और चिन्ता जनक मनोविकारों का शमन होने तथा सुमति, एकता, प्रेम, अनुशासन तथा सद्भाव की परिवार में बढ़ोतरी होती हुई स्पष्ट रूप से दृष्टि−गोचर होती है। साधना निर्बल हो तो प्रगति धीरे−धीरे होती हैं पर होती अवश्य है।
उपासनाएँ करे चाहे न करे, केवल गायत्री जप से द्विज जीवन मुक्त हो जाता है। साँसारिक और पारलौकिक समस्त सुखों को पाता है। संकट के समय दस हजार जप करने से विपत्ति का निवारण होता है।
उपासना करने से दर्पण के प्रतिबिम्ब एवं कुएं की आवाज की तरह वे भी हमारे लिये उसी प्रकार प्रत्युत्तर देते हैं। संसार में सबसे अधिक स्नेहमूर्ति माता होती है। भगवान की माता के रूप में उपासना करने से प्रत्युत्तर में उनका अगर वात्सल्य प्राप्त होता है। मातृ पूजा के नारी जाति के प्रति पवित्रता सदाचार एवं आदर के भाव बढ़ते हैं जिनकी मानव जाति को आज अत्यधिक आवश्यकता है।
उपासना करते हैं वे आत्मलाभ करते हैं।
उपासना का व्रत लेने को ‘अभियान साधना’ कहते हैं। इसका नियम इस प्रकार है −
उपासना करते रहने में कोई हानि नहीं। सच तो यह है कि अन्य किसी भी मन्त्र का जप करने में या देवता की उपासना में तभी सफलता मिलती है, जब पहले गायत्री द्वारा उस मन्त्र या देवता को जागृत कर लिया जाय । कहा भी है:-
उपासना में उसका प्रथम स्थान रखते थे। शास्त्रों में,धर्मग्रन्थों में स्मृतिय में पुराणों में गायत्री की महिमा तथा साधना पर प्रकाश डालने वाले सहस्रों श्लोक भरे पड़े है। इन सबका संग्रह किया जाय तो एक बड़ा भारी गायत्री पुराण ही बन सकता है।
उपासना से मिलता है। सिर में दर्द, चक्कर आना, निद्रा में कमी, आये दिन नाना प्रकार के शिरो−रोगों की शिकायतें जिन्हें बनी रहती हैं उन्हें गायत्री उपासना का अवलम्बन लेना चाहिये। इससे मस्तिष्क के सभी कल पुर्जे बलवान सजीव चैतन्य और निरोग बनते हैं। बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी जिनके मनः क्षेत्र में प्रवेश करेंगी उसका मानसिक विकास होना स्वाभाविक है। मस्तिष्क के अंतर्गत जो नाना प्रकार की शक्तियाँ सन्निहित हैं उनका धीरे धीरे विकास होता है और मनुष्य बुद्धिमान, विवेकशील एवं प्रतिभा वान बनता चलता है।
उपासना द्वारा कर सकती हैं। इस तपस्या से अनेकों स्त्रियों ने अपने पतियों के बुरे स्वभाव और बुरे आचरणों को सुधारा हैं। झगड़ालू, रूखे, निष्ठुर स्वभाव को बदल कर मधुर भाषी, सहानुभूति, सद्भाव, एवं स्नेह वाला बनाया है। उनकी कुसंगति छुड़ाने एवं व्यभिचार आदि को बुराइयों से बचने में भी स्त्रियाँ गायत्री उपासना को रामबाण की तरह प्रयोग कर सकती हैं।
उपासना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक हैं।
उपासना में लगते हैं वे ऐसे हो जाते हैं। इस प्रकार गायत्री और द्विजत्व एक साथ रहते हैं। इसी एकता को संस्कृत में ‘अधिकार’ कहा गया है। जिनमें इस प्रकार की एकता न हो वे अनधिकारी कहे जाते हैं। उच्च भावना और गायत्री का सम्बन्ध बनाये रखने के लिये “अधिकार” की प्रतिष्ठा की गई है।
उपासना का पुण्य फल आपको स्वयमेव सदैव बिना कुछ दिये भी प्राप्त होता रहेगा। चूँकि प्रत्येक साधक किसी की प्रेरणा से साधना से प्रवृत्त होता है इसलिए उसकी दशाँश साधना उस प्रेरक के लिए कटती रहती है। उसकी पूर्ति तभी हो सकती है जब वह नये साधक बनाकर अपने लिए उतना पुण्य फल प्राप्त करे। कुछ लोग अपने आड़े वक्त के लिए कुछ जमीन जायदाद खरीद लेते हैं ताकि उसके ब्याज भाड़े से आसानी से खर्च निकलता रहे। अनेक उपासक बना देना एक प्रकार से आध्यात्मिक जायदाद खरीद लेने के समान है जिसका पुण्य फल अपने को सदा ही निरन्तर प्राप्त होता रहता है।
उपासना करके थोड़ी ही समय में इस महाशक्ति के चमत्कार देखने को मिलते हैं। कीमती दवाएँ जो कार्य नहीं कर सकती वह इससे पूरा होता है। ब्राह्मी तेल लगाने और बादाम पाक सेवन से मस्तिष्क को उतना बल नहीं मिल सकता जितना इस उपासना से मिलता है। सिर में दर्द, चक्कर आना, निद्रा में कमी, आये दिन नाना प्रकार के शिरो−रोगों की शिकायतें जिन्हें बनी रहती हैं उन्हें गायत्री उपासना का अवलम्बन लेना चाहिये। इससे मस्तिष्क के सभी कल पुर्जे बलवान सजीव चैतन्य और निरोग बनते हैं।
उपासना कभी भी असफल नहीं होती। अटल प्रारम्भ का कोई सुनिश्चय न टाल सके तो भी अन्य अनेकों रीतियों से उपासना साधन के लिए शुभ परिणामों का आयोजन करती है।
उपासना करती हैं, और उसके महत्व पूर्ण आध्यात्मिक और सांसारिक लाभों को प्राप्त करती हैं।
उपासना से सुधार अवश्य होता है। प्रायः सभी परिवारों पर समयानुसार बुरे दिनों और अशुभ घड़ियों की कुदशा आती है। ऐसे संकटों एवं अनिष्टों की भयंकरता कम करने के लिये स्त्रियाँ गायत्री माता की शरण ले सकता है। घर का अर्थ संकट, दारिद्र, राजदण्ड का भय, मुकदमा, रोग, शत्रु भय आदि आपत्तियाँ जब सिर पर मंडरा रहीं हों तो इस महामन्त्र की सहायता से बहुत सहारा मिलता है। सन्तान का न होना, होकर मर जाना, केवल कन्याएँ ही होना, गर्भपात होते रहना आदि व्यथाओं में बहुधा पूर्व जन्मों के अशुभ संस्कार कारण होते हैं, तो भी उनका निवारण गायत्री द्वारा होना असम्भव नहीं।
उपासना करके देखें, तो उनका अविश्वास विश्वास में परिणत होकर रहता है।
उपासना का लाभ अधिक मिलता हे क्योंकि माता को स्वभावतः पुत्र की अपेक्षा कन्या का अधिक ध्यान रहता है, वह अपनी पुत्रियों के लिये अधिक उदारता का परिचय देती हैं।
उपासना कैसे करें ।-)
उपासना करनी चाहिए। इसी प्रकार अन्य कठिनाइयों के निवारण एवं सुख शान्ति की वृद्धि के लिए भगवती का आश्रय लेना सब प्रकार मंगलमय होता है।
उपासना करने वाले के मस्तिष्क और हृदय पर बहुत जल्दी आश्चर्यजनक प्रभाव परिलक्षित होता है । मनुष्य के मनः क्षेत्र में समाये हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, चिन्ता, भय, शोक, ईर्ष्या, द्वेष, पाप, कुविचार आदि चाहे कितनी ही गहरी जड़ जमाये बैठे हों, मन में तुरन्त ही हलचल आरम्भ होती है और उनका उखड़ना, घटना तथा मिटना प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने लगता है।
उपासना से लाभान्वित हो सकती हैं। कई आध्यात्मिक तत्ववेत्ताओं का यह कहना है कि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को गायत्री उपासना का लाभ अधिक मिलता हे क्योंकि माता को स्वभावतः पुत्र की अपेक्षा कन्या का अधिक ध्यान रहता है, वह अपनी पुत्रियों के लिये अधिक उदारता का परिचय देती हैं।
उपासना के फलस्वरूप मस्तिष्क में सद्विचार और हृदय में सद्भाव उत्पन्न हो जाते हैं, जिसके कारण मनुष्य का जीवन क्रम ही बदल जाता है। सद्भावना की वृद्धि के साथ−साथ उसे अनायास ही अनेक प्रकार के सुख सौभाग्य उपलब्ध होते हैं, साथ ही उसके समीप रहने वाले पड़ौसी एवं सम्बन्धी भी उसकी समीपता से सुख तथा सन्तोष लाभ करते हैं। ऐसे व्यक्ति जहाँ भी रहते हैं वहाँ सुखद वातावरण उत्पन्न करते हैं।
उपासना रोकने की आवश्यकता नहीं है। अवसर आने पर वे पीछे भी जनेऊ ले सकते हैं। इसी प्रकार यदि अपने स्थान पर ठीक पथ प्रदर्शक गुरु प्राप्त न हो तो किसी दूरस्थ व्यक्ति से संपर्क स्थापित करके काम चलाया जा सकता है। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति को गुरु मान कर अपने ‘निगुरापन’ को दूर कर लिया था। गुरु का दर्जा आध्यात्मिक पिता का है पुरुष और स्त्री दोनों ही के माता पिता होते हैं, इसी प्रकार गुरु भी दोनों के होते हैं।
उपासना स्त्रियों और पुरुषों के दोनों के लिए ही आवश्यक है। यदि उसे उचित शिक्षा दीक्षा, एवं विधि व्यवस्था के आधार पर किया जाय तो निश्चित रूप से अधिक सत्परिणाम प्राप्त होते हैं।
उपासना सम्बन्धी आवश्यक सूचनाएँ, विज्ञप्तियाँ तथा जानकारियाँ प्रकाशित होती रहती हैं। जुलाई में हर साल एक ‘गायत्री अंक’ निकलता है। गायत्री संस्था से सम्बन्ध रखने के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ का ग्राहक रहना आवश्यक है। वार्षिक मूल्य 2॥ ) मात्र ।
उपासना कर सकती हैं। विधवाएँ आत्म संयम, इन्द्रिय निरोध, मनोनिग्रह एवं सात्विकता की वृद्धि करने में गायत्री की सहायता से सफल होती हैं। वे घर में रह कर इस तपस्या द्वारा आत्मकल्याण प्रभु प्राप्ति एवं जीवन मुक्ति प्राप्त कर सकती हैं। कुमार्र कन्याओं की गायत्री साधन उनको अच्छे घर वर तथा अनन्त सौभाग्य प्राप्त करने में सहायक होती हैं। सधवा गायत्री साधना द्वारा दंपत्ति जीवन में प्रेम, घर में सुख शान्ति एवं समृद्धि, बालकों की कुशल क्षेत्र प्राप्त करती हैं।
उपासना गायत्री विद्या को पुनः भारत भूमि में प्रतिष्ठापित करने की− आज की परिस्थिति में अत्याधिक आवश्यकता है। यह कार्य सामूहिक आयोजनों से ही हो सकता है। गायत्री विद्या के महत्व को समझने वाले धर्म प्रेमियों को इस दिशा में कुछ सक्रिय कार्य करने की आवश्यकता है।
उपासना में तभी सफलता मिलती है, जब पहले गायत्री द्वारा उस मन्त्र या देवता को जागृत कर लिया जाय । कहा भी है:-
उपासना के प्रभाव से तन की बुराइयाँ बहुत जल्दी अपने आप ही सुधरती हैं और साधक स्वयं ही कुछ दिन की अनेक बुराइयों को छोड़ कर शुद्ध सतोगुणी बनने लगता है। जप प्रारम्भ करने से पूर्व पवित्रीकरण, आचमन,शिखा बन्धन प्राणायाम,न्यास करने का नियम है। यह पाँचों कार्य केवल गायत्री मन्त्र में हो सकते हैं। जिनको यह सब न आता हो वे गायत्री माता के चित्र को प्रणाम पूजन करने या मानसिक ध्यान करके जप प्रारंभ कर सकते हैं। जप के समय जल और धूप बत्ती रखनी चाहिए।
उपासना में संलग्न होते हैं या जो गायत्री उपासना में लगते हैं वे ऐसे हो जाते हैं। इस प्रकार गायत्री और द्विजत्व एक साथ रहते हैं। इसी एकता को संस्कृत में ‘अधिकार’ कहा गया है। जिनमें इस प्रकार की एकता न हो वे अनधिकारी कहे जाते हैं। उच्च भावना और गायत्री का सम्बन्ध बनाये रखने के लिये “अधिकार” की प्रतिष्ठा की गई है।
उपासना का अवलम्बन लेना चाहिये। इससे मस्तिष्क के सभी कल पुर्जे बलवान सजीव चैतन्य और निरोग बनते हैं। बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी जिनके मनः क्षेत्र में प्रवेश करेंगी उसका मानसिक विकास होना स्वाभाविक है। मस्तिष्क के अंतर्गत जो नाना प्रकार की शक्तियाँ सन्निहित हैं उनका धीरे धीरे विकास होता है और मनुष्य बुद्धिमान, विवेकशील एवं प्रतिभा वान बनता चलता है।
उपासनाएं करता है वह पकवान छोड़ कर भिक्षा माँगने वाले के समान मूर्ख है। काम्य सफलता तथा तप की सिद्धि के लिए गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ नहीं हैं ।
उपासना गृह में ही हो सकता है। किन्तु गायत्री देवता तो मनुष्य का जीवन प्राण ही है उसके पूजन किसी नियत समय पर किसी नियत स्थान पर कर देने से काम नहीं चल सकता । यह देवता तो ऐसा है जिसका सोते जागते, चलते फिरते, खाने नहाते, हर घड़ी साथ रखना है एक क्षण के लिए भी अपने को अलग नहीं होने देना है। इसलिये उसकी प्रतिमा धातु या पत्थर की न बना कर सूत की बनाई गई है। यज्ञोपवीत गायत्री की मूर्तिमान प्रतिमा है।
उपासना न की जा सकती हो सो बात नहीं है। ईश्वर की वाणी, वेद ऋचा, भगवती महाशक्ति गायत्री को अपनाने में कोई प्रतिबंध नहीं हैं। शास्त्र विधान के अनुसार ब्राह्मण बालक का 10 वर्ष, क्षत्रिय का 12 वर्ष, वैश्य का 14 वर्ष की आयु में यज्ञोपवीत होना चाहिए । इससे अधिक आयु हो जाने पर जल्दी की दृष्टि से बिना किसी विशेष समारोह के, किसी भी यज्ञ आदि के शुभ अवसर पर साधारण रीति से यज्ञोपवीत धारण किया जा सकता है। पर जिनको ऐसी सुविधा भी न हो उन्हें यज्ञोपवीत के लिए गायत्री उपासना रोकने की आवश्यकता नहीं है।
उपासना करने की प्रेरणा एवं शिक्षा देना। अपनी पुस्तकें दूसरों को पढ़ने को देकर उनका ज्ञान बढ़ाना एवं नये गायत्री उपासक उत्पन्न करना। इन छः नियमों को एक वर्ष नियम पूर्वक पालन किया जाय तो उसका परिणाम बहुत ही कल्याणकारक होता है। वर्ष के अन्त में यथा− शक्ति हवन एवं दान पुण्य करना चाहिये।
उपासना की जाय, कोई कामना पूर्ति की शर्त न लगाई जाय। क्योंकि मनुष्य अपने वास्तविक लाभ या हानि और आवश्यकता को स्वयं उतना नहीं समझता जितना घट−घट वासिनी सर्व शक्ति मान माता समझती है। वह हमारी वास्तविक आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करती है प्रारब्ध वश कोई अटल दुर्भाग्य न भी टल सके तो भी साधना निष्फल नहीं जाती । वह किसी न किसी अन्य मार्ग से साधक को उसके श्रम की अपेक्षा अनेक गुना लाभ अवश्य पहुँचा देती है। सब से बड़ा लाभ आत्म कल्याण है।
उपासना करने वाली स्त्रियों के पेट में जो सन्तान होती है उस पर माता के विचारों का बड़ा उत्तम प्रभाव पड़ता है। उसमें विद्या, बुद्धि, विवेक, तेज प्रतिभा, सदाचार आदि गुणों की कमी नहीं रहती । माताएँ बालकों को दूध पिलाते समय यदि मन ही मन गायत्री मन्त्र जपती रहें, तो वह दूध बालक के शरीर और मन को शुद्ध बनाने के लिए अमृत रूप हो जाता है। बच्चों की निरोग, हँसमुख, सुन्दर, तेजस्वी, बुद्धिमान, गुणवान और दीर्घजीवी बनाने में माताएँ गायत्री महामन्त्र से आशा जनक लाभ उठा सकती हैं।
उपासना के साथ−साथ अन्य कोई उपासना करते रहने में कोई हानि नहीं। सच तो यह है कि अन्य किसी भी मन्त्र का जप करने में या देवता की उपासना में तभी सफलता मिलती है, जब पहले गायत्री द्वारा उस मन्त्र या देवता को जागृत कर लिया जाय । कहा भी है:-
उपासना नहीं करता वह निन्दा का पात्र है।
उपासना के आधार पर वशिष्ठ पद पाया था। ‘वशिष्ठ शाप मोचन’ का तात्पर्य यह है कि इस प्रकार के किसी अनुभवी उपासक से गायत्री साधना की शिक्षा लेना चाहिए उसे अपना पथ प्रदर्शक नियुक्त करना चाहिए । विश्वामित्र का अर्थ है− संसार की भलाई करने वाला परमार्थी, और सच्चरित्र एवं कर्तव्य निष्ठ । गायत्री का शिक्षक केवल वशिष्ठ गुण वाला होना ही पर्याप्त नहीं उसे विश्वामित्र भी होना चाहिए। तपस्वी और परमार्थी दोनों ही गुण जिनमें हों उन्हें वशिष्ठ एवं विश्वामित्र श्रेणी का व्यक्ति कहा जा सकता है।
उपासना कर सकते हैं। क्यों कि उपासना के प्रभाव से तन की बुराइयाँ बहुत जल्दी अपने आप ही सुधरती हैं और साधक स्वयं ही कुछ दिन की अनेक बुराइयों को छोड़ कर शुद्ध सतोगुणी बनने लगता है। जप प्रारम्भ करने से पूर्व पवित्रीकरण, आचमन,शिखा बन्धन प्राणायाम,न्यास करने का नियम है। यह पाँचों कार्य केवल गायत्री मन्त्र में हो सकते हैं। जिनको यह सब न आता हो वे गायत्री माता के चित्र को प्रणाम पूजन करने या मानसिक ध्यान करके जप प्रारंभ कर सकते हैं।
उपासना के मार्ग में लगाने, गायत्री का मंत्र का ज्ञानदान देने के शुभ कार्य में जहाँ अनेक आत्माओं का कल्याण,एवं संसार की महान सेवा है वहाँ अपने लिए अत्यन्त पुण्य फल का संचय भी है। गायत्री का ‘नः’ अक्षर हम सब को यह प्रेरणा देता है कि इस महान उपासना में जितने अधिक व्यक्ति यों का लगाना, या प्रेरणा देना संभव है उसके लिए पूरी तत्परता से प्रयत्न करना चाहिये।
उपासना करता है और आँवले के ताजे
उपासना करने पर वेदमाता गायत्री आत्मा को पवित्र करती है और आयु, प्राण, पशु, कीर्ति, धन तथा ब्रह्म तेज प्रदान करती है।
उपासना कर सकती हैं। सधवा बहिनों को अपने पति, पुत्र तथा दोनों कुलों को सुखी समृद्ध, स्वस्थ, सम्पन्न एवं दीर्घजीवी, बनाने के लिए गायत्री उपासना करनी चाहिए। इसी प्रकार अन्य कठिनाइयों के निवारण एवं सुख शान्ति की वृद्धि के लिए भगवती का आश्रय लेना सब प्रकार मंगलमय होता है।
उपासना प्रत्यक्ष तपश्चर्या है। इससे तुरन्त आत्म बल बढ़ता है। गायत्री−साधना एक बहुमूल्य दिव्य सम्पत्ति है। इस सम्पत्ति को इकट्ठी करके साधक उसके बदले में साँसारिक सुख एवं आत्मिक आनन्द भली प्रकार प्राप्त कर सकता है।
उपासना करने से प्रत्युत्तर में उनका अगर वात्सल्य प्राप्त होता है। मातृ पूजा के नारी जाति के प्रति पवित्रता सदाचार एवं आदर के भाव बढ़ते हैं जिनकी मानव जाति को आज अत्यधिक आवश्यकता है।
उपासना की जा सकती है पर प्रातः सायंकाल का समय अधिक उत्तम है। यदि अधिक रात्रि हो जाये या चलते फिरते जप करना हो तो मन ही मन मौन मानसिक जप करना चाहिए। यदि मन्दिर या स्थिर उपासना गृह में नहीं बैठे हैं तो सूर्य को गायत्री का प्रतीक मान कर प्रातःकाल पूर्व को,मध्याह्न उत्तर को, सायंकाल पच्छिम को मुख करके बैठना चाहिए। माला जपते समय सुमेरु (माला के आरंभ का सबसे बड़ा दाना) का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। एक माला पूरी होने पर उसे मस्तक से लगा कर पीछे को ही उलट देना चाहिए।
उपासना आरम्भ करते ही साधक को ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे आन्तरिक क्षेत्र में एक नई हल−चल एवं रद्दोबदल आरम्भ हो गई है। सतोगुणी तत्वों की अभिवृद्धि होने से दुर्गुण, कुविचार, दुःस्वभाव एवं दुर्भाव घटने आरम्भ हो जाते हैं और संयम, नम्रता, पवित्रता, उत्साह, स्फूर्ति, श्रमशीलता,मधुरता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, उदारता, प्रेम, सन्तोष, शान्ति, सेवा भाव, आत्मीयता, आदि सद्गुणों की मात्रा दिन दिन बड़ी तेजी से बढ़ती जाती है। फल स्वरूप लोग उसके स्वभाव, एवं आचरण से सन्तुष्ट होकर बदले में प्रशंसा, कृतज्ञता,श्रद्धा एवं सम्मान के भाव रखते हैं और समय समय पर उसकी अनेक प्रकार से सहायता करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त सद्गुण स्वयं इतने मधुर होते हैं कि जिस हृदय में इनका निवास होता है वहाँ आत्मसन्तोष की परम शान्तिदायक शीतल निर्झरिणी सदा बहती रहती है। ऐसे लोग सदा स्वर्गीय सुख का आस्वादन करते हैं।
उपासना हो या कौल एवं ताँत्रिक प्रयोग किया जाये, बिना गायत्री को आगे लिए वे सब निष्फल होते हैं। इसीलिये गायत्री उपासना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक हैं।
उपासना गृह में नहीं बैठे हैं तो सूर्य को गायत्री का प्रतीक मान कर प्रातःकाल पूर्व को,मध्याह्न उत्तर को, सायंकाल पच्छिम को मुख करके बैठना चाहिए। माला जपते समय सुमेरु (माला के आरंभ का सबसे बड़ा दाना) का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। एक माला पूरी होने पर उसे मस्तक से लगा कर पीछे को ही उलट देना चाहिए। तर्जनी उंगली का जप के समय उपयोग नहीं होता ।
उपासना जैसे महान कल्याण कारक साधन को लोग भूल बैठे हैं इसका मूल कारण गायत्री के महत्व, महात्म्य एवं विज्ञान की जानकारी न होना है जानकारी को फैलाने से ही पुनः संसार में गायत्री माता का दिव्य प्रकाश फैलेगा और असंख्यों हीन दशा में पड़ी हुई आत्माएँ महापुरुष बनेंगी । इसलिए गायत्री ज्ञान का फैलाना भी अनुष्ठान की भाँति ही महान् पुण्य कार्य है। इस प्रचार साधना का नाम ‘अनुज्ञान’ है। जैसी यह सस्ती पुस्तक आपके हाथ में है वैसी ही या अन्य किन्हीं गायत्री पुस्तकों को अपनी श्रद्धानुसार 24,108,240,1008,2400 की संख्या में धार्मिक प्रकृति के मनुष्यों को पढ़वाना, दान देना या खरीदवाना “अनुज्ञान” है। मकर संक्रान्ति पर, नवरात्रियों में,गायत्री जयन्ती, गंगा दशहरा,अपना जन्म दिन, पूर्वजों के श्राद्ध,पुत्र जन्म,विवाह, सफलता, उन्नत,व्रत त्यौहार,उत्सव आदि के शुभ अवसरों पर ऐसे “अनुज्ञान”करते रहना एक उच्च कोटि की माता को प्रसन्न करने वाली श्रद्धाञ्जलि है।
उपासना करे या न करे, केवल गायत्री के जप से द्विज अक्षय मोक्ष को प्राप्त होता है।
उपासना करके ऐसी प्रज्ञा पाई थी ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-November
उपासना करता, त्यों-त्यों बोध करता, मेरी बुद्धि रही है, उस का प्रकाश बढ़ता जा रहा है। साथ ही समाज में भी स्वतः मेरा सम्मान बढ़ता जा रहा था। यह देख मेरे निकटस्थ साथियों को ही मुझसे ईर्ष्या होने लगी।
उपासना की चर्चा के संग श्रीराम शर्मा आचार्य और “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका की चर्चा सुनाई और उसी रात में मैंने स्वप्न देखा कि गायत्री मन्त्र के पवित्र उच्चारण सहित मैं महायज्ञ में आहुति दे रहा हूँ। उस समय मुझे अनिर्वचनीय आनन्द मिल रहा था। जागने पर भी मेरे अंगों में उस आनन्द का संचरण होता रहा। मैं भाव-मुग्ध हो रहा । उसी दिन अपने स्वप्न की चर्चा सहित सारी बातें लिख भेजी।
उपासना प्रारम्भ की थी। महायज्ञ का संरक्षण-जप स्वीकार किया था। इस समय वे पटना के बी.एन. ट्रेनिंग स्कूल में पढ़ते थे। उसी में रंजना देवी भी पढ़ रही थी। वह सुन्दरी और सुसंस्कृत थीं दोनों में प्रेम का बीज अंकुरित हुआ और परस्पर विवाह करने का निश्चय किया, पर अशोक कुमार के पिता बिना तिलक-दहेज लिये शादी करना पसन्द नहीं करते थे, रंजना की पारिवारिक स्थिति साधारण थी।
उपासना प्रारम्भ किया। दो तीन दिन के उपरान्त ही आश्चर्य पूर्ण दृश्य देखा। मैं जिस छत पर सोता था, उस पर रात में कभी-कभी मनुष्य की साक्षात् मूर्ति मुझे दिखाई देती। मैं उसे बुलाता तो उत्तर में वह कहता- अब में नहीं आ सकता।
उपासना है।
उपासना की। अर्चना में पुष्प के बदले आंखों ने मोती-बूंदों की वर्षा की। इस के उपरान्त “मींयामीर छावनी” जहाँ हमारा परिवार विवश और निःसहाय पड़ा था, जाने की सोचने लगा। स्टेशन से बाहर गया। वहाँ सहसा ही एक मुसलमान ताँगे वाले ने आकर कहा- मैं तुम्हें उस छावनी में पहुँचा सकता हूँ।
उपासना के पहले पढ़ने में मेरा मन भार सा बोध करता था, पर अब उसमें भी रुचि बढ़ गयी है। और कुछ भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभ, जो मुझे हुए हैं, उसे में उल्लेख करना नहीं चाहता।
उपासना सम्बन्धी आवश्यक सूचनाएँ, विज्ञप्तियाँ तथा जानकारियां प्रकाशित होती रहती है।,
उपासना ही करता। परीक्षा दी। किसी तरह-परचे पूरे कर दिये। मुझे तो अपने किये परचे के आधार पर उत्तीर्ण होने की कोई भी आशा न थी। केवल मन ही मन माता की रट लगाये रहता।
उपासना करता हूँ और जीवन में चारों ओर सुख-शाँति ही मुझे नजर आती है।
उपासना नहीं करेगा?
उपासना करने लगा। झालावाड़ में अध्यापक पद के लिये “इन्टरव्यू” हुआ। मैं भी गया। कुछ दिन उपरान्त उसका परिणाम निकला ! सभी मिडिल पास वालों को अध्यापकपद की नियुक्ति के पत्र आ गये और मुझ इंटर पास वाले का कहीं पता नहीं। इसी बीच कुवार की नवरात्रि का अवसर आया और मैंने अनुष्ठान व्रत लिया।
उपासना पर मेरी श्रद्धा दृढ़ हो गयी और नित्य गायत्री जप करने लगा।
उपासना को सर्वप्रथम स्थान दिलाये जाय तैसे मुसलमानों में ‘कलमा’ को प्राप्त है।
उपासना करते हुए अनीति से बचना। (10) निराशा, चिन्ता, क्रोध, शोक, लोभ, भय, मद, आदि उद्वेगों से बचते हुए मानसिक सन्तुलन को स्थिर तथा चित्त को प्रसन्न रखना। (11) अपने उत्तरदायित्वों और कर्तव्यों को पूरी तरह पालन करना (12) अनीति से लड़ने और धर्म-भावनाओं की रक्षा करने के लिए, कष्ट सहने को भी तैयार रहना। इस प्रकार के और शास्त्रों में विभिन्न रूपों से विस्तार पूर्वक लिये गये है। उनको किस परिस्थिति में?
उपासना करते ही मुझ में उत्साह की बाढ़ आ गयी और पढ़कर परीक्षा दी। अच्छे नंबरों से पास हुआ परीक्षा के प्रथम मैं विशेष रूप से उपासना में संलग्न रहा था। इसी भाँति माता की कृपा के बल से दसवीं-ग्यारहवीं कक्षा भी पास कर आज बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा हूँ। प्रत्येक बार अच्छी तरह पास होते रहने के कारण अब घर में भी मेरा सम्मान बढ़ गया है। माता की कृपा से पढ़ना भी मेरे लिये सुन्दर और सरस हो गया है।
उपासना में गायत्री उपासना को सर्वप्रथम स्थान दिलाये जाय तैसे मुसलमानों में ‘कलमा’ को प्राप्त है।
उपासना करने में मेरे मन जरा भी नहीं लगता था, पर गुरुदेव के आदेशानुसार करते ही रहने से आज ऐसा हो गया है, कि यदि मुझे केवल वही काम रहे, तो मैं करता ही रहूँ, कभी न थकूँ। पता नहीं इसमें किधर से अद्भुत रस उत्पन्न होता है।
उपासना करता रहा।
उपासना करने लगा था। पिता-ताऊ एवं भाई की मृत्यु की सूचना मुझे पूर्व ही माता ने खड़ी होकर मुझे सुना दी थी, साथ ही कष्ट दूर होने का आश्वासन भी दिया था। इसके उपरान्त छोटे भाई की मृत्यु हो गयी। जीविका की कोई सुस्थिर-अवस्था नहीं रहने के लिये भोजन भी भार स्वरूप हो गया। शरीर भी शीर्ण हो गया, पर उपासना करते ही रहा।
उपासना को छोड़ते ही प्रेतों के उपद्रव खड़े हो गये। आधा भाद्रपद तक मेरी पत्नी को पर्याप्त कष्ट पहुँचाया गया। बन्धु दलवीर सिंह जी की प्रेरणा से पुनः गायत्री- उपासना प्रारम्भ किया। दो तीन दिन के उपरान्त ही आश्चर्य पूर्ण दृश्य देखा। मैं जिस छत पर सोता था, उस पर रात में कभी-कभी मनुष्य की साक्षात् मूर्ति मुझे दिखाई देती।
उपासना से बेकारी दूर हुई
(श्री महावीर प्रसाद शर्मा, पिड़ावा, झालावाड़)
उपासना करता रहा। घी के दीप जल रहे थे।
उपासना छोड़कर आतुर भाव से दौड़ता हुआ पिताजी के निकट गया। उनका सार शरीर हाथ-पाँव सभी ठण्डे हो चुके थे। नाक भी शीतल और टेढ़ी हो चुकी थी। सभी उन्हें खाट से उतार कर नीचे सुला रहे थे। मैं देखते ही निराश हो गया फिर भी उसी दशा में मैंने उन्हें बैठाकर 24000 जप का तुलसीदल, गंगाजल लेकर संकल्प किया और वह उनके मुख में डाल दिया।
उपासना मैं संलग्न हो गया।
उपासना को व्यर्थ की भावुकता तथा अनर्थक-पुरुषार्थ समझकर त्याग दिया कुछ दिन उपरान्त मैंने “प्राचीन भरत में शिक्षा की प्रणाली” एक अँग्रेजी पुस्तक पढ़ी और उसने मुझे गायत्री उपासना में प्रवृत्त कर दिया। फिर प॰ आचार्य राम शर्मा लिखित गायत्री विज्ञानादि ग्रन्थ पढ़ कर तो मैं इसका अनुरक्त बन गया। ज्यों-ज्यों उपासना करता, त्यों-त्यों बोध करता, मेरी बुद्धि रही है, उस का प्रकाश बढ़ता जा रहा है। साथ ही समाज में भी स्वतः मेरा सम्मान बढ़ता जा रहा था। यह देख मेरे निकटस्थ साथियों को ही मुझसे ईर्ष्या होने लगी।
उपासना करने के बाद से मैं अपना आत्मबल पर्याप्त बढ़ा हुआ अनुभव करता हूँ। कैसी भी चिन्ता भरी परिस्थिति में, मेरे चित्त जरा भी क्षुब्ध और उद्विग्न नहीं होता। भयानक से भयानक परिस्थितियाँ जीवन में उपस्थित होकर अनायास ही उसका शमन भी हो जाता है।
उपासना करते ही रहा। आज माता के प्रसाद से अनायास ही हम सभी भाँति सुखी-स्वस्थ, और प्रसन्न है।
उपासना में संलग्न रहा था। इसी भाँति माता की कृपा के बल से दसवीं-ग्यारहवीं कक्षा भी पास कर आज बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा हूँ। प्रत्येक बार अच्छी तरह पास होते रहने के कारण अब घर में भी मेरा सम्मान बढ़ गया है। माता की कृपा से पढ़ना भी मेरे लिये सुन्दर और सरस हो गया है। चारों ओर मुझे माता की सहायता के हाथ दिखाई देते हैं।
उपासना सभी करते हैं, पर गुरु कृपा से इसमें जितनी जल्दी सफलता मिलती है, उतनी शीघ्रता से सफलता देने वाला शायद ही कोई साधन हो। मेरा तो अपने अनुभव के आधार पर यही विश्वास है।
उपासना गृह में आ कर माता के निकट घंटों रोता रहा। यह रुदन माता की करुणा के प्रति श्रद्धा, प्रेम और कृतज्ञता का उद्रेक था।
उपासना प्रारम्भ की। उस दिन अंग्रेजी ता. 21.09.55 था। मैं ब्राह्मी मुहूर्त से ही साधना में संलग्न हो जाता था। दूसरे दिन 22.09.55 को मैं जप कर रहा था। आंखें खुली थी।
उपासना में प्रवृत्त कर दिया। फिर प॰ आचार्य राम शर्मा लिखित गायत्री विज्ञानादि ग्रन्थ पढ़ कर तो मैं इसका अनुरक्त बन गया। ज्यों-ज्यों उपासना करता, त्यों-त्यों बोध करता, मेरी बुद्धि रही है, उस का प्रकाश बढ़ता जा रहा है। साथ ही समाज में भी स्वतः मेरा सम्मान बढ़ता जा रहा था। यह देख मेरे निकटस्थ साथियों को ही मुझसे ईर्ष्या होने लगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-June
उपासना करते होते तो आज पतित, पराधीन, बीमार, बेकार और तरह तरह से दीन हीन होते । धर्म के साधक की यह दुर्गति तीन काल में भी नहीं होती । बहुत कुछ खोने के पश्चात बहुत कुछ ठोकरें खाने पश्चात् अब हमें होश में आना होगा और उस वास्तविक धर्म को ढूँढ़ना होगा जिसकी शरण में जाने से मनुष्य की सब प्रकार की आधि व्याधि मिट जाती है, सब प्रकार के क्लेश कष्टों से छुटकारा मिल जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-April
उपासना, पूजा पुरुषार्थ करते हैं तो यह उनका एक आध्यात्मिक व्यापार हैं। इसके लिए किसी दूसरे से न तो भिक्षा माँगनी चाहिए और न स्वीकार करनी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-August
उपासना करने का एक तरीका यह है कि कुल्ला करने के बाद स्वच्छ जल का एक गिलास पीया जाए। इसके बाद कुछ देर चारपाई और इधर उधर करवटें बदलनी चाहिए। इसके बाद शौच जाना चाहिए। इस उपासना का वरदान तुरन्त मिलता है। खुल कर शौच होता है और पेट साफ हो जाता है।
उपासना एक ही बात है।
उपासना का वरदान तुरन्त मिलता है। खुल कर शौच होता है और पेट साफ हो जाता है। यह ‘उषापान’ वरुण देवता की प्रत्यक्ष आराधना है।
उपासना और अग्नि उपासना एक ही बात है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-May
उपासना, ध्यान, जप तप, संयम, तीर्थ, व्रत, या अन्य उपायों द्वारा अपने को अखिलेश के पाद पद्मों के पास पहुँचने का अधिकार नहीं बना लिया, तो साक्षात् ब्रह्मा से भी तेरी भेंट हो जाय तो उससे भी तेरा उपकार नहीं होने का। यदि उपरोक्त किन्हीं उपायों से तूने अपने को अधिकारी बना लिया तो रास्ता चलता गड़रिया भी तुझे ऊँचा उपदेश देने के लिए पर्याप्त होगा।
उपासना करना ही संसार का सबसे बड़ा उपकार हैं। ज्ञान साधना से बढ़कर और कोई पुण्य कर्म इस संसार में नहीं हैं। भगवान ने कहा-’ज्ञान ज्ञानवतामहम्’ अर्थात् ज्ञानवानों में जो ज्ञान हैं वह मैं ही हूँ। निःसंदेह ज्ञान ईश्वरीय दिव्य शक्ति ही हैं। सर्वश्रेष्ठ यज्ञ भी यही हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-December
उपासना करनी चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-November
उपासना करने की सलाह दी परिणाम बहुत अच्छा निकला। भूत बाधा के सारे उत्पात उनके घर से चल गये।
उपासना की एक बहुत लाभदायक विधि अगले अंक में लिखेंगे।
उपासना करो। निर्बलों को सुख प्राप्त होना तो दूर उनको तो किसी प्रकार जीवन धारण किया रहना भी कठिन है। बलवानों के अतिरिक्त और कोई इस दुनिया में सुखी नहीं रह सकता है।
उपासना है। इससे जो लाभ मिलता है वह स्वयं की हुई साधना की तुलना में बहुत ही तुच्छ है। अपने काम के लिए आप ही साधना करनी चाहिए। अदृष्ट शक्तियाँ हृदयगत भावों को परखती हैं और उस भाव शृंखला के अनुरूप ही फल देती हैं। अपने कार्य के लिए जितनी तीव्र इच्छा, निष्ठा, एकाग्रता और आराधना स्वयं की जा सकती है उतनी किराये के व्यक्ति द्वारा कदापि नहीं हो सकती इसलिए इतना अच्छा फल भी दूसरों द्वारा की हुई पूजा से हरगिज नहीं मिल सकता।
उपासना और साधना से जो चमत्कारी फल प्राप्त होते हैं वे मन शास्त्र की वैज्ञानिक विधि के आधार पर ही होते हैं। निष्ठा, विश्वास, एकाग्रता और तीव्र इच्छा इन चारों का एक स्थान पर केन्द्रीकरण करने से एक वैसा ही अदृश्य तेज उत्पन्न होता है जैसा कि आतिशी शीशे के द्वारा सूर्य की किरणें एक स्थान पर केन्द्रित कर देने से अग्नि उत्पन्न हो जाती है। गायत्री की शब्द रचना-अक्षर शास्त्र के अनुसार बड़ी अद्भुत है वेद की वह माता है, आदि काल से लेकर अब तक करोड़ों-करोड़ उच्च आत्माओं ने इस मन्त्र का असीमित और अनन्य श्रद्धा के साथ जप किया है ऐसे ही अनेक कारणों से एक तो गायत्री मन्त्र स्वयं ही बहुत शक्तिपूर्ण सत्ता बन गया है, दूसरे जब उसे उच्च मनोभावों के साथ सविधि सिद्ध किया जाता है तो एक ऐसी तेजस्वी ब्रह्म शक्ति पैदा होती है जो असफलताओं का निवारण और सफलताओं का वरदान देने में पूर्ण तथा समर्थ होती है। गायत्री द्वारा प्राप्त हुए फल किसी अन्य सत्ता द्वारा दिया हुआ पुरस्कार नहीं है वरन् अपनी निजी शक्ति द्वारा एक प्रकार की अध्यात्म मल्ल विद्या का पुरुषार्थ है। पुरुषार्थी व्यक्तियों को लक्ष्मी मिलती है और साधकों को सिद्धि प्राप्त होती है, वह बिलकुल साधारण और स्वाभाविक बात है, इसमें आश्चर्य और अविश्वास की कोई बात नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-September
उपासना के लिए भी होता है, जिससे अभीष्ट महान् कार्य की सिद्धि होती है। देश, काल, क्रिया, वस्तु और कर्त्ता में पाँचों जब साधना के लिए उपयुक्त होते हैं तभी साधना सिद्ध होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-November
उपासना के साधन मात्र ही हैं। एक बार हिन्दुस्तान में मैं एक महात्मा के पास जाता है। बाइबल, वेद, कुरान, आदि की चर्चा करने लगा। पास ही एक पुस्तक पड़ी थी। जिसमें पानी बरसने का भविष्य लिखा था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-May
उपासना करता है, वह यदि किसी भी दूसरी चीज की आराधना करता है तो व्यभिचारी ठहरता है। तो फिर विकार को आराधना क्योंकर की जा सकती है? जिसकी सारी प्रवृत्ति एक सत्य के दर्शन के लिये है, वह सन्तान पैदा करने या गृहस्थी चलाने के काम में क्यों कर पड़ सकता है। भोगविलास द्वारा किसी को किसी को सत्य की प्राप्ति हुई हो, ऐसी एक भी मिसाल हमारे पास नहीं।
उपासना का एक केन्द्र है। इसके साधक तन्त्र विज्ञान की दुरूह क्रियाएं करके जो शक्ति प्राप्त करते हैं, उसे जनहित में बाँट देते हैं। अब यह निश्चित हो चुका है कि योरोप के डॉक्टर मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म, मैगनेटिज्म, मनो विज्ञान आदि के द्वारा लोगों पर जितना असर डालते हैं तन्त्र विज्ञान द्वारा उन सब से कई गुना असर लोगों पर डाला जा सकता है, क्योंकि मैस्मरेजम आदि के जो सिद्धान्त हैं वह सब तो तन्त्र विद्या के भीतर हैं ही, वरन् उससे भी बहुत अधिक बातें उसमें हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-February
उपासना के अभ्यास से आश्चर्य जनक सिद्धियां मिलती हैं। ऊँची अवस्था में जाकर प्राणों का इतना संयम हो जाता है कि महात्मा लोग प्राणों की गति अपनी इच्छानुसार मृत्यु को वश में कर लेते हैं और वे जब तक चाहते हैं एक ही शरीर को धारण किये रहते हैं। वर्षों की समाधि लगा जाना प्राणों का संयम नहीं तो और क्या है?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-January
उपासना हमारा कर्तव्य पथ राज मार्ग है। इसी पर चल कर हम सुख, शान्ति और सन्तोष की सांस ले सकते हैं। मानवता ही वह अमृत है, जिसे पीकर प्यास बुझती है। शैतान की उपासना से हमने तृष्णा का अभिशाप प्राप्त किया है। वह मानवता की पूजा से ही शान्त होगा।
उपासना से हमने तृष्णा का अभिशाप प्राप्त किया है। वह मानवता की पूजा से ही शान्त होगा। कंकरीली झाड़ियों से निकलकर आदमी जब तक अपने राजमार्ग पर न आवेगा, तब तक वह भेड़िया ही बना रहेगा और जीभ निकाल कर हाय प्यास, हाय प्यास चिल्लाता रहेगा।
उपासना के अनेकों विधि विधान प्रचलित हैं पर उनका एक मात्र उद्देश्य यही है। कर्मकाण्डों, साधना उपक्रमों की बाल पोथी के साथ भावनात्मक उत्कर्ष की उचस्तरीय शिक्षा व्यवस्था की जाती है। सीड़ियों के सहारे ऊपर चढ़ते हैं केवल मुंगदरों के सहारे पहलवान बनते हैं पुस्तकों के सहारे विद्या प्राप्त करते हैं ठीक इसी प्रकार साधना विधानों के सहारे भावनात्मक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा किया जाता है। जिन साधनाओं में भावोत्कर्ष का तथ्य अछुता छोड़ दिया जाता है और शारीरिक क्रिया कलाप अथवा वस्तुओं का हेरफेर भर जुड़ा रहता है वे प्रायः बाल क्रीड़ा बन कर ही रह जाती हैं उनसे कोई महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
उपासना कर सकते हैं। भ्रातृ भाव, करुणा, प्रेम, उदारता, परोपकार, दया, न्याय प्रियता, सत्यनिष्ठा, सदाचार प्रभृति दिव्य गुण ही मानवता के प्रतीक है अन्यथा भेड़िया और मनुष्य में क्या अन्तर रह जाता है?
उपासना में है। इस समय जितनी गुत्थियाँ दुनियाँ के सामने हैं, उनकी जड़ में एक ही कारण है- मनुष्यता का अभाव। राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, साम्प्रदायिक, आर्थिक, शारीरिक, कौटुम्बिक, मानसिक जितनी भी उलझनें हैं, उनका पूरी तरह तब तक निराकरण नहीं हो सकता जब तक हमारे आचरण पवित्र न हो, जब तक हम सच्चे नागरिक न बनें। सच्चा योगी बनाने का एक ही मार्ग हो सकता है और वह है सदाचार। सदाचार और अध्यात्म विद्या को एक ही चीज के दो पहलू कहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-December
उपासना गृह, यहूदियों के सिनोगोंग, पारसियों के अग्नि मन्दिर, मुसलमानों की मस्जिदें और ईसाइयों के गिरजे एक साथ मिलते हैं, यदि विवेकपूर्वक सूक्ष्म दृष्टि से विचार करें तो आर्यों के इस पवित्रतम धार्मिक चिन्ह स्वस्तिक को किसी न किसी रूप में इन मन्दिरों ओर इबादतगाहों के लिए, धर्मकार्यों के लिये सबने ही माना है। पारसी लोग आतिशपरस्त अर्थात् अग्नि पूजक कहलाते हैं इनमें धरित्री के क्रोड़ पर भाँति-2 के धार्मिक चिन्ह लिखने की आर्यों जैसी ही प्रथा प्रचलित है।
उपासना करनी चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-April
उपासना सफल होती है। औरों के हाथ में तो उपासना के उपकरण रह जाते हैं।
उपासना के उपकरण रह जाते हैं।
उपासना में अनेक विघ्न आते हैं। जो विघ्नों से विरक्त रहकर शान्ति और निर्भयता के साथ अटल भाव से आगे बढ़ते हैं उन्हीं की उपासना सफल होती है। औरों के हाथ में तो उपासना के उपकरण रह जाते हैं।
उपासना गृह, यहूदियों सिनोगोग, पारसियों के अग्नि मन्दिर, मुसलमानों की मस्जिदें और ईसाइयों के गिर्जे एक साथ मिलते हैं। यदि विवेक पूर्वक सूक्ष्म दृष्टि से विचार करें तो आर्यों के इस पवित्रतम धार्मिक चिन्ह स्वास्तिक को किसी न किसी रूप में इन मन्दिरों और इबादतगाहों के लिए, धर्मकार्यों के लिये सबने ही माना है पारसी लोग आतिशपरस्त अर्थात् अग्नि पुराण कहलाते हैं इनमें धरित्री के क्रोड़ पर भाँति भाँति के र्मक चिन्ह लिखने की आर्यों जैसी ही प्रथा प्रचलित हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-March
उपासना का एक केन्द्र है। इसके साधक तन्त्र विज्ञान की दुरूह क्रियाएं करके जो शक्ति प्राप्त करते हैं, उसे जन हित में बाँट देते हैं। अब यह निश्चित हो चुका है कि योरोप के डॉक्टर मैस्मरेजम हिप्नोटिज्म, मैगनेटिज्म, मनोविज्ञान आदि के द्वारा लोगों पर जितना असर डालते हैं तन्त्र विज्ञान द्वारा उन सब से कई गुना असर लोगों पर डाला जा सकता है क्योंकि मैस्मरेजम आदि के जो सिद्धाँत हैं वह सब तो तन्त्र विद्या के भीतर हैं ही, वरन् उसमें भी बहुत अधिक बातें उसमें हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-October
उपासना में भी आपके सब कर्तव्य निहित हैं। ईश्वर उपासना करने के लिये ईश्वर को आदर्श पुरुष जानकर उपासना की जाती है और उस आदर्श पुरुष में पूर्ण अहंता का प्रसार साधन व आत्म समर्पण करते हैं, अतएव ऐसे पुरुष की उपासना करने के लिये उसका आदर्श हृदय में अंकित कर कार्यक्षेत्र में उस आदर्श का अनुगामी होना होता है। बुद्धिमान पाठक जीवन के प्रत्येक कर्तव्य को सूक्ष्म दृष्टि से आलोचना कर देखने से समझ सकेंगे कि प्रत्येक कर्तव्य ‘मैं’ के प्रसार पर स्थापित है। यह भित्ति दूर करते ही वह अकर्तव्य में परिणत हो जायेगा।
उपासना से कुष्ठ रोग नष्ट हो जाने और सोवरण काया हो जाने की बात घर-घर में प्रचलित है और उस पर विश्वास किया जाता है।
उपासना करने के लिये उसका आदर्श हृदय में अंकित कर कार्यक्षेत्र में उस आदर्श का अनुगामी होना होता है। बुद्धिमान पाठक जीवन के प्रत्येक कर्तव्य को सूक्ष्म दृष्टि से आलोचना कर देखने से समझ सकेंगे कि प्रत्येक कर्तव्य ‘मैं’ के प्रसार पर स्थापित है। यह भित्ति दूर करते ही वह अकर्तव्य में परिणत हो जायेगा।
उपासना निष्फल हुई तो? आदि आदि। यद्यपि मुँह से इन बातों का कहना बुरा मालूम होता है। तथापि भीतर इसका बीज बहुत कुछ बढ़ा हुआ होता है इसके अतिरिक्त धर्म विमुख होने का और कोई कारण दिखाई नहीं देता।
उपासना, सूर्य योग, सूर्य चक्र वेधन तथा सूर्य यज्ञ आदि अनेक क्रियाओं को धार्मिक स्थान दिया था। डॉक्टर सोले कहते हैं कि “सूर्य में जितनी रोगनाशक शक्ति मौजूद है उतनी संसार की किसी वस्तु में नहीं है। केन्सर, नासूर और भगन्दर प्रभृति दुस्साध्य रोग जो जली और रेडियम के प्रयोग से भी अच्छे नहीं किये जा सकते थे वे सूर्य किरणों के ठीक प्रकार प्रयोग करने से अच्छे हो गये।” तपेदिक के विशेषज्ञ डॉक्टर हरनिच का कथन है कि “पिछले तीस वर्षों से मैंने करीब करीब सभी प्रसिद्ध औषधियों को अपने चिकित्सालय में आये हुए प्रायः बाईस हजार रोगियों पर आजमा डाला पर मुझे उनमें से किसी पर भी संतोष न हुआ। अब गत तीन वर्षों से मैंने सूर्य चिकित्सा प्रणाली का उपयोग अपने मरीजों पर किया है फलतः मैं यह कह सकने को तत्पर हूँ कि सूर्य शक्ति से बढ़कर क्षयी के लिये और कोई औषधि नहीं है।
उपासना करने के लिये ईश्वर को आदर्श पुरुष जानकर उपासना की जाती है और उस आदर्श पुरुष में पूर्ण अहंता का प्रसार साधन व आत्म समर्पण करते हैं, अतएव ऐसे पुरुष की उपासना करने के लिये उसका आदर्श हृदय में अंकित कर कार्यक्षेत्र में उस आदर्श का अनुगामी होना होता है। बुद्धिमान पाठक जीवन के प्रत्येक कर्तव्य को सूक्ष्म दृष्टि से आलोचना कर देखने से समझ सकेंगे कि प्रत्येक कर्तव्य ‘मैं’ के प्रसार पर स्थापित है। यह भित्ति दूर करते ही वह अकर्तव्य में परिणत हो जायेगा।
उपासना को ही यदि धर्म कहा जाय तो ईश्वर उपासना में भी आपके सब कर्तव्य निहित हैं। ईश्वर उपासना करने के लिये ईश्वर को आदर्श पुरुष जानकर उपासना की जाती है और उस आदर्श पुरुष में पूर्ण अहंता का प्रसार साधन व आत्म समर्पण करते हैं, अतएव ऐसे पुरुष की उपासना करने के लिये उसका आदर्श हृदय में अंकित कर कार्यक्षेत्र में उस आदर्श का अनुगामी होना होता है। बुद्धिमान पाठक जीवन के प्रत्येक कर्तव्य को सूक्ष्म दृष्टि से आलोचना कर देखने से समझ सकेंगे कि प्रत्येक कर्तव्य ‘मैं’ के प्रसार पर स्थापित है। यह भित्ति दूर करते ही वह अकर्तव्य में परिणत हो जायेगा।
उपासना की जाती है और उस आदर्श पुरुष में पूर्ण अहंता का प्रसार साधन व आत्म समर्पण करते हैं, अतएव ऐसे पुरुष की उपासना करने के लिये उसका आदर्श हृदय में अंकित कर कार्यक्षेत्र में उस आदर्श का अनुगामी होना होता है। बुद्धिमान पाठक जीवन के प्रत्येक कर्तव्य को सूक्ष्म दृष्टि से आलोचना कर देखने से समझ सकेंगे कि प्रत्येक कर्तव्य ‘मैं’ के प्रसार पर स्थापित है। यह भित्ति दूर करते ही वह अकर्तव्य में परिणत हो जायेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-June
उपासना और ज्ञान काण्ड नामक तीन काण्ड इसमें यज्ञ, दान, तप, योग आदि अनेक शाखा प्रशाखाएं हैं और शान्ति, दान्ति उपरति आदि अनेक पत्र हैं। यह वृक्ष सदैव चार ही फल देता है जिनका नाम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष है, और चार प्रकार का भक्त आर्त जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी उन चारों फलों का सेवन करते हैं।
उपासना खंड और सर्वोपरि मंजिल का नाम ज्ञानखण्ड है। ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा, शम, दम आदि अनेक विचित्र खम्भे इसमें लगे हुए हैं, जिनका दृश्य अपूर्व ही है। इस अट्टालिका के बहुत से शिखर भी हों, जिनमें रचयिता के आदेश लिखे गए हैं, उनमें से एक ऐसा है-
उपासना सरस्वती की विमल धारायें आकर एकत्रित हुई हैं। भला, इसमें स्नान करने वालों को गर्भवास कैसे हो? जो इस अष्टादश तरंगयुक्त त्रिवेणी में नित्य स्नान करता है वह ‘ज्ञान सिद्धि सलभते ततोयाति परमं पदम्’ के अनुसार जीवितावस्था में ही ज्ञानसिद्धि को प्राप्ति होकर जीवन मुक्ति हो परम पद को प्राप्त कर लेता है।
उपासना का एक केन्द्र है। इसके साधक तन्त्र विज्ञान की दुरूह क्रियाएं करके जो शक्ति प्राप्त करते हैं, उसे जनहित में बाँट देते हैं। अब यह निश्चित हो चुका है कि योरोप के डॉक्टर मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म, मैगनेटिज्म, मनो विज्ञान आदि के द्वारा लोगों पर जितना असर डालते हैं तन्त्र विज्ञान द्वारा उन सब से कई गुना असर लोगों पर डाला जा सकता है क्योंकि मैस्मरेजम आदि के जो सिद्धान्त हैं वह सब तो तन्त्र विद्या के भीतर हैं ही, वरन् उससे भी बहुत अधिक बातें उसमें हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-January
उपासना का बीजारोपण किया जाता है। तभी बोई हुई फसल लहलहाती है। ऐसी ही उर्वरा भूमि पर लगाया गया उद्यान फलता−फूलता देखा जाता है।
उपासना का महत्वपूर्ण आधार है। उसे बखेरना नहीं चाहिए। बहुत देवताओं के जंजाल में “सात मामाओं का भानजा भूखा रहता है” वाली कहावत चरितार्थ होती है। गायत्री उपासना की प्राचीन परिपाटी में प्रातःकाल हंसारुढ़ा ब्राह्मी−मध्याह्न को गरुड़ा रुढ़ा वैष्णवी—सायं वृषभारुढ़ा शांभवी की भिन्न आकृतियों का ध्यान बताया गया है। हमने एक ही रूप को पर्याप्त माना है और अपनी ही भाँति परामर्श मानने वालों को एक ही ध्यान के लिए अनुरोध किया है।
उपासना और स्वाध्याय मनन जैसे उपचार बीजारोपण की तरह हैं जो खाद पानी, निराई, गुड़ाई, रखवाली आदि की चिरकाल तक अपेक्षा करते हैं और समयानुसार कल्प-वृक्ष बनकर मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाते हैं। आन्तरिक दृष्टि से आनन्द विभोर और बहिरंग दृष्टि से श्रद्धा का पात्र बना हुआ भूदेव यह अनुभव करता है कि आत्म-विज्ञान ही जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ है।
उपासना का केन्द्र बिन्दु यह ईश्वर ही रहता है।
उपासना के लिए मिल सके। निस्सन्देह इस प्रयोजन में लगा हुआ समय हर दृष्टि से सार्थक होता है। उपासना से आत्मिक प्रगति, उसके फलस्वरूप व्यक्तित्व का समग्र विकास, उसके द्वारा सर्वतोमुखी समृद्धि की सम्भावना, यह चक्र ऐसा है, जिससे इस कृत्य में लगाया गया समय सार्थक ही सिद्ध होता है।
उपासनाएं की जाती हैं। कारण शरीर से केवल भावना की पहुँच है। निष्ठा, आस्था, श्रद्धा का भाव भरा समन्वय ‘भक्ति’ कहलाता है। प्रेम संवेदना इसी को कहते हैं। यह स्थिति तर्क से ऊपर है।
उपासना के लिए आसन पर बैठने के साथ आत्म शुद्धि का प्रथम कृत्य करना पड़ता है। इसके बाद देव आह्वान तथा देव पूजन की प्रक्रिया आरम्भ करनी चाहिए।
उपासना आरम्भ करने से पूर्व (1) पूजा प्रतीक के रूप में गायत्री माता का स्थापना चित्र जो इस अंक में लगा है इसे शीशे में मढ़ा लिया जाय। (2) जल कलश की छोटी लुटिया, ढक्कन समेत (3) अगरबत्ती स्टैंड (4) पंच पात्र आचमन आदि के लिए पानी का छोटा गिलास चमची समेत (5) छोटी तश्तरियाँ एक में चावल, नैवेद्य, चन्दन, पुष्प रखने के लिए—दूसरी पूजा के समय यह वस्तुएँ छोड़ने के लिए (6) एक डिब्बा चावल, नैवेद्य, रोली, अगरबत्ती, माचिस, आदि सामान संभाल कर रखने के लिए। इतना सामान संग्रह कर लेना पर्याप्त है।
उपासना क्षेत्र में फैले हुए अनेकानेक कर्मकाण्डों की है।
उपासनाओं में—जप, ध्यान, नाद, एकाग्रता, तन्मयता, स्वाध्याय, सत्संग आदि साधनों का आश्रय लिया जाता है ताकि चेतना को दिशा एवं प्रेरणा दी जा सके और उसे अपनी जीव ससीमता को ब्रह्म असीमता में घुला देने के लिए आवश्यक प्रकाश एवं प्रशिक्षण मिल सके।
उपासना क्रम में भारी विघ्न उत्पन्न करता है।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों में प्रधानतः तीन हैं। (1) जप (2) ध्यान (3) प्राणायाम। इन्हीं के अन्तर्गत अन्यान्य अनेकों उपचारों की गणना होती है। इनका स्थानीय महत्व भी है। जिन अंग उपांगों के द्वारा यह हलचलें की जाती हैं उनके साथ जुड़े हुए सूक्ष्म शक्ति संस्थान भी झंकृत होने लगते हैं और उस जागरण का विशेष लाभ मिलता है।
उपासना अकेली प्रोटीन, अकेली कैल्शियम खाने की तरह है। आवश्यकता पड़ जाने पर चिकित्सा उपचार की तरह कोई विशेष तत्व अमुक मात्रा में लिया जाता है, इसी प्रकार विशेष प्रयोजन के लिए कोई देव−साधना उपयोगी हो सकती है, पर सर्वतोमुखी प्रगति के लिए—सर्वकालिक साधना समग्र ब्रह्म की ही होनी चाहिए।
उपासना से इसी प्रयोजन की पूर्ति होती है।
उपासना काल में हर घड़ी यही अनुभूति रहनी चाहिए कि हम भगवान के अति निकट बैठे हैं और साधक तथा साध्य के बीच सघन आदान-प्रदान हो रहा है। साधक अपने समग्र व्यक्तित्व को भगवान को होम रहा है और वे उसे अपने समतुल्य बनाने की अनुकम्पा प्रदान कर रहे हैं।
उपासनात्मक विधि−विधानों का अंतर नहीं साधक के व्यक्तित्व की पवित्रता एवं उपास्य के प्रति गहन श्रद्धा को ही आधारभूत कारण मानना चाहिए। प्रतीक उपासना से इसी प्रयोजन की पूर्ति होती है।
उपासना में भी ध्यान का अवलंबन तो करना ही पड़ता है—उसके बिना तो सम्पत्ति की पूर्णता में पहुँचने पर भी गति नहीं; पर यह ध्यान अधिक परिष्कृत होता है। भगवान व्यक्ति नहीं शक्ति बन जाता है और उसे स्थान विशेष पर प्रतिष्ठित नहीं वरन् व्यापकता के सहित अनुभूति में उतारा जाता है। यों मूर्ति पूजक भी प्रतिमा को प्रतीक ही मानते हैं और भगवान को सर्वव्यापी ही मानते हैं ध्यान के लिए ही वे उनकी अवतारी प्रतिमाएँ गढ़ते हैं निराकार ध्यान में उससे आगे की ध्यान धारणा अपनानी पड़ती है।
उपासना का अगला ऊँचा चरण माना गया है।
उपासना की पार्थिव पूजा के कितने ही कर्मकाण्डों का प्रचलन है। तीर्थयात्रा, देवदर्शन, स्तवन, पाठ, षोडशोपचार, परिक्रमा, अभिषेक शोभायात्रा, श्रद्धाँजलि, रात्रि-जागरण, कीर्तन आदि अनेकों विधियाँ विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों में अपने-अपने ढंग से विनिर्मित और प्रचलित है। इससे आगे का अगला स्तर वह है जिसमें उपकरणों का प्रयोग न्यूनतम होता है और अधिकाँश कृत्य मानसिक एवं भावनात्मक रूप से ही सम्पन्न करना पड़ता है। यों शारीरिक हलचलों, श्रम और प्रक्रियाओं का समन्वय उनमें भी रहता ही है।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों में से प्रत्येक जीवन धारा की दिशा मोड़ने में सहायक होता है। रेल की पटरियाँ सरल और सस्ती होती हैं, पर उनके बिना बहुमूल्य और जटिल इंजन अनेक डिब्बों सहित दौड़ते चले जाने में समर्थ नहीं हो सकता। उपासनात्मक कर्मकाण्डों की रेल पटरी से उपमा दी जा सकती है।
उपासना कृत्यों में बिना मन लगे ही चिरकाल तक लगा रहना पड़ता है। पीछे वह अभ्यास स्वभाव में बदल जाता है और उसकी भी शौच, स्नान, भोजन शयन जैसे दैनिक आवश्यकता अनुभव होने लगती है।
उपासना काल समाप्त होने के पश्चात् भी शेष समय में उसी पवित्रता को बनाये रहने वाली गतिविधियाँ अपनाते रहने का ध्यान रखें। इसी प्रकार पृथ्वी पूजन का उपचार पूरा करते समय दिन में एकबार तो यह सोच ही लिया करें कि हमारा कर्तव्य पेट और परिवार तक ही सीमित नहीं वरन् देश, धर्म, समाज एवं पूजन प्रक्रिया पूरी कर लेने के उपरान्त भी शेष समय ऐसी रीति-नीति अपनायें जिसमें सार्वभौम, सद्भावना एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में अपना बढ़ा-चढ़ा योगदान प्रस्तुत होता रहे।
उपासना आरम्भ करने से पूर्व नित्य कर्म से निवृत्त होना-शरीर, वस्त्र और स्नान उपकरणों की अधिकाधिक स्वच्छता के लिए तत्परता बरतना—आवश्यक है। स्नान और धुले वस्त्र बदलने से मन में पवित्रता का संचार होता है। चित्त प्रफुल्ल रहता है। आलस्यवश मलीनता को लादे रहने से मन भारी रहता है और उपासना से जी उचटता है। जँभाई आती है—ऊब लगती है और अधिक बैठना भारी पड़ता है।
उपासना सन्दर्भ में जो विवाद चलता है, उसे साकार निराकार का रूप न देकर प्रतीक को व्यक्त आकृति का मानने न मानने की उलझन कहना ठीक है। पूर्ण निराकार का ध्यान तो नादयोग तथा दूसरी सम्वेदनाओं में भी नहीं हो सकता। शंख, घड़ियाल, बादल आदि की ध्वनियाँ सुनने का अभ्यास करते समय स्वभावतः उनके स्रोत की छवि मस्तिष्क में घूम जाती है। शंखनाद तो सुना जाय, पर शंख की आकृति ध्यान में आवे ही नहीं यह असम्भव है। गंध साधना में गुलाब पुष्प की सुगंध पर ध्यान एकाग्र करते हुए भी यह प्रश्न उपस्थिति होगा और उस सुगन्ध को पुष्प की आकृति से सर्वथा बचाते हुए ध्यान में लाया जा सकना सम्भव न होगा।
उपासना के लिए यही ध्यान प्रतिमा सर्वोत्तम समझी गई है। इस अंक में इसी दृष्टि से वह चित्र दिया गया है और अपेक्षा की गई है कि ध्यान तथा पूजन के लिए उच्च कक्षा के छात्रों को यही अपनाना चाहिए। सामान्य कक्षाओं के लिए हंसारूढ़ गायत्री माता की पुरानी छवि का उपयोग करते रहना ही ठीक है। गायत्री को विराट् ब्रह्म की प्रतीक प्रतिमा मानकर ही चलना चाहिए उसमें उन सभी देव शक्तियों का सन्तुलित समन्वय मौजूद है जो साधक की भौतिक एवं आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक है।
उपासना स्थल पर असामान्य स्थिति में विद्यमान है। इसके लिए प्रतीक प्रतिमा की स्थापना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। आद्य शक्ति गायत्री माता की अथवा अपने विश्वास के आधार पर कोई अन्य प्रतिमा—एक छोटे किन्तु सुसज्जित सिंहासन पर स्थापित रहनी चाहिए। जब भी पूजा करनी हो तब उसी के सामने बैठ कर करना चाहिए। जिस स्थान पर जो कार्य बहुत समय तक किया जाता रहता है वहाँ अनायास ही ऐसी विशेषता उत्पन्न हो जाती है जिससे प्रेरित होकर उन कार्यों की पुनरावृत्ति के लिए मन मचलने लगता है।
उपासना कहा जायगा।
उपासना का आधार मान बैठना गलत है। एकाग्रता के भी स्तर हैं, मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म में भी एकाग्रता प्रयुक्त होती है और देव प्रतिमा के समक्ष होकर उसकी पूजा, आरती स्तुति आदि से भी एकाग्रता का पाठ पढ़ा जाता है। पीछे यह बढ़ते−बढ़ते उस स्थिति तक भी पहुँच सकती है जिसे तन्मयता, भाव समाधि, विचार शून्यता आदि का नाम दिया जा सके। यह अन्तिम और समय साध्य स्थिति है। लोग इसी को पहले दिन प्राप्त करना चाहते हैं।
उपासना कृत्य आरम्भ करने की बात इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए कही गई है।
उपासना वर्ग में आते हैं।
उपासना केन्द्रित की जा सकती है। सरस्वती विद्या की—लक्ष्मी समृद्धि की—दुर्गा बलिष्ठता की देवी हैं। गणेश बुद्धि के, हनुमान बल के, सूर्य तेज के, शिव कल्याण के, विष्णु वैभव के, ब्रह्म सद्ज्ञान के देवता हैं। अन्यान्य देवी देवताओं के संबंध में भी यही बात है। यह सब एक ही विराट् ब्रह्म के अवयव मात्र हैं।
उपासना का सारा ढाँचा इसी प्रयोजन के लिए विनिर्मित हुआ समझा जाना चाहिए।
उपासना से आत्मिक प्रगति, उसके फलस्वरूप व्यक्तित्व का समग्र विकास, उसके द्वारा सर्वतोमुखी समृद्धि की सम्भावना, यह चक्र ऐसा है, जिससे इस कृत्य में लगाया गया समय सार्थक ही सिद्ध होता है।
उपासना कृत्य को क्रियान्वित करना ही उपयुक्त रहता है।
उपासना आरम्भ करते हुए आत्म शुद्धि के कृत्य किये जाएं, उस अवधि में अपने भीतर सर्वतोमुखी पवित्रता भरी होने की भावना रखें और उपासना काल समाप्त होने के पश्चात् भी शेष समय में उसी पवित्रता को बनाये रहने वाली गतिविधियाँ अपनाते रहने का ध्यान रखें। इसी प्रकार पृथ्वी पूजन का उपचार पूरा करते समय दिन में एकबार तो यह सोच ही लिया करें कि हमारा कर्तव्य पेट और परिवार तक ही सीमित नहीं वरन् देश, धर्म, समाज एवं पूजन प्रक्रिया पूरी कर लेने के उपरान्त भी शेष समय ऐसी रीति-नीति अपनायें जिसमें सार्वभौम, सद्भावना एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में अपना बढ़ा-चढ़ा योगदान प्रस्तुत होता रहे।
उपासना सर्वोत्तम है। ‘प्रकाश’ की साधना साकार और निराकारवादी दोनों ही पक्षों के लिए समाधान कारक है। सभी धर्म सम्प्रदायों ने किसी न किसी रूप में प्रकाश ध्यान की महत्ता स्वीकार की है। इसलिए उसे सार्वभौम भी कह सकते हैं। गायत्री मन्त्र का देवता सविता है।
उपासना पूरी न हो जाने तक कुछ न खाने−पीने का नियम कई लोग पालते हैं—यह उपवास का ही छोटा रूप है। उपवास को तप माना गया है।
उपासना करनी पड़ती है। भगवत् स्मरण उपासना का प्रधान अंग है। नाम के आधार पर ही किसी सत्ता का बोध और स्मरण हमें होता है। ईश्वर को स्मृति पटल पर प्रतिष्ठापित करने के लिए उसके नाम का सहारा लेना पड़ता है। स्मरण के आह्वान—आह्वान से स्थापना और स्थापना से उपलब्धि का क्रम चल पड़ना मनोविज्ञान शास्त्र द्वारा समर्थित है।
उपासना के लिए यही सर्वोत्तम समय है। मुख से कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं, पर यह मान्यता−चित्र मस्तिष्क में अधिकाधिक स्पष्टता के साथ जमाना चाहिए कि “आज का एक दिन एक पूरे जीवन की तरह है। इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग किया जाना चाहिए। समय का एक भी क्षण न तो व्यर्थ गँवाया जाना चाहिए और न अनर्थ कार्यों में लगाना चाहिए।” सोचा जाना चाहिए कि “ईश्वर ने अन्य किसी जीवधारी को वे सुविधाएँ नहीं दीं, जो मनुष्य को प्राप्त हैं।
उपासनात्मक विधि−विधान की अपनी महत्ता है, पर उतने भर से ही काम नहीं चलता। चिन्तन और कर्तृत्व की रीति−नीति भी लक्ष्य के अनुरूप ही ढालनी पड़ेगी।
उपासना की प्राचीन परिपाटी में प्रातःकाल हंसारुढ़ा ब्राह्मी−मध्याह्न को गरुड़ा रुढ़ा वैष्णवी—सायं वृषभारुढ़ा शांभवी की भिन्न आकृतियों का ध्यान बताया गया है। हमने एक ही रूप को पर्याप्त माना है और अपनी ही भाँति परामर्श मानने वालों को एक ही ध्यान के लिए अनुरोध किया है। सविता देवता के रूप में परब्रह्म की उपासना सर्वोत्तम है। ‘प्रकाश’ की साधना साकार और निराकारवादी दोनों ही पक्षों के लिए समाधान कारक है। सभी धर्म सम्प्रदायों ने किसी न किसी रूप में प्रकाश ध्यान की महत्ता स्वीकार की है।
उपासना बिना कुछ क्रिया-कृत्य किये भी की जा सकती है।
उपासना के निमित्त किये गये प्राणायाम में इसी अविज्ञात तथ्य को प्रत्यक्ष करने का—प्रसुप्त जगाने का प्रयत्न किया जाता है। जीव अपने आपको शरीर मान बैठा है। उसी की सुविधा एवं प्रसन्नता की बात सोचता है, उसी के लाभ प्रयत्नों में संलग्न रहता है। काया के साथ जुड़े हुए व्यक्ति और पदार्थ ही उसे अपने लगते हैं और उसी सीमित संबंध क्षेत्र तक ममत्व को सीमित करके—अन्य सबको पराया समझता रहता है। ‘अपनों’ के लाभ के लिए ‘परायों’ को हानि पहुँचाने में उसे संकोच नहीं होता।
उपासना है। विविध−विधि शारीरिक और मानसिक क्रिया कृत्य इसी प्रयोजन के लिए पूरे किये जाते हैं। शरीर से व्रत, मौन, अस्वाद, ब्रह्मचर्य, तीर्थयात्रा, परिक्रमा, आसन, प्राणायाम, जप, कीर्तन, पाठ, बन्ध, मुद्राएँ, नीति, धोति वस्ति, न्योलि, वज्रोली, कपाल भाति जैसे क्रियाकृत्य किये जाते हैं। मानसिक साधनाओं में प्रायः सभी चिन्तन-परक होती हैं और उनमें कितने ही स्तर के ध्यान करने पड़ते हैं। नादयोग, बिन्दुयोग, लययोग, ऋजुयोग, प्राणयोग, हंसयोग, षट्चक्र वेधन, कुण्डलिनी जागरण जैसे बिना किसी श्रम या उपकरण के लिये जाने वाले मात्र मनोयोग के सहारे संपन्न किये जाने वाले सभी कृत्य ध्यानयोग की श्रेणी में गिने जाते हैं।
उपासना स्थल को—पूजा के पात्र उपकरण प्रतीक आदि को—स्वच्छ कर लेने की बात को महत्व ही दिया जाना चाहिए। अधिक ठंड, बीमारी, पानी का अभाव, स्थान की असुविधा जैसी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाने पर तो बिना स्नान के—हाथ मुँह धोकर भी पूजा पर बैठा जा सकता है, पर सामान्य स्थिति में आलस्यवश ऐसी उपेक्षा नहीं बरती जानी चाहिए। रुग्णता की अन्य विवशता की परिस्थितियों में—सफर में — मानसिक उपासना बिना कुछ क्रिया-कृत्य किये भी की जा सकती है।
उपासना जिनका विषय नहीं रहा है वे अन्य विषयों के विद्वान होते हुए भी इस क्षेत्र में नौसिखियों की तरह ही प्रवेश करते हैं। अस्तु इन्हें ध्यान−प्रक्रिया का अभ्यास करने के लिए प्रतीक पूजा का आश्रय लेना सुविधाजनक ही रहता है। छतों पर सीमेंट, मिट्टी, लोहे का स्लैब ढालने के लिए उसके नीचे ‘सहारे’ खड़े करने होते हैं। छत कड़ी हो जाने पर ‘सहारे’ निकाल दिये जाते हैं और फिर वह अपने आप खड़ी रहती है, इतना ही नहीं अपने ऊपर वजन भी उठा लेती है। किन्तु आरम्भ में जबकि वह ढलाई गीली थी तो बिना सहारे के काम नहीं चल सकता था।
उपासना में नर और नारी की दोनों ही आकृतियों में परब्रह्म की प्रतिमा बनाई जाती रही है। दोनों में पवित्रता, कोमलता, उदारता, सेवा, समर्पण स्नेह, वात्सल्य जैसी दिव्य भावनाओं के आधार पर देखना हो तो नारी की गरिमा अधिक बैठती है। नारी दानी है और नर उपकृत। ईश्वर की प्रतिमा को किस रूप में माना जाय? इस दृष्टि से विवेक का सहज झुकाव नारी के पक्ष में जाता है।
उपासना उद्देश्य पूरा कराना होता है।
उपासना का प्रधान अंग है। नाम के आधार पर ही किसी सत्ता का बोध और स्मरण हमें होता है। ईश्वर को स्मृति पटल पर प्रतिष्ठापित करने के लिए उसके नाम का सहारा लेना पड़ता है। स्मरण के आह्वान—आह्वान से स्थापना और स्थापना से उपलब्धि का क्रम चल पड़ना मनोविज्ञान शास्त्र द्वारा समर्थित है।
उपासना के रूप में ध्यान प्रक्रिया के सहारे—उन कृत्यों को करने की कल्पना करने हुए भी किये जा सकते हैं। उपासना में नागा करने की अपेक्षा इस प्रकार की मानसिक पूजा कर लेना उत्तम है। इससे संकल्पित साधना प्रक्रिया को किसी न किसी रूप में अनवरत चलती हुई तो रखा ही जा सकता है।
उपासना क्षेत्र में प्रवेश करने वालों प्रत्येक छात्र के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इसके बिना मनोनिग्रह में गड़बड़ी बनी रहेगी और प्रत्याहार धारणा एवं ध्यान के अगले चरण ठीक तरह से उठ सकना कठिन पड़ेगा।
उपासना के समय प्रतीक में देव शक्ति का आह्वान करने के उपराँत उनका सम्मानोपचार किया जाना चाहिए। इससे भाव निष्ठा में और भी अधिक परिपक्वता उत्पन्न होने का अवसर मिलता है। इस प्रयोजन के लिए पञ्चोपचार पूजन की परम्परा प्रचलित है। पञ्चोपचार में (1) जल (2) चावल−नैवेद्य (3) पुष्प (4) धूप दीप (5) चन्दन−रोली को गिना जाता है। इन्हें एक तश्तरी में रखना चाहिए और क्रमशः एक−एक को पास में रखी दूसरी तश्तरी में श्रद्धा, सम्मान की अभिव्यक्ति के लिए छोड़ते जाना चाहिए।
उपासना, परिवार-व्यवस्था, लोक-मंगल आदि कार्यों में, कौन, कब, किस प्रकार, कितना समय देगा, यह हर व्यक्ति की अपनी परिस्थिति पर निर्भर है, पर समन्वय इन सब बातों का रहना चाहिए। दृष्टिकोण यह रहना चाहिए कि आलस्य-प्रमाद में एक क्षण भी नष्ट न हो और सारी गतिविधियाँ इस प्रकार चलती रहें, जिनमें आत्मकल्याण, परिवार निर्माण एवं लोक-मंगल के तीनों तथ्यों का समुचित समावेश बना रहे। इन सारे क्रियाकलापों में आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाया जाए। दुष्प्रवृत्तियों को— दुर्भावनाओं को स्थान न मिलने दिया जाए। जहाँ भी जब भी गड़बड़ दिखाई पड़े, तब वहीं उसकी रोक-थाम की जाए और गिरते कदमों को संभाल लिया जाए।
उपासना कृत्य भगवान की समीपता है, उसका सत्परिणाम सामने आये बिना नहीं रह सकता। कीट भृंग का उदाहरण प्रख्यात है।
उपासना क्षेत्र में सार्वभौम एकता उत्पन्न होगी, जो आगे चलकर भाषा, संस्कृति, धर्म, शासन आदि सभी क्षेत्रों में एकता उत्पन्न करने की—दिशा में जन-मानस बनाने की—भूमिका भी प्रस्तुत करेगी। अशिक्षितों, अल्प शिक्षितों एवं बालकों के लिए अनेक विधानों के लिए अनेक मन्त्र याद करना कठिन है, इसलिए एक ही गायत्री मन्त्र याद करने की सरलता सोची गई है और देव पूजन तथा आत्मशोधन के सभी कृत्य इसी मन्त्रोच्चार से पूरे करने के लिए कहा गया है।
उपासना की है। उसमें आकृति सहित परमात्मा की कल्पना करनी पड़ती है। उसे उच्चस्तरीय श्रेष्ठताओं से सम्पन्न माना जाता है, समीप उपस्थित अनुभव किया जाता है, सघन श्रद्धा का आरोपण करते हैं, गहरी प्रेम भावना उमगाते हैं और उनके साथ घनिष्ठता बनाते हैं। इसी कृत्य के अंतर्गत आने वाले विविध उपचार भक्ति साधना कहे जाते हैं। ‘लय’ प्रक्रिया का यह प्रथम सोपान है।
उपासना की भी खण्ड साधना भी की जा सकती है, पर अपना अनुभव और परामर्श यह है कि समग्र ब्रह्म की साधना ही सर्वोत्तम है। आहार वही आदर्श माना जाता है जिसमें पोषण के सभी तत्व मौजूद हों। प्रोटीन कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो, अकेले उसी को खाना लाभदायक न रहेगा। अमुक देवता की उपासना अकेली प्रोटीन, अकेली कैल्शियम खाने की तरह है। आवश्यकता पड़ जाने पर चिकित्सा उपचार की तरह कोई विशेष तत्व अमुक मात्रा में लिया जाता है, इसी प्रकार विशेष प्रयोजन के लिए कोई देव−साधना उपयोगी हो सकती है, पर सर्वतोमुखी प्रगति के लिए—सर्वकालिक साधना समग्र ब्रह्म की ही होनी चाहिए।
उपासना प्रक्रिया को एकत्रित करके साधना रत होने से उनका स्वतंत्र अस्तित्व भासने लगता है। ध्यान की सुविधा के लिए इन शक्ति तत्वों का मनुष्याकृति वाला शरीर भी कल्पित किया गया है। पूर्व मान्यताएँ और साधनात्मक निष्ठाएँ मिलकर उस प्रकार की प्रतिमा का स्वरूप वस्तुतः सामने ले आती हैं और वह ‘इष्टदेव’ साधक की सहायता के लिए प्रस्तुत दीखने लगता है। साधक का व्यक्तित्व और संकल्प इस भाव निर्मित इष्टदेव में प्राण फूँकता है। उस उपास्य में साधक के स्तर के अनुरूप ही शक्ति होती है।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों का उद्देश्य- भावनात्मक स्तर को प्रयत्नपूर्वक ऊँचा उठाना है। यदि आस्थाओं का स्तर बदला जा सके और मात्र चित्र-विचित्र शारीरिक क्रियाएँ करते रहा जाय; तो इतने भर का प्रभाव शरीर तक ही सीमित रह जायगा। चेतना का वह परिष्कार न हो सकेगा जो; तपश्चर्या का मूल भूत उद्देश्य है।
उपासना करने के लिए समय निकाल ही लेना चाहिए। प्रयत्न यह करना चाहिए कि आधा घंटा से लेकर एक घंटे तक समय उपासना के लिए मिल सके। निस्सन्देह इस प्रयोजन में लगा हुआ समय हर दृष्टि से सार्थक होता है। उपासना से आत्मिक प्रगति, उसके फलस्वरूप व्यक्तित्व का समग्र विकास, उसके द्वारा सर्वतोमुखी समृद्धि की सम्भावना, यह चक्र ऐसा है, जिससे इस कृत्य में लगाया गया समय सार्थक ही सिद्ध होता है।
उपासना का ध्यान अनिवार्य अंग है। जप के साथ उसका जुड़ा रहना निताँत आवश्यक है। अन्यथा मन यहाँ−वहाँ भागता रहेगा। ध्यान, शब्द, रूप, रस, गंध स्पर्श की पाँच तन्मात्राओं में से किसी न किसी का आश्रय लिये बिना सम्भव नहीं हो सकता। यह तन्मात्राएँ क्रमशः आकाश, अग्नि, जल, पृथ्वी और वायु इन जड़ यन्त्र तत्वों की है।
उपासना ही है, जप के लिए जो नाम अथवा मन्त्र लिया जाता है, इसलिए उसमें भी ब्रह्म दृष्टि रखकर जप करना चाहिए। जप करते−करते यदि शरीर में कम्प, रोमाँचादि होने लगे, तो समझना चाहिए कि मंत्र चेतन हो गया।
उपासना से जी उचटता है। जँभाई आती है—ऊब लगती है और अधिक बैठना भारी पड़ता है। स्थान और पूजा उपकरणों की मलीनता से मन में अरुचि उत्पन्न होती है और उत्साह घटता है। अस्तु उपासना स्थल को—पूजा के पात्र उपकरण प्रतीक आदि को—स्वच्छ कर लेने की बात को महत्व ही दिया जाना चाहिए। अधिक ठंड, बीमारी, पानी का अभाव, स्थान की असुविधा जैसी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाने पर तो बिना स्नान के—हाथ मुँह धोकर भी पूजा पर बैठा जा सकता है, पर सामान्य स्थिति में आलस्यवश ऐसी उपेक्षा नहीं बरती जानी चाहिए।
उपासना कभी भी—किसी की भी—निष्फल नहीं जाती। यदि उद्देश्य समझते हुए सही दृष्टिकोण अपनाया जा सके और विधिवत् साधना की जा सके तो जीवन साधना को अमृत, पारस और कल्प−वृक्ष की कामधेनु की सार्थक उपमा दी जा सकती है।
उपासनात्मक कर्मकाण्ड दिशा निर्देश है। दिशा सही होने और पहिया लुढ़कने लगने पर उसके परिणाम दूरगामी होना आश्चर्यजनक नहीं है।
उपासना के समय मन में यह निष्ठा जमनी चाहिए कि जिस दिव्य सत्ता के साथ घनिष्ठता जोड़नी है वह उपासना स्थल पर असामान्य स्थिति में विद्यमान है। इसके लिए प्रतीक प्रतिमा की स्थापना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। आद्य शक्ति गायत्री माता की अथवा अपने विश्वास के आधार पर कोई अन्य प्रतिमा—एक छोटे किन्तु सुसज्जित सिंहासन पर स्थापित रहनी चाहिए। जब भी पूजा करनी हो तब उसी के सामने बैठ कर करना चाहिए। जिस स्थान पर जो कार्य बहुत समय तक किया जाता रहता है वहाँ अनायास ही ऐसी विशेषता उत्पन्न हो जाती है जिससे प्रेरित होकर उन कार्यों की पुनरावृत्ति के लिए मन मचलने लगता है।
उपासना आरम्भ करने से पूर्व थोड़े हेर-फेर के साथ प्रायः इन्हीं विधानों का निर्देश है। इन कृत्यों के साथ कई-कई तरह के मन्त्र भिन्न-भिन्न ग्रन्थों में लिखे हैं। भिन्नता को एकता की दिशा में ले जाने की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए यही उचित समझा गया है कि सभी उपासना कृत्यों में एक मात्र गायत्री मन्त्र का ही उपयोग किया जाय। इसमें उपासना क्षेत्र में सार्वभौम एकता उत्पन्न होगी, जो आगे चलकर भाषा, संस्कृति, धर्म, शासन आदि सभी क्षेत्रों में एकता उत्पन्न करने की—दिशा में जन-मानस बनाने की—भूमिका भी प्रस्तुत करेगी। अशिक्षितों, अल्प शिक्षितों एवं बालकों के लिए अनेक विधानों के लिए अनेक मन्त्र याद करना कठिन है, इसलिए एक ही गायत्री मन्त्र याद करने की सरलता सोची गई है और देव पूजन तथा आत्मशोधन के सभी कृत्य इसी मन्त्रोच्चार से पूरे करने के लिए कहा गया है।
उपासना में इन्हीं सब प्रयोजनों को पूरा करना पड़ता है। यह चारों ही परतें छेड़नी होती हैं। भगवान की समीपता अनुभव कराने वाली प्रतीक पूजा ‘रिटेन्शन’ है। ईश्वर के साथ आत्मा के अति प्राचीन संबंधों को भूल जाने के कारण ही जीवन में भटकाव होता है। पतंग उड़ाने वाले के हाथ से डोरी छूट जाती है तभी वह इधर−उधर छितराती फिरती है।
उपासना कृत्य समझा जा सकता है। उसमें नाम जप की रटाई कराई जाती है ताकि यह छात्र वर्णमाला, गिनती पहाड़े, भली प्रकार याद कर सकें। एक ही विधान को लगातार दुहराते रहने के पीछे यही बाल शिक्षण की प्रक्रिया काम करती है।
उपासना में नागा करने की अपेक्षा इस प्रकार की मानसिक पूजा कर लेना उत्तम है। इससे संकल्पित साधना प्रक्रिया को किसी न किसी रूप में अनवरत चलती हुई तो रखा ही जा सकता है।
उपासना कृत्य करने की स्थिति न हो तो आत्म शुद्धि, देव पूजन तथा जप ध्यान आदि सारे कृत्य मानसिक उपासना के रूप में ध्यान प्रक्रिया के सहारे—उन कृत्यों को करने की कल्पना करने हुए भी किये जा सकते हैं। उपासना में नागा करने की अपेक्षा इस प्रकार की मानसिक पूजा कर लेना उत्तम है। इससे संकल्पित साधना प्रक्रिया को किसी न किसी रूप में अनवरत चलती हुई तो रखा ही जा सकता है।
उपासना कृत्यों में एक मात्र गायत्री मन्त्र का ही उपयोग किया जाय। इसमें उपासना क्षेत्र में सार्वभौम एकता उत्पन्न होगी, जो आगे चलकर भाषा, संस्कृति, धर्म, शासन आदि सभी क्षेत्रों में एकता उत्पन्न करने की—दिशा में जन-मानस बनाने की—भूमिका भी प्रस्तुत करेगी। अशिक्षितों, अल्प शिक्षितों एवं बालकों के लिए अनेक विधानों के लिए अनेक मन्त्र याद करना कठिन है, इसलिए एक ही गायत्री मन्त्र याद करने की सरलता सोची गई है और देव पूजन तथा आत्मशोधन के सभी कृत्य इसी मन्त्रोच्चार से पूरे करने के लिए कहा गया है।
उपासना क्षेत्र में उलटी बैठती है। ध्यान और निष्ठा को केन्द्रित रखना उपासना का महत्वपूर्ण आधार है। उसे बखेरना नहीं चाहिए। बहुत देवताओं के जंजाल में “सात मामाओं का भानजा भूखा रहता है” वाली कहावत चरितार्थ होती है। गायत्री उपासना की प्राचीन परिपाटी में प्रातःकाल हंसारुढ़ा ब्राह्मी−मध्याह्न को गरुड़ा रुढ़ा वैष्णवी—सायं वृषभारुढ़ा शांभवी की भिन्न आकृतियों का ध्यान बताया गया है।
उपासना करें। अन्यथा प्रातः साँय दो बार से भी काम चल सकता है। अत्यन्त व्यस्त व्यक्तियों को भी प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर एक बार तो उपासना करने के लिए समय निकाल ही लेना चाहिए। प्रयत्न यह करना चाहिए कि आधा घंटा से लेकर एक घंटे तक समय उपासना के लिए मिल सके। निस्सन्देह इस प्रयोजन में लगा हुआ समय हर दृष्टि से सार्थक होता है।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों की रेल पटरी से उपमा दी जा सकती है।
उपासना काल में अपने आपे को पवित्रता से ओत-प्रोत अनुभव करना चाहिए। सम्मिलन सजातीयों का ही होता है। पानी में घुलनशील पदार्थ ही घुल सकते हैं। लोहे जैसी भारी धातुओं का पानी में घुलना सम्भव नहीं। ईश्वर का सजातीय अपना व्यक्ति होगा तो उसमें दिव्य अवतरण की अपेक्षा की जा सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-May
उपासना का एक प्रयोजन है। आहार और स्वच्छता की व्यवस्था न करने पर शरीर निर्वाह कठिन हो जाता है उसी प्रकार उपासना न करने पर आत्मा दिन-दिन दुर्बल होता है। आत्मिक क्षेत्र विकृतियों से भरा चला जाता है। अस्तु आजीविका उपार्जन-विश्राम आदि दैनिक कृत्यों की तरह उपासना को भी आध्यात्मिक नित्य कर्म माना गया है।
उपासना आरम्भ की है उसी श्रद्धा से अंशदान का उसमें प्राण संचार होना चाहिए। विदाई समारोह पर लोगों ने अपने-अपने यहाँ ‘ज्ञान घट’ स्थापित किये थे लगता है वह उत्साह पानी के बुलबुलों की तरह ठंडा पड़ गया। वे डिब्बे समझ गये और जहाँ-तहाँ छितरा दिये गये। प्रत्येक प्रतिमाएं टंगी रहें और भाव निष्ठा मर जाये तो यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। उपासना संलग्न और बिना उपासना वाले सभी परिजनों से इस बार पुनः आग्रह है कि अंशदान को आत्मोत्कर्ष साधना का एक अनिवार्य अंग मानें और उसके लिए नित्य तकाजा करने वाले ज्ञान घटों को पुनः स्थापित कर दें, इस बार उनकी स्थापना इतनी निष्ठा से करें कि वे फिर उपेक्षा अवज्ञा के गर्त में न गिर पड़े।
उपासना के अतिरिक्त अंशदान भी
उपासना वाले सभी परिजनों से इस बार पुनः आग्रह है कि अंशदान को आत्मोत्कर्ष साधना का एक अनिवार्य अंग मानें और उसके लिए नित्य तकाजा करने वाले ज्ञान घटों को पुनः स्थापित कर दें, इस बार उनकी स्थापना इतनी निष्ठा से करें कि वे फिर उपेक्षा अवज्ञा के गर्त में न गिर पड़े।
उपासना में निर्धारित क्रिया-कृत्य कर लेना ही पर्याप्त माना जाता है, पर अनुष्ठान पुरश्चरणों में साधक को कितने ही प्रकार के प्रतिबन्ध उस अवधि में लगाने पड़ते हैं और तपस्वी जैसा जीवन जीना पड़ता है। (1) उपवास (2) ब्रह्मचर्य (3) भूमिशयन (4) अपनी शारीरिक सेवा अपने हाथों करना (5) चमड़े से निर्मित वस्तुओं का त्याग यह पाँच नियम स्थल आचरण में पालन किये जाने के हैं। शारीरिक, मानसिक और आर्थिक पापों से बचना सज्जनोचित रीति, नीति अपना कर उन दिनों उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व से भरा पूरा जीवन निर्वाह करना पड़ता है।
उपासना भी इसी कला विज्ञान का एक पक्ष है। जो मानवी अस्तित्व की गरिमा समझ सका और उसे अनगढ़ स्थिति से निकाल कर सुसंस्कृत पद्धति से जी सका उसे सर्वोपरि कलाकार कह सकते हैं।
उपासना में संलग्न होने का परामर्श देते रहे हैं। इसका सत्परिणाम भी सामने आया है। ईश्वर भक्ति का आश्रय लेकर जिन सत्परिणामों का लाभ मिला है, उस पर हमें सन्तोष है, साथ ही इस प्रेरणा द्वारा लाभान्वित होने वालों को देखकर भी यह विश्वास दिन-दिन बढ़ा है कि ईश्वर की समीपता के लिए किये गये प्रयत्न मनुष्य के लिए हर दृष्टि से श्रेयस्कर ही सिद्ध होते हैं।
उपासना कोई महत्वपूर्ण प्रतिफल प्रस्तुत न कर सकेगी। ईश्वर की अनुकम्पा भावना-स्तर की परख पर आधारित है, उसे मात्र टंट-घंट के सहारे आकर्षित नहीं किया जा सकता, इस तथ्य को जितनी अच्छी तरह, जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही अच्छा है। यहाँ उपासना की निरर्थकता नहीं बताई जा रही है। उसे कलेवर कहा जा रहा है और सेवा साधना को प्राण के रूप में प्रतिपादित किया जा रहा है। मनुष्य शरीर और प्राण दोनों का ही समन्वय है।
उपासना रास्ता चलते-सोते या किसी अन्य काम को करते हुए भी की जा सकती है। मौन जप में किसी प्रकार का विधि विशेष प्रतिबन्ध नहीं है।
उपासना अपने को पवित्र एवं परिष्कृत बनाने की जीवन साधना के साथ-साथ उदार आत्मविस्तार का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करने वाली अंशदान प्रतिज्ञा का समावेश करना प्रत्येक अध्यात्मवादी का पुनीत कर्तव्य है। अखण्ड ज्योति परिजनों से इसी त्रिवेणी में स्नान करके परम पद प्राप्त करने का अनुरोध है। अंशदान की प्रवृत्ति को प्रखर बनाने और उसे इसी गायत्री जयन्ती से गुरुपूर्णिमा के बीच कार्यरूप में परिणत कर देने के आग्रह सहित यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं।
उपासना के ध्यान पक्ष को सहारा दिया जाता है। प्रतीकों की आवश्यकता इसी निमित्त होती है।
उपासना को भी आध्यात्मिक नित्य कर्म माना गया है।
उपासना कर सकते हैं। पर ऐसी असमय की अथवा अनियमित उपासना मुँह बन्द रखकर मानसिक जप के रूप में ही चलनी चाहिए। ऐसी उपासना रास्ता चलते-सोते या किसी अन्य काम को करते हुए भी की जा सकती है। मौन जप में किसी प्रकार का विधि विशेष प्रतिबन्ध नहीं है।
उपासना की उपयोगिता समझाते रहे हैं। हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण भाग उपासना के निमित्त ही समर्पित रहा है। इसके अतिरिक्त जो भी सम्पर्क में आया है उसे आस्तिकता अपनाने और उपासना में संलग्न होने का परामर्श देते रहे हैं। इसका सत्परिणाम भी सामने आया है। ईश्वर भक्ति का आश्रय लेकर जिन सत्परिणामों का लाभ मिला है, उस पर हमें सन्तोष है, साथ ही इस प्रेरणा द्वारा लाभान्वित होने वालों को देखकर भी यह विश्वास दिन-दिन बढ़ा है कि ईश्वर की समीपता के लिए किये गये प्रयत्न मनुष्य के लिए हर दृष्टि से श्रेयस्कर ही सिद्ध होते हैं।
उपासना न करने पर आत्मा दिन-दिन दुर्बल होता है। आत्मिक क्षेत्र विकृतियों से भरा चला जाता है। अस्तु आजीविका उपार्जन-विश्राम आदि दैनिक कृत्यों की तरह उपासना को भी आध्यात्मिक नित्य कर्म माना गया है।
उपासना है।
जिन्दगी जीना कला है और जीवन साधना है॥
उपासना का शास्त्रीय निर्देश अनेक स्थानों पर मिलता है। यथा-
उपासना के अवसर पर प्रयुक्त होने वाले क्रिया-कलाप एवं उपचार भी आधार मात्र हैं। उनके सहारे चेतना को यह प्रशिक्षण दिया जाता है कि आत्मोत्कर्ष के अभिलाषी को अपने गुण, कर्म, स्वभाव में क्या परिवर्तन एवं परिष्कार करना चाहिए। संक्षेप में जीवन विकास का लक्ष्य और उस के लिए अपनाई जाने वाली रीति-नीति के सम्बन्ध में चेतना को अधिकाधिक परिचित एवं प्रशिक्षित करना ही समूचे उपासना विज्ञान का एकमात्र उद्देश्य है। आत्मिक प्रगति पूरी तरह उदात्त दृष्टिकोण और आदर्श क्रिया-कलाप के दोनों चरण बढ़ाते हुए- दोनों पहिये घुमाते हुए ही सम्भव होती है। ईश्वर भक्ति का उद्देश्य न इससे कम है और न अधिक।
उपासना भी नित्य कर्म है। कपड़े धोना, झाडू लगाना, स्नान, दन्तमंजन आदि स्वच्छता कर्मों की तरह ही मनः क्षेत्र पर आये दिन जमने वाले कषाय-कल्मषों का परिशोधन करना भी नित्य उपासना का एक प्रयोजन है। आहार और स्वच्छता की व्यवस्था न करने पर शरीर निर्वाह कठिन हो जाता है उसी प्रकार उपासना न करने पर आत्मा दिन-दिन दुर्बल होता है। आत्मिक क्षेत्र विकृतियों से भरा चला जाता है। अस्तु आजीविका उपार्जन-विश्राम आदि दैनिक कृत्यों की तरह उपासना को भी आध्यात्मिक नित्य कर्म माना गया है।
उपासना अनिवार्य है। गायत्री के बिना किसी भी विधान के अनुसार सन्ध्या कृत्य पूर्ण नहीं हो सकता। जिन्हें अन्य विधान न आते हों वे केवल गायत्री जप करके भी सन्ध्या कृत्य पूर्ण कर सकते हैं।
उपासना में हमें श्रद्धावान होना चाहिए साथ ही सेवा साधना की गरिमा के प्रति भी निष्ठा में त्रुटि नहीं आने देनी चाहिए।
उपासना उपचार। अंश दान चाहे न्यूनतम ही क्यों न हो? पर वह नित्य और नियमित रूप से होना चाहिए। इससे संयम, परमार्थ, अनुदान, आत्म-विस्तार जैसी अनेकों सत्प्रवृत्तियों को विकसित करने का अवसर मिलता है। इस ओर उपेक्षा बरतने पर कर्मकाण्डों का निर्जीव कलेवर ही हाथ रह जाता है।
उपासना की 45 मिनट वाली पूजा प्रक्रिया जिस उत्साह से की जा रही है उतने ही विश्वासपूर्वक उस तत्वज्ञान को, जीवन दर्शन को, परमलक्ष्य को अपनाया जाना चाहिए जिनसे इस सुरदुर्लभ मनुष्य की सार्थकता सिद्ध होती है। दर्शन की अपेक्षा करके मात्र उपचार ही अपनाया गया तो समझना चाहिए कि निष्प्राण शरीर की सेवा, सज्जा मात्र के लिए श्रम किया जा रहा है।
उपासना संलग्न और बिना उपासना वाले सभी परिजनों से इस बार पुनः आग्रह है कि अंशदान को आत्मोत्कर्ष साधना का एक अनिवार्य अंग मानें और उसके लिए नित्य तकाजा करने वाले ज्ञान घटों को पुनः स्थापित कर दें, इस बार उनकी स्थापना इतनी निष्ठा से करें कि वे फिर उपेक्षा अवज्ञा के गर्त में न गिर पड़े।
उपासना विज्ञान का एकमात्र उद्देश्य है। आत्मिक प्रगति पूरी तरह उदात्त दृष्टिकोण और आदर्श क्रिया-कलाप के दोनों चरण बढ़ाते हुए- दोनों पहिये घुमाते हुए ही सम्भव होती है। ईश्वर भक्ति का उद्देश्य न इससे कम है और न अधिक।
उपासना का आधार उसी माध्यम से खड़ा हो सकता है और ईश्वर भक्ति के जो लाभ माहात्म्य बताये गये हैं उन्हें जीवन शोधन के राजमार्ग पर चलते हुए ही पाया जा सकता है।
उपासनात्मक सरल प्रक्रिया अपनायी है उसी उत्साह से उन्हें कठिन परीक्षण के लिए भी साहस जुटाना चाहिए। अंशदान की बात न तो अनावश्यक है और न अपेक्षणीय। सच तो यह है कि अंशदान प्राण है और उपचार आवरण। उपासना की एक बार उपेक्षा की जा सकती है और अंश दान की अभिवृद्धि करते हुए जीवन लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, पर मात्र मन्त्र तन्त्र तक सीमित कृपणता की परिधि में जकड़ी हुई उपासना कोई महत्वपूर्ण प्रतिफल प्रस्तुत न कर सकेगी। ईश्वर की अनुकम्पा भावना-स्तर की परख पर आधारित है, उसे मात्र टंट-घंट के सहारे आकर्षित नहीं किया जा सकता, इस तथ्य को जितनी अच्छी तरह, जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही अच्छा है।
उपासना मुँह बन्द रखकर मानसिक जप के रूप में ही चलनी चाहिए। ऐसी उपासना रास्ता चलते-सोते या किसी अन्य काम को करते हुए भी की जा सकती है। मौन जप में किसी प्रकार का विधि विशेष प्रतिबन्ध नहीं है।
उपासना कर लेने का भी विधान है। इस दस हजार की संकल्पित साधना को अनुष्ठान तो नहीं कह सकते, पर सामान्य जप क्रमशः उनका विशेष महत्व है। इसे न्यूनतम तीन दिन में और अधिकतम दस दिन में पूरा करना चाहिए। उपवास, ब्रह्मचर्य यह दो नियम तो इसमें भी आवश्यक है। उपवास में फलाहार पर रहना कठिन हो तो एक अन्न और एक शाक पर निर्वाह करना भी सामान्य उपवास में गिना जा सकता है।
उपासना करने से वह गुरु, शिष्य, स्त्री, और प्राणी सब का उद्धार करती है”।
उपासना के माध्यम से किया जाता है पर वह उतने तक ही सीमित नहीं रहता। व्यायामशाला में शरीर को परिपुष्ट बनाया जाता है पर उस पुष्ट शरीर का उपयोग व्यायामशाला तक सीमित न रहकर विभिन्न प्रयोजनों के लिए होता है। जिस तालाब में तैरना सीखते हैं उसी में आजीवन तैरा जाये अन्य कहीं उस कला का उपयोग न हो, ऐसा कहाँ होता है। ईश्वर भक्ति की साधना से परिष्कृत अन्तः चेतना को अपनी सघन आत्मीयता एवं सहृदयता का परिचय पग-पग पर देना होता है। इससे प्रेमी तो धन्य होता ही है- प्रेम पात्र को भी अति महत्वपूर्ण लाभ मिलता है।
उपासना के दो आधार हैं- एक ईश्वर का स्वरूप निर्धारण दूसरा उसकी समीपता, अनुकम्पा प्राप्त करने का प्रयत्न। स्वरूप निर्धारण में प्रायः मनुष्य आकृति की किसी प्रतिमा को ध्यान पूजन का प्रतीक बनाया जाता है। यह प्रतीक प्रतिमाएं मनुष्यकृत हैं। उनके निर्माण का उद्देश्य ध्यान साधना के लिए आधार खड़ा करना भर है। भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम एवं भगवान कृष्ण को पूर्ण पुरुष कहा जाता है।
उपासना उपचार में उत्साह उत्पन्न करने के साथ-साथ उसके पीछे प्राण चेतना की तरह काम करने वाले तथ्यों को भी हृदयंगम कराया जा सकता तो ही इस प्रबल प्रयत्न की सार्थकता समझी जा सकती है- जिसमें एक लाख भावनाशील परिजनों को आग्रहपूर्वक सम्मिलित किया गया है। उपासना की 45 मिनट वाली पूजा प्रक्रिया जिस उत्साह से की जा रही है उतने ही विश्वासपूर्वक उस तत्वज्ञान को, जीवन दर्शन को, परमलक्ष्य को अपनाया जाना चाहिए जिनसे इस सुरदुर्लभ मनुष्य की सार्थकता सिद्ध होती है। दर्शन की अपेक्षा करके मात्र उपचार ही अपनाया गया तो समझना चाहिए कि निष्प्राण शरीर की सेवा, सज्जा मात्र के लिए श्रम किया जा रहा है।
उपासना की एक बार उपेक्षा की जा सकती है और अंश दान की अभिवृद्धि करते हुए जीवन लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, पर मात्र मन्त्र तन्त्र तक सीमित कृपणता की परिधि में जकड़ी हुई उपासना कोई महत्वपूर्ण प्रतिफल प्रस्तुत न कर सकेगी। ईश्वर की अनुकम्पा भावना-स्तर की परख पर आधारित है, उसे मात्र टंट-घंट के सहारे आकर्षित नहीं किया जा सकता, इस तथ्य को जितनी अच्छी तरह, जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही अच्छा है। यहाँ उपासना की निरर्थकता नहीं बताई जा रही है। उसे कलेवर कहा जा रहा है और सेवा साधना को प्राण के रूप में प्रतिपादित किया जा रहा है। मनुष्य शरीर और प्राण दोनों का ही समन्वय है।
उपासना को नित्य कर्म माना गया है। शरीर की भूख बुझाने जीवन-यापन के लिए उपयुक्त शक्ति संग्रह के लिए- आहार करना नित्य कर्म है। मल विसर्जन स्नान आदि की स्वच्छता भी नित्य कर्म है। इसी प्रकार आत्मा को भोजन देने- आत्मबल संचय करके उत्कर्ष की क्षमता प्राप्त करने के लिए उपासना भी नित्य कर्म है। कपड़े धोना, झाडू लगाना, स्नान, दन्तमंजन आदि स्वच्छता कर्मों की तरह ही मनः क्षेत्र पर आये दिन जमने वाले कषाय-कल्मषों का परिशोधन करना भी नित्य उपासना का एक प्रयोजन है।
उपासना एवं साधना का उद्देश्य यह है कि जीवन अपनी मलीनताओं से छुटकारा प्राप्त करने का प्रयत्न करे और अपने इष्टदेव की-भगवान की- समीपता समता प्राप्त करता हुआ आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ता चला जाय। इस प्रगति का परिचय इसी कसौटी पर मिलता है कि व्यक्ति ने संकीर्ण स्वार्थपरता को किस सीमा तक छोड़ा और अपनी आत्मीयता का विस्तार कितनी परिधि तक फैलाया।
उपासना का कल्पवृक्ष अवश्य बोयें किन्तु साथ ही अंश दान से उसके पोषण का प्रबन्ध भी करें। यही अनादि काल से होता है और यही अनन्त काल तक चलता रहेगा। अध्यात्म के सत्परिणाम देखने हो तो वृक्षारोपण के साथ साथ उसके लिए खाद पानी का प्रबन्ध भी किया जाना चाहिए।
उपासनात्मक विधि-विधान पर। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि उपचारों को देवता से वरदान झटकने का जादू समझकर बाल बुद्धि उतने भर को ही सब कुछ मान बैठती है- अंश दान की बात वे उपेक्षा के गर्त में फेंक देती हैं। हमें यह देखकर निराशा होती है कि बीज बोने में तो बच्चे भारी दौड़-धूप करते हैं किन्तु अंकुर में खाद, पानी लगाने की आवश्यकता न समझते। यह तथ्य है कि भगवत् भक्ति के सारे विधि-विधान-परमार्थ प्रयोजनों के लिए अंश दान में कृपणता बरतने पर निष्प्राण और निरर्थक बनकर रह जाते हैं। मरुभूमि में बोया हुआ बीज खाद, पानी के अभाव में नष्ट ही हो जाता है।
उपासना की निरर्थकता नहीं बताई जा रही है। उसे कलेवर कहा जा रहा है और सेवा साधना को प्राण के रूप में प्रतिपादित किया जा रहा है। मनुष्य शरीर और प्राण दोनों का ही समन्वय है। इनमें से कोई भी अकेला होने पर अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर सकता । उपासना में हमें श्रद्धावान होना चाहिए साथ ही सेवा साधना की गरिमा के प्रति भी निष्ठा में त्रुटि नहीं आने देनी चाहिए।
उपासना में निरत साधकों को छोटे या बड़े रूप में- दैनिक अथवा सामयिक यज्ञ आयोजनों के लिए यथासम्भव प्रयत्नशील रहना चाहिए। गायत्री जप और यज्ञ कृत्य के मिलने से सर्वांगपूर्ण साधना का लाभ मिलता है।
उपासना के निमित्त ही समर्पित रहा है। इसके अतिरिक्त जो भी सम्पर्क में आया है उसे आस्तिकता अपनाने और उपासना में संलग्न होने का परामर्श देते रहे हैं। इसका सत्परिणाम भी सामने आया है। ईश्वर भक्ति का आश्रय लेकर जिन सत्परिणामों का लाभ मिला है, उस पर हमें सन्तोष है, साथ ही इस प्रेरणा द्वारा लाभान्वित होने वालों को देखकर भी यह विश्वास दिन-दिन बढ़ा है कि ईश्वर की समीपता के लिए किये गये प्रयत्न मनुष्य के लिए हर दृष्टि से श्रेयस्कर ही सिद्ध होते हैं।
उपासना की अपेक्षा अनुष्ठान पुरश्चरणों का विशेष महत्व एवं परिणाम बताया गया है। यह उचित ही है। उपासना में निर्धारित क्रिया-कृत्य कर लेना ही पर्याप्त माना जाता है, पर अनुष्ठान पुरश्चरणों में साधक को कितने ही प्रकार के प्रतिबन्ध उस अवधि में लगाने पड़ते हैं और तपस्वी जैसा जीवन जीना पड़ता है। (1) उपवास (2) ब्रह्मचर्य (3) भूमिशयन (4) अपनी शारीरिक सेवा अपने हाथों करना (5) चमड़े से निर्मित वस्तुओं का त्याग यह पाँच नियम स्थल आचरण में पालन किये जाने के हैं। शारीरिक, मानसिक और आर्थिक पापों से बचना सज्जनोचित रीति, नीति अपना कर उन दिनों उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व से भरा पूरा जीवन निर्वाह करना पड़ता है।
उपासना का निश्चित रूप से अधिक प्रतिफल होता है। आत्मबल संवृद्धि की दिशा में बढ़ने के लिए उपयुक्त प्रकाश प्राप्त करना इन अनुष्ठान पुरश्चरणों का प्रमुख प्रयोजन होता है। साधन की कठिनता के अनुरूप ही उनकी उपलब्धियाँ भी बढ़ी-चढ़ी होती हैं।
उपासना लोक मण्डल के सत्प्रयोजनों में संलग्न रहकर की जा सकती है।
उपासना को भी नित्य कर्म में सम्मिलित रखा जाता है। ठीक इसी प्रकार अंश दान हमारा नित्य कर्म होना चाहिए। स्थूल संपत्ति के रूप में धन और सूक्ष्म संपत्ति के रूप में श्रम सद्भाव संवर्धन के लिए नित्य ही नियोजित किया जाना चाहिए। यही है अंश दान, जिसके आधार पर दृष्टिकोण की उदारता और अन्तःकरण में विकसित आत्म भाव का प्रमाण मिलता है।
उपासना को एक पक्ष और अंशदान को उसका पूरक दूसरा पक्ष मानते हैं इसलिए दोनों तथ्यों पर समान रूप से बल देते हैं। एकाँगी प्रयासों में असफलता ही हाथ लगती है। अस्तु हमें उपेक्षित पक्ष की वकालत इन पंक्तियों में अधिक जोर देकर करनी पड़ रही है और कहना पड़ रहा है कि ईश्वर भक्ति का रथ दोनों पहियों वाला होना चाहिए। हमारे प्रति व्यक्तिगत स्नेह सौजन्य प्रकट करना हो तो भी उसकी प्रामाणिकता हमारा अनुरोध आग्रह स्वीकार करने के रूप में यथार्थवादी होनी चाहिए।
उपासना के लिए जो नित्य विधान है। उसे सन्ध्या कहते हैं। सन्ध्या, दिन और रात्रि के मिलन काल को कहते हैं। प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व का और सायं सूर्यास्त से पीछे का समय सन्ध्या काल माना गया है। इस समय सन्ध्या वन्दन कृत्य आवश्यक हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-June
उपासना कहा गया है। प्राचीनकाल में इस दिशा में उत्साहवर्धक प्रगति हुई थी और इस विद्या के विशेषज्ञों ने अपनी उपलब्धियों को ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में सर्व साधारण के सामने रखा था। अपने शरीर और मस्तिष्क को एक अच्छी-खासी वैज्ञानिक प्रयोगशाला के रूप में परिणत करके उन्होंने इस तथ्य को प्रमाणित किया था कि “पूर्ण मदः पूर्ण मिदं” पूर्ण से उत्पन्न हुआ यह भी पूर्ण है। आवश्यकता केवल प्रसुप्ति को जागृति में परिणत करने भर की है। ‘साधना’ इसी प्रयत्न का नाम है।
उपासना सूर्य सेवन से और आध्यात्मिक उपासना तेजस् का ध्यान करते हुए की जा सकती है। उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर आशाजनक प्रभाव पड़ता है।
उपासना गृह वन्य स्थलों में इसी कारण रखे जाते थे कि वहाँ ओषजन पर्याप्त मात्रा में मिलती है और ध्यान की एकाग्रता अधिक सम्भव हो जाती है। प्राकृतिक स्थानों पर रोगियों को रहने की आज भी सलाह दी जाती है।
उपासना तेजस् का ध्यान करते हुए की जा सकती है। उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर आशाजनक प्रभाव पड़ता है।
उपासना, उपचार और साधना व्यवहार की उभय-पक्षीय प्रक्रिया आरम्भ करके प्रखर अध्यात्म का पुनर्निर्माण करने में कटिबद्ध होना चाहिए।
उपासना द्वारा सम्भव होती है।
उपासना करने वालों को प्रसन्न होकर वरदान देने वाला समझा जाता है। अब गहन अन्वेषण ने उसे पृथ्वी की जड़-चेतन सत्ता में विविध-विधि स्पन्दन उत्पन्न करने वाला शक्ति स्रोत माना जाता है और स्वीकार किया जाता है कि धरती पर जितना कुछ जीवन तत्व है-जितनी भी हलचल है उसका उद्गम केन्द्र सूर्य सत्ता में ही सन्निहित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-August
उपासना प्रक्रिया का उद्देश्य इसी संवेदना को उभारना और परिपुष्ट करना है। भगवान को व्यक्ति विशेष मानकर उसे प्रशंसा और उपहार देकर प्रसन्न करने की बात तो मात्र अबोध बालक ही सोच सकते हैं। प्रौढ़ावस्था में यह स्थित उपहासास्पद मानी जाती है। विकसित दृष्टिकोण में ईश्वर प्राप्ति के प्रयासों में चेतना को अतिमानव स्तर पर विकसित करना ही एकमात्र लक्ष्य रह जाता है। इस प्रयास में सफल साधकों को देवात्मा कहते हैं परमात्मा का मिलन देवात्मा स्तर की पहुँची हुई पृष्ठभूमि पर ही सम्भव होता है।
उपासना को अपनाने से ही चेतना की परतों पर दिव्य अवतरण सम्भव होता है।
उपासना का अधिक उच्चस्तरीय प्रतिफल प्राप्त किया जा सकता है। संसार के अवतारी महामानवों का उज्ज्वल यश और प्रकाश स्वयं धन्य बनता और दूसरों को धन्य बनाता है यह लोक साधना की तपश्चर्या का ही प्रतिफल है।
उपासना का उद्देश्य है। इस सफलता का परिचय क्षुद्रता के परित्याग और महानता के वरदान की परख से जाना जा सकता है। जिसमें जितनी ईश्वरीय अन्तर्दृष्टि होगी उसका ब्रह्मवर्चस भी उतना ही प्रचण्ड होगा। फलतः उसकी सत्ता अपने समय के अति महत्वपूर्ण प्रयोजनों को सिद्ध कर रही होगी। अवतारों को इसी रूप में देखा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-November
उपासना स्थल में धूपबत्ती जलाकर, गुलदस्ता सजाकर, चन्दन, कपूर आदि के लेपन या इत्र -गुलाबजल के छिड़काव द्वारा सुगन्ध पैदा की जाती है और उपासना अवधि में उसी की अनुभूति को सहज बनाया जाता है। यह अनुभूति गहरी होती चले, तो साधना स्थल से बाहर निकलने पर, बिना किसी गन्ध-उपकरण के भी दिकगन्ध आती रहेगी। ऐसी दिकगन्ध, एकाग्रता की अभिरुचि का चिन्ह है। विभिन्न पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ों में घ्राण-शक्ति का महत्व सर्वविदित है। उसी के सहारे वे रास्ता ढूँढ़ते शत्रु को भाँपते और सुरक्षा का प्रबन्ध करते, प्रणय-सहचर को आमंत्रित करते, भोजन की खोज करते तथा मौसम की जानकारी प्राप्त करते हैं।
उपासना अवधि में उसी की अनुभूति को सहज बनाया जाता है। यह अनुभूति गहरी होती चले, तो साधना स्थल से बाहर निकलने पर, बिना किसी गन्ध-उपकरण के भी दिकगन्ध आती रहेगी। ऐसी दिकगन्ध, एकाग्रता की अभिरुचि का चिन्ह है। विभिन्न पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ों में घ्राण-शक्ति का महत्व सर्वविदित है। उसी के सहारे वे रास्ता ढूँढ़ते शत्रु को भाँपते और सुरक्षा का प्रबन्ध करते, प्रणय-सहचर को आमंत्रित करते, भोजन की खोज करते तथा मौसम की जानकारी प्राप्त करते हैं।
उपासना बीज को खाद, पानी देने वाली जीवन-साधना में कोई रुचि है या नहीं। साधना के अविच्छिन्न अंग स्वाध्याय, संयम और सेवा की ओर भी ध्यान दिया गया है या नहीं। शिष्य होने का दावा करते और जिह्वाग्र भाग से गुरुदेव कहते तो कितने ही सुने जाते हैं, पर अपने परिवार में प्रवेश करने की पहली और अनिवार्य शर्त न्यूनतम एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य ज्ञान-यज्ञ के लिए निकालते रहने को कितने लोग पालन करते हैं, यह जाँचने पर भारी निराशा होती है। लगता है कर्मनिष्ठा का युग लद गया और वाचालता ने उसका स्थान हथिया लिया है। परिजनों ने यदि स्वार्थ परमार्थ का समन्वय किया होता तो निश्चय ही वे व्यक्तिगत लोभ, मोह के लिए जितनी भाग दौड़ करते और चिन्तित रहते हैं उतना ही उत्साह लोक-निर्माण के क्रिया-कलापों में भी प्रस्तुत करते।
उपासना क्रम में की जाने वाली खेचरी साधना के लिए शिथिलीकरण और मन को रिक्त करने की अलग से प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं। मन्त्र-जाप की उत्कृष्ट स्थिति में, जब चिन्तन एकाग्र और एकरस हो जाता है, जो शरीर-मन स्वयमेव उसी स्थिति में पहुँच जाते हैं।
उपासना में किया कर्त्तव्य ही मानता और ऐसा ही अनुभव करता है। प्राणी मात्र से इस प्रकार की एकात्मता, अध्यात्म योग की वह कोटि है, जो बड़े-बड़े जप, तप तथा साधना, उपवास से भी कठिनतापूर्वक पाई जा सकती है।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-February
उपासना क्षेत्र में गायत्री को ही प्रमुखता देनी होगी।
उपासना में आस्तिकता को−ईश्वर भक्ति को परमात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित करने वाले प्रयोग प्रयोजनों को अनिवार्य माना गया है। उपासना साधना की पृष्ठभूमि इसी केन्द्र बिन्दु पर आधारित है।
उपासना कक्ष का वातावरण भिन्न रखा जाता है और वहाँ की परिस्थितियां ऐसी बनाई जाती हैं जिनमें बैठने पर उत्कृष्टता की अनुभूति बढ़ने से सुविधा मिल सके।
उपासना−एक घण्टे स्वाध्याय को मिला कर दो घण्टे का भाव परिष्कार साधना बनती है। दो घण्टे इस चिन्तन को कर्मरूप में परिणत करने के लिए लगने चाहिएं। लोक−मंगल के परमार्थ प्रयोजनों में यह समय लगना चाहिए। व्यक्तिगत जीवन ही सब कुछ नहीं है−अपने लिए जिन्दा रहते वासना, तृष्णा की और मरने के बाद स्वर्ग मुक्ति की बात सोचते रहना स्वार्थ साधन ही कहा जायगा। मनुष्य जीवन ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए−इस संसार को अधिक सुन्दर, सुव्यवस्थित, सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए मिला है।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों के साथ−साथ जीवन−साधना का क्रम भी चलना चाहिए। पूजा और पाठ का बीजारोपण, उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व के रूप में अंकुरित और पल्लवित होना चाहिए।
उपासना का प्रचार और मार्ग−दर्शन करना पड़ रहा है। इस अवधि में कितने ही लोगों ने यह साधना−क्रम आरम्भ किया था और किसी न किसी रूप में हमारा सहयोग लिया था। इनमें से कुछ तो निष्ठापूर्वक हमारे कदम से कदम मिलाकर बढ़ते चले आये हैं और आत्मिक प्रगति की दृष्टि से आज वहाँ हैं जिस पर वे और हम दोनों ही सन्तोष व्यक्त कर सकते हैं। किन्तु कितने ही ऐसे भी रहे हैं जिनका उत्साह देर तक स्थिर न रह सका। कारणवश उनमें शिथिलता आई और वह प्रयास छूट गया।
उपासना कृत्य भी विशुद्ध रूप से भौतिक है। इससे आत्मिक प्रगति जैसा कोई लाभ मिल नहीं सकेगा। यदि उतने समय शरीर रहित−भौतिक प्रभावों से मुक्त−ज्योतिर्मय आत्मा ही ध्यान में है और उसमें महाज्योति के साथ समन्वित हो जाने की दीप−पतंग जैसी आकाँक्षा उठ रही है, तो समझना चाहिए कि उपासना का सच्चा स्वरूप अपना लिया गया और उससे अभीष्ट उद्देश्य पूरा हो सकने की सम्भावना बन रही है।
उपासनाओं को रखकर तोला जाय तो गायत्री ही भारी बैठती है। राम, कृष्ण आदि अवतारों की−देवताओं और ऋषियों की उपासना पद्धति गायत्री ही रही है। उसे सर्वसाधारण के लिए उपासना अनुशासन माना गया है और उसकी उपेक्षा करने वाली की कटु शब्दों में भर्त्सना हुई है। सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिए की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप से महत्व मिला है। गायत्री, गंगा, गीता, गौ और गोविन्द हिन्दू धर्म के पाँच प्रधान आधार माने गये हैं, इनमें गायत्री प्रथम है।
उपासना है।
उपासना में लगना चाहिए। महात्मा गाँधी, बिनोवा, विवेकानन्द आदि असंख्य आत्मिक प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँचे हुए व्यक्ति एक घण्टा भगवत् चिंतन में निरत रहकर समुचित सामर्थ्य प्राप्त करते रहे हैं। ठीक तरह बन पड़े तो इतना समय किसी भी दृष्टि से कम नहीं है। स्वर्ण−जयन्ती साधना वर्ष के उपलक्ष में चल रही 45 मिनट की प्रातःकालीन उपासना और प्रातः सायं का आत्मबोध, तत्वबोध, चिन्तन क्रम मिलाकर प्रायः एक घण्टा ही हो जाता है। इतनी उपासना, श्रद्धा एवं तत्परता मनोयोगपूर्वक निभती चली जाय तो समझना चाहिए कि आत्मिक प्रगति का सुनिश्चित आधार बन गया।
उपासना को बीजारोपण की उपमा दी जा सकती है, इसे बन्दूक और कारतूस का समन्वय भी कहा जा सकता है। उभय−पक्षीय व्यवस्था बन पड़ने पर ही आत्मिक प्रगति का रथ ठीक तरह अग्रसर होता है। दोनों पहिये समान आकार−प्रकार के और सही सुदृढ़ होने चाहिएं।
उपासना में घड़ी की सहायता से 45 मिनट का पता चल सकता है, पर जप में गति की न्यूनाधिकता रहने से संख्या की जानकारी बिना माला के नहीं हो सकती। वस्तु नवरात्रि साधना में गणना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए माला का उपयोग आवश्यक माना गया है।
उपासना ही हमें सर्वश्रेष्ठ लगी है तदनुसार जिनने भी हमारा परामर्श एवं सहयोग माँगा है, उन्हीं के लिए कहा है। अन्य कोई मार्ग देखा ही नहीं तो उसका मार्ग−दर्शन किया भी कैसे जा सकता है।
उपासना में संलग्न होना चाहिए। उसी समय आकाशवाणी ने ब्रह्माजी को गायत्री मन्त्र सुनाया। ब्रह्मा ने उसकी उपासना की। शक्ति पाई। सृष्टि रची और ज्ञान की धारा गायत्री और विज्ञान की धारा सावित्री को प्रवाहित करके जीवधारियों के लिए सुख−शांतिदायिनी गंगा−यमुना बहाई।
उपासना में शरीर को आलस्य लगने और मन में अरुचि रहने की शिकायत तब तक बनी ही रहेगी जब तक लौकिक महत्वाकाँक्षाएँ सारे चिन्तन क्षेत्र को पकड़−जकड़कर बैठी रहेंगी। ईश्वर प्राप्ति की आत्मिक प्रगति की महा यात्रा आरम्भ हुई तब माननी चाहिए जब उत्कृष्टता का जीवन−लक्ष्य निर्धारित कर लिया जाय। अन्यथा साँसारिक मनोकामनाओं की मनौती मनाने के लिए पूजा−पाठ की उपहासास्पद विडंबना तो सर्वत्र फैली पड़ी है ही।
उपासना का तत्वज्ञान, स्वरूप, आधार और प्रयोग हर महीने विस्तारपूर्वक समझाया जा सकता है। पर अनुसदस्य तो केवल उपासना प्रक्रिया ही जान पायेंगे और इस सन्दर्भ का तत्वज्ञान उन तक छन−छनकर ही थोड़ा बहुत पहुँच पावेगा। स्कूल में नियमित रूप से पढ़ने वाले छात्रों में और घर पर ही अभ्यास करके परीक्षा देने वाले छात्रों में कुछ तो अन्तर रहता ही है। वह कमी तो यहाँ भी रहेगी फिर भी न कुछ से कुछ अच्छा की उक्ति के अनुसार यह स्थानीय साधना मंडलियाँ भी कुछ उपयोगी ही कार्य करेंगी और उतने से भी बहुतों का बहुत कल्याण होगा। अस्तु जहाँ भी−जिनके लिए भी जो सम्भव हो वह प्रयत्न उन्हें अपनी स्थिति और सुविधा के अनुसार आरम्भ कर देना चाहिए और स्थानीय साधना मंडली की व्यवस्था यथासम्भव जल्दी ही बना लेनी चाहिए।
उपासना क्रम में स्वयं सम्मिलित होने (2) दोनों नवरात्रियों की तपश्चर्या करने (3) अनुसाधक तलाश करके उनकी स्थानीय मण्डली चलाने एवं (4) चार दिवसीय सत्र व्यवस्था बनाने के चार कार्यों का अनुरोध किया गया है। इसके लिए आरम्भ के दो महीने कुछ अधिक सोचने, करने और तैयारी का ढाँचा बिठाये में लगेंगे। इसके बाद तो निश्चिन्ततापूर्वक शेष वर्ष की साधना प्रक्रिया में ही निरत रहना होगा। स्मरण रखने योग्य यह है कि 45 मिनट की उपासना एवं नवरात्रि आदि की तपश्चर्या पर जितना ध्यान दिया जाना है उतना ही जीवन साधना का आश्रय लेकर अपने गुण, कर्म, स्वभाव का दृष्टिकोण एवं क्रिया−कलाप का भी परिमार्जन, परिशोधन किया जाना है। जीवन साधना को−उर्वरा भूमि की और उपासना को बीजारोपण की उपमा दी जा सकती है, इसे बन्दूक और कारतूस का समन्वय भी कहा जा सकता है।
उपासना का त्रिविधि स्वरूप। गायत्री मन्त्र में तीन व्याहृतियाँ इसीलिए हैं। आठ−आठ अक्षरों के तीन चरण होने के कारण इस महाशक्ति को त्रिपदा कहा गया है। उपासना के इन तीनों आधारों को अपना कर गायत्री मन्त्र के सहारे अथवा कोई और अवलम्बन अपना कर ईश्वर की साकार निराकार जो भी उपासना अपनाई जायगी निश्चित रूप से सफल होगी और अभीष्ट सत्परिणाम उत्पन्न करेगी।
उपासना विधान हैं पर जहाँ तक गुरु मन्त्र शब्द का सम्बन्ध है वह गायत्री के साथ ही जुड़ा हुआ है। कोई गुरु किसी अन्य मन्त्र की साधना सिखाये तो उसे गुरु का दिया मन्त्र तो कहा जा सकता है, पर जब भी गुरु मन्त्र शब्द को शास्त्रीय परंपरा के अनुसार प्रयुक्त किया जायगा तो उसका तात्पर्य गायत्री मन्त्र से ही होगा। इस्लाम धर्म में कलमा का −ईसाई धर्म में बपतिस्मा का जो अर्थ है वही हिन्दू धर्म में अनादि गुरु मंत्र गायत्री को प्राप्त है।
उपासनाएँ चलती हैं। राम भक्त उन दिनों रामायण पारायण और कृष्ण भक्त गीता पारायण करते हैं। देवी उपासकों में दुर्गा पाठ के विभिन्न उपचार चलते हैं। इन दिनों व्रत, उपवास करते हैं।
उपासना और स्वाध्याय की चर्चा ऊपर हो चुकी। संयम का अर्थ सादगी, मितव्ययिता होता है जिसे व्यक्तित्व के उत्कर्ष का योगाभ्यास कहा गया है। चौथा चरण सेवा साधना है। इसे अपनाये बिना सद्भावनाओं को सत्प्रवृत्तियों का रूप धारण करने का अवसर ही नहीं मिल पायेगा और परमार्थ चिन्तन के अंकुर खाद पानी के अभाव में मुरझाते सूखते चले जाएंगे। सेवा साधना से बच कर मात्र भजन, पूजन में निरत रहने वाले तथाकथित साधक इसी कारण छूंछ रहते हैं कि वे उदारता को चरितार्थ करने वाला सत्साहस जुटा नहीं पाते और व्यक्तिगत उपलब्धियों की संकीर्णता में ही घिर कर रह जाते हैं।
उपासना का छोटा −सा प्रयोग भी फुरसत न मिलने की आड़ में समाप्त हो जाता है। मन भी उस प्रयोजन में नहीं लगता। इसमें मन का कोई दोष नहीं, उस पर जो भी प्राथमिकता छाई रहेगी उसी में उसकी रुचि एवं तत्परता रहेगी। यदि भौतिक लाभ ही एकमात्र लक्ष्य बने हुए हैं तो आत्मिक प्रयोजन जो लगभग विपरीत पड़ते हैं उनमें एकाग्रता कैसे बनेगी? दुहरा रोल कैसे प्रस्तुत किया जा सकेगा?
उपासना का दूसरा आधार कर्मकांडों का क्रिया−कृत्य और तीसरा आधार भावना क्षेत्र में दिव्य उभार उत्पन्न करना होता है। यह दोनों ही आधार अपने आप में अति महत्वपूर्ण हैं। उनसे चेतना को बदलने एवं ढालने में असाधारण सहायता मिलती है।
उपासना यदि उदारता से विकसित हो सके तो ही यह समझा जाना चाहिए कि रोपा गया पौधा बढ़ा, फला−फूला और अपने अस्तित्व को सार्थक बना सकने में समर्थ हुआ।
उपासना का उच्चस्तरीय दर्शन विराट् स्वरूप के रूप में देखा जा सकता है। यह समस्त विश्व−ब्रह्माण्ड ईश्वर की साकार प्रतिमा है, ऐसा मानकर चलने से लोक−मंगल की, जन सेवा की, विश्व−कल्याण की आकाँक्षा उभर कर आती है। रामायण की एक चौपाई में− ‘‘सियाराम भय सब जग जानी’’ की स्थापना है। ‘ईशावास्थ मिदं सर्व’ जैसी उक्तियाँ प्रत्येक अध्यात्म ग्रन्थ में पन्ने−पन्ने पर अंकित है। कितने ही उपाख्यानों में इस विराट् दर्शन की चर्चा है।
उपासना के साँसारिक विचार न आयें इसका एक ही उपाय है कि उन क्षणों के लिए एक निर्धारित विचार पद्धति सामने रहे। वह भी दृश्य मुक्त−आकर्षक स्तर की ऐसी हो जो मन को अपने शिकंजे में पकड़े रहे। यों वैज्ञानिकों जैसे गहरे चिन्तन से भी हो सकता है, पर वैसे बहुत समय के अभ्यास और एकाग्र एकात्म स्तर मिल जाने पर ही सम्भव है। आरम्भ में दृश्य मुक्त चिन्तन मनःक्षेत्र पर छाया रहे ऐसा ही अभ्यास लेकर चलना चाहिए। ध्यान इसी को कहते हैं उपासना में ध्यान अनिवार्य है।
उपासना के इन तीनों आधारों को अपना कर गायत्री मन्त्र के सहारे अथवा कोई और अवलम्बन अपना कर ईश्वर की साकार निराकार जो भी उपासना अपनाई जायगी निश्चित रूप से सफल होगी और अभीष्ट सत्परिणाम उत्पन्न करेगी।
उपासना का क्रिया−कृत्य अन्तरंग और बहिरंग स्तर का ऐसा ‘माहौल’ बनना चाहिए जिससे व्यक्ति के भावनात्मक स्तर में उत्कृष्टता की अभिवृद्धि होती हो। बहिरंग वातावरण बनाने में पूजा उपासना में प्रयुक्त होने वाली प्रतीक प्रतिमा−उसका सज्जा शृंगार पूजा उपचार में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ उपकरण आदि का मिला जुला स्वरूप अपना काम करता है पूजा वेदी के समीप बैठने पर ऐसा लगना चाहिए मानो किन्हीं असाधारण दिव्य परिस्थितियों में जा पहुँचे। मन्दिर, देवालय पूजाग्रह, देवपीठ, आराधना कक्ष को बनाने में उपयुक्त वातावरण बनाने का तथ्य ही प्रधान रूप से काम करता है। वहाँ के सुसज्जा साधन सँजोने में इसी बात का ध्यान रखा जाता है कि उस स्थान में जाते ही मन अपने आपको पवित्रता की दिव्य परिस्थितियों से घिरा हुआ अनुभव करने लगे। सामान्य वातावरण से उपासना कक्ष का वातावरण भिन्न रखा जाता है और वहाँ की परिस्थितियां ऐसी बनाई जाती हैं जिनमें बैठने पर उत्कृष्टता की अनुभूति बढ़ने से सुविधा मिल सके।
उपासना का तीसरा प्रयोजन है मनःक्षेत्र पर ईश्वरीय सान्निध्य का चिन्तन घटाटोप की तरह छाये रहना। सामान्य जीवन में आत्म सत्ता शरीर रूप में ही काम करती है अस्तु अपना आपा शरीर मात्र ही अनुभव होने लगता है। शरीर से सम्बन्धित समस्याओं का विस्तार अत्यधिक है। उनके खट्टे मीठे स्वाद भी चित्र−विचित्र हैं और वे सभी बड़े आकर्षक हैं। यों प्रिय अप्रिय स्तर की परस्पर विरोधी अनुभूतियाँ सामने आती हैं, पर वे दोनों ही अपने−अपने ढंग के गहरे प्रभाव चेतना पर छोड़ती हैं।
उपासना के क्रिया−कृत्य में (1) स्थापना सुसज्जा के आधार पर वातावरण का निर्माण (2) प्राणायाम, न्यास, पूजा, उपचार आदि क्रिया−कृत्यों द्वारा विचारणा की क्रिया रूप में परिणित (3) जप के साथ ध्यान का अवलम्बन और दिव्य सत्ता के साथ ऐसे सघन तादात्म्य की स्थापना जो चिन्तन क्षेत्र में उत्कृष्टता और क्रिया क्षेत्र में आदर्शवादिता अपनाने के लिए विवश कर सके। यही है उपासना का त्रिविधि स्वरूप। गायत्री मन्त्र में तीन व्याहृतियाँ इसीलिए हैं। आठ−आठ अक्षरों के तीन चरण होने के कारण इस महाशक्ति को त्रिपदा कहा गया है। उपासना के इन तीनों आधारों को अपना कर गायत्री मन्त्र के सहारे अथवा कोई और अवलम्बन अपना कर ईश्वर की साकार निराकार जो भी उपासना अपनाई जायगी निश्चित रूप से सफल होगी और अभीष्ट सत्परिणाम उत्पन्न करेगी।
उपासना से ही सम्भव होता है। भूमि की उर्वरता और बीज की प्रखरता का महत्व तो है ही, पर साथ ही अनुभवी माली का सहयोग मिल जाय तो पौधे के सुविकसित होने की सम्भावना और भी अधिक सुनिश्चित रहती है। इस वर्ष के साधना−क्रम में सौभाग्य से ऐसा ही संयोग जुड़ गया है।
उपासना तो थोड़े समय तक होने से भी काम चल सकता है, पर साधना तो हर घड़ी चलती रहनी चाहिए। मन, वचन और कर्म का स्तर ऊंचा रखकर जो सोचा, बोला और किया जाता है, वह सब कुछ योगाभ्यास की तरह सत्परिणाम उत्पन्न करता है। कर्मयोग की साधना सर्वांगपूर्ण है। वह जीवन−लक्ष्य को प्राप्त करने और अगणित दिव्य सिद्धियों को प्रदान करने में सुनिश्चित रूप से सफल होती है।
उपासना से वैसी ही विशेषताओं का बढ़ना स्वाभाविक है। कीट भृंग का उदाहरण प्रसिद्ध है टिड्डे हरी घास में रहते हैं तो उनका शरीर हरा रहता है पर जब वे सूखी घास में रहने लगते हैं तो पीले पड़ जाते हैं। तितलियाँ फूलों के अनुरूप अपने रंग बदलती रहती हैं। समीपता के अनुरूप ढलने के अगणित उदाहरण सर्वत्र पाये जाते हैं। वातावरण की प्रभाव शक्ति को कौन नहीं जानता।
उपासना साधना की पृष्ठभूमि इसी केन्द्र बिन्दु पर आधारित है।
उपासनात्मक विधि−विधान, जिसमें 45 मिनट नियमित जप ध्यान, हंसयोग तथा लययोग की प्रक्रिया सम्मिलित है। सोते और उठते समय का आत्मबोध चिन्तन और तत्वबोध मनन भी इसी से जुड़ा हुआ है। (2) जीवन के स्तर को परिष्कृत करने के लिए आत्म−चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की प्रक्रिया (3) दिव्य−सत्ता केन्द्र से मिलने वाले विशिष्ट अनुदान जो साधकों की श्रद्धा एवं सम्वेदना के आधार पर ग्रहण किये जाते एवं फलित बनते हैं।
उपासना मानता है और सत्कर्म में संलग्न रहकर ‘कर्त्तव्य−पालन में ईश्वर पूजा’ की उक्ति को सार्थक बनाता है।
उपासना का सच्चा स्वरूप अपना लिया गया और उससे अभीष्ट उद्देश्य पूरा हो सकने की सम्भावना बन रही है।
उपासना में मन लगना आवश्यक माना जाता है। भजन में मन न लगे तो निराशा होती है। उस बात में इतना और बढ़ा देना चाहिए कि हर उपयुक्त काम कर्मयोग है और उसमें श्रम ही नहीं पूरी तन्मयता का भी समावेश होना चाहिए। यदि हर काम में मन लगाने का अभ्यास हो जायगा तो भजन भी एक काम होने से उसमें भी मन लगेगा। जिनकी आदत आधे−अधूरे मन से− अन्यमनस्कता एवं उपेक्षापूर्वक काम करने की है उन्हें भजन में मन लगने की आशा नहीं करनी चाहिए।
उपासना में इष्टदेव के समीप अति समीप होने पर उनके साथ लिपट जाने −उच्चस्तरीय प्रेम के आदान−प्रदान की गहरी कल्पना करनी चाहिए। इसमें भगवान और जीव के बीच माता−पुत्र, पति−पत्नी, सखा−सहोदर, स्वामी, सेवक जैसा कोई भी सघन सम्बन्ध माना जा सकता है इससे आत्मीयता को अधिकाधिक घनिष्ठ बनाने में सहायता मिलती है। लोक व्यवहार में स्वजनों के बीच आदान-प्रदान उपहार और उपचार की तरह चलते हैं। मन, वचन कर्म से घनिष्ठता एवं प्रसन्नता व्यक्त की जाती है। भेंट उपहार से कई तरह की वस्तुएँ दी जाती हैं।
उपासना का असाधारण योगदान रहता है। इसी से तत्वदर्शियों ने उपासना को अत्यन्त आवश्यक नित्यकर्म माना है और उसे अपनाने पर होने वाले अनेकानेक लाभों का वर्णन किया है। वस्तुतः यह अवलम्बन ऐसा ही है− इसे अपनाकर हर व्यक्ति उज्ज्वल भविष्य की दिशा में अनवरत रूप से बढ़ते हुए पूर्णता का जीवन लक्ष्य पूरा कर सकता है।
उपासना के लिए प्रतीक पूजा-मूर्तिपूजा एक चिर−प्रचलित आधार है। इससे अपनी आस्तिकता को केन्द्रित एवं विकसित करने का आधार बनता है। पुस्तक के माध्यम से अध्ययन एवं मुगदर आदि व्यायाम उपकरणों के सहारे स्वास्थ सम्वर्धन की सुविधा होती है, इसी प्रकार प्रतीक पूजा से श्रद्धा संवर्धन का प्रयोजन पूरा होता है। यही कारण है कि साकारवादी ही नहीं निराकारवादी भी किसी प्रतीक में दिव्य सत्ता का समन्वय करके अपनी श्रद्धा का पोषण करते हैं। ईसाई धर्म में क्रूस, इस्लाम धर्म में काबा संगे असवद, पारसी और आर्यसमाजियों में अग्नि में दिव्यता का आरोपण किया गया है।
उपासना के क्रिया−काण्डों का महत्व उतना ही है कि वे अमुक स्तर के विचार उत्पन्न करने और उन्हें परिपक्व बनाने में महत्वपूर्ण साधन सिद्ध होते हैं। यदि विचार परिष्कार में उनसे कोई सहायता न मिले तो समझना चाहिए अन्य निरर्थक विडंबनाओं की तरह यहाँ भी लकीर ही पिट रही है। देवी−देवताओं को मन्त्र−तन्त्र द्वारा वश में करने की बात में इतना तथ्य है कि श्रद्धायुक्त विचार, मन्त्र का निष्ठा युक्त कर्म− तन्त्र−अपना प्रभाव जीवन प्रक्रिया पर अनिवार्य रूप से छोड़ते हैं और उनका सत्परिणाम साधन सिद्धि बनकर सामने आ खड़ा होता है।
उपासना द्वारा भौतिक ऋद्धियाँ एवं आत्मिक सिद्धियाँ प्राप्त करने का उल्लेख है। साधना विज्ञान में गायत्री उपासना को सर्वोपरि माना जाता रहा है। उसके माहात्म्यों का वर्णन सर्वसिद्धिप्रद कहा गया है और लिखा है कि तराजू के एक पलड़े पर गायत्री को और दूसरे पर समस्त अन्य उपासनाओं को रखकर तोला जाय तो गायत्री ही भारी बैठती है। राम, कृष्ण आदि अवतारों की−देवताओं और ऋषियों की उपासना पद्धति गायत्री ही रही है। उसे सर्वसाधारण के लिए उपासना अनुशासन माना गया है और उसकी उपेक्षा करने वाली की कटु शब्दों में भर्त्सना हुई है।
उपासना एवं नवरात्रि आदि की तपश्चर्या पर जितना ध्यान दिया जाना है उतना ही जीवन साधना का आश्रय लेकर अपने गुण, कर्म, स्वभाव का दृष्टिकोण एवं क्रिया−कलाप का भी परिमार्जन, परिशोधन किया जाना है। जीवन साधना को−उर्वरा भूमि की और उपासना को बीजारोपण की उपमा दी जा सकती है, इसे बन्दूक और कारतूस का समन्वय भी कहा जा सकता है। उभय−पक्षीय व्यवस्था बन पड़ने पर ही आत्मिक प्रगति का रथ ठीक तरह अग्रसर होता है। दोनों पहिये समान आकार−प्रकार के और सही सुदृढ़ होने चाहिएं।
उपासना का कलेवर तो विधि−विधानों और कर्मकाण्डों से सँजोया जाता है, पर उसका प्राण संबद्ध विचारणाओं और भावनाओं में ही सन्निहित रहता है। भाव में ही देवता की स्थापना मानी गई है। उन्हीं के कारण पाषाण प्रतिमा में देवत्व का प्रकटीकरण होता है।
उपासना के लिए ही समय की पाबन्दी रहे वरन् इन दिनों पूरी दिनचर्या ही नियमबद्ध रहे। सोने, खाने नहाने आदि सभी कृत्यों में यथासम्भव अधिक से अधिक समय निर्धारण और उसका पक्का पालन करना आवश्यक समझा जाय। अनुशासित शरीर और मन की अपनी विशेषता होती है और उससे शक्ति उत्पादन से लेकर सफलता की दिशा में द्रुत गति से बढ़ने का लाभ मिलता है। अनुष्ठानों की सफलता में भी यही तथ्य काम करता है।
उपासना में उत्साह था, पर अब वह छूट गया। ऐसे लोगों तक स्वर्ण−जयन्ती वर्ष की−साधन शृंखला की जानकारी पहुँचाई जानी चाहिए। यह कार्य उन्हें जनवरी, फरवरी के अखण्ड−ज्योति अंकों का साराँश बताकर समझाई जा सकती है। इससे यदि उनका उत्साह जगे तो उनका मार्ग−दर्शन करने का कार्य प्रविष्ट सदस्यों द्वारा स्वयं ही उठाया जा सकता है। चूँकि वे पत्रिका नहीं पढ़ते इसलिए भविष्य में भी आवश्यक निर्देश उन तक पहुँच न सकेंगे।
उपासना की विधि सामान्य नियमों के अनुरूप ही है। आत्म शुद्धि और देव पूजन के बाद जप आरम्भ हो जाता है। आरम्भ में सोहम और अन्त में खेचरी मुद्रा का नियम इसमें भी निवाहना पड़ता है। अन्तर इतना ही पड़ता है कि नित्य आधा घण्टा जप करना पड़ता था, वह अब बढ़ कर प्रायः ढाई−तीन घण्टे हो जाता है। जप के साथ सविता देवता के प्रकाश का अपने में प्रवेश होते पूर्ववत् अनुभव किया जायगा।
उपासना भले ही निष्फल चली जाय, पर जीवन देवता की आत्म−निर्माण साधना निश्चित रूप से अभीष्ट सिद्धि देकर ही रहती है।
उपासना अपनाई जायगी निश्चित रूप से सफल होगी और अभीष्ट सत्परिणाम उत्पन्न करेगी।
उपासना को सर्वोपरि माना जाता रहा है। उसके माहात्म्यों का वर्णन सर्वसिद्धिप्रद कहा गया है और लिखा है कि तराजू के एक पलड़े पर गायत्री को और दूसरे पर समस्त अन्य उपासनाओं को रखकर तोला जाय तो गायत्री ही भारी बैठती है। राम, कृष्ण आदि अवतारों की−देवताओं और ऋषियों की उपासना पद्धति गायत्री ही रही है। उसे सर्वसाधारण के लिए उपासना अनुशासन माना गया है और उसकी उपेक्षा करने वाली की कटु शब्दों में भर्त्सना हुई है। सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिए की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप से महत्व मिला है।
उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिए की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप से महत्व मिला है। गायत्री, गंगा, गीता, गौ और गोविन्द हिन्दू धर्म के पाँच प्रधान आधार माने गये हैं, इनमें गायत्री प्रथम है। बाल्मीक रामायण और श्रीमद्भागवत में एक−एक शब्द का सम्पुट लगा हुआ है। इन दोनों ग्रन्थों में वर्णित रामचरित्र और कृष्णचरित्र को गायत्री का कथा प्रसंगात्मक वर्णन बताया जाता है इन सब कथनोपकथनों का निष्कर्ष यही निकलता है कि गायत्री मन्त्र के लिए भारतीय धर्म में निर्विवाद रूप से सर्वोपरि मान्यता मिली है। उसमें जिन तथ्यों का समावेश है उन्हें देखते हुए निकट भविष्य में मानव जाति का सार्वभौम मन्त्र माने जाने की पूरी−पूरी सम्भावना है।
उपासना अधिक की जाय जैसे चार दिन अनुष्ठान चलाने के बाद किसी आकस्मिक कार्यवश बाहर जाना पड़ा। तब शेष पाँच दिन उस कार्य से वापस लौटने पर पूरे करने चाहिए। इसमें एक दिन व्यवधान का अधिक बढ़ा देना चाहिए अर्थात् पाँच दिन की अपेक्षा छह दिन में उस अनुष्ठान को पूर्ण माना जाय। स्त्रियों का मासिक धर्म यदि बीच में आ जाय तो चार दिन या शुद्ध न होने पर अधिक दिन तक रोका जाय और उसकी पूर्ति शुद्ध होने के बाद करनी जाय। एक दिन अधिक करना इस दशा में भी आवश्यक है।
उपासना में ईश्वरीय सान्निध्य की कल्पना ही नहीं अनुभूति भी अपेक्षित होती है। भावनिष्ठा को कार्यान्वित होते देख कर ही ऐसी मनःस्थिति बनती है। इसलिए यह सोचना होता है कि परमेश्वर प्रत्यक्ष ही, सचमुच ही सामने है और उनकी किसी जीवित व्यक्ति के उपस्थित होने पर की जाने जैसी अभ्यर्थना की जा रही है। आत्मशोधन और देवपूजन के दोनों की कृत्यों में इसी प्रकार का भाव समन्वय होता है। वह यदि बेगार भुगतने के उथले मन से किया गया है और जैसे−तैसे परम्परा गत लकीर पीटी गई हो−तो बात दूसरी है अन्यथा प्रयोजन के लिए यह प्रचलन हुआ है उसे ध्यान में रख कर चला जाय तो अन्तःक्षेत्र में अभीष्ट निष्ठा होगी और लगेगा कि निराकार परमेश्वर अपेक्षाकृत अधिक सघन− अधिक साकार बन कर सामने आया है।
उपासना के लिए तथा विशेष शक्ति संचय के लिए गायत्री उपासना ही हमें सर्वश्रेष्ठ लगी है तदनुसार जिनने भी हमारा परामर्श एवं सहयोग माँगा है, उन्हीं के लिए कहा है। अन्य कोई मार्ग देखा ही नहीं तो उसका मार्ग−दर्शन किया भी कैसे जा सकता है।
उपासना में प्रातः सायं की जाने वाली ‘संध्या विधि’ मुख्य है। संख्या कृत्य यों सम्प्रदाय मद में कई प्रकार किये जाते हैं, पर उन सब में गायत्री का समावेश अनिवार्य रूप से होता है। गायत्री को साथ लिए बिना संध्या सम्पन्न नहीं हो सकती। गायत्री को गुरु मन्त्र कहा गया है। यज्ञोपवीत धारण करते समय गुरु मन्त्र देने का विधान है।
उपासना और प्रातः सायं का आत्मबोध, तत्वबोध, चिन्तन क्रम मिलाकर प्रायः एक घण्टा ही हो जाता है। इतनी उपासना, श्रद्धा एवं तत्परता मनोयोगपूर्वक निभती चली जाय तो समझना चाहिए कि आत्मिक प्रगति का सुनिश्चित आधार बन गया। आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में विशेष तप साधना का उपक्रम बन जाया करे तो उसका प्रभाव भी छह−छह महीने बने रहने का महत्वपूर्ण आधार बन जायगा।
उपासना एवं स्वाध्याय को। आत्मिक प्रगति के चार सूत्र प्रख्यात हैं (1) साधना (2) स्वाध्याय, (3) संयम और (4) सेवा। इन चारों को चारपाई के चार पाये की तरह कमरे के चार कोनों की तरह, चार दिशाओं की तरह परस्पर अविच्छिन्न माना जाना चाहिए। उपासना और स्वाध्याय की चर्चा ऊपर हो चुकी। संयम का अर्थ सादगी, मितव्ययिता होता है जिसे व्यक्तित्व के उत्कर्ष का योगाभ्यास कहा गया है।
उपासना की। शक्ति पाई। सृष्टि रची और ज्ञान की धारा गायत्री और विज्ञान की धारा सावित्री को प्रवाहित करके जीवधारियों के लिए सुख−शांतिदायिनी गंगा−यमुना बहाई। गंगा और यमुना के मिलन−संगम पर तीर्थराज बना है। सर्दी−गर्मी की ऋतुओं के मिलने की तरह ही ज्ञान-विज्ञान की दो धाराओं का समन्वय गायत्री है।
उपासना पद्धति गायत्री ही रही है। उसे सर्वसाधारण के लिए उपासना अनुशासन माना गया है और उसकी उपेक्षा करने वाली की कटु शब्दों में भर्त्सना हुई है। सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिए की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप से महत्व मिला है। गायत्री, गंगा, गीता, गौ और गोविन्द हिन्दू धर्म के पाँच प्रधान आधार माने गये हैं, इनमें गायत्री प्रथम है। बाल्मीक रामायण और श्रीमद्भागवत में एक−एक शब्द का सम्पुट लगा हुआ है।
उपासना का अर्थ है समीपता। ईश्वर और जीव में यों समीपता ही है। जब भगवान कण−कण में संव्याप्त है तब मानवी काया एवं चेतना में भी वे समाये हुए क्यों नहीं होंगे। जो अपने में ओत−प्रोत ही है वह दूर कैसे? और जो दूर नहीं है उसकी समीपता का क्या अर्थ?
उपासना, श्रद्धा एवं तत्परता मनोयोगपूर्वक निभती चली जाय तो समझना चाहिए कि आत्मिक प्रगति का सुनिश्चित आधार बन गया। आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में विशेष तप साधना का उपक्रम बन जाया करे तो उसका प्रभाव भी छह−छह महीने बने रहने का महत्वपूर्ण आधार बन जायगा।
उपासना एक व्यायाम है। औषधि सेवन है। उसका समुचित लाभ ही इन सामयिक प्रयोगों को पूरे जीवन−क्रम के साथ जोड़ने से ही होता है। एक घण्टा व्यायाम करना पर्याप्त है उसके साथ आहार−विहार की सुव्यवस्था जुड़ी होने पर स्वास्थ संवर्धन होता चलेगा। एक समय दस रत्ती औषधि सेवन पर्याप्त है।
उपासना स्वाध्याय का समय भी इसी में से काटना पड़े तो भी दो−तीन घंटे लोक−मंगल के कार्यों के लिए बच रहते हैं। अपने युग का सबसे भयंकर संकट विकृत चिन्तन के कारण ही उत्पन्न हुआ है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता सामाजिक, नैतिक और बौद्धिक क्रान्ति की है। इसके लिए अपना ज्ञान−यज्ञ अभियान युग−निर्माण आन्दोलन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। लोक सेवा के लिए इससे बढ़कर इन दिनों और कोई कदम नहीं हो सकता।
उपासना कहा जा सकता है। जब कभी मानवी एकता से सूत्रों को चुना जाय तो आशा की जानी चाहिए गायत्री को महामन्त्र के रूप में स्वीकारा जायगा। हिन्दू धर्म के वर्तमान बिखराव को समेटकर उसके केन्द्रीकरण की एक रूपता की बात सोची जाय तो उपासना क्षेत्र में गायत्री को ही प्रमुखता देनी होगी।
उपासना के सम्बन्ध में भी यह तथ्य काम करता है। उदास मन से ज्यों−त्यों− जब, तब वह बेगार भुगत दी जाय तो उसके सत्परिणाम भी स्वल्प ही होंगे, पर यदि उसमें चुस्ती, फुर्ती की व्यवस्था और तत्परता बरती जायगी तो लाभ कई गुना दिखाई पड़ेगा। अनुष्ठान में सामान्य जप की प्रक्रिया को अधिक कठोर और अधिक क्रमबद्ध कर दिया जाता है अस्तु उसकी सुखद प्रतिक्रिया भी अत्यधिक होती है।
उपासना क्रम ठीक तरह चले इस पर आवश्यक ध्यान रखा जा रहा है और उन्हें प्रगति की दिशा में अग्रसर करने वाला आवश्यक सहयोग दिया जा रहा है। आशा की जानी चाहिए कि इस साधना उपक्रम से उतना लाभ उठाया जा सकेगा जितना कई वर्षों की−कई घण्टे की उपासना से ही सम्भव होता है। भूमि की उर्वरता और बीज की प्रखरता का महत्व तो है ही, पर साथ ही अनुभवी माली का सहयोग मिल जाय तो पौधे के सुविकसित होने की सम्भावना और भी अधिक सुनिश्चित रहती है। इस वर्ष के साधना−क्रम में सौभाग्य से ऐसा ही संयोग जुड़ गया है।
उपासना प्रक्रिया ही जान पायेंगे और इस सन्दर्भ का तत्वज्ञान उन तक छन−छनकर ही थोड़ा बहुत पहुँच पावेगा। स्कूल में नियमित रूप से पढ़ने वाले छात्रों में और घर पर ही अभ्यास करके परीक्षा देने वाले छात्रों में कुछ तो अन्तर रहता ही है। वह कमी तो यहाँ भी रहेगी फिर भी न कुछ से कुछ अच्छा की उक्ति के अनुसार यह स्थानीय साधना मंडलियाँ भी कुछ उपयोगी ही कार्य करेंगी और उतने से भी बहुतों का बहुत कल्याण होगा। अस्तु जहाँ भी−जिनके लिए भी जो सम्भव हो वह प्रयत्न उन्हें अपनी स्थिति और सुविधा के अनुसार आरम्भ कर देना चाहिए और स्थानीय साधना मंडली की व्यवस्था यथासम्भव जल्दी ही बना लेनी चाहिए।
उपासना का समन्वय रहेगा। शिक्षार्थियों को एक 24 हजार गायत्री पुरश्चरण इसी पुनीत भूमि में रहकर करना होगा। सोऽहम् साधना, खेचरी मुद्रा, जप, ध्यान, आत्मशोधन, देव सान्निध्य की सभी साधनाएँ साथ−साथ चलेंगी। इन प्रयोजनों को ठीक तरह पूरा कर सकने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन एवं सहयोग सभी शिक्षार्थियों को मिलेगा। पूरे दस−दस दिन के यह सत्र होंगे।
उपासना की जाय, उसी के अनुरूप वरदान मिलते चले जायेंगे। अन्य किसी देवता की उपासना भले ही निष्फल चली जाय, पर जीवन देवता की आत्म−निर्माण साधना निश्चित रूप से अभीष्ट सिद्धि देकर ही रहती है।
उपासना काल है। यह सही हुआ या गलत, इसकी पहचान इतनी ही है कि उन क्षणों में मनःक्षेत्र पर आत्मिक स्तर का चिन्तन छाया रहा या भौतिक स्तर का। यदि साँसारिक मनोकामनाओं की उथल−पुथल मची हुई है और इष्टदेव से तरह−तरह के भौतिक वरदान पाने की ललक उठ रही हो तो समझना चाहिए कि यह उपासना कृत्य भी विशुद्ध रूप से भौतिक है। इससे आत्मिक प्रगति जैसा कोई लाभ मिल नहीं सकेगा। यदि उतने समय शरीर रहित−भौतिक प्रभावों से मुक्त−ज्योतिर्मय आत्मा ही ध्यान में है और उसमें महाज्योति के साथ समन्वित हो जाने की दीप−पतंग जैसी आकाँक्षा उठ रही है, तो समझना चाहिए कि उपासना का सच्चा स्वरूप अपना लिया गया और उससे अभीष्ट उद्देश्य पूरा हो सकने की सम्भावना बन रही है।
उपासना के साथ जुड़ा हुआ है। जीवन भर उसी के सम्बन्ध में चिन्तन−मनन किया गया है। साधना के नाम पर हमारे जीवन का जो भी बहुमूल्य समय लगा है उसका प्रत्येक क्षण गायत्री को आधार मानकर ही प्रयुक्त किया गया है। इस प्रयोग में जो अनुभव हुए हैं उनने व्यक्तिगत रूप से भी हमारी निष्ठा को क्रमशः अधिकाधिक परिपक्व ही किया है। ऐसी दशा में हमारा परामर्श भी अपने विश्वास एवं अनुभव के आधार पर ही हो सकता है।
उपासना का, उपक्रम बनाना पड़ता है। शरीर ठण्ड से काँप रहा हो तो आग की समीपता से आवश्यक गर्मी प्राप्त की जाती है। आदर्शवादिता से रहित मानव जीवन घिनौना ही कहा जायगा। जो पशु के लिए क्षम्य है वही मनुष्य के लिए अक्षम्य। पशु निर्वस्त्र रहते, खुले में मलमूत्र त्यागते और रति कर्म करते हैं।
उपासना अधूरी छोड़नी पड़े। ऐसी दशा में यह किया जाना चाहिए कि बीच में जितने दिन बन्द रखना पड़े उसकी पूर्ति आगे चलकर कर ली जाय इस व्यवधान की क्षति पूर्ति के लिए एक दिन उपासना अधिक की जाय जैसे चार दिन अनुष्ठान चलाने के बाद किसी आकस्मिक कार्यवश बाहर जाना पड़ा। तब शेष पाँच दिन उस कार्य से वापस लौटने पर पूरे करने चाहिए। इसमें एक दिन व्यवधान का अधिक बढ़ा देना चाहिए अर्थात् पाँच दिन की अपेक्षा छह दिन में उस अनुष्ठान को पूर्ण माना जाय। स्त्रियों का मासिक धर्म यदि बीच में आ जाय तो चार दिन या शुद्ध न होने पर अधिक दिन तक रोका जाय और उसकी पूर्ति शुद्ध होने के बाद करनी जाय।
उपासना की आवश्यकता और प्रक्रिया। तृतीय−ईश्वर दत्त सम्पत्तियाँ और उनका सदुपयोग। (3) तत्वज्ञान के तीन लेख हैं। प्रथम−विकृत दृष्टिकोण ही नरक और परिष्कृत चिन्तन ही स्वर्ग है। द्वितीय−राग−द्वेष रहित सुसन्तुलित स्नेह, सद्भाव।
उपासनारत होकर व्यक्ति अपना स्तर ऊँचा उठाता है और सर्वतोमुखी प्रगति का पथ−प्रशस्त करता है। आस्तिकता को परिपक्व करने में उपासना का असाधारण योगदान रहता है। इसी से तत्वदर्शियों ने उपासना को अत्यन्त आवश्यक नित्यकर्म माना है और उसे अपनाने पर होने वाले अनेकानेक लाभों का वर्णन किया है। वस्तुतः यह अवलम्बन ऐसा ही है− इसे अपनाकर हर व्यक्ति उज्ज्वल भविष्य की दिशा में अनवरत रूप से बढ़ते हुए पूर्णता का जीवन लक्ष्य पूरा कर सकता है।
उपासना में प्रयुक्त होने वाली प्रतीक प्रतिमा−उसका सज्जा शृंगार पूजा उपचार में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ उपकरण आदि का मिला जुला स्वरूप अपना काम करता है पूजा वेदी के समीप बैठने पर ऐसा लगना चाहिए मानो किन्हीं असाधारण दिव्य परिस्थितियों में जा पहुँचे। मन्दिर, देवालय पूजाग्रह, देवपीठ, आराधना कक्ष को बनाने में उपयुक्त वातावरण बनाने का तथ्य ही प्रधान रूप से काम करता है। वहाँ के सुसज्जा साधन सँजोने में इसी बात का ध्यान रखा जाता है कि उस स्थान में जाते ही मन अपने आपको पवित्रता की दिव्य परिस्थितियों से घिरा हुआ अनुभव करने लगे। सामान्य वातावरण से उपासना कक्ष का वातावरण भिन्न रखा जाता है और वहाँ की परिस्थितियां ऐसी बनाई जाती हैं जिनमें बैठने पर उत्कृष्टता की अनुभूति बढ़ने से सुविधा मिल सके।
उपासना को अत्यन्त आवश्यक नित्यकर्म माना है और उसे अपनाने पर होने वाले अनेकानेक लाभों का वर्णन किया है। वस्तुतः यह अवलम्बन ऐसा ही है− इसे अपनाकर हर व्यक्ति उज्ज्वल भविष्य की दिशा में अनवरत रूप से बढ़ते हुए पूर्णता का जीवन लक्ष्य पूरा कर सकता है।
उपासना करने वालों को कितनी अधिक मात्रा में मिली हैं, इन्हें अनुभव के आधार पर ही जाना जा सकता है। इस वर्ष केवल पाँच साधना सत्र होंगे। प्रथम सत्र 1 फरवरी से 10 फरवरी तक का बसन्त पर्व के अवसर पर होगा जो यह अंक पहुँचने से पूर्व ही सम्पन्न हो चुका होगा। अब जिनमें सम्मिलित हुआ जा सकता है, वे केवल चार ही शेष हैं।
उपासना के लिए भी न समय बचता है न मन को उसमें रस आता है। इसमें न शरीर का दोष है न मन का। जो लक्ष्य स्थिर किया है उसी में तो इन दोनों वाहनों को लगना है। मन और शरीर स्वामिभक्त सेवक की तरह कर्त्तव्य−पालन में निरत रहते हैं। उन्हें आन्तरिक आकाँक्षाएँ ही प्रेरणा देती हैं यदि जीवन−लक्ष्य बड़प्पन और उपयोग है तो फिर आत्मिक प्रयोजनों में रुचिपूर्वक लग सकना उनके लिए सम्भव हो ही नहीं सकता।
उपासना में ध्यान अनिवार्य है। यदि उसे छोड़ कर मात्र क्रिया−कृत्य ही किये जा रहे होंगे तो मन इधर−उधर भागता रहेगा और अधूरा शरीर कर्म ही पूजा−पाठ के नाम पर अपनी लंगड़ी−लूली गाड़ी घसीट रहा होगा।
उपासना प्रक्रिया का प्रधान रूप से विवेचना एवं मार्ग−दर्शन किया जा चुका है। इस फरवरी अंक में जीवन−साधना की विचारणा एवं कार्य−पद्धति पर प्रकाश डाला गया है और उसे किस प्रकार कार्यान्वित किया जा सकता है, इसका व्यावहारिक परामर्श दिया गया है।
उपासना में तथा रात्रि के प्रवचनों में सम्मिलित किया जा सकेगा, फिर भी प्रतिबन्ध तो रहेंगे ही। हर किसी को इन विशेष आयोजनों में घुस पड़ने और अव्यवस्था फैलाने की छूट न रहेगी इसलिए साधना एवं प्रवचनों में सम्मिलित रहने के लिए सत्र संचालकों से विशेष अनुमति लेने की आवश्यकता रहा करेगी।
उपासना अनुशासन माना गया है और उसकी उपेक्षा करने वाली की कटु शब्दों में भर्त्सना हुई है। सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिए की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप से महत्व मिला है। गायत्री, गंगा, गीता, गौ और गोविन्द हिन्दू धर्म के पाँच प्रधान आधार माने गये हैं, इनमें गायत्री प्रथम है। बाल्मीक रामायण और श्रीमद्भागवत में एक−एक शब्द का सम्पुट लगा हुआ है। इन दोनों ग्रन्थों में वर्णित रामचरित्र और कृष्णचरित्र को गायत्री का कथा प्रसंगात्मक वर्णन बताया जाता है इन सब कथनोपकथनों का निष्कर्ष यही निकलता है कि गायत्री मन्त्र के लिए भारतीय धर्म में निर्विवाद रूप से सर्वोपरि मान्यता मिली है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-October
उपासनाओं को गिना जाता है। राजयोग में प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के रूप में जिसे चार चरणों में बाँटा गया है उसकी वस्तुतः एक ही प्रक्रिया है-उच्चस्तरीय चिंतन सहित एकाग्रता की साधना। एक ही चेतना की चार गतिविधियों को मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को अन्तःकरण चतुष्टय की संज्ञा दी गई है। चार स्वरूप और व्याख्याएँ होते हुए भी वस्तुतः यह एक ही सत्ता की विवेचनाएँ हैं। ठीक इसी प्रकार एकाग्रता की उपयोगी विद्या में दक्षता प्राप्त करने के लिए योगसाधना के अन्तर्गत राजयोग, हठयोग, भक्ति योग और लययोग की चारों दिशाएँ, चारों विद्याएँ अपनी-अपनी सड़क पर चलते हुए अन्ततः जिस केन्द्रबिन्दु पर जा मिलती हैं, उसे एकाग्रता कहा जा सकता है।
उपासना का क्रम जहाँ बन सकता हो उसके लिए प्रयत्न करें। इसके लिए अपने प्रभाव का पूरा उपयोग करें।
उपासना मन्त्र था।
उपासना जैसे धार्मिक आध्यात्मिक कर्मकाण्ड हों या भोजन, निद्रा, विश्राम जैसे शारीरिक कार्य हों, क्रिया, भावना और विचार सभी के संदर्भ में पूर्व निर्धारित मान्यता रहती है कि हम अपनी भलाई और अपने कल्याण के लिए ही सब कुछ कर रहे हैं। स्वार्थी से स्वार्थी और निन्दित से निन्दित व्यक्ति भी यही सोचता है और परमार्थ परायणता का गर्व रखने वाला भी यही मानता है। वस्तुस्थिति क्या है यह जानने के लिए मनोविज्ञानवेत्ताओं ने कुछ कसौटियाँ स्थिर की हैं, जिनमें से कुछेक इस प्रकार हैं-स्वयं के प्रति अपनी धारणा, शरीर के प्रति अपना व्यवहार बाह्य घटनाओं के प्रति दृष्टिकोण और उनकी प्रतिक्रिया तथा आध्यात्मिक विश्वास। इन चार कसौटियों पर अपने बाह्य जीवन और अन्तरंग को परख कर यह निश्चित किया जा सकता है कि स्वयं के प्रति हमारा व्यवहार कैसा है?
उपासना से लेकर दान-पुण्य तक के विविध प्रयोजन पूरे करने चाहिएं और सत्कर्मों में निरत रहना चाहिए किन्तु साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए यह एकाँगी क्रिया-कलाप सर्वथा अपर्याप्त है। उसके साथ अवाँछनीयताओं के उन्मूलन का साहस भरा प्रयोग अविच्छिन्न रूप से जुड़ा ही रहना चाहिए।
उपासना का कार्यक्रम सम्भव हो सके वहाँ उसके लिए प्रयत्न किया जाय। प्रातः सूर्योदय से लेकर सायं सूर्य अस्त तक का अखण्ड गायत्री जप रखा जा सकता है। इसके लिए प्रति सप्ताह कोई एक दिन नियत किया जा सकता है। स्थान नियत निर्धारित रहे और योजनानुसार सम्मिलित होने वाले व्यक्ति नियत समय पर वहाँ पहुँच जाया करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-July
उपासना का अर्थ है-उस अदृश्य सत्ता के अस्तित्व और विधान की अनुभूति और तदनुसार मर्यादा पालन के लिए अपनी मनोभूमि का प्रशिक्षण।
उपासना का विधि-विधान भक्तियोग के अन्तर्गत आता है। भक्ति ईश्वर की की जाती है। इसलिए सर्वत्र “ईश्वर भक्ति” शब्द ही प्रयोग में आता है। अपनी भुलक्कड़ चेतना को झकझोरने और उसे विकासोन्मुख बनाकर मनोकामना पूर्ति का वरदान दे सकने योग्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसी अनुनय-विनय का नाम ईश्वर प्रार्थना है।
उपासना, साधन सिद्धि आदि का सारा आधार श्रद्धा की आधार शिला पर खड़ा है। सच तो यह है कि साधना का विशालकाय कलेवर इसलिए खड़ा किया गया है कि उन लौह श्रृंखलाओं में जकड़ कर श्रद्धा विश्वास रूपी महादैत्य को उपयोगी प्रयोजन उत्पन्न कर सकने के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। श्रद्धा से व्यक्तित्व का निर्धारण होता है-श्रद्धा से अनेक क्रिया-कलापों का सूत्र संचालन और उन्हें सफलता के उच्चस्तर तक पहुँचा सकना सम्भव होता है। आत्मा का सब से विश्वस्त और सबसे घनिष्ठ सचिव श्रद्धा ही है। उसी के सहारे आत्मिक प्रगति से लेकर सिद्धि चमत्कार के वरदान पाने और आत्म साक्षात्कार से लेकर ईश्वर दर्शन तक के समस्त दिव्य उपहार प्राप्त होते हैं।
उपासना एवं साधनों के अनेकों विधि-विधान विनिर्मित हुए हैं।
उपासना का वास्तविक स्वरूप तो जप, ध्यान जैसे मानसिक अभ्यासों में और योग, तप जैसे शारीरिक पुरुषार्थों के साथ जुड़ा रहता है। जप, ध्यान को व्यायाम और योग, तप को आहार की संज्ञा दी जाती है। ईश्वर का मनुहार वस्तुतः प्रकारान्तर से आत्म-परिष्कार का ही एक मनोवैज्ञानिक स्वरूप समझा जाय तो इससे हम वस्तुस्थिति को समझने में अधिक अच्छी तरह समर्थ हो सकते हैं।
उपासना है। मनोयोगपूर्वक किये गये कर्म करते समय लक्ष्य के हजारों मार्ग खुल जाते हैं। कर्म कैसा ही हो? उसमें सफलता तभी प्राप्त होती है जब उसमें भावना की सरसता हो। जीवन जीने का गुरु मन्त्र यही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-March
उपासना प्रयोग में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ उपकरणों की भौतिक किन्तु सूक्ष्म शक्ति (4) भावना-प्रवाह, श्रद्धा, विश्वास एवं उच्चस्तरीय लक्ष्य दृष्टिकोण। इन चारों का जहाँ जितने अंश में समावेश होगा वहाँ उतने ही अनुपात से मन्त्र शक्ति का प्रतिफल एवं चमत्कार दिखाई पड़ेगा। इन तथ्यों की जहाँ उपेक्षा की जा रही होगी जल्दी-जल्दी वरदान पाने की धक लग रही होगी वहाँ निराशा एवं असफलता ही हाथ लगेगी।
उपासना आत्म शक्ति अभिवर्धन का सरल किन्तु श्रेष्ठतम उपाय है। जो इसके लिए प्रयत्न करते हैं वे समर्थ, सफल और सार्थक जीवन जी कर धन्य बनते हैं।
उपासना प्रक्रिया में भी मन्त्रोच्चार के साथ श्रद्धा भरी अनन्य तन्मयता का समावेश होना चाहिए। ऐसा समावेश जिसमें क्रमबद्ध, लयबद्ध, स्वरबद्ध गुन-गुनाहट तो हो ही साथ ही इष्ट के साथ एकाकार होने की आकुलता भी हो। इसी को भक्ति भावना कहते हैं। मन्त्रों का वास्तविक लाभ इसी ‘गान’ मनःस्थिति में मिलता है।
उपासना से उठने पर शरीर में स्फूर्ति और मन में सरसता लगे तो समझना चाहिए कि परिपक्वता आ गई और इसका श्रेयस्कर सत्परिणाम अत्यन्त सन्निकट है। आरम्भ में यह स्थिति नकली रूप में बनानी पड़ती है। थोड़े समय में वह स्थिति स्वाभाविक बन जाती है। बलपूर्वक मार-धाड़ और धड़ पकड़ द्वारा बलात्कार पूर्वक उच्चस्तरीय मनःस्थिति बनाने के काल को ही साधना काल कहते हैं, जब वह स्थिति सहज बनी रहने लगे तो समझना चाहिए कि सिद्धावस्था प्राप्त हो गई।
उपासना करना पर्याप्त नहीं, उसे ‘वाक्’ बनाकर ही इस योग्य बनाया जा सकता है कि अध्यात्म पथ पर बढ़ते हुए साधक को कुछ कहने लायक सफलता मिल सके। आयुर्वेद में सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा, अभ्रक, पारद आदि की भस्म बनाकर उनके सेवन का विधान है। विषों का भी बड़ा लाभ बताया गया है पर वह सम्भव तभी होता है जब उन विषों को विधान पूर्वक शुद्ध किया जाय। वाणी एक मूल पदार्थ है। शोधित होने पर वह अमृत बन जाती है और विकृत होने पर विष का काम करती है।
उपासना से लोक और परलोक में मिल सकने वाली समस्त विभूतियों को गायत्री उपासना के माध्यम में प्राप्त होने का उल्लेख है।
उपासना करके सिद्धि पाई। तुम्हें बार−बार नमस्कार है।
उपासना के माध्यम में प्राप्त होने का उल्लेख है।
उपासना क्रम चलना चाहिए। साधक के अन्तस् में मस्ती छाई रहनी चाहिए और बेगार भुगतने की तोता रटन्त की तरह नहीं, भाव तरंगों में लहराते हुए उसे गाया, गुन-गुनाया जाना चाहिए। जिह्वा का शब्दोच्चार मात्र तो बकवास कहलाता है। अन्य प्राणी, छोटे बच्चे अथवा अविकसित मस्तिष्क वाले प्रायः बेसिलसिले की बकझक करते रहते हैं। वाणी की प्रौढ़ता, सुविज्ञ मस्तिष्क की ज्ञान सम्पदा जुड़ जाने से बनती है।
उपासना करते हैं।
उपासना काल में अक्षरों की देव शक्तियों की ध्यान साधना करने में उनके साथ सायुज्यता प्राप्त होती है। साधक उसी स्तर का उन्हीं विशेषताओं से युक्त बनता जाता है।
उपासना विज्ञान के आकाश में उसे ध्रुव तारे का स्थान मिला है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-December
उपासना, भावना एवं शुभ-कामना के स्तर पर प्रायः सभी परिजन भागीदार बने हैं। इस वर्ष की पूर्णाहुति अखण्ड-ज्योति के सदस्यों की संख्या दुगनी कर देने के रूप में की जा सकती है। यह प्रकट तथ्य है कि मिशन का विस्तार पत्रिका के पृष्ठों पर लिपटे रहने वाले प्राण द्वारा ही सम्भव हुआ है। उसका सम्पर्क क्षेत्र बढ़ेगा तो अभीष्ट वातावरण बनने और समर्थ सहकर्मी मिलने की सम्भावना बढ़ेगी। जितने पाठक इन दिनों हैं उतने ही बने रहे तो समझना चाहिए कि मिशन का विस्तार जहाँ का तहाँ स्थिर होकर रह जायगा।
उपासना में इष्टदेव का और निराकार में प्रकाश का ध्यान किया जाता है। यह दोनों ही ‘रूप’ वर्ग में आते हैं। इतने पर भी यह नहीं समझ लेना चाहिए कि ध्यान केवल ‘रूप’ के माध्यम से ही हो सकता है। उसके लिए अन्य तन्मात्राएँ भी काम में लाई जा सकती हैं। रस, गन्ध और स्पर्श का प्रचलन कम और शब्द का व्यवहार अधिक होता है, तो भी ध्यान की सम्भावना सभी पाँच तत्वों को पाँचों तन्मात्राओं के आधार पर सम्भव होती है।
उपासनात्मक क्रिया कृत्य तो आवरण मात्र हैं। उनमें प्राण संचार कर सकने की शक्ति तो श्रद्धा में ही सन्निहित है। यदि जीवन ही न रहा तो कठपुतली का तमाशा वह आनन्द नहीं देता जो जीवन अभिनय में देखा जाता है।
उपासना करता है कि ‘ध्यान ही ब्रह्म है,’ उसके ध्यान की गति ब्रह्म जैसी ही विस्तृत हो जाती है।
उपासना और साधना के छैनी हथौड़े से जीवन के अनगढ़ रूप को कलात्मक देव प्रतिमा के रूप में परिणत किया जाता है। अध्यात्म शब्द का तात्पर्य ही आत्मा का दर्शन एवं विज्ञान है। इस सन्दर्भ के सारे क्रिया-कलापों का निर्माण निर्धारण मात्र एक ही प्रयोजन के लिए किया गया है कि व्यक्तित्व को-चेतन की उच्चतम-परिष्कृत-सुविकसित-सुसंस्कृत स्थिति में पहुँचा दिया। इस लक्ष्य की उपलब्धि का नाम ही ईश्वर प्राप्ति है। आत्म साक्षत्कार एवं ईश्वर दर्शन इन दोनों का अर्थ एक ही है।
उपासना विशुद्ध विज्ञान है जिसमें आत्म-परिष्कार के लिए प्रबल प्रयत्न करना पड़ता है। यह जितना गम्भीर वास्तविक और प्रखर होता है उसी अनुपात से व्यक्तित्व निखरता है निखार के साथ ही भौतिक समृद्धियों और आत्मिक विभूतियों को ऋद्धि-सिद्धियाँ मिलती हैं।
उपासना करते हैं कि उसके फलस्वरूप ईश्वर को फुसला कर उससे मनोवाँछाएँ पूरी करा ली जायेंगी। वे भारी भूल करते हैं। पूजा को कर्म व्यवस्था का प्रतिद्वन्दी नहीं बनाया जा सकता भगवान के अनुकूल हम बनें यह समझ में आने वाली बात है, पर उलटा उसी को कठपुतली बना कर मर्जी मुताबिक नचाने की बात सोचना बचकानी ढिठाई के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। हमें ईश्वर से व्यक्तिगत राग-द्वेष की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए वरन् उसकी विधि-व्यवस्था के अनुरूप बन कर अधिकाधिक लाभान्वित होने के राजमार्ग पर चलना चाहिए।
उपासना के विधि-विधान का मार्ग दर्शन तो सरल है। उतनी आवश्यकता तो पुस्तकें भी पूरी कर देती हैं। जटिलता तो जीवन साधना में पड़ती है। आये दिन उतार-चढ़ाव और मोड़-तोड़ आते रहते हैं। उनके समाधान का दूरदर्शी निष्कर्ष अनगढ़ बुद्धि से नहीं निकल पाता, वह प्रायः भटकती और अनुपयुक्त निर्णय करती देखी गयी है।
उपासना के उस स्तर की आवश्यकता पड़ती है। जिसे योग एवं तप के नाम से जाना जाता है। पूजा-पत्री उसी की बाल कक्षा है।
उपासना दक्षिण मार्गी कहलाती है उससे साधक में सत तत्वों की वृद्धि होती है और देव अनुग्रह उपलब्ध होता है। इसके प्रतिपक्षी तन्त्रोक्त वाम मार्ग द्वारा आसुरी शक्तियों से भी संपर्क साधा जा सकता है। उनके सहयोग से मारण, मोहन उच्चाटन, वशीकरण जैसे क्रूर कर्म किये जा सकते हैं।
उपासना में लग जाओ-
उपासना की सार्थकता तभी मानते हैं जब उनके मनोरथ पूरे होते चलें। इसमें कमी पड़े तो वे देवता मन्त्र,पूजा,सभी को भरपेट गालियाँ देते देखे जाते हैं। कैसी विचित्र विडंबना है कि छोटा सा गन्दा नाला गंगा को अपने चंगुल में जकड़े और यह हिम्मत न जुटाये कि अपने को समर्पित करके गंगाजल कहलाये।
उपासना क्षेत्र में यही भ्रान्ति सिर से पैर तक छाई हुई है।” मनोकामना पूर्ति के लिए पूजा-पत्री का सिद्धान्त तथाकथित भक्तजनों के मन में गहराई तक घुसा बैठा है। वे उपासना की सार्थकता तभी मानते हैं जब उनके मनोरथ पूरे होते चलें। इसमें कमी पड़े तो वे देवता मन्त्र,पूजा,सभी को भरपेट गालियाँ देते देखे जाते हैं। कैसी विचित्र विडंबना है कि छोटा सा गन्दा नाला गंगा को अपने चंगुल में जकड़े और यह हिम्मत न जुटाये कि अपने को समर्पित करके गंगाजल कहलाये।
उपासना के प्रति गहरी श्रद्धा उत्पन्न की और उस श्रद्धा ने उसके चिन्तन एवं कर्तृत्व को देवोपम बना दिया। जहाँ यह शर्त पूरी की गई है वहीं निश्चित रूप से ईश्वरीय अनुकम्पा की वर्षा भी हुई है, पर जहाँ फुसलाने का धूर्तता को भक्ति का नाम दिया गया है वहाँ निराशा ही हाथ लगी है।
उपासना ईश्वर को रिझाने के लिए नहीं, आत्म-परिष्कार के लिए की जाती है। छोटी मोटर में कम पावर रहती है और थोड़ा काम होता है। बड़ी मोटर लगा देने से अधिक पावर मिलने लगती है और ज्यादा लाभ मिलता है। बिजली घर में तो प्रचण्ड विद्युत भण्डार भरा पड़ा है। उससे गिड़गिड़ा कर अधिक शक्ति देने की प्रार्थना तब तक निरर्थक ही जाती रहेगी जब तक घर का फिटिंग मीटर,मोटर आदि का स्तर ऊँचा न उठाया जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-September
उपासना और साधना की, प्रक्रिया व्यक्ति की मनःस्थिति को व्यापक बनाने के लिए ही रची गई है। आत्मवत् सर्वभूतेषु की, विश्व परिवार की मान्यता ही आत्म विस्तार का आत्म कल्याण का प्रयोजन पूरा करती है। व्यक्तिगत सुख-सुविधा को पद दलित करके उन्हें परमार्थ प्रयोजनों के लिए नियोजित करना इसी का नाम परमार्थ साधना है। व्यक्ति का स्वार्थ जितना व्यापक होता है उतना ही वह परमार्थी बनता है। परमार्थी को ही ईश्वरभक्त, अध्यात्मवादी, महामानव तत्वदर्शी आदि का दूसरा नाम दिया जाता है।
उपासना काल में इन सब को पूजा प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठापित किया जाता है। उनकी छवि का ध्यान एवं उपचार पदार्थों से पूजा सत्कार किया जाता है। यह देव सान्निध्य की तथ्यपूर्ण मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। मोटी बुद्धि से इसे अन्ध-विश्वास कहा जा सकता है। पर वस्तुतः वैसी बात है नहीं।
उपासना क्षेत्र में उत्साह रखने वाले परिजनों से प्रत्यक्ष सम्पर्क की व्यवस्था करना और यह देखना कि उनकी प्रगति किस क्रम से चल रही है। उन्हें किसी अवरोध का सामना तो नहीं करना पड़ रहा है, वे कहीं भटक तो नहीं रहे हैं। यह बातें यों पत्र-व्यवहार से भी किसी कदर हल हो सकती हैं, पर अधिक उपयुक्त यही है कि परस्पर विचार-विनियम एवं प्रत्यक्ष सम्पर्क से वस्तुस्थिति को समझा जाय और स्थिति के अनुरूप समाधान प्रस्तुत किया जाय। अगले चार महीने इसी प्रयोजन के लिए नियत निर्धारित किये गये है।
उपासना एवं साधना पद्धति के अतिरिक्त परिजनों की व्यक्तिगत मनःस्थिति एवं परिस्थिति के अनुरूप उनका मार्गदर्शन किया जा सके और सिद्धान्तों को व्यवहार में उतारने का उपाय बताया जाय। उपरोक्त सम्पर्क आयोजनों की चार महीने तक चलने वाली सम्पर्क योजना का उद्देश्य यही है। प्रतिनिधि सभी शाखा केन्द्रों में इसी प्रयोजन के लिए भेजे जा रहे हैं कि साधकों के व्यक्तित्व का परिष्कार और नव-निर्माण के लिए रचनात्मक प्रवृत्तियों का अभिवर्धन जहाँ जिस प्रकार सम्भव हो सकता हो वहाँ उसके लिए विचार-विनिमय द्वारा रास्ता खोज निकाला जाय।
उपासना ही अभिनव धार्मिक दर्शन का मूल स्वरूप है।
उपासना के रूप में उसे अब तक अगणित व्यक्तियों द्वारा प्रयुक्त किया गया है। इससे उस दिव्य शक्ति की क्षमता युग युगों से निरन्तर बढ़ती चली आई है और वह अधि देवता अधिकाधिक परिपुष्ट होता चला आया है। गायत्री की शक्ति अन्य मन्त्रों से अधिक है। इस स्पष्ट तथ्य का कारण उसके अधि देवता का शक्ति सम्पन्न होना है। गायत्री एक अधि देवता भी है।
उपासना परक और ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग जैसी भावना पर कितनी ही साधनाएँ हैं जो पात्रता और स्तर के अनुरूप बताये और अपनाये जाते हैं। मनःस्थिति का निर्माण इसी आधार पर सम्भव होता है। बौद्धिक शिक्षण तो उसकी पृष्ठभूमि भर बनाता है।
उपासना श्रद्धा पूर्वक अपनाये रहते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-April
उपासना को सोना और सुगंध मिलने की तरह अधिक सराहा गया है और उससे अधिक लाभ होने का तथ्य समझाया गया है। ईश्वर उपासना कोई भी कर सकता है पर अधिक लाभ उसी को होगा जो प्रभु समर्पित आदर्शवादी जीवन प्रक्रिया भी अपनाने का प्रयत्न करेगा। ईश्वर उपासना गाड़ी का एक पहिया है और आदर्शवादिता अपनाने वाली जीवन साधना दूसरा। इन दोनों के सम्मेलन से ही सर्वतोमुखी प्रगति का रथ अग्रसर होता है। मात्र पूजा पाठ कर लेने से भी यों तो कुछ लाभ होता ही है पर पूरा सत्परिणाम देखना हो तो पवित्र जीवन कम अपनाने की साधना के साथ ईश्वर की उपासना करनी चाहिए।
उपासना नित्य नहीं है गायत्री उपासना को वेदों ने नित्य कहा है। इस गायत्री से रहित विप्र का अधः पतन हो जाता है। किसी भी अन्य उपासना का उतना सत्परिणाम नहीं, जितना गायत्री का। केवल गायत्री उपासना से ही मुक्ति प्राप्त हो सकती है भले ही कोई साधना न करें। मनु भगवान ने भी ऐसा ही कहा है।
उपासना करने के नाम का तो कहना ही क्या है?
उपासना मंत्र है जिसे बिना धर्म, जाति, सम्प्रदाय, देश, वेशभूषा, लिंग आदि का भेदभाव किये मनुष्य मात्र द्वारा अपनाया जा सकता है।
उपासनाएँ करते हैं वे ऐसे ही मूर्ख हैं जैसे हाथ आई चिन्तामणि को फेंक कर छोटे छोटे रत्न कर्णों को ढूंढ़ने वाले मूर्ख।
उपासना द्वारा दुगुने पुण्य पाने की आनन्दानुभूति करते हैं।
उपासना पक्ष देवताओं की अलंकारिक प्रतिमा भी बना लेता है और निराकार पक्ष प्रकाश किरणों के रूप में उसको पकड़ता है। सूर्य की सात रंग की किरणों में से हम जिसे चाहें उसे रंगीन शीशे के माध्यम से उपलब्ध कर सकते हैं। एक्सरे मशीन अल्ट्रा वायलेट उपकरण आकाश में से अपनी अभीष्ट किरणों को ही प्रयुक्त करते हैं। हंस दूध पीता है, पानी छोड़ देता है। इसी प्रकार किस मंत्र के लिए ब्रह्म चेतना की किस दिव्य तरंग का प्रयोग किया जाये उसके लिए क्रियायें इसी प्रयोजन के लिए होती हैं।
उपासना करता है वह चिरकाल में भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।
उपासना करके जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- इन चारों वर्गों को नहीं साधता वह अंधी बुद्धि वाला है। गायत्री के द्वारा द्विजत्व को प्राप्त करके जो अन्य देवताओं की साधना करते हैं, वे वैसे ही हैं जैसे हाथ में आई चिन्तामणि को त्यागकर रत्नों की इच्छा करने वाले होते हैं।
उपासना का उतना सत्परिणाम नहीं, जितना गायत्री का। केवल गायत्री उपासना से ही मुक्ति प्राप्त हो सकती है भले ही कोई साधना न करें। मनु भगवान ने भी ऐसा ही कहा है।
उपासना करने वाला विद्वान ब्राह्मण सब प्रकार के कल्याण को प्राप्त करता है।
उपासना से ही मुक्ति प्राप्त हो सकती है भले ही कोई साधना न करें। मनु भगवान ने भी ऐसा ही कहा है।
उपासना मूलक भगवद् भक्ति है। ऐसी समाज सेवा परमार्थ की दृष्टि से की जाती है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि परमार्थवादी दृष्टिकोण ही समाज सेवा व भगवद् भक्ति के स्वरूप का सही मापदण्ड है अतः एकमात्र निःस्वार्थ निर्मोह, निष्कपट और अहेतुक सेवा ही भक्ति की कोटि की मानी जाती है।
उपासना उसी का नाम है।
उपासना की जाती है, उसको भी इसलिए मनीषियों ने संध्या कहा है।
उपासना में सविता देवता का ध्यान करने की प्रक्रिया इसलिए की जाती है कि अंतर के कण-कण में संव्याप्त प्रकाश आभा को अधिक दीप्तिमान बनने का अवसर मिले। अपने ब्रह्मरंध्र में अवस्थित सहस्राँशु आदित्य सहस्रदल कमल को खिलाये और उसकी प्रत्येक पंखुड़ी में सन्निहित दिव्य कलाओं के उदय का लाभ साधक को मिले।
उपासना करने पर विष्णु की ही उपासना होती है ऐसे उपासक तेज तथा तपोबल से सूर्य तुल्य होते हैं। उनके पाद रज स्पर्श से पृथ्वी पवित्र होती है और उनको जीवनमुक्त पदवी पर प्रतिष्ठा मिलती है।
उपासना गाड़ी का एक पहिया है और आदर्शवादिता अपनाने वाली जीवन साधना दूसरा। इन दोनों के सम्मेलन से ही सर्वतोमुखी प्रगति का रथ अग्रसर होता है। मात्र पूजा पाठ कर लेने से भी यों तो कुछ लाभ होता ही है पर पूरा सत्परिणाम देखना हो तो पवित्र जीवन कम अपनाने की साधना के साथ ईश्वर की उपासना करनी चाहिए। पवित्र जीवन उर्वरा भूमि है और भजन उपजाऊ बीज। दोनों की व्यवस्था पर समुचित ध्यान रखा जाना चाहिये।
उपासना को अग्रिणी माना गया है। यह विशुद्ध रूप से प्रज्ञा को प्राप्त करने की वैज्ञानिक पद्धति है।
उपासना का अधिकारी अमुक को अनाधिकारी ठहराया जाता रहा है। जबकि वास्तविकता इससे सर्वथा भिन्न है। तत्वदर्शी-मानवतावादी-ऋषि इतने संकीर्ण हो ही नहीं सकते थे कि वे किसी अमुक जाति वंश को आत्मिक प्रगति के साधनों को अपनाने का अधिकारी ठहरायें और अन्यों को उससे वंचित कर दें। ऐसा पक्षपात तो बहुत ही ओछे स्तर के संकीर्ण बुद्धि, पक्षपाती और विद्वेषी लोग ही कर सकते हैं। भारतीय धर्मशास्त्रों और उनके प्रस्तुतकर्त्ता ऋषियों पर ऐसे आक्षेप लगने लगेंगे तो यह उस महान संस्कृति का अपमान ही होगा जिसके कारण समस्त विश्व ने इस देश वासियों को देव मानव माना था और जगद्गुरु कहकर अपना मस्तक नवाया था।
उपासना करते हैं तो हमारे भीतर के दूषित प्रकाश अणुओं को हटाने और उसके स्थान पर दिव्य प्रकाश अणु भर देने का माध्यम ‘गायत्री’ का देवता सविता अर्थात् सूर्य होता है।
उपासना का पूरा लाभ लेना हो तो द्विजत्व के नाम से जानी जाने वाली जीवन साधना को अपनाया जाना भी अनिवार्य रूप से आवश्यक समझना चाहिए।
उपासना कर पारमार्थिक सुख व आत्मिक संतोष पाना चाहता है।
उपासना करें न करें गायत्री मन्त्र की उपासना करने वाला द्विज कृतकृत्य हो जाता है।
उपासना करते हैं।
उपासना करते हैं वेदवेत्ता विद्वान तेरी ही यश पताका उड़ाते फिरते हैं।
उपासना में लग गये।
उपासना भी की हुई गायत्री देवी मनुष्य को क्या-क्या नहीं दे दिया करती है?
उपासना विधान भले ही कुछ समय तक अलग बने रहें, पर उनके बीच एकता का सूत्री तो जुड़ा ही रहना चाहिए और उसे सर्वजनीन श्रद्धा समर्थन मिलना चाहिए। मानवी एकता की सम्भावना ऐसे ही सर्वभौम सूत्रों को अपनाने से सम्भव हो सकती है। घर में अनेक सदस्य होते हैं। सभी का सम्मान एवं सहयोग मिलता है, पर गृहस्वामी का सब पर अनुशासन रहता है इसलिए वह सर्वोपरि है। विश्व में बिखरे हुए तत्व दर्शनों एवं साधना विधानों के परिवार में मूर्धन्य मन्त्र गायत्री मन्त्र को ठहराया जाए।
उपासना चिरकाल तक करनी चाहिए। ऋषि लोग दीर्घ काल तक सन्ध्या की उपासना करने ही के कारण लम्बी आयु की प्राप्ति किया करते थे और इसी के प्रभाव से वे प्रजा-यश-कीर्ति और ब्रह्मवर्चस को भी प्राप्त करते थे।
उपासना विज्ञान में गायत्री को सर्वोपरि माना गया है और सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसके कई कारण हैं। एक तो यह कि इस महामन्त्र के अक्षरों के बीज रूप में मानवी संस्कृति एवं आदर्शवादिता के सारे सिद्धान्त सन्निहित हैं। इसे विश्व का सबसे छोटा मात्र चौबीस अक्षरों का वह ग्रन्थ कह सकते हैं, जिसमें धर्म और अध्यात्म का समूचा तत्व ज्ञान सार रूप में समाविष्ट मिल सकता है। इन अक्षरों की व्याख्या करते हुए जो कुछ मानवी प्रगति एवं सुव्यवस्था के लिए आवश्यक है; यही प्रज्ञा का विवेकशीलता का मन्त्र है।
उपासना मानव मात्र के लिए है। सद्बुद्धि की देवी-ऋतम्भरा प्रज्ञा की अधिष्ठात्री इस महाशक्ति की आराधना और अन्तःकरण में प्रतिष्ठापन करना, हर किसी के लिए आवश्यक है। यह तत्व जिसे भी प्राप्त होगा वह ऊँचा उठेगा। जहाँ तक अधिकार का प्रश्न है प्रत्येक सत्प्रयोजन को सम्पन्न करने-सन्मार्ग की दिशा में कदम बढ़ाने की छूट और सुविधा हर किसी को है। प्रतिबन्ध तो अवाँछनीय गतिविधियों पर ही लगाये जाते हैं।
उपासना का अधिकार हर किसी को है। मनुष्य मात्र बिना किसी भेद-भाव के उसे कर सकता है। इस सामान्य बुद्धि संगत तथ्य के समर्थन में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं तो भी इस संदर्भ में प्रमाण मिल ही जाते हैं।
उपासना करनी चाहिए और हवन करना चाहिए। गायत्री जप करने वाला कमल पत्रवत् रहता है। इसके ऊपर पाप नहीं चढ़ सकता।
उपासना की दिव्य उपलब्धियाँ अधिक अच्छी तरह हो सकती हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म। दूसरे जन्म से तात्पर्य है पशु प्रवृत्तियों से जकड़े हुए सामान्य प्राणि जीवन से ऊँचा उठकर मानवी उत्तरदायित्वों की विशिष्टता भरी भूमिका को अपनाया जाना। नर पशु की रीति नीति छोड़कर, देव जीवन की महानता अपनाया जाना। इसके लिए व्रत लेना पड़ता है कि वासना तृष्णा की क्षुद्रता में कृषि कीटकों की तरह निरत नहीं रहा जायगा वरन् मानवी उत्कृष्टता को जीवन क्रम से ओत प्रोत करते हुए उच्च स्तरीय सिद्धान्तों को अपनाकर चला जायगा।
उपासना कोई भी कर सकता है पर अधिक लाभ उसी को होगा जो प्रभु समर्पित आदर्शवादी जीवन प्रक्रिया भी अपनाने का प्रयत्न करेगा। ईश्वर उपासना गाड़ी का एक पहिया है और आदर्शवादिता अपनाने वाली जीवन साधना दूसरा। इन दोनों के सम्मेलन से ही सर्वतोमुखी प्रगति का रथ अग्रसर होता है। मात्र पूजा पाठ कर लेने से भी यों तो कुछ लाभ होता ही है पर पूरा सत्परिणाम देखना हो तो पवित्र जीवन कम अपनाने की साधना के साथ ईश्वर की उपासना करनी चाहिए। पवित्र जीवन उर्वरा भूमि है और भजन उपजाऊ बीज।
उपासना को वेदों ने नित्य कहा है। इस गायत्री से रहित विप्र का अधः पतन हो जाता है। किसी भी अन्य उपासना का उतना सत्परिणाम नहीं, जितना गायत्री का। केवल गायत्री उपासना से ही मुक्ति प्राप्त हो सकती है भले ही कोई साधना न करें। मनु भगवान ने भी ऐसा ही कहा है।
उपासनाएँ हैं। उन सब में गायत्री मन्त्र परम श्रेष्ठ है।
उपासना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें हम अपने भीतर के काले मटमैले और पापाचरण को प्रोत्साहन देने वाले प्रकाश अणुओं को दिव्य, तेजस्वी, सदाचरण और शान्ति एवं प्रसन्नता की वृद्धि करने वाले मानव अणुओं में परिवर्तित करते हैं। विकास की इस प्रक्रिया में किसी नैसर्गिक तत्व पिण्ड या ग्रह नक्षत्र की साझेदारी होती है। उदाहरण के लिए जब हम गायत्री की उपासना करते हैं तो हमारे भीतर के दूषित प्रकाश अणुओं को हटाने और उसके स्थान पर दिव्य प्रकाश अणु भर देने का माध्यम ‘गायत्री’ का देवता सविता अर्थात् सूर्य होता है।
उपासना करते हैं वे सौ कोटि कल्पों में भी अभीष्ट सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। गायत्री यः परित्यज्य चा्य मन्त्र मुपासते।
उपासना ब्रह्माजी ने की थी वह भी उसी का अंग है। इन दोनों से बढ़कर जपने योग्य तीनों लोकों में और कुछ नहीं है।”
उपासना में ऐसी कोई बात नहीं है। न तो उसमें कुछ अनैतिक है और न दुस्साध्य। उसका लक्ष्य सद्बुद्धि की शरण में जाना है। इसमें अधिकारी अनधिकारी का प्रश्न ही नहीं उठता।
उपासना का-गायत्री का-अधिकारी कहा जायगा तब तो निश्चित रूप से अर्थ का अनर्थ ही हो जायगा। दुर्भाग्य से पिछले दिनों ऐसी ही भूल होती रही है और अमुक जाति वंश के लोगों को इस पवित्र उपासना का अधिकारी अमुक को अनाधिकारी ठहराया जाता रहा है। जबकि वास्तविकता इससे सर्वथा भिन्न है। तत्वदर्शी-मानवतावादी-ऋषि इतने संकीर्ण हो ही नहीं सकते थे कि वे किसी अमुक जाति वंश को आत्मिक प्रगति के साधनों को अपनाने का अधिकारी ठहरायें और अन्यों को उससे वंचित कर दें। ऐसा पक्षपात तो बहुत ही ओछे स्तर के संकीर्ण बुद्धि, पक्षपाती और विद्वेषी लोग ही कर सकते हैं।
उपासना से स्वर्ग भी मिलता है और मोक्ष भी अतएव नित्य नियमित रूप से गायत्री की भक्तिपूर्वक जप साधना करनी चाहिए।
उपासना का- उपलब्धियों का परिचय देते हुए तत्व दर्शियों ने बहुत कुछ कहा है। शास्त्र वचनों में इस तथ्य का उल्लेख स्थान स्थान पर हुआ है। उसमें से कुछ प्रसंग इस प्रकार हैं -
उपासना ब्रह्मा आदि देव भी करते हैं। यह गायत्री ही वेदों का मूल है।
उपासना को अपनाने से वेदाध्ययन का लाभ मिल जाता है। अन्य मन्त्रों की तुलना में गायत्री की विशेषता से इनकार नहीं किया जा सकता। इस प्रसंग में कुछ प्रमाण इस प्रकार मिलते हैं-
उपासना करता है उसका संसार में कभी पतन नहीं होता।
उपासना के द्वारा प्रज्ञा शक्ति प्राप्त करने के साथ साथ साधक को वे सभी विशिष्ट क्षमताएँ प्राप्त होती हैं जिनका वर्णन विद्याविधा के अवगाहन तथा योग तप आदि के साधना विधान के साथ जुड़ा हुआ है। गायत्री उपासक की आत्मिक पूँजी निरन्तर बढ़ती चली जाती है और यदि धैर्य और साहस के साथ आत्म संशोधन करते हुए अपने मार्ग पर बढ़ता ही चले तो एक दिन नर से नारायण स्तर पर पहुँचा हुआ सिद्ध पुरुष बनकर रहता है। कहा भी है-
उपासना होती है ऐसे उपासक तेज तथा तपोबल से सूर्य तुल्य होते हैं। उनके पाद रज स्पर्श से पृथ्वी पवित्र होती है और उनको जीवनमुक्त पदवी पर प्रतिष्ठा मिलती है।
उपासना से अविद्या काम और कर्म इन तीन ग्रन्थियों का नाश होता है, और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष ये इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।
उपासना उस ‘प्रज्ञा’ को आकर्षित करने और धारण करने की अनुभूत प्रक्रिया है जो परब्रह्म की विशिष्ट अनुकम्पा, दूरदर्शी-विवेकशीलता और सन्मार्ग अपना सकने की प्रखरता के रूप में साधक को प्राप्त होती है। इस अनुदान को पाकर वह स्वयं धन्य बनता है और समूचे वातावरण में मलय पवन का संचार करता है। उसके व्यक्तित्व से सारा सम्पर्क क्षेत्र प्रभावित होता है और सुखद सम्भावनाओं का प्रवाह चल पड़ता है।
उपासना से मिल सकती हैं।
उपासना के क्षेत्र में भी यही होना चाहिए। अनेकानेक धर्म सम्प्रदाय, मतमतान्तर एवं उपासना विधान भले ही कुछ समय तक अलग बने रहें, पर उनके बीच एकता का सूत्री तो जुड़ा ही रहना चाहिए और उसे सर्वजनीन श्रद्धा समर्थन मिलना चाहिए। मानवी एकता की सम्भावना ऐसे ही सर्वभौम सूत्रों को अपनाने से सम्भव हो सकती है। घर में अनेक सदस्य होते हैं। सभी का सम्मान एवं सहयोग मिलता है, पर गृहस्वामी का सब पर अनुशासन रहता है इसलिए वह सर्वोपरि है।
उपासना से आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक इन तीनों तापों से मुक्ति मिलती है। गायत्री की उपासना से अविद्या काम और कर्म इन तीन ग्रन्थियों का नाश होता है, और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष ये इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।
उपासना से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को प्राप्त नहीं करते वे अन्ध बुद्धि वाले है। जो गायत्री जैसे मन्त्र के होते हुए भी अन्य मन्त्रों की उपासनाएँ करते हैं वे ऐसे ही मूर्ख हैं जैसे हाथ आई चिन्तामणि को फेंक कर छोटे छोटे रत्न कर्णों को ढूंढ़ने वाले मूर्ख।
उपासना करनी चाहिए। पवित्र जीवन उर्वरा भूमि है और भजन उपजाऊ बीज। दोनों की व्यवस्था पर समुचित ध्यान रखा जाना चाहिये। इसी प्रतिपादन को गायत्री और द्विजत्व का समन्वय करने की संगति बिठाकर किया गया है। तथ्य को समझा जाना चाहिए।
उपासना-जप करने से वह गुरु, शिष्य, स्त्री और प्राणी सबका उद्धार करती है।
उपासना करने वाला द्विज कृतकृत्य हो जाता है।
उपासना करने ही के कारण लम्बी आयु की प्राप्ति किया करते थे और इसी के प्रभाव से वे प्रजा-यश-कीर्ति और ब्रह्मवर्चस को भी प्राप्त करते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-March
उपासनाओं में प्रार्थना का बहुत बड़ा महत्व है। संसार को कोई भी ऐसा महात्मा अथवा धर्म-प्रवर्तक नहीं हुआ, जिसने किसी न किसी रूप में परमात्मा की प्रार्थना न की हो। यहाँ तक कि देवतागण भी एक-दूसरे की प्रार्थना करते रहते हैं। विष्णु, महेश की, महेश विष्णु की, ब्रह्मा विष्णु और महेश की तो ब्रह्मा की प्रार्थना विष्णु और महेश किया करते हैं। बिना परमात्मा की प्रार्थना किए कोई भी ध्येय पूरा नहीं हो सकता।
उपासना के लिये विशेष प्रयत्न करना चाहिये। 27 माला प्रति दिन जपने से इस अवधि में 24 हजार का गायत्री पुरश्चरण हो सकता है। नवरात्रियों का पुण्य पर्व गायत्री उपासना के लिये अतीव उपयुक्त एवं फलदायी होता है।
उपासना करते हैं, वे सब प्राणियों के हित में लगे हुए मुझे ही पाते हैं।” यहाँ ईश्वर के प्रति निष्ठा और परोपकार का समन्वय किया करते है। निष्काम-कर्म का यही स्वरूप है कि मनुष्य उस परमात्मा पर अटल विश्वास रखकर कामनारहित कर्म करे।
उपासना के लिये अतीव उपयुक्त एवं फलदायी होता है।
उपासना करते हुए हमने अपना पथ अधिक सफलतापूर्वक अधिक दूरी तक पार किया। यदि यह साधन न रहा होता तो जितना कुछ मिल सका उसकी सम्भावना न रही होती।
उपासना करना होगी। संसार का कोई भी धर्म अथवा मत-मतान्तर ऐसा नहीं है, जिसमें विनम्रता, दया, क्षमा, सहानुभूति आदि गुणों को महत्ता न दी गई हो।
उपासना क्षेत्र में उत्साहवर्धक सहायता दी है। ‘अखण्ड दीप’ का सम्बल लेकर अपनी निज की गायत्री उपासना करते हुए हमने अपना पथ अधिक सफलतापूर्वक अधिक दूरी तक पार किया। यदि यह साधन न रहा होता तो जितना कुछ मिल सका उसकी सम्भावना न रही होती।
उपासना नहीं कर सकते। न जाने किस बुरी सायत में रुपया-पैसा संसार में आया कि आज हम उसके दास बन गये हैं। यदि मैं कहूँ कि संसार के समृद्धिशाली और सुखी बन सकने में सबसे बड़ी बाधा धन यानी रुपया है तो पुराने खयालों के लोग चौंक पड़ेंगे। पर आज संसार में जो कुछ पीड़ा है वह इस नीच देवता के कारण है। खाद्य-सामग्री का संकट, रोग, व्याधि सबका कारण यही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-June
उपासना का लाभ नहीं उठाया जा सकता, उन्हें जानना चाहिये कि महर्षि कण्व, जमदग्नि, विश्वामित्र, वशिष्ठ, भरद्वाज, गौतम, शंख, दक्ष आदि अनेक ऋषि गृहस्थ ही थे और गृहस्थ में रहकर ही उन्होंने उच्च तत्वों की शोध की थी। वस्तुतः मनुष्य के विकास में परिवार पहली और सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। अनेक कष्ट और कठिनाइयाँ भी गृहस्थ जीवन में हँसी खुशी के साथ काट ली जाती हैं। दूसरे तीनों आश्रमों के संचालन की व्यवस्था भी इसी से पूरी होती है।
उपासना करनी पड़ती है।
उपासना की जानी चाहिये। प्रेम में मृत्यु की सी यन्त्रणा है पर उसमें स्वर्गीय आनंद है, जो प्रेम करता हैं वही सच्चा सुखी और भाग्यवान है।
उपासनालय मानलें तो कहीं अधिक लाभ की गुँजाइश रहेगी।
उपासना करते हुये जो लोग गुरुजन, माता, पिता, भाई, पत्नी एवं देवताओं की समुचित सेवा करते रहते हैं, ऐसा करते हुये जिन्हें तनिक भी अभिमान नहीं होता वे निष्काम भाव से मुझे ही भजते हैं, तब मैं भी सदैव उन्हीं के हृदय में विश्राम किया करता हूँ। सदैव उस कर्मयोगी के अन्तःकरण में ही ओतप्रोत रहता हूँ।”
उपासना का प्रतीक भी नारी को ही माना गया है।
उपासना आरम्भ कर दोगे तो पुरुषार्थ का देवता ही अपने लिये अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देगा। काम करने में शिथिलता न व्यक्त करें। ढिलाई न करें। चिन्तित न हों। आत्म विश्वास न खोओ।
उपासना अधिक फलवती होगी। हमें पाषाण नहीं देवत्व की आत्मा को मूर्ति रूप में पूजना है और उन पर अपनी सद्भावनाओं की अर्घ्य चढ़ाना है। इतना कर सकें तो अनैतिकता और भ्रष्टाचार दूर करने में अपना बहुत बड़ा योगदान समझा जायेगा। मन्दिरों की सार्थकता इन्हीं सत्यप्रवृत्तियों के विकसित करने में है।
उपासना, दान, अनुष्ठान, यज्ञ, पुरश्चरण आदि में आचार्य यजमान को संकल्प ग्रहण कराते हैं उससे उनके उद्देश्य में कोई सटिकता भले ही न आती हो पर डडडडसारी मानसिक चेष्टायें एक ही लक्ष्य की ओर लग जाती हैं, फलस्वरूप आने वाली बाधा, कठिनाई का विचार डडडड डडडड करने से आ जाता है, जिससे प्रतिकूल परिणाम डडडड डडडड से डडड आते डडडड हैं मानसिक शक्तियों का विकेन्द्रीकरण करना महत्वपूर्ण होता है कि उसे जिस कार्य में लगा दिया जाय डडडड डडडडउधर ही आशा सन्तोषजनक सफलता मिलने लगती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-October
उपासना में निरन्तरता आती है और उपासक अध्यात्म लाभ की ओर अग्रसर होता है। कभी किसी समय उपासना करना उसी प्रकार की धार्मिक अथवा अध्यात्मिक अनियमितता है, जिस प्रकार आहार-बिहार की। इस प्रकार की अनियमित उपासना व्यक्ति को विशुद्ध आध्यात्मिक न बना कर आध्यात्मिक रोगी बना देती है, जिससे किसी सुख शान्ति की आशा करना असामान्य कल्पना मात्र ही होगी।
उपासना में तब भी कोई आनन्द नहीं आता जब वह किसी लाभ अथवा लोभ के लिये की जाती है। किसी स्वार्थ के वशीभूत होकर जब उपासना की जाती है तब उपासक का ध्यान इष्ट के प्रति लगा रहने के स्थान पर अभीष्ट के प्रति लगा रहता है। जिससे भावनाओं का वेग इष्ट की ओर उन्मुख रहने के बजाय लोभ की ओर गतिवान रहता है। इससे इष्ट की समीपता प्राप्त होने के बजाय लोभ को बल मिलता है, जिससे वह उत्तरोत्तर दुर्निवार होता जाता है और कल्याणवती उपासना प्रतिकूल दिशा में फलीभूत होने लगती है। मनुष्य लोभ, लाभ, स्वार्थ एवं कामनाओं का भंडार बन कर स्वयं अपने लिये भयंकर बन जाता है।
उपासना में मन स्थिर हो पाता है और न उसका कोई फल होता है।
उपासना में सिंह वाहिनी ॐ ध्वजधारी गायत्री की क्लीं शक्ति का ध्यान करना चाहिये। अखण्ड-ज्योति के मुख पृष्ठों पर इस वर्ष तथा गत वर्ष कई बार इस चित्र को प्रकाशित किया जाता रहा है। साधक उसे काट कर शीशे में मढ़ा ले और उसकी पूजा-अर्चना किया करें। यह चित्र अलग से भी छपाया गया है। पुस्तकें आदि मँगाते समय उनके साथ ही यह चित्र भी मँगाया जा सकता है।
उपासनात्मक जो कार्यक्रम शरद पूर्णिमा से आरम्भ किया जाना है, उसके लिये अखंड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को भाग लेना चाहिए। रचनात्मक कार्यक्रमों की भाँति यह आध्यात्मिक कार्यक्रम नितान्त आवश्यक और अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इससे राष्ट्र में शक्ति एवं समर्थता का वातावरण उत्पन्न होगा। शीत ऋतु का हमारा दौरा वहीं होगा जहाँ अनिवार्य आवश्यकता समझी जायगी । 100 से अधिक स्थानों में जाने का जो कार्यक्रम बनाया था वह इस वर्ष नहीं हो सकेगा।
उपासना करनी चाहिए। अध्यात्म विद्या के जानकारों को पता है कि ह्रीं सरस्वती, बुद्धि का, श्रीं लक्ष्मी, समृद्धि का तथा क्लीं काली, दुरित संहार का बीज-मन्त्र है। गायत्री महाशक्ति में समय-समय पर विशेष प्रयोजनों के लिए इन्हें प्रयुक्त किया जाता है। वर्तमान परिस्थितियों में शुँभ-निशुँभ, महिषासुर, मधुकैटभ की तरह आक्रमणकारी दुर्दान्त दस्युओं को परास्त करने वाली दुर्गा शक्ति से भारतीय जन-मानस को ओत-प्रोत करने की आवश्यकता है। इसलिये उसका उद्भव के लिये इसे आश्विन सुदी पूर्णिमा-शरद पूर्णिमा से एक वर्ष के लिये राष्ट्र व्यापी 24-24 करोड़ जप के प्रतिमास दो क्लीं महापुरश्चरण आरम्भ कराये जा रहे हैं।
उपासना से विरत हुआ उपासक मृत्यु से भयभीत और जीवन से निराश कायर की तरह त्रासपूर्ण जिन्दगी बिताता है।
उपासना व्यक्ति को विशुद्ध आध्यात्मिक न बना कर आध्यात्मिक रोगी बना देती है, जिससे किसी सुख शान्ति की आशा करना असामान्य कल्पना मात्र ही होगी।
उपासना को मनुष्य कब तक चला सकता है? ऐसी उपासना सम्पन्न करने के लिए एक सामान्य स्थिति के व्यक्ति को अपने पारिवारिक व्यय में कुछ कोताही करनी पड़ेगी, जिससे उसको तथा उसके परिवार को प्रत्यक्ष में न सही, परोक्ष में तो कुछ न कुछ तकलीफ होगी ही। उपासना के लिये खर्च जुटाने में उसे अपना ध्यान घर के बजट में कतरव्योंत करने में लगाना पड़ेगा। इस प्रकार उक्त महंगी उपासना एक आर्थिक योजना बनकर रह जायेगी, जिससे आत्मिक शान्ति के स्थान पर मानसिक उद्विग्नता बढ़ सकती है और ऐसी स्थिति में उपासना का दीर्घकाल तक चल सकना संदिग्ध होगा।
उपासना के लिये अधिक आडम्बर भी ठीक नहीं। असामान्य रूप में रहने वाला उपासक समाज में अन्यथा दृष्टिकोण से देखा जाता है। कोई उसे कुतूहल की दृष्टि से, कोई आदर की दृष्टि से, तो कोई उपहास की दृष्टि से देखता है। इससे उपासक की मानसिक स्थिति जब तक अपेक्षित कोटि में न पहुँचे जाये, उस पर उसके मानसिक भावों पर वाँछित प्रभाव नहीं पड़ता। समाज में साँकेतिक स्थल बन कर कभी वह हर्ष और कभी अमर्ष के वशीभूत होकर आँदोलित होता रहता है, जो कि उसकी साधना के लिये हितकर नहीं होता।
उपासना के सत्परिणाम उसके जीवन में उतरते हैं। आत्मिक सुख, सन्तोष और शान्ति की उसे तुरन्त प्राप्ति होती है, यही सद्गति के आधार है और इन्हीं से समाज निर्माण के कार्य भली भाँति चल पाते हैं।
उपासना एक आर्थिक योजना बनकर रह जायेगी, जिससे आत्मिक शान्ति के स्थान पर मानसिक उद्विग्नता बढ़ सकती है और ऐसी स्थिति में उपासना का दीर्घकाल तक चल सकना संदिग्ध होगा।
उपासना को किसी विशेष कर्तव्य के रूप में ग्रहण करने से भिन्नता का भाव रहता है। पूरे समय यह विचार घेरे रहता है कि मैं कोई विशेष काम अंजाम दे रहा हूँ, जिसके कारण उसमें एकाग्रता प्राप्त नहीं हो पाती, जिसके अभाव में उसमें अपेक्षित आनन्द की उपलब्धि नहीं होती! स्वाभाविक है कि जिस कार्य में अरुचि पूर्ण निरानन्दता रहती है वह देर तक नहीं चल पाता, और यदि खींच-तान कर चलाया भी गया तो उसमें किसी बड़े फल की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
उपासना की भी निरन्तरता निरापद नहीं है, जो एक विस्तृत कर्मकाण्ड और आडम्बर पर आधारित होती है। एक तो इस प्रकार की उपासना के लिये एक लम्बे समय की आवश्यकता है, जिसका मनुष्य के व्यस्त जीवन में प्रायः अभाव ही रहता है। दूसरे, बहुत प्रकार के उपकारण एवं उपादान एकत्र करने में काफी धन की आवश्यकता है। आज के महार्घ जीवन में जीवन की सीमान्त आवश्यकतायें ही जुटाना कठिन हो रहा है, तब महंगी उपासना को मनुष्य कब तक चला सकता है? ऐसी उपासना सम्पन्न करने के लिए एक सामान्य स्थिति के व्यक्ति को अपने पारिवारिक व्यय में कुछ कोताही करनी पड़ेगी, जिससे उसको तथा उसके परिवार को प्रत्यक्ष में न सही, परोक्ष में तो कुछ न कुछ तकलीफ होगी ही।
उपासना है, जो जीवन-भर चलती भी और फलवती भी होती है।
उपासना और अर्घ्यदान की अपेक्षा यदि स्त्रियाँ अपने पतियों को उस भाव से देखा करें तो इससे जो प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, उससे पारस्परिक आनन्द, बाल-निर्माण और समाज की सुव्यवस्था का वातावरण भी बनता है।
उपासना के लिये खर्च जुटाने में उसे अपना ध्यान घर के बजट में कतरव्योंत करने में लगाना पड़ेगा। इस प्रकार उक्त महंगी उपासना एक आर्थिक योजना बनकर रह जायेगी, जिससे आत्मिक शान्ति के स्थान पर मानसिक उद्विग्नता बढ़ सकती है और ऐसी स्थिति में उपासना का दीर्घकाल तक चल सकना संदिग्ध होगा।
उपासना में इस धर्म युद्ध में भारतीय राष्ट्र की विजय की भी माता से प्रार्थना करनी चाहिये। मन्दिरों में, धर्मस्थानों में, सत्संग, कथा, कीर्तनों में भी समय-समय पर ऐसी ही सामूहिक प्रार्थनाओं का आयोजन करना चाहिये।
उपासना में आनन्द कब नहीं आता? जब कोई मनुष्य उसे सामान्य जीवन क्रम से भिन्न एक विशेष कर्तव्य समझ-कर करता है। ऐसा भाव रहने से कुछ समय बाद उपासना उसे एक अनावश्यक बेगार-सी अनुभव होने लगती है, जिससे वह आनन्द अनुभव करने के स्थान पर थकान अनुभव करने लगता है और कुछ ही समय में उसे छोड़-छाड़ कर बैठ रहता है।
उपासना सम्पन्न करने के लिए एक सामान्य स्थिति के व्यक्ति को अपने पारिवारिक व्यय में कुछ कोताही करनी पड़ेगी, जिससे उसको तथा उसके परिवार को प्रत्यक्ष में न सही, परोक्ष में तो कुछ न कुछ तकलीफ होगी ही। उपासना के लिये खर्च जुटाने में उसे अपना ध्यान घर के बजट में कतरव्योंत करने में लगाना पड़ेगा। इस प्रकार उक्त महंगी उपासना एक आर्थिक योजना बनकर रह जायेगी, जिससे आत्मिक शान्ति के स्थान पर मानसिक उद्विग्नता बढ़ सकती है और ऐसी स्थिति में उपासना का दीर्घकाल तक चल सकना संदिग्ध होगा।
उपासना उसे एक अनावश्यक बेगार-सी अनुभव होने लगती है, जिससे वह आनन्द अनुभव करने के स्थान पर थकान अनुभव करने लगता है और कुछ ही समय में उसे छोड़-छाड़ कर बैठ रहता है।
उपासना के अमृत में विष का काम करता है।
उपासना में लोभ क्रियाशील है। इसकी वंचक उपासना ने ही इसको इस दशा में भेजा है। अन्यथा उपासना का फल है-तेजस्विता, ओजस्विता, सबलता, सम्पन्नता आदि दिव्य गुण।
उपासना का दीर्घकाल तक चल सकना संदिग्ध होगा।
उपासना को जब तक पूरा नहीं कर लिया जाता, तब तक हृदय में उसी प्रकार की छटपटाहट रहती है, जैसे किसी प्रियतम से मिलने की इच्छा में। उपासना मनुष्य जीवन का एक अभिन्न अंग है। उसे इसी रूप में ग्रहण करना चाहिए। उपासना को किसी विशेष कर्तव्य के रूप में ग्रहण करने से भिन्नता का भाव रहता है। पूरे समय यह विचार घेरे रहता है कि मैं कोई विशेष काम अंजाम दे रहा हूँ, जिसके कारण उसमें एकाग्रता प्राप्त नहीं हो पाती, जिसके अभाव में उसमें अपेक्षित आनन्द की उपलब्धि नहीं होती! स्वाभाविक है कि जिस कार्य में अरुचि पूर्ण निरानन्दता रहती है वह देर तक नहीं चल पाता, और यदि खींच-तान कर चलाया भी गया तो उसमें किसी बड़े फल की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
उपासना का फल है-तेजस्विता, ओजस्विता, सबलता, सम्पन्नता आदि दिव्य गुण।
उपासना में इष्ट की अदला-बदली का अर्थ है कि आप उसकी गरिमा को कोई महत्व न देते हुये दैवी शक्तियों के साथ खिलौनों की तरह खेलते हैं। उनका महत्व आपकी रुचि पर निर्भर है। साथ ही इष्ट की अदला-बदली से यह भाव भी प्रकट होता है कि आप किसी एक दैवी विभूति को किसी दूसरी से कम या ज्यादा समझते हैं। उपासना के क्षेत्र में विषमता का यह भाव सबसे अधिक घातक है। इस प्रकार की चेष्टा से मानसिक चाँचल्य की वृद्धि होती है, जिसके कारण न उपासना में मन स्थिर हो पाता है और न उसका कोई फल होता है।
उपासना ने ही इसको इस दशा में भेजा है। अन्यथा उपासना का फल है-तेजस्विता, ओजस्विता, सबलता, सम्पन्नता आदि दिव्य गुण।
उपासना जब जीवन का एक आवश्यक अंग बन जाती है तब उसकी पूर्ति करने में वैसी ही तृप्ति होती है, जैसी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति में। जीवन का अंग बना उपासना को जब तक पूरा नहीं कर लिया जाता, तब तक हृदय में उसी प्रकार की छटपटाहट रहती है, जैसे किसी प्रियतम से मिलने की इच्छा में। उपासना मनुष्य जीवन का एक अभिन्न अंग है। उसे इसी रूप में ग्रहण करना चाहिए। उपासना को किसी विशेष कर्तव्य के रूप में ग्रहण करने से भिन्नता का भाव रहता है।
उपासना जीवन-क्रम से भिन्न किसी विशेष कर्तव्य की भाँति नहीं, जीवन-क्रम से भिन्न किसी विशेष कर्तव्य की भाँति नहीं, जीवन-क्रम के एक अभिन्न अंश की भाँति करना चाहिये। उपासना जब जीवन का एक आवश्यक अंग बन जाती है तब उसकी पूर्ति करने में वैसी ही तृप्ति होती है, जैसी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति में। जीवन का अंग बना उपासना को जब तक पूरा नहीं कर लिया जाता, तब तक हृदय में उसी प्रकार की छटपटाहट रहती है, जैसे किसी प्रियतम से मिलने की इच्छा में। उपासना मनुष्य जीवन का एक अभिन्न अंग है। उसे इसी रूप में ग्रहण करना चाहिए।
उपासना प्रतिकूल दिशा में फलीभूत होने लगती है। मनुष्य लोभ, लाभ, स्वार्थ एवं कामनाओं का भंडार बन कर स्वयं अपने लिये भयंकर बन जाता है।
उपासना के पूर्ण लाभ प्राप्त होते हैं। किसी देव प्रतिमा, पीपल या तुलसी की उपासना और अर्घ्यदान की अपेक्षा यदि स्त्रियाँ अपने पतियों को उस भाव से देखा करें तो इससे जो प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, उससे पारस्परिक आनन्द, बाल-निर्माण और समाज की सुव्यवस्था का वातावरण भी बनता है।
उपासना मनुष्य जीवन का एक अभिन्न अंग है। उसे इसी रूप में ग्रहण करना चाहिए। उपासना को किसी विशेष कर्तव्य के रूप में ग्रहण करने से भिन्नता का भाव रहता है। पूरे समय यह विचार घेरे रहता है कि मैं कोई विशेष काम अंजाम दे रहा हूँ, जिसके कारण उसमें एकाग्रता प्राप्त नहीं हो पाती, जिसके अभाव में उसमें अपेक्षित आनन्द की उपलब्धि नहीं होती! स्वाभाविक है कि जिस कार्य में अरुचि पूर्ण निरानन्दता रहती है वह देर तक नहीं चल पाता, और यदि खींच-तान कर चलाया भी गया तो उसमें किसी बड़े फल की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
उपासना की जाती है तब उपासक का ध्यान इष्ट के प्रति लगा रहने के स्थान पर अभीष्ट के प्रति लगा रहता है। जिससे भावनाओं का वेग इष्ट की ओर उन्मुख रहने के बजाय लोभ की ओर गतिवान रहता है। इससे इष्ट की समीपता प्राप्त होने के बजाय लोभ को बल मिलता है, जिससे वह उत्तरोत्तर दुर्निवार होता जाता है और कल्याणवती उपासना प्रतिकूल दिशा में फलीभूत होने लगती है। मनुष्य लोभ, लाभ, स्वार्थ एवं कामनाओं का भंडार बन कर स्वयं अपने लिये भयंकर बन जाता है।
उपासना की दृष्टि से इस वर्ष राष्ट्र की प्रतिरोधात्मक शक्ति को उत्पन्न करने के लिये अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को गायत्री महातत्व की ‘क्लीं’ शक्ति की सामूहिक उपासना करनी चाहिए। अध्यात्म विद्या के जानकारों को पता है कि ह्रीं सरस्वती, बुद्धि का, श्रीं लक्ष्मी, समृद्धि का तथा क्लीं काली, दुरित संहार का बीज-मन्त्र है। गायत्री महाशक्ति में समय-समय पर विशेष प्रयोजनों के लिए इन्हें प्रयुक्त किया जाता है। वर्तमान परिस्थितियों में शुँभ-निशुँभ, महिषासुर, मधुकैटभ की तरह आक्रमणकारी दुर्दान्त दस्युओं को परास्त करने वाली दुर्गा शक्ति से भारतीय जन-मानस को ओत-प्रोत करने की आवश्यकता है। इसलिये उसका उद्भव के लिये इसे आश्विन सुदी पूर्णिमा-शरद पूर्णिमा से एक वर्ष के लिये राष्ट्र व्यापी 24-24 करोड़ जप के प्रतिमास दो क्लीं महापुरश्चरण आरम्भ कराये जा रहे हैं।
उपासना के लिये एक लम्बे समय की आवश्यकता है, जिसका मनुष्य के व्यस्त जीवन में प्रायः अभाव ही रहता है। दूसरे, बहुत प्रकार के उपकारण एवं उपादान एकत्र करने में काफी धन की आवश्यकता है। आज के महार्घ जीवन में जीवन की सीमान्त आवश्यकतायें ही जुटाना कठिन हो रहा है, तब महंगी उपासना को मनुष्य कब तक चला सकता है? ऐसी उपासना सम्पन्न करने के लिए एक सामान्य स्थिति के व्यक्ति को अपने पारिवारिक व्यय में कुछ कोताही करनी पड़ेगी, जिससे उसको तथा उसके परिवार को प्रत्यक्ष में न सही, परोक्ष में तो कुछ न कुछ तकलीफ होगी ही। उपासना के लिये खर्च जुटाने में उसे अपना ध्यान घर के बजट में कतरव्योंत करने में लगाना पड़ेगा।
उपासना निःसार होकर बहुत समय तक नहीं चल पाती। वह दिन प्रति दिन साधना को कामनाओं की कसौटी पर कसता रहता है और जब उसकी कामनायें फलीभूत होती नहीं दीखतीं तो वह धीरे-धीरे उपासना से ऊबने लगता है और शीघ्र ही निरर्थक कार्य समझ कर उससे विरत हो जाता है। कामनाओं के कारण उपासना से विरत हुआ उपासक मृत्यु से भयभीत और जीवन से निराश कायर की तरह त्रासपूर्ण जिन्दगी बिताता है।
उपासना प्रणाली मात्र ही नहीं था, बल्कि यह उन माँगलिक साधनों में से एक था, जिसने यवन बादशाहों के अत्याचार पूर्ण प्रयत्नों द्वारा तीव्रता से बढ़ते हुये इस्लामी प्रभाव से शिखा-सूत्र की रक्षा की थी। यह मत एक धार्मिक धरोहर थी, जिसे हिन्दुत्व में चिर जीवन फूँकने के लिये सुरक्षित रखना आवश्यक था।
उपासना के क्षेत्र में विषमता का यह भाव सबसे अधिक घातक है। इस प्रकार की चेष्टा से मानसिक चाँचल्य की वृद्धि होती है, जिसके कारण न उपासना में मन स्थिर हो पाता है और न उसका कोई फल होता है।
उपासना से ऊबने लगता है और शीघ्र ही निरर्थक कार्य समझ कर उससे विरत हो जाता है। कामनाओं के कारण उपासना से विरत हुआ उपासक मृत्यु से भयभीत और जीवन से निराश कायर की तरह त्रासपूर्ण जिन्दगी बिताता है।
उपासना के विषय में भी लागू रहता है। अतएव उपासना जीवन-क्रम से भिन्न किसी विशेष कर्तव्य की भाँति नहीं, जीवन-क्रम से भिन्न किसी विशेष कर्तव्य की भाँति नहीं, जीवन-क्रम के एक अभिन्न अंश की भाँति करना चाहिये। उपासना जब जीवन का एक आवश्यक अंग बन जाती है तब उसकी पूर्ति करने में वैसी ही तृप्ति होती है, जैसी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति में। जीवन का अंग बना उपासना को जब तक पूरा नहीं कर लिया जाता, तब तक हृदय में उसी प्रकार की छटपटाहट रहती है, जैसे किसी प्रियतम से मिलने की इच्छा में। उपासना मनुष्य जीवन का एक अभिन्न अंग है।
उपासना करना ही वास्तव में उपासना है, जो जीवन-भर चलती भी और फलवती भी होती है।
उपासना अथवा इष्ट को दोष देकर यह धारणा बना लेते हैं कि अधिक पूजा, पाठ करने वाला दुःख, दरिद्रता और दीनता का भागी बनता जाता है। इस प्रकार की धारणा भयंकर भूल है।
उपासना हमें प्राणों से अधिक प्रिय हैं, पर उसके साथ-साथ देश-सेवा के सामयिक कर्तव्यों का पालन करते रहने में हमें कोई अड़चन नहीं दिखाई पड़ती।
उपासना करना उसी प्रकार की धार्मिक अथवा अध्यात्मिक अनियमितता है, जिस प्रकार आहार-बिहार की। इस प्रकार की अनियमित उपासना व्यक्ति को विशुद्ध आध्यात्मिक न बना कर आध्यात्मिक रोगी बना देती है, जिससे किसी सुख शान्ति की आशा करना असामान्य कल्पना मात्र ही होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-February
उपासना आदि ऐसे आधार हैं, जिनके द्वारा हम अपनी बुद्धि का विकास कर सकते हैं। बौद्धिक विकास के क्षेत्र में न तो किन्हीं प्राचीन ग्रन्थों के पाठ करने से काम चलेगा, न पूर्वजों की गुण गाने से। इसी तरह वर्तमान युग के उच्छृंखल लहरों में बह जाने से भी कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। बौद्धिक विकास के लिए आधुनिक युग के अनुरूप नई प्रयोगशालाएं बनानी पड़ेंगी, जहाँ प्राचीन और अर्वाचीन समन्वय के नवीन प्रयोग करने होंगे, नई सूझ-बूझ का परिचय देना होगा, नई राह निकालनी पड़ेगी।
उपासनात्मक इतिहास पर बारीकी से दृष्टिपात करने से स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ आदिकाल से ही गायत्री उपासना की प्रधानता रही है। त्रिकाल सन्ध्या में गायत्री के बिना भारतीय धर्म के अनुरूप संध्या उपासना हो ही नहीं सकती । शास्त्रों में लिखा है कि गायत्री से रहित व्यक्ति निन्दनीय है, उसके हाथ का अन्न जल भी ग्रहण न करना चाहिए। इस भर्त्सना के पीछे मूल प्रयोजन इतना ही है कि गायत्री का परित्याग कोई भारतीय धर्मावलम्बी न करे। अवतारों,ऋषियों और महापुरुषों की प्रधान उपासना गायत्री की ही रही है।
उपासना की प्रधानता रही है। त्रिकाल सन्ध्या में गायत्री के बिना भारतीय धर्म के अनुरूप संध्या उपासना हो ही नहीं सकती । शास्त्रों में लिखा है कि गायत्री से रहित व्यक्ति निन्दनीय है, उसके हाथ का अन्न जल भी ग्रहण न करना चाहिए। इस भर्त्सना के पीछे मूल प्रयोजन इतना ही है कि गायत्री का परित्याग कोई भारतीय धर्मावलम्बी न करे। अवतारों,ऋषियों और महापुरुषों की प्रधान उपासना गायत्री की ही रही है।
उपासना द्वारा अपना स्वयं का आत्म-बल बढ़ावे और दूसरे सत्पात्रों में इसके बीजाँकुर उगाते एवं सींचते रहें। इसके लिए हमारी व्यक्तिगत परम्परा गायत्री उपासना की है। इस उपासना को वे इस ढंग से करें कि उन्हें उस स्तर का आत्म-बल मिले, जिसकी आत्म-कल्याण, जीवन की लक्ष्य प्राप्ति एवं राष्ट्र के नव-निर्माण में नितान्त आवश्यकता रहेगी। हम अब तक जो कुछ कर सके या पा सके हैं, उसके पीछे गायत्री द्वारा उपार्जित आत्म-बल ही महिमा की काम कर रही है। आगे जिन्हें इस परम्परा को विशेष बल-पूर्वक जारी रखना है, उन्हें भी इस आधार को अपनाये रहना ही पड़ेगा।
उपासना के विशेष साधना क्षेत्र में भी उतरेंगे एवं बढ़ेंगे ताकि आत्म-बल का वह स्रोत उन्हें उपलब्ध हो सके, जो नर को नारायण बना सकने में समर्थ हो सकता है।
उपासना सदा निष्काम होती है। जो बिना किसी कामना या इच्छा के साधना करते हैं, उन्हें ही ईश्वर का सच्चा प्रेम और आशीर्वाद प्राप्त होता है। आत्म-बल भी उन्हीं का बढ़ता है और दूसरों का उपकार करने, प्रेरणा देने, जीवन बदलने, प्रकाश पहुँचाने एवं आशीर्वाद देकर भला करने की क्षमता की निष्काम उपासकों में ही रहती है। कामनाशील उपासकों के अन्तःकरण में उतनी स्पष्ट एवं गहरी श्रद्धा उत्पन्न नहीं हो सकती, जिससे परमेश्वर को द्रवित किया जा सके। फिर जो कुछ वे कामते हैं, वह उनके भौतिक प्रयोजनों में ही पूरा हो जाता है, ऐसी दशा में वे उस पूँजी का संग्रह कर नहीं पाते, जिससे बड़े आध्यात्मिक प्रयोजनों की पूर्ति हो सके।
उपासना का जो व्यापक प्रचार है वह पूर्वज मनीषियों द्वारा समाज के बौद्धिक जागरण की एक महत्वपूर्ण योजना का ही रूपांतरण हैं। दैवी चेतना का प्रकाश बुद्धि के क्षेत्र में जितना अधिक होता है, उतना ही वह प्रखर, तेजस्वी बनती है। मन्त्रराज गायत्री में तो बुद्धि को प्रखर, शुद्ध बनाने के लिए परमात्मा से स्पष्ट प्रार्थना का विधान है। किसी भी रूप में परमात्मा का चिन्तन, मनन, ध्यान, पूजा, उपासना बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने का महत्वपूर्ण उपाय है।
उपासना न भी करें तो उसके लिए बाध्य नहीं। सामाजिक स्तर पर नव-निर्माण का जो कार्य भार उनके कन्धे पर पड़ा है, वे उसे निबाहते रहेंगे, तो उनके प्रतिनिधित्व का उत्तरदायित्व पूरा हुआ मान लिया जायगा। उत्तराधिकारियों को इतना तो करना ही ठहरा, इसके अतिरिक्त वे गायत्री उपासना के विशेष साधना क्षेत्र में भी उतरेंगे एवं बढ़ेंगे ताकि आत्म-बल का वह स्रोत उन्हें उपलब्ध हो सके, जो नर को नारायण बना सकने में समर्थ हो सकता है।
उपासना व्यर्थ चली गई। जिनने आत्मकल्याण के उद्देश्य में निष्काम उपासना की है, उनके सन्तोष का तो कहना ही क्या है? वे अपने जीवन क्रम और स्तर में कायाकल्प जैसा परिवर्तन हुआ अनुभव करते हैं।
उपासना करने वाले को किसी भी स्थिति में पहुँचकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि बस, अब इतिश्री हो चुकी। स्मरण रखिये, ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। यह नित नूतन विकास क्रम की गोद में पलता है, इसीलिए बुद्धि की भी कोई सीमा नहीं हो सकती। उसके लिए भी विकसित होने के नित नये अध्याय खुलते रहते हैं। प्रसिद्ध विचारक बेकन ने कहा है “ईश्वर ने बुद्धि की कोई सीमा निश्चित नहीं की है।
उपासना जगत में मात्र गायत्री की ही प्रतिष्ठा थी। इस महान अवलम्बन को लेकर यहाँ के निवासियों ने आध्यात्मिक और भौतिक सत्परिणाम भी प्राप्त किये थे। प्राचीन इतिहास में भारत का जो महान गौरव दृष्टिगोचर होता है, उसके पीछे गायत्री शक्ति की प्रधानता थी। इस महान् तत्व को खोकर आज हम मणि-हीन सर्प ही तरह दीन-हीन बने हुए हैं।
उपासना पर थोपकर उसे छोड़ बैठे। उनकी दृष्टि में लाभ कमाने के अनेक उद्योग धन्धों में से एक धन्धा पूजा भी होता है। लाटरी की तरह इसमें कम लागत से अधिक लाभ होने के लालच में कई व्यक्ति बहुत कुछ कमा लेने या बड़े दुर्भाग्यों को मिटा लेने की आशा में ही कोई पूजा करने को तैयार होते हैं। थोड़े दिन की परीक्षा में यदि अभीष्ट लाभ नहीं निकला, तो इसे भी बेकार का धन्धा मानकर छोड़कर बैठते हैं।
उपासना की प्रेरणा देते रहे हैं। जिनने उस शिक्षा को अपना कर इस मार्ग पर कदम उठाये हैं, उनने भी उत्साहवर्धक और आशाजनक अनुभव ही प्राप्त किए हैं। लौकिक सफलताओं के लिए, अत्यन्त संकट और कष्टों की निवृत्ति के लिए जिनने भी इस अवलम्बन का आश्रय लिया है, उन्हें सन्तोषजनक प्रतिफल ही मिला है। ऐसे कोई विरले ही होंगे जिन्हें यह कहने का अवसर मिला है कि हमारी गायत्री उपासना व्यर्थ चली गई। जिनने आत्मकल्याण के उद्देश्य में निष्काम उपासना की है, उनके सन्तोष का तो कहना ही क्या है?
उपासना को वे इस ढंग से करें कि उन्हें उस स्तर का आत्म-बल मिले, जिसकी आत्म-कल्याण, जीवन की लक्ष्य प्राप्ति एवं राष्ट्र के नव-निर्माण में नितान्त आवश्यकता रहेगी। हम अब तक जो कुछ कर सके या पा सके हैं, उसके पीछे गायत्री द्वारा उपार्जित आत्म-बल ही महिमा की काम कर रही है। आगे जिन्हें इस परम्परा को विशेष बल-पूर्वक जारी रखना है, उन्हें भी इस आधार को अपनाये रहना ही पड़ेगा। अतएव उपासना पथ पर हमारे कदम से कदम मिला कर या आगे पीछे जो चल सकेंगे उन्हें हम अपना उत्तराधिकारी मानेंगे।
उपासना के पीछे भी उसका प्रयोजन कुछ भौतिक लाभ उठाना ही बना रहता है। कुछ फायदा हो गया तो भोग प्रसाद चढ़ाने लगे और कुछ नुकसान हो गया तो उसका सारा दोष उपासना पर थोपकर उसे छोड़ बैठे। उनकी दृष्टि में लाभ कमाने के अनेक उद्योग धन्धों में से एक धन्धा पूजा भी होता है। लाटरी की तरह इसमें कम लागत से अधिक लाभ होने के लालच में कई व्यक्ति बहुत कुछ कमा लेने या बड़े दुर्भाग्यों को मिटा लेने की आशा में ही कोई पूजा करने को तैयार होते हैं। थोड़े दिन की परीक्षा में यदि अभीष्ट लाभ नहीं निकला, तो इसे भी बेकार का धन्धा मानकर छोड़कर बैठते हैं।
उपासना करने को तत्पर हों, वे ही हमारे उत्तराधिकार का उत्तरदायित्व सम्भाल सकने में समर्थ हो सकेंगे।
उपासना विधान, कर्मकाण्ड, योगशास्त्र आदि सभी मनः शोधन पर ही आधारित हैं। जिस तरह पहलवान बनने के लिए, शरीर को शक्ति शाली बनाने के लिए नित्य-प्रति व्यायाम और पौष्टिक भोजन की आवश्यकता पड़ती है उसी तरह मन को शक्ति शाली बनाने के लिए, मनः शक्ति के शोधन के लिए मानसिक साधनाएँ, मानसिक व्यायाम करने पड़ते हैं, मन को भी पौष्टिक भोजन देना पड़ता है, उत्कृष्ट विचार और उदात्त भावनाओं का। सचमुच सधा हुआ, निर्मल, स्वस्थ मन जीवन सिद्धि के लिए एक वरदान है।
उपासना करनी चाहिये। दार्शनिक बालक ने परमात्मा की पूजा का कितना हृदय स्पर्शी चित्र खींचा है। उन्होंने लिखा है- “दीनों के प्रति मैं सहज भाव से खिच जाता हूँ, उनकी भूख मेरी भूख है, उनके पैरों में रहता हूँ, वंचनाओं की पीड़ा सहना है, गले से लगाता हूँ, मैं भी उतनी देर के लिये दीन और ठुकराया हुआ प्राणी बन जाता हूँ।”
उपासना करते हैं।
उपासना ने लोगों के आत्मिक स्तर को समुन्नत बनाने में जो योग दिया है, उसी का प्रतिफल है कि यह परिवार आत्मिक दृष्टि से समुन्नत लोगों का एक श्रेष्ठ संगठन बन कर सामने आया है और युग-निर्माण योजना जैसे ऐतिहासिक कार्य की भूमिका सम्पादन करने का साहस करने एवं उत्तरदायित्व सम्भालने के लिए कटिबद्ध हो सका है।
उपासना के स्तर से ऊँचा उठकर निष्काम भावना अपनानी पड़ेगी और अपनी साधना का उद्देश्य परमार्थ ही रखना पड़ेगा। जो इस शर्त को स्वीकार करते हुए गायत्री उपासना करने को तत्पर हों, वे ही हमारे उत्तराधिकार का उत्तरदायित्व सम्भाल सकने में समर्थ हो सकेंगे।
उपासना का महान माध्यम-
उपासना बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने का महत्वपूर्ण उपाय है।
उपासना हो ही नहीं सकती । शास्त्रों में लिखा है कि गायत्री से रहित व्यक्ति निन्दनीय है, उसके हाथ का अन्न जल भी ग्रहण न करना चाहिए। इस भर्त्सना के पीछे मूल प्रयोजन इतना ही है कि गायत्री का परित्याग कोई भारतीय धर्मावलम्बी न करे। अवतारों,ऋषियों और महापुरुषों की प्रधान उपासना गायत्री की ही रही है। हिन्दू-धर्म के सूर्य-चन्द्र-राम कृष्ण गायत्री के अनन्य उपासक थे।
उपासना सद्व्यवहार, सहृदयता, उदारता, निष्कपटता, ये कौन-से वजनदार पत्थर हैं, जो उठाये नहीं उठते। मनुष्य इन सद्गुणों को अपने जीवन में विकसित करने का साहस करे, तो ऐसी कोई भी बाधा नहीं जो उसे सुख प्राप्ति से रोक सके। मनुष्य जीवन की सरलता, शुचिता और सात्विकता की त्रिशक्ति के आधार पर ही उसके भौतिक, भावनात्मक और पारलौकिक सुख विकसित होते हैं।
उपासना की कुछ विशिष्ट शिक्षा देना उन लोगों को आरम्भ कर रह हैं, जो भौतिक प्रयोजनों के लिए नहीं आत्मिक उत्कर्ष के लिए उसका उपयोग करना चाहते हैं
उपासना निष्काम होगी, उसका उद्देश्य केवल आत्म-बल की प्राप्ति रहेगा। इसके अतिरिक्त उन्हें अपने साधना क्रम में भी इस वसन्त पंचमी से कुछ हेर-फेर कर देना होगा, जिसका वर्णन अगले लेख में किया जा रहा है।
उपासना की जा सके, तब तो कहना ही क्या है? मनोबल वृद्धि, सद्भावनाओं का विकास, आन्तरिक पवित्रता एवं आध्यात्मिक विशिष्ट शक्तियों का जागरण जैसी अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं और उनका प्रतिफल लौकिक एवं पारलौकिक, भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टि से परम मंगलमय होता है।
उपासना गायत्री की ही रही है। हिन्दू-धर्म के सूर्य-चन्द्र-राम कृष्ण गायत्री के अनन्य उपासक थे। समस्त ऋषियों की तपश्चर्या का केन्द्र बिन्दु गायत्री था। वैदिक काल में तो आज के प्रचलित अगणित देवी देवताओं की चर्चा तक न थी, न आज जैसी विभिन्नता और विद्रूपता ही उस समय उत्पन्न हुई थी। तब उपासना जगत में मात्र गायत्री की ही प्रतिष्ठा थी।
उपासना की प्रेरणा विगत 25 वर्षों से लगातार दी जाती रही है। परिजनों ने उस प्रेरणा को अपनाया भी है और उसका समुचित प्रतिफल भी सामने आया है। इस उपासना ने लोगों के आत्मिक स्तर को समुन्नत बनाने में जो योग दिया है, उसी का प्रतिफल है कि यह परिवार आत्मिक दृष्टि से समुन्नत लोगों का एक श्रेष्ठ संगठन बन कर सामने आया है और युग-निर्माण योजना जैसे ऐतिहासिक कार्य की भूमिका सम्पादन करने का साहस करने एवं उत्तरदायित्व सम्भालने के लिए कटिबद्ध हो सका है।
उपासना की है। इस उपासना को वे इस ढंग से करें कि उन्हें उस स्तर का आत्म-बल मिले, जिसकी आत्म-कल्याण, जीवन की लक्ष्य प्राप्ति एवं राष्ट्र के नव-निर्माण में नितान्त आवश्यकता रहेगी। हम अब तक जो कुछ कर सके या पा सके हैं, उसके पीछे गायत्री द्वारा उपार्जित आत्म-बल ही महिमा की काम कर रही है। आगे जिन्हें इस परम्परा को विशेष बल-पूर्वक जारी रखना है, उन्हें भी इस आधार को अपनाये रहना ही पड़ेगा। अतएव उपासना पथ पर हमारे कदम से कदम मिला कर या आगे पीछे जो चल सकेंगे उन्हें हम अपना उत्तराधिकारी मानेंगे।
उपासना। ईश्वरी सत्ता के साथ एकात्मकता जितनी बढ़ेगी, उतनी ही बुद्धि सूक्ष्म और सामर्थ्यवान् बनेगी। सन्त बिनोवा ने कहा है- “बुद्धि की शुद्धि के लिए भगवान की भक्ति से बढ़कर कोई भी साधन आज तक अनुभव में नहीं आया।” हमारे देश में भगवान की भक्ति , उपासना का जो व्यापक प्रचार है वह पूर्वज मनीषियों द्वारा समाज के बौद्धिक जागरण की एक महत्वपूर्ण योजना का ही रूपांतरण हैं। दैवी चेतना का प्रकाश बुद्धि के क्षेत्र में जितना अधिक होता है, उतना ही वह प्रखर, तेजस्वी बनती है।
उपासना और आत्मबल-
उपासना करनी हो तो आत्मीयता की उपासना करनी चाहिये। दार्शनिक बालक ने परमात्मा की पूजा का कितना हृदय स्पर्शी चित्र खींचा है। उन्होंने लिखा है- “दीनों के प्रति मैं सहज भाव से खिच जाता हूँ, उनकी भूख मेरी भूख है, उनके पैरों में रहता हूँ, वंचनाओं की पीड़ा सहना है, गले से लगाता हूँ, मैं भी उतनी देर के लिये दीन और ठुकराया हुआ प्राणी बन जाता हूँ।”
उपासना पद्धतियाँ प्रचलित हैं। अपने स्थान पर वे सभी ठीक हैं और साधक की भावनानुसार उन सबका ही फल होता है। इन सबमें गायत्री का अपना विशिष्ट स्थान है। चारों वेदों की जननी, भारतीय धर्म और संस्कृति की उद्गम गंगोत्री-गायत्री के 24 अक्षरों में वह भावना, शिक्षा और शक्ति ओत-प्रोत हो रही है, जिसका आश्रय लेकर मनुष्य लौकिक और पारलौकिक प्रगति की दिशा में तेजी से अग्रसर हो सकता है।
उपासना भी उन्हें करनी ही चाहिए। गायत्री में उनकी रुचि न हो, तो वे किसी भी प्रकार भगवान का स्मरण करते रहें और उससे आत्म-बल प्राप्त होने की प्रार्थना करते रहें।
उपासना की है, उनके सन्तोष का तो कहना ही क्या है? वे अपने जीवन क्रम और स्तर में कायाकल्प जैसा परिवर्तन हुआ अनुभव करते हैं।
उपासना पथ पर हमारे कदम से कदम मिला कर या आगे पीछे जो चल सकेंगे उन्हें हम अपना उत्तराधिकारी मानेंगे।
उपासना द्वारा उपलब्ध हुए हैं, उसी अनुभव से प्रेरित होकर हम अपने सभी स्वजन प्रिय जनों को समय-समय पर गायत्री उपासना की प्रेरणा देते रहे हैं। जिनने उस शिक्षा को अपना कर इस मार्ग पर कदम उठाये हैं, उनने भी उत्साहवर्धक और आशाजनक अनुभव ही प्राप्त किए हैं। लौकिक सफलताओं के लिए, अत्यन्त संकट और कष्टों की निवृत्ति के लिए जिनने भी इस अवलम्बन का आश्रय लिया है, उन्हें सन्तोषजनक प्रतिफल ही मिला है। ऐसे कोई विरले ही होंगे जिन्हें यह कहने का अवसर मिला है कि हमारी गायत्री उपासना व्यर्थ चली गई। जिनने आत्मकल्याण के उद्देश्य में निष्काम उपासना की है, उनके सन्तोष का तो कहना ही क्या है?
उपासना का मूल प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। लालची आदमी आत्मोत्कर्ष के क्षेत्र में दूर तक आगे नहीं बढ़ सकता।
उपासना का अवलम्बन करना होगा। ऊपर की पंक्तियों में यह कहा जा चुका है कि उनकी उपासना निष्काम होगी, उसका उद्देश्य केवल आत्म-बल की प्राप्ति रहेगा। इसके अतिरिक्त उन्हें अपने साधना क्रम में भी इस वसन्त पंचमी से कुछ हेर-फेर कर देना होगा, जिसका वर्णन अगले लेख में किया जा रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-November
उपासना से मनुष्य को वह स्थिति प्राप्त होती है जहाँ से वह अधिक सूक्ष्मता, दूरदर्शिता एवं विवेक के साथ संसार और उसकी परिस्थितियों का निरीक्षण करता है। अपने ही क्षुद्र अहंकार से संसार की तुलना करने से मनुष्य के प्रत्येक कार्य में संकीर्णता रहती है और संकीर्णता, के कारण आत्मा अपनी विशालता का अपनी शक्ति और सामर्थ्य का आनन्द नहीं लूट पाती। मनुष्य तुच्छ-सा बना रहता है, ठीक उसी तरह जिस तरह सृष्टि के अन्य जीव-जन्तु। आत्मा के सच्चे स्वरूप के ज्ञान के लिये वह ऊंचाई अपेक्षित है जो ईश्वर उपासना से मिलती है। सही लक्ष्य का ज्ञान उस स्थिति का बार-बार मनन किये बिना प्राप्त नहीं होता।
उपासना भाव केवल इसलिए नहीं था कि वे स्वयं एक हिन्दू थे। उनकी इस भावना का कारण हिन्दू-संस्कृति का वह गौरव तथा हिन्दू-धर्म के मानवतापूर्ण वे सिद्धान्त तथा सन्देश थे जिनको उन्होंने गम्भीरता-पूर्वक अध्ययन किया था और अपने जीवन में उनको उतार कर उनकी यथार्थता तथा महानता का अनुभव किया था।
उपासना से कम फलदायक न होगा। सद्गुणों के द्वारा सुख और ईश्वर की प्राप्ति यह एक अचल दैवी विधान है। इसे कोई मिटा नहीं सकता।
उपासना के लिये तत्पर होता है तो वह इस आधार को लेकर ही चलता है कि इस संसार की कोई मुख्य नियामक शक्ति अवश्य होनी चाहिये। प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई रचयिता होता हैं, विश्व का तब सृजनहार भी अवश्य कोई होगा। जब इस तरह की मान्यता अन्तःकरण में उदय होती है तो तत्काल मनुष्य के सोचने के ढंग में परिवर्तन होता है। जब तक वह जिन वस्तुओं से अनावश्यक लगाव रख रहा था अब उनके प्रति कौतूहल पैदा होता है। अब तक जो वस्तुयें उसे सामान्य-सी प्रतीत होती थी अब उनमें विशद विज्ञान भरा पड़ा दिखाई देने लगता हैं।
उपासना न करने वाला संसार में सबसे निकृष्ट व्यक्ति है। मनुष्य का जन्म ही संसार में कुछ ऊँचा कार्य सम्पादित करने के लिये हुआ है। जो अपने इस कर्तव्य को पूरा नहीं करता, संसार को सुन्दर एवं समुन्नत बनाने में अपना अंश दान नहीं करता, उसे कर्तव्यघाती के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता हैं। जिसकी इच्छाओं में दृढ़ता नहीं, संकल्प में शक्ति नहीं, वह संसार में कोई भी श्रेयस्कर कार्य सम्पादित नहीं कर सकता। इस प्रकार का संकल्पहीन व्यक्ति जानवरों की तरह उत्पन्न होता है, उन्हीं की तरह जीवन-यापन करता और अन्त में अहमत्त्वपूर्ण मृत्यु मर कर चला जाता है।
उपासना से मिलती हैं।
उपासना का अर्थ है- अपने आपको विकसित करना। चील की तरह ऊपर उठकर अपनी निरीक्षण वृत्ति को चौड़ा करना। जो जितनी ऊँचाई पर उठकर देखता है उसे उतना ही दूरदर्शी, विवेकवान समझा जाता है। जब सारी वस्तुओं की स्थिति का सही पता चल जाता है तो फिर यह कठिनाई नहीं रहती कि किसे चुनें, किसे न चुनें। इस प्रकार का ज्ञान पैदा हुये बिना मनुष्य अपनी जिन्दगी सुख पूर्वक बिता नहीं सकता।
उपासना करो तो उसका संकेत ज्ञान की उपासना ही होती है। ज्ञान-अर्थात् प्रकाश ही परमात्मा का दिग्दर्शक स्वरूप है इसलिये प्रकाश की पूजा परमात्मा की ही पूजा हुई।
उपासना ही होती है। ज्ञान-अर्थात् प्रकाश ही परमात्मा का दिग्दर्शक स्वरूप है इसलिये प्रकाश की पूजा परमात्मा की ही पूजा हुई।
उपासना क्रम को धर्म रक्षा का एक आवश्यक अंग मानकर ही करना चाहिये। अखण्ड-ज्योति परिवार के लोग स्वयं तो करेंगे ही, अन्य जो लोग उनकी पहुँच तथा प्रभाव प्रेरणा के क्षेत्र में आते हों, उन्हें भी इसके लिये प्रोत्साहित करना चाहिये।
उपासना से मिलती है। सही लक्ष्य का ज्ञान उस स्थिति का बार-बार मनन किये बिना प्राप्त नहीं होता।
उपासना का स्तर जितना विकसित होता हैं गूढ़ प्रश्न उतने ही अधिक मात्रा में प्रस्फुटित होते हैं। विचार करने की क्षमता भी उसी अनुपात में बढ़ती है और यह निश्चय है की तब मनुष्य अपने जीवनोद्देश्य की समीपता की ओर भी तीव्रता से अग्रसर होने लगता है।
उपासना की आवश्यकता यों है कि उस सत्य को भुला न दिया जाय। वह सामने रहेगा तो अन्धकार का जीवन में प्रवेश न हो सकेगा। काम, क्रोध, लोभ, मनस्ताप, दुश्चिन्ता, अशक्तता, आलस्य सब उस प्रकाश को देखकर भाग जाते हैं। वह जहाँ रहता है वहाँ कष्ट नहीं होते, दरिद्रता नहीं होती। दुर्बलता दूर रहती है।
उपासना भले ही न करें पर यदि वे अपने पतियों के प्रति निष्ठावान हैं तो सहज सद्गति प्राप्त कर सकती हैं। परिवार को स्वर्ग बनाकर रखना, सुसन्तति को जन्म देना भी इस व्रत के अंतर्गत हैं। जिस समाज में ऐसी पति पारायण नारियों की कमी नहीं रहती वे समाज, वे जातियाँ निश्चय ही श्री, समृद्धि और सफलता प्राप्त करती हैं।
उपासना में लगी रहती।
उपासना भले ही न करे पर यदि कोई व्यक्ति अन्य प्राणियों के साथ आत्मीयता, दया, करुणा, शुचिता और सच्चरित्रता का व्यवहार करता है तो वह किसी उपासना से कम फलदायक न होगा। सद्गुणों के द्वारा सुख और ईश्वर की प्राप्ति यह एक अचल दैवी विधान है। इसे कोई मिटा नहीं सकता।
उपासना, जहाँ से ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है।
उपासना में लगी हुई बुद्धि मनुष्य में इतना विवेक भरती है जिससे वह संसार की क्षुद्र वासनाओं से बचने का प्रयत्न करता है और विश्व के सर्वोच्च सत्य को पहचानने का प्रयत्न करता है। सच्चाई का अनुभव किये बिना सुख कहाँ? अज्ञान तो मनुष्य के दुःख का ही कारण बताया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-April
उपासना है। इसे भी उसी लगन और भावना से करना चाहिए जिस तरह परमात्मा की उपासना श्रद्धा और विश्वासपूर्वक करते हैं।
उपासना के लिये भी इस तरह घर छोड़कर भाग खड़े होना न शास्त्र सम्मत है न ईश्वर इच्छा के अनुरूप। एक व्यक्ति की सुविधा के लिये अनेकों को दुखी एवं कष्टमय जीवन बिताने के लिये विवश करना ईश्वर का विधान कभी नहीं हो सकता। मनुष्य में इतना साहस होना चाहिये कि छोटी-छोटी कमियों, गलतियों, त्रुटियों, कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों में भी स्वधर्म-पालन पर अड़ा रह सके। गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है-
उपासना के लिये पवित्रता अनिवार्य है। (2) वह पवित्रता बाह्य भी हो और आन्तरिक भी। अशुद्ध वस्तुओं का त्याग करना और शुद्ध वस्तुओं को धारण करना यह मनुष्य के व्यक्तित्व की कसौटी है इसके बिना यह अध्यात्मिक मार्ग पर एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकता। इससे आवश्यक हो जाता है कि मनुष्य अपने को बाहर और भीतर दोनों ओर से स्वच्छ और पवित्र रखे। शरीर की, वस्त्रों की, घर की खान-पान तथा रहन सहन की शुद्धि मन की स्वस्थ अवस्था की द्योतक होती है।
उपासना का वही सुख घर में रहकर भी प्राप्त कर सकता है जो दर-दर भटकते से भी संभव नहीं हैं। छोड़ना ही है तो मनुष्य के शरीर में बसे हुए काम, क्रोध, लोभ, मद तथा मोह आदि को ही क्यों न छोड़ा जाय। इससे यह जीवन भी शान से जीने का आनन्द मिलता है और परलोक में भी सुख मिलता है।
उपासना श्रद्धा और विश्वासपूर्वक करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-December
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगाये जाने वाले बीज-मन्त्रों का साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3.50।-
उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
उपासना ही होती है। जिस देवता की चिन्तन द्वारा निरन्तर उपासना की जाती है, वह प्रसन्न होकर अपने अनुरूप वरदान करता है। यदि आप अपने क्षुद्र विचारों का निरन्तर चिन्तन करते रहेंगे तो अवश्य ही आपको क्षुद्रता की सिद्धि होगी और अनचाहे भी वह आपके जीवन में बस जायेगी।
उपासना का भाव रहता है, जिससे मनुष्य अपने पूर्ण पवित्र तन-मन से उसे करता है और ऐसी दशा में कार्य में सफलता मिलना अनिवार्य है। परमात्मा के प्रति किया हुआ छोटा-सा नीराजन भी जिस प्रकार परम पवित्र तथा महान् समझा जाता है, उसी प्रकार प्रभु को समर्पित किया हुआ मनुष्य का साधारण कार्य भी असाधारण माना जाता है। एक गरीब द्वारा की हुई छोटी-सी आरती के प्रति क्या गरीब, क्या अमीर सभी नत-मस्तक होते हैं, पूर्ण पवित्र समझते हैं। उसी प्रकार ईश्वरीय कार्य समझ कर किया हुआ लघु से लघु कार्य भी लोगों की श्रद्धा-भक्ति का कारण बनता है।
उपासना की जाती है, वह प्रसन्न होकर अपने अनुरूप वरदान करता है। यदि आप अपने क्षुद्र विचारों का निरन्तर चिन्तन करते रहेंगे तो अवश्य ही आपको क्षुद्रता की सिद्धि होगी और अनचाहे भी वह आपके जीवन में बस जायेगी।
उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3.50।-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-August
उपासना से कम श्रेयस्कर नहीं है। जिन परिजनों ने समय-दान का व्रत लिया है उनने सचमुच बहुत बड़ी बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, उदारता एवं उत्कृष्ट आध्यात्मिकता का परिचय दिया है, इसके लिये उनकी जितनी प्रशंसा की जाय उतनी ही कम है।
उपासना के साथ साथ शक्ति की भी समवेत उपासना इस देश में हुई है। अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर जो “अशनि” शब्द का प्रयोग हुआ है उसका अर्थ आजकल की भीमकाय तोपों जैसा ही है। प्रोफेसर विल्सन का कथन है—”गोलों का आविष्कार सबसे पहले भारत में हुआ था। यूरोप के संपर्क में आने के बहुत समय पहले उनका प्रयोग भारत में होता था।”
उपासना ही नहीं है। यह सारे कर्म-काण्ड जीवन को धार्मिक पथ पर चलाने और उसका अभ्यस्त बनाने के साधन मात्र हैं। पवित्र कर्म-काण्ड करने से मनुष्य के कुसंस्कार तथा अहितकर अभ्यास मिटते हैं और उनके स्थान पर सुसंस्कार और कल्याणपूर्ण अभ्यासों का समावेश होता है।
उपासना से ही सिद्धि या अन्तःकरण में स्थित परमात्म देव के दर्शन सम्भव होते हैं।
उपासना इस देश में हुई है। अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर जो “अशनि” शब्द का प्रयोग हुआ है उसका अर्थ आजकल की भीमकाय तोपों जैसा ही है। प्रोफेसर विल्सन का कथन है—”गोलों का आविष्कार सबसे पहले भारत में हुआ था। यूरोप के संपर्क में आने के बहुत समय पहले उनका प्रयोग भारत में होता था।”
उपासना ही करता है, दुहरा पुण्य प्राप्त करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-January
उपासना और जीवन साधना का मार्ग भी ऐसा ही है। इसमें सहचर, स्नेही, मार्गदर्शक ही नहीं अनुदान दाता की आवश्यकता भी पड़ती है और जब यह आवश्यकता पूरी हो जाय तो सफलता की सम्भावना अधिक असंदिग्ध हो जाती है।
उपासना को सर्वप्रथम और अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है।
उपासना का। पुरुषार्थ ही हमारे जीवन का मूल मन्त्र होना आवश्यक है।
उपासना भी हमारी महानता को बढ़ाने में सहायक होती है। आवश्यक है कि जिसे महान बनने की आकाँक्षा हो, वह ईश्वर का प्रकाश एवं अनुग्रह प्राप्त करने का प्रयत्न करे।
उपासना को दैनिक कार्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, आहार, विश्राम, सफाई, गृहस्थ पालन, विद्याध्ययन, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है, वैसा ही ध्यान उपासना का भी रखा जाना चाहिए।
उपासनायें दीन-दुखियों के कल्याणार्थ थीं। सूक्ष्म शरीर के पाँच आवरणों को हटाने के लिए पंचकोष की साधनाएँ हैं इनसे मानवीय शक्तियों के गुप्त केन्द्रों का प्रकाश प्रस्फुटित होने में सहायता मिलती है। शास्त्रकारों ने जिस विधि-विधान का उल्लेख किया है, उन विधानों को सही रूप में जन-साधारण तक पहुँचाना हमारा कर्तव्य था। ऋषि ऋण से उऋण होने के लिए यह हमें करना ही चाहिए था। किया भी है और करते भी रहेंगे।
उपासना की दृष्टि से कई लोग काफी बढ़े-चढ़े होते हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि जहाँ दूसरे लोग भगवान् को बिल्कुल ही भूल बैठे हैं वहाँ वह व्यक्ति ईश्वर का स्मरण तो करता है, औरों से तो अच्छा है। इसी प्रकार जो बदमाशियों से बचा है, अनीति और अव्यवस्था नहीं फैलाता, संयम और मर्यादा में रहता है, वह भी भला है। उसे बुद्धिमान कहा जायगा क्योंकि दुर्बुद्धि को अपनाने से जो अगणित विपत्तियाँ उस पर टूटने वाली थीं, उनसे बच गया। स्वयं भी उद्विग्न नहीं हुआ और दूसरों को भी विक्षुब्ध न करने की भलमनसाहत बरतता रहा।
उपासना का सम्वल थमाया और साथ ही अपना अनन्त वात्सल्य एवं अजस्र अनुदान भी समय-समय पर प्रदान किया। यदि वह सब प्राप्त न हुआ होता तो इस जीवन में जितनी मंजिल पार कर ली गई हैं उसका सौवाँ भाग भी अपने निज के पुरुषार्थ से पूरा न हो सका होता।
उपासना के विविध स्तर-
उपासना करें, विचारों में निर्मलता और जीवन में आत्मसंयम का अभ्यास करें, दूसरों की सेवा को ही परमात्मा की सच्ची सेवा मानें तो ही महानता का गौरव प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते है। अतः हमें साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में कभी भी आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये।
उपासना में निष्ठा एवं अभिरुचि बनी रहे। इसके लिए समझाने - बुझाने का तरीका सबसे अच्छा है। गृहपति का अनुकरण भी परिवार के लोग करते है इसलिए स्वयं नित्य नियमपूर्वक नियत समय पर उपासना करने के कार्यक्रम को ठीक तरह निबाहते रहा जाय। घर के लोगों से जरा जोर देकर भी उनकी ढील पोल को दूर किया जा सकता है। आमतौर से अच्छी बातें पसन्द नहीं की जातीं और उन्हें उपहास तथा उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है।
उपासना की विविध विधि शिक्षायें देते रहे है। साधारण लौकिक कष्टों को दूर करने वाली सकाम उपासनायें दीन-दुखियों के कल्याणार्थ थीं। सूक्ष्म शरीर के पाँच आवरणों को हटाने के लिए पंचकोष की साधनाएँ हैं इनसे मानवीय शक्तियों के गुप्त केन्द्रों का प्रकाश प्रस्फुटित होने में सहायता मिलती है। शास्त्रकारों ने जिस विधि-विधान का उल्लेख किया है, उन विधानों को सही रूप में जन-साधारण तक पहुँचाना हमारा कर्तव्य था। ऋषि ऋण से उऋण होने के लिए यह हमें करना ही चाहिए था।
उपासना का वास्तविक स्वरूप विश्व-मानव की सेवा के रूप में आ गया हों वे हमारी कसौटी पर खरे उतरेंगे। जिनके मन में अपनी शक्ति सामर्थ्य का एक अंश पीड़ित मानवता को ऊँचा उठाने के लिये लगाने की भावना उठने लगी हो उन्हीं के बारे में ऐसा सोचा जा सकता है कि मानवीय श्रेष्ठता की एक किरण उनके भीतर जगमगाई है। ऐसे ही प्रकाश पुँज व्यक्ति संसार के देवताओं में गिने जाने योग्य होते हैं। उन्हीं के व्यक्तित्व का प्रकाश मानव-जाति के लिये मार्ग-दर्शक बनता हैं। उन्हीं का नाम इतिहास के पृष्ठों पर अजर अमर बना हुआ हैं।
उपासना क्रम चल रहा हो उसे चालू रखें। फरवरी अंक पहुँचने पर अपनी साधना योजना उस आधार पर बनावें।
उपासना का भारी योग रहता है। इसलिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों की भाँति ही उपासना को दैनिक कार्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, आहार, विश्राम, सफाई, गृहस्थ पालन, विद्याध्ययन, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है, वैसा ही ध्यान उपासना का भी रखा जाना चाहिए।
उपासना मानव जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। आत्मिक स्तर को सुविकसित, सुरक्षित एवं व्यवस्थित रखने के लिए हमारी मनोभूमि में ईश्वर के लिए समुचित स्थान रहना चाहिए और यह तभी संभव है जब उसका अधिक चिन्तन, मनन, अधिक सामीप्य, सान्निध्य प्राप्त करते रहा जाय। भोजन के बिना शरीर का काम नहीं चल सकता, साँस लिए बिना रक्ताभिषरण की प्रक्रिया बिगड़ जाती है। इसी प्रकार ईश्वर की उपेक्षा करने के उपरान्त आन्तरिक स्तर भी नीरस, चिन्ताग्रस्त, अनिश्चित, अनैतिक, अव्यवस्थित एवं आशंकित बना रहता है। यह हानि कुछ कम हानि नहीं है।
उपासना करने के कार्यक्रम को ठीक तरह निबाहते रहा जाय। घर के लोगों से जरा जोर देकर भी उनकी ढील पोल को दूर किया जा सकता है। आमतौर से अच्छी बातें पसन्द नहीं की जातीं और उन्हें उपहास तथा उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। यही वातावरण अपने घर में भी धुला हुआ हो सकता है, पर उसे हटाया तो जाना ही चाहिए। देर तक सोना, गंदे रहना, पढ़ने में लापरवाही करना, ज्यादा खर्च करना, बुरे लोगों की संगति आदि बुराइयां घर के किसी सदस्य में हो तो उन्हें छुड़ाने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है।
उपासना तंत्र का आविर्भाव हुआ हैं। भौतिक सुख- साधन, बाहुबल और बुद्धिबल के आधार पर कमाये जा सकते हैं पर गुण-कर्म-स्वभाव की उत्कृष्टता पर निर्धारित समस्त विभूतियाँ हमारे आन्तरिक स्तर पर ही निर्भर रहती हैं। इस स्तर के सुदृढ़ और समुन्नत बनाने में उपासना का भारी योग रहता है। इसलिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों की भाँति ही उपासना को दैनिक कार्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, आहार, विश्राम, सफाई, गृहस्थ पालन, विद्याध्ययन, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है, वैसा ही ध्यान उपासना का भी रखा जाना चाहिए।
उपासना की शिक्षा दी है, उनने उसका भविष्य आनन्दमय बनाने के लिए सबसे बड़ी सम्पत्ति वसीयत कर दी है। इसके विपरीत जिन लड़कियों को उच्छृंखलता, नास्तिकता, विलासिता और असहिष्णुता के वातावरण में पलने दिया है, वे जहाँ कहीं भी रहेंगी नरक उत्पन्न करेंगी उसमें स्वयं भी जलेंगी और सारे परिवार को भी जलाती रहेंगी। ऐसी आदतों की अभ्यस्त लड़कियों का अहित उन अभिभावकों ने ही किया होता है जिनने बचपन से उन्हें धार्मिक मान्यताओं से पूजा उपासना से वंचित रखा है। संभव है ऐसा उन्होंने प्यारवश किया हो पर वस्तुतः वह परिणाम में शत्रुता के समान ही अहितकर सिद्ध होता है।
उपासना से वंचित रखा है। संभव है ऐसा उन्होंने प्यारवश किया हो पर वस्तुतः वह परिणाम में शत्रुता के समान ही अहितकर सिद्ध होता है।
उपासना की उपेक्षा जैसे आध्यात्मिक दुर्गुणों को भी हटाने के लिए घर के लोगों को जरा अधिक सावधानी और सफाई से कहा सुना जाय तो भी उसे उचित ही माना जाएगा।
उपासना का भी रखा जाना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-September
उपासना पर प्रभाव नहीं पड़ता वह पूरी नौ रात्रि तक करनी पड़ती है। किसी-किसी पंचांग के अनुसार 25 सितम्बर से भी नवरात्रि आरम्भ मानी गई है, पर हमारे मतानुसार 26 से ही आरम्भ होना ठीक है।
उपासनाओं से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। अन्त में वे अपने स्वयं के चिन्तन और मनन के आधार पर नर-नारायण की उपासना के निष्कर्ष पर पहुँचे।
उपासना के निष्कर्ष पर पहुँचे।
उपासना को तब पूर्ण समझना चाहिये जब लक्ष्मी-नारायण दोनों की प्रतिष्ठा हो। जहाँ लक्ष्मी नहीं वहाँ का परमात्मा भी बेचैन रहता है। लक्ष्मी रहती है तो परमात्मा की प्राप्ति में सुविधा मिलती है, हमारी मान्यता इस प्रकार की होनी चाहिये।
उपासना का उपदेश लिया। अनन्तर उन्होंने इस्लाम तथा ईसाई उपासना पद्धतियों का भी प्रयोग किया, किंतु पाया कि उन्हें इन उपासनाओं से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। अन्त में वे अपने स्वयं के चिन्तन और मनन के आधार पर नर-नारायण की उपासना के निष्कर्ष पर पहुँचे।
उपासना है।
उपासना में ही संलग्न होना चाहिये।
उपासना, जीवन शोधन एवं परमार्थ के विविध कार्यक्रमों को भी अनिवार्य कर्तव्यों की तरह सम्मिलित करना चाहिए। इसके बिना वे आत्मिक प्रगति के महान लाभ से लाभान्वित न हो सकेंगे। प्रसन्नता की बात है कि यह शिक्षा परिवार के प्रत्येक सदस्य ने हृदयंगम की है और सेवा धर्म को अपनाना जीवन की सार्थकता का अमोघ उपाय माना है। विभिन्न परिस्थितियों के व्यक्ति आर्थिक एवं शारीरिक साधनों से भी कुछ लोक सेवा करते ही हैं पर हमारे इस संगठन ने यह समझा और माना है कि आज की बुद्धि भ्रम-ग्रस्त जनता के ढोंग का एक मात्र कारण उसके पास विवेक दृष्टि का अभाव होना ही है। इस कमी की पूर्ति की जा सके तो संसार के समस्त अभावों, कष्टों एवं क्लेशों को दूर किया जा सकता है।
उपासना जब कोई उत्साहवर्धक फल लाते दिखलाई न दी तब उन्होंने क्रम से भारती ब्रह्मचारी और नग्न वेदान्ती तोतपुरी से सगुण साधना तथा निर्गुण ब्रह्म की उपासना का उपदेश लिया। अनन्तर उन्होंने इस्लाम तथा ईसाई उपासना पद्धतियों का भी प्रयोग किया, किंतु पाया कि उन्हें इन उपासनाओं से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। अन्त में वे अपने स्वयं के चिन्तन और मनन के आधार पर नर-नारायण की उपासना के निष्कर्ष पर पहुँचे।
उपासना करता हूँ” इतना भी अहंभाव जब तक शेष रहता है तब तक पूर्ण समर्पण में कमी है। देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि और अहंकार-इन सब पर जब पूर्ण रूप से परमात्मा का अधिकार हो जाता है तभी पूर्ण समर्पण की असीम सुखदायिनी स्थिति मिल जाती है। उस समय “मैं” और “मेरा” यह भाव समाप्त हो जाता है। जो कुछ है सब तेरा है। “तेरा तुझे सौंपने में ही” जीवात्मा आनन्द लेने लगे तो यह समझना चाहिये कि उसके मल-विक्षेप धुल गये हैं।
उपासना को जितना महत्व हम देते हैं उससे कम जीवन शोधन और लोक सेवा को नहीं देते। हमारी जीवन साधना में उपरोक्त तीनों तथ्य समान रूप से गुंथे रहे हैं। फलस्वरूप अधिक नहीं तो इतना कहा जा सकता है कि हमारी साधना निरर्थक नहीं गई, सार्थक हुई है। दूसरे लोग हैं जो दिन-रात माला ही फेरते हैं और जनकल्याण के पुनीत धर्म कर्तव्य का महत्व नहीं समझते। उनकी उसी भूल ने उनके सारे भजन-पूजन में किये गये श्रम को एक प्रकार से निरर्थक बनाकर नष्ट कर दिया।
उपासना परमात्मा की उपासना है।
उपासना का मार्ग अपनाया। स्वयं अपनी विधि एवं बुद्धि से की हुई उपासना जब कोई उत्साहवर्धक फल लाते दिखलाई न दी तब उन्होंने क्रम से भारती ब्रह्मचारी और नग्न वेदान्ती तोतपुरी से सगुण साधना तथा निर्गुण ब्रह्म की उपासना का उपदेश लिया। अनन्तर उन्होंने इस्लाम तथा ईसाई उपासना पद्धतियों का भी प्रयोग किया, किंतु पाया कि उन्हें इन उपासनाओं से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। अन्त में वे अपने स्वयं के चिन्तन और मनन के आधार पर नर-नारायण की उपासना के निष्कर्ष पर पहुँचे।
उपासना सत्य की उपासना और सत्य की उपासना परमात्मा की उपासना है।
उपासना का। लक्ष्मी को परमात्मा का वामाँग मानते हैं। इसलिये उपासना को तब पूर्ण समझना चाहिये जब लक्ष्मी-नारायण दोनों की प्रतिष्ठा हो। जहाँ लक्ष्मी नहीं वहाँ का परमात्मा भी बेचैन रहता है। लक्ष्मी रहती है तो परमात्मा की प्राप्ति में सुविधा मिलती है, हमारी मान्यता इस प्रकार की होनी चाहिये।
उपासना तथा भक्ति करने पर उन्हें मोक्ष तो मिला ही होगा, इसके अतिरिक्त संसार उनकी सेवाओं का लाभ पाकर उन्हें एक अवतारी पुरुष के रूप में याद करता रहेगा।
उपासना पद्धतियों का भी प्रयोग किया, किंतु पाया कि उन्हें इन उपासनाओं से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। अन्त में वे अपने स्वयं के चिन्तन और मनन के आधार पर नर-नारायण की उपासना के निष्कर्ष पर पहुँचे।
उपासना पद्धतियों को छोड़ दिया और नर-नारायण की सेवा में लग गये।
उपासना ही की, प्रत्युत आत्म शान्ति तथा अन्य चमत्कारिक सिद्धियों के लिये तान्त्रिक साधना भी की। इस तान्त्रिक साधना में जो सिद्धियाँ उन्हें प्राप्त हुई वे नर-नारायण की सेवा में प्राप्त सुख की तुलना में बड़ी ही तुच्छ तथा हेय थीं। उनमें उतना ही अन्तर था जितना एक लोलुप धनवान और आत्म तुष्ट योगी में हो सकता है। इस निःसारता का अनुभव करके उन्होंने तृण के समान तुच्छ तान्त्रिक साधना को त्याग कर जन सेवा की महान गुणमयी साधना को अपना लिया।
उपासना और सत्य की उपासना परमात्मा की उपासना है।
उपासना के साथ ‘लोक सेवा’ भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। उसकी उपेक्षा करने पर न किसी की साधना सफल हुई है और न होगी। हमने स्वयं इसी मार्ग का अवलम्बन किया है और जब तक जीवित है इसी मार्ग पर चलते रहेंगे। उपासना को जितना महत्व हम देते हैं उससे कम जीवन शोधन और लोक सेवा को नहीं देते। हमारी जीवन साधना में उपरोक्त तीनों तथ्य समान रूप से गुंथे रहे हैं।
उपासना शरणागति मुख्य आधार है। ईश्वर के समीप बैठने से वैसी दिव्यता उपासक को भी प्राप्त होती है और उसके सन्ताप गलकर नष्ट होने लगते हैं। नित्य-निरन्तर अभ्यास चलाने से ही जीवन में वह शुद्धता आ पाती है जो पूर्ण शरणागति के लिए आवश्यक होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-May
उपासना अधूरी है। उसे कभी भगवान मिलेंगे यह सोचना भी गलत है।
उपासना का मूल हैं-गुण-विकास। ऐच्छिक-लाभ प्राप्त करने का मूल हैं-गुण-विकास। गुण-विकास ही सम्पूर्ण सुखों का जनक है।
उपासना का प्रचलन हुआ है।
उपासना से किसी न किसी प्रकार से उसका पावन प्रकाश अवतरित न हो। अनेकों उदाहरण ऐसे सामने आ चुके हैं, जब इस युग में भी सामूहिक प्रार्थनाओं के सत्परिणाम देखने को मिले हैं। आज के समूहवादी युग में एकता और साम्य-भावना का विस्तार करने के लिये ऐसे आयोजनों का निःसन्देह बहुत अधिक लाभ हो सकता है।
उपासना न करे और प्राणियों को दुःख दे, स्वार्थपरता का बर्ताव करे, छल कपट रखे, विषयों में भटकता रहे तो कितना ही “षोडश अक्षर मन्त्र” का जप क्यों न किया जाय, परमात्मा का प्रकाश मिलना कठिन है। उपासना का मूल हैं-गुण-विकास। ऐच्छिक-लाभ प्राप्त करने का मूल हैं-गुण-विकास। गुण-विकास ही सम्पूर्ण सुखों का जनक है।
उपासना से कम फलदायक नहीं होती। पिता का आशीर्वाद पाकर पुत्र की आकाँक्षायें तृप्त होती हैं, जीवन सुमधुर, नियंत्रित और बाधा रहित बनता है।
उपासना से वंचित रहकर केवल कर्मकाण्ड के पीछे पड़े हुए अपने बड़प्पन की डींग हाँकते रहते हैं। सचमुच, जो असहायों के हृदय स्पर्श न कर सका, संसार को सद्व्यवहार न दे सका, उसकी उपासना अधूरी है। उसे कभी भगवान मिलेंगे यह सोचना भी गलत है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-July
उपासना के कार्यक्रम भी चलते रहें तो स्नेह बन्धनों को मजबूत बनाने में तथा आत्मिक परिष्कार में सुविधा ही मिलेगी।
उपासना से अधिक परिणाम प्राप्त होता है। सन्त टेनीसन ने लिखा है-”जितना संसार समझता है, प्रार्थना से उससे अधिक कार्य होता है।” इसलिए अपनी प्रार्थना ऐसी हो कि हे प्रभु! तेरी शरण आए हैं तुझसे वह प्रकाश प्राप्त करना चाहते हैं जिससे अन्धकार में भटकते हुए मनुष्यों के दुःख और सन्ताप दूर कर सकें।
उपासना है। जिसकी वाणी में सम्पूर्ण प्राणियों के कल्याण की भावना सन्निहित है वही परमात्मा की सच्ची प्रार्थना है। स्वार्थपूर्ण कामनायें इस विशालता में बाधा उत्पन्न करती हैं, इसलिए इनसे ऊपर उठ कर हमारी भावनायें ऐसी हों जो आत्म-कल्याण और संसार की भलाई से प्रेरित हों। यही प्रार्थना सार्थक हो सकती है कि “हे भगवान् ! हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
उपासना से आन्तरिक दिव्यता प्रबुद्ध होकर व्यक्ति के सद्गुणों को जगाती है यह अवस्था सर्वथा न तो सुखमय ही होती है न दुःखमय। इसमें एक अलौकिक आनन्द होता है, प्रेम की गुदगुदी से अन्तरात्मा विभोर रहती है। जिसे इस सुख का क्षणिक आभास भी मिल जाता है उसका मनुष्य जीवन धन्य हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-November
उपासनाओं के लिए अन्य इष्टदेवों का भी निर्धारण हो सकता है, पर उन सब प्रक्रियाओं में अग्नि को इष्ट मान लेना कहीं अधिक श्रेयस्कर है। उपासना कृत्यों की अनेकानेक विधि व्यवस्थाओं में ‘अग्नि पूजन’ को शास्त्रकार अधिक वरिष्ठता देते हैं। आत्मोत्कर्ष के इच्छुकों को वेद भगवान से यजन कृत्य को प्रमुखता देने के लिए कहा है और उस अवलम्बन को अपनाने का निर्देश किया है।
उपासना कृत्यों की अनेकानेक विधि व्यवस्थाओं में ‘अग्नि पूजन’ को शास्त्रकार अधिक वरिष्ठता देते हैं। आत्मोत्कर्ष के इच्छुकों को वेद भगवान से यजन कृत्य को प्रमुखता देने के लिए कहा है और उस अवलम्बन को अपनाने का निर्देश किया है।
उपासना प्रयोजनों में प्रयुक्त किये जाते हैं। यही सन्धिकाल विग्रह, व्यथा एवं उथल-पुथल का समय होता है और बहुधा कष्ट कर असुविधा उत्पन्न करता है। जन्म के समय बालक तथा प्रसूता को कष्ट होने की-मरण काल में प्राणी तथा सम्बन्धियों की छटपटाहट देखते ही बनती है। कन्या जब पितृ ग्रह को छोड़कर ससुराल जाती है तो उसका असमंजस भी विचित्र होता है। अफसरों की बदली होती है तो उठक-पठक का झंझट कितना असुविधाजनक लगता है।
उपासना के दो पक्ष हैं एक ज्ञान पक्ष और दूसरा विज्ञान पक्ष। इन्हें ब्रह्मविद्या और ब्रह्मशक्ति भी कह सकते हैं। आत्मिक प्रगति के लिए इन दोनों पक्षों पर समान रूप से ध्यान देना पड़ता है। सामान्य जीवन क्रम में भी शक्ति और ज्ञान का समन्वय हुए बिना अभीष्ट दिशा में कोई प्रगति नहीं होती। केवल ज्ञान हो और शक्ति न हो तो भी अभीष्ट दिशा में कदम नहीं बढ़ाये जा सकते और केवल साधन शक्ति हो किन्तु उनके उपयोग की कला न आती हो तो भी कोई परिणाम प्राप्त नहीं किये जा सकते।
उपासना, तपश्चर्या और योग साधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश परामर्श इस प्रकार है-
उपासना के जो लाभ अध्यात्म तत्व दर्शन-शास्त्र निर्धारण-आप्त वचन एवं योगी तप-स्त्रियों के अनुभव बताते हैं। उन सबको ब्रह्म विद्या के महा मनीषी यज्ञ प्रक्रिया के माध्यम से भी भली प्रकार उपलब्ध होने की बात कहते हैं। उपासनाओं के लिए अन्य इष्टदेवों का भी निर्धारण हो सकता है, पर उन सब प्रक्रियाओं में अग्नि को इष्ट मान लेना कहीं अधिक श्रेयस्कर है। उपासना कृत्यों की अनेकानेक विधि व्यवस्थाओं में ‘अग्नि पूजन’ को शास्त्रकार अधिक वरिष्ठता देते हैं। आत्मोत्कर्ष के इच्छुकों को वेद भगवान से यजन कृत्य को प्रमुखता देने के लिए कहा है और उस अवलम्बन को अपनाने का निर्देश किया है।
उपासना का यही सत्परिणाम है। देवता जिस पर भी प्रसन्न होते हैं इन्हें अपनी गहरी हलकी प्रसन्नता के अनुरूप सत्प्रवृत्तियों को अपनाने की उमंग भरते हैं। यह दैवी वरदान है। यह जितना जिसे मिलेगा वह उतना ही श्रेष्ठ वरिष्ठ बनता चला जायगा। कहना न होगा कि व्यक्तित्व की विशिष्टता परिष्टता ही लौकिक जीवन में अनेकानेक सफलताएँ प्रदान करती और शक्ति सम्पन्न सफलताएँ प्रदान करती है शक्ति सम्पदाओं का अधिष्ठाता बनाती है।
उपासना का हाथोंहाथ प्रतिफल मिलता है। वर्तमान या भूतकाल में जो उसकी जितनी साधना कर चुके कर रहे हैं वे उसी अनुपात से चमत्कारी और सिद्ध पुरुष कहलाते हैं। इन विशेषताओं का परिचय जहाँ-तहाँ अनायास भी मिलता रहता है। प्रयत्नपूर्वक तो उन्हें कोई भी कभी भी उपार्जित कर सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-December
उपासना उपक्रम द्वारा समर्थ समुन्नत किया जाता है।
उपासना का लक्ष्य है, यह भाव इस शब्दार्थ से प्रकट होता है। संक्षेप में भगवान को सत्प्रवृत्तियों का समावेश करता है वह उसी अनुपात में ईश्वर पारायण माना जाता है। समाज में सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाना, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन हेतु प्रखर पुरुषार्थ करना एवं इस हेतु स्वयं को उस योग्य बनाना परमात्मा की विश्वात्मा की विराट् की आराधना ही है।
उपासना के समय एक दिन अचानक आग की लपटें निकलने लगी। इस अग्नि परीक्षा से सन्त डॉन चार दिनों तक जूझते रहे और अचेतावस्था में हो गए। इस घटना के समय इटली के मूर्धन्य शल्य चिकित्सक डा. बाटाग्लिया भी उस स्थान पर परीक्षण हेतु आये थे जहाँ सन्त परीक्षा से जूझ रहे थे। इस विवरण को फ्लोरेंस की एक पत्रिका ने अक्टूबर 1776 में प्रकाशित किया था।
उपासना आराधना है।
उपासना करना ही पर्याप्त नहीं है, उसे ‘वाक्’ बनाकर ही इस योग्य बनाया जा सकता है, कि अध्यात्म पथ पर बढ़ते हुए साधक को कुछ कहने लायक सफलता मिल सकें। आयुर्वेद में सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा, पारद आदि की भस्म बनाकर उनके सेवन का विधान है। विषों का भी बड़ा लाभ बताया गया है। पर वह सम्भव तभी होता है जबकि उन विषों को विधान पूर्वक शुद्ध किया जाय। वाणी एक मूल पदार्थ है शोधित होने पर वह अमृत बन जाती हैं और विकृत होने पर विष का काम करती है।
उपासना में व्यक्तित्व को और अधिक प्रखर बनाया जाय। स्मरण रखा जाना चाहिए कि वाणी से उपासना करना ही पर्याप्त नहीं है, उसे ‘वाक्’ बनाकर ही इस योग्य बनाया जा सकता है, कि अध्यात्म पथ पर बढ़ते हुए साधक को कुछ कहने लायक सफलता मिल सकें। आयुर्वेद में सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा, पारद आदि की भस्म बनाकर उनके सेवन का विधान है। विषों का भी बड़ा लाभ बताया गया है। पर वह सम्भव तभी होता है जबकि उन विषों को विधान पूर्वक शुद्ध किया जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-February
उपासना से आत्मिक आवश्यकताओं की ही मात्र पूर्ति नहीं होती। अपितु भौतिक साधनों की भी आपूर्ति होती है। गायत्री की धीं शक्ति धारा द्वारा भौतिक साधन संवर्धन की सुसम्पदा अर्जन की विवेक बुद्धि प्राप्त होती है। यह स्वाभाविक है कि प्रगति के प्रयास तो भौतिक स्तर पर ही करने पड़ेंगे। पर उन पर विवेक का अंकुश होने से भटकाव की गुँजाइश नहीं रहती।
उपासना भारतीय संस्कृति में सदियों से होती चली आ रही है। तत्वेत्ता ऋषि इस तथ्य से अवगत थे कि सद्ज्ञान के बिना मनुष्य का कल्याण सम्भव नहीं। इसीलिए उन्होंने गायत्री मन्त्र का आश्रय लिया। सद्ज्ञान की ओर ले चलने वाला सर्व समर्थ मन्त्र घोषित किया। यह ऋषियों की परम्परा रही है कि ज्ञान एवं शक्ति धाराओं को उत्पन्न करने वाली दैवी शक्तियों को ‘माँ’ के रूप में विभूषित किया जाता है।
उपासना द्वारा इन शक्ति केन्द्रों को जागृत किया जा सकता है। कुण्डलिनी जागरण इस क्लीं शक्ति की आराधना की ही फलश्रुति है। अन्तः जागरण की इस प्रक्रिया से इतनी सामर्थ्य प्राप्त की जा सकती है जितनी कि परमाणु द्वारा भी नहीं हो सकी है।
उपासना से ही मिलती है। यही कारण है कि सच्चा गायत्री उपासक साधन सम्पन्न होते हुए भी निर्लिप्त बना रहता है। अपने लिए कम से कम साधनों का उपयोग करता है। व्यापक स्तर पर विद्यमान अभाव, दरिद्रता के निवारण में ही उसे शाश्वत आनन्द की अनुभूति होती है।
उपासना करते रहे हैं। इन सबका विभिन्न माध्यमों से एकमात्र लक्ष्य है- मनुष्य को असत् से सत् की ओर ले चलना।
उपासना द्वारा असाधारण सामर्थ्य प्राप्त की है। चाहे वह रामकृष्ण परमहंस हों अथवा योगीराज अरविन्द। महर्षि दयानन्द हों अथवा महर्षि रमण। विवेकानन्द से लेकर स्वामी रामतीर्थ तक सभी के ऊपर माँ सरस्वती का वरद्हस्त रहा है। ज्ञान सम्पदा का अनुग्रह आत्मज्ञान की प्राप्ति गायत्री महाशक्ति द्वारा ही सम्भव हो सकी है।
उपासना का संपर्क श्रवण का सुयोग भी व्यवस्थापूर्वक वन जाया करेगा। घोड़े पर सवार भगदड़ मचाने वालों के लिए तो ऐसा कुछ बन पड़ना सम्भव नहीं है। बसों में आये यात्री मात्र 12 से 3 की निर्धारित अवधि में ही भेंट कर सकेंगे चाहे जब नहीं।
उपासना की जानी चाहिए। ज्ञान, सम्पदा एवं शक्ति के तीनों ही अनुदान आद्य शक्ति गायत्री की ही अनुकम्पा से मिलते हैं। इस महाशक्ति का अंचल श्रद्धापूर्वक पकड़ा जा सके तो अज्ञान, अभाव एवं अशक्ति की स्थिति ही समाप्त हो जाय, ज्ञान, वैभव एवं सामर्थ्य की त्रिवेणी साधक में फूट पड़े।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-September
उपासना से सम्पन्न होता है, वह प्रवण और व्याहृतियों में सन्निहित भावनाओं को अपनाने से हो सकता है। इन भावनाओं का मनन-चिन्तन एक आत्मानुशासन स्थापित करता है। व्याहृतियों का दर्शन वस्तुतः मनुष्य की अन्तःभूमि को सुसम्बद्ध रूप से विकसित करने की एक सुव्यवस्थित विद्या है।
उपासना, शरीर व मन को स्वस्थ, संयत, ऊर्ध्वगामी, सद्गुण सम्पन्न बनाकर कायारूपी प्रभु की साधना तथा अन्तरात्मा को पवित्र, उदार बनाकर अन्तःकरण में विराजमान ईश्वर की प्रतिमूर्ति की पूजा करता है। सर्वत्र ईश्वर ही ईश्वर परिलक्षित होना ही परमानन्द की, ब्रह्मा निर्वाण की, सहज समाधि की स्थित प्रज्ञ की, परमहंस की स्थिति है। जितनी मात्रा में साधक इस तथ्य को हृदयंगम करता चला जाता है उसी अनुपात में वह माया मुक्त होता चला जाता है। इस जीवन में ही वह स्वर्ग का आनन्द उठा लेता है।
उपासना पद्धतियाँ इसीलिये हैं कि मनुष्य प्रभु की सत्ता को अपने समीप देखें एवं उसे मनोभूमि में प्राथमिकता दे। जो कार्य किसी भी उपासना से सम्पन्न होता है, वह प्रवण और व्याहृतियों में सन्निहित भावनाओं को अपनाने से हो सकता है। इन भावनाओं का मनन-चिन्तन एक आत्मानुशासन स्थापित करता है। व्याहृतियों का दर्शन वस्तुतः मनुष्य की अन्तःभूमि को सुसम्बद्ध रूप से विकसित करने की एक सुव्यवस्थित विद्या है।
उपासना साथ चल ही रही है। जन-मानस से आद्य शक्ति के युग शक्ति के रूप में बदलने की सम्भावना को साकार होते देखने में अब कोई संशय नहीं रहना चाहिए।
उपासना का जो स्वरूप उन्होंने महाप्रज्ञा के अनुष्ठान के रूप में अनुमोदित किया है, वह प्रज्ञा परिजनों द्वारा आरम्भ किया जा चुका । नैष्ठिक साधना के रूप में तो युग सन्धि की उपासना साथ चल ही रही है। जन-मानस से आद्य शक्ति के युग शक्ति के रूप में बदलने की सम्भावना को साकार होते देखने में अब कोई संशय नहीं रहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-May
उपासना से ईश्वरीय गुणों को जीवन में उतारने का अभ्यास किया जाता है, साधना से मन को दुष्प्रवृत्तियों से जूझने योग्य सशक्त बनाया जाता है एवं आराधना द्वारा अपने क्रिया-कलापों को सोद्देश्य बनाकर ईश्वरीय उद्यान को और भी सुन्दर-सुव्यवस्थित बनाने आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना का विकास किया जाता है। सतत् हर क्षण इनका अभ्यास जीवन में अनिवार्य है।
उपासना परक ही नहीं, मन्त्र में सन्निहित प्रज्ञा प्रेरणा पक्ष भी अपनाया जाय और सत्प्रवृत्तियों के रूप में उसे जीवनचर्या का अविच्छिन्न अंग भी बनाया गया।
( क्रमशः )
उपासना यदि भक्तियोग है तो साधना ज्ञानयोग एवं आराधना- कर्मयोग है। कारण, सूक्ष्म, स्थूल शरीर के रूप में इनके कार्यक्षेत्र हैं। आत्म सत्ता को महानता के पथ पर पहुँचाने के लिये इन्हीं विविध सोपानों को अपनाना पड़ता है।
उपासना है। उपासना से तात्पर्य है जिसके समीप बैठे हैं, तद्रूप हो जाना। यह समर्पण घनिष्ठता जितनी निश्छल उच्चस्तरीय होगी, उतनी ही उपासना सार्थक होगी, यह तभी सम्भव है जब उपासक का स्वयं का स्तर ऊँचा हो और उपास्य के सम्बन्ध में वास्तविक बोध बना रहे किसी प्रकार की भ्रान्ति न हो।
उपासना से पाप नाश होने या सुख शांतिदायक पुण्यफल प्राप्त होने की फलश्रुति के साथ इतना संकेत और भी जुड़ा हुआ है कि उस आधार पर उपलब्ध होने वाली प्रेरणा को जीवनचर्या में सम्मिलित किया जाय। व्यवहार क्रम में उतारा जाय। इसका अधिक स्पष्टीकरण इसलिए नहीं किया गया है कि पुरातन काल में इस तथ्य से तो सभी अवगत थे कि आदि और अन्त के संकेत करने पर उसकी मध्य शृंखला का अनुमान सामान्य ज्ञान के आधार पर ही हर कोई लगा लेता है।
उपासना से तात्पर्य है जिसके समीप बैठे हैं, तद्रूप हो जाना। यह समर्पण घनिष्ठता जितनी निश्छल उच्चस्तरीय होगी, उतनी ही उपासना सार्थक होगी, यह तभी सम्भव है जब उपासक का स्वयं का स्तर ऊँचा हो और उपास्य के सम्बन्ध में वास्तविक बोध बना रहे किसी प्रकार की भ्रान्ति न हो।
उपासना-साधना के सूक्ष्म उपचार किये जाते थे जो आज भी विभिन्न स्थानों पर व्यक्तिगत स्तर पर छिटपुट रूप में प्रचलित हैं। सूर्य एवं चन्द्रग्रहण के बाद नदियों आदि में स्नान करने की परम्परा है जो पूर्णतया वैज्ञानिक है। वैज्ञानिकों का मत है कि प्रवाहित जल में प्राण ऊर्जा की प्रचुरता होती है। शरीर पर सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण से बढ़ने वाले वायुमण्डलीय विषाणुओं का आक्रमण होता है। स्नान करने से नदी के जल की प्राण ऊर्जा उन्हें मार डालती है।
उपासना को सार्थक बनाती है।” वस्तुतः यह समर्पण “तादात्म्य का भाव नियोजित किए बिना सारे पूजा उपचार के क्रम अधूरे, खोखले हैं।
उपासना का महत्व एवं माहात्म्य वर्णित किया जाता रहा है। निश्चय है कि गायत्रीमय जीवनचर्या अपनाने पर व्यक्तित्व में उत्कृष्टता का समावेश होगा और उस प्रक्रिया में संलग्न व्यक्ति को प्रगति, समृद्ध, संस्कृति एवं सुख शान्ति जैसे प्रतिफलों से लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा।
उपासना को और भी फलवती बनाने वाला कारण है, साधक का श्रद्धामय विश्वास। विश्वास की शक्ति से सभी मनोविज्ञानवेत्ता भली-भाँति परिचित हैं। इस तरह के कई उदाहरण देखने में आते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि केवल विश्वास के कारण ही लोग भय की वजह से अकाल मृत्यु के मुख में चले गए और विश्वास के कारण ही मृतप्राय लोगों ने नवजीवन प्राप्त किया। रामायण में तुलसीदास जी ने ‘भवानी शंकरौ वंदे श्रद्धा विश्वास रुपिणौ’ गाते हुए श्रद्धा विश्वास को भवानी शंकर की उपमा दी है। लोग अपने विश्वासों की रक्षा के लिये धन, आराम तथा प्राणों तक को हँसते-हँसते गँवा देते हैं।
उपासना करते हैं।
उपासना में अन्तःकरण को- भावनाओं को उच्चस्तरीय उद्देश्यों के अनुरूप गतिशील बनाना पड़ता है। साधना व आराधना भी इसी के साथ स्मरण किये जाने वाले कृत्य हैं जिनमें क्रमशः विचारणा व गतिविधियों को उत्कृष्टता के साथ जोड़ा जाता है। उपासना यदि भक्तियोग है तो साधना ज्ञानयोग एवं आराधना- कर्मयोग है। कारण, सूक्ष्म, स्थूल शरीर के रूप में इनके कार्यक्षेत्र हैं। आत्म सत्ता को महानता के पथ पर पहुँचाने के लिये इन्हीं विविध सोपानों को अपनाना पड़ता है।
उपासना के कर्मकाण्ड इसी कारण बाह्योपचार मात्र बनकर रह गए हैं। समय क्षेप तो इसमें होना ही था, असन्तोष एवं ग्लानि और साथ लग जाती है। देवात्मा बनना तभी सम्भव है, जब परमात्मा के समकक्ष विशेषताएं उत्पन्न करने योग्य पात्रता विकसित कर ली गयी हो। भावना विचारणा और क्रिया प्रक्रिया में जितना अधिक उत्कृष्टता आदर्शवादिता का समावेश हो सकेगा, उपासना उतनी ही सफल होगी। यही है श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा का तत्वदर्शन।
उपासना क्रम चलाने से है जो भावनापूर्वक, भावभरी मनःस्थिति में चलाया जाता है। साधक के अन्तस् में मस्ती छाई रहनी चाहिए और बेगार भुगतने की तोता रटन्त की तरह नहीं, अपितु भाव तरंगों में लहराते हुए उसे गाया गुनगुनाया जाना चाहिये। जिह्वा का शब्दोच्चार मात्र तो बकवास कहलाता है। अन्य प्राणी, छोटे बच्चे अथवा अविकसित मस्तिष्क वाले प्रायः बिना मतलब की बकझक करते रहते हैं। वाणी की प्रौढ़ता सुविज्ञ मस्तिष्क की ज्ञान सम्पदा जुड़ जाने से ही वह विशेषता उत्पन्न होती है जो प्रखर भी होती है और प्रभावशाली भी।
उपासना, साधना व आराधना के इन तीन उपायों से ही ईश्वर जीवसत्ता में प्रवेश करता है तथा मनुष्य को देवोपम चिन्तन चरित्र विनिर्मित करने की प्रेरणा देता है। साहसी मनस्वी इस पथ पर चलकर असीम सामर्थ्य प्राप्त करते हैं, स्वयं को ऊँचा उठाते हैं और दैवी अनुकम्पा उन पर सतत् बरसती रहती है। योगाभ्यास एक पराक्रम है, अपनी अन्तः की दुष्प्रवृत्तियों से संघर्ष है। जो इस देवासुर संग्राम में जितना अधिक सफल होता है वह बहिरंग जगत में सुसंस्कृत एवं अन्तरंग की दृष्टि से महान बनता चला जाता है।
उपासना प्रक्रिया में भी मन्त्रोच्चार के साथ श्रद्धा भरी अनन्य तन्मयता का समावेश होना चाहिए। ऐसा समावेश जिसमें क्रमबद्ध, लयबद्ध, स्वरबद्ध गुनगुनाहट तो हो ही साथ ही इष्ट के साथ एकाकार होने की आकुलता भी हो। मन्त्रों का वास्तविक लाभ इसी गान वाली मनःस्थिति में मिलता है। विशेषताओं से संयुक्त गायत्री शब्द के अनेक अर्थ हैं। गय ‘प्राण’ को भी कहते हैं और ‘गीत’ को भी।
उपासना का तत्व दर्शन समझने के उपरान्त शेष इतना ही रह जाता है कि प्रारम्भिक प्रयासों में उसे भावनात्मक व्यायामों की तरह प्रयुक्त कर धीरे-धीरे आगे बढ़ा जाय। कर्मकाण्ड यदि काय कलेवर है तो तादात्म्य वाला पक्ष उसका प्राण है। एक प्रत्यक्ष है, दूसरा परोक्ष। जप, ध्यान, प्राणायाम का क्रिया पक्ष महत्वहीन है, यदि भाव पक्ष को प्रधानता नहीं दी गयी है। पौरुष हीन के हाथ में तलवार सौंप दी जाय तो पराक्रम के बिना वह मात्र लोहे का एक टुकड़ा भर सिद्ध होती है।
उपासना उतनी ही सफल होगी। यही है श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा का तत्वदर्शन।
उपासना में शरीर का भी ध्यान न रहा। पर इन कठोर साधनों के बावजूद भी हरिदास का मन व्यग्र तथा असन्तुष्ट बना हुआ था। आत्मसाक्षात्कार का लक्ष्य पूरा नहीं हो रहा था। सब कुछ निराशाजनक और प्रयत्न निष्फल जान पड़ रहे थे।
उपासना सार्थक होगी, यह तभी सम्भव है जब उपासक का स्वयं का स्तर ऊँचा हो और उपास्य के सम्बन्ध में वास्तविक बोध बना रहे किसी प्रकार की भ्रान्ति न हो।
उपासना की परिणति ऐसी नहीं है जिसे भ्रान्त एवं निरर्थक कहा जा सके। दूर से तो तारे भी जुगनूँ जैसे दीखते हैं। समीपता अथवा जानकारी की गहराई बढ़ते जाने पर ही यह प्रतीत होता है कि वे उतने छोटे नहीं हैं जितने कि सामान्य दृष्टि से प्रतीत होते थे। गायत्री की गरिमा के सम्बन्ध में भी यही बात है। त्रुटि वेद मन्त्र में नहीं उसके प्रयोक्ताओं, पर्यवेक्षकों में हो सकती है।
उपासना अर्थात् आत्मा को परमात्मा से जोड़ देना। भाव संस्थान जो मान्यताओं, आकाँक्षाओं से लिपटा होता है- वही अपनी आत्मा ही तो है। परमात्म तत्व उत्कृष्ट आदर्शवादिता का ही दूसरा नाम है। अपनी ढर्रे में चली आ रही, लोभ-मोह के बंधनों में जकड़ी आत्मा को परिष्कृत शोधितकर उसे उत्कृष्टता की ओर मोड़ देना ही सच्ची उपासना है। उपासना से तात्पर्य है जिसके समीप बैठे हैं, तद्रूप हो जाना।
उपासना को सार्थक बनाती है, कर्मकाण्ड के क्रिया-कलाप नहीं।
उपासना यदि समर्पित शरणागति स्तर की है तो भक्त उसके अनुशासन को हृदयंगम करता है। अपनी इच्छा ईश्वर की इच्छा में विसर्जित कर ललक लिप्साओं में भटकने के बजाय अन्तराल को पवित्र व्यवहार को प्रखर बनाने में लगाता है। पात्रता-प्रमाणिकता विकसित करने वाले के लिये न आत्म-सन्तोष की कभी कमी रहती है, न लोक सम्मान की। ऋद्धि अर्थात् प्रतिभा, सिद्धि अर्थात् सम्पदा- सफलता की प्राप्ति ही ईश्वर भक्त को प्राप्त दैवी अनुदान है।
उपासना आदि कृत्यों को कभी महत्वपूर्ण नहीं समझा जाता था पर नवीन वैज्ञानिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि सभी क्रियायें पूर्णतया वैज्ञानिक सुरक्षा और उपचार की समर्थ माध्यम हैं।
उपासना में परब्रह्म को नहीं, भगवान को साकार या निराकार रूप में स्मरण किया जाता है। यह भगवान कोई व्यक्ति नहीं, सद्भावना-सद्विचारणा, सत्प्रवृत्तियों का समुदाय है जिसकी समस्त विशेषताओं का स्मरण कर उन्हें आत्मसात करने का प्रयास किया जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-April
उपासना का आग्रह किया गया है। इसका तात्पर्य इसी प्राणतत्व की लय-तालबद्धता के नियमों को जानना और उससे लाभ उठाना है। यही प्रखर, पुष्ट प्राण संकल्प बनकर प्रकट होता और सिद्धि का आधार बनता है। प्राण को आकर्षित करने में सफलता उन्हें ही मिल सकती हैं, जो इस लय-ताल की विधि को समझते और अपनाते हैं। योगी इसी विधि को जानकर प्राणाकर्षण द्वारा प्राण संवर्धन में समर्थ होते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-July
उपासना) पर कदम बढ़ाने वाले का भी पथ अवरुद्ध नहीं होता। उल्टा परिणाम भी नहीं निकलता। थोड़ा-सा प्रयत्न करने पर भी भय से त्राण ही मिलता है।”
उपासना यदि लाभ न दे तो नुकसान भी कभी नहीं पहुँचाती।
उपासना से तात्पर्य है- उत्कृष्टता की देवसत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करना, साधना का अर्थ है- अपने गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का अनुपात अधिकाधिक मात्रा में बढ़ाना। यदि गायत्री तत्वज्ञान को सही रूप में समझा गया होगा तो साधक को निर्धारित उपासना कृत्य श्रद्धापूर्वक स्वीकार करना पड़ेगा, साथ ही आत्म-परिष्कार की जीवन साधना में भी उतनी ही तत्परता के साथ संलग्न होना पड़ेगा। दोनों का मिलन होते ही चमत्कार दृष्टिगोचर होने लगते हैं। भ्रष्ट जीवन के रहते दैवी अनुकम्पाएँ मिल सकना संभव नहीं। जो देवताओं को फुसलाकर अपना उल्लू साधना चाहते हैं पर चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश नहीं करते, ऐसे ही लोगों की उपासना प्रायः निष्फल रहती है।
उपासना में भी चिन्तन और कृत्य को भ्रष्ट और बाह्योपचार को प्रधानता दी जाती रही तो प्रतिफल उस चिन्तन की दुष्टता के ही मिलेंगे। उन्हें बाह्योपचारों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। इन्हीं उपचारों में मुँह से जप लेना, जल्दी-जल्दी या उँघते-उँघते माला घुमा लेना, किसी तरह संख्या पूरी कर लेना, मात्र कृत्य तक ही सीमित रहना भी आता है। इतना अन्तर तो सभी को समझना चाहिए और तथ्यों को भली-भाँति हृदयंगम करना चाहिए। उपासना यदि लाभ न दे तो नुकसान भी कभी नहीं पहुँचाती।
उपासना करते रहना चाहिये।
उपासना पर भी यह बात लागू होती है। भगवान सदैव सत्कर्मों का सत्परिणाम देने वाली सन्तुलित विधि-व्यवस्था को ही कहा जाता रहा है। दुष्परिणाम तो दुष्कृतों के निकलते हैं। यदि उपासना में भी चिन्तन और कृत्य को भ्रष्ट और बाह्योपचार को प्रधानता दी जाती रही तो प्रतिफल उस चिन्तन की दुष्टता के ही मिलेंगे। उन्हें बाह्योपचारों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
उपासना की जाती है तो चिन्तन और कर्म में स्वभावतः श्रेष्ठता का समावेश होना ही चाहिए। यदि मन्त्र जाप के पूर्व ही उसे ‘इफ’ और ‘बट’ की आशंकाओं के जाल में उलझा दिया गया तो सारा प्रयोजन ही गड़बड़ा जाता है।
उपासना विधान के सम्बन्ध में एक विज्ञ मार्गदर्शक अवश्य होना चाहिए। अनुभव ज्ञान रहित मार्गदर्शक के स्थान पर आप्त निष्कर्षों के आधार पर निर्धारित अनुशासनों को ग्रहण कर लेना अधिक श्रेयस्कर है। मार्गदर्शक की खोज-बीन में जल्दी भी न की जाय और स्वयं का समुचित समाधान पहले कर लिया जाय, यही उचित है। हिन्दू धर्म में की गयी खींचतान और मध्यकालीन मनमानियों ने परस्पर विरोधी मतभेदों को अधिक जन्म दिया है। इन सबको सुन, समझकर उचित-अनुचित के चयन की बात यदि सोची जाएगी तो शंकाएँ इतनी अधिक होंगी कि उसका समाधान तो दूर, स्वयं को भ्रम जंजाल से निकालना भी भारी पड़ जाएगा।
उपासना के उपयुक्त निर्धारण एवं अवलम्बन से आत्मपरिष्कार– पराक्रम का लक्ष्य पूरा होता है। फलतः संकटों के निवारण में भी संदेह नहीं रह जाता। गायत्री लाठी लेकर संकटों को मार भगाये और श्रद्धालु आँखें मूँदकर उस तमाशे को देखें, ऐसा नहीं होता।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों से शरीर और मनःक्षेत्र में सन्निहित दिव्य शक्तियों को उभारा जाता है। इस मन्त्र में सार्वभौम धर्म के सभी तथ्य विद्यमान हैं। इसे संसार का सबसे छोटा किन्तु समग्र धर्मशास्त्र कहा जा सकता है। गायत्री के शब्दों और अक्षरों में वे संकेत भरे पड़े हैं जो दृष्टिकोण और व्यवहार में उदार शालीनता का समावेश कर सकें।
उपासना करने और उससे लाभान्वित होने का पूरा-पूरा अधिकार है। इस सम्बन्ध में अधकचरे ज्ञान के आधार पर उठायी गई प्रतिगामी टिप्पणियों से अप्रभावित हो, जिन्हें भी आत्मिक प्रगति में तनिक भी रुचि हो, बिना किसी आशंका-असमंजस के श्रद्धापूर्वक गायत्री उपासना करते रहना चाहिये।
उपासना प्रायः निष्फल रहती है। इसी प्रकार लोग विभिन्न शंकाएं उठाते देखे गये हैं और कुतर्क का जाल बुनकर भावना के क्षेत्र में कुहराम मचाते पाये गये हैं।
उपासना कृत्यों पर, विशेषकर गायत्री उपासना पर भी यह बात लागू होती है। भगवान सदैव सत्कर्मों का सत्परिणाम देने वाली सन्तुलित विधि-व्यवस्था को ही कहा जाता रहा है। दुष्परिणाम तो दुष्कृतों के निकलते हैं। यदि उपासना में भी चिन्तन और कृत्य को भ्रष्ट और बाह्योपचार को प्रधानता दी जाती रही तो प्रतिफल उस चिन्तन की दुष्टता के ही मिलेंगे। उन्हें बाह्योपचारों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मूल्य 80 पैसा मात्र 15 पुस्तकों के सैट का मूल्य 12.00। ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं।
उपासना में सत्, चित्त के साथ आनन्द की अनुभूति की भी कामना रहती है। इष्ट को सर्वश्रेष्ठ, सर्वगुण सम्पन्न, अलौकिक सुन्दरतम् अभिव्यक्त किया जाता है। उसमें मन को दिव्य आनन्द के सागर में डुबकी मारने का अवसर मिलता है। मन की प्रकृति चंचल है। सरस आधार न मिलने पर वह भटकता है।
उपासना कृत्य श्रद्धापूर्वक स्वीकार करना पड़ेगा, साथ ही आत्म-परिष्कार की जीवन साधना में भी उतनी ही तत्परता के साथ संलग्न होना पड़ेगा। दोनों का मिलन होते ही चमत्कार दृष्टिगोचर होने लगते हैं। भ्रष्ट जीवन के रहते दैवी अनुकम्पाएँ मिल सकना संभव नहीं। जो देवताओं को फुसलाकर अपना उल्लू साधना चाहते हैं पर चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश नहीं करते, ऐसे ही लोगों की उपासना प्रायः निष्फल रहती है। इसी प्रकार लोग विभिन्न शंकाएं उठाते देखे गये हैं और कुतर्क का जाल बुनकर भावना के क्षेत्र में कुहराम मचाते पाये गये हैं।
उपासना व साधना के मध्य अविच्छिन्न संबंध। दोनों परस्पर पूरक हैं। उपासना से तात्पर्य है- उत्कृष्टता की देवसत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करना, साधना का अर्थ है- अपने गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का अनुपात अधिकाधिक मात्रा में बढ़ाना। यदि गायत्री तत्वज्ञान को सही रूप में समझा गया होगा तो साधक को निर्धारित उपासना कृत्य श्रद्धापूर्वक स्वीकार करना पड़ेगा, साथ ही आत्म-परिष्कार की जीवन साधना में भी उतनी ही तत्परता के साथ संलग्न होना पड़ेगा। दोनों का मिलन होते ही चमत्कार दृष्टिगोचर होने लगते हैं।
उपासनात्मक कर्मकाण्ड। दूसरा- धर्मधारणा का अनुशासन। तीसरा उत्कृष्टता का पक्षधर तत्व दर्शन। इन तीनों ही क्षेत्रों का अपना-अपना महत्व है। उपासनात्मक कर्मकाण्डों से शरीर और मनःक्षेत्र में सन्निहित दिव्य शक्तियों को उभारा जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-January
उपासना उसके एक पक्ष की ही की जाती है, जो मनुष्य को उत्कृष्टता की ओर अग्रसर करे। अन्यथा चेतना की सामर्थ्य तो उभयपक्षीय है, वह दुष्टता के क्षेत्र में दुःत्साहस बन कर भी काम करती है और उत्कृष्टता के क्षेत्र में मानवी चेतना का स्तर ऊंचा उठाने वाले सत्साहस के रूप में भी सक्रिय रहती है। प्राण के जिस रूप की उपासना की जाती है वह दुष्टता का निषिद्ध पक्ष नहीं उत्कृष्टता का वरणीय स्वरूप ही है। इसी विशेषता को ब्राह्मी शक्ति- ब्रह्म प्रेरणा साक्षात् ब्रह्म आदि नामों से पुकारा गया है। इस प्राण-शक्ति की व्याख्या करते हुए शास्त्रों में कहा गया है-
उपासना पक्ष का अपना महत्व एवं लाभ है। जप-अनुष्ठान का विधान इसी प्रयोजन के लिए है। गायत्री-विज्ञान का उच्चस्तरीय पक्ष कुण्डलिनी जागरण का है। यह योगाभ्यास पक्ष है। प्राण पक्ष है।
उपासना करो। प्राण ही जीवन है। इस लोक में अमृत की प्राप्ति का आधार प्राण है।
उपासना की जाती है वह दुष्टता का निषिद्ध पक्ष नहीं उत्कृष्टता का वरणीय स्वरूप ही है। इसी विशेषता को ब्राह्मी शक्ति- ब्रह्म प्रेरणा साक्षात् ब्रह्म आदि नामों से पुकारा गया है। इस प्राण-शक्ति की व्याख्या करते हुए शास्त्रों में कहा गया है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-August
उपासना की परोक्ष और युग सृजन की प्रत्यक्ष गतिविधियाँ एक-दूसरे के साथ पूरी तरह गुँथी रहे। प्राण और शरीर की तरह दोनों की परस्पर सघनता आवश्यक है। एकाकी रहने पर दोनों ही निरर्थक हो जायेंगे। उनकी शोभा और सफलता साथ-साथ रहने में है। गृहस्थ के नर-नारी दो पक्ष हैं।
उपासना प्रिय लोगों को यह समझाया जाना चाहिए कि उपासना में भावना का, विधान का जितना महत्व है उससे अनुशासन पालन की गरिमा किसी भी प्रकार कम नहीं। इस संदर्भ में असावधानी बरती गई तो चिन्ह-पूजा भर चलती रहेगी, जिन तीक्ष्ण परिणामों की आशा की गई है उस संबंध में निराश ही रहना पड़ेगा।
उपासना की दृष्टि से उसके दोनों ही प्रभाव प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं। साधक के स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीर का परिशोधन, परिष्कार करने की व्यक्तिगत जितनी सामर्थ्य इसमें है उतनी कदाचित ही किसी अन्य उपासना आधार से मिल सके। साथ ही इस शब्द प्रवाह के साथ जुड़ी हुई सामर्थ्य अदृश्य जगत में अन्तरिक्ष में भरी विषाक्तताओं का निराकरण कर सकने में भी समर्थ है।
उपासना विज्ञान के रहस्यवेत्ता एक समय पर एक प्रक्रिया के क्रियान्वित होने की परिणति का अनुमान ही नहीं अनुभव भी प्रस्तुत करते रहे हैं कि मन्त्र शक्ति की पृष्ठभूमि में इस एकता, एकरूपता, एक समय निर्धारण का कम महत्व नहीं है। भारतीय धर्म में प्रातः सायं सूर्योदय और सूर्यास्त का समय संध्या काल बताया गया है। इस समय के संध्या वन्दन को अन्य समयों की अपेक्षा कहीं अधिक सत्परिणाम प्रस्तुत करने वाला बताया गया है। इस्लाम धर्म में नमाज के मन्त्रों का जितना महत्व है, उतना ही उस प्रक्रिया का नियत समय पर करने का भी अनुशासन है। मस्जिदों में अजान दी जाती है।
उपासना में भावना का, विधान का जितना महत्व है उससे अनुशासन पालन की गरिमा किसी भी प्रकार कम नहीं। इस संदर्भ में असावधानी बरती गई तो चिन्ह-पूजा भर चलती रहेगी, जिन तीक्ष्ण परिणामों की आशा की गई है उस संबंध में निराश ही रहना पड़ेगा।
उपासना कृत्यों को नियत समय पर सम्पन्न करने का अनुशासन है, उसके निर्वाह का कठोर निर्धारण भी।
उपासना का शुभारम्भ कर देता है। ईसाई रविवार प्रातः एकत्र होते हैं तथा चर्च में सामूहिक प्रार्थना करते हैं। मिलिट्री की ‘रिट्रीट’ जब भी होती है, जो व्यक्ति जहाँ होता है, वहीं सावधान मुद्रा में खड़ा हो जाता है। ये सारे उदाहरण एक समय एवं सामूहिकता की शक्ति की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए बताए जा रहे हैं।
उपासना भी निरर्थक चली जाती है, जबकि निर्धारित अनुशासन का परिपालन सामान्य विधि-विधानों की भी अद्भुत परिणति उत्पन्न करता देखा गया है। इस संदर्भ में न केवल समय का वरन् विधान की एकरूपता का भी अपना महत्व है। जीवन्त धर्मों में उपासनात्मक-एकरूपता को बहुत महत्व दिया गया है। उनमें एक मन्त्र, एक विधान, एक अनुगमन पर बहुत जोर दिया गया है। एक विच्छृंखलित हिन्दू धर्म ही है।
उपासनात्मक-एकरूपता को बहुत महत्व दिया गया है। उनमें एक मन्त्र, एक विधान, एक अनुगमन पर बहुत जोर दिया गया है। एक विच्छृंखलित हिन्दू धर्म ही है। जिसमें साम्प्रदायिक विभ्रमों ने सब कुछ अस्त-व्यस्त अव्यवस्थित करके रख दिया है। धार्मिक क्षेत्र की इस अराजकता को दूर करना अनिवार्य रूप से आवश्यक है।
उपासना प्रयोजन में प्रयुक्त होने वाले शब्द गुच्छक की नहीं। सृष्टि में अनेकों विभूतियाँ हैं, उनमें से एक गायत्री भी है। उसका शब्द गुँथन इस प्रकार हुआ हैं, जो भावार्थ और सामर्थ्य की दृष्टि से विलक्षण है। उससे व्यक्ति और समाज को सुसंपन्न, सुसंस्कृत एवं समृद्ध बनाने वाले अनेकानेक रहस्यमय तत्वों का समावेश है। त्रिपदा के तीन चरणों में समझदारी, ईमानदारी और जिम्मेदारी के सिद्धान्त की साँगोपाँग विवेचना भरी पड़ी है।
उपासना आधार से मिल सके। साथ ही इस शब्द प्रवाह के साथ जुड़ी हुई सामर्थ्य अदृश्य जगत में अन्तरिक्ष में भरी विषाक्तताओं का निराकरण कर सकने में भी समर्थ है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-June
उपासना करने में कोई हर्ज नहीं। किसी को बहुत ही सन्देह हो तो मौन, मानसिक जप तो बिना संकोच कर सकता है। मानसिक जप पर तो स्नान, स्थान जैसा भी प्रतिबन्ध नहीं है।
उपासना में गायत्री को माता के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। माता होते हुए भी उसका स्वरूप नवयौवना के रूप में दो कारणों से रखा गया है। एक तो इसलिए कि देवत्व को कभी वार्धक्य नहीं सताता। सतत् उसका यौवन रूपी उभार ही झलकता रहता है। सभी देवताओं की प्रतिमाओं में उन्हें युवा सुदर्शन रूप में ही दर्शाया जाता है।
उपासना आराधना करने की ठानी है। वे आज नहीं तो कल इस लोक में स्वर्ग की रचना अवश्य कर लेंगे। खेतों में हरियाली के रूप में यह श्रम ही लहलहा रहा है। उसी का अनुदान- वरदान पाकर धरती पुत्र कृतकृत्य हो रहे हैं। जब तक उसकी अर्चना होती रहेगी भूलोक पर वैभव की कमी न पड़ेगी।
उपासना के सम्बन्ध में की जाती है कि गायत्री मन्त्र गुप्त है। इसका उच्चारण निषिद्ध है। यह प्रचार वर्ण के नाम पर स्वयं को ब्राह्मण कहने वाले धर्म मंच के दिग्गजों ने अधिक किया है। विशेषकर दक्षिण भारत में यह भ्रान्ति तो सर्वाधिक है। वस्तुतः गुप्त तो मात्र दुरभि सन्धियों को रखा जाता है।
उपासना की सामान्य तथा कठोर अध्यात्मिक उपचार मनःशक्ति के परिशोधन एवं उसमें सन्निहित प्रचण्ड-ऊर्जा जिसे मनोबल, संकल्प बल के नाम से जाना जाता है, के लिये किये जाते थे। अभ्यास में- संस्कारों में घुल न पाने के कारण सद्विचार मानवी विकास में उतने सहायक नहीं सिद्ध हो पाते। उन्हें आचरण में उतारने की दृष्टि से पुनरावृत्ति होना आवश्यक है। प्रतीक क्रियाओं एवं माध्यमों से उनका अभ्यास किया जाता है। तप तितीक्षा से संकल्पबल मजबूत होता मनोबल उभरता तथा सद्मार्ग पर चलने का आधार सुदृढ़ बनता है।
उपासना की ही न जा सकेगी। ब्राह्ममुहूर्त को भी एक प्रकार से रात्रि ही कहा जा सकता है। उसमें तो सभी को जल्दी उठकर उपासना करने और सूर्योदय होने पर सूर्यार्घ देकर उसे समाप्त करने की साधारण विधिव्यवस्था है। वस्तुतः सूर्य न कभी अस्त होता है और न देवता शयन करते हैं। इसलिए रात्रि में उपासना करने में कोई हर्ज नहीं।
उपासना, तप, तितीक्षा की प्रक्रियाएँ अन्तःकरण में जड़ जमाये कुसंस्कारों के परिशोधन तथा सुसंस्कारों की प्रतिष्ठापना का प्रयोजन पूरा करती है। जिनका अवलंबन लेकर हर कोई न केवल मन की उपयोगिता- उपादेयता को समझने में समर्थ हो सकता है वरन् मनःशक्ति को उभरने- विकसित करने में भी सफलता प्राप्त कर सकता है।
उपासना का लाभ अधिक माना गया है। किन्तु ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं कि सविता देवता की अनुपस्थिति में- रात्रि होने के कारण उपासना की ही न जा सकेगी। ब्राह्ममुहूर्त को भी एक प्रकार से रात्रि ही कहा जा सकता है। उसमें तो सभी को जल्दी उठकर उपासना करने और सूर्योदय होने पर सूर्यार्घ देकर उसे समाप्त करने की साधारण विधिव्यवस्था है। वस्तुतः सूर्य न कभी अस्त होता है और न देवता शयन करते हैं।
उपासना को जादूगरी बाजीगरी के समतुल्य ठहराया गया और सोचा गया कि उससे कौतुक कौतूहल देखने दिखाने वाले दृश्य सामने दौड़ने लगते हैं। मनोकामना सिद्धि के लिए यह सस्ते नुस्खे बाल-बुद्धि को बहुत सुहाये। बिना पात्रता और परिश्रम के ऐसे ही हाथों की हेरा-फेरी- जीभ से कुछ कहते रटते भर रहने से ऋद्धि-सिद्धियां छप्पर फाड़कर घर में कूदेंगी, ऐसे ही कुछ अनगढ़ सपने तथाकथित साधकों के सिर पर छाये रहते हैं।
उपासना प्रयोजन के लिये प्रयुक्त किया जाय? इसका समाधान मात्र यही है कि जिन्हें निराकार रुचता हो, वे सविता के ‘भर्गः’ स्वरूप का ध्यान करें। सूर्य का तेज- प्रकाशवान स्वरूप उसका प्रतीक है। प्रभातकालीन स्वर्णिम सूर्य को सविता की आकृति माना जाता है। यह मात्र आग का गोला नहीं है।
उपासना करने और सूर्योदय होने पर सूर्यार्घ देकर उसे समाप्त करने की साधारण विधिव्यवस्था है। वस्तुतः सूर्य न कभी अस्त होता है और न देवता शयन करते हैं। इसलिए रात्रि में उपासना करने में कोई हर्ज नहीं। किसी को बहुत ही सन्देह हो तो मौन, मानसिक जप तो बिना संकोच कर सकता है। मानसिक जप पर तो स्नान, स्थान जैसा भी प्रतिबन्ध नहीं है।
उपासना के क्षेत्र में भी दोनों को स्वभावतः समान अधिकार प्राप्त हैं।
उपासना रात्रि में की जा सकती है? इस विषय पर भी भाँति-भाँति के मत व्यक्त किये जाते हैं एवं जन-साधारण को भ्रान्ति के जंजाल में उलझा दिया जाता है। वस्तुतः गायत्री का दाता सूर्य है सूर्य की उपस्थिति में की गयी उपासना का लाभ अधिक माना गया है। किन्तु ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं कि सविता देवता की अनुपस्थिति में- रात्रि होने के कारण उपासना की ही न जा सकेगी। ब्राह्ममुहूर्त को भी एक प्रकार से रात्रि ही कहा जा सकता है।
उपासना करते रह सकते हैं। ( क्रमशः )
उपासना का तात्विक दर्शन।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-October
उपासना ही वेद ने बतलाई है। है विभो! फिर क्या कारण है कि तीनों संध्याकाल की वन्दना में तथा अन्य समय में भी नित्य ही उस शक्ति का त्याग करके द्विजगण अन्य देवों की उपासना को क्यों ग्रहण किया करते हैं।”
उपासना काल में साधकों को दिखाई देने वाले नृत्य-गायन और संगीतों की मधुर-ध्वनियाँ भी इसी प्रकार सुनी जाती हैं, वह प्रसारण किसी विशेष लोक या स्थान से सुनिश्चित रूप से संचारित होते हैं, अब यह आत्मा की पवित्रता और मलिनता पर निर्भर है कि वह किसी सन्देश या दृश्य को कितनी स्पष्टता से देखे। पवित्र आत्माओं को दृश्य और सन्देश बिल्कुल साफ और स्पष्ट मिलते हैं, जबकि अपवित्र आत्मायें देख-सुनकर भी सही अर्थ नहीं समझ सकतीं।
उपासना करते हों, पर गायत्री महामन्त्र की उपेक्षा न करें। प्रधानता गायत्री को दें। अनिवार्य उसी को रखें और फिर जिस भी देवता या उसके मन्त्र की आराधना करनी हो, करते रहें।
उपासना सनातन और सर्वोपरि
उपासना क्षेत्र का प्रवेश-द्वार है। नित्य-कर्म, संध्या-वन्दन उसी की प्रमुखता में सम्पन्न होता है और यह विदित तथ्य है कि बिना संध्या किये किसी भी देवता की उपासना का न तो अधिकार मिलता है और न सफलता ही मिलती है।
उपासना ही नित्या है। जिसके बिना द्विज का निश्चय ही अधःपतन हो जाता है।
उपासना करते थे। अब समय की विपरीतता और अदूरदर्शिता के कारण लोग इधर-उधर भटक रहे हैं। इतने पर भी सुनिश्चित तथ्य जहाँ का तहाँ है। इसकी महिमा एवं महत्ता कम नहीं होती। इस अनादि उपासना का इतिहास बताते हुए महर्षि व्यास कहते हैं-
उपासनाओं से मिलने वाला अनुग्रह और प्रार्थना से मिलने वाला आशीर्वाद भी इसी तरह होता है। उससे अधिक अतीन्द्रिय ज्ञान से जीवन की अमरता सिद्ध होती है।
उपासना, सच बोलना, न्याय और परिश्रम की कमाई खाना, नियम, संयम और ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना- करने लगा है तो भी अब तक जो दुष्कर्म हो चुके हैं, उनका प्रतिफल भोगे बिना वह रह नहीं सकता। जब तक असत् कर्मों और संस्कारों का प्रक्षालन नहीं हो जाता- अच्छे कर्म करते हुए भी लोगों को व्याधियाँ निश्चित रूप से आती रहेंगी। अब के लिए हुये सत्कर्मों तक का हिसाब न हो जाने तक वह पीड़ायें पिंड नहीं छोड़ सकतीं।
उपासना तत्त्व गायत्री ही रहा है। वे सभी इस महाशक्ति की आराधना करके अपनी शक्ति और महिमा की अक्षुण्ण बनाये रखने में समर्थ रहे हैं। इसलिये सर्व-साधारण के लिये भी यही उचित है कि भले ही अन्य देवी-देवता की वे उपासना करते हों, पर गायत्री महामन्त्र की उपेक्षा न करें। प्रधानता गायत्री को दें। अनिवार्य उसी को रखें और फिर जिस भी देवता या उसके मन्त्र की आराधना करनी हो, करते रहें।
उपासना का न तो अधिकार मिलता है और न सफलता ही मिलती है।
उपासना की जाय पर ध्यान यही रहना चाहिये कि भारतीय धर्मानुयायियों का प्रधान उपास्य गायत्री ही है।
उपासना का इतिहास बताते हुए महर्षि व्यास कहते हैं-
उपासना की महत्ता को सर्वोपरि बताया है। इस उपाख्यान में इस शंका का समाधान किया गया है कि गायत्री के रहते अन्य देवताओं अथवा मन्त्रों का महत्व क्यों दिया जाता है? उपाख्यान में अनादि मन्त्र गायत्री को ही बताया गया है और उसे सर्वोपरि प्रतिपादित किया गया है।
उपासना के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की है, उसका संदर्भ इस प्रकार है-
उपासना करते हैं और उसके समीप पहुँचने डडडड तो दूर प्रदेशों के दृश्य, श्रव्य आदि ऐसे दिखाई व सुनाई देने लगते हैं, जैसे वह बिल्कुल पास का दृश्य हो। आत्मा जब ‘परमात्मा’ की स्थिति में पहुँचने लगती है, तब त्रिकाल-दर्शन, सर्वात्मभूति की विलक्षण क्षमतायें मिलने लगती हैं। अन्तिम भूमिका सर्व-शक्तिमान भूमिका होती है।
उपासना को क्यों ग्रहण किया करते हैं।”
उपासना करके उससे अधिकाधिक लाभ उठाना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-May
उपासना में संलग्न होना चाहिये। सक्रिय कार्यकर्ताओं को ‘ऋत्विज’ की जिम्मेदारी उठानी चाहिये। ‘महत्तम गायत्री महापुरश्चरण’ में भागीदार बनना चाहिये और नव-निर्माण के लिए प्रबुद्ध आत्माओं के कंधों पर आये हुए उत्तरदायित्वों को आगे बढ़कर स्वीकार, शिरोधार्य करना चाहिये।
उपासना पद्धति का निर्धारण किया गया है, जो व्यस्त लोगों के लिए भी थोड़े समय में सम्पन्न हो सकने वाली और अति सरल है। कष्टसाध्य अनेक बंधन प्रतिबंधों से जुड़ी हुई- बहुत समय लेने वाली साधनायें अक्सर सर्वसाधारण के उपर्युक्त नहीं होती। उन्हें कोई विरले ही श्रद्धावान और सुविधा सम्पन्न व्यक्ति कर पाते हैं। अधिकाँश को तो रोजी-रोटी और अन्यान्य समस्याओं में उलझे रह कर व्यस्त जीवन जीना पड़ता है। ऐसे लोगों के लिए सरल साधना पद्धति ही उपयुक्त पड़ती है।
उपासना प्रथम चरण है, साधना उससे अगला। उपासना अति सरल है। थोड़ी देर पालथी मार कर बैठना और कुछ समय भगवान का नाम स्मरण एवं पूजन वन्दन कर लेना कोई ऐसा भार नहीं है जिसे उठाया न जा सके। रुचि न हो तो फुरसत न मिलने की बात भी कही जा सकती है पर यदि तनिक भी इच्छा और रुझान हो तो दस-बीस मिनट- घण्टा, आध घण्टा बड़ी सरलता से लगाया जा सकता है। हम में अधिकाँश व्यक्ति अनेक निरर्थक कार्यों में समय बर्बाद करते रहते हैं।
उपासना के साथ साधना अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। अध्यात्म का पथ इन दोनों पहियों पर ही गतिशील होता है। जो भजन तो बहुत करता है पर चारित्रिक एवं भावनात्मक विकास की ओर से विमुख है, उसका भजन कदाचित ही कुछ प्रयोजन पूरा करे। रोटी और पानी का- दिन और रात का- जिस प्रकार जोड़ा है, वैसे ही उपासना और साना का ‘अन्योन्य’ संबंध है। एक-दूसरे पर पूर्णतया अवलंबित है।
उपासना और साना का ‘अन्योन्य’ संबंध है। एक-दूसरे पर पूर्णतया अवलंबित है। दोनों के समन्वय से ही समग्र प्रतिफल उत्पन्न होता है।
उपासना का प्रथम चरण भजन-पूजन अति सरल और तप त्याग कुछ कठिन है पर अभ्यास से उन्हें भी पूरा कर ला जाता है।
उपासना की समन्वित प्रक्रिया को अपनाने वाले 24 हजार साधकों द्वारा इस युग के अभूतपूर्व महत्तम गायत्री महापुरश्चरण को पूरा किया जाना है। पुरश्चरणों में जप-संख्या की पूर्ति ही पर्याप्त नहीं होती वरन् कर्ताओं का स्तर प्रधान रहता है। उत्कृष्ट स्तर के साधक ही किसी मंत्र का समुचित प्रतिफल उत्पन्न कर सकते हैं। प्रतिदिन 24 लक्ष जप वाला महत्तम गायत्री महापुरश्चरण ऐसे ही साधकों द्वारा सम्पन्न होना है जो उपासना को ही पद्धति न मान बैठे हों वरन् साधना को भी अनिवार्य रूप से आवश्यक समझ कर उसके लिए अभीष्ट पुरुषार्थ करने के लिए कटिबद्ध हों।
उपासना को हम प्रारंभिक चरण मानते रहे हैं और उसकी पूर्ति के लिए साधना का समावेश करने के लिए पूरा-पूरा जोर देते रहे हैं। यही ऋषि प्रणीत सनातन एवं आर्ष-परम्परा है। जो भजन-पूजन का अलंकारिक, अत्यधिक महात्म्य बता कर- उतने में ही स्वर्ग मुक्ति, ऋद्धि-सिद्ध मिल जाने की बात कहते हैं, उनका प्रतिपादन अशास्त्रीय अनार्ष एवं अवैज्ञानिक है। यही कारण है कि अधूरा भजन करने वाले खाली हाथ रहते और अन्ततः अश्रद्धालु बनते देखे जाते हैं।
उपासना के साथ-साथ साधना को भी जुड़ा रखना चाहिये। तभी उसे सन्तोषजनक लाभ मिल सकेगा। यही प्रयत्न अपना भी रहा है। उपासना को हम प्रारंभिक चरण मानते रहे हैं और उसकी पूर्ति के लिए साधना का समावेश करने के लिए पूरा-पूरा जोर देते रहे हैं। यही ऋषि प्रणीत सनातन एवं आर्ष-परम्परा है।
उपासना अंक था। उसमें एक ऐसी उपासना पद्धति का निर्धारण किया गया है, जो व्यस्त लोगों के लिए भी थोड़े समय में सम्पन्न हो सकने वाली और अति सरल है। कष्टसाध्य अनेक बंधन प्रतिबंधों से जुड़ी हुई- बहुत समय लेने वाली साधनायें अक्सर सर्वसाधारण के उपर्युक्त नहीं होती। उन्हें कोई विरले ही श्रद्धावान और सुविधा सम्पन्न व्यक्ति कर पाते हैं। अधिकाँश को तो रोजी-रोटी और अन्यान्य समस्याओं में उलझे रह कर व्यस्त जीवन जीना पड़ता है।
उपासना को ही पद्धति न मान बैठे हों वरन् साधना को भी अनिवार्य रूप से आवश्यक समझ कर उसके लिए अभीष्ट पुरुषार्थ करने के लिए कटिबद्ध हों।
उपासना अति सरल है। थोड़ी देर पालथी मार कर बैठना और कुछ समय भगवान का नाम स्मरण एवं पूजन वन्दन कर लेना कोई ऐसा भार नहीं है जिसे उठाया न जा सके। रुचि न हो तो फुरसत न मिलने की बात भी कही जा सकती है पर यदि तनिक भी इच्छा और रुझान हो तो दस-बीस मिनट- घण्टा, आध घण्टा बड़ी सरलता से लगाया जा सकता है। हम में अधिकाँश व्यक्ति अनेक निरर्थक कार्यों में समय बर्बाद करते रहते हैं। समय का मूल्य समझने वाले एक-एक क्षण का उपयोग करने वाले- निरंतर तत्परतापूर्वक कर्म पथ पर चलते रहने वाले लोग कितने हैं?
उपासना आसानी से हो सकती है। वह निश्चय ही अति सरल प्रक्रिया है- इसलिए प्रथम शिक्षण उसी का किया गया है।
उपासना का विकास साधना में होना आवश्यक है। इन दोनों पंखों के आधार पर ही हम आत्मिक प्रगति के उन्मुक्त आकाश में ठीक तरह उड़ सकते हैं।
उपासना में साधना का समन्वय कर सकने की स्थिति में अब अपने परिजन पहुँच चुके हैं, इसलिये उनके कंधों की मजबूती जाँच लेने के बाद यह उपयुक्त ही प्रतीत हुआ कि वह आधार भी जोड़ लेने के लिए कहा जाय जो आत्मिक प्रगति के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-January
उपासना में भावना का समावेश, यह जीवन साधना की पद्धति हममें से हर एक के जीवन क्रम का अंग बने इसके लिए हर सदस्य से व्यक्तिगत रूप से भली-भाँति विचार विनमय किया जाय और इस आत्मोत्कर्ष के पुनीत कार्य का उसकी रुचि को अभिवर्धन किया जाय।
उपासना भावना का समावेश जितना-जितना होता जायेगा उतनी ही एकाग्रता तन्मयता बढ़ती जायेगी और आत्मा में अनिवर्चनीय आनन्द का अनुभव होने लगेगा।
उपासना में वह अलौकिक दिव्य शक्ति विद्यमान है कि यदि ठीक तरह उसका प्रयोग किया जा सके तो विश्वव्यापी वातावरण बदला जा सकता है और विश्व-शाँति का शिलान्यास ठोस आधार पर किया जा सकता है।
उपासना केवल ‘गायत्री’ है। वही हमारा गुरु मन्त्र है। वही हमारे तत्वज्ञान का सार और धर्म एवं संस्कृति का आधार है। गायत्री उपासना में वह अलौकिक दिव्य शक्ति विद्यमान है कि यदि ठीक तरह उसका प्रयोग किया जा सके तो विश्वव्यापी वातावरण बदला जा सकता है और विश्व-शाँति का शिलान्यास ठोस आधार पर किया जा सकता है।
उपासना पद्धति को अपनाना चाहिये। कहना न होगा कि भारती धर्म की अनादि उपासना केवल ‘गायत्री’ है। वही हमारा गुरु मन्त्र है। वही हमारे तत्वज्ञान का सार और धर्म एवं संस्कृति का आधार है। गायत्री उपासना में वह अलौकिक दिव्य शक्ति विद्यमान है कि यदि ठीक तरह उसका प्रयोग किया जा सके तो विश्वव्यापी वातावरण बदला जा सकता है और विश्व-शाँति का शिलान्यास ठोस आधार पर किया जा सकता है।
उपासना के पक्ष में ही जाता है। जो अन्य उपासना करते हैं वह भले ही उसे भी करते रहें पर हमारा अनुरोध है कि उसके साथ गायत्री उपासना अवश्य जोड़ दें। उचित तो यही है कि नियत समय पर, नियत विधि-विधान के साथ उपासना की जाय। पर जिनको किन्हीं कठिनाइयों के कारण इसमें अड़चन दिखाई पड़ती हो वे बिना स्नान के भी मानसिक जप और ध्यान करके काम चला सकते हैं। पूरा नहीं तो आधा परिणाम इसका भी होता है।
उपासना में संलग्न हो सके। गायत्री तपोभूमि की स्थापना, गायत्री परिवारों का संगठन, अलभ्य गायत्री साहित्य का निर्माण, गायत्री यज्ञों की देशव्यापी श्रृंखला आदि प्रयत्नों के आधार पर इस दिशा में जितना कार्य हुआ है, उसका मूल्याँकन आज नहीं हो सकता, उसे तो भावी इतिहासकार ही आंकेंगे। अभी तो हमें इतना जान लेना ही पर्याप्त है कि युग-निर्माण के शुभारम्भ के लिए उपासनात्मक प्रक्रिया की अनिवार्य आवश्यकता थी, उसका प्रचलन एक संतोषजनक सीमा तक हो चुका। अब इसका विशेष प्रयोग इस दस वर्षीय अभियान के लिए करना है, जिसका आरम्भ इसी बसंत पंचमी- 3 फरवरी 1968 शनिवार से होने जा रहा है।
उपासना के लिए यदि आधा घण्टा नित्य निकाला जा कसे तो पर्याप्त है। गाँधी जी की प्रार्थना आधा घण्टा ही होती थी पर उतनी ही देर में ईश्वर से सम्बन्ध जोड़ लेते थे। सन्त विनोबा जी की उपासना का भी थोड़ा-सा ही समय निर्धारित है। सच्चे मन और सच्चे ढंग से की गई थोड़ी-सी पूजा प्रार्थना भी चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करती है। किन्तु यदि भावना-रहित, लक्ष्य-रहित, विवेक-रहित टंट-घंट दिन भर भी करते रहा जाय तो उसका परिणाम बालू से तेल निकालने की तरह ही होगा।
उपासना के साथ-साथ सामूहिक गायत्री मन्त्रों का भी प्रसार होना चाहिये। द्रव्य यज्ञ भी और ज्ञान यज्ञ भी दोनों की संकुलित व्यवस्था रहे तो हमारे यह आयोजन अन्तरिक्ष में यह आध्यात्मिक चेतना उत्पन्न कर सकते हैं जिनके आधार पर जन-मानस को उत्कृष्टता की दिशा दी जा सके और सम्मिलित होने वालों को एक नया प्रकाश मिल सके। शास्त्र ने यज्ञ को श्रेष्ठतम सत्कर्म कहा है। आज की परिस्थितियों में जिस उद्देश्य से, जिस आधार पर, जिस स्तर के इन युग-निर्माण सम्मेलनों सहित गायत्री यज्ञों का आयोजन किया जा रहा है वे अपनी उपयोगिता के कारण निस्संदेह सर्वोपरि सत्कर्म हैं। इन आयोजनों का साहस हर सचेतन और समर्थ केन्द्र द्वारा किया जाना चाहिये ताकि अपना हर वर्ष सहस्र कुंडी खण्ड यज्ञ करने का- दस वर्ष में दस अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प पूर्ण हो सके।
उपासना की जाय। पर जिनको किन्हीं कठिनाइयों के कारण इसमें अड़चन दिखाई पड़ती हो वे बिना स्नान के भी मानसिक जप और ध्यान करके काम चला सकते हैं। पूरा नहीं तो आधा परिणाम इसका भी होता है। 108 मन्त्र युगनिर्माण अभियान की सफलता में योगदान देने के लिये और 108 मन्त्र व्यक्तिगत आत्म-कल्याण के लिये हममें से हर एक को जपने चाहिये। माला न हो तो गणना उंगलियों पर की जा सकती है।
उपासना को अनिवार्य और व्यापक बनाते हुये अपने कदम आगे बढ़ाने हैं।
उपासना है। शतसूत्री कार्यक्रम इसी दृष्टि से हैं कि मनुष्य उन्हें अपनाकर सेवा धर्म की सार्थक साधना कर सके और अपना तथा समस्त संसार का सच्चा हित साधन कर सके। परिस्थिति के अनुरूप कौन क्या सेवा कर सकता है इस बात को ध्यान में रखकर अनेक प्रकार के सेवा कार्यों की एक सूची बनाई गई है, जिनमें सौ तरह के सेवा कार्य हैं। उनका विस्तृत उल्लेख एक रुपया मूल्य की ‘हमारी युग-निर्माण योजना’ पुस्तक में है। उनमें से कुछ चुने हुये सूत्र इस लेख में प्रस्तुत किये जा रहे हैं ताकि सामूहिक सत्प्रयत्नों के अंतर्गत उनका समावेश करके सेवा धर्म की सार्थक साधना कर सकें-
उपासना और साधना दोनों का इसमें समन्वय है। पूजा और अर्चा यह दो साधना के पक्ष हैं। एक में भगवान के सान्निध्य का क्रम किसी निर्धारित समय पर चलाया जाता है। दूसरे में जीवन शोधन और लोकमंगल के लिये तपश्चर्या का परिचय दिया जाता है। जब तक यह उभयपक्षीय पूजा अर्चा एकत्रित नहीं होती तब तक बिजली के दोनों तार मिले बिना प्रकाश न होने की तरह अंतःकरण में अंधेरा ही बना रहता है।
उपासना करते हैं। पर उस संघशक्ति महत्व भुला देते हैं, जो सर्वोपरि है। गायत्री महामंत्र समूहवाद का मन्त्र है। इसका तत्व-ज्ञान “नः” शब्द में सन्निहित है। यह कहता है कि एकाकीपन में नहीं, संगठित एवं सम्मिलित प्रयत्नों में ही मानवीय कल्याण का श्रेय साधन छिपा हुआ है।
उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। इसके अनेक विधान हैं। इन सब विधानों में हमें गायत्री महामंत्र का जप और ध्यान सर्वोत्तम प्रतीत हुआ है। शास्त्र, पूर्वजों के निर्देश और हमारे व्यक्तिगत अनुभव तीनों का सम्मिलित निष्कर्ष गायत्री उपासना के पक्ष में ही जाता है। जो अन्य उपासना करते हैं वह भले ही उसे भी करते रहें पर हमारा अनुरोध है कि उसके साथ गायत्री उपासना अवश्य जोड़ दें।
उपासना, यात्रा दर्शन, हवन, पूजन आदि धार्मिक कर्मकाँड कर लेने से पाप दूर करने, स्वर्ग मुक्ति मिलने, ईश्वर प्रसन्न होने का प्रयोजन पूर्ण हो जाता है। इस मान्यता के लोग थोड़ी पूजा-पत्री करके परमार्थ प्रयोजन और आत्म-कल्याण के बारे में आत्म-सन्तोष कर लेते थे, निश्चिन्त हो जाते थे। पर अब तर्क, अनुभव, प्रमाण और कारणों ने इस मान्यता को मिथ्या सिद्ध कर दिया है। वेद, शास्त्र तथा ऋषि-मुनियों के प्रतिपादन इससे भिन्न हैं। वे कहते हैं व्यक्तित्व की उत्कृष्टता ही किसी व्यक्ति के अध्यात्मवादी एवं ईश्वर परायण होने की कसौटी है और जो उस कसौटी पर खरा होगा वह स्वार्थपरता की सिद्धि में ही न लगा रहकर लोक-मंगल की प्रवृत्तियों में अवश्य संलग्न होगा।
उपासना का भी थोड़ा-सा ही समय निर्धारित है। सच्चे मन और सच्चे ढंग से की गई थोड़ी-सी पूजा प्रार्थना भी चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करती है। किन्तु यदि भावना-रहित, लक्ष्य-रहित, विवेक-रहित टंट-घंट दिन भर भी करते रहा जाय तो उसका परिणाम बालू से तेल निकालने की तरह ही होगा।
उपासना के साथ आरम्भ किये जाते हैं तो ‘युग-निर्माण’ जैसे महानतम कार्य के मूल में उपासना का आधार न रहे यह कैसे हो सकता है? गायत्री-मन्त्र भारतीय धर्म और संस्कृति का मूल है। इसमें वह शिक्षा भी है और यह शक्ति भी है जिसके आधार पर व्यक्ति और समाज का स्तर उत्कृष्ट बनाया जा सके। अनादि काल से हमारे पूर्वज इस अवलम्बन को अपना कर अपनी आँतरिक और लौकिक महानता अक्षुण्ण बनाये रहने में समर्थ हुए। अब हमें उनका स्तर पुनः प्राप्त करने के प्रयास में उनकी उपासना पद्धति को अपनाना चाहिये।
उपासना में भावना का समावेश।
उपासना के साथ अध्यात्म तत्व ज्ञान का शुभारम्भ होता है। अतएव हमें भक्तियोग के अंतर्गत उस ओर भी पूरा-पूरा ध्यान देना है। विचार परिवर्तन आंदोलन के मूल में आध्यात्मिक तत्व ज्ञान को अविच्छिन्न रूप में जोड़ रखा गया है। अतएव हमें उपासना को अनिवार्य और व्यापक बनाते हुये अपने कदम आगे बढ़ाने हैं।
उपासनात्मक प्रक्रिया की अनिवार्य आवश्यकता थी, उसका प्रचलन एक संतोषजनक सीमा तक हो चुका। अब इसका विशेष प्रयोग इस दस वर्षीय अभियान के लिए करना है, जिसका आरम्भ इसी बसंत पंचमी- 3 फरवरी 1968 शनिवार से होने जा रहा है।
उपासना भी है पर उसे सामूहिक प्रयत्नों में भी सर्वोपरि सफलता के साथ प्रयुक्त किया जा सकता है। इस महामन्त्र का “नः” शब्द यही इंगित करता है कि गायत्री व्यक्ति को ही नहीं समाज को भी- समूह को भी- पलट देने में- सुधार देने में समर्थ है। यह क्षमता और किसी मन्त्र में नहीं। इसलिए उसे गुरु मन्त्र के साथ-साथ राष्ट्र मन्त्र भी कहा गया है। युग-निर्माण प्रक्रिया में इसका उपयोग अनिवार्य रूप से आवश्यक है यही सोच कर गत् बीस वर्षों से इस संदर्भ में अथक प्रयत्न करके उसे लोक मानस में एक सुपरिचित तथ्य बना दिया गया।
उपासना करने तथा स्वाध्याय के लिए समय नियत रखने की आवश्यकता अनुभव कराना।
उपासना विशिष्ट साधकों के लिये हैं। उनका मार्ग-दर्शन साधन की मनोभूमि के अनुरूप व्यक्तिगत रूप से किया जाता है। पंचकोशी उपासना क्रम एक-दो वर्ष तो साधकों ने चलाया फिर उत्साह ठण्डा पड़ गया तो बहुत थोड़े साधक रह गये। अतएव ‘अखण्ड-ज्योति’ में वह साधना क्रम छापना बन्द करना पड़ा। जो साधक उस मार्ग पर चल रहे हैं उन्हें पत्रों द्वारा अगला मार्ग-दर्शन बराबर किया जा रहा है।
उपासनात्मक कार्यक्रम छपा है। 200 शाखाओं द्वारा 5-5 कुण्डों के गायत्री यज्ञ होते रहने से हर वर्ष 1000 कुण्डों का एक वैसा ही महायज्ञ सम्पन्न होता रहेगा जैसा सन् 58 में मथुरा में किया गया था। ऐसे यज्ञों की तुलना- अश्वमेध यज्ञ से की जाती है। त्रेता में भी दस अश्वमेध यज्ञ आसुरी वातावरण को निवृत्ति के लिये गंगा तट पर काशी में किये गये थे, जिनकी स्मृति और साक्षी ‘दशाश्वमेध घाट’ अभी भी बना हुआ है। अब पुनः उस पुण्य प्रयोजन की पुनरावृत्ति हो रही है।
उपासना का आधार न रहे यह कैसे हो सकता है? गायत्री-मन्त्र भारतीय धर्म और संस्कृति का मूल है। इसमें वह शिक्षा भी है और यह शक्ति भी है जिसके आधार पर व्यक्ति और समाज का स्तर उत्कृष्ट बनाया जा सके। अनादि काल से हमारे पूर्वज इस अवलम्बन को अपना कर अपनी आँतरिक और लौकिक महानता अक्षुण्ण बनाये रहने में समर्थ हुए। अब हमें उनका स्तर पुनः प्राप्त करने के प्रयास में उनकी उपासना पद्धति को अपनाना चाहिये।
उपासना करते हैं वह भले ही उसे भी करते रहें पर हमारा अनुरोध है कि उसके साथ गायत्री उपासना अवश्य जोड़ दें। उचित तो यही है कि नियत समय पर, नियत विधि-विधान के साथ उपासना की जाय। पर जिनको किन्हीं कठिनाइयों के कारण इसमें अड़चन दिखाई पड़ती हो वे बिना स्नान के भी मानसिक जप और ध्यान करके काम चला सकते हैं। पूरा नहीं तो आधा परिणाम इसका भी होता है। 108 मन्त्र युगनिर्माण अभियान की सफलता में योगदान देने के लिये और 108 मन्त्र व्यक्तिगत आत्म-कल्याण के लिये हममें से हर एक को जपने चाहिये।
उपासना अवश्य जोड़ दें। उचित तो यही है कि नियत समय पर, नियत विधि-विधान के साथ उपासना की जाय। पर जिनको किन्हीं कठिनाइयों के कारण इसमें अड़चन दिखाई पड़ती हो वे बिना स्नान के भी मानसिक जप और ध्यान करके काम चला सकते हैं। पूरा नहीं तो आधा परिणाम इसका भी होता है। 108 मन्त्र युगनिर्माण अभियान की सफलता में योगदान देने के लिये और 108 मन्त्र व्यक्तिगत आत्म-कल्याण के लिये हममें से हर एक को जपने चाहिये।
उपासना क्रम एक-दो वर्ष तो साधकों ने चलाया फिर उत्साह ठण्डा पड़ गया तो बहुत थोड़े साधक रह गये। अतएव ‘अखण्ड-ज्योति’ में वह साधना क्रम छापना बन्द करना पड़ा। जो साधक उस मार्ग पर चल रहे हैं उन्हें पत्रों द्वारा अगला मार्ग-दर्शन बराबर किया जा रहा है। सर्व साधारण के लिये सरल और स्वल्पकाल में सम्भव हो सकने वाला साधन ही चल सकता है। इसलिये दो माला 216 गायत्री मंत्र नित्य जपने की बात हर परिजन को कड़ाई के साथ निबाहनी चाहिये और जब भी अवसर हो भगवान के साथ अपनी अनन्यता एवं अभिन्नता का भावनापूर्ण ध्यान करना चाहिये।
उपासना के सम्बन्ध में जितना सीखा सिखाया जा चुका है वह पर्याप्त है। उपासना के लिए यदि आधा घण्टा नित्य निकाला जा कसे तो पर्याप्त है। गाँधी जी की प्रार्थना आधा घण्टा ही होती थी पर उतनी ही देर में ईश्वर से सम्बन्ध जोड़ लेते थे। सन्त विनोबा जी की उपासना का भी थोड़ा-सा ही समय निर्धारित है। सच्चे मन और सच्चे ढंग से की गई थोड़ी-सी पूजा प्रार्थना भी चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करती है।
उपासना के समय अथवा जब भी अवसर हो भगवान का ऐसा भावपूर्ण ध्यान करना चाहिये। उपासना भावना का समावेश जितना-जितना होता जायेगा उतनी ही एकाग्रता तन्मयता बढ़ती जायेगी और आत्मा में अनिवर्चनीय आनन्द का अनुभव होने लगेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-February
उपासना के निष्काम होकर की जाये।
उपासना, (2) जीवन शोधन, (3) परमार्थ, यह तीन स्तम्भ अध्यात्म के हैं। इन्हीं को भक्ति योग, कर्मयोग और ज्ञानयोग कहते हैं। इन्हीं से कारण, सूक्ष्म और स्थूल कर्तव्यों का परिष्कार होता है। इस तथ्य को पिछले दो अंकों में विस्तारपूर्वक समझाया जा चुका है। अधिकांश परिजन इस दिशा में पहले से ही प्रयत्नशील हैं।
उपासना का आडम्बर ही किया करते हैं। या तो उसके आधार पर उन्हें अपना महत्व प्रदर्शन करने का भाव घेरे रहता है अथवा उनकी उपासना का लक्ष्य किसी कामना की पूर्ति रहता है परमात्मतत्व की प्राप्ति नहीं।
उपासना द्वारा परमात्मा का सामीप्य प्राप्त करेगा उसके समीप बना रहेगा, उसमें परमात्मा का गुण, श्रेष्ठता का स्थानान्तरण होना चिर स्वाभाविक ही है।
उपासना नहीं, बल्कि उसका आडंबर मात्र है, दिखावा है, प्रदर्शन है।
उपासना क्रम भी इस तीर्थ स्थान पर रहकर पूरा करलें।
उपासना वाँछित फल के साथ सफल नहीं होती। न तो उन्हें श्रेष्ठता मिलती है और न आत्म-शाँति। वे पूजा-पाठ करने के बाद भी झूठ बोलते हैं, मक्कारी करते हैं। क्रोध लोभ और मोह के वशीभूत रहते हैं जिसके फलस्वरूप मन में न तो शीतलता और न आत्मा में संतोष की अनुभूति होती है, ज्यों के त्यों, शोक-संतापों, यातनाओं, त्रासों, शंकाओं, अभावों तथा असन्तोषों से पीड़ित रहा करते हैं। पूरी तरह से यथावत भव-रोगी बने रहते हैं।
उपासना करते हुए भी बार-बार पथ से विचलित होना पड़ता है। ऐसी असफलतायें ही जीवन लक्ष्य में बाधक हैं।
उपासना का अर्थ है आत्मा को परमात्मा से जोड़ देना। ऐसा करने पर, जिस प्रकार प्रणाली द्वारा खाली जलाशय को भरे जलाशय से सम्बन्धित कर देने से उसकी जलराशि उसमें भी आने लगती है और रिक्त जलाशय भी उसकी तरह ही पूर्ण हो जाता है, उसी प्रकार आत्मा द्वारा परमात्मा से सम्बन्ध बना लेने से परमात्मा की श्रेष्ठताएं मनुष्य में भी प्रवाहित हो जाती हैं। किन्तु इस माध्यम के बीच कोई व्यवधान रख दिया जाये तो प्रवाह रुक जायेगा। जलाशय को जल और मनुष्य के श्रेष्ठता प्राप्त नहीं होगी।
उपासना की प्रक्रिया को फैलाया जाय।
उपासना प्रारम्भ कर परमात्मा से आत्मा का सम्बन्ध स्थापित करिये और श्रेष्ठताओं की उपलब्धि कर सुख-शाँति के अक्षय आनन्द से भरे जीवन और अनन्त अन्त की परख कीजिए।
उपासनात्मक, जीवन शोधन परक तथा पारमार्थिक पुण्य प्रयोजनों के लिए- भक्ति-योग, कर्म-योग और ज्ञान-योग की साधना के लिए- सच्ची श्रद्धा और तत्परता के साथ हम पूरा-पूरा प्रयत्न करें। इसकी पूर्णाहुति होली के दिन प्रेम मिलन- गायत्री यज्ञ तथा युग-निर्माण कार्यक्रमों के साथ सम्पन्न की जाय। 40 दिन में यों सवालक्ष गायत्री अनुष्ठान होता है। यह 40 दिन यदि आत्म-कल्याण और लोक-मंगल की प्रस्तुत प्रक्रिया को सफल बनाने में लगाये जा सकें तो समझना चाहिये, एक अतिशय उच्च कोटि का धर्मानुष्ठान सम्पन्न हो गया। इसे सम्पन्न करने का हम अपने प्रत्येक परिजन से- अन्तःकरण की पूरी गहराई के साथ आग्रहपूर्वक अनुरोध करते हैं और आशा करते हैं जो किया जायेगा उसका विवरण भी हमें यथासमय प्राप्त होगा।
उपासनाएं जो भी करनी हो करते रहें पर एक माला, 108 मन्त्र-गायत्री के हर किसी को नित्य जपने चाहिए। जिन्हें शारीरिक निर्बलता या अन्य असुविधा हो वे प्रातः उठते ही हाथ-मुँह धोकर पालथी मार कर बैठें और 6 मिनट में वह गायत्री मन्त्र मौन मानसिक जप करके उपरोक्त संख्या पूरी करलें। इतना तो हर कोई कर सकता है। बाल, वृद्ध, रोगी आसक्त, व्यस्त, नर-नारी किसी के लिए भी यह कठिन नहीं है। इसके बाद एक पाठ युग-निर्माण सत्संकल्प का अवश्य होना चाहिए।
उपासना’ भी इसी दिन से आरम्भ की, लोक-मंगल के कार्यक्रमों में भी इसी दिन हमने हाथ डाला और अब जीवन की अन्तिम तप साधना भी इसी दिन से आरम्भ होगी। इसलिए व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए और सामूहिक रूप से समस्त परिवार के लिए यह एक प्रेरणापूर्ण प्रकाश पर्व है। इसे उत्साहपूर्वक मनाये जाने में हमारी आन्तरिक अभिव्यञ्जना की अभिव्यक्ति ही होती है। इस सम्बन्ध में जहाँ जितना उत्साह देखने को मिले वहाँ उतनी ही निष्ठा आँकी जा सकती है। इस संदर्भ में बरती जाने वाली उपेक्षा को हमारे प्रति- हमारे मिशन के प्रति उपेक्षा कहा जाय तो उसे अनुचित नहीं कहा जायेगा।
उपासना हमारे जीवन का एक अनिवार्य अंग रहे। कभी किया कभी नहीं, यह ढील-पोल अब बन्द करनी चाहिए। अन्य उपासनाएं जो भी करनी हो करते रहें पर एक माला, 108 मन्त्र-गायत्री के हर किसी को नित्य जपने चाहिए। जिन्हें शारीरिक निर्बलता या अन्य असुविधा हो वे प्रातः उठते ही हाथ-मुँह धोकर पालथी मार कर बैठें और 6 मिनट में वह गायत्री मन्त्र मौन मानसिक जप करके उपरोक्त संख्या पूरी करलें। इतना तो हर कोई कर सकता है।
उपासना का वास्तविक फल प्राप्त होना सम्भव नहीं। अधिकाँश पूजा-पाठ तथा चन्दन-वन्दन करने वाले उपासना नहीं उपासना का आडम्बर ही किया करते हैं। या तो उसके आधार पर उन्हें अपना महत्व प्रदर्शन करने का भाव घेरे रहता है अथवा उनकी उपासना का लक्ष्य किसी कामना की पूर्ति रहता है परमात्मतत्व की प्राप्ति नहीं।
उपासना से प्राप्त होती है। नास्तिक अथवा अनाध्यात्मिक व्यक्ति संसार का कोई भी वैभव, कोई भी पदार्थ और कोई भी भोग क्यों न प्राप्त कर ले पर उसे सच्ची आत्मोत्कृष्टि नहीं मिल सकती है। इस संसार में जो कुछ शुभ है, श्रेष्ठ है, उत्कृष्ट और मंगलमय है वह सब उस परमात्मा की ही विभूति है। उसी से सम्पन्न होती है और उसी में आश्रित है। सृष्टि का सौंदर्य, पृथ्वी की संपन्नता, सागर का भण्डार, वनस्पतियों का स्वाद, औषधियों की शक्ति, ग्रह-नक्षत्रों का प्रकाश, ऋतुओं का आनन्द और मनुष्य की अनुभूति शक्ति- सबक पीछे उस परमात्मा की ही विभूति विराजमान है।
उपासना करता दिखलाई देने पर भी जिस व्यक्ति में श्रेष्ठ परिवर्तन के लक्षण दृष्टिगोचर न हों कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति असंदिग्ध घोषणा कर सकता है कि वह उपासना, उपासना नहीं, बल्कि उसका आडंबर मात्र है, दिखावा है, प्रदर्शन है।
उपासना के कारण उनकी सूक्ष्म-बौद्धिक शक्ति का जागरण हुआ इसलिये बहुत अधिक संस्कृत न जानने पर भी उन्होंने भागवत् का तेलुगु अनुवाद किया। थोड़े ही दिनों में यह सफलता सारे आन्ध्र में चमक गई।
उपासना (भक्ति योग):-
उपासना में रहने वाला व्यक्ति परमात्मा के समीप ही रहता है और उसके परिणामस्वरूप उसकी विशेषताएं ग्रहण करता रहता है। परमात्मा सारी श्रेष्ठताओं तथा उत्कृष्टताओं का विधान है। इसलिए वे गुण उस उपासक में भी आने और बसने लगते हैं। कोई कारण नहीं कि मनुष्य हिमाच्छादित पर्वतों के समीप रहे और शीतलता अनुभव न करे। फूलों से भरी वाटिका में रहने तथा तन मन सुगन्धित न हो उठे, ऐसा होना संभव नहीं।
उपासना क्रम देर से चल रहा है। अब उन्हें स्तर की उत्कृष्टता बढ़ानी चाहिए और उपासना में प्रेम भावना का समन्वय कर अपने सारे जीवन-क्रम को प्रेम, सेवा, मधुरता, पवित्रता, त्याग और परमार्थ की भावना से ओत-प्रोत करना चाहिए ताकि उन्हें इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति का प्रत्यक्ष रसास्वादन उपलब्ध होना तत्काल आरम्भ हो जाय।
उपासना की विधि में आत्मा और परमात्मा के बीच कामनाओं का व्यवधान डाल दिया जाता है तो मनुष्य परमात्मा के गुणों को ग्रहण करने से वंचित हो जाता है। जिन उपासकों में परमात्मा के लक्षण संकलित होते दिखलाई न दें समझ लेना चाहिये कि उसकी आत्मा और परमात्मा के बीच कामनाओं, वाँछनाओं तथा वासनाओं का व्यवधान पड़ा हुआ है और जब तक यह व्यवधान हटाया नहीं जायेगा, उपासना का वास्तविक फल प्राप्त होना सम्भव नहीं। अधिकाँश पूजा-पाठ तथा चन्दन-वन्दन करने वाले उपासना नहीं उपासना का आडम्बर ही किया करते हैं। या तो उसके आधार पर उन्हें अपना महत्व प्रदर्शन करने का भाव घेरे रहता है अथवा उनकी उपासना का लक्ष्य किसी कामना की पूर्ति रहता है परमात्मतत्व की प्राप्ति नहीं।
उपासना कर रहे हैं। बहुत से दूसरे लोग भी उन्हें उपासक मान बैठते हैं। पर उनकी यह उपासना वाँछित फल के साथ सफल नहीं होती। न तो उन्हें श्रेष्ठता मिलती है और न आत्म-शाँति। वे पूजा-पाठ करने के बाद भी झूठ बोलते हैं, मक्कारी करते हैं।
उपासना के आधार पर ही पाया जा सकता है। किन्तु सच्ची उपासना वह है जो केवल उपासना के निष्काम होकर की जाये।
उपासना में प्रेम भावना का समन्वय कर अपने सारे जीवन-क्रम को प्रेम, सेवा, मधुरता, पवित्रता, त्याग और परमार्थ की भावना से ओत-प्रोत करना चाहिए ताकि उन्हें इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति का प्रत्यक्ष रसास्वादन उपलब्ध होना तत्काल आरम्भ हो जाय।
उपासना का अर्थ है- समीप बैठना, सामीप्य अथवा उपसंग। जिसके समीप उपस्थ रहा जायेगा उसकी विशेषता अपने में आ जाना स्वाभाविक ही होता है। गर्म लोहे के पास स्थित ठण्डा लोहा उसकी गर्मी ग्रहण करता हुआ स्वयं भी गर्म हो जाता है। हिम के संपर्क में आने वाली वस्तु ठण्डी हो जाती है। जंगल में चन्दन वृक्ष के समीप उगा वृक्ष भी उसके संपर्क से चन्दन जैसी ही गन्ध वाला हो जाता है और प्रकाश के संग में आने वाली वस्तु भी प्रकाशित हो उठती है।
उपासना करने से उसकी श्रेष्ठताओं का आत्मान्तरित होना एक अटल सत्य है। इसमें अपवाद हो नहीं सकता। जब उपासना करता दिखलाई देने पर भी जिस व्यक्ति में श्रेष्ठ परिवर्तन के लक्षण दृष्टिगोचर न हों कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति असंदिग्ध घोषणा कर सकता है कि वह उपासना, उपासना नहीं, बल्कि उसका आडंबर मात्र है, दिखावा है, प्रदर्शन है।
उपासना का लक्ष्य किसी कामना की पूर्ति रहता है परमात्मतत्व की प्राप्ति नहीं।
उपासना श्रेयस्कर है, कल्याण तथा मंगलकारी है।
उपासना में भावना का समावेश’ पर पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए। परमेश्वर को अपना जीवन सहचर साथी, सभी मान कर उससे अनन्त प्रेम करना उसकी सत्ता में अपनी सत्ता-उसकी इच्छा में अपनी इच्छा समर्पित करना, प्रेम का सच्चा स्वरूप है। परमात्मा से केवल प्रकाश और साहस माँगा जाय, उसे अपनी प्रेम की सच्चाई प्रकट करने का प्रमाण सेवा और पवित्रता की प्रवृत्ति बढ़ा कर दिया जाय। साँसारिक पदार्थ न माँगे जाय न उसके लिए रोया गिड़गिड़ाया जाय। सच्ची भक्ति का यही स्वरूप है।
उपासना देर से चल रही है। उन्हें अब ध्यान साधना की ओर कदम बढ़ाने चाहिए। ‘उपासना में भावना का समावेश’ पर पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए। परमेश्वर को अपना जीवन सहचर साथी, सभी मान कर उससे अनन्त प्रेम करना उसकी सत्ता में अपनी सत्ता-उसकी इच्छा में अपनी इच्छा समर्पित करना, प्रेम का सच्चा स्वरूप है। परमात्मा से केवल प्रकाश और साहस माँगा जाय, उसे अपनी प्रेम की सच्चाई प्रकट करने का प्रमाण सेवा और पवित्रता की प्रवृत्ति बढ़ा कर दिया जाय।
उपासना का भावनात्मक रूप है। जो आत्मा को, परिवार को, राष्ट्र और समाज को प्रेम करता है। सारे मनुष्यों यहाँ तक कि समस्त जड़-चेतन में आत्मीयता का सच्चा भाव रखता है, वह परमात्मा का सच्चा भक्त है। प्रेम हृदय की उसे पवित्र भावना का वाचिक रूप है जो अद्वैत को बोध कराती है। उसे ‘मैं’ और ‘तुम’ का, अपने पराये का विलगाव नहीं रहता।
उपासना में गिना जाता है। उसका फल और पुण्य ईश्वर-आराधना से भी सौगुना बड़ा माना जाता है। अपने पराये, ऊँच-नीच, छोटे-बड़े का भेदभाव सहानुभूति को सार्थक नहीं करते वरन् उसकी परिभाषा को छोटा बनाते हैं। सहानुभूति सारे संसार के लिए एक जैसी हो वही सच्ची और सार्थक होती है।
उपासना नहीं उपासना का आडम्बर ही किया करते हैं। या तो उसके आधार पर उन्हें अपना महत्व प्रदर्शन करने का भाव घेरे रहता है अथवा उनकी उपासना का लक्ष्य किसी कामना की पूर्ति रहता है परमात्मतत्व की प्राप्ति नहीं।
उपासना करनी चाहिए।
उपासना के लिए प्रस्तुत होता है। बिगुल बजते ही सैनिक दौड़ कर मैदान में पंक्ति बद्ध हो जाते हैं। घण्टी बजते ही सर्कस का खेल आरम्भ हो जाता है। इस वर्ष का बसन्तोत्सव कुछ ऐसी ही नवीन प्रेरणा लेकर उपस्थित हुआ है। जिसका उद्देश्य हम में से हर किसी की उदासीनता, उपेक्षा एवं अकर्मण्यता का निराकरण करके रख देना है।
उपासना वह है जो केवल उपासना के निष्काम होकर की जाये।
उपासना, उपासना नहीं, बल्कि उसका आडंबर मात्र है, दिखावा है, प्रदर्शन है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-November
उपासना और सात्विक जीवन-क्रम अपनाकर अनुकूल और लाभदायक भी बनाया जा सकता है, इसका प्रमाण अमेरिकी वैज्ञानिक दे रहे हैं। सूर्य मंडल में हो रहे परिवर्तनों की वहाँ तेजी से जाँच हो रही है, देखा गया है कि सूर्य में कुछ किरणें विखण्डित हो रही हैं, उनसे तेज चमक उठती है। उसका प्रभाव अगले वर्षों में पृथ्वी पर उड़ने वाले जहाजों पर पड़ेगा। सन् 1969-70 में सर्वाधिक हवाई दुर्घटनायें होने की संभावना है। आश्चर्यजनक खोज यह है कि सूर्य से एक प्रकार की प्रकाश पूर्ण आँधी पृथ्वी की ओर वेग स चल पड़ी है।
उपासना का मूल तात्पर्य ईश्वर के प्रति प्रेम का विकास करना ही है।
उपासना की। उनके तप से प्रसन्न होकर एक दिन शकामन्य नाम के महामुनि उनके पास आये। उन्होंने बृहद्रथ के तप की प्रशंसा की और कहा- “वत्स! तेरी जो इच्छा हो मुझसे कह।”
उपासना के सम्बन्ध में है। उसकी उपासना चाहे साकार अथवा निराकार रूप में की जाये, यदि श्रद्धा, भक्ति और निष्ठा आदि की, प्रेम प्रवण भाव की कमी रहेगी तो उपासना का कोई भी प्रकार सफल न होगा। इससे स्पष्ट है कि उपासना में पूजा पाठ, ध्यान, जप, तप आदि की उतनी महत्ता नहीं है जितनी की सच्ची प्रेम भावना की। उपासना के रूप में साधक जो भी जप तप, पूजा-पाठ करता है, उससे वह अपनी निष्ठा और प्रेमभावना को ही परिष्कृत एवं विकसित करता है। इस दिशा में वह जितनी जितनी प्रगति करता जाता है, उतना-उतना ही ईश्वरीय अनुभूति का अधिकारी बनता जाता है।
उपासना का कोई भी प्रकार सफल न होगा। इससे स्पष्ट है कि उपासना में पूजा पाठ, ध्यान, जप, तप आदि की उतनी महत्ता नहीं है जितनी की सच्ची प्रेम भावना की। उपासना के रूप में साधक जो भी जप तप, पूजा-पाठ करता है, उससे वह अपनी निष्ठा और प्रेमभावना को ही परिष्कृत एवं विकसित करता है। इस दिशा में वह जितनी जितनी प्रगति करता जाता है, उतना-उतना ही ईश्वरीय अनुभूति का अधिकारी बनता जाता है। साधना का सार प्रेम अथवा भक्ति को ही माना गया है, बाह्य आडम्बर को नहीं।
उपासना चाहे साकार अथवा निराकार रूप में की जाये, यदि श्रद्धा, भक्ति और निष्ठा आदि की, प्रेम प्रवण भाव की कमी रहेगी तो उपासना का कोई भी प्रकार सफल न होगा। इससे स्पष्ट है कि उपासना में पूजा पाठ, ध्यान, जप, तप आदि की उतनी महत्ता नहीं है जितनी की सच्ची प्रेम भावना की। उपासना के रूप में साधक जो भी जप तप, पूजा-पाठ करता है, उससे वह अपनी निष्ठा और प्रेमभावना को ही परिष्कृत एवं विकसित करता है। इस दिशा में वह जितनी जितनी प्रगति करता जाता है, उतना-उतना ही ईश्वरीय अनुभूति का अधिकारी बनता जाता है। साधना का सार प्रेम अथवा भक्ति को ही माना गया है, बाह्य आडम्बर को नहीं।
उपासना का सीधा सम्बन्ध सूर्य से है। सविता को गायत्री का देवता (फल देने वाला) कहा गया है। आगे लाखों, करोड़ों की संख्या में उपासक बढ़ेंगे तब सूर्य मंडल का और भी तीव्र मंथन होगा और उसकी भारतवर्ष में तीव्र प्रतिक्रिया परिलक्षित होगी। आसुरी स्वभाव वालों के लिये यह प्रतिक्रिया प्रतिकूल बैठेगी, अर्थात् उन्हें रोग-शोक, सामाजिक अपमान और राजदण्ड का भागी बनना पड़ेगा पर शुद्ध और पवित्र आचरण वाले व्यक्ति उससे लाभान्वित होंगे। उन्हें सुख सम्पत्ति धनधान्य की कोई कमी नहीं रहेगी।
उपासना की वृद्धि हो रही है। गायत्री मन्त्र और उपासना का सीधा सम्बन्ध सूर्य से है। सविता को गायत्री का देवता (फल देने वाला) कहा गया है। आगे लाखों, करोड़ों की संख्या में उपासक बढ़ेंगे तब सूर्य मंडल का और भी तीव्र मंथन होगा और उसकी भारतवर्ष में तीव्र प्रतिक्रिया परिलक्षित होगी। आसुरी स्वभाव वालों के लिये यह प्रतिक्रिया प्रतिकूल बैठेगी, अर्थात् उन्हें रोग-शोक, सामाजिक अपमान और राजदण्ड का भागी बनना पड़ेगा पर शुद्ध और पवित्र आचरण वाले व्यक्ति उससे लाभान्वित होंगे।
उपासना के बिना मुझे जीवन नीरस और शून्य प्रतीत होने लगता है।”
उपासना से मिलते हैं, यह निश्चित हैं यहाँ तो केवल यह बताना था कि मनुष्य की तरह भी प्राण, पंच-भौतिक प्रकृति और मनोमय क्रियाशीलता तीनों ही अंग सूर्यदेव में विद्यमान हैं, हम उनको आत्मा के रूप में ‘गायत्री’ के रूप में ध्यान और धारण करते हैं, चाहें तो उनकी कल्पना एक विराट पुरुष के रूप में भी कर सकते हैं, पर निश्चित है कि जिस तरह मनुष्य का एक छोटा-सा ‘अहंभाव’ है, सूर्य का भी वैसा अहंभाव सम्भव है। और जस तरह हम किसी तेजस्वी महात्मा के वरदान द्वारा प्राण प्राप्त कर आरोग्य-लाभ, पुत्र-लाभ, धन-लाभ, बुद्धिलाभ आदि प्राप्त कर सकते हैं, इन प्राण पुरुष गायत्री के तत्व देवता- सविता से और अधिक विश्वासपूर्वक ऐसे आशीर्वाद और स्नेह प्राप्त कर सकते हैं, शर्त इतनी भर है कि यदि हम उनको अपनी प्रगाढ़ श्रद्धा और निष्ठा से उसी तरह प्रभावित कर सकें, जिस तरह पुत्र अपने पिता को प्रसन्न करके स्नेह के साथ उनकी अन्य भौतिक वस्तुओं का भी अधिकार पा लेता है।
उपासना करने वालों को आध्यात्मिक व्यक्ति समझते हैं। इस बात को संक्षेप में इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि जो व्यक्ति संसार और उसकी उपलब्धियों, सम्पत्तियों में रमना चाहता है, वह भौतिकवादी है और जो संसार का त्याग कर ईश्वर तक सीमित रहता है, वह अध्यात्मवादी होता है।
उपासना, मुक्ति के सारे प्रयत्न और क्रिया-कलाप उसी विश्वास पर आधारित हैं। यद्यपि उस अदृश्य शक्ति का कोई प्रत्यक्ष दिग्दर्शन या भौतिक प्रमाण नहीं है, तो भी उस पर विश्वास करने के अनेक प्रमाण हैं।
उपासना करते-करते यह स्वयम् ही जागृत हो जाती है।
उपासना में पूजा पाठ, ध्यान, जप, तप आदि की उतनी महत्ता नहीं है जितनी की सच्ची प्रेम भावना की। उपासना के रूप में साधक जो भी जप तप, पूजा-पाठ करता है, उससे वह अपनी निष्ठा और प्रेमभावना को ही परिष्कृत एवं विकसित करता है। इस दिशा में वह जितनी जितनी प्रगति करता जाता है, उतना-उतना ही ईश्वरीय अनुभूति का अधिकारी बनता जाता है। साधना का सार प्रेम अथवा भक्ति को ही माना गया है, बाह्य आडम्बर को नहीं।
उपासना अथवा साधना के क्रम में यश, वैभव, पूजा-प्रतिष्ठा की कामना का सन्निवेश कर दिया जाय तो वह आध्यात्मिक क्रम घोर भौतिकवाद बन जायेगा। भौतिकवाद अथवा अध्यात्मवाद अलग-अलग दो वाद नहीं हैं, बल्कि एक ही जीवन में जोड़े दो दृष्टि अथवा विचार कोणों की संज्ञायें मात्र हैं।
उपासना के लाभों का वर्णन करते हुए बताया है कि परमात्मा अपने उपासक की स्वयं रक्षा करता है, उसकी कृपा वर्षा क जल की तरह आवाज करती है। ऋग्वेद में भगवान् को वीर कहा गया है, वे भक्तों पर तुरन्त कृपा करने वाले और कर्मठ हैं, क्योंकि सोम याग में पाषाण हाथ में लेकर अध्वर्य आदि के रूप में सोम निष्पीड़ित करते हैं। यही देवताओं की रचना करने की कामना किया करते हैं।
उपासना अथवा पूजा-पाठ करना पड़े। वास्तविक ज्ञान के बिना न तो जीवन में सच्ची शान्ति मिलती है और न उसको परकल्याण प्राप्त होता है।
उपासना, श्रद्धा और भक्ति आदि रहस्य का भी प्रकट हो जायेगा और सिद्धियों, सामर्थ्यों की बात भी सत्य साबित हो जायेगी।
उपासना के रूप में साधक जो भी जप तप, पूजा-पाठ करता है, उससे वह अपनी निष्ठा और प्रेमभावना को ही परिष्कृत एवं विकसित करता है। इस दिशा में वह जितनी जितनी प्रगति करता जाता है, उतना-उतना ही ईश्वरीय अनुभूति का अधिकारी बनता जाता है। साधना का सार प्रेम अथवा भक्ति को ही माना गया है, बाह्य आडम्बर को नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-March
उपासना से मोक्ष लाभ अर्थात् वासना एवं तृष्णा के बन्धनों से छुटकारा मिलना प्रसिद्ध है।
उपासना से इन सभी क्षेत्रों में आनन्द उल्लास की परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
उपासना करके हम वह लाभ ले सकते हैं, जिसके लिये यह मानव शरीर उपलब्ध हुआ है। वस्तुतः गायत्री उपासना-सावित्री साधना ही हमारा जीवन लक्ष्य हो सकता है, होना चाहिये।
उपासना में संलग्न होता है, उसे किसी भी दिशा में- किसी भी क्षेत्र में असफल एवं अभाव-ग्रस्त नहीं रहना पड़ता।
उपासना के पीछे दृढ़-निष्ठा का बल ही प्रधान कार्य करता है। दुर्बल-निष्ठा वाले- कभी किया, कभी छोड़ा वाले शिथिल मनोभूमि के लोग वह आनन्द एवं लाभ नहीं उठा सकते, जो निष्ठावानों के लिए ही सम्भव है। इसलिये इस अनुष्ठान के माध्यम से निष्ठावान उपासकों को आगे बढ़ाया गया है। यह अनुष्ठान दस वर्ष तक चलेगा। इसलिये इन भागीदारों में वे ही आवेंगे, जिनका अन्तःकरण अपेक्षाकृत अधिक श्रद्धा एवं निष्ठा से भरा है।
उपासना से जागृत हो जाते हैं। किसी मिल में छः इंजन हों और वे ठण्डे पड़े रहें तब वो सारी मिल बन्द पड़ी रहेगी, पर यदि वे एक-एक करके सभी चालू हो जांय तो मिल अपनी पूरी रफ्तार से चलने लगेगी और देखते-देखते उत्पादन का ढेर जमा हो जायेगा। षट्-चक्र मानव-शक्ति में छिपे हुये अत्यन्त शक्तिशाली बायलर, इंजन, जनरेटर हैं। उनके सक्रिय होने पर मनुष्य साधारण जीव नहीं रह जाता वरन् उसकी गणना सिद्ध पुरुषों में होने लगती है। इस षट्-चक्र जागरण के विधि-विधान में सावित्री सान्निध्य को ही प्रधान आधार माना गया है, इसलिए उसे छः कुक्षि वाली- छः साधनाओं वाली-बताया गया है।
उपासना में श्रद्धा रखने वाले हर धर्म-प्रेमी का कर्तव्य है कि वह अपने क्षेत्र में कम-से-कम पाँच भागीदार बना कर स्वयं ऋत्विज का उत्तरदायित्व ग्रहण करें और संलग्न फार्म में अपने सदस्यों का नाम पता भर कर मथुरा भेजें। आशा है यह महापुरश्चरण बड़े शान और सफलता के साथ सम्पन्न होगा। आवश्यक संख्या 24 हजार भागीदार शीघ्र पूरे हो जायेंगे।
उपासना में सविता का आधार लेना ही पड़ता है। सूर्य जैसे प्रकाश के साथ सम्बद्ध करके ही गायत्री का ध्यान किया जा सकता है। गायत्री का चित्र अथवा विग्रह जहाँ कहीं भी होगा वहीं प्रकाश मंडल अवश्य चित्रित किया जायेगा। अन्य देवताओं का चित्रण प्रकाश-वलय से रहित भी हो सकता है पर गायत्री का नहीं। क्योंकि वह सविता की ही शक्ति है।
उपासना कितनी भी हो सकती है पर न्यूनतम दो माला जप और दो पाठ उपरोक्त क्रम से नित्य होने ही चाहिये। ऐसे 24 हजार नैष्ठिक साधक इस महा-अनुष्ठान के भागीदार रहेंगे। अभी इस वर्ष का इतना ही संकल्प है। स्थिति के अनुरूप इसे सवा करोड़ या चौबीस करोड़ प्रतिदिन का भी किया जा सकता है।
उपासना साधक को यही विशेषतायें प्रदान करती है। वह इसकी सम्भावना को देखता है, दूर की बात सोचता है, सुदूर भविष्य का निर्माण करता है। जो बातें छोटे आँख वालों को, ओछे लोगों को सूझ नहीं पड़ती वह उस कमल नेत्र वाली सावित्री के भक्तों को सूझती हैं और वे उपलब्ध दिव्य-दृष्टि के माध्यम से अपना ही नहीं अन्य असंख्यों का भी कल्याण करते हैं।
उपासना में इस सीमा तक लग गये हैं कि मूल उद्देश्य को ही भूल गये।
उपासना-सावित्री साधना ही हमारा जीवन लक्ष्य हो सकता है, होना चाहिये।
उपासना के इस महा-अनुष्ठान उपक्रम का एक उद्देश्य निष्ठा की परिपक्वता प्रतिष्ठापित करना भी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-September
उपासना का कोई एक ही प्रकार निश्चित नहीं है। यह बहुत प्रकार से हो सकती है। जैसे विधि-विधान पूर्वक कर्मकाण्ड करना, समस्त आडम्बरों सहित पूजा करना। वेदों, पुराणों तथा शास्त्रों का पारायण करना, भजन-कीर्तन और प्रार्थना करना। योग, ध्यान और जाप करना।
उपासना। यदि नित्य-प्रति मनुष्य थोड़ी बहुत उपासना करता चले तो संसार के सारे काम करते हुये भी लक्ष्य की ओर उसकी यात्रा होती रहे। और जिस प्रकार बूँद-बूँद करके घट भर जाता है, एक-एक गिनकर सौ तक पहुँच जाते हैं और कदम-कदम चल कर कोस पूरा कर लेते हैं उसी प्रकार उपासना द्वारा दिन-दिन रेंगते हुये भी हम जन्म-जन्मान्तरों में से किसी भी चाल से अपने लक्ष्य परमात्मा को प्राप्त कर लेंगे।
उपासना का प्रभाव तब हमारे दिन के एक लम्बे समय तक बना रहेगा और हम उतनी देर तक परमात्मा का सामीप्य अनुभव करते रहेंगे। इसी प्रकार यह संक्षिप्त उपासना ज्यों-ज्यों परिपक्व तथा आत्मसात् होती जायेगी त्यों-त्यों उसका प्रभाव विलम्बित एवं स्थायी होता जायेगा, और यदि उपासना में अपने हृदय की गहराई और ईमानदारी अधिकाधिक बढ़ाई जाती रहे तो जरा भी अभिभाव्य नहीं कि इसी संक्षिप्त उपासना द्वारा हम जल्दी ही उस कक्षा में जा पहुँचें, जहाँ पहुंच कर स्वयं अपने के साथ सारा संसार परमात्मामय और परमात्मा संसारमय गोचर होने लगता है। और अपनी क्रिया-प्रक्रिया, भाव, विचार और श्वास-श्वाँस तक परमात्मा रूप अनुभव होने लगती है।
उपासना में अपने हृदय की गहराई और ईमानदारी अधिकाधिक बढ़ाई जाती रहे तो जरा भी अभिभाव्य नहीं कि इसी संक्षिप्त उपासना द्वारा हम जल्दी ही उस कक्षा में जा पहुँचें, जहाँ पहुंच कर स्वयं अपने के साथ सारा संसार परमात्मामय और परमात्मा संसारमय गोचर होने लगता है। और अपनी क्रिया-प्रक्रिया, भाव, विचार और श्वास-श्वाँस तक परमात्मा रूप अनुभव होने लगती है।
उपासना का स्वरूप बन जाये- इस उच्च स्थिति को पाने तक हमारा पावन कर्त्तव्य है कि हम प्रतिदिन सच्चे और गहरे मन से परमात्मा की थोड़ी-थोड़ी उपासना तो करते ही चलें। यह थोड़ी-थोड़ी उपासना भी जब हमारे जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बन कर हमें अपने अभाव में सताने लगेगी तब इसी उपासना में एक आनन्द, एक विह्वलता और एक कातरता का समावेश होने लगेगा। इस भाव सघन संक्षिप्त उपासना का प्रभाव तब हमारे दिन के एक लम्बे समय तक बना रहेगा और हम उतनी देर तक परमात्मा का सामीप्य अनुभव करते रहेंगे। इसी प्रकार यह संक्षिप्त उपासना ज्यों-ज्यों परिपक्व तथा आत्मसात् होती जायेगी त्यों-त्यों उसका प्रभाव विलम्बित एवं स्थायी होता जायेगा, और यदि उपासना में अपने हृदय की गहराई और ईमानदारी अधिकाधिक बढ़ाई जाती रहे तो जरा भी अभिभाव्य नहीं कि इसी संक्षिप्त उपासना द्वारा हम जल्दी ही उस कक्षा में जा पहुँचें, जहाँ पहुंच कर स्वयं अपने के साथ सारा संसार परमात्मामय और परमात्मा संसारमय गोचर होने लगता है। और अपनी क्रिया-प्रक्रिया, भाव, विचार और श्वास-श्वाँस तक परमात्मा रूप अनुभव होने लगती है।
उपासना करता चले तो संसार के सारे काम करते हुये भी लक्ष्य की ओर उसकी यात्रा होती रहे। और जिस प्रकार बूँद-बूँद करके घट भर जाता है, एक-एक गिनकर सौ तक पहुँच जाते हैं और कदम-कदम चल कर कोस पूरा कर लेते हैं उसी प्रकार उपासना द्वारा दिन-दिन रेंगते हुये भी हम जन्म-जन्मान्तरों में से किसी भी चाल से अपने लक्ष्य परमात्मा को प्राप्त कर लेंगे।
उपासना के कितने प्रकार एवं स्वरूप हैं। यदि करना चाहें तो साराँश में यों भी कह सकते हैं कि वे सारी शारीरिक, मानसिक तथा वाचिक क्रियाएं उपासना ही है जिनका विषय अध्यात्म अथवा परमात्मा है। इसी प्रकार सत्कर्म, समाज-सेवा, आत्म-सुधार, सृजन तथा अनुशासन, शिष्टाचार आदि सारे काम तथा भाव उपासना के अंतर्गत आते हैं। स्वार्थ के अतिरिक्त जितना भी पारमार्थिक प्रसंग है वह सब उपासना के अंतर्गत ही आता है। अब इनमें से कोई भी अपनी सुविधा, सामर्थ्य तथा स्थिति के अनुसार चुना जा सकता है।
उपासना तो करते ही चलें। यह थोड़ी-थोड़ी उपासना भी जब हमारे जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बन कर हमें अपने अभाव में सताने लगेगी तब इसी उपासना में एक आनन्द, एक विह्वलता और एक कातरता का समावेश होने लगेगा। इस भाव सघन संक्षिप्त उपासना का प्रभाव तब हमारे दिन के एक लम्बे समय तक बना रहेगा और हम उतनी देर तक परमात्मा का सामीप्य अनुभव करते रहेंगे। इसी प्रकार यह संक्षिप्त उपासना ज्यों-ज्यों परिपक्व तथा आत्मसात् होती जायेगी त्यों-त्यों उसका प्रभाव विलम्बित एवं स्थायी होता जायेगा, और यदि उपासना में अपने हृदय की गहराई और ईमानदारी अधिकाधिक बढ़ाई जाती रहे तो जरा भी अभिभाव्य नहीं कि इसी संक्षिप्त उपासना द्वारा हम जल्दी ही उस कक्षा में जा पहुँचें, जहाँ पहुंच कर स्वयं अपने के साथ सारा संसार परमात्मामय और परमात्मा संसारमय गोचर होने लगता है। और अपनी क्रिया-प्रक्रिया, भाव, विचार और श्वास-श्वाँस तक परमात्मा रूप अनुभव होने लगती है।
उपासना भी जब हमारे जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बन कर हमें अपने अभाव में सताने लगेगी तब इसी उपासना में एक आनन्द, एक विह्वलता और एक कातरता का समावेश होने लगेगा। इस भाव सघन संक्षिप्त उपासना का प्रभाव तब हमारे दिन के एक लम्बे समय तक बना रहेगा और हम उतनी देर तक परमात्मा का सामीप्य अनुभव करते रहेंगे। इसी प्रकार यह संक्षिप्त उपासना ज्यों-ज्यों परिपक्व तथा आत्मसात् होती जायेगी त्यों-त्यों उसका प्रभाव विलम्बित एवं स्थायी होता जायेगा, और यदि उपासना में अपने हृदय की गहराई और ईमानदारी अधिकाधिक बढ़ाई जाती रहे तो जरा भी अभिभाव्य नहीं कि इसी संक्षिप्त उपासना द्वारा हम जल्दी ही उस कक्षा में जा पहुँचें, जहाँ पहुंच कर स्वयं अपने के साथ सारा संसार परमात्मामय और परमात्मा संसारमय गोचर होने लगता है। और अपनी क्रिया-प्रक्रिया, भाव, विचार और श्वास-श्वाँस तक परमात्मा रूप अनुभव होने लगती है।
उपासना, साधना और तपस्या क्यों न की जाए यदि हृदय में प्राणिमात्र के लिये दया नहीं है तो उसका कोई लाभ न होगा। उन सारी क्रियाओं से धर्म का उद्देश्य पूरा न होगा। इसके अतिरिक्त यदि हृदय में दया का निवास है, संवेदना, सहानुभूति और पर पीड़ा का अनुभाव है तो वह मनुष्य कोई भी धार्मिक क्रिया न करता हुआ भी पूरा धर्मात्मा है। जो धर्मात्मा है संसार में उसकी पूजा कौन न करेगा?
उपासना के अंतर्गत आते हैं। स्वार्थ के अतिरिक्त जितना भी पारमार्थिक प्रसंग है वह सब उपासना के अंतर्गत ही आता है। अब इनमें से कोई भी अपनी सुविधा, सामर्थ्य तथा स्थिति के अनुसार चुना जा सकता है।
उपासना में नष्ट कर डालें। शारीरिक उपादानों के साथ जो जीवन मनुष्य को मिला है उसको चाहे निःसार मार्गों से नष्ट कर डालिये चाहे तो उसका समुचित दिशा में सदुपयोग करके परमार्थ के शिलाधार पर अपना स्थायित्व स्थापित कर जाये- इस द्विविध गति से सर्वथा परिचित होते हैं। उन्हें जरा भी यह दुर्बुद्धि नहीं होती कि जिस मानवजीवन से लोक एवं परलोक दोनों पर विजय प्राप्त की जा सकती है उसे नारकीय स्थिति में अथवा स्वयं नरक बना कर नष्ट कर डाला जाये इस प्रकार के उच्च-विचार तथा उच्च उद्देश्य रखने वाले महापुरुषों का अशान्ति अथवा असन्तोष सता सकता है- यह सम्भव नहीं। जो संसार से आवश्यकता भर लेकर एवं उसका भंडार भर देने की भावना रखते हों ऐसे उदार एवं उच्चमना व्यक्तियों के समीप दुःख, दारिद्रय अथवा लोभ, लिप्सा की छाया भी तो आने का साहस नहीं करेगी।
उपासना के अंतर्गत ही आता है। अब इनमें से कोई भी अपनी सुविधा, सामर्थ्य तथा स्थिति के अनुसार चुना जा सकता है।
उपासना में एक आनन्द, एक विह्वलता और एक कातरता का समावेश होने लगेगा। इस भाव सघन संक्षिप्त उपासना का प्रभाव तब हमारे दिन के एक लम्बे समय तक बना रहेगा और हम उतनी देर तक परमात्मा का सामीप्य अनुभव करते रहेंगे। इसी प्रकार यह संक्षिप्त उपासना ज्यों-ज्यों परिपक्व तथा आत्मसात् होती जायेगी त्यों-त्यों उसका प्रभाव विलम्बित एवं स्थायी होता जायेगा, और यदि उपासना में अपने हृदय की गहराई और ईमानदारी अधिकाधिक बढ़ाई जाती रहे तो जरा भी अभिभाव्य नहीं कि इसी संक्षिप्त उपासना द्वारा हम जल्दी ही उस कक्षा में जा पहुँचें, जहाँ पहुंच कर स्वयं अपने के साथ सारा संसार परमात्मामय और परमात्मा संसारमय गोचर होने लगता है। और अपनी क्रिया-प्रक्रिया, भाव, विचार और श्वास-श्वाँस तक परमात्मा रूप अनुभव होने लगती है।
उपासना के रूप में बदल जाये और वह हर समय परमात्मा को सामीप्य अनुभव करता रहे। उसका समग्र जीवन ही उपासना रूप हो जाये। उसे अपना तथ्य पाने के लिये फिर न तो अलग से कोई क्रिया-कलाप करना पड़े और न जन्म-जन्मान्तर की प्रतीक्षा ही करना होगा। वह एक इस ही जीवन में परमात्मा को पाकर मुक्ति, मोक्ष अथवा निर्वाण की स्थिति में पहुँच जाये।
उपासना ही है जिनका विषय अध्यात्म अथवा परमात्मा है। इसी प्रकार सत्कर्म, समाज-सेवा, आत्म-सुधार, सृजन तथा अनुशासन, शिष्टाचार आदि सारे काम तथा भाव उपासना के अंतर्गत आते हैं। स्वार्थ के अतिरिक्त जितना भी पारमार्थिक प्रसंग है वह सब उपासना के अंतर्गत ही आता है। अब इनमें से कोई भी अपनी सुविधा, सामर्थ्य तथा स्थिति के अनुसार चुना जा सकता है।
उपासना के उपाय में नहीं लगते तो निश्चय ही जीवन की इस असफलता की आशंका बनी हुई है।
उपासना रूप हो जाये। उसे अपना तथ्य पाने के लिये फिर न तो अलग से कोई क्रिया-कलाप करना पड़े और न जन्म-जन्मान्तर की प्रतीक्षा ही करना होगा। वह एक इस ही जीवन में परमात्मा को पाकर मुक्ति, मोक्ष अथवा निर्वाण की स्थिति में पहुँच जाये।
उपासना ज्यों-ज्यों परिपक्व तथा आत्मसात् होती जायेगी त्यों-त्यों उसका प्रभाव विलम्बित एवं स्थायी होता जायेगा, और यदि उपासना में अपने हृदय की गहराई और ईमानदारी अधिकाधिक बढ़ाई जाती रहे तो जरा भी अभिभाव्य नहीं कि इसी संक्षिप्त उपासना द्वारा हम जल्दी ही उस कक्षा में जा पहुँचें, जहाँ पहुंच कर स्वयं अपने के साथ सारा संसार परमात्मामय और परमात्मा संसारमय गोचर होने लगता है। और अपनी क्रिया-प्रक्रिया, भाव, विचार और श्वास-श्वाँस तक परमात्मा रूप अनुभव होने लगती है।
उपासना द्वारा हम जल्दी ही उस कक्षा में जा पहुँचें, जहाँ पहुंच कर स्वयं अपने के साथ सारा संसार परमात्मामय और परमात्मा संसारमय गोचर होने लगता है। और अपनी क्रिया-प्रक्रिया, भाव, विचार और श्वास-श्वाँस तक परमात्मा रूप अनुभव होने लगती है।
उपासना द्वारा दिन-दिन रेंगते हुये भी हम जन्म-जन्मान्तरों में से किसी भी चाल से अपने लक्ष्य परमात्मा को प्राप्त कर लेंगे।
उपासना- क्रियाओं में परमात्मा का भाव और तदनुरूप पवित्रता रक्खी जाती है, यदि उसी प्रकार मनुष्य अपने जीवन की प्रत्येक अन्य क्रिया में भी वहीं भाव एवं पवित्रता रक्खे और जिस प्रकार अपनी पूजन सामग्री परमात्मा को समर्पित करता है उसी प्रकार अपने सर्वस्व में भी समर्पण का भाव रक्खे तो उसकी अणु-अणु क्रिया ही उपासना के रूप में बदल जाये और वह हर समय परमात्मा को सामीप्य अनुभव करता रहे। उसका समग्र जीवन ही उपासना रूप हो जाये। उसे अपना तथ्य पाने के लिये फिर न तो अलग से कोई क्रिया-कलाप करना पड़े और न जन्म-जन्मान्तर की प्रतीक्षा ही करना होगा। वह एक इस ही जीवन में परमात्मा को पाकर मुक्ति, मोक्ष अथवा निर्वाण की स्थिति में पहुँच जाये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-December
उपासना करने का अर्थ है, अपने जीवन में और अधिकाधिक दुःखों की इच्छा करना। एक तो कामनायें यों भी दुःख का बहुत बड़ा हेतु हैं। फिर यदि उपासना द्वारा किसी ने अपनी लौकिक कामनाओं की सिद्धि भी करली, तब भी उसके दुःखों का अन्त कदापि न हो सकेगा। वह धन-दौलत, पुत्र-पौत्र पायेगा, शक्ति और सम्बल का अर्जन कर लेगा। किंतु वह सकाम उपासक यह कभी नहीं सोचता कि इन सब लौकिक लाभों के उपयोग अथवा उपभोग का परिणाम क्या होगा, वही विस्मरण, अज्ञान और अन्धकार डडडडडडडडडड।
उपासना-अनुष्ठान भी करते रहते हैं। यह बातें बहुत कुछ इस बात की शिफारिस करती हैं कि ऐसे लोग अपने को आध्यात्मिक व्यक्ति मान लें। लेकिन यह मान लेने में भय न करना चाहिये कि मनुष्य की यह क्रियायें ही आध्यात्मिकता का प्रमाण नहीं हैं। आध्यात्मिकता वास्तव में वह आत्म-गौरव, आत्म-सन्तोष और आत्म-शाँति है, जो किन्हीं भी कार्य-व्यवहारों में उत्कृष्टता के समावेश से उत्पन्न होता है। यदि सच्ची भावना से विरत रहकर चार-चार घंटे भजन-पूजन किया जाय, अनेक यज्ञ अनुष्ठानों का आयोजन किया जाय, धर्म-कर्मों की झड़ी लगादी जाय, तो भी आध्यात्मिक उपलब्धि का प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता और न ऐसा अन्यमनस्क धार्मिक व्यक्ति आध्यात्मिक ही माना जा सकता है।
उपासना का उद्देश्य पूरा होता है। पर तब किसी से छल-कपट, अभद्र-व्यवहार पाप और अत्याचार नहीं किया जा सकता। संसार के प्रत्येक पदार्थ और प्राणी के प्रति ईश्वर जैसी श्रद्धा रखने से उसके प्रति सहज ही सेवा और सद्-व्यवहार की भावना जागृत होती है, यही भावना विश्व-शान्ति एवं आत्म-कल्याण का प्रधान आधार होती है।”
उपासना करने में निरत रहता है अथवा शिवोपासना में प्रेम करता है, ऐसा विप्र सर्वथा नरकगामी होता है। इसलिये हे राजन्! आप अर्थात् कृत युग में सभी गायत्री के जप करने में परायण रहा करते थे। सभी द्विज भगवती के चरण-कमल में रति करने वाले हुये थे।
उपासना वाँछित दिशा में फलीभूत नहीं होती। यद्यपि लोग सुख पाने के लिये ही सकाम उपासना किया करते हैं, तथापि यह उल्टा प्रयत्न ही है। सकाम उपासना करने का अर्थ है, अपने जीवन में और अधिकाधिक दुःखों की इच्छा करना। एक तो कामनायें यों भी दुःख का बहुत बड़ा हेतु हैं। फिर यदि उपासना द्वारा किसी ने अपनी लौकिक कामनाओं की सिद्धि भी करली, तब भी उसके दुःखों का अन्त कदापि न हो सकेगा।
उपासना में निष्णात द्विज मानव-जीवन के परम पुरुषार्थ स्वरूप मोक्ष को प्राप्त कर लिया करता है। महर्षि मनु ने कहा है कि गायत्री के जपाराधना करने वाला द्विज अन्य कुछ करे या कुछ भी न करे अर्थात् अन्य किसी के भी करने की उसे संगति प्राप्त करने के लिये आवश्यकता नहीं होती है। गायत्री पर त्याग करके जो केवल विष्णु की उपासना करने में निरत रहता है अथवा शिवोपासना में प्रेम करता है, ऐसा विप्र सर्वथा नरकगामी होता है। इसलिये हे राजन्! आप अर्थात् कृत युग में सभी गायत्री के जप करने में परायण रहा करते थे। सभी द्विज भगवती के चरण-कमल में रति करने वाले हुये थे।
उपासना का आश्रय लेकर हम भी अपने महान् पूर्वजों की तरह आत्मिक और भौतिक समृद्धियों से पूरी तरह लाभान्वित हो सकते हैं।
उपासना इन दिनों बहु प्रचलित है, विष्णु देव के अवतार हैं।
उपासना का रहस्योद्घाटन करते हुए, इसी महाशक्ति को अपना इष्टदेव प्रतिपादित किया जाता रहा है। शक्तियों का केंद्र वस्तुतः यही महामन्त्र है। इसी उपासना से मनुष्यों से लेकर देवताओं तक का कल्याण होना सिद्ध होता रहा है।
उपासना, जप-तप, भक्ति और आचरण सुधार करेंगे, उन्हें कष्ट कम होंगे और इस अशाँति के घेरे में भी उन्हें शाँति एवं धैर्य मिलेगा।”
उपासना में संलग्न होने के पीछे प्रायः स्वर्ग पाने की ही कामना छिपी रहती है। यद्यपि सकाम उपासना को अधिक श्रेष्ठ नहीं माना गया है, तथापि यदि वह कामना साँसारिक पदार्थों के आगे की वस्तुओं को पाने से सम्बन्धित है तो उसको किसी हद तक स्वीकार कर लिया जाता है।
उपासना कीजिये, निष्काम उपासना और उसके उपहार स्वरूप त्रिदानन्द की उपलब्धि कर सदा-सर्वदा के लिये संसार के दैहिक, दैविक और भौतिक पाप तापों से उस पार उतर जाइये।
उपासना द्वारा आत्मा की मुक्ति के प्रयास को जीवन में प्रथम स्थान देना चाहिये। एक दूसरे को समझाने का, अपनी बात प्रमाणित करने का प्रयास चल रहा था।
उपासना किया करते हैं, तथापि यह उल्टा प्रयत्न ही है। सकाम उपासना करने का अर्थ है, अपने जीवन में और अधिकाधिक दुःखों की इच्छा करना। एक तो कामनायें यों भी दुःख का बहुत बड़ा हेतु हैं। फिर यदि उपासना द्वारा किसी ने अपनी लौकिक कामनाओं की सिद्धि भी करली, तब भी उसके दुःखों का अन्त कदापि न हो सकेगा। वह धन-दौलत, पुत्र-पौत्र पायेगा, शक्ति और सम्बल का अर्जन कर लेगा।
उपासना से मनुष्यों से लेकर देवताओं तक का कल्याण होना सिद्ध होता रहा है।
उपासना से अच्छा और कोई उपाय नहीं है। जप, तप, पूजा, अर्चना आदि के जो भी विधान बनाए गये हैं, वे सब परमात्मा को अपने स्मृति-पटल पर बनाये रखने के लिये ही बनाये गये हैं। नित्य-प्रति जब नियत समय पर उपासना की जायेगी तो परमात्मा की स्मृति हृदय-पटल पर उसी प्रकार अंकित हो जायेगी, जिस प्रकार बार-बार याद करते रहने पर किसी बालक की गिनती अथवा पहाड़ा याद हो जाता है। किसी का संपर्क उसकी स्थायी याद के लिये सबसे बड़ा कारण है। हमें अपने परिवार और कुटुम्ब के लोग औरों की अपेक्षा अधिक याद क्यों रहते हैं?
उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता। (128) हम ईश्वर से विमुख न हों। (129) गृहस्थ एक योग साधना। (130) आत्मा की पुकार अनसुनी न करें। (131) हम सशक्त और साहसी बनें।
उपासना को अधिक श्रेष्ठ नहीं माना गया है, तथापि यदि वह कामना साँसारिक पदार्थों के आगे की वस्तुओं को पाने से सम्बन्धित है तो उसको किसी हद तक स्वीकार कर लिया जाता है।
उपासना ही नित्य है- ऐसा सभी वेदों में स्पष्टतया बतलाया है, जिसके बिना ब्राह्मण का तो सर्वथा अधःपतन हो जाता है। ब्राह्मण के लिये उतना ही अर्थात् गायत्री मन्त्र का जाप करना सफलता प्राप्त करने के लिये पर्याप्त होता है। उसे फिर अन्य किसी की अपेक्षा नहीं रहती है। केवल एकमात्र गायत्री की उपासना में निष्णात द्विज मानव-जीवन के परम पुरुषार्थ स्वरूप मोक्ष को प्राप्त कर लिया करता है। महर्षि मनु ने कहा है कि गायत्री के जपाराधना करने वाला द्विज अन्य कुछ करे या कुछ भी न करे अर्थात् अन्य किसी के भी करने की उसे संगति प्राप्त करने के लिये आवश्यकता नहीं होती है।
उपासना को प्रधानता दी जाती रही है। शास्त्र-इतिहासों में ऐसा ही विवरण मिलता है और देवताओं द्वारा अपनी उपासना का रहस्योद्घाटन करते हुए, इसी महाशक्ति को अपना इष्टदेव प्रतिपादित किया जाता रहा है। शक्तियों का केंद्र वस्तुतः यही महामन्त्र है। इसी उपासना से मनुष्यों से लेकर देवताओं तक का कल्याण होना सिद्ध होता रहा है।
उपासना और उसके उपहार स्वरूप त्रिदानन्द की उपलब्धि कर सदा-सर्वदा के लिये संसार के दैहिक, दैविक और भौतिक पाप तापों से उस पार उतर जाइये।
उपासना करना ठीक वैसी ही गलती है, जैसे कोई अनजान व्यक्ति रत्नोपम वस्तु का विनियम किसी रंगीन काँच से कर लेता है। जिस उपासना के आधार पर सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मा और परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है, उसके लिये उन भौतिक वस्तुओं का क्या माँगना जो किसी पुरुषार्थी व्यक्ति के हाथों का मैल कही गई हैं। उपासना कीजिये, निष्काम उपासना और उसके उपहार स्वरूप त्रिदानन्द की उपलब्धि कर सदा-सर्वदा के लिये संसार के दैहिक, दैविक और भौतिक पाप तापों से उस पार उतर जाइये।
उपासना बताया है। भारतीय धर्म में सत्य को परमात्मा का स्वरूप माना है। सत्य को नारायण कहा गया है। सत्य-नारायण भगवान् की जय बोलने, कथा सुनने, व्रत रखने का अपने यहाँ चिर प्रचलन है। यह सत्य-नारायण कोई व्यक्ति या देवता नहीं है, वरन् सचाई को अन्तःकरण, मस्तिष्क और व्यवहार में प्रतिष्ठापित करने की प्रगाढ़ आस्था ही है।
उपासना की जायेगी तो परमात्मा की स्मृति हृदय-पटल पर उसी प्रकार अंकित हो जायेगी, जिस प्रकार बार-बार याद करते रहने पर किसी बालक की गिनती अथवा पहाड़ा याद हो जाता है। किसी का संपर्क उसकी स्थायी याद के लिये सबसे बड़ा कारण है। हमें अपने परिवार और कुटुम्ब के लोग औरों की अपेक्षा अधिक याद क्यों रहते हैं? इसीलिये कि उनसे हमारा सतत् और घनिष्ठ संपर्क बना रहता है।
उपासना नित्य है- ऐसा वेद में कहीं पर भी नहीं कहा गया है। विष्णु और शिव की दीक्षा भी नित्य नहीं है। केवल एक गायत्री की उपासना ही नित्य है- ऐसा सभी वेदों में स्पष्टतया बतलाया है, जिसके बिना ब्राह्मण का तो सर्वथा अधःपतन हो जाता है। ब्राह्मण के लिये उतना ही अर्थात् गायत्री मन्त्र का जाप करना सफलता प्राप्त करने के लिये पर्याप्त होता है। उसे फिर अन्य किसी की अपेक्षा नहीं रहती है।
उपासना पद्धति का जिसको भारतीय भूल गये हैं, तेजी से प्रसार होगा और भारतवर्ष दुनिया के सब देशों स ज्यादा उन्नति करेगा।” इस अवसर पर सर गिरजा शंकर बाजपेई भी उपस्थित थे, उन्होंने और एक भारतीय कर्नल ने इन तमाम बातों को मानने के लिये इनकार कर दिया था, किन्तु पाठक आधी से अधिक बातें सत्य हुई देख चुके हैं और अब इतिहास जो नई करवट ले रहा है, उसके उत्तरार्द्ध को लोग आगे देखेंगे।
उपासना द्वारा परमात्मा के संपर्क में रहा जाये।
उपासना द्वारा जब परमात्मा के सतत् संपर्क में रहेगा तो अवश्य ही एक दिन उसके सत्यस्वरूप को जान ही जायेगा। परमात्मा को साक्षी करते ही उसे अपना सत्य स्वरूप स्मरण हो उठेगा। अपने आनंद रूप सत्यस्वरूप को जानते ही मनुष्य की सारी दुःखद अनुभूतियाँ दूर हो जायेंगी और वह सदा-सर्वदा के लिये अपनी स्वाभाविक अनुभूति में स्थिर हो जायेगा।
उपासना से प्रारम्भ कर दुःखों के आत्यांतिक अभाव तक आसानी से पहुँचाया जा सकता हैं
उपासना द्वारा किसी ने अपनी लौकिक कामनाओं की सिद्धि भी करली, तब भी उसके दुःखों का अन्त कदापि न हो सकेगा। वह धन-दौलत, पुत्र-पौत्र पायेगा, शक्ति और सम्बल का अर्जन कर लेगा। किंतु वह सकाम उपासक यह कभी नहीं सोचता कि इन सब लौकिक लाभों के उपयोग अथवा उपभोग का परिणाम क्या होगा, वही विस्मरण, अज्ञान और अन्धकार डडडडडडडडडड।
उपासना प्रगतिवती हो तभी सकती है, जब इसका स्वरूप विशुद्ध आध्यात्मिक होगा। जो परमात्मा को छोड़कर अन्य किसी प्रयोजन से पूजा-पाठ या जप-तप किया करते हैं, उनकी वह उपासना वाँछित दिशा में फलीभूत नहीं होती। यद्यपि लोग सुख पाने के लिये ही सकाम उपासना किया करते हैं, तथापि यह उल्टा प्रयत्न ही है। सकाम उपासना करने का अर्थ है, अपने जीवन में और अधिकाधिक दुःखों की इच्छा करना। एक तो कामनायें यों भी दुःख का बहुत बड़ा हेतु हैं।
उपासना देवताओं की तरह की।
उपासना ही है। इस आध्यात्मिक क्रम को उपासना से प्रारम्भ कर दुःखों के आत्यांतिक अभाव तक आसानी से पहुँचाया जा सकता हैं
उपासना के आधार पर सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मा और परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है, उसके लिये उन भौतिक वस्तुओं का क्या माँगना जो किसी पुरुषार्थी व्यक्ति के हाथों का मैल कही गई हैं। उपासना कीजिये, निष्काम उपासना और उसके उपहार स्वरूप त्रिदानन्द की उपलब्धि कर सदा-सर्वदा के लिये संसार के दैहिक, दैविक और भौतिक पाप तापों से उस पार उतर जाइये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-April
उपासना करनी चाहिये। प्रयत्न यह भी करना चाहिये कि परिवार के दूसरे लोग भी- दस-पांच मिनट वहाँ बैठ कर थोड़ी-बहुत उपासना अवश्य कर लिया करें। घर में आस्तिकता का- भक्ति भावना का वातावरण रहना परिवार की भावनात्मक समृद्धि और आत्मिक शुद्धि के लिए अति आवश्यक है।
उपासना के विमुख रहें तो दोस्ती संभव नहीं- तब साधारण जान-पहचान मात्र रह जायेगी और वह उतनी लाभदायक सिद्ध न हो सकेगी।
उपासना के लिए निकालना ही चाहिये। साढ़े 23 घंटे शरीर की आवश्यकतायें और समस्यायें सुलझाने में लगाये जा सकते हैं, तो क्या आत्मा की प्रगति और आवश्यकता की पूर्ति के लिये आधा घंटा भी खर्च नहीं किया जाना चाहिए? माना कि शरीर महत्वपूर्ण है और उसके तथा उससे संबंधित प्रियजनों के हित साधन के लिए काफी समय और श्रम लगाना पड़ता है, पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि आत्मा सर्वथा उपेक्षणीय है। उसकी आवश्यकताओं को समझा ही न जाय, उसकी प्राप्ति एवं तृप्ति के लिये कुछ किया ही न जाय।
उपासना क्रम अपनाया जाय-भावनात्मक तत्परता का समावेश रखा जाय- तो एक बार इस आनन्द का रसास्वादन करने के उपरान्त उपासना को छोड़ने का कोई नाम भी न ले।
उपासनाओं के विधान बता देने से किसी का कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। पंच-कोषों का अनावरण, षट्चक्र वेधन, कुंडलिनी जागरण आदि की क्रिया-प्रक्रियायें विस्तारपूर्वक बताई, समझाई जा सकती हैं, पर इतने मात्र से किसी को कोई लाभ न होगा। उस मार्ग पर चलने के लिए शक्ति प्राप्त करना यह सबसे बड़ा काम है। और पूरा कराने में सहायक कोई अनुभवी गुरु ही हो सकता है। और वह इस प्रकार की सहायता देने के लिए किसी के बातूनीपन से नहीं वरन् उसकी निष्ठा से ही प्रभावित होता है।
उपासना और साधना का आवश्यक समावेश है। व्यस्त रहने वाले या शरीर के दुर्बल लोगों के लिए भी यह कठिन नहीं है। सरल होते हुए भी यह अपनी सजीवता एवं सर्वांगपूर्णता के कारण इतनी प्रभावपूर्ण है कि इसका प्रत्यक्ष लाभ हर कोई अनुभव कर सकता है और प्राप्त अनुभवों के आधार पर यह प्रतिपादन साहसपूर्वक कर सकता है कि कभी किसी की उपासना निष्फल नहीं जाती। वह भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति में निःसंदेह आश्चर्यजनक रीति से सफल होती है।
उपासना में आनन्द की अभिवृद्धि होती चलेगी। प्रेमी की समीपता सदा सुखद होती है। भगवान को यदि अपना प्रेम-पात्र बना लिया गया है, उसे माता, गुरु या सखा के रूप में वरण कर लिया गया है, तो निस्सन्देह उसके साथ रहने की भावना अति सुखद होगी और उस अवसर पर मन खूब लगेगा। मन का स्वभाव यह है कि वह प्रेम-पात्र के पास, प्रिय वस्तु के साथ, प्रिय कल्पना के सान्निध्य में रहना पसंद करता है। दौड़-दौड़ कर वहीं जाता है।
उपासना अपने स्थान पर, अपने प्रयोजन के लिए ठीक है, पर वह साधना की आवश्यकता पूरी नहीं कर सकती। यदि कर सकी तो हर भजन करने वाला, उत्कृष्ट चरित्र वाला पाया जाता। पर ऐसा होता कहाँ है? इससे स्पष्ट है कि हमें साधना के लिए पृथक से प्रयत्न करना होगा। जीवन शोधन और जीवन विकास की साधना पद्धति को उतना ही- उससे भी अधिक महत्व देना होगा- जितना कि उपासना को देना है।
उपासना का व्यापक प्रसार किया गया और सुसंगठित यज्ञ आंदोलन को जन्म दिया गया है। शतकुंडी और सहस्र कुंडी यज्ञ मथुरा में हुए। देश भर में उनकी श्रृंखला विस्तृत की गई। यह समस्त आध्यात्मिक कार्यक्रम सूक्ष्म अंतरिक्ष को निर्मल बनाने और जन-मानस के गुह्य अंतरंग को परिष्कृत करने के लिये ही चले हैं। निस्संदेह ऐसी साधनात्मक प्रवृत्तियां ही चेतन मानव-प्राणी की चेतना को परिवर्तित और परिष्कृत करने में समर्थ होती हैं।
उपासना की सात्विकता को नष्ट करता है।
उपासना की प्रस्तुत प्रक्रिया के अंतर्गत इतना परमार्थ तो हर किसी को करना ही चाहिये कि वह दस पैसा प्रतिदिन ज्ञान-दान के लिये निकालता रहे। उस पैसे घर में ज्ञान-मंदिर स्थापित करे। दोनों पत्रिकायें और ट्रेक्टों का मूल्यवान रत्न-कोष घर में जमा करे। घर के हर सदस्य को उसे पढ़ाने, सुनाने की व्यवस्था करे और परिचित संबंधियों तक उसका प्रकाश पहुंचायें।
उपासना प्राणवान बनती है।
उपासना के विज्ञान-विधान ‘अखण्ड-ज्योति’ के माध्यम से हम सर्व-साधारण के सामने रख जाने के लिए यथासंभव कुछ कमी न रहने देंगे।
उपासना में भावना और साधना का जो जितना समन्वय कर लेगा, उसका श्रम उतना ही सार्थक होगा। यह एक सुनिश्चित तथ्य है और उसकी उपेक्षा किसी भी विवेकवान अध्यात्मवादी को नहीं करना चाहिये।
उपासना मानव जीवन का महानतम संबल है। उसे परम पुरुषार्थ कहा जाता है। संसार में जितनी भी विभूतियाँ सफलताएं और उपलब्धियाँ हो सकती है, उन सब में बड़ी यह है कि हम ईश्वर से परिचित मात्र न रह कर उसके साथ दोस्ती का रिश्ता जोड़ लें और उस समस्त वैभव के उत्तराधिकारी बन जांय जो उसके पास है। इसके बढ़ कर और कोई उपलब्धि इस जीवन में हो ही नहीं सकती। इसलिए बुद्धिमता एवं दूरदर्शिता इसी में है कि हम अन्य आवश्यक क्रिया-कलापों से कम नहीं वरन् अधिक महत्व ईश्वर की समीपता को लाभ दें और उसके लिए ‘उपासना’ की प्रक्रिया परिपूर्ण निष्ठा के साथ अपनाएं।
उपासना का क्रिया-कृत्य पूरा कर लेना अभीष्ट परिणाम उत्पन्न नहीं करता। आवश्यकता श्रद्धा के समन्वय की भी है। यह समावेश जितना अधिक और जितना प्रखर होगा सत्परिणाम उतनी ही बड़ी मात्रा में और उतने ही शीघ्र दृष्टिगोचर होंगे।
उपासना सर्वोत्कृष्ट मानी गई है। इसलिये उसकी स्थापना की प्रमुखता देनी चाहिये। यदि किसी का दूसरे देवता के लिये आग्रह हों तो उन देवता का चित्र भी रखा जा सकता है। शास्त्रों में गायत्री के बिना अन्य सब साधनाओं का निष्फल होना लिखा है। इसलिये यदि अन्य देवता को इष्ट माना जाय और उसकी प्रतिमा स्थापित की जाय तो भी गायत्री का चित्र प्रत्येक दशा में साथ रहना ही चाहिये।
उपासना और साधना का स्वतंत्र अस्तित्व हैं। एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जायेगी यह सोचना उचित नहीं। लाखों साधु-बाबा, पंडा-पुजारी भजन ध्यान में नित्य घण्टों समय लगाते हैं पर उनका प्रायः जीवन घृणित एवं निकृष्ट स्तर का बना रहता है।
उपासना अवश्य कर लिया करें। घर में आस्तिकता का- भक्ति भावना का वातावरण रहना परिवार की भावनात्मक समृद्धि और आत्मिक शुद्धि के लिए अति आवश्यक है।
उपासना बीज बोना है। बीज बोना थोड़े समय में, थोड़े खर्च में पूरा हो जाता है। इसी प्रकार उपासना घंटे, आधे घंटे करने से काम चल जाता है पर साधना में चौबीसों घंटे निरत रहना पड़ता है। हर घड़ी यह ध्यान रखना पड़ता है कि किसी भी समय कोई अनुचित विचार या कार्य अपने से न बन पावे। अधिक पुरुषार्थ इसी में करना होना है।
उपासना का विज्ञान तथा विधान समझा दिया जायेगा। यह हम अपना कर्त्तव्य पालन करने की दृष्टि से करेंगे, पिछले अनुभवों के आधार पर यह आशा कम ही है कि अधिक लोग उस मार्ग पर दूर तक चल सकेंगे। बताना सिर्फ इसलिए आवश्यक समझा गया कि कोई बिरले ही सही- उस मार्ग पर यदि चलना चाहें तो उन्हें अभिष्ट जानकारी के अभाव में प्रगति पथ पर अग्रसर होने से वंचित न होना पड़े। उपलब्ध अनुभव और ज्ञान को सर्वसाधारण के लिए छोड़ जाना यह हमारा नैतिक कर्त्तव्य भी है। इसलिए अध्यात्म के गूढ़ रहस्य और उच्चस्तरीय गायत्री उपासना के विज्ञान-विधान ‘अखण्ड-ज्योति’ के माध्यम से हम सर्व-साधारण के सामने रख जाने के लिए यथासंभव कुछ कमी न रहने देंगे।
उपासना और साधना का अवलंबन ग्रहण करना चाहिए।
-स्वामी कृष्णानन्द
उपासना का है उतना ही साधना का भी है। हमें उपासना पर ही नहीं साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिये। जीवन को पवित्र और परिष्कृत संयत और सुसंतुलित उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उच्च स्तरीय बनाने के लिये निरन्तर प्रयत्न करना चाहिये। इस प्रयत्न का नाम ही जीवन-साधना अथवा साधना है। उपासना पूजा को निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है।
उपासना का आश्रय लेना आरंभ करें।
उपासना के लिए हर कोई थोड़ा समय लगाये। दैनिक साधना में हर किसी को निष्ठा हो। इस प्रक्रिया के अंतर्गत ही महत्तम गायत्री महापुरश्चरण की भागीदारी भी सम्मिलित है। एक माला अपने लिए, एक विश्व-कल्याण के लिए करने से सहज ही उस महापुरश्चरण का भागीदार बना जा सकता है। अपने परिवार के- संपर्क के लोगों को भी इस साधना क्रम में सम्मिलित होने की प्रेरणा देनी चाहिये।
उपासना के लिए श्रम किया और मनोयोग लगाया।
उपासना पूजा को निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है। जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरंत सुधारा- जहाँ विकार पाया कि तुरंत उसकी चिकित्सा की- जहाँ पाप देखा कि तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है। जिस प्रकार सीमा रक्षक प्रहरियों को हर घड़ी शत्रु की चालों और घातों का पता लगाने और जूझने के लिए लैस रहना पड़ता है, वैसे ही जीवन संग्राम के हर मोर्चे पर हमें सतर्क और तत्पर रहने की आवश्यकता पड़ती है।
उपासना के लिए पूजा-स्थली की स्थापना आवश्यक है। घर में एक ऐसा स्थान तलाश करना चाहिये जहाँ अपेक्षाकृत एकान्त रहता हो, आवागमन और कोलाहल कम-से-कम हो। ऐसे स्थान पर एक छोटी चौकी को पीत वस्त्र से सुसज्जित कर उस पर काँच से मढ़ा भगवान का सुन्दर चित्र स्थापित करना चाहिये। गायत्री की उपासना सर्वोत्कृष्ट मानी गई है। इसलिये उसकी स्थापना की प्रमुखता देनी चाहिये।
उपासना एक आनन्द विभोर कर देने वाली भावनात्मक प्रक्रिया है, उसे यदि सही ढंग से अपनाया जा सके तो उपासक उतने स्वर्णिम क्षणों में आनन्द और उल्लास से ओत-प्रोत ही रह सकता है।
उपासना का प्रयोजन ईश्वर और जीव जैसे दो चेतन-तत्वों में समीपता एकता की स्थापना करना है। इसके लिए भावनात्मक माध्यम का प्रयोग अनिवार्य रूप से आवश्यक है। उपासना के साथ-साथ भावना को अविच्छिन्न रूप से जुड़ा ही रहना चाहिये। कर्मकांड को शरीर और भावना को प्राण कहा जा सकता है। शरीर और प्राण दोनों को मिला कर ही एक समग्र व्यक्तित्व विनिर्मित होता है।
उपासना का मूल प्रयोजन सिद्ध होना निर्भर है।
उपासना पर ही नहीं साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिये। जीवन को पवित्र और परिष्कृत संयत और सुसंतुलित उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उच्च स्तरीय बनाने के लिये निरन्तर प्रयत्न करना चाहिये। इस प्रयत्न का नाम ही जीवन-साधना अथवा साधना है। उपासना पूजा को निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है।
उपासना का सफल स्वरूप यही है। क्रिया-कृत्यों के साथ भावना का समन्वय करने से उसमें सजीवता आती है। आरंभ में ऐसा न हो सके तो भी चिन्ता की बात नहीं। मन का स्वभाव क्रीड़ा कौतुकों में लगने का है। उसकी दौड़ बाह्य-मुखी है।
उपासना का उपचार सम्पन्न करते हुए- जप, पूजन, वंदन, अर्चन, स्तवन, ध्यान करते हुये- हमें यह अनुभूति भी करनी चाहिये कि इष्टदेव हमारे अति निकटवर्ती स्वजन, संबंधी, मित्र, कुटुम्बी एवं आत्मीय हैं। प्रियजनों के बीच अनेक रिश्ते होते हैं, उन्हीं में से एक रिश्ता उनसे स्थापित कर लेना चाहिये, माता, पिता, गुरु, बंधु, मित्र, पति आदि अपने से बड़े पक्ष का रिश्ता अधिक उपयोगी रहता है। कभी-कभी पुत्र, पत्नी आदि के रिश्ते भी स्थापित किये जाते हैं। कौशल्या, देवकी, यशोदा, सूरदास आदि ने बालगोविन्द को इष्ट माना था। फारसी भाषा के सूफी कवियों ने इश्क हकीकी की भक्ति धारा में भगवान को अपनी प्रेयसी के रूप में भी चित्रित किया है।
उपासना’ की प्रक्रिया परिपूर्ण निष्ठा के साथ अपनाएं।
उपासना को पूजन, जप और ध्यान इन तीनों भागों में बाँटा जा सकता है, उसी प्रकार आत्म-निर्माण और समाज-निर्माण साधना के अविच्छिन्न अंग हैं। भगवान के स्मरण पर जितना ध्यान देना आवश्यक है, उतनी ही आवश्यकता जीवन शोधन की भी है। आदर्शवादी, उत्कृष्ट जीवन आस्तिकता का सबसे प्रमुख प्रमाण है। ऐसे भक्त जो अपने आचरण की शुद्धता लेकर ईश्वर के सन्मुख उपस्थित होते हैं, अपने प्रभु को प्रसन्न एवं द्रवित करने में निःसंदेह समर्थ होते हैं।
उपासना का आश्रय लेना क्यों दूरदर्शिता न मानी जायेगी? निःसंदेह यह उच्चकोटि की चतुरता कही जायेगी कि हम शरीर के स्वार्थों का ध्यान रखने के अतिरिक्त आत्म-कल्याण की भी आवश्यकता समझें और इसके लिए उपासना का आश्रय लेना आरंभ करें।
उपासना का प्रयोजन ही नष्ट कर देती है। मान्यता यह होनी चाहिये कि प्रस्तुत प्रतीक या प्रतिमा सचमुच साक्षात ईश्वर है, वह एक सजीव व्यक्ति की तरह सामने प्रस्तुत है, और जो कुछ किया या कहा जा रहा है उसे वह पूरी तन्मयता और रुचिपूर्वक सुन समझ अथवा ग्रहण कर रहा है। चुपचाप ग्रहण कर रहा हो सो बात नहीं, वरन् वह हमारी हर प्रक्रिया को स्वीकार करते हुये प्रसन्नता एवं सद्भावना भी व्यक्त कर रहा है। अपने प्रेम का वह अनेक गुना अनुदान भी प्रदान कर रहा है।
उपासना पद्धति का समावेश माना जा सकता है। साकार और निराकार दोनों की पूजा करने का स्वरूप प्रायः यही है। ईश्वर को साकार मान कर उसकी प्रतिमा स्थापित करने वाले रोली, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, आरती आदि से पूजन करते हैं, निराकार मानने वाले चित्र अथवा प्रतिमा न रख कर ध्यान में प्रकाश आदि का कोई रूप बनाते हैं। अग्निहोत्र भी एक तरह की मूर्ति पूजा है। ईश्वर को अग्नि रूप में स्थापित कर वेद मंत्रों से उसकी स्तुति करते हुए, घृत हविष्य आदि की आहुतियाँ देना एक प्रकार से भोग लगाना ही है।
उपासना में पूजा के अतिरिक्त भावना और साधना का भी समन्वय होना चाहिए, तभी वह अभीष्ट परिणाम प्रस्तुत करने में समर्थ हो सकती है। जितना ध्यान पूजा पद्धति पर दिया जाता है, उससे भी अधिक भावना तथा साधना पर दिया जाना चाहिए। तीनों का सम्मिश्रण जहाँ भी होगा वहाँ सफलता निश्चित रूप से मिलेगी।
उपासना करना महत्वपूर्ण मानते हैं, उसी प्रकार शीत और ग्रीष्म ऋतुओं के मिलन की यह ऋतु संध्या 9-9 दिन के लिए- नवरात्रि के रूप में- वर्ष में दो-बार आया करती हैं। शरीर और मन के विकारों का निष्कासन- परिशोधन इस अवसर पर बड़ी आसानी से हो सकता है। जिस प्रकार बीज बोने की एक विशेष अवधि आती है और चतुर किसान उन दिनों सतर्कतापूर्वक अपने खेतों में बीज बो देते हैं, उसी प्रकार इन नवरात्रियों में भी कुछ तपश्चर्या की जा सके तो उसके अधिक फलवती होने की संभावना रहती है। स्त्रियों को महीने में जिस प्रकार ऋतुकाल आता है, ‘उसी प्रकार नवरात्रियाँ प्रकृति की भी ऋतुकाल है। इन दिनों यदि आध्यात्मिक बीजारोपण किये जांय तो उनके फलित होने की संभावना निश्चय ही अधिक रहेगी।
उपासना घंटे, आधे घंटे करने से काम चल जाता है पर साधना में चौबीसों घंटे निरत रहना पड़ता है। हर घड़ी यह ध्यान रखना पड़ता है कि किसी भी समय कोई अनुचित विचार या कार्य अपने से न बन पावे। अधिक पुरुषार्थ इसी में करना होना है। उपासना में भावना का और साधना में विवेक का समावेश करना होता है। भावना, उपासना का और विवेकशीलता साधना को समग्र बनाती है।
उपासना उसी अभाव की पूर्ति करती है। ईश्वर और जीव के बीच घनिष्ठ आत्मीयता के संबंधों को सजग एवं गतिशील बनाती है। कहावत है कि ‘दोस्ती और दुश्मनी पास रहने से बढ़ती है और दूर रहने से घट जाती है।’ ईश्वर और जीव की दोस्ती के बारे में भी यह युक्ति पूरी तरह लागू होती है। बार-बार पास बैठने से- हर दिन संपर्क बनाये रहने से- ईश्वर और जीव के बीच दोस्ती का रिश्ता मजबूत होता चला जाता है।
उपासना में लगाया है। और मंथन, चिन्तन, मार्गदर्शन, अध्ययन एवं अनुभव के आधार पर यह पाया है कि उपासना में पूजा के अतिरिक्त भावना और साधना का भी समन्वय होना चाहिए, तभी वह अभीष्ट परिणाम प्रस्तुत करने में समर्थ हो सकती है। जितना ध्यान पूजा पद्धति पर दिया जाता है, उससे भी अधिक भावना तथा साधना पर दिया जाना चाहिए। तीनों का सम्मिश्रण जहाँ भी होगा वहाँ सफलता निश्चित रूप से मिलेगी।
उपासना का कार्यक्रम उपस्थित किया जा रहा है, जिसमें उपासना और साधना का आवश्यक समावेश है। व्यस्त रहने वाले या शरीर के दुर्बल लोगों के लिए भी यह कठिन नहीं है। सरल होते हुए भी यह अपनी सजीवता एवं सर्वांगपूर्णता के कारण इतनी प्रभावपूर्ण है कि इसका प्रत्यक्ष लाभ हर कोई अनुभव कर सकता है और प्राप्त अनुभवों के आधार पर यह प्रतिपादन साहसपूर्वक कर सकता है कि कभी किसी की उपासना निष्फल नहीं जाती। वह भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति में निःसंदेह आश्चर्यजनक रीति से सफल होती है।
उपासना के साथ-साथ भावना को अविच्छिन्न रूप से जुड़ा ही रहना चाहिये। कर्मकांड को शरीर और भावना को प्राण कहा जा सकता है। शरीर और प्राण दोनों को मिला कर ही एक समग्र व्यक्तित्व विनिर्मित होता है। इसी प्रकार सजीव उपासना वही कहला सकती है, जिसमें पूजा प्रयोग के कर्मकांड के साथ-साथ स्नेह की अभिव्यंजना भी जुड़ी हुई हो। उल्लास इस अभिव्यंजना पर ही निर्भर है।
उपासना क्रम आशाजनक परिणाम प्रस्तुत करता है, उससे जीवनोद्देश्य की प्राप्ति में भारी सफलता मिलती है। इसलिए तत्त्वदर्शी आत्म-वेत्ताओं ने उपासना को जीवन का एक अनिवार्य नित्य धर्म माना है। जो इस संदर्भ में उपेक्षा बरतते हैं, आलस्य, प्रमाद करते हैं, उनकी कटु-भर्त्सना शास्त्रकारों ने की है।
उपासना को छोड़ने का कोई नाम भी न ले।
उपासना और जीवन को साधना, उत्कृष्ट भावनाओं के साथ करनी चाहिये। तभी जीवनोद्देश्य की प्राप्ति संभव हो सकेगी।
उपासना और साधना आध्यात्मिक प्रगति के दो अविच्छिन्न पहलू हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। जिस तरह अन्न और जल, रात और दिन, शीत और ग्रीष्म, स्त्री और पुरुष जोड़ा है, उसी प्रकार उपासना और साधना भी अन्योन्याश्रित है। एक के बिना दूसरा अकेला असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा, इसलिये दोनों को साथ लेकर अध्यात्म मार्ग पर प्रगतिशील होना ही उचित और आवश्यक है।
उपासना के बारे में कही जा सकती है। यथा संभव नियमितता ही बरतनी चाहिये। रेलवे की रनिंग ड्यूटी करने वाले, यात्रा में रहने वाले, फौजी, पुलिस वाले जिन्हें अक्सर समय-कुसमय यहाँ-वहाँ जाना पड़ता है, उनकी बात दूसरी है। वे मजबूरी में अपना क्रम जब भी, जितना भी बन पड़े, रख सकते हैं। न कुछ से कुछ अच्छा।
उपासना वही कहला सकती है, जिसमें पूजा प्रयोग के कर्मकांड के साथ-साथ स्नेह की अभिव्यंजना भी जुड़ी हुई हो। उल्लास इस अभिव्यंजना पर ही निर्भर है। जिनके मन नहीं मिले, केवल शरीर ही समीप है, उन्हें मिलने का आनन्द आयेगा? किन्तु यदि भावनाएं प्रबल हैं तो शरीर के दूर रहते हुए भी मन उत्साह से भरा रहता है और कल्पना के माध्यम से भी मिलन-सुख उपलब्ध होता रहता है। इस तथ्य को भुला कर जो लोग पूजा-पत्री का कर्मकाँड मात्र पूरा करते रहते हैं और भावनात्मक अभिव्यंजना का समन्वय नहीं करते।
उपासना की जाती है। इस आवश्यक नित्यकर्म का पालन करना ही हमारे लिए उचित है। उत्कृष्टता की अनुभूतियों के संपर्क में आकर ही हम उन दैवी सम्पदाओं के अधिपति बन सकते हैं, जिन्हें प्राप्त करने के लिए यह महान मानव जीवन उपलब्ध हुआ है।
उपासना एक ऐसे वटवृक्ष का बीज है, जिसकी छाया, पल्लव, पुष्प, फल और विशालता से सब का सब प्रकार हित होता है। ईश्वर की समीपता का लाभ उठा कर जीव अपनी शक्ति सामर्थ्य को अनन्त गुनी बढ़ा सकता है और महापुरुष की- भूदेव की- नर-नारायण की भूमिका सम्पादित कर सकता है। ईश्वर का सान्निध्य अनुग्रह प्रकाश और अनुदान जिसने प्राप्त कर लिया उसे और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता। इस उपलब्धि के फलस्वरूप क्या मिलता है, उसे वाणी से कहना और लेखनी से लिखना पर्याप्त नहीं, उसे तो अनुभव करके ही देखना चाहिये। पक्षी की छाती की गर्मी से सेये जाने पर अण्डे कुछ ही दिन में पक्षी के रूप में विकसित हो जाते हैं।
उपासना का मूल प्रयोजन पूरा होने लगा। ईश्वर कहीं बहुत दूर रहता है, उसे पाने या बुलवाने की अभी अपनी सामर्थ्य कहां? ऐसी निराशात्मक एवं अविश्वास मूलक भावना उपासना का प्रयोजन ही नष्ट कर देती है। मान्यता यह होनी चाहिये कि प्रस्तुत प्रतीक या प्रतिमा सचमुच साक्षात ईश्वर है, वह एक सजीव व्यक्ति की तरह सामने प्रस्तुत है, और जो कुछ किया या कहा जा रहा है उसे वह पूरी तन्मयता और रुचिपूर्वक सुन समझ अथवा ग्रहण कर रहा है। चुपचाप ग्रहण कर रहा हो सो बात नहीं, वरन् वह हमारी हर प्रक्रिया को स्वीकार करते हुये प्रसन्नता एवं सद्भावना भी व्यक्त कर रहा है।
उपासना क्रम में एक माला गायत्री महामंत्र की आत्म-कल्याण के लिये और एक माला विश्व-कल्याण के लिए। दो को अनिवार्य माना गया है। इसके अतिरिक्त अधिक जप या किसी अन्य देवी-देवता का जप पाठ अपनी इच्छा और सुविधा पर निर्भर है। आत्म-कल्याण की भावनाओं की अभिव्यक्ति ‘गायत्री चालीसा’ में और विश्वकल्याण की रीति-नीति ‘युग-निर्माण सत्संकल्प’ में मौजूद है। इसलिए पहली आत्म-कल्याण की माला जपने के बाद गायत्री चालीसा का पाठ और दूसरी विश्व कल्याण की माला जपने के बाद युग-निर्माण सत्संकल्प का पाठ करना चाहिये।
उपासना का क्षेत्र बहुत विशाल और व्यापक है। जिनके पास समय है, अभिलाषा है, निष्ठा है, उनके लिए एक से एक महत्वपूर्ण और चमत्कारी साधना-क्रम मौजूद है। उन्हें अपनी मनोभूमि और परिस्थिति के अनुसार मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिये। इस अंक में तो न्यूनतम कार्यक्रम ही प्रस्तुत किया जा रहा है।
उपासना थोड़ी भी की जाय तो वह आशाजनक परिणाम उत्पन्न करेगी। उसके विपरीत एकाँकी पूजा पद्धति तक सीमित रहा गया तो किसी महत्वपूर्ण परिणाम की आशा नहीं की जा सकती। उपासना में भावना और साधना का जो जितना समन्वय कर लेगा, उसका श्रम उतना ही सार्थक होगा। यह एक सुनिश्चित तथ्य है और उसकी उपेक्षा किसी भी विवेकवान अध्यात्मवादी को नहीं करना चाहिये।
उपासना के लिए पिछले पृष्ठों पर अभी (1) प्रातः 3 से 5 अथवा रात्रि को 8 से 10 बजे के बीच की जाने वाली ‘ज्योति-अवतरण’ की साधना, (2) नित्य पूजन-आत्म-शुद्धि के पाँच विधान- सप्तविधि उपचार अर्चन और एक माला एवं एक चालीसा पाठ आत्मकल्याण के लिए- एक माला सत्संकल्प पाठ युग-निर्माण के लिये करने का प्रकार बताया गया है। मालाओं की संख्या कम भले ही हो पर जप के साथ ध्यान अवश्य जुड़े होने चाहिये। आत्म-कल्याण वाली माला के साथ माता की गोदी में क्रीड़ा-कल्लोल करने और पय-पान करने का और विश्व-कल्याण वाली माला के साथ दीपक पर पतंगे की तरह विश्व-मानव के लिए आतम-समर्पण करने का ध्यान बताया गया है।
उपासना, नियत समय पर संस्था में, नियत स्थान पर होनी चाहिये। इस नियमितता से वह स्थान संस्कारित हो जाता है और मन भी ठीक तरह लगता है। जिस प्रकार नियत समय पर सिगरेट आदि की ‘भड़क’ उठती है, उसी तरह पूजा के लिये भी मन में उत्साह जगता है। जिस स्थान पर बहुत दिन से सो रहे हैं, उस स्थान पर नींद ठीक आती है। नई जगह पर अकसर नींद में अड़चन पड़ती है।
उपासना को प्रखर बनाने के अनुकूल बनता और बढ़ता चला जाय। अपने आपका निर्माण ही सबसे बड़ा और सबसे झंझट का काम है। यदि उसे पूरा किया जा सके तो कोई छोटी-सी भी उपासना पद्धति थोड़े दिनों में ही आशाजनक प्रतिफल उत्पन्न कर सकती है।
उपासना को देना है। साधना रहित उपासना विडम्बना मात्र बन कर रह जाती है। किन्तु यदि साधना को सर्वांगपूर्ण बना लिया है- जीवन को उत्कृष्ट बना लिया जाय- तो बिना उपासना के भी अध्यात्म प्रयोजन की पूर्ति हो सकती है।
उपासना क्रम साँगोपाँग होना चाहिये और उसमें आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास की परिपूर्ण प्रक्रिया जुड़ी ही रहनी चाहिये। उपासना और साधना का स्वतंत्र अस्तित्व हैं। एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जायेगी यह सोचना उचित नहीं। लाखों साधु-बाबा, पंडा-पुजारी भजन ध्यान में नित्य घण्टों समय लगाते हैं पर उनका प्रायः जीवन घृणित एवं निकृष्ट स्तर का बना रहता है।
उपासना की भाँति ही आधे घंटे या कम-से-कम 15 मिनट का समय प्रतिदिन प्रातःकाल निकालना चाहिये। यह सोकर उठते ही चारपाई पर बैठ कर भी पूरा किया जा सकता है। अथवा नित्य-कर्म, पूजा आदि से निवृत्त होकर फिर थोड़ी देर से इस चिन्तन क्रम को पूरा करना चाहिये। अपने कार्यक्रम से ही सबेरे ही इसको भी किसी स्थान पर फिट कर लेना चाहिये। पूजा में ही आगे-पीछे इसे भी मिला सकते हैं।
उपासना एक बोझिल प्रक्रिया मात्र बन कर रह जाती है और आरंभिक उत्साह शिथिल होते ही कितने लोग उसे छोड़ बैठते हैं। यदि प्रारंभ से ही वस्तु स्थिति का ध्यान रखा जाय- सजीव उपासना क्रम अपनाया जाय-भावनात्मक तत्परता का समावेश रखा जाय- तो एक बार इस आनन्द का रसास्वादन करने के उपरान्त उपासना को छोड़ने का कोई नाम भी न ले।
उपासना में- जब कि दो ही माला नित्य करनी हैं, गति में तेजी लाना ठीक नहीं। माला न हो तो उंगलियों पर 108 गिन कर एक माला पूरी होने की गणना की जा सकती है। घड़ी सामने रख कर भी समय का अनुमान लगाया जा सकता है।
उपासना भूमिका के वातावरण का स्वरूप है। पहले इसी पर ध्यान एकाग्र किया जाये।
उपासना की उपेक्षा को चाहे भूल कहा जाय, चाहें उद्दंडता, उसका दंड हमें एक ऐसे भारी आत्मिक अभाव के रूप में भुगतान पड़ता है, जिसके कारण जीवन में न रस रह जाता है और न आनन्द। उत्कृष्टता की सरलता की अनुभूति ही वह अमृत है, जिसे पीकर आत्मा तृप्ति का अनुभव करती है और जिसका रसास्वादन करने के लिए वह बार-बार जन्म-मृत्यु का कष्ट सह कर भी, मानव शरीर धारण करने के लिए लालायित रहती है। निम्न स्तर के विचारों और कार्यों को तो कीचड़ ही कहा जा सकता। कृमि-कीट उसमें बुजबुजाते हुए अपने दिन गुजार सकते हैं, पर जिसकी आत्मा जाग पड़ी उसके लिए यह स्थिति असह्य है। उसकी तृप्ति और संतुष्टि उत्कृष्टता से ही संभव है।
उपासना प्रक्रिया में रहने वाली एक ऐसी भूल है, जिसकी ओर ध्यान दिया या दिलाया नहीं गया। यदि यह भूल सुधार ली जाय तो उपासना हमारे जीवन की सबसे अधिक उल्लास और उत्साह भरी भूमिका हो सकती है।
उपासना करते हैं। यह ताँत्रिक विधान है। ताँत्रिक प्रयोग मनुष्य में तमोगुणी तत्वों को बढ़ा सकते हैं, उससे कोई साँसारिक प्रयोजन पूरा हो भी सकता है। पर तमोगुण के वातावरण में आत्मिक प्रगति की आशा नहीं की जा सकती। इसलिये श्रेय पथ के पथिकों को गायत्री अनुष्ठान ही नवरात्रियों में करने चाहिये।
उपासना है। यों सत्ता की दृष्टि से ईश्वर इस विश्व के कण-कण में समाया हुआ है। हमारे शरीर और समीपवर्ती वातावरण में भी वह ओत-प्रोत है। तथ्य की दृष्टि से वह समीप है। पर तत्व की दृष्टि से फिर भी वह दूर ही बना रहता है।
उपासना का अर्थ है- समीपता- पास बैठना। जीव का ईश्वर के समीप बैठना- इसी का नाम उपासना है। यों सत्ता की दृष्टि से ईश्वर इस विश्व के कण-कण में समाया हुआ है। हमारे शरीर और समीपवर्ती वातावरण में भी वह ओत-प्रोत है। तथ्य की दृष्टि से वह समीप है।
उपासना क्रम में जो दो माला गायत्री जप करने की व्यवस्था की गई है, उसमें एक माला आत्म-कल्याण के लिए है और दूसरी विश्व-कल्याण के लिए है।
उपासना में भावना का और साधना में विवेक का समावेश करना होता है। भावना, उपासना का और विवेकशीलता साधना को समग्र बनाती है। इसलिए अपने आध्यात्मिक क्रिया-कलापों में इनका जुड़ा रहना आवश्यक है।
उपासना का और विवेकशीलता साधना को समग्र बनाती है। इसलिए अपने आध्यात्मिक क्रिया-कलापों में इनका जुड़ा रहना आवश्यक है।
उपासना अपना प्रतिफल उत्पन्न किये बिना नहीं रहती, इस तथ्य पर भी हमारी परिपूर्ण मान्यता होनी चाहिये। और प्रयत्न यह किया जाना चाहिये कि अपने भावना-स्तर उपासना को प्रखर बनाने के अनुकूल बनता और बढ़ता चला जाय। अपने आपका निर्माण ही सबसे बड़ा और सबसे झंझट का काम है। यदि उसे पूरा किया जा सके तो कोई छोटी-सी भी उपासना पद्धति थोड़े दिनों में ही आशाजनक प्रतिफल उत्पन्न कर सकती है।
उपासना, दूसरा जीवन को उत्कृष्ट, अनुकरणीय बनाने की साधना। इन दोनों के लिए यदि स्थिर मति और प्रगाढ़ निष्ठा के साथ प्रयत्न किया जाय तो निस्संदेह आत्मिक प्रगति भी इसी तरह मिल सकती है, जैसी कि भौतिक प्रगति।
उपासना एवं साधना का निर्धारित क्रम अपनाये रहूँगा। यदि साधना बंद या स्थगित रखूँगा तो उसकी सूचना अपने ऋत्विज को तथा मथुरा केन्द्र को दे दूँगा।’
उपासना की पूर्ति की जा सकती है। अधिक देर बैठने से घुटने दर्द करते हों, तो खड़े होकर भी कुछ जप किया जा सकता है। बीच में पेशाब के लिए उठना पड़े तो फिर हाथ-पैर धोकर बैठना चाहिये और जप आरंभ करने से पूर्व तीन आचमन कर लेने चाहिये। स्त्रियों को यदि बीच में अशुद्धि काल आ जाय तो चार दिन बंद रखें और जितने दिन का जप शेष रहा था, उसे पीछे पूरा कर लें।
उपासना हमें वह प्रकाश और मार्ग दर्शन प्रदान करती है, जिससे समस्त उत्कृष्टताओं का समुच्चय भगवान हमारे समीप आता है और अपनी श्रेष्ठताओं से हमें ओत-प्रोत कर देता है।
उपासना विडम्बना मात्र बन कर रह जाती है। किन्तु यदि साधना को सर्वांगपूर्ण बना लिया है- जीवन को उत्कृष्ट बना लिया जाय- तो बिना उपासना के भी अध्यात्म प्रयोजन की पूर्ति हो सकती है।
उपासना रही जो मात्र पूजा पद्धति को सब कुछ समझते रहे और उसी में संलग्न रहे, वे हमसे अधिक श्रम करते रहने पर भी आज खाली हाथ हैं। हमारा व्यक्तिगत अनुभव और शास्त्रों तथा ऋषियों का निर्देश समग्र साधना करने के पक्ष में है। हमारा अटूट विश्वास है कि यदि सर्वांगपूर्ण उपासना थोड़ी भी की जाय तो वह आशाजनक परिणाम उत्पन्न करेगी। उसके विपरीत एकाँकी पूजा पद्धति तक सीमित रहा गया तो किसी महत्वपूर्ण परिणाम की आशा नहीं की जा सकती। उपासना में भावना और साधना का जो जितना समन्वय कर लेगा, उसका श्रम उतना ही सार्थक होगा।
उपासना पद्धति की माँग की जाती रही है। यह अंक उसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए लिखा जा रहा है। जिनकी श्रद्धा सामान्य है, जिनके पास अवकाश भी कम है, किन्तु उपासना पथ पर अग्रसर होना चाहते हैं, उन्हें एक संतुलित उपासना पद्धति चाहिए ही। यह माँग और आवश्यकता ऐसी है, जिसकी पूर्ति की जानी चाहिए। अतएव यह अंक उसी समाधान के लिए लिखा जा रहा है।
उपासना। उपासना हमें वह प्रकाश और मार्ग दर्शन प्रदान करती है, जिससे समस्त उत्कृष्टताओं का समुच्चय भगवान हमारे समीप आता है और अपनी श्रेष्ठताओं से हमें ओत-प्रोत कर देता है।
उपासना और साधना भी अन्योन्याश्रित है। एक के बिना दूसरा अकेला असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा, इसलिये दोनों को साथ लेकर अध्यात्म मार्ग पर प्रगतिशील होना ही उचित और आवश्यक है।
उपासना प्रक्रिया के अंतर्गत ज्योति-अवतरण ध्यान तथा नित्य पूजा एवं जप का सरल विधान बताया गया है और नवरात्रियों में अनुष्ठानों की तपश्चर्या करते रहने का सुझाव दिया गया है। यह क्रम व्यस्त समय वाले लोगों के लिये भी कुछ कठिन नहीं है। यदि अन्तःकरण में आकाँक्षा जाग पड़े तो प्रातः सोकर उठते ही चारपाई पर पड़े-पड़े आधा घण्टे का ध्यान और नित्य-कर्म के उपरान्त आधा घण्टे की पूजा-प्रक्रिया यह समय अथवा विधान ऐसा नहीं है जिससे कहीं साँसारिक कार्यों में अड़चन पड़ती हो। प्रश्न केवल रुचि और आकाँक्षा का है, यदि मन को जागृत किया जा सके तो जीवनोद्देश्य को पूर्ण करने की दिशा में इतने मात्र से महत्वपूर्ण प्रगति हो सकती है।
उपासना में लगाया उनके चरित्र और वृतान्त पढ़ने का यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि वे घाटे में नहीं रहे, तृष्णा और वासना के दो पाटों की चक्की में पिसते रहने वालों की तुलना में वे अधिक ही लाभान्वित रहे जिनने ईश्वर का आश्रय ग्रहण करके उपासना के लिए श्रम किया और मनोयोग लगाया।
उपासना’ में संलग्न हैं। उनका ठीक तरह मार्गदर्शन किया जा रहा है।
उपासना, सूक्ष्म जगत, आत्म-विकास यह सभी दिव्य सत्तायें हमारी प्रगाढ़ श्रद्धा पर अवलम्बित है।
उपासना पद्धति है। इसका अनुपम लाभ लेने से किसी को भी नहीं चूकना चाहिये। प्रस्तुत ध्यान साधना के लिये रात्रि का समय ही अधिक उपयुक्त है। यों उसे दिन में भी सुविधानुसार समय पर किया जा सकता है पर रात्रि की नीरवता में जितनी अच्छी तरह इसका सत्परिणाम मिलता है, उतना दिन में नहीं।
उपासना पद्धति थोड़े दिनों में ही आशाजनक प्रतिफल उत्पन्न कर सकती है।
उपासना की सफलता का पथ-प्रशस्त करती है। जमीन अच्छी हो तो बीज उगने में सरलता होती है। भूमि बहुत दाम की खरीदी जाती है। बहुत परिश्रम उसको उर्वर बनाने में लगता है। खाद, पानी, जुताई, मेंड़बन्दी आदि की भारी व्यवस्था बना कर उस जमीन को जब उर्वर बना लिया जाता है, तब कोई भी फसल उसमें कोई उगाई जा सकती है।
उपासनात्मक क्रिया-कलाप उससे ठीक तरह न बन पड़े।
उपासना, आत्म-शोधन और परमार्थ तीनों का ही समावेश आवश्यक है। भगवान का नित्य स्मरण करे। अपने दोष, दुर्गुणों से नित्य संघर्ष करे और उन्हें हटावे। सद्गुणों और योग्यताओं को बढ़ाने के लिए नित्य पुरुषार्थ करे। निजी, पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूरी-पूरी ईमानदारी और तत्परतापूर्वक निबाहे।
उपासना पथ पर अग्रसर होना चाहते हैं, उन्हें एक संतुलित उपासना पद्धति चाहिए ही। यह माँग और आवश्यकता ऐसी है, जिसकी पूर्ति की जानी चाहिए। अतएव यह अंक उसी समाधान के लिए लिखा जा रहा है।
उपासना को जीवन का एक अनिवार्य नित्य धर्म माना है। जो इस संदर्भ में उपेक्षा बरतते हैं, आलस्य, प्रमाद करते हैं, उनकी कटु-भर्त्सना शास्त्रकारों ने की है।
उपासना की भाँति ही साधना भी आत्मिक प्रगति का अनिवार्य अंक है। जीवन-शोधन और परमार्थ प्रक्रिया का समन्वय करने से साधना का प्रयोजन पूरा होता है। जिस प्रकार उपासना को पूजन, जप और ध्यान इन तीनों भागों में बाँटा जा सकता है, उसी प्रकार आत्म-निर्माण और समाज-निर्माण साधना के अविच्छिन्न अंग हैं। भगवान के स्मरण पर जितना ध्यान देना आवश्यक है, उतनी ही आवश्यकता जीवन शोधन की भी है। आदर्शवादी, उत्कृष्ट जीवन आस्तिकता का सबसे प्रमुख प्रमाण है।
उपासना क्रम पूछते रहते हैं। उनके मार्ग दर्शन के लिए इस अंक में एक ऐसा न्यूनतम कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा रहा है, जो सर्वसाधारण के लिए-संक्षिप्त सरल एवं अति उपयोगी है। जिनके पास अधिक समय है, जिनकी प्रगति उस मार्ग पर काफी आगे तक हो चुकी है, उनके लिए विशिष्ट साधनाओं के क्रम प्रस्तुत किए जा सकते हैं। ऐसे लोग ‘पंचकोशी गायत्री उपासना’ में संलग्न हैं। उनका ठीक तरह मार्गदर्शन किया जा रहा है।
उपासना में भगवान को माता के रूप में माना गया है। माता के प्रति बालक का प्रेम सब से सरल और स्वाभाविक है। क्या मनुष्य, क्या मनुष्येत्तर, पशु-पक्षी, कीटपतंग सभी अपने बच्चों को प्यार करते हैं। माता में तो वह प्यार और भी अधिक होता है। अन्य योनियों में तो बहुधा माता ही एक मात्र शिशु की संरक्षक एवं स्नेह भाजन होती है।
उपासना के हर कर्मकांड के साथ आवश्यक भावनाओं का समन्वय रहे तभी उनमें प्रखरता आयेगी।
उपासना जैसे रूखे प्रसंग को ग्रहण करने से इनकार ही करने लगता है। यदि उसकी बात मान ली गई तो फिर भविष्य में किसी ऐसे प्रसंग पर उसे झुका लेना और भी कठिन हो जाता है। अतएव मन के असहयोग के आगे हमें झुकना नहीं चाहिये वरन् बलात्कारपूर्वक तब-तक उसे निर्धारित दिशा में जोते ही रहना चाहिये, जब तक कि वह उसका अभ्यस्त न हो जाय। मन में एक अच्छी विशेषता भी है कि वह जिस बात का अभ्यस्त हो जाता है फिर उसे सहज छोड़ता भी नहीं। हानिकारक व्यसनों और दुर्गुणों को जब वह मजबूती से पकड़ बैठता है तो कोई कारण नहीं कि उपासना जैसे श्रेय साधन को सदा-सर्वदा निबाहते रहने के लिये तत्पर न हो जाये।
उपासना की जा सकती है। हम निष्पाप बनें इतना ही पर्याप्त नहीं वरन् यह भी आवश्यक है कि अपने कर्म एवं स्वभाव में सद्गुणों का समुचित समावेश करके दिव्य जीवन बनावें और उसके द्वारा अपना और समस्त समाज का कल्याण करें। व्यक्तित्व को परिष्कृत और विकसित करते हुए ही हम आत्मिक प्रगति के मार्ग पर बढ़ते हैं और पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकने में सफल होते हैं।
उपासना पथ पर प्रगति में गतिशीलता उत्पन्न होती है। भावनात्मक आदान-प्रदान के लिये इस प्रकार की स्थापना आवश्यक है।
उपासना जीव और ईश्वर को एकनिष्ठ आत्मीयता के संबंध सूत्र में बाँध देने की एक सर्वमान्य एवं सुनिश्चित पद्धति है।
उपासनात्मक आध्यात्मिक प्रगति का परिणाम परिपूर्ण निर्भयता के रूप में परिलक्षित होता है। अनुभव होता है कि ईश्वर हर घड़ी हमारे साथ है। एक सहयोगी सहचर की तरह- अंग-रक्षक सुरक्षा अधिकारी की तरह साथ-साथ आगे-पीछे चलता दिखाई देता है। ऐसी दशा में डर किसका? जब हथियाबन्द पुलिस गारद अपनी सुरक्षा के लिये तैनात हो जाता है, साथ-साथ चलता है, तब शत्रुओं और खतरों से छिपे होने पर भी निश्चिन्तता हो जाती है।
उपासना जैसे श्रेय साधन को सदा-सर्वदा निबाहते रहने के लिये तत्पर न हो जाये। कठिनाई आरंभिक दिनों की ही है। इससे जब तक स्थिति अनुकूल न हो जाय तब तक उस दिशा में जंगली जानवरों को सधाने-सिखाने के समय बरती जाने वाली चतुरता एवं कड़ाई का हमें प्रयोग करते रहना चाहिये।
उपासना प्रखर होगी और उसका प्रतिफल उतना ही उत्साहवर्धक होगा। भाव भरी पूजा पद्धति साधक के अन्तःकरण को पुलकित कर देती है। अपनी भक्ति भावना की प्रखरता- भगवान की मधुर मुसकान बन कर हमारे साथ हास-विलास भरा प्रेमालाप करने लगती है। और अनुभव होता है कि भक्त और भगवान दोनों अति निकट होकर एक अनिवर्चनीय आनन्द सागर में निमग्न हो रहे हैं।
उपासना हमारे सूक्ष्म, स्थूल और कारण शरीरों को प्रभावित करेगी और जीवन क्रम में ऐसा हेर-फेर उत्पन्न करेगी, जिससे अपने अध्यात्म की अभिवृद्धि का परिचय अपने को और दूसरों को भली प्रकार मिल सकेगा। शरीर में रक्त-माँस बढ़ने का प्रमाण, परिचय अपने को और दूसरों को आसानी से लग जाता है, फिर कोई कारण नहीं कि अन्तरंग में अध्यात्म की अभिवृद्धि से जीवन-क्रम में उत्पन्न हुई दिव्यता का प्रमाण परिचय न मिले। सच्चे उपासक की जीवन सुगंधि हर दिशा को सुवासित करती है।
उपासना के साथ जीवन को उत्कृष्ट बनाने की साधना भी करे। इसके लिये भी एक क्रम विधान है, उसे अगले लेखों में प्रस्तुत किया जा रहा है।
उपासना- आत्मिक प्रगति के लिए एक अति आवश्यक एवं अनिवार्य माध्यम है। जीवन-शोधन की साधना के साथ चलता हुआ उपासना क्रम आशाजनक परिणाम प्रस्तुत करता है, उससे जीवनोद्देश्य की प्राप्ति में भारी सफलता मिलती है। इसलिए तत्त्वदर्शी आत्म-वेत्ताओं ने उपासना को जीवन का एक अनिवार्य नित्य धर्म माना है। जो इस संदर्भ में उपेक्षा बरतते हैं, आलस्य, प्रमाद करते हैं, उनकी कटु-भर्त्सना शास्त्रकारों ने की है।
उपासना निष्फल नहीं जाती। वह भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति में निःसंदेह आश्चर्यजनक रीति से सफल होती है।
उपासना के भी अध्यात्म प्रयोजन की पूर्ति हो सकती है।
उपासना की सफलता के लिये हमें अपनी मनोभूमि को श्रद्धासिक्त करना होगा। ईश्वर के अस्तित्व, उसके स्वभाव और कर्तृत्व पर वैसा ही विश्वास करना होगा जैसा कि हम उसके ऊपर अथवा अपने साधन, सहचरों पर करते हैं। भावनापूर्ण उपासना अपना प्रतिफल उत्पन्न किये बिना नहीं रहती, इस तथ्य पर भी हमारी परिपूर्ण मान्यता होनी चाहिये। और प्रयत्न यह किया जाना चाहिये कि अपने भावना-स्तर उपासना को प्रखर बनाने के अनुकूल बनता और बढ़ता चला जाय। अपने आपका निर्माण ही सबसे बड़ा और सबसे झंझट का काम है।
उपासना को उपेक्षापूर्वक त्यागते रहते हैं?
उपासना पद्धति चाहिए ही। यह माँग और आवश्यकता ऐसी है, जिसकी पूर्ति की जानी चाहिए। अतएव यह अंक उसी समाधान के लिए लिखा जा रहा है।
उपासना तो वह है जिसमें जीव अपना समस्त मोह कलेवर, अहंता परिवार- ईश्वर को समर्पण करता है और ईश्वर उसे उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता के प्रकाश से पूर्णतया प्रकाशवान कर देता है।
उपासना के प्रति उपेक्षा। सृष्टि के संविधान में क्षमा के लिए गुंजाइश नहीं। हर किसी को अपने कर्मों का प्रतिफल भोगना पड़ता है। उपासना की उपेक्षा को चाहे भूल कहा जाय, चाहें उद्दंडता, उसका दंड हमें एक ऐसे भारी आत्मिक अभाव के रूप में भुगतान पड़ता है, जिसके कारण जीवन में न रस रह जाता है और न आनन्द। उत्कृष्टता की सरलता की अनुभूति ही वह अमृत है, जिसे पीकर आत्मा तृप्ति का अनुभव करती है और जिसका रसास्वादन करने के लिए वह बार-बार जन्म-मृत्यु का कष्ट सह कर भी, मानव शरीर धारण करने के लिए लालायित रहती है।
उपासना पूर्ण हो गई। कर्मकांड पूजा का एक महत्वपूर्ण अंग तो है पर उतने मात्र से उसमें पूर्णता नहीं आ सकती। उपासना के हर कर्मकांड के साथ आवश्यक भावनाओं का समन्वय रहे तभी उनमें प्रखरता आयेगी।
उपासना परम प्रेरक और प्रकाशपूर्ण बन सकती है। तब हमें ईश्वर को अपने समीप और भीतर, बाहर ओत-प्रोत अनुभव करने के साथ-साथ अपनी विचार पद्धति और कर्म-पद्धति को सुधारना भी अनिवार्य रूप से आवश्यक प्रतीत होगा। हम कोई ऐसा विचार और कार्य न करें जो ईश्वर को अप्रिय हो, उसे रुष्ट करे। साधारण पुलिस दरोगा या सरकारी अफसर की उपस्थिति में कुख्यात चोर, उठाईगीरे भी अपनी हर बात पकड़े जाने के भय से मुँह बन्द रखते हैं फिर जो सर्वत्र ईश्वर में समाया हुआ निष्पक्ष न्यायकारी अनुभव करेगा वह उसके दंड भय से, रोष और कोप से सदा डरेगा और कोई दुर्भाव एवं दुष्कर्म करने को तैयार न होगा।
उपासना के संबंध में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उसमें केवल पूजापरक कर्मकाण्ड ही काफी नहीं वरन् साथ में भावनात्मक समावेश भी होना चाहिए। ज्यों-त्यों कुछ पूजा-पत्री कर देने, थोड़ा जप कर लेने या कुछ पाठ कर लेने मात्र से काम नहीं चलेगा। आमतौर से लोग इतना ही करते हैं और समझ लेते हैं कि उनकी उपासना पूर्ण हो गई। कर्मकांड पूजा का एक महत्वपूर्ण अंग तो है पर उतने मात्र से उसमें पूर्णता नहीं आ सकती। उपासना के हर कर्मकांड के साथ आवश्यक भावनाओं का समन्वय रहे तभी उनमें प्रखरता आयेगी।
उपासना जैसी प्रक्रिया अपना कर सम्पन्न नहीं किया जा सकता। हर घड़ी आत्म-निरीक्षण की दृष्टि अपने ऊपर रखने से ही यह प्रयोजन सिद्ध होता है। साधना के प्रथम चरण में अपने शरीर और मन पर- कार्य और विचारों पर बारीकी से तीखी नजर रख कर यह देखना होता है कि मनुष्यता के गौरव को गिराने वाले- पशु-स्तर के- कुसंस्कार अपने में कितने समाये हुए हैं? गुण, कर्म, स्वभाव में किन पशु प्रवृत्तियों का समावेश है? उन्हें धीरे-धीरे, एक-एक करके छोड़ने का संकल्प करना चाहिये।
उपासना का क्रम हर सद्गृहस्थ को अपने यहाँ चलाना चाहिये। स्वयं तो नियमित उपासना करनी चाहिये। प्रयत्न यह भी करना चाहिये कि परिवार के दूसरे लोग भी- दस-पांच मिनट वहाँ बैठ कर थोड़ी-बहुत उपासना अवश्य कर लिया करें। घर में आस्तिकता का- भक्ति भावना का वातावरण रहना परिवार की भावनात्मक समृद्धि और आत्मिक शुद्धि के लिए अति आवश्यक है।
उपासना में ईश्वर से साँसारिक लाभ अथवा आत्मिक अनुदान माँगे जाते हैं, पर जैसे-जैसे स्तर ऊंचा होता जाता है, साधक माँगने की तुच्छता छोड़ समर्पण की महानता अपनाने के लिए व्याकुल होता है। ध्यान अथवा भावना तक ही उसकी साधना सीमित नहीं रहती वरन् वस्तुतः वह विश्व के लिये, लोक-मंगल के लिये बड़े-से-बड़ा अनुदान देकर अपनी गणना बड़े से बड़े भक्तों में कराने का आत्म-संतोष उपलब्ध करता है। उसका व्यवहार अपने जीवन परिवार एवं समाज के प्रति इतना सज्जनतापूर्ण हो जाता है कि प्रतिक्रिया उसे दैवी वरदान की तरह चारों ओर से पुष्प वर्षा करती हुई परिलक्षित होती है। स्वर्ग सुख यही तो है। अहंता और मनता, वासना और तृष्णा के बन्धनों से मुक्त जीव को मरने पर मुक्ति मिलने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती है वह जीवित रहते हुए भी जीवन-मुक्त होता है।
उपासना, उसकी नित्य परिणिति के पीछे श्रद्धा ही प्रधान आधार है। मस्तिष्कीय तर्क पदार्थ विज्ञान का अभी इतना विकास नहीं हुआ कि सूक्ष्म जगत और उसकी दिव्य संवेदनाओं को लैबोरेटरी में प्रत्यक्ष करके देखा जा सके। आत्मा हमारी अनोखी प्रयोगशाला है, उसकी अनुभूतियाँ किसी भौतिक प्रत्यक्षीकरण से कम महत्व की नहीं। सुख और दुःख की, प्रेम और घृणा की अनुभूतियों की वास्तविकता एवं स्थिति विज्ञान की प्रयोगशाला में सिद्ध नहीं की जा सकती है, तो क्या यह कहा जाय कि सुख दुःख अथवा प्रेम-घृणा जैसी कोई वस्तु इस संसार में नहीं है? अध्यात्म का आधार तर्क या प्रयोगशाला नहीं- आत्मा की अनुभूति है।
उपासना काल में प्रयत्न यह किया जाना चाहिए कि पूजा में प्रयुक्त होने वाला पदार्थ- हर क्रिया-कलाप हर विधान हमारे अन्तःकरण पर ईश्वर की समीपता एवं मधुर मिलन की संवेदना अनुभूति आच्छादित करने में सहायक हो। जैसे कोई सजीव प्रियजन पास में बैठा हो और उसे सचमुच ही उन क्रिया-कृत्यों से दुलारा जा रहा हो यदि ऐसी मान्यता और भावना बन सकी तो समझना चाहिए कि उपासना का मूल प्रयोजन पूरा होने लगा। ईश्वर कहीं बहुत दूर रहता है, उसे पाने या बुलवाने की अभी अपनी सामर्थ्य कहां? ऐसी निराशात्मक एवं अविश्वास मूलक भावना उपासना का प्रयोजन ही नष्ट कर देती है। मान्यता यह होनी चाहिये कि प्रस्तुत प्रतीक या प्रतिमा सचमुच साक्षात ईश्वर है, वह एक सजीव व्यक्ति की तरह सामने प्रस्तुत है, और जो कुछ किया या कहा जा रहा है उसे वह पूरी तन्मयता और रुचिपूर्वक सुन समझ अथवा ग्रहण कर रहा है।
उपासना क्षेत्र में नर-नारी को एक समान अधिकार है। ईश्वर के लिए पुत्र-पुत्री दोनों समान हैं। यह भेदभाव तो संकीर्ण बुद्धि का अभागा मनुष्य ही करता रहता है।
उपासना क्रम हुआ। वर्ष में दो बार विशेष तपश्चर्यायें करनी चाहिये। आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों के 9-9 दिन विशिष्ट साधना के लिए अति उपयुक्त हैं। जिस प्रकार दिन और रात्रि के मिलन अवसर को संध्याकाल कहते हैं और प्रातः साँय के संध्याकाल में उपासना करना महत्वपूर्ण मानते हैं, उसी प्रकार शीत और ग्रीष्म ऋतुओं के मिलन की यह ऋतु संध्या 9-9 दिन के लिए- नवरात्रि के रूप में- वर्ष में दो-बार आया करती हैं। शरीर और मन के विकारों का निष्कासन- परिशोधन इस अवसर पर बड़ी आसानी से हो सकता है।
उपासना है। उपासना मानव जीवन का महानतम संबल है। उसे परम पुरुषार्थ कहा जाता है। संसार में जितनी भी विभूतियाँ सफलताएं और उपलब्धियाँ हो सकती है, उन सब में बड़ी यह है कि हम ईश्वर से परिचित मात्र न रह कर उसके साथ दोस्ती का रिश्ता जोड़ लें और उस समस्त वैभव के उत्तराधिकारी बन जांय जो उसके पास है। इसके बढ़ कर और कोई उपलब्धि इस जीवन में हो ही नहीं सकती।
उपासना हमारे जीवन की सबसे अधिक उल्लास और उत्साह भरी भूमिका हो सकती है।
उपासना का अधिकार प्राप्त करने के लिये उपासक को जीवन-शोधन की प्रक्रिया तुरन्त आरंभ करनी चाहिये। मलीनताओं को हटाना चाहिये और उत्कृष्टताओं को जीवन-क्रम में समाविष्ट करना चाहिये। यह स्थिति जितनी-जितनी स्पष्ट होती जाती है, उतना ही उतना साहस ईश्वर से मित्रता करने को बढ़ता जाता है। डरता, झिझकता, लज्जा, भय और संकोच में डूबा- हेय और घृणित बना प्राणी इतनी ऊंची हस्ती के साथ जी खोल कर प्रेम करने का साहस नहीं कर पाता। साहस तब होता है, तब जी साफ हो।
उपासना पद्धति होती है, जिसमें महत्तम गायत्री महापुरश्चरण की भागीदारी जुड़ी हुई है।
उपासना क्रम एक माला जप इसी प्रयोजन के लिए- विश्व-कल्याण लिए रखा गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-June
उपासना कोई वाँछित फलदायिनी नहीं होती। जैसे-जैसे मनुष्य स्वार्थ छोड़ता और परमार्थ अपनाता चलता है, वैसे-वैसे उसका मानसिक स्तर ऊँचा होता जाता है और उसमें सेवा तथा संयम के सक्रिय संकल्प बलवत्तर होने लगते हैं। उसकी वृत्ति संचय से विमुख होकर त्याग की ओर उन्मुख हो उठती है और यह सोचने के स्थान पर कि हमारी वासनायें कैसे पूरी हों यह सोचने लगता है कि वह कौन-सा कार्यक्रम तथा विचार-धारा अपनाई जाये, जिससे व्यक्तिगत इच्छायें, सार्वजनिक आवश्यकताओं में तिरोहित हो जावें। ऐसी स्थिति में आकर मनुष्य की आत्मा प्रकाशित हो उठती है और वह मनुष्यता से देवत्व की ओर उठकर, ईश्वरीय भण्डार में से मनोवाँछित उपहारों का अधिकारी बन जाता है।
उपासना, अनुष्ठान-विधि, गायत्री संबंधी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगाये जाने वाले बीज-मन्त्रों का साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना-विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3.50
उपासना-विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3.50
उपासना में संलग्न व्यक्ति में दिख पड़ती है। प्रगति का आधार मनुष्य का विकसित व्यक्तित्व ही है। देवता किसी की भौतिक सहायता नहीं करते, वे व्यक्ति के व्यक्तित्व में कुछ वैसे सुधार कर देते हैं, जिससे वह सफलता पर सफलता प्राप्त करता हुआ, अभीष्ट प्रयोजन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ता चला जाता है। गायत्री की उपासना वस्तुतः प्राण-शक्ति की ही उपासना है। जिसे जितना प्राण बल उपलब्ध हो गया समझना चाहिये, उसकी उपासना उतने ही अंशों में सफल हो गई।
उपासना, जीवन-निर्माण, परिवार-निर्माण और समाजोत्थान का कार्य बिना किसी पथ-प्रदर्शन के भी कर सकते हैं। इन पुस्तकों से सैकड़ों हजारों लोगों ने लाभ उठाया है- अन्धकार में प्रकाश पाया है।
उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता। (128) हम ईश्वर से विमुख न हों। (129) गृहस्थ एक योग साधना। (130) आत्मा की पुकार अनसुनी न करें। (131) हम सशक्त और साहसी बनें।
उपासना करने वाले को स्वर्ग-सुख प्राप्त होता है और उसकी कुल परम्परा से वीर जन उत्पन्न होते हैं।
उपासना उतने ही अंशों में सफल हो गई।
उपासना करते हैं। प्राण ही सूर्य है, चन्द्रमा है और वही प्रजापति है।
उपासना को ब्रह्म विद्या के नाम से उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रन्थों तथा आरण्यकों में वर्णन किया गया है। ब्रह्म की चर्चा, विवेचना एवं स्तुति प्राण के रूप में भी की गई है।
उपासना करनी चाहिये।
उपासना से साधक में विकसित रूप से प्राण-शक्ति बढ़ती चली जाती है, उससे उसके व्यक्तित्व में कई प्रकार के सुधार, परिवर्तन होते हैं, कई तरह के आकर्षण बढ़ते हैं, फलस्वरूप कठिनाइयों के अवरोध कार्य में से हटते हैं और सफलताओं का पथ-प्रशस्त होता है।
उपासना यदि ठीक प्रकार की जाय तो उपासक में प्राण-शक्ति की अभिवृद्धि शीघ्र ही होने लगती है और वह उस अभिवर्धन के आधार पर कई तरह की सफलतायें प्राप्त करने लगता है। कहने वाले इसे गायत्री माता का अनुग्रह आशीर्वाद कहा करें पर वस्तुतः होता यह है कि उस उपासना से साधक में विकसित रूप से प्राण-शक्ति बढ़ती चली जाती है, उससे उसके व्यक्तित्व में कई प्रकार के सुधार, परिवर्तन होते हैं, कई तरह के आकर्षण बढ़ते हैं, फलस्वरूप कठिनाइयों के अवरोध कार्य में से हटते हैं और सफलताओं का पथ-प्रशस्त होता है।
उपासना है। जिसे जितना प्राण बल उपलब्ध हो गया समझना चाहिये, उसकी उपासना उतने ही अंशों में सफल हो गई।
उपासना वस्तुतः प्राण-शक्ति की ही उपासना है। जिसे जितना प्राण बल उपलब्ध हो गया समझना चाहिये, उसकी उपासना उतने ही अंशों में सफल हो गई।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-July
उपासना करिये। उन्हीं का विकास और अनुसरण करिये और उसी रूप में उसे पाने का प्रयत्न करिये। ईश्वर को पाने का यह सबसे सही, सरल और सुन्दर मार्ग है।
उपासना करने का लाभ अब तक लाखों व्यक्ति उठा चुके हैं। यहाँ के वायु मंडल में वह संस्कार हैं, जिनके कारण साधक की आत्मा सहज ही खिल पड़ती है और वह आनन्द मिलता है, जो घर या अन्य स्थान पर सम्भव नहीं। यही कारण है कि जब भी अवसर मिलता है, निष्ठावान उपासक अपनी साधना करने के लिए यहाँ दौड़े आते हैं। विशेष अवसरों पर होते रहने वाले शिविरों के इसके अतिरिक्त लाभ भी हैं। इन दिनों दोनों समय डेढ़-डेढ़ घण्टे के दो प्रवचन गायत्री महाशक्ति का रहस्य, विवेचन, दर्शन, तत्वज्ञान, अभ्यास, कर्मकाण्ड, अनुभव आदि समझाने के लिए उस व्यक्ति के होते रहते हैं, जो इस मार्ग पर काफी दूरी तक सारे जीवन भर चलता रहा है और जिसने ज्ञान एवं अभ्यास की दृष्टि से कुछ कहने लायक मर्म एकत्रित किये हैं।
उपासना सद्गुणों के प्रकटीकरण से होती है, शारीरिक अथवा वाचिक सेवा साधना से नहीं।
उपासना करने के लिए समय कहाँ?
उपासना निश्चित रूप से अधिक सफल एवं प्रभावी परिणाम उत्पन्न करने वाली सिद्ध होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-August
उपासना का परिणाम आत्मानन्द और आत्म-सन्तोष है। उपासना करने से इन्हीं की उपलब्धि होगी। भौतिक विभूति और आर्थिक उपलब्धियों के लिए पुरुषार्थ और परिश्रम का नियम निश्चित है। जो इस नियम का उल्लंघन करते हैं या करेंगे, उन्हें विपन्न रहना ही पड़ेगा। परमात्मा ने जब साधन, शंकित, उपाय एवं बुद्धि की व्यवस्था करके भौतिक उपलब्धियों का मार्ग प्रशस्त कर दिया तब क्या कारण है कि लोग उससे उपासना के पुरस्कार रूप धन-दौलत और सुख-सुविधा चाहते हैं।
उपासना के माध्यम के परमात्मा के समीप रहने पर आत्मा में आनन्द का सागर न लहराने लगे यह सम्भव नहीं।
उपासना द्वारा अनायास और अनाधारित रूप से आनन्दित हो सकता है, तब अनावश्यक आडम्बरों का बोझ अपने शिर पर रखना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। जिस प्यास को मिटाने के लिये जिस उपाय से अमृत-सागर की उपलब्धि हो सकती है, उसी उपाय के आधार पर तालाब के दो चिल्लू पानी की आशा करना आंतरिक हीनता के सिवाय और कुछ भी नहीं है।
उपासना करते हुए भी जो विपन्न और दुःखी रहते हैं, वे सच्चे उपासक नहीं। प्रभु के पास उनका गमन ठीक वैसा ही होता है, जैसे कि कोई बच्चा मन्दिर की प्रार्थना में प्रसाद के लालच से शामिल होने जाता है। ऐसे लालची लोग उपासना का वह आनन्द नहीं पा सकते, जो भक्ति रस में डूबे हुए भावों के साथ प्रभु को आत्म-समर्पण करने वाले उपासकों को मिलता है। प्रभु के चरणों में अपनी अन्तरात्मा को निष्काम-भाव से अर्पण करने वाले भक्ति-विभोर और प्रसाद की मिठाई लेने के उद्देश्य से उपस्थित लोभी में जो अन्तर होता है, वही अन्तर सच्चे तथा वंचक उपासक में होता है।
उपासना का परिणाम तो संतोष, शाँति, प्रफुल्लता, आशा, विश्वास तथा आनन्द ही होता है। तब उसको धारण करने वाले को विपन्नता और दुख किस प्रकार हो सकता है? मनुष्य वृक्ष की घनी छाया में बैठे और उसका आतप-ताप दूर न हो, फूलों से भरी वाटिका में बिहार करे और उसका तन-मन न महक उठे, ऐसा किस प्रकार सम्भव हो सकता है? उपासना के माध्यम के परमात्मा के समीप रहने पर आत्मा में आनन्द का सागर न लहराने लगे यह सम्भव नहीं।
उपासना का प्रतिफल पाने के लिए प्रतीक्षा तो उन्हें करनी पड़ती है, जो दीन-हीन भिक्षुक के समान उसके सामने उन वस्तुओं के लिये रिरियाते रहते हैं, जिनको वह शक्ति, विवेक, उपाय तथा अवसरों के रूप में पहले ही दे चुका है। केवल इन विशेषताओं का प्रयोग ही मनुष्य का काम रह जाता है। जिसने हल, बैल, जल, भूमि और शक्ति रखी है, उससे अब यह आशा करना ही वह खेती भी करे और उससे उत्पन्न फसल उसको दे दे तो एक दुराशा ही नहीं अनाधिकार चेष्टा है, जोकि किसी दशा और किसी मूल्य पर भी स्वीकार नहीं की जा सकती।
उपासना करने वाले लोग विपन्न तथा दुखी बने रहते हैं।”
उपासना द्वारा आत्मानन्द की उपलब्धि हो जाने पर जब किसी सुख की प्राप्ति शेष ही न रह जायेगी, तब धन-दौलत अथवा वैभव भण्डारों की क्या तो महत्ता रह जायेगी और क्या प्रपोज? उद्देश्य जीवन को सुखी बनाना है और जब वह उपासना द्वारा अनायास और अनाधारित रूप से आनन्दित हो सकता है, तब अनावश्यक आडम्बरों का बोझ अपने शिर पर रखना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। जिस प्यास को मिटाने के लिये जिस उपाय से अमृत-सागर की उपलब्धि हो सकती है, उसी उपाय के आधार पर तालाब के दो चिल्लू पानी की आशा करना आंतरिक हीनता के सिवाय और कुछ भी नहीं है।
उपासना के पीछे निहित लक्ष्य भौतिक विभूतियों बाह्य उपलब्धियों तथा आर्थिक उन्नतियों का नहीं बल्कि आत्मिक, शाँति, संतोष तथा आनन्द का ही होना चाहिये। यही अनुकूलता एवं अनुरूपता है। ऐसा सच्चा और अनुकूल उपासक जब परमात्मा की समीपता में आता है तो उसमें दैवी श्रेष्ठताओं की अभिवृद्धि होती है। परमात्मा समस्त श्रेष्ठताओं का उद्गम है, उसका समीप्य आत्मा में अनुदिन श्रेष्ठताओं को ही स्थानांतरित करता चलता है। पर निन्दा, ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, लालच आदि के अदैवी दोष उससे दूर होते जाते हैं और शीघ्र ही वह प्रभात कालीन समुद्री वायु की तरह निर्विकार तथा निरुद्विग्न होकर आनन्द में स्थित हो जाता है।
उपासना में निरत होते हैं। पर सोचने की बात है कि जब निर्लोभ उपासना के आधार पर अहेतुक, अविनश्वर, अक्षय और अनन्त आनन्द की उपलब्धि हो सकती है, तब निकृष्ट सुख को लक्ष्य बना कर उपासना करने में कौन-सा विवेक अथवा दूर दृष्टि है? निर्विकार उपासना द्वारा आत्मानन्द की उपलब्धि हो जाने पर जब किसी सुख की प्राप्ति शेष ही न रह जायेगी, तब धन-दौलत अथवा वैभव भण्डारों की क्या तो महत्ता रह जायेगी और क्या प्रपोज? उद्देश्य जीवन को सुखी बनाना है और जब वह उपासना द्वारा अनायास और अनाधारित रूप से आनन्दित हो सकता है, तब अनावश्यक आडम्बरों का बोझ अपने शिर पर रखना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। जिस प्यास को मिटाने के लिये जिस उपाय से अमृत-सागर की उपलब्धि हो सकती है, उसी उपाय के आधार पर तालाब के दो चिल्लू पानी की आशा करना आंतरिक हीनता के सिवाय और कुछ भी नहीं है।
उपासना से कामनाओं का कलुष मिटता है, जिससे मनुष्य के हृदय से याचकता का दोष निकल जाता है। उपासना से वासनाओं का शमन होता है, जिससे आन्तरिक शाँति की वृद्धि होती है। उपासना से तृष्णा का ताप नष्ट होता है, जिससे शाँति और सन्तोष की प्राप्ति होती है। उपासना से चिन्ता, भय, घृणा, अशाँति, दुष्टता तथा द्वेष के दोष मिटते हैं। आत्मा में प्रकाश तथा आनन्द की समाविष्टि होती है।
उपासना स्वार्थ से नहीं प्रेम से प्रेरित होकर की जानी चाहिये। उपासना के पीछे निहित लक्ष्य भौतिक विभूतियों बाह्य उपलब्धियों तथा आर्थिक उन्नतियों का नहीं बल्कि आत्मिक, शाँति, संतोष तथा आनन्द का ही होना चाहिये। यही अनुकूलता एवं अनुरूपता है। ऐसा सच्चा और अनुकूल उपासक जब परमात्मा की समीपता में आता है तो उसमें दैवी श्रेष्ठताओं की अभिवृद्धि होती है। परमात्मा समस्त श्रेष्ठताओं का उद्गम है, उसका समीप्य आत्मा में अनुदिन श्रेष्ठताओं को ही स्थानांतरित करता चलता है।
उपासना का वह आनन्द नहीं पा सकते, जो भक्ति रस में डूबे हुए भावों के साथ प्रभु को आत्म-समर्पण करने वाले उपासकों को मिलता है। प्रभु के चरणों में अपनी अन्तरात्मा को निष्काम-भाव से अर्पण करने वाले भक्ति-विभोर और प्रसाद की मिठाई लेने के उद्देश्य से उपस्थित लोभी में जो अन्तर होता है, वही अन्तर सच्चे तथा वंचक उपासक में होता है।
उपासना के आधार पर अहेतुक, अविनश्वर, अक्षय और अनन्त आनन्द की उपलब्धि हो सकती है, तब निकृष्ट सुख को लक्ष्य बना कर उपासना करने में कौन-सा विवेक अथवा दूर दृष्टि है? निर्विकार उपासना द्वारा आत्मानन्द की उपलब्धि हो जाने पर जब किसी सुख की प्राप्ति शेष ही न रह जायेगी, तब धन-दौलत अथवा वैभव भण्डारों की क्या तो महत्ता रह जायेगी और क्या प्रपोज? उद्देश्य जीवन को सुखी बनाना है और जब वह उपासना द्वारा अनायास और अनाधारित रूप से आनन्दित हो सकता है, तब अनावश्यक आडम्बरों का बोझ अपने शिर पर रखना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। जिस प्यास को मिटाने के लिये जिस उपाय से अमृत-सागर की उपलब्धि हो सकती है, उसी उपाय के आधार पर तालाब के दो चिल्लू पानी की आशा करना आंतरिक हीनता के सिवाय और कुछ भी नहीं है।
उपासना से वासनाओं का शमन होता है, जिससे आन्तरिक शाँति की वृद्धि होती है। उपासना से तृष्णा का ताप नष्ट होता है, जिससे शाँति और सन्तोष की प्राप्ति होती है। उपासना से चिन्ता, भय, घृणा, अशाँति, दुष्टता तथा द्वेष के दोष मिटते हैं। आत्मा में प्रकाश तथा आनन्द की समाविष्टि होती है। न कि उससे धन-दौलत और सम्पदाओं की उपलब्धि होती है।
उपासना कीजिये और भौतिक विभूतियों के लिये पुरुषार्थ। इन दोनों का संतुलन बनाये रखने वाला भीतर-बाहर दोनों ओर सुखी, शाँत, सम्पन्न और सन्तुष्ट बन कर लोक, परलोक के सारे पदार्थ पा जाते हैं।
उपासना के पुरुषार्थी निराधार रूप से देवताओं जैसे सुखी और सम्पन्न बने रहते हैं। उनकी कामनायें, तृष्णायें और वासनायें मिट जाती हैं और उनका जीवन मानसरोवर की तरह निर्मल, शाँत, शीतल और प्रसन्न हो जाता है।
उपासना करने वाले सदा-सर्वदा ही दरिद्र बने रहते हैं। जबकि अवंचक उपासना के पुरुषार्थी निराधार रूप से देवताओं जैसे सुखी और सम्पन्न बने रहते हैं। उनकी कामनायें, तृष्णायें और वासनायें मिट जाती हैं और उनका जीवन मानसरोवर की तरह निर्मल, शाँत, शीतल और प्रसन्न हो जाता है।
उपासना ही हमारी परम्परा पुरखों से चली आ रही है।”
उपासना के पुरस्कार रूप धन-दौलत और सुख-सुविधा चाहते हैं। यह अनाधिकार चेष्टा है, जिसको स्वीकार नहीं किया जा सकता।
उपासना से तृष्णा का ताप नष्ट होता है, जिससे शाँति और सन्तोष की प्राप्ति होती है। उपासना से चिन्ता, भय, घृणा, अशाँति, दुष्टता तथा द्वेष के दोष मिटते हैं। आत्मा में प्रकाश तथा आनन्द की समाविष्टि होती है। न कि उससे धन-दौलत और सम्पदाओं की उपलब्धि होती है।
उपासना करना समीचीन तथा न्यायसंगत है। जल से आग और आग से जल की आशा करना न केवल असंगत ही है बल्कि अन्यायपूर्ण मूर्खता है। उपासना से कामनाओं का कलुष मिटता है, जिससे मनुष्य के हृदय से याचकता का दोष निकल जाता है। उपासना से वासनाओं का शमन होता है, जिससे आन्तरिक शाँति की वृद्धि होती है। उपासना से तृष्णा का ताप नष्ट होता है, जिससे शाँति और सन्तोष की प्राप्ति होती है।
उपासना के मूल्यरूप धन-दौलत और सुख-साधन का हेतु परमात्मा का वरदान उस पर बरसने वाला ही है, जिसके परिणामस्वरूप उसके लिए उन्नति, विकास तथा वैभव का द्वार स्वयं खुल जायेगा और वह बैठे बैठाये मुफ्त में ही मालामाल होकर सर्व सुख सम्पन्न हो जायेगा।
उपासना करने वाले लोग बहुधा विपन्न ओर दुखी ही रहा करते हैं।”
उपासना करना, सर्व-मैत्री, सबसे प्रेम की भावना रखना यह बातें सबके लिये संतोषदायक, हितकर और आनन्ददायी है। इन्हें स्वीकार करने में कभी किसी भी मनुष्य को आपत्ति नहीं हो सकती। इन्हीं का नाम- धर्म-जीवन। जब ऐसे मानव जीवन का प्रवर्तन होगा, तभी सच्ची सुख-शाँति के दर्शन उपलब्ध होंगे।
उपासना के उसी फल को चाहता है, जो उसके साथ नियत है और दूसरा वह कुछ चाहता है, जिसकी निर्यात किन्हीं अन्य साधनों तथा उपायों से है। ऐसे ना-समझ और नियति विरोधियों की ओर वह परम दयालु परमात्मा भी कुछ अधिक ध्यान नहीं दे पाता। निदान वे विपन्न तथा दुखी बने रहते हैं।
उपासना से चिन्ता, भय, घृणा, अशाँति, दुष्टता तथा द्वेष के दोष मिटते हैं। आत्मा में प्रकाश तथा आनन्द की समाविष्टि होती है। न कि उससे धन-दौलत और सम्पदाओं की उपलब्धि होती है।
उपासना करने से इन्हीं की उपलब्धि होगी। भौतिक विभूति और आर्थिक उपलब्धियों के लिए पुरुषार्थ और परिश्रम का नियम निश्चित है। जो इस नियम का उल्लंघन करते हैं या करेंगे, उन्हें विपन्न रहना ही पड़ेगा। परमात्मा ने जब साधन, शंकित, उपाय एवं बुद्धि की व्यवस्था करके भौतिक उपलब्धियों का मार्ग प्रशस्त कर दिया तब क्या कारण है कि लोग उससे उपासना के पुरस्कार रूप धन-दौलत और सुख-सुविधा चाहते हैं। यह अनाधिकार चेष्टा है, जिसको स्वीकार नहीं किया जा सकता।
उपासना के प्रतिफलों में जोड़ना क्षीर में क्षार मिलाने के समान असंगत है। इससे सारा रस और सारा उद्देश्य भंग हो जाता है। केवल निष्फलता और निराशा ही हाथ लगती है। आत्म प्रसन्नता के लिये उपासना कीजिये और भौतिक विभूतियों के लिये पुरुषार्थ। इन दोनों का संतुलन बनाये रखने वाला भीतर-बाहर दोनों ओर सुखी, शाँत, सम्पन्न और सन्तुष्ट बन कर लोक, परलोक के सारे पदार्थ पा जाते हैं।
उपासना जीवन की सर्वोपरि बुद्धिमता है। किन्तु तब जब वह निर्लोभ और निर्विकार रूप से की जाये। धन-दौलत और भौतिक सुख-साधन पुरुषार्थ और परिश्रम के प्रतिफल हैं। इनको उपासना के प्रतिफलों में जोड़ना क्षीर में क्षार मिलाने के समान असंगत है। इससे सारा रस और सारा उद्देश्य भंग हो जाता है।
उपासना से विकसित होती है और अन्त में जीवन को महान बना देती है, इसलिये यह भाव भी निर्मूल नहीं।
उपासना का जो प्रतिफल नियत है, उसकी इच्छा के साथ उपासना करना समीचीन तथा न्यायसंगत है। जल से आग और आग से जल की आशा करना न केवल असंगत ही है बल्कि अन्यायपूर्ण मूर्खता है। उपासना से कामनाओं का कलुष मिटता है, जिससे मनुष्य के हृदय से याचकता का दोष निकल जाता है। उपासना से वासनाओं का शमन होता है, जिससे आन्तरिक शाँति की वृद्धि होती है। उपासना से तृष्णा का ताप नष्ट होता है, जिससे शाँति और सन्तोष की प्राप्ति होती है।
उपासना करने में कौन-सा विवेक अथवा दूर दृष्टि है? निर्विकार उपासना द्वारा आत्मानन्द की उपलब्धि हो जाने पर जब किसी सुख की प्राप्ति शेष ही न रह जायेगी, तब धन-दौलत अथवा वैभव भण्डारों की क्या तो महत्ता रह जायेगी और क्या प्रपोज? उद्देश्य जीवन को सुखी बनाना है और जब वह उपासना द्वारा अनायास और अनाधारित रूप से आनन्दित हो सकता है, तब अनावश्यक आडम्बरों का बोझ अपने शिर पर रखना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। जिस प्यास को मिटाने के लिये जिस उपाय से अमृत-सागर की उपलब्धि हो सकती है, उसी उपाय के आधार पर तालाब के दो चिल्लू पानी की आशा करना आंतरिक हीनता के सिवाय और कुछ भी नहीं है।
उपासना की इतनी बड़ी उपलब्धि छोड़ कर जो व्यक्ति उसके अन्धकार पर नश्वरता एवं निस्सारता से दूषित बाह्य एवं भौतिक संपत्तियों की कामना करते हैं, अवश्य ही उनकी बुद्धि पर तरस खाने को जी चाहता है।
उपासना और आत्म-शाँति एक ही बात के दो पक्ष हैं। आत्मा जब अपनी आदि एवं उद्गम सत्ता की ओर उन्मुख होगी तो निश्चय ही आत्म-लोक और आनन्द की प्राप्ति होगी। आत्मा पर परमात्मा का प्रकाश पड़ते ही उसमें सत्-चित् आनन्द के रूप में उसका प्रतिबिम्ब प्रतिफलित हो उठेगा, जिससे साधारण मनुष्य भी परमात्मस्वरूप होकर नर से नारायण और अंश से अंशी बन जाता है। उपासना की इतनी बड़ी उपलब्धि छोड़ कर जो व्यक्ति उसके अन्धकार पर नश्वरता एवं निस्सारता से दूषित बाह्य एवं भौतिक संपत्तियों की कामना करते हैं, अवश्य ही उनकी बुद्धि पर तरस खाने को जी चाहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-September
उपासना के समय के अतिरिक्त भी श्वास के साथ हर पल गायत्री महामंत्र के जप में साधक को संलग्न रहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-July
उपासना, देवदर्शन यह सब शाँति एवं आनंद प्राप्त करने के लिए ही तो किया जाता है, किंतु जब तक मन में अन्यान्य भाव एवं ध्वनियाँ भरी होंगी, तब तक शाँति एवं आनंद प्राप्त करना कैसे संभव हो सकेगा?
उपासना करने पर परम सत्य का भान होता है। परम सत्य ही कुरान का खुदा है।
उपासना के समय के अतिरिक्त प्रतिदिन बारह घंटे इस ज्ञानयज्ञ में ही लगाए हैं। विगत 43 वर्षों से हो रही हमारी ज्ञान साधना, जिसमें हमारी दूनी रुचि रही है और दूना श्रम करते रहे हैं, कम ही लोगों की जानकारी में हैं।” (पृष्ठ 57,58)
उपासना में घंटा-नाद की प्रथा है। घंटा-नाद की प्रथा है। घंटा मंगल ध्वनि का प्रतीक है। घंटे के स्वर वातावरण में पवित्रता का भाव भरते हैं। मन में आध्यात्मिकता के भाव जगाते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-August
उपासना करके सिद्धियां प्राप्त करने के निमित्त गंगातट पर चला गया, घर का काम छोड़ दिया और भिक्षा से दिन काटने लगा।
उपासना में षट्कर्म का यह एक अभिन्न अंग है। तीर्थों में देवदर्शन हेतु उपस्थित होने पर वहाँ माथे पर तिलक लगाकर शुभकामना दी जाती है। पर्व-त्यौहारों में, मेहमानों के आगमन पर उन्हें तिलक धारण कराकर उनका स्वागत किया जाता है और मंगलकामना व्यक्त की जाती है। यह सब एक सामान्य और औपचारिक कृत्य जैसा लगते हुए भी इसका महत्व असाधारण है। इसके दार्शनिक और विज्ञानिक पक्षों पर विचार करने से आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।
उपासना में संलग्न रहा, ताकि अशुभ-अदृष्ट का निवारण हो सके। धैर्य और श्रद्धापूर्वक साधना मार्ग पर कुछ दिनों तुम्हें लगा रहना पड़ेगा। तभी कुछ सत्य परिणाम होने की आशा है।
उपासना होती थी। जार्नस्टजर्ना एक स्कैडिनेवियाई हैं। वे अपनी उक्त रचना में लिखते हैं कि सात वारों के स्कैंडिनेवियन नाम उनके भारतीय नामों से बहुत मिलते हैं। इस आधार पर परोक्ष रूप से उन्होंने यही कहना चाहा है कि भारतीयता की स्पष्ट छाप वहाँ अब भी देखी जा सकती है।
उपासना के साथ साधना-आराधना के तत्व भी जोड़कर सच्चे धर्मावलंबी बने।
उपासना क्रम को छह भागों में विभाजित किया गया था, आत्मशोधन के लिए षट्कर्म, प्रतीक पूजा उपचार, सोऽहम्, प्राणयोग, गायत्री जप और ध्यान, खेचरी मुद्रा तथा सूर्यार्घ्य दान। प्रत्येक का महत्व विस्तार से सात पृष्ठ के संपादकीय द्वारा समझाया गया था। एक लाख साधकों द्वारा पूज्यवर ने प्रतिदिन छह करोड़ प्रतिदिन की साधना संपन्न कराई। इनके साथ-साथ सभी से दोनों नवरात्रियाँ संपन्न करने हेतु आग्रह किया। उन्होंने अनुमान लगाया कि यदि न्यूनतम एक हजार भी व्यक्ति निकल आते हैं, तो इस साधना स्वर्ण जयंती वर्ष में चौबीस सौ करोड़ का जप संपन्न होगा।
उपासना के साथ-साथ हर शुभ कार्य से जोड़कर उसे धार्मिक कर्मकाँड का एक अविच्छिन्न अंग बना दिया, ताकि नियमित रूप से उस स्थान के स्पर्श से उसे उद्दीपन मिलता रहे और वहाँ से संबद्ध स्थूल-सूक्ष्म अवयव जागरण की प्रक्रिया से जुड़ सकें। यों तो अतींद्रिय शक्तियों के उन्नयन के लिए साधना विज्ञान में सुनिश्चित विधि-विधान और अभ्यास बताए गए हैं, पर ऐसे कठिन अभ्यास न तो सब के मनोनुकूल होते हैं, न हर एक का सहज रुझान इस ओर होता है। ऐसी स्थिति में क्या मनुष्य को लंबे समय तक पिछड़ी और अविकसित दशा में पड़ा रहने के लिए छोड़ दिया जाए?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-November
उपासना है।
उपासना के नियमों की अवहेलना होती है। बुरा है तो यह कि हमारी माँगी हुई वस्तु ऐसी न हो, जिसमें जगत् के किसी भी प्राणी के लिए अमंगल या अहित की भावना हो। दूसरी बात यह कि मन में ‘प्रभु देंगे कि नहीं देंगे’ ऐसा संशय क्षण मात्र के लिए भी न आए। विश्वास किसी भी स्थिति में शिथिल नहीं होना चाहिए। विश्वास से हमारे अंदर अद्भुत शाँति एवं सहिष्णुता का संचार हो उठेगा।
उपासना के समय परम शुभ भाव रख परमात्मा के साथ एकाकार हो जाने वाला साधक प्रभु को जितना प्रिय है, उतना ही उन्हें वह साधक भी प्रिय है, जो उनसे विश्वासपूर्वक कुछ माँग रहा है। भगवान के लिए यह कदापि संभव नहीं कि पहले का सम्मान करे और दूसरे की उपेक्षा। उनके लिए दोनों ही समान हैं। हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि पहला प्रभु की स्नेहधारा में बहकर अपनी यात्रा समाप्त करके प्रभु के आनंदरस सिंधु में निमग्न होने के लिए तट के अत्यंत समीप पहुँचा हुआ उनका प्रौढ़ पुत्र है और दूसरा उनकी स्नेह भरी गोद में खेलने वाला अबोध शिशु है, जो उनसे मिट्टी का एक खिलौना माँग रहा है।
उपासना का पवित्र आदर्श है। भगवान से कुछ भी माँगना वास्तव में अज्ञानता ही है। हमारे लिए जो भी आवश्यक है, उसे वे बिना माँगे ही आगे से आगे देते रहते हैं और देते रहेंगे। परमस्नेहमयी जननी की भाँति हमारे लिए सब कुछ वे पहले से ही सुव्यवस्थित कर रखते हैं। उनसे हम क्या माँगे क्यों माँगे?
उपासना का अर्थ- स्वयं को प्रभु के साथ जोड़ देना। चाहे यह सकाम उपासना के द्वारा हो या निष्काम के। इष्ट की समीपता के लिए नहीं, अपने अभीष्ट की याचना के निमित्त ही सही, प्रभु से हमारा जो संबंध जुड़ेगा, वही हमारे लिए अमूल्य निधि बन जाएगा।
उपासना के द्वारा हो या निष्काम के। इष्ट की समीपता के लिए नहीं, अपने अभीष्ट की याचना के निमित्त ही सही, प्रभु से हमारा जो संबंध जुड़ेगा, वही हमारे लिए अमूल्य निधि बन जाएगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-January
उपासना हो तो महावीर हनुमान् जैसी। साधना ऐसी हो, जैसी हनुमान् ने की। आराधना के मूर्तिमान् स्वरूप भला मेरे आराध्य हनुमान् के सिवा और कौन होगा। महावीर हनुमान् की यह उक्ति “राम काजु कीन्हें बिनु मोहिं कहाँ विश्राम” ही उनका आदर्श वाक्य था। सचमुच ही वह कभी विश्राम नहीं करते थे।
उपासना गृह में न्यूनतम पाँच दीपों द्वारा अवश्य उतारी जाए।
उपासना आरंभ कर दें। दृश्य क्या दीखेंगे, ऐसा न सोचें।
उपासना कर हजारों साधक मुक्ति के लक्ष्य तक पहुँचे होंगे। स्वामी निगमानंद ने पत्नी की आराधना की और सिद्ध स्तर पर पहुँचे। पश्चिम बंगाल के नदिया क्षेत्र में हुए इस संन्यासी को लोगों ने नहीं स्वीकारा, लेकिन स्वामी निगमानंद ने इसकी कभी चिंता नहीं की। वे कहते थे पत्नी के प्रेम ने उन्हें लौकिक दुःखों और अपेक्षाओं से मुक्त कर दिया। परमेश्वर का कोई और रूप दूसरों के लिए आराध्य होगा, मेरे लिए तो पत्नी ही ईश्वर रूप है।
उपासना संबंधी मार्गदर्शन है, ध्यान कैसे किया जाए, यह बताया गया है।
उपासना पद्धति से यह क्रम संपन्न कर सकते हैं। जो पारिवारिक-व्यक्तिगत स्तर पर करना चाहते हैं, वे भी न्यूनतम इस आधे घंटे की अवधि को दीप प्रज्वलित कर जप-प्रार्थना द्वारा संपन्न करें, यह प्रेरणा दी जाए। इक्कीसवीं सदी की अगवानी की यह आरती हर दरवाजे पर, हर उपासना गृह में न्यूनतम पाँच दीपों द्वारा अवश्य उतारी जाए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-May
उपासना, पूजा-अर्चना, प्रार्थना-मनुहार का तो उसमें कोई योगदान भी नहीं होता। गुरु बोले, “वत्स! यदि मनुष्य के पास भगवान् की दी हुई दैवी संपदा-समय, श्रम व सुदृढ़ स्वास्थ्य न हो तो वह संपत्ति जिसे तुम पुरुषार्थजन्य कह रहे हो, कभी एकत्र नहीं कर सकता। यदि पूर्व में दैवी संपत्ति का उपयोग कर साधनसंपन्न बन भी जाता है, तो यह नहीं मानना चाहिए कि वह अपना उद्देश्य पा गया। जरा-सा भी भटकने पर ऐश्वर्य में प्रमाद, श्रम से जी चुराना, इंद्रिय असंयम, विचारों की कुमार्गगामिता अथवा बिखराव एवं समय की हानि इनमें से एक धुन लग जाने पर वह फिर खोखला हो जाता है और अर्जित संपदा खो देता है।” संपत्ति और संपदा संबंधी अपनी जिज्ञासा का तर्क-तथ्य पूर्ण समाधान सुनकर शिष्य संतुष्ट हो गया।
उपासना-साधना के सार्वभौम सूत्रों को अपनाकर वे न केवल युग निर्माण की प्रक्रिया को गति देंगे, एक नए विश्व, देव संस्कृति प्रधान राष्ट्र के नेतृत्व वाले ग्लोबल ग्राम के रूप में देखे जाने वाले मानव-समुदाय की भवितव्यता रच रहे होंगे। निश्चित ही यह सब कुछ अपने अंदर उस गहरे स्तर की संवेदना विकसित किए, जीवन जीने की कला में सुगढ़ता लाए तथा सद्बुद्धि को अंगीकार किए बिना संभव नहीं है। इसीलिए बार-बार इस साधना आँदोलन की धुरी जाग्रत् संवेदना, व्यक्तित्व परिष्कार एवं गायत्री महाशक्ति को ही मानकर आगे चलने को कहा जा रहा है।
उपासना करते हैं, उसी के अनुसार मैं उनकी कामनाओं को पूरा करते हूँ।" इसी बात को संत कबीर के एक दोहे द्वारा भी समझाया गया था। अब इसी श्लोक की व्याख्या के साथ आगे की यात्रा करेंगे।
उपासनापरक दो और भी आध्यात्मिक प्रयोग हैं, जो आपको करने ही चाहिए। इनमें से एक का नाम है, ‘चिंतन’ और दूसरे का नाम है, ‘मनन’। चिंतन और मनन के लिए किसी कर्मकाँड की जरूरत नहीं है, किसी पूजा-विधान की जरूरत नहीं है और किसी समय निर्धारण की जरूरत नहीं है। अच्छा तो यह हो कि इन सब कामों के लिए आप सबेरे का समय ही रखें। अध्यात्म साधना के लिए सबसे अच्छा प्रातःकाल का ही है।
उपासना में चिंतन और मनन का भी स्थान रहना चाहिए और न केवल स्थान रहना चाहिए, बल्कि उसे मजबूती से पकड़े रहना चाहिए। छोड़ना किसी भी कीमत पर न हो, अगर आपका ऐसा संकल्प हो तो आप अध्यात्म जीवन में तेजी से आगे बढ़ेंगे और वह लाभ प्राप्त करेंगे जो अध्यात्मवाद की शक्ल में प्राप्त होते रहें हैं।
उपासना अद्वैत, विशिष्ट द्वैत, द्वैताद्वैत आदि की साधना, षड्दर्शन-ज्ञान, कर्म, भक्ति, योग साधन, तंत्र आदि के मार्गों के प्रचलन के कारण विगत चार-साढ़े चार हजार वर्षों में एक कठिन परिस्थिति उत्पन्न हुई। अनेक धर्म-मतों के अनुयायी राजशक्ति की सहायता से अपने-अपने धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए परस्पर संघर्षरत हुए। "मेरा धर्म सत्य है" इस भाव से बहुत कुछ रक्त इस धरती पर बहा है। ऐसे में ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस की जीवन-साधना अवतरित हुई व उनने बता दिया कि सभी धर्म-मत सत्य हैं, अनंत मत-अनंत पथ हैं। इसीलिए तो श्री रामकृष्ण के संबंध में भाव-विभोर होकर स्वामी विवेकानंद कह उठते हैं, "उनका जीवन एक असाधारण प्रकाश स्तंभ है, जिसके तीव्र प्रकाश से लोग हिंदू धर्म के समाज अंग और आशय को समझ सकेंगे।
उपासना पद्धति कुछ भी क्यों न हो, हमारे इष्ट भिन्न-भिन्न क्यों न हों, साधना तो जीवन देवता की है। एक कल्पवृक्ष के रूप में विकसित हो सकने वाले जीवन की है। इसीलिए इस आँदोलन में भागीदारी हर वर्ग की है, हर जाति, पंथ, मत, संप्रदाय, वर्ग, लिंग के भावनाशील की है। उपासना-साधना के सार्वभौम सूत्रों को अपनाकर वे न केवल युग निर्माण की प्रक्रिया को गति देंगे, एक नए विश्व, देव संस्कृति प्रधान राष्ट्र के नेतृत्व वाले ग्लोबल ग्राम के रूप में देखे जाने वाले मानव-समुदाय की भवितव्यता रच रहे होंगे। निश्चित ही यह सब कुछ अपने अंदर उस गहरे स्तर की संवेदना विकसित किए, जीवन जीने की कला में सुगढ़ता लाए तथा सद्बुद्धि को अंगीकार किए बिना संभव नहीं है।
उपासना-पद्धति हो, सभी साधनाएँ एक ही लक्ष्य उस अनंत सौंदर्य-आनंदस्वरूप-तत्त्वरूप परमात्मा की ओर ले जाने वाली पगडंडियाँ ही तो हैं।
उपासना का प्रभाव हो रहा है या नहीं, इस सही दिशा में बढ़ रहे हैं या नहीं अथवा यथास्थिति ही बनी हुई है? यह जानने का उपाय समीक्षा के सिवा कोई नहीं हो सकता। साधना के क्षेत्र में जो भी पुरुषार्थ किया जाता है, उसका उद्देश्य अपने आपको ऊपर उठाना है। संत महात्माओं की प्रेरणा के अनुसार यह कार्य परमात्मा को पाना अथवा अपने क्षुद्र अहं को विराट चेतना में घुला मिला देना है। अपनी स्थिति की निरंतर समीक्षा की जाती रहे, तभी पता चलता है कि प्रगति हो रही अथवा नहीं?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-March
उपासना नियमित बनाएँ। प्रातः आत्मबोध, रात्रि में तत्त्वबोध की साधना करें। षट्कर्म एवं ज पके साथ ध्यान का क्रम नियमित रखें। ध्यान के लिए परमपूज्य गुरुदेव की पुस्तक ‘उपासना के दो चरण जप और ध्यान’ देखी जा सकती है।
उपासना-साधना’ पुस्तिका को इस आँदोलन के लिए माध्यम बनाएँ।
उपासना व जीवन-साधना का अभ्यास प्रखर बनाएँ। समाज के हर वर्ग, संप्रदाय को लोगों को उनकी श्रद्धा के अनुरूप उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना हेतु प्रेरित करें। स्थान-स्थान पर सामूहिक साधना सत्रों का समय-समय पर आयोजन करें।
उपासना सिखाने, संस्कार कराने तथा युगसाहित्य जन-जन को उपलब्ध कराने जैसी गतिविधियाँ नियमित रूप से चलती हैं। नवरात्रियों में कभी-कभी वहाँ साधनाएँ भी संपन्न होती हैं एवं वर्ष में कुछ दिन यज्ञ होता रहता है।
उपासना कर ली, पर भावपक्ष को तो भूल ही गए। तुम स्नेह बाँटो, बदले में दस गुना पाओगे। सब जीवधारियों में अपनी ही आत्मा समाई मानकर स्वयं को भक्तिप्रवाह में सराबोर कर डालो। अपनी धारा को परमात्मा के अक्षय आनंद रूपी गंगा से मिला दो, तो तुम सम्मान, श्रेय तो पाओगे ही, उस अभाव की पूर्ति भी होगी, जो तुम्हें त्रास दे रही है।” शीतल वचन सुनकर मंकी को दिशा मिली।
उपासना के दो चरण जप और ध्यान’ देखी जा सकती है।
उपासना, नंदी, पशुपति, शिव आदि रूपों में वैदिक सभ्यता के सशक्त प्रमाण मिले हैं। योग-आसन में ध्यान करते हुए योगी की मुद्रा, उस समय की योग-साधना पर प्रकाश डालते हैं। सैकड़ों मुद्राओं से उपलब्ध रहस्यमयी सिंधु लिपि का संस्कृत से संबंध पाया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-April
उपासना की पावन त्रिवेणी का संगम है। ज्ञान और कर्म संपत्ति का प्रभु अनुग्रह के साथ सामंजस्य ही वैदिक भक्ति का आदर्श है।
उपासना में ध्यान-धारणा पर जोर देने के अनेक शारीरिक-अध्यात्मिक लाभों के अतिरिक्त एक अतिरिक्त लाभ यह भी हैं कि उसे करते रहने पर विस्मृति की शिकायत पनपने नहीं पाती।
उपासना करने के संबंध में लोगों को एक और भी शिकायत रहती है कि हमको जाड़े के दिनों में ठंड लगती हैं, स्नान करना संभव नहीं होता, कैसे उठें, पानी मिलता नहीं है। उसके लिए यह संध्यावंदन, जो आपको हम बता रहे हैं, इसको आप यहाँ से जा करके नियमित रूप से करते रहें। संध्यावंदन के लिए ऋषियों ने जो प्रातःकाल और सायंकाल का समय बताया हैं, उसके स्थान पर प्रातःकाल सो करके उठने का समय और रात्रि को सोने का समय, यह दो समय आपके लिए हम नियुक्त किए देते हैं। कई लोगों के पास स्थान नहीं होता है, पर स्थान नहीं हैं, पूजा का सामान नहीं हैं, नहाने का समय नहीं हैं, तो न सही, फिर आप ऐसा करें, चारपाई पर पड़े-पड़े ही संध्यावंदन कर लिया करें। इसके लिए न उठने की जरूरत है और न कुछ है।
उपासना के पात्र हैं। पौराणिक देवताओं में प्रायः विष्णु और शिव ही भक्तिमयी उपासना के केंद्र -बिंदु है। महाभारत में भक्ति चेतना का सुस्पष्ट एवं प्रभावपूर्ण प्रतिपादन हुआ है। इसमें वासुदेव कृष्ण के देवत्व की परिकल्पना की गई है और तभी इस महाकाव्य को धर्मग्रंथ की संज्ञा मिली है।
उपासना दोनों के अंदर सन्निहित है। अतः इसमें भक्तिभाव अंकुरित होते देखा जा सकता है। शतपथ ब्राह्मण में भक्ति की पर्याप्त विवेचना हुई है। जैसे, द्वेष से दूर रहना, सबसे प्रेम करना, दिव्यता और पवित्रता का प्रयास करना, आत्म-तत्व को प्राप्त करना आदि को प्रधानता दी गई है। ये भक्ति के अनिवार्य अंग कहे जा सकते हैं।
उपासना के केंद्र -बिंदु है। महाभारत में भक्ति चेतना का सुस्पष्ट एवं प्रभावपूर्ण प्रतिपादन हुआ है। इसमें वासुदेव कृष्ण के देवत्व की परिकल्पना की गई है और तभी इस महाकाव्य को धर्मग्रंथ की संज्ञा मिली है।
उपासनागृहों, शक्तिपीठों, प्रज्ञामंडलों, संगठित इकाइयों, घरों, कार्यालयों, क्लबों, संगठनों के मिलन केंद्रों पर भी लगाया जा सकता है। इस प्रतीक स्थापना के परिणाम बड़े दूरगामी होंगे।
उपासना। स्तुति में प्रभु के गुणों का कीर्तन होता है। यह ज्ञान की मीमाँसा है। प्रार्थना में प्रभु से पापों के प्रायश्चित और पुण्य प्राप्ति के लिए कामना की जाती है। पापमयी दानवता का दमन तथा पुण्यमयी दैवी विभूतियों का समावेश प्रचंड कर्म की अपेक्षा रखते हैं।
उपासना का ढंग कुछ भी हो, यदि मूलभूत अनिवार्य शर्तें पूरी होती हों तो उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होंगी, यह प्रभु का आश्वासन है। जिस व्यक्ति की गहन तन्मयता के साथ जैसी कामनापूर्ति के लिए तप किया जाएगा, उसकी उसी निष्ठापूर्वक प्रार्थना को भगवान् द्वारा सुना जाएगा। फिर यह शिकायत करना जायज नहीं कि भगवान् ने हमें यह दिया, उसे यह दिया। जैसी मन की आँतरिक स्थिति थी वैसा ही मिला। कबीर साहब ने इसी बात को इस तरह लिख दिया हैं-
उपासना के लिए, संध्यावंदन के लिए समय नहीं मिलता।
उपासना का दैनिक जीवन में स्थान रखिए। इन सब बातों का समन्वित जीवन का अभ्यास कर लें, तो कल प्रातःकाल वाला संध्यावंदन पूरा हो हो जाएगा।
उपासना से लोक -परलोक दोनों सधते हों।”
उपासना पद्धति, जितनी गहरी उसकी तीव्रता होती है, भगवान उसकी सुनते हैं। आह्वान का, उपासना का ढंग कुछ भी हो, यदि मूलभूत अनिवार्य शर्तें पूरी होती हों तो उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होंगी, यह प्रभु का आश्वासन है। जिस व्यक्ति की गहन तन्मयता के साथ जैसी कामनापूर्ति के लिए तप किया जाएगा, उसकी उसी निष्ठापूर्वक प्रार्थना को भगवान् द्वारा सुना जाएगा। फिर यह शिकायत करना जायज नहीं कि भगवान् ने हमें यह दिया, उसे यह दिया। जैसी मन की आँतरिक स्थिति थी वैसा ही मिला।
उपासना और शयन से तेरा उपकार होगा। तू तपस्या कर। उसी से तेरा उद्धार होगा।”
उपासना करते हैं, उसी के अनुसार, मैं उनकी कामनाओं को पूरी करता हूँ) क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।” (अध्याय 4 ग्यारहवाँ श्लोक)
उपासना उस लक्ष्य के समीप आसीन करा देती है। अतः भक्ति ज्ञान, कर्म एवं उपासना की पावन त्रिवेणी का संगम है। ज्ञान और कर्म संपत्ति का प्रभु अनुग्रह के साथ सामंजस्य ही वैदिक भक्ति का आदर्श है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-June
उपासना करते हैं, तब मैं आपकी किया करता हूँ। घाट का पत्थर गद्दा हो उठा और दुगने उत्साह से लोगों का मैल धोने लगा।
उपासना करे। "ये यथा माँ प्रपद्यन्ते" श्लोक की विस्तृत व्याख्या विगत अंक में की गई। इसकी पुष्टि हेतु ठाकुर श्रीरामकृष्ण देव एवं परमपूज्य गुरुदेव के जीवन के माध्यम से व्याख्या की गई। यह भी बताया गया कि साँसारिकता के लौकिक लाभ फल की आकाँक्षा से पूजने वाले लोगों को मिल जाते हैं, किंतु ये अल्पकालिक एवं अस्थाई होने के कारण तुच्छ होते है। निष्काम कर्म की अपनी महत्ता है।
उपासना करने की इच्छा होती हैं, यह आपकी प्रगति का प्रधान लक्षण है। यदि आपकी गति रुक जाएगी, तो आपका उत्साह ठंडा हो जाएगा और श्रद्धा शिथिल पड़ जाएगी। आपकी श्रद्धा और तीव्र उत्कंठा को देखकर हम यह जान लेते हैं कि आपकी प्रगति किस प्रकार हो रही है।”
उपासना-साधना का, आध्यात्मिक का जो प्रशिक्षण दिया जा रहा है, उसका उद्देश्य क्या हैं ? उसका प्रयोग क्या हैं ? उसके सिद्धाँत बताने के साथ यह भी बतलाने का प्रयास करेंगे कि यहाँ पर जो क्रियाएँ हमने सिखाई हैं, उसमें आप कैसे सफल और पारंगत हो सकते हैं, ? इसमें आपको क्या-क्या करना होगा ? यह विषम समझाना आज से हमारा उद्देश्य है।
उपासनास्थल के रूप में अन्य देवी-देवताओं के साथ-साथ शिवालय भी बनवाए। इसी क्रम में विश्व के अनेक मुस्लिम और ईसाई शासित राष्ट्रों में भी शिवलिंग पाए गए है, जो अब या तो संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे है या यत्र-तत्र उनकी विधिवत् पूजा होती है। वेटिकन सिटी के एटरुस्कन संग्रहालय में ऐसा ही एक अत्यंत पुराना शिवलिंग है, जो कहीं उत्खनन के दौरान पाया गया था। ऐसी मान्यता है कि पुराकाल में जब इटली में हिंदुओं का आधिपत्य था, तब वे इसकी पूजा किया करते थे। तुर्किस्तान के एक प्रमुख नगर बाँबीलन में एक हजार दो सौ फुट का एक विशाल शिवलिंग अब भी मौजूद है।
उपासना गृह में उपासना के लिए जाती है।
उपासना के क्षेत्र में इसी तरह की तत्परता और निष्ठा होनी चाहिए।
उपासना कर सकेंगे, तो आपको भौतिकता की सारी उपलब्धियाँ प्राप्त हो जाएँगी। आप शेखचिल्ली की उड़ान न भरें, वरन् आध्यात्मिकता के सही स्वरूप को समझने का प्रयास करें, तभी वास्तविक श्रम का लाभ व सत्परिणाम आपको प्राप्त होगा। आप दौलत चाहते हैं, तो आप इस प्राप्त कर सकते हैं। हमको स्वर्ग की कोई इच्छा नहीं है। हमने पंडितों से सुना है कि एक स्वर्ग है, जो बहुत ही वाहियात किस्म का है।
उपासना-पद्धति हो। सभी साधनाएँ एक ही लक्ष्य-आनंद स्वरूप तत्त्वरूप परमात्मा की ओर ही ले जाती हैं। प्रत्येक को अपने आह्वान की तीव्रता के अनुपात में अपने कार्य-क्षेत्र में सफलता मिलती है। यह तभी हो पाता है, जब मनुष्य आसक्ति, भय और क्रोध को त्यागकर स्थिर मन से परमात्मा के अनंत सौंदर्य की उपासना करे। "ये यथा माँ प्रपद्यन्ते" श्लोक की विस्तृत व्याख्या विगत अंक में की गई।
उपासना करने का दर्शन इसी श्रद्धा तत्व पर आधारित है। अपने इष्ट के प्रति अटूट श्रद्धा आरोपित करके ही उपासक उसके साथ अनन्य एकता स्थापित कर लेते हैं। ईश्वर, कर्मफल, जीवनोद्देश्य, कर्तव्यपालन, आत्मा की गरिमा जैसे सत्य तथ्यों पर सघन श्रद्धा रखने वाले लोग ही सामान्य जीवन से उठकर महामानवों देवदूतों की पंक्ति में बैठ सकते हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र की उच्चस्तरीय साधनाओं में श्रद्धा की ही अपरिमेय शक्ति काम करती है।
उपासना करते हुए भी बार-बार पथ से विचलित होना पड़ता है।
उपासना के लिए जाती है।
उपासना इस आध्यात्मिक दर्प से छुटकारा दिलाती है। वह इस विनम्र बोध में ले जाती है कि ईश्वर हैं, उसकी सत्ता कण-कण में व्याप्त है। इस कार्य कलेवर में उसी की एक चिंगारी व्यक्त हुई है। वह अब भी उसी महाज्वाला का अंश है और बुझ जाएगी तब भी उसी ज्योति में लीन हो जाएंगी अपना क्षुद्र अहं मात्र एक भ्राँति है। ईश्वर ही नियंता, व्यापक और अस्तित्वज्ञान है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-December
उपासनास्थल की एक विशेषता है, वहाँ होते रहने वाला अखण्ड यज्ञ। गत 42 वर्षों से हमारा अखण्ड घृतदीप (1926 से) जलता है। साथ ही अगरबत्तियों एवं धूपबत्तियों के रूप में हवन सामग्री भी वहाँ यथाक्रम जलती रहती है। दीपक का घी और बत्तियों की सामग्री निरंतर जलने से दोनों का सम्मिश्रित धूम्र, वर्चस, तेज और प्रभाव उपासना कक्ष में यज्ञीय वातावरण उत्पन्न करता है। अतएव वह केवल अखण्ड दीप मात्र ही नहीं रहता वरन् अखण्ड यज्ञ बन जाता है, वहाँ अनायास ही हमें अपनी मनोभूमि उच्चस्तरीय रखने और उस स्थिति के महत्त्वपूर्ण लाभ लेने में सुविधा मिलती है।
उपासना के लिए कर्म को सेवा साधना-लोक आराधना का रूप देकर एक विराट संगठन गायत्री परिवार खड़ा कर दिया एवं उनकी जिनकी उपासना को एक विराट रूप दे दिया।
उपासना से आराधना की ओर
उपासना में संलग्न होना चाहते हैं, तो आपको किसी-न-किसी रूप में देवपूजन करना पड़ेगा। हिन्दू हैं तो भी करना पड़ेगा, निराकारवादी हैं, तो भी करना पड़ेगा। मुसलमान हैं, तो धूपबत्ती जलानी पड़ेगी। ईसाई हैं तो भी आपको मोमबत्ती जलानी पड़ेगी, फूल चढ़ाना पड़ेगा। देवता के सामने श्रद्धाँजलि अर्पित करनी पड़ेगी, मस्तक झुकाना पड़ेगा, सिर झुकाना पड़ेगा, श्रद्धा व्यक्त करनी पड़ेगी।
उपासना इसलिए करना चाहते हैं कि हम कृष्ण जैसे बनना चाहते हैं। कृष्ण भगवान की खुशामद और चापलूसी करने से क्या हो सकता है? बेटे तू बता तो सही कि कृष्ण जी अपनी खुशामद करने वाले को, चापलूसी करने वाले को या किसी चमचे को अपना चमचा बनाना चाहते हैं क्या? असली यही बात है ना? हाँ गुरुजी! हम तो भगवान का चमचा बनना चाहते हैं।
उपासना प्रयोजन में प्रयुक्त होने वाले शब्द गुच्छक की नहीं। सृष्टि में अनेकों विभूतियाँ हैं। उनमें से एक गायत्री भी है। इस मंत्र का शब्द गुँथन इस प्रकार हुआ है जो भावार्थ और सामर्थ्य की दृष्टि से विलक्षण है। इसमें व्यक्ति और समाज को सुसंपन्न, सुसंस्कृत एवं समृद्ध बनाने वाले अनेकानेक रहस्यमय तत्वों का समावेश है।
उपासना को एक विराट रूप दे दिया।
उपासना कक्ष में यज्ञीय वातावरण उत्पन्न करता है। अतएव वह केवल अखण्ड दीप मात्र ही नहीं रहता वरन् अखण्ड यज्ञ बन जाता है, वहाँ अनायास ही हमें अपनी मनोभूमि उच्चस्तरीय रखने और उस स्थिति के महत्त्वपूर्ण लाभ लेने में सुविधा मिलती है।’ (अखण्ड ज्योति मई 1961, पृष्ठ 61) उपर्युक्त प्रसंग उस अखण्ड दीपक के विषय में हैं, जो आँवलखेड़ा, आगरा एवं मथुरा के बाद अब शाँतिकुँज हरिद्वार में सतत प्रज्वलित है एवं जिसकी साक्षी में हमारी गुरुसत्ता द्वारा उस प्राणचेतना का आह्वान किया गया, जिसके प्रत्यक्ष स्वरूप के रूप में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका निकलती है। वस्तुतः अखण्ड दीपक से प्रेरणा लेकर ही 1937-38 में पूज्यवर ने यह विलक्षण नाम इस पत्रिका को दिया था।
उपासना करती रहो। वृद्धावस्था की संतान स्वयं दुःख पाती है और माता-पिता को भी चिंता में डालती है। आजकल मनुष्यों की आयु अधिक नहीं होती। कौन जाने आप लोगों की आयु कितनी है। यदि थोड़ी आयु रही तब तो बेचारे बच्चों की कैसी दुर्दशा होगी, इसकी कल्पना करके तुम सब समझ सकती हो।
उपासना तक सीमित न रह जीवन साधना बन जाए, हर श्वास में योगसाधना, संयम तपश्चर्या का समावेश हो जाए, तो वातावरण निश्चित ही बदलेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-October
उपासना के लिए आपने कोई इष्टदेव की मूर्ति बनाकर रखी होगी तो कोई हर्ज नहीं, लेकिन उसको आप सिद्धाँतों का समुच्चय मानिए, आदर्शों का समुच्चय मानिए। उसे व्यक्ति विशेष मत कीजिए। अगर व्यक्ति विशेष मानेंगे तो भ्रम और जंजाल में घूम रहे होगे। आपने अगर शंकर जी को एक आदमी माना होगा, जो बैल की सवारी करता हुआ जहाँ तहाँ घूमता रहता है और बेल के पत्ते खाता है। आक के फूल और धतूरे के फल खाता है, तो आप गलती कर रहे हैं।
उपासना विधि का विस्तार से वर्णन किया गया है। वस्तुतः पौराणिक युग को शक्ति उपासना का यौवन काल कह सकते हैं। पुराणों के व्यापक प्रचार से शक्ति की उपासना को इतना बल मिला था कि वह घर-घर में पूजी जाने लगी।
उपासना की ही रही है। नवरात्रि के पावन पर्व पर प्राचीन काल में गायत्री उपासना का ही एकमात्र प्रसंग मिलता है। विभिन्नताएँ मध्यकाल के अंधेरे युग की उपज हैं। जिसमें शक्ति-देवियों के नाम पर अनेकों रूप सामने आए। फिर भी प्रधानता गायत्री की ही रही है।
उपासना का ही एकमात्र प्रसंग मिलता है। विभिन्नताएँ मध्यकाल के अंधेरे युग की उपज हैं। जिसमें शक्ति-देवियों के नाम पर अनेकों रूप सामने आए। फिर भी प्रधानता गायत्री की ही रही है।
उपासना की थी, ताकि युद्ध में अर्जुन विजयी हो। भगवान राम द्वारा इसकी उपासना का उल्लेख अनेक राम कथाओं में मिलता है। बौद्ध धर्म में मातृ शक्ति की पूजा विविध रूप में प्रचलित रही है। बौद्ध तंत्रों में तो शक्ति को शीर्ष स्थान प्राप्त रहा है। शाक्त पुराणों में देवी के स्वरूप, महिमा एवं उपासना विधि का विस्तार से वर्णन किया गया है।
उपासना को इतना बल मिला था कि वह घर-घर में पूजी जाने लगी।
उपासना का यौवन काल कह सकते हैं। पुराणों के व्यापक प्रचार से शक्ति की उपासना को इतना बल मिला था कि वह घर-घर में पूजी जाने लगी।
उपासना का उल्लेख अनेक राम कथाओं में मिलता है। बौद्ध धर्म में मातृ शक्ति की पूजा विविध रूप में प्रचलित रही है। बौद्ध तंत्रों में तो शक्ति को शीर्ष स्थान प्राप्त रहा है। शाक्त पुराणों में देवी के स्वरूप, महिमा एवं उपासना विधि का विस्तार से वर्णन किया गया है। वस्तुतः पौराणिक युग को शक्ति उपासना का यौवन काल कह सकते हैं।
उपासना भी योग का एक साधन है, यह भगवान नवें अध्याय के 13-14 वें श्लोक में बताते हैं। “ऐसे अनन्य प्रेमी भक्तजनों को जो निष्काम भाव से भजन करते हैं, मैं स्वयं योगक्षेम प्राप्त करा देता हूँ।” यह आश्वासन प्रभु ने इसी अध्याय के 22वें श्लोक में दिया है। “पत्र, पुष्प, फल, जल जो भी कोई भक्त प्रेमभाव से अर्पित करता है, उसे भी वे प्रीति के साथ ग्रहण करते हैं।” यह भी उनकी घोषणा है (श्लोक 26)।
उपासनापद्धति में शिथिलीकरण मुद्रा, उन्मनी मुद्रा, खेचरी मुद्रा, गायत्री जप, सोऽहम् साधना, बिंदुयोग, लययोग, तत्त्वबोध, नादयोग, दो बार के दस साधनाक्रमों का समावेश किया गया। अंतः करण की भावभूमिका को उच्चस्तरीय बना देना ही इसका प्रधान लक्ष्य था। आत्मशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया को प्रथम दिन महत्वपूर्ण स्थान दिया गया, जिसे पूज्यवर स्वयं व्यक्तिगत परामर्श के लिए मिले 15 मिनट के समय में संपन्न करते थे। बीच में दर्पण−साधना के दौरान भावभरे गीत टेपरिकॉर्डर से साधकों को सुनाए जाते थे तथा इन्हें सुनकर वे हलके ही नहीं होते, आत्मबोध की साधना भी कर पाते थे। एक घंटे का प्रवचन दो खंडों में सुनाया जाता था।
उपासना−साधना का नियमित क्रम, शाँतिकुँज, गायत्री तपोभूमि मथुरा में किए गए सत्र (सभी का स्मृति के अनुसार विवरण), अपने स्तर पर किए गए अनुष्ठान, समयदान एवं अंशदान का क्रम तथा समयदान के अंतर्गत किए गए उल्लेखनीय सप्त आँदोलनपरक या अन्य कोई सेवाकार्यों का विवरण लिख भेजें। साथ ही एक वर्तमान समय का पासपोर्ट साइज का फोटो भी भेजें। अनुमति मिलने पर ही आएँ।
उपासना का मेरुदण्ड था। योगी, तपस्वी इसी के सहारे अपना महालक्ष्य प्राप्त करते थे। देवताओं और अवतारों के लिए भी शक्ति का स्रोत यही थी। नवरात्रि के अवसर पर गायत्री मंत्र को केन्द्र मानकर विशिष्ट शक्ति साधना अनुष्ठान संपन्न किए जाते थे।
उपासना का समूचा विधि विधान गायत्री की धुरी पर परिभ्रमण करता था। उन दिनों सर्वसाधारण के लिए दैनिक सन्ध्या वंदन में गायत्री मंत्र ही उपासना का मेरुदण्ड था। योगी, तपस्वी इसी के सहारे अपना महालक्ष्य प्राप्त करते थे। देवताओं और अवतारों के लिए भी शक्ति का स्रोत यही थी। नवरात्रि के अवसर पर गायत्री मंत्र को केन्द्र मानकर विशिष्ट शक्ति साधना अनुष्ठान संपन्न किए जाते थे।
उपासना पर है, जिसमें शक्ति की व्यापकता का सुन्दर विवेचन किया गया है-”मैं ही ब्रह्म के दोषियों को मारने के लिए रुद्र का धनुष चढ़ाती हूँ। मैं ही सेनाओं को मैदान में लाकर खड़ा करती हूँ। मैं ही आकाश और पृथ्वी में सर्वत्र व्याप्त हूँ, मैं ही संपूर्ण जगत् की आधीश्वरी हूँ। मैं परमब्रह्म को अपने से अभिन्न रूप में जानने वाले पूजनीय देवताओं में प्रधान हूँ। संपूर्ण भूतों में मेरा प्रवेश है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-April
उपासना का पुण्य फल चाहती है। मैंने उस आत्मा की शाँति और सद्गति के लिए जप आरंभ किया। बहुत दिन बाद फिर उस आत्मा का प्रत्यक्ष हुआ तो उसने बताया कि उस गायत्री जप से उसे पूर्ण शान्ति मिली है उसकी एक कामना वासना जो और शेष थी उसे पूर्ण करने का भी प्रयत्न कर रहा हूँ। गायत्री माता जीवित और मृत सभी को शाँति देती है।
उपासना से हुए लाभ के बारे में लिखते हैं-एक बार रात को मेरी छाती में जोरों से दर्द पैदा हुआ। मैं छटपट करने लगा। दवा खाने से जरा भी पीड़ा कम न हुई। कुछ देर बाद खून की कै हुई और मैं बेहोश हो गया। फिर विविध औषधि उपचार होने लगे।
उपासना करते हैं। कितने ही निष्ठावान व्यक्ति नियत संख्या में अपनी मालाएँ पूरी करते हैं, गायत्री चालीसा पाठ, मंत्र लेखन आदि अनुष्ठानों में कितने ही नर नारी लगे हुए हैं, कइयों ने बड़ी कठोर तपश्चर्याओं के साथ साधना का व्रत लिया है। यह सभी निष्ठावान उपासक भूरि-भूरि प्रशंसा के योग्य हैं। आत्म बल की वृद्धि, आँतरिक पवित्रता की स्थापना, प्रभु शरणागति, बड़े ही महत्वपूर्ण तत्व हैं। इन्हें उपासना के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।
उपासना की भारी आवश्यकता है। जिस प्रकार अनेकों दुष्टों ने अपनी दुष्प्रवृत्तियों से वातावरण को दूषित किया है उसी प्रकार अनेकों सज्जनों की सत्प्रवृत्तियाँ मिलकर उनका समाधान भी कर सकती हैं। सेना का मुकाबला सेना से किया जाता है। संसार के लिए विपत्तियाँ उत्पन्न करने वाली दुष्प्रवृत्तियों का निवारण भी धर्मात्माओं की धर्मसेना के शक्तिशाली धर्मोपचारों द्वारा ही होगा। ऐसे उपचारों में गायत्री की शक्ति सर्वश्रेष्ठ है।
उपासना आरंभ की। फल यह हुआ कि एक पैसे बराबर गोलाई की कैविटी जो अकसर दो-दो वर्ष में भी बंद नहीं होती तीन मास में ही ठीक हो गयी। डॉक्टर आश्चर्यचकित रह गये।
उपासना के सामूहिक कार्यक्रमों के स्थान-स्थान पर विविध आयोजन करा रही है। पर इतने से ही काम चलने वाला नहीं है। अब प्रत्येक गायत्री उपासक को स्वयं एक सजीव गायत्री मन्दिर बनना होगा। गायत्री माता की महिमा बढ़ाने के लिए पिछले -अज्ञानान्धकार युग में तमसाच्छन्न की गई इस महाशक्ति को पुनः प्रकाशवान बनाने के लिए हम सब को मिल जुल कर साधारण नहीं,-असाधारण प्रयत्न करना होगा। एकाकी गायत्री उपासना तक सीमित न रह कर इसे धर्मानुष्ठानों का रूप देना होगा ताकि माता को भूले हुए अगणित मनुष्य अपनी जननी को पहचान सकें।
उपासना आरंभ की है, घर में बड़ी शाँति रहने लगी है। आर्थिक समस्या भी हल हुई है। अभी-अभी डेढ़ हजार रुपये में 5 एकड़ जमीन खरीदी है। नित्य दस माला जपने के अतिरिक्त दोनों नवरात्रियों में अनुष्ठान करता हूँ।
उपासना से जितनी प्रसन्न होती है उससे अनेकों गुनी प्रसन्नता उसे साधक की परमार्थ परायणता से होती है। इसी के लिए वह अपने सच्चे कृपा पात्रों को प्रेरणा भी करती है और प्रत्यक्ष आदेश देती है। नारद शंकराचार्य, दयानंद, विवेकानंद आदि को एकाँत साधना में से कान पकड़ कर उठाने और लोक सेवा में जुड़ा देने का कार्य उसी महाशक्ति ने किया। जिस पर भी वह प्रसन्न होती है उसे निश्चित रूप से यही प्रेरणा देती है। क्योंकि आत्मशक्ति, पुण्य संचय, विश्वहित, सुख शाँति, स्वर्ग मुक्ति, समृद्धि सम्पत्ति, शक्ति सफलता, कीर्ति प्रतिष्ठ के सभी लाभ परमार्थ परायणता में सन्निहित हैं।
उपासना में लगा हूँ। 19 अनुष्ठान कर चुका। 5 बार गायत्री तपोभूमि में माता के दर्शन कर आया।
उपासना में सभी कुछ आ जाना चाहिए। शील, चरित्र सुरुचि। जो अश्लील है वह अहितकर है, अवाँछनीय है, अतएव कुरूप है। उसका बहिष्कार होना चाहिए। इसके विपरीत जो शीलयुक्त एवं संयत है, सदाचार तथा चरित्र को उज्ज्वल एवं प्रशस्त करने वाला है, वह श्लाघनीय है अतएव सुँदर है।
उपासना करने वालों की साधना की प्रगति एवं गतिविधियों पर निरंतर बारीकी से ध्यान रखा है। इस लम्बे समय के गंभीर अनुभव का एक मात्र निष्कर्ष एक ही है कि माता किसी साधक की व्यक्तिगत पूजा उपासना से जितनी प्रसन्न होती है उससे अनेकों गुनी प्रसन्नता उसे साधक की परमार्थ परायणता से होती है। इसी के लिए वह अपने सच्चे कृपा पात्रों को प्रेरणा भी करती है और प्रत्यक्ष आदेश देती है। नारद शंकराचार्य, दयानंद, विवेकानंद आदि को एकाँत साधना में से कान पकड़ कर उठाने और लोक सेवा में जुड़ा देने का कार्य उसी महाशक्ति ने किया। जिस पर भी वह प्रसन्न होती है उसे निश्चित रूप से यही प्रेरणा देती है।
उपासना के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। पर ये आवश्यक हैं। अन्यथा यह सब भी कंजूस सेठ के धन संग्रह करते रहने की तरह एक आध्यात्मिक स्वार्थ परता ही रह जायेगी। प्रसन्नता की बात है कि अखण्ड-ज्योति के पाठक और गायत्री परिवार के सदस्य इस तथ्य को अधिक दृढ़तापूर्वक समझते जा रहे हैं और धर्म प्रचार को भी तपस्या का, साधना का, एक आवश्यक अंग मानते हैं और उसके लिए भी निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं।
उपासना के प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ था और नित्य प्रेम से माता की आराधना किया करती थी। एक बार मेरे पतिदेव एक ऊँचे पहाड़ पर गये थे चढ़ने का रास्ता संकीर्ण और खतरों से भरा था। संभल-संभल कर पग रखना पड़ता था, पर पता नहीं क्या होनहार था। सारी सावधानी के बर्तते हुए भी आखिर इनके पैर फिसल ही गये। मीलों की ऊँचाई थी।
उपासना की है और अपने ही श्रेणी के अन्य अनन्य उपासना करने वालों की साधना की प्रगति एवं गतिविधियों पर निरंतर बारीकी से ध्यान रखा है। इस लम्बे समय के गंभीर अनुभव का एक मात्र निष्कर्ष एक ही है कि माता किसी साधक की व्यक्तिगत पूजा उपासना से जितनी प्रसन्न होती है उससे अनेकों गुनी प्रसन्नता उसे साधक की परमार्थ परायणता से होती है। इसी के लिए वह अपने सच्चे कृपा पात्रों को प्रेरणा भी करती है और प्रत्यक्ष आदेश देती है। नारद शंकराचार्य, दयानंद, विवेकानंद आदि को एकाँत साधना में से कान पकड़ कर उठाने और लोक सेवा में जुड़ा देने का कार्य उसी महाशक्ति ने किया। जिस पर भी वह प्रसन्न होती है उसे निश्चित रूप से यही प्रेरणा देती है।
उपासना का क्रम भी चलता है।
उपासना क्षेत्र में भी प्रवेश कीजिए।
उपासना विधि गुरुदेव से शिक्षा ग्रहण कर प्रारंभ की। काफी सुधार हुआ। फिर टायफैड हुआ। उससे भी रक्षा हुई। अंतिम कर्म भोग रूप में सारे शरीर में भयंकर दर्द शुरू हुआ।
उपासना की। उसका बड़ा अच्छा परिणाम हुआ। थोड़े ही दिन में उसके सब दुर्गुण दूर हो गये। घर के सब लोग संतुष्ट हैं। अब वह मित्र भी गायत्री उपासक बन गया है।
उपासना का बड़ा प्रचार हो रहा है। मंत्र लेखन महायज्ञ के लिए वे बड़ी तत्परतापूर्वक कार्य कर रहे हैं। उपासकों का सच्चा सहयोग मिल रहा है। -एक उपासक
उपासना के बड़े प्रभावशाली अनुभव मुझे हुए हैं। कितने ही व्यक्तियों को इस महामंत्र की उपासना की प्रेरणा मैंने दी है और उनको आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त करते देखा है। कई वर्ष पूर्व मुझे लकवा हुआ था। बड़ी भयंकर स्थिति थी वह भी मानसिक जप से बिल्कुल अच्छा हो गया। अब इस वृद्धावस्था में माता ने एक पुत्र दिया है।
उपासना की प्रेरणा मैंने दी है और उनको आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त करते देखा है। कई वर्ष पूर्व मुझे लकवा हुआ था। बड़ी भयंकर स्थिति थी वह भी मानसिक जप से बिल्कुल अच्छा हो गया। अब इस वृद्धावस्था में माता ने एक पुत्र दिया है। इसका संकेत कुछ दिन पूर्व माता ने मुझे दिया था और लड़के क्या नाम रखा जाय यह भी मुझे नोट करा दिया था।
उपासना के क्षेत्र में भी विकसित करें। इसके लिए स्थान-स्थान पर सामूहिक यज्ञानुष्ठानों की आवश्यकता है। एक छोटा-बड़ा आयोजन आप भी कीजिए। ऐसे शुभ संकल्प माता की सहायता से सदा सफल ही होते ह
उपासना करते हैं। एक दिन रात में उसके घर में चोर घुसा। उसके वस्त्रादि उठा ले गया। खड़खड़ सुनकर उसकी पत्नी की नींद टूट गयी और उसने पति को जगाया। आवाज सुन चोर भी शीघ्रता से भाग गया।
उपासना की। प्राकृतिक चिकित्सा का सहारा लिया, धीरे-धीरे स्वास्थ्य सुधरने लगा। बम्बई प्लास्टिक लि. में नौकरी करता था। वह भी अस्वस्थता के कारण छूट चुकी थी। स्वास्थ्य सुधरा तो पैसे की तंगी की विपत्ति सामने आई।
उपासना जैसे परम पुनीत कार्यक्रम में इस प्रवृत्ति का जुड़ जाना तो ‘सोना व सुगंध’ का उदाहरण बन जाता है।
उपासना के लिए बड़ा उत्साह पैदा हुआ है। जप, हवन, स्वाध्याय, सत्संग कार्यों में सदस्यगण बड़े चाव से भाग लेते हैं। -राम प्रसाद मिश्र
उपासना से मेरी अनेकों उलझनें दूर हुई हैं। पेंशन मिलने में बड़ी कठिनाइयाँ थीं वे हल हुईं। ज्येष्ठ पुत्र की आजीविका संबंधी समस्या सुलझी। कन्या के प्रसव काल से जो प्राण घातक संकट उपस्थित था वह टला। पौत्री की अत्यंत भयंकर ज्वर एवं मूर्छा से जीवन रक्षा हुई।
उपासना तक सीमित न रह कर इसे धर्मानुष्ठानों का रूप देना होगा ताकि माता को भूले हुए अगणित मनुष्य अपनी जननी को पहचान सकें। उसकी गोद में चढ़कर, आँचल पकड़कर, सच्चा वात्सल्य सुख पा सकें। माता से उसके खोये हुए पुत्रों का मिलाप कराने के लिए किया हुआ सत्प्रयत्न कितनी उच्चकोटि का है यह शब्दों में कहना और अक्षरों में लिखना संभव नहीं। जिन्होंने इस कार्यप्रणाली को अपनाया है वे ही जान सकते हैं कि केवल जप करते रहने की अपेक्षा यह सामूहिक गायत्री आयोजन कितने अधिक आनंद व संतोष प्रदान करने वाले हैं। निस्संदेह सामूहिकता की प्रवृत्ति मानव प्राणी की सर्वोत्कृष्ट विशेषता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-September
उपासना में श्रद्धा स्थापित की है। मनुष्य सच्चे मन से जिस काम में लगता है उसमें सफलता प्राप्त होती ही है। परमार्थिक लक्ष धारण करने वाले लोग अपनी अभीष्ट दिशा में चुपचाप धीरे-धीरे चलते रहकर भी कितने आगे बढ़ सकते हैं इसका एक प्रमाण ब्रह्मानन्द जी हैं।
उपासना और धर्म कार्यों में जाता है। जो कोई भी इनके संपर्क में आता है चाहे मित्र, रिश्तेदार अथवा मिलने वाला हो उससे गायत्री माता और यज्ञ पिता का सन्देश सुनाकर उनको अपनाने की अपील करते रहते हैं।
उपासना करने को तैयार हों वहाँ गायत्री परिवार की एक शाखा स्थापित कर लेनी चाहिये। और मिल जुल कर अधिकाधिक गायत्री साधन द्वारा ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल बनाने में सहायक होना चाहिये।
उपासना और जप का उपदेश देती हैं जो जनता को बहुत आकर्षित करता है।
उपासना करना चाहती है तो अनुदार, अविवेकी एवं प्रतिगामी लोग उन्हें रोकने में विरोध करने में ही अपनी शेखी समझते हैं।
उपासना एवं यज्ञानुष्ठानों के प्रचार के लिए सच्चे परिव्राजकों की तरह धर्म फेरी करें। कुछ लोग तपोभूमि में रहकर यहाँ यज्ञानुष्ठान में तत्पर रह कर अपना तथा समस्त संसार का भारी हित साधन कर सकते हैं। आगामी पाँच वर्ष बड़े ही महत्वपूर्ण हैं, इन्हें जो सफल बना सकें उन्हें ही सच्चे भाग्यवान कहा जायेगा। जो लोग इन धर्मानुष्ठानों की उपेक्षा करके व्यक्तिगत लाभ उपार्जन में लगे हुए हैं वे मूर्ख हैं क्योंकि उनकी उपार्जित वस्तुयें दुर्दैव के एक ही थपेड़े में चूर-चूर हो जाने वाली हैं। छप्पर में आग लग जाने पर जो काम धन्धा छोड़कर उसे बुझाने में लग पड़ता है वह बुद्धिमान है और जो बुढ़िया आग को दूर समझ कर अपने काम से काम रखकर चक्की पीसती रहती है वह बुढ़िया अपने आप से ही नहीं अपने शरीर से भी हाथ धो बैठती है।
उपासना को ही मनुष्य जाति की सर्वोपरि आवश्यकता समझा है। आप प्रतिदिन 6-6 घन्टे गायत्री उपासना में तन्मय रहते हैं, हवन आपका नित्य नियम है। उस प्रदेश में दूर-दूर तक गायत्री प्रसार आपने किया हैं। खूँटी में एक बहुत बड़ा गायत्री यज्ञ करा चुके हैं। वहाँ की शाखा आपके प्रयत्न स्वरूप बड़ा कार्य कर रही है।
उपासना करते थे। तिब्बत के लोग अपने शरीर में स्वस्तिक के आकार का गोदना गोदवाते हैं। फारस में पुरोहितों के चोगों पर स्वस्तिक का चिन्ह बनाया जाता है। अल्जीरिया और मिस्र में भी इसका काफी प्रचार है। मिस्र वालों का विश्वास है कि स्वस्तिक उनके देश में यूनान से आया।
उपासना को सर्वाधिक महत्व देती है। जिस विषय को समझने में मस्तिष्क और जिव्हा की सामर्थ्य समाप्त हो जाती है उसके बोध के लिये प्रतीक का हाथ पकड़ा जाता है।
उपासना करने वाला हो तो बहुत ठीक है। इसी समय मेरा तबादला भी धोलका को हो गया और मैं अपने कुटुम्ब को छोड़कर वहाँ रहने लगा जिससे लड़की के विवाह की समस्या और भी कठिन हो गई। पर मैं लगातार गायत्री जप और माता जी की उपासना करता रहा जिसके फल से अनायास ही बड़ा सुयोग्य वर मिल गया और मेरा तबादला भी पुनः बड़ौदा को हो गया। इस प्रकार माता की कृपा से मेरी दोनों मनोकामनाएं पूरी हो गईं।
उपासना के अधिकार से भी धर्म ध्वजियों द्वारा वंचित कर दी गई है। मुसलमान स्त्री कुरान पढ़ सकती है, ईसाई स्त्री बाइबिल पड़ सकती है पर अभागिनी हिन्दू स्त्री अपने धर्म कर्तव्यों की आकाँक्षा करती है। भारतीय धर्म की मूल गंगोत्री गायत्री की उपासना करना चाहती है तो अनुदार, अविवेकी एवं प्रतिगामी लोग उन्हें रोकने में विरोध करने में ही अपनी शेखी समझते हैं।
उपासना और धर्म सेवा के लिए लगाना निश्चित किया है। प्रतिदिन 10 घन्टे लगाकर अपना 24 लक्ष महापुरश्चरण करने में इन दिनों बड़ी श्रद्धा और तन्मयता के साथ संलग्न हैं।
उपासना में तन्मय रहते हैं, हवन आपका नित्य नियम है। उस प्रदेश में दूर-दूर तक गायत्री प्रसार आपने किया हैं। खूँटी में एक बहुत बड़ा गायत्री यज्ञ करा चुके हैं। वहाँ की शाखा आपके प्रयत्न स्वरूप बड़ा कार्य कर रही है।
उपासना के प्रभाव ने उनकी रक्षा की।
उपासना करता रहा जिसके फल से अनायास ही बड़ा सुयोग्य वर मिल गया और मेरा तबादला भी पुनः बड़ौदा को हो गया। इस प्रकार माता की कृपा से मेरी दोनों मनोकामनाएं पूरी हो गईं।
उपासना के ऋषि आदर्शों की ओर भी कदम बढ़ाया है। श्री कृष्णा कुमारी ने 24 लक्ष के कई महापुरश्चरण किये हैं। अगणित उपासिकाएं बनाई हैं। अभी छिबरायज्ञ में एक बड़ा यज्ञ कराया है। कई बार तपोभूमि आई हैं।
उपासना के सर्वश्रेष्ठ पर्वकाल हैं। सर्दी और गर्मी की ऋतुओं की यह नौ नौ दिन की संध्यायें साधना के लिए वैसी ही महत्वपूर्ण हैं जैसे प्रतिदिन दिन और रात्रि के मिलन की प्रातः सायं संध्या वेला उपयुक्त होती है। इस वर्ष यह नवरात्रियाँ आश्विन सुदी 1 से लेकर 9 तदनुसार तारीख 24 सितम्बर मंगलवार से आरम्भ होकर तारीख 2 अक्टूबर बुधवार को पूर्ण होती है। इन दिनों 24 हजार जप का अनुष्ठान करने के लिये प्रतिदिन 26 मालायें करनी पड़ती हैं जिसमें लगभग ढाई तीन घण्टे लगते हैं। यदि प्रातःकाल एक बार में इतना समय न मिले तो प्रातः सायं दोनों समय में पूरा किया जा सकता है।
उपासना का कुछ नियमित संकल्प लेकर ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का भागीदार बन सकता है। चूँकि यह सामूहिक संकल्प है इसलिये इसमें अकेले-अकेले कुछ जप तप कर लेने से काम न चलेगा। अपने निकटवर्ती धर्म प्रवृत्ति के लोगों को इस मार्ग की प्रेरणा देकर उन्हें एक संगठन सूत्र में सम्बद्ध करके ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में लगाया जा सकता है। जहाँ इस प्रकार के थोड़े से भी व्यक्ति सामूहिक रूप से गायत्री उपासना करने को तैयार हों वहाँ गायत्री परिवार की एक शाखा स्थापित कर लेनी चाहिये। और मिल जुल कर अधिकाधिक गायत्री साधन द्वारा ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल बनाने में सहायक होना चाहिये।
उपासना पर आप जितना ध्यान देते हैं उतना ही सार्वजनिक सेवा, लोकहित और जन कल्याण का महत्व भी समझते हैं। आपने प्रयत्न से रिसिया शाखा के सदस्यों के एक 24 हजार का सामूहिक अनुष्ठान प्रति दिन पूरे एक वर्ष तक करने का निश्चय किया है। यह संकल्प बड़े आनन्द पूर्वक निभ रहा है। इस संकल्प के एक वर्ष पूरा होने पर एक बड़ा सामूहिक यज्ञ करने तथा रिसिया गायत्री मन्दिर एवं यज्ञशाला बनाने का ठोस कार्यक्रम अभी से बन रहा है। प्रभाव शाली व्यक्ति अपने प्रभाव का उपयोग जनता को सन्मार्ग में प्रवृत्त करने के लिये करें तो वे श्री कन्हैयालाल जी की तरह बहुत उपकार कर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-January
उपासना में मेरी दिलचस्पी बढ़ गयी थी। इस बार की परीक्षा देने के बाद मेरे सहपाठी मेरी खिल्ली उड़ाते-कहते तुम अपनी श्रेणी में सबसे ऊँचा नम्बर पाओगे। आज परीक्षा फल निकलने वाला था। स्कूल जाते ही मेरे सहपाठीगण हँसी उड़ाने के लिए मेरी ओर जुट गये-उसी समय नम्बर सुनाने का अवसर आया। मेरे सहित सभी को मेरा प्रथम नम्बर से पास होना विस्मित कर रहा था।
उपासना। सर्वसाधारण का पढ़ना तो असंभव सा ही है। विद्या संस्कार कराने के पूर्व ही सैंकड़ों रुपयों का होना आवश्यक है। पग-पग पर धन की कमी प्रतीत होती है। अध्ययन का स्तर निम्न से निम्नतर होता जा रहा है।
उपासना से एक दूसरे को पुष्टि मिले। और सब मिलकर भगवान का गुणगान करें। भगवान के अनन्त नाम और अनन्त गुण हैं। जब एक मामूली शहर में पहुँचने के लिए कई रास्ते होते हैं, तो भगवान के पास पहुँचने के भी असंख्य रास्ते हो सकते हैं। इसलिए हर कोई अपने-अपने मार्ग से भगवान के पास पहुँचने की कोशिश करें।
उपासना करने की प्रेरणा ग्रहण की तथा सम्मिलित रूप से शुक्लपक्ष के रविवार को गायत्री यज्ञ सम्पन्न किया गया।
उपासना के उपराँत सामूहिक रूप से हवन किया तथा साँस्कृतिक उत्थान करने के लिए सत्संकल्प लिया।
उपासना करें, यही मैं चाहता हूँ। इससे हमारे देश में एक मधुर स्नेहमय जीवन बनेगा। इसलिए हिंदुओं को हिंदु कहलाने में लज्जा नहीं मालूम होनी चाहिये बल्कि उनको निष्ठा से हिंदु-धर्म की उपासना करनी चाहिये।
उपासना के लाभों का वर्णन करते हैं :- मैं नित्य टूटे-फूटे रूप से गायत्री जप लिया करता था। विद्यालय में स्कॉलर शिप की दरखास्तें पड़ रही थीं, मैं अयोग्य तो था ही, फिर भी दरखास्तें दे दिया करता था। जब वह रुपया आया तो स्वयं मुझे अपना नाम देख कर आर्श्चय हुआ और माता की कृपा की याद से परिप्लुत हो रहा था। अब पढ़ने और गायत्री उपासना में मेरी दिलचस्पी बढ़ गयी थी। इस बार की परीक्षा देने के बाद मेरे सहपाठी मेरी खिल्ली उड़ाते-कहते तुम अपनी श्रेणी में सबसे ऊँचा नम्बर पाओगे।
उपासना पूरी कर ही ली। तपोभूमि के यज्ञ भस्म से थोड़ी सी शान्ति हुई पर पीड़ा बनी रही। अन्दर से ध्वनी हुई। टाइफ़ाइड! चौबीस घण्टे में टाइफ़ाइड का निर्णय कोई डॉक्टर स्वीकार नहीं कर सकता, पर मैंने अपनी बुद्धि से अन्तर के आदेश को अधिक महत्व दिया और टाइफ़ाइड की प्रसिद्ध ऐडियोपेथी गोली खाना आरम्भ किया। दूसरे दिन शाम को तीन दस्त आए-जो संपूर्णतः टाइफ़ाइड के लक्षणों को प्रमाणित करते थे।
उपासना का वर्णन है। मन्त्र का जो संक्षिप्त सा आशय यहाँ वर्णित किया गया है उससे पाठक कल्पना कर सकते हैं कि इस मन्त्र को इतना अधिक गौरवास्पद स्थान क्यों प्राप्त हुआ है और क्यों यह समस्त आर्य जाति का मूलमन्त्र बना है। यह है- ‘बुद्धि की स्फुरणा’ का गीत। हमने अपने मूलमन्त्र में उत्तमोत्तम स्वादिष्ट भोजन नहीं माँगे, असीम धन-दौलत नहीं माँगी, स्त्री-पुत्र-परिजन नहीं माँगे। हमने माँगी है-‘दिव्य प्रकाश से जगमगाती हुई बुद्धि।
उपासना नहीं कर सकते।’ इसके लेखक श्री आर्थर ई. जोन्स के सुन्दर विचार मैं पाठकों की भेंट कर रहा हूँ। जोन्स साहब का कहना है कि ‘न जाने किस कु-घड़ी में रुपया-पैसा संसार में आया, जिसने आज हमारे ऊपर ऐसा अधिकार कर लिया है कि हम उसके अंग बन गये हैं। शायद इसका जन्म उसी दिन हुआ जब आदम और हौवा अदके उद्यान में फल के लालच में पड़ गये। ईसा से 2000 वर्ष पहले बैबीलन में सम्राट हम्मुरावी का शासन था।
उपासना कर रहा था सदा उनसे प्रार्थना किया करता। एक दिन स्वप्न में आश्वासन मिला-तुम दूसरे दर्जे में पास हो और यही चरितार्थ हुआ।
उपासना के प्रति खिंचने का कारण लिखते हैं- मेरा भाई विश्वनाथ दसवीं श्रेणी में पढ़ रहा था। उसकी योग्यता से जरा भी उत्तीर्ण होने की आशा नहीं थी, इसलिए उसके पास होने के लिए मैंने गायत्री उपासना प्रारम्भ की और वह अच्छी तरह उत्तीर्ण हो गया। तभी से मेरी आँख खुली और नियमित रूप से मैं गायत्री उपासना करने लग गया हूँ।
उपासना से ही नष्ट हो गया। इसके बाद मुझे एक पुत्री रत्न की भी प्राप्ति हुई, जिसका नाम श्रद्धा से गायत्री ही रखा। गायत्री तपोभूमि में होने वाले यज्ञ की भागीदारी के लिए मैं भी जप करता था। तीन महीने जप करने के बाद अनायास ही लकवे ने भी मेरे शरीर से विदाई ले ली। आज मैं युगों का पीड़ित-सुखी जीवन का आनन्द ले रहा हूँ।
उपासना का स्थान-इस विषय पर भाव पूर्ण भाषण हुए।
उपासना करनी पड़ेगी।’
उपासना करनी चाहिये।
उपासना के मार्ग में हुए अपने अनुभवों का सार भेजते रहने की उपासकों से प्रार्थना है।
उपासना करने लग गया हूँ।
उपासना के अनुभव का वर्णन करती हैं :-
उपासना तो दूर-ईश्वर के आस्तित्व तक में, मेरा विश्वास नहीं रह गया था।
उपासना करती चली आई है, वह यह पवित्र गायत्री मन्त्र है। शास्त्रों ने इसके जप का बहुत माहात्म्य गाया है। इसे सब वेदों का सार माना गया है। किन्तु इसके अन्दर वह क्या उच्च भाव है, जिसके कारण इसे सर्वोपरि स्थान प्राप्त हुआ है?
उपासना करने वालों को समय-समय पर अनेक प्रकार के बड़े उत्साह वर्धक आध्यात्मिक एवं भौतिक अनुभव होते हैं। उपासक समय-समय पर उनकी सूचना तपोभूमि में भेजते हैं। इन अनुभवों का सार आगे से इन पृष्ठों में देते रहेंगे। गायत्री उपासना के मार्ग में हुए अपने अनुभवों का सार भेजते रहने की उपासकों से प्रार्थना है।
उपासना करेंगे।
उपासना प्रारम्भ की और वह अच्छी तरह उत्तीर्ण हो गया। तभी से मेरी आँख खुली और नियमित रूप से मैं गायत्री उपासना करने लग गया हूँ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-February
उपासना करने तथा धार्मिक जीवन बनाने के लिए तत्पर हो रहे हैं। लगभग 180 नर-नारियों ने यज्ञ में मन्त्र दीक्षा ली तथा यज्ञोपवीत संस्कार कराये।
उपासना को फलवती बनाना ही है। इन साधनों द्वारा क्रमशः उन्नति करते हुए मनुष्य उस विश्वेश्वर के परम स्वरूप की कल्पना तक उस सर्वोच्च ईश्वर की धारणा तक पहुँचते हैं, ईश्वर की धारणा तक पहुँच जाने पर फिर चाहे वे उसकी उपासना विष्णु स्वरूप में करें या उनके किसी अवतार के रूप में अथवा उस पर गोपयोगी ज्ञान के अधिष्ठाता शिव के रूप में ही करें, परन्तु इन अगणित व्यक्त रूपों के मूलाधार उस एक ब्रह्म की धारणा तक पहुँच जाते हैं।
उपासना प्रारम्भ कर दी। कुछ दिनों में सपने में माता ने दर्शन दिया बाद में पत्नी के गर्भवती होने की जानकारी मिली। हमारी उपासना अजस्र चलती रही। एक दिन सपने में माता ने कहा- तुम बड़े चिन्तित थे- लो यह फूल। इतना कहकर कमल का फूल मेरे हाथ में देकर माता तिरोहित हो गयीं।
उपासना का एक आवश्यक नियम रखा गया है। -सदाशिव शर्मा
उपासना करते अवश्य ही धीरे-धीरे अनेकों दुर्गुणों एवं दुर्व्यसनों से मुक्त हो गया, पर बीस वर्षों से बीड़ी तम्बाकू पीने की बुरी लत को नहीं छोड़ सका। हार मानकर मैंने अपने गुरुदेव से इसके लिए प्रार्थना की। उनका उत्तर आते ही अन्दर से पवित्र शक्ति उमड़-उमड़कर मेरे इस बुरी लत के उठे हुए वेग को रोक देती है। मुझे आश्चर्य होता है कि पत्र में क्या जादू था जो आज माता ने मेरे अन्दर रोक सकने की शक्ति उड़ेल दी है। मुझे लगता हैं- माता का प्रत्यक्ष स्वरूप ही गुरुदेव हैं।
उपासना में इस दृष्टिकोण को लेकर ही चलने से कल्याण हो सकता है। संक्षेप से यह विषय पाठको के समक्ष उपस्थित किया गया है। आवश्यकता होने पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किये जा सकते हैं। गरुड़वाहन श्री भगवान विष्णु हम सब की रक्षा करें। ‘विष्णुगोपा अदाभ्यः।
उपासना अपनी रुचि के अनुसार आवश्यक बतलायी है।
उपासना के अगणित रूप मिलते हैं, किन्तु उन सभी का उद्देश्य प्रेम को दिखा देना, भक्ति को प्रेरणा देना एवं उपासना को फलवती बनाना ही है। इन साधनों द्वारा क्रमशः उन्नति करते हुए मनुष्य उस विश्वेश्वर के परम स्वरूप की कल्पना तक उस सर्वोच्च ईश्वर की धारणा तक पहुँचते हैं, ईश्वर की धारणा तक पहुँच जाने पर फिर चाहे वे उसकी उपासना विष्णु स्वरूप में करें या उनके किसी अवतार के रूप में अथवा उस पर गोपयोगी ज्ञान के अधिष्ठाता शिव के रूप में ही करें, परन्तु इन अगणित व्यक्त रूपों के मूलाधार उस एक ब्रह्म की धारणा तक पहुँच जाते हैं।
उपासना के बाद प्रथम बार मुझे भृकुटी के मध्य में प्रकाश का दर्शन हुआ प्रथम दीपक जैसा, पुनः बिंदु सी ज्योति हो गयी। फिर तो नित्य रंग-बिरंगे-प्रकाश, सूर्य, चन्द्र, अनन्त दिव्य प्रकाश दिखाई देते रहे। कभी कृष्ण, विष्णु, शिव एवं सूर्य देव साक्षात से दीख पड़ते- कभी बड़े-बड़े सुन्दर महल, मन्दिर, हंस, बैल, हाथी, घोड़े भी दिखाई दिये। कई बार हृदय देश में अत्यन्त चमकीला प्रकाश भी देखा। कई दिन तो कुछ मित्रों के सामने दीवाल पर एक उज्ज्वल प्रकाश आकर स्थिर हो गया।
उपासना विष्णु स्वरूप में करें या उनके किसी अवतार के रूप में अथवा उस पर गोपयोगी ज्ञान के अधिष्ठाता शिव के रूप में ही करें, परन्तु इन अगणित व्यक्त रूपों के मूलाधार उस एक ब्रह्म की धारणा तक पहुँच जाते हैं।
उपासना अधिक है, वहाँ नकद धर्म बहुत है।
उपासनाएँ भी वैसी ही रखी हैं- ‘यजन्ते सात्विका देवान् यक्षरक्षाँसि राजसाः’ कहकर श्री भगवान ने सात्विक पुरुषों को देवोपासक बतलाया है। ‘यथाभिमतध्यानाद्वा’ कहकर महर्षि पतंजलि ने चित्त शुद्ध के लिए देवताओं की उपासना अपनी रुचि के अनुसार आवश्यक बतलायी है।
उपासना का सम्मानपूर्वक विविध उल्लेख है। पाठकों के समक्ष उनके विषय कुछ उदाहरण हम यहाँ दे रहे हैं।
उपासना, दैवी शक्ति की आराधना, मनुष्य की मनुष्यता के साथ उसे अविनाशी पद पाने के लिए लोगों के समक्ष रखी है। सारे प्राणी अपने-2 कर्मों के अनुसार सुख-दुःखादि का उपभोग करते हैं। अपनी-अपनी वासनाओं के अनुसार सारे प्राणी सात्विक, राजस, तामस भेद से विविध होते हैं। उनके कल्याण के लिए शास्त्रों ने उपासनाएँ भी वैसी ही रखी हैं- ‘यजन्ते सात्विका देवान् यक्षरक्षाँसि राजसाः’ कहकर श्री भगवान ने सात्विक पुरुषों को देवोपासक बतलाया है। ‘यथाभिमतध्यानाद्वा’ कहकर महर्षि पतंजलि ने चित्त शुद्ध के लिए देवताओं की उपासना अपनी रुचि के अनुसार आवश्यक बतलायी है।
उपासना अजस्र चलती रही। एक दिन सपने में माता ने कहा- तुम बड़े चिन्तित थे- लो यह फूल। इतना कहकर कमल का फूल मेरे हाथ में देकर माता तिरोहित हो गयीं। उसके पाँचवें दिन कमल सा प्रफुल्लित पुत्र उत्पन्न हुआ। जो माता की छाया में संरक्षित घर को प्रकाशित कर रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-March
उपासना करने लगा था। मैं प्रतिदिन साइकिल पर एक पुल पार करते हुए पढ़ाने जाया करता था। वर्षा का मौसम था। पुल के बगल में लो मुड्डियाँ लगी हुई थीं, वह बरसात में टूट फूट गयी थीं। पुल के नीचे पत्थरों के ढेर थे।
उपासना-सामूहिक सेवा आदि करने के लिए स्वयं कटिबद्ध होते हैं और दूसरों के पीछे पड़कर उनसे इच्छा अनिच्छा के साथ, आग्रह, अनुरोध, मित्रता, खुशामद, नाराजी, प्रार्थना, शिक्षा आदि के आधार पर कुछ कराते रहते हैं तो काम कुछ होता दीखता है। पर जब वह प्रेरणा देने वाले कुछ ढीले पड़ते हैं तभी वे “किसी प्रकार” तैयार किये व्यक्ति कंधा डाल देते हैं। उनका उत्साह ठंडा पड़ जाता है। एक बार छोड़े हुए कार्य को पुनः आरंभ करने में उन्हें कुछ हेठी, झिझक, संकोच की सी स्थिति मालूम पड़ती है। इसलिए वे दुबारा कहने सुनने पर पहले से भी अधिक शिथिल बन जाते हैं।
उपासना रूढ़ की, लेकिन वे उपासनाएँ कर्ममय नहीं थी; वांग्मय थीं। इसलिए दोनों तरफ से लाभ नहीं देती थीं। ध्यानयोग के लिए अगर हम एक साथ बैठ जायं, जैसे कुछ लोग कहते हैं और उस ध्यान में अगर हम यशस्वी होते हैं तो ध्यान का लाभ जरूर मिलता है; लेकिन वैसी ध्यान क्रिया जिनके मन में नहीं चलती, उनके लिए वह आराम की या आलस्य की क्रिया बन जाती है। यानी ध्यान योग की उपासना इकहरी लाभदायी है। मन में ध्यान हुआ तो लाभ और वैसा ध्यान न हुआ तो अलाभ।
उपासनाओं तथा व्यवहारिक जीवन में धार्मिक प्रवृत्तियों का बढ़ाया जाना अतीव आवश्यक है। पर मार्ग में एक भारी कठिनाई यह है कि कार्य आसानी से होने वाला नहीं है। लेखनी और वाणी से- पुस्तकों और प्रवचनों से निस्संदेह इस दिशा में बड़ी सहायता मिलती है। पर वह सहायता ‘जमीन तैयार करने’ जितनी ही है। दृढ़ स्थायी और ठोस कार्य जब कभी होगा तो उसके मूल में धर्म को अपने कंधे का सहारा देने, अंधे की लकड़ी का उदाहरण बनने के लिए कुछ व्रतधारी कर्मठ धर्मात्मा लोग कटिबद्ध मिलेंगे।
उपासना के समान ही दूसरों को प्रेरणा देने का महत्व समझें-तब तक सामूहिक क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हो सकती। लोगों का मन बहुत दुर्बल होता है। जब तक कोई कोंचते रहने वाला पीछे पड़ने वाला-पीछे पड़ते रहने वाला होता है तब तक उसके लिहाज से श्रद्धा या अश्रद्धापूर्वक कुछ धर्म कार्य करते हैं। जैसे ही वह पीछे पड़ने वाली प्रेरणा ठंडी हुई कि साधारण लोगों के सहयोग से चलने वाले संगठन का ढांचा बिखर जाता है और वह कार्यक्रम समाप्त हो जाता है। धर्म ‘पंगु’ है।
उपासना करने से वर्ष के अन्य समयों की अपेक्षा अनेक गुना अधिक सत्परिणाम निकलता है। गायत्री परिवार के सदस्य सदा ही नवरात्रियों में अपनी स्थिति के अनुसार साधना अनुष्ठान आदि करते हैं। यह वर्ष अधिक महत्वपूर्ण होने के कारण नवरात्रियों में और भी अधिक सामूहिक उपासना की जानी चाहिए।
उपासना तथा उसके 24 अक्षरों में सन्निहित शिक्षाओं की जानकारी।
उपासना कर रहे हैं।
उपासना में जप का स्थान सबसे ऊपर है। राम नाम से लेकर गायत्री मंत्र तक सभी मंत्रों का जप माला पर ही किया जाता है। माला में 108 दाने होते हैं। इसके सम्बंध में सहज ही यह प्रश्न उठता है कि इतने ही दाने क्यों रखे गये? इससे न्यूनाधिक क्यों नहीं रखे गये?
उपासना विधि जान कर मैं उपासना करने लग गयी।
उपासना करने लग गयी।
उपासना इकहरी लाभदायी है। मन में ध्यान हुआ तो लाभ और वैसा ध्यान न हुआ तो अलाभ। लेकिन कर्ममय उपासना दोनों तरफ से लाभदायी होती है, इसलिए सामुदायिक दृष्टि से कर्ममय उपासना ही श्रेष्ठ होती है।
उपासना प्रारम्भ की। उनकी पत्नी भी उनकी अनुगामिनी बनी। कुछ दिनों की उपासना के बाद उसका लड़का भी स्वस्थ रहने लगा और पढ़ने में उसकी बुद्धि विकसित होती चली गयी। अब वे लोग लगातार गायत्री उपासना कर रहे हैं।
उपासना करने की बात स्वीकार कर ली-फार्म भर दिया है- उन्हें बार-बार पूछते रहने, कोंचते रहने, रिपोर्ट देने के बहाने बार-बार मिलते रहने, प्रेरणा देते रहने से ही यह आशा की जा सकती है कि वे किसी प्रकार गिरते पड़ते संकल्प को निभा सकेंगे। नये उपासक पैदा करना भी इस युग में काफी कठिन है। बीमा-कम्पनी का एजेंट जिस परिश्रम और प्रयत्न से किसी व्यक्ति को बीमा कराने के लिए तैयार करता है- अनेकों बार घर पर चक्कर लगाता है। बार-बार उपेक्षा और तिरस्कार सहता है- तब कहीं किसी को बीमा कराने को तैयार करके अपना कमीशन सीधा करता है। ठीक उतना ही कठिन कार्य किसी को धर्म-कर्म में लगाने का है।
उपासना करता ही रहा। कुछ ही दिनों में मेरी गिरी माली हालत सुधर गयी, मेरा यश भी क्रमशः फैलता गया। भीतर में ओऽम् ध्वनि सुनायी पड़ती है। उस का केन्द्र खोजने के ख्याल में, मैं जप सहित अपने को भूल जाता हूँ। एक बार मेरे पेट में भयंकर दर्द हुआ।
उपासना करने लगे। एक योग्य तेजस्वी छात्र ने यह देख गायत्री उपासना का बड़ा मजाक उड़ाया। आश्चर्य मुझे भी हुआ कि परीक्षा में ये दोनों छात्र उत्तीर्ण और तेजस्वी छात्र ही फेल हो गया।
उपासना की इच्छा प्रबल हो उठी। उन्हीं से उपासना विधि जान कर मैं उपासना करने लग गयी।
उपासना करने की अपेक्षा सदस्यगण एक स्थान पर, एक समय, उपासना, हवन आदि के सामूहिक आयोजन में सम्मिलित हों गायत्री चालीसा का पाठ बाजे आदि पर हो। इसके लिये एक सुसज्जित पंडाल बना लिया जाय, बैठने की, माला पाठ के लिये चालीसा, पंचपात्र, धूपबत्ती, पुष्प, अक्षत चन्दन आदि की व्यवस्था रहे। गायत्री माता के मंत्र लेखन के लिये कापी, दवात, कलम आदि उपलब्ध रहें धार्मिक चित्रों एवं शिक्षाप्रद वाक्यों से नवरात्रि का उपासना स्थान सजाया जाय, जौ बो दिये जायं, कलश एवं माता की प्रतिमा स्थापित रहे। कीर्तन प्रवचन, हवन आदि की व्यवस्था रहे इस प्रकार एक सुन्दर एवं प्रभावशाली कार्यक्रम बन सकता है। गायत्री चालीसा का कीर्तन बाजे पर मधुर स्वर से करने में बड़ा सुँदर मालूम पड़ता है।
उपासना संबंधी प्रगति, गतिविधि, शंका, कठिनाई एवं आगामी कदम के सम्बन्ध में आवश्यक परामर्श प्राप्त कर सकें (3) ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की गतिविधि एवं परिस्थिति विचार विनिमय (4) गायत्री परिवार की शाखा संस्थाओं की प्रगति तथा भावी योजनाओं का निर्धारण (5) साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के लिए आगामी वर्ष की रूप रेखा (6) परिजनों के व्यवहारिक जीवन में उपस्थित समस्याओं पर आवश्यक मार्गदर्शन (7) विश्व की, मानव जाति की, वर्तमान स्थिति को समझना आदि।
उपासना करने लगी। इससे आर्थिक दशा एवं मेरे कमजोर स्वास्थ्य की पुष्टि का प्रारम्भ हुआ। पूज्य आचार्य जी के आशीर्वाद प्राप्त कर मैं हिस्टीरिया रोग से मुक्त हो गयी और मेरे पूज्य पतिदेव उन्हीं की कृपा से आज समाज शिक्षा के आयेजक पद पर आसीन हो 200) दो सौ रुपये मासिक अर्जन कर रहे हैं। गुरु और माता की कृपा से हमारे जीवन में शान्ति और सुख का स्वाभाविक निवास है।
उपासना की भावना है तो श्रेय होता है और वैसी भावना न रही तो कम से कम उत्पादन तो होता ही है। गीता में धर्मयुद्ध का वैसा ही वर्णन किया गया है। वैसी भावना इस उपासना में है।
उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ समय है। वर्ष में दो बार- आश्विन और चैत्र में शीत और ग्रीष्म की मिलन वेला में- ऋतु संध्याएं नवरात्रियाँ आती हैं। इनमें उपासना करने से वर्ष के अन्य समयों की अपेक्षा अनेक गुना अधिक सत्परिणाम निकलता है। गायत्री परिवार के सदस्य सदा ही नवरात्रियों में अपनी स्थिति के अनुसार साधना अनुष्ठान आदि करते हैं। यह वर्ष अधिक महत्वपूर्ण होने के कारण नवरात्रियों में और भी अधिक सामूहिक उपासना की जानी चाहिए।
उपासना-भक्ति के आदर्श प्रतीक हैं। यह उपासना-भक्ति ज्ञानस्वरूप भगवान का क्षण भर भी साथ नहीं छोड़ती। इसलिए मानवता का संरक्षण हो सका। ज्ञानहीन भक्ति हैवानियत है और भक्तिहीन ज्ञान शैतानियत है। हमारे राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न इस विश्व के विचित्र चित्रकूट पर जब एक साथ मिलते हैं, तब मानवता अपने सम्पूर्ण रूप में प्रस्फुटित होती है।
उपासना में लग गया। गायत्री महा विज्ञान पढ़कर विधि-पूर्वक अनुष्ठान किया। फलतः बिना किसी प्रयत्न मेरी पत्नी को नौकरी मिल गयी और उसका वेतन थोड़े ही दिनों में दुगना बढ़ गया। फिर मुझे भी रोजगार करने की सुविधा मिल गयी और आज मैं माता को धन्यवाद देता हुआ दिनों दिन उन्नति की ओर जा रहा हूँ।
उपासना के बाद उसका लड़का भी स्वस्थ रहने लगा और पढ़ने में उसकी बुद्धि विकसित होती चली गयी। अब वे लोग लगातार गायत्री उपासना कर रहे हैं।
उपासना करने लगा। मेरे पिता जी इन्कम टैक्स महकमे में थे। मेरी कुछ दिन की उपासना के बाद ही उन्नती करके जबलपुर बदली कर दिये गये। यहाँ के विद्यालय में आते ही मेरी बुद्धि का प्रकाश दिनों दिन बढ़ता ही चला गया। फिर तो कठिन से कठिन विषय मिनटों में समझ लेता था।
उपासनाएँ कर्ममय नहीं थी; वांग्मय थीं। इसलिए दोनों तरफ से लाभ नहीं देती थीं। ध्यानयोग के लिए अगर हम एक साथ बैठ जायं, जैसे कुछ लोग कहते हैं और उस ध्यान में अगर हम यशस्वी होते हैं तो ध्यान का लाभ जरूर मिलता है; लेकिन वैसी ध्यान क्रिया जिनके मन में नहीं चलती, उनके लिए वह आराम की या आलस्य की क्रिया बन जाती है। यानी ध्यान योग की उपासना इकहरी लाभदायी है। मन में ध्यान हुआ तो लाभ और वैसा ध्यान न हुआ तो अलाभ।
उपासना करने की एक बहुत ही छोटी शर्त है। इस संस्था में धन का चंदा नहीं रखा गया है। उनकी कोई प्रधानता इसमें नहीं है। यहाँ समय की, श्रम की, सहयोग की, श्रद्धा की प्रतिष्ठ है। प्रतिदिन कुछ मिनट स्वयं जप करके सदस्यता की साधारण शर्त पूरी कर देने वालों में से-अब ऐसे कर्मठ व्रतधारी व्यक्ति भी निकलने चाहिए, जो श्रद्धापूर्ण सहयोग के साथ कुछ समय देने को भी तैयार हों।
उपासना की यह खूबी होती है कि उसमें अगर उपासना की भावना है तो श्रेय होता है और वैसी भावना न रही तो कम से कम उत्पादन तो होता ही है। गीता में धर्मयुद्ध का वैसा ही वर्णन किया गया है। वैसी भावना इस उपासना में है।
उपासना को ही जाना जीवन साधन॥
उपासना प्रारम्भ किया। इस उपासना से वे अनुभव अधिक उन्नत हो रहे हैं, पर डर बेहोशी का कहीं पता नहीं है। एक दिन ध्यान में साक्षात् सूर्य मण्डल में ही जैसे मैं प्रविष्ट हो गया।
उपासना के पहले मैं मस्तिष्क प्राणायाम किया करता था। उससे स्वेद, कम्प आदि लक्षण प्रगट होने लगे थे। कभी मेरुदण्ड के ऊपर चींटी चलती सी मालूम पड़ती, शरीर सुन्न हो जाता, होश खोया सा लगता। मुझे बड़ा डर लगा और मैंने प्राणायाम छोड़ गायत्री उपासना प्रारम्भ किया। इस उपासना से वे अनुभव अधिक उन्नत हो रहे हैं, पर डर बेहोशी का कहीं पता नहीं है।
उपासना किया करती थी, सो आज उस माता की याद कर बड़ी रोयी-रोते-रोते सो गयी। स्वप्न में देखा-मैं परीक्षा कक्षा में बैठी सवाल को कठिन देख कर रो रही हूँ। सहसा खिड़की की राह से माता आयी और साँत्वना के स्वर में कहा- माधुरी बेटी! रोती क्यों हो-मन लगा कर पढ़ती रहो। परीक्षा में तुम सर्व प्रथम ओर तेरी सहपाठिनी भूला द्वितीय होंगी। परीक्षा हुई और माता की स्वप्न की वाणी साकार हुई।
उपासना-भक्ति ज्ञानस्वरूप भगवान का क्षण भर भी साथ नहीं छोड़ती। इसलिए मानवता का संरक्षण हो सका। ज्ञानहीन भक्ति हैवानियत है और भक्तिहीन ज्ञान शैतानियत है। हमारे राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न इस विश्व के विचित्र चित्रकूट पर जब एक साथ मिलते हैं, तब मानवता अपने सम्पूर्ण रूप में प्रस्फुटित होती है। और वहीं ज्ञान भक्तिरूप राम-लक्ष्मण को अपने हृदय में बसाकर जब भरत जी वैराग्य पूर्ण कर्म की घोषणा करते हैं तभी अयोध्या के राज्य चलाने में समर्थ होते हैं।
उपासना ही श्रेष्ठ होती है।
उपासना के अतिरिक्त अखण्ड रामायण पाठ भी हुआ, बड़ा उत्साह था।
उपासना की प्रेरणा दी और मैं उपासना करने लगा। मेरे पिता जी इन्कम टैक्स महकमे में थे। मेरी कुछ दिन की उपासना के बाद ही उन्नती करके जबलपुर बदली कर दिये गये। यहाँ के विद्यालय में आते ही मेरी बुद्धि का प्रकाश दिनों दिन बढ़ता ही चला गया। फिर तो कठिन से कठिन विषय मिनटों में समझ लेता था।
उपासना करने में काफी बल मिला। उस समय महायज्ञ की पूर्णाहुति का निमन्त्रण मिल गया था, पर मेरे चार सन्तान, पत्नी आदि का उदर पोषण ही कठिन था। मेरी बड़ी लालसा थी मैं अपने बच्चों को भोजन दूध दे सकूँ और पूर्णाहुति में जरूर सम्मिलित होऊँ। अचानक एक सज्जन सेठ ने मुझे बुलाया कहा- मेरी उमर बीत चली। यह धेनु गाय मैंने ब्राह्मणों के दान देने के लिये पोस-पाल रखा है।
उपासना में है।
उपासना का बड़ा मजाक उड़ाया। आश्चर्य मुझे भी हुआ कि परीक्षा में ये दोनों छात्र उत्तीर्ण और तेजस्वी छात्र ही फेल हो गया।
उपासना से वे अनुभव अधिक उन्नत हो रहे हैं, पर डर बेहोशी का कहीं पता नहीं है। एक दिन ध्यान में साक्षात् सूर्य मण्डल में ही जैसे मैं प्रविष्ट हो गया।
उपासना के बाद ही उन्नती करके जबलपुर बदली कर दिये गये। यहाँ के विद्यालय में आते ही मेरी बुद्धि का प्रकाश दिनों दिन बढ़ता ही चला गया। फिर तो कठिन से कठिन विषय मिनटों में समझ लेता था। फिर ऊँचे दर्जे से मैट्रिक पास कर सुसम्पन्न हुआ। तदुपरान्त ही सुशीला कन्या से विवाह सम्पन्न हुआ।
उपासनात्मक तथा अधिकाधिक सहयोगी बढ़ाने की संगठनात्मक प्रवृत्तियाँ चल रही हैं। आगे चलकर जब यह धर्म तंत्र कुछ मजबूत हो जायेगा-भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान का व्यापक कार्यक्रम हाथ में लिया जायेगा और यह प्रयत्न किया जायेगा कि जन मानस में से स्वार्थपरता, अनैतिकता, अधार्मिकता हटे। लोग उच्च आदर्शों के अनुसार विचार और कार्य करें। जन साधारण का आन्तरिक एवं बाह्य जीवन इस प्रकार ढले कि उसके फलस्वरूप सर्वत्र प्रेम, सहयोग, सद्भाव, सदाचार, शाँति और समृद्धि का वातावरण बने। हम राजनीति तथा सामाजिक क्षेत्र की उपयोगिता समझते हैं-उन क्षेत्रों के कार्यों और कार्यकर्ताओं का हार्दिक अभिनंदन करते हैं, पर अपना कार्यक्षेत्र मनुष्य के आन्तरिक आसुरी दुर्गुणों को हटाने और उसके स्थान पर दैवी सद्गुणों की स्थापना तक सीमित रखना चाहते हैं।
उपासना स्थान सजाया जाय, जौ बो दिये जायं, कलश एवं माता की प्रतिमा स्थापित रहे। कीर्तन प्रवचन, हवन आदि की व्यवस्था रहे इस प्रकार एक सुन्दर एवं प्रभावशाली कार्यक्रम बन सकता है। गायत्री चालीसा का कीर्तन बाजे पर मधुर स्वर से करने में बड़ा सुँदर मालूम पड़ता है। एक सी वेषभूषा में पीले वस्त्र पहन कर पीले दुपट्टे डाले हुए साधक एक लाइन में बैठे हुए बहुत ही शोभायमान लगते हैं। ऐसे दृश्य देखकर नये व्यक्तियों के मन में भी साधना की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।
उपासना का जो व्यापक कार्यक्रम देश भर में चलाया जा रहा है यह बात केवल उसी के संबंध में नहीं है, वरन् यह एक व्यापक समस्या है। सभी सत्कार्यों में इन दिनों सर्वत्र यही एक बात भिन्न-भिन्न प्रकारों से चरितार्थ होती है। सभा व्याख्यानों में, सत्संगों में, किन्हीं विशाल आयोजनों में प्रभावित होकर कई व्यक्ति कुछ शुभ काम करने के लिए प्रवृत्त होते हैं। कुछ दिनों उनका वह क्रम चलता भी है। पर थोड़े ही दिनों में शिथिलता आने लगती है और उनके से अनेकों का उत्साह समाप्त हो जाता है।
उपासना दोनों तरफ से लाभदायी होती है, इसलिए सामुदायिक दृष्टि से कर्ममय उपासना ही श्रेष्ठ होती है।
उपासना का रूढ़ करने में यशस्वी हुए हैं। आमतौर से धर्म में भेद थे ही। तो हर धर्म वालों ने अपनी-अपनी अलग उपासना रूढ़ की, लेकिन वे उपासनाएँ कर्ममय नहीं थी; वांग्मय थीं। इसलिए दोनों तरफ से लाभ नहीं देती थीं। ध्यानयोग के लिए अगर हम एक साथ बैठ जायं, जैसे कुछ लोग कहते हैं और उस ध्यान में अगर हम यशस्वी होते हैं तो ध्यान का लाभ जरूर मिलता है; लेकिन वैसी ध्यान क्रिया जिनके मन में नहीं चलती, उनके लिए वह आराम की या आलस्य की क्रिया बन जाती है।
उपासना, हवन आदि के सामूहिक आयोजन में सम्मिलित हों गायत्री चालीसा का पाठ बाजे आदि पर हो। इसके लिये एक सुसज्जित पंडाल बना लिया जाय, बैठने की, माला पाठ के लिये चालीसा, पंचपात्र, धूपबत्ती, पुष्प, अक्षत चन्दन आदि की व्यवस्था रहे। गायत्री माता के मंत्र लेखन के लिये कापी, दवात, कलम आदि उपलब्ध रहें धार्मिक चित्रों एवं शिक्षाप्रद वाक्यों से नवरात्रि का उपासना स्थान सजाया जाय, जौ बो दिये जायं, कलश एवं माता की प्रतिमा स्थापित रहे। कीर्तन प्रवचन, हवन आदि की व्यवस्था रहे इस प्रकार एक सुन्दर एवं प्रभावशाली कार्यक्रम बन सकता है। गायत्री चालीसा का कीर्तन बाजे पर मधुर स्वर से करने में बड़ा सुँदर मालूम पड़ता है।
उपासना की जानी चाहिए।
उपासनामय जीवन यापन करता हूँ। मेरे प्रसन्न शान्त स्वभाव से मेरे संपर्क में आने वाले मुझे छोड़ना नहीं चाहते। माता की प्रेरणा से मुझे सभी प्राणियों में ईश्वर की झलक ही दीख पड़ती है और मैं आनंद से उत्फुल्ल रहा करता हूँ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-August
उपासना को प्राप्त है। एक बार भोजन छूट सकता है पर साधना में व्यतिरेक नहीं पड़ सकता।
उपासना ने स्थान पा लिया। शायद जैन और बौद्धों को छोड़कर प्रत्येक धर्म ने सगुण परमेश्वर की कल्पना स्वीकार की, बौद्ध भी, यद्यपि वे सगुण परमेश्वर को तो तथापि अपने धर्म संस्थापकों की ठीक करते हैं, जिस प्रकार अन्य धर्मोपासक ईश्वर की। किसी एक ऐसे उन्नततम व्यक्ति और उपासना, जो मनुष्य को उसके प्रेम का बदला दे सके, सर्वत्र दिखायी देती है। विभिन्न धर्मों में यह प्रेम और भक्ति भिन्न-भिन्न रूपों में विभिन्न परिमाण में प्रकट होती आई है। सबसे पहली अवस्था है ‘बाह्य उपचार’।
उपासना विधियों का अभ्यास करना अच्छा है, पर आजन्म उसी उपासना-पद्धति में पड़े रहना और मर जाना यह प्रकट करता है कि उसकी आध्यात्मिक उन्नति नहीं हुई।
उपासना में संलग्न हैं। उन्होंने अपने साधना अनुभवों से अनेकों व्यक्तियों की आध्यात्मिक सेवाएं की हैं। अखण्ड ज्योति से प्रकाशित गायत्री संबंधी पुस्तकों का सार लेकर आपने कई पुस्तकें गुजराती भाषा में छापी हैं और गायत्री परिवार के बहुत से सदस्य बनाने का सफल प्रयत्न किया है।
उपासना का अच्छा उत्साह है। उत्सव श्री नंदराम दास जी वैरागी व कन्हैयालाल जी वोहरा के स्थान पर हुआ था।
उपासना-पद्धति में पड़े रहना और मर जाना यह प्रकट करता है कि उसकी आध्यात्मिक उन्नति नहीं हुई।
उपासना में बड़ी श्रद्धा है। उसने करीब 27 हजार मंत्र लिखकर तपोभूमि में भेजे हैं। गत वर्ष पूर्णाहुति में भी हमारा परिवार तपोभूमि में गया था। बेटी कृष्णा को अच्छे घर वर की प्राप्ति के लिए हमें बड़ी चिंता रहती थी सो नाम मात्र के दहेज से ही सब कुछ प्राप्त हो गया। लड़की बहुत ही आनंद के घर में गई है और लड़का सब प्रकार सुयोग्य मिला है, ऐसा सुयोग्य घर वर भारी दहेज देने पर भी मिलना कठिन था पर वह सब माता की कृपा से अनायास ही प्राप्त हो गया।
उपासना पद्धति प्रायः सभी धर्मों में पाई जाती है। नाम अत्यंत पवित्र माना जाता है और ईश्वर का नाम सबसे अधिक पवित्र है। ईश्वर के नाम की महिमा अतुलनीय मानी गई है, और ऐसा माना गया है कि यह पवित्र नाम ही परमेश्वर है। और यह सत्य भी है, क्योंकि यह विश्व नाम और रूप के अतिरिक्त और है ही क्या? क्या शब्दों के बिना तुम सोच सकते हो?
उपासना के बाहरी अंग हैं, जिनमें होकर मनुष्यों को गुजरना पड़ता है। ये मंदिर और गिरजा, पोथी और पूजा-ये धर्म के केवल प्राथमिक उपकरण मात्र हैं, जिनसे मानव की अध्यात्म-शक्ति बलवती होती है, जिससे वह आध्यात्मिकता की उच्चतर सीढ़ियों पर पैर रखने में समर्थ होता है। यदि उसकी इच्छा है कि उसकी धर्म में गति हो तो ये पहली सीढ़ियाँ आवश्यक हैं। पर आजकल के मनुष्य धर्म के बारे में केवल बड़ी-बड़ी बातें ही करना चाहते हैं, पर उसे पाना नहीं चाहते और न उसका प्रत्यक्ष अनुभव लेना चाहते हैं। क्या तुम यह कहने का साहस कर सकते हो कि दुनिया के ये लोग परमेश्वर को चाहते हैं पर उसे पा नहीं सकते?
उपासना, जो मनुष्य को उसके प्रेम का बदला दे सके, सर्वत्र दिखायी देती है। विभिन्न धर्मों में यह प्रेम और भक्ति भिन्न-भिन्न रूपों में विभिन्न परिमाण में प्रकट होती आई है। सबसे पहली अवस्था है ‘बाह्य उपचार’। इस अवस्था में सूक्ष्म वस्तु की कल्पना कर सकना प्रायः असंभव होता है। इसलिए उन सूक्ष्म कल्पनाओं को स्थूल रूप में परिणत किया जाता है।
उपासना से आपकी अनन्य निष्ठ ने आपके जीवन को सच्चे ब्राह्मणत्व की प्रतिमा बना दिया है। अपनी भावना के प्रकाश से आप उस क्षेत्र में गायत्री माता का संदेश घर-घर पहुँचाने में संलग्न हैं।
उपासना का निर्देश दिया। उनके बताये हुए मार्ग पर चलते हुए मुझे कुछ ही महीने हुए हैं कि सेंट्रल गवर्नमेंट की एक अच्छी तरक्की की संभावना वाली सुविधा जनक नौकरी मिल गयी वेतन भी संतोषजनक है। पहले एक मास की वेतन गायत्री माता के लिए अर्पण कर रहा हूँ, क्योंकि माता की दी हुई सुविधा से प्रथम उनका सत्कार करना किसी सच्चे पुत्र का कर्तव्य है।
उपासना करने लगा। आश्चर्य तो देखिए कि मैं जिन जगहों के लिए कोशिश कर रहा था उससे कहीं-बड़ी और लगभग दूनी तनख्वाह की जगह के लिए आर्डर आ गया। अब मैं स्थायी और संतोषजनक तनख्वाह की जगह पाकर संतुष्ट हूँ।
उपासना के साथ-साथ दूसरों को भी इस पुण्य पथ का मार्गदर्शन करते रहते हैं, उनकी प्रेरणा से अनेकों को बड़े सत्परिणाम प्राप्त करने का सुअवसर मिला है। गायत्री तपोभूमि को अधिक सुविकसित करने की आपकी बड़ी भावना है।
उपासना। यह उपासना पद्धति प्रायः सभी धर्मों में पाई जाती है। नाम अत्यंत पवित्र माना जाता है और ईश्वर का नाम सबसे अधिक पवित्र है। ईश्वर के नाम की महिमा अतुलनीय मानी गई है, और ऐसा माना गया है कि यह पवित्र नाम ही परमेश्वर है। और यह सत्य भी है, क्योंकि यह विश्व नाम और रूप के अतिरिक्त और है ही क्या?
उपासना की विधियाँ बतलाई गई हैं।
उपासना की पृथक-पृथक विधियाँ तो बाद में स्वयं आ जाती हैं। धर्म का मूल आधार तो एक ईश्वर में विश्वास करना है। अगर हम यह समझ लें कि हम सबको एक ईश्वर ने उत्पन्न किया है और वह हमारा वास्तविक पिता है तो फिर हम किसी के साथ कभी भी बुरा या हानिकारक आचरण कैसे कर सकते हैं? ऐसे सर्वशक्तिमान और कल्याणकारी जगदीश्वर में अटल विश्वास और भक्ति करना ही धर्म का प्रथम सोपान है। जिस पर तुम्हारी भक्ति होगी, जिस पर तुम्हारा प्रेम होगा, उसकी प्रसन्नता के काम तुम अवश्य करोगे।
उपासना आरंभ करते हैं। उतावली एवं अधीरता में वे उतने दिन श्रद्धा को स्थिर नहीं रख पाते जितने की समुचित फल प्राप्त करने के लिए आवश्यकता है। पर कुछ नैष्ठिक साधक ऐसे होते हैं जो अपने व्रत को जीवन भर निबाहते है।
उपासना एवं सात्विकी सत्प्रवृत्तियों की बड़े उत्साह पूर्वक अभिवृद्धि हो रही है।
उपासना की पद्धतियाँ भिन्न-भिन्न हैं, तो भी धर्म का मूल रूप सर्वत्र एक है, और उन्हीं मूल सिद्धाँतों को आरंभिक अवस्था में हृदयंगम कराना चाहिए। धर्म की शेष क्रियाएँ, उपासना की पृथक-पृथक विधियाँ तो बाद में स्वयं आ जाती हैं। धर्म का मूल आधार तो एक ईश्वर में विश्वास करना है। अगर हम यह समझ लें कि हम सबको एक ईश्वर ने उत्पन्न किया है और वह हमारा वास्तविक पिता है तो फिर हम किसी के साथ कभी भी बुरा या हानिकारक आचरण कैसे कर सकते हैं? ऐसे सर्वशक्तिमान और कल्याणकारी जगदीश्वर में अटल विश्वास और भक्ति करना ही धर्म का प्रथम सोपान है।
उपासना करेंगे, तो सभी जगह उनका आदर सम्मान होगा। ईश्वर की भक्ति द्वारा जब तुम्हारे हृदय में कर्तव्य बुद्धि जागृत होगी और बुरे कामों से घृणा होगी तो तुम स्वयं ही ईश्वर को प्रसन्न करने वाले कामों को समझ जाओगे और वैसा ही आचरण करने लगोगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-June
उपासना के भौतिक और आत्मिक सत्परिणाम निश्चित रूप से दृष्टिगोचर होते हैं।
उपासना का भारी प्रचार हुआ है। वहाँ हवन और सत्संग पूरे उत्साह से होते हैं। नवरात्रियों में सामूहिक अनुष्ठान बड़ी श्रद्धा के साथ चलते हैं। धार्मिक वातावरण विनिर्मित करने में श्री माँगीलाल जी तथा उनके साथी बड़ी श्रद्धापूर्वक संलग्न हैं।
उपासना की सफलता में श्रद्धा और विश्वास सबसे बड़ा तत्व है। अन्य मनस्कता, उपेक्षा, अंधविश्वास, संदेह के तमसाच्छन्न मन से कई लोग थोड़ी उपासना करते हैं और अत्यन्त शीघ्र, अत्यधिक मात्रा में बड़े-बड़े भौतिक लाभ प्राप्त करना चाहते हैं, ऐसे लोगों को बहुधा असफलता और निराशा ही हाथ लगती है। किन्तु जिन्हें सच्ची उपासना की शक्ति पर विश्वास है, जो निष्ठापूर्वक श्रद्धा विश्वास के साथ माता का अंचल पकड़ते हैं, उन्हें प्रत्यक्ष सत्य की भाँति उपासना के भौतिक और आत्मिक सत्परिणाम निश्चित रूप से दृष्टिगोचर होते हैं।
उपासना करने के साथ-साथ लोक हित के लिए समय और शक्ति व्यय करके, प्रयत्न और पुरुषार्थ करने का भी व्रत लिया हुआ है। इस जमाने में अधिकाँश लोग स्वार्थी हैं। हर आदमी अपने मतलब में चौकस है। जिसमें अपना फायदा न हो उसे करने को एक कदम भी नहीं उठाना चाहता। साधु बाबा जी जो विरक्त और त्यागी दिखते हैं वे भी वस्तुतः पक्के स्वार्थी हैं।
उपासना को कोई जानता तक न था अब वहाँ सहस्रों आत्माओं में धर्म प्रेम की हिलोरें उठ रही हैं। जो भी व्यक्ति अपने संपर्क में आये उसके जीवन में कुछ धार्मिकता का समावेश करने की शिक्षा देते रहने का क्रम बना लिया जाय तो कोई भी सत्पुरुष अनेक लोगों की आत्मा को ऊँचा उठाने में समर्थ हो सकता है। श्री भगवती प्रसाद जी अपने विचारों में अटूट श्रद्धा रखने के कारण ही उतनी महत्वपूर्ण धर्म सेवा लम्बे समय से कर रहे हैं। जबकि अन्य लोगों का, देखा देखी का उत्साह कुछ ही दिन में ठण्डा पड़ जाता है।
उपासना में निष्ठ है। छः घण्टे से कम समय गायत्री उपासना में लगाये बिना इन्हें संतोष नहीं होता। अब झूठे सच्चे मुकदमे वालों की वकालत उन्होंने पूर्णतया छोड़ दी है और गायत्री माता की वकालत आरम्भ कर दी है। जगह-जगह जाकर गायत्री उपासना की महत्ता बताना, दोष दुर्गुणों को छोड़कर सज्जनता एवं सात्विकता अपनाने की शिक्षा देना, इन्हीं दो कार्यों में आपके उपासना से बचे हुए समय का उपयोग होता है। आज चारों आश्रमों का लोप होकर केवल एक गृहस्थाश्रम रह गया है।
उपासना न करने के लिए कोई न कोई कारण गिनाया जा सकता है पर वस्तुतः एक मात्र कारण अश्रद्धा आलस्य एवं अनुत्साह ही होता है। यह एक व्यापक कठिनाई है। इसका दोष किसी व्यक्ति विशेष को देना व्यर्थ है। इस अवसाद का कारण तो अन्तरिक्ष में व्याप्त हुआ-तमसाच्छन्न अदृश्य वातावरण ही है। इस अन्धकार को चीरने योग्य प्रकाश की व्यवस्था न होगी तो चलने वाला अनुभवहीन नया पथिक देर तक चलता न रह सकेगा।
उपासना करते हैं- हम घृणित और त्याज्य समझते हैं। इसलिये हमको कहना पड़ता है कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सिद्धाँत अब कथन मात्र को रह गया है।
उपासना के अतिरिक्त इन व्रतधारी कार्यकर्ताओं के प्रमुख कार्य यह होंगे। (1) गायत्री संस्था की विचारधारा और कार्यशैली पर अधिकाधिक गम्भीर विचार करना और उसकी उपयोगिता पर अपनी आस्था दिन-दिन बढ़ाये जाना। ताकि उस निष्ठ के आधार पर कुछ अधिक कार्य कर सकने की अन्तः प्रेरणा अपने भीतर दिन-दिन तीव्र गति से प्रस्फुटित होती रहे। (2) अपने अवकाश के समय में से ऐसा समय धर्मफेरी के लिए निकालना जो लोगों को भी सुविधाजनक हो। उस समय का लोगों के घरों पर जाना और संगठन, सामूहिक कार्य शैली तथा सच्चरित्रता संच्चत्रित एवं साँस्कृतिक विचार धारा की महत्ता समझाना (3) सप्ताह में कम से कम अपने एक दिन के भोजन के बराबर पैसों का सद्ज्ञान प्रसार के लिए दान करना।
उपासना की उपयोगिता और आवश्यकताओं को मानते हैं अपने कल्याण के लिये उसे अनिवार्य भी समझते हैं इतने पर भी भीतर से उसकी क्रिया को करने के लिए तीव्र उत्साह नहीं जगता। जो थोड़ी गर्मी आती है सो भी आलस्य और उत्साह के तमसाच्छन्न वातावरण में ठण्डी पड़ जाती है। इस जमाने में तब तक कोई धर्म-चेतना जीवित नहीं रह सकती जब तक उसे सजीव रखने के लिए कुछ विशेष प्रयत्न न किये जावें।
उपासना करने वालों की संख्या अब संतोषजनक हो चली है और लगता है कि यह प्रगति आगे भी चलती रहेगी अब इन दिनों अपने परिवार द्वारा प्रतिदिन 24 लक्ष सामूहिक अनुष्ठान की पूर्ति होती है। जिस दिन नित्य 24 करोड़ जप सामूहिक अनुष्ठान के अंतर्गत होने लगेगा, उसी दिन से भारत की आध्यात्मिक अन्तरात्मा जाग पड़ेगी और ऋषियों के प्राचीन युग का प्रमाण इस भूमि पर प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगेगा। गायत्री संजीवनी विद्या है। उससे मृत जी सकते हैं, निष्प्राण प्राणवान हो सकते हैं। भारतीय भूमि और भारतीय संस्कृति में नव चेतना का प्रादुर्भाव होना भी गायत्री महामंत्र की प्रचण्ड शक्ति द्वारा पूर्णतया संभव है।
उपासना बड़ी श्रद्धापूर्वक करते हैं। साप्ताहिक हवन, सत्संग उत्साहपूर्वक होते रहते हैं। कितने ही उत्साही सज्जन उनके सहयोगी हैं, जिनके सहयोग से झाँसी में समय-समय पर बड़े यज्ञानुष्ठान होते रहते हैं। गत वर्ष आषाढ़ में एक बहुत बड़ा यज्ञ हुआ था। अब इसी मास 25 कुण्डों का गायत्री महायज्ञ तथा बुन्देलखण्ड प्रान्तीय गायत्री परिवार सम्मेलन का सफल आयोजन किया है।
उपासनाओं में स्थान प्राप्त कर लेगी तभी यह कहा जा सकेगा कि भारतीय समाज से एक भारी अभाव की पूर्ति हुई।
उपासना से बचे हुए समय का उपयोग होता है। आज चारों आश्रमों का लोप होकर केवल एक गृहस्थाश्रम रह गया है। आज का मनुष्य जब से होश संभालता है और जब तक मरता है तब तक केवल स्वार्थ, संग्रह और भोग विलास में ही अपना मन लगाये रहता है। यह आदर्श भुला दिया गया है कि ढलती आयु में परिवार संचालन को बोझ समझकर लड़कों पर छोड़ शेष आयु आत्म-कल्याण एवं जन सेवा में लगाई जानी चाहिए। श्री उमाकान्त जी वानप्रस्थ आश्रम की जीवित प्रतिमूर्ति हैं।
उपासना के चमत्कार स्वयं अपने संबंध में देखे हैं और अनेकों को भारी विपत्तियों से माता का सहारा दिलाकर पार कराया है। इस अंक में श्री जैतली का एक लेख छपा है जिसमें उनने अपने निजी के अनुभव का वर्णन किया है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि गहरी निष्ठ वाले उपासक अपना निज का तथा दूसरों का कितना बड़ा हित साधन कर सकता है जबकि अश्रद्धालु और अंधविश्वासी लोग असफलता का रोना रोते रहते हैं।
उपासना करने वालों में से केवल एक माला के जप को भी लोग आलस्यवश छोड़ बैठते है। यों कहने को तो सत्संग में न आने, उपासना न करने के लिए कोई न कोई कारण गिनाया जा सकता है पर वस्तुतः एक मात्र कारण अश्रद्धा आलस्य एवं अनुत्साह ही होता है। यह एक व्यापक कठिनाई है। इसका दोष किसी व्यक्ति विशेष को देना व्यर्थ है। इस अवसाद का कारण तो अन्तरिक्ष में व्याप्त हुआ-तमसाच्छन्न अदृश्य वातावरण ही है।
उपासना से दूर रखने का प्रयत्न करते हैं पर मानवता के जगते हुये अधिकार की प्रचण्ड शक्ति के आगे उनका बस नहीं चल पा रहा है।
उपासना की शक्ति पर विश्वास है, जो निष्ठापूर्वक श्रद्धा विश्वास के साथ माता का अंचल पकड़ते हैं, उन्हें प्रत्यक्ष सत्य की भाँति उपासना के भौतिक और आत्मिक सत्परिणाम निश्चित रूप से दृष्टिगोचर होते हैं।
उपासना के अनेक लाभ हैं। इससे भौतिक जीवन की अनेक कठिनाइयों तथा कमियों की पूर्ति में सहायता मिलती है। आत्मबल का विकास होकर अनेक दुर्गुणों का शमन और अनेक सद्गुणों का विकास होता है बुद्धि में सात्विकता एवं दूरदर्शिता की प्रतिष्ठापना होती है। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ा लाभ भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान का है। जो कुछ हिन्दू धर्म में है वह सब गायत्री मंत्र में मौजूद है।
उपासना का भारी प्रचार हो चला है। सैकड़ों नहीं हजारों की संख्या में नैष्ठिक गायत्री उपासना बड़ी श्रद्धापूर्वक करते हैं। साप्ताहिक हवन, सत्संग उत्साहपूर्वक होते रहते हैं। कितने ही उत्साही सज्जन उनके सहयोगी हैं, जिनके सहयोग से झाँसी में समय-समय पर बड़े यज्ञानुष्ठान होते रहते हैं। गत वर्ष आषाढ़ में एक बहुत बड़ा यज्ञ हुआ था।
उपासना में लगाये बिना इन्हें संतोष नहीं होता। अब झूठे सच्चे मुकदमे वालों की वकालत उन्होंने पूर्णतया छोड़ दी है और गायत्री माता की वकालत आरम्भ कर दी है। जगह-जगह जाकर गायत्री उपासना की महत्ता बताना, दोष दुर्गुणों को छोड़कर सज्जनता एवं सात्विकता अपनाने की शिक्षा देना, इन्हीं दो कार्यों में आपके उपासना से बचे हुए समय का उपयोग होता है। आज चारों आश्रमों का लोप होकर केवल एक गृहस्थाश्रम रह गया है। आज का मनुष्य जब से होश संभालता है और जब तक मरता है तब तक केवल स्वार्थ, संग्रह और भोग विलास में ही अपना मन लगाये रहता है।
उपासना की महत्ता बताना, दोष दुर्गुणों को छोड़कर सज्जनता एवं सात्विकता अपनाने की शिक्षा देना, इन्हीं दो कार्यों में आपके उपासना से बचे हुए समय का उपयोग होता है। आज चारों आश्रमों का लोप होकर केवल एक गृहस्थाश्रम रह गया है। आज का मनुष्य जब से होश संभालता है और जब तक मरता है तब तक केवल स्वार्थ, संग्रह और भोग विलास में ही अपना मन लगाये रहता है। यह आदर्श भुला दिया गया है कि ढलती आयु में परिवार संचालन को बोझ समझकर लड़कों पर छोड़ शेष आयु आत्म-कल्याण एवं जन सेवा में लगाई जानी चाहिए। श्री उमाकान्त जी वानप्रस्थ आश्रम की जीवित प्रतिमूर्ति हैं।
उपासना करने वाले सदस्यगण (2) पत्र व्यवहार एवं व्यवस्था करने वाला एक मंत्री, यह दो ही विभाग थे। अब एक तीसरी श्रेणी ‘व्रतधारी सक्रिय कार्यकर्ताओं’ की और बनाई जा रही है। प्रत्येक शाखा संगठन की कार्यकर्त्ती सेना एवं प्राणवाहिनी धमनी, एवं पथ प्रदर्शक प्रकाश ज्योति की भाँति यह तीसरी श्रेणी ही रहेगी। अपनी निज की उपासना के अतिरिक्त इन व्रतधारी कार्यकर्ताओं के प्रमुख कार्य यह होंगे। (1) गायत्री संस्था की विचारधारा और कार्यशैली पर अधिकाधिक गम्भीर विचार करना और उसकी उपयोगिता पर अपनी आस्था दिन-दिन बढ़ाये जाना।
उपासना की कोई न जरूरत होती। इसलिए हमें यही स्वीकार करना पड़ता है कि परमात्मा मनुष्य की आत्मा का सबसे श्रेष्ठ रूप है।
उपासना करने वाले- गायत्री परिवार के सदस्यों की संख्या अब इतनी हो चुकी है जिस पर प्रसन्नता प्रकट की जा सकती है। यों प्रत्येक हिन्दू धर्मानुयायी का परम् उपास्थ मंत्र गायत्री उसी प्रकार है जिस प्रकार मुसलमानों का कलमा। वह मुसलमान किस काम का जो कलमा नहीं जानता। वह हिन्दू भी अपने धर्म से दूर है जिसे गायत्री उपासना से अनभिज्ञता या अरुचि है। इसलिए शिखा सूत्र की भाँति जब गायत्री माता भी प्रत्येक हिन्दू की उपासनाओं में स्थान प्राप्त कर लेगी तभी यह कहा जा सकेगा कि भारतीय समाज से एक भारी अभाव की पूर्ति हुई।
उपासना करते हैं और अत्यन्त शीघ्र, अत्यधिक मात्रा में बड़े-बड़े भौतिक लाभ प्राप्त करना चाहते हैं, ऐसे लोगों को बहुधा असफलता और निराशा ही हाथ लगती है। किन्तु जिन्हें सच्ची उपासना की शक्ति पर विश्वास है, जो निष्ठापूर्वक श्रद्धा विश्वास के साथ माता का अंचल पकड़ते हैं, उन्हें प्रत्यक्ष सत्य की भाँति उपासना के भौतिक और आत्मिक सत्परिणाम निश्चित रूप से दृष्टिगोचर होते हैं।
उपासना से अनभिज्ञता या अरुचि है। इसलिए शिखा सूत्र की भाँति जब गायत्री माता भी प्रत्येक हिन्दू की उपासनाओं में स्थान प्राप्त कर लेगी तभी यह कहा जा सकेगा कि भारतीय समाज से एक भारी अभाव की पूर्ति हुई।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-July
उपासना चैत्र की नवरात्रि के अवसर पर प्रति वर्ष माता का मेला भरवाने का निश्चय किया है। इस प्रकार ताराचंद जी पालीवाल तथा अन्य कई ने प्रति वर्ष गायत्री महायज्ञ का भी निश्चय किया है। 55 सदस्यों ने 24-24 हजार का अनुष्ठान का संकल्प किया है।
उपासना करो-रक्षा कवच भेज रहे हैं, इसे धारण कर लें। मैंने ऐसा ही किया। कुछ समय उपराँत स्वास्थ्य में आशातीत सुधार हुआ। मैंने और भी अधिक निष्ठापूर्वक माता की उपासना की। कुछ ही समय में मैं बिल्कुल स्वस्थ हो गया।
उपासना की महिमा पर प्रकाश डाला गया। इस वर्ष में सागौनभाड़ी की शाखा में 31 लाख जप व 25 हजार मंत्र लेखन हुआ।
उपासना नियमित रूप से चल रही है।
उपासना की। कुछ ही समय में मैं बिल्कुल स्वस्थ हो गया। इसके पश्चात मथुरा विशद् गायत्री महायज्ञ में भी जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। यहाँ से मैं इतना प्रभावित हो गया हूँ कि अब आत्म कल्याण का प्रयत्न करते हुए जन कल्याण के लिए भी सतत् प्रयत्नशील रह कर वेद माता का अधिक से अधिक प्रचार कर रहा हूँ। यह मुझ पर माता की ही महान अनुकम्पा है।
उपासना तथा हवन प्रारम्भ किया। इसके कुछ समय उपराँत मेरे पेट का दर्द बिल्कुल ठीक हो गया। ऐसी वात्सल्यमयी माँ के अनुग्रह का सदैव आभारी रहूँगा।
उपासना करने के लिए प्रोत्साहित किया। मैंने तुरंत ही साधना प्रारम्भ कर दी। कुछ समय उपराँत ही आशातीत सफलता प्राप्त हुई अर्थात् अस्थायी नौकरी मिल गयी। मैं नियमित साधना करता ही रहा। इसके फलस्वरूप मेरी नौकरी स्थायी हो गयी।
उपासना के लिए प्रोत्साहित किया। मैंने उनकी सद्प्रेरणा से चैत्र की नवरात्रि में ही सर्व प्रथम एक लघु अनुष्ठान किया। इसी मध्य में मात्रा की विशेष कृपा से मेरे पतिदेव का वेतन 150 रुपये हो गया। माता के इस चमत्कार को कोटि-कोटि नमस्कार है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-October
उपासना कर रहे हैं। पर कितने ही उपासक ऐसे भी हैं अपने लाभ की अपेक्षा दूसरों को सुख शाँति के मार्ग पर अग्रसर करने के लिये गायत्री परिवार का कार्य में बड़े उत्साह से संलग्न हैं। वस्तुतः ब्रह्मदान और ज्ञान-यज्ञ संसार का सबसे बड़ा परमार्थ है। दूसरों को ज्ञान-दान देने में आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने में- जो परिश्रम किया जाता है, उससे अनेक आत्माओं को प्रकाश मिलता है। इस प्रकाश से उत्पन्न सुख−शांति, धर्म का श्रेय उस प्रेरणा देने वाले व्यक्ति को भी मिलता है।
उपासना में लगे- दोनों ही श्रेणी के व्यक्तियों में स्वार्थी और परमार्थी देखे जाते हैं। जिस प्रकार बहुत से स्वार्थी दुकानदार केवल दूसरों से मुनाफा उठाकर रुपया कमाना ही अपना लक्ष्य रखते हैं, उसी प्रकार भजनानन्दियों में भी अनेक ऐसे पाये जाते हैं जो केवल अपने लिये स्वर्ग मुक्ति प्राप्त करने की चेष्टा में तल्लीन रहते हैं। अनेक सन्त-महन्त तो ऐसे भी मौजूद हैं, जो दूसरों के दान पर सुख से रहते हैं पर किसी की सेवा या उपकार नाम मात्र को भी नहीं करते, केवल अपने ही लिए ‘पुण्य’ उपार्जन में लगे रहते हैं। ऐसे लोग देखने में भले ही साधु-संन्यासी लगें, कपड़े भले ही लाल-पीले पहन लें, पर वस्तुतः वे उस स्वार्थी दुकानदार से कम नहीं होते जो मुनाफा तो सबसे उठाता है, पर काम केवल अपने ही मतलब से रखता है। सच पूछा जाय तो भारतीय- समाज, विशेषतः हमारी हिन्दू- जाति के पतन का कारण यही है कि हमारे साधु-संत नामधारियों ने लोक-हित की ओर से मुँह मोड़कर केवल निजी स्वार्थ को ही अपना लक्ष्य बना लिया।
उपासना का प्रचार हुआ।
उपासना का भाव फैला है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-May
उपासना हो रही थी, उसे भी उन्होंने स्वीकार कर लिया, केवल इतना कहा कि वे सब भी उसी एक परम महान ईश्वर के अधीन हैं-
उपासना सम्बन्धी प्रगति, शंका, कठिनाई एवं आगामी कदम के सम्बन्ध में परामर्श (3)इस वर्ष के अत्यन्त महत्वपूर्ण ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान पर विचार-विनिमय। (4) गायत्री परिवार की शाखा संस्थाओं की प्रगति एवं भावी योजनाओं का निर्धारण। (5) साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के लिए आगामी वर्ष की रूप रेखा। (6) परिजनों के व्यावहारिक जीवन में उपस्थित समस्याओं पर आवश्यक मार्ग-दर्शन। (7) विश्व की मानव जाति की, वर्तमान स्थिति को समझना और उसे सुलझाने का मार्ग ढूँढ़ना।
उपासना ही, ईश्वराधना का तत्व ज्ञान है। इस दार्शनिक तथ्य को अध्याय, सत्संग, साधन, कर्मकाण्ड, दान-पुण्य आदि अनेक प्रकारों के माध्यम से हृदयंगम करने का प्रयत्न किया जाता है। परम्पराओं के अनुसार धर्म तंत्र के यह विधि-विधान तो चलते रहते हैं पर कालान्तर में उनके भीतर छिपे हुए- सिद्धान्तों, आदर्शों और तथ्यों को लोग भूलने लगते हैं। ब्राह्मणों-ऋषियों का कार्य इन उपचारों की सहायता से जन-साधारण की अन्तरात्मा में देवत्त्व की मनोवृत्ति को प्रदीप्त करना होता है। साधारण जनता के उथले मानसिक स्तर को देखते हुए वे अनेक आयोजनों की व्यवस्था करते हैं पर मूल लाभ एक ही रहता है कि मनुष्य अपनी शक्तियों से केवल अपना ही लाभ न सोचे-उसे अपनी क्षमता द्वारा दूसरों का हित करते रहने के महान तथ्य का भी ध्यान रहे-कम से कम दूसरों के अधिकारों का अनीतिपूर्वक हनन तो न करे।
उपासना का आयोजन बड़े विशाल रूप में हुआ। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के निर्धारित जप,पाठ लेखन हवन में अभी कमी है। उपासकों को अभी कुछ और अधिक परिश्रम करना पड़ेगा तभी निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-November
उपासना की पूँजी में से दस हजार गायत्री जप का संकल्प करके माता से प्रार्थना की कि मेरे भाई की रक्षा करो। साथ ही अपनी धर्म-पत्नी को भड़का गाँव के लिए रवाना कर दिया। जब वह दूसरे दिन वहाँ पहुँची तो मेरे भाई व उसकी स्त्री को बिलकुल स्वस्थ पाया। माता अपने भक्त की पुकार सब तरह सुनती हैं।”
उपासना हनुमान मन्दिर में ता. 24 सि. से शुरू की गई। इस कार्यक्रम में 35 साधकों ने भाग लिया जो प्रातः 4 बजे से रात के 10 बजे तक धर्म कार्यों में संलग्न रहते थे। 60 हजार आहुतियों का हवन हुआ और 240 चालीसा तथा 240 गायत्री चित्र नवमी को बाँटे गये। कुमारी कन्याओं को भोजन कराया गया और 1 मन का प्रसाद बाँटा गया। सर्वश्री सेठ चम्पालाल जी, बनारसीलाल जी अग्रवाल, शीतलप्रसादजी पाण्डे वैद्यराज, कंचन लाल जी अग्रवाल, रामेश्वरजी अग्रवाल, रामस्वरूपजी अग्रवाल, श्री लालसिंह ठाकुर, हरिलालजी अग्रवाल, चन्द्रलाल उजवने ने धन से सहायता देकर कार्य को सफल बनाया।
उपासना और प्रार्थना करने से पुत्र उत्पन्न हुआ। गायत्री जप द्वारा मैंने कितने ही लोगों के बुरे व्यसन छुड़ा दिए।”
उपासना का अनुष्ठान किया गया, जिससे परम शाँति का अनुभव हुआ।
उपासना का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसी प्रकार मेरे दस वर्ष से सन्तान नहीं होती थी। अब माता की उपासना और प्रार्थना करने से पुत्र उत्पन्न हुआ। गायत्री जप द्वारा मैंने कितने ही लोगों के बुरे व्यसन छुड़ा दिए।”
उपासना एवं यज्ञ आयोजन के परम पुनीत कार्यों में लगे हुए लोगों को सत्कर्म से हटाने में जी तोड़ कोशिश करते हैं। शास्त्र-शिक्षा सर्वत्र होते हुए जुआ, चोरी, व्याभिचार, असत्य, छल, पाखण्ड, नशा आदि बुराइयों के विरुद्ध जिनकी जीत जीवन भर नहीं खुली वे लोग गायत्री जप और यज्ञानुष्ठान न करने देने में अड़ंगे लगाकर ‘शास्त्र-रक्षा’ की बात करते हैं यह संसार का एक अनोखा आश्चर्य है। असुरता अपना छद्मवेश बनाकर अनेक मंथराओं की जीभ पर जा बैठती है और उनसे मारीच, सुबाहु, ताड़का, खरदूषण आदि यज्ञ-विरोधियों का कार्य अनायास ही करा लेती है।
उपासना के लिये प्रेरणा देने में लगाना होगा।
उपासना कर रहा हूँ। बैसाख सुदी पंचमी सं. 2014 को माताजी का दिन था। हवन के बाद रात्रि में चालीस का पाठ व रामचरित मानस पर प्रवचन हुआ। घर के सभी व्यक्ति हवन-स्थल में ही थे कि घर में चोरों ने सेंध लगाना शुरू किया। हवन से आकर हम सब लोग सो गये और इधर चोरों ने सेंध पूरी करके भीतर घुसने की तैयारी की।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-December
उपासना का ज्ञान पनपेगा, जिससे विश्व को सच्चा संरक्षण और शान्ति प्राप्त हो सकेगी।
उपासना कर रहे थे। जिसने माता की शरण ली, वह अवश्य सफल हुआ यह मेरा अनुभव है।
उपासना करने को कहा। इस पर सब बच्चे और स्त्री गायत्री जप करने लगे। माता की कृपा से एक सप्ताह के भीतर ही मेरा रोग पूर्णतया शाँत होकर इस संकट से छुटकारा मिला।
उपासना करते हैं, कुछ तो स्वप्न में भगवान के दर्शन तक करते हैं। इसका अर्थ यह है कि मन मूलतः पाशविक नहीं है। वह विकृत हो जाता है और प्रयत्न से उसे शुद्ध किया जा सकता है। हमारे शास्त्रों में मन की उत्पत्ति अहंकार के सत्वाँश से मानी गई है। वह सत्व स्वरूप है।
उपासना में लगाने जैसे सामान्य संकल्प को भी छोड़ बैठते हैं। सामूहिक सत्संग और आयोजनों में जाने का महत्व नहीं समझ पाते और धर्म-फेरी जैसी सच्ची तीर्थ-यात्रा में, सभी प्रदक्षिणा परिक्रमा में अपनी हेठी, तौहीन, बेइज्जती समझते हैं। ऐसी उलटी बुद्धि की प्रधानता मनुष्य की आत्मिक हीनावस्था एवं प्रगति अवरुद्धता का चिन्ह है। समझना चाहिये माता ने इनकी आन्तरिक गन्दगी देखकर अपनी शरण में नहीं लिया। जिसे वे प्यार करती हैं उसे और कोई वस्तु चाहे दें चाहे न दें पर एक चीज निश्चित रूप से देती हैं- सन्मार्ग की प्रेरणा।
उपासना से विमुख आत्माओं को उद्बोधन-दिव्य प्रसाद देने का ब्रह्म-भोज निश्चित रूप से अत्यन्त ही महान पुण्य होगा। यदि इन 24 ‘ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान अंक’ का प्रसाद ग्रहण करने वालों में से एक भी व्यक्ति साधना-पथ पर अग्रसर हुआ तो उस वितरणकर्ता दानी का पुण्य-हजार मनुष्यों को लड्डू, कचौड़ी खिलाने की अपेक्षा निश्चित रूप से कहीं अधिक हो गया।
उपासना, साधना, जप, तप, धर्म एवं आध्यात्म की शक्ति एवं उपयोगिता पर विश्वास करते हैं उनके लिए इस समय की सर्वोत्तम साधना यही हो सकती है कि अन्तरिक्ष में फैले हुए विषाक्त आसुरी वातावरण को शान्त करने एवं दिव्य विचारधारा को फैलाने के लिए धर्म-प्रसार की साधना में लग जावें। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में साधना और लोक शिक्षा दोनों ही कार्य-क्रम सन्निहित हैं। इस साधना में स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही एक साथ सधते हैं। इस श्रेय पथ पर अनेक व्यक्तियों को लगाते हुए सूक्ष्म वातावरण को शुद्ध करने की अनुष्ठानात्मक प्रक्रिया से संसार की जड़-चेतन आत्माओं पर छाई हुई विपत्ति घटती है, इस परमार्थ से असंख्यों का अन्धकारमय भविष्य प्रकाशवान बनता है। ऐसे शुभ कार्य में संलग्न होना इतना बड़ा परमार्थ है कि उसका कर्त्ता भारी पुण्य फल का अधिकारी हो जाता है।
उपासना सच्चे मन से होगी तो हमारा हर तरह से कल्याण ही होगा।
उपासना में संलग्न हुये थे। 1955 की चैत्र
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-October
उपासना करने से भी सहायता मिल सकती है। इसे योग कहते हैं। योग का तात्पर्य है- जुड़ना। किसके साथ जुड़ना? विराट ब्रह्म, समग्र समाज के साथ अपने को जोड़ना और क्षुद्र स्वार्थपरता के-सीमा बन्धन शिथिल करने का अभ्यास करना।
उपासना तथा निर्गुण उपासना। श्रद्धावान साधक अपने मनोरंजन में आरोपित भावनाओं से जिस तत्व की अनुभूति करता है उसी तत्व के विभिन्न स्वरूप की अनुभूति बुद्धि से भी हो सकती है। ‘एकम् सत्य विप्रा बहुधावदरन्ति’ सत्य एक ही है, विद्वतजन् उसका विभिन्न स्वरूपों में दर्शन करते हैं। इसी दर्शन के कारण भारत में चार्वाक जैसे ईश्वर को इंकार करने वाले सांख्य, जैन, बौद्ध आदि अर्ध ईश्वरवादी एवं अनेक देववाद को मानने वाले, विभिन्न विचार धाराओं वाले व्यक्तियों के बीच भी अन्योन्याश्रित प्रेम और आदर पाया जाता है। ठीक इसी तरह विज्ञान की चरम सीमा तक पहुँचने वाले मनीषी भी भारतीय तत्व ज्ञान में अपने ही मत का समर्थन अपने ही तौर तरीके से दर्शन कर सकते हैं।
उपासना और सत्संग प्रवचन के उपरान्त वे अपना बचा हुआ समय लोकोपयोगी कार्यों में लगाते थे?
उपासना। श्रद्धावान साधक अपने मनोरंजन में आरोपित भावनाओं से जिस तत्व की अनुभूति करता है उसी तत्व के विभिन्न स्वरूप की अनुभूति बुद्धि से भी हो सकती है। ‘एकम् सत्य विप्रा बहुधावदरन्ति’ सत्य एक ही है, विद्वतजन् उसका विभिन्न स्वरूपों में दर्शन करते हैं। इसी दर्शन के कारण भारत में चार्वाक जैसे ईश्वर को इंकार करने वाले सांख्य, जैन, बौद्ध आदि अर्ध ईश्वरवादी एवं अनेक देववाद को मानने वाले, विभिन्न विचार धाराओं वाले व्यक्तियों के बीच भी अन्योन्याश्रित प्रेम और आदर पाया जाता है। ठीक इसी तरह विज्ञान की चरम सीमा तक पहुँचने वाले मनीषी भी भारतीय तत्व ज्ञान में अपने ही मत का समर्थन अपने ही तौर तरीके से दर्शन कर सकते हैं।
उपासना का विधि-विधान देखने को मिलता है। भूकम्पों की पूर्व सूचना भी इनके संकेतों के आधार पर होती है।
उपासना में अत्याधिक रुचि लेते रहे होंगे। वहाँ के फारूह सम्राट को मरणोपरान्त ‘सन वोट’ में देवताओं द्वारा स्वर्ग में ले जाने के संकेत स्पष्ट परिलक्षित होते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-January
उपासना-चर्चा में, प्रयुक्त करते आए हैं। उभारा और प्रतिपादित किया जा सके तो उपलब्ध अनेकानेक गंधों से मानव जाति को लाभ दिया जा सकता है। मूल प्रवृत्तियों के आदिम रूप को देवत्व परक मोड़ मिलने पर इस ज्ञानेन्द्रिय की उपलब्धि की सार्थकता भी सिद्ध होगी।
उपासना में भी चूक नहीं करता फिर भी न मेरा लक्ष्य ही पूरा होता दिखाई पड़ता है, न भीतर का सन्तोष ही मुझे प्राप्त है।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-March
उपासनाएँ करते हैं। कबीर पन्थ, राधा स्वामी पन्थ आदि में नाद योग की साधना ही प्रधान है।
उपासना उपक्रम में उन्हीं तथ्यों का सार संक्षेप एवं संकेत है जिनके सहारे व्यक्ति को अपने कषाय−कल्मषों का परिमार्जन करने का प्रयास संकल्प पूर्वक करते रहने की प्रेरणा मिलती रहे। शरीर में दुष्प्रवृत्तियों का अभ्यास रहता है और मन में अनेकों दुर्भावनाएँ जन्म−जन्मान्तरों से लिपटी चली आती हैं। इनका परिशोधन आवश्यक है। कपड़ा रँगने से पहले उसे अच्छी तरह धोया जाता है। मैले−कुचैले तेल, तारकोल में सने कपड़े पर कोई भी रंग चढ़ाया जाय, चढ़ेगा ही नहीं।
उपासना करने वालों के आगे−पीछे देवी−देवता रहते हैं और वे अपने भक्तों की ही नहीं उनके संकेतों के अनुरूप शाप वरदान भी देते हैं। धार्मिकता की कसौटी किसी जमाने में चमत्कार दिखाने को माना जाने लगा। फलतः तन्त्र-मन्त्र जानने वाले और जादूगरी करामातें दिखाने वालों की बन आई। वे अपने को सच्चा और प्रभावशाली सिद्ध करने लगे।
उपासना का भी महत्व है ताकि उस आधार पर हमें हमारे कर्त्तव्य और लक्ष्य का बोध निरन्तर बना रहे। उपासना उपक्रम में उन्हीं तथ्यों का सार संक्षेप एवं संकेत है जिनके सहारे व्यक्ति को अपने कषाय−कल्मषों का परिमार्जन करने का प्रयास संकल्प पूर्वक करते रहने की प्रेरणा मिलती रहे। शरीर में दुष्प्रवृत्तियों का अभ्यास रहता है और मन में अनेकों दुर्भावनाएँ जन्म−जन्मान्तरों से लिपटी चली आती हैं। इनका परिशोधन आवश्यक है। कपड़ा रँगने से पहले उसे अच्छी तरह धोया जाता है।
उपासना का कर्मकाण्ड है। उसे शोभा-सज्जा की श्रेणी में गिना गया है। चरित्र स्वास्थ्य है और उपचार उस पर चढ़ाया हुआ श्रृंगार। दोनों साथ−साथ चलें तो शोभा होती है पर यदि स्वास्थ्य गल गया हो। मृत्यु सिर पर मंडराई हो तो रेशमी वस्त्र और स्वर्ण अलंकार और तेल फुलेल लगा देने पर भी स्थिति उपहासास्पद बनी रहेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-April
उपासना का वर्तमान चरण सूक्ष्मीकरण के रूप में चल रहा है। इस प्रक्रिया के पीछे किसी व्यक्ति विशेष की ख्याति, सम्पदा, वरिष्ठता या विभूति नहीं है। एकमात्र प्रयोजन यही है कि मानवी सत्ता और गरिमा के लड़खड़ाते हुए पैर स्थिर हो सकें। पाँच वीरभद्रों के कन्धों पर वे अपना उद्देश्य लादकर उसे सम्पन्न भी कर सकते हैं। हनुमान के कन्धों पर राम और लक्ष्मण दोनों बैठे फिरते थे।
उपासना, साधना। दिन में परमार्थ प्रयोजन की आराधना। सम्भव हुआ तो जौ की रोटी। न सम्भव हुआ तो परोसे गए सामान में से जो सात्विक हो उसका चयन। यह दोनों क्रम साथ-साथ चलते रहे।
उपासना क्रम समझाया। गायत्री पुरश्चरणों की श्रृंखला बताई। इसके साथ पालन करने योग्य नियम बताये, साथ ही स्वतन्त्रता संग्राम में एक सच्चे स्वयंसेवक की तरह काम करते रहने के लिये कहा।
उपासना, साधना और आराधना में - “साधना” ही प्रमुख है। उपासना का कर्मकाण्ड कोई नौकरी की तरह भी कर सकता है। आराधना - पुण्य परमार्थ को कहते हैं। जिसने अपने को साध लिया है, उसके लिए और कोई काम करने के लिए बचता ही नहीं। उत्कृष्टता सम्पन्न मन अपने लिए सबसे लाभदायक व्यवसाय पुण्य परमार्थ ही देखता है।
उपासना करने का विधि-विधान बताया था। छोटी उम्र थी पर से पत्थर की लकीर की तरह माना और विधिवत् निभाया। कोई दिन ऐसा नहीं बीता जिसमें नागा हुई हो। साधना नहीं तो भोजन नहीं। इस सिद्धान्त को अपनाया।
उपासना के लिए पर्याप्त होने चाहिए। स्नान का बन्धन वहाँ नहीं रहा। मध्याह्न को ही नहाना और कपड़े सुखाना सम्भव होता था। इसलिए परिस्थिति के अनुरूप दिनचर्या बनानी पड़ी। दिनचर्या के अनुरूप परिस्थितियाँ तो बन नहीं सकती थी।
उपासना तो समय काटने का एक व्यवसाय बन गया।
उपासना का कर्मकाण्ड कोई नौकरी की तरह भी कर सकता है। आराधना - पुण्य परमार्थ को कहते हैं। जिसने अपने को साध लिया है, उसके लिए और कोई काम करने के लिए बचता ही नहीं। उत्कृष्टता सम्पन्न मन अपने लिए सबसे लाभदायक व्यवसाय पुण्य परमार्थ ही देखता है। इसी में उसकी अभिरुचि और प्रवीणता बन जाती है।
उपासना का प्रतिफल भी। इसलिए संदेह करने की गुंजाइश नहीं है। समय आने पर सब हो जायेगा। साथ ही सर्वसाधारण को यह भी विदित हो जायेगा कि सच्चे साधक की सच्ची साधना का कितना चमत्कारी प्रतिफल होता है। यह तुम्हारे कार्यक्रम का प्रथम चरण है।
उपासना क्रम में कभी एक दिन भी विघ्न न आया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-September
उपासना आत्मशक्ति अभिवर्धन का सरल किन्तु श्रेष्ठतम उपाय है। जो इसके लिए प्रयत्न करते हैं वे समर्थ, सफल और सार्थक जीवन जीकर धन्य बनते हैं।
उपासना से ही सिद्धि या अंतःकरण में स्थित परमात्म देव के दर्शन सम्भव होते हैं।
उपासना स्थलों की श्रृंखलाएं हैं, वे विविधता की परिचायक है। अपनी स्थिति, प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण तो वे देखने योग्य हैं ही, सिद्ध पीठ शक्ति स्थल होने के नाते भी वे जाने योग्य हैं। वहाँ समय निकालकर पैदल जाने एवं साधना करने का अपना अलग आनन्द है। फिर भी अभी इस क्षेत्र की जनसाधारण में चार धामों के अतिरिक्त जानकारी का अभाव ही है।
उपासना की जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-August
उपासना वाले हंसारूढ़ देवमाता को प्रतीक बनाते हैं और निराकारवादी प्रातःकाल के उदीयमान स्वर्णिम सूर्य-सविता का ध्यान करते हैं। ध्यान या पूजन के साथ घनिष्ठ आत्मीयता की भावना करना आवश्यक है।
उपासना का तात्पर्य भी पात्रता विकसित करना भर है। न कि ईश्वर को फुसलाना।
उपासना में इष्टदेव की प्रतिमा इसी प्रयोजन के लिए कल्पित करनी पड़ती है और उस कल्पना में घनिष्ठता का पुट लगाना पड़ता है।
उपासना प्रेमियों के सम्मुख उद्घाटित किया है।
उपासना में साकार उपासना वाले हंसारूढ़ देवमाता को प्रतीक बनाते हैं और निराकारवादी प्रातःकाल के उदीयमान स्वर्णिम सूर्य-सविता का ध्यान करते हैं। ध्यान या पूजन के साथ घनिष्ठ आत्मीयता की भावना करना आवश्यक है।
उपासना का आनन्द नहीं मिला। परिशोधन भक्त की अनिवार्य कसौटी है। उसका श्रेय चाहे भक्त स्वयं ले ले या भगवान को दे दे। पर है इस प्रक्रिया की हर हालत में अनिवार्यता। मनुष्य एक ओर तो अनाचाररत रहे और दूसरी और उथले कर्मकाण्डों के बल पर ईश्वरीय अनुकम्पा का आनन्द लेना चाहे तो उसे अब तक की परम्परा और शास्त्र मर्यादा के सर्वथा प्रतिकूल ही समझना चाहिए।
उपासना को आरम्भ कर दें तो उससे प्रकट होने वाली शक्ति आक्रमणकारियों के हौंसले पस्त कर सकती है।”
उपासना की विशेषतया इसी निमित्त आवश्यकता पड़ती है। जो आस्तिक नास्तिक, साकारवादी निराकारवादी, सभी क्षेत्रों में ऐसे श्रद्धा संवर्धक आधारों का आश्रय लिया जाता है। मुसलमान संगे असवद के प्रति असीम श्रद्धा रखते हैं। राष्ट्रीय क्षेत्रों में झण्डे का श्रद्धापूर्ण सम्मान किया जाता है। कलश स्थापन, दीपक प्रज्ज्वलन आदि के पीछे यही भाव है।
उपासना का अर्थ है- पास बैठना। भगवान को अपने पास बिठाना या स्वयं भगवान के पास बैठना। दोनों ही स्थितियों में इसकी पात्रता आवश्यक है। राजा को अपने घर बुलाकर उसे देर तक पास बिठाये रहना या स्वयं राज महल में जाकर उनके समीप रहना एवं देर तक वार्तालाप करना, यह हर किसी के लिए सम्भव नहीं। इसके लिए पात्रता चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-November
उपासना मात्र कर्मकाण्ड होकर न रह जाय उसमें भावना के समन्वय की प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहे।
उपासना के सम्बन्ध में लागू होती है। घृत सेवन का लाभ वही उठा सकता है जिसकी पाचन क्रिया ठीक हो। देवता और मन्त्रों का लाभ वे ही उठा पाते हैं जिन्होंने व्यक्तित्व को भीतर और बाहर से−विचार और आचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है। औषधि का लाभ उन्हें ही मिलता है जो बताये हुए अनुपान और पथ्य का भी ठीक तरह प्रयोग करते हैं। अतः पहले आत्म उपासना फिर देव उपासना की शिक्षा ब्रह्म विद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है।
उपासना का अवलम्बन ग्रहण किया जायेगा तो उसमें लगे हुए समय की कहीं अधिक सुन्दर सुव्यवस्था जीवन क्रम में विकसित होगी। शर्त यही है कि उपासना मात्र कर्मकाण्ड होकर न रह जाय उसमें भावना के समन्वय की प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहे।
उपासना के माहात्म्य तथा विधान भी बहुतेरे। किन्तु इतने पर भी यह निश्चित नहीं कि वे अभीष्ट अनुग्रह करेंगे ही। इच्छित वरदान देंगे ही। यह भी हो सकता है कि निराशा हाथ लगे। मान्यता को आघात पहुँचे और परिश्रम निरर्थक चला जाय।
उपासना को अपने नित्य क्रम में सम्मिलित करना ही चाहिये। यह नहीं सोचना चाहिये कि हम ईश्वरीय आदेशों का पालन करते हैं फिर उपासना की क्या जरूरत। लुहार, बढ़ई, मूर्तिकार आदि शिल्पी अपने श्रम और प्रयोजन में लगे रहते हुए भी यह आवश्यक समझते हैं कि उनके औजारों पर जल्दी−जल्दी धार धरी जाती रहे। नाई अपने काम में ठीक तरह लगा रहता है पर उस्तरा तो उसे बार−बार तेज करना पड़ता है। मन ही वह औजार है जिससे क्रिया-कलापों को ठीक तरह करते रह सकना सम्भव होता है।
उपासना को गौण मानना पड़ेगा। धुला वस्त्र बिना रंगे भी अपनी गरिमा बनाये रह सकता है, पर मैला वस्त्र रंग को बर्बाद करेगा और रंगरेज को बदनाम। स्वयं तो उपहासास्पद बना ही रहेगा। मैले कपड़े पर रंग चढ़ाने की सूझ−बूझ भी भौंड़ी ही मानी जायेगी इस प्रकार का किया श्रम भी सार्थक न रहेगा।
उपासना अत्यधिक सहायक होती है, उसे समय नष्ट करने वाली बाधा नहीं माना जाना चाहिए। पारलौकिक पुरुषार्थों में अधिक उत्कृष्टता लाने के लिये अपने समय का एक अंश उपासना में नियत रूप से लगाना चाहिए। धुले कपड़े पर टिमोपाल लगा देने से−लोहा करने से और भी सुन्दरता आ जाती है। निर्मल और उज्ज्वल जीवन क्रम रहते हुये भी यदि उपासना का अवलम्बन ग्रहण किया जायेगा तो उसमें लगे हुए समय की कहीं अधिक सुन्दर सुव्यवस्था जीवन क्रम में विकसित होगी। शर्त यही है कि उपासना मात्र कर्मकाण्ड होकर न रह जाय उसमें भावना के समन्वय की प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहे।
उपासना में साथ लेकर चलने की बात सोची गई है। वह माध्यम है- गायत्री चालीसा का पाठ। इसे किसी भी समय पढ़ा जा सकता है। यथासंभव जितनी शुद्धि रखी जा सके उतनी उत्तम है, पर उसके लिए कोई अनिवार्य प्रतिबंध नहीं है।
उपासना में नियत रूप से लगाना चाहिए। धुले कपड़े पर टिमोपाल लगा देने से−लोहा करने से और भी सुन्दरता आ जाती है। निर्मल और उज्ज्वल जीवन क्रम रहते हुये भी यदि उपासना का अवलम्बन ग्रहण किया जायेगा तो उसमें लगे हुए समय की कहीं अधिक सुन्दर सुव्यवस्था जीवन क्रम में विकसित होगी। शर्त यही है कि उपासना मात्र कर्मकाण्ड होकर न रह जाय उसमें भावना के समन्वय की प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहे।
उपासना मनःक्षेत्र को सुरभित उद्यान की तरह फल फूलों से लदा हुआ बनाने के कुशल पुरुषार्थ की तरह ही समझी जानी चाहिए। वस्तुतः मनोकामनायें पूर्ण करने का यह विवेक संगत एवं यथार्थ मार्ग है। मन देवताओं का भी देवता है। यदि उसे साध सँभाल लिया जाय तो वह कल्पवृक्ष से कम नहीं अधिक ही उपयोगी एवं वरदानी सिद्ध होता है। उपासना इस मन कल्पवृक्ष को सुविकसित बनाने की वैज्ञानिक विधि−व्यवस्था का ही नाम है।
उपासना से पाप नष्ट होने का वास्तविक अर्थ यह है कि ऐसा व्यक्ति जीवन साधना के प्रथम चरण का परिपालन करते हुए दुर्भावनाओं, दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम समझेगा और उनमें सतर्कतापूर्वक वितरण हो जायेगा, पाप नष्ट होने का अर्थ है पाप कर्म करने की प्रवृत्ति का नाश, पर उल्टा अर्थ कर दिया गया पाप कर्मों के प्रतिफल का नाश। कदाचित ऐसी उलटवांसी सही होती तो फिर इस संसार में पाप को ही पुण्य और कर्त्तव्य माना जाने लगता। फिर कोई भी पाप से न डरता। राजदण्ड से बचने की हजार तरकीबें हैं। उन्हें अपना कर अनाचारी लोग सहज ही निर्द्वंद्व निश्चिन्त रह सकते हैं।
उपासना फिर देव उपासना की शिक्षा ब्रह्म विद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मन्त्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं, इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते। फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाये, उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है उसे उतना ही मिलेगा। निरन्तर वर्षा होते रहने पर भी आँगन में रखे हुये पात्रों में उतना ही चल रह पाता है।
उपासना इस मन कल्पवृक्ष को सुविकसित बनाने की वैज्ञानिक विधि−व्यवस्था का ही नाम है।
उपासना की जाती है वह ब्रह्म नहीं है।
उपासना की क्या जरूरत। लुहार, बढ़ई, मूर्तिकार आदि शिल्पी अपने श्रम और प्रयोजन में लगे रहते हुए भी यह आवश्यक समझते हैं कि उनके औजारों पर जल्दी−जल्दी धार धरी जाती रहे। नाई अपने काम में ठीक तरह लगा रहता है पर उस्तरा तो उसे बार−बार तेज करना पड़ता है। मन ही वह औजार है जिससे क्रिया-कलापों को ठीक तरह करते रह सकना सम्भव होता है। यदि भौंथरा होने लगे तो फिर कर्तृत्व का स्तर भी गिरने लगेगा।
उपासना को नित्य कर्म में सम्मिलित करने की आवश्यकता इसीलिए पड़ती है कि आन्तरिक स्वच्छता का क्रम बिना व्यवधान के निर्बाध गति से चलता रहे। नित्य का अभ्यास ही किसी महत्वपूर्ण विषय में स्थिरता और प्रखरता बनाये रह सकता है। यदि पहलवान लोग नित्य का व्यायाम छोड़ दें, फौजी सैनिक परेड की उपेक्षा कर दें तो फिर उनकी प्रवीणता कुछ ही दिन में अस्त−व्यस्त हो जायेगी। स्कूली पढ़ाई छोड़ने के बाद जिन्हें फिर कभी पुस्तकें उलटने का अवसर नहीं मिलता वे उस समय के सारे प्रशिक्षण भूल जाते हैं। याद केवल उतना ही अंश रहता है जितना काम में आता रहता है।
उपासना को कामना पूर्ति का माध्यम समझा गया और आवश्यक कर्म निष्ठा से मुँह मोड़ लिया गया। इस गलत आधार को मान्यता मिल जाने से आस्तिकता का उपकार नहीं हुआ वरन् उसे असत्य और संदिग्ध मानने की अनास्था ही बढ़ी।
उपासना की शिक्षा ब्रह्म विद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मन्त्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं, इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते। फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाये, उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है उसे उतना ही मिलेगा। निरन्तर वर्षा होते रहने पर भी आँगन में रखे हुये पात्रों में उतना ही चल रह पाता है।
उपासना को रंगाई कह सकते हैं और साधना को धुलाई। दोनों अन्योन्याश्रित हैं। इनमें प्रधान और गौण का वर्गीकरण करना हो तो साधना को प्रधान और उपासना को गौण मानना पड़ेगा। धुला वस्त्र बिना रंगे भी अपनी गरिमा बनाये रह सकता है, पर मैला वस्त्र रंग को बर्बाद करेगा और रंगरेज को बदनाम। स्वयं तो उपहासास्पद बना ही रहेगा।
उपासना का आहार बार−बार नित्य ही दिया जाना आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-June
उपासना गायत्री मन्त्र के साथ की थी। पुत्र को भी उन्होंने यही साधना बताई। समर्थ नित्य दो हजार सूर्य नमस्कार और गायत्री का मानसिक जप करते थे। हनुमानजी के प्रति उनकी सहज श्रद्धा थी। वे हनुमान की तरह ही राम-काज करना चाहते थे।
उपासना का प्रथम चरण है- निकटवर्ती वातावरण में भगवान की उपस्थिति विशेष रूप से अनुभव करना, भगवान सर्वव्यापी हैं। रंच मात्र भी स्थान उनकी उपस्थिति से खाली नहीं। पर यह व्यापक भावना असीम वातावरण में अभ्यास में नहीं उतरती। जहाँ उपासना के लिए बैठा गया है उनमें बस उपस्थिति को विशेष रूप से अनुभव करने के लिए मन को अभ्यास डालना पड़ता है। इसका तरीका यह है कि जैसे किसी सम्मानित अतिथि के आगमन पर स्थान को स्वच्छ करते हैं।
उपासना के प्रति बचपन से ही बड़ी लगन थी। पर गाँव में आजीविका के स्त्रोत उपयुक्त नहीं थे। उनके बड़े भाई कलकत्ता रहते थे। उनने छोटे भाई को भी वहीं बुला लिया और कुछ बड़े होने पर दक्षिणेश्वर मन्दिर की पूजा-अर्चा का कार्य उन्हीं के जिम्मे आ गया।
उपासना ठीक चल रही है, अन्यथा भिखारी का, जेबकट का बाना पहन कर भगवान के पास जाया गया तो उसे निकृष्टता के कारण दुत्कार सहनी पड़ेगी। माता गोद में बच्चे को तब उठाती है, जब उसे अच्छी तरह धो लेती है। मलमूत्र से सना होने पर एवं उसे प्यारा होने पर भी गोदी में नहीं उठाया जाता। साकार उपासना के जितने भी फलितार्थ हैं, वे देवमानव बनाने वाले हैं। गन्दगी चिपटाये रहने पर तरह-तरह की मनोकामनाओं का ताना-बाना बुनना, पुरुषार्थ किये बिना लोभ लूटकर खजाने भर लेना यह तो उपासना के सिद्धान्त के विपरीत ही हो जाता है।
उपासना के सिद्धान्त के विपरीत ही हो जाता है।
उपासना करते समय भी इन दोनों का उपयोग हो सकता है। फिर भी सुविधा की दृष्टि से पहले साकार का और पीछे निराकार का अभ्यास किया जाय तो सरलता रहेगी। यह तथ्य सभी धर्म सम्प्रदायों पर समान रूप से लागू होता है।
उपासना के सही तीन उपचार हैं। भक्त अपनी-अपनी भावना के अनुरूप इसमें से किसी का भी चयन कर सकते हैं।
उपासना में आनन्द आने लगेगा।
उपासना का है। उसमें नाम जप, ध्यान और भाव का समन्वय होना चाहिए। इसके निमित्त विभिन्न धर्म समुदायों में भिन्न-भिन्न प्रकार के उपाय उपचार बताये गये हैं, पर एक साधना ऐसी है जिसे मत-मतान्तरों से ऊपर सार्वभौम अथवा सर्वजनीन कहा जा सकता है।
उपासना, साधना अथवा यज्ञ में काम आने वाले विभिन्न पात्रों का प्रयोग मात्र उसी प्रयोजन तक सीमित रखा जाय। कल्प सूत्रों की मर्यादा है कि निर्धारित कर्मकाण्ड समाप्त हो जाने पर उसका बचा हुआ द्रव्य, यातयाम, निर्वीय हो जाता है। कारण यह है कि उन पदार्थों को जिस उद्देश्य से अभिमंत्रित किया गया था वे उस उद्देश्य से भिन्न प्रयोजन के उपयुक्त नहीं है। यही कारण है कि विभिन्न कर्मकाण्डों के उपरान्त बचे द्रव्य आदि को नदी आदि में प्रवाहित कर देने का विधान है।
उपासना के लिए बैठा गया है उनमें बस उपस्थिति को विशेष रूप से अनुभव करने के लिए मन को अभ्यास डालना पड़ता है। इसका तरीका यह है कि जैसे किसी सम्मानित अतिथि के आगमन पर स्थान को स्वच्छ करते हैं। अतिथि सत्कार हेतु जो उपचार किये जाते हैं वे पूरी तरह तो नहीं हो सकते तो भी उनकी चिन्ह पूजा कर लेनी चाहिए। देवताओं के अतिथि सत्कार के लिए षोडशोपचार या पंचोपचार की परम्परा है। यह तभी हो सकती है जब इष्टदेव की कोई साकार छवि, चित्र अथवा प्रतिमा के रूप में स्थापित की जाय।
उपासना की यथार्थता का परिचय देकर फिर से भक्ति भावना की यथार्थता तथा परिणित सिद्ध करना था। यही उन्होंने जीवन भर किया भी।
उपासना का चयन उत्तम रहता है। इष्टदेव को जिस भी रूप में जिस भी रिश्ते में चुना हो उसके साथ सघन निकटता की अनुभूति करनी चाहिए। भक्ति योग इसके बिना चरितार्थ नहीं होगा। प्रेम व्यवहार में जितनी अधिकतम निकटता होगी, उतनी ही घनिष्ठता का रसास्वादन बन पड़ेगा और उपासना में आनन्द आने लगेगा।
उपासना है। अध्यापक सबसे पास वाले लड़के को पढ़ाने का नम्बर लगाता है। पंक्ति में पहले स्थान पर बैठे हुए को भोजन पहले परोसा जाता है। भगवान के निकटस्थ होने से दिव्य विशेषताएं मिल भी रही हैं, साथ ही चौकीदारी भी हो रही है कि कोई दोष-दुर्गुण चिपका न रह जाय। पुलिस सामने हो तो जेबकतरा अपनी उस्तादी बन्द कर देता है।
उपासना है। सर्वव्यापी निराकार के अतिरिक्त वह किसी और के प्रति हो ही नहीं सकती। निराकार का भी कोई ध्यान तो चाहिए अन्यथा मन के जमने का कोई आधार ही न रहेगा। प्रकाश ज्योति को इस चरण में प्रयुक्त किया जाता है। प्रातःकाल का उदीयमान स्वर्णिम सूर्य ध्यान के लिए उपयुक्त बैठता है।
उपासना के लिए एक निर्धारित समय रहना चाहिए। आत्मा की श्रेष्ठताओं का समुच्चय परमात्मा है। हम उसके निकटतम पहुँचते जांय- घनिष्ठ तक बनते जांय, यही भजन भाव एक प्रकार का आध्यात्मिक व्यायाम माना जाना चाहिए। अन्तःकरण की पवित्रता अक्षुण्ण बनाये रहने के लिए यह आवश्यक है। जैसे मलीनता के शोधन हेतु शरीर को नहलाने, कपड़ों को धोना, कमरे को बुहारना, बर्तनों का माँजना आवश्यक है।
उपासना के फलस्वरूप, आत्मकल्याण और लोक संसिद्धि के उभयपक्षीय प्रयोजनों की पूर्ति का विवरण है। यह मात्र सद्बुद्धि की प्रार्थना ही नहीं है वरन् उसकी अभीष्ट प्रेरणा देने में भी समर्थ है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन का रथ ही संचालित नहीं किया था वरन् उसकी बुद्धि जब भटक रही थी तब दबाव भरी प्रेरणा देकर भी उसे उपयुक्त रास्ते पर चलाया था। गायत्री मन्त्र में ऐसे ही प्रेरणा देने और साधक को सन्मार्ग पर चलाने की परिपूर्ण क्षमता है।
उपासना के उपरान्त प्रवचन शंका समाधान, वार्त्तालाप के रूप में करते थे। उनसे दूर-दूर से भक्तजन आते। शारदामणि उन सबको अपने हाथ से भोजन बनाकर खिलाती। कभी-कभी इतनी भीड़ हो जाती कि उनका आधा दिन उसी में लग जाता और हाथ दुखने लगते पर कभी उनने उससे अनख न माना। उनका वात्सल्य इतना उभर आया था कि 19 वर्ष की आयु में ही लोग उन्हें माता कहने लगे थे।
उपासना के लिए सर्वोत्तम है। उस समय ब्रह्म तेज का आह्वान उपयुक्त पड़ता है। इसलिए हंसारूढ़ा भगवती का सर्व-प्रचलित स्थान ही उपयुक्त है। एक मुख और द्विभुजा वाली बात मनुष्यों और देवताओं के लिए समान रूप से सार्थक है।
उपासना के जितने भी फलितार्थ हैं, वे देवमानव बनाने वाले हैं। गन्दगी चिपटाये रहने पर तरह-तरह की मनोकामनाओं का ताना-बाना बुनना, पुरुषार्थ किये बिना लोभ लूटकर खजाने भर लेना यह तो उपासना के सिद्धान्त के विपरीत ही हो जाता है।
उपासना की समूची प्रक्रिया संकेत रूप में अपने व्यक्तित्व को पवित्र एवं प्रखर बनाने के लिए प्रशिक्षण प्रक्रिया है। जो इतना कर सकेंगे वे सृष्टा का अनुग्रह प्राप्त कर सकेंगे और महामानव, ऋषि, देवता बनने की दिशा में अग्रसर होंगे उन्हें आत्मसन्तोष और जन सम्मान एवं सहयोग की कमी न रहेगी।
उपासना के लिए तो आवश्यक है ही, निराकार मान्यता वाले भी इतना कर लें तो कुछ हर्जा नहीं। सीमित के साथ घनिष्ठता की स्थापना सुविधाजनक रहती है।
उपासना के लिए स्वच्छता, नियत समय, स्थिर मन के नियम हैं। सुगन्धित वस्तुओं से वातावरण को प्रसन्नतादायक बनाने की विधि है। वे अगर सुविधापूर्वक बन सकें तो श्रेष्ठ। अन्यथा रात्रि को आँख खुलने पर बिस्तर पर पड़े-पड़े भी इसे किया जा सकता है। यों मेरुदण्ड को सीधा रखकर पद्मासन से बैठना हर साधना में उपयुक्त माना जाता है, पर इस हंसयोग में उन सबका अनिवार्य प्रतिबन्ध नहीं है।
उपासना को यों अद्वैत कहा जाता है। क्योंकि उसमें [स- वह] अहम् (मैं) होने के समन्वय का समर्पण का एकाकार होने के भाव हैं। किन्तु तत्व दर्शन के तीनों प्रयोजनों के अनुरूप भी इसका अर्थ हो सकता है। स- वह अहम्- मैं, मैं और वह दोनों की स्थिति अलग-अलग मान लेने पर यह द्वैत हो जाएगा और इस ध्वनि के साथ साँस का आवागमन प्रकृति पदार्थ है इसलिए यह त्रैत भी हो सकता है। भक्त को अपनी मान्यता और भावना के अनुरूप इनमें से किसी को भी अपनी लेने की गुँजाइश है।
उपासना तो है ही।
उपासना में भक्ति का समावेश आवश्यक है। भगवान हमारे समीप हैं या हम भगवान के समीप हैं, यह कोरी कल्पना मात्र रहने से काम नहीं चलता। उसके साथ घनिष्ठ आत्मीयता का रिश्ता जोड़ना होता है, जिसके प्रति प्रेम भावना और श्रद्धा की अभिव्यक्ति की जा सके। यह रिश्ता अपने से बड़े का होना चाहिए। माता-पिता, स्वामी, सखा आदि।
उपासना का उपक्रम करते रहने की आवश्यकता होती है। ताकि मन को उसका अभ्यास बन पड़े और धीरे-धीरे वह परिपक्व होता चले, साँचे में ढलता चले।
उपासना में जो कुछ करना होता है अपने लिए ही करना होता है। भगवान को न किसी वस्तु की आवश्यकता है और न उन्हें प्रसन्न करने के लिए कुछ देने का उपक्रम बन सकता है। तो भी नियत समय पर नियत उपासना का उपक्रम करते रहने की आवश्यकता होती है। ताकि मन को उसका अभ्यास बन पड़े और धीरे-धीरे वह परिपक्व होता चले, साँचे में ढलता चले।
उपासना के दो अध्याय आरम्भ होते हैं। दोनों में से जो भी रुचि कर हो, उसे चुन लेना चाहिए। ध्यान का केन्द्रीकरण करने की दृष्टि से साकार उपासना का चयन उत्तम रहता है। इष्टदेव को जिस भी रूप में जिस भी रिश्ते में चुना हो उसके साथ सघन निकटता की अनुभूति करनी चाहिए। भक्ति योग इसके बिना चरितार्थ नहीं होगा।
उपासना सम्मिलित रहनी चाहिए।
उपासना की समग्रता में जप, ध्यान और भाव इन तीनों के समन्वय की आवश्यकता होती है। पूजा अर्चा को प्रतीक परिचर्या माना जाता है। प्रतिमा की दर्शन झाँकी एवं नमन वन्दन के अतिरिक्त धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, जल आदि के समर्पण को स्मरण प्रक्रिया के अंतर्गत लिया जाता है। लोग भगवान को भूले रहते हैं। यह स्मरण नहीं रखते कि सर्वव्यापी और न्यायकारी भगवान सर्वत्र समाया हुआ है वह हमारे चरित्र और चिन्तन को बारीकी से देखता है और इसी आधार पर आक्रोश एवं उपहार जन्य प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहता है।
उपासना से उसे यह अभय दान मिला हुआ है। दूसरों को धर्मोपदेश देने में वह प्रवीण पारंगत है। इतने भर से यह आवश्यकता पूरी हो जाती है कि उन शिक्षाओं को अपने पास तक न फटकने दे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-December
उपासना पद्धतियों से लेकर कर्मकाण्ड तक में सर्वत्र “स्वर” संयोजन अनिवार्य रहा है। मन्त्र भी वस्तुतः छन्द ही हैं। वेदों की प्रत्येक ऋचा का कोई ऋषि, कोई देवता तो होता ही है उसका कोई न कोई छन्द जैसे युष्टटुप, अनुष्टुप, गायत्री आदि भी होते हैं। इसका अर्थ ही होता है कि उस मन्त्र के उच्चारण की ताल, लय और गतियाँ भी निर्धारित हैं। अमुक फ्रीकोंसी पर बजाने से ही अमुक स्टेशन बोलेगा उसी तरह अमुक गति, लय और ताल के उच्चारण से ही मन्त्र सिद्धि होगी−यह उसका विज्ञान है।
उपासना की। सिद्धि से उन्हें सन्तोष नहीं हुआ तो लौटकर वे फिर समाज में आये और प्राणियों की सेवा को अपनी उपासना का आधार बनाया।
उपासना का आधार बनाया।
उपासना कीजिए। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जब हम कोई बुरा काम करते हैं जिससे किसी को दुख होता है, हम अशांत हो उठते हैं क्योंकि हमारी आत्मा हमें कोसती है। इसी प्रकार जब हम सच्चाई के मार्ग पर चलते हैं, किसी की भलाई करते हैं तो मन प्रसन्न शांत रहता है, उसी समय हम देवत्व का अनुभव करते हैं क्योंकि अशांत मन में शैतान रहा करता है। वेदांत के अनुसार इसी धरती पर स्वर्ग नर्क दोनों हैं। वेदांत की आधारशिला कर्म सिद्धांत है।
उपासना करता है और प्राणि मात्र में परमात्मा का दर्शन करता है, इसलिए विश्व के सभी पैगम्बरों और सन्तों का वह सम्मान करता है और पूज्य भाव दर्शाता है।”
उपासना का अवसर मिलता है और इससे श्रद्धा ने सही मान्यता का भाव तो जगता ही है। परिवार में छोटे−बड़े वर्ग के विभिन्न लोग रहने से−उन्हें इस प्रतिमा पूजा के माध्यम से नमन वन्दन का अवसर मिलता है जो प्रकारान्तर से किसी न किसी रूप में आस्तिक भावनाओं के पोषण में सहायक ही होता है।
उपासना में साधक की इच्छा, उत्सुकता, लालसा का उतना महत्व नहीं जितना अनुभवी मार्गदर्शक के निरीक्षण परीक्षण का।
उपासना का अर्थ एकाँगी लाभ उठाना रहा होता तो इन महापुरुषों ने भी या तो किसी एक स्थान में बैठकर समाधि से ली होती या भौतिक सुखों के लिये बड़े से बड़े साधन एकत्र कर शेष जीवन सुखोपभोग में बिताते। पर उनमें से किसी ने भी ऐसा नहीं किया। उन्होंने अन्त में मानव मात्र की ही उपासना की। सिद्धि से उन्हें सन्तोष नहीं हुआ तो लौटकर वे फिर समाज में आये और प्राणियों की सेवा को अपनी उपासना का आधार बनाया।
उपासना और पुस्तक से स्वाध्याय का−सत्संग का−मनन चिन्तन का भाव है। मातृ शक्ति की यही प्रतिभा है। मानवी गरिमा की वह अधिष्ठात्री है, इसलिए उसकी एक दिशा धारा, एक प्रतिपादन के रूप में एक मुख है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-July
उपासना अपनाने की सार्थकता है।
उपासना का उपक्रम चलता है। जप पुरश्चरण की ध्वनि बड़े ही लयबद्ध ढंग से धीमे स्वर में यात्रियों को सुनाई देती है। लोगों का ऐसा विश्वास है कि सूर्य की देवी की उपासना से रोगोपचार में काफी सफलता मिलती है। वहाँ के पुरोहित अध्यात्मिक चिकित्सा को अत्यधिक महत्व देते हैं। प्रत्येक गुरुवार को “मामारोजा” जो वहाँ की प्रसिद्ध देवी समझी जाती है, उपस्थित श्रद्धालुओं को अभिनय प्रेरणा प्रदान करती है।
उपासना पश्चात्। संयम के बाद उपासना न ही उदारता का दूसरा चरण आता है। न्यूनतम में निर्वाह। सादा जीवन उच्च विचार का अवलंबन। इतना कर गुजरने पर स्वल्प में निर्वाह करने वाला अपने साधनों से बचत करेगा ही और जहाँ उदारता तथा बचत का संयोग है वहाँ परमार्थ के लिए दान की उत्कंठा उठे बिना रह नहीं सकती।
उपासना अधूरी है। सच्ची भक्ति तो प्रेम ही है। प्रेम ही परमात्मा का प्रकट स्वरूप है।
उपासना में इस उद्दात्त भावना का दर्शन संसार के सभी धर्मों में पाया जाता है। भगवान को प्रेममय समझ कर प्रेम मार्ग द्वारा उसकी साधना सभी देशों के भक्तों एवं साधकों में देखी जाती है। उपनिषद् में भगवान को “मधुब्रह्म” कहा है यह उसका विशुद्ध प्रेममय स्वरूप ही है। परमात्मा प्रेम द्वारा ही मधुर होता है—‘मधुक्षरन्तितद्ब्रह्म’, जिससे मधु अर्थात् प्रेम प्रकीर्ण होता है वही ब्रह्म है। अपने इसी रूप में वे भक्त के लिये, आराधक के लिये पुत्र, धन आत्मीय स्वजन—इन सबसे बढ़कर प्रियतम हो जाते हैं।
उपासना कृत्य अपनाने पर दुराचारियों को भी क्षमा मिल जाती है एवं थोड़ा कष्ट भुगतने के बाद वे स्वस्थ हो जाते हैं।
उपासना सम्भव है। ऐसे व्यक्ति थोड़ा कर्मकाण्ड करने पर भी विशालकाय पूजा−पाठ कर लेने का फल प्राप्त कर लेते हैं। इसके विपरीत जो केवल भजन पूजन की लकीर को पीटते रहते हैं, किन्तु गुण, कर्म, स्वभाव को उत्कृष्ट बनाने वाली संयम साधना से दूर रहते हैं, असंयमी जीवन जीते हैं। काम, क्रोध, लोभ−मोह, मद−मत्सर के भूत−प्रेम साथ लिए फिरते हैं। मात्र नाम उच्चारण अथवा कर्म काण्डों के क्रिया-कलाप से, पूजा-पत्री के उपहार उपचार भेंट करने से परमात्मा को प्राप्त करने के स्वप्न देखते रहते हैं, उन्हें निराश ही रहना पड़ता है।
उपासना से रोगोपचार में काफी सफलता मिलती है। वहाँ के पुरोहित अध्यात्मिक चिकित्सा को अत्यधिक महत्व देते हैं। प्रत्येक गुरुवार को “मामारोजा” जो वहाँ की प्रसिद्ध देवी समझी जाती है, उपस्थित श्रद्धालुओं को अभिनय प्रेरणा प्रदान करती है। 17 नवम्बर 1970 को वहाँ उपस्थित सैकड़ों व्यक्तियों ने सूर्य-चिकित्सा से लाभ उठाया। इस घटना का उल्लेख “औब्जरवेटरे रोमनो” में हुआ है।
उपासना न ही उदारता का दूसरा चरण आता है। न्यूनतम में निर्वाह। सादा जीवन उच्च विचार का अवलंबन। इतना कर गुजरने पर स्वल्प में निर्वाह करने वाला अपने साधनों से बचत करेगा ही और जहाँ उदारता तथा बचत का संयोग है वहाँ परमार्थ के लिए दान की उत्कंठा उठे बिना रह नहीं सकती। जो संयमी है, जो उदार है, जो मितव्ययी है, साथ ही जो पुरुषार्थ परायण है वह अपने साधनों का पुण्य परमार्थ में नियोजन करता ही रहेगा।
उपासना कर प्राण शक्ति लेकर जाते हैं।
उपासना का क्रम चलता है तो यह रक्त अचानक ही खौलने लगता है। घटनाक्रम की सत्यता का गहनता से अवलोकन करते हुये पोप चतुर्थ ने इसे सार्वजनिक साधना का केन्द्र घोषित किया। लोग बड़ी श्रद्धा से आते एवं यहाँ उपासना कर प्राण शक्ति लेकर जाते हैं।
उपासना में उसे किसी न किसी रूप में प्रकट होना आवश्यक है। इसके बिना उपासना अधूरी है। सच्ची भक्ति तो प्रेम ही है। प्रेम ही परमात्मा का प्रकट स्वरूप है।
उपासना तथा धर्मानुष्ठानों को जीवन का अति आवश्यक अंग मानते हुए अपनाया एवं अपने पूर्व जीवन-क्रम को आमूल-चूल बदला है।
उपासना का क्रम चलता है। धर्मानुष्ठान का यह उपक्रम ईसवी शताब्दी 1010 से प्रचलित है। लोगों का अभिमत है कि यह वस्त्र किसी बलिदानी शहीद का है जो अपने धर्म की रक्षा हेतु प्राण न्यौछावर कर चुका है। जब सामूहिक उपासना का क्रम चलता है तो यह रक्त अचानक ही खौलने लगता है। घटनाक्रम की सत्यता का गहनता से अवलोकन करते हुये पोप चतुर्थ ने इसे सार्वजनिक साधना का केन्द्र घोषित किया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-May
उपासना, साधना और आराधना के त्रिविध अवलम्बनों के साथ आगे बढ़ा और ऊंचा उठा है। उसने इसी मूल्य पर परोक्ष दैवी अनुकम्पा और प्रत्यक्ष सम्पदा प्राप्त की है। अनुयायियों के लिए भी यही राजमार्ग है। वे आंधी, तिरछी मनुहार के सहारे विभूतिवान बनने की आशा न करें। आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ चलने के लिए इस राजमार्ग को छोड़कर कोई ‘‘शॉट कट’’ नहीं है।
उपासना या ध्यान धारणा का लेखा जोखा रखे। यह मनुष्य का अपना इच्छित विषय है कि वे भगवान को किन्हीं गुणों का समुच्चय माने और किसी ऐसे रूप की कल्पना करे जिनमें अभीष्ट महानताऐं विद्यमान हो।
उपासना क्रिया-कृत्यों का रहस्य ज्ञानपूर्वक समझना चाहिए और उन्हें करते समय तद्विषयक भावनाओं को प्रदीप्त करना चाहिए। अन्यथा कर्मण्ड का मात्र शरीर श्रम एवं वस्तुओं की उलट पुलट मात्र बन रह जायेगा और उनका वह प्रतिफल न मिलेगा जो शास्त्रकारों द्वारा बताया गया है। शब्दब्रह्म का तात्पर्य मन्त्र विद्या का ज्ञानपूर्वक सम्पन्न करने उनके साथ विचारणा एवं भावना का समावेश करने से है।
उपासना में या धार्मिक कर्मकाण्डों में प्रयुक्त होती थी और वह जितनी गहरी होती थी उतने ही चमत्कारी फलितार्थ प्रस्तुत करती थी। अब नवीन ध्यान प्रक्रिया में श्वेत रक्त कणों को देवता मानकर ध्यान द्वारा रोग निवारण के लिए जुटाया जाता है तो भी वैसा ही लाभ मिलता है। इस वैज्ञानिक आत्मोपचार को आश्चर्य नहीं स्वाभाविक माना जाना चाहिए।
उपासना भी करनी चाहिए और साथ ही अपनी विवेक बुद्धि को अधिकाधिक पवित्र एवं प्रखर बनाने में संलग्न रहना चाहिए। यह दोनों अवलम्बन अपनाने पर मनुष्य का सब प्रकार कल्याण ही कल्याण है।
उपासना में ध्यान को अत्यधिक महत्व दिया गया है। मात्र कर्मकाण्डों की उपेक्षापूर्वक करते रहा जाय तो उसे निरर्थक चिह्न पूजा माना जाता है।
उपासनाऐं भी छोटी पड़ती हैं। यह रोकना एकाँगी बात हुई। दूसरा कार्य इसका पूरक “नव सृजन” रह जाता है। मात्र अशुभ का निराकरण हो और शुभ का संस्थापन न हो सके तो तो बात सर्वथा अधूरी रह जाती है। आसुरी उपद्रवों के निराकरण के साथ ही रामराज्य की स्थापना मिला देने से ही एक पूरी बात बनी थी।
उपासना जो भी चली हो, हमें उसकी नकल करने की अपेक्षा निर्देशन को पर्याप्त मानना चाहिए। यह आपत्तिकाल है। इसकी तीन माला गायत्री का जप, प्रातः कालीन सूर्य का ध्यान करते हुए नियमपूर्वक करते रहने से काम चल जायेगा, आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के अन्तरंग और बहिरंग को सुव्यवस्थित करने के लिए इतना बहुत है। दो नवरात्रियों में अनुष्ठान भर कर लिए जांय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-February
उपासना में रस स्वाभाविक है किन्तु यदि आत्मोत्कर्ष की निष्ठा न रही तो मेघ का मन उचट जायेगा अतएव उसकी निष्ठा को सुदृढ़ कराने वाले तप की आवश्यकता है। सो वे मेघ को बार−बार उधर धकेलने लगे।
उपासना तो उसका एक अंग मात्र है।
उपासना का सरल कर्मकाण्ड सिखा दिया है। इस गुह्य विद्या के अन्याय पक्ष तो हमें बाद के जीवन में विदित हुए। निर्धारित क्रम अपनी जगह ज्यों का त्यों करके चल रहा था और लक्ष्य तक पहुँचने का जिज्ञासा भाव क्रमशः अधिक प्रचण्ड हो रहा था। इसी उद्वेग में कितनी ही रातें बिना सोए निकल जातीं।
उपासना का प्रतिपादन किया गया है। यह मान्यता अंतर्दृष्टि सम्पन्न ऋषियों की थी कि यह सूर्य स्थिर है, शेष ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं एवं ऐसे एक नहीं, अनेकों सूर्य हैं जो एक महासूर्य के चारों ओर धूम रहे हैं। ऐसे एक नहीं, अनेकों ब्रह्माण्ड हैं जिन सबका अधिपति एक है−सृष्टि संचालन की सुव्यवस्था करने वाला परब्रह्म। सत्य की शोध मानव मूल वृत्ति है। बहुत बार सत्य मिलता है, बहुत बार खो जाता है।
उपासना से असीम शान्ति मिलती है। कूड़े से जीवन में मणि−मुक्ता की-सी ज्योति झल-झलाने लगती है, मन वाणी चित्त अलौकिक स्फूर्ति से भर जाते हैं साधक को रस मिलने लगता है सो मेघ भी अधिकाँश समय उसी में लगाते। किन्तु आर्य श्रेष्ठ महावीर की दृष्टि अत्यन्त तीखी थी वह जानते थे रस−रस सब एक हैं−चाहें वह भौतिक हों या आध्यात्मिक। रस की आशा चिर नवीनता से बँधी है इसीलिये जब तक नयापन है तब तक उपासना में रस स्वाभाविक है किन्तु यदि आत्मोत्कर्ष की निष्ठा न रही तो मेघ का मन उचट जायेगा अतएव उसकी निष्ठा को सुदृढ़ कराने वाले तप की आवश्यकता है। सो वे मेघ को बार−बार उधर धकेलने लगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-August
उपासना की अनेक विधियाँ बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है। आत्मा को परमात्मा तक पहुँचाने की लक्ष्यपूर्ति के लिए भी गायत्री से अधिक सरल एवं शीघ्र सफल होने वाला साधन और कोई नहीं है।
उपासना निस्सन्देह मनुष्य की अपूर्णताओं की खाई पाटती हुई उसे पूर्णता के परम लक्ष तक पहुँचा देने में समर्थ होती है।
उपासना एक रामबाण अमोघ औषधि के रूप में अपनानी चाहिए। आत्मिक उन्नति की दिशा में जिनका उत्साह अधिक है, जो गुप् आध्यात्मिक शक्तियों को विकसित करके अपने आपको सामान्य स्थिति से ऊँचा उठाकर असामान्य स्थिति में ले जाना चाहते हैं उनके लिए गायत्री के अनुष्ठान, पुरश्चरण एवं तपश्चर्यात्मक अनेक विधान हैं। लौकिक आकांक्षाओं की पूर्ति एवं उपस्थित आपत्तियों के समाधान में भी गायत्री उपासना की अनेक विधियाँ बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है। आत्मा को परमात्मा तक पहुँचाने की लक्ष्यपूर्ति के लिए भी गायत्री से अधिक सरल एवं शीघ्र सफल होने वाला साधन और कोई नहीं है।
उपासना से इन सभी गुणों का साधके प्रयत्न अनुरूप विकास होता है। निष्ठा, श्रद्धा, दृढ़ता, साहस, धैर्य, उत्साह, श्रेष्ठता, आदर्शवादिता, एवं संकल्प शक्ति हृदयगत गुण हैं। गायत्री जप से इनका भी अभिवर्धन होता है। गायत्री बुद्धि एवं भावना की देवी है। जहाँ उसकी प्रतिष्ठा होगी वहाँ सद्ज्ञान एवं सद्भाव का विकास स्वयमेव होता चलेगा।
उपासना कैसे की जाय, इस संबंध में कितने ही ग्रंथ लिखे जा चुके हैं। फिर भी समय-समय पर अपनी मनोभूमि का परीक्षण कराते हुए उसके अनुरूप साधनाओं में परिवर्तन करते रहना चाहिए। जिस प्रकार कक्षाएँ उत्तीर्ण करता हुआ छात्र, अगली कक्षा में अपने पाठ्यक्रम को बदलता है उसी प्रकार साधना पथ पर अग्रसर साधक को भी अपने क्रमिक विकास के अनुरूप समय-समय पर अपने साधन विधान में हेर-फेर करना आवश्यक होता है। रोग के लक्षणों में हेर फेर होने और बीमारी घटने-बढ़ने पर कुशल वैद्य चिकित्सा, व्यवस्था, परिचर्या एवं पथ्य में परिवर्तन करते हैं। इसी प्रकार अन्तः स्थिति के उतार चढ़ाव के अनुसार साधन विधानों में भी हेर फेर की अपेक्षा रहती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-June
उपासना की क्या आवश्यकता थी? गायत्री सूर्य की आत्मा सविता शक्ति के साथ उपासक को सम्बन्धित करती है जिसके द्वारा वह परब्रह्म का महाप्राण अपने शरीर और अन्तःकरण में आवश्यक मात्रा में धारण करके लौकिक सुख एवं आत्मिक शान्ति को अनुभव करता हुआ जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
उपासना क्या निरुपयोगी ही है? स्त्री बच्चों को
व्यक्तिगत दिलचस्पी से दूर रखकर क्या उन्हें रोटी कपड़ा देते रहना ही
पर्याप्त है? जिस समाज में हम जन्मते और पलते है क्या उसके प्रति हमारे कोई
कर्तव्य नहीं है?
उपासना में लगे रहते है। वे दोनों जंगल से लकड़ी काट-काट अपना गुजारा करते है और भक्ति भावना में तल्लीन रहते हैं। अपने परिश्रम पर ही गुजर करना उनका व्रत था। दान या पराये धन को वे भक्ति मार्ग में बाधक मानते थे। रास्ते में मुहरों की थैली पड़ी मिली।
उपासना के महात्म्य से यह आत्म-निर्माण का कार्य अधिक सरलता से पूर्ण होता है।
उपासना में संलग्न ऋषि मुनि योग के द्वारा अपनी आत्मा को उस तेज पुँज, महाप्राण, परब्रह्म में प्रविष्ट करते है। शुकदेव जी अपनी साधना को पूर्ण करते हुए जिस स्थिति में प्रविष्ट हुए उसका उल्लेख महाभारत में इस प्रकार मिलता है :-
उपासना की जाती है।
उपासना की जाय ‘सूर्य’ का उसे अविच्छिन्न सम्बन्ध अनिवार्य रूप से रखना होगा। गायत्री का देवता ही सूर्य है तो उसका स्वरूप भी साथ में होना स्वाभाविक ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-July
उपासना की जाती है, वह ही देख तत्त्व का केन्द्र हैं इस उपलब्ध करके मनुष्य देवत्व का-देव सत्ता का प्रत्यक्ष दर्शन अपने भीतर करता है। शिर में सहस्र दल कमल के स्थान पर जो सहस्र देवताओं का कोष है वह प्राण मन और अन्न के द्वारा ही आवृत हो जा रहा है। अभक्ष्य अन्न का त्याग कर मन का संयम करते हुए जो प्राण साधना की जाती है उससे वे सहस्र दल वाले देवतत्व जागृत होते और साधक पर शान्ति का वरदान बरसाते है।
उपासना करता है वह निश्चय ही सम्पूर्ण आयु को प्राप्त कर लेता हैं
उपासना के बीज भली प्रकार उग सकें। प्राण ही वह बीज है जो आगे चलकर साधक के सामने शक्ति एवं सिद्धि के रूप में प्रकट होता है। गायत्री उपासक के लिए जप की प्रथम कक्षा पूर्ण कर लेने के बाद दूसरी कक्षा प्राण साधना को ही है। गायत्री शब्द का अर्थ ही-प्राण का उत्कर्ष करने वाली प्रक्रिया है।
उपासना के द्वारा साधक अपनी अन्तरात्मा में इस शक्ति जितना मात्रा में अपने अन्दर धारण कर लेता है उतना ही वह प्राणवान- आत्मबल सम्पन्न बनता जाता है।
उपासना तक ही सीमित है। ‘सक्रिय सदस्य’ वे होंगे जो अपनी निज कि साधना के अतिरिक्त दूसरों को धर्म प्रेरणा देते रहने का उत्तरदायित्व भी निभाएँगे। इस समय जहाँ शाखाएँ सजीव हैं वे अपने सदस्यों से उनकी वर्तमान भावनाओं और गतिविधियों का पता लगावें और तदनुसार उपासकों और सक्रिय सदस्यों के पूरे पते समेत सूची भेज दे। इसी सूची के आधार पर शाखाओं के तथा सदस्यों के नये रजिस्टर बनाये जावेंगे।
उपासना से स्वयं ही वेद विद्या को प्राप्त किया और उसका नाम माध्यन्दिनी शाखा रखा। उस समय से ब्रह्रारात का नाम याज्ञवल्क्य हो गया और वे अपने समय के सर्वश्रेष्ठ वेदवेदान्त और ब्रह्मविद्या के ज्ञाता माने गये। बाद में श्रेष्ठ ज्ञानी राजा जनक ने उनको अपना गुरु बनाया। उन्होंने अपने उदाहरण से दिखला दिया कि जो व्यक्ति अध्ययन और मनन में निरन्तर संलग्न रहेगा, वह सब प्रकार के ज्ञान को निश्चय ही प्राप्त कर सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-October
उपासना की दो कक्षाएँ है। आरम्भिक बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है वही विद्यार्थी कालान्तर में कागज, स्याही और फाउन्टेन पेन से लिखने लगता है। दोनों स्थितियों में अन्तर तो है पर इसमें कोई विरोध नहीं है जो लोग निराकार और साकार का झगड़ा उत्पन्न करते हैं वे ऐसे ही है जैसे पट्टी खड़िया और कागज स्याही को एक दूसरे का विरोधी बताने वाले। जब तक मन स्थिर न हो तब तक साकार उपासना करना उचित है। गायत्री जप के साथ माता का एक सुन्दर नारी के रूप में ध्यान करना चाहिए।
उपासना करना उचित है। गायत्री जप के साथ माता का एक सुन्दर नारी के रूप में ध्यान करना चाहिए। माता के चित्र अखण्ड ज्योति कार्यालय से छपे हैं । पर यदि उनसे भी सुन्दर चित्र किसी चित्रकार की सहायता से बनाये जा सकें तो उत्तम हो। सुन्दर से सुन्दर आकृति की कल्पना करके उसे अपनी सगी माता मानकर जप करते समय अपने ध्यान क्षेत्र में प्रतिष्ठित करना चाहिए।
उपासना का आधार गायत्री था। यज्ञोपवीत धारण के समय प्रत्येक द्विज को गुरु मन्त्र के रूप में केवल गायत्री की ही दीक्षा देने का धर्मग्रन्थों में विधान हैं। भारतीय संस्कृति की इस आधार भित्ति गायत्री महामंत्र की जानकारी सर्व साधारण तक पहुँचानी आवश्यक थी। महाभारत के बाद आये हुए अज्ञानान्धकार युग में जो नाना मतमतान्तरों और सम्प्रदाय बरसाती मेंढकों की तरह उपज पड़े थे उनने उपासना के मूल आधार को हटाकर अपना-अपना ही सिक्का जमा लिया था और गायत्री को शाप लगी हुई, केवल ब्राह्मणों की, गुपचुप कान में कहने की,सतयुग में जपने की आदि आशंका एवं उपेक्षा पैदा करने वाली बातें कहकर एक प्रकार से बहिष्कृत ही कर दिया था। प्रसन्नता की बात है कि भ्रम का वह अन्धकार अब हट गया हैं अखण्ड-ज्योति ने इस दिशा में समुचित प्रकाश प्रदान किया हैं।
उपासना की द्वितीय भूमिका में प्रवेश करने वाला साधक अपने को जिन शक्तियों तथा सिद्धियों से ओतप्रोत पाता हैं वस्तुतः वह प्राण शक्ति का ही प्रसाद एवं चमत्कार होता हैं।
उपासना के लिये यह भूमि एक प्रकार से सिद्ध पीठ ही हैं। जिन्हें जय कभी, जितने दिन के लिए भी अवकाश मिले यहाँ रहकर अपनी साधना करें। व्यवहारिक मार्ग दर्शन, शान्तिमय वातावरण निवास की सब प्रकार की सुविधा, स्वास्थ्यकर जलवायु आदि कारणों से यहाँ रह कर गायत्री साधना करना अन्य स्थानों की अपेक्षा निश्चित रूप में अधिक फलप्रद हो सकता है।
उपासना के रूप में गायत्री जप का सामान्य विधान अब तक सुविस्तृत किया जाता रहा। पर उतने से ही पूर्णता के लक्ष तक नहीं पहुँचा जा सकता। जप से मनोभूमि की शुद्धि होती है। जमीन को जोतने का जो कार्य हल बैल द्वारा सम्पन्न होता हैं वही कार्य मनोभूमि की शुद्धि के लिए माला द्वारा गायत्री के जप से होता हैं भूमि की जुताई हो जाने पर उसमें (1) बीज बोना, (2) सींचना (3) खाद देना, (4) निराई गुड़ाई करना, (5) रखवाली आदि की आवश्यकता पड़ती हैं, इसी प्रकार जप द्वारा परिमार्जित की हुई मनोभूमि में पाँच संस्कारों की आवश्यकता होती हैं। इसे ही पंचकोशी या पंचमुखी साधना कहते हैं ।
उपासना करते थे। श्रीमद्भागवत से स्पष्ट है कि श्रीकृष्णचन्द्र की उपासना का आधार गायत्री था। यज्ञोपवीत धारण के समय प्रत्येक द्विज को गुरु मन्त्र के रूप में केवल गायत्री की ही दीक्षा देने का धर्मग्रन्थों में विधान हैं। भारतीय संस्कृति की इस आधार भित्ति गायत्री महामंत्र की जानकारी सर्व साधारण तक पहुँचानी आवश्यक थी। महाभारत के बाद आये हुए अज्ञानान्धकार युग में जो नाना मतमतान्तरों और सम्प्रदाय बरसाती मेंढकों की तरह उपज पड़े थे उनने उपासना के मूल आधार को हटाकर अपना-अपना ही सिक्का जमा लिया था और गायत्री को शाप लगी हुई, केवल ब्राह्मणों की, गुपचुप कान में कहने की,सतयुग में जपने की आदि आशंका एवं उपेक्षा पैदा करने वाली बातें कहकर एक प्रकार से बहिष्कृत ही कर दिया था।
उपासना के मूल आधार को हटाकर अपना-अपना ही सिक्का जमा लिया था और गायत्री को शाप लगी हुई, केवल ब्राह्मणों की, गुपचुप कान में कहने की,सतयुग में जपने की आदि आशंका एवं उपेक्षा पैदा करने वाली बातें कहकर एक प्रकार से बहिष्कृत ही कर दिया था। प्रसन्नता की बात है कि भ्रम का वह अन्धकार अब हट गया हैं अखण्ड-ज्योति ने इस दिशा में समुचित प्रकाश प्रदान किया हैं।
उपासना करने वालों को यह शिकायत रहती कि भजन करते समय उनका मन स्थिर नहीं रहता, अनेक जगह भागता रहता है। साधना में मन न लगे, चित्त कहीं का मारा कहीं भागा फिरे तो उसमें यह आनन्द नहीं आता जो आना चाहिए। इस कठिनाई का उपाय सोचने से पूर्व विचार करना होगा कि मन क्यों भागता है? भागकर कहाँ जाता है? हमें जानना चाहिए कि प्रेम का गुलाम है।
उपासना क्षेत्र में गायत्री का महत्व सर्वोपरि है। प्राचीनकाल के समस्त ऋषियों ने गायत्री के आधार पर अपनी योग साधनाएँ की थी। भगवान के 24 अवतार हुए हैं उनने भी अपनी उपासना में गायत्री की प्रमुखता रखी है। बाल्मीकि रामायण साक्षी हैं कि भगवान राम गायत्री की उपासना करते थे। श्रीमद्भागवत से स्पष्ट है कि श्रीकृष्णचन्द्र की उपासना का आधार गायत्री था।
उपासना में गायत्री की प्रमुखता रखी है। बाल्मीकि रामायण साक्षी हैं कि भगवान राम गायत्री की उपासना करते थे। श्रीमद्भागवत से स्पष्ट है कि श्रीकृष्णचन्द्र की उपासना का आधार गायत्री था। यज्ञोपवीत धारण के समय प्रत्येक द्विज को गुरु मन्त्र के रूप में केवल गायत्री की ही दीक्षा देने का धर्मग्रन्थों में विधान हैं। भारतीय संस्कृति की इस आधार भित्ति गायत्री महामंत्र की जानकारी सर्व साधारण तक पहुँचानी आवश्यक थी।
उपासना-आवश्यक होती हैं−
उपासना में दृढ़ हो चुकी है वे अपनी धर्म पत्नियों को भी प्रेरणा देकर इस मार्ग पर अग्रसर करें और कम से कम इन चार महीनों में तो ब्रह्मचर्य से रहने की प्रतिज्ञा कर ही लें। ऐसे श्रद्धावान दाम्पत्य किन्हीं महान् उच्च आत्माओं को अपने यहाँ जन्म लेने के लिए आकर्षित कर सकते हैं।
उपासना से और अन्त निराकार उपासना में होता है। साकार और निराकार उपासना की दो कक्षाएँ है। आरम्भिक बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है वही विद्यार्थी कालान्तर में कागज, स्याही और फाउन्टेन पेन से लिखने लगता है। दोनों स्थितियों में अन्तर तो है पर इसमें कोई विरोध नहीं है जो लोग निराकार और साकार का झगड़ा उत्पन्न करते हैं वे ऐसे ही है जैसे पट्टी खड़िया और कागज स्याही को एक दूसरे का विरोधी बताने वाले। जब तक मन स्थिर न हो तब तक साकार उपासना करना उचित है।
उपासना से शुरू होती है और धीरे-धीरे विकसित होकर वह निराकार तक जा पहुँचती है। मन किसी रूप पर ही जमता है, निराकार का ध्यान पूर्ण परिपक्व मन ही कर सकता है, आरम्भिक अभ्यास के लिए वह सर्वथा कठिन है। इसलिए साधना का आरम्भ साकार उपासना से और अन्त निराकार उपासना में होता है। साकार और निराकार उपासना की दो कक्षाएँ है। आरम्भिक बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है वही विद्यार्थी कालान्तर में कागज, स्याही और फाउन्टेन पेन से लिखने लगता है।
उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
उपासना में होता है। साकार और निराकार उपासना की दो कक्षाएँ है। आरम्भिक बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है वही विद्यार्थी कालान्तर में कागज, स्याही और फाउन्टेन पेन से लिखने लगता है। दोनों स्थितियों में अन्तर तो है पर इसमें कोई विरोध नहीं है जो लोग निराकार और साकार का झगड़ा उत्पन्न करते हैं वे ऐसे ही है जैसे पट्टी खड़िया और कागज स्याही को एक दूसरे का विरोधी बताने वाले। जब तक मन स्थिर न हो तब तक साकार उपासना करना उचित है।
उपासना 21-अनादि गुरुमंत्र गायत्री 22 गायत्री से योग साधना 23-सचित्र गायत्री 24- गायत्री सहस्रनाम 25-मनुष्य जीवन की सार्थकता 26-विश्वव्यापी संकट का गायत्री से समाधान।
उपासना (6) गायत्री की विशिष्ट साधनाएँ (7) गायत्री गीता (8) सचित्र गायत्री (9) गायत्री परिवार का लक्ष (10) गायत्री यज्ञ का महत्व
उपासना की प्रथम भूमिका में आवश्यक है। भजन के साथ भाव की मात्रा भी पर्याप्त होनी चाहिए। इस ध्यान को कल्पना न समझा जाय वरन् साधक अपने को वस्तुतः उसी स्थिति में अनुभव करे और माता के प्रति अनन्य प्रेम-भाव के साथ तन्मयता अनुभव करे। इस अनुभूति की प्रगाढ़ता में अलौकिक आनन्द का रसास्वादन होता है और मन निरन्तर इसी में लगे रहने की इच्छा करता है। इस प्रकार मन को वश में करने और एक ही लक्ष्य में लगे रहने की एक बड़ी आवश्यकता सहज ही पूरी हो जाती है।
उपासनात्मक साधना का अवलम्बन करने का अपना एक सुनिश्चित मिशन इस लम्बे समय से चल रहा है। प्रसन्नता की जाता है कि परिवार के अगणित सदस्यों ने इससे समुचित लाभ भी उठाया हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-November
उपासना का अमल तथ्य तो अपनी बुद्धि को कुमार्ग पर जाने से बचाये रहने और संसारी कुसंस्कारों के जो मैल नित्य ही मन पर जमते हैं उन्हें माँजने के लिए आवश्यक ही हैं। इसमें अपनी स्वाभाविक स्थिति के बने रहने, पतन के गर्त में गिरने से बचे रहने का ही लाभ है। विशेष प्रगति के लिए ऊँची कक्षा में प्रवेश करना पड़ता हैं और वह कक्षा पाँच कोशों के अनावरण वाले साधना क्रम से आरम्भ होती हैं।
उपासना के रूप में जप हवन पर्याप्त है। यह प्रत्येक हिन्दू का अनिवार्य धर्म कर्तव्य है। शास्त्रों में लिखा हैं कि जो नित्य गायत्री जप नहीं करता वह चाण्डाल के समान है तात्पर्य यह है कि दैनिक उपासना का अमल तथ्य तो अपनी बुद्धि को कुमार्ग पर जाने से बचाये रहने और संसारी कुसंस्कारों के जो मैल नित्य ही मन पर जमते हैं उन्हें माँजने के लिए आवश्यक ही हैं। इसमें अपनी स्वाभाविक स्थिति के बने रहने, पतन के गर्त में गिरने से बचे रहने का ही लाभ है। विशेष प्रगति के लिए ऊँची कक्षा में प्रवेश करना पड़ता हैं और वह कक्षा पाँच कोशों के अनावरण वाले साधना क्रम से आरम्भ होती हैं।
उपासना के साथ उनके आश्रमों में बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाएँ, शिक्षण संस्थाएँ, चिकित्सालय, साहित्य सृजन आदि के कार्यक्रम भी चलते थे। चरक, सुश्रत, विश्वकर्मा, चाणक्य व्यारा, पाणिनि, आर्यभट्ट, नागार्जुन आदि ऋषियों की महत्ता विश्वभर में विख्यात था। तक्षशिला और नालन्दा के गुरुकुल इसने विशाल थे कि उनमें संसार के कोने कोने से सहस्रों छात्र आकर अध्ययन करते थे। इन गुरुकुलों को चलाने वाले ऋषि गृहस्थ ही थे।
उपासना के रूप में गायत्री साधना का ही सर्वोपरि स्थान रहा। साधारण गृहस्थ उसे नित्यकर्म के रूप में अपनाये रहते और वानप्रस्थ संन्यासी एवं विशेष स्थिति के व्यक्ति इसकी विशेष साधनाएँ करके जीवन लक्ष की पूर्णता प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते। इस प्रकार अनादि काल से भारतीय धर्मानुयायी इस उपासना के आधार पर अपना आत्म सुधार, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास करते हुए आत्म साक्षात्कार की ब्राह्मी स्थिति प्राप्त करते रहे।
उपासना के आधार पर अपना आत्म सुधार, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास करते हुए आत्म साक्षात्कार की ब्राह्मी स्थिति प्राप्त करते रहे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-April
उपासना, साधना पूजा, आदि का वास्तविक उद्देश्य ईश्वर को प्राप्त करना ही नहीं है वरन अपने आपको उनके लिए समर्पित करने के लिए भी है। दिन प्रतिदिन भक्ति द्वारा, पूजा उपासना सेवादि द्वारा अपने आपको उस ब्रह्म में बाधा हीन रूप से व्याप्त कर देना ही उपासना आदि का सच्चा रूप है और ऐसी ही पूजा से प्रभु को प्राप्त करने की चिर इच्छापूर्ण होती हैं।
उपासना की सुविधा के लिए एक प्रतिमा या प्रतीक के रूप में कल्पित की गई थी। पहलवान मुगदर की सहायता से अपनी भुजाओं का बल बढ़ाता है। वह भुज बल जीवन के विस्तृत क्षेत्र में अनेकों प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होता है। ऐसा नहीं है कि वह भुज बल केवल उठाने तक ही सीमित रहे। यदि कोई पहलवान भारी मुगदर तो उठा लेता हो पर उसकी भुजाएँ और कुछ पराक्रम करने में असमर्थ हों तो लोग उसे पहलवान नहीं कहेंगे वरन कोई जादूगर समझकर उस मुगदर उठाने वाले की क्रिया में कोई चालाकी होने का सन्देह करने लगेंगे।
उपासना करते हुए भी लक्ष्य की प्राप्ति क्यों नहीं होती? समस्त जीवन चला जाता है, इतना ही नहीं अनेकों जन्म इसमें लग जाते है फिर भी उस परब्रह्म की अनुभूति प्राप्त नहीं होती? अशान्तियों और उद्वेगों से छुटकारा भी नहीं मिलता। इस असफलता का कारण क्या है यह प्रश्न विचारणीय है।
उपासना आदि का सच्चा रूप है और ऐसी ही पूजा से प्रभु को प्राप्त करने की चिर इच्छापूर्ण होती हैं।
उपासना आदि की अनेक प्रणालियाँ निकाली गई हैं, जिन के द्वारा मनुष्य को भौतिक जगत की संचालिका आत्मा शक्ति का ज्ञान हो सकता है और वह साधारण साँसारिक भोगों के संकीर्ण जीवन से ऊपर उठकर एक विशाल और उच्च जीवन-क्षेत्र में प्रवेश करने में समर्थ होता है।
उपासना, साधना, स्वाध्याय आदि से अपने ज्ञान को विशुद्ध एवं शक्ति को सचेष्ट रखना पड़ता है दूसरी ओर सम्पूर्ण भाव से अपने आपको ईश्वर की इच्छा पर उसी के लिए से निवेदित करना पड़ता है। जब साँसारिक तुच्छ लाभों के लिए कुछ न कुछ उत्सर्ग करना पड़ता है तो उस समग्र-अखण्ड, विश्वात्मा, ब्रह्म के साक्षात्कार के लिए अपने आपको सम्पूर्ण रूपेण निवेदन करना ही पड़ेगा पतंगा अपने आपको सम्पूर्ण भाव से दीपक को अर्पण कर देता है और तभी वह लौ में मिल जाता है? अपने प्रियतम के मिलन के लिए उसे समग्र भाव से अपने आपको अर्पण करना पड़ता है।
उपासना, दैनिक कृत्य भी अनिवार्य है। इस प्राथमिक सोपान पर चलकर ही आगे बढ़ना सम्भव है।
उपासना, नियम, साधना के पथ पर दृढ़ता रखकर बढ़ने वाले अनेकों साधक मिला जायेंगे जो कठोरतम चेष्टाएँ जारी रखते है किन्तु अपने आपका समर्पण करने वाले साधक बहुत ही कम दिखाई देते है। यह ही ब्रह्म साक्षात्कार के पथ का रहस्य है। अक्सर मनुष्य उस प्रियतम, परमात्मा के मिलन पथ में भी कृपणता करता है और अपने आपको स्वयं के हाथों में ही रखना चाहता है। दूसरों के-उस विराट के हाथों में नहीं देना चाहता? कठोर साधनाओं और व्रत पालन में वह प्राण पण चेष्टा जारी रखता है अपनी साधना का हिसाब लगाकर एक विशेष अभिमान पूर्ण आनन्द के साथ ब्रह्म साक्षात्कार का मूल्यांकन करता है।
उपासना साधना करते रहना ब्रह्म प्राप्ति के लिए आवश्यक ही नहीं प्रथम शर्त भी है। बिना साधना कि सिद्धि नहीं मिलती है। एक परीक्षा में सफल होने के लिए विद्यार्थी को कितना श्रम करना पड़ता है। एक मोती को समुद्र तल से निकालने के लिए किस प्रकार जान को हथेली पर रखकर समुद्र की गहराई में उतरना पड़ता है, किसी मंजिल तक पहुँचने में राही को कितना श्रम करना पड़ता है। साध्य तक पहुँचने के लिए साधना आवश्यक है।
उपासना सेवादि द्वारा अपने आपको उस ब्रह्म में बाधा हीन रूप से व्याप्त कर देना ही उपासना आदि का सच्चा रूप है और ऐसी ही पूजा से प्रभु को प्राप्त करने की चिर इच्छापूर्ण होती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-May
उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुधार ढ़ड़ से प्रतिपादन मूल्य 2”‘)
उपासना करने से साधक उस महान विश्वव्यापी गायत्री शक्ति का एक महत्वपूर्ण अंश अपनी ओर आकर्षित करके अपने में धारण कर सकता है। जिस प्रकार जल से भरे हुए सभी गड्ढे चाहे वो समुद्र हों, चाहे छोटे पोखर, सभी जलाशय कहलाते है, इसी प्रकार विश्वव्यापी गायत्री शक्ति के सजातीय होने के कारण, घनिष्ठ संबंध रखने के कारण यह चौबीस अक्षरों वाला प्रसिद्ध वेदमंत्र भी गायत्री ही कहलाता है।
उपासना करनी चाहिए।
उपासना करते हैं। प्राण ही सूर्य, चन्द्र और प्रजापति हैं।
उपासना के माध्यम अलग-अलग हो सकते हैं, उसी प्रकार जैसे एक नदी में उतरने के लिए विभिन्न घाट।
उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरू के समान पथ प्रदर्शन करता है ।इस विषय की सभी जिज्ञासाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाने जाने वाले बीज-मन्त्रों का साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों को विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुधार ढ़ड़ से प्रतिपादन मूल्य 2”‘)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-December
उपासना जिनकी अब तक बिलकुल नहीं चलती, वे इस आधार पर थोड़ी-सी से ही आरम्भ कर सकते है। जिनकी चलती है वे ध्यान के द्वारा उसे और परि-पुष्ट कर सकते है।
उपासना और साधना के लिये एक आवश्यकीय शर्त यह है कि वह सच्चे भाव से चित्त लगाकर की जाय। आज कल जिस प्रकार बहुसंख्यक ‘धार्मिक’ कहलाने वाले व्यक्ति दुनिया को दिखाने के लिये अथवा एक रस्म पूरा करने के लिये मंदिर में जाकर दर्शन कर लेते है और नियम को पूरा कर लेने के लिए एकाध माला भी जप लेते है, उससे किसी बड़े सुफल की आशा नहीं की जा सकती। उपासना और साधना तो तभी सच्ची मानी जा सकती है जब कि मनुष्य उस समय समस्त साँसारिक विषयों और आसपास की बातों को भूलकर प्रभु के ध्यान में निमग्न हो जाय। जब मनुष्य इस प्रकार की संलग्नता और एकाग्रता से अपने इष्टदेव की उपासना करता है, तभी वह आध्यात्म मार्ग पर अग्रसर हो सकता है और तभी वह देवी कृपा का लाभ प्राप्त कर सकता हैं इसी तथ्य को समझाने के लिये इस मन्त्र में बतलाया गया है जब मनुष्य हृदय और आत्मा से सोम का अभिषेक (परमात्मा की उपासना) करता है तब उसे स्वयमेव ईश्वरीय तेज के दर्शन होने लगते है और परमात्मा की कृपा अपने चारों तरफ मेह की तरह बरसती जान पड़ती है।
उपासना का साँसारिक कामनाओं की पूर्ति से काई सम्बन्ध नहीं, ठीक नहीं है। एक अन्य वेद मंत्र में कहा गया है कि-अपमिव प्रवणे यस्य दुर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावतम्।” ‘भगवान का धन कभी न रुकने वाला और सदा स्थिर रहने वाला हैं वह उसके उपासकों को इस प्रकार प्राप्त होता है जिस प्रकार नीचे की ओर बहता हुआ जल।’ वर्तमान समय में अनेकों ऐसे व्यक्ति हो चुके है जो बहुत साधारण विद्या-बुद्धि के होते हुए भी परमात्मा के भरोसे सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करते है और जो अपने दूसरों के बड़े-बड़े कार्यों को सहज में ही पूरा कर देते है। हम अपने प्राचीन ग्रन्थों में संतों, तपस्वियों ओर भक्तों के जिन चमत्कारों का वर्णन पढ़ते है उनसे तो यह बात स्पष्ट दिखलाई पड़ती हे कि ईश्वर की सच्चे हृदय से उपासना करने वालों को किसी साँसारिक सम्पदा का अभाव नहीं रहता।
उपासना और साधना तो तभी सच्ची मानी जा सकती है जब कि मनुष्य उस समय समस्त साँसारिक विषयों और आसपास की बातों को भूलकर प्रभु के ध्यान में निमग्न हो जाय। जब मनुष्य इस प्रकार की संलग्नता और एकाग्रता से अपने इष्टदेव की उपासना करता है, तभी वह आध्यात्म मार्ग पर अग्रसर हो सकता है और तभी वह देवी कृपा का लाभ प्राप्त कर सकता हैं इसी तथ्य को समझाने के लिये इस मन्त्र में बतलाया गया है जब मनुष्य हृदय और आत्मा से सोम का अभिषेक (परमात्मा की उपासना) करता है तब उसे स्वयमेव ईश्वरीय तेज के दर्शन होने लगते है और परमात्मा की कृपा अपने चारों तरफ मेह की तरह बरसती जान पड़ती है।
उपासना के सत्य होने की कसौटी है। जो कोई भी एकाग्र चित्त से और तल्लीन होकर परमात्मा का ध्यान करेगा उसे कुछ समय उपरान्त उसके तेज का अनुभव होना अवश्यम्भावी है। यह तेज ही साधक के अन्तर को प्रकाशित करके उसकी भ्रांतियों को दूर कर देता है और उसे जीवन के सच्चे मार्ग को दिखलाता है। इसी प्रकार से मनुष्य सच्चे ज्ञान का अधिकारी बनता है और सब प्रकार की भव बाधाओं को सहज में पार कर सकने की समर्थ प्राप्त करता है।
उपासना में लगने का प्रयत्न करे। यही मार्ग सीधा सरल और सुगम है।
उपासना करते हुए, मित्रों से प्रेम करते हुए, शत्रुता रखने वालों के प्रति किसी प्रकार की घृणा न करते हुए, अन्ध-विश्वासों को घृणित समझते हुए शान्ति और सन्तोष के साथ मृत्यु का वर्णन करता हूँ।
उपासना करने का कार्यक्रम बनावें। जिनसे बन पड़े वे उन दिनों 24 हजार का एक अनुष्ठान करें जहाँ संभव हो सके वहाँ उन दिनों सामूहिक जप-अनुष्ठान भी किये जायें।
उपासना में संलग्न साधक यदि उस योजना के अंतर्गत शक्ति ग्रहण करने लगे तो उन्हें अपने भीतर एक नया तंतु प्रवेश करता हुआ अनुभव हो सकता हैं इस माध्यम से उन्हें हमारा व्यक्तिगत प्रतिदान उसी तरह प्राप्त हो सकता है जैसे पास बैठे हुए दो व्यक्ति आपस में कुछ आदान प्रदान कर सकते है। इस प्रकार हम लोगों के बीच शरीरों की दूरी रहते हुए भी वस्तुतः अत्यन्त समीपता और एकता की स्थिति बनी रहेगी। इस शक्ति संचार साधना का विधान सब के लिए नहीं है, उसकी उपयोगिता केवल संलग्न साधकों के लिए ही है। इसलिए उसका विधान उन्हें ही बता दिया जाता है जो उसकी आकांक्षा व्यक्त करते है।
उपासना मनुष्य के कल्याणार्थ आवश्यक मानी गई है। प्राचीन काल के जितने भी धर्म और मतमतान्तरों हे उन सब में कोई न कोई विधान पाया जाता है। चाहे ईश्वर को निराकार मानने वालों को देखिये ओर चाहे साकार वालों को, स्तुति और प्रार्थना की उपयोगिता सब स्वीकार करते है। भारतवर्ष में सैकड़ों ही नहीं हजारों विभिन्न संप्रदाय पाये जाते है, जिनके सिद्धान्तों में जमीन आसमान का सा अन्तर है, पर एक बात सब में समान रूप से मिलेगी और वह यही है कि वे किसी न किसी रुपं में ईश्वर का गुणगान अवश्य करते हैं और उससे अपने कल्याण की प्रार्थना करते है। थोड़े से अर्द्धमृतक लोग वान का नाम लेकर इस बात को विरोध करने को तैयार हो सकते है, पर सत्य बात यह है कि उन्होंने न विज्ञान के मर्म को समझा है और न अध्यात्म क्षेत्र में कदम रखा है।
उपासना में संलग्न होता है, तो उसकी अवस्था में परिवर्तन होने लगता है। जब साधना में अग्रसर होकर वह अपने चारों ओर परमात्म-शक्ति की क्रीड़ा अनुभव करता है और यह समझने लगता है कि संसार जो कुछ हो रहा है वह उस प्रभु की प्रेरणा और इच्छा का भी फल है तब वह जो कुछ करता है उसका अन्तिम परिणाम जीव के लिये शुभ ही होता है, चाहे वह तत्काल उसे न समझ सके, तब उसकी व्याकुलता और अशान्ति दूर होने लगती है और उसे ऐसा अनुभव होता है मानो ग्रीष्म ऋतु से व्यथित, श्रान्ति, क्लान्त व्यक्ति को शीतल और शान्तिदायक वर्षा ऋतु प्राप्त हो गई। मनुष्यों ने अपनी भिन्न-भिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिये तरह-तरह की साधनायें निकाली है। धन, संतान, वैभव, सम्मान, प्रभाव, विद्या, बुद्धि आदि की प्राप्ति के लिए लोग भाँति-भाँति के उपायों का सहारा लेते रहते है, निकसे उनको अपनी योग्यतानुसार कम या अधिक परिणाम में सफलता भी प्राप्त होती है। पर आत्मिक शांति, प्राप्त करने, साँसारिक तापों के छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय यही हे कि मनुष्य भिन्न-भिन्न कामनाओं का मोह त्याग कर सच्चे-हृदय से परमात्मा का आश्रय ले और शुद्ध भाव से उसकी स्तुति और प्रार्थना करे।
उपासना) करता है तब उसे स्वयमेव ईश्वरीय तेज के दर्शन होने लगते है और परमात्मा की कृपा अपने चारों तरफ मेह की तरह बरसती जान पड़ती है।
उपासना करने के उदाहरण मिलते है। यह सत्य है कि स्त्री का प्रधान कार्य-क्षेत्र घर-गृहस्थी ही मानी गई है। गृहस्थ आश्रम के पश्चात् पत्नी भी पति के साथ वानप्रस्थ आश्रम में रह कर ईश्वरोपासना करती थी और उसके संन्यासी हो जाने पर वह भी उसी प्रकार का त्यागमय जीवन व्यतीत करती थी। इस प्रकार धार्मिक दृष्टि से इस देश की स्त्रियों का दर्जा कभी हीन अथवा निकृष्ट नहीं समझा गया।
उपासना करने वालों को किसी साँसारिक सम्पदा का अभाव नहीं रहता।
उपासना करता है, तभी वह आध्यात्म मार्ग पर अग्रसर हो सकता है और तभी वह देवी कृपा का लाभ प्राप्त कर सकता हैं इसी तथ्य को समझाने के लिये इस मन्त्र में बतलाया गया है जब मनुष्य हृदय और आत्मा से सोम का अभिषेक (परमात्मा की उपासना) करता है तब उसे स्वयमेव ईश्वरीय तेज के दर्शन होने लगते है और परमात्मा की कृपा अपने चारों तरफ मेह की तरह बरसती जान पड़ती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-September
उपासना में दृढ़ हो चुकी है वे अपनी धर्म पत्नियों को भी प्रेरणा देकर इस मार्ग पर अग्रसर पर आर कम से कम इन चार महीनों में तो ब्रह्मचर्य से रहने की प्रतिज्ञा कर हो। ऐसे श्रद्धावान दम्पत्ति किन्हीं महान् उच्च आत्माओं को अपने यहाँ जन्म लेने के लिए आकर्षित कर सकते है।
उपासना के अनेकों विधि विधान, भजन पूजन होते रहते है और भक्ति भावना से उनके लाभ भी मिलते है। पुराणों में देवताओं की शक्ति और कृपा के अनेकों उपाख्यान मौजूद है। वे असत्य नहीं है। यदि असत्य होते तो अतीत काल से अब तक वह श्रद्धा भक्ति और पुण्य परम्परा यथावत चलती न आती। असत्य कमजोर होता है इसलिए वह काम समय तक ठहरता है।
उपासना करने वाले लोगों की मनोभूमि सांसारिक स्तर पर निम्न श्रेणी की ही होती है, इसलिए वे मंत्र शक्ति से अपना कोई प्रयोजन भले ही सफल करले पर सच्ची देव कृपा से वंचित ही रहते है। इसके विपरीत जिनकी आत्मा में सच्ची श्रद्धा भक्ति होती है, जिनका मन निस्वार्थ और निष्काम होना है उन्हें उच्च कोटी के दैवी अनुग्रह प्राप्त होते है। उनको लोक और परलोक दोनों ही सार्थक होते है। इस तथ्य पर विचार करने से भी यही स्पष्ट होता है कि उच्च स्तर की आत्मिक भूमिका ही देव कृपा उपलब्ध होने का प्रधान कारण है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-February
उपासना बन गया है और अधिकाँश लोग घर में या मन्दिर में भगवान की स्तुति, प्रार्थना, कीर्तन, भजन कर लेने को ही ईश्वर-भक्ति का मार्ग समझने लगे हैं, पर इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि यदि इन कार्यों के फलस्वरूप हमारे हृदय में भूत दया, दुखियों के साथ करुणा और आपत्तिग्रस्तों की सहायता का भाव उदय नहीं होता तो वह सब भजन, पूजा बिलकुल दिखावटी अथवा मूढ़ता है और उससे हमारा आत्मकल्याण कभी नहीं हो सकता। प्राचीन समय में जो प्रसिद्ध भक्त, संत और त्यागी-तपस्वी हुए हैं वे सब लोक-सेवक और लोक-शिक्षक ही थे, यह दूसरी बात है आज सैकड़ों वर्ष का समय बीत जाने से और अपनी त्रुटिपूर्ण मनोभावना के कारण उनके चरित्रों को हमने केवल भजन-पूजा और कुछ अलौकिक चमत्कारों तक ही सीमित कर दिया है।
उपासना करना, शुद्ध जीवन व्यतीत करना, जप-तप-ध्यान करना भी बहुत श्रेष्ट और सराहनीय गुण हैं, पर इनका संबंध प्रायः व्यक्तिगत जीवन से ही होता है। बहुसंसयक मनुष्य ऐसे देखने में आते है कि जिनका रहन-सहन आचरण सब प्रकार से शुद्ध और त्यागमय है, पर दुनियाँ के लोग उनके विषय में कुछ भी नहीं जानते। इसलिए अमर-जीवन के अभिलाषी मनुष्य का परोपकारी और समाज सेवक होना परमावश्यक है। दुनियाँ हमको तभी याद करेगी, सर्व साधारण हमको तभी श्रद्धा की दृष्टि से देखेंगे जब हमारा जीवन और कार्य उनके लिए लाभदायक, कल्याणकारी प्रतीत होंगे। इसलिए वेद के उपदेशानुसार मनुष्य को सदैव सत्कृत्य और दूसरों की भलाई करते हुए जीवन व्यतीत करने का प्रयत्न करना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-December
उपासना इतनी सस्ती होती है कहीं? जिसमें कष्ट न उठाना पड़ता हो, पुरुषार्थ न करना पड़ता हो, इतनी सस्ती साधना भी कहीं होती है। क्या ? इतनी कीमती चीजें आप इतनी सस्ती कीमत पर खरीदने की कोशिश करेंगे? ऐसा मत कीजिए।
उपासना की थी अर्जुन ने, आप ही बताइये। कोई अनुष्ठान , जप, तप, ध्यान, धारणा , समाधि, दैनिक पूजा भी नहीं की थी बस भगवान की आज्ञा मानी थी उन्होंने कहा की इस समय सबसे बड़ी साधना महाभारत की है और अर्जुन उसी में लग गये ।तब भगवान की बनायी साधना मनुष्यों द्वारा की गयी साधना की अपेक्षा लाखों गुनी श्रेयस्कर सिद्ध हुई ऐसी ही दूसरों की बात है ।
उपासना निष्फल क्यों होने लगी? पत्थर को प्राणवान बनाने वाली श्रद्धा कहा गुम हो गई ? भागीरथी और शुनःशपुओं की यह धरती क्या अब बांझ हो जाएगी? कर्तवरुो की बलि चढ़ाकर अधिकार की मांग को उचित कैसे ठहराया जाय? व्यक्तिगत स्वार्थ को लेकर सम्पूर्ण राष्ट्र के स्वास्थ्य के साथ समझौता कर पाना किस प्रकार सम्भव हो?
उपासना के रूप में किया करते हैं। उनके अनुसार यह इस तथ्य का स्पष्ट संकेत है कि भारत ने मात्र अपनी सम्पन्नता के कारण ही नहीं अपनी आध्यात्मिक चेतना के कारण विरुव को प्रभावित किया है। भारतीय दर्शन , वेद-पुराण, उपनिषद् , सबका लक्ष्य एक है, ‘श्रेष्ठतम की प्राप्ति । यह मात्र बुद्धिवाद के आधार पर नहीं लिखे गए। इनमें प्रतिपादित प्रत्येक तथ्य प्राचीन ऋषिगणों की तम -साधना का निष्कर्ष है चूंकि यह सृष्टि असीम है विचार असीम है अतः किसी भी एक विचार को पूर्ण नहीं माना जा सकता ।
उपासना की दृष्टि से सामयिक कर्तव्यों, सामयिक जिम्मेदारियों का परिपालन करना बहुत जरूरी है। हनुमान जी ने ही किया और जिस दिन से भगवान की शरण में आये, उनकी अनुसार जीवनभर साधना करते रहे। अपनी मर्जी की साधना की? नहीं, अपनी मर्जी की साधना नहीं की । भगवान ने हुकुम दिया-सीता को ढूंढ़ लाइये और वे सीताजी को ढूंढ़ लाइये और वे सीताजी को ढूँढ़ लाये, अंगूठी दे आये और माँ की निशानी लाकर दी ओर कहा देखिये हम पता लगा लाये।
उपासना की जाती थी। जेरार्ड येकार्टोर ने अपने ग्रन्थ ‘काँस्मोग्राफी” में उन्होंने भारत को ‘सौर नगर’ कहा है जहां के लोग नित्य-प्रति गायत्री महामंत्र की उपासना सूर्य उपासना के रूप में किया करते हैं। उनके अनुसार यह इस तथ्य का स्पष्ट संकेत है कि भारत ने मात्र अपनी सम्पन्नता के कारण ही नहीं अपनी आध्यात्मिक चेतना के कारण विरुव को प्रभावित किया है। भारतीय दर्शन , वेद-पुराण, उपनिषद् , सबका लक्ष्य एक है, ‘श्रेष्ठतम की प्राप्ति । यह मात्र बुद्धिवाद के आधार पर नहीं लिखे गए।
उपासना सूर्य उपासना के रूप में किया करते हैं। उनके अनुसार यह इस तथ्य का स्पष्ट संकेत है कि भारत ने मात्र अपनी सम्पन्नता के कारण ही नहीं अपनी आध्यात्मिक चेतना के कारण विरुव को प्रभावित किया है। भारतीय दर्शन , वेद-पुराण, उपनिषद् , सबका लक्ष्य एक है, ‘श्रेष्ठतम की प्राप्ति । यह मात्र बुद्धिवाद के आधार पर नहीं लिखे गए। इनमें प्रतिपादित प्रत्येक तथ्य प्राचीन ऋषिगणों की तम -साधना का निष्कर्ष है चूंकि यह सृष्टि असीम है विचार असीम है अतः किसी भी एक विचार को पूर्ण नहीं माना जा सकता ।
उपासना का मतलब राम नाम लेना, माला घुमाना ही नहीं होता। हर जगह माला काम नहीं आती है, ऐसी बात नहीं।
उपासना करेगा। वह भी दैवी शक्ति प्राप्त करेगा।
उपासना करने वाले को किसी भी स्थिति में पहुंचकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि अब पढ़ाई -लिखाई समाप्त हो चुकी है और अब सीखने जैसी कोई बात नहीं रही है ज्ञान की सीमा नहीं , वरन् वह समुद्र की भांति अत्यन्त और अगाध है उसकी कोई सीमा नहीं है। ज्ञान नित-नूतन विकासक्रम की गोद में पलता है इसलिए बुद्धि विकास और उन्नति की कोई सीमा नहीं हो सकती प्रत्येक पढ़े -लिखे आदमी के लिए नया सीखने को बहुत कुछ शेष रहता है क्योंकि मानव ज्ञान भी बड़ी तेज रफ्तार में बढ़ता ही जाता है जितना मनुष्य इस दिशा में प्रयास करेगा। प्रज्ञा वाक् बनता चला जाएगा।
उपासना समझा ली है। आपने? उपासना इतनी सस्ती होती है कहीं? जिसमें कष्ट न उठाना पड़ता हो, पुरुषार्थ न करना पड़ता हो, इतनी सस्ती साधना भी कहीं होती है। क्या ?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-May
उपासना करने का विधान है। इसमें सद्बुद्धि के लिए मात्र प्रार्थना ही नहीं है, वरन् यह तथ्य है कि इस उपासना से बुद्धि में प्रखरता का, सत्प्रेरणाओं का अभिवर्धन है। यह बात दूसरी है कि उसका प्रयोग किस काम के लिए किया जाय। देवता श्रेष्ठ के लिए और दैत्य निकृष्ट के लिए भी बुद्धि की प्रतिभा का प्रयोग करते रहे है।
उपासना का समय स्वरूप क्या है और उसकी सिद्धियाँ क्या अभी भी संभव है ? और वह लाभ मिले तो मिले कैसे ? इसके लिए उनके समान साधनात्मक जीवन को प्रस्तुत करते हुए अध्यात्म प्रेमियों को उस पथ का अनुकरण करने की प्रेरणा दी जा सकती है। वहाँ एक बात ध्यान रखने योग्य है कि चमत्कार से किसी को कोई मार्गदर्शन नहीं मिलता। प्रायः परमपूज्य गुरुदेव की चर्चा आते ही परिजन उनके चमत्कारी पक्ष की उभारने-कहने के जोश में आ जाते हैं और समझते हैं कि इन चमत्कारी बातों से जनता जल्दी प्रभावित होगी।
उपासना से बुद्धि में प्रखरता का, सत्प्रेरणाओं का अभिवर्धन है। यह बात दूसरी है कि उसका प्रयोग किस काम के लिए किया जाय। देवता श्रेष्ठ के लिए और दैत्य निकृष्ट के लिए भी बुद्धि की प्रतिभा का प्रयोग करते रहे है।
उपासना करते थे। ऋषियों, अवतारी महामानवों का भी वही अवलम्बन रहा। मनुष्यों में शिखा और यज्ञोपवीत के रूप में गायत्री को अपनी काया तथा बुद्धि में समाविष्ट होने की भावना रखना और उसकी यथासंभव नित्य नियमित उपासना करने का विधान है। इसमें सद्बुद्धि के लिए मात्र प्रार्थना ही नहीं है, वरन् यह तथ्य है कि इस उपासना से बुद्धि में प्रखरता का, सत्प्रेरणाओं का अभिवर्धन है। यह बात दूसरी है कि उसका प्रयोग किस काम के लिए किया जाय।
उपासनात्मक तपश्चर्याओं द्वारा अतीन्द्रिय - शक्ति का उद्भव करते हैं। अन्तराल में प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं को जगाया जाना ओर इस विशाल ब्रह्माण्ड में बिखरे हुए शक्तिशाली चेतन-तत्वों को खींचकर अपने में धारण करना यह दोनों ही प्रयत्न अध्यात्म-साधनाओं द्वारा किये जाते हैं। जिनमें यह उभयपक्षीय विशेषताएँ बढ़ती हैं उन्हें कई दृष्टियों से चमत्कारी विशेषताओं से सुसम्पन्न पाया जाता है।
उपासना-साधन अनन्त गुना फलदायी होती है फिर इस बार की गायत्री-जयंती तो हस्त-नक्षत्र पर पड़ रही है जो सर्वार्थ-सिद्धि प्रदान करने वाला योग है। इस वर्ष यह शुभ संयोग उपलब्ध होने से प्रत्येक प्रज्ञा परिजन इसका अधिकाधिक लाभ उठावेंगे और परम-पूज्य गुरुदेव-परम वन्दनीया माताजी द्वारा निर्देशित कार्यों को अधिक मुस्तैदी से पूरा करने में जुट पड़ने का संकल्प लेंगे और महाकाल के साथी-सहचर होने का पुण्य-गौरव अर्जित करेंगे, ऐसी आशा-उपेक्षा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-September
उपासना का अधिकार होना चाहिए। इसके लिए हमने अब तक लड़ाई लड़ी है और आगे भी लड़ेंगे। बाप-दादों की बातों को हम नहीं जानते, वे अंधकार के जमाने में पैदा हुए थे। मध्यकालीन युग में स्त्रियों पर तरह-तरह के बंधन लगाये गये थे। उससे पहले प्राचीनकाल का जो समय था, वह दिन का समय था।
उपासना प्रचलित की। यह सर्वव्यापक और विश्व उपासना के रूप में सम्मानित हुई। उसी से मातृसत्ता की महिमा प्रतिपादित होती है।
उपासना शुरू कर दी है। इसे यों भी कह सकते हैं कि आज का मानव शान्ति शीलतादायिनी निर्झरिणी से दूर मरुस्थल की मृग मरीचिका में भटक गया है। निराशा, अशान्ति, असन्तोष, कलह, कटुता में खीझते हुए दम्पत्ति सामाजिक जीवन भी यही बुराइयां फैलाते हैं। यह एक कटु सत्य है जो माँ के प्रति कृतज्ञ नहीं हो सकता, वह समाज को भी कभी अपना नहीं मानता। ऐसे स्वार्थ व संकीर्णता की प्रवृत्ति वाला व्यक्ति किसी के भी साथ छल कर सकता, धोखा दे सकता है।
उपासना के रूप में सम्मानित हुई। उसी से मातृसत्ता की महिमा प्रतिपादित होती है।
उपासना उसके अन्तर में कवित्व की अनुपमेय शक्ति के रूप में प्रस्फुटित हो उठी थी। वह कभी का मूढ़ अब महाकवि हो गया। देश देशान्तर सभी उसे आश्चर्य से देखते, सराहते और शिक्षण लेने का प्रयास करते। वह सभी से एक ही स्वानुभूत तथ्य कहता, “पहचानो, नारी की गरिमा, उस कुशल शिल्पी की सृजनशक्ति, जो आदि से अब तक मनुष्य को पशुता से मुक्त कर सुसंस्कारों की निधि सौंपती आयी है।”
उपासना से ही अवकाश नहीं मिलता । फिर बुराइयाँ तो मुझमें ही सैकड़ों भरी पड़ी हैं। उनको सुधारूं या दूसरों के दोष-दर्शन में अपना समय व्यर्थ गँवाऊँ।”वह सज्जन राबिया बीबी की भक्ति से बड़े प्रभावित हुए और दूसरों की कभी भी बुराई न करने की प्रेरणा लेकर घर गये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-February
उपासना प्रक्रिया में भाव भरी नियमितता । साधना, अर्थात् जीवन साधना । संचित कुसंस्कारों एवं अवांछनीय आदतों मान्यताओं का उन्मूलन । गुण, कर्म, स्वभाव, चिंतन, चरित्र में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश। आराधना अर्थात् लोकमंगल की सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में उदार सहयोग, श्रम दान, अंशदान ।
उपासना निकटता को कहते हैं। निकटता अर्थात् एकता- घनिष्ठता। आग और ईंधन निकट आते हैं तो दोनों एक रूप के हो जाते हैं। इसके लिए साधक को साध्य के प्रति समर्पण करना होता है। उसके अनुशासन को जीवन नीति बनाना पड़ता है।
उपासना यदि सच्ची हो तो उनका प्रतिफल सुनिश्चित रूप से होना चाहिए कि जीव और ब्रह्म में गुण कर्म और स्वभाव की ममता दृष्टि गोचर होने लगे। उपासना निकटता को कहते हैं। निकटता अर्थात् एकता- घनिष्ठता। आग और ईंधन निकट आते हैं तो दोनों एक रूप के हो जाते हैं। इसके लिए साधक को साध्य के प्रति समर्पण करना होता है।
उपासना का स्वरूप एवं उद्देश्य यही है । जो उसे क्रिया कृत्यों की जादूगरी समझते हैं, वे भूल करते हैं। अध्यात्म पराक्रम का केन्द्र बिन्दु है- आत्म परिष्कार । उपासनात्मक कर्मकाण्डों के सभी उपाय, उपचार साधक को पवित्रता और प्रखरता अपनाने के लिए उत्साहित और अग्रसर करते हैं। उनके द्वारा चित्र- विचित्र चमत्कार देखने और उपयुक्त अनुपयुक्त मनोरथ पूरा करने जैसी बिना पंखों की कल्पना उड़ाने नहीं उड़ी जानी चाहिए।
उपासना पक्ष इनकी अलंकारिक प्रतिमा भी बना लेता है और निराकार पक्ष प्रकाश किरणों के रूप में उसको पड़ता है। सूर्य की सात रंग की किरणोँ में से हम जिसे चाहे उसे रंगीन शीशे के माध्यम से उपलब्ध कर सकते हैं। एक्सरे मशीन अल्ट्रावायलेट किरणें आकाश में से अपनी अभीष्ट किरणों को ही प्रयुक्त करते हैं। हंस दूध पीता है, पानी छोड़ देता है। इसी प्रकार किसी मंत्र के लिए ब्रह्म चेतना की किस दिव्य तरंग का प्रयोग किया जाय इसके लिए विधान निर्धारित है।
उपासना करके जो जीवन में अलौकिक ऋषि सिद्ध पाने की लालसा रखते हैं वे किसी जुआरी की तरह नगण्य सा धन लाकर बहुत अधिक लाभ उठाना जानते हैं। बिना श्रम के मालामाल होना जानते हैं। ऐसे लोभी उपासकों की यह अनिश्चित आशा कभी भी पूरी नहीं हो सकती और हो यह भी हो सकता है कि इस लोभ के कारण अपनी उस समान उपासना का भी कोई फल न मिले । देवताओं का वरदान वस्तुतः इतना सस्ता नहीं होता जितना कि लोगों ने समझ रखा है।वे मंदिर में जाकर हाथ जोड़े जान या अक्षत पुष्प जैसी तुच्छ वस्तुएं चढ़ा देन से प्रसन्न हो जायेगी और अपने वरदान लूटने लगेंगे ।
उपासना का भी कोई फल न मिले । देवताओं का वरदान वस्तुतः इतना सस्ता नहीं होता जितना कि लोगों ने समझ रखा है।वे मंदिर में जाकर हाथ जोड़े जान या अक्षत पुष्प जैसी तुच्छ वस्तुएं चढ़ा देन से प्रसन्न हो जायेगी और अपने वरदान लूटने लगेंगे । ऐसा सोच कर अज्ञान के सिवाय और कुछ नहीं । सामान्य पूजा पाठ का अपना जो पुरस्कार है मिलेगा।
उपासना, याचना स्तर की नहीं होती । वे पात्रता और प्रमाणिकता सिद्ध करने के लिए आत्म-शोधन और आत्म- परिष्कार का द्विविध पुरुषार्थ करते हैं। यही है वह मूल्य जिसकी कीमत पर अध्यात्म क्षेत्र की विभूतियाँ हस्तगत होती है । उपासना का स्वरूप एवं उद्देश्य यही है । जो उसे क्रिया कृत्यों की जादूगरी समझते हैं, वे भूल करते हैं।
उपासना उपेक्षित हो उसे करते रहा जाय । लौकिक जीवन में सुविकसित एवं सुसंस्कृति बना देने के बाद ही आत्मिक अथवा आलौकिक जीवन में प्रवेश किया जाय।
उपासना, साधना, आराधना का त्रिवेणी संगम अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहना चाहिए। औसत देश वासियों का निर्वाह स्तर अपनाये । परिवार को छोटा रखे उसे सुसंस्कारी, स्वावलंबी बनाये। बड़प्पन की लिप्सा छोड़े। महानता का लक्ष्य अपनाये।
उपासना मात्र नहीं है। उसका क्षेत्र आत्मा के सूक्ष्म संस्थाओं की साधना, उन शक्तियों के प्रबोधन की प्रक्रिया है जो मनुष्य के अंतःकरण में बीच रूप में सन्निहित आत्मिक अध्ययन के उस क्षेत्र में एक से एक बढ़कर सिद्धियाँ एवं स्मृतियाँ भारी पड़ जाती है किंतु उनकी प्राप्ति तभी संभव है जब मन में वृद्धि, चित्त, अहंकार, से निर्मित अंतःकरण पाँचों कोशों 6 चक्रों मस्तिष्कीय ब्रह्म रन्ध्र में अव्यवस्थित, कमल हृदय स्थिति सूर्य चक्र नाभि की ब्रह्म ग्रंथि और मूलाधार वासनीय कुंडलिनी आदि के शक्ति संस्थान और कोश केन्द्रों के प्रबुद्ध प्रयुक्त ओर अनुकूलता पूर्वक निर्धारित दिशा में सक्रिय बनाया जा सकता है यह बड़ी गहन सूक्ष्म और साध्य तपस्या है।जन्म जन्म से तैयारी किये हुए किये हुए कोई बिरले ही वह साधना कर पाते हैं और आलौकिक शक्तियों को प्राप्त करते हैं यह साधना न सामान्य है और न कोई सर्वसाधारण के वश की। तथापि असंभव भी नहीं हैं एक समय था, जब भारत वर्ष में अध्यात्म की इस साधना पद्धति का पर्याप्त प्रचलन रहा।देश का ऋषि वर्ग उस वर्ग की देन है।
उपासना के लिए वन की ओर गये होंगे। किन्तु जब सब ने उन्हें अपने सिर पर लकड़ियों का भारी गट्ठा उठाये आते हुए देखा तो वस्तु स्थिति से अवगत होते देर न लगी।
उपासना के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। यही बात मनन साधना पर लागू होती है। उसे भजन के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। वातावरण शान्त ओर स्थान एकान्त होना चाहिए । आंखें बंद करके आराम से कुर्सी पर पड़े हुए यह सोचना चाहिए कि -” शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकलकर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा।
उपासना अर्थात् ईश्वर की इच्छा को प्रमुखता, उसके अनुशासन के प्रति अटूट श्रद्धा, घनिष्ठता के लिए निर्धारित उपासना प्रक्रिया में भाव भरी नियमितता । साधना, अर्थात् जीवन साधना । संचित कुसंस्कारों एवं अवांछनीय आदतों मान्यताओं का उन्मूलन । गुण, कर्म, स्वभाव, चिंतन, चरित्र में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश। आराधना अर्थात् लोकमंगल की सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में उदार सहयोग, श्रम दान, अंशदान ।
उपासनात्मक कर्म काण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही संभव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका महात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया जाता रहा है।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों के सभी उपाय, उपचार साधक को पवित्रता और प्रखरता अपनाने के लिए उत्साहित और अग्रसर करते हैं। उनके द्वारा चित्र- विचित्र चमत्कार देखने और उपयुक्त अनुपयुक्त मनोरथ पूरा करने जैसी बिना पंखों की कल्पना उड़ाने नहीं उड़ी जानी चाहिए। ऐसे में सिर, पैर के रंगीन सपने किसी को भी नहीं देखने चाहिए। जादुई चमत्कारों के लिए किसी देवता या संत के दर्शन अनुग्रह से लम्बी - चौड़ी उपलब्धियाँ पाने की लालसा में उलझने की अपेक्षा यथार्थता इसमें है कि हम अंतर्मुखी हो । अंतर्जगत में छिपी दिव्य शक्तियों को खोजे और सुधारें ।
उपासना, साधना एवं आराधना के तीन आधार चाहिए। उपासना अर्थात् ईश्वर की इच्छा को प्रमुखता, उसके अनुशासन के प्रति अटूट श्रद्धा, घनिष्ठता के लिए निर्धारित उपासना प्रक्रिया में भाव भरी नियमितता । साधना, अर्थात् जीवन साधना । संचित कुसंस्कारों एवं अवांछनीय आदतों मान्यताओं का उन्मूलन । गुण, कर्म, स्वभाव, चिंतन, चरित्र में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-November
उपासना पद्धति की कल्पना क्यों न की जाय, वह इस पृथ्वी पर किसी-न-किसी जगह अवश्य ही क्रिया रूप में होती मिल जाएगी।
उपासना की एक भिन्न विधि निकाल कर एक पृथक सम्प्रदाय स्थापित कर देते हैं। उनका एक नवीन मन्दिर या मठ बन जाता है। इस प्रकार के सैकड़ों-हजारों नये-नये मत और धार्मिक फिर्के जंगली एवं पिछड़े कहे जाने वाले प्रदेशों में ही नहीं, वरन्- योरोप, अफ्रीका, अमेरिका, एशिया के सभ्य एवं सुसंस्कृत देशों में भी पाये जाते हैं। ऐसी कोई पूजा-पद्धति नहीं है। जिसका आविष्कार और प्रचलन संसार में कहीं-न-कहीं न हो चुका हो।
उपासना जैसे अंतरंग को बदलने वाले आध्यात्मिक उपचारों का अभ्यास कराया जाता है। इसके अतिरिक्त फुर्सत के समय स्वाध्याय के लिए सत्साहित्यों का वितरण किया जाता है। बीच-बीच में यज्ञ, दीपयज्ञ, कीर्तन, आरती जैसे कार्यक्रम भी कराये जाते हैं। उनके प्रति स्नेह और प्रेम प्रदर्शित करने के लिए रक्षा-बन्धन जैसे त्यौहारों में उनकी कलाइयों में राखी बाँधी जाती है। इसके अतिरिक्त समय-समय पर उनसे मिलने और उन्हें श्रेष्ठ चिन्तन देकर रचनात्मक कार्यों के प्रति रुचि जगाने का भी उपक्रम होता रहता है।
उपासना करते समय मुँह के बल लेट जाते हैं, कैथोलिक ईसाई घुटनों के बल झुकते हैं, प्रोटेस्टेंट ईसाई कुर्सी पर बैठकर प्रार्थना करते हैं। मुसलमानों की नमाज में कई बार उठना-बैठना पड़ता है और हिन्दुओं की सर्वोच्च प्रार्थना वह है जिसमें साधक ध्यानमग्न होकर अचल हो जाय। यदि कहा जाय कि इन सब में एक ही उपासना विधि ठीक है और दूसरी अन्य सभी बेकार हैं, तो भी काम नहीं बनता। अन्य में भी अनेक व्यक्ति बड़े सन्त और त्यागी महात्मा हो गये हैं। धार्मिक क्षेत्र के इसी घोर वैम्य को देखकर मूर्धन्य लेखक एस. बैरिंग गोल्ड ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘ओरीजिन एण्ड डेवलपमेंट ऑफ रिलीजियस बिलीफ’ में लिखा है कि, “संसार में समस्त प्राचीन युगों से अगणित ऐसे धार्मिक विश्वास पाये गये हैं, जो एक दूसरे से सर्वथा विपरीत हैं और जिनकी रस्मों तथा सिद्धान्तों में जमीन-आसमान का अन्तर है।
उपासना विधि ठीक है और दूसरी अन्य सभी बेकार हैं, तो भी काम नहीं बनता। अन्य में भी अनेक व्यक्ति बड़े सन्त और त्यागी महात्मा हो गये हैं। धार्मिक क्षेत्र के इसी घोर वैम्य को देखकर मूर्धन्य लेखक एस. बैरिंग गोल्ड ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘ओरीजिन एण्ड डेवलपमेंट ऑफ रिलीजियस बिलीफ’ में लिखा है कि, “संसार में समस्त प्राचीन युगों से अगणित ऐसे धार्मिक विश्वास पाये गये हैं, जो एक दूसरे से सर्वथा विपरीत हैं और जिनकी रस्मों तथा सिद्धान्तों में जमीन-आसमान का अन्तर है। एक प्रदेश में मन्दिर का पुजारी देवमूर्ति को मानव रक्त से लिप्त करता है दूसरे ही दिन अन्य धर्म का अनुयायी वहाँ आकर उसे तोड़ कर गन्दे कूड़े के ढेर में फेंक देता है। जिनको एक धर्म वाले भगवान मानते हैं, उन्हीं को दूसरे धर्मानुयायी शैतान कहते हैं।
उपासना के उपक्रम में पंचकुण्डीय यज्ञायोजन एवं क्षेत्रीय प्रशिक्षण योजना ने एक विराट सेना समयदानी कार्यकर्त्ताओं की खड़ी कर दी है। भूमि उर्वर है, ऋषि संस्कृति का खाद-पानी डला हुआ है, मात्र संस्कारों के बीज डालने की आवश्यकता भर शेष है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-April
उपासना स्थल मिलान के दक्षिण में स्थित सैन डैमियानों नामक स्थान में अवस्थित है। प्रत्येक गुरुवार को वहाँ ‘मामो रोजा’ की सामूहिक उपासना की जाती है। मामा रोजा सूर्य की अधिष्ठात्री है। लोगों का विश्वास है कि उस दिन देवी सूक्ष्म रूप से उपस्थित हो सभी को आशीर्वाद देती हैं। इस आशीर्वाद से बीमार स्वस्थ होते देखे गये हैं और स्वस्थ अनेक प्रकार की शुभ प्रेरणाओं से लाभ उठाते सुने गये हैं।
उपासना साधना करने वाले साधकों के लिए एक विशिष्ट आशीर्वाद का प्रेरणा प्रवाह हम लोगों को उपलब्ध है जिसे ‘शक्ति अनुदान की संचार साधना’ कहते हैं। इस साधना उपक्रम में निखिल आकाश में संव्याप्त गायत्री महाशक्ति के महाप्राण को भावना तथा श्वास क्रिया के सम्मिश्रित प्रयोग द्वारा खींचना और अपने अन्दर धारण करना होता है। यह प्रक्रिया जितनी सरल है, उतनी ही महत्वपूर्ण भी। इस विधा का गहन अवगाहन करके मनुष्य देवतुल्य सामर्थ्यवान बन सकता है। शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक प्रगति में यह साधना बहुत ही सहायक सिद्ध हो सकती है।
उपासना की जाती है। मामा रोजा सूर्य की अधिष्ठात्री है। लोगों का विश्वास है कि उस दिन देवी सूक्ष्म रूप से उपस्थित हो सभी को आशीर्वाद देती हैं। इस आशीर्वाद से बीमार स्वस्थ होते देखे गये हैं और स्वस्थ अनेक प्रकार की शुभ प्रेरणाओं से लाभ उठाते सुने गये हैं। बताया जाता है कि 17 नवम्बर, 1870 के दिन वहाँ एक अद्भुत चमत्कार हुआ था जिसमें मामा रोजा की उपस्थिति का प्रत्यक्ष अनुभव सभी ने प्राप्त किया।
उपासना के फलस्वरूप यहाँ के साधक इन्द्रियातीत असीम सुख का रसास्वादन करते थे, यही नहीं उस शक्ति को पाकर वे जहाँ चाहते थे, वहीं मनोवाँछित वस्तुयें पैदा करते थे।
उपासना है। आदि शक्ति की महिमा और गरिमा से परिचित होने पर चित की वह हीनता की ग्रन्थि सहज खुल जाती है, जिसके कारण वे अब तक तरह-तरह से ठगे जाते रहे। जो धन और भावनाएं अभी तक इस कुचक्र में खपती रहीं, उन्हें यदि लोक मंगल में लगाया जा सके तो न सिर्फ पुण्य लाभ होगा, बल्कि परमात्मा की सहज कृपा मिलने से जीवन की अगणित समस्याएं अपने आप सुलझ जाएंगी।
उपासना के दिन हर वर्ष उस संत की आत्मा वहाँ उपस्थित होती है और लोगों की प्रार्थना स्वीकारती हुई उन्हें मौन आशीर्वाद देती है। आत्मा की उपस्थिति का प्रमाण लोगों को तब प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने लगा है, जब काँच के बक्से में बन्द उस पवित्र परिधान में अचानक हलचल आरंभ हो जाती है और तब तक बनी रहती है, जब तक प्रार्थना का क्रम बन्द नहीं हो जाता। अनेक श्रद्धालुओं को इस अवसर पर तरह-तरह की अनुभूतियाँ भी होती हैं। इन्हीं सब कारणों से तत्कालीन पोप चतुर्थ ने इसे एक सामूहिक साधना केन्द्र के रूप में परिवर्तित कर दिया। तब से लेकर अब तक यह केन्द्र सर्वसाधारण का श्रद्धा-बिन्दु बना हुआ है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-October
उपासना, संयम, सेवा-सदाचार का पालन करता हुआ अपने भौतिक कर्तव्य पूरे करे, ताकि आत्म-शक्तियों का क्षय न हो। शक्ति को विघटित कर देने से मनुष्य इस जीवन में भी दुःखी होता है और वह निम्नगामी योनियों की ओर आकर्षित हो जाता है। बढ़ी हुई शक्ति चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक, बौद्धिक अथवा आत्मिक उससे यह जीवन तो सफल होता ही है उस परम स्थिति को प्राप्त करने में भी लाभ मिलता है। इस विज्ञता का ही परिणाम है कि भारतीय जीवनशैली आज भी अपने ही ढंग की है। उसमें पाश्चात्य ढंग के विकारों के लिए कोई स्थान नहीं।
उपासना अधिक फलवती होती है और संध्या के नाम से पुकारी जाती है। उसी प्रकार नवरात्रियों का समय भी दोनों संध्याओं के समतुल्य माना गया है।
उपासना क्षेत्र में नर-नारी को एक समान अधिकार है। ईश्वर के लिए पुत्र-पुत्री दोनों समान हैं।
उपासना, भजन, सेवा करनी चाहिए। अतः सच्ची श्रद्धा उसी के प्रति मानी जा सकती है, जिससे अभिन्न आत्मीयता की अनुभूति हो और जिसके जैसा स्वयं बनने की उत्कृष्ट इच्छा एवं प्रयास हो।
उपासना और साधना के उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। उपासना से आत्मकल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही है। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ-वानर, कृष्णकाल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि महान प्रयोजनों की पूर्ति के लिए सज्जनों की सहकारिता सम्पादित किये बिना और कोई चारा नहीं। देवताओं की संयुक्त शक्ति दुर्गा ने ही उन्हें असुरों के त्रास से छुड़ाया था।
उपासना बिना आत्मीयता के सम्भव नहीं। शास्त्र में कहा है-’शिवो भूत्वा शिवं यजेत्’ अर्थात् स्वयं शिव रूप बनकर ही शिव की उपासना, भजन, सेवा करनी चाहिए। अतः सच्ची श्रद्धा उसी के प्रति मानी जा सकती है, जिससे अभिन्न आत्मीयता की अनुभूति हो और जिसके जैसा स्वयं बनने की उत्कृष्ट इच्छा एवं प्रयास हो।
उपासना से आत्मकल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही है। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ-वानर, कृष्णकाल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि महान प्रयोजनों की पूर्ति के लिए सज्जनों की सहकारिता सम्पादित किये बिना और कोई चारा नहीं। देवताओं की संयुक्त शक्ति दुर्गा ने ही उन्हें असुरों के त्रास से छुड़ाया था। ऋषियों का संचित रक्त घट ही सीता को जन्म देकर और दानवी विभीषिकाओं को निरस्त करने का आधारभूत कारण बना था।
उपासना की चिन्ह-पूजा भी बीजारोपण की दृष्टि से उपयोगी मानी गई है और उसे किसी भी रूप में, किसी भी मनःस्थिति में अपनाये रहने पर जोर दिया गया है। फिर भी उसे निष्ठापूर्वक अपनाने की प्रौढ़ता का स्तर सदा ऊँचा ही रहता है। उच्चस्तरीय सत्परिणामों की आशा-अपेक्षा योजनाबद्ध तपश्चर्या अपनाकर की जाने वाली साधना के साथ अविच्छिन्न रूप से संबंधित है।
उपासना के साथ सूर्य का ध्यान भी करना पड़ता है। ध्यान की अवस्था में सूर्य के विद्युत-चुम्बकीय प्रवाह से अपने मस्तिष्क की चोटी वाले स्थान से नलिका विहीन ग्रंथियों का संबंध जुड़ जाता है और सूर्य के तेज कण हमारे शरीर ओजस्वी, तेजस्वी, वर्चस्वी होता चला जाता है। जिस दिन शरीर के सभी प्रकाश अणु बदल जाते हैं उसी दिन साधक गायत्री सिद्ध या सूर्य की सी गति वाला हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-August
उपासना करना चाहता है तो अपने कर्मों के द्वारा ही उपासना कर। कर्म ही तेरे लिए पत्र-पुष्प हैं, कर्म ही फल व दूग्ध हैं अतः समर्पित कर दे अपने समस्त कर्म ईश्वर को जल में रहकर भी जैसे कमल पत्र जल से ऊपर रहता है, उसी प्रकार कर्म करते हुए भी तू कमल पत्र की भाँति कर्म से ऊपर उठा रह।........
उपासना, एक घण्टा एवं बीस पैसा प्रतिदिन अथवा एक दिन की आजीविका माह में एक बार शाँतिकुँज को देव संस्कृति विस्तार के निमित्त देने का अनुबन्ध।
उपासना के समय, क्रिया और भावना की दृष्टि से एकता, एकात्मता को आधार मानकर जब अपना क्रम पूरा। स्वर्ण जयन्ती साधना वर्ष घोषित करते हुए कहा- “ स्वर्ण जयन्ती वर्ष, साधना वर्ष होगा। इसमें एक लाख निष्ठावानों को साधनात्मक मार्गदर्शन एवं सहयोग देने का निश्चय किया है। यह संख्या देखने भर में बड़ी है पर वस्तुतः अपने लिए बहुत छोटी है। लगभग इतने ही अखण्ड ज्योति पत्रिका के नियमित सदस्य हैं।
उपासना क्रम को छह भागों में इस प्रकार विभक्त किया गया था-(अ) आत्मशोधन के लिए षट्कर्म (आ) प्रतीक पूजा- उपचार (इ) सोऽहम् प्राणयोग (ई) गायत्री जप और ध्यान (उ) खेचरी मुद्रा (ऊ) सूर्य अर्घ्यदान।
उपासना को केवल लकीर पीटने की तरह मात्र कर्मकाण्ड स्तर तक पूरा नहीं किया जाता, वरन् उसके साथ जिस भावोत्कर्ष का सम्बन्ध है उसे अधिकाधिक प्रखर बनाने पर जोर दिया जाता । यही कारण है कि इन दिनों साधकों की मनःस्थिति उच्चस्तरीय भावभूमिका में अवस्थित रहती और वे किसी शान्ति लोक में निवास करने का अद्भुत आनन्द जीवन में पहली बार मिला अनुभव करते ।
उपासना, साधना, आराधना के मर्म को पूज्यवर के जीवन के परिप्रेक्ष्य में समझाया।
उपासनाक्रम के साथ प्रातः आँख खुलते ही 15 मिनट का आत्मबोध चिन्तन-जिसमें यह मान्यता चित्र मस्तिष्क में अधिकाधिक स्पष्टता के साथ जमानी होती है कि आज का एक दिन पूरे जीवन की तरह है इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग किया जाना चाहिए। समय का एक क्षण न तो व्यर्थ गँवाया जाना चाहिए और न अनर्थ कार्यों में लगाया जाना चाहिए। सोचा जाना चाहिए कि ईश्वर ने अन्य किसी जीवधारी को वे सुविधाएँ नहीं दीं जो मनुष्य को प्राप्त हैं। यह पक्षपात या उपहार नहीं वरन् विशुद्ध अमानत हैं जिसे उत्कृष्ट आदर्शवादी रीति-नीति अपनाकर पूर्णता प्राप्त करने, स्वर्ग और मुक्ति का आनन्द इसी जन्म में लेने के लिए दिया गया है। यह प्रयोजन तभी पुरा होता है जब प्राप्त क्षणों का योजनाबद्ध रूप से सदुपयोग किया जाय।
उपासना पद्धति में शिथिलीकरण मुद्रा, उन्मनी मुद्रा खेचरी मुद्रा, गायत्री जप, सोऽहम् साधना, बिंदु योग, आत्माराधना, तत्वबोध, नाद योग के दस साधना क्रमों का समावेश था । इसके अतिरिक्त आत्मशोधन की प्रक्रिया ही अमूल्य थी, जिसे साधक गुरुदेव के सान्निध्य में पूरा करते । यह प्रक्रिया विगत जीवन के पापों का स्मरण करने और बताने प्रायश्चित करने ओर भविष्य में पुनः उन भूलों को न दुहराने का निश्चय करने के रूप में सम्पन्न होते । यह प्रत्यावर्तन का प्रथम और आवश्यक चरण था । पहले दिन जब साधक पू.गुरुदेव से मिलने जाते, तो वह उनसे अकेले में अपनी सभी ग्रन्थियों को खोलने की बात कहते ।
उपासनाक्रम में गायत्री मंत्र का अनिवार्य होना इसकी विशिष्टता को और अधिक बढ़ देता है।
उपासना-साधना एवं विशिष्ट लेखनी के साथ ऊपर एक छोटी खुली छत के साथ बना दिया गया एवं जब तक गुरुदेव आये तब तक ऊपर रहने, उस स्थान को तप -ऊर्जा से अनुप्राणित करने हेतु देवी का स्वरूप समझे जाने वाली 24 बालिकाओं को रहने की व्यवस्था यहीं पर बना दी गई । यहीं पर रहकर प. पूज्य गुरुदेव को न केवल देव कन्याओं का वरन् प्राप्त ऊर्जा सम्पन्न कार्यकर्त्ताओं का प्राण प्रत्यावर्तन एवं महत्वपूर्ण शिक्षण सम्पन्न करना था ।
उपासना कर। कर्म ही तेरे लिए पत्र-पुष्प हैं, कर्म ही फल व दूग्ध हैं अतः समर्पित कर दे अपने समस्त कर्म ईश्वर को जल में रहकर भी जैसे कमल पत्र जल से ऊपर रहता है, उसी प्रकार कर्म करते हुए भी तू कमल पत्र की भाँति कर्म से ऊपर उठा रह।........
उपासना के समय, क्रिया और भावना की दृष्टि से एकता, एकात्मता को आधार मानकर जब अपना क्रम पूरा करते होंगे तो उसमें निश्चित रूप से असामान्य शक्ति उत्पन्न होती होगी। इस उपासनाक्रम में गायत्री मंत्र का अनिवार्य होना इसकी विशिष्टता को और अधिक बढ़ देता है।
उपासना करने का मंत्र है। अब हम तुम्हें इसी का अर्थ बोध कराएँगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-March
उपासना क्रम का निर्धारण कुछ ऐसा किया है कि जिसका पालन कर सकना सभी के लिए सुलभ है। इस अवधि में सत्ताईस माला प्रतिदिन करते हुए चौबीस हजार गायत्री महामंत्र का लघु गायत्री अनुष्ठान भी सम्पन्न हो जाता है। श्रेयपथ के पथिकों के लिए ऋषिगणों ने चौबीस सहस्र जप की संकल्पित साधना ही नवरात्रि हेतु सर्वश्रेष्ठ बतायी है। गायत्री परम सतोगुणी,शरीर के लिए भी व आत्मा के लिए भी दिव्य तत्वों का आध्यात्मिक विशेषताओं का अभिवर्धन करने वाली महाशक्ति है। यही आत्म कल्याण का मार्ग है।
उपासना का प्रतिफल संदिग्ध हो सकता है किन्तु जीवन देवता की साधना का पुण्यफल तो हाथों-हाथ मिलता है। व्यक्तित्व का निर्माण इतनी बड़ी सम्पदा है कि उसके बदले इस संसार के बाजार में से कुछ भी खरीदा जा सकता है। जीवन को कल्पवृक्ष, पारस अमृत कहा गया है जो उसकी साधना कर सका वह सुनिश्चित रूप से कृत-कृत्य होकर रहा है।
उपासना की तरह ही आत्म चिन्तन के लिए न्यूनतम पन्द्रह मिनट का समय निश्चित रहना चाहिए। आत्मनिरीक्षण, आत्म सुधार आत्म निर्माण और आत्म-परिष्कार के सम्बन्ध में अपनी जाँच पड़ताल कड़ाई के साथ करनी चाहिए। मानवीय गरिमा के अनुरूप जीवन निर्वाह में कहाँ त्रुटि रही रही है। अशोभनीय, व्यर्थ, निरर्थक और अनर्थमूलक चिंतन और व्यवहार कब किस प्रकार बन पड़ता है और उन आदतों को कैसे सुधारा जाना चाहिए। इस ऊहापोह में आत्म-समीक्षा और आत्म-सुधार की प्रक्रिया बन पड़ती है।
उपासना करता हूँ। अच्छे विचारों को फैलाना, जन-जागरण करना, लोगों की भावनाओं को परिवर्तित करना उसके लिए परामर्श देना-ये सारे के सारे कार्य हैं जो आपको करना चाहिए।
उपासना हेतु नवरात्रि साधना को इसलिए महत्व दिया जाता रहा है।
उपासनायें भी करायेंगे। हमारे भीतर का भगवान सो गया है-देवता सो गया है हमारे भीतर की शक्तियाँ सो गयी हैं, सिद्धियाँ सो गयी हैं, चमत्कार सो गये हैं। हमारे भीतर का आनन्द सो गया है, हमारे भीतर का शिव सो गया है। सौंदर्य सो गया है-देवता सो गया है हमारे भीतर की शक्तियां सो गयी हैं, सिद्धियाँ सो गयी हैं, चमत्कार सो गये हैं। हमारे भीतर का आनन्द सो गया है, हमारे भीतर का शिव सो गया है सौंदर्य सो गया है, भीतर की कला सो गयी है।
उपासना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। आपको तो इसलिए मालूम नहीं पड़ता कि आप माला घुमाने को ही गायत्री मंत्र कहते हैं और और अच्छे वारों के विस्तार के लिए जो प्रयास किये जाते हैं उसको आप गायत्री मंत्र नहीं मानते। वस्तुतः अच्छे विचारों का-अच्छी भावनाओं का संवर्धन करना विशुद्ध गायत्री मंत्र की उपासना करना है। मैं चौबीसों घंटे इसी महामंत्र की उपासना करता हूँ-जप करता हूँ। सोलह घंटे काम करता हूँ नहाने-धोने, खाने-पीने, सोने सबमें गायत्री मंत्र की उपासना करता हूँ।
उपासना दुर्गा शक्ति की पूजा आराधना तथा विशिष्ट अनुष्ठान परक साधना द्वारा आत्मबल का संचय इन नौ दिनों में बड़ी सरलता से हो सकता है। ऋग्वेद के अदिति सूक्त में शक्ति का मातृभाव वाला स्वरूप देखा जाता है, जबकि ऊषा सूक्त में कुमारी भाव, सूर्यादेवी सूक्त में कुमारी भाव, देवी सूक्त एवं वाक्सूक्त में शुद्ध शक्तिभाव के चिन्ह मिलते हैं। ऋग्वेद में भी पृथ्वी की स्तुति गायी गयी है एवं उन्हें पिता द्यौ के साथ वर्णित किया गया है। “समुद्र वसने देवि पर्व स्तन मण्डले। विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्श क्षमस्वमे” अर्थात् समुद्र ही जिनके वस्त्र हों, पर्वत जिनके स्तन हों, ऐसी विष्णु पत्नी पृथ्वी देवी को पैर से स्पर्श करने की त्रुटि हेतु मैं क्षमा चाहता हूँ।
उपासना से जोड़ कर रखा गया है, फिर गायत्री अनुष्ठान वस्तुतः दुर्गा महाकाली भी गायत्री महाशक्ति का एक रूप है। दुर्गा कहते हैं-दोष-दुर्गुणों, कषाय-कल्मषों को नष्ट करने वाली महाशक्ति को। नौ रूपों में माँ दुर्गा की उपासना इसलिए की जाती है कि वह हमारी इन्द्रिय चेतना में समाहित दुर्गुणों को नष्ट कर दे। मनुष्य की पापमयी वृत्तियाँ ही महिषासुर हैं। नवरात्रियों में उन्हीं प्रवृत्तियों पर मानसिक संकल्प द्वारा अंकुश लगाया और संयम द्वारा दमन किया जाता है।
उपासना इसलिए की जाती है कि वह हमारी इन्द्रिय चेतना में समाहित दुर्गुणों को नष्ट कर दे। मनुष्य की पापमयी वृत्तियाँ ही महिषासुर हैं। नवरात्रियों में उन्हीं प्रवृत्तियों पर मानसिक संकल्प द्वारा अंकुश लगाया और संयम द्वारा दमन किया जाता है। संयमशील आत्मा को ही दुर्गा, महाकाली, गायत्री की शक्ति से सम्पन्न कहा गया है। प्राण चेतना के परिष्कृत होने पर यही शक्ति महिषासुर-मर्दिनी बन जाती है।
उपासना द्वारा अपनी चेतना का परिष्कार मलीनताओं का निवारण तथा आत्म शोधन के द्वारा अपने व्यक्तित्व का परिपाक करना पड़ता है। जिस समय चेतना पूर्णतया निर्मल शुद्ध हो जाती है, उस आत्म सत्ता में
उपासना का पर्व है। जो कार्य सामान्य साधना के माध्यम से साधारणतया काफी दिनों में सिद्ध कर पाते हैं, वह इन 9 दिनों की अवधि में बड़ी आसानी से सध जाता है, इसी कारण चैत्र-आश्विन इन दोनों ही नवरात्रियों को विशेष महत्व दिया जाता रहा है।शक्ति की मातृभाव से उपासना दुर्गा शक्ति की पूजा आराधना तथा विशिष्ट अनुष्ठान परक साधना द्वारा आत्मबल का संचय इन नौ दिनों में बड़ी सरलता से हो सकता है। ऋग्वेद के अदिति सूक्त में शक्ति का मातृभाव वाला स्वरूप देखा जाता है, जबकि ऊषा सूक्त में कुमारी भाव, सूर्यादेवी सूक्त में कुमारी भाव, देवी सूक्त एवं वाक्सूक्त में शुद्ध शक्तिभाव के चिन्ह मिलते हैं। ऋग्वेद में भी पृथ्वी की स्तुति गायी गयी है एवं उन्हें पिता द्यौ के साथ वर्णित किया गया है।
उपासना है। सो बाकी दिनों अब अपनों से अपनी बातें ही नहीं कहेंगे-अपनी सारी ममता भी उन पर उढेलते रहेंगे। शायद इससे परिजनों को भी यत्किंचित् सुखद अनुभूति मिले।
उपासना द्वारा अपनी मलीनताओं तथा विकृतियों का
उपासना करना है। मैं चौबीसों घंटे इसी महामंत्र की उपासना करता हूँ-जप करता हूँ। सोलह घंटे काम करता हूँ नहाने-धोने, खाने-पीने, सोने सबमें गायत्री मंत्र की उपासना करता हूँ। अच्छे विचारों को फैलाना, जन-जागरण करना, लोगों की भावनाओं को परिवर्तित करना उसके लिए परामर्श देना-ये सारे के सारे कार्य हैं जो आपको करना चाहिए।
उपासना करता हूँ-जप करता हूँ। सोलह घंटे काम करता हूँ नहाने-धोने, खाने-पीने, सोने सबमें गायत्री मंत्र की उपासना करता हूँ। अच्छे विचारों को फैलाना, जन-जागरण करना, लोगों की भावनाओं को परिवर्तित करना उसके लिए परामर्श देना-ये सारे के सारे कार्य हैं जो आपको करना चाहिए।
उपासना व जीवन साधना परस्पर अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध हैं। दोनों के समन्वय से ही परम लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव होती है। रंगाई के पूर्व कपड़ों को धोना आवश्यक है। अकेला बाण ही लक्ष्य नहीं बेधता उसके पीछे तनी हुई कमान का बल भी रहना चाहिए। उगता तो बीज ही है पर उसके लिये उपयुक्त भूमि भी तो चाहिए।
उपासनाएँ चलती हैं। रामभक्त उन दिनों रामायण का परायण और कृष्ण भक्त गीता या श्रीमद्भागवत का पारायण करते हैं। देवी उपासकों में दुर्गापाठ के विभिन्न उपचार चलते हैं। तपस्वी इन दिनों व्रत उपवास करते हैं। तंत्र विधान में शव साधना, कुमारी पूजन, कुण्डलिनी जागरण चक्रवेधन आदि की साधनाएँ विशेष रूप से इन्हीं दिनों सम्पन्न की जाती हैं।
उपासना से आरम्भ होती है और प्राणी मात्र को अपनी ही आत्मा के समान अनुभव करने और अपने ही शरीर के अंग अवयवों की तरह अपनेपन की भावना रखते हुए अनन्य श्रद्धा चरितार्थ करने तक व्यापक होती चली जाती है।
उपासना सबको सिखा देंगे ? नहीं बेटे, हमने तो ये प्रतीक बनाया है यह एक सिमबल है। हम चाहते हैं कि इसका विस्तार हो।
उपासना।” इन नवरात्रियों में सर्वसाधारण से लेकर योगी, यती, तपस्वी, भी अपने-अपने स्तर की संयम साधना एवं संकल्पित अनुष्ठान करते हैं। इस अवधि की प्रत्येक अहोरात्रि बड़ी महत्वपूर्ण मानी जाती है और उन प्रत्येक क्षणों को साधक अपनी चेतना को परिष्कृत-परिशोधित करने-उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ाने में लगाता है।
उपासना, गायत्री मंत्र की विशेषता और गायत्री मंत्र को जीवन में समावेश कर लेना-इसकी विधियाँ सिखायेंगे। सारे विश्व में हम गायत्री मंत्र की एक हवा पैदा करेंगे। चारों ओर गायत्री मंत्र की हवायें पैदा करेंगे जिसे सभी मानेंगे। गायत्री मन्त्र की जो दिशा है, जो कल्पना है, वह हर एक को हृदयंगम करायेंगे और उनसे यह कहेंगे कि यह सार्वभौम मंत्र है-सर्वजनीन मंत्र है और इसमें व्यक्ति विशेष के लिए कोई अंतर नहीं पड़ता। ज्ञानरथ चलाने से लेकर सम्मेलन करने तक सी हमारे कार्यक्रम गायत्री माता को घर पहुँचाने के लिए हैं।
उपासना करने पर कोई प्रतिबन्ध हमारे ऋषियों ने कभी लगाया नहीं। शुभ कर्म के लिए कभी कोई मुहूर्त्त देखने की आवश्यकता नहीं। फिर भी कालचक्र की प्रतिक्रिया से लाभ उठाने में बुद्धिमत्ता ही है। नवरात्रि पर्व में विभिन्न उपासनाएँ चलती हैं। रामभक्त उन दिनों रामायण का परायण और कृष्ण भक्त गीता या श्रीमद्भागवत का पारायण करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-July
उपासना में संलग्न ऋषि-मुनि योग के द्वारा अपनी आत्मा को उस तेज पुँज महाप्राण परब्रह्म में प्रविष्ट करते हैं। शुकदेव जी अपनी साधना को पूर्ण करते हुए जिस स्थिति में प्रविष्ट हुये उसका उल्लेख महाभारत में इस प्रकार मिलता है -
उपासना की क्या आवश्यकता ? गायत्री सूर्य की आत्मा सविता शक्ति के साथ उपासक को सम्बन्धित करती है। जिससे द्वारा वह परब्रह्म का महाप्राण अपने शरीर और अन्तःकरण में आवश्यक मात्रा में धारक करके लौकिक सुख एवं आत्मिक शक्ति को अनुभव करता हुआ जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
उपासना की है, साधना की है और उपासना-साधना करने के साथ-साथ में अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिये वहाँ के वातावरण का लाभ उठाया है, वहाँ जो ऋषि रहते हैं, उनके परामर्श से आप रास्ता भी तलाश करते हैं और उस तलाश में एक रास्ता यह भी है कि आपने अब तक जो गलतियाँ की है उनका प्रायश्चित कैसे हो ? भरपाई कैसे हो ? आप उसके लिये क्या करे ? मित्रों इसके लिये आप अपने गुण, कर्म और स्वभाव में शालीनता का समावेश करें, इस निमित्त ऐसी कौन-सी गतिविधियाँ अपनायेंगे, जो आपके संस्कारों के रूप में परिणित हो सकें ? जप नहीं नहीं, जप से संस्कार नहीं बनते, रामायण पाठ से भी संस्कार थोड़े ही बन जायेंगे।
उपासना में बैठना था। उनकी मुसकान कह रही थी- “समस्त भोग जीवन के लिए है”- मनुष्य को यह तथ्य समझ में आ जाए तो उसे न इन्द्रियाँ मूर्ख बना सकती हैं न देवता। मनुष्य जब इस सत्य को छोड़कर इन्द्रियों को व्यक्त करने के लोभ में पड़ता है, तो उसे मूर्ख ही नहीं, रोगी भी बनना पड़ता है और कष्टों की परम्परा में जकड़ा जाकर विवश होना पड़ता है। सिद्धियों की फिर ऐसे को आवश्यकता ही क्या हो सकती है।
उपासना-साधना करने के साथ-साथ में अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिये वहाँ के वातावरण का लाभ उठाया है, वहाँ जो ऋषि रहते हैं, उनके परामर्श से आप रास्ता भी तलाश करते हैं और उस तलाश में एक रास्ता यह भी है कि आपने अब तक जो गलतियाँ की है उनका प्रायश्चित कैसे हो ? भरपाई कैसे हो ? आप उसके लिये क्या करे ? मित्रों इसके लिये आप अपने गुण, कर्म और स्वभाव में शालीनता का समावेश करें, इस निमित्त ऐसी कौन-सी गतिविधियाँ अपनायेंगे, जो आपके संस्कारों के रूप में परिणित हो सकें ? जप नहीं नहीं, जप से संस्कार नहीं बनते, रामायण पाठ से भी संस्कार थोड़े ही बन जायेंगे।
उपासना की जाती है।
उपासना हो जायेगी। आप उस अध्यात्म के चमत्कार को देख पायेंगे जिसकी चर्चा शास्त्रों में की गई है।
उपासना के समकक्ष पुण्य फलदायक साधना मानी जाती है। यह विचारों के सामान्यतः निम्न प्रवाह को उत्कृष्टता की ओर मोड़ देती है। इस स्थिति में जप ध्यान भी श्रेष्ठ स्तर के बन पड़ते हैं। अतः आश्वमेधिक अनुयाज में इसे जप से पहले सम्पन्न करने की अनुशंसा की गई है। प्रतिदिन आधा से एक घण्टा इन श्रेष्ठ प्रक्रियाओं में लगाना चाहिए, किन्तु ज पके पूर्व दस मिनट का समय ही पर्याप्त है।
उपासना का तब से आगार थी जबसे महामना मदनमोहन मालवीय जी ने उन्हें काशी में गायत्री मंत्र की दीक्षा दी थी, उनकी गुरुसत्ता का आगमन हुआ अदृश्य छायाधारी सूक्ष्म रूप में। उनने प्रज्ज्वलित दीपक की लौ में से स्वयं को प्रकट कर उन्हें उनके द्वारा विगत कई जन्मों में सम्पन्न क्रिया -कलापों का दिग्दर्शन कराया तथा उन्हें बताया कि वे दुर्गम हिमालय से आए हैं एवं उनसे अनेकानेक ऐसे क्रिया-कलाप कराना चाहते हैं जो अवतारी स्तर की ऋषि सत्ताएँ उनसे अपेक्षा रखती हैं। चार बार कुछ दिन से लेकर एक साल तक ही अवधि तक हिमालय आकर रहने, कठोर तप करने का भी उनने संदेश दिया एवं उन्हें तीन संदेश दिए- (1) गायत्री महाशक्ति के चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण जिन्हें आहार के कठोर तय के साथ पूरा करना था। (2) अखण्ड घृतदीप की स्थापना एवं जन-जन तक उसका प्रकाश फैलाने के लिए समय आने पर ज्ञान यज्ञ अभियान चलाना, जो बाद में अखण्ड ज्योति पत्रिका के 1938 के प्रथम प्रकाशन से लेकर विचार क्रान्ति अभियान के विश्वव्यापी होने के रूप में प्रकटा तथा (3) चौबीस महापुरश्चरण के दौरान युगधर्म का निर्वाह करते हुए राष्ट्र के निमित्त भी स्वयं को खपाना, हिमालय यात्रा भी करना तथा उनके संपर्क से आगे का मार्गदर्शन लेना।
उपासना की जाय ‘सूर्य’ का उससे अविच्छिन्न सम्बन्ध अनिवार्य रूप से रखना होगा। गायत्री का देवता ही सूर्य है तो उसका स्वरूप भी साथ में होना स्वाभाविक ही है।
उपासना में लगाइये, और अच्छे लोगों के संपर्क में लगाइये, अच्छी बातों के सोचने में लगाइये , गंगा के किनारे जा करके रहिये। पूरा का पूरा समय आपका ऐसा हो जिसमें कहीं अवाँछनीयता के लिये जगह न हो। आपका चिन्तन ऐसा हो, जिसमें अवाँछनीयता के लिये कोई गुँजाइश न हो। बस, यह एक तीर्थ हमने बनाया है। मान्धाता की सहायता से जगतगुरु शंकराचार्य ने चार धाम बनाये थे, चार तीर्थ बनाये थे।
उपासना, जीवन साधना अथवा समाज सेवा की आराधना में से कोई भी मार्ग ऐसा हो सकता है, जिसे अपनाता हुआ मनुष्य आत्मिक विकास के सोपानों पर क्रमशः आगे बढ़ता चला जाए। जो भी क्रिया-कृत्य अपनी अन्तःप्रेरणा को साधना उपादानों द्वारा सशक्त बनाने के लिए किये जाते हैं, वे ही सच्चे कर्मकाण्ड हैं एवं आध्यात्मिक विकासवाद की प्रक्रिया में उन्हें ऋषि मनीषियों ने गरिमापूर्ण स्थान भी दिया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-June
उपासना से जिन स्ळाल लाभों की चर्चा की जाती हैं वह सूर्य देव की प्रकाश शक्ति का ही चमत्कार हैं जिस तरह मन में जब काम वासना के विचार उठते हैं, उसकी शारीरिक इन्द्रियों पर उत्तेजना परिलक्षित होती हैं उसी प्रकार मन का ध्यान जब सूर्य लोक में करते हैं तो सूर्य की सबसे समीप वाला किरणों में मन का व्नान होता है और उसकी श्रेष्ठ शक्तियों के चमत्कारी परिणाम भी निश्चित रूप से शरीर में परिलक्षित होते हैं सूर्य भगवान का ध्यान करने से मानसिक शुद्धि ओर आत्मिक पवित्रता भी बढ़ती है, इसलिए ही सूर्य को लोक एवं परलोक दोनों प्रकार के सुखों का दाता कहा गया है। सूर्य सृष्टि का प्राण है। प्राणों की उपेक्षा कर मानवी जीवन के अस्तित्व की रक्षा नहीं की जा सकती , इसलिए स्वस्थ, बलिष्ठ रोग मुक्त और आत्मिक प्रगति के लिए हमें सूर्य किरणों सूर्य के प्राण तत्व की उपासना करनी ही चाहिए।
उपासना करनी ही चाहिए।
उपासना से उसे यह अभयदान मिल हुआ है। दूसरों को धर्मोपदेश देने में वह प्रवीण-पारंगत है। इतने भर से यह आवश्यकता पूरी हो जाती है। कि उन शिक्षाओं को अपने पास तक नहीं फटकने दे।
उपासनाएँ कीजिए, आत्म-परिष्कार के लिए पृष्ठ-भूमि बनाइए।
उपासना की। प्रकाश किरणों के प्रभाव से वे रोग मुक्त हुए थे। मत्स्य पुराण में 67।79 में सूर्य को आरोग्य के अधिष्ठाता देवता बताया गया है। और कहा गया है- “आरोग्य भस्करादिच्छेत् “ अर्थात् आरोग्य की कामना भगवान भास्कर से करनी चाहिए।
उपासना कीजिए और ऐसे वातावरण और सत्संग में रहिए, जिससे कि आप पिछले वाले घिनौने भूतकाल को छोड़ करके उज्ज्वल भविष्य में प्रवेश करने में समर्थ हो सकें। यह कार्य वातावरण से ताल्लुक रखता है, यह कार्य उसकी सामग्री से ताल्लुक रखता है, यहाँ यह कार्य प्राणदायक प्रक्रिया से ताल्लुक रखता है। यहाँ यह कार्य प्राणदायक प्रक्रिया से ताल्लुक रखता है। तीर्थों में पहले सारी बातों की सुविधाएँ होती थीं। इसलिए लोग तीर्थों में जाते थे और वहीं निवास करते थे अनुष्ठान तो अपने घर रहकर भी किया जा सकता है, पर अच्छे वातावरण में रह करके अनुष्ठान करना एक बात है और घिनौने वातावरण में रह करके अनुष्ठान करना एक बात है और घिनौने वातावरण में, घिसे-पिटे वातावरण में, कामवासना के वातावरण में, लोभ और मोह के वातावरण में, लोभ और मोह के वातावरण में रहकर कर लें तो वह एक चिह्न-पूजा जैसी प्रक्रिया होगी।
उपासना करने, सेवन करने से दुःख स्वप्न जनित अनिष्ट एवं नवग्रह जन्य पीड़ा का निवारण होता है राक्षसों से , दुष्प्रवृत्तियों से भी छुटकारा दिलाने-उनसे रक्षा करने वाली शक्ति सूर्य किरणों में है। ऋग्वेद 1।115।1-6 में कहा है कि “हे प्रकाश रश्मियों! टाज सूर्योदय के समय इधर-उधर बिखरकर तुम लोग हमें पापों से निकालकर बचा लो इस संसार में जो कुछ भी निन्दनीय है। दुःख दारिद्रय हैं गर्हणीय है उन सबसे हमारी रक्षा करो तात्पर्य यह है कि सूर्य किरणों में समस्त रोग-शोकों को विनष्ट करने की क्षमता विद्यमान है।
उपासना, जप और योग करने के लिए बताया गया है। यह बहुत ही मूल्यवान है, इसलिए आप इस ओर भी ध्यान रखें और ऐसी जिन्दगी प्राप्त करें जिस पर संतोष ही नहीं गर्व और गौरव भी अनुभव किया जा सके। बस आज की आज समाप्त ।
उपासना करता है। बाह्य परिस्थिति जैसी भी बने, जिसकी वृत्ति में चंचलता नहीं है, वही कुछ कर्त्तव्य पालन कर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-January
उपासना- साधना अनिवार्य मानी गयी है और कहा गया है कि प्रातःकाल दैनिक क्रिया कृत्यों से निवृत्त होकर एक बार महा यज्ञ की उपासना नित्य ही करनी चाहिए। संभव हो सके तो शाम को भी करनी चाहिए। शाम को एक माला आत्मकल्याण की करने से भी काम चल सकता है। आत्म शुद्धि पाँच संध्या विधान और सप्त विधि पूजा सायंकाल को ही करनी चाहिए। घर के अन्य लोगों को भी, स्त्री बच्चों को भी यह प्रेरणा देनी चाहिए कि वे पूजा स्थलों के समीप बैठकर कम से कम एक माला गायत्री मंत्र की सभी कर लिया करें।
उपासना अवश्य कर लिया करें। घर में आस्तिकता का भक्ति भावना का वातावरण रहना परिवार की भावनात्मक समृद्धि और आत्मिक शुद्धि के लिए अति आवश्यक है।
उपासना नित्य ही करनी चाहिए। संभव हो सके तो शाम को भी करनी चाहिए। शाम को एक माला आत्मकल्याण की करने से भी काम चल सकता है। आत्म शुद्धि पाँच संध्या विधान और सप्त विधि पूजा सायंकाल को ही करनी चाहिए। घर के अन्य लोगों को भी, स्त्री बच्चों को भी यह प्रेरणा देनी चाहिए कि वे पूजा स्थलों के समीप बैठकर कम से कम एक माला गायत्री मंत्र की सभी कर लिया करें।
उपासना निदिध्यासन या ध्यान से और आवरण समाधि भगवत्कृपा से स्वतः तिरोहित हो जाता है।
उपासना भूमिका वातावरण का स्वरूप है। पहले इसी पर ध्यान एकाग्र किया जाये।
उपासना का क्रम हर सद्गृहस्थ को अपने यहाँ चलाना चाहिए। स्वयं तो नियमित उपासना करनी चाहिए। प्रयत्न यह भी करना चाहिए कि बैठकर थोड़ी बहुत उपासना अवश्य कर लिया करें। घर में आस्तिकता का भक्ति भावना का वातावरण रहना परिवार की भावनात्मक समृद्धि और आत्मिक शुद्धि के लिए अति आवश्यक है।
उपासना करनी चाहिए। प्रयत्न यह भी करना चाहिए कि बैठकर थोड़ी बहुत उपासना अवश्य कर लिया करें। घर में आस्तिकता का भक्ति भावना का वातावरण रहना परिवार की भावनात्मक समृद्धि और आत्मिक शुद्धि के लिए अति आवश्यक है।
उपासना करने के लिए अपना सब कुछ नियोजित हो सकें। यह मर्म समझ में आ जाने पर यथार्थता की संपदा पा लेने पर आत्मिक प्रगति के पथ पर चल पड़ने में किसी को संशय नहीं करना चाहिए।
उपासना के प्रभाव सर्वकालिक एवं सर्वभौम है। फिर भी अन्तर्ग्रही परिस्थिति के विशेष योग इस प्रभाव को अनेक गुना बढ़ा देते हैं। काल के प्रवाह में कतिपय सुयोग ऐसे भी आते हैं, जिनमें की जाने वाली एक घण्टे की साधना का परिणाम सामान्य समय में की गई वर्षों की साधना के बराबर होती है।
उपासना ध्यान में होती है। “ गोपीनाथ जी जैसे स्वतः बाते करने के अभ्यस्त हो। प्रज्ज्वलित अग्नि भी वृष्टि से बुझ गयी। उसे छाया अभीष्ट है।
उपासना की रहस्य रश्मियाँ एकत्रित होकर यहाँ प्रकाशित है। इस उपनिषद् के तृतीय अध्याय के प्रथम खण्ड में सविता की उस अमृत साधना को मनोरम ढंग से समझाया गया है। इसके अनुसार आदित्य देवताओं का मधु है-
उपासना से, महापुरुषों की कृपा से। ”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-August
उपासना में प्रवृत्त हो जाया जाय 2. इस महाशक्ति की महत्ता का व्यापक प्रचार करके अनेक आत्माओं को लाभान्वित किया जाय। इन दो विकल्पों के सम्बन्ध में बहुत दिनों तक विचार करते रहने के उपरान्त माता की प्रेरणा यही प्राप्त हुई है कि दूसरे मार्ग को अपनाया जाय। ब्रह्मदान एवं ज्ञान यज्ञ भी उतना ही महान् है, जितना कि जप, तप, ध्यान और साधन। अपने अनेक पुत्रों को ब्रह्म ज्ञान का अमृत बाँटते देखकर माता उतनी ही संतुष्ट हो सकती है, जितना कि कठोर तपश्चर्याओं की श्रद्धाँजलि पाकर प्रसन्न होती है। अतएव हमारा भावी कार्यक्रम प्रधानतया गायत्री प्रचार होगा।
उपासना का अर्थ है-उन आध्यात्मिक उपचारों का अवलम्बन करना जो अन्तःकरण में सतोगुणी परमार्थ भावना का बीजारोपण करते हैं। गायत्री का आश्रय लेने का तात्पर्य बुद्धि को उस सात्विकता की गोद में डाल देना है जो मनुष्य के समस्त विचारों, गुणों, स्वभावों और आचरणों को दिव्य तत्वों से परिपूर्ण कर देती है। इस प्रक्रिया को अन्तस्तल में गहराई तक प्रतिष्ठित करने से मनुष्य उस स्थिति में पहुँच जाता है, जिससे कि उसके सामने कोई उलझन शेष नहीं रहती। आइए, अब जीवन की प्रमुख समस्याओं पर विचार करें और देखें कि गायत्री रूपी सद्बुद्धि को अपना लेने पर वे किस प्रकार सुलझ सकती हैं।
उपासना भी और त्यागो या दानों की तरह होगी, करें या न करें, किसी को पैसा दें या न दें, हमारी इच्छा पर हैं ‘जो ऐसा समझे हैं धोखे में हैं, यह त्याग रूपी उपासना आवश्यक है। आवश्यक क्योंकि और कहीं ठंड पड़ने की नहीं।
उपासना करते हुए भी अंतःकरण में विशिष्ट दिव्यता का आभास नहीं हुआ, तो आस्तिक कहने का हम दावा नहीं कर सकते। इसके साफ माने हैं कि जिन नियमों के पालन करने से मनुष्य में दैवी गुणों का प्रादुर्भाव होता है, हमने उन नियम का पालन नहीं किया।
उपासना करके उसे प्रसन्न करें। यह ध्यान रखो कि तुमने यह शक्ति प्राप्त की-कि अभ्युदय और निःश्रेयस तुम्हारे हाथों में हैं। संसार में अनेक भौतिक शक्तियाँ अपने अपने स्थान पर श्रेष्ठ हैं, पर सर्वश्रेष्ठ तो आत्म शक्ति ही है। हमें इसके संचय और विकास की ओर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए।
उपासना आवश्यक है। आवश्यक क्योंकि और कहीं ठंड पड़ने की नहीं।
उपासना ही रस देगी, न ज्ञान, न वेद की संहिता का अर्थ आयेगा, न उपनिषद् का।
उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-July
उपासना में एक आन्तरिक रस आने लगा। इस सम्बन्ध में अधिक जानकारी प्राप्त करने की रुचि ने आध्यात्मिक ज्ञान को इतना बढ़ा दिया कि साँसारिक लाभों की तुलना में आत्म लाभ का महत्व अनेक गुना अधिक मालूम होने लगा। माता के प्रति अगाध भक्ति बढ़ती गई और साधना ही एक महान लाभ प्रतीत होने लगी। अब मैं पूर्ण निष्काम भाव से उपासना करता हूँ और उसका वह प्रतिफल पाता हूँ जो बड़ी से बड़ी कमाना पूर्ण होने की अपेक्षा अधिक सरस है। सकाम उपासना अन्ततः निष्काम मातृ श्रद्धा में बदल जाती है।
उपासना कर रहा हूँ। अभियान का प्राण यज्ञ विधिपूर्वक रहा है।
उपासना में प्रवृत्त हूँ। मुझे हर घड़ी यह अनुभव होता रहता है कि कोई दिव्य शक्ति शरीर को पार करती हुई अन्तः करण में प्रवेश कर रही है। कई बार स्वप्न में और कई बार अर्ध जागृत अवस्था में माता का साक्षात्कार हुआ है। उन क्षणों के आनन्द को याद करके आज भी देह रोमाँचित हो जाती है।
उपासना में दिन-दिन चित्त अधिक बढ़ता जाता है।
उपासना हो या धाम मार्ग के कौल तंत्रिका प्रयोग किये जाय बिना गायत्री को आगे लिए वे सभी निष्फल होते हैं।
उपासना अन्ततः निष्काम मातृ श्रद्धा में बदल जाती है। ऐसा मैंने व्यक्तियों के उदाहरणों से देखा है। परन्तु यह ध्यान रखने की बात है कि प्रारम्भ में छोटी से छोटी ही कामना करनी चाहिए। प्रारम्भिक साधक की श्रद्धा और साधना अत्यंत निर्बल होती है। जो लोग रत्ती भर श्रम का लाख मन फल पाने का अमर्यादित लोभ करते हैं और प्रबल कर्म भोगों को एक माला फेर कर ही हटाना चाहते है उनको निराशा ही होती है।
उपासना के लिए प्रोत्साहन दिया और सारी विधि बता दी। दूसरे दिन से ही मैं साधना करने लगा। मेरा मन घर जाने को कर रहा था घर लौट आया। अब मेरे स्वभाव में और विचारों में भारी हेर फेर हो रहा था। खेती करने की इच्छा हुई।
उपासना चलने लगी। गंगा की बड़ी नहर के किनारे माता का जप करने में बड़ा आनन्द अनुभव होता।
उपासना में आत्मा को श्रद्धा पूर्वक लगाये रहना और शरीर को कर्तव्य धर्म में निरत रखना यह दो कार्यक्रम ऐसे हैं जिन्हें अपनाकर हम सब अपनी अन्तिम यात्रा को कष्ट रहित बना सकते हैं। मैंने इसी मार्ग को पकड़े रहने का निश्चय किया है। पाठक बन्धुओं से भी ऐसा ही करने की मेरी प्रार्थना है।
उपासना का व्रत लिया हुआ है। मैंने भी उन्हीं से गायत्री उपदेश लिया और यथाशक्ति उस कल्याण मार्ग पर चल रहा हूँ।
उपासना में अनुभव के आधार पर उपलब्ध हुए सुदृढ़ विश्वास को प्रकट कर रहा हूँ।
उपासना करते हैं वे आत्मलाभ करते हैं।
उपासना करके ही सन्तान पाई थी, कुन्ती ने कुमारी अवस्था में गायत्री द्वारा सूर्य के तेज धारण करके कर्ण को जन्म दिया था।
उपासना में संलग्न हूँ। अब यही एक मात्र मेरी जीवन साधना है।
उपासना करके देखें उन्हें मनोवाँछित लाभ होगा माता-पिता गायत्री का आश्रय लेकर इच्छानुकूल सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं ऐसे अनेक उदाहरण अनेक बार देखे गये हैं।
उपासना में लगे हुये हैं अब उनकी अवस्था 50 के करीब होगी। भगवान सूर्य देव के सन्मुख खड़े होकर साधना किया करते हैं और दोपहर में नित्य प्रति हवन करते हैं तथा एक बार ही भोजन करते हैं। उनके चेहरे पर एक अनोखा तेज है। वाणी में मधुरता है, संस्कृत का उदाहरण तो उनका इतना शुद्ध है कि प्रशंसा से बाहर है उनका घर धन-+धान्य से परिपूर्ण है और सभी प्रकार से सुख शान्ति है। उस कुटी पर उनके गुरु बाल ब्रह्मचारी हैं।
उपासना की है। परन्तु हर एक को ‘गायत्री’ का प्रथम आश्रय अवश्य लेना पड़ा है। बिना गायत्री के कोई भी तप या साधन सफल नहीं हो सकता।
उपासना करके किस प्रकार परम सिद्धि प्राप्त की थी और गायत्री की शक्ति द्वारा वे कितनी महान् सफलताएँ सम्पादित कर सके थे। इतिहास पुराणों के ज्ञाताओं से इन महर्षियों के चरित्र छिपे नहीं हैं।
उपासना के लिए गायत्री से बड़ा और कोई मंत्र नहीं हो सकता।
उपासना करके स्वयं आत्म कल्याण करते हुए अनेकों दूसरों का भी भला किया उसी प्रकार अन्य व्यक्ति भी श्रद्धापूर्वक साधना करके लाभ उठा सकते हैं। गायत्री सर्व शक्तिमान है उसकी शरण में जाने वाला साधक सब प्रकार की सफलता प्राप्त करता है। उसे किसी बात की कमी नहीं रहती।
उपासना के प्रथम रूप में मातृरूप है, जिसमें सभी दिव्यताएं मौजूद हैं, करने पर अल्प समय में ही सब स्त्रियों में मातृभाव उत्पन्न होने लग जाता है जिससे कर्मरूपी शत्रु का दमन और सर्वात्म भाव का मार्ग खुल जाता है ।
उपासना। अखण्ड ज्योति के प्रकाश में मुझे वह मार्ग भी दिखाई दिया जिस पर चलकर पिता से उस दस गुनी ममता रखने वाली माता की आनन्दमयी गोद प्राप्त हो सकती है।
उपासना चाहे न करे, केवल गायत्री जप से द्विज जीवन मुक्त हो जाना है। साँसारिक और परि लौकिक समस्त सुखों को पाता है। संकट के समय दस हजार जप करने से विपत्ति का निवारण होता है।
उपासना करने से दिनों दिन उपासना करके वे लोग स्वयं ही शान्त हो गये तथा उन लोगों की यह विचार धारा मेरे प्रति प्रेम में परिणित हो गई, मुझे प्रतीत हुआ कि मेरी सब बुराइयाँ गायत्री देवी की कृपा से दूर हो गयी। जो कुछ भी जप मैंने किया सो सब निष्काम भाव से ही किया सकाम भाव से नहीं। सकाम भाव में साधना करने से साधकों को निश्चित पदार्थ ही मिलता है न कि दुष्प्राप्य वस्तु।
उपासना में जो लोग लगे हैं उनमें से अनेकों को आत्मिक लाभ के अतिरिक्त साँसारिक लाभ भी मिले हैं। एक सज्जन जेलखाने के दण्ड से सर्वथा छूट गये। एक सज्जन ने बड़ी प्रतिकूल परिस्थितियाँ होते हुए भी पर्याप्त लाभ कमाया है। एक सज्जन की कन्या विवाह की चिन्ता बड़ी सरलता से हल हो गई। ब्रह्मचारी जी चिन्ता बड़ी सरलता से हल हो गई।
उपासना करके वे लोग स्वयं ही शान्त हो गये तथा उन लोगों की यह विचार धारा मेरे प्रति प्रेम में परिणित हो गई, मुझे प्रतीत हुआ कि मेरी सब बुराइयाँ गायत्री देवी की कृपा से दूर हो गयी। जो कुछ भी जप मैंने किया सो सब निष्काम भाव से ही किया सकाम भाव से नहीं। सकाम भाव में साधना करने से साधकों को निश्चित पदार्थ ही मिलता है न कि दुष्प्राप्य वस्तु।
उपासना का कार्य जारी ही रखा। इस प्रकार उपासना करते हुए कुछ ही महीनों के अन्दर गायत्री माता के प्रति मेरा प्रेम अधिकाधिक बढ़ता गया। साँसारिक वस्तुओं से मोह उठता गया। वैराग्य की भावनाएं काफी जाग्रत होने लगी। हर समय भगवती माता की ही धारणा बनी रहती थी-सोते-उठते बैठते।
उपासना आरम्भ कर दी।
उपासना में तल्लीन हो जाते। अपने हाथ छै छटाँक जौ के आटे की रोटी बनाकर एक समय भोजन करना, तख्त पर सोना, खड़ाऊं पहनना, गंगाजल पीना जैसे अनेक संयम नियमों को वे पालन करते रहे।
उपासना करते हुए कुछ ही महीनों के अन्दर गायत्री माता के प्रति मेरा प्रेम अधिकाधिक बढ़ता गया। साँसारिक वस्तुओं से मोह उठता गया। वैराग्य की भावनाएं काफी जाग्रत होने लगी। हर समय भगवती माता की ही धारणा बनी रहती थी-सोते-उठते बैठते। सच पूछा जावे तो मेरी दशा उन्मत्त की सी हो रही थी।
उपासनाओं में कुमारी कन्याओं की पूजा होती है। ध्यान और पूजन में अमित सौंदर्य की प्रति मूर्ति गायत्री के प्रति मातृभावना स्थापित करनी पड़ती है। इस प्रकार मनुष्य नारी के जिन पुत्री, बहिन और माता के निर्मल स्वरूपों को भूलता जाता है उनको पुनः हृदयंगम कर सकेगा।
उपासना को अपनी साँसारिक कमाई से अधिक महत्व देता हूँ ताकि मूल्यवान् लाभ प्राप्त किया जा सके। मैं वकील हूँ अपनी समस्त तर्क शक्ति के द्वारा जब सोचता हूँ कि मेरा वास्तविक लाभ किस में है तब यही समझ में आता है कि आत्म कल्याण के लिए प्रयत्न करना ही सर्वोत्तम है। गायत्री का आश्रय लेकर वही मैं कर भी रहा हूँ।
उपासना में मेरी बहुत दिनों से रुचि है। निर्धारित विधान के साथ मैं उस महामंत्र की आराधना करता हूँ। मित्र नित्य नियमित आराधना के अतिरिक्त नव रात्रियों में 24 हजार के लघु अनुष्ठान किया करता हूँ।
उपासना करते हैं महात्मा गान्धी, महामना मालवीय, कवीन्द्र रवीन्द्र टी.सुवाराव, सर राधाकृष्णन, जगद्गुरु शंकराचार्य, स्वामी शिवानन्द आदि महापुरुषों ने गायत्री की महानता के संबंध में अपने जो उद्गार प्रकट किये हैं वह बहुत ही विचार पूर्ण और मनन योग्य हैं। अखण्ड ज्योति संचालक आचार्य द्वारा गायत्री का जो असाधारण प्रकाश हुआ वह तो आश्चर्यजनक है।
उपासना करनी चाहिए। क्योंकि यह विद्या का महान मंत्र है। इससे पढ़ाई सम्बन्धी अनेक कठिनाइयों का निवारण होता है। मस्तिष्क की कमजोरी, शरीर की अस्वस्थता, घरेलू विघ्न बाधाएं, आर्थिक अड़चन के कारण जिनकी शिक्षा सम्बन्धी उन्नति रुक रही हो वो विद्यार्थी सच्चे हृदय से वेदमाता की आराधना करें तो उनकी असुविधाएं दूर हो सकती हैं।
उपासना करना, यह एक ऐसा कार्यक्रम जो है मानव हृदय में एक दिव्य परिवर्तन करता है। यही वह महान तत्व है जिसके अभाव में आज सरकार के संस्थाओं के तथा लोक सेवकों के हाथ पाँव फूल रहे हैं। यदि लोगों में थोड़ा चरित्र बल बढ़े तो अनेकों पर्वत जैसी दीखने वाली समस्याएं चुटकी बजाते हल हो सकती हैं।
उपासना और सात्विक भोजन के फल स्वरूप में आमवात गठिया रोग से भी मुक्त हो गया और आजकल पूर्ण स्वास्थ्य और सुखी जीवन व्यतीत करता हूँ। इस समय वानप्रस्थ में समय व्यतीत कर रहा हूँ।
उपासना करता हूँ और उसका वह प्रतिफल पाता हूँ जो बड़ी से बड़ी कमाना पूर्ण होने की अपेक्षा अधिक सरस है। सकाम उपासना अन्ततः निष्काम मातृ श्रद्धा में बदल जाती है। ऐसा मैंने व्यक्तियों के उदाहरणों से देखा है। परन्तु यह ध्यान रखने की बात है कि प्रारम्भ में छोटी से छोटी ही कामना करनी चाहिए। प्रारम्भिक साधक की श्रद्धा और साधना अत्यंत निर्बल होती है।
उपासना में प्रवृत्त नहीं हो सकता था। रोग की भयंकरता दिनों दिन बढ़ती गई यद्यपि मैं इसके निवारणार्थ कुछ व्यायाम, आसन इत्यादि किया करता था। यह रोग गत 20 सालों से चला आ रहा था और मुझे तो वह असाध्य ही मालूम पड़ता था। कई दिनों तक मुझे सूझे ज्वर में रहना पड़ता था। इस रोगोत्पत्ति के होते हुए भी मैं अपने जीवनोपयोगी सारे कार्य किया करता था।
उपासना नहीं करता वह निन्दा का पात्र है।
उपासना के नाम से ही प्रसिद्ध है। मैं इस गायत्री उपासना को अपनी साँसारिक कमाई से अधिक महत्व देता हूँ ताकि मूल्यवान् लाभ प्राप्त किया जा सके। मैं वकील हूँ अपनी समस्त तर्क शक्ति के द्वारा जब सोचता हूँ कि मेरा वास्तविक लाभ किस में है तब यही समझ में आता है कि आत्म कल्याण के लिए प्रयत्न करना ही सर्वोत्तम है। गायत्री का आश्रय लेकर वही मैं कर भी रहा हूँ।
उपासनाएं करता है वह पकवान छोड़कर भिक्षा माँगने वाले के समान मूर्ख है। वाम्य सफलता तथा तप की वृद्धि के लिए गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।
उपासना के लिए स्थल इतना शक्ति सम्पन्न है कि सफलता बहुत शीघ्र मिलती है।
उपासना, आराधना, साधना ऐसी वैज्ञानिक पद्धतियाँ है जिनके द्वारा अन्तः चेतना में पात्रता उत्पन्न की जाती है, साधक जैसे-जैसे आन्तरिक बल एकत्रित करता जाता है वैसे ही वैसे उसके उस सूक्ष्म चुम्बक शक्ति का विकास होता है जो महामाया को अपनी ओर खींचती है, कृपा प्राप्त करती है और उसके अक्षय भण्डार से उपयुक्त वस्तुओं को उपलब्ध करती है दयालु माता है वह अपने पुत्रों को बहुत देने को तत्पर रहती है पर देती उन्हें ही है जो पात्र होते हैं अनधिकारी लोग बड़ी बड़ी लालसायें और कामनाएं करते हैं पर अपनी पात्रता बढ़ाने के लिए समुचित प्रयत्न नहीं करते। ऐसी दशा में वे बड़े-बड़े मनोरथ पूरे नहीं हो पाते जो साधना के तप में खरे उतरने वाले साधकों को ही उपलब्ध हो सकते हैं।
उपासना का गृह थोड़े ही दिनों में निर्माण होगा पर उसका श्रेय किसी बड़भागी को ही मिलेगा। ऐसा तीर्थ निर्माण करना जहाँ गायत्री का ब्रह्म विद्यालय, प्रचार केन्द्र, जप, तप, साधारण पुण्य नहीं। उस स्थान में होने वाले धर्म फलस्वरूप जन्म जन्मांतरों तक सद्गति का यह अधिकारी हो सकता है। यश और कीर्ति का जो देश व्यापी विस्तार होगा उसके सम्बन्ध में तो कुछ कहना ही नहीं है।
उपासना करने लगा। भगवान ने एक बालक और दिया जिसे पाकर प्रसन्नता की सीमा न रही। साथ ही यह भय भी था कि इस बालक का भी कोई अनिष्ट न हो जाय भय और आशंका से दिल धड़कता रहता, पर गायत्री माता का ध्यान करके कुछ साहस बंधता।
उपासना हो, चाहे व्यापार, चाहे नौकरी, चाहे और कुछ साधना से मुझे वस्तुतः कोई प्रेम न था। अपना प्रयोजन सिद्ध करने के लिए गायत्री की परीक्षा कर देखने की इच्छा हुई।
उपासना के कुछ ही दिनों के पश्चात् मेरी बुद्धि और स्वभाव में परिवर्तन हो गया जिससे मेरे हर्ष की सीमा न रही। धन्य गायत्री माता की कृपा उन्हीं की कृपा से मेरे उद्धार होने की सम्भावना है। सात्विक आचार विचार तथा आहार व्यवहार से साधकों को विशेष लाभ होने की आशा है मुझे भी ऐसा ही हुआ।
उपासना करना तभी से प्रारम्भ कर दिया। परन्तु शारीरिक अस्वस्थता के कारण मनोवृत्ति को केन्द्रीभूत करने में बहुत कुछ कठिनाई होती थी। फिर भी मैंने अपनी उपासना का कार्य जारी ही रखा। इस प्रकार उपासना करते हुए कुछ ही महीनों के अन्दर गायत्री माता के प्रति मेरा प्रेम अधिकाधिक बढ़ता गया। साँसारिक वस्तुओं से मोह उठता गया।
उपासना की जायगी उसका उतने ही परिणाम में सुमधुर तथा चिरस्थाई परिणाम प्राप्त होगा। यह कहने सुनने नहीं करके देखने की बात है।
उपासना ही मेरे विचार में सर्वश्रेष्ठ है।
उपासना में प्रवृत्त हैं वे दूसरों को इस मार्ग में प्रवृत्त करें। गायत्री का अधिकाधिक लोगों में प्रसार करना एक ऐसा आध्यात्मिक पुण्य है जिसकी तुलना में अन्य सभी पुण्य हल्के बैठते हैं।
उपासना निश्चित रूप से आशाजनक परिणाम उत्पन्न करती है। अनेक अन्य गायत्री उपासकों से भी हमारा परिचय एवं सम्बन्ध है, उनको माता का आश्रय लेने से जो लाभ हुए हैं। उनकी विस्तृत जानकारी होने के कारण हमारी श्रद्धा वेदमाता के प्रति और भी अधिक बढ़ी है। मनुष्य की उलझी हुई व्यक्तिगत तथा समाज की समस्याओं को सुलझाने में गायत्री का माध्यम हमें सर्वश्रेष्ठ प्रतीत होता है।
उपासना किया करते हैं उनकी उन्नति बड़े सन्तोष प्रद ढंग से होती चलती है। परीक्षा के दिनों में इस महामंत्र का थोड़ा साधना करना भी बड़ा अच्छा रहता है। इससे परीक्षार्थी को पिछला पढ़ा हुआ आसानी से याद हो जाता है और परीक्षा काल में चित्त शान्त रहने से प्रश्न पत्रों का तात्पर्य भली प्रकार समझने की सुविधा होती है। अक्सर विद्यार्थी लोग परीक्षा काल में उतावली, घबराहट और भय के कारण अपने मानसिक संतुलन को डाँवाडोल कर लेते है। फलस्वरूप अच्छी तैयारी होते हुए भी वैसे उत्तर नहीं लिख पाते जैसे कि लिखे जाने चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-February
उपासना, समाज पुरुष की सेवा, भगवान ‘ॐ’ की ही आराधना है। गीता के 10 वे अध्याय में भगवान ने बताया है कि- वृक्षों में पीपल, पशुओं में गौ, मनुष्यों में ब्राह्मण, नक्षत्रों में चन्द्रमा, ग्रहों से सूर्य, इंद्रियों में मन, पर्वतों में हिमालय, पक्षियों में गरुड़, नदियों में गंगा, मन्त्रों में गायत्री मंत्र, ऋतुओं में बसन्त मैं हूँ। अर्थात् जो जो श्रेष्ठ, सात्विक, सुदृढ़ एवं उपयोगी विभूतियाँ हैं उनमें मेरे ही अंश की अधिकता हैं। जिन विचार धाराओं में, व्यक्तियों में, वस्तुओं में इस प्रकार के तत्व अधिक हैं उनमें ईश्वरीय कलाओं की विशेषता अनुभव की जा सकती हैं। जहाँ प्रभु का निवास होगा वहाँ निर्णय पूर्वक श्रेष्ठता, सात्विकता, दृढ़ता एवं परोपकार की प्रधानता होगी।
उपासना करनी चाहिए।
उपासना करने वाले, इस महा शक्ति की आराधना करने वाले साधक ईश्वरीय महाशक्ति को आगे रखकर, अग्रसर हों, परमात्मा को साक्षी लेकर जो कार्य किये जाते हैं वही कल्याण कारक होते हैं।
उपासना, प्रशंसा, उत्सव, समारोह, कथा, यात्रा, लीला आदि करने का तात्पर्य है--सतोगुण के प्रति अपना अनुराग प्रकट करना, उसको हृदयंगम करना, उसमें तन्मय होना। इस कृपा से हमारी मनोभूमि पवित्र होती हैं और हमारे विचार तथा कार्य ऐसे हो जाते हैं जो हमारे व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवन में स्थायी सुख शान्ति की सृष्टि करते हैं। ईश्वर उपासना का महा प्रसाद साधक की अन्तरात्मा में सतोगुण की वृद्धि के रूप में, तत्क्षण मिलना आरम्भ हो जाता हैं।
उपासना का महा प्रसाद साधक की अन्तरात्मा में सतोगुण की वृद्धि के रूप में, तत्क्षण मिलना आरम्भ हो जाता हैं।
उपासना एक प्रकार का आध्यात्मिक व्यायाम है जिसके करने से हमारा आत्मबल बढ़ता है। सतोगुण की मात्रा में वृद्धि होती है ईश्वर को सर्व व्यापक समझने वाला पापों से डरेगा। कोतवाल सामने खड़ा हो तो चोर प्रकृति का मनुष्य भी उस समय साधु सा आचरण करता है। सबसे बड़े कोतवाल ईश्वर को जो अपने अन्दर बाहर चारों ओर व्यापक देखता हैं वह उसके दंड से डरेगा और पाप न कर सकेगा। प्राणिमात्र में ईश्वर को व्यापक देखने वाला व्यक्ति सब के साथ सद्व्यवहार ही कर सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-May
उपासना मानव जीवन को सात्विकता एवं सुख शान्ति की ओर ले जाती है। पाठको से प्रार्थना है कि वे प्रयोग कर परीक्षण के रूप में ही सही कुछ दिन इस महामंत्र की उपासना करके देखें। आशा की जाती है कि उन्हें भी शान्तिदायक अनुभव होंगे।
उपासना, पाठ, संस्कार, जप, शिक्षा आदि पुण्य आयोजनों में ही व्यय होगा ।
उपासना करके देखें। आशा की जाती है कि उन्हें भी शान्तिदायक अनुभव होंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-September
उपासना करे।
उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन
उपासना करने दे, जिसकी समस्त पूँजी एक बूढ़ा बैल, एक टूटी हुई पलँगड़ी, एक पुराना चिमटा, थोड़ी-सी राख, नाग और एक खाली खोपड़ी है। क्या यह महिम्न-स्तोत्र के महादेव हैं? नहीं, नहीं। ये तो साक्षात् नारायण-स्वरूप भूखे भारतवासी है। यही मेरा धर्म है, और भारत के प्रत्येक मनुष्य का यही धर्म, साधारण मार्ग, यही व्यवहारिक वेदान्त और यही भगवान की भक्ति होना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-April
उपासना से प्राण बलवान होते हैं। प्राणों का बल ही वास्तविक बल है। इस बल से तेजस्वी हुआ मनुष्य सत्य को प्राप्त करता है। यह सत्य ही आत्मा का दिव्य चक्षु है। सत्य की दृष्टि से जो कुछ देखा जाता है उसी के सम्यक् दृष्टि या तत्व दर्शन कहते हैं।
उपासनाएँ की गई है उनके अनुभव का निचोड़ भी यही है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। सद्बुद्धि के रूप में, सद्गुणों के रूप में, आत्मबल के रूप में एवं दैवी सहायता के रूप में किसी न किसी प्रकार उसका सत्परिणाम अवश्य प्राप्त होता है।
उपासना करने वाला कभी उसके सत्परिणामों से वंचित नहीं रह सकता, सत्पुरुषों द्वारा विविध स्थानों पर विविध विधियों से जो गायत्री उपासनाएँ की गई है उनके अनुभव का निचोड़ भी यही है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। सद्बुद्धि के रूप में, सद्गुणों के रूप में, आत्मबल के रूप में एवं दैवी सहायता के रूप में किसी न किसी प्रकार उसका सत्परिणाम अवश्य प्राप्त होता है।
उपासना और ईश्वरीय महिमा को समझना चाहिए क्योंकि इस मन्त्र में ईश्वर की वह महिमा गायी गई है जो हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है। दुनिया में फैली हुई ढेरों जानकारियाँ उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं जितनी कि गायत्री के गर्भ में छिपा हुआ विज्ञान महिमामय है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-June
उपासना- जिन लोगों के हृदय में शिव रूप त्याग और वैराग्य बसा है, ऐश्वर्य, धन , सौभाग्य उनके पास स्वयं आते हैं और जिन लोगों के अन्तःकरण लक्ष्मी, धन दौलत की लाग में मोहित हैं वे दरिद्र के पात्र रहते हैं जैसे जो कोई सूर्य की तरफ पीठ मोड़ कर अपनी छाया को पकड़ने दौड़ता है, तो छाया उससे आगे बढ़ती जाती है। कभी काबू में नहीं आती है। और जो कोई छाया से मुँह फेर कर सूर्य की और दौड़े तो छाया अपने आप ही पीछे भागती आती है, साथ छोड़ती ही नहीं।
उपासना में लगा देना वाणी की श्रद्धांजलि है। धन द्वारा गायत्री साहित्य का वितरण करना माता का प्रिय भेंट चढ़ाना है।
उपासना। उपासना की जरा न्यून स्थिति बच्चे की सी श्रद्धा और विश्वास है, और यह निष्ठा भी क्या प्यारी और प्रबल है। बच्चा अपने माता-पिता को अनन्त शक्तिमान मानता है। और उनके बल को अपना बल समझ कर माता की गोद में बैठा हुआ शाहनशाही करता है, रेल को भी धमका लेता है। पवन और पक्षियों पर भी हुकुम चलाता है, दरिया को भी कोसने लगता है और कोई चीज असम्भव जानता ही नहीं।
उपासना आदि के परमार्थिक कार्यों में प्रवृत्त रहती थी उन्हें ‘ब्रह्म वादिनी’ कहते थे। ब्रह्म वादिनी और सद्यो वधू के कार्यक्रम तो अलग-2 थे पर उनके मौलिक धर्माधिकारों में कोई अन्तर न था देखिए-
उपासना की जरा न्यून स्थिति बच्चे की सी श्रद्धा और विश्वास है, और यह निष्ठा भी क्या प्यारी और प्रबल है। बच्चा अपने माता-पिता को अनन्त शक्तिमान मानता है। और उनके बल को अपना बल समझ कर माता की गोद में बैठा हुआ शाहनशाही करता है, रेल को भी धमका लेता है। पवन और पक्षियों पर भी हुकुम चलाता है, दरिया को भी कोसने लगता है और कोई चीज असम्भव जानता ही नहीं। धन्य हैं वे पुरुष उच्च भाग्य वाले जिनका इस जोर का विश्वास सचमुच सर्व शक्तिमान पिता में जम जाए।
उपासना का फल तत्काल मिलता है जो अपने अन्तःकरण में सद्बुद्धि को जितना स्थान देता है उसे उतनी ही मात्रा में तत्काल आनन्दमयी स्थिति का लाभ प्राप्त होता है।
उपासना करते हुए पाप का भय भी नहीं लगता इन कारणों से सम्पत्ति के उपार्जन का ‘कर्तव्य’ ‘वित्तेषणा’ को ‘अकर्तव्य’ बताया है। इस बारीकी को न समझने वाले परिश्रमपूर्वक रोटी कमाने को छोड़कर भीख टूक माँग खाने के लिए उतर पड़ते है। और भ्रमवश अपने मिथ्याचार को वैराग्य मान बैठते हैं। वैराग्य का अर्थ मन का राग रहित निर्लोभ, होना है। कर्तव्य का परित्याग तो किसी प्रकार भी वैराग्य नहीं कहा जा सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-December
उपासना का इतनी अधिक संमिश्रण हो ऐसे पुण्य कार्य कभी कभी ही सामने आते हैं और उनसे कोई विरले भाग्यशाली ही अपने आप को धन्य कर पाते हैं।
उपासना के लिए प्रेरणा दी जायगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-March
उपासना’ ग्रहण करें। माता की सुन्दर छवि का परम पवित्र मातृ भावना के साथ ध्यान किया करें। धीरे-धीरे उनकी भावना समस्त नारी जाति में श्रद्धामयी एवं परम पवित्र रहने लगेगी। माता का ध्यान बहुत देर तक मन में करने से नारी रूप में भगवान की झाँकी होती है। भगवान के प्रति ईश्वरीय शक्ति के प्रति, स्वभावतः मातृ भावना होती है।
उपासना से सिद्धि पाई थी। अर्जुन का उर्वशी को माता कहना, छत्रपति शिवाजी का पवन राज कन्या को पुत्री मान कर उसके पास पहुँचा देना, लक्ष्मण को शूर्पणखा को तिरष्कृत करना आदि भारतीय इतिहास में ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जिनमें मातृ भावना की दृढ़ता को प्रतिष्ठित किया गया है। यह भावना गायत्री की उपासना द्वारा आसानी से प्राप्त हो सकती है। मेरी दृष्टि में इस महान आत्मिक सफलता का इससे सरल उपाय और दूसरा नहीं हो सकता।
उपासना द्वारा आसानी से प्राप्त हो सकती है। मेरी दृष्टि में इस महान आत्मिक सफलता का इससे सरल उपाय और दूसरा नहीं हो सकता।
उपासना करने वाला प्रत्येक व्यक्ति निश्चित रूप से प्राणवान बनता है और संसार के सब सुख सौभाग्यों को प्राप्त करता है क्योंकि वे प्राण वालों के लिए ही बनाये गये हैं। प्राणशक्ति प्रेरणा स्फूर्ति, साहस, शौर्य, पराक्रम एवं पुरुषार्थ की जननी है। जो गायत्री द्वारा अपनी प्राणशक्ति बढ़ाता है, अपने प्राण की रक्षा करता है, वह सफल एवं आनन्दमय जीवन का उपभोग करता है।
उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोग, माता का साक्षात्कार, स्त्रियोपयोगी साधनाएँ, गायत्री तप, गायत्री का अर्थ, कुण्डलिनी जागरण आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का विस्तृत वर्णन है। मू0 3॥) रु॰
उपासना द्वारा निश्चित रूप से मातृ भावना का विकास होता है और इस मार्ग का अवलम्बन करके कोई भी व्यक्ति अपने दृष्टिकोण को पवित्र कर सकता है।” मैंने वैसे ही किया अब मैं देखता हूँ कि माता की कृपा से कुदृष्टि का संतोषजनक शमन हो गया है और नारी मात्र को देखते ही माता, बहिन तथा बेटी के भाव उत्पन्न होते हैं। मातृ भावना को वृद्धि के साथ-साथ जिस आत्मिक विकास का प्रारम्भ हुआ है उसकी चर्चा करने की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-November
उपासना का आयोजन सर्वत्र उल्लास पूर्वक हुआ। लोग इस सनातन श्रेय मार्ग को जिन स्थानों पर पूर्णतया भूल चूकें थे वहाँ अप्रत्याशित रूप से ऐसे आयोजन हुए, जिसने साधना, तपश्चर्या और सात्विकता की एक लहर प्रवाहित कर दी। गत आश्विन मास की नवरात्रियों में हमने एक साधारण अपील की थी कि” इस पुराण पर्व पर 24 हजार के लघु अनुष्ठान तपश्चर्या पूर्वक किये जाये।” वर्तमान काल की स्थिति को देखते हुए हमारा अनुमान था कि-’बहुत थोड़े लोग इस ओर ध्यान देंगे जो लोग साधना करेंगे उनके उत्साह को बढ़ाने और अन्यों को प्रेरणा देने के लिए उन साधकों के नाम अखण्ड-ज्योति में छापेंगे।’ परन्तु जो सूचनाएं प्राप्त हुई हैं उनसे प्रकट है कि इस वर्ष नवरात्रि में जिन सज्जनों ने गायत्री के तप किये हैं उनकी संख्या इतनी अधिक है कि पूरी अखंड ज्योति में चार मास तक केवल नाम ही छापे जावें तो भी वह नाम पूरे नहीं हो सकते।
उपासना की पूर्णाहुति करते हुए यह संकल्प कर दिया गया। परन्तु अब मन में नाना प्रकार के संकल्प विकल्प उठ रहे हैं। आज के युग में लोगों की मनोवृत्ति जैसी हो रही है। उसमें एक स्थान पर दस पाँच आदमी भी धार्मिक विचारों के मिलने कठिन हैं। फिर सवा लाख तो इतनी बड़ी संख्या है कि मस्तक चकरा जाता है।
उपासना में प्रवृत्त रहे हैं। गायत्री शोध के लिए शास्त्राध्ययन, इस विद्या के सिद्ध पुरुषों की खोज, निज की तपश्चर्या, अन्य व्यक्तियों को इस मार्ग की प्रेरणा देना, आदि कार्यक्रमों में हमारे जीवन का अधिकाँश भाग व्यतीत हुआ है। अनेक ऐसे आशाजनक परिणाम हमने देखे हैं जिनका उल्लेख करना यहाँ अनावश्यक है। पर इस वर्ष नवरात्रि में हमें स्वयं ऐसा प्रकाश मिला जो अब तक के अनुभवों से ऊँचा है। सदा से हम नवरात्रियों में साधारण उपवास करते थे इस वर्ष हमारा पूर्ण निराहार, केवल जल के आधार पर उपवास हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-July
उपासना उपक्रमों के माध्यम से प्राप्त करता है ।
उपासना पद्धति में भी निष्ठा और नियमितता का अधिकाधिक समावेश करना पड़ता है। जो इस तथ्यों पर जितना अधिक ध्यान देता है वह उसी अनुपात से सच्चा साधक माना जाता है ओर उसी परिमाण से चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त करता है। जो उस ओर ध्यान नहीं देते मात्र उपासना कृत्यों को ही सब कुछ मान बैठते हैं उनको बाल बुद्धि की जादूगरी में रस लेने वाला कहा जा सकता है। हाथों की हेरा-फेरी और जीभ को लपालपी भर से तो बाजीगर ही चमत्कार दिखा सकते हैं। जो इतना भी नहीं समझते कि सस्ते उपचारों से बडे़ चमत्कार दिखाने वाले बाजीगर वस्तुतः खोखले होते हे और बाल मनोरन्जन करके पेट भरने मात्र की कमाई कर पाते है।
उपासना विधियों में से किसे अपनाये, किसे छोडे़ । भ्रान्तियों, शंकाओं, सन्देहों और अनिश्चित दिशा धारा की मनःस्थिति साधक की निष्ठा में सबसे बड़ी बाधा है। इसके रहते किसी का अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचना कठिन है।
उपासना में सप्ताह में एक दिन अस्वाद ब्रह्मचर्य एवं मौन की संयम साधना पर जोर दिया गया है। साथ ही नव सृजन के लिए अंशदान की उदारता बरतने में निष्ठावान रहना चाहिए इनहें तपश्चर्या की नीति अपनाने का अंगुलि निर्देश समझा जाना चाहिए इन्हें मात्र कृत्य की तरह पूरा भर नहीं कर लिया जाना चाहिए , वरन् उन्हें तपस्वी जीवन के आधार भूत सिद्धान्त समझा जाना चाहिए और निरन्तर यह प्रयत्न चलना चाहिए कि यह आदर्श व्यक्तित्व के अंग बनकर दबे देवत्व को उभारने का चमत्कार दिख सके ।
उपासना का युग सन्धि अवधि तक साधना में रहनें वालों का उच्चस्तरीय अनुदान है। इस आधार पर वे अपनी नैष्ठिकता बनाये रहकर आत्मबल सम्पादित करेंगे और आत्म-कल्याग का लाभ अर्जित करेंगे ।
उपासना-साधना अज्ञानग्रस्त लोगों जैसी भ्रम धारणाओं पर निर्धारित नहीं होती। वह ईश्वर अनुकम्पा, बहुमूल्य उपलब्धियाँ पाने के लिए पूरी कीमत चुकाने पर विश्वास करता है और उसके लिए महामानवों जैसी स्थिति प्राप्त करने की प्रेरणा उपासना उपक्रमों के माध्यम से प्राप्त करता है ।
उपासना पर बैठने की उपयोगिता के सम्बन्ध में दो मत नहीं हो सकते । किन्तु इस ध्यान धारणा में उसकी अनिवार्यता नहीं है। नित्य कर्म से निपट कर बिना स्नान के भी इसे किया जा सकता है। रात्रि की सामूहिक साधना में तो हाथ-पैर धोकर बैठ जाना ही पर्याप्त है। आसन बिछा कर बैठा जाय।
उपासना का नियमित और निश्चित होना (2) व्यक्तित्व में पवित्रता एवं प्रखरता का समावेश बढ़ना । (3) तपश्चया्र की संयम एवं सेवा शर्तो की पूरा किया जाना-यह तीन चरण हैं। साधक इन्ही के सहारे इतना सशक्त बनता है कि अन्तराल से सिद्धियों का उभार-संगम से सम्मान, सहयोग और अदृश्य जगत की देवी अनुग्रह की विद्युत वर्षा होने लगे । इस वर्ष की नैष्ठिक उपासना में सप्ताह में एक दिन अस्वाद ब्रह्मचर्य एवं मौन की संयम साधना पर जोर दिया गया है। साथ ही नव सृजन के लिए अंशदान की उदारता बरतने में निष्ठावान रहना चाहिए इनहें तपश्चर्या की नीति अपनाने का अंगुलि निर्देश समझा जाना चाहिए इन्हें मात्र कृत्य की तरह पूरा भर नहीं कर लिया जाना चाहिए , वरन् उन्हें तपस्वी जीवन के आधार भूत सिद्धान्त समझा जाना चाहिए और निरन्तर यह प्रयत्न चलना चाहिए कि यह आदर्श व्यक्तित्व के अंग बनकर दबे देवत्व को उभारने का चमत्कार दिख सके ।
उपासना में उतर मुख बैठने का प्रयत्न किया जाय । किन्तु सामूहिक साधना में वैसा प्रतिबन्ध नहीं है। वहाँ बैठने की सुविधा को ही प्रधानता देनी चाहिए ।
उपासना पद्धति और जीवन प्रक्रिया से उच्चस्तरीय निष्ठा का समावेश करते चलना ही है।
उपासना में साधन श्रद्धा और जीवन प्रक्रिया में उत्कषृता का अधिकाधिक समनवय करना चाहिए । भजन-पूजन बेगार भुगतने की तरह क्रिया-कृत्य बन कर ही नहीं चलते रहना चाहिए वरन् उसमें सघन निष्ठा का समावेश होना चाहिए । इन दिनों युग पुरश्चरण का जो महान संकल्प चल चडा है उसमें संख्या और समय स्वल्प है, पर निष्ठा का स्तर बढ़ाने पर पूरा जोर दिया गया है। कहा गया है कि उसकी नियमितता और आवश्यकता भोजन, शयन से कम नहीं वरन् अधिक ही अनुभव की जानी और वत्र लिया जाना चाहिए कि भोजन या शयन से पूर्व निर्धारित साधना क्रम पूरा किया जाययेगा । किसी कारणवश बन नहीं पडा तो उसे छोड़ नहीं दिया जाना चाहिए, वरन् अगले दिनो साधन बढा कर उसे पूरा किया जाना चाहिए यह नैष्ठिक अनुशासन हैं ।
उपासना कृत्यों को ही सब कुछ मान बैठते हैं उनको बाल बुद्धि की जादूगरी में रस लेने वाला कहा जा सकता है। हाथों की हेरा-फेरी और जीभ को लपालपी भर से तो बाजीगर ही चमत्कार दिखा सकते हैं। जो इतना भी नहीं समझते कि सस्ते उपचारों से बडे़ चमत्कार दिखाने वाले बाजीगर वस्तुतः खोखले होते हे और बाल मनोरन्जन करके पेट भरने मात्र की कमाई कर पाते है। साधना को जो बाजीगरी भर मानते हैं और देवताओं की छुट-पुट उपहार मनुहार से बरगलाये जा सकने जैसे मूर्ख मानते है वे भारी भूल करते हैं। तत्वतः आत्मिक क्षेत्र का पुरुषार्थ उपासना पद्धति और जीवन प्रक्रिया से उच्चस्तरीय निष्ठा का समावेश करते चलना ही है।
उपासना के क्षेत्र में हर गुरु नामधारी ने अपना एक विशेष सम्प्रदाय शास्त्रों , आप्त वचनों एवं परम्पराओं की पूरी अवहेलना करते हुए गढ़ लिया है। पर्यवेक्षण में उसे हारना न पड़े इसलिए यसह तुर्रा लगा दिया है कि जो विधि बताई गई है उसे प्रकट न किया जाय जब कि समस्त संसार में विज्ञ-जन अपने प्रतिपादनों की प्रामाणिकता एवं विशिष्टता सिद्ध करने के लिए उन्हें साहसपूर्वक तर्क एवं प्रमाणें सहित प्रस्तुत करते हैं तब अपने यहाँ किसी को न कहने का प्रतिबन्ध लगाया जाता है। इसका और कोई कारण नहीं, उस मनगढंत जाल-जंजाल की पोल खुल जाने का भय ही गोपनीयता का प्रतिबन्ध लगाता है। साधना विधियों की बहुलता और गोपनीयता की इस अराजकता के दिनों किसी सहज जिज्ञासु के लिए यह निर्णय करना कठिन पड़ता है कि इन तथाकथित गुरुजनों द्वारा बताई जाने वाली अनेकानेक उपासना विधियों में से किसे अपनाये, किसे छोडे़ । भ्रान्तियों, शंकाओं, सन्देहों और अनिश्चित दिशा धारा की मनःस्थिति साधक की निष्ठा में सबसे बड़ी बाधा है।
उपासना का न्यूनाधिक क्रम चलता रहे तो इसका लाभ विशेष मिलता है। न करने पर भी हानि या रुकावट कुछ नहीं है गायत्री परिवार के सभी परिजन इस उपक्रम का आरम्भ तत्काल कर दें। जहाँ सामूहिक या मासिक रुप से इसे चलाया जा सकता है । इस अनुदान का लाभ अपने ग्रहण शक्ति के अनुरुप न्यूनाधिक मात्रा में हर कोई उठा सकता है। इसलिए उसका प्रसार प्रशिक्षण करने में काई हर्ज नहीं है ध्यानकर्ता अपना नामाँकन शान्ति-कुँज में करालें और समय-समय पर अपने अनुभवों का उल्लेख करते हुए परामर्श प्राप्त करते रहना चाहें तो अधिक मात्रा में अधिक उच्चस्तर का उपयुक्त अनुदान मिलने की अधिक सम्भावना रहेगी ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-March
उपासना, स्वाध्ययाय, संयम, सेवा की चतुविधि श्रेय साधना में संलग्न रह सकते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-January
उपासना-शरीर को भगवान का मन्दिर की कसौटी और प्रमाण है।
उपासना के युग्म को अन्योन्याश्रित-एक दूसरे का पूरक माना गया है।
उपासना करो। शकंराचार्य ने मुख्य परोक्षानुभूति में कहा है-
उपासना
उपासना भी करते है। इस पृथ्वी से अलग ही अन्यान्तर लोक में र्स्वग जैसै किसी स्थान का अस्तित्व है, अथवा नहीं, यह विवाद का विषय है। पर उसे प्राप्त करने की इच्छा मनुष्य के आगे बढ़ने की आकाँक्षा को द्योतक है जिसे अनुचित नहीं कहा जा सकता।
उपासना कृत्यों की तरह है इसकी भी गरिमा है। साधना और उपासना के युग्म को अन्योन्याश्रित-एक दूसरे का पूरक माना गया है।
उपासनाग्रह में जाती थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-October
उपासना कर लेने से भी उच्चस्तरीय परिणाम प्राप्त कर सकने में सफल हुए हैं। विवेकानन्द, गाँधी, विनाबा आदि के उदाहरण ऐसे ही हैं जिनमें सेवा साधना ही प्रधान है। पूजा अर्चा तो वे थोड़ी सी ही करते रहे हैं सो भी एकान्तिकनहीं सामूहिक। भगवान बुद्ध और महावीर ने भी आरम्भिक दिनों में ही तपश्चर्या अपनाई थी उसके उपरान्त वे धर्म चक्र प्रवृत्तियों को विश्वव्रुपी बनाने, उसके लिए परिव्राजक प्रशिक्षित करने तथा साधन जुटाने, में ही निरत रहे। गुरु गोविन्दसिंह, समर्थ रामदा, चाणक्य, आदि की गणना भी ऐसे ही कर्मयोगियो में की जाती है।
उपासना में अधिकाधिक निष्ठा का समावेश, युग साधकों की साधना प्रखरता बनाने के लिए अनिवार्य समझा जाना चाहिए। निष्ठा का जितना ही समावेश हो सकेगा, नैष्ठिक उपासकों द्वारा चलायें जाने वाले युग सन्धि महापुरश्चरण के सत्परिणाम उसी अनुपात में फलित होंगे।
उपासना के अखाड़े में बलिष्ठता का-निष्ठा का-अभ्यास करना होता है, पर उस उपार्जित सामर्थ्य को इतने छोटे क्षेत्र में कैद नहीं रखा जाता। पहलवान दंगल पछाड़ते और दूसरे प्रकार के पराक्रम प्रस्तुत करते हैं। ठीक यही बात नैष्ठिक साधकों के सम्बन्ध में भी हैं। वे निर्धारण, जप संख्या एवं व्रतशीलता का उपक्रम चलाते हुए उपासना क्षेत्र के प्रयोगकर्त्ता तो समझे जा सकते हैं। पर बात इतने भर से बनती नहीं।
उपासना और साधना का सज्जनता और उदारता का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। उपासनात्मक उपचारों में दान-पुण्य की प्रक्रिया इसीलिए सम्मिलित रखी गई है कि दोनों के मिलने से ज्ञान और कर्म का-भावना और तत्परता का समावेश रहने से अभीष्ट परिणाम उपलब्ध हो सकें।
उपासना-आत्म साधना और लोक सेवा को गंगा यमुना सरस्वती माना गया है। और उनके त्रिवेणी संगम को तीर्थराज कहकर कायाकल्प जैसा पुण्य फलदायक बताया गया है।
उपासना में अभिरुचि रखने वाले इन दिनों की प्रतीक्षा करते रहते हैं और उस अवसर पर कुछ न कुछ व्रत पालन निश्चित रुप से करते हैं।
उपासना का भी नियमित उपक्रम बन नहीं पड़ रहा है। इस समुदाय के लिए एक अति सरल पंचसूत्री कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया है और उसको अपनाने के लिए नवरात्रि पर्व को ही शुभारम्भ के मुहूर्त के रुप में मनाने के लिए अनुरोध किया गया है।
उपासना को पू कर लेने की सुविधा भी है। पर निष्ठा के अभाव में लड़खड़ानें वाले अन्तराल में तो नियमित पूजा-पाठ तक नहीं बन पड़ता। फिर व्यक्तित् के उच्चस्तरीय बनाने वाले जिस आन्तरिक पराक्रम की आवश्यकता है वह तो बनेगा ही केसे ? ऐसी मनोभूमि के लोग ही असफलता का रोना रोते और उसका कारण यहाँ-वहाँ-ढूँढ़ते रहते हैं। जब कि निष्ठा का अभाव ही अशक्तता के रुप में असफलता का एकमात्र निमित्त कारण हैं।
उपासना के अमुक विधि-विधान पूरे करने से ही कराया गया है, पर उन्हें उतने छोटे दायरे तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। मात्र वातावरण संशोधन का उपक्रम ही पर्याप्त नहीं, युग सृजन में हमारा प्रत्यक्ष योगदान भी सम्मिलित रहना चाहिए। नवनिर्माण की प्रस्तुत गतिविधियों को विशुद्ध रुप से सृष्टा की इच्छा आवश्यकता समझा जाना चाहिए और पराक्रम भरे अनुदान की माँग को थोड़ी-सी पूजा-पत्री को पर्याप्त मानकर अनसुनी नहीं करना चाहिए। युग पुरश्चरण के नैष्ठिक उपासकों को यह भी समझने की आवश्यकता है कि महाप्रज्ञा की आराधना में इन दिनों नव-सृजन के निमित्त भाव भरे अनुदानों को भी सम्मिलित रखने की आवश्यकता है।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों को कलेवर और निष्ठा को उसके अन्तरंग को प्राण शक्ति कहा जाता है। साधना की सिद्धि इसी एक तथ्य पर निर्भर है कि उसे कितनी गहन निष्ठा के साथ अपनाया गया। यों जब तब, ज्यों-त्यों करके कुछ न कुछ भजन-पूजन करते रहने में भी हर्ज नहीं, उतने से भी रुचि बदलती है और प्रवाह बनता है, पर इस तथ्य को भुलाया नहीं जाना चाहिए कि वाण की बेधक शक्ति इस बातपर निर्भर रहती हैं कि धनुष्य की प्रत्यंचा को कितना खींचा जा सका और लक्ष्य बेध में कितने एकाग्र मनोयोग का उपयोग किया गया। आत्मिक सफलताओं का रहस्य एक ही है कि ‘निष्ठा’ का महत्व कितना समझा गया और उसे कितनी गम्भीरतापूर्वक अपनाया गया। कर्मकाण्ड तो उपचार भर है।
उपासना की दृष्टि से युग-सन्धि पुरश्चरण की भागीदारी पर्याप्त है। उसमें सन्निहित जप, अर्चन, व्रत अनुशासन एंव विशिष्ट ध्यान के त्रिवेणी संगम को इतना पर्याप्त न मान लेना चाहिए कि उतने भर से आत्मशोधन का प्रयोजन भली प्रकार पूरा होता रहेगा। प्रयास पुरुषार्थ का नियोजन उस युग-सृजन प्रक्रिया में किया जाना चाहिए जिसमें स्वार्थ और परमार्थ का आत्म कल्याण और लोक-मंगल का उभयपक्षीय प्रयोजन पूर्ण होता है।
उपासना अधिक फलवती होती और संध्या के नाम से पुकारी जाती है। उसी प्रकार नवरात्रियों का समय भी दोनों सन्ध्याओं के समतुल्य माना गया है।
उपासना की ओर अग्रसर किया जा सकता हैं। अस्तु, आरम्भ में जिन्हें अभ्यास नहीं है और जो नये-नये ही गायत्री उपसना में संलग्न हो रहे है उनके लिए ऐसा सरल मार्ग प्रस्तुत किया गया है जिन्हे वे एकाकी प्रयासों से अस्तु किन्हीं भी परिस्थितियों में करते रह सकते हैं।
उपासनाएं चलाते हुए यह ध्यान रखन होगा कि उपासना की पूर्णता के लिए जीवन साधना की ओर साधना को समर्थ बनाने के लिए सेवा परायणता की आवयकता है। भगवत् उपासना-आत्म साधना और लोक सेवा को गंगा यमुना सरस्वती माना गया है। और उनके त्रिवेणी संगम को तीर्थराज कहकर कायाकल्प जैसा पुण्य फलदायक बताया गया है।
उपासना का उपक्रम बने और उसे एक उत्साह आयोजन का स्वरुप मिले। ऐसी व्यवस्था बनाने में उत्साही लोगों को स्वयं आगे रहने, थोड़ी दौड़ धूप करने साधन जुटानें एवं जन-सर्म्पक साधकर उत्साह दिलाने जैसे प्रयत्न करने होते हैं। ऐसा कुछ कर पाने वाले उत्साही जहाँ एक दो भी हों वहाँ नवरात्रि आयोजन की व्यवस्था सहज ही बन जाती हैं। वह न तो मँहगी है और न कठिन कष्ट साध्य। जो इसके लिए आगे बढ़कर साहस दिखाते है उन्हं अनुभव से इस निर्ष्कष पर पहूँचना होता है कि भारत जैसे धर्म प्रकृति वाले देश में नवरात्रि आयोजनों को साधना सत्रों के रुप में विकसित और व्यापक बना सकने में अनुत्साह के अतिरिक्त और कोई भी कठिनाई नहीं हैं जो हँसते-हँसातें हल न की जा सकं।
उपासना उपचार करने के अतिरिक्त लोकमंगल की साधना को भी सम्मिलित करना और उसके लिए साहस जुटाना आवश्यक समझा जाता है। जो इनमें से एक के लिए अपनाते और दूसरे को छोड़ते हैं वे एक पंख के सहारे उड़ने का प्रयास करने वाले पक्षी की तरह निराश ही रहते हैं। एक पहिये की गाड़ी कहाँ चल पाती है ? एक पैर के लम्बी यात्रा कर सकने में सफलता कहाँ मिलती है ? लंगड़े व्यक्ति भी लकड़ी का सहारा लेकर ही खड़े होते और आगे चलने में समर्थ हो पाते हैं।
उपासना में प्रवृत्त कने का उत्तरदायित्व भी युग साधकों को सौंपा गया है। सामान्य उपासक एकदम तो युग पुरश्चरण जैसी निष्ठ प्रधान साधनाओं में संलग्न नहीं हो सकते। उन्हं क्रमशः ही नैष्ठिक उपासना की ओर अग्रसर किया जा सकता हैं। अस्तु, आरम्भ में जिन्हें अभ्यास नहीं है और जो नये-नये ही गायत्री उपसना में संलग्न हो रहे है उनके लिए ऐसा सरल मार्ग प्रस्तुत किया गया है जिन्हे वे एकाकी प्रयासों से अस्तु किन्हीं भी परिस्थितियों में करते रह सकते हैं।
उपासना के अभ्यस्त नहीं हैं और यदा-कदा ही कभी कुछ पूजा पाठ करते हैं ऐसे लोगों पर भी जोर दिया जाता हैं कि वे कम से कम उन दिनों तो कुछ नियम निवाहें और निश्चित साधना की बात सोंचे। इन अभ्यासो के लिए भी कई प्रकार की सरल साधनाओं की विशेष व्यवस्थ की जाती है ताकि बोझ लगने और मन उचटने की कठिनाई का सामना न करना पड़े। मन्त्र लेखन गायत्री चालीसा पाठ, पंचाक्षरी जप आदि की सरल व्यवस्थाएँ उसी आधार पर बनी हैं। और 24 हजार वाली संख्या को घआ कर 10 हजार तक हलका कर दिया गा है। नौ दिन में दस हजार जप करने का तार्त्पय मात्र हर रोज एक घण्टा समय लगाना भर होता है।
उपासना को ही उस स्थिति में फलवती होने का अवसर कैसे मिल सकता है ?
उपासना पाँच मिनट की भी हो सकती है। स्नान की असुविधा हो तो मौन मानसिक जप किसी भी स्थिति में एवं किसी भी समय किया जा सकता है। जप के साथ ध्यान आवश्यक है। युग पुरश्चरण में शक्ति संचार की उच्चस्तरीय ध्यान धारणा का समावेश है। पाँच मिनट की न्यूनतम गायत्री जप उपासना में प्रकाश मंडल के अर्न्तगत महाप्रज्ञा का गायत्री माता का-ध्यान किया जाना चाहिए।
उपासना-
उपासना को बीज और साधना को खाद, पानी की उपमा दी जाती है ओर कहा जाता है कि फसल का फलित होना इस समन्वय पर ही निर्भर है।
उपासनात्मक उपचारों में दान-पुण्य की प्रक्रिया इसीलिए सम्मिलित रखी गई है कि दोनों के मिलने से ज्ञान और कर्म का-भावना और तत्परता का समावेश रहने से अभीष्ट परिणाम उपलब्ध हो सकें।
उपासना एवं युग साधना के अनुदानों का संक्षिप्त पर स्पष्ट विवरण अवश्य दें।
उपासना की पूर्णता के लिए जीवन साधना की ओर साधना को समर्थ बनाने के लिए सेवा परायणता की आवयकता है। भगवत् उपासना-आत्म साधना और लोक सेवा को गंगा यमुना सरस्वती माना गया है। और उनके त्रिवेणी संगम को तीर्थराज कहकर कायाकल्प जैसा पुण्य फलदायक बताया गया है।
उपासना में अधिक प्रखरता का वह समावेश हो सकें जो सुविधा, सरलता के वातावरण में उपलब्ध नहीं होता।
उपासना ही एक मार्ग नहीं है। उसके अतिरिक्त परमार्थ में प्रयोजनों रत रहने वालों ने भी अध्यात्म क्षेत्र की अभीष्ट सफलताएँ पाई है। लोक-सेवा भी किसी भजन-पूजन से कम महत्व की साधना नहीं है। ऐसे व्यक्ति नित्य नियम तिजनी थोड़ी उपासना कर लेने से भी उच्चस्तरीय परिणाम प्राप्त कर सकने में सफल हुए हैं। विवेकानन्द, गाँधी, विनाबा आदि के उदाहरण ऐसे ही हैं जिनमें सेवा साधना ही प्रधान है।
उपासना और साधना के उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। प्रातः काल सामूहिक जप, हवन-पूजन का औ सायं काल संगीत प्रवचन के ज्ञान यज्ञ की व्यवस्था रहती हैं। उपासना से आत्म कल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही हैं। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ बानर, कृष्ण काल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रामाणित करते हैं कि महान दित किये बिना और कोई चारा नहीं।
उपासना’ में समय एवं संख्या का बन्धन तो नहीं है, पर नियमितता को जीवन्त रखने के लिए इतना तो करना ही होगा कि जो भी करना हो उसे संकल्पपूर्वक तथा नियमित रुप से किया जाय। अस्त-व्यस्तता अश्रद्धा की परिचायक है। निष्ठा में अनुशासन जुड़ा हुआ है। भले ही न्यूनतम मात्रा में उपासना की जाय, पर उसमें ढ़ील-पोल नहीं चलनी चाहिए।
उपासना से आत्म कल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही हैं। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ बानर, कृष्ण काल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रामाणित करते हैं कि महान दित किये बिना और कोई चारा नहीं। देवताओं की संयुक्त शक्ति दुर्गा ने ही उन्हें असुरों के त्रास से छुड़ाया था। ऋषियों का संचित रक्त घट ही सीमा को जन्म देने और दानवी विभीषिकाओं को निरस्त करने में आधारभूत कारण बना था।
उपासना की जाय, पर उसमें ढ़ील-पोल नहीं चलनी चाहिए।
उपासना का माध्यम बने और रात्रि को सोते समय अस्त होते हुए सूर्य को मानसिक नमन किया जाये। यह पाँच-पाँच मिनट का उभयकालीन सविता वन्दना करने का क्रम चल पड़े तो इससे न समय संबंधी कठिनाई पड़ेगी और न आस्तिकता-नास्तिकता के जंजला बाधक बनेंगे। प्रकाशपुँज के ध्यान में तेजस् का साथ सर्म्पक जुड़ता है और उससे प्रकाश की दिशा में प्रगति देने वाला साहस भी जगता है।
उपासनारकी सरलता देखकर उतने भर से जीवन लक्ष्य की प्राप्ति और भगवत् कृपा उपलब्ध हो जाने की बात सूझती है उन्हें भी बताया जाता हैं कि आराधना बीजारोपण के समान है, उसे अंकुरित, पल्लवित, और फलित, विकसित बनाने के लिए साधना का खादपानी लागाने की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। साधना का संगम महा-मानवों जैसी उदात्त जीवनचर्या एवं लोक मगंल के निमित्त किये गये त्याग बलिदान के समन्वय से बनता है। जो केवल भजन-पूजन भर को सब कुछ मान लेते हैं वे कमान वाले तीर को घूमाते तो फिरते हैं पर वे उससे लक्ष्य बेध का प्रयोजन पूरा नहीं कर पाते।
उपासना में जिनकी रुचि नहीं हैं वे सबेरे सोकर जागने और रात्रि को बिस्तर पकड़ने के बाद पाँच मिनट को महाप्रज्ञा का प्रकाशपुँज के रुप में ध्यान कर लिया करें। प्रज्ञा का अधिष्ठाता सविर्ता को माना गया है। सविता अर्थात् प्रकाशपंज सूर्य। प्रभात काल का उदीयमान सूर्य अपनी प्रभातकालीन उपासना का माध्यम बने और रात्रि को सोते समय अस्त होते हुए सूर्य को मानसिक नमन किया जाये। यह पाँच-पाँच मिनट का उभयकालीन सविता वन्दना करने का क्रम चल पड़े तो इससे न समय संबंधी कठिनाई पड़ेगी और न आस्तिकता-नास्तिकता के जंजला बाधक बनेंगे।
उपासना और उसके साथ सम्मिलित रहने वाले आदर्शवादी अनुबन्धों को साधना कहते हैं। उपासना को बीज और साधना को खाद, पानी की उपमा दी जाती है ओर कहा जाता है कि फसल का फलित होना इस समन्वय पर ही निर्भर है।
उपासना में प्रकाश मंडल के अर्न्तगत महाप्रज्ञा का गायत्री माता का-ध्यान किया जाना चाहिए। प्रातःकाल का स्वर्णिम सूर्य-उसकी दिव्य किरणों का साधक की काया में प्रवेश-स्थूल शरीर काय कलेवर में सत्पुरुषार्थ-सूख्म शरीर-ज्ञान संस्थान में सद्भाव-कारण शरीर-अन्तःकरण में सद्भाव के रुप में सविता प्रकाश में अनुभूति। यही है वह सरलतम ध्यान जो पाँच मिनट की नितय जप साधना करने के रुप में चलता रह सकता है।
उपासना क्षेत्र के प्रयोगकर्त्ता तो समझे जा सकते हैं। पर बात इतने भर से बनती नहीं। बढ़ना और आगे पड़ता है। गाड़ी एक पहिये नहीं दो से चलती है। ताली एकनही दो हाथ से बजती है।
उपासना का दूसरा पक्ष है- साधना। एक पख् से पक्षी नहीं उड़ता, इसी प्रकार लोक-कल्याण के लिए तत्पर हुए बिना किसी को भी आत्मकल्याण का लाभ मिल नहीं सकता। इस सच्व्चाई को जितनी जल्दी समझा जा सके उतना ही श्रेयस्कर रहेगा।
उपासना की चिन्ह पूजा भी बीजारोपण की दृष्टि से उपयोगी मानी गई है और उसे किसी भी रुप में किसी भी मनःस्थिति में अपनाये रहने पर जोर दिया गया है। फिर भीउसे निष्ठापूर्वक अपनाने की प्रौढ़ता का स्तर सदा ऊँचा ही रहता है। उच्चस्तरीय कर की जाने वाली साधाना के साथ अविच्छिन्न रुप से सम्बन्धित हैं।
उपासना उठते समय अरुणोदय और सोते समय सूर्यास्त का ध्यान करने की प्रक्रिया का शुभारम्भा इन्हीं दिनों कर देना चाहिए।
उपासना तत्वज्ञान में सन्निहित संकेत सभी ऐसे हैं जिन्हें साधना अवधि में प्रयुक्त करने के बहाने अभ्यास में उतारा जाए और उसका निर्वाह भविष्य में भी यथासम्भव करते रहा जाए। ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ की अध्यात्म मान्यता का प्राणि वध से उपलब्ध साधनों का उपयोग करने से बढ़ती नहीं वरन् घटती और बुझती ही चली जाती हैं। अस्तु नवरात्रि में चर्मत्याग की लकीर पीट लेने से ही नहीं प्राणियों के प्रति करुणा बरतने, यहाँ तक कि अत्यधिक भार से लदे घायल पशुओं के श्रम का उपयोग करते समय भी उसी करुणा को अपना कर कुछ निर्णय करना होगा। प्रकारान्तर से नवरात्रि में चर्मत्या के पीछे अहिसाँ वृत्ति के विकास का तत्वज्ञान जुड़ा हुआ समझा जाना चाहिए।
उपासना क्रम में सरलता उत्पन्न करने तरह व्रत अनुशासनों में भी ढील देकर उन्हं मनीषियों ने बाल सुलभ बना दिया हैं। भूमिशयन, स्वयं सेवा, उनके लिए अनिवार्य नहीं। ब्रह्मचर्य तो आवश्यक है। पर उपवास में भी ढील की काफी गुँजायश बना दी गई है। रोटी-शाक, दाल-चावल जैसे दो वस्तओं के युग्म अपना कर नौ दिन काट लेने में मात्र पदार्थो का सीमा बन्धन ही हैं भूखा रहने जैसी कोई कठिनाई नहीं है।
उपासनात्मक अभ्यास सौंपा जाय। तद्नुसार एक लाख साधकों द्वारा प्रतिदिन 4 करोड़ गायत्री जप के युग पुरश्चरण की योजना बनाई गई है। यहाँ यह स्मरणीय है कि इसमें मात्र उनहीं को लिया गया है जो निष्ठा को परिपक्व करने वाले अनुबन्धों का कड़ाई से पाल कर सकें। यही कारण है इस युग साधना के साध “नैष्टिक” कहलाते है। निष्ठा से उत्पन्न ऊर्जा ही आत्मकल्याण और लोकनिर्माण के उीय पक्षीय प्रयोजन पूरी कर पाती है।
उपासना के अतिरिक्त “एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य” ज्ञानयज्ञ के निमित्त निकालते रहने की सदस्यता शर्त देव परिवार के परिजनों के लिए आरम्भ से ही निर्धारित की गई है। अपने समय में अग्निहोत्र को प्रतीक और ज्ञानयज्ञ को युग धर्म के रुप में मान्यता मिली थी। कभी सब लोग देवमानव थे और सभी ज्ञान सम्पन्न, इसलिए ज्ञानयज्ञ को उतना महत्व नहीं दिया गया, जितना कि वह महत्वूपर्ण है। आज इसलिए महत्वपूर्ण है कि इन दिनों चारों और अज्ञानान्धकार की ओर तमिस्त्रा ने सर्वत्र अपना साम्राज्य जमा लिया है इस स्थिति में ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल जलानी पड़ेगी और उसी को युग यज्ञ की मान्यता देनी पडे़गी।
उपासना का अवलम्बन आवश्यक है। समय का अभाव य अन्य कोई कारण हो तो न्यूनतम उपासना पाँच मिनट की भी हो सकती है। स्नान की असुविधा हो तो मौन मानसिक जप किसी भी स्थिति में एवं किसी भी समय किया जा सकता है। जप के साथ ध्यान आवश्यक है। युग पुरश्चरण में शक्ति संचार की उच्चस्तरीय ध्यान धारणा का समावेश है।
उपासना का शुभारम्भ कर सकेंगे और निजी परिवार में सृजनात्मक वृत्तियों का सूत्र संचालन करते हुए वही प्रक्रिया आरम्भ कर सकेंगे जो बड़े रुप शाखा संगठन एवं प्रज्ञापीठों के माध्यम से किया जाना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-November
उपासना भी प्रभावी हो सकती है।
उपासना हुई। इनके अतिरक्त स्नान करने के उपराँत भी कुछ समय गायत्री का प्रतिमा पूजन, नमन, अभिनन्दन, जप, ध्यान का कुछ औपचारिक नियम बनाया जाय। परिवार में भी हर सदस्य को इतना करने की प्रेरणा दी जाय।
उपासना की सामर्थ्य बहुत स्वल्प होती है, उससे निजी आवश्यकताओं को पूरे करने के लिए स्वावलम्बी भी रहा जा सकता है। यदि बड़े काम कन्धे पर लदें तो उनकी पूर्ति के लिए अन्यत्र से बड़ी व्यवस्था करनी पड़ती है। बड़े उद्योगों का काम अपनी निजी पूँजी से नहीं चलता उन्हें बैंकों से उधार लेकर काम चलाना पड़ता है। इसी प्रकार महत्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य से काम नहीं चलता, किसी सामर्थ्य स्रोत के साथ सम्बंध जोड़कर काम चलाना पड़ता है। प्राण प्रत्यावर्तन, शक्तिपात, वरदान आदि नामों से अध्यात्म क्षेत्र में इसी प्रक्रिया को बड़े के द्वारा छोओं के लिए प्रयुक्त किया जाता रहा है।
उपासना-सविता ध्यान के द्वारा प्राण शक्ति का आकर्षण एवं सम्बर्द्धन होता है। विभिन्न यौगिक क्रियाओं आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बंध और ध्यान आदि के द्वारा प्राण का संचार सुचारु रुप से होने लगता है।
उपासना, पराशक्ति के साथ अपना सम्बन्ध सूत्र जोड़कर उसके अनुदानों के लिए द्वार खोलने की प्रक्रिया है। युग संधि में यह नितान्त आवश्यक है। भले ही वह दस मिनट जितनी स्वल्प ही क्यों न हो। इतने पर भी उसे निष्ठा युक्त तो होना ही चाहिए। नैष्ठिक अर्थात आस्था और दृढ़तापूर्वक अपनाया जाना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-June
उपासना श्रेष्ठ चिन्तन एवं उत्कृष्ट व्यक्तित्व के निर्माण का एक सशक्त माध्यम है। मस्तिष्क की बनावट कुछ ऐसी है वह चिन्तन के लिए आधार ढूँढ़ता है। जैसा माध्यम होगा उसी स्तर का च्िन्तन चल पडे़गा। तद्नुरुप क्रिया-कलाप होगे। वातावरण का व्यक्ति पर पड़ने वाला प्रभाव एक तथ्य है।
उपासना का अवलम्बन आवश्यक है। इसमें व्यक्ति एवं समाज के सर्वतोमुखी परिष्कार एवं प्रगति के सभी आधार विद्यमान है। समस्याओं की जटिलता एवं परिस्थितियों की विषमता के निराकरण के लिए उपासना आज की सर्वोत्तम आवश्यकता है।
उपासना के साथ जुड़े चिन्तन प्रवाह में आदर्शवादिता का जितना अधिक पुट होगा उसी स्तर की सफलता प्राप्त होगी। इष्ट से तादात्म्य और उससे मिलने वाले दिव्य अनुदानों से वह आधार बन जाता है जिससे साधक अपने चिन्तन एवं गतिविधियों को श्रेष्ठता की ओर मोड़ सके।
उपासना व्यक्तित्व निर्माण की एक समग्र प्रक्रिया है। जिसका अवलम्बन लेने वाला स्वयं श्रेष्ठ बनता तथा अन्यों को भी प्रभावित करता है। वह अपने विचारों का प्रसारण अभौतिक माध्यमों से अन्य लोगों तक कर सकता है। इसमें व्यक्ति एवं वातावरण को अनुपवर्ती बनाने के सभी तत्व विद्यमान है।”
उपासना की तन्मयता एवं उसकी प्रतिक्रियाआँ का ही प्रभाव है। यह असामान्य स्थिति न भी हो तो भी साधक के विचारों का परिशोधन होता जाता है। भाव-संवदेनाओं में आदर्श वादिता जुड़ने लगती हैं
उपासना को जीवन की अनिवार्य आवश्यकता के रुप में स्वीका करते हुए प्रसिद्ध मनवैज्ञानिक ‘चार्ल्सथुग’ ने कहा है कि “सभी धर्मों में प्रचलित उपासनाएँ मानव स्वास्थ्य एवं समग्र विकास के लिए आवश्कय है।” उनका कहना है कि “संसार के सभी मानसिक चिकित्सक मिलकर भी उतने रोगियों को आरोग्य प्रदान नहीं कर पाते जितना कि संसार का छोटे से छोटा धर्म करा पाता हैं
उपासनाएँ मानव स्वास्थ्य एवं समग्र विकास के लिए आवश्कय है।” उनका कहना है कि “संसार के सभी मानसिक चिकित्सक मिलकर भी उतने रोगियों को आरोग्य प्रदान नहीं कर पाते जितना कि संसार का छोटे से छोटा धर्म करा पाता हैं
उपासना में इष्ट का निर्धारण क्या हो यह व्यक्तिगत अभिरुचि एवं मनःस्थिति के उपर निर्भर करता है। चिन्तन को लक्ष्य की ओर नियोजित किए रखने के लिए साकार अथवा निराकार कोई भी अवलम्बन लिया जा सकता है। यह आवश्यक है और उपयोगी भी। उपासना के साथ जुड़े चिन्तन प्रवाह में आदर्शवादिता का जितना अधिक पुट होगा उसी स्तर की सफलता प्राप्त होगी। इष्ट से तादात्म्य और उससे मिलने वाले दिव्य अनुदानों से वह आधार बन जाता है जिससे साधक अपने चिन्तन एवं गतिविधियों को श्रेष्ठता की ओर मोड़ सके।
उपासना के प्रभावों के विषय में लिखते है कि हम शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को किसी दिव्य सत्ता, देवदूत अथवा सर्व व्यापी चेतना से एकत्व स्थापित करके निश्चय पूर्वक सुधार करते है। उनका कहना है कि “हम जिस प्रकार की आत्मा का ध्यान करते है उससे हमारा सर्म्पक उसी प्रकार स्थापित हो जाता है उससे हमारा सर्म्पक उसी प्रकार स्थापित हो जाता है जिस प्रकार वायरलेस के द्वारा संसार के विभिन्न रेडियों स्टेशनों से सर्म्पक हो जाता है। दिव्य-सत्ताओं से सर्म्पक एवं उनसे मिलने वाली दिव्य प्रेरणाओं से आध्यात्मिकही नहीं शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य सर्म्बधन का लाभ भी प्राप्त कर सकते है। प्रत्येक मनुष्य का मस्तिष्क वायरलेस सैट के समान है जो हर समय भले-बुरे विचारों को ग्रहण करता रहता है। मन में किस प्रकार के विचार उत्पन्न होगे यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस प्रकार की आत्मा से सर्म्पक जोड़ रहे है अर्थात् इष्ट से जुडे़ आदर्श कैसे है।
उपासना आज की सर्वोत्तम आवश्यकता है।
उपासना से जुड़ी आदर्शवादी मान्यताएँ एवं प्रेरणाएँ ही चिन्तन को श्रेष्ठ एवं व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बना सकने में समर्थ हो सकती है। उपासना की समग्रता एवं उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों को भली-भाँति समझा जा सके तो व्यक्तित्व निर्माण का एक सुदृढ़ आधार मिल सकता है। व्यक्तित्व का परिष्कार ही उपासना का लक्ष्य होता है।
उपासना का लक्ष्य होता है।
उपासना का अवलम्बन।
उपासना में तन्मयता की पराकाष्ठा साधक-साध्य के बीच विभेदकों समाप्त कर देती है। द्वैत से उठकर ‘अद्वैत’ की स्थिति बन जाती है। फलस्वरुप इष्ट की अनुभूतियाँ साधक को होने लगती है। सेन्ट कैथेराइन की पीड़ा, मीरा का कृष्ण के प्रति भक्ति में एकाकार हो जाना, रामकृष्ण परमहंस द्वारा सर्वत्र काली का दर्शन करना, काली के स्वरुप में स्वयं का अस्तित्व भूल जाना उपासना की तन्मयता एवं उसकी प्रतिक्रियाआँ का ही प्रभाव है। यह असामान्य स्थिति न भी हो तो भी साधक के विचारों का परिशोधन होता जाता है।
उपासना द्वारा निर्माण की यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया चलती रहती है। उपासना में तन्मयता की पराकाष्ठा साधक-साध्य के बीच विभेदकों समाप्त कर देती है। द्वैत से उठकर ‘अद्वैत’ की स्थिति बन जाती है। फलस्वरुप इष्ट की अनुभूतियाँ साधक को होने लगती है। सेन्ट कैथेराइन की पीड़ा, मीरा का कृष्ण के प्रति भक्ति में एकाकार हो जाना, रामकृष्ण परमहंस द्वारा सर्वत्र काली का दर्शन करना, काली के स्वरुप में स्वयं का अस्तित्व भूल जाना उपासना की तन्मयता एवं उसकी प्रतिक्रियाआँ का ही प्रभाव है।
उपासना की एकाग्रता का परिणाम है। संत कैथेराइन ‘ईसा’ के ध्यान में इतनी तन्मय हो जाती है कि उन्हं वह अनुभूतियाँ भी होने लगती है जो क्रास पर लटकाये जाने के समय ईसा को हुई थी। उनकी सघन संवेदनाएँ अपने इष्ट से जुड़कर अनुभूति का रुप ले लेती थी।
उपासना में इष्ट का निर्धारण परोक्ष रुप में श्रेष्ठ आदर्शों की ही प्रतिष्ठापना है। जिसके निकट आने, तादात्म्य स्थापित करने वाला भी उसी के अनुरुप ढलता-बनता चला जाता है।
उपासना की समग्रता एवं उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों को भली-भाँति समझा जा सके तो व्यक्तित्व निर्माण का एक सुदृढ़ आधार मिल सकता है। व्यक्तित्व का परिष्कार ही उपासना का लक्ष्य होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-December
उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग सें प्रतिपादन। मूल्य-7)50 सजिल्द।
उपासना क्रम ही पर्याप्त नहीं वरन जीवन साधना का वह उपक्रम भी जुटाया जाना चाहिए जो व्यक्तित्व को विकसित करने के साथ-साथ सिद्धियों का सुयोग भी प्रस्तुत करता है ।
उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रुप् से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि इन टैक्टारें का महत्व असाधरण है। प्रत्येंक टैक्ट का मू. 12) टै्रक्ओं के नाम इस प्रकार है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-February
उपासना का प्रतिफल आत्म विस्तार के रुप में ही उपलब्ध होता है संकीर्ण स्वार्थपरता के बन्धनों को तोड़ के फेंक देने और विराट् के साथ अपनी आत्मीयता जोड़ लेने का ही नाम मुक्ति है । र्स्वग के दो पक्ष हैं उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व । जिसके अन्तःकरण में इन दोनों की प्रतिष्ठापना हो गई, समझाना चाहिए उसने मनुष्य शरीर में रहते हुए ही ‘देवयोनि’ प्राप्त कर ली ।
उपासना, साधना में भावनाओं का महत्व प्रतिपादित करने, उन्हें विकसित करने पर जोर देने के पीछे यही मनोवैज्ञानिक आधार है कि परमात्मा द्वारा दिये गये भाव सूत्रों में ही मनुष्य को बाँधा जा सकता है ।
उपासना साधना द्वारा उसी प्रेरणा को हृदयंगम किया जाता है । आस्तिकता और धार्मिकता का समस्त कलेवर इसी प्रयोजन के निर्मित्त खड़ा किया गया है । ईश्वर की प्रसन्नता और अनुकम्पा का प्रत्यक्ष सम्बन्ध व्यक्ति के भाव संस्थान से है । उत्कृष्टता की भाव भूमिका में ही ईश्वर की दिव्य चेतना का अवतरण सम्भव हो सकता है । साधना उपक्रम का एकमात्र उद्देश्य अन्तः भूमिका का परिष्कार ही है ।
उपासना में प्रवृत्त रहने में ही जीवन की सार्थकता है । माया-बन्धन से मुक्ति का वही मार्ग है । दोनों ही प्रकार की शक्तियों की संचालक विष्णुसत्ता सूक्ष्म रुप में प्रत्येक प्राणी के हृदयाकाश में सच्चिदानन्द रुप में विद्यमान है । उस चेतन-तत्व का प्रकाश जीवन में अधिकाधिक संव्याप्त होता चले, यही प्रयास मनुष्य का पुरुषार्थ है, कर्त्तव्य है ।
उपासना प्रणाली भी अपना प्रभाव नहीं दिखा पाती । समस्त आध्यात्मिक उपचार इन्हीं दो का अवलम्बन पाकर सफल होते हैं । यही कारण है कि सभी धर्मशास्त्र इनकी महत्ता का प्रतिपादन करते हैं ।
उपासना में सहायता नहीं ली गई, तब पद्य का प्रस्फुटन सम्भव नहीं, तब तो बस कीचड़ ही कीचड़ होगा, जिसमें जोंक आदि पैदा होंगीं, कमल नहीं खिलेगा । व्यक्ति चेतना में विद्य और अविद्या के बीच निरन्त द्वन्द्व चलता रहता है । इसी चिन्मूलक द्वन्द्व का नाम माया है । ईशावास्य उपनिषद् में कहा है कि सत्य का मुख्य हिरणमय पात्र के ढंका हैः-
उपासना, स्वाध्याय और व्यक्तित्व को सुसंयत बनाने वाली संयम-साधना का उपक्रम ऐसा सुनियोजित रहेगा, जिसमें अव्यवस्था की असुरता को जीवन क्रम में प्रवेश पाने के लिये गुँजायश ही न रहे । अपने हाथ भोजन बनाने की सुविधा भी है और सामूहिक भोजनालय की व्यवस्था भी । दैनिक जीवन की अन्य आवश्यकतायें पूरी करने वाले सभी साधन गायत्री नगर में मौजूद हैं ।
उपासना का प्रयोजन आत्मा को परमात्मा के स्तर तक पहुँचाने वाली उत्कृष्ट प्रेरणा को अन्तःकरण के गहन-तप स्तर में प्रतिष्ठापित करना ही है । अन्यथा ईश्वर को किसी निन्दा-प्रशंसा से अथवा कर्मकाण्ड परक क्रिया-प्रक्रिया से क्यों कर प्रभावित कर सकना सम्भव हो सकता है ?
उपासना का तथ्य यदि न समझा जाय तो उस दिशा में किये गये प्रयत्न काल-क्षेपमात्र बनकर रह जायेंगे । हमें हजार बार जानना चाहिए और लाख बार समझना चाहिए कि अध्यात्म का एकमात्र अर्थ परिष्कृत दृष्टिकोण का अवलम्बन ही है ।उपासना का प्रयोजन आत्मा को परमात्मा के स्तर तक पहुँचाने वाली उत्कृष्ट प्रेरणा को अन्तःकरण के गहन-तप स्तर में प्रतिष्ठापित करना ही है । अन्यथा ईश्वर को किसी निन्दा-प्रशंसा से अथवा कर्मकाण्ड परक क्रिया-प्रक्रिया से क्यों कर प्रभावित कर सकना सम्भव हो सकता है ?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-August
उपासना की प्रक्रिया को जीवनक्रम में नित्य कर्म की तरह सम्मिलित करने की आवश्यकता पड़ेगी। प्राचीन काल के देवयुग में भी इस अवलम्बन को प्रमुखतः प्राप्त थी और अब उस परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए उपासना के लिए गम्भीर लोक-रुचि उत्पन्न करनी पडे़गी।
उपासना के लिए गम्भीर लोक-रुचि उत्पन्न करनी पडे़गी।
उपासना, साधना की भारतीय परम्परा रही है जो इसी तथ्य की पुष्टि करती है कि उस अवसर सूर्य एवं चन्द्रमा से निस्सृत होने वाले हानिकारक विकिरणों से सुरक्षा की जा सके। कब किस ग्रह की क्या स्थिति है? उनके आपसी गठबन्धन की स्थिति का पृथ्वी पर-मुनष्य जाति पर क्या प्रभाव पडे़गा इसे जानने के लिए आधुनिक वेधशाला का योगदान आवश्यक है। हर क्षण उनकी चाल में होने वाले परिवर्तनों का सही अध्ययन तभी किया जा सकता हैं।
उपासना का अभ्यास परस्पर मिलकर ऐसी प्रतिक्रिया उत्पन्न करते है जिससे अन्तराल में जमे कुसंस्कारों का निष्कासन और उत्कृष्टता का अभिवर्धन सम्भव हो सके। अस्तु नवयुग का बीजारोपण उपासना की प्रक्रिया को जीवनक्रम में नित्य कर्म की तरह सम्मिलित करने की आवश्यकता पड़ेगी। प्राचीन काल के देवयुग में भी इस अवलम्बन को प्रमुखतः प्राप्त थी और अब उस परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए उपासना के लिए गम्भीर लोक-रुचि उत्पन्न करनी पडे़गी।
उपासना परक अभ्यास किये जा सकते है यह आत्मोर्त्कष के, भाव-विज्ञान के अनुरुप अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रयोग हैं।
उपासना है। इसमें ईश्वर को व्यक्ति बनाने का नहीं, व्यक्ति को ईश्वर-अति मानव बनाने और अति मानस को प्रखर करने का प्रयोग है। सच्ची उपसना लघु को विभु, क्षुद्र को महान् बनाती एवं कामना को भावना में विकसित करती है। मनोकामना पूर्ति के लिए ईश्वर का मनुहार कना बाल-कक्षा के विद्यार्थियों तक ही सीमित रहता हैं आत्मिक प्रौढ़ता की स्थित आते ही ईश्वर का स्वरुप उत्कृष्ट आस्थाओं और आदर्शवादी भाव-सम्वेदनाओं का समुच्चय बन जाता है।
उपासना के आधार पर सम्भव हो सकता है। व्यक्ति निर्माण का आधार-भूत क्षेत्र यही है। यह प्रक्रिया ऐसी है जिसे उपेक्षित नहीं किया जा सकता। उसे प्रमुखता ही देना होगा। जन-जन को आस्तिक और उपासना प्रिय बनाने के प्रयत्नों में नवयुग की उज्जवल सम्भावनाएँ पूर्णतया समाविष्ट है, अस्तु युग शिल्पियों को अपने समस्त क्रिया-कलापों में इस केन्द्र बिन्दु को प्रदान मानकर चलना होगा।
उपासना की अनिवार्यता वाली बात भी पूरी होती रहे और धर्मतन्त्र से लोक शिक्षण का उपक्रम भी चलता रहे। व्यक्ति, परिवार एवं समाज निर्माण की व्यापक कार्य पद्धति को गाँव-गाँव, घर-घर, जन-जन तक पहुँचाने के लिए आवश्यक हो गया है कि इन छोटे देवालयों की स्थापना की जाय और उनकी लागत तथा विधि इतनी स्वल्प एवं सरल हो कि कहीं भी उन्हं बनाने में कठिनाई अनुभव न हों।
उपासना में मनुहार द्वारा उसकी कृपा प्राप्त कर लेने, जितना छोटा उद्देश्य सन्निहित नहीं है, वरन् तथ्य यह है कि ईश्वर को उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता का समुच्चय मानना होता है और उसे चिन्तन एवं चरित्र का अविच्छिन्न अंग बनाकर तादात्म्य स्थापित करना ही होता है।
उपासना प्रिय बनाने के प्रयत्नों में नवयुग की उज्जवल सम्भावनाएँ पूर्णतया समाविष्ट है, अस्तु युग शिल्पियों को अपने समस्त क्रिया-कलापों में इस केन्द्र बिन्दु को प्रदान मानकर चलना होगा। महाकाल वैसी ही प्रेरणा देने और व्यवस्था बनाने में संलग्न भी है।
उपासना उसे परिपक्व करने का प्रयोग अभ्यास। दोनों का परस्पर अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। दर्शन एक कल्पना है उसका परिणाम तभी निकलता है तब वह अभ्यास में उतरे। आस्तिकता में मात्र ईश्वर का आस्तित्व स्वीकार कर लेने और उपासना में मनुहार द्वारा उसकी कृपा प्राप्त कर लेने, जितना छोटा उद्देश्य सन्निहित नहीं है, वरन् तथ्य यह है कि ईश्वर को उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता का समुच्चय मानना होता है और उसे चिन्तन एवं चरित्र का अविच्छिन्न अंग बनाकर तादात्म्य स्थापित करना ही होता है।
उपासना की जाती है। परब्रहमातो नियामक सत्ता भी है, सृष्टि प्रवाह को सुव्यवस्थित रीति से चलाने के अतिरिक्त मानवी चेतना को वह उच्चस्तरीय चिन्तन और चरित्र अपनाने के लिए बाधित करती हैं इसी को अन्तः प्रेरणा या ईश्वर की वाणी कहते है। कर्मफल के दण्ड पुरस्कार की विधि व्यवस्था परब्रहमा के द्वारा संचालित होती है किनतु मानवी गरिमा विशुद्ध रुप से आस्तिकता के तत्वज्ञान से जुड़ी हुई है। आस्तिकता के अनेक स्वरुप है। उनमे से एक ईश्वर उपासना का अवलम्बन लेकर चेतना के दिव्य परतों को सुविकसित और सशक्त बनाना भी है।
उपासना का अवलम्बन लेकर चेतना के दिव्य परतों को सुविकसित और सशक्त बनाना भी है।
उपासना, साधन-सिद्धि का आधार श्रद्धा की ही आधारशिला पर खड़ा है। देवताओं का जन्म श्रद्धा से ही होता है, वे श्रद्धा से ही जन्मते, बढ़ते, परिपुष्ट होते और वरदान दे सकने में समर्थ सक्षम बनते है। उनका उदय एवं अस्त भी इसी श्रद्धा के अनन्त अन्तरिक्ष में होता रहता है। सच तो यह है क साधना का विशालकाय कलेवर इसलिए खड़ा किया गया है कि श्रद्धा-विश्वास की महाशक्ति का उपयोग आत्मिक प्रगति की उद्देश्य पूर्ति में किया जा सके क्योंकि श्रद्धा से ही व्यक्तित्व का निर्माण और निर्धारण होता है। उसी आधार पर अनेक क्रिया-कलापों का सूत्र संचालन होता तथा सफलता के उच्च स्तर पर पहुँच पाना सम्भव होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-September
उपासना घर में एकत्रित करीब नौ सौ व्यक्ति जिमजोंस के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन व्यक्तियों के कान में अपने गुरु की आवाज गूँजी-”अब वह समय आ गया है जिसके लिए मैं तुम लोगों को सदैव तैयार रहने के लिए कहता रहा हूँ। हम सबको आज ही मरना है, इसी वक्त।
उपासना कर रहा है, विद्या में रत दीख रहा होने पर वह अन्धकार में ही भटक रहा है। अनात्मतत्वों को आत्म-दर्शन का आधार मान बैठना अस्मिता मूलक अविद्या है, विद्या नहीं।
उपासना के तत्व ज्ञान को समझा जाय तो उसमें सार तत्व इतना ही है। आत्म परिष्कार का हर सम्भव उपाय अपनाया जाय। इस पुरुषार्थ में जो जितनी प्रगति करता है उस पर उपसाय का अनुग्रह उसी अनुपात से बरसता है। उपसाय का बाह्य कलेवर कुछ भी क्यों न हो उसकी आत्मा साधक की आत्मा में ही घुली रहती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-April
उपासना इस प्रयोजन को जिस सीमा तक पूरा कर रही होगी, उसके चमत्कार भी उसी अनुपात से उपलब्ध हो रहे होगे। इस लोक मान्यता को उपहासारुपद भ्रान्ति ही मानना चहिए कि मनुहार और उपहार के भूखे देवताओं की छुट-पुट, टन्ट-घन्ट से फुसलाया और उन्हें हर कामनामनाओं को पूरी करने के लिए मनाया जा सकता है।
उपासना गौ-दुग्ध की तरह परिपूर्ण आहार है। किसे, किस स्तर की-किस प्रकार गायत्री उपासना करनी चाहिए इस का निर्धारण व्यक्ति विशेष के स्तर का देख परख कर किया जायेगा। संजीवनी बूटी भी अनुगन भेद से दी जाती है। उसकी मात्रा तथा सेवन विधि में अन्तर रहता हे। सामान्य क्रम तो सभी के लिए एक है पर अगली सीढियों पर चढते ही आवश्यकतानुसार अन्तर होने लगता है।
उपासना पद्धति सामान्य भी होगी और विशिष्ट भी। आश्रम की सामान्य साधना पद्धति एक होते हुए भी हर साधक को अपने स्तर का विशिष्ट साधना क्रम अलग से बताया और कराया जायेगा। अल्पकाल में सामान्य दिनचर्या, नियम मर्यादा, विधि-व्यवस्था एक रहते हुए भी हर रोगी का उपचार एवं निर्धारण अलग-अलग रहता है। यही नीति उपासना के क्षेत्र में भी अपनानी पड़ती है। गायत्री नगर के सूक्ष्म दर्शी मार्ग दर्शक साधकों का आन्तरिक विश्लेषण करने पर यह पता लगाते है कि उसके लिए क्या उपचार सरल एवं उपयुक्त पड़ेगा।
उपासना करनी चाहिए इस का निर्धारण व्यक्ति विशेष के स्तर का देख परख कर किया जायेगा। संजीवनी बूटी भी अनुगन भेद से दी जाती है। उसकी मात्रा तथा सेवन विधि में अन्तर रहता हे। सामान्य क्रम तो सभी के लिए एक है पर अगली सीढियों पर चढते ही आवश्यकतानुसार अन्तर होने लगता है। प्राथमिक पाठशालाओं में सर्वत्र एक ही स्तर की पढाई होती है।
उपासना इसी प्रखरता को जागृत करने के लिए की जाती है। यदि वह तथ्य को समझते हुए की गई है और भजन-पूजन के साथ साथ ही अपनी दिशाधारा मोड़ने और रीति-नीति सुधारने का प्रयत्न भी जरी रखा गया है तो उसका प्रतिफल निश्चित रुप से होना चाहिए। ईश्वर के अतिरिक्त अनुदान सन्त, सुधारक एवं शहीद की गरिमा रुप में मिलते हैं। महामानव, ऋषि, देवतात्मा बनने के उपरान्त मनुष्य अन्ततः परमात्मा के पद तक जा पहुँचता है। यह आध्यात्मिक पदोन्नति जिस ईमानदारी एवं कर्त्तव्य परायणता के आधार पर सम्भव होती है उसे ही आत्मपरिष्कार एवं परमार्थ पुरुषथ्र के रुप में देखा जाता है।
उपासना के फलस्वरुप साधक को सिद्ध बन जाने की प्रक्रियाओं जाद जैसी अटपटी लगती है, पर उसके पीछे सारतत्व इतना ही है कि उपासना से अन्तराल में जन्मे कुसस्कारी कषाय-कल्मप कटते हैं। पुशु प्रवृतियों से जो जितना हलका होता है वह आत्मिक प्रगति के राजमार्ग पर उतनी ही तीव्रगति से चलता और उतनी ही निश्चिन्तता पूर्वक चरम लक्ष्य तक पहुँचता है। सन्तों और सिद्व पुरुषों में पाई जाने वाली प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विशेषताओं का आधार एक ही है उनके चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता। इस मूल तत्व की अवज्ञा करके किसी को भी उस प्रखरता का लाभा नहीं मिल सकता जिसके साथ अगणित निभूतियाँ, विशेषताएँ, एवं समर्थताएँ जुडी रहती हैं।
उपासना से ही सम्भव होता है। वस्तु साधना को प्राथमिक महत्व दिया और अनिवार्य माना या है। गायत्री उपासना गौ-दुग्ध की तरह परिपूर्ण आहार है। किसे, किस स्तर की-किस प्रकार गायत्री उपासना करनी चाहिए इस का निर्धारण व्यक्ति विशेष के स्तर का देख परख कर किया जायेगा। संजीवनी बूटी भी अनुगन भेद से दी जाती है।
उपासना के फलस्वरुप साधक को सिद्ध बन जाने की प्रक्रियायों जाद जैसी अटपटी लगती है, पर उसके पीछे नारतत्व इतना ही है कि उपासना से अन्तराल में जन्में कुसस्कारी कपाय-कल्मप कटते है। पशु प्रवृतियों से जो जितना हलका होता है वह आत्मिक प्रगति के राजमार्ग पर उतनी ही तीव्रगति से चलता और उतनी ही निश्चिन्तता पूर्वक चरत लक्ष्य तक पहुँचता है। सन्तों और सिद्ध पुरुषों में पाई जाने वाली प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विशेषताओं का आधार एक ही है उनके चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता। इस मूल तत्व की अवज्ञा करके किसी को भी उव प्रखरता का लाभ नहीं मिल सकता जिसके साथ अगणित विभूतियाँ, विशेषताएँ, एवं समर्थताएँ जुडी रहती हैं।
उपासना का विधि-विधान इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए विनिर्मित हुआ है।
उपासना से अन्तराल में जन्मे कुसस्कारी कषाय-कल्मप कटते हैं। पुशु प्रवृतियों से जो जितना हलका होता है वह आत्मिक प्रगति के राजमार्ग पर उतनी ही तीव्रगति से चलता और उतनी ही निश्चिन्तता पूर्वक चरम लक्ष्य तक पहुँचता है। सन्तों और सिद्व पुरुषों में पाई जाने वाली प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विशेषताओं का आधार एक ही है उनके चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता। इस मूल तत्व की अवज्ञा करके किसी को भी उस प्रखरता का लाभा नहीं मिल सकता जिसके साथ अगणित निभूतियाँ, विशेषताएँ, एवं समर्थताएँ जुडी रहती हैं।
उपासना पूजा पद्धति को कहते है और साधना जीवन चर्या को। जीवन चर्या अर्थात् चिन्तन और क्रिया कलाप की सुनियोजित दिशा धारा। आमतौर से लोग अनढंग, उच्छ खल, अव्यवस्थित और अस्तव्यस्त जीवन जीते है। बन्दरों की तरह मचकते और कुत्तों की तरह भटकते हुए मन योग और श्रम समय की बर्बादी होती रहती है। कुसंस्कार मनुष्य को जहाँ तहाँ घसटते फिरते है।
उपासना, तपश्चर्या, योगासाधना आदि के नाम से जानी जाने वाली क्रिया-प्रक्रियाओं का उद्वेश्य एक ही है-साध्क के अन्तरंग और वहिरंग की उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालना। जो उपासना इस प्रयोजन को जिस सीमा तक पूरा कर रही होगी, उसके चमत्कार भी उसी अनुपात से उपलब्ध हो रहे होगे। इस लोक मान्यता को उपहासारुपद भ्रान्ति ही मानना चहिए कि मनुहार और उपहार के भूखे देवताओं की छुट-पुट, टन्ट-घन्ट से फुसलाया और उन्हें हर कामनामनाओं को पूरी करने के लिए मनाया जा सकता है।
उपासना और साधना के अन्तर को और भी स्पष्ट करने की आवश्यकता है। उपासना पूजा पद्धति को कहते है और साधना जीवन चर्या को। जीवन चर्या अर्थात् चिन्तन और क्रिया कलाप की सुनियोजित दिशा धारा। आमतौर से लोग अनढंग, उच्छ खल, अव्यवस्थित और अस्तव्यस्त जीवन जीते है। बन्दरों की तरह मचकते और कुत्तों की तरह भटकते हुए मन योग और श्रम समय की बर्बादी होती रहती है।
उपासना से अन्तराल में जन्में कुसस्कारी कपाय-कल्मप कटते है। पशु प्रवृतियों से जो जितना हलका होता है वह आत्मिक प्रगति के राजमार्ग पर उतनी ही तीव्रगति से चलता और उतनी ही निश्चिन्तता पूर्वक चरत लक्ष्य तक पहुँचता है। सन्तों और सिद्ध पुरुषों में पाई जाने वाली प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विशेषताओं का आधार एक ही है उनके चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता। इस मूल तत्व की अवज्ञा करके किसी को भी उव प्रखरता का लाभ नहीं मिल सकता जिसके साथ अगणित विभूतियाँ, विशेषताएँ, एवं समर्थताएँ जुडी रहती हैं।
उपासना के क्षेत्र में भी अपनानी पड़ती है। गायत्री नगर के सूक्ष्म दर्शी मार्ग दर्शक साधकों का आन्तरिक विश्लेषण करने पर यह पता लगाते है कि उसके लिए क्या उपचार सरल एवं उपयुक्त पड़ेगा। कहते है कि सही निदान हो जाने से चिकित्सा का उद्देश्य पूरा हो जाता है। अन्यथा सभी साधकों को एक लाठी से हाँका जाता है। सभी धान वाईस पंसेरी के भाव तोले जाते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-May
उपासना की आवश्यक जानिकारी देने वाली 20 पैसे वाली पुस्तिका अधिक संख्या में गायत्री तपोभूमि से मँगालें और उसे पढ़ाने सुनाने का प्रयत्न करें। इस प्रयत्न से नैष्ठिक उपासकों की संख्या बढ़ने में प्रयत्न की तुलना में सफलता ही अधिक मिलेगी। अनतरिक्ष में प्रवाहित युगान्तरीय चेतना इस सफलता में विशेष रुप से सहायक सिद्ध होगी। साथ ही छोटे प्रज्ञामन्दों की स्थापना केलिये भी श्रद्धालुओं के संयुक्त प्रयास को प्रोत्साहित किया जाये, तो हर क्षेत्र में इन्हीं में इन्ही दिनों अनेकों प्रज्ञामन्दिर बन सकेंगे और उनका अनुकरण अन्य गाँवों में भी चल पडे़गा। सभी जागृत आत्माओं से गायत्री जयन्ती तक की अवधि इस प्रयोजन के लिय समयदान करने के लिए इन पक्तियों द्वारा विशेष अनुरोध किया जा रहा हैं।
उपासना से बड़ी सहायता मिलती है।
उपासना भी करते थे ओर साधना भी। दोनो की सचाई और गहराई उनके प्रखर जीवनदर्शन में प्रकट परिलक्षित होती थी, वे निर्वाह भी करते थे, कुटुम्ब भी सम्भालते थे साथ ही परमार्थ प्रयोजनों के लिए इतना कुछ करते थे, जिसके सहारे उन का व्यक्तित्व देवोपम स्तर की भूमिकाएँ निभाने में सफल रह सके।
उपासना का तत्व दर्शन जीवन साधना की आस्था एवं प्रेरणा उभारने के निमित विनमित हुआ है। भगवान खुशामद और रिश्वत की पकड़ से बहुत ऊँचा है। उपासना तो उत्कृष्टता के रुप में विघमान अन्तःचेतना की जाती है। भ्रमग्रसित एक जंजाल से निकल कर दूसरे में फँसते है। आत्मकल्याण के निमित जीवन साधना करन की आवश्यकता वे भी नहीं समझते और जिस तिस मंत्र-तंत्र का सहारा लेकर आत्माकल्याण और ईश्वरीय अनुग्रह का दिवा स्वप्न देखते है।
उपासना का बीजारोपण जीवन साधना की उर्वरभूमि पर ही उगता और फेलता है। इस तथ्य को जिनने भी जाना है उनने लिप्साओं पर अंकुश लगाया आर परमार्थ पथ पर चल पड़ने का साहस दिखाया है। कल्पना-जल्पना करते रहने में तो आत्म प्रवंचना ही बन पड़ती है। मन मोदक खाते रहने से पेट भरता है ?
उपासना तो मात्र सुरुचि उत्पन्न करने भर का थोड़ा-सा प्रयोजन पूरा करती है अस्तु जिसे आत्म-शक्ति का बिन्दु संचय युग शक्ति बनने जा रहा है, उसको प्रचुर परिणाम में उत्पन्न करने के लिए प्रस्तुत युग पुरश्चरण का अभूत पूर्व आयोजन किया गया है और इसके लिये एक लाख नैष्ठिक साधक नया संकल्प देकर इन्हीं दिनों बनाये जा रहे है। यह देखने में छोटा किन्तु परिणाम में अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य है। इसे सम्पन्न करने में सहायता करने की अपेक्षा सभी जागृत आत्माओं से की गई है।
उपासना में मनुष्य का लोक-परलोक बनता है।
उपासना तो उत्कृष्टता के रुप में विघमान अन्तःचेतना की जाती है। भ्रमग्रसित एक जंजाल से निकल कर दूसरे में फँसते है। आत्मकल्याण के निमित जीवन साधना करन की आवश्यकता वे भी नहीं समझते और जिस तिस मंत्र-तंत्र का सहारा लेकर आत्माकल्याण और ईश्वरीय अनुग्रह का दिवा स्वप्न देखते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-March
उपासना, योग-साधना, धर्मानुष्ठान, कथा कीर्तन, स्वाध्याय, सत्संग, दान, पुण्य आदि का जो जितना कुछ भी धर्म कलेवर खड़ा है; इस सबके पीछे एक ही उद्देश्य है मनुष्य व्यक्तिवादी पशु प्रवृत्तियों से छुटकारा पाये और समाजनिष्ठा के परमार्थ मार्ग को अपनाकर उदार एवं लोकसेवी प्रक्रिया अपनाये। इस मूल प्रयोजन की ओर मनुष्य को अग्रगामी बनाने के लिए अनेक कथा पुराण बनाये गये-धर्म शास्त्र रचे गये, साधन विधान बनाये गये-स्वर्ग-नरक के भय प्रलोभन प्रस्तुत किये गये। अदृश्य जगत के, लोक-लोकान्तरों के, देव-दानवों के प्रतिपादन किये गये। मत-मतान्तरों के बीच इन प्रतिपादनों में भारी अन्तर पाया जाता है पर मूल प्रयोजन सबका एक है-मनुष्य की पशु प्रवृत्ति को व्यक्तिवादी स्वार्थपरता को समाजनिष्ठ परमार्थ को धर्म धारणा में विकसित करना।
उपासनात्मक प्रयोजन के लिए शिव और शक्ति भी कहा जाता है। इन दोनों का समन्वय जिस सूत्र द्वारा होता है उसे ही कुण्डलिनी समझना चाहिए।
उपासना है और तुम्हारी पूजा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-December
उपासना और साधना का सहारा लेकर मनुष्य चाहे तो इतना ऊँचा उठ सकता है जहाँ पहुँचने पर उसे सिद्ध पुरुष एवं देवात्मा कहा जा सके।
उपासना रत हो किन्तु उसके क्रिया-कलाप में स्वार्थपरता, संकीर्णता और दुष्टता भरी पड़ी हो। इसलिए चिन्तन को अपर्याप्त एकाँगी मानना होगा तथा ज्ञान और कर्म के समन्वय सन्तुलन पर जोर देना पड़ेगा।
उपासना के अतिरिक्त और चाह ही क्या होती है? गुजारे के लिये बीस रुपये बाँधे गये जो पर्याप्त थे।
उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मूल्य 40 पैसा- 15 पुस्तकों के सैट का मूल्य 6 रु. ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं-
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज-मन्त्रों का साधन-विधान, आत्म साक्षात्कार एवं ऋद्धि सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन । मूल्य 3 रु. 50
उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता। 5. जीवन लक्ष्य और उसकी प्राप्ति। 6. जीवन लक्ष्य भुला न दिया जाय। 7. आन्तरिक सुख ही वास्तविक सुख। 8. ज्ञान योग की साधना।
उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन । मूल्य 3 रु. 50
उपासनायें तथा कर्मकाँडात्मक प्रक्रियायें सम्पन्न होती हैं। इसमें शब्द विन्यास की ही प्रधानता है। अर्थ की दृष्टि से, उस शब्दावली को सामान्य अथवा स्वल्प सार भी कह सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-May
उपासना इस मन कल्पवृक्ष को सुविकसित बनाने की वैज्ञानिक विधि व्यवस्था का ही नाम है।
उपासना और साधनात्मक गति विधियाँ अपनाने का प्रभाव परिणाम भी इन्हीं सत्प्रवृत्तियों का विकास होना चाहिए अन्यथा वह जप भजन भी एक चिह्न पूजा बनकर रह जायगा और उससे कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा।
उपासना का अपना महत्व है। जप आवश्यक है। आसन, प्राणायाम क्रिया प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि की छह मंजिली इमारत बनानी ही चाहिए पर उससे पहले यम नियम का ईंट, चूना नींव में गहराई तक भर के नींव पक्की कर लेनी चाहिए। मंत्र-विद्या का महात्म्य बहुत है। योग साधना की गरिमा गगनचुम्बी है।
उपासना क्रम को भी छोड़ बैठना उचित नहीं समझा गया। हाँ मल मूत्र का त्याग-हाथ, पैर, मुख आदि की शुद्धि और शुद्ध वस्त्र धारण जैसी व्यवस्था तो बना ही लेनी चाहिए।
उपासना क्रम ठीक से चलने जमने लगे। एक दम उछल कर चक्र वेधन, कुण्डलिनी जागरण, समाधि, ईश्वर दर्शन जैसे प्रसंगों के लिए लालायित होना मञ्जिल पार करने का राजमार्ग है। यदि ऐसा न होता तो स्वयं गुरु देव को क्यों पैंतालीस वर्ष पापड़ बेलने पड़ते और अब इस वृद्धावस्था में भी क्यों अपने को इस तरह धुनते। कोई जादू ही तुर्त-फुर्त चमत्कार दिखा सकता है, पर यह ध्यान रखना चाहिए कि वह जल्दबाजी का जादू अस्थिर होता है। बाजीगर दस मिनट में झोली में से गुठली से आम का पौधा और उस पौधे पर फल लगा देता है पर वह छलावा भर होता है यदि वह बात वास्तविक होती तो बाजीगर पैसे-पैसे को हाथ न फैलाता-अब तक आमों का विशाल व्यापार करके लखपति करोड़पति बन गया होता।
उपासना को नित्य कर्म में सम्मिलित करने की आवश्यकता इसीलिए पड़ती है कि आन्तरिक स्वच्छता का क्रम बिना व्यवधान के निर्बाध गति से चलता रहे। नित्य का अभ्यास ही किसी महत्व पूर्ण विषय में स्थिरता और प्रखरता बनाये रह सकता है। यदि पहलवान लोग नित्य का व्यायाम छोड़ दें, फौजी सैनिक परेड की उपेक्षा कर दें तो फिर उनकी प्रवीणता कुछ ही दिन में अस्त-व्यस्त हो जायगी। स्कूली पढ़ाई छोड़ने के बाद जिन्हें फिर कभी पुस्तकें उलटने का अवसर नहीं मिलता वे उस समय के सारे प्रशिक्षण को भूल जाते हैं। याद केवल उतना ही अंश रहता है जितना काम में आता रहता है।
उपासना की पूर्व भूमिका जीवन साधना से आरम्भ होती है। तपश्चर्या का प्रयोजन मनोभूमि पर छाये हुए कुसंस्कारों का निराकरण है। एक बार समझ लेना चाहिए कि साधना ‘सर्फ’ पाउडर है और उपासना ‘टिनोपाल’ कपड़े को जर्क-वर्क धुला हुआ बनाना हो तो दोनों का उपयोग करना चाहिए। कपड़े को ‘सर्फ’ में धोकर मल रहित करना चाहिए और तदनन्तर ‘टिनापोल’ की नीली झलक देनी चाहिए। यह भूल नहीं करनी चाहिए कि धोने में बहुत झंझट समझ कर उसे उपेक्षित विस्मृत कर दिया जाय और मात्र टिनोपाल के छींटे लगाकर चमचमाते वस्त्र पहनने की आशा रखी जाय।
उपासना पद्धति गुरु देव के प्रत्येक परिचित और संपर्क में रहने वाले को आरम्भ कर देनी चाहिए। इस प्रकार जोती हुई भूमि में उनके लिए उन विभूति वृक्षों का आरोपण सम्भव होगा जिनकी कि इन दिनों वे पौध तैयार कर रहे हैं।
उपासना को उसकी सुसज्जा। बाल्यकाल पूरा करने के बाद ही यौवन आता है और साधना की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण होने से ही उपासना की द्वितीय कक्षा में प्रवेश मिलता है।
उपासना को व्यावहारिक रूप देने के लिए बनाई जाती है। इसी प्रकार जल, दीप, नैवेद्य, पुष्प, चन्दन के पंच विधि पूजा उपकरण प्रयुक्त किये जाते हैं। इस देवार्पण के पीछे जीवन साधना की ओर इंगित करने वाला गहन तत्वज्ञान सन्निहित है। उसे यदि न समझा जाए और मात्र उपासनात्मक कर्मकाण्डों को ही सब कुछ मान लिया जाए तो यही कहना पड़ेगा कि यथार्थता को भुला कर विडम्बना की उलझन में पैर फंसा दिया गया।
उपासना में नियमितता बनाये रखने या आरम्भ करने के लिए कहा जाय। जो कर रहें हैं उनसे कहा जाय कि भले ही वे अपनी पूजा विधि के बाहरी स्वरूप को अपनी रुचि और परम्परा के अनुसार बनाये रहें पर उसमें भावना का प्राण अवश्य जोड़ें। अनेक मत मतान्तरों की पूजा प्रक्रिया भिन्न हो सकती है। पर उनके भीतर भावनात्मक तथ्य तो समुचित मात्रा में रहना ही चाहिए। जब तक गायत्री परिवार के संगठन का- गायत्री के महामंत्र के प्रचार विस्तार का उत्तरदायित्व का कार्य उनके कंधों पर था तब तक वे केवल गायत्री मन्त्र की महिमा और विधि ही बताया करते थे पर अब जबकि विश्वव्यापी भावनात्मक नव निर्माण का उच्च स्तरीय कार्य उन्हें सौंपा गया है तो उन्होंने विभिन्न रुचियों और मान्यताओं के अनुरूप चली आ रही परम्पराओं के समन्वय में कुछ कहना बन्द कर दिया है।
उपासना में लगाना ही चाहिए। इससे अधिक जिससे जितना बन पड़े-कर सकते हैं। दिन में कई बार किया जा सकता है। ध्यान की यह प्रक्रिया तो ऐसी है कि मानसिक जप की तरह उसे कभी भी सुविधा और अवकाश के समय किया जा सकता है।
उपासना को अपने जीवन क्रम में एक नियमित नित्य कर्म को स्थान अवश्य दें। इस बार भी जब वे आये तो यह कहना न भूले कि सम्बद्ध परिजनों को उपासना क्रम में व्यवधान उत्पन्न न होने देने के लिए सचेत करते रहा जाय। जिनने अभी तक यथाक्रम उसे अपनाया नहीं है उनसे उस ओर कदम बढ़ाने के लिये अनुरोध किया जाय। हर विचारशील को समझाया जाय कि यह समय की बर्बादी नहीं वरन् उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग की महत्व पूर्ण प्रक्रिया है।
उपासना क्रम के अभ्यासियों को उच्चस्तरीय अनुदान भी साधना क्षेत्र में मिल सकते हैं। सम्भव है अगले दिनों उन्हें अपने तप अंश का कुछ प्रत्यावर्तन जीवन्त आत्माओं में करना पड़े इस बीज बोने का ठीक परिणाम निकले। इसके लिये यह आवश्यक है भूमि जोतने और उसमें नमी रखने का प्रयास पहले से ही चलता रहा हो। जो भूमि न जोती गई है-न जिसमें खाद पानी की मात्रा है उसमें बहुमूल्य बीज या पौधे का आरोपण भी निरर्थक चला जायगा। इसलिए आवश्यक है कि इस दिशा में प्रगति की सच्चे मन से आकाँक्षा करने वाले अपने नित्य कर्म में उपासना की प्रक्रिया को सम्मिलित कर लें।
उपासना सराहनीय है पर उसका जितना प्रतिफल हो सकता था उससे सहस्रों गुना अनुदान प्रत्यावर्तन के रूप में मिला है यह भी सर्वथा सत्य है।
उपासना मात्र कर्म काण्ड होकर न रह जाय उसमें भावना के समन्वय की प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहे।
उपासना को रंगाई कह सकते हैं और साधना को धुलाई। दोनों अन्योन्याश्रित हैं। इनमें प्रधान और गौण का वर्गीकरण करना हो तो साधना को प्रधान और उपासना को गौण मानना पड़ेगा। धुला वस्त्र बिना रंगे भी अपनी गरिमा बनाये रह सकता है पर मैला वस्त्र रंग को बर्बाद करेगा और रंगरेज को बदनाम। स्वयं तो उपहासास्पद बना ही रहेगा।
उपासना को सर्वोच्च स्थान दिया। वे कहते थे पुरुषार्थ की प्रखरता में उपासना अत्यधिक सहायक होती है, उसे समय नष्ट करने वाली बाधा नहीं माना जाना चाहिए। पर लौकिक पुरुषार्थ में अधिक उत्कृष्टता लाने के लिये अपने समय का एक अंश उपासना में नियमित रूप से लगाना चाहिए। धुले कपड़े पर टिनोपाल लगा देने से-लोहा करने से और भी सुन्दरता आ जाती है। निर्मल और उज्ज्वल जीवन क्रम रहते हुए भी यदि उपासना का अवलम्बन ग्रहण किया जायगा तो उसमें लगे हुए समय की कहीं अधिक सुन्दर सुव्यवस्था जीवन क्रम में विकसित होगी।
उपासना भर से किसी बड़ी आत्मिक सफलता की आशा नहीं की जा सकती।
उपासना एवं जीवन साधना का श्रेष्ठ किन्तु सरल रूप क्या हो सकता है इसकी चर्चा पिछले पृष्ठों पर हो चुकी है। उस दिशा में एक-एक कदम हर किसी को उठाना चाहिये और ‘इन दोनों गति विधियों को अपने जीवन क्रम में अविच्छिन्न रूप से सम्मिलित कर लेना चाहिए।
उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मूल्य 40 पैसा—15 पुस्तकों के सैट का मूल्य 6) रु.। ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं—
उपासना का अवलम्बन लेना चाहिये। मन असीम क्षमताओं का भंडार है वह यदि मलीनताओं से भर जाय तो हमें अपार क्षति उठानी पड़ेगी। दाँत साफ न किये जायें तो उनमें कीड़ा लग जायगा और मुँह से बदबू आयेगी। शरीर को स्नान न करायें तो चमड़ी पर जमा हुआ मैल अनेक बीमारियाँ पैदा करेगा। मशीनों की सफाई न की जाय तो पुर्जों में जमा हुआ कीचड़ उनका ठीक तरह से काम करना ही असम्भव कर देगा।
उपासना अत्यधिक सहायक होती है, उसे समय नष्ट करने वाली बाधा नहीं माना जाना चाहिए। पर लौकिक पुरुषार्थ में अधिक उत्कृष्टता लाने के लिये अपने समय का एक अंश उपासना में नियमित रूप से लगाना चाहिए। धुले कपड़े पर टिनोपाल लगा देने से-लोहा करने से और भी सुन्दरता आ जाती है। निर्मल और उज्ज्वल जीवन क्रम रहते हुए भी यदि उपासना का अवलम्बन ग्रहण किया जायगा तो उसमें लगे हुए समय की कहीं अधिक सुन्दर सुव्यवस्था जीवन क्रम में विकसित होगी। शर्त यही है कि उपासना मात्र कर्म काण्ड होकर न रह जाय उसमें भावना के समन्वय की प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहे।
उपासना का आहार बार-बार नित्य ही- दिया जाना आवश्यक है।
उपासना क्रम में व्यवधान उत्पन्न न होने देने के लिए सचेत करते रहा जाय। जिनने अभी तक यथाक्रम उसे अपनाया नहीं है उनसे उस ओर कदम बढ़ाने के लिये अनुरोध किया जाय। हर विचारशील को समझाया जाय कि यह समय की बर्बादी नहीं वरन् उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग की महत्व पूर्ण प्रक्रिया है।
उपासना का दूसरा चरण कैसे उठेगा। जब पहली मंजिल ही बन कर तैयार नहीं हुई तो भवन की दूसरी मंजिल बनाने की योजना कैसे पूर्ण होगी।
उपासना की क्या जरूरत। लुहार, बढ़ई, मूर्तिकार आदि शिल्पी अपने योजन में लगे रहते हुए भी यह आवश्यक समझते हैं कि उनके औजारों पर जल्दी-जल्दी धार धरी जाती रहे। नाई अपने काम में ठीक तरह लगा रहता है पर उस्तरा तो उसे बार-बार तेज करना पड़ता है। मन ही वह औजार है जिससे क्रिया कलापों को ठीक तरह करते रह सकना सम्भव होता है। यदि यह भोथरा होने लगे तो फिर कर्तृत्व का स्तर भी गिरने लगेगा इसलिए जहाँ अन्य अन्य अनेक कार्यों में समय लगाया जाता है वहाँ मन की मलीनता को स्वच्छ करने और उसे प्रखर बनाने के प्रयास को भी नित्य का एक आवश्यक कर्तव्य माना जाना चाहिए।
उपासना सफल होती है। निराकार निर्विकार परमेश्वर की साकार प्रतिमा उपासना को व्यावहारिक रूप देने के लिए बनाई जाती है। इसी प्रकार जल, दीप, नैवेद्य, पुष्प, चन्दन के पंच विधि पूजा उपकरण प्रयुक्त किये जाते हैं। इस देवार्पण के पीछे जीवन साधना की ओर इंगित करने वाला गहन तत्वज्ञान सन्निहित है। उसे यदि न समझा जाए और मात्र उपासनात्मक कर्मकाण्डों को ही सब कुछ मान लिया जाए तो यही कहना पड़ेगा कि यथार्थता को भुला कर विडम्बना की उलझन में पैर फंसा दिया गया।
उपासना का प्रयोजन मनुष्य को ईश्वर- विश्वासी अर्थात् धर्म मर्यादाओं का पालन करने के लिए व्रत-बन्ध धारण किये रहने वाला है। यदि पूजा पाप-दंड से मुक्ति दिलाती है तो फिर यही कहना पड़ेगा कि वह नैतिक, मानवीय धार्मिक और आत्मिक मूलभूत आधारों को ही नष्ट करेगी। ऐसी दशा में यह पूजा वस्तुतः नास्तिकता से भी महंगी पड़ेगी, पिछले दिनों यही हुआ है यही बताया सिखाया गया है। कथा-वार्ताओं में हम यही सुनने पढ़ते हैं, गुरु लोगों के पास यही सबसे बड़ा आकर्षण अपने मंत्र के पक्ष में है। भोले लोग सस्ते मोल में परमदंड की बहुत बड़ी विपत्ति से बचने के लिए फंसते हैं और दुहरी हानि भुगतते हैं।
उपासना की प्रक्रिया को सम्मिलित कर लें।
उपासना मनःक्षेत्र को सुरभित उद्यान की तरह फल फूलों से सदा लदा हुआ बनाने के कुशल पुरुषार्थ की तरह ही समझी जानी चाहिए। वस्तुतः मनोकामनायें पूर्ण करने का यह विवेक संगत एवं यथार्थ मार्ग है मन देवताओं का भी देवता है। यदि उसे साध सँभाल लिया जाय तो वह कल्पवृक्ष से कम नहीं अधिक ही उपयोगी एवं वरदानी सिद्ध होता है। उपासना इस मन कल्पवृक्ष को सुविकसित बनाने की वैज्ञानिक विधि व्यवस्था का ही नाम है।
उपासना से पाप नष्ट होने का वास्तविक अर्थ यह है कि ऐसा व्यक्ति जीवन साधना के प्रथम चरण का परिपालन करते हुए दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम समझेगा और उनसे सतर्कता पूर्वक विरत हो जायेगा, पाप नष्ट होने का अर्थ है पाप-कर्म करने की प्रवृत्ति का नाश, पर उल्टा अर्थ कर दिया गया पाप-कर्मों के प्रतिफल का नाश। कदाचित ऐसी उलटबांसी सही होती तो फिर इस संसार में पाप को ही पुण्य और कर्तव्य माना जाने लगता। फिर कोई भी पाप से न डरता। राजदण्ड से बचने की हजार तरकीबें हैं। उन्हें अपना कर अनाचारी लोग सहज ही निर्द्वन्द्व निश्चिन्त रह सकते हैं दैव दण्ड ही एक मात्र बंधन था सो इन धर्मध्वजियों ने उड़ा दिया।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों को ही सब कुछ मान लिया जाए तो यही कहना पड़ेगा कि यथार्थता को भुला कर विडम्बना की उलझन में पैर फंसा दिया गया।
उपासना पद्धति को विभाजित कर लेना चाहिए।
उपासना कारतूस है और जीवन साधना बन्दूक। अच्छी बन्दूक होने पर ही कारतूस का चमत्कार देखा जा सकता है। बन्दूक रहित अकेला कारतूस तो थोड़ी आवाज करके फट ही सकता है उससे सिंह व्याघ्र का शिकार नहीं किया जा सकता। अनैतिक गतिविधियाँ और अवाँछनीय विचारणायें यदि भरी रहें तो कोई साधक आत्मिक प्रगति का वास्तविक और चिरस्थायी लाभ न ले सकेगा। किसी प्रकार कुछ मिल भी जाय तो उससे जादूगरी जैसा चमत्कार दिखा कर थोड़े दिन यश लिप्सा पूरी की जा सकती है।
उपासना को अपने नित्य क्रम में सम्मिलित करना ही चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि हम ईश्वरीय आदेशों का पालन करते हैं फिर उपासना की क्या जरूरत। लुहार, बढ़ई, मूर्तिकार आदि शिल्पी अपने योजन में लगे रहते हुए भी यह आवश्यक समझते हैं कि उनके औजारों पर जल्दी-जल्दी धार धरी जाती रहे। नाई अपने काम में ठीक तरह लगा रहता है पर उस्तरा तो उसे बार-बार तेज करना पड़ता है। मन ही वह औजार है जिससे क्रिया कलापों को ठीक तरह करते रह सकना सम्भव होता है।
उपासना कर सकते हैं। गुरु देव को भी कभी-कभी जब बर्फीले तूफान आते हैं तब स्नान की सुविधा न होने से उसका व्यतिक्रम करना पड़ा पर इससे उपासना क्रम को भी छोड़ बैठना उचित नहीं समझा गया। हाँ मल मूत्र का त्याग-हाथ, पैर, मुख आदि की शुद्धि और शुद्ध वस्त्र धारण जैसी व्यवस्था तो बना ही लेनी चाहिए।
उपासना ‘टिनोपाल’ कपड़े को जर्क-वर्क धुला हुआ बनाना हो तो दोनों का उपयोग करना चाहिए। कपड़े को ‘सर्फ’ में धोकर मल रहित करना चाहिए और तदनन्तर ‘टिनापोल’ की नीली झलक देनी चाहिए। यह भूल नहीं करनी चाहिए कि धोने में बहुत झंझट समझ कर उसे उपेक्षित विस्मृत कर दिया जाय और मात्र टिनोपाल के छींटे लगाकर चमचमाते वस्त्र पहनने की आशा रखी जाय।
उपासनायें चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करती हैं। ऋद्धि-सिद्धियों की चर्चा काल्पनिक नहीं है, पर वह सारा आकर्षक विवरण, कथा सार आकाश कुसुम ही बना रहेगा जब तक साधना की पृष्ठ-भूमि को अनिवार्य मान कर न चला जाएगा।
उपासना में कर्म काण्ड परक स्वेच्छा की भिन्नता रह सकती है पर उसके भाव पक्ष में एक रूपता रखनी ही होगी। अस्तु हमें उसी दृष्टिकोण को अपनाकर चलना चाहिए।
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज-मन्त्रों का साधन-विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ, आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू0 3)50
उपासना करते हैं पर उनमें से कोई सफल होता है कोई असफल। किसी को तुरन्त परिणाम दिखाई पड़ता है किसी को मुद्दतें बीत जाने पर भी कोई सफलता दृष्टि-गोचर नहीं होती। इसका क्या कारण है? यह मैंने गुरुदेव से और भी स्पष्ट रूप से पूछा। कारण कि इन दिनों मुझे ही डाक का उत्तर देना पड़ता है और उनमें ऐसे पत्र भी कम नहीं होते जो बताये हुए विधान से उपासना करते हुए बहुत दिन हो जाने पर भी कुछ परिणाम न मिलने से असन्तुष्ट है।
उपासनात्मक उपार्जन गँवा बैठता है और उसे छूँछ बनकर खाली हाथ रहना पड़ता है।
उपासना विधियाँ, आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू0 3)50
उपासना का यही प्रयोजन है।
उपासना करते हुए बहुत दिन हो जाने पर भी कुछ परिणाम न मिलने से असन्तुष्ट है। इस कठिनाई का उत्तर गुरुदेव के मुख से जो निकला उसका साराँश नीचे की पंक्तियों में प्रस्तुत किया जाता है।
उपासना में नियमित रूप से लगाना चाहिए। धुले कपड़े पर टिनोपाल लगा देने से-लोहा करने से और भी सुन्दरता आ जाती है। निर्मल और उज्ज्वल जीवन क्रम रहते हुए भी यदि उपासना का अवलम्बन ग्रहण किया जायगा तो उसमें लगे हुए समय की कहीं अधिक सुन्दर सुव्यवस्था जीवन क्रम में विकसित होगी। शर्त यही है कि उपासना मात्र कर्म काण्ड होकर न रह जाय उसमें भावना के समन्वय की प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहे।
उपासना का अवलम्बन ग्रहण किया जायगा तो उसमें लगे हुए समय की कहीं अधिक सुन्दर सुव्यवस्था जीवन क्रम में विकसित होगी। शर्त यही है कि उपासना मात्र कर्म काण्ड होकर न रह जाय उसमें भावना के समन्वय की प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहे।
उपासना की द्वितीय कक्षा में प्रवेश मिलता है।
उपासना तपश्चर्या एवं आवश्यकता समझते हुए इसी में सर्वतोभावेन संलग्न होंगी। साथ ही सामान्य स्तर के व्यक्तियों में इतना विवेक तो अनायास ही जागृत होगा कि वे अन्धकार और प्रकाश का अन्तर समझ सकें। अनुचित के लिए दुराग्रह छोड़ कर न्याय और विवेक के आधार पर प्रतिपादित उचित को स्वीकार कर सकें। इस प्रकार उभय पक्षीय सुयोग संयोग उस प्रयोजन को अग्रगामी बनाता चला जायेगा जो युग परिवर्तन का मूल भूत आधार है।
उपासना को गौण मानना पड़ेगा। धुला वस्त्र बिना रंगे भी अपनी गरिमा बनाये रह सकता है पर मैला वस्त्र रंग को बर्बाद करेगा और रंगरेज को बदनाम। स्वयं तो उपहासास्पद बना ही रहेगा। मैले कपड़े पर रंग चढ़ाने की सूझ-बूझ भी भोंड़ी ही मानी जायेगी इस प्रकार का किया हुआ श्रम भी सार्थक न रहेगा।
उपासना की सफलता का एक मात्र कारण है आत्मिक प्रगति की पहली मंजिल ‘साधना’ की उपेक्षा। गुण-कर्म स्वभाव का परिष्कार साधना का मूलभूत उद्देश्य है। उसका स्वरूप है आत्म-बोध, आत्म-चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण, आत्म-विकास। यही आत्म देव का सच्चा पंचोपचार पूजन है। जो उसे कर सकता है उसी की पूजा उपासना सफल होती है।
उपासना को कामना पूर्ति का माध्यम समझा गया और आवश्यक कर्म निष्ठा से मुँह मोड़ लिया गया। इस गलत आधार को मान्यता मिल जाने से आस्तिकता का उपकार नहीं हुआ वरन् उसे असत्य और संदिग्ध मानने की अनास्था ही बढ़ी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-November
उपासना का- भक्ति का- क,ख,ग,घ भी अभी यहाँ आरम्भ नहीं हुआ। ढेरों पूजा पाठ करने वाला व्यक्ति भी अभक्त और आत्मिक प्रकाश-प्रेम से रहित हो सकता है। ऐसे ही तथाकथित भक्त, नामधारी आज सर्वत्र बिखरे पड़े हैं और अपनी भाव शून्यता के कारण भक्ति के सत्यपरिणामों से सर्वथा वंचित रह रहे हैं।
उपासना करना पर्याप्त नहीं, उसे ‘वाक्’ बनाकर ही इस योग्य बनाया जा सकता है कि अध्यात्म पथ पर बढ़ते हुए साधक को कुछ कहने लायक सफलता मिल सके। आयुर्वेद में सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा, अभ्रक, पारद आदि की भस्म बनाकर उनके सेवन का विधान है। विषों का भी बड़ा लाभ बताया गया है पर वह सम्भव तभी होता है जब उन विषों को विधान पूर्वक शुद्ध किया जाय। वाणी एक मूल पदार्थ है। शोधित होने पर वह अमृत बन जाती है और विकृत होने पर विष का काम करती है।
उपासना में प्रयुक्त होने वाला भगवान है। प्रेमास्पद उसी को बनाया जा सकता है।
उपासना के लिए-शक्ति सञ्चय के लिए पूरे पुरुषार्थ और मनोयोग के साथ खड़े होंगे तभी उस त्रास से त्राण मिलेगा जो प्रकृति की हर इकाई द्वारा दुर्बलों की सत्ता मिटाने के लिए दिया जाता है।
उपासना करने वाले पर गिरेंगे और उसे अभक्त से भी अधिक गये गुजरे स्तर का बना देंगे। अत्याचारी, आक्रमणकारी, दुरात्मा लोग अपने अवाँछनीय स्वार्थों की पूर्ति के लिये तान्त्रिक देवी देवताओं की वाम मार्गी पूजा करते, बलि चढ़ाते देखे जाते हैं। निश्चित रूप से ऐसे इष्टदेव उपासक को पतन के गर्त में धकेलने के ही माध्यम बनते हैं। कारण स्पष्ट है इष्टदेव सदा उपासक की मानसिक सन्तान भर होता है उसे जिस स्तर का गढ़ा गया है फल उसके भिन्न स्तर का हो ही नहीं सकता। यदि आत्मिक उत्कृष्टता अभीष्ट हो तो उपास्य-प्रेमास्पद की सत्ता आदर्शवादी सिद्धान्तों की आधारशिला पर खड़ी की गई होनी चाहिए।
उपासना की जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-July
उपासना में सब प्रकार चौकस व्यक्ति भी जब सर्वथा खाली हाथ दीखते हैं तो उसका एक मात्र कारण इतना ही होता है कि उन्होंने अन्तःकरण के परिष्कार-और दृष्टिकोण को उदात्त बनाने की आवश्यकता अनुभव नहीं की। उस ओर कदम नहीं बढ़ाये।
उपासना करते हैं, वे सब प्राणियों के हित में लगे हुए सुख ही पाते हैं।
उपासना का उपार्जित पुण्य फल खर्च हो जाता था। प्रत्यावर्तन के लिए जिस उच्चकोटि की शक्ति की आवश्यकता पड़ती है उसे प्राप्त करने में उग्र तपश्चर्या करनी पड़ती है। वह उन दिनों सम्भव नहीं थी, फिर दाता और गृहीता का अन्तरंग मर्म स्थल जिस प्रकार एकाग्र होना चाहिए वह उन दिनों न गुरु देव के लिए सम्भव था न दूसरे साधकों के लिए। स्थान की अनुपयुक्तता जैसे कितने ही अभाव ऐसे थे जिनसे वह प्रयोजन उन दिनों पूरे नहीं हो सकते थे। अस्तु कभी उस तरह का प्रयास भी नहीं किया गया।
उपासना साधना की अपेक्षा कहीं अधिक उच्चस्तर का माना जा सकता है। प्रचलित योग साधनाओं का लक्ष्य व्यक्ति विशेष की स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि जैसी सफलताएं प्राप्त करना रहता है और आत्म प्रयोजन के लिए काय कष्ट सहा जाता है। युग साधना में आपा भुलाया जाता है और विश्व कल्याण को लक्ष्य रखा जाता है। अस्तु उसकी परमार्थ परायण विशेषता न केवल साधक के लिए कल्याण कारी होती है वरन् समस्त विश्व की ही साधना करती है। इस विशेषता के कारण उसका स्तर भी ऊँचा होना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-January
उपासना है।
उपासना क्रम और धर्म साहित्य के सृजन का काम जारी रखा। उनकी रचनाओं का संग्रह ‘विद्या सागर’ नाम से विख्यात है। इन्हीं दिनों उन्होंने कितने ही धर्म स्थानों की भी स्थापना की।
उपासना-परा प्रकृति की साधना ही कहना चाहिए।
उपासना प्रार्थना करते हैं वह सर्वात्मा एवं पवित्रात्मा ही समझा जाना चाहिए। व्यक्तिगत परिधि को संकीर्ण रखने और पेट तथा प्रजनन के लिए ही सीमाबद्ध रखने वाली वासना तृष्णा भरी मूढ़ता को ही माया कहते हैं। इस भव बन्धन से मोह, ममता से छुड़ाकर आत्म-विस्तार के क्षेत्र को व्यापक बना लेना यही आत्मोद्धार है। इसी को आत्म-साक्षात्कार कहते हैं। प्रार्थना में अपने उच्च आत्म-स्तर से परमात्मा से यही प्रार्थना की जाती है कि वह अनुग्रह करे और प्रकाश की ऐसी किरण प्रदान करे जिससे सर्वत्र दीख पड़ने वाला अन्धकार-दिव्य प्रकाश के रूप में परिणत हो सके।
उपासना की जाय तो समझना चाहिए कि साधना का एक महत्वपूर्ण अंग छूट गया। ऐसी दशा में सफलता भी संदिग्ध रहेगी।
उपासना की भी विशाल परिधि है। पंचमुखी गायत्री के द्वारा पंच तत्वों के अधिपति पाँच देवताओं का-पंच कोषों का अनावरण किया जाता है और उसके द्वारा पंच रत्न जैसे पाँच दिव्य अनुदान प्राप्त किये जाते हैं। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए गायत्री विद्या और उपासना का प्रशिक्षण अब तक दिया भी जाता रहा है?
उपासना का प्रशिक्षण अब तक दिया भी जाता रहा है?
उपासना की जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-October
उपासना की जाती है। भौतिक विज्ञानी भी यही मानते हैं कि ब्रह्माण्ड की विशालता और परमाणु की लघुता में भारी अन्तर दीखते हुए भी मूलतः उनका क्रिया कलाप एक है। मानव शरीर में काम करने वाली परमाणु, जीवाणु परक सत्ता उन समस्त शक्तियों और हलचलों की प्रतिलिपि है जो इस विशाल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त हैं। काय कलेवर एक प्रकार से छोटा ब्रह्माण्ड ही है। यों वह नर कीटकों का घृणित घोंसला भर दीखता है पर यदि उसे व्यवस्थित और परिष्कृत बनाया जा सके तो शरीर भूलोक का-मन भुवः लोक का और अंतरात्मा का स्वः लोक का प्रतिनिधित्व करता प्रतीत होगा।
उपासना के विधि विधानों का अध्यात्म विज्ञान के अंतर्गत सुविस्तृत उल्लेख है। निराकार साधना में अपने कण-कण को नील वर्ण प्रभा ज्योति से ज्योतिर्मय देखने का अभ्यास किया जाता है। आकाश में आत्म सत्ता तनिक सी नील आभा लिये हुए सूर्य के समान प्रकाशवान है और उसकी दिव्य एवं प्रखर किरणें शरीर के रोम-रोम में प्रवेश करके, बलिष्ठता बढ़ा रही हैं- मन में प्रवेश करके मनस्विता को प्रखर कर रही हैं। अन्तरात्मा के भाव संस्थान (हृदय) में प्रवेश करके आत्मशक्ति को ज्वलन्त बना रही हैं। अपना सबकुछ ज्योतिर्मय हो रहा है।
उपासना करने से पूर्व सबसे प्रथम कदम इस जन्म से बन पड़े पाप कर्मों का प्रायश्चित किया जाना चाहिए। यों कुविचार भी हानि कारक हैं और कालान्तर में वे भी परिपक्व होकर दुर्गति के कारण बनते हैं पर कुकर्म तो प्रत्यक्ष है, उनके तत्काल संस्कार बनते हैं और उनका ऐसा भला बुरा कर्मफल विनिर्मित होता है जिसे भुगते बिना और कोई मार्ग नहीं। कर्म की गति अति गहन है। श्रवण कुमार को तीन मारने के फलस्वरूप दशरथ को पुत्र विछोह का शाप लगा था और उन्हें राम वनवास के अवसर पर बिलख बिलखकर प्राण त्यागने पड़े थे। बालि को छिपकर बाण मारने का कर्मफल राम को कृष्णावतार के समय भुगतना पड़ा था और बालि ने बहेलिया बनकर कृष्ण के पैर में तीर मारकर उन्हें मृत्यु मुख में पहुँचाया था।
उपासना अपना दिव्य प्रभाव तत्काल ही दिखाना आरम्भ कर देती है। अपने काय कलेवर में परमेश्वर की सत्ता और महत्ता की अनुभूति जितनी गहरी होगी उतनी ही उत्कृष्ट रीति-नीति अपनाने की भावना उमड़ेगी। कहना न होगा कि अन्तःकरण में उत्कृष्टता का उभार ही नर को नारायण बनाया करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-April
उपासना, आत्म चिन्तन, आत्मा और परमात्मा का मिलन प्रधान रूप से सम्मिलित रहना चाहिए। जप, ध्यान, पूजन वन्दन की क्रिया नियमित रूप से चलनी चाहिए, पर उसमें भावनाओं का गहरा पुट रहना चाहिए। लकीर पीटने की चिह्न पूजा अभीष्ट प्रतिफल उत्पन्न नहीं कर सकती। भौतिक महत्वाकाँक्षाओं से जितनी विरक्ति होगी उतनी ही आत्मिक विभूतियों के सम्पादन में अभिरुचि एवं तत्परता बढ़ेगी। इस तथ्य को भली-भाँति समझ लिया जाना चाहिए।
उपासना-साधना के लिए निश्चित रहा करेंगे केवल कुछ घण्टे ही नितान्त आवश्यक परामर्श के लिए निकल सका करेंगे। यह बहुमूल्य समय दर्शन, शंका समाधान-भौतिक प्रयोजनों के लिए आशीर्वाद जैसे तुच्छ कार्यों में बर्बाद नहीं किया जायगा। प्रेरणा प्राप्ति के आत्मिक प्रयोजनों के संदर्भ में ही वह घड़ियाँ नियोजित रहेंगी। उसके लिए पहले से ही पत्र व्यवहार कर लेना चाहिए कि किसी की उत्कण्ठा यदि मिलने की है तो उसका प्रयोजन क्या है और उसे न्यूनतम कितने समय में पूरा किया जा सकता है। घण्टों स्वच्छन्द दर्शन, सत्संग, हास-परिहास-संपर्क सान्निध्य के लिए बैठे रहने की बात अब बहुत पीछे रह गई है।
उपासना का कर्मकाण्ड ही सब कुछ नहीं मान लिया जाना चाहिए, वरन् उसके प्रयोजन की उत्कृष्टता बनाये रहनी चाहिए। यदि ईश्वर को रिश्वत और खुशामद के बल पर फुसला कर अपने भौतिक स्वार्थ साधनों का जाल बिछाया जा रहा है तो समझना चाहिए कि वह भक्ति, साधना, उपासना से हजारों कोसों दूर भौतिक मायाजाल है, जिससे आत्म प्रवञ्चना के अतिरिक्त और कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
उपासना से हजारों कोसों दूर भौतिक मायाजाल है, जिससे आत्म प्रवञ्चना के अतिरिक्त और कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
उपासना थोड़ी सी ही हो पाती है। अधिकाँश समय तो पत्रिकाओं के सम्पादन, पत्रों के उत्तर तथा आगन्तुकों के स्वागत सत्कार में ही निकल जाता है। गुरुदेव ने अपनी सारी शक्ति विश्व महत्व के कार्यों में पूरी तरह लगा रखी थी। विशाल परिवार की विविध आवश्यकतायें पूरी करने का भार मेरे ऊपर आ पड़ा। शक्ति कम और बोझ अधिक पड़ने से अपना ढाँचा चरमराने लगा तो उसमें कुछ आश्चर्य भी नहीं था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-February
उपासना की उपलब्धियों द्वारा ही सम्भव हो सका है। परिवार के अगणित सदस्य उसका सम्भव लाभ सदा उठाते रहेंगे। रोतों को हँसाने में उन्हें मजा आता है, उसे उनका सबसे बड़ा चाव, विनोद या व्यसन कहा जा सकता है। जिन्हें वे कुछ ऊँचा उठा देखते हैं, उनकी कामनाओं और तृष्णाओं को तृप्त नहीं समाप्त करते हैं और उन्हें बड़प्पन से छुड़ाकर महानता में संलग्न करते हैं। उनके साथ भी तो यही बीता है।
उपासना
उपासना और गुरुदेव की कृपा का पूरा लाभ तो उनने उठाया। चि0 उर्मिला, चि0 शशि प्रथम श्रेणी मेरिट में पास हुई। छात्रवृत्ति मिली वे दोनों अब एम0बी0बी0एस॰ का कोर्स पूरा कर रही हैं जो सभी लोगों के लिए आश्चर्य का कारण बना हुआ है।
उपासना क्या भावना की हिलोरों में आत्म-विभोरता की स्थिति ही उसे कहना चाहिये। सुना है मीरा के साथ कृष्ण नाचते थे। सुना है, रामकृष्ण परमहंस काली को अपने हाथ से भोजन कराते थे। सुना है चैतन्य महाप्रभु के साथ भगवान खेलते थे, सुना है अन्धे सूरदास की लाठी पकड़कर कृष्ण उन्हें ले जाते थे। पता नहीं वे घटनायें कहाँ तक सत्य हैं।
उपासना है और तुम्हारी पूजा है। कठिन परिश्रम करना सीखो। खूब गढ़कर, जमकर मेहनत करो और अपने उच्च और पवित्र आदर्श को कभी मत भूलो। शास्त्र और शस्त्र, बुद्धिबल और बाहुबल, दोनों का उपार्जन करो।” -मालवीय जी
उपासना करते हैं। उपासना क्या भावना की हिलोरों में आत्म-विभोरता की स्थिति ही उसे कहना चाहिये। सुना है मीरा के साथ कृष्ण नाचते थे। सुना है, रामकृष्ण परमहंस काली को अपने हाथ से भोजन कराते थे। सुना है चैतन्य महाप्रभु के साथ भगवान खेलते थे, सुना है अन्धे सूरदास की लाठी पकड़कर कृष्ण उन्हें ले जाते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-June
उपासना की— कीर्तन, भजन, तप, स्तवन आदि की— आवश्यकता समझी गई है।
उपासना इस कर्त्तव्य से विमुख न होने— इसके लिए निरंतर सचेष्ट रहने की प्रेरणा करती है; इसलिए उसे भी प्रथम चरण के रूप में आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी माना गया है।
उपासना का कर्मकांड बनाया ही इस प्रयोजन के लिए गया है कि
मनुष्य विस्मृति के गर्त में न गिर पड़े। आत्मज्ञान को ‘प्रकाश’ के नाम से
संबोधन इसलिए किया जाता है कि उसके सहारे सही दिशा विदित होती रहे।
दिग्भ्रम की भूल-भुलैयों में भटकने से बचा जा सके।
यह प्रकाश मिलता रहता है और दिशा सूझती रहती है।
उसपर चलने को जी भी करता है और कभी-कभी आकुलता भी रहती है, पर कुछ बन नहीं
पड़ता।
उपासना भी ठीक तरह बन पड़ती और उसका लाभ भी प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता।
उपासना को साधना कहते हैं। साधन की चेष्टा जुटाना— साधना। साधन अर्थात प्रयत्न, उपकरण, क्रियाकलाप। साध्य— ईश्वर की अनुकंपा की— प्रसन्नता और सहायता की प्राप्ति। साधना एक उपाय भर है।
उपासना इसलिए की जाती है। देवदर्शन, पाठ, जप, ध्यान, पूजन आदि का प्रयोजन यह है कि ईश्वर हमें याद आए। मानसिक चिंतन और शारीरिक कर्तृत्व में ईश्वरीय महत्ता को ओत-प्रोत करने की आवश्यकता अनुभव होती रहे, साथ ही इस बात का भी भान रहे कि ईश्वर और जीव यदि मिल-जुलकर, एक होकर रहें तो उससे हर्ष और आनंद का विस्तार होगा। ईश्वर संतुष्ट होगा कि उसने मनुष्य के निर्माण पर जो श्रम किया था, वह निरर्थक नहीं गया। जीव आनंद अनुभव करेगा कि उसने सर्वशक्तिमान सत्ता के संकेतों पर चलना स्वीकार करके उसका स्नेह-सद्भाव और अनुग्रह प्राप्त कर लिया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-August
उपासना में संलग्न लोगों की मनोभूमि इसी बच्चों जैसे स्तर की होती है। वे विधि विधानों, कर्मकाण्डों या उपहारों का ताना-बाना बुनते रहते हैं और उसी टंट-घंट से अपना उल्लू सीधा करने की तरकीबें भिड़ाते रहते हैं। तथाकथित भक्तों की मण्डली इसी स्तर की होती है वे तिलक छापे लगाकर अपनी भक्ति का प्रमाण भगवान के सामने प्रस्तुत करते हैं या कुछ और खेल खड़ा करके भगवान की आँखों में धूलि झोंककर अपने असली स्वरूप को छिपाते हुए भक्त को मिलने वाले लाभ प्राप्त करना चाहते हैं। वस्तुतः न भगवान इतने भोले हैं न कोई देवता इतना सरल है, न कोई मन्त्र ऐसा है जिसे कुछ बार जप, रटकर मनचाहा लाभ उठाया जा सके। उपासना का एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान है अध्यात्म विद्या को एक समग्र साइन्स ही कहना चाहिए।
उपासना का उपक्रम हम इसलिये रखा करते हैं कि भगवान हमारे भीतर प्रवेश करे और अन्तःकरण में निवास करें। उन्हें तो हम केवल तृष्णाओं और वासनाओं को समुन्नत, परिपुष्ट करने में सहायता करने भर के लिये बुलाते हैं।
उपासना, तपश्चर्या का समुचित लाभ उठा सकता है और देवताओं के अनुग्रह का अधिकारी बन सकता है। जब तक यह पात्रता न हो तब तक उत्कृष्ट वरदान माँगने की दूरदर्शिता ही उत्पन्न न होगी और साधना के पुरुषार्थ से कुछ भौतिक लाभ भले ही मिल जायं, देवत्व का एक कण भी उसे प्राप्त न होगा। और आसुरी भूमिका पर कोई सिद्धि मिल भी जाय तो अन्ततः उसके लिये घातक ही सिद्ध होगी। असुरों की साधना और उसके आधार पर मिली हुई सिद्धियों से उनका अन्ततः सर्वनाश ही उत्पन्न हुआ। अध्यात्म विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिए साधक का अन्तःकरण एवं व्यक्तित्व जितना निर्मल होगा, उतनी ही उसकी उपासना सफल होगी।
उपासना सम्भव नहीं। उपासना के लिये प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक छोटा सा प्रतिनिधि उनका मौजूद है। साधक और तपस्वी अपनी निष्ठा। अनुरूप उसका पोषण करते -समर्थ बनाते और लाभ उठाते हैं। एक ग्वाले की गाय स्वस्थ सुन्दर और बहुत दूध देती है।
उपासना की शिक्षा ब्रह्म विद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मन्त्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं इससे पहली आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाये, उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है उसे उतना ही मिलेगा। निरंतर वर्षा होते रहने पर भी आँगन में रखे हुए पात्रों में उतना ही जल रह पाता है जितनी उनमें जगह होती है। अपने भीतर जगह को बढ़ाये बिना कोई बरतन बादलों से बड़ी मात्रा में जल प्राप्त करने की आशा नहीं कर सकता, देवता और मन्त्रों से लाभ उठाने के लिये भी पात्रता नितान्त आवश्यक है।
उपासना, पूजा स्तोत्र आदि का चमत्कार देखने का दूसरा कदम उठाया गया होता तो निस्सन्देह हर उपासक को आशाजनक सफलता मिली होती और और किसी को भी निराश होने, अविश्वासी बनने या असमंजस में पड़ने का अवसर न आता।
उपासनात्मक प्रक्रिया अपनाई पीछे उनकी स्थिति हर प्रकार बिगड़ती ही चली गई। भौतिक सुख सम्पत्ति न सही आत्मिक शान्ति और विभूति का प्रकाश मिला होता तो भी सन्तोष किया जा सकता था पर वैसा भी कुछ वे प्राप्त न कर सके।
उपासना रूपी बाल्टी में दूध दुहने की बात बनती है।
उपासना को जादूगरी, बाजीगरी जैसी कोई चीज मानकर चलते हैं। उनकी कल्पना किन्हीं ऐसे देवताओं की होती है जो स्तुति, जप, पूजा, प्रसाद के तनिक से प्रलोभन पर ललचाये जा सकते हैं और उनसे इन नगण्य उपहारों के बदले मनचाहे लाभ उठाये जा सकते हैं। अधिकाँश पूजा, उपासना में संलग्न लोगों की मनोभूमि इसी बच्चों जैसे स्तर की होती है। वे विधि विधानों, कर्मकाण्डों या उपहारों का ताना-बाना बुनते रहते हैं और उसी टंट-घंट से अपना उल्लू सीधा करने की तरकीबें भिड़ाते रहते हैं। तथाकथित भक्तों की मण्डली इसी स्तर की होती है वे तिलक छापे लगाकर अपनी भक्ति का प्रमाण भगवान के सामने प्रस्तुत करते हैं या कुछ और खेल खड़ा करके भगवान की आँखों में धूलि झोंककर अपने असली स्वरूप को छिपाते हुए भक्त को मिलने वाले लाभ प्राप्त करना चाहते हैं।
उपासना करती थीं और यह प्रार्थना करती थीं कि उनकी सभी सन्तानें धर्म की सेवा में ही अपने जीवन का उत्सर्ग करें। उनकी यह मनोकामना पूर्णतः सफलीभूत हुई। लुईस के 8 लड़के 5 लड़कियाँ थीं। वे सभी धर्मसेवी बने, अविवाहित रहे और सारा जीवन ईसाई मिशन के लिए दान कर दिया। पादरी और ननों के रूप में पवित्र जीवन बिताने वाले पवित्र माता के इन पवित्र बच्चों की चर्चा पाश्चात्य जगत में शताब्दियों तक चर्चा का विषय रही है।
उपासना अन्ध-विश्वास है तो फिर उससे कितने ही लाभान्वित क्यों होते हैं? यदि सत्य है तो उससे कितनों को ही निराश क्यों होना पड़ता है। जल हर किसी की प्यास बुझाता है, सूरज हर किसी को गर्मी -रोशनी देता है फिर देवता और उनके उपासना क्रम में परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएं क्यों?
उपासना क्रम का उथलापन। लोग क्रिया-कृत्यों को सब कुछ मान बैठे हैं- धर्मानुष्ठानों का विधि-विधान ही उनके लिए सब कुछ है, गुण, कर्म, स्वभाव के परिष्कार से लेकर भावना क्षेत्र में स्नेह साधना के दिव्य दृष्टि-कोण को स्थान देने की आवश्यकता ही नहीं समझी। फलस्वरूप उस छोटे से शारीरिक श्रम का जितना स्वल्प लाभ हो सकता है था उसके अतिरिक्त और कुछ अधिक हाथ न लग सका। ईश्वर को अबोध बालक मान बैठना उपहासास्पद है। शब्द जञ्जाल में तुच्छ से उपहारों में छुट-पुट क्रिया-कृत्यों से उसे बहकाने, फुसलाने का प्रयास अपने ही अनाड़ीपन का परिचय देना है।
उपासना सफल होगी। धुले हुए कपड़े पर रंग आसानी से चढ़ता है मैले पर नहीं। स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी पूजा उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है।
उपासना का एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान है अध्यात्म विद्या को एक समग्र साइन्स ही कहना चाहिए। उसके नियम और प्रयोजनों को समझकर तदनुकूल चलने से ही लाभान्वित हुआ जा सकता है। यदि यह तथ्य लोगों ने समझा होता तो अध्यात्म मार्ग की देहरी पर पैर रखते ही पहला प्रयोग अपने अन्तरंग में मूर्छित, पददलित, विभुक्षित, मलिन पड़े हुए इष्टदेव को सँभालने-सँजोने का प्रयत्न किया होता। उन्हें समर्थ और बलवान बनाया होता। इस प्रथम प्रयोजन को पूरा करने के बाद मन्त्र जप, उपासना, पूजा स्तोत्र आदि का चमत्कार देखने का दूसरा कदम उठाया गया होता तो निस्सन्देह हर उपासक को आशाजनक सफलता मिली होती और और किसी को भी निराश होने, अविश्वासी बनने या असमंजस में पड़ने का अवसर न आता।
उपासना क्षेत्र में कुमारी पूजन को प्राथमिकता इसीलिए दी गई है।
उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों की लकीर पीट लेना इस संदर्भ में सर्वथा अपर्याप्त है। तेज धार की तलवार में सिर काटने की क्षमता है इसमें सन्देह नहीं पर वह क्षमता सही सिद्ध हो इसके लिये चलाने वाले का भुजबल, साहस एवं कौशल भी आवश्यक है। बिजली में सामर्थ्य की कमी नहीं पर उससे लाभान्वित होने के लिये उसी प्रकार के यन्त्र चाहिये। यन्त्र उपकरणों के अभाव में बिजली का उपयोग व्यर्थ ही नहीं होता अनर्थ मूलक भी बन जाता है।
उपासना क्षेत्र में प्राथमिकता दी गई है तो यह उचित तर्क संगत एवं तथ्यपूर्ण ही है। जप अनुष्ठान पाठ, पूजन आदि में कन्याएँ जितनी अधिक सफलता प्राप्त करती हैं, उतनी अन्य किसी आयु में संभव नहीं होती।
उपासना क्रम में परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएं क्यों?
उपासना के सम्बन्ध में लागू होती है। घृत सेवन का लाभ वही उठा सकता है जिसकी पाचन क्रिया ठीक हो, देवता और मन्त्रों का लाभ भी वे ही उठा पाते हैं जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को भीतर और बाहर से विचार और आचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है। औषधि का लाभ उन्हें ही मिलता है जो बताये हुए अनुपात और पथ्य का भी ठीक तरह प्रयोग करते हैं। अतः पहले आत्म उपासना फिर देव उपासना की शिक्षा ब्रह्म विद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मन्त्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं इससे पहली आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है।
उपासना के लिये प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक छोटा सा प्रतिनिधि उनका मौजूद है। साधक और तपस्वी अपनी निष्ठा। अनुरूप उसका पोषण करते -समर्थ बनाते और लाभ उठाते हैं। एक ग्वाले की गाय स्वस्थ सुन्दर और बहुत दूध देती है। दूसरे की ठीक वैसी ही होने पर भी दुबली रुग्ण और कम दूध देती है।
उपासना फिर देव उपासना की शिक्षा ब्रह्म विद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मन्त्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं इससे पहली आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाये, उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है उसे उतना ही मिलेगा। निरंतर वर्षा होते रहने पर भी आँगन में रखे हुए पात्रों में उतना ही जल रह पाता है जितनी उनमें जगह होती है। अपने भीतर जगह को बढ़ाये बिना कोई बरतन बादलों से बड़ी मात्रा में जल प्राप्त करने की आशा नहीं कर सकता, देवता और मन्त्रों से लाभ उठाने के लिये भी पात्रता नितान्त आवश्यक है।
उपासनाएं करके अद्भुत शक्तियाँ, विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। स्वयं भी इतने समर्थ हुए कि दूसरों को अपनी साधना का एक अंश देकर वरदान आशीर्वाद से लाभान्वित कर सके। भारत ही नहीं संसार भर का पुराण साहित्य ऐसी ही घटनाओं से भरा पड़ा है जिनमें चर्चा के प्रमुख पात्रों में से अधिकाँश की सामर्थ्य और विशेषताएं देव प्रदत्त थीं। ऋषियों, तपस्वियों, सन्तों के जीवन चरित्रों में अधिकाँश में ऐसे वर्णन मौजूद हैं जिनसे प्रतीत होता है कि उनमें कितनी ही अलौकिक विशेषताएं थी और उन्हें, उनने तप साधना के द्वारा देवताओं से अथवा सीधे भगवान से पाया था प्रमाणिक इतिहास में भी ऐसे अगणित प्रमाण विद्यमान हैं जिनसे साधना के फलस्वरूप अनेक व्यक्तियों ने अपने व्यक्तित्वों में ऐसी विशेषताएं उत्पन्न कीं जो सर्वसाधारण के लिये सम्भव या सुगम नहीं होतीं। अभी भी ऐसे व्यक्ति मौजूद हैं जो उपरोक्त तथ्य को अपने अद्भुत व्यक्तित्व या कर्तृत्व के द्वारा सही सिद्ध कर रहे हैं।
उपासना पक्ष इनकी अलंकारिक प्रतिमा भी बना लेता है और निराकार पक्ष प्रकाश किरणों के रूप में उसको पकड़ता है। सूर्य की सात रंग की किरणों में से हम जिसे चाहें उसे रंगीन शीशे के माध्यम से उपलब्ध कर सकते हैं। एक्सरे मशीन अल्ट्रा वायलेट उपकरण आकाश में से अपनी अभीष्ट किरणों को ही प्रयुक्त करते हैं। हंस दूध पीता है, पानी छोड़ देता है। इसी प्रकार किस मन्त्र के लिए ब्रह्म चेतना की किस दिव्य तरंग का प्रयोग किया जाय इसके लिए विधान निर्धारित है।
उपासनात्मक विधान का कर्मकाण्ड और जीवन साधना की निरन्तर गतिशील तप साधना का समन्वय ही वह मर्म है जिसके आधार पर गुरुदेव अध्यात्म विज्ञान की गरिमामयी यथार्थता को अपनी उपलब्धियों के आधार पर प्रमाणित कर सके। हर कोई जानता है कि उनका व्यक्तित्व ‘असाधारण’ है। युग-निर्माण परिवार का विशालकाय संगठन, हर दिशा से प्रगति पथ पर अग्रसर युग-परिवर्तन अभियान। एक लाख सजग आत्माओं की सृजन सेना का गठन, बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति का गगन भेदी शंखनाद, आर्ष साहित्य का सर्व सुलभ सरलीकरण, युग साहित्य के सृजन का अजस्र प्रवाह आदि लोक मंगल के लिये उनके प्रयासों को अनुपम और ऐतिहासिक ही कहा जा सकता है। अपनी व्यक्तिगत तप साधना से उनने अगणित व्यक्तियों की भौतिक और आत्मिक सहायताएं की हैं उनके प्रतिफल को देखते हुए अवाक् रह जाना पड़ता है।
उपासना देवी-देवताओं की की जाती है। स्वयं भगवान अथवा उसके समाज परिवार के देवी-देवता ही आमतौर से जन साधारण की उपासना के केन्द्र होते हैं। विश्वास यह किया जाता है कि पूजा, अर्चा, जप, स्तुति, दर्शन, भोग, प्रसाद आदि धर्मकृत्यों के माध्यम से भगवान अथवा देवताओं को प्रसन्न किया जा सकता है और जब वे प्रसन्न हो जाते हैं तो उनसे इच्छानुसार वरदान प्राप्त करके अभीष्ट सुख सुविधाओं से लाभान्वित हुआ जा सकता है।
उपासना में कुमारी कन्याओं की पूजन का महान फल होता है। भगवान शंकर स्वयं मुख से कहते हैं- सुन्दरी! मैं तो कुमारी के पूजन का फल सहस्र करोड़ जिह्वा तथा शत कोटि मुखों से भी नहीं कह सकता हूँ। इसलिये सभी जातियों की कन्याओं का पूजन करें। शिवे! कुमारी कन्या के पूजन में जाति के भेद का तो ध्यान कभी करना ही नहीं चाहिए।
उपासना के केन्द्र होते हैं। विश्वास यह किया जाता है कि पूजा, अर्चा, जप, स्तुति, दर्शन, भोग, प्रसाद आदि धर्मकृत्यों के माध्यम से भगवान अथवा देवताओं को प्रसन्न किया जा सकता है और जब वे प्रसन्न हो जाते हैं तो उनसे इच्छानुसार वरदान प्राप्त करके अभीष्ट सुख सुविधाओं से लाभान्वित हुआ जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-September
उपासना निशिदिन, ज्ञान-ध्यान सत्काम की।
उपासना का अर्थ है- पास बैठना। पास बैठें और बिठायें। जीवन के उद्देश्य और सदुपयोग का मार्ग पूछें और उस पर चलने की अपनी तत्परता बनायें। बैठने की दूरी क्रमशः घटनी चाहिए और निकटता इतनी बढ़नी चाहिए कि अपना आपा— "परमेश्वर में तल्लीन हो जाए और उस परम ज्योति से अपना कण-कण जगमगाने लगे।ठ
उपासना का अर्थ समृद्धि और सुविधा के लिए गिड़-गिड़ाना नहीं; वरन यह है कि हमारा वह शौर्य सजग हो; जिसमें अंधकार में भटकते लोगों का अनुसरण छोड़कर ईश्वर के पीछे एकाकी चल सकें।
उपासना भी एक अंग है। भोजन में नमक शक्कर का जितना स्थान है, उतना ही मूल्य जप भजन का भी है। क्षुधा तो आहार से पूरी होती है, आत्मकल्याण तो जीवन-साधना की तत्परता पर निर्भर रहता है।
उपासना, आराधना करने से साधक वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है, जो इस विश्व में पाने योग्य है, इन्हीं तथ्यों के निम्नांकित संकेत ध्यान देने योग्य है"—
उपासना भी एक सीमा तक ही इस प्रयोजन में सहायक हो सकती है। स्पष्ट है कि उपासनात्मक उपचारों को ‘साधन’ कहा जाता है, साध्य नहीं। साध्य है आत्मोत्कर्ष और उसके लिए चिंतन एवं कर्त्तृत्व से प्रखर, परिष्कृति का समावेश। जीवन लक्ष्य इसी का दूसरा नाम है। स्वर्गमुक्ति इसी के प्रतिफल हैं।
उपासनात्मक उपचारों को ‘साधन’ कहा जाता है, साध्य नहीं। साध्य है आत्मोत्कर्ष और उसके लिए चिंतन एवं कर्त्तृत्व से प्रखर, परिष्कृति का समावेश। जीवन लक्ष्य इसी का दूसरा नाम है। स्वर्गमुक्ति इसी के प्रतिफल हैं। आत्मसाक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन इस मनः स्थिति का नाम है।
उपासना उसका शोभा-शृंगारमात्र हैं। इस दिशा में आज तक जिनने भी कुछ कहने लायक प्रगति की है, उन्होंने अनिवार्य रूप से आत्मबोध, आत्मशोधन और आत्मपरिष्कार की प्रक्रिया पूरी की है। हमें यदि खिलवाड़ का ही शौक हो तो हम तंत्र-मंत्रों के विधि-विधान में सीमित रह सकते है, यदि कुछ पाना हो तो कदम आगे बढ़ाने ही होंगे।
उपासना, प्रयोजन सिद्ध करने के लिए उपयुक्त माध्यम के रूप में उन्हें गढ़ा गया है। उनमें मूर्तिकार, शिल्पियों की कला को ही प्रत्यक्ष और वास्तविक कहा जा सकता है।
उपासनारत होती है और ईश्वर निराकार होने से अपनी गरिमा शरीरधारी मनुष्य के द्वारा प्रकट करना चाहता है। भक्त भगवान के लिए ललचाता है और भगवान भक्त को पाने के लिए लालायित रहता है।
उपासना से आत्मकल्याण का पथप्रशस्त नहीं होता और न वह परमेश्वर को ही प्रभावित करती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-April
उपासनात्मक विधि−विधानों, कथा–प्रसंगों तथा धर्मानुष्ठानों के बहिरंग स्वरूप को सीधी तरह समझने−समझाने में कठिनाई होती है। जब इन में सन्निहित प्रेरणाओं के भाव−भरे वातावरण में हृदयंगम होने और चमत्कारों से भरे सत्परिणाम उत्पन्न होने की प्रतिक्रिया सामने आती है तो समझ में आता है कि यह निरर्थक-सी लगने वाली प्रक्रिया कितनी मर्मस्पर्शी, व्यक्तित्व का काया कल्प कर डालने वाली प्रभावोत्पादक विद्या है।
उपासना का उच्च स्तरीय दर्शन है “विराट् स्वरूप” से साक्षात्कार। साकार व निराकार दोनों ही उपासना में आदर्शवादी उत्कृष्टता से सम्बन्ध दृढ़ बनाकर उस विराट् की ही साधना की जाती है।
उपासना विज्ञान पर छाये छद्म एवं मलीन आवरण को मिटाया जाय व इनका बोधगम्य तथा सही स्वरूप जन−मानस के सम्मुख प्रस्तुत किया जाय। आर्ष स्तर की ऋषि प्रणीत धर्म चेतना का सच्चे अर्थों में आज उद्धार ही होना है। यदि ऐसा न हुआ तो बाह्योपचारों व अविश्वासों से ग्रस्त मूढ़ जन−मानस धीरे−धीरे नास्तिक होता चला जायेगा अथवा साधना विज्ञान का क्रमिक रूप में अवसान ही हो जायेगा।
उपासना करने वाला अपने को विश्व नागरिक मानता है और सृष्टि के इस उद्यान को और अधिक सुन्दर, सुविकसित बनाने का प्रयास करता है। उपासना का सच्चा स्वरूप, आस्तिकता की ‘विराट् दर्शन’ वाली मान्यता ही है। यदि इस आस्तिकता को अन्तरात्मा में स्थान मिल सके तो उपासना सार्थक हुई समझी जाती है। अनुशासन ही रस्सी से बँधा, देव मर्यादाओं का पालन करने वाला व्यक्ति ही आस्तिक है और ऐसा व्यक्ति ही विराट् का दर्शन करने का सच्चा अधिकारी है। इस स्वरूप को भली−भाँति समझने वाला व्यर्थ के प्रपंच में न पड़ अध्यात्म पथ पर बढ़ चलता है तथा सामान्य ने असामान्य बन जाता है।
उपासनात्मक विधि−विधान नहीं साधक के व्यक्तित्व का परिष्कार, अन्तः की निश्छलता–पवित्रता एवं उपास्य अन्तराल के प्रति गहन श्रद्धा ही सारे चमत्कारों–आत्मिक सफलताओं के मूल कारण हैं। ध्यान साधना से इसी प्रयोजन को पूरा किया जाता है।
उपासना एवं तपश्चर्या का समुचित लाभ उठाते हैं और दैवी अनुग्रह के अधिकारी बनते हैं। आसुरी भूमिका पर कोई भौतिक सिद्धि मिल भी जाय तो अंततः वह घातक ही सिद्ध होगी। रावण, हिरण्यकश्यपु, भस्मासुर, बाणासुर, हिरण्याक्ष जैसे कितनों को चमत्कारी सिद्धियों प्राप्त थीं, पर पात्रता न होने से उन्होंने उनका दुरुपयोग ही किया। अन्ततः स्वयं भी घाटे में रहे और जब तक जीवित रहे आतंक और अत्याचार फैलाते रहे। यह एक अनुभूत सत्य है व हमेशा रहेगा कि स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी उपासना उपचार का आशाजनक लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है।
उपासना में आदर्शवादी उत्कृष्टता से सम्बन्ध दृढ़ बनाकर उस विराट् की ही साधना की जाती है।
उपासना से ही पूरा होता है भौतिक स्तर की स्थूल साधना जहाँ लोक−व्यवहार की एक सामान्य प्रक्रिया है वहाँ आत्मिक प्रगति की सूक्ष्म साधना वह पुरुषार्थ है जिसमें साधक को अपना अन्तः का स्तर ऊँचा उठाना होता है। इन प्रयासों को ही अध्यात्म साधना कहते है। इसके लिए प्रधान अवलम्बन ईश्वर को बनाना होता है। चेतना की उच्चस्तरीय संवेदना को ही प्रकारान्तर से ईश्वर कहते हैं। उपासना प्रक्रिया में इसी महत् सत्ता से अपना संपर्क जोड़कर अपनी जीव सत्ता को तद्रूप बनाया जाता है।
उपासना, दैनिक कथा−सत्संग, षोडश संस्कारों का प्रबन्ध, समस्त तीर्थों का एक ही स्थान पर दिव्य दर्शन, देवात्मा हिमालय और गंगावतरण शान्तिमय वातावरण, स्नेह सौजन्य और आतिथ्य से भरा पूरा सज्जनोचित व्यवहार, बालकों का गुरुकुल, गृहस्थों का तीर्थ सेवन और अधेड़ों का आरण्यक जहाँ एक साथ चलते हों ऐसा प्रशिक्षण देश विदेशों में धर्म−धारणा का आलोक उत्पन्न करने वाले लेखनी और वाणी के माध्यम से चलने वाले उच्चस्तरीय प्रयास इतनी विशेषता किसी एक स्थान पर देखने को मिल सके ऐसा कोई तीर्थ कदाचित ही किसी ने देखा हो। यही कारण है कि जो इस प्राणवान तीर्थ को एक बार देख जाता है उसकी स्मृति कभी नहीं भूलता और कभी कोई परिचित सम्बन्धी हरिद्वार यात्रा के लिए जाता है तो उसे वह इतना परामर्श अवश्य देता है कि शान्ति−कुँज ब्रह्मवर्चस् देखे बिना वापस न लौटें। प्रज्ञा पुरुष महाप्राण पू. गुरुदेव और अरुन्धती की जीवन्त प्रतिमा स्नेह सलिला माता जी का जाज्वल्यमान प्राण और प्रयास जिस संस्थान के कण−कण में ओत−प्रोत हो उसे सच्चे अर्थों में तीर्थ होना ही चाहिए। पाँच दिन के लिए यहाँ आने वाले तो अपनी यात्रा सार्थक मानते ही हैं, जो मात्र दर्शन के लिए पहुँचते हैं वे भी यह मानते हैं कि अभी भारत भूमि से तीर्थ परम्परा सर्वथा नष्ट नहीं हुई है।
उपासना दर्शन प्रधान प्रज्ञायोग विशेषाँकों का उद्देश्य यही है कि व्यक्ति को आस्थाओं के उन्नयन से धर्म−धारणा के सम्वर्धन की, विद्या की जानकारी करायी जाय। कर्मकाण्डों, उपासनात्मक विधि−विधानों, कथा–प्रसंगों तथा धर्मानुष्ठानों के बहिरंग स्वरूप को सीधी तरह समझने−समझाने में कठिनाई होती है। जब इन में सन्निहित प्रेरणाओं के भाव−भरे वातावरण में हृदयंगम होने और चमत्कारों से भरे सत्परिणाम उत्पन्न होने की प्रतिक्रिया सामने आती है तो समझ में आता है कि यह निरर्थक-सी लगने वाली प्रक्रिया कितनी मर्मस्पर्शी, व्यक्तित्व का काया कल्प कर डालने वाली प्रभावोत्पादक विद्या है।
उपासना की जा रही है। स्थान एवं वातावरण मन की एकाग्रता–तन्मयता में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जहाँ विशिष्ट साधना की बात आती है वहाँ तो सिद्ध पीठों–संस्कारित तप स्थलियों पर समय निकाल कर जाने व संकल्पित अनुष्ठान को पूरा करने की बात सोचना चाहिए। परन्तु साधारण स्थिति के साधक को अपने ही निवास स्थान में कोलाहल रहित सुसंस्कारित वातावरण तलाशना होगा ताकि नित्य की साधना सम्पादित की जा सके। वातावरण वे तलाशना होगा ताकि नित्य की साधना सम्पादित की जा सके।
उपासना सार्थक हुई समझी जाती है। अनुशासन ही रस्सी से बँधा, देव मर्यादाओं का पालन करने वाला व्यक्ति ही आस्तिक है और ऐसा व्यक्ति ही विराट् का दर्शन करने का सच्चा अधिकारी है। इस स्वरूप को भली−भाँति समझने वाला व्यर्थ के प्रपंच में न पड़ अध्यात्म पथ पर बढ़ चलता है तथा सामान्य ने असामान्य बन जाता है। ईश्वर अंश जीव को तद्रूप बनने के लिये उपासना के जिस तत्वदर्शन को आत्मसात् करना अति अनिवार्य है, उसी का विवेचन साधना विज्ञान के ज्ञाता करते रहे हैं।
उपासना के जिस तत्वदर्शन को आत्मसात् करना अति अनिवार्य है, उसी का विवेचन साधना विज्ञान के ज्ञाता करते रहे हैं।
उपासना को एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान–एक विद्या की तरह मानकर चलना होगा जो नियमों से व सुनिश्चित उद्देश्यों को लेकर बनायी गयी है। सबसे पहला प्रयोग अपने मूर्च्छित आत्मदेव को समर्थ–बलवान बनाने के रूप में यदि हम करने लगे तो कोई कारण नहीं कि हमारे ऊपर देव अनुदान न बरसें। जिन्होंने ये लाभ अपने जीवन में पाया वे भी इसी पथ पर चले है। इसके लिए कोई ‘शार्टकट’ नहीं। हमें भी इसी मार्ग का अवलम्बन कर अध्यात्म पर बढ़ना होगा।
उपासना की प्रक्रिया निर्धारित करने के साथ−साथ ही आहार कल्प का प्रावधान रखा गया है।
उपासना उपचार का आशाजनक लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है।
उपासना उसी पुरुषार्थ का नाम है जो मनुष्य को हर जीवधारी की तुलना में अतिरिक्त रूप से अनुदान रूप में सहज प्राप्त है, जिसे सम्पादित कर स्थूल रूप में भौतिक समृद्धि तथा थोड़ा और ऊँचे उठने पर सूक्ष्म स्वरूप में आत्मिक विभूतियों को करतलगत करना सबके लिये सम्भव है। मनुष्य−मनुष्य में जो अन्तर पाया जाता है वह इन तीनों स्तरों के कारण ही होता है। कुछ तो भौतिक व आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों में पिछड़े होते हैं व अन्य प्राणियों से कुछ श्रेष्ठ तो क्या गतिविधियों के क्षेत्र में उनसे भी हेय होते हैं। दूसरा स्तर स्थूल साधना का है। व्यायाम, अध्ययन, अनुभव शिल्पकला, वाणिज्य जैसे विषयों में कुशलता अर्जित कर ऐसे व्यक्ति अपना लौकिक जीवन सफल बनाते हैं, वैभव को प्राप्त होते हैं।
उपासना प्रक्रिया में इसी महत् सत्ता से अपना संपर्क जोड़कर अपनी जीव सत्ता को तद्रूप बनाया जाता है।
उपासना करते हुए भी जो विपन्न और दुःखी बने रहते है, वे सच्चे उपासक नहीं। प्रभु के पास उनका जाना व याचना करना ठीक उसी प्रकार है जैसे कि कोई बच्चा मन्दिर की प्रार्थना में प्रसाद के लालच में शामिल होने जाता है। ऐसे लोलुप व्यक्ति न तो वह आनन्द पाते हैं, नहीं वे अनुदान जो प्रभु को सम्पूर्ण समर्पण करने पर स्वयमेव मिलते चले जाते हैं।
उपासना मूलतः भाव विज्ञान की उच्चस्तरीय स्थिति है जिसमें मनःस्थिति के अनुरूप साधक को अपना माध्यम चुनना होता है। सतत् परिष्कृति एवं प्रगति के सोपानों पर चढ़ते हुए साधक ऐसी स्थिति विशेष में जा पहुँचता है जहाँ उसे फिर किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं रह जाती। प्रतीकोपासना, इष्ट के साकार ध्यान की प्राथमिक सीढ़ियों को पारकर वह जब निराकार ध्यान की स्थिति में पहुँचता है तो परम सत्ता को सम्वेदनाओं की श्रेष्ठता के रूप में अनुभव करता है। सद्भाव भरी स्थिर आतुरता ही ध्यान की पराकाष्ठा है। ईश्वर निराकार भी है, साकार भी।
उपासना कर छुटपुट उद्देश्यों की पूर्ति भर कर लेते हैं। विराट् महाकाली तो मात्र एक ही है। जहाँ रामकृष्ण के अन्तरंग में परिपोषित काली अंश की क्षमता उनके अनुरूप थी–अपनी प्रगाढ़ निष्ठा से वे तद्नुरूप हो गये थे, वहाँ ओझा, अघोरी लोगों की काली बहुत दुर्बल ओछे किस्म की होती है।
उपासना, साधना, आराधना के तत्वदर्शन को सही स्वरूप में प्रस्तुत करके ही अगले दिनों प्रज्ञायुग की सम्भावनाओं को साकार किया जा सकेगा। इस प्रज्ञायुग में श्रद्धा तत्व को मानवी अन्तराल में प्रविष्ट प्रतिष्ठित होने का अवसर मिलेगा। जो साधक जितना अधिक इस उपलब्धियों से सम्पन्न होगा, उसी अनुपात में उसे अपने दृष्टिकोण–स्वभाव–आचरण के स्तर को ऊँचा उठाने का सुवर्ण सौभाग्य प्राप्त होगा। इस सौभाग्य के सहारे ही व्यक्तित्व प्रखर बनता है व आत्मिक विभूतियों तथा भौतिक सफलताओं का पथ−प्रशस्त होता है। यह तथ्य भली−भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिए कि आत्म−कल्याण का सौभाग्य वे ही प्राप्त करते हैं जो अश्रद्धा व अंधश्रद्धा दोनों से विमुख हो श्रद्धा तत्व को सच्चे अर्थों में अपने जीवन में उतारते हैं।
उपासना के रूप में कल्पित किया जाय अथवा ज्ञान चक्षु के माध्यम से निराकार रूप में–उद्देश्य दोनों का एक ही है।
उपासना को सम्पादित करने वाला अपना ही नहीं, अपने संपर्क क्षेत्र के अनेकानेक व्यक्तियों का हित कर जाता है।
उपासना का सत्पात्र तथा भगवत् कृपा का श्रेयाधिकारी बन पाता है। साधना क्षेत्र में पग रखने वाले हर पथिक को यह जानना ही होगा कि चिन्तन की उपयुक्त दिशाधारा ही व्यवहार में उत्कृष्ट दिशाधारा में बदलती है और इसके परिणाम उस स्तर की सफलता बनकर सामने आते हैं जिसे सामान्यतया वरदान या चमत्कार की संज्ञा दी जाती है।
उपासनाएं करके अद्भुत विभूतियाँ−उपलब्धियाँ अर्जित की। वे स्वयं भी समर्थ बने तथा दूसरों को भी अपनी साधना का एक अंश देकर वरदान, आशीर्वाद से लाभान्वित कर सके। मात्र भारतवर्ष नहीं− अन्यान्य धर्मों के महापुरुषों व पुराण साहित्य में वर्णित घटनाक्रमों का अवलोकन करने पर पता चलता है कि अधिकाँश की सामर्थ्य और विशेषताएँ दैवी सत्ता की कृपा के रूप में उन्हें प्राप्त हुई थी। सर्वसाधारण के लिये जो सम्भव नहीं हो पाता, वह उन्हें प्राप्त हो सका व वे साधारण स्थिति से ऊँचा उठकर महामानव, देव−पुरुष बन सकने में सफल हुए। साथ ही यह भी ज्ञात होता है कि उन्हें जो सिद्धियाँ मिली−वे उनके साधना पुरुषार्थ के बलबूते−आत्मबल सम्पादन के आधार पर ही मिली, संयोगवश नहीं।
उपासना का सच्चा स्वरूप, आस्तिकता की ‘विराट् दर्शन’ वाली मान्यता ही है। यदि इस आस्तिकता को अन्तरात्मा में स्थान मिल सके तो उपासना सार्थक हुई समझी जाती है। अनुशासन ही रस्सी से बँधा, देव मर्यादाओं का पालन करने वाला व्यक्ति ही आस्तिक है और ऐसा व्यक्ति ही विराट् का दर्शन करने का सच्चा अधिकारी है। इस स्वरूप को भली−भाँति समझने वाला व्यर्थ के प्रपंच में न पड़ अध्यात्म पथ पर बढ़ चलता है तथा सामान्य ने असामान्य बन जाता है। ईश्वर अंश जीव को तद्रूप बनने के लिये उपासना के जिस तत्वदर्शन को आत्मसात् करना अति अनिवार्य है, उसी का विवेचन साधना विज्ञान के ज्ञाता करते रहे हैं।
उपासनात्मक कर्म−काण्डों को कभी अपनाया न हो।
उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के श्रेयार्थियों को दी जाती है।
उपासना द्वारा दिव्य−चेतना से घनिष्ठता बनाना, योगाभ्यास द्वारा प्रस्तुत शक्तियों को जगाना तथा तप साधना के माध्यम से अतिमानवी शक्तियों का उन्नयन तो साधना विज्ञान का एक अंग है ही। दूसरी महत्वपूर्ण आवश्यकता है सूक्ष्म वातावरण परिशोधन हेतु सामूहिक ध्यान धारणा की। जिस सन्धि बेला से विश्व मानस आज गुजर रहा है, ऐसे सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता और बढ़ जाती है। ऐसे प्रयोग सम्मिलित आत्मशक्ति को उभारने के लिये किये जाते हैं। नैष्ठिकता साधना−महापुरश्चरणों की इस प्रक्रिया में लाखों साधक अपनी संकल्प शक्ति एक साथ, एक समय विशेष में एक लक्ष्य की पूर्ति के लिये नियोजित करते हैं।
उपासना जादूगरी नहीं है। हमारे देवता इतने ओछे नहीं है कि नगण्य से उपहारों पर रीझ जायें और मनचाहे वरदान ही देते चले जाये। इसके लिये हमें अपनी मनोभूमि व बाल स्तर से ऊँचा उठाना होगा। उपासना को एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान–एक विद्या की तरह मानकर चलना होगा जो नियमों से व सुनिश्चित उद्देश्यों को लेकर बनायी गयी है। सबसे पहला प्रयोग अपने मूर्च्छित आत्मदेव को समर्थ–बलवान बनाने के रूप में यदि हम करने लगे तो कोई कारण नहीं कि हमारे ऊपर देव अनुदान न बरसें।
उपासना करने का निर्देश दिया गया है। प्रज्ञानं ब्रह्म, “तत्वमसि, शिवोऽहम्” जैसे सूत्र संकेतों में इसी तथ्य का प्रतिपादन है कि अपना परिष्कृत आपा ही सुविकसित, सुसंस्कृत स्थिति में पहुँचने पर परब्रह्म की−परमात्मा की–भूमिका निभाने लगता है। नर−पिशाच, नर−पशु, नर−कीटक की स्थिति तो तभी तक रहती है जब तक अपने आपे का बोध नहीं होता।
उपासना का चमत्कार दिखाई नहीं दिया। न उन्हें सुख मिला न शान्ति। स्वास्थ्य, यश, सम्मान, वैभव किसी भी दृष्टि से उन्हें ऊँचा उठा हुआ नहीं कहा जा सका, आत्मबल वृद्धि की बात तो बहुत दूर की है। इससे स्वाभाविकतः मन में असमंजस उठता है कि ऐसा क्यों होता है? प्रक्रिया वही–फिर अवलम्बन लेने वालों में से एक को लाभ व दूसरे को हानि क्यों?
उपासना वह स्तर है जिसमें मनुष्य और भी ऊँचा उठकर अपने गुण, कर्म, स्वभाव, दृष्टिकोण को परिष्कृत करता है– प्रसुप्त सामर्थ्यों को जगाता है। व्यक्ति अपनी आकाँक्षाओं, मान्यताओं एवं भावनाओं को उच्चस्तरीय बनाता है। इस सूक्ष्म उपासना को सम्पादित करने वाला अपना ही नहीं, अपने संपर्क क्षेत्र के अनेकानेक व्यक्तियों का हित कर जाता है।
उपासना पर भी यही तथ्य पूर्णरूपेण लागू होता है। देवता की शक्ति व मन्त्रों के चमत्कार से वे ही लाभान्वित हो सकते हैं जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को भीतर और बाहर से−विचार ओर आचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है। यह न करने पर तो उपासनात्मक विधि−विधानों में नष्ट किये समय व पुरुषार्थ के अभाव से साधक और भी गयी−गुजरी स्थिति में पहुँच जाता है। इसी लिये पहले आत्मोपासना और फिर देव उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के श्रेयार्थियों को दी जाती है।
उपासनात्मक विधि−विधानों में नष्ट किये समय व पुरुषार्थ के अभाव से साधक और भी गयी−गुजरी स्थिति में पहुँच जाता है। इसी लिये पहले आत्मोपासना और फिर देव उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के श्रेयार्थियों को दी जाती है।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों की लकीर पीट लेना अपर्याप्त ही नहीं–ईश्वर के प्रति अनास्था बढ़ाना भी है। तेजधार की तलवार सिर काट सकती है, पर यह तथ्य भी अपनी जगह अटल है कि चलाने वाले का साहस, कौशल व शरीरबल भी पर्याप्त हो। बिजली तो हाईटेन्शन लाइनों में बराबर दौड़ती रहती है, परन्तु उस अपने घर लाने व उससे यन्त्र चला सकने के लिये आवश्यक व्यवस्था बीच में बना लेना भी जरूरी है। यन्त्र तो घर में हों व लाइन भी सामने से जा रही हो तो यह कल्पना करना ही उससे यन्त्र चल सकेंगे, बाल कौतुक ही कहा जायगा। घृत सेवन का लाभ वही उठा पाता है जिसकी पाचन क्रिया ठीक हो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-September
उपासना कर्मफल व्यवस्था स्वीकारने, मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखने और नीति मर्यादा का अनुशासन पालने भर से हो सकती है।
उपासना याचना नहीं है। याचना करने से भी किसी को कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ कहाँ मिलती है। पात्रता और प्रामाणिकता ही सब कुछ रहे। याचना से उच्च पदवी किसे मिली हैं? प्रतिस्पर्धा जीतने वाले ही पुरस्कृत होते हैं।
उपासना उपचार में दीपक, अगरबत्ती, धूपबत्ती, अग्नि-होत्र आदि के प्रयोग होते हैं। न केवल भारतीय धर्म में वरन् संसार भर के सभी धर्मों में अपने-अपने ढंग से यह प्रक्रिया काम में लाई जाती है। अगरबत्ती, धूपबत्ती, लोबान, धूनी जैसे उपचार मन्दिर, गिरजाघर, गुरुद्वारे, चैतन्य आदि सभी जगह प्रयुक्त होते हैं। पारसी धर्म में तो यह मान्यता और भी अधिक है। उन्हें तो एक प्रकार से ‘अग्निपूजक’ ही माना जाता है।
उपासना में अग्निहोत्र को भी जुड़ा रहना चाहिए। होता भी यही है। अनुष्ठानों की पूर्णाहुति यज्ञ कृत्य के साथ ही सम्पन्न होती है। उन दिनों जप के समय दीपक, धूपबत्ती जलाए रहते हैं। जहाँ श्रद्धा और सद्भावना है वहाँ अखण्ड अग्नि, अखण्ड धूनी, अखण्ड दीपक की भी स्थापना रहती है।
उपासना सही होने के कारण सुनिश्चित परिणाम भी उत्पन्न करती है-जो ऐसे ही अन्धेर में ढेले फेंकते हैं और मनमाने अर्थ लगाते हैं उन्हें भटकावजन्य थकान के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।
उपासना के समस्त उपचारों का एकमात्र उद्देश्य है आत्मा को परमात्मा स्तर का विकसित करने का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आत्मशोधन और आत्म परिष्कार के दो कदम अनवरत रूप से बढ़ाते चलना। आत्मशोधन अर्थात् संचित कुसंस्कारों का दृढ़तापूर्वक उन्मूलन। आत्म परिष्कार अर्थात् सत्प्रवृत्तियों का अपने गुण, कर्म, स्वभाव में अधिकाधिक समावेश। पूजा अर्चा के-योग तप के-जप ध्यान के समस्त क्रिया कृत्य-आत्मनिर्माण एवं आत्म विकास का लक्ष्य प्राप्त कराने के उद्देश्य से ही सृजित किये गये हैं। कार्य कारण को संगति बिठाकर जो क्रिया-कृत्यों को-लक्ष्य का ध्यान रखते हुए-भावना पूर्वक सम्पन्न करते हैं उनकी उपासना सही होने के कारण सुनिश्चित परिणाम भी उत्पन्न करती है-जो ऐसे ही अन्धेर में ढेले फेंकते हैं और मनमाने अर्थ लगाते हैं उन्हें भटकावजन्य थकान के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।
उपासना वाला परमेश्वर-परमात्मा-ससीम हैं। परब्रह्म असीम। ससीम परमात्मा की उन सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय समझना चाहिए जो मानवी गरिमा का स्तर ऊँचा रखने की प्रेरणा देती है। साथ ही पात्रता के अनुरूप प्रतिफल अनुग्रह, अनुदान भी प्रदान करती है। इसे मनोविज्ञान का भाषा में सुपर चेतना-परिष्कृत अन्तःकरण कहते हैं।
उपासना की जाय।
उपासना दर्शन की प्राथमिकता सिद्ध करता रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-February
उपासना कह सकते हैं जो सही और सुदृढ़ हो तो आत्मा, पतंग की तरह ऊपर उठेगा और कठपुतली की तरह प्रशंसा योग्य अभिनय करेगा।
उपासना की योगपरक प्रक्रिया यही है। उसमें आत्मसमर्पण और अनुशासन का अवधारण करना पड़ता है। तादात्म्य होने का यही तरीका है, इसमें भक्त को भगवान के अनुशासन मानने होते हैं, उसे अपनी मर्जी पर चलाने— मनोकामना को पूरी करने के लिए बाधित नहीं करना पड़ता। चिड़ीमार-मछलीमार की तरह फुसलाकर चंगुल में फँसा लेने और उससे अपना स्वार्थ सिद्ध करने की कुचेष्टा कोई सच्चा भक्त न कर सकता है और न वैसा कुछ सोच ही सकता है।
उपासना को करें। संचित प्रारब्ध की निवृत्ति हो जाने से आपको अब के प्रयास में सफलता मिलेगी।"
उपासना में गायत्री पुरश्चरण मुख्य हैं। ढाई घण्टा नित्य का समय इसके लिए नियत है। इस बीच निर्धारित जप संख्या पूरी की जाए। साथ ही प्रभातकालीन सूर्य किरणों के तीनों शरीर में प्रवेश करने का ध्यान किया जाए। अनुभव किया जाए कि गायत्री के प्राण सविता देवता का दिव्य आलोक जीवनसत्ता के कण-कण में प्रवेश करके तीन अनुदान प्रदान करता है।
उपासना करते हैं, वे उसे प्राप्त कर लेते हैं।
उपासना निष्फल कैसे हो गई? इतना समाधान करा देना भी आपका वरदान पर्याप्त होगा, जब आप गायत्री तेज के सम्मुख होने तक का साहस न कर सके तो आपसे अन्य वरदान क्या माँगू।"
उपासना आदि उपचार इसी के अंतर्गत आते हैं।
उपासना के अतिरिक्त जो भी समय खाली मिले उसमें इन्हीं चार प्रयोजन में मन को लगाए रहना पड़ता हैं। इन चारों का लक्ष्य एक ही हैं— आत्मपरिष्कार। उज्ज्वल भविष्य का योजनाबद्ध निर्धारण। इसके लिए आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास के चार प्रसंगों पर गंभीरतापूर्वक समुद्र-मंथन जैसा आत्मचिंतन करते रहना होता है। ताकि ईश्वरप्रदत्त अलभ्य उपहार मनुष्य जन्म का सही उपयोग संभव हो सके।
उपासना को इतनी तेजस्वी पाते हैं तो कृपाकर यह बता दें कि मेरी इतनी निष्ठा भरी उपासना निष्फल कैसे हो गई? इतना समाधान करा देना भी आपका वरदान पर्याप्त होगा, जब आप गायत्री तेज के सम्मुख होने तक का साहस न कर सके तो आपसे अन्य वरदान क्या माँगू।"
उपासना का तत्त्वदर्शन है। जागृत अवस्था में कार्य करने वाला मन विभिन्नता की कल्पना करता है। जब वही मन एकाग्र हो स्थिर होने लगता है तो विविधता की कल्पनाएँ मिट जाती हैं और एकता का— जीव−ब्रह्म की पारस्परिक निकटता का अनुभव होने लगता है। जागृति की दूसरी अवस्थाएँ हैं— स्वप्न एवं सुषुप्ति। भूमा-अवस्था तो वहाँ भी होती है; पर वह मन की स्थिरता नहीं है।
उपासना (3) भविष्य निर्धारण की आराधना। संयम साधना में उपवास प्रमुख हैं। इस अवधि में सामान्य आहार की तुलना में आधा ही लिया जाता है। जो खाया जाए वह पूर्ण सात्विक एवं सुसंस्कारी हो, इसका ध्यान रखा जाता है। संयम को ही तप कहते हैं।
उपासना परमात्मा की, साधना अंतरात्मा की और आराधना विश्वात्मा की की जाती है। चांद्रायणकाल में बहिर्मुखी माया-प्रपंच से अवकाश प्राप्त किया जाता है और उस अवधि में अंतर्मुखी रहकर अंतर्जगत का पर्यवेक्षण किया जाता है। इस दिशा परिवर्तन के लिए नियोजित आत्मसाधना जितनी भावपूर्ण एवं गंभीर होगी उतना ही चांद्रायण का प्रत्यक्ष वरदान उपलब्ध होगा।
उपासना करता है कि ‘ध्यान ही ब्रह्म है’ उसके ध्यान की गति इतनी विस्तृत हो जाती है, जितनी की ब्रह्म की।
उपासना करता है। बाह्य परिस्थिति जैसी भी बने, जिसकी वृत्ति में चंचलता नहीं है, वही कुछ कर्त्तव्यपालन कर सकते हैं।
उपासना के विधि-विधान और मर्यादाओं का परिपालन करते हुए भी अभीष्ट लाभ नहीं मिल पाता। विषाक्त वातावरण का असाधारण प्रभाव पड़ता है। साथ ही परिवार-समाज के जिस परिवेश में मनुष्य रहता है, उसके संस्कार भी बने रहते हैं। फलस्वरूप मन को जबरन उन संस्कारों से मुक्त कर पाना कठिन पड़ता है। ऐसी स्थिति में–साधना का उच्चस्तरीय लाभ उठाने की दृष्टि से आवश्यक होता है कि सदा के लिए न सही, तो कुछ समय के लिए ऐसे सात्विक वातावरण में रहकर साधना की जाए जहाँ से अभीष्ट परिमाण में आत्मिक ऊर्जा जुटाई जा सके।
उपासना हैं। जीवन को अधिकाधिक पवित्र एवं प्रखर बनाने वाली सुसंस्कारिता की अवधारणा साधना है। लोक-मंगल का परमार्थ और उसके सहारे अपनी सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन ही आराधना है। उपासना परमात्मा की, साधना अंतरात्मा की और आराधना विश्वात्मा की की जाती है। चांद्रायणकाल में बहिर्मुखी माया-प्रपंच से अवकाश प्राप्त किया जाता है और उस अवधि में अंतर्मुखी रहकर अंतर्जगत का पर्यवेक्षण किया जाता है।
उपासना हेतु साधक को सहमत करने के लिए अनेकानेक तर्क, तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। इनका अवगाहन करने पर निष्कर्ष यही निकलता है कि आमतौर से आहार से क्षुधा निवृत्ति और स्वाद तृप्ति भर का जो लाभ समझा जाता है, यह मान्यता अधूरी-अविवेकपूर्ण है। आहार प्रकारांतर से जीवन है, साधक के लिए तो सफलता प्राप्ति के मार्ग का एक महत्त्वपूर्ण ‘माइलस्टोन’ है। यदि इस देवता की आराधना ठीक प्रकार से की जा सके तो शरीर को आरोग्य, मस्तिष्क को ज्ञान−विज्ञान, अंतःकरण को देवत्व का अनुदान, व्यक्तित्व को प्रतिभावान एवं भविष्य को उज्ज्वल संभावनाओं से जाज्वल्यमान बनाया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-June
उपासना−चिन्तन और चरित्र में शालीनता की− महाप्रज्ञा का समावेश करने की− जीवन साधना का समन्वय ही प्रकारान्तर से आत्म−निर्माण है। अग्रगामी सूर्य प्रथम इन शाश्वत लक्ष्यों को निजी जीवन में प्रतिष्ठापित करके सर्वसाधारण को यह विश्वास दिला सकने में समर्थ होंगे कि यह प्रयोग ने केवल सरल और सरस है वरन् हाथों−हाथों सत्यपरिणाम प्रदान करने वाला भी है। व्यक्तित्व में गरिमा का संवर्धन इतना बड़ा उपार्जन है जिसकी तुलना हजार मन रत्नराशि एकत्रित करने से भी भारी सिद्ध होती है।
उपासनात्मक पुरुषार्थ का अवलम्बन करना चाहिए। इसके लिए लक्ष्य−इष्ट−निर्धारण करना होता है। भारत की सनातनी परम्परा में वह महाप्रज्ञा के रूप में ही निर्धारित है। गुरु मन्त्र गायत्री है। संध्या−वन्दन का आधार वही है।
उपासना से अन्तराल की प्रसुप्त श्रद्धा को जगाया और समर्थ, सक्षम बनाया जाता है। उपासना देवताओं की जेब काटने वाली चालाकी नहीं वरन् अन्तः− करण में उत्कृष्टता भर वाली ब्रह्म विद्या है। इस तथ्य को पुजारी लोग तो अनुभव नहीं कर सकते किन्तु यथार्थता के अति निकट जा पहुँचने के कारण प्रज्ञा परि−जन उस तथ्य का—सत्य का—प्रत्यक्ष दर्शन करेंगे।
उपासना परमात्मा की,की जाती है। परमात्मा का अर्थ फिर एक बार समझ लेना चाहिए। विराट्−महान उदात्त। उसे आदर्शों का समुच्चय कह सकते हैं। उसके साथ सम्बन्ध स्थापित करने का नाम ही प्रतिफल है− संकीर्ण स्वार्थपरता से मुक्ति।
उपासना का महत्व ही चला जाता है। जो भी, जितना भी किया जाय श्रद्धा युक्त हो।
उपासना उपक्रम सुनिश्चित आधार पर अवलम्बित सुनिश्चित विज्ञान है। उसमें न भटकाव है न दिवास्वप्न देखने का जंजाल। पुरुषार्थ का प्रतिफल हर क्षेत्र में सुनिश्चित है फिर आत्मोत्कर्ष के क्षेत्र में ही क्यों कोई व्यतिरेक खड़ा होगा।
उपासना की सफलता में आधार भूत कारण होता है। उसमें जैसे−जैसे वृद्धि होगी आत्मा से परमात्मा का प्रकाश अनुदान भी उसी अनुपात से उतरता बढ़ता चला जायगा। यह उपलब्धि मात्रा में थोड़ी होने पर भी व्यक्तित्व को उभारने और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना सुनिश्चित बनाने में भावभरी उपासना का असाधारण योगदान रहता है इस तथ्य को समझना और उस मार्ग पर चल पड़ना ही श्रेयष्कर है।
उपासना का असाधारण योगदान रहता है इस तथ्य को समझना और उस मार्ग पर चल पड़ना ही श्रेयष्कर है।
उपासना कहते हैं। इन्हीं दिनों उसे युगावतार के अनुरूप प्रज्ञा आराधना कह सकते हैं। इसका अभ्यास इन दिनों करना ही होगा। मात्र सामर्थ्यों से ही इन दिनों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। इन आवश्यकता की पूर्ति का छोटा श्री गणेश प्रज्ञा परिजनों के लिए निर्धारित प्रथम सूत्र में होता है।
उपासना से आस्था उच्चस्तरीय बनती है और साधना से व्यवहार में शालीनता उभरती है यह दोनों तत्वतः आस्थाएँ हैं। जिन्हें भाव संस्थान और मनःसंस्थान में प्रतिष्ठित करने के उपरान्त गाड़ी आगे चलती हैं। इस स्थिति पर पहुँचने से ही आदर्शवादिता अपना चमत्कार दिखाती है।
उपासना क्षेत्र में भी अपनाई जानी चाहिए। यहीं यह मानकर चला जा रहा है कि सभी प्रज्ञा परिजनों का पट्टी पूजन हो रहा है। वर्णमाला का ककहरा पढ़ाया जा रहा है। जिसकी प्रगति आगे तक पहुँची हो वे गायत्री महाविज्ञान ग्रन्थ एवं युग शक्ति गायत्री के पिछले अंक पढ़लें निजी पत्र−व्यवहार करके अपने उपयुक्त अगला मार्ग दर्शन प्राप्त कर लें इन पंक्ति यों का उद्देश्य श्रीगणेश शुभारम्भ कराना है। अच्छा हो सभी एक साथ कदम मिलाकर चलें और नये पुराने का भेद न करके एक ही पंक्ति में बैठ कर भोजन करें।
उपासना यदि सही रीति से की जा सके तो उसके परिणाम भी ऐसे ही होते हैं जैसे कि उपरोक्त उदाहरणों से छोटों की बड़ों के साथ एकता होने पर विनिर्मित होते हैं। आत्मा अपूर्ण है। उसकी पूर्णता से वह समीपता अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होती है जिसे अध्यात्म भाषा में ‘उपासना’ कहा जाता है। महामानवों के संपर्क सान्निध्य अनुग्रह से अनेकों सामान्य व्यक्ति महान बने हैं। फिर परमात्मा सत्ता के साथ एकात्मता स्थापित करने वाले क्यों ऐसे लाभों से लाभान्वित न होंगे जैसे कि भक्तजनों में पाई जाने वाली विशेषताओं और विभूतियों के रूप में कहे, समझे और जाने जाते हैं।
उपासना अपना चमत्कार दिखाये बिना न रहेगी।
उपासना की है। सृष्टा की अगणित क्षमताएँ इस विश्व ब्रह्माण्ड की दृश्य और अदृश्य गति विधियों का सूत्र संचालन करती है उनमें से एक सत्ता है−परमात्मा। यह आत्मा के चरम उत्कर्ष की परिणति है। आत्मा के चरम उत्कर्ष की परिणति है आत्मा क्षुद्र है परमात्मा महान। आत्मा सीमित है—परमात्मा असीम।
उपासना’ कहा जाता है। महामानवों के संपर्क सान्निध्य अनुग्रह से अनेकों सामान्य व्यक्ति महान बने हैं। फिर परमात्मा सत्ता के साथ एकात्मता स्थापित करने वाले क्यों ऐसे लाभों से लाभान्वित न होंगे जैसे कि भक्तजनों में पाई जाने वाली विशेषताओं और विभूतियों के रूप में कहे, समझे और जाने जाते हैं।
उपासना के न्यूनतम समन्वय की बात हुई। अब निष्ठावान् प्रज्ञा परिजनों की बात आगे आती है। उनके लिए न्यूनतम निर्धारण में इतना और जुड़ता है कि प्रातःकाल आँख खुलते ही बिस्तर पर पड़े−पड़े पन्द्रह मिनट मानसिक जप और आलोक अवतरण का ध्यान करें। इसी प्रकार रात्रि को सोने से पूर्व पन्द्रह मिनट निदिध्यासन की साधना करें। इसके दो अंग हैं—मनन और चिन्तन।
उपासना की युग प्रक्रिया सीखनी, अपनानी और कार्यान्वित करनी होगी। इस आधार पर वे अनुभव करेंगे कि उन्हें कोई बड़ा आश्रय अवलम्बन मिला है। अकेले नहीं रह रहे हैं किसी सर्वसमर्थ सत्ता की छत्र छाया में उनका चेतनात्मक अभ्युत्थान हो रहा है। स्मरण रहे यह आन्तरिक बलिष्ठता भौतिक समर्थताओं की तुलना में कहीं अधिक उच्चस्तर की और समस्त सम्पदाओं की तुलना में अधिक दूरगामी अधिक चिरस्थायी, सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली है।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों में अभीष्ट उद्देश्य पूरा कर सकने की क्षमता जब आती है जब उसमें भाव संस्थान का श्रद्धा, विचार संस्थान की प्रज्ञा और शरीर संस्थान की व्यवहार गत निष्ठा का भी त्रिविधि समन्वय हो। यह त्रिवेणी संगम जहाँ भी बनेगा उपासना अपना चमत्कार दिखाये बिना न रहेगी।
उपासना जीवन साधना और परिवार निर्माण की आराधना करते हुए अन्तरंग, बहिरंग और पारिवारिक क्षेत्र को किस प्रकार समुन्नत बनाना चाहिए। इसकी विद्या सीखनी और कार्य रूप में परिणति करनी होगी। अभ्यास के कारण ही यह प्रयोग कठिन प्रतीत होता है, पर जब उस असमंजस को दूर कर नव निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश किया जायगा तो प्रतीत होगा कि जो कठिन समझा जाता रहा यहां कितना सरल है। जिस नीरस माना गया था वह कितना सरस है। जिसमें घाटा प्रतीत होता था वह कितना लाभदायक है अवाँछनीयता अपनाने में बुद्धिमानी और आदर्शों के अवलम्बन में मूर्खता समप्र जाने को लोक मान्यता की असत्यता प्रज्ञा परिजन इस दिशा में कुछ ही कदम उठाने के उपरान्त भला प्रकार सिद्ध कर सकते हैं।
उपासना की दिशा में कदम बढ़ाने का तात्पर्य है आत्मा में महानता के समावेश का उपक्रम इससे तत्काल प्रत्यक्ष कितना लाभ होता है। इसका तो निश्चय नहीं किन्तु कुछ ही कदम बढ़ने पर समय को बर्बादी जैसा असमंजस दूर हो जाता है। बीज बोकर धैर्य पूर्व अंकुर उगने और समयानुसार फसल पकने पर विश्वास करने वाले किसान जैसी मनःस्थिति उपासना मार्ग पर चलने वाले की भी हो जाती है।
उपासना पद्धति प्रज्ञा परिजनों के लिए इन दिनों निर्धारित हो गई है जो इसे अपनायेंगे वे अनुभव करेंगे कि उनकी आत्मा परमात्मा के साथ जुड़ने के लिए अग्रसर हो रही है। यह मिलन संयोग ही आत्म−साक्षात्कार, या ब्रह्म साक्षात्कार कहलाता है। आरम्भ में इसकी मात्रा थोड़ी या सामान्य हो, कोई गहरी अनुभूति न होती हो तो भी हर्ज नहीं। पूर्व संचित और श्रद्धा विश्वास का स्तर उपासना की सफलता में आधार भूत कारण होता है। उसमें जैसे−जैसे वृद्धि होगी आत्मा से परमात्मा का प्रकाश अनुदान भी उसी अनुपात से उतरता बढ़ता चला जायगा।
उपासना मार्ग पर चलने वाले की भी हो जाती है।
उपासना के माध्यम से परमात्म सत्ता के साथ घनिष्ठता जोड़ना और उस भण्डार से अभीष्ट समर्थता उपलब्ध करना।
उपासना आत्मा की करनी होती है। समग्र परमेश्वर तो अचिन्तय है। साक्षी, दृष्टा भी। उसकी व्यापकता और विधि −व्यवस्था तो मानवी बुद्धि की कल्पना से भी परे हैं। इसलिए परब्रह्म की सत्ता के साथ जुड़े हुए अनुशासन का निर्वाह की पर्याप्त माना जाता है उपासना परमात्मा की,की जाती है।
उपासना देवताओं की जेब काटने वाली चालाकी नहीं वरन् अन्तः− करण में उत्कृष्टता भर वाली ब्रह्म विद्या है। इस तथ्य को पुजारी लोग तो अनुभव नहीं कर सकते किन्तु यथार्थता के अति निकट जा पहुँचने के कारण प्रज्ञा परि−जन उस तथ्य का—सत्य का—प्रत्यक्ष दर्शन करेंगे।
उपासना ऐसी है जिसमें उपेक्षा, अश्रद्धा के अतिरिक्त और कोई कठिनाई आड़े नहीं आती। पूजा उपचार देवता का करने से आत्म देव में पात्रता और प्रखरता की प्राण प्रतिष्ठा करने के लिए पवित्रीकरण, आचमन, शिखा− वन्दन, प्राणायाम, न्यास, पृथ्वी पूजन के षट्कर्म करने चाहिए। इसका सरल विधान किसी भी अभ्यस्त उपासक से पूछ लेना चाहिए।
उपासना इसलिए फलवती नहीं होती कि उसके साथ श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा का त्रिविधि समन्वय नहीं होता। अन्न, जल, वायु शरीर के ऊर्जा प्रदान करते और जीवित रखते हैं। आत्मा को परमात्मा के साथ आदान−प्रदान स्तर की घनिष्ठता स्थापित करने के लिए श्रद्धा,प्रज्ञा और निष्ठा चाहिए। कर्मकाण्ड तो उसकी प्रयोग प्रक्रिया का वाहन वारण हैं। मात्र कृत्यों से तो शरीरगत हलचल का ही प्रमाण मिलता हैं।
उपासना का केन्द्र बिन्दु परमात्मा सविता को—महाशक्ति−सावित्री पर अवलम्बित होना चाहिए। उसका दृश्य स्वरूप सविता और शब्द शक्ति सावित्री है। सविता सूर्य को कहते हैं। सावित्री वही है जो ॐकार, तीन व्याहृति सहित चौबीस अक्षरों वाली गायत्री के रूप में प्रख्यात है। सविता का ध्यान किया जाता है और गायत्री का जप।
उपासना के सूक्ष्म पुरुषार्थ पर पूजा अर्चा को उपचार प्रक्रिया का भी समावेश करना पड़ता है। महाप्रज्ञा के रूप में परमात्मा सत्ता के साथ घनिष्ठता साधने की विधि−व्यवस्था के तीन आधार समझे जाने चाहिए (1) प्रतीकोपचार (2)गायत्री जप (3)सविता की ध्यान धारणा। तीनों का त्रिवेणी संगम बनता है। आत्मोत्कर्ष में इन तीनों की वैसी ही उपयोगिता है जैसी कि शरीर निर्वाह में अन्न, जल और वायु की।
उपासना को अध्यात्म कहते हैं और जीवन साधना को धर्म−धारणा। उपासना से आस्था उच्चस्तरीय बनती है और साधना से व्यवहार में शालीनता उभरती है यह दोनों तत्वतः आस्थाएँ हैं। जिन्हें भाव संस्थान और मनःसंस्थान में प्रतिष्ठित करने के उपरान्त गाड़ी आगे चलती हैं। इस स्थिति पर पहुँचने से ही आदर्शवादिता अपना चमत्कार दिखाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-December
उपासनात्मक कर्मकाण्ड के साथ−साथ इस भाव साधना को भी चलाना चाहिए। गायत्री महामन्त्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही सम्भव होती है और इसी के परिणाम स्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका महात्म्युत वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया गया है।
उपासनाएँ कुछ कम कर दी जायेंगी और बदले में उन्हें (1) भाषण सम्भाषण (2) संगीत अभ्यास (3) आसन प्राणायाम एवं जड़ी−बूटी विज्ञान के स्वास्थ्य सम्वर्धन की तीन कक्षाओं में सम्मिलित रहने का अवसर मिलेगा साधना तो भी कुछ कल्प साधना के लिए निर्धारित क्रम के अनुरूप ही चलती रहेगी। साधना प्रधान मंत्रों में सम्मिलित होने वालों का प्रधान विषय तो नहीं रहेगा किन्तु उन्हें भी तीन घन्टे नित्य उपरोक्त तीन कक्षाओं में सम्मिलित रहने का अवसर मिल सकेगा। इस प्रकार शिक्षा प्रधान कल्प साधना के लिए आने वाले युग शिल्पियों जितनी तो नहीं पर उससे कुछ ही कम मात्रा में उपरोक्त तीनों विषयों की काम चलाऊ जानकारी मिल जायगी। इस प्रकार अब इन एक महीने के सत्रों में सम्मिलित होने वाले दुहरा लाभ उठा सकेंगे। आत्मबल की अभिवृद्धि, उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण एवं लोक नेतृत्व के लिए आवश्यक भाषण, संगीत एवं चिकित्सा उपचार की त्रिविध विशेषताएँ भी हस्तगत हो सकेंगी।
उपासना के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। यही बात साधना पर लागू होती है। उसे भजन के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। वातावरण शान्त और स्थान एकान्त होना चाहिए। आँखें बन्द करके आराम कुर्सी पर पड़े हुए यह सोचना चाहिए कि—”शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकल कर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा।
उपासना में फर्ममाण्ड परक पर्ट्पग, आत्मशोधन, जप, देवपूजन आदि उपचार सम्पन्न करने पड़ते हैं। इससे डडडड की उच्चस्तरीय गायत्री साधना में भावपद का प्राधान्य है। इसके भी तीन चरण हैं। उच्चस्तरीय गायत्री साधना के भावपक्ष को (1) भजन (2) मनन और (3) चिन्तन कहा जा सकता है। इन्हें त्रिपदा गायत्री के भावपक्ष के तीनचरण कहा जा सकता है।
उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही सम्भव होती है और इसी के परिणाम स्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका महात्म्युत वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया गया है।
उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मू. 80 पैसा मात्र 15 पुस्तकों के सैट का मू. 12.00 ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार है।
उपासना, आराधना किया करते थे। वे अन्तरिक्षीय गतिविधियों के अध्ययन पर्यवेक्षण के साथ−साथ उनसे लाभ उठाने के लिए साधनात्मक विधि−व्यवस्था बनाते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-January
उपासना का अर्थ होता है–समीप बैठना। समीप बैठना वैसा–जैसा कि गीली लकड़ी आग के समीप पहुँचकर अपना गीलापन समाप्त कर लेती है और आग की ऊष्मा को अपने में धारण करके सूखती चली जाती है। अधिक निकट पहुँचने पर स्वयं आग बन जाती है। उपासना का वास्तविक स्वरूप यही है। महानता की समस्त उत्कृष्टताओं के पुंज परमेश्वर का सान्निध्य प्राप्त करके साधक उसकी गुण गरिमा को क्रमशः अपने में अधिकाधिक मात्रा में भरता चला जाए।
उपासना का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि आत्म−शोधन की प्रक्रिया पूर्ण की जाय। यह प्रक्रिया प्रायश्चित्त−विधान से ही पूर्ण होती है। हठयोग में शरीर−शोधन के लिए नेति–धोति, वस्ति, न्योलि, कपाल–भाति क्रियाएँ करने का विधान है। राजयोग में यह शोधन कार्य यम−नियमों के रूप में करना पड़ता है। भोजन बनाने से पूर्व चौका−चूल्हा, बर्तन आदि की सफाई करली जाती है।
उपासना विज्ञान पर चित्र−विचित्र लाँछन लगाते देखे जाते हैं। सभी जानते हैं कि जादूगरी मात्र छलावा है। मिट्टी से रुपया बनाना, हथेली पर सरसों जमाना विज्ञान के सामान्य नियमों से सर्वथा विपरीत है। मिट्टी से रुपया बन तो सकता है, पर उसके लिए किसान, कुम्हार या ईंट पकाने वाले जैसी सुनियोजित प्रक्रिया का आश्रय लेना होता है। पूजा−उपचार के जादूगरी जैसे परिणाम देखने के लिए आतुर व्यक्ति बालकों जैसी आशा−निराशा के झूले में झूलते रहते है।
उपासना–परमात्मा की–अर्थात् आदर्शों के लिए आत्म समर्पण की श्रद्धा−भावना। (2) साधना–अन्तरात्मा की। जीवन देवता की। जिसमें कुसंस्कारों से जूझने और सद्गुणों को अभ्यास में उतारने वाला पराक्रम। (3) आराधना– विश्वात्मा की।
उपासना करने लगी। प्रसन्न होकर ज्ञान की देवी प्रकट हुई और शीला से उन्होंने वर माँगने को कहा। शीला ने प्रार्थना की कि यदि उसके पति की मृत्यु पहले हो जाय तो भी पति की आत्मा उसके समक्ष बनी रहे। देवी सरस्वती यह वरदान देकर कि शीला जब भी स्मरण करेगी वह प्रकट हो जायेंगी और उसकी इस इच्छा की पूर्ति करेगी, अंतर्ध्यान हो गयी। कुछ समय बाद राजा की मृत्यु हो गयी।
उपासना का चमत्कार कह सकता है।
उपासनाएँ, साधनाएँ भक्ति भावनापूर्वक होती रहें।
उपासना के फलितार्थों के सम्बन्ध में भी इसी दृष्टिकोण से सोचा जाना चाहिए।
उपासना, साधना एवं आराधना की सुगन्धित शोभा सुषमा के सहारे उल्लसित रहने और प्रमुदित करने की प्रक्रिया सहज ही सधती रहे।
उपासना का वास्तविक प्रयोजन अपने मन मन्दिर को बुहार कर इस योग्य बनाना है कि उस स्वच्छता से सन्तुष्ट होकर ब्राह्मी शक्ति उस क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए सहमत हो सके। शरीर को नित्य स्नान कराते हैं, कपड़े नित्य धोते हैं, दाँतों को मंजन नित्य करना होता है, कमरे में झाडू नित्य लगाते हैं, इस दैनिक स्वच्छता का प्रयोजन इतना ही हैं कि मलीनता के कारण उत्पन्न होने वाली दुर्गन्ध, रुग्णता एवं कुरुचि से बचा जा सके। इसमें कोई अतिरिक्त चमत्कार नहीं होता। स्वच्छता अपनाने से चित्त हल्का होता है। सभ्य लोगों की पंक्ति में सम्मान पूर्वक बैठने का द्वार खुलता है और मलीनताजन्य बीमारियों से सहज ही बचाव होता रहता है।
उपासना, आराधना जुड़ी हुई है। पापों का प्रायश्चित मात्र उपवास भर से नहीं होता, परिशोधन के लिए जीवन साधना और क्षति पूर्ति के लिए उदार पारमार्थिकता का प्रमाण−परिचय देना पड़ता है। इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखे रहना चाहिए।
उपासना का वास्तविक स्वरूप यही है। महानता की समस्त उत्कृष्टताओं के पुंज परमेश्वर का सान्निध्य प्राप्त करके साधक उसकी गुण गरिमा को क्रमशः अपने में अधिकाधिक मात्रा में भरता चला जाए। यही दैवी विभूतियाँ व्यक्तित्व को श्रेष्ठ, शालीन उदार और उदात्त बनाती है। कहना न होगा कि व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्ति एक प्रकार से सिद्ध पुरुष ही होता है। उसका मूल्य हर क्षेत्र में सामान्य नर पशुओं की तुलना में हजारों लाखों अधिक आँका जाता है।
उपासना उपचार पर करना होता है, उससे कहीं अधिक प्रयास अपनी भाव चेतना में उत्कृष्टता का समावेश करने के लिए करना होता है। यह मरुस्थल को सुरम्य उद्यान में बदलने जैसा परम पुरुषार्थ है।
उपासना जिन्हें भी करनी हो वे इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए करें। उस आधार पर उपलब्ध होने वाली दिव्य प्रेरणाओं के सहारे अपने गुण, कर्म, स्वभाव की प्रसुप्त विशेषताओं को विकसित करें और उन्हीं समस्त सिद्धियों−विभूतियों को पाने के अधिकारी बनें जो भक्ति योग की साधना करने वालों में मिलने की बात शास्त्रकारों एवं आप्त जनों ने अपने प्रतिपादनों में समय−समय पर बताई है।
उपासना के गुणवान लिखे हैं– वह यही देवाधिदेव आत्मदेव है। इसके लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं। वह अपने ही भीतर बैठा–प्रस्तुत की स्थिति में है। आवश्यकता इसे जगाने भर की है। साधना−पुरुषार्थ इसी निमित्त नियोजित है।
उपासना में व्रतशील रहना। आहार में सात्विकता रखना, सादगी अपनाना। अस्वच्छता और अव्यवस्था को बदलने में तनिक भी ढील न होने देना। मिल बाँट कर खाना। हँसते−हँसाते जीना।
उपासना उपचार कह सकते हैं, किन्तु उसे लहलहाते पौधे का रूप देने के लिए भाव श्रद्धा का खाद पानी अनिवार्यतः चाहिए। अन्यथा बीज बोने में जो परिश्रम एवं धन खर्चा गया, वह भी बेकार चला जायेगा। यहाँ उस तथ्य का रहस्योद्घाटन किया जा रहा है जिस पर साधना की सफलता–असफलता का केन्द्र–बिन्दु निर्धारित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-August
उपासनात्मक उपचार करने वाले जब प्रतिफलों के सम्बन्ध में निराश होते हैं तो एक प्रकार से नास्तिक ही बनते जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि एक अत्यन्त उच्चस्तरीय एवं महान सम्भावनाओं से भरे-पूरे विज्ञान को उपहासास्पद बनना-तिरस्कृत होना पड़ता हैं। इस स्थिति से भारी हानि यह हो रह है कि उन असाधारण उपलब्धियों से व्यक्ति ओर समाज को वंचित रहना पड़ रहा है जो समस्त मानवी समुदाय को आन्तरिक उत्कृष्टता एवं बहिरंग सुसम्पन्नता से भरापूरा रख सकती थी।
उपासना का एक महत्वपूर्ण अंग समझा जाता था। सूर्य की हर गतिविधियों को एक दैवी व्यवस्था के रूप में ही प्रतिपादित किया गया। उसका नियत समय दिशा में ही उदय होना तथा अस्त होना, ऋतु परिवर्तन की निर्धारित प्रक्रिया आदि का रहस्य हजारों वर्षों तक लोगों के दिमाग में ठीक-ठीक नहीं बैठ पाया था। हमारे पूर्वज इन सारी प्रक्रियाओं को एक दैवी अनुग्रह मानते थे और यह प्रतिपादन देते थे कि नित्य एक नया सूर्य उदय होता है तथा सायं को वह समुद्र में समा जाता है। कालान्तर में ज्यों-ज्यों आदमी का बुद्धि विकास हुआ त्यों-त्यों यह तथ्य सामने आया कि सूर्य एक ग्रह है और उसकी क्षमता अन्य सभी ग्रहों से सर्वोपरि है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-October
उपासना, शास्त्र, कथा-सत्संग, दान-पुण्य-तीर्थ,
भजन आदि क्रिया-कृत्यों के पीछे मूलभूत उद्देश्य एक ही है कि मानवी चिंतन,
पतनोन्मुख प्रवृत्तियों से विरत होकर पवित्रता और प्रखरता अपनाएँ, संयमी और
उदारचेता बनें। चरित्रनिष्ठा और समाजनिष्ठा के सभी महत्त्वपूर्ण तथ्य उसमें
कूट-कूटकर भरे हैं। चिथड़ों में लिपटा हुआ हीरा भी ग्राह्य है। प्रस्तुत
विकृतियों के ढकोसले को उखाड़कर यदि अंतराल तक पहुँचने और वस्तुस्थिति का
पता लगाने का प्रयत्न किया जाए तो पता चलेगा कि धर्म मानवी उत्कृष्टता का
जीवन-प्राण है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-March
उपासना कहा जा सकता है। जब भी कभी मानवी एकता के सूत्रों को चुना जायगा तो निश्चिततः गायत्री को ही महामन्त्र के रूप में स्वीकारा जायगा।
उपासना की गयी अथवा उपासना फलदायी होती ही नहीं। असफलता मिलने पर बहुतायत ऐसों की ही होती है जो अपने को नहीं, दोष दैव को−भाग्य को−देते देखे जाते हैं। प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के अभाव में तथा श्रुतियों के भ्रम−जंजालों के कारण भोले साधना पारायण व्यक्ति भी इस विडंबना से ग्रस्त दुःखी होते देखे जाते हैं।
उपासना करने लगे। एक वर्ष तक वे जप करते रहे। पर उन्हें वह उपलब्धियाँ नहीं प्राप्त हो सकीं जो मन्त्री को हुई थीं। निराश होकर एक दिन मन्त्री को बुलाकर कारण पूछा। मन्त्री ने उत्तर देने के बदले राज्य के एक किशोर लड़के को बुलाया और कहा–बेटे! राजा के गाल पर एक चपत लगाओ।
उपासना।” ये सर्वसाधारण के लिये ही है। उपासना क्रम ऐसा है जिसका पालन कर सकना सर्वसुलभ हो– मन्त्रोपचार के किन्हीं भी पेचीदा विधि-विधानों का दबाव न हों। पुरश्चरण कड़े होते हैं और उन्हीं के लिये उपयुक्त पड़ते हैं जो पूरा समय–पूरा मनोयोग उसी कार्य में नियोजित रखे रह सकते हों व कड़ी तपश्चर्या का पालन कर सकते हों। इसी कारण लिये सर्व श्रेष्ठ है।
उपासना एवं ध्यान धारण को भक्ति योग, स्वाध्याय-सत्संग को स्थूल और चिन्तन-मनन को सूक्ष्म ज्ञानयोग तथा व्रतोपवास के अनुशासन को कर्मयोग कहा जाता है। इस समन्वय में तीनों शरीरों को परिष्कृत करने वाली तीन प्रकार की विधि-व्यवस्था के अंतर्गत समूचे
उपासना की आवश्यकता भी पड़ती है किन्तु सूक्ष्म जगत को प्रभावित करने के लिये अध्यात्म पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है। वह एकाकी तो अपने स्थान पर चले ही, उसे सामूहिक स्तर का भी बनाया जाना चाहिए।
उपासना के चमत्कार देखना हो तो वैज्ञानिक और भावनात्मक दोनों ही आधारों की कसौटी पर नवरात्रि की गायत्री साधनावधि में कसकर देख सकते हैं। व्यक्तित्व का परिष्कार, अन्तराल से विभूतियों के रत्नों का निकल पड़ना व विपत्ति बाधाओं का निराकरण ये प्रत्यक्ष प्रति फलों से रूप में मिलते देखे जा सकते हैं।
उपासना करने के बाद जब उसे कोई विशेष उपलब्धि नहीं हुई तो वह सन्त के पास जाकर बोली देव! भगवान भी बड़ा पाती है। वह किसी-किसी को तो ऋद्धि-सिद्धियों का स्वामी बना देता है और किसी को प्रकृति भी नहीं देता हैं। सन्त ज्ञानेश्वर मुस्कराये और बोले–”बहिन। ऐसा नहीं है। भगवान विशिष्ट विभूतियाँ सत्पात्रों को देता है।
उपासना का उद्देश्य अन्तःक्षेत्र में उच्चस्तरीय श्रद्धा का आरोपण, परिपोषण एवं अभिवर्धन। इस प्रचण्ड सामर्थ्य से देव शक्तियों को भी आह्वान आमंत्रण ताकि उनकी तपः शक्ति से असुरों से संघर्ष किया जा सके।
उपासना की जाय ताकि सूक्ष्म जगत का उद्देश्य पूरा होता रहे। सूर्योदय और सूर्यास्त काल को ही सन्ध्यावन्दन के लिये क्यों निर्धारित किया गया, इसका एक ही उत्तर है कि इससे संयुक्त शक्ति की अत्यन्त प्रभावशाली प्रचण्ड धारा उत्पन्न होती है। यह शक्ति के केन्द्रीकरण का चमत्कार है। गायत्री उपासना में वे सारे तत्व विद्यमान है जो व्यक्ति को लौकिक दृष्टि से स्वस्थ, सुखी, सन्तुष्ट, समृद्ध बनाने वाला प्राण तो फूँकते ही हैं, साथ ही उसे आत्मिक दृष्टि से इतना अधिक सक्षम और समर्थ बना देते हैं जिससे कोई भी अवाँछनीयता, अनैतिक उसका कोई अनिष्ट न कर सके। इस शक्ति का सामूहिक उत्पादन तो और भी अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियों के द्वार खोलता है।
उपासना में वे सारे तत्व विद्यमान है जो व्यक्ति को लौकिक दृष्टि से स्वस्थ, सुखी, सन्तुष्ट, समृद्ध बनाने वाला प्राण तो फूँकते ही हैं, साथ ही उसे आत्मिक दृष्टि से इतना अधिक सक्षम और समर्थ बना देते हैं जिससे कोई भी अवाँछनीयता, अनैतिक उसका कोई अनिष्ट न कर सके। इस शक्ति का सामूहिक उत्पादन तो और भी अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियों के द्वार खोलता है।
उपासना की व उस पर भी प्रदर्शन का दम्भ तुझ में है। यदि आत्मिक प्रगति की ओर ध्यान दिया होता तो मछली–कछुए को प्राप्त इस विशेषता से प्रकृति ऊँचा ही उठा होता।” शिष्य की आँखें खुलीं। वह फिर चल पड़ा आत्मिक प्रगति हेतु तपश्चर्या करने। इतना कहते हुए परमहंस बोले–सच्चा साधक कभी सिद्धियों के व्यामोह में नहीं उलझता।
उपासना−साधना की चर्चा इसलिये का जा रही है कि समय विशेष को– संक्रान्तिकाल को देखते हुए यह आवश्यक है। सामूहिकता में जो शक्ति है उसे यदि अपने अन्तः से सब लोग मिलकर उभार सकें तो इस धरती पर स्वर्ग का अवतरण होने में जरा भी देर न लगे।
उपासना। विडंबना यह है कि इस सम्बन्ध में जितने भ्रम−जंजाल फैले हैं उतने साधनादि अन्यान्य विषयों में नहीं। उपासना का दर्शन समझे बिना मात्र कर्मकाण्डों में उलझना एक प्रवंचना मात्र ही है। बहुसंख्य साधकों के साथ होता भी यही है। ऐसे व्यक्ति डींग तो बड़ी लम्बी−चौड़ी हाँकते हैं पर उपासना का कोई परिणाम उनके चिन्तन−चरित्र व्यवहार में परिलक्षित होता दीख नहीं पड़ता।
उपासना का अवलम्बन लेना क्यों अदूरदर्शिता माना जाय? निस्सन्देह यही सही जीवन की रीति−नीति है कि शरीरगत स्वार्थों का ध्यान रखने के अतिरिक्त आत्म−कल्याण की भी आवश्यकता समझी जाय और उपासना का आश्रय इसके लिये लिया जाय। इसे नियमित दिनचर्या का अंग बनायें तो हर व्यक्ति अनुपम लाभ प्राप्त कर सकता है।
उपासना का प्रचलन हुआ। वातावरण के अनुकूलन एवं सूक्ष्म जगत के परिशोधन में ऐसी ही संयुक्त उपासना शक्ति सफल कारगर सिद्ध होती है। सामूहिक रूप से नियत समय और नियत क्रम से विधि व्यवस्था से की गयी उपासना प्रचण्ड शक्ति का उत्पादन कर सकने में समर्थ हो सकती है। इस तथ्य को इन दिनों प्रत्यक्षतः कारगर होते देखा जा सकता है।
उपासना प्रचण्ड शक्ति का उत्पादन कर सकने में समर्थ हो सकती है। इस तथ्य को इन दिनों प्रत्यक्षतः कारगर होते देखा जा सकता है।
उपासना फलदायी होती ही नहीं। असफलता मिलने पर बहुतायत ऐसों की ही होती है जो अपने को नहीं, दोष दैव को−भाग्य को−देते देखे जाते हैं। प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के अभाव में तथा श्रुतियों के भ्रम−जंजालों के कारण भोले साधना पारायण व्यक्ति भी इस विडंबना से ग्रस्त दुःखी होते देखे जाते हैं।
उपासना विधान हैं, पर जहाँ तक ‘गुरुमन्त्र’ शब्द का सम्बन्ध है वह मात्र गायत्री के साथ जुड़ा है। इस्लाम में कलमा, ईसाई में बपतिस्मा को जो स्थान प्राप्त है वही हिन्दू धर्म में अनादि गुरु मन्त्र गायत्री को प्राप्त हैं। साधना की दृष्टि से गायत्री को ही सर्वांगपूर्ण माना जाता है। त्रिपदा के रूप में इसकी तीन सिद्धियों अमृत (आनन्द-उल्लास से भरा अन्तःकरण–चिरयौवन), पारस (उत्कृष्टतावादी प्रगतिशील सत्साहस) तथा कल्पवृक्ष (परिष्कृत चिन्तन-सद्बुद्धि प्राप्त होने तथा आप्तकाम होने का सौभाग्य अनुदान) के माध्यम इसकी महिमा शास्त्रों में गायी है। राम, कृष्ण आदि अवतारों की–देवताओं की–ऋषि-ऋषिकाओं का उपासना पद्धति भी गायत्री ही रही है।
उपासना की सही दिशा दे देना तथा अध्यात्म−पथ का पथिक बना देना। यात्रा पूरी करने में हमें अपने पैरों का सहारा लेना होता है। लाठियाँ तो सहारा भर देती हैं। सद्गुरु हमें पार उतारते हैं, पर उन तक पहुँचने के लिये शरीरधारी गुरु की भी अपने ढंग की आरम्भिक किन्तु महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सद्गुरु कैसे हों, उनकी पहचान क्या हो–इस विषय में आचार्य शकर ‘विवेक चूड़ामणि’ में लिखते हैं–
उपासना प्रक्रिया को अपनाते हुए भी एक चमत्कारी सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है, ऋद्धियों, सिद्धियों का स्वामी बन जाता है जबकि दूसरे को कोई विशेष लाभ नहीं मिल पाता?” परमहंस ने उत्तर में एक कथा सुनायी जो इस प्रकार थी– ‘‘किसी राज्य के मन्त्री ने अपने जप, तप से विशेष आध्यात्मिक शक्ति अर्जित करली। उसकी चमत्कारी विशेषताओं की सूचना राजा को मिली। राजा ने मन्त्री को बुलाकर रहस्य पूछा तो उसने बताया, यह सब गायत्री मन्त्र की उपासना का चमत्कार है। इसकी उपासना, साधना द्वारा सब प्रकृति प्राप्त कर सकना सम्भव है।
उपासना का भी है और वैयक्तिक परिष्कार के लिये अलग−अलग एकान्त उपासना की आवश्यकता भी पड़ती है किन्तु सूक्ष्म जगत को प्रभावित करने के लिये अध्यात्म पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है। वह एकाकी तो अपने स्थान पर चले ही, उसे सामूहिक स्तर का भी बनाया जाना चाहिए।
उपासना पद्धति भी गायत्री ही रही है। इस सर्वसाधारण का उपासना अनुशासन मानकर इसकी उपेक्षा करने वालों की कटु भर्त्सना की गयी है। सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिये की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप में महत्व मिला है। गायत्री, गंगा, गीता, गौ और गोविंद हिन्दू धर्म के पाँच आधार माने गये हैं। जिनमें गायत्री सर्वप्रथम है।
उपासना अर्थात् उप−आसन। समीप बैठना। ईश्वर उपासना का अर्थ है ईश्वर का सामीप्य पाना– ईश्वर अर्थात् सद्.गुणों का समुच्चय आदर्शों से ओत−प्रोत परम सत्ता। ऐसी सत्ता जिसका वरण कर हम श्रेष्ठ बन सकें– वर्तमान स्थिति से स्वयं को ऊँचा उठा सकें। ईश्वर और जीवों में यों समीपता तो है, पर है वह उथली।
उपासना को सही अर्थों में समझाना हो तो पहले उसके अर्थ पर एक दृष्टि डाली जाय। उपासना अर्थात् उप−आसन। समीप बैठना। ईश्वर उपासना का अर्थ है ईश्वर का सामीप्य पाना– ईश्वर अर्थात् सद्.गुणों का समुच्चय आदर्शों से ओत−प्रोत परम सत्ता। ऐसी सत्ता जिसका वरण कर हम श्रेष्ठ बन सकें– वर्तमान स्थिति से स्वयं को ऊँचा उठा सकें।
उपासना स्थली पर बैठकर इन सद्गुणों के सम्वर्धन का ही ध्यान किया जाय तो उल्टे ऋषिकेश को ही पार्थ अर्जुन का रथ चलाने–सफलता का पथ–प्रशस्त करने आना पड़ता है। भक्त और भगवान के बीच अनादिकाल से यही क्रम चलता आया है व चलता रहेगा।
उपासना का आश्रय इसके लिये लिया जाय। इसे नियमित दिनचर्या का अंग बनायें तो हर व्यक्ति अनुपम लाभ प्राप्त कर सकता है।
उपासना−साधना के रूप में जाना जाता है जिसमें व्यक्ति स्वयं को अनगढ़ से सुगढ़ व ईश्वर का सामीप्य पाने योग्य बनाता है।
उपासना का कोई परिणाम उनके चिन्तन−चरित्र व्यवहार में परिलक्षित होता दीख नहीं पड़ता। लगता है या तो वह आधार गलत है जिस पर उपासना की गयी अथवा उपासना फलदायी होती ही नहीं। असफलता मिलने पर बहुतायत ऐसों की ही होती है जो अपने को नहीं, दोष दैव को−भाग्य को−देते देखे जाते हैं। प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के अभाव में तथा श्रुतियों के भ्रम−जंजालों के कारण भोले साधना पारायण व्यक्ति भी इस विडंबना से ग्रस्त दुःखी होते देखे जाते हैं।
उपासना के सम्बन्ध में भी यही बात है। सामूहिक और सुगठित स्वरूप की उपासना के विशालकाय आयोजन वातावरण को बदलने– आमूलचूल रूप से सुधारने का महत् प्रयोजन पूरा करते हैं।
उपासना क्रम ऐसा है जिसका पालन कर सकना सर्वसुलभ हो– मन्त्रोपचार के किन्हीं भी पेचीदा विधि-विधानों का दबाव न हों। पुरश्चरण कड़े होते हैं और उन्हीं के लिये उपयुक्त पड़ते हैं जो पूरा समय–पूरा मनोयोग उसी कार्य में नियोजित रखे रह सकते हों व कड़ी तपश्चर्या का पालन कर सकते हों। इसी कारण लिये सर्व श्रेष्ठ है। लम्बे समय तक व्रत पालन करते रहने के लिये सुदृढ़ मनोबल चाहिये। संकल्प किसी बहाने से टूटे या उपेक्षापूर्वक चिन्ह पूजा की जाय इस से उत्तम यही है कि छोटे संकल्प लिए जायें।
उपासना के विधि−विधान एवं नियमों का कड़ाई के साथ पालन करते हुए भी देखे जाते हैं, पर उनमें से प्रकृति ही ऐसे होते हैं, जो अभीष्ट परिमाण में आध्यात्मिक उपलब्धियों को करतलगत कर पाते हैं। अधिकांश तो सीमित लाभ ही उठा पाते हैं। एक ने चमत्कारी सामर्थ्य अर्जित करली जबकि दूसरा खाली हाथ रह गया, इस अन्तर के कारणों का बारीकी से अध्ययन−विश्लेषण किया जाय तो एक ही तथ्य हाथ लगेगा कि श्रद्धा की न्यूनाधिकता ही इस भारी विरोधाभास का कारण बनती है।
उपासना, साधना द्वारा सब प्रकृति प्राप्त कर सकना सम्भव है। राजा ने भी मन्त्र और सम्बन्धित विधि-विधान पूछा और उपासना करने लगे। एक वर्ष तक वे जप करते रहे। पर उन्हें वह उपलब्धियाँ नहीं प्राप्त हो सकीं जो मन्त्री को हुई थीं। निराश होकर एक दिन मन्त्री को बुलाकर कारण पूछा।
उपासना की सार्थकता इसी में है कि जीव अपने आपको भ्रम जंजाल से मुक्त करे। यह मात्र प्राणायाम व ध्वनि की अनुभूति मात्र न बनकर रह जाय। स्वार्थवादी संकीर्णता, काम, क्रोध−लोभ, मोह आदि भव−बन्धनों से जकड़ी यह जीवात्मा दिग्भ्रांत बनी रहती है। इस स्थिति को ही जीव−भाव या जीव भूमिका कहा जाता है। इस भ्रम−जंजाल भरे जीव भाव को हटा दिया तो ईश्वर का विशुद्ध अंश ही अविनाशी निश्छल आत्मा के रूप में शेष रह जाता है।
उपासना के क्रमिक सोपान है। ध्यान इन सबके ऊपर है।
उपासनाओं को भी सामूहिकता की शृंखला में ही बाँधा गया है। मुसलमानों की नमाज का समय नियत है व प्रत्येक धर्मानुयायी कड़ाई के साथ उसका पालन करता है। जुम्मे की, ईद की नमाज पर एकत्र समुदाय की उपासना सामूहिक धर्मानुष्ठान का ही एक स्वरूप है।
उपासना की उच्च कक्षा माना गया है। नामोच्चार से बढ़कर वाक्, वाक् से बड़ा मन, मन से भी अधिक महत्वपूर्ण संकल्प से भी अधिक बलवान चित्त को कहा गया है। चित्त से भी बढ़कर सामर्थ्यवान ध्यान को बताया गया है। नाम−जप वाक् संयम, मनोनिग्रह, संकल्पोद्भव, चित्त निरोध ये सभी उपासना के क्रमिक सोपान है। ध्यान इन सबके ऊपर है।
उपासना का बहिरंग स्वरूप क्या हो–इसके विस्तार में अभी न जाकर यह देखा जाय कि परमेश्वर साधक के आन्तरिक स्तर को कैसा चाहता है? रामकृष्ण परमहंस कहते थे–”ईश्वर का दर्शन तब होता है जब पाँच सत्प्रवृत्तियाँ अन्दर प्रवेश पाने व फलने–फूलने लगती है। ये पाँच सत्प्रवृत्तियाँ हैं–उत्कृष्टता, निर्मलता, सहृदयता, उदारता, आत्मीयता। ये ही परमात्मा के–ईश्वरीय सत्ता के–भी गुण हैं। जैसे −जैसे इन गुणों का अनुपात अपने अन्दर बढ़ने लगता है, समझना चाहिए जीव उतना ही ईश्वर के समीप पहुँच गया है।
उपासना का अर्थ है ईश्वर का सामीप्य पाना– ईश्वर अर्थात् सद्.गुणों का समुच्चय आदर्शों से ओत−प्रोत परम सत्ता। ऐसी सत्ता जिसका वरण कर हम श्रेष्ठ बन सकें– वर्तमान स्थिति से स्वयं को ऊँचा उठा सकें। ईश्वर और जीवों में यों समीपता तो है, पर है वह उथली। जीव की सार्थकता तभी है जब उसका स्वरूप एवं स्तर भी उसी के अनुरूप ऊँचा उठे। शिश्नोदर परायण जीवन जीते हुए मनुष्य अपनी आस्थाओं को– आकाँक्षाओं को–दिव्य नहीं बना सकता।
उपासना विज्ञान के निर्धारण में इस तथ्य को बहुत महत्ता दी है कि नियत समय, नियत क्रम से निर्धारित मनोभूमि की व्यवस्था बनाकर उपासना की जाय ताकि सूक्ष्म जगत का उद्देश्य पूरा होता रहे। सूर्योदय और सूर्यास्त काल को ही सन्ध्यावन्दन के लिये क्यों निर्धारित किया गया, इसका एक ही उत्तर है कि इससे संयुक्त शक्ति की अत्यन्त प्रभावशाली प्रचण्ड धारा उत्पन्न होती है। यह शक्ति के केन्द्रीकरण का चमत्कार है। गायत्री उपासना में वे सारे तत्व विद्यमान है जो व्यक्ति को लौकिक दृष्टि से स्वस्थ, सुखी, सन्तुष्ट, समृद्ध बनाने वाला प्राण तो फूँकते ही हैं, साथ ही उसे आत्मिक दृष्टि से इतना अधिक सक्षम और समर्थ बना देते हैं जिससे कोई भी अवाँछनीयता, अनैतिक उसका कोई अनिष्ट न कर सके। इस शक्ति का सामूहिक उत्पादन तो और भी अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियों के द्वार खोलता है।
उपासना अनुशासन मानकर इसकी उपेक्षा करने वालों की कटु भर्त्सना की गयी है। सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिये की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप में महत्व मिला है। गायत्री, गंगा, गीता, गौ और गोविंद हिन्दू धर्म के पाँच आधार माने गये हैं। जिनमें गायत्री सर्वप्रथम है। यही नहीं, इसमें जिन तथ्यों का समावेश है, उन्हें देखते हुए निकट भविष्य में इसके मानव जाति का सार्वभौम मंत्र माने जाने की पूरी-पूरी सम्भावना है।
उपासना जिसमें ईश्वरीय गुणों से स्वयं को अनुप्राणित किया जाता है। यह आत्मिक पुरुषार्थ हर साधक के लिये अनिवार्य है।
उपासना हमें उसके समीप ले जाकर स्थायी बल प्राप्त कराती है। जितना सामीप्य हमें ईश्वर का–परमात्मा सत्ता का–मिलता है, उतनी ही श्रेष्ठताएँ हमारे अन्तःकरण में उपजती तथा बढ़ती चली जाती हैं। इसी अनुपात में हमारी आत्मिक शाँति–प्रगति का पथ–प्रशस्त होता चला जाता है।
उपासना का–मन्त्र जप का–चमत्कारी प्रतिफल उन्हें ही मिल पाता है जिन्होंने अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परमात्मा के अनुरूप ढाल लिया हैं।”
उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिये की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप में महत्व मिला है। गायत्री, गंगा, गीता, गौ और गोविंद हिन्दू धर्म के पाँच आधार माने गये हैं। जिनमें गायत्री सर्वप्रथम है। यही नहीं, इसमें जिन तथ्यों का समावेश है, उन्हें देखते हुए निकट भविष्य में इसके मानव जाति का सार्वभौम मंत्र माने जाने की पूरी-पूरी सम्भावना है। देश, धर्म, जाति, समाज और भाषा की सीमाओं से ऊपर इसे सार्वजनीन उपासना कहा जा सकता है।
उपासना का चमत्कार है। इसकी उपासना, साधना द्वारा सब प्रकृति प्राप्त कर सकना सम्भव है। राजा ने भी मन्त्र और सम्बन्धित विधि-विधान पूछा और उपासना करने लगे। एक वर्ष तक वे जप करते रहे। पर उन्हें वह उपलब्धियाँ नहीं प्राप्त हो सकीं जो मन्त्री को हुई थीं।
उपासना की नित्य निरन्तर आवश्यकता पड़ती है ईश्वरीय गुणों का समावेश अपने चिन्तन व्यवहार में इससे कम में हो ही नहीं सकता। आग के समीप बैठे बिना गर्मी आये कैसे?
उपासना सामूहिक धर्मानुष्ठान का ही एक स्वरूप है।
उपासना मार्ग पर आरुढ़ साधकों को दिव्य-अलौकिक शक्तियाँ भी मिलती हैं, पर उनके मिलने का आधार एक ही हैं–उपासना के साथ-साथ अपनी पात्रता का विकास करना। पात्रता अर्थात् अपने व्यक्तित्व को दैवी गुणों–देवत्व से परिपूर्ण बनाना। यह सम्भव हो सके तो वे विभूतियाँ अपने आप सहचरी बन सकती हैं जिन्हें विभूतियों एवं चमत्कारों के रूप में जाना जाता हैं।
उपासना द्वारा पूरी हो सकीं और चौदह रत्नरूपी सिद्धियों की उपलब्धि सम्भव हो सकी। रावण वानरों सहित सामूहिक साधना ही थी। श्रीकृष्ण का महारास तत्ववेत्ताओं द्वारा सामूहिक साधना का एक स्वरूप हो माना जाता है जिसमें वृत्तियों का सामूहिक विलय, विसर्जन समष्टि सत्ता में किया गया है। बुद्ध ने सामूहिक साधना के विशाल आयोजनों को व्यापक स्तर पर आयोजित कर लोक जागरण किया। महात्मा गाँधी ने भी सामूहिक प्रार्थना सभाओं का जागृति विस्तार का एक अनिवार्य अंग माना व उसे हमेशा महत्व देते रहे।
उपासना जैसी श्रद्धा व आस्था से करे तो मनुष्य के साधारण नित्य नैमित्तिक कार्य भी ईश्वरोपासना के रूप में बदल जाये व वैसी ही शाँति–सन्तोष–आनन्द के पुण्यफल देने लगे।
उपासना के विशालकाय आयोजन वातावरण को बदलने– आमूलचूल रूप से सुधारने का महत् प्रयोजन पूरा करते हैं।
उपासना शक्ति सफल कारगर सिद्ध होती है। सामूहिक रूप से नियत समय और नियत क्रम से विधि व्यवस्था से की गयी उपासना प्रचण्ड शक्ति का उत्पादन कर सकने में समर्थ हो सकती है। इस तथ्य को इन दिनों प्रत्यक्षतः कारगर होते देखा जा सकता है।
उपासना के माध्यम से आत्मा को परमात्मा से सम्बन्धित करने का प्रयास किया जाता है। यों तो वह हर समय, हर एक के पास, हर स्थिति में कोई भी काम करते समय बना रहता है। किन्तु सामान्य व्यक्ति उसके सान्निध्य की अनुभूति नहीं कर पाते। यदि मनुष्य अपने हर काम को परमात्मा को सौंप दे, हर काम उसी को जान समझ कर करे और हर क्रिया को उपासना जैसी श्रद्धा व आस्था से करे तो मनुष्य के साधारण नित्य नैमित्तिक कार्य भी ईश्वरोपासना के रूप में बदल जाये व वैसी ही शाँति–सन्तोष–आनन्द के पुण्यफल देने लगे।
उपासना का दर्शन समझे बिना मात्र कर्मकाण्डों में उलझना एक प्रवंचना मात्र ही है। बहुसंख्य साधकों के साथ होता भी यही है। ऐसे व्यक्ति डींग तो बड़ी लम्बी−चौड़ी हाँकते हैं पर उपासना का कोई परिणाम उनके चिन्तन−चरित्र व्यवहार में परिलक्षित होता दीख नहीं पड़ता। लगता है या तो वह आधार गलत है जिस पर उपासना की गयी अथवा उपासना फलदायी होती ही नहीं। असफलता मिलने पर बहुतायत ऐसों की ही होती है जो अपने को नहीं, दोष दैव को−भाग्य को−देते देखे जाते हैं।
उपासना, प्रार्थना में महत्वपूर्ण प्रयोजन यही है कि सदाशयता की संघबद्ध होने और एक दिशाधारा में चल पड़ने की व्यवस्था बन सके। महत्व तो व्यक्तिगत उपासना का भी है और वैयक्तिक परिष्कार के लिये अलग−अलग एकान्त उपासना की आवश्यकता भी पड़ती है किन्तु सूक्ष्म जगत को प्रभावित करने के लिये अध्यात्म पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है। वह एकाकी तो अपने स्थान पर चले ही, उसे सामूहिक स्तर का भी बनाया जाना चाहिए।
उपासना का, ईश्वर की समीपता का उपक्रम अपनाया जाता है। संगति का−समीप बैठने का– महत्व सर्वविदित है– चन्दन के समीप बहने वाली सुगन्धित पवन आस−पास के वृक्षों को भी वैसा ही सुरभित बना देती है। टिड्डा हरी घास में रहता है तो उसका शरीर वैसा ही हो जाता है और जब सूखी घास में रहता है तो पीला पड़ जाता है। महामानवों का सामीप्य पाने वाले उनकी शक्ति से–संगति से– लाभान्वित होते, उन्हीं गुणों से ओत−प्रोत होते देखे जाते हैं। महात्मा गाँधी एकाकी सत्ता के रूप में विकसित हुए पर इस वट वृक्ष के नीचे पलने – बढ़ने वाले पटेल, जवाहर, लाल बहादुर बने।
उपासना के साथ-साथ अपनी पात्रता का विकास करना। पात्रता अर्थात् अपने व्यक्तित्व को दैवी गुणों–देवत्व से परिपूर्ण बनाना। यह सम्भव हो सके तो वे विभूतियाँ अपने आप सहचरी बन सकती हैं जिन्हें विभूतियों एवं चमत्कारों के रूप में जाना जाता हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-May
उपासना च सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः॥
उपासना–साधना– ये सभी विशेषताएँ उपलब्ध रहती हैं। तात्पर्य यह कि अपनी घर−गृहस्थी को उत्कृष्ट बनाने की चाह हो तो इन विशिष्टताओं का उसमें समावेश अवश्य करना चाहिए।
उपासना में इन्हीं के साथ संपर्क और परस्पर आदान−प्रदान का मार्ग खोलने का प्रयास किया जाता है।
उपासना के निमित्त−साधक की स्थिति के अनुसार जप ध्यान, पुरश्चरण, स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन−मनन।
उपासना विज्ञान सम्मत और विविध प्रयोजनों के लिए विविध रूपों में प्रचलित थी। मन्त्र शक्ति यज्ञोपचार आदि द्वारा वर्षा पर नियन्त्रण प्राप्त करने, प्राण तत्व को धरती पर उतारने जैसे प्रयोग सुलभ थे।
उपासना, साधना, का भी चिकित्सा एवं मानसोपचार की तरह ही सर्वोपयोगी मानकर उन्हें विधिवत् उपयोग में लाने की आवश्यकता स्वीकार की जायेगी।
उपासना किसी समय घर−घर प्रचलित थी। भारत ही नहीं जापान, चीन, इंग्लैंड, रोम, जर्मनी आदि स्थानों पर भी सूर्य उपासना के प्रचलन का उल्लेख विविध ग्रन्थों में मिलता है। सूर्य सौर मण्डल के सदस्यों का मुखिया है। पृथ्वी पर सर्वाधिक प्रभाव भी उसी का पड़ता है। अन्याय ग्रह सूर्य के साथ मिलकर अपनी प्रतिक्रियाएँ पृथ्वी पर प्रकट करते हैं।
उपासना के प्रचलन का उल्लेख विविध ग्रन्थों में मिलता है। सूर्य सौर मण्डल के सदस्यों का मुखिया है। पृथ्वी पर सर्वाधिक प्रभाव भी उसी का पड़ता है। अन्याय ग्रह सूर्य के साथ मिलकर अपनी प्रतिक्रियाएँ पृथ्वी पर प्रकट करते हैं। अस्तु सूर्य उपासना विज्ञान सम्मत और विविध प्रयोजनों के लिए विविध रूपों में प्रचलित थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-November
उपासनापरक पूर्वार्ध समाप्त हो जाता है। चिंतनपरक उत्तरार्ध दो चरणों में आत्म बोध एवं तत्व बोध की साधना के रूप में सम्पन्न होता है।
उपासना पद्धति का मूल आधार प्रज्ञायोग हे इसका नित्य उपासना उपक्रम को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। जप-ध्यान जैसे भावना प्रधान कृपा ‘जिन्हें परिमार्जन-प्रखरता सम्पादन के लिये नित्य करना अनिवार्य है। (2)आत्मबोध की प्रातःकालीन साधना जिसमें दिन भर क्या किया जाना है, इस सुर दुर्लभ मानव शरीर का सदुपयोग किस प्रकार होता है इस पर चिन्तन किया जाता है। आत्म-विश्लेषण व निरीक्षण की इस साधना का प्रज्ञायोग का प्राण कहा जा सकता है। (3)तत्त्वबोध की सायंकालीन साधना जिसमें दिन भर का लेखा-जोखा लिया जाता है तथा पूरे दिन को एक पूरा जीवन मानकर मृत्यु की गोद में जाने का चिन्तन करते हुए प्राप्त के पर्यवेक्षण की एक रिहर्सल की जाती है।
उपासना के प्रथम चरण में जहाँ कृत्यों के साथ जुड़े भावनात्मक संकल्पों की प्रधान भूमिका है वहाँ आत्म-बोध-तत्व-बोध की साधना में चिन्तन-मनन का प्राधान्य है। कल्प साधकों को इन तीनों ही उपक्रमों को समान महत्व देते हुए नियमित रूप से भावनापूर्वक सम्पन्न करने के लिये कहा जाता है। परिणति स्वरूप इनसे उन विभूतियों का प्रत्यक्ष रसास्वादन होने लगता है जो अध्यात्म मार्ग पर सही रूप से संकल्पपूर्वक चलने वालों को मिलना चाहिए।
उपासना उपक्रम को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। जप-ध्यान जैसे भावना प्रधान कृपा ‘जिन्हें परिमार्जन-प्रखरता सम्पादन के लिये नित्य करना अनिवार्य है। (2)आत्मबोध की प्रातःकालीन साधना जिसमें दिन भर क्या किया जाना है, इस सुर दुर्लभ मानव शरीर का सदुपयोग किस प्रकार होता है इस पर चिन्तन किया जाता है। आत्म-विश्लेषण व निरीक्षण की इस साधना का प्रज्ञायोग का प्राण कहा जा सकता है। (3)तत्त्वबोध की सायंकालीन साधना जिसमें दिन भर का लेखा-जोखा लिया जाता है तथा पूरे दिन को एक पूरा जीवन मानकर मृत्यु की गोद में जाने का चिन्तन करते हुए प्राप्त के पर्यवेक्षण की एक रिहर्सल की जाती है।
उपासना का आधार केन्द्र मानें। महाप्रज्ञा का प्रतीक गायत्री माँ का चित्र है। इसे सुसज्जित पूजा वेदी पर रखें। पवित्रता सम्पादन के प्रथम पाँच कृत्यों के बाद इष्ट से घनिष्ठता स्थापन के पंचोपचार को पूरी श्रद्धा के साथ विधिवत् सम्पन्न करें। जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप नैवेद्य-इन प्रतीक समर्पणों को आराध्य के सम्मुख प्रस्तुत करने को ही पंचोपचार अथवा देव पूजन कहते हैं।
उपासना करनी होती है। नाम के आधार पर ही किसी सत्ता का बोध और स्मरण होता है। ईश्वर को-उच्चस्तरीय आदर्शों को अपने स्मृति पटल पर प्रतिष्ठापित करने के लिए नित्य उसके नाम का सहारा लेना पड़ता है। स्मरण से आह्वान, आह्वान से स्थापना और स्थापना से उपलब्धि की क्रम व्यवस्था मनोविज्ञान द्वारा भी तर्क सम्मत सिद्ध होती है।
उपासना-मान्यताओं में-आदतों में उत्साहवर्धक परिवर्तन करने वाली जीवन साधना-एवं लोक व्यवहार को आनन्द उल्लास से सराबोर कर देने वाली आराधना का विविध समन्वय है। इसे अन्तःकरण, व्यक्ति त्व और व्यवहार में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश करने वाली सुनियोजित प्रक्रिया कहा जा सकता है। मान्यताओं, आकांक्षाओं, विचारणाओं और आदतों को बदलने की कल्प प्रक्रिया उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है जैसी कि बुढ़ापे को जवानी में बदलने वाले काया-कल्प के बारे में लोक-मान्यता प्रचलित है। न तो बुढ़ापा अभिशाप है और न जवानी वरदान। दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही है।
उपासना उपक्रम
उपासना का प्रमुख आधार मानकर नित्य किया जाना अनिवार्य है। इनका एक ही उद्देश्य है-शरीर के जड़ और मन के अर्ध चेतन स्तरों को जो सामान्य स्थिति में अविकसित ही होते हैं, परिष्कृत बनाना, अपना आपा इतना ऊँचा उठा देना कि दिव्य सत्ता हमें आध्यात्मिक प्रगति के लिये वाँछित अनुदान कर सकें।
उपासना के मंगलाचरण से करते हैं। इस क्रम में पाँच प्रमुख कृत्य हैं-आत्म शोधन (2)देव पूजन (3)जप (4)ध्यान विसर्जन-सूर्य अर्घ्यदान ये पाँचों चिन्ह पूजा की तरह निपटाने जाने वाले कृत्य नहीं हैं वरन् श्रद्धा विश्वास के सम्पुट से किये जाने वाले सोद्देश्य उपक्रम हैं। क्रिया के साथ भावना का जितना समन्वय होना उत्तम ही उसमें आनन्द आयेगा, मन लगेगा और सत्परिणाम हस्तगत होंगे। पाँचों ही उपासना उपचारों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है।
उपासना के इस अन्तिम कृत्य में पूजा वेदी पर रखे छोटे कलश का जल सूर्य की दिशा में अर्घ्य रूप में चढ़ाया जाता है। इसके पीछे भाव एक ही है-आलोक फैलाने वाले आदर्शों को कभी अभिसिंचन की कमी न पड़ने पावे। हमारी कामना उस समय यही रहे कि हे सूर्य भगवान —हमारे द्वारा समर्पित यह जल भाप बनकर आकाश में उड़ जाये। यह यज्ञ कृत्य भविष्य में कभी बन्द न हो। हमारा श्रद्धा समर्पण से भरा यह अन्तिम कृत्य जितने गहरे स्तर का होगा, हम कभी अन्तः की सम्पदाओं से रिक्त नहीं होगे।
उपासना, साधना, आराधना के तीनों पक्ष इस चार घण्टे प्रतिदिन चलने वाली कक्षाओं में मात्र एक महीने सम्मिलित रहकर साधक अनुभव करता है कि उसने इतनी छोटी अवधि में जितनी उपयोगी जितनी सुनियोजित शिक्षा प्राप्त की कदाचित उतनी वह जीवन भर में उपलब्ध नहीं कर सका होगा। उच्चस्तरीय एवं सामयिक व्यवहार दर्शन की ऐसी समन्वित दिशाधारा अभी तक कहीं अन्यत्र नहीं देखी गई जैसी कि कल्प साधना के साधकों को सार-सूत्रों सहित, सरल प्रतिपादन एवं सुगम शैली में हस्तगत होती है।
उपासना उपक्रम में प्रधानता दो कृत्यों की है-जप जब ध्यान। दोनों परस्पर जुड़े हुए हैं। क्रम से चलते हुए ही मंजिल पार की जाती है। नित्य जल्दी उठकर साधक अपने आवश्यक कर्मों में निवृत्त होकर जीवन का शुभारम्भ उपासना के मंगलाचरण से करते हैं। इस क्रम में पाँच प्रमुख कृत्य हैं-आत्म शोधन (2)देव पूजन (3)जप (4)ध्यान विसर्जन-सूर्य अर्घ्यदान ये पाँचों चिन्ह पूजा की तरह निपटाने जाने वाले कृत्य नहीं हैं वरन् श्रद्धा विश्वास के सम्पुट से किये जाने वाले सोद्देश्य उपक्रम हैं।
उपासना उपचारों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-January
उपासना करने लगे। इस आधार पर उनकी चेतना जगी और सृष्टि-निर्माण का ताना-बाना बुन लिया गया। उसकी सुव्यवस्थित योजना बना ली गई।
उपासना ही तप है।" पीछे उन्हें गायत्री मंत्र बताया गया, जिसकी वे उपासना करने लगे। इस आधार पर उनकी चेतना जगी और सृष्टि-निर्माण का ताना-बाना बुन लिया गया। उसकी सुव्यवस्थित योजना बना ली गई।
उपासना विज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए ध्यान की अनिवार्य आवश्यकता प्रतीत होती है। एकाग्रता और श्रद्धा के आधार पर ही ध्यान बन पड़ता है, इसलिए उस हेतु कोई न कोई नामरूप वाली प्रतिमा बुद्धि कल्पित करती है। कल्पना बेपर की उड़ान भर ही हो तो बात दूसरी है, अन्यथा यह ध्यान के अनुरूप ही साधक की आकृति बना लेती है। ध्यान, श्रद्धा एवं विश्वास के संयोग से ठीक उसी प्रकार फलित होने लगता है, जैसी कि उस पर आस्था जमाई गई थी। इसी दृष्टि से गायत्री की प्रतिमा ठीक मानुषी जैसी गढ़ी गई है।
उपासना का विधान बनाया जाता है। वस्तुतः साधनाएँ आत्मपरिष्कार के लिए ही की जाती हैं, ताकि पात्रता निखरे। जीवनपात्र का इतना विकास-विस्तार हो कि सावन की घटा की तरह सदा-सर्वदा बरसने वाली प्रभूकृपा का बड़े से बड़ा भाग अपने हिस्से में आ सके।
उपासना की जाने का विधान है।
उपासना में वह मानुषी है और उसकी आकृति वैसी ही है। दो हाथ दो पैर ज्ञानेंद्रियाँ-कर्मेंद्रियाँ भी उतनी हैं। किसी और प्राणी की यदि मनुष्य जैसी बुद्धिमता होती तो वह अपनी जैसी आकृति, वैसा ही चेतना के स्वरूप को समझ पाता। बैल का भगवान बैल जैसा और पक्षी का भगवान पक्षी जैसा होता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-March
उपासना की जाती है। इससे मनुष्य का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार परिष्कृत होता है। इसलिए उसे देव माता भी कहा गया है। सावित्री विश्वमाता है उसका प्रभाव व्यक्ति विशेष तक सीमित न रहकर विश्वव्यापी पड़ता है। जनमानस का परिष्कार, लोककल्याण, वायुमण्डल की शुद्धि, वातावरण की परिष्कृति यह सब सावित्री शक्ति के प्रतिफल हैं।
उपासना और वेदान्त दर्शन का सार संक्षेप भी कह सकते हैं।
उपासनात्मक कर्मकाण्ड सीखने और उन्हें जल्दी-पल्दी निपटा कर तुर्त-फुर्त सिद्ध चमत्कार बटोरने की फिराक में रहते हैं। अच्छा होता कि कोई इन बाल-बुद्धि लोगों को यह समझा सकने में समर्थ हुआ होता कि हर साधना मन की एकाग्रता और पवित्रता से सधती है। इस श्रीगणेश के बिना गाड़ी एक कदम नहीं चलती जो साधना उपचार में मन की भूमिका को समझ लेगा उसे मनोनिग्रह की साधना को प्राथमिकता देनी होगी। इसके बाद अन्यान्य कर्मकाण्डों में हाथ डालने की बात सोची जा सकेगी।
उपासना करनी होती है। जिन साधकों को स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि शान्ति आदि निजी आकाँक्षा है उन्हें गायत्री साधना का अवलम्बन लेना ही उचित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-February
उपासना साधक को देवता बना सके, उन जैसी विशेषताएं उत्पन्न कर सके, तभी उस प्रयास की सार्थकता है।
उपासना की दृष्टि से आत्म दर्शन, या ईश्वर दर्शन का यह स्वरूप सर्वोत्तम प्रतीत होता है कि अपने भीतर के परब्रह्म परमात्मा की झाँकी की जाये। इसके लिये उपचार माध्यम यह है कि एक बड़ा या दर्पण सुसज्जित रूप में सामने रखा जाये। उसमें जो अपने शरीर की छवि दृष्टिगोचर होती है उसे दिव्य देवालय माना जाये और उसके भीतर निराकार भगवान की स्थापना अपनी प्रखर भावना के आधार पर की जाये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-December
उपासना की आवश्यकता पड़ती है, किन्तु उच्चस्तरीय साधना के लिए प्रकाश ध्यान को ही अपनाना पड़ता है। गायत्री की उच्चभूमिका सवितामय बन जाती है। गायत्री का प्राण प्रकाश पुंज सविता देवता ही है, अस्तु समुन्नत भूमिका के साधक प्रकाश के ध्यान का ही अवलम्बन करते हैं। विभिन्न प्रसंगों में श्रुति यही कहती आयी है। ताण्ड्योपनिषद (10/5/3) कहता है- “तेजसा वे गायत्री एवं ज्योतिर्वे गायत्री छन्दसाम्” (13/7/2) यजुर्वेद कहता है- “सविता वे प्रसकानामीशे अर्थात् सबको उत्पन्न करने वाला परमेश्वर सविता है।
उपासना, साधना और आराधना त्रिवेणी की तरह अवगुँठित हुई है और जीवन, तीर्थराज संगम की तरह बना है। प्रस्तुत वर्ष संसार में फैले भ्रमों का निवारण कर सकने योग्य प्रमाण साक्षी बन कर खरे सोने की तरह प्रस्तुत हुआ है इसकी हीरक जयन्ती परिजनों ने मनाई है तो उसे प्रस्तुत जीवनशैली के प्रति आस्था का प्रकटीकरण ही कहा जा सकता है। जीवन के 75 वें वर्ष में मनाई जाने वाली हीरक जयन्ती का द्विवर्षीय कार्यक्रम था। इसलिए इस वर्ष उसका समापन किया जा रहा है तो इसमें कुछ हर्ज भी नहीं है।
उपासना का क्रम बनाकर शेष समय लोक साधना में लगाने लगे।
उपासना में मध्यकालीन प्रौढ़ सूर्य को नहीं प्रभात कालीन स्वर्णिम सूर्य को ही उपयुक्त माना गया है। भावना संज्ञा उसी की है। ध्यान में स्वर्ण कान्ति वाले नवोदित सविता का ध्यान करने का ही निर्देश है। इसकी फलश्रुतिओं का साधक को शीघ्र ही अनुभव होने लगता है।
उपासना में शिव और उनकी शक्ति की ही प्रमुखता है। उन्हें सरलता की मूर्ति माना जाता है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों के नाम से उनके विशालकाय तीर्थ स्वरूप देवालय भी हैं। साथ ही यह भी होता है कि खेत की मेंड़ पर किसी वृक्ष की छाया में छोटी चबूतरी बनाकर गोल पत्थर की उनकी प्रतिमा बना ली जाय। पूजा के लिए एक लोटा जल चढ़ा देना पर्याप्त है।
उपासना करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-November
उपासना का अर्थ है- विश्वात्मा के समीप बैठना। यह समीपता सब में अपने को और अपने में सब को देखने की भावना द्वारा ही संभव हो सकती है। इसका व्यावहारिक रूप यह है कि जैसा व्यवहार दूसरों से अपने लिए चाहते हैं, वैसा ही हम भी दूसरों के साथ करें। स्पष्ट है कि हम दूसरों से अपने प्रति सज्जनता, शालीनता, उदारता एवं सहयोग की आशा करते हैं। ऐसी दशा में यह भी आवश्यक हो जाता है कि हम भी दूसरों से वैसा ही मृदुल व्यवहार करें।
उपासना एक ही बात है, यद्यपि यह दो क्रियाएँ एक-दूसरे से पृथक प्रकार की मालूम देती हैं। विश्व की सेवा और भगवान के भजन में कोई अन्तर नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-May
उपासना का अवलम्बन लेना चाहिए। उसका प्रभाव सार्वभौम है और उपयोग सार्वजनीन समस्याओं का समाधान है। इस सर्व के अंतर्गत ही अपना “स्व” भी आता है।
उपासना प्रसंग में जप का महत्वपूर्ण स्थान है। उसे सभी धर्म सम्प्रदायों में भक्ति प्रयोजन के लिये प्रमुख स्थान दिया गया है। मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, पारसी आदि सभी धर्मों के सन्तों के हाथ में, गले में, कमरे में माला लटकती देखी गई है। वे उसका उपयोग नाम जप के लिये करते भी हैं।
उपासना करने वाले साधारण जप में भूर्भुवः स्वः जनः, तपः, महः, सत्यम् का भी प्रयोग करते हैं। ध्यान माता की अपेक्षा पिता का, सविता का- प्रातःकालीन स्वर्णिम सूर्य का किया जाता है। (क्रमशः)
उपासना समझा जाय। आध्यात्मिक प्रयोजनों में स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि आदि की गणना होती है और भौतिक प्रयोजनों में रोग, शोक, उद्वेग, दरिद्व, शत्रुता, आक्रमण, अभाव जैसे कारणों की गणना होती है। इन वस्तुओं के लिए दयालु माता से प्रार्थना की जा सकती कि वे अपनी और दूसरे सम्बन्धित लोगों की बुद्धि में सुधार करके उपस्थित संकटों का निराकरण करें।
उपासना के दो स्तर हैं। एक सर्व साधारण के लिए सर्वोपयोगी, सुगम और सरल जिसे सामान्य स्थिति का भावनाशील व्यक्ति भली प्रकार करता रह सकता है। दूसरा स्तर वह है जो विशिष्ट व्यक्तियों के लिए, परिशोधित और परिष्कृत लोगों के लिए ही संभव है। इसमें इतने कठोर प्रतिबन्ध, विधान और अनुशासन हैं कि उनका निर्वाह कर सकता हर किसी के लिए सम्भव नहीं है। इसलिए वह प्रयोजन अभी अपने तक ही सुरक्षित रखा है।
उपासना है। हँसते-मुस्कराते रहने की आदत ऐसी है जो अपनी अन्तरंग और बहिरंग क्षमताओं को उल्लसित करती हैं और अनायास ही अनेकों को मित्र सहयोगी एवं प्रशंसक बना देती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-July
उपासना है।
उपासनात्मक कर्मकांडों का शुभारंभ आचमन से किया जाता है। कारण कि जिह्वा को पवित्र करने के उपरांत ही दिव्य प्रयोजनों का बन पड़ना संभव होता है। शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी इसी की प्रमुखता है। जो सवेरे स्नान नहीं कर सकते वे भी उठते ही कुल्ला तो करते हैं। जितनी बार भोजन किया जाता है उतनी बार भोजन के अंत में कुल्ला करने-आचमन करने की प्रथा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-August
उपासना की जाती है। सावित्री पाँच मुखी है। पाँच तत्व, पाँच प्राण का प्रतीक मानकर उसे सावित्री कहा गया है। वह पंचमुखी दशभुजी है। दशभुजी का अर्थ है दश इन्द्रियों की बलिष्ठता का केन्द्रीकरण।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-June
उपासना, साधना और आराधना का विज्ञान भी इन तीन व्याहृतियों के साथ जुड़ा हुआ है।
उपासना भी कहा गया है।
उपासना करने लगे। इसके पश्चात समयानुसार उन्हें ज्ञान और विज्ञान के रूप में दो उपलब्धियाँ हस्तगत हुईं। ज्ञान पक्ष को ‘गायत्री’ और विज्ञान पक्ष को ‘सावित्री’ कहा गया। गायत्री चेतना हुई और सावित्री प्रकृति। प्रकृति से पदार्थ बना और उसे गतिशील रखने वाली चेतना का इस विश्व-व्यवस्था में समावेश हुआ।
उपासना में जिन चौबीस अक्षरों का उच्चारण किया जाता है, उनसे इन सभी केन्द्रों में मन्थन जैसी हलचल मचती है और वे प्रसुप्त स्थिति से जागृत हो अपने-अपने चमत्कार दिखाने लगते हैं। उन्हीं को ऋद्धि-सिद्धियों के नाम से जाना जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-April
उपासना पंचकोशों के जागरण विधान पर निर्भर है। इसका आरम्भिक परिचय हम पंचमुखी गायत्री के रूप में समय-समय पर देते रहे हैं। सर्वसाधारण से जितना बन पड़े, जितना बेजोखिम का हो, उस मर्यादा को ध्यान में रखते हुए ही यह विवरण छपा रहा है ताकि किसी अनजान द्वारा उत्साह में भरकर किसी परमाणु विस्फोट जैसे भयंकर कृत्य कर बैठने की आशंका न हो। अन्नमय कोश के लिए आहार-विहार की पवित्रता (2) प्राणमय कोश के लिए छोटे-छोटे व्रत लेकर साहसिकता बढ़ाने का प्रयास (3) मनोमय कोश के लिए एकाग्रता और सन्तुलन (4) विज्ञानमय कोश के लिए सहृदयता विवेकशीलता (5) आनन्दमय कोश के सर्वत्र बिखरे हुए सौंदर्य को दृष्टिगत रखते हुए प्रफुल्लित पुलकित रहने का सरल तत्वज्ञान और विधान बताया जाता रहा है और आगे भी बताया जाता रहेगा पर वह होगा उतना ही, जितना भार वहन करने वालों की क्षमता होगी। जिनका स्तर ऊँचा उठ सका है, उनके लिए मार्गदर्शक की कमी न अखरेगी।
उपासना में, समय के अनुरूप तेजस् धरती पर खींच बुलाने के लिए यह प्रयत्न ऐसा ही है जैसे कि भागीरथ ने गंगा को स्वर्ग से जमीन पर खींच बुलाने के लिए बाधित किया था।
उपासना की दृष्टि अधिक उपयुक्त चुना है। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं अध्यात्मवेत्ता लैडबीयर का कथन है कि आपत्तिकालीन स्थिति में उनकी सहायता 7000 मील दूर अदृश्य सहायकों ने ही की। इसका अनुमान सूक्ष्म शरीर की क्रियाशील विद्युत को देखकर लगाया जा सकता है। उसमें सूर्य तथा अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों से आने वाली ज्ञात और अविज्ञात किरणों का भरपूर समन्वय विद्यमान है।
उपासना, कर्मकांडों से नहीं, भावनाओं से की जाती है। उसे केवल भक्त की भावनाओं का स्वाद सुहाता है। ईश्वर के प्रति भक्ति-भाव रखने का तात्पर्य है उसके इस विश्व उद्यान को अधिक सुरम्य- अधिक सुविकसित बनाना। मात्र भावुकता प्रकट करने की प्रवंचना उसे लुभाने फुसलाने में समर्थ नहीं होती।
उपासना व्यक्तित्व को परिष्कृत करते हुए महानता की ओर अग्रसर करने के निमित्त की जाती है और सावित्री की साधना बल, पराक्रम वैभव प्राप्त करके सशक्त बनने के लिए। सावित्री को दूसरे शब्दों में जीवनी शक्ति कह सकते हैं। गायत्री को तो आत्म चेतना के परिष्कार और आत्मोत्कर्ष की दृष्टि से अनिवार्य माना ही गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-May
उपासना करते हैं, वे सब प्राणियों के हित में लगे हुए मुझे ही पाते हैं।” यहाँ ईश्वर के प्रति निष्ठा और परोपकार का समन्वय किया गया है। निष्काम-कर्म का यही स्वरूप है कि मनुष्य उस परमात्मा पर अटल विश्वास रखकर कामना रहित कर्म करे।
उपासना से प्रतिकूलताएँ टलती हैं और अनुकूलताएँ बढ़ती है। शारीरिक रोग, मानसिक उद्वेग, शत्रुता का आक्रमण, दुर्बुद्धिजन्य अनाचरण, व्यसन, प्रायः प्रतिकूल परिस्थितियों के रूप में सामने आते रहते हैं। इनसे किस प्रकार पीछा छुड़ाया जाय, इसकी अंतःप्रेरणा सूर्योपासना से जन्म लेती है। उपाय सूझ पड़ते हैं और उन्हें कार्यान्वित करने के लिए जिस विवेक और साहस की आवश्यकता पड़ती है उनका उद्भव भी अन्तःक्षेत्र में से अनायास ही उदय होने लगता है। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन, के उपायों को अन्तःचेतना के अभिवर्धन में सहायक माना गया है।
उपासना के लिए अधिक उपयुक्त माना गया है। इसी समय सविता देव की प्रेरणा का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। तालाबों में कमल खिलते हैं। उद्यान में पुष्पों की खिलखिली दृष्टिगोचर होती है। चिड़ियाँ घोंसलों से निकल कर चहचहाती, कुदकती–फुदकती दृष्टिगोचर होती है।
उपासना से ही द्रौपदी को ऐसा अक्षय पात्र मिला था जिसकी भोजन सामग्री कभी समाप्त ही नहीं होती थी। हनुमान को सूर्य का तेजाँश प्राप्त हुआ था और उन्हीं की कृपा से वे अनेक विभूतियों के अधिनायक बने थे। सीता के वाल्मीकि के आश्रम में सूर्य साधना करके ही लव-कुश को जन्म दिया था। राजा इक्ष्वाकु ने सूर्य साधना की थी। वहीं से उनके वंशधर सूर्यवंशी कहलाते चले गये।
उपासना साधना के लिए तो यह समय सर्वोपरि है। कारण कि वातावरण में नवोदित सूर्य द्वारा प्रेरित प्राण तत्व की मात्रा का परिणाम अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में उपलब्ध होता है।
उपासना की पृष्ठभूमि भी है।
उपासना से अन्तराल में सन्निहित दिव्य विशेषताओं का विभूतियों का अभिवर्धन होता है। सकाम उपासना से प्रतिकूलताएँ टलती हैं और अनुकूलताएँ बढ़ती है। शारीरिक रोग, मानसिक उद्वेग, शत्रुता का आक्रमण, दुर्बुद्धिजन्य अनाचरण, व्यसन, प्रायः प्रतिकूल परिस्थितियों के रूप में सामने आते रहते हैं। इनसे किस प्रकार पीछा छुड़ाया जाय, इसकी अंतःप्रेरणा सूर्योपासना से जन्म लेती है। उपाय सूझ पड़ते हैं और उन्हें कार्यान्वित करने के लिए जिस विवेक और साहस की आवश्यकता पड़ती है उनका उद्भव भी अन्तःक्षेत्र में से अनायास ही उदय होने लगता है।
उपासना विज्ञान कहते हैं।
उपासना करने पर सूर्य क्या-क्या प्रदान नहीं करते। आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, स्वर्ग, अपवर्ग सभी कुछ उनसे मिलते हैं।
उपासना साधना के प्रबल पुरुषार्थ से सहस्रों गुना बढ़ा सकता है। और चाहे तो पतन पराभव के गर्त्त में भी जा सकता है।
उपासना करे। उन्हीं की कृपा से कष्टों का निवारण और सुयोग का आगमन हो सकता है।
उपासनाएँ सफल नहीं होतीं, मनोकामनाएँ पूरी नहीं हो पाती। अध्यात्म पर यह कलंक उनने लगाया हैं जो खेत तैयार किए बिना ही बीज बोने और फसल काटने की जल्दबाजी करते हैं। आत्मशोधन की उपेक्षा और पूजा-पत्री को ही सब कुछ मान लेने से ऐसी स्थिति पैदा होती है। सही ढंग से चला जाय, तो अध्यात्म से वे सब लाभ आज भी उठाये जा सकते हैं, जो कभी पढ़े या सुने गये हैं। पूज्य गुरुदेव का निजी अनुभव भी हम सबके सामने हैं।
उपासना के रूप में, सप्ताह में एक दिन यज्ञ कर्मयोग की साधना और प्रज्ञा संकीर्तन भक्तियोग की साधना के अंतर्गत जहाँ भी प्रजा परिजन हों मिलकर चलाएँ। इससे देवात्मा भारत की महाशक्ति कुण्डलिनी का जागरण सुनिश्चित होकर रहेगा।
उपासना विज्ञान के अवलम्बन से उसे श्रेष्ठ मार्गदर्शन एवं दैवी संरक्षण में किए जाने पर ही मिलती है। चेतना के उदात्तीकरण की इस प्रक्रिया हेतु, प्रारम्भ से ही उच्च स्तर की साधनाओं के लिए किसी को नहीं कहा जाना चाहिए, न किसी को वैसा दुस्साहस ही करना चाहिए। यही व्यावहारिक है। संजीवनी विद्या वाले पक्ष को जीवन में उतार कर यदि अपने को सुविकसित कर लिया जाता है तो अन्तराल की गहराई में छिपे पंचकोशों, षट्चक्रों, उपत्यिकाओं, गुच्छकों को उभारने वाली और अनेक ऋद्धि-सिद्धियों को सामने उपस्थित करने वाली विभूतियों का अर्जन संभव भी हो जाता है और सरल भी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-March
उपासना छोटे या बड़े रूप में, साकार या निराकार रूप में होती रहती है। माना जाता है कि वे स्वर्ग नामक ऊर्ध्ववर्ती लोक में रहते हैं और आमंत्रित करने पर मनुष्यों की सहायता के लिए दौड़ आते हैं।
उपासना संदर्भ में सूर्य को सविता कहा गया है और सविता की शक्ति को सावित्री नाम दिया गया है। सावित्री अर्थात् गायत्री। आद्यशक्ति-महाप्रज्ञा। शक्ति शक्ति वाक्देवी-मंत्र विद्या की अधिष्ठात्री, मंत्र विचार है, विवेक प्रेषक। ओजस् तेजस् वर्चस् का प्रतीक प्रतिनिधि।
उपासना पद्धति के लिए प्रचार करते हैं। इसके लिए उन्हें पुरातन बौद्ध मंदिरों की खाली पड़ी जगह उपयोग के लिए आसानी से मिल जाती है। जेन साधना में जीवन की पवित्रता प्रथम शर्त है। साधकों को अपना आहार सात्विक रखना पड़ता है। बीच बीच में उन्हें कुछ दिन उपवास करते हुए भी बिताने पड़ते हैं।
उपासना क्षेत्र में वहाँ अन्यान्य पूजा-प्रार्थनाएँ भी चलती हैं, पर असाधारण वरिष्ठता और प्रतिभा ‘जेन’ साधना की है। जापान के तोकुफु मंदिर में इसके उपदेष्टाओं एवं अभ्यासियों का अच्छा खासा जमघट रहता हैं। कभी-कभी तो अभ्यासियों की संख्या हजारों तक पहुँच जाती है। मौसम प्रतिकूल होने तथा व्यस्तता के दिन आने पर भी तोकुफु का प्रांगण साधकों से भरा ही रहता है।
उपासना, साधना और आराधना भी कह सकते है। उपासना ही संगतिकरण है। संगतिकरण का एक अर्थ है संघबद्धता। एक है निकटतम बैठना। पूजा का अर्थ है- अपने आप को भीतर और बाहर से पवित्र करना।
उपासनात्मक कर्मकाण्डों का अपना महत्व है। उनके द्वारा प्रसुप्त शक्तियों के जागरण में सहायता मिलती है। किन्तु इतने पर भी यह अनिवार्य रूप से आवश्यक है कि साधक का व्यक्तित्व संयमी, सदाचारी और करुणा से भरा पूरा हो। यदि यह पवित्रता अर्जित करने के लिए तपस्वियों जैसा साहस न जुटाया जा सका तो समझना चाहिए के बात बनी नहीं। चट्टान पर उपवन लगाने के प्रयत्न में कोई सफलता मिलने वाली नहीं है।
उपासना का संगतिकरण का यही उद्देश्य हैं।
उपासना ही संगतिकरण है। संगतिकरण का एक अर्थ है संघबद्धता। एक है निकटतम बैठना। पूजा का अर्थ है- अपने आप को भीतर और बाहर से पवित्र करना। यही साधना का प्रयोजन है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-June
उपासना का सर्व साधारण द्वारा की जाने वाली प्रक्रिया का यह महत्वपूर्ण अंश है कि धरती को हरीतिमा से ढका रखा जाय, उस पर मनुष्यों तथा पशु-पक्षियों के लिए उपयुक्त आहार उगाया जाय। वृक्ष वनस्पतियों से प्रत्येक भूभाग को भरा-पूरा रखा जाय। आदित्य पुराण में वृक्षों को सूर्य के केश और वनस्पतियों को रोम बताया गया है, पृथ्वी को आदित्य भगवान का दिया हुआ यह सीधा अनुदान है।
उपासना प्रसिद्ध है। उनके शासनकाल में सतयुगी वातावरण था। राजा के धर्मात्मा होने से प्रजा भी वैसी ही हो गई थी। उनके राज्य में अपराधों का सिलसिला एक दम ही समाप्त हो गया था। और सभी प्रजाजन धन-धान्य और सुख शान्ति से पूर्ण थे।
उपासना विज्ञान के अनुसार उपयोग किया जाय तो शरीर और मन में भरी हुई अलौकिक शक्तियाँ अपने-अपने ढंग से अपने-अपने समय पर स्वयमेव उद्भूत होती जाती हैं। आध्यात्मिक गुणों में तेजी से अभिवृद्धि होती है, बुद्धि तीव्र होती है तथा ऐसी दूरदर्शिता का विकास होता है, बुद्धि तीव्र होती है तथा ऐसी दूरदर्शिता का विकास होता है जिसके आधार पर जीवनी समस्या की अनेक गुत्थियों को सरल किया जा सके।
उपासना का एक मात्र मंत्र सावित्री है। सप्त व्याहृतियाँ लगने पर वह सावित्री कहलाती है और तीन व्याहृतियाँ रहने पर उसे गायत्री कहते हैं। सावित्री का प्रयोग भौतिक प्रयोजनों के लिए होता है तथा गायत्री को अध्यात्म तत्त्व-ज्ञान के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
उपासना का ही एक पक्ष है। जहाँ वनस्पति से धरती ढकी नहीं होती उसे शास्त्रों में निर्वसना कहा गया है। अनुपयोगी रहने की ओर संकेत किया गया है। रेगिस्तान इसी कारण बढ़ते हैं। बंजर ऊसर भी इसी कारण पनपते हैं।
उपासना, साधना यज्ञ के साथ ही होता है। प्रसूति गृह से अखंड अग्नि की स्थापना के साथ हिन्दू बालक का जन्म होता है और जीवन लीला समाप्त होने पर यज्ञ भगवान को अन्त्येष्टि संस्कार के साथ शरीर सौंप
उपासना पर्व भी निर्धारित हैं। रविवार को सूर्य दिन का दिन माना जाता है। उस दिन उपवास रखकर सूर्य को प्रसन्न करने की प्रथा है। वट सावित्री का संबंध सावित्री सत्यवान की कथा से जोड़ा जाता है। सावित्री से सूर्योपासना, करके अपने पति सत्यवान को यमराज के हाथ से पुनः वापस लौटाया था।
उपासना प्रयोजनों में अगरबत्ती धूप-दीप का विधान इसीलिए है कि देव प्रयोजनों में सूर्यांश को साक्षी रखे रहा जाय।
उपासना से अनेकों ने असाधारण सिद्धियाँ पाई।
उपासना, साधना, आराधना का जीवनचर्या में समावेश होना आवश्यक है। पेट प्रजनन की, लोभ-मोह और अहंकार की तृप्ति के लिए हर कोई व्यस्त, उद्विग्न देखा जा सकता है। पर यह भौतिक क्षेत्र की उछल-कूद हुई। उससे शरीर भर को तात्कालिक रसास्वादन करने का अवसर मिलता है। इन उपलब्धियों से तृष्णा और भी भड़कती रहती है और अधिकाधिक की माँग इस प्रकार बढ़ती जाती है कि उसकी पूर्ति संभव ही नहीं होती।
उपासना करें तो इसके द्वारा हम और भी उत्तम एवं महत्वपूर्ण वस्तुयें प्राप्त कर सकते हैं।
उपासना करके त्रैलोक्य का अधिपति बनाया था।
उपासना में लगे और संन्यासी हो गये। वे काठ की लंगोटी पहनते थे। इसीलिए उनका नाम काठिया बाबा प्रसिद्ध हो गया। कोई दीन दुःखी याचना, करता तो उसे धन देते रहते। लोगों ने समझा इनने काठ की लंगोटी में पैसा छिपा रखा है, सो उनके सेवक बने धूर्तों ने दो बार जहर दिया कि लंगोटी में छिपा धन मिल जाय।
उपासना करने में सदैव संलग्न रहता योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है। यह निर्विवाद है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-August
उपासना करते वह हवा में उड़ने लगते हैं। हवा में उड़ने वाले साधु के नाम से प्रसिद्ध इस पादरी गिसप देसा जोसेप का जन्म 1603 में इटली के कापरटिनों नामक स्थान पर हुआ था। पिता बढ़ईगिरी का काम करते थे। बचपन से ही अन्तर्मुखी जोसेप घण्टों पूजावेदी के सामने बैठे उपासना किया करते थे।
उपासना किया करते थे।
उपासना का तात्पर्य हैं-श्रद्धा, निष्ठा, प्रज्ञा की त्रिधा, सद्भावनाओं का संगम। इस समागम को जिसने अन्तरात्मा में धारण कर लिया, समझना चाहिए कि उसने ब्राह्मी स्थिति उपलब्ध कर ली।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-April
उपासना का परिणाम था, जो बिना प्रयास के उसे इस जन्म में मिली। परामनोविज्ञानी लेनहाॅफ ने गेरार्ड की अतींद्रियशक्ति की परीक्षा ली, जिसमें वह सफल पाया गया। सिनेमा हॉल के एक निश्चित नंबर की सीट पर पाँच दिनों तक बैठने वाले व्यक्तियों का नाम एवं हुलिए को सीट को स्पर्श करके गेरार्ड ने बता दिया। इस छोटी-सी परीक्षा के बाद वह अधिक लोकप्रिय हो गया और सर्वत्र उसकी चर्चा होने लगी।
उपासना का अर्थ है— आठों प्रकार की शक्तियाँ साधक को मिलती है। उसका जीवन एकांगी नहीं होता, बहुमुखी होता है।
उपासना का काम चलाया जाता था, तब गायत्री महामंत्र के शब्द समुच्चय को सूर्योपासना का प्रधान मंत्र माना गया। प्रातःकालीन उदीयमान सूर्य स्वर्णिम होता है। जिस प्रकार नवागंतुक के आगमन के समय ही स्वागत सत्कार की परंपरा है, उसी प्रयोग को सूर्योपासना के लिए भी प्रयुक्त किया गया।
उपासना द्वारा साधक के मन में सर्वतोमुखी उन्नति की उमंग उठनी चाहिए। गायत्री उपासना के अवलम्बन से साधक ऐसी प्रेरणा प्राप्त करता है, जिससे समग्र प्रगति के लिए समग्र प्रयास चल सकें।
उपासना अभिप्राय: व्यक्त किया जाता था। यथा-सूर्यार्घ्यदान, सूर्योपस्थान, सूर्यनमस्कार, सूर्यस्नान, सूर्यसांनिध्य, सूर्य सेवन, सूर्यदर्शन, सूर्य-परिक्रमा आदि-आदि। यह सभी क्रिया-कृत्य ऐसे थे, जो जलाशय की समीपता में आसानी से हो सकते हैं। यहाँ तक कि सूर्य प्रभावित जल को सौम या अमृत की संज्ञा दी जाने लगी। उसका पान करके रोग-निवारण या दीर्घायुष्य की कामना की जाने लगी सूर्योदयकाल को पवित्र समय मानकर उपासना हेतु निर्धारित किया गया।
उपासना का परिधान पक्ष है— शृंगार। काया को सुंदर वस्त्राभूषण पहना देने में वह शोभायमान दिखती है। इत्र-फुलेल लगा देने से महकती भी है और शृंगार-प्रसाधनों से वह चमकती भी है। किंतु इतने पर भी यदि कोई व्यक्ति रोगग्रसित हो, जरा-जीर्ण हो अथवा मृत्यु का ग्रास बन चुका हो तो उस साज-सज्जा से भी कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। छूत के रोगी या मृतक पर डाले हुए कपड़े भी अस्पृश्य बन जाते हैं।
उपासना से अपने मनःक्षेत्र में ऐसा परिवर्तन होता है कि पापकर्मों से अनायास ही घृणा होने लगती है।"
उपासना, साधना एवं आराधना करने से हमारे स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीर का परिमार्जन हो सकता है। दर्शन का काम, चिंतन को दिशा देना है और साधन का स्वरूप अभीष्ट शक्तियों को अपने में उभारने की वैज्ञानिक कार्यपद्धति को अपनाना है। हम गायत्री का तत्त्व दर्शन भी समझें और उसके साधना-विधानों को अपनाने का भी प्रयत्न करें। इस आधार पर मस्तिष्क और अंतःकरण दोनों ही महानता के ढाँचे में ढल सकते हैं और उनके स्तर के अनुरूप ही हमारे प्रत्यक्ष व्यवहार एवं क्रियाकलाप का पहिया लुढ़क सकता है।
उपासना है।
उपासना के अवलम्बन से साधक ऐसी प्रेरणा प्राप्त करता है, जिससे समग्र प्रगति के लिए समग्र प्रयास चल सकें।
उपासना का उपक्रम इतना अधिक हुआ है कि वह शब्दावली आकाश में अद्वितीय मात्रा में अनंत आकाश में परिभ्रमण कर रही है। शब्दशक्ति कभी नाश नहीं होती, वह अपने अनुरूप वातावरण पर अनायास ही बरस पड़ती है। गायत्री उपासकों को भूतकाल की उन साधनाओं को अपने ऊपर अवतरित होता, बरसता दृष्टिगोचर होता है। निजी प्रयत्नों में उसी स्तर का सृष्टि में भरा-पूरा अनुदान बरसने का लाभ भी उन्हें मिलता है। इस प्रकार वे असाधारण नफे में रहते हैं।
उपासना का दार्शनिक स्वरूप दूरदर्शी विवेकशीलता है, जो संकीर्ण स्वार्थपरता द्वारा समर्थित तात्कालिक लाभों से ऊँचा उठाती है और वहाँ ले पहुँचती है, जहाँ पैर टिकाने पर अपना ही नहीं समस्त सृष्टि का हित-साधन हो सकता है।
उपासना द्वारा संपन्न होता है। हर साधक को इसका अवलंबन लेकर अपना जीवन धन्य बनाना चाहिए।
उपासना हेतु निर्धारित किया गया।
उपासना है। इस आद्यशक्ति— महाशक्ति की उपासना, साधना एवं आराधना करने से हमारे स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीर का परिमार्जन हो सकता है। दर्शन का काम, चिंतन को दिशा देना है और साधन का स्वरूप अभीष्ट शक्तियों को अपने में उभारने की वैज्ञानिक कार्यपद्धति को अपनाना है। हम गायत्री का तत्त्व दर्शन भी समझें और उसके साधना-विधानों को अपनाने का भी प्रयत्न करें। इस आधार पर मस्तिष्क और अंतःकरण दोनों ही महानता के ढाँचे में ढल सकते हैं और उनके स्तर के अनुरूप ही हमारे प्रत्यक्ष व्यवहार एवं क्रियाकलाप का पहिया लुढ़क सकता है।
उपासना का पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि भगवान के दृश्य प्रतीकों में सर्वप्रथम मान्यता सूर्य को प्राप्त हुई। वह प्रत्यक्ष एवं दृश्यमान भी है। अंयान्य देवताओं के नामरूप कल्पित हैं। जिस आकार-प्रकार में उनका वर्णन हुआ है, वैसा कहीं प्रत्यक्ष दृश्यमान नहीं होता। प्रतिमाएँ उनकी विशेषताओं को ध्यान में रखकर कल्पित एवं विनिर्मित की गई हैं।
उपासना के माध्यम से मिटाने पर ये प्रज्वलित अग्नि की तरह दिव्य प्रकाश एवं ज्ञान से चमक जाते हैं और सारे ज्ञान का रहस्य व्यक्त कर देते हैं। तप, संयम एवं सादगी से कोई साधारण-सा मनुष्य भी ऐसा कर सकता है। आधुनिक जगत में भी अनेक लोगों ने यह सफलता पाई है।
उपासना के रूप में होने लगा। इससे पूर्व ‘ॐ शं सूर्याय नमः’ इतना कहकर ही काम चलाया जाता था। शं— सूर्य का बीज मंत्र है। इसे पूर्व गायत्री का छोटा रूप माना गया। ए और भी छोटा रूप गायत्री का है—’ हरि ॐ तत् सत्’ एक तीसरा प्रयोग है, मात्र तीन व्याह़तियों का उच्चारण “ॐ भूर्भुवः स्वः” इन लघु स्वरूपों का आश्रय इसलिए लेना पड़ा कि 24 अक्षरों और तीन पदों वाली गायत्री का उच्चारण करने के लिए भाषा संबंधी इसलिए जानकारी आवश्यक थी।
उपासना करता है। वह धृति, मेधा और प्रज्ञा को प्रचूर-परिमाण में प्राप्त करता है।"
उपासना आत्मबल-संवर्धन की सशक्त साधना है। मंत्र का “धी” अक्षर मनुष्य की अंतशक्ति जागृत करने की शिक्षा देता है। जीवात्मा ही परमात्मा का अंश है। बीजरूप में वे सभी शक्तियाँ विद्यमान है, जो ईश्वर में हैं। आवश्यकता उन्हें जागृत करने की है।
उपासना का महत्त्व और बढ़ जाता है।
उपासना करें। अंय प्रकार की उपासनाएँ न बन पड़ें तो कम से कम इतना तो प्रत्येक साधक को करना ही चाहिए।"
उपासना व इन प्रेरणाओं को जीवन में उतारकर भौतिक एंव आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्र में प्रगति-पथ परं बढ़ा जा सकता है। चौबीस अक्षरों में से चौबीस शक्तिधाराएँ फूटती है जो आत्मिक प्रगति की दिशा में अग्रसर साधक का मार्गदर्शन करती है।
उपासनाएँ न बन पड़ें तो कम से कम इतना तो प्रत्येक साधक को करना ही चाहिए।"
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-February
उपासना और परलोक की चर्चा में ही निरत रहता था, पर अब उसकी परिधि में वे सभी आधार सम्मिलित किये जा रहे हैं जो मनुष्य के चिन्तन, चरित्र ओर व्यवहार को परिष्कृत, सुव्यवस्थित करते हैं। इस दृष्टि से धर्मोपदेशक ही नहीं वरन् वे साहित्यकार, कलाकार, लोकसेवी भी पुरोहित कहे जा सकते हैं जो आदर्शवादी आस्थाओं को उभारने में अपने अपने ढंग से योगदान देते हैं।
उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मू0 1) मात्र, 15) पुस्तकों के सैट का मू0 15)/- ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-November
उपासना का विधान इसमें स्पष्ट रूप से अंकित है। लोग इसे अमेरिकन इण्डियन सिविलाइजेशन के नाम से भी पुकारते हैं। अमेरिकन इण्डियन की खोज का श्रेय क्रिस्टोफर कोलम्बस को दिया जाता है। उसने इस खोज के उपरान्त एकत्रित किये गये तथ्यों को प्रकाशित करते हुए कहा था कि भारतीय संस्कृति ही सबसे प्राचीन है। एस्किमो जाति को भी उनने इसी की उत्पत्ति माना है।
उपासना का उपदेश देकर अपनी विचारणा शक्ति बढ़ाने के लिए विदा कर दिया। क्योंकि उनके सोचने की सीमा ब्रह्म तत्व की परिधि में अभी प्रवेश कर सकने योग्य, सूक्ष्म बनी न थी।
उपासना का मूल तात्पर्य ईश्वर के प्रति प्रेम का विकास करना ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-December
उपासना की शक्ति भी अनेक गुनी बढ़ती है और उस आधार पर निग्रहित की गई जिव्हा जो कहती है, वह भी सत्य होकर रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-October
उपासना करते थे। ऋषियों का भी वही अवलम्बन रहा। मनुष्यों में शिखा और यज्ञोपवीत के रूप में गायत्री को अपनी काया तथा बुद्धि में समाविष्ट होने की भावना रखना और उसकी यथासम्भव नित्य नियमित उपासना करने का विधान है। इसमें सद्बुद्धि के लिए मात्र प्रार्थना ही नहीं है वरन् यह तथ्य है कि इस उपासना में बुद्धि में तीव्रता का, सत्प्रेरणाओं का अभिवर्धन है। यह बात दूसरी है कि उसका प्रयोग किस काम के लिये किया जाये।
उपासनापरक साधनाओं की आवश्यकता पड़ती है। इन्हें यदा-कदा कर लेने से काम नहीं चल सकता। वरन् उनका नित्य नियम बनाना पड़ता है। यदा-कदा किये जाने वाले कृत्य स्वभाव का अंग नहीं बन पाते। संस्कार स्तर तक पहुँच सकने में असमर्थ नहीं हो पाते।
उपासना कभी भी की जा सकती है किन्तु एक निर्धारित समय में असंख्यों की संयुक्त शक्ति का समन्वय हो जाने पर उसका चमत्कारी प्रतिफल होता है। जिन्हें संयुक्त शक्ति की चमत्कारी प्रक्रिया का ज्ञान है, उन्हें यह समझने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि सूर्योदय के समय की उपासना को क्यों महत्व दिया गया है? एक समय में असंख्यों की एक क्रिया का सूक्ष्म प्रभाव पड़ता है इस सिद्धांत के अनुसार पुल पर सेना को कदम मिला कर नहीं चलने दिया जा सकता, क्योंकि पैरों की संयुक्त शब्द शक्ति पुल को गिरा देने का खतरा उत्पन्न कर सकती है, वातावरण का संशोधन करने वाली दिव्य शक्ति भी उत्पन्न रूप से लाभ मिलने की अतिरिक्त सम्भावना है।
उपासना का अर्थ है, देवत्व के समीप बैठना अथवा अपनी जगह पर देवता को घसीट लाना। दोनों का साराँश है सद्गुणों से अपने को ओत प्रोत कर लेना।
उपासना में बुद्धि में तीव्रता का, सत्प्रेरणाओं का अभिवर्धन है। यह बात दूसरी है कि उसका प्रयोग किस काम के लिये किया जाये। देवता श्रेष्ठ के लिए और दैत्य निष्कृष्ट के लिए भी बुद्धि की प्रतिभा का प्रयोग करते रहे है।
उपासना करने का विधान है। इसमें सद्बुद्धि के लिए मात्र प्रार्थना ही नहीं है वरन् यह तथ्य है कि इस उपासना में बुद्धि में तीव्रता का, सत्प्रेरणाओं का अभिवर्धन है। यह बात दूसरी है कि उसका प्रयोग किस काम के लिये किया जाये। देवता श्रेष्ठ के लिए और दैत्य निष्कृष्ट के लिए भी बुद्धि की प्रतिभा का प्रयोग करते रहे है।
उपासना तभी बन पड़ती है जब उसके साथ जीवन साधना जुड़ी हुई हो। सुखा ईंधन ही प्रज्वलित होता है, अन्यथा गीलापन रहने से धुँआ ही आता रहता है। जीवन साधना के लिए उपासना का आश्रय लिया जाय या उपासना को सही तरीके से कर सकने के लिए जीवन क्रम में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समन्वय किया जाये। ईश्वर भजन से पाप नाश होते हैं। इसका तात्पर्य इतना ही है कि ईश्वर की सता को दृष्टि से रखने वाला दुष्कर्म नहीं कर सकता।
उपासना का आश्रय लिया जाय या उपासना को सही तरीके से कर सकने के लिए जीवन क्रम में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समन्वय किया जाये। ईश्वर भजन से पाप नाश होते हैं। इसका तात्पर्य इतना ही है कि ईश्वर की सता को दृष्टि से रखने वाला दुष्कर्म नहीं कर सकता। यह नहीं है कि जीभ से नाम रटंत चलती रहे और क्रिया पद्धति में छल, पाखण्ड अहंकार एवं अनाचार भरा रहे। पवित्रता और प्रखरता का अभ्यास, अनुशासन अपने में भरे लेने का अर्थ ही ईश्वर भक्ति है।
उपासना की है। इस अवधि में हमने अपने अवरोधों को हटाने और अनुकूलताओं के उगने में आशातीत सफलता पाई है। संपर्क परिकर के जिन लोगों को यह प्रयोग बताया है, उन सब ने भी अपनी प्रतिक्रिया ऐसी ही व्यक्ति की है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि विश्वासी के लिए इस साधना का सुनिश्चित प्रतिफल हो सकता है और वह मंत्र शक्ति की सार्थकता के सम्बन्ध में स्वयं संतुष्ट रहकर दूसरों को भी अपने अनुभवों से आश्वस्त कर सकता है। किन्तु कहाँ कठिनाई यह आड़े आती है कि यह संस्कृत भाषा में विनिर्मित है, साथ ही हिन्दू परम्परा से भी जुड़ा हुआ है।
उपासना को क्यों महत्व दिया गया है? एक समय में असंख्यों की एक क्रिया का सूक्ष्म प्रभाव पड़ता है इस सिद्धांत के अनुसार पुल पर सेना को कदम मिला कर नहीं चलने दिया जा सकता, क्योंकि पैरों की संयुक्त शब्द शक्ति पुल को गिरा देने का खतरा उत्पन्न कर सकती है, वातावरण का संशोधन करने वाली दिव्य शक्ति भी उत्पन्न रूप से लाभ मिलने की अतिरिक्त सम्भावना है।
उपासना अपनाकर लोग परम लक्ष्य की प्राप्ति होना सोचते हैं, पर यह नितांत भ्रम हैं। ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है और न मनुष्यों जैसी दुर्बलताओं से वह सना है कि जो उसकी दुहाई दे, दण्ड प्रणाम करे, भेंट उपहार प्रस्तुत करे, उसके लिए अपना मन पक्षपातपूर्ण बनाने और याचना के अनुरूप देने के लिए चल पड़े।
उपासना का मर्म अधिक अच्छी तरह समझना हो तो वेदान्त दर्शन की विचारणा का मनन, चिन्तन करना चाहिए, जिसमें कहा गया है कि मनुष्य को परमात्मा में आत्म सता को समर्पित करके अपनी स्थिति अद्वैतवत् बनानी चाहिए। अपने गुण, कर्म, स्वभाव में से दोष दुर्गुणों का पूरी तरह निष्कासन करना चाहिएं परमेश्वर श्रेष्ठताओं का समुच्चय है। हमें वैसा ही बनना चाहिए। भीतर से भी और बाहर से भी।
उपासना से पूर्व स्नान कर लेने का विधि विधान आवश्यक माना गया है। उसका तात्पर्य जिस तिस प्रकार नहाने की चिह्न पूजा कर लेना नहीं है वरन् यह है कि त्वचा को रगड़ कर लाल कर लिया जाय, ताकि उसके ऊपर किसी कारण जमी हुई परत का भली प्रकार समापन हो जाय। इस व्यवधान के हट जाने पर प्रकृति की अनेक महत्वपूर्ण शक्तियों का शरीर के साथ आदान प्रदान सम्भव हो जाता है। बदलते मौसम अपना प्रभाव त्वचा पर डालते हैं। उनके दबाव ऐसे होते हैं कि तापमान के अनुरूप कपड़े पहने बिना काम नहीं चलता।
उपासना को सही तरीके से कर सकने के लिए जीवन क्रम में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समन्वय किया जाये। ईश्वर भजन से पाप नाश होते हैं। इसका तात्पर्य इतना ही है कि ईश्वर की सता को दृष्टि से रखने वाला दुष्कर्म नहीं कर सकता। यह नहीं है कि जीभ से नाम रटंत चलती रहे और क्रिया पद्धति में छल, पाखण्ड अहंकार एवं अनाचार भरा रहे। पवित्रता और प्रखरता का अभ्यास, अनुशासन अपने में भरे लेने का अर्थ ही ईश्वर भक्ति है।
उपासना में, तत्व दर्शन में विभिन्नताओं को अपनाये रहने की भी छूट मिल सकती है। पर चरित्रनिष्ठा और समाज निष्ठा के परमार्थ वादी सिद्धांतों में तो एकरूपता रह सकती हैं प्रथा प्रचलनों को भी यथासम्भव एकता और समता के ढांचे में ढाला जा सकता है। भिन्नताएँ जितनी कम हो, उतना ही अच्छा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-January
उपासना में यही अन्तर है। अपने-अपने स्तर की सफलता दोनों ही प्रयत्नों से साधकों को मिलती है।
उपासनाओं में साधारणतया भावनात्मक ज्वार भाटे आते रहते हैं। कभी भक्ति भावना का आवेश ऊँचे दर्जे तक की उष्णता ले आता है। कभी वह दूध के झाग या पानी के बुलबुले जैसा नीचे बैठ भी जाता है। किन्तु यदि उसमें कुण्डलिनी शक्ति का समावेश हुआ तो स्थिरता यथावत् बनी रहती है।
उपासना गायत्री का ही भौतिक पक्ष है। भौतिक प्रयोजनों के लिए शक्ति चाहिए। शक्ति ऊर्जा के सहारे विकसित होती है। कार्य कलेवर में अवस्थित पंचतत्व पंचप्राण ईंधन का काम दे जाते है। और उनके सहारे भीतरी अग्नि जगाई जा सकती है।
उपासना मूलतः धर्मधारणा और भाव संवेदना का प्रयोग है। इसमें आत्मशोधन को प्रधानता दी है एवं ध्यान धारण द्वारा भक्ति संचार करते हुए ब्राह्मी चेतना को निकटवर्ती बुलाया जाता है या उसके साथ गुँथा जाता है। लकड़ी के ढेर पर आग उगल देना या जलती आग में ईंधन डालते जाना समांतर कृत्य हैं। अन्तर इतना ही है कि आत्म समर्पण की अद्वैत की स्थिति ले आने चमत्कारी परिणति अविलम्ब बन पड़ती है। समर्पण भाव न होकर अपने लिये कुछ चाहने का सकाम प्रयोजन भाव न होकर अपने लिये कुछ चाहने का सकमा प्रयोजन भी हो गाड़ी धीमी चाल से चलती हो तो भी उस में अपना हित साधन तो हो ही जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-September
उपासना का तात्पर्य है- उसी के ढाँचे में अपने गुण, कर्म, स्वभाव को ढालना। मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखना। सज्जनोचित सदाशयता से अपने आपे को ओत-प्रोत करना। आस्तिकता की यही अवधारणा वास्तविक है और श्रेयस्कर भी। जहाँ वह रहेगी वहाँ आध्यात्मिकता भी आत्मावलम्बन के रूप में रहेंगी और व्यवहार में धार्मिकता, कर्तव्य परायणता के रूप में दृष्टिगोचर होती रहेंगी।
उपासना का सामान्य क्रम यह है कि प्रातःकालीन उगते सूर्य को अर्द्ध खुली आँखों से देखकर पलक बंद कर लिया जाय। भावना की जाय कि वह दिव्य सत्ता अपने किरण जाल समेत सम्पूर्ण शरीर में संव्याप्त हो गई। इस शुभारम्भ में जलाशय की समीपता शक्ति आकर्षण की दृष्टि से अधिक फलप्रद होती है। कई व्यक्ति जलाशय में खड़े होकर सूर्याभिमुख स्थिति में जप तथा ध्यान करते हैं। कई उतने समय तक गीले वस्त्र धारण किये रहते हैं।
उपासना मनोकामना पूर्ति और बाधाओं की निवृत्ति के लिए करते हैं। यह सर्वविदित परिचय है। गायत्री का सूक्ष्म परिचय प्राप्त करने के लिए अधिक गहराई में उतरने की आवश्यकता है। जिस प्रकार शुक्राणु में, एक व्यक्ति का स्वस्थ बुद्धि कौशल प्रतिभा आदि सभी कुछ सन्निहित रहता है। बीज में वृक्ष का कलेवर पुष्पों की बनावट, फलों का स्वाद एवं आयु विस्तार आदि की सारी विशेषताएँ सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहती हैं, उसी प्रकार गायत्री महामंत्र के 24 अक्षरों में से विभिन्न स्तर की विभूतियाँ, अशिष्टताएँ, ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ समाविष्ट हैं।
उपासना की जाती है वह है सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय। उत्कृष्टता एवं भाग्यवादिता का समन्वय। मात्र पूजा करने से नहीं आत्मा को परमात्मा के साँचे में डाल लेना ही योगाभ्यास हैं
उपासनात्मक कर्मकाण्डों द्वारा अपना पोषण प्राप्त करने के लिए आशा, अपेक्षा करते रहते हैं। जब वैसा कुछ मिल जाता है तो प्रसन्न होकर मनोवाँछित वरदान प्रदान करते हैं। मनुष्यों की संकल्प शक्ति देवताओं के स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के लिए विवश करती रही है। भागीरथ ने गंगा को स्वर्ग से उतार कर पृथ्वी पर बहने के लिए विवश किया था वृत्रासुर से संत्रस्त होकर देवगण महर्षि दधीचि से अस्थियाँ लेकर वज्र बनाने और संकट से त्राण पाने में सफल हुए थे। हरिश्चंद्र की आदर्शवादिता पर पुलकित होकर देवता स्वर्ग से पुष्प वर्षा करने के लिए छोड़ पड़े थे।
उपासना, साधना की सम्प्रदाय मेद से अनेकों विधि परंपरायें प्रचलित हैं। इनमें ध्यान-धारणा की सार्वभौम एवं सर्वानुमोदित स्थान मिला हुआ है। इसे आत्मवादी विशेष आकाँक्षा सँजोकर श्रद्धा विश्वास के साथ अपनाते और उसका भावना के अनुरूप प्रतिफल भी प्राप्त करते हैं। इतना ही नहीं अनीश्वरवादी भी मानसिक संतुलन बिठाने और एकाग्रताजन्य विशिष्टता प्राप्त करने के लिए ध्यान उपचार को प्रयोग में लाते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-July
उपासना का अर्थ है— "पास बैठकर संगति करना। जो सच्चे मन से संगति करेगा, उसमें उसके गुण भी अवश्य प्रकट होंगे। चंदन के पेड़ के पास उगने वाले झाड़-झंखाड़ भी सुगंधित हो उठते हैं। पारस छूकर लोहा सोना हो जाता है। भगवान के पास बैठने का तात्पर्य है उसके गुणों को अपने में भर लेना।
उपासना प्रयोगों में सर्वत्र स्थान दिया जाता है। उन अभ्यासों को अनीश्वरवादी भी मानसिक तनाव दूर करने एवं स्फूर्ति प्राप्ति के उद्देश्य से किया करते हैं। ध्यान को यों धर्मधारणा की परिधि में भी गिना जाता है, पर यह यहाँ तक सीमाबद्ध नहीं है। जिन्हें धर्म-प्रसंगों में आस्था नहीं है, वे भी इसे अनुभव के लिए अपनाते हैं और उसके लाभदायक परिणाम देखते हैं।
उपासना है। जिसकी वाणी में संपूर्ण प्राणियों के कल्याण की भावना सन्निहित है, वही परमात्मा की सच्ची प्रार्थना है। स्वार्थपूर्ण कामनाएँ इस विशालता में बाधा उत्पन्न करती हैं, इसलिए इनसे ऊपर उठकर हमारी भावनाएँ ऐसी हों जो आत्मकल्याण और संसार की भलाई से प्रेरित हों। वही प्रार्थना सार्थक हो सकती हैं, “हे भगवान! हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
उपासना का तात्पर्य है उसी के ढाँचे में अपने गुण-कर्म-स्वभाव को ढालना— "मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखना"— "सज्जनोचित सदाशयता में अपने आपको ओत-प्रोत करना। आस्तिकता की यही अवधारणा वास्तविक है और श्रेयस्कर भी। जहाँ वह रहेगी वहाँ आध्यात्मिकता भी आत्मावलंबन के रूप में रहेगी और व्यवहार में धार्मिकता, कर्त्तव्यपरायणता के रूप में दृष्टिगोचर होती रहेगी।"
उपासना तो थोड़ी-सी ही होती थी, पर पीड़ित मानवता को सहारा देने के लिए उन्होंने वृद्धावस्था के अंतिम चरण तक काम किया। विदेशी महिलाओं में सिस्टर निवेदिता, सरला बेन, मीरबेन, मदर टेरेसा को किसी कथा-कीर्तन वाली महिला से कम नहीं माना जा सकता।
उपासना का स्वरूप भी जनमानस में श्रद्धा का संचार कर सकता है।
उपासना से अधिक परिणाम प्राप्त होता है। संत टेनीसन ने लिखा है। “जितना संसार समझता है, प्रार्थना से उससे अधिक कार्य होता है।” इसलिए अपनी प्रार्थना ऐसी हो “हे प्रभु! तेरी शरण हम आए हैं। तुझसे वह प्रकाश प्राप्त करना चाहते हैं, जिससे अंधकार में भटकते हुए मनुष्यों के दुःख और संताप दूर कर सकें।
उपासनात्मक कर्मकांड ढेरों समय लगाकर करते रहने पर भी कोई कहने लायक प्रतिफल नहीं प्राप्त होता है।
उपासना, साधना का मूलभूत प्रयोजन यही है। कांटों में भटकने और सस्ते दाम में बहुमूल्य उपलब्धियां झटकने की फिराक में रहने वालों को ही असफलताजन्य निराशा का सामना करना पड़ता है।
उपासना, जिसने जो बताया, उसने बड़ी श्रद्धा से पूर्ण किए। फिर भी उसकी गोद सूनी-की-सूनी ही रही। अंत में उदास मन लेकर संतान पाने की लालसा से वह चिदम्बर दीक्षित के पास पहुँची। दीक्षित जी उद्भट विद्वान समाजसेवी और लोकोपकारी व्यक्ति थे। वह दूसरों के दुःख-दर्दों को अपना दुःख-दर्द समझकर दूर करने का भरसक प्रयत्न करते।
उपासना करने वाले ईश्वर के समान पवित्र, निस्पृह, न्यायपरायण, निरंतर व्यस्त परमार्थरत जैसे सद्गुणों से संपन्न न हो।"
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-February
उपासना एवं तपश्चर्या की चर्चा इन पृष्ठों में होती ही रही है। सहस्रांशु ब्रह्म यज्ञ इस युग का अभूतपूर्व यज्ञ है, उसमें भागीदार होने वाले ऋत्विज् आशाजनक गति से बढ़ रहे हैं। यह बड़े ही हर्ष की बात है। यह साधना पक्ष का महत्वपूर्ण अंग है। साथ ही ऋत्विजों का तथा प्रत्येक गायत्री प्रेमी का यह भी कर्त्तव्य है कि गायत्री माता की शिक्षा एवं नीति के अनुसार अपने जीवन की व्यवस्था बनावें जिससे अपने तथा अपने साथियों की सुख शान्ति में अभिवृद्धि हो।
उपासना करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-June
उपासना। मैं समाज में बड़ा कहलाऊँ, लोग मेरा आदर करें। रुपया होने से मैं आदर का पात्र बन सकूँगा। ‘ऐसे अनेक विचार मनः शक्ति को भंग करते हैं। यश, लाभ, सामाजिक प्रतिष्ठा की अनेक योजनाएं मनुष्य बनाया करता है, जिनमें कुछ पूर्ण तथा कुछ कभी पूर्ण न होने वाली होती हैं।
उपासना द्वारा ही हो सकता है।
उपासना के लाभों से लाभान्वित होना प्रत्येक श्रद्धालु एवं तपस्वी मनोवृत्ति के मनुष्य के लिए पूर्णतया संभव है।
उपासना के अतिरिक्त और क्या हो सकता है। परिवार देश तथा समाज के शासन में उचित व्यवहार ऐसे विश्वव्यापी शासन का एक अंग है, जो निष्पक्ष दृष्टि से जीवों की सम्पूर्णता को देखता है। विश्व का शासक भगवान् है और संसार का शासक भगवान् की एक किरण है। हम जीवित हैं, क्योंकि ईश्वर की एक सत्ता है। अतः जिस प्रकार भगवान् न्यायपूर्ण और सर्व आनन्द है।
उपासना के कारण उसके वास्तविक स्वरूप का जो अपमान होता है, उससे उसकी रक्षा हो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-January
उपासना की राह नहीं जानी थी वे उग्र तपश्चर्या में प्रवृत्त हो रहे हैं। जिनमें थोड़े से भी पूर्व संस्कार मौजूद थे, उनने तो इस यज्ञ में स्वयं ऋत्विज् बनने और दूसरों को बनाने में बहुत अधिक उत्साह दिखाया है।
उपासना करते हैं उसके सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी प्राप्त करने से वंचित न रहें। जो वैद्य निदान, निघंटु, नाड़ी परीक्षा, औषधि कूटना और गोली बनाना मात्र जानता है, उसे चिकित्सा के महत्वपूर्ण कार्य में कितनी सफलता मिलेगी, इसका अनुमान लगाना कुछ कठिन नहीं है। चिकित्सा शास्त्री की भाँति ही गायत्री विद्या का भी एक अत्यन्त महत्व पूर्ण विज्ञान है, उसकी जानकारी प्राप्त करने के लिए समुचित अध्ययन करने की आवश्यकता है। जो लोग उस ज्ञान की उपेक्षा करके जप करने मात्र को ही पर्याप्त समझते हैं, वे उपयुक्त लाभ प्राप्त नहीं कर सकते।
उपासना से दम्भ पर, मौन के द्वारा योग के विघ्नों पर और शरीर प्राण आदि को चेष्टारहित करके हिंसा पर विजय प्राप्त करें॥
उपासना करते हो, वह तो एक कोरा आदर्शवाद है। वह व्यावहारिक नहीं है। कभी थके, माँदे, झुँझलाये हुए आदमी को शान्त करने के लिए उसे एक औषधि के रूप में अच्छा असर समझा गया है;पर उस मनुष्य के इतिहास को जब प्रारम्भ से अन्त तक फरेब, प्रेम के साथ क्रोध, अहिंसा के साथ साथ हिंसा, सजा, और खून का बदला खून, मनुष्य क्या चींटी से लेकर हाथी तक ने स्वीकार किया है। देखते हो एक बड़ी मछली रहती है। बुद्धिमान मनुष्य भी ऐसा ही करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-May
उपासना के नाम से ही पुकारना हो तो कहना पड़ेगा कि यह प्रेम की अत्यन्त अविकसित अवस्था है। जब तक हृदय में किसी प्रकार का भय बना हुआ है तब तक प्रेम का विकास कैसे हो सकता है? प्रेम स्वभाव से ही सम्पूर्ण भय को नाश कर देता है। मान लीजिए एक माता रास्ते में खड़ी है, किसी कुत्ते के भूँकते ही वह डरी और पास घर में चली गयी। किन्तु सोचिये, यदि माँ के साथ उसका बच्चा होता और सिंह बच्चे के ऊपर झपट पड़ता तो माँ कहाँ जाती?
उपासना करना भी अधर्म बताया गया है। प्रेम किस फलाभ की आकाँक्षा नहीं रखता। प्रेम केवल प्रेम के लिए ही होता है। भक्त भगवान् से प्रेम इसलिए करता है कि वह प्रेम किये बिना रह ही नहीं सकता। तुम एक सुन्दर प्राकृतिक दृश्य देखकर उससे प्रेम करने लगते हो, तुम इस दृश्य से कुछ माँगते नहीं हो और न दृश्य ही तुमसे कुछ प्रार्थना करता है।
उपासना या मामूली अनुभवों को छपने के लिए भेजने का कोई सज्जन कष्ट न करें। क्योंकि इस अंक में सर्वसाधारण का, सामान्य साधनाओं का प्रकाशन न तो उपयोगी है और न आवश्यक।
उपासना की थी। वर्तमान समय में भी ऐसे अनेक सज्जन हैं जो गायत्री महाशक्ति की तपस्या करके अपने में अनेक विशेषताएं उत्पन्न कर चुके हैं, ऐसे सज्जन बहुधा स्वयं अपनी विशेषताएं प्रकट करने में संकोच करते हैं। इसलिए अखण्ड-ज्योति के पाठकों से प्रार्थना है कि उन्हें किन्हीं स्वर्गीय गायत्री उपासक का उत्साहवर्धक वृत्तान्त मालूम हो या वर्तमान काल के किन्हीं सफल साधक का परिचय हो तो उनकी सफलता प्रकट करने वाली घटनाओं का पूरा हाल छपने के लिये भेजें। उन महात्माओं के फोटो, या उनके द्वारा जिनको लाभ हुआ हो उनके फोटो अथवा लेखक महोदयों के फोटो भी छपने के लिए भेजे जा सकते हैं। लेख यथासंभव जल्दी ही भेजने चाहिए।
उपासना करते हैं वे वर-प्राप्ति की आशा न रहने पर उपासना न करेंगे, किन्तु भक्त तो भगवान् को प्रेमास्पद जान प्रेम करता है।
उपासना में सन्तोषजनक सफलता पाई है। ऐसे लोगों के चरित्रों का वृत्तान्त जानने से साधारण साधकों को आशा और उत्साह के साथ इस कल्याण मार्ग पर चलने का प्रोत्साहन मिलता है।
उपासना न करेंगे, किन्तु भक्त तो भगवान् को प्रेमास्पद जान प्रेम करता है।
उपासना करने से हम इहलोक और परलोक दोनों से गिर जायेंगे; इसका भी संकेत ईशोपनिषद् में ही ग्यारहवें श्लोक में किया गया है—
उपासना करते हैं। उनका ख्याल है कि भगवान् एक बड़े आदमी हैं, उनके एक हाथ में सोटा और दूसरे में चाबुक है, उनका हुकुम न मानने से डंडा पड़ने लगेगा, दण्ड के भय से की हुई उपासना के नाम से ही पुकारना हो तो कहना पड़ेगा कि यह प्रेम की अत्यन्त अविकसित अवस्था है। जब तक हृदय में किसी प्रकार का भय बना हुआ है तब तक प्रेम का विकास कैसे हो सकता है? प्रेम स्वभाव से ही सम्पूर्ण भय को नाश कर देता है। मान लीजिए एक माता रास्ते में खड़ी है, किसी कुत्ते के भूँकते ही वह डरी और पास घर में चली गयी।
उपासना आदर्श रूप में करना प्रारम्भ कर देगा। वह समझ लेगा की अन्य सब आदर्श इस आदर्श के भीतर ही हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-December
उपासना सन्तोषजनक होगी। ऐसे व्यक्ति भी 125 से अधिक सम्मिलित न किये जावेंगे।
उपासना के लिए प्रेरणा देता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-September
उपासना आरम्भ करने का मुहूर्त बहुत ही शुभ है। उस दिन उपवास, नवीन यज्ञोपवीत धारणा, अपने गायत्री गुरु का अभिवन्दन करके नई माला से जप आरम्भ करना चाहिए। पहले दिन 5 मालाएं जपनी चाहिए बाद को अपनी सुविधानुसार कम या ज्यादा मालाएं जपने का नियम रखा जा सकता है। जिन्हें नियमित साधना करने का अवकाश नहीं मिलता वे 24 मंत्र प्रातःकाल आँख खुलते ही और 24 मंत्र रात को सोते समय मौन मानसिक रूप में मन ही मन जप लिया करें। जप के समय ध्यान भी करते जाना चाहिए।
उपासना भी अधिक फलवती होती है।
उपासना आरम्भ कर दें।
उपासना द्वारा ही उसे प्राप्त किया जा सकता है।
उपासना, प्राणायाम, त्राटक और चित्त वृत्ति-निरोध का अभ्यास करो। इससे मन को एकाग्र करने में सहायता मिलेगी। फिर निरन्तर गम्भीर ध्यान का अभ्यास करो। आखिर में मन मग्न हो जावेगा।
उपासना का उग्र कार्यक्रम रहने के कारण हमारा अधिकाँश समय एकान्तवास में ही व्यतीत होता है। इसलिए उन दिनों कोई सज्जन मथुरा आकर हमारी शान्ति भंग न करें और न अनावश्यक पत्र व्यवहार ही करें।
उपासना के लिए नवरात्रि का पुण्य पर्व बहुत ही शुभ है। जैसे रात्रि और दिन के मिलन का समय “सन्ध्या” काल कहलाता है वैसे ही सर्दी और गर्मी की ऋतुओं का मिलन काल में आश्विन और चैत्र की नवरात्रि आती हैं इन ऋतु संध्याओं में साधना का भी विशेष महत्व है। जैसे स्त्री के ऋतुमती होने पर गर्भाधान सफल होने की संभावना अधिक रहती है वैसे ही नवरात्रि की गायत्री उपासना भी अधिक फलवती होती है।
उपासना नहीं करते उनके लिए आश्विन सुदी 1 शनिवार ता. 28 सितम्बर को प्रातःकाल उपासना आरम्भ करने का मुहूर्त बहुत ही शुभ है। उस दिन उपवास, नवीन यज्ञोपवीत धारणा, अपने गायत्री गुरु का अभिवन्दन करके नई माला से जप आरम्भ करना चाहिए। पहले दिन 5 मालाएं जपनी चाहिए बाद को अपनी सुविधानुसार कम या ज्यादा मालाएं जपने का नियम रखा जा सकता है। जिन्हें नियमित साधना करने का अवकाश नहीं मिलता वे 24 मंत्र प्रातःकाल आँख खुलते ही और 24 मंत्र रात को सोते समय मौन मानसिक रूप में मन ही मन जप लिया करें। जप के समय ध्यान भी करते जाना चाहिए।
उपासना की प्रगति की सूचना आप समय-समय पर गायत्री संस्था को देते रहें और तत्संबन्धी आवश्यक परामर्श प्राप्त करते रहें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-August
उपासना करोगे, किस रूप को पकड़ के अपने दिल में बिठाओगे। उपनिषद्कार ऋषि यह उपदेश दे रहे हैं कि इन सबकी ओर से अपना चित्त हटा के केवल भगवद् चरणों में लगाओ—वह ही एक ‘सत्’ है और उसकी उपासना जीव का कल्याण करती है। यही उस प्रश्न का उत्तर है कि ‘हम ईश्वर की उपासना क्यों करें। इसके लिए किसी दूसरी देखी-भाली अपनी प्यारी वस्तु को क्यों न छाँट लें’ उपनिषद् आगे और भी कहता है :—
उपासना ढीली रहती है, उसका चिंतन और ध्यान एक रस नहीं चल पाता है, वह आत्म चेष्टा में हिम्मत हार बैठता है, वह मन के धक्के का सहन नहीं कर सकता, विघ्न आने पर उनका मुकाबला नहीं कर सकता, बलहीन में साहस और उत्साह की कमी रहती है, उसका इरादा अथवा संकल्प मजबूती लिए नहीं होता, करता है फिर छोड़ देता है, ऐसों को अमरधाम में पहुँचना एवं मन पर अधिकार करके आत्मसाक्षात्कार करना बड़ा ही कठिन हो जाता है। वह सफल हो सकेगा या नहीं इसमें सन्देह ही रहता है। इसलिए ठीक रास्ता जिज्ञासु के लिए यह है कि—वीर्य रक्षा करके और रोगों से बचा करके शरीर को बलवान बनाओ फिर आत्म साधनों में लग पड़ो और उस अवस्था में अपने को पहुँचाओ जहाँ आगे पीछे, ऊपर नीचे, दाएँ-बाएँ एक शुद्ध चैतन्य पुरुष की सत्ता भरी हुई दृष्टि-गोचर हो, प्रत्येक वस्तु उसके रंग में रंगी हुई दिखाई दे, प्रत्येक पदार्थ में उसके रूप की झलक झलकती हुई नजर आवे, प्रकृति के प्रत्येक कण तुम्हारे लिए दर्पण बन जाये जिसमें प्यारे का मुखड़ा चमकता हुआ जान पड़े। तुममें तुमसे बाहर, औरों में औरों से बाहर वही एक तत्व भरा हुआ अनुभव हो, वह सबमें और सब उसमें प्रत्यक्ष मालूम देने लगें, इसका नाम ही ‘ब्रह्मचर्यावस्था’ है और यहाँ तक पहुँचा हुआ ही ‘ब्रह्मचारी’ है। वीर्य रक्षा, विचार संयम और इच्छा शक्ति को बलवान बनाने से और निरन्तर अपना उद्योग जारी रखने से आगे चल कर कुछ काल में साधकों पर यह अवस्था आ जाती है।
उपासना से और फल मिलता है और प्रकृति के बने हुये पदार्थों, शरीर इत्यादि की उपासना का और (दूसरा) फल मिलता है। ऋषि कह रहे हैं कि—ऐसा बुद्धिमान धीर पुरुषों से हमने सुना है और उन्होंने खोल के अर्थात् स्पष्ट हमको बतलाया है।
उपासना करता है, आत्मा और शरीर दोनों को बल देता है, शरीर और आत्मा दोनों के रोगों को दूर कर उन्हें स्वस्थ बनाता है, वही अमरता को प्राप्त होता है।
उपासना भी नहीं बन पड़ेगी कोई साधन मन की एकाग्रता का नहीं हो सकेगा, ध्यान व पूजन भी ऐसा निर्बल मनुष्य नहीं कर सकेगा, तो ऐसी दशा में क्या करना उचित है? इसका उपाय भी उपनिषद्कारों ने बताया है :—
उपासना जीव का कल्याण करती है। यही उस प्रश्न का उत्तर है कि ‘हम ईश्वर की उपासना क्यों करें। इसके लिए किसी दूसरी देखी-भाली अपनी प्यारी वस्तु को क्यों न छाँट लें’ उपनिषद् आगे और भी कहता है :—
उपासना का और (दूसरा) फल मिलता है। ऋषि कह रहे हैं कि—ऐसा बुद्धिमान धीर पुरुषों से हमने सुना है और उन्होंने खोल के अर्थात् स्पष्ट हमको बतलाया है।
उपासना क्यों करें। इसके लिए किसी दूसरी देखी-भाली अपनी प्यारी वस्तु को क्यों न छाँट लें’ उपनिषद् आगे और भी कहता है :—
उपासना मन में और आत्मा में बल लाती है और ऐसी बलवती आत्मा और बलवान मन ही उस (जीव) को उठाकर शान्ति और आनन्द के धाम में पहुँचाता है इसीलिए कहा जाता है कि—इच्छा शक्ति और विचार शक्ति को बलवान बनाओ, इन्हीं के द्वारा जीव का कल्याण होता है, वह मोक्ष धाम में पहुँचाता है, आवागमन के चक्कर से छुटकारा पाता है। मन की बिखरी हुई शक्तियों को एकाग्र करना और विचार पर संयम करना ही मनुष्य का कर्त्तव्य है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-October
उपासना नहीं की। अर्चना की तो सागर ही की। छोड़िये त्रेता को।
उपासना और साधना का, आध्यात्मिकता का विषय तपस्वियों और साधना से सम्बन्ध रखता है। जिन व्यक्तियों की इस क्षेत्र में गति है, अनुभव है उन्हीं को कुछ कहना या बोलना चाहिए। यों साहित्य के अंतर्गत सभी बातें आती हैं। पुस्तकों में बहुत कुछ लिखा है पर केवल पुस्तकीय ज्ञान के आधार पर हर व्यक्ति को हर विषय में बोलने का अधिकार नहीं होता। शास्त्री लोग व्याकरण की, साहित्य की बारीकियों को आसानी से समझ सकते हैं, उस विषय में वे प्रामाणिक भी हो सकते हैं।
उपासना में भी बाल की खाल निकाल कर अधार्मिक सिद्ध करने और लोगों को उस मार्ग से रोकने के लिए उनका शास्त्रीय ज्ञान उछल पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-July
उपासना एक बड़ा ही महत्वपूर्ण आध्यात्मिक व्यायाम है। जैसे शारीरिक व्यायाम से शरीर का बल बढ़ता है वैसे ही उपासना रूपी आध्यात्मिक व्यायाम से आत्मिक बल बढ़ता है। जैसे रुपए की शक्ति से बाजार में बिकने वाली चाहे जिस वस्तु को खरीद सकते हैं वैसे ही आत्मिक शक्ति के बदले में भी नाना प्रकार की साँसारिक एवं आत्मिक समृद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं।
उपासना में बहुत थी।
उपासना का भारी असर उस बैमत (प्रेतात्मा) पर हो रहा था।
उपासना के सम्बन्ध में भी यही बात है। साधक का अपनी साँसारिक या आत्मिक उन्नति का मनोवाँछित लक्ष पूर्ण हो चाहे न हो पर इस महान साधना की उपयोगिता वैसे ही रहेगी जैसी अनादि काल से असंख्य प्रयोगों के बाद महत्वपूर्ण सिद्ध हुई है। जिन्हें लाभ नहीं हुआ है उन्हें व्यायाम को कोसने से काम न चलेगा, उन्हें वे कारण ढूँढ़ निकालने होंगे जो असफलता के कारण हैं। वे सब कारण यदि दूर न हो सकते हों तो उस अच्छे व्यायाम से यदि उन्नति कुछ कम होती हो तो उससे भी सन्तोष करके धीरे धीरे अधिक उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।
उपासना की सलाह दी, उन्होंने गत नवरात्रियों में मेरे साथ चौबीस हजार का लघु अनुष्ठान किया। उन्हें माता की कृपा प्राप्त हुई और 10 दिन बाद ही एक अच्छी नौकरी मिल गई। उनके अफसर भी बहुत खुश हैं और आगे उन्नति के लक्षण दिखाई दे रहे हैं।
उपासना करके और भी कई लोग लाभ उठा चुके हैं। सीकरी गाँव में एक ब्राह्मण के कोई सन्तान न थी उसने गायत्री की साधना की। उसके एक पुत्र हुआ जो अब बड़ा ही होनहार और सुन्दर दिखाई पड़ता है। एक रागी का 6 मास का पुराना आधाशीशी का सिर दर्द दूर हो गया। नगरिया गाँव का एक लड़का जो वर्ष में तीन महीने भी स्कूल नहीं गया था और उसके पास होने की कोई आशा न थी गायत्री जप करने से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ।
उपासना मेरी दृष्टि में एक विशुद्ध विज्ञान है जिसके आधार पर चलने वाले मनुष्य के लिए यह सुगम है कि वह अपने विचार, स्वभाव और दृष्टिकोण में उच्च कोटि का परिवर्तन हो जाने के कारण संसार में शान्तिपूर्ण सुविकसित जीवन व्यतीत करें और आत्मा को परमात्मा के समीप पहुँचा देने की दिशा में दिन दिन तीव्र गति से अग्रसर होता चले।
उपासना से मनुष्य को आत्मिक उन्नति में बहुत शीघ्र सफलता मिलती है। अब उसका कारण भी मेरी समझ में आ गया। अन्य मार्गों से साधना करने में सही पथ प्रदर्शन ढूँढ़ने और प्राप्त करने में ही बहुत भारी शक्ति व्यय करनी पड़ती है पर गायत्री उपासना में वह सब अनायास ही प्राप्त हो जाती है। यही कारण है कि इस मार्ग के पथिक, अन्य मार्गों की अपेक्षा अधिक शीघ्र निर्धारित लक्ष तक पहुँच जाते हैं।
उपासना की। वृन्दावन में रहकर उन्होंने 13 वर्ष तक निरन्तर गायत्री पुरश्चरण किये। इतना करने पर भी उन्होंने अपने में कोई विशेषता दिखाई न दी और न कोई अन्य प्रकार का लाभ दिखाई दिया। इतने लम्बे समय तक निरन्तर इतना परिश्रम करना और फिर उसका कुछ भी लाभ दिखाई न देना,सचमुच ही एक बड़ी निराशा की बात थी, माधवाचार्य जी को भी निराश हुई और वे उस साधना को तथा वृन्दावन को छोड़कर काशी चले गये।
उपासना करते हैं उनमें से कई को गायत्री माता की कृपा के चमत्कारी अनुभव हुए हैं—
उपासना से यदि मनोवाँछित सीमा तक लाभ न भी हो तो भी स्वभाव में, चरित्र में, विचारों में, स्वास्थ्य में, बुद्धि में जो भारी परिवर्तन होते हैं उनके कारण जीवन का विकास सुख शान्ति की दिशा में ही होता है। यह विकास एक दिन पूर्णावस्था तक पहुँच सकता है।
उपासना होती है उस घर में भूत पिशाच जैसी मलीन आत्माएँ रह नहीं सकतीं, ऐसे घरों में तो देव वास ही रहता है।
उपासना पर ध्यान रखती। इसी प्रकार धीरे धीरे कई महीने बीते परीक्षा का फार्म भर दिया गया। देखते देखते तिथि भी आ गई। तैयारी बहुत कम थी, इसलिए फेल होने की बात मन में बैठी हुई थी। परीक्षा समाप्त हुई तो मैंने पूछा कि कैसी आशा है?
उपासना द्वारा ही हुआ था।
उपासना करने की मैं अन्य लोगों को सलाह देता रहता हूँ।
उपासना का सारा विधान उन्हें समझा दिया।
उपासना करके सिद्धावस्था को प्राप्त किया था। उनकी सिद्धियों के बारे में वहाँ के सत्संग प्रेमी सज्जनों के मुख से अनेक गाथाएं सुनी जा सकती हैं।
उपासना करने लगा।
उपासना में अत्यधिक तल्लीन रहना और दूसरे अधिकारी व्यक्तियों को इस महान् साधना में प्रवृत्त होने के लिए आग्रहपूर्वक प्रेरणा देना। उनकी यह आसक्ति वस्तुतः अनासक्ति साधना की ही एक पद्धति है। ऐसे महात्माओं से भारत भूमि को फिर प्राचीन युग उपस्थित करने की आशा की जा सकती है।
उपासना को अपना लिया और वे शेष जीवन उसी को अपनाये रहे जिससे उनके स्वभाव में बड़े ही उत्तम सतोगुणी परिवर्तन हुए और शान्ति पूर्ण सद्गति के अधिकारी बने।
उपासना की थी तदनुसार उन्हें महा प्रतापी पुत्र की प्राप्ति हुई। योगीराज मछीन्द्र नाथ की भस्म विभूति के द्वारा महायोगी गोरखनाथ का जन्म हुआ था। अंजनी ने कठिन तप करके बजरंगी हनुमान जी का प्रसव किया था। दशरथ जी को यज्ञ के पुण्य प्रताप से संतान हीन के दुख से मुक्ति मिली थी और चार पुत्र प्राप्त हुए थे। कर्ण को नित्य सवा मन स्वर्ण प्राप्त होने का वरदान प्राप्त हुआ था, वह इस स्वर्ण को नित्य दान कर देता था।
उपासना प्रारम्भ कर दी।
उपासना के लिये प्रसन्नतापूर्वक तैयार हो गये। मैंने उन्हें सारा विधि विधान समझा दिया। वे 40 दिन की साधना में लग गये। इस साधना को भंग करने के लिए वैमत ने ऐसे ऐसे उपद्रव खड़े किये कि यह लगता था कि यह इस साधना को पूरा न होने देगी, बीच में ही खंडित करके मानेगी। पर साधना किसी प्रकार चलती ही रही।
उपासना की वैज्ञानिक पद्धति से ही हम अपनी मनोभूमि को निम्नस्तर से उठाकर उच्च भूमिका में परिवर्तन कर सकते हैं। जैसे अग्नि संस्कार से संसार के स्थूल पदार्थों में भारी हेर-फेर हो जाता है वैसे ही साधना की अग्नि द्वारा मनोभूमि में ऐसे वैज्ञानिक परिवर्तन होते हैं जिनके कारण उसके पूर्व रूप में अभीष्ट परिवर्तन किया जाना संभव है।
उपासना से अनेकों को अनेक लाभ प्राप्त करते हुए मैंने देखा है। पर सबसे बड़ा लाभ इस साधना का मुझे यह दिखाई पड़ता है कि गायत्री उपासक के विचार और कार्यों में दिन दिन सात्विकता एवं सेवा का सम्पुट बढ़ता जाता है। उसकी बुराइयाँ अपने आप घटती हैं और सन्मार्ग की ओर चलने की स्वाभाविक प्रवृत्ति पैदा हो जाती है।
उपासना में तत्पर रहने लगा।
उपासना को इस शिक्षा के साथ साथ उसने अपना आधार बनाया। वह पढ़ाई की भाँति ही वरन् उससे भी अधिक गायत्री उपासना पर ध्यान रखती। इसी प्रकार धीरे धीरे कई महीने बीते परीक्षा का फार्म भर दिया गया। देखते देखते तिथि भी आ गई। तैयारी बहुत कम थी, इसलिए फेल होने की बात मन में बैठी हुई थी।
उपासना की ओर अग्रसर हुए हैं ओर वे भी मेरी ही भाँति आन्तरिक शान्ति एवं प्रगति का अनुभव कर रहे हैं। मैं अन्ध श्रद्धालु नहीं हूँ। हर बात की वास्तविकता का परीक्षण करके ही उसे स्वीकार करना मेरा स्वभाव है। गायत्री उपासना मेरी दृष्टि में एक विशुद्ध विज्ञान है जिसके आधार पर चलने वाले मनुष्य के लिए यह सुगम है कि वह अपने विचार, स्वभाव और दृष्टिकोण में उच्च कोटि का परिवर्तन हो जाने के कारण संसार में शान्तिपूर्ण सुविकसित जीवन व्यतीत करें और आत्मा को परमात्मा के समीप पहुँचा देने की दिशा में दिन दिन तीव्र गति से अग्रसर होता चले।
उपासना में संलग्न हैं और अपने प्रेमियों को वही बताते रहते हैं कि अनासक्त जीवन व्यतीत करना एवं गायत्री की उपासना करना आत्म कल्याण के यह दो ही मार्ग हैं।
उपासना एक उच्च कोटि का आध्यात्मिक व्यायाम है। उसके लाभ महान् हैं और सुनिश्चित हैं। परन्तु उसे प्राप्त करने के लिए साधक में आवश्यक धैर्य, विवेक और, भावना का होना आवश्यक है। जिनमें यह तीनों बातें होती हैं वे माता के दरबार से कदापि खाली हाथ नहीं लौटते।
उपासना की महिमा अपार है उससे गृहस्थ और महात्मा सभी उच्च स्थिति पर पहुँच सकते हैं।
उपासना रूपी आध्यात्मिक व्यायाम से आत्मिक बल बढ़ता है। जैसे रुपए की शक्ति से बाजार में बिकने वाली चाहे जिस वस्तु को खरीद सकते हैं वैसे ही आत्मिक शक्ति के बदले में भी नाना प्रकार की साँसारिक एवं आत्मिक समृद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं।
उपासना पर विश्वास करता हूँ। क्योंकि उस दिव्य शक्ति से अधिक लाभ उठाने का यही मार्ग सर्वोत्तम है। जब साधक का मन कामना के स्वार्थ और लोभ में लगा रहता है तो वह दिव्य शक्ति को अपना मतलब निकालने का एक जरिया मात्र समझता है। ऐसी क्षुद्र मनोभूमि को घटघट वासिनी माता भली प्रकार जानती है, और उसे कुत्ते को टुकड़ा फेंक देने की भाँति कभी कुछ दे देती है। परन्तु जो साधक स्वार्थ की कामनाओं से दूर रह कर सच्चे हृदय से भक्ति एवं आत्म समर्पण करता है,उसे वे अपनी गोद में ले कर वह वस्तु देती हैं जिसे संसार में कोई व्यक्ति नहीं दे सकता।
उपासना में ही लगाते हैं। मैं भी अपनी जीवनदात्री महाशक्ति को कैसे भूल सकता हूँ। मैं भी यथासम्भव गायत्री उपासना में भूल नहीं करता और विश्वास करता हूँ कि जो शक्ति इतना बड़ा संकट टाल सकती है उसके लिए किसी भी कठिनाई को दूर कर सकना कठिन नहीं है।
उपासना करना आत्म कल्याण के यह दो ही मार्ग हैं।
उपासना में भी उपस्थित होते हैं। कई व्यक्ति जन्म जन्मान्तरों के संचित शुभ संस्कारों और वर्तमान जीवन में उपयुक्त मनोभूमि रहने के कारण बहुत शीघ्र उन्नति कर जाते हैं और उन्हें आशाजनक आत्मिक उत्कर्ष एवं आश्चर्यजनक साँसारिक लाभ मिलते हैं परन्तु दूसरा व्यक्ति जिसके संचित कर्म, एकत्रित संस्कार और वर्तमान जीवन के उपयुक्त अवसर प्राप्त नहीं हैं, वे उसी साधना को उसी रीति से करते हुए भी कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाते। ऐसे लोग खिन्न होते हैं और साधना के प्रति अश्रद्धा भी प्रकट करते हैं। वे बहुत शीघ्र तात्कालिक सफलता असफलता के आधार पर अपना निर्णय दे देते हैं परन्तु उन सूक्ष्म बातों के अन्तर पर दृष्टिपात नहीं करते जो इन सफलता और असफलता की तह में काम करती हैं।
उपासना है। साधना, तपस्या, व्रत, आराधना, उपासना की वैज्ञानिक पद्धति से ही हम अपनी मनोभूमि को निम्नस्तर से उठाकर उच्च भूमिका में परिवर्तन कर सकते हैं। जैसे अग्नि संस्कार से संसार के स्थूल पदार्थों में भारी हेर-फेर हो जाता है वैसे ही साधना की अग्नि द्वारा मनोभूमि में ऐसे वैज्ञानिक परिवर्तन होते हैं जिनके कारण उसके पूर्व रूप में अभीष्ट परिवर्तन किया जाना संभव है।
उपासना में लगे हुए हैं। जितना कुछ बन पड़ता है माता की सेवा-पूजा करते हैं। अपने थोड़े से प्रयत्न को देखते हुए, उससे प्राप्त होने वाले सत्परिणामों की मात्रा बहुत भारी है। जब हम स्वल्प साधना से इतना लाभ उठाते हैं तो नाना जी की तपस्या को देखते हुए उनका इतना प्रताप उचित ही था।
उपासना में वह सब अनायास ही प्राप्त हो जाती है। यही कारण है कि इस मार्ग के पथिक, अन्य मार्गों की अपेक्षा अधिक शीघ्र निर्धारित लक्ष तक पहुँच जाते हैं।
उपासना में प्रवृत्त रहती है। पड़ोस की स्त्रियाँ उस पर बहुत श्रद्धा करती हैं और कोई बच्चा बीमार होता है तो उसके पास ले जाती हैं। धर्मपत्नी गायत्री से जल अभिमन्त्रित करके देती है और उसका प्रभाव औषधि से भी अधिक होता है।
उपासना करो। भैरव उपासना का सारा विधान उन्हें समझा दिया।
उपासना ने अन्तर एवं परिवर्तन उपस्थित कर दिया है।
उपासना का वास्तविक लाभ सतोगुण की वृद्धि और आत्म कल्याण ही है। इसी मार्ग पर मैं स्वयं प्रवृत्त हूँ और इसी भावना से गायत्री की उपासना करने की मैं अन्य लोगों को सलाह देता रहता हूँ।
उपासना ऐसी तपश्चर्या है जिसे गृही और विरागी, स्त्री और पुरुष, बालक और वृद्ध समान सुविधा से कर सकते हैं। तप ही एकमात्र वह साधन है जिससे आत्मिक शक्ति बढ़ती है और आत्म शक्ति ही संसार की वह सर्वोपरि वस्तु है जिसके द्वारा मनुष्य इच्छानुकूल पदार्थ, मनोवाँछित परिस्थिति और अक्षय शाँति प्राप्त कर सकता है। दैवी शक्तियों को सहायता एवं ईश्वरीय कृपा को उपलब्ध करना भी तप द्वारा उपार्जित आत्म शक्ति पर ही निर्भर है।
उपासना करता है वह दुर्बुद्धि पुरुष पकाये हुए अन्न को छोड़ कर भिक्षा के लिए घूमने वाले पुरुष के समान है॥42॥
उपासना में प्रवृत्त हो गये। कुछ बड़ी आयु होने पर माता जी उन्हें धन उपार्जन के लिए प्रेरणा देने लगी ताकि निर्वाह की कठिनाई दूर हो। ब्रह्मचारी जी ने जगत जननी गायत्री से प्रार्थना की। आज्ञा हुई कि अमुक स्थान पर भूमि में धन गढ़ा है। उसमें से अपनी आवश्यकतानुसार निकाल लो।
उपासना में मेरी श्रद्धा, विश्वास, जानकारी और अनुभूति दिन दिन बढ़ती जा रही है और यह अनुभव होता है कि प्रगति सन्तोष जनक हो रही है।
उपासना करने वाला द्विज कृतकृत्य हो जाता है।
उपासना में भूल नहीं करता और विश्वास करता हूँ कि जो शक्ति इतना बड़ा संकट टाल सकती है उसके लिए किसी भी कठिनाई को दूर कर सकना कठिन नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-April
उपासना के दो अंग हैं। (1) साकार उपासना, (2) निराकार उपासना। साकार उपासना वह है जिसमें ईश्वर की या उसकी किसी विशेष शक्ति की कोई प्रतिमा बनाकर उसका ध्यान एवं पूजन किया जाता है। यह प्रतिमा किसी धातु, पत्थर आदि की या चित्र की बनी हो सकती है और उसकी मांगलिक वस्तुओं से षोडशोपचार पूजा की जाती है अथवा केवल ध्यान द्वारा किसी प्रतिमा में अपना मानसिक वन्दन और तादात्म्य किया जा सकता है।
उपासना उपयोगी पड़ती है। ऊँची स्थिति में पहुँचे हुए साधक के लिये फिर उसकी आवश्यकता नहीं रह जाती उसके लिये निराकार उपासना ठीक पड़ती है।
उपासना से उसका कोई गम्भीर विरोध नहीं समझना चाहिए। क्योंकि बुतपरस्ती से घोर द्वेष करने वाले मुसलमान भी मजार, ताजिया, दुलदुल, कावे का पत्थर आदि के माध्यम से किसी न किसी प्रकार उसे करते हैं। धर्म से दूर रहने वाले आज के राजनीतिक नेता भी झण्डा वन्दन, महात्मा गाँधी की समाधि पर माथा टेकना आदि क्रियाएँ करते हैं।
उपासना। साकार उपासना वह है जिसमें ईश्वर की या उसकी किसी विशेष शक्ति की कोई प्रतिमा बनाकर उसका ध्यान एवं पूजन किया जाता है। यह प्रतिमा किसी धातु, पत्थर आदि की या चित्र की बनी हो सकती है और उसकी मांगलिक वस्तुओं से षोडशोपचार पूजा की जाती है अथवा केवल ध्यान द्वारा किसी प्रतिमा में अपना मानसिक वन्दन और तादात्म्य किया जा सकता है।
उपासना विधियों में कोई विरोध नहीं, वरन् एक दूसरे की पूरक हैं। आरम्भिक साधक के लिये मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधार पर साकार उपासना उपयोगी पड़ती है। ऊँची स्थिति में पहुँचे हुए साधक के लिये फिर उसकी आवश्यकता नहीं रह जाती उसके लिये निराकार उपासना ठीक पड़ती है।
उपासना :- उपासना के दो अंग हैं। (1) साकार उपासना, (2) निराकार उपासना। साकार उपासना वह है जिसमें ईश्वर की या उसकी किसी विशेष शक्ति की कोई प्रतिमा बनाकर उसका ध्यान एवं पूजन किया जाता है। यह प्रतिमा किसी धातु, पत्थर आदि की या चित्र की बनी हो सकती है और उसकी मांगलिक वस्तुओं से षोडशोपचार पूजा की जाती है अथवा केवल ध्यान द्वारा किसी प्रतिमा में अपना मानसिक वन्दन और तादात्म्य किया जा सकता है।
उपासना की तपश्चर्या बहुत ही संतोषजनक रीति से पूर्ण हुई। तप से अन्तःकरण के मल जलते हैं और आत्मबल बढ़ता है। असुरता घटती और देवत्व पनपता है। अनेकों ग्रन्थ पढ़ने और अगणित प्रवचन सुनने पर भी जिनकी मनोभूमि में कोई सुधार नहीं हो सका उन्हें थोड़े ही तप से अपने अन्दर एक अपूर्व परिवर्तन परिलक्षित होता है। स्वाध्याय, सत्संग, कथा, कीर्तन, हवन, दान आदि का अपना महत्व है, पर तप की महत्ता सर्वोपरि है।
उपासना में मनुष्याकृति प्रतिमा की आवश्यकता नहीं पड़ती। केवल प्रकाश ज्योति, शून्य आकाश आदि की कोई प्रकृति परक स्थिति का ध्यान करके ईश्वर में तादात्म्य स्थापित किया जाता है।
उपासना करने वालों के लिए माता की सुन्दर मूर्ति या चित्र या प्रतिमा मांगलिक द्रव्यों से पूजन एवं भक्ति भावना पूर्ण ध्यान एवं अभिवन्दन आवश्यक होता है।
उपासना करनी हो वे प्रकाश की प्रज्ज्वलित ज्योति के रूप में, भृकुटि, सूर्यचक्र या आकाश में ध्यान करें। बाह्य पूजा में अग्नि को देव प्रतिमा मानकर अग्निहोत्र, धूपबत्ती, घी का दीपक आदि के रूप में सुगंधित हविष्य जलाते हुए पूजन की विधि पूर्ण कर लें।
उपासना, (2) निराकार उपासना। साकार उपासना वह है जिसमें ईश्वर की या उसकी किसी विशेष शक्ति की कोई प्रतिमा बनाकर उसका ध्यान एवं पूजन किया जाता है। यह प्रतिमा किसी धातु, पत्थर आदि की या चित्र की बनी हो सकती है और उसकी मांगलिक वस्तुओं से षोडशोपचार पूजा की जाती है अथवा केवल ध्यान द्वारा किसी प्रतिमा में अपना मानसिक वन्दन और तादात्म्य किया जा सकता है।
उपासना वह है जिसमें ईश्वर की या उसकी किसी विशेष शक्ति की कोई प्रतिमा बनाकर उसका ध्यान एवं पूजन किया जाता है। यह प्रतिमा किसी धातु, पत्थर आदि की या चित्र की बनी हो सकती है और उसकी मांगलिक वस्तुओं से षोडशोपचार पूजा की जाती है अथवा केवल ध्यान द्वारा किसी प्रतिमा में अपना मानसिक वन्दन और तादात्म्य किया जा सकता है।
उपासना को जीवन में समाहृत करता रहा है।
उपासना ठीक पड़ती है।
उपासना से उसमें और भी चार चाँद लग जाते हैं। इस तप के ऐसे सूक्ष्म परिणाम होंगे जो इस महान् तपश्चर्या में प्रवृत्त तपस्वियों का ही नहीं, समस्त मनुष्य जाति का, समस्त संसार का कल्याण उपस्थित करेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-March
उपासना भी सन्तोषप्रद परिणाम उत्पन्न करती है।
उपासना से जिन सज्जनों को स्वयं कोई उत्साह वर्धक अनुभव हुए हों, या किन्हीं दूसरों को प्राप्त हुए लाभों का वृत्तांत विदित हो तो वह घटनाएँ सम्बन्धित व्यक्तियों का आधे शरीर का फोटो भी भेजने का प्रयत्न करना चाहिए। उस प्रकार के लेख यथासम्भव शीघ्र ही भेजने चाहिए ताकि फोटो ब्लॉक बनवाने और लेख संशोधन का कार्य समय पर पूरा हो सके।
उपासना के क्षेत्र में अब तक प्रवेश नहीं किया है, उनके लिए इस नवरात्रि से प्रारम्भ करना एक बहुत ही शुभ मुहूर्त है। जो लोग नियमित साधना न कर सकते हों वे सुविधा के समय मौन मानसिक जप कर सकते हैं थोड़ी सी साधना भी श्रद्धा बढ़ाती है और परीक्षा के लिए की हुई थोड़ा उपासना भी सन्तोषप्रद परिणाम उत्पन्न करती है।
उपासना के लिए यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण समय है। इस समय में की हुई साधना अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण होती है। इसलिए इस वर्ष संध्या की ऋतु बेला में साधारण साधना की अपेक्षा कुछ न कुछ अधिक साधना करनी चाहिए।
उपासना के अंतर्गत यही भाव है कि हम विशुद्ध, पवित्र और पूर्ण बन जावें, जैसा कि परमात्मा का स्वरूप है—’वह भूमा है,जो सुख है, सो सुख अल्प है, उसमें आनन्द ही कैसे—अन्तः भूमा में ही सुख है और उसी की प्राप्ति करनी चाहिये। ईश्वर का आनन्दमय, दिव्य-स्वरूप हम पाना चाहते हैं तो हमें अवश्य तद्गुणात्मक ही हो जाना चाहिये।’
उपासना के लिए पाठकों से हमारा विशेष अनुरोध है। परीक्षा के रूप में इस ओर कदम बढ़ाने से सज्जनों को इससे आशा जनक सन्तोष मिलेगा।
उपासना के ऐसे अनुभव रहेंगे जिनसे इस मार्ग के पथिकों का पथ-प्रदर्शन हो और उनके उत्साह एवं श्रद्धा-विश्वास में अभिवृद्धि हो। गायत्री उपासना से जिन सज्जनों को स्वयं कोई उत्साह वर्धक अनुभव हुए हों, या किन्हीं दूसरों को प्राप्त हुए लाभों का वृत्तांत विदित हो तो वह घटनाएँ सम्बन्धित व्यक्तियों का आधे शरीर का फोटो भी भेजने का प्रयत्न करना चाहिए। उस प्रकार के लेख यथासम्भव शीघ्र ही भेजने चाहिए ताकि फोटो ब्लॉक बनवाने और लेख संशोधन का कार्य समय पर पूरा हो सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-January
उपासना, तपश्चर्या के द्वारा कई व्यक्ति कुछ दैवी वरदान प्राप्त करते हैं। कइयों को तपस्वी महापुरुषों की कृपा से भी कुछ विशेष लाभ प्राप्त होता है, पर इसमें भी भाग्य नहीं पुरुषार्थ ही प्रधान है। साधना को इस संसार का सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना गया है। उसमें शरीर, मन और आत्मा के तीनों क्षेत्रों को नियंत्रित करके एक विशेष दिशा में प्रयत्नपूर्वक चलाना पड़ता है। यह पुरुषार्थ ही कालान्तर में फलित होकर दैवी अनुग्रह या वरदान के रूप में वापस लौटता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-February
उपासना के लिए पूजा पाठ से कर्मकाण्ड की चिन्हपूजा करते रहने मात्र से उपासना का उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सकता। जीव को जीवन धारण करने के लिये शरीर की आवश्यकता होती है पर शरीर ही जीवन
उपासना द्वारा आत्मा और परमात्मा का मिलन होने पर जीव में दैवी गुणों की तीव्रगति से अभिवृद्धि होने लगती है।
उपासना के तत्वज्ञान से अभी बहुत पीछे हैं। उन्हें उन बालकों में गिना जाना चाहिये जो प्रसाद के लालच से मन्दिर में जाया करते हैं। ऐसे बच्चे वह आनन्द कहाँ पाते हैं जो भक्तिरस में निमग्न एक भावनाशील आस्तिक को प्रभु के सम्मुख अपना हृदय खोलने और मस्तक झुकाने में आता है। प्रभु के चरणों पर अपनी अन्तरात्मा की अर्पण करने वाले भावविभोर भक्त और प्रसाद को मिठाई लेने के उद्देश्य में खड़े हुए भिखमंगे में जो अन्तर होता है वही सच्चे और झूठे उपासकों में होता है। एक का उद्देश्य परमार्थ है दूसरे का स्वार्थ।
उपासना का उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सकता। जीव को जीवन धारण करने के लिये शरीर की आवश्यकता होती है पर शरीर ही जीवन
उपासना हो सकती है। साधारण वस्तुएँ तथा प्राणी अपनी विशेषताओं की छाप दूसरों पर छोड़ते हैं तो परमात्मा के समीप बैठने वालों पर उन दैवी विशेषताओं का प्रभाव क्यों न पड़ेगा?
उपासना करने वाले में—यही विशेषताएँ अवतरित होती है। अपने भाई बहिनों में प्रति-प्राणिमात्र के प्रति अनन्त करुणा और आत्मीयता की भावनायें उपासक के अंतःकरण में उद्भूत होती हैं। उनको चरितार्थ करके वह अपने जीवन को यशस्वी बनाता है और मनः क्षेत्र में धारण किये रहकर अनन्त शान्ति का अनुभव करता है।
उपासना में लगता नहीं, या जिन्हें आनन्द नहीं आता समझना चाहिए कि इन्होंने उपासना के तत्वज्ञान, आदर्श और विधान को अभी समझा ही नहीं है। पूजा का कर्मकाण्ड तो कई व्यक्ति पूरा करते रहते हैं पर उपासना में आनन्द की अनुभूति उन भावनाओं पर निर्भर रहती है जो दो बिछुड़े हुओं को जोड़ने के लिए आवश्यक है।
उपासना का दूसरा प्रतिफल है श्रेष्ठताओं की वृद्धि। चूँकि परमात्म का समस्त श्रेष्ठताओं का केन्द्र है, उसका सान्निध्य आत्मा को दिन दिन उत्कृष्ट बनाता चलता है। भक्त को अपना भगवान् सब में दिखाई पड़ता है इसलिए वह हर किसी की अच्छाइयाँ देखता है और उनकी चर्चा एवं विचारणा करते हुए अपने आनन्द और दूसरों का सद्भाव को बढ़ाता है। निन्दा और ईर्ष्या असुरता के दो प्रधान अस्त्र हैं। इनका प्रयोग उसी पर किया जा सकता है जिसके प्रति परायेपन का, शत्रुता का भाव रहे।
उपासना को मानव-जीवन की सर्वोपरि बुद्धिमत्ता माना गया है।
उपासना के समय अलौकिक आनन्द की अनुभूति का लाभ किस प्रकार मिल सकता है। अभी इन पंक्तियों में तो इतना ही बताना है कि इस संसार के जड़ चेतन प्रत्येक पदार्थ का कार्यक्रम वियोग दूर करके संयोग का आनन्दमय मिलन प्राप्त करना है। धातुओं की खानों का पता लगाने वाले अन्वेषक मिट्टी में मिले हुए धातु कणों की चाल और दिशा का हिसाब लगा कर यह निर्धारित करते हैं कि यहाँ से कितनी दूरी पर, किस दिशा में, किस धातु की कितनी बड़ी खान होनी चाहिए। बात यह है कि मिट्टी में हर धातु के कण मिले होते हैं। वे कण किसी सूक्ष्म आकर्षण शक्ति से खिंचते हुए धीरे-धीरे अपने आप किसी दिशा में सरकते रहते हैं।
उपासना—
उपासना के तत्वज्ञान, आदर्श और विधान को अभी समझा ही नहीं है। पूजा का कर्मकाण्ड तो कई व्यक्ति पूरा करते रहते हैं पर उपासना में आनन्द की अनुभूति उन भावनाओं पर निर्भर रहती है जो दो बिछुड़े हुओं को जोड़ने के लिए आवश्यक है।
उपासना वासना की आग को बुझाती है, तृष्णा की जलन को शान्त करती है। चिन्ता, भीति और घृणा की उन व्यथाओं को हटाती है, जो मानव-जीवन को निरन्तर अशान्त बनाये रहती हैं। उपासना और आत्मशांति एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। आत्मा अपनी उद्गम सत्ता परमात्मा की ओर उन्मुख होगी तो निश्चय ही उसे प्रकाश मिलेगा। परमात्मा का प्रकाश पड़ने पर आत्मा भी अपने सत्-चित आनन्दमय स्वरूप के साथ प्रकाशवान दीखता है।
उपासना विहीन पूजा भी होती तो है पर उससे कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
उपासना साधना और भावना का अवलम्बन करना आवश्यक होता है। वहाँ यह भी अनिवार्य है कि जीवन की गतिविधियाँ पृथकतावादी नहीं वरन् एकतावादी हों। आध्यात्म और अनात्मा, पुण्य और पाप, धर्म और अधर्म, उचित और अनुचित का निर्णय इसी आधार पर होता है कि उसके मूल में एकता की ओर बढ़ने न बढ़ने की कितनी भावना सन्निहित है। नीति, धर्म और आचार शास्त्र का समस्त विधि विधान इस एक तथ्य को ध्यान में रखकर ही रचा गया है।
उपासना का प्रतिफल पाने के लिये प्रतीक्षा उन्हें करनी पड़ती है जो पुरुषार्थ और प्रतिभा के मूल्य पर मिलने वाली भौतिक सम्पदाओं को परमात्मा से मुक्त में ही पाने की आशा लगाये हुए दीन-हीन भिक्षुक की तरह बैठे रहते हैं। जिन्हें प्रेम और उत्सर्ग की उच्च भावनाओं से प्रेरित होकर प्रभु के चरणों में बैइने की आकाँक्षा है उन्हें अपने प्रियतम का प्रेम प्रतिपादित, प्राप्त करने के लिए क्षणभर भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। उपासना वासना की आग को बुझाती है, तृष्णा की जलन को शान्त करती है। चिन्ता, भीति और घृणा की उन व्यथाओं को हटाती है, जो मानव-जीवन को निरन्तर अशान्त बनाये रहती हैं। उपासना और आत्मशांति एक ही वस्तु के दो पहलू हैं।
उपासना में प्रति दिन एक माता गायत्री मंत्र को सुरक्षा के लिए अतिरिक्त रूप से बढ़ा देने वाली बात तो प्रायः सभी पाठकों ने कार्यान्वित करनी और कर दी है, यह हर्ष और संतोष की बात है। पर यह याद रखना चाहिए कि यह सामयिक और बाह्य प्रयत्न मात्र स्थिर शक्ति का संचय करने के लिए हमें अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रम भी अपनाने होंगे। राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के लिए हमें और भी बहुत कुछ करना होगा।
उपासना सच्ची है या झूठी है उसकी एक ही परीक्षा है कि साधक की अन्तरात्मा में सन्तोष, प्रफुल्लता, आशा, विश्वास और सद्भावना का कितनी मात्रा में अवतरण हुआ। यदि यह गुण नहीं आये हैं और हीन वृत्तियाँ उसे घेरे हुए हैं तो समझना चाहिए कि वह व्यक्ति पूजा पाठ कितना ही करता हो उपासना से अभी दूर ही है।
उपासना उपयोगी होती हैं जो जीव और ईश्वर की एकता अनुभव कराने में समर्थ होती हैं। साथ ही यह भी आवश्यक है कि व्यक्ति का जीवनक्रम एकता के आदर्शों के अनुकूल रहे। हम सब ईश्वर के अमर पुत्र आपस में भाई बहिन हैं। परस्पर प्रेम और एकता की भावना से ओत-प्रोत सामूहिक हित के सत्कार्य करने और सद्भाव रखने से ही तो वह स्वार्थपरता-हृदयों की वह दूरी समाप्त हो सकती है जो इस संसार में विभिन्न प्रकार के उपद्रव आये दिन खड़े करती रहती है।
उपासना से अभी दूर ही है।
उपासना अलग। उपासना के लिए पूजा पाठ से कर्मकाण्ड की चिन्हपूजा करते रहने मात्र से उपासना का उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सकता। जीव को जीवन धारण करने के लिये शरीर की आवश्यकता होती है पर शरीर ही जीवन
उपासना और आत्मशांति एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। आत्मा अपनी उद्गम सत्ता परमात्मा की ओर उन्मुख होगी तो निश्चय ही उसे प्रकाश मिलेगा। परमात्मा का प्रकाश पड़ने पर आत्मा भी अपने सत्-चित आनन्दमय स्वरूप के साथ प्रकाशवान दीखता है। ऐसे प्रकाशवान जीवन में नर से नारायण की, पुरुष से पुरुषोत्तम की, आत्मा से परमात्मा की प्रत्यक्ष परिणति दृष्टिगोचर होती है। इसलिये उपासना को मानव-जीवन की सर्वोपरि बुद्धिमत्ता माना गया है।
उपासना करें। आन्तरिक स्तर सुधारे और सत्प्रवृत्तियों को बढ़ावें तो ही हमारा कल्याण होगा तो ही जीवन-लक्ष की पूर्ति सम्भव बनेगी।
उपासना में आनन्द की अनुभूति उन भावनाओं पर निर्भर रहती है जो दो बिछुड़े हुओं को जोड़ने के लिए आवश्यक है।
उपासना का अर्थ है—पास बैठना। परमात्मा के पास बैठने से ही ईश्वर उपासना हो सकती है। साधारण वस्तुएँ तथा प्राणी अपनी विशेषताओं की छाप दूसरों पर छोड़ते हैं तो परमात्मा के समीप बैठने वालों पर उन दैवी विशेषताओं का प्रभाव क्यों न पड़ेगा?
उपासना का राजमार्ग मनुष्य की अन्तः चेतना में ज्ञान और कर्म की आवश्यक प्रेरणा उत्पन्न करने के लिए ही है। ध्यान और जप के द्वारा साधक अपने स्वरूप को, आत्मा को, अपने उद्गम परमात्मा को समझने की चेष्टा करता है और दोनों की एकता का तारतम्य मिलाता है। जप के द्वारा उस विराट ब्रह्म के प्रति अपनी निष्ठा बढ़ाता है जो उच्च भूमिका में उपलब्ध होने वाली महान् अनुभूतियों का उद्गम है। जप और ध्यान के समय जिस परब्रह्म की धारणा की गई थी उसे पूजा के बाद व्यवहारिक जीवन में उतारना भी आवश्यक है। अन्यथा केवल एक नियत समय पर थोड़ा पूजा विधान या जप, ध्यान कर लेने मात्र से आत्मिक प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त न हो सकेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-August
उपासना के साथ जीवन साधना का समन्वय होने पर मनुष्य अनेक विभूतियों का अधिकारी बन जाता है। इस सुनिश्चित तथ्य पर किसी को संदेह की गुँजाइश नहीं हो सकती। मेरा भी संदेह उस दिन के प्रवचन को भूलकर भली प्रकार दूर हो गया।
उपासना को सबसे प्रमुख और अनिवार्य माना है। जो इसकी उपेक्षा करते हैं उनकी भर्त्सना की और उन्हें कई प्रकार के दण्डों का भय भी बताया है।
उपासना में जप-अनुष्ठान के अतिरिक्त आत्म निर्माण का कार्य भी करना होता है। बिजली के दोनों तार मिलने पर जैसे बल्ब जलता है उसी प्रकार उपासना के साथ जीवन साधना का समन्वय होने पर मनुष्य अनेक विभूतियों का अधिकारी बन जाता है। इस सुनिश्चित तथ्य पर किसी को संदेह की गुँजाइश नहीं हो सकती। मेरा भी संदेह उस दिन के प्रवचन को भूलकर भली प्रकार दूर हो गया।
उपासना और सत्संग आदि के कार्यक्रमों के उपयुक्त बनाया जा रहा हैं।
उपासना और साधना के दो पहिये होने से ही आत्मिक उन्नति का रथ अग्रसर होता है और वही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं। उन्हीं के द्वारा साधक सिद्धियों और विभूतियों का अधिकारी बनता है। हमने उपासना के साथ-साथ सेवा धर्म और आत्मशोधन को भी समान महत्व दिया है। त्रिपदा गायत्री का एक पाद सेवन करने से नहीं वरन् तीनों पादों की समुचित उपासना करने से ही पूर्णता प्राप्त होती हैं।
उपासना करेंगे। युग-निर्माण योजना मानव-मात्र के हृदय में सच्ची आस्तिकता उत्पन्न करके उनका हित साधन करने के लिये ही चलाई गई है।
उपासना का जो महात्म्य बताया जाता है, उसके द्वारा अनेक कामनाओं की पूर्ति, प्रस्तुत कठिनाइयों का समाधान, उज्ज्वल भविष्य की संभावना, पाप निवारण और परलोक की सद्गति का जो लाभ मिलना प्रतिपादित किया जाता है, वह कहाँ तक ठीक? इस संबंध में उनने अपने ग्रन्थों में बहुत कुछ लिखा है। मौखिक रूप से वे इतना कहते रहते थे- ‘यह असत्य नहीं, हम असत्य को प्रतिपादित नहीं करते। उपासना के द्वारा व्यक्ति का अन्तःकरण निर्मल बनता है और उसमें सुसंस्कारों के बीज आसानी से बोये तथा बढ़ाये जा सकते हैं। सुसंस्कारों, सत्कर्मों और सद्भावनाओं का फल मनुष्य के लिए सब प्रकार श्रेयस्कर ही होता है।
उपासना को तो हिन्दू-संस्कृति की गंगोत्री माना गया है। इसलिए नवीन प्रेरणा के अनुसार पुराने उपासकों ने अपना जप-साधन अधिक श्रद्धा-भावना से परिपूर्ण बनाने का निश्चय किया है। जो इस मार्ग पर आगे बढ़ चुके हैं उन्होंने पंचकोशी गायत्री-साधना के माध्यम से अपने अन्नमयकोश, मनोमयकोश, प्राणमयकोश विज्ञानमयकोश, आनन्दमयकोश का परिष्कार करते हुये आत्म-साक्षात्कार की स्थिति तक पहुँचने का प्रण किया है। जो लोग अभी नये-नये ही इस परिवार में सम्मिलित हुए हैं, उन्होंने गुरुपूर्णिमा से अपनी साधना किसी न किसी रूप से प्रारम्भ कर दी है। साथ ही सबने यह आश्वासन दिया है कि अपने कुटुम्बी, सम्बन्धी और मित्रों को उपासना मार्ग में लगाने का शक्तिभर प्रयत्न करेंगे।
उपासना करने से ही पूर्णता प्राप्त होती हैं।
उपासना, जीवन-शोधन और परमार्थ के त्रिविध कार्यक्रमों को अपनाते हुये हमें जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिये ही अग्रसर होना है। योजना में सन्निहित कार्यक्रम हमारे आध्यात्मिक उद्देश्यों की पूर्ति हो सहायक या साधन-मात्र ही हो सकते हैं। हमें लक्ष्य को प्रधानता देते हुये उसकी पूर्ति के लिये ही इन कार्यों को करना है। लक्ष्य को भूल कर दूसरी संस्थाओं की तरह लोकरंजन, दिखावट, यश की कामना या तुच्छ स्वार्थ की प्राप्ति के लिये कार्य करने से तो वही दुर्गति हमारी भी होगी जो दूसरी की हो रही है।
उपासना का आध्यात्मवाद में प्रमुख स्थान है, पर इसके साथ ही यह भी साधना का अनिवार्य अंग माना जाता है कि मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उत्कृष्ट और आदर्श बनावे। जीवन के हर क्षेत्र में आध्यात्मवाद का समावेश करे ऐसी जिन्दगी जिये जैसे कि मानव शरीर-धारी को जीनी चाहिए। पूजा को औषधि और जीवन विकास की परम्पराओं को पथ्य, परिचर्या माना गया है। औषधि तभी लाभ करेगी जब परहेज भी ठीक रखा जाय। चिकित्सक के बतलाये सारे नियमों का उल्लंघन करते रहने पर भी यदि कोई आशा करे कि औषधि सेवन मात्र से बीमारी दूर हो जाय तो यह उसकी गलती ही मानी जायगी।
उपासना का ही विकसित रूप है। छोटे छात्रों को पहले अक्षर ज्ञान कराते हैं। जब उतना याद कर लेता है तो उसे अंक गणित सिखाना आरम्भ कर दिया जाता है। एक के बाद एक सिखाने की पद्धति हमें अच्छी लगी सो अब तक जप, ध्यान अनुष्ठान रूपी अक्षर ज्ञान सिखाते रहे। अब आत्म शोधन रूपी अंक गणित सिखाया जा रहा है।
उपासना आत्मशोधन और सेवा। इनमें से गायत्री उपासना की शिक्षा आचार्य जी पिछले पन्द्रह वर्षों से देते आ रहे हैं। गत दो वर्षों से उसकी उच्चस्तरीय शिक्षा भी पंचकोशी साधना के रूप में चल रही है। योजना में सर्व साधारण के लिये सामान्य उपासना क्रम बतलाया गया है। इसे कार्यक्रम का एक अनिवार्य अंग मानना चाहिये।
उपासना, आत्म शोधन और सेवा कार्य करते रहने की भी शिक्षा दे सकते हैं। यह उनके पूर्व कर्मों का निराकरण करने वाला एक प्रायश्चित होगा, जिससे आगामी जीवन सुखी बन सकेगा। अध्यापक अपने छात्रों को शिक्षा के साथ-साथ चारित्रिक और नैतिक शिक्षा भी दे सकते हैं। बच्चों के अभिभावकों से भी उनका कुछ न कुछ संपर्क और प्रभाव भी रहता है। इस परिचय के आधार पर वे अभिभावकों को भी यह प्रेरणा दे सकते हैं कि बच्चों को सुधारने की दृष्टि वे स्वयं भी अपनी प्रवृत्तियों में सुधार करें।
उपासना जिसमें भगवान् का स्मरण करने के साथ-साथ आन्तरिक दोष दुर्गुणों का शमन एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन का प्रयत्न भी चल रहा हो निश्चय ही सर्वांगपूर्ण साधना कहलायेगी। उसका फल मनुष्य को महापुरुष बनने के रूप में ही दृष्टि गोचर होगा। जमीन जोतने मात्र से किसी किसान को भरी पूरी फसल नहीं मिल सकती। उसे बीज बोने, सींचने, निराने, रखाने, काटने आदि की झंझट की क्रियाएं भी करनी पड़ती है तब कहीं उसके कोठे अन्न से भरते है। इसी प्रकार गायत्री उपासना में जप-अनुष्ठान के अतिरिक्त आत्म निर्माण का कार्य भी करना होता है।
उपासना तो बहुत करते हैं पर उनमें मानवीय गुण निकृष्ट कोटि के ही बने रहते हैं। ऐसी दशा में यह कैसे माना जाय कि उनका भविष्य उज्ज्वल बनेगा। उपासना तो वही सार्थक मानी जा सकती है जो मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव को उत्कृष्ट बना सके। उत्कृष्टता के फलस्वरूप ही वह प्रतिभा और क्षमता प्राप्त होनी संभव है जिसके द्वारा उन्नति का सुयोग मिले, अनिष्ट हटे और जन-साधारण का स्नेह, विश्वास प्राप्त हो। उन्नति इन्हीं बातों पर निर्भर है।
उपासना की तरह जीवन की स्थूल समस्याओं और मानसिक उलझनों को समझना तथा उनको हल करने का ठीक मार्ग जानना आवश्यक है। जो पुस्तकें इस उद्देश्य की पूर्ति करने वाली हों उनमें से किसी न किसी को नित्य नियमपूर्वक पढ़ते रहना और उसके उपदेशों को मनन और चिन्तनपूर्वक व्यवहार में लाने का प्रयत्न करना ही सच्चा स्वाध्याय कहा जा सकता है। इससे हम उन भूलों से भी बच सकते हैं जो संसार की उलझनों के कारण समय-समय पर पैदा होती है और जिनमें फंसकर मनुष्य मार्गच्युत हो जाता है।
उपासना के साथ-साथ सेवा धर्म और आत्मशोधन को भी समान महत्व दिया है। त्रिपदा गायत्री का एक पाद सेवन करने से नहीं वरन् तीनों पादों की समुचित उपासना करने से ही पूर्णता प्राप्त होती हैं।
उपासना में संलग्न होना पड़ता है। शिक्षार्थी को कापी, पुस्तक, कलम, दवात का उपयोग करने की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिकों को अपने अन्वेषण कार्य में अनेक प्रकार के यन्त्रों, रासायनिक द्रव्यों और प्रयोगशालाओं की जरूरत होती है। सद्गुणों का अभ्यास बढ़ाने के लिये सत्कर्मों में लगे रहने का कार्यक्रम बनाना पड़ता है। केवल चाहने या सोचने से सद्गुणों का अभ्यास नहीं हो सकता, लिये जो सद्गुणों की उपयोगिता और महत्व का अनुभव करते हों, उनको अपने भीतर जमा हुआ देखना चाहते हों, उनके लिये आवश्यक है कि अपने दैनिक जीवन में किसी न किसी रूप में सत्कार्यों का व्यवहार अवश्य करते रहें।
उपासना की विधि ‘गायत्री महा विज्ञान’ में मौजूद है और उसकी शिक्षा भी अधिकार भेद से दी जा रही है। शेष आत्मशोधन और सेवा कार्यों से अधिकाँश कार्यक्रम सम्बन्धित हैं। आत्म-कल्याण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये इन तीनों को ही पूर्ण करना पड़ता है। मुझे जान पड़ता हैं कि समाज की स्थिति को सुधारने और व्यक्ति को अपना जीवन लक्ष्यपूर्ण करने के लिये एक सन्तुलित और समन्वयपूर्ण कार्यक्रम युग-निर्माण-योजना के रूप में जनता के सामने रखा गया है, जिसके लिये निर्माता हमारे धन्यवाद के पात्र हैं।
उपासना गायत्री तत्व ज्ञान का अध्ययन, गायत्री उपासकों को खोजना और उनके अनुभवों का लाभ प्राप्त करना ही प्रमुख कार्य प्रतीत होते हैं। चालीस वर्ष के आयु के पीछे उनने आवश्यक आत्म-बल और आत्म-विश्वास प्राप्त करने के पश्चात गायत्री प्रचार आरम्भ किया और थोड़े ही वर्षों में उसे उच्च शिखर तक पहुँचा दिया। करोड़ों को उन्होंने यह तत्वज्ञान सिखाया और समझाया, लाखों ने उनके बताये मार्ग पर निष्ठापूर्वक कदम उठाये और अब तक वे उसी उपासनाक्रम को श्रद्धापूर्वक अपनाये हुए हैं। इस प्रकार विहंगम दृष्टि से देखा जाय तो आचार्य जी का जीवन गायत्रीमय ही दीखता है।
उपासना के जप, अनुष्ठान वाले प्रथम चरण में भाग लिया था।”
उपासना द्वारा भी केवट, शबरी, विदुर गोपी द्रौपदी, नरसी, नाई की तरह परमात्मशक्ति की कृपा उपलब्ध की जा सकती है।
उपासना नहीं मानना चाहिए। वह तो पूर्वार्ध मात्र है। अब उपासना का उत्तरार्ध सिखाया जायगा, जिसे जीवन निर्माण की साधना कहना चाहिए। उपासना और साधना के दो पहिये होने से ही आत्मिक उन्नति का रथ अग्रसर होता है और वही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं। उन्हीं के द्वारा साधक सिद्धियों और विभूतियों का अधिकारी बनता है।
उपासना और जीवन शोधन के साथ-साथ परमार्थ को भी आवश्यक महत्व दिया है। ज्ञान-यज्ञ के लिए सभी परिजन अपनी भावना समय, एवं श्रद्धा अर्पित करेंगे, हमारे लिए यह सबसे अधिक प्रसन्नता और सन्तोष की बात है।
उपासना में मेरी अत्यधिक श्रद्धा है, इसलिए तद्विषयक अपनी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए मैं उन्हीं के पास दौड़ता हूँ। अन्यान्य बातों के साथ एक बात पर मैं सदा ही उनसे चर्चा करता हूँ कि- गायत्री उपासना का जो महात्म्य बताया जाता है, उसके द्वारा अनेक कामनाओं की पूर्ति, प्रस्तुत कठिनाइयों का समाधान, उज्ज्वल भविष्य की संभावना, पाप निवारण और परलोक की सद्गति का जो लाभ मिलना प्रतिपादित किया जाता है, वह कहाँ तक ठीक? इस संबंध में उनने अपने ग्रन्थों में बहुत कुछ लिखा है। मौखिक रूप से वे इतना कहते रहते थे- ‘यह असत्य नहीं, हम असत्य को प्रतिपादित नहीं करते। उपासना के द्वारा व्यक्ति का अन्तःकरण निर्मल बनता है और उसमें सुसंस्कारों के बीज आसानी से बोये तथा बढ़ाये जा सकते हैं।
उपासना के साथ आरंभ होता है। अधेड़ आयु होने तक उनने अपना अधिकाँश समय इसी कार्य में लगाया है। उनके जीवन का विश्लेषण करें तो गायत्री उपासना गायत्री तत्व ज्ञान का अध्ययन, गायत्री उपासकों को खोजना और उनके अनुभवों का लाभ प्राप्त करना ही प्रमुख कार्य प्रतीत होते हैं। चालीस वर्ष के आयु के पीछे उनने आवश्यक आत्म-बल और आत्म-विश्वास प्राप्त करने के पश्चात गायत्री प्रचार आरम्भ किया और थोड़े ही वर्षों में उसे उच्च शिखर तक पहुँचा दिया। करोड़ों को उन्होंने यह तत्वज्ञान सिखाया और समझाया, लाखों ने उनके बताये मार्ग पर निष्ठापूर्वक कदम उठाये और अब तक वे उसी उपासनाक्रम को श्रद्धापूर्वक अपनाये हुए हैं।
उपासना में सम्मिलित हो सकीं तो इसमें सन्देह नहीं कि अगली पीढ़ी के लिए सहस्रों महापुरुष और महा नारियाँ भारतमाता का गौरव बढ़ाने वाले पैदा हो सकेंगे। पारिवारिक ज्ञान गोष्ठियाँ इस दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक हैं। इस सम्बन्ध में भी उत्साहवर्धक सूचनाएँ मिली हैं। आधे से अधिक पाठक ऐसे हैं जिन्होंने अपने घरों में एक घण्टा रोज ज्ञानचर्चा और शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था में प्रतिदिन लगाना आरम्भ कर दिया है। परिवार सुधरेंगे तो सारा समाज ही सुधरेगा और इसी क्रम से समस्त संसार का सुधार संभव हो सकेगा।
उपासनात्मक पूजा प्रक्रिया साधना का पूर्वार्ध है। उसकी पूर्णता आत्म-शोधन करने वाली सद्बुद्धि का व्यवहारिक जीवन में व्यवहारिक प्रयोग करने से ही संभव होता है। ऐसी उपासना जिसमें भगवान् का स्मरण करने के साथ-साथ आन्तरिक दोष दुर्गुणों का शमन एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन का प्रयत्न भी चल रहा हो निश्चय ही सर्वांगपूर्ण साधना कहलायेगी। उसका फल मनुष्य को महापुरुष बनने के रूप में ही दृष्टि गोचर होगा। जमीन जोतने मात्र से किसी किसान को भरी पूरी फसल नहीं मिल सकती।
उपासना की शिक्षा आचार्य जी पिछले पन्द्रह वर्षों से देते आ रहे हैं। गत दो वर्षों से उसकी उच्चस्तरीय शिक्षा भी पंचकोशी साधना के रूप में चल रही है। योजना में सर्व साधारण के लिये सामान्य उपासना क्रम बतलाया गया है। इसे कार्यक्रम का एक अनिवार्य अंग मानना चाहिये। विशेष उपासना की विधि ‘गायत्री महा विज्ञान’ में मौजूद है और उसकी शिक्षा भी अधिकार भेद से दी जा रही है।
उपासना मार्ग में लगाने का शक्तिभर प्रयत्न करेंगे। स्त्रियों की उपासना पर अधिक जोर दिया गया था, ताकि नई पीढ़ी को प्रबुद्ध बनाने में सहायता मिले। इस सुझाव का प्रायः सभी ने स्वागत किया है और तदनुसार प्रयत्न भी आरम्भ कर दिया है। जैसा कि आश्वासन मिला है यदि ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के सदस्यों की धर्मपत्नियाँ निष्ठापूर्वक गायत्री-उपासना में सम्मिलित हो सकीं तो इसमें सन्देह नहीं कि अगली पीढ़ी के लिए सहस्रों महापुरुष और महा नारियाँ भारतमाता का गौरव बढ़ाने वाले पैदा हो सकेंगे। पारिवारिक ज्ञान गोष्ठियाँ इस दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक हैं।
उपासना और सेवा कार्यों में अधिकाधिक समय लगाते हुये गृहस्थ में रहकर भी संन्यास का सा सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।
उपासना के द्वारा व्यक्ति का अन्तःकरण निर्मल बनता है और उसमें सुसंस्कारों के बीज आसानी से बोये तथा बढ़ाये जा सकते हैं। सुसंस्कारों, सत्कर्मों और सद्भावनाओं का फल मनुष्य के लिए सब प्रकार श्रेयस्कर ही होता है। इसलिए यदि गायत्री उपासक का भविष्य उज्ज्वल बने तो इसमें आश्चर्य की बात ही क्या है?
उपासना की तरह एकाकी उपायों से संभव है और न कथा-प्रवचनों द्वारा उसे प्रत्यक्ष रूप दिया जा सकता है। यह कार्य जब कभी सम्पन्न किया जायगा तभी यही प्रयत्न करना होगा कि अच्छे आचरणों तथा श्रेष्ठ परंपराओं को उत्साहपूर्ण वातावरण में एक सुनियोजित रूप में अग्रसर किया जाय।
उपासना तो वही सार्थक मानी जा सकती है जो मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव को उत्कृष्ट बना सके। उत्कृष्टता के फलस्वरूप ही वह प्रतिभा और क्षमता प्राप्त होनी संभव है जिसके द्वारा उन्नति का सुयोग मिले, अनिष्ट हटे और जन-साधारण का स्नेह, विश्वास प्राप्त हो। उन्नति इन्हीं बातों पर निर्भर है। लोक और परलोक की सुख शान्ति का आधार भी यही तथ्य है। यदि यह स्थिति प्राप्त न हुई तो कोई व्यक्ति केवल गायत्री जप से ही कैसे उन्नतिशील बनेगा?
उपासना के द्वारा मिलने वाले असंख्य लाभों का मूल कारण आत्म शोधन और आत्म परिष्कार ही है। जप, ध्यान, अनुष्ठान आदि द्वारा व्यक्ति की मनोभूमि को कोमल एवं उर्वर बनाया जाता है। उसके बाद उसमें सत्प्रवृत्तियों के बीज बोये जाते हैं। अब तक जप तक की प्रक्रिया बताकर उपासकों की भूमि का शोधन किया है अब उन्हें सत्प्रवृत्तियों की प्रेरणा देकर बीज बोया जा रहा है। यह बीज सत्कर्मों के रूप में उगेगा, हरा भरा होगा, फलेगा-फूलेगा, तब स्पष्ट हो जायगा कि गायत्री महामंत्र का जो महात्म्य बताया जाता है वह सही है या गलत।
उपासना अध्यात्म का मूल है। गायत्री उपासना को तो हिन्दू-संस्कृति की गंगोत्री माना गया है। इसलिए नवीन प्रेरणा के अनुसार पुराने उपासकों ने अपना जप-साधन अधिक श्रद्धा-भावना से परिपूर्ण बनाने का निश्चय किया है। जो इस मार्ग पर आगे बढ़ चुके हैं उन्होंने पंचकोशी गायत्री-साधना के माध्यम से अपने अन्नमयकोश, मनोमयकोश, प्राणमयकोश विज्ञानमयकोश, आनन्दमयकोश का परिष्कार करते हुये आत्म-साक्षात्कार की स्थिति तक पहुँचने का प्रण किया है। जो लोग अभी नये-नये ही इस परिवार में सम्मिलित हुए हैं, उन्होंने गुरुपूर्णिमा से अपनी साधना किसी न किसी रूप से प्रारम्भ कर दी है।
उपासनाक्रम को श्रद्धापूर्वक अपनाये हुए हैं। इस प्रकार विहंगम दृष्टि से देखा जाय तो आचार्य जी का जीवन गायत्रीमय ही दीखता है।
उपासना की कोई आवश्यकता अनुभव करते हैं।
उपासना को अधिक निष्ठापूर्वक आरम्भ करेंगे, जीवन शोधन पर पूरा ध्यान देंगे और जन-जागृति के लिए सेवा-बुद्धि से कुछ न कुछ समय नियमित रूप से लगाते रहेंगे। परमार्थ का सबसे श्रेष्ठ तरीका किसी को सन्मार्ग की प्रेरणा देना ही हो सकता है। अपना सुधार करके ही कोई मनुष्य आपत्तियों और कठिनाइयों से छुटकारा प्राप्त कर सकता है। दूसरों की भौतिक सहायता तो उसे तत्कालिक थोड़ा लाभ भले ही पहुँचा दे पर स्थायी हित साधन तो अपने सुधार से ही होता है। इसलिये युग-निर्माण कार्यक्रम में जन-भावनाओं को उत्कृष्ट बनाने को ही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ माना गया है।
उपासना के द्वारा आचार्य जी ने नारी को भगवान की सर्वश्रेष्ठ प्रतिमा सिद्ध किया है। उसके प्रति पूज्य और पवित्र भाव रखने, श्रद्धा और सत्कार का व्यवहार करने की शिक्षा गायत्री की प्रतिमा पूजा के रूप में देनी आरम्भ की है। यज्ञ-अनुष्ठानों के बाद कन्या-भोजन की परम्परा इसी दृष्टिकोण को व्यावहारिक रूप देने के विचार से प्रचलित हुई है। नारी मात्र को माता गायत्री का प्रतिनिधि मानकर जब उसका समुचित सत्कार होने लगेगा तो मनु भगवान की वह उक्ति सार्थक होकर रहेगी जिसमें कहा गया है “जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं।”
उपासना आरम्भ करता है। धीरे-धीरे बहुत बड़ी साधनाओं तक पहुँच जाता है और अन्त में परमहंसों के समान संसार से पूर्णतः निर्लिप्त होकर परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। उस समय उसे सभी ईश्वरीय शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं और लोग उसे साक्षात भगवान स्वरूप ही मानने लगते हैं। पर यह भगवान केवल बाहरी नहीं अन्तःकरण की होनी चाहिये। परमात्मा मनुष्य के मन और अन्तर की भावनाओं को देखता है।
उपासना पर अधिक जोर दिया गया था, ताकि नई पीढ़ी को प्रबुद्ध बनाने में सहायता मिले। इस सुझाव का प्रायः सभी ने स्वागत किया है और तदनुसार प्रयत्न भी आरम्भ कर दिया है। जैसा कि आश्वासन मिला है यदि ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के सदस्यों की धर्मपत्नियाँ निष्ठापूर्वक गायत्री-उपासना में सम्मिलित हो सकीं तो इसमें सन्देह नहीं कि अगली पीढ़ी के लिए सहस्रों महापुरुष और महा नारियाँ भारतमाता का गौरव बढ़ाने वाले पैदा हो सकेंगे। पारिवारिक ज्ञान गोष्ठियाँ इस दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक हैं। इस सम्बन्ध में भी उत्साहवर्धक सूचनाएँ मिली हैं।
उपासना का उत्तरार्ध सिखाया जायगा, जिसे जीवन निर्माण की साधना कहना चाहिए। उपासना और साधना के दो पहिये होने से ही आत्मिक उन्नति का रथ अग्रसर होता है और वही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं। उन्हीं के द्वारा साधक सिद्धियों और विभूतियों का अधिकारी बनता है। हमने उपासना के साथ-साथ सेवा धर्म और आत्मशोधन को भी समान महत्व दिया है। त्रिपदा गायत्री का एक पाद सेवन करने से नहीं वरन् तीनों पादों की समुचित उपासना करने से ही पूर्णता प्राप्त होती हैं।
उपासना की विधि एक नहीं हजारों है। साधारण जप, नाम स्मरण से लेकर कठिन योगाभ्यास तक का विधान विभिन्न मनोवृत्तियों के व्यक्तियों के लिये किया गया है। कोई व्यक्ति जो आरंभ में केवल एक माला जपने से उपासना आरम्भ करता है। धीरे-धीरे बहुत बड़ी साधनाओं तक पहुँच जाता है और अन्त में परमहंसों के समान संसार से पूर्णतः निर्लिप्त होकर परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। उस समय उसे सभी ईश्वरीय शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं और लोग उसे साक्षात भगवान स्वरूप ही मानने लगते हैं।
उपासना क्रम बतलाया गया है। इसे कार्यक्रम का एक अनिवार्य अंग मानना चाहिये। विशेष उपासना की विधि ‘गायत्री महा विज्ञान’ में मौजूद है और उसकी शिक्षा भी अधिकार भेद से दी जा रही है। शेष आत्मशोधन और सेवा कार्यों से अधिकाँश कार्यक्रम सम्बन्धित हैं। आत्म-कल्याण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये इन तीनों को ही पूर्ण करना पड़ता है।
उपासना (2) आत्मशोधन और (3) परमार्थ के त्रिविधि कार्यक्रम को अपनाता हुआ आत्मकल्याण का लक्ष्य भी पूरा करे और संसार की सुख-शांति बढ़ाने में योगदान देता हुआ यशस्वी बने। अपनी क्षमता और रुचि के अनुसार हममें से प्रत्येक को निश्चय कर लेना चाहिये और उसे पूर्ण करते हुये तथा अपने सद्गुणों को बढ़ाते हुए प्रगति-मार्ग पर बढ़ना चाहिये। लोक कल्याण तो इस प्रकार होता ही रहेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-June
उपासना की शिक्षा पर जोर देते रहने के बाद अब उसकी दिशा बदली जा रही है, या कोई भिन्न प्रकार का कार्यक्रम दिया जा रहा है। हमारी जीवन का लक्ष्य और कार्यक्रम एक था और वह सदा एक ही दिशा में गतिशील रहेगा।
उपासना का कार्यक्रम इसी दृष्टि से है। अन्न मय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोशों के अनावरण के लिए जो साधना विधि बनाई जा रही हैं उसमें जीवन शोधन का पर्याप्त अंश है। युग-निर्माण कार्यक्रम लोक-सेवा वाले अंश की पूर्ति करता है। इस प्रकार यह त्रिविधि कार्यक्रम एक सर्वांगपूर्ण आध्यात्मिक कार्यक्रम की पूर्ति कर देता है।
उपासना के साथ-साथ धर्म सेवा का भी केन्द्र बनाया जाय।
उपासना क्षेत्र के हर जिज्ञासु के सामने भली प्रकार खुले शब्दों में प्रकट कर दें।
उपासना-कृत्यों की जितनी आवश्यकता है उतनी ही भावनाओं की उत्कृष्टता भी अपेक्षित है। जिनने इस तथ्य को हृदयंगम किया है वे सभी साधक उन्नत स्तर पर पहुँच चुके हैं और उनकी आत्मिक प्रगति आशाजनक सफलता प्रस्तुत कर रही है। थोड़े समय में भी वे सर्वांगपूर्ण उपासना करके बहुत कुछ प्राप्त कर चुके और जो शेष है उसे इसी जीवन में प्राप्त कर लेंगे ऐसा हमारे संपर्क में आने वाले अनेकों साधकों की स्थिति देखकर हमने निश्चित विश्वास कर लिया है। किन्तु जो जीवन के नैतिक स्तर को उठाने के लिए तैयार नहीं, उसे गंदा ही रखना चाहते हैं पर भौतिक और आत्मिक लाभों की बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाये रहते हैं उन्हें चिरप्रयत्न करने पर भी हम खाली हाथ ही देखते हैं। ऐसी दशा में यह आवश्यक ही हो जाता है कि आध्यात्मिक मार्ग में चलते हुए सफलता और असफलता प्राप्त करने के रहस्य को हम उपासना क्षेत्र के हर जिज्ञासु के सामने भली प्रकार खुले शब्दों में प्रकट कर दें।
उपासना (भावना। उपासना का तात्पर्य पूजा की प्रक्रिया, विधि व्यवस्था से है। गायत्री उपासना का कर्म-काण्ड इसी श्रेणी में आता है। जप, उपवास, अस्वाद व्रत, अनुष्ठान, पुरश्चरण, अग्निहोत्र, आदि क्रियाएं उपासना कही जा सकती हैं। यह हैं तो महत्वपूर्ण पर सर्वांगपूर्ण नहीं हैं।
उपासना में प्रति दिन छह-छह घंटे नियमित रूप से लगाये हैं वहाँ जीवन के हर पहलू को शुद्ध और सुव्यवस्थित रखने के लिए पूरा-पूरा ध्यान दिया है। साथ ही लोक सेवा, समाज हित के लिए जप जितना हो, वरन् उससे भी अधिक समय लगाते रहने का प्रयत्न किया है। जीवन के आरम्भ में ही हमें यह सिखा दिया गया था कि जीवन शोधन और लोक सेवा की उपेक्षा करने वाला कोई व्यक्ति उच्च आध्यात्मिक स्तर तक नहीं पहुँच सकता। इसलिए एक सुनिश्चित कार्यक्रम के अनुसार हम अपने जीवन की गतिविधि निश्चित किये रहे हैं और सही मार्ग पर चलते रह कर ही प्रगति के एक स्तर तक पहुँच सकने में समर्थ हुए हैं। यही परम्परा अनादि काल में सभी श्रेय पथ के पथिकों की रही है।
उपासना के पश्चात् भी उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। तृष्णाओं और वासनाओं की पूर्ति के साधन के रूप में ही जिनने ईष्ट देव की पूजा शुरू की हो, उन्हें कोई ऊँचा वरदान प्राप्त होने की आशा नहीं करनी चाहिए।
उपासना को शरीर और भावना का प्राण मिल गया है। प्राण विहीन शरीर का जो मूल्य है वही भावना विहीन उपासना का है। तीर्थयात्रा, उपवास, ध्यान, जप, तप,दान, पुण्य इन सबके परिणामों का होना न होना कर्ता की भावनाओं पर निर्भर रहता है। गायत्री उपासना के सम्बन्ध से यही तथ्य लागू होता है। कितने ही व्यक्ति जप बहुत करते हैं पर उनका आन्तरिक स्तर निष्कृष्ट से जरा भी ऊँचा नहीं होता।
उपासना करके बहुत कुछ प्राप्त कर चुके और जो शेष है उसे इसी जीवन में प्राप्त कर लेंगे ऐसा हमारे संपर्क में आने वाले अनेकों साधकों की स्थिति देखकर हमने निश्चित विश्वास कर लिया है। किन्तु जो जीवन के नैतिक स्तर को उठाने के लिए तैयार नहीं, उसे गंदा ही रखना चाहते हैं पर भौतिक और आत्मिक लाभों की बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाये रहते हैं उन्हें चिरप्रयत्न करने पर भी हम खाली हाथ ही देखते हैं। ऐसी दशा में यह आवश्यक ही हो जाता है कि आध्यात्मिक मार्ग में चलते हुए सफलता और असफलता प्राप्त करने के रहस्य को हम उपासना क्षेत्र के हर जिज्ञासु के सामने भली प्रकार खुले शब्दों में प्रकट कर दें।
उपासना कही जा सकती है। उसके लिए हमें नित्य नियमित रूप से कुछ समय निकालना चाहिए। चाहे वह समय पाँच मिनट ही क्यों न हो। 108 गायत्री मंत्र जपने में प्रायः इतना ही समय लगता है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि अपने घर, परिवार, सम्बद्ध समाज और परिचय-क्षेत्र के सभी गायत्री उपासना में संलग्न रहें।
उपासना
उपासना में संलग्न किया जा चुका है। तब की अपेक्षा अब अपने साथियों की संख्या और निष्ठा कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी है। युग-निर्माण की जिस योजना को लेकर कार्यारंभ किया जा रहा है वह आज उपहासास्पद भले ही लगे पर कल या परसों उसका अत्यन्त विशाल रूप सामने आने वाला है। उसकी सफलता के सम्बन्ध में सन्देह करने की कोई बात नहीं, क्योंकि इसके पीछे युग की पुकार और दैवी प्रेरणा का प्रचंड बल मौजूद है। यह बल जिस प्रक्रिया के भी पीछे होगा उसकी सफलता सुनिश्चित ही रहती है।
उपासना के द्वारा सन्मार्ग पर चलने की जो प्रेरणा मिलती है उसे सद्भावनाओं और सत्कर्मों को जीवन में क्रियात्मक रूप देकर सींचा जाय। उपासना क्षेत्र में उगा हुआ भावना का पौधा यदि सत्कर्मों द्वारा ठीक तरह पोषण किया जाता रहे तो वह एक दिन कल्पवृक्ष जैसे सुखद, सुरम्य प्रतिफल प्रस्तुत करता है।
उपासना, व्यायाम, दान, सोना-उठना आदि हर कार्य की निर्धारित मर्यादाएँ अपनी परिस्थितियों के अनुकूल निर्धारित करके उसका कड़ाई के साथ पालन करने की आवश्यकता हर व्यक्ति अनुभव करे, ऐसा लोक शिक्षण किया जाय। बुरी आदतों को क्रमशः घटाते चलना और सद्गुणों को निरन्तर बढ़ाते चलना भी इस आन्दोलन का एक अंग रहे। साधना-मय, संयमी और मर्यादित जीवन बिताने की कला हर व्यक्ति को सिखाई जाय ताकि उसके लिए प्रगतिशील हो सकना संभव हो सके।
उपासना होती रहेगी। जिनने मंत्र लिखे हैं उनका स्वाभाविक प्रेम और सहयोग रहने से उस केन्द्र में अनेकों सत्-प्रवृत्तियाँ संचालित की जा सकेंगी।
उपासना का है। तीर्थयात्रा, उपवास, ध्यान, जप, तप,दान, पुण्य इन सबके परिणामों का होना न होना कर्ता की भावनाओं पर निर्भर रहता है। गायत्री उपासना के सम्बन्ध से यही तथ्य लागू होता है। कितने ही व्यक्ति जप बहुत करते हैं पर उनका आन्तरिक स्तर निष्कृष्ट से जरा भी ऊँचा नहीं होता। ऐसी दशा में चिरकालीन उपासना के पश्चात् भी उन्हें निराशा ही हाथ लगती है।
उपासना में जीवन का अधिकाँश लगा देने के उपरान्त हमने निष्कर्ष निकाला है कि आत्मोन्नति के लिए उपासना-कृत्यों की जितनी आवश्यकता है उतनी ही भावनाओं की उत्कृष्टता भी अपेक्षित है। जिनने इस तथ्य को हृदयंगम किया है वे सभी साधक उन्नत स्तर पर पहुँच चुके हैं और उनकी आत्मिक प्रगति आशाजनक सफलता प्रस्तुत कर रही है। थोड़े समय में भी वे सर्वांगपूर्ण उपासना करके बहुत कुछ प्राप्त कर चुके और जो शेष है उसे इसी जीवन में प्राप्त कर लेंगे ऐसा हमारे संपर्क में आने वाले अनेकों साधकों की स्थिति देखकर हमने निश्चित विश्वास कर लिया है। किन्तु जो जीवन के नैतिक स्तर को उठाने के लिए तैयार नहीं, उसे गंदा ही रखना चाहते हैं पर भौतिक और आत्मिक लाभों की बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाये रहते हैं उन्हें चिरप्रयत्न करने पर भी हम खाली हाथ ही देखते हैं। ऐसी दशा में यह आवश्यक ही हो जाता है कि आध्यात्मिक मार्ग में चलते हुए सफलता और असफलता प्राप्त करने के रहस्य को हम उपासना क्षेत्र के हर जिज्ञासु के सामने भली प्रकार खुले शब्दों में प्रकट कर दें।
उपासना का कर्म-काण्ड इसी श्रेणी में आता है। जप, उपवास, अस्वाद व्रत, अनुष्ठान, पुरश्चरण, अग्निहोत्र, आदि क्रियाएं उपासना कही जा सकती हैं। यह हैं तो महत्वपूर्ण पर सर्वांगपूर्ण नहीं हैं। भावना के समन्वय से ही यह परिपूर्ण बनती हैं। वे भावनाएँ रखते हुए जो उपासना की जाती है वह तुरन्त फलित होती है।
उपासनाओं के साथ-साथ जीवन शोधन और लोक-सेवा के लिए इसे निरन्तर कर्मरत रहना पड़ता है। आरम्भ में बल लाठी घुमाना सिखाया जा सकता है, पर फौजी सैनिक को आखिर बन्दूक और संगीन चलाना भी जानना ही पड़ेगा। लाठी घुमाने मात्र की शिक्षा के साथ उसकी पूर्णता सम्पन्न नहीं हो सकती।
उपासना क्षेत्र में उगा हुआ भावना का पौधा यदि सत्कर्मों द्वारा ठीक तरह पोषण किया जाता रहे तो वह एक दिन कल्पवृक्ष जैसे सुखद, सुरम्य प्रतिफल प्रस्तुत करता है।
उपासना स्थल पर गायत्री मंत्र अवश्य कर लिया करें। इससे आत्मिक प्रगति में बड़ी सहायता मिलती है।
उपासना तो प्रत्येक व्यक्ति करने ही लगे। जिन्हें कुछ सुविधा और श्रद्धा अधिक हो वे नित्य नियमपूर्वक स्नान करके उपासना स्थल पर गायत्री मंत्र अवश्य कर लिया करें। इससे आत्मिक प्रगति में बड़ी सहायता मिलती है।
उपासना के उच्च स्तर की ओर प्रेरित करना है। पंचकोशी उपासना का कार्यक्रम इसी दृष्टि से है। अन्न मय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोशों के अनावरण के लिए जो साधना विधि बनाई जा रही हैं उसमें जीवन शोधन का पर्याप्त अंश है। युग-निर्माण कार्यक्रम लोक-सेवा वाले अंश की पूर्ति करता है। इस प्रकार यह त्रिविधि कार्यक्रम एक सर्वांगपूर्ण आध्यात्मिक कार्यक्रम की पूर्ति कर देता है।
उपासना आवश्यक है। अन्नमय कोश को विकसित करके आत्म साक्षात्कार की स्थिति तक पहुँचने के लिए इस साधना की बहुत उपयोगिता है। गत दो वर्षों से अक्टूबर मास की अखण्ड ज्योति में एक-एक वर्ष का साधना क्रम प्रस्तुत किया जा रहा है। जिनने उसे आरंभ किया है उनने आशाजनक प्रगति की है। जो अभी तक उसे आरंभ नहीं कर सके हैं उन्हें उसके लिए प्रयत्न करना चाहिए।
उपासनाएँ जो करते हैं वे उन्हें भी करते हुए गायत्री जप कर सकते हैं।
उपासना, तपश्चर्या एवं आध्यात्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत होना चाहिए तथा योजना के संपर्क में आने वाले दूसरे लोगों को भी इसी भावना से प्रभावित करना चाहिए। हमारे सुधार आन्दोलन आध्यात्मिक लक्ष की पूर्ति के लिए एक साधन मात्र हैं इसलिए साधन के साथ साध्य को भी ध्यान में रखना ही होगा। हमारे आठ आध्यात्मिक कार्यक्रम नीचे प्रस्तुत हैं :—
उपासना के सम्बन्ध से यही तथ्य लागू होता है। कितने ही व्यक्ति जप बहुत करते हैं पर उनका आन्तरिक स्तर निष्कृष्ट से जरा भी ऊँचा नहीं होता। ऐसी दशा में चिरकालीन उपासना के पश्चात् भी उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। तृष्णाओं और वासनाओं की पूर्ति के साधन के रूप में ही जिनने ईष्ट देव की पूजा शुरू की हो, उन्हें कोई ऊँचा वरदान प्राप्त होने की आशा नहीं करनी चाहिए।
उपासना की जाती है वह तुरन्त फलित होती है। स्वल्प प्रयत्न, श्रम और भय में ही उसका आशाजनक सत्परिणाम प्राप्त होता है। किन्तु यदि भावनाओं के महत्व की उपेक्षा करते हुए, जड़ मशीन की तरह जप आदि की कोई क्रिया करते रहा जाय तो उससे वह प्रतिफल कदापि नहीं हो सकता जो होना चाहिए।
उपासना और जीवन निर्माण विद्या के दोनों ही माध्यमों से हमारे साथ संबद्ध व्यक्तियों के विशाल जनसमूह को हम ‘अखण्ड ज्योति’ परिवार के नाम से पुकारते हैं। यह सभी लोग हमें व्यक्ति गत रूप अपने शरीर के अंगों की तरह प्रिय हैं और विश्वास है कि वे लोग भी हमें उसी दृष्टि से देखते हैं। पारस्परिक प्रेम भाव और भावनात्मक आदान-प्रदान को बनाये रखने में ‘अखण्ड ज्योति” पत्रिका महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती रहती है।
उपासना करने में हमारा मार्गदर्शन परामर्श एवं सहयोग लेने वाले व्यक्ति यों को हम गायत्री परिवार कहते रहे हैं। जो लोग उपासना को उस विधि में तो नहीं करते, पर जीवन निर्माण के कार्यक्रमों में सहमत हैं ऐसे लोगों की भी संख्या कम नहीं। उपासना और जीवन निर्माण विद्या के दोनों ही माध्यमों से हमारे साथ संबद्ध व्यक्तियों के विशाल जनसमूह को हम ‘अखण्ड ज्योति’ परिवार के नाम से पुकारते हैं। यह सभी लोग हमें व्यक्ति गत रूप अपने शरीर के अंगों की तरह प्रिय हैं और विश्वास है कि वे लोग भी हमें उसी दृष्टि से देखते हैं। पारस्परिक प्रेम भाव और भावनात्मक आदान-प्रदान को बनाये रखने में ‘अखण्ड ज्योति” पत्रिका महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती रहती है।
उपासना, जीवन शोधन और सेवा कार्यों का भी उसी प्रकार ध्यान रखना चाहिए जैसे कि रोटी कमाने, वासनाओं को तृप्त करने तथा शरीर का पोषण करने का ध्यान रखा जाता है। यदि इस प्रयत्न में हमें सफलता मिलती है तो निश्चय ही तीस हजार व्यक्तियों का आज का ‘अखंड-ज्योति परिवार’ कल लाखों और परसों करोड़ों व्यक्तियों के जीवन में सत्प्रवृत्तियों का जागरण उत्पन्न करके स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण करेगा।
उपासना का मूल उद्देश्य भावनाओं और प्रवृत्तियों का सन्मार्ग की ओर प्रेरणा प्राप्त करना ही तो होता है। यह आधार गायत्री में है। और उसकी उपासना में वह शक्ति भी है कि अन्तःकरण को इसी दिशा में मोड़े। इस दृष्टि से गायत्री सर्वांगपूर्ण एवं सार्वभौम मानवीय उपासना कही जा सकती है। उसके लिए हमें नित्य नियमित रूप से कुछ समय निकालना चाहिए।
उपासना करने का कार्यक्रम बनाना चाहिए ताकि आत्म-शोधन के इस अभियान के लिए आवश्यक आत्मबल प्राप्त हो सके। इसी अवधि में इस अंक को दो या तीन बार पढ़ना चाहिए और सोचना चाहिये कि हम अपनी स्थिति के अनुसार क्या कर सकते हैं। यह एक महीना हृदय-मंथन की अवधि है। प्रतिदिन कुछ समय एकान्त में बैठकर मानव जीवन की महत्ता और उसकी सफलता के लिये प्रस्तुत योजना के समन्वय के सम्बन्ध में प्रतिदिन अनेक बार सोचना चाहिये और जो कुछ आत्मा स्वीकार करे उसे कर गुजरने के लिए साहस कर ही लेना चाहिए।
उपासना और भावना दोनों ही महान लाभों से जन साधारण को लाभान्वित किया जा सकता है। पर्व और त्यौहारों पर भी इन्हें विकसित बनाने के लिए ऐसे ही आयोजन किये जाते रहने चाहिए।
उपासना का तात्पर्य पूजा की प्रक्रिया, विधि व्यवस्था से है। गायत्री उपासना का कर्म-काण्ड इसी श्रेणी में आता है। जप, उपवास, अस्वाद व्रत, अनुष्ठान, पुरश्चरण, अग्निहोत्र, आदि क्रियाएं उपासना कही जा सकती हैं। यह हैं तो महत्वपूर्ण पर सर्वांगपूर्ण नहीं हैं। भावना के समन्वय से ही यह परिपूर्ण बनती हैं।
उपासनात्मक कर्मकाण्ड के अतिरिक्त जीवन शोधन और लोक-सेवा को भी समान रूप से महत्व दिया है और इन तीनों में से किसी की भी उपेक्षा नहीं की है।
उपासना करनी चाहिए। और इन भूत-पलीतों के भ्रम जंजाल से सर्वथा दूर रहना चाहिए। जनसमाज को भी इससे बचाना चाहिए। और भी अनेकों कुरीतियाँ विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूपों में पाई जाती हैं। हानिकारक और अनैतिक बुराइयों का उन्मूलन करना ही श्रेयस्कर है।
उपासना में संलग्न रहें। इससे अतिरिक्त उपासनाएँ जो करते हैं वे उन्हें भी करते हुए गायत्री जप कर सकते हैं।
उपासना का सम्मिश्रण हो जाने से तो सेवा सोने में सुगंधि का काम करती है। इस मार्ग में जितना अपना लाभ है उतना ही दूसरों का भी लाभ है। जिनकी सेवा की गई है उनका हित साधन होगा ही, उनके सुखों में वृद्धि होगी ही। इस प्रकार उससे स्वार्थ और परमार्थ दोनों का लाभ है। जहाँ अपना जीवन धन्य बनता है वहाँ दूसरों के उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त होने में जनता जनार्दन की, विश्व वसुधा की सुख शान्ति में वृद्धि होती है।
उपासना में वह शक्ति भी है कि अन्तःकरण को इसी दिशा में मोड़े। इस दृष्टि से गायत्री सर्वांगपूर्ण एवं सार्वभौम मानवीय उपासना कही जा सकती है। उसके लिए हमें नित्य नियमित रूप से कुछ समय निकालना चाहिए। चाहे वह समय पाँच मिनट ही क्यों न हो। 108 गायत्री मंत्र जपने में प्रायः इतना ही समय लगता है।
उपासना से चरित्र शुद्धि की प्रेरणा तो मिलती है, अंकुर तो उगता है पर साथ ही यह भी आवश्यक है कि उस अंकुर को ठीक प्रकार खाद पानी दिया जाय। यदि उसका संरक्षण, पोषण न हुआ तो वह अंकुर फलने फूलने की स्थिति तक न पहुंचेगा। उपासना के द्वारा सन्मार्ग पर चलने की जो प्रेरणा मिलती है उसे सद्भावनाओं और सत्कर्मों को जीवन में क्रियात्मक रूप देकर सींचा जाय। उपासना क्षेत्र में उगा हुआ भावना का पौधा यदि सत्कर्मों द्वारा ठीक तरह पोषण किया जाता रहे तो वह एक दिन कल्पवृक्ष जैसे सुखद, सुरम्य प्रतिफल प्रस्तुत करता है।
उपासनात्मक स्थान दिया जाता है। हमें नित्य यज्ञ करना चाहिए। यदि विधिवत् यज्ञ करने में समय और धन खर्च होने की असुविधा हो तो चौके में बने भोजन के पाँच छोटे ग्रास गायत्री मंत्र बोलते हुए अग्निदेव पर होमे जा सकते हैं। अथवा भोजन करते समय इसी प्रकार का अग्नि पूजन किया जा सकता है। घी का दीपक एवं अगरबत्ती जलाना भी यज्ञ विधि का ही एक रूप है।
उपासना कही जा सकती हैं। यह हैं तो महत्वपूर्ण पर सर्वांगपूर्ण नहीं हैं। भावना के समन्वय से ही यह परिपूर्ण बनती हैं। वे भावनाएँ रखते हुए जो उपासना की जाती है वह तुरन्त फलित होती है। स्वल्प प्रयत्न, श्रम और भय में ही उसका आशाजनक सत्परिणाम प्राप्त होता है।
उपासना को उस विधि में तो नहीं करते, पर जीवन निर्माण के कार्यक्रमों में सहमत हैं ऐसे लोगों की भी संख्या कम नहीं। उपासना और जीवन निर्माण विद्या के दोनों ही माध्यमों से हमारे साथ संबद्ध व्यक्तियों के विशाल जनसमूह को हम ‘अखण्ड ज्योति’ परिवार के नाम से पुकारते हैं। यह सभी लोग हमें व्यक्ति गत रूप अपने शरीर के अंगों की तरह प्रिय हैं और विश्वास है कि वे लोग भी हमें उसी दृष्टि से देखते हैं। पारस्परिक प्रेम भाव और भावनात्मक आदान-प्रदान को बनाये रखने में ‘अखण्ड ज्योति” पत्रिका महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती रहती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-April
उपासना, (2) शरीर और वस्त्रों की सफाई (3) वस्तुओं को यथास्थान सुव्यवस्थित रूप से रखना (4) बड़ों को नित्य अभिवादन करना, माता पिता एवं वृद्धों के चरण छूना (5) शृंगार एवं विलासिता के उपकरणों को छोड़कर सादगी अपनाना (6) रात को जल्दी सोना और प्रातः जल्दी उठना (7) निर्धारित दिनचर्या बना कर निरन्तर व्यस्त रहना, आलस्य को पास भी न फटकने देना (8) गाली देना या ‘तू’ का संबोधन तथा कटु भाषण छोड़कर मधुर वाणी से विनम्र संभाषण करना (9) आमदनी और खर्च का लिखित हिसाब रखना (10) टूटी-फूटी वस्तुओं की मरम्मत करके उन्हें पूर्ण निरुपयोगी होने तक काम में लेना (11) भोजन को सात्विक रखना, आहार संबंधी नियमों का पालन करना और भगवान को भोग लगाकर खाना (12) श्रम एवं व्यायाम की व्यवस्था रखना (13) हँसमुख
उपासना ‘ब्रह्म’ की उपासना के रूप में ही की जाती है। आत्मा में ज्ञान का प्रकार बन कर ही ब्रह्म का अवतरण होता है।
उपासना की शिक्षा “अखंड ज्योति” के पृष्ठों पर लम्बे समय से हम देते चले आ रहे हैं। वह न बन पड़े तो जितना भी जिस प्रकार भी संभव हो ईश्वर स्मरण करना चाहिए। इतना तो हर कोई कर सकता है कि सो कर उठते समय पन्द्रह मिनट ईश्वर का ध्यान स्मरण करके तब अन्य कार्य करे इसी प्रकार रात को सोते समय भी परमात्मा का स्मरण करते हुए सोया जाय।
उपासना के बारे में हम सदा से कहते रहे हैं। चरित्र निर्माण की आधार-शाला आस्तिकता है। ईश्वर विश्वास छोड़ देने से मनुष्य अंकुश रहित उन्मत्त हाथी की तरह आचरण करता है-अपने लिए तथा दूसरों के लिए विपत्ति का कारण बनता है। इसलिए हम में से हर एक को किसी न किसी रूप में ईश्वर उपासना नित्य ही करनी चाहिए। गायत्री उपासना की शिक्षा “अखंड ज्योति” के पृष्ठों पर लम्बे समय से हम देते चले आ रहे हैं।
उपासना को स्थान देना चाहिये। (2) स्वाध्याय के लिए कोई निश्चित समय निर्धारित करना चाहिए। (3) नित्य युग निर्माण का सत्संकल्प पढ़ना चाहिये। (4) सोते समय आत्मनिरीक्षण का कार्यक्रम नियमित रूप से चलाना चाहिये। (5) दिन में समय-समय पर कुविचारों से लड़ते रहने की तैयारी करनी चाहिये।
उपासना के रूप में ही की जाती है। आत्मा में ज्ञान का प्रकार बन कर ही ब्रह्म का अवतरण होता है।
उपासना, स्वाध्याय, व्रत, पर्व, अनुष्ठान, कथा, कीर्तन, सत्संग, देव दर्शन, हवन, तीर्थयात्रा, श्राद्ध आदि के द्वारा यह प्रयत्न निरन्तर होते हैं कि व्यक्ति को सुसंस्कारी बनाने की प्रक्रिया बन्द न होने पावे, उसका क्रम किसी न किसी प्रकार चलता ही रहे।
उपासना नित्य ही करनी चाहिए। गायत्री उपासना की शिक्षा “अखंड ज्योति” के पृष्ठों पर लम्बे समय से हम देते चले आ रहे हैं। वह न बन पड़े तो जितना भी जिस प्रकार भी संभव हो ईश्वर स्मरण करना चाहिए। इतना तो हर कोई कर सकता है कि सो कर उठते समय पन्द्रह मिनट ईश्वर का ध्यान स्मरण करके तब अन्य कार्य करे इसी प्रकार रात को सोते समय भी परमात्मा का स्मरण करते हुए सोया जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-September
उपासना मनुष्य की लौकिक और पारलौकिक प्रगति में निश्चय ही बहुत सहायक सिद्ध होती है। सर्व साधारण के लिए जिस गायत्री उपासना की आवश्यकता है, उसका उल्लेख गायत्री महा विज्ञान ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में किया जा चुका है। जप और ध्यान ही उसके प्रमुख आधार हैं। विशेष शक्ति प्राप्ति के लिए अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता हैं। किन्हीं विशेष अभाव या कष्टों की निवृत्ति के लिए बीज मंत्र समेत जप के विशेष विधान है।
उपासना तथा दूसरे धार्मिक कर्मकाण्डों का भी बहुत कुछ असर होता है पर सबसे अधिक प्रभाव अन्न का होता है। जिस प्रकार का, जिस स्तर का आहार किया जाता है उसी तरह का मन बनता है। वस्तु जैसी कुछ बनी है उसका प्रधान गुण तो वही रहेगा। सुधार और संस्कार से उसकी प्रगति में कुछ न कुछ अन्तर तो आता है पर पूरा परिवर्तन नहीं होता। आज साधना मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति आहार पर उतना ध्यान नहीं देते जितना कि देना चाहिए।
उपासना में संलग्न पति पत्नी-स्वाध्याय और परस्पर विचार विनिमय द्वारा भावनात्मक उत्कर्ष करते रहें। साथ ही परमार्थिक कार्यों में भी आवश्यक अभिरुचि लेते रहें तो उनके शरीरों में वे तत्व उत्पन्न हो सकते हैं जिनके कारण नर रत्नों को जन्म दे सकना संभव होता है। हमारी हार्दिक इच्छा है कि गायत्री परिवार के सद्गृहस्थों के यहाँ उच्च कोटि की आत्माएँ जन्म लें। युग निर्माण के लिए वैसी ही विभूतियों की आवश्यकता भी पड़ेगी। दशरथ-कौशल्या, वसुदेव-देवकी, दुष्यन्त-शकुन्तला की तरह प्रबुद्ध दम्पत्ति ही यह सौभाग्य लाभ कर सकते हैं।
उपासना का आरम्भ अन्नमय कोश की शुद्धि से ही होता है। नींव पक्की न हुई तो आगे ऊँची दीवार उठाने और उसे स्थायी बनाने का कार्यक्रम सफल न हो सकेगा ? जो व्यक्ति जिह्वा के गुलाम हैं, स्वादेन्द्रिय पर जो नियंत्रण नहीं कर सकते, शुद्ध आहार की प्राप्ति में जो कष्ट और असुविधा उठानी पड़ती है उसे सहन कर सकना जिनके वश की बात न हो, उन्हें योगाभ्यास, आत्मोत्कर्ष लक्ष्य की पूर्ति, स्वर्ग-मुक्ति जैसे स्वप्न नहीं ही देखने चाहिए। अध्यात्म शूरवीरों का मार्ग है। साधना को संग्राम कहा गया है।
उपासना का अपने स्थान पर काफी महत्व है परन्तु लक्ष्य तक पहुँचने के लिए वहीं तक सीमित रह जाना ठीक नहीं। आगे न बढ़ने से प्रगति रुकी ही रहेगी। सदा खेत जोतते रहने से भी क्या बनेगा? (1) बीज बोना, (2) सींचना, (3) नराना, (4) रखवाली करना, (5) काट मीड़ कर दाने निकालना - यह पाँच क्रियाएँ भी चतुर किसान को करनी ही होती हैं। इसके बिना अन्न उत्पादन का लक्ष्य पूरा नहीं होता।
उपासना, पंचकोशी साधना के नाम से विख्यात है। साधारण प्राथमिक उपासना में एक मुखी और द्विभुजी गायत्री का ध्यान किया जाता है। सद्बुद्धि एक मुख है और जप, ध्यान-नाम रूप-उसकी दो भुजाएँ हैं। ज्ञान की प्रतीक, सद्भावनाओं की प्रेरक श्रद्धामयी गायत्री को हिन्दू-धर्म के प्रत्येक सदस्य का एकमात्र उपासना माध्यम माना गया है। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के सभी आस्थावान धर्मज्ञ गायत्री उपासना के माध्यम से साधना करते हुए जीवन-लक्ष्य की पूर्ति के लिए-आत्मोत्कर्ष के लिए-प्रयत्नशील रहे है।
उपासना के माध्यम से पंचकोशों का जागरण और चक्रों का बेधन सब से सरल है। उसे साधारण स्थिति का गृहस्थ, कामकाजी आदमी थोड़े से सरल नियमों का पालन करते हुए, एक-दो घन्टे रोज साधना के लिए निकालते हुए प्रायः दस वर्षों में पूरा कर लेता है जब कि हठयोग या तंत्र-योग के मार्ग पर चलते हुए सारा जीवन लगाना पड़ता है और कोई थोड़ी-सी भी असावधानी होने पर प्राणघातक परिणाम भी निकल सकता है पर गायत्री उपासना के माध्यम से पंचकोशी साधना का मार्ग सर्वथा निर्दोष है। इसमें लगातार भूलें होते रहने पर भी खतरे की रत्ती भर संभावना नहीं है। हानि इतनी ही हो सकती है कि अनियमितता करने वाले को लाभ कम मिले।
उपासना करने के लिए प्रचार करने लगा।
उपासना की। यहाँ राम और रहीम में कुछ भी अंतर नहीं माना जाता और अंत में गाँधीजी ने ‘ईश्वर अल्ला एक हि नाम’ वाला मंत्र देकर संसार की आंखें खोल दीं कि भारतीय संस्कृति में सम्प्रदायवाद को किंचित भी स्थान नहीं है।
उपासना के महान महात्म्य का, जैसा शास्त्रों में वर्णन है, वैसा ही लाभ प्राप्त करते हैं।
उपासना माध्यम माना गया है। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के सभी आस्थावान धर्मज्ञ गायत्री उपासना के माध्यम से साधना करते हुए जीवन-लक्ष्य की पूर्ति के लिए-आत्मोत्कर्ष के लिए-प्रयत्नशील रहे है।
उपासना का वैज्ञानिक आधार यह है कि इस शब्द-समूह का जप, ध्यान, चिन्तन, मनन करते रहने से अन्तःकरण में सत् तत्व की अभिवृद्धि होती हैं। इसलिये अन्तःकरण में आवश्यक सत्प्रेरणाएँ भी उद्भूत होने लगती हैं।
उपासना की उच्चस्तरीय साधना में प्रवेश करने वाले योद्धा को सर्वप्रथम शिक्षण स्वादेन्द्रिय से लड़ने और आहार शुद्धि की सुव्यवस्था बनाने का ही है उसकी उपेक्षा करने से आगे का मार्ग अवरुद्ध ही पड़ा रहेगा, यह बात हर उच्चस्तरीय साधक को कान खोलकर सुन लेनी चाहिए और सुन समझकर गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि आहार को सात्विक बनाये बिना किसी भी प्रकार काम चलने वाला नहीं है। जो साधक मिष्ठान, पकवान और माल-मलाई विपुल परिमाण में चरते रहते हैं उन्हें वासनाएँ ऐसे ही पथ पर भ्रष्ट कर देती हैं जैसे मुर्गे की गर्दन को बिल्ली मरोड़ कर रख देती है। ऐसे साधकों को पग-पग पर आलस, प्रमाद सताता है और वासना तृष्णा की मृग मरीचिका उन्हें निरन्तर भ्रमाती, भटकाती रहती हैं।
उपासना पर, श्री गिरीश देव वर्मा रामायण के माध्यम से चरित्र निर्माण और श्री बद्रीप्रसाद जी दोष दुर्गुणों के निवारण पर जोर देते थे। आगे हमें क्या करना चाहिए, जीवन क्रम कैसा बनाना चाहिए इस विषय पर अन्य वक्ता बोलते थे। इस प्रकार सत्संग 10 बजे तक चलाने की बात सोची गई थी पर वह प्रायः 11-12 बजे तक ही बंद हो पाता था।
उपासना क्रम प्रकाशित किया जा रहा है। दस वर्ष में यह पाठ्यक्रम पूरा किया जाना है। दो वर्ष बीत गये। तीसरा वर्ष यह आरम्भ होता है। इस वर्ष का पाठ्यक्रम सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर के तीन अंकों में दिया जा रहा है।
उपासना की आवश्यकता है, उसका उल्लेख गायत्री महा विज्ञान ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में किया जा चुका है। जप और ध्यान ही उसके प्रमुख आधार हैं। विशेष शक्ति प्राप्ति के लिए अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता हैं। किन्हीं विशेष अभाव या कष्टों की निवृत्ति के लिए बीज मंत्र समेत जप के विशेष विधान है। ऐसे विशेष आयोजनों के अन्त में हवन भी करना पड़ता है।
उपासना स्वाध्याय, करने, बड़ों के चरण स्पर्श, साप्ताहिक उपवास, नागरिकता, सामूहिकता आदि सत्प्रवृत्तियों को अपनाने की प्रतिज्ञाएँ यज्ञ भगवान की साक्षी में कराई जातीं। यज्ञ कार्य प्रायः सभी जगह पं. शिवप्रसाद शुक्ल ने कराये । प्रातः काल का कार्यक्रम प्रायः दस बजे तक चलता था। दोपहर को भोजन, विश्राम और व्यक्तिगत परामर्श का कार्यक्रम चलता और तीसरे पहर अगले गाँव की यात्रा के लिए टोली रवाना हो जाती।
उपासना प्रायः प्रत्येक आत्म-लक्ष्य की प्राप्ति करने के इच्छुक को करनी पड़ती है।
उपासना क्रम को “पंचकोशी गायत्री साधना” इसलिए कहते हैं कि इसमें आत्मा के ऊपर वस्त्रों की तरह चढ़े हुए पाँच कोशों का अनावरण करना पड़ता है। प्रत्येक कोश की अपनी-अपनी विशेषता है उसके अनावरण एवं जागरण से आत्म-शक्ति की विशिष्ट अभिवृद्धि होती है और साधक साधारण मनुष्य न रह कर अनेक दृष्टियों से असाधारण बनने लगता है।
उपासना का प्रत्येक साधक दूसरों की अपेक्षा आत्मिक दृष्टि से अधिक उत्कृष्ट होगा, इसलिए ज्ञान विस्तार का उत्तर-दायित्व भी स्वभावतः उसके कन्धे पर पड़ेगा। इस धर्म कर्तव्य से किसी को इन्कार नहीं करना चाहिए और न आलस, उपेक्षा ही दिखानी चाहिए।
उपासना का मर्म संकेत एवं महत्व पंचमुखी गायत्री प्रतिमाओं में प्रदर्शित किया गया है। यह स्पष्ट है कि इस मार्ग में जिन्हें कुछ विशेष अनुभूतियाँ प्राप्त करनी होती है। यों साधारण गायत्री जप, ध्यान तो सब के लिए उपयोगी एवं आवश्यक है ही।
उपासना विधियों में विभिन्नता रही। परंतु परस्पर साम्प्रदायिक संघर्ष की नौबत कभी भी नहीं आई। बल्कि वे दोनों धर्म सनातन धर्मियों के सहयोग से उन्नत हुए। आज अनेक जन धर्मावलम्बी भी राम-कृष्ण और महावीर जी का साथ-साथ पूजन करते हैं।
उपासना के माध्यम से साधना करते हुए जीवन-लक्ष्य की पूर्ति के लिए-आत्मोत्कर्ष के लिए-प्रयत्नशील रहे है।
उपासना में एक मुखी और द्विभुजी गायत्री का ध्यान किया जाता है। सद्बुद्धि एक मुख है और जप, ध्यान-नाम रूप-उसकी दो भुजाएँ हैं। ज्ञान की प्रतीक, सद्भावनाओं की प्रेरक श्रद्धामयी गायत्री को हिन्दू-धर्म के प्रत्येक सदस्य का एकमात्र उपासना माध्यम माना गया है। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के सभी आस्थावान धर्मज्ञ गायत्री उपासना के माध्यम से साधना करते हुए जीवन-लक्ष्य की पूर्ति के लिए-आत्मोत्कर्ष के लिए-प्रयत्नशील रहे है।
उपासना विधि अब तक अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित होती रही है। इस मांग पर श्रद्धा रखने वाले जिज्ञासुओं को अधिक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण देने के लिए उच्चस्तरीय गायत्री साधना का उल्लेख इस स्तंभ के अंतर्गत भविष्य में नियमित रूप से किया जाता रहेगा।)
उपासना में अन्नमय कोश को अनावरण करने का प्रयत्न करते हुए श्रद्धालु साधक यदि ब्रह्मचर्य को अधिकाधिक महत्व देते रहें और अपने साथ ही पत्नी का आत्मिक स्तर ऊंचा उठाने का प्रयत्न करते रहें तो गायत्री माता के अन्य वरदानों के साथ यह वरदान भी मिल सकता है कि इतिहास में अपना और पिता-माता का नाम अमर करने वाली सुसंतति उन्हें प्राप्त हो।
उपासना के माध्यम से पंचकोशी साधना का मार्ग सर्वथा निर्दोष है। इसमें लगातार भूलें होते रहने पर भी खतरे की रत्ती भर संभावना नहीं है। हानि इतनी ही हो सकती है कि अनियमितता करने वाले को लाभ कम मिले।
उपासना का पथ इस संयम से ही प्रशस्त होता है। पंचकोशी उपासना का मर्म संकेत एवं महत्व पंचमुखी गायत्री प्रतिमाओं में प्रदर्शित किया गया है। यह स्पष्ट है कि इस मार्ग में जिन्हें कुछ विशेष अनुभूतियाँ प्राप्त करनी होती है। यों साधारण गायत्री जप, ध्यान तो सब के लिए उपयोगी एवं आवश्यक है ही।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-September
उपासना में मन अपेक्षाकृत अधिक शान्त स्थिर एवं संलग्न रह सकता है इसलिए गायत्री का इष्ट शीघ्र सिद्ध होता है।
उपासना की है क्यों कि यह खुला रहस्य है कि, शक्ति बिना मुक्ति नहीं। सरस्वती, लक्ष्मी, काली, माया, प्रकृति, राधा, सीता, सावित्री, पार्वती, आदि के रूप में गायत्री की ही पूजा की जाती है। पिता से सम्बन्ध होने का कारण माता है। इसलिए पिता से माता का दर्जा ऊँचा है समुद्र से जल ला लाकर मेघमालाएं ही वर्षा का आयोजन करती हैं। ईश्वर की असीम आनन्द राशि का आस्वादन करने का सौभाग्य गायत्री माता द्वारा ही मानव प्राणी को प्राप्त होता है।
उपासना करते हैं। शिव से पहले शक्ति की पूजा है। लक्ष्मी नारायण, सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर, आदि नामों में नारी को प्रथम और नर को गौण रखा गया है। माता का, पिता और गुरु से भी पहला स्थान है। इस प्रकार विश्व नारी के रूप में भगवान की पूजा करना नर पूजा की अपेक्षा अधिक उत्तम उपयोगी है।
उपासना की यही विशेषता है।
उपासना करें तो उसकी प्रति क्रिया भगवान की ओर से भी वैसी ही वात्सल्य मय होगी जैसी कि माता की अपने बच्चे के प्रति होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-June
उपासना में अधिक समय लगाना चाहिए, सन्ध्या के लिए तो कम भाग ही छोड़ना चाहिये। जप के समय मस्तक के मध्य भाग अथवा हृदय में प्रकाश पुँज ज्योति स्वरूप गायत्री का ध्यान करते जाना चाहिए।
उपासना एक नैष्ठिक अनुष्ठान है। जिसे “गायत्री अभियान” कहते हैं। पाँच लाख का जप होता है। यह एक वर्ष में पूरा किया जाता है। एक वर्ष की यह तपस्या साधक को उपासनीय महाशक्ति से तादात्म्य करा देता है।
उपासना में लगा देना कुछ विशेष कठिन बात नहीं है। सूतक, यात्रा, बीमारी आदि के दिनों में बिना माला के मानसिक जप चालू रखना चाहिये। किसी दिन साधना छूट जाने पर उसकी पूर्ति अगले दिन की जा सकती है।
उपासना का अर्थ क्या है? अपना सिर ऊंचा रखकर, सूर्यनारायण के दर्शन करके आँखों को शुद्ध और स्वस्थ करना।
उपासना तो सनातनी और आर्यसमाजी ही कर सकते हैं। यह तो मैंने आप के सामने स्थूल अर्थ रखा है। इस उपासना का अर्थ क्या है? अपना सिर ऊंचा रखकर, सूर्यनारायण के दर्शन करके आँखों को शुद्ध और स्वस्थ करना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-August
उपासना से समस्त पातकों से मुक्ति (20) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (21) गायत्री की नव दुर्गा साधना (22) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (23) गायत्री का अर्थ (24) गायत्री से साक्षात्कार और वार्तालाप (25) गायत्री साधना से चमत्कारी सिद्धियाँ (26) गायत्री की वाम मार्गी साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-March
उपासना करना देवी भक्ति कहलाती है और मनुष्य की उपासना करना मानवीय भक्ति कहलाती है।
उपासना करना मानवीय भक्ति कहलाती है।
उपासना। क्या ये तप नहीं है?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-July
उपासना करके जो अद्भुत लाभ प्राप्त किये हैं, उनके स्वयं बताये हुए वर्णन भी दिये गये हैं। (मूल्य 2)
उपासना से होने वाले चमत्कारी लाभों की विवेचना इस पुस्तक में बड़े विस्तार से की गई है। गायत्री संध्या, गायत्री अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ की विधियाँ भली प्रकार समझाई गई हैं। (मूल्य 2)
उपासना को भी वैसा ही आवश्यक नित्य कर्म बताया है जैसा साँस लेना, अन्न जल ग्रहण करना, शौच स्नान से निपटना एवं निद्रा लेना आवश्यक है। इन क्रियाओं से शरीर की रक्षा एवं वृद्धि होती है। गायत्री उपासना से आत्मबल की रक्षा और अभिवृद्धि का लाभ मिलता है।
उपासना करने के लिए विशेष जोर दिया गया है।
उपासना से आत्मबल की रक्षा और अभिवृद्धि का लाभ मिलता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-October
उपासना में मानव लगा हुआ है। उपनिषद् के शब्दों में यह द्वैत की उपासना मौत को निमन्त्रण देना है। अमरत्व के लिये, दिव्यता के लिये, सुख शान्ति के लिये हमें अद्वैत की ओर बढ़ना चाहिये।
उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋषि सिद्धियों का योग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोग, माता का साक्षात्कार, स्त्रियोपयोगी साधनाएं, गायत्री तप, गायत्री का अर्थ, कुंडलिनी जागरण, आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का विस्तृत वर्णन है। मू. 3॥)
उपासना करने का जितना महत्व है, उतना ही उसकी समस्त जानकारी को प्राप्त करना भी आवश्यक है। अधूरी शिक्षा के आधार पर की हुई क्रिया में अनेकों शंकाएं, भ्रान्तियाँ , त्रुटियाँ, भूलें रह जाती हैं जो कई बार बड़ी अनिष्टकर साबित होती हैं। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हमने बीस वर्ष तक लगातार परिश्रम करके दो हजार आर्ष ग्रन्थों के निचोड़ स्वरूप गायत्री महाविद्या का ज्ञान भली प्रकार करा देने वाली 9 पुस्तकें प्रकाशित कर दी है। अनुभवी गुरु की भाँति सच्चा पथ-प्रदर्शन करने वाली इन पुस्तकों को पढ़ना हर गायत्री-प्रेमी के लिए आवश्यक है।
उपासना जारी रखी जा सके तो बड़ा ही उत्तम है। वर्ष में 3 नवदुर्गाओं के छोटे अनुष्ठान तथा प्रतिदिन 11 मालाएं जपते रहने से एक वर्ष में पाँच लाख का ‘अभियान’ नामक जप-यज्ञ पूरा हो जाता है। प्रतिदिन दो मालाएं नियम पूर्वक जपते रहने से वर्ष में सवालक्ष का एक पूर्ण अनुष्ठान हो जाता है। इतना भी न बन पड़े तो प्रातः सोकर उठते समय रात को सोते समय गायत्री का मानसिक जप और ध्यान करके नियमित साधना को चालू रखा जा सकता है। एक वर्ष तक नियमित रूप से माता से संबंध बनाये रखा जाय तो साधक की मनोभूमि इतनी परिमार्जित हो जाती है कि उसमें दैवी तत्वों की स्थापना समुचित रूप से हो सकती है।
उपासना करें और देखें कि साधना में उनका जितना समय खर्च हुआ, उतने मूल्य का प्रतिफल आत्मिक एवं साँसारिक शक्ति के रूप में उन्हें मिला या नहीं ? हमारा विश्वास है कि यह बेजोखिम का परीक्षण हर किसी को संतोष एवं उत्साह प्रदान करने वाला ही सिद्ध होगा।
उपासना करनी होगी और अन्त में निष्काम कर्म द्वारा मोक्ष मिलेगा।
उपासना करने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए।
उपासना छोड़कर द्वैत का, भेदभाव का शिकार बना हुआ है।
उपासना मौत को निमन्त्रण देना है। अमरत्व के लिये, दिव्यता के लिये, सुख शान्ति के लिये हमें अद्वैत की ओर बढ़ना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-February
उपासना कर सकता है। तब उसे नैतिक बल बढ़ाना पड़ता है और स्वयं को तपस्या की-कष्ट सहने की आँच में तपने के लिए छोड़ना पड़ता है। तब वह विज्ञापनों के चक्कर में नहीं फंसता बल्कि इन सबसे अपने को ऊपर उठाकर स्वतंत्र विचारों की साधना में अपने को खपा देता है। तब सारे प्रलोभन उसके लिए बेकार हो जाते हैं। संसार तो उसके लिए प्रयोग-शाला रहती है जहाँ वह अपने “स्व-“में प्रतिष्ठित रहता है और उसके तंत्र के आगे किसी को कुछ नहीं समझता ।
उपासना में निमग्न होते हैं तो आनन्द का पारावार नहीं रहता। आत्मानन्द की उपलब्धि ही जीवन का लक्ष्य है दूसरे शब्दों में यों कहना चाहिए कि परमात्मा की प्राप्ति ही जीव का ध्येय है। जो ईश्वर के मार्ग पर चलता है वही सत्पथगामी, बुद्धिमान और सूक्ष्मदर्शी कहा जा सकता हैं।
उपासना विधि से होता है वही कार्य प्रणव और व्याहृतियों में सन्निहित भावनाओं को अपनाने से हो सकता है।
उपासना से होने वाले चमत्कारी लाभों की विवेचना इस पुस्तक में बड़े विस्तार से की गई है। गायत्री संध्या, गायत्री अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ की विधियाँ भली प्रकार समझाई गई हैं। (मूल्य 2)
उपासना की जाती है। इन सबका एक मात्र रहस्य यह है कि मनुष्य प्रभु की सत्ता को अपने समीप देखे, उसका ध्यान रखे, मनोभूमि में उसे प्राथमिकता दे, और अपने चारों ओर ईश्वर की समीपता देखते हुए उचित विचारधारा और कार्यप्रणाली को ही अपनाए। ईश्वर को निकटतम उपस्थित देखने वाला व्यक्ति स्वभावतः सन्मार्गगामी होगा। उसका मन और शरीर उचित गतिविधि को ही अपनाता है। फलस्वरूप सत्कर्मों का फल इतना शान्ति दायक, इतना सन्तोषजनक, इतना कल्याणकारक होता है कि उसे ईश्वरीय वरदान से कम किसी भी प्रकार नहीं कह सकते ।
उपासना करने की इच्छा होती है। शरीर और मन को स्वस्थ, संयत, सक्रिय, सन्मार्ग गामी, सुखी, सद्गुण सम्पन्न बनाने में प्रभु प्रज्ञा का ध्यान रहता है। अन्तरात्मा को पवित्रता, पुण्य, परहित, उदारता, प्रेम, प्रसन्नता की भावना द्वारा प्रभु के निवास योग्य सुन्दर मन्दिर बनाने का विचार होता है। जीवन के इन तीनों क्षेत्रों में भी ईश्वरीय श्रद्धा की स्थापना हो जाती है। समष्टि क्षेत्र विश्वव्यापी ईश्वर के प्रति श्रद्धा रखने और व्यष्टि क्षेत्र में जीवन के इन तीनों विभागों में ईश्वर की व्यापकता का अनुभव करने से जीवनमुक्ति का अनुभव होता है।
उपासना करके जो अद्भुत लाभ प्राप्त किए हैं, उनके स्वयं बताए हुए वर्णन भी दिये गए हैं। (मूल्य 2)
उपासना एक आध्यात्मिक व्यायाम है, एक आत्म-अनुशासन है जिससे मनुष्य की अन्तः भूमि का सुसंबद्ध विकास होता है। उस विकास के फलस्वरूप ऐसे विचारों और कार्यों का अभ्यास हो जाता है जिसके कारण अति आनन्द दायक परिस्थितियाँ आये दिन अनायास ही प्राप्त होती रहती हैं। ईश्वर उपासक कृतज्ञतापूर्वक इस आनन्द उपहार को ईश्वरीय वरदान समझ कर शिरोधार्य करता हुआ अपनी अहंकारिता का परिचय देता है। इस प्रकार जो कार्य किसी भी ईश्वर उपासना विधि से होता है वही कार्य प्रणव और व्याहृतियों में सन्निहित भावनाओं को अपनाने से हो सकता है।
उपासना करने के लिए विशेष जोर दिया गया है।
उपासना की अनेक विधियाँ प्रचलित हैं। विभिन्न सम्प्रदायों के अनेक धर्मग्रन्थों में विविध प्रकार के ईश्वरीय चरित्रों, कथाओं का वर्णन है, इनके कहने या सुनने से परमात्मा प्रसन्न होने का महात्म्य लिखा है। मन्दिर, मस्जिद, गिरजे, तीर्थ, व्रत, उद्यापन, हवन, बलिदान, जप-तप, साधना, संन्यास, ध्यान, संध्या, नमाज, कथा, कीर्तन, दान, पुण्य, पूजा, अर्चना, भोग, प्रसाद आदि अनेक विधि-विधानों कर्मकाण्डों द्वारा परमात्मा की उपासना की जाती है। इन सबका एक मात्र रहस्य यह है कि मनुष्य प्रभु की सत्ता को अपने समीप देखे, उसका ध्यान रखे, मनोभूमि में उसे प्राथमिकता दे, और अपने चारों ओर ईश्वर की समीपता देखते हुए उचित विचारधारा और कार्यप्रणाली को ही अपनाए। ईश्वर को निकटतम उपस्थित देखने वाला व्यक्ति स्वभावतः सन्मार्गगामी होगा।
उपासना के प्रतीक हैं। चूँकि सभी में ईश्वर है इसलिए अपने में, अपने परिवार में, अपने स्वजनों निकटवर्तियों में भी वह है। अपने निकटवर्ती क्षेत्र से कार्य आरंभ करना सुविधाजनक एवं उचित होता है, इसलिए अन्तरात्मा की अपेक्षा अपना मन निर्मल है उसे ऊंचा उठाना चाहिए एवं अपने परिजनों को आन्तरिक और साँसारिक संपदाओं से सम्पन्न करना चाहिए। उनमें सात्विकता के अंश अधिकाधिक मात्रा में भरने चाहिएं। इस प्रकार अपने निकटवर्ती क्षेत्र से, मन-मन्दिर तथा परिवार-उपवन से ही ईश्वराधना आरंभ कर देनी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-April
उपासना करके इस प्रकार उन्हें समर्पण करें कि ‘हे दयानिधे! आपकी कृपा से हम जो जो शुभ कर्म करते हैं, वे सब आपके अर्पण हैं, जिससे कि हम लोग आपको प्राप्त होकर सत्य एवं न्यायानुकूल आचरण रूप धर्म, धर्मानुकूल पदार्थों की प्राप्ति कर अर्थ, धर्म, और अर्थ के द्वारा इष्ट भागों का सेवन कर काम तथा समस्त दुःखों से छूटकर सर्वदा आनन्दमग्न रहना रूप मोक्ष प्राप्त कर सकें।
उपासना नहीं करता, वह कृतघ्न और महामूर्ख है, क्योंकि जिसने जीव के सुख के लिये इस जगत् के सारे पदार्थ दे रक्खे हैं, उस ईश्वर के गुण भूल जाना-उसी को न मानना-कृतघ्नता और मूर्खता ही है।
उपासना से होने वाले चमत्कारी लाभों की विवेचना इस पुस्तक में बड़े विस्तार से की गई है। गायत्री संध्या- गायत्री अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ की विधियाँ भली प्रकार समझाई गई हैं। मूल्य 2 रु 0/
उपासना करके जो अद्भुत लाभ प्राप्त किये है, उनके स्वयं बताये हुए वर्णन भी दिये गये है। मूल्य 2 रु 0/
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-December
उपासना की जा रही है हमारे महाविद्यालयों में इनकी बड़ी पूछ है बड़ा आदर है। सत्याग्रह-आश्रम की बुनाईशाला के द्वारों पर एक-2 पटिया टंगी रहती थी, जिस पर लिखा रहता था - ‘कला ही राष्ट्र का जीवन है।’ और, अगर यह कहूँ कि संगीत की उपासना तो गुजरात में सत्याग्रहाश्रम से ही शुरू हुई तो अत्युक्ति न होगी। भर्तृहरि ने साहित्य, संगीत और कला से हीन मनुष्य को पशु से भी बदतर कहा है एक श्रुति ने तो रस ही को ब्रह्म कहा है। इन प्रबल प्रमाणों के रहते हुए भी आज साहित्य, संगीत और कला की जो विचार-हीन उपासना हो रही है, उसका विरोध करना कर्त्तव्य हो जाता है।
उपासना नहीं।
उपासना तो गुजरात में सत्याग्रहाश्रम से ही शुरू हुई तो अत्युक्ति न होगी। भर्तृहरि ने साहित्य, संगीत और कला से हीन मनुष्य को पशु से भी बदतर कहा है एक श्रुति ने तो रस ही को ब्रह्म कहा है। इन प्रबल प्रमाणों के रहते हुए भी आज साहित्य, संगीत और कला की जो विचार-हीन उपासना हो रही है, उसका विरोध करना कर्त्तव्य हो जाता है।
उपासना मनुष्य को पूर्णता तक पहुँचा सकती है, जिससे समस्त प्रजा का कल्याण हो सकता है, वह अकेले साहित्य, संगीत और कला की उपासना नहीं।
उपासना आवश्यक है, मेरे विचार में वही साहित्यिक उपासना की सीमा का सूचन करती है। उसके हृदय में उत्पन्न होने वाली सात्विक प्रसन्नता से और उसके जीवन की पूर्णता से उसकी वाणी में जितना आनन्द उत्पन्न हो सकता है, वही सात्विक का सच्चा रस है और उसमें जितनी स्वाभाविक सुन्दरता प्रतीत होती है वही सच्ची कला है।
उपासना की सीमा का सूचन करती है। उसके हृदय में उत्पन्न होने वाली सात्विक प्रसन्नता से और उसके जीवन की पूर्णता से उसकी वाणी में जितना आनन्द उत्पन्न हो सकता है, वही सात्विक का सच्चा रस है और उसमें जितनी स्वाभाविक सुन्दरता प्रतीत होती है वही सच्ची कला है।
उपासना हो रही है, उसका विरोध करना कर्त्तव्य हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-May
उपासना, यज्ञ, तप आदि का प्रयोजन यह होता है कि व्यक्तिगत या सामूहिक प्रयत्नों द्वारा उन ईश्वरीय शक्तियों को अधिकाधिक मात्रा में प्राप्त किया जाय जो मनुष्य के लिए हितकर, लाभदायक एवं आनन्दप्रद हैं।
उपासना में सबने गायत्री को प्रमुख स्थान दिया है। उपासना क्या है। उपासना एक ऐसी वैज्ञानिक विधि को कहते हैं जिसके द्वारा अपने शरीर और मन में निवास करने वाली अनेक प्रसुप्त शक्तियों का जागरण एवं एकीकरण करके उनकी आकर्षण शक्ति द्वारा ईश्वरीय शक्ति भंडार में से किसी विशेष शक्ति को खींच लाया जाय।
उपासना क्या है। उपासना एक ऐसी वैज्ञानिक विधि को कहते हैं जिसके द्वारा अपने शरीर और मन में निवास करने वाली अनेक प्रसुप्त शक्तियों का जागरण एवं एकीकरण करके उनकी आकर्षण शक्ति द्वारा ईश्वरीय शक्ति भंडार में से किसी विशेष शक्ति को खींच लाया जाय।
उपासना एक ऐसी वैज्ञानिक विधि को कहते हैं जिसके द्वारा अपने शरीर और मन में निवास करने वाली अनेक प्रसुप्त शक्तियों का जागरण एवं एकीकरण करके उनकी आकर्षण शक्ति द्वारा ईश्वरीय शक्ति भंडार में से किसी विशेष शक्ति को खींच लाया जाय।
उपासना माता का नित्य दूध पीने के समान, नित्य व्यायाम करके शरीर पुष्ट करने के समान नित्य कर्म है। उसमें भूल नहीं करनी, चाहिए। साथ ही कभी कभी विशेष शक्ति का उपार्जन एवं संचय का आयोजन करने के लिए विशेष साधन भी करने चाहिए। अपनी निष्ठा, श्रद्धा, स्वास्थ्य, अवकाश, मानसिक स्थिति आदि का ध्यान रखते हुए छोटे या बड़े साधन किये जाते हैं। कोई विशेष कार्य माता से कराना होता है तो बालक विशेष मनोयोग विशेष भावनाओं के साथ माता से प्रार्थना करता है ऐसी ही विशेष प्रार्थना जब गायत्री माता से की जाती है तो उसे अनुष्ठान या पुरश्चरण कहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-June
उपासना, कर्मकाण्ड आदि विषयों में अभिरुचि हो, वे चाहें ते तीन मास में ही पौरोहित्य कोर्स भी पूरा कर सकते हैं, इसमें निम्न विषय होंगे- (1) विवाह प्रयोजनों और कामनाओं को पूर्ण करने वाले 20 प्रकार के यज्ञों की क्रियात्मक, शिक्षा, (2) नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह, अंत्येष्टि आदि षोडश संस्कार कराने का क्रियात्मक विधान, (3) शिक्षात्मक वेदमन्त्रों का स्वाध्याय, (4) गायत्री गीता, (5) रामायण, गीता आदि की धार्मिक कथाएँ कहने का रोचक अभ्यास।
उपासना करने वालों को सच्चा भक्त , योगी, ज्ञानी, संन्यासी कहा गया है और बताया गया है कि ब्रह्म निर्माण, शाश्वत शान्ति, परम समाधि एवं जीवन मुक्ति का अक्षय पुण्य ऐसी ही आध्यात्मिक स्थिति वालों को मिलना सम्भव है।
उपासना (2) अपने व्यक्ति गत जीवन को दिन-दिन अधिक उत्कृष्ट एवं आदर्श बनाते चलना (3) सांस्कृतिक एवं नैतिक भावनाओं को फैलाने के लिए एक प्रकार के धर्म शिक्षण का कार्य करते रहना। इन तीन कार्यक्रमों के लिए अपनी भावना तथा क्रिया को लगाने के लिए प्रत्येक सदस्य अपनी परिस्थिति के अनुसार अधिकतम प्रयत्न करता रहेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-April
उपासना से जीवन पवित्र होता है। आत्मा उन्नति को प्राप्त होती है और अमृतत्व को भी प्राप्त करती है।
उपासना करने के लिये अधिक उपयुक्त होती है, उसी प्रकार शीत और शीत की मिलन-वेला आश्विन नवरात्रि होती है। इस संक्रमण काल में जिस भाँति भौतिक प्रकृति अपने विशाल क्षेत्र में एक अवस्था से दूसरी में प्रवेश करती है, उसी भाँति सूक्ष्म प्रकृति के क्षेत्रों में भी उस समय संक्रमण काल उपस्थित होता है। ऐसे समय में जो साधक सावधान और एकाग्र चेतना से उपासना करता है, उसे सहसा ही अपना निचला स्तर छोड़कर ऊर्ध्व के स्तर में जाने की सर्वव्यापिनी शक्ति द्वारा बल, सहायता और गति प्रदान की जाती है। जिसे अन्य समय में वह अपनी वैयक्तिक उपासना के बल पर पाने में असमर्थ था, वह अनायास ही उपलब्ध हो जाता है। इस भाँति नवरात्रि उपासना का विशाल परिणाम निष्ठावान एवं सच्चे उपासकों को मिलता रहता है।
उपासना करता है, उसे सहसा ही अपना निचला स्तर छोड़कर ऊर्ध्व के स्तर में जाने की सर्वव्यापिनी शक्ति द्वारा बल, सहायता और गति प्रदान की जाती है। जिसे अन्य समय में वह अपनी वैयक्तिक उपासना के बल पर पाने में असमर्थ था, वह अनायास ही उपलब्ध हो जाता है। इस भाँति नवरात्रि उपासना का विशाल परिणाम निष्ठावान एवं सच्चे उपासकों को मिलता रहता है।
उपासना अन्य समयों में की गई उपासना की अपेक्षा अधिक बलशालिनी और फलवती होती है। जैसे दिन-रात्रि का मिलन काल-सन्ध्या, आध्यात्मिक उपासना करने के लिये अधिक उपयुक्त होती है, उसी प्रकार शीत और शीत की मिलन-वेला आश्विन नवरात्रि होती है। इस संक्रमण काल में जिस भाँति भौतिक प्रकृति अपने विशाल क्षेत्र में एक अवस्था से दूसरी में प्रवेश करती है, उसी भाँति सूक्ष्म प्रकृति के क्षेत्रों में भी उस समय संक्रमण काल उपस्थित होता है। ऐसे समय में जो साधक सावधान और एकाग्र चेतना से उपासना करता है, उसे सहसा ही अपना निचला स्तर छोड़कर ऊर्ध्व के स्तर में जाने की सर्वव्यापिनी शक्ति द्वारा बल, सहायता और गति प्रदान की जाती है। जिसे अन्य समय में वह अपनी वैयक्तिक उपासना के बल पर पाने में असमर्थ था, वह अनायास ही उपलब्ध हो जाता है।
उपासना कर [यः अन्तः सिन्धुः ] जो इस संसार में रम रहा है (सत्यस्य+सूनुः) जो सदा सत्य की ओर ही प्रेरणा करता है [ युवानाम् ] जो सर्वदा युवा अर्थात् एक रस रहता है, (सुवेशम्) जो सारे बलों, सुखों और आनन्द का भण्डार है ( अद्रोघवाचम्। जिसकी वाणी में किसी के प्रति असत्य, द्रोह और विश्वासघात नहीं है।
उपासना की अपेक्षा अधिक बलशालिनी और फलवती होती है। जैसे दिन-रात्रि का मिलन काल-सन्ध्या, आध्यात्मिक उपासना करने के लिये अधिक उपयुक्त होती है, उसी प्रकार शीत और शीत की मिलन-वेला आश्विन नवरात्रि होती है। इस संक्रमण काल में जिस भाँति भौतिक प्रकृति अपने विशाल क्षेत्र में एक अवस्था से दूसरी में प्रवेश करती है, उसी भाँति सूक्ष्म प्रकृति के क्षेत्रों में भी उस समय संक्रमण काल उपस्थित होता है। ऐसे समय में जो साधक सावधान और एकाग्र चेतना से उपासना करता है, उसे सहसा ही अपना निचला स्तर छोड़कर ऊर्ध्व के स्तर में जाने की सर्वव्यापिनी शक्ति द्वारा बल, सहायता और गति प्रदान की जाती है। जिसे अन्य समय में वह अपनी वैयक्तिक उपासना के बल पर पाने में असमर्थ था, वह अनायास ही उपलब्ध हो जाता है।
उपासना द्वारा उसमें तल्लीन हो जाता है और इतना तल्लीन हो जाता है कि अपने को भूलकर भेद के शब्दों में स्वयं कह उठता है:—
उपासना में ब्रह्मचर्य पालन अत्यावश्यक है। जो कर सकें, वे उपवास भी करें, परिमित फल और दूध लेना भी उपवासवत् ही है। जिनसे ऐसा नहीं बन पड़े, वे भी सात्विक-परिमित भोजन करें। स्वाद के लिये न खायें, अतः यथासम्भव नमक और मीठा (चीनी मिष्ठानादि) छोड़ दें। यह भी श्रेष्ठ व्रत ही है।
उपासना के बल पर पाने में असमर्थ था, वह अनायास ही उपलब्ध हो जाता है। इस भाँति नवरात्रि उपासना का विशाल परिणाम निष्ठावान एवं सच्चे उपासकों को मिलता रहता है।
उपासना, तपस्या करना, दोनों में एक भी पथ प्रशस्त नहीं। वरन् विषय से अनासक्त होकर उसका आवश्यक उपयोग तथा कष्टदायी तपस्या के आकर्षण से विरत हो शान्त चित्त से ही, जिसे वे “मध्यम मार्ग” कहते हैं— स्थायी शान्ति प्राप्त हो सकती है।
उपासना में लीन होना ही तप है।
उपासना से मैं जन्म-मरण के बन्धन से तो छूट जाऊँगा किन्तु मेरा अन्तिम लक्ष्य तो परमानन्द की प्राप्ति है। क्या प्रभु-भक्ति द्वारा इसकी भी मुझे प्राप्ति होगी या नहीं? वेद भक्त के इस संदेह को भी दूर करता है, हे प्रिय भक्त ! तू इस सन्देह को भी अपने हृदय-पटल से दूर कर दे, क्योंकि तेरे आराध्यदेव भगवान् तो “सुशेवः” हैं। सारे सुखों के भंडार हैं। परम शान्ति और पूर्णानन्द के धाम हैं।
उपासना करने पर मुझे अपने चरम लक्ष्य की प्राप्ति होगी या नहीं? भक्त कैसे आराध्यदेव की आराधना करें? इस सम्बन्ध में अथर्ववेद में एक सुन्दर मंत्र आता है-
उपासना पूर्व मुख एवं सन्ध्या काल की पश्चिम मुख होकर करनी चाहिये। जप के समय घी का दीप या कम से कम धूपबत्ती जलती रहे। जल का पात्र निकट में रहे। नित्य सन्ध्या कर लेने के उपरान्त गायत्री माता और गुरु का पूजन करके जप प्रारम्भ कर देना चाहिये। नियमित जप समाप्त कर सूर्य के सम्मुख जल चढ़ा देना चाहिये।
उपासना करो।
उपासना का विशाल परिणाम निष्ठावान एवं सच्चे उपासकों को मिलता रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-May
उपासना करने का उपदेश दिया। पर गायत्री मन्त्र में भगवान को तेज रूप मानकर उनसे केवल अपनी ही नहीं वरन् संसार भर की बुद्धि के निर्मल और उज्ज्वल करने की प्रार्थना की गई है। जब अर्जुन ने पूछा कि मैं भगवान का ज्ञान कैसे प्राप्त करूं और कैसे उनका ध्यान करूं तो भगवान कृष्ण ने यही कहा कि तुम जहाँ कहीं प्रकाश देखो वहीं समझलो कि भगवान हैं। अर्जुन ने कहा कि मैं एक ही स्थान पर भगवान का दर्शन करना चाहता हूँ। तब भगवान ने उसे विराट रूप दिखाया।
उपासना की महत्ता पर प्रकाश ढाला है।
—सम्पादक
उपासना के द्वारा हमने जितने लोगों को विविध कष्टों एवं आपत्तियों से छुटकारा पाते हुए देखा और स्वयं किया, उसे लिखने से एक मोटी पुस्तक ही बन जायगी। तो भी एक विशेष घटना मैं लिखना चाहता हूँ।
उपासना करते हुए इस मान्यता के अनुकूल ही आचरण करूंगा।
उपासना की दीक्षा प्राप्त की है। उसने अपने कन्धों पर समाज की सेवा का बहुत बड़ा भार सहर्ष स्वीकार किया है। उसने अग्नि देव तथा जनता जनार्दन को साक्षी करके मानव मात्र के कल्याण का बोझा उठाया है।
उपासना करके सदा अपनी आत्मोन्नति के साथ देश और समाज-सेवा में संलग्न रहूँगा।
उपासना में संलग्न हो गया गायत्री उपासना के द्वारा हमने जितने लोगों को विविध कष्टों एवं आपत्तियों से छुटकारा पाते हुए देखा और स्वयं किया, उसे लिखने से एक मोटी पुस्तक ही बन जायगी। तो भी एक विशेष घटना मैं लिखना चाहता हूँ।
उपासना का सुदृढ़ संकल्प करें तो अवश्य आप के जीवन की रक्षा हो जायगी। पहले तो मैंने विशेष ध्यान नहीं दिया, पर जब कई दिनों के इलाज से कोई लाभ न हुआ और मेरी जहाँ तक प्रसिद्धि थी, सर्वत्र यह खबर फैल गयी कि जादूगरी बाबा नहीं बचेंगे, तब मैंने अपने को मरा हुआ मान कर ही गायत्री माता की शरण ग्रहण करली और उसी दिन से आश्चर्य पूर्ण तीव्र गति मेरे स्वास्थ्य का सुधार होने लगा। स्वस्थ होते ही मैंने गुरु देव आचार्य श्रीराम शर्मा का आश्रय लिया और तत्परता से गायत्री उपासना में संलग्न हो गया गायत्री उपासना के द्वारा हमने जितने लोगों को विविध कष्टों एवं आपत्तियों से छुटकारा पाते हुए देखा और स्वयं किया, उसे लिखने से एक मोटी पुस्तक ही बन जायगी। तो भी एक विशेष घटना मैं लिखना चाहता हूँ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-March
उपासना, कथा कीर्तन, यज्ञ हवन, तीर्थ यात्रा, ग्रन्थ,शास्त्र, आदि का निर्माण किया है। आयोजनों का-परम्पराओं का विधिवत् पालन करने से ही उपरोक्त चार संकल्पों में सन्निहित तत्वज्ञान को जनसाधारण की मनोभूमि में स्थापित करना तथा स्थिर रखना सम्भव है। इसलिए तात्विक
उपासना के लिए उत्साह पैदा किया जाय। तथा बताया जाय कि सद्बुद्धि की स्थापना के लिए बौद्धिक क्रान्ति-मानवता की पूजा एवं नारी की पद-दलित महानता का समुचित उत्कर्ष करने का आन्दोलन भी गायत्री आन्दोलन में सन्निहित हैं।
उपासना, सामूहिक गायत्री यज्ञ अनुष्ठान आदि के आयोजनों की व्यवस्था करके जनमानस में गायत्री उपासना के लिए उत्साह पैदा किया जाय। तथा बताया जाय कि सद्बुद्धि की स्थापना के लिए बौद्धिक क्रान्ति-मानवता की पूजा एवं नारी की पद-दलित महानता का समुचित उत्कर्ष करने का आन्दोलन भी गायत्री आन्दोलन में सन्निहित हैं।
उपासना करना।
उपासना क्यों न हो, पर गायत्री एवं यज्ञ की परम्परा को दैनिक जीवन में प्रत्येक सदस्य को स्थान देना आवश्यक है।
उपासना
उपासना में स्थान रहना है। चाहे 24 गायत्री मन्त्र जपने और 5 मिनट सुगन्धित धूपबत्ती या घृत दीप जलाने जितनी छोटी सी ही छोटी उपासना क्यों न हो, पर गायत्री एवं यज्ञ की परम्परा को दैनिक जीवन में प्रत्येक सदस्य को स्थान देना आवश्यक है।
उपासना को भी उसमें सम्मिलित रखना आवश्यक है। क्योंकि एक तो ऋषियों ने इस गायत्री को आवश्यक नित्यकर्म माना है, दूसरे इस महामन्त्र में सन्निहित शिक्षाओं के आधार पर ही साँस्कृतिक पुनरुत्थान का सारा कार्यक्रम चलाना है। (1) सद् ज्ञान की निरन्तर अभिवृद्धि (2) त्यागमय प्रेम से परिपूर्ण व्यवहार, इन दो कार्यक्रमों के प्रतीक ही गायत्री सद्ज्ञान) यज्ञ (त्यागमय प्रेम) हैं। इन दोनों प्रतीकों को हमारी नित्य उपासना में स्थान रहना है। चाहे 24 गायत्री मन्त्र जपने और 5 मिनट सुगन्धित धूपबत्ती या घृत दीप जलाने जितनी छोटी सी ही छोटी उपासना क्यों न हो, पर गायत्री एवं यज्ञ की परम्परा को दैनिक जीवन में प्रत्येक सदस्य को स्थान देना आवश्यक है।
उपासना अन्य समस्त उपासनाओं की अपेक्षा अधिक सरल, स्वल्प-श्रमसाध्य एवं अत्यधिक फलदायिनी है। प्राचीनकाल में ऋषि−मुनि इसी महामन्त्र के आधार पर तपस्याएं करके परम सिद्धि प्राप्त करते थे। सर्व साधारण के लिए गायत्री को एक आवश्यक नित्यकर्म माना गया है। गायत्री को एक आवश्यक नित्यकर्म माना गया है। गायत्री हीन की कटुशब्दों में शास्त्रकारों ने भर्त्सना की है।
उपासना-गायत्री का महत्व समझाने, किसी न किसी रूप में प्रतिदिन गायत्री उपासना, करने गायत्री की शिक्षाओं के आधार पर अपने विचारों एवं कार्यों को बनाने के लिए व्यापक प्रचार किया जाय और मुसलमानों के ‘कलमे’ की तरह आध्यात्मिक प्रकाश के रूप में प्रतिष्ठित कराया जाय।
उपासनाओं की अपेक्षा अधिक सरल, स्वल्प-श्रमसाध्य एवं अत्यधिक फलदायिनी है। प्राचीनकाल में ऋषि−मुनि इसी महामन्त्र के आधार पर तपस्याएं करके परम सिद्धि प्राप्त करते थे। सर्व साधारण के लिए गायत्री को एक आवश्यक नित्यकर्म माना गया है। गायत्री को एक आवश्यक नित्यकर्म माना गया है। गायत्री हीन की कटुशब्दों में शास्त्रकारों ने भर्त्सना की है।
उपासनाएं करके उन शक्ति यों की खोज करें जो प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों को इस महामंत्र की साधना से प्राप्त होती थी।
उपासना से लाभ, (5) तीर्थों एवं देवालयों का वास्तविक रहस्य, (6) वर्णाश्रम-धर्म और आज की स्थिति का समन्वय (7) भाषा, भेष, भाव की एकता का महत्व (8) भारतीय शिष्टाचार और सदाचार(9) युग धर्म की आवश्यकता (10) जीवन का लक्ष पूर्ण करने वाली दार्शनिक दृष्टि।
उपासना (2) शिक्षा प्रद वेद मन्त्रों को कंठस्थ करना (3) अनेक प्रकार के यज्ञों का विज्ञान और विधान (4)सोलह संस्कारों की शिक्षायें तथा कराने की सरल पद्धतियाँ (5) भाषण देने एवं कथा कहने का अभ्यास (6) कथा कीर्तन तथा शिक्षा प्रद भजनों के योग्य आवश्यक ताल स्वर, तथा गायन वाद्य की संगीत शिक्षा (7) गीता,रामायण,भागवत् सत्यनारायण आदि धर्म ग्रन्थों की अत्यन्त हृदय ग्राही तथा शिक्षाप्रद कथा कहने की नवीन पद्धति (8) आरोग्य शास्त्र का अपनी स्वस्थता एवं दूसरों की सेवा के योग्य ज्ञान (9) श्रम शीलता शिष्टाचार, दिनचर्या एवं कर्तव्य परायण की व्यवहारिक शिक्षा (10) शिक्षार्थी के व्यक्ति गत जीवन की समस्याओं पर आवश्यक सलाह।
उपासना तो सुविधा पूर्वक कर सकते हैं, पर लोक सेवा के लिए समय, अवसर एवं क्षेत्र कम ही प्राप्त होता है। ऐसे लोग व्रतधारी कहलावेंगे।
उपासना कीजिए—हमारे धर्म ग्रन्थों में क्या नहीं हैं जो हम दूसरों से उधार लेकर काम चलाने की इच्छा करें?
उपासना, करने गायत्री की शिक्षाओं के आधार पर अपने विचारों एवं कार्यों को बनाने के लिए व्यापक प्रचार किया जाय और मुसलमानों के ‘कलमे’ की तरह आध्यात्मिक प्रकाश के रूप में प्रतिष्ठित कराया जाय।
उपासना के प्रकार तीर्थयात्रा कथा, कीर्तन, आचार-विचार, रहन-सहन, भाषा-भेष भाव, आदि के पीछे भी उन्हीं आदर्शों की आत्मा झाँकती है जो मानव को महामानव बनाने के लिए बनाये गये हैं। रामायण, भागवत, गीता आदि की कथाएं यद्यपि आज के लोग अमुक उपाख्यान सुन लेने से स्वर्ग का अमुक लाभ प्राप्त होने की तुच्छ बुद्धि के अनुसार पढ़ते-सुनते हैं, पर यदि उन्हें आदर्शों की प्रेरणा के लिए सुना या पढ़ा जाय तो सामान्य सभा-व्याख्यानों की अपेक्षा उनका प्रभाव अनेक गुना हो सकता है। ऐसी कथाएं मरने के बाद स्वर्ग पहुँचाने के लाभों तक ही सीमित न रह कर नैतिक उत्थान में तुरन्त सहायक हो सकती है और भूतल पर स्वर्ग रचना की भूमिका सम्पादन कर सकती हैं। प्राचीनकाल में होता भी ऐसा ही था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-August
उपासना का प्रचार किया है। उन सबने मिलकर गुरु पूर्णिमा के दिन हवन किया। महबूबाबाद (हैदराबाद) में श्री विलासीराम लोहिया तथा अन्य धर्म-प्रेमियों के प्रयत्न से यज्ञ हुआ। मोतिया (बिहार) में सर्व श्री कुमु- दानन्द, अवधेश झा, शंभूनाथ ठाकुर, सुधाकर झा, देवव्रत झा, पंचानन झा, गजेन्द्र झा आदि सज्जनों ने बड़े उत्साह से हवन को पूर्ण कराया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-February
उपासना के सब रूप एक समान अच्छे हैं।
उपासना करने वाले रैदास को अभिमान छूकर नहीं गया था। अन्तःकरण में साधु-सन्तों के लिए भरपूर भक्ति थी। उनको देखते ही रैदास आनन्द विभोर हो जाते, उनका मन-मयूर नाच उठता, जो कुछ उस समय पास होता उनके लिए समर्पित हो जाता और साथ ही कर्म-कुशल पुत्र काम छोड़ देता। धन-लोलुप पिता से यह सहा न गया और पुत्र को घर से अलग कर दिया गया। रहने के लिए केवल एक कुटी बनवा दी।
उपासना की है। भगवान को सर्वव्यापी समझकर, परात्पर की कल्पना करने में भी वह अन्य किसी सन्त से पीछे नहीं हैं। परन्तु अधिकतर वह सत्संगति को प्रधानता देते हैं। एक पद्य देखिए:—
उपासना, सेवा का अटल व्रत और न्याय की अविचल निष्ठा नहीं बन जाता।
उपासना का कोई भी मार्ग ग्रहण करें, वे मुझे ही प्राप्त होते हैं।’
उपासना की विधि की शिक्षा दी। स्वयं हमारे युग में गाँधी जी ने भी, महान् राजनीतिक युद्ध की बाग हाथ में लिए हुए, अपने ढंग से कर्म और उपासना की रीति सिखायी। हमारे युग में गाँधीजी के श्रीमुख गीता का पुनर्जन्म हुआ। हमें उस शिक्षा को हृदयंगम करना चाहिए, केवल शब्दों का उच्चारण नहीं। गीता की सच्ची पूजा उसके आशय का प्रतिदिन सचाई के साथ मनन करने में और उसके अनुसार अपने आचार-विचार को ढालने में निहित है।
उपासना में वृद्धि, दुर्बल संरक्षण बढ़ाने के लिए अधिक गायत्री उपासकों की वृद्धि, मन्त्र-लेखन, गायत्री पुस्तकालयों की स्थापना, आत्मदान की तैयारी, कुछ दिन पहले मथुरा आने का प्रयत्न,आर्थिक सहयोग, अखण्ड-ज्योति के सदस्य बढ़ाना, आवश्यक परामर्श देते रहना, आदि अनेक कार्य ऐसे हैं, जिनमें हाथ बँटाने के लिए कदम बढ़ाया जा सकता है, पर आज जो काम ‘ड्यूटी’ के रूप में सौंप रहे हैं, वह सन्देशवाहक का कार्य है। इस मास हम अपने प्रत्येक प्रेमी के नाम पर ध्यान रखेंगे कि किसने हाथ बँटाया, कौन चुप बैठा रहा, हमें आप सभी से इस सम्बन्ध में सहयोग की आशा है।
उपासना के समान ही होते हैं।
उपासना की रीति सिखायी। हमारे युग में गाँधीजी के श्रीमुख गीता का पुनर्जन्म हुआ। हमें उस शिक्षा को हृदयंगम करना चाहिए, केवल शब्दों का उच्चारण नहीं। गीता की सच्ची पूजा उसके आशय का प्रतिदिन सचाई के साथ मनन करने में और उसके अनुसार अपने आचार-विचार को ढालने में निहित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-November
उपासना करें। पर इससे यह हानि होती है कि प्रभावशाली उपासकों के मथुरा चले आने से उनके स्थानों पर कोई सामूहिक कार्यक्रम नहीं हो पाता। अतएव इस बार जहाँ कोई और साधक नहीं है, गायत्री परिवारों का संगठन नहीं है वहाँ के साधकों को ही मथुरा आने की स्वीकृति दी गई और जहाँ अन्य उपासक भी हैं वहाँ के लोगों को यह प्रेरणा की गई कि वे अपने यहाँ ही जप हवन प्रवचन सामूहिक आयोजन करें। आगे भी नवरात्रि के संबंध में यही नीति रहेगी। समस्त गायत्री परिवार का वार्षिक सम्मेलन गायत्री जयन्ती जेष्ठ सुदी 10 पर हुआ करेगा उन दिनों गर्मी तो अवश्य कुछ अधिक पड़ती है पर व्यापारी किसान, अध्यापक, छात्र, सरकारी कर्मचारी सभी को छुट्टी एवं फुरसत का समय रहता है।
उपासनाओं के भेद हैं और उनमें अन्ध श्रद्धा का बाहुल्य है। मुसलमान स्वयं मूर्तिभंजक होते हुए भी कब्रों की पूजा करते हैं। मानव स्वभाव उपासना के विभिन्न मार्गों में भी एक अद्भुत सामंजस्य खोज लेता है जो इस बात का प्रमाण है कि मानव जाति में एक स्वभावगत मौलिक एकता है और उसके विचारों में सदैव समन्वय की गुँजाइश रहती है।
उपासना के विभिन्न मार्गों में भी एक अद्भुत सामंजस्य खोज लेता है जो इस बात का प्रमाण है कि मानव जाति में एक स्वभावगत मौलिक एकता है और उसके विचारों में सदैव समन्वय की गुँजाइश रहती है।
उपासना करता है। यह स्वस्थ और संस्कारी मनुष्य का अपना वैभव है।
उपासना ठीक रीति से ठीक पथ प्रदर्शन, शास्त्रोक्त विधि और कड़े नियंत्रण में करता रह सकता है। दो ढाई घन्टे का यह परिश्रय मिल जाने से छात्र अपना भोजन परिश्रमपूर्वक कमाते हुए संस्कृति विद्यालय की महत्वपूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। छात्र वृत्ति, ब्राह्मण भोजन, संस्कृति सेवा, आत्म कल्याण इन चारों ही दृष्टियों से इस प्रकार की सहायता करना एक ऊंचे दर्जे का पुण्य फलदायक दान है। जिनकी श्रद्धा तथा सामर्थ्य हो वे इस योजना के अंतर्गत अपनी ओर से जप, आदि कराने की कृपा करें।
उपासना के क्षेत्र के कर्मवीर अब गायत्री माता की प्रेरणा “धियोयोनः” में “नः” – “हम सब” के तत्वज्ञान को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं और एकान्त सेवी अलगाव की प्रकृति को बदल कर सहयोग की प्रेम गंगा का अवतरण कर रहे हैं।
उपासना में उत्साह उत्पन्न होने, सदस्यों में परस्पर प्रेम भाव विकसित होने पर अनेक धार्मिक और साँस्कृतिक सत्कार्यों की व्यवस्था सहज ही बन सकती है। एक साथ बहुत से कार्यक्रम बना लेने से किसी की भी पूर्ति नहीं होती। अभी अपनी शाखाऐं मजबूत करने, सदस्य बढ़ाने नई शाखाऐं स्थापित करने, तथा पारिवारिक साप्ताहिक सत्संगों का आयोजन करने का कार्यक्रम ही सामने रहना चाहिए और पूरे उत्साह से इसमें लगना चाहिए।
उपासना कराने वाली सज्जन यदि 6 मासिक दें तो एक विद्यार्थी एक घंटा प्रतिदिन उनके लिए वह उपासना ठीक रीति से ठीक पथ प्रदर्शन, शास्त्रोक्त विधि और कड़े नियंत्रण में करता रह सकता है। दो ढाई घन्टे का यह परिश्रय मिल जाने से छात्र अपना भोजन परिश्रमपूर्वक कमाते हुए संस्कृति विद्यालय की महत्वपूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। छात्र वृत्ति, ब्राह्मण भोजन, संस्कृति सेवा, आत्म कल्याण इन चारों ही दृष्टियों से इस प्रकार की सहायता करना एक ऊंचे दर्जे का पुण्य फलदायक दान है। जिनकी श्रद्धा तथा सामर्थ्य हो वे इस योजना के अंतर्गत अपनी ओर से जप, आदि कराने की कृपा करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-January
उपासना और यज्ञ अनुष्ठान के आध्यात्मिक नित्य कर्मों के अतिरिक्त- मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत लोक शिक्षण हो सकता है और जन साधारण की मनोभूमि को ज्ञान और त्याग के साथ सुसंबद्ध बनाया जा सकता है। लम्बी चौड़ी योजनाऐं बनाना व्यर्थ है। सब कार्यों के लिए कर्म निष्ठ, पुरुषार्थी परिश्रमी सच्चे और धुन के पक्के कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है ऐसे कार्यकर्ता हों तो उनका प्रत्येक कदम एक कार्यक्रम बन सकता है, अनुभव के आधार पर उन कार्यक्रमों में हेर फेर होता रह सकता है। मूल आवश्यकता अपने को तुच्छ स्वार्थों से ऊंचा उठाकर इस सांस्कृतिक आवश्यकता के लिए अधिक से अधिक मात्रा में अपना समय, मन, वचन, धन, साधन, योग्यता, चातुर्य, आदि लगा देने के लिए उत्सुक त्याग भावना की है।
उपासना यानी उपस्थान एवं आहुति दोनों काम भारती युद्ध में प्रत्येक आर्य का करने पड़ते थे। सायंकाल में सूर्य के अस्त होते समय सन्ध्यावन्दन एवं होम करना पड़ता था। महर्षि बाल्मीकि ने भी रामायण में ऐसा ही वर्णन किया है। विश्वामित्र के साथ जाते हुए अथवा वनवास में जाने पर जहाँ जहाँ प्रभात और सन्ध्या हुई वहाँ-वहाँ राम और लक्ष्मण के सन्ध्या का वर्णन आया है।
उपासना में गायत्री ज्ञान का, साहित्य का भी प्रमुख स्थान है।
उपासना—तीन ही काण्ड वेद में हैं। चौथा विज्ञान काण्ड है ज्ञान अर्थात् गुण गुणी का ज्ञान ऋग्वेद में कर्म का यजुर्वेद में, उपासना का सामवेद में वर्णन है विज्ञान का अथर्ववेद में है किन्तु तीनों वेदों में प्रथम “यज्ञ” शब्द का प्रयोग है। अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजं होतारम्। ऋग्वेद के पहले मन्त्र में यज्ञ शब्द सबसे पूर्व है यज्ञस्य-अग्निम् ईले। शेष सब अग्नि के विशेषण है।
उपासना, ध्यान, हवन, अनुष्ठान आदि की आवश्यकता है वहाँ गायत्री महाविद्या की समुचित जानकारी प्राप्त करके उसमें छिपे हुए अत्यन्त महत्वपूर्ण रत्न भंडार को समझ लेना भी आवश्यक है। ज्ञान और कर्म अध्यात्म रस के दो पहिये हैं। दोनों से बिना यह गाड़ी ठीक प्रकार नहीं चल सकती। गायत्री माता का ध्यान करना उनका पूजन करना जिस प्रकार आवश्यक है उसी प्रकार गायत्री ज्ञान की पुस्तकें पढ़ना तथा उनका स्वाध्याय मनन चिन्तन करना भी आवश्यक है। गायत्री उपासना में गायत्री ज्ञान का, साहित्य का भी प्रमुख स्थान है।
उपासना के उपयुक्त चित्र सब मिला कर 27॥=) का होता है। थोड़ी सामर्थ्यवान् व्यक्ति भी अपने घर में यह देवालय स्थापित कर सकते हैं। जिनके पास कई पुस्तकें मौजूद हैं उनके लिए शेष पुस्तकें मंगा लेना कोई बहुत भारी काम नहीं है। कई व्यक्ति मिलकर तो ऐसा पुस्तकालय बड़ी आसानी से स्थापित कर सकते हैं। आधा मूल्य उधार कर सकने की सुविधा से तो आर्थिक कठिनाई वाले प्रसंगों में भी काफी सरलता हो सकती है।
उपासना का सामवेद में वर्णन है विज्ञान का अथर्ववेद में है किन्तु तीनों वेदों में प्रथम “यज्ञ” शब्द का प्रयोग है। अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजं होतारम्। ऋग्वेद के पहले मन्त्र में यज्ञ शब्द सबसे पूर्व है यज्ञस्य-अग्निम् ईले। शेष सब अग्नि के विशेषण है। अतः यज्ञ शब्द पूर्व, यज्ञ नाम परमेश्वर का है।
उपासना के लिए स्थायी खर्च का प्रबन्ध करने की जरूरत पड़ती है। पर गायत्री पुस्तकालय बीस तीस रुपये की छोटी पूँजी से स्थापित हो जाता है। अखंड ज्योति पत्रिका इस पुस्तकालय में सदा आती रहे तो यह 31 वार्षिक का चार आना मासिक पूजा खर्च की इतना है जिसकी व्यवस्था कोई गरीब भी आसानी से कर सकता है।
उपासना करो, वेदों को पढ़ो और उसकी आज्ञा के अनुकूल व्यवहार करके सुखी होओ।
उपासना में जहाँ पूजा, उपासना, ध्यान, हवन, अनुष्ठान आदि की आवश्यकता है वहाँ गायत्री महाविद्या की समुचित जानकारी प्राप्त करके उसमें छिपे हुए अत्यन्त महत्वपूर्ण रत्न भंडार को समझ लेना भी आवश्यक है। ज्ञान और कर्म अध्यात्म रस के दो पहिये हैं। दोनों से बिना यह गाड़ी ठीक प्रकार नहीं चल सकती। गायत्री माता का ध्यान करना उनका पूजन करना जिस प्रकार आवश्यक है उसी प्रकार गायत्री ज्ञान की पुस्तकें पढ़ना तथा उनका स्वाध्याय मनन चिन्तन करना भी आवश्यक है। गायत्री उपासना में गायत्री ज्ञान का, साहित्य का भी प्रमुख स्थान है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-July
उपासना के लिए केवल शरीर-पूजा ही नहीं, किन्तु इन्द्रियनिग्रह संयम और बौद्धिक विराग भी अपेक्षित है। युद्धोन्मुख राष्ट्रीयता के इस युग में यदि विश्व राजनीतिज्ञ विरक्त बुद्धि से समस्याओं पर विचार करना सीख लें तो युद्ध का आतंक बहुत कुछ दूर हो जाय। सामाजिक व्यवस्था तथा अन्य विधि निषेध, इन्हीं आदर्शों को जीवन में उतारने के साधन मात्र हैं, जहाँ तक भारतीय संस्कृति का प्रश्न है, वह दीर्घकालीन साधना और चिंतन की उपज है, मानवता को एक करने की अधिक से अधिक क्षमता उसमें है पर उसके प्रकाश में जब हम समाज का दलित-गलित रूप देखते हैं तो ऐसा लगता है कि कभी इस राष्ट्र के लोक-जीवन में सामूहिक चेतना जग ही नहीं सकती, उसका विगत एक हजार वर्ष का इतिहास पराजय और आपसी घृणा का इतिहास है। वह ऐसी अचल जातों का ढेर है जिनमें न जीवन है और न ही गति। आशा-निराशावाद, हिंसा-अहिंसा और प्रवृत्ति-निवृत्ति की विचारधाराओं से इस साँस्कृतिक पतन का उतना सम्बन्ध नहीं जितना कि सदोष वर्णमूलक समाज व्यवस्था से।
उपासना और यज्ञ, शीर्ष स्थान पर स्थित हैं। वह नित्य नवीन है। हजारों युगों के बाद भी इसमें कोई मलिनता प्रवेश नहीं कर सकी। इस भौतिक प्रधान युग में भी ये दोनों आध्यात्मिक प्रेरणा देते रहते हैं।
उपासना के लिए उत्साह पैदा करने तथा साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना को व्यापक बनाने के उद्देश्य से एक देश व्यापी दौरा करने का विचार अवश्य है। हर महीने इसके लिए एक सप्ताह निकालते रहने का विचार है। जहाँ के परिजनों का अधिक उत्साह एवं आग्रह होगा वहाँ के प्रोग्राम को प्राथमिकता दी जायगी।
उपासना जीवन और भाषा में एक ही राष्ट्रीय आत्मा व्याप्त है। विभिन्न दार्शनिक सिद्धान्त- (ब्रह्मवाद,चेतनवाद, अनात्मवाद) भी इसी अनेकता में एकता की अनुभूति पर जोर देते हैं।
उपासना कैसे करें? —)।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-September
उपासना को एक अनिवार्य दैनिक कृत्य नियत किया गया था। किन्तु समय का कुचक्र हमें इस स्थिति तक ले आया कि गायत्री को भूत भगाने का मंत्र या कानोंकान रखने, किसी को न बताने की जादूगरी जैसी चीज माना जाने लगा। भारतीय संस्कृति की अनादि जननी गायत्री में वह शक्ति, प्रेरणा, शिक्षा, स्फूर्ति एवं प्रक्रिया सन्निहित है, जिसके द्वारा प्राचीन काल में हमने उन्नति के उच्चतम सोपान तक पहुँचने में सफलता प्राप्त की थी और अब यदि फिर उस अवलम्बन को ग्रहण करें तो उस प्राचीन काल के महान् गौरव को पुनः प्राप्त कर सकते हैं। यह दुर्भाग्य की ही बात है कि इस गायत्री रूपी अमूल्य निधि को हम बहुत काल तक भूले रहे। प्रभु की दिव्य प्रेरणा अब उस विस्मरण को हटाकर चेतना का नव-सन्देश प्रदान कर रही है।
उपासना करना। अन्धश्रद्धा मत करना; अपनी बुद्धि पर भरोसा करके विवेक से काम करना। अपने मन में सार्वजनिक स्नेह का भाव रखना। प्रजा, सन्तान का उच्छेद मत करना। अपने सुख, चैन की स्वार्थी लालच से गार्हस्थ्य के उत्तम धर्म का बोझ उठाने से जान मत छिपाना।
उपासना रूप वेदत्रयी का आचरण, दर्श-पौर्णमास आदि यज्ञों का करना, गृहस्थ धर्म का पालन—संतति का प्रसव, महायज्ञ—सर्वहुत तथा पञ्चमहायज्ञों का करना और अन्त में समग्र यज्ञ पूर्ण जीवन को यज्ञमय ही बना देना ब्रह्मणत्व-प्राप्ति के साधन कहे गये हैं। अन्तिम साधन त्याग की पराकाष्ठा को सूचित करता है। ऐसे ब्राह्मण ही संन्यासी की उस प्रतिज्ञा को पूर्णतया चरितार्थ कर सकते हैं जिनमें पुत्र-वित्त-यश सभी आकांक्षाओं के त्याग का प्रतिपादन है।
उपासना आदि कार्यों के अतिरिक्त उनमें परस्पर मिलते-जुलते रहने के कारण प्रेम-भाव, संगठन और सहयोग का भी विकास हो, एक दूसरे के अपने अनुभव सुनायें, कठिनाइयों को सुलझाएं और आगे बढ़ने के लिए एक दूसरे से प्रेरणा प्राप्त करें। सुख-दुख के साथी बढ़ावें, जिससे एकाकीपन का भारी, अनिश्चित और चिन्तित जीवन अपेक्षाकृत सरल हो सके। ऐसे संगठन मिलजुल कर अपने निकटवर्ती प्रभाव क्षेत्रों में नये गायत्री उपासक बढ़ाने, गायत्री संगठन बनाने का भी कार्य कर सकते हैं यह सब यदि बिलकुल भी न हो तब भी शुभ उद्देश्य वाले, एक भावना और एक मान्यता के लोगों का परस्पर मिलते-जुलते रहने और प्रेम-सूत्र में सम्बद्ध रहना भी कुछ कम लाभ की बात नहीं है। इन सब बातों पर विचार करते हुए यह निश्चय किया गया है कि जहाँ भी सम्भव हो वहाँ गायत्री प्रेमियों के संगठन स्थापित कर दिये जायं और उनका नाम “गायत्री परिवार” रख दिया जाय। सभा सुसाइटियों के झगड़ालू तरीकों से यह संगठन सर्वथा भिन्न रहे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-October
उपासनात्मक लक्ष चण्डी सूक्त यज्ञ का महा अनुष्ठान भी तपोभूमि में इस आश्विन की नवरात्रि से आरम्भ किया जा रहा है। इस अनुष्ठान में वेदोक्त चण्डी सूक्त के एक लाख पाठ, नवार्ण मन्त्र का 24 लक्ष जप तथा दुर्गा सप्तशती के एक सहस्र पाठ होंगे। इस प्रकार वैदिक लक्ष चण्डी, पौराणिक सहस्र चंडी तथा नवार्ण मंत्र का 24 लक्ष चण्डी महापुरश्चरण इन तीनों का समावेश होने से यह महा अनुष्ठान साधारण एकाकी लक्ष चण्डी, सहस्र चण्डी, नवार्ण पुरश्चरण की अपेक्षा तीन गुनी शक्ति से सम्पन्न होगा। यह प्रचंड चंडी महा पुरश्चरण एक ऐसी शक्ति उत्पन्न करेगा जो असाधारण रूप से असुरता को परास्त करने और खेत्व को परिपुष्ट करने में समर्थ होगी। अगले वर्ष सन् 57 के विशेष अशुभ होने की संभावना को देखते हुए इस समय यह और भी अधिक आवश्यक है।
उपासना की व्यापक प्रक्रिया आज अतीक आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए अधिकाधिक परिमाण में गायत्री उपासना तथा यज्ञ आयोजनों का महत्वपूर्ण कार्यक्रम गायत्री तपोभूमि द्वारा चलाया जा रहा है। प्रसन्नता की बात है कि उसकी उपयोगिता विचारवान धर्म प्रेमी आत्माओं ने समझी है और वे उसमें उत्साहपूर्वक योग दे रही हैं। विशद् गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के बाद विभिन्न स्थानों में सामूहिक यज्ञों की एक लहर चल पड़ी है। गत गुरु पूर्णिमा पर 108 यज्ञों में 24 लक्ष से कहीं अधिक आहुतियाँ हो चुकी हैं।
उपासना तथा यज्ञ आयोजनों का महत्वपूर्ण कार्यक्रम गायत्री तपोभूमि द्वारा चलाया जा रहा है। प्रसन्नता की बात है कि उसकी उपयोगिता विचारवान धर्म प्रेमी आत्माओं ने समझी है और वे उसमें उत्साहपूर्वक योग दे रही हैं। विशद् गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के बाद विभिन्न स्थानों में सामूहिक यज्ञों की एक लहर चल पड़ी है। गत गुरु पूर्णिमा पर 108 यज्ञों में 24 लक्ष से कहीं अधिक आहुतियाँ हो चुकी हैं। श्रावण भाद्रपद में भी कई जगह अच्छे यज्ञ हुए हैं।
उपासना करना तीर्थयात्रा, समुचित पथ डडडडड न, परामर्श, सिद्धपीठ एवं अनुकूल वातावरण का डडडडड व आदि अनेक कारणों से यहाँ अधिक सुविधा रहती है। ठहरने, भोजन आदि की यहाँ समुचित व्यवस्था रहती ही है।
उपासना भी- अन्य समयों में बहुत दिन तक, बड़ी मात्रा में की हुई साधना के समान फलप्रद होती है।
उपासना की जानी है। फिर आज की विपन्न परिस्थिति में तो इसकी आवश्यक व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक सुरक्षा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है जो लोग इसमें भाग लेना चाहें वे मथुरा आकर इसमें भाग ले सकते हैं या अपनी ओर से इच्छित संख्या में जप हवन आदि करा सकते हैं। संकल्प पूर्ण हो जाने पर निर्धारित पाठ एवं जप का दशांश हवन होगा। जितनी संख्या में पंडित अभी बिठाये जा रहे हैं उतने से एक वर्ष में यह संकल्प पूर्ण होगा, और पूर्णाहुति आश्विन में ही होगा। यदि अधिक साधक बिठा दिये जायं तो 8 महीने में जेष्ठ की गायत्री जयन्ती तक भी यह सब कार्य पूरा हो सकता है।
उपासना की अपेक्षा कुछ अधिक मात्रा में साधना एवं तपश्चर्या करनी चाहिए। 9 दिन में 24 हजार का अनुष्ठान कुछ बहुत कठिन नहीं है। प्रतिदिन 27 माला के हिसाब से 9 दिन में अनुष्ठान पूर्ण हो जाता है। इसके लिए 3 घंटा प्रतिदिन समय लगता है, जो जल्दी 4 बजे उठकर 7 बजे तक पूरा हो सकता है। जिन्हें एक साल इतना समय लगाने में असुविधा हो वे प्रातः सायं दोनों समय मिलाकर इसे पूरा कर सकते हैं।
उपासना का रहस्य है। प्रभु हमें उसका पात्र बनावे!
उपासना की जाती है। कार्तिक कृष्ण पक्ष में श्रीसूक्त से लक्ष्मी यज्ञ होगा जिसकी पूर्णाहुति दिवाली के दिन होगी। कार्तिक शुक्ल पक्ष में 15 दिन पुरुषसूक्त से विष्णु यज्ञ होगा।
उपासना करते हुए परम-शान्ति को प्राप्त हो चुके हैं!
उपासना करने के लिये किसी शिल्पकार के द्वारा निर्मित मन्दिर एवं प्रस्तर प्रतिमा का आश्रय लेते हैं और उसी में अपने आराध्य प्रभु की प्रतिष्ठा करके उसी को पूजते हैं लेकिन प्रकृति माता के बनाये हुए देह रूपी मन्दिर में निवास करने वाले सर्वोपरि प्रिय अपने आप रूपी आरूप-रूप में परम प्रभु की प्रतिष्ठा नहीं करते।
उपासना के लिए सभी समय उत्तम हैं। पर नवरात्रि का समय सबसे श्रेष्ठ है। जिस प्रकार प्रातः सायंकाल की संध्या अन्य कालों की अपेक्षा अधिक फलप्रद होती है उसी प्रकार शीत और ग्रीष्म ऋतुओं के मिलन की संध्या आश्विन और चैत्र की नवरात्रि हैं। इन 9-9 दिनों में की हुई थोड़ी गायत्री उपासना भी- अन्य समयों में बहुत दिन तक, बड़ी मात्रा में की हुई साधना के समान फलप्रद होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-December
उपासना करने से बहुत काल में मन की शुद्धि होती है। पर सच्चे साधुओं के तो दर्शन और सत्संग से ही चित्त सद्यः शुद्ध हो जाता है। तीर्थ-स्थानों में जो सच्चे साधु (साध्नोति शुभाम् कामान् इति साधुः) तपस्वी विद्वान बसते हैं, वे ही तीर्थ के तीर्थंकर हैं, तीर्थों को तीर्थ बनाने वाले हैं। जो शोक के पार तारे वह तीर्थ (तरति शोकं येन सहायेन सः तीर्थः)। सप्त पवित्र पुरी आदि तीर्थ इसी हेतु से तीर्थ थीं, कि वे उत्तम विद्या पीठ का काम देती थीं।
उपासना से प्यार करवाने की तथा आनन्दित होने की एक वृत्ति पैदा होती है- ‘हम प्रेम करें’ क्योंकि उसने पहले हमसे प्रेम किया था।’
उपासना करने से मनुष्य सब दुखों से तर जाते हैं। ‘शित्’ ‘ईडा’ और ‘अशित’ ‘पिंगला’ ये दोनों यहाँ मिलती हैं उनको सुषुम्ना कहते हैं उसमें योगाभ्यास से स्नान करके जीव शुद्ध हो जाता है और फिर शुद्ध रूप परमेश्वर को प्राप्त होके सदा आनन्दमय रहता है इस वास्ते योगाभ्यास को सच्चा तीर्थ मानकर परमात्मा की उपासना करनी चाहिये।
उपासना करते हैं, उसमें एक माला गायत्री जप की और बढ़ा दें। जो अनियमित रूप से कभी करते हैं, कभी नहीं करते हैं वे इस वर्ष नियमितता की प्रतिज्ञा कर लें। जो अब तक बिलकुल नहीं करते हैं वे भी एक माला गायत्री मन्त्र की कम से कम एक वर्ष के लिये करना अवश्य स्वीकार कर लें। एक माला प्रायः छह से दस मिनट में हो जाती है। इतना समय एक धर्मकार्य के लिये अनिच्छा पूर्वक, असुविधा होते हुए भी दे दिया जाय तो यह कोई बहुत भारी बात नहीं है।
उपासना के अनुभव भी रहा करेंगे। गायत्री-उपासकों को अपनी उपासना में जो अध्यात्मिक एवं भौतिक विशेष अनुभव हुए हों उन्हें अखण्ड ज्योति में प्रकाशनार्थ भेजते रहें।
उपासना में जो अध्यात्मिक एवं भौतिक विशेष अनुभव हुए हों उन्हें अखण्ड ज्योति में प्रकाशनार्थ भेजते रहें।
उपासना करने वाले साधकों की संलग्नता।
उपासना आत्मिक और भौतिक दोनों ही रूप से उपासक के लिये परम श्रेयष्कर होती है।
उपासना करने का उपदेश दिया गया। महेश्वर से गाड़ी द्वारा 9 बजे धामनोद को रवाना हुए, जो बम्बई-आगरा सड़क पर मोटरों का एक बड़ा जंक्शन है। यहाँ पर भाई रामेश्वर जी सोहनी ने सब व्यवस्था ठीक कर रखी थी जिससे कोई कठिनाई नहीं हुई। यात्रा की थकावट के कारण आज रात को यहीं विश्राम करने का निश्चय किया गया। प्रातः काल इन्दौर के लिये चले।
उपासना-संस्कृति आदि विषयों पर संभाषण हुए। प्रथम यज्ञ कोपरगंज में श्री सुकृति लाल गुप्ताजी के निवास स्थान पर, दूसरा श्री नारायण दत्त जी बाजपेयी जी के संरक्षण में श्री तपेश्वरी देवी में, तीसरा पुराने कानपुर के गंगा किनारे रानी घाट पर, चौथा गान्धीनगर के श्री गिरिजादत्त वाजपेयी की वास भूमि में तथा पाँचवाँ श्री हजारी लाल जी वर्मा जी के स्थान परमट पर सानन्द-सोत्साह सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ।
उपासना की ओर अग्रसर होने का उपदेश दिया। सभी नागरिकों ने गुरुदेव का श्रद्धा पूर्वक नमस्कार किया और गदगद हृदय से विदाई दी।
उपासना, गणित-फलितात्मक, अद्भुत ज्योतिष-शास्त्र की उपासना, “मिटियोरोलोजी”, “आस्ट्रोनोमी” आदि है। इससे जो कुछ काल ज्ञान में, कृषि में, समुद्र यात्रादि में, सहायता मिल सके वह सब इनकी उपासना का दृष्ट-फल है, पर सहायता के स्थान में जो विघ्न ज्योतिष-शास्त्र के कुप्रयोग से हो रहे हैं, वह सबको विदित हैं।
उपासना करनी चाहिये।
उपासना, “मिटियोरोलोजी”, “आस्ट्रोनोमी” आदि है। इससे जो कुछ काल ज्ञान में, कृषि में, समुद्र यात्रादि में, सहायता मिल सके वह सब इनकी उपासना का दृष्ट-फल है, पर सहायता के स्थान में जो विघ्न ज्योतिष-शास्त्र के कुप्रयोग से हो रहे हैं, वह सबको विदित हैं।
उपासना के लिए समय देने की याचना करें। यज्ञोपवीत संस्कार भिक्षा माँगने की परम्परा पूरी किये बिना पूरा नहीं होता, यह “ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान” भी जन सहयोगी की भिक्षा के बिना पूरा न होगा। अपने सम्पूर्ण स्वजन के अन्तः करण में जितना ब्रह्मतेज है, उसे उद्बोधन करके इस संकल्प की सफलता में जुट पड़ने के लिए हम आह्वान करते हैं। परिजनों में से एक भी व्यक्ति हम ऐसा नहीं देखना चाहते, जो इस भयंकर समय की अत्यन्त प्रबल आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए कुछ समय देने में आनाकानी करें। जिस कार्य को मनुष्य ‘आवश्यक’ समझता है उसके लिये उसे ‘फुरसत नहीं’ का बहाना नहीं करना पड़ता।
उपासना करने के बाद ऐसा लगे कि यह हमारा समय व्यर्थ चला गया, तो हम इन पंक्तियों को साक्षी रखकर प्रतिज्ञा करते हैं, कि इस 36 घंटे की सामान्य कीमत हम पैसे के रूप में भी चुकाने को तैयार हैं। कारण एक ही है हमारा विश्वास है कि विश्व शान्ति में एक महत्वपूर्ण योग देने के अतिरिक्त व्यक्तिगत रूप से भी यह गायत्री उपासना आत्मिक और भौतिक दोनों ही रूप से उपासक के लिये परम श्रेयष्कर होती है।
उपासना का दृष्ट-फल है, पर सहायता के स्थान में जो विघ्न ज्योतिष-शास्त्र के कुप्रयोग से हो रहे हैं, वह सबको विदित हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-January
उपासना करता है। सौंदर्य का अर्थ सज-धज, टीपटाप, तड़क-भड़क का फूहड़ प्रदर्शन करते फिरना नहीं वरन् यह है कि हर वस्तु को अपना सहज सौंदर्य यथा स्थान-यथा स्थिति में रहते हुए प्रकट करने का अवसर मिले। करीने से रखे हुए बर्तन-कपड़े, पुस्तकें एवं अन्यान्य उपकरण सहज ही शोभायमान प्रतीत होंगे और यह घोषणा करेंगे कि इन वस्तुओं का उपयोग करने वाले में कला-संवेदन जीवित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-June
उपासना और दूसरी तरह हो ही नहीं सकती। हमें इस समय दान को ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट पूजा के रूप में नियोजित करना चाहिए। यही न्यूनतम अनुदान है जिसकी आशा अखण्ड-ज्योति परिवार के प्राणप्रिय परिजनों से हम बहुत ही आशा भरे नेत्रों से कर रहे हैं।
उपासना करते हुए स्वर्ग मुक्ति का लाभ उठाने की प्रक्रिया विशुद्ध व्यक्तिवादी है। अपने लिए लाभ उठाने में निरत लोग अपने निर्वाह के लिए दूसरों पर निर्भर करे यह बड़ी अजीब बात है। जब किसान, दुकानदार, शिल्पी अपने उपार्जन भर निर्वाह करते हैं तो कोई भजनानन्दी ही भिक्षा पर निर्भर क्यों रहे? प्राचीन काल के साधु, ब्राह्मणों की परम्परा अलग थी वे भजन भी करते थे, पर साथ ही लोक-मंगल के लिए इतना अथक श्रम करते थे जिसका मूल्य उन्हें दी गई भिक्षा से हजारों गुना अधिक होता था पर आज तो वैसा कुछ नहीं होता। ऐसी दशा में केवल वेष या वंश के आधार पर भिक्षा माँगने या देने की बात किसी भी दृष्टि से औचित्यपूर्ण नहीं रह जाती।
उपासनाओं में सूर्योपासना सर्वोपरि है। गायत्री महामन्त्र का अधिष्ठाता सूर्य देवता है। ब्रह्मरंध्र में अवस्थित सहस्रार सूर्य चक्र ही अन्याय षटचक्रों को प्रभावित करता है। आकाशस्थ सूर्य नवग्रहों और उपग्रहों पर अनेकानेक स्तर की शक्तियाँ प्रदान करके उन्हें अपने कर्म चक्र पर चलते रहने का साधन प्रदान करता है। हमारी पृथ्वी पर जो जीवन उपलब्ध है वह मात्र सूर्य देवता का ही अनुदान है।
उपासनात्मक, आध्यात्मिक उपचार इसी प्रयोजन के लिए है। यों प्रकृति के दबाव के आगे मनुष्य को नतमस्तक होना पड़ता है फिर भी वह उस दबाव को प्रतिकूल न बनने देने के लिए अपनी उत्कृष्ट आत्म-शक्ति का उपयोग कर सकता है। इस प्रकार विवश दिखाई पड़ने पर भी समर्थता उसके हाथ में बनी ही रहती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-October
उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू. 6)
उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मूल्य 50 पैसा—15 पुस्तकों के सैट का मूल्य 7,50। ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं—
उपासना वाले मात्र सूर्य का या दीपक की लौ जैसे प्रकाश बिन्दु का ध्यान करते हैं। इस आधार पर की गई साधना में चिन्तन के बिखराव को एकत्रित करने का अवसर मिलता है। इष्ट देव के वाहन, आयुध, अलंकार, उपकरण आदि की विविधता यह मन को एक सीमित क्षेत्र में चाहे जितनी दौड़ लगाते रहने का अवसर देती है। भाव निष्ठा जुड़ी होने से वह लाभ और भी अधिक बढ़ा−चढ़ा बन जाता है। उसके सत्परिणाम कई प्रकार की चमत्कारी अतीन्द्रिय सिद्धियों के रूप में दृष्टिगोचर होती है।
उपासना करनी होगी और उन्हें अपनी आदत में लाना पड़ेगा।
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज मन्त्रों का साधन−विधान, आत्म−साक्षात्कार एवं ऋद्धि−सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू. 6)
उपासना के क्षेत्र में बहुत समय से प्रचलित है। छाया लोक की चर्चा बहुत समय से कही सुनी जाती रही है अब यह सम्भावना प्रामाणिक स्तर पर स्वीकार की जा रही है कि एक दिव्यलोक हमारे साथ−साथ ही रह रहा है; उसमें ने केवल पदार्थ ही भरा है वरन् प्राणी भी निवास कर रहे हैं। वे प्राणी देव दानवों की कल्पना से मिलते−जुलते हो सकते हैं और जीवाणुओं, विषाणुओं जैसे भी। हम मनुष्यों से वे समर्थ अपरिचित उदासीन भी हो सकते हैं और सम्बद्ध सहचर बनकर हमारी परिस्थितियों के निर्माण में भारी योगदान करते हुए भी पाये जा सकते हैं। कहा नहीं जा सकता कि इस अविज्ञात संसार में भरा हुआ जड़ चेतन हमारे लिए संपर्क बढ़ाने योग्य है या अयोग्य।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-December
उपासना रूपी छलनी में छानकर ग्रहण करने में पानी को छानकर पीने में उसमें घुली अस्वच्छता से बचने जैसा लाभ मिलता है। सूर्योपासना मानवी विवेक की एक अति उपयोगी उपलब्धि थी, जिसे हम क्रमशः भूलते जा रहे हैं।
उपासना का विज्ञान समझाने वाली प्रक्रिया आरम्भ होगी। उपासना में क्या त्रुटियाँ रहने से उनका घोषित प्रतिफल मिल नहीं पाता? क्या सतर्कता बरतने से हमारी साधना सिद्धि रूप में परिणत हो सकती है ? यह सभी तथ्य अगले वर्ष, तर्क, प्रमाण, अनुभव एवं विज्ञान सिद्धांतों के आधार पर प्रस्तुत किये जाते रहेंगे।
उपासना है। सृष्टि संचालन, शरीर संचालन के लिए यह श्रमयोग इतना अनिवार्य तत्व है।
उपासना में निराशा और खीज कैसे हाथ लग सकती है आनन्द की दिशा में बढ़ाया गया हर कदम तो सुखद ही होना चाहिए। आधार को विकृत कर लेने पर जो भटकाव आता है खीज उसी का प्रतिफल है।
उपासना में क्या त्रुटियाँ रहने से उनका घोषित प्रतिफल मिल नहीं पाता? क्या सतर्कता बरतने से हमारी साधना सिद्धि रूप में परिणत हो सकती है ? यह सभी तथ्य अगले वर्ष, तर्क, प्रमाण, अनुभव एवं विज्ञान सिद्धांतों के आधार पर प्रस्तुत किये जाते रहेंगे।
उपासना के धर्मकृत्यों का सुविस्तृत विधि-विधान विनिर्मित किया है। इन्हें अपनाकर मनुष्य दिव्यसत्ता को अपने भीतर-बाहर विद्यमान देखता है और कुमार्ग से विरत रहकर सुमार्ग पर चलने का अधिक उत्साह के साथ प्रयत्न करता है। ईश्वर विश्वास के फलस्वरूप पशु प्रवृत्तियों के नियन्त्रण में भारी सहायता मिलती है और व्यक्ति तथा समाज का स्तर सन्तुलित बनाये रहने का प्रयोजन बहुत अंशों तक पूरा होता है। नास्तिकता अपनाकर विश्व-शान्ति का मानवी उत्कृष्टता का आधार ही डगमगाने लगेगा, इसलिए तत्वदर्शियों ने आध्यात्मिक अनास्था की - नास्तिकता की कठोर शब्दों में भर्त्सना की है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-March
उपासना प्रयोग में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ उपकरणों की भौतिक किन्तु सूक्ष्म शक्ति (4) भावना प्रवाह, श्रद्धा, विश्वास एवं उच्चस्तरीय लक्ष्य दृष्टिकोण। इन चारों का जहाँ जितने अंश में समावेश होगा वहाँ उतने ही अनुपात से मन्त्र शक्ति का प्रतिफल एवं चमत्कार दिखाई पड़ेगा। इन तथ्यों की जहाँ उपेक्षा की जा रही होगी और ऐसे ही अन्धाधुन्ध गाड़ी धकेली जा रही होगी- जल्दी -पल्दी वरदान पाने की धक लग रही होगी वहाँ निराशा एवं असफलता ही हाथ लगेगी।
उपासना से उठने पर शरीर में स्फूर्ति और मन में सरसता लगे तो समझना चाहिये कि परिपक्वता आ गई और इसका श्रेयस्कर सत्परिणाम अत्यन्त सन्निकट है। आरम्भ में यह स्थिति बलपूर्वक उत्पन्न करनी पड़ती है। कल्पना और संकल्प शक्ति का उपयोग करके वैसी मानसिक स्थिति नकली रूप में बनानी पड़ती है। थोड़े समय में वह स्थिति स्वाभाविक बन जाती है। बलपूर्वक मारधाड़ और धड़पकड़ द्वारा बलात्कार पूर्वक उच्चस्तरीय मनःस्थिति बनाने के काल को ही साधना काल कहते हैं जब वह स्थिति सहज बनी रहने लगे तो समझना चाहिये कि सिद्धावस्था प्राप्त हो गई।
उपासना विज्ञान पर इतनी गहरी होनी चाहिए कि उसमें संशय की -अविश्वास की कहीं कोई गुँजाइश न रहे। परीक्षा बुद्धि कौतूहल एवं शंकालु मन लेकर की गई साधना निष्फल चली जाती है। श्रद्धा अपने आप में एक शक्ति है। पैट्रोल, भाप, बिजली की तरह उसकी भी अपनी सामर्थ्य है। श्रद्धालु साधक पूर्णरूपेण सफल होकर रहते हैं जबकि शंकाशीलों को खाली हाथ रहना पड़ता है।
उपासना जिस प्रयोजन के लिए की जा रही हो वह उच्चस्तरीय होना चाहिए। भौतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए उसे प्रयुक्त नहीं करना चाहिए। संसार सुख तो योग्यता, कुशलता एवं पुरुषार्थ की कीमत पर पाये जाते हैं उन्हें उसी आधार पर खरीदना चाहिए। आध्यात्मिक शक्तियों का उपयोग संपत्ति बढ़ाने के लिए विभूतियों के अभिवर्धन में ही किया जाना चाहिए। उनके आधार पर आन्तरिक क्षमताएं विकसित की जानी चाहिए।
उपासना काल में आहार पर सर्व प्रथम ध्यान देना पड़ता है।बिहार भी इसी कोटि में आता है-बिहार का तात्पर्य समग्र दिनचर्या से है उसे सात्विक रहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-September
उपासनात्मक-कर्म-काण्ड और विधान आदि के संबंध में क्रमशः इतने अधिक परिवर्तन होते रहें हैं कि भूतकालीन मान्यताएँ न केवल विचित्र वरन् बहुत अंशों में अब के प्रतिपादनों में लगभग सर्वथा विपरीत पड़ते हैं। धर्म संस्थापक, सुधारक एवं अवतारी व्यक्ति वस्तुतः अपने समय की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिस्थितियों मान्यताओं एवं प्रथाओं में-क्रान्तिकारी परिवर्तन करके सुधारवादी प्रतिष्ठापनाएँ करने वाले लोग ही थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-November
उपासना क्षेत्र में उदीयमान संध्याकाल का बहुत महत्व है प्रायः सभी सम्प्रदायों ने उस पुण्य-बेला को धर्मकृत्यों में लगाने का निर्देश किया है। सायंकालीन संध्याकाल भी ऐसे ही सत्कर्मों में लगाने की परंपरा है। परिवार को संस्था को, व्यक्ति और समाज को मध्यवर्ती संध्या कहा जा सकता है।
उपासना के खाद, पानी से निरन्तर सींचते हुए सर्वतोमुखी कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए।
उपासनात्मक कर्मकाण्ड बताये हैं। ईश्वर भक्ति का प्रमुख प्रयोजन यही है। व्यक्तित्व का सर्वतोमुखी परिष्कार ही जीवन लक्ष्य है। अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ने के लिए इसी संशोधन और परिष्कार के मार्ग पर चलना पड़ता है। सद्भावनाएं और सत्प्रवृत्तियाँ ही व्यक्तित्व में देवत्व का समावेश होता चलेगा।
उपासना, साधना आदि सत्कर्मों से दूर रहकर अनीति की रीति अपनाये रहना ही ठीक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-May
उपासनात्मक तपश्चर्याओं द्वारा अतीन्द्रिय शक्ति का उद्भव करते हैं। अन्तराल में प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं को जगाया जाना और इस विशाल ब्रह्मांड में बिखरे हुए शक्ति शाली चेतन तत्वों को खींचकर अपने में धारण करना वह दोनों ही प्रयत्न अध्यात्म साधनाओं द्वारा किये जाते हैं। जिनमें यह उभयपक्षीय विशेषताएं बढ़ती हैं उन्हें कई दृष्टियों से चमत्कारी विशेषताओं से सुसम्पन्न पाया जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-August
उपासनात्मक-कर्मकाण्ड और विधान आदि के संबंध में क्रमशः इतने अधिक परिवर्तन होते रहे है कि भूतकालीन मान्यताएँ न केवल विचित्र वरन् बहुत अंशों में अब के प्रतिपादनों में लगभग सर्वथा विपरीत पड़ते हैं। धर्म संस्थापक, सुधारक एवं अवतारी व्यक्ति वस्तुतः अपने समय की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिस्थितियों मान्यताओं एवं प्रथाओं में- क्रान्तिकारी परिवर्तन करके सुधारवादी प्रतिष्ठापनाएं करने वाले लोग ही थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-February
उपासना अवश्य है, पर उतने भर से लक्ष्य की प्राप्त नहीं हो सकती। पूजा करते रहने भर से किसी को भी आत्मबल नहीं मिल सकता। इसके लिए जीवन साधना अभीष्ट है। हमारी आस्थाएँ विचारणाएँ गतिविधियाँ तीनों ही उस स्तर तक परिष्कृत होनी चाहिए जिसे उत्कृष्ट आदर्शवादिता के नाम से कहा समझा जा सकता है। साधना व्यक्तित्व के अन्तरंग और बहिरंग स्वरूप में काया-कल्प उपस्थित करती है।
उपासनात्मक अध्यात्म का आरम्भ हुआ है। एकाकी स्वेच्छाचार ने जब समूह में रहने की प्रवृत्ति अपनाई होगी तो आचार संहिता की आवश्यकता पड़ी होगी, अन्यथा सहयोग का अभिवर्धन और टकराव का समाधान ही सम्भव न होता। धर्म यहीं से चला है। अब हम धर्म और अध्यात्म को दो धाराओं में बाँटते हैं, पूर्व काल दोनों एक थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-July
उपासना, प्रार्थना होती रहती है। भक्ति भावना संपन्न लोग ही वहाँ आते हैं और एक ही स्तर की गतिविधियाँ लगातार चलती है। इसका प्रभाव वहाँ के वातावरण पर ही नहीं इमारत पर भी पड़ता है। वह उसी रंग में रंग जाती है और आगन्तुकों में अपने ढंग की सहज प्रेरणा उत्पन्न करती है। तीर्थों का निर्माण भी इसी आधार पर किया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-April
उपासना पद्धति बाह्य रूप में भले ही भिन्न दिखाई देती हो, परन्तु उसका मूल रूप तो ऋग्वेद की वाणी में छिपा है, “एक सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।”
उपासना करते हैं किन्तु मानव का विनाश नहीं चाहते।’
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-September
उपासना में भाग न ले सके, उसे अपने घर पर ही करने की प्रेरणा देनी चाहिए। जो लोग पूरा अनुष्ठान न कर सकें, उन्हें 12 माला गायत्री जप या 12 चालीसा पाठ या 108 मन्त्र लेखन करने के लिए प्रोत्साहित करें। इस साधना के साथ अनुष्ठान के विशेष नियम लागू नहीं होते। जो लोग सामूहिक साधना करने के लिए तैयार हो जायें, उन्हें अनुष्ठान के विशेष नियमों की जानकारी करवा देनी चाहिए। साधकों का धोती या दुपट्टा कोई एक वस्त्र पीला अवश्य होना चाहिए।
उपासना पद्धति को क्यों न स्वीकार करे, दो बातों का होना सदैव आवश्यक माना गया है। वे दोनों हैं—त्याग और पवित्रता। संसार के विभिन्न धर्मों में कितनी ही बातें एक दूसरे के विपरीत जान पड़ती हैं, बाह्य क्रियाकलापों में जमीन आसमान का अन्तर देखने में आता है—एक मत का अनुयायी अपना धर्मानुष्ठान समाप्त होने पर प्राणियों को आहार दान द्वारा संतुष्ट करता है और दूसरे धर्म वाला वैसे ही अवसर पर उनका बलिदान कर देता है—फिर भी यदि उस धर्म के सिद्धान्तों का विवेचन न किया जाय तो उसमें त्याग और पवित्रता का उद्देश्य अवश्य निहित मिलेगा। क्योंकि आत्मा और परमात्मा का अनुभव मनुष्य को तब तक कदापि नहीं हो सकता जब तक उसके हृदय में सत्य निष्ठा और आन्तरिक श्रद्धा का प्रकाश न हो और ऐसा प्रकाश अधिक से अधिक आत्म समर्पण और आत्मानुशीलता के बिना संभव नहीं है, इस संबंध में एक महात्मा ने कहा है—
उपासना परम कर्तव्य है। इसका मुख्य लाभ आगे के श्लोक में बतलाया गया है—
उपासना और आत्म साधन के लिए बहुत ही उपयोगी माना जाता है क्योंकि सूक्ष्म दृष्टि से देखने से पता चलता है कि इस समय किया गया थोड़ा श्रम भी अधिक फलदायक होता है, इसलिए इस समय ईश्वराधन को ही विशेष रूप से महत्ता दी गई है और अन्य कार्य जैसे कि भोजन करना, सोते रहना, यात्रा आरम्भ करना, मैथुन करना आदि वर्जित माने गये हैं क्योंकि इस सन्ध्या के समय इन कार्यों को करने से हानि होती देखी गई है। यही नियम ऋतुओं के मिलन-नवरात्रि पर लागू होता है।
उपासना करते हैं, ताकि उनके अगले वर्ष के कार्य सफलतापूर्वक संपन्न हों। इस लक्ष्य की पूर्ति और नवीन शक्ति की प्राप्ति के लिए अनेकों प्रकार के अनुष्ठान किये जाते हैं। हिन्दूधर्म के मतानुसार सृष्टि रचना का आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हुआ था इसलिए हमारा वर्ष इसी दिन से शुरू होता है जिसका पूर्वार्द्ध छह माह आश्विन कृष्ण अमावस्या को समाप्त होता है और उत्तरार्द्ध भाग आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होता है। वर्ष के इन दोनों भागों के आरम्भ में हमारे पूर्वज महाशक्ति की आराधना किया करते थे। इन्हीं दिनों सर्दी, गर्मी की प्रधान ऋतुओं का मिलन होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-November
उपासना में कन्याओं को सर्वोपरि महत्व दिया गया है। वैसे भी ब्राह्मण के समान ही हिन्दू धर्म में कन्याओं का पूज्य स्थान है। गौ के समान ही कन्याएं भी पूजनीय मानी गई हैं। उनमें धर्म तत्व सबसे अधिक होता है। तपस्वी और नैष्ठिक ब्राह्मणों के अभाव में यदि धर्म कार्य के उपयुक्त किसी का नम्बर आता है तो वह कन्या ही है।
उपासना के सम्बन्ध में बातचीत की तो मालूम हुआ कि उसे इस विषय का ‘प्रणववाद’ नामक एक प्राचीन ग्रंथ मुखाग्र है।
उपासना, सदाचार तथा संयम का पालन करते थे। इसके लिये सात्विक आहार पर तथा सात्विक वातावरण में रह कर अपने को इस प्रकार की साधना के योग्य बनाते थे। इस प्रकार उनको ऐसी मंत्रशक्ति प्राप्त हो जाती थी जिससे वे अनेक आश्चर्यजनक कार्यों को सिद्ध कर दिखाते थे।
उपासना की प्रणाली में तो देश, काल और समाज के भेद से अन्तर हो सकता है, उसको अधिक महत्व देना ओर उसके नाम पर ईर्ष्या, द्वेष और शत्रुता के भावों को जन्म देना बुद्धिमानी की बात नहीं है। हम मंदिर मस्जिद और गिरजाघर में चाहे जैसी विधि से भजन और ईश-प्रार्थना करें पर हमको उसका उत्तम फल तभी प्राप्त हो सकेगा जब वह सच्चे हृदय से निकलेगी और उन विचारों को हम कार्य रूप में भी पूरा करके दिखायेंगे। इस उद्देश्य के लिये परलोक सम्बन्धी ज्ञान का प्रचार और उसकी कुछ जानकारी प्रत्येक व्यक्ति के लिये कल्याणकारी सिद्ध हो सकती है।
उपासना में लगा हुआ कन्याओं का समय उनके भावी जीवन के लिए एक दैवी वरदान सिद्ध हो सकता है।
उपासना के पुनीत तप द्वारा उनमें वह तत्व उत्पन्न करने का प्रयत्न होगा कि वे किसी प्रकार जीवन के दिन पूरे करने वाली भार भूत नारी न रह कर पार्वती, सावित्री, अनुसूया, सीता, गान्धारी, कौशल्या, देवकी, शैव्या, दमयन्ती, पद्मिनी, अहिल्याबाई, लक्ष्मीबाई की प्रति-मूर्ति बन सकें। अपना जीवन धन्य बनाते हुए संसार के इतिहास में उज्ज्वल उदाहरण उपस्थित कर सकें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-October
उपासना का संकल्प लेकर प्रतिदिन कम से कम सवा करोड़ गायत्री जप करते रहें (4) सहस्र कुँडी यज्ञ-जिसमें देश भर के गायत्री उपासक एक स्थान पर एकत्रित होकर एक सम्मिलित शक्ति का उद्भव कर सकें। (5) युग निर्माण के लिए नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान आँदोलन का आरंभ। (6) देश भर में 24000 कुण्डों के यज्ञ कराके गायत्री और यज्ञ का व्यापक प्रसार तथा भावी अशुभ समय की शाँति की सम्पन्नता। (7) चारों वेदों का सरल सुबोध एवं सस्ता हिन्दी भाष्य करके वेदज्ञान का विस्तार। सात वर्षों में यह सात कार्य उन्हें सम्पन्न करने थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-July
उपासना का कर्तव्य कंधे पर आ जाने से उसी प्रकार तत्परता होती है जैसे परीक्षा का लक्ष रखने वाले विद्यार्थी को पढ़ने का रंग चढ़ा रहता है। व्रतधारी का संकल्प एक प्रकार से परिक्षा फार्म भर देने के समान है जिसकी प्रेरणा से उसे उपासना करना आवश्यक हो जाता है। आत्मबल बढ़ने, अनन्त सुख-शान्ति का द्वार खोलने एवं जीवन का लक्ष्यवेध करने के लिए व्रतधारी का प्रथम संकल्प बहुत ही सहायक सिद्ध होता है। साधना में प्रेरणा देने का यह अत्यन्त ही सरल एवं प्रभावशाली मार्ग है।
उपासना करने से उसकी समस्त शक्ति का झुकाव हमारी तरफ हो जाता है। पर्वत का दर्शन जिस प्रकार स्थिरता का भाव उत्पन्न करता है, समुद्र का दर्शन विशालता की भावना उत्पन्न करता है, उसी प्रकार ईश्वर का ध्यान करने से ईश्वर की शक्ति का प्रभाव हमारे ऊपर पड़ता है, चाहे उसका परिमाण कितना भी कम क्यों न हो।
उपासना अनिवार्य है। इस संकल्प में सम्मिलित होने से उपासना की ढील-ढाल दूर हो जाती है। नियमित उपासना का कर्तव्य कंधे पर आ जाने से उसी प्रकार तत्परता होती है जैसे परीक्षा का लक्ष रखने वाले विद्यार्थी को पढ़ने का रंग चढ़ा रहता है। व्रतधारी का संकल्प एक प्रकार से परिक्षा फार्म भर देने के समान है जिसकी प्रेरणा से उसे उपासना करना आवश्यक हो जाता है। आत्मबल बढ़ने, अनन्त सुख-शान्ति का द्वार खोलने एवं जीवन का लक्ष्यवेध करने के लिए व्रतधारी का प्रथम संकल्प बहुत ही सहायक सिद्ध होता है।
उपासना में रखनी चाहिये। इसका कारण यह है कि परमात्मा ‘तज्जलान्’ है। अर्थात् यह संसार उसी से उत्पन्न होता है उसी में लय होता है और उसी से प्रतिपालित होता है। पुरुष की जैसी भावना होगी वैसी ही उसकी गति होगी। यदि हम परमात्मा की भक्ति करके उसी का आश्रय लें तो अवश्य उसे प्राप्त कर सकते हैं—”सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत“
उपासना ‘गायत्री’ का आश्रय लेने से आत्मा पर चढ़े हुए कलुष कल्मष छूटते हैं, पवित्र आत्मा ईश्वरीय प्रकाश का आविर्भाव तुरन्त होता है और परमात्मा की समीपता का मार्ग अति सरल हो जाता है। व्रतधारी आन्दोलन में भाग लेने वाले प्रत्येक परिजन के लिए गायत्री उपासना अनिवार्य है। इस संकल्प में सम्मिलित होने से उपासना की ढील-ढाल दूर हो जाती है। नियमित उपासना का कर्तव्य कंधे पर आ जाने से उसी प्रकार तत्परता होती है जैसे परीक्षा का लक्ष रखने वाले विद्यार्थी को पढ़ने का रंग चढ़ा रहता है। व्रतधारी का संकल्प एक प्रकार से परिक्षा फार्म भर देने के समान है जिसकी प्रेरणा से उसे उपासना करना आवश्यक हो जाता है।
उपासना का अर्थ है समीप रहना, पर जिसका कोई पता ठिकाना ही नहीं उसके समीप कोई कैसे रह सकता है? शास्त्र कहते हैं कि “मनुष्य शरीर ही ब्रह्मपुर है, उसका दहर (हृदय कमल) भगवान का निवास स्थान है, उसमें भगवान को खोजो। उसमें रहते हुये भी भगवान शरीर के धर्मों का स्पर्श नहीं करते। जरा, मृत्यु, क्षुधा, पिपासा, उनका स्पर्श नहीं कर सकती। बाहर की अभिलाषाएँ वहाँ पूर्ण रहती हैं।
उपासना सफल होती है।
उपासना करने में समर्थ होते हैं।
उपासना करने से परम मधु की प्राप्ति सहज हो जाती है—”असौ वा आदित्यो देव मधु वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्य मृतानि।”
उपासना की ढील-ढाल दूर हो जाती है। नियमित उपासना का कर्तव्य कंधे पर आ जाने से उसी प्रकार तत्परता होती है जैसे परीक्षा का लक्ष रखने वाले विद्यार्थी को पढ़ने का रंग चढ़ा रहता है। व्रतधारी का संकल्प एक प्रकार से परिक्षा फार्म भर देने के समान है जिसकी प्रेरणा से उसे उपासना करना आवश्यक हो जाता है। आत्मबल बढ़ने, अनन्त सुख-शान्ति का द्वार खोलने एवं जीवन का लक्ष्यवेध करने के लिए व्रतधारी का प्रथम संकल्प बहुत ही सहायक सिद्ध होता है। साधना में प्रेरणा देने का यह अत्यन्त ही सरल एवं प्रभावशाली मार्ग है।
उपासना करना आवश्यक हो जाता है। आत्मबल बढ़ने, अनन्त सुख-शान्ति का द्वार खोलने एवं जीवन का लक्ष्यवेध करने के लिए व्रतधारी का प्रथम संकल्प बहुत ही सहायक सिद्ध होता है। साधना में प्रेरणा देने का यह अत्यन्त ही सरल एवं प्रभावशाली मार्ग है।
उपासना और सेवा का व्रतधारी आँदोलन में पूरा समन्वय एवं सम्मिश्रण है। युग निर्माण की जो महान् सम्भावना इस आन्दोलन में सन्निहित है उसे समय की सबसे बड़ी पुकार कहा जा सकता है। नैतिक बुराइयों दुष्प्रवृत्तियों और कुरीतियों से आज का वातावरण ऐसा गंदा और विषाक्त हो रहा है कि उसमें साँस लेते हुए दम घुटता है। यदि इस वातावरण को बदला न गया तो हमारा भविष्य सब प्रकार अन्धकारमय ही बनेगा। जागृत धर्मात्माओं पर इसकी जिम्मेदारी है कि जन-समाज को कुमार्ग पर जाने से रोके और सन्मार्ग की प्रेरणा दें।
उपासना के बिना नहीं होता। उपासना का अर्थ है समीप रहना, पर जिसका कोई पता ठिकाना ही नहीं उसके समीप कोई कैसे रह सकता है? शास्त्र कहते हैं कि “मनुष्य शरीर ही ब्रह्मपुर है, उसका दहर (हृदय कमल) भगवान का निवास स्थान है, उसमें भगवान को खोजो। उसमें रहते हुये भी भगवान शरीर के धर्मों का स्पर्श नहीं करते। जरा, मृत्यु, क्षुधा, पिपासा, उनका स्पर्श नहीं कर सकती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-May
उपासना करते हैं—सो भी ठीक है। साधु सज्जनों का मान सम्मान करते हैं सो भी उत्तम है। तीर्थ, व्रत, पूजन कीर्तन दान पुण्य करते हैं सो भी सराहनीय है। पर इतने तक ही सीमित हो जाने से काम चलने वाला नहीं है। यह साधन हैं—लक्ष नहीं।
उपासनायें की जायँ तो सफलता अवश्य मिलती है।
उपासना और प्रार्थना साधक के लिए आवश्यक है।
उपासनाओं का उद्देश्य इसी से सम्बन्ध रखता है। यदि इसी तत्व को समझते हुए पूजा उपासनायें की जायँ तो सफलता अवश्य मिलती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-June
उपासना गायत्री एवं यज्ञ पर ही आधारित है। अन्य उपासना विधियाँ भी चल सकती हैं पर वे इस शाश्वत साधना का स्थान ग्रहण नहीं कर सकतीं जिसका कि अवलम्बन लेकर हमारे ऋषि−मुनियों, देव अवतारों, से लेकर सामान्य नागरिकों को महानता प्राप्त करने की शक्ति एवं प्रेरणा प्राप्त होती रही है।
उपासना के साथ ही ‘चिन्तन’ का नम्बर आता है। जिस कसौटी पर आत्म और अनात्म, सत् और असत्, खरे और खोटे की परख हो सकती है वह विवेक ही है और यह विवेक हमारे सही चिन्तन पर निर्भर रहता है। स्वाध्याय और सत्संग की महिमा धर्मग्रन्थों में बहुत गायी गई है, इनका बहुत महात्म्य बताया गया है। इसका कारण इन दोनों के द्वारा सही चिन्तन प्राप्त होना ही है। आज स्वाध्याय के नाम पर किसी देवता या महापुरुष की कथा वृत्तान्त या एक ही पुस्तक को रोज रोज पढ़ते रहने की रूढ़ि प्रचलित है।
उपासना की विधि चाहे कितने ही छोटे रूप में क्यों न की जाय पर यही सही है, यही ऋषि प्रणीत है, यही आर्य है, यही वैदिक परम्परा है यह मान्यता-हममें से हर एक को स्थापित करनी है। गायत्री ही भारतीय संस्कृति की जननी और यज्ञ ही भारतीय धर्म का पिता है यह तथ्य हम सबको भली भाँति समझ लेना है। यदि आर्य सिद्धान्त सत्य है तो यह भी सत्य है कि हमारी सनातन एवं अनादि उपासना गायत्री एवं यज्ञ पर ही आधारित है। अन्य उपासना विधियाँ भी चल सकती हैं पर वे इस शाश्वत साधना का स्थान ग्रहण नहीं कर सकतीं जिसका कि अवलम्बन लेकर हमारे ऋषि−मुनियों, देव अवतारों, से लेकर सामान्य नागरिकों को महानता प्राप्त करने की शक्ति एवं प्रेरणा प्राप्त होती रही है।
उपासना के समान ही आवश्यक है।
उपासना, आत्म चिन्तन और गुण कर्म स्वभाव का लेखा जोखा रखना आवश्यक है उसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि दैनिक जीवन में—परमार्थ के लिए-परोपकार के लिए-लोक सेवा के लिए नित्य ही कुछ नियमित समय और श्रम लगाया जाता रहे। यह भी भजन का ही एक भाग है। सेवा के बिना भजन पूरा नहीं होता। भजन शब्द संस्कृत की ‘भज्-सेवयाँ’ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है सेवा। उपासना, जप, ध्यान पूजन अर्चन की भाँति ही सेवा भी प्रत्येक भजन में आस्था रखने वाले धर्म प्रेमी के लिए आवश्यक है।
उपासना, आत्म चिन्तन, स्वाध्याय, गुण कर्म स्वभाव का लेखा जोखा यह चारों काम व्यवहारिक दृष्टि से भी बहुत सरल हैं। इन्हें कौन नहीं कर सकता है? अब तक भी हम लोग अस्त व्यस्त रूप से इन कार्यों को करते ही रहे हैं। फिर नित्य, निरन्तर, नियमित रूप से इन्हें करने की प्रतिज्ञा लेकर अपनी कार्यशैली को अत्यधिक प्रभावशाली बनाने का अवसर आने पर झिझकने की आवश्यकता ही क्या है? यह एक अव्यवस्था को व्यवस्था में, ढिलमिल नीति को तीव्र प्रयत्न में परिणत करने का प्रयत्न है।
उपासना विधियाँ भी चल सकती हैं पर वे इस शाश्वत साधना का स्थान ग्रहण नहीं कर सकतीं जिसका कि अवलम्बन लेकर हमारे ऋषि−मुनियों, देव अवतारों, से लेकर सामान्य नागरिकों को महानता प्राप्त करने की शक्ति एवं प्रेरणा प्राप्त होती रही है।
उपासना व्रतधारी की आवश्यक शर्त है। मन लगे चाहे न लगे इसे गायत्री मंत्र की एक माला अवश्य करनी चाहिए। यज्ञ पिता की उपासना के लिए उसे कम से कम एक धूपबत्ती या एक बार घृत दीप जलाना आवश्यक है। उपासना की विधि चाहे कितने ही छोटे रूप में क्यों न की जाय पर यही सही है, यही ऋषि प्रणीत है, यही आर्य है, यही वैदिक परम्परा है यह मान्यता-हममें से हर एक को स्थापित करनी है। गायत्री ही भारतीय संस्कृति की जननी और यज्ञ ही भारतीय धर्म का पिता है यह तथ्य हम सबको भली भाँति समझ लेना है।
उपासना, भक्ति किया करे। इससे उसका कल्याण होगा और सुख पूर्वक जीवन व्यतीत कर सकेगा। पर यह कोई विशेष वाञ्छनीय स्थिति नहीं है। जब तक हमारी बागडोर किसी दूसरे के हाथ में रहेगी, तब तक हमारा सुख और कल्याण अस्थायी ही है। जब वह किसी कारणवश असंतुष्ट हो जाय, या हमारी मनोवृत्ति ही किसी अन्य दिशा में मुड़ जाय तो हम फिर कष्ट सागर में तैरने लगेंगे।
उपासना, जप, ध्यान पूजन अर्चन की भाँति ही सेवा भी प्रत्येक भजन में आस्था रखने वाले धर्म प्रेमी के लिए आवश्यक है।
उपासना के लिए उसे कम से कम एक धूपबत्ती या एक बार घृत दीप जलाना आवश्यक है। उपासना की विधि चाहे कितने ही छोटे रूप में क्यों न की जाय पर यही सही है, यही ऋषि प्रणीत है, यही आर्य है, यही वैदिक परम्परा है यह मान्यता-हममें से हर एक को स्थापित करनी है। गायत्री ही भारतीय संस्कृति की जननी और यज्ञ ही भारतीय धर्म का पिता है यह तथ्य हम सबको भली भाँति समझ लेना है। यदि आर्य सिद्धान्त सत्य है तो यह भी सत्य है कि हमारी सनातन एवं अनादि उपासना गायत्री एवं यज्ञ पर ही आधारित है। अन्य उपासना विधियाँ भी चल सकती हैं पर वे इस शाश्वत साधना का स्थान ग्रहण नहीं कर सकतीं जिसका कि अवलम्बन लेकर हमारे ऋषि−मुनियों, देव अवतारों, से लेकर सामान्य नागरिकों को महानता प्राप्त करने की शक्ति एवं प्रेरणा प्राप्त होती रही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-February
उपासना करें-
उपासना का मंत्र संध्या समय हम बोलते हैं। सूर्य ही हमारे जगत का आत्मा है। पुरुष बिना स्त्री जिस प्रकार निष्फल रहती है, उसी प्रकार सूर्य बिना पृथ्वी भी बंध्या के समान है। सूर्य की सत्ता से पृथ्वी पर वनस्पतियाँ ही उत्पन्न नहीं होती, वरन् समस्त सचेतन प्राणी भी उसी के द्वारा उत्पन्न और वृद्धि को प्राप्त होते हैं।
उपासना और ज्ञान का जो समन्वित विवेचन उनमें किया गया है, वह इस बात का प्रमाण है। वैदिक काल के उपरान्त जब हम धार्मिक समन्वय से दूर जाने लगे तो बड़ा विरोध फैला, कर्म, उपासना और ज्ञान के पृथक-पृथक समर्थकों ने एक दूसरे की तीव्र आलोचना करना प्रारम्भ कर दिया। यह विरोध केवल विचार-गत ही न था वरन् कार्य और वस्तुगत भी था। “प्लवाह्मेते अदृढ़ा यज्ञ रूपा” आदि उक्तियाँ, जिनमें कर्म के अंतर्गत यज्ञ की आलोचना की गई है, इसी प्रकार की है। शंकराचार्य जी ने ज्ञान का समर्थन करने के लिये ‘कर्म’ का जो स्पष्ट विद्रोह किया उसे सभी विद्वान जानते हैं।
उपासना अधिक प्रचलित और व्यापक है। कारण यह कि राम, कृष्ण आदि के मन्दिरों में उपासना करने का अधिकार विशेष रूप से उच्च वर्णों के हिन्दुओं को ही है। नीच जातियों में जिन लोगों की गणना की जाती है उन्हें या तो इन मन्दिरों में जाने का अधिकार ही नहीं है, अथवा वे स्वयं ही वहाँ बहुत कम जाते हैं। ऐसी सभी जातियाँ देवी की उपासना करती हैं। साथ ही उच्च वर्ण के लोग भी अन्य देवताओं के साथ देवी की पूजा भी करते हैं और प्रत्येक वंश की कोई न कोई पूज्य “कुलदेवी” अवश्य होती है।
उपासना ने प्रसार पाया। आज भी देश के कोने-कोने में भिन्न-भिन्न प्रकार से दुर्गा पूजा प्रचलित है। नवरात्रि में प्रायः सर्वत्र दुर्गा या उनके ही अन्य रूप की पूजा धूम-धाम के साथ की जाती है।
उपासना के रूप में उसका मध्य तथा विजयदशमी के उल्लास पर्व में दुर्गा पूजा का उपसंहार होता है। नेपाल में अभी भी इस उत्सव में सैनिक धूमधाम की प्रधानता रहती है। अस्त्र-शस्त्रों की पूजा होती है और विजय यात्रा का उपक्रम होता है। नवयुवक इस अवसर पर विशेष उत्साह प्रदर्शित करते हैं और ऐसा प्रतीत होता है मानो यह पर्व आकर उन्हें उत्तष्टित् जाग्रत का संदेश दे रहा हो।
उपासना के उद्गम को आच्छादित किए हुए हैं। एक कथा के अनुसार उग्रदेव रुद्र की पत्नी रुद्राणी को आद्या शक्ति माना गया। पिता द्वारा किये जाने वाले यज्ञ में अपने पति रुद्र का अपमान न सह सकने के कारण क्रुद्ध रुद्राणी ने आत्मदाह कर लिया। इस समाचार को सुनते ही रुद्र प्रलयकारी रूप धारण कर शक्ति के शव को उठाकर त्रैलोक में घूमने लगे। रुद्र के क्रोध को शमन करने की शक्ति भला किसमें थी।
उपासना में अनेक बाधाएँ उपस्थित हो गई हैं। हमारे समाज में एक वर्ग तो ऐसा है जो सर्वथा वैदिक संस्कार रहित होने के कारण, पाश्चात्य वैज्ञानिक मोह से मोहान्वित होने के कारण, विद्या बुद्धि होने पर भी इस महत्वपूर्ण विचारणीय चर्चा से पृथक है, और इसे सर्वथा निरुपयोगी मानकर भारतीय वेद-विद्या की अवहेलना कर रहा है। दूसरा वर्ग उन विद्वानों का है जो कि वेद में श्रद्धा परायण हैं, परन्तु देश, काल और पात्र-सम्बन्धी ज्ञान से अपरिचित होने के कारण न तो परिस्थिति के अनुकूल अनुशासन तैयार कर सकते हैं व न अन्य शुभेच्छापरायण व्यक्तियों को सहयोग देते हैं, अपितु यथाशक्ति और यथामति विरोध करने लगते हैं।
उपासना-काण्ड के अनुसरणकारी ‘प्रेयस-श्रेयस’ उभयकामी थे, एवं जो ‘ज्ञान-काण्ड के अनुसरण करने वाले थे वे केवल “श्रेयस कामी” थे। पर उस समय के समाज के नेताओं ने, जो निष्काम कर्म के तत्व को जानने वाले, पूर्ण श्रेयस मार्ग पर चलने वाले ऋषि मुनि थे, सब श्रेणियों के व्यक्तियों का ऐसा समन्वय कर रखा था कि समाज की व्यवस्था ठीक ढंग से कायम रहती थी। पर वर्तमान युग में समाज की बागडोर मुख्यतः “प्रेयस कामी” विद्वान-बुद्धिमान लोगों के हाथ में आ गई है और थोड़े से ‘श्रेयस-प्रेयस उभयकामी’ विद्वान उनकी सहायता करते रहते हैं। ये ही समस्त पृथ्वी के “श्रद्धावान और अश्रद्धावान” लोगों के ऊपर आधिपत्य कर रहे हैं। इसी से आज संसार पर तरह-तरह के दुखों और आपदाओं का प्रहार हो रहा है।
उपासना और ज्ञान के पृथक-पृथक समर्थकों ने एक दूसरे की तीव्र आलोचना करना प्रारम्भ कर दिया। यह विरोध केवल विचार-गत ही न था वरन् कार्य और वस्तुगत भी था। “प्लवाह्मेते अदृढ़ा यज्ञ रूपा” आदि उक्तियाँ, जिनमें कर्म के अंतर्गत यज्ञ की आलोचना की गई है, इसी प्रकार की है। शंकराचार्य जी ने ज्ञान का समर्थन करने के लिये ‘कर्म’ का जो स्पष्ट विद्रोह किया उसे सभी विद्वान जानते हैं। उन्होंने कहा-
उपासना विश्व के इस सर्वप्रथम प्रकाश की ही प्रार्थना है। रेडियो में कुछ सुनने की इच्छा होने से सबसे पहले उसमें “लाइट” की जाती है, जिससे वह उचित प्रमाण में गरम हो जाता है, फिर उसी तेज में से जो कुछ सुनना हो वही सुना जा सकता है। उसी प्रकार चित्त की अथवा मन की एकाग्रता हृदय की तरफ ठीक-ठीक ढंग से करने पर एक प्रकार के आत्मिक प्रकाश का अनुभव होने लगता है। उस प्रकाश की सहायता से जो कुछ प्राप्त करना हो वही मिल सकता है।
उपासना हम गायत्री-मंत्र द्वारा करते हैं और ध्यान भी कर सकते हैं। आत्मा ही सूर्य है, ऐसी भावना रखते हुये गायत्री का जप करने से ज्ञान प्राप्त होता है। इस मंत्र के अंतिम भाग में साधक भगवान से ‘धि’ अर्थात् बुद्धि (ज्ञान) माँगता है। गायत्री की उपासना विश्व के इस सर्वप्रथम प्रकाश की ही प्रार्थना है। रेडियो में कुछ सुनने की इच्छा होने से सबसे पहले उसमें “लाइट” की जाती है, जिससे वह उचित प्रमाण में गरम हो जाता है, फिर उसी तेज में से जो कुछ सुनना हो वही सुना जा सकता है।
उपासना करने का अधिकार विशेष रूप से उच्च वर्णों के हिन्दुओं को ही है। नीच जातियों में जिन लोगों की गणना की जाती है उन्हें या तो इन मन्दिरों में जाने का अधिकार ही नहीं है, अथवा वे स्वयं ही वहाँ बहुत कम जाते हैं। ऐसी सभी जातियाँ देवी की उपासना करती हैं। साथ ही उच्च वर्ण के लोग भी अन्य देवताओं के साथ देवी की पूजा भी करते हैं और प्रत्येक वंश की कोई न कोई पूज्य “कुलदेवी” अवश्य होती है। यही कारण है कि राम, कृष्ण और शिव के तीर्थों की अपेक्षा देवी के तीर्थ स्थान बहुत अधिक संख्या में हैं और उनमें जाने वाले उपासकों की सम्मिलित संख्या अन्य तीर्थों के उपासकों से कहीं अधिक होती है।
उपासना करती हैं। साथ ही उच्च वर्ण के लोग भी अन्य देवताओं के साथ देवी की पूजा भी करते हैं और प्रत्येक वंश की कोई न कोई पूज्य “कुलदेवी” अवश्य होती है। यही कारण है कि राम, कृष्ण और शिव के तीर्थों की अपेक्षा देवी के तीर्थ स्थान बहुत अधिक संख्या में हैं और उनमें जाने वाले उपासकों की सम्मिलित संख्या अन्य तीर्थों के उपासकों से कहीं अधिक होती है।
उपासना, महिमामयी माँ की आराधना के रूप में हमारी संस्कृति में आदिकाल से प्रतिष्ठित है। अनेकानेक कथाएँ इस शक्ति-उपासना के उद्गम को आच्छादित किए हुए हैं। एक कथा के अनुसार उग्रदेव रुद्र की पत्नी रुद्राणी को आद्या शक्ति माना गया। पिता द्वारा किये जाने वाले यज्ञ में अपने पति रुद्र का अपमान न सह सकने के कारण क्रुद्ध रुद्राणी ने आत्मदाह कर लिया। इस समाचार को सुनते ही रुद्र प्रलयकारी रूप धारण कर शक्ति के शव को उठाकर त्रैलोक में घूमने लगे।
उपासना का इष्ट है। अतः आज हम इन शब्दों में दुर्गा की उपासना करें-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-January
उपासना कर रहे हैं और उसी प्रकार उन्हें सफलता मिल रही है, ऐसा हमको उनके पत्रों, अनुभवों तथा व्यक्तिगत संपर्क से प्रतीत होता है। पर कुछ सज्जन ऐसे भी हैं जो 2-3 वर्ष तक साधना करने के बाद भी निराशा का भाव प्रकट करते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिये हम इस लेख में गायत्री साधना के संबंध में कुछ ऐसे संकेत देना चाहते हैं जिनसे साधना की सफलता में सहायता प्राप्त हो सकती है।
उपासना की महिमा पर अनोखा प्रकाश डाला है। आप एक आधुनिक शिक्षा प्राप्त और बुद्धिवादी पुरुष हैं इसलिए आपने गायत्री उपासना के विषय में जो कुछ बतलाया है वह विशेष रूप से बुद्धि-संगत प्रतीत होता है और प्रत्येक विचार का व्यक्ति उस पर विश्वास कर सकता है। अभी हाल में पिलखुआ (मेरठ) में आपने कुछ विद्यार्थियों के प्रश्न करने पर अपने गायत्री संबंधी अनुभव सुनाये थे जो वास्तव में ध्यान देने योग्य हैं। नीचे उन्हीं बातों को पाठकों के लाभार्थ दिया जा रहा है।]
उपासना-जप करने से वह गुरु, शिष्य, स्त्री और प्राणी सब का उद्धार करती है। वह सविता को प्रसव करती है इससे उसका नाम सावित्री भी कहा जाता है। उसके वाग रूप होने से उसके दूसरा नाम सरस्वती भी है।
उपासना कल्याणकारी है।
उपासना करने वाले भिन्न-भिन्न भावों को लेकर उपासना कर रहे हैं और उसी प्रकार उन्हें सफलता मिल रही है, ऐसा हमको उनके पत्रों, अनुभवों तथा व्यक्तिगत संपर्क से प्रतीत होता है। पर कुछ सज्जन ऐसे भी हैं जो 2-3 वर्ष तक साधना करने के बाद भी निराशा का भाव प्रकट करते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिये हम इस लेख में गायत्री साधना के संबंध में कुछ ऐसे संकेत देना चाहते हैं जिनसे साधना की सफलता में सहायता प्राप्त हो सकती है।
उपासना और साधना करने वाले होते हैं और न शिष्य को उसकी विधिवत शिक्षा देकर उसे साधन-मार्ग में अग्रसर कराने का प्रयत्न करते हैं। यही कारण है कि बहुत समय से लोग गुरु मंत्र का महत्व और उससे लाभ उठाने की विधि को भूल गये हैं। अगर गुरु सच्चे और ज्ञानी हों तो वे इस मंत्र की शिक्षा देकर अपने अनुयाइयों का अपार हित कर सकते हैं। इस विषय में गुरु का महत्व बतलाते हुए अहमदाबाद के ‘प्रज्ञान-मन्दिर’ के संचालक महात्मा सदाशिव जी के निम्न विचार पाठकों को विशेष उपयोगी प्रतीत होंगे।
उपासना पद्धति द्वारा मैं तुझे पूजता हूँ और तू अनेक नाम धारण कर अनेक शरीर धारण कर प्रपंच में प्रसिद्ध और दिव्य और आश्चर्य कारक अनेक कार्य किये हुए ऐसी चरित्र वाली हे भगवती ओजमयी गायत्री तुझे नमस्कार है।
उपासना में हार्दिक अनुराग उत्पन्न हो जाने से उसके संसर्ग से अन्य उपासक भी स्वतः तैयार होने लगते हैं। इसलिये जो व्यक्ति इस उद्देश्य को सामने रखकर साधना करेगा तो वह सफलता का अनुभव अवश्य करता रहेगा। इसके साथ-साथ उसके व्यक्तिगत उद्देश्य तो स्वयं पूरे होते रहेंगे। व्यायाम करने का मुख्य उद्देश्य शरीर को मजबूत बनाना होता है, फिर स्फूर्ति, पाचन शक्ति, चेहरे पर तेज आदि बातें तो साथ-साथ स्वतः उत्पन्न हो जाती हैं।
उपासना करनी पड़ती है। इसलिये गरीब अमीर, शक्तिशाली और दुर्बल, पंडित और सामान्य बुद्धि वाला सभी इसको कर सकते हैं। जो व्यक्ति सकाम भावना से कोई विशेष उद्देश्य सामने रखकर जप करते हैं उनको वैसे फल की प्राप्ति होती है और जो निष्काम भाव से करते हैं उनकी आत्म-शुद्धि होकर मोक्ष मार्ग में प्रगति होती है।
उपासना करता है वह सिद्ध अन्न को छोड़कर भिक्षा के लिये फिरने वाले व्यक्ति की तरह मूर्ख है।’
उपासना करने लगता है तो कुछ समय में उसकी पत्नी, बच्चा, भाई, बन्धु, पड़ोसी भी क्रमशः इस ओर आकर्षित होते जाते हैं। जिस प्रकार कोई पेड़ समय आने पर फल देने लगता है उसी प्रकार गायत्री उपासना में हार्दिक अनुराग उत्पन्न हो जाने से उसके संसर्ग से अन्य उपासक भी स्वतः तैयार होने लगते हैं। इसलिये जो व्यक्ति इस उद्देश्य को सामने रखकर साधना करेगा तो वह सफलता का अनुभव अवश्य करता रहेगा। इसके साथ-साथ उसके व्यक्तिगत उद्देश्य तो स्वयं पूरे होते रहेंगे। व्यायाम करने का मुख्य उद्देश्य शरीर को मजबूत बनाना होता है, फिर स्फूर्ति, पाचन शक्ति, चेहरे पर तेज आदि बातें तो साथ-साथ स्वतः उत्पन्न हो जाती हैं।
उपासना के विषय में जो कुछ बतलाया है वह विशेष रूप से बुद्धि-संगत प्रतीत होता है और प्रत्येक विचार का व्यक्ति उस पर विश्वास कर सकता है। अभी हाल में पिलखुआ (मेरठ) में आपने कुछ विद्यार्थियों के प्रश्न करने पर अपने गायत्री संबंधी अनुभव सुनाये थे जो वास्तव में ध्यान देने योग्य हैं। नीचे उन्हीं बातों को पाठकों के लाभार्थ दिया जा रहा है।]
उपासना के अनुभवों का वर्णन करते हुए लिखा था-
उपासना का सबसे बड़ा लाभ अज्ञानता का नाश होकर सद्बुद्धि का उदय होना है और यही मानव-जीवन का प्रधान कार्य है। इसी प्रकाश को प्राप्त करने के लिये यह देव दुर्लभ शरीर हमको दिया गया है। गायत्री तपोभूमि ने अपने प्रचार-कार्य द्वारा इस महालाभ को प्राप्त करने का मार्ग मनुष्य मात्र के लिये प्रशस्त कर दिया है और लाखों सौभाग्यशाली निस्सन्देह उससे अपना हित-साधना कर रहे हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-April
उपासना का उद्देश्य इन दो लाभों के लिए ही है। प्रभु की प्रसन्नता उसकी प्रशंसा करते रहने से नहीं इन आध्यात्मिक आधारों को पुष्ट करने से ही उपलब्ध हो सकना संभव है। इन चारों कर्तव्यों को ध्यान में रखकर जीवन की गतिविधि निर्धारित करने से सत्कर्म का प्रयोजन पूरा होता है।
उपासनात्मक एकता का माध्यम वेदमाता गायत्री ही बन सकती है। कोई व्यक्ति अपनी पूजा में अन्य कोई प्रकार, देवता या विधान अपनाता है तो इसमें आपत्ति नहीं पर गायत्री मन्त्र को कम से कम 108 बार (1 माला) जप करना हमारा नित्यकर्म होना चाहिए। यदि किसी दिन जप भूल जाय तो उसकी पूर्ति अगले दिन कर ली जाय। गायत्री जप एक निश्चित धर्म कर्तव्य प्रत्येक व्रतधारी का रहे।
उपासना प्रत्येक व्रतधारी का आवश्यक कर्तव्य होगा। मन में आस्तिकता की भावनाएं स्थिर रखने, आत्मा की अमरता, पुनर्जन्म एवं कर्मफल के तत्वज्ञान पर विश्वास करना ही नैतिक जीवन का प्रमुख दर्शन शास्त्र एवं तत्वज्ञान है, यह आस्था आस्तिकता के आधार पर ही संभव है। भारतीय समाज की उपासनात्मक एकता का माध्यम वेदमाता गायत्री ही बन सकती है। कोई व्यक्ति अपनी पूजा में अन्य कोई प्रकार, देवता या विधान अपनाता है तो इसमें आपत्ति नहीं पर गायत्री मन्त्र को कम से कम 108 बार (1 माला) जप करना हमारा नित्यकर्म होना चाहिए। यदि किसी दिन जप भूल जाय तो उसकी पूर्ति अगले दिन कर ली जाय।
उपासना, भजन से लोक-सेवा बढ़ी। मगर वैराग का पता नहीं लगा कि, मुझे वैराग कब से हुआ?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-March
उपासना में दृढ़ रहने का व्रत लेना चाहिए। दूसरे दिन चैत्र मास आरम्भ हो जाता है और होलिका दाह की कल्पना करके प्रतिपदा को स्नान का त्यौहार मानते हैं। इसके लिए केसू (या टेसू) के फूल रात को ही भिगोकर रंग तैयार कर लेना चाहिये। सबको अपने साथ यही रंग लेकर एक स्थान पर इकट्ठा हो प्रेमपूर्वक होली का रंग खेलना चाहिये। मस्तक पर गुलाल, या चन्दन, रोली आदि लगा देना चाहिये।
उपासना का उपदेश दिया। व्यासजी ने इस उपदेश को मानकर अपने शुष्क शास्त्रीय जीवन को त्यागकर रसमयी बालकृष्ण की भक्ति का जीवन स्वीकार किया। जिसके परिणामस्वरूप ‘श्रीमद्भागवत’ का सृजन हुआ। कृष्ण की बाललीला गा-गा कर न सिर्फ व्यासजी ने ही मानसिक शान्ति प्राप्त की किन्तु करोड़ों नर नारियों ने अपने आपको आनन्दमय बना लिया। आज भी कृष्ण-चरित्र भारत के करोड़ों लोगों के अवर्णनीय सुख का हेतु है।
उपासना, दान, उपकार, सत्कर्मों के विधान रचे। पर ये बाह्य कर्म विधानों के रूप- एक ही लक्ष्य स्थान पर जाने वाले विविध पंथों की भाँति कभी एक नहीं हो सकते। इसके अतिरिक्त व्यक्ति यों और समुदायों की मनोवृत्ति तथा रुचि में देश, काल और पात्र के कारण जो भेद रहता है उसके अनुसार भी विभिन्न प्रकार के मार्गों की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिये भिन्न-भिन्न ऋषियों द्वारा एक ही काल-देश एवं पात्र के लिये भिन्न-भिन्न विधान रचे गये। परिस्थिति की परिवर्तित स्थिति के अनुसार उन विधानों के स्वरूपों की विविधता बढ़ती ही गयी, पर लक्ष्य की एकता के कारण इन विविध विधानों को एक दूसरे के विरोध में कभी खड़ा नहीं किया गया।
उपासना करते हैं जिससे आपको परम सिद्धि प्राप्त हुई है?” शिव इस संसार में आदि-योगी थे, योग के सभी भेदों को मालूम कर चुके थे। उन्होंने उत्तर दिया-”गायत्री ही वेदमाता है और पृथ्वी की सबसे पहली और सबसे बड़ी शक्ति है। वह संसार की माता है। गायत्री भूलोक की कामधेनु है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-December
उपासना के बल से उनका वचन सिद्ध हो गया था। जो कुछ मुँह से निकल जाता वही सत्य हो जाता। उदाहरणार्थ ब्राह्मण भोजन करने को बैठे और पानी बरसने लगा, तो आप कहते कि वर्षा तो अभी बन्द हो जायेगी और वैसा ही हो जाता। “ जा, तेरा ज्वर अभी उतर जायगा।” यह कहते ही ज्वर दूर हो जाता।
उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
उपासना का मार्ग छूट गया अर्थात् उससे सम्बन्ध विच्छेद होने से प्रथम ही शोक संताप का अनुभव होने लगा। दूसरा आश्चर्य यह हुआ कि गुरु ने जब यह उपदेश दिया कि तुम ही पूर्ण ब्रह्म हो, तो उस दर्जे पर पहुँचना तो सहज नहीं है, इस उपदेश को सुनकर वह अपने को ब्रह्म मान कर धर्म कर्म छोड़ बैठा और ज्ञान-अज्ञान के द्वंद्व में फँस गया और इस प्रकार जीव को माया ने, (जो जीवात्मा अथवा ब्रह्म से ही उत्पन्न होती है और इस दृष्टि से उसी की बेटी है) साँसारिक बन्धनों में बाँध लिया।
उपासना में सूर्य मंडल को क्यों सम्मिलित किया गया? इसका उत्तर यही है कि यद्यपि हम सबमें गर्मी का अस्तित्व है, पर जो वस्तु या व्यक्ति हमसे अधिक गरम होता है उसे छूने से गरमी का अनुभव होता है। इसी प्रकार ईश्वरीय शक्ति सब वस्तुओं में है, पर जिनमें उसका परिणाम अधिक होता है। उन्हीं में हमको उसका प्रत्यक्ष दर्शन हो सकता है और उन्हीं का उदाहरण देते हैं। इससे अतिरिक्त चीजों का आकार नहीं होता।
उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री संबंधी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज-मन्त्रों की साधना विधान आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
उपासना का मार्ग बताया जिससे जीव और ब्रह्म की अभेदता का ज्ञान हृदय में उदय हो। इससे पहले देवता की उपासना का मार्ग छूट गया अर्थात् उससे सम्बन्ध विच्छेद होने से प्रथम ही शोक संताप का अनुभव होने लगा। दूसरा आश्चर्य यह हुआ कि गुरु ने जब यह उपदेश दिया कि तुम ही पूर्ण ब्रह्म हो, तो उस दर्जे पर पहुँचना तो सहज नहीं है, इस उपदेश को सुनकर वह अपने को ब्रह्म मान कर धर्म कर्म छोड़ बैठा और ज्ञान-अज्ञान के द्वंद्व में फँस गया और इस प्रकार जीव को माया ने, (जो जीवात्मा अथवा ब्रह्म से ही उत्पन्न होती है और इस दृष्टि से उसी की बेटी है) साँसारिक बन्धनों में बाँध लिया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-August
उपासना सम्बन्धी नियमों के लिये है। धर्म के नित्य अथवा शाश्वत सिद्धान्तों में विशेष अन्तर नहीं पड़ता। भारतीय ऋषि-मुनियों ने इन सिद्धान्तों की विवेचना हजारों वर्ष पूर्व ऐसे स्पष्ट और पूर्णरूप से की है कि मनुष्य का कितना ही विकास हो जाय वे सदैव उसे प्रेरणा देते रहेंगे। इसीलिये भारतीय धर्म को सनातन धर्म के नाम से भी पुकारा जाता है। ऋषियों ने इस धर्म का चरम निरूपण योग के रूप में किया है, जिस पर चलकर मनुष्य इस जीवन में ही परमात्मा के दर्जे को भी प्राप्त कर सकने में समर्थ हो सकता है।
उपासना का संकल्प लेते समय यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है। यज्ञ का ही प्रतीक यज्ञोपवीत है। चूँकि गायत्री परिवार ने गायत्री और यज्ञ को जन-जन के मन मानस में स्थापित करने का सत्संकल्प लिया हुआ है इसलिए गायत्री परिवार शाखाओं को श्रावणी का त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाना चाहिए। प्रत्येक शाखा में हवन और सत्संग होने चाहिएं। यज्ञोपवीत की महत्ता और उसमें छिपी शिक्षाओं पर प्रवचन होने चाहिएं।
उपासना करके मनुष्य बड़ी से बड़ी उन्नति को प्राप्त कर सकता है—परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है। यह शरीर ही इन्द्रियों के स्वामी (आत्मा) का निवास स्थान है और इसमें निवास करता हुआ वह ऐसे सुकर्म रूपी उत्तम अन्नों की खेती कर सकता है जिससे यह जीवन सुख शाँति से भरपूर हो जाय। यदि मनुष्य इस वेदोपदेश का पालन करेगा। मानव देह को झूठे भोगों में लिप्त न करके, उसके द्वारा उत्तम कार्य करने का ध्यान रखेगा तो अवश्य ही उसका जीवन उच्च स्थिति को प्राप्त होता जायगा और वह साँसारिक पाप-ताप से पृथक रह कर लोक और परलोक में सुख सुयश का भागी बन सकेगा।
उपासना करनी चाहिए। सब भूतों का रस सार पृथ्वी है। पृथ्वी का रस जल है। जल का सार औषधियाँ हैं। औषधियों का सार मानव देह है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-December
उपासना साधना द्वारा इन्हीं दो अप्रत्यक्ष शरीरों को परिपुष्ट बनाया जाता है। यह अन्तर शरीर यदि बलवान हो तो बाह्य शरीर में तेज, शौर्य, प्रकाश, बल और ज्ञान की आभा सहज ही प्रस्फुटित दीखती है। उत्साह और उल्लास भी सूक्ष्म शरीर की निरोगता का ही परिणाम है।
उपासना इन सब में तो सत्य ही आधार है सो मैं आपको नहीं जाने दे सकता।
उपासनात्मक प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता और आत्मा को परमात्मा से मिलाने वाला भाव संचार साधन बन ही नहीं पाता। ज्ञान से इतना भर समझा समझाया जा सकता है कि ईश्वर है और उसका विधा-कर्तृत्व यह है। उससे प्रेम करने की भार वासध्ना निराकार के साथ सम्भव है ही नहीं। इसलिए आत्म विद्या को दो भागों में बाँटा गया एक ज्ञानयोग जिसमें वस्तुस्थिति को समझना भर सीमित है। दूसरा भक्ति योग जिसमें भावनात्मक उभार आवेश का चुम्बकत्व पैदा करके उस परब्रह्म के साथ सघनता स्थापित करना सम्भव होता है।
उपासना का सीधा सम्बन्ध सूर्य से है अखंड-ज्योति में कई बार छप चुका है कि गायत्री सिद्ध हुये आत्मदर्शी पुरुष और सूर्य में कोई अन्तर नहीं होता दोनों तदाकार हो जाते हैं अतएव यह निर्विवाद सिद्ध है कि यह नया अवतार महान् सावित्री शक्ति (गायत्री तत्व या सूर्य शक्ति) का सिद्ध होगा। यह स्पष्ट संकेत है नये निर्माता की पहचान का)।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-March
उपासना है।
उपासना को सर्वोपरि मानते हैं।
उपासना को प्रकृति की उपासना कहकर कुछ लोग उसे जड़ उपासना का दोष लगाते हैं यहाँ उसके भाव पक्ष को ही स्पष्ट किया जा रहा है कि प्रकृति का सत्व-गुण उतना ही चेतन और सर्वशक्तिमान है जितना ब्रह्मा इसलिये ब्रह्मा की उपासना से जो लाभ मिल सकते हैं वह सब प्रकृति की भावनात्मक उपासना से भी मिल सकते हैं विभिन्न याँत्रिक और ताँत्रिक साधनों द्वारा ही उसे वश में करने की कष्ट साध्य प्रक्रिया आवश्यक नहीं । प्रकृति की कृपा पाने के लिये उसका पति (परमेश्वर में स्थित होना) ही आवश्यक नहीं पुत्र होकर भी उसका स्नेह और प्यार प्राप्त किया जा सकता है। गायत्री को माँ मानने और नारी रूप में उपासना का यही दर्शन है। प्रस्तुत प्रमाण उसकी चेतनता सिद्ध करने को ही लिखे जा रहे है।
उपासना कहकर कुछ लोग उसे जड़ उपासना का दोष लगाते हैं यहाँ उसके भाव पक्ष को ही स्पष्ट किया जा रहा है कि प्रकृति का सत्व-गुण उतना ही चेतन और सर्वशक्तिमान है जितना ब्रह्मा इसलिये ब्रह्मा की उपासना से जो लाभ मिल सकते हैं वह सब प्रकृति की भावनात्मक उपासना से भी मिल सकते हैं विभिन्न याँत्रिक और ताँत्रिक साधनों द्वारा ही उसे वश में करने की कष्ट साध्य प्रक्रिया आवश्यक नहीं । प्रकृति की कृपा पाने के लिये उसका पति (परमेश्वर में स्थित होना) ही आवश्यक नहीं पुत्र होकर भी उसका स्नेह और प्यार प्राप्त किया जा सकता है। गायत्री को माँ मानने और नारी रूप में उपासना का यही दर्शन है। प्रस्तुत प्रमाण उसकी चेतनता सिद्ध करने को ही लिखे जा रहे है।
उपासना का दोष लगाते हैं यहाँ उसके भाव पक्ष को ही स्पष्ट किया जा रहा है कि प्रकृति का सत्व-गुण उतना ही चेतन और सर्वशक्तिमान है जितना ब्रह्मा इसलिये ब्रह्मा की उपासना से जो लाभ मिल सकते हैं वह सब प्रकृति की भावनात्मक उपासना से भी मिल सकते हैं विभिन्न याँत्रिक और ताँत्रिक साधनों द्वारा ही उसे वश में करने की कष्ट साध्य प्रक्रिया आवश्यक नहीं । प्रकृति की कृपा पाने के लिये उसका पति (परमेश्वर में स्थित होना) ही आवश्यक नहीं पुत्र होकर भी उसका स्नेह और प्यार प्राप्त किया जा सकता है। गायत्री को माँ मानने और नारी रूप में उपासना का यही दर्शन है। प्रस्तुत प्रमाण उसकी चेतनता सिद्ध करने को ही लिखे जा रहे है।
उपासना द्वारा सूक्ष्म का अवगाहन और प्राप्ति जैसी विधा और कोई नहीं है इसलिये इस उपासना को सर्वोपरि मानते हैं।
उपासना के लिये सन्ध्या ............ सबसे उपयुक्त माना गया। मृत्यु भी एक ऐसी ही ................ सन्ध्या है जिसमें जीवन के स्थूल और सूक्ष्म ......................... का ज्ञान होता है इसलिये उसकी विशेष तैयारी के .............. यहाँ पूर्व विधान बनाये गये है।
उपासना से लाभ मिलने की बात कही जाती है। स्थूल की उपासना द्वारा सूक्ष्म का अवगाहन और प्राप्ति जैसी विधा और कोई नहीं है इसलिये इस उपासना को सर्वोपरि मानते हैं।
उपासना से जो लाभ मिल सकते हैं वह सब प्रकृति की भावनात्मक उपासना से भी मिल सकते हैं विभिन्न याँत्रिक और ताँत्रिक साधनों द्वारा ही उसे वश में करने की कष्ट साध्य प्रक्रिया आवश्यक नहीं । प्रकृति की कृपा पाने के लिये उसका पति (परमेश्वर में स्थित होना) ही आवश्यक नहीं पुत्र होकर भी उसका स्नेह और प्यार प्राप्त किया जा सकता है। गायत्री को माँ मानने और नारी रूप में उपासना का यही दर्शन है। प्रस्तुत प्रमाण उसकी चेतनता सिद्ध करने को ही लिखे जा रहे है।
उपासना करना ही नहीं जानते वरन् आर्थिक औद्योगिक व वैज्ञानिक क्षेत्र में आगे बढ़कर सर्व शक्तिमत्ता की अभिव्यक्ति भी अच्छी तरह जानते हैं।
उपासना का यही दर्शन है। प्रस्तुत प्रमाण उसकी चेतनता सिद्ध करने को ही लिखे जा रहे है।
उपासना से भी मिल सकते हैं विभिन्न याँत्रिक और ताँत्रिक साधनों द्वारा ही उसे वश में करने की कष्ट साध्य प्रक्रिया आवश्यक नहीं । प्रकृति की कृपा पाने के लिये उसका पति (परमेश्वर में स्थित होना) ही आवश्यक नहीं पुत्र होकर भी उसका स्नेह और प्यार प्राप्त किया जा सकता है। गायत्री को माँ मानने और नारी रूप में उपासना का यही दर्शन है। प्रस्तुत प्रमाण उसकी चेतनता सिद्ध करने को ही लिखे जा रहे है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-April
उपासना को कम और जीवन साधना को अधिक महत्व देने की प्रेरणा ही हमने सर्वे साधारण को दी है। फिर अगले दिनों हमें जो कदम उठाने पड़ रहे हैं, हिमालय में अज्ञात एकान्त साधना के लिए जाना पड़ रहा है- उससे किसी को ऐसा लग सकता है कि अपनी पिछले मान्यताओं और शिक्षाओं के विपरीत हम आचरण करने जा रहे है। नव-निर्वाण के महान् अभियान की गतिशीलता में हमारा कर्तव्य इतना घुल मिल गया है कि लोगों को यह लग सकता है कि यह व्यक्तित्व एवं मार्ग-दर्शन हट जाने से मिशन को क्षति पहुँचेगी और शिथिलता आ जायगी। ऐसी दशा में नव निर्माण की अभिरुचि रखने वाले प्रत्येक भावनाशील व्यक्ति को हमारा यह महा प्रयाण दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण लग सकता है। और अधिक जोर देकर कहा जा सकता है कि यह विचार हम छोड़ दें और जिस तरह अब तक काम करते रहे उसी तरह आगे भी करते रहें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-October
उपासना का उपक्रम एक ही परिणाम उत्पन्न कर सकता है और वह है काषाय−कल्मषों के कारण उत्पन्न होने वालों से परिणाम उलटा उपद्रव खड़ा करने की उसकी प्रकृति ही नहीं है। उसके कारण किसी प्रकार का संकट उत्पन्न होने की आशंका तो करनी ही नहीं चाहिए। माता कभी अहित न तो कर सकती है न वैसा सोच ही सकती है। धरती माता, गौ माता, प्रकृति माता की सहज प्रकृति स्नेह करने, सहायता करने एवं सुविधा साधन उपलब्ध कराने ही है। वे छेड़खानी करने पर अधिक से अधिक इतना ही कर सकती हैं कि सहयोग से हाथ खींच लें।
उपासना को दिया जाय और असफलताओं का दोष अपने प्रारम्भ पुरुषार्थ में कमी रहना मानकर अपने ऊपर ओढ़ा जाय। इस मापदण्ड को अपनाकर ही श्रद्धा को जीवन्त रखा जा सकता है और आत्मिक प्रगति का द्वार खुला रह सकता है।
उपासना के मार्ग पर बढ़ने वाला यही सोचता है कि क्यों इस व्यर्थ झंझट में फँसे। भविष्य के लिए वह इस जंजाल से किसी प्रकार पिण्ड छुड़ाने भर की बात ही सोचता है।
उपासना क्षेत्र के अधिष्ठाता बन गये तब उस व्यापक अनाचार को निरस्त करने के लिए भगवान बुद्ध का अवतरण हुआ और उन्होंने उस अनाचार की धज्जियाँ उड़ाई’। उन्हीं दिनों की बात है कि पुरोहित वर्ग ने अपनी विशिष्टता सिद्ध करने तथा अर्थ उपार्जन का नया स्त्रोत उभारने के लिए उस मान्यता का परिपूर्ण समर्थन किया कि विधि-विधान में राई-रत्ती भूल जाने पर भी देवता रुष्ट हो जाते हैं और फिर कर्ता से उलट कर बदला लेते हैं। यह मान्यता योजना बद्ध ढंग से फैलाई गई। उसके समर्थन में बहुत कुछ कहा एवं लिखा गया।
उपासना से अन्तःक्षेत्र की सत्प्रवृत्तियाँ को उभारने और व्यक्तित्व में सुसंस्कारिता के समावेश का अवसर मिलता है। कुशलता प्रतिभा पर साँसारिक सफलता सुविधा की न्यूनाधिकता निर्भर है। जबकि उपासना मनुष्य के दृष्टिकोण, चरित्र, रुझान एवं कार्यक्षेत्र में उत्कृष्टता का समावेश करती है। ऐसी दशा में एक-दूसरे की जोड़ने की बात सर्वथा अनुपयुक्त है। फिर भी प्रचलित भ्रम मान्यताओं के अनुरूप यदि उपासना से भौतिक लाभ हानि की संगति जोड़े बिना काम न चले तो फिर दो दृष्टिकोण अपनाने चाहिए।
उपासना करनी हो तो उसके प्रयोजन परिणाम की आशा इतनी ही करनी चाहिए कि इससे अपने आत्म परिष्कार में सहायता मिलेगी। आगत संकट इस किलो भारी हो तो उपासना के आधार पर उपलब्ध हुए मनोबल के कारण आधा तिहाई ही रह जायगा।
उपासना मनुष्य के दृष्टिकोण, चरित्र, रुझान एवं कार्यक्षेत्र में उत्कृष्टता का समावेश करती है। ऐसी दशा में एक-दूसरे की जोड़ने की बात सर्वथा अनुपयुक्त है। फिर भी प्रचलित भ्रम मान्यताओं के अनुरूप यदि उपासना से भौतिक लाभ हानि की संगति जोड़े बिना काम न चले तो फिर दो दृष्टिकोण अपनाने चाहिए। सफलताओं का श्रेय उपासना को दिया जाय और असफलताओं का दोष अपने प्रारम्भ पुरुषार्थ में कमी रहना मानकर अपने ऊपर ओढ़ा जाय। इस मापदण्ड को अपनाकर ही श्रद्धा को जीवन्त रखा जा सकता है और आत्मिक प्रगति का द्वार खुला रह सकता है।
उपासना जैसे नित्य कर्मों के सम्बन्ध में भी यह शंका की जाने लगी कि कहीं भूल होने पर अनर्थ न होने लगे और इष्टदेव उस भूल से रुष्ट होकर उलटे आक्रमण पर न उतर आयें।
उपासना की सफलता में कर्मकाण्ड का महत्व दस प्रतिशत और सघन श्रद्धा की भूमिका नब्बे प्रतिशत होती है। यदि श्रद्धा डगमगाने लगे तो समझना चाहिए कि कर्मकाण्ड की लकीर पीटते रहने से कोई लाभ नहीं। आगत कठिनाइयों का कारण यदि उपासना को सोचा माना जाने लगा तो समझना चाहिए अब यह श्रद्धा के पैर जमने जैसी कोई सम्भावना रह नहीं गई। जो तन्त्र विनय वंदन का प्रतिफल अनिष्ट उत्पन्न कर सकता है वह निश्चय ही निकृष्ट स्तर का घिनौना होना चाहिए। उसका आश्रय लेने पर आयेदिन ऐसे ही उपद्रव खड़े होने का भय बना रहेगा।
उपासना के मत्थे मढ़ देना सर्वथा अनुचित है।
उपासना के आधार पर उपलब्ध हुए मनोबल के कारण आधा तिहाई ही रह जायगा।
उपासना को सोचा माना जाने लगा तो समझना चाहिए अब यह श्रद्धा के पैर जमने जैसी कोई सम्भावना रह नहीं गई। जो तन्त्र विनय वंदन का प्रतिफल अनिष्ट उत्पन्न कर सकता है वह निश्चय ही निकृष्ट स्तर का घिनौना होना चाहिए। उसका आश्रय लेने पर आयेदिन ऐसे ही उपद्रव खड़े होने का भय बना रहेगा। प्रत्यक्ष है कि भय, अनिश्चितता और दुष्टता की आशंका मन में उठने लगे तो फिर उस केन्द्र पर श्रद्धा विश्वास का भक्ति भावना का स्नेह समर्पण का कोई आधार बन ही नहीं सकता। यदि आस्था सुदृढ़ न हुई तो फिर कोई श्रेष्ठ कर्मकाण्डों वाली उपासना भी किसी के लिए कभी भी परिणाम में फलप्रद नहीं हो सकती।
उपासना मार्ग के साधक और साहस में इसी प्रकार के भावभरे आदान-प्रदान चलते हैं। उनमें कर्मकाण्डों का अधूरापन या व्यतिक्रम कोई खास बाधा नहीं डालता। यों उचित तो यही है कि हर वर्ग स्तर के लोग नियम मर्यादाओं के परिपालन में सतर्कता बरतें और सही तरीका ही अपनायें।
उपासना भी किसी के लिए कभी भी परिणाम में फलप्रद नहीं हो सकती। उसमें लगाया हुआ श्रम निष्फल ही नहीं जायगा वरन् असफलताजन्य आक्रोश के कारण नास्तिकता में परिणित होता चला जाएगा। ऐसे लोगों से तो वे लोग कहीं अच्छे जो उपासना करते ही नहीं। उन्हें कम से कम असन्तोष, आक्रोश एवं नास्तिकता के गर्त में जा गिरने का अनर्थ तो नहीं अपनाना पड़ता। इस प्रकार वे नफा भले ही न कमायें, अकारण घाटा देने का संकट नहीं सहते।
उपासना की संगति बिठाने का तत्वतः आवश्यकता है नहीं, क्योंकि दोनों के क्षेत्र सर्वथा भिन्न हैं। प्रतिकूलता आमतौर से व्यक्ति की कुशलता पर निर्भर रहती है। जबकि उपासना से अन्तःक्षेत्र की सत्प्रवृत्तियाँ को उभारने और व्यक्तित्व में सुसंस्कारिता के समावेश का अवसर मिलता है। कुशलता प्रतिभा पर साँसारिक सफलता सुविधा की न्यूनाधिकता निर्भर है। जबकि उपासना मनुष्य के दृष्टिकोण, चरित्र, रुझान एवं कार्यक्षेत्र में उत्कृष्टता का समावेश करती है।
उपासना से भौतिक लाभ हानि की संगति जोड़े बिना काम न चले तो फिर दो दृष्टिकोण अपनाने चाहिए। सफलताओं का श्रेय उपासना को दिया जाय और असफलताओं का दोष अपने प्रारम्भ पुरुषार्थ में कमी रहना मानकर अपने ऊपर ओढ़ा जाय। इस मापदण्ड को अपनाकर ही श्रद्धा को जीवन्त रखा जा सकता है और आत्मिक प्रगति का द्वार खुला रह सकता है।
उपासना करते ही नहीं। उन्हें कम से कम असन्तोष, आक्रोश एवं नास्तिकता के गर्त में जा गिरने का अनर्थ तो नहीं अपनाना पड़ता। इस प्रकार वे नफा भले ही न कमायें, अकारण घाटा देने का संकट नहीं सहते।
उपासना कहते हैं।
उपासना की भक्ति माता भी ऐसी ही हैं। उसका आश्रय लेने पर कष्ट घटते हैं, बढ़ते नहीं।
उपासना के क्षेत्र पर आक्रमण बोल दिया। इतना ही नहीं उसे भी बेतरह अपने चंगुल में फँसा लिया। दैनिक उपासना जैसे नित्य कर्मों के सम्बन्ध में भी यह शंका की जाने लगी कि कहीं भूल होने पर अनर्थ न होने लगे और इष्टदेव उस भूल से रुष्ट होकर उलटे आक्रमण पर न उतर आयें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-August
उपासना के क्षेत्र में प्रवेश किया तो यह आदत दूसरे रूप में परिणत हो गई। अभाव ग्रस्त, शोक संतप्त उलझनों में जकड़ा हुआ कि कर्तव्य विमूढ़ जो भी सामने आया, उसकी मनोव्यथा समझने में देर न लगी। करुणा से भरा हुआ हृदय देखते देखते पिघल गया। नवनीत और हिम खण्ड तब गलते और पिघलते हैं जब धूप उन्हें सताती और तपाती हैं। सन्त पराई व्यथा को अपनी व्यथा मानकर अपनी सहज सम्वेदना से व्यथित होकर गलते पिघलते रहते हैं।
उपासना, साधना, तपश्चर्या करते थे उसका फल बालकों को मिठाई बाँटने में खर्च करने का आनन्द लेते रहते थे। फलस्वरूप उनके इर्द-गिर्द बालकों की भारी भीड़ लगी रहती थी। बालकों से मतलब भौतिक प्रगति के लिए लालायित और उलझनों से उद्विग्न उन व्यक्तियों से है जो अपने पुरुषार्थ से अपनी गुत्थी सुलझा सकने में समर्थ नहीं हो पा रहे थे और किसी दूसरे की समर्थ सहायता की अपेक्षा करते थे। आत्मिक दृष्टि से प्रौढ़ व्यक्ति अपने पुरुषार्थ से अपनी मंजिल आप पूरी करते हैं और प्रारब्ध की जटिलता को साहस और धैर्य पूर्वक सहन करते हैं। बालकों की मनःस्थिति उससे भिन्न होती है।
उपासना करते समय उनके रूप का ध्यान करते हुए जप और नाम संकीर्तन करते हैं देखने में समय गंवाने जैसी इस क्रिया में भी वैज्ञानिकता हो सकती है केवल मात्र ध्यान और स्मरण से जिसका ध्यान किया जा रहा है उसकी समस्त क्षमताओं का अपने अन्दर विकास किया जा सकता है किन्तु वैज्ञानिकों द्वारा पूर्ण परीक्षित निम्न उदाहरण यह बताता है कि ध्यान एक पूर्ण विज्ञान सम्मत विधान हैं जो सामान्य पंक्ति में भी इच्छित असामान्य गुणों और शक्तियों का विकास कर सकता है।
उपासना करो।
उपासना पद्धति में जप, तप का जितना स्थान था उससे हजार गुना महत्व वे जीवन साधना को देते थे और अपनी आत्मिक उपलब्धियों का श्रेय वे आन्तरिक काषाय कल्मषों के उन्मूलन और वाह्य जीवन की आदर्शवादिता को देते थे। उन्होंने जब भी कहा-यही कहा-मेरी उपासना को फलित करने का श्रेय उस जीवन साधना को ही दिया जाना चाहिये जिसमें अंतरंग की निर्मलता और बहिरंग की उत्कृष्टता को अविच्छिन्न रूप से जोड़ता संजोया जाता रहा। ऐसा अध्यात्म यदि सर्व साधारण की रुचि का विषय बन जाय और लोग उसे अपनाने में गुरुदेव जैसी सर्वतोमुखी प्रगति अनुभव करने लगें तो निस्सन्देह उत्कृष्टता की जीवन साधना अपनाने का आकर्षण असंख्यों को होगा और फलस्वरूप महान् व्यक्तित्वों के उपवन चारों ओर लहलहाने लगें। उस दृष्टि से अब जब कि गुरुदेव चले गये यह अनुभव करा ही दूँ कि उनके सहयोगी जिनने अपनी जीवन यात्रा में प्रकाश पाया, भौतिक एवं आन्तरिक कठिनाइयों से छूटे तथा प्रगति पथ पर चल सकने योग्य अनुदान उपलब्ध किया उनके अनुभवों का एक संकलन प्रकाशित करने की व्यवस्था जुटाने में हर्ज नहीं है। गुरुदेव होते तो वे अप्रसन्न होते और रोकते जैसा कि वे अब तक इस विचार को सदा निरुत्साहित करते रहे।
उपासना को फलित करने का श्रेय उस जीवन साधना को ही दिया जाना चाहिये जिसमें अंतरंग की निर्मलता और बहिरंग की उत्कृष्टता को अविच्छिन्न रूप से जोड़ता संजोया जाता रहा। ऐसा अध्यात्म यदि सर्व साधारण की रुचि का विषय बन जाय और लोग उसे अपनाने में गुरुदेव जैसी सर्वतोमुखी प्रगति अनुभव करने लगें तो निस्सन्देह उत्कृष्टता की जीवन साधना अपनाने का आकर्षण असंख्यों को होगा और फलस्वरूप महान् व्यक्तित्वों के उपवन चारों ओर लहलहाने लगें। उस दृष्टि से अब जब कि गुरुदेव चले गये यह अनुभव करा ही दूँ कि उनके सहयोगी जिनने अपनी जीवन यात्रा में प्रकाश पाया, भौतिक एवं आन्तरिक कठिनाइयों से छूटे तथा प्रगति पथ पर चल सकने योग्य अनुदान उपलब्ध किया उनके अनुभवों का एक संकलन प्रकाशित करने की व्यवस्था जुटाने में हर्ज नहीं है। गुरुदेव होते तो वे अप्रसन्न होते और रोकते जैसा कि वे अब तक इस विचार को सदा निरुत्साहित करते रहे। पर अब जबकि उनकी प्रशंसा निन्दा का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है और इस परिधि से वे बहुत आगे निकल गये तो उसमें हर्ज नहीं दीखता कि वे प्रसंग इस उद्देश्य से प्रकाशित कर दिये जाय कि आत्म-साधना की समर्थता और सार्थकता क्या है और उसे प्राप्त करने के लिये साधक को किस प्रकार की गतिविधियाँ अपनानी होती हैं।
उपासना करने लगे-हे वरुण देव! तुम एक ही दृष्टि में समस्त सृष्टि को देखने वाले हो, मुझे वहाँ तक पहुंचाओ जहाँ मेरे भाई का मन है। यदि उसका मन आकाश के छोर में है, भूत या भविष्य में है तो भी वहाँ तक मेरे मन को पहुंचाओ। वरुण देव प्रसन्न हुये। महर्षि गोपयन के मन का उन्होंने सुबन्धु के मन से मिलाप करा दिया। गोपायन भगवान् इन्द्र की कृपा और प्रेरणा से मृत भाई के प्राणों को वापस ले आये और मृतक देह में उन्हें स्थिर कर दिया।
उपासना तपश्चर्या का जो पुण्य फल हो सकता था उसका एक कण भी उन्होंने अपने लिये किसी भौतिक एवं आत्मिक प्रतिफल के लिये बचाकर नहीं रखा। जितना वे कमा सके उसका राई रत्ती उन्हें मिलता रहा जो आशा लेकर उनके सामने आये। कभी सम्भव हुआ तो उनके द्वारा की हुई सहायता के कारण लाभान्वित हुये व्यक्तियों की कहानी उन्हीं की जवानी प्रकाश में लाई जायेगी इससे विदित होगा कि कितनों के अन्धकारमय वर्तमान को प्रकाश पूर्ण भविष्य में उन्होंने बदल दिया और कितने उनका साहाय्य सहयोग पाकर धन्य हो गये। गुरुदेव ने अपनी इस उदारता और समर्थता को सर्व साधारण के सामने प्रकट न होने देन में सदा कठोरता बरती। वे नहीं चाहते थे कि उनकी कोई प्रशंसा करे या अहसान माने अथवा उन्हें चमत्कारी, उदार दानी, तपस्वी एवं सेवाभावी माना जाय।
उपासना 6 घण्टे नित्य थी इतने असंख्य अभाव ग्रस्तों का साहित्य सम्भव हो सके। दूसरे उनसे भी अधिक कर्मकाण्डी एवं जप-तप करने वाले मौजूद हैं पर उनकी उपलब्धियाँ नगण्य ही रहती है फिर गुरुदेव के लिये इतना उपार्जन कैसे सम्भव हुआ? इस पर उनकी अति निकटवर्ती एवं निम्र अनुगामिनी होने के नाते इतना ही कह सकती हूँ कि उनने निर्मलता और उदारता की प्रवृत्तियों को विकसित करने में अत्यधिक ध्यान दिया और पुरुषार्थ किया। अपने व्यक्तित्व को उर्वर क्षेत्र की तरह विकसित करने में यदि इतनी सतर्कता न बरती होती तो सम्भवतः उनके 24 वर्षों के 24 गायत्री महापुरश्चरण तथा सामान्य समय के जप-तप उतने प्रभावी न हो से होते जितने कि देखे और पाये गये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-September
उपासना करे और साधना किस प्रकार चलाये इसके निर्धारण सभी के लिए एक जैसे नहीं होंगे वरन् हर व्यक्ति की मन स्थिति, परिस्थिति, परम्परा एवं पूर्व प्रगति को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग होंगे। किसे, किस प्रयोजन के लिए किस स्तर की आत्मशक्ति चाहिए, कौन कितना कर सकने में समर्थ है, इन सब बातों का तालमेल बिठाकर ही साधन विधि का पृथक-पृथक निर्धारण किया जायेगा।
उपासना एवं जीवन साधना में उन विशिष्ट तत्वों का समावेश करें जो इन्हीं दिनों नितान्त आवश्यक है। इन पंक्तियों द्वारा इस स्तर के सभी वरिष्ठ परिजनों से इसी का अनुरोध किया जा रहा है।
उपासना का तत्वज्ञान भारतीय अध्यात्म शक्ति का अविच्छिन्न अंग है। गायत्री को आद्य शक्ति कहा जाता है। उसकी शाखाएं प्रशाखाएं अन्य देवी देवताओं में प्रकट होती चली गई। ब्राह्मी, वैष्णवी, शाँभवी के त्रिवर्ग में विभाजित होने के उपरान्त गायत्री अनेक नामों से जाने वाली देवियों के रूप में विस्तृत होती चली गई है। अन्यान्य देवशक्तियाँ की उपासना की प्रकारान्तर से आदि शक्ति गायत्री की प्रवाह धारा में ही सम्मिलित होती जाती है।
उपासना को, भक्ति के गीले नयम दो।दो न आँसू की दुहाई, साधनों के सुमन दो॥
उपासना करते हैं। तब मैं आपकी क्रिया करता हूँ।
उपासना की प्रकारान्तर से आदि शक्ति गायत्री की प्रवाह धारा में ही सम्मिलित होती जाती है।
उपासना सम्बन्धी -दूसरा उतने ही आकार का जीवन साधना सम्बन्धी रहा करेगा। इस प्रकार दस बार में दोनोँ प्रकार में मिलाकर 20 पाठ्यक्रम पत्रक पहुँच जायेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-May
उपासना,
योग और साधनाओं से मन, बुद्धि, चित्त और अन्तःकरण इतने स्वच्छ हो जाते हैं
कि ईश्वरीय प्रेरणाओं और दूर भविष्य की अनजानी घटनाओं के दृश्य चलचित्र की
भाँति उतरते चले आते हैं। श्री शास्त्री जी इस बात को स्वीकार करते थे, पर
वे इस तरह का अहंकार अपने लिये व्यक्त नहीं करना चाहते थे। श्री शास्त्री
जी ने सन् 1945 और 1950 के मध्य भारतवर्ष को स्वतन्त्र होने की भविष्यवाणी
की थी, वह सच हुई। उन्होंने दस वर्ष पूर्व ही गान्धीजी की मृत्यु की भविष्यवाणी की थी, वह भी सच निकली थी। उन्होंने बताया था, सन् 1970 में अमरीका का कोई मनुष्य चन्द्रमा की परिक्रमा करेगा।
उपासना किया करते हैं, वे उनकी प्रीति के उतने सत्य पात्र नहीं बन पाते, जितने कि संसार के रंग-मंच पर सच्चाई के साथ अपना अभिनय अदा करते हैं।
उपासना का तात्पर्य भगवान को प्रसन्न करना ही होता है। एकान्त में बैठ कर जप-तप द्वारा वे उतने प्रसन्न नहीं होते जितने कि वेश के अनुसार यथायोग्य व्यवहार किये जाने से, कारण स्पष्ट है कि यदि उन्हें लीलापरक संसार अभीष्ट न होता तो वे इसकी रचना इतने वैचित्र्यमय ढंग से नहीं करते और न माता-पिता, पुत्र-पुत्री, पति-पत्नी, स्वामी-सेवक, भले-बुरे और अपने- पराये के अभिनय ही करते। इस विचित्रता के मूल में उनका एकमात्र तात्पर्य यही है कि लोग प्रत्येक में उनका स्थायी भाव रखते हुए यथायोग्य व्यवहार करते हुए इस संसार नाटक को सरस तथा सफल बनाएँ। संसार की इस सक्रिय लीला से मुख मोड़ कर जो व्यक्ति एकान्त में बैठकर उसकी उपासना किया करते हैं, वे उनकी प्रीति के उतने सत्य पात्र नहीं बन पाते, जितने कि संसार के रंग-मंच पर सच्चाई के साथ अपना अभिनय अदा करते हैं।
उपासना है। उपासना का तात्पर्य भगवान को प्रसन्न करना ही होता है। एकान्त में बैठ कर जप-तप द्वारा वे उतने प्रसन्न नहीं होते जितने कि वेश के अनुसार यथायोग्य व्यवहार किये जाने से, कारण स्पष्ट है कि यदि उन्हें लीलापरक संसार अभीष्ट न होता तो वे इसकी रचना इतने वैचित्र्यमय ढंग से नहीं करते और न माता-पिता, पुत्र-पुत्री, पति-पत्नी, स्वामी-सेवक, भले-बुरे और अपने- पराये के अभिनय ही करते। इस विचित्रता के मूल में उनका एकमात्र तात्पर्य यही है कि लोग प्रत्येक में उनका स्थायी भाव रखते हुए यथायोग्य व्यवहार करते हुए इस संसार नाटक को सरस तथा सफल बनाएँ। संसार की इस सक्रिय लीला से मुख मोड़ कर जो व्यक्ति एकान्त में बैठकर उसकी उपासना किया करते हैं, वे उनकी प्रीति के उतने सत्य पात्र नहीं बन पाते, जितने कि संसार के रंग-मंच पर सच्चाई के साथ अपना अभिनय अदा करते हैं।
उपासना है-ऐसी निष्ठा रखने वाला कर्म योगी, कर्मों के बंधनों में न बँधकर संसार सागर से मुक्त हो जाता है ऐसा ध्रुव सत्य, सत्य है इसमें शंका न करना सबसे बड़ी आस्तिकता है; सर्वोपरि भक्ति है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-July
उपासना करे-साँसारिक कर्तव्यों की अवहेलना कर या देवी-विधान का उल्लंघन कर कभी सुखी नहीं रह सकते। जैसा कर्म बीज वैसा ही फल-यह उसका निश्चल नियम है दूसरों का तिरस्कार करने वाला कई गुना तिरस्कार पाता है। परमार्थ उसी तरह लौटकर असंख्य गुने सुख पैदा कर मनुष्य को तृप्त कर देता है। सुख और दुःख , बन्धन और मुक्ति मनुष्य के कर्म के अनुसार ही प्राप्त होते हैं। दुष्कर्मों का फल भागने से मनुष्य बच नहीं सकता इस विधान में कही राई रत्ती भर भी गुँजाइश नहीं है।
उपासना इस चेतना से संपर्क और उसका आशीर्वाद प्राप्त करने का ही वैज्ञानिक तरीका है उससे वंचित नहीं रहना चाहिये।
उपासना की और यह वर प्राप्त कर लिया कि यदि उसके पति की मृत्यु पहले हो जाय तो पति की अंतःचेतना राजमहल से बाहर न जाये । सरस्वती ने यह भी आशीर्वाद दिया कि तुम जब चाहोगी अपने पति से भेट भी कर सकोगी। कुछ दिन बीते पद्म का देहान्त हो गया। लीला ने पति का शव सुरक्षित रखवा कर भगवती सरस्वती का ध्यान किया सरस्वती ने उपस्थित होकर कहा-भद्रे ! दुःख न करो तुम्हारे पति इस समय यही है पर वे दूसरी सृष्टि में है उनसे भेट करने के लिए तुम्हें उसी सृष्टि वाले शरीर (मानसिक-कल्पना ) में प्रवेश करना चाहिए।
उपासना, तप, ज्ञान सम्वर्धन और साधना द्वारा अपना मनोबल और आत्म बल विकसित कर लेते हैं वह अनेक गुणों और संस्कारों से युक्त सुन्दर बनी रह पाते हैं और जिनकी इंद्रियों के प्रति लालसा जागृत बनी रहती है वे उन उन इच्छाओं की पूर्ति के लिए पुनः कोई शरीर धारण करते हैं। यह पटाक्षेप तनातन काल तक चलते रहते हैं।
उपासना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है। नदियाँ जब तक समुद्र में नहीं मिल जाती अस्थिर व बेचैन रहती है।मनुष्य की असीमता भी अपने आपको मनुष्य मान लेने की भावना से ढकी हुई है।उपासना विकास की प्रक्रिया है। संकुचित का सीमा रहित करना, स्वार्थ को छोड़कर परमार्थ की ओर अग्रसर होना, “मैं” और मेरा छुड़ाकर “हम” और हमारे की आदत डालना ही मनुष्य के आत्म की ओर विकास की परम्परा है।
उपासना विकास की प्रक्रिया है। संकुचित का सीमा रहित करना, स्वार्थ को छोड़कर परमार्थ की ओर अग्रसर होना, “मैं” और मेरा छुड़ाकर “हम” और हमारे की आदत डालना ही मनुष्य के आत्म की ओर विकास की परम्परा है। पर यह तभी सम्भव है जब सर्व शक्तिमान परमात्मा की सत्ता को स्वीकार करलें, उसकी शरणागति की प्राप्ति हो जाय। मनुष्य रहते हुए उसकी मानवता को भेदकर उसे देव रूप में विकसित कर देना ईश्वर शक्ति का कार्य है। उपासना का अर्थ परमात्मा से शक्ति को प्राप्त करना ही है।
उपासना का अर्थ परमात्मा से शक्ति को प्राप्त करना ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-November
उपासना का कोई परिणाम न निकलता हो, सो बात नहीं है। प्रश्न पात्रता का है। अधिकारी के पास उपयुक्त साधन अनायास ही खिंचते चले आते हैं। फूल के पास कितनी मधुमक्खी और भौंरे बिना बुलाए ही मंडराने लगते हैं। चुम्बक अपने समीपवर्ती लोह-कणों को सहज ही खींच लेता है।
उपासना में इतना ही दीखता था, सो समझने वाले उतना ही समझ सकते थे। पर वस्तुतः उनकी साधना इन क्रियाकलापों तक ही सीमित नहीं थी, वरन् काया के कर्मकाण्डात्मक क्रियाकलापों से बहुत आगे बढ़कर मन और प्राण की सूक्ष्मशरीर और कारणशरीर की परिधि प्रवेश कर गई थी।
उपासना करो तो उनसे तुम्हें अवश्य ही धन प्राप्त हो सकता है।" अनुरथ उस दिन से देवी की उपासना करने लगा।
उपासना की सिद्धि) यह भी इस घटना से स्पष्ट समर्थित और प्रतिपादित हो जाता है।
उपासना पर निर्भर नहीं है। जिसके आचरण पवित्र न हों, वह योग-साधना में सफल नहीं हो सकता। आत्मा की प्रगति और परमात्मा की उपलब्धि के लिए सत्यनिष्ठ और तपस्वी जीवन जीना पड़ता है। आत्मा ज्ञानस्वरुप, सत्य, शिव और सुन्दर है। उसे प्राप्त करके मनुष्य सबकुछ प्राप्त कर लेता है, पर इस लाभ को हर कोई प्राप्त नहीं कर सकता।
उपासना का आनंद पाया जा सकता है तो मिट्टी की काया में समाए हुए अमृत आत्मा के समावेशयुक्त सजीव व्यक्ति के प्रति क्यों आत्मीयता नहीं बनाए रखी जा सकती ?
उपासना करने लगा।
उपासना किया करते थे। यह आत्मिक श्रम एक व्यक्ति को पूरी तरह थका देने के लिए पर्याप्त है। शारीरिक श्रम आठ घंटे, मानसिक श्रम सात घंटे और आत्मिक श्रम छह घंटे ही हो सकता है। छह घंटे की उपासना एक व्यक्ति को पूरे दिन थका देने वाली मेहनत के बराबर ही गिनी जानी चाहिये।
उपासना करने वाले सामान्य तथा नित्य ही जल चढ़ाते और प्रणाम करते हैं। समर्थगुरु उन्हें मिले पर ऐसे सिद्ध पुरुषों से यह पृथ्वी रहित नहीं है। और यह भी निश्चित है कि उनका द्वार सभी के लिए खुला पड़ा है। बादल सर्वत्र बरसते रहते हैं। तालाब लाखों मन पानी जमा कर लेते हैं पर पत्थर की चट्टान पर एक बूँद भी नहीं ठहरता।
उपासना करता है, वह कामरूप हो जाता है। और उसकी कामनाएँ फलवती होती हैं।
उपासना एक व्यक्ति को पूरे दिन थका देने वाली मेहनत के बराबर ही गिनी जानी चाहिये।
उपासना का कर्मकांड तो उपकरण एवं निमित्तमात्र था।
उपासनाएँ चलती रहती हैं तो दूसरी ओर वृक्ष भी ऋतु के अनुसार फलता-फूलता रहता है। तने के भीतर बना गिरजाघर आश्चर्य हो गया, पर उस वृक्ष के नियंता को किसी ने भी आश्चर्य से नहीं देखा। यह ऐसा ही है जैसे कि लोग विराट ब्रह्मांड में समुद्र की एक बूँद के समान पृथ्वी को ही सब कुछ मानते हैं; पर विराट जगत की कल्पना उन्हें कभी नए ढंग से सोचने की प्रेरणा ही नहीं देती।
उपासना की, जिसे संध्यावंदन के समय आमतौर से सभी धर्मप्रेमी हिंदू जपा करते हैं। उनका भी इष्ट वही सविता देवता था जिसे उपासना करने वाले सामान्य तथा नित्य ही जल चढ़ाते और प्रणाम करते हैं। समर्थगुरु उन्हें मिले पर ऐसे सिद्ध पुरुषों से यह पृथ्वी रहित नहीं है। और यह भी निश्चित है कि उनका द्वार सभी के लिए खुला पड़ा है। बादल सर्वत्र बरसते रहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-June
उपासना का एक अनिवार्य अंग बताया गया है- “तत्जयात प्रज्ञा लोकाः” अर्थात्-संयम विजय से प्रज्ञा बुद्धि का विकास होता है। प्रज्ञा का अर्थ सार्वभौम ज्ञान से है इन्द्रियों की सामर्थ्य और समय की सीमा से परे अर्थात् जो कुछ देखा सुना है और जो कुछ देखा सुना भी नहीं उस समस्त ज्ञान को प्राप्त करना ही प्रज्ञ होना है। ब्रह्म की प्राप्ति भी संयम से विजित प्रज्ञा बुद्धि द्वारा ही होती है। इसलिए उपासना के साथ संयम को आवश्यक ही नहीं अनिवार्य माना गया है।
उपासना का मूल प्रयोजन अन्तरंग पर चढ़े हुए मल आवरण विक्षेपों पर साबुन लगाकर अपने ज्ञान और कर्म को अधिकाधिक परिष्कृत करना भर है। ईश्वर को न किसी की खुशामद पसन्द है न धूप दीप बिना उसका कोई काम रुका पड़ है। व्यक्तित्व को परिष्कृत और उदार बनाकर ही हम ईश्वरीय अनुग्रह के अधिकारी बन सकते हैं। इस तथ्य को हमारा हर परिजन हृदयंगम करले तो वह मन्त्र-तन्त्र में उलझा रहने की अपेक्षा उस दिशा में बहुत दूर तक चल सकता है जिससे कि विश्व कल्याण और ईश्वरीय प्रसन्नता के दोनों आधार अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए है।
उपासना करनी चाहिये जिससे मन के अंदर सतोगुण की वृद्धि होकर अच्छे स्वप्न दिखाई देने लगे और आत्मा की अनुभूति होने लगे।
उपासना करता है वह तेजस्वी, प्रदीप्त जठराग्नि वाला होता है पूर्ण आयु पाता है। प्रजा और पशु से सम्पन्न प्रतिष्ठा वाला होता है वह कीर्ति से भी महान् होता है- अग्नि की ओर मुख करके न कुछ खाये न थूके यह व्रत है।
उपासना का मिथ्यात्व न केवल लोक बल्कि परलोक को भी नष्ट कर देता है। जो मनुष्य मनुष्यों से छल करता है उसको ही जब सिर छिपाने का स्थान नहीं मिलता तो भला उस मनुष्य की लोक-परलोक में कौन रक्षा कर सकता है जो देवताओं के साथ छल करता है। निकृष्ट कामनाओं को साथ लेकर उपासना करना देवता से छल करना है अथवा श्रद्धा, आस्था या भक्ति न होने पर भी जो किसी स्वार्थ सिद्धि के लिए वैसा करता है वह भी देवताओं से छल करता है। अथवा किसी साधना से देव कृपा प्राप्त कर लेने पर उसका उपयोग परमार्थ में न करके स्वार्थ में करने वाला अथवा उसके प्रभाव से दूसरों को भयभीत या आतंकित करने वाला देवताओं से छल नहीं करता बल्कि उन दिव्य शक्तियों के साथ विश्वासघात करता है। ऐसा विश्वासघात किसी मूल्य पर भो क्षमा नहीं किया जाता है।
उपासना करना देवता से छल करना है अथवा श्रद्धा, आस्था या भक्ति न होने पर भी जो किसी स्वार्थ सिद्धि के लिए वैसा करता है वह भी देवताओं से छल करता है। अथवा किसी साधना से देव कृपा प्राप्त कर लेने पर उसका उपयोग परमार्थ में न करके स्वार्थ में करने वाला अथवा उसके प्रभाव से दूसरों को भयभीत या आतंकित करने वाला देवताओं से छल नहीं करता बल्कि उन दिव्य शक्तियों के साथ विश्वासघात करता है। ऐसा विश्वासघात किसी मूल्य पर भो क्षमा नहीं किया जाता है। वह दिन रात आत्म-जन्य ताप से तो जलता ही रहता है साथ ही रौरव जैसे नरक में उसके लिए स्थान की व्यवस्था होती रहती है। ऐसे मिथ्यावादी लोगों का सुख-शान्ति के लिए तरसते रहना स्वाभाविक ही है।
उपासना या योग-साधनाओं से नाड़ी शोधन क्रिया होती है शुद्ध हुई सुषुम्ना में मन का प्रवाहित होना ही दिव्य स्वप्न दिखाता है उस समय एक विराट क्षेत्र में हमारी चेतना तैर रही होती है इसीलिये दिव्य आकृतियाँ, ग्रह नक्षत्र, पर्वत नदी, हरे-भरे स्थान दिखाई देते हैं। हमारे संस्कारों में अनेक जन्मों की स्मृतियाँ होने के कारण मन की चंचलता रेडियो की खड़खड़ाहट की तरह तब भी रहती है पर इन अनुभूतियों का लाभ कठिन परिस्थितियों में भी निरन्तर आत्म-विकास की और उन्मुख रहने में लिया जा सकता है।
उपासना के साथ संयम को आवश्यक ही नहीं अनिवार्य माना गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-February
उपासना जप और स्तुति व जप-तप से नहीं होती कर्म से भी होती है। यह विराट् जगत उन्हीं का प्रकट रूप है यहाँ जो दीन-दुःखी जन है उनकी सेवा करना, जो पिछड़े और दलित लोग है उन्हें आत्म-कल्याण का मार्ग दिखाना भी भगवान् का ही भजन है। इस दृष्टि से मैंने जो किया वह झूठ नहीं , ईश्वर की सच्ची उपासना ही है।
उपासना किया करते हैं इस तरह झूठ बोलने का पाप तो आपको लगेगा ही ?
उपासना एवं पर्व उत्सव, नदी , नाले , जंगल, पर्वत, खेत , खलिहान, विश्वास, मन्तव्य मान्यताओं आदि में से ढेर से सद्गुणों का संचय कर हम अपनी मनोवृत्ति को सतोगुणी बना सकते हैं और आत्म-पुलक का शाश्वत सुख उपलब्ध कर सकते हैं।
उपासना करते हैं वे स्वयं सपत्नीक है। राम, कृष्ण, शिव, विष्णु आदि किसी भी देवता को ले सभी विवाहित है। सरस्वती, लक्ष्मी, काली जैसी देवियों तक को दाम्पत्य जीवन स्वीकार रहा है। हर भगवान और हर देवता के साथ उनकी पत्नियाँ विराजमान है फिर उनके मनो को अपने इष्ट देवों से भी आगे निकल जाने की बात क्यों सोचनी चाहिए ?
उपासना और साधना साथ-साथ मिल कर चली है। परमात्मा को हमने इसलिए पुकारा कि वह प्रकाश बनकर आत्मा में प्रवेश करे और तुच्छता को महानता में बदल दे। उसकी शरण में इसलिए पहुँचे कि उस महत्ता में अपनी क्षुद्रता विलीन हो जाये। वरदान केवल यह माँगा कि हमें वह सहृदयता और विशालता मिले जिसके अनुसार अपने में सब को और सब को अपने में अनुभव किया जा सकना संभव हो सके। 24 महा गुरुचरणों का जप, ध्यान, तप, संयम सब इसी परिधि के इर्द-गिर्द घूमते रहे हैं।
उपासना के लिए समय निकालते। युद्ध से वापस होते ही वे अपनी व्यक्तिगत साधना में लग जाते । इस समय उन्होंने किसी से भी न मिलने का नियम बनाया था।
उपासना का ही एक अंग मानते थे, अपनी वैयक्तिक समस्याओं के लिए उन्होंने कभी भी पराश्रय नहीं लिया।
उपासना भजन- कीर्तन और भारतीय पद्धति के संगीत का आनन्द लेने आने लगेंगे।
उपासना-कक्ष से निकल चलने लगे तो शेष पाँडव भी छिपकर उनके पीछे-पीछे हो लिये। उन्होंने देखा महाराज युधिष्ठिर हाथ में कुछ लिए उधर की ओर बढ़ रहे हैं जिधर दिन में संग्राम होता था। यह देखकर पांडवों की उत्सुकता और भी बढ़ गई। वे अपने को छिपाये उनका पीछा करते चले गये।
उपासना ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-January
उपासना में भी संगीत को हृदय की वाणी का नाम दिया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-June
उपासनाएं की है, ऐसे ढेरों आदमियों के नाम बता सकता हूं, जिन्होंने इस तरह की उपासना की हैं। लेकिन यह सही बात- ईमानदारी की यह बात है की हमारे गुरु की गुरु शक्ति की सामर्थ्य हमें बराबर मिलती रही है। और उसी के आधार पर हम कठपुतलियों की तरह तमाशा करते आये हैं। आप भी आइये, आपके लिए भी रास्ता खुला है।
उपासना करना ही मुश्किल है। माँ और बेटे का सम्बन्ध निभाना ही मुश्किल है। पंचमुखी गायत्री की, पांच देवताओं की उपासना कर रहे हैं, पाँच इष्टों की की उपासना कर रहे हैं, पाँच शक्तियों की उपासना कर रहे हैं, क्योंकि हमें पांच क्षेत्रों में काम करना है। बुद्धिजीवियों के साथ काम करना है। हमको राजनेताओं की अक्ल ठिकाने लगाना है।
उपासना आत्मा की खुराक है। शरीर का आहार जितना अनिवार्य नहीं, उतना आत्मिक आहार अनिवार्य है। चाणक्य नीति में कहा गया है-
उपासनाक्रम को पूरा करने के अतिरिक्त चार घंटा नित्य युगसाहित्य सृजन में लगता रहा। उसी का परिणाम है की कछुआ खरगोश से आगे जा पहुंचा। चीलों ने गरुड़ों से पहले मंजिल पूरी कर ली। "
उपासना व प्राणायाम जैसे पुण्यकार्यों में ही नियोजित करें। संध्या दिन-रात्रि के बीच की वह कालावधि है, जिसमें न दिन का सूर्य दिखाई देता है, न रात के नक्षत्र-
उपासना कर रहे हैं, पाँच इष्टों की की उपासना कर रहे हैं, पाँच शक्तियों की उपासना कर रहे हैं, क्योंकि हमें पांच क्षेत्रों में काम करना है। बुद्धिजीवियों के साथ काम करना है। हमको राजनेताओं की अक्ल ठिकाने लगाना है। हम कलाकारों को एक खास रास्ते पर ले जायेंगे। हम सम्पन्न आदमियों से कुछ कम कराएंगे और आप जैसे लोगों से, जिनको हम भावनाशील कहते हैं।
उपासना कर रहे हैं, पाँच शक्तियों की उपासना कर रहे हैं, क्योंकि हमें पांच क्षेत्रों में काम करना है। बुद्धिजीवियों के साथ काम करना है। हमको राजनेताओं की अक्ल ठिकाने लगाना है। हम कलाकारों को एक खास रास्ते पर ले जायेंगे। हम सम्पन्न आदमियों से कुछ कम कराएंगे और आप जैसे लोगों से, जिनको हम भावनाशील कहते हैं।
उपासना की है। तो आपने हमें क्यों नहीं बताया पंचमुखी गायत्री की उपासना? इसलिए की आप इसे नहीं कर सकते हैं। आपको एक मुखी गायत्री की उपासना करना ही मुश्किल है। माँ और बेटे का सम्बन्ध निभाना ही मुश्किल है।
उपासना कर रहे हैं, क्योंकि हमें पांच क्षेत्रों में काम करना है। बुद्धिजीवियों के साथ काम करना है। हमको राजनेताओं की अक्ल ठिकाने लगाना है। हम कलाकारों को एक खास रास्ते पर ले जायेंगे। हम सम्पन्न आदमियों से कुछ कम कराएंगे और आप जैसे लोगों से, जिनको हम भावनाशील कहते हैं।
उपासना का उपदेश देकर अपनी विचारणा शक्ति बढ़ाने के लिए, बिदा का दिया। क्योंकि उनके सोचने के सीमा ब्रह्मतत्त्व की परिधि में अभी प्रवेश का सकने योग्य सूक्ष्म बनी न थी। "
उपासना? इसलिए की आप इसे नहीं कर सकते हैं। आपको एक मुखी गायत्री की उपासना करना ही मुश्किल है। माँ और बेटे का सम्बन्ध निभाना ही मुश्किल है। पंचमुखी गायत्री की, पांच देवताओं की उपासना कर रहे हैं, पाँच इष्टों की की उपासना कर रहे हैं, पाँच शक्तियों की उपासना कर रहे हैं, क्योंकि हमें पांच क्षेत्रों में काम करना है।
उपासना
पांच वीरभद्रों का जागरण
उपासना की हैं। लेकिन यह सही बात- ईमानदारी की यह बात है की हमारे गुरु की गुरु शक्ति की सामर्थ्य हमें बराबर मिलती रही है। और उसी के आधार पर हम कठपुतलियों की तरह तमाशा करते आये हैं। आप भी आइये, आपके लिए भी रास्ता खुला है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-January
उपासनाक्रम के रूप में, मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव बनाने के लिए सामूहिक महासाधना के नियोजन के रूप में एक दिव्य महापुरश्चरण सन्निकट का आश्विन नवरात्र से शाँतिकुँज में आरंभ किया गया है। नाम है ‘युगसंधि महापुरश्चरण ‘। शाँतिकुँज हरिद्वार से संचालित यह पुण्य आयोजन सारे भारत व विश्व में सन् 2000 तक चलता रहेगा, इक्कीसवीं सदी के आरंभ के साथ ही उसकी पूर्णाहुति होगी, जिसे साधना के अनुरूप ही इतना बड़ा कहा जा सकेगा कि उसी तुलना अब तक के किसी भी विशालतम समागत से भी न की जा सकें ‘ परमपूज्य गुरुदेव द्वारा ये पंक्तियाँ आज से 10 वर्ष 4 माह पूर्व अक्टूबर, 1988 की अखण्ड ज्योति में लिखी गयी थी। युगसंधि की विषम वेला में उनने इस साधना को प्रत्येक के लिए अनिवार्य बताते हुए उसके भागीदारों की संख्या समापन होते-होते प्रायः चौबीस करोड़ से भी अधिक होने की बात कही थी।
उपासना में लगाया, जिसे चौबीस साल तक विधि-विधानपूर्वक किया। हमने अपने गुरुदेव से एक प्रश्न पूछा कि पूज्यवर हमारी एक शंका है। आप बतलाये कि गुरुओं की खोज में लोग छुट्टी लेते हैं, मेडिकल लीव लेते हैं, घर-बार छोड़ते है, तब जाकर शायद किसी कोने में कोई सच्चा गुरु मिलता है, परन्तु आप तो स्वयं हमारे पास चलें आये, यह क्या बात है? पूज्यवर ने बतलाया -बेटे! धरती क्या बादलों के पास जाती है या बादल स्वयं उसके पास आते है धरती पर? हमने कहा ’बादल स्वयं आते है एवं धरती पर बरस जाते है।
उपासना-भक्तियोग साधना-ज्ञानयोग एवं आराधना-कर्मयोग हमारे जीवन में समाविष्ट नहीं होती, स्थिति और भी विषम ही होती चली जाएगी एवं सुख -चैन दूभर ही रहेगा। परमपूज्य गुरुदेव जो राष्ट्र की स्वतंत्रता के प्रत्यक्ष साक्षी रहे, इस तथ्य को जानते थे कि सदियों से गुलाम रहा यह देश जब अंकुश हटने पर उदारीकरण की हवा लगेगी तो गड़बड़ा सकता हैं इसीलिए उनने राष्ट्र को समर्थ-समृद्ध व सशक्त बनाने के लिए राष्ट्र के नागरिकों को एक श्रेष्ठ साधक के रूप में निखरने हेतु अनेकानेक उपचारों का प्रावधान किया, गायत्री को सार्वजनीन बनाया एवं यज्ञीय तत्त्वदर्शन के विश्वभर में विस्तार द्वारा सत्कर्म व पर्यावरण -संशोधन की प्रक्रिया को परिपूर्णता तक पहुँचाया। प्रस्तुत साधना महापुरश्चरण राष्ट्र के साँस्कृतिक पुनर्जागरण हेतु अनिवार्य माना जा सकता है व समय की विषमता से जूझने हेतु एक आध्यात्मिक महापुरुषार्थ भी। यह भी एक प्रसन्नता की ही बात मानी जानी चाहिए कि इस प्रखर साधना पराक्रम के शुरुआती दीप प्रज्ज्वलन के रूप में पिछले दिनों गायत्रीतीर्थ शाँतिकुँज हरिद्वार में एक अन्तर्राष्ट्रीय योगसम्मेलन भी सफलता-पूर्वक आयोजित हो कर इस उपक्रम का शानदार शुभारम्भ हो चुका है।
उपासनाक्रम के रूप में, मनुष्य में देवत्व उपासनाक्रम के रूप में, मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव बनाने के लिए सामूहिक महासाधना के नियोजन के रूप में एक दिव्य महापुरश्चरण सन्निकट का आश्विन नवरात्र से शाँतिकुँज में आरंभ किया गया है। नाम है ‘युगसंधि महापुरश्चरण ‘। शाँतिकुँज हरिद्वार से संचालित यह पुण्य आयोजन सारे भारत व विश्व में सन् 2000 तक चलता रहेगा, इक्कीसवीं सदी के आरंभ के साथ ही उसकी पूर्णाहुति होगी, जिसे साधना के अनुरूप ही इतना बड़ा कहा जा सकेगा कि उसी तुलना अब तक के किसी भी विशालतम समागत से भी न की जा सकें ‘ परमपूज्य गुरुदेव द्वारा ये पंक्तियाँ आज से 10 वर्ष 4 माह पूर्व अक्टूबर, 1988 की अखण्ड ज्योति में लिखी गयी थी। युगसंधि की विषम वेला में उनने इस साधना को प्रत्येक के लिए अनिवार्य बताते हुए उसके भागीदारों की संख्या समापन होते-होते प्रायः चौबीस करोड़ से भी अधिक होने की बात कही थी।
उपासना, प्रार्थना करते है, वह सर्वात्मा एवं पवित्रात्मा ही समझा जाना चाहिए। व्यक्तिगत परिधि को संकीर्ण रखने और पेट तथा प्रजनन के लिए ही सीमाबद्ध रखने वाली वासना-तृष्णा भरी मूढ़ता को ही माया कहते है। इस भवबन्धन से, मोह-ममता से छुड़ाकर आत्म-विस्तार के क्षेत्र को व्यापक बना लेना ही आत्मोद्धार है। इसी को आत्म-साक्षात्कार कहते है। प्रार्थना में अपने उच्च आत्म-स्तर से, परमात्मा से यही प्रार्थना की जाती है कि वह अनुग्रह करे और प्रकाश की ऐसी किरण प्रदान करें जिससे सर्वत्र दीख पड़ने वाला अन्धकार-दिव्य प्रकाश के रूप में परिणत हो सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-September
उपासनागृहों -देवालयों, तीर्थों तथा रोटरी लायन्स क्लब भारत विकास परिषद जैसे समाजसेवी संगठनों से संपर्क, अपने परिजनों को अभी से आरंभ करना होगा। इसमें हमें जन-जन तक पहुँचने, सबसे सद्भाव स्थापित करने का मौका मिलेगा, साथ ही महापूर्णाहुति का एक पूर्वाभ्यास भी संपन्न हो जाएगा, जिसमें संभवतः इन सभी संगठनों की हम पुनः भागीदारी करा सकेंगे।
उपासनागृहों में एक साथ संपन्न इस दीपयज्ञ के माध्यम से महापूर्णाहुति वर्ष में किए जानेवाले संकल्पों की, राष्ट्रनिर्माण की प्रतिज्ञाओं की घोषणा की जाएगी। हर परिजन अपनी भूमिका-भागीदारी का स्वरूप एवं अपने प्रभाव क्षेत्र का तब तक अध्ययन कर चुका होगा। ये सभी घोषणाएँ इस वेला में होंगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-March
उपासना।
उपासना क्यों और किसी? गायत्री से अंतः कायाकल्प।
उपासना के साथ जब भी जोड़ा जाता है, वह आत्मिक प्रगति के साथ भौतिक प्रगति का भी लक्ष्य पूरा करता है। ईश्वरप्राप्ति-जीवनलक्ष्य की प्राप्ति जैसे महानतम उद्देश्यों के कारण उपासना व ध्यान परस्पर जोड़कर किये जाते हैं व तुरंत लाभ भी देते हैं। विभिन्न संप्रदायों तथा विधियों में उसके प्रकारों में थोड़ा-बहुत अंतर भले ही हो, पर ध्यान का समावेश हर पद्धति में है।
उपासना पद्धति के नाम पर बनाये गये विभिन्न मार्गों-संप्रदायों के नाम पर परस्पर लड़ने लगेंगी, एक-दूसरे की जान लेंगी-और एक-दूसरे के पूजा गृहों को आग लगाएँगी। जब ईश्वर एक ही है, तब किसी का धर्मांतर जबरदस्ती, प्रलोभन से या भय से करना उतना ही बड़ा पाप है, जितना कि किसी दूसरे संप्रदाय से घृणा, द्वेष रखते हुए उन पर अत्याचार करना। भारतवर्ष में आज घट रही घटनाएँ एक गलत होली के जलने का संकेत दे रही हैं। जहाँ जातिगत एकता के सद्भाव से-मनोमालिन्य दूर होने के मैत्री भाव से होलिका पर्व मनाया जाता था- उस देश में आज जाति-वर्ग के नाम पर एक-दूसरे का सामूहिक नरसंहार किया जा रहा है। निरीह-भोले छोटे-छोटे बच्चों का क्या दोष है कि वे किसी जाति विशेष में पैदा हुए।
उपासना या प्रार्थना करते हैं, वह सर्वात्मा है और पवित्रात्मा है।
उपासना के कारण पूर्वजन्म की स्मृति रह जाती है।”
उपासना करनी चाहिए जिससे उसके
उपासना विज्ञान की दृष्टि में, रोगोपचार हेतु।
उपासना, जीवनसाधना, सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन की पुण्य-परमार्थ वाली युग-साधना हेतु पाना चाहते हैं, तो रामनवमी 25 मार्च के बाद आरंभ हो रहे विशिष्ट पाँच दिवसीय व्यक्तित्व परिष्कार-युग साधना सत्रों में भागीदारी कर सकते हैं। ये पाँच दिवसीय सत्र चार माह तक गुरुपूर्णिमा के बाद तक चलेंगे। पहले कितने भी साधनासन्न किये हो, यदि कुछ विशेष अनुदान पाना है- ऋषियुग्म की सत्ता का विशिष्ट सूक्ष्म मार्गदर्शन पाना है, तो यह अवसर महापूर्णाहुति की पूर्व बेला में अपने आप में एक विलक्षण अनुग्रह के रूप में आया है। मार्च के अंतिम सप्ताह में 26 मार्च, 1999 से आरंभ प्रतिमास पाँच-इस प्रकार कुल पच्चीस ये सत्र 30 जुलाई तक चलेंगे। इस वर्ष 28 जुलाई की गुरुपूर्णिमा है।
उपासनात्मक धार्मिक कृत्यों का नित्य-नियम रखना चाहिए। भूमिशयन एवं ब्रह्मचर्य पालन का विधान आवश्यक है। व्रत का संकल्प लेते समय मुंडन कराने का भी शास्त्र आदेश है, साथ-ही-साथ चांद्रायण का उत्तरार्द्ध पक्ष यह है कि जो खाई खोदी गयी है अर्थात् जो दुष्कृत्य अपने से बन पड़े है, उनकी किसी-न-किसी रूप में भरपाई की जाय। व्रत की समाप्ति पर सामर्थ्यानुसार हवन-यज्ञ ब्राह्मण या कन्याभोज, ब्रह्मभोज जैसे उपक्रम भी अपनाये जा सकते हैं।
उपासना व ध्यान परस्पर जोड़कर किये जाते हैं व तुरंत लाभ भी देते हैं। विभिन्न संप्रदायों तथा विधियों में उसके प्रकारों में थोड़ा-बहुत अंतर भले ही हो, पर ध्यान का समावेश हर पद्धति में है।
उपासना करता है, उसके जीवन में कोई अभाव नहीं रह जाता। प्राचीन प्रमुख ऋषि-मुनियों की आराधना का आधा गायत्री रहा है। गायत्री की अनुष्ठान परक साधनाएँ जानने के लिए पढ़िए-
उपासना को जीवन -साधना के रूप में फलित कर निज के व्यक्तित्व परिष्कार के रूप में उसे संपन्न कर दिखाना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-February
उपासना द्वारा मनुष्य जीवन की सार्थकता।
उपासना करते हैं- यथा ॐ नमः शिवाय, हरे कृष्ण, हरे राम, जय श्री कृष्ण, जय श्री राम, नमो भगवते वासुदेवाय, शब्द कीर्तन, जैन धर्म की प्रार्थना, नमाज के समय की प्रार्थना अथवा बाइबिल की प्रार्थना-का भाव और जोड़ लें। भावविह्वल होकर दस पंद्रह मिनट निर्धारित समय पर नित्य प्रार्थना करें। यदि सहमत हो सकें तो इष्टमंत्र, नाम-जप के साथ ही गायत्री मंत्र, उसका भावार्थ अथवा मात्र पञ्चाक्षरी जप की एक माला जपने के लिए प्रेरित किया जाय।
उपासना द्वारा।
उपासना करते हैं, वह वस्तुतः अपने भीतर की, व्यक्तित्व के विकास की उपासना है। हमें न तो भगवान के सामने नाक रगड़ने की आवश्यकता है और न पूजा करने की आवश्यकता है। बिजली के बारे में जिनको जानकारी होती है वे घर में बैठे रहकर उसके बटन दबाते रहते हैं, जिससे घर के पंखे चलते रहते हैं, बल्ब जलते रहते हैं। अतः उस बिजली के बारे में भी आपको सही जानकारी होनी चाहिए।
उपासना’ के अभियान ने विगत पाँच वर्षों में तेजी से गति पकड़ी है एवं अनीति-अनाचार-अनास्था से विषाक्त होते चले जा रहे वातावरण को परिमार्जित कर और न बिगड़ने देने की दिशा में बहुत कुछ मदद की है। देव-संस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत संपन्न हुए अश्वमेध महायज्ञों की ऊर्जा को सितम्बर-अक्टूबर 1996 से लगातार चल रहे संस्कार महोत्सवों की श्रृंखला ने जन-जन तक पहुँचाया है व अगणित प्राणवानों की ऊर्जा को भली-भाँति मथा है। संस्कारों के प्रचलन-प्रभावशीलता में तेजी आयी है, उससे परिवार संस्था ही नहीं-समाजपरिकर भी प्रभावित हुआ है, पर इतना ही पर्याप्त नहीं है। जब अनास्था का असुर तेजी से पैर पसार रहा हो- भारतीय संस्कृति की मान्यताओं पर अन्तरिक्षीय जगत से लेकर पठन-पाठन तक के माध्यमों, इलेक्ट्रॉनिक व प्रिन्ट मीडिया द्वारा निरन्तर हमला जारी हो तो श्रेष्ठ वातावरण बनाये जाने के प्रयासों को द्रुतगति से क्रियान्वित ही नहीं करना होगा, लोगों को वे सर्वमान्य हो सकें, यह पुरुषार्थ भी करना होगा। जाति-सम्प्रदाय प्रचलनों, रीति-रिवाजों की भिन्नता वाले हमारे राष्ट्र व सारे विश्व में श्रेष्ठ आस्थाओं के प्रति लगन को एक महामारी की तरह फैलाने के लिए ही यह साधना रूपी महासमर आरंभ हुआ था व अंतिम दो वर्षों में उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के रूप में यह भूमि के चप्पे-चप्पे में फैलने जा रहा है।
उपासना क्यों बन्द कर दी? सन्त मधुर वाणी में बोले- वत्स! भगवान की इच्छा है कि उनके संसार में कोई दुःखी न रहे। उनकी इच्छा की पूर्ति आवश्यक है। दूसरों की सेवा से ही उपासना सफल होती है।
उपासना भगवत् अनुकंपा का पात्र बनाती है। इसमें पढ़ें और पाएँ-
उपासना में असत से सत की ओर अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की, अज्ञान में ज्ञान की स्थापना की विलक्षण शक्ति है। एकाकी साधना द्वारा वह मात्र जपकर्ता को, साधक को लाभान्वित करती है, तो सामूहिक अनुष्ठानों द्वारा उससे सारा समाज, राष्ट्र एवं युग प्रभावित होता है, इस अकाट्य सत्य से कोई इनकार नहीं कर सकता। आज सारे समाज में अचिन्त्य चिन्तन के कारण दुर्मति-जन्य दुर्गति-नैतिक पतन, लिप्साओं की होड़ एवं क्षुद्र अहंकार रूपी विष जो समा गया है, उसे धोने के लिए गायत्री रूपी सद्ज्ञान एवं यज्ञरूपी सत्कर्म के साथ संस्कारों की पावन त्रिवेणी के विस्तार की क्रान्ति खड़ी करने की आवश्यकता इसीलिए सर्वाधिक पड़ रही है कि इससे कम में आध्यात्मिक वातावरण विनिर्मित होगा नहीं। वातावरण में प्रविष्ट की गयी श्रेष्ठ आस्थाएँ ही इस देश की नहीं, अपितु समूचे विश्व को उत्कृष्टता के प्रति निष्ठावान् बनाए रख सकेंगी। वातावरण का प्रभाव सभी भली-भाँति जानते हैं।
उपासना भी आत्मा की एक अनिवार्य आवश्यकता है। निष्काम भाव से की गई उपासना भगवत् अनुकंपा का पात्र बनाती है। इसमें पढ़ें और पाएँ-
उपासना और भविष्य-निर्माण की आराधना, इन तीन पक्षों पर टिका हुआ है जागृति का विज्ञान। इसमें व्यक्तित्व को परिष्कृत कर ऊर्ध्वगमन की प्रक्रिया योग त्रयी द्वारा सम्पन्न की जा सकती है, पढ़-
उपासना करें, पूजा एवं ध्यान योग का मर्म।
उपासना एक अनिवार्य आवश्यकता, उपासना फलवती कैसे हो? उपासना करें तो इस तरह। उपासना के साथ भावना भी।
उपासना भारतीय अध्यात्म के मूल मर्म के रूप में आदिकाल से रही है, इसीलिए वेदों में ऋषिगणों द्वारा कहा जाता रहा है- मही देवस्य सवितुः परिष्टुति- महान है सविता देवता रूपी व्यापक तेज की अभ्यर्थना-स्तुति जो रचयिता है- मानव मात्र का पोषक है, वही सविता है। प्रसविता शब्द इसी कारण इसके लिए प्रयुक्त होता है अर्थात् मानवमात्र का पालन-पोषण करने वाला। सूर्यदेव की उपासना को भारतीय संस्कृति में इसी कारण अति महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता रहा है। अक्षय शक्ति के स्रोत परमदेव सविता के बारे में जानने-उनकी महत्ता समझने के उपरान्त यह महत्वपूर्ण है कि उनसे संबंध जोड़ने के सूत्रों को हृदयंगम किया जाय। संबंध न जुड़ने व बने रहने से ही आज की आस्था संकट की विभीषिका पैदा हुई, यदि यह कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी।
उपासना करें तो इस तरह। उपासना के साथ भावना भी।
उपासना अधिक फलवती होती है। हमें पाषाण नहीं, देवत्व की आत्मा को मूर्ति-रूप में पूजना है। इतना कर सके तो समझा जा सकेगा कि साधना वर्ष का आयोजन सफल ही नहीं शानदार भी रहा। देवालयों को इस प्रखर साधना वर्ष में साधना केन्द्रों के रूप में विकसित करके ही भारत को पुनः देवभूमि का गौरव प्रदान किया जा सकता है।
उपासना से आदमी का अपना बाह्यान्तर मात्र प्रभावित हो सकता है, अधिक-से-अधिक परिवारजन व पड़ोसी प्रभावित होते देखे जा सकते हैं, किन्तु जब इन प्रेरणाओं को व्यापक रूप से जनशक्ति तक प्रवाहित करना होता है, तो उन्हें सामूहिक रूप देना पड़ता है। गायत्री मंत्र के -धियो यो नः प्रचोदयात्’ में यही शक्ति छिपी पड़ी है- जिसे सामूहिकता के परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है। ‘धियः’ अर्थात् हमारी, प्रचोदयात्, अर्थात् बलात् श्रेष्ठता की ओर प्रवृत्त करना। जहाँ ‘नः’ है, वहाँ व्यक्ति से परे समष्टि का, विराट अहं का सामूहिकता का भाव आ जाता है। जब हम सामूहिकता अनुष्ठान करते हैं, तो इस ‘नः’ में प्रचण्ड शक्ति आ जाती है, क्योंकि कई प्राणवानों की ऊर्जा उसमें समन्वित हो जाती है एवं सारे वातावरण को आंदोलित कर देने की, इच्छित दिशा में मोड़ देने की शक्ति उस अनुष्ठान में पैदा हो जाती है।
उपासना के साथ भावना भी।
उपासना छोड़कर अगर अपने व्यक्तित्व का विकास करने का प्रयास करें, अपने आप का सुधार करने का प्रयास करें तो यह जीवन स्वर्गमय हो सकता है तथा हम सारी चीजें प्राप्त कर सकते हैं। उस परिस्थिति में मनुष्य देवता बन जाता है, पैगम्बर बन जाता है। यह कार्य अपने आपको परिष्कृत करने से ही संभव होता है। अध्यात्म खुशामद करने का, नाक रगड़ने का नाम नहीं है। वास्तव में इसके लिए मनुष्य को तपाने की आवश्यकता है।
उपासना- अभ्यर्थना पर केन्द्रित रहे। इसी ने विराट गायत्री परिवार का सृजन किया, इसी ने युगनिर्माण की आधारशिला रखी और वही युगपरिवर्तन का अगले दिनों निमित्त बनने जा रहा है। सविता-अमृतत्व का स्रोत है। इसकी उपासना साधक के जीवन में प्राणशक्ति का संचय करने में मदद करती है- मन में उल्लास तरंगित करती और आत्मा को उसके अमृत स्वरूप का बोध कराती है। इसीलिए इसकी साधना के विज्ञान को मधुविद्या कहा गया है।
उपासना को भारतीय संस्कृति में इसी कारण अति महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता रहा है। अक्षय शक्ति के स्रोत परमदेव सविता के बारे में जानने-उनकी महत्ता समझने के उपरान्त यह महत्वपूर्ण है कि उनसे संबंध जोड़ने के सूत्रों को हृदयंगम किया जाय। संबंध न जुड़ने व बने रहने से ही आज की आस्था संकट की विभीषिका पैदा हुई, यदि यह कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी। प्रस्तुत प्रखर साधना वर्ष में सविता देव के तेज के ध्यान के साथ सद्बुद्धि की प्रार्थना-उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ भावनापरक ध्यान इसी कारण अति महत्वपूर्ण बताया गया है।
उपासना पद्धति का निर्धारण क्यों? इन प्रश्नों का उत्तर भी बड़ा स्पष्ट मिला जाता है।
उपासना साधना तथा आराधना में लीन रहा। यह सब मन तथा हृदय को अच्छा भी लगता रहा, परन्तु ऐसी मनःस्थिति कभी नहीं बन पायी, जैसी कि आप बनी।
उपासना-साधना-आराधना के आधार पर आत्मपरिष्कार करेंगे, धार पैनी करेंगे और इतनी अंतःक्षमता अर्जित करेंगे, जिसके आधार पर उनसे कुछ महत्वपूर्ण कार्य करते बन पड़े।
उपासना पद्धति से नहीं जुड़े हैं-पहले चरण में मात्र दस मिनट ईश्वर की प्रार्थना इस भाव से करें कि सभी अनिष्ट से बचें, सबको सद्बुद्धि मिले व सभी उज्ज्वल भविष्य तक पहुँचे। इसके लिए निम्नलिखित भाषा विभिन्न भाषाओं में अनुवाद कर, टाइप कराके, छपवाकर वितरित की जा सकती है, ताकि अशिक्षितों को भी याद कराया जा सके व अपनी भाषा का भाव भी उनके मन में बना रहें, यह प्रार्थना है- ‘हे प्रभु आप हम सबको सद्बुद्धि दें, उजला भविष्य दें। प्रभु! मैं सदैव अच्छा ही सोचूँ, अच्छे ही कर्म ही करूं।’ दुहराई जा सकती है व इस दौरान अपने इष्ट का अथवा सूर्य के उगते स्वरूप का ध्यान भी किया जा सकता है।
उपासना साधक के जीवन में प्राणशक्ति का संचय करने में मदद करती है- मन में उल्लास तरंगित करती और आत्मा को उसके अमृत स्वरूप का बोध कराती है। इसीलिए इसकी साधना के विज्ञान को मधुविद्या कहा गया है। छान्दोग्य उपनिषद् के प्रथम खण्ड के प्रथम बारह श्लोकों में इसका विस्तृत विवरण पढ़ा जा सकता है। आज जो प्राणशक्ति का ह्रास तेजी से होता जा रहा है, उसमें यदि किसी का सहारा है, तो मात्र सविता साधना का- जिसकी शक्ति के संदोहन से मानवमात्र को चिरयौवन की-देवताओं के समकक्ष अमरत्व की प्राप्ति हो सकती है।
उपासनात्मक उपचार के द्वारा ही किया जा सकता है। चिंतन में पवित्रता का समावेश किए जाने के लिए साधनात्मक प्रयास इंद्रिय, समय, अर्थ व विचार चारों स्तर पर संयम किए जाने के माध्यम से संपादित होने चाहिए। आध्यात्मिक चिंतन ही स्वच्छ मन का जन्मदाता माना जाना चाहिए। अपने-अपने इष्ट के प्रति समर्पण भाव जब राष्ट्र देवता के प्रति समर्पण में रूपान्तरित होता है, तो ऐसा मन समष्टि के साथ मिलकर एक विराट-समूह मन का निर्माण करता है जिसमें परिवर्तन हेतु अनिवार्य क्राँतिकारी शक्ति होती है।
उपासना की महत्ता एवं विधि-व्यवस्था-षट्कर्म के उद्देश्य, प्रतीक पूजा का औचित्य, जप और ध्यान का विज्ञान।
उपासना अर्थात् ईश्वर के पास बैठना, जीवन-शोधन
उपासना के पहले, भजन के पहले हमें अपने मस्तिष्क एवं शरीर को सात्विक बनाना होगा, ताकि भगवान हमारे शरीर में उपस्थित हो सकें और हमारे मस्तिष्क में प्रेरणा दे सकें। इसके लिए हमें सात्विक आहार का सेवन करना होगा।
उपासना-समर्पण योग
उपासना के साथ कामनाएँ जोड़ना ओछापन है। सच्चे सन्त उससे अपने आपको सदैव बचाकर रखते हैं, यही उनकी महानता की पहचान होती है।
उपासना फलवती कैसे हो? उपासना करें तो इस तरह। उपासना के साथ भावना भी।
उपासना पर क्या प्रभाव पड़ता है। हमने चौबीस साल तक जौ की रोटी एवं छाछ का सेवन किया है। इस बीच न नमक खाया है, न शक्कर। आप पूछते हैं कि गुरुजी आपने कौन-सा बीजमंत्र लगाया है? हमने अपनी साधना में केवल सात्विक आहार का सेवन किया है।
उपासना समर्पण योग (वा0 क्र0 3) से
उपासना है। हमें न तो भगवान के सामने नाक रगड़ने की आवश्यकता है और न पूजा करने की आवश्यकता है। बिजली के बारे में जिनको जानकारी होती है वे घर में बैठे रहकर उसके बटन दबाते रहते हैं, जिससे घर के पंखे चलते रहते हैं, बल्ब जलते रहते हैं। अतः उस बिजली के बारे में भी आपको सही जानकारी होनी चाहिए।
उपासना संबंधी भ्रांतियों का निवारण।
उपासना सफल होती है।
उपासना की पहली सीढ़ी सात्विकता है। अतः आपको यह ध्यान रखना होगा कि आप चाहे यहाँ रहें अथवा कहीं भी रहें, आपको इसी प्रकार सात्विक अन्न-आहार का प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार अगर आप करेंगे तो आपको पता चलेगा कि सात्विक आहार का भजन-पूजन पर, साधना-उपासना पर क्या प्रभाव पड़ता है। हमने चौबीस साल तक जौ की रोटी एवं छाछ का सेवन किया है। इस बीच न नमक खाया है, न शक्कर।
उपासना में अपने को लगाते हैं। इस युगसंध्या में भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं की आपाधापी पर नियंत्रण करके जीवित रहने भर के लिए आवश्यक निर्वाह की व्यवस्था बनाकर तप-साधना में स्वयं प्रवृत्त होने और अन्यों को इसके लिए प्रेरित करने की बात सोचनी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-May
उपासना जो बल देता है, उसका नाम अन्न है। यह सात्विक होना चाहिए इससे मन पवित्र, स्थिर और शाँत रहता है। अगर आपका मन ठीक नहीं रहता है, तो साधना-उपासना का मूल आप समझ नहीं पाए है, फिर मैं आपको कैसे समझा सकता हूँ, जब आपके दिमाग में कूड़ा भरा है। उस गन्दगी को आपके दिमाग से हम कैसे साफ कर सकते है। इसकी सफाई आपको स्वयं ही करनी होगी।
उपासना का मूल आप समझ नहीं पाए है, फिर मैं आपको कैसे समझा सकता हूँ, जब आपके दिमाग में कूड़ा भरा है। उस गन्दगी को आपके दिमाग से हम कैसे साफ कर सकते है। इसकी सफाई आपको स्वयं ही करनी होगी।
उपासना के अनेकानेक आयाम खोले- उसे युग धर्म से जोड़कर आराधना का, विश्वब्रह्मांड की सेवासाधना का विराट रूप दे दिया। विचार क्राँति के माध्यम से आसुरी चिंतन को निरस्त करने हेतु एक व्यापक ज्ञानयज्ञ उन्होंने रचा। सबसे बड़ी बात गायत्री व यज्ञ को एक सीमित दायरे से निकलकर उसे जनसुलभ बना दिया। यह अवतारी स्तर की जगद्गुरु स्तर की चेतना ही कर सकती है। पूज्यवर कहते है -हर अवतार ने अपने समय की विकृतियों के समाधान का नेतृत्व अवश्य किया, पर उनके पीछे वस्तुतः अपार जनशक्ति थी।
उपासना, ध्यान, पढ़ाई आदि में मन लगता है। स्वाध्याय की प्रति रुचि जगती है। पाचक अग्नि तीव्र होकर क्षुधा को बढ़ाती है। वेद में जल को अमृत और जीवन का नाम दिया है।
उपासना के क्षेत्र में आगे कैसे बढ़ेंगे? एक दिन हमने आपको आहार-विहार के बारे में बताया था, साथ ही यह भी चर्चा की थी कि समय का विभाजन करे और समय का मूल्य समझे। अगर आप अपनी जीभ को साध ले, तो चमत्कार उत्पन्न हो जायेगा। आहार-विहार के असंयम के कारण ही बीमारियों आपको घेरे रहती है। इसी के कारण अभी तक आप छोटे आदमी बने रहे।
उपासना के सही अर्थों को समझ नहीं पाते है। वास्तव में विवेक की सिद्धि महान स्थान रखती है। छोटे से गाँव में पैदा हुए व्यक्ति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति हो गए। यह विवेक की सिद्धि है।
उपासना के साथ साधना भी की, जिसका लाभ उन्हें मिल गया। वे ऑपरेटर के साथ-साथ विभाग के अन्य पेंडिंग कार्यों को भी पूरा करते रहे उनके विभाग के लोग उनके कार्य एवं व्यवहार से प्रसन्न रहते थे।
उपासना, जो सातवलेकर ने की और उच्चतम स्थान तक पहुँच गए। मछली पानी को चीरती हुई आगे बढ़ती है, उसी प्रकार अध्यात्मवादी आदमी अपना रास्ता स्वयं बनाते हुए चले जाते है। उनका रास्ता कोई नहीं रोक सकता है।
उपासना की थी। लोगों ने कहा कि आपके बच्चे नहीं है अतः आपको दूसरी शादी करनी चाहिए या फिर कोई बच्चा गोद लेना चाहिये, नहीं तो वंश कैसे चलेगा? उन्होंने कहा कि ऐसा संभव नहीं है। हमें देश, संस्कृति की सेवा करनी है। असंख्य ऐसे बच्चे है जिनकी पढ़ाई नहीं होती, जो गरीबी की मार से दबे रहते है, उनकी हमें सेवा करनी है।
उपासना - आराधना का विधान है। इस क्रम में कमल एक शाश्वत -सांस्कृतिक प्रतीक है। कमल भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही तथ्यों का प्रतीक माना गया है। यह श्रृंगार एवं वैराग्य तथा सृष्टि व प्रलय के रूप में वर्णित होता है। यह असीम -अनंत आकाश के साथ प्राणी के सूक्ष्म अन्तः कारण का भी प्रतीक है।
उपासना में अग्निहोत्र, आरती, विसर्जन
उपासना गायत्री महामंत्र का प्राण है वस्तुतः अग्नि ने ही भौतिकी ज्ञान-विज्ञान का मार्ग प्रशस्त किया है सामान्य अग्नि और यज्ञाग्नि में अंतर है। इस अंतर-ज्ञान के पठनीय विषय है-
उपासना में बहुत लगता है इसमें हमें जो आनंद आता है, उसका वर्णन हम नहीं कर सकते है। आपका भी मन लगे, इसके लिए आपको अन्न की सात्विकता अपनानी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-July
उपासना भी कम नहीं की। बेटे! यह साधन कहीं से भी आएँगे। जिस भगवान ने यह प्रेरणा भेजी है, वह इसे अवश्य पूरा करेगा। अब जो संकल्प ले लिया है, उस ओर ही हमारे कदम बढ़ेंगे और उसे पूरा करके ही रहेंगे।
उपासना है प्रेम की अवस्था को प्राप्त करना ही सिद्धावस्था है प्रेम कभी निष्फल नहीं होता। प्रेम का पुरस्कार स्वयं प्रेम ही है, कुछ और नहीं। यही वह तत्व है जो यही वह अमृत का प्याला है, जिसे पीने से इस संचार रूपी व्याधि का नाश हो जाता है। मनुष्य ईश्वरोन्मुखी हो जाता है और 'मैं मनुष्य हूँ’ यह तक भूल जाता है। प्रेम कोई पुरस्कार नहीं चाहता।
उपासना लोकमंगल के लिए की है। उन्होंने समाज की उपासना भी कम नहीं की। बेटे! यह साधन कहीं से भी आएँगे। जिस भगवान ने यह प्रेरणा भेजी है, वह इसे अवश्य पूरा करेगा। अब जो संकल्प ले लिया है, उस ओर ही हमारे कदम बढ़ेंगे और उसे पूरा करके ही रहेंगे।
उपासना पद्धतियों, का सभी भाषाओं (भारत व विश्व की ) का प्रशिक्षण क्रम वर्तमान शिक्षण संस्थान में चलना है, इसे विस्तार से उन्होंने बताया। वर्तमान शाँतिकुँज परिसर साधना प्रधान श्रद्धा प्रधान केंद्र होगा एवं अकादमी स्तर की यह स्थापना मूलतः शिक्षण प्रधान होगी। विधा के अंतर्गत प्रशिक्षित संस्कृति संदेश वाहक राष्ट्र व विश्व के कोने-कोने में भेजे जायेंगे। स्वास्थ्य विधा के अंतर्गत आयुर्वेद का विज्ञानसम्मत अति आधुनिक शोध केंद्र एवं बेयर-फुटेड डॉक्टरों का प्रशिक्षण स्थल तथा शिक्षा विधा के अंतर्गत सारे राष्ट्र की शिक्षण पद्धति को नया रूप देने शिक्षकों को मूल्य आधारित संस्कार युक्त शिक्षा के प्रशिक्षण केंद्र के रूप में विकसित किया जाना है। स्वावलंबन विधा के अंतर्गत गौ-केंद्रित अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिये प्रायः दो सौ प्रकार के ग्रामोद्योगों के प्रशिक्षण का क्रम बनाया जाएगा।
उपासनाओं का सारभूत तत्व। श्री अरविन्द ने अपनी बँगला रचना ’वासवदता’ में कहा है, “प्रतिदान न होने पर भी प्रेम तो स्वयं ही पर्याप्त मधुर है। “ ब्रह्मलीन मनीषी स्वामी शिवानन्द का कहना है, “ प्रेम ही विश्व को रूपांतरित करने में सक्षम है।” इसीलिए शिरडी के महान संत साँई बाबा ने प्रेम का प्रतीक बनने के लिए प्रेरित किया है। संत तरुवर के अनुसार प्रेम पुष्प से भी कही अधिक मृदुल व कोमल होता है।
उपासना है इसे कुछ यूँ भी कह सकते हैं कि प्रेम क्षणभंगुर मानवीय शरीर में ईश्वर की उपासना है प्रेम की अवस्था को प्राप्त करना ही सिद्धावस्था है प्रेम कभी निष्फल नहीं होता। प्रेम का पुरस्कार स्वयं प्रेम ही है, कुछ और नहीं। यही वह तत्व है जो यही वह अमृत का प्याला है, जिसे पीने से इस संचार रूपी व्याधि का नाश हो जाता है। मनुष्य ईश्वरोन्मुखी हो जाता है और 'मैं मनुष्य हूँ’ यह तक भूल जाता है। प्रेम कोई पुरस्कार नहीं चाहता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-November
उपासना।
उपासनागृहों पर संपन्न होगा। इसके लिए रोटरी-क्लब, लॉयन्स-क्लब, भारत विकास परिषद् जैसे सभी संगठनों के साथ मिलकर चर्चा कर उन्हें भागीदारी करने व अधिकाधिक को उससे जोड़ने के लिए सहमत किया जा रहा हैं।
उपासना, (प्रातः पंद्रह मिनट प्राणाकर्षण की विशेष साधना, रात्रि की पंद्रह मिनट की नियति संतुलन साधना एवं नित्य-नियमित प्रातः गायत्री का माला का जप) (ब) जीवन साधना (स) सामूहिक साधनाएँ (द) सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन (ई) दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन। ]
उपासना करते हैं, वे ओजस्, तेजस् एवं वर्चस् का लाभ प्राप्त करते है। अग्निकोण में दीप प्रज्वलित रखने, रसोईघर में सतत् अग्नि जलाए रखने व उसे न बुझने देने को शास्त्रों ने इसीलिए शुभदायक बताया है। यदि भवन में अग्निकोण का समुचित सदुपयोग किया जा सके तो जीवन में प्रगति-उन्नति तो होती है, व्यक्तित्व भी आकर्षक एवं ओजस्वी-तेजस्वी बनता है।
उपासना करने के पश्चात् भी लोकसेवा की भूख न जागे तो समझना चाहिए कि कहीं-न-कहीं भूल है। अपने आपको इस कसौटी पर कसने पर वह खरा न उतरा। उसने आगे से लोकसेवा को नित्यकर्म में सम्मिलित कर लिया।
उपासनात्मक पराक्रम, मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव बनाने के लिए सामूहिक महासाधना का नियोजन। यह दिव्य पुरश्चरण, शाँतिकुँज हरिद्वार। गायत्रीतीर्थ से आरंभ कर सारे विश्व में विगत ग्यारह वर्षों में तीव्र वेग के साथ संपन्न हो रहा है। अपने समय का
उपासनागृह में एक साथ दीपयज्ञ होंगे। इस दीपयज्ञ के माध्यम से प्रतिभाओं के नवयुग के नवनिर्माण में नियोजन के संकल्पों की घोषणा की जाएगी। प्रत्येक परिजन अपनी भूमिका-अपनी भागीदारी का स्वरूप एवं प्रभावक्षेत्र को निर्धारित कर अपने-अपने संकल्पों को व्यक्त करेंगे। यही संकल्प क्रियारूप में एक वर्ष बाद 29 जनवरी 2001 को सामने आ जाएँ, यह मूल आधार रहेगा। परमपूज्य गुरुदेव ने एक लाख प्रतिभाओं के माध्यम से एक करोड़ व्यक्तियों की महापूर्णाहुति में भागीदारी की बात कही थी, बाद में 1989 में उनने लक्ष्य बढ़कर 2 लाख प्रतिभाओं से दो करोड़ जाग्रत् साधकों के निर्माण तक का निर्धारित कर दिया।
उपासना करने वाले श्रद्धालु भी उसे माता कहते हैं। “श्री सूक्त” “लक्ष्मी सूक्त” “महालक्ष्मी स्तोत्र”ए “लक्ष्मीयंत्र”, “श्री सिद्धि” जैसे अनेक विधान हैं, जिनमें नारायणी का मंत्रशक्ति के रूप में आराधना की गई है। विपर्यय के न जाने किस दौर में यह मान्यता प्रचलित हो गई कि लक्ष्मी चलपा और चंचला है। वह किसी एक जगह स्थिर नहीं रहती। उसके आशीर्वाद-वरदान बरसते और बदलते रहते हैं।
उपासना को ही बदनाम कर दिया। इसी प्रकार राम, हनुमान, विष्णु, कृष्ण, इंद्र, सूर्य आदि देवताओं की आराधना में भी कुछ विशिष्ट विधान रखे गए हैं। सामान्यतः सभी साधनाओं में संयम-नियम का ध्यान रखना अनिवार्य है। उसी स्थिति में यंत्रों का प्रभाव ग्रहण करने योग्य पात्रता आती है। विशिष्ट साधनाओं में कुछ विशेष विधान उस यंत्र की विशिष्ट क्षमता को ध्यान में रखकर ही किया जाता है।
उपासना में कतिपय क्षेत्रों में थोड़ी छूट दी गई। वह शक्ति के रौद्र पक्ष को ध्यान में रखकर ही दी गई थी। यह विडंबना ही रही कि भोगी और तामसी वृत्ति के लोगों ने उसका दुरुपयोग किया और शक्ति उपासना को ही बदनाम कर दिया। इसी प्रकार राम, हनुमान, विष्णु, कृष्ण, इंद्र, सूर्य आदि देवताओं की आराधना में भी कुछ विशिष्ट विधान रखे गए हैं। सामान्यतः सभी साधनाओं में संयम-नियम का ध्यान रखना अनिवार्य है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-October
उपासना की निर्दिष्ट प्रक्रिया ही संपन्न कर रहे थे। कुछ और भी जुड़ना चाहिए था क्या? इस संबंध में मार्गदर्शन हेतु प्रस्तुत समय से अच्छा और कोई समय नहीं हो सकता। परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन की अपेक्षा के साथ हमने ‘अखण्ड ज्योति’ के पन्ने पलटे, थोड़ा गहरे डूबकर स्वाध्याय किया एवं कुछ पाया है, जो जन-जन को दिशा दे सकता है, सही अर्थों में हम सभी को साधक बना सकता है।
उपासना में नौ दिनों तक दुर्गा पूजा के बाद विसर्जन के लिए विजयादशमी या उससे पहले नवमी का दिन निर्धारित है। किन्हीं क्षेत्रों में आश्विन नवरात्र के समय रामलीला का चलन रहा है। और किन्हीं क्षेत्रों में दुर्गा पूजा का। अब साधना सम्प्रदायों की कोई सीमा रेखा नहीं खींची जाती। इसलिए राम लीला के साथ दुर्गा पूजा भी सम्मिलित-समन्वित हो गयी है।
उपासना की जाए, तो वह सरस और फलदायी बन जाती है। उपासना के षट्कर्म से लेकर जप के नियम-अंत में भगवान् सूर्य को अर्घ्य चढ़ाना तथा सृजन यह क्रम तो सभी को मालूम है, अतः बताने की आवश्यकता नहीं, किंतु ज पके समय की मनोभूमि के विषय में परमपूज्य गुरुदेव का मार्गदर्शन आज की परिस्थितियों में अभीष्ट भी है व समयानुकूल भी।
उपासना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है-लूटमार नहीं। आत्मिक प्रगति का एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान है यह। उचित साधन, उचित श्रम और उचित परिस्थितियाँ उपलब्ध होने पर ही यह प्रक्रिया फलवती होती है। सो उसी को करने-कराने में हम निष्ठापूर्वक लगे हैं।”
उपासना के रूप में में परिभाषित किया जाता है। राम की विजय और शक्तिसाधना पूरी होने की तिथि एक ही है। विजयादशमी पर आसुरी आतंक के प्रतिनिधि रावण का पराभव हुआ। नवरात्र की अंतकथा के अनुसार इस दिन भगवती दुर्गा ने महिषासुर और शुँभ-निशुँभ आदि दैत्यों का संहार कर देवसत्ताओं को निष्कंटक राज्य दिया। विजयादशमी उस शक्ति की आराधना के समापन और विसर्जन का दिन है।
उपासना,ध्यान-धारणा में यों कर्मकाँड नहीं करने पड़ते। थोड़े-बहुत उपचार होते है। पवित्रीकरण, आचमन, आसनशुद्धि, प्राणायाम आदि उपचारों के साथ वह भावभूमि निर्मित कि जाती है, जिसमें जप-ध्यान में प्रवेश किया जाता है। जप−ध्यान आदि साधन स्वयं ही संपन्न करने होते है वक्ता,उपदेशक, आचार्य उसमें शिक्षक या दिशानिर्देश देने कि स्थिति में ही रहते है। उन्हें देखते-सुनते रहने से साधना में गति नहीं होती तैराकी सीखने के लिए मास्टर के संकेत और क्रिया देखने से काम नहीं चलता।
उपासनागृह रहे होंगे या फिर वेधशाला जैसे उद्देश्य कि पूर्ती कि जाती रही होंगी अथवा एक साथ दोनों कार्य पूरे होते होंगे। वे मानते है कि उनके अंदर जो ब्रह्मांडीय ऊर्जा व्याप्त है, वह साधारण नहीं है। उसमें दिव्य रूपांतरण कि क्षमता विद्यमान है।
उपासना के पीछे आत्मोन्नति में सहायक ठोस तत्वों का बल है। गायत्री साधना कभी निष्फल नहीं जाती।
उपासना और साधना का जोड़ा अविच्छिन्न रूप से आवश्यक है। इसमें न तो ढील की गुंजाइश है, न उपेक्षा की। शास्त्रकारों से लेकर तपोनिष्ठ ऋषियों और सफल आराधकों ने सदा इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है। हमारे मार्गदर्शक ने यह बात प्रारंभ में ही कूट-कूटकर अंतरंग में बिठा दी थी कि उपासना आवश्यक है, किंतु इस क्षेत्र की सफलताओं का स्रोत भावनात्मक विकास की जीवनसाधना पर ही अवलंबित है। हमने इस शिक्षा को गाँठ बाँध लिया।
उपासना के कार्यक्रमों में लोग जिस तरह उत्साह से भाग लेते है, उसकी तुलना दस- पाँच साल पूर्व होने वाले श्राँक-पाँपश् म्यूजिक कार्यक्रमों से कि जा सकती है। कथा-कीर्तन-सत्संग-प्रवचन से लेकर मंदिर या धर्मसंस्थान के छोटे-मोटे आयोजन भी लगो को प्रबल रूप में आकर्षित कर लेते है। अनुमान जो भी लगाये,उनके पीछे सूक्ष्म जगत में आये उभार ही मूल कारण दिखाई देते है। प्रतीत होता है कि महाकाल ने युग- चेतना को मथ-सा दिया है और उसमें अध्यात्म कि भूख जाग्रत हुई है। अभीप्सा का अमृत निकल रहा है।
उपासना नहीं करता, वह निंदा का पात्र है।”
उपासना-जप में भी प्राण आ सकते हैं। शरीर और वस्त्रों की शुद्धि-पूजा-उपकरणों की स्वच्छता, शांत और सौम्य वातावरण, प्रफुल्ल मन का ध्यान रखकर नियत समय, नियत स्थान पर बैठकर उपासना की जाए, तो वह सरस और फलदायी बन जाती है। उपासना के षट्कर्म से लेकर जप के नियम-अंत में भगवान् सूर्य को अर्घ्य चढ़ाना तथा सृजन यह क्रम तो सभी को मालूम है, अतः बताने की आवश्यकता नहीं, किंतु ज पके समय की मनोभूमि के विषय में परमपूज्य गुरुदेव का मार्गदर्शन आज की परिस्थितियों में अभीष्ट भी है व समयानुकूल भी।
उपासनास्थल के रूप में बनवाए थे, जहाँ सुरक्षित ध्यान-साधना एवं पूजा करते हुए ब्रह्माँडीय ऊर्जा और चेतना से सम्बन्ध साधा जा सके। कालान्तर में इन्हें कभी शव सुरक्षित और संरक्षित रखने का सर्वोत्तम स्थल समझकर शायद ऐसा किया जाने लगा हो, लेकिन केवल शवसंरक्षण के लिए इतनी विशाल, श्रम, समय एवं व्ययसाध्य संरचनाएं खड़ी करने की बात गले नहीं उतरती। शव सिद्धाँत को तब गहरा आघात लगा, जब अन्वेषकों को पिरामिडों का महीनों खाक छानने के बाद भी उसमें न कोई ममी मिली, न उनकी शवपेटिकाएं, न धन-दौलत ही।
उपासना का एक स्वरूप है आदर्शवादिता से भरे अन्तःकरण में ही ईश्वर निवास करते है
उपासना के आरंभ में अपनी एक दो वर्ष जितने निश्चिंत, निर्मल, निष्काम, निर्भय बालक जैसी मनोभूमि बनाने की भावना करनी चाहिए और संसार में नीचे नीलजल और ऊपर नीलाकाश के अतिरिक्त किसी अन्य पदार्थ एवं इष्टदेव के अतिरिक्त और किसी व्यक्ति के न होने की मान्यता जमानी चाहिए। बालक और माता, प्रेमी और प्रेमिका, सखी और सखा जिस प्रकार पुलकित हृदय से परस्पर मिलते, आलिंगन करते हैं, वैसी ही अनुभूति इष्टदेव की समीपता की होनी चाहिए। चकोर जैसे चंद्रमा को प्रेमपूर्वक निहारता है और पतंगा जैसे दीपक पर अपना सर्वस्व समर्पण करते हुए तदनुरूप हो जाता है, ऐसे ही भावोद्रेक इष्टदेव की समीपता के उन ध्यान में जुड़े रहना चाहिए, जिसे साधना कहा गया है। इससे भावविभोरता की स्थिति प्राप्त होती है और उपासना ऐसी सरस बन जाती है कि उसे छोड़ने को जी नहीं चाहता। “परमपूज्य गुरुदेव के चौबीस लक्ष के चौबीस अनुष्ठान उपर्युक्त मनोभूमि की धुरी पर ही चले।
उपासनास्थली कहना ज्यादा तर्क और तथ्यसंगत होगा।
उपासना में गुरुसत्ता के प्रेमभाव-समर्पण और अधिक प्रगाढ़ हो, उनके कार्यों की पूर्णता के अंजाम तक पहुँचाने की टीस बढ़ती ही चली जाए, तो मानना चाहिए कि साधना प्राणवान् होती चली जा रही है।
उपासनाएँ करें चाहे न करें, केवल गायत्री जप से द्विज जीवनमुक्त हो जाता है। साँसारिक और पारलौकिक समस्त सुखों को पाता है। संकट के समय दस हजार जप करने से विपत्ति का निवारण होता है।”
उपासना के षट्कर्म से लेकर जप के नियम-अंत में भगवान् सूर्य को अर्घ्य चढ़ाना तथा सृजन यह क्रम तो सभी को मालूम है, अतः बताने की आवश्यकता नहीं, किंतु ज पके समय की मनोभूमि के विषय में परमपूज्य गुरुदेव का मार्गदर्शन आज की परिस्थितियों में अभीष्ट भी है व समयानुकूल भी।
उपासना कि कुछ आहुतियाँ अपनी ओर से भी दी जा जानी चाहिए।
उपासना में व्यतीत करने का विधान किया। ये उपविचार काम को उर्ध्वदिशा में ले जाते है। शास्त्रों ने नवरात्र कि वेला को शक्ति-साधना का अवसर कहा है। सर्जन शब्द बहुत कम आया है। सर्जन वस्तुतः परिणति है, उससे पहले ध्वंस आता है दोनों का मेल-परिवर्तन प्रक्रिया को सम्पूर्ण बनाता है।
उपासना का स्वरूप समझ में आया है इससे अधिक मैं नहीं जनता ष् अपना निरीक्षण पूरा कर जय-विजय लौटे।। प्रजापति ने उनके लिखे विवरण पर दृष्टि दौड़ाई। उनकी दृष्टि सब पढ़कर उस अंधे के विवरण पर ही जाकर टिकी वे बोले- तुम्हारा विवरण देखकर मुझे लगता है कि वर्तमान में शेष सभी तो आडम्बर व समयक्षेप में लगे हैं। मात्र यही एक अधिकारी है, जिसे स्वर्ग लाया जाना चाहिए ष् जय-विजय की मानसिक उलझन को पढ़ कर वे आगे बोले- ष् तात! उपासना मात्र जप-तप नहीं है वरन् जनमानस को सही दिशा देना भी उपासना का एक स्वरूप है आदर्शवादिता से भरे अन्तःकरण में ही ईश्वर निवास करते है
उपासना मात्र जप-तप नहीं है वरन् जनमानस को सही दिशा देना भी उपासना का एक स्वरूप है आदर्शवादिता से भरे अन्तःकरण में ही ईश्वर निवास करते है
उपासना कर रहे हैं, तो आपको क्या करना चाहिए? आपको तीन बंधनों से मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए। आप कोशिश कीजिए कि तीनों बंधन तोड़ दें। अगर आप चाहें तो इन तीन बंधनों को तोड़ सकते हैं। मकड़ी जाला स्वयं बनाती है और उसमें स्वयं फँस जाती है और फँसने के बाद में जब उसका मन आता है कि जाला हमारे लिए नुकसानदायक है और जाले में हमको नहीं रहना चाहिए, तो वह क्या करती है कि सारे-के-सारे जाले को अपने मुँह से समेट लेती है और निगल जाती है तथा भाग खड़ी होती है।
उपासना आवश्यक है, किंतु इस क्षेत्र की सफलताओं का स्रोत भावनात्मक विकास की जीवनसाधना पर ही अवलंबित है। हमने इस शिक्षा को गाँठ बाँध लिया।” आगे परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं- “मंत्रशास्त्र का विशाल अध्ययन और अन्वेषण हमने किया है। महामाँत्रिकों से हमारे संपर्क रहे हैं और साधनापद्धतियों के सूक्ष्म अंतर-प्रत्यांतरों को हम इतना अधिक जानते हैं जितना वर्तमान पीढ़ी के मंत्रज्ञाताओं में से शायद ही कोई जानता हो। लोगों ने एकाँगी पढ़ा-सीखा है।
उपासना और यज्ञे-अग्निहोत्र के बाद राम के सामने भी शक्ति प्रकट हुई और रावण को भी साक्षात् दर्शन हुए अर्थात् दोनों ही पक्षों की पूजा-आराधना सफल हुई,लेकिन विजय श्री ने राम का ही वरण किया। साधन और श्रद्धा में कम नहीं होने पर भी रावण को पराजित होना पड़ा, क्योंकि उनके पास धर्म मर्यादा नहीं थी।
उपासना ऐसी सरस बन जाती है कि उसे छोड़ने को जी नहीं चाहता। “परमपूज्य गुरुदेव के चौबीस लक्ष के चौबीस अनुष्ठान उपर्युक्त मनोभूमि की धुरी पर ही चले। हमें क्या कठिनाई हो सकती है, यदि हम भी इसी प्रकार अपने जप में प्राण डाल सकें व अपनी साधना के वे प्रतिफल प्राप्त कर सकें, जिनकी अपेक्षा गुरुसत्ता ने समूहमन के निर्माण से समष्टि के उपचार के रूप में की है।
उपासनाएँ करता है, वह पकवान छोड़कर भिक्षा माँगने वाले के समान मूर्ख है। काम्य सफलता तथा तप की वृद्धि के लिए गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ है नहीं।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-April
उपासना में लगा हूँ। सरल, सादा जीवन भी जी रहा हूँ, पूजा, आराधना, उपासना में लगा हूँ। सरल, जीवन भी जी रहा हूँ, किंतु मुझे ऐसा कभी लगता ही नहीं कि मुझ पर कुछ भगवान की विशेष कृपा हो रही है। भक्त की निराशा देखकर रामकृष्ण मुस्कराए। उन्होंने खेतों में काम कर रहे किसानों की ओर संकेत किया ओर बोल-किसान दो तरह के होते हैं, जिन्हें खेतों में काम करना सहज भला लगाता है, उन्हें नफा-नुकसान से कोई तात्पर्य नहीं, उन्हें खेती करनी है।
उपासना आसानी से पूर्ण हो जाती है।
उपासना है तो यह चरण साधना है। हमारी भौतिक महत्वाकांक्षाओं पर रोकथाम-चारों प्रकार के संयमों का परिपालन-जीवन के हर पहलू में गुरुसत्ता का अनुशासन-यही अब हमारा लक्ष्य होना चाहिए। इस क्षेत्र में जितनी रुकावट आएगी-साधनों की होड़ में रोकथाम लगेगी एवं ब्राह्मणोचित जीवन जीने की रीति-नीति जीवन का अंग बन जाएगी, उतना ही हम गुरुसत्ता की दृष्टि में प्रमाणिक बनेंगे। अंतिम चरण है आराधनापरक अर्थात् हम अपनी आत्मीयता के विस्तार से समाज के कितने बड़े परिवार को अपनी कर्मशैली में बाँध पाए हैं, अपने गुरुसत्ता के लक्ष्य के साथ जोड़ सकने में सफल हो पाए हैं। अपना रौब जमाने के स्थान पर हमारी भूमिका ‘तृणादपिषुनिचेन’ तिनके की तरह विनम्र बनने की दिशा में होनी चाहिए।
उपासना में लगा हूँ। सरल, जीवन भी जी रहा हूँ, किंतु मुझे ऐसा कभी लगता ही नहीं कि मुझ पर कुछ भगवान की विशेष कृपा हो रही है। भक्त की निराशा देखकर रामकृष्ण मुस्कराए। उन्होंने खेतों में काम कर रहे किसानों की ओर संकेत किया ओर बोल-किसान दो तरह के होते हैं, जिन्हें खेतों में काम करना सहज भला लगाता है, उन्हें नफा-नुकसान से कोई तात्पर्य नहीं, उन्हें खेती करनी है। एक वे भी किसान हैं, जो लाभ-हानि सामने रखकर खेती करते हैं।
उपासना के उदाहरण मिलते हैं। आज भी इस वृक्ष के प्रति लोगों में इतनी आस्था है कि इसे काटना, जलाना धार्मिक अपराध माना जाता है। मात्र हवन के लिए समिधा के रूप में तथा पीपल को जलाने में सकी लकड़ी प्रयुक्त की जाती है। अश्वत्थ अर्थात् पीपल वृक्ष को ज्ञानवृक्ष और ब्रह्मवृक्ष कहा गया है। सूर्य प्रकाश में विशेष रूप से संश्लेषण करने के कारण इसे सौर वृक्ष भी कहते है।
उपासना करता रहता। वह पूजा करते समय राम-राम मंत्र का उच्चारण करता। उसकी बड़ी पुत्रवधू जब इस मंत्र को सुनती तो उसे बड़ा आश्चर्य होता। उसने एक दिन ससुर से पूछा-पिताजी! आप राम नाम का इतना जाप क्यों करते हैं? उसने बताया-बहू! भगवान से बड़ी शक्ति उनके नाम में है।
उपासना-साधना का क्या महत्व एवं मूल्य है? इसके क्षणिक स्पर्श एवं एक लघु अंश को ग्रहण करके ही तुम भिखारी से राजा बन सके हो। अब तुम चारों ओर धर्म की ज्योति का प्रकाश फैलाओ, ताकि इसकी आभा एवं प्रकाश से सभी के जीवन का अँधेरा दूर हो सके।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-August
उपासना करनी चाहिए। इस कोने के पूरब उत्तर वाली दीवाल के सहारे एक छोटी चौकी पर या दीवाल में आला बनाकर अपने इष्टदेव या आराध्य का चित्र या मूर्ति स्थापित कर उपासना करनी चाहिए। भारी समान रखकर या चबूतरा बनाकर इस कोने का अनावश्यक भार नहीं बढ़ाना चाहिए।
उपासना चल रही थी वसंत पर्व का दिन था। ब्रह्ममुहूर्त में कोठरी में ही सामने प्रकाशपुँज के दर्शन हुए। आँखें मल कर देखा कि कहीं कोई भ्रम तो नहीं।...........प्रकाश के मध्य में से एक योगी का सूक्ष्म शरीर उभरा, सूक्ष्म इसलिए कि छवि तो दीख पड़ी पर वह प्रकाशपुँज के मध्य अधर में लटकी हुई थी। यह कौन है?
उपासना करने का विधान शास्त्रों में बताया गया है।
उपासना अभियान साधना, प्रखर साधना वर्ष की अपनी साधना के अतिरिक्त एक अतिरिक्त गायत्री मंत्र की माला इस धर्मयुद्ध रखा-अनुष्ठान विभीषिका निवारण के लिए करेंगे। विश्व शाँति की सामूहिक साधना तभी बन सकेगी, जब अधिकाधिक व्यक्ति एक ही समय, एक ही भावना से एकनिष्ठ होकर समष्टिगत शक्ति के उपार्जन की दृष्टि से उसे संपन्न करेंगे। एक अतिरिक्त माला जा कर रहे है। क्लीं बीजमंत्र के संपुट सहित जपें। ॐ भूर्भुवः स्वः क्लीं क्लीं क्लीं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं ॐ।
उपासना करने वाले व्यक्ति का मुँह सदैव पूरब, पश्चिम या उत्तर दिशा की ओर रहे और वह सूर्य की जीवनदायिनी प्राण-ऊर्जा से लाभान्वित होता रहें। ज्ञान प्राप्ति के लिए उत्तर दिशा में उत्तराभिमुख धन-संपदा हेतु पूर्व दिशा में पूर्वाभिमुख एवं सुख-शांति हेतु पश्चिम दिशा में पश्चिमाभिमुखी होकर पूजा उपासना करने का विधान शास्त्रों में बताया गया है।
उपासना की दृष्टि से श्रेष्ठतम स्थिति वह मानी गई है, जिसमें इष्टदेवता का मुख पश्चिम की ओर एवं साधक का मुख पूरब की ओर होता है। इससे मन की एकाग्रता सधती है, स्वास्थ्य ठीक रहता है तथा साधना की सफलता मिलने में देर नहीं लगती। गायत्री महाशक्ति के सच्चे उपासक इस तथ्य से भली-भाँति परिचित है।
उपासना करनी चाहिए। भारी समान रखकर या चबूतरा बनाकर इस कोने का अनावश्यक भार नहीं बढ़ाना चाहिए।
उपासना करता है, तो उसका मुँह पूर्व की ओर होता है। इससे प्रातःकालीन उदीयमान सविता देवता की -सूर्य की स्वर्णिम किरणों का लाभ साधक को मिलता है। हमारी काया के उत्तरी ध्रुव अर्थात् मस्तिष्क में सहस्रार चक्र, आज्ञाचक्र एवं ब्रह्मरंध्र जैसे कई सूक्ष्म शक्ति केंद्र है, जिनका संबंध सूर्य से स्थापित हो जाने पर वे जाग्रत होने लगते है। और अतींद्रिय क्षमताएँ एवं ऋद्धि-सिद्धियाँ हस्तगत होने लगती है। ओजस -तेजस एवं वर्चस का स्रोत सूर्य ही है।
उपासना-स्थल रहें। पारिवारिक एकता के लिए यह बहुत आवश्यक है। एक पूजा-कक्ष होने पर परिवार में एकता, समरसता एवं स्नेह-सद्भाव बना रहता है। अनेक पूजा -कक्ष होने पर उनका अवमूल्यन होने लगता है। और वे अपनी पवित्रता गँवा बैठते है।
उपासना स्थल या पूजा कक्ष भवन का प्रमुख अंग है। इसे ईशान कोण में स्थापित किया जाता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि सूर्य पूरब से उदित होता है। शास्त्रों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है, साथ ही इसे आरोग्य का देवता माना गया है। पूर्वाभिमुखी पूजाकक्ष में जब व्यक्ति उपासना करता है, तो उसका मुँह पूर्व की ओर होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-December
उपासना में गायत्री मंत्र का जप किया जाता है। गायत्री मंत्र भारतीय परंपरा का परम उपास्य मंत्र है। हजारों वर्षों से ऋषि-मुनि और साधक श्रेणी के लोग इसे जपते रहे हैं। सामान्य गृहस्थ भी जो नियमित उपासना नहीं कर पाते, उनकी आस्था भी नहीं हो फिर भी कर्मकाण्ड की औपचारिकता करते हैं, तो गायत्री का आश्रय लेते हैं। अब तक कितने ही लोगों ने गायत्री मंत्र का कुल मिलाकर कितना जप किया होगा, इसका हिसाब लगाना कठिन है।
उपासना का ही एक प्रकार है। अश्वमेध, राजसूय, वाजपेयी जैसे विशाल यज्ञ सूक्ष्मजगत में व्याप्त ‘तेज’ और ‘ओज’ को आकर्षित करने के उपक्रम ही थे। सामूहिक प्रयत्नों से ब्रह्मतेज को अभीप्सा के साथ पुकारते हुए उसे धारण करने योग्य भावभूमि भी तैयार की जाती थी। इस क्रम करे मेध के आह्वान और खेती के लिए जमीन तैयार करने की दोनों प्रक्रियाओं का एक साथ चलना कहा जा सकता है।
उपासना को महत्व दिया है। मुसलमानों द्वारा शुक्रवार के दिन तथा ईद आदि अवसरों पर सामूहिक नमाज, ईसाइयों द्वारा रविवार को चर्च में सामूहिक प्रार्थना, बौद्धों का संघ ध्यान, सूफियों की नृत्य साधना जैसे कई उदाहरण हैं वैदिक परंपरा में यज्ञभाग भी सामूहिक उपासना का ही एक प्रकार है। अश्वमेध, राजसूय, वाजपेयी जैसे विशाल यज्ञ सूक्ष्मजगत में व्याप्त ‘तेज’ और ‘ओज’ को आकर्षित करने के उपक्रम ही थे। सामूहिक प्रयत्नों से ब्रह्मतेज को अभीप्सा के साथ पुकारते हुए उसे धारण करने योग्य भावभूमि भी तैयार की जाती थी। इस क्रम करे मेध के आह्वान और खेती के लिए जमीन तैयार करने की दोनों प्रक्रियाओं का एक साथ चलना कहा जा सकता है।
उपासना नहीं कर पाते, उनकी आस्था भी नहीं हो फिर भी कर्मकाण्ड की औपचारिकता करते हैं, तो गायत्री का आश्रय लेते हैं। अब तक कितने ही लोगों ने गायत्री मंत्र का कुल मिलाकर कितना जप किया होगा, इसका हिसाब लगाना कठिन है। हिसाब लगाना तो दूर ही बात है, इसकी कल्पना करना भी कठिन है। हजारों-करोड़ों लोगों ने दस-पंद्रह वर्ष से लेकर साठ -सत्तर वर्ष तक प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जप किया होगा। उस जप का प्रभाव सूक्ष्म आकाश में संव्याप्त है।
उपासना के लिए सूर्य के उदय और अस्त होने का ऐसा समय निर्धारित था कि एक ही समय जप और अर्घ्य की शर्त स्वतः पूरी हो जाती थी। किसी भी जप-तप से पहले संकल्प करना ही पड़ता है। निजी उत्कर्ष अथवा आत्मकल्याण के लिए ‘मयोत्पाददुरित क्षम पूर्वकम्’ और कार्यक्रमों के लिए ‘विजयार्थ’ ‘संतान लाभार्थ’ सामूहिक कल्याण के लिए ‘राष्ट्ररक्षार्थ विश्वकल्याण’ जैसी भावनाओं को व्यक्त किया जाता है। संकल्प में उद्देश्य जोड़ने का नियम पूरा करना ही होता है। उसके बिना जप-तप अधूरा समझा जाता है।
उपासना किया करते थे। मानवीय जीवन को सबसे पहली व्यवस्था देने वाले मनु महाराज ने अपनी स्मृति में वन संपदा को नष्ट करने वालों के लिए कठोर दंड विधान बनाया था। अथर्ववेद में वनों को समस्त सुख-संपदा का स्रोत कहा गया है। यही क्यों ऋग्वैदिक महर्षियों से लेकर शास्त्र, पुराण, उपनिषद्, रामायण आदि के प्रणेता ऋषिगणों ने आरण्यकों का आश्रय लेकर ही इस देवदुर्लभ ज्ञान को लिपिबद्ध किया था। मत्स्यपुराण में तो वनों की महत्ता प्रतिपादित करते हुए कहा गया है- दषकूपसमावापी, दषवापीसमोह्रदः, दषह्रद समःपुत्रो दषपुत्रसमो द्रुमः यानि कि दस कुएँ खोदने का पुण्य एक तालाब बनवाने के बराबर, दस तालाबों के निर्माण का पुण्य एक झील बनवाने के बराबर और दस झीलों के बनवाने में उतना ही पुण्य प्राप्त होता है, जितना कि एक गुणवान् पुत्र प्राप्त करने में तथा दस गुणवान् पुत्रों का यश उतना ही होता है, जितना कि एक वृक्ष लगाने का।
उपासना और भक्ति तथा अपने संकल्प को दिव्य प्रयोजन के अधीन कर देना है। तीनों मार्गों में अंतर सैद्धांतिक, भावनात्मक और व्यावहारिक पक्ष पर बल देते हुए किया गया है। मनुष्य विभिन्न प्रकार के होते हैं, यथा-चिंतनशील भावुक और सक्रिय। तीनों के लिए क्रमशः ज्ञान, भक्ति और कर्म है। ये विभाजन स्थूल हैं।
उपासना, योगाभ्यास, शोध, अनुसंधान, विज्ञान आदि ऐसे कार्य हैं, जिनमें अधिक गंभीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की जरूरत है। इसलिए इनका आरंभ भी ऐसे ही समय में होना चाहिए, जब शरीर के सूक्ष्म कोष चंद्रमा की शीतलता को ग्रहण कर रहें हों।
उपासना की जगह, वेदी, दिशा, मूर्ति या प्रतीकों के स्वरूप में आमतौर पर एकरूपता रहती है। भारतीय धर्म-परंपरा में ही अंतर रहता है। उसे अंतर न कहकर वैशिष्ट्य ही कहा जाना चाहिए। साधक का अपनी श्रद्धा भावना और आवश्यकता के अनुरूप प्रतीक चुनने की स्वतंत्रता सिर्फ भारतीय धर्म में ही उपलब्ध है। किसी भी प्रतीक, स्वरूप, इष्ट और स्थान को मानें, सबके लिए मार्ग और उपाय भारतीय धर्म-संस्कृति में उपलब्ध हैं।
उपासनागृहों की आस्तिकता संवर्द्धन से लेकर समाज में लोकोपयोगी प्रवृत्तियों के संचालन तक एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण स्थापना है ये आस्था के केंद्र। क्यों इन्हें यह महत्व मिला एवं समय के साथ बढ़ते नैतिक अवमूल्यन के फलस्वरूप आज उनका स्वरूप क्या है? कैसे उनके मूलभूत आधार को जीवंत कर इन स्थापनाओं से प्रेरणा ली जा सकती है? पढ़ें इस संबंध में।
उपासना सामूहिक जप की श्रेणी में आती है। उसका प्रभाव भारत के गौरवमय अतीत के दिनों में देखा गया। भारतीय मान्यता के अनुसार हमारी यह सृष्टि लाखों वर्ष पुरानी है। वैदिक परंपरा अनादि है। इतिहास के विद्वान इस प्रतिपादन को नहीं मानते।
उपासना के सभी प्रारंभिक साहित्य का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करने की आवश्यकता तुरंत अनुभव की जा रही है। भारत की सभी भाषाओं सहित, विदेश की फ्रेंच-जर्मन-स्पेनिश-रशियन-जापान-इंग्लिश इन छह भाषाओं में अनुवाद होना व प्रकाशित होना है, ताकि महापूर्णाहुति वर्ष में यह क्राँतिकारी चिंतन जन-जन तक पहुँच सके। जिन परिजनों के अनुवाद को-एम्बेसी-कल्चरल सेंटर आदि स्तर पर संपर्क हों, वे ‘महापूर्णाहुति प्रकोष्ठ ‘ शान्तिकुञ्ज हरिद्वार से तुरंत संपर्क करें।
उपासना करनी होती है। हजारों साधकों को उसके लिए श्रम, संकल्प और संयम जुटाना पड़ता है। जुटते रहे हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-June
उपासना की गई है और उससे प्रार्थना की गई है कि तू मुझे तेजादि गुणों से युक्त कर। यहाँ परमेश्वर के गुणों का ध्यान करके अपने अन्दर मनुष्य उन गुणों की स्थापना के लिए निश्चय करता, संकल्प करता है और निश्चय करने के बाद उन गुणों की प्राप्ति का प्रयत्न करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-September
उपासना, व्रत, अनुष्ठान, साधन यह सब भी तो मात्रा निर्मित, ही हैं, इन सब को छोड़कर ब्रह्म प्राप्ति किस प्रकार होनी संभव है? जैसे ऊपर आकाश में पहुँचने के लिए वायुयान की आवश्यकता पड़ती है वैसे ही ब्रह्म प्राप्ति के लिए भी प्रकृति मूलक आराधना का ही आश्रय लेना पड़ता है। गायत्री के आवरण में होकर पार जाने पर ही ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। सच तो यह है कि साक्षात्कार का अनुभव भी गायत्री के गर्भ में ही होता है। इस से ऊपर पहुँचने पर सूक्ष्म इन्द्रियाँ और उनकी अनुभव शक्ति भी लुप्त हो जाती है।
उपासना बहुत ही लाभदायक सिद्ध होती है। आश्विन की नवदुर्गाएं निकट हैं। पाठक उस समय एक छोटा अनुष्ठान करके उसका लाभ देखें।
उपासना भी गायत्री क्षेत्र से बाहर नहीं है।
उपासना के लिए बैठना चाहिए। नौ दिन में 24 हजार जप करना है। प्रतिदिन 2667 मंत्र जपने हैं। एक माला में 108 दाने होते हैं। प्रतिदिन 25 मालाएं जपने से यह संख्या पूरी हो जाती है।
उपासना करते हैं। निर्विकार ब्रह्म का सायुज्य तो तभी होगा जब ब्रह्म “बहुत से एक होने” की इच्छा करेगा और सब आत्माओं को समेट कर अपने में धारण कर लेगा। उससे पूर्व सब आत्माओं की सविकार ब्रह्म में ही सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य आदि हो सकता है। इस प्रकार गायत्री मिश्रित सविकार ब्रह्म ही हमारा उपास्य रह जाता है। उसकी प्राप्ति के साधन जो भी होंगे, वे सभी सूक्ष्म प्रकृति गायत्री द्वारा ही होंगे।
उपासना करना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-February
उपासना से होने वाले चमत्कारी लाभों की विवेचना, इस पुस्तक में बड़े विस्तार से की गई है। गायत्री संध्या, गायत्री अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ की विधियाँ भली प्रकार समझाई गई हैं।
उपासना से साधक को रोग, बुढ़ापा, मृत्यु आदि का भय नहीं सताता है। उसका शरीर पुष्प के समान हल्का और आरोग्यमय हो जाता है, मुख पर शान्ति एवं प्रसन्नता झलकने लगती है। उसे किसी पर पदार्थ में लोलुपता नहीं दिखती, शरीर गठित एवं पुष्ट हो जाता है। शोक, मोहादि कोसों दूर भागते हैं। वह अपने विकारों का आखेट नहीं बनता।
उपासना करते हैं अथवा स्वदेव अपना अपने इन उपकरणों द्वारा विस्तार करते हैं। सीमा में रहते हुए भी वे अपनी असीमता का विस्तार करते हैं। लेकिन जिस समय ये मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आत्मदेव को भुलाकर अपने को ही प्रधान मानना आरंभ कर देते हैं, उसी समय से अस्वस्थता का बीजारोपण होता है। फिर इन्द्रियाँ स्वेच्छाचारिणी हो जाती हैं। यह स्वेच्छाचारिता यहाँ तक बढ़ती है कि जिस शरीर को आधार बनाकर उन्हें भोग भोगना होता है फिर उसे भी भुला दिया जाता है।
उपासना करके जो अद्भुत लाभ प्राप्त किये हैं, उसके स्वयं बताये हुए वर्णन भी दिये गये हैं।
उपासना करने के लिए विशेष जोर दिया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-November
उपासनादि, अर्थात् सकाम कर्मों को अपनी स्वार्थ सिद्धि के निमित्त करना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-October
उपासना।
उपासना करते हैं वे आत्मलाभ करते हैं।”
उपासनाएं करें चाहे न करें, केवल गायत्री जप से द्विज जीवन मुक्त हो जाता है। साँसारिक और पारलौकिक समस्त सुखों को पाता है। संकट के समय दस हजार जप करने से विपत्ति का निवारण होता है।
उपासना करना ब्राह्मणों के लिए तो अत्यन्त आवश्यक है। जो ब्राह्मण गायत्री जप नहीं करता वह अपने कर्त्तव्य धर्म को छोड़ने का अपराधी होता है।
उपासना में उसका प्रथम स्थान रखते थे। शास्त्रों में, धर्म ग्रन्थों में, स्मृतियों में, पुराणों में गायत्री की महिमा तथा साधना पर प्रकाश डालने वाले सहस्रों श्लोक भरे पड़े हैं, इन सब का संग्रह किया जाय तो एक बड़ा भारी गायत्री पुराण ही बन सकता है।
उपासना कोई अन्धविश्वास जन्य परम्परा नहीं है, वरन् उसके पीछे आत्मोन्नति करने वाले ठोस तत्वों का बल है। इस महान शक्ति को अपनाने का जिसने भी प्रयत्न किया है उसे लाभ ही मिला है। गायत्री साधना कभी भी निष्फल नहीं जाती।
उपासना नहीं करता वह निन्दा का पात्र है।
उपासना करना योग का सबसे प्रथम अंग है।
उपासनाएं करता है वह पकवान छोड़कर भिक्षा माँगने वाले के समान मूर्ख है। काम्य सफलता तथा तप की वृद्धि के लिए गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।
उपासना, शुरू में ही सारे आयोजन इकट्ठा करने और उपयुक्त वातावरण तैयार करने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लुढ़कते हुए पत्थर पर काई नहीं जमती और ‘रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ”- यह दो कहावतें याद रखनी चाहिए। जीवन में यदि सब्र और शाँति से काम लिया जाय तो असफल होने का कोई कारण नहीं रहता।
उपासना करता है और आँवले के ताजे फलों का सेवन करता है वह दीर्घजीवी होता है।’
उपासना के क्षेत्र में आई कठिनाइयों को सुलझाने में समर्थ है। हम विधिज्ञ भी उसे ही मानेंगे जो पग-पग पर आई कठिनाई को हटाने में सुलझा हो तथा सिद्धि की अंतिम सीढ़ी तक पहुँचा दे, क्योंकि चढ़ना गिरना, संभलना साधारण रूप के साधना क्षेत्र में नित्य ही देखने में आते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-July
उपासना करो। ‘सेवा के निमित्त सदैव प्रस्तुत रहो, पति के सुख का ही ध्यान रखो। वह तुम्हारा भक्त बन जावेगा और सोचेगा कि मेरी पत्नी मुझे सचमुच प्यार करती है। मैं भी उसका अनुगमन करूं।’ द्वार पर जैसे ही अपने पति की आवाज सुनो, खड़ी हो जाओ तथा उसकी सेवा के लिए प्रसन्न बदन हो प्रस्तुत रहो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-December
उपासना करने वाला कभी भी निराश नहीं लौटता।
उपासना करनी चाहिए। मंत्र के अन्त में तीन बार श्रीं बीज का सम्पुट लगाना चाहिए। साधन काल के लिए पीले वस्त्र, पीले पुष्प, पीला यज्ञोपवीत, पीला तिलक, पीला आसन उपयोग करना चाहिए। शरीर पर शुक्रवार को हल्दी मिले हुए तेल की मालिश करनी चाहिए और रविवार को उपवास करना चाहिए। पीताम्बर धारी, हाथी पर चढ़ी हुई गायत्री का ध्यान करना चाहिए।
उपासना बड़ी उपयोगी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-August
उपासना करना रुचिकर हो तो संसार के प्रत्येक प्राणी एवं पदार्थ को सुँदर सुव्यवस्थित एवं सतोगुणी बनाने के लिए आत्म त्याग के साथ सेवापरायण होना चाहिए। ईश्वर को सर्वव्यापी सर्व शक्तिमान समझकर पापों से बचना और लोकहित के लिए अधिक आत्म-त्याग करना यह साकार ओर निराकार की उभय पक्षीय पूजा का संमिश्रण है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-January
उपासना-साधना का क्रम बनाये रखना चाहिए। इससे अन्तःकरण पवित्र एवं शुद्ध होता है।निश्चय ही इसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ता है।
उपासना भी करते और शिक्षा भी प्राप्त करते।
उपासना में संलग्न हैं, यह देखकर हार्दिक प्रसन्नता होती है। अगहन सुदी 11 या पूर्णिमा को आप थोड़ा ब्रह्मभोज कर दें। आजकल प्राप्त हो, इसलिए पुस्तक वितरण का ब्रह्मभोज ही श्रेष्ठ है। यों दो-चार ब्राह्मणों को भोजन करा देने में भी हानि कुछ नहीं। हवन, तिल, जौ, चावल, घी, शक्कर, मेवा इन चीजों को मिलाकर कर लें।
उपासना-पद्धतियाँ भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, पर जीवन-साधना संयम-साधना, तो सबके लिए एक जैसी ही हैं। फिर उन पर विवाद कैसा? सद्बुद्धि की प्रार्थना तो सभी के लिए की जा सकती है। उसे किसी धर्म विशेष से जोड़कर किसी को क्या मिलेगा? वस्तुतः साधना आँदोलन मानवी व्यक्तित्व के परिष्कार का, तनाव मुक्ति का, जीवन जीने की कला के शिक्षण का आँदोलन है।
उपासना सारे असंभव को संभव बनाने में सक्षम एवं समर्थ है। तुम समूचे विश्वास के साथ आदि शक्ति माता गायत्री का आँचल थाम लो। माँ कृपा से तुम्हारी सारी पीड़ाएँ दूर होंगी।
उपासना से उसकी मेधा तीव्र से तीव्रतर और तीव्रतम हो गयी। तमाम परेशानियों के बावजूद उसने इण्टर फिर बी.ए. किया। इन्हीं झंझावातों में एक दिन उसने एम. ए. की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली।
उपासना हमारे धार्मिक कर्मकाँड का अंग है, किंतु जब ‘सूर्य नमस्कार’ के रूप में इसे हम अपनाते हैं, तो यही अभ्यास चेतना का उन्नायक और स्वास्थ्य-संवर्द्धक बन जाता है। यह उन तत्वज्ञों का आविष्कार है, जिन्हें यह पता था कि इससे केवल स्वास्थ्य-रक्षा ही नहीं होती वरन् मानसिक शक्तियों के संतुलन,नियमन और सुनियोजन में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसकी विभिन्न 12 स्थितियों का साधक जब नियमित रूप से अभ्यास करता है, तो उससे उसकी सूक्ष्म ऊर्जा प्रभावित होती है, उसमें एक लयबद्धता आती और साधक की सोच संसार के प्रति सकारात्मक बनती जाती है।
उपासना आपको मुबारक हो, लेकिन अध्यात्मवाद को इससे कोई मतलब नहीं है। इन सब प्रक्रियाओं से एक ही मतलब है कि आदमी का चरित्र, आदमी का व्यवहार, आदमी का व्यक्तित्व ऊँचा उठे, परिष्कृत बने।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-April
उपासना द्वारा प्राप्त शक्ति केबल पर ब्रह्मतेज चमकने, छलकने लगता है। यदि उपासना और साधना का ऐसा सुयोग कुछ वर्षों तक नियमित रूप से रह सके तो फिर उसके संकल्प मिथ्या नहीं होते। उसके द्वारा सोचे गए कार्य अनायास ही होने लगते हैं। दुर्धर्ष दुर्योगों के चक्रव्यूह अपने आप ही ध्वस्त होते हैं। साधक पर माँ आदिशक्ति की कृपा कुछ ऐसी होती है कि कुटिल काल भी अपनी चाल बदलने पर मजबूर होता है।
उपासना हम नवरात्रि के दिनों में कर रहे हैं। यदि हमें अपना स्वत्व प्राप्त करना है अपने संकल्प को सिद्ध करना है तो हमें इस सत्य को पहचानना होगा। जो तरल प्रेम, वात्सल्य, ममता और परमेश्वरीय करुणा का विग्रह है, उस माँ को और उसके मातृत्व भाव को दूषित, प्रदूषित करने की प्रक्रिया, आधुनिकता के नाम से जानी जाने वाली परम्परा नहीं रुकी, तो पशुवत् मनुष्य ही जन्मेंगे, मनुष्यवत् देवता नहीं।
उपासना से हमारी आत्मा को ढाँकने-ढाँपने वाला कुहासा कुछ-कुछ ही सही हटता है। नवरात्रि के पर्व की खासियत यही है कि समग्र भारतीय मन समेकित रूप में माँ के द्वार-दरबार पर आ खड़ा होता है।
उपासना और साधना का ऐसा सुयोग कुछ वर्षों तक नियमित रूप से रह सके तो फिर उसके संकल्प मिथ्या नहीं होते। उसके द्वारा सोचे गए कार्य अनायास ही होने लगते हैं। दुर्धर्ष दुर्योगों के चक्रव्यूह अपने आप ही ध्वस्त होते हैं। साधक पर माँ आदिशक्ति की कृपा कुछ ऐसी होती है कि कुटिल काल भी अपनी चाल बदलने पर मजबूर होता है।
उपासना काल में जिस ऊर्जा का अवतरण होता है, उसके धारण करने की प्रक्रिया साधना कही जाती है। छलनी में अमृत की धार भी गिरे तो भी वह टिकेगी नहीं। उपासना में प्राप्त तप शक्ति का अमृतत्त्व टिक सके इसके लिए साधना का समुचित पात्र चाहिए। साधना का अर्थ है कठोर संयम, शरीर ही नहीं मन पर भी नियंत्रण रखना। उन सभी शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों को वर्जित समझना जो हमारी जीवनी शक्ति को नष्ट करती हैं, हमारी चिन्तन शक्ति को विकृत एवं बर्बाद करती हैं।
उपासना के क्रम में साधकों को पूरी भक्ति एवं श्रद्धा के साथ 24,000 का जप पूर्ण करना होता है। नवरात्रि के दिनों के हिसाब से प्रतिदिन की जप संख्या का निर्धारण होता है। 30 माला जप करने से जप संख्या का विधान भली-भाँति पूरा हो जाता है। परन्तु जैसे-तैसे जप पूरा कर लेना उपासना नहीं है। इसके लिए प्रतिदिन निश्चित संख्या, निश्चित समय एवं निश्चित स्थान के नियम का पालन करते हुए अपनी पूजा वेदी पर गुरु और ईष्ट के पूजन के साथ जप करना चाहिए।
उपासना व राष्ट्र आराधना का अद्भुत समन्वय होता था। पृथक से प्रकाशित पुस्तकों रहित विभिन्न कवियों को हमारे गुरुवर ने लिखना सिखाया, छंदबद्ध करना सिखाया एवं प्रायः दो से तीन हजार कविताएँ इनसे लिखवा लीं। इन्हीं का समन्वित रूप काव्य के वाङ्मय के खंडों के रूप में शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा हैं। देखने योग्य बात है- कविता लेखन पर सुव्यवस्थित मार्गदर्शन। कवि अपनी भाव संवेदनाओं को पिरोते हुए कैसे लिखें, यह स्टीक बिंदुवार चिंतन वे सतत देते रहते थे।
उपासना का अंकुरण मिलता है। ‘अहं राष्ट्रीय संगमनी वसूनाँ’ एवं ‘अहं रुद्राय धनुरातनोमि’ आदि मंत्रों में वह कहती है कि ‘मैं राष्ट्र को बाँधने वाली शक्ति हूँ। मैं ही उसे ऐश्वर्यों से सम्पन्न करती हूँ। मैं ही ब्रह्मद्वेषियों के संहार के लिए रुद्र का धनुष चढ़ाती हूँ। मैं ही आकाश और पृथ्वी में व्याप्त होकर मनुष्य के लिए संहार करती हूँ।
उपासना नहीं है। इसके लिए प्रतिदिन निश्चित संख्या, निश्चित समय एवं निश्चित स्थान के नियम का पालन करते हुए अपनी पूजा वेदी पर गुरु और ईष्ट के पूजन के साथ जप करना चाहिए। जो अंतर्मन में सद्गुरु एवं ईष्ट की एकता को अनुभव करते हैं। उनके लिए गुरु पूजा ही पर्याप्त है। तप के साथ सूर्यमण्डल में स्थित गुरुदेव या माँ गायत्री कर ध्यान अनिवार्य है।
उपासना में प्राप्त तप शक्ति का अमृतत्त्व टिक सके इसके लिए साधना का समुचित पात्र चाहिए। साधना का अर्थ है कठोर संयम, शरीर ही नहीं मन पर भी नियंत्रण रखना। उन सभी शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों को वर्जित समझना जो हमारी जीवनी शक्ति को नष्ट करती हैं, हमारी चिन्तन शक्ति को विकृत एवं बर्बाद करती हैं। यदि व्यावहारिक रूप से कतिपय साधना सूत्रों को अपनाना हो तो तप के विशेष समय में शारीरिक तल पर 1. ब्रह्मचर्य, 2. अस्वाद, 3. किसी से सेवा न लेना, 4. कठोर बिछौने पर शयन करना एवं 5. दिनचर्या को पूर्णतया नियमित एवं अनुशासित रखना जैसे सूत्रों को अपनाया जा सकता है।
उपासना के साथ साधना और आराधना के कठोर अनुशासन जुड़ें हों। उपासना के क्रम में साधकों को पूरी भक्ति एवं श्रद्धा के साथ 24,000 का जप पूर्ण करना होता है। नवरात्रि के दिनों के हिसाब से प्रतिदिन की जप संख्या का निर्धारण होता है। 30 माला जप करने से जप संख्या का विधान भली-भाँति पूरा हो जाता है। परन्तु जैसे-तैसे जप पूरा कर लेना उपासना नहीं है।
उपासना, साधना एवं आराधना के ये सभी सूत्र मिलकर तप की उच्चस्तरीय प्रयोग भूमि विनिर्मित करते हैं। इसके परिणाम कैसे और कितने प्रभावकारी है, यह कहने-सुनने की बात नहीं है। नवरात्रि के दिनों में इन्हें अपनाने वाले की अनुभूति अपने आप ही इसकी सत्यता बखान कर देगी। प्रयोग के अन्तिम दिन साधक को पूर्णाहुति के रूप में हवन का विशेष उपक्रम करना चाहिए। हवन की प्रत्येक आहुति के साथ यह भाव रखा जाना चाहिए।
उपासना का रहस्य यही है। श्रद्धा, भक्ति एवं विश्वास रूपिणी माँ को सभी भूतों-प्राणियों, चर-अचर सभी में अनुभव कर मन अनायास पवित्रता से भर जाता है। माँ की उपासना से हमारी आत्मा को ढाँकने-ढाँपने वाला कुहासा कुछ-कुछ ही सही हटता है। नवरात्रि के पर्व की खासियत यही है कि समग्र भारतीय मन समेकित रूप में माँ के द्वार-दरबार पर आ खड़ा होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-July
उपासना, अध्ययन एवं सेवा में जुटे रहना किसी बड़े से बड़े अचरज से कम बड़ा नहीं था। पर वह स्वयं इसे आश्चर्य नहीं मानती थी। उसका कहना था कि सच्ची बात भले ही देर से समझ में आए, लेकिन जब आ जाती है तो न भूलती है, न छूटती है। फिर बच्चे तो वैसे भी बहुत समझदार होते हैं, बस उन्हें प्यार और धीरज से समझाने-बताने की जरूरत है। फिर तो वे ऐसे पक्के हो जाते हैं, कि कुछ पूछो मत।
उपासना का केन्द्र था। इसमें परम पूज्य गुरुदेव एवं उनके द्वारा प्रशिक्षित कुछ साधक तंत्र विज्ञान की दुरूह क्रियाएँ करके जो शक्ति प्राप्त करते, उसे जनहित में बाँट देते। गुरुदेव द्वारा प्रवर्तित तंत्रविद्या की इन साधनाओं व प्रक्रियाओं की सूक्ष्मता बहुत अधिक थी। तदानुसार उनका प्रभाव भी बहुत व्यापक व दीर्घकालिक होता था। इसकी गूढ़ क्रियाओं द्वारा उत्पन्न किए गए सूक्ष्म कम्पन इतने शक्तिशाली होते थे कि हजारों मील दूर बैठे हुए आदमी पर भी उतना ही असर पड़ता, जितना कि पास बैठे हुए आदमी पर होता।
उपासना से अलग था। इसका मतलब था किसी की सेवा करना, किसी को सहायता पहुँचाना, किसी रोते हुए को हंसाना, किसी दुःखी जन को सुखी करना। बच्चे अपनी दीदी को सुखी करने के लिए दिन भर में एक न एक कोई अच्छा काम अनिवार्य रूप से कर लेते थे। कभी तो किसी बीमार को दवा लाकर देते, या फिर कभी उसकी कोई अन्य सेवा करते। कभी किसी वृद्ध या वृद्धा को सड़क पार करा देते।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-May
उपासना में है। इस समय जितनी गुत्थियाँ दुनिया के सामने हैं, उनकी जड़ में एक ही कारण है- मनुष्यता का अभाव। राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, साम्प्रदायिक, आर्थिक, शारीरिक, कौटुम्बिक, मानसिक जितनी भी उलझनें हैं, उनका पूरी तरह से तब तक निराकरण नहीं हो सकता, जब तक हमारे आचरण पवित्र न हों, जब तक हम सच्चे नागरिक न बनें। सच्चा योगी बनाने का एक ही मार्ग है, और वह है सदाचार। सदाचार और अध्यात्म विद्या को एक ही चीज के दो पहलू कहना चाहिए।
उपासना करते हैं, क्योंकि श्रद्धा से ही ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।” गीतकार ने भी इसी श्रद्धा शब्द की 17वें अध्याय में ‘सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत” कहकर की है।
उपासना-समर्पण योग- खंड 3, पृष्ठ 3.32,33)। कितनी सुँदर व्याख्या श्रद्धा की हुई है और हमें बड़ा स्पष्ट मार्ग भी देती है कि श्रद्धावान कैसे बनें? कैसे श्रद्धा से ज्ञान की प्राप्ति करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-December
उपासना निजी लाभ के निमित्त की जाती है, उसकी सुविधा में दूसरों की सहायता क्यों ली जाए?
उपासना में मन को लगाइए
उपासना में एक कमी है। तू यह सारी-की-सारी क्रियाएँ करने के साथ में उपासना में मन को क्यों नहीं लगाता। जब भी कोई क्रिया करे, तो उसमें अपने मन को लगा लिया कर। इन वस्तुओं के साथ में जो शिक्षण दिया हुआ है, उसे हृदयंगम करने से ही उपासना का प्रतिफल मिलता है। क्या शिक्षण दिया हुआ है?
उपासना कृत्य पूरा करते।
उपासना के बाद थोड़ा-बहुत समय बचता है, वह जनसंपर्क में लगाते है। उन सब के बारे में और लोगों से तरह-तरह की बातें सुनी। उन्हें भूख-प्यास नहीं लगती। कभी किसी ने कुछ आहार लेते नहीं देखा। उन्हें शौच आदि के लिए भी नहीं जाना पड़ता।
उपासना करते, तो पहला दीपक बुझाकर दूसरा जलाते, जिसमें उनके निजी परिश्रम का उपार्जित तेल जलता।
उपासना बताते हैं, उसमें गायत्री माता के एक हाथ में कमंडल, एक हाथ में पुस्तक, एक हंस, एक मोर मुकुट है। ये क्या चीज है? यह क्या चक्कर है महाराज जी? बेटे, चक्कर यह है कि मन को सीमाबद्ध करने के लिए इसे इतने बड़े दायरे में घुमाना पड़ेगा। कभी कमल को देख, कभी हंस को देख, कभी मुकुट को देख, कभी उनके होठों को देख, कभी साड़ी को देख, कभी इसको देख।
उपासना का जब समय आए, तो आप अपनी उपासना के समय जो क्रिया-कृत्य करते हैं, तो उसके पीछे जो शिक्षण दिए गए हैं, उनके साथ अपने आपको मिलाइए। जब आप देवता को फूल चढ़ाते हैं, तो इस चक्कर में मत पड़िए कि साहब, ये चमेली का फूल है कि गेंदा का फूल है कि गुलाब का फूल है या बेला का फूल है। महादेव जी न आक का फूल खाते हैं, न गणेश जी चमेली का फूल खाते हैं और विष्णु भगवान गुलाब का फूल खाते हैं। ये बेकार की बाते छोड़िए और सोचिए कि आदमी का जीवन फूल जैसा होना चाहिए। फूल जैसा कोमल जीवन होगा, तो भगवान के चरणों में भी स्थान मिल सकता है, गले में भी स्थान मिल सकता है, सिर में भी वे स्थान दे सकते हैं।
उपासना के समय जो क्रिया-कृत्य करते हैं, तो उसके पीछे जो शिक्षण दिए गए हैं, उनके साथ अपने आपको मिलाइए। जब आप देवता को फूल चढ़ाते हैं, तो इस चक्कर में मत पड़िए कि साहब, ये चमेली का फूल है कि गेंदा का फूल है कि गुलाब का फूल है या बेला का फूल है। महादेव जी न आक का फूल खाते हैं, न गणेश जी चमेली का फूल खाते हैं और विष्णु भगवान गुलाब का फूल खाते हैं। ये बेकार की बाते छोड़िए और सोचिए कि आदमी का जीवन फूल जैसा होना चाहिए। फूल जैसा कोमल जीवन होगा, तो भगवान के चरणों में भी स्थान मिल सकता है, गले में भी स्थान मिल सकता है, सिर में भी वे स्थान दे सकते हैं।
उपासना बताते हैं, गायत्री माता की उपासना बताते हैं, उसमें गायत्री माता के एक हाथ में कमंडल, एक हाथ में पुस्तक, एक हंस, एक मोर मुकुट है। ये क्या चीज है? यह क्या चक्कर है महाराज जी? बेटे, चक्कर यह है कि मन को सीमाबद्ध करने के लिए इसे इतने बड़े दायरे में घुमाना पड़ेगा। कभी कमल को देख, कभी हंस को देख, कभी मुकुट को देख, कभी उनके होठों को देख, कभी साड़ी को देख, कभी इसको देख।
उपासना में मन को क्यों नहीं लगाता। जब भी कोई क्रिया करे, तो उसमें अपने मन को लगा लिया कर। इन वस्तुओं के साथ में जो शिक्षण दिया हुआ है, उसे हृदयंगम करने से ही उपासना का प्रतिफल मिलता है। क्या शिक्षण दिया हुआ है? पंचोपचार में पाँच चीजें आती है।
उपासना का प्रतिफल मिलता है। क्या शिक्षण दिया हुआ है? पंचोपचार में पाँच चीजें आती है। जब इसमें से एक चीज चढ़ाया करे, तब अपनी विचारणा को, विचारों को उन वस्तुओं के साथ उसी प्रकार से लगा लिया करे, जिसका शिक्षण उसका आधार बनाया गया है। क्या आधार बनाया गया है?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-August
उपासना।
उपासना की थी। दोनों का एज-ग्रुप 25-35 वर्ष के बीच रखा गया। दोनों ग्रुपों के सभी लोगों की स्वास्थ्य-परीक्षा कर यह सुनिश्चित कर लिया गया कि वे पूर्णतः स्वस्थ है। उनमें से किसी को भी न रक्तचाप संबंधी रोग था, न हृदय संबंधी। आध्यात्मिक ग्रुप के लोगों को यह सलाह दी गई कि वे अपना जीवनक्रम हर स्थिति में आध्यात्मिक बनाए रखें और गायत्री मंत्र का जप नियमित रूप से प्रतिदिन करते रहें।
उपासना करो, पर ऐसे तल्लीन हो जाओ कि बस आनंद आ जाए। हमारे यहाँ अखण्ड ज्योति कार्यालय में एक चित्र है, जो अभी भी है। गुरुजी जब उपासना में बैठते थे तो छह घंटे यह नहीं मालूम पड़ते थे कि जाने कहाँ निकल गए। फिर सारा दिन काम करते थे। छह घंटे तो नहीं, तुम्हारे लिए आधा घंटा ही बहुत है।
उपासना अवश्य करनी चाहिए। इससे एक साथ तीन लाभ प्राप्त होंगे-स्वास्थ्य, समृद्धि और आत्मिक प्रगति, ऐसा गायत्री महाविद्या के आचार्यों का कथन है।
उपासना का हवाला क्यों दिया?
उपासना की, उससे कम उपासना कलम की नहीं की, और उससे कम उपासना उन्होंने समाज की नहीं की। जितनी गायत्री माता के प्रति उनकी श्रद्धा थी, उससे ज्यादा कलम के लिए थी और उससे भी ज्यादा समाज सेवा के लिए थी। वे समाज को ऊँचा उठाना चाहते थे। वे समाज को, राष्ट्र को बहुत से होनहार नागरिक देना चाहते थे, यही उनका उद्देश्य था। उनकी सारी जिंदगी इसी में लग गई।
उपासना में बैठते थे तो छह घंटे यह नहीं मालूम पड़ते थे कि जाने कहाँ निकल गए। फिर सारा दिन काम करते थे। छह घंटे तो नहीं, तुम्हारे लिए आधा घंटा ही बहुत है। आधा घंटा नित्यप्रति जब खाना खाएँ तो पहले उपासना कर लें। इसके बाद अपने जीवन का शोधन करें, कहाँ-कहाँ हमारी कमियाँ हैं, किस तरीके से अपनी इन कमियों को हम निकालें।
उपासना तो नित्यप्रति करनी ही है। हमारे जो कार्यकर्ता हैं वे बजाय आलस्य के चाहें तो आधा घंटा उपासना करें। मैं यह तो नहीं कहती कि सारे दिन माला लेकर तुम बैठे रहो। बैठे रहेंगे तो काम कौन करेगा। चाहे तुम पंद्रह मिनट ही उपासना करो, पर ऐसे तल्लीन हो जाओ कि बस आनंद आ जाए।
उपासना करें। मैं यह तो नहीं कहती कि सारे दिन माला लेकर तुम बैठे रहो। बैठे रहेंगे तो काम कौन करेगा। चाहे तुम पंद्रह मिनट ही उपासना करो, पर ऐसे तल्लीन हो जाओ कि बस आनंद आ जाए। हमारे यहाँ अखण्ड ज्योति कार्यालय में एक चित्र है, जो अभी भी है।
उपासना कर लें। इसके बाद अपने जीवन का शोधन करें, कहाँ-कहाँ हमारी कमियाँ हैं, किस तरीके से अपनी इन कमियों को हम निकालें।
उपासना के पश्चात् जब बीमार अवयव अपना स्वाभाविक स्पंदन प्राप्त कर लेता है तो वह स्वस्थ हो जाता है और व्यक्ति नीरोग। इसलिए डॉ.शर्मा का विश्वास है कि गायत्री-चिकित्सा की यह विधि हर रोग और हर परंपरा के लोगों के लिए सफल एवं कारगर सिद्ध होनी चाहिए, क्योंकि यह तरंग प्रधान चिकित्सा भी है। यदि साथ में आस्था और जुड़ जाए, तब तो यह सोने में सुहागे की तरह असर दिखाता है, किंतु न जुड़ने पर भी यह निष्फल नहीं जाता और धीरे ही सही, स्वास्थ्य-लाभ संबंधी प्रयोजन पूरा करके रहता है। इस तरह ‘गायन्त त्रायते’ संबंधी इसकी शास्त्रीय मान्यता सिद्ध हो जाती है।
उपासना में वे गायत्री मंत्र का जप और अनुष्ठान करते और यदा-कदा गायत्री यज्ञों में भाग लेते।
उपासना, साधना और आराधना तीनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं।
उपासना उन्होंने समाज की नहीं की। जितनी गायत्री माता के प्रति उनकी श्रद्धा थी, उससे ज्यादा कलम के लिए थी और उससे भी ज्यादा समाज सेवा के लिए थी। वे समाज को ऊँचा उठाना चाहते थे। वे समाज को, राष्ट्र को बहुत से होनहार नागरिक देना चाहते थे, यही उनका उद्देश्य था। उनकी सारी जिंदगी इसी में लग गई।
उपासना कलम की नहीं की, और उससे कम उपासना उन्होंने समाज की नहीं की। जितनी गायत्री माता के प्रति उनकी श्रद्धा थी, उससे ज्यादा कलम के लिए थी और उससे भी ज्यादा समाज सेवा के लिए थी। वे समाज को ऊँचा उठाना चाहते थे। वे समाज को, राष्ट्र को बहुत से होनहार नागरिक देना चाहते थे, यही उनका उद्देश्य था। उनकी सारी जिंदगी इसी में लग गई।
उपासना भगवान के समीप बैठना अर्थात् उसमें मिल जाना। अनुभूति होना, करुणा पैदा होना, दया पैदा होना। ये सब कौन और क्या हैं? ये भक्ति का स्वरूप हैं और दूसरा वह है जिसका मन शुद्ध, जिसके अंदर दया, करुणा और संवेदना होती है, फिर वह अपने तक सीमित नहीं रहता, वरन् वह ऊँचा उठ जाता है, जिस तरीके से वाल्मीकि ने एक पक्षी के जोड़े को तिलमिलाते हुए देखा और उनकी करुणा फूट पड़ी। इसी तरह संत तुलसीदास की करुणा फूट पड़ी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-October
उपासना की गहराई बढ़ एवं हमारी प्रार्थना−उपासना जीवन−साधना की ओर उन्मुख हो। इसके लिए उपलब्ध है, सबके लिए सुलभ उपासना−साधना पुस्तिका। इसका संशोधित−संवर्द्धित संस्करण शांतिकुंज, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं सभी तीस साहित्य विस्तार पटलों पर उपलब्ध हैं।
उपासना करते हैं (4/40/93)। वायु पुराण के अनुसार श्राद्ध के अवसर पर अग्नि का आवाहन सपत्नीक करना चाहिए (15/70)। यज्ञ मण्डप में सपत्नीक प्रवेश करना मंगलदायी माना गया है (मत्स्य पुराण 58/21)। मनु स्मृति (5/155) के अनुसार स्त्री का यज्ञ पति के साथ सफल होता है। शतपथ ब्रा. (15/3/1/33) से स्पष्ट होता है कि उद्गाता का कार्य भी पत्नियाँ ही करती थीं।
उपासना जीवन−साधना की ओर उन्मुख हो। इसके लिए उपलब्ध है, सबके लिए सुलभ उपासना−साधना पुस्तिका। इसका संशोधित−संवर्द्धित संस्करण शांतिकुंज, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं सभी तीस साहित्य विस्तार पटलों पर उपलब्ध हैं।
उपासना−साधना कराई, पर समाधि तक ले जाकर रोक लिया, कहा, तुम्हें लोकसेवा का कार्य करना है।
उपासना-आराधना कर सकें। इस आँकड़े से प्रदर्शित होता है कि जड़ जगत् के अध्येता-अध्ययनकर्त्ता भी अब इस जगत् से परे की ओर सोचने-विचारने लगे हैं। सन् 2000 में हुए एक अमेरिकी विज्ञान सम्मेलन में भी इस बात पर बल मिला है कि ब्रह्मांड विज्ञान में ईश्वर को मानने के अनेकों प्रमाण हैं। अनेकों ऐसे अकाट्य तर्क एवं तथ्य हैं जिसे यदि खुले मन से स्वीकारा जाए तो ईश्वर के अस्तित्त्व पर कोई भ्रम नहीं रह जाएगा।
उपासना−साधना पुस्तिका। इसका संशोधित−संवर्द्धित संस्करण शांतिकुंज, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं सभी तीस साहित्य विस्तार पटलों पर उपलब्ध हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-March
उपासना, व्रत एवं संकल्प के द्वारा आत्मबोध को पाना है। सत्य तो यह है कि इसमें निहित प्रेरणाओं को सभी धार्मिक आस्थाओं वाले किसी न किसी रूप में महत्त्व देते हैं। हाँ उनकी रीति-नीति भले ही स्पष्ट हो या अस्पष्ट। और हो भी क्यों नहीं, जीवन-बोध के बना जीवन का अंधेरा नहीं मिटता।
उपासना-मानवाकृति एवं लिंगाकृति इन दो रूपों में करने का प्रचलन रहा है। प्रारम्भ में शिव के इन रूपों को मन्दिरों के मुख्य गर्भगृह में स्थापित किया जाता था। लेकिन बाद में मन्दिर में सिर्फ लिंग को ही स्थापित करने की प्रथा विकसित हुई। अभी भी शिवपूजा ज्यादातर लिंग रूप में ही होती है। मद्रास के निकट ऐनीगुँटा लिंग कलात्मक कौशल का अद्भुत उदाहरण है।
उपासना बन जाता है और पुरुषार्थ साधन। इस पथ पर बढ़ते हुए वह हर कठिनाइयों एवं मुसीबतों को धैर्य के साथ सामना करता है। असफलता की क्रूर ठोकरों से वह व्यथित एवं विचलित नहीं होता। छेनी के नुकीले वार को सहते हुए भी वह अपने अन्दर एक नवीन सृजन की कल्पना संजोये रहता है। उसे विश्वास होता है कि सघन तमिस्रा को चीरकर ऊषा की सुनहली आभा अवश्य मुस्करायेगी।
उपासना उतनी लोकप्रियता नहीं पा सकी थी। बाद में शैव मत को गुप्त, चोल और चालुक्य एवं राष्ट्रकूट शासकों ने खूब संरक्षण प्रदान किया। हालाँकि गुप्त शासक वैष्णव थे, परन्तु उनकी धार्मिक सहिष्णुता की नीति के कारण शैव धर्म का खूब विकास हुआ। और इसका असर कला पर भी पड़ा।
उपासना और आत्मिक प्रगति पर सबसे अधिक ध्यान दें। जितनी ही आत्मबल बढ़ेगा उतनी ही शक्ति मिलेगी और उतना ही प्रभाव दूसरों पर पड़ेगा। इसलिए हमें अपनी ओर ही अधिक ध्यान देना है।”
उपासना और साधना यही दो आत्मिक प्रगति के आधार है। साधना का प्रकरण ज्ञानयज्ञ से संबंधित है। यह स्वाध्याय से आरंभ होकर सद्ज्ञान प्रसार के लिए किए जाने वाले प्रबल प्रयत्नों तक फैलता है..... ज्ञान ही है जो पशु को मनुष्य, मनुष्य को देवता और देवता को भगवान बनाने में समर्थ होता है। ज्ञान से ही प्रसुप्त मनुष्यता जागती है और वही आत्मा को अज्ञान के अंधकार में भटकने से उबारकर कल्याणकारी प्रकाश की और उन्मुख करता है।” (पृष्ठ 59)।
उपासना करते है, जिससे आपको परम सिद्धि प्राप्त हुई है? शिव इस संसार में आदि योगी थे, योग के सभी भेदों को मालूम कर चुके थे। उन्होंने उत्तर दिया, “गायत्री ही वेदमाता है और पृथ्वी की सबसे पहली और सबसे बड़ी शक्ति है। वह संसार की माता है, भूलोक की कामधेनु है। इससे सब कुछ प्राप्त होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-November
उपासना का जो परिणाम मिलना चाहिए था, उससे जिस वातावरण का परिशोधन होना चाहिए था, उस वातावरण का परिशोधन हुआ क्या? जिस उद्देश्य से हमने प्रेरणा दी थी, शक्ति दी थी और दीक्षा दी थी, शिक्षा दी थी। न हमारा उद्देश्य पूरा हुआ न तेरा हुआ और न ही भगवान का। तीनों में से एक का भी उद्देश्य पूरा नहीं हुआ इसलिए क्रिया के साथ-साथ में विचारणा का समावेश करने की शिक्षा मैं हमेशा देता रहा हूँ और देता रहूँगा।
उपासना विशेष रूप से की जाती थी।
उपासना की प्रवाहमान् कालसरिता न तो कभी बन्द हुई और न कभी मन्द पड़ी। बल्कि उत्तरोत्तर सूर्य उपासना का सामाजिक, साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व बढ़ता गया। महाभारत काल में इसका प्रचलन काफी बढ़ गया था। कुषाण काल में तो सूर्य उपासना का प्रचलन ही नहीं था, वरन् कुषाण सम्राट स्वयं भी सूर्योपासक थे। इतिहासवेत्ताओं के अनुसार कनिष्क (78 ई.) के पूर्वज शिव तथा सूर्य के उपासक थे।
उपासना में क्रिया के साथ-साथ मन को भी लगाइए। मन कैसे लगाएँ? बेटे, मैं यही तो समझा रहा था। प्रत्येक क्रिया के साथ क्या संकेत जुड़े हुए हैं, क्या शिक्षण भरा हुआ है, उस पर गौर कीजिए। साथ ही यह भी गौर कीजिए कि किस काम के लिए यह किया जा रहा है।
उपासना से भी ज्यादा, भजन से भी ज्यादा। कर्मकाँड से भी ज्यादा आवश्यक है। अति आवश्यक है कि आप भी अपना आत्मसंशोधन कर ले, तो बात बने। लोहा तब तक कच्चा रहता है, तब तक उसकी कोई चीज नहीं बन सकती। हमने भिलाई और टाटानगर में कच्चा लोहा देखा।
उपासना के समय भी हम अकसर अपने मन को खाली छोड़ देते है, छुट्टल छोड़ देते हैं। उसको कोई काम सौंपते नहीं, कोई जिम्मेदारी सौंपते नहीं, इसीलिए मन भाग जाता है। मन भागेगा नहीं तो क्या करेगा? नहीं साहब! मन भागना नहीं चाहिए। बेटे, मन भागेगा नहीं तो क्या करेगा?
उपासना के उत्तरार्द्ध आराधना-समाजसेवा के विभिन्न दायित्वों से परिचित कराती है एवं संकल्पित कराती है। इस अवधि में एक दिन शाँतिकुँज-ब्रह्मवर्चस-देवसंस्कृति विश्वविद्यालय दिग्दर्शन हेतु मध्याह्न के बाद खाली रखा जाता है। प्रज्ञापुराण का शिक्षण एक दिन उसका प्रदर्शनात्मक प्रवचन से हो जाता है। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य परिचर्चा एवं ग्राम्य विकास पर किन्हीं दो दिनों में गोष्ठी भी ली जाती है, जो साधकों को नई दिशाएँ देती देती है। इन नौ दिवसों को माँ के गर्भ में रहकर बिताए गए नौ माह की अवधि की तरह माना जाना चाहिए।
उपासना-साधना एवं आराधना जैसे जीवन सूत्रों पर आस्था। उन्हें जीवन में अपनाते हुए सीखने, सिखाने की प्रारम्भिक दक्षता।
उपासना का उद्देश्य एक तो यह है कि हम अपने आपको परिशोधित करते चले जाएँ। अपने आपका परिशोधन करते हुए चले जाएँगे, तो फिर देखेंगे कि क्या कमाल होता है। देखें क्या मजा आता है। देखिए आपके पास कैसे सब चमत्कार आते है। मैं आपसे यही कहने वाला था कि आप अपनी वाणी को संशोधित कर लीजिए, फिर आप अपनी जुबान से कहिए कि तेरा भला हो जाए, आशीर्वाद हो जाए और तेरा कल्याण हो जाए।
उपासना पाँच चरणों में बँटी हुई है। पहला कृत्य है- आत्मशोधन की क्रिया। आत्मसंशोधन की क्रिया जिसमें हम पाँच कृत्य कराते है। 1. पवित्रीकरण कराते हैं, 2. आचमन कराते हैं, 3. शिखा बंधन कराते हैं, 4. प्राणायाम कराते हैं, 5. न्यास कराते हैं। इन पाँच क्रियाओं का एक उद्देश्य है कि हम अपने पाँचों कोशों को, पाँचों तत्वों को, पाँचों प्राणों को शुद्ध बनाते है।
उपासना का प्रतीक बन गया।
उपासना में पहला काम है सफाई करना। हमारे दिमाग में एक बात आनी चाहिए कि हमको भगवान के चरणों में जाने के लिए नहा-धोकर जाना चाहिए। स्वच्छ और पवित्र होकर जाना चाहिए। हमारे जीवन की क्रियाएँ पवित्र होनी चाहिए। हमारा चिंतन पवित्र होना चाहिए।
उपासना का उल्लेख मिलता है। कुमार गुप्त (414-55 ई.) के समय में विष्णु, शिव एवं सूर्य की उपासना विशेष रूप से की जाती थी।
उपासना ने देश को न केवल आध्यात्मिक रूप से बल्कि साँस्कृतिक रूप से भव्यता प्रदान की। वैदिक वाङ्मय के साथ सूत्र, स्मृति ग्रन्थ एवं रामायण-महाभारत महाकाव्य इसकी साक्षी देते हैं। ब्रह्मांड पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण आदि अनेकों महापुराण एवं भविष्य पुराण व साम्बपुराण आदि विविध उपपुराण इस ऐतिहासिक सत्य की साहित्यिक साक्षी हैं। महापुराणों व उपपुराणों के अतिरिक्त महाकवि कालीदास, बाणभट्ट, भवभूति, मयूर, भट्ट, नारायण, श्री हर्ष आदि कवियों ने सूर्य स्तुति से अपनी काव्य साधना को सफल बनाया है।
उपासना तेरी अधूरी है। तेरी उपासना का जो परिणाम मिलना चाहिए था, उससे जिस वातावरण का परिशोधन होना चाहिए था, उस वातावरण का परिशोधन हुआ क्या? जिस उद्देश्य से हमने प्रेरणा दी थी, शक्ति दी थी और दीक्षा दी थी, शिक्षा दी थी। न हमारा उद्देश्य पूरा हुआ न तेरा हुआ और न ही भगवान का। तीनों में से एक का भी उद्देश्य पूरा नहीं हुआ इसलिए क्रिया के साथ-साथ में विचारणा का समावेश करने की शिक्षा मैं हमेशा देता रहा हूँ और देता रहूँगा।
उपासना सफल हुई।
उपासना का सामाजिक, साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व बढ़ता गया। महाभारत काल में इसका प्रचलन काफी बढ़ गया था। कुषाण काल में तो सूर्य उपासना का प्रचलन ही नहीं था, वरन् कुषाण सम्राट स्वयं भी सूर्योपासक थे। इतिहासवेत्ताओं के अनुसार कनिष्क (78 ई.) के पूर्वज शिव तथा सूर्य के उपासक थे। इसके पश्चात् तीसरी शताब्दी ई. के गुप्त सम्राटों के समय में भी सूर्य, विष्णु तथा शिव की उपासना का उल्लेख मिलता है।
उपासना के स्वरूप पर यद्यपि शौनक, यास्क, सायण आदि प्राचीन आचार्यों तथा बर्गेन, हिले ब्रॉन्ट, आलेनबर्ग, ब्लूमफील्ड, ग्रिसवोल्ड, कीथ, स्वामी दयानन्द, श्रीअरविन्द, पं. सातवलेकर, स्वयं परम पूज्य गुरुदेव आदि पाश्चात्य एवं प्राच्य विद्वानों ने साहित्यिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विचार किया है। वी.सी. श्रीवास्तव आदि इतिहास के कतिपय विशेषज्ञों ने प्राचीन भारत की सूर्योपासना पर ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक दृष्टि से कार्य किया है। परन्तु अभी भी इस कार्य के कई पहलू अधूरे एवं अपूर्ण हैं। इन पर विशद् एवं व्यापक शोध कार्य की अपेक्षा एवं अनिवार्यता है। ताकि प्राचीन भारत के इतिहास व संस्कृति के प्रेरक प्रकाशपुञ्ज भगवान् सूर्य की उपासना का सर्वांग स्वरूप विश्व दृष्टि के समक्ष उजागर हो सके।
उपासना के बीज अगर भारत के चिर प्राचीन प्राक् ऐतिहासिक युग में न छिपे होते तो इनका प्रस्फुटन एवं पल्लवन प्रारम्भिक वैदिक युग में देखने को न मिल पाता।
उपासना का सर्वांग स्वरूप विश्व दृष्टि के समक्ष उजागर हो सके। गायत्री महामन्त्र के उपास्य देव भगवान् सविता के स्वरूप और महत्त्व पर व्यापक शोध करने के लिए देव संस्कृति विश्वविद्यालय में एक विस्तृत शोध योजना बनायी गयी है। इसकी सुपरिणति के रूप में देव संस्कृति के प्रेरक प्रकाश पुञ्ज भगवान् सूर्य के अलौकिक तेज से समग्र संस्कृति प्रभामय हो सकेगी।
उपासना काफी व्यापक थी। इतिहास विशेषज्ञ इस सत्य को प्रमाणित करते हैं कि हर्ष के समय में प्रयाग में तीन दिन का अधिवेशन हुआ था। इस अधिवेशन में पहले दिन बुद्ध की मूर्ति प्रतिष्ठित की गयी। बाद में क्रमशः दूसरे और तीसरे दिन सूर्य तथा शिव की पूजा की गयी।
उपासना में लगना चाहिए। महाराज जी, यही तो हमको शिकायत है। क्या शिकायत है? मन भाग जाता है, अच्छा तो आपका यह शिकायत है। चलिए हम बताते है, फिर मन भाग जाए तो आप हमसे कहना।
उपासना का प्राचीनतम ऐतिहासिक-साहित्यिक साक्ष्य है। यह इस सत्य का स्पष्ट प्रमाण है कि प्रारम्भिक वैदिक युग के आते तक भारतवासी सूर्य उपासना से न केवल सुपरिचित हो चुके थे, बल्कि उसका गहन मर्म भी समझ चुके थे।
उपासनाएँ बताते है। पाँच उपासनाओं का मोटा-मोटा स्वरूप हमने पत्रिकाओं में भी छापा दिया था और पिछले साल भी हमने स्वर्ण जयंती साधना भी सिखाई थी। गुरुजी! हम स्वर्ण जयंती साधना वर्ष की साधना करते हैं और भजन भी पैंतालीस मिनट करते हैं। भजन तो करता है बेटा, पर तू एक बात तो बता तो बता कि उस कर्मकाँड के साथ-साथ जो विचार हैं, उनको भी करता है कि नहीं।
उपासना और ध्यान करते। उसके उपराँत भ्रमण के लिए निकल जाते। प्रतिदिन तीन मील की पैदल यात्रा करने के बाद यज्ञ करते, तत्पश्चात् उनका अध्यापन कार्य आरंभ होता, जिसमें वे करीब एक घंटा लगाते। ग्रंथों को पढ़ाते समय उनकी अद्भुत स्मरण शक्ति की झलक मिलती। छात्रों के सम्मुख पुस्तकें खुली रहती।
उपासना से न केवल सुपरिचित हो चुके थे, बल्कि उसका गहन मर्म भी समझ चुके थे।
उपासना को, साधना को लोगों ने जादू मान लिया। अध्यात्म को मनोकामना पूरा करने का जादू मान लिया। यह जादू नहीं है, यह जीवन जीने की कला है। जीवन का संशोधित करने की विधि है। आपका जीवन इतना बड़ा जीवन है कि इस पर हम देवताओं को निछावर करते है, भगवान को हम इस पर निछावर कर सकते है।
उपासना भारतवासियों की आध्यात्मिक आस्था का प्रतीक बन गयी थी। उनके समय में मालवा के मन्दसौर नामक स्थान में, ग्वालियर में, इन्दौर में तथा बघेलखण्ड के आठमक नामक स्थान में निर्मित चार श्रेष्ठ सूर्य मन्दिरों का उल्लेख प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त उनके समय में बनी हुई सूर्य देव की कुछ मूर्तियाँ बंगाल में भी मिलती हैं।
उपासना ऋग्वैदिक काल से भी कहीं अधिक प्राचीन है। क्योंकि सूर्य उपासना के बीज अगर भारत के चिर प्राचीन प्राक् ऐतिहासिक युग में न छिपे होते तो इनका प्रस्फुटन एवं पल्लवन प्रारम्भिक वैदिक युग में देखने को न मिल पाता।
उपासना का प्रचलन ही नहीं था, वरन् कुषाण सम्राट स्वयं भी सूर्योपासक थे। इतिहासवेत्ताओं के अनुसार कनिष्क (78 ई.) के पूर्वज शिव तथा सूर्य के उपासक थे। इसके पश्चात् तीसरी शताब्दी ई. के गुप्त सम्राटों के समय में भी सूर्य, विष्णु तथा शिव की उपासना का उल्लेख मिलता है। कुमार गुप्त (414-55 ई.) के समय में विष्णु, शिव एवं सूर्य की उपासना विशेष रूप से की जाती थी।
उपासना, श्रम-साधना के परिणामों का विश्लेषण किया जाता है। परामर्श के आधार पर परिजन स्वास्थ्य संवर्द्धन हेतु वनौषधि सेवन व बताई साधना को जीवन में उतार सकते है। सभी साधकों का अपनी-अपनी टोली के साथ संस्था प्रमुख के साथ फोटोसेशन भी होता है। अंतिम दिन एक सुँदर प्रमाण पत्र दिया जाता है। पूर्व अनुमति लेकर आने वाले स्वस्थ साधकों के लिए ये सत्र वर्षभर खुले है।
उपासना, साधना व आराधना के क्षेत्र में अच्छी प्रगति कर सकेंगे। और उनमें साधकों की जिज्ञासाओं एवं समस्याओं के समाधान की सम्यक् सामर्थ्य का विकास हो सकेगा।
उपासनाओं का मोटा-मोटा स्वरूप हमने पत्रिकाओं में भी छापा दिया था और पिछले साल भी हमने स्वर्ण जयंती साधना भी सिखाई थी। गुरुजी! हम स्वर्ण जयंती साधना वर्ष की साधना करते हैं और भजन भी पैंतालीस मिनट करते हैं। भजन तो करता है बेटा, पर तू एक बात तो बता तो बता कि उस कर्मकाँड के साथ-साथ जो विचार हैं, उनको भी करता है कि नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-September
उपासना की अनुभूति प्रत्यक्ष हो रही थी। बड़ी संख्या में वे सब उन्हें लेने के लिए हवाई अड्डे पहुँचे। वन्दनीया माताजी के जयघोष और परिजनों की श्रद्धा से भीगे नेत्रों ने हवाई अड्डे के कर्मचारियों को भी श्रद्धा से भिगो दिया।
उपासना स्थली बना लिया। ऐसे व्यक्तियों ने बाद के दिनों में अनेकों दिव्य अनुभूतियाँ पायीं। उनकी अन्तर्चेतना में एक अलौकिक आलोक का अवतरण हुआ।
उपासना-आराधना दोनों को ही परमप्रिय थी। जसवन्तराव नित्य-नियम से देवी सप्तशती का सम्पूर्ण पाठ किया करते थे। उनका घर-आँगन प्रतिदिन जगन्माता के महिमागान से मुखरित होता था। सप्तशती के सम्पूर्ण पाठ के साथ गायत्री मंत्र एवं नवार्ण मंत्र पर उनकी गहन आस्था थी। ‘ॐ ऐं ह्री क्लीं चामुण्डाय विच्चै’ का जप करते हुए वह भावलीन हो जाते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-September
उपासना तथा पूजा पद्धति लोगों को सिखाई है और साथ ही यह भी कहा है कि इनका पूरा लाभ उन्हीं को मिलेगा जो अपने व्यक्तित्व को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने की साधना भी साथ ही करेगा।” आगे वे लिखते है कि “हमने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को हमारी ही तरह जीवन का वैसा ही अंग बनाएं जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्यकर्म हेतु हम प्रयत्नशील रहते है। यही सच्चा अध्यात्म है।
उपासना विधियों की उपयोगिता को सुबोध शैली में समझाया। पहली बार जनसाधारण के सम्मुख ऐसा प्रतिपादन आया, जिससे वे प्रेरणा ले सकें कि अध्यात्म मात्र शास्त्र वचन ही नहीं हैं, पूर्णतः उसका पूरा आधार विज्ञान सम्मत भी है। बाद की अखण्ड ज्योति के अंकों में वे शब्द शक्ति की महत्ता, गायत्री के चौबीस अक्षरों का वैज्ञानिक विवेचन, यज्ञ विज्ञान के महत्वपूर्ण पक्षों तथा कुण्डलिनी महाशक्ति के विज्ञान सम्मत आधार पर लिखते रहे। यह क्रम 1967-68 तक चला।
उपासना का नियमित क्रम 1937 से आरंभ कर 1951 तक यथावत चलाया एवं पूर्णाहुति तक उनने सारे व्रत अनुशासन उसी प्रकार निबाहे जैसा कि उनके गुरु ने उन्हें बताया था। इस बीच 1951 में वे एक बार हिमालय यात्रा पर गए जो कुछ माह की थी व पुनः बाद में 1961 में एक वर्ष के लिए दुर्गम हिमालय उनने प्रवास किया। सब कुछ अपने मार्गदर्शक के बताये निर्देशों के अनुरूप।
उपासना कार्यों के लिए बनी थी। 1971 तक तो नौ दिवसीय सत्रों के माध्यम से पूज्य गुरुदेव यह क्रम बराबर चलाते रहे, फिर प्रचार प्रकाशन तंत्र के तेजी से बढ़ने से उनके वहाँ से शाँतिकुँज आ जाने के बाद नई भूमि खरीद कर वहाँ प्रज्ञा नगर बसाया गया तथा बढ़े कार्यक्रमों के अनुरूप नई इमारतें बना दी गई रोटरी आँफसेट मशीनें खरीदी गई। इस प्रकार गायत्री तत्वज्ञान से आरंभ हुआ लोकशिक्षण युगपरिवर्तनकारी साहित्य रचने वाली बहुमुखी कार्यपद्धति के रूप में विकसित हो सब दिशाओं में फैल गया। गुजराती मराठी, उड़िया, अँग्रेजी आदि भाषाओं में साहित्य का अनुवाद होकर पत्रिका कई रूपों में प्रकाशित होने लगी।
उपासना का महत्व तथा फैलायी जा रही भ्रान्तियों के निवारण हेतु शास्त्र सम्मत तर्क सम्मत समाधान दिए। दिसम्बर 1942 की अखण्ड ज्योति में उनने घोषणा कर दी कि ज्येष्ठ सुदी सं. 2010 गायत्री जयन्ती (सन 1943) को कई महान कार्यों की पूर्णाहुति होगी उसमें प्रथम थी सहस्राँशु गायत्री ब्रह्मयज्ञ की पूर्णाहुति। 124 करोड़ गायत्री महामन्त्रों का जप, 124 लाख आहुतियों का हवन, 124 हजार उपवास तीनों ही पूरे होने को आ रहे थे वे सभी गायत्री जयन्ती तक पूरे हो जाने की संभावना उनने व्यक्त की थी। दूसरा था सवा करोड़ हस्तलिखित मंत्रों के संकल्प की पूर्ति व उसकी भी पूर्णाहुति। तीसरा था स्वयं के 24-24 लक्ष के 24 पुरश्चरणों की पूर्णाहुति।
उपासना के माध्यम से उपनयन संस्कार के बाद ही जगाना आरंभ कर दिया।
उपासना को सेवा साधना से जोड़ने का उनका तरीका स्वयं में निराला था एवं अध्यात्म को सही प्रगतिशील दिशा देने वाला भी। लाखों व्यक्तियों को इस प्रकार उनने अपनी ही मुक्ति, वैराग्य, समाधि वाले चिन्तन से विरत कर लोकसेवी बना दिया। यह एक क्रान्तिकारी स्तर का विचारक ही कर सकता था। धर्म के संबंध में जो भ्राँतियाँ संव्याप्त हैं एवं जनोपदेशक जो भी कुछ कहकर उन्हें पोषण देते रहे है, उनसे जूझना व योद्धा की तरह संघर्षरत रह बिना विचलित हुए लक्ष्य सिद्धि तक पहुंच जाना उनके व्यक्तित्व के एक अनूठे पक्ष को प्रस्तुत करता है।
उपासना, साधना और आराधना का समन्वय करना चाहिए।
उपासना का क्रम शक्ति पीठों में चलाना, युग संगीत के माध्यम से जन चेतना को झकझोरना का विस्तार करना, रामायण गीता प्रज्ञापुराण की कथा द्वारा प्रगतिशील अध्यात्म का प्रतिपादन करना, अपने मण्डल की तीर्थ यात्रा-धर्म प्रचार की पदयात्रा-साइकिल यात्रा सतत् चलाना, जन-जन को युग साहित्य के संजीवनी से परिचित कराना, इस के लिए चल पुस्तकालयों की व्यवस्था करना, स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना व उनका संचालन बाल संस्कार शालाओं तथा प्रौढ़ पुरुषों व महिलाओं की साक्षरता हेतु नियमित कक्षाएँ चलाना, वृक्षारोपण द्वारा हरीतिमा विस्तार करना तथा नशा निवारण आँदोलन चलाना-थे अनेकों कार्यों में से कुछ थे जिन पर पूज्यवर सतत् जोर देते रहे।
उपासना का अपना प्रतिफल है तथा श्रेष्ठ संस्कारों से अनुप्राणित भूमि में साधना का अपना। महर्षि रमण ने अपनी एकान्त साधना के लिए शैव साधकों की तपस्थली अरुणाचलम् को चुना क्योंकि वहाँ वे सारे संस्कार विद्यमान थे जहाँ वे न्यूनतम पुरुषार्थ से अपनी सिद्धियों को जगा कसते थे। योगीराज अरविन्द ने भी वेद पुरी को ही अपनी तपःस्थली बनाया जो महर्षि अगस्त की तपोभूमि थी। रावण महाबली था पर तप शक्ति से डरता था। उसके निर्देश थे कि उसके असुर उत्तर में कहीं भी जाएँ पर वेदपुरी जहाँ आज पांडिचेरी स्थित है से कोसों दूर रहें क्योंकि उस स्थान के प्रभामण्डल का प्रभाव असुरत्व के लिए विनाशकारी था।
उपासना क्रम चालू रख रविवार के दिन साप्ताहिक कार्यक्रम रखना व सामूहिक हवन करना चाहिए।”
उपासना का प्रयोजन प्रमुखता सद्बुद्धि का अवतरण है। वह ऋतम्भरा या महाप्रज्ञा कही जाती हैं उसका यही लाभ प्रमुख है। इस संदर्भ में हम जितना कुछ उपलब्ध कर सके है, वह गर्व करने योग्य तो नहीं, पर संतोषजनक अवश्य है। नवनिर्माण हमारे इस जीवन का प्रमुख उद्देश्य है। सज्जनों में ही सद्बुद्धि का अवतरण होता है।
उपासना कैसे की जाती है? यह समझाया
उपासना को इतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए जितना कि मानसिक परिष्कार और भावनात्मक उत्कृष्टता के अभिवर्धन के प्रयत्नों को। यह माना जाना चाहिए कि यदि विचारणा और कार्य पद्धति को परिष्कृत न किया गया होता तो उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते जिस तरह कि अनेक पूजा पत्र तक सीमित मन्त्र तन्त्रों का ताना बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली हाथ रहना पड़ता है। हमारी जीवन साधना को यदि सफल माना जाय और उसमें दिखने वाली अलौकिकता को खोजा जाय तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाय। पूजा उपासना को गौण माना जाय। आत्मकथा के एक अंश को लिखते का दुस्साहस करते हुए, हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्मशोधन में लगा है।
उपासना जो आठ घण्टे शारीरिक श्रम व सात घण्टे मानसिक श्रम (चिन्तन, मनन, स्वाध्याय, लेखनी की साधना) के अतिरिक्त थी। यह सोचा जा सकता है कि 24 घंटे में 21 घंटे जब इसमें चले गए तो वे सोते कब थे। यही तो अलौकिक सिद्धि है जो किसी भी नाम से पुकारी जा सकती है पर उनके निकटवर्ती जानते हैं कि प्रातः 1 बजे से उठकर जो उनने कार्य आरंभ किया है तो उसे बिना विराम दिये सतत् रात्रि 10 बजे तक सम्पन्न किया है। यह संभव है तपोबल से अर्जित सामर्थ्य के सहारे।
उपासना-कारण शरीर अंतःकरण से संबंधित है। साधना चिन्तन से-सूक्ष्म शरीर से और आराधना समाज सेवा के लिए किये गये उदार सहकार भरे कृत्यों से-स्थूल शरीर से। पूज्य गुरुदेव ने अपने तीनों शरीरों से पूरी निष्ठा के साथ गायत्री साधना स्वयं सम्पन्न की व माँ गायत्री के वरदपुत्र बन गए। असंख्यों की सहायता करने वाला ब्रह्मवर्चस् इससे कम में संग्रहित हो भी तो नहीं सकता था। अपने व्यक्तित्व को उर्वर क्षेत्र की तरह विकसित करने में यदि इतनी सतर्कता न बरती होती तो संभवतः उनके चौबीस वर्षों के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण तथा सामान्य समय के जप-तप उतने प्रभावी न हो सके होते जितने कि देखे और पाये गये।
उपासना संपन्न की थी। साथ ही ज्ञानवृद्ध, आयुवृद्ध, लोकसेवी, पुण्यात्मा सत्पुरुषों के पते भी माँगे गये ताकि उनसे इस पुण्य आयोजन हेतु आशीर्वाद लिया जा सके। कितना कुछ सुनियोजित व शालीनता, सुव्यवस्था से भरा पूरा आयोजन, जिसमें स्वयं को सिद्ध न बताकर सबके आशीर्वाद माँगे ताकि भूमि के संस्कारों को जगाकर एक सिद्धपीठ विनिर्मित की जा सके।
उपासनात्मक क्रिया-कृत्यों को करने के लिए उठे और खाया पिया तब जाय जबकि शारीरिक नित्यकर्म करने की तरह मन की मलीनता को स्वच्छ करने की तरह मन की भूख बुझाने के लिए संकल्पित साधना कृत्य पूरा कर लिया जाय”।
उपासना गृह में साक्षात्कार कर उसके अंदर छिपे महामानव का, अवतारी सत्ता का उसे परिचय करा दिया जाय ताकि भविष्य में जो किया जाना है, उसके माध्यम से संपन्न होना है उसका पूरा खाका उसके दिमाग में बैठ सके। समस्त मानव जाति का व विश्व का कल्याण उन्हें जिस प्रयोजन में दिखा उसे पूरा करने प्रकाश पुँज के रूप में आए व तप साधना का आदर्श ही नहीं, अटूट विश्वास और प्रचण्ड साहस, पर्याप्त मनोबल देकर चले गए। दिव्य सत्ताओं का प्यार अनुदान भी विचित्र होता है। संभवतः यही शक्तिपात प्रक्रिया भी है।
उपासना भी करवा लेता तथा यज्ञ में बैठकर आहुतियां भी डलवा लेता? संभव नहीं। अछूत व स्त्री कैसे गायत्री का प्रयोग कर सकते है, यह भ्रान्ति जिस राष्ट्र में रोम रोम में संव्याप्त हो, वहाँ यह क्राँतिकारी कदम सारे खतरे मोल लेते हुए उठाना, एक अवतारी सत्ता का ही काम हो सकता था। संभवतः इसी काम के लिए, आमूलचूल परिवर्तन के लिए, तथा कथित बुद्धिवादियों व अनास्था बढ़ाने वाले कर्मकाण्डियों से मोर्चा लेने हेतु यह कालजयी जन्मा था। आजीवन वे आचार से, अविवेकपूर्ण प्रचलनों से, दुर्बुद्धि भरे कुतर्की प्रतिपादनों से मोर्चा लेते रहे, न जाने कितने घाव व चोटें खायीं पर राणा साँगा की तरह मोर्चे पर डटे रहे, यह शक्ति उन्हें कहाँ से मिली?
उपासना, संध्यावन्दन के उपचार, गायत्री जप की विधि, भावनाओं के परिष्कार परिमार्जन को प्राथमिकता जैसे विषयों से शुरुआत की। क्रमशः उच्चस्तर की ओर प्रेरित करते हुए गुरुदेव ने गायत्री के पाँच मुखों की प्रेरणा स्वरूप पाँच कोषों की साधना, तीन शरीरों के परिष्कार-उन्नयन की साधना, सावित्री तथा कुण्डलिनी साधना और आत्मा-परमात्मा के मेल-मिलन की साधना की विभिन्न दिशाओं में परिजनों को अग्रसर कर दिया। अब यह आश्चर्य का ही विषय है कि एक ही पत्रिका में सभी परिजनों को उनकी मनःस्थिति, प्रकृति, रुचि के अनुरूप साधना की सामग्री भी मिली और प्रेरणा थी। जो जिस पथ पर अग्रसर हो गया, उसे वही मार्ग प्रकाशित होता दिखाई देने लगा। सामान्य सी शैली में सामान्य ढंग से कोई बात कहकर हजारों भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों का समाधान करने की क्षमता अलौकिक और दिव्य ही कहीं जाएगी।
उपासना तो करता ही, अपने साथियों को भी अमराई के कुँजों में ले जाकर अध्यात्म तत्वज्ञान के गूढ़ उपदेश व्यावहारिक रूप में ग्रामीण भाषा में समझाता। संभवतः वह अध्यात्म क्षेत्र का लोक शिक्षक बनने की तैयारी अभी से कर रहा था। एक सज्जन जो उनसे आयु में एक वर्ष बड़े हैं, अभी भी जीवित हैं व अपने रोचक संस्मरण बालक श्रीराम की अध्यात्म क्षेत्र में प्रगति के सुनाते हैं। उन संस्मरणों को इसी अंक में अन्यत्र स्थान दिया गया है।
उपासना की चर्चा की जा रही है जिससे उनने पर्याप्त तप पूँजी कमाई और जी भर कर लुटाई।
उपासना आदि नामों से ही कतराता रहा है अथवा मन में उनके संबंध में भ्रान्तियाँ पाले हुए है, भी उनकी बात समझकर इस आलोक का विस्तार कर सकेगा।
उपासना जो बन पड़ी है उसे भी हमने भाव परिष्कार के प्रयत्नों के साथ पूरी तरह जोड़ रखा है।” (पृष्ठ 135 प्रथम संस्करण, सन् 1965)
उपासना क्रम भी चालू रखते थे। 1971 की विदाई से 15 दिन पहले तक वे सतत् घूमते रहे थे व एक-एक दिन में 3-4 स्थानों के कार्यक्रम उनने निपटाये। न केवल सम्पन्न किया, वरन् जो मिलने आया उससे इतना समीप से मिले कि उसे लगा मुझसे अधिक उनका कोई और समीप नहीं है। 1980-81-82 में शक्तिपीठों के शिलान्यास व फिर प्राण प्रतिष्ठा हेतु निकले तो एक दिन में पाँच कार्यक्रम सम्पन्न कराते चले गये।
उपासना आदि का नाश करने लगे।
उपासना परायण महापुरुषों ने इसी का अवलम्बन लिया है। यज्ञोपवीत उसी की दिव्य प्रेरणाओं का सार संक्षेप प्रतीक रूप में पहनाया जाता है ताकि साक्षात गायत्री माता कंधे पर, छाती पर, कलेजे पर, पीठ पर हर समय विराजमान होने के कारण उस तत्व ज्ञान को समझाती रहें जिससे वे फलित होती हैं और साधक अपनी पात्रता बढ़ाता हुआ सच्चे अर्थों में ब्राह्मण बनता है।
उपासना आदि पर उनका दृष्टिकोण स्थूलवादी ही रहा।
उपासना के प्रतिफल तो अभी किसी विशेष कार्य के लिए तिजोरी में बंद कर रखे है। यह तो हमारी काया के इस पृथ्वी से ऊर्ध्वारोहण के बाद ही रहस्य खुलेगा। आपने जो कुछ जाना और सुना है, वह सब तो जीवन में उतारे गये ब्राह्मणत्व का प्रतिफल हैं। ब्राह्मणत्व अपने आपमें एक तपश्चर्या है। अभी तक तो उसी का लाभ उठाया और दिया है व आगे भी यही प्रतिफल उससे मिलता रहेगा।
उपासना कर्मकाण्ड प्रधान, भावविहीन न हो। भावना का परिष्कार ही वस्तुतः आत्मबल का अभिवर्धन करता है। कर्मकाण्ड उसका बाह्य उपकरण मात्र है।”
उपासना की, उनके चित्र जुलाई अंक में छापे। जिनमें सावित्री देवी, शिवशंकर जी मिश्र बाला शंकर जी भट्ट, नन्दकिशोर उपाध्याय, पुरुषोत्तम साखरे तथा शालिग्राम जी दुबे कुछ नाम है। वस्तुतः जुलाई 1942 का अंक ही गायत्री साधना की अनुभूतियों पर आधारित अंक था। इस तथा आगे के अंकों की “गायत्री चर्चा” प्रसंग में उनने स्थान स्थान पर गायत्री उपासना का महत्व तथा फैलायी जा रही भ्रान्तियों के निवारण हेतु शास्त्र सम्मत तर्क सम्मत समाधान दिए। दिसम्बर 1942 की अखण्ड ज्योति में उनने घोषणा कर दी कि ज्येष्ठ सुदी सं. 2010 गायत्री जयन्ती (सन 1943) को कई महान कार्यों की पूर्णाहुति होगी उसमें प्रथम थी सहस्राँशु गायत्री ब्रह्मयज्ञ की पूर्णाहुति।
उपासना की तथा महामानवों, ऋषिसत्ताओं ने भी। फिर जगह जगह कुआँ खोदते रहने की विडंबना क्यों रची जाय? आज के बुद्धिवादी युग में महाप्रज्ञा के तत्वदर्शन के विस्तार की और अधिक आवश्यकता है। वह सही अर्थों में नवयुग ला सकता है और लाकर रहेगा।
उपासना के क्षेत्र में प्रवेश किया तो नवनीत रूपी हृदय वाला यह सन्त पिघल कर अगणित व्यक्तियों को अपनी तप साधना के अनुदान बाँटता चला गया। उसके गुरु ने उनसे कहा, “सौ हाथों से कमाना, हजार हाथों से लुटाना। जितना तुम समाज रूपी खेत में बोओगे कई गुना तुम्हें वापस मिलेगा, उसे काटना व वितरित कर देना।” ऐसे औघड़दानी को साक्षात् रुद्र न कहा जाय तो क्या कहें? नवनीत और हिमखण्ड जब गलते और पिघलते रहते हैं तथा अपने तप अनुदान सहज वितरित करते रहते हैं।
उपासना में वसंत पंचमी के दिन बालक श्रीराम के उपासना ग्रह में एक दिव्य प्रकाश का अवतरण हुआ जो बाहर से घनीभूत होता हुआ उसके शरीर, मन, अन्तःकरण में समा गया और उसे साधारण बालक से अवतारी महापुरुष बना कर निहाल कर गया। इसे आत्मबोध कहा जाय या परोक्ष सत्ता द्वारा शक्तिपात स्तर का अनुग्रह., जो भी कुछ यह था, उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण था।
उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते जिस तरह कि अनेक पूजा पत्र तक सीमित मन्त्र तन्त्रों का ताना बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली हाथ रहना पड़ता है। हमारी जीवन साधना को यदि सफल माना जाय और उसमें दिखने वाली अलौकिकता को खोजा जाय तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाय। पूजा उपासना को गौण माना जाय। आत्मकथा के एक अंश को लिखते का दुस्साहस करते हुए, हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्मशोधन में लगा है। उपासना जो बन पड़ी है उसे भी हमने भाव परिष्कार के प्रयत्नों के साथ पूरी तरह जोड़ रखा है।
उपासना कार्यक्रम के रूप में दावानल की तरह व्यापक क्षेत्र में फैलती और गजब की ऊर्जा उत्पन्न करती चली गयी।
उपासना व वेदाध्ययन करने का प्रसंग भी आया है। पुराण के पैंतीसवें श्लोक से चालीसवें श्लोक तक कल्कि द्वारा पिता से वेद, सावित्री ब्राह्मणत्व, यज्ञोपवीत, गायत्री ब्रह्म विद्या आदि की व्याख्या पूछी गयी है। सच्चा ब्राह्मणत्व क्या होता है व उसकी उपासना कैसे की जाती है? यह समझाया
उपासना ग्रह में एक दिव्य प्रकाश का अवतरण हुआ जो बाहर से घनीभूत होता हुआ उसके शरीर, मन, अन्तःकरण में समा गया और उसे साधारण बालक से अवतारी महापुरुष बना कर निहाल कर गया। इसे आत्मबोध कहा जाय या परोक्ष सत्ता द्वारा शक्तिपात स्तर का अनुग्रह., जो भी कुछ यह था, उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण था।
उपासना कर वर्चस् की सिद्धि करने वाले पूज्य गुरुदेव ने सदैव डंके की चोट पर यह कहा कि जो भी उनके द्वारा निर्देशित साधना उपक्रम को जीवन में अपनाएगा, वह सुनिश्चित ही प्रतिफल पाएगा। अखण्ड ज्योति जूना 1966 में “अखण्ड ज्योति के परिजन इतना तो करें ही” प्रसंग में वे लिखते है कि “हमने गायत्री उपासना तथा पूजा पद्धति लोगों को सिखाई है और साथ ही यह भी कहा है कि इनका पूरा लाभ उन्हीं को मिलेगा जो अपने व्यक्तित्व को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने की साधना भी साथ ही करेगा।” आगे वे लिखते है कि “हमने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को हमारी ही तरह जीवन का वैसा ही अंग बनाएं जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्यकर्म हेतु हम प्रयत्नशील रहते है। यही सच्चा अध्यात्म है।
उपासना को गौण माना जाय। आत्मकथा के एक अंश को लिखते का दुस्साहस करते हुए, हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्मशोधन में लगा है। उपासना जो बन पड़ी है उसे भी हमने भाव परिष्कार के प्रयत्नों के साथ पूरी तरह जोड़ रखा है।” (पृष्ठ 135 प्रथम संस्करण, सन् 1965)
उपासना उनने जिस लगन व एक निष्ठा भाव से की, अगणित व्यक्तियों से करा ली उसने उन्हें युग का विश्वामित्र बना दिया। उनने व्यक्ति व्यक्ति को यह बोध करा दिया कि जीवन शोधन को स्वास्थ्य और कर्मकाण्डों को श्रृंगार मानकर चलना चाहिए। दोनों उनने तब प्रतिपादित किया जब लोगों में यह भ्रान्ति बड़ी गहराई तक जड़ जमाए बैठी थी कि ब्राह्मणत्व अर्जित करने के लिए भीतर से उत्कृष्ट व बाहर से आदर्शवादी जीवन जीने की कोई आवश्यकता नहीं है। जीवन कैसा भी जिया जाय बस स्थूल कर्मकाण्ड येन केन प्रकारेण पूरा होना चाहिए। इस भ्रान्ति का उन्मूलन एक प्रकार की विचार क्रांति थी।
उपासना सम्पन्न की। प्रस्तुत पंक्तियाँ भी उसी अखण्ड दीपक के प्रकाश में परोक्ष प्रेरणा से लिखी जा रही है। इसमें किसी का व्यक्तिगत पुरुषार्थ नहीं है, दिव्य धना का तपोबल जो पूज्य गुरुदेव रूपी ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न महामानव के रूप में सिद्ध हुआ ही इसके मूल में कार्य कर रहा है वह आगे भी करता रहेगा।
उपासना, साधना, आराधना से लेकर लोक सेवा संबंधी विशद मार्गदर्शन भी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-April
उपासना (२) साधना (३) आराधना का समन्वय ही आत्मशक्ति के उपार्जन को सुनिश्चित करता है। इन्हें समान रूप से अपनाया जा सके तो कोई कारण नहीं कि जिन चमत्कारी ऋद्धि-सिद्धियों को अध्यात्म की परिणति माना जाता है, वे अक्षरशः सही सिद्ध न हों। तीनों की संक्षिप्त विवेचना यहाँ प्रस्तुत हैं।
उपासना भी तिल से ताड़ और राई से पर्वत बनती देखी जा सकती हैं, ईश्वर समर्पित मनुष्य ही देव-मानव कहलाते हैं और उन्हीं में वे सिद्धियाँ विभूतियाँ प्रकट होती हैं जिनके बारे में एक व्यक्ति के माध्यम से बन पड़े अनेकानेक महान कार्यों की चर्चा एवं पूछताछ की जाती हैं।
उपासना (२) साधना (३) आराधना। तीनों के समन्वय से ही एक पूरी बात बनती हैं।
उपासना-निकट बैठना। ईश्वर को सर्वतोभावेन आत्मसमर्पण करना। उसके निर्देश और अनुशासन को इस सघनता के साथ अपनाना मानों आग और ईंधन, नाला और नदी एक हो गये हों। एक ने अपनी इच्छा, अस्तित्व और सत्ता समाप्त कर दी हो और दूसरे में अपने को लय करने में कोई कमी न रखी हो। पूजा पाठ इसी मनःस्थिति को विनिर्मित करने का एक माध्यम है, अपनाया उसे भी जाय किन्तु सद्भावनाओं, सत्प्रवृत्तियों का समन्वय अर्थात् ईश्वर।
उपासना मानकर मन बहलाता, पास पड़ोस वालों को बहकाता रहता हैं। ऐसी दशा में प्रवंचना की विडम्बना उन्हें मात्र निराशा ही प्रदान करती हैं जो अपने को भक्तजनों की श्रेणी में गिन लेते हैं।
उपासना केन्द्र अब इसी एक बिन्दु पर केन्द्रित होकर रह गये हैं। यह प्रवाह प्रचलन दिन-दिन अधिक तेजी से चलने वाले तूफान की तरह बढ़ रहा है। मनोकामना पूरी करने का दावा करने वाले देवी देवताओं, जंतर-मंतर ओर तथाकथित सिद्धपुरुषों की, दाढ़ीवाले भगवाधारियों की ऐसी बाढ़ आई है कि जल-थल उसी में डूब गए प्रतीत होते हैं। वरदान आशीर्वाद पाने का प्रमुख माध्यम उसी प्रतिपादन को माना जाने लगा हैं। फलतः उसी निमित्त धनशक्ति, समयशक्ति और भावचेतना का नियोजन होते रहना स्वाभाविक सा बन गया हैं।
उपासना, साधना, आराधना के समन्वय पर अवलम्बित है। इन तीनों को जीवनचर्या की हर क्रिया प्रक्रिया के साथ जोड़ना पड़ता है और ध्यान रखना पड़ता है कि इसके विपरीत तो कुछ नहीं बन पड़ रहा है।
उपासना, साधना और आराधना के त्रिविध प्रयत्न करते रहने की आवश्यकता होती है। इसी आधार पर आत्मिक स्वस्थता बन पड़ती है। पूजन, अर्जन, उपहार, आदि क्रिया-कृत्यों को भी आत्म साधना का अंग माना जाता है पर वह ऐसा ही है जैसा कि स्वस्थ शरीर पर धुले वस्त्र और श्रृंगार साधनों की सुसज्जा। आवश्यकता उसकी भी है पर उसे महत्व इतना ही देना चाहिए जितना कि अपेक्षित है। पूजा कृत्यों को कलेवर और आत्म साधना को यदि प्राण समझा जाय तो भी ठीक है।
उपासना, सृजनात्मक संरचना के साथ साथ वह संकल्प भी क्रियान्वित किये जाने का ताना-बाना बुना जा रहा है जिसमें एक लाख संगठन, समारोह तथा एक करोड़ सृजन शिल्पी सम्मिलित किये जाने की योजना भी समग्र तत्परता के साथ चल रही हैं।
उपासना से जुड़ी भ्रान्तियों से घिरे आज के समाज को देखकर मन में कई प्रश्न उठते हैं कि क्या वास्तव में ईश्वर ऐसा ही है? यदि वह पुजारियों को निहाल करने की मान्यता का प्रतिवाद नहीं करता, विदूषकों-चारणों-बहुरूपियों को-कर्तव्य पालन में उपेक्षा बरतने वालों को प्रश्रय देता है तो उस पर न्यायनिष्ठ ईश सन्तानों को पक्षपात का महाभियोग उसी तरह लगाना चाहिए जैसा कि कभी कभी राष्ट्रपति-प्रधानमंत्रियों पर लगाने की चर्चा होती रही हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-November
उपासना के ही समतुल्य है।
उपासना करो। उसकी उपासना करने वाला, जहाँ तक उसकी गति है वहाँ तक वह स्वेच्छापूर्वक जा सकता है।” मुक्तिकोपनिषद् में वर्णन है -”सहस्रों अंकुर, त्वचा, पते, शाखा फल-फूल से युक्त इस संसार वृक्ष का यह मन ही मूल है। वह संकल्प रूप है। संकल्प को निवृत्त करके उस मनस्तत्व को सुखा डालो जिससे यह संसार वृक्ष भी सूख जाये।
उपासना साक्षरता की तरह आवश्यक मानी गयी है। न करने वालों की कड़ी भर्त्सना की गयी है। उन्हें धर्मानुष्ठान करने तक के अधिकार से वंचित करने की धमकी दी गयी है। उन्हें शूद्र-गँवार तक कहा गया है। गायत्री सर्वसाधारण की साधना है।
उपासना करने वाला, जहाँ तक उसकी गति है वहाँ तक वह स्वेच्छापूर्वक जा सकता है।” मुक्तिकोपनिषद् में वर्णन है -”सहस्रों अंकुर, त्वचा, पते, शाखा फल-फूल से युक्त इस संसार वृक्ष का यह मन ही मूल है। वह संकल्प रूप है। संकल्प को निवृत्त करके उस मनस्तत्व को सुखा डालो जिससे यह संसार वृक्ष भी सूख जाये। “ तैत्तिरीय उपनिषद् में मन को ब्रह्म बतलाया है और कहा है कि ‘सचमुच मन से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर मन से ही जीते हैं तथा इस लोक से प्रयाण करते हुए अन्त में उसमें ही सब प्रकार से प्रविष्ट हो जाते हैं।
उपासना करना तो अनिवार्य ही माना गया है चाहे वह बिना किसी विधि विधान के किसी भी स्थिति में मानसिक रूप से ही कर ली जाय।
उपासना क्षेत्र में इसलिए प्राणायाम जैसे प्रयत्न सरलतापूर्वक किए जाते हैं। तपश्चर्या में तितीक्षा अपनाते हुए साधन-सुविधा की आवश्यकता इसी अन्तःशक्ति के सहारे संपन्न कर ली जाती थी। शाप-वरदान एवं असाधारण स्तर के चमत्कार दिखा सकना और कुछ नहीं मात्र प्राणाग्नि के ज्वलनशील होने से उत्पन्न हुई ऋद्धि-सिद्धि स्तर की क्षमता ही है।
उपासना, साधना, आराधना परक त्रिविध अध्यात्म प्रधान प्रसंगों, पर उद्बोधन इसके पश्चात् हुआ। “ऋषिचिन्तन” नाम फिल्म के साथ ही कार्यक्रम समाप्त हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-October
उपासना थी। एक दिन तो सभी आश्चर्य में ऊब गए जब उन्होंने एक काले-कलूटे नंग धड़ंग बालक को पुरुष सूक्त के मूत्र से स्नान कराया वस्त्र आदि दिए भोजन आदि की व्यवस्था कर अपनी पाठशाला में भरती कर लिया। इस विचित्र किन्तु सत्य के इस अद्भुत संस्करण ने युवक के चिन्तन की चूलें हिला दीं।
उपासना के माध्यम से किया जाता है, पर वह इतने तक ही सीमित नहीं रहता। व्यायामशाला में शरीर को परिपुष्ट बनाया जाता है, पर उस पुष्ट शरीर का उपयोग व्यायामशाला तक सीमित न रहकर विभिन्न प्रयोजनों के लिए होता है। जिस तालाब में तैरना सीखते हैं, उसी में आजीवन तैरा जाय, अन्य कहीं उस कला का उपयोग न हो, ऐसा कहाँ होता है? ईश्वर भक्ति की साधना से परिष्कृत अंतःचेतना को अपनी सघन आत्मीयता एवं सहृदयता का परिचय पग-पग पर देना होता है। इससे प्रेमी तो धन्य होता ही है, प्रेम पात्र को भी अति महत्वपूर्ण लाभ होता है।
उपासना का ढोंग रचकर उपहासास्पद विडम्बना रचती है। मुकदमा ईश्वर पर नहीं मनुष्य पर चलाया जाना चाहिए जिसने अपने हाथों इस विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने के स्थान पर भग्नावशेषों में बदल डाला है। जिस दिन यह मर्म समझ में आजाएगा व्यक्ति मनःस्थिति बदलकर सही अध्यात्म पर चलने का मार्ग सीख जाएगा। फिर वह परिस्थितियों पर दोष न मढ़कर अपने चिन्तन को बदलने का कला को जीवन में स्थान देगा।
उपासना भी नहीं कर पाता सो गुरुवार को उपवास और रात्रि में ध्यान करता हूँ। यही वह कारण है।” किलेदार ने जमीन में आंखें सुनकर क्षत्रपति की आँखों से आँसू झड़ पड़े। वह भावुक हो बोले-”धन्य हो तुम जो न जनता से गाफिल हो और न उस मालिकों के मालिक से। वेतन भी इससे अधिक नहीं लेते कि कपड़ों का दूसरा जोड़ा बन सके।
उपासना कराने की ऐसी क्या ललक उस पर चढ़ दौड़ी कि वह चाटुकारों की मनुहार के पीछे छद्म को नहीं समझ सका।
उपासना में इसी दिव्य प्रकाश को परम ज्योति को अपने अन्तः भूमिका में अवतरण करने और उससे समूचे व्यक्तित्व को प्रकाशित करने के लिए साधक सविता देवता का ध्यान करता है। इसकी जितनी मात्रा जिसके भीतर विद्यमान हो, समझना चाहिए कि उसमें उतना ही अधिक ईश्वरीय अंश आलोकित हो रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-December
उपासना के कुछ नियम पालन कर लेने भर से साधना समग्र रूप से सफल नहीं हो सकती। जिस प्रकार पूजा काल में शरीर को शुद्ध करना आवश्यक है, धुले कपड़े ही पहनने चाहिए, उसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि आहार-विहार की पवित्रता में, व्यतिरेक न होने दिया जाय।
उपासना का उच्चस्तरीय सोपान ‘ब्रह्मवर्चस्’ कहलाता है। इसमें दो शब्द हैं- ब्रह्म+वर्चस्। ब्रह्म अर्थात्- ब्रह्म विद्या, ब्रह्मज्ञान। वर्चस् अर्थात्-तेजस् ब्रह्मतेज। अतः ब्रह्मवर्चस् के दो पक्ष हुए-तेजस् ब्रह्मतेज।
उपासना परक जो नियम-उपनियम बनाये बताये गये हैं, वे तो श्रद्धापूर्वक समग्र अनुशासन के साथ पूरे करने ही चाहिए, पर साथ ही एक बात यह भी भूलनी नहीं चाहिए कि उन दिनों आहार-विहार की सात्विकता का अनुबंध भी ठीक तरह पालन करना चाहिए। अस्त-व्यस्त जीवनचर्या अपनाते हुए पूजा-उपासना के कुछ नियम पालन कर लेने भर से साधना समग्र रूप से सफल नहीं हो सकती। जिस प्रकार पूजा काल में शरीर को शुद्ध करना आवश्यक है, धुले कपड़े ही पहनने चाहिए, उसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि आहार-विहार की पवित्रता में, व्यतिरेक न होने दिया जाय।
उपासना का तथा गायत्री तीर्थ की परिक्रमा की मानसिक ध्यान-धारणा का क्रम नियमित चलता रहे। साथ ही विशेष रूप से आगामी दस वर्षों में सन्धिकाल की पुरश्चरण साधना भी चलती रहे।
उपासना के अंग हैं। श्रेष्ठता को प्रोत्साहन और निकृष्टता पर बंधन दोनों ही आवश्यक हैं।
उपासना से प्राप्त अमृत, पारस और कल्पवृक्ष कहते हैं। प्रखरता, पराक्रम और पुरुषार्थ की उपलब्धियाँ ब्रह्मास्त्र, ब्रह्मदण्ड और ब्रह्मपाश के रूप में सामने आती हैं। गायत्री और सावित्री के रूप में साधना विज्ञान की भाषा में इसे योग और तप का समन्वय कहा जाता है। योग से आत्मा के देवात्मा, परमात्मा स्तर तक विकसित होने का अवसर प्राप्त होता हैं तप से शक्ति उत्पन्न होती है। सशक्तता ही प्रगति, समृद्धि और विभूति के विविध सत्परिणाम उत्पन्न करती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-May
उपासना उसके अन्तराल में कवित्व की अनुपमेय शक्ति के रूप में प्रस्फुटित हो उठी थी और एक दिन वह कभी का मूढ़ अब महाकवि हो गया। देश देशान्तर सभी उसे आश्चर्य से देखते सराहते और शिक्षण लेने का प्रयास करते। वह सभी से एक ही स्वानुभूति तथ्य कहता, पहचानो नारी की गरिमा, उस कुशल शिल्पी की सृजन शक्ति को जो आदि से अब तक मनुष्य को पशुता से मुक्त कर सुसंस्कारों की निधि सौंपती आयी हैं। महाराज भोज ने उन्हें अपने दरबार में रखा अब वह विद्वत् कुलरत्न थे। दाम्पत्य का रहस्य सूत्र उन्हें वह सब कुछ दे रहा था जो एक सच्चे इनसान को प्राप्त है स्वयं के जीवन से लोक जीवन को दिशा देते थे दंपत्ति थे महाविदुषी विद्योत्तमा और कविकुल चूड़ामणि कालिदास।
उपासना विमान तथा उसके क्रिया–कलापों को कोसते देखे जाते हैं। बिना नींव की दीवार यदि एक धक्के में ढह जाय तो आश्चर्य ही क्या है? रेगिस्तान में बगीचा लगाने वालों को तद्नुरूप तैयारी करनी पड़ती है। इच्छा करने मात्र से या पूजा पाठ की बाल क्रीड़ाएँ करने भर से किसी उच्चस्तरीय सत्परिणाम की आशा करना आकाश कुसुम तोड़ने के समान है, जो शेखचिल्ली जैसी कल्पना ही बन कर रह जाती है।
उपासना में असफलता अथवा उस में धीमी प्रगति रहने का कोई विशेष कारण होना चाहिए। इस पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। यह न युग का प्रभाव है और न उपासनाओं के माहात्म्य एवं विधान में कोई त्रुटि ही है। यदि ऐसा होता तो इन्हीं दिनों कितने ही साधक क्यों अत्यन्त उच्चकोटि की स्थिति में पाये जाते हैं? क्यों उन्हें सिद्धियों से ओत−प्रोत देखा जाता है?
उपासना को फलित होने का सूत्र हाथ लग गया। इसका अनुमान लगाया जा सकता है, कि अध्यात्म मार्ग की सफलता का प्रारंभ कहाँ से करना चाहिए। प्रथम सोपान है आत्म परिष्कार। इसके लिए अपने गुण-कर्म स्वभाव की वर्तमान त्रुटियों को पैनी नजर से परखा जाय और उन्हें बहार फेंकने का साहस भरा पराक्रम कर दिखाया जाये।
उपासना का चमत्कार उत्पन्न होगा। दुष्कर्मों में निरत व्यक्ति किसी देवी देवता का अनुग्रह अर्जित नहीं कर सकते, क्योंकि समूचा देव परिकर शुद्धता प्रधान है। जहाँ उसकी जितनी कमी होती है वहाँ उन्हें उतनी ही उपेक्षा या अप्रसन्नता उत्पन्न होती है। जब साधारण मनुष्य घिनौनी, दुर्गन्धित, अस्त-व्यस्त जगह में नहीं रुकना टिकना चाहता तो देवता किसी घिनौने व्यक्तित्व की ओर क्यों ध्यान देंगे?
उपासनाओं के माहात्म्य एवं विधान में कोई त्रुटि ही है। यदि ऐसा होता तो इन्हीं दिनों कितने ही साधक क्यों अत्यन्त उच्चकोटि की स्थिति में पाये जाते हैं? क्यों उन्हें सिद्धियों से ओत−प्रोत देखा जाता है?
उपासना करनी चाहिए’ इसका तात्पर्य यह है कि देव परिकर की जैसी प्रवृत्ति है उसी के अनुरूप अपने को ढालना चाहिए। यह सोचना व्यर्थ है कि मनुष्य को अपने को बदलने सुधारने की आवश्यकता नहीं है। देवता ही उलट कर मनुष्य जैसे घिनौने बन जाय। काली भैरव आदि के संबंध में लोगों ने ऐसी ही मान्यता कर रखी है कि उन्हें गद्य माँस जैसी वस्तुएँ भेंट करके, स्तवन की जय-जयकार सुनाकर उन्हें अपने भक्त की मनोकामनाएँ पूरी करने के लिए सहमत किया जा सकता है। चाहे वे कामनाएँ सर्वथा अनीतियुक्त ही क्यों न हो?
उपासना समझो’।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-June
उपासना करते है वह चन्द्रलोक को प्राप्त करते हैं, वही जब लौट कर आते हैं तब संतान की इच्छा वाले वे ऋषि दक्षिण में जाते हैं। ऐतरेयोपनिषद् (2।1।4।5) में उल्लेख आता है पिता के पुण्य कार्यों के निमित्त पिता की ही आत्मा पुत्र रूप में प्रतिनिधि बनती है तब पिता रूप आत्मा अपना कर्तव्य पूरा हो जाने पर मृत्यु को प्राप्त होकर संसार से गमन करती है और जाकर फिर जन्म लेकर लौट आती है।
उपासना आराधना का मतलब है समय की उपासना आराधना का मतलब है समय की उपासना आराधना। ठीक है न भाई।” उनका इशारा श्रीमन्नारायण की ओर था।
उपासना से तो सिद्धियाँ, शक्तियाँ मिलती है और आपके देवता क्या दे रहे हैं? सिर्फ सूत की डोरियां।” कहने के साथ वह हँस पड़े। “अच्छा इसलिए हँस रहा है तू” फिर अपनी मुसकान रोकते हुए बोले—”नहीं रे! जो समय की उपासना करते हैं, अर्थात् प्रत्येक पल के साथ अपने श्रम का सुनियोजित तन्मयतापूर्वक करते हैं, साथ ही दिल में प्रभु समर्पण के भाव छलकते रहते है, उन्हें इसी जीवन में एकाग्रता, प्रतिभा, परिष्कार आदि आन्तरिक विभूतियों से लेकर विराट की अनुभूति तक बाह्य जीवन की समृद्धि, व्यक्तित्व का परिष्कार तथा सफलता आदि की प्राप्ति हुए बिना नहीं रहती। ये सिद्धियाँ और शक्तियाँ नहीं तो और क्या हैं?
उपासना की विभिन्न विधियों क्रिया पद्धतियों का आधार परिष्कृत अन्तराल ही है।
उपासना आराधना। ठीक है न भाई।” उनका इशारा श्रीमन्नारायण की ओर था।
उपासना करते हैं, अर्थात् प्रत्येक पल के साथ अपने श्रम का सुनियोजित तन्मयतापूर्वक करते हैं, साथ ही दिल में प्रभु समर्पण के भाव छलकते रहते है, उन्हें इसी जीवन में एकाग्रता, प्रतिभा, परिष्कार आदि आन्तरिक विभूतियों से लेकर विराट की अनुभूति तक बाह्य जीवन की समृद्धि, व्यक्तित्व का परिष्कार तथा सफलता आदि की प्राप्ति हुए बिना नहीं रहती। ये सिद्धियाँ और शक्तियाँ नहीं तो और क्या हैं?”
उपासना का ब्रह्मतेजस् के अभिवर्धन का, सौर ऊर्जा के आध्यात्मिक अंश को ग्रहण करने की प्रेरणा देने वाला मंत्र है। अगले दिनों सूर्य मण्डल में भारी उथल पुथल की संभावना है, ऐसे में सविता साधना का आश्रय लेना चाहिए।
उपासना आराधना का मतलब है समय की उपासना आराधना। ठीक है न भाई।” उनका इशारा श्रीमन्नारायण की ओर था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-February
उपासनात्मक अभ्यासों के द्वारा जीवनशैली को नया रूप प्रदान करने, धार्मिक वातावरण बनाने में वे उत्साहपूर्वक लगे हैं। उनका कहना है कि आसन्न संकटों का निवारण तो दैवी चेतना के द्वारा ही संपन्न होगा, परंतु माध्यम तो मनुष्य ही रहेगा। उसकी सूक्ष्मप्रेरणाएँ वही ग्रहण कर सकते हैं, जिनकी आत्मचेतना जाग्रत एवं परिष्कृत स्तर की होंगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-August
उपासना तथा पूजा पद्धति लोगों को सिखाई है और साथ ही यह भी कहा है कि इनका पूरा लाभ उन्हीं को मिलेगा जो अपने व्यक्तित्व को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने की साधना भी साथ ही करेगा।” आगे वे लिखते है कि “हमने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को हमारी ही तरह जीवन का वैसा ही अंग बनाएं जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्यकर्म हेतु हम प्रयत्नशील रहते है। यही सच्चा अध्यात्म है।
उपासना विधियों की उपयोगिता को सुबोध शैली में समझाया। पहली बार जनसाधारण के सम्मुख ऐसा प्रतिपादन आया, जिससे वे प्रेरणा ले सकें कि अध्यात्म मात्र शास्त्र वचन ही नहीं हैं, पूर्णतः उसका पूरा आधार विज्ञान सम्मत भी है। बाद की अखण्ड ज्योति के अंकों में वे शब्द शक्ति की महत्ता, गायत्री के चौबीस अक्षरों का वैज्ञानिक विवेचन, यज्ञ विज्ञान के महत्वपूर्ण पक्षों तथा कुण्डलिनी महाशक्ति के विज्ञान सम्मत आधार पर लिखते रहे। यह क्रम 1967-68 तक चला।
उपासना का नियमित क्रम 1937 से आरंभ कर 1951 तक यथावत चलाया एवं पूर्णाहुति तक उनने सारे व्रत अनुशासन उसी प्रकार निबाहे जैसा कि उनके गुरु ने उन्हें बताया था। इस बीच 1951 में वे एक बार हिमालय यात्रा पर गए जो कुछ माह की थी व पुनः बाद में 1961 में एक वर्ष के लिए दुर्गम हिमालय उनने प्रवास किया। सब कुछ अपने मार्गदर्शक के बताये निर्देशों के अनुरूप।
उपासना कार्यों के लिए बनी थी। 1971 तक तो नौ दिवसीय सत्रों के माध्यम से पूज्य गुरुदेव यह क्रम बराबर चलाते रहे, फिर प्रचार प्रकाशन तंत्र के तेजी से बढ़ने से उनके वहाँ से शाँतिकुँज आ जाने के बाद नई भूमि खरीद कर वहाँ प्रज्ञा नगर बसाया गया तथा बढ़े कार्यक्रमों के अनुरूप नई इमारतें बना दी गई रोटरी आँफसेट मशीनें खरीदी गई। इस प्रकार गायत्री तत्वज्ञान से आरंभ हुआ लोकशिक्षण युगपरिवर्तनकारी साहित्य रचने वाली बहुमुखी कार्यपद्धति के रूप में विकसित हो सब दिशाओं में फैल गया। गुजराती मराठी, उड़िया, अँग्रेजी आदि भाषाओं में साहित्य का अनुवाद होकर पत्रिका कई रूपों में प्रकाशित होने लगी।
उपासना का महत्व तथा फैलायी जा रही भ्रान्तियों के निवारण हेतु शास्त्र सम्मत तर्क सम्मत समाधान दिए। दिसम्बर 1942 की अखण्ड ज्योति में उनने घोषणा कर दी कि ज्येष्ठ सुदी सं. 2010 गायत्री जयन्ती (सन 1943) को कई महान कार्यों की पूर्णाहुति होगी उसमें प्रथम थी सहस्राँशु गायत्री ब्रह्मयज्ञ की पूर्णाहुति। 124 करोड़ गायत्री महामन्त्रों का जप, 124 लाख आहुतियों का हवन, 124 हजार उपवास तीनों ही पूरे होने को आ रहे थे वे सभी गायत्री जयन्ती तक पूरे हो जाने की संभावना उनने व्यक्त की थी। दूसरा था सवा करोड़ हस्तलिखित मंत्रों के संकल्प की पूर्ति व उसकी भी पूर्णाहुति। तीसरा था स्वयं के 24-24 लक्ष के 24 पुरश्चरणों की पूर्णाहुति।
उपासना के माध्यम से उपनयन संस्कार के बाद ही जगाना आरंभ कर दिया।
उपासना को सेवा साधना से जोड़ने का उनका तरीका स्वयं में निराला था एवं अध्यात्म को सही प्रगतिशील दिशा देने वाला भी। लाखों व्यक्तियों को इस प्रकार उनने अपनी ही मुक्ति, वैराग्य, समाधि वाले चिन्तन से विरत कर लोकसेवी बना दिया। यह एक क्रान्तिकारी स्तर का विचारक ही कर सकता था। धर्म के संबंध में जो भ्राँतियाँ संव्याप्त हैं एवं जनोपदेशक जो भी कुछ कहकर उन्हें पोषण देते रहे है, उनसे जूझना व योद्धा की तरह संघर्षरत रह बिना विचलित हुए लक्ष्य सिद्धि तक पहुंच जाना उनके व्यक्तित्व के एक अनूठे पक्ष को प्रस्तुत करता है।
उपासना, साधना और आराधना का समन्वय करना चाहिए।
उपासना का क्रम शक्ति पीठों में चलाना, युग संगीत के माध्यम से जन चेतना को झकझोरना का विस्तार करना, रामायण गीता प्रज्ञापुराण की कथा द्वारा प्रगतिशील अध्यात्म का प्रतिपादन करना, अपने मण्डल की तीर्थ यात्रा-धर्म प्रचार की पदयात्रा-साइकिल यात्रा सतत् चलाना, जन-जन को युग साहित्य के संजीवनी से परिचित कराना, इस के लिए चल पुस्तकालयों की व्यवस्था करना, स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना व उनका संचालन बाल संस्कार शालाओं तथा प्रौढ़ पुरुषों व महिलाओं की साक्षरता हेतु नियमित कक्षाएँ चलाना, वृक्षारोपण द्वारा हरीतिमा विस्तार करना तथा नशा निवारण आँदोलन चलाना-थे अनेकों कार्यों में से कुछ थे जिन पर पूज्यवर सतत् जोर देते रहे।
उपासना का अपना प्रतिफल है तथा श्रेष्ठ संस्कारों से अनुप्राणित भूमि में साधना का अपना। महर्षि रमण ने अपनी एकान्त साधना के लिए शैव साधकों की तपस्थली अरुणाचलम् को चुना क्योंकि वहाँ वे सारे संस्कार विद्यमान थे जहाँ वे न्यूनतम पुरुषार्थ से अपनी सिद्धियों को जगा कसते थे। योगीराज अरविन्द ने भी वेद पुरी को ही अपनी तपःस्थली बनाया जो महर्षि अगस्त की तपोभूमि थी। रावण महाबली था पर तप शक्ति से डरता था। उसके निर्देश थे कि उसके असुर उत्तर में कहीं भी जाएँ पर वेदपुरी जहाँ आज पांडिचेरी स्थित है से कोसों दूर रहें क्योंकि उस स्थान के प्रभामण्डल का प्रभाव असुरत्व के लिए विनाशकारी था।
उपासना क्रम चालू रख रविवार के दिन साप्ताहिक कार्यक्रम रखना व सामूहिक हवन करना चाहिए।”
उपासना का प्रयोजन प्रमुखता सद्बुद्धि का अवतरण है। वह ऋतम्भरा या महाप्रज्ञा कही जाती हैं उसका यही लाभ प्रमुख है। इस संदर्भ में हम जितना कुछ उपलब्ध कर सके है, वह गर्व करने योग्य तो नहीं, पर संतोषजनक अवश्य है। नवनिर्माण हमारे इस जीवन का प्रमुख उद्देश्य है। सज्जनों में ही सद्बुद्धि का अवतरण होता है।
उपासना कैसे की जाती है? यह समझाया
उपासना को इतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए जितना कि मानसिक परिष्कार और भावनात्मक उत्कृष्टता के अभिवर्धन के प्रयत्नों को। यह माना जाना चाहिए कि यदि विचारणा और कार्य पद्धति को परिष्कृत न किया गया होता तो उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते जिस तरह कि अनेक पूजा पत्र तक सीमित मन्त्र तन्त्रों का ताना बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली हाथ रहना पड़ता है। हमारी जीवन साधना को यदि सफल माना जाय और उसमें दिखने वाली अलौकिकता को खोजा जाय तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाय। पूजा उपासना को गौण माना जाय। आत्मकथा के एक अंश को लिखते का दुस्साहस करते हुए, हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्मशोधन में लगा है।
उपासना जो आठ घण्टे शारीरिक श्रम व सात घण्टे मानसिक श्रम (चिन्तन, मनन, स्वाध्याय, लेखनी की साधना) के अतिरिक्त थी। यह सोचा जा सकता है कि 24 घंटे में 21 घंटे जब इसमें चले गए तो वे सोते कब थे। यही तो अलौकिक सिद्धि है जो किसी भी नाम से पुकारी जा सकती है पर उनके निकटवर्ती जानते हैं कि प्रातः 1 बजे से उठकर जो उनने कार्य आरंभ किया है तो उसे बिना विराम दिये सतत् रात्रि 10 बजे तक सम्पन्न किया है। यह संभव है तपोबल से अर्जित सामर्थ्य के सहारे।
उपासना-कारण शरीर अंतःकरण से संबंधित है। साधना चिन्तन से-सूक्ष्म शरीर से और आराधना समाज सेवा के लिए किये गये उदार सहकार भरे कृत्यों से-स्थूल शरीर से। पूज्य गुरुदेव ने अपने तीनों शरीरों से पूरी निष्ठा के साथ गायत्री साधना स्वयं सम्पन्न की व माँ गायत्री के वरदपुत्र बन गए। असंख्यों की सहायता करने वाला ब्रह्मवर्चस् इससे कम में संग्रहित हो भी तो नहीं सकता था। अपने व्यक्तित्व को उर्वर क्षेत्र की तरह विकसित करने में यदि इतनी सतर्कता न बरती होती तो संभवतः उनके चौबीस वर्षों के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण तथा सामान्य समय के जप-तप उतने प्रभावी न हो सके होते जितने कि देखे और पाये गये।
उपासना संपन्न की थी। साथ ही ज्ञानवृद्ध, आयुवृद्ध, लोकसेवी, पुण्यात्मा सत्पुरुषों के पते भी माँगे गये ताकि उनसे इस पुण्य आयोजन हेतु आशीर्वाद लिया जा सके। कितना कुछ सुनियोजित व शालीनता, सुव्यवस्था से भरा पूरा आयोजन, जिसमें स्वयं को सिद्ध न बताकर सबके आशीर्वाद माँगे ताकि भूमि के संस्कारों को जगाकर एक सिद्धपीठ विनिर्मित की जा सके।
उपासनात्मक क्रिया-कृत्यों को करने के लिए उठे और खाया पिया तब जाय जबकि शारीरिक नित्यकर्म करने की तरह मन की मलीनता को स्वच्छ करने की तरह मन की भूख बुझाने के लिए संकल्पित साधना कृत्य पूरा कर लिया जाय”।
उपासना गृह में साक्षात्कार कर उसके अंदर छिपे महामानव का, अवतारी सत्ता का उसे परिचय करा दिया जाय ताकि भविष्य में जो किया जाना है, उसके माध्यम से संपन्न होना है उसका पूरा खाका उसके दिमाग में बैठ सके। समस्त मानव जाति का व विश्व का कल्याण उन्हें जिस प्रयोजन में दिखा उसे पूरा करने प्रकाश पुँज के रूप में आए व तप साधना का आदर्श ही नहीं, अटूट विश्वास और प्रचण्ड साहस, पर्याप्त मनोबल देकर चले गए। दिव्य सत्ताओं का प्यार अनुदान भी विचित्र होता है। संभवतः यही शक्तिपात प्रक्रिया भी है।
उपासना भी करवा लेता तथा यज्ञ में बैठकर आहुतियां भी डलवा लेता? संभव नहीं। अछूत व स्त्री कैसे गायत्री का प्रयोग कर सकते है, यह भ्रान्ति जिस राष्ट्र में रोम रोम में संव्याप्त हो, वहाँ यह क्राँतिकारी कदम सारे खतरे मोल लेते हुए उठाना, एक अवतारी सत्ता का ही काम हो सकता था। संभवतः इसी काम के लिए, आमूलचूल परिवर्तन के लिए, तथा कथित बुद्धिवादियों व अनास्था बढ़ाने वाले कर्मकाण्डियों से मोर्चा लेने हेतु यह कालजयी जन्मा था। आजीवन वे आचार से, अविवेकपूर्ण प्रचलनों से, दुर्बुद्धि भरे कुतर्की प्रतिपादनों से मोर्चा लेते रहे, न जाने कितने घाव व चोटें खायीं पर राणा साँगा की तरह मोर्चे पर डटे रहे, यह शक्ति उन्हें कहाँ से मिली?
उपासना, संध्यावन्दन के उपचार, गायत्री जप की विधि, भावनाओं के परिष्कार परिमार्जन को प्राथमिकता जैसे विषयों से शुरुआत की। क्रमशः उच्चस्तर की ओर प्रेरित करते हुए गुरुदेव ने गायत्री के पाँच मुखों की प्रेरणा स्वरूप पाँच कोषों की साधना, तीन शरीरों के परिष्कार-उन्नयन की साधना, सावित्री तथा कुण्डलिनी साधना और आत्मा-परमात्मा के मेल-मिलन की साधना की विभिन्न दिशाओं में परिजनों को अग्रसर कर दिया। अब यह आश्चर्य का ही विषय है कि एक ही पत्रिका में सभी परिजनों को उनकी मनःस्थिति, प्रकृति, रुचि के अनुरूप साधना की सामग्री भी मिली और प्रेरणा थी। जो जिस पथ पर अग्रसर हो गया, उसे वही मार्ग प्रकाशित होता दिखाई देने लगा। सामान्य सी शैली में सामान्य ढंग से कोई बात कहकर हजारों भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों का समाधान करने की क्षमता अलौकिक और दिव्य ही कहीं जाएगी।
उपासना तो करता ही, अपने साथियों को भी अमराई के कुँजों में ले जाकर अध्यात्म तत्वज्ञान के गूढ़ उपदेश व्यावहारिक रूप में ग्रामीण भाषा में समझाता। संभवतः वह अध्यात्म क्षेत्र का लोक शिक्षक बनने की तैयारी अभी से कर रहा था। एक सज्जन जो उनसे आयु में एक वर्ष बड़े हैं, अभी भी जीवित हैं व अपने रोचक संस्मरण बालक श्रीराम की अध्यात्म क्षेत्र में प्रगति के सुनाते हैं। उन संस्मरणों को इसी अंक में अन्यत्र स्थान दिया गया है।
उपासना की चर्चा की जा रही है जिससे उनने पर्याप्त तप पूँजी कमाई और जी भर कर लुटाई।
उपासना आदि नामों से ही कतराता रहा है अथवा मन में उनके संबंध में भ्रान्तियाँ पाले हुए है, भी उनकी बात समझकर इस आलोक का विस्तार कर सकेगा।
उपासना जो बन पड़ी है उसे भी हमने भाव परिष्कार के प्रयत्नों के साथ पूरी तरह जोड़ रखा है।” (पृष्ठ 135 प्रथम संस्करण, सन् 1965)
उपासना क्रम भी चालू रखते थे। 1971 की विदाई से 15 दिन पहले तक वे सतत् घूमते रहे थे व एक-एक दिन में 3-4 स्थानों के कार्यक्रम उनने निपटाये। न केवल सम्पन्न किया, वरन् जो मिलने आया उससे इतना समीप से मिले कि उसे लगा मुझसे अधिक उनका कोई और समीप नहीं है। 1980-81-82 में शक्तिपीठों के शिलान्यास व फिर प्राण प्रतिष्ठा हेतु निकले तो एक दिन में पाँच कार्यक्रम सम्पन्न कराते चले गये।
उपासना आदि का नाश करने लगे।
उपासना परायण महापुरुषों ने इसी का अवलम्बन लिया है। यज्ञोपवीत उसी की दिव्य प्रेरणाओं का सार संक्षेप प्रतीक रूप में पहनाया जाता है ताकि साक्षात गायत्री माता कंधे पर, छाती पर, कलेजे पर, पीठ पर हर समय विराजमान होने के कारण उस तत्व ज्ञान को समझाती रहें जिससे वे फलित होती हैं और साधक अपनी पात्रता बढ़ाता हुआ सच्चे अर्थों में ब्राह्मण बनता है।
उपासना आदि पर उनका दृष्टिकोण स्थूलवादी ही रहा।
उपासना के प्रतिफल तो अभी किसी विशेष कार्य के लिए तिजोरी में बंद कर रखे है। यह तो हमारी काया के इस पृथ्वी से ऊर्ध्वारोहण के बाद ही रहस्य खुलेगा। आपने जो कुछ जाना और सुना है, वह सब तो जीवन में उतारे गये ब्राह्मणत्व का प्रतिफल हैं। ब्राह्मणत्व अपने आपमें एक तपश्चर्या है। अभी तक तो उसी का लाभ उठाया और दिया है व आगे भी यही प्रतिफल उससे मिलता रहेगा।
उपासना कर्मकाण्ड प्रधान, भावविहीन न हो। भावना का परिष्कार ही वस्तुतः आत्मबल का अभिवर्धन करता है। कर्मकाण्ड उसका बाह्य उपकरण मात्र है।”
उपासना की, उनके चित्र जुलाई अंक में छापे। जिनमें सावित्री देवी, शिवशंकर जी मिश्र बाला शंकर जी भट्ट, नन्दकिशोर उपाध्याय, पुरुषोत्तम साखरे तथा शालिग्राम जी दुबे कुछ नाम है। वस्तुतः जुलाई 1942 का अंक ही गायत्री साधना की अनुभूतियों पर आधारित अंक था। इस तथा आगे के अंकों की “गायत्री चर्चा” प्रसंग में उनने स्थान स्थान पर गायत्री उपासना का महत्व तथा फैलायी जा रही भ्रान्तियों के निवारण हेतु शास्त्र सम्मत तर्क सम्मत समाधान दिए। दिसम्बर 1942 की अखण्ड ज्योति में उनने घोषणा कर दी कि ज्येष्ठ सुदी सं. 2010 गायत्री जयन्ती (सन 1943) को कई महान कार्यों की पूर्णाहुति होगी उसमें प्रथम थी सहस्राँशु गायत्री ब्रह्मयज्ञ की पूर्णाहुति।
उपासना की तथा महामानवों, ऋषिसत्ताओं ने भी। फिर जगह जगह कुआँ खोदते रहने की विडंबना क्यों रची जाय? आज के बुद्धिवादी युग में महाप्रज्ञा के तत्वदर्शन के विस्तार की और अधिक आवश्यकता है। वह सही अर्थों में नवयुग ला सकता है और लाकर रहेगा।
उपासना के क्षेत्र में प्रवेश किया तो नवनीत रूपी हृदय वाला यह सन्त पिघल कर अगणित व्यक्तियों को अपनी तप साधना के अनुदान बाँटता चला गया। उसके गुरु ने उनसे कहा, “सौ हाथों से कमाना, हजार हाथों से लुटाना। जितना तुम समाज रूपी खेत में बोओगे कई गुना तुम्हें वापस मिलेगा, उसे काटना व वितरित कर देना।” ऐसे औघड़दानी को साक्षात् रुद्र न कहा जाय तो क्या कहें? नवनीत और हिमखण्ड जब गलते और पिघलते रहते हैं तथा अपने तप अनुदान सहज वितरित करते रहते हैं।
उपासना में वसंत पंचमी के दिन बालक श्रीराम के उपासना ग्रह में एक दिव्य प्रकाश का अवतरण हुआ जो बाहर से घनीभूत होता हुआ उसके शरीर, मन, अन्तःकरण में समा गया और उसे साधारण बालक से अवतारी महापुरुष बना कर निहाल कर गया। इसे आत्मबोध कहा जाय या परोक्ष सत्ता द्वारा शक्तिपात स्तर का अनुग्रह., जो भी कुछ यह था, उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण था।
उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते जिस तरह कि अनेक पूजा पत्र तक सीमित मन्त्र तन्त्रों का ताना बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली हाथ रहना पड़ता है। हमारी जीवन साधना को यदि सफल माना जाय और उसमें दिखने वाली अलौकिकता को खोजा जाय तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाय। पूजा उपासना को गौण माना जाय। आत्मकथा के एक अंश को लिखते का दुस्साहस करते हुए, हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्मशोधन में लगा है। उपासना जो बन पड़ी है उसे भी हमने भाव परिष्कार के प्रयत्नों के साथ पूरी तरह जोड़ रखा है।
उपासना कार्यक्रम के रूप में दावानल की तरह व्यापक क्षेत्र में फैलती और गजब की ऊर्जा उत्पन्न करती चली गयी।
उपासना व वेदाध्ययन करने का प्रसंग भी आया है। पुराण के पैंतीसवें श्लोक से चालीसवें श्लोक तक कल्कि द्वारा पिता से वेद, सावित्री ब्राह्मणत्व, यज्ञोपवीत, गायत्री ब्रह्म विद्या आदि की व्याख्या पूछी गयी है। सच्चा ब्राह्मणत्व क्या होता है व उसकी उपासना कैसे की जाती है? यह समझाया
उपासना ग्रह में एक दिव्य प्रकाश का अवतरण हुआ जो बाहर से घनीभूत होता हुआ उसके शरीर, मन, अन्तःकरण में समा गया और उसे साधारण बालक से अवतारी महापुरुष बना कर निहाल कर गया। इसे आत्मबोध कहा जाय या परोक्ष सत्ता द्वारा शक्तिपात स्तर का अनुग्रह., जो भी कुछ यह था, उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण था।
उपासना कर वर्चस् की सिद्धि करने वाले पूज्य गुरुदेव ने सदैव डंके की चोट पर यह कहा कि जो भी उनके द्वारा निर्देशित साधना उपक्रम को जीवन में अपनाएगा, वह सुनिश्चित ही प्रतिफल पाएगा। अखण्ड ज्योति जूना 1966 में “अखण्ड ज्योति के परिजन इतना तो करें ही” प्रसंग में वे लिखते है कि “हमने गायत्री उपासना तथा पूजा पद्धति लोगों को सिखाई है और साथ ही यह भी कहा है कि इनका पूरा लाभ उन्हीं को मिलेगा जो अपने व्यक्तित्व को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने की साधना भी साथ ही करेगा।” आगे वे लिखते है कि “हमने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को हमारी ही तरह जीवन का वैसा ही अंग बनाएं जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्यकर्म हेतु हम प्रयत्नशील रहते है। यही सच्चा अध्यात्म है।
उपासना को गौण माना जाय। आत्मकथा के एक अंश को लिखते का दुस्साहस करते हुए, हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्मशोधन में लगा है। उपासना जो बन पड़ी है उसे भी हमने भाव परिष्कार के प्रयत्नों के साथ पूरी तरह जोड़ रखा है।” (पृष्ठ 135 प्रथम संस्करण, सन् 1965)
उपासना उनने जिस लगन व एक निष्ठा भाव से की, अगणित व्यक्तियों से करा ली उसने उन्हें युग का विश्वामित्र बना दिया। उनने व्यक्ति व्यक्ति को यह बोध करा दिया कि जीवन शोधन को स्वास्थ्य और कर्मकाण्डों को श्रृंगार मानकर चलना चाहिए। दोनों उनने तब प्रतिपादित किया जब लोगों में यह भ्रान्ति बड़ी गहराई तक जड़ जमाए बैठी थी कि ब्राह्मणत्व अर्जित करने के लिए भीतर से उत्कृष्ट व बाहर से आदर्शवादी जीवन जीने की कोई आवश्यकता नहीं है। जीवन कैसा भी जिया जाय बस स्थूल कर्मकाण्ड येन केन प्रकारेण पूरा होना चाहिए। इस भ्रान्ति का उन्मूलन एक प्रकार की विचार क्रांति थी।
उपासना सम्पन्न की। प्रस्तुत पंक्तियाँ भी उसी अखण्ड दीपक के प्रकाश में परोक्ष प्रेरणा से लिखी जा रही है। इसमें किसी का व्यक्तिगत पुरुषार्थ नहीं है, दिव्य धना का तपोबल जो पूज्य गुरुदेव रूपी ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न महामानव के रूप में सिद्ध हुआ ही इसके मूल में कार्य कर रहा है वह आगे भी करता रहेगा।
उपासना, साधना, आराधना से लेकर लोक सेवा संबंधी विशद मार्गदर्शन भी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-March
उपासना का क्रम एक साथ उपजाना होगा। अभी तक व्यक्ति व चरित्र की पूजा होती आई है, पर अब हम व्यक्तित्व व चरित्र के पूजकों की श्रृंखला तैयार करना चाहते हैं, कहते-कहते समर्थ की आँखें गीली हो गईं। उन्होंने समझा कहकर शिवा की ओर देखा। शिवा का जवाब था, हाँ। तो बस जा रघुवीर की सामर्थ्य से तू उद्देश्य में सफल होगा।
उपासना, साधना, आराधना जैसे पुण्य प्रयोजनों में अपने को नियोजित करने के लिए कोई क्यों तैयार हो?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-January
उपासना करते हुए, अपने मित्रों से प्रेम करते हुए, मुझे शत्रु समझने वालों के प्रति किसी भी प्रकार का विद्वेष न रखते हुए और अविवेक, अंधविश्वास तथा अन्याय को दूर हटाने की गुहार करते हुए मृत्यु का आलिंगन करता हूँ। इस गुहार को सुनें और आगे आएँ।